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फिर वही -02

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विनीता और आलोक प्‍यार की मदहोशी में उस मंजिल तक पहुंच जाते हैं, जहां उन्‍हें होश नहीं रहता। लेकिन आलोक ने इस भूल को खूबसूरती के साथ संवार लिया और दोनों ने अपनी दुनिया बसाई। जब उनका बेटा गुंजन बड़ा हुआ, तो इतिहास ने एक बार फिर अपने आप को दोहराया, पर नए जमाने का गुंजन आलोक की तरह जिम्‍मेदार और वफादार नहीं था। उसने लिंडा के साथ प्‍यार का नाटक किया और बदनामी के मोड़ पर लाकर छोड़ दिया। क्‍या लिंडा ने हार मान ली? क्‍या गुंजन उसे अपनाएगा? आज के युवा जीवन में मूल्‍यों के बदलते मायने को पेश करती है यह उपन्‍यास।
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आप दो उससे चलो कुछ उदास सा लग रहा था । सुबह दफ्तर आते ही वो फाइलों को निपटाने में छूट गया । पीडिता ने देखा आधो आपने एक बार भी उसकी और दृष्टि नहीं डाली थी । शायद व्यस्तता का खोल तोडकर वो किसी पीडा, अभाव या उदासी को भूल जाना चाहता था । लंच में विधिता ने उसे कोई दातो सिर्फ इतना ही बोला नहीं मैं नाविक नहीं है । कितना क्या कह रहे वालो ठीक ही कह रहा हूँ नहीं कुछ समझ में नहीं आ रहा है । साफ साफ तो नहीं कहते व्यर्थ में पहेलियां हो जा रहे हो । आज सुबह घर से चिट्ठी आई थी । मैंने लिखा है पापा की तरह खराब है । उधर सूखा पडने से खेतों में पौधे चलकर रात हो गए हैं । छोटी बहन ताहर जैसी लंबी हो गई है और उसने आलोक की बात को बीच में ही काट दिया । बोले घर वालों ने पैसे मंगाए हैं । लिखा है वो सारे घर की नैया मझधार में है । यदि तुमने सहायता नहीं की तो ये नाव डूब जाएगी तो थोडे से पैसे भेज होना मुसीबत में अपने ही काम आते हैं । पर मैं नाविक कैसे बन सकता हूँ? नहीं नाव को खेलना और किसी नाविक की मदद करना कि दो भिन्न स्थितियां मिले हैं क्या पुरानी जर्जर नाव की खतर मैं स्वयं के नाव का निर्माण न करूँ हो? ऍम गयी बडी अर्थपूर्ण बात कह गया था वो नहीं तो मैं नहीं मालूम । मुझे साढे तीन सौ रुपए मासिक मिलते हैं । इसमें से हार पहली तारीख को मैं डेढ सौ रुपए मनीऑर्डर द्वारा घर भेज देता हूँ । फिर शेष रुपयों में मैं पूरे महीने कैसे जीवित रहता हूँ, नहीं जानता हूँ । इस पर समय समय पर और मांग आती रहती है तो भी बताऊँ । घर वालों की मांग कहाँ तक न्यायसंगत है । भनिता चुप हो गई । क्या कहती है तो कुछ लोग कह रहा था वो काफी हद तक उचित था । फिर आलू की अपनी भी जिंदगी थी । वो अपनी स्वयं की नाव का भी निर्माण करना चाहता था । ये सोचकर विनिता का मन गुदगुदा गया । लंच समाप्त हो गया । आलोक अपने काम में फिर से व्यस्त हो गया । विनीता के अंतर में राख रन की रंगोली से बन रही थी । लगभग एक वर्ष पूर उसकी इस विभाग में नियुक्ति हुई थी । मम्मी पापा चाहते थे कि वह बी ए करने के बाद नौकरी कर लेंगे । उसमें भी ये पास कर लिया था । तृतीय श्रेणी आई तो उसका