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शिव से शिवत्व तक (द्वितीय खंड - नीलकंठ) - ट्रेलर

शिव से शिवभक्तों तक नीलकंठाय दूसरे लोग से आया अनोखा व्यक्ति जो शिव का ही अंश है, किस प्रकार अब का कर्तव्य निभाता है तार टिकेंद्र किस प्रकार विपत्तिकाल अस्त्र के लिए डाल विश्व प्राप्त करते हैं? कुमार घनेंद्र को गणपति क्यों कहाँ चाहता है? गण कौन थे और कहां से आए और उन्हें कौन लाया? जब आशुतोष इंद्रा नहीं काल दृश्य ग्रहण किया तो उनका जीवन समाप्त होने ही वाला था कि महागौरी दें क्या किया की उनका जीवन सुरक्षित हो गया? ऐसे कई सवालों के जवाब और आपको अपनी शरीर से आध्यात्मिक जीत का आनंददायक होगा जो आपको भाव भी फोड कर देगा । इस उपन्यास में सगुण निर्गुण भक्ति, मुख्य मानवीय लिप्सा, मनुष्य का अंतर्निहित सकते, योगियों के लक्षण आदि का बखूबी वर्णन किया गया है । तो सुनी केवल ऍम पर शिव से शिवस्त्रोत तक अध्याय दूसरा नीलकंठ हूँ हूँ हूँ ।

भाग - 01

आप सुन रहे हैं तो कोई ऍम किताब का नाम है । शिव से शिवस्त्रोत तक अध्याय दूसरा नीलकंठ था । जैसे लिखा है आशुतोष थी और आवाज भी है । श्रीकांत सिन्हा ने कुकू ऍम सुनी जो मन चाहे महाराज आशुतोष सिर्फ माँ गौरी वह तो कुमार नरेन्द्र बताते केंद्र अपने मूल निवास स्थान क्रू सिंघपोरा से दो एक लोग पहल में अपने आध्यात्मिक उन्नति है रह रहे थे । योग महल को अत्यंत वैज्ञानिक विधि द्वारा निर्मित किया गया था । मैं कल को अदृश्य होने की क्षमता प्रदान की गई थी । प्रमुख सी जिनका नाम परिनीति प्रमुख है उन्होंने महल को अतिरिक्त की सुरक्षा कवच प्रदान किया था पर इलेरी प्रमुख था पर एक्शन निरीक्षण वाॅयलेशन प्रमुख पूरा महल हवा में स्थित था । साथ ही महल के चारों ओर जीतनी सेना जिससे बच पाना असंभव था । इतनी महान व्यवस्थाओं के उपरांत अभी पांच ये लोग से आये शक्ति हूँ योग महल में प्रवेश कर पाने में सफल हो गए । रिश्वत को जिनका भोजन मनुष्य महाराज आशुतोष इन को माँ गौरी के साथ सहज होने के लिए मजबूर हो । दोनों कुमार पहले ही रहे हैं । गोलगप्पे विज्ञान के कारण वे दोनों कुमार जो बच गए और महल नष्ट । इसके उपरांत महाराज आॅवर उनके सहयोगियों को लगा कि शत्रु सवा तो हो गया है । सभी के महल के साथ जलसमाधि बन चुकी है । अब आशुतोष इंद्रा उनके सहयोगी जब अपनी राजधानी को शॉपिंग पूरा पहुंचते हैं तो वहाँ भी आक्रमण करते हैं । गोसलिंग पूरा पर आक्रमण के परचार शत्रु के पैर उखड जाते हैं हूँ कराची होने लगता है शत्रु को अपनी ब्रेक तो सामने दिखने लगती है । किसी के थे धोखे से शक्ति महाराज आशुतोष इंद्रा के ऊपर ऍम चला देता है । फॅमिली भी होते हैं वो बाॅम्बे लग जाता है और शत्रु इसी का लाभ उठाकर युद्धभूमि से हाथ चाहता है । तब उन्हें क्या होता है कि इस अस्त्र का पूर्ण है काल विश्व इस जानकारी के प्राप्त होते ही कुमार का अधिकेन्द्र कहते हैं भी लाएंगे, काल अब आगे सुनेंगे माँ वकार टिकेंद्र का न बिल्ला प्रभु पहला आ चुके थे । सुख दुख, हर्षो उल्लास, विषाद, जय पराजय का यहाँ पर समागम था । गोश्त सिंगपुरा में सभी अनुकूल प्रतिकूल मराइस थितियों का संयोग जैसा चल रहा था । न तो जितना में विचार से हर्षोल्लास की अनुभूति हो पा रही थी, ना ही पूर्ण निराशा का वातावरण कारण अस्पष्ट ही था । युद्ध विजय के साथ ही साथ प्रभु का घायल हो रहा हूँ । महत्व घायल होना ही कारण नहीं था बल्कि उसका उपचार अत्यंत तो अलग था । संपूर्ण राज पहल वह प्रजाजन अत्यंत चिंतित थे कि क्या इस प्रकार का दुर्लभ उपचार संभव है? एक का एक नन्द रिश्वतें चारों को देखा और विस्पर भरे शब्दों में कहना प्रारम्भ किया सभी यहाँ पर उपस् थित हैं परन्तु माँ कहाँ है? जब से हम युद्ध से विजयी होकर आए हैं, माँ के दर्शन नहीं हुई । क्या आप लोगों को ये याद नहीं कि जैसे ही हम सभी युद्ध से विजयी होकर लौट आते थे, प्रभु की आगवानी हेतु सदैव माँ पहले से ही तक पर रहती थी और आज सभी इतनी उहापोह की स्थिति में थे कि वे अपने मन मस्तिष्क के साथ अपनी शारीरिक अवस्था का संतुलन नहीं बैठा पा रहे थे । नंदीश्वर के बाद सुनने के उपरांत सभी ऐसे जाते हुए उन्हें अपने होने का आभास हुआ । अभी भी कोई नहीं समझ पा रहा था कि आखिर बात गौरी कहाँ है और क्यों नहीं प्रमुख जीने का क्या आप सभी को ये ज्ञात नहीं है । जब हम सभी युद्ध के लिए युद्धभूमि पर जाते थे और जब तक युद्ध से विजय श्री लेकर वापस लौट कर नहीं आते थे तब तक माँ गौरी आपने ध्यान योग कक्ष से बाहर नहीं निकलते थे । जब एक दिवस में समाप्त हो अथवा एक माह में निर्जल निराहार रहकर वे हम सभी के युद्ध से सकुशल आने तक ध्यान योग अवस्था में ही रहती थी । नंदेश्वर का प्रॉक्सी हमें क्या सभी को आज विस्मय हो रहा है कि जनता विजय प्राप्त होने के उपरांत भी आज ही व्यवस्थित नया अधिकतर बहल की सेवा में उपस्थित रहा हूँ । आज आप सभी को एक रहस्य की बात बताता हूँ । इतना बोल ही पाए थे कि दण्डक हाथ नहीं आगे बढकर का हो सकता है कि प्रभु की घायल अवस्था के कारण उन्हें किसी ने सूचना देने का साहस नहीं दिखा पाया हूँ अथवा प्रभु के कारण ही व्यस्त हो गए हूँ । पता माँ को सूचित कर दिया जाए जिससे भी यहाँ पर आ जाए । दंड इस पर कुछ मुस्कुराते हुए बोले हाँ आपने मेरी पूरी वार्ता सुने ही नहीं । मेरी पूरी वार्ता तो पूरी होने दीजिए । दंडा धार देगा शहबाज अंधविश्वासी महाराज आप अपनी बात पूरी करें । मैं कह रहा था एक रहस्य स्वतः मैं आज तक नहीं जान पाया । युद्ध सवा तो होने और युद्ध में विजय श्री प्राप्त होने की सूचना माँ को नहीं पहुंचाई जाती थी । वे स्वतः ही सब जान जाती थी कि अब प्रभु युद्ध में विजय प्राप्त कर चुके हैं और वे सभी को स्वतः आज्ञा देती थी । स्वागत की तैयारी करो इस बात की जानकारी मुझे अंतपुर के निवासियों से हुई थी । इस चर्चा को सुनने के बाद सभी अपने अपने मन में विचार मतलब अब एक साथ तीन तीन समस्याएँ थी । एक प्रभु की घायल अवस्था, दूसरी उपचार की व्यवस्था और तीसरी माँ का अभी तक ध्यान योग कक्ष से न निकलना । सभी अब अत्यंत चिंतित थे कि कुमार कार्तिक केंद्र जो अपताल दृश्य लेने जाने का प्रण कर चुके थे, वो अपनी माँ की आज्ञा लगे बिना ही जाएंगे । उनके साथ कौन कौन जाएगा इसका निर्णय अब माँ को ही लेना चाहिए । प्रश्न अभी भी वहीं का वहीं था की माँ को आखिर आप पास क्यों नहीं हुआ? तभी कुमार घनेन्द्र एका एक बोले ये संभावना इसका कारण वे जानते हैं । सभी का ध्यान कुमार घनेन्द्र की तरफ हो गया । सभी उन्हीं के मुखमण्डल को निहार रहे थे कि ये रहस्य कुमार गणतंत्र को किस प्रकार की आप है । कुमार गणतंत्र ने कहा मैं सवा चाहता हूँ । मेरा अभिप्राय था की संभावना मेरा अनुमान सत्य हो । सभी ने लगभग एक साथ अनुमोदन किया कि आपका अनुमान सत्य अथवा सत्य के निकट ही होगा । तब पुरा कुमार घनेन्द्र नहीं कहना प्रारम्भ किया । कुमार घनेंद्र ने कहा मेरे मत के अनुसार अभी युद्ध समाप्त नहीं हुआ है वो बात नहीं हुआ है । सभी आवाज थे ये क्या कह रहे हैं कुमार गणतंत्र परन्तु किसी नहीं कहने के लिए शब्दों का प्रयोग नहीं किया । सभी के मुख्य मंडल की अभिव्यक्ति इस प्रकार की थी कि सभी प्रश्न पूछना चाह रहे थे सम्भवता सभी का प्रश्न एक ही था युद्ध तो सब हो गया अब युद्ध न समाप्त होने का क्या तात्पर्य था । तब पुलिस गगनेन्द्र ने कहना प्रारम्भ किया आप सभी मेरे एक प्रश्न का उत्तर दे क्या कभी युद्ध के उपरांत प्रभु विकास जी इस प्रकार घायल हुए नहीं हुए ना अर्थात युद्ध अभी चल रहा है । माँ यदि ध्यान योग कक्ष से बाहर नहीं आएगी तो किस प्रकार आगवानी करेंगी अर्थात प्रभु को पूर्ण स्वस्थ करना तभी संपूर्ण विजय होगी । अब सभी के लिए एक विकट समस्या हो गयी क्योंकि बात तो मेरा हार वन्य चल की रहेगा । ध्यान योग एवं भक्ति का समागम करती हैं । यदि प्रभु के स्वस्थ होने में समय अधिक लग गया अथवा काल विश लाने में सफलता न मिली तो ये विचार आते ही प्रमुख चीज जैसे धैर्य वाल धीर गंभीर व्यक्ति भी असंतुलित होने लगे थे । वे अभी तक खडी थी । अब उन्हें भी सहारे की आवश्यकता पडने लगी । सभी ने प्रमुख ही की इस प्रकार की दशा कभी नहीं देखी । नहीं उन्हें आसन पर बैठाया गया । कुर्सी क्षणों में उनके ज्ञान रुपये प्रकाश नहीं, निराशा रूपी अंधकार पर विजय प्राप्त की । वह पुनर्स् सतर को होकर उठ खडे हुए और अत्यंत गंभीर भाव के साथ बोले, आप सभी अपनी अपनी बुद्धि, विवेक का पूर्ण उपयोग करने का प्रयास की चाहिए । करन तब संपूर्ण भूमंडल पर संकटा पडा है । आपके प्रश्न करने के पूर्व ही मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ की संपूर्ण भूमंडल शब्द का प्रयोग मैंने क्या किया । आप सभी ध्यान दें । प्रभु घायल अवस्था में प्रभु के घायल अवस्था के कारण हाँ आपने ध्यान योग कक्ष से बाहर नहीं आ रही है । साथ ही वे नर्स अलवर निराहार हैं । म की गति तो कोई भी नहीं जानता । यदि कालरेस लाडे में अधिक विलंब हुआ अथवा सफलता ना मिली तो आप सभी जन लेंगे कि प्रभु के साथ वहाँ का जीवन भी संकट में हो जाएगा । प्रभु वहाँ के बिना ये राष्ट्र सब आप तो हो जाएगा । इस राष्ट्र पर संकट का अर्थ है शत्रु का पूरा आक्रमण तो सात प्रबंधको प्रभु के अतिरिक्त कोई नहीं रोक सकता है । ये भी ना भूलें । आपके शत्रु पराजित हो जब भूमि से भाग गया है सब आप नहीं हुआ है । यही सब थोडे आक्रमण किया तो उसका सामना कौन कर सकेगा? अब वह भूमंडल को ही नष्ट कर देगा क्योंकि इसी भूमंडल से उसे पराजय मिली थी । वो नहीं चाहेगा की किसी कारण पुरा उममंडल सशक्त हो जाए और पूरा उसे संघर्ष करना पडेगा । प्रमुख के इन विचारों से सभी अक्सर असर सहमत थे । सभी नहीं । स्वीकृति में ही अपनी मुखाकृति का प्रदर्शन किया । दण्डक हारने कहा प्रमुख सी क्या आप कारण जानते हैं? हाँ आपने ध्यान योग कक्ष से क्यों नहीं निकल रही है? यदि पे निकल आते हैं तो कम से कम एक समस्या तो कम हो जाती है और वहाँ की तरफ से कुछ मार्गदर्शन प्राप्त हो जाता । तभी भोजन केश्वर ने कहा मुझे भी यही प्रतीत हो रहा है । यदि बात के साथ होती तो निश्चय ही एक सही मार्गदर्शन प्राप्त हो जाता हूँ । पर तू एक विचार मन में ये भी है कि प्रभु वहाँ तो सतह ही हम लोगों के साथ ही रहते हैं । फिर क्या कारण है कि प्रभु घायल अवस्था में है और माँ ध्यान योग कक्षा में कुछ संपूर्ण रूप से समझ में नहीं आ रहा है । कहीं इसके पीछे भी तो कोई रहस्य नहीं है । प्रमुख ने कहा जी भोजन गे स्वति । अब मुझे भी यही प्रतीत हो रहा है । इसमें कुछ अंतर्निहित है । क्या अंक करने है तभी अस्पष्ट नहीं मनवा । बुद्धि की कसावट से हो सकता है कि कुछ स्पष्ट हो । ये भी हो सकता है कि ये रहस्य मनमोहक थी । जैसे स्कूल सातों से परे हूँ । कुछ भी स्पष्ट नहीं है । यहाँ पर कुछ भी स्पष्ट न होने का ये नहीं है । हम हाथ पर हाथ रखकर टीम कर्तव्य विमूढ होकर बैठे गए । हमें अत्यंत प्रगति से विचार करना चाहिए । किस प्रकार प्रभु का जीवन शीघ्रातिशीघ्र सुरक्षित किया जा सकता है । तभी एक का एक प्रमुख जी के बंद मस्तिष्क में आंचलिक ओ था । उन्होंने आंचलिक के विषय में जानकारी प्राप्त करने का प्रयास किया । सभी को उत्सुकता प्रारंभ हो गयी । आंचलिक भी उसी अस्त्र से घायल हुआ है जिससे प्रभु घायल हुए हैं । जब प्रभु नहीं मालिक शिशुओं को अपने दोनों हाथों से उठाकर हवा में घुमाकर फेंका था तब वो और भाग्य से प्रभु के रत के पास आकर कि राधा जब पूरा उठा तो उसने देखा कि प्रभु के रहत पर अस्त्रशस्त्र सच्ची थी । उन्हीं रास्तों में से एक तो उसने प्रभु के ऊपर ही चला दिया । अस्त्र के चलने के पूर्व ही आंचलिक नहीं वो आसाराम वाले शो उनके हाथ में देख लिया था । उसने अब का पूरा प्रयास किया कि मालिक शिश्यूं अस्त्र से आघात करें । उसके पहले वह माॅनसून पर आघात कर दी । उधर से ही सलेक्शन सोना नहीं अस्त्र चलाया और इधर से आंचलिक ने अपना आक्रमण किया । तब हूँ वहाँ अस्त्र के बाद थे अंजलिका गया आघात को आंचलिक ने कमजोर कर दिया । आंचलिक की गति इतनी तीव्र थी कि आघात सहने के उपरांत भी वो सीधा माॅनसून के ऊपर था और उसने अपने पंजों से बाल एक्शन शोंक की एक आंख निकालने उसे अत्यंत विकट रूप से घायल कर दिया था । उनकी आंख खाली संभव का उसने भी सुन रखा था कि बाॅक्स सोने के भाव अपने आप स्वतः ही भर जाते हैं । जवाब होगी ही नहीं तब क्या होगा? आघात की गति कम होने से प्रभु पर आघात कमजोर हो गया । वस्त्र जिस प्रकार अवश्य कारित किया गया था, उसका प्रहार होने के उपरान्त जीव का बच पाना असंभव था । उसके ही प्रहार के उपरांत विश्व का प्रभाव अत्यंत ही तीव्र गति से प्रारंभ हो जाता है । सभी प्रभु की अवस्था के कारण इतने व्यक्तित्व व्याकुल थे कि उन्हें आंचलिक की सुधि नहीं रही । अब जब प्रमुख ने आंचलिक की चर्चा प्रारंभ की तो सभी पुन अत्यंत दुखित वह चिंतित थे । कारण स्पष्ट ही था कि प्रभु ने तो अपनी योग ध्यान मोर्चा के कारण अपने ऊपर होने वाले अस्त्र के प्रभाव को अत्यंत कम कर दिया था परन्तु आंचलिक सभी के मस्तिष्क में विचार था कि अब आंचलिक नहीं रहा होगा ।

भाग - 1.1

पूरा मस्तिष्क ने विचार परिवर्तन किया कि यदि ऐसा हुआ तो सूचना अवश्य ही आ जाती है । जिस प्रकार सभी गई, अंतर्मन में अपेक्ष नहीं, वहाँ की अवस्था थी कि आंचलिक का क्या हुआ? तब ठंडक खाते प्रमुख जी की तरफ देखा और प्रश्न किया प्रमुख सी यहाँ आप की चर्चा के उपरांत सभी को आंचलिक के विषय में जानना चाह रहे हैं कि आन चली कप प्रमुख ही कुछ कहना ही चाह रहे थे । तब तक प्रमुख औषधालय के एक मुख्य बैठ, जिनका नाम सुमन अच्छा था, उपस् थित होने की आज्ञा चाह रहे थे । इस प्रकार की सूचना प्राप्त हुई । सूचना प्राप्त होते ही प्रमुख ही नहीं, उन को अंदर आने के लिए आमंत्रित किया । मुख्य बैठ नहीं, भवन में प्रवेश किया और सभी का अभिवादन करते हुए उससे कहना प्रारंभ दिया, सभी को मेरा सादर प्रणाम है । सभी ने उनके प्रणाम का उत्तर उन्हीं की शैली में उनको दिया । सभी उनको सुनने के लिए उत्सुक थे । तब बुला सुमन अस्वानी कहा मैंने अपने संपूर्ण जीवनकाल में अत्यंत घायलावस्था के हजारों लाखों सैनिकों का उपचार किया है । ब्रह्मा की कृपा से और प्रभु वहाँ के आशीर्वाद से अपने रोगियों का भला किया है, परन्तु आज ये कहकर वे रुक गए । उन के रूप जाने से सभी के हृदयगति बढ गई । अब सभी उनके मुख को निहारकर समझना चाह रहे थे कि आखिर हुई क्या कहना चाहते हैं और क्यों रुक के हैं? पुणे । अपना मंत्रित करने के उपरांत सुमन अस्वनी गया प्रारम्भ किया मैं जो कहने जा रहा हूँ उसमें संभव है क्या आप सभी को ठेस पहुंचे परन्तु में वैद्य हूँ और प्रत्येक वैध की कुछ सीमाएं होती हैं । वैसे अपना पूरा प्रत् नहीं तो कर सकता है, सही गंभीर के हाथ में ही होता है । इतना सुनने के उपरांत किसी को अब कुछ भी शंका नहीं थी कि अब सभी पूर्ण निश्चिंत हो चुके थे कि आंचलिक नहीं रहा । सभी को ऐसा प्रतीत हुआ कि एक महान योद्धा के साथ साथ मैं जोर सुरक्षा कवच अपने ही रहा है । सभी ने अपना मस्तक चुका लिया सम्भवता उस को श्रद्धांजलि देने के लिए । इस प्रकार के वातावरण को देखकर सुमन अस्वानी बुरा कुछ कहना चाहता हूँ । परन्तु उसके पूर्व प्रमुख जी ने कहना आरंभ किया समझ दसवा जी निसंदेह वैसे अपना सर्वश्रेष्ठ ही कर सकता है परंतु अंतिम निर्णय तो उसी का रहता है जिसने इस खिलौनें शरीर को बनाया है । उसने कितने साल के लिए इस खेल होने में अपनी ऊर्जा प्रवाहित की, ये तो मात्र वही जानता है । आप तो खेला हूँ आपने अपना सर्वश्रेष्ठ क्या जो आपके हाथ में नहीं है उस पर आप क्यों शोक करते हैं? सबका? शी शमा मैं शोक कहाँ कर रहा हूँ? मैं तो मात्र तभी नंदेश्वर ने कहा क्या आंचलिक के लिए शोक प्रकट करना उचित नहीं है? मुझे तो प्रतीत होता है कि उसकी वीरगति पर इतना ही नंदेश्वर कहता आए थे के सोमन स्वाॅट स्वर्ग कहा वीरगती आंचलिक की वीरगति । ये आपसे किसने कहा? मैं तो अपनी एक समस्या लेकर आया था और आप सभी ने उसे क्या से क्या समझ क्या सभी के मुख से एक साथ निकला? क्या अंजलि कभी निसंदेह अंजली का भी जीवित है जो मेरी समझ से परे हैं । मैं उस समस्या के साथ आप सभी के संभव हो बस से तुम हूँ । अब प्रमुख जी ने आगे बढकर कहना प्रारम्भ किया सुबह सवा जी आपने आंचलिक के विषय में जो सूचना दी और निश्चित रूप से ही मन बुद्धि दोनों को ही ऊर्जा प्रदान करने वाली है । अब आपने एक समस्या तो हाल करती ज्ञान चले, जीवित है परन्तु मेरे मन में एक प्रश्न उठ रहा है । इतना ही प्रमुख ही कह पाए थे किसको मानस वाले हाथ छोडकर कुछ कहने की मुद्रा प्रकट की तब प्रमुख से रुक गए और उन्होंने सुमन असवा से अपनी समस्या रखने को कहा । ये मेरा प्रश्न सभी सभागारों से मैं बहुत ही असमंजस में पड गया हूँ । मेरे अनुसार मेरी औषधि अधिकारी कर रही है तो अंजलि को स्वस्थ हो जाना चाहिए था और यदि औषधि कार्य नहीं कर रही है तो उसे अब समस्या यह है कि उसकी अवस्था में सुधार तो नहीं हो रहा है बल्कि शिलायन्स है । उसकी स्थिति खराब होती जा रही है । मेरा प्रश्न यह है यदि औषधियां कार्य कर रही है तब उसे अभिषेक स्वस्थ हो जाना चाहिए था और यदि रही तब उसे अभिषेक र । अब यहाँ दोनों ही स्थितियां नहीं । मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि मैं क्या करूँ । अब यहाँ पर उपस् थित सभी सभागारों के मन, मस्तिष्क कमेंट, नया प्रश्न जागृत हुआ । प्रभु के ऊपर अस्थिरता प्रभाव बहुत ही धीरे धीरे हो रहा है । इसका कारण है प्रभु की योग शक्ति । आंचलिक के ऊपर अस्तर का प्रभाव बहुत धीरे धीरे होने का अभिप्राय क्या है? सभी पहले से ही प्रश्न ओके चक्रव्यू में फंसे थे । अब नया प्रश्न सभी के मुखमण्डल पर प्रश्नवाचक चंद्र के रूप में दिखाई दे रहा था । सभी कुछ न बोलते हुए एक दूसरे की तरफ देख रहे थे । किसी के पास कोई उत्तर भी ना था । जब कोई भी कुछ बोलने की स्थिति में नहीं था तो कुमार कर नरेंद्र ने कहना प्रारम्भ किया सभी सभागंज मेरी बात ध्यान से सुनें । आज हम सभी पर संकट के बादल छाए हैं । इन बादलों के बीच में मुझे प्रकाश की किरण दिख रही है । सभी कुमार कर नरेंद्र की तरफ देखने लगे । किस संकट के समय पर प्रकाश की किरण सभी शब्दहीन भावहीन होकर गणतंत्र को सुन रहे थे । जब जीवन में पूर्ण अंधकार छा जाए तब आपको उसी अंधकार को ध्यान से देखना चाहिए क्योंकि प्रकाश के किरण उसी अंधकार में छिपी होती है । यहाँ भी वही स्थिति है । गजेंद्र स्वतंत्र प्रकाश किरण देखी है । सभी शस्त्ररहित होकर उनसे पूछना चाह रहे थे कि वह प्रकाश किरण कहाँ है? कुमार गजेंद्र नहीं कहना प्रारम्भ किया आपको प्रेम भले समय प्रदान किया है । आप हम सभी समय को व्यर्थ रही अपने हाथों से जाने दे रहे हैं । आज यदि अपने पास कुछ है तो थोडा सा समय है और हम उसका भी उपयोग नहीं कर पा रहे हैं । यदि समय रहते हमने उपयुक्त निर्णय लिए । तब आप सभी ये मान लीजिए कि इस भूमंडल का विनाश दक्षित है । प्रमुख पीने का कुमार आपके अनुसार हमें क्या सर्वप्रथम निर्णय लेना चाहिए? कुमार घनेन्द्र अपने प्रमुख जी से कहा प्रमुख सी मैं उम्र वहाँ अनुभव दोनों में ही अभी आप हमारे हूँ । निर्णय क्या लेना है और किस प्रकार से लेना है ये आप सभी प्रबुद्धजन ही जान सकते हैं । मेरे अनुसार कार्य शीघ्रता से होना चाहिए । आज यहाँ कार्य की सफलता समय पर पूर्ण रूप पे निर्भर है ऐसा मेरा मत है । सभी चर्चा परिचर्चा कर रहे थे की प्रमुख जी का ध्यान कुमार का केंद्र पड गया । उन्होंने एक सेवक को संकेत देकर बुलाया और उसके कानों में धीरे से कुछ कहा । तुरंत उसने वहाँ से प्रस्थान किया । उसके प्रस्थान करते ही सभी का ध्यान प्रमुख जी पर था की उन्होंने सेवक को कहा वक्त क्यों भेजा है । अब सभी के प्रश्नवाचक दुखों को देखकर प्रमुख जी ने कहना प्रारम्भ किया आप सभी के अनुसार ही मैंने कार्य प्रारंभ कर दिया है । सर्वप्रथम मैंने कुमार का टिकेंद्र कहाँ है तो साथ सेवक को पता करने हेतु भेजा है । सभी यहाँ पर स्थित हैं । मात्र कुमार कार्तिक केन्द्र के अतिरिक्त दार थी । केंद्र ने ही काल विश लाने का प्रण किया है । मेरे अनुसार वह सक्षम हैं । आपने कहा है और विलंब क्यों कर रहे हैं इसका कारण इसका क्या अभिप्राय । सभी की आशा का आधार अब कार्तिक केंद्र पर ही टिक गया था । सभी उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे । कुछ ही समय पश्चात जो सेवक प्रमुख जीने कुमार कार्य केंद्र की खोज के लिए भेजा था वो वापस आ गया और उसने जब कहना प्रारम्भ किया तब एक नहीं समस्या सामने प्रकट होती है । पहले से ही समस्याएं पर्याप्त मात्रा में थी और अब एक नहीं समस्या सभी प्रमुख जी गण इंद्रा वापस सेवक को देख रहे थे । कुछ मनन चिंतन के उपरांत प्रमुख ही नहीं कुमार गण इंद्रा की तरफ मुखिया और कहना प्रारम्भ किया कुमारगंज आप के अनुसार हमें अपना कार्य शीघ्र अतिशीघ्र कर लेना चाहिए । हमने उसका प्रयास प्रारंभ कर दिया और प्रथम प्रयास ही सफलता की दिशा में चला गया । प्रमुख शी तब क्या आपके अनुसार हमें शुद्धता से कार्य नहीं करना चाहिए अथवा हमारे परामर्श से सहमत हैं? प्रमुख पीने का कुमार हमे शीघ्रता भी करनी चाहिए और हम क्या यहाँ उपस् थित सभी सभागंज आपकी सलाह से सहमत हैं? एक विशेष घटना प्रभु की चर्चा मुझे बस में हुआ है । एक बार जब प्रभु ने कहा था आप कभी किसी कार्य को शिक्षुता से समाप्त करना चाहते हैं परंतु ये नहीं जानते हैं । इतनी शीघ्रता से समाप्त होने का परिणाम आपके अनुकूल नहीं आएगा । तब मैंने कहा था आपके प्रभु नहीं, आपका आशय समझ नहीं सका । तब उन्होंने उदाहरण देकर समझाया था और कहा था कि यदि आप किसी वन को पार करना चाह रहे हैं और ब्रह्मा आप का मार्ग प्रशस्त करना चाह रहा है तब यह निश्चित है कि आप उनको आसानी से पार कर लेंगे । शीघ्रता से थोडा विलंब से ये आप नहीं जानते हैं । आप मानव सभाओं के अनुसार वन को आती शिक्षुता से बात करना चाहते हैं परन्तु यदि आप अभी वहाँ वन में होते तब आप संभव तक जीवित ना होते क्योंकि वन में भीषण अपनी प्रचालित हो चुकी थी । हम ने आप के मार्ग में बाधा उत्पन्न करके आपके उस समय खंडों को वहां पहुंचने से विलंबित कर दिया । आप अत्यंत दुखी और आघोषित क्योंकि आप समय पर नहीं पहुंच सके परन्तु जवाब वन में विलंब से पहुंचे तो आपने देखा कि कुछ समय पूर्व वन में आग लगी हुई थी । अब वर्ष के कारण आप हो चुकी है और आप का मार्ग प्रशस्त है । मात्र मार्ग रही नहीं प्रशस्त है बल्कि मार्ग में अवरोध उत्पन्न करने वाले झाड झंखाड भी जलकर भस्म हो चुके हैं था । अब आपको भ्रमयति कृपा का भान होता है की यदि विलंबन होता तो मैं अभी सम्भवता जब इतना होता है । इसी प्रकार जीवन में भी कई बार विलंब होना उचित हो जाता है । इतना कहने के उपरांत प्रमुख शांत हो गए और कुछ विचार करने लगे । तब नंदेश्वर ने कहा प्रमुख से सेवक जो अभी आया है उसमें क्या समस्या उजागर कर दी । प्रमुख लेने का समस्या यह है कि प्रभु घायल अवस्था में है । हाँ आपने ध्यान योग कक्षा से अभी नहीं निकली है । हाँ निराहार वर्नियर चल आर आत्मलीन है । अब प्रभु के ध्यान योग कक्ष में कार्तिक केंद्र नहीं आसन जवा लिया है । साथ ही बाहर उपस् थित सेवक पर सैनिकों को ये आदेश है इनका एकांत भंगर ना किया जाए । वसवा ही शीघ्र अतिशीघ्र उस ध्यान योग कक्ष से बाहर आएंगे । इतना कहने के उपरांत प्रभाव शांत हो गए । उन्होंने अपनी दोनों आंखें बंद कर ली सम्भवता वे स्कूल कृष्टि से उत्तर स्पष्ट नहीं देख पा रहे थे जितना इस समय स्पष्ट देखने की आवश्यकता थी । सभी के पास प्रतीक्षा करने के अतिरिक्त और कोई विकल्प शीर्ष था । ये प्रतीक्षा जो समय के साथ साथ जीवन से दूर वह मृत्यु के पास ले जा रही थी परन्तु कोई बाल कोई नियुक्ति कम आ रही थी । सब एक दूसरे को मात्र देहात रहे थे और संभव सभी की काॅपियां महल के द्वार बढी थी की संभावना को कहते कि कुमार कार्तिकेय ध्यान योग कक्ष से बाहर आ गए ।

भाग - 02

देवा श्री वाॅशिंग इसे कार्तिक केंद्र की प्रथम भी फॅस । तार का प्रयोग आपके पिता घात महाराज आशुतोष शेत्र पर हुआ । ये किस प्रकार संभव है? नहीं नहीं ये असंभव है जब मैंने वो सस्त्र को निर्मित किया था और उसकी क्षमता को परखा था हूँ । मैं इस निर्णय पर पहुंचा था । डाॅन पेपर महाराज आशुतोष इंद्रा के अतिरिक्त और कोई इतना क्षमतावान लगभग दो से धारण कर सकता हूँ । ये चर्चा प्रभु के ध्यान रोक कक्ष में कार्तिक केंद्र मणिका भाव हुई हूँ । सर्वेसर्वा मान आज देव धन कमाने के बीच चल रही हूँ । देवदत्त मलिंग क्या संभव मान रहे थे कि तब निकाल अस्त्र का प्रयोग आशुतोष केन्द्र के अतिरिक्त कोई और भी कर सकता है । कुछ क्षण शांत रहने के उपरांत ऍम कहने को हूँ । शांत भाव से एकाग्रचित होकर कात्य केंद्र उनको सुन रहे थे । देवदत्त मणि ने कहा कबार कार्तिक ऍम मैंने जब सशस्त्र का निर्माण अपने लोग प्रारम्भ किया तब बहुत से हमारे मंत्री गन बस सेना पति ये सस्त्र को लेकर चिंतित नहीं कार्तिक केंद्र ने कहा आप हमारे बिठा के मित्र हैं । मैंने क्या किया की आप यहाँ पर आ गई और सहायतार्थ आपने मुझसे पुत्रवत नहीं किया । इसके लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद हो । इसके पहले की कुमार कार्तिक केंद्र कुछ और कहते देवदत्त माडी नहीं उनसे कहा पत्रकार ऍम, मैं तो भारी सहायता के लिए यहाँ क्यों और कैसे उपस् थित हुआ हूँ । ये जानकारी आप अपने विधा सिर्फ हो । तुम विचार अवश्य कर रहे होगे कि मेरे पिताश्री तो घायल अवस्था में है और वो किस प्रकार मुझे ये सब प्रदान तो बताएंगे । तो बता पूर्ण प्रयास करूँ और मैं आश्वस्त करता हूँ कि तुम अपने कार्य में सफल होगी । मकाल रिश् लाने में सफल होगी वो गाल विश्व के विषय में जानना चिंता आवश्यक है अन्यथा तुम उसे प्राप्त नहीं कर पाओगे । कार्य केंद्र ने कहा, क्या मैं आपको देश नहीं कह सकता हूँ? जब आप मुझे जाने तो एक क्षण विचार किए बिना ही उन्होंने अपना उत्तर स्वीकृति के रूप में दिया और साथ ही मुस्कुराते हुए गा खुमार फिर शिष्य थे । तुम्हारे भीतर अपने पिता के सवाल श्रेष्ठ गुड तो तुम्हारे पिता महान दानी है और काम भी उन्हीं के सामान हो । बेवश रही मैं किस प्रकार देवदत्त बडी ने मुस्कुराते हुए कहा तुमने मेरा नाम करन अत्यंत ही सुंदर कर दिया अर्थात उसको एक नया नाम दिया । हो सकता है इसमें भी ब्रह्म का ही कुछ गूढ रहस्य हूँ । कुमार ने बीस नहीं बोलते हुए कहा देवस् दी एक प्रश्न के उत्कंठा माल में उत्पन्न हो रही है कि आप कह रहे थे कि मेरे पिताश्री पर अस्त्र का प्रयोग असंभव है या आपने क्यों का देवदत्त बडी कुछ विचार होते हुए का है तो वह अब मैं तुम्हें ऍम अस तार के विषय में जो जानकारी उपलब्ध करा रहा हूँ, वह पृथ्वी पर तुम्हारे पिता के अतिरिक्त किसी के पास नहीं है । जब मैंने इस अस्त्र के निर्माण के विषय में विचार किया तो हमारे अधिनस्त वैज्ञानिक बहुत अधिक जनसभी विचार में पढते हैं । उन सभी का मत था कि इस प्रकार के अस्त्र की उत्पत्ति न की जाए । फिर मैंने सभी को समझाया । ये अस्त्र जब बन जाएगा तब उस का संयोजन, संचालन ऍम इतना अधिक कठिन होगा की दुर्लभ ही व्यक्ति होंगे जो इसको पूर्ण रूप से नियंत्रित कर सकते हैं । मैंने पृथ्वी लोग पर मात्र महाराज आशुतोष इंद्रा को ही इस विषय की पूर्ण जानकारी दी थी । अच्छा वही मात्र हैं जो इसको पूर्णता सफल प्रकार से संचालित कर सकते हैं । अब उन पर ही सस्त्र से प्रहार किया गया है । इतना कहने के उपरांत देवदत्ता मालिक शांत हो गए और आंखों को बंद कर विचार होगा । कुछ छडो प्रांत उन्होंने कुछ कहना प्रारम्भ किया जैसे को कडी को कडी से ढूंढ रहे थे पुत्र कार्तिकेय । मैं विचार कर रहा था कि जब मैंने तुम्हारे पिता के अतिरिक्त किसी अन्य को इस विषय में जानकारी नहीं तो अन्य किसी को इसके संचालन व्यवस्था का ध्यान का । अब सर्वप्रथम यहाँ का कार्य समाप्त करने के उपरांत यही जानकारी उपलब्ध करनी होगी । और कौन कौन है सिस्टर के विषय विज्ञान रखता है साथ ये भी जानकारी प्राप्त करनी होगी ये किस प्रकार संभव हुआ? पत्रकार टिकेंद्र अब आगे ध्यान से सुनो देविश आप चिंतित हूँ । मैं पूर्ण मनोयोग से आपके सार को ग्रहण करता हूँ । पुत्र कार्तिकेय सस्त्र के निर्माण में बहुत वर्षों का समय लगता है । शास्त्र के निर्माण में बहुत सी धातुओं के केंद्र की आपस में अभिक्रिया जिससे नए केंद्र को की उत्पत्ति हूँ, उन केंद्र को में असीमित ऊर्जा एकत्रित हो गई । जब इस अस्त्र का प्रयोग होता है वो अत्यंत भीषण अप्रैल इन्कारी ऊर्जा प्रवाह होता है । संपूर्ण युद्धक्षेत्र समाप्त हो जाता है । कौन अपना कौन पराया यस भेद नहीं करता है । फॅमिली वार्ता को रोकते हुए शाम देवश्री मैं कुछ कहना चाहता हूँ यदि आप आप क्या थे तो हाँ हूँ क्या कहना चाहते हो डेवलॅप परन्तु स्वस्थ्य के प्रहार से इस प्रकार का कुछ भी घटनाक्रम नहीं हुआ । जैसा कि आपके वर्णित किया है हूँ अभी मेरी संपूर्ण बात समाप्त नहीं हुई है । इस विषय में जो मुझे जानकारी है वह पहले तो सुनु हूँ आप अपनी वार्ता जारी रहेंगी । सस्त्र का निर्माण हुआ तो साथ ही इसका प्रतिरोधक विलियन भी उत्पन्न किया गया । उस प्रतिरोधक विलियन की कुछ बूंदे यदि मानव शरीर में प्रविष्ट करा उसे रख समय मिला दिया जाए तो इस सस्त्र का प्रवाह उस काम हो जाता है जब मैंने ये अस्त्र तुम्हारे पिताश्री को दिया था तब उसका प्रतिरोधक विलियन भी साथ में दिया । आपके पिता श्री ने उसे अपने रख तभी शल्यचिकित्सा विधि से पहुंचा दिया । सिविलियन उस समय तक ही अस्त्र के प्रभाव को रोक पाता है । महत्वपूर्ण समस्या निवारण हूँ मैं कालवश लाना होगा ये ऍम हो बाप ये प्रतिरोधक बिलियन के साथ ही उत्पन्न एकता अधिक घातक विषय इसकी कल्पना करना भी असंभव है । ये विश्व सृष्टि का संतुलन बिगड ना जाए इस हेतु अत्यंत सुरक्षित बस दुर्गा मस्त स्थान पर रख दिया गया । अब तो मैं उस विश्व को प्राप्त करना है ये ध्यान रखता के विश्व की एक भी बूंद दादी रही हूँ न वायु के संपर्क में आए । अब एक प्रश्न मैं भी जानना चाहता हूँ की नेत्र आशुतोष इन्द्र में प्रतिरोधक विलियन के अंदर क्या है? व्यस्तता प्रभाव न के समान ही हुआ है । देवश्री सम्भवता वह है पिताश्री की योगशक्ति । अब मुझे वहाँ पहुंचने का बार को हुआ क्या व्यवस्था चाहिए, इस की जानकारी प्रदान करने की कृपा करें । मैं वहाँ पहुंचने का बार व्यवस्था के विषय में तो मुझे जानकारी दे रहा हूँ । बहुत ही ध्यानपूर्वक इस ज्ञान वपूर्ण रहस्य को समझने का प्रयास कर अब उन दोनों के मध्य कोड रहस्य बच्चा अच्छा तो नहीं थी । वार्ता के बदले में कई बार इस प्रकार की चर्चा हुई कि कुमार का लेकिन कश्मीर वह चकित हो कभी भी ठीक है है । जीव का स्वाभाविक उन्हें परन्तु भर से भयभीत होकर पलायन कर जाना चीफ की कार्यर्ता है है के ऊपर मनवा बुद्धि से अंकुश लगाना, बहुत से पराजित करना चीज का कर्तव्य भी है और धर्म इन चर्चाओं के उपरांत अन्तर्ध्यान होने के ठीक पहले देवा श्री ने कुछ कहा जिसने कुमार को भयाक्रांत कर दिया । आपने आपको पूरा संतुलित वह मनोभाव पर थोडा अंकुश लगाते हुए ॅ देवश्री द्वारा विश्लेषित सभी चर्चाओं को क्रमवार अपने मस्तिष्क में लाते हैं । उनकी दोनों आंखें बंद हैं परन्तु भी अपने मन वक्त थी की आंखों से दूर देखती का प्रयास करते हैं । एक तरफ कुमार काॅल अपने आप को पूर्णतया तत्पर करने का प्रयास कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ प्रमुख चीज दंड आधार, नंदेश्वर गन इन वन्य प्रबुद्धजनों के लिए एक एक बाल का विलंब भी अत्यंत तो सर प्रतीत हो रहा है । समय का काल भी अलग अलग होता है । जब समय अनुकूल हो तो भिन्न और जब समय प्रतिकूल हो तब अनुकूल समय का काल इस प्रकार व्यतीत हो जाता है कि महलों समय के पंद्रह लगते हैं और प्रतिकूल समय हो तो मानव रूप से आ जाता है । यहाँ कार्तिक केन्द्र के पास दोनों प्रकार के काल उपलब्ध है । कारण उनको अस्पष्ट ही सही परंतु मार्ग सोचने लगा था । अन्य महल में उपस्थित जब मानने गण सर्वाधिक काढा समय व्यतीत कर रहे थे । कार्तिक केंद्र अपने आसन से उतने ही वाले थे कि उनको कक्ष में अतिरिक्त प्रकाश का भाई हुआ । उन्होंने धीरे धीरे अपने देखते खोले तो सामने दिन विचित्र आकृति का मध्यम करना बैठती है । उसके केश उलझकर लडको में परिवर्तित हो चुके थे । उसके हाथों पैरों का अनुपात विपरीत था । डाॅन अपेक्षाकृत कुछ छोटे बाहर अपेक्षा के कुछ बडे थे वक्ष स्थल उन्नत कंधे, चौडे ग्रि बात हो जैसे थी ही नहीं । उसको देखकर कुछ क्षण के लिए कुमार काफी केन्द्र के मद में है । उत्पन्न होने लगा । इससे पूर्व ही उसने कुमार को प्रणाम किया । प्रणाम करने के साथ ही उसने अपना परिचय देना प्रारंभ किया तो बार प्रणाम । मेरा नाम लाॅचिंग ही है । मुझे देवदत्त मणि अर्थात देवा श्री जी नहीं आपके पास भेजा है मुझे आप आप क्या नहीं कि मुझे क्या करना है? कुछ क्षणों के लिए कुमार कार्तिकेय लटक भिंडी को देखते ही रहे । वो उसका विकट रूप का ठंडी शारीरिक स्वास्थ्य भी निहारते रह गए । उन्होंने कभी इस वक्त में भी ऐसा रोक नहीं देखा था । जब मनुष्य इस प्रकार का रूप अथवा कृति देख लेता है तो उस की सभी इंद्रियां स्थिर हो जाते हैं और वो मात्र भावनाएं ही प्रकट कर पाता है । वो भी मुझे देखकर उन्होंने सावधान होकर लटक । भिंडी ने कहा तो बार मेरे लिए क्या क्या है? कुमार जैसे दिवास्वप्न के आवरण से बाहर निकलते हैं । अपने मन मस्तिष्क को एक आगार डर लगता भिंडी से पूछते हैं, आपने अपना नाम क्या प्रभु मेरा नाम ही लाट देंगी । है मैं आपका सेवक मुझे देवदत्त बडी जी आपकी सहायता के लिए भेजा है आपको अपने पिता बाहर आज के लिए देश की आवश्यकता है । मैं दुष्कर कार्य में आपकी सहायता करूंगा । कार्तिक से लेकर है आपका धन्यवाद । परन्तु पिताश्री की आज्ञा के अनुसार हम सभी से सहायता नहीं ले सकते हैं । एक प्रश्न और भी है । क्या आप हमारी सहायता क्यों करना चाहते हैं? क्या देश दुष्कर कार्य में आपको कुछ क्षति हो गई तो मैं उसकी क्षतिपूर्ति किस प्रकार कर सकूंगा? लटक भरेंगे नहीं मुस्कुराते फॅस प्रकार उसको रहने के लिए शहबाब रखी थी । मैं प्रभु के कार्य करने में अपना जीवन अर्पण करूँ । इससे अधिक पारितोषिक इस जन्म में संभव नहीं । देवदत्त वाली प्रभु ने मुझसे कहा था कि तुम्हारे जीवन के सभी रहस्य वहीं पर अटक को बार से प्रार्थना है । मुझे अपने साथ सहयोग की आप क्या नहीं । साथ ही यह भी अवश्य ध्यान रखने योग्य विषय की हमारा ये थोडे समय के साथ अभी तक चल रहा है । समय पर किसी का वर्ष ऍम नहीं । अच्छा आप यहाँ से निकलने का । मुझे भी आप क्या दे? मैं कल प्रात आपके साथ प्रस्थान करूँ । मुझे भी तो अपने जीवन के रहस्य हो जानने का अधिकार प्रदान कीजिए । इतना कहने के उपरांत लग जाएंगी अतिरिक्त हो गया एक प्रकाश का प्रतीक और ऊर्जा का भी बहुत प्रतीत हुआ । कुमार कार्य केन्द्र के अपने छोटे से जीवन क्रम में हो इस प्रकार की घटना मन में उत्साह वहाँ आनंद का प्रवास करने वाली थी ।

भाग - 2.2

कुमार कार्तिक केंद्र ये विचार कर रहे थे कि दिवस केवल लेटर रहेंगी के विषय में सभी प्रबुद्धजनों से चर्चा की जाए अथवा नहीं । स्तर अपने मन में विचार करते हुए भी ध्यान जो कक्ष से बाहर निकले । कुमार कार्तिक केन्द्र के कक्ष से बाहर आते ही दूध नहीं अति शुद्धता से सूचना अभिसार इत करती कि कुमार कक्ष से बाहर आ चुके हैं और बिना विलंब किए ही वह सभाकक्ष की तरफ बढ रहे हैं । कुछ ही समय उपरांत सभी प्रमुख सभागंज सभाकक्ष में उपस्थित थे । प्रभु वहाँ का आसन रखता था । कुछ क्षण सन्नाटा रहा । किसी के पास शेष कहने के लिए कुछ भी नहीं था । आज बहुत समय उपरांत सभा कक्ष में सब सुनने के लिए बैठे थे । सभी की दृष्टि कुमार कार्तिक केंद्र पर थी । सभा में उपस्थित प्रमुख सी डंडधार वो जंगेश्वर नंदीश्वर कुमार गनन अन्य मंत्री बस सेना प्रमुख सभी कुमार कार्तिक केंद्र पर आश्रित प्रतीत हो रहे थे । सभी को ध्यानपूर्वक देखने के उपरांत कार्तिक केंद्र ने कहना प्रारम्भ किया सवस्थ सभा गढों को मेरा प्रणाम । कल रात अकाल काल विश्व प्राप्त करने हेतु का स्थान करना है । पिताश्री के ध्यान योग कक्ष में पिताश्री के देवदत्ता मानी के दर्शन संभव हो सके । उन्होंने ही आगे का मार्ग प्रशस्त किया है । साथ ही उन्होंने एक पिता श्री का गढ भी हमारे साथ क्या है? इतना सुनने के उपरांत प्रमुख से सहित सभी लोग जो पहले ही अचरज में थे अब अत्यधिक अचरच से कार्तिक केंद्र को निहार रहे थे । तब कुछ समय विचार करने के उपरांत प्रमुख भी अपने आसन पर खडे हुए और उन्होंने कहना प्रारम्भ किया कुमार कार्तिक एंड्र पुस्तक सबेरे जिसमें पिछले कई दिनों से वे एकांत में थे । मैं अभी पूर्ण रूप से नहीं जान पाया की अन्य भी और किस प्रकार डंडधार जो बहुत ही कम धैर्य धारण करते थे, सामान्य था, मुखर ही रहते थे । उनके लिए शांतिप्रद होना किसी अच्छे दस से कम नहीं था । ज्वालामुखी आखिर कितने समय तक सुषुप्तावस्था में रह सकता है । उसके भीतर भरा हुआ लावा ड्राॅप सीमाओं को लांघकर बाहर आ ही जाएगा । इसी प्रकार दंड आधार का भी धैर्य समाप्त हुआ । जब तक कुमार का टिकेंद्र आपने ध्यान योग कक्षा के विषय में को जानकारी उपलब्ध कराते हैं, उसके पूर्व ही दंड आधार ने अपना मंतव्य सब के सब प्रस्तुत कर दिया । डंडधार ने अत्यंत तीव्रता के साथ कहा, कुमार आपको ध्यान योग कक्ष में स्वयं मात्र ही थे । अन्य कोई बिना आज्ञा किस प्रकार ये तो मुझे भी पूर्ण रूप से ज्ञात नहीं है । वे किस प्रकार आए और उन्हें किस प्रकार यहाँ की सभी सूचनाएं प्राप्त हैं । सभी विचार विमर्श व प्रश्नोत्तरी के मध्य प्रमुख थी । अपने आसन से धीरे से खडे हुए और अब के छह परिषद शारीरिक प्रतिक्रिया के अनुसार अपने श्वेत दाढी पर हाथ रहते हुए धीरे से बोले यदि कल प्रातःकाल कुमार को अपना कार्य सिद्ध करने हेतु प्रस्थान करना है तो उस की समुचित व्यवस्थाओं के विषय में भी विचार विमर्श करना चाहिए । कौन कौन सात जाएगा ये भी एक शिखर प्रश्न है । किस प्रकार की व्यवस्थाएँ और संसाधन की आवश्यकता होगी, इस पर भी चर्चा होनी चाहिए । इस प्रकार प्रमुख जी की बात सुनकर सभी के विचार करने की दिशा में परिवर्तन हो गया । सभी एक दूसरे का मुखावन लोकन करने लगे । सभी इस प्रकार से सहमत थे कि इस समय सबसे अधिक उपयोगी यात्रा के विषय ज्ञान की ही चर्चा है । तब कुमार गणतंत्र नहीं कहना प्रारम्भ किया । मेरा मत है कि भ्राता कार्तिकेय इंद्रा अपने कक्ष की तरफ प्रस्थान करें क्योंकि प्राथा उन्हें फलौदा यात्रा के लिए निश्चित ही प्रस्थान करता है । अन्य कौन कौन उनके साथ रहेगा, क्या क्या संसाधन व कौन कौन से अस्त्रशस्त्र की आवश्यकता मार्ग में हो सकती है, इसकी परिचर्चा की जाएगी । ये सुनकर जब कुमार कार्तिक इंद्रा नहीं सभी की तरफ देखा तो उनको प्रतीत हुआ कि सभी के सम्मिलित विचारों को कुमार गजेंद्र के स्वर प्राप्त हुए हैं । उन्होंने सभी से आप क्या ली और अपने शयन कक्ष की तरफ चल पडे । इधर कार्तिक केंद्र का प्रस्थान हुआ और तुरंत ही सभी पुनः चर्चा पर एकाग्र हो गए । अब नए अनेक अनेक प्रश्नों के अंबार थी । जैसे कि कौन कौन कुमार के साथ चाहेगा । क्या क्या अस्त्र हूँ जिससे कुमार सुरक्षित रहे, किस साधन से वहाँ तक पहुंचा जाए इस पर नंदेश्वर नहीं आगे बढकर कहा मैं कुमार के साथ जाने को तैयार हूँ । आप सभी भी अपना मंतव्य कहे । इतना सुनने के उपरांत प्रमुख सी वतन था । दोनों ही लगभग एक साथ अपने आसन से खडे हुए । दोनों ने एक दूसरे का मुकाबलो काम किया । प्रमुख सी ये जानते थे कि डंडधार अभी उत्साह में रहने वाले व्यक्ति हैं अतः उन्हें प्रथम वक्ता बनने का अधिकार मिलना चाहिए । प्रमुख सीने जैसे ही बैठने का मन बनाया, तुरंत ही प्रतिक्रिया सहित दण्डक हारने दोनों हाथों को आगे बढाकर कहा प्रमुख मैं क्षमा चाहता हूँ । आप ही पहले इतना ही कहता आए थे की प्रमुख ने संकेत देते हुए कहा, अपनी वार्ता जारी रखें, प्रमुख से धन्यवाद । मेरे विचार से नंदीश्वर जाए या कोई और जाएगी इस पर विचार करने से पूर्व कुछ और विषय भी विचार करने योग के हैं । नंदेश्वर देगा डंडधार थी आप जो भी उचित जाने वो विचार अवश्य ही सभी के सम्मुख सकें । आप के अनुसार अन्य विचार क्या है? डंडधार ने कहा मेरा विचार था कि क्या कुमार के साथ दो चार व्यक्ति का जाना ही उचित रहेगा । यदि कुमार को सहायता की आवश्यकता हुई तो वहाँ क्या होगा? सुरक्षा टुकडी जानी चाहिए । इतनी सभी चर्चाओं के मत्थे प्रमुख जी का ध्यान गणतंत्र के उस वाक्य पर गया जहां उन्होंने कहा था कि क्या युद्ध समाप्त हो गया है । ये विचार उनके मस्तिष्क में जैसे दम नहीं की । भर्ती प्रकाश कर गया और एक आई तो खडे हो गए और उनके खडे होते ही सभी का ध्यान उन्हीं की तरफ हो गया । तब उन्होंने कहना प्रारम्भ किया, दंड हार चीज मैं क्षमा प्रार्थी हूँ क्योंकि आपकी वार्ता पूर्ण होने के पूर्व ही इतना प्रमुख ही कहता है कि दंडधारी जी ने कहा नहीं नहीं प्रमुख चीज आप यहाँ पर सब के अभिभावक सामान है और बल्कि मैं अपनी भूल में सुधार करना चाहता हूँ । आप अभिभावक ही है । आप सबसे अधिक धैर्यवान, बुद्धिमान, वहाँ अनुभवी है । आपकी अपनी बात सर्वप्रथम रखे प्रमुख लेने का धन्यवाद । ठंडक । हारसी मैं विचार कर रहा था कि कुमार गजेंद्र नहीं । अभी कुछ समय पूर्व ही कहा था युद्ध सब आपका नहीं हुआ है । मुझे उसमें ब्रह्मा की प्रेरणा प्रतीत हुई । क्या ये संभव नहीं है कि बाल एक अभी अपने राज्य के निकट ही हूँ और वो इस समय की प्रतीक्षा कर रहे होंगे । सभी ने ये विचार जो प्रमुख के मन मस्तिष्क से प्रचलित हुआ था को अपना समर्थन प्रदान किया । अब नंदेश्वर ने अपना मत प्रकट किया । मेरे विचार से प्रमुख जी का कथन संभव है । अब इसका तो अभिप्राय के हुआ की हम पर दुगना संकट आप पडा है । कुमार कार्तिक केंद्र की सहायता हेतु और साथ ही अपने गोश सिंगर पूरा की पूर्ण सुरक्षा हित अपने दायरे हाथ के प्रथम दो उंगलियों हूँ । वहाँ अंगूठी से अपने मस्तक को सहलाते हुए संभव का आपने अंतर मस्तिष्क के विचारों को बाहर लाने का प्रयास करते हुए आपने बंद आंखों की पुतलियों के भीतर वे घुमा रहे हैं । ये सभी को प्रत्यक्ष दिख रहा है । सभी उनका ही मुक्त देख रहे हैं कि अब वो क्या कहना चाहते हैं परन्तु ये तो मात्र संभावना ही है । डंडधार ने कहा नंदेश्वर चीज रोकने की प्रतीक्षा किए बिना ही बोल पडे, जीवन में सभी कुछ संभावनाओं पर ही निर्भर करता है । ऐसी घटना कभी संभव नहीं है जिसकी संभावना सुनने हो । हमारा दोस्त है कि हम साथ हूँ । कुछ संभावनाओं को सुनने मान लेते । क्या कह सकते हैं कि हमारा मस्तिष् उन संभावनाओं की विवेचना नहीं कर पाता है तब घटित होती हैं । तब हमारा मस्तिष् ये समझ पाता है कि अरे ये तो सोचा ही नहीं था । अब इस समय मेरा ऐसा मत है । सभी प्रबुद्धजन सभी संभावनाओं पर विचार करने के उपरांत ही निर्णय ले । सभी मुख्य सभाकक्ष में आगे की रणनीति सुरक्षा देती वकाल विश्व के विषय में मंथन कर रहे थे की सभा कक्ष के बाहर उपस् थित प्रमुख द्वारपाल ने भीतर अगर सभी को अचंभित कर दिया । अंदर प्रमुख कक्ष में प्रवेश के उपरांत वह द्वारपाल अपना शीर्ष झुकाकर खडा हो गया । उसके आते ही सभी का दृष्टिपात उस पर हुआ । तब तक सुधारने कठोर शब्दों में उसके अंदर आने के विषय में पूछा द्वारपाल जब तुम आदेश थे के नहीं भी परिस्थितियों में अंदर प्रवेश वर्जित है । अब तो इस सर्वज्ञा का दंड काम जानते ही हो ना? सेनापति मैं सबको जानता हूँ । जानने के उपरांत में इतना दुस्साहस कुमार गंद रहेगा । दण्डक हार चीज आप उसके आने का मंतव्य प्रथम तया जान तो ले । प्रमुख द्वारपाल आपकी जय हो । कुमार डंडधार जी मैं अपने जीवन को दांव पर लगाकर ही भीतर आया था । मैंने विचार किया कि मेरा जीवन आवश्यक है अथवा मेरी मातृभूमि अच्छा । मैंने अपनी जीवन दायनी जन्मभूमि को प्रथम माला तभी मैंने भीतर प्रवेश किया । एक समय जब महाराज आशुतोष केंद्र स्वस्थ थे उस सभा में जिसमें मैं उपस् थित था, महाराज ने कहा था खुल के रखा है तो एक व्यक्ति को गांव की रक्षा है तो एक कुल को नगर की रक्षा है तो एक गांव को देश की रक्षा है तो एक नगर को त्याग देना चाहिए । इस पर किसी प्रबुद्ध व्यक्ति ने बाहर आज से प्रश्न किया था आपके महाराज अपनी रक्षा प्रदेश सुरक्षा के विषय में आपका क्या विचार है? महाराज ने कहा था व्यक्त्तिव देश में कोई तुलना ही नहीं है । देश हित सर्वोपरि हैं । देश हित से श्रेष्ठ केवल एक ही विषय है, वह है आत्मा का विषय यदि आपकी आत्मा का उत्थान संभव हो तो आप आत्मा को प्रथम देश को द्वितीय मान सकते हैं । इस आखिरी विचार पर डंडधार क्रोधित हो गए और उन्होंने कहा नहीं मैं आत्मवत ए इसमें देश को ही श्रेष्ठ मानता हूँ । प्रमुख द्वारपाल ने कहा जी सेनापति जी मैं भी आत्मा से देश को श्रेष्ठ मानता हूँ परन्तु महाराज आशुतोष इंद्रा के बुक्स से निकला प्रत्येक शब्द सच्ची होता है । इतना सुनकर दंडा त्यौहार का क्रोध कुछ कम हुआ परन्तु उन्होंने कहा की संभावना तुम महाराज का भावार्थ ही समझना पाए होंगे । देश ही श्रेष्ठ है ना की आत्मा । तब कुमार गणतंत्र अपने स्थान से मुस्कुराते हुए उठे और उन्होंने कहना प्रारम्भ किया द्वारपाल क्या तुम इतने विश्वास के साथ कह सकते हो कि पुंछ पिताश्री महाराज जी ने आत्मा का ही प्रयोग किया था या कुछ अन्य प्रमुख द्वारपाल ने कहा क्षमा कुमार मैं इतना अधिक योग्य व्यक्ति नहीं हूँ । संभावना उन्होंने इसके पूर्व कुछ कहता गवेन्द्र नहीं कहना प्रारम्भ किया । उन्होंने जीवात्मा शब्द का प्रयोग किया होगा क्योंकि आपका बहुत ही विस्तृत स्वरूप है, इसकी चर्चा पूरा करेंगे । जीवात्मा और देश दो भिन्न भिन्न खैर अभी रहने दीजिए क्योंकि ये विषय अभी चर्चा का नहीं है । अभी का विषय है कि द्वारपाल फिल्म आया । अभी हम सभी मूल पर ही केंद्रित रहें । समय सभी के पास बहुत ही कम है । सब इस प्रस्ताव से सहमत थे । डंडधार अभी उत्साही सांसी व वीर योद्धा होने के साथ साथ कभी कभी अत्यंत उत्तेजना से कार्य कर लेते थे । अत्यत देखो तेज ना सभी चीजों की सार्थक पत्ती पर पडता डाल देती है । जब बुद्धि पर पर्दा पड जाता है तो थी जो देख सकती थी अब वो नहीं देख पाती । जब तेजना शांत होती है तब वो अभी बेकी पर्दा हटता है और पश्चाताप के अतिरिक्त कुछ हाथ नहीं आता । पता प्रयत्नपूर्वक साथ ही अभ्यास द्वारा ये प्रयास किया जाना चाहिए कि आप उत्तेजित हो । अब जब कुमार नरेन्द्र स्वतः प्रमुख द्वारपाल से चर्चा परिचर्चा करने लगे तो तंगधार की उत्तेजना स्वतः ही कम हो गई । तब कुमार गजेंद्र ने पूछा कि तुम अंदर क्यू आए आपको बार राजा सत्रह विजय उन के सेनापति अश्रद्धा उनके मंत्री कौशिक जी आपसे मिलना चाहते हैं । मैंने बहुत प्रयास किया कि वे अपना मन तब मुझे बताते परन्तु उन्होंने ऐसा करने से मना कर दिया । मैंने कहा कि उनसे बेट होना संभव है । तब उन्होंने इतना रहता उद्घाटन किया कि आज वे और उनका राज्य यदि सुरक्षित है तो उसका कारण है और बल्कि एक मात्र कारण हैं महाराज आशुतोष, सिंध वहाँ उनका देश गोश रिंग पूरा । आज मेरे पास इस बात के संकेत पूर्णतया पुख्ता है कि आज महाराज को सिंगपुरा पर संकट के गहरे बादल छाए हैं, जिन पर चारों ओर से जलवा छपडा का आघात होने को है । अब आप ही बताया कि मैं क्या? इतना सुनते ही प्रमुख जी ने अपनी कमान संभाली और प्रमुख द्वारपाल को वही रोकते हुए महाराज शत्रु विजय, सेनापति अश्वत्थामा व महामंत्री कौनसी को बुलवा भेजा ।

