00:00
00:00

Premium
गुजरा हूँ जिधर से - Part 2 in  | undefined undefined मे |  Audio book and podcasts

Story | 28mins

गुजरा हूँ जिधर से - Part 2 in 

AuthorTej pal Singh 'Tej'
गुज़रा हूँ जिधर से कविता संग्रह Voiceover Artist : RJ Nitin Author : Tejpal Singh ' Tej'
Read More
Listens644
Transcript
View transcript

हर पल नया सवाल हुआ है इतना फकत कमाल हुआ है नए दौर की चकाचौंध में जीना बहुत मोहाल हुआ है लोकतंत्र की छाती पर चढ हरसू खूब धमाल हुआ है हिंसा के हाथों से बेशक इंसा आज हलाल हुआ है प्रशासन अब राजनीति का सबसे बडा दलाल हुआ है तो हम को क्या देना लेना है दुनिया से हम को तो बस आस स्वागत है धनियाँ से रूखी सूखी जैसी भी है खा लेंगे चटनी से, कुछ सब्जी से, कुछ पन्नियां से कब तक आंख चुनाव होगे कुछ सोचो तो राजनीति की आंख बदलती दुनिया से फूल चुराने का सपना पालो भी खेतों से खलिहानों से, कुछ बढिया से तेज वक्त है बचने का, सम्मोहन से, नेता से, अभिनेता से की ठगी या से हूँ दिलों की बात क्या कीजे दीवाने खास में गुजारे हैं बादशाह का हर पल कयास में जिंदगी को एक है कीमत जुदा जुदा किसी की लाख में उठी किसी की पचास में बहुत कोमल धवल अनमोल है लेकिन धंदे की बात है सो है कि ले का पास में मैं ही बंद की मार हूँ मस्जिद नहीं जाता वाइज मगर मिलता है नित नौ ल्लेबाज में घूमता फिरता हूँ मैं भी तेज की तैयारियाँ एस की न उसकी बस वक्त अपनी तलाश में हंसने का घुमा और है रोने का घुमा और उल्फत की जुबान और है नफरत के जुबान और जानते सब है मगर समझे तो बात है झूले का धूम और है मरघट का धूम और पर्चियां डर पर्चियां जब मौत की आने लगी कहने लगे जहाँ बाज भी जीना है और नाहक की खुशगवार है दुनिया की शहर का घर से बडी दुनिया भला पाएंगे कहाँ और होश में रहने का कुछ हासिल नहीं है तेज बहकने की चाह है दे पी रही मोगा ऍम जब जब मौसम दैनिक सुहाना लगता है अपना कोई लाख सयाना लगता है चौखट पर हर सांस मौत का पहला है जीवन ने ले लिया बयाना लगता है हमने दो ता उम्र फकीरी झेली है साथ ही को मिल गया खजाना लगता है गए सांझ ही उसने नाता तोडा है गुजरा लेकिन एक समाना लगता है कहाँ जवा हैं गजलें नाथ नहीं तू जा रहे सब छत और साथ ही नहीं साल को कर आई ना बेपर्दा हुई शहरी रातें हैं याद आएगी आइंदा भी गए वर्ष की गुजरी बातें कल की दरियां कल भी आ रहा काम करेंगी खुलकर खाते हैं रोजी रोटी की चाहत में कल भी होंगी लम्बी बातें जीवन भर जीवन ना पाया उलझी लेट सुलझाना पाया सारी उम्र बनाया घर पर घर अपना होना पाया दुनिया से टकराने वाला खुद से ही तक रहना पाया गैरों को तो समझाया पर खुद को वह समझाना पाया जिसने दुनिया को अपनाया वो दुनिया को राष्ट्र आया भारतीय बदली है यू और एक फसाद में की मिट गया अंतर सफेद ओसियां नहीं जिसके किए बुझने लगे दिल के चिराग रखा है क्या तुम्ही कहो ऐसे गुना हमें लाजिम है बहुत कोर्ट में माना की गवाही गैरत मगर बाकी कहाँ आपके गवाह में डीजे न यार आजकल मांगे बिना सलाह थोडा बहुत रखो वजन अपनी सलाह में यूँ ही नहीं है तेज को साहब बहुत नसीब कुछ न कुछ तो बात है उसके निबाह में मन है मेरा की सब तक मेरा सलाम पहुंचे हर खासोआम की रुख मेरा कलाम पहुंचे दीनो मजहब का रोडा बाकी रहे