दिल टूट गया । आगे पडने की अच्छा मर गई । पापा ने नौकरी करने का प्रस्ताव रखा तो उसने सहज स्वीकार कर लिया । आपको कितनी दौड धूप करनी पडी । उन्होंने कुछ पैसे ले देकर रोजगार दफ्तर से उसका नाम निकलवाकर उस विभाग में भिजवाया है । इस विभाग के अधिकारी पापा की परिचय थे । पापा की दौड हूँ सफल हो गई । जब उसकी नियुक्ति हुई और उसने यहाँ काम करना शुरू किया तो उसे यहाँ का वातावरण बडा विचित्र लगा । लोगों को देखकर उसे बडा आश्चर्य हुआ क्योंकि अधिकांश जो काम छोड थे उनका मुख्य धंदा था दूसरों की बुराई, भलाई और आंतरिक राजनीति के दावपेंचों द्वारा अपने अस्तित्व की रक्षा करना । स्वार्थी हो उन्नीस नहीं और सहानुभूति का अभाव था । वो यौन श्रद्धा से पीडित है । हम सबके बीच उसे आलोक का वित्त तो एक दम अलग सा लगा । वो समझदार संजीता और परिपक्व था । मेरी था उससे प्रभावित हो गई और यह आकर्षण मित्रता में बदल गया । वो लोग अक्सर शाम को मिलते । दफ्तर के वक्त के बाद साठ साठ घर जाते । कभी कॉफी भी थे । एक दो बार दफ्तर से छुट्टी लेकर वो लोग पिक्चर देखने गए थे । उसे आलोक के व्यवहार नहीं बेहद प्रभावित किया था । एक बात थी जिसके बारे में वह चित्र भी सोचती । उतनी आलोक के प्रति मन में श्रद्धा उपर ही है । आलोक के व्यवहार में एक विशेष शालीनता थी । उसने कभी ऐसा कुछ नहीं किया था । इससे सस्तापन या साधारण पन की संख्या दी जा सके । शाम हुई दफ्तर का समय समाप्त हो गया । दोनों दफ्तर से बाहर आ गए । अब क्या प्रोग्राम है? विजेता ने पूछा घर जाऊंगा क्या? बात है तो बहुत उदास हो तो कुछ नहीं बोला । ऍम छमा कारॅपोरेट नहीं । घर जा कर क्या करोगे? अलोक चुक रहा चर्च में अकेले बडे बडे घूमते रहोगे । फिर क्या करूँ? तो भी कंपनी की आवश्यकता है । तो फिर चलो ना कहाँ मेरे साथ कहाँ घर चौक गई । पूरे साल में यह पहला अवसर था । इससे पूर्व आलोक ने उसे कभी भी अपने घर नहीं बुलाया था । वो पल भर गोलची क्या लोग के साथ उसके घर जाना उचित होगा क्या? सोचने लगी तो तुम्हारे साथ कोई और भी रहता है, ना था उसी के अंतर पडता है । वो घर पर हुआ तो वहाँ करें । कुछ अजीब सा नहीं लगेगा और इसमें अजीब लगने की क्या बात है तो उसका वहाँ होना न होना कुछ भी निश्चित नहीं । क्यों पता नहीं किस धंधे में पैसा रहता है । पता नहीं नौकरी करता है या बेकार है । बस कंधे पर कैमरा लडका रहता है । फोटोग्राफी करता है । इतना तो मालूम है । वो सुनती रही उसे आलोक के साथ रहने वाले में कुछ भी रूचि नहीं थी । वो तो इसी उधेडबुन में थी कि लोग के घर जाए या नहीं चल रही हूँ । आलोक की संतुलित स्वर में वो कुछ ऐसा आदेश सभा की वह मना नहीं करवाई । यंत्रवत वो लोग के साथ हो रहीं कैसे चलना है? उसने पूछा पैदल चलते हैं के पास ही है । हाँ, एक मील का फासला है । होगी तो हमारा साथ हो तो एक मिल क्या? युग युग तक मैं तुम्हारे साथ चल सकती हूँ । उसके गले तक के स्वर आए पर वो अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति का गला घोंटने में सफल हो गयी । वो अनूप के साथ पैदल चल रही थी । एक नई दिशा एक का नाम रहा हूँ । एक विचित्र गति पर न जाने क्यूं उसका अंतर किसी आधारहीन, अनाम आशंका से बार बार कम जाता था । क्या कुछ अनहोनी होने जा रही है? उतने कुछ संयुक्त और सहज करने की कोशिश कर रही थी । आलू बहुत चुका था । अभिनेता को लगा ये मौन ही नाम है । कि सृष्टि कर रहा है । उसने मौन केंद रहस्य में पर्दों को चीनी डाला, बुरी हूँ तो उसका कर चुकी हूँ । क्या बोलूँ कुछ बातें करो ना । अर्थहीन बातें मुझे उबाल देती हैं तो महत्वपूर्ण बातें करो उसकी उस अर्थपूर्ण बात, कुछ आलोक झटका उसने कनखियों से उसको देखा और सिर्फ उस करा लिया । ऍम अल अत्यंत महत्वपूर्ण लगा । वो अपने आप को स्पष्ट करना चाहती थी, इसलिए बोली घर की समस्या के लिए क्या सोचा है, क्या सोचो? मिट्टी कुछ तो सोचना ही होगा । हम सोच होगी । मैं बहुत स्वार्थी हूँ, पर मैंने फैसला कर लिया है । जितनी मेरी सामर्थ्य हैं, उतना तक कर रहा हूँ, उससे अधिक मैं नहीं करता हूँ । अरे हर इंसान की सामर्थ्य की कुछ सीमाएं होती है । इन सीमाओं को लांघने की कुचेष्टा में क्या मिलता है? प्रशंसा नहीं और सुख इन सब का पुरस्कार है । पीठ ने अनुसार दिमाग में ट्यूमर या फिर भ्रष्टाचार सच्ची नहीं । आलो अच्छा नहीं, मत समझो, पर एक बात निश्चित है, चाहे नाव डूब जाएगी । अब किनारे लगे मुझे कोई चिंता नहीं । मुझे अपनी सीमाओं का ऐसा है और मैं उनको लांघनी का दुस्साहस करके अपने आप को नष्ट नहीं करना चाहता हूँ । मैं पुस्तक हो गई । कितनी साफ कोई थी । आलोक के विचारों में आज सुबह तुम अपनी नाव की बात कर रहे हो । उसने साहस जुटाकर पूछे लिया । सुबह क्यों न जाने मैंने अपनी कितनी रात और दिन उसके निर्माण की योजना में लगा दिए हैं? सब कुछ स्पष्ट और सहज होने के बाद भी नाव चल के लिए तरस रही है । मतलब हो नहीं ना जाल में करती है । बाल ऊपर नहीं । अभी तक तो मेरी जिंदगी मरुस्थली भूमि ही है तो जलधारा का प्रबंध क्यों नहीं कर लेते? साहस नहीं जुटा पाता हूँ उसमें इतनी कार्यरता की गुंजाइश कहाँ है? आलोक झटका विनिता को लगा एक युग ट्विटर पर खडा हो गया है । वो सुख के एक और निर्वाचन ईयर छत से अभिभूत होने की तैयारी करने लगे । मेरी तलाश तो कभी की पूरी हो चुकी है । ये नहीं सोचता हूँ । कहीं मेरे मन में कोई खलती तो नहीं करती है क्यों? सोचते वालो तो बोल भी नहीं तो नहीं हूँ । चलो मैं कब से प्रतीक्षा कर रही हूँ तो घर पहुंच गए । अभिनेता को लगा उसका रूपांतर हो गया है । वो लोग के घर पहुंच गई और वहां पहुंचकर उसे लगा उसे वहाँ आने का अधिकार है । अंदर पहुंचने ही आलोक ने उसे आलिंगनबद्ध कर दिया । उसने कोई प्रतिवाद नहीं किया । इसका तो उसने लोग को अधिकार दे दिया था और रूप से ही सही उसने अपने आप को आलोक के बंधन से मुक्त क्या क्या ये घर था जिसमें उसका आलोक रहता था । छोटे सब कमरा था । इसके दो छोरों पर दो चारपाइयां