भाग - 03

मालिक क्योंकि पूरा जानकारी प्राप्त होगा । जब तक महाराज शक्ति विजय महामंत्री पहुँच वसेना प्रति अश्रद्धा नहीं प्रमुख सभा कक्ष में संस्थान में अमावस्या की दिशा के सवाल निशक्तता नहीं महाराज शत्रु विजय का राज्य डॅाक गोश सिंगर पूरा से सौ तो उस की दूरी पर स्थित था । उन्होंने भी माल बच्चों के अत्याचारों हमारे को झेला था । अब भी सुरक्षित थे । उन्हें महाराज्य तो सेंटर नहीं करूँगा । क्यूँकि रचनाकर सुरक्षित कर लिया था । उसी गरूण व्यू मालिक फस गए नहीं गए । रुपयों के कारण मालिक समाप्त होने लगी । दुर्भाग्य सेवा लक्ष्य राजा मालिक सोन वह सेनापति मलिक शब्दम बच निकले । संभव हो सकता है कि कुछ मालिक और शेष रह गई हूँ । युद्ध में दुर्भाग्य से एक अत्यंत विनाशकारी धुलना बस्तर से महाराज आशुतोष इंद्रा घायल हो गए और अब उनके उपचार हेतु सभी अत्यंत चिंतित हैं । सभी एक दूसरे का बुक देखते हुए वेस्ट भाव से ग्रसित है कि क्या दफ्तर रहस्य है, जो महाराष्ट्र तो विजय जानते हैं, तभी उनके आने की सूचना प्राप्त होती हैं । उन्हें बहुत ही सम्मान भाव से सभाकक्ष में स्थान दिया जाता है । स्थान ग्रहण करने के उपरांत प्रमुख खडे होकर अपनी बात कक्ष में रखते हैं । प्रवक्ता ने कहा, आप सभी का गोश्त सिंगपुरा के सभागार में मैं परिनीति प्रवक्ता स्वागत करता हूँ । शत्रु विजय, महाराष्ट्र आप सभी के स्वागत अभिवादन से हम सभी पहले ही संत हो चुके हैं । आपके महल आपके सम्मुख रहने का जो मतलब सब हम लोगों ने प्राप्त किया है वो अवर्णनीय । अब आप जब पूरा नम्रता का भाव प्रदर्शित करते हैं तब ये भावना पूर्ण रूप से मन में स्थिर हो जाती हैं या कत्यूर पृथ्वी पर आप लोग सिर मौर्य कहे जाते हैं । प्रवक्ता ने कहा अरे नहीं नहीं महाराज, हमारे अत्यंत छोटे सम्मान अर्थ अमन से की गई सेवा को आप इतना अधिक कह रहे हैं । ये आपकी ही उतारता है । आप तो जान ही रहे हैं । हमारा राज्य किस प्रकार के संकट से आच्छादित हो गया है । आप तो स्वाइन ही उसके साथ ही है । ये कहकर प्रमुख भी शांत हो गए । उनके अवचेतन मन में जो ज्वार की ब्रजमंडल रहें, अपनी सीमाओं को झबरी नगर देना चाहते थे, उसका परिचालन सामान्य व्यक्ति के लिए जान मना । संभावना जीवन के अंधकार युक्त काल में जब आपका बनी काली माँ आयुक्त हो जाता है तब उसका प्रभाव आपकी मुद्दे वह बुद्धि कौशल का पर पडता है । बुद्धि का प्रभाव आपकी मुखाकृति पर पडता है तो सब खडे व्यक्ति को आपके बनके स्थिति को उजागर कर देता है । मुद्दे कौशलता का प्रभाव आपके कार्यों पर पडता है । जो जब मैं आपके विपरीत समय खंड को प्रदर्शित करना है और ज्ञान वह साक्षीभाव तीन इस प्रकार के स्तर हैं जो मन में उठ रही प्रचंड लहरों से ही तट रुपये, मन, बुद्धि पर प्रहार को सहने समझने, बहुत कार्य होने से आपको सुरक्षित रखते हैं, प्रमुख से नहीं । तीन अस्त्रों की सहायता से अपने आप को सुरक्षित करने की चेष्टा कर रहे थे । आपकी प्रतिरक्षा प्रणाली कितने ही शक्तिशाली क्यों ना हो, आक्रमण का प्रभाव अंतर बन में हो । बंदो कष्ट तो शरीर को ही झेलना होगा । प्रमुख सीने ज्ञान है देवर साक्षीभाव से सब सही लिया था परंतु छोड की पीडा होगी । अधिक समय तक शांत रहने पर महाराज शत्रु विजय नहीं कहना प्रारम्भ क्या प्रमुख आपको शत शत समझ बल्कि यहाँ पर स्थित सभी महानुभावों को सब सब तमन, आपका नमन स्वीकार्य है । परन्तु इसके पहले प्रमुख ही कुछ कहते हैं शत्रु विजय ने कहना प्रारम्भ किया प्रमुख सी आप सभी बाप का राज्य आज समय खानदान की जिस कालिमा से मतलब है वो मुझसे पूर्ण रूप से उजागर है । आप में से किसी ने भी सहायता नहीं मानता हूँ । मैं जानता हूँ कि आप सहायता मांग कर अपने किए हुए उपकार को समाप्त नहीं करना चाहते हैं परंतु आपके मित्र हैं । हम अपने प्राणों की आहुति देकर भी मित्रता का धर्म निभाएंगे । हमने आपका कार्यप्रारंभ भी कर दिया और उसमें सफलता भी प्राप्त कर ली है । दण्डक हारने का सफलता दस प्रकार की सफलता आवाज में प्रश्नवाचक उत्तार स्पष्ट देख रहे थे । साथ ही अंधकार में प्रकाश किरण नंदीश्वर ने कहा महाराज! आप किस प्रकार की सफलता की चर्चा कर रहे हैं? क्या वही सफलता हूँ जो हम समझ रहे हैं? क्या ये वही सफलता है जिसने हमारे उपवनों से पक्षियों की चहचहाट छीन ली है? क्या वही जिसने भवनों के कुंजन को बंद कर दिया है? वस्तुतः हमें जिस वस्तु मत्वा बैठने की प्रतीक्षा होती है, आने वाला प्रत्येक पंजाब हमें उसी का अनुभव कराना चाहते हैं । यही है मन की लोलुपता । इंद्रिया उसे ही अनुभव करना चाहती हैं जिसकी हमें आवश्यकता थी । इस प्रकार सभी को उस साल विश्व के विषय में ही जानने, वह उसे प्राप्त करने के विषय को जानने की उत्सुकता थी । परन्तु जब उत्तर आया कि महाराज को काल विश्व के विषय में कुछ भी जानकारी नहीं है तो सभी अत्यंत दुखी हो गए । अगले ही क्षण जब सेनापति अश्वत धाम जीने को छडने जानकारियों के विषय में बनाया और महामंत्री कौशिक थी नहीं जब उसका बरी मार्च किया तो सभी की दृष्टि में चमक आ गई । महाराज शत्रु विजय जब अपना गुप्त कार्य बताना प्रारम्भ किया तब कालवश लाने की योजना काल विश्व युद्ध देते में परिवर्तित हो गयी । छत्रों में जाने का सभी प्रभुत्व सभासद मेरी वार्ता को ध्यान से सुनें तो उस पर गंभीरता से विचार करें । मेरे मुख्य गुप्तचार के अनुसार मालिक अभी गोश्त सिंगपुरा से अधिक दूर नहीं है बल्कि ये कहना अभी उत्तम होगा । क्यों उन्होंने अभी युद्ध में अपनी पराजय स्वीकार नहीं की है । मेरे अनुसार वो अभी हम पर दृष्टि जब आए हुए हैं । मुझे ईश्वर का महाराज ये किस प्रकार संभव है । उनके लगभग सभी मालिक समाप्त हो गए थे । जो शेष बचे थे वो अत्यंत घायलावस्था में थे । ऍम ये तो आंचल इतने ही समाप्त करती थी । इसके उपरांत में अपने प्राण बचाकर जो भूमि से बात करते थे । अब ये किस प्रकार संभव है कि वो इतनी शीघ्रता से पुनर संगठित हो गई हूँ । अब महामंत्री कौशिक अपने आसन से थे और अपने साथ खडे सेवक से कुछ कहा तब कौशिक जी सभा का केंद्र बिंदु सम्भवता उन्होंने किसी को सभा में बुलाने के सेवक भेजा था । उन्होंने अपनी वार्ता प्रारंभ पत्र चलो प्रणब मैं दिव्या मार कंटक का महामंत्री आपने महाराज की आज्ञा से कुछ कहने की अनुमति चाहता हूँ । आप भी अपने विशेष को प्रचारको सभाग्रह में उपस् थित करने की भी अनुमति चाहता हूँ । प्रमुख ही इस समय सभा का संचालन कर रहे थे तो उन्होंने अपने मुखा भाव से बिना कुछ कहे स्वीकृति दे नहीं हूँ । मुखा भाव शब्दों से अधिक महत्वपूर्ण होते हैं क्योंकि सृष्टी में जब जीवन का प्रारंभ हुआ, जीव के आते ही स्वीकृति वहाँ अस्वीकृति के भाव आए, उन भावों को अभिव्यक्ति करने के लिए जीव के पास अपने मुक्के भाव की थी । शब्दों व्याकरण का ज्ञान तो उसके उपरांत हुआ था, मूल तत्व है भाव न कि शब्द है और उस पर बनावटी व्याकरण बनी है न भूल पाने वाला छोटा नन्हा शिशु शब्दहीन व्याकरण इन अवश्य ही है परंतु भावहीन नहीं । उसके माँ बिना व्याप्त रन हुआ बिना शब्द के ही उसके एक एक सप्ताह का इस हाथ समझ लेती है जैसे भक्त का भाव बिना शब्द के परम पिता परमेश्वर अंतर मंतर जान जाता है । इतने समय में ही प्रमुख आप अच्छा का भी पदार्पण हो जाता है । आते ही उसने सभी को प्रणाम किया । गुप्तचार का नाम है को चरण हार । आप क्या प्राप्त करने के उपरांत उसने अपनी विवेचना प्रारंभ गौचरण सँभालने का श्रेष्ठ जनों को दास का परिणाम इस वक्त की कृपा से मुझ जैसे ज्ञान हिंदू कुछ व्यक्ति को को शॉपिंग पूरा जैसे महान राज्य की सेवा का अवसर प्राप्त हुआ । मैं अपने महाराज सेनापति महामंत्री जी का अत्यंत आभारी हूँ । जिन्होंने सच है वो अपनी सेवक पर अनुकंपा बनाए रखी है । मैं और मेरा राज्य गोश सिंगर पूरा का ऋण कभी नहीं चुका सकता । आप सभी ने मेरे राज्य को संकट बाल अच्छे से जिस प्रकार सुरक्षित दिया, उस ऋण से मुक्त होने के लिए दिव्या मार कंटक का एक एक जन भी यदि अपने प्राणों की आहूति भी देते तो भी ऋण उतर नहीं सकता । आपने मेरी जन्मभूमि मेरी माँ की रक्षा की । मैं आपको हिरदय से धन्यवाद देता हूँ । प्रमुख ही देखा बहुत चरण भाई आप अत्यंत श्रेष्ठ को प्रचार होने के साथ अत्यंत तो भाषी आपने अपने राज्य से देश के लिए जो प्रेम भावना है वही आपको श्रेष्ठ बनाती है । जिस प्रकार जीवन के लिए प्राणों की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार उत्तम गुप्तचर वही हो सकता है जिसके अंतर्मन में राष्ट्रप्रेम, सबसे ऊपर पायदान पर राष्ट्रप्रेम गुप्तचर का रात में गुण है । अब आप अपनी गुप्त परिचर्चा प्रारंभ करें क्योंकि यहाँ सभी उसे जानने हेतु अत्यंत उत्सुक हैं । बो चरण भाग लेकर या प्रारम्भ क्या चीज प्रमुखी जैसा आदेश जब युद्ध समाप्त हुआ और महाराज प्रभु एक्टिव ऍसे घायल हुए तो आप ही की भर्ती हम भी अत्यंत चिंतित थे । जब इस विषय में ज्ञान प्राप्त हुआ कि वह अस्त्र असाधारण है तो हम सभी इस तरह व्यथित हो रहे थे जैसे कारागार में निर्दोष व्यक्ति, निर्दोष व्यक्ति गतिविधि के द्वारा कभी अकारण ही राज दंड का भागी हो जाए तो वह कारागार में कभी राजतंत्र को दोषी कहता है । कभी अपने सहयोगियों पर उसे आशंका होती है, कभी वह को दोषी ठहराता है और अंततः वो अपना प्रारब् कही मान लेता है । उसके अंदर बन की दशा स्थिरता को कभी पूर्णतयः प्राप्त नहीं हो पाती है । इसी प्रकार महाराज आशुतोष इंद्रा के घायल होने पर हम सभी भी स्थिर मान बहुत से ये समझ नहीं पा रहे थे । महाराज के घायल होने में किसका दोष है । सुरक्षा व्यवस्था इतनी सौ होने पर भी महाराज किस प्रकार घायल हो गए? क्या इसका कारण हम लोग तो नहीं? इतना सुनने के उपरांत कुमार नरेन्द्र ने अपने आसन पर खडे होते हुए कहा आपकी सहृदयता का प्रमाण है आप अपने आप को दोषी मान रहे । आप किस कारण दोषी हो सकते हैं । उन्हें तो कोशिश पूरा पर आक्रमण करना ही था । कौशिक चीनी महामंत्री लेगा । शाम कुमार मैं आपके पूर्ण चर्चा सुने बिना ही अपनी बात कह रहा हूँ । इस पर कुमार ने बिना कुछ कहे ही अपनी मान स्वीकृति दे दी बल्कि पूरी सभा ही कुमार से सहमत थी । कारण अस्पष्ट था की सभी अभिषेक अपनी उत्कंठा को तृप्त करना चाहते थे । अब एक नई दिशा में वार्ता अनुमोदित थोडी प्रतीत हो रही थी । अपराध दिन बंडल से अपराध बहोत मुखाकृति में परिवर्तित सायद ही विश्लेषित हो जाता है । अपराधी इन मुखमण्डल निर्मल जल के सवाल अस ऍम का प्रतीक है और अपराध भूत मुखाकृति जल्द ही के हारे पन से उत्पन्न लवन कुमार यह अनायास ही भाव आकृतियों में परिवर्तित दंड आधार वो जंगेश्वर नंदेश्वर पर विश्लेषित होने लगा । उन्हें अपने अंतर्मन में ये विचार वित्त की तरंग की भारतीय रिलीज कर गया । क्या महाराज के घायल होने का कारण वेट हो रही है? कारण स्पष्ट था ये महाराज की सुरक्षा व्यवस्था तो इन्हीं के हाथों भी थी । उन्हें अपनी क्षुद्रता का भी आभास जो अपने राज्य के नहीं है वे अपने को दोषी मान रहे हैं और जो आपने इतनी तीव्रता से ये विचार मन में अ स्थान बना गया कितन उधार नहीं अपने पूर्व स्वभाव को प्रदर्शित करते हुए कहा हूँ सभी सभा जान सुनी महाराज के घायल हो रही का अपराधी मैं हूँ मैं मैं अपना अपराध स्वीकार करता हूँ । मैं इसके लिए अपना दंड स्वतः ही चुनता हूँ । मेरा ठंड एकमात्र तो ही हो सकता है । बूरी सभा पूर्ण रूप से सन्नाट से परिलक्षित हो गई । कोई समझ नहीं आ रहा था कि ये क्या हो गया । ठंडा घाटे प्रमुख कि कुछ कहना चाह रहे थे कि कुमार गगनेन्द्र नहीं उन्हें कहना प्रारम्भ किया डंडाधारी चीज आप साथ ही वीरता से परिपूर्ण वह महान पराक्रमी, साहस, वीरता, पराक्रम मनुष्य में तभी संभव है जब मन मस्तिष्क पर भावनाओं का पूर्ण नियंत्रण रखेंगे । अब आप भावनाओं के बहाव में पहले आप क्या कह रहे हैं, आपको स्वतः ही उसका भाई नहीं है । कोई भी चीज सुख दुख के लिए स्वतः ही कारण होता है । ब्रह्मजी उसे ही सभी उत्तम वर्लिन कम कार्य करवाता है जिससे कार्यों के परिणाम का पूर्ण पारितोषिक अथवा दंड जी को ही प्राप्त हूँ । स्वता प्राम्भ कुछ भी और कही भी कारण नहीं बनता । और हाँ सबसे महत्वपूर्ण तो ये जब वो करता है तो हम जान नहीं सकते क्योंकि तब वो करता के रूप में प्रकट होता है जब सृष्टि में जीव या तो प्रारंभ ही ना हुआ हूँ अथवा सृष्टी में जीवन का एक आप पूरा हो चुका हूँ था जब हम होते हैं तो हम ही कारण है और जब हम नहीं होते हैं तो वो कारण है स्वास्थ में कारण वकर्ता सब वही है परंतु उसका विधान ही ऐसा है कि कारण वकर्ता हम बन जाते हैं । अच्छा डंडधार थी या अन्य भी जो अपने को दोषी मान रहे हैं । वास्तव में दोनों ही प्रकार से दोषी नहीं है । प्रथम तो ये की सब कुछ ही किया है वही कारण वही करता हूँ द्वितीय यदि जीव उत्तरदायी हैं तो मुझे पिताश्री स्वयं ही इसके उत्तरदायी होंगे ।

भाग - 3.1

काटते एक सौ तब जीवन मरण हानि साहब विलन बहुत योगदान ही वही उत्तरदायी हो जाना है, जबकि मूल कारण काम रही है । अब मैं मूल वार्ता पर वापस आना चाहता हूँ । जब तक हम लोग गुप्त सूचना का प्रकारण ना समझ ले, तब तक अन्य चर्चाएँ वेस्टगेट थी । रखी जाए ऐसा बेरा बरामद है अब जाकर पूरा कौशिक जी को अपनी गुप्तवार्ता जो उन्होंने गुप्तचर विभाग से प्राप्त की थी । रखने का मुझे समय प्राप्त हुआ । गौर जीने का धन्यवाद गण इंद्रजीत मेरे विचार से पहले दो चरण भाल को बोला रूप से सुन लिया जाए हूँ तत्पश्चात मैं अपनी बात सभी के संभव हूँ । इतना सुनने के उपरांत गौचरण भाले बुलाना कहना प्रारंभ गया जब महाराज घायलावस्था में अपने पहला चुके थे । सब अत्यंत वैधिक वचिंत नहीं मुझे महाराज शत्रु विजय रहे, अपने कक्ष में बुलाया हूँ, जहाँ पर महामंत्री कौशिक जी, सेनापति अश्रद्धा हम पहले से ही उपस् थित सभी के उपस् थिति भावभंगिमा से स्पष्ट था कि कारण विशेष था मैंने वहाँ का वातावरण अनुभव कुछ असामान्य था, परन्तु किस कारण पता नहीं एक का एक सेना पति ने मुझसे भ्रष्ट क्या मुझसे पूछा तो बारह साल एक शो के विषय में क्या विचार है? मैं समझ नहीं सकता हूँ । मैंने जब क्षण सोच नहीं व्यवस्थाएंॅ की तो सेना पति जी समझ है कि मैं कुछ समझ नहीं पाया हूँ था । उन्होंने अपना प्रश्न दोहराया, गौचरण भाषी आपके विचार से मालिक हो गया । सब आपको हो गए । तब मैंने उनसे कहा हूँ कलेक्शन यदि समाप्त हो गए हो तो अच्छी बात है । अन्यथा मेरे विचार से यदि प्रमुख ऍफ होंगे तो वे अवश्य ही दोबारा आएंगे । इतना सुनने के बाद उन्होंने कहा हूँ तो मैं अपने ही राज्य की भर्ती इस राज्य की भी सेवा करो । तब बैठे अपनी गुप्तचर व्यवस्था को तुरंत ही पुनर्जागृत किया और अब मैं अब मैं क्या आगे जीतन राधा जी, मैंने कमान स्वता संभाली व अन्य एक व्यवस्था के लिए दूसरी गुप्तचर की टोली का चयन कर प्रस्थान करवा दिया । मेरा अनुमान था कि वाले यदि अभी नहीं भाग गए हैं तो वे उसी मार्ग पर होंगे जिस मार्ग से वे आक्रमण करने आए थे । मैंने स्वत उसी मार्ग का चयन किया जहाँ से मालिक हम लोगों के साथ आए थे । तीव्रगति के अशोक की सहायता से हम बहुत दूर तक गए परंतु हमें लगा कि हम सही नहीं है । पूरा हम लौटने लगे और एक स्थान पर हम लोगों ने रात्रिविश्राम करने की योजना बनाई हूँ । गुप्तचर होने के कारण मैंने अपने गुप्तचर कर्व का पूर्ण पालन किया । एक्शन रुके कब? प्रचार कर्म ये क्या है? कुमार गुप्तचर के बहुत से गर्म थे परंतु रात्रि में कभी न शयन करना । वह सदैव ये विचार रखना कि मैं सदैव शत्रु के सभी फोन अत्यंत प्रमुख है । मैं और मेरे दो सहयोगी थी । हमने अपना शिविर उस स्थान पर लगाया था जहाँ से हम सभी को देख ले परन्तु हमें सामान्यता न देखा जा सके । मैं इसे प्राम्भ के ही कृपा करूंगा । उसके बाद थे । रात्रि में कुछ कृतियां प्रतीत पूरी प्रारंभ । धीरे धीरे उनकी संख्या पड रही थी । मेरे सब बुक स्थित पर्वत श्रृंखला की एक गुफा से निकल रहे थे । अपने हाथ से निकल गए । तब हम लोगों ने की जानने का प्रयास किया । ये कौन है? इतनी अधिक संख्या में यहाँ क्या कर रहे हैं? हम तीनों जब अत्यंत सावधानीपूर्वक वहाँ पहुंचे तो बहुत है । हमारे हाथ, पैर मजबूती और यहाँ तक कि अंतर्चेतना को जैसे लकवा मार गया । कुछ क्षण स्वास्थ लेने की वह काम वो चरण हाल नहीं होना कहना प्रारम्भ किया । यही तो बडा भी कल्पना नहीं कर सकती थी । वो दृश्य मेडिकल पाॅप अरे था । उस गुफा में बेहद अस्थान जिसे कराधार में परिवर्तित किया गया था वहाँ पर अब बात ऍम आप सब आप हो चुका था । इन अवॅार्ड अस्पष्ट जो अभी वहाँ से गए हैं । जिनकी धुंधली आकृतियां रात्रि की कालिमा में प्रतीत हुई थी वो मालिक से ही थी । मालिक शो के विषय में तो जानने ही गए थे कि अब वो कहाँ हैं, पृथ्वी पर हैं अथवा नहीं । प्रभु की कृपा से उनकी जानकारी प्राप्त हो गई । अंडर हाथ ये तो आपने अत्यंत ही महत्वपूर्ण सूचना सूचना से आगे की सभी रणनीति तय करने में निश्चित भी सहायता प्राप्त हो । एक्शन रुकने के उपरात आप कह रहे थे आप अत्यंत ही अस्मित हो गए थे और जी सकते हैं वो दृश्य जिसमें अपनों का ही रखता हूँ । सभी के मुख से लगभग एक साथ ही निकल पडे । अब मौका ही और आप जब कुछ समय और व्यतीत हुआ प्रकाश की किरणों ने पृथ्वी की कालिमा को अपने में समेट करता को प्रकाशित किया तो मेरा बन बुद्धिवाद मा तक अंदर का तो वहाँ पर विशेष रूप में पडे वस्त्र उन पर अंकित चंद हमारे दादा अच्छी खेलती थी तो वो सभी सैनिक थे । क्या बर्तन तक अच्छे सैनिक कुछ देश बंदे का आपके राज्य के साथ नहीं । ये किस प्रकार संभव है आपके राज्य के सभी सैनिकों की सुरक्षा व्यवस्था के लिए ही तो महाराज ने करोड व्यू की रचना की थी । करोड व्यू में ही मालिक फस गए और आप सभी सुरक्षित हो गए । ये तो हम सभी नहीं देखा हूँ और आज भी आपके सभी फॅार सुरक्षित है । इतनी बात सुनने के उपरांत भोजन केशवजी कुप्रचार को चरण भालसे उत्तर की अपेक्षा रख रहे थे । परंतु वो चरण हाल अपनी मर्यादा वाॅल था । वो जानता था कि वो प्रचार का कार्य है । गुप्त जानकारी ऍम उनको क्रम पर वह व्यवस्थित करने के उपरांत अपने स्वामी तक सुरक्षित स्थानांतरित करना हूँ । इसके उपरांत का कार्य उसके स्वामी का है तब उसने शांत रहना ही उचित समझा । सेनापति अश्वत्थामा, उसके स्वामी वो अब खडे उन्होंने बहुत सम्मान वहाँ आभार प्रकट करते हुए का वो जंगेश्वर जी आपके तो आपके राष्ट्र का मैं और मेरा राज्य विद्या मरगन तक सदय आभारी रहेगा । आप सभी नहीं सामाजिक सूझ बूझ से जिस प्रकार हमारे रक्षा के बहुत बनते ही सराहन के इसमें किसी भी प्रकार का संशय नहीं वो चरण भाल ने अभी जस्ट दृष्टांत का उल्लेख या उसकी विवेचना करने के उपरांत ही हम लोगों ने आपसे मिलना उचित समझा । हम लोगों को भी एक अन्य जानकारी होगी । वो जंगेश्वर अन्य जानकारी और था । क्या अन्य कोई रहस्य जीबू? जंगेश्वर जी जब हम सभी अपने राज्य दिव्या बर्गन ट्रक में थे और मालिक शो ने हमें अपने जाल में फंसा लिया था । उस समय हमारे सैनिक जो अवकाश पर अपने अपने घरों को गए थे उनमें से कुछ अपने शिविरों को लौट कर वापस है और बहुत से लौटकर वापस नहीं है । डंडधार होते हुए वो हमारे सैनिक होते तो हम उन्हें मृत्युदंड देते हैं । फॅार हो जाए और प्रारंभ होने के पूर्व ही रणभूमि छोडकर भाग जाए तो उन्हें अपने राष्ट्र क्या इस पृथ्वी पर रहने का कोई अधिकार नहीं है । सैनिक बनने के पूर्व व्यक्ति को ये अपनी अंतरात्मा भी ये विचार लौहस्तंभ की भर्ती ऋण कर लेना । चाहूँ तो उसका विवाह रणचंडी के साथ संपन्न हो चुका है । सैनिक में यो था अयोध्या में भी वीर में सूरवीर सूरवीर में महावीर और महावीर में बाहर अभी बंदे की ललक होनी चाहिए । यही लोग रुकता व्यक्ति को साइरिक से अलग करती है । डंडधार आपने वार्तालाप प्रदर्शन पढाते ही जा रहे थे । राजा शत्रु विजय सेनापति अश्रद्धा हम वहाँ मंत्री कौन सी थी । उन्हें रोकने का भाव प्रकट कर रहे नहीं परंतु उनके भाषा प्रवाह के सब वे शांति रहेगी । जब वो एक क्षण के लिए रुके तो अश्वत हमने आप जानते ही नफरता से दंडधारी । आप अक्सर रशा सत्य कह रहे हैं परन्तु अभी मेरी संपूर्ण बात समाप्त नहीं हुई है । आप से अनुरोध मैं अपनी स्वधाम जी मैं क्षमा चाहता हूँ क्योंकि यदि सेना कि अपने कर्तव्य से विमुख हो जाए तो राष्ट्र का तो ही नहीं रहेगा । अब आप कहें हमारे सैनिक युद्ध से डर कर नहीं भागे थे । अश्रद्धा हमने बहुत ही रहता से जिससे दंड आधार का हम समाप्त हो । उन्हें बॉल एक शो द्वारा बंधक बना लिया गया था । पहले हम लोगों का विचार था कि बाल एक शो ने उन्हें अपना ग्रास बना लिया । अब जब को चरण जी ने जब कुछ रुककर सोचते हुए सम्भवता घटित परिस्थितियों को हम बात कर रहे थे । अब प्रमुख चीजें अपने वैज्ञानिक दृष्टिकोण के आधार पर अश्वत हम जी से का अश्वत्थामा जी मैं सम्भवता आपकी बात समझ गया । इतना सुनना बाट रखा की प्रमुख ही सभी के दृष्टि के निर्णय यहाँ रहेंगे । प्रमुख चीनी सभी को ध्यान से एक बार में हारा और अपनी झीर परिचित शारीरिक प्रतिक्रिया के आधार पर उन्होंने ऍम हाथ फिर के समय उनकी दोनों आँखे बंद नहीं परंतु स्पष्ट था कि वे बाल को के भीतर मस्तिष्क ऍम में बना रहे हैं । प्रमुख जीने का हमारे प्रयोगशाला के निष्कर्ष के आधार पर यह तय हो गया था ऍम पृथ्वी के निवासी नहीं । वे आकाशवाणी तत्व में हमारे सवाल है परंतु उनमें पृथ्वी, जल, वायु तक को हम से बढ रहे । इसी कारण वे पृथ्वी पर आपका जीवन जीने के लिए हमारे रख ऍम बच्चा पर निर्भर करते हैं । इस संपूर्ण चर्चा का विवरण सभी को पहले ही पता चल चुका है । केवल ये चर्चा ऍर कंटक निवासियों के लिए नवीन हो सकती है । उन्होंने अपने जीवन को सुरक्षित करने के लिए आप के सैनिकों को बंधक बनाया था, जिससे उनको जब आवश्यकता हूँ अपना ग्रास बना सकते । अब ये निश्चित हो चुका है कि वे अभी हमारे आस पास ही है । अब हमें साफ खान रहकर अपनी योजना का निर्धारण करना चाहिए । इस पर अब सभी अत्यंत सतर्क रहकर विचार करने लगे तो पूरी रात्रि समाप्त होने की थी । गांधी केन्द्र के साथ कौन कौन जाएगा और यहाँ की सुरक्षा व्यवस्था का क्या होगा, इसका निर्णय न हो सकता । मालिक युद्ध हार करती संकट का कारण पडे हुए हैं गोसलिंग पूरा युद्ध जीतकर भी संकट में हैं । जो विजयी हुआ वो विजय का स्वाद ही नहीं जान खा रहा है और जो पराजित वहाँ वो विजय का स्वाद जानना चाहता है आपको श्रृंगा पूरा के ऊपर अंदर गार मैं बेघरों के साथ कर चल ऍफ लता का भी हो रहा है महाराज घायल माँ योग कक्षा में मेरा हा मालिक शो का संकट और कोई प्रकाश के कारण नहीं मात्रा अमावस्या की काली माँ, आयुक्त, राष्ट्रीय रात्रि का परहेज कितना भी अधिक लालिमायुक्त भयावह हो परंतु जब भगवान दिन कर अपने रत परासी हो आपने सार्थी अरुण के साथ पूर्व देशों से आने वाले का विचार करते हैं तब संपूर्ण चारा चाहता हूँ । जगत प्रकाश प्रवाहित हो जाता है । इसी प्रकार चहुँओर प्रकाश के किलों का पदार्पण वो चला था परन्तु सभागार में छपा अभी भी अपनी साइन का स्थिति में ही संचालित हो नहीं नहीं । एक का एक सूचना प्राप्त हुई कि कुमार का अधिकेन्द्र सभा की तरफ अग्रसर हो रहे हैं । सभी एक दूसरे की तरफ देख रहे थे । कारण स्पष्ट था कि अभी किसी भी निर्णय पर नहीं पहुंचा जा सका था । जब समय समाप्त हो जाता है और प्रतीक्षित परिणाम प्राप्त नहीं कर पाते हैं, तब आप अपना आत्मसमर्पण डाल के समक्ष भी कर देते हैं । संभावना सभी के मन में यही विचार विचारित हो रहे थे कि अब तब तक कार्तिक केंद्र नहीं, सभा कक्ष में प्रवेश दिया और सभी की भाव भंगिमा को निहारते हुए उन्होंने अत्यंत सरलता से सभी के निर्णय रहने का पता करेंगे । आसन पर पहुंचने ही कहना प्रारम्भ किया सभी सभा सांसदों को मेरा सुप्रभात । आपके मुखमण्डल से ये स्पष्ट प्रदर्शित आप सभी किसी परिपक्व निर्णय पर नहीं पहुंच सके । अब यदि मैंने आपके और अधिक परामर्श के कारण विलंब कर दिया तो वो विलंब हम सभी पर रखते ही भारी कुठाराघात करेगा आप । मैं निर्णय ले रहा हूँ कि मैं और मेरे साथ लटक भृंगी जाएंगे । वे सम्भवता आते ही होंगे । इतनी वार्ता चल ही रही थी कि मुख्यद्वार से लटक हिंदी ने प्रवेश दिया । न तो द्वारपाल ही उसका आत्मन् देख सका और नहीं गलियारों में व्यवस्थित सैनिक । वो एक का एक सभागार के द्वार पर ही न जाने कहां से प्रकट हो गया । उसने आते ही सभी को प्रणाम किया और कार्यसिद्ध करने हेतु तुरंत ही प्रस्थान का प्रस्ताव भी रखा । उसके रन गठन का आकार हूँ । वह असंतुलित शारीरिक बनावट के कारण उस सभी के लिए अचरज का विषय था । जवाब परिस्थितियों से हारने लगते हैं तो उनके दास बन जाते हैं और उन्हीं के आदेश पर कार्य करने लगते हैं । यहाँ पर भी संभव तक यही स्थिति थी । कार्ति केन्द्र के कहते ही सभी भारी वन से जाने की तैयारी करना प्रारंभ करते हैं । प्रमुख कुछ विशेष अस्त्रशस्त्र व कुछ अन्य होगी । शर्मा में लिपटा हुआ है । उस को सचित करने लगते हैं । अब कार्तिक केंद्र सभा सदियों से कहते हैं कि वो अब अपने पिताश्री से आशीर्वाद प्राप्त कर वहाँ से आशीर्वाद प्राप्त करेंगे । दस । वर्षात वे अपने गंतव्य की ओर प्रस्थान करेंगे अभी जो रात्री को विचार विमर्श कर रहे थे । बहुत अच्छा था जब आप किसी निर्णायक स्थिति में नहीं पहुंचने की स्थिति में मुद्दे ही तो जहाँ भी प्रकाश के किरण अवलोकित होती है, आपको पता ही हैं उसी गरीब हो जा नहीं । अब कुमार कात्य केंद्र और कुमार गणित साथ चल रहे हैं । उनके कुछ तक आगे ॅ सम्भवता उसने अपना मोर्चा संभाल हूँ । दोनों कुमारों के पीछे प्रमुख थी । मुझे अंदेश्वर डंडधार वन नंदेश्वर हैं । कुमार ऍम नहीं महाराज के बच्चों की तरफ अपने कदम बढाए तो पीछे प्रमुख ही नहीं आगे बढकर ऍम दोनों कुमारों ने स्वीकृति में अपना बम दिलाया दोनों कुमारों ने अपनी बिना के दर्शन तो उस से ठीक है समय भी क्या है जब बिठा के चरण स्पर्श भी पुत्र के लिए हूँ कैसे समय की कल्पना कर सकते हैं फॅमिली योग मैं तथा संपूर्ण दक्षता संपन्न होने के बाद भी आप समय से नहीं अब दोनों कुमार अपनी माँ के कक्ष के लिए बढते दोनों ही जानते हैं की मांग के हीरो ऍम मे रहा और बस ममता ही तो है जो दोनों को जम्मू की भारतीय नहीं रही है जबकि वो भी जानते हैं कि माँ के दर्शन असंभव है । उन्हीं के दर्शन करने के लिए काल विश्व लाना ही होगा । ये विचार कार्य केन्द्र के मन में ज्वालामुखी की भर्ती, अपना आकार पर साथ ही ऊंचा विस्फोटक की भर्ती सतत बढती जा रही है । वे दोनों कक्ष के बाहर से प्रणाम करवा बस नाचते और सीधे महल के बाहर कप द्वार से पहुंचकर सभी को सांत्वना देते हैं कि वे प्रतीक्षा का मैं अवश्य आऊंगा क्योंकि मेरी सफलता पर इस मानव जाति का भविष्य निर्भर राॅड पलट फिल्म की दोनों के लिए उत्तम बच्चों की व्यवस्था की गई । दो अन्य अश्कों पर अस्त्रशस्त्र की व्यवस्था की गई । अशोक और सवार होते ही कार्तिके तने घोष महाराजा सुतो शिंद्र की जय नीलकंठ प्रभु की जय इस जाॅब

भाग - 04

इसी पूर्व जन्मा संचित ही कहेंगे अथवा ते योग भी कह सकते हैं । जवाब अपने लक्ष्य की ओर परिलक्षित हो रहे हैं । तब अन्य शुभ चिंतक आपके लक्ष्य को अपना पुण्य कर्म अचानकर आपकी सहायता को उपस्थित । इसी प्रकार जब कुमार का टिकेंद्र पलट फेंकी काल विश लाने हैं तो वो कर्सर हुए तो उस समय मणिका भाव पुरी में समस्त सभासदो, प्रबुद्ध चारों वैज्ञानिकों की सभा एकत्र हो चुकी थी । सभा में विचार विमर्श का परस्पर आदान प्रदान पूर्ण रूप से गतिमान था । विचार विमर्श के मूल कारण तो थे प्रथम गई जानकारी उपलब्ध करता की किस प्रकार दिखते काल अस्त्र के प्रयोग की भी थी । पृथ्वी पर महाराज आशुतोष केन्द्र के अतिरिक्त किसी अन्य के पास पहुंची बेटी अब हम किस प्रकार कुमार कार्तिक केंद्र की सहायता करें कि वो काल विश लाने में सफल रहे हैं । किसी विचार विमर्श नहीं । देवदत्त मलिनी कहना प्रारम्भ किया समस्य सभा सकूँ । मैं आप सभी के समक्ष कुछ इस प्रकार के तहत से रखना चाहता हूँ जिससे आप सभी लगभग अनभिज्ञ ही हैं । उन रहस्यों को उजागर करने में आप अपना पूर्ण सहयोग दे, ये हमारी आपसे अपेक्षा है । इतना सुनने के उपरांत महामंत्री विश्वपति अपने आसन से बहुत ही नम्रता के साथ अपने छह परिचित स्वभाव के अनुसार थे और उन्होंने कहना प्रारम्भ किया महाराज आप स्वयं ही संपूर्ण सक्षम हैं और आप स्वतः ही रहस्यों के तहत से ही आप विश्वदेव इतना ही कह पाए थे कि महाराज ने उनको बीच नहीं रोक दिया होती है वो चीज आपने क्या कह दिया दे देते मैं रहस्यों का रहस्य नहीं अब इस तरह की चर्चा न की जाए । महाराज शर्मा परन्तु ऐसा क्यों ना इतना ही वो कह रहे थे कि देवदत्त माडी नहीं पुणा कहना प्रारम्भ किया विश्व तेज जी आपको तो जानना ही चाहिए कि कौन है रहस्यों का रहस्य? इतना कहने के उपरांत देवदत्त मनी शांत हो गयी सभी उपस् थित सभागंज एक दूसरे का मूक मुकाबलो काम कर रहे थे परंतु किसी को कुछ भी समझ नहीं आ रहा था तब होना देवदत्त मणि नहीं कहना प्रारम्भ किया सभी रहस्यों के रहत से आज पृथ्वी पर महाराज आशुतोष ऍम आज भी घायल अवस्था में हैं । एक समय के पश्चात ऍम सर्वाधिक रहस्यों से अधिक रहस्य में हो जाएंगे । उनको वह उन के विषय में केवल वही जान सकेंगे जिनको वो स्वता ही बताना चाहेंगे । ये विषय भी ध्यान रखने योग्य है कि जब कोई श्रेष्ठ व्यक्ति आपातकाल में हो तो उसकी सहायता अभिषेक करनी चाहिए क्योंकि यदि बोसॅन क्षमतावान है तो निश्चित ही अधिक साल तक आपात स्थिति में नहीं रहेगा । तुम को उसकी सहायता करना मात्र तुम्हारे लिए प्रमुख का दिया हुआ एक स्वस्थ सर जो तुम्हारे को लेकर मैं बरसाने के लिए तुम्हें प्राप्त हुआ है । अन्यथा सुरेश तो व्यक्ति आपातकाल को सिख रही छिन्न भिन्न नहीं वाला है । मेरे मतानुसार हम सभी को आती तत्पर्ता से बाराज आशुतोष इंद्रा के कार्य हेतु लग जाना चाहिए । बितता सुनने के पश्चात सेनापति गिरती शौर्य देवनी भी अपना मतलब का महाराज हमें पृथ्वी पर होने वाले उथलपुथल से क्या औचित्य? पृथ्वी वहाँ अन्य जिन लोगों में से होने वाली उस फसल से पहले भी अधिक प्रयोजन नहीं रहा हूँ इसलिए मेरे मतानुसार इतना ही सेनापति कहते थे कि वहाँ मंत्री विश्वदेव नहीं महाराज की ओर दृष्टि डालते हैं । महाराज गिरती शौर्य देव का कथन पूर्व के अनुभवों के आधार पर संभावना सकते ही है । परन्तु जैसा की आपने कहा कि बाहर आज आशुतोष इंद्रा एक दिन इतना ही विश्वदेव कहता आए थे कि महाराज देवदत्त माडी नहीं मुस्कुराने की मुखाकृति इस भारतीय प्रदर्शित की अथवा स्वतः ही अंतर मन के विचारों के कारण वो प्रदर्शित ये तो किसी को पता नहीं था परन्तु उनकी मुखाकृति को देख कर उनके साथ रह रहे प्रमुख विभूतियों को निश्चित ही अनुमान हो गया कि महाराज जो कहना चाह रहे हैं वो सम्भवता हम सभी उसे पूर्ण रूप से समझ नहीं पा रहे हैं । तब तेज पत्ता मणि ने अपनी सभा को संबोधित अप्रारंभ सभा जाऊँ विश्वपति वह कीर्ति शौर्य देव का कथन अक्सर असल सकते तो नहीं है परन्तु सत्य के निकट वर्ष से ही है । मुझे क्या ये सभी को क्या है कि हम पृथ्वी अथवा अन्य किसी लोग में होने वाली घटनाओं से अपना संबंध नहीं रखते हैं । यहाँ पर परिस्थितियां भिन्न है । हाँ महाराज! परन्तु हमारा वहाँ की भिन्न परिस्थितियों से भी क्या संबंध हो सकता है ये संभव तक हम सभी के बस सिस्टर की क्षमताओं से परे । तब महाराज देवदत्त अमाडी ने संपूर्ण सभागार में सभी के ऊपर आपने सेवा फिर रखते हुए अपने दृष्टिकोण को चाहिए । उनकी इस प्रकार की दृष्टिगोचर करने की प्रतिक्त्रिया अनोखी प्रतीत हो रही थी । सभी को ये भी प्रतीत हो रहा था कि जो प्रश्न हम सपने क्या है, क्या वो प्रश्न योग्य है अथवा नहीं? तब देवदत्त मणि ने कहना प्रारम्भ किया सभी प्रबुद्धजन मेरी बात ध्यान से सुने वसंथ महाराज आशुतोष इंद्रा मेरी ज्योतिष गणित, पूर्वानुमान आध्यात्म के अनुसार ही वो पुण्य जीवात्मा युक्त । पर उसने जो आपने अर्जित पुण्यकर्मों के कारण कुछ जन्मों के उपरांत पूर्णता को प्राप्त हो जाएंगे । संभावना मैं सकते नहीं कह रहा हूँ । संभव का ऐसा है कि वे पूर्ण ही हैं और सृष्टि को कर्म की प्रधानता का ध्यान दे रहे हैं तो इस प्रकार के चरित्र को रचित कर रहे हैं । क्या सकते हैं ये उनके अतिरिक्त इस काम में कोई भी नहीं जान सकता । अब आप ही कहे क्या इस समय हमें उनकी सहायता करनी चाहिए अथवा नहीं । किसी से डर की प्रतीक्षा किए बिना पूरा ही कहना प्रारंभ हमें उनकी सहायता तो करनी ही होगी, क्योंकि हम उनकी सहायता नहीं करते हैं बल्कि ब्रह्मणे सहायता का स्वस्थ प्रदान कर हमें कृतार्थ कर दिया । कुछ देर रुकने के उपरांत उन्होंने का यदि हम कोर्ट नीति के अनुसार भी विचार करें तो भी सहायता करनी चाहिए । जो भी कूटनीति की चर्चा हुई तो तुरंत ही कीर्ति सौर्य देव नहीं, अपने विचार नहीं । महाराज बूट नीति कहती है कि हम सहायता इसलिए करें कि दो हमारी समय आने पर सहायता करेंगे अथवा हमारा उनका शत्रु एक ही है । मेरे अनुसार दोनों ही कारण नहीं है । फॅमिली ने कहा, आपका शोध सकते हैं कि दो कारण हो सकते हैं । अनुमान सत्य रही हैं । इतना सुनकर सभी महाराज के उत्तर की प्रतीक्षा होकर बिना प्रश्न पूछे ही करते हैं । तब महाराज गुना खोलना प्रारंभ करते हैं । ऍम आपने कूटनीति के अंतर्गत जो तो कारण सर्वविदित किए, वो निश्चित ही दोनों ही सकते हैं । इतना सुनने के पश्चात सभागार में सन्नाटा सा अच्छा ऍफ नहीं था । अभी सभागार के लगभग सभी सदस्य सेनापति के देश दे देंगे । विचार से सहमत अब जब महाराज ने इंगित किया सेनापति के अनुमान अलग अथवा पूर्ण रूप से सकते नहीं । तब सभी सभा सांसदों के मन मस्तिष्क में नए विचारों अ स्थान है । तो आप क्योंकि सभासद ये तो जानते ही थे । यदि महाराज देवता तुम नहीं कुछ कह रहे हैं तो उसका भी प्रायः निश्चित ही सत्यता की कसौटी पर खरा । अब सेनापति महामंत्री सहित सभी सदा सब महाराज के ऊपर ही दृष्टि प्रहार ये हुए थे । तब अत्यंत उत्कंठा जानकर महाराज ने अपना मन तब के बताया आप सभी डॅाट महाराष्ट्र का राम तो जानते होंगे तो सस्त्र का सृजन अपने ही लोग में किया गया उस महान अस्त्र के संचालन व निस्तारण का ज्ञान पृथ्वी लोग पे केवल महाराज आशुतोष इंद्रा को ही था । उसी अस्त्र से उन पर प्रहार किया गया । इतना सुनने के वर्ष सभी के विचार दिशा अभी सब विचार कर रहे थे कि महाराज आशुतोष इंद्रा की सहायता की जाए अथवा देंगे परन्तु अब विषय परिवर्तित हो चुका है । अब सभी विचार कर रहे थे कि ये किस प्रकार संभव है । सभी को ये जानकर है वो आपको हुआ कि उस अस्त्र का हूँ । किसी के पास भी तोडा नहीं । परंतु गई जानकर कुछ शांति का आभास वो अस्त्र महाराज, आशुतोष इंद्रा यहाँ महल में अब सभी के मन में ये विचार प्रवाहित हो गया कि ये कैसे संभव फॅमिली नहीं कहना हूँ । निश्चित ही आप सभी ये समझते होंगे कि हम अब फिर से छोटे नहीं रहेंगे । महाराज आपसे सहमत हूँ । आप अपना अस्त्र वहाँ से ले आइए और समस्या समाप्त ऍम की सहायता अनावश्यक ही क्यों करें । विश्वदेव ने कहा महाराज नदियाँ आदेश दें तो इस प्रश्न का उत्तर बैठूं । देवदत्त ने स्वीकृति में अपना शीर्ष हिलाया । संभव वो ये भी चाहते थे कि सभी महामंत्री जी के ज्ञान और दूरदर्शिता को जान जाएगा । विश्व देखने का महाराज मेरे विचार से हमें महाराज आशुतोष केंद्र की सहायता इसलिए करनी चाहिए जिससे हमें ये क्या हो जाए कि महाराज आशुतोष इंद्रा के सत्रह को डिब्बे कालस्य का बयान किस प्रकार हुआ? कुछ रुककर विचार करते हैं और उनका कहना प्रारंभ करने के भूत । उन्होंने अपनी आंखों गोल स्कूल आया और इसमें अन्य बहुत सी संभावनाएं ही मुझे अब दिखाई दे रही है । गिरती स्वागत देखने का विश्व तेज यदि संभावनाएं देख रही है तो अभी शिखर उसका रहे उद्घाटन की हम सब प्रतीक्षा से इतना ही कहता है कि विश्वदेव ने पूरा कहना हूँ आप सभी तनिक ऍम विचार मस्तिष्क में एकत्रित नहीं बल्कि वाॅच रहे मस्तिष्क में प्रवाहित होते जा रहे हैं । विचार योग के ये भी है आपके शत्रु के अतिरिक्त क्या कोई और अन्य भी है जिसे इस अस्त्र के विषय में ज्ञान हो चुका है? अन्य विषय इसके साथ ही प्रचालित होता है । ये किस प्रकार संभव हुआ? करन का ध्यान अत्यंत आवश्यक है क्योंकि कारण अथवा वो व्यक्ति तो ज्ञात ही होना चाहिए जिससे इस अस्त्र के विषय का मूल जो रहस्य होना चाहिए को किस कारण? क्या साथ ही मेरा अनुमान है । शत्रु ने आंसू तो सेंटर पर आक्रमण कारण ही नहीं किया होगा । आशुतोष केंद्र और उसके सहयोगियों ने संभावना द्रव्यमान, स्थानांतरण के विषय में ज्ञान प्राप्त कर लिया है । सत्र यदि उनसे वो ज्ञान प्राप्त करने में सफल हो गए तो उन के सत्र के लिए कहीं भी पहुंचना आसान होगा । मेरे विचार से यदि आप आशुतोष केंद्र की सहायता करेंगे तो एक तरह से अपनी ही सहायता कर रहे हैं । यदि सत्तू को वही समाप्त कर दिया जाए और रिश्ते थी, अति उत्तम रहेगा । जिस प्रकार शत्रु भी समाप्त तो हो जाएगा और साथ ही वो कारण भी ज्ञात हो जाएगा कि अस्त्र के विषय का ज्ञान किस प्रकार विदेश साथ ही जब महाराज देवदत्त वाली जी नहीं अपने ज्ञान जो तीस वाद ध्यान से ये ज्ञात कर लिया है तो निश्चित ही बाहर आ जाता तो वो परम ऊर्जा पुंज रहे अथवा जो मैं कह सकता था । मैंने कहा अंत में आप सभी महाराज जैसा उचित जाने वैसा निर्णय ले । इतने विचार विमर्श के उपरांत ये निश्चित हुआ कि महाराज आशुतोष केंद्र की सहायता हूँ ।

भाग - 4.1

अभी भी एक भ्रष्ट शेष किस आया था । किस प्रकार की जाए एक बात निश्चित है । जब कोई प्रबंध ऍन व्यक्ति सभा में अपने विचार रखता है तो ये बुद्धिमान व्यक्ति को ज्ञान हो जाना चाहिए । ये उसके विचार नहीं बल्कि उसका निर्णय, मौत, अपने विचार, धारदार डर को प्रदर्शन, ज्ञान से सभी को सत्र कर देता है की वही सत्य के निकट हैं । वो चाहता तो अपना आदेश भी प्रसारित कर सकता था । परंतु आपने दर्शन पत्तर को से अपनी बात मनवा लेट हो, आदेश देना दोनों में फॅस । आपके दर्शन बयान के सामने नतमस्तक हो जाते हैं तो वे अपना सर्वस्व आप करने, इच्छावर करने को और हो जाते हैं । यहाँ पर भी यही हुआ था क्योंकि महाराज देवदत्त मडी पहले ही कार्तिक केंद्र से मिल चुके हैं और एक सहायक लटक भरेंगे को भेज भी चुके थे । अंतर था सभा समाप्त हो गई और बाद तीन ही वहाँ शीर्ष थी देवरत बढेंगे गिर गए थे । पर विश्व इन तीनों महानुभावों की चर्चा परिचर्चा चलती रही । इधर तेजपत्ता बडी भर्ती केंद्र की सहायता के विषय में विचार विमर्श कर रहे हैं और उधर खाना लगाया हुए कॉलेज अलेक शो का मूल उद्देश्य आपको सॅान्ग कर रही थी । काॅपर घनेन्द्र आधी मुख्य सभी एक साथ जानता हूँ । मालिक के विषय में ज्ञान उन का मूल उद्देश्य गोश्त इनका पूरा पर विषय प्राप्त कर उस पर शासन करना नहीं । इस विषय पर ऍम महाराष्ट्र है । साथ सेनापति होता था । वह महामंत्री फॅमिली मालिक बोलेंगे की कहा कि उन्हें गोश्त नहीं पूरा पर आक्रमण करता है परंतु शासन नहीं । आपको ऍम जान जान चुके बॉल एक शो का आक्रमण मात्र स्थानान्तरण विज्ञान की तकदीर काम करता हूँ के वो तक नहीं थी जिससे आप पलक झपकते ही कहीं भी सब शरीर बन सकते हैं । अब भ्रष्ट यहाँ पर फॅमिली पूरा हो रहा है । सभाकक्ष में सभी विश्वस्त व्यक्ति हो चुके हैं । उसके मन में शंका ऍम पास ही है और वे आक्रमण कर सकते हैं । उसके मन में विचार था कि वे आक्रमण नहीं करेंगे क्योंकि एक बार विश्वास ही समाप्त होते होते बच्चे और भाग्य से यदि प्रभु आशुतोष केंद्र घायल हुए होते तो वह निश्चित ही समाप्त हो जाते । तो पुणा इतनी शीघ्रता से ऊंचा एकत्रित करना और उन आक्रमण असंभव । मनुष्य जब अपने जीवन के मुख्य उद्देश्य में और सफल हो जाता है, तब मन से, विचार से और शक्ति से थोडा तैयार हूँ । उसका आत्मिक बाल भी दुर्बल हो जाता है । ऐसे यदि आपका आपने कलॅर दबाव, शिक्षुता से अपनी मानसिक, वैचारिक, शारीरिक परिस्थितियों पर नियंत्रण पा जाते हैं । जब आपका बाल एक्शन है तब आपको पूरा संयोजित होने में बहुत काल की आवश्यकता होगी । कभी कभी ये काल जीवन काल से भी बेहद हो जाता है । इसी प्रकार वाले क्यों का पूरा शेक रहता के साथ संगठित हो, ऊर्जावान होना, वह पूरा प्रबंध करना लगभग असंभव ही है । इसी प्रकार अलग अलग व्यक्तियों के मन में अलग अलग विचार शंकाएं नहीं । तब सर्वप्रथम कुमार नरेन्द्र नहीं कहना प्रारम्भ किया । सभी श्रेष्ठ मनीषियों को बेहरा । प्रणब मैं आप सभी के सबका अपना विचार रखना चाहता हूँ । यदि इतना ही काॅल सभी देगी, मत्स्य का अति तब खाती हूँ । तब आप ही श्री गणेश चंद्र करें । धन्यवाद । मेरे विचार से उनको आक्रमण कर देना चाहिए था । आक्रमण करने के कुछ कारण हो सकते हैं । नदी कारण होता तब वे अवश्य पूरा भ्रमण करते हैं । नंदेश्वर ने का कुमार मैंने विचार किया था क्यों उनको आक्रमण नहीं करना चाहिए? कारण स्पष्ट था कि जब व्यक्ति अपनी महत्वाकांक्षा और जीवन दोनों के अस्तित्व पर संकट देखता है तब निश्चित ही वो अपने जीवन को सुरक्षित रखने का प्रयास प्रथम ता सुनिश्चित करता है । उसके इस प्रकार के भयंकर प्रतिकार की कल्पना भी नहीं की थी । साथ ही बाल एक राजा अपनी एक आप हो चुका है । उसके साथ ही भी उसके स्वरूप जनता का अवश्य होंगे जो उसे निश्चित ही युद्ध न करने की सलाह देंगे । नंदेश्वर आप सत्य कह रहे हैं कुछ रुककर विचार करने के उपरांत कुमार नरेन्द्र नहीं कहना हो परन्तु क्या मात्र यही एक कारण है? वो युद्ध में हम से भयभीत हो गए हैं । मेरे विचार से कुछ और संभावनाओं पर भी विचार करना चाहिए । इतना सुनने के उपरांत डंडधार ने शिष्टता से कहा अन्य क्या संभावनाएं हो सकती है । सभी लोग विचार करें । कुछ देर शांत वातावरण के उपरांत प्रमुख ही अपने आसन से उठ खडे होंगे और उन्होंने कहना प्रारम्भ किया संभावनाएं तो अंतहीन होती हैं । अंतहीन संभावनाओं पर विचार करना मेरे अनुसार बात समय व्यक्त करना ही होगा । हाँ, कुछ मुख्य विषय हो सकते हैं सम्भवता कुमार घनेंद्र को ये अच्छा प्रदीप नहीं तब भी उन्होंने मुस्कुराते इतने का ही प्रमुख थी । आप मुख्य विषय ही सुझाइए तो माँ संभव है देश शक्ति हो गए हूँ । शक्ति इन ऍम संभव है उनकी संख्या तंत्र कम हो गई हूँ अथवा बे घायल अवस्था में हूँ, नहीं हुआ कुछ जंगेश्वर कुमार के उस कहने के पूर्व ही पूर्व हवा की मैं वार्ता के मध्य में ही बोल पडा । मेरे विचार से ये संभव ही नहीं है क्योंकि उनके खाओ अपने आपकी भर जाते हैं साथ ही संख्या के विषय में भी । दिव्या मार कंटक के महाराज ने जो अवगतकराया उससे अस्पष्ट ही है कि वे अभी भी पर्याप्त संख्या में हैं । तब नरेंद्र मुस्कुराते हुए यहाँ ये संभव नहीं है । अब उन्होंने अपना उद्देश्य परिवर्तित कर दिया हूँ परन्तु लक्ष्य परिवर्तित हुआ हूँ । गणतंत्र के इस प्रश्नोत्तर संबंधित वाक्य का संभव कही कोई समस्या हो सभी एक दूसरे के आपको बाॅन हो करने आती नहीं थी । मुख की आवश्यकता ही कहाँ शेष रहे आती है । जब आप भाव के विषय में परिचर्चा पर विचार करते हैं तब प्रमुख से भी समझ नहीं पाने के कारण बोल पडेंगे । कुमार आपका वाक के निश्चित ही पथप्रदर्शक होगा परन्तु संभावना भावार्थ समझना दुष्कर हो रहा है । प्रमुख सी उनका यहाँ आक्रमण करने का उद्देश्य निश्चित ही उस गोली को प्राप्त करना था जिससे जब विमान स्थानांतरण के विज्ञान को वो प्राप्त कर सके । परन्तु अब तब विमान अ स्थानांतरण के विज्ञान के ज्ञान के विषय के अतिरिक्त एक अगर कुमार ऍम उनके शांत होते ही सभी के मन, मस्तिष्क में अशांति कि आपको प्यार जिसकी तीव्रता की प्रतिध्वनि मुखमण्डल पर अस्पष्ट देख नहीं मुखमण्डल तो इतना स्वच्छता दर्पण होता है कि मन मस्तिष्क में चलने वाले विचार तरंगों से उत्पन्न ऊर्जा का सोच स्पष्ट प्रभाव उसने प्रदर्शित है । मात्र आपको बुक दर्पण देखने की महारत होनी चाहिए । इस प्रकार की तरंगों को प्रत्येक व्यक्ति छुपाना चाहते हैं और इससे बडा शक्ति क्या हूँ कि हर व्यक्ति स्वस्थ, स्पष्ट इसे भाजना भी चाहता है । इसके उपरांत प्रमुख ही अपने आसन से थे और उन्होंने बहुत ही नंबर भावसिंह सभी मेरा विचार ध्यान से नहीं । मैं सदैव से ही कहता रहा हूँ कि प्रभु आशुतोष केंद्र में दैवीय गुणों की हत्या दिखता है । वे ही एक साल के उपरांत सर्वशक्ति बार में परिणीत होंगे । अब मैं अपनी वार्ता आगे बढा रहा हूँ कि कुमार गवेन्द्र में भी अपने पिता के ही सवाल उन दिनों की परिपक्वता उत्साहित होना प्रारंभ हो गई है । इतना ही प्रमुख ही कहता आए थे गणतंत्र नहीं उनसे अनुरोध दिया इन सभी प्रसंगों का समय सम्भवता अभी नहीं । अ तवे मूल विचारों पर ही अपना मार्गदर्शन थे । तब पुनर प्रमुख जी ने कहना प्रारंभ की कुमार गवेन्द्र सत्य कह रहे हैं उन्हीं के कारण मैं अब देश से परिवर्तन के विषय में विचार कर पा रहा हूँ । मेरे विचार से अब वे जब विमान स्थानांतरण तक के साथ कुछ और प्राप्त करने के विचार में लग गए और इस पृथ्वी पर गया इतना महत्वपूर्ण हो सकता है जो रवि मानस थानांतरण के समान अथवा उससे अधिक मूल्यवान और उपयोगी हो । ऍम करना कुमार गणतंत्र नहीं । छठे में तीव्रता से कहा सभी के मुख से लगभग एक समान ही निकल पडा । काल देश, काल विश्व का मालिक इतना ही सबका पाए थे कि भोजन देश ऍम कुमार गणित की जय हो । ऍफ उन्होंने नई दिशा प्रदान की परन्तु साहब था यदि ऐसा हुआ तो अब राष्ट्ररक्षा वह पृथ्वी रक्षा अत्यंत दुष्कर कार्य हो जाएगा । अभी मालिक को निश्चित ही रोकना होगा । नंदीश्वर देगा, कुमार नरेन्द्र की जय हूँ परन्तु सभी पूर्ण रुपेन तथ्य को समझ नहीं पाए तथा भुवनेश्वर जी आप स्पष्ट रूप से समझाएँ । नंदेश्वर जी आपने मुझे अस्पष्ट करने के लिए कहा है । मैं अपना प्रयास करता हूँ शेष प्रभु मेरे अनुसार यदि कुमार ने कहा है तो उन्हें कालवश चाहिए । तब वे ऍम अब पहले से अधिक सचेत वहाँ आक्रामक प्रतीत हो रहे ऍर इसका अर्थ है ये भी नहीं चाहते हैं कि प्रभु स्वस्थ हो । अब ऍफ होता है ये प्रभु ही उनके मार्ग में मुख्य बाधाएं तो आप भी जानते हैं कि यदि कालरेस को प्रभु तक पहुंचने से रोक दिया जाए तो वे युद्ध भी जी जाएंगे और साथ ही उनका लक्ष्य भी पूरा हो जाएगा । सभी रे स्वीकृति से अपना भाव प्रकट दिया । मात्र केंद्र के अतिरिक्त उन के संभाव रहने पर अब वे सभा के केंद्र बन गए । तब कुमार गणतंत्र नहीं कहना ब्लॅक मेरे मतानुसार वो जंगेश्वर जी सकते कह रहे हैं परन्तु ये कहकर बंद हो गए और सम्भवता उन्होंने विचार किया कि आज का बच्ची दम विषयों पर अपना ध्यान प्रकट नहीं करवा रहे हैं जबकि इसके पूर्व विस सतह भी अत्यंत सहित दिशानिर्देशित कर दे रहे हैं । उन्होंने अपने मन को अपनी अंतरात्मा के साथ से सूचित किया तो उन्हें आप खासकर यह संसार में कोई प्राणी ज्ञानी अच्छा बुरा नहीं होता है । जब ब्रह्मा की कृपा होती है तब और कभी की आने की भांति ज्ञान की परिचर्चा करने लगता है और जब उस परम सत्ता की कृपा नहीं होती है तो ग्यारह भी अज्ञानता का परिचय देने लगते हैं । अच्छा मूल तत्व ब्रह्मज्ञान ही है । सब विचार कर रहे थे कि घनेन्द्र क्या विचार कर रहे हैं । तब कुमार ने कहना प्रारम्भ किया एक गुल रहस्य मेरे अनुसार से वो रहस्य हैं । वे मालिक काल विश्व प्राप्त करना चाहते हैं । इतना सुनने के उपरांत उसके मन में व्यंगात्मक पहुंचा ही थी कि कुमार ने का कारण भी नहीं है । करन भी नहीं था । वेस्ट किए कालवश चाहते हैं । यदि वे अस्त्र पर अब का नियंत्रण प्राप्त कर लेते हैं तो सब उनके अनुकूल हो जाएगा । यदि रही प्राप्त कर पाते हैं, बस्तर प्रयोग से वे सुरक्षित हो जाएंगे, तब साल विश्व उनके लिए सुरक्षा कवच बन जाएगा । मेरे अनुसार एक विचार और कर रहे होंगे । ऍम कहते हुए गए और पुनर्शिक्षा ही कहना प्रारंभ दुनियाँ । उन्होंने हम पर आक्रमण तंत्र विचार करने वपूर्ण जानकारी प्राप्त करने के उपरांत ही किया था । तो उनको ये भी ज्ञान होगा ये अस्त्र पृथ्वी पर निर्मित नहीं है । इस प्रकार का एक या अनेक और भी संभव हो सकते हैं । अच्छा पूर्ण रूप से सुरक्षित रहने के लिए वो अपने शत्रु आशुतोष केंद्र की समाप्ति के लिए बाल एक शो के लिए काल विश्व अत्यंत आवश्यक है । इन चर्चाओं के अनुसार वो आपको साथ करने के उपरांत कुमार नरेन्द्र की थी । वह विवेक की सराहना मिलेंगे । परंतु गवेन्द्र की बहुत थी । ये विचार कर रही थी कि अब क्या निर्णय लिया जाए । मालिक निश्चित ही कार्ति केन्द्र के पीछे गए होंगे तो क्या कार्य केंद्र की सहायता है । तू अच्छा यहाँ को श्रृंगा पूरा की सुरक्षा अथवा दोनों की सुरक्षा । यही विचार उन्होंने सभी के समक्ष रखा । कोई भी पूर्ण मिस्टर पर नहीं पहुंच पा रहा था । अभी विचार वचिंत गांव की स्पष्ट रेखाएं मस्तिष्क पर प्रदीप होगी रही थी । इंदूर अभी भी संभावना पूर्ण रूप से नहीं समझ सका रहा । उसके अनुशासन के साथ सब था । जो शो वह चिंता के आधा जलने थी । मैं डावाडोल हो रही थी, उससे कुछ कहने की अनुमति मांगी । उसको प्रवक्त जी ने बिना समय लिए कहने अथवा पूछने की अनुमति प्रदान सम्भवता प्रमुख शी इस ज्ञान से पूर्णतया प्रेस किए थे कि कब किसके बब्बर माँ ज्ञानदायिनी का वास हो जाए । कहना संभावना था अच्छा उन्होंने तुरंत ही इंदौर से अपनी बात रखने के लिए का सभा के सभी श्रीमन वाॅटर जनों को प्रणाम मेरी छू बच छुद्र बुद्धि इस मंतव्य को समझ नहीं पाएंगे । इन वाले को काल विश्व से क्या लाभ होगा? हाँ नहीं, ये तो समझ गया कि कालवश वे प्रभु तक नहीं पहुंचना । इतना ही वह कह सकता था कि गणतंत्र उसे वह सभा को पुन अस्पष्ट करना हो सकता । सभा जरूर चंबा आप में से कुछ मेरी चर्चा का अर्थ नहीं समझ सके । अच्छा मैं पुण्यकाल विश्व के विषय में परिचर्चा करता हूँ । क्या कारण है जो उस काल देश को मालिक हम लोगों से अधिक प्राप्त करने हिंदू ला लाये थे? सम्भवता कुमार गणित क्रमबद्धता को प्राथमिकता दे रहे थे । आप समझे यदि हमने काल विश्व प्राप्त किया तो उसका उद्देश्य प्रभु की जीवन रक्षा है । यदि मालिक सोने प्राप्त किया तो उनके दो दृश्य प्रथम वे काल विश्व को प्रभु तक नहीं जाने देना चाहते हैं जिससे महाराज का अंतर हूँ और उन का वृद्धि पर निष्कंटक आधिपत्य हो जाएगा हुई थी । वो जानते हैं कि ये अस्त्र पृथ्वी पर निर्मित नहीं है । अच्छा अन्य स्थान वो अवश्य ही होगा । जब वहाँ आक्रमण करेंगे तो ये काल विश्व तो उनकी रक्षा करेगा । इतना सुनने के वर्ष सभी मालिक शो के भविष्य अन्वेशन से अत्यधिक हूँ ।

