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1. Murkh Ko Salah Dena Nasamjhi Hain

नमस्कार दोस्तो, मैं महेंद्र दोगने आपॅरेशन के नाम से जानते हैं और आप सुन रहे हैं उनको वैसे यहाँ पर मैं आप लोगों के लिए लेकर आया हूँ । संपूर्ण चाणक्य थी जिसके पूरे सत्र अध्याय यहाँ पर आपको सुनने को मिलेंगे । यदि आप अपने जीवन को बदलना चाहते हैं और चाहते हैं की आपको कुछ ऐसे तरीके पता चले जिससे आप जीवन को बहुत ही अच्छे ढंग से जी सकें तो ये सत्रह अध्याय आप सभी के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है । तो चलिए इस चाणक्य नीति की शुरुआत करते हैं आचार्य चाणक्य के जीवन की एक प्रारंभिक घटना से । उनके चरित्र का बहुत सुन्दर खुलासा होता है । एक बार वे अपने शिष्यों के साथ दक्षिण जिला से मदद की और आ रही थी । मदद कर आजा महानंद हमसे द्वेष रखता था । वहाँ एक बार भरी सभा में चाणक्य का अपमान कर चुका था । तभी से उन्होंने संकल्प लिया था कि वे मगध के सम्राट महानंद को पद से नीचे उतारकर ही आपने शिखा में गार्ड मानेंगे । इसके लिए वे अपने सर्वाधिक प्रिय शिष्य चंद्रगुप्त को तैयार कर रहे थे । हम अगर पहुंचने के लिए वे सीधे मार्ग से न जाकर एक अन्य अक्टूबर खावन मार्ग से अपना सफर तय कर रहे थे उस मार्ग में काटे बहुत है । तभी उनके पैरों में एक काटा छूट गया । मैं क्रोध से भर उठे । तत्काल उन्होंने अपने शिष्यों से कहा उखाड से को इन नाखूनों को एक भी शेष नहीं रहना चाहिए । उन्होंने तब उन काटो को ही नहीं उखाडा उन काटो के वृक्षों के चरणों में मही डाल दिया ताकि मैं दोबारा न हो सके । इस प्रकार में अपने शत्रु का समूलनाश करने पर ही विश्वास करते थे । वे दूसरों के बनाये गए मार्ग पर चलने में कभी भी विश्वास नहीं करते थे । अपने द्वारा बनाए गए मार्ग पर ही चलने में विश्वास करते थे । आशा करता इन अध्यायों को सुनने के बाद आप भी अपनी जिंदगी में अपने मार्ग खुद तैयार करें । अपने ऊपर विश्वास करें और अपनी जिंदगी में आगे बढे । तो चलिए प्रारंभ करते हैं प्रथम अध्याय में श्री चाणक्य श्री विष्णु भगवान् को नमन करते हुए समझाते हैं कि राजनीति में कभी कभी कुछ कर्म ऐसे दिखाई पडते हैं जिन्हें देखकर सोचना पडता है कि यह उचित हुआ या अनुचित परन्तु जिस नीतिकार इसे भी जनकल्याण होता हूँ अथवा धर्म का पक्ष प्रबल होता हूँ तो कुछ अनैतिक कार्य को भी नीति सम्मत ही माना जाएगा । प्रधान के रूप में महाभारत के युद्ध में युधिष्ठिर द्वारा अश्वत्थामा की मृत्यु का उद्घोष करना है । यद्यपि नीति विरुद्ध था पर नीति कुशल योगीराज कृष्ण में इसे उचित माना था क्योंकि वे गुरु द्रोणाचार्य के विकेट संहार से अपनी सेना को बचाना चाहते थे । आगे चल के समझाते हैं कि मूत्र छात्रों को पढाने से, दुष्ट इस तरीके पालन पोषण से और दुखियों के साथ संबंध रखने से बुद्धिमान व्यक्ति भी दुखी होता है । इसका मतलब यह नहीं है कि मूर्ख शिष्यों को कभी उचित उद्देश् नहीं देना चाहिए । समझाने का तात्पर्य यह हैं की पत्र आसाराम वाले इस तरी की संगती करना तथा दुखी मनुष्यों के साथ समागम करने से विद्वान तथा भले व्यक्ति को दुखी उठाना पडता है । वास्तव में शिक्षा उसी इंसान को दी जानी चाहिए जो सुपात्र हो । जो व्यक्ति बताई गई बातों को ना समझे उसे परामर्श देने से कोई लाभ नहीं है । मुझे एक व्यक्ति को शिक्षा देकर अपना समय ही नष्ट किया जाता है । यदि बात दुखी व्यक्ति के साथ संबंध रखने की है तो दुखी व्यक्ति हर पल अपना ही रोना रोता रहता है । इससे विद्यान व्यक्ति की साधना और एकाग्रता भंग हो जाती है । आगे श्री चढा के हमें समझाते हैं कि दुस्त स्त्री छल करने वाला, मित्र पलट कर तीखा जवाब देने वाला नौकर तथा जिस घर में साफ रहता हूँ, उस घर में निवास करने वाले गृहस्वामी की मौत में संजय ना करें, वहाँ निश्चित ही मृत्यु को प्राप्त होगा । घर में यदि दुष्ट और दुष्चरित्र वाली पत्नी हूँ तो उस पति का जीना ना जीना बराबरी है । रहा अपमान और लग जा के बोल से एक तो वैसे ही मृतक के समान है, ऊपर से उसे सदैव यह भी बना रहेगा कि यहाँ इस्त्री अपने स्वास्थ्य के लिए कहीं उसे विष्णु देते हैं । दूसरे भी उस ग्रहस्वामी का मित्र भी दगाबाज हो, धोखा देने वाला हो तो ऐसा मित्र आज तीन का साथ होता है । वह कभी भी अपने स्वास्थ्य के लिए उस गृहस्वामी को ऐसी स्थिति में डाल सकता है जिससे उबरना उसकी सामर्थ से बाहर की बात होती है । तीसरा घर में यदि नौकर बच्चों बाद बात बात में झगडा करने वाला हूँ, पलट कर तीखा जवाब देने वाला हो तो समझ लेना चाहिए कि ऐसा नौकर निश्चित रूप से घर के भेद जानता है और जो घर के भेज जान लेता है उसी तरह से घर बार का विनाश कर सकता है । जैसे भीषण ने घर में भेद करके रावण का मिनाज करा दिया था । तभी मुहावरा भी बना घर का भेदी लंका ढाए, विपत्ति के समय काम आने वाले धन की रक्षा करें, धन से स्त्री की रक्षा करें और अपनी रक्षा, धन और तीसरी से सादा करें । अर्थात संकट के समय धान की जरूरत सभी को होती है । इसलिए संकटकाल के लिए धन बचाकर रखना उत्तम होता है । धन से अपनी पत्नी की रक्षा की जा सकती है अर्थात यदि परिवार पर कोई संकट आए तो धन का लोग नहीं रखना चाहिए । परन्तु यदि अपने ऊपर कोई संकट आज है तो उस समय उस धन, वहाँ इस्त्री, दोनों का ही बलिदान कर देना चाहिए । आगे श्री चाना के कहते हैं की आपत्ति से बचने के लिए धन की रक्षा करें क्योंकि पता नहीं कब आपदा जाए और लक्ष्मी तो चंचल है । संचय किया गया धन कभी भी नष्ट हो सकता है । श्री चाना के कहते हैं कि जिस देश में सम्मान नहीं, आजीविका के साधन नहीं बंधु बांधव अर्थात परिवार नहीं और विद्या प्राप्त करने के साधन नहीं, वहाँ में कभी भी नहीं रहना चाहिए । अगले शोक में श्री चाइना के कहते हैं कि जहाँ धनी वैदिक ब्राह्मण, राजा नदी और वैध ये पांच न हो, वहाँ एक दिन से भी ज्यादा नहीं रहना चाहिए । भावार्थ यह है कि जिस जगह पर इन पांचों का अभाव हो, वहाँ मनुष्य को एक दिन भी ठहरना उत्तर नहीं होगा । जहाँ धनी व्यक्ति होंगे वहाँ व्यापार अच्छा होगा । जहाँ व्यापार अच्छा होगा तो वहाँ आजीविका के साधन भी अच्छे होंगे । जहाँ श्रुतियों अर्थात वेदों के ज्ञाता ब्राह्मण होंगे, वहाँ मनुष्य जीवन के धार्मिक तथा ज्ञान के क्षेत्र में भी विस्तृत रूप से पहले हुए होंगे । जहाँ स्वच्छ जल की नदियाँ होंगी, वहाँ जल का अभाव नहीं रहेगा और जहाँ कुशल वैद्य होंगे वहाँ बीमारी पास में नहीं आ सकती है । आगे चल के कहते हैं कि जहाँ जीविका, भय, लज्जा, चतुराई और त्याग की भावना ये पांच चीज न हो, वहाँ के लोगों का साथ कभी ना करें । शौचालय के कहते हैं कि जिस स्थान पर जीवन यापन के साधन ना हूँ, जहाँ साडी भय की परिस्थिति बनी रहती हूँ, जहाँ लग्नशील व्यक्तियों की जगह बेशर्म और खुद ही लोग रहते हूँ, जहाँ कलाकौशल और हस्तशिल्प का सर्वथा अभाव हो और जहाँ के लोगों के मन में जरा भी त्याग और परोपकार की भावनाएँ ना हूँ, वहाँ के लोगों के साथ ना तो रहे हैं और न ही उनसे कोई व्यवहार रखी । श्री चाइना के कहते हैं कि नौकरों को बाहर भेजने पर, भाई बंधुओं को संकट के समय तथा दोस्तों को विपरीत परिस्थितियों में और अपने इस तरी को धन के नष्ट हो जाने पर पर रखना चाहिए था । उनकी परीक्षा नहीं नहीं चाहिए । चाणक्य ने समय समय पर आपने सेव को भाई, बंद हुआ मित्रों और अपनी स्त्री की परीक्षा लेने की बात कही है । समय आने पर ये लोग आपका किस प्रकार साथ देते हैं या देंगे इसकी जांच उनकी कार्यों से ही होती है । वास्तव में संसार में मनुष्य का संपर्क आपने सेव को मित्रों और अपने निकट रहने वाली अपनी पत्नी से होता है । यदि ये लोग छल करने लगे तो जीवन दुभर हो जाता है । इसलिए समय समय पर इनकी जांच करना जरूरी है कि कहीं ये आपको धोखा तो नहीं दे रहे हैं । आगे समझाते हैं कि बीमारी में विपत्तिकाल में, अकाल के समय, दुश्मनों से दुख पाने या आक्रमण होने पर, राज दरवार में और शमसान भरने में जो साथ रहता है वही सच्चा भाई बंधु अथवा मित्र होता है । छह जाने की समझाते हैं कि जो आपने निश्चित कर्मों तथा वस्तु का त्याग करके अनिश्चित की चिंता करता है उसका अनिश्चित लाॅट हो ही जाता है, निश्चित भी नष्ट हो जाता है । किसी ने सही कहा है आदि को छोड सारी गोधाम आधी मिले । पूरी पावें जो भी थी आपने निश्चित लक्ष्य से भटक जाता है । उसका कोई भी लक्ष्य पूरा नहीं हो पाता है । अर्थाभाव यही है कि आदमी को उन्हीं कार्यों में अपने हाथ डालना चाहिए जिन्हें वहाँ पूरा करने की शामत रखता हूँ । आगे श्री चढा के कहते हैं कि बुद्धिमान इंसान को अच्छे कुल में जन्म लेने वाली कुरूप करने से भी बे वहाँ कर लेना चाहिए । परन्तु अच्छे रूप वाली मीट कुल की कन्या से मेवा नहीं करना चाहिए क्योंकि विवाह संबंध सामान कूल में ही श्रेष्ठ होता है । लम्बे नाखून वाले हिंसक पशुओं नदी हो, बडे बडे सिंह वाले पशुओं, शस्त्रधारियों, स्त्रियों और राजपरिवारों का कभी भी विश्वास नहीं करना चाहिए । पहचाना की कहते हैं कि पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों का भोजन दुगना लग जा, चौगनी साहस छह गुना और कम आठ गुना अधिक होता है । इन बातों का हमेशा ध्यान रखना चाहिए । ये था भाग एक अब हम सुनेंगे अगले एपिसोड में भाग तो आप सुन रहे हैं कुक ऊॅं के साथ ऍम

2. Bimaari mein aapke joh saath rahe woh saccha saathi

3. Lakshya Nahi To Jeet Nahi

4. Apni Sabse Badi Yojanao Ko Hamesha Gupt Rakhein

नमस्कार हूँ । आप सुन रहे हैं फॅमिली पिछले एपिसोड में अपने संपूर्ण जाने की नीति का पहला अध्याय सुना । अब हम सुनने जा रहे हैं दूसरा दूसरे अध्याय की शुरुआत में ही चरण के कहते हैं कि झूठ बोलना, उतावलापन दिखाना, छलकपट, मूर्खता, अत्याधिक लालच करना, अशोभनीयता और दयनीयता ये सभी प्रकार के दोष स्त्रियों में स्वाभाविक रूप से मिलते हैं । स्त्रियों के विषय में जाने की उपयुक्त धारणा का कारण क्या रहा था, यह कहना तो कठिन है, परंतु सभी स्त्रियों में ये स्वाभाविक दुर्गा हूँ, यह संभव नहीं । चानकी के काल में स्त्री शिक्षा का निश्चित रूप से अकाल रहा होगा । इसी आधार पर चाहे के नहीं, इस तरी को मूर्ख, लालची, अशुद्ध, झूठी, छली आदि कहाँ होगा लेकिन दया हीनता की भावना स्त्री का स्वाभाविक दोष नहीं माना जा सकता । चाइना के कहते हैं कि भोजन करने तथा उसे अच्छी तरह से बचाने की शक्ति हो तथा अच्छा भोजन समय पर प्राप्त हो । प्रेम करने के लिए अर्थात रहती सुख प्रदान करने वाली उत्तम स्त्री के साथ संसर्ग हो, खूब सारा धन और उस धन को दान करने का उत्साह हो । ये सभी से किसी तपस्या के फल के समान होते हैं अर्थात कठिन साधना के बाद ही ये सुख प्राप्त होते हैं । आगे कहते हैं कि जिसका पुत्र आज्ञाकारी हो इस तरह उसके अनुसार चलने वाली हो अर्थात पति व्रता हो जो अपने पास ढंग से संतुष्ट रहता हो उसका स्वर्ग यहीं पर हैं और कहते हैं कि पुत्र वही है जो पिता भागते हैं । पिता वही है जो अपने बच्चों का लालन पोषण करता है । मित्र वही है जिसमें पूर्ण विश्वास हो और इस तरी वही है जिससे परिवार में शोक शांति व्याप्त हो । जो मित्र प्रत्यक्ष रूप से मधुर वचन बोलता हूँ और पीठ पीछे अर्थात अप्रत्यक्ष रूप से आपके सारे कार्यों में रोडा अटकाता हो ऐसे मित्रों को उस घडे के समान त्याग देना चाहिए जिसके भीतर विश भरा हूँ और ऊपर उनके पास दूध धारा पूरे मित्रों पर और अपने मित्रों पर भी कभी विश्वास नहीं करना चाहिए क्योंकि कभी नाराज होने पर संभव आपका विशिष्ट मित्र भी सारे रहस्यों को बाहर जाकर प्रकट कर सकता है । मन में बिचारे गए कार्यों को कभी किसी के सामने नहीं करना चाहिए । अभी तू उसे मंत्र की तरह रक्षित करके अपने मतलब सोचे हुए कार्य को करते रहना चाहिए । निश्चित रूप से मूर्खता, दुखदाई और योवन भी दुःख देने वाला है परंतु क्रिस्टो में भी बडा कष्ट दूसरे के घर पर रहना होता है । निश्चित रूप से मूर्ख व्यक्ति के समाज में कोई सम्मान नहीं । बेकिंग व्यक्ति को पक पक पर अपमानित होना पडता है और परिहास का पात्र बनना पडता है । इसी प्रकार योवन के आने पर भी आदमी कभी कभी अपना विवेक और आपा थे, बेटा है । जवानी में आदमी का जोश और उत्साह तो खूब बडा चढा होता है पर वह अपना होश भी खोले रहता है । उसमें अपनी शक्ति का अहम इस कदर बढ जाता है की उसे अपने सामने वाला व्यक्ति तो अच्छे दिखाई देने लगता है । जाने के का कहना है कि किसी को व्यवस्था में जब दूसरे के घर पर निर्भर रहना पडे तो उसका अपना वर्चस्व समाप्त हो जाता है । उसे दूसरों की कृपा पर निर्भर रहना पडता है, उसकी स्वाधीनता नष्ट हो जाती है और यही उसके दुखों का सबसे बडा कारण होता है । आगे चल के कहते हैं कि हर एक पर्वत में मनी नहीं होते हैं और हर एक खाते में मुक्तामणि नहीं होती है । साधु लोग सभी जगह नहीं मिलते हैं और हर एक वन में चंदन के वृक्ष नहीं होते हैं । यहाँ में समझाते हुए कह रहे हैं कि अच्छी चीजें सभी जगह प्राप्त नहीं होती । पर्वत श्रंखलाओं के मध्य खनिज पदार्थ भरे पडे हैं उनमें हीरे जवाहरातों की खदानें भी है परंतु सभी पर्वतों में ये प्राप्त नहीं होते हैं । विशेष गुण वाली वस्तुओं को वेस्ट स्थानों में ही खोजना पडता है । मध्यम लोगों का कर्तव्य होता है कि वे अपनी संतान को अच्छे कार्य व्यापार में लगाए । क्योंकि नीति के जानकार बस अब व्यवहार वाले व्यक्ति ही कुल में सम्मानित होते हैं । चाहे कि कहते हैं कि जो माता पिता अपने बच्चों को नहीं पढाते हैं वे उनके शत्रु होते हैं । ऐसे अपन बालक सभा के मध्य में उसी प्रकार शोभा नहीं पाते जैसे हंसू के मध्य में बगुला शोभा नहीं पाता हूँ । अत्यधिक लाड प्यार से पत्र और शिष्य गुणहीन हो जाते हैं और तारना से गुडी हो जाते हैं । भाव यही है कि से शी और पुत्र को यदि ताडना का भय रहेगा तो वे कभी भी गलत मार्कर नहीं जाएंगे । आचार्य चढा के कहते हैं कि एक स्लोग आधार स्लो स्लो का एक चरण, उसका आधा अथवा एक अच्छा ही सही या आधा अक्सर प्रतिदिन जरूर पढना चाहिए । कहने का अर्थ है कि शिक्षा से ही लोग व्यवहार का रहस्य प्रकट होता है । इसलिए हमें हमेशा पढते रहना चाहिए । स्त्री का वियोग, अपने लोगों से अनाचार, कर्ज का बंधन, दूसरे राजा की सेवा, दरिद्रता और अपने प्रतिकूल सभा ये सभी अग्नि न होते हुए भी शरीर को जलाकर राख कर देते हैं । नदी के किनारे खडे ब्लॅक दूसरों के घर गई इस्त्री मंत्री के बिना राजा शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं । इसमें कोई भी संशय नहीं करना चाहिए । आगे चल के कहते हैं कि ग्रामीणों का बाल विद्या है । राजा ुका बाल उनकी सेना है, वैश्यों का बाल उनका धन है और शूद्रों का बाल छोटा बनकर रहना अर्थात सेवा कर्म करते रहना है । आपको इन बातों का भी ध्यान रखना चाहिए कि वैष्णो निर्धन मनुष्य को ताजा पराजित राजा को पक्षी फलरहित बृक्ष को अतिथि उस घर को जिसमें वो आमंत्रित किए जाते हैं, आपको भोजन करने के पश्चात छोड देते हैं । ब्राहमण दक्षिण ग्रहण करके यजमान को शिक्षक विद्याध्ययन करने के उपरांत अपने गुरु को फाॅर्स जले हुए वन को त्याग देते हैं । इस श्लोक में चाणक्य ने कहा है कि किसी प्रयोजन के लिए यदि कोई व्यक्ति किसी के पास जाता है तो उसे कार्य पूरा होते ही वह स्थान छोड देना चाहिए । उद्देश्यपूर्ति के बाद वहाँ रुकना किसी भी दृष्टि से उत्तम नहीं है । बुरा आचरण और थार दुराचारी के साथ रहने से पास द्रष्टि रखने वालों का साथ करने से अर्थात अशुद्ध स्थान पर रहने वालों से मित्रता करने वाला शीघ्र ही नष्ट हो जाता है । बुरी संगत का सदैव बुरा असर पडता है । यहाँ जाने के लिए किसी और ध्यान खींचा है । चाइना की समझाते हैं कि मित्रता हमेशा बराबर वालों में ही शोभा पाती है । नौकरी राजा की अच्छी होती है । व्यवहार में कुशल व्यापारी और घर में सुंदर स्त्री शोभा पाती है । मित्रता कभी भी दो स्तर वालों में सफल नहीं होती है । एक साथ स्वभाव एक समान समाज में जीवन स्तर एक से कर्म दो व्यक्तियों के बीच में मित्रता के आधार हो सकते हैं । नौकरी हमेशा सरकारी अच्छी होती है क्योंकि इसमें स्थायित्व होता है । जो व्यापारी चतुर और व्यवहारकुशल होता है वहाँ इस समाज में सम्मान का पात्र होता है और सुंदर स्त्री घर में ही शोभनीय होती है । ये आप सुन रहे थे चाणक्य नीति का दूसरा अध्याय फॅमिली के साथ आइए बढते हैं तीसरे अध्याय की और हूँ

5. Dusro Ki Galtiyan Se Seekho

नमस्कार हूँ । आप सुन रहे हैं चाणक्य नीति कॅश इनके साथ अभी तक आपने तीसरा अध्याय सुना था । अब हम पढते हैं चौथे अध्याय क्या जहाँ चाणक्य हमें समझा रहे हैं कि शरीरधारी जीत के गर्भकाल में ही आयु, कर्म, धन, विध्या, मृत्यु इन पांचों की सृष्टि साथ ही साथ हो जाती है । इस नीति के द्वारा चाहे के मानव जीवन की सभी बातों को पूर्वनिर्धारित मानते हैं । उनका मत है कि मनुष्य जीवन काल की अवधि, मृत्यु, सुख दुख, मान अपमान, विद्या और संपत्ति का भोग सभी ईश्वर के आधीन है । बिना उसकी मर्जी के पत्ता तक नहीं हिलता था । सब कुछ उस पर छोडकर मनुष्य को अपने कर्म पर ध्यान देना चाहिए । आगे जाने के समझाते हैं कि साधु महात्माओं के सबसे से तृत्य मित्र बंधु और जो अनुराग करते हैं, वे संसार के चक्र से छूट जाते हैं और उनके कुल धर्म से उनका कुल उज्वल हो जाता है । भाव है कि जिस स्कूल में साधु महात्मा जैसा कोई पुत्र उत्पन्न हो जाता है, उसके सक्षम से बाकी सभी लोगों का भी सांसारिक परिष्कार हो जाता है । आगे समझाते हैं कि जिस प्रकार मछली देख रेख से कच्ची चिडिया इस परसे सदेव अपने बच्चों का लालन पोषण करती है वैसे ही अच्छे लोगों के साथ से सर प्रकार से रक्षा होती है । यहां सडक सत्संगति पर जोर देते हैं और कहते हैं की अच्छे लोगों का साथ होने पर किसी प्रकार की हानि नहीं होती हैं । सज्जनों का साथ सदेव, सुखकारी और हितकारी होता है । चाइना की कहते हैं कि ये नश्वर शरीर जब तक निरोग स्वस्थ है या जब तक मृत्यु नहीं आती हैं जब तक मनुष्य को अपने सभी तो निकल कर लेने चाहिए क्योंकि अंत समय आने पर वहाँ क्या कर पाएगा । समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता, समय गुजरता जाता है इसलिए किसी भी कार्य को कल पर नहीं छोडना चाहिए और कहाँ भी जाता है । कल करे तो आज कर आज करे तो आप बाल में पर ले होएगी फिर करेगा काम । अतः समय का कोई भरोसा नहीं जो पुण्य कर्म करने हैं अभी कर लेना चाहिए फिर समय नहीं मिलेगा । आगे कहते हैं कि विद्या कामधेनु के समान शिक्षक पूरी करने वाली होती है । विद्या से सभी फल समय पर प्राप्त होते हैं । विदेश में विद्या माता के समान रक्षा करती है । विद्वानों ने विद्या को गुप्त धन कहा है अर्थात विद्या वह धन है जो आपातकाल के समय काम आती है । इसका न तो हरण किया जा सकता है और ना ही इसे कोई चुरा सकता है । विद्या सभी प्रकार से सुरक्षित पास समय पडने पर रक्षा करने वाली है । इसे जितना दिया जाता है यह उतनी ही बढती जाती है । आगे श्री जाने के एक बहुत ही कठिन बात कहते हैं । कहते हैं कि बहुत बडी आयु वाले मूर्ख पुत्र की अपेक्षा पैदा होते ही जो मर गया वहाँ अच्छा है क्योंकि मारा हुआ पुत्र कुछ देर के लिए कष्ट देता है परन्तु मुर्हुत जीवन भर चलता है । आगे फिर चला के कहते हैं कि उस गाय से क्या लाभ चुना, बच्चा जने और ना ही दूध देंगे । ऐसे पुत्र के जन्म लेने से क्या लाभ चुना तो विद्वान हूँ, करना ही है किसी देवता का भक्त हो । भाव यह है कि दूध देने वाली गाय के समान ही ऐसा पुत्र की कामना की गई है जो विद्वान भी हो । पांच ईश्वर में आस्था रखने वाला भी हो और ऐसे बच्चे सदैव सुख देने वाले और माँ बाप का नाम रोशन करने वाले होते हैं । आगे चल के समझाते हैं कि राजा एक ही बार बोलते हैं मतलब आज्ञा देते हैं । पंडित लोग किसी कर्म के लिए एक ही बार बोलते हैं । मतलब बार बार श्लोक नहीं पढते हैं और कन्याएं भी एक ही बार दी जाती है । ये तीन एक ही बार होने से विशेष महत्व रखती हैं । राजा का, विद्वान का और कन्या के पिता का वचन अथवा कथन अटल होता है । आगे समझाते हैं की तपस्या अकेले में, अध्ययन या पढाई दो के साथ और गाना तीन के साथ । यात्रा चार के साथ खेती पांच के साथ और युद्ध बहुत की सहायता से होने पर ही उत्तम होते हैं । फिर आगे कहते हैं की पत्नी वही है जो पवित्र और चतुर है । पति व्रता है । पत्नी वही है जिसपर पति का प्रेम है । पत्नी वही है जो सदैव सत्य बोलती हैं । आगे समझौते कि बार बार अभ्यास न करने पर विद्या विश्व बन जाती है । बिना बच्चा भोजन विश बन जाता है । दरिद्रों के लिए सज्जनों की सभा या साल पार बन्दों के लिए युवा स्त्री भेज के समान होती है । अभ्यास से ही शिक्षा अथवा विद्या का विकास होता है । जो भोजन पचता नहीं है वह शरीर पर कोई प्रभाव डालता है । एक दरिद्र परिजन अपने है । लोगों को प्रवेश के समान दिखाई पडता है । उन्हें भार स्वरूप दिखाई देने लगता है । यदि किसी वृद्ध को युवा इस्त्री मिल जाए तो वहाँ उसे संतुष्ट न करने की स्थिति में इस जहर दिखाई देने लगती है । प्रत्येक वस्तु का अपना उचित स्थान और महत्व होता है । आगे कहते हैं कि दयाहीन धर्म को छोड दो, विद्या विहीन गुरु को छोड दो, झगडालू और क्रोधी इस्त्री को छोड दो और इसलिए विहीन बंधु बांधवों को छोड दो भाव है कि ऐसे धर्म को कभी नहीं अपनाना चाहिए जिसमें प्राणी मात्र के लिए दयाभाव न हो । ऐसे गुरु को नहीं अपनाना चाहिए जिसमें विद्वता या ज्ञान ना हूँ । ऐसी पत्नी को कभी स्वीकार नहीं करना चाहिए जो क्रोधी स्वभाव की हो और कलह करने वाली हो । साथ ही ऐसे पर इंजनों से संबंध नहीं रखना चाहिए जो सुख दुःख में काम ना आए । बहुत ज्यादा पैदल चलना मनुष्य को बडा पाला देता है । घोडे को एक ही स्थान पर बांधे रखना, स्त्रियों के साथ पुरुष का समागम न होना और मस्त को लगातार धूप में डालने से उनका बुढापा आ जाता है । बुद्धिमान व्यक्ति को बार बार यह सोचना चाहिए कि हमारे मित्र कितने हैं, हमारा समय कैसा है, अच्छा है या फिर बुरा है । यदि बुरा है तो उसे अच्छा कैसे बनाए । हमारा निवास स्थल कैसा है? हमारी आई कितनी है और कितना है? मैं कौन हूँ, आत्मा हूँ अथवा शरीर, स्वाधीन अपना पराधीन तथा मेरी शक्ति कितनी है । आगे चल के कहते हैं कि राजा की पत्नी, गुरु, किस तरीक, मित्र की पत्नी, पत्नी की माता अर्थात साथ और अपनी जनानी ये पांच माताएं मानी गई हैं । इनके साथ हमेशा माँ का व्यवहार करना चाहिए । यदि आप इन सभी बातों का ध्यान रखेंगे तो अपने जीवन में सफलता के मार्ग पर आगे बढते चले जाएंगे । आप सुन रहे थे संपूर्ण जाने की नीति का चौथा भाग अब बढते हैं पांचवें वहाँ की और आप सुन रहे हैं फॅमिली ऍम के साथ हूँ ।

6. Satark Vyakti Ko Koi Bhay Nahi Hota

नमस्कार साथी हो आप सुन रहे हैं संपूर्ण जाना, कहीं थी कॅश इनके साथ, ये हैं अध्याय तीन । तीसरे अध्याय की शुरुआत में श्री चाइना के कहते हैं कि दोष किसकी कुल में नहीं है । ऐसा कौन है जैसे दुखने नहीं बताया अगर किसी नहीं है सर देर सुखी कौन रहता है यह संसार दुखों का सागर । इस संसार में एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं है जिसे दुख ना हुआ हूँ । सभी व्यक्तियों में कुछ न कुछ दुख रोग ऍम अथवा कुछ न कुछ बुरी आदतें पाई जाती है । इस संसार में एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं है जो सदैव सुखी रहता हूँ । हर इंसान को किसी ना किसी तरह के संकटों का जुडोका रोगों का बुरी आदतों का सामना करना ही पडता है । दुख और सुख तो साथ साथ लगे रहते हैं जैसे दिन और रात आगे श्री चढा के कहते हैं कि मनुष्य का चरित्र उसकी खानदान को बताता है । भाषण अर्थात उसकी बोली से उसके देश का पता चलता है । विशेष आदर सत्कार से उसके प्रेम भाव का तथा उसके शरीर से उसके बहुजन का पता चलता है । आगे श्रीजानकी समझाते हैं की कन्या का विभाग अच्छे स्कूल में करना चाहिए । पुत्रको विद्या के साथ जोडना चाहिए दुश्मन को विपत्ति में डालना चाहिए और मित्र को अच्छे कार्यों में लगना चाहिए । शौचालय के समझाते हैं कि अपनी पुत्री का विवाह वरपक्ष के खानदान को अच्छी तरह पर कर ही करना चाहिए । वहाँ अपने पुत्र को अच्छा और उच्च शिक्षा प्रदान करना चाहिए । यदि सत्र निकट आ जाए तो उसे विपत्ति में डाल देंगे और अपने प्रिय मित्र को हमेशा अच्छे और महत्वपूर्ण कार्यों में लगा कर रखें । आगे समझाते कि दुर्जन और सबके सामने आने पर सर्वआवरण करना उचित है ना कि दुर्जन का । क्योंकि सर तो सिर्फ एक ही बार डसता है लेकिन दुर्जन व्यक्ति आपको कदम कदम पर बार बार दस्ता ही रहता है । इसलिए इस बात का हमेशा ध्यान रखें । राजा खानदानी लोगों को ही अपने पास एकत्र करता है क्योंकि कुलीन अर्था अच्छे खानदान वाले लोग प्रारंभ में मध्य में और अंत में राजा को किसी भी दिशा में नहीं त्यागते हैं । चाइना की समझाते हैं कि मूर्ख व्यक्ति से हमेशा बचना चाहिए । वहाँ प्रत्यक्ष में दोपहर वाला पशु है । जिस प्रकार बिना आंख वाले अर्थात अंधे व्यक्ति को काटे भेजते हैं, उसी प्रकार मूर्ख व्यक्ति अपने कटु अज्ञान से भरे बच्चों से हमें भेजता रहता है । रूप और यौवन से संपन्न तथा उच्चकुल में जन्म लेने वाला व्यक्ति बीएडी विद्या से रहित है तो वहाँ बिना सुगम के फूल की भांति शोभा नहीं पाता है । भाव यही है कि आदमी की शोभा उसके सुंदर रूप यौवन हाँ, सच्ची कुल में जन्म देने से नहीं होता है । उसकी शोभा उसके ज्ञान से होती है । गोयल की शोभा उसके स्वर में हैं । स्त्रियों की शोभा उनके पति व्रता धर्म में है । गुरु व्यक्ति की शोभा उनके ज्ञान में होती है और तपस्वियों की शोभा उनके छमा में हैं । यदि किसी एक व्यक्ति को त्यागने से पूरे कुल की रक्षा होती है तो उस एक व्यक्ति को छोड देना चाहिए तो गांव के भलाई के लिए, कुल को तथा देश की भलाई के लिए एक गांव को और अपने आत्म सम्मान की रक्षा के लिए सारी पृथ्वी को छोड देना चाहिए । आगे श्री चढा के कहते हैं कि उद्योग धंदा करने पर निर्धनता कभी नहीं रहती है । प्रभु का नाम जपने पर पाप नष्ट हो जाते हैं, चुप रहने था । सहनशीलता रखने पर लडाई झगडे नहीं होते हैं । जो जाता रहता है अर्थात सदैव सजग रहता है । उसे कभी भी किसी भी चीज का है नहीं बताता है । आगे चाहा कि समझाते हैं कि अति सुन्दर होने के कारण सीता का हरण हुआ । अत्यंत अहंकार के कारण रावण का वध हुआ । अत्यधिक दान के कारण राजा वाली बांधा गया अर्थात सभी के लिए अति ठीक नहीं होती है । इसलिए हमें किसी भी चीज में अति नहीं करना चाहिए । हर चीज की एक सीमा होती है, मर्यादा होती है । सीमा से बाहर जाने पर दायर नुकसान ही होता है । आगे चल के समझाते हैं कि समर्थको बाहर कैसा । व्यवसाय के लिए कोई स्थान दूर । क्या विद्वान के लिए विदेश कैसा मधुर वचन बोलने वाले के लिए छात्र कौन अर्थात जो कि समर्थ है, उसे कोई भी काम सहज ही लगेगा । उसे कोई भी कार्य भारतीय रूप नहीं लगेगा । व्यवसायी व्यक्ति अपने व्यवसाय के लिए कहीं भी जा सकता है, वहाँ स्थान की दूरी को नहीं देखता, वहाँ अपने लाभ को देखता है । इसी प्रकार विद्वान व्यक्ति के लिए विदेश में भी लाखों मित्र हो सकते हैं और यदि कोई व्यक्ति मीठा बोलता है, अच्छा वाणी में बोलता है तो उसकी कोई शत्रु नहीं होते हैं । आगे समझाते हैं कि एक ही सुगंधित फूल वाले ब्रेक से जिस प्रकार सारा वन सुगंधित हो जाता है, उसी प्रकार एक सापुतारा से सारा कुल शोभित हो जाता है । अच्छे हैं । सभी जगह प्रशंसनीय होते हैं । उनकी नो प्रसिद्धि सुगंधित पुष्प की भांति होती है, जो सभी जगह फैल जाती है । किसी कुल का एक सापुतारा सारे उनको सम्मानित कर देता है । आगे कहते हैं कि आग से चलते हुए सूखे बृक्ष से सारा बंद जल जाता है । जैसे कि एक कुपुत्र से सारे कुल का नाश हो जाता है । कुल का विनाश करने के लिए एक ही को पुत्र काफी होता है । ठीक उसी प्रकार जैसे एक जलता हुआ बृक्ष पूरे वन को जलाकर खाक कर देता है । आगे चल के कहते हैं कि शोक और दुख देने वाले बहुत से पुत्र को पैदा करने से क्या लाभ है । कुल को आश्रय देने वाला एक ही पुत्र सबसे अच्छा होता है । जैसे महाभारत में भ्रष्ट राष्ट्र के सौ पुत्र थे, पर सभी ने उन्हें दुखी पहुंचाया । वे सभी महाभारत युद्ध के करन बने जबकि पांच पांडवों ने धर्म के मार्ग पर चलकर विजय प्राप्त की और मंच का नाम सुशोभित । क्या आगे समझाते हैं कि पुत्र से पांच वर्ष तक प्यार करना चाहिए । उसके बाद दस वर्ष तक उसे दाल आदि देते हुए अच्छे कार्यों की ओर लगना चाहिए । सोलह साल आने पर मित्र जैसा व्यवहार करना चाहिए । संसार में जो कुछ भी भला बुरा है उसका उसे ज्ञान कराना चाहिए । इस प्रकार एक पिता अपने पुत्र के जीवन को भली बातें सवार सकता है और उसे गलत मार्ग पर बढने से रोक सकता है । आगे जाना के समझाते हैं कि देश में भयानक उपद्रव होने पर शत्रु के आक्रमण के समय पर भयानक अकाल के समय दूसरी का सात होने पर जो भाग जाते हैं वही जीवित रहता है । मतलब समझने का तात्पर्य यह है कि यदि ऐसी कंडीशन आपकी लाइफ में आती है तो उस कंडीशन में भागना ही सही फैसला होगा । जिनके पास धर्म, अर्थ, काम पर मुख्य इनमें से कुछ भी नहीं होता है उसके लिए जन्म लेने का फल केवल मृत्यु हुई होता है । आगे चणक समझाते हैं कि जहाँ मुर्खों का सम्मान नहीं होता जहाँ अन्य भंडार सुरक्षित रहता है । जहाँ पति पत्नी में कभी झगडे नहीं होते हैं वहाँ लक्ष्मी बिन बुलाए ही निवास करती है । भाव यह है कि जिस देश में मूर्खों की जगह विद्वानों का सम्मान होता है तो जहाँ समुचित अन्य भंडार रहता है, जहाँ परिवार और घर गृहस्ती में प्यार बना रहता है वहाँ सुख और समृद्धि बराबर बनी रहती है । यह था चाणक्य नीति का भागती हूँ आप सुन रहे हैं फॅमिली के साथ चलिए बढते हैं अगले अध्याय की ओर दो ऍम हूँ ऍम

7. Sabhi Sampattiyo Mein Gyan Sarvoch Hai

हमेशा साथ ही हूँ । आप सुने हैं चाइना की नीति ऍम के साथ हम शुरू करने जा रहे हैं चाणक्य नीति का पांचवां ध्यान । चलिए प्रारंभ करते हैं पांच है के प्रारंभ चाइना के कहते हैं कि स्त्रियों का गुरु पति होता है । अतिथि सबका गुरु है । ब्राह्मण, क्षत्रिय और एशिया का गुरु अग्नि हैं तथा चारों वर्णों का गुरु ब्राम्हण है । आगे समझाते हैं कि जिस प्रकार की इसने काटने, आग में तापने पीटने, इन चार उपायों से सोने की परख की जाती है वैसे ही त्याग, शील, गुड और कर इन चारों से मनुष्य की पहचान होती है । वैसे तभी तक डरना चाहिए जब तक भर आये नहीं । आये हुए भाई को देख कर मिशन होकर प्रहार करना चाहिए अर्थात इस भय की परवाह कभी नहीं करना चाहिए । एक ही माता के पेड से और एक ही क्षेत्र में जन्म लेने वाली संतान समान गुण और शील वाली नहीं होती है । जैसे देर के काटे सभी बच्चों का स्वभाव अलग अलग होता है । भले ही मैं जुडवा पैदा हो, देर के पेड पर फल भी लगाते हैं और काटे भी । यही ईश्वर की विचित्र लीला है । जैसे समझना सरल नहीं । जिसका जिस वस्तु से लगाव नहीं है तो उस वस्तु का मैं अधिकारी नहीं है । यदि कोई व्यक्ति सौन्दर्यप्रेमी नहीं होता तो श्रंगार शोभा के प्रति उसकी आशक्ति नहीं होती है । मुझे एक व्यक्ति प्री और मधुर वचन नहीं बोल पाता और और स्पष्टवक्ता कभी धोखेबाज या दूर दिया मक्कार नहीं होता है । साफ साफ बोलने वाला करवा जरूर होता है, पर वह धोखेबाज नहीं होता है । मूर्खों के पंडित दरिद्रों के धनी मैं जवाब की सुहागिने पार वैष्णव की कुल धन रखने वाली पति व्रता स्त्रियाँ क्षत्रों के समान होती है । ये संसारिक नियम है कि मूर्ख व्यक्ति पंडितों से एशिया करते हैं । निर्धन व्यक्ति धनिकों से ईर्ष्या करते हैं, वैश्य है, धर्म का पालन करने वाली पतिव्रता स्त्री से एशिया करती है और विधवाएं सुहागिनों को देखकर अपने भाग्य को कोसती रहती है । यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है । दूसरों को सुखी देख कर कोई सुखी नहीं होता है । आगे समझाते हैं कि आलस्य से अध्ययन कभी ना करें, क्योंकि विद्या नष्ट हो जाती है । दूसरे के पास गई इसी बीच की कमी से खेती और सेनापति न होने से सेना नष्ट हो जाती है । आगे जाने के समझाते हैं कि विद्या अभ्यास से आती है । सुशील स्वभाव से कुल का बडा होता है । श्रेष्ठ तत्व की पहचान गुणों से होती है और करोड का पता आंकडों से लगता है । धर्म की रक्षा धन से होती है । विद्या की रक्षा निरंतर साधना से होती है । राजा की रक्षा मृदु स्वभाव से और पतिव्रता स्त्रियों से घर की रक्षा होती है । ऐसा कहने वाले की बेड और पंडित व्यर्थ है । शास्त्रों का ज्ञान व्यर्थ है । ऐसे कहने वाले स्वयं ही व्यर्थ होते हैं । इनकी एशिया और दुख भी व्यक्त होता है । वे व्यर्थ में दुखी होते रहते हैं । जबकि वेदों और शास्त्रों का ज्ञान तो कभी भी व्यर्थ नहीं होता है । आगे कहते हैं की दरिद्रता का नाश दान से, दुर्गति का नाश, शालीनता से मूलता का नाश सद्बुद्धि से और भय का नाश अच्छी भावना से होता है । काम वासना की सामान दूसरा कोई रोग नहीं । मूड के समान शत्रु नहीं । क्रोध के समान आग नहीं और ज्ञान से बढकर सुबह नहीं । मनुष्य अकेला है, जान लेता है और अकेला ही मारता है । वहाँ अकेला ही अपने अच्छे और बुरे कर्मों को भोक्ता है । अकेला ही नर्क में जाता है और परम पद को पाता है । ब्रह्मज्ञानी की दृष्टि में स्वर्ग तिनके के समान है । शूरवीर ओके दृष्टि में जीवंत इनको के समान है । इंद्रजीत के लिए स्त्री तिनके किस सामान है और जिसे किसी भी वस्तु की कामना नहीं है, उसकी दृष्टि में यह सारा संचार तिनके के समान है । उसे सारा संचार क्षणभंगुर दिखाई देता है, वहाँ तत्वज्ञानी हो जाता है । विदेश में विधेयक ही मित्र होती है, घर में पत्नी है, मित्र होती है, रोगियों के लिए औषधि मित्र हैं और मारते हुए व्यक्ति का मित्र धर्म होता है अर्थात उसके सत्कर्म होते हैं । इसलिए विद्या पति व्रता विदेशी स्तरीय रोक के समय उचित पांच नहीं और मृत्युकाल निकट आने पर व्यक्ति के सत्तर में ही उस का साथ देते हैं । इसी प्रकार आगे समझाते हैं कि समुद्र में बरसात का होना व्यस्त है तब व्यक्ति को भोजन कराना व्यर्थ है । धनिक को दान देना व्यर्थ है और दिन में दीपक जलाना व्यर्थ हैं । चाइना के कहते हैं कि बादल के जल के समान कोई दूसरा जल नहीं होता । आत्मबल के समान कोई दूसरा बाल नहीं होता । अपनी आंखों के समान कोई दूसरा प्रकाश नहीं है और अन्य के सम्मान दूसरा प्रिया प्रधान नहीं होता । निर्धन लोग धन चाहते हैं, पशु वाणी चाहते हैं । मनुष्य स्वर्ग की शिक्षा करता है और देवगढ मुख्य चाहते हैं । संसार में सभी पानी किसी ने किसी अभाव से ग्रस्त रहते हैं । इस अभाव को मिटाने के लिए वे प्रयत्न करते रहते हैं । टायर जिस प्राणी के पास जिस वस्तु का अभाव होता है, वहाँ उसी को पाना चाहता है । सत्य पर पृथ्वी टिकी है । सत्य से सूर्य तपता है, सत्य से वायु बहती है । संचार के सभी पदार्थ सत्य में ही नहीं होते हैं । यहाँ सत्य की मेहता का प्रतिपादन करते हुए आचार्य चाणक्य कहते हैं कि समस्त पृथ्वी हवा की गति, सूर्य की तपिश पार, संपूर्ण ब्रह्मांड सत्य में ही समय हुआ है । सत्य के द्वारा ही सारा ब्रह्मांड चलाया जाता है और कहाँ भी जाता है? सत्यम शिवम सुंदरम अर्थात सत्य ही सबसे बडा धर्म है । सत्य से बढकर कुछ भी नहीं । लक्ष्मी अनित्य और अस्थिर है, ब्रांड अनित्य हैं और जीवन भी लेते हैं । इस चलते फिरते संसार में केवल धर्म ही स्थिर है । पुरुषों में नई भूत होता है, पक्षियों में हुआ, पशुओं में गेधर और स्त्रियों में मालिन धूप होती है । ये चारों साडी दूसरों के कार्य को बिगाडने वाले होते हैं । मनुष्य को जन्म देने वाला, यज्ञोपवित संस्कार कराने वाला, पुरोहित, विद्या देने वाला, आचार्य अन्य देने वाला, भय से मुक्ति दिलाने वाला अथवा रक्षा करने वाला ये पांच पिता कहे गए हैं । अगर समाज में इन्हें पिता अर्थात पालन करने वाला उच्च स्थान दिया गया है । यहाँ पर समाप्त होता है पांचवां अध्याय । अब हम बढेंगे छठे अध्याय की ओर आप सुन रहे हैं ऍम के साथ हूँ हूँ ऍम हूँ हूँ हूँ

8. Nadi Behti Rahe to Saaf Rehti Hai

नमस्कार साथी आप समय चाणक्य नीति ऍम के साथ अभी तक आपने चाणक्य नीति के पांच अध्यक्षने अब हम शुरू करने जा रहे हैं छठ बात है तो चलिए आरंभ करते हैं चल रहे है कि आर्मी में श्री चाइना के हमें समझाते हैं कि मनुष्य शास्त्रियों को पढकर धर्म को जानता है और मूर्खता को त्यागकर ज्ञान की प्राप्ति करता है तथा शास्त्रों को सेंटर मुख्य प्राप्त करता है । शौचालय कि कहते हैं कि पक्षियों में का हुआ पशुओं में कुत्ता, ऋषि मुनियों में क्रोध करने वाला पार, मनुष्यों में चुगली करने वाला चांडाल अर्थात नहीं होता है । पापकर्म चुगली करने वाला मानव जीवन में दोष माने गए हैं । इन्हें करने वाला मनुष्य ऋषिमुनि होने पर भी चांडाल होता है । जैसा पक्षियों में हुआ और पशु में कुत्ते को नीचे माना गया है । आगे समझाते हैं कि काफी का पात्र रात द्वारा मानने से शुद्ध होता है । तांबे का पात्र खटाई से रगडने से शुद्ध होता है । स्त्री रजस्वला होने से पवित्र होती है और नदी तीव्र गति से बहने से निर्मल होती हैं । प्रजा की रक्षा के लिए भ्रमण करने वाला राजा सम्मानित होता है । भ्रमण करने वाला योगी और ब्राम्हण सम्मानित होता है किंतु इधर उधर घूमने वाली इस्त्री भ्रष्ट होकर नष्ट हो जाती है । जिसके पास धन होता है, उसके अनेक मित्र होते हैं । उसी के अनेक बंधु बांधवों भी होते हैं । वहीं पुरुष कहलाता है और वही पंडित कहलाता है । धन का महत्व इतना बडा है कि जिसके पास होता है वहाँ उसे ही महापुरुष पंडित मतलब भगवान और सबका हितेषी मानने लगते हैं । आगे समझाते हैं कि जैसे काबिलियत होती है वैसे ही बुड्ढी हो जाती है । उद्योगधंधे भी वैसे ही हो जाते हैं और सहायक भी वैसे ही मिल जाते हैं । काल अर्थात समय मृत्यु हुई पंचभूतों पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश को बचाता है और सब प्राणियों का संहार भी काल ही करता है । साल की सीमा को निश्चय ही कोई भी लाभ नहीं सकता । काल की गति को कोई रोक नहीं सकता । समय चक्र में आकर सभी को एक न एक दिन नष्ट होना ही पडता है । आगे समझाते हैं कि जन्म से अंधे व्यक्ति को कुछ दिखाई नहीं देता । काम में आशक व्यक्ति को भला बुरा को सुझाई नहीं देता । मत्स्य मतवाला बना व्यक्ति या प्राणी कुछ सोच नहीं पाता और अपनी जरूरत को सिद्ध करने वाला दोष नहीं देखा करता हूँ । धनशक्ति के अहंकार से भरा व्यक्ति अपना विवेक खो बैठता है, उसे केवल अपना स्वार्थ ही सर्वोपरि दिखाई देता है । उसकी दशा उस अन्धेरे के समान होती है जो जन्म से अंधा होता है । जी स्वयं ही नाना प्रकार के अच्छे बुरे कर करता है । उसका फल भी स्वयं ही होता है । मैं संसार की मुहिम या में फसता है और स्वयं ही इसे त्यागता भी है । आगे समझाता है कि राजा अपनी प्रजा के द्वारा किए गए आपको रोहित राजा के आपको पति अपनी पत्नी के द्वारा किए गए आपको और गुरु अपने शिष्य के आपको भोक्ता है राजा का करते हुए है कि वह अपनी प्रजा को पापकर्म की और ना बढने देख रोहित असम मंत्री का कर्तव्य है कि वह राजा को आपकी और प्रवक्ता ना होने दे और इसी प्रकार पति का करते हुए हैं कि वहाँ अपनी पत्नी को गलत राह पर न जाने दे तथा गुरु का करते हुए हैं कि वहाँ अपने शिष्य को पाप कर्म न करने दें । यदि वे ऐसा नहीं करते हैं तो राजा को प्रजा पुरोहित को राजा पति को पत्नी का और गुरु को अपने शिष्य का पाप स्वयं ही भुगतना पडता है । आगे कहते हैं कि जो पिता अपनी संतान पर अपना कर छोड कर जाता है, वहाँ क्षेत्रों के समान है । जो माता पतन के मार्ग पर चल रही है वहाँ संतान के लिए शत्रु है । जो इस तरी सुंदर है उस की रक्षा में पति को बहुत कठिनाई झेलनी पडती है क्योंकि सभी की दृष्टि उस पर रहती है और यदि संतान मूर्ख हो तो वह माता पिता के लिए शत्रु से काम नहीं होता है । आगे समझाते हैं कि जो भी व्यक्ति धन का लालची होता है, अहंकारी व्यक्ति अपने अहंकार की संतुष्टि चाहता है, उसे नम्रता से वर्ष में करना चाहिए । मुख्य व्यक्ति की इच्छा अनुसार कार्य करके उसे बहला फुसलाकर वर्ष में करना चाहिए । बाद विद्वान व्यक्ति के समूह कभी झूठ नहीं बोलना चाहिए । उसे सच्चाई से ही वर्ष में करना चाहिए । बिना राज्य के रहना उत्तम है परंतु दूसरे राजा के राज्य में रहना अच्छी बात नहीं है । बिना मित्र के रहना अच्छा है किन्तु दुष्ट मित्र के साथ रहना उचित नहीं है । बिना शिष्य के रहना ठीक है परंतु नहीं । अच्छे अच्छे को ग्रहण करना ठीक नहीं है । बिना इस तरीके रहना उचित है किन्तु दुष्ट और फॅमिली के साथ रहना उचित नहीं है । आगे चल के समझाते हैं कि शेर और बंगले से एक एक गन्ने से तीन, मुर्गों से चार करो । वैसे पांच और कुत्तों से छः गुण हमेशा किसी भी मनुष्य को सीखने चाहिए । इन्हें समझाते हुए कहते हैं कि कम छोटा हो या बडा उसे एक बार हाथ में लेने के बाद कभी नहीं छोडना चाहिए । उसे पूरी लगन और सामंत के साथ करना चाहिए । जैसे शेर पकडे हुए शिकार को कदापि नहीं छोडता । शेर का यह गुड हमें अवश्य लेना चाहिए अर्थात मनुष्य जो भी काम करें उसे पूरी शक्ति और लगन के साथ करें । पूरा साहस और सामर्थ लगा दे । कार्य करते समय इन बातों का ना देखे कि कार्य बहुत छोटा है, उसे तो बस हम यही कर लेंगे । यह व्यवस्था अलग से की होती है । शेर को जब हमला चाहे हाथ पर कर रहा हूँ या फिर किसी हीरोइन पर कहना मैं एक से आक्रमक मुद्रा बनाकर एक से साहस और वीरता के साथ हमला करता है । आगे कहते कि सफल व्यक्ति वही है जो बदलों के समान अपनी संपूर्ण इंद्रियों को संयम में रख कर अपना शिकार करता है । उसी के अनुसार देश निकाल और अपनी सामर्थ्य को अच्छी प्रकार से समझकर अपने सभी कार्यों को करना चाहिए । हमें बदले से ये एक गुड ग्रहण करना चाहिए अर्थात एकाग्रता के साथ अपना कार्य करें तो सफलता अवश्य प्राप्त होगी । अर्थात कार्य को करते वक्त अपना सारा ध्यान उसी कार्य की और लगना चाहिए तभी सफलता मिलेगी । बदला वही ध्यान लगाकर बैठा है जहाँ मछली मिलने की आशा होती है अन्यथा छोडकर दूसरी जगह चला जाता है । आगे समझाते की अत्यंत थक जाने के बाद भी बोझ ढोना, ठंडे गर्म का विचार न करना, सादा संतोषपूर्वक विचरन करना ये तीन बातें हमें गधे से हमेशा सीखनी चाहिए । बुद्धिमान व्यक्ति को कभी भी अपने कर्तव्य से विमुख नहीं होना चाहिए । उसे अपने कार्य को बहुत नहीं समझना चाहिए । ऋतु के प्रभाव को भी अनदेखा कर देना चाहिए और संतोष के साथ अपने कार्यों को करते रहना चाहिए । ये तीन गुड गधे में पाए जाते हैं जो हमें अपनी जिंदगी में सीखना चाहिए । आगे समझाते हैं कि ब्रह्ममूहर्त में जानना, रन में पीछे नहीं हटना, बंधुओं में किसी वस्तु का बराबर भाग करना और स्वयं चढाई करके किसी से आपने भक्ष को छीन लेना । ये चारों बातें हमें मुर्गी से सीखनी चाहिए । वह सुबह उठकर बाल देता है, दूसरे मुर्गों से लडते हुए कभी पीछे नहीं हटा । मैं अपने खाद्य पदार्थों को आपने चीजों में सात बात कर खाता है और अपनी मुर्गी को समागम में संतुष्ट रखता है । आगे क्या करोगे के पांच गुण समझाते हैं । कहते हैं कि संभव हमेशा गुप्त में करना चाहिए । छिपकर चलना चाहिए । समय समय पर सभी इक्षाएं वस्तुओं का संग्रह करना चाहिए । सभी कार्यों में सावधानी रखनी चाहिए और किसी पर जल्दी विश्वास नहीं करना चाहिए । ये पांच बातें कल वैसे हमें जरूर सीखनी चाहिए । अब बताते हैं कुत्ते के छह बहुत भोजन करने की शक्ति रखने पर भी थोडे भोजन में ही संतुष्ट हो जाए । अच्छी नींद हुई परन्तु जला से घट के पर ही जांच जाए । अपने रक्षक से प्रेम करें, बाद क्षमता दिखाए । इन छह गुंडों को हमें कुत्तों से सीखना चाहिए । यदि आप इन सभी गुणों का अपनी जिंदगी में उतारेंगे तो आपको सफलता अवश्य मिलेगी । ये था भाग बढते हैं भाग सात की और आप सुन रहे हैं फॅमिली हूँ हूँ हूँ

9. Seekhte Samay Besharam Hona Chahiye

हम इशकजादे हूँ । आप सुन रहे हैं चाणक्य नीति ऍम के साथ अभी तक आपने सुने हैं छह अध्ययन अब शुरू करते हैं साथ बात है । साथ ही है की शुरुआत में श्री चाइना के कहते हैं कि बुद्धिमान पुरुष धन के नाश को, मन के संताप को रहने के, दोषियों को, किसी धूर्त के द्वारा ठगे जाने को और अपमान को किसी को नहीं बताते हैं । यहां मनुष्य की सहनशीलता की और इशारा करते हुए कहा है कि बुद्धिमान व्यक्ति वहीं है जो अपने परिवार के नुकसानों को और दोषियों को छिपाकर सहन कर लेता है, क्योंकि उसका प्रदर्शन करने से केवल जगह ही होती है । ऐसी बातों को कभी भी अन्य व्यक्तियों के सामने उजागर नहीं करना चाहिए । चाहे की का मानना है कि कई बार संकोच की प्रवृत्ति के कारण मनुष्य को हानि उठानी पडती है । मनुष्य के लिए ये जरूरी है कि किसी भी आर्थिक व्यवहार में उसे लिखा पडी कर लेनी चाहिए । इसमें उसे जरा भी संकोच नहीं करना चाहिए । इसके अलावा विध्या लेते समय भोजन करते समय कभी भी संकोच नहीं करना चाहिए । आगे समझाते हैं कि संतोष से सर्वश्रेष्ठ सुख की प्राप्ति होती है । याचक दीनता प्रकट करता है, धनी गर्व करता है तथा और अधिक की शिक्षा करता है । जिसका धन नष्ट हो गया हूँ, वहाँ शोक करता है पर जो संतोषी हैं वहाँ सुखी रहता है । आगे समझाते हैं कि अपनी स्त्री भोजन और धन इन तीन चीजों में सन्तोष रखना चाहिए और विद्याध्यन तब और दान करने में कभी भी संतोष नहीं करना चाहिए । जीवन में सफलता बहुत जरूरी है इसलिए चाय के का कहना है कि दो ग्रामीणों के बीच से गुजरने का अर्थ यही है कि आप उन के बाद विवाद में बिजनेस डाल रहे हैं । अतः कभी उनके बीस से होकर ना निकले ग्रामीण और अपनी के दिन से गुजरने का अर्थ यही है कि आप उनके अग्निहोत्र में बिग डाल रहे हैं । पति पत्नी तथा स्वामी पार सेवक के बीच जब वार्तालाप चल रहा हो तब बीच में घुसकर आप उनकी बातों में बैंक डालते हैं । इसी तरह बाॅलर हल्के बीस से निकलते वक्त चोट लग जाने का भय बना रहता है । अगर इन बातों का हमेशा ध्यान रखना चाहिए आगे समझाते हैं कि पैर से अग्नि, गुरु, ब्लॅड गांव, कन्या रद्द और बालक को कभी नहीं होना चाहिए । इन्हें पैर से स्पर्श करने पर पाप लगता है क्योंकि ये सभी आदरणीय हैं । चाइना की कहते हैं कि बैलगाडी से पांच हाथ घोडे से दस हाथ खाती से हजार हाथ दूर बजकर रहना चाहिए और दुष्ट पुरुष या राजा का देश छोड ही देना चाहिए । यहाँ वो ये समझाना चाहते हैं कि जो जितना अधिक दुष्ट है उसे उसी अनुपात में दूरी रखते हुए जीवन यापन करना अच्छा होता है । आगे समझाते हैं कि हाथ को अंकुश से, घोडे को, चाबुक से, सिंह वाले बैल को डंडे से और दूसरे व्यक्ति को वर्ष करने के लिए हाथ में तलवार लेना आवश्यक है । आचार्य चाणक्य के अनुसार दूसरे व्यक्ति को आसानी से ना तो वर्ष में किया जा सकता है और न ही उसे सुधारा जा सकता है । ऐसे व्यक्ति को ठीक करने के लिए कभी कभी उसे तलवार से चोट पहुंचाने पडती है और कभी कभी उसे खत्म करना पडता है । आगे चल के कहते हैं कि ब्राह्मण भोजन से संतुष्ट होते हैं । मोर बादलों के गरजने से साधु लोग दूसरों की समृद्धि देखकर और दुसरे लोग दूसरे पर विपत्ति आई देखकर प्रसन्न होते हैं । आगे समझाते हैं की अपने से शक्तिशाली क्षत्रों को विनय पूर्वक उसके अनुसार चलकर दुर्बल शत्रुओं पर अपना प्रभाव डालकर और सामान बाल वाले शत्रु को अपनी शक्ति से या फिर विनम्रता से जैसा अवसर हो उसी के अनुसार व्यवहार करके अपने वर्ष में करना चाहिए । क्षत्रों से व्यवहार करते समय इस बात की ओर इशारा किया है कि शत्रु से व्यवहार करने से पूर्व उसकी शक्ति और सामर्थ्य का पूर्वानुमान लगा लेना चाहिए । राजा की शक्ति उसके बाहुबल में, ग्रामीण की शक्ति, उसके तत्वज्ञान में और स्त्रियों की उनकी सांगरी तथा माधुरी में होती है । संचार में अत्यंत सरल और सीधा होना भी ठीक नहीं है । बन में जाकर देखो कि सीधे बृक्ष को ही पहले काटा जाता है और तेरे मेरे बच्चों को छोड दिया जाता है । इस बात में जीवन की सच्चाई की और संकेत क्या है? सीधापन आदमी की कमजोरी का परिचायक माना जाता है तो उसे हर कोई सताने लगता है परन्तु तेरे स्वभाव के दुष्ट व्यक्तियों से कोई भी उलझना नहीं चाहता । सभी उन से बचना चाहते हैं । जिस सरोवर में जल रहता है, हंस वहीं रहते हैं और सूखे सरोवर को छोड देते हैं । मनुष्य को ऐसे हंसो के सामान नहीं होना चाहिए कि बार बार स्थान बदले । चाणक्य का मत है कि मनुष्य के लिए अपना स्वार्थी प्रमुख नहीं होना चाहिए । जैसे स्थान विशेष से एक बार नाता जोड लिया जाए तो उसे कठिनाई आने पर भी नहीं छोडना चाहिए । कमाए हुए धन का दान करते रहना ही उसकी रक्षा है । जैसे तालाब के पानी का बहते रहना ही उत्तम है । तालाब का पानी एक स्थान पर रुका रहेगा तो वह सड जाएगा । संसार में जिसके पास धन है उसी के सब मित्र होते हैं । उसी के सब बंधु बांधव होते हैं । वहीं श्रेष्ठ पुरुषों की गिनती में गिना जाता है और वहीं ठाटबाट से जीवन जीता है । चाहे के कहते कि धन के बिना कोई भी कार्य नहीं चलता है । धन परमात्मा तो नहीं है परंतु उसका छोटा भाई आवश्यक है । जिसके पास धन है वहीं कुलीन है, विद्वान है, शास्त्रीय के हैं, धोनी हैं, वक्ता है, धन कमा हूँ मगर ईमानदारी से काम हूँ । अत्यंत क्रोध करना, कडवी वाणी बोलना, दरिद्रता और अपने सगे संबंधियों से मैं विरोध करना, बीच पुरुष का संघ करना, छोटी कुल के व्यक्तियों की नौकरी अथवा सेवा करना । ये छह दुर्गणों ऐसे हैं जिनसे युक्त मनुष्य को प्रति लोग में ही मैं रख के दुखों का आभास होता है । मनुष्य दी से हैं की मांग के पास जाता है तो मजबूती पाता है । पानी दी सीआर की मांग के पास जाता है तो बछडे की पूछ और गधे के चमडे का टुकडा पाता है । भाव यह है कि बडे लोगों के पास जाने से धन, संपत्ति और ऐश्वर्य प्राप्त होता है और छोटे तथा नीच लोगों की संगती करने से सेवाएं दुःख के और कुछ भी प्राप्त नहीं होता है । आगे जाना कि कहते हैं कि बोल चाल अथवा वाणी में पवित्रता मन की स्वच्छता का, यहाँ तक कि इंडिया को वर्ष में रखकर पवित्र रखने का भी कोई महत्व नहीं होगा । जब तक के मनुष्य के मन में जीवन मात्र के लिए दया की भावना उत्पन्न नहीं होती है । आगे जाने की समझाते हैं कि जिस प्रकार स्कूल में गंद तीनों में तील लकडी में आग, दूध में भी गन्ने में मिठास आदि दिखाई न देने पर भी विद्यमान रहते हैं, उसी प्रकार मनुष्य के शरीर में दिखाई न देने वाली आत्मा निवास करती है । यह रहस्य ऐसा है इसे विवेक से ही समझा जा सकता है । मनुष्य को चाहिए कि वह इस रहस्य को समझने का प्रयास करें । वहाँ शरीर न होकर आत्मा है । आत्मारूपी तत्व इस देर में उसी प्रकार विधमान रहती है जिस तरह फूलों में गन, तीनों में तेल और लकडी में अग्नि तथा गन्ने में मिठास और दूध में घी विधमान होने पर भी वहाँ दिखाई नहीं देते हैं, लेकिन वे उसमें हैं । इसी प्रकार हम सब में भी कई सारे गुरु पस्थित है । उन्हें पहचानकर उन्हें बाहर निकालने की कोशिश कीजिए । यह था अध्याय साथ अब हम बढते हैं । अध्ययन आठ की ओर आप सुन रहे हैं फॅमिली साथ

10. Daya Se Bada Koi Dharm Nahi Hai

हमेशा जाती हूँ । अभी तक आप सुन रहे थे चाणक्य नीति का सातवां अध्याय । अब हम शुरू करने जा रहे हैं आठ है फॅमिली के साथ । तो चलिए आरंभ करते हैं आठ देगी शुरुआत में श्री चढा के कहते हैं कि निकृष्ट लोग सिर्फ धन की कामना करते हैं । मध्यम लोग धन और यश दोनों की चाहत रखते हैं और उत्तम लोग केवल यश की चाहत रखते हैं क्योंकि मान सम्मान सभी प्रकार के धनों से श्रेष्ठ है । जिस जीवन में मनुष्य को मान सम्मान नहीं मिलता है वहाँ जीवन धन से भरपूर होने पर भी व्यर्थ है । धन नष्ट हो जाता है परंतु आदमी का यश उसके मरने के बाद भी अमर रहता है । आगे समझाते हैं कि दीपक का प्रकाश अंधकार को खा जाता है और कालिख को पैदा करता है । उसी तरह मनुष्य सदेव जैसा अन्य खाता है वैसे ही उसकी संतान होती है । यदि मनुष्य गलत तरीके से कमाए गए धन का अन्य खाता है तो उसकी संतान भी उसी तरह के गलत कर्मों में लग जाएगी और यदि आदमी ईमानदारी से कमाए गए अन्य को खाता है तो उसकी संतान भी ईमानदार होगी । इसलिए परिश्रम, ईमानदारी से प्राप्त अन्य खाना है श्रेष्ठ होता है । आगे समझाते हैं कि है बुद्धिमान पुर । धन गुड वालों को ही दे, अन्य को नहीं देखो । समुद्र का जल मेघु के मूड में जाकर सदेव मीठा हो जाता है और प्रति के चर अचर जीवों को जीवन दान देकर भी कई करोड गुना होकर फिर से समुद्र में चला जाता है । मतदान की महिमा अपरंपार है, परंतु दान उसी को देना चाहिए जो सुपात्र हो । सुपात्र के पास जाने से दान दी गई वस्तु अथवा धन का समुचित उपयोग होगा । दूसरे के पास जाकर दान की गई वस्तु का उपयोग स्वार्थ से प्रेरित होकर ही हो पाता है । मेरे घर के पास जाकर समुद्र का खारा पानी भी मीठा हो जाता है और करोडों जीवों की प्याज को बुझाता है । फिर से सागर में मिल जाता है । आगे समझाते हैं कि तेल लगाने पर, चिंता का, धुंआ लगने पर, स्त्री संभव करने पर, बाल कटवाने पर मनुष्य तब तक चांडाल था, अशुद्ध बना रहता है जब तक कि वहाँ नहीं कर लेता । इसलिए हमेशा ध्यान रखें कि इन चीजों के बाद हमेशा सबसे पहले स्नान करें । आप होने पर पानी दवा है, बचने पर बल देने वाला है । भोजन के समय थोडा थोडा जल अमृत के समान है और भोजन के अंत में जहर के समान फल देता है । इसलिए हमेशा ध्यान रखें कि भोजन के अंत में पानी ना पी है या तो भोजन के दौरान थोडा थोडा पानी पी है या भोजन समाप्त होने के आधे से एक घंटे के बाद पानी का सेवन करें । बुढापे में स्त्री का मर जाना, बंधु के हाथों में धन का चला जाना और दूसरों के आसरे पर भोजन का प्राप्त हो ना ये तीनों ही स्थितियां पुरुषों के लिए दुखदायी है । ये ये ना करने वाले का बेद करना व्यर्थ है । बिना दान के यज्ञ करना व्यर्थ है । बिना भाव के सिद्धि कभी नहीं होती है । इसीलिए भाव अर्थात प्रेम ही सब में प्रधान है । भाव के बिना कोई भी कार्य संपन्न नहीं होता । अतः सभी कार्यों में आस्था जरूरी होती है । शांति के बराबर दूसरा कोई तब नहीं है । संतोष से बढकर कोई सुख नहीं है । लालच से बडा कोई लोग नहीं है और दया से बडा कोई धर्म नहीं है । क्रोध यमराज की मूर्ति है । लालच नरक में बहने वाली नदी है । विद्यार्थी कामधेनु गाय हैं और संतोष इंद्रा के नंदनवन जैसे सुख देने वाला है । क्रोध आदमी को हमेशा मृत्यु की ओर धकेलता है । लालच अनेक कष्टों को जन्म देता है । विद्या मनोवांछित फल देने वाली है और संतोष से आत्मसुख मिलता है । गुड से रूप की शोभा होती है । शील से कुल की शुभावती है । सिद्धि से विद्या की शोभा होती है और भूख से धन की शोभा होती है । यहाँ भूख से आशय यह है कि धन का उपयोग जब तक स क्रमों के लिए नहीं किया जाता तब तक धान की शोभा नहीं की जा सकती । आगे चला के कहते हैं कि गुणहीन व्यक्ति की सुंदरता व्यर्थ है । दुसरे स्वाभाव वाले व्यक्ति का कुल नष्ट होने योग्य है । यदि लक्ष्य की सिद्धि न हो तो विद्या व्यर्थ है और जब धन का सदुपयोग हो वह धन व्यस्त है । आगे श्री चाइना के कहते हैं की भूमि के भीतर प्रविष्ट हुआ जल्द ही पवित्र होता है । वर्ष का अधिकांश जल तो बहकर नाले नदियों द्वारा समुद्र में चला जाता है । जो जल बचा हुआ है वहाँ वो नदियों और तालाबों में भूमि के श्रोत से आता रहता है । आगे कहते हैं कि लोग से प्रेरित ब्राह्मण आदर का पात्र नहीं रहता है । पांच महत्वकांशा ना रखने वाला राजा आलसी और अकर्मण्य होकर नष्ट हो जाता है । संकोच करने वाली वैश्याएं ग्राहकों को प्रश्न न करने के कारण अपना धंधा चौपट कर लेती है और बेशर्म कुलीन स्त्री दूसरों का विषय वासना का शिकार हो कर पतित हो जाती हैं । संसार में विद्वान व्यक्ति की प्रशंसा होती है । मैं देखती ही सभी जगह पूछे जाते हैं । विद्या से ही सब कुछ मिलता है । विद्या ही सब जगह पूजा जाता है । जो व्यक्ति मांस मदिरा का सेवन करता है वे इस पृथ्वी पर बोझ है । इसी प्रकार जो निरक्षर है वे भी पृथ्वी पर बोझ है । इस प्रकार के मनुष्य रूपी पशुओं के बाहर से यह पृथ्वी हमेशा पीडित और कभी भी रहती है तो आप जिंदगी में कोशिश करे कि निरक्षक ना बने, अनपढ ना बने या फिर पडे हुए अनपढ ना बनें । ये था अध्याय आठ अब हम बढेंगे अध्याय नौ की और आप सुन रहे हैं फॅमिली साथ ऍम तो हाँ हूँ हूँ ऍम फॅस

11. Buri Aadate Zehar Ki Tarah Hoti Hain

हूँ । अभी तक आप सुन रहे थे चाणक्य नीति का आठ है अब हम बढते हैं नवे अध्याय क्या आप सुन रहे हैं फॅमिली तो चलिए आरंभ करते हैं नवे अध्याय के आरंभ ऍम कहते हैं मेरे मुक्ति चाहते हो तो समस्त विषय वासनाओं को विश्व के समान छोड दो । क्षमाशीलता, नम्रता, दया, पवित्रता और सत्यता को अमृत की भारतीय भी हो अर्थात अपनी जिंदगी में उसे अपना हूँ । आगे समझाते हैं कि जो व्यक्ति परस्पर की गई गुप्त बातों को दूसरों से कह देते हैं वे ही दीमक के घर में रहने वाले साहब की भर्ती नष्ट हो जाते हैं । इसलिए मित्रों के गुप्त रहस्यों को कभी भी प्रकट ना करें इससे केवल शत्रुता ही पैदा होती है । आगे चल के कहते हैं कि ब्रह्मा जी को शायद कोई बताने वाला नहीं मिला क्योंकि उन्होंने सोने में सुगंध, एक में फल, चंदन में फूल, विद्वानों को धनी और राजा को चिरंजीवी नहीं बनाया । समझाने का तात्पर्य यह है कि सृष्टिकर्ता ने ये कैसे बडा माना कि है कि उन्होंने सोने में सुगंध नहीं डाली, गन्ने पर फल नहीं लगेगा । चंदन के वृक्ष पर कोई नहीं हो गया और विद्वान को धनवान नहीं बनाया और इसके बाद राजा को जो कि सबका प्रजापालक है, उसे दीर्घजीवी नहीं बनाया है । चला कि कहते हैं कि अमृत से जीवन को अमरता प्राप्त होती है, भोजन से शरीर को पुष्टि मिलती है, ट्रपति प्राप्त होती है और आंखों के बिना सारा संसार ही अंधकार में डूब जाता है और दिमाग के बिना तो चिंतन ही असंभव है । चारा कि कहते हैं कि न तो आकाश में कोई दूध गया ना इस संबंध में किसी से कोई बात हुई । ना पहले किसी ने इसे बनाया और ना ही इसका प्रकाशन सामने आएगा । तब भी आकाश में भ्रमण करने वाले चंद्र और सूर्य में ग्रहण के बारे में जब ब्रह्मांड पहले से ही जान लेता विद्वान क्यों नहीं अर्थात वास्तव में वहाँ विद्वान है जिसकी गन्ना से ग्रहों की चाल का सही सही पता लगाया जा रहा है । आगे जाने के लिए बहुत ही अच्छी बात समझाई है कि विद्यार्थी, नौकर पथिक, भूख से व्याकुल व्यक्ति, भय से त्रस्त भंडारी और द्वार पर इंसान को यदि आप कभी सोता हुए देख ले तो तत्काल जगहें क्योंकि अपने समस्त कार्य और कर्तव्यों का पालन ये जाकर ही या फिर सचेत रहकर ही करते हैं । अर्थात विद्यार्थी भी सोयेगा तो पडेगा कैसे? नौकरी भी सोयेगा तो डाका पड सकता हैं । मुझे अफरीदी सोयेगा तो उसे कोई लूट सकता है । भंडार घर का स्वामी और द्वारपाल यदि सोते रहेंगे तो चोरों को चोरी करने का अवसर मिल सकता है । अतः इन्हें सदेव सावधान रहना चाहिए । इसकी बात चार के कहते हैं की साफ राजा, शेर, ततैया और बालक और दूसरे का कुत्ता तथा मुझे व्यक्ति इन सातों को सोने से कभी नहीं लगाना चाहिए । इन्हें जगाने से खानी ही हो सकती हैं । आगे कहते हैं कि जो ग्रामीण केवल धन के लिए अपने विद्या को बेचते हैं, ऐसे ब्राह्मणों की विधियां उस घर पे की भर्ती होते हैं जिसके मुख में विश्व की थैली ही नहीं था । ये किसी को ना तो श्राप दे सकते हैं और नहीं वरदान । आगे समझाते हैं कि जिसके नाराज होने का डर नहीं और प्रसन्न होने से कोई लाभ नहीं । जिसके दंड देने या दया करने का सामर्थ्य नहीं । मैं नाराज हो कर भी क्या कर सकता है । मैं भी उसी से हुआ जा सकता है जिसमें कुछ दंड देने की सामान हो । जिसमें ऐसी सामर्थ्य नहीं है । उस व्यक्ति से डर कैसा? अपना हानिया लाभ देख कर ही कोई किसी से प्रभावित होता है । विश्व इन सबको अपनी फन को फैलाकर पुरस्कार करनी चाहिए । देश के न होने पर भी पुरस्कार से उसे डराना विषय चाहिए । यदि विषहीन सर तो ऐसा नहीं करेगा तो वहाँ अपना बचाव नहीं कर पाएगा । लोगों से पत्थर मारेंगे तो आ रही है कि राजा के पास शक्ति चाहे थोडी हो पर उसे अपनी शक्ति का दिखावा करके शत्रु को भयभित अवश्य करते रहना चाहिए । आगे श्री चढा के कहते हैं कि जुआरियों की कथा को महाभारत की कथा से जोडकर दिखाया है कि राजनीतिक आरोप को जुए की लत से कितना भारी नुकसान उठाना पडता है । इसलिए प्रसंग की कथा को रामायण से जोडकर बताया गया है कि परस्त्री हरण से कितना बडा विनाश होने की संभावना रहती है और चोर की कथा को श्रीमद्भागवत से जोडकर भगवान श्रीकृष्ण की सोलह हजार रानियों के रहते हुए भी इंद्रियनिग्रह की भावना का प्रतिपादन किया गया है । भाव यह है कि बुद्धिमान व्यक्ति वही है जो परिस्थिति गमन से दूर रहता है । पांच सदेव अपनी इंद्रियों को संयम में रखने का प्रयत्न करता है । आगे समझाते हैं कि अपने हाथों से गुंथी माला अपने हाथों से ऐसा चंदन पर अपने हाथों से ही लिखा स्रोत इन सबको अपने ही कार्यों में लगाने से देवताओं के राजा इंद्र कि श्री लक्ष्मी भी नष्ट हो जाती है । आगे समझाते हैं कि दरिद्रता के समय धैर्य रखना उत्तम है । मैंने कपडे को साफ रखना उत्तम है । घटिया आने का बना गर्म भोजन भी अच्छा लगता है और कोई व्यक्ति के लिए अच्छे स्वभाव का होना श्रेष्ठ है । भाव है की दरिद्रता मेरे धैर्य रखा जाए तो दुख नहीं होता । धनी व्यक्ति धैर्यपूर्वक अपना समय गुजार लेता है । फटे पुराने मैले कपडों को ही साफ सुथरा करके और उनको अच्छे प्रकार से सीकर पहना जाए तो वे भी अच्छे लगते हैं । जो बजा जो मक्का इनके जैसे अन्य की भी रोटी अधिक गर्म करके बनाई जाए और खाई जाए तो स्वादिष्ट लगती है और अच्छे शील स्वभाव का व्यक्ति यदि ग्रुप भी हो तो वो भी अच्छा लगता है । यहाँ पर समाप्ति होती है नौवें अध्याय कि अब हम बढते हैं । दस यह है कि और आप सुन रहे हैं फॅमिली के साथ हूँ ।

12. Paisa Nahi Gyan Insaan Ko Amir Banata Hai

हमेशा साथ हूँ । अभी तक आप सुन रहे थे चाणक्य नीति का नौ बात है और हम बढ रहे हैं दस से अध्याय क्या आप सुन रहे हैं? फॅमिली तो चलिए आराम करते हैं । निर्धन व्यक्ति ही नहीं था, छोटा नहीं धनवान वही है जो अपने निश्चय पर ड्रम है । परंतु विद्या रुपये रत्न से जो हीन है वह सभी चीजों से ही जाना कि कहते हैं कि किसी भी कार्य को सम्पन्न करने के लिए विद्या बहुत जरूरी है । उसी के द्वारा धन प्राप्त होता है । विद्या ही सच्चा धन है । आगे कहते हैं कि अच्छी तरह पैर रखकर चलना चाहिए । कपडे से छानकर पानी पीना चाहिए । शास्त्र से व्याकरण से शुद्ध करके बच्चन बोलना चाहिए और मन में विचार करके कार्य को करना चाहिए । समझाते हैं कि विद्यार्थी को यदि सुख की इच्छा है और वहाँ परिश्रम करना नहीं चाहता हूँ तो उसे विद्या प्राप्त करने की शिक्षा को त्याग कर देना चाहिए । यदि वहाँ विद्या चाहता है तो उसे सुख सुविधाओं का त्याग करना होगा क्योंकि सुख चाहने वाला विद्या प्राप्त नहीं कर सकता है । दूसरी ओर विद्या प्राप्त करने वाले को आराम नहीं नहीं सकता । आचार्य चढ के आगे कहते हैं कि कभी लोग क्या क्या नहीं देखते हैं । स्त्रियां क्या क्या नहीं कर सकती । मदिरा पीने वाले क्या क्या नहीं सकते और का हुए क्या क्या नहीं खाते हैं । कहते हैं कि जहां ना पहुंचे रवि वहाँ पहुंचे । कभी युक्ति बहुत प्रसिद्ध है कि जहाँ सूर्य की रोशनी नहीं पहुंचती, वहाँ कभी की कल्पना बहुत जाती हैं । स्त्री जब अपनी पर आती है तो वह कुछ भी कर सकती है । शराबी जब नशे में हो जाते हैं तो उल्टा सीधा पकने लगते हैं और का हुआ न खाने योग्य खाद्य पदार्थ को भी खा लेते हैं । इसका भाव यह है कि विद्वान की सभी कार्य सुरु समझकर करता है और नीचे व्यक्ति अपने विवेक से कार्य नहीं करता । भाग्य की शक्ति अत्यंत प्रबल है । वहां फल में निर्धन को राजा और राजा को निर्धन बना देती है । भाग्य से जीतना असंभव है । भाग्य कब क्या करते, कोई नहीं जानता हूँ । इस की लीला अपरंपार है । इस पर किसी का वर्ष नहीं चलता हूँ । आगे समझाते हैं कि लोभियों का शत्रु अधिकारी हैं । मूर्खों का शत्रु ज्ञानी हैं, व्यभिचार नहीं । इसलिए का शत्रु उसका पति है और चोरों का शत्रु चंद्रमा हैं । भाव है कि लो भी मूर्ति कुलटा स्त्री और चोर के कार्यों में जिनके द्वारा बेचने पडता है, वे सभी उनके शत्रु होते हैं, जिसके पास में विद्या है, न तब है, मतदान है, न धर्म है मैं इस मृत्यु लोग में पृथ्वी पर भारतीय रूप मनुष्य रुपये लोगों के समान घूम रहा है । वास्तव में ऐसे व्यक्ति का जीवन व्यर्थ है । वहाँ समाज के लिए किसी भी काम का नहीं चाहते कि कहते हैं कि शून्य निर्दय पर कोई उपदेश लागू नहीं होता । जैसे मल्या चल के संबंध से बास चंदन का ब्रश नहीं बनता था । जिस मनुष्य में भावना नहीं, योग्यता नहीं, किसी भी प्रकार के उपदेश से लाभ नहीं उठा सकता, जिनको स्वयं बुड्ढी नहीं है, शास्त्र उनके लिए क्या कर सकते हैं? जैसे अंधे के लिए दर्पण का क्या महत्व है । भाव है कि जो पूरी तरह मूर्ख है उसके लिए शस्त्र भी कुछ नहीं कर सकता हूँ । इस पृथ्वी पर दुर्जन व्यक्ति को सज्जन बनाने का कोई उपाय नहीं । जैसे सैकडों बार धोनी के उपरांत भी गुदा स्थान शुद्ध इंद्रा नहीं बन सकता है । अपनी आत्मा से द्वेष करने से मनुष्य की मृत्यु हो जाते हैं । दूसरे से अर्थात शत्रु से देश करने के कारण धन का नाश और राजा से द्वेष करने से अपना सर्वनाश हो जाता है । किंतु ब्राह्मण से द्वेष करने से संपूर्ण कुल नष्ट हो जाता है । बडे बडे हाथियों और बाघों वाले वन में ब्राॅन का कोर्ट रुपये घर अच्छा है । पाकिस् वालों को खाना जल गया पीना इनको परसोना पेडों की छाल पहनना उत्तम है परन्तु अपने भाई बंधुओं के मध्य निर्धनों के रहना अच्छा नहीं । अनेक रूप वाले पक्षी साॅस पर आकर बैठते हैं और प्रातःकाल दस दिशाओं में उड जाते हैं । ऐसे ही बंधु बांधवों एक परिवार में मिलते हैं और छोडते हैं । इस विषय में शौक कैसा? आचार्य चढा के कहते हैं कि जो भी इंसान इस संसार में जन्म हुआ है उसकी मृत्यु निश्चित है । जब मृत्यु एक शास्वत सत्य है तो फिर इस बात के लिए शोक संताप कैसा मतलब कैसा प्रकृति के मृत्यु जान से चिंतित होने से कोई लाभ नहीं । जो बुद्धिमान है वहीं बलवान है । बुद्धिमान के पास शक्ति नहीं होती । जैसे जंगल में सबसे अधिक बलवान होने पर भी शेर मतवाला होकर खरगोश के द्वारा मारा जाता है । पंचतंत्र में या एक खता है जिसमें खरगोश अपनी चतुराई से शेयर की परछाई हुए में दिखाकर परछाई को उसका प्रतिद्वंदी बता देता है । शेर हुए में उस पर छलांग लगा देता है और कुएं में डूबकर मर जाता है अर्थात बुद्धि बल से बडी होती है । बुद्धि के द्वारा ताकतवर मनुष्य को भी पराजित किया जा सकता है । शीर्ष हालांकि कहते हैं कि अभी भगवान जगत के पालन करता है तो हमें जीने की क्या चिंता है । यदि वे रक्षक ना होते तो माता के स्तनों से दूध क्यों नहीं था? यही बार बार सोच कर हे लक्ष्मीपति! अच्छा विष्णु मैं आपके चरण कमल में सेवा है । तू समय व्यतीत करना चाहता हूँ । विष्णु की उपासना के साथ साथ कर्महीन होकर बैठ जाने की मंशा या नहीं । भगवान उसी के सहायक है जो काम करता है । चाहे कि कहते हैं कि यद्यपि मेरी बुद्धि संस्कृत में श्रेष्ठ है तब भी मैं दूसरी भाषा का लालची हूँ । जैसे अमृत पीने के बाद ही देवताओं की शिक्षा, स्वर्ग की अप्सराओं केओस रुपये मत को पीने की बनी रहती है । समझाते कि हम भले ही किसी श्रेष्ठ भाषा में पारंगत हूँ, पर दूसरी अन्य भाषाओं को जानने और समझने के लिए हमें सदा प्रयत्नशील रहना चाहिए । इससे हमारा ध्यान पडता है । अन्य की अपेक्षा दूसरे जोनाथन पीसे हुए आटे में दस गुना अधिक शक्ति होते दूध में आठ से दस गुना अधिक शक्ति होती है । मास में दूध से आठ गुना अधिक शक्ति होती है लेकिन घी में मान से दस गुना अधिक बन होता है । चाहे के कहते हैं कि मांस खाने वालों को घर के सेवन का अभ्यास डालना चाहिए । आज डाले तथा सूखे में भी भी मांस की पूर्ति कर सकने में सामर्थ है उसमें भी प्रोटीन काफी मात्रा में मिलता है । सब्जियाँ खाने से रोक दूर होते हैं । दूध से शरीर बलवान होता ही से वीर अच्छा शक्ति बढती है और मांस खाने से माफी बढता है । अच्छा बल और बुद्धि की शक्ति के लिए घी और दूध का सेवन ही उत्तम मांस नहीं । साग सब्जी से रोक तभी बढते हैं जब उन्हें अच्छी प्रकार से धोकर अच्छा शुद्ध करके नहीं लिया जाता । शुद्ध न करने पर उसमें बाय कीटाणु रह जाते हैं जो लोग को बनाते हैं । यहाँ पर समाप्ति होती है । दस यह है कि अब हम बढते हैं ग्यारवें अध्याय क्यों आज सुन रहे हैं ऍम ऍम हूँ

13. Tirtha Yatra Pe Jake Man Nahi Saaf Hota

नमस्कार साथी हो । अभी तक आप सुन रहे थे चाणक्य नीति का दस स्वाध्याय । अब हम बढ रहे हैं ग्यारह अध्याय क्यों आप सुने हैं फॅमिली साथ तो चलिए आरंभ करते हैं । ग्यारह । देख के आरंभ में शौचालय के कहते हैं कि दान देने का स्वभाव, मधुर वाणी, धैर्य और उचित की पहचान । ये चारों बातें अभ्यास नहीं आती । ये मनुष्य के स्वाभाविक गुण है, ईश्वर के द्वारा ही प्राप्त होते हैं । जो व्यक्ति इन गुणों का उपयोग नहीं करता है वही ईश्वर के द्वारा दिए गए वरदान की उपेक्षा ही करता है और दुर्गुणों को अपना कर घोर कष्ट भोक्ता है । आगे समझाते हैं कि जो अपने वर्ग को छोडकर दूसरों के वार का आश्रय ग्रहण करता है, वहाँ स्वयं ही हो जाता है । जो मिट्टी अपनों का ना हुआ, मैं दूसरों का कैसे हो सकता है । अपने को त्यागना ही धर्म के मार्ग पर चलना है जैसे अंतर हानि नहीं होती है । आगे कहते हैं कि हाथ मोटी शरीर वाला है परंतु अंकुश से वर्ष में रहता है । क्या अंकुश हाथ के बराबर है? दीपक के चलने पर अंधकार न से हो जाता है । क्या दीपक अंधकार के बराबर है? बडे से बडे बडे पर्वत शिखर टूटकर गिर जाते हैं । क्या ब्रज पर्वत के समान है? सत्यता यह है कि जिसका तेज चलता रहता है वहीं बलवान है । मोटेपन से बाल का एहसास नहीं होता । भाव यह है कि किसी के आकार को देखकर उसकी शक्ति का अनुमान नहीं लगाना चाहिए । शक्ति साहस में होती है । आगे समझाते हैं कि घर गृहस्ती में आशक्ति व्यक्ति को कभी विद्या नहीं आती । मांस खाने वाले व्यक्ति को कभी दया नहीं आती । धन के लालची को सच बोलना नहीं आता और इस्त्री में आशक्त कामुक व्यक्ति में पवित्रता नहीं होती । अर्था विद्याप्राप्ति के लिए घर त्याग करके गुरु के पास जाना जरूरी है । मांसाहारी व्यक्ति दया भूल जाता है । लालची व्यक्ति अपने स्वार्थ के लिए बार बार झूठ का सहारा लेते है और काम व्यक्ति सादा स्त्री संभव में लिख रहा था तब वह पवित्र कैसे हो सकता है? आगे कहते हैं कि जिस प्रकार नीम के वृक्ष की जड को दूध और घी से सीखने के बाद भी वहाँ अपनी कडवाहट नहीं जोडता हूँ, नहीं हो जाता है, ठीक उसी प्रकार दुष्प्रवृत्ति वाले व्यक्ति को यदि आप सदू देश देते हैं उसके बाद भी उस पर उसका कोई असर नहीं होता । कहने का आशय यह है कि दोस्त मनुष्य की आदत बन चुके अब को बदला नहीं जा सकता । आगे कहते हैं कि जिस प्रकार शराब वाला पात्र अग्नि में तपाए जाने के बाद भी शुद्ध नहीं हो सकता है उसी प्रकार जिस मनुष्य के हिरदे में आप और कुटिलता भरी होती है, सैकडों तीर्थस्थान जाने के बाद भी ऐसे मनुष्य पवित्रा नहीं हो सकते हैं । आगे समझाते हैं कि जो व्यक्ति संतोष के साथ जो मिले उसी में संतुष्ट रहता है उसे पृथ्वी पर ही स्वर्ग का सुख प्राप्त होता है तो उसे ना तो कोई दुःख होता है और ना ही कोई कस्ट । आचार्य चढ के कहते हैं कि भोजन हमेशा प्रसन्नमुख तथा शांतभाव के साथ करना चाहिए । आगे युवाओं के लिए बहुत ही अच्छी बात समझाते हैं कि कम क्रूड, लालच, स्वाद, शंकार, खेल और दूसरों की चापलूसी ये दुर्गुण विद्यार्थी के लिए वर्जित है । हर विद्यार्थी को इन आठ दुर्गुणों को सरदा के लिए त्याग देना चाहिए । कहने का तात्पर्य यह है कि ये अवगुण विद्यार्थी को कभी भी अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंचने देते हैं । यदि आप को अपने लक्ष्य तक पहुंचना है तो इन दुर्गुणों को हमेशा के लिए त्यागना होगा । आगे कहते हैं कि दूसरों के कार्य में बेहन डालकर नष्ट करने वाला घमंडी, स्वार्थी, कपटी, झगडालू, ऊपर से कोमल और भीतर से मिस्टर व्यक्ति जानवर कहलाता है । आगे कहते हैं कि भाग्यशाली लोगों को खाद्य सामग्री, पास, धन धान्य आदि का संग्रह न करके उसे अच्छी प्रकार से दान करना चाहिए । कहते हैं की डाल देने से करण, दैत्यराज बलि और विक्रमादित्य जैसे राज्यों की कीर्ति आज भी बनी हुई हैं । इसके अलावा इस अध्याय में ग्रामीण को लेकर काफी सारी बातें की गई है कि कौन व्यक्ति एक अच्छा भ्रमण नहीं हो सकता । तो ये था अध्याय ग्यारह । अब हम बढते हैं अध्याय बारह की और आप सुन रहे हैं फॅमिली साथ हूँ ।

14. Boond Boond se Sagar Banta Hai

हमेश करता हूँ । अभी तक आप सुन रहे थे चाणक्य नीति का अध्याय । अब हम बढ रहे हैं बारह अध्याय क्यों आप सो रहे हैं फॅमिली साथ तो चलिए आरंभ करते हैं बार बार है के आरंभ में शिक्षण के कहते हैं कि घर आनंद से युक्त हो, संतान मध्यमान हो, पत्नी मधुर वचन बोलने वाली हो, इच्छापूर्ति के लायक धन हो, पत्नी के प्रति प्रेम भाव हो, आज्ञाकारी सेवक हो, अतिथि का सत्कार पारसी शिव की पूजा हूँ । घर में में स्थान शीतल जल मिला करें और महात्माओं का सत्यन प्रतिदिन मिला करें । ऐसा घर सभी आश्रमों से अधिक धन्य हैं । ऐसे घर का स्वामी अत्यंत सुखी और सौभाग्यशाली होता है । आगे समझाते हैं कि जो पुरुष अपने वर्ग में उदारता, दूसरों के वर्ग पर दया दोनों के वर्ग में दूसरा उत्तम पुरुषों के वर्गों में प्रेम, दुष्टता से सावधानी, पंडित वर्ग में कोमलता, शत्रु में वीरता, अपने बुजुर्गों के बीच शहर सकती, स्त्रीवर्ग में धूर्तता, आर्थिक लाओ में चतुर है । ऐसे ही लोगों से इस संसार की मर्यादा बंदी हुई है । स्थान और समय के अनुसार जो कार्य करता है वहाँ चतुर है । आगे समझाते हैं कि जो व्यक्ति दान, दया, धर्म से वंचित होकर गलत तरीके से कमाए गए धन पर अहंकार करते हैं वहाँ नीच होते हैं । ऐसे व्यक्ति को अपने शरीर से मुझे नहीं करना चाहिए । भाव यह है कि मनुष्य को इस शरीर से अच्छे कर्म करना चाहिए । आगे चल के कहते हैं कि अभी वसंत ऋतु में काॅपर पत्ते नहीं आते हैं तो इसमें बसंती का क्या दोष है । पूरी सबको प्रकाश देता है पर यदि दिन में उन लोग को दिखाई नहीं देता तो इसमें सूर्य का क्या दोष । किसी प्रकार वर्षा का जल चार तक के मुंबई नहीं पडता तो इसमें मेंगो का क्या दोष है । इसका अर्थ है कि भाग्य प्रबल है और अटल है उसे कोई नहीं मिटा सकता । आगे कहते हैं कि अच्छी संगती से दोस्तों में भी साधुता आ जाती है । उत्तम लोग उसके साथ रहने के बाद नहीं नीचे नहीं होते हैं । फूल की सुगंध को मिट्टी तो ग्रहण कर लेती है पर मिट्टी की गन को फूल ग्रहण नहीं करना । आगे चालक की सामाजिक स्थिति को स्पष्ट करते हुए बताते हैं कि वास्तव में देंगे हाथ में से कोई बडा नहीं हो जाता है । किसी से कोई चीज मांग कर उसे वापस दे देने से कोई दानी नहीं बन जाता है । परन्तु आज की स्थिति तो यही है कि आदमी समाज की विषम परिस्थितियों के मध्य किए मकोडों की भर्ती अपना जीवन का आता है । आगे कहते हैं कि सत्य मेरी माता है । पिता मेरा ज्ञान है, धर्म मेरा भाई है । दया मेरी मित्र हैं । शांति मेरी पत्नी हैं और शाम मेरा पुत्र है । ये छह मेरे बंधु बांधव है । कहते हैं कि सभी शरीर ऍम है । सभी धन सब दिया चलायमान है और मृत्यु निकट हैं । ऐसे में मनुष्य को सदेव धर्म का संचय करना चाहिए । इस प्रकार यह संसार नश्वर है । केवल सत्तर में ही नियुक्ति अस्थायी है । हमें इन्ही को अपने जीवन का बनाना चाहिए । कहते हैं कि जो व्यक्ति दूसरों की स्त्री को, माता के समान, दूसरे के धन को, अंकल के समर्थक और सभी जीवों को अपने सामान देखता है वहीं पंडित या विद्वान है । आचार्य चाणक्य समझाते हैं कि बिना विचार के धन खर्च करने वाला, अकेले रहकर झगडा करने वाला और सभी जगह व्याकुल रहने वाला मनोज शीघ्र ही नष्ट हो जाता है । यहाँ के समझाते हैं की जितनी चादर हो उतने ही पैर चलाना चाहिए । बिना हिमायती के क्षत्रों से झगडा करना उचित नहीं है । हर समय चिंता में रहने से स्वास्थ्य शुरू हो जाता है और आदमी असमय ही अपने आप को खत्म कर लेता है । आगे समझाते हैं कि वृद्धिमान पुरुष को बहुजन की चिंता नहीं करना चाहिए । उसे केवल एक धर्म का ही चिंतन मनन करना चाहिए । वास्तव में मनुष्य का आहार तो उसके जान के साथ साथ ही पैदा होता है । आगे कहते हैं कि धन और अन्य के व्यवहार ने विद्या ग्रहण करने में, भोजन करने में और व्यवहार में जो व्यक्ति कभी लग जा नहीं करता हूँ, सदेव सुखी रहता है । समझाते हैं कि मनुष्य को धर्म के लिए भी थोडा थोडा समय अपने व्यस्त जीवन से निकालना चाहिए क्योंकि थोडा थोडा ही बहुत हो जाता है । समझाते हैं कि जो दोस्त है उम्र के अंतिम पडाव तक दुसरे ही रहता है । जिस प्रकार इंद्रायन का फल पक जाने के बाद भी कटुता नहीं छोडती हूँ और मीठा नहीं हो जाता है, किसी किसी का स्वाभाविक गुण बन जाता है । जो जीवन भर उसका पीछा नहीं छोडा वह जैसे हैं आखिर तक वैसा ही रहता है । लेकिन आप अपनी जिंदगी का मकसद बनाई है कि आप अपने आपको अच्छाई की और बदलते रहेंगे । यहाँ पर अध्याय बारह की समाप्ति होती है । अब हम करते हैं अध्याय तेरा की ओर आप सुन रहे हैं फॅसा

15. Bhavishya Aur Atit Mein Mat Khoiye

हमेशा चाहती हूँ । अभी तक आप सुन रहे थे चाणक्य नीति का बार बार ध्यान अब हम बढते हैं तेरे अध्यक्ष आपॅरेशन के साथ । तो चलिए आरंभ करते हैं तीन अध्याय की शुरुआत में शिवसेना के कहते हैं की उत्तम कार्य करते हुए एक बाल का जीवन भी श्रेष्ठ है परंतु दोनों लोगों में दुष्कर्म करते हुए हजारों साल का जीना भी स्टेशन नहीं है । आगे समझाते हैं कि बीते हुए का शोक नहीं करना चाहिए और भविष्य में जो कुछ होने वाला है उस की कभी चिंता नहीं करना चाहिए । आए हुए समय को देख कर ही विद्वान लोग किसी भी कार्य में लगते हैं । इस प्रकार बुद्धिमान व्यक्ति वही है जो वर्तमान के संबंध में ही सोच विचार कर कार्य करते हैं अर्थात जो वर्तमान में जीते हैं, भूत और भविष्य की चिंता नहीं करते हैं । उत्तर स्वभाव से ही देखता सज्जन और पिता संतुष्ट होते हैं बंधु बांधव खान पान से पांच श्रेष्ठ वार्तालाप से पण्डित अर्थात भगवान प्रसन्न होते हैं । मनुष्य को अपने मृदुल स्वभाव को बनाए रखना चाहिए । आचार्य चढने प्रस्तुत लोग में समझाया है कि जो व्यक्ति जैसे प्रसन्न हूँ उसे वैसे ही प्रसन्न करना चाहिए । आगे कहते हैं कि बडों के स्वभाव विचित्र होते हैं । वे लक्ष्मी की तृष्णा के समान समझते हैं और उनके प्राप्त होने पर उनके बाहर से और भी अधिक नम्र हो जाते हैं । भाव यह है कि जो महान है वे धन के महत्व को कुछ नहीं समझते । उनका उसने तो वहाँ वो धन से भी अधिक ऊंचा होता है । आगे बहुत ही अच्छी बात समझाई है जैसे हर इंसान को समझना चाहिए । आज की जिन्दगी में कई लोग किसी व्यक्ति से लगाव लगा लेते हैं । चाचा के कहते हैं कि जिसे किसी से लगाव है उतना ही भयभीत होता है लगाओ । दुख का कारण है दुखों की जब लगाओ है । अतः लगाओ को छोडकर सुब से रहना सीखो । आगे समझाते हैं कि भविष्य में आने वाली संभावित विपत्ति और वर्तमान में उपस् थित विपत्ति पर जो तत्काल विचार करके उसका समाधान खोल लेते हैं, मैं सरदार सुखी रहते हैं । इसके अलावा जो ऐसा सोचते हैं कि यहाँ होगा वैसा होगा तथा जो होगा देखा जाएगा और कुछ उपाय नहीं करते, विशेज्ञ ही नष्ट हो जाते हैं । यहाँ चाहके ने कर्म करते रहने और भगवान के भरोसे ना बैठे रहने की बात कही है । उनके कहने का भाव यह है कि केवल भाग्य के भरोसे ही नहीं बैठे रहना चाहिए । पति आने पर या उसके आने की संभावना होने पर तत्काल उपाय कर देना चाहिए । जो व्यक्ति विपत्ति को भगवान की ओर से रचा गया भाग्य कहकर उसे समाप्त करने का उपाय नहीं करते, वे नष्ट हो जाते हैं । आगे कहते हैं कि जैसे राजा होता है, उसकी प्रजा भी वैसे ही होती है । धर्मात्मा राजा के राज्य की प्रजा, धर्मात्मा पार्टी के राज्य की पापी और मध्यमवर्गी राजा के राज्य की प्रजा मध्यम अध्यात्म राजा का अनुसरण करने वाली होती है । आगे समझाते हैं कि धर्म से विमुख व्यक्ति जीवित भी मृतक के समान होता है, परंतु धर्म के आचरण करने वाले व्यक्ति चिरंजीवी होते हैं । धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों का संबंध इस लोग और कर लोग दोनों से हैं । मनुष्य को अपना जीवन सार्थक करने के लिए इन में से किसी एक को अवश्य ही पाना चाहिए । आगे बहुत ही अच्छी बात समझाते हैं कि नीच मनुष्य दूसरों की यशश्वी अग्नि की तेजी से चलते रहते हैं और उस स्थान पर न पहुंचने के कारण उन की निंदा करते रहते हैं । दूसरों की निंदा साडी दुस्त व्यक्ति ही क्या करते हैं । वे दूसरों के यश को देखकर सदेव एशिया में चलते रहते हैं । आगे समझाते हैं कि मन को विषय ही नहीं था । मैं से युक्त करके ही मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है क्योंकि मन में विषय वासनाओं के आगमन के कारण ही मनुष्य मोहमाया के जाल में आशा होकर रह जाता है । अच्छा हर मनुष्य को मन को जीतने का प्रयत्न करना चाहिए । चाहे कि कहते हैं कि मन की शिक्षा के अनुसार सारे सुख किसको मिलते हैं और था किसी को नहीं मिलते हैं । इस से यह होता है कि देव के ही बस में सब कुछ । अतः संतोष का ही आश्रय लेना चाहिए । आगे चला के जीवन की बहुत ही बडी बात समझा रहे हैं कि जैसे हजारों गायों के मध्य भी बचना अपनी माता के पास आ जाता है, उसी प्रकार किए गए कर्म करता के पीछे पीछे आ जाते हैं । मनुष्य जैसे काम करता है उसे फल भी उसी के कर्मों के अनुसार प्राप्त होते हैं । सदेव अच्छे काम करके ही अपना जीवन सुधारना चाहिए । कहते हैं कि अव्यस्थित कार्य करने वाले को ना तो समाज में और न ही वन में सुख प्राप्त होता है क्योंकि समाज में लोगों से भला बुरा कहकर जलाते हैं और निर्जन वन में अकेला होने के कारण मैं दुखी होता है । भाव यह है कि ऐसे व्यक्ति को ना तो घर में सब मिलता है और ना ही सन्यास लेने पर सुख प्राप्त होता है । समझाते हैं कि जिस प्रकार भावना था कुदाल से खोदकर व्यक्ति धरती के नीचे से जल प्राप्त कर लेता है, उसी प्रकार एक शिष्य गुरु कि मन से सेवा कर के ही विद्या प्राप्त कर लेता है । फला धर्म के अधीन है । बुद्धि कर्म के अनुसार होती है तब भी वृद्धिमान लोग और महान लोग सोच विचार करके ही कोई कार्य करते हैं । किसी भी कार्य को करने से पूर्व अच्छी प्रकार से सोच समझ लेना चाहिए । तभी कार्य अच्छे से होते हैं । आगे समझाते हैं कि अपनी थी भोजन और धन । इन तीनों में संतोष करना चाहिए और विद्या पडने जब करने और दान देने इन तीनों में कभी भी संतोष नहीं करना चाहिए । बडे लोगों के समूह कितनी भी विपत्ति होना चाहिए वो अपने लक्ष्य से कभी भी विचलित नहीं होते हैं । जो सोच लेते हैं उसे करके रहते थे । कभी अपनी मान्यताओं, अपने सिद्धांतों, अपने आदर्शों और अपने उद्देश्य से कभी भी पीछे नहीं हटते हैं । आप भी अपने उद्देश्य से कभी पीछे मतलब यहाँ समाप्ति होती है तेरह अध्याय कि अब हम करते हैं चौधरी अध्याय । क्या आप सुन रहे हैं कुछ ऐसे ऍम के साथ हाँ ऍम जो

16. Lobh Hai Sari Buraiyon Ki Jar Hai

नमस्कार चाहती हूँ । अभी तक आप सुन रहे थे चाणक्य नीति का चौदह है । अब हम आगे बढ रहे हैं । पंद्रह अध्याय क्या आप सुन रहे हैं फॅमिली साथ तो चलिए आरंभ करते हैं । शुरुआत में शिवसेना के कहते हैं कि जिसका हिरदय सभी प्राणियों पर दया करने है तो द्रविड होता है । उसे ज्ञान, मोर, जटा और बस में लगाने की क्या जरूरत है? भावना है कि हमें सभी प्राणियों पर दया करनी चाहिए, उनसे नहीं करना चाहिए । जो ऐसा करता है उसका स्थान परमात्मा के समकक्ष हो जाता है । जो गुरु एक ही अक्षर अपने से किसी को पढा देता है उसके लिए इस पृथ्वी पर कोई अन्य चीज ऐसी महत्वपूर्ण नहीं है जिसे गुरु को देकर उसका रहेंगे, उतार सकें । आगे कहते हैं कि दोस्तों और काटो से बचने के दो ही उपाय है जूतों से उन्हें कुछ डालना और उनसे दूर रहना । भाव यह है कि दूसरा और काटे ऐसा देवगढ पहुंचाने वाले होते हैं । इनसे बचकर रहना ही ठीक है । यदि इनका सामना हो जाए तो इन्हें जूतों से कुछ डालना चाहिए । आगे समझाते हैं कि गंदे वस्त्र धारण करने वाले, दातों पर मैं जमाए रखने वाले, अत्यधिक भोजन करने वाले, कठोर वचन बोलने वाले सूर्योदय से सूर्यास्त तक सोने वाले चाहे मैंने साक्षात विष्णु ही क्यों ना हूँ, लक्ष्मी भी उन्हें त्याग देती हैं । ऐसे व्यक्ति जो आलसी, कामचोर, पेटू, क्रोधी और निगम में होते हैं, ऐसे लोगों के पास धन संपत्ति कभी भी नहीं आती । यदि आती भी है तो शीघ्र ही नष्ट हो जाती है । परन्तु जो व्यक्ति स्वच्छ रहेगा, कर्मठ होगा वही धन को जुटाने में कामयाब होगा । निर्धन होने पर मनुष्य को उसके मित्र, स्त्री, नौकर और हितेषी जान छोड कर चले जाते हैं परन्तु उन्होंने बनाने पर फिर से उसी का आश्रय लेते हैं । इसका भाव यह है कि आदमी के जीवन में धन का बडा महत्व है । धन ही भाई है, धन ही मित्र है और धन ही स्त्री हैं । आगे कहते हैं कि अन्याय से उपार्जित किया गया धन दस वर्ष तक चलता है । ग्यारह वर्ष के आते ही जड सहित नष्ट हो जाता है । इसलिए अन्यायपूर्वक धन कमाने के लिए व्यक्ति को कभी प्रयास नहीं करना चाहिए । समर्थ व्यक्ति द्वारा किया गया गलत कार्य भी अच्छा कहलाता है और नीचे व्यक्ति के द्वारा किया गया अच्छा कार्य भी गलत कहना आता है । ठीक वैसे ही जैसे अमरता प्रदान करने वाला अमृत राहू के लिए मृत्यु का कारण बना और प्राणघातक विष भी शंकर के लिए भूषण हो गया । आगे समझाते हैं कि भोजन वही है जो ब्राह्मण के करने के बाद बच्चा रहता । भलाई वही है जो दूसरों के लिए की जाती है । बुद्धिमान वही है जो आप नहीं करता और बिना पाखंड और दिखावे के जो कार्य किया जाता है वही धर्म है । आगे बहुत ही अच्छी बात समझाते हैं की मणि चाहे पैरों में पडी हो और का चाहे सिर पर धारण किया गया हो परंतु क्रय विक्रय करते समय अर्थात मूलभाव करते समय मणि मणि ही रहती है और काम काजी रहता है । भाव यह है कि समय तथा भाग्य के कारण विद्वान व्यक्ति का भले ही सम्मान ना हो पर जब मूल्यांकन का समय आता है तो विद्यान विद्वान ता तो कोई चुनौती नहीं दे सकता । योगी व्यक्ति की अलग ही पहचान होती है और अयोग्य व्यक्ति की जग हंसाई ही होती है । शास्त्रों का कोई अंत नहीं है । विद्याएं बहुत हैं, जीवन छोटा है, देखने और बाधाएं अनेक हैं । अतः जो सार्थक रहे हैं उसे ही ग्रहण करना चाहिए । जैसे हंस जल के बीच से भी दूध को पी लेता है अर्थात मानव जीवन बहुत छोटा है और संसार में ज्ञान आप सीमित है । पूरे जीवन में सारे ज्ञान को पाया नहीं जा सकते हैं । इसलिए ज्ञान के उस सार तत्व को ग्रहण कर लेना चाहिए जो सत्य है । आगे चल के कहते हैं कि अचानक दूर से आए थके हारे पथिक से बिना पूछे जो व्यक्ति स्वयं भोजन कर लेता है, वहाँ चांडाल होता है । आगे जाना के कहते हैं कि यह विषय है कि बंधन बहुत सारे हैं परन्तु प्रेम का बंधन निराला होता है । जैसे लकडी को छेडने में सामर्थ, भोर कमल की पंखुडियों में उलझकर क्रियाहीन हो जाता है अर्थात प्रेमरस में मस्त हुआ भोर कमल की पंखुडियों को नष्ट करने में, सामर्थ होते हुए भी उसमें छेद नहीं कर पाता था । जो प्राणी संसार की मोहमाया में फस जाता है वहाँ भौरे की तरह शीघ्र ही नष्ट हो जाता है । जिस प्रकार भरा कमाल के मोह में फंस कर उसकी पंखुडियों में कैद होकर अपना जीवन गंगा देता है । चंदन का कट आॅफ भी सुगर नहीं छोडती हूँ । बूढा होने पर भी गजराज क्रीडा नहीं छोडती हूँ एक गोलू से पिछले के बाद भी आपने मिठास नहीं छोटा और कुलीन व्यक्ति दरिद्र होने पर भी सुशील और गुंडों को नहीं छोडना । भाव है कि जन्म से ही जो शाश्वत गुड मनुष्य को प्राप्त होते हैं वे अंत तक साथ नहीं छोडते हैं । यहाँ पर समाप्ति होती है पंद्रह अध्याय कि अब हम करते हैं सोलह याद है क्यों आप सुन रहे हैं वो ऍम के साथ ऍम

17. Paisa Khone Ke Baad Kma Sakte Hai, Sarir Nahi

नमस्कार जाती है । अभी देखो आप सुन रहे थे चाणक्य नीति का तेरे बाद है अब हम भर रहे हैं चौदह हो । आप सुन रहे हैं फॅमिली के साथ । तो चलिए आरंभ करते हैं जिंदगी के सीख देने वाली बात के साथ । शुरुआत करते हुए श्री चाहे के कहते हैं कि इस पृथ्वी पर तीन ही रतन है जल, अन्य और मधुर वचन बाॅंटी इसकी समझ सकता ऍम लोग पत्थर के टुकडे को ही रतन कहते हैं । जल और अन्य के बिना मनुष्य का जीवन बिल्कुल भी संभव नहीं और मधुर वचनों के बिना समाज में विचरण कहना मुश्किल है । कटु वचन करने वाले का कोई भी अगर नहीं करता, मनुष्य भी अध्यन के मार कर चलता है तो उसे अपने जीवन में उपयुक्त दुखों का सामना करना पडता है । धन, मित्र, स्त्री और प्रति ये बार बार प्राप्त होते हैं परंतु मनुष्य का शरीर बार बार नहीं मिलता । इस लोग में चढा के मानव के शरीर का महत्व बताते हैं । उनके अनुसार मानव शरीर चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करने के उपरांत हमें प्राप्त हुआ है । यह अत्यंत दुर्लभ है । इसमें ईश्वर का स्मरण किया जा सकता है । आगे चल के कहते हैं की है एक निश्चित तथ्य है कि बहुत से लोगों का समूह ही शत्रु पर विजय प्राप्त करता है । जैसे वर्ष की धार को धारण करने वाले मेरे के जाल को इनको के द्वारा तीन किसी बना छप्पर ही रोक सकता है । भाव यह है कि एकता में बडा बाल होता है बडी से बडी शक्ति से टकरा सकता है । आगे समझाते हैं कि पानी में तेल, दुष्ट व्यक्तियों में धो, अपनी बातें उत्तम पात्र को दिया गया । दान और बुद्धिमान के पास शास्त्रज्ञान नहीं थोडा भी हो तो वो स्वयं अपनी शक्ति से विस्तार पा जाते हैं । भाव यह है कि जिस प्रकार पानी में डाला गया जरा सा तेल भी फैल जाता है । दोस्तों में पहुंची गोपी बातें चारों और फैल जाती है और बुद्धिमान का थोडा सा भी शास्त्रज्ञान काफी लोगों को प्रभुत्व करता है । ज्ञान का विस्तार इसी प्रकार होता है अर्थात सभी चीजों का अपना अपना महत्व होता है । आगे बहुत ही बडी बात समझाते हैं कि धार्मिक कथा सुनने पर शमशान में चिताह को जलते देखकर रोगी को अगस्त में बडे देखकर जिस प्रकार मेरा के भाव उत्पन्न होता है वहाँ यदि स्थिर है तो यह सांसारिक मोहमाया व्यक्त लगते हैं । परंतु स्थिर मान शमशान से लौटने पर फिर से मोहमाया में फस जाता है । आगे समझाते हैं की चिंता करने वाले व्यक्ति के मन में चिंता उत्पन्न होने के बाद की जो स्थिति होती है, हर था उसकी जैसे बुद्धि हो जाती है । वैसे बुद्धि यदि पहले से ही होती तो भला किसका भाग्योदय नहीं होता । यहाँ समझाया गया है कि गलत कार्य करने के उपरांत पश्चताप के समय उसकी जैसी निर्मल बुद्धि हो जाती है । यदि वैसी निर्मल बुद्धि पहले से ही रही होती तो किसका भला या कल्याण नहीं होगा । आगे समझाते हैं कि दान, तपस्या, वीरता, ज्ञान, नम्रता किसी में ऐसी विशेषताओं को देखकर आश्चर्य नहीं करना चाहिए क्योंकि इस दुनिया में ऐसे अनेक रतन भरे पडे हैं । समझाते हैं कि जो जिसके मन में हैं वहाँ से दूर रहकर भी दूर नहीं और जो जिसके हिरदय में नहीं है, मैं समीर रहते हुए भी दूर है । भाव यह है कि सच्चा प्रेम हिरदय से होता है, उसमें दूरी का अच्छा पास होने का कोई भी जगह नहीं होता । सच्चे प्रेम में प्रिय हर समय आंखों के सम्मुख रहता है । आगे जाने की कूटनीति की ओर इशारा करते हुए कहते हैं कि जिससे भी अपना हित साधना हूँ उसे साडी प्रिया बोल बोलना चाहिए । जैसे मैं आपको मारने के लिए बहेलिया मीटर सफर में गीत गाता जाता है । राजा, अग्नि, गुरु और स्त्री इनसे सामान्य व्यवहार करना चाहिए क्योंकि अत्यंत समीप होने पर ये नाश के कारण होते हैं और दूर रहने पर इनसे कोई फल प्राप्त नहीं होता । भावना है कि इन से व्यवहार करते से मैं मध्यमार्ग अपना नवीन जैसे करने और नागौर जैसे नीट है । ज्यादा दूरी भी नहीं और ज्यादा पास भी नहीं । आगे समझाते हैं कि अगली पानी स्त्रियाँ मूड साफ । राजा को उसे निकट संबंध सावधानी से करना चाहिए क्योंकि ये छह तत्काल प्राणों को हरने वाले होते हैं । समझाते हैं कि जिसके पास गढ है, उसके पास धर्म है, वहीं जीवित है, गुड और धर्म से भी है । व्यक्ति का जीवन निरर्थक है । चाहे के समझाते हैं कि यदि एक ही कर्म से समझाते संसार को वर्ष में करना चाहते हो तो पंद्रह खो से विचरण करने वाले मन को रखो अर्थात उसे वर्ष में करूँ । ये पंद्रह लाख कौन कौन से हैं? ये है मुंबई आठ । कान नाक जीव तो हाथ पैर, लिंग, गुदा रो ऍम यहाँ समझाते हैं कि यदि एक ही कर्म से सारे संसार को वर्ष में करना चाहते हो तो परनिंदा करना बंद कर मन को वर्ष में करना और परनिंदा न करना दोनों ही उचित लगते हैं । ऐसा करके आपके हाथों में वशीकरण मंत्र की शक्ति आ सकती है । आगे कहते हैं कि जो प्रस्ताव के योग्य बातों को प्रभाव के अनुसार तो ये कार्य को या बच्चन को और अपनी शक्ति के अनुसार क्रोध करना जानता है । वहीं अगले पंडित है अर्था प्रसंग अनुकूल बात करनी चाहिए । यदि प्रसन्नता का मौका है तो उसमें प्रसन्नता की बात होनी चाहिए । इसी तरह अन्य योग्यताओं का भी वर्णन किया है । आगे कहा है कि एक ही वस्तु को तीन दृष्टियों से देखा जा सकता है । जैसे एक सुंदर स्त्री को एक योगी मृतक के रूप में देखता है । कामों व्यक्ति उसे कामिनी के रूप में देखता है और कुत्ते के द्वारा मांस के रूप में देखी जाती है । भावना है कि नारी की सौंदर्यता दृष्टिभ्रम मात्र है । प्रत्येक व्यक्ति हर चीज को अपनी अपनी दृष्टि से दिखता है । आचार्य चढा के समझाते हैं कि बुद्धिमान व्यक्ति नहीं है जो अति शिंदे दवा को, धर्म के रहस्य को, धर्म के दोष को । मैं तो था संभव की बातों को, स्वाधीन भोजन को और अतिकष्टकारी मृत्यु को किसी को न बताएं । भाव यह है कि कुछ बातें ऐसी होती है जिन्हें समाज से छिपाकर रखना चाहिए और आगे समझाते हैं कि दोस्तों का साथ त्याग सज्जनों का साथ करो, दिन रात धर्म का आचरण करो और प्रतिदिन इस अनित्य संसार में नीति परमात्मा के विषय में विचार करना, उसे याद कर यहाँ पर समाप्ति होती है । चौदह है कि अब हम आगे बढते हैं । पंद्रह याद है क्या आप सुन रहे हैं? फॅमिली साथ हूँ हूँ, ऍम हूँ हूँ अच्छा हूँ हैं ।

18. Kitabon Tak Seemit Gyan Kisi Kam Ka Nahi

हमेशा साथ हूँ । अभी तक आप सुन रहे थे चाइना की नीति का पंद्रह अध्याय, अब हम बढते हैं सोलह है । क्या आप सुन रहे हैं फॅमिली साथ? तो चलिए आरंभ कहते हैं । चाचा के कहते हैं कि जिन लोगों ने ना तो बहुत एक संसार का ही उपयोग किया और ना ही पर लोग को सुधारने के लिए प्रभु की पूजा पाठ की आना ही धर्म का संग्रह किया । ऐसे लोगों को जन्म देना माता के लिए व्यर्थ ही हुआ । कहते हैं कि सफलता तो तभी मिलती है जब इस लोग में सुबह उठाते हुए परलोक सुधार के लिए धर्माचरण किया जाए । आगे जाने की का मानना है कि कुलटा स्त्रियों का प्रेम एकांक इतना होकर बहुत ही होता है । उनका कहना है कि कुलटा ऑस्ट्रिया पर आए व्यक्ति से बातचीत करती है, कटाक्ष पूर्वक देखती है और आपने हिरदय में परपुरुष का चिंतन करते हैं । इस प्रकार चरित्रहीन