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भाग - 06

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लड़की की शादी होते ही और उसके ससुराल चले जाने पर किस तरह अपने पराए और पराए अपने हो जाते हैं, रिश्‍तों के इस भंवर को बीना न समझ सकी। और उसकी इस नासमझी ने पति-पत्‍नी के बीच दरारें आ गईं। उनके फूलों से सुखद जीवन में कांटों की चुभन पैदा कर दी। यह बात बीना को बहुत देर से समझ में आई कि उसके दांमपत्‍य जीवन में कटुता लानेवाली कोई और नहीं उसकी अपनी मां ही है। छोटी-छोटी बातों से गृहस्‍थ जीवन में किस तरह विष घुलता है और कैसे इससे बचा जा सकता है… इस उपन्‍यास में बड़ी रोचकता से बताया गया है। Writer: रा. श्याम सुंदर
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भारत छह हैं । जब तक मनुष्य जीता है तब तक वो वहाँ के बंधन में झगडा हुआ । अजीब सी छटपटाहट लिये हुई जीता है । उसी से ज्यादा अपने पराए की चिंताएं घेरी रहती है । दूसरों के लिए तो मनुष्य इतनी चिंता नहीं करता । सिर्फ साहनुभूति के कुछ शब्द बोलकर ये एक लंबी सी आहा भर कर रहे जाता है । लेकिन अपनों के लिए ऐसे घुल जाता है जैसे घुल लगा काॅस्ट कौशल्या देवी को भी दो चिंताएं खा जा रही थी तो बीना मायके बडी थी और दूसरे पीतांबर का बिहार आ जाना था । उन्हें ऐसा लगता था कि वह शायद अपनी बहू को इस घर में आगवानी करने के लिए नहीं रहेगी । वैसे उन्होंने बहु को देख लिया था और उन्हें वो बेहद पसंद दीदी । आशा को दो बार बुलाया भी गया और उसी उन्होंने पितांबर के साथ घूमने में भेजा था । पितांबर का खेला हुआ चेहरा देखकर कौशल्या देवी आश्वस्त ऑपरेशन हो ठीक है और उन्होंने मनी मनी बहुत बेटे को ढेर सारी आशीष दी थी । तो मैं चाहती थी कि जितनी जल्दी हो सके उतनी जल्दी इस लक्ष्मी से बहु को अपने घर ले आए । मगर ब्राहमन तारा डूबा रहने के कारण तीन महीने के बाद का मूरत शुभ रहा था और उन्हें यहाँ हर पर अपना आखिरी पल लग रहा था । इन दिनों ऑपरेशन के लिए अपनी स्वीकृति नहीं दे रही थी । वो कह रही थी कि कैसे भी हो वो इस ऑपरेशन की बात तो बच नहीं पाएगी इसलिए बेटे का ब्याज देखकर उसके बाद ही ऑपरेशन करवाएंगे । फिर अगर बढ भी गए तो उनके मन में साथ नहीं रहेगी की उन्होंने अपने बेटे का बयान ही देखा और अपनी भाव घर नहीं आएगा । लेकिन हालात दिन ब दिन भी करते गए और वो सही उधर पीर से छटपटाती हुई एक प्रकार की मुर्शिदा अवस्था में रहने लगी । उन की ये हालत देखकर मोतीराम ने उन्हें अस्पताल में दाखिल कर दिया और डॉक्टरों के दबाव डाले पर उन्होंने ऑपरेशन शीट पर भी हस्ताक्षर कर दिए । कौशल्या देवी ने सुना तो वह मोतीराम के कंधे पर सिर रखकर सिसक पडी और आंसू से उनका कंधा भी हो दिया । प्रलाप करने लगी । मुझे मेरी बेटी की शादी देख लेने दो फिर मुझे जहर पीकर मार देना । अभी मैं ऑपरेशन नहीं करवा होंगी ये तो मेरे लिए मौत है । अब मैं यहाँ से बजकर वापस घर नहीं जा सकती होंगी तो मुझे अपने घर ले चलूँ और ऍम को बुलाकर आपने पी तू की शादी कर दो । अब मुझे अपनी श्वासों का भरोसा नहीं रहा । मैं तुम्हारी बहुत पडती हूँ, मुझे घर ले चलो । जब स्ट्रेचर पर लिटाकर ऑपरेशन थिएटर ले जाने लगे तो फॅमिली टीवी जी एक बडी नहीं नहीं, मुझे जल्लाद ऊ के पास बर्फी जो मुझे बाहर डालेंगे । मैं चीरफाड से नहीं डरती, मौत से नहीं डरती । मगर मोतीराम ने उसके बाल सहना दिए और उसके पागल प्रलाप पर वितृष्णा से मुंह फेर लिया । ऑपरेशन थिएटर से मूर्च्छित अवस्था में कौशल्या देवी निकली जरूर, लेकिन उनका पेट फूला हुआ था । वो फूलता ही गया हूँ और उनका दम घुटने लगा । उनकी जबान बंद हो गयी । सिर्फ घर घर की फंसी आवाज आ रही थी । उन्होंने विवरण चेहरे वह पथराई आंखों से सबको देखा और सही यात्रा से वोट भेज लिए और एक और लुढक पडी मोतीराम स्थल खडे कौशल्य । देवी का निश्चल शरीर देखने लगे और उनकी आंखों में एक प्रकार की जलन से हुई । उनकी आंखों से अब बहुत गति से आंसुओं की धारा बहर