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काला पहाड़ -03

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सुलतान कारनानी की सेना का सूबेदार कालाचंद राय धर्मनिष्‍ठ ब्राह्मण था। सुलतान की बेटी दुलारी ने उस पर मुग्‍ध होकर विवाह करने का फैसला लिया, लेकिन धर्म के खातिर उस ने यह प्रस्‍ताव ठुकरा दिया। लेकिन समय बदला और उसने दुलारी का हाथ थाम लिया। फिर शुरू हुई धर्मांध ब्राह्म्‍णों की कुटिलता की कहानी- इंसान को हैवान बनाने का सफर। जाने वह पहले कालाचंद राय से मोहम्‍मद फर्मूली बना और फिर बना काला पहाड़ कैसे बना?
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तो कालाचंद की सजा की खबर आपकी तरह फैल कर हरम में भी पहुंच गई । आतंकित गुलशन ने हफ्ते हफ्ते कहा हो जाता है शिवजोर वो चंद के तीसरे दिन उसका सिर कलम कर देंगे । शहजादी के चेहरे पर लम्बा था । उसने पूछा क्यों? क्योंकि क्योंकि मैं समझती हूँ नहीं उसका आपसे मैं कहा करने से इंकार कर दिया है । तेरे को असली वजह क्या थी, मैं ये जानना चाहती हूँ । अभी मुझे मालूम नहीं है । काजी का कहना है कि उसने बादशाह सलामत की आज्ञा का उल्लंघन किया है और गद्दारी है । तुम्हारी को बेचैनी होने लगी । उसी विश्वास ही नहीं हो रहा था । अब पहचान किसी आदमी को सिर्फ इसलिए मौत की सजा क्यों देंगे? उसने मेरे साथ शादी करने से इंकार कर दिया है । शहजादी मैंने सुना है उससे पहले मुसलमान होने के लिए कहा गया और उसने कलमा पडने से इंकार कर दिया । तुम्हारी के चेहरे पर मुस्कान करेंगे । तब उसने मुझसे नहीं कहा करने के लिए इनकार नहीं किया । उसने अपना धर्म बदलने से इनकार किया है । ये अच्छी बात है । किसने इंकार कर लिया । इससे मालूम होता है कि वो एक ईमानदार और चरित्रवान व्यक्ति है । दासियों सिर हिलाकर हामी भरी क्योंकि पातशाह की बेटी से नहीं करने के लिए साहस से कुछ और अधिक चाहिए । तुलाडीह ने दृढता के साथ कहा वो नहीं मारेंगे, मैं उन्हें नहीं होंगी । रबिया ने पूछा कैसे शहजादी मुझे खुद भी मालूम नहीं है लेकिन तुम लोग जायेंगे मुझे अकेला छोड दो । पछतावे भरी आवाज में गुलशन ने कहा छह जाती हैं ऍफ पता लग गई है और अब सच उसको समाप्त करती हैं । मैं उम्मीद करती हूँ कि वो आपकी वजह से जिंदा रहेगा । दासियां कमरे से बाहर चले गए और तुम्हारी फिर की के पास जाकर खडी हो गई । उसने देखा महानंदा बिना किसी चिंता के बह रही थी । वो मन ही मन नदी से कहने लगी मैं तुम्हारे किनारे पर पैदा हुई हूँ तो मुझे नाउम्मीद नहीं कर सकती तो नहीं मुझको उसे बचाने का रास्ता पता नहीं होगा कि मैं बेहद प्यार करती है और अगर तो मुझे रास्ता नहीं सूझा होगी तो मेरी लाश तुम्हारी गोद में होगी । नदी केवल कल कल करती रही । वो खिडकी के नजदीक बहुत तेज तभी शाम बैठी रही पर उसके दिलो दिमाग में तूफान बूट पडा था । वो अपनी कल्पना में कालाचंद को महानंदा में स्टान करके लौटे देख रही थी । उसका हृदय उछलने लगा । उसके बाद एक का एक बहुत बन गए तथा उसके मन नहीं के विचार कौन गया कि वह करेगी, वो ऐसा ही करेगी और उसे बचाने का सिर्फ यही रास्ता है । रात को उसने अपने अब पहचान की । मिन्नतें मेरे पास के बाहर है । मेरी बच्ची सुल्तान ने अपनी