भाग - 05

कार्तिक केंद्र द्वारा लड करेंगे को आत्मत्या महाराज आशुतोष केंद्र की जय हो । ये उद्घोष तो निश्चित ही को सिंगर पूरा को ऊर्जा प्रवाहित करने में सहायक होगा परन्तु नीलकंठ प्रभु की जय का क्या फिर हो सकता है । एस नीलकांत के जयघोष से गोश सिंगपुरा के मुख्य पदाधिकारी किस विषय में चर्चा कर रहे हैं ये वाले क्योंकि सदस्य निश्चित ही पडे था मालिक शो के लिए नीलकंड नवीन नवोदित रचना था । आखिर उन्होंने ये निश्चित कर ही लिया कि नीलकंठ निश्चित ही महाराज आशुतोष इंद्रा के ही समकक्ष ही होगा । किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचते हुए भी मालिक सुपरसंडे देख रहे थे, परंतु मन में नीलकंठ एक व्यापारी की भर्ती प्रवेश कर गया था जिसे न सोचते हुए भी मनुष्य सोचता रहता है । प्रसन्न है इसलिए थे कि अब अपना वेश बदलकर लगातार कार्तिक केंद्र वहाँ उसके सहयोगी के बार का का अनुसारण कर रहे थे । उन्हें अपना कार्य सिद्ध होता हुआ दिख रहा था । उनके कुछ कब प्रचार कार्तिक केंद्रों पलट भरेंगी के सभी पहकर उनका पीछा कर रहे थे । उसके पीछे शेष मालिक कुछ दूरी पर थी । प्रसन्नता का कारण और उस की प्राप्ति की ओर अग्रसर होते पर जो प्रसन्नता उपलब्ध कराती है वो लक्ष्य प्राप्ति के बाद शाहिद होना प्रारंभ कर देते हैं अर्थात मनोकामना की पूर्ति में वो आनंद नहीं होता है जो मनोकामना बोर्ड होने से पूर्व उस कल्पना भी होता है जिस कल्पना में आप उसे पूर्ण मुद्दा देखते हैं । मालिक इस मना स्थिति से प्रसंद थे कि अब कार्तिक केंद्र से और है । काल विश्व हो जाएगा जैसे उन्हें काल देश प्राप्त होगा । फिर भी अजय हो जाएंगे और साथ ही आशुतोष इंद्र का भी अंतर निश्चित हो जाएगा । बस कल्पना मात्र से मालिक सोन प्रसन्न था । रात्रि का प्रथम शहर ही कारण हुआ था कि गुप्तचरों द्वारा ये सूचना प्राप्त होगी कि कार्ति केंद्र में उसका सहयोगी अब संभव का विश्राम हेतु व्यवस्था कर रहे हैं । इतना सुनने के उपरांत बले छोड नहीं आंतरिक विचार विमर्श प्रारम्भ किया । इस वार्ता में मात्र विशेष मालिक रही थी वो । बहुत कम समय में ये वार्ता समाप्त हो गई । सबूत कर जाने को ही थे कि मालिक दम ने कहा हवा महाराज मालिक सोन को संबोधित करते हुए कलेक्शन अमिता कहने के उपरांत शांत हो गया । मालिक सोंधे अपनी एक शेष आपसे उसकी तरफ देखा और अपनी भाव भंगिमा देंगे । प्रदर्शन किया तो उसे कहने वार पूछने की अनुमति है परन्तु शिक्षा था के साथ इस अनुमति के प्राप्त होते ही पूरा बाॅध क्या धन्यवाद महाराज सभी लोग मेरी वार्ता को ध्यान से सुने । वह विचार करें जिस प्रकार अभी वार्ता के मध्य यह तय हुआ एक आर्थिक केंद्र उसके सहयोगी के साथ मिलकर अपना कार्य सत्य करना है । अपने पास एक मात्र ही विकल्प शेष है और वह है किसी भी परिस्थिति में काल विश्व प्राप्त करना । ध्यान रहे या निकाल रिस्ट प्राप्त करने में हम सफल रहे तो निश्चित ही समाप्त हो जाएंगे । यदि किसी के मन मस्तिष्क में कोई विचार हो तो अभी इसकी चर्चा कर ले । अब ये अवसर पूरा प्राप्त होगा । मालिक दो स्वर्ग हो चुके थे । पहला, जब उन्होंने योग पहले पर आक्रमण किया था और दूसरा जब उन्होंने कोशिश इनका पूरा पर आक्रमण किया था । अपने दोनों ही अवसरों में वे विजय श्री के अत्यंत निकट पहुंच गए परन्तु विजय पुरस्कार उन्हें प्राप्त हो सकता है । जवाब अपनी सफलता के बहुत करीब खर्च कर आज सफलता का मुख्य आवलोकन करते हैं । तब निश्चित ही आस्तिकता नास्तिकता में वो नास्तिकता आस्तिकता में परिवर्तित हो जाती है । अर्थात इश्वर को मारने वाला व्यक्ति कहता है कि इस वक्त कहीं नहीं है और इस वर्ग को ना मानने वाला दास भी कहता है कि कहीं कोई अदृश्य शक्ति अठारह ईश्वर ही उसे पराजित कर रहा है या असफल बना रहा है । इस प्रकार रेहता सफलता आपके बोल चरित्र को प्रभावित करने की क्षमता रखती है । अंतर था । उन्होंने अपने निर्णय के अनुसार मुख्य सेना को पोस्ट पर पीछे रखते हुए दस को प्रचार टुकडियों को लगभग समान दूरी पर व्यवस्थित करते हुए कुमार कार्तिक इन पलट देंगी को अपना लक्ष्य निर्धारित दिया । उन्होंने स्वयं गुप्तचर विभाग को इस प्रकार नियुक्त किया की उनकी दृष्टि कुमार वल्लभ हिंदी पर रहे और कुमार वल्लभ भिंडी उन्हें देख ना सकें । अब इस प्रकार की व्यवस्था के उपरांत मालिक होना तैयार आस्वस्त परन्तु पूर्ण सतर्कता थी । मालिक सिद्धम की इस व्यवस्था को देखकर माॅनसून नहीं । आपने मुखा भाव से स्पष्ट किया कि वो व्यवस्था से संतुष्ट इधर मात्र कोर्स भर की दूरी पर कार्य केंद्र पलट देंगी । अब विश्राम करने की व्यवस्था में आ रहे थे । लगभग जी अब कुमार के लिए छोटा परंतु पर्याप्त व्यवस्थित धातु वस्त्र निर्भर कक्ष का निर्माण करते हैं । ये व्यवस्थाएं साथ चल रहे अश्वों पर पहले ही कर दी गई थी । भिंडी ने कुछ ही क्षणों में पर्याप्त व्यवस्था कर दी और कुमार से विश्राम करने के लिए कहा कुमार अब आप विश्राम करें । ताकत काल से अब तक यात्रा के कारण निश्चित थी । आप शारीरिक शीतलता का अनुभव कर रहे होंगे । कुमार ने कहा परन्तु आपने अपने लिए व्यवस्था कुमार इतना ही कह रहे थे कि लटकेंगे ने कहना प्रारम्भ किया नहीं नहीं कुमार ये किस प्रकार संभव है । संभव है और था क्या आप शाम नहीं करेंगे आप भी तो नहीं कुमार ये संभव नहीं । जब प्रभु शाम कर रहे हूँ तो सेवक किस प्रकार विश्राम कर सकता है और यहाँ तो वी आवान वन में जहाँ प्रत्येक दिशा, प्रत्येक जी, प्रत्येक व्यवस्था यहाँ तक कि प्रत्येक आहट शंका उत्पन्न करती हूँ आप निश्चिंत होकर विश्राम करें । जब तक जीवन की डोर से बंधा हूँ तब तक आप के जीवन पर संकट असंभव है । इतना ही लटकेंगे कहीं पाए थे कि कुमार कार्तिक केन्द्र के मन मस्तिष्क में प्रश्नों के हम बाद जो ध्यान लोग कक्ष में लव भेंगी से मेरा नाम भेंट में उत्पन्न हुई थी, भरभराकर मनमस्तिष्क से निकलकर मुकेंद्र अर्था जी वहाँ पर आ गए । उन्होंने अपने मन में विचार किया की इस समय विश्राम करना तो उचित है परंतु शयन निश्चित ही संकट बनना कर सकता है । इस विचार के आते ही कुमार ने लड हिंदी से कहना प्रारम्भ किया आपने जब मुझसे प्रथम गया ध्यान कक्ष में भेज की थी तब आप आप के विषय में अधिक चर्चा नहीं हो सकी थी । तो अब समय है कि आप अपने विषय में मुझे अवगत कराएं । लैट्रिन गिनेगा हूँ मेरा नाम तो आप जानते ही हैं । मेरे विषय में स्वतः मैं भी बहुत अधिक नहीं जानता हूँ । मैं वही जानता हूँ जो मुझे देवा श्री जी ने अवगत कराया है । कांस्य केंद्र ने मुस्कुराते भी का हर व्यक्ति वही जानता है तो उसे अवगत कराया जाता है । इसमें कुछ विशेष नहीं है । मैं भी संभावना वही जानता हूँ जो मुझे अवगत कराया गया है । लेट भरेंगे ने कहा हूँ आप अक्षय नशा हो सकते हैं कुछ रुपये के उपरांत परन्तु आप में वह मुझे एक विशेष अंतर प्रभु अंतर ये है कि आप के विषय में आपके माता पिता, आप के अन्य शुभचिन्तक, वह महल के अन्य प्रबुद्धजन भी आपके जर्मन से अब तक के विषय में जानकारी रखते हैं । ये तो आपने सबसे का परन्तु आप के विषय में भी तो आपके माता पिता व अन्य या लटकाएंगे बीच नहीं बन । नहीं नहीं प्रभु मेरे विषय में बात करते, दूसरी वो आपके विनाश नहीं जानते हैं । मेरे पिताश्री वो किस प्रकार ॅ क्या तुम पहले को सिंगपुरा आ चुके हो । अब तो कार्तिक केन्द्र के मन में विचारों का अम्बार और भी बढ गया । इसके पहले की कुमार कुछ कहते हैं लटकेंगे ने कहना प्रारंभ नदियाँ तो मेरे विषय में देवा श्री जानते हैं तो क्योंकि वे ही मुझे मेरे लोग से लाए थे । कुमार अब और भी आश्चर्यचकित नहीं कि वह किस लोग से आया है । क्या वहाँ कोई अन्य भी है? यदि है तो हो क्यों नहीं आया? पिता श्री से क्या संबंध है अब मन में प्रश्न तो बढते ही जा रहे थे । ऍम हिंदी ने कहा हूँ आप को समय दें तो मैं जो जानता हूँ वो आपको स्पष्ट कर देता हूँ और जो नहीं जानता हूँ उस को जानने के हेतु आपके वहाँ आपके पिता के समक्ष आया । मुझे देवा श्री मेरे लोग से लाये थे । वहाँ पर अन्य लोग भी हैं और वे आने की प्रतीक्षा में तब हूँ की सेवा का अवसर उपयुक्त समय आने पर ही प्राप्त होता है । कुछ मेरे पुण्य संचित रहे होंगे जिसके फलस्वरूप मुझे आपकी सेवा का अवसर शिक्षा प्राप्त हुआ जो वहाँ पर शेष है, वे प्रभु कृपा प्राप्त करने हेतु प्रतीक्षा रखते हैं । देवा श्री मुझे बहुत वर्ष पूर्व की ले आए थे । आप के पिता अर्थात प्रभु मुझे किस प्रकार जानते हैं और हमारा उनका क्या संबंध है ये मुझे याद नहीं । परन्तु देवा श्री ने कहा था कि प्रभु ही संपूर्ण हैं । वहीं पर तुम को अपने जीवन के रहस्य की घूमता का अर्थ स्पष्ट होगा । आपने ये भी पूछा था क्या मैं कभी गो श्रृंगा पूरा आया? मैं कभी कोशिश िंगम बुरा नहीं आया । सत्य था तो ये है कि मैं कभी फिर फिर लोग ही नहीं आया अगर मैं अब यहाँ पर अपने जीवन के रहस्यों के विषय में जानने हुआ हूँ । इन सब चर्चाओं के मध्य का अधिकेन्द्र का वहीं महल की ओर केंद्रित हुआ हूँ । एक का एक उसके मन में एक विशाल नहीं अस्थान आकार पढाना प्रारंभ किया । मान के विचार सामान्यतः जीवन के ऋणात्मक महयोगों के पक्ष में अधिक समर्थन करते प्रतीत होते हैं । आप कितने भी अधिक धैर्यवान ज्ञानवान हूँ, जब काल अपनी कसौटी पर कसता है तब ज्ञान और धैर्य की परीक्षा प्रतिकूल समय पर मन निश्चित ही ऋणात्मकता की तरफ अधिक संभावना देखता है । इसका संभव का ये भी कारण हो सकता है कि जहाँ घटनाक्रम घटित हो रहा होता है । यदि आप वहाँ उपस्थित हैं तो आपका समय वह घटनाक्रम एक साथ घटित होते हैं । जब आप वहाँ पर उपस् थित नहीं होते हैं । तब आपका मन मस्त इस घटनाक्रम की गति से अधिक तीन प्रगति से चलना प्रारंभ करना है । ऐसी कारण जो अभी घटित नहीं हुआ होता है, मैंने उसको मारने के लिए बुद्धि के डर को बता हार करता है । अंततः जो नहीं हुआ होता है, मन मस्तिष् उसको मानने लगते हैं । जब कार्ति केंद्र महल में थे, तब उन्हें सामान्य तार इतनी शीघ्रता न थी, जितनी अभी प्रार्थन से निकले हुए हैं । एक ही दिन व्यतीत होने पर हो रही है । उन्होंने लड भिंडी से अपने मन की व्यथा कहना उचित समझा । आप से मैं कुछ कहना चाहता हूँ आप स्वामी है प्रभु आप आदेश करें, नहीं आदेश नहीं । मैं कुछ कहना लादा प्रभु आप मुझे सेवक ही रहे थे । मेरा स्थान वही है । आप केवल आदेश करें । यदि मैं आपका आदेश पूर्ण करूँ तो मैं अपने जीवन को धन्य मानूंगा । अच्छा हमें अभी महल से निकले हुए मात्र एक ही दिन वैदिक हुआ है । परन्तु ये कहकर कार्ति केंद्र शांत हो गए । श्रेष्ठ वही है जो आपने स्वामी के मुखमण्डल से उसके अंतर्दशा का सत प्रतिशत सही आकलन करें । लड फेंकी गई होते ही समय में आकलन कर लिया कि कार्य केंद्र बहल में चल रही समस्याओं से चिंतित हैं अथवा हो सकता है कि वे काल विश्व के प्रति चिंतित हूँ । तब उन्होंने कुमार से क्या आप कल विश्व को इतना ही कहता है कि कार्यक्षेत्र ने कहा नहीं कालवश चिंता का विषय नहीं । कालवी लाने से मुझे कोई नहीं रोक सकता हूँ । बहन तो ये कहकर बहुत हो गए । लगभग जी अब उनके मन के विचारों को पढ चुके थे । उन्होंने पूरा कार्तिक केंद्र से कहा, कुमार आप संभव कब? पिता वह माता को लेकर चिंतित हो रहे हैं । या तो विलंब हो गया और ये कहकर लटकेंगे रुक गया । परंतु कार्ति केंद्र नहीं, कुछ भी नहीं होता । अब लेट करेंगे । पूर्ण रूप से समझ चुका था कि कुमार प्रभु वहाँ के विषय में चिंतित थे । डबलर भेंगी ने कुमार से कहा हूँ, आप अपने आप को पहचानने प्रभु आप जिनकी चिंता कर रहे हैं, एक समय पर शायद उन का चिंतन करने से समस्त चिंताएं समाप्त हो जाया करेंगे । वो स्वतः चिंता हारी हो जाएंगे । ऐसा उससे देश जी ने कहा था । आपको मैं रहस्य की बात बताता हूँ । जब मुझे के पता चला कि प्रभु आशुतोष इंद्रा को दिखते काल अस्त्र से प्रहार हुआ है तब मैं निश्वित रह गया । मैं ही नहीं देवा श्री भी अत्यंत विस्मित । वह चिंतित हो गए थे । उनके अनुसार उस वस्त्र का दोनों असंभव था । कार्तिक केंद्र ने कहा असंभव की पिताश्री को पहले शल्यचिकित्सा विधि से प्रतिरोधक खोल ये कहकर वो शांत हो गए क्योंकि संभावना का केंद्र को ये इस प्रति हुआ आया था की ये घटना तो लड करेंगी जानता ही है । अब जो लाॅन्ड्रिंग कहना प्रारम्भ किया तो कार्य केन्द्र के चक्षु दीर्घाकार हो गए । कुमार उस प्रतिरोधक खोल का समय बहुत छोटा था । सम्भवता वो समाप्त हो चुका है । कार्तिक केंद्र तीव्रता के साथ अपने आसन से खडे होते हुए कब समाप्त हुई वो थी आप व्यर्थ चिंता न करें । तो जब मैं बातें श्री आपसे मिलने आए थे तभी वो अवधि समाप्त हो रही थी । अब मैं आपको एक रहस्य बताऊंगा और आपसे एक रहस् से पूछूँगा । पहले आप एक रहस्य ध्यान से सुने । रहस्य ये है कि मैं सौभाग्यशाली क्योंकि मुझे इस कार्य के लिए चुना गया । जिस कार्य के लिए मुझे चुना गया है वो कार्य अवश्य ही सिद्ध हो होगा । इसको इस प्रकार भी कर सकते हैं के कार्य तो सिद्ध है ही मात्र उसका घटनाक्रम प्रदर्शित करना है । ऍम मैं स्पष्ट रूप से समझा रही । तब लटकेंगे ने स्पष्ट किया कि जो प्रभु आशुतोष इन कार्य वकाल की सीमा से परे हैं, हम उन का कार्य क्या सिद्ध करेंगे । हम साधन बात सही है । ऍम उससे कहा था कि कार्य तो पूर्वनियोजित ही है और अब ये सब प्रभु की लीला है । ये सुनने के उपरांत कार्तिक केंद्र मंद मंद मुस्कराने लगे । तब लाॅन्ड्रिंग जीने का केंद्र से क्षमा मांगते हुए कहा प्रमुख शाम निश्चित ही आप मेरी किसी अज्ञानता पर उसको रह रहे हैं । आप मेरा मार्गदर्शन करें, नहीं नहीं ऐसा नहीं है । आपने जो कहा है हो सकते हैं मुझे इसका आंशिक खान है और इसी कारण ये मेरे लिए रहस्य नहीं । आप मुझ से कुछ रहस्य जानना चाह रहे थे । इतना ही कहना मात्र था की लडकी सिंगिंग प्रणाम करने की मतलब कार्तिक केंद्र से कहा आपके पिता श्री नहीं आपको योग के विषय में ज्ञान दिया है और आपको उसका अनुभव भी कराया है । क्या दिया पूछे जाने और प्रभु की आपने ताज पर कृपा हो तो उस ज्ञान से कुछ आंशिक ज्ञान मुझे भी प्रदान करने की कृपा करें । इतना सुनने के उपरांत कार्तिक केंद्र नहीं अपने नेत्रों को बंद कर लिया । लगभग दो घडी तक भी शांतभाव से एक ही मुद्रा में बैठे रहे हैं । एक बार तो ऐसा प्रतीत हुआ कि वे मित्रा में है परंतु दूसरी क्षण प्रतीत हुआ कि वे ध्यान वहाँ समाधिस्थ हो चुके हैं । समाग्री पवित्रा दोनों का संबंध करन शरीर से होता है । दोनों बाहर से एक सवाल दिखाई देते हैं परन्तु दोनों में सब और असद के सवाल नहीं रहता है । समाप्तिकाल में वासुदेवन सरवन ऐसा ध्यान जान कर रहे हैं । दो । ज्ञान स्कूल शरीर सुक्ष्म शरीर कारण शरीर के साथ अंतर्रात्मा को प्रकाशित वह प्राणों को ऊर्जावान करता है । नेतृत्वकाल में वृत्तियां अविद्या में लीन हो जाती है । सब आधिकार में दस वो इन्द्रियाँ पांचों प्राण वन मन बुद्धि की गति स्थिर हो अपनी चंचलता का परित्याग कर देती है । नेतृत्वकाल में प्राणों की मन की वह बुद्धि की गति विद्यमान रहती है इसलिए नेत्रा के समय सब आप ही होते हैं । दो गाडी के उपरांत कार टिकेंद्र ने अपने नेत्र को खोला और बोलना प्रारम्भ किया । नंबर के प्रेरणा से मुझे ये संकेत प्राप्त हुए हैं की मैं आप कुछ ज्ञान देने का प्रयास करेंगे । इसका कारण सम्भवता विकाश में ही है । इतना कहने के उपरांत उन्होंने उस ज्ञान योग को लग भिंडी को प्रदान करने ही दूँ । अपने आपको मानसिक वहाँ आध्यात्मिक रूप से तैयार किया । अब उन्होंने कहना प्रारम्भ किया मेरे पास संपूर्ण ज्ञान नहीं और ये ज्ञान जो मैंने अपने पिताश्री से प्राप्त किया है वो आंशिक ही है । डॅडी ने कहा हूँ अंधकार में अत्यंत छूट दी । बस का महत्व मात्र अंधकार में खडा व्यक्ति ही जान सकता है । फिर आपका ध्यान तो इतना कहने के उपरांत एक्शन के लिए लड टिंकी शांत हो गए । कुछ विचार करने के उपरान्त पुनः कहना प्रारम्भ किया हूँ । जब मैं आपके साथ आने हेतु पृथ्वी लोग पर आया तब देवा श्री ने मुझसे कहा था कि मुझे अपने प्रश्नों के उत्तर वही प्राप्त होंगे । संभव का उसका समय हो गया है । आप से मेरा एक अनुरोध हैं । इतना ही कहता है लडकी देंगी । दोनों हाथ जोडकर खडे हो गए और उन्होंने कहा हूँ यदि आप अनुरोध करेंगे तो मुझे आप सर्वप्रथम मेरी संपूर्ण बात सुन लें । इसके उपरांत ही कुछ गए । आप मुझे प्रभु ला कहाँ करें । आप मुझे कुमार ही गए, कुछ क्षण लटकेंगे, विचार करते रहे और तब बोले छुआ क्या प्रभु फिर आप नहीं प्रभु कहा शमा कुमार क्या अपने अपने प्रश्न पूछे परन्तु ध्यान रखा की संपूर्ण ज्ञान बाट पिताश्री के पास ही है और मैं तो जानता हूँ वह स्पष्ट करने का प्रयत्न करूंगा । तब लड्डू भिंडी ने अपना पहला भ्रष्ट क्या? हमारा संबंध ऍम समय से किस प्रकार होता है? पार्टी केंद्र कुछ विचार करते होगे । आप का प्रश्न बहुत ही बेहतर वशिष्ठ है । इस प्रश्न के उत्तर के लिए सर्वप्रथम हमें अपने आप को जानना होगा क्योंकि आपने अपना हमारा संबंध काल के साथ जाने की इच्छा अभिव्यक्ति की है । सर्वप्रथम हमें ये जानना होगा कि शरीर वर्ष दीदी जी बात दो अलग अलग सर्वथा भिन्न विभाग है । एक चढ नाशवान है, विकारी प्रतिक्षण परिवर्तनशील निरंतर सहज निपटती है । एक चेतन है अभी नाशी नेट स्वीकार है, अब परिवर्तनशील है निरंतर सभी को प्राप्त हैं शरीर जिसको सामान्यता एक माना जाता है वो भी तीन प्रकार का होता है इस स्कूल शरीद, सूक्ष्म शरीर वह कारण शरीर, स्कूल, शरीर, भोजन, चल आदि से दीपित रहता है । सूक्ष्म शरीर पांच काॅपियों, पांच कर्मेंद्रियों पांच कारणों, एक मन वो आपत्ति से मिलकर बना होता है

भाग - 5.1

इतना ही मात्र सुनने के उपरांत लाट भरेंगे के भाव हम यह बात स्पष्ट थी क्यों उसे सभी तथ्य अभी समझ नहीं आए थे । अब कार्तिक केंद्र नहीं रोकना ही उचित समझा । कुमार के रुकते ही लड भरेंगे ने अपने प्रश्न रखना उच्च समझा को बार कुछ तथ्य में अपनी छतरपुर थी, बस विज्ञान के कारण समझ नहीं सका या दिया आप उसे फोडा तैयार अस्पष्ट करें तो आपके महान अनुकंपा आपके सेवक पर होगी । आप जोर समझ सके हूँ से स्पष्ट करें । इतना सुनना क्या था कि लटकेंगे ने द्रुतगति से छोटे बालक के समान प्रश्नों के हम बाद लगना प्रारम्भ कर दिया हूँ । इतना सुनते ही कुमार ने अपनी भौं सिकोडी तो तुरंत ही लड करेंगे नहीं । उन्होंने कहा क्षमा कुमार आप मेरी स्वामी के पुत्र है । आप से मैं ज्ञान अर्जित कर रहा हूँ । दोनों ही प्रकार से आप मेरे प्रभु ही हुए । गुरु को प्रभु वह माता पिता से भी अधिक श्रेष्ठ माना गया है । आप मुझे प्रभु ही कहने दे । कार्य केंद्र अपनी आंखों को गोल गोल घुमाते हुए जैसे ये विचार कर रहे हो की बात तो सही है । मेरे एक प्रश्न का उत्तर तो अच्छा रहने दो तो मैं जो उचित लगे वही करो अपने प्रश्न पूछो हो भाग के कुमार हूँ । इतना सुनते ही कुमार पूरा मुस्कुराने लगे । मुस्कुराते हुए कुछ नहीं कहा बस मुस्कुराते रहे । कुमार प्रभु शरीर के प्रकार को यदि आप उचित जाने तो ठीक से स्पष्ट करेंगे फॅार प्रतिक्षण परिवर्तनशीलता अस्पष्ट नहीं है । जो अपने स्कूल शरीर के लक्षण बताए लेटर भरेंगे । जी जड को समझना तो अत्यंत ही सरल है । ज्यादा अठारह जिसमें आपने कारण गति हो । आपने कारण परिवर्तन हो, स्कूल शरीर से यदि चेतना निकल जाए जैसे हम जीवात्मा कहते हैं तो स्कूल शरीर की गति अथवा उसकी क्रियाशीलता था । सब आप तो हो जाएगी । इस पर उन्होंने देखा के भरेंगे जी के बुक पर अस्पष्ट प्रश्न रेखाएं तो भर रही हैं । तब कुमार ने बिना प्रश्न सुने ही चार लिया कि वे क्या कृष्ण करना चाहते हैं और आगे कहना प्रारम्भ किया । कुमार ने कहा सम्भवता आप विचार कर रहे होंगे कि बिना चेतना के भी शरीक अक्षय होता रहता है । ये भी तो क्रिया ही है । ये सुनकर लड फ्रेंकी नहीं स्वीकृति में मुख्य लाया । तब कुमार ने बहुत ही उत्तम विधि से स्पष्ट किया शरीर का बडों प्रांत अक्षय होना एक प्राकृतिक क्रिया है । डोकरिया शरीर द्वारा ना होकर प्रकृति द्वारा हो रही है । शरीर जिन पंच तत्वों से मिलकर बना होता है उन सभी में पुनर्विनियोग चित हो जाता है । अब प्रतिक्षण परिवर्तनशीलता को ध्यान से समझो । इस स्कूल खरीद के मुख्यतः छह परिवर्तन होते हैं बहुत पन्ना होना, अस्पष्टता, दृश्य होना, बदलना बढना, घटना और अन् तथा नष्ट हो ना शिक्षुता के साथ जिससे क्रम पंगा हो गए । लटकेंगे ने तुरंत कहा कुमार प्रभु ये छा परिवर्तन में बदलना तो बढ ने वह घटने का भी भाग प्रतीत होता है यदि इसे आप कुमार ने मुस्कुराते हुए कहा जरा विचार कीजिए कि जब एक युवा व्यक्ति की कुछ वर्षों तक युवावस्था ही रहती है, परन्तु उसकी आकृति में चेहरे में परिवर्तन, अस्पष्टता प्रतिफल आता है । ये अतिरिक्त विषय है कि हमारी आंखें और स्पष्ट परिवर्तन को प्रतिदिन परिलक्षित नहीं कर पाती है । धीरे धीरे कुछ वर्षों के उपरांत ये परिवर्तन स्पष्ट रूप से प्रदर्शित होने लगता है हूँ । मैं समझ गया अब पांच प्राणों के विषय में ठीक है, सूक्ष्म शरीर का भाग है । पांच प्राण कांड समस्त जीवन स्थल शरीर का आधार है और सूक्ष्म शरीर का भाग है । प्राण ऊर्जा है, शक्ति है, तेज है गति इन सभी से अधिक कांड तीनों शरीर स्कूल स्वच्छ व करन का जीवात्मा से संपर्क सूत्र है वो डोर है जिसके बाद धर्म से शरीर जीवात्मा के साथ संशोधित रहता है । प्राणों के नियंत्रण वार समन्वय से हम अपने स्कूल शरीर के जीवनकाल को बढा सकते हैं । साथ ही स्कूल शरीर के अनियंत्रित क्रियाकलाप से प्राणों का नियंत्रन वक्त समन्वय कम हो सकता है । जैसे जैसे ज्ञान चर्चा आगे बढ रही थी, भिंडी को इस वार्ता से यह स्पष्ट होने लगा कि ये प्रभु आशुतोष केंद्र की ही कृपा है अथवा इतना ज्ञान एक किशोर कुमार नहीं, एक ही क्षण के उपरांत बन के विचार परिवर्तित हो गए । हो सकता है कि प्रभु पुत्र को ज्ञान प्राम्भ के द्वारा ही प्राप्त हुआ हूँ अथवा प्रभु आशुतोष केंद्र की ही कृपा हूँ अथवा सोचने से किसी विशेष निष्कर्ष पर लगभग रिंकी न बहुत सकता परन्तु उसे तो मात्र अपने ज्ञान प्राप्ति से अर्थ था वो एक एक विषय वहाँ ओप्पो विषय को अत्यंत ध्यानपूर्वक ग्रहण कर रहा था । कुमार ने कहा कुछ विचार कर रहे हो, क्या नहीं आप बहुत ही स्पष्ट कह रहे हैं प्रभु आप कहना जारी रखे ये पांच प्राण स्कूल शरीर को किस प्रकार प्रभावित करते हैं । गेम के प्रकार जानने के साथ साथ आप स्वता जान पाएंगे । इनके प्रकार है प्राण, अपान, व्यान, उदान और सामान । पांच अन्य उपग्रहण भी हैं परन्तु अभी मैं मुख्य पांच विषय में चर्चा कर रहा हूँ । सभी प्राणवायु के रूप में जीवात्मा के साथ ही प्रवेश करते हैं । जब जीवात्मा शरीर का त्याग करती है तो साथ साथ प्राण भी शरीर का त्याग करते हैं । ध्यान रहे प्राण सुक्ष्म शरीर का भाग है और जीवात्मा आत्मा का भाग है । आत्मा परमात्मा का अंश है । एक विचार से देखें तो प्रतीत होगा की सभी कुछ परमात्मा का अंश है । कार्ड निर्वास में नहीं होता क्योंकि वहाँ वायु नहीं है । आत्मा और परमात्मा तो निर्वात में भी हैं की बात मैं वहीं पर सक्रिय हो सकेगी जहाँ प्राण ऊर्जा हो । प्रथम प्राण कार्ड है जो नासिका से है तब तक निवास करते हैं । इसकी ऊर्जा नासिका से हृदय तक प्रवाहित होती है । मात्र शुद्ध वायु ही इस कारण का पोषन नहीं करती है बल्कि प्रतिरोधक क्षमता, अनुशासित जीवन, आत्मबल, व्यायाम, प्राणायाम भी प्राणों को शक्ति प्रदान करते हैं । ऐसा प्रवाइड अनेको बार उपस् थित हुआ कि स्वस्थ वायु और शुद्ध भोजन करने पर व्यक्ति की प्राणशक्ति कमजोर थी और इसके विपरीत व्यवस्था पर प्राणशक्ति मजबूत थी । द्विती प्राण हाँ, जो लाभ भी से पैरों के तलवों तक को प्रभावित करता है । याफान प्राण निष्कासन प्रक्रिया को वे नियमित करता है । कृति प्राण व्यान जो संपूर्ण शरीर में नाडियों के माध्यम से फैला हुआ है । नाडियों की मुख्य ऊर्जा को प्रोत्साहित करने के कारण ये प्राण अत्यधिक महत्वपूर्ण उसके लिए होता है । जो योगी पुरुष हैं जिनको सभी नाडिया स्वच्छ चाहिए । चतुर प्राण होता जो उच्च आरोही ऊर्जा क्रमशा बढने वाली है । ये है वैसे मस्तिष्क तक प्रवाहित होती है । इसके नियंत्रन से शरीर अत्यंत भारहीन हो जाता है । आप जल अथवा वायु में चलने की संभावना प्राप्त कर लेते हैं ये मृत्यु को अर्थात प्राण बच्ची वह आत्मा को नंबर अंदर से निष्कासित करने में संपूर्ण सहायता करता है । इस प्रकार प्राण त्यागने में तीनों शरीर को कष्ट नहीं होता है और और क्या हूँ अपूर्ण अस्पष्ट कर रही थी अब आप मेरे को वो भी हैं । बिना कुछ प्रत्युत्तर दिए हुए कुमार ने कहा और जब पुनर्चलन होता है तो पूर्व संस्कृतियों के रहने की संभावना रहती है । आश्चर्य से लड करेंगी ने पूछा पूर्वजन्म की इस प्रतियां था क्या पूर्वजन्म की स्मृतियां शेष रह जाते हैं? इस पे रेतिया शेष रह जाती हैं परन्तु संभावना लगभग नगर नहीं है । कुछ देर शांत रहने के उपरांत लग फेंघे ने पुनर्विचार किया के अभी कुमार कह रहे थे कि पूर्वजन्म की इस बेटियाँ संभव है और अभी कह रहे हैं की संभावना नगर नहीं है । वास्तव में जब विषय गंभीर ही नहीं बल्कि आध्यात्मिक होता है तब आप मात्र ज्ञान से ही नहीं सीख सकते हैं । ज्ञान से आप लिख सकते हैं, प्रवचन कर सकते हैं, विवेचना कर सकते हैं परंतु सब निरर्थक है क्योंकि ये ज्ञान बात उस प्रकार ही है जैसे स्वयं प्रयोगशाला में प्रयोग न करने पर परीक्षण का वास्तविक ज्ञान नहीं आता है । समय आने पर पर एक्शन ज्ञान न होने से आपका सफल हो जाते हैं । ये आध्यात् प्रदर्शन नहीं है कि आप अपनी बौद्धिक क्षमता से इसको अस्पष्ट करें । अध्याय आपकी शारीरिक तीनों शरीर क्षमता से परे हैं । फिर प्रश्न हुआ थी जब शारीरिक क्षमता से परे हैं तो किस प्रकार उसको प्राप्त किया जा सकता है । उसको सुनकर ज्ञान वृद्धि से नहीं प्राप्त किया जा सकता है । प्रत्युत सुनकर उपासना से जान सकते हैं । उपासना से आपकी आध्यात्मिक ऊर्जा बढने लगती है । आध्यात्मिक ओरछा पडने से प्राणों को बाल प्राप्त होने लगता है । बढता हुआ अध्याप्ति पाल पांचवें कार्ड अर्थात सामान प्राण को जो हिरदय से लाभ ही तक प्रस्तुत थे को उचित करता है । छमाहण प्राण का प्रभाव मणिपुर चक्र पर होता है । मणिपुर चक्र के ऊर्जावान बच्चा कृत होते ही शरीर के भीतर शुद्ध ज्योति प्रज्वलित होने लगती है । ये सक्रिय ऊर्जा फिरते तक पहुंचकर राहत चक्र को ओरछा प्रदान कर उसे जागृत करती है । यहीं पर चार कर कार्तिक केंद्र रुक गए और उन्होंने लटक भेंगी को अस्पष्ट । क्या इसके आगे विषय अत्यंत गंभीर है अथवा मुझे भी स्पष्ट नहीं है? तब लाट भृंगी ने कहा प्रभु कुमार इसका अर्थ हुआ कि अब पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रभु का ही सहारा है और सहारा हो भी क्यों ना, वही तो हैं इस प्राम्भ हांड के रहस्यों के रहस्य । अच्छा कुमार अब मैं स्कूल शरीर, वह सुक्ष्म शरीर के विषय में जान गया । शेष रहस्य वह ज्ञान महाप्रभु ही बताएंगे । तो अब आप कारण शरीर के विषय में बताइए । कुमार ने कहा ठीक है । अब आप कारण शरीर के विषय में समझे । सशक्ति अवस्था को कारण शरीर माना गया है जो बुद्धि का विषय नहीं है । इस पर प्रकृति स्वभाव उपस् थित रहता है । जिस प्रकार एक गाय जिसको आप प्यार से सहलाते हैं तो वह भी आपसे दुलारती हैं । वहीं पर दूसरी का है । जब आप उस पर हाथ लेते हैं तो वो आप पर आक्रामक हो जाती है । दोनों कायों का ये भिन्न स्वभाव सभी को स्पष्ट है । इसी प्रकार सभी का कारण शरीर होता है । अब तीनों प्रकार के शरीरों का मैंने वर्णन कर दिया है, जो मैं जानता था । कुमार कब हूँ आपकी दयादृष्टि सादा ही मेरे ऊपर किसी प्रकार बनी रहे आपका ज्ञान निश्चित ही मनुष्य तो क्या चलिए छोडिए प्रभु आपके ज्ञान से बैठ कृतार्थ हो गया । अब आपका प्रश्न शरीर का काल के साथ संबंध इसको समझो । स्कूल शरीर का परिवर्तन प्रतिक्षण होता है और इसमें परिवर्तन प्रतीत भी होता है । अस्पष्ट परिवर्तन प्रतिक्षण होने पर भी वह प्रतीत नहीं होता है । एक कालखंड के उपरांत अस्पष्ट परिवर्तन प्रतीत होता है । इसी प्रकार सुक्ष्म व कारण शरीर में भी परिवर्तन होता है । सुक्ष्म शरीर, इंद्रिया, मन, बुद्धि, प्राण सभी एक समय के बाद परिवर्तित हो हो जाते हैं । लटकाएंगे नहीं कहा कुमार प्रभु मैं प्रश्न यहाँ अवश्य मुझे ऐसा भ्रम था कि स्कूल शरीर शिथिल होने पर इंद्रिया मन बहुत थी । वह प्राण शिथिल हो जाते हैं । क्या यह सत्य नहीं है? कुमार ने मुस्कुराते हुए कहा लगभग करेंगे जी । आप के अनुसार यदि शरीर शिथिल हु तो सूक्ष्म शरीर परिवर्ती थी ना हो झील प्रभु ऐसा नहीं है । बाल्यवस्था युवावस्था अथवा वृद्धावस्था में भोजन की रुचि, सामान अथवा अलग अलग बाल्यावस्था में रुचियां अलग बोझ मुझे पदार्थों में होती है । युवावस्था में अलग अर्थात स्वास्थ्य केंद्र में परिवर्तन अस्पष्ट है । किसी प्रकार शब्द, अस्पष्ट डब्बे, वगंधा की ज्ञानेन्द्रियां वह कर्मेन्द्रियां भी परिवर्तित हो जाती हैं । ये शरीर की शीतलता पर निर्भर नहीं करती है । इसी प्रकार बचपन की बना अवस्था, युवाकाल की मनाई स्थिति वन तकाल की मनाई स्थिति में अंतर अस्पष्ट दृश्य होता है । हम कह सकते हैं कि कालका स्कूल शरीर के साथ स्कूल शरीर पर पूर्णतया प्रभाव प्रदर्शित होता है । अब कारण शरीर के विषय में विचार करते हैं । करन शरीर का संबंध है आपकी सोनू शक्ति अवस्था से । आप की प्रकृति आपके स्वभाव से जवाब युवावस्था में स्वस्थ देखते हैं तो अपने आपको युवा देखते हैं । जब बाल्यावस्था में स्वच्छ देखते हैं तो अपने आप को बालक और जब वृद्धावस्था में इस वक्त देखते हैं तो अपने आप को वृद्ध देखते हैं । स्वथ्य में आपने तीन रूप अलग अलग कालखंडों में अलग अलग दिखाई देते हैं । बाल्यवस्था की आदत है जो व्यवस्था में और युवावस्था की प्रकृति वृद्धावस्था में परिवर्तित हो जाती है तथा इस प्रकार तीनों शरीर समय से प्रभावित होते हैं । लेकिन भिंडी ने कहा कुमार प्रभु ऐसे अस्पष्ट हुआ कि तीनों प्रकार के शरीर काल से प्रभावित रहते हैं । निसंदेह अब लट्ठ देंगी । मन ही मन विचार करता हुआ कुछ संकोच करता है । संकोच का कारण उसकी अपनी अज्ञानता हो सकती है अथवा उसकी ये अज्ञानता भी हो सकती है कि अब जो उसके मन मस्तिष्क में प्रश्न है, क्या उसका उत्तर कुमार दे पाएंगे? भ्रष्ट पूछने वाले व्यक्ति को निश्चित ही ये मर्यादा रखनी चाहिए कि उसका प्रश्न किया है क्या उसका उत्तर संभव है? इन्हें विचारों के बस थे, लटक रहेंगी । ये भूल गया कि वह प्रभु की कृपा से ही कुमार के साथ है और उन ज्ञान रहस्यों को जान रहा है जिसको जानना लगभग असंभव सा है । फिर अपने मन को दृढ करते हुए उसने अगला प्रश्न पूछ ही लिया । को बार कब हूँ? देहान् तार के उपरांत शरीर समाप्त हो गया । तब पुण्य और पाप कर्मों का भूख कौन करता है? सुख और दुःख का भोग तो शरीर ही करता है और अब वो समाप्त हो चुका है । कुमार मंद मंद मुस्कुराते हुए कहते हैं, अभी आपके प्रथम प्रश्न का उत्तर शेष है और आपने? दूसरा प्रश्न अब आप हूँ । मुझे प्रतीत हुआ की प्रश्न का संपूर्ण उत्तर हो गया है । अभी प्रथम प्रश्न में मात्र शरीर पर ही चर्चा हुई थी । जीवात्मा के साठ साल का संबंध शेष था । अब मैं तुम्हारे दूसरे प्रश्न के उत्तर के साथ ही जीवात्मा के विषय में चर्चा करता हूँ । लटकेंगे ने बात तो छोटे बाला कि भारतीय संस्कृति में अपना शीर्ष हिलाया । तब कुमार ने पुनः कहना प्रारम्भ किया यहाँ विषय तनिक गंभीर है । जब देहांत और होता है तब एक तेज त्याग वह दूसरा दे । प्राप्ति के बीच का समय भी अत्यंत महत्व होता है । स्कूल शरीर के समाप्त होने से सूक्ष्म शरीर कारण शरीर समाप्त नहीं होते हैं । सूक्ष्मा व कारण शरीर जिनमें कोनो बदोश आ चुके हैं वे अपने कर्मों के अनुसार अलग अलग लोगों में जाकर सब वादुक को बोलते हैं । वे की बात माँ के साथ रहते हैं । जीवात्मा भी इसका अर्थवर्क जिम आत्मा भी सुख दुख रोकती है । जो चेतना है, निर्गुण, निराकार, अविनाशी निर्विकार है वो सुख दुख से बहुत दूर है बल्कि गुणदोष, पुणे वहाँ आपसे भी उसका कोई संबंध नहीं है । वो आत्मा का अंश है और आत्मा पर बात । आकांशा जब पर बात नही निर्विकार है तो आपका फिर ने स्वीकार हुई और जब आत्मा निर्विकार है तो विवाद भी ने विकास भी वो काल से परे हैं । लड करेंगे ने कहा जीवात्मा काल से परे किस भांति बीस में बोलना प्रारंभ कर दिया । कुमार का समय एक खंड है । जब काल अथवा समय भी प्रारंभ नहीं हुआ था तो पाँच अपना था । इतना प्रकाशनाथ जीवन अपमृत्यु तब एक ऊर्जा उत्पन्न हुई और उस ऊर्जा से ओमकार नाथ उत्पन्न हुआ जो पर बात पर है । वो काल से पूर्व था और काल के पश्चात भी होगा । परमात्मा वही है जिसने उस ऊर्जा को उत्पन्न किया और उनका नाथ की गूंज संपूर्ण जगत के प्राप्त हुई । जब परमात्मा काल से परे है तो आत्मा बच्ची बातें कभी काल से परे हैं था । अखबार अकाल से कोई भी संबंध नहीं है । ये था आपके प्रथम प्रश्न का उत्तर अब तो इतने प्रश्न पर मैं वापस आता हूँ । सुखों का कारण शरीर जीवात्मा के साथ रहते हुए अपने आंशिक पडे वहाँ आपका भोक करने उपरांत होना देख प्राप्ति करते हैं । इस नहीं देर में उसे अपने पिछले सूक्ष्म शरीर से इंद्रियों की चंचलता, मन की चंचलता, स्थिरता वह पत्ति प्राप्त होते हैं । कारण शरीर से उसे अपनी आदत है, प्राप्त होती हैं । इतना सुनने के उपरांत लाॅन्ड्रिंग ही अत्यंत आश्चर्यचकित थे कि किशोर को इतना क्या हम असंभव परन्तु सबकुछ उसकी अपनी आंखों के सामने ही घटित हो रहा था । इस तरह की चर्चा करते हैं । समय न जाने किस गति से व्यतीत हुआ कि रात्रि का दूसरा बहस समाप्त होने को था । लाॅन्ड्रिंग ही नहीं वार्ता को रोकने की प्रार्थना की और अपने दृष्टि चारों ओर घुमाकर कुछ कदम घूम कर पुनः आकर बैठ गया । जिज्ञासु बालक की भांति पूरा और ज्ञान के इच्छा से प्रमुख आर्थिक केंद्र को देखने लगा । साथ ही उसके मन में नया प्रश्न जागृत हो गया । कुमार प्रभु जब हमें सुक्ष्म शरीर प्राप्त हुआ वह कारण शरीर प्राप्त हुआ तो हमें पूर्वजन्म की स्मृतियों क्यों नहीं रहती हैं? पूर्वजन्म की प्रकृति अथवा आदतें था आपका तर्क सकते हैं । सूक्ष्म शरीर ही बुद्धि का क्षेत्र हैं । यदि सूक्ष्म शरीर का पूरा भोकने के उपरांत आगमन हुआ है तो बुद्धि को कुछ याद क्यों नहीं है । ठीक प्रभु जब जीवात्मा को शरीर से बाहर निकलना पडता है तब साथ ही पांचों प्राण भी शरीर का त्याग करते हैं । पांच उपकरण भी प्राणों के बाहर निकलते समय स्थूल शरीर को अत्यंत पीडा की अनुभूति होती है । शरीर वापस थी, बिना प्राणवायु के लकवाग्रस्त होने लगते हैं । स्कूल शरीर तो सब आ तो हो जाता है परंतु बुद्धि पर इसका इतना गंभीर प्रभाव होता है कि उसकी पूर्व इस प्रति नष्ट हो जाती है । ऐसा भी होता है कि कभी उल्टा हो जाता है । पहले प्राणवायु निकल जाती है और उसके तुरंत बाद ही जीवात्मा जब शरीर बुद्धि को उतनी पीया नहीं होती है अर्थात इस प्रकार की घटना प्राया अकालमृत्यु से होती है तब पूर्व स्मृति नष्ट नहीं होती है । अब ये नहीं सोचना की अकाल मृत्यु ही उचित है क्योंकि इससे पूर्व जन्म की संस्कृति तो रहेगी ही । अकालमृत्यु यदि दुर्घटना के कारण है तो उस पर आपका वर्ष नहीं है अन्यथा आत्महत्या तो आप है ।

भाग - 5.2

अकाल मृत्यु के उपरांत सक्षम शरीर व कारण शरीर स्थूल शरीर का त्याग करना हो तो उसको कहीं भी अ स्थान प्राप्त नहीं होता है और छह अथवा निम्न लोगों में आपका समय हुआ नहीं और यहाँ स्कूल शरीद आपने त्याग दिया । तब सुषमा व कारण शरीर जिसमें आपकी इंद्रियां, मन, बुद्धि सभी सम्मिलित है । बिना इस धूल शरीर गई उसी प्रकार है जैसे आपको कोई चाल में जकडते और आपकी संपत्ति । अभी आप की सामग्री, आपकी पत्नी, आपकी सभी व्यवस्थाओं का उपयोग करें । तब आप अपनी अवस्था को विचार की वो स्कूल खरीद के बिना आपकी झटपटाहट इतनी अधिक होगी कि उसे समझाया नहीं जा सकता हूँ । बस अब कल बनाएगी कर सकते हैं ये कष्ट जीवात्मा के स्वाभाविक निकलने के कष्ट से अनुकूलित को ना अधिक से अधिक स्वाभाविक मृत्यु ही उचित है । हाँ, कुछ विशेष लोग क्रिया सही, आप अपने जीवात्मा बस सभी प्राणों को ब्रह्मरंध्र, सही स्कूल शरीर से बाहर निकाल सकते हैं । यह क्रिया भी आप कभी करें । जब उन लोगों में जहाँ आपको जाना है, उनकी अनुमति प्राप्त हो जाएगी । इस प्रकार समाधि अवस्था में अच्छी बात । मैं उपकरणों का उत्सर्जन बात महान योगी ही कर पाते हैं । इससे भी इस मृति नष्ट नहीं होगी । इस लोग क्रिया से और हूँ । सक्षम था वकार अनशन हीरू जब पुनर्जन्म प्रक्रिया में आएंगे तो शर्म के समय भी उनकी श्वास अवरोधित नहीं होगी अथवा कम होगी तब पूर्ण अथवा आंशिक पर्व स्थिति अवश्य ही बनी रहेगी । यदि आप अकाल मृत्यु से स्मृति हरास पचास लेते हैं तो भी चंद्र के समय स्वास्थ्य गति रुकने से एक छड में ही आपकी फरवरी स्मृति संपूर्ण रूप से नष्ट हो जाएगी । इस प्रकार के उत्तर पाकर लडवाएंगे के मन मस्तिष्क में जो ज्ञान मानेंगे, अभिलाषा नहीं हो वो प्रद्युत कम होने के स्थान पर बढ रही थी । कारण स्पष्ट नहीं था के जवाब किसी विषय है और छोटे रहते हैं तो उसका ध्यान ही नहीं आता है परंतु विषय का ज्ञान आना प्रारंभ है तो मनवा विचार उसके आगे के ज्ञान के विषय में लालायित हो जाना है । इसी प्रकार लड भिंडी ने पूरा कुछ कदम चल कर सुरक्षा व्यवस्था का अवलोकन किया और ज्ञान के विषय का मदन किया । वापस आकर उन्होंने कार्तिक केंद्र को प्रणाम किया और कहा आपने जो ज्ञान वर्ष की है उससे मैं निश्चित ही कृतार्थ हो गया परंतु वह पुरा कुछ प्रश्न पूछने की अनुमति चाहता हूँ । कुमार आपने ग्रीवा को खिलाते हुए कहते हैं तो आप क्या पूछना चाहते हो? यह जो जीवन है जिसमें सुख दुख है । सर्वप्रथम तो ये कि जीवन में सुख है ही नहीं बल्कि सुख का धर्म है और तो की होती है लगभग भी कुछ संकोच के साथ क्योंकि उन्हें अब संभव का कुमार प्रभु के तर्गत भी फ्री जाना पड रहा है । प्रभु जीवन में कभी तो तो कभी सुख की अनुभूति तो सभी को होती है । ऐसा मेरे विचार है बल्कि इतना कहने के उपरांत लग जाएंगी शांत है । रात के काम पसंद आती है । जहाँ पत्तों के खरखडा नहीं वह पत्तियों की सरसराहट के अतिरिक्त कोई नहीं ना ऊपर । आकाश में चंद्रमा अपनी गति से पूर्व से पश्चिम दिशा हो जाते होंगे । आकाश के बीचोंबीच चंद्रमा के साथ प्रकाशित आ रही इस प्रकार प्रतीत हो रहे हैं जैसे सब दूर से चंद्रमा की प्रतीक्षा कर रहे हैं । परन्तु चन्द्रमा अपनी ही धुन में पार्टियों के पत्ते चला जा रहा है हूँ । दुख से बनेंगे तब कुमार कार्तिक केंद्र नहीं कहना प्रारम्भ किया जिस प्रकार चर्म तो चालान का दुःख देता है और उसे खो जाने से सुख का होता है । वस्तुत था जलन हो जाने का सब दोनों ही कोई नहीं चाहता था । तुम ही दुख है, किसी प्रकार जीवन में सुख नहीं है, दुख ही दुख है । लाॅचिंग इस प्रकार के उत्तर के लिए पूरी तरह से तैयार हैं । वो अब अमित हो गए और उन्होंने पूरा पूछा क्या सुख का कोई उपाय नहीं है? तब प्रभु का अधिकेन्द्र नहीं पूरा कहना प्रारम्भ किया लाॅबी सुख के लिए शरीर, स्कूल पर नियंत्रण आवश्यक है । वो उसी प्रकार है जिस प्रकार धनुष पर नियंत्रण होने से आखा सही स्थान पर ही होगा । परन्तु वास्तव में सही लक्ष्य के लिए धन शुभ बताई नहीं उत्तरदाई है ईद की भेदन सबसे अधिक उत्तर ताई है लक्ष्य संघार परन्तु ये भी ध्यान रहना चाहिए के बिना धन उसके लक्ष्य संहारक अथवा दी कुछ नहीं कर सकता हूँ । किसी प्रकार शरीर मुख्य करता होकर भी करता है परन्तु यदि शरीर हो ही न दो कब हूँ ठप कार्य संभव होगा सकते हैं । परन्तु यदि लक्ष्य भडक चाहे और दुर्घटना हो जाए तब अनुत्तरदायी होगा । क्षेत्री लक्ष्य संघ भारत चाहेंगे । संभव नहीं की दोष धनोओ शक्ति पीता हूँ । उनमें दोष हो आप सत्य कह रहे हैं । प्रतिशत दोष लक्ष्य संघ धारक का ही होगा परन्तु संभव है एक प्रतिशत दूज धनुष भगवान का फिर भी जल्दी दोष धनों सतवास का है तब भी ये तो उस ित्रों के बहुत अनुष् अथवा सीट का लोग जिसने किया उत्तर होगा संघ भारत अंतर तो उसी संहारक ही माना जाएगा और सजा उसे ही हूँ । इसी प्रकार शरीर धनुष के सवाल है । गर्म दीदी के समान है, उसको चलाने वाला है । सुक्ष्म ही अच्छा नियंत्रक सुक्ष्म शरीर ही सुबह रोकना चाहता है । जिस प्रकार संघ भारत ही लक्ष्य भेदन करना चाहता है । लगी धनुष अथवा नहीं लटकाएंगे नहीं कहा कुमार हूँ मैं आप का दर्द समझ गया पर तो छुद्र बुद्धि के कारण मूल भावार्थ नहीं समझ सका । यदि प्रभु हूँ ही मैं ऐसे समझाने का प्रयास करता हूँ । इसे इस प्रकार समझो की सौ कौन चाहता हैं, कौन भोक्ता चाहता है इसे इन्द्रियाँ मन की सहायता से बोलना चाहती हैं । कब हूँ बन की सहायता से और था दैनिक प्रतीक्षा करूँ मैं तुमको शबाब प्रभु आप कहीं परन्तु विषय इस प्रकार है की प्रतीक्षा सुरक्षा प्रभु आप कहीं आप विचार करें कि जैसे किसी व्यक्ति ने उत्तम स्वादिष्ट जो वस्तु खाई तो उसका क्राॅस उसका क्रम होगा । पहले उसकी आंखों ने देखा होगा अथवा उसके कंधे को महसूस किया होगा । फिर उसके मन ने कहा होगा की चलो उसको खाया जाए । ऐसा भी हो सकता है कि पहले मन से विचार आया हूँ कि चलो उस अच्छी स्वादिष्ट जो वस्तु का सेवन किया जाए, परंतु विचार रहेंगे । विषय के है । यदि आपने तो वस्तु का पहले कभी सेवन नहीं किया तो अथवा उसके विषय में कभी सुना ही होगा तो आपका मन उस विषय वस्तुओं तक कभी नहीं जा सकता है । अर्थात सर्वप्रथम इन्द्रियाँ मन पर नियंत्रण चाहती है । यदि मान इन दलों के आधीन हो गया तो अब वे उस सबको मन की सहायता से रोकना चाहते हैं, जिससे शरीर को सुख की अनुभूति होती है । इस प्रकार इन्द्रियाँ बलपूर्वक मन का रण कर लेती हैं । इसके उपरांत मनुष्य वन्यजीवों में बिजनस का स्पष्ट दिखाई देती है । अन्य चीजों में बुद्धि है और मनुष्य के पास बुद्धि के साथ विवेकशील था है, जो बताती है कि इस उपभोग से शरीर को अथवा सुक्ष्म शरीर को लाभ होगा । पसंद स्पष्ट है कि मुख्य नियंत्रक आपकी बुद्धि व विवेक जो अन्य चीजों में नहीं है, मनुष्यों के इंद्रियों ने मन का और मंडे बुद्धि का हरण कर लिया हूँ तो उनका पदन निश्चित कराया है । यदि राजा ही सेवक के अधीन हो गया तो अब आप समझ गए होंगे । अब मुख्य चर्चा प्रारंभ करें । शरीर से किए गए सभी भोग नाशवान है हूँ क्यों कि जिस रस्का आप भोक कर रहे हैं वो तात्कालिक हैं तथा अधिक समय तक उसका अस्तित्व संभव नहीं है । स्त्री, धन, मान मर्यादा आदि सभी में प्राप्ति के समय तो ट्रस्ट आता है वो बाद में नहीं रहता । प्राप्ति के अंत में वो सही हो ही जाता है । अच्छा सुख शादी हुआ, प्रत्युत नहीं हुआ तब वास्तविक सुख कहाँ है? वास्तविक सब अभिलाषी है वहाँ खंड कुमार हूँ । तब क्या मन द्वारा इंद्रियों के नियंत्रन से वो वास्तविक सुख प्राप्त हो जाएगा । नहीं मात्र मान द्वारा इन जातियों के नियंत्रन से नहीं संभावना नहीं था । चित्तवृत्ति निरोध सहयोग पूर्ण सकते नहीं होने सकते हैं । चित्तवृत्ति अर्थात शरीर स्कूल मंदिर इन्द्रियाँ आती सुक्ष्म शरीर पर बुद्धि का हम को ही कुमार हूँ वो ठीक काम को श्रद्धा और भी तो सुख शरीर का भाग है । तब भी किस प्रकार संभव है क्योंकि बुद्धि ही मन पर नियंत्रण रख सकती हैं तो थे ही अपनी विवेकशीलता के कारण बनके नियंत्रन के साथ तत्वबोध कर सकती हैं । यदि हमने तत्वबोध के बिना ही इंद्रियों के विषयों से संबंध मुझे क्या अठारह लोगों का त्याग किया तब ये बुद्धि भी उसे रस शप्त अस्पर्श ते गंधावल स्वाद से आच्छादित हो जाएगी । तब ये बुद्धे दस थी । कहलाएगी सभी प्रकार के भोगों के प्यार के उपरांत भी रस बुद्धि बनी रहेगी और बहुत संभव नहीं होगा । पहले बुड्ढी को तत्वबोध की तरफ प्रेरित करना होगा । जैसे जैसे कर्मयोग से सेवा, रस, ज्ञान, योग से तत्व अनुभव, रस, भारतीय योग से प्रेम दस बस सांख्ययोग से आत्मिक रस की अनुभूति होगी, वैसे वैसे रस थी, सूख जाएगी तब बुद्धि मांॅ हो जाएगी । इसको ये भी कह सकते हैं कि बनवा इन्द्रियां बुद्धि के अनुगामी हो जाएंगे । तब हमारी भक्ति का पार्कस दिखाई देना प्रारंभ हो जाएगा । अठारह हम सुख प्राप्ति के लिए पाँच नंबर पर चलेंगे प्रभु क्या बडे के उपरांत हम वहां पहुंचेंगे तब सुख की पूर्ण अनुभूति होगी । नहीं सकते जब जीवन मृत्यु सब आप तो हो जाएगा तब निश्चित ही सुख की अनुभूति हूँ । ये जीवन मृत्यु का चक्र कर्मों की दृष्टि से शुभ वहाँ अशुभ कर्मों का भूत करने के लिए, ज्ञान की दृष्टि से, अज्ञानता के कारण भक्ति की दृष्टि से प्रमुख से भी । मुक्ता के कारण सांख्यिकी दृष्टि से शरीर देवर आत्मा भी भिन्नता न जानकर अज्ञानता के कारण ही होता है । जब दस थी विपरित हो जाएगी और एक मत बुद्धि तत्वबोध की तरफ अग्रसर हो जाएगी । तब धीरे धीरे वो रस बढ नहीं सकेगा जो अखंड है । अभिलाषी है, कुमार हूँ । ये एक मत बुद्धि और था । एक मजबूत थी का अर्थ यहाँ पर दो विशेष कारणों से समझाते हैं । कथन बुद्धि असंख्य कामनाओं वाली होती है । इस असम के कामनाओं वाली बुद्धि का त्यागकर एकमात्र पर बात में स्थित कर डिस । फिर मन से आप लॉक सिद्धियां प्राप्त कर सकते हैं, परंतु स्थित शाखा रहित बुद्धि से पारलौकिक परमात् होता तो सिद्धता प्राप्त होती है । हुई थी एक मत बुद्धि का अर्थ केवल पृथ्वी पर बात में स्थिर वो किसी शास्त्रीय जाल में लाभसिंह । शास्त्रीय जाल में पहुँचना तो सांसारिक चाल में फंसने से भी अधिक कष्टकारी हाँ शास्त्रीय चाल का अभिप्राय मत मतांतरों में फसा मतों को मत मतांतरों के कर्मकांड विवेक बताएँ आपको मूल लक्ष्य परमात्मा तब तो सही भी मुक्त करना प्रारंभ करते थे । मूल है प्रभु की तरफ बुद्धि को लगा रहा है, न कि वो क्रियाएं जो उस तरफ प्रेरित करती है । क्योंकि क्रियाओं में बुद्धि प्रतिष्ठित होने से हम क्रिया कौशल लगा मिलने तो कुछ आते हैं और उन तक छूट जाता है । कुमार कब ये आपका आपने दास परग्रही जो इतना गूढ रहस्य आपने कुछ समझाया कब एक सितंबर में यदि आप हाँ पूछे कुमार भूल अब मैं समझ सका की एक मत बुद्धि को परम ब्रह्म पर केंद्रित करना है हूँ ये किस प्रकार संभावनाएं लटकाएंगे बोल दोष है सांख्ययोग कुल्लू समझता प्रारंभिक यही से करते हैं । जब हम शरीर वर्ष दीदी तेज अथवा जीवात्मा दोनों में भेद नहीं जानते हैं अथवा जानते हैं तो उसको मानते नहीं है अथवा शरीर के दुर्गुणों, इन्द्रियाँ, मन आदि के कारण शरीर से बहुत कर बैठते हैं । वो के कारण मात्र शो भी कार्य होते हैं । मोहू के कारण वाहियात जगह से हो जाता है, पदार्थों से, व्यक्तियों से रात के कारण है अथवा होता होता है । प्रभु क्षमा हो मैं बीच में ही बोल पडा परंतुक हैअथवा क्रूज एकसाथ कैसे उत्पन्न हो सकते हैं? रात होने पर यदि कोई सफल व्यक्ति आपका उस पदार्थ अथवा व्यक्ति से संबंध विच्छेद करता है, तुम्हे उत्पन्न होता है और आपसे निर्मल व्यक्ति आपके रात में बिकता उत्पन्न करता है तो वो टाॅप उदाहरण आपकी प्रियसी आपके साथ हूँ और आपके श्रेष्ठ अथवा उसके सृष्टिरचना आ जाएँ तो आप भयाक्रांत हो जाएंगे और यदि आप सिंदे सफल व्यक्ति हूँ वो आपसे प्रदर्शित करता करा देंगे । रात के पढने से उसे प्राप्त करने की इच्छा जागृत होती है जिसे कामना कहते हैं । कामना बोर्ड होने की संभावना को आशा कहते हैं । कामना प्राप्ति होने के उपरांत नए पदार्थों की आशा व काम ना इसी लोग कहते हैं । लोग की पराकाष्ठा रिश्ता है । अब यदि शरीर से मूड ही ना हो तो यहाँ तक आने की बात ही समाप्त हो जाती है । खान मूल्य का प्रारम्भ हमें सांख्ययोग से करना चाहिए । अमित शरीर को मात्र साथ मानना चाहिए जब हम शरीर को साधन मानेंगे तो नहीं होगा । बिना मूंग के किए गए कार्य सर्वथा शुभ रहे होंगे । शुभ कार्यों में भी आपकी आ सकती नहीं रहेगी । जब कर्मों से आपकी आ सकती नहीं होगी तो न बोलने होगा ना आप । क्योंकि हमारा कार्य पक्ष बात रागद्वेष रहित होगा तब बंधन कारक कर्म होंगे और आप बंधन होंगे यहाँ बाप उन दोनों से रहित होने का अर्थ है उनके फंसे होना । तब तो ये किस प्रकार संभव है कि फल की चिंता बगैर कर्म किया जाए । आप ऐसे मानी एक व्यक्ति और उसका मजबूर एक खेत पर कार्य कर रहे हैं । दोनों ही सामान मेहनत करते हैं । पारिश्रमिक पैदावार का दस प्रतिशत है । मजदूर कहता है कि जब संसार के छोटे से छोटे जीव को भी भोजन उपलब्ध हो जाता है तो मुझे भी प्राप्त होगा और कार्य समाप्त होने उपरांत उसका कार्य से मंदबुद्धि इस वक्त ही वो हो जाता है और वो अन्य कार्यों में अपनी ऊर्जा लगाना है । जबकि मालिक का ध्यान परिणाम पर है । अगर जब तक फसल नहीं आ जाती है तब तक वो अन्य कार्यों में अपना ध्यान नहीं लगा पाता है । अठारह से भी अपने कार्य को जीवन में अग्रसर करना चाहते हैं तो कार्य करें और परिणाम की चिंता न करें क्योंकि परिणाम आपके कर्म की कोख से स्वतः ही उत्पन्न हुआ और वैसा ही होगा जैसा आपने बीच में लाना है । ये राघवेश ही बंधन कारक हैं न कि कुशल अकुशल करना । अगर राग पूर्वक किए गए कर्म कितने ही श्रेष्ठ क्यों ना पाने वाले ही होते हैं । सरकार रात से हटने पर अथवा संसार से हटने पर बुद्धि निशल और मात्र एक दम पर केंद्रीय होने से बुड्ढी घर चल हो जाती है । इस प्रकार एक मत बुद्धि पर भ्रम पर केंद्रित रहती है । इस प्रकार एक सूत्र में लगी बुद्धि वाला व्यक्ति अभ्यासरत रखते हुए योग में स्थित हो योगी कहलाता है । योगी दिन में देखता है और रात्रि में भी कब हूँ ऍम किया है संपूर्ण प्राणियों की जो रात है अठारह । मुझसे भी मुक्ता अज्ञान का भक्ति ही लगा । योगी पुरुष उस रात्रि में भी चाहता है का अर्थ है कि वो प्रमुखता अज्ञानता वहाँ भक्ति हीनता को जानता है । संपूर्ण प्राण वालों के लिए जो तिन है अठारह हो संख्या रात वेश योगी के लिए वह रात्रि है । रात्रि में जागने का अर्थ है कि वह इस भोक संग्रह रात देश होगी जानता है । इस प्रकार योगी पुरुष रात्रि वक्त इन दोनों में चाहता है और दोनों का अंतर स्पष्ट रूप से जानता है । दो सामान्य व्यक्ति के दिन को रात्रि वार रात को दिन समझता है । इस प्रकार रात्रि बस दिन की चर्चा करते हुए हैं । ऐसा एक का एक हुआ कि रात्रि अब समाप्त होने को है और दिन का उदय होना प्रारंभ होने वाला है । भगवान सूर्यनारायण अब बस प्रकट होने ही वाले हैं । जिस प्रकार सबके प्रकट होते ही असब का अस्तित्व नहीं रहता, उसी प्रकार प्रकाश दिखाने के पूर्व ही अंधकार अस्तित्वविहीन । तब कुमार कार्तिक केंद्र ने कहा अब क्या चर्चा धोती चाहिए और आगे प्रस्थान की तैयारी शुरू की जाएगी । तुरंत ही आज्ञा का पालन प्रारंभ हुआ और लगभग रिंकी ने सभी आवश्यक वस्तुओं को व्यवस्थित कर लिया और आगे बढने की तैयारी शुरू हो गई ।

