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Part 2

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यह उपन्यास उन तमाम लोगों के लिए है जिन्होंने अपनी जिंदगी में कभी-न-कभी किसी मोटे आदमी का मजाक उड़ाया है। न पढ़ा, न लिखा, न कुछ सीखा, वो अब खोटा हो गया। उसकी जीभ हर पल लपलपाई, वो बेचारा मोटा हो गया। writer: अभिषेक मनोहरचंदा Script Writer : Mohil Script Writer : Abhishek Manoharchanda
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भारतों दादी का पूरा दिन आप ठाकुर को खिलाने में बीतता था । कभी गोदी में, कभी कंधे पर, कभी अपनी खाट पर, कभी झूले पर वैसे बुढापा उम्र की सीमा होती है जिसमें अक्सर जीने के उत्साह मर्सी जाती है । लेकिन घर में आए बच्चे अक्सर बूढे लोगों के फिर से जीने की वजह बन जाते हैं तो दादी वकुल के खाने पीने का विशेष ध्यान रखती थी । हमेशा बखपुर को शुद्ध देसी ताकत वाली चीजें ही खिलाती पिलाती थी । रोज सुबह जाकर गाय का ताजा निकल ता हुआ । दो ला दी थी और दिनभर पिलाती अगर मच्छर के काटने से भी बकुल को रोना आता तो दादी फौरन दूध की बॉटल लगा देती हूँ । अगर गिरने पडने पर भी रोना ऍम दूध की वोटल ऊपर आ जाती है । एक साल बकुल को दादी का बहुत लाड प्यार मिला । दादी जितना खयाल बगोर का रखती है उतना ही का आलू का भी रखती हूँ । चालू हुआ है जो बगल के साथ ही पैदा हुआ था । जमुना का बेटा । हमेशा घर के पीछे बरामदे में जहाँ जमुना और कालू बंधे रहते थे वहीं डाली की एक खाट लगी थी । बस वो बखपुर को वही हमेशा कालों के साथ खिलाती और कहती देखो तुम दोनों भाई हो, एक ही साथ पैदा हुए हो, कभी आपस में लडना नहीं । यह सुनते ही हसते हुए बक्कर की हंसी अचानक रुक जाती और आखें दादी पत्ते जाती । बकौल के पेटा जगत नारायण, जो सुबह जल्दी उठकर अपनी ऍम करते हैं न! हाँ घर महाकाल मंदिर जाते हैं । वर्षों से वे उसी मंदिर में पंडित हैं । मंदिर का गर्भगृह संभालने वाले पुजारी से जगत नारायण की अच्छी बनती है । इसीलिए सुबह जल्दी जाकर भोलेनाथ केश अंगार में हाथ बटाने का सौभाग्य भी कभी कभी प्राप्त कर लिया करते थे और उनके द्वारा किए गए श्रंगार के दृष्टिकोण की प्रशंसा पूरे मंदिर प्रांगण में हमेशा होती और शाम को जब भी घर आकर नहा धोकर पाठ करने बैठे ब खुद को भी गोद में बैठाते हैं और कहते हैं देखो वो कितने ध्यान से सुन रहा है । पंडित बनेगा ये भी बडा हो गया है । उनका यह नजारिया कुछ ही मिनटों में तब बदल जाता था जब ठाकुर के गोदी में सोच तो करते ही रह कहते थे डैडा बनेगा । ये तो बडा होकर दादी के लाड प्यार और कालू के साथ खेलते खेलते हैं । बकौल का बीस किलो का हो गया पता आॅल्टर सिर्फ पांच साल का ही हुआ था लेकिन अभी थोडा ज्यादा सोलह सोलह देखने लगा था । आस पास के लोग, मेहमान, रिश्तेदार जो भी आते हैं भरतपुर के फूले फूले गाल इतने आनंद से खींच से जैसे इनके मन कोष की गाल खींचने से मोक्ष की प्राप्ति हो । नानी की उम्र की एक और बूढी दादी रोज सुबह सुबह जमुना का ताजा दूध लेने आती थी और बकौल को रोज गोदी में उठाकर पडोस की ही किराना दुकान से एक ट्रॉफी दिलाती ट्रॉफी देने के बाद दो बार गाल खींचकर उसकी कीमत वसूलती थी । कभी कभी साथ में वो अपने पांच साल की पोती । इससे वह गौडियां हमसे बुलाती थी । उसे भी लांदी थी और जब तक उन्हें जमुना का दूध ना मिल जाता । गुडिया बखपुर को ही घोलकर देखा करती थी लेकिन थोडे दिन बाद तीनों अच्छे दोस्त बन गए थे । बकोरी गुडिया और कालू रोज सुबह सुबह डाली जब जमुना और कालू को चलाने के लिए लेकर जाती थी तो गुडिया भी आ जाय करती थी दादी बकौल और गुडिया दोनों को जमुना के ऊपर बिठा दिया करती थी और थोडी दूर पर एक मैदान में लेकर जाती थी जहाँ की घास कालू और जमुना चलते थे और उस दौरान बकुल और गुडिया भी घास तोड तोड कर लाते और कालों से मस्ती करते हुए उसे खिलाते थे । कानून थोडा बडा हो गया था तो बस कुर्की जिद पर दादी उसे कालू के ऊपर भी बिठा दिया करती थी । एक बार मैदान में कीचर था और कालू के गड्ढे में पैर रखने की वजह से मैं लडखडाता है और ठाकुर कीचड में मिल जाता है । मकुर की हालत देखकर दुनिया बहुत हस्ती है और बकौल आलू को बहुत डांटा है । एक दिन बांकुरों और गोलियाँ दोनों जमुना के ऊपर बैठे होते हैं । जमुना मैदान में घाषणा नहीं होती है । तभी चार पांच कुत्ते आकर जमुना पर भौंकने लगते हैं और जमुना बचाना डर के मारे भागना शुरू कर देती है । बक्तूर और गुडिया भी डरने लगते हैं । वेदादि रानी चलाकर आवाज लगाते हैं । जमुना कुत्तों से बचने के लिए पूरे मैदान में भाग रही है । उसके पीछे कुत्ते भाग रहे हैं और उनके पीछे एक पतला सा डंडा लेकर दादी भाग रहे हैं और उनके पीछे कालू भाग रहा है । चारों में से कोई भी नहीं रुकता तो थोडी देर बाद जमुना और कालू दोनों मिलकर कुत्तों को सिंग मारकर भागने में कामयाब होते हैं । बकुल और गोडिया को दादी नीचे उतारती हैं और दोनों का रोना बंदी नहीं होता । समय के साथ साथ दोनों और भी बडे होते जा रहे थे । बकुल और गोलियाँ एक साथ स्कूल में पढते थे लेकिन पाक और आप भी वैसा ही था । किसी से कुछ नहीं बोल पाता था शर्मा उसका कहना था, मानो सबके सामने आने में घबराता था । उसे कोई मोटा बोलता था तो उसे रोना आ जाता था । पर वह पलट कर कभी भी जवाब नहीं नहीं पाता । लेकिन गौडियां ऐसी बिल्कुल नहीं । क्लास में किसी बच्चे ने बकुल को मोटा कहा और उसे रोना आया तो गुडिया उससे जाकर बैठ जाती थी । पीठ पर दो चांटे मारे गुडिया ने और बच्चा रोने लगा । तब मैडम ने आकर गोलियाँ को हाथ ऊपर करके खडा रहने की सजा दी । उस दिन से बकुल को गुडिया और अच्छी स्कूल ज्यादा बुरा लगने लगा । मन मार मार कर पढाई में कब तक और पांचवी कक्षा में आ गया ॅ । इससे ज्यादा यह पता नहीं लगा कि वह कब बीस