Made with  in India

Buy PremiumDownload Kuku FM

बिलिसिया कांड

Share Kukufm
बिलिसिया कांड in  | undefined undefined मे |  Audio book and podcasts
2 KListens
इंसान के हाथों होने वाले अपराध की सच्‍ची कहानियों को बयां करता यह उपन्‍यास रहस्‍य और रोमांच से भरा है।
Transcript
View transcript

बिल्ली सी है । जैसी लावणी महीने होती के लिए नाम कुछ अटपटा लगता है वो बाईस वर्ष की दुबली पतली लंबी युवती तात्कालीन संयुक्त प्रांत सरकार के एक बहुत बडे अधिकारी ब्रजभूषण से आई सी एस के घर में आया का काम करती थी । एक केस अंदर ऐसा होता है जिसके प्रति सम्मान जाता है । मन में सद्भाव उठते हैं, दृष्टिकोण गंभीर होता है और एक ऐसा की देखते ही आग लगा दें । आमंत्रण देता था मदहोशी में दुबारा हुआ बिदेसिया का संदेह दूसरी तरह का था बच्चे भूषण सिंह एक कुशल प्रशासक हैं । उन दिनों उनकी पोस्टिंग लखनऊ में थे । मिश्र आईसीएस से उनके पडोसी नहीं । इन्हीं मिश्रा जी के तीसरी पत्नी मीरा मिश्रा अभिनेत्री के रूप में प्रसिद्ध थी । उन्नीस सौ सैंतालीस में ही सांप्रदायिक दंगों में उनकी मृत्यु हो गई थी । इन दोनों अधिकारियों के संबंध अच्छे नहीं थे और उन्हें खूब होल्ड चलती थी । जानकार लोगों का कहना था की उनके विवाद का एक कारण बिल्सी अभी नहीं । कल इसी को अपने मारक सौ के जादू का खूब पता था और वो उसका भरपूर फायदा उठाना भी चाहती नहीं । वो सिंह साहब के बंगले के आउट हाउस में रहती थी । बिल इसी के इरादों और कारनामों की भनक उसके मालिक के कानून में भी पहुंचे लेकिन आधुनिक विचारों की होने के कारण उन्होंने इस बात पर कोई मुश्किल सिद्धार्थ नहीं । सिंह साहब समझते थे कि वो जो कुछ करती है बंगले के बाहर और छुट्टी के समय में ही करती है । इसलिए उन्होंने उसे एक दो बार मामूली तौर पर डाट में बट करने के अलावा और कोई कदम नहीं उठाया । लेकिन मिलिसिया की हरकतें इतनी बढ गई कि मई तक वहाँ के वातावरण में काफी उत्तेजना आ गए हैं । ऐसा लगने लगा जैसे उस मकान के चारों ओर कोई खतरा बता रहा हूँ । और फिर छब्बीस मई उन्नीस सौ की रात को कलीसिया गायब हो गई । बाद में कभी भी जीवित या मृत दिखाई नहीं । फौरन ही पूछताछ शुरू हो गए । काफी लोगों ने इसमें दिलचस्पी नहीं उससे जैसे हिस्ट्री के बारे में ये कोई आश्चर्य की बात भी नहीं की । कितने लोगों की कितनी जल्दी उसके बारे में पूछताछ करने लगे थे । वैसे ये कोई नहीं आता था कि मिलिसिया कहाँ गई हो गई । उसे खोजने की छिटपुट कोशिश नहीं की गई । लेकिन विकास अब वही जरूर करे । खूब तेजी से पहले उसके बारे में पूछता । आज करने वाले अधिकांश व्यक्ति आस पास रहने वाले निम्र वर्ग किए थे । कोई कुछ कहता था तो कोई कुछ लेकिन एक बात की ओर सभी कर सके था और वो ये कि मिलिसिया की गायब होने में उसके मालिक ब्रजभूषण सिंह का आता है । उन दिनों श्रीमोदी संयुक्त प्रांत सरकार के चीफ सेक्रेटरी थे । ये अपवाहें उनके गानों तक भी पहुंची या यू गए पहुंचाएगी और इस काम में इन मिश्रा जी ने भी कभी दिलचस्पी नहीं । उस दिन