Made with  in India

Buy PremiumDownload Kuku FM

Part 11

Share Kukufm
Part 11 in  | undefined undefined मे |  Audio book and podcasts
240Listens
आँख मिचौनी writer: रमेश गुप्त Voiceover Artist : Rashmi Sharma Author : Vishwa Books
Transcript
View transcript

दरबान सीकर मन्दाकिनी जी कहिए चाहे क्या मैं अंदर आ सकती हूँ कमरे में सितार की मथुरावासी आई पंद्रह कश्मीर रखें मैं सकपकाया सक्रियता अपनी तो आराम कुर्सी पे थे अनढके पक्ष को साढे खींचकर बैठकर उन्होंने एक दीर्घ निश्वास अच्छा की हरी स्माॅल तुम्हें मैं अच्छा हूँ चलो मेरे सामने वाली कुर्सी पर बैठे ही समझ भी नहीं आ रहा था कि वह मेरे पास क्यों नहीं सुबह तो मेरे कमरे में आई थी ऍम नहीं । ऐसी ही अच्छा बाद में मैंने सोचा कि मुझे ऐसे नहीं जाना चाहिए । ठीक है पर मुझे भी अफसोस आपको क्यूँ? मैंने आपके साथ काफी रोक हमें हमारा क्या नहीं नहीं ऐसी कोई बात नहीं है । कुछ कयामत की थी । मेरे ख्याल से उसको पहुंचाएंगे जी, मैंने तो उसको माइंड नहीं किया करते हैं । आप की तबीयत कैसी? क्यों मेरी तबीयत को क्या मुझे लगा था? क्या बीमारी है? नहीं तू मैं काम नहीं देंगे । फिर उन्होंने गहरी संस्कृत, एक दम स्वस्थ नॉर्मल होने की भूमिका जैसी कल रात को मैं अपना बाकि पूरे निकल पाए । मैं साहसी नहीं जुटा पाए । तेजी दौर खबरें हुआ एक तक उनकी होती है और भले और आश्चर्य की मिलीजुली अनुभूति से ओतप्रोत कल रात को क्या हुआ उन्होंने अधिकारपूर्ण स्पॅाट आपको नींद की गोली की जरूरत थी ना तो क्या हुआ मैंने सोचा जरूरत से ज्यादा सोचना भी बीमारी है हूँ मैं लचित हो गया ऐसा कौन सा इंसान है जिसको कभी का बाहर नेत्रविहीन रात ना बितानी पडती थी । नींद ना आए तो इसका मतलब ये तो नहीं खराब वर्ष में भीड भी तो गए थे । तो क्या मैं कांग्रेस की तरह करके अरब जानबूजकर? क्योंकि नहीं मंदाकिनी जी ने मेरी तरफ फूटकर दिखा फिर मुस्कराकर पूरी हम काफी होशियार होती । याद नहीं कैसे जाना? मैंने साहस छोटा करूँ आज तुमने खाने की हडताल क्यों करती है? मैंने नोट किया । मन्दाकिनी जी मेरे नुकीले प्रश्न से साफ बचकर नहीं कर दिया । उन्होंने प्रसन्न हूँ कहाँ नहीं तू तो क्या फॅमिली थी ये सब आपको कैसे पता चला अभी दिनों से हूँ । लगता है तुम सुबह की बात का फरामान के जी नहीं तब तो ऐसा ही है । आप फिर अविश्वास करेंगे नहीं नहीं । फिर क्या है कोई खास बात तो नहीं । किसका क्या कह रही हूँ ठीक अजीत पंद्रह पंद्रह हादसा मोहाली फन किया था, अकेली क्या करती हूँ? बस यही बोर होता रहता हूँ । कभी पलंग पर पडा रहता हूँ या फिर बाहर निरुद्देश्य घूमने निकल जाता हूँ तुम कैसी की वहाँ? मन्दाकिनी नहीं जी ने अपनी ठीक ही नहीं मुझे ठीक रहती है । पूरी तरह से था पल भर के लिए मैं चौंका फिर कुछ नर्वस था हुआ ही संभाल के हूँ या क्या कह रही है? निशांत ऍम हो सकता है मैं नहीं कर लेती हूँ किसी गलती । मैंने एक बार में एक विज्ञापन देख उसकी छुट्टी फोटो हो तुम से भी लेती थी । सिर्फ इतना ही फर्क । इस फोटो वाली लडकी की तैयारी नहीं थी । पल भर की नहीं हिचका थे शीघ्र