पडी । अपनी सुखी छिपाने के लिए उन्होंने रूमाल मोमेंट उस लिया । तारा और बीना दोनों दहाडी मारकर कौशल्या देवी की निर्जीव शरीर पर लुढक पडी और पितंबर कोने में खडा अपनी सजल आंखों कोडो माल से पूछ नहीं लगा । कौशल देवी का शव परीक्षा के बाद घर लाया गया और मोतीराम ने भ्रमण के द्वारा सब भाई बन्दों को सूचना भेज दी । दूर निकट के रिश्तेदार जो बम्बई मद्रास आदि शहरों में रहते थे उन्हें तार भेज दिया गया । राकेश शवयात्रा में शामिल होने के लिए आया । इसके पहले वह कौशल्या देवी के बीमार होने की खबर भिजवाने पर भी देखने नहीं आया था । जब बीना ने राकेश को इस भीड में देख लिया तो उसने अपना मूड भेज लिया । उसकी माँ को जब बांस की खपच्चियों से बनी थी पर लिटाकर शवको रस्सी से कसते देखा तो दो हफ्ते मारकर उन्हें पीटने लगी और तो नहीं उसे थाम लिया और सांत्वाना देने लगी । शाम को जब शमशान से मर्द लौटे तो राकेश उनमें नहीं था । बीना ने दुख से अपनी कूट बीच लिए । तारा के ससुराल वाले मोतीराम को सांत्वाना के दो शब्द बोलकर चले गए और तारा वही ठहर गई । आशा के मायके वाले तेज तक मोतीराम को संसार का जीवन मरण का अटूट सिलसिला बता दे रहे और फिर आशा के साथ चले गए । सिया पे के बाद और से उठ कर चली गई सिर्फ पीना के साथ सारा उसकी मौसी मामी का की उसी बैठी थी । उन सबकी आंखें अभी भी लाल थी और लगातार होने की वजह से सूजी हुई थी । उनमें अभी भी आषाड की प्रथम कुमार से आंसू झलक उठते हैं । मौसी ने अपना नाक से करते हुए कहा बिचारी कौशल्य अपने घर में बहुल अनेक काॅमन में लाई चल बसी । कितना कहती रही कि पी तू की शादी कर दो । बेचारी ने कैसे दिन तिनका करके जोडा था और जब वो अपने बंगले में सुखी रह रही थी तो प्रकृति से भी उसका सुख फोर्टी आपको नहीं देखा गया । ये भी कोई उसकी उम्र भी मरने की । ताकि ने कहा अरे इन्ही चार छह सालों से तो इन पर लक्ष्मी मेहरबान हुई है । वरना उन दिनों इनके पास किया था पाकिस्तान से शरणार्थी होकर जब यहाँ आए थे तब बहुत गरीबी में गुजर बसर करते थे । गरीबी ऐसी वैसी नहीं एक बार में निकल गई थी । इसके घर तो वह झट परचून की दुकान भाग गई और पर उन चीजों से हाथ जोडकर एक पैकेट चाहे कुछ एक बाउल चीनी उधार ले आई थी, चुकी उस पर काफी उधर बताया था । इसलिए वो अक्सर कौशल्या देवी की ओर उधार मांगने पर जी दाल देता था । उस दिन उसने तरस खाकर कौशल्या देवी को अचानक मेहमान आने पर चाय का पैकेट पावभर चीनी दे दी । मगर उसने मेरे सामने कभी अपनी गरीबी का रोना नहीं रोया था । मैंने तो उसे आप भरते हैं । आंसू बहाते में कभी नहीं देखा तो कुछ वो चुप फॅमिली थी थी उसने कभी हमें खबर ही नहीं थी कि वह क्या खाती है और क्या पीती है । उसका गुजर बसर कैसे होता है और उसकी हम देने कितनी है । मौसी ने कहा तो ऐसा कहती हूँ । अरे मैंने उस दिनों एक दूध आंसू बहाते नहीं देखा था । कभी ऐसा नहीं देखा कि वह मांझी अपने भैया के पास आकर घर का रोना रोती या कोई अच्छी बुरी बात बताती हूँ । वैसे हम उसकी हालत से अनजान नहीं थी और ये तो हरदम कुछ ना कुछ सहायता करने के लिए तैयार रहते थे । बगैर जानती हूँ । उसने जितना वाजिब लेना होता है उस से बढकर एक ढेला भी ज्यादा नहीं लिया । मामी ने कहा, सच अजब जीवट हाउस में खुद खिचडी पापड खाती है या दाल फुल्का? उसने दूसरों की तरफ झांककर भी नहीं देखा कि कोई क्या खाता है । जितना उसका अपना कम्बल था उतने में ही वो पांव पसार दी थी । यानी लोग अक्सर ऐसा ही करते हैं । फिर जो कुछ था उसका तो उसे ही सामना करना था । जिंदगी हमें मिलती है खुद का मुकाबला करने के लिए । हम ही को तो अपनी जिंदगी की तमाम समस्याओं से जूझना पडता है । दूसरा कोई कर भी क्या सकता है । फिर ज्यादा लडकी का घर संचार सब कुछ तो अपने पति का घर ही होता है । घर भी तभी अपना घर बनता है जब हम अपने घर को अपना घर समझते हैं और अभाव गरीबी, दुख से घबराकर इससे दूर नहीं भागते अरी घर गृहस्ती गाडी चलाना इतना आसान नहीं है । इसी सुखसुविधाओं