भाग - 06

मालिक द्वारा कार टिकेंद्र पलट भिंडी को खेलने का प्रयास अगर यात्रा प्रारंभ होते ही मालिक शिवपुरा सकती हो गए हैं । उसी क्रम के अनुसार कोर्स भर की दूरी बनाकर मुख्य सेना सेना प्रमुख कॅश ओ वो मालिक शब्दम अपने गुप्तचरों का अनुसरण करने लगे । उस भर के अंतर पर गुप्तचरों का चाल फैला था वो आपस में सामने अवस्था बनाकर कुमार कार्तिक फॅमिली का लगातार अनुक्रमण कर रहे हैं । सभी अपने अपने को सावधानी बरतते हुए अब कर रहे थे वातावरण ऍम सब फॅमिली हर व्यक्ति अपना एक एक साफ हो सकता हूँ । कोई भी अपने ऊपर दूसरा ऊपर नहीं देना चाहिए । सभी अपने फॅमिली नवविचार उसी प्रभावित हो रहे थे तो प्रचंड दो सबसे अधिक कुमार वह लटकेंगे किसने थी उनका बन बाॅडी तरह कारण में अत्यंत सावधानीपूर्वक अपने शरीर ऊपर ऍम कि कहीं उनको देखता हूँ शरीर में विद्युत के समान चपल साधारण कभी ना कभी तो जब तक चलना कभी फिल्म पर नहीं चाहता हूँ उनकी कर्ण शक्ति अपनी अधिकतम, वहाँ बात शक्ति अपनी सुनने का ही उनको अनुभव यदि उनसे कुछ हो तो उसका परिणाम क्या हो सकता है । इनके पीछे ऍम बरसेना ऍम सेना के मांॅग कुछ लोगों मलिक का मानना खाती अब हम सही दिशा में आशुतोष ेंद्र घायल हो गए हैं और बिना काल विश्व गई कितने दिन चिकित् रहेंगे? अच्छा तब विजय निश्चित ही है । इन दोनों काल विश्व, वहाँ आशुतोष इंद्रा पर नियंत्रण से संपूर्ण नियंत्रन अपने ही हाथ में होगा । यदि प्रारंभ में ही युद्ध में विजय हो जाती तो युद्ध का क्या था? रह जाता है । कुछ सैनिकों के मन में विचार चल रहा था कि युद्ध में विजय प्राप्त हो नहीं होती तो पहले ही प्राप्त हो चुकी होती है । बार बार सफलता के निकट पहुंचने के पश्चात दिया सफलता वो भी प्राणों के संकट के साथ । कोई अच्छा शगुन होता है । महाराज को अब यहाँ से हट जाना चाहिए । महाराज अपनी एक आपको पहुँच चुके हैं । ऍम मुख्य सैन्यबल के साथ अपने अपने विचारों से स्वतः क्रेडिट हो रहे हैं । अब जब सब नियंत्र कर रहे हैं और यदि चाहें तो अभी कुमार पलट देंगे, वो अपने नियंत्रण में भी कर सकते हैं तो विजय लक्ष्य अधिक दूध भी नहीं हूँ । इसी प्रकार विचार करते हुए कलॅर नहीं । पहले से बाहर आज बाहर आज जैसे किसी की चारों के अनुशार ॅ एकाएक विचारों के जनजा बाद से बाहर आते थे । उन्होंने ऍम तो पहले से अधिक भयंकर करती हूँ मेरा कुछ कहे बॅायकॅाट कुछ इस प्रकार ऍम परन्तु उसके मन मस्तिष्क पर विचारों और रिश्तों का इतना अधिक अधिक्रमण हो चुका है कि डाॅॅ के लिए हो पुष्पलता हूँ मालिक दम को बिहार था बस लगभग हो हूँ ऍम उनसे महाराज कुछ ऐसा विषय तो आप समझ रहे हैं और हम सभी उससे अधिक के हो यदि तब एक अत्यंत गहरी श्वास छोडते हुए जैसे उसके मन के विचार स्वास्थ्य के साथ बिखर गए उससे उसने कहना प्रारंभ दिया कुछ अलग विषय आप कहाँ संभव है जब तक को श्रृंगा पूरा पर विजय हो जाए महाराज बोस रिंग पूरा पर भी जाए वो तो जब आप आदेश करें बस मात्र वहाँ पहुंचने भर के ही दे रहे हैं अब वहाँ अपना सामना अलिक्सो आपने मुझको विश भारती सिंह थोडा एक्शन के लिए मालिक शतम् भी भी थी ऍम को शॉपिंग बुरा पर विजय चाहते हो मेरा को श्रृंगा पूरा कहने का अर्थ था मैं उस सत्रों का नाम नहीं लेना चाहता हूँ । उसके ही कारण मेरा एक नहीं गति मेरा उद्देश्य परिवर्तित हुआ होता है तो मैं उसे घायलावस्था भी समाप्त कर देता हूँ और उसके पति को ये कह कर दो साल मात्र से शब्द नहीं निकल रहे थे । शब्दों का स्थान मुख के भाव नहीं दे रखा है आपने महाराज के हृदय की इस व्यवस्था था डाॅन मालिक को था परन्तु पूर्ण अनुमान मालिक दम गे भी चार नहीं कर पा रहा था कि अचानक उद्देश्य में क्या परिवर्तन हो सकता है वो देश से परिवर्तन का विचारशीलता । जब अपने निष्कर्ष बनना तब मालिक तब नहीं पूरा महाराज से निवेदन एक रुपया वे स्पष्ट करें कि अब उसे क्या करना चाहिए । उसे इस बात का भी दुख था कि उसके रहते महाराज को इतना अधिक व्यथित होना पडा । वो ये तो समझ रहा था कि उसने अपने जीवन, काल, बच्चे इतने युद्ध लडे हैं । उसमें ये सबसे अधिक संघर्ष मोड बदुश कर है । इतनी अधिक क्षति कभी नहीं हुई । महाराज कभी घायल नहीं हुए । इतने के पश्चात भी युद्ध का परिणाम कुछ नहीं के सामान को । तब मालिक तुमने कहना प्रारंभ महाराज, हम ये नहीं समझता रहे हैं कि कालरेस की प्राप्ति से किसे लाभ होने वाला है । मैं कुछ समझ नहीं सका । हो सकता है कि कालरेस अपने लिए काल बन जाए और कोशिश रंगपुरा था । आशुतोष इंद्रा के लिए हम कुछ रखने के उपरांत इसका विपरीत भी संभव है । सरकार अपने लिए अमृत और उसके लिए ब्रेक क्यू का आशिक उत्तम विचार कर रहे होंगे । ये किस प्रकार संभव है अधिकांश बिस उन्हें प्राप्त हो गया और इससे थी आशुतोष । केंद्र की जीवन रक्षा संभव है । मात्र जीवन रक्षा ही संभव नहीं है बल्कि उसका पूरा मुकाबला करना होगा । समस्या यही समाप्त नहीं हो जाती बल्कि भूल समस्या अभी शेष है । यदि हम पृथ्वी को युद्धमें चीज भी लेते हैं तो जिन्होंने इस अस्त्र को बनाया था उनसे जब भी युद्ध होगा हमें इस अस्त्र से दृश्यते ही सावधान रहना होगा । प्रदेश कालरेस को हम प्राप्त कर लेते हैं तो एक तीर से तीन लक्ष्य का एक बार में ही भेदन हो जाएगा । बाहर आज लक्ष्य हाँ मालिक कदम तीन लाख कदम फॅस होते ही हमको सिंगर पूरा को पराजित कर देंगे । साथ ही आशुतोष केंद्र की मृत्यु देश कोई दिए हम पर्व सस्त्र का प्रभाव नहीं होगा क्योंकि अस्त्र के कार्ड पहले ही अपने पास होगी तो ये हम लोग को भी हरा देंगे । जहाँ इस प्रकार निर्माण हुआ था वो लोग भी हम से पराजित हो जाएगा । कारण हमें सपोर्ट प्राम्भ फंड पर विजय प्राप्त करनी है । संपूर्ण ब्रह्मांड पर विजय प्राप्त करने के लिए उस लोग को भी जीतना अनिवार्य होगा जहाँ पर ये अस्त्र बनाते ऍन तू क्या बाहर आज इसी झंझावात में तो लग गया नहीं एक इसका विपरीत हो रहा हूँ ऍम हाँ हूँ ऍम एच आर करो यदि वो योग बहल में हम से पराजित हो गया होता तब क्या कालरेस की आवश्यकता होती? ऍम ही नहीं होती अब यदि उसे कालरेस प्राप्त हो जाए तो वो स्वस्थ हो जाएगा । साथ ही उस को पराजित करने के लिए पूरा प्रारंभ से प्रयास करता होगा । ऍम स्वस्थ होने के उपरांत उसकी प्रतिरोधक क्षमता अनंत गुना बढ जाएगी । शमा बाहर आज क्षमता अनंत गुना बढ जाएगी इसका क्या अभिप्राय मैं कुछ समझ नहीं सका । भारी ऍन शक्ति हो गई हैं । तो मैं ये भी स्मरण नहीं कि जब हम लोगों ने देवदत्त माडी पर आक्रमण किया और वहाँ से जब हम विजय श्री प्राप्त कर सके तब हमने वहाँ से दो श्रेष्ठ वैज्ञानिकों का अपहरण कर लिया था । शाम । बहरहाल, शाम आपने दो विशिष्ट व्यक्तियों का अपहरण करने का आदेश दिया था और मुझे अस्पष्टता स्मृति है के उनका अपहरण करने के उपरांत हम लोग जब अपने लोग वापस लौटे तब के साथ थी, उसके उपरान्त क्या हुआ? आप कभी चर्चा रहेगी और मैंने उस को इतना महत्व नहीं दिया । महाराज अब आपके दूरदर्शिता के विषय में विश्वास और भी दृढ हो रहा है । क्या आप कितने आगे का चिंतन रखते हैं? बाहर उनसे क्या रहस्य पता चला? उन्होंने ही फॅस को आवश्यक तारित करने में मुख्य भूमिका निभाई थी । उनसे मुझे काल अस्त्र संधान करने की कला अभ्यास हो गई । बंदो इस सस्त्र का संयोजन करना बस का प्रतिरोध क्या है, ये नहीं जानते थे । शाम बाहर जब आप संयोजन नहीं जानते थे, दबाब से युद्ध में उसका प्रयोग किस प्रकार किया था की अवस्था बयासी तो शैलेंद्र उसे पहले ही संयोजित कर रखा था, जिससे उपयोग करने में विलंब होगा । ये मेरा सौभाग्य था कि वह मुझे संयोजित अवस्था में प्राप्त हुआ और मैंने उसका उपयोग कर दिया । इसके उपरांत ऍम के बस कभी एक विचार, कुछ ठंड, अपने मन में विचार करने के उपरांत उसके उन विचारों को साझा महाराज मालिक उनसे क्या विचारों को सुनने के उपरांत वाले हूँ । कुछ मुस्कुराया पर दोस्ती उसको राहत नहीं । प्रसन्नता की झलक काम लोग की मात्रा अधिक प्रदर्शन नहीं महाराज यदि आप उचित समझें तो मुझे अभी आप क्या थे? मैं आप की शपथ लेकर कहता हूँ । कोई भी को श्रृंगा पूरा में कोई ऐसा नहीं है जिसे मैं समाप्त ना कर सकू एक ही दिन में मैं सभी को समाप्त करने के पश्चात वापस आ जाऊंगा । बस यदि आप मुझे ऍन बीस में ही बोलना प्रारम्भ क्या बडे कदम आपकी शूर पीता तो सास पर मुझे क्या पूरी बाल एक्शन जाती को कर वाॅश शत्रु को कमजोर समझना कहाँ के थे? बारी है साथ ये मत बोलो कि को सिंगपुरा में भी वीडियो की कमी रही है । तुम ये मत समझो है तो मैं तो उत्साहित कर रहा हूँ मेरे विचार से अब तुम्हारा पूरा दोष इनका पूरा जाना, वहाँ रबड करना अर्थहीन अब हमारा उद्देश्य है । कालरेस हाँ, देश का तो होते ही संपूर्ण मनोरथ सकता हो जाएंगे । व्यक्ति की रिश्ता ही तो है तो उसे अपने कर बदल के साथ भी बहुत पसंद आता था । बारिश हो सकती काम नहीं करने देते । जब व्यक्ति एक महत्वपूर्ण कार्य सफल होने ही वाला होता है जो सफलता के पहले ही रिश्ता आ जाए और उसका अगला लक्ष्य निर्धारित जाना है । अगला लक्ष्य निर्धारण पूर्व लक्ष्य की प्राप्ति की, सफलता की सुख की अनुभूति नहीं । किसी प्रकार मालिक तो उनके मन में भी कृष्णा नहीं स्थान प्राप्त कर लिया । राजस्थान ही नहीं बल्कि रिश्ता नहीं चढ जमा लीजिए । वो विचार कर रहा है कि अब आशुतोष केंद्र को समाप्त करना अधिक कठिन ना होगा । अब यदि वो चाहे तो आसुतोष इंद्रा को समाप्त कर संपूर्ण पृथ्वी पर अपना परचम लहरा सकता है । यहीं से अन्य लोगों पर जाने का बार कभी प्रशस्त हो जाएगा हूँ ।

भाग - 6.1

एक ठंड के लिए अंतर्मन ने कहा, चलो जब आप नहीं कर दिया जाए । आॅल परन्तु अगले ही क्षण वो चाहते हो और उसके मुंह से अनायास ही निकलता है । नहीं, नहीं नहीं अब वरिष्ठ कम हो जाएगा और एक कदम जो उसके निकट ही था, उसने महाराज को देखा और बोला, महाराज, शाम काम क्या हुआ? आप निश्चित ही किसी अंतर्द्वंद्व में फंसे हुए हैं । आप मुझे कुछ बताएँ । हो सकता है कि मैं कुछ इतना कहने के उपरांत वाले उच्चतम शाम तो मालिक सुंदर भ्रष्टा में फंस चुका था । तब मालिक सोलह पुरा अपनी स्थिति का आकलन करते हुए बोलना प्रारम्भ किया । अब तुम ध्यान से समझे अपना लकी हाँ, उसे विशालतम हो गया है । पहले मैंने विचार किया था । इस सर्वप्रथम पृथ्वी को जीतना है । उसके पश्चात रितवी से अन्य बच्चे लोगों में जाने का स्थान प्राप्त हो जाएगा । अच्छे लोगों को में जाने का विज्ञान तो उस दिन पूरा के पास परन्तु मात रोज से लोगों में पहुंचने से कोई अंधश्रद्धा नहीं होगा । उन्होंने अच्छे लोगों पर भी विजय पताका फहरानी होगी । अब यदि आशुतोष को समाप्त कर दिया तो एक नई समस्या जनबल ले सकती है । मैं और समस्या को नहीं आने देना चाहता हूँ । यही समस्या ये नई समस्या क्या है? महाराज कुछ शांत रहने के माॅल तरीक विचार करूँ यदि आशुतोष को समाप्त कर दिया और ये घटना इन दोनों को पता चल गई तो निश्चित ही ये दोनों काल विश्व प्राप्त नहीं करेंगे । रिश्ता बहत फॅमिली बात महाराज के जीवन रक्षा है तो ही है । दबाव हो तो शैलेंद्र जीवित होंगे तो कल विश्व का क्या प्रयोजन? मरन तो हमारी दृष्टि फॅर हमें प्राप्त करना है । इससे हमारी विजय, उसकी पराजय, वो अपने भविष्य के लिए इस से सुरक्षा भी निश्चित हो जाएगी । ऍम पर तो बाहर आज रन तो क्या इतनी दूरी पर आने के उपरांत पोस्टिंग पूरा में क्या हो रहा है इसकी भनक किस प्रकार यहाँ पर आरती केंद्र को हो सकेगी । मेरे विचार से वो सिंगर पूरा का समाचार यहाँ पर इतनी शीघ्रता के साथ संभव ऍम मुस्कुराते ऍम हूँ । जो लोग जब विमान स्थानांतरण का विज्ञान जानते हो हम लोगों का रहस्य लगभग जान ही गए । हम लोगों का रहस्य था हूँ हम लोगों का रहस्य दैनिक तोता बोर्ड विचार का । यदि उन्होंने हम लोगों के विषय में जानकारी ना एकत्रित की होती तो युद्ध में हम उनको समाप्त कर देते हैं या नहीं । अब मालिक शतम् शाम तक उसको समझ पे आज हुआ था कि निश्चित ही उन्होंने हमारे विषय में अत्यंत महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होगी । कभी हम उन्हें समाप्त नहीं करना है । युद्ध में उन्होंने हमारे जीवन आधार को अर्थात मानुष भोजन मनुष्यों का माल हो हम से कर दिया था जिससे हम समाप्त होने लगे । नहीं इतना विचार आते ही बाल एक शतक नहीं बाहर आज से बाहर आज आप निश्चित ही श्रेष्ठ है । आप के बाद शत प्रतिशत सत्य प्रतीत होती है । इस प्रकार की संभावना पर विचार करना होगा कि दोनों के पास या ग्रो सिंगर पूरा के पास कुछ इस प्रकार का साधन अवश्य होगा जिससे यह आपस में मुख्य समाचारों का आदान प्रदान कर सके । आप कह रहे थे कि कालरेस प्राप्ति के उपरांत उनकी आंसू तो सुरेंद्र की क्षमता अत्यंत बढ जाएगी सकते दोनों ही चर्चाएं सत्य प्रतीत हो रही है । गठन उनके पास इस प्रकार का साधन भी हो सकता है जिससे वो अपने मुख्य समाचारों को भेज सकते हैं । अच्छा हमें कालरेस प्राप्त करने तक उन्हें शांति नहीं पहुंचानी चाहिए । काॅस्ट होने के उपरांत हम इन दोनों के साथ को सिंगापूर पूरा को भी समाप्त कर देंगे । साथ ही ब्रह्मांड विजय का मार्ग भी प्रशस्त हो जाएगा । तो थी शक्ति का प्रचंड प्रवाह हो जाएगा । ये अधिकार विश्व का प्रयोग किया जाए । दोनों वैज्ञानिकों का कहना था कि यदि कालरेस शरीर में विशिष्ट तकनीक के द्वारा प्रविष्ट करा दिया जाए तो संभावना किसी भी अस्त्र सही शरीर सुरक्षित हो जाएगा । महाराज तब तो टाॅप अब भूतपूर्व इस प्रकार हम अजय हो जाएंगे । महाराज हम स्वतः काल वेस्ट प्राप्त क्यों नहीं कर लेते हैं? इससे तो सौ प्रतिशत संभावना हमारी विजय की ही होगी । बाल एक दम वो सस्त्र को जिसका नाम बेताल अस्त्र है, का निर्माण बहुत से वैज्ञानिकों ने अत्यंत कठिन परिश्रम के उपरांत किया था । उस सस्त्र को निर्मित करने में विभागों का पूर्णतया विभाजन किया गया था जिससे कोई भी उस अस्त्र से संबंधित संपूर्ण जानकारी न प्राप्त कर सके । इसलिए किसी को उसके प्रारंभ के विषय में जानकारी थी तो किसी को अंतर के विषय इसको इस प्रकार भी समझ सकते हैं किसी को निर्माण प्रक्रिया का हिस्सा बनाया गया, किसी को संयोजन प्रक्रिया का और किसी वैज्ञानिक को संचालन की व्यवस्था सौंपी नहीं । इसके अतिरिक्त इसका प्रतिरोधक काल विश्व को उत्पन्न करने तो व्यवस्थित करने के लिए अलग अलग वैज्ञानिकों का उपयोग किया गया । वृद्धि लोग पर इस को व्यवस्थित करने का कार्यभार किसी अन्य को सौंपा गया था । इस प्रकार किसी को भी इस के विषय में पूर्ण जानकारी असंभव है । ये अपना स्वाभाव के नाम हम जिन वैज्ञानिकों का अपहरण करने में सफल हुए थे, वे संचालन व्यवस्था जानते थे । इसी कारण मैं उस अस्त्र का प्रयोग कर सकता हूँ । ऍम स्थान बहुत से प्राप्त करने की विधि इन दोनों में से किसी एक को अथवा दोनों को ही क्या था, ऐसा मेरा मत पता ही नहीं । दोनों का अनुसरण करना होगा । अब इस प्रकार की चर्चा के उपनाम ऍम दोनों ही कुछ समय के लिए शांत हो । दोनों के मध्य ही वार्ता वह विचारों के आदान प्रदान के कारण दोनों के मन मस्तिष्क में नए नए विचारों के सूत्र प्रवाहित हो रहे थे । दोनों मिल एक शो के विचार भिन्न भिन्न दिशा में प्रवाहित हो रहे थे । जवाब अनुपयुक्त समय में अपना जीवन जी रहे होते हैं तो ऋणात्मक विचारों का सवा धनात्मक विचारों पर भरी रहती हूँ । इस समय जो व्यक्ति अपनी धनात्मक विचारों के नाम को साहसी बनवार ठहरे की बताता हूँ, अपने आत्मबल से खेलता है । वो इलाज तक विचार संबंधी भवर को देश नहीं पार कर चाहता है । यहाँ पर मालिक अपने अपने अंदर धरात्मज विचारों को भी प्रवाहित करने की चीज का लग रहे हैं । परन्तु लो रिश्ता जो पतन का कारण है उसके साथ हाथ ही धरातल विचार उसी प्रकार समाप्त हो जाते हैं जैसे सुंदर सालों से लदे वृक्षों तेज आम थी । एक पल वही वृक्षों से अलग करते थे । इसी प्रकार लोग कृष्णा की आधी धनात्मक विचारों को शरीर से अलग करेंगे । इन्हें विचारों के थे वाले हो कुछ कहना चाहता हूँ ऍम उससे पहले ही अपना प्रदर्शन किया । बारह एक रस्तम मेरे मस्तिष्क में बहुत समय से उथल पुथल कर रहा है । यदि आप अब हाँ जो नहीं ओझी । मैं विचार कर रहा था कि आपने कहा था कि काल विश्व को शरीर में विशेष तकनीक से पहुंचाया जाता है । क्या वो तकनीक हम चाहते हैं क्या? इस पर आप अपने विचार तो भारत रिश्ता तो उचित है परंतु एक बार काल विश्व प्राप्त हो जाए । इतनी ही वार्ता हो पाई थी कि गुप्तचर सूचना देने ही दूँ आना चाहता है । ये सुनकर सभी विचार कहाँ चले गए, पता ही नहीं चला । तुरंत ही को प्रचार से मिलने की व्यवस्था हो गई । गुप्तचार कहना प्रारम्भ किया महाराज की जय हो क्या सोचना है महाराज अब हम लोग उनके पीछे नहीं जा पा रहे हैं, उनके पीछे नहीं जा पा रहे हैं और था । बोर्ड गति हुए और फिर इस से हो गए तो तुम सब भी सतारा के लिया दृश्य होता हो गई । हाँ, उनका पीछा करूँ । इतना सुनने के उपरांत भी गुप्तचर शांतभाव से ही खराब है । वो जानता था कि शांतभाव की एक मात्र निकल रहे हैं । उसका इस प्रकार शांत भाव प्रदर्शित करना बहुत कुछ कह रहा था अपने से बहुत श्रेष्ठ व्यक्ति से । जब आप का सामना तो शांत रहना ही संसार का सर्वोत्तम ऍम प्रचार अनुभवी था, उसमें भी किसी अस्त्र का चयन किया । मालिक स्कूल बहुत समय तक अपने आपको संयमित नहीं रख सका और अंतर था उसने पुना कुछ उत्तर क्यों नहीं दे रहे हो? क्या वे अपने व्यू रचना से बाहर निकल गए? नहीं महाराज, वे अभी तक आपने व्यू रचना में ही है परन्तु अब मालिक उनके स्थान पर बलिक शतक नहीं चर्चा को । अगर सारे अभी तक आपने ही व्यूह रचना में है तो समस्या क्या है? सेना बनती थी अब तक आपने वियोग में हैं परन्तु शेक रही वे अपनी ब्यूह रचना से बाहर निकल जाएगा और बोर वही तो जानना चाह रहे हैं कि किस प्रकार निकल जाएंगे । हौली कारण होगा कारण इसका क्या अभिप्राय महाराज की तरफ मुह करने के बाद तो चलेगा महाराज अब कुछ ही समय में हम सभी वन प्रांत से बाहर निकल जाएंगे । अब अपने आधार पर नहीं चल रहे हैं । हम मात्र उनको व्यू में घेरकर उनका अनुसरण कर रहे हैं । अब वन प्रांत सब आप तो होते ही नदी का किनारा आ जाएगा । तब तब क्या अब क्या समस्या आ जाएगी? सेनापति जी आपने अभी वन प्रांत के बाहर का दृश्य नहीं देखा है । ये सालोदा नदी का पार्ट अत्यधिक चौडा होने के कारण जब भी दोनों नदी की दिशा में अग्रसर होंगे तब हम उनको अपने व्यू में नहीं रख सकेंगे । नदी के मुहाने पर आने के पश्चात दृष्यता बहुत अधिक बढ जाएगी । महाराज उस समय हम उनको अपने व्यू में न रख सकेंगे । इतना कहने के पश्चात को प्रचंड को शांत हो गया परंतु बालक शिशु वह मालिक शतम् अशांत उनको समझ में आ चुका था कि कब प्रचार की समस्या अपने स्थान पर उच्च मालिक सूनने तुरंत ही गुप्तचर से कहा वो उसने नदी का दृश्य दिखा रहे हैं तो इस प्रकार व्यवस्था करें अभी तक चल रही व्यवस्था में दिखाना इसका आकर्षित का प्रबंध जैसे ही मालिक सोने नदी का दृश्य देखकर देखा । उसको बस कोई स्थिति का बोला गया है । क्या नदी के दोनों पार्टियों के पत्ते का अंतर बहुत मालिक से सोच विचार करने लगा कि यदि इसमें कोई भी जाएगा तो तुरंत ही वह सभी को दूर से ही अस्पष्टता दिख जाए । अब उसने देखा उससे लगभग आधे को उस की दूरी पर दो आकृतियाँ नदी के किनारे जा रहे हैं । साथ में दो होते हैं कुछ क्षण के लिए वो जैसे टीम कर सकते हो । अभी भी वो कुछ समझ नहीं पा रहा था । दो मनुष्य आकृतियाँ धीरे धीरे नदी की दिशा में पढ रही थी । एक ही उसके बन में विचार आया । इस सायंकाल समाप्त होने वाला है । क्या पता यह नदी के किनारे ही अपना रात्रि विश्रामस्थल चुनी । अच्छा उसने कुछ काल के लिए धैर्य धारण करना ही उचित समझा । ऍम उनसे कुछ कहना चाह रहा था परन्तु उसने संकेत से उसे समझाया कि वो कुछ समय के लिए शांत रहे । विश्व सभी को जीवन में समान अवसर प्रदान करने परन्तु व्यक्ति ही माया वो लोग टूर काम के आवरण के कारण उन अफसरों को पहचान नहीं पाता है जिस प्रकार सूर्य ऍम सभी के लिए समान रूप से प्रकाशित परन्तु पत्ती के ऊपर छाया वाॅर्डन आकाश में बादलों की भारतीय सुनील को खतरे का और उसका प्रकाश नहीं पता नहीं पाता है । यहाँ बाॅधें सही नहीं है नदी के इसी पार वे रुकते सम्भवता रात उधर रात्रिविश्राम के लिए लाॅ कुछ ही समय में नदी की एक विशाल शिला के पर था । वस्त्र कक्ष का होना है निर्माण प्रारंभ कर दिया ये ठीक उसी प्रकार की व्यवस्था थी । किस प्रकार की व्यवस्था पिछली रात को लेट भरेंगे नहीं । आज जब लड भिंडी व्यवस्था कर रहे थे तब कुमार गांधीगिरी फिर नहीं उन्हें बना क्या किस प्रकार की व्यवस्था की आवश्यकता नहीं हैं । परंतु लाॅबी ने प्रार्थना से उनके आदेश को परिवर्तित बना लिया और कहा हूँ आप निश्चित ही थक गए अच्छा प्रभु से अनुरोध है कि आज थोडा तैयार शाम करें । मैं भी आज आपको कष्ट नहीं होगा । खलता भी आपने जो अमृत ज्ञान चर्चा की उससे मैं सिद्धार्थ हो गया । इस पर कुमार कार्तिक केंद्र नहीं मौन रखना ही उचित समझा । उनको ये पूर्ण विश्वास कि जिसको भी इस प्रकार की अमृत ज्ञान से परिपूर्ण जलधारा में स्नान का अवसर ता तो होगा वो अफसर को जाने नहीं देगा । कुमार कार्य केंद्र का अनुमान धान लडवाएंगे अधिक समय तक शांतना रह सकेंगे क्योंकि उसके मन में अन्य प्रश्न अब तक निश्चित ही जनरल ले चुके होंगे । अब मात्र संगोष् भाव के कारण ही शांत भाव से बैठे हुए हैं । रात्रि के शांत वातावरण में अलग व्यक्तियों के लिए वो रात्रि अलग अलग नहीं । ध्यान से देखा जाए तो एक समान दिन अच्छा देती कहने के लिए तो सभी के लिए एक जैसे ही प्रदर्शित परन्तु सभी के लिए वह भिन्नता से बडी हूँ । आप ऐसे भी समझ सकते हैं कि सामान थी वह दिन किसी के जीवन का प्रारंभ होता है और किसी की जीवन का कोई उस विशेष तीन सफल होता है और कोई असफल कोई मिलता है और कोई भी होता है किसी के जीवन में वो दिन याद कार होता है और किसी के जीवन का श्याम पृष्ठ । इस प्रकार संसार में जितने भी व्यक्ति हैं वो एक दिन सब का सवाल तिथि के बाद भी सामान नहीं है । अच्छा हम कह सकते हैं कि संसार में जितने भी व्यक्ति होते हैं उस एक दिन में उठते ही दिन होते हैं । इसी प्रकार इस समय उस रात्रि के प्रथम शहर के ना होने के कुछ समय पश्चात कुमार का लेकिन शांतभाव से संभाल मध्या मिले लखनऊ रहेंगी उनकी सुरक्षा के कारण समाधि की बिजली व्यवस्था । इधर जंगल के अंदर मालिक अब कुछ शांति का होता है । उन्होंने अपने साथ बंधक बनाया । उसने मनुष्य को राजी हो उनको भी भूमंडल पर रहने के लिए इस की आवश्यकता पूरी प्रक्रिया में शामिल नहीं बनी रहे । इसके लिए जितने भी मदद से उनकी पकडते हैं उन्होंने सभी ताकि वो बोल नहीं सकते, शोर रामाचा सकते है एक ही समय पर बात को घर की दूरी पर इतना मनोरम वाॅ वो भी एक साथ । एक तरफ समादेश कुमार का लेकिन जिनके बस तक से फोर्जा पंजाब हो रहा है और दूसरी तरफ मालिक शो के द्वारा मनुष्य को क्रास बनाना जो अपनी बीज को भी चिल्लाहट से काम नहीं करता रहे । बस उसके गले से एक दर्द भरी आवाज निकल रही थी जो किसी पशु की आवाज के सवाल करती हूँ । रात्रि के प्रथम प्रहर की समाप्ति तक वाले छोटे बडे ही सावधानीपूर्वक अपना भक्षण कार्यक्रम बंधता के साथ और करेगा । इसी मत है मालिक क्यों नहीं रात्रि का लाभ खाते हुए नदी के दोनों तरफ अपना चाल फैला लिया । दोनों तरफ इसलिए कि कुमार वाॅ तब जस्ट दिशा में जाएंगे । वे उनके पीछे आसानी से बने रहेंगे । इससे बडा हास्यास्पद क्या होगा? जिसका मात्र नाम स्मरण करने से संसार का हर ब्यूरो टूट जाता है । उन्हीं का कार्य करने जा रहे कुमार वॅाक उपयोग में घेर देगा । प्रयास हो रहा है ।

भाग - 07

कार्तिक केंद्रों पर लटकेंगे द्वारा मालिक शो के को तोडना रात्रि का हुई थी । पहले चल रहा है कुमार कार्तिक केंद्र अपनी समाज व्यवस्था से सामान्य अवस्था में आते हैं । उनको देखकर लटक दिन की जिनके ऊपर कुमार की संपूर्ण सुरक्षा का उत्तरदायित्व हैं । सामने स्थित शिला से चलकर कुमार के समीप आ जाते हैं । कुमार के पास शांत भाव से भूमि पर बैठने के लिए जैसे ही नीचे की ओर झुकते हैं, कुमार उन के दोनों कंधों पर हाथ रखकर कहते हैं आपको भूमि पर बैठने की आवश्यकता नहीं है । आप यहाँ ऊपर हो । सेवक अपना स्थान जानता है और व्यक्ति को अपना स्थान सतह ध्यान रखना चाहिए । अपना स्थान न जानना भी दुख का कारण हो सकता है । अच्छा प्रभु मुझे मेरे अपने स्थान पर ही रहने दीजिए । प्रभु यदि अनुमति हो तो मैं कुछ हाँ क्या जानना चाहते हैं । आपने पिछली रात से भी विश्राम नहीं किया था और आज रात से भी आपने अभी शायद नहीं किया । इतना अधिक परिश्रम परिश्रम नहीं ये करना है । दखार घर में एक स्वाभाविक क्रिया है । कर्तव्य कर्म असहज होता है और परिश्रम से आप खर्च चाहते हैं । करन है परिश्रम था । कामना से युक्त होकर किया गया कर कामना होगी तो आशा होगी, आशा होगी तो स्वार्थ होगा, स्वार्थ होगा तो लोग जम्मू काम क्रोध का होना उसी प्रकार होना स्वाभाविक है । जैसे वर्षा ऋतू में सूखी हुई भूमि पर वनस्पतियां होता ही निकलती है । इसी प्रकार काम ना होते ही कर्म परिश्रम में परिवर्तित हो जाता है । हम यहाँ पर करतब देखकर मत कर रहे हैं । जब परिश्रम है ही नहीं तब थकने का प्रश्न कहा । इतना सुनने के उपरांत लटकेंगे के मन प्रांगण में उत्सुकता का मृत्य प्रारंभ हो गया । जिसका अनुमान कुमार कार्तिक केंद्र को पहले से ही था कि लफंगे को जब भी अनुकूल समय प्राप्त होगा वो अवश्य ही अपनी जिज्ञासा प्रस्तुत करेंगे । इसके पहले की लटकेंगे और प्रश्न करते कुमार ने स्वतः ही करवा के विषय में उन्हें समझाना प्रारम्भ किया । करवडा थे चंदू अर्थात कर्मों से जीव बनता है । ध्यान रहे उन्हीं कर्मों से उसकी मुक्ति भी संभव है । कर्मयोग में मूल रहस्य की चार मुख्य बातें हैं । प्रथम मेरा कुछ नहीं है, मात्र कहते नहीं । मार्च से मात्र विचार कर लेने मात्र से नहीं होगा । प्रत्युत इस बात को समझता भी होगा जैसे आज आप एक वस्तु ग्रह करके लाते हैं जिसका मोह आज होगा । कुछ समय पश्चात निश्चित ही नहीं होता है । ये तो निश्चित ही है । जो धन वैभव आज आपका है वह सदैव आपका रहने वाला नहीं है । संभव है आपके जीवन पर्यंत स्थायी रहे । यदि मान भी लें कि वह जीवन पर्यंत स्थायी रहेगा तब भी जीवन ही शास्वत नहीं है । तब हुई थी अपने लिए कुछ नहीं करना है । कारण अपने लिए कर्व करते ही लोग वो जागृत हो जाएगा । लोग वो वो आते ही फल की इच्छा जागृत होगी । हल्की इच्छा कर्म को परिश्रम में परिवर्तित कर देती है । इतना सुनकर लटपट इनकी सम्भवता वो पूर्ण रुपये भाव समझना सके । तब उन्होंने पूछा लगभग देंगे प्रभु कर्म का परिश्रम में परिवर्तन । यदि आप पुरा आप इस प्रकार विचार करें के जवाब अपने घर में किसी अनुष्ठान के उपरांत पहुंच की व्यवस्था करते हैं तब आपको बहुत से चिंताएं रहती हैं जैसे भोजन कहीं काम ना पड जाए । ये भोजन व्यस्त बचना चाहिए । ये भोजन यदि कम स्वादिष्ट बना तो लोग क्या कहेंगे चाहती थी । परन्तु यहीं पर जब जब कर रखा इसी प्रकार और स्थान करते हैं तब आपको इसकी चिंता नहीं रहती । आपका विचार परिवर्तित हो जाता है । यदि भोजन कम हो गया तो आप कहते हैं कि प्रभु की इच्छा नहीं थी कि आपको प्रसाद प्राप्त हो और आने वाला आगंतुक भी कहता है । यहाँ संभावना प्रभु नहीं चाहते थे तो नहीं हुआ अर्थात ना आप तो सी ना अगर यदि भोजन पर गया तो आप कहते हैं कि जिसके भाग्य था उसे प्राप्त हो गया । शेष भोज्य पदार्थ को नदी में प्रवाहित करूंगा । अभी से मछली वह जलचर खाएंगे । इसमें भी आपको संतुष्टि प्राप्त होती है । ये चिंताएं परिश्रम के साथ अवश्य ही रहेंगे परंतु कर्तव्य कर्मा के साथ कदापि नहीं । इसी प्रकार रीत किये मुझे कुछ नहीं चाहिए । जब आपको कुछ नहीं चाहिए तभी आपको सुख वक्त दुख नहीं होगा और आप कर्मफल से वे मुख् रह सकते हैं । चतुर्थ सभी कार्य प्रभु के हैं और हम प्रभु कार्य ही कर रहे हैं । यदि ये चारों बातें व्यक्ति मान ले और वो इनका नंबर समझ ले तो वह निश्चित ही कर्मयोगी होगा । इस प्रकार का कर्मयोगी निश्चित ही प्रभु के अत्यंत समीप होता है । वो प्रभु भक्तों होता है । इतना सुनने के उपरांत लड्डू करेंगी के मन मस्तिष्क में भक्त के विषय में जानने की अभिलाषा प्रबल हो गई । मन में अभिलाषा और संकोच दोनों ही एक साथ उत्प्रेरित में प्रीत मनाई । स्थिति कौन विजयी होगा दोनों एक ही मन से बहुत कार्य एक भक्ति के प्रेरणा से उत्तेजित है जो अभिलाषा कहलाती है । दूसरी सेवक के कारण प्रेरित हुई जो संगोष् गहलाई अब यहाँ सेवक ही भक्त है और भक्ति ही सेवा अर्थात सेवक भक्त है । कभी सेवक का भाव सिंचाई हो रहा है और कभी भक्त का भाव अंततक दोनों ही विजयी होना चाहते हैं । दोनों ही एक मन से उत्पन्न भाव इस प्रकार प्रतिद्वंदिता कर रहे हैं की बुद्धि को ही हस्तक्षेप करना पडा । ये ठीक उसी प्रकार था जिस प्रकार एक पिता के दो पुत्र युक्त कर रहे हो । दोनों में समान पराक्रम, सामान, कौशलता, सामान, प्रतिद्वंदिता परन्तु भिन्न वैचारिकता हो । कोई भी किसी से हारने को तैयार नहीं । सर्वश्रेष्ठ उपाय पिता युद्ध ही रूकवाते । किसी प्रकार स्वामी ने अपने धर्म की दुविधा को समाप्त करने के लिए स्वतः ही पूछ लिया । अब आपका अगला प्रश्न मानो भूखों को भोजन प्यासे को जल अथवा जीवन प्राप्त हो गया हो, निष्प्राण शरीर हो, इस प्रकार का सुख शब्दों से नहीं बल्कि भावों से ही स्पष्ट हो पाता है । इतना सुनकर लेट करेंगे ने कुमार से अगला प्रश्न किया हूँ । धक्का के विषय में भी यदि आप चर्चा करें कारण बहुत प्रकार से भक्ति के कारण मैं इस विषय पर लिखते थी अत्यंत अंधकार में हूँ । धक तो चार प्रकार के होते हैं । प्रथम जो अनुकूलता प्राप्त करने के कारण भक्ति करते हैं उनको अठारह थी । भक्त कहते हैं इस प्रकार के भक्त ईश्वर आराधना करते हैं परन्तु उसका गर्भ फल संबंधता में प्राप्त करना चाहते हैं । आप ये भी समझ सकते हैं कि वह इस्वर से अपने शुभ कर्मों का पारितोषिक प्रसन्नता के रूप में चाहते हैं । वो धनार्जन उचित वाह मैदान तक सिद्धांतों के आधार पर करना चाहते हैं । वेदांत इक विचारों पर चलते चलते वो कभी दरार चंद त्यागकर प्रभु भक्ति में लीन हो जाते हैं । इसको आप इस भर्ती भी समझ सकते हैं कि किसी भी प्रभु उपासना में अपना जीवन लगाया क्योंकि उसको राजा बनना था । वो राजा बनना चाहता था परंतु जा प्रभु ने उसको दर्शन दिए तो उसमें रागद्वेष लोग वो सब समाप्त हो गए । प्रभु के दर्शन के उपरान्त रागद्वेष, माया हूँ, मददगार आदि स्वतः ही समाप्त हो जाते हैं । अब वो राजा नहीं बनना चाहता है । करन उसने सत्य को जान लिया है परन्तु प्रभु दर्शन निष्फल नहीं हो सकता अर्थात उसे राजसिंहासन अवश्य ही प्राप्त होगा । इस प्रकार का भक्त चतुर्थश्रेणी का भक्त कहा जाता है । अब दूसरे प्रकार है । आठ जो आधार थी से श्रेष्ठ भक्त माना जाता है अर्थात श्रेणी के अनुसार रही थी और तब भक्त का अर्थ है प्रतिकूलता ना चाहने वाला भक्त है । निश्चित ही अनुकूल का चाहने वाले भक्त की तुलना में प्रतिकूल का ना चाहने वाला भक्त श्रेष्ठ होता है । हूँ में अनुकूलता चाहने वाला वह प्रतिकूलता न चाहने वाले भक्त में भी लगता नहीं कर पा रहा हूँ । मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा है कि दोनों एक ही हैं । मात्र कहने में भी रहता है । लेटर भेंगी दोनों एक समान प्रतीत होते हैं परन्तु दोनों भी नहीं । अनुकूलता का अर्थ है अपने अनुसार धन संपदा, मान सम्मान । आप ख्याति आप ध्यान दे वो लॉकी वह पारलौकिक सुख प्राप्त करना चाहता है । प्रतिकूलता अर्थात वो सुख नहीं चाहता । बस वो चाहता है कि प्रभु कष्ट से उसके रक्षक है । आप इसको इस खाते भी समझ सकते हैं कि दो व्यक्ति नदी पार करना चाहते हैं । एक व्यक्ति ईश्वर को इसलिए याद कर रहा है केश्वर नदी पार करने हेतु अनुकूलता बनाते । अठारह नाव की व्यवस्था कराते हैं । दूसरा लाओ नहीं चाहता । वर्चस्वता तैरकर नदी पार करना चाहता है परंतु वो इश्वर से सहायता मांगता है । जब वह देखता है कि नदी में उसके सामने मगर आ गया है अथवा वो डूबने लगा है । इतनी बात सुनकर लटकेंगे ने अपना सेट खिलाया और मुद्रा स्पष्ट की । जैसे की वो समझ गया है तब कुमार ने आगे बढना उचित समझा । भक्त का तृतीय प्रकार है जिज्ञासु हूँ । ये श्रेष्ठता में इस काम में हुई थी । ये आधार थी वहाँ अर्थ दोनों से ही सृष्ट है । इसका कारण है कि इसको प्रभु भक्ति में मात्र जिज्ञासा है । ये प्रभु के विषय में ही उसके प्राप्ति के साथ उन के विषय में जानना चाहता है । वो अपनी उन्नति अथवा अवनति, सुख दुःख, लाभ हानि, जीवन मरण, मिलन वियोग आदि को अपना प्रारब्ध मानता है तो इन सभी के लिए प्रभु को इस पर नहीं करता । वो बस प्रभु को ही जानना चाहता है । अब चतुर्थ अखार ज्ञानी प्रेमी सर्वश्रेष्ठ भक्त होता है क्योंकि वह सुख तक हानि लाभ हाथ से तो पहले ही बाहर आ चुका है और वो प्रभु को प्रेम करता है । इतना सुनने के उपरांत लटक पडेंगे की भाव भंगिमा से कुमार जान चुके थे कि अब विराम लेना होगा । कारण कुछ अस्पष्टता कुमार का रुकना हुआ और लडेंगे का बुक चलना कब हूँ? ज्ञानी भक्त अच्छे क्या सुन भक्त से श्रेष्ठ किस प्रकार है जो प्रेमी अथवा ज्ञानी भक्त है वो प्रभु के विषय में कहीं भी शंका नहीं करता अर्थात उसको अंतर बन में स्पष्टता प्रभु दर्शन हो रहे हैं । प्रेमी या ज्ञानी भक्त वही हो सकता है जो इस वर्ग को जान गया हो । आप किसी से प्रेम बिना देखे अथवा बिना उसके विषय में जाने नहीं कर सकते हैं, उसके विषय में सुनकर प्रेम कर सकते हैं । परन्तु निश्चित ही वो भाव नहीं आएगा जो उसको देखने के उपरांत आएगा । जब आप इश्वर के दर्शन अपने अंतर्मन में कर लेते हैं तब शंकाएं समाप्त हो जाती है । मन की दुविधा निर्मूल हो जाती है । परन्तु इतना कहकर कुमार शांत हो गए । कुमार के शांत होते ही लड भरेंगे ने पूरा प्रश्न किया । प्रभु परन्तु ऍम ग्यारह भक्त ईश्वर को भी मिलना दो क्लब हो जाता है । यानी भक्त ईश्वर की असीम कृपा के बिना संभव नहीं । इतना सुनने के उपरांत लग भृंगी का मन विचार करने लगा कि ज्ञानी होने के लिए अंतर्मन में प्रभु के दर्शन अर्था सगोनी या निर्गुण । तब लडवाएंगे ने पूरा प्रश्न किया प्रभु ज्ञानी होने के लिए सकुल यानी कुल किस प्रकार उपासना की जाए कि बार गई हूँ, काम हो जाए । प्रथम ता आपके समझने का प्रयास कीजिए । किस्सा गूंजा निर्गुण दोनों एक ही है । जिस प्रकार जल जब वास्तव अवस्था में परिवर्तित हो जाता है, कब उसका कोई आकार, रूप अथवा भौतिक उपस् थिति प्रतीत नहीं होती है हूँ । मैं क्षमा चाहता हूँ । मेरी अज्ञानता ही है जो आपको कष्ट दे रही है । मैं बिना आप क्या ही बात संपूर्ण समाप्त होने के पूर्व ही पोल पर कुमार ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी बल्कि कुछ पल पर शायद मुस्कुरा दिए । एक का एक पता नहीं क्यों लड करेंगे को प्रतीत हुआ कि कुमार का मुखमण्डल कुछ नहीं । उन्होंने अपनी आंखों को कुमार कार्तिक केन्द्र के मुखमण्डल पर के विकसित किया । उनका मुस्कुराता हुआ भक्तमंडल परिवर्तनशील प्रतीत हुआ । लाॅचिंग की अब कुछ शंकर से ग्रसित हुआ । उसे प्रतीत हुआ कि क्या ये बाले क्षों का फिर उसके कुछ क्षण के लिए अपनी आंखों को बंद किया और कुछ क्षण उपरांत जब उसने अपनी आंखें खोली तो उसके विचार कुछ परिवर्तित हुए । उसने कुछ कहना अथवा पूछना इस विषय में उचित नहीं समझा । तब वो अपने पूर्व विषय पर वापस आ गया । प्रभु मैं बहुत इको पस्थिति का अर्थ नहीं समझ सका । इसका अर्थ है जिस प्रकार जल को देख कर अथवा छूकर उसका भगवान होता है । उसके ठीक वे अपनी जब जल वास्तव में परिवर्तित हो जाता है तो उसको ना तो देखा जा सकता है अथवा ना ही अस्पष्ट से समझा जा सकता है । अब यदि उसी जल को ठोस में अर्थात बर्फ में परिवर्तित कर लिया जाए तो आप छूकर देखकर आसानी से उसके आकार, रूप वार रंगा को समझ सकते हैं । इसी प्रकार प्राम्भ चेतता वास्तव के समान देर को भी है और बर्फ के सवाल सकू भी है । इसी प्रकार उस प्राम्भ छेडता को ऊर्जा के रूप में भी समझ सकते हैं । ऊर्जा जब आपने आपका प्रभाव प्रदर्शित करती है तब वो नकुल हैं परन्तु से ताप के अंतर के प्रभाव के कारण अस्पष्टता समझ पाते हैं । अब जब वो ऊर्जा ताप के प्रभाव के साथ प्रकाश के रंगों के साथ अपना रूप प्रकट करती है तब वो सब हो जाते हैं । इस प्रकार वह पोछा दोनों ही रूपों में अपने को प्रदर्शित कर पाती है । इतनी बात कुमार का टिकेंद्र नहीं पाए थे कि लटकेंगे ने अपना अगला प्रश्न समय गवाह ही पूछा प्रभु आप किस प्रकाश ने तो हो सकता है जबकि हम उसे अनुभव कर सकते हैं । निर्गुणं मत साहपुर में बहुत से अंतर है परन्तु सबसे महत्वपूर्ण लगता है उसको अंतर्मन से देखना । अनुभव तो आपको दोनों ही होंगे, परन्तु साग उनका अनुभव आसान है और अंतर्मन में अस्पष्टता इसका बूत हो सकता है । आपका आप अपने अंतर्मन में पोर्ट नहीं कर सकते हैं । यदि आपको अंतर्मन में अनुभव करने की चेष्टा करो गए और निश्चित ही स्कूल हरीज अथवा स्थूल वस्तु की आवश्यकता होगी । जब आपने स्कूल शरीद अथवा वस्तु की सहायता ले ली तो वो कह रहा है वो तो सब हो गया, अब तुम प्रश्न पूछ हो क्योंकि इस वरीय प्रेरणा से मैं तुम्हारा अगला प्रश्न जान गया । तुम्हारा अगला प्रश्न है सगुन वरना कुल में कौन सा ड्रेस है? सकुन मार्ग यदि आसान है तो क्यों इसका उत्तर ध्यानपूर्वक सुनो । मैं अब सरोवर नहीं, कुल दोनों के विषय में चर्चा कर रहा हूँ । आप स्वतः ही विचार करें की दोनों में श्रेष्ठ कौन? उपासक में उपासना क्या सकती तो स्वतः ही चीज व्यक्ति की होती है । जवाब सदन उपासक होते हैं तो वो प्रेम वह इंद्रियों को संयमित करने का बाल प्रभु सेवा में चित्र को लगाने का साबर थे, प्रभु से प्राप्त होता है । जवाब निर्गुण भक्ति के मार्ग पर चलते हैं तो वो प्रेम संभव नहीं है । कारण कि सिर्फ इंद्रियों को मन को संयमित करने का बाल तो चाहिए ही और वो पल आपको स्वतः अर्चित करता होता है । अब आप ऐसे समझो जैसे मनुष्य का छोटा बालक जब अपने कदम बढाता है और गिरने वाला होता है तब उसकी माँ से संभाल लेती है । वो इस बात को जानता भी है कि माँ स्वता ही उसे सुरक्षित रखेगी । इसके विपरीत बंदर का छोटा बच्चा अपने बल से ही अपनी रक्षा के विषय में सोचता है । जब महात्व अभिभावक चलते हैं तो वह स्वतः एक हाथ से बच्चे को संभालते रहते हैं परंतु बंदरिया धाक दिया था होती है तो वो अपने बच्चों का ध्यान नहीं देती है । इसी प्रकार सगुण भक्ति में प्रभु का सहारा अभिभावक की भर्ती प्राप्त होता रहता है और निर्माण में स्वयं कोई स्वयं का सहारा बनना होता है । इसी प्रकार सकल उपासना भैया भी कुछ कभी रहती जाती है तो वह दोष प्रभु स्वतः ही कृपा करके समाप्त करते थे । यहाँ पर निर्गुण में प्रथम तो वह दोष दिखता ही नहीं है और यदि दिख गया तो उस को ठीक करने की दिशा में पढना बिना सहायता के कठिन मार्ग होगा है । सगुण भक्ति की विशेष बात भी है तो उसमें आपको गुरु की आवश्यकता नहीं है बस ईश्वर ही आपका गुरु रहे । मैं यहाँ पर ये नहीं कह रहा हूँ की सकून भक्ति में गुरु कभी हो ही नहीं सकता बल्कि कुरोकी सतत् आवश्यकता नहीं होती है परन्तु निर्गुण भक्ति में गुरु की आवश्यकता अंत तक होगी । जब तक स्वयं ज्ञानवान न हो जाये वो बिल्कुल उसी बंदरिया के बच्चे की भर्ती ही होता है जो एक कदम भी अपने माँ के बिना आगे नहीं पडता था । ऍम

भाग - 7.1

जब तक स्वयं क्षमतावान न हो जाएं । अंतर में सकुन उपासक सपोर्ट कर मंगल इश्वर से काम करता है जिससे वह प्रथम बाल से ही संबद्धता जबकि निर्गुन उपासन प्रकृति से उन चेतनाओं को प्राप्त करना है जिसको स्वतः ईश्वर नहीं । देर क्या है? अब आपको विचार करना है कि क्या श्रेष्ठ है कब वो अब इस पर विचार करने जैसा कुछ रह नहीं गया है । होडा तैयार स्पष्ट है किस जगह उपासना ही सृष्ट है । अब आप ये भी ध्यान की दोनों ही मार्क अंक आता है । उसी परम ऊर्जा पर अब पिता परम गंभीर के लिए ही बने हुये हैं । सब कुछ उसी प्राम्भ के कारण ही प्राप्त है जो आप प्राप्ति की प्राप्ति है वो प्रमुख के कारण ही संभव है और प्राप्ति के उपरांत हूँ उसकी रक्षा उसी नंबर द्वारा ही संभव है । वो इस प्रकार ज्ञान चर्चा करते हुए समय का ध्यान ही नहीं हुआ और रात्रि का अंतिम रहते हो गया । अपुन लटकेंगे ने जब कुमार कार दिगेन्द्र को ध्यानपूर्वक तिहारा तो इस समय उनका मुखमण्डल रात्रि के समय से न प्रभावित हो रहा था । रात्रि के समय उनके भक्तमंडल पर अत्यधिकता आभा के साथ प्रभुता प्रतिक हो रही थी । अब आपके साथ किशोरावस्था का बोर्ड प्रदर्शन । इतना अधिक परिवर्तन देखने वाले की आंखों का खेल नहीं हो सकता । इस परिवर्तन का कारण ना तो लटक भरेंगे ने जानने की इच्छा की और नहीं कुमार नहीं बताना आवश्यक समझा । अब लग जाएंगी नहीं । आगे कुमार से कहा प्रभु अब हम लोग को श्रृंगा पूरा से लगभग पचास के इसकी पूरी पर आ चुके हैं । मेरा अनुमान है कि वल एक्शन भी हम लोगों के पीछे ही होंगे । इतना कहने के उपरांत कुमार का टिकट मुस्कुराने लगे इसका भी प्राय के हुआ की संभावना है । उनको भी इसका अनुमान था । तब लडकी रहेंगी ने कहा प्रभु सुर्योदय होने में कुछ सरे शेष गति आप अनुमति दें तो कार्य प्रारम्भ किया जाए । कार्यप्रारंभ घर था तब लाट देंगी नहीं । उस भूमिगत मार कर के विषय में एक हजार बताना प्रारम्भ किया जिसके विषय में उसको देवा श्री से जानकारी हूँ हूँ । आगे का मार्ग यही नदी के बीच से ही निकट भूमिगत नदी के मध्य से तब दोनों उसमें प्रवेश किस प्रकार करेंगे । तब लडकी सिंह जी ने आप क्या लेकर नदी में प्रवेश किया । कुछ दूरी पर नदी का बात बहुत ही संकरा था । पीछे का बाढ बहुत चौडा था और ऊंचाई पर स्थित था वहाँ से न थी । उस सन करीब से होकर नीचे पढ रही थी लेट करेंगे नहीं कुमार को देखा और पुणे का नाम क्या है? कोबार रेहमानी मन विचार क्या क्या परिणाम । तब कुमार ने देखा ग्रीलट दिन की वहाँ से शुरू किया ये घटना कुमार को श्रृंगा के ध्यान योग लक्ष्य में देख चुके थे । अच्छा उन्हें इसका भाई था । अब कुमार विचार कर रहे थे कि अभी भूमिगत मार्ग के विषय में बात कर रहे थे और अपनी अस्पृश्य कुछ क्षण व्यतीत होंगे । की नदी के दूसरी तरफ से जो पर्वत श्रृंखला थी वहाँ कुछ पत्रों की हलचल का अगले ही क्षण एक गोलाकार शिला लुढकते हुए । ठीक उसी संकरे मार्ग पर आकर भास्कर जैसे ही वो शिला वहाँ पर खांसी जलधारा का प्रवाह रुक गया । उसके रुकते ही घडी भर के भीतर नदी के नीचे भाग का जलस्तर अत्यंत ही कम हो गया । साथ ही कुछ स्थानों पर अस्पष्ट रूप से रेस वो मिट्टी दिखने लगी तब तक लड देंगे भी आज के थे अब लड करेंगी ने आते ही कहना प्रारम्भ किया तब्बू अपने पास मात्र एक खडी का समय और शेष है । मात्र एक घडी का समय शेष था मैं कुछ समझा नहीं । प्रभु अब जहाँ पर नदी में जल समाप्त हो गया है और कुछ ऊंचा सा प्रतीत हो रहा है । हाँ हाँ प्रति तो हो रहा है वहीं पर द्वार हैं वहीं से भूमिगत मार्ग में प्रवेश करता है परंतु कुमार राखु द्वारा आपको अभी देख वो मिट्टी के हटने के उपरांत निश्चित ही दृश्य हो जाएगा परन्तु विशेष साफ खाने के साथ इसके प्रवेश करना का इस द्वार से जल भीतर नहीं जाना चाहिए । इसके पूर्व की जल का अस्तर बढे और शीला को बार करने के उपरांत यहाँ हो ना आए हमें प्रवेश कर लेना चाहिए इसका कहने के उपरांत लग पडेंगे अत्यंत प्रगति के साथ रेड वो मिट्टी को हटाने, लगभग उनके इस कार्य की जानकारी मालिक को भी हो चुकी थी । मालिक पहले विचार में थे कि सम्भवता दोनों का स्नान के लिए नदी में जा रहे हैं । पहले एक अफगान करेगा और उसके उपरांत पूछा यहाँ पर शीला के द्वारा मार्ग अवरूद्ध । वे पूरी तरह से समझ नहीं पा रहे थे कि अवरोध प्राकृतिक कारण से है अथवा नहीं का कार्य आपको वे दुविधा में पहुँच गए थे । उनके बल में एक विचारधारा की उन्हें पकड लिया जाए परंतु विचार निश्चित ही मिला था । यदि पकडना ही था तो पहले भी पकडा जा सकता था या आगे भी पकडा जा सकता है । उन्हें कैद करना तो विकल्प नहीं था । अभी अभी मालिक भी जंगल से बाहर निकलते हैं तो निश्चित ही वह पहचान लिए जाएंगे । इसी वहाँ पूर्व में उस समय सामने का दृश्य बोला तैयार अस्पष्ट नहीं बल्कि ये प्रतीत हो रहा था की जल प्रवाह हो चुका है और एक व्यक्ति कुछ कार्य कर रहा है । व्यक्ति क्या कर रहा है ये इतनी अधिक दूरी से पूरा तैयार स्पष्ट नहीं था । तब मालिक सोन ने कहा ऍम क्या तुम कोई स्पष्ट हुआ कि वे दोनों क्या कर रहे हैं? महाराज उसे प्रतीत हो रहा है कि एक व्यक्ति रेट में कुछ कर रहा है परन्तु क्या कर रहा है ये समझ नहीं आ रहा है । इतनी चर्चा बात हो पाई थी । व्यक्ति बहुत प्रगति से भूमि पर ले गया और उसके लेते ही वहाँ पर अपनी फॅमिली होने लगा । अपनी की लग के ऊपर की दिशा में रुकने के कारण दूर से वो अत्यंत सुन्दर प्रतीत हो रहा है । सुंदरता मन की स्थिति पर निर्भर करती हैं । नदी मन प्रसन्न है, सुंदर वस्तु सुंदर रहती थी । अच्छा भोजन अच्छा । आज से प्रेस चर्चा बहुत करनी होती है हर प्रसन्न हो तो सुंदर वस्तु करता भोजन की स्वादिष्ट होता हादसे फिर चर्चा आपने सुभाव भरी प्रतीत होती है । इसी प्रकार सुंदर निश्चय अब भयानक प्रतीत हो रहा था । कुछ क्षण व्यतीत हुए होंगे रखने के तहत कम होना फॅमिली और देखते ही देखते अपनी शांत हो । अब मान एक दूसरे को निहार रहे थे की ये क्या हुआ और हुआ वो आपस में कुछ कहते अथवा समझते तब तक जो दृश्य सामने घटित हुआ इसकी कल्पना ऍम नहीं तभी माॅ लाया एक हो वो अपने और सो सहित तभी के भीतर घुस गए हैं । बकूल रहे । इतना कहना ही मात्र था की चारों दिशाओं में पहले पहले छोटे से आसमान तरफ सावधानी पूर्वक की प्रगति से पहुंचने का प्रयास करते हैं । जहाँ पर मालिक से छूटे हुए थे वहाँ से उस स्थान की पूरी जहाँ से कुमार लाइटिंग की बहुत उनके अश्व भूमिगत हो गए । बोस भर के लगभग हाँ पहुंचने में आधी गाडी का समय लगना होता था । अब जब कुमार गलत देंगी, वहाँ उसके अस्वस्थ सुरंग के भीतर आ गए । तब को बार ऍम आपने द्वार बंदा करने की व्यवस्था देंगे ही नहीं । तब लाॅस सुविधाए और फिर तुरंत ही मुस्कुराने पर आेबामा हो । वो द्वारा ही बंद हो जाएगा । अब बस कुछ ही क्षण शेष रह गए । मुझे क्षणों में वो किस प्रकार हूँ । पहले थी प्रगति से उसको और तक पहुंचना आवश्यक है । इधर कुमार बजट देंगी । भूमिगत मार्ग से नियत स्थान तक पहुँचते हैं और उधर मालिक भी उस भूमिगत मार्ग के वक्त तक पहुंचने वाले हैं । साथ ही रुके हुए चल का स्तर लगातार बढते हुए । अब वो शिला को पार करने वाला है । करन पीछे से नाती में उसी कभी से चल आ रहा है । अब सुरक्षित दूरी प्राप्त करने के उपरांत लगभग देंगे । नहीं कहना प्रारंभ हूँ अब जैसे जल इस भूमिगत मार्ग द्वार से अंदर आएगा । अरे तब तो यहाँ सब चल भर जाएगा । अरे हम तो स्वतः ही संकट में फंस गए । ये तो ठीक है कि जल भरने के कारण मालिक नहीं आ पाएंगे । परन्तु इतना कहने के उपरांत कुमार उन्होंने विचार किया कि जब तक यहाँ चल भरेगा निश्चित ही हम लोग पहुंचे अ स्थान पर चुके या लाॅबी को कोई ऊंचा स्थान के । आप तब चिंतित कुमार को देखकर लग ही नहीं रहा हूँ । आप चिंतित हूँ । यहाँ पर जैसे ही जल प्रवेश करेगा वैसे ही भयानक दीप प्रज्ज्वलित हो जाएगी । संपूर्ण चल तो अन्दर की तरफ आएगा, वहाँ तीव्रगति से प्रचलित हो जाएगा । चल चलने लगेगा । अर्थात अरे ये किस प्रकार संभव है । यह पर्वत इस तरह के पदार्थों को अपने गर्व में समेटे हैं कि वह पदार्थ जैसे ही जल के संपर्क में आते हैं, वह चलना प्रारंभ कर देते हैं । इसी प्रकार अभी कुछ समय पूर्व जब हमने नदी के जल को रोकने की व्यवस्था की थी, मिट्टी वार रेट को वहाँ से हटाया था, तब भी कुछ समय के लिए अपनी प्रचलित हो गई । हाँ हाँ, प्रचलित हुई थी, परंतु तब अग्निष्व ही पूछ गई थी । साथ ही इतनी अधिक प्रबल नहीं थी । तब उस समय नदी का प्रवाह हो चुका था । मात्र मिट्टी व रेट में संचित जल के कारण ही वो कुछ समय के लिए प्रज्वलित जैसे जल समाप्त हुआ । अब मैं इस वक्त ही मुझे गई । इतनी ही चर्चा हो पाई थी कि अत्यंत कर्कश विस्मित करने वाला कोलाहल प्रति हुआ । ध्वनि प्रकार प्रतीत हो रही थी कि जल प्रभाग अत्यंत दी प्रगति से जल को प्रवाहित कर रहा है । देखते ही देखते थे वन में परिवर्तन होने लगा । इस प्रकार का कोलाहल पहले कभी नहीं सुना । ऐसा प्रतीत होता था कि जल अगवत तब किसी गर्व रात ऊपर के साथ हूँ । साथ ही उसके बाद का उसी बनी की कर्कशता की पराकाष्ठा तक पहुंच नहीं थी । तब कुमार ने लगभग एक तरफ देखा और तब लडकी भी नहीं कहना चाहता हूँ । क्या प्रभु अब चल भीतर नहीं आ पाएगा अपनी दोनों आपको वह मस्तक उसी वोट देंगे, चल भी डर नहीं आ पाएगा था । जल तो भीतर आ ही रहा है । नहीं प्रभु जल भीतर नहीं आ पाएगा । जब चल भीतर आएगा तो भूगर्भ में उपस् थित पदार्थ उससे अधिक अभिक्रिया करके अविलंब अपनी प्रचलित कर देंगे । साथ ही जिस गति से चल भीतर आएगा उसी गति से अपनी प्रचलित होगी और चल के आने वाले मार्ग से ही बाहर की दिशा में उसका बहन प्रदर्शन होगा । लटकाएंगे क्या अंदर अपनी नहीं चलेगी हूँ अगर भीतर बात वहीं तक चलेगी जहाँ तक चल पहुंचेगा अगले सदय वायु की उपस् थिति में ही प्रचलित हो सकती है । अग्नि के चलने में तो बस हुई एक साथ अवस्थित होनी चाहिए मैं वो वस्तु जो प्रचलित होती है । साथ ही द्वितीय प्राणवायु की पर्याप्त मात्रा यहाँ पर भूमि में गर्व में इस प्रकार के पदार्थ है जो जल के संपर्क में आते ही जल्दी उठते हैं और प्राण वायु भूमि के बाहर है । बितता सुनने के उपरांत शिक्षा था से कुमार ने कहा मरन तो प्राण वायु तो यहाँ भी है जहाँ हम लोग चल रहे हैं प्रभु परन्तु यहाँ जल नहीं है । अपनी के लिए प्राणवायु जल व ज्वलनशील पदार्थ तीनों ही यहाँ पर उपस् थित होने चाहिए । अच्छा अग्नि की लॉक बाहर ही जाएगी । बाहर जाते हुए लाओ जल को अंदर आने से रोकने की और उतना ही जल भी डर आने देगी जिससे अपनी चलती रहे और बाहर भी लौट जाती रहेगी । इससे साम्यावस्था स्थापित हो गई होगी । अपना आदमी पूछेगी और नाॅलेज अंदर आई सकेंगे । अब बाहर का दृश्य मेरे विचार से बहुत ही बहुत नदी के ऊपर रखने की विशाल फॅमिली नहीं । ये दृश्य देखकर वाले को हमारी व्यवस्था का अनुमान दे संदेह हो गया होगा । इतना कहने के उपरांत कुमार पलट देंगी । उसी भूमिगत मार्ग सिर्फ इतना गर्मी से आगे बढेंगे । मार्ग में लगेंगी ने कुमार को बताया एक भूमिगत मार्ग होता है और सुरक्षित ये कोर्स चल कर हम पुरा फिर भूमिगत मात्र से बाहर निकल जाएंगे । इधर नदी के दल पर भीषण फॅमिली हो रही थी । इस प्रचलित लाओ का प्रभाव पार्टी केंद्र बलर्ट भरेंगे के वर्मिंग उत्साह लग रहा था और मालिक शो के मन मस्तिष्क झंझावात की हाथ निराशा मालिक ने हिस्सा अचानक प्रज्वालित भयंकर रखती में बुरा आपने सैनी को हो गया था । मालिक शेख पर पूरा अपने आप को पराजित अनुभव कर रहे थे । बिना युद्ध के पराजित होना और भी अधिक पीडादायक हो रहा था परंतु इस बार तो बाल एक ऍर हो गए विचारशून्यता को प्राप्त हो गए थे । विचार सुन नेता में सब आधी होने का भी होता है परंतु समाधि काल में मन बुद्धि इंद्रिया स्थिरो कर अपनी ऊर्जा प्राणों को देखकर ऐश्वर्या तत्वों कब जाते हैं? इससे विचारशून्यता प्रतीत होती है । हाँ जगत के लिए परन्तु अंतर बन में प्रकाश प्रकाश नहीं और रन तो शांति का आपका अनुभव होता है । याद में इश्वर ये अनुभव विचार नेता नहीं है । मात्र वायर जगत को ऐसा ही अनुभव होता है । एक का एक मालिक सूनने अपने आपको संतुलित क्या जो उसकी आंख नहीं बीभत्स रिश्ते का उनका पूरा मंचन मालिक सोन को अपनी आपको बंद करने के उपरांत हुआ । वो अपनी एक आपको बंद कर आपके अंदर देख रहा था उसके सामने ततीमें चल नहीं नदी का जल प्रवाह एक मिसाल खंड के अवरोध के कारण रूप चुका है । एक व्यक्ति लगभग चल रही नदी में कुछ कर रहा है जी का एक वहाँ भी प्रचलित हो जाती है और कुछ ही क्षणों में वो अभी समाप्त हो जाती है । देखते ही देखते हैं जब तक को सोच पाना दोनों भूमिगत हो जाते हैं उसके सारे चारों ओर से दौडते हुए आ रहे । जैसे ही वो उस मार का के सभी पहुंचते हैं नदी का जलस्तर इतना बढ चुका होता है कि वो शिलाखंड के ऊपर से प्रवाहित होना प्रारंभ करता है । तो वो माॅब अपनी बंदा आपको इतने अधिक बल के साथ और अधिक बंद करना चाहता है कि वह दृश्य जो अब उसका स्मरण में आ रहा है और रोक से देखना नहीं चाहते हैं । जो आपके इस बार शक्ति में सब सहित हो गया है वो रिश्ते तो आप बिना इच्छा के ही दे पाते हैं । वो अच्छा हुआ था । पूरा ऍम शक्ति को कुछ अंदर नहीं पडता हूँ । मालिक सोन देख रहा है, उसके सैनिक की प्रगति से आ रहे हैं और चलते हैं उसके सैनिको । वह जलधारा के मध्य जैसे प्रतियोगिता चल रही है कि कौन उस उम्मीदवार तक पहले पहुंचता है । चल ऍम दोनों ही लगभग एक साथ वहाँ पहुंचे और पहुंचते ही चल धारा जैसे ही उस उम्मीदवार से भूमिगत हुई एक महान प्रचंड नहीं नहीं उसके सैकडो सैनिकों का जैसे अंतिम संस्कार कर दिया और साथ ही चल धारा ने उन्हें अपने में समेट कर मुख्य की दिशा भी मेरे दिन कर दिया । इस दृश्य के साथ ही माॅल अत्यंत तीव्रता से चिल्लाया और ऍम उसकी भीषण ऍम उसकी भीषण पीडा चले । चिल्लाहट सही, सभी मालिक ऐसे कम्पित हो गए हैं ।