ही मैंने मन ही मन फैसला करती है । स्वयं आरोपित इस मान मास कर रहे ऍम दाकिनी जी को नहीं पता था कई बार गर्म हो जाता है ना ऍम हो सकता है अक्सर किसी को देख कर ऐसा लगता है मानो उसे हम पहले भी कहीं देख चुके हैं । किसका शायद तुम की कहती हूँ पर मेरी समझ में नहीं आती । क्या लोग कैसे भर्ती की हुई? नहीं क्या उतरती हूँ? यदि प्रश्न का उत्तर मेरे पास होता तो मैं घर से खुद क्यों था? क्या उनकी पास अपनी समस्या सुलझाने के लिए कोई और रास्ता नहीं? क्या ये हठधर्मी क्या ऐसे लोग कायल होते हैं? क्या उनका दृष्टिकोण एकांगी होता है । अभी दूसरी की दृष्टिकोण को समझता ही नहीं चाहती । मंदाकिनी जी बोलिए चली जा रही । मुझे लग रहा था जैसे वो मुझसे नहीं अपने आपसे ये ऍम प्रश्न पूछे जा रहे हैं । मुझे थोडी सी असुविधा और फॅमिली प्रसंग को बताना चाहता हूँ । इसलिए मैंने का अब चाहिए काफी कुछ देंगी । बंदा के नीचे मांॅ अच्छी थी । कॅश सबकुछ पता चला था । उसी बोली मैंने पहले ही कहा था तो काफी होशियार मालूम होती हैं । इस प्रशंसा के लिए धन्यवाद आपने मेरे प्रश्न का उत्तर नहीं थी कि समय कुछ भी लेने की छनी क्यों? अभी कुछ दिन पहले ही टोमॅटो दिया है । कॉफी भी पी अच्छा अचानक मुझे मिस्टर मल्होत्रा किया था । मन्दाकिनी जी को सोचे तो कर देना चाहिए कि वो उनसे मिलने आई थी । आपका कमरा बंद था हूँ । आप कहीं गई थी क्या आपकी बीजेपी ऍफ से मिलने आई थी । कांथि कोई मिस्टर मनोहर थी । मल्होत्रा मंदाकिनी जी के मुख पर भी चित्र से हूँ । फिर मैं उलझती हुई से बोलिए नहीं तो किसी मल्होत्रा को नहीं जानती । वो तो को खूब अच्छी तरह से जानते हैं । अच्छा मांॅ मैं तो आपकी काफी देर तक प्रतीक्षा करते रहेंगे । मेरी प्रतीक्षा कहाँ? मेरी कम नहीं है कि तीन दिन बैठिए यही कोई घंटे डेढ घंटे की घंटी ये चीज थी । आदमी काफी दिलचस्प, हसमुख और होशियार लगे तुम मिस्टर मल्होत्रा ऍम करती रहेगी । काश खेलती नहीं हम दोनों किस के साथ जमीन ली थी उन्होंने हाँ पर आपको कैसे पता चला हूँ? समय के साथ साथ अनुमान लगाने की कला ही जाती है । कहकर मन्दाकिनी सहित चर्चा दैनिक और से मंदाकिनी जी की होते हैं । उनके मुख पर अब पहली बार ना कि चाहती हूँ । उस वक्त सी लग रही थी निकलेगा । उन्होंने मिस्टर मल्होत्रा की पहले को सुलझा लिया है । मिस्र मल्होत्रा खूब अच्छे ही खेल लेते हैं । मैंने कहा कांजी तक अच्छा इसलिए मल्होत्रा और कितना तो हार हार होती हैं उसे? मैं आप से क्या फायदा? तो नहीं तो नहीं । कई बार बहुत अच्छे पति है । शो मेरी होनी थी, पर एक पति की प्रतीक्षा करते करते हार गया । शो होते होते रहे । चाहता हूँ कई बार हाथ फर्स्ट क्लास पत्ती होने पर भी ऐसी हानि हाँ शायद ठीक कह रही हूँ । आजकल तो ये ही जीते हैं जिनके हाथ में अविश्वास, संदेह, निर्ममता खेलना अन्याय के होते हैं । क्या कह रही हैं ऍम मन्दाकिनी जी के भयावह हताश अनिक मूड की आतंकी टाइमिंग टूटता चाहिए किसका अंजानी में ऐसी बात करके जिसका तरह तक लगाया जा सकता है फिर वो घबरा करता हूँ । फिर उन्होंने दोनों हाथों को हवा में फेंक कर वे अगर समझता से