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भाग - 03 in Hindi

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12 K Listens
AuthorOmjee Publication
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मालिक क्योंकि पूरा जानकारी प्राप्त होगा । जब तक महाराज शक्ति विजय महामंत्री पहुँच वसेना प्रति अश्रद्धा नहीं प्रमुख सभा कक्ष में संस्थान में अमावस्या की दिशा के सवाल निशक्तता नहीं महाराज शत्रु विजय का राज्य डॅाक गोश सिंगर पूरा से सौ तो उस की दूरी पर स्थित था । उन्होंने भी माल बच्चों के अत्याचारों हमारे को झेला था । अब भी सुरक्षित थे । उन्हें महाराज्य तो सेंटर नहीं करूँगा । क्यूँकि रचनाकर सुरक्षित कर लिया था । उसी गरूण व्यू मालिक फस गए नहीं गए । रुपयों के कारण मालिक समाप्त होने लगी । दुर्भाग्य सेवा लक्ष्य राजा मालिक सोन वह सेनापति मलिक शब्दम बच निकले । संभव हो सकता है कि कुछ मालिक और शेष रह गई हूँ । युद्ध में दुर्भाग्य से एक अत्यंत विनाशकारी धुलना बस्तर से महाराज आशुतोष इंद्रा घायल हो गए और अब उनके उपचार हेतु सभी अत्यंत चिंतित हैं । सभी एक दूसरे का बुक देखते हुए वेस्ट भाव से ग्रसित है कि क्या दफ्तर रहस्य है, जो महाराष्ट्र तो विजय जानते हैं, तभी उनके आने की सूचना प्राप्त होती हैं । उन्हें बहुत ही सम्मान भाव से सभाकक्ष में स्थान दिया जाता है । स्थान ग्रहण करने के उपरांत प्रमुख खडे होकर अपनी बात कक्ष में रखते हैं । प्रवक्ता ने कहा, आप सभी का गोश्त सिंगपुरा के सभागार में मैं परिनीति प्रवक्ता स्वागत करता हूँ । शत्रु विजय, महाराष्ट्र आप सभी के स्वागत अभिवादन से हम सभी पहले ही संत हो चुके हैं । आपके महल आपके सम्मुख रहने का जो मतलब सब हम लोगों ने प्राप्त किया है वो अवर्णनीय । अब आप जब पूरा नम्रता का भाव प्रदर्शित करते हैं तब ये भावना पूर्ण रूप से मन में स्थिर हो जाती हैं या कत्यूर पृथ्वी पर आप लोग सिर मौर्य कहे जाते हैं । प्रवक्ता ने कहा अरे नहीं नहीं महाराज, हमारे अत्यंत छोटे सम्मान अर्थ अमन से की गई सेवा को आप इतना अधिक कह रहे हैं । ये आपकी ही उतारता है । आप तो जान ही रहे हैं । हमारा राज्य किस प्रकार के संकट से आच्छादित हो गया है । आप तो स्वाइन ही उसके साथ ही है । ये कहकर प्रमुख भी शांत हो गए । उनके अवचेतन मन में जो ज्वार की ब्रजमंडल रहें, अपनी सीमाओं को झबरी नगर देना चाहते थे, उसका परिचालन सामान्य व्यक्ति के लिए जान मना । संभावना जीवन के अंधकार युक्त काल में जब आपका बनी काली माँ आयुक्त हो जाता है तब उसका प्रभाव आपकी मुद्दे वह बुद्धि कौशल का पर पडता है । बुद्धि का प्रभाव आपकी मुखाकृति पर पडता है तो सब खडे व्यक्ति को आपके बनके स्थिति को उजागर कर देता है । मुद्दे कौशलता का प्रभाव आपके कार्यों पर पडता है । जो जब मैं आपके विपरीत समय खंड को प्रदर्शित करना है और ज्ञान वह साक्षीभाव तीन इस प्रकार के स्तर हैं जो मन में उठ रही प्रचंड लहरों से ही तट रुपये, मन, बुद्धि पर प्रहार को सहने समझने, बहुत कार्य होने से आपको सुरक्षित रखते हैं, प्रमुख से नहीं । तीन अस्त्रों की सहायता से अपने आप को सुरक्षित करने की चेष्टा कर रहे थे । आपकी प्रतिरक्षा प्रणाली कितने ही शक्तिशाली क्यों ना हो, आक्रमण