भाग - 08

गजेंद्र की गोलक द्वारा प्रथम यात्रा की तैयारी इधर गोश्त सिंगपुरा में एक एक दिन एक एक वर्ष के समान व्यतीत हो रहा था । महाराज आशुतोष केंद्र की शारीरिक अवस्था समय सुने शुरू होती जा रही थी । साथ ही साथ माँ भी ध्यान कक्ष से बाहर नहीं आई थी । निश्चित उनकी शारीरिक अवस्था चिंता योग्य होगी । इन सभी के मध्य समय का कुछ भी निश्चित नहीं था की अब आगे क्या होगा । ये कहना अधिक उचित होगा कि कुछ होगा भी अगवान अब सब समाप्ति की हो रही है । इस प्रकार के परिस्थितियों से को श्रृंगार पूरा का कभी सामना नहीं हुआ था । गोश सिंगपुरा में पिछले कुछ दिनों की भर्ती ही सभाकक्ष में सभी एक अच्छी होती है । सभी अर्थात प्रवक् चीज कुमार ऍम डंडधार मुझे तेश्वर नंदेश्वर इंडोर जब से कार्तिक केंद्र बाॅडी काल विशेन्द्र गए हैं तब से प्रयोगशाला में बिना रुके रात दिन प्रमुख जी का कार्य चल रहा है । अभी सभा में सबसे अंत में प्रमुख से ही आए हैं । आते ही उन्होंने सभा को संबोधित करना प्रारम्भ किया । कुमार गगनेन्द्र आपने एक बार कहा था कि गोलक के कारण ही आपके जीवन रक्षा संभव हुई थी । आप ही उसका सर्वप्रथम उपयोग करेंगे । अब गोलक अपने सभी सातों गुणों से परिपूर्ण है । यदि आप उसका उपयोग करना चाहे तो प्रमुख ही मैं उसका उपयोग करने के पूर्व उसके विषय में कुछ जानकारी चाहता हूँ । यह दिया था आप मुझे कुमार क्या मैं उससे जहाँ जाना चाहता हूँ वहाँ पहुँच सकता हूँ । निसंदेह तब सर्वप्रथम उसका उपयोग करने हेतु मेरे साथ दो अन्य व्यक्तियों को जाने की व्यवस्था कीजिए कौन? दो व्यक्ति कुमार ने सभागार में दृष्टि कुमारी और कहा क्या तीन व्यक्ति जा सकते हैं? प्रमुख स्वीकृति में मुख्य लाया मेरे साथ दंडा हर वो जंगेश्वर वही इंदूर के जाने की व्यवस्था की थी जाती है । मालिक सोडे आक्रमण किया और अंदेश्वर आप अन्य सेनानायक निश्चित ही सक्षम होंगे । नंदेश्वर जी को को श्रृंगा पूरा की व्यवस्था अत्यंत अच्छी तरह से ज्ञात है । इस तरह से सभी सहमत थे परन्तु ज्यादा कहा है और कैसे कोला कार्य करेगा ये कोई नहीं जानता था । सभी सुरक्षा व्यवस्था अब प्रमुख सी वार नंदेश्वर के कंधों पर नहीं, सभी प्रयोगशाला के लिए चल पडेंगे । सर्वप्रथम नरेंद्र महाराज आशुतोष केन्द्र के कक्ष के बाहर पहुंचे और अपने पिता से गुस्सा आशीर्वाद को प्राप्त किया जो शारीरिक, मानसिक ना होकर क्योंकि क्रियाओं के कारण आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण था, तक प्रशाद कुमार गजेंद्र नहीं माँ से उनके कक्ष के बाहर से ही मन ही मन में परिणाम कर आशीष बात प्राप्त किया । आज शुरुआत प्राप्त करने के उपरांत सभी महल के गुप्त मार्गों से अंदर ही अंदर प्रयोगशाला पहुंचते हैं । प्रयोगशाला में अत्यंत तीव्र गति से कार्य चल रहा था । बहुत से वरिष्ठ व कनिष्ठ वैज्ञानिक अपने अपने कार्यों पर लगे हुए थे । वहां पहुंचकर कुमार को अंदर एक विशेष कक्ष में ले जाया गया । वो कक्ष प्रयोगशाला के साथ साथ औषधालय भी प्रतीत हो रही थी । वहाँ पहुंचने ही कुमार ने प्रमुख जी से पूछा प्रमुख से मेरे साथ और भी जो नहीं कुमार अभी गोल आपको आप के लिए तैयार करना है मेरे लिये । अर्थात अभी इसमें आपके रखता की कुछ बूंदे चाहिए । साथ ही साथ रक्त की बूंदें उसका क्या होगा? सर्वप्रथम गोलप के दिशा में आपको कुछ और जानकारी देनी शेष है । प्रथम तो ये इसको इस भर्ती अभी संयोजित करना है कि कोई भी इसका दुरुपयोग न कर सके । आपके रक्त आपके हृदय की गति बहुत की अप्रीति । साथ ही आपके श्वांसों की बहक ही इसका कूट संकेत है । प्रमुख मैं कुछ समझ नहीं पा रहा हूँ । मेरे लिए कोलक रखता की कुछ बूंदें हिर्दय की गति, वह उसकी आवृति, स्वास्थ्य का संबंध, कुमार गोल अब तक सामान्यता पहुंचना तो लाभ भी है । अतिरिक्त सुरक्षा की दृष्टि से ऐसे इस भर्ती कूट निर्देशों से सुरक्षित दिया गया है । यदि कोई व्यक्ति इस तक पहुंच भी जाए तो भी इसका उपयोग ना कर सके । इसके अंदर प्रवेश करने के उपरांत आप के रख ताकि बूंद एक विशेष स्थान पर संपर्क में आते ही एक दर्पण की भारतीय चमकता हुआ चौरस कल उभर आएगा । उस चौरस कल को आप अपने टाइम में हाथ की अनामिका से स्पर्श करेंगे तो उस चमत्कार दर पर पर हिर्दय की आकृति दिखेगी । आप अपनी अनामिका उंगली उसी पर एक पल के लिए स्थिर रखें । इतना सुनने के उपरांत कुमार नरेन्द्र से रह नहीं गया । कारण स्पष्ट नहीं था । इस प्रकार के विशेषता उन्होंने पहली बार सुनी थी । तब उन्होंने बोला प्रारम्भ किया प्रवक्ता सी ये सब क्या और कैसे कारण सहित बताइये जब तक किसी का कारण ना ज्ञात हो अब ज्ञान का ही प्रतीत होती है । कारण ज्ञात होने के उपरांत ही आप आपातकाल में भी अपनी बुद्धि व विवेक का प्रयोग कर सकते हैं । इतना कहने के उपरांत कुमार करेंगे शांत हो गए । प्रमुख सी ने कहा कुमार व्यक्तकी बोल से आपके पृथ्वी वह मात्र संबंध का स्पष्टीकरण सिद्ध हो जाएगा । इसका अर्थ है कि मैं कार्तिकेयन पिताश्री वहाँ सभी नहीं । कुमार आपके रक्त से माता पिता आपके पढाता का संबंध सिद्ध हो सकता है परंतु आपके रखतें उनके अतिरिक्त भी होंगे । किसी के रखती थी संपूर्ण कुल उसके माँ, पिता या परिवार से नहीं मिल खाते हैं । कुछ बोल को नहीं मिल खाते हैं जिसके आधार पर आप ये जान सकते हैं क्या मुख व्यक्ति आपके परिवार से संबंध रखता है? अखबार रही अभी कार्तिक केन्द्र के रखते से ही इसे कोर्ट ने देश करना शेष है । इसके उपरांत जब आप के संबंध दरपन की भर्ती चौरस कल उभर आए और उस पर हिरदय का चित्र दिखाना प्रारंभ हो जाए तब आपको अपने हिर्दय की गति आप कृति कूट करने के लिए अनामिका उंगली को निर्दय के चित्र के ऊपर बाल भर के लिए रखा होगा । अनामिका का संबंध है जैसे होता है उसके स्पष्ट से आपका हृदय स्पोर्ट संकेत के रूप में स्थापित हो जाएगा । जैसे ही ये प्रक्रिया संपर्क होगी सोता ही चौदह देखने वाले दर्पण पर क्षेत्र प्रतीत होने लगेंगे । अब आपको सामान्य अवस्था में रहते हुए मुख् को इसके इतना समीप रखना होगा ताकि आपके उत्सर्जन वायु टेस्ट का स्पष्ट पहुंच जाएगा । अब जैसे ही ये कोर्ट संकेत भी स्थापित हो जाएगा तब आप के अतिरिक्त अन्य कोई से संचालित न कर सकेगा । प्रमुख से ही कुछ प्रश्न मेरे मन में आ रहे हैं । कुमार अभी मेरी संपूर्ण वार्ता समाप्त नहीं हुई है । यदि आप खाता हूँ । यदि आप बिना पूछे ही सब स्पष्ट कर रहे हैं तो पूछने की आवश्यकता क्या है? तब प्रमुख सीने गहरी श्वास खींचते हुए पूरा कहना प्रारंभ दिया कुमार हिर्दय की गति वहाँ प्रीती का बोल प्रत्येक चीफ में सर्वथा होता है । वो शारीरिक दृष्टि से अथवा वैद्यकी दृष्टि से समान प्रतीत हो सकता है । परंतु जिस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति की मुखाकृति होती है, आर्थो वह पैरों के चलना भी होते हैं, उसी प्रकार है ते की गति । वहाँ आप स्थिति के मूल में भी भिन्नता होती है । क्या अभी कोई प्रश्न शेष है? अखबार नरेन्द्र कुछ विचार करते हुए एक प्रश्न है परन्तु को शोक ने के उपरांत उन्होंने कहा, यदि कोई मुझसे बलपुर्वक इसी संचालित करवाना चाहे और मैं उसका बंदी बन गया हूँ । कभी अरे क्या कह दिया आपको? आप बंदी असंभव मैं जहाँ तक देख सकता हूँ और जहाँ तक मेरी स्कूल बृष्टि विज्ञान जा सकते हैं । वहाँ तक आपका बंदी होना असंभव है । आप से मैं इतना ही कह सकता हूँ । फिर भी यदि आप नहीं चाहेंगे तो ये संचालित नहीं होगा । यदि आपके प्रश्न का मान रखना है तो मैंने इसकी भी व्यवस्था की है । यदि आप प्रतिकूल परिस्थिति में इसके संभव चाहेंगे तो हिरदय के स्पंदन गति, वह मुख्यता आपके और हवा उधर प्राणों की गति में भिन्नता आ जाएगी । इससे आपकी श्वासों की बहन का परिवर्तन स्पष्टत संचालन प्रणाली को संकेत देगा और गोलक कार्य नहीं करेगा । अब कुमार नरेन्द्र के मन में कोई शंस है शेष नहीं था । उनके एक उन दरक हृदयगति, विश्वासों की बहक को कूट निर्देशों के रूप में समायोजित कर दिया गया । इसके उपरांत प्रमुख शी ने बहुत सी सावधानियां दंडधारी वह इंदूर को भी समझाई । अब गोलक अपने कार्य करने के लिए वह नरेन्द्र गोल का श्री गणतंत्र करने के लिए तत्पर थे । अब प्रश्न था कि कहाँ जाना है और ये किस प्रकार निश्चित होगा? इस प्रश्न का उत्तर भी प्रमुख चीज देने के लिए तत्पर थे । कुमार आपको संचालन की व्यवस्था संपूर्ण रूप से अस्पष्ट है? जवाब संपूर्ण कूट निर्देश संयोजित कर लें । तब अंत में बॅाल और आपके मस्तिष्क में संबंध स्थापित हो जाएगा । संबंध स्थापित होते ही आपको आपके मस्तिष्क प्रति आकृति चौदह स्थल पर दिखेगी । उसको देखने के उपरांत आप अपनी आंखों को बंद करेगा और उस स्थान को दृढतापूर्वक अपने बस सिस्टर नहीं स्थापित करेगा । मन मस्तिष्क में दृढ प्रति क्षेत्र स्थापित होते ही चौथाई पल में आप आप के साथ जो भी हैं वो सर शरीर गंतव्य तक पहुंच चुके होंगे । इतना कहने के उपरांत प्रमुख कि इस प्रतीक्षा के लिए रुक कहते कि प्रश्न तो निश्चित ही होगा । प्रमुख सी का विचार सकते था । अब दण्डक हारने प्रश्न किया परंतु वापस आने का क्या उपक्रम होगा इसे भेज पष्ट कीजिए । प्रमुख जी के पहले के पूर्व ही कुमार गजेंद्र नहीं कहना प्रारम्भ किया प्रमुख से सम्भवता मुझे स्पष्ट है कि ये किस प्रकार करना होगा । सभी को अपने साथ रखते हुए पूरा मन मस्तिष्क में गोलप की स्मृति दृढ करनी होगी और संभावना इससे प्रमुख बीस में ही बोल पडे मैं इसके लिए एक हथेली से भी छोटी वस्तु आपको दूंगा । उसमें भी वही प्रक्रिया करनी होगी जो आपको गोलक के भीतर स्पष्ट थी । अब मैं स्पष्ट कर समझ गया । मेरे अनुसार एक ही प्रश्न शेष । यदि मैं किसी स्थान पर गया ही नहीं तब वहाँ की आकृति अ स्थान या वस्तु अपने मन के विचार में किस भर्ती ला सकता हूँ? कुमार आप का गठन सकते है परंतु परन्तु क्या इसमें परन्तु का स्थान कहा है मेरे विचार से इस कथन के लिए परन्तु अर्थहीन से इतना सुनने के उपरांत प्रमुख ची कुछ पल के लिए शांत हो गए । जीवन में जवाब अपने से श्रेष्ठ व्यक्तित्व के सम्मुख होते हैं तब निश्चित कई बार शब्दहीन हो जाते हैं । एस शक्तिहीनता का समय का तब देखते थी बढ जाता है जब संभव व्यक्ति की श्रेष्ठता आध्यात्मिकता से परिपूर्ण होती है । यहाँ पर कुमार का केंद्र की श्रेष्ठता आध्यात्मिकता से परिपूर्ण होती है । यहाँ पर कुमार गजेंद्र की आयु, उनका अनुभव, उनकी शिक्षा, निश्चित ही प्रमुखी के संबंध अल्पस ही आध्यात्मिकता का अंतर, मुख्य ज्ञान, बहुत का शीतलता से परिपूर्ण अनंत प्रकाश स्कूल जगत के अनुभव, शिक्षा वायु पर अत्यधिक भारी प्रतीत होते हैं । यहाँ पर प्रमुख जी को इसी प्रकार का अनुभव हो रहा है । उनको ये आपने गणित, ज्ञान अथवा ज्योतिष ज्ञान अथवा अंतर्चेतना के कारण अथवा इन सभी के संयोजन के निष्कर्ष के कारण ये क्या हो रहा है कि को बाहर घनेन्द्र कहाँ के विषय में नहीं जानते हैं? प्रमुख सी के अनुसार ऐसा कोई ज्ञान हो सकता है जो कुमार ना जानती हूँ । इतना विचार करते हुए प्रमुख ही नहीं अपने सभी विचारों को शब्दों में परिवर्तित करने का प्रयास किया । कुमार जहाँ तक मैं देख सकता हूँ, ऐसा कोई अ स्थान नहीं है जहां के विषय में आपना चाहती हूँ । प्रमुख सी इसका क्या हुआ? मैं सभी स्थानों के विषय में कुमार आप अन्यथा नसल थे आपके भीतर वो अनंत ऊर्जा पुंज जागृत अवस्था में जो सामान्य जीव में जागृत अवस्था में नहीं होता है । अगर कुमार से निवेदन है कि वो अपनी फॅमिली चार कृति ऊर्जा को पहचान नहीं और समयानुसार उसका उपयोग करें । इसके उपरांत कुमार गजेंद्र नहीं कुछ भी प्रश्न अथवा उत्तर के विषय में चर्चा नहीं । उसको गलत में जहाँ बैठने का स्थान चेन्नई था, कुमार गणित वहाँ पर बैठ गए । सभी प्रकार के कूट संकेतों का गोल अब वह कुमार के साथ सामने स्थापित कर दिया गया । इसके उपरांत डंडधार भुज जंगेश्वर वही इंदौर को भी प्रमुख प्रारंभिक शिक्षा प्रदान की

भाग - 8.1

अब सभी जाने की तैयारी में उत्सुक थे । तब प्रमुख सीने कुमार गजेंद्र को कुछ अन्य विषय बताने का प्रयास किया । कुमार आप जहाँ भी जाने के विषय में विचार कर रहे हैं, वहाँ के परिस्थिति वह वस्तु स्थिति के विषय में निश्चित ही विचार कर लीजिएगा । परिस्थिति वह वस्तु स्थिति को तो हम स्वतः ही अपने अनुकूल परिवर्तित कर लेंगे । आप के आशीर्वाद से हम सभी इसके लिए सक्षम हैं । इस पर प्रमुख सीधे कुमार घनेन्द्र की ओर देखा । तब कुमार गणतंत्र नहीं कहना प्रारम्भ किया । मैं परिस्थिति वह वस्तु स्थिति के विषय में जानकारी करने के उपरांत ही चाहूंगा । एक बात मैं स्पष्ट करना चाहता हूँ कि मैं वहीं पर चाहूंगा जहाँ पर मुझे जाना है । इसका आर्थिक गए है कि मुझे कहाँ जा रहा है अथवा क्यों जाना है । ये लगभग निश्चित ही है । इतनी चर्चा हो ही रही थी कि को बार का केंद्र ने देखा कि इंदौर को जानना चाहता है । तब उन्होंने इंदौर की तरफ देखा और उसे संकेत दिया कि वह क्या जानना चाहता है । तबेला विलंब के हिंदू तो कहना प्रारम्भ किया, प्रभु मैं अल्पज्ञानी हो । अटक उनचास की इच्छा जागृत हो गई है । मैं अभी तक समझता था की परिस्थिति व्यवस्था स्थिति एक ही होती है । इतना सुनने के उपरांत उदंडता हार वह वो जंगेश्वर ने भी इसी भर्ती आपने मुक्की आकृति को दर्शाया जिससे यह स्पष्ट हुआ कि उन्हें भी इसकी जानकारी ठीक से नहीं थी । तब कुमार गजेंद्र नहीं कहना । प्रारम्भ किया परिस्थिति वह तो स्थिति एक ही शब्द प्रतीत होते हुए भी भिन्न है । भिन्नता बोलना तैयार स्पष्ट है परंतु ध्यान से समझने का विषय है प्रथम परिस्थिति । निश्चित ही दूसरे व्यक्ति के द्वारा उत्पन्न की गई स्थिति हैं, दोस्ती है वस्तु स्थिति दूसरे अथवा अपने ही द्वारा निर्मित वस्तुओं के कारण उत्पन्न स्थिति है । आप ऐसे भी समझ सकते हैं की परिस्थिति मनाई स्थिति की व्यवस्था है और वस्तुस्थिति उस समय के स्कूल व्यवस्था है । इतना कहने के उपरांत कुमार घनेन्द्र शांत हो गए । तब उन्हें सभी के मुख्य मंडल के आधार पर ये विधित हुआ कि अभी भी बात स्पष्ट नहीं है । तब उन्होंने सभी को एक बार फोन देखा और इस बार देखने की दृष्टि में भिन्नता थी और कहना प्रारम्भ किया सम्भवता आप सभी स्पष्ट रूप से अभी समझ नहीं पाए । मैं पूरा प्रयास करता हूँ । आप ये समझे कि आप किसी व्यक्ति के यहाँ उसके निमंत्रण पर गए हुए हैं । उस ने आप के लिए अत्यंत उत्तम व्यवस्था की है । अच्छा बहुजन अच्छा अनुकूल शयन कक्ष, अच्छा शांत वातावरण आती । ये सभी वहाँ की अच्छी वस्तु स्थिति को प्रदर्शित करता है । अब हम परिस्थिति के विषय में चर्चा करते हैं । अब कल्पना कीजिए कि वहाँ पर कोई दुर्घटना मृत्यु आने की सूचना आ जाएगा और वह सूचना आपके लिए न हो । बल्कि जहाँ आप गए हो, ऊँट वहाँ के परिवार के लिए हो तो आप वहाँ के परिस्थिति को क्या करेंगे? अब वहाँ पर अच्छे वस्तु स्थिति के साथ खराब परिस्थिति उत्पन्न हो गई । ये सहदेव ध्यान रखे अच्छी क्या खराब वस्तुस्थिति इतना प्रभाव नहीं डालती है जितना अच्छा या खराब परिस्थिति प्रभाव डालती है । आता हमको नंबर से सदैव अच्छी परिस्थितियां बनी रहे इसके लिए प्रार्थना करते रहना चाहिए । मैं पूरा अपनी चर्चा पर वापस आता हूँ की प्रमुख की कृपा से मेरे अंतर करण में वो स्थान प्रदर्शित हो चुका है जहाँ हमें जाना है । अब संभव का वह समय भी आ चुका है जब मुझे अपने गंतव्य की ओर प्रस्थान करना चाहिए । समय से महत्वपूर्ण कुछ नहीं है इसलिए ही संभव परम ब्रह्म को महाकाल कहा जाता है । वस्तु, व्यक्ति, स्थान, कार्य यहाँ तक के धर्म भी काल्कि परिसीमा से बाहर नहीं है । इतना ही कहना था की प्रमुख जी के मस्तक में बाल बढ गए । मस्तक में आये उपहार साफ स्पष्ट कर रहे थे कि कोई चर्चा गलत हो गई है अथवा प्रमुख जी के विचारों से बनना है । प्रमुख ही नहीं अपना विचार रखा क्या धर्म भी काल पर निर्भर है? मुझे तो आप जानते ही होंगे । वस्तु स्थिति अस्थान कार्य आधी सभी समय पर निर्भर करता है । वही वस्तु, व्यक्ति, स्थान अथवा कार्य कभी उपयोगी होता है और कभी उपयोगी नहीं होता है । सर विश्व के भी उपयोगिता तब जीवन के लिए सर्वाधिक हो जाती है जब सर्पदंश हो । अच्छा तो उस वस्तु की उपयोगिता भी हो सकती है जिसका विषय में आप सोचते हो कि वह अनुपयोगी है । आप विचार कर रहे होंगे कि धर्म शास्वत है, ऐसा नहीं है । प्रत्येक निर्मित स्वास्थ्य नहीं और पादित सचिव अथवा निर्जीव वस्तु, व्यक्ति अथवा उनसे जनहित कार्य या विचार एक ना एक दिन काल के गाल में समा जाएंगे । खो बार ये सब बोर्ड बाद सकते हैं । परन्तु क्या धर्म अभी सर्वप्रथम ये जानते हैं कि धर्म क्या है? जी प्रभु यही सर्वोत्तम रहेगा । मुस्कुराते हुए घनेन्द्र नहीं । पुणे कहना प्रारम्भ किया छल्लो इंदौर का मान रख लिया जाए । इस पर सभी बस को रहने लगे । बस उतर सत्यता यही है कि इंदौर का मन रखना अलग विषय । गणतंत्र को तो धर्म की व्याख्या कर नहीं थी । प्रमुख शी दंड आधार भुत जंगेश्वर भी विचार कर रहे थे । के छह प्रारभ ही होता है । अन्यथा किशोरावस्था में इतना तत्वज्ञान असंभव ही है । अब उन्होंने धर्म को जानने के लिए गगनेन्द्र का मुख्य निहारा । तब कुमार गणतंत्र नहीं कहना प्रारम्भ किया । जड से ब्रह्मा टक्का ज्ञान धर्म है था । सब कुछ घर में है नहीं । वो ज्ञान जो ज्यादा से ब्रह्म तक पहुंचाएं वो धर्म है । वही तो मैं भी कह रहा हूँ कि ज्यादा से ब्रह्मण तक सभी कुछ आ गया । अठारह सबकुछ धर्म है नहीं, नहीं नहीं अब आप ध्यान से सब अच्छे जल्दी से ब्रह्म तक सही दिशा में चलना । जो प्रमुख तक पहुंचे वो धर्म है अनेक । बल्कि लगभग प्रत्येक बार जड से ब्रह्म तक चलना तो प्रारंभ करते हैं परन्तु पहुंच नहीं पाते हैं । तब अचानक वो धर्म आधार में परिवर्तित हो जाता है को माँ मैं सत्य का हूँ, मुझे समझ नहीं आ पा रहा है आप । यदि इसे धर्म को समझना इतना सरल नहीं है । अच्छा तरीक रखें और सुने उस पर सभी शांत हो गए और उन्होंने अपने मुँह बंद कर लिए और मन में ये विचार भी कर लिया कि अब शांत रहेंगे । पूरा कुमार कंद्र नहीं कहना । प्रारम्भ किया संस्थान जल और शरीर के मध्य का ज्ञान शिक्षा शरीर, जीवात्मा के बच्चे का स्वास्थ्य आये जीवात्मा वहाँ आत्मा के बच्चे का ध्यान, अध्यात्म और आत्मा और परमात्मा प्रमोद के थे । परमज्ञान को तत्वज्ञान कहते हैं । अब हम कह सकते हैं आपके चढ से प्रमुख तक के संपूर्ण ज्ञान को और उस दिशा को जो प्राम्भ की ओर ही जा रही हो । धर्म कहते हैं इसको आप ये समझ सकते हैं कि हमारा साडी जिन्हें जड तत्वों से बना होता है, उन तत्वों से प्रारंभ होकर अनंत जागृत परम तत्व को प्राप्त करना ही धर्म है । इसके लिए मैं एक अन्य उदाहरण प्रस्तुत करता हूँ । मान लो कि किसी पुष्प के बीच को किसी पुस्तक में परिवर्तित कर इश्वर पर चढाना । यदि धर्म है तो आप इसको कैसे समझेंगे? सर्वप्रथम पुष्प के बीच के लिए भूमि जल वक्त चाहिए । अब बीज को और वन भूमि में रूप देना चाहिए । यदि भूमि उर्वरक नहीं होगी तो आपका बीच व्यस्त हो जाएगा । अब भूमि की उर्वरता हाँ चल उस बीच का अंकुरण करेंगे । बीच का अंकुरण उसी प्रकार है जैसे कोर्ट में शिशु को उदय होना । अब अंकुरण के उपरांत को बीच गन्ने पौधे के रूप में कृष्य होगा । इसी प्रकार नन्ना शिशु भी दृश्य होता है । ललना पौधा धीरे धीरे बडा होकर वृक्ष बनने लगता है और उसमें पुष्पा आने लगते हैं । पुष्प वृक्ष का विशिष्ट गुण है । इसी प्रकार शिशु भी व्यस्कों होकर शिक्षित होने लगता है और ये शिक्षा उसे अपने अनुभव से अपने गुरु से अपनी प्रकृति से धीरे धीरे प्राप्त होने लगती है । अब यहाँ दो संभावनाएं जन्म लेती है । प्रथम अच्छा ज्यादा सही शरीर तक की उसे उस मार्ग पर ले जाएंगे जहाँ से रोज शरीर से जीवात्मा के विषय में जानने हेतु अग्रसर हो जाए । दो ही दिए वो उस पद पर चला जाए जहाँ विषय वो गिलास व्याप्त हैं अर्थात अब वह माया में हो गया तो वहाँ पर भ्रष्ट हो गया अर्थात धर्म पद पर नहीं है । इसी प्रकार पुष्प अच्छी बहत न देकर प्रदूषित तो भी फैला सकता है और वो भी अपने धर्म के पद से भटक गया । इसका अभिप्राय यह हुआ के पहले प्रारंभ में वह धर्म पर था और बाद में वह पथभ्रष्ट हो गया । इसी प्रकार यदि पुश्तो बहत दे रहा है और मनुष्य का शरीर जीवात्मा के साथ स्वाध्याय में लगा है तो वो अभी भी धर्म के मार्ग में ही प्रेरित है । अब यदि वह उस पर इश्वर तक पहुंच चाहता है तो उसने अपना लक्ष्य प्राप्त कर लिया । किसी प्रकार अब वह मनुष्य यदि स्वाध्याय के ज्ञान से आत्मा के विषय में जान गया तो वो आध्यात्मिक हो गया और उसने भी अपना लक्ष्य प्राप्त किया । अब मात्र दोनों को पुष्पो । वह मनुष्य अब का परम लक्ष्य प्राप्त करना है वह है मुख्य । यहाँ पर पुश्तों का धर्म समाप्त हो जाता है क्योंकि वह बहुत प्राप्त नहीं कर सकता । कारण मोक्ष की प्राप्ति की उपलब्धता केवल मनुष्य योनि को ही प्राप्त है । अब यदि मनुष्य ज्ञानयोग, कर्मयोग, सांख्ययोग अथवा भक्ति योग से उस परम तत्व को प्राप्त कर लेता है तो वह बॉक्स को प्राप्त कर लेता है । यही है चार से परम तत्व तक की प्राप्ति । अर्था धर्म इंदुर बीस में ही बोलना प्रारम्भ किया प्रभु शाबास मैंने बिना अनुमति के ही बोलना प्रारंभ कर दिया । यदि कोई व्यक्ति स्वाध्याय में लगा रहा हूँ परन्तु बॉक्स तक ना पहुंच पाया हो तो उसका संपूर्ण कार्य अथवा धर्मपत् पर चलना व्यस्त हो गया । इस प्रकार यदि मनुष्य उस परम लक्ष्य तक पहुंच पाए तो पुनर शुरू से ही प्रारंभ करना होगा । अर्थात उसका संपूर्ण धर्म निष्फल हो गया? नहीं नहीं ऐसा कदापि नहीं । अच्छा तुम ये बताओ कि हर शिशु का जन्म क्या सामान्य परिस्थितियों में होता है । हर शिशु सामान क्षमतावान होता है । प्रत्येक शिशु सामान क्षमतावान माता पिता के घर जान माल लेता है । प्रत्येक अपने जीवन के समान करने के उपरांत भी क्या सामान फल प्राप्त कर पाते हैं? पिता कहने के उपरांत कुमार कविंद्र शांत हो गए । उनके शांत होते ही वहाँ उपस्थित इंदुर प्रमुख सी दंड आधार भुत जंगेश्वर के मन में बहुत से प्रश्नों ने अस्थान ले लिया । रिश्तों को बात नहीं इंदौर से किया था, परंतु इंदौर से पहले वो जंगेश्वर ने गहरा प्रारम्भ किया । कुमार ये तो सभी जानते हैं कि जन्म के समय वह उसके उपरांत सभी व्यक्तियों की परिस्थितियां होती है । यदि कभी कुछ परिस्थितियां समान होती भी है तो ये मात्र सिंह लोगे ही होता है । अब आप अपने अंतिम प्रश्न का उत्तर पीछे क्यों? समान कर्म के उपरांत भी दो भिन्न व्यक्ति तो भिन्न कर्मफल को प्राप्त करते हैं । अंतिम प्रश्न नहीं बल्कि वही एक प्रश्न ही था से इसको सभी बातें आप प्रतिदिन देखते और उसका अनुभव करते हैं । आप देखते हैं ये एक ही घर में जान में अलग अलग व्यक्ति अपने जीवन को अलग अलग तरीके से व्यतीत करते हैं । एक व्यक्ति धनवान के घर जन्म लेता है और एक व्यक्ति धनहीन गया । जन्म लेने में तो कोई कर्म नहीं किया गया है । यहाँ पर भी परिणाम कर्मों पर ही निर्भर करते हैं । मिलना था मात्र कितनी हैं वे पूर्व जन्मों के कर्मों का फल है जिसे आप प्रारब्ध कहते हैं । प्रारभ का होता है पहले से ही प्राप्त किया हुआ । इसी प्रकार यदि आपके अपने जीवन के पूर्व के चरणों में बहुत सा धर्मकर्म क्या है तो आपका जन्म उन्हीं परिस्थितियों में होता है जहां से आपके पिछले चरणों में कार्य छोडा था । आप ऐसे भी कह सकते हैं कि हजारों लाखों ग्वारन जन्मों का संबंध जैसी थी बना रहता है । इसलिए कोई काम कर्म करने के उपरांत भी सफल होता है और कोई अधिक कर्मों के उपरांत भी असफल कुमार इसका अर्थ क्या ये नहीं हुआ के मुख्य प्राप्त ही है । इस जीवन के कर्मों का बहत को बहुत कम है । अपनी आंखों कोकन ेंद्र गोल गोल को बातें भी कहते हैं । नहीं नहीं ऐसा नहीं है । वो प्रारभ जो आज तुम्हारे कर्मों पर भारी पड रहा है वो भी एक एक धर्म से जोडकर बना है । प्रारभ का महत्व सम्भवता इसलिए अधिक होता है कि वह बहुत से जन्मों से संचित फल है । आप उसे मात्र चर्म के कर्म से समायोजित नहीं कर सकते हैं । यहाँ पर एक विशेष बात का भी ध्यान रखना होगा । एक घर वही महान है क्योंकि कर्म सही प्रारब्ध बना है ताकि प्रारभ से कर आता है । जो पूर्वजन्मों के संचित कर्मफल हैं उन्हें हम बदल तो नहीं सकते परंतु अच्छे कर्मों से आने वाले जीवन का धीरे धीरे प्रारब्ध निश्चित ही बदल सकते हैं । अ तक कर रही प्रधान है या कर्म वो छोटी बचत है जो कुछ फिल्मों के उपरांत बडी संपत्ति के रूप में प्रारब्ध के भाव में आपको प्राप्त होती है । एकता सुनने के उपरांत प्रमुख भी बहुत विचाराधीन स्थिति में प्रतीत हो रहे थे । संभव तो उनको अपने प्रश्न का उत्तर नहीं प्राप्त हो सका था । तब वे धीरे से बोले कुमार जब चढता ब्रह्मा तक पहुंचना ही धर्म है तब हर वो कार्य, वो चिंतन, वचन, वो दर्शन जो प्रमुख बार को प्रशस्त करें तो निश्चित ही धर्म है । इतना कहना था की कुमार तुरंत बोल पडे प्रवक्ता आप सत प्रतिशत सत्य समझ रहे । कुमार इसका तो हुआ आप के घर पर शास्वत है । आप कह रहे थे कि धर्म भी काल्कि परिसीमा में बना हुआ है । नरेन्द्र नहीं कुछ विचार किया और उनके विचार करते समय सभी ये विचार कर रहे थे कि कुमार घनेन्द्र के विचारों का सिंधु बात कर रही है । उनके हिरदय प्रांगण में ज्ञान स्रोत प्रस्फुटित हो गया है । तब कुमार कल इंद्रा ने कहा धर्म का परम तत्व तो निश्चित है, शास्वत है परन्तु क्या युद्धकाल में जवाब का राष्ट्र संकट में हो तो क्या भक्ति मार्ग को अपनाना घर में है? जब आपका कुकुम्बर संकट में हूँ और आप पर निर्भर हो तो क्या भक्ति भाव में डूबे रहना घर मैं जब रात तीन आपा इज अथवा अबला पर अत्याचार हो रहा हूँ तो क्या शांति के बारह पर अथवा प्रभु भक्ति में लीन होना धर्म है? नहीं ये सभी धर्म के बाहर गए । जब राष्ट्र पर संकट हो तो राष्ट्र के लिए शरीर मान अल थी या युक्ति से समर्पित हो ना घर में है । इसी प्रकार रात दिन आप आइच अथवा अबला की रक्षा ही धर्म है । जब शांतिकाल चल रहा हो तो प्रभु भक्ति में लीन होना है । अर्थात अलग अलग समय पर अलग अलग कार्य धर्म होते हैं । परंतु मूलतत्व अभी भी नहीं बदला मूल है । सभी कार्य करते हुए प्रभु कुम्भ मन में बनाए रखा था । परम लक्ष्य को मन में स्थिर रखना ही धर्मा है । इस प्रकार हम कह सकते हैं कि धर्म भी काल्कि परिसीमा से वो अलग नहीं है । इतना सुनने के उपरांत सभी के मन में विचारों की गतिशीलता बढ गई । सभी इस विचार से ओतप्रोत हो गए कि इस समय हमारा राष्ट्र, हमारे प्रभु, हमारा परिवार, हमारा सब को संकट में है । पता हमें उससे भक्ति चाहिए और मुक्ति आज परम धर्म है । इतनी चर्चा के उपरांत सभी देश भक्ति की भावना के साथ धर्म भाव से भी लबालब भरे हुए थे । तभी ये विचार प्रमुख सीधे रखा कि अब जाने का समय प्रतीत हो रहा है । इस पर गजेंद्र बस सभी ने स्वीकृति दी । तब कुमार गवेन्द्र इंडोर डंडधार । वह बहुत जगेश्वर उसको लाभ के अंदर स्थिर होकर बताया हुये स्थानों पर बैठ गए । प्रमुख ही कोलक के बाहर आ गए । उन के बाहर आते ही गोलक सोता ही बंद हो गया । उसके उपरांत क्या हुआ इसका अनुभव कुमार कविंद्र वशेष तीन व्यक्तियों को हुआ । इन चारों का अनुभव प्रायोगिक था जबकि प्रमुख किसी का अनुभव इसको लग पर प्रायोगिक नहीं था । इसके बाद भी प्रमुख जी को बोल अब के बाहर लगे संकेतों से पता चल रहा था की गोलक अपना कार्य ठीक प्रकार से कर रहा था । अब प्रमुख सी जो कर सकते थे वो थी प्रतीक्षा । अब प्रतीक्षा के साथ उनके ऊपर राज्य की सुरक्षा का भी भार था और भी इसके लिए तैयार थे ।

भाग - 09

गणतंत्र द्वारा दलों को महंगी लोग से लाना । जो गोल्ड का नेतृत्व उम्मादवार बंद हुआ, प्रमुख चुके श्रद्धानुसार सभी सीधे वह मेरूदंड भूमि के लंबा वक्त करते बैठ गए । सभी के नेत्र बंद थे । कुमार गणतंत्र के मन वस्तुनिष्ट में क्या चल रहा था सम्भवता वहीं जान सकते थे । शेष तीनों तो मात्र कुमार नरेन्द्र का अनुकरण करने वाले थे बल्कि अनुकरण करना भी उचित ना होगा क्योंकि वे शांत बैठे हुए थे और पूरी तरह से कुमार कंटेंट ऊपर निर्भर थी । एकाएक क्या हुआ इसका तो किसी को भी ज्ञान नहीं । एक पल से भी कम समय के लिए सभी को कुछ इस प्रकार का अनुभव हुआ कि वे और उनका शरीर दो भिन्न भिन्न प्रारूप हैं । आप ऐसा भी समझ सकते हैं कि आप अलग है और आपका शरीर नहीं है । अच्छा आपको उसकी अनुभूति नहीं है । कुछ भी याद नहीं हुआ कि क्या हुआ है । जी का एक एक झटके के साथ सभी ने अपने आपको पुराना अनुभव किया । अपने शरीर के साथ अपने शस्त्रों जो उनके साथ नियत स्थानों पर रखे थे, सभी की आंखे बंद थी । सर्वप्रथम कुमार गणतंत्र नहीं तो उसके पश्चात सभी ने अपनी आंखों को खोला । आप खोल कर ही सभी नहीं सर्वप्रथम एक दूसरे को देखा और अपनों को साथ देखकर मन ही मन शांति व प्रसन्नता का अनुभव किया । इसके उपरांत उन्होंने अपने चारों तरफ देखता वर्ष व्यवस्था प्रारम्भ किया । सभी के साथ एक समान ही अनुभव था की सभी ऊर्जा बहुत साल से परिपूर्ण तथा फॅमिली के साथ चकित थे । वो कहाँ गए सर, शरीर किस प्रकार पहुंच गए? बहुत से विज्ञान के प्रयोग आप प्रतिदिन करते रहते हैं परन्तु वो किस प्रकार हो रहे हैं यह मात्र वही जानते हैं जो वैज्ञानिक है अथवा उस प्रयोग में होने वाले यंत्रों के यांत्रिकी को समझते हैं । इसी प्रकार के किस प्रकार संभव हुआ ये मात्र प्रमुख ही जानते थे । उन्होंने अपने आप को एक वन नुमा स्थान में पाया । सभी उठ खडे हुए । सभी ने अपने अपने अस्त्रों को सुनियोजित तरीके से रख लिया । उनके पास ही चल के कितने कि धोनी का आभास हो रहा था । वातावरण सुखद प्रतीत हो रहा था । वे सभी कुमार गणतंत्र का अनुसरण करते हुए जल की धोनी की दिशा की ओर बढ चले । वातावरण वृद्धि लोग जैसा ही प्रतीत हो रहा था परंतु वृक्षों की ऊंचाई का अखबार कुछ काम था जबकि वृक्षों का फैलाओ अपेक्षाकृत अधिक था । ये दृश्य सभी को अस्पष्टता भिन्न दिखाई दिया । जैसे जैसे वे आगे बढ रहे थे, धीरे धीरे जल्द होने की तिव्रता बना रही थी । उन्होंने सावधानीपूर्वक आगे पडने का क्रम जारी रखा । एकाएक उन्होंने देखा कि एक गुफा के द्वार के सम्मुख पहुंचनेवाले तब उनके पैर रुक गए । उन्होंने अपने आप को और अधिक सावधान किया । क्योंकि गुफा के भीतर क्या है? इधर से ही ध्वनि आ रही है अथवा गुफा के बाहर से तो नहीं आ रही है । किसी को कुछ अनुमान नहीं था । तब कुमार कंटेंट करने का मेरे विचार से हमें रात्रि की प्रतीक्षा करनी चाहिए । इससे अपना कार्य आसान हो जाएगा । मेरे अनुसार यही सही है । आपका क्या मत है । सभी ने लोग सजाते दे दी । तब गुफा के मुख्यद्वार से हटकर वृक्षों की ओट में आकर छिप गए । उन्होंने अनुमान लगाया कि इससे एक लाख हो सकता है । यदि कोई यहाँ से आने अथवा जाने वाला होगा तो अवश्य ही दिखाई देगा । उनके अनुसार अपनी आगे की रणनीति बनाने में मदद मिलेगी । यहाँ पर समय का अनुमान लगाना कुछ कठिन प्रतीत हो रहा था । यहाँ पर आए हुए दोपहर हो चुके थे परंतु समय कुछ थी देती दे व्यतीत हो रहा था । सभी को इस प्रकार का सवाल अनुभव हुआ तब टंडन हाथ नहीं कहा मुझे कुछ इस प्रकार का अनुभव हो रहा है । इस समय की गति यहाँ काम है अथवा ये भी हो सकता है कि यहाँ पर दिन भर रात का समय ज्यादा पूर्ण अथवा ये भी हो सकता है कि तीन बार रात में कोई अधिक वह कोई काम हो परन्तु कुछ है तो आवश्यक क्योंकि हम लोगों को यहाँ पर आये हुए कितना समय हुआ है उसके अनुसार परिवर्तन नहीं दिख रहा है । इस पर सभी सहमत थे । इस पर भोजन केश्वर ने कहा मेरा अपना ध्यान कहता है कि इस जगत में जहाँ जहाँ जीवन है वहाँ पर सभी स्थानों पर दिन सामान समय का नहीं होता है । अच्छा यहाँ पर किसी कारण से ऐसा हो रहा होगा इस बात से सभी सहमत नहीं । अब सभी शांत किसी के देखने की प्रतीक्षा कर रहे थे । इसके अतिरिक्त अब कोई अन्य विकल्प दिन के प्रकाश में संभावना था । काफी समय के उपरांत रात्रि के अंधकार ने यह स्पष्ट किया कि यहाँ रात्रि भी आती है । अब स्पष्ट था कि दिन रात्रि यहाँ पर भी है परंतु उन का समय पृथ्वी के समय से बिन वहाँ अधिक है । जब रात्रि का अंधकार पूरी तरह से व्याप्तो हो गया । तब सभी ने संयुक्त रूप से विचार किया कि अब खोखा में प्रवेश किया जाए । तब कुमार कंद्र कहना प्रारम्भ किया, अब रात्रि के अंधकार में कुछ भी स्पष्ट प्रतीत नहीं हो रहा है । साथ ही गुफा के अंदर या उसके पार किया है । आपको समझ में आएगा । मेरा विचार है कि हमें शालो पहले गुफा के द्वार पर चलकर देखते हैं । कुमार युद्धनीति कहती है कि हम चारों को एक साथ नहीं चलना चाहिए । पहले मैं जाता हूँ और देखता हूँ कि गुफा के पास किस प्रकार की संभावना है । इस पर कुमार ने और सभी ने स्वीकृति में अब का से लाया । तब तंगधार अपने मन मस्तिष्क में प्रभु को स्मरण करके आगे सावधानीपूर्वक पडे । धीरे धीरे वे गुफा के द्वार पर पहुंचे और अपने कानो को अपनी अन्य इंद्रियों की भी क्षमता प्रदान करने का प्रयास का सुनने का प्रयास करते लगे । जैसे ही और आगे पढे उन्हें बहुत ही मंदिर प्रकाश प्रतीत हुआ । अब उन्होंने अंदर प्रवेश करने का मन नहीं बताया था कि पीछे से किसी की आहट सुनाई पडी । दंड, आधार, विद्युत की गति के साथ कुमार और उसने देखा के भोजन देश था । तब भोजन देश बनने का डंडधार चीज कुमार गजेंद्र का मत है आप अब अकेले प्रवेश न करें । इतनी बात हो ही रही थी कि गणतंत्र इंदुर भी वहाँ पहुंच गए । तब घनेन्द्र नहीं कहना प्रारम्भ किया । अब मेरे मन में विचार आया है कि यदि हम सभी साथ रहते हैं तो उत्तम रहेगा । अलग होने से समस्या बढ सकती है । इस पर सभी एक साथ होकर कुम्भ में प्रवेश करते हैं । जैसे जैसे आगे बढते हैं प्रकाश धीरे धीरे पडने लगता है । जब एक गुफा के अंत में पहुंचते हैं तो वहाँ से स्पष्ट रूप से एक नगर दिखाई पडता है । सभी धीरे धीरे उस स्विंग बढना प्रारंभ करते हैं । धीरे धीरे सभी ये आभास करते हैं कि उनको घेरा चाहता है । आपस में एक दूसरे के इस सूचना से बिना बोले ही अवगत कराते हैं । साथ विषम परिस्थितियों के लिए मान वतन से तैयार हो जाते हैं । कुमार गजेंद्र ने संकेत ही समझा दिया के प्रथम आक्रमण हम नहीं करेंगे । धीरे धीरे सभी नगर के द्वार तक पहुँच गए । नगर द्वार पर द्वारपालों ने उन्हें अंदर जाने से नहीं होगा । सभी ने नगर में प्रवेश किया । नगर में प्रवेश करते ही सभी आश्चर्यचकित थी । यहाँ पर लोगों की संख्या कम थी । लोगों की शारीरिक बनावट बहुत अप्राकृतिक थी । सामान्य का किसी भी स्थान पर रहने वाले चीज एक प्रकार के ही होते हैं । उनकी शारीरिक बनावट समान होती है परन्तु कट में भिन्नता हो सकती है । यहाँ पर शारीरिक बनावट ही भिन्न थी । कुछ तो कद में बहुत ही विशाल थे और कुछ कट में बहुत ही छोटे । कुछ शरीर में एकमुख था । किसी के मुख पर दो मुक्ति किसी के एक आई थी और किसी की दो और कुछ भी तो तीन बच्चा रखी थी । तब इस प्रकार के रूप अप्राकृतिक बराबर देखने के उपरांत कुमार कंटेंट ने कहा आप सभी ने कुछ ध्यान दिया । प्रभु मैंने को अपने जीवन काल में इतना शरीर चडक । यहाँ तो हाॅल उसको इस प्रकार विचित्र है कि यदि किसी ने न देखा हो तो वो कभी मणिका ही गई सकते हैं । इसके अतिरिक्त कुछ और नहीं प्रभु परन्तु यही इतना मन उद्वेलित करने वाला है कि इसके आगे ब्लॅक सी हो गई है । तब आपने मुझ पर हाथ रहते हुए वो चंदेश्वर ने कहा कुमार मुझे प्रतीत हो रहा है यहाँ के घरों का आकार बहुत विशाल है और साथ ही व्यक्तियों की संख्या बहुत कम प्रतीत होती है । इतना कहने के उपरांत वो चंदेश्वर शांत हो गए । तब उन सभी के शांत रहने पर कुमार कंटेंट ने कहा यहाँ सबसे मुख्य विषय हैं । यहाँ पर केवल पडोसी पुरुष दिखाई दे रहे हैं । इतने समय में एक भी महिला नहीं दिखाई थी । इतना सुनने के पश्चात सभी आवाज थी ये तो ध्यान ही नहीं दिया । स्त्रीपुरुष तो प्रकृति में एक दूसरे के पूरक है । कोई किसी से कम नहीं है । दोनों अपने अपने स्थान पर सेट है । समस्या तब प्रारंभ होती है जब हमें एक दूसरे का स्थान लेना चाहते हैं । शक्कर व मिर्ची दोनों का ही अपना अपना स्थान है । दोनों ही भोजन के महत्वपूर्ण भाग है परन्तु भोजन बनाते समय यदि मिर्ची को शक्कर के स्थान पर प्रयोग करें तो भोजन खाने योग के न रहेगा । इसी प्रकार सबका प्राप्ता स्थान है और सभी अपने अपने में श्रेष्ठ है हैं । जब कोई वस्तु अथवा व्यक्ति आवश्यकता से अधिक उपलब्ध हो जाता है तो उसका महत्व काम मत हुआ । लगभग सब आपका ही हो जाता है । सभी विचार करते हुए संदेह ये किस प्रकार संभव है कि केवल पुरुष ही हूँ । तब दंडधारी ने अपना विचार रखा । मुझे लगता है कि यहाँ पर महिलाएं भी होंगी सम्भवता उन्हें बाहर नहीं आने दिया जाता हूँ । मेरा महिला के सृष्टी में संतुलन किस प्रकार संभव है । इतनी चर्चा चल रही थी । एक बहुत अजीब सी आकृति वाला व्यक्ति पास आता दिखाई पडा । उसके पास आकर बिना किसी औपचारिक अभिवादन के कहा हमारे साथ आपको चलना होगा । बिना प्रतीक्षा किए वह वापस घूम गया और उसके घूमने से अस्पष्ट था कि वो जान रहा था की उस की आज्ञा का पालन होगा । सभी ने एक दूसरे की तरफ देखा और सभी नहीं आंखों ही आंखों के संकेत से ये निश्चित किया की हमें इसके साथ चलना चाहिए । सभी उसके साथ सावधानीपूर्वक चलने लगे । अपने स्वभाव के अनुसार दंड आधार की दृष्टि चारों ओर थी और उनका एक हाथ अपनी तलवार पर था । पूजन देशभर के भी लगभग वही प्रतिक्रिया थी । ऍम कुमार गजेंद्र के ठीक पीछे था । चलते समय इंदौर इस बात का विशेष ध्यान दे रहा था की यहाँ के विशेषताओं को वो ध्यान रख सके । सभी पत्थर से निर्मित मार्ग से होते हुए चारों तरफ देखते हुए चले जा रहे थे । कुछ समय के भीतर उनको एक विशाल भवन के भीतर ले जाया गया । वो भवन विशाल पत्थरों को फंसाकर नेटवर्क किया गया था । वो विशाल भवन बाहर भी पुराना प्रतीत हो रहा था । चार । उस भवन के भीतर जब पहुंचे तब उन्होंने विशाल कक्ष में लगभग सौ लोगों को देखा । उनमें से कुछ खडे थे और कुछ बैठे हुए थे । विशाल कक्ष में एक विशाल सिंहासन जो पत्थर वन लकडी से निर्मित प्रतीत हो रहा था, पर एक व्यक्ति बैठा था । उसका नाम था लोचन पडेंगी । इसके अतिरिक्त वहाँ पर अन्य कुछ बडों के नाम प्रभाषा वर्तुल पडेंगी डन तब रहेंगी न, तब ऋंगी आती था । सर्वप्रथम लोचन भृंगी ने बहुत ही तीव्र स्वर में प्रश्न किया कौन हो तुम सब गांव हो तब यहाँ कैसे आए? इसके पहले कोई भी था कुमार घनेन्द्र नहीं आगे बढकर उत्तर क्या हम कौन हैं? कहाँ से आए हैं, कैसे आए हैं यह पूछने का तुम को क्या अधिकार है उसने का अधिकार राजा अथवा युक्त में विजय प्राप्त करने वाले कोई होता है यहाँ की व्यवस्था के अनुरूप नहीं तो आप राजा प्रतीत होते हैं और रही आप हम से विजयी हुए हैं । इतना सुनने के उपरांत वहाँ पर वस्थित सभी क्रोध से भर के तब पूरा लोचन भिंडी ने कहा तो भारी अवस्था देखकर तो को मैंने अपने काबू में रखा था । इतना पहले को प्रांत वो शांत हो गया । तब बुलाना डंडधार ने अपने स्वभाव के प्रतिकूल होकर का क्या कुमार नया सकते कहा है? आपका तो राजा प्रतीत हो रहे हैं क्योंकि यहाँ कोई है ही नहीं । कुछ ही लोग हैं वो भी देखने में इस प्रकार के बने हैं कि अधूरे प्रतीक होते हैं । साथ ही युद्ध में विजय भी नहीं हुए हैं । मध्य की बहुत अभिलाषा प्रतीत हो रही है । आप सभी को चलो ऐसा ही सही । इसके पश्चात रोजन भृंगी ने संकेत किया तो वर्तुल भेंगी आगे बढा और होना हम सभी में जो चाहे मेरे साथ युद्ध कर सकता है । इतना कहना था की डंडधार आगे बढे । तब कुमार गणतंत्र नहीं संकेत संकेत देखकर ठंड आधार रुक गए । एक्शन के लिए कुमार ने अपने नेत्र बंद की और पुनः दंड आधार को सम्भवता । प्रथम बार आदेश क्या प्रभु को माल में धारण करके समझाऊँ कि हम कौन हैं और कहाँ से आए हैं? एकता सुनने के उपरांत डंडधार नियतन जोरदार आवास में कहा राॅकी जय हो । इतना कहने के उपरांत दंड था आप अपने स्थान से विद्युत की भारती गुप्ता और वर्तुल बढेंगे के सामने था । डंडधार के दोनों हाथों में तलवार थी और वर्तुल भंगी के हाथ में भी विक्षित प्रशस्त्र था । जो तलवार वह भाले का संयोजित प्रतीत होता था परन्तु का वर्तुल भरेंगे अपने स्थान पर जल के समान खडा ही रहा । अंडर बाहर के दोनों हाथ हवा में बनी हुई थी परन्तु वर्तुल भिंडी उन्हें प्रत्युत्तर देने की बत्रा में गई था । उसने अपना आस करंट लग दिया । इधर उसने अपना अस्थि रखा और उधर लोचन पडेंगे भी अपना स्थान छोडकर सभी पा गया कांदा बाहर अचंभित था कि क्या हुआ उसके जब कुमार गजेंद्र की तरफ देखा तो कुमार मुस्कुरा रहे थे । मुस्कुराते हुए कुमार नरेन्द्र ने कहा डंडधार जी मैंने कहा था इन को समझाओ की हम कौन हैं और कहाँ से आए हैं आपने तो हाँ आक्रमण ही कर दिया आपका बात प्रभु आशुतोष केंद्र कहना ही पर्याप्त था । मैं समझा नहीं । इतना मात्र कहना हुआ ही था कि लोचन सिंह जी ने कहा मैं चाहता हूँ कि आप ये बताएँ आपने प्रभु आशुतोष केंद्र का नाम क्यों लिया? आपके कौन हैं? मेरे हिर्दय में बहुत ही आनंद की अनुभूति हो रही है । हम सभी भाव राहीन जर्व पशुवत है । यदि इस प्रकार होते तो आपको पहले ही पहचान लेते फिर आपका परिचय दे और हमारे बनके उत्कंठा को शान्त करें । इतना कहने के उपरांत उसके आशोक लानी के कारण पहने के लिए डंडधार भोजन देवेश्वर वरिंदर भी अधिक कुछ नहीं समझ पा रहे थे कि एक आई क्या हो गया । कुमार कंद्र को पहले ही कुछ आभास हो गया था परंतु हुआ उन्होंने अपना परिचय प्रारंभ में छिपाना उचित समझा । इसके दो कारण हो सकते हैं । पहला कारण जो उनका क्या कह रहा था । ये कोई प्रभु लगते हैं । यदि ये जान जाएगा कि मैं प्रभु आशुतोष इंद्र का पुत्र हूँ तो संभव है कि एक का एक उसे विश्वास ही ना हो । दूसरा कारण जो उनकी बुद्धि कह रही थी, कीबोर्ड पडताल के उपरांत ही अपना परिचय खोलना चाहिए । अजय कुमार गजेंद्र ने कहना प्रारम्भ किया हम सभी प्रभु आशुतोष केन्द्र के सेवक है । इतना सुनना ही था । किलो जान भृंगी कुमार का केन्द्र के पैरों पर गिर गया । उसने कुमार कंद्र को बार पार्टन डबल प्रणाम किया । कुमार उसे बार बार उठाने का प्रयास करते हैं परन्तु कुमार के चरणों को पकडे हुए था और उसके शुरू बह रहे थे । बेस्ट दृश्य को देखकर सभी उपस् थित लोग भूमि पर दंडवत हो गए । कुमार और साथ में गए भोजन देशभर दंड था । वह हिंदुस् रिश्ते से भाव भूत हो गए । अब इस सृष्टि के उपरांत डंडधार वो चंदेश्वर वह इंदुर के मन में कुमार कर केंद्र का स्थान और ऊपर उठ गया था ।