प्रशासन में काली और गोरी ऐसी साहब के बीच काफी तनातनी गुरु, चीफ सेक्रेटरी आॅफिसर को अपमानित करने का अवसर हाथ से नहीं जाने दिया । बिल इसी के मामले में एकदम पुलिस से जांच का आदेश दे दिया । जैसे ही ये पता चला की पुलिस ने जांच शुरू की है इधर उधर बिखरी अब पुलिस तक पहुंच गई । इन अफवाहों के आधार पर खोश करते हुए पुलिस को कुछ उपकमांडर और उनसे सिंह साहब को मिलिसिया के है । हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया । चार अन्य वृद्धि भी बहुत बढिया है । उन चारों में एक था बहुत से मिसाइल सिंह की बहन का पति और सिंह का नौकर और दो बार से एक ऐसी ऐसे अवसर हत्या के आरोप में पकडा जाए । ये एक महत्वपूर्ण घटना थे । लखनऊ और नई दिल्ली दोनों ही स्थानों पर काफी चर्चा हुई । सिंह साहब की गिरफ्तारी के बाद आईसीएस वर्ग के दो दल हो गए । भारतीय आईसीएस सिंह को निर्दोष बताते थे और अंग्रेजी ऑफिसर उनकी इतना करते हैं । सुनवाई के लिए मुकदमा अंग्रेज स्टेशन जज की अदालत में आया । जब सिंह साहब को बंदी के रूप में अदालत लाया गया तो खचाखच भरे कोर्ट रूम में उपस्थित हर व्यक्ति के चेहरे पर उत्सुकता की ये देखा है नहीं गई । जज ने आरोप बढ कर सकता है । सरकार ने ब्रजभूषण सिंह पर हत्या के प्रयास का आरोप लगाया था लेकिन जज ने उसे बढाकर हत्या का आरोप कर दिया । सिंह पर केवल बिदेसिया की हत्या का आरोप नहीं था । उन पर क्या आरोप भी था की उन्होंने अपने को हत्या के आरोप से बचाने के लिए हत्या के प्रमाण नष्ट कर दिए । लाश गैर करते हैं हत्या के संबंध में अब तक सर्वाधिक गुप्त रखी गई थी इसलिए आरोप सुनकर दर्शक रोमांचित तोड हैं । चारों व्यक्तियों ने आरोप के उत्तर में अपने को निर्दोष बताया और इसके बाद सरकारी वकील ने आरोप पक्ष की ओर से मुकदमा शुरू किया । उसने यूरी के सदस्य को सलाह दी कि अपने दिमाग से ये ये खयाल निकालते की वो एक आई । सी । एस । के मुकदमे में बैठे हैं इसलिए पहले से सुनी अपनाए बुलाते हैं और अदालत में उपस्थित होने वाले गवाहों और सबूतों के आधार पर ही मुकदमे का फैसला दें । इसके बाद उसने मुकदमे का विवरण दिया । मुख्य बातें ये थी छब्बीस मई उन्नीस सौ को दिन में एक कथित अपराधी के घर में उसके एक बटलर सेमुअल के साथ बिदेसिया संभोग करती हुई पर गए । मिस्टर सिंह इस घटना से बहुत उत्तेजित ही और बिदेसिया की इस तरह की हरकतों को एकदम समाप्त करने का निश्चय लेकर अपने पति के लौटने की प्रतीक्षा करने लगे । शाम को साढे सात बजे सिंह साहब से लौटे तो होते हैं बिदेसिया के कारनामों की खबर दे दी गई । थकी मांदी और भूखे अवसर के लिए ये सुविधा बहुत हैं । उन्होंने उसे बुलाया और मारापीट । यहाँ आरोप पक्ष का खयाल था कि लडकी को मार मार कर अधमरा कर दिया गया था । इसकी एक घंटे बाद नहा धो कर कथित अपराधी आपने एक के मित्र के साथ डिनर पर चला गया और आधी रात के बाद लौटा । तब उसे पता चला कि मिलिसिया मारते हैं । इसके कुछ देर बाद एक कथित अपराधी अपने पत्नी और शोफर महावीर के साथ कार में बैठकर भंवरसिंह अपराधी नंबर