का प्रभाव अंतर बन में हो । बंदो कष्ट तो शरीर को ही झेलना होगा । प्रमुख सीने ज्ञान है देवर साक्षीभाव से सब सही लिया था परंतु छोड की पीडा होगी । अधिक समय तक शांत रहने पर महाराज शत्रु विजय नहीं कहना प्रारम्भ क्या प्रमुख आपको शत शत समझ बल्कि यहाँ पर स्थित सभी महानुभावों को सब सब तमन, आपका नमन स्वीकार्य है । परन्तु इसके पहले प्रमुख ही कुछ कहते हैं शत्रु विजय ने कहना प्रारम्भ किया प्रमुख सी आप सभी बाप का राज्य आज समय खानदान की जिस कालिमा से मतलब है वो मुझसे पूर्ण रूप से उजागर है । आप में से किसी ने भी सहायता नहीं मानता हूँ । मैं जानता हूँ कि आप सहायता मांग कर अपने किए हुए उपकार को समाप्त नहीं करना चाहते हैं परंतु आपके मित्र हैं । हम अपने प्राणों की आहुति देकर भी मित्रता का धर्म निभाएंगे । हमने आपका कार्यप्रारंभ भी कर दिया और उसमें सफलता भी प्राप्त कर ली है । दण्डक हारने का सफलता दस प्रकार की सफलता आवाज में प्रश्नवाचक उत्तार स्पष्ट देख रहे थे । साथ ही अंधकार में प्रकाश किरण नंदीश्वर ने कहा महाराज! आप किस प्रकार की सफलता की चर्चा कर रहे हैं? क्या वही सफलता हूँ जो हम समझ रहे हैं? क्या ये वही सफलता है जिसने हमारे उपवनों से पक्षियों की चहचहाट छीन ली है? क्या वही जिसने भवनों के कुंजन को बंद कर दिया है? वस्तुतः हमें जिस वस्तु मत्वा बैठने की प्रतीक्षा होती है, आने वाला प्रत्येक पंजाब हमें उसी का अनुभव कराना चाहते हैं । यही है मन की लोलुपता । इंद्रिया उसे ही अनुभव करना चाहती हैं जिसकी हमें आवश्यकता थी । इस प्रकार सभी को उस साल विश्व के विषय में ही जानने, वह उसे प्राप्त करने के विषय को जानने की उत्सुकता थी । परन्तु जब उत्तर आया कि महाराज को काल विश्व के विषय में कुछ भी जानकारी नहीं है तो सभी अत्यंत दुखी हो गए । अगले ही क्षण जब सेनापति अश्वत धाम जीने को छडने जानकारियों के विषय में बनाया और महामंत्री कौशिक थी नहीं जब उसका बरी मार्च किया तो सभी की दृष्टि में चमक आ गई । महाराज शत्रु विजय जब अपना गुप्त कार्य बताना प्रारम्भ किया तब कालवश लाने की योजना काल विश्व युद्ध देते में परिवर्तित हो गयी । छत्रों में जाने का सभी प्रभुत्व सभासद मेरी वार्ता को ध्यान से सुनें तो उस पर गंभीरता से विचार करें । मेरे मुख्य गुप्तचार के अनुसार मालिक अभी गोश्त सिंगपुरा से अधिक दूर नहीं है बल्कि ये कहना अभी उत्तम होगा । क्यों उन्होंने अभी युद्ध में अपनी पराजय स्वीकार नहीं की है । मेरे अनुसार वो अभी हम पर दृष्टि जब आए हुए हैं । मुझे ईश्वर का महाराज ये किस प्रकार संभव है । उनके लगभग सभी मालिक समाप्त हो गए थे । जो शेष बचे थे वो अत्यंत घायलावस्था में थे । ऍम ये तो आंचल इतने ही समाप्त करती थी । इसके उपरांत में अपने प्राण बचाकर जो भूमि से बात करते थे । अब ये किस प्रकार संभव है कि वो इतनी शीघ्रता से पुनर संगठित हो गई हूँ । अब महामंत्री कौशिक अपने आसन से थे और अपने साथ खडे सेवक से कुछ कहा तब कौशिक जी सभा का केंद्र बिंदु सम्भवता उन्होंने किसी को सभा में बुलाने के सेवक भेजा था । उन्होंने अपनी वार्ता प्रारंभ पत्र चलो प्रणब मैं दिव्या मार कंटक का महामंत्री आपने महाराज की आज्ञा से कुछ कहने की अनुमति चाहता हूँ । आप भी अपने विशेष को