भाग - 9.1

मात्र अच्छे कुल में जन्म लेना ही आपको उत्तम नहीं बनाता है, बल्कि आपको अपने कुल के उत्तरदायित्व भी निभाने होते हैं । यही उत्तरदायित्व आपका आपके कुल के लिए होता है । यदि श्रेष्ठ कुल में जन्म लेने के उपरांत भी आप अपना उत्तरदायित्व नहीं निभा पाते हैं तो आपका चंद लेना कलंक है । मैंने विचारों से दंड आधार भुत चंदेश्वर वह इंदर ओतप्रोत थे । उन्हें अब अनुमान हो गया था कि कुमार को गोलक में बैठने के पूर्व ही सब पता था । हर था, वो सब पहले ही जानते थे । कई बार प्रयास करने के उपरांत जब लोजन भरेंगे उठा तो उसने शेष सभी तीनों को प्रणाम किया । अब उसने कुमार कमलेन्द्र सही प्रार्थना की । प्रभु! आपके दर्शन से पता नहीं क्यों मन इतना अधिक प्रफुल्लित हो गया है कि आज से पूर्व कभी नहीं हुआ कहाँ प्रभु आशुतोष केन्द्र के सेवक है अथवा स्वयं भी प्रभु है । मेरी बहन में अत्यंत उत्कंठा जागृत हो रही है । मेरे मन की अंतर्दशा का संभावना आपको ज्ञान हो ही गया होगा । इतना सुनने के उपरांत चंदेश्वर आगे बढे और बोले, आपका अनुमान सकते ही है । हर खाओ प्रभु नहीं । ये प्रभु आशुतोष केन्द्र के पुत्र कुमार कडे ंद्र हैं । इतना सुनते ही वहां उपस्थित सभी भाव विभोर हो गए । इतने भावविभोर के उन्होंने किसी को बैठे तक के लिए नहीं कहा । इस समय सभा में सभी खडे थे । कोई किसी से कुछ न कह रहा था और मैं कुछ पूछ रहा था । जब न कोई सामने उपस् थित व्यक्ति से पूछे और ना कुछ कहे बस मूर्ति के सवाल शरीर के साथ साथ मान भीचर हो जाए अर्थात मन अपनी गतिशीलता को भूल जाए तो समझना चाहिए । व्यक्ति सब बात हो चुका है । सब आप ही आंखों को बंद कर बैठा ही मात्र नहीं है । जब आपका मन अपनी गति अर्थात अपना कर मैं भूल जाये तो समझो सवाद व्यवस्था आ गई । तब कुमार गजेंद्र नहीं ध्यान हटाने के लिए कहा । क्या हम सब स्थान ग्रहण कर सकते हैं आप? प्रभु हम में ही तो है तो पहले अपने प्रभु कोटा पहचान सके और अब आंखों का दोष । वह मन का तो शॉप कि प्रभु से पटना ही नहीं चाहते हैं । एकता कहते हुए लोचन भेंगी अपने हाथों से पकडकर कुमार का नरेंद्र को अपने आसन पतले गया और उन्होंने कुमार को अपने आसन पर बैठाया । पहले तो कुमार गजेंद्र नहीं वहाँ बैठने से मना कर दिया परंतु बहुत आग्रह करने पर उन्होंने आसन पर बैठा स्वीकार कर लिया । कुमार के आसन पर बैठते ही सभी ने आसन ग्रहण किया । डंडधार भोजन अवेशवर वह इंदूर को भी सन सम्मान आसन पर बैठाया गया । अब दोनों ही पक्षों के मन में विभिन्न प्रकार के प्रश्न थी । तब मन की उत्सुकता को नियंत्रित न कर पाने के कारण दंड आधार ने भ्रष्ट क्या मैं अपने मन के उत्कंठा को संभाल नहीं पा रहा हूँ? इसी कारण कुछ प्रश्न करना चाह रहा हूँ । यदि आप सभी की अनुमति हो तो दूसरे पक्ष ने बोल कर और शेष तीनों ने मौन स्वीकृति दे दी । तब डंडधार ने प्रश्न किया मैंने जितना अभी तक जाना है अथवा देखा है उसमें इस प्रकार का स्थान अथवा इस प्रकार के लोग अथवा केवल पडोसी परुष आप समझ रहे हैं कि मैं क्या कहना चाहता हूँ । मेरा अभिप्राय था की यहाँ पर सर्वथा भिन्नता के कारण सब कुछ अप्राकृतिक सा प्रतीत हो रहा है । आप सम्भवता समझ गए होंगे कि मैं क्या कहना चाहता हूँ । जब व्यक्ति बहुत ही अप्रत्याशित वस्तुओं अथवा व्यक्तियों को देखता अथवा सुनता है तो पहले पहले उसके थी, अपनी कसौटी पर उसको कसना चाहती हैं । परन्तु जब उत्थे भी अपनी कसौटी पर कस नहीं पाती है तो उसकी चीज हुआ उसका साथ नहीं देती हैं । आप ऐसे भी समझ सकते हैं कि जब मन थे ये अस्पष्टता के साथ नहीं समझ पा रहे हो तो क्या पूछा जा सकता है । साथ ही पूछना भी आवश्यक हो भले ही ना पता होगी क्या पूछना है । परंतु यह तो निश्चित है कि कुछ उसका तो है । सम्भवता उत्तर जानने वाले को ये पता हूँ की सामने वाला क्या पूछना चाहता है । यहाँ पर यही विकट स्थिति है । तब लोचन फिलिंग जी ने कहा प्रभु यह स्थान जहाँ पर हम लोग इस समय है वो स्थान अधिक समय तक नहीं रहने वाला है । हाँ अधिक समय तक नहीं रहने वाला है । इसका क्या अभिप्राय इतनी ही चर्चा हो पाई थी कि एक का एक विशाल कक्ष में ना जाने कहां से देवदत्ता बडे ने प्रवेश किया । उनको देख कर ही कुमार भोजन देशभर डंडधार वही दूर के अतिरिक्त सभी अपने आसन पर खडे हो गए । सभी ने देवदत्त मणि को प्रणाम किया । बिलोचन भृंगी ने देवदत्त मनी, सही कुमार गजेंद्र का परिचय कराना चाहा । तब देवदत्त मनी ने कहा मैं जानता हूँ इनका नाम दलितेन्द्र है और इनके पिता का नाम आशुतोष है । ये सभी पृथ्वीलोक से आए हैं । आप सभी के मन में जो कंठ आए हैं वो मैं समाप्त करने का प्रयास करता हूँ । सर्वप्रथम आप ये जान ले कि मैं महाराज, आशुतोष इंद्र का मित्र देवदत्त हो । मणिका भाव पूरी मेरा निवास स्थान है । ये वो स्थान है जहाँ बारह हजार आशुतोष इंद्रा आ चुके हैं । बाहर आ जाता तो सुरेंद्र इस समय डिब्बे काल अस्त्र के प्रभाव से घायल होने का अभिनय कर रहे हैं । शमा करें घायल होने के अभिनय से ही आपका क्या अभिप्राय? क्या वे घायल नहीं है? अर्थात काल देश लाना व्यस्त है । आप ये क्या कह रहे हैं? नहीं नहीं, मुझे अभिनय शब्द का प्रयोग नहीं करना चाहिए था । वास्तव में प्रभु लीला कर रहे हैं । आप अन्य थाना ले क्या आप क्या क्या और कोई उनको स्वस्थ हुआ अस्वस्थ्यकर सकता है । वे स्वस्थता या अस्वस्थता, जीत या हार जो आप हम सोच सकते हैं उससे परे हैं । यदि हम वो आप कुछ भी ना करें तो भी होगा । वही जो होना है हम आपको साधन मात्र है । आने वाले जन्मों में महाराज आशुतोष इंद्रा अपने मूल चरित्र रूप में आ जाएगी जहाँ उनके नाम से जीव को मुक्ति प्राप्त हो जाएगी । अब मैं आपके प्रश्नों के उत्तर देता हूँ । ये लोग अब समाप्त हो जाएगा । वैसे तो प्राम्भ के अतिरिक्त सभी कुछ नश्वर है, उसी प्रकार अब इसका समय सभी आ गया है । ये लोग समाप्त हो जाएगा । अर्थात् ये लोग हमने वहां आशुतोष इंद्रा नहीं इसी कारण छोडा था आपने वह पिता श्री इस कुछ सुना था कब? इतने वर्ष पूर्व क्या पिताश्री यहाँ आ चुके हैं । आप सभी आश्रय है ना करें । मेरी बात को ध्यान से सुने । आपके पिता के पिछले जन्म में हम लोग यहां आए थे । तब भी आपके पिता हमारे मित्र थे । मैं इसी रूप में था । आपके पिता को सब याद है । तब हम लोगों ने ये एक ऐसा लोग खोजा था जो अब समाप्त होने वाला हूँ । तब ये लोग हमने निश्चित किया । यहाँ पर एक हजार सात लोग हैं । उन्हें आपके पिता के अंशुल से बनाया गया है । इनमें से सभी तुम्हारे पिता के अलग अलग हिस्सों से लिए गए रक्त कडी गांव से निर्मित है । एक यहाँ पर नहीं है । वो अपने प्रभु के कार्य में लिप्त हैं । उसका नाम लाॅचिंग । इस प्रकार कुल एक हजार आठ लोग यहाँ पर थे । सभी का नाम उन्हीं अंगों के आधार पर रखा गया जिससे वे निर्मित थी । उदाहरण के लिए लटक रहेंगी । लाॅक मुकेश से निर्मित लोचन भरेंगे का निर्माण प्रभु के स्टोर से किया गया । डन तब रहेंगे का निर्माण प्रभु के दातों के अंशुल से किया गया । इसी प्रकार एक हजार आठ का निर्माण यहाँ पर किया गया । मैं आपको क्या कहकर पुकारूं? यदि आप इतना कहकर कुमार करेंगे, शांत हो गए । तब देवदत्त मणि ने कहा मेरा नाम तो आप जानते ही हैं । यदि आप चाहो तो मुझे देवा श्री के नाम से भी बुखार सकते हैं । यहाँ मुझे आपके भ्राता कुमार कार्तिक केंद्र नहीं दिया था । हाथ उत्तम देवस् से जी मेरा एक प्रश्न यह है आप निर्मित शब्द का प्रयोग क्यों कर रहे हैं? क्या निर्मित शब्द के स्थान पर को बार तो भारत प्रश्न उचित है परन्तु यहाँ निर्मित शब्द ही उपयुक्त है । ये सभी वैज्ञानिक अनुसंधानों की मदद से बने इन सभी की विशेषताएं अलग अलग हैं । इसी कारण इन सब की बनावट पर रंगरूप भिन्न है । एक विशेष बात और भी है डंडधार चीनी का देवर स्ट्रेची यदि हमारे यहाँ आने के पूर्व कोई और लोग से आखिरी नहीं ले जाता तब तो इतना कहने के उपरांत ठंडक हाथ शांत हो गए । डंडधार की बात में या थार थका का बाहर था अच्छा । यह सुनकर सभी देवता की ओर देखने लगे । आप के बाद सत्य नहीं हो सकती है । दंडधारी करन इनको बलपूर्वक ले चारा लगभग असंभव है और अब आप ये जाएंगे नहीं । इस बात का आर्थिक सामान्यता कोई नहीं जान पाया । तब कुछ पल शांत रहने के उपरांत पुरा देवश्री कहना प्रारम्भ किया । इनके अंदर मानवीय पर यांत्रिकी दोनों है । मानवीय कोण ये है कि ये सभी मदद सियों की तरह भावों से ओतप्रोत है । साथ ही यांत्रिकी गोला इस प्रकार है कि यंत्र की भर्ती, बिना रुके, बिना थके कार्य करने की क्षमता, इसके अतिरिक्त हर एक अलग अलग विशेषताओं से परिपूर्ण उदाहरण के लिए लडते रहेंगे । लड करेंगे जब जहाँ चाहे बिना साधन के पहुँच सकता है । साथ ही पल बहुत ही गया था । ऐसे प्रकार सभी की अपनी अपनी विशेषताएं हैं । यदि ये सभी एक साथ हैं तो कभी कोई इन को हरा नहीं सकता हूँ । आप ऐसे समझ सकते हैं इन को मिला दें तो आज आशुतोष केन्द्र के समान हो जाएंगे । देवश्री जे आप का क्या अभिप्राय कुमार ये प्रश्न आप पूछ रहे हैं, आप स्वतः ही सक्षम हैं । फिर भी यदि आपने प्रश्न कर ही दिया है तो मैं इसे अपना दायित्व मानता हूँ । कि मैं उत्तर आज आज तो सेंटर की क्षमता है, जितनी है कुछ काल पश्चात अनंतो हो जाएंगी । इसीलिए पहले आज से तुलना की परन्तु वो प्रश्न की आप चिंतित ना हो, मैं आपके प्रश्न का उत्तर दे रहा हूँ । इतने बलशाली होने के कारण इन्हें यहाँ सही कोई नहीं ले जा सकता । क्या बात तो शैलेंद्र या उन का अंश यहाँ आएगा तब उसके रक्त कणिकाओं से इनकी रक्त कणिकाओं के सामंजस्य के उपरांत जब इनके शरीर से यांत्रिकी विधि से संप्रेषण किया जाएगा, तब ये सभी जन जायेंगे और आपके साथ जाने पर रहने के लिए प्रेरित हो जाएंगे । अब वो समय आ गया है इसके लिए चलिए वो यांत्रिकी प्रतिक्रिया पूर्णकर ली जाए । इस प्रकार सभी समझ गए कि क्यों ना इन सभी के लिए डेविड शब्द परिभाषित किया गया । इसके बाद वैज्ञानिक विधि से उन सभी को इस प्रकार प्रेरित कर दिया गया कि वे सदैव आशुतोष इंद्रा परिवार के लिए ही कार्य करें । उनका जन्म तो इसे उद्देश्य के लिए हुआ था । अब एक प्रश्न और शेष था । ये अस्थान क्यों और कैसे समाप्त हो जाएगा? इस पर देवश्री देख रहा हूँ । क्या स्थान वो है जहाँ पर इस प्रकार के परीक्षण किए गए? हम सभी चाहते हैं कि ये कोई भी न जान पाए कि ऐसा भी संभव है । मैंने वहां आशुतोष इंद्रा एक ऐसा स्थान चुना था जहाँ बहुत वर्ष के उपरांत एक क्षुद्रग्रह आकर संघर्ष तो करेगा । उसके टक्कर इतनी भीषण होगी के संस्थान का चिन्नई समाप्त हो जाएगा । अब यहाँ से चलने की तैयारी करूँ मेरी गाडी बहुत इसके अनुसार बहुत समय अब अधिक दूर रही है । अब हमें यह स्थान छोड देना चाहिए । मैं कुमार गजेंद्र का नया नाम रखना चाहता हूँ । नया नाम इसका क्या अभिप्राय हैं? तुम यहाँ पर सैकडों वर्षों से प्रतीक्षारत बडों को ले जा रहे हो तो अपराजेय है तो तुम्हारे सब खाएँ । सेवक है । भक्त है अच्छा तो भारत नया नाम होगा गणपति । तब सभी ने गणपति गणेशचंद्र की जय हो का उद्घोष किया । गणपति गड ेंद्र की जय हो से वो लोग गुंजायमान हो कर अपने को धन्य मान रहा था । उस लोग का भाग के देखो सब आप तो सभी को होना है, चाहे सचिव हो चाहे निति परन्तु ऐसी समाप्ति तो मोक्ष कहलाती है । सभी अपने अपने स्थान पर बैठे जहाँ कुमार गन इंद्रा नहीं बैठने को कहा । इसके उपरांत को बार कल इंद्रा नहीं अपने हाथ से छोटे यंत्र में यांत्रिकी प्रतिक्रिया प्रारंभ की । देवा श्री अपने लोग को चले गए । कुछ शहरों में गणपति गजेंद्र की खून समाप्त हुई और एक ऐसा विस्फोट हुआ जिसकी चमक कुछ क्षणों के लिए सूर्य के समान प्रतीत हो और फिर अंधकार के आगोश में तो लोकसभा के लिए समझ गया हूँ ।

भाग - 10

कार्तिक केंद्र द्वारा काल विश्व की प्राप्ति उधर छत्रक रह रहेंगे, लोग से टकराता है और ऍम भीषण पहुंचा के कारण ब्रेन की लोग जलकर नष्ट हो जाता है । और इधर गोलक के बाहर प्रतीक्षा कर रहे प्रमुख जी को गनी संकेतों से ये आभास होता है की गोलक अपना कार्य कर रहा है । वो प्रतीक्षारत है कि कुमार नरेन्द्र वापस हैं और साथ ही बेच इस उद्देश्य है तो गए थे वो उद्देश्य भी पूर्ण हूँ । भाषा में मन की संतुष्टि का जो भाव छिपा होता है वो वास्तविक संतुष्टि से सतह बहुत अधिक और प्राप्ति के उपरांत नई आशा को प्रेरित करने वाला होता है । जो पुनर्निर्यात आशा में परिवर्तित होने वाला है और पूरा एक नई आशा और उसके प्राप्ति के उपरांत माया चलने ताशा इसी प्रकार जीव आशा और उसके पश्चात नहीं आशा में सुख को खोजता फिरता है परन्तु सकता आशा में नहीं है ये बहुत नहीं जानता । यहाँ पर आशा ऐश्वर्या कार्य हेतु प्रेरित है । आता आशा के उपरांत नई आशा तो होती है परंतु सुख शांति के साथ कृष्णा वाइब्रेट मरीचिका के साथ नहीं । जहाँ ईश्वर का कार्य करते हैं वहीं घर में है और धर्म के कार्यों में कृष्णा और एक मरीचिका का स्थान का ऐसी धर्मनिष्ठ आशा के साथ सब पक्षी दोनों हाथ बांधकर गोलप के खुलने की प्रतिक्षा कर रहे थे और वन में चारों की प्रतीक्षा गोलक के द्वार खुलने की प्रक्रिया प्रारंभ सर्वप्रथम इंडोर निकला और उसके उपरांत जब गणपति गजेंद्र के करना निकले के प्रमुख जी के साथ खडे सभी लोग विचार करते लगे कि क्या पूरा वाले आ गए । सभी ने इंदौर की तरफ देखा तो इन दोनों के मुखमण्डल पर विजयी भाव स्पष्ट थे और आने वालों के मुक्ता भाव पर रखना तो नई चुनौती थी । उनके मुखों का भाव भी अपना भाव समझ नहीं पा रहा था । जब मुख में एक ही आपको अथवा चार चार आंखे हूँ अथवा दस दस गान हूँ अथवा वर्णन करना ही चोटिल हो तो भाव का अनुमान असंभव सभी पाषाण की भर्ती चढ थे । विचारों के विचारशीलता भी जो विचार न कर सके तो इस पर मन बुद्धि पंगु हो जाती है । मनवर थी के पंगु होने से शरीर तो अपना कर मैं भी भूल जाता है । सभी गोलक से निकलने वाले विभिन्न आकृतियों के कारण महल में रहने वालों की आंखों का केंद्र बन चुके थे । धीरे धीरे भीड बढती जा रही थी । अंततः डंडधार बोझ चंदेश्वर व कुमार कंटेंट गोलक से निकाले उनके निकलते हैं । महल में पूरा जय खोज प्रारंभ हुआ । बाहर आ जाता हूँ तो केंद्र की जय गणपति गणेशचंद्र की जय इस प्रकार के जाए खोज रही कुछ समय के लिए ही सही परंतु मानसिक वर्ष रेडी कोर्चा में वृद्धि हुई । जब प्रमुख जी को गडों के विषय में जानकारी हुई तो वे भी सभी की भर्ती प्रसन्न हुए और उन्होंने करोडों का परिचय सभी मुख्य व्यक्तियों से कराया । इसके उपरांत गढ भी आपने प्रभु की जीवन रक्षा है तो बताए गए कार्यों में संलग्न हो गए । अब को श्रृंगा पूरा को नई शब्द टी वार नहीं ऊर्जा प्राप्त हो गई थी । अब को श्रृंगा पूरा के पास यदि कुछ करने के लिए शेष था तो वो थी कार्ति केंद्र की प्रतीक्षा । इधर कार्तिक केंद्र कोकाब मार्ग से बाहर निकल चुके हैं । कार्तिक केंद्र वर्लड भेंगी दोनों ही अपने अपनी अशोक वर्दी प्रगति के साथ आगे बढते हैं । आज वे अपने काम तब तक पहुंच जाएंगे इस की बोर्ड संभावना कुमार गांधी केंद्र को है । काटी केंद्र बहुत समय से शांत है । अब ये अपना मांग जोडते हैं । लाॅन्ड्रिंग इजी आपका क्या अनुमान हैं? कब हो ऍम हम लोग कितने समय भी पहुंच जाएंगे । प्रभु सम्भवता आज सायंकाल के और वही हम पहुंच जाएंगे । वहाँ पहुंचने के उपरांत शिखर अभिषेक काल विश्वासपात्र प्राप्त कर वापस होना होगा हूँ । मेरे हुआ मंदराचल पर्वत के बद्ध एक विशाल जलाशय जिसकी गहराई बहुत अधिक है । मेरा अनुमान है कि वह गहराई हजार हाथ की लंबाई के सवाल होगी । उस पार जलराशि में तलहट्टी वहाँ ऊपरी सत्ता के बाद थे । बात छिपाकर रखा गया है । अच्छा उसे निकालना भी एक दुष्कर कार्य होगा । दुश्कर कार्य होगा परंतु आपको देवश्री नहीं उसको निकालने की थी तो अवश्य ही बताई होगी । कब हूँ वो भी तो बताई है पर हम तो जब से वो अस्त्र निर्मित हुआ है तब से प्रथा बताया उसका उपयोग हुआ । इस कारण आज तक कालवश निकालने की प्रक्रिया कभी क्रियानवयन नहीं हुई । विधीवत विधान सीखने में तथा उसके उपरांत उसके क्रियान्वयन में कई बार बहुत अंतर प्रतीत होता है । परंतु प्रभु आप सात हैं और प्रभु आशुतोष इंद्रा वहाँ का आशीर्वाद हो तो असंभव कार्य भी आसान हो जाता है । किसी प्रकार की चर्चा करते हुए दोनों को मेरे उ वह मंदराचल पर्वत के मध्य पहुंचकर दो स्थान दृश्य होता है, जहाँ पर वो पात्र छुपा हुआ है । वो व्यापार जलसंग्रह इस प्रकार प्रतीत हो रहा है । मारो सबूत जिसका कोई ओर छोर ही नहीं दिखाई दे रहा है । इतने विशाल जलसंग्रह से एक छोटा सा पात्र प्राप्त करना लगभग असंभव प्रतीत होता है । तब कोबार कार्तिक केंद्र नहीं शिखर अतिशिक्षित कार्य सम्पन्न करने को लगभग हिंदी से कहा । साथ ही यह भी कहा कि उन्हें क्या करना होगा? तब लाट भरेंगे ने कहा प्रभु! सर्वप्रथम हमें एक विशाल पांॅच विशाल कक्ष को ढूंढना है जिसमें बहुत सारी व्यवस्थाएँ हैं जिनकी सहायता से हम कावेश प्राप्त कर पाएंगे । लाॅचिंग विशाल कक्ष वो बेन पर्वत श्रृंखलाओं के थे । आपको कुछ तो अनुमान होगा अथवा दिवस पीने कुछ संकेत तो बताए ही होंगे । प्रभु संकेत तो अवश्य ही बताएं हैं परन्तु ये कहकर लटकेंगे शांत हो गया । विचार करते हुए ऊपर स्वक्ष आसमान को ने हाथ नहीं लगा । फिर और वह दिशा को निहारने लगा । तब कार के केंद्र ने अनुमान लगाया कि कुछ दिशाओं और आसमान से संबंधित संकेत हैं । मन में विचार करते हुए कार्य केंद्र नहीं । लड हिंदी से कहा लड करेंगे जी मुझे ऐसा अनुमान हो रहा है कि कुछ खास बानवे दिशाओं का संबंध है । क्या हूँ वायु तारामंडल? मैं मयूर के सिर पर लगी । कल की वह मयूर के पाँच का अंतिम छोड जब चंद्रमा के साथ एक सीधी रेखा में आए और इन तीनों से मिलने वाली काल्पनिक रेखा जैसा स्थान कोई स्पष्ट करेगी, वहीं पर उस विशाल कक्ष का बाहर का होगा । मैं अभी थोडा तैयार समझ नहीं पाया कब हो । अभी सायंकाल होने का समय हो रहा है । कुछ समय पश्चात आपको आसमान में मयूर तारामंडल दिखाई देगा । पहले भी प्रभु इसके पूर्व कभी इस तरह का कार्य नहीं किया । मुझे तो पृथ्वी लोग पर आए हुए अधिक समय भी नहीं हुआ है । साथ ही जब से पृथ्वी पर हूँ लगभग आपके साथ ही हूँ । मैं भी आज की पहली बार इसका परीक्षण करूंगा । इस प्रकार की चर्चा परिचर्चा में समय व्यतीत होने से शाम से रात्रि का पहर काम प्रारंभ हो गया पता ही नहीं चला । तभी कार्तिक केंद्र की दृष्टि खूले नीलगगन में गईं । कार्तिक केंद्र ने देखा कि कहाँ कार्य धीरे धीरे प्रकाश नये होते जा रहे हैं । दोनों ही अपनी दृष्टि आकाश पर चलाए हुए थे कि एक का एक कार्य केन्द्र के स्वर में उत्साह का मिश्रण दिखाई दिया । वो देखो मयूर तारामंडल दिखाया नहीं । हाँ संभव वही है । अब विचार कीजिए कि चंद्रमा कहाँ से उतर होगा और किस ओर चलेगा । नहीं समझ गया । कुछ संपन्न गलत समझ में आ गई । अब मेरे साथ शुत्रता से आ गया । पूर्व दिशा से निकलने वाला छतरवार दक्षिण दिशा से होते हुए पश्चिम की ओर जाएगा । अब हमें चंद्रबाबू मयूर की कल की पंख का आखिरी छोर वाह वाह स्थान खोजना है जहाँ ये चारों एक सीधी रेखा में हूँ । इसलिए हमें पश्चिम की दिशा की ओर से होते हुए उत्तर की ओर पडा है तो उन्होंने विशाल जलपरी क्षेत्र के किनारे किनारे सफलता से चलते हुए पश्चिम से होते हुए उत्तर की ओर बढ नहीं चाहिए । अब सब भाग के पर अथवा प्राम्भ के हाथ में था क्योंकि यदि चंद्रमा एक बार उदय होकर उस स्थिति से गुजर गया जहाँ से एक रेजो रेखा सीधी रेखा बनती है तो फिर एक दिन और प्रतीक्षा करती होगी । आज की रात आसमान साफ है । एक दिनोपरांत यहाँ बादल होंगे अथवा नहीं ये कौन जानता है । आटा दोनों ने अपने मन में भ्रम को धारण कर अब का पूरा बाल बुद्धि वसावर्धक लगाया । बल बुत दिवस साबर थे । जब ब्रह्मा के साथ लग गई तब होने वाले कार्य को धर्म कहते हैं । इस धर्म मैं कार्य को खान कर सकता है । रात्रि के दूसरे शहर के आरंभ होते होते खून को लगा कि तीन बिंदु एक रेखा में आने वाले हैं, वो तीनों बिंदु है । चंद्रबाबू मयूर कल की वह मयूर के पंखा का आखिरी हिस्सा । बस वहीं पर दोनों रुक गए । ऐसे ही चंद्रबाबू उस बिंदु पर पहुंचा जहां से तीनों एक रेडियो रेखा पे आ गए । तब वे उसी स्थान पर थे, जहां चारों दो एक देखा रेखा पे आ गए । तब उन्होंने देखा कि उनके ठीक पीछे एक पर्वत में तो ऐसा प्रतीत हो रहा है । दोनों समझ गए कि तुम आ रही है और अब इसको कैसे खोलना चाहिए, यही प्रश्न शेष है । इस भ्रष्ट परताप केंद्र पहले ही निश्चित थे कि लटक भृंगी को ज्ञात होगा । इसी आधार पर उन्होंने लडकी रहेंगी से कहा, आपको द्वार खोलने की युक्ति तो पता ही होगी । प्रभु मुझे क्या बात है? परन्तु इसके लिए चल में उतरता होगा चल मैं जल की गहराई तो आप कह रहे थे कि बहुत अधिक है, इतने गहरे जल में किस प्रकार संभव है । अपने पास इतने गहरे जल में उतरने का कोई साधन भी तो नहीं है । तब वो कह रहे चल में उतर रहा तो है परन्तु बहुत कह रहे जल में जाना नहीं है था । यही द्वार के सामने ही द्वार खोलने की व्यवस्था है । चल में कुछ हाथ नीचे एक पत्थर को जो बहुत ही भारी है । वो एक खातों के टुकडे के सहारे दिखाया गया है । धातु के टुकडे को तोडना है, ऐसे ही उसे तोडेंगे पत्थर चल में हो जाएगा । उस पत्थर से खातों की रस्सी बंधी जो जल के भीतर से द्वार से बनती है । जब पत्थर होगा तो उसके बाहर से द्वार पीछे की तरफ खुल जाएगा । कुछ बाल भारती केंद्रों विचार करते रहे और उसके उपरांत कार्तिक केंद्र ने एक प्रश्न किया क्या ऐसे भी रहा तो संभव है जो चल से अभिक्रिया न करें और इतनी अधिक मजबूत हो रस्सी जिस हाथों से निर्मित है प्रभु वो बहुत सी धातुओं का एक विशेष अरुण बात का मिश्रण है जिसमें चल लगवा वायु अथवा मिटटी से अभिक्रिया नहीं होती है था वो अभिक्रिया मुक्त है अच्छा वो रस्सी अभी भी सुरक्षित होगी और अपना कार्य पूरी तरह से करेगी । लडकी रहेंगी जी एक प्रश्न और मेरे मन में आ रहा है कि यदि हमने वो पत्थर वहाँ से विस्थापित कर दिया तो क्या दोबारा उसको उसी स्थान पर स्थापित कर पाओगे क्योंकि आपने कहा था कि वह बहुत ही भारी है । इस पर लड पढेंगी नहीं कुछ भी उत्तर नहीं दिया बल्कि स्वता ही दुविधा में पड गए और विचार करने लगे कि उन्हें ये प्रश्न देवदत्त मडी जी से पूछना चाहिए था । पहले पूछा नहीं और उन्होंने बताया नहीं, अब मैं क्या करूँ? इतने विचारशील भावभंगिमा को देखने के उपरांत कार के केंद्र समझ गए, लेट रहेंगी, दुविधा में हैं । तब कार्तिक ने कहा लेट उबरेंगी जी, आप चिंतित ना हो क्योंकि मैं समझ गया उस पत्थर को पुनर्स्थापित नहीं करना है । करन इतनी उत्तम व्यवस्था जब प्रयोग हो जाती है तब उसकी गोपनीयता भंग हो जाती है । यहाँ पर गोपनीयता सर्वप्रथम है । मेरे विचार से अब पत्थर को वहाँ पुनर्स्थापित करना प्रयोजन हीन है । इसी कारण देवदत्त बडी जीत नें आपको ये विषय नहीं बताया । इतना सुनने के उपरांत लगता देंगी का मन शांत हो गया और द्वार को खोलने की व्यवस्था में लग गया । सर्वप्रथम लड फेंकीं, आपने अशोक के साथ जो अस्त्रों वस्तुएं लाया था उसको निकालने लगा । शस्त्रों के साथ लाई गई वस्तुओं में उपयोगी वस्तु खोजने का प्रयास करने लगा । कोई भी वस्तु कोई भी विद्या सदैव उपयोगी नहीं हो सकती है । जहाँ सोई उपयुक्तहै वहाँ तलवार अनुपयोगी है और जहाँ तलवार उपयोगी है वहाँ कोई अनुपयोगी । इसी प्रकार सतह एक ही वित्त या कार्य नहीं करती है । जिस नगर में सभी व्यक्ति स्वस्थ हूँ, वहाँ वैध देखा ज्ञान व्यस्त हो जाता है । रेगिस्तान में जहाँ कृषि योग्य भूमि ना हो, कृषक का संपूर्ण ज्ञान व्यस्त हो जाता है । इसी प्रकार सात लाई हुई सभी वस्तुएं बहुत उपयोगी ही थी । परन्तु यहाँ इस समय कौन कार्य करेगा? वही वस्तु लाॅबी खोज रहे थे । उनके साथ कार्तिक केंद्र ने भी सहयोग किया । जब लट्ठ देंगी अपने उपयोग की वस्तु निकाल रहे थे । उसने ही समय में कार्तिक एंड्स विशाल कक्ष के द्वार के सब लोग पहुंचे । उसे ध्यान से देखते हुए बोले, लाॅबी, क्या आप जानते हैं कि इतना ही कर पाए थे? किंलटन भरेंगे भी । कुछ तक चलकर कार्तिक केन्द्र के पास पहुंच गए और द्वार को देखते हुए बोलिए प्रभु, मैं अभी आपका आश्रय नहीं समझा । दोनों द्वारों पर भिन्न पच्चीकारी है । सामान्य तो द्वारों पर पच्चीस कार्य सवा नहीं होती है । मुझे लग रहा है कि यहाँ कुछ समझाने का प्रयास किया गया है । दोनों चंद्र किरणों के प्रकाश में समझने का प्रयास करते हैं । यहाँ दोनों का शरीर बढता जाता है । जैसे जैसे रात से बढ रही है, वैसे वैसे द्वार पर बनी पच्चीकारी और अधिक स्पष्ट दिखने लगती है । तब काॅलिंग इसे कहते हैं कुछ और प्रतीक्षा कीजिए मेरे अनुसार यहाँ पर इस प्रकार के प्रदार्थ का लेपन किया गया है कि रात में ही कोचर इसके दो अर्थ हो सकते हैं । प्रथम यदि दिन के समय यहाँ कोई आ जाए जिसकी संभावना नगर नहीं है तो भी उसको कुछ ला दिखाई दी हुई थी । रात्रि को ही मयूर तारामंडल चंद्रमा के उपर स्थिति में ही ये द्वार खोला चाहिए । करन मेरा चंद्रमा मयूर तारामंडल के इस वार का मिलना असंभव है । इत्ती चर्चा के साथ द्वार पर बनी बच्ची कार्य पूर्ण तैयार स्पष्ट हो गई । उस स्पष्ट रूप से संकेत बने थे किस स्थान पर जल में नीचे उतरता है? अब क्या था? बिना विलंब ये ही एक मजबूत लॉक हाथों का हथौडा लेकर लगभग हिंदी जल में बहुत रही । एक ही त्रप्रहार से वह खातों का टुकडा टूट गया और उसके टूटते ही अत्यंत भारी पत्थर जो रस्सी से बंधा था, जाल में नहीं जाने लगा । उसके नीचे जाते ही द्वार पर खिंचाव ऊपर नहीं लगा और द्वार जोरदार फरवरी के साथ खुल गया । द्वार के खुलते ही कार्य केंद्र नहीं उसमें छापते का प्रयास किया परन्तु अंधेरा होने के कारण कुछ देख ना सके तब तक लड भरेंगे भी जल्द से निकलकर बाहर आ गए । उन्होंने अपने अधोवस्त्र को बदलाव और कुछ ही क्षणों में वो भी कार्तिक केन्द्र के साथ खडे थे ।

भाग - 10.1

रात्रि का दूसरा प्रहर समाप्त होने को है । अब दोनों में पारस्परिक सहमति हुई कि रात्रि में ही इस विशाल कक्ष में प्रवेश किया जाए । इसके लिए उनके पास हो रहे वह चंद्र दोनों से आवश्यक होने वाला प्रकाश यंत्र था । ये प्रकाश यंत्र सोधी अथवा चंद्र दोनों से ही ऊर्जा अवशोषित करने के उपरांत उस ऊर्जा को प्रकाश में परिवर्तित करने की क्षमता रखता था । उसका प्रयोग करना प्रातकाल की प्रतीक्षा करने से उत्तम समझा गया । इसका एक कारण और भी था क्योंकि कक्ष के भीतर प्रातकाल कितना प्रकाश पहुंचेगा, कहना संभावना था । तब दोनों ने प्रकाश यंत्र की सहायता से अंदर प्रवेश करने का निश्चय किया । अंदर प्रवेश करने से पल भर पूर्व कार्तिक केंद्र ने कहा, लटकेंगे जी, आपका क्या विचार है? क्या हम दोनों को एक ही सात प्रवेश करना चाहिए अथवा इतना सुनने के पश्चात लटकेंगे को भी लगा की दोनों को एक साथ प्रवेश नहीं करना चाहिए । उन्होंने अपनी दोनों आंखों को गोल गोल घुमाकर अपने मस्तिष्क पर दबाव देकर विचार प्रेषित करने का प्रयास किया । वित्तीय समय में कुमार कार्तिक केन्द्र के मन में एक विचार आया और उन्होंने लट्ठ रहेंगी से कहा, लाइट भरेंगे जी, तभी हम लोग द्वार पर कुछ फंसा दी तब सम्भवता द्वार बंद होने की संभावना न रहेगी । इस व्यवस्था में हम दोनों एक साथ ही प्रवेश कर सकते हैं । लव फिरेंगे ने कुछ भी उत्तर नहीं दिया । उनके मन में कुमार कार्तिक केंद्र की सुरक्षा को लेकर प्रश्न उठ रहा था । वो विचार कर रहे थे कि यदि वे अंदर गए और यदि वे किसी प्रकार फंस गए तो बाहर कुमार की सुरक्षा का क्या होगा और यदि कुमार को बेहतर भेजा और स्वयं बाहर रहे तो यदि कुमार अंदर फंस गए तो क्या होगा । सुरक्षा की भावना उनके कार्य परिणाम की भावना से इस समय बडी हो रही थी । इस बात को वह कहना नहीं चाह रहे थे और साथ ही यह भी सोच रहे थे कि को बार उनका मन तब कहना चाहता सकें । यहाँ तो वही विचित्र बात हो गई की कठपुतली ये विचार कर रही है । क्यों उसे चलाने वाले को उसे सुरक्षा दे दी है? क्या कठपुतलियों से सुरक्षित कर सकती है जिसकी ऊर्जा से वो चल रही है जिसकी उंगलियों पर वो नृत्य कर रही है । इसी प्रकार हम भी कई बार उसकी सुरक्षा करते का प्रयास करते हैं जिसकी हम कठपुतली काफी समय व्यतीत होने पर कुमार ने लाॅन्ड्रिंग जी से पुणे कहा आपने क्या विचार किया प्रभु मेरे विचार से हम दोनों को ही एक साथ जाना चाहिए । लाॅन्ड्रिंग का मंतव्य कार्ति केंद्र जान चुके थे परंतु जिस प्रकार भक्त के तले में प्रभु बंद हो जाते हैं उसे प्रकार भारतीय केंद्र ने प्रेम के धागे के कारण लटकेंगे की ही बात मान ली और दोनों ने एक साथ शस्त्रों व अन्य सामान के साथ प्रवेश दिया । अंदर प्रवेश करते समय उन्होंने उसके द्वार को एक चौडे पत्थर से फसा दिया जिससे वह पुनः बंद करना होगा । ये पत्थर इस प्रकार द्वार पर चौखट में फंस गया की जब तक पत्थर नहीं हटेगा द्वार पंद्रह नहीं हो सकता । अंदर अंधकार में प्रकाश यंत्र की सहायता से देखा एक बहुत विशाल मथाडी नुमा यंत्र रखा है उसके साथ बहुत ही मजबूत प्रतीत होने वाली रस्सी रखी है । अब इसके बाद की जानकारी लड भरेंगे के पास थी । उसने विशाल मथानी नुमा यंत्र को बाहर निकाला । उसके साथ वहाँ बहुत सारी खातों की मोटी छडे रखी थी । कुछ ही समय में पूरा सामान बाहर निकाल लिया गया । अब रस्सी को बाहर निकालना शीर्ष था । रस्सी को जैसे ही बाहर निकालने के लिए उठाया तो क्या हुआ कि रस्सी भूमि के भीतर से आ रही है । दोनों ने रस्सी को सूचना प्रारम्भ किया परन्तु क्या वो तो निकलते ही जा रही थी । लग पडेंगे । जिस प्रकार से खींच रहा था उससे स्पष्ट था कि उसे उस के विषय में जानकारी थी । कुछ समय उपरांत रस्सी का निकलना रुक गया और वो इस प्रकार रूप गए जैसे की वो कहीं फस गए हो । तब लड फेंकी नहीं । सामने की दीवार में बनी एक घंटी में उसे बांध और कुमार से कहना प्रारम्भ किया प्रभु अब हमको इस रस्सी के सहारे काल विश्व को निकालना होगा । इतना सुनने के बाद कार्तिक केंद्र की दृष्टि फिफ्टी के बगल वाली दीवार पर पडेगी । उन्हें विद्युत का झटका जैसा लगा और वे कुछ समझ गए । उन्होंने लगता हिंदी से कहा लड पडेंगे जिससे कृता से हूँ । मैं कुछ समझा नहीं । समझाने का समय नहीं है । आप बिना समय गवाएं ही अब का कार्य प्रारंभ कीजिए क्योंकि काल विश्वासपात्र को आपने अपने स्थान से अनजाने में विस्थापित कर दिया है । अब जो मैं समझ सकता हूँ उसके अनुसार हमें शीघ्रता से ही उसे प्राप्त कर लेना चाहिए । प्रभु मैं अभी लम्बे ही कार्य प्रारंभ करता हूँ । इसके उपरांत कार्तिक केंद्र वर्ल्ड पडेंगी दोनों ने विशाल बथानी वक्त हाथों छडों को बाहर रखा । उन्होंने देखा के विशाल कक्ष के बगल वाले पर्वत पर इस प्रकार की व्यवस्था की गई थी कि पर्वत शिखर वह पर्वत के आधार पर मधानी फंस जायेंगे । उन्होंने बधार्इ में धातु छडों को जोडना प्रारम्भ किया । मथानी को चल में डालने के उपरांत लगातार खाते उछालों को जोडते जा रहे थे । इस कार्य के समाप्त होते ही उन्होंने मथानी को विशाल रस्सी से लपेट दिया । मधानी के ऊपरी भाग को पर्वत के ऊपरी हिस्से से वह मध्यभाग को पर्वत के आधार में फंसा दिया गया और शेष आधा भाग जल में टूट गया । पर्वत में मथानी फंसाने की व्यवस्था पहले से ही की गई थी । अब रस्सी के एक सिरे पर कार्तिक केंद्र दूसरे सिरे पर लडकी रहेंगी पहुंच चुके थे । दोनों ने ही निश्चित किया । पहले कल कार्ति केंद्र लगाएंगे और जब वह घूम जाएगी तब लगा फिरंगी बाल लगाएंगे । अब जब कार्तिक केंद्र ने बाल लगना प्रारम्भ किया तो रस्सी वर्मा थानी का भार अत्यंत अधिक होने के कारण रस्सी नहीं भेज सकते हैं । अब कार्तिक केंद्र ने अपने पिता और जगह पिता आशुतोष इंद्रा को प्रणाम किया । साथ ही अपनी माता को भी मन में परिणाम क्या । जवाब जगत पिता पर जगत चलाने से सहायता मानते हैं तो आप को कौन रोक सकता है की आप सफल लाखों मात्र आप तक सहायता तक नहीं पहुंचती है । जवाब स्वास्थ्य अथवा लोग लालच हेतु सहायता मानते हैं । इसे माता पिता के आशीर्वाद का बाल कहे अथवा ईश्वर की कृपादृष्टि की । कार्तिक केंद्र दोबारा बाल लगा ही रहे थे कि मत हानि नहीं घूमना प्रारम्भ क्या अब क्या था एक बार मखानी घूमी तो फिर उसको संबेध प्राप्त हो गया । अब दोनों ही छोड के बाल लगने के कारण मथानी तीव्रता से घूमने लगी । उसके घूमने से जल में धीरे धीरे हलचल बढने लगी । इस बात खाने की घूमने का कारण दोनों के बल के अतिरिक्त कुछ और भी था । क्या था वो कारण दोनों अभी पूर्ण तैयार समझ नहीं पाया । धीरे धीरे चल में हलचल बहुत हो गई । जलाशय के भीतर से चल उछल उछलकर बाहर निकलने लगा । कुछ समय पर सात एक प्रतिशत उत्प्रेरक वस्तु जल के भीतर से ही बाहर आती हुई प्रतीत हुई । धीरे धीरे वह वस्तु ऊपर की तरफ आ रही थी । साथ ही उसकी प्रतिभूति भी बढती जा रही थी । इस समय ये प्रतीत हो रहा था कि एक साथ तीन तीन चन्द्रमा उतार हो गए । देश नीलगगन में और तो चल रही है चल में दो एक का प्रतिबिंब और एक बढती हुई प्रदीप नहीं । जब कोलाकात प्रतिपदा ऊपर सतह से कुछ ही दूर गए तो कार्तिक केंद्र नहीं जल में छलांग लगाते हैं । संभव है इसके लिए लड देंगी तैयार नहीं थी । जब तक वे कुछ समझते कार्तिक केंद्र उस चमक तार गोलाकार वस्तु के पास पहुंच गए । तभी लड करेंगी नहीं । बहुत तेईस आवाज में पुकारा प्रभु प्रभु से मत छूरा नहीं होता हूँ । इतना कहने के उपरांत लड भेंडी दें । अब के हाथ में कुछ हजार जैसी वस्तु उठाई जो वो अपने साथ लाए थे । अत्यंत झूट गति के साथ वो भी जल में उतर गए और कुछ ही पल में कुमार के पास पहुंच गए । अब तक वो गोलाकार चमकदार वस्तु लगभग सादा पर पहुंच चुकी थी । वो एक विशेष वायु गैस से निर्मित गोलाकार आकृति थी । उस वायु की मुख्य विशेषता ये थी कि उसका बलपुरा चल में डूबा रहता था । इसका कारण था उस वायु का खडक चलके घनत् तो से अधिक था । उसको ओला कार आकार में वायु के बत्तीस स्थित था । काल विश जो वायु काल देश के ऊपर गोलाकार आवरण नुमा थी वो अत्यंत विषैली थी । हटाना अब उसे ध्यानपूर्वक हटाना था । तब लाॅन्ड्रिंग कुमार से कहा प्रभु इस गोलाकार वायु आवरण को आसानी से भेजा जा सकता है परंतु इतना कहते लटकेंगे शांत हो गए और कुमार शानू अशांत होना स्वाभाविक ही है जब हम किसी कार्य के अंत तक सफलतापूर्वक पहुंचाते फिर असफलता प्राप्त होने की दैनिक संभावना भी हमारे धैर्य को दिखा देती है । इसी प्रकार इतने संघर्ष के उपरांत अब जब काल विश्व पात्र सबका है तो असफलता का काम ही धैर्य को दिखाने के लिए पर्याप्त रहें । परन्तु क्या कुछ तो बहुत देशना के साथ ऍफ ने कहा कब उ इसके वायु सामान्य वायु से भरी और विषैली तुम्हारी वैभवशाली शप्त सुनते ही पार्टी केंद्र ने अपनी स्वास्थ्य को तीन प्रगति से छोडा और अपनी दोनों आंखों को बंद किया । इसके साथ ही उनके मस्त दस पर सिकुडन भी दिखाई थी । देर का विश्वास के साथ ही उनका खून बहुत तेज ना उनके शरीर से बाहर निकल गए । अब कार्तिक केंद्र स्वता ही समझ गए थे की भारी वायु ऊपर ना आउट कर नीचे सतह पर ही रह सकती है । सतर पर रहने के कारण विषैली वायु प्राणघातक भी हो सकती है । अच्छा दोनों नहीं निर्णय लिया । केशव हकदार गोलाकार वायु आकृति को झलके भीतर रखते हुए किनारे की ओर ले चला जाएगा । धीरे धीरे जल के बहाव को दिशा देते हुए किनारे की तरफ बढे । जब वे किनारे पहुंचने वाले थे तब लड भेंगी तेजी के साथ बाहर आ गया । बाहर आते उसने मथानी नुमा यंत्र के घाटों छडों को बाहर की दिशा में निकालना प्रारंभ किया । कार्तिक केंद्र चलते रहकर पात्र अकोला का रात कृति को चल प्रवाह के द्वारा न तो डूबने दे रहे थे और नहीं चल की सत्ता से बाहर आने दे रहे थे । कुछ ही समय में लड भृंगी ने मथानी नुमा यंत्र को ठीक गोलाकार आकृति के नीचे स्थापित करने में सफलता प्राप्त होगा । नहीं अब कार टिकेंद्र भी चल से बाहर आ गए । बाहर आते ही उन्होंने रस्सी के द्वारा गोलाकार आकृति को बाहर निकाला । बाहर निकालते ही वो वायु आवरण खूब गया । इस समय पात्र मधानी नुमायां यंत्र में फंसा हुआ था । दोनों लोग पर्याप्त दूरी पर थे । उसी समय में पहले वाली पवन के साथ विषैली वायु बह गई और काल विश्व पात्र को प्राप्त कर लिया गया । कल विश पात्र में उस प्रकार की प्रतिभूति नहीं थी जिस प्रकार वो जल के भीतर प्रकाशमान था । अब कुछ प्रश्न कार्तिक केन्द्र के पास थे । और कुछ प्रश्न लटकेंगे के पास सर्वप्रथम लड करेंगे ने कार्य केंद्र को प्रणाम किया और कहना प्रारम्भ किया प्रभु आप के बिना यह असंभव कार्य संभावना था । एक भ्रष्ट मन में आ रहा है । यदि आप प्रश्न तो मेरे मन में भी हैं परंतु पहले आप पूछ लीजिए आप कैसे जन गए कि रस्सी के हटने से विश्वास पात्र अपने स्थान से विस्थापित हो चुका है, अलर्ट करेंगी थी । आपने संभावना ध्यान नहीं दिया परंतु दीवार पर स्पष्ट चित्रांकन किया गया था । क्षेत्र में स्पष्ट था कि रस्सी से ताल विश्वास इस प्रकार फंसा हुआ है कि जवाब दे । रस्सी को खींचा तो मैं समझ गया कि पात्र अपने स्थान से स्थापित हो गया होगा । बहन समझ के आप प्रभु बेरा प्रश्न है कि पात्र में अब चमक नहीं है जबकि जल के भीतर गोलाकार चमकदार वस्तु प्रतीत हो रही थी । प्रभु वायु जो विश्वासपात्र का आवरण थी उसमें गिरने वाली प्रकाश के निर्णय बोरडा आंतरिक परावर्तित होने के कारण प्रकाश उत्पन्न कर रही नहीं । देवा श्री ने मुझे बताया था कि जैसे पात्र ऊपर की ओर आएगा प्रकाशित होने लगेगा । जल के बहुत भीतर प्रकाश नहीं पहुंचने के कारण वो प्रकाश नहीं होगा । इतना सुनने के उपरांत कार्तिक केंद्र शांत थी परन्तु मन व बुद्धि कुछ विचार कर रही थी । वे विचार कर रहे थे कि यदि सब कुछ बताने के उपरांत अभी पात्र प्राप्त करना बुद्धिमानी का ही कार्य था । इसका क्या कारण है कि लटकेंगे लगभग सब जानते हुए भी प्राप्त न कर पाता? अर्थात पात्र प्राप्त करने वाला तंत्र बुद्धिशाली होना चाहिए । इसका अर्थ यह वहाँ की पात्र को यथास्थान पहुंचाने के लिए बहुत थी । वहाँ विवेक की आवश्यकता हूँ । उन्होंने अपने माता पिता को मन ही मन में परिणाम क्या और शिखर सम्मेलन की प्रार्थना ब्रह्मसिंह

भाग - 11

माँ के द्वारा प्रभु की जीवन रक्षा गाल विश प्राप्त करने के उपरांत हूँ । अब सबसे महत्वपूर्ण कार्य था मात्र को सुरक्षित पोस्टिंग पूरा नहीं जाना । जब इतने अधिक संघर्ष के उपरांत कालवश प्राप्त हुआ है तो निश्चित ही उसे अपने गंतव्य तक पहुंचना चाहिए । कुमार के मन मस्तिष्क नहीं, उसे गो श्रृंगा पूरा तक पहुंचाने की अनेक विचार विद्युत की जब तक की भर्ती आ रहे थे, कुछ विचार धना पत्ता से परिपूर्ण थे । साथ ही कुछ विचार ऋणात्मकता निकले बादल के भारतीय थे जो धनात्मकता के प्रकाश निकल जाना चाहते थे । धनात्मकता इस बात से उत्प्रेरित हो रही थी की काल देश प्राप्त हो गया था । ऋणात्मकता के विचार कह रहे थे कि अब किस प्रकार के पात्र मालिक से बचाकर को सिंह का पूरा तक पहुंचाया जाए है । आशंका को निर्मूल नहीं मान सकते हैं कि बालिक अभी तक काल विश्व प्राप्त करने की चेष्टा कर रहे होंगे । मात्र चेष्टा ही नहीं बल्कि जीतोड प्रयास कर रहे होंगे । अब मान ने अपने दिशा को परिवर्तित किया नहीं नहीं नहीं ऐसा नहीं हो सकता । कार्ति केंद्र मन में ही बुदबुदाए ऍम मानकार करेंगे । नहीं है कि मन शांत हो गया । ज्यादातर मॉनिटरिंग उपरांत मन अधिक आसान तो हो जाता है । जब मन का विचार, रूपये लावा मुख्य रुपये ज्वालामुखी से नहीं निकल पाता है तो और अधिक विकराल हो जाता है । इसलिए सामान्य था बोलना ही उचित रहता है । यदि मॉल मान के स्थिर होने के बाद की व्यवस्था है तो निश्चित ही वो सच्चा मौन है । जब अंदर दहकता हुआ लावा ही नाम तब ज्वालामुखी से क्या मिलेगा? हर था मन शांत होते ही मौन स्थिति स्वतः ही आ जाएगी । यहाँ पर अंदर रहता हुआ लावा और बॉल एकसाथ कैसे संभव है? बुदबुदाहट सुनकर लड भरेंगी ने कुमार की तरफ ध्यान से देखा तो उनके ऊपर एक हफ्ता हुआ, ज्वालामुखी दिखाई दिया लेकिन फिर भी एक का एक नहीं हो गए क्योंकि वे तो अपने मन में विजयी हाउस लिए हुई थी । माना स्थिति में त्वरित परिवर्तन हुआ तब लटकेंगे नहीं । कुमार से कहा प्रभु प्रभु! विचारों का कोलाहल जब आवश्यकता से अधिक हो जाता है तो इंडिया की क्षमता शंका की परिधि में आजाद नहीं है । इंडिया सक्रिय रहते हुए भी अपना कार्य नहीं कर मान नहीं है । यहाँ पर लटकेंगे के दो बार पगार देंगे । बच्चा भी कुमार का ध्यान ना दे ना इस बात का सोचा था कि कुमार के मना स्थिति पूर्ण तैयार संतुलित न थी, तब लड भरेंगे नहीं और अधिक बलपूर्वक पुकार रहा हूँ । प्रभु ऍम क्या हुआ था? क्या विचार कर रहे हैं, कब फॅस के होते आप इतने अधिक चिंतित हो? तब मेरे होने का अर्थ ही नहीं रह गया आप एक बार आदेश तो कुमार ने पहले अपनी आंखों को घुमाया परन्तु जब आखिरी सफलता प्राप्त ना कर सकी तो लटक भरेंगे को देखने के लिए गर्दन का सहारा प्राप्त किया । गर्दन के ढंग से लक भेंगी उनके ऋणात्मक ऊर्जा की पराकाष्ठा तो जान गए परंतु कारण नहीं जान सकते हैं । जब की अब तो हम सही दिशा में बढ रहे हैं । कालवी भी प्राप्त हो गया है । अब क्या समस्या है? तब लटकेंगे नहीं पूरा कहा कब हो? इतना ही सुनकर कुमार नहीं कहना प्रारंभ दियां लड भरेंगे जी मन एक का एक पता नहीं क्यों विचलित हो रहा है फिर पुरा क्षणभर रुककर भाई का तो है । मन को श्रृंगा पूरा की स्थिति का आकलन करने लगा । एक्साइट विचार आया कि कहीं ऐसा ना हो । हम यहाँ से काल देश लेकर पहुंचे और वहाँ मालिक उन्होंने आक्रमण कर दिया हो अथवा हम लोगों को वहाँ पहुंचने में विलंब ना हो जाए । इस प्रकार था । न जाने क्यूँ मन व्यथित हो रहा था । ऍम प्रभु यहाँ तो सर्वद के हैं । आप यदि इस प्रकार धैर्य धारण नहीं करेंगे तो हमारे जैसे सामान्य दास का क्या होगा? प्रभु मेरे विचार से ऐसा इसलिए हो रहा है कि बहुत समय से गो श्रृंगा पूरा पर संकट के बादल छाए हुए हैं । जब परिस्थितियां बहुत अधिक समय तक अच्छी हूँ तो मन मस्तिष्क पर उसका प्रभाव इस प्रकार होता है की यदि अच्छा समय आता भी हैं तो मन डर से ग्रसित रहना है । कहीं अच्छा समय पुरा चलाना चाहे हूँ । आज काल विश्व प्राप्त करना उसी दिशा में बढा हुआ है जिस कारण बंद व्यथित हो रहा है । इतना सुनकर कार्तिक केंद्र नहीं अपना सिर हिलाया और पुरा कहना प्रारम्भ किया । अब हमें आती शिकॉगो श्रृंगा पूरा पहुंचना चाहिए । साथ ही ये भी ध्यान रखा होगा कि हम मालिक को सही सुरक्षित नहीं हैं । सात । ये भी विचार करना होगा कि कहीं वहाँ युद्ध ना प्रारंभ हो गया हो । फिर अपने ही मन की बात को नकार ना नहीं नहीं युद्ध नहीं प्रारंभ हुआ का बले क्षेत्र में मुर्ख नहीं है कि युद्ध प्रारंभ करते हैं । वे भलीभांति जानते हैं कि काल विश्व यदि उन्हें चाहिए तो पिताश्री को इतना कहने के बाद कार्तिकेय था शांत होकर विचार करने लगे । अब उन्हें शिखर वह सुरक्षित पहुंचने की चिंता थी । साथ निकाल विश्व के साथ तब लाॅन्ड्रिंग इन्हें एका एक रहस्य से करता हटाया तो कार्तिक केंद्र प्रसन्न हो गए । प्रभु अब तो आप प्रसन्न नजदीक रहे आपको पहले ही बता देना चाहिए था के वापस लौटने का बार का अलग है और सुरक्षित वापस लॉटरी का बार किस पर याद नहीं किया गया था की उन पर्वत श्रृंखलाओं से सीधा भूमिगत मार्ग हूँ । सिंगापूर आ जाता है कब प्रसन्नता के साथ लौटने का कार्यक्रम प्रारम्भ किया गया । पर अब तो चलते ही कुमार ने प्रश्न किया ऍम करेंगे जी जब लौटने का मार्ग बनाया गया है तो हम इस मार्ग से आप ही सकते थे । सुरक्षित व्यक्ति प्रगति के साथ इतना समय अनावश्यक ही नष्ट हो गया हूँ । यही प्रश्न मैंने भी देवा श्री से पूछा था । तब उन्होंने मुझे इसका कारण बताया था । उन्होंने जो मुझे समझाया वो मैं आपको बता रहा हूँ कब हो मार्ग किस प्रकार किया गया है कि उसका द्वार जो को श्रृंगा बोला में खोलता है वो सुरंग भी डर से बंद है । इसे इस कारण बंदा रखा गया है जिससे कोई अनावश्यक विश्वासपात्र की खोज में ना आ सके । देवश्री वह प्रभु आशुतोष इंद्रा नहीं चाहते थे कि पात्र आसानी से प्राप्त हो सकें । यदि कभी आवश्यकता होगी तो वही वहाँ पहुंच सकें जैसे बार बताया जाए । क्या दिया ने बचाने का मार्ग कितना सुगम होगा तो कभी भी कोई भी इसका दुरुपयोग नहीं कर सकेगा । तो फिर काटने का मार्कर क्यों बनाया थी । आपने काल विश्व प्राप्त कर लिया है तो आपको बार कर निश्चित ही बताया गया होगा । बार आपको दिवस की । वहाँ आशुतोष इंद्र प्रभु के अतिरिक्त और कोई नहीं बता सकता हूँ । अब लौटने के मार्ग का खुल्ला उसी प्रक्रिया का भाग था जब हम लोगों ने मयूर सारा मंडल की सहायता से विशाल कक्ष का द्वार खुला कर उसी प्रक्रिया में यहाँ का लौटने वाला प्रवेश द्वार खुलता है । यदि महल से द्वार पदार्थ किया जाता है तभी के द्वार बंद ही रहता था । इतना सुनकर का केंद्र शांत हो गए । अब उन्होंने अगला प्रश्न किया लगभग बोलेंगे की महल के पास वाला दुआ छह । प्रभु हम लोग जिस मार्ग से चल रहे हैं, वहाँ पर अंत में एक द्वार मिलेगा । वो द्वार इसी तरह से बंद रहे । द्वार खोलने के उपरांत हमें एक शिला को हटाना होगा और हमको श्रृंगा पूरा के आंतरिक धूकर ये मार्ग में पहुंच जाएंगे । आंतरिक मार्गों से तुरंत ही महल में प्रवेश कर जाएंगे । बार सुव्यवस्थित होने के कारण दोनों तीन प्रगति से चले जा रहे थे । दोनों शांत शांत होने का कारण था । संपूर्ण ऊर्जा समय बचाने में ही लगे । गोधुली बेला के समय दोनों नहीं महल की आंतरिक सुरंगों में प्रवेश किया । प्रवेश करते ही महल की सुरक्षा व्यवस्था में लगे सुरक्षाधिकारी सजग है । महल की सुरंगों में लगे गुप्ता दर्पणों पर विशेष मंत्रों के संयोजन से ही ये स्पष्ट हो गया कि सुरंगों में किसी प्रवेश दिया है । कुछ क्षणों में सूचना महल के मुख्य सुरक्षा अधिकारी तक पहुंचाई सुरक्षाधिकारी दें अविलंब सेनापति व अन्य प्रमुख व्यक्तियों को स्थितियां और साथ ही आज शरीर भी प्रकट दिया । सेनापति दंडधारी जी को प्रणाम प्रणाम । ध्यान सूचना है हूँ । दो व्यक्ति घोडे सहित गुप्त मार्ग से बहल की हो रहा रहे हैं । महल की ओर आ रहे हैं और उन्हें किस दिशा से प्रवेश किया । कब हूँ उन्होंने उस तरह के बाद फिर से नहीं नहीं क्षमा प्रभु उन्होंने किसी भी मार्ग से प्रवेश नहीं किया । किसी भी द्वार से प्रवेश नहीं क्या बात हूँ गुप्त भूमिगत मार्ग में प्रवेश के चार हुआ है । पूर्व अच्छी मुद्दा अच्छे प्रभु सभी द्वार बंदे हैं और सुरक्षित सभी में सेना स्वच्छता से पहला दे देंगे । किसी भी द्वार से उन्होंने प्रवेश नहीं किया । ठंड था, आश्चर्यचकित होती है । किसी भी बाहर से प्रवेश हूँ, ऐसे संभव है इत्ती चर्चा हो ही रही थी । अन्य सभी अर्थात सबकी कुमार, नरेन्द्र चंदेश्वर तक ईश्वर आदि प्रमुख व्यक्ति वहाँ पर आ गए । पूरी सभी ने भी इस विषय को समझा । तब इकाई नंदीश्वर आते आए और उन्होंने सभी के बंद पूछ सहित गालियाँ मेरे अनुमान से अथवा लगभग सकते ही होगा । आगर तो कोई और नहीं बल्कि कुमार कार्तिक केंद्र पलट देंगे ही है ऍम दंडधारी इसके आगे कुछ कहते हैं तब तक गणतंत्र नहीं, आश्चर्य प्रकट किया, परंतु भूमिगत मार्ग पर प्रवेश कहाँ से किया? जबकि चारों प्रवेश द्वारों पर सेना नियुक्त है और उन्होंने किसी को प्रवेश करते नहीं देखा ही तो आश्चर्य है तब का मुख्य नहीं नंदेश्वर को देखा है और अपना प्रश्न किया । धन देशवासी आफिॅस किस प्रकार की गुप्त मार्गों पर? इस समय कुमार काफी गेंद रही है । बहुत वर्ष और एक बार हुआ सुपोषित योग महल से कुछ समय के लिए । यहाँ तब उन्होंने एक बार उत्तर दिशा के भूमिगत मार्ग पर इस प्रकार बनाया था कि वो द्वार किसीको पता ना चले किसी को द्वारकाधाम न हो इसका क्या अभिप्राय खुबा द्वारा निर्मित होने के उपरांत अंदर से उसे इस प्रकार बंद कर दिया गया के किसी को भी ये पता चल सके कि यहाँ पर एक बार भी बार बनाकर उसे बंद करने का क्या अभिप्राय है । ये मेरी समझ चलते देखा जाए की कौन आ रहा है । इतनी चर्चा परिचर्चा हो रही थी किसी व्यक्ति द्वारा कुमार का टिकेंद्र के प्रवेश की सोच रहा हूँ सभी सभाकक्ष क्यूँ ठीक रखनी पडेगी । कुछ ही समय में सभी सभागार सभी को देशभर ने बता दिया था । आप की किस प्रकार कुमार बनाकर उसे बंद कर दिया गया था । सभी के मन में प्रश्न था कितनी बार इस प्रकार बंद किया गया की बहुत सही नहीं होगा । जब नहीं दृश्य करना था तो बनाया है क्यों अब जैसे ही काफी फॅमिली ने समाधान में प्रवेश दिया उनकी सबकी नहीं चाहिए । आसन ग्रहण करने के उपरांत लगभग हिंदी ने वो द्वार होना बंद करने के लिए राजधानी है और सभी को द्वार बंद करने का कारण भी बता दिया हूँ ।

भाग - 11.