तो घर साठ भेज दूँ जामगढ कुछ दिया गया बहुत सिंह की पत्नी मिस्टर सिंह की बहन थी । उनके घर बसंती नामक गद्दार से काम करते हैं जो बिदेसिया की चचेरी कहते हैं । आरोप पक्ष के अनुसार बिदेसिया का मृत शरीर घर के पिछले हिस्से में रखा था और इससे यात्रा का उद्देश्य उसकी लाश को ठिकाने लगाना था । संयोग की बात है की कार के पहिए पंचर हो गए और वह रामगढ गुलेरिया से एक मील इधर ही ठप हो गई । तभी एक बेलगाडी उधर से कुछ भी उसमें कुछ ग्रामीण बैठे हुए थे । गाडी रोककर उसमें बैठे ग्रामीणों से कहा गया है कि वे उन लोगों को भुवन सिंह के घर तक ले जाए । वो उन लोगों को भवन सिंह के घर पहुंचाकर आगे बढते हैं । ब्रजभूषण सिंह और पवन सिंह ने थोडी देर बाद जीत नहीं । इसके बाद भंवरसिंह ने अपने नौकर अपराधी नवति और दो पारसियों अपराधी नंबर चार और पांच को शोफर महावीर के साथ वहाँ भेज दिया जहां कार बिक्री पडी थी । वहां पहुंचकर इन चारों व्यक्तियों ने मिलिसिया के इलाज को उठाकर सडक से परे पेडों के झुरमुट में छुपा थी । इसके बाद उन्होंने लाश के टुकडे टुकडे कर दे रहे हैं । मांस को गीतों के लिए फेंक दिया और गड्डियाँ जंगल में इधर उधर छूट रहते हैं । इन हड्डियों के अलावा अब मिलिसिया का कोई निशान बाकी नहीं रहा था । दो दिन बाद पुलिस भुवानसिंह के घर पहुंची और पूछताछ करने के बाद भंवरसिंह, उसके नौकर और दोनों पार्टियों को गिरफ्तार कर लिया गया । नौकर और दोनों पासी पुलिस की जिला के सामने नहीं टिक सकें । उन्होंने अपना अपराध स्वीकार कर लिया और वे पुलिस को वहाँ लेकिन जहाँ मिलिसिया के शरीर की चीरफाड की गई थी । जहाँ हड्डियाँ से की गई थी वो स्थान भी उन्होंने पुलिस को दिखा दिया । पुलिस ने हड्डियाँ इकट्ठी कर ली और उन्हें मुकदमे के दौरान अदालत में पेश करते हैं । बाद में महावीर को भी गिरफ्तार कर लिया है । जब उसने देखा की वो कानून के शिकंजे से नहीं बच सकता है तो उसने भी अपना अपना अधिक स्वीकार कर लिया और जो कुछ जानता था पुलिस को बताते हैं बाद में कहीं वो मुकदमा जाए । इस आशंका से उसका बयान एक मजिस्ट्रेट के सामने लिया गया । सुनवाई के दौरान उसे एक गवाह के रूप में उपस्थि किया गया । मुकदमे के दौरान कई गवाहियां पेश्के गवाहों में प्रमुख थे । दो लोग आया है जिनमें एक हमे ला थी शो पर महावीर रात के समय रामगढ किलोरिया के पास, बैलगाडी में गुजरनेवाली ग्रामीण आदि । इन व्यक्तियों ने हत्या कांड की विभिन्न बातों पर ऍम लेकिन अदालत में महावीर मजिस्ट्रेट के सामने दिए गए पहले वाले बयान की कुछ महत्वपूर्ण बातों से इंकार कर दिया । इन बातों से उसके मालिक ब्रजभूषण सिंह पर अच्छी आती नहीं । सिंह साहब ने बडे ध्यान से दवाइयाँ सुनी । सरकारी पक्ष की दवाइयों के अंत में बज भूषण सिंह को कठघरे में बुलवाया गया । ब्रजभूषण सिंह जिस समय अदालत में बयान देने खडे हुए उस वक्त हर कोई उचक उचककर एक एक शास्त्र बडे ध्यान से सुने लगा । सिंह ने स्वीकार किया कि उन्होंने छब्बीस मई की शाम को मिलिसिया को मारा था लेकिन इस बात पर जोर दिया कि वह