से पैंतीस किलो आ गया । आप बाकी और क्लास में बाकी सारे बच्चों से हालांकि दिखाई पडता था । एक दम बडा शरीर सब कुछ बोला बोला इसीलिए बखपुर को अंतिम बेंच पर बैठना पडता था । प्रार्थना करते समय लगने वाली लाइन में भी सबसे अंत में लगना पडता था और अब बस खुरका मोटापा उसके लिए परेशानियां खडी करना शुरू कर चुका था हूँ । प्रार्थना करने के लिए खडे होने पर कई बार पैंट फट जाती थी । अच्छे कर रहे देखने पर सब हर दिन वही रंग बोलकर चिढाते थे । ए डॅडी वाले फॅमिली चड्डी वाले । धीरे धीरे स्कूल में शरारती बच्चों ने बखपुर के अलग अलग नाम रखना शुरू कर दिया था । मोटे गेंदें खाती फुग्गे जारिये हैं हूँ हूँ से अभी भी आता था लेकिन अब वहाँ अकेले में होता था ॅ । सारे नामों में से एक नाम गुडिया ने भी रखा था । सिर्फ उसी नाम का बकुल को कभी भी बुरा नहीं लगा । ऍम को बारह बडकुर आदमियों का दोबारा इस क्लास तक बाकी और उसी की वजह से आप आया है । बांकुरे इस बात से परेशान था क्योंकि उसका ये स्कूल सिर्फ पांचवीं ताकि था और उस समय पांचवी की बोर्ड परीक्षा हुआ करती थी । इसलिए यहाँ से पास होने के बाद फिर सब अलग अलग किसी ने स्कूल चले जाएंगे । परीक्षा होने के बाद गर्मी की छुट्टी को भी दो महीने बीच चुके थे । जगत नारायण खाना खा रहे थे । ध्याडी और गुडिया की दादी दोनों साथ में स्कूल से बकुल और गुडिया के रिजल्ट लेकर आते हैं । दादी कहती हैं गायत तेरह छोरा तो फेल हो गया पांचवी में बकौल का पढाई में मन कम लगता है ये तो जगह लगाये जानते थे पर इतना काम की फेल हो जाएगा । ये आज जान पाए थे । उन्होंने खाना छोडकर भी नाथ होते हुए पहले बखपुर को धोना उचित समझा । गायत्रीदेवी और दादी के बीच बचाव में बीच बीच में थोडा बहुत ब्रेक करो मिल रहा था लेकिन जगह नारायण नहीं रोक रहे थे । फिर गोडिया कीडा डीबीआई भी बचाव में तब जगह नारायण के हाथ रख के और बातों बातों में दादी से पता लगा कि गुडिया तो पास हो गई । मार खाने से ज्यादा बाकुल को दुख इस बात का हो रहा था कि गुडिया पास हो गई ऍम दूसरे स्कूल में चली जाएगी और बाकी और उसी स्कूल में रह जाएगा । पहले ही तो पढने में मन नहीं लगता था । अब यह सुनकर तो पूरा हो चुका जोरो कर उसका बुरा हाल था क्योंकि अब गुडिया बखपुर के साथ नहीं रहेगी । अब स्कूल में चिढाने वालों से कौन भिडे का कौन बखपुर का ध्यान रखेगा और कौन उसे बोलेगा । दो बारह बखपुर आदमियों का गुब्बारा

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यह उपन्यास उन तमाम लोगों के लिए है जिन्होंने अपनी जिंदगी में कभी-न-कभी किसी मोटे आदमी का मजाक उड़ाया है। न पढ़ा, न लिखा, न कुछ सीखा, वो अब खोटा हो गया। उसकी जीभ हर पल लपलपाई, वो बेचारा मोटा हो गया। writer: अभिषेक मनोहरचंदा Script Writer : Mohil Script Writer : Abhishek Manoharchanda
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