में हर कोई चला कर ले जा सकता है । लेकिन अभिभावक गरीबी के उत्तराई में कोई भलीभांति उतर कर लाए तो जाने उतरते वक्त थी तो काफी सतर्क । सावधान रहना पडता है वरना जा गिरती है बदनसीबी की खाई में पहले पहले जब मैं ससुराल गई तब छोटी मोटी बात अपनी माँ को जाकर बता देती थी । लेकिन जब मैंने देखा कि मेरी माँ की दखलंदाजी से घर में झगडा बढ रहा है तो मैंने माँ को कुछ भी बताना छोड दिया और घर में थोडी शांति सी रहने लगी । फिर जब देखा कि घर के सदस्यों को छोड कर के हमारे घर के कार्य परिवारों में किसी बाहर के व्यक्ति के हस्तक्षेप से हमारे घर की शांति डोले लगती है तो मैंने अपने घर के सदस्यों को छोडकर किसी दूसरे की दखल बाजी रोक दी और घर पर जो भी छोटे मोटे टंटे फसाद होते थे उन पर हमें सोच विचार कर कोई समझौता ढूंढ निकालते थे । फिर तो हमारी जिंदगी सुख चैन से बीतने लगी । ऐसा नहीं कि हमारे घर में सदर शांति ही रही हूँ । कभी कभी जाने कहाँ से प्रबल हवा के झोंके ऐसी बात उठ खडी हो जाती थी और हमें झील जोड कर रख देती हूँ लेकिन हमारे संबंध अडीग बने रहते हैं और एक दूसरे के प्रति हमारा विश्वास टूट रहता है तो वह बात हमारा कुछ नहीं बिगाड पार्टी खबरें लगता है की आधी के पेड की तरह हम थोडी देर के लिए छत जोड दिए गए हैं । फिर मर बर करते पत्तों की तरह चाहे जाने लगे हैं और झूलती डोलियों की तरफ फिर से हम एक दूसरे के कंधों का सहारा लेकर झूमने लगे हैं । दरअसल बहत अपने घर के सदस्य ही अपने होते हैं और घर के बाहर का व्यक्ति कितना भी घनिष्ठ ऊपर आया ही होता है उससे हमें पढाई की तरह व्यहवार करना पडता है । वरना मान लो तुम किसी को अपना हितेशी समझकर अपने घर के मामलों में शरीक होने के लिए बुला लेती हूँ और घर का दूसरा सदस्य किसी और को अपना हित चिंतक समझकर घर के व्यवहारों में दखल देने के लिए बुला लेता है और हम उन्हें अपने ही घर पर अधिक्रमण करने की छूट देते तो हमारे घर में सुख शांति कैसे स्थापित होगी? भाई जैसे अपने अपने देशों में लोग दूसरे देशों की दखलंदाजी पसंद नहीं करते उसी तरह मैं भी अपने घर में किसी की घुसपैठ पसंद नहीं करती । तभी तो आज तक मेरा घर अखाडा बनने से बचता आया है । दिया बाकी के समय जो ही मोदी राम ने घर में प्रवेश किया की हुई सब औरते उठ कर चली गई । इन दिनों मोतीराम शाम को जल्दी आ जाते हैं और अपने कमरे में जाकर चुप चाप ले जाते हैं । ऐसा लगता है जैसे कौशल्या देवी की मौत का दुख उन्हें घेरे हुए हैं । आज भी वो आते ही अपने कमरे में जाकर लेट गए । तारा एक प्याली में चाय और एक प्लेट में बिस्कुट लेकर उनके कमरे में गई । मोतीराम अपने कमरे में जीरो का बल्ब जलाकर आंखों पर कोहनी रखे लेते हुए थे । पिताजी पिताजी उठे, चाय पी लीजिए कहकर तारा ने बत्ती जला दी । मोतीराम क्या की रोशनी में चुन यहाँ गयी वोट कर बैठ गए और उन्होंने दो बिस्कुट उठाकर चाय में भी गोभी होकर खाये फिर चाय रखते हुए पी गए । पिता जी अब मैं ससुराल चली जाऊँ था । लेकर मोदी राम ने अपनी चुकी बल्कि उठाए और आखिर फैलाकर तारा को देखा । पिताजी तेल भी तो हो गई । अब मुझे वापस जाना चाहिए । तारा इतनी जल्दी भी किया है । बिना ने आकर कहा बेटी यहाँ भी तो अब घर संभालने वाला कोई नहीं रहा । भर्राए स्वर में मोतीराम नहीं काम । पिता जी भी तो बैठे है ना तो वो घर भर संभाल लेगी । अब आप मुझे कल भेज दीजिए । कल हाँ, मगर इतनी जल्दी भी किया है पर आये घर में तो नहीं हूँ । जो भी भागम भाग कर रही हो, ये भी अपने ही घर है दीदी मगर वो भी तो पर आया घर नहीं है । यहाँ की चिंता करके रुक जाओ तो वहाँ का ख्याल कौन करेगा? वहाँ पर तो तुम्हारी सास हैं ननद हैं भूके तुम्हारी गैरमौजूदगी में घर बार नहीं संभाल लेंगी टीवी संभालने को तो संभाल लेगी, लेकिन जाती ही में उनके तनी क्यों सुनूँ? मुझे तो माँ की तक यहाँ रहना जरूरी था, इसलिए ठहर गई । अब अगर मैं यहाँ रुक गई तो वह समझेंगे कि वहाँ के कामकाज एक जी चुराने के लिए मैं यहाँ बैठ गई हूँ । मैं ऐसा काम ही की पर हूँ जिसके लिए मुझे उन्हें कुछ कहने का मौका मिले । फिर कोई कितने दिन भी रुक जाएगा । आखिर तो उसे अपने घर ही रहा पकडनी होती हैं । तारा की ये बात पीना के मन में तीसरी कहीं गहरी छुप गई । उसे लगा जिसे तारा जानबूझ कर उस पर ताना कस रही हैं । उसे इस बात की एशिया सी हुई कि तारक किस तरह अपने घर से पढाई हो गई है और उसे अब के नए घर पर ससुराल का खयाल लगा रहता है । क्या वाकई शादी के बाद मायके का संबंध छूट जाता है? क्या ससुराल अपना घर और माइका पर आया घर बन जाता है । फिर वो क्यों सादा मायके को अपना घर और ससुराल को पर आया घर समझती रही । कभी उसने ससुराल को अपना घर नहीं समझा और सादा यहाँ से जुडी रहें । कहीं सुख सुविधा के लोग में तो वहाँ से यहाँ पर आया नहीं करती रही नहीं नहीं ऐसा नहीं तो फिर क्या बात थी क्योंकि यहाँ खींच लाई है क्यों उसके वहाँ की सारी बातें सुनाकर माँ का भी जी खराब कर दिया । उसे क्यों अपना लाये रहती हाल बताती रहें और उसे चिंता खुल कर दिया हूँ । माने तो कभी किसी से अपनी गरीबी में गिला शिकवा तक नहीं किया था । उसने इसे भी दिन देखे थे जब उसकी जिंदगी में सिर्फ अभाविप भाग थे और बेहद गरीबी थी । माँ को मौसी ने मैली सेवन लगी साडी में देख लिया था और खोद खोदकर पूछने पर भी उसने अपने चेहरे पर शिकन तक नहीं आने दी थी । और एक वो है की खाते पीते परिवार में जाकर भी वहाँ फ्रिज और स्कूटर न रहने से पति से झगड पडी । उसी अगर माँ की तरह बेहद गरीबी में गुजर बसर करना पडता या अभावग्रस्त जिन्दगी जीनी पडती तो वो क्या करती है? एक बार गई इस विचार मात्र से वो कांप उठी । बिना को लगा कि उसकी माँ आखिरी दिनों में कहीं उसी की चिंता में तो घुल घुलकर नहीं चल बसी । अंतिम श्वास लेते वक्त भी वो घर घर कहती रही । कहीं उसने उसके घर की तरफ तो कोई संकेत नहीं करना चाहा था । मोदी राम के कमरे से निकलकर बीना पूजा घर में चली गई । जहां अब कौशल्या देवी के प्रेम मंडी तस्वीर लगी है । वो मांग के चित्र के सामने जाकर खडी हो गई और माँ की तस्वीरें देखकर प्रलाप करने लगी । हाँ तुमने मुझे तभी झिडक दिया होता तो आज ही दिन देखने पडते हैं बीना नहीं सोचा माँ के मन में दो बातें अधूरी रह गई थी । एक उसे अपने ससुराल में घुली मिली और सुखी संपन्न ना देख सके और दूसरे पीतांबर के लिए बहु ना ला सके । कम से कम वो तो अपने ससुराल जाकर रहने लगती । वहाँ ढाई कौन एक माँ और एक दूसरा राकेश । दोनों ने कभी उसे एक छिडकी डर नहीं सुनाई थी । चौके से उसने कई बार लापरवाह होकर भी गिरा दिया था और रोटियाँ जला दी थी और दाल जला दी थी । फिर भी उन्होंने उसे कुछ नहीं कहा था । ऐसा याद नहीं आता कि कभी दमयंती नहीं राकेश ने उसे किसी से शिकायत की हो । उल्टे वो तो उसकी प्रशंसा करती थकती नहीं थे । राकेश अपने मित्रों से उसकी तारीफ के पुल बांध देता था और दमयंती अपने रिश्तेदारों पडोसियों में उसकी बेहद प्रशंसा क्या करती थी । फिर जब देखा कि किन्हीं वजहों से सास बहु में अनबन है और वो मायके चली गई है तो किस चतुराई से वो अपने भैया के साथ पूना चली गई थी और जाते वक्त उसी सारा घर बार सौंप गई थी । फिर भी यही सोचती रही कि साडी फसादों की जय दमयंती है । फिर जब दमयंती चली गई तब उसे राकेश पर इल्जाम लगा दिए । वहीं सहयोग नहीं दे रहा है और उसके साथ लड झगड रहा है । दरअसल उसमें दूसरों से लडती झगडती रही हैं और इल्जाम दूसरों पर लगती रही है । क्या यह सच है वो अपने आप से पूछ कर जवाब में फूट फूटकर लोग बडी बिना ने तारा को रोकना चाहा लेकिन तारा रुकी नहीं, वो तो यही कहकर से ली गई दे दी । अब जब तक इस घर में बहुआ जाएगा तब तक तो भी संभालना पडेगा ये घर बाद लेकिन मौसी को हमारे घरेलू मामलों में दूर रखना ये सुखी घरों में फूट डालने वाली है और इधर की बात उधर सुनाकर घर घर में आग लगती फिरती है । वैसे भी बीना को मौसी की दखलंदाजी पसंद नहीं आ रही थी । घर में दूध पतीली भर बच जाता है या माँ के गहने बेटियों