बेटी के दुख से कातर होकर असमर्थता प्रकट करते हुए कहा अब बच्चा आप बंगाल और बिहार के सुल्तान है और आपका जी का फैसला बदल सकते हैं । बाकी उसे बचा लीजिए । माफ कर दो बेटे, अब बहुत देर हो चुकी है । अब कुछ हुआ क्या है कि मुझे कोई नहीं पता था । मेरी बच्ची माफ कर हम कुछ नहीं कर सकता । वो नहीं कर सकता । बाजार नहीं, उसे नहीं मरने दूंगी । बिफरते हुए पागलों की भारतीय दुलानी ने कहा, बादशाह ने अपने कंधे उसका तो बहुत दुखी था । वो अपनी बेटी से बातें करते हुए कर रहा था । वो नहीं चाहता था कि कालाचंद जीवित रहे क्योंकि उसने उसे बहुत चोट पहुंचाई थी । कालाचंद की मौत ही सिर्फ उसकी चोट की दवा छुपन समझता था की दुलारी थोडा रहेगी क्योंकि वो मासूम लडकी ही तो है और वक्त उसके गांव भर देगा । शहजादी ने बात आगे नहीं बढाई । उसने सोच लिया था कि वही करेगी, इसका उसमें फैसला कर लिया है । वो अपने अब मंत्री और काजी को ऐसा सबक सिखाएगी की वो भी याद रखेंगे । ज्ञानेंद्र नाथ बहादुरी शीघ्र ही टांडा पहुंच गए और रूपाली और रुपानी के साथ सुल्तान के सामने गए । उसने बादशाह से विनती की उससे भीख मांग पर नहीं पहुंच चाह नहीं पसीजा और हो रही थी लेकिन सुल्तान नहीं पिघला । फैसला हो चुका है अब इसके विरुद्ध कौन जा सकता हूँ । अंत में निराश होकर ज्ञानेंद्र नाथ ने पूछा पानी जा क्या कोई और रास्ता नहीं हैं? उसने मेरी आज्ञा का उल्लंघन किया है और ये गद्दारी है और आदमी से जानता है कि हम कानून नहीं बदल सकते हैं । बूढे ज्ञानेंद्र रात ने कहा है खाली जा मैं उसे समझाऊंगा और अपनी बात मनवा लूंगा । मेहरबानी करके मुझे बता दें कि उसने क्या क्या नहीं मानी । तैयार गरयाली जा मानने वाली क्या तुम समझते होंगे तो भी अकेले इंसान हो जो उससे प्यार करता है मैं उस से प्यार करता हूँ । मेरी बेटी से बेहद प्यार करती है । पहुंचकर सबाही उससे प्यार करते हैं । आप क्या का उल्लंघन तो आज्ञा का उल्लंघन है और उसके मायने सिर्फ मौत है । भारीजा वो भी बच्चा है । वो लापरवाह हो सकता है । अगर आप मुझे उस से मिलने की जा सकते हैं तो मैं ऐसे समझा दूंगा । मेरी बात मान ले । गाली जान देखिए, मानने वाले बहुत देर हो चुकी है । पूरा ज्ञानेंद्र नाथ और कालाचंद राय की दोनों पत्नियां होती हुई अपने घर वापस लौट नहीं पर जी घर अब उदासी और दुख से भर गया था । निराशा के सागर में गोता लगाते हुए उसकी मौत का इंतजार कर रहे थे चंद तीसरे दिन करन उनको प्रेमियों से चढकर पहले शाही दरबार में लाया गया । सिपाहियों ने उसे घेर रखा था । सुल्तान एक ऊंची सिंघासन पर बैठा था । उसके नजदीक खडा पूरा मंत्री धीरे धीरे अपनी गाडी सहला रहा था । आसपास देश के सरदार और अफसर तथा कुछ नागरिक खडे हुए थे और भेड में ज्ञानेंद्र नाथ भी खडा था । उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे और सूरत से दुख और पीडा झलक रही थी । कालाचंद छाती फुलाकर को सीधा पडा था । उसकी बाहों के मांसपेशियां भडक रही थी । उस सुल्तान और मंत्री को भी शांत नजरों से देख रहा था । शौतान आपने सिंघासन पर बैठक छेद सराहा था । सुजॅय जवान को देखकर निकल रहा था लेकिन है नहीं रहा था । कालाचंद एक स्वाभिमानी ब्राह्मण था जबकि ब्राहमण को तीन और शालीन होना चाहिए