मारपीट बिल्कुल मामूली थी । केवल हाथों और बाहों पर जैसी खरोंचे लगी थी । जब वो भागने लगी तो एक चोट कमर पर भी पडी थी । उन्होंने कहा कि वह मिलिसिया की इस हरकत पर बहुत नाराज है क्योंकि कई बार इसके पहले भी उसमें ऐसा ही किया था । उसे पीटने के बाद वो अपनी पत्नी के पास गए और उस से कह दिया कि वह बिल इसी को फोर घर से निकाल रहे हैं । आधी रात में डाॅॅ पता चला कि बिदेसिया अभी तक घर में ही है तो उन्हें बहुत गुस्सा आया । वो उसे एक बाल के लिए भी घर में रखने को तैयार नहीं हुए और अपनी पत्नी और मिलिसिया को साथ लेकर भवन सिंह के घर चले गए हैं ताकि मिलिसिया को उसकी चचेरी बहन बसंती को सौंपा जा सकें । यहाँ तक सरकारी पक्ष और सिंह के बयान के जैसे मारपीट की मात्रा की अतिरिक्त अपराधी ने सरकार विपक्ष के विवरण को ही स्वीकार किया था । अंतर है वहाँ है जहाँ उन्होंने कहा था कि रात को लौटने पर उन्होंने मिलिसिया को अपने घर में पाया और उसके साथ भुवन सिंह के घर की ओर लखनऊ से एक कार में जाने वाली मिलिसिया जिंदा थी । क्या होता है आगे बयान देते हुए सिंह से हमें यह स्वीकार किया कि भवन सिंह के मकान से एक या दो मिल इधर उनकी कार पंचर हो गई थी । इसलिए ड्राइवर महाबीर को पंचर ठीक करने के लिए छोड कर वो उनकी पत्नी और मिलिसिया पैदल ही भवन सिंह के घर पहुंचे थे । जैसे ही महावीर ठीक करके भंवरसिंह के घर पहुंचा वैसे ही सिंहा बिदेसिया और अपनी पत्नी को वहीं छोडकर लखनऊ लौट हैं । उन्होंने कहा कि इसी बीच मिलिसिया सोच से निर्मित होने के लिए जंगल की तरफ चली गई और फिर कभी नहीं लौटी । उन्होंने उसे मारपीट कर जान से नहीं मारा और न ही उन्हें ये मालूम है कि वो कहाँ गायब हो गए । आपने मैं अन्य सिंह साहब ने बैलगाडी और उसमें बैठे ग्रामीणों की बात तथा चार व्यक्तियों द्वारा मिलिसिया के शरीर की चीज ऍम करके उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि पंजाब ठीक करने के लिए महावीर को पीछे छोड दिया गया था । गवाही खत्म होने के बाद सिंह से आपके वकील नहीं जीरा शुरू की है । उसने तर्क दिया की हत्या का अपराध प्रभावित करने के लिए की आवश्यक है कि अपराधी के मन में हत्या की इच्छा हो अथवा उसे ये पता हो कि उस प्रक्रिया से निश्चित रूप से किसी की हत्या हो सकती है । ब्रजभूषण सिंह के मन में मिलिसिया की हत्या की कोई इच्छा नहीं थी क्योंकि उन्होंने बहुत हल्की मारपीट की थी । ये हत्या का प्रयास भी नहीं था और साधारण या कोई भी व्यक्ति ये अंदाजा नहीं लगा सकता है कि इस से मारपीट से वो बढ सकती है या ये हो सकता है कि लडकी को कोई अंदरूनी चोट लगी हो जो रात में उभर आई हो और वो जब सोच के लिए गई हो तो उसकी मृत्यु हो गई हूँ । इस बात का भी कोई प्रमाण नहीं था की अदालत में जो हड्डियाँ प्रस्तुत की गई थी वो निश्चित रूप से फॅमिली, वस्तुतः और के श्रीनाथ असम बोलते हैं इसलिए बिल इसी की हत्या प्रमाणित नहीं होती थी और स्पष्ट की जिस अपराध का होना प्रमाणित ना हो तो उसके लिए किसी पर दूर नहीं लगाया जा सकता है । जूरी ने एक घंटे के