को नहीं बहु को मिलने चाहिए । ये पीना को सातवाँ महीना चल रहा है, इसलिए अब उसे आराम करना चाहिए । ये सब मौसी को बताने की क्या जरूरत है? बिना तो मौसी का यहाँ रहना ही खलने लगा और फिर हर बात में उसका टांग अडाना और बडप्पन दिखाना और भी खटकने लगा । खुशी याद नहीं आया कि माने कभी उसकी इतनी दखल अंदाजी सही थी । उसे भी उसकी इतनी बेट तक कुल्लू दखलांदाजी असह लगने लगी । फिर उसने सोचा कि माँ की सगी बहन ही तो है, जाने दो । लेकिन फिर सोचा कि जब उसकी मां अपनी सगी बहन को अपने घर के मामलों में दखल देने नहीं देती थी तो वो ही उस को दखल देने दे । लेकिन माने उसके घर के मामलों में क्यों दखल दिया? वो कहाँ दखल देती थी, बिना नहीं तो उसे हर छोटी बडी बात सुनाकर चिंता में डाल दिया था । फिर से है जी था कि जिस माने अपने बहुत सारे साल बेहद गरीबी में गुजार दिए हो, वो अपनी बेटी को दैनिक से भी और सुविधा में देखकर चिंतित हो उठे । लेकिन एक दिन वो फिट मौसी में अनाप शनाप वक्त दिया तारा तो अपने ससुराल में सुखी वह संतुष्ट है और उसने कभी गिला शिकवा नहीं किया । वही बेटी तो अपने माँ बाप का नाम रोशन करती है जो अपने ससुराल में निभा करना जानती है । बिना खोलेगा कि जले पर किसी ने नमक छिडक दिया है और उसने मौसी को दो जून कोर निकलकर चुपचाप कोने में पडे रहने को कह दिया । मौसी ने बिफर कर अपना बोरिया बिस्तर बांध लिया और जयनगर अपने बेटे के पास चली गयी । बीना ने राहत की सांस ली । मौसी के जाने के बाद बीना को लगा कि वो आवश्यक रूप से दखलंदाजी करके उसके घर बार की सुख शांति मिटा रही थी । माइकल के घर भर से भारतीय वक्त उसे लगा कि वह अपना मायका जिस खूबी से संभाल रही हैं उस खूबी से उसने अपनी ससुराल क्यों नहीं संभाला । यहाँ पर जो खाना पकाने के अलावा वो हर एक की रूचि लिए उनकी पसंद पूछती रहती है और चार चार सब्जियां बना देती है । किसी के लिए फुल्के तो किसी के लिए पराठे और किसी के लिए पूरी या कल देती हैं इतना सब फिर ड्राम होने के बावजूद वो खुश हैं । चाहती है कि हर एक को पेट भर अपनी अपनी पसंद का खाना मिल जाएगा । लेकिन जब वो ससुराल में थे तब उसकी सास पोपले मुंह से कारण उसे नरम नरम तुर दल देने के लिए और राकेश अपने लिए उबली हुई सब्जियों की भाजी बना देने के लिए कह देता था तो जल उठती थी उसने तो कभी उस घर को अपना घर ही नहीं समझा । वहाँ है तो सिर्फ दो ही जनें एक मांझी जिसे उसने कभी अपनी माँ के बराबर नहीं समझा उल्टे अभी माँ को बिहार के बाद भी अपना ही समझती रही । इन दिनों यहाँ जिस कोशियारी से वो घर बार चला रही है और हर चीज में बचत करना चाहती है वैसी ही अगर वो अपने ससुराल में बचत कर दी और चाहती की कुछ बेकार न जाए तो कितना अच्छा होता । यहाँ अब जैसे अपने व्यक्तिगत खर्चों पर रोक लगा रही है और कोई भी चीज लेते वक्त उस की आवश्यकता आवश्यकता पर घंटों सोचती रहती है तो वैसा ही ससुराल में करती तो राकेश के ऊपर आवश्यक दबाव ना पडता । आज जब मायके में अपने हाथों से सौ सौ के नोट लेकर बुला रही है तब उसे मालूम पडता है कि कैसी सौ का नोट घर गृहस्ती के खर्चों में इतनी जल्दी खत्म हो जाता है । उस ने सोचा कि जब यहाँ पर ही इतना खर्च हो रहा है तो वहाँ पर कितना न घर जाता होगा । राकेश के वेतन में से गृहस्ती कैसे चलती होगी? उसने तो इन बातों की तरफ कभी ध्यान ही नहीं दिया । उल्टे फिजूल खर्च करती रही और फ्रीज स्कूटर की फरमाइश कर बैठे जी तो उसने सोच कर भी नहीं देखा कि हम इतना खर्च बर्दाश्त भी कर सकते हैं या नहीं । बल्कि वो तो अपनी ख्वाहिश पूरी करने के लिए अपने भैया वो पिता से राकेश पर अनुचित दबाव डलवाती रही ताकि राकेश उसकी दमित इच्छाओं के आगे झुक जाएगा । वैसे तो मोदी राम चाहती थी कि एक साल के बाद पितांबर की शादी करे, लेकिन घर की हालत देखकर उन्हें लगा कि पितांबर की शादी पूर्वनिश्चित मुहरत में ही कर देनी पडेगी । इधर बिना के बाल भी भरी थे और वो इन दिनों इतनी ज्यादा मेहनत मशक्कत भी नहीं कर सकती