था । हर व्यक्ति की जवानी पर दुखी था । उसे सभी पसंद करते थे । सभी को आश्चर्य हो रहा था की उसमें ऐसा कौन सा काम कर दिया है जिससे बात शाह की अवज्ञा हुई हैं । काजी सामने आया और पांच चाह के सामने चुका हूँ । ऍम बलपूर्वक रहा है । आगे जा के सजा की तैयारियां पूरी हो चुकी है । ठीक है चलात को बुलाऊं । गाजी ने घूमकर एक्सपायरी की तरफ देखा । उसने एक सिपाही को शराब क्या है? सिपाही बाहर चला गया और थोडी ही देर बाद एक नाते से ताकत पर चल रात के साथ लौट आया । जल्लाद नहीं लगा पहन रखी थी वो । हम नहीं लग रहा था । उसके शरीर में मांसपेशिया नजर आ रही थी । उसको ऊपरी भाग लगा था । कमर से नीचे उत तंग चूडीदार पायजामा पहने हुए था । उसके हाथ में एक बडा सफर सा था । अब शॅल बादशाह को झुककर सलाम किया । सलाम करने के बाद कालाचंद की और भू करके खडा हो गया । कालाचंद बिना पलक झपकाए निर्भीकतापूर्वक उसे खुल रहा था चलना आपको आश्चर्य हो रहा था । किसी साधारण गया मौत की सजा पाए अपराधी भी रहते हैं । हो सकती है बिल्कुल नहीं था काफी और मंत्री धीरे धीरे काला जम के पास पहुंचे । कुछ सोचा हट के साथ मंत्री ने कहा तो भी मुसलमान पढने से कर करते हो । वहाँ उपस्थित हर व्यक्ति ने ठंडी सांस ली हूँ । तो सारी पाक का कारण है बूरा । नाना ज्ञानेंद्र बेहोश होकर गिर पडा । ऍम मुस्कुराने लगा । उस से कहा मैंने बहुत पसंद की है । फरसा उठाओ और मेरी कर्जन उडा दो क्योंकि मैंने खुद मौत को पसंद किया है । मुसलमान बनने की जगह नहीं, एक हजार बार मरना पसंद करूंगा । जब पूरा ज्ञानेंद्र होश आया उसकी नजरों में काला जम के प्रति प्रशंसा के भाव नहीं तो सोच रहा था कि अगर स्वयं शाॅ से प्रार्थना करता की वो कालाचंद को मुसलमान बनने के लिए तैयार करें तो कभी ऐसा नहीं करता हूँ । उसे काला संपर्क करता था । सुबान ने कहा तुमने हर बात को मुश्किल बना दिया है । कलेक्शन में सुल्तान की तरफ की नजरों से देखा आरे जा ऍम है । पर से की चोट से हर चीज खत्म हो जाएगी । काजी और मंत्री श्रद्धान के पास गए । सुल्तान ने उन्हें ऍम चलना अपने फसा उठाया और उद्धार पर हाथ फेरकर उसकी तेजी देखने लगा । वाला जमने निश्चिंत होकर उसकी तरफ देखा । सिपाही कारण जान के पास पहुंचा जलते कहा भरवानी करके छुप चाहूँगा । करा चलने हसते हुए कहा हूँ मैं कभी नहीं होगा जलाटको मेरा सिर्फ से ही उतारना पडेगा । हो रही थी वो थोडा सा फॅसा उठाया और से चलाने के लिए फिर से को बोला । फरसा चलाना ही चाहता था की फॅमिली टैरो आवास पतली पर तीखी थी । धरसा हवा में ही रुक गया । हर कोई ये जानने के लिए इधर उधर देखने लगा कि आवास किसकी है । गाजी और मंत्री भी हत्थे सुल्तान खडा हो गया । उसे लगा कि इस मिली आवास जानी पहचानी है । तूफान की चौकी की तरह फॅमिली सामने आएंगे । कालाचंद के सामने आकर खडी हो गई । सुल्तान में खोखली आवाज में आश्चर्य सफर कर रहा हूँ तो नारी किन्तु ऍम खडी नहीं । उसने कुछ सब्जी आवाज में कहा इन्हें भरने से पहले मुझे मारना होगा ऍम शहजादी शहजादी को अब तक बहुत थोडे से लोगों ने देखा था । वो तुम्हारी को नहीं पहचानते थे लेकिन उन सबको ये भगवान हो गया था कि वह शहजादी ही है । उसके बीच पूछा । उसका सुंदर शरीर और शाही निशाना इस बात