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इसी पूर्व जन्मा संचित ही कहेंगे अथवा ते योग भी कह सकते हैं । जवाब अपने लक्ष्य की ओर परिलक्षित हो रहे हैं । तब अन्य शुभ चिंतक आपके लक्ष्य को अपना पुण्य कर्म अचानकर आपकी सहायता को उपस्थित । इसी प्रकार जब कुमार का टिकेंद्र पलट फेंकी काल विश लाने हैं तो वो कर्सर हुए तो उस समय मणिका भाव पुरी में समस्त सभासदो, प्रबुद्ध चारों वैज्ञानिकों की सभा एकत्र हो चुकी थी । सभा में विचार विमर्श का परस्पर आदान प्रदान पूर्ण रूप से गतिमान था । विचार विमर्श के मूल कारण तो थे प्रथम गई जानकारी उपलब्ध करता की किस प्रकार दिखते काल अस्त्र के प्रयोग की भी थी । पृथ्वी पर महाराज आशुतोष केन्द्र के अतिरिक्त किसी अन्य के पास पहुंची बेटी अब हम किस प्रकार कुमार कार्तिक केंद्र की सहायता करें कि वो काल विश लाने में सफल रहे हैं । किसी विचार विमर्श नहीं । देवदत्त मलिनी कहना प्रारम्भ किया समस्य सभा सकूँ । मैं आप सभी के समक्ष कुछ इस प्रकार के तहत से रखना चाहता हूँ जिससे आप सभी लगभग अनभिज्ञ ही हैं । उन रहस्यों को उजागर करने में आप अपना पूर्ण सहयोग दे, ये हमारी आपसे अपेक्षा है । इतना सुनने के उपरांत महामंत्री विश्वपति अपने आसन से बहुत ही नम्रता के साथ अपने छह परिचित स्वभाव के अनुसार थे और उन्होंने कहना प्रारम्भ किया महाराज आप स्वयं ही संपूर्ण सक्षम हैं और आप स्वतः ही रहस्यों के तहत से ही आप विश्वदेव इतना ही कह पाए थे कि महाराज ने उनको बीच नहीं रोक दिया होती है वो चीज आपने क्या कह दिया दे देते मैं रहस्यों का रहस्य नहीं अब इस तरह की चर्चा न की जाए । महाराज शर्मा परन्तु ऐसा क्यों ना इतना ही वो कह रहे थे कि देवदत्त माडी नहीं पुणा कहना प्रारम्भ किया विश्व तेज जी आपको तो जानना ही चाहिए कि कौन है रहस्यों का रहस्य? इतना कहने के उपरांत देवदत्त मनी शांत हो गयी सभी उपस् थित सभागंज एक दूसरे का मूक मुकाबलो काम कर रहे थे परंतु किसी को कुछ भी समझ नहीं आ रहा था तब होना देवदत्त मणि नहीं कहना प्रारम्भ किया सभी रहस्यों के रहत से आज पृथ्वी पर महाराज आशुतोष ऍम आज भी घायल अवस्था में हैं । एक समय के पश्चात ऍम सर्वाधिक रहस्यों से अधिक रहस्य में हो जाएंगे । उनको वह उन के विषय में केवल वही जान सकेंगे जिनको वो स्वता ही बताना चाहेंगे । ये विषय भी ध्यान रखने योग्य है कि जब कोई श्रेष्ठ व्यक्ति आपातकाल में हो तो उसकी सहायता अभिषेक करनी चाहिए क्योंकि यदि बोसॅन क्षमतावान है तो निश्चित ही अधिक साल तक आपात स्थिति में नहीं रहेगा । तुम को उसकी सहायता करना मात्र तुम्हारे लिए प्रमुख का दिया हुआ एक स्वस्थ सर जो तुम्हारे को लेकर मैं बरसाने के लिए तुम्हें प्राप्त हुआ है । अन्यथा सुरेश तो व्यक्ति आपातकाल को सिख रही छिन्न भिन्न नहीं वाला है । मेरे मतानुसार हम सभी को आती तत्पर्ता से बाराज आशुतोष इंद्रा के कार्य हेतु लग जाना चाहिए । बितता सुनने के पश्चात सेनापति गिरती शौर्य देवनी भी अपना मतलब का महाराज हमें पृथ्वी पर होने वाले उथलपुथल से क्या औचित्य? पृथ्वी वहाँ अन्य जिन लोगों में से होने वाली उस फसल से पहले भी अधिक प्रयोजन नहीं रहा हूँ इसलिए मेरे मतानुसार इतना ही सेनापति कहते थे कि वहाँ मंत्री विश्वदेव नहीं महाराज की ओर दृष्टि डालते हैं । महाराज गिरती शौर्य देव का कथन पूर्व के अनुभवों के आधार पर संभावना सकते ही है । परन्तु जैसा की आपने कहा कि बाहर आज आशुतोष इंद्रा एक दिन इतना ही विश्वदेव कहता आए थे कि महाराज