बिछी थी और बीच में थी लिखने की में दो कुर्सियां और एक कोने में रैंक में रखा स्टोर और चाय कॉफी बनाने का सामान । आरोप की चारपाई, साफ सुथरे गी और दूसरी चारपाई पर मैंने कपडे, फोटोग्राफी का सामान और न जाने क्या क्या बिखरा पडा था । कैसे रह लेते हो उसमें आलू मजबूरी है । विभाग के बाद क्या करोगे उसे छोड दूंगा कि तुम्हारा साथ ही काफी लापरवाह और कांदा रखता है । वो हर मायने में गंदा है । उसकी गंदगी के प्रमाण कहाँ रखे हैं? मुझे मालूम है तो कैसे प्रमाण अभी दिखाता हूँ । कहकर आलोक ने अपने साथी की चार वाईपर बडे एक्टर को उठाया और एक कुर्सी पर बैठ गया । वो भी बैठी है आलोक में डिब्बे को मेज पर रखा और से खोलकर बोला हूँ देखो ऍम फोटोग्राफों को देखने लगेगा । वितृष्णा विभत्सता, नग्नता करना विलासिता ये भाव बारी बारी से विनिता के मन में उभर रहे थे । सब के बावजूद उसका संपूर्ण अस्तित्व उत्तेजित हो चुका था । हूँ यही धंदे करता है लू फिल्में नगनी चित्र वाले इस तरह के फोटो खिंचवाने के लिए की लडके लडकियाँ कहाँ मिल जाते हैं उसे पालो अपने अपने बहुत उसकी गर्दन में डाल दिए । आपने गाल को उसके गांव से हटा दिया और उनकी बात हरेश्वर में बहुत पता है । ये जीवन भी विचित्र पहली है । नहीं हो तो सब कुछ मिल जाता है । विनता को लगा था कि उस दिन पहली बार और भी एक साथ एक ही जगह पर जाने ही घंटे हो गए थे । उत्तेजना के एक विचित्र अग्नि प्रज्वलित हो चुकी थी । आरोप के पूरे एक साल का संयम पल भर में खुल गया । वो प्रतिवाद करना चाहती थी, पर यही सोचकर हो गए के नाव जलधारा की तलाश कर रही है । करना है तो अंत में तो वरीयता खडकी पर खडी थी और बाहर बडी देश बारिश हो रही थी । उसने अपने को दोहरा कर देख लिया था । उस की आशंका आधारहीन या निर्मूल नहीं । उसने क्या कर दिया? क्या उसने रेत मच्छर छुपाकर उस मानवीय चेतना और संवेदना को तलाश करने की कोशिश की थी जिसके आने वाली जिंदगी को दिशा दे सकें । वो सुरमा शाम और वो पल क्या? शारीरिक भूख और भविष्य की जिंदगी को जोडने वाला बर्फ का पुल था स्कूल की मजबूती को बनाए रखना । इसको कल ने से बचाना एक पहन कर उत्तरदायित्व है । न जाने कितनी देर तक विनिता फिर की के सहारे चेतनाशून्य खडे रहे । उसे महसूस हो रहा था जैसे वह खिडकी के सहारे नहीं एक ऑपरेशन टेबल पर लेती है । कोई सर्जन उसकी चीरफाड में जुटा है । सर्जन की समझ में नहीं आ रहा है कि वह कौन से अंग को काटकर पहाड है के शायद रात के दो बच गए थे । सरिता लौटकर चारपाई पर लेटी उसकी आंखें मूंदी । उसके अंदर में भयावह अंधेरा और सुन ओपन किया रहता जा रहा था तो सोने की कोशिश करने लगी हो । मेमसाहब चाय बना रही हूँ । हूँ तो पेस्ट भ्रष्ट चारपाई पर ही लिया है और दो की तरह बडी हो रही है । शर्म और हया का तो नामोनिशान तक नहीं रह गया । ललिता ने आगे होली भारी भोजन बल्कि उस पंद्रह में थी, हुई हुई साथ ही जाती हूँ । मम्मी के कर्कटेश्वर उसके कानों में पडेगी । उसे