का संकेत कर रहे थे कि वो शाही खानदान से ताल्लुक रखती है । अरे ऍम छोकरी कानून और उसकी अवहेलना कर रही है । बजाने मुझे मारे बिना कोई नहीं कोई नहीं मार सकता । वहाँ खडे लोगों और सरदारों के बीच ऍम सुल्तान की समझ में नहीं आ रहा था कि वो क्या करें । बहुत चक्कर से नजर आ रहा था । खाना चाहिए इस लडकी के साहस को देखकर आश्चर्यचकित था वो उतने आश्चर्य कुछ पाने के लिए निचला हूँ काट रहा था तो है शहजाद पांच छह की बेटी है, तुम्हारी नहीं । वो लडकी है जो शादी करना चाहती थी और जिससे शादी के लिए उस ने इंकार कर दिया था । उसमें कल्पना की थी शहजादी आलसी और सिद्धि होगी । उसने कभी सोचा भी नहीं था कि शहजादी बिफरी शेरनी की तरह भी हो सकती है । सुबह हमने फिर जीत कर रहा है सारे ऍम तो लडकी ने भी चेक कर जवाब दिया कभी नहीं आता क्या पहचान मैं देखती हूँ किस में मुझे हाथ लगाने की हिम्मत है । अगर किसी ने मेरे पदन को छोड दिया तो फिर मैं आपकी बेटी नहीं रहेंगे । सुल्तान कांप रहा था । वो अपनी बेटी के पास गया । मंत्री और काजी की सवाल पंद्रह क्योंकि शाही खानदान का मसला था और उसके बीच में न पडने में ही सब ने अपनी भलाई समझी फॅस अगर संतान मेरी पिछली गलतियों को माफ कर देंगे तो मैं उनकी बेटी से ने कहा कर लूँगा । छोटा चौक पडा तुम शादी करो । उसने आश्चर्य दो बार पूछा यहाँ चले जाते हैं । मैं शादी करूँगा तो मुसलमान बन जाओगे, नहीं आ जाएगा । मैं नहीं चाहती कि मुसलमान बने । मैं ऐसे ही चाहती हूँ । जैसे ही है मेरे बच्चे तो सब कुछ होगा । सुल्तान उसके साहस की प्रशंसा करते हुए कहा बच्चा मैं आपकी बेटी हूँ । सुल्तान में सिपाहियों की तरफ देखा । उसने आदेश दिया इसे आजाद कर दूँ । सफाइयों ने आगे बढकर उसके आदेश का पालन किया और कालाचंद को जंजीरों से मुक्त कर दिया । कालाचंद ने अपनी कलाइयों पर हाथ फेरा तक जंजीरों के कारण नाडियों में रुका हुआ खून रह सके । उन्होंने एक दूसरे की तरफ देखा । तुम्हारी ने धीमे स्वर में कहा आपको अपना मौसम बदल कर मुझे शादी नहीं करनी है । मैं ये नहीं चाहती कि आप कुछ पट्टाया करते शादी करें । मैं चाहती हूँ कि आप मेरे शौहर बने । ठीक ऐसा त्यौहार तो प्यार, मोहब्बत और आनंद से बडा हो । मुझे प्यार करें ना के मुझ पर तरह करें । उस अवधि में सब कर दिया ये दया नहीं शादी और ना ही यह मोहब्बत है था । इसे प्रशंसा कह सकती हैं । मैं आपके हिम्मत की प्रशंसा करता हूँ । शाही शानशौकत से शादी हुई । बडे छोटे गरीब अमीर सभी को शादी में दावत दी गई । सारे देश में खुशियाँ मनाई गई । वो सुपान इकलौती बेटी थी इसलिए शादी मुसलमानी ढंग से की गई ।

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सुलतान कारनानी की सेना का सूबेदार कालाचंद राय धर्मनिष्‍ठ ब्राह्मण था। सुलतान की बेटी दुलारी ने उस पर मुग्‍ध होकर विवाह करने का फैसला लिया, लेकिन धर्म के खातिर उस ने यह प्रस्‍ताव ठुकरा दिया। लेकिन समय बदला और उसने दुलारी का हाथ थाम लिया। फिर शुरू हुई धर्मांध ब्राह्म्‍णों की कुटिलता की कहानी- इंसान को हैवान बनाने का सफर। जाने वह पहले कालाचंद राय से मोहम्‍मद फर्मूली बना और फिर बना काला पहाड़ कैसे बना?
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