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Part 4

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यह उपन्यास उन तमाम लोगों के लिए है जिन्होंने अपनी जिंदगी में कभी-न-कभी किसी मोटे आदमी का मजाक उड़ाया है। न पढ़ा, न लिखा, न कुछ सीखा, वो अब खोटा हो गया। उसकी जीभ हर पल लपलपाई, वो बेचारा मोटा हो गया। writer: अभिषेक मनोहरचंदा Script Writer : Mohil Script Writer : Abhishek Manoharchanda
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भारत चाहे बैंक से बक और रोज रात आठ नौ बजे तक घर लौटा है । आपका लौटे समय मोहल्ले के कोने पर एक आटा चक्की की दुकान है जहाँ पर मोहल्ले के सारे फालतू आवारा लडके टायॅज या फिर क्रिकेट हमेशा खेलते हुए मिलते जहाँ से बकुल के लिए निकलना बडा मुश्किल सा होता था क्योंकि ये लोग बकुल को देखकर अचानक से हसने लगते हैं या मोटे भैंसे हाथ बोल कर उसका मजाक बनाते हैं । बस और इस बात से अधिक उदास हो जाता था और उसे मन ही मन बहुत गुस्सा आता था जो तब तक ठंडा नहीं होता था जब तक है पेट वर्ग कुछ खाना ले । यहाँ तक बचपन से दादी के कारण उसमें आ गई थी । अगर बाकी और थोडा भी रोता नाराज होता, गुस्सा होता तो दादी फौरन उसे कुछ न कुछ खाने को दे देती और बकौल शांत हो जाता था बकुल घर आता है अंदर आने लगता है और थोडा दरवाजे में फसता है । खुद को थोडा टेढा करता है फिर अंदर आता है अपने मोटापे के कारण । बकुल को रोज ऐसे ही आना जाना पडता है । घर में गायत्रीदेवी खाना बना रही थीं । जगत नारायण प्रमाण का पाठ कर रहे थे पास में अगर बत्ती जलाई हुई थी बकुल फौरन हाथ मुंह धोकर आ जाता है । माँ छोटी बन गई बाॅल से अपने हाथ सोचते हुए बोझा ये सुनते ही रवायत पढते पढते जगत नारायण बखपुर को नाराजगी वाली नजरों से देखते हैं भोजन बन गया है बेटा खाले गायत्रीदेवी मानो समझ रही थी की जगह नारायण पाठ न कर रहे होते तो अभी क्या बोलते हैं? बकौल बैठ जाता है अरे एक बार चिंटू को भी बाहर से आवाज लगाकर बुला ले । साठ नहीं खा लेगा । बकौल बैठ चुका था अब फिर से मन मारकर उठता है मोटे इंसान को बैठने के बाद उठने का सुनते ही लगता होगा कि इससे अच्छा तो काला पानी की सजा दे दो फिर भी थोडा आसान पडेगा । बकौल चिंटू को बुलाने के लिए उठता है । चिंटू ठाकुर का चचेरा भाई है । वर्षों पहले बस कुर्की मौसा जी को अचानक हटाए आया और उनके सदमे में मौसी भी कुछ दिनों बाद शांत हो गई । छह सात साल की उम्र में चिंटू अकेला रह गया था । तब गायत्रीदेवी ने जगह नारायण से कहा कि चिंटू को संभालने वाला कोई और नहीं तो हम अपने साथ रख लेते हैं । तब से चिंटू गायत्रीदेवी और जगह नारायण को मम्मी पापा ही बुलाता है । अभी कॉलेज में पडता है । चिंटू पापा सरकारी नौकरी में थे तो उनकी पेंशन से चिंटू का सारा खर्च निकल जाता था । बाकी और चिंटू को बाहर बुलाने गया । चिंटू अपने दोस्तों के साथ था । इतने सारे दोस्तों के बीच देख कर ही ब कुर्की हिम्मत नहीं हुई उसे आवाज लगाने की । उसे हमेशा की तरह डर लगा कि फिर से लोगों से देखकर हसाएंगे उसका मजाक उडाएंगे हम नहीं मैं तो बाहर