ना रह में मस्जिद में हो पुजारी मंदिर इमाम पहुंचे छोटा बडा ना कोई बंदे हैं सब खुदा के यानि कि मोहम्मद का घर घर पाया हम पहुंचे पर जा को चाहिए कि राजा का हाल जाने पर जा का हाल लेने घर घर निजाम पहुंचे पीरी मिले जिगर की लूंगा तेज मैं खुद कातिल मेरा सलामत अपने मकाम पहुंचे तो भी एक कहानी लिखना विस्तर को राजधानी लिखना अंतर अंतर राग रागनी आंखों आंखों पानी लिखना गए दौर की तरिया तो भी एक राजा एक रानी लिखना शब्द अकेले ना काफी हैं कुछ दाना कुछ पानी लिखना चेहरा जेहरा चांद सरीखा क्यू जन का रंग धानी लिखना कोहरा कोहरा सारा जंगल नई हवा का मारा जंगल चिडियों ने आवाज उठाएगी इंसानों से हाला जंगल कल तक जंगल में मंगल था आज हुआ आवारा जंगल कल देखता था चांद सरीखा आज देखे है तारा जंगल जीवन सत्ता का रखवाला तेज हुआ अब नारा जंगल लडते लडते पायल हारी आज हुआ साडियों पर भारी हवा हवा में जहर घुला है देशक नदी नदी है खाली हैं जैसे जैसे हुआ सवेरा अंधियारे ने पलटी मारी मानवता को मार अडंगी मानवता ने बाजी मारी तेज जलाने होंगे दिल अब हरसू है अंधियारा तारीख चंद जब जब भी भला लगता है देश सांसों में पाला लगता है रोज मिलना भी खूब है लेकिन थोडा अंतर भी भला लगता है आग खाने का हुनर है जिसमें जंगी हाथों में पाला लगता है वो जो गिनता है पाओ के छाले बात मुद्दत के चला लगता है हरसू खोजे हैं हवा में खुशबू तेज गुरबत का सिला लगता है बेटिया जब ससुराल चली बचपन का सच भूल चल नहीं आने वाले कल की खाते कल पे पानी डाल चली अपने ही हाथों से अपने घर का आंगन कील चली युद्ध क्षेत्र कि जाने के लिए गहर श्रृंगारी ढल चली तेज अकेला रहा सुबह ता बिटिया जब ससुराल चली कोई अपना पास तो दिल में दैनिक उजास तो हूँ अपनी भाग का मस्ती का भी काम ज्यादा इतिहास हूँ रोटियां भी हस लिख लेंगे इतना भर परिहास तो हो हा गुनमा से मेघा बरसे पत्र जड में मधुमास तो तेज का क्या वो तो पागल है इसका पर एहसास हो शहरा में बदला क्या गरजे थकी प्यास उठ बैठी फिर से वर्षों बाद खुदा की पकडनी कान खुजाती निकली घर से महक उठी धनियाँ किशन सिंह मोईज चुनरिया किसकी सेट से सत्ता की यहाँ के खुजलाई हाथ मिला बैठी मुख बेड से लगी झांकने बगल झोपडी तेज हवा पानी के डर से सागर सागर पानी पानी तब रही! पर मछली रानी अपने ही घर में बेघर है । दादा दादी नाना नानी क्या बरखा क्या ऋतु वसंती भूल गए बच्चे गुडधानी गए दौर की दौड धूप में बदल गए शब्दों के मानी तेज महल में राजनीति के कैद हुई बेशक जलवानी सावन में बदली ना बरसी मधु ऋतु में बलियाणा सरसी जाने कैसी हवा चली है आंचल को धनिया हैं तरसी सत्ता की मारामारी में संसद हुई राम के घर सी भूख प्याज को लोकतंत्र ने नारों की थाली है पर्सी ठंडा हुआ तेजी वो सूरज निकला पहन जेठ में जैसी हूँ गांव बडे भोले भाले हैं संबंधों के रख वाले हैं गोद में अपनी बेशक इसने छोटे बडे शहर पाले हैं चलते चलते धक्के नहीं को वाओ में इनके भी छाले हैं मगर खेद विज्ञानी युग में गांव मेरे बैठे डाले हैं तेज ये कैसी फाकामस्ती हाथों हाथों में प्याले हैं खट्टे मीठे कडवे देश सबके अपने अपने देश आजादी के उजियारे में पाल रहा अंधियारे देश सत्ता की मारामारी में दूर हुआ आंखो से देश गैरों की चर्चा क्या करना जूझ रहा अपनों से