प्रचारको सभाग्रह में उपस् थित करने की भी अनुमति चाहता हूँ । प्रमुख ही इस समय सभा का संचालन कर रहे थे तो उन्होंने अपने मुखा भाव से बिना कुछ कहे स्वीकृति दे नहीं हूँ । मुखा भाव शब्दों से अधिक महत्वपूर्ण होते हैं क्योंकि सृष्टी में जब जीवन का प्रारंभ हुआ, जीव के आते ही स्वीकृति वहाँ अस्वीकृति के भाव आए, उन भावों को अभिव्यक्ति करने के लिए जीव के पास अपने मुक्के भाव की थी । शब्दों व्याकरण का ज्ञान तो उसके उपरांत हुआ था, मूल तत्व है भाव न कि शब्द है और उस पर बनावटी व्याकरण बनी है न भूल पाने वाला छोटा नन्हा शिशु शब्दहीन व्याकरण इन अवश्य ही है परंतु भावहीन नहीं । उसके माँ बिना व्याप्त रन हुआ बिना शब्द के ही उसके एक एक सप्ताह का इस हाथ समझ लेती है जैसे भक्त का भाव बिना शब्द के परम पिता परमेश्वर अंतर मंतर जान जाता है । इतने समय में ही प्रमुख आप अच्छा का भी पदार्पण हो जाता है । आते ही उसने सभी को प्रणाम किया । गुप्तचार का नाम है को चरण हार । आप क्या प्राप्त करने के उपरांत उसने अपनी विवेचना प्रारंभ गौचरण सँभालने का श्रेष्ठ जनों को दास का परिणाम इस वक्त की कृपा से मुझ जैसे ज्ञान हिंदू कुछ व्यक्ति को को शॉपिंग पूरा जैसे महान राज्य की सेवा का अवसर प्राप्त हुआ । मैं अपने महाराज सेनापति महामंत्री जी का अत्यंत आभारी हूँ । जिन्होंने सच है वो अपनी सेवक पर अनुकंपा बनाए रखी है । मैं और मेरा राज्य गोश सिंगर पूरा का ऋण कभी नहीं चुका सकता । आप सभी ने मेरे राज्य को संकट बाल अच्छे से जिस प्रकार सुरक्षित दिया, उस ऋण से मुक्त होने के लिए दिव्या मार कंटक का एक एक जन भी यदि अपने प्राणों की आहूति भी देते तो भी ऋण उतर नहीं सकता । आपने मेरी जन्मभूमि मेरी माँ की रक्षा की । मैं आपको हिरदय से धन्यवाद देता हूँ । प्रमुख ही देखा बहुत चरण भाई आप अत्यंत श्रेष्ठ को प्रचार होने के साथ अत्यंत तो भाषी आपने अपने राज्य से देश के लिए जो प्रेम भावना है वही आपको श्रेष्ठ बनाती है । जिस प्रकार जीवन के लिए प्राणों की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार उत्तम गुप्तचर वही हो सकता है जिसके अंतर्मन में राष्ट्रप्रेम, सबसे ऊपर पायदान पर राष्ट्रप्रेम गुप्तचर का रात में गुण है । अब आप अपनी गुप्त परिचर्चा प्रारंभ करें क्योंकि यहाँ सभी उसे जानने हेतु अत्यंत उत्सुक हैं । बो चरण भाग लेकर या प्रारम्भ क्या चीज प्रमुखी जैसा आदेश जब युद्ध समाप्त हुआ और महाराज प्रभु एक्टिव ऍसे घायल हुए तो आप ही की भर्ती हम भी अत्यंत चिंतित थे । जब इस विषय में ज्ञान प्राप्त हुआ कि वह अस्त्र असाधारण है तो हम सभी इस तरह व्यथित हो रहे थे जैसे कारागार में निर्दोष व्यक्ति, निर्दोष व्यक्ति गतिविधि के द्वारा कभी अकारण ही राज दंड का भागी हो जाए तो वह कारागार में कभी राजतंत्र को दोषी कहता है । कभी अपने सहयोगियों पर उसे आशंका होती है, कभी वह को दोषी ठहराता है और अंततः वो अपना प्रारब् कही मान लेता है । उसके अंदर बन की दशा स्थिरता को कभी पूर्णतयः प्राप्त नहीं हो पाती है । इसी प्रकार महाराज आशुतोष इंद्रा के घायल होने पर हम सभी भी स्थिर मान बहुत से ये समझ नहीं पा रहे थे । महाराज के घायल होने में किसका दोष है । सुरक्षा व्यवस्था इतनी सौ होने पर भी महाराज किस प्रकार