विचार विमर्श के बाद सर्वसम्मति से अपना निर्णय दे दिया की किसी कथित अपराधी के खिलाफ कोई अपराध प्रमाणित नहीं था । जज ने हत्या के प्रमाण नष्ट होने के आधार पर जूरी का निर्णय स्वीकार करके बाकि अपराधियों को तो छोड दिया लेकिन वो सिंह साहब के विरुद्ध हत्या के अपराध पर जूनी की राय से सहमत नहीं हुए हैं । जैसे आपने लंबे फैसले में मुकदमे की सारी कार्यवाही पर विस्तार से विचार किया । बिल इसी की पिटाई के संबंध में उसने अपना मत इस प्रकार व्यक्त किया । ये तो पूरे तौर पर साबित नहीं होता कि मारपीट काफी जोर से की थी या मिलिसिया की मृत्यु मारपीट के कारण ही हुई । लेकिन मेरा ख्याल है कि दोनों पाया हूँ और खास तौर पर मुस्मात ॅ जिस तरह दवाई दी है उसे लगता है कि वह सच्चाई छुपा रही हैं । अभियोग पक्ष के बयानों पर विचार करते समय अवश्य दिमाग में रहना चाहिए । अपने फैसले के अंत में जितने ये धारणा व्यक्ति की थी कि बिदेसिया को पीते समय सिंह साहब बेकाबू हो बैठे और उन्होंने एक बडी लकडी से उसे बुरी तरह मारता है । मेरा ख्याल है कि मिस्टर सिंह ने ये जानते हुए कि उनकी मारपीट से बिदेसिया की मृत्यु हो सकती है, उसे बुरी तरह पीटा था । मार्केट की बात पर जज ने दो परस्पर विरोधी विचार प्रकट किए थे । इससे स्पष्ट था कि महत्वपूर्ण तत्पर वो भ्रम में थे । उसने बचाव पक्ष की ये बात अस्वीकार कर दी कि बिदेसिया की मौत किसी अंदरूनी चोट की वजह से हुई होगी । लाश ठिकाने लगाने के संबंध में जैसे उन ग्रामीणों की गवाही को अधिकांश सही मना जो टायर पंचर हो जाने के बाद उधर आने वाले थे । उसने कहा कि इससे गवाही से ये साबित होता है कि मिलिसिया उस समय साथ नहीं जज की इस धारणा से बचाव पक्ष का मामला काफी बिगड गया । सबसे अधिक उल्लेखनीय बात यह रही थी कि मिलिसिया को किसी भी करवाने नहीं देगा ना जीवित नमृता । हड्डियों के संबंध में जज ने गवाना पति और पांच की गवाही सही मानी और ये स्वीकार किया ॅ की हो सकती थी । वैसे उसे इस बात को साबित होने में देखा था । फॅसने बृजभूषण सिंह को हत्या के लिए नहीं बल्कि हत्या की कोशिश करने का दोषी ठहराया और छह साल के कडे कारावास का दंड सुना दिया । बहुत पूरा आईसीएसए ब्रजभूषण सिंह कोचिंग वर्ड्स की सजा भुगतनी के लिए जेल ले जाया गया । सजा की खबर सारे देश में फैलेगी । समाचार एजेंसी ने इसे विश्व के कोने कोने में पहुंचा दिया । ब्रजभूषण सिंह ने अवध के चीफ कोर्ट में इस फैसले के खिलाफ अपील की उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया है । लेकिन तब तो वो चार महीने की कडी कैद कर चुके थे । सभी तेजबहादुर सप्रू ने उनकी पैरवी की और बहुत खूबी से की । सर तेजी ने सरकारी मुकदमे की बुरी तरह नहीं ना कि उन्होंने कहा कि अभियोग पक्ष के अनुसार मिलिसिया का शरीर कार में रखा गया और कार में पंचर होने के स्थान तक ले जाएंगे । फिर वहाँ से सब लोग भंवरसिंह के मकान तक गए । यहाँ प्रश्न यह उठता है कि क्या उन्होंने कार में लाश को अकेले ही पडी रहने दिया होगा और वो भी एक ऐसी सडक जिस पर ट्रैफिक