देश सोने की चिडिया तुम जानो हम जाने भिखमंगे देश लेकिन इंसानीयत तियो आजकल फैरी चुकी चुकी है एकांत में हस्ती है पर अब भी कभी कभी तो ही तो मेरा अपना दुनिया में दिल नशी है तो रहती है तेरे सामने आंखें झुकी झुकी यू मंजिले बाकी है अभी और भी बेशक राहे मगर लगती हैं कुछ काफी ढकी था की नए दौर में पेशे नजर यू बोझ बस्तों का बढा की उम्र बचपन की भी है लगती पक्की पक्की कल बादलों को छोड कर ली तेज नहीं अंगडाइयां है चांदनी भी आज कल बेशक ठगी ठगी वो लौटकर घर आए तो अच्छा हुआ हो रूबरू बत्ती आए तो अच्छा हुआ सुंडियों के आईने से कल आंखे लडा वह दो घडी मुस्कुराए तो अच्छा हुआ धूल कर गुजरे दिनों की दास था कुछ टूटकर शर्माएं तो अच्छा हुआ पथरा गई थी हाँ सच तेरे बिना मैं ना दैनिक सरसाइज तो अच्छा हुआ बात मुद्दत आज के बिस्तर मेरे थोडा बहुत करना है तो अच्छा हुआ हूँ मैं तो पागल ठहरा जी गांव घना है गहरा जी मैं क्या जानू अपनी हस्ती मैं तो फक्कड ठहरा जी तुम खुद देखो आईने में अपना असली चेहरा जी आंगन आंगन खून सेना है पर्वत पर्वत बेहरा जी तेज मेरी चौखट पर बैठा अंधियारों का पहरा जी घर के कूल्हे पे गगरिया सहित घर से निकली है गुजरिया साहेब तुम तो समझी ना हवा की साजिश सेंसेक् किसकी है चुनरिया साहेब जो भी देखे है नाटक जाए हैं ऐसे लचके कमरिया साहिब पाओ धरती से नहीं बाबस्ता ऐसे बहकी है उमरिया चाहे बाहर निकला है बदन कपडों से ऐसे निकली है उमरिया सहित हूँ सेट पर बेशक नीलगगन है धरती धरती मगर तपन है अर्थ हुए शब्दों से पृथक शब्दों का संसार सघन है संबंध हुए विकलांग धरा पर अनुबंधों की धारा सफल है लोकतंत्र की मर्यादा का संसद संसद खुला हनन है सत्ता की मारामारी में मानवता का हुआ पतन आंख चुनाव होगे तुम कब तक प्यार छुप आओगे तो मैं कब तक छोडो की अब आंख मिचौनी ख्वाब दिखाओगे तुम कब तक कोई नहीं फंसने वाला यहाँ जाल बिछा हो गए तुम कब तक अपनी फितरत में चलना है आज सुझाव होगे तुम कब तक तेज हिमालय की चोटी पर गांव बताओगे तुम कब तक दादी माँ जो कहती थी अब लगता है सच कहती थी बचपन की नहीं दुनिया में अंबर पर नदियां बहती थी धरती पर थे चोर उचक्के अम्बर पर पर यार रहती थी घर की छत पर भूत भूत ली आंगन में चिडिया रहती थीं आज हुआ गुलशन आवारा कल बुजदार हवा बहती देश मरने कु्त्ता सब वो तो नहीं जख्म कह रहे हैं समंदर हमने जाना कि लोग दुनिया के बहुत जालिम है, सिकंदर तो नहीं उन के आने का इंतजार तो है उनकी राहुल ने मगर सिर्फ तो नहीं वो जो बैठा है मेरी चौखट पे मना अपना मुंतजिर तो नहीं कैसे छेड हूँ में तार वीणा के मुझको रोना भी मैं असर तो नहीं देश की बारी में खास होने का रंज बेशक है तहस सुर तो नहीं बातों बातों में सिमट जाएगा तेज इतना विमुक्त सर तो नहीं गुजरा हूँ इधर से मैं सारा धुंधला धुंधला प्रकाश मिला कि चांद सितारों से बोझिल कुछ झुका झुका आकाश मिला पतझड तो हर सांस जिंदगी अरु पावस को सन्यास मिला या रोटी के बदले में अक्सर एक अदद उपवास मिला आका मस्ती का कुछ कुछ तो मुझको है इतिहास मिला नए दौर की राजधानी में है जनता को उपवास मिला अनुबंधों की तंग गली में बिखरा बिखरा विश्वास मिला शहर हुआ विश्वास समूचा डोल गया खिडकी दरवाजे मान के सब खोल गया करवट करवट सोचों की थी चुभन बहुत यादव