थी । मोतीराम जानते थे कि उनके घर में हर एक का अपना अपना रात चलता है । कोई पूरी मांगता है तो कोई पराठे और कोई फुल्के । कोई कडी चावल मांगेगा तो कोई पनीर मटर कोई गोश्त खाना चाहेगा तो कोई उसे छोडेगा भी नहीं । मसले एक वक्त के खाने के लिए पांच पति लाये चढाव और दवा कढाई उतारो चलता हूँ बिना आखिर तो किसी घर की बहुत है और उससे इस हालत में न तो मेहनत मशक्कत करने बनेगी और ना ही इतनी मेहनत लेनी चाहिए । फिर थोडे दिनों की बात जब वह अस्पताल चली जाएगी तो फिर घर को संभालेगा । शुरू से ही कौशल्य देवी महाराजन रखने के खिलाफ की और वो भी नहीं चाहते थे कि महाराज इनके हाथ का खाना खाएंगे इसलिए उन्हें लगा कि क्यों ना पितंबर का बिहार अच्छा दे । बहू आकर घर बार संभाल लेगी और बिना के प्रसव के समय कोई दिक्कत भी नहीं पडेगी । फिर अगर बिना अपने ससुराल चली भी गई तो बहुत रहेगी घर भार संभालने के लिए । आखिर तो बिना को पति ग्रह जाना ही है इसलिए उन्होंने पितंबर की शादी स्थगित नहीं तो आशा के हाथों की मेहंदी भी नहीं मिलती होगी की वो अपने ससुराल का घर बार संभालने लगी । उसने तो जैसे बीना से सारा चार्ज ही ले लिया और बिना को आराम करने के लिए कह दिया । वैसे तो बिना के हाथों इतना काम नहीं हो रहा था फिर भी वो नहीं चाहती थी कि इस तरह आराम लेने के बहाने दरकिनारे कर दी जाए । इसलिए वह भाषा का हाथ बटाने के लिए चली जाती है । मगर आशा ने उसे हाथ भी नहीं लगाने दिया । बिना नहीं । जब देखा कि उसकी जरूरत होते हुए भी आशा उससे कोई काम नहीं रही है और स्वयं जुड जाती है तो वह दुखी होती ही पढाई अब यहाँ अपनी हो गई और वो अपनी होकर भी इस घर में पढाई हो गई । अब उसने देखा कि हर कोई हर चीज की मांग आशा से करने लगा है । ऐसा आदेश घर के बच्चों के लिए आशा नहीं नहीं बल्कि पीतांबर ने भी कर दिया है । मोदी राम तो दास रहते थे इसलिए वो इन मामलों में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाते थे और तटस्थ रह जाते थे । उन्होंने कभी बीना को ये आश्वासन देने की जरूरत नहीं महसूस की कि वह आशा से बिना को फिर से घर बार चलाने का सारा अधिकार दिला देंगे । दिन भर दिन बीना ने देखा कि सारे अधिकार आशा के हाथों में चले गए हैं और वो जैसे अपदस्त कर दी गई है । घर की हर आवश्यक त्या की चीज या तो आशा स्वयं जाकर ले आती या फिर उसी से पूछ कर पीताम्बर ले आया । कभी ऐसा नहीं हुआ कि बीना से भी पूछ लिया जाता कि घर में टमाटर की चटनी कीबोर्ड लेंगे । ये जान के डिब्बे कितने मंगवाए जाएँ या अंडे कितने दर्जन मंगाए जाएंगे । दूध वाले से समय समय पर दूध कितना लिया जाएगा यह पनीर के डिब्बे मंगवाए जाए या नहीं । पीना को तो लगा कि दूसरों के साथ उसको भी खाना परोस दिया जाता है और अब इस घर की व्यवस्था में उसकी कोई जरूरत महसूस नहीं की जाती । नहीं बहु होने के बावजूद बीना को अच्छा हुआ कि आशा घर की तो घर से चला रही है । ठीक ही तो है घर एक खेला है जिसमें सिर्फ अपने घर के सदस्य ही अपनों की तरह रह सकते हैं । दूसरे जो भी लोग घुस आए हैं वो आखिर घुसपैठिए ही तो कहलाएंगे जो जाने अनजाने घर का अमन व शांति बिगाड सकते हैं । पीना को लगा कि उसका भी एक छोटा सा घर था जिसमें वो अपने पति और सास के साथ रहती थी । ना हक ही उसने अपनी माँ को अपनी ही देशी समझकर अपने घर का सारा हाल बता दिया । लेकिन कभी उसने ये तो सोचा ही नहीं कि उसी माँ की ममता ले डूबेगी का ना उसने अपनी माँ से अपने घर का हाल बताया होता और उसकी माँ ने उसके जीवन स्तर को बढाने की कोशिश की होती है और ना घर में ये बवाल उठ खडा होता और ना आज ये अपने आप को यहाँ इतनी लम्बी महसूस करती । उस दिन आठ वर्षीय मधु पड गई कि वह दूध में चाहे मिला कर देगी, अक्सर वहाँ से बढकर दूध में चाहिए या काफी मिलाकर पीती थी । मतलब जब से आशा घर में आई है तब से उसने मधु को दूध में एक बूंद चाहिए कॉफी मिलाकर नहीं । ऊपर से वो उपदेश देती है । आज भी उसे मधु से कहा अच्छे बच्चे दूध देते हैं चाहे या