बहुत अधिक रहता है और फिर भवन सिंह ने जिस से पहले इस बारे में कोई खबर न थी फोर ही बिना सोचे विचारे अपने नौकरों को इससे बात की । अज्ञात दीदी की वो लोग महाबीर के साथ जाकर मिलिसिया का शरीर ऍम तीन अपर सीटों को अपना लाजा बनाने से पहले उसने कुछ भी नहीं सोचा । मोहन सिंह को कितना भी ध्यान नहीं है की इस तरह के काम से वो अपने और अपने परिवार की सुरक्षा को खतरे में डाल रहा है और फिर तीन तीन व्यक्तियों ने मिलिसिया के शरीर को छोड कर के उस की हड्डियाँ जंगल में की थी । वे भी बिना सोचे विचारे ऐसे बयान काम के लिए तैयार हो गए हैं । और फिर जिन तीन व्यक्तियों ने फॅमिली कि चीफ करके उस की हड्डियाँ जंगल में फेंकी थी वे भी बिना सोचे विचारे ऐसे भयानक काम के लिए तैयार हो गए हैं । उन्होंने एक बार भी ये नहीं सोचा कि उनके इस काम के परिणाम कितने भयंकर हो सकते हैं । सर तेज ने कहा कि मुकदमे का ये वंश पुलिस द्वारा बनाया गया है । देखते ही पता चल जाता है कि ये अंश असत्य और वास्तविक है । यदि एक ऐसी इस अवसर हत्यारा होता तो वो कहानी करने में इतनी ऐसा उडानी नंबर दत्ता इतनी भूले नहीं करता । चीफ कोर्ट ने सर तेज के डर के स्वीकार करते हुए अपने निर्णय में कहा कि लाख को नष्ट करने के संबंध में जो तथ्य दिए गए वे एकदम वास्तविक लगते हैं । उनमें कहीं भी वह सामान्य सूझबूझ नहीं चलती जो ऐसी स्थिति में आवश्यक होती हैं । इससे कहानी के बचा ही ये कल्पना कहीं अधिक स्वभाविक होगी की मृत्यु शरीर को यदि वो था तो मिस्टर सिंह और उनके शोफर महावीर ने रामगढ गुलेरिया पहुंचने से पहले ही ठिकाने लगा दिया होगा । चीफ कोर्ट के अनुसार लोकभवन सिंह के पास इसीलिए गए होंगे ताकि उस से मिलकर एक ऐसी कहाँ नहीं कर सके । चीफ कोर्ट के जजों ने राॅकी जूरी के सदस्यों की ट्राय को सही माना और कहा की अदालत में पेश की गई हड्डियों के बारे में ये प्रमाणित नहीं हुआ था कि वो बिल्ली सिया की थी । मारपीट के संबंध में जजों का ख्याल था कि सिंह साहब ने उसे इतना मारा जिससे उसकी मृत्यु हो गई और फिर लाश को कार में रखकर कहीं ले जाया गया । हालांकि ये प्रमाणित नहीं हो सका की मृत्यु शरीर को किस तरह नष्ट किया गया । मुकदमे में सबसे महत्वपूर्ण बात यह नहीं कि मृत्यु शरीर की कोई खोज खबर नहीं लग सके । मारपीट प्रमाणित होने की करण जी कोर्ट ने दंड को कायम रखा लेकिन उसकी अवधि घटाकर चार महीने करती । इतना दंड सिंह जहाँ पहले ही भुगत चुके थे इसलिए वो मुक्त हो गए । अब उन्हें जेल जाने की जरूरत नहीं थी लेकिन चीज कोर्ट में भी नहीं । हत्या के प्रयास में कहा अपराधी माना था । इससे अपने को निर अपराध घोषित कराने की उनके प्रयास में को बडा आघात पहुंचा । अब प्रिवी काउंसिल में अपील करने के अतिरिक्त सिंह साहब के सामने कोई और रास्ता नहीं था । उनके मित्रों ने उन्हें आर्थिक सहायता दी । उन्होंने सेम अपना भी सब कुछ दांव पर लगाने का फैसला करके चीफ कोर्ट के निर्णय के विरूद्ध टीवी कौंसिल में अपील करते हैं । प्रसिद्ध ऍम उनके मुकदमे की पैरवी की करके हिंदू