लगा कुछ दिल्ली का बच्चा बयानों पर चढ गया है । उसके ऊपर वो उछल कूद कर रहा है । पियानो से बेसुरे स्वर निकल रहे हैं । वो ऍम एशिया की तरह उसके अपनी दोनों हथेलियों को मूंग के पास ले जाकर छोड दिया तो हाथों से मालूम को सवारा साडी ठीक की और आंखों को मला । सारा माहौल और स्पष्ट था । सामने दीवार पर टंगी खडी की और उसने गौर से देखा आखिर बढकर आठ बज कर दस मिनट हो रहे थे चौक नहीं । रोज तो उस वक्त वो राहत होकर सब लोगों के लिए नाश्ता बनाकर तैयार कर देती थी । आज इतने देर कैसे हो गई? अंदर बाहर सब जगह अंधेरा था । साधारण है तो आठ बजे तक सारे घर में धूप भर जाती है । फिर ये अंधेरा कैसे? कहीं घडी बंद तो नहीं हो गई है । अब ऍम नहीं जाना क्या? दो बारह कमरे में आई और वो विकृत कर आखिर बचाकर बोली हूँ कितने बज कर माँ अरे दोपहर हो रही है और पटरानी पूछ रही कितने बज रहे हैं । अभी तो अंधेरा है तो सोचा चाहे ठंडी हो रही है । मुझे क्या फॅमिली चारपाई से नीचे उतर आई । खडे होते उसे लगा उसका सहारा शरीर निष्प्राण हो गया है । बहुत कमजोरी महसूस होता है । महसूस हुआ जैसे किसी ने उसके संपूर्ण शरीर में शक्ति को निचोडकर बाहर खींच लिया है । वो कमरे से निकलकर बाहर बरामदे में आई । कृति से बाहर टका आकाश नहीं काली पादर लटके हुए किसी भी क्षण बरसाने को तत्पर नहीं । नीचे जमीन भेजी थी । घंटों में पानी भरा हुआ था । स्पष्ट था कि रात भर चमकर बरसात हुई है । दुष्कर के विजेता चाहती थी । सारे घर का एक चक्कर लगाई लगता । स्कूल चली गई थी । बस शेयर कर रहे थे । सुनीता अखबार पडने में तकलीफ थी । मम्मी रसोई घर में थी और बडबडाती ही काम कर रही थी । विजेता को लग रहा था कि आज वो तब तक नहीं जा पाएंगी । एक समय खाना न खाने से क्या इतनी कमजोरी हो जाती है और कुछ ही क्षण बीते होंगे कि विनीता एक दम घबरा नहीं । एक प्याला चाय गले के नहीं छोटी थी । शायनी अंदर तहलका समझा दिया था । प्रतिबंध तो बाहर आने के लिए उमर खुल रही थी । कैसे चलेगा पूरी तरह सोचा और परेशान हो गयी । विनी ॅ विनीता को पापा कश्मीर भीगा स्वर सुनाई दिया । वो बरामदे में गई तार पर तौलिया डाला था । मुझे उतारने के लिए आगे बढी ही थी कि कडवा कसैला एक गोला उसके करें तक आ गया ऍम तक छूट गई । एक ब्याला चाय सौ से मुक्ति मिल चुकी थी और और खाओ हजार की सडी गली चीजें पता नहीं आज कल के लडके लडकियां छूटने चटोरे हो गए । मम्मी रसोई घर से बाहर निकलकर ठीक रही थी देने की माँ हर वक्त कब बिगडना अच्छा नहीं होता । कभी तो शांति से काम दिया करो । एक तो बेचारी की तबियत गडबडा गई हैं । ऊपर से कल शाम से तुम उसके पीछे हाथ धोकर पड गई हूँ । आप अभी बाहर बरामदे में आ गए थे और तार से तौलिया उतार कर तो ऊपर लगे साबुन को पहुंच रहे थे । फिर जाने खुल्ला किया और धोती के पल्लू समूह और आखिर पहुंचने चलो बेटा तो मैं डॉक्टर से दवा दिला लाता हूँ हूँ । अफेयर्स में चिंता कर रहे हैं सब ठीक हो जाएगा । आज दफ्तर से छुट्टी