घायल हो गए? क्या इसका कारण हम लोग तो नहीं? इतना सुनने के उपरांत कुमार नरेन्द्र ने अपने आसन पर खडे होते हुए कहा आपकी सहृदयता का प्रमाण है आप अपने आप को दोषी मान रहे । आप किस कारण दोषी हो सकते हैं । उन्हें तो कोशिश पूरा पर आक्रमण करना ही था । कौशिक चीनी महामंत्री लेगा । शाम कुमार मैं आपके पूर्ण चर्चा सुने बिना ही अपनी बात कह रहा हूँ । इस पर कुमार ने बिना कुछ कहे ही अपनी मान स्वीकृति दे दी बल्कि पूरी सभा ही कुमार से सहमत थी । कारण अस्पष्ट था की सभी अभिषेक अपनी उत्कंठा को तृप्त करना चाहते थे । अब एक नई दिशा में वार्ता अनुमोदित थोडी प्रतीत हो रही थी । अपराध दिन बंडल से अपराध बहोत मुखाकृति में परिवर्तित सायद ही विश्लेषित हो जाता है । अपराधी इन मुखमण्डल निर्मल जल के सवाल अस ऍम का प्रतीक है और अपराध भूत मुखाकृति जल्द ही के हारे पन से उत्पन्न लवन कुमार यह अनायास ही भाव आकृतियों में परिवर्तित दंड आधार वो जंगेश्वर नंदेश्वर पर विश्लेषित होने लगा । उन्हें अपने अंतर्मन में ये विचार वित्त की तरंग की भारतीय रिलीज कर गया । क्या महाराज के घायल होने का कारण वेट हो रही है? कारण स्पष्ट था ये महाराज की सुरक्षा व्यवस्था तो इन्हीं के हाथों भी थी । उन्हें अपनी क्षुद्रता का भी आभास जो अपने राज्य के नहीं है वे अपने को दोषी मान रहे हैं और जो आपने इतनी तीव्रता से ये विचार मन में अ स्थान बना गया कितन उधार नहीं अपने पूर्व स्वभाव को प्रदर्शित करते हुए कहा हूँ सभी सभा जान सुनी महाराज के घायल हो रही का अपराधी मैं हूँ मैं मैं अपना अपराध स्वीकार करता हूँ । मैं इसके लिए अपना दंड स्वतः ही चुनता हूँ । मेरा ठंड एकमात्र तो ही हो सकता है । बूरी सभा पूर्ण रूप से सन्नाट से परिलक्षित हो गई । कोई समझ नहीं आ रहा था कि ये क्या हो गया । ठंडा घाटे प्रमुख कि कुछ कहना चाह रहे थे कि कुमार गगनेन्द्र नहीं उन्हें कहना प्रारम्भ किया डंडाधारी चीज आप साथ ही वीरता से परिपूर्ण वह महान पराक्रमी, साहस, वीरता, पराक्रम मनुष्य में तभी संभव है जब मन मस्तिष्क पर भावनाओं का पूर्ण नियंत्रण रखेंगे । अब आप भावनाओं के बहाव में पहले आप क्या कह रहे हैं, आपको स्वतः ही उसका भाई नहीं है । कोई भी चीज सुख दुख के लिए स्वतः ही कारण होता है । ब्रह्मजी उसे ही सभी उत्तम वर्लिन कम कार्य करवाता है जिससे कार्यों के परिणाम का पूर्ण पारितोषिक अथवा दंड जी को ही प्राप्त हूँ । स्वता प्राम्भ कुछ भी और कही भी कारण नहीं बनता । और हाँ सबसे महत्वपूर्ण तो ये जब वो करता है तो हम जान नहीं सकते क्योंकि तब वो करता के रूप में प्रकट होता है जब सृष्टि में जीव या तो प्रारंभ ही ना हुआ हूँ अथवा सृष्टी में जीवन का एक आप पूरा हो चुका हूँ था जब हम होते हैं तो हम ही कारण है और जब हम नहीं होते हैं तो वो कारण है स्वास्थ में कारण वकर्ता सब वही है परंतु उसका विधान ही ऐसा है कि कारण वकर्ता हम बन जाते हैं । अच्छा डंडधार थी या अन्य भी जो अपने को दोषी मान रहे हैं । वास्तव में दोनों ही प्रकार से दोषी नहीं है । प्रथम तो ये की सब कुछ ही किया है वही कारण वही करता हूँ द्वितीय यदि जीव उत्तरदायी हैं तो मुझे पिताश्री स्वयं ही इसके उत्तरदायी होंगे ।

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