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Part 3

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लक्ष्य की ओर चलने वाले को बीच में विश्राम कहा? सिर्फ चलते जाना है चलते जाना है कहीं भी शिथिलता या आलस्य नहीं ज़रूर सुने, शिखर तक चलो बहुत ही प्रेरणादायक कहनी है। writer: डॉ. कुसुम लूनिया Voiceover Artist : mohil Author : Dr. Kusun Loonia
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होटल सिटी पैलेस के पांचवें तल पर रात्रिकालीन ड्यूटी कर रहे सहायक वो मैनेजर केशव आकाशवाणी से समाचार सुन रहे थे । अकस्मात अपने आपको प्रकंपित पाकर विस्मित हो गए । दृष्टि उठाकर सामने देखा तो उनकी मेज और उस पर रखा सामान भी तेजी से काम पे था । अपने पांवों के नीचे प्रकंपित होती धरती को महसूस कर रहे हैं । भूकंप की तीव्रता को तार गए । काफी दीवार ही किसी भीषण प्राकृतिक आपदा का पूर्वाभास दे रही थी । कुछ सेकेंडों की सनसनी के पश्चात सबकुछ सामान्य हो गया । पुराना केशव का ध्यान रेडियो की ओर गया । अचानक उन के समाचारों में हिंद महासागर के इस समुद्री क्षेत्र में सुनामी आने की संभावना के बारे में सुना । वह चिंतित हो उठा हूँ । टेशन ने तुरंत होटल में फॅस बजा दिया हूँ । इंटर ब्रॉडकास्टिंग सिस्टम से उद्घोषणा करवा गई की कृप्या सब शीघ्र अति शीघ्र होटल छोडकर दूर दराज में सुरक्षित स्थान की ओर खोज करें । अचानक केशव को ध्यान आया । ॅ अरे शिवा कमरे में अकेला सोया है । उसका तो दरवाजा भी बंद है । फ्लोवर के इस छोर पर लॉबी थी । अंतिम छोर पर कमरा नंबर पांच हजार था । केशव ने उसकी चार ही उठाई तेजी से दौडते हुए कमरे के दरवाजे पर पहुंचा हूँ । ऍम हाथों से दरवाजा खोल ही नहीं पा रहा था । फिर क्षण भर के लिए संयमित होकर उसने जैसे ही चाहती लगाई दरवाजा खुल गया और तभी भयंकर शोर सुनाई दिया हूँ । केशव को लगा हर सब कुछ घटना हो जाएगा । होटल की इमारत खेल उठी थी हूँ । शोर इतना तेज था कि शिवा रीड जब करोड बैठा हूँ उसने देखा के पास में ना मम्मी है ना पापा वी रोने लगा । मम्मी मम्मी केशव ने बिना एक क्षण गंवाए शिवा को गोद में ले लिया । वहीं रखी पानी की बोतल उठाई और लिफ्ट की तरफ दौडा । भूतल पर पहुंचकर पिछले दो बाहर से बाहर भागा हूँ । दौडते दौडते बहुत दूर निकल गया हूँ जो गोल काफी पीछे छोड गया था । हमने एक छोटा सा यात्री निवास दृष्टिगत हुआ हूँ । केशव ने वही शरण लेने को सोचता हूँ । एक दिन बीता दो दिन भी थे । तीसरे दिन भी केशव ने बहुत ढूंडा बहुत खोजा । बची हुई इमारतों में राहत शिविरों में उनके होली का उल्लेख करके भी लोगों से पूछा किन्तु उनकी सारी मेहनत बेकार गई । सीमा एवं सोमेश की कोई खबर नहीं है । ऍम रो रो कर बुरा हाल था तो उसे मम्मी की बहुत याद आ रही थी । इन तीन दिनों में उसने बिस्कुट का एक टुकडा भीमू में नहीं डाला था । बस एक ही रंग बंदी के बाहर जाना है । मम्मी पांच जाना है । किसी तरह बहलाफुसलाकर केशव नहीं थोडा बहुत दूध जबरदस्ती पिलाया । आज थोडी देर के लिए बिजली की सप्लाई प्रारंभ हुई थी । टेलीफोन नहीं नहीं अभी ठीक नहीं थी । मैं सोच रहा था उसके लिए परिवार में सब चिंतित होंगे । लेकिन खबर का तो कैसे करें? कुछ दिनों पश्चात टेलीफोन लाइनें ठीक हुई तो उसने माँ पिता जी से बात की । सबको आपने कुशल छेम के समाचार प्रेषित करके केशव शिवा के बारे में चिंतन करने लगा । अब इसका क्या किया जाए? अभी हफ्ता भर पहले ही उसने अंग्रेजी अखबार में यू । एस । ए । के एक निस्संतान दंपत्ति की अपील रखी थी । वो ऐसा ही बच्चा चाहते थे और इसके लिए हजारों डॉलर पेमेंट करने को तैयार थे । इस समय इतनी बडी राशि उसके लिए बहुत मायने रखती थी । शाम को लेकर मैं अपने स्तर पर आ गया । मैंने देखा ऍम तो थी । केशव ने कहा यहाँ बैठा हो जाऊँ । ऍम मुझे हमेशा लोरी सुनाती थी । उसके बिना आपॅरेशन को याद आया । वो भी तो हमेशा अपनी बडी बहन सावित्री डॅडी सुनकर इस होता था । सावित्री दीदी को बच्चों का बहुत जाता था हूँ । सीजेरियन होने के बावजूद बेटा पाकर बहुत खुश थी, लेकिन दीदी की खुशियाँ क्षणिक थी । ऍम होने से छठे भी नहीं उनका बेटा चलवा हूँ । डॉक्टर ने दोबारा चांस लेने के लिए पहले ही साफ मना कर दिया था, क्योंकि इससे धीरे की जान को खतरा था तो तभी से सावित्री दीदी गहरे अवसाद की शिकार होगा । बीमार रहने नहीं नहीं, शरीर भी सूखकर कांटा हो गया था । जीजा जी भी हालत में अपने व्यापार पर पूरा ध्यान नहीं दे पा रहे हैं । केशव ने सोचा कि शिवा को पुत्र रूप में बात है । सावित्री दीदी कितना खुश होंगी हूँ । अगर उनका बेटा जिन्दा होता तो आज इतनी ही उम्र का होता हूँ । एक तरफ हजारों डॉलर का लालच है । दूसरी तरफ अपनी प्रिय बहन की खुशियाँ ऍम भयंकर अंतर्द्वंद में फंस चुका था । मैं शिवा की मासूम सूरत देखने लगा । देखते देखते उसे अपने बहन की अनुभूति होने लगी । आखिर पैसे पर प्यार की विजय हुई हूँ । केशव नहीं शिवा खो साबित्री डीडी को सौंपने की ठान ली । क्या सारे तेरी दीदी शिवा का सही तरीके से परवरिश कर पाएंगे? क्या शिवार दीदी को अपना पाएगा?

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लक्ष्य की ओर चलने वाले को बीच में विश्राम कहा? सिर्फ चलते जाना है चलते जाना है कहीं भी शिथिलता या आलस्य नहीं ज़रूर सुने, शिखर तक चलो बहुत ही प्रेरणादायक कहनी है। writer: डॉ. कुसुम लूनिया Voiceover Artist : mohil Author : Dr. Kusun Loonia
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