प्रिंट के सहायक के रूप में कौंसिल में उपस्तिथ है । प्रीवी काउंसिल में वातावरण कुछ दूसरा ही था । वहाँ ना भारतीय अदालतों जैसा शोर शराबा था, ना अखबारों का भ्रामक प्रचार । पीवी काउंसिल की बेंच में सर जॉॅब ये तीनों जस्ट हैं । सत्रह अक्टूबर को मुकदमे का फैसला सुनाया गया । कोई भी काम सिलने, सफाई पक्ष की अंदरूनी चोट वाली धरना स्वीकार डालें । उसने कहा कि ये बात बिल्कुल विश्वास नहीं लगती है कि अगर अपराधी, ॅ ऑफिसर और उच्च वर्ग का सब संस्कृतिक व्यक्ति है, मिलिसिया को मार मार कर अधमरा कर दिया होता तो उसकी मरहमपट्टी की व्यवस्था कराए बिना ही बाहर चला जाता था और ऐसी स्थिति मना उत्तर के भावना के साथ साथ ये आशंका भी उसके मन में आवश्यक है कि इस लडकी की मृत्यु से वो बुरी स्थिति में फंस ऍम । लखनऊ में हुई दुर्घटनाओं का विश्लेषण करते हुए कौंसिल ने कहा कि इस बात का कोई गवाह नहीं है कि मिलिसिया को बुरी तरह पीटा गया । किसी ने उसे बेहोश जमीन पर गिरी हुई स्थिति में नहीं देखा । उसकी लाश देखने की बात भी किसी ने नहीं अभियोग पुछ के लिए बात भी प्रमाणित नहीं हो सकी की बिना किसी की मृत्यु निश्चित रूप से हो ही गई हैं कौनसी नहीं ये कहा कि चीफ कोर्ट में है । अभियोग पक्ष के मुकदमे के इस अंश की गवाई पर विश्वास करके गलती की । अपराधी के बयान पर विचार करते हुए काउंसिल ने कहा, अपराधी में आधी रात के समय मोटर यात्रा का जो कारण बताया था उसे तो भारतीय ऍम और वैसे भी ये बात अजीब लगती है कि अपराधी ने इतनी लंबी यात्रा केवल इसलिए की क्योंकि वो बिदेसिया के साथ उस घर में है, राहते बिताने को तैयार नहीं था । आधी रात के समय एक लंबी मोटर यात्रा की गई और उसके लिए गलत कारण बताया गया । इस बासी ये संदेह हुआ कि संभव है कि ये यात्रा लिसिया के मृत्यु शरीर को ठिकाने लगाने के लिए की गई होगी । ये संदेह को इस बात से और बल मिल गया की जब मोटर कार अपराधी के घर से रवाना हुई तब किसी भी गवाह ने मिलिसिया को जिंदा या मोटा नहीं देखा और फिर अपराधी ने ये भी स्वीकार किया कि वो अगले दिन गायब हो गए नहीं लेकिन संदेह साबित नहीं होता । इस बात पर निर्णय असंभव था की लंबी मोटर यात्रा और पुलिसिया के गायब होने से केवल यही एक अर्थ निकलता था कि अपराधी ने उसकी हत्या कर दी थी । लखनऊ की घटना में संदेह की गुंजाइश देख और लाश ठिकाने लगाने वाली बात साबित न होने पर टीवी काउंसिलें आपने देने में सिंह की अपील स्वीकार करके कारावास की सजा नामंजूर करें । ढाई साल के अपमानजनक जीवन के बाद ब्रजभूषण सिंह के सिर से मिलिसिया की हत्या का कलंक घट गया । उन्हें फिर से नौकरी में रखेगा गया लेकिन उनके जीवन में वह पुरानी बात फिर लौटे । इस बीच उनकी पत्नी की भी मृत्यु हो गए । मिस्टर सिंह मानसिक रूप से बहुत अस्त व्यस्त कोठे और प्रिवी काउंसिल के निर्णय के एक साल बाद उन्होंने आॅवर से आत्महत्या करने हूँ ।

Details
इंसान के हाथों होने वाले अपराध की सच्‍ची कहानियों को बयां करता यह उपन्‍यास रहस्‍य और रोमांच से भरा है।
share-icon

00:00
00:00