इसके उपरांत सभी ताल विश्व पात्र देखने के लिए उत्सुक थे । तब कुमार कार्तिक केंद्र नहीं टाल विश्वासपात्र सभी के सामने रखा और कहा सभागार में उपस्थित महानुभावों को प्रणाम । आप सभी के सुभाष आशीर्वादों के कारण ही ये पात्र लाने में हम सफल हो सके । अब चर्चा करते हुए प्रथम था पिताश्री महाराज के उपचार की व्यवस्था निश्चित की जाए । साथ ही को श्रृंगा पूरा की सुरक्षा व्यवस्था भी अत्यंत व्यवस्थित कर दी जाए क्योंकि कालरेस की सूचना प्राप्त होते ही मालिक छह से प्राप्त करने का प्रयास करेंगे । सभी कार्तिक केन्द्र के कथनानुसार व्यवस्थाओं में तत्पर हो गए । अब सबसे महत्वपूर्ण था काल देश का प्रयोग कांग्रेश पात्र के विषय में मास्टर लग सकेंगी ही संपूर्ण जानकारी रखा था । करन उसको दिवस पे दे संपूर्ण उपचारविधि बता दी थी । कार्तिक केंद्र का आदेश होते ही सभी काल विश पात्र लेकर प्रभु के कप शक्ति ओर चले । सर्वप्रथम सभी के बाद माँ के कक्ष की ओर बढ गए । सभी ने माँ से मन ही मन आशीर्वाद मांगा । कक्ष के भीतर तो प्रवेश निषेध था । सभी बाहर से प्रधान करने के उपरांत प्रभु के कक्ष के लिए चल पडे । प्रभु के कक्ष में पहुंचते ही लड भरेंगी ने प्रमुख जी से कहा, प्रमुख जी एस पात्र में कालवश नहीं है । सभी एक साथ रहते नहीं है । काल वेस्ट नहीं है । नहीं नहीं आप हमारा भावार्थ नहीं समझे । मैं क्षमा चाहता हूँ । अभी काल विश्वास रहे और कुछ प्रतिक्रियाओं के उपरांत लगभग तीन प्रहर के उपरांत काल विश्व प्राप्त होगा । प्रमुख लेने का ये तो मेरी क्षमताओं से परे हैं । ताल देश पात्र है और काल बेच नहीं है । गहरी श्वास छोडते हुए प्रमुख शी ने कहा, अब आप ही मार्गदर्शन करें कि क्या करना है? कार्ति केंद्र ने कुछ पदार्थ जिनमें से अधिकतम खाद्य पदार्थ थे, को लाने के लिए कहा । उसके पश्चात जो प्रक्रिया सभी के संभव प्रदर्शित हुई उससे प्रमुख से भी नतमस्तक हो गए । सर्वप्रथम पात्र के ऊपर यह है कि भाजपा को वो करना प्रारम्भ किया गया । कुछ ही समय पर शायद पात्र अपना चांदी के सवाल वर्ल्ड परिवर्तित करने लगा । एक का एक चढा की आवाज आई और ऍम थी कि सभी उपस् थित व्यक्तियों का सूख गया । मारो सम्पूर्ण जीवन शक्ति किसी ने अवशोषित करनी होगी । टूटे कि धोनी से यदि किसी के मुख्य भाव परिवर्तित नहीं हुए थे तो वो थे लटकेंगे । जब लेट भृंगी नहीं सभी के ऊपर अपनी दृष्टि डाली तो भी आवाज कट गए । अतिशीघ्र ता के साथ उन्होंने कहा मैं क्षमा चाहता हूँ । यहाँ पर शहबाज शक्ति के दो अलग अलग भाव हो गए । लड भिंडी के अनुसार उन्हें ये बताना चाहिए था कि पात्र टूट जाएगा और उन्होंने नहीं बताया । इस कारण सभी तब थे अन्य लोगों ने क्षमा का अर्थ यहाँ पर ये समझा कि कार्य बिगड गया है । इस कारण लड करेंगे एक सभा मांग रहे हैं । इस बात को कुमार गजेंद्र अच्छी शिक्षा था से समझ गए और उन्होंने कहा लटकेंगे जी आप अपना कार्य करते रही । हम समझ गए हैं कि ये पात्र का प्रथम कवर टूट हो । पात्र से विश्व प्राप्त करने की दिशा में बढाया गया प्रथम बस है । इतना सुनने के उपरांत सभी के बदले अत्यंत उथल पुथल स्वाभाविक थी । इसको भागने के पश्चात लड भरेंगे नहीं अपना सिर्फ धरात्मज अभिव्यक्ति के रूप में हिलाया और अंदर से निकले गहरे नीलवर्ण पात्र में शहर का लेपन करने लगे । लेपन करने के उपरांत उन्होंने कहा ऍम कवच मात्र सुरक्षा के दृष्टि से बना हुआ था । जब की भाषा में जो रासायनिक तत्व हो जाते हैं उनसे वो कवच अभिक्रिया करके टूट गया था । अब शहर नील वर्णीय आवरण द्वारा अवशोषित हो रहा है । कुछ समय पश्चात ये नील वर्णीय आवरण भी टूट जाएगा परंतु हरित वर्णीय आवरण जो इसके उपरांत प्राप्त होगा उस तक शहर पहुंच चुका होगा । इतना सुनने के उपरांत सभी शांत थे और कर भी क्या सकते थे । जो कर सकते थे वो भी प्रतीक्षा । कुछ समय पश्चात मील वर्णीय कमल चलने लगा और कल कर गिर गया । इसके पश्चात शहर से आच्छादित हरित वाडी कवच दृश्य होने लगा । अब लटकेंगे नहीं का प्रयोग किया और तृत्व आवृत करने के उपरांत लड फेंकी ने कहा अब फिर शहर दोनों का अंश आहरित बढिया कवच में प्रवेश करेगा और प्रवेश करने के कुछ समय उपरांत हरितवर्ण ये कवच स्वतः ही अभी प्रचलित करेगा । अपनी प्रचलित होने के कारण आपने तक वो शहर वक्त के साथ आंतरिक कवच में प्रवेश करेगा । इतना सुनने के पश्चात सभी अब अपनी प्रचलित होने की प्रतीक्षा करने लगे । कुछ समय पश्चात अपनी प्रज्वालित थोडा प्रारंभ हो गई । साथ ही कुछ समय उपरान्त स्वतः बुझ भी गई । तब लग सिंह जी ने कहा अब अंतिम कवच हटना शेष है । इसके लिए उन्होंने एक विशेष पदार्थ प्रमुख जिसे प्रयोगशाला से लाने के लिए कहा । कुछ ही समय में प्रयोगशाला से विशेष रासायन उपलब्ध हो गया जैसे उसका प्रयोग किया गया । अंतिम कवच वास्तव में परिवर्तित होने लगा । वाजपई के कारण कुछ भी दृश्य नहीं था । सभी ध्यानपूर्वक पात्र को देख रहे थे । कुछ और समय व्यतीत हुआ तो काल विश्व पात्र का आगाज छोटा हो चुका था । सभी आवरण हटने के कारण अब वो एक छोटी गोलाकार इनके आकार जितना दिख रहा था । अब लटकाएंगे जी नहीं उसे अपने हाथों से उठाया और कुमार गजेंद्र के हाथों में दे दिया । पात्र के साथ ही लड भृंगी ने कहा मैंने जितना देवश्री से इस विषय में ज्ञान प्राप्त किया था, अब वह पूर्ण होकर कार्य में परिवर्तित हो चुका है । अब इस गोलाकार पात्र के भीतर काल विश बन चुका है । ऍम पदार्थो से बना है । वो सभी रसायन अलग अलग गोश खोल में थे । जैसे जैसे आवरण हट रहे थे, रसायन का अंश अंदर प्रवेश कर रहा था और काल विश्व बनता जा रहा था । एक का सुनने के उपरांत कुमार घनेंद्र ने कहा, इसका आशय यह हुआ आपके कालवश ऐसे पात्र में निर्मित हुआ है । पहले उसके अभी अब अलग अलग थे । साथ ही जो हमने बाहर से मिलाया है उसके बिना काल विश बनना संभव नहीं था । ऐसा क्यों था कि कांग्रेस तैयार करके नहीं रखा गया था । संभव है ये दो कारणों से हूँ । प्रथम यदि पात्र किसी को भी प्राप्त हो जाए तो वो इसका ताल वेश प्राप्त ना कर पाए तो हुई थी कावेश कभी दुर्घटनावश उपयोग या प्रयोग में ना आप आए क्या कालरेस तैयार हो चुका है? नहीं शुक्र ही तैयार होने वाला है । एक का कहना था की गोलाकार गेंद आकार के वस्तु में आधा भाग स्वीट वहाँ आधा भाग रक्त वर्ड हो गया । इसका क्या अभिप्राय था ये किसी को भी ज्ञात नहीं था । कुमार गणतंत्र ने रक्त वर्णीय भाग को भूमि पर स्वीट वर्णीय भाग को ऊपर को रखा जैसे उन्होंने काल विश्वासपात्र को रखा एक का एक उन्हें ये प्रतीत हुआ कि यही सही थी है । सभी कुछ और विचार करते । इससे पूर्व स्वेत वार्ड के भाग पुष्पवती पंखुडियों की भर्ती खुलने लगा । सभी उसे एक तब देख रहे थे सभी कुमार नरेन्द्र की बुद्धि व विवेक की सराहना कर रहे थे । कुमार गणेश बन में विचार कर रहे थे ये सब उन्होंने प्रगति कृपा से क्या है उन्हें तो सराहना प्रमुख की कृपा से मिल रही है कार्य सदैव आपको पारितोषित नहीं मिला था बल्कि पारितोषिक आपको ईश्वर की कृपा से प्राप्त होता है । उन कार्यों में जहाँ आपको पारितोषित नहीं मिला, वहाँ भी आपने पूरे तन मन और पास ही क्षमता के साथ कार्य किया था । गजेंद्र बाॅस दोनों की क्या जाएगा? यार हो रही थी अब तक ही विस्मित कर देने वाला । छोटे से जामुन से हल्के आगार का पात्र प्रदर्शित हुआ । वह संपूर्ण पारदर्शी होने के कारण अत्यंत अब बहुत भी लग रहा था । सभी एक दूसरे को निहार रहे थे कि अब क्या करें, कैसे करें और कौन करें? तब कुमार गणतंत्र नहीं । कार्तिक केंद्र की ओर देखा और उनका मंतव्य जानने के उपरांत प्रमुख जी की ओर देख कर कहा प्रतिपक्षी औषधि अब तैयार है । अब आप इतना कहने के उपरांत भी शांत हो गए । पूरे कक्ष में बर घट के सवाल नहीं शक्तता छा गई । बहुत ही धीरे से प्रमुख कि उठे । उन्होंने औषधि काल विश्व को अपने दोनों हाथों से उठाया और पलभर देखा । उसके पश्चात प्रभु के आसन के समीप पहुंचे । उनके हाथ आप रहे थे । एक हाथ दूसरे हाथ को सहारा नहीं दे पा रहा था । उनकी आंखे बंद हो गयी । बन, बुद्धि, विचार, धर्मप्राण विश्वास सब एक आधार हो गए । अब इस समय वे अपनी बुद्धि व विवेक से कार्य नहीं कर रहे थे । जब किसी के जीवन में इस प्रकार का पल लाता है कि वो देश के लिए, समाज के लिए, सृष्टि के लिए अथवा प्राणी मात्र के लिए कुछ ऐसा करने वाला होता है जो सामान्य अवस्था में संभव ना हो । तो ये जानना और साथ में मानना भी चाहिए की ये कार्य तो होना ही था । ये प्रभु की क्षमता का कार्य था जो तुम्हारे पुण्यकर्मों के कारण मात्र प्रभु नहीं तो मैं आगे कर दिया । इस कारण तुम इसे कर पा रहे हो । आप एक कदाचित नवविचार करें कि ये कार्य आपने किया है बल्कि गई जाने माने की आपसे ये कार्य करवाया गया है । ना जाने कौन से शक्ति है जो अपना बच्ची को नियंत्रित कर रही थी । प्रमुख भी प्रभु के सभी पहुंचे । उन्होंने प्रभु को ध्यान से देखा । प्रभु का शरीर कुछ जर्मन प्रभावित हो रहा था परन्तु मुझ पर एक विचित्र आभा प्रतीत हो रही थी । प्रमुख पात्र के मुख को देखा उसमें बूंदे गिरने के लिए क्षेत्र अस्पष्ट अपना बीत हो रहा था । अंत में उनके मन में न जाने कहाँ से और क्यों आशुतोष केंद्र की छवि हूँ, अपनी प्रारंभ हो गई । उनकी आंखे बंद हो गयी । छवि धीरे धीरे अस्पष्ट होती जा रही थी । छवि के स्पष्ट होने के साथ साथ अंतर बन में एक बनी एक उनका पहुंचने लगा । उस स्कूल जवा प्रभु आशुतोष केंद्र की छवि इस प्रकार उभरी के प्रमुख से भी सम्भवता सुनने में चले गए । उन्होंने अपने अंतर्मन में देखा के भी प्रभु आशुतोष चंद्र को अपने हाथों से कुछ खिला रहे हैं । साथ ही वहाँ उपस्थित लोगों ने देखा की उन्होंने अपने हाथों से प्रभु के वोटों को खोला । वह दो बूंद औषधि थी, काल विश्व डाल दी । यही है भाव के खेलाने वाले नहीं । काहल विश भी इस भाव से खिलाया कि वह खिलाने वाले वक्त खाने वाले दोनों को मिष्ठान प्रतीत होने लगा । भाव वह भाव से प्रेरित सद्भाव मनुष्य अथवा जीवमात्र का वो गुण है जो इंद्रियों की पराकाष्ठा से परे हैं । इंद्रियों की पराकाष्ठा मात्र होने तक ही है, परंतु भाव उसकी भावना, अंतर बन कि वह प्रति छवि है जो सूक्ष्म शरीर में लिप्त हो । स्कूल शरीर के आगे जा सकती है । इसी कारण व्यक्ति पत्थर में भी ईश्वर को खोज लेता है, खोज ही लेता नहीं है, बल्कि प्राप्त करने की दिशा दे बढ जाता है । वो भावना ही तो है जो भोजन के अनुष्ठान को प्रसाद में परिवर्तित कर देती है अन्यथा भोजन वह प्रसाद दोनों ही एक समान होते हैं । भेजना का मात्र गी कि आप प्रसाद को इश्वर की मोटी के सब बुग्रक भोजन को प्रसाद में परिवर्तित कर देते हैं । उस प्रसाद को प्राप्त करने है तो मनुष्य को सौ दूर यात्रा तय करके गंतव्य तक पहुंचता है और अपने को धन्य मानता है । इसके विपरीत जो भोजन ईश्वर को समर्पित नाखून वह सामान्य ही रह जाता है । अठारह इस जीवन में भाव वह भावना से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं । औषधि प्रभु के मुख में बढ चुकी थी मात्र दो ही बूंद औषधि जिसके कारण औषधि घंटे के नीचे नहीं गई । अब सभी प्रभु के ऊपर औषधि के धरातल प्रभाव की प्रतीक्षा कर रहे थे । सभी पडा तैयार आश्वस्त थे कि कुछ ही समय में प्रभु पर इसका प्रभाव दिखाना प्रारंभ हो जाएगा और प्रभु उठ जाएंगे प्रतीक्षा का एक एक बाल काटा दुष्कर कार्य होता है । यदि समय की गंभीरता जांच नहीं हो तो व्यक्ति को उस समय जांचनी चाहिए जब जीवन व्यक्ति का समय चलता हूँ और अब उसकी प्रतीक्षा करनी हो कि परिणाम क्या होगा । कालने अपनी गति परिवर्तित की और राष्ट्रपति ने प्रभाव भी खाना प्रारंभ कर दिया । शरीर व मुखमण्डल पर घरात प्रभाव अस्पष्ट प्रदीप होने लगा । समय की गति सदैव सामान रहने के बाद शादी भी इस समय मानव समय अपनी कभी भूल गया हूँ । तब नंदेश्वर ने आगे आकर अपनी करो ना उसको शब्दों का रूप दे दिया । प्रवक्ता अब प्रभु लेस से थी । शेखर स्वस्थ हो जाएंगे । दंद ईश्वर के शब्दों में प्रश्न के उत्साह भी अपनी पराकाष्ठा पर था । प्रभुजी अब प्रभु देवा थी, शिखर स्वस्थ हो जाएंगे । नंदीश्वर के शब्दों में प्रश्न के साथ उत्साह भी अपनी पराकाष्ठा पर था । प्रमुख स्वतः अत्यंत उत्साहित थे तो उन्होंने अपने होठों के अ स्थान पर अपनी आंखों से प्रतिरोध कर दिया । सभी प्रसन्नाता की आनंदमई कल्पना से प्रफुल्लित हो रहे थे । इसी बीच प्रमुख जी के बुक की भाव भंगिमा बिजली की भर्ती परिवर्तित हुई और उनके मुख से जो शब्द निकले उसके सभी को अंधकार रूपी सागर में तो भूतिया अब ये क्या हो रहा है ही प्रभु की? अब हाँ सभी ने एक सुर में कहा आप क्या समस्या है? प्रमुखी प्राम्भ ये क्या हो रहा है? प्रभु की स्थिति तो अत्यंत चिंताजनक हो रही है । मैं कुछ समझते हैं वाह करने की स्थिति में रही हूँ ये प्राम्भ एकता कहने के उपरांत उन्होंने अपने नेत्र बंद करके सभी वेस्ट में भी वहाँ आवाज थे । इतना ही होने के पश्चात उस विशाल कक्ष में प्रकाश असंख्य गुना बढ गया । किसी ने कहा अरे देखो किसी भी प्रभु को अपनी गोद में उठा लेगा ऍम है हूँ प्रकाश की तीव्रता के कारण सभी ब्याकुल वक्त टीम का तब बेमोल थे सभी के मुख से निकला प्रभु प्रभु प्रभु एका एक प्रकाश ऋतिक था, शीतलता में परिवर्तित हो गई । सभी के नेत्र बंद हो चुके थे । सम्भवता अंतर्दृष्टि जागृत हो चुकी नहीं क्यों जागृत हूँ कैसे जागृति किसने जागृति कोई नहीं जान पाया । बस सभी को बंद नेत्रों के बाद भी अस्पष्ट दिखाई दे रहा था । सभी को एक समान दृश्य ही दिखाई दे रहे थे अर्थात ये कोई मतिभ्रम नहीं था । प्रभु जब आपने लीला करते हैं तो लीला के पत्ते में वो अपने भक्तों को अपनी पारलौकिक शक्तियों का भी ध्यान कर आते हैं । इससे भक्तों में ऊर्जा के साथ विश्वास का प्रवास होता रहेगा । यहाँ पर सम्भवता प्रभु आशुतोष इंद्रा नहीं, अपने सभी भक्तों के लिए इस प्रकार की लीला महागौरी के साथ प्रदर्शित की, जिससे उनमें ओडिशा का पूरा प्रभाव हो जाए । सभी कक्ष में उपस्थित रहती देख रहे हैं कि एक अत्यंत सुन्दर इस्त्री अपने दोनों हाथों से प्रभु आशुतोष इंद्रा को उठा रही हैं । देखते ही देखते उस स्त्री का आकार बढना प्रारंभ हो जाता है । वो स्त्री इतने विशालकाय हो जाती है कि प्रभु आशुतोष इंद्रा उसकी गोद में एक शिशु की भर्ती प्रतीत हो रहे हैं । एक आई वस्त्र पद्मासन में बैठकर प्रभु आशुतोष इंद्रा को अपनी गोद में रखकर स्तनपान कराना प्रारंभ करती है । प्रारंभ में आशुतोष इंद्रा कुछ भी प्रतिक्रिया नहीं करते हैं, जैसे इस्त्री उनके बस तक बस को सहलाती है । प्रभु आशुतोष इंद्रा के शरीर भी एक विद्युत के सवाल झटका लगता है और अमृत समान डॉक्टर का पान करते हैं । उनके शरीर में चैतन्यता आती जा रही है । अब इस तरी उन्हें शिशु की भर्ती बहुत थी रे से पूरा उनके अ स्थान पर लिटा देती है । जब घूमती है तो सभी के मुख से ही एक ही शब्द निकलता है महागौरी महागौरी ।

भाग - 12

नील वर्णी ग्रीवा के प्रथम दर्शन कुछ समय पर शायद सभी को अपने स्कूल होने का अनुभव होता है । सभी धीरे धीरे अपनी आंख को खोल रहे हैं । सभी अपने आपको मानसिक रूप से व्यवस्थित करने के उपरांत प्रभु को देखते हैं । प्रभु अपने शहर न स्थान पर उसी दिशा में लेते हुए हैं, जिस दिशा में माने अभी उनको लिटाया था । मात्र कुमार नरेन्द्र नहीं इस बात को ध्यान दिया । सभी उनको स्वस्थ देखना चाहते थे । सभी ने देखा कि प्रभु का स्वास्थ्य उत्तम प्रतीत हो रहा है । सभी ने चयन केशवास । इसी बीच प्रभु ने अपनी पलकों को हिलाया । इधर प्रभु ने पलकों को हिलाया और उधर सूचना प्राप्त हुई कि महान आपने ध्यान प्रतिशत से बाहर आ गई है । एक बडे अंधकार में कालखंड के बाद गोश सिंगपुरा में पूरा प्रसन्ना था । वह उत्साह का सूर्य उदय हुआ है । चारों दिशाओं में उत्साह देखते ही बनता है । सभी अपने पद की गरिमा के विपरीत एक दूसरे का आलिंगन कर एक दूसरे को बधाई दे रहे हैं । कुछ ही समय और व्यतीत हुआ होगा की माने कक्ष में प्रवेश क्या मांगा कक्ष में प्रवेश करना, वह प्रभु का खोलना एक साथ हुआ । प्रभु ने आंख खोली और उनके सबका माँ भी प्रभु धीरी से मुस्कुराए तब वहाँ भी मुस्कुराये माँ की मुस्कुराहट के साथ तो उन उनकी आंखों से निकलकर उनके कानों पर आ गए । मारने गहरी श्वास ली और प्रभु को प्रणाम करने के उपरांत कहना प्रारम्भ किया प्रभु को सही दिशा में लिटाना चाहिए । आपने सिर्फ की दिशा में पैसा वह पैर की दिशा में सेंड कर दिया है । इतना सुनते ही सभी सब हो गए । सभी को ये बोला तैयार स्पष्ट था कि प्रभु सही दिशा में ही लेते हैं । अभी तक सभी ने जो अनुभव किया था तो हर कोई अपने मन में विचार कर रहा था की क्या बात तो उस नहीं अनुभव किया है अथवा सभी ने अनुभव किया । अब क्या सभी ने एक दूसरे से बात की तो सभी का अनुभव एक समान था अर्थात वो स्वयं माही तो थी जिन्होंने प्रभु को शिशु रूप में गोद में लिया, स्तनपान कराया और स्वयं ही विपरीत दिशा में प्रभु खोल लेता क्या परन्तु बनी प्रभु को स्तनपान कराया ये कैसे संभव है? हाँ तो आपने ध्यान योग कक्षा से अभी अभी निकली है । तब सांस कर के प्रमुख मैंने कहा बाय । यदि आप कुछ चाहने तो प्रभु के स्वस्थ होने के उपरांत मैं कुछ पूछना वार्ता पूर्ण होने से पूर्व ही मैंने कहा स्वास्थ्य होने के उपरांत अर्थात प्रभु तो वह स्वस्थ्य ही हैं । इतना कहने के उपरांत उन्होंने प्रभु को उठने के लिए कहा । प्रभु ने एक बार अपने नेत्र बंद किए और पुनर् नेत्र खोलने के साथ ही उठ खडे हुए । प्रभु के उठ खडे होने के साथ ही माँ प्रभु कुमार गगनेन्द्र वक्त बार कार्तिक केन्द्र के जयघोष से श्री वो शॉपिंग पूरा गूंज उठा । जयघोष के साथ साथ प्रेम, श्रद्धा व भक्ति का बहाव भी सबको बाहर लिये जा रहा था । सभी माँ की भक्ति शक्ति व प्रेम में बहे जा रहे थे । साथ ही प्रभु की असीन धारण क्षमता जिसने उस अस्त्र को सहरिया जिसे ब्रम्हांड में कोई नहीं रह सकता था, का कोन दान कर रहे थे साथ ही साथ मन मस्तिष्क में विचार भी हिलोरे मार रहे थे । माँ का प्रभु को शिशु रूप में गोद लेना, उस समय मांग का आपने ध्यान लोग कक्ष से निकलना जब प्रभु ने अपनी बल्कि झपकाएं । इन सब का क्या अर्थ था सभी अगले दिन की सभा वह प्रभु के पूरा तैयार स्वस्थ होने की कामना के साथ अपने अपने भवन को साइन होते ही चले गए । बहुत समय के पश्चात को श्रृंगा पूरा नहीं शान्ति की रात्रि आई थी । सभी प्रसन्न नवंबर उत्साह के साथ रात्रिविश्राम की तैयारी कर रहे थे की प्रमुख व्यक्तियों को सूचित किया गया के दिन के प्रथम प्रहर के आरंभ होते ही सभागार में उपस्थित होना है प्रमुख सीखो प्राम्भ बहुत में ही आना था सूर्योदय के पूर्व ही प्रमुख सी प्रभु आशुतोष इंद्रा के महल के कक्ष के बाहर उपस् थित हो चुके थे । जैसे ही प्रमुख सेवक को अपने आने की सूचना माँ तक पहुंचाने के लिए कहा ठीक उसी समय माने उन्हें अंदर आने की अनुमति दे दी । माँ की आज्ञा प्राप्त होते ही प्रमुख भी प्रभु के भवन के एक कक्ष में खडे थे और मां बैठी हुई थी । माने प्रमुख से कहा प्रमुख अब आंचलिक इतना सुनने के उपरांत प्रमुख चीजें मन में विचार किया एस हौश धी काल देश का कार्य तो नाममात्र ही है । सम्पूर्णता तो माँ प्रभु में स्व कही है । फिर विचार क्या ब्रह्मा की लीला को कौन जान सकता है और बोलना प्रारम्भ क्या माँ मैंने जब कल औषधि का प्रयोग प्रभु के लिए किया था तब मेरे मन में अंजली का भी विचार था पर दो इतना कहने के पश्चात प्रमुख शांत हो गए और बांधें कहना प्रारम्भ किया परन्तु परन्तु क्या माँ मैं क्षमा चाहता हूँ । शाम को शिक्षा मार्क इस कारण पर्याप्त साहस अर्जित करने के उपरांत प्रमुख चीजें कहा, माँ आप तो जानते ही है कि औषधि के प्रयोग के उपरांत आप की आवश्यकता होगी । मैं समझ गया हूँ बल्कि मुझे अनुभव हो गया है कि मूल शक्ति प्राणदायिनी शक्ति तो आप ही हो । इस कारण मेरे अकेले औषधि के प्रयोग से आंचलिक को सम्भवता लाभ हो अथवा माँ ने मुस्कुराते हुए कहा आप क्या कह रहे हैं? मैं यहाँ हूँ । मैं तो अच्छा रहने दीजिए । अब आप मुझे आंचलिक के समीप ले चल गई । बिना विलंब किए प्रमुख सी माँ के औषधालय पहुंचने की सूचना पहुंचाते हैं । कुछ ही समय में माँ वह प्रमुख ही औषधालय पहुंचाते हैं और औषधालय प्रमुख सुमन असवा से माँ पूछती है सोमनाथ स्वा जी ऍम आप इधर आएगी वो किधर है? इतना सुनने के उपरांत माँ आंचलिक को देखती हैं, भावविभोर माफ हो जाती है । ऐसा भी स्वामीभक्त जीव संभव है जो अपने प्राणों को महत्व ना देकर अपने स्वामी के लिए प्राणों की आहूति देने को तत्पर है । फिर माँ आंचलिक को अपनी गोद में लेना चाहती हैं परन्तु उसके वृहदाकार होने के कारण ये संभव नहीं हो पा रहा है । तब हाँ आसन पर बैठती है और उपदेश देती है कि आंचलिक को उनकी गोद पर रख दिया जाए । ऐसा ही किया जाता है । अब दृश्य अत्यंत ही मार्किट है । इस प्रकार का आघात गंभीर सभी को दें, जिससे स्वयं जगत्जननी अपनी गोद में ले । सारे चमन के संपूर्ण अर्चित करने आज फलीभूत हो गए । इस प्रकार के विचार प्रमुख जीवन सुमन असवा के मन मस्तिष्क में चल रहे थे । अब माने अपने हाथों से औषधि अंजलि के मुख में डाली । कुछ क्षणों तक वे आंचलिक के शरीर पर हाथ रेट भी रही । फिर उन्होंने आंचलिक से कहा आज चले आंजर्ले उठूँ उठो युआन चले । इस बीच प्रमुख से अपने विचार मिलाकर हुए थे । उनका विचार था कि और स्थिति बॉक्स में जाने के कुछ को प्रांत का एक प्रभु आशुतोष इंद्र का स्वास्थ्य बिगड गया था । क्या यही घटना अंजलि के साथ भी अथवा कुछ नवीन घटना ये विचार उनके अंतर्मन में चल ही रहा था कि उनकी दृष्टि आंचलिक पर पडी और ये तीन दिन से बोल पडे हरे आश्चर्य आंचलिक की आंखें खुल रही है महा आप धन्य हैं वहाँ की जय हो प्रभु आशुतोष केंद्र की जय हो इतना ही कहता है थे कि आंचलिक नहीं अपनी आंखें खोल दीन और अपने आप को माँ की कोर्ट में पाया । उसकी पिछली याद में वह शक्तियों से जाप किया था और उसने शत्रु की आप भी नोट डाली थी । इसके पश्चात हुआ इतना समय कैसे प्रतीत हुआ उसे कुछ भी याद नहीं था । अब उसने अपने आप को माँ की कोर्ट में पाया । उसकी आपसे अश्विन पहन के वो मन में विचार कर रहा था । अब इसी क्षण यदि प्राण निकल जाए तो उसके जीवन का इससे श्रेष्ठ बारी दोषित क्या होगा? उसने अपना संपूर्ण बाल लगाया और उठने का प्रयास किया । प्रथम प्रयास में असफल होने के उपरांत दो इतने प्रयास में वह पंजे पर खडा हो गया और तुरंत ही माँ की गोद से उतरकर वो माँ के चरणों के पास पहुंच गया । मास नहीं से बार बार उसे उठाने का प्रयास कर रही थी । परंतु को माँ के चरणों से हटने को तैयार नहीं था । कम्मल स्वतः भूमि पर बैठ गई । धक तीवा प्रेम में कितना बलवंत सामर्थ्य है । विपक्षी मात्र के प्रेम भाव में लीन होकर जगत्जननी भी भूमि पर बैठ गई । जवान जल इतने ध्यान दिया कि उसके कारण माँ को भूमि पर बैठना पड रहा है तो वह माँ के चरणों से हट गया । अब एंजलिक स्वस्थ था परन्तु शारीरिक कमजोरी के कारण उसकी गति कम थी । कुछ ही दिनों में निश्चित ही वो अपनी पुरानी क्षमता को प्राप्त कर लेगा । अब माँ वह प्रमुख ही नहीं मुख्य सभागार के लिए प्रस्थान किया । मार्च में माने प्रमुख सीसे औषधि को सुरक्षित रखने अथवा उस की उचित व्यवस्था करने का निर्देश दिया । दोनों कुछ ही समय में सभागार पहुंच गए । वहाँ पर महाराज आशुतोष इंद्रा के अतिरिक्त संपूर्ण सभागार भरा हुआ था । कुछ ही समय में महाराज आशुतोष इंद्रा सभागार में आए । अब महाराज स्वस्थ त्वपूर्ण ऊर्जावान प्रतीत हो रहे थे । सभी गई विभिन्न प्रश्न थे और मालिक शो के विषय का प्रश्न तो वहीं पर था कि मालिक शो का क्या हुआ? क्योंकि कुमार कार्तिक केंद्र वर्लड करेंगे? नहीं । अभी मालिक शो के विषय में किसी को कुछ नहीं बताया था । सब प्रकार का वातावरण् अत्यंत सुखद वहाँ ऊर्जावान प्रतीत हो रहा था । सभी के मुख्य मंडल पर अब एक विजयी भाव प्रतीत हो रहा था जो युद्ध के उपरांत प्रतीत होना चाहिए था । जब तक सब कुछ अनुकूल होता है तो सेवक यदि मालिक से अपनी क्षमता से परे जाकर भी प्रश्न कर ले तो मालिक कभी नाराज नहीं होगा बल्कि प्रसन्नता प्रदर्शित करता है । यहाँ पर आज सब अनुकूल है । किसी अनुकूल वातावरण को मापने के पच्चास इंदौर नहीं माँ से प्रश्न किया माँ मैं कृष्णा पूछना चाहता हूँ । माँ का जोरू सभी ने बंद नेत्रों से देखा । उसके उपरांत सामान्यता कोई भी प्रश्न करने का साहस नहीं करता रहा था, परन्तु हिंदू तो कुमार गजेंद्र के समान किशोर वहाँ रही था । इसी कारण उसके प्रश्न पर माँ वह प्रभु दोनों ही मुस्कुराने लगे । तब मैंने कहा हाँ बेटा इंडोर क्या पूछना चाहते हो माँ मैं जानना चाहता हूँ कि जब आप अपने कक्ष में थी और बाहर आई ही नहीं तो सभी ने ये कैसे देख लिया कि आपने प्रभु को कोर्ट में उठा लिया । सभी ने अपने बंद नेत्रों से एक समान रूप देखा । क्या ये सकते हैं अथवा इतना कहने के उपरांत बहुत शांत हो गया । मां व प्रभु ने सभागार को ध्यान से निहारा तो अनुभव किया कि सभी इस प्रश्न का उत्तर चाहते हैं । तब माने प्रभु की तरफ संकेत किया कि वह कुछ कहें तब प्रभु आशुतोष इंद्रा नहीं कहना प्रारम्भ किया आप सपने जो देखा वो सकते था । इस अस्त्र के प्रयोग होने के कारण मेरी आध्यात्मिक शक्ति और अधिक पड गई है । इस शास्त्र के प्रयोग के उपरांत ब्राॅड का कोई भी जी जीवित नहीं बच सकता था । साथ ही से निकलने वाली असीमित ऊर्जा से सबूत ही पृथ्वी का विनाश निश्चित था । सम्भवता कुछ पुण्यकर्मों के कारण मेरे भीतर जो योग सकती थी उससे मैंने उन सस्त्र को बहुत समय तक अपने शरीर में धारण रखा । आपकी माँ के पास अनंत शक्तियां जो पूर्वजन्मों से संचित है, जब उन्होंने अपनी शक्तियों को अंतर्मन की दृष्टि से पहचाना, सबवे शक्ति स्वरूप हो गई । आप सब ये विचार न करें कि जिन्होंने जीवन दान दिया, अच्छा मुझे होते उठाया वो हमारी पत्नी है । वास्तव में वे उस समय पत्नी स्वरूप होकर ऊर्जा स्वरूप जगह चल नहीं थी मैं वहाँ वे दोनों एक ही है, एक रूप है और दूसरा उसकी शक्ति एक ऊर्जा प्रवाह है और दूसरा वो ऊर्जा स्रोतों एक शक्ति है और दूसरा शक्ति को प्रदर्शित करने वाली छह तरह । अब वो योग शक्ति पुना एकत्रित करनी होगी क्योंकि संपूर्ण योग शक्ति उस प्रचंड अस्त्र को सहने में समाप्त हो गई है, आता है । अब हमें पुणा वो योग साधना करनी होगी । इतना सुनने के पश्चात सभी के मन में प्रश्न था कि क्या प्रभु के पास हो शक्ति समाप्त हो गई अथवा प्रभु इसके लिए कह रहे हैं कि सभी उनको वो सामान्य मानव की समझे । किसी के मध्य का अधिकेन्द्र । वल्लभ भृंगी ने भी सभी को मालिक शो के विषय में जानकारी उपलब्ध कराई जिससे सभी लड करेंगी वक्त आप केंद्र की प्रशंसा करने लगे । साथ ही अब ये योजना भी तय करनी है कि अब मालिक शो की प्रतीक्षा न की जाए बल्कि उन्हें खोजकर समाप्त कर दिया जाए । अब सभा समाप्त हो रही थी और योजना भी बन चुकी थी कि क्या करना है । तब तक प्रभु केजरीवा में पडा हुआ वस्त्र हट गया । वस्त्र के हफ्ते ही सभी के मुख से एक ही शब्द निकला, अरे ये क्या हुआ प्रभु की ग्रीवा को तब लटकेंगे जी धीरे से खडे हुए और उन्होंने कहना प्रारंभ दिया प्रभु की जय हो । ये एक रीवा वस्त्र के प्रभाव से प्रभावित हो गई है । इस ब्रह्मांड में प्रभु के समान कोई दूसरा नहीं हो सकता क्योंकि प्रभु के समान अस्त्र सहने की क्षमता किसी में नहीं है । मात्र प्रभु ही कहलाएंगे । नीलकंठ प्रभु नीलकंठ की जय हो । इतना सुनना ही था कि पूरे सभागार में नीलकंठ का चाय खोज गुंजायमान हो गया । कुछ समय तक नीलकंठ का गुंजायमान सतक चलता रहा । तब का मुझे नहीं अपना आसन छोडा और कहा परन्तु प्रभु कष्ट में है प्रभु कष्ट में है । ये सुनना तो इस प्रकार ही था जैसे अमृत के पास में विश्व कप खुला अथवा जीवन दादा के हाथों मृत्यु की प्राप्ति अथवा दिन का रात्रि में यात्री का दिन में परिवर्तित हो ना सभी कुछ पल पहले नीलकंड का गुंजायमान कर रहे थे । एकाएक इतना घोर सन्नाटा । ये सन्नाटा मृत्यु को भी कोला खाली करने की क्षमता रखता है । कोई कुछ समझ नहीं पा रहा था की प्रमुख ही नहीं ये क्या कह दिया भाव क्या है? सामान्यता व्यक्ति इसका अर्थ बाद में लगता है । सर्वप्रथम शब्दों में क्या है इससे प्रभावित हो जाता है जब की श्रेष्ठता शब्दों में कभी नहीं होती बल्कि शब्द शब्द तो कुछ होते ही नहीं । शब्द कुछ होते ही नहीं । इसका अभिप्राय यह है कि जहाँ तक प्रिया को प्रियतम से कुछ कहने के लिए शब्दों का सहारा लेना पडे, समझो वो प्रेम सच्चा नहीं है । या भक्त को भगवान से कुछ कहने के लिए शब्दों का सहारा लेना पडे तो समझो प्रेम की दूर उन दोनों के मध्य न के समान है । इसी प्रकार प्रमुख जी के शब्द के सवाल सभी के हित में खासकर गए कि अब क्या शेष है । तब प्रमुख ने सभी की भाव भंगिमा को देखने के उपरांत होना कहना प्रारम्भ किया । आप सभी चिंतित हो ये सब प्रभु की लीला है, परंतु सकते भी है कि प्रभु अभी कष्ट में है । प्रभु के कष्ट निवारण है तो हम सभी अपने प्राणों का भी मूड नहीं करेंगे । आप इसका उपाय जानते हो तो कहे सभी ने हाँ में हाँ मिलाई तो प्रमुख जीने का शास्त्र के निवारण का उपाय उन्हें भी ज्ञात नहीं । अब प्रभु अस्त्र के मूल प्रभाव से मुक्त हो चुके हैं । इसके कुछ सुक्ष्म प्रभाव शेष रहेंगे । सुषमा प्रभाव जी सुक्ष्म प्रभाव ये प्रभाव भी प्रभु के लिए सुखमय परन्तु सामान में जीव इन प्रभावों के साथ जीवित नहीं रह सकता । इसका प्रभाव प्रभु की ग्रीवा पर अस्पष्टता दिखाई देगा । ग्रीवा नील वर्णीय होगी और सदैव नीलवर्ण येही रहेगी । दण्डक हार जीने का प्रमुख जी नील वर्णीय रेवा से प्रभु और भी आकर्षक लग रहे हैं । उनका आभामंडल और भी अधिक प्रभावशाली प्रतीत हो रहा है । एकता सुनने के पश्चात प्रभु वह प्रमुख चीज दोनों ही मुस्कुराने लगे । उनकी मुस्कुराहट से डंडधार समझ गए कि कुछ अर्थहीन कह दिया है । तब प्रमुख ने पूरा कहा डंडधार जी नील वर्णीय विवाह डॅाल अस्त्र के कारण हुई है । उस स्थान पर और उसके आसपास के स्थान पर अस्त्र के प्रभाव के कारण प्रभु को जलन का अनुभव होता होगा । ये चलन प्रभु योगशक्ति से काम कर लेते हैं, परंतु समाप्त होना संभव नहीं है । अर्थपूर्ण स्वस्थ होने के लिए कुछ अतिरिक्त उपाय खोजना होगा । वो उपाय क्या होगा ये स्वयं मुझे भी याद नहीं है । तब प्रमुख ने अपनी पीडा को छुपाते हुए सभी के संबंध ये प्रस्ताव रखा कि ये पीडा वो कुछ समय के लिए सही लेंगे । इसका उपाय बाद में खोजा जाएगा । सर्वप्रथम अब मालिक से आपने भूमंडल को मुक्त कराना होगा । पूर्ण प्रयास करना होगा कि मालिक सब आप सही हो जाए । इसके लिए प्रमुख ही नहीं अपनी प्रयोगशाला के लिए रोक किया और अन्य सभी नहीं अपने अपने अस्त्र शस्त्रों की तरफ

भाग - 13

मालिक शिपबोर्ड द्वारा मालिक शो की संख्या बढाने की योजना मालिक शिशु अपने कानों पर विश्वास नहीं कर पा रहा था । उसको गुप्तचर बारंबार विश्वास दिलाने का प्रयास कर रहे थे कि गोश्त श्रृंगा पुरा में प्रभु आशुतोष इंद्रा की जयजयकार गूंज रही है । इसका अभिप्राय मात्र एक ही है कि महाराज आशुतोष इंद्रा को काल विश्व औषधि प्राप्त हो गई है और वे अब स्वस्थ हो गए हैं । इतने के बाद भी मालिक शोन का ये ते ये मानने को तैयार नहीं था की काल विश बोस जिनका पूरा पहुंच गया है इस समय वह सभा में अकेला टहल रहा था और शेष को उसने बैठने का आदेश दे रखा था । एकाएक वो चिल्लाया असंभव है ये उसने अपनी बच्चे हुई । सेना हर उस मार्ग पर लगती जहाँ से गोश्त इनका पूरा पहुंचा जा सकता था । इसके बाद भी वह दो लोग काल वेश प्राप्त कर गोश इनका पूरा पहुंच गए । जब सभी मार्क हमारे नियंत्रण में थे तो बेकिस् मार्क्स पहुंचाई । इस पर विचार करने के साथ उसको अत्यंत महत्वपूर्ण चर्चा याद हुआ । उस चर्चा के याद आते ही उसने पुनः गुप्तचर से बात की । गुप्तचार हमने स्वता आशुतोष केंद्र को देखा नहीं महाराज बहुत तब तुम ने इतनी महत्वपूर्ण सूचना को बिना पोख्ता की ये ही मुझ तक पहुंचा दिया । यदि ये सूचना आ सकते हुई तो गुप्तचर ने बीच में ही कहा क्षमा महाराज! सूचना गलत नहीं हो सकती है । महाराज्य मैंने प्रजाजनों का उत्साह देखा है । ये मृतप्रायः गोरसिंग पूरा एका एक जागृत हो गया और मात्र जागृत ही नहीं हो गया बल्कि ऊर्जावान होकर जागृत हो गया । क्या आपको नहीं लगता है कि ये मात्र आशुतोष केंद्र महाराज के स्वस्थ होने का प्रतीक है । चर्चा चल ही रही थी कि एक अन्य कुप्रचार के आगमन की सूचना प्राप्त होगी । अब सब उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे । कुछ समय के लिए गुप्तचार की प्रतीक्षा वर्गो, श्रृंगा पूरा की नवीन जानकारी प्राप्त करने हितों प्रत्येक व्यक्ति के कान द्वार पर पहला देने लगे । पहला भी इस भर्ती कि आते ही सर्वप्रथम उन्हें ही सूचना प्राप्त हो की कोशिश सिंगपुरा का ताजा समाचार क्या है? जैसे ही गुप्तचर आया उसने पहले से उपस् थित कुप्रचार की तरफ देखा और रचने क्या संकेत दिया कि कोई जान ही न सका । उसके सभी को प्रणाम किया और जाने की आज्ञा मांगी । उसके जाने की आज्ञा मांगने से सभी लोग हक प्रत्येक की अभी तो उसने कुछ कहा ही नहीं । और जाने की आज्ञा इसका क्या अभिप्राय हो सकता है । तब मालिक शब्दम ने पूछा गुप्तचर तुम किस कारण यहाँ आए थे? या तो हमारे पास कोई सूचना नहीं थी, क्या दे रही थी तो यहाँ आने का क्या प्रयोजन आने वाला गुप्तचार शाम तथा उसने पुराने गुप्तचार की तरफ देखा और फिर अपनी पूर्व स्थिति में खडा हो गया । इसके पहले की कोई भी कुछ प्रश्नकर्ता पुराना को प्रचार आगे बढा और कहने लगा महाराज हमारी सूचना शत प्रतिशत सत्य है । आने वाले गुप्तचर कार मैं समझ गया हूँ । महाराजा तो सुरेंद्र ना केवल औषधि प्राप्त कर चुके हैं बल्कि पूर्ण स्वस्थ भी हैं । इतना सुनने के उपरांत कलेक्शन सोन अत्यंत क्रोध हुआ । हताशा सही ग्रसित हो गया । कुछ समय तक वो शांत रहा । मन ही मन में कुछ विचार कर रहा था । एकाएक उसे एक वैज्ञानिक की बात याद आई । ये वही वैज्ञानिक था जिसको उसने मालिक आभापुरी से अब रहित किया था । उसने बताया था कि इस अस्त्र के प्रयोग से ही अभिव्यक्ति ठीक हो गया । तब भी उसके शरीर में भयंकर चलन होती रहेगी और उस चलन के कारण उसका शरीर नीला हो जाएगा । यानी कुछ समय तक उपचार दा मिला तो भी मृत्यु तो निश्चित ही है । कुछ विचार करते हुए उसने पूरा गुप्तचर से पूछा कब कच्चा? क्या आशुतोष ेंद्र को किसी ने देखा? हाँ प्रभु उसके शरीर में कोई विशेष परिवर्तन अथवा उसके ग्रीमा में उसकी क्वेवा हाँ महाराज । इस पर उन्होंने बस ढक रखा था । इतना सुनने के पश्चात माॅनसून नहीं अपनी सभा विसर्जित करती और कुछ विशेष लोगों को पूरा प्राथा काल आने के लिए कहा और कुछ बडी योजना के विषय में विचार करने लगा । मालिक शून्य अकेले बैठकर विचार कर रहा था की अब पूरा आशुतोष इंद्रा स्वस्थ्य हो गया । अब उसके अपने पास मालिक शिवसैनिकों की संख्या भी कम रह गई है । युद्ध तो निश्चित ही भयंकर होगा । अब जब आप हो तो शिंद्र डाॅक्टर से भी बचकर निकल आया तो किस प्रकार उसके मृत्यु निश्चित की गए । ऍम सैनिक भी चाहिए आप क्या बेरा अब क्या विजय श्री लिए बिना ही वापस जाना होगा । उसके अपने मन को समझाया कि अच्छा हुआ यदि आशुतोष शैलेन्द्र ही ना होता तो युद्ध का मजा ही नहीं था । अब होगा संघर्ष तो कुछ आनन्द अभी आएगा? जवाब बार बार पराजित होते हैं तो आपका मन भी पराजित हो जाता है और कई बार मन जो स्वार्थ की गठरी है वो बुड्ढी को समझाता है की पराजय ही अच्छी थी, उससे ये लाभ हुआ । इसी प्रकार कलेक्शन शोरूम का मन भी बुद्धि को समझा रहा है । यदि आशुतोष इंद्रा, योग महल अथवा गो श्रृंगा पूरा के युद्ध में मृत्यु को प्राप्त हो जाता तो उसे काल विश्व की प्राप्ति कभी नहीं हो पाती । अब उसे काल विश्व की प्राप्ति भी होगी और आशुतोष इंद्र को पराजित करने का गौरव । इतना विचार करने के पश्चात उसका बन कुछ शांत हो गया था । उसके मन नहीं, बुद्धि को समझा दिया । अब उसके सम्मुख प्रश्न था सैनिक संख्या, सैन्यबल उसके लिए वो कुछ सोच नहीं पा रहा था । इन्हीं सब विचारों के उथलपुथल में रात से कब व्यतीत हो गयी? मालिक ससून जान नहीं पाया । ज्यादा जब पक्षियों का कलरव उसके कारणों को आनंदित करने लगा तो वो समझ गया कि अब उसे सभा में चलना चाहिए । प्रातः काल से ही सभा के लिए मुख्य मालिक एकत्रित होने लगे । सभी महाराज, मालिक शिशु उनके मुक्का तलाओ अनुभव कर सकते थे । सभी मालिक शो के ऊपर आये संकट का अनुभव कर रहे थे । व्यथित मान के मालिक शिशु नहीं सभा का आरंभ किया । अपने पास सैन्यबल कम हो गया है । अपने वाले तीन स्थानों पर हताहत हुए प्रथम योग बहल के युद्धमें दोहिती गोश श्रृंगा पूरा के युद्ध में तेरे थी उन दोनों का टिकेंद्र पलट रहेंगी । का पीछा करते समय नदी में हो जाने के कारण अब सैन्यबल इतना ही कह पाया था के मालिक से फोन की दृष्टि बाहर की तरफ गए तो मानो उसके शरीर में विद्युत प्रवाहित हो गई और वह चुप हो गया । कुछ ही पलों में एक मालिक सामने उपस् थित था । उसका नाम था मालिक शिपबोर्ड । वतंत्र योग के वैज्ञानिक वह दार्शनिक था । सभी उसका सम्मान करते थे । उसके पास आते ही सभी चौंक गए कि ये यहाँ कैसे उसे बाल एक अपने लोक में छोड कर आए थे, क्योंकि वह कुछ आवश्यक अनुसंधान में व्यस्त था । उसे देखकर बाल एक्सशोरूम नहीं, उसे बैठने को कहा और उससे पूछा भले ऍम आप यहाँ महाराज की जय हो । जिन नाविश कारूवा अनुसंधानों पर मैं कार्य कर रहा था, वे अब संपन्न हो चुके हैं । अच्छा मैंने विचार किया कि मुझे महाराज के सभी पहुंचना चाहिए । इसी कारण मैं आपके सभी पा गया । पर तो मैं देख रहा हूँ । यहाँ पर सब ठीक नहीं चल रहा है । आप सत्य कह रहे हैं । एकता सुनने के उपरांत चर्चा परिचर्चा में बाली क्षेपण को ज्ञात हो गया की समस्या क्या है? वो समस्या सुनकर मुस्कुराने लगा और उसके मुस्कुराने पर सभी लोग उसे देखने लगे । तब वो शमा मांगते हुए पूरा ये भी क्या संयोग है कि आपकी समस्या का समाधान अभी कुछ ही समय पूर्व मैंने अपने अनुसंधान में क्या इतना सुनना मात्र था की सभी को मालू अंधकार में प्रकाश प्रदर्शित हो गया? ऐसा प्रतीत बाकी सभी कुछ न पूछते हुए भी उससे सब कुछ पूछना चाहते थे । तब मालिक शिप उत्साह भाव से कहने लगा महाराज, आप सैन्यबल की चिंता ना करें, मैं उसका प्रबंध कर दूंगा । माॅनसून की ओर देखकर वाले क्षेत्र हमने कहा महाराज सम्भवता मालिक ऍम अभी पूरी बात समझ नहीं पाए । हमें मनुष्यों का साइन लेबल नहीं चाहिए । हमें मालिक शोका, सैन्यबल चाहिए । सामान्य मनुष्य ऍम उसकी सेना का सामना नहीं कर सकते । महाराज गुप्तचर सूचनाओं के आधार पर मैं कह सकता हूँ गोश सिंगर पूरा को अन्य लोगों से भी सहायता प्राप्त हो रही है । इतना सुनने के पश्चात मालिक शिशु उनके बस तक पर बाल आ गए । उसके बस तक पर तनाव स्पष्ट था । देख रहा था वो । आपने आवेश को चाहकर भी रोक नहीं पा रहा था । आवेश के प्रभाव से उसका मुखमण्डल तम तमाम था । वो आवेश के साथ बोल उठा कौन है, किसके मृत्यु आई है जो वो सिंगर पूरा के साथ ही अपना अंतर भी चाहता है । गुप्तचरों के अनुसार एक हजार आठ गन किसी लोग से आए हैं । उस लोग आराम करेंगे । लोग था, भरेंगे लोग था महाराज अब वो लोग सब हो गया है और वे सभी एक हजार आठ सदस्य को श्रृंगा पूरा में ही रहेंगे । ऍम गोल सिंगापूर में साडी हो रहेंगे । जब वो सिंगर पूरा ही नहीं रहेगा तो कहाँ रहेंगे? चलो अच्छा है इसी बहाने से उनकी मृत्यु भी निश्चित हो गयी महाराज एक विशेष बात ये भी है कि वो व्यक्ति जो कुमार कार्तिक केन्द्र के साथ काल विश लेने गया था । हाँ मुझे याद है वो विचित्र प्रकार का प्राणी महाराज वो अकेला ही कालरेस लाने में सफल हुआ । साथ ही गुप्तचरों का कहना है कि वे सभी अत्यंत वीर वह अद्भुत हैं । इसके अतिरिक्त न जाने क्यों सभी उनको कुमारों के समान स् नहीं दे रहे हैं । कुछ गुप्तचर ये भी सूचना लाए हैं यहाँ सूत्रों सेंटर के ही अंश हैं । इसका सुनने के उपरांत बाल एक्सशोरूम शाम तथा ये विचार कर रहा था कि वे आशुतोष इंद्र का अंश किस प्रकार हो सकते हैं । यदि है तो उनमें भी अद्भुत क्षमता होगी । अब उनका सामना बीना बडी मालिक शिवसेना संभव नहीं है । इतना सब सुन कर वह समझकर बाल एक रिपोर्ट नहीं ऐसा बात के बोला कि सभी निःशब्द होकर उसे देखते रहेंगे । महाराज मैं एक वर्ष के समय से भी कम समय में पूरी मालिक शो के सेना आपके सामने खडी कर दूंगा । यदि आप कहे तो मैं छह माह में ही हजारों लाखों मालिक चौका सामने बाल उपस् थित कर सकता हूँ । सास मामी हजारों लाखों वाले ये किस प्रकार संभव है? पहले ब्लॅक आप जो कह रहे हैं उसका अर्थ समझ रहे हैं । हाँ महाराज मात्र छामा में और ऐसे मालिक जो बात रहे एक सप्ताह में पूरा तैयार सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त कर लेंगे । कलेक्शन पहुँच आप जो कह रहे हैं यदि वो कोई और कहता तो संभव का यहाँ पर कोई विश्वास नहीं करता हूँ । परन्तु यहाँ पर अभी भी मैं मैं कैसे कल्पना करूँ कि आप एक सप्ताह में प्रशिक्षण दे देंगे और कोई भी व्यक्ति एक सप्ताह में सैन्य काल में पारंगत हो जाएगा । मैं अपने कानों पर विश्वास नहीं कर पा रहा हूँ । सैन्य काला में परिपक्वता के लिए कम से कम एक वर्ष तो चाहिए ही । मेरी समस्या परे बहन तब आप कह रहे हैं तो इतना कहने के उपरांत कलेक्शन सोन शांत हुआ तो उसका सेनापति मलिक शतम् प्रारंभ हो गया । मैं ये नहीं समझ पा रहा हूँ के बाद छह मामले हजारों लाखों वाले कहाँ से पैदा हो जाएंगे? क्या आप अपने लोग से उन्हें लाने की चेष्टा तो नहीं कर रहे हैं? आप तो जानते ही हैं कि अपने लोग से यहाँ आने में जितना समय लगता है वो बहुत ज्यादा है । हाँ, कुछ विशेष व्यवस्थाओं से शीघ्रता हो सकती है परन्तु उसे भी कुछ लोग ही आ सकते हैं । हजारों लाखों व्यक्ति नहीं आ सकते । इस प्रकार के लोग कहाँ से आएंगे? मैं क्या यहाँ उपस् थित कोई भी ये नहीं समझ पा रहा है । अगर आप स्पष्ट करें मैं अपने लोग से बुलेट ही ला रहा हूँ । मैं यही पर मालिक को जनमत दूंगा । चल मतुंगा फिश शब्द नहीं मालिक शो के मस्तिष्कों को सुनने कर दिया । इसका कोई अर्थ समझ नहीं सका । ऑमलेट शो का जन्म वो भी पृथ्वी पर । छह माह में एक सप्ताह में वो सैनिक के रूप में तैयार हो जाएंगे । इस पहली को कोई जानना सका । सभी मालिक शिप को देख रहे थे । सभी की भाव भंगिमा को देख मालिक शिप उन्होंने कहा महाराज! मैं तो आपसे कहने जा रहा हूँ उसे आप ध्यान से सुने । मैं यही पृथ्वी लोग परबल एक्शन को जन्म दूंगा । मैंने अभी जो अनुसंधान किया है उससे मैंने एक इस प्रकार का परिणाम पाया कि किसी भी चीज को अधिकतम चालीस को ना गति से बनाया जा सकता है । मैं आप के बाद नहीं समझ सका । इसे पूरा स्पष्ट करें । महाराज जिस प्रकार गर्भावस्था मालिक शो कि चालीस सप्ताह की होती है अर्थात हमारे शिशु गर्व में चालीस सप्ताह तक रहते हैं और उसके बाद उनका जन्म होता है । हाँ, ये सकते हैं अब आगे का हूँ । महाराज मैंने अभी अनुसंधान में यह निष्कर्ष प्राप्त किया है । मैं अपनी वैज्ञानिक क्षमता से चालीस सबका भ्रूण अवस्था को एक सप्ताह में बदल सकता हूँ । अर्था गर्भावस्था मात्र एक सप्ताह के ही होगी और शिशु का जन्म हो जाएगा । मालिक स्कूल हतास हो गया । उसने अपने मन में सोचा क्या इसी को हमने महान वैज्ञानिक का पद दिया था? बच्चों का हम क्या करेंगे? फिर सोचा कि बच्चों को बडा करने में जो समय लगेगा लगता है बाल एक रिपोर्ट नहीं, उसका आकलन नहीं किया । फिर हताशा वह दुःख के कारण उसने अपनी आंखें बंद कर ली और अपने सिर को बाएं दाएं हिलाने लगा । इस बात को मालिक शिफोन समझ गया कि बाहर आज मेरी बात अभी पूर्ण का समझ नहीं पाए हैं । अच्छा उसने पूरा शमा मांगते हुए कहा महाराज! मैं क्षमा चाहता हूँ की पूरी बात आपको समझा नहीं सका । शिशु के पैदा होने के छामा में ही वह बीस वर्ष का बाॅक्स हो जाएगा । एक वर्ष में उसकी व्यवस्था चालीस वर्ष के मालिक के सामान हो जाएगी । इतना सुनते ही सभी को मालूम प्राण औषधि प्राप्त हो गई । अब मालिक अपुन ने इस कार्य के लिए जो आवश्यकताएं बताएं उन पर विचार प्रारम्भ किया । सर्वप्रथम सभी इस तरह के वैज्ञानिक शोध पर मालिक शिप उनको बधाई दे रहे थे । अपना वाले एक शून्य के मन में ऊर्जा का संचार हुआ और उसने सभा में कहना प्रारम्भ किया वाले सोल ने का साॅस आज पूरी बाॅक्स जाती । पहले क्षयपूर्ण ऋणी हो गई । अब हम कंबाइंड विजय अवश्य करेंगे । पूरे ब्रह्मांड पर बाल एक शो का राज्य होगा ऍम आप बताएँ कि हमें क्या और कैसे व्यवस्थाएँ करनी है? महाराज सर्वप्रथम आप मुझे ये बताया कि आपको कितने मालिक चाहिए । उसी के अनुसार मैं आपको आवश्यकता बताऊंगा । मुझे पचास हजार बाॅर चाहिए जिससे हमारी विजय सुनिश्चित हो जाएगा । अब आप बताए महाराज इसके लिए मुझे पच्चीस हजार महिलाओं की आवश्यकता हूँ । पच्चीस हजार महिलाएं क्या एक महिला दो मालिक को जन्म देगी? क्या दिए? एक महिला तो मालिक शिशुओं को जन्म दे सकती है तो एक महिला चार शिशुओं को क्यों नहीं? इससे हमें काम महिलाओं की व्यवस्था करनी होगी से राप्ती थी । आप सत्य कह रहे हैं परन्तु संभव नहीं है । कारण कारण स्पष्ट रही है । शिशु के विकास की गति इतनी अधिक होगी । यदि दो से अधिक शिशुओं को गर्व में विकसित किया गया तो महिला का शरीर उसे पोषण न दे पाने के कारण समाप्त हो जाएगा । अर्थात महिला का जीवन ही नहीं बचेगा । इस प्रकार मुझे पच्चीस हजार महिला एक सप्ताह के लिए और उन के रहने का उचित स्थान चाहिए । साथ ही मालिक बच्चों के पालन पोषण के लिए कम से कम छह माह चाहिए । छह माह के उपरांत मैं आपको पचास हजार युवा बलिक चुकी सेना दूंगा । इतना सुनने के उपरांत बाल एक्सोन के बस फॅमिली विचारों का ज्वालामुखी फट गया । वो विचार करने लगा की किस प्रकार के संभव है ।

भाग - 14

हूँ । गुप्तचर द्वारा मालिक क्यूँकि गुप्त योजना का पता चलना महाराज आशुतोष इंद्रा कुछ ही समय में पूर्ण स्वस्थ और जवान हो चुके थे । आंचलिक भी अब स्वस्थ था । गोश सिंगपुरा इस समय उत्साह नवागंतुक एक हजार आठ करों के साथ प्रसन्नता में सराबोर था । गण भी ऐसे की एक एक घंटे, एक एक सेना के समान । हाँ प्रभु दोनों कुमार सभी सेनापति, महामंत्री व अन्य गणमान्य व्यक्ति । प्रसन्नता वह विजयी महोत्सव में डूबे हुए थे । इस बीच महाराज ने मुख्य पदाधिकारियों को बुला भेजा । सभी प्राधन प्रसन्न मुद्रा में राज्यसभा में उपस्थि थे । इसी के बंदे प्रभु का विशेष को प्रचार भी सभा में उपस्थित हुआ । गुप्तचार वह महाराज के भाव भंगिमा इस प्रकार थी कि कुप्रचार महाराज, आशुतोष इंद्रा को मूल घटना वह खुद का रहस्य बता चुका है । अब महाराज उसे सभी के सम्मुख रखना चाहते हैं । इसलिए उन्होंने गुप्तचार को सभा में आमंत्रित किया । गुप्तचर ने सभा में सभी को प्रणाम किया और शांत भाव से अपने स्थान पर खडा हो गया । महाराज आशुतोष इंद्रा ने सभा को संबोधित करते हुए कहा, सभा जनों सर्वप्रथम आप सभी का मैं धन्यवाद करता हूँ या अपने जिस निस्वार्थभाव से देश वराज परिवार की विपरीत समय में सहायता की है वो निश्चित ही अत्यंत प्रशंसनीय है । आप ये न समझे क्या आपने मेरे जीवन रक्षा के लिए जो संघर्ष किया वो योगदान मैं अथवा आपका राष्ट्र कभी भूलेगा? राष्ट्र के ऊपर तो कोई उपकार कर ही नहीं सकता । इसके लिए प्लंबर नहीं । राष्ट्र पर विजय देने वालों के लिए स्वर्ग के मार्ग खोले हुए हैं । जो व्यक्ति अपनी जाती अपना घर में, अपना परिवार, राष्ट्र से ऊपर रखता है वो व्यक्ति मनुष्य प्रजाति का नहीं हो सकता है । बताया से पशुवत व्यक्ति के साथ पशुओं के सवाल ही व्यवहार करना चाहिए । जब राष्ट्र संगठित है तो हम है, हमारा परिवार है, हमारे संस्कार हैं, हमारी चाहती है और हमारा धर्म है । यानी राष्ट्र ही नहीं होगा तो कुछ भी शेष नहीं होगा । इतना कहने के उपरांत महाराज एक्शन शांत हुई और उन्होंने देखा कि प्रमुख जी कुछ कहना चाहते हैं प्रभु मैं क्षमा चाहता हूँ, शाम किस लिए? प्रभु कारण मैं आपकी बात से असहमत हूँ । इतना सुनने के उपरांत सभी संदर रह गए कि आज तक महाराज से कभी असहमति प्रकट ना करने वाले प्रमुख सी ये क्या कह रहे हैं? क्या सहमती प्रकट करना चाहते हैं? प्रमुख से नहीं सभी का मुक्त देखा और विचार किया कि कोई कुछ कहे इससे पूर्व अपना विचार सकते ना ही उचित है । प्रभु आप पर कौन कार्य कर सकता है? आप पर उपकार कोई कर ही नहीं सकता । आपके जीवन पर संकट था तब हम सब मात्र खडे ही रहे । जिन्होंने मुख्य भूमिका निभाई वह स्वतः आप ही थी । अब तो मुझे विश्वास हो गया है कि घायल भी आप ही थे । औषधि लेने भी आप ही गए थे और साडी भी आपने ही अपने मुख में डाली और उसके उपरांत माँ भी आपकी थी सब आप ही है । बस देखने में भिन्नता है प्रमुख थी ये सब आप क्या कह रहे हैं आप तो कम से कम मैं सादा कहें प्रभु शमा करें । जो देख रहा हूँ वही तो कह रहा हूँ । कार्तिक केंद्र विश्वास लाए सात में लटक करेंगी । दोनों ही आपके अंशय है । गाॅव भृंगी लोग से गडों को लाये वो भी आपका ही अंशय हैं । माँ आपको काल विश्व के प्रभाव से मुक्ति दिलाई । माँ और आप एक ही है एक जीवन तो दूसरा शक्ति एक प्रकाश तो दूसरा प्रकाशपुंज एक ही है । दोनों अगवाह एक से ही है दोनों अब आप ही कहे प्रभु आप पर किसने उपकार? क्या आप स्वतः ही सब कर रहे हैं और इतना कहने के उपरांत प्रमुख सी शाम तो हो गए । बात तो सच ही थी । अब सभी विचार करने लगे कि जो कार्य बडे बडे नहीं कर सकें वह दोनों कुमारों ने कैसे कर दिया । ब्रह्मा जिससे जो करवाना चाहता है उसे वो सुबह सकते देता है अन्यथा सभी सामान ही होते हैं । इस प्रकार सभी की महाराज आशुतोष इंद्रा के प्रति अगाध शर्ट था और पड गई । इस पर बब्बू ने कुछ नहीं कहा । वह मुस्कुराते रहे । तब महाराज की दृष्टि गुप्तचर पर पडी तो वे एक आई चौंक गए और उन्होंने कहा आप सभी की चर्चा में मूल विषय तो पीछे ही रह गया । मूल विषय अब प्रभु ने अपने मुख से कुछ नहीं कहा बल्कि मात्र गुप्तचार की तरफ दृष्टि बात किया । वो गुप्तचर भी क्या होगा जिसे भाषा व शब्दों की आवश्यकता हूँ । गुप्तचार तो वो होता है जो आंखों से, शक्तों को, भावों को, संकेतों से और कार्य प्रयोजन को कार्यशैली से जान जाता है । इसी प्रकार गुप्तचार ने मात्र प्रभु की दृष्टि बात से जान लिया की अब उसे ही बोलना है । महाराज की जय हो, मेरी अपनी संपूर्ण क्षमता, वहाँ आत्मनिष्ठा का परिणाम अब आपके संभव प्रस्तुत है । मैं पूरा क्षमा चाहता हूँ कि मैं जो कहने जा रहा हूँ वो मुझे अपने संपूर्ण जीवनकाल का सबसे निकृष्ट । इसका कहने के उपरांत वह गुप्तचर रोने लगा । कोई समझ नहीं पा रहा था की गुप्तचर को क्या हो गया है । ये गुप्त संदेश देने जा रहा था । एक आए उसके बाद वो भावों में इतना बडा परिवर्तन क्या हुआ? क्या राष्ट्र संकट क्या महाराज को अथवा कोई कुछ भी समझ नहीं पा रहा था । डंडधार आगे बढे । उन्होंने उसको बैठने में सहायता की, उसके पीने हितू जल आया परन्तु उसने जल ग्रहण करने से बना कर दिया । कुछ एक पल के उपरांत वह पुनः खडा हुआ और इस बार पहले से अधिक आत्मनियंत्रण और आत्मबल उसमें प्रतीत हो रहा था । सर्वप्रथम उसने सभी से क्षमा मांगी और अपने मनोभावों को अपने कर्तव्यों के नीचे दबाकर उसने कहना प्रारम्भ किया हूँ मैं क्षमा चाहता हूँ । मैं अपने भावों पर नियंत्रण रख सकता हूँ । इसके लिए पहले इस राज्यसभा का मूल्य समय नष्ट किया । इसके लिए मैं अपने आप को अपराधी बंदा हूँ और अपने लिए दंड की प्रार्थना करता हूँ । ये सुनकर प्रभु आशुतोष इंद्रा के अतिरिक्त प्रत्येक व्यक्ति का बन वाभाव गुप्तचर के लिए प्रेम व सम्मान से सराबोर हो गया । तब सभी ने आग्रह किया कि वह मूल चर्चा प्रारंभ करें । इसके उपरांत गुप्तचर ने जो कहा उसे सुनकर सभी सन्न रह गए हूँ । गैस प्रकार हम उनकी सूचनाएं लाने में सफल रहे हैं, उसी प्रकार उन्हें भी हमारी कुछ सूचनाएं प्राप्त हैं । आभारी सूचनाएं इस प्रकार और संभव है । सही राप्ती थी । उन्हें पता चल चुका है कि महाराष्ट्र स्वस्थ हो चुके हैं । अप्रैल में एक हजार आठ गण भी आए । ऍम गुप्तचार ये सूचनाएं तो जनमानस में भी हैं और जो सूचनाएं जनमानस में हूँ उनको गुप्ता नहीं कहा जा सकता है क्या महल व विशेष सूचना उन तक नहीं? महाराज उन तक अंदर की गुप्त सूचनाएं नहीं पहुंच रही हैं । गुप्तचार तुम जो मुख्य सूचना लाए थे उसका क्या हुआ? प्रभु वो कब तक सूचना यहाँ कहता हूँ? प्रभु ने एक बार दृष्टि कुमारी और राजा ने क्या देखा और क्षण भर के उपरांत कहा की सभा में कह तो कब? उ वे अपनी संख्या बढाने का प्रयास कर रहे हैं । ऍम सिद्ध होता है कि वे पर्याप्त संख्या में हताहत हो चुके हैं जी । उन्होंने स्वता ही कहा था कि वे तीन स्थानों पर युद्ध में अपने सैनिकों को खो चुके हैं । अब ये जो करने जा रहे हैं वो मैंने तो कभी नहीं सुना है । सम्भवता आपने सुना या देखा हो इसमें भी मुझे संशय । आपने ऐसा क्या सुना कब अच्छी इसके लिए वे प्राकृतिक कार्य करने जा रहे हैं और प्राकृतिक कार्य कुछ समझ नहीं आया । करपिया को समय के लिए आप सभी शांत रहे और जब तक गुप्तचार के बाद समाप्त हो जाए तब तक कोई प्रश्न पूछा जाएगा । अब आप अपनी बात कहें वे किसी राज्य से पच्चीस हजार महिलाओं का अपहरण करना चाहते हैं । महाराज एकता सुनने के पश्चात किसी को अपने कारणों पर विश्वास नहीं हुआ परन्तु आंसू तो सुरेंद्र नहीं कुछ भी पूछने या कहने को मना किया था । इसी कारण सभी के वक्त बंद थे । मुखाकृति से अस्पष्ट था की सभी प्रश्न पूछना चाह रहे हैं । प्रश्न अभी लगभग सभी का सामान ही रहा होगा । गुप्तचार दे सभी के बुक के भाव को देखा और पुनर् अपना कथन प्रारम्भ किया । पच्चीस नहीं पच्चीस हजार महिलाएं आप सभी ने सही सुना है । अब आप विचार कर रहे होंगे कि पच्चीस हजार महिलाएं किस लिए महिलाओं का प्रयोग में माल बच्चों को और पन्न करने में करेंगे । इतना सुनने के उपरांत डंडधार से रहा ना गया और वह बोल पडा हो परंतु कब अच्छा अभी भी महिलाओं का हरण करेंगे । इसके लिए उन्हें पूरे राज्य को जीतना होगा । इसके लिए ऐसा राज्य भी चाहिए जहाँ इतनी संख्या हो । फिर कुछ समय उस राज्य को जीतने के लिए चाहिए । फिर मेरे अनुसार ये कम से कम एक वर्ष का कार्य । तब तक तो हम उन्हें जीत लेंगे और समाप्त कर देंगे । साथ ही यह भी तो विचार करके कि मालिक शिवचंद्र लेते ही युद्ध करने नहीं लगेंगे । इस तर्कपूर्ण बात पर लगभग सभी ने स्वीकृति प्रदर्शित की । कुछ लोगों को बाल एक्शन का ये कदम मूर्खतापूर्ण प्रतीत हुआ और कुछ लोगों को लगा थी । गुप्तचर ही मुल्क है जीवन में प्रायर ये होता है कि जब आप किसी चर्चा को समझ नहीं पाते हैं अथवा वो चर्चा वो ज्ञान वह विज्ञान आपकी क्षमता से परे होता है तो आप सामने वाले व्यक्ति को मुर्ख सिर्फ करके अपने को पुत्ती बाल प्रदर्शित करते हैं । इसको ऐसे भी समझ सकते हैं कि वर्क शिष्य अपनी सफलता का ठीकरा अपने गुरु पर फूटता है । इसी प्रकार गुप्तचर को भी लगा परन्तु वो अपने पद और अपनी मर्यादा के अनुसार शांत रहा और पूरी चर्चा सुनने के उपरांत बहुत ही शांत भाव से उसने उत्तर दिया आप सभी अत्यंत बुद्धिमान वाॅटर जान है परन्तु मैं जो कह रहा हूँ वो चिंतन का विषय है । पता पहले उसे सुनी फिर कुछ नहीं । मालिक शो के पास कुछ समय पूर्व ही एक वैज्ञानिक उनके लोग से आया है । उसने एक अनुसंधान क्या है? इस अनुसंधान के अनुसार वो विकास वो उसके उपरांत शरीर के विकास की दर को चालीस गुना बढा सकता है । गुप्तचर चालीस को ना इसका क्या अभिप्राय महाराज स्टार था । ये है भूमकाल जो सामान्यता चालीस सप्ताह का होता है उसका ताल मात्र एक सप्ताह हो जाएगा । आप ये भी समझ सकते हैं कि गर्भकाल मात्र एक सप्ताह का हो जाएगा । ऐसा पहले स्वता अपने कानून से सुना है । शरीर का विकास उस वैज्ञानिक का दावा है कि जब शिशु पैदा होगा तो एक वर्ष में ही उसकी उम्र चालीस वर्ष के सामान हो जाएगी । अच्छा अच्छा माँ में वो बीस वर्ष का हो जाएगा । इसका अर्थ तो ये हुआ कि वे मालिक सिख रही । सब आप कभी हो जाएंगे । प्रभु सकते हैं । यदि उनकी आयु दो सौ वर्ष है तो इस प्रकार पैदा हुए मालिक पांच वर्ष में ही अपनी व्यवस्थापूर्ण कर सब हो जाएंगे । इसका अभिप्राय यह हुआ कि वे मालिक नहीं वे मालिक के रूप में उनके अस्त्रशस्त्र हैं । क्या कोई और सूचना नहीं? प्रमुख सी मेरे गुप्तचर सहयोगी अभी उन्हीं के साथ है । इसके अतिरिक्त जो भी सूचना प्राप्त होगी आपको अविलम्ब सूचना दी जाएगी । मेरे लिए क्या किया है? प्रभु से आज्ञा पाकर गुप्तचर अपने कार्य में लग गया और शेष युद्ध वयुद्ध नीति की तैयारी प्रभु ने अपनी ग्रीवा पर हाथ फेरा और कष्ट के कुछ जान है उनके मुख पर क्षणिक प्रदर्शित होने के उपरांत प्रसन्नता के आवरण में छुप गए । तब प्रभु ने कहना प्रारम्भ क्या प्रमुख जी आपका विचार क्या है? क्या ये विज्ञान द्वारा संभव है? प्रभु था तो सर्व के हैं । अध्यात्मवाद इश्वर के अतिरिक्त विज्ञान से सब संभव है । साथ ही यह भी ध्यान रखने का विषय है कि आविष्कार है महत्वपूर्ण महत्वपूर्ण नहीं है । ये सृष्टि के नियमों का उल्लंघन है । साथ ही जहाँ तक मैं देख सकता हूँ, मानवीय दृष्टिकोण से भी अत्यंत निंदा है । इसका एक प्रभाव मुझे अभी से दिख रहा है । वो क्या प्रभु वो वैज्ञानिक पच्चीस हजार महिलाओं से पच्चास हजार मालिक शिशु चाहता है था? एक महिला एक साथ दो शिशुओं को जन्मते । इसका अर्थ यह हुआ महिला की क्षमता दो बच्चों से अधिक जन्म देने की नहीं है, अन्यथा वे इसका अर्थ यह वहाँ की एक महिला, दो शिशुओं को जन्म देने के उपरांत सवा तो हो जाएगी । महिला समाप्त हो जाएगी । प्रभु मैं कुछ समझा नहीं । मेरे अनुसार यदि वे इस प्रकार का कार्य करने से नहीं चल रहे हैं तो मेरा अनुमान सत्य होगा । मेरे अनुसार में पच्चास हजार मालिक को मरने है तो ही पैदा कर रहे हैं । या तो वे युद्ध में मारे गए अथवा पांच ही वर्ष में अपनी न्यूपोर्ट करने के पश्चात मर जाएंगे । यदि वे अपने वाले का प्रयोग, यह समय, शस्त्र अस्त्र कई तरह कर रहे हैं तो रिश्ते थी । वो महिलाओं की अधिक क्षमता का प्रयोग करेंगे हूँ । मेरा भी गणित यही कहता है । यदि किसी महिला के शरीर से दो स्वस्थ शिशु एक सप्ताह में ही पूर्ण विकसित होंगे तो उसका बचना असंभव है । मेरे विचार से सब बहुत ही गन्ना के साथ किया गया है । इतना सुनने वह समझने के पश्चात प्रभु नहीं, कुछ क्षण के लिए अपनी आंखों को बंद किया और फिर एक गहरी श्वास छोडते हुए बोले, संस्कार था, ये हुआ कि हमें उन महिलाओं का भी जीवन सुरक्षित करना होगा । सर्वोत्तम तो यही होगा तो उनका विज्ञान ही गलत हो जाए । अब हमें उनके विज्ञान को पराजित करता है । जीवन रक्षा भी करनी है । प्रकृति का संतुलन भी बचाना है क्योंकि इस प्रकार चन्द्र लेने वाले बाल एक जब स्वता पिता बनेंगे तो क्या होगा ये कोई नहीं जानता । अब मैं करता हूँ जब थका शम खरान ।