देवदत्त माडी नहीं मुस्कुराने की मुखाकृति इस भारतीय प्रदर्शित की अथवा स्वतः ही अंतर मन के विचारों के कारण वो प्रदर्शित ये तो किसी को पता नहीं था परन्तु उनकी मुखाकृति को देख कर उनके साथ रह रहे प्रमुख विभूतियों को निश्चित ही अनुमान हो गया कि महाराज जो कहना चाह रहे हैं वो सम्भवता हम सभी उसे पूर्ण रूप से समझ नहीं पा रहे हैं । तब तेज पत्ता मणि ने अपनी सभा को संबोधित अप्रारंभ सभा जाऊँ विश्वपति वह कीर्ति शौर्य देव का कथन अक्सर असल सकते तो नहीं है परन्तु सत्य के निकट वर्ष से ही है । मुझे क्या ये सभी को क्या है कि हम पृथ्वी अथवा अन्य किसी लोग में होने वाली घटनाओं से अपना संबंध नहीं रखते हैं । यहाँ पर परिस्थितियां भिन्न है । हाँ महाराज! परन्तु हमारा वहाँ की भिन्न परिस्थितियों से भी क्या संबंध हो सकता है ये संभव तक हम सभी के बस सिस्टर की क्षमताओं से परे । तब महाराज देवदत्त अमाडी ने संपूर्ण सभागार में सभी के ऊपर आपने सेवा फिर रखते हुए अपने दृष्टिकोण को चाहिए । उनकी इस प्रकार की दृष्टिगोचर करने की प्रतिक्त्रिया अनोखी प्रतीत हो रही थी । सभी को ये भी प्रतीत हो रहा था कि जो प्रश्न हम सपने क्या है, क्या वो प्रश्न योग्य है अथवा नहीं? तब देवदत्त मणि ने कहना प्रारम्भ किया सभी प्रबुद्धजन मेरी बात ध्यान से सुने वसंथ महाराज आशुतोष इंद्रा मेरी ज्योतिष गणित, पूर्वानुमान आध्यात्म के अनुसार ही वो पुण्य जीवात्मा युक्त । पर उसने जो आपने अर्जित पुण्यकर्मों के कारण कुछ जन्मों के उपरांत पूर्णता को प्राप्त हो जाएंगे । संभावना मैं सकते नहीं कह रहा हूँ । संभव का ऐसा है कि वे पूर्ण ही हैं और सृष्टि को कर्म की प्रधानता का ध्यान दे रहे हैं तो इस प्रकार के चरित्र को रचित कर रहे हैं । क्या सकते हैं ये उनके अतिरिक्त इस काम में कोई भी नहीं जान सकता । अब आप ही कहे क्या इस समय हमें उनकी सहायता करनी चाहिए अथवा नहीं । किसी से डर की प्रतीक्षा किए बिना पूरा ही कहना प्रारंभ हमें उनकी सहायता तो करनी ही होगी, क्योंकि हम उनकी सहायता नहीं करते हैं बल्कि ब्रह्मणे सहायता का स्वस्थ प्रदान कर हमें कृतार्थ कर दिया । कुछ देर रुकने के उपरांत उन्होंने का यदि हम कोर्ट नीति के अनुसार भी विचार करें तो भी सहायता करनी चाहिए । जो भी कूटनीति की चर्चा हुई तो तुरंत ही कीर्ति सौर्य देव नहीं, अपने विचार नहीं । महाराज बूट नीति कहती है कि हम सहायता इसलिए करें कि दो हमारी समय आने पर सहायता करेंगे अथवा हमारा उनका शत्रु एक ही है । मेरे अनुसार दोनों ही कारण नहीं है । फॅमिली ने कहा, आपका शोध सकते हैं कि दो कारण हो सकते हैं । अनुमान सत्य रही हैं । इतना सुनकर सभी महाराज के उत्तर की प्रतीक्षा होकर बिना प्रश्न पूछे ही करते हैं । तब महाराज गुना खोलना प्रारंभ करते हैं । ऍम आपने कूटनीति के अंतर्गत जो तो कारण सर्वविदित किए, वो निश्चित ही दोनों ही सकते हैं । इतना सुनने के पश्चात सभागार में सन्नाटा सा अच्छा ऍफ नहीं था । अभी सभागार के लगभग सभी सदस्य सेनापति के देश दे देंगे । विचार से सहमत अब जब महाराज ने इंगित किया सेनापति के अनुमान अलग अथवा पूर्ण रूप से सकते नहीं । तब सभी सभा सांसदों के मन मस्तिष्क में नए विचारों अ स्थान है । तो आप क्योंकि सभासद ये तो जानते ही थे । यदि महाराज देवता तुम नहीं कुछ कह रहे हैं तो उसका भी प्रायः निश्चित ही सत्यता की कसौटी पर खरा । अब सेनापति महामंत्री सहित सभी सदा सब महाराज के ऊपर ही दृष्टि प्रहार ये हुए थे । तब अत्यंत उत्कंठा