ले लो । मैं भी यही सोच रही थी पापा आज दफ्तर नहीं जाउंगी, बच्चा हूँ, आराम करो, हल्का खाना लेना । मेरे साथ चलो ऍम दवा दे लगता हूँ आप क्या करेंगे पापा मैं खुद जाकर दवा ले होंगे । विजेता ने बहुत दूर तक जाकर होता तो पापा को साथ नहीं ले जाना चाहती थी । किसी डॉक्टर ने कोई रहस्य उद्घाटन किया तो पापा की उपस्थति में वो उस स्थिति का सामना कैसे कर सकेगी? ठीक है तो मैं अकेली चले जाना । पर चाइना से हो ये बरसात का मौसम बहुत खराब होता है । कहकर पापा बातों में चले गए वेरी तक ठगी से खडे रहे हैं । एक बारी से उदासी ने उसके मन को मत कर रख दिया था । एक का नाम से ठंडक उसके दोनों हथेलियों में रह रही थी । अंतर में कोई अजन्मा, अनदेखा और आकृति हीन सपना कुलबुला रहा था । लगभग आधे घंटे की प्रतीक्षा के बाद उसकी पारी आई । डॉक्टर के कमरे में घुसी तो उसके कदम तक बता रहे थे । रजत धडक रहा था और वह विचित्र सी बेचैनी महसूस कर रही थी । बैठिये लेडी डॉक्टर ने कहा विनीता डॉक्टर के पास पडे सोन पर बैठ गई । कई क्या तकलीफ है? कल से क्या हो रही है? सपोर्ट नहीं हैं जी क्या कहता था जी कुछ नहीं व्रत रखा था । जी मितला आता रहा था दिखाने की छह ही नहीं हुई । मेरा मतलब था उल्टियाँ होने से पहले क्या खाया था आई । मीन कोई ऐसी वैसी बाजार की चीज खाई थी । जी नहीं । सीरिया बच्चों अजील कैसे हुआ? अभी तक चुप रही । कल से कितने उल्टी हो चुकी हैं तो कुछ चार पांच क्या निकलता है उसमें जो कुछ खाओ पियो सब बाहर आ जाता है । कुछ खट्टा घटना का सलाह होता है । जी भूख लगती है, बिल्कुल नहीं । उनके रोटियों को देखते हैं । चीन में चलाने लगता है । न जाने किस में बहकर बनी का सब कह गई । करवाके पूरा करते हैं । उस व्यक्ति चीज काटी हूँ क्या कर दिया उसने । अब तक तो डॉक्टर को सारा मिल गया हैं । वो पकडते किस बीमारी का कारण बात है क्या? क्या डॉक्टर मुस्कराई? फिर बोली कुछ चीजों को देखकर उल्टी आती है । कुछ खास चीजें खाने का मंदिर रहता होगा । वो अभी तक कुछ नहीं बोली । चलिए किस तरह कर लेना चाहिए । मैं आपको परीक्षण कर लेती हूँ । आप भी देख लेती हूँ । ये सब रहने दीजिए । डॉक्टर साहब सिर्फ ऐसी कोई दवा दे दीजिए जिससे उल्टियाँ रुक जाएगी । अरे वो भी दे दूंगी । पर ये बताइए कितने दिनों पार हो गए और कुछ दस पंद्रह दिन डॉक्टर ने पर्चे पर दवाई लिखना शुरू कर दिया । लिख लिख कृष्णा पूछा शादी को कितने दिन हो गए यदि फॅमिली भीषण रूप से चौक गई । डॉक्टर दवा का पर्चा लिखती रही और बडबडाती रही है । आज कल के लडके लडकियां पढे लिखे होने पर भी कमाल करते हैं । जरा भी समझ नहीं शादी हुई और ऍम ये नहीं कि कुछ दिन शॉक मॉस कर लें । फॅमिली डॉक्टर के अनुभवी किंतु उस नहीं भरे मुख को एक तक देखते रही । जो कुछ कह रही थी उसमें उसका बुरा नहीं माना । डॉक्टर ने विजेता को पर्चा पकडाते हुए कहा ये तीन तरह की गोलियाँ लिखती है । हरी गोली रात को सोने से खानी है और एक सफेद और एक गुलाबी