भाग - 15

मालिक शो का युद्ध के लिए तत्पर होना मालिक के सम्मुख सबसे बडा प्रश्न था की भी एक ऐसा राज्य खोजे जहाँ की जनसंख्या पर्याप्त हो ताकि उसको अपनी आवश्यकता के अनुसार महिलाएं प्राप्त हो जाये । अभी समस्या समाप्त नहीं हुई है बल्कि यहाँ से प्रारंभ हो रही है । यदि राज्य मिल भी जाए तो उसके पुरूषों को कैसे दूर किया जाए । बाल एक उनको अपने भोजन के रूप में उसका प्रयोग करना चाहते थे । साथ ही साथ ये भी नहीं चाहते थे कि उन्हें युद्ध करना पडे । करन युद्ध करने से उन का समाचार को श्रृंगा पूरा तक जा सकता था । वो अपनी तरफ से कोई गलती नहीं करना चाहते थे । जब उन्हें महिलाएं मिल जाए तो शिशु प्राप्त हो जाएंगे । परंतु इसके लिए सुरक्षित स्थान चाहिए जहाँ शिशु बडे हो सकें । इस प्रकार समस्याओं का अंबार था । जैसे योजना बनाना तो बहुत ही आसान कार्य है परन्तु उस पर क्रियान्वयन अत्यंत मतलब । इसी प्रकार मालिक विचारमंथन में लगे थे कि क्या और कैसे अब अनुकूलता प्राप्त हो । पर्याप्त खोज में विचार के उपरांत कलेक्शन शुरू नहीं एक योजना बनाई और उसकी योजना से सभी मालिक अप्रसन्न दिख रहे थे । सभी को प्रसन्न देखकर उसने कहा, आप सभी हमारी योजना वयुद्ध नीति से सहमत हैं ही महाराज । इतना सुनने के पश्चात मालिक शुरू नहीं कुम्भ हापुर नामक नगर जो मैच ही नदी के तट पर बसा था, उस और कोच करने का निर्देश दिया । मैच ही नदी के एक ओर और कुंभ हापुर और दूसरी तरफ पर्वत श्रृंखलाएं थी । वहां पहुंचकर मालिक सुनाई । सर्वप्रथम पर्वत श्रृंखलाओं को काटकर गुफाओं में परिवर्तित किया और कुछ ही दिनों में रहने योग्य स्थान में परिवर्तित कर दिया । कार्य इतनी सावधानी से किया गया कि कुंभ हापुर को कुछ भी खबर ना थी । इसके उपरांत मालिक शो नहीं अपने बच्चों से कहा आप सावधानीपूर्वक अपना देश बताइए जिससे कोई आपको पहचान ना सके । उसी समय में हमारे गुप्तचार पंपापुर से लौट रहे होंगे । इतनी चर्चा होगी रही थी कि गुप्तचर के आने की सूचना प्राप्त हुई । गुप्तचरों ने वहाँ के वेशभूषा का वर्णन किया और सात लाख हुए वस्तुओं को पहन कर दिखाया भी । इस प्रकार कुछ ही समय में सौ से अधिक मालिक कुम्भ हापुर जाने के लिए तत्पर थे । मालिक को समझाकर मालिक सोन आपने अगले जाल्को बिछाने में तक पर हो गया । मालिक सोने ही मैच ही नदी पार कर नगर में प्रवेश । क्या वे सभी अलग अलग पूरे नगर में विभाजित हो गए । कुछ ही समय में उन्होंने कार्य प्रारम्भ किया । एक मालिक स्वर्णकार के पास पहुंचा और उसने अपना आभूषण वह स्वर्णमुद्राएं दिखाई तो स्वर्ण का बोला आप इस नगर के तो नहीं प्रतीत हो रहे हैं? मालिक ने भय का प्रदर्शन किया और बोला नहीं नहीं मैं दूसरे नगर का हूँ, किस नगर के हैं । आप आभूषण वाप उतरा का मूल्य लगाएगी । आपको मेरा परिचय जानने की क्या आवश्यकता है? इतना सुनते ही स्वर्णकार के मन में लालच आ गया और वह मालिक को राजदंड से भयभीत करने लगा । इस प्रकार मालिक अपने कार्य में सफल हो गया और उसने स्वर्णकार से कहा शाम करें ये आभूषण मेरे ही है । परंतु मैंने इन्हें जहाँ से प्राप्त किया है वहाँ पर बहुत से आभूषण मुद्राएं आप भी प्राप्त कर सकते हैं । मैं प्राप्त कर सकता हूँ था बहुत उसके कृष विक्रता करूँ । कहीं और कोई न प्राप्त कर ले आप पहले मुझे इसका मूल्य नहीं तब मैं आपको वहाँ लेकर चल सकता हूँ । पहले स्वर्णकार अपने राज्य के मुद्रा नहीं देना चाहता था परंतु जब मालिक ने कहा कि यदि वह पकडा गया तो स्वर्णकार को इतने से ही संतोष करना होगा । स्वर्णकार ने आभूषण उसकी स्वर्णमुद्राएं रखी और उसके मूल्य के सामान अपने राज्य की मुद्रा दे दी । अब दोनों में दिखावे की मित्रता हो गई । तब मालिक शून्य अपना मूल कार्य प्रारम्भ किया और कहा आपने ही मैच ही नदी देखी है । हाँ, इस राज्य का प्रत्येक व्यक्ति उसको जानता है । इस नदी से क्या संबंध है? उस नदी के पार पर्वत श्रृंखलाओं पर एक ऐसा स्थान है जहाँ पर प्रत्येक पूर्णिमा वह उसके एक दिन पूर्व रात्रि के दूसरे प्रहर के प्रारंभ में आभूषण वहुत ट्रायल न जाने कहाँ से आ जाती हैं सारे । तब तो अभी कई दिन से हाँ जाती । पर्वत पर कहीं से आ जाती है तो अभी भी वही होंगी । आप पहले हमारी पूरी चर्चा सुने, दम बोले । साथ ही आप अपनी आवाज को धीरे रखे क्योंकि दीवारों के भी कान होते हैं । आपको इतने तीव्र स्वर में बोल रहे हैं । इतना सुनकर स्वर्णकार न केवल शांत हो गया बल्कि सावधानीपूर्वक इधर उधर देखने लगा । अब उसके मन में लालच का बीच पड चुका था । लालच लोग का मित्र है । लोग वो काम प्रोत् । ये चारों मनुष्य की पुत्री पर पर्दा डाल देते हैं । उसका विवेक उस पर्दे से ढक चाहता है कि वो चाहकर भी नहीं देख पाता । इस प्रकार स्वर्णकार सावधानीपूर्वक ना केवल इधर उधर देख रहा था बल्कि उसे ये भरा था कि किसी ने उसकी चर्चा न सुन ली हूँ तो उसने मालिक को अपने घर में रुकने के लिए कहा । कुछ ही समय में वह मालिक को लेकर अपने घर के लिए चल पडा । उसको मार्ग में लगने वाला समय अत्यंत भारी लग रहा था । मालिक उसके घर पर नहीं जाना चाहता था क्योंकि उसे बहुत से व्यक्तियों को मुर्ख बनाकर अपने जाल में फंसाना था । पता मालिक सुने मार्ग में ही एक वृक्ष के नीचे रुककर होना चर्चा प्रारंभ कर दी । आप कह रहे थे कि यदि अभी वहाँ चले तो आप ठीक है । यहाँ शांति है । हाँ, तो अभी वहाँ चलने में क्या हानि हो सकती है? मैं स्वतः कई बार वहाँ गया परंतु वहाँ पर स्वर्णभूषण मुद्राएं केवल माह में दो ही दिन मिलते हैं । शेष तीनों में न जाने कहाँ हो जाते हैं । साथ ही एक विशेष बात भी मैंने देखी है । वो क्या वहाँ पर महिलाओं का प्रवेश न हो अन्यथा आपको कुछ भी प्राप्त नहीं होगा । इसका कारण मुझे पता नहीं । ऐसा क्यों होता है? स्वर्णकार तो अपनी पत्नी को वैसे ही नहीं ले जाना चाहता था क्योंकि यदि वह स्वर्ण लेकर जायेगा तो उसका महत्व घर में बहुत बढ जाएगा । अभी उसकी पत्नी उसे कम बुद्धि का व्यक्ति कहती है । अधिकतर पत्नियां अपने अपने पति को काम भी आती हैं । कारण अत्यंत पास कहने के कारण व्यक्ति वस्तु का स्थान घट जाता है । तब उसके मन में लोग लालच । वह परिवार को ये दिखाना कि वो कितना बुद्धिमान है । दोनों एक साथ चल रहे थे । आता मालिक का कार्य पूर्ण हो गया था । मालिक शून्य उससे विदा ली और आपने अगले आखिर पर लग गया । अभी पूर्णिमा को पंद्रह दिन से अधिक शीर्ष थे सभी मालिक शो ने किसी प्रकार अलग अलग स्थानों पर अपनी जो रणनीति अपनाई उसके अनुसार बहुत तीव्र गति से कुंभ हापुर नगर में ये चर्चा फैल गई की मैच ही नदी के पार पर्वत श्रृंखलाओं पर स्वर्ण भंडार है जो पूरनमासी उसके एक दिन पूर्व ही मिल सकता है । कोई भी किसी को बताना नहीं चाहता था परंतु प्रत्येक व्यक्ति धीरे धीरे करके जान चुका था । हर व्यक्ति अपने अपने घर में उस दिन बाहर जाने का बहाना कर रहा था । किसी भी महिला को कुछ भी पता नहीं था । जैसे ही वो दिन आया उस राज्य के सभी व्यक्ति यहाँ तक कि सैनिक मंत्री आदि सभी मैच ही नदी की ओर चल पडे । कितने आश्चर्य का विषय की सभी जा रहे हैं और कोई किसी से कुछ बता नहीं रहा है । इसी को माया कहते हैं सब उसी में लिप्त हो पतन की ओर चाहते हैं और सब अपने आप में यह प्रदर्शित करते हैं कि उनका पतन नहीं होगा । इसी प्रकार जीव माया में लिप्त हो पतन की ओर चल पडता है और दूसरे के पतन को देखकर भी वो नहीं चेतता करन जीतना पर दो माया ने पर्दा डाल दिया है । इस माया से यदि मुक्ति चाहते हैं तो एक उपाय हैं वो है निष्काम नहीं स्वार्थ शिवभक्ति नदी पार करते ही सभी समझ चुके थे कि सभी स्वर्ण आभूषणों व स्वर्ण मुद्राओं के तुम यहाँ आए हैं । सभी एक दूसरे से पहले पहुंचना चाहते थे । इसी कारण धीरे धीरे उनकी गति बढती जा रही थी । पैरों में गति, मन में उत्सुकता वह लोग परम सीमा तक पहुंच चुका था । परम सीमा के उपरांत जैसे चीज को मुक्ति मिलती है अथवा नहीं ये उसके कर्मों पर निर्भर करता है । इसी प्रकार यहाँ तो माया मुंह लोग चलित करती थी तो इसका अंत मुक्ति कैसे हो सकता है । अंततः संपूर्ण राज्य के पुरुष मालिक शो के जाल में फंस गए । मालिक सपने प्रथम कार्य में सफल हुई मालिक है । उत्पन्न करने हेतु बहुत से व्यक्तियों को अपना आहार बना लिया । सामान्य व्यक्तियों ने जब उसका बे बहुत स्वरूप देखा तो वे भयाक्रांत हो गए । उस भय के प्रभाव से कुंभ हापुर निवासी कहती होने के साथ मृतप्रायः थे । उसी रात मालिक होने संपूर्ण कुम बाबू पर बिना रक्तपात की अपना अधिकार कर लिया । पूरे राज्य के सभी महिलाएं अब इलेक्शन के लिए प्रयोगशाला का उपकरण बन चुकी थी । अगले ही दिन से मालिक उन्होंने अपना प्रयोग महिलाओं पर प्रारंभ कर दिया । व्यक्ति को समय से पूर्व क्षमता से अधिक सफलता भी हानि पहुंचा सकती है । अधिक सफलता आपको अतिउत्साहित कर देती है, जिससे आपकी सतर्कता में कमी आ जाती है । यहाँ पर भी यही हुआ । मालिक शाम अपनी सफलता बहुत उत्साह में फूल गए कि वे भी किसी के शक्ति है और सत्यता उन्होंने ही प्रारंभ की है । जीवन में सत्यता अंतिम चुनाव है क्योंकि ये वो स्थान है जहां से लौटना प्राया संभव नहीं होता । यदि आप लौट से भी है तो लौटने का मार्ग अत्यंत कठिन होता है । साथ ही उस मार्ग पर लौटा आपको सामान्यता दुख और अपराधबोध देता है और बार बार आपको यह प्रदर्शित करता है कि आपको शत्रुता नहीं करनी चाहिए थी । अब शांति ही उत्तम है बल्कि सर्वोत्तम है । अब जब मालिक ने तीन तीन बार आक्रमण किया तो स्वाभाविक ही है कीगो सिंगपुरा को मालिक शो की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए । जब शांति के सारे मार्ग बंद रहे हैं तो मात्र एक ही मार्गशीर्ष है वो है युद्ध और युद्ध में विजय गोरसिंग पूरा महाराज आशुतोष केन्द्र के नेतृत्व में अब जो था ना चाहते हुए भी योद्धा चाहता था । यह युद्ध उसकी अपनी सीमाओं के वृद्धि अथवा प्रभुता की वृद्धि है तो नहीं था बल्कि पृथ्वी वजन कल्याण के हेतु था । कारण स्पष्ट था के मालिक पृथ्वी के लिए नहीं पढे थे और उनको पृथ्वी पर शासन भी नहीं करना था । उनको पृथ्वी सही उच्च लोगों तक पहुंचने का ध्यान चाहिए था और अब कालवश चाहिए । इसके उपरांत हो सकता है कि वे पृथ्वी को तहस नहस करते हैं तथा उन्हें समाप्त करना ही एक शेष उपाय था । गुप्तचरों द्वारा जब पूर्ण वह सटीक जानकारी गो श्रृंगा पूरा को हो चुकी थी तब उन्होंने भी उसके अनुरूप अपनी तैयारी प्रारंभ की । दो ही दिनों में प्रमुख जी ने अपनी प्रयोगशाला में कई प्रयोग किए और उन अनुसंधानों से संतुष्ट भी दिखाई दे रहे थे । इधर दंडधारी, नंदेश्वर, वो जंगेश्वर आदि प्रमुख सेनापति अपने शस्त्रों को व्यवस्थित कर रहे थे । तीसरे ही दिन ये निर्णय लिया गया कि अब संपूर्ण तैयारी हो चुकने के उपरांत मैं अच्छी नदी पर उनको खेल लिया जाए । मुख्य व्यक्तियों ने पारस्परिक संयोजन से युद्धनीति का निर्णय लिया और युद्ध को आखिरी प्रारूप प्रदान किया । सर्वप्रथम गडों के साथ कार्तिक केंद्र को कुंभ हापुर भेजा गया । ये करण अपना वेश बदलने में पूर्ण तैयार सक्षम थी । पंपापुर के एक एक घर पे वो पहुंचने लगे । वहाँ पहले से उपस् थित मालिक सावधान नहीं थी । इस तरह बडों ने दो दिनों में ही अपना कार्य सुना कर लिया और बहुत ही सावधानी से वापस लौट है । गन ओवर कुमार कार्तिक केन्द्र के आने के उपरांत पूरा सैन्यबल मैच ही नदी के दोनों किनारों पर व्यवस्थित होने के लिए तत्पर था । विशेष रत जो गति पकडते ही भूमि से ऊपर उठ जाते थे, उनको भी तत्पर किया गया । एक रख पर पोलक व्यवस्थित कर दिया गया और उसे नदी के तट पर पहुंचा दिया गया । संपूर्ण युद्ध संचालन प्रभु आशुतोष केंद्र स्वयं ही कर रहे थे । रात्रि का दूसरा पहना था । सभी प्रमुख व्यक्ति आशुतोष केन्द्र के शिविर में उपस्थित थे । तब आशुतोष केंद्र महाराज ने कहना प्रारम्भ किया, आज रात्रि को ही स्कूल आपको ही मैच ही नदी में स्थिर करना होगा । हमें अपनी सेना को दो भागों में विभक्त करना होगा । आधी सेना नदी के एक तरफ और शेष दूसरी तरह प्रमुख सुनेगा प्रभु संपूर्ण युद्ध तो गोलक प्राप्ति के लिए ही हो रहा है । हमने सत्र के सामने ही को लाख रख दिया सम्मत कहाँ तो वो तो चल में छिपा है । कब हूँ आप तो जानते ही है यहाँ उनके लिए कोला खोजना कितना आसान होगा । प्रमुख सी उन्होंने कुंभ हापुर निवासियों को लालच फसा लिया तो क्या हमें गोला कल आलस नहीं देना चाहिए? ये भी न भूली के जीवन में कुछ तो खतरा लेना ही चाहिए । एहतियात सदर सुरक्षा कोई प्राथमिकता देंगे तो उन्नति व विजय होने की संभावना सुनने ही रहेगी । यह युद्ध नहीं करेंगे तो विजय कहाँ से प्राप्त होगी तब हो तब तो कोई अलग उनके सम्मुखी रखा जाए । नहीं ऐसा करने से उनको संदेह हो सकता है । कितनी महत्वपूर्ण वस्तु सामने? क्या ये कोई सडयंत्र तो नहीं और ध्यान दें कि हमें कोलक कोई जब हमें प्रयोग करना है रात्रि के समय कोलक को नदी में व्यवस्थित कर दिया गया । सेना को भी दो भागों में विभाजित कर दिया गया । सेना को इस प्रकार छुपाया गया कि मालिक शो को इसकी जानकारी न हो पाए । अब मालिक सौ से दूरी दो को से अधिक न थी । गडों के आ जाने से गोश सिंह का पूरा की क्षमता बहुत बढ गई थी । कुछ करो को वेश बदलकर कुंभ हापुर में मालिक शो के बदले रहने का निर्देश दिया । बाल बाल का समाचार प्राप्त हो रहा था । मालिक युद्ध के लिए तैयार नहीं थे । कारण स्पष्ट था कि उन्हें अपनी सैन्य संख्या बढानी थी । प्रभु युद्ध की प्रतीक्षा क्यों कर रहे थे, ये कोई नहीं समझ पा रहा था । रात्रि को शिविर में चर्चा चल रही थी । यद्ध अब अत्यंत ही निकट है परन्तु कुछ प्रतीक्षा करनी होगी । प्रभु युद्ध के प्रतीक्षा से हमें खतरा हो सकता है । यदि मालिक को हमारी सूचना प्राप्त हो गई तो वे हम पर आक्रमण कर सकते हैं । इससे हमें क्या हानि? हम तो पहले से ही तक पर हैं । आप सभी विचार कर रहे हैं कि हम युद्ध की आज्ञा क्यों नहीं दे रहें । आप सभी कुछ प्रतीक्षा करें । आपको सब की आप हो जाएगा । माॅस् प्रतीक्षा में था कि कब उसे सूचना प्राप्त हो कि मालिक शिशुओं ने जन्म लेना प्रारंभ कर दिया है । प्रभु आशुतोष ेंद्र इस प्रतीक्षा में थे कि कब मालिक सोंग को क्रोध हाय और वो अपना काम निकाल ले और मेरा काम प्रारंभ हो जाए हूँ । हाँ,

भाग - 16

नीलकंठ द्वारा गर्म भत्तों के दर्शन, वहाँ अनुभव, प्रतीक्षा ना सुख है, न दुख है । वो सुख भी हो सकता है और दुख भी । साथ ही दोनों से पूर्णतया भिन्न । अभी यदि सुबह घटना की आपको प्रतीक्षा है तो आप सुख के साथ दुख का भी अनुभव करते हैं । करन सुख इसलिए क्योंकि सुखद घटना का संदेश उस की प्राप्ति आपको सुख देने वाली है । इसके विपरीत इसमें सत्य का विलंब आपको दुख देने वाला है । आप समय से पूर्व सुखद घटना चाहते हैं अर्थात सुख के साथ दुख चल रहा है । इसके विपरीत यदि आपको दुखद घटना का आभास है तो अभी विचारों में दुख है और घटित होने के बाद सत्यता, पेट दुख होगा । इस दुखद घटना की प्रतीक्षा समय का लम्बा होना सुख प्रदान करता है । इस प्रकार के दुःख में सुख है । इस तरह मालिक शिश्यूं सुख की प्रतीक्षा में दुखी है । सुख में दुख होना पल पल भारी हो जाता है । माॅनसून अपना धैर्य धारण किए हुए था । इसके अतिरिक्त वो कुछ कर भी नहीं सकता था । तब तक उसको सूचना प्राप्त हुई कि बाल एक शिवपोरा मिलने आ रहे हैं । उसको सुख का संदेश सुनने की तत्पर्ता व्यक्त किये जा रही थी । वो अपने कक्ष में बैठा था । तब मालिक शिप होना नहीं, कक्ष में प्रवेश किया । महाराज की जय हो कार्य संपन्न हो गया है । आज से सातवें दिन आपको परिणाम मिलने प्रारंभ हो जाएंगे । आपके सैनिक शिशु आज से सातवें दिन जन्म लेना प्रारंभ करेंगे । महाराज और तो दिनों तक लगातार शिशुओं का जन्म होता रहेगा । अतिउत्तम हाँ आप अपने कार्य से छोडता संतुष्ट हैं । महाराज क्या आज तक मैंने आपके बताया सभी अनुसंधान सत्य सिद्ध नहीं किए । नहीं नहीं ये बात नहीं है । ये प्रजनन विकास प्रकृति के नियमों का उल्लंघन प्रतीत होता है । इसके साथ ही मैंने कभी ऐसा नहीं सुना है । इसलिए जब से आप ने इस विषय पर चर्चा की है मुझे पता नहीं क्यूँ कुछ शंग होता जा रहा है । मुझे आपकी योग्यता पर संदेह नहीं है परन्तु इतना कहकर बाल एक्शन सोन शाम तो हो गया । मालिक शिप भी शांत था । बिना परिणाम आए वो भी क्या प्रदर्शित कर सकता था । अच्छा उसने भी वहाँ से वापस जाना उचित समझा । इधर वह मालिक शुरू उनके पास से वापस हुआ ही था कि लगभग उसी समय आशुतोष इंद्रा महाराज के पास गुप्तचर पहुंचा और उसने पूर्ण विवरण प्रभु को दिया । विवरण सुनकर प्रभु मुस्कुराने लगे । प्रभु आशुतोष चंद्र नहीं कुछ एक को छोडकर सभी को वापस बुला लिया । अब प्रभु ने उपयोग रचना प्रारंभ की जिससे इस बार मालिक बजकर ना निकल सके । प्रभु ने सभी मुख्य सेनापतियों और बडों को बुलाया और सभा प्रारंभ हो गई । यह था आज से सातवें दिन प्रारंभ हो जाएगा । हमें पूरे कुंभ हापुर पर्वतश्रृंखला । वही मैं चीन आदि को ध्यान में रखकर ऍम बनानी है । ये क्षेत्र बहुत विस्तृत है । हम सभी को घेर नहीं सकते । याद रहे केबल एक हारने के समय भाग सकते हैं । हमें उन्हें भागने का अवसर नहीं देना है । क्या युद्ध सात दिन के पहले प्रारंभ नहीं हो सकता जो नहीं हो सकता है । हो सकता है यदि हम आक्रमण करे तो हमें प्रतीक्षा करनी चाहिए । यदि उन्होंने आक्रमण किया तब प्रमुख वे आक्रमण नहीं करेंगे क्योंकि वे अपनी सैन्य संख्या बढाने में तक पर हैं । हम क्यों नहीं आक्रमण कर रहे हैं, इसका कारण आपको कुछ समय पर शायद पता चल जाएगा । अब आप एक कार्यप्रारंभ भतीजी आदेश करे । प्रभु प्रमुख से पांच दिन के भीतर आपको पूरे युद्ध क्षेत्र का आकलन करने के पश्चात दस स्थानों को चेन्नई करना होगा जहाँ से आप व्यक्तियों को कहीं भी स्थानांतरित कर सके और काम पे हूँ । मैं अभी से कार्यप्रारंभ करता हूँ । एकता आदेश प्राप्त होते ही प्रमुख चीजें आंचलिक को याद किया अंजलि के साथ गोश सिंगा पूरा प्रस्थान करके क्योंकि वहीं पर संपूर्ण अनुसंधान की व्यवस्था थी । उन्होंने आंचलिक की सहायता से कार्य प्रारंभ करने की योजना प्रारंभ की । उन्होंने आंचलिक को उसका वेश पहना दिया । उस देश में प्रकाश परावर्तन करने वाले श्रेष्ठ यंत्रों का सिंह जो जान था । अंजलि को पूर्णता समझा दिया गया कि वह भूमि से अधिक दूरी पर रहे ताकि उसको कोई पहचान न सके । आंचलिक एक करोड पक्षी होने के साथ साथ अत्यंत योग के वहाँ प्रशिक्षित योग था । मालिक के साथ हुए युद्ध में उसने मालिक राजा मालिक हो उनकी एक आंख नोचकर खा डाली थी । दो ही दिनों में प्रमुख सीधे मानचित्रों पर मैं दस स्थान अंकित कर दिए तो साथ ही गढों की सहायता से वहाँ पर स्थानान्तरण की व्यवस्था कर दी गई । अब तीन दिन हो चुके थे को श्रृंगा पूरा की सेना ने पूरी व्यवस्था कर ली थी । मुख्यता आक्रमण की ही प्रतीक्षा थी । रात का प्रथम प्रहर था । प्रकाश की व्यवस्था इस प्रकार की गई थी कि प्रकाश बाहर के दिशा में न जाए । सभी को एक एक पल काटना भारी हो रहा था । सभी मुख्य पदाधिकारी महाराज माँ वह दोनों कुमार उपस्थित थे । तब लाट भृंगी नहीं प्रभु से एक प्रश्न किया कब उ मैं कुछ जानना चाहता हूँ । यदि आप पूछे जाने तो इस समय युक्त की चर्चा के अतिरिक्त और कोई विषय नहीं । अच्छा पूछो शाम हूँ । मैं भी समझ रहा हूँ की युद्ध क्षेत्र में युद्ध की ही चर्चा होनी चाहिए । परन्तु मन में एक प्रश्न है कि यदि युद्ध में मैं वीरगति को प्राप्त हो गया तो इस ज्ञान को प्राप्त करने के लिए न जाने कितने जन्म लेने पडेंगे । इतना सुनने के उपरांत प्रभु भाव विभोर हो गए । क्या ऐसा व्यक्तिग ज्ञान पाने का सर्वोत्तम अधिकारी नहीं जो अपने प्राणों से अधिक महत्व ज्ञान को दे रहा है? इस पर प्रभु के अंदर का प्रभुत्व चाक किया और उन्होंने कहा क्या है मृत्यु मृत्यु केवल शरीर का त्याग नहीं तो भारे विचार नहीं ही तुम्हें अमर कर दिया है । जिस व्यक्ति के अंदर ज्ञान पाने की अभिलाषा जीवन रक्षा से श्रेष्ठ है वो अमर है । साथ ही उसका मौके पर अधिकार सिद्धर है । सत्य का ज्ञान शरीर का गुणा नहीं है । सत्य का ज्ञान जीवात्मा का गुण है । जीवात्मा जब सत्य का अनुभव करने लगती है तो उसे आनन्द की अनुभूति होती है । आनंद जीवात्मा ज्ञान से सराबोर जीवात्मा उत्तरोत्तर जम्मू में अपने ज्ञान की बढोत्तरी करते हुए परमात्मा में समा जाती है । यही है मुख्य पूछो क्या पूछना चाहते हो मुझे? कुमार कार्तिक केंद्र नहीं सामान प्राण का संबंध मणिपुर चक्र से होता है । यहाँ तक बताया है । यहाँ तक बताया था की उसके उपरांत उसके उपरांत क्या संभव है? वे स्वतः ही स्पष्ट थे, ऐसा उन्होंने कहा था । इसका अभिप्राय यह हुआ क्या प्राणों का चक्रों से संबंध जानना चाहते हैं जी प्रभु सभी अत्यंत उत्सुकतावश प्रभु के वचनों को सुनने के लिए आतुर थे । पूर्वजन्मों के पूर्व कर रही संचित होंगे की कहने वाले प्रभु स्वयं हूँ । तब प्रभु ने कहना प्रारम्भ किया योग से ध्यान से संयमित जीवन से आप अपने दो चक्रों को जागृत कर सकते हैं, वो है मूलाधार । वह स्वाधिष्ठान । इसके जागृत होने से आप स्वस्थ, ऊर्जावान वहाँ एक आक्रो जीवन में अग्रसर हो सकते हैं । अभी अधिशेष चक्रों को भी जागृत करना है तो प्राणों को आध्यात्मिक बाल देना होगा । आध्यात्मिक बाल मात्र कर्मकांड नहीं है, बल्कि आध्यात्मिक बाल अपने मन, बुद्धि, वाइन, सियो के नियंत्रन के साथ अपने तीनों शरीर को प्राण से उर्जित करते हुए उर्ध्वगामी ले जाने से प्राप्त होता है । शाम आप हूँ । मैं आपका अभिप्राय नहीं समझता । प्रभु ने सभी की तरफ निहारा । उनको समझ आ गया कि कोई भी इसे समझ नहीं सकता है । तब उन्होंने पुनः कहना प्रारम्भ किया था तो होते ये शब्द तो वह समझ नहीं कहा विषय नहीं है । ये अनुभव करने का विषय है । अब प्रभु ने माँ की तरफ देखा तो मारने के आसन क्या ये भावार्थ तो कोई नहीं जान सका, परंतु को संकेत अवश्य था । इसके उपरांत प्रभु ने अपने को योगासन की मुद्रा में स्थापित किया । सभी को निहारा । सभी को इस प्रकार की अनुभूति हुई कि जैसे प्रभु की आंखों से प्रेम का प्रकाश उत्पन्न हो रहा है । देखते ही देखते सभी न जाने का हो गए । किसी को आपने होने या न होने का अनुभव ही ना था । अब सभी को समान अनुभव होना प्राप्त हुआ । सभा सभी देख रहे थे कि प्रभु वमा दोनों एक में ही समा गए । देखते ही देखते हुए शरीर रहित होकर ऊर्जा पुंजा के सामान हो गई । एक ऐसी मोर्चा जिसमें उस मना होकर शीतलता प्रवाहित हो रही है, सब और हसीन शीतल ऊर्जा का अनुभव कर रहे थे । एक ओमकार का कूंच चौथी धीरे धीरे आपने वृहत्ताकार रूप लेती जा रही थी । तब ओमकार का नाथ वार शीतल ओरछा एक सवाल प्रतीत होने लगी था । दोनों का स्रोत एक ही हो गया । धीरे धीरे सभी को यह अनुभव होना प्रारंभ हुआ । किना भी के केंद्र में प्रकाश की शीतलता प्रतीत हो रही है । वो प्रकाश किसी तल ऊर्जा उर्ध्वाधर दिशा में पडती हुई मणिपुर चक्र से अनाहत चक्र पर पहुंची । राहत चक वक्ष के ठीक नीचे के अ स्थान पर होता है जहाँ पर अस्थियां पेट से जोडती हैं । धीरे धीरे आ राहत चक्र के प्रकाश माल होने के उपरांत विशुद्धि चक्र जो की सेवा के मध्य में होता है, से मस्तक के केंद्र में प्रकाश पहुंचता है । अब संपूर्ण ऊर्जा केंद्र आप क्या चक्र पर स्थापित हो चुका था । इसके ऊपर अंतिम चक्र जो सहस्त्रार कहलाता है वहाँ ऊंचा वहाँ ओमकार का केंद्र होना लगभग असंभव होता है । अब जब प्रभु वर्मा अर्थात शिव पर शक्ति अथवा संपूर्ण ऊर्जावान चेतनता ही सात हो तो क्या संभव नहीं है । देखते ही देखते ऊर्जा का केंद्र संस्कार पर इस फिर हो गया । संस्कार पर ऊर्जा चक्र के चार आकृत होते ही सभी ने अनुभव किया तो स्वतः प्रभु शाम में समाज है । वो चीज एक बूंद थी जो अनंत महासागर में समाने के उपरांत अपने को समुद्र कह रही थी । बूंद का अकेले समुद्र बन जाना असंभव था परन्तु वहाँ वो उन महासागर में परिवर्तित हो गई । साथ ही अपने को महासागर ही मान रही है और उसमें वे कुछ आ गए हैं जो महासागर में होते हैं । इस तरह जीव चीज बना होकर ब्रह्मा बन परम ब्रह्म हमें समझ आ गया और जहाँ से उस की उत्पत्ति हुई थी वहीं पहुंच गया । इस प्रकार का अनुभव संभावना किसी को प्राप्त हो अथवा उसी को प्राप्त होगा जिसको परम चाहेंगे अथवा जो परम प्राम्भ की कृपा से चलेगा अथवा जिसने अपने लाखों करोड जन्मों का पुण्य संचित क्या होगा । कुछ भी हो यह अनुभव पढकर ज्ञान अर्जित कर अथवा सुनकर प्राप्त हो सकता था । अब प्रभु ने अपनी चेतता को अपने में समेट नाश प्रारम्भ किया तब धीरे धीरे सभी की चेतना वापस आई । इस प्रक्रिया वह प्राम्भ ज्ञान में कितना समय व्यतीत हो गया, किसी को कुछ पता ही नहीं चला था ।

भाग - 17

मालिक शोका । लाश तो सृष्टि के निर्माण का बीच आर ओपन लोग कहते हैं कि आज अमुक तिथि है अथवा आज रविवार है अथवा गुरुवार है । क्या ये तिथि और दिन सभी के लिए समान है? सामान्यता व्यक्ति कहेगा, हाँ सामान है । इसमें किस प्रकार का असमंजस हो सकता है? सभी के लिए एक विशेष दिन होती थी । सामान ही होगी । परन्तु यदि आप इसका सही विश्लेषण करें तो पाएंगे कि विशेष तिथि पर कोई प्रसन्ना था, कोई दुखी किसी ने पाया, किसी ने खोया, किसी ने जन्म लिया और किसी का जीवन काल समाप्त हो गया । इस प्रकार इस दुनिया में जितने भी चीज हैं अथवा जहाँ जहाँ जीवन है, एक विशेष तिथि होकर भी प्रत्येक काॅल भिन्न है । इस संसार में जितने व्यक्ति होंगे, उस विशेष तिथि भी उतने ही प्रकार के दिन होंगे । इस प्रकार आज को श्रृंगा, पूरा प्रसन्नता वहाँ आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर है । उसके दिन किस प्रकार व्यतीत हो रहे हैं, वहाँ कोई जान नहीं पा रहा है । इसके विपरीत उन्हीं सामान दिनों में मालिक शो को एक एक पल काटना युग के सवाल प्रतीत हो रहा है । कारण स्पष्ट था, तिथि सामान थी, परंतु कारण मिलना था प्रतीक्षा का एक एक पल एक एक युग के सवाल प्रतीत होता है । मालिक सशोरूम के मन में विचार उथल पुथल मचा रहे थे । एक आई उसके मन वापस थी । दोनों ने एक दूसरे को पुष्ट किया । मन तो पहले से ही विश्व था । साथ ही पति ने तर्क दिया की अब तक लगभग आधा करप् काल समाप्त हो गया होगा । इसका अर्थ हुआ कि गर्भावस्था दिखने लगी होगी । शारीरिक भिन्नता से भी स्पष्ट हो जाएगा कि मालिक शिशुओं का विकास सही हो रहा है अथवा नहीं । एहि सब विचारों का मंथन करता हुआ वो मालिक शब्दम से बोला अलेक् शब्दम मैं विचार कर रहा था की आधा करप् काल व्यतीत हो गया है तो महाराज मैं भी यही विचार कर रहा था । जब यहाँ अनुमति दे तो मैं वहाँ जाकर देखो और आपको शुभ समाचार हूँ । मालिक सोनकी आधी चर्चा के बाद मालिक शतम् ने वही कह दिया जो मालिक शिशुओं सुनना चाहता था । पहले व्यक्ति का यही एक तो उस होता है कि वो अपनी आलोचना नहीं सुनना चाहता । उसका कर पर प्रतिष्ठा उसको इस प्रकार अभिमंत्रित कर देते हैं कि वह सर्वश्रेष्ठ है और उससे कभी गलती हो ही नहीं सकती । इन्हीं दोनों के कारण सत्य बोलने वाले मित्र मंत्री उससे दूर होते जाते हैं । साथ ही लालची वन लोग से ग्रसित, बनावटी मित्र चाटुकारिता कर उसको पतन के मार्ग पर फीस देते हैं । मालिक शब्दम वह मुख्य माॅनसून की हाँ में हाँ मिलाते रहते थे । उन्हें अच्छे मित्र व श्रेष्ठ सेनापतित्व का गुण दर्शाते हुए गयी समझना चाहिए था आपके महाराज अब हमारी विजय संभव नहीं है । जिस प्रकार संसार में सबकुछ मिलना संभव है परंतु अच्छा मित्र मिलना असंभव है, उसी प्रकार यहाँ मालिक सोंग को अच्छे सुबह चिंतक, मित्र नहीं मिले । अब आप क्या पार कर मालिक शतम् कुंभ हापुर की ओर चला जबकि महाराज पर्वत श्रृंखलाओं की गुफाओं में ही रह गए । लोग तो कम वक् रूद ये चारों वृत्तियां पतन का मूल कारण है । इनमें से मात्र एक ही मनुष्य का पूर्ण पतन करने में सक्षम हैं । बडे से बडा मुनि साथ हो अथवा तपस्वी संपूर्ण जीवन के तब बाल को एक सुंदर स्ट्रीपर अथवा एक ग्रुप का परिणाम संपूर्ण जीवन पर भारी पड सकता है । यही तो विलक्षण होता है । ऍम चारों व्यक्तियों से घर चुका है । संपूर्ण प्राम्भ बांड के विजय होने का । मूंग दसो दिशाओं में अपनी जयजयकार सुनने का लोग योग महल में देखे हुए हिस्ट्री को पानी की लाल था । वहाँ आँसू तो सिंधु से क्रोध की पराकाष्ठा उसको बिच्छू कि भारतीय ढंग का मरती रहती थी । अब आज उसको सुखद समाचार मिलने की कामना उसके पीलिया को अवश्य ही कुछ काम करती थी । एनी सब विचारों के उठा पटक के बीच उसे किसी के पच्चास सुनाई पडे बच्चा आपकी आवाज भी व्यक्ति की विशिष्ट पहचान होती है । बच्चा सुनते ही माल अक्षय सोंग कुमार और उसने मालिक शब्दम के साथ बाल एक शिप को देखा । मुक्के भाव प्रतिकूल होता का परिचय करा रहे थे । सब कुछ अनुकूल होने के उपरांत प्रतिकूल का का स्थान कैसे संभव है? कुछ समझ में ना आने के कारण मालिक सोन ने पूछा क्या हुआ? आप तो सौ प्रतिशत निश्चित थे अथवा कोई अन्य आवश्यकता महाराज मैंने अपने लोग में हजारों प्रयोग किए और वे सभी सफल हुए थे । परंतु परन्तु क्या क्या तुम अपने प्रयोग में और सफल हो? इस बार मालिक सोन के स्वर्ग क्रोध था । कॅश सोन के क्रोध को भलीभांति जानता था । उसका वन भयाक्रांत हो गया परन्तु उसने अपने आप को पुनर्व्यवस्थित किया और पूरा महाराज आप चिंतित थे । ये मुझे ज्ञात हैं परन्तु मैं अभी भी आप स्वस्थ हूँ । नदियाँ पार स्वस्थ है तो समस्या कहाँ है? महाराज गर्भावस्था के कारण शारीरिक भिन्न का भी प्रदर्शित नहीं हो रही है । मोर इसका अर्थ स्पष्ट है के प्रयोग असफल हुआ । इतना सुनते ही मालिक शिफोन के मन में अपने जीवन को बचाने हेतु विचार पहुंच गए । संभव का वह कुछ समय और चाहता था । कारण वो अपने आप में पक्का कहाँ के उसका प्रयोग सफल होगा । तब उसने महाराज से कहा महाराज, मैंने यदि आपको साथ में दिन मालिक से शिशु न दिए तो इतना कहकर बलिक शिफोन शांत हो गया । दोस्तों का साथ कभी हितकर नहीं हो सकता चाहे वह संबंध में आपका कुछ भी क्यों ना हो । क्योंकि विपरीत समय आने पर वो अपना स्वभाव अर्थात दृष्टता प्रदर्शित करने में जरा भी समय नहीं लगता है । इस बात को भले क्षेपण समझ चुका था । आज तक उसने हजार होरा संधान कर महाराज की सेवा और आज चपेट अनुसंधान में वो असफल हुआ तो प्रशांत कलेक्शन सोनपुरा बोल पडा शक्कर वमेध कुछ है ही नहीं तो बाहर आ । जैसा भी तो हो सकता है कि शिशु का पूर्ण विकास गर्व के बाहर ही हो । ये पूरी बात निराधार थी परन्तु समय विपरीत होने पर मन कुछ भी मानने को विवश हो जाता है । इतना सुनने के उपरांत बाल एक्शन सोन नहीं मालिक छिपो को जाने के लिए का साथ ये भी कहा कि ये उसके लिए जीवन वक्त मृत्यु का प्रस्ताव है । मालिक शिवपुर यह जान चुका था कि अब जीवन का अंतर निकट है परन्तु अभी वो अपने प्रयास में लगा हुआ था । वो विचार करने लगा कि आखिर उससे क्या भूल हो गई । उसका अनुसंधान की उम्र सफल हो गया । कुंभ हापुर पहुंचते ही वो अपने मन मस्तिष्क को एकाग्र कर ये समझने का प्रयास कर रहा था कि उसने क्या एक का एक उसके मन में विचार आया कि यदि गलती होती तो एक साथ पच्चीस हजार प्रयोग सफल अर्थात कहीं ये शत्रु का कार्य तो रही फिर उसके बनने कहा यहाँ शत्रु कहाँ है? अब उसको एक ही आशा थी संभवता शिशुओं का जन्म हो और विकास की गति चंदमल लेने के उपरांत बढे परन्तु ये महाराज को किस खाती समझाऊँ तो तीन दिन की प्रतीक्षा के उपरांत वो जान गया कि अपना इलेक्शन शिशुओं का जनमत असंभव प्रतीत हो रहा है । उसमें महाराज से मिलने का निर्णय लिया । वो महाराज के पास पहुंचा और उसने महाराज से कहा महाराज संभाव्यता मेरा प्रयोग सफल नहीं रहा । मेरा प्रयोग असफल हो गया है । इतना सुनने के पश्चात कलेक्शन सोन अपने पर नियंत्रण नहीं रख सका । उसने अपनी कमर पर बंद हुई तलवार निकली और मालिक अपन पर प्रहार कर दिया । इसे विधि का विधान कहें या प्रभु आशुतोष इंद्र का सौभाग् के की ये घटना खुले आसमान के नीचे हुई । उसे घटनास्थल से कोर्स पर की दूरी पर आंचलिक बैठा हुआ था । अंजली ने देखा के भले क्षेपण भूमि पर गिरने के उपरांत पडते लगा और कुछ समय पश्चात शांत हो गया । कुछ क्षण और व्यतीत हुए होंगे ऍफ खडा हुआ माॅनसून अपने आप को नियंत्रित नहीं कर पा रहा था । उसे क्या था कि मालिक शो के खाओ अपने आप भर जाते हैं । इसके उपरांत भी उसे लगा केबल एक शिफोन समाप्त हो गया होगा जैसे उसने बाल एक रिपोर्ट के खाओ भरते हुए देखे । वो अपने थैली को नहीं रख सका । मनुष्य जब सफल होता है तो संपूर्ण सफलता का श्री स्वता लेता है और जब असफल होता है तो संपूर्ण सफलता का उत्तर ताई सहयोगी को कहता है । इसी प्रकार मालिक शोन क्रोध के कारण के भूल गया । केवल एक शेप अपन उसी का साथ ही है । जीवन भर उसने महाराज के लिए ही कार्य किया है । मालिक सुकून जैसे एक रूप से पागल हो गया । वो बहुत तीव्र स्वर्ग खिलाया और उसने उसका पाया कान काट दिया । कान के काटते ही नीले रंग का तरफ जैसा बहने लगा और इसके उपरांत चपरोत से भरे बाल एक्शन शोर नहीं बले क्षेपण पर प्रहार किया तो वह पुरा लाउड सका और समाप्त हो गया । उसके इस भयंकर को कृत्य को देखकर वहाँ बात उपस् थित मालिक शब्दम भी भयभीत हो गया । इतना देखकर वह शांत था । वो जानता था कि महाराज स्कूल में हैं और कुछ भी कहना मृत्यु को निमंत्रण देने के समान होगा । इधर मालिक शिफोन के प्राण निकले और उधर आंचलिक निकला । अपने स्वामी को सबसे महत्वपूर्ण समाचार देने के लिए हाँ

भाग - 17.1

पांजलि के पंखों से हवा के कटने की ध्वनि ने सभी को सावधान किया । आंचलिक प्रमुख जी के समीप पहुंचा और उसने अपनी सांकेतिक भाषा में प्रमुख सी को सब बता दिया । प्रमुख जी सब जानकर प्रसन्न थे और उन्होंने आंचलिक को एक पत्र दिया । अंजली गोश सिंगा । पूरा से कुछ ही समय में प्रभु के समय पहुंच गया । प्रभु ने पत्र पढा और प्रभु मुस्कुराए प्रभु का पत्र लेकर आंचलिक पुरा गोश्त इनका पूरा पहुंचा पत्र पढकर प्रमुख जी ने प्रभु के युद्ध कौशल वह पूर्वानुमान को प्रणाम किया । प्रभु ने रात्री को ही सभा आमंत्रित की और कहना प्रारम्भ किया कल प्रातों से युद्ध प्रारंभ हो जाएगा । मालिक शोल ने अपना सबसे श्रेष्ठ वैज्ञानिक खो दिया । उसने उसे स्वता ही मार डाला । प्रभु जब मालिक सोन ने स्वतः ही उसे मार डाला तो आपने क्यों कहा कि उसमें खो दिया? दंडा था बाल एक्सोन हमारे बनाए चाल में फंस गया बल्कि वो अपने ही बनाए जाल में फंस गया हूँ । मैं कुछ समझ नहीं सका । जब मुझे पता चला कि उसके पास एक वैज्ञानिक आया है तो निश्चित ही श्रेष्ठ होगा । उसके अनुसंधान ही उसको श्रेष्ठ बनाते हैं । मैंने विचार किया कि इसकी मूल शक्ति उसी वैज्ञानिक के कारण सभी ने हाथ में हम सभी जानते थे कि मालिक के खाओ स्वतः ही भर जा रहे हैं । उनमें बहुत से विशिष्ट क्षमताएं थी, जो सामान्यता प्राणियों में नहीं होती है । ये संपूर्ण अक्षमताएं वैज्ञानिक प्रयोगों के कारण की थी । तब प्रभु ने पूरा कहना प्रारंभ हो, मैंने जब सुना केबल एक महिलाओं के प्रति विशेष प्रयोग से एक सप्ताह वही मालिक सिर्फ उनको जनमत देंगे । तब मैंने विचार किया केस वैज्ञानिक को समाप्त करना प्रथम कार्य होना चाहिए । मेरे प्रमुख से कहा वे कुछ इस प्रकार का प्रयोग करेंगे कि उसके प्रयोग से गर्भधारण हो सके । प्रमुख मैंने एक ही दिन में इस प्रकार की औषधि तैयार यदि उसके पास तो कोई स्टोरी एक बार सुन ले तो वह गर्भधारण न कर सकेगी । अब भ्रष्ट था कि बहुत साडी कैसे प्रत्येक स्तर तक पहुंचे । इसके लिए मैंने करों को लगाया और उन्होंने वेश बदलकर कुछ ही समय में प्रत्येक स्त्री के कक्ष नहीं उस औषधि की पूर्व को पहुंचा दिया । तो औषधि धीरे धीरे पूर्ण से वास्तव में परिवर्तित हो गई और स्वसन द्वारा इस तरीके शरीर में पहुंच गई । इस प्रकार जब मालिक वैज्ञानिक अपने अनुसंधान द्वारा बाल एक्शन शिशुओं को जन्म देना चाहता हूँ तो वो सफल हो गया और मेरा अनुमान सत्य हो गया । प्रभु आपका कौन सा अनुमान सकते हो गया? भुजंगेशाय स्वाती किसी भी व्यक्ति को बहुत बडा स्वच्छता नहीं दिखाना चाहिए क्योंकि जब वो स्वतंत्र बोरडा नहीं होता है तो उसका आघात भी बहुत ही होता है । जब मुझे ज्ञात हुआ केबल एक शिप नहीं, शाम में पचास हजार बाल एक शो की सेना तैयार करने की योजना तैयार की है तो मेरे मस्तिष्क में ये विचार आया कि यदि यह योजना सफल हुई तो दो लाख होंगे । प्रथम वाले फोन अपने वैज्ञानिक से इतना क्रोधित हो जाएगा तो उसे निश्चित ही मार डाला । क्रोध से व्यक्ति का अलग होता है । मेरा उद्देश् कल एक शेप को समाप्त करना था जिससे भविष्य में इस प्रकार की संभावनाएं समाप्त हो जाएगा के साथ मैं दिन ही होगा क्योंकि तब तक तो सभी प्रतीक्षा करेंगे । इसी कारण मैंने कहा था कि सात वे दिन जब प्रारंभ होगा । पत्र द्वारा प्रभु की इसकी सूचना को श्रृंगा पूरा भेज दी गई जिससे प्रमुख जी को संपूर्ण जानकारी प्राप्त हो गई थी । रात्रि को ही प्रभु ने ध्यान क्यों गतिविधि से जल्दी हो अभी मंत्रित करेंगे । इस चल के प्रयोग से सभी सैनिक वरिष्ठ सेनापति मलिक शो द्वारा सुरक्षित हो गए मालिक शो का सामान्य व्यक्ति को भोजन बना लेना साधारण प्रक्रिया थी । अपने पिछले युद्ध की भावी युद्ध तो कर सकेंगे, साथ ही मालिक शोका ग्राॅस नहीं बनेंगे । सभी वीर योद्धा युद्ध के लिए तत्पर थे और मालिक सौ का मनोबल रसातल था । मैं प्रभु अंत में प्रभु आशुतोष इंद्रा नहीं, मूल रहस्य को खोला है, जिसे पत्र द्वारा प्रमुख अच्छी नहीं प्रभु को सूचित किया था, जिसे आंचलिक ने एक ही दिन पूर्व ही देखा था । प्रभु ने अंतिम संबोधन में कहा, आप सभी ध्यान से समझे बाल एक शो के गाओ अपने आप स्वता ही भर जाते हैं । ब्रह्मा की कृपा से आंचलिक ने वो रहस्य देख लिया है । सभी अत्यंत उत्सुकता के साथ प्रभु को देख वसूल रहे थे । कारण भी स्पष्ट था कि प्रभु बोल रहे हूँ और साथ ही मालिक श्यों का वो रहस्य जो अभी तक अनसुलझा था । आप सभी को मालिक सैनिकों के बाद खान पर आक्रमण करना होगा । आक्रमण के पश्चात एक रंगीन जब कान से बाहर निकले का डब्बे के बहते ही उसमें स्वता घाव भरने की प्रक्रिया समाप्त हो जाएंगे और वे मृत्यु को प्राप्त हो जाएंगे हूँ । अब आप युद्ध की आप क्या देंगे? आज मालिक का अंतर निश्चित है । प्रभु वहाँ की आज्ञा पाकर जैसे ही युद्ध का शंखनाद किया गया कुछ ही क्षणों में बाॅक्स चौकन्ने भी हो गए । मालिक सोने जैसे ही आंसू तो सेंध नीलकंठ का जाय को सुगुना वे समझ है कि आशुतोष इंद्रा ही नीलकंठ है और उन पर आप खबर हो गया है । मालिक सोलह युद्ध में सामना करने का निश्चय किया । कुछ समय में सारे वाले मैच श्री नदी के दोनों तरफ दिखाई पडने लगेंगे । तब उन्होंने देश दिया की अपनी रणनीति के अनुसार हमें मैच भी नदी के एक तरफ ही रहना है । तब उन्हें मुख्य सेना प्रमुखों को सेना के आगे वसेना के सबसे पीछे व्यवस्थित किया । प्रभु माँ एक रस्ते पर सबसे आगे और उनके साथ हैं । कुमार ऍफ इंगी वतन था । इसके अतिरिक्त शेष सभी मुख्य सेनापति सबसे पीछे रखे गए गोलप जल में छुपा हुआ है । आंचलिक अपनी अस्त्रों व्यवस्थाओं के साथ हवा में जब तक दोनों सेनाएं आमने सामने ऍम फोन भी रथ पर सवार था । उसके पास कुम्भ हापुर की संपूर्ण ऍम युद्ध के लिए भी वह पूर्ण रुपये तैयार था । आज उसने अपने मन में विषय क्या मृत्यु दोनों को अस्थान दे रखा था । समूह खाते ही प्रथम वक्ता कलेक्शन शो नहीं पढा हूँ । मैं स्वतः ही तुम्हारे स्वस्थ होने की प्रतीक्षा कर रहा था अन्यथा तुम्हारे राष्ट्र को समाप्त करने में । मुझे तो चार घडी बिना लगती हमने एक अच्छा सुअवसर खो दिया । अब इस प्रकार का सुअवसर बोला ना मिलेगा लाइक मैं तो मैं पराजित करना चाहता था । एन सैनिकों को मारकर मुझे क्या मान प्राप्त होता हूँ । अब हम स्वस्थ हो । अब युद्धक आनंद ही कुछ और होगा । मैं तो मैं जीवन दान दे सकता हूँ ऍम अस स्थानांतरण । विज्ञान का रहस्य और ये तेरी दे दो तो हाँ । इतना सुनने के पश्चात प्रभु आशुतोष, इंद्रा नीलकंठ ने अपनी दोनों आंखें ऍम और ऐसा प्रतीत हुआ कि उनकी आंखों का प्रकाश स्रोत के रूप में उनके मस्तिष्क पर भरा है । इतना कूद के उसको रोज से बहुत से मालिक भी हो गए । वहाँ भी अत्यंत कूद में थी । उन्होंने सारथी को हटा दिया और उसके स्थान पर जा रहे थे । एक बार उन्होंने प्रभु को प्रणाम किया और रात को एक का एक दिन प्रकृति से आगे बढाते । अब बहुत मालिक सोन के करीब बहुत चुका था । माँ ने रत रोक दिया । प्रभु ने बाढ को धनुष प्रसंज्ञान कर मालिक सोम को लक्ष्य बनाया । पांच मालिक ससून के वक्त पार करके चारों तरफ योद्धा युद्धरत हो गए । मात्र वस्तुओं का कोलाहल सुनाई पड रहा था । जैसा कि निश्चित सभी ने मालिक शो के बारे कान पर आक्रमण किया और रंगीन तरफ निकल नहीं लगा । उसके उपरांत में सामान्य शरीर के होंगे, जिनके खाओ भरने बंद हो गए और वे पीस गति को प्राप्त हुए । चारों तरफ दोनों पक्षों के योद्धा घायल हो कर रहे हो कर रहे हैं । मालिक भोजन नहीं बना पा रहे थे । उनके खाओ भी नहीं भर रहे थे । वे आतिश िक्र हतोत्साहित होने लगे । इसको देखकर वाले क्षेत्रम ने नदी के पार मालिक शोको आक्रमण करने को कहा परंतु अच्छे ही वे नदी बार करने के लिए नदी में उतरे है । न जाने कहाँ से नदी के भीतर से करों नहीं निकलना प्रारंभ कर दिया । ये सभी गन अभी स्थानांतरण विधि से गोश सिंगपुरा से गोल आपके भीतर आए और संकेत प्राप्त होते ही चल में उतर गए । संपूर्ण युद्ध का चलचित्र आंचलिक की सहायता से प्रमुख जी को सिंगपुरा से देख रहे थे । बाल एक्शन चल से प्रकट हुए कपडों का सामना न कर सके । गडों में अलग ऊर्जा शक्ति भरी थी । उन्होंने कुछ ही क्षणों में सभी को मार डाला । अब मालिक नदी पार करने का सामर्थ्य नहीं जुटा पा रहे थे । इस प्रकार मालिक शिवसेना कमजोर पड गई है । जैसा की अपेक्षित था कलेक्शन सोन ने अपने शरीर का पानी निकाला और वह पुनः स्वस्थ था । उसका भाव भर चुका ना उससे भी प्रभु पर तोमर से प्रहार किया परंतु प्रभु ने उसे मार्क में ही समाप्त कर दिया । प्रभु ने उसके बाद कान को अपना लक्ष्य बनाया परंतु खाओ कुछ ही समय में भर गया । प्रभु समझ गए कि इसका मर्मस्थान सर्वथा बनना है जिससे इसे बाल एक्शन भी न मार सकें । वो प्रभु से बाल में कमजोर पड रहा था परन्तु बार बार पुणे उठ खडा हो रहा था । ऐसा प्रतीत हो रहा था कि प्रभु अपना खेल खेल रहे हैं । इधर ठंड आधार नहीं मालिक शतम् का काम समाप्त करता था । मालिक शब्द होता को नंदेश्वर ने मार डाला । एका एक जब मालिक सोन ने देखा कि उसकी सेना समाप्त होने के लगभग है तो उसने एक अस्त्र का प्रयोग ना जिससे चारों तरफ धुआं छा गया । कुछ पल के उपरांत जब हुआ झगडा तो देखा वाले शुरू वहाँ नहीं था । वो भाग चुका था परन्तु उसे नहीं पता था कि भागने के सभी मार्ग बंद हो चुके हैं । एक का एक आंचलिक अत्यंत तीव्रता से नीचे आया और प्रभु के रख के सभी अगर एक विशेष दिशा में वो चला बहाने रत उसके पीछे तीव्र गति से लगा दिया । रख की विषेशता थी । एक विशेष गति के उपरांत वो भूमि से उठ जाता था । रत को चलने में कोई समस्या नहीं थी । कुछ समय में मालिक सोंग सामने भागता हुआ दिखा माने रत से उसको पार किया और पार करते समय न जाने कितने फल में वे रस्से, भूमि मजबूती और एक भीषण पर प्रहार किया । पैर के प्रहार से वो बहुत दूर तक लो बढता चला गया । पुनः खडा हुआ तब ततमा चलते हुए रखने पुनः अपने स्थान पर आपको अच्छी थी । वो अपनी फूल झाड रहा था । प्रभु आपने रख से उतरे और अब मालिक होगा । तब वो जान चुके थे कि सर्वप्रथम उसका पर्व स्थान क्या करना होगा । अब प्रभु नहीं उस को उठा उठाकर पटकना प्रारम्भ किया और इस बात का ध्यान रखा कि कब इसको दर्द का भाई हो रहा है । प्रभु ने लगभग शरीर के प्रत्येक अंग पर प्रहार किया परंतु मुक्के पहाडों से ये स्पष्ट था कि उसको आघात का प्रभाव नहीं हो रहा था । एका एक प्रभु के मन में विचार आया कि कौन सा स्थान शेष है जहाँ आघात तक किया हूँ । सब जगह तो आघात कर चुका हूँ । तब उन्होंने बात की तरफ देखा माफी । इतने समय से मालिक सुकून को पराजित होते देख रही थी । एकाएक उन्होंने अपना पाया हाथ खाया और कहाँ के स्थान पर त्यौहार करने को कहा । क्योंकि वही एक स्थान अब शेष था जहाँ प्रभु नेता हाथ नहीं किया था । इतने समय में लगभग सभी बडे सेनापति भी वहाँ आ चुके थे । मालिक समाप्त हो चुके थे । अब प्रभु आशुतोष, इंद्रा, नीलकंठ नहीं, उसका बायां हाथ पकडा और उसे उठाकर भूमि पर पटक दिया और अपने कमर में बंधी तलवार । उसके आँख में कार्ड बाहर होते ही नीलवर्ण द्रविड बहन एक और उसे भारी पीडा का आभास हुआ । इसके पहले प्रभु उस पर अपना प्रहार करते हैं । हाँ, न जाने कितनी तीव्रता के साथ सबसे त्रिशूल लेकर उसके एक रीवा पर कार्ड चुकी थी । उसके प्राण उड चुके थे । चारों तरफ नीलकंड वहाँ की चाय जाकार हो रही थी । महाने प्रभु को प्रणाम किया तो प्रभु ने माँ को गले से लगाया । अब चार हूँ । जय खोज के अतिरिक्त कुछ सुनाई नहीं पड रहा था । युद्ध समाप्त हो चुका था प्रभु ने सभी को बधाई थी । साथ ही कुंभ हापुर निवासियों को मुक्त करने, उनके स्त्रियों को स्वस्थ करने की अतिशिक्षित व्यवस्था करते को कहा । यहाँ के निवास से मुक्त होकर अपने घर गए और प्रमुख सीखी । औषधि से वहां की महिलाएं पुणे स्वस्थ होकर जीवन छीनने लगी । अब सभी को श्रृंगा पूरा बहुत चुके थे । पूरी पृथ्वी से संकट के बादल आ गए थे । कुछ साल के उपरांत प्रभु नीलकंठन ने सभी को सभा में आमंत्रित किया और कहा क्या आप मुझे अपने कष्ट निवारण है तो कुछ करना होगा । इतना सुनने के उपरांत प्रमुख जी खडे हुए और उन्होंने का प्रभु मैं क्षमा चाहता हूँ क्योंकि मेरी सारी औषधियां आपके किसी बाकी चलन को समाप्त नहीं कर पा रही है । आप यदि कुछ आप सरवत हैं आप आदेश दे । तब्बू आंख बंद करके बैठे हुए थे । उन्होंने अपनी आंखें खुली आंखों से प्रेम, करुणा बताया, प्रवाहित हो रही थी । सभी अभिभूत थे । तब प्रभु नीलकंठ ने का एस चलन से मुक्ति का उपाय जब गंगा मेरी चटाक से प्रवाहित तो उसके क्षेत्र था मुझे चलन से मुक्ति । सभी के मुख से निकला गंगा ये गूंगा कहाँ से आएगी? इसी कौन लाएगा अभी गंगा का है । ये कोई चंद न सका । कंदाड दूसरे लोग से आएगी । इतना कहकर प्रभु ने जो कहा किसी को भी अनुमान नहीं था । अब ये काल समाप्त हो गया है । कब हूँ ये काल समाप्त हो गया है । मैं कुछ समझा नहीं । अभी सृष्टि का समय समाप्त हो गया है । कुछ ही पल में अगले सृष्टि के निर्माण हेतु सभी को पर मोर्चा में समाना होगा । कब तूने अपनी माया को इस प्रकार प्रसारित किया की कुछ पलों में सभी प्रभु मैं हो गए । सभी को अनुभव हुआ कि प्रभु का आगाज बढता जा रहा है । बढते बढते वो वासी मोर्चा के रूप में प्रचलित हो गया । सभी के इस स्कूल काया ने कार्य करना बंद कर दिया । सभी की जीवात्मा कर्मों में लिप्त होकर प्रभु में सामान्य लगी । हाँ फिरते भाग में दोनों पुत्र नेत्र भाग में समा गयी । इसी प्रकार रोम रोम में संपूर्ण प्रभान डर समा गया । प्रकाश की परिसीमा इतनी अधिक हो गई कि प्रकाश के अतिरिक्त कुछ भी शीर्ष था । कुछ क्षणों के उपरांत प्रकाश क्षेत्र संकुचित होने लगा और संकुचन के उपरांत एक छोटा अंडाकार प्रकाश प्रतीत हो नहीं वो उनका बनी के साथ वो अंडाकार प्रकाश अंधकार में अगले युग के प्रारंभ ही तो हो गया । शिव के अद्भुत चरित्र की कुछ बूंदें जो आपको अगले खंड में प्राप्त होंगे हूँ । क्या पूरा सृष्टी में ही नया जीवन का प्रारंभ शिव करेंगे? शिव का क्या नाम होगा? शिव के ग्रीवा चालन से मुक्ति प्राप्त होगी अथवा नहीं शर्तों की प्राप्ति होगी कि नहीं शिव का प्रभूराम से संबंध कैसे बना शिव रहस्य जान में है तो सुनी अगला खडे पीना की हूँ हूँ ।

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