प्रकट करती हूँ मेरा वो मतलब नहीं था । मैं कहना चाहती थी कि हम मेरी समझ में नहीं आता है कि मैं अपने आप को कैसे स्पेशल करूँ । मैं समझ गया क्या यही है कि आज इंसान प्रेम, शराफत, नम्रता, विश्वास गया और सहानुभूति के पत्तों को हाथ में पकडे हुए हो । क्यों ठीक समझा ना? शायद पर बंदा की नहीं थी उनकी यह हार वास्तविक हार नहीं एक शाॅल मन्दाकिनी जी कुछ फिर संतुष्ट सीधे पूरी पर गंदे पर तो मानों कि जी तो उसकी होती है ना? जी नहीं ये चीज तो वास्तव में हार है करी है जिंदगी इतनी आसान चीज नहीं जितना तुम समझते हो । फॅमिली सिंदगी से टीवी रखती हूँ कि तुम किसी हारे हुए जुआरी से पूछा मुझे तो लगता है आपकी एक में है कई बार क्या हाल है आप ही बताइए मंदा की नहीं जी कुछ उदास हूँ की मुझे लगा वो अतीत की गर्त कुमार भरी करी होंगी तक नहीं ऍम को देखता हूँ हार को दोहराना बडी ही कष्ट प्रक्रिया है हम उसे रहने नहीं फिर आप आंटी भी उसका बोझ हल्का हो जाता है खुशी बांटने से बढ जाती है सिंदगी की पेस्ट ऍम अस होती है तो मैं कैसे तीस ऍम ये सब मेरी समझ से बाहर की बात है खाजपुरा एक वर्ष हो गया है उसका मेरी मुक्ति की कामना के काम पर मेरे पति ने अपनी स्वीकृति की सी लगती है ऍम ट्रेन चाहिए थी मनचाही बंधनों का चूना टूट फॅस उस छलना महीने मेरे प्रति बच्चे छीन हूँ मंदिर की नहीं थी अपनी संपत्ति सी स्मृतियों को क्रम से याद कर रही हूँ करने कल की सुनी बातों से इसका क्रम्प बैठा था । एक बात स्पष्ट हो चुकी थी मंदाकिनी परित्याग क्या और उनकी उनकी पति के बीच की विभाजक नहीं खाना है । एक नहीं जो अनाधिकार खींचता द्वारा दूसरों की जगह हथिया लेते हैं, उन पर विश्वास करना मोड करता है । ये खतरे से खाली नहीं पर शायद आपकी कह रही है । टूटने के बाद दो स्थिति आती है थाना पनकी जुडे रहे या फिर खंड खंड ऍम तो अगर यहाँ मेरे मुख से नहीं मेरी समझ में नहीं आता । मैं कहा बीच की स्थिति हैं भी जुडी हूँ अच्छी टक्कर फिक्सिंग अजीब परेशानी नहीं हूँ ऍम मन्दाकिनी जी की आंखें हो गई और उनका स्वर्ण फल आया हुआ है तेरी आंखों के सामने रहस्य की सारी पडते उठे ऐसी नारी गिरिजाघर के बस सीमेंट के बीच ठंडी पहंचकर नहीं क्या करें सिंघासन खैनी नारी की यही भी उठ खडी हूँ मुझे आपसे पूरी सही होती है मैं भी खडा हो गया आप सारी कॅश मुझे मेरा मतलब है मैं किसी की सहानुभूति की मोहताज नहीं उत्तेजित होकर पूरी शीघ्र ही संभव है फॅमिली एक छपा करो था क्या की हूँ न जाने किस ऍम हूँ आप मुझ पर भरोसा कर सकते हैं कि उस विश्वास की रक्षा करते हैं यह करो तेजी से कमरे से बाहर निकल के मैं कमरे में अकेला नहीं ही है । फॅमिली कितना कुछ तो माॅर्डन पर आकर बढाना, जिंदगी भी कैसी एम यूज पहली ऍम नहीं बाहर ऍम पहाडों पर रुपये प्रेक्षकों की फुनगियों से धोनी जैसे काले बात है नीचे वो कर रहे हैं ऐसी खुश हूँ पतली भरी तो कह रहे थे तीनो स्कूटर की पिछली सीट पर लम्बा रास्ता स्ट्रेंस की मेरी बगल में हाॅट मुझे बडी होती होगी । उस दिन सुबह से ही आकाश में बादल चाहिए लडकी थी थोडी थोडी बूंदाबांदी हो रही है हवा में मस्ती घर ही उनकी कहीं