का अंधियारा सिर चढकर बोल गया उसके हंसने में था दुख सुख का दर्शन भेद अचानक मन का एक एक खोल गया भूल गए सब प्रेम प्रीत की परिभाषा कोई अनगढ उल्फत में विश्व खोल गया तेज सावनी हवा चली तो सहसा हो जाते जाते मन की सांकल खोल गया तेरे पीछे छुप के रहना सीख गया अस मानों से बातें करना सीख गया तेरे संग होने भर से थी गजल जवाब तुम बिछडे तो आगे बढना सीख गया पल पल इतना टूटा बिखरा मैं आखिर रेत की दीवार ओसा डाॅॅ सीख गया वादे तो वादे हैं सच्चे झूठे क्या वादों की धारा में बहना सीख गया बहुत लोग मार मार के जिंदा रहते हैं तेज बीमार के जिन्दा रहना सीख गया हूँ उम्र चढी तो रफ्तार रफ्तार अर्थ खेल के बदल गए सांझ सकारे भी अब दन्नू मिलने से कतरावल हैं धूम हुई आवारा दिनभर इत उत आंख लडा वे हैं शहर हुए निकले हैं घर से सांझ हुए घर आ गए हैं पाओ में पाजी पडे जब मांग के लिए सिन्दूरी है पीपल की तब छांव घने दी ना धन लोगों की भावना है जीवन दो तेज पहली सुलझाए ना सुलझे हैं जब चाहे तब बहन निकले है जब चाहे धर्म जावे है हूँ तुम क्या जानो मुर्दा दिल हो बहुत मजा है जीने में बहन निकले हैं दिल का दरिया पनघट के ढंग पीने में देश का मजा है इश्क करता है इसके सजा है क्या कहने सारी उम्र गुजर जाती है चाक जिगर को सीने में पेश करना हो तो सब भेजा है सूरज चांद सितारे क्या इश्क के होते ढल जाते हैं राजकरण सहज नगीने में हाय नाजुकी फूलबदन की हाय बदन का पैनापन आए बदन का रंग गीलापन रंग हमारे पश्मीने में मीर साहब ने हाई तेज से क्या तरकीब बनाई है रंग बदन का जब देखो तब भी के गाने फस रहने में हूँ थोडा सा जो असर हुआ है जिंदा अपना हुनर हुआ है हाँ गोवा को चपल चांदनी पाओ पाओ सफर हुआ है मानव मानव गूंगा बहरा दानव दानव मुखर हुआ है बेसिक संबंधों के चलते अनुबंधों का गुजर हुआ है बस्ती बस्ती सन्नाटा है जाने कोई कुफर हुआ है हूँ नया वर्ष कुछ ऐसे आए सात सात सब कदम उठाएं मानव मानव को पहचानने रेम के प्याले उछालू थी हवा मुकम्मिल दुनिया की घर बदले तो यू बदले बस्ती बस्ती खुशहाली हो गांव बगीचे महक उठे सूरज धरती पर उतरे आंगन आंगन धूप केले सुबह सवेरे बैठे मुंडेरी चीज चीज चिडिया चहक उठे हरिया को रोटी मिल जाए और धनिया को पैजनियां झालों भले हाथ को चूडी घायल पायल छनक उठे हिंदू हो या मुस्लिम, कोई कोई ईसाई से क्या बहुत आपस में यूँ तेज मिले सब सबके चेहरे चमक उठे आप अपनी जो सादा होने के लिए सारी दुनिया ही खफा होने के लिए उनके होने से जवाब महफिल में बात मुठ्ठी की हवा होने के लिए ऐसा बदला है जमाने का चलन खुल के मिलना भी खता होने के लिए, जड के सीने पर गुजरना उनका उनके जिले की ज्यादा होने के लिए तेज बानूर जिंदगी अपनी अपने खाते में जमा होने के लिए कुछ ही दिन की बात है चुप चाप है मिलने को निजात है चुप चाप रहे आंख काली बढ गई चेहरे पर झुर्रियां अब तू भी न तेरे हाथ है चुप चाप रहे जरा जरा जमीन है जरा जरा है और की जाने लगा तो मान है जो चाह रहे बादे बहारी कब गए पत्र जन का दौर है कुछ बागवान कम जात है चुप चाप बातों में तेरी अबकी वो दमखम नहीं ऊपर से भीतर घात हैं जो आप रहे आग जब लगी गयी बचने का यतन कर बाकी कहाँ बरसात है चुपचाप रहे शहर अब आने को है कि तेज सुनी जाने को खुद का रात है जबकि आप