गोली मिलाकर दो बार दिन में खाना खाने के बाद लेनी है । खाने में एक दो दिन खिचडी, दलिया, टमाटर का सूप जैसी हल्की चीजें लीजिए । विनीता ने पर्चा पकडा, हाथ जोडकर डॉक्टर को धन्यवाद दिया और खडी हो गई । और सुनिए अब आपको नियमित रूप से जगह कराना होगा । जहाँ डिलीवरी कराना है उस अस्पताल में रजिस्ट्रेशन करा लीजिए और ऍम पर बहुत परेशानी होती है । वो डॉक्टर के कमरे से बाहर निकल आई । दवा के पर्चे को रजिस्ट्री करा के बहुत दवा लेने वाली खिडकी पर खडी हुई । लगभग बीस पच्चीस व्यक्ति आगे ही लाइन में खडे थे । वो भी वहाँ जाकर खडी हो गई । शादी को कितने दिन हो गए, शादी को कितने दिन हो गए । शादी को कितने दिन हो गए विंता के कानों में लेडी डॉक्टर के शब्द मंदिर में अनवरत पष्टि घंटों जैसे बार बार पूछ रहे थे की होती है शादी अब तो तुम खुश होना नहीं कुछ ठंड तक वो मौन बैठी रही खिडकी के बाहर वह धनीश देखती जा रही थी पर्वतीय ठंडी हवा की अटखेलियां पर्व क्षेत्रों पर धूपछांव की आप मिचौनी झरनों की कलकल ध्वनि नारी शरीर जैसा सडक का उतार चढाव पर्वतों के वक्ष पर हो गए । क्या इस समय खाने सुरक्षा के उठा बोलती क्यों नहीं? चौकी प्रकृति के इस अंदर सौंदर्य से दृष्टि हटाकर उसने पास बैठे पुरुष को देखा वो कॉलेज मुस्कराई तुम को शोक नहीं, बहुत ऐसा लग रहा है । अच्छा मैं भी कितना खुश हूँ हम दोनों है टोटल झील पर शिकारा डूबते सूरज की रंग बिरंगी आभा झील के हरे पानी पर उतर आई थी । शारीरिक सुंदर है, मानसिक परिपक्क होता हूँ और भावनात्मक अलौकिकता की ये त्रिवेणी मेरी मुट्ठी में है क्या कर उसमें विलेन था की कमर में हाथ डाल दिया था तुम्हारे शहर का ये तूफान समय के ठंडी छोटों के कारण तो नहीं जाएगा । तो बच्चों की तरफ से निपट गया । फिर बोला सकती हूँ सोचती हो गई नहीं, मैं ट्रेन में समझना चाहती हूँ तो मेरे ऊपर निर्भर प्रशस्ति होगी । नहीं वो संतुष्ट हो गयी । मधुफला होना नहीं कैसा होगा कमाल करती है यहाँ आई हो । मुझे मालूम है कश्मीर में मधुमास पर्ची लाइए । देवी जी विनीता का मधुभाषी दिवास्वप्न टूट गया । कुछ देखा आगे वाले सारे लोग दवा लेकर जा चुके हैं । उसका नंबर आ चुका था । उसने दवा की पर्ची कम्पाउण्डर के आगे रखती ।

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विनीता और आलोक प्‍यार की मदहोशी में उस मंजिल तक पहुंच जाते हैं, जहां उन्‍हें होश नहीं रहता। लेकिन आलोक ने इस भूल को खूबसूरती के साथ संवार लिया और दोनों ने अपनी दुनिया बसाई। जब उनका बेटा गुंजन बड़ा हुआ, तो इतिहास ने एक बार फिर अपने आप को दोहराया, पर नए जमाने का गुंजन आलोक की तरह जिम्‍मेदार और वफादार नहीं था। उसने लिंडा के साथ प्‍यार का नाटक किया और बदनामी के मोड़ पर लाकर छोड़ दिया। क्‍या लिंडा ने हार मान ली? क्‍या गुंजन उसे अपनाएगा? आज के युवा जीवन में मूल्‍यों के बदलते मायने को पेश करती है यह उपन्‍यास।
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