मैं कॉलेज पहुंचता था तीनो कॉलेज के गेट करी खडे थे मुझे देखकर ऍम ऊपर आकाश की ओर उठाया और ऍम मौसम है फॅमिली मैडम उदाहरण देना हो तो सही देना चाहिए ईद की लाइन कुछ इस तरह है मौसम है प्याज की एक ही बात है ना तीनों फिर भी कहाँ चलना है हूँ फिर ये है तो नहीं पूछेगी कहाँ चले तो बता दूँ सितारों से आगे जहाँ पीना कम होगी फिर मुझे छिडकती हुई बोली आज पडे रोमेंटिक हो रही हूँ ये मौसम से तुम्हारा पिकनिक पर चलाने का प्रस्ताव मैं तो फॅमिली हुआ हूँ और कोई हो तो कभी बन जाता है । अब तक बच्ची किए जाओ की या कहीं जाने का फैसला भी करोगे हूँ बट करले चली सुना है बडी खूबसूरत जगह है तो काफी दूर है पर जाना है कोई पैदल थोडी चलना है फिर भी खरीद ज्यादा दूर नहीं है कब तक लौट आएंगे हूँ हम लोग राॅकी उन्होंने मुझे कसकर पकडा जिसके संपूर्ण शरीर दस पर निर्भर चुनी । सुखद अनुभूति हुई हुई था राज स्कूटर थोडा टीमा कर लो ना नीनू नहीं मेरी और समिता कर मेरे काम था क्यों डर लग रहा है क्या? नहीं तो फिर सोचती हूँ ये रास्ता कहीं जल्दी नहीं हूँ । मैंने अपना सीधा हाथ पीछे क्या और तीनों का हत्था ऍन अपना हाथ छोडा गया और ऍम स्कूटर पर मत फरमाएंगे । मैं स्कूटर चलता है । कुछ देर तक मान छाया रहा हूँ सडक पर बहुत ट्रैफिक था काली काली पर क्या नीचे चुकी आ रही थी । किसी भी समय वर्ष हो सकती है । तुम चुप हो गए उन्होंने मेरे पीठ पर चुटकी काटकर अच्छा हैं । नहीं तो तो सोच रही हूँ था क्या यही की हनीमून मनाने कहाँ जायेंगे? ऍम इसमें जस्टिन की क्या बात है? तुम्हारे ऍम से ही थी । इसलिए मैंने कौन सी मीनू में मेरी फॅमिली नाम पहले पढाई खत्म कीजिए । हो जाए नौकरी लगाई, फिर हनीमून के सपने देखना शुरू कीजिए नहीं पर फिर चुके हैं । शायद उन्होंने ठीक ही कहा था हम लोग बट कल एक पहुंच गए । मैंने स्कूटर स्टैंड पर रखा । अंदर काफी भीड भाड । पीले कहाँ है? इधर तो दिखाई नहीं देती । उन्होंने पूछा उस ऊंची दीवार बांध के उस पार बोल नहीं सकते हैं हमारे पास खडी एक नहीं होती ने मुस्कराकर बीवी को उन्होंने एक दूसरे का हाथ पकड तेजी से बांध की सीढियां ऊपर एक लिस्ट बना हम लोगों पर पहुंचे तो दूर तक पर्वतों के बीच भी एक चीन दिखेंगे कितना सुंदर दृश्य ऍम हम दोनों बांध पर एक स्थान टाॅक तू तक सीमित जलराशि बिक्री पडेंगे अनायास बहुत हल्की बूंदाबांदी होनी मैं सडक है जैसे नमक राज एकता पूछूँ । पूछा साहस है तब ही नहीं होगा तो तुम से उधार ले लूंगा क्या? सच मुझे तुम उससे प्यार करती हूँ । पता नहीं क्या कहूँ तीनो पूरी तरह चाहते हैं तीनों प्यार कोई वस्तु नहीं जिसे शब्दों के माध्यम से अभिव्यक्त प्रिया सिद्ध किया जा सके । यह तो एक अहसास होता है किसी से किया जा सकता है हूँ मैंने काम ना की तुम्हारी कामना मेरी कामना कोई आधारभूत अंतर नहीं हूँ तीनों ने एक बडा सकंदर उठाते फिर में था ऍम पानी के दायरे खींचते ऍम फिर मेरी कंधे पर अपनी फॅमिली मैं ना जाने कौन से हम लोग नहीं होगी । हाँ,

Details
आँख मिचौनी writer: रमेश गुप्त Voiceover Artist : Rashmi Sharma Author : Vishwa Books
share-icon

00:00
00:00