जानकर महाराज ने अपना मन तब के बताया आप सभी डॅाट महाराष्ट्र का राम तो जानते होंगे तो सस्त्र का सृजन अपने ही लोग में किया गया उस महान अस्त्र के संचालन व निस्तारण का ज्ञान पृथ्वी लोग पे केवल महाराज आशुतोष इंद्रा को ही था । उसी अस्त्र से उन पर प्रहार किया गया । इतना सुनने के वर्ष सभी के विचार दिशा अभी सब विचार कर रहे थे कि महाराज आशुतोष इंद्रा की सहायता की जाए अथवा देंगे परन्तु अब विषय परिवर्तित हो चुका है । अब सभी विचार कर रहे थे कि ये किस प्रकार संभव है । सभी को ये जानकर है वो आपको हुआ कि उस अस्त्र का हूँ । किसी के पास भी तोडा नहीं । परंतु गई जानकर कुछ शांति का आभास वो अस्त्र महाराज, आशुतोष इंद्रा यहाँ महल में अब सभी के मन में ये विचार प्रवाहित हो गया कि ये कैसे संभव फॅमिली नहीं कहना हूँ । निश्चित ही आप सभी ये समझते होंगे कि हम अब फिर से छोटे नहीं रहेंगे । महाराज आपसे सहमत हूँ । आप अपना अस्त्र वहाँ से ले आइए और समस्या समाप्त ऍम की सहायता अनावश्यक ही क्यों करें । विश्वदेव ने कहा महाराज नदियाँ आदेश दें तो इस प्रश्न का उत्तर बैठूं । देवदत्त ने स्वीकृति में अपना शीर्ष हिलाया । संभव वो ये भी चाहते थे कि सभी महामंत्री जी के ज्ञान और दूरदर्शिता को जान जाएगा । विश्व देखने का महाराज मेरे विचार से हमें महाराज आशुतोष केंद्र की सहायता इसलिए करनी चाहिए जिससे हमें ये क्या हो जाए कि महाराज आशुतोष इंद्रा के सत्रह को डिब्बे कालस्य का बयान किस प्रकार हुआ? कुछ रुककर विचार करते हैं और उनका कहना प्रारंभ करने के भूत । उन्होंने अपनी आंखों गोल स्कूल आया और इसमें अन्य बहुत सी संभावनाएं ही मुझे अब दिखाई दे रही है । गिरती स्वागत देखने का विश्व तेज यदि संभावनाएं देख रही है तो अभी शिखर उसका रहे उद्घाटन की हम सब प्रतीक्षा से इतना ही कहता है कि विश्वदेव ने पूरा कहना हूँ आप सभी तनिक ऍम विचार मस्तिष्क में एकत्रित नहीं बल्कि वाॅच रहे मस्तिष्क में प्रवाहित होते जा रहे हैं । विचार योग के ये भी है आपके शत्रु के अतिरिक्त क्या कोई और अन्य भी है जिसे इस अस्त्र के विषय में ज्ञान हो चुका है? अन्य विषय इसके साथ ही प्रचालित होता है । ये किस प्रकार संभव हुआ? करन का ध्यान अत्यंत आवश्यक है क्योंकि कारण अथवा वो व्यक्ति तो ज्ञात ही होना चाहिए जिससे इस अस्त्र के विषय का मूल जो रहस्य होना चाहिए को किस कारण? क्या साथ ही मेरा अनुमान है । शत्रु ने आंसू तो सेंटर पर आक्रमण कारण ही नहीं किया होगा । आशुतोष केंद्र और उसके सहयोगियों ने संभावना द्रव्यमान, स्थानांतरण के विषय में ज्ञान प्राप्त कर लिया है । सत्र यदि उनसे वो ज्ञान प्राप्त करने में सफल हो गए तो उन के सत्र के लिए कहीं भी पहुंचना आसान होगा । मेरे विचार से यदि आप आशुतोष केंद्र की सहायता करेंगे तो एक तरह से अपनी ही सहायता कर रहे हैं । यदि सत्तू को वही समाप्त कर दिया जाए और रिश्ते थी, अति उत्तम रहेगा । जिस प्रकार शत्रु भी समाप्त तो हो जाएगा और साथ ही वो कारण भी ज्ञात हो जाएगा कि अस्त्र के विषय का ज्ञान किस प्रकार विदेश साथ ही जब महाराज देवदत्त वाली जी नहीं अपने ज्ञान जो तीस वाद ध्यान से ये ज्ञात कर लिया है तो निश्चित ही बाहर आ जाता तो वो परम ऊर्जा पुंज रहे अथवा जो मैं कह सकता था । मैंने कहा अंत में आप सभी महाराज जैसा उचित जाने वैसा निर्णय ले । इतने विचार विमर्श के उपरांत ये निश्चित हुआ कि महाराज आशुतोष केंद्र की सहायता हूँ ।

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