कॉफी नहीं पीते, क्यों नहीं पीते? मेरी सहेली कमला तो पीती है कौन? मुझे सागली सावली सी तेरे साथ खुल जाती है हाँ वहीं तभी तो वह साहब ली है नहीं, हम नहीं मानते तो झूट कह रही हूँ ठीक है हम झूठ कह रहे हैं तो अपने भैया से पूछ लो । पितांबर ने भी आशा का इशारा पाकर कह दिया हाँ मधु चाय कॉफी पीने से बच्चे काले और सामने हो जाते हैं । वो ऍम कि तुम जब छोटी थी तब कितनी गोरी गोरी की दूध जी पूछ लू । अरे भाई हम से पूछती हूँ मधु पी तू इसे इसकी बचपन की तस्वीरें दिखा दो । अब आप देख लेगी । मधु को जब दसवीं लाकर दिखाई गई तो उसका जहरा मलीन पड गया । ऊपर से आशा ने छोड दिया हम को भी हमारी मम्मी ने चाय कॉफी पिलाकर इतना सामना बढा दिया है । चर्च भाभी तब तो तुम्हारी मम्मी गन्दी है, गंदी कैसे हैं? अरे भाई, हम भी तुम्हारी तरह आॅटो की तरह कर जाते थे और हमें भी मम्मी दूध में चाय कॉफी मिलाकर देती थी और कहती थी कि जा देखना अपना नसीब । फिर उसे झुककर मधु के कान में कुछ कहा तो पितंबर ने टोस्ट खाते का दे सहज गोतो को वर्ष मधु को अपने पास बुलाया । आशा ने घबराकर मधु का हाथ पकड लिया और सितंबर की तरफ जाने से रोक दिया । हम तो कबन वागले चलेंगे और बच्चों की ट्रेन बिठाएंगे । पितांबर ने लालच किया । सच भैया कहकर मधु पितांबर की तरफ बडने लगी मगर आशा ने उसे जाने को नहीं दिया । नहीं मधु हम तो मैं आइसक्रीम खिलाएंगे, वो ऍम हम भी खिला देंगे । दोहरे लालच में पडकर मधु ने अपना हाथ छुडाया और पिता बर के कान में जाकर कह दिया । भाभी कहती है कि साहब नहीं होने से सामला पति मिलता है मुझे दूध में नहाया, पति लेकर देगी पितंबर कॉफी गटककर उठ खडा हुआ आशा को पकडने के लिए लेकिन वह तो मधु को पिन नंबर के कान में कुछ कहता देख कर ही भाग गई थी । मधु को खाली दूध पिलाना हूँ या कुछ हो बस आजकल आशा की चलती है और सभी जैसे उसी की बात का समर्थन करते हैं पिताम्बर की तो फिर बात ही निराली है । वो नया शादी शुदा है, बीवी का ही पक्ष लेगा । लेकिन इतने दिन तक स्थित रहने वाले मोतीराम भी आशा की बात का समर्थन करने लगे । तब बीना को ऐसा लगा जैसे आशा का पक्ष सबल हो रहा है और अगर वहाँ नशा के विरुद्ध कुछ बोलती भी तो उसकी बात का पितांबर ही नहीं, मोतीराम भी खनन करते । वहाँ एक ही अकाट्य तर्क पेश करके उसे चुप कर देते । बेटी घर बार तो बहु को चलाना है । पीना को लगता कि जैसे पर आए घर में आकर वह दखलंदाजी करने लगी है । वो घर उसके लिए पराया कब से हो गया । जब तक माँ थी तब तो ये उसी का घर था, अपना था । फिर माँ की मौत के बाद से लेकर उसी का बना रहा और वही तो सब पर हूँ । काम चलाया करती थी, लेकिन अब जैसे उस अधिकार से वंचित कर दी गई है । शारदा जब बिना के पास आकर रोने बिलखने लगी तो बिना कढाई का प्रेम एक तरफ रखकर पूछा क्या? और शार्दूल मगर शारदा है, किसी रोए जा रही है । बिना को शक हुआ कि कहीं आशा नहीं तो नहीं डाल दिया । वैसे जबसे आशा आई है तब से वह देखती है कि दोनों में अनबन थी, चली आ रही है । वैसे भी बिना को आशा का हर एक पर अब गालिब करना अच्छा नहीं लग रहा है । लेकिन बिना आशा को कैसे रोकें? जब पितांबर भी उसे नहीं रोकता है, उसे लगा । शायद पितांबर की शहर पाकर ही आशा शेरनी हो गई है और हर एक को अपने कब्जे में रखना चाहती है । बिना शारदा के पास रखकर उसके बालों को सहला दिया । शारदा ने अपने आँसू पहुंचकर कहा दीदी, मैंने मैट्रिक का इम्तिहान अच्छा दिया है और साठ प्रतिशत से ज्यादा ही अंक प्राप्त होंगे । मैंने पिताजी से कहा की मैं कॉलेज जॉइन करना चाहती हूँ तो उन्होंने भैया से पूछ लेने के लिए कहा । में जब भैया से पूछने गई भाभी ने ठोक दिया अब और पढाई किस लिए कौन सा तो जजिया डॉक्टर बनना है और भैया ने भी हामी भर दी । अब तो भी बताओ कि मैं अगर दो एक साल कॉलेज जाना चाहती हूँ तो इसमें भाभी कर किया जाता है । अब के इस घर में होने की बात चलेगी । पूछो आपने मुझसे बोल देगी । वही इस घर में कानून बन जाएगा । बिना तिलमिला उठी । हाँ नहीं, नहीं तो क्या भाषा के इशारों पर हर एक को नाचना पडेगा । उसे शारदा को आश्वासन दिया । घबराओ मत, ऐसा कभी नहीं होगा । मैं डैडी से बात करेंगे । अभी से आशा तो में चूल्हे चौके में झूठ देगी क्या खाने की मेज पर सारा परिवार एकत्रित था । अक्सर रात को सभी मिलकर खाते थे । कभी कबार दुकान देर से बंद होती थी तो पितांबर पीछे रह जाता था । लेकिन इन दिनों पितांबर भी जल्दी आने लगा है । हाँ जी, वही तो कह रहे कि अब पढाई छोड दो, मगर आप क्या कहते हैं? शारदा ने पूछा बेटी मैं तो कहूंगा कि पितांबर जो कह रहा है वहीं करूँ । आखिर वो बडा है और तुम्हारे भले के लिए गहरा । मोतीराम ने कहा कॉलेज में पढ कर गया तो मैं जस्ट डॉक्टर बनना है । आशा ने पूछा नहीं लेकिन दो एक साल कॉलेज में पढने से बिगड जाएगा । शारदा ने पूछा स्कूल की पढाई बहुत हो चुकी, अब थोडी घर की रसोई की भी ट्रेनिंग । लोग अगर खाना पकाना ही सिखाना चाहती हो, भाभी तो होम साइन्स में दाखिला दिला दो । कॉलेज में कोई क्या सिखाएगा? तुम्हें तो जाकर किसी का घर बसाना है और दूसरे के घर में जाकर तभी तो सब कुछ संभाल होगी जब यहाँ पर माहिर हो जाओगी । तुमसे ज्यादा ही जानते होंगे कॉलेज वाले अगर पढ कर ही कोई घर बार संभालना सीख जाता तो ये घरबारी कोई नहीं बताता तो भावी कॉलेज कई ही नहीं हो तो तुम्हें क्या मालूम की शारदा बडो से ऐसे बहस नहीं किया करते । मोतीराम ने आंखे दिखाकर कहा अब तक बीना चुप बैठी थी । उसने कहा मम्मी डैडी आशा को घर की सारे संभाल, चौदह चुकी का कामकाज इतना ज्यादा लगता है तो कोई महाराजिक क्यों नहीं रखी थी महाराज इनको इस घर में आना होता तो कभी क्या चुकी होती? पितांबर ने कहा मगर डीडीबी तो है घर में शारदा ने फोरन कह दिया कब तक आशा ने आखिरी कौर मुंबई डाल दिया और सब लोगों को सब देखकर वह उठकर खडी हो गई । अपने घर को चलाने के लिए अपने ही घर के सदस्य राजी नहीं होंगे तो क्या बाहर के लोग इसे चलाने आएंगे और एक कटु मुस्कान बीना परफेक्ट कर आशा अपने हाथ होने के लिए वाशबेसिन की तरफ बढ गई । बीना को लगा इसे कहीं कुछ टूट गया है । उसे लगा कि हरे भरे वृक्ष से टूटकर वो धूल में गिर गई है । वो अपने आप को बेहद सुकडी सुकडी सी महसूस करने लगी । वो अपने कमरे में ऑन डिलीट कर रोने बिलखने लगी । आज वो अपने किए पर पछताने लगे और सोचने लगे कि अपने ससुराल को पर आया घर समझकर ना यहाँ टी और ना यहाँ उसका कल की आई बहु के हाथों इतना निरादर होता जब हमने को अपनाने के बजाय पुराने से बुरी तरह चिपक जाते हैं । तब हम ना पुराने से चिपके रह पाते हैं और न नए में ही अपने को एडजस्ट कर पाते हैं । यही वजह है कि बिना नए संबंधों को निभाना पाई क्योंकि वह पुराने संबंधों से बुरी तरह चिपकी रही और आज ना इधर की रही है । मैं उधर की काम वो उस घर को वहाँ के सदस्यों को अपना समझ लेती और उनके सुख दुख में भागीदार बन जाती है । तो आज उसी ये दिन ना देखने पडते हैं । वो तो उनके साथ ऐसा बर्ताव करती रही जैसे वो उन सब के लिए पर आई है और जैसे उस की आपने न हो । सिर्फ युवावस्था की सहज प्याज के कारण वो राकेश की बाहों में चली गयी वर्ना उसने उसे भी कब अपना समझा था । समझा था तो इन्हें जो अब इतने अपने ना रहे और बेगाने से लगते हैं ।

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लड़की की शादी होते ही और उसके ससुराल चले जाने पर किस तरह अपने पराए और पराए अपने हो जाते हैं, रिश्‍तों के इस भंवर को बीना न समझ सकी। और उसकी इस नासमझी ने पति-पत्‍नी के बीच दरारें आ गईं। उनके फूलों से सुखद जीवन में कांटों की चुभन पैदा कर दी। यह बात बीना को बहुत देर से समझ में आई कि उसके दांमपत्‍य जीवन में कटुता लानेवाली कोई और नहीं उसकी अपनी मां ही है। छोटी-छोटी बातों से गृहस्‍थ जीवन में किस तरह विष घुलता है और कैसे इससे बचा जा सकता है… इस उपन्‍यास में बड़ी रोचकता से बताया गया है। Writer: रा. श्याम सुंदर
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