दिखाई नहीं मुझे कुछ वहाँ से आकर छोड देता है । मकुर जगत नारायण के नजदीक फिर से खाना खाने के लिए बैठता है तो इतने बडे शरीर का छोटा सा हिस्सा जलती हुई हूँ । पांच । अगर बत्तियों पर पड जाता है जगह नारायण उसे गुस्से में देखते हैं । बकुल गरम गरम अगर बत्ती के दर्द को भूलकर फौरन शहर चुका लेता है, छोटे से घायल हैं अक्सर बखपुर के उठने बैठने चलने पर कुछ ना कुछ हो ही जाता है हूँ । सवाल पहले ही छोटा है । उसमें भी एक पलंग भी अच्छा होता है और उसके अलावा बस एक कमरा । वे भी छोटा सा जिसमें बकुल और चिंटू होते हैं । माँ बाप और को खाना परोसती है और बकुल फौरन तेजी से खाना शुरू कर देता है क्योंकि उसका गुस्सा भी ठंडा नहीं हुआ था । तब तक जगह नारायण का भी पार्ट हो चुका होता है । हजार बार कहा है खाना शुरू करने से पहले भोजन मंत्री बोला करो राम मान के घर पैदा हुए हो । किसी नहीं जाती क्या? नहीं जगह? नारायण ने आसन से रोड से उठते चीजें जगह पर रखते हुए कहा, बाॅन्ड सुनते ही एकदम हाँ जोड, आंख बंद करके मंत्री बोलने लगता है । अरे बुद्धि शिप्रा नदी में फेंक आया है क्या झूठा करने के बाद भोजन मंत्र बोलकर क्या पाप चला रहा है सिर पे जगत नारायण ने बखपुर के बिल्कुल नजदीक आते हुए कहा मछली जल्दी से रोटी दे तो भूक लग रही है । चिंटू ने अंडर आते ही बिना किसी पर ध्यान दिया । आसन पर बैठते हुए बोला चिंटू कई है । बोलते ही जगह नारायण का उसे गुस्से में देखना एवं बहुत और गायत्रीदेवी का चिंटू को देखना, पूरा बोलना । नेता भगवान के नाम पर रोटी देने मई जैसे मैं भिखारी हो जाकर बनते हैं । जगत नारायण ने चढते हुए बोला खाना दे दो नामा चिंटू ने पिता जी के गुस्से के कारण को समझाते हुए हैं और अपने शब्द को बदलाव गायत्रीदेवी की खाना लगाते ही किंतु फौरन खाना शुरू कर देता है । बिना भोजन मंत्र बोले जगह जा रहा है । फिर से गुस्से में देख रहे हैं ऍम कल से पहले भोजन मंत्र बोला करूँ, उसके बाद खाना शुरू किया करो । गायत्रीदेवी ने जगह नारायण की बोलने से पहले बचाव करते हुए बोला मानता छोडो हाथ तक नहीं तो बाहर से आकर इन्होंने भ्रमण के घर को नरक बना रखा है । बोलते बोलते जगह नारायण बाहर चले जाते हैं । इतना तो ये दिनभर पूछा पार्ट नहीं करते, कितना गुस्सा करते हैं । गायत्रीदेवी ने उन्हें जाता देखकर कहा जगत नारायण के जाने के बाद ब कुर्ने जमकर खाना खाया । ठीक लोगों को तो फिर भी इतना अच्छा खाने को मिल रहा है हमने तो ऐसे ऐसे दिन देके सबकी तक नहीं होती थी । घर में हाँ घंटे की रोटी बनाती और आटे की सब्जी भी बनाती थी । गायत्रीदेवी ने तुरंत खुद को अपनी पुरानी यादव में ले जाते हुए कहा

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यह उपन्यास उन तमाम लोगों के लिए है जिन्होंने अपनी जिंदगी में कभी-न-कभी किसी मोटे आदमी का मजाक उड़ाया है। न पढ़ा, न लिखा, न कुछ सीखा, वो अब खोटा हो गया। उसकी जीभ हर पल लपलपाई, वो बेचारा मोटा हो गया। writer: अभिषेक मनोहरचंदा Script Writer : Mohil Script Writer : Abhishek Manoharchanda
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