रहे ऍम पग पग जो निर्बाध बढा है धनवानों के हाथ चढा है बांच न पाया इस दुनिया को पडने को यूँ बहुत पढा है मानवता को दिखा आईना दान अवतार का क्षेत्र बढा है सबकुछ कडवा कडवा सा है कोई करेला नीम चढा है लोकतंत्र के गलियारे में भ्रष्ट जनों का भाव बढा है अंदर अंदर शूल गढे हैं आंचल आंचल फूल कडा है बडी देर से मजलूमों पर इनका लाभ का भूत चढा है काट सके तो हीरा काट नजरों से अंधियारा काट जिस घर में चंदा बंदी है उस घर का दरवाजा गार्ड जिसमें मेरा सूखी लकडी है जितना चाहे उतना काट खासी बहुत पुरानी होली मुश्किल है अब इसका कार्ड छोड तेज अब कालाधंधा कुछ तो जिला उजला कार्ड आंखों का उतरा पानी है अर्थ हुआ या बेमानी है चौपट है कानून कायदा सबकी अपनी मनमानी है वो बोले तो बात बडी है हम बोले तो बचकानी अपने घर आंगन की छोडो घायल अपनी राजधानी है प्यार महोब्बत बदरंगी है जुल्मों की जूनियर धानी है हूँ लील गई जडती नदी पका पकाया धान भूख प्याज की मार से टेडा किसान धनिया को नहीं बात है अब पीतल की इच्छाओ पाओ में पाजेब सिर पे तीरकमान धीरे धीरे बिक गया घर का सारा माल होरी खाक उडाता है खाली बडी दुकान जोरो कि पंचायत है गीदड है सरपंच थाम हाथ उल्टी कलम लिखते चोर विधान तेज उजाला थक गया सूरज गया विदेश सारे मिलकर कर रहे चंदा का अपमान गली गली नेता घने गली गली हडताल संसद जैसे बन गई तुगलकी घुडसाल नेता ही डाकू यहाँ नेता ही सरपंच प्रभु की करने की कहूँ कौन करें पडता कॉलेज कॉलेज बाज है आंगन आंगन का कोयलिया बोझल हुई बिगड गया सोरता आंगन आंगन बुक है हाथोंहाथ खाज सत्ता की चौपाल पर लगी हुई टक सा राजा बहरा हो गया जनता हो गयी मौन तेज निरर्थक भीड में बजा रहा हडताल फागुन भागवन रंग है आंखन आंखन नहीं वाले हो ले पड रहा भी डर भी डर में है धरती और आसमान ने आखिर थोडा मोहन कब तक झेले आज को कंचन कंचन देते हैं कागज के गुलदान है रूप स्वरूप निगन बस्ती बस्ती आग है जंगल जंगल रहे हैं दानवता ने पहुंच दी मानवता की मांग अंडा अंडा बांध है जब मर्जी तब से मन मंदिर को छोडकर गया कबूतर दूर तेज टिका है आजकल अनुबंधों पर नहीं है यू आदमी से आदमी डर नहीं लगा बात दीवारों से हैं करने लगा लीक से हटकर समय का देवता रिश्ते नए हैं खून के बोलने लगा कान का कच्चा हुआ इतना या की जरा जरा सी बात पर उठने लगा देखकर नए दौर का चिकना बदन धरती हिली की आसमा झुकने लगा नित नई तहजीब के पेशे नजर तेज अपने आप से लड नहीं लगा खून सपनों के मेरे काम ना हुए हाथ कातिल के मदर नाम ना हुए हस्तियां डर हस्तियां महफिल में थी उनकी महफिल में मगर हम ना हुए बढ सा की ये है नैन यू तो उम्र भर पर वर्क जीवन के कभी नम ना हुए लोग धरती के गगन तक पहुंचे एक हम है कि हम मुझे मौसम ना हुए तेज तो है जान से अपनी गुजर गया न करें मगर दिलशाद के बेहरम ना हुए तो चंदासी उज्वल घनी धवन है तो गंगा सी गति में सहज सरल है तू मेरे को पवन की केसर के आ रही है तो मेरी आंखों का नीलकमल है तो मेरी आंगन की चपल चांदनी तू मेरे अधरों का गीत नवल है तू मेरे अंतर कि अमृत धारा ने युक्त तू निर्मल सहज सरल है तो मेरे हिंदी की कोमल आभास तो मेरे जीवन की सहज गजल है

Details
गुज़रा हूँ जिधर से कविता संग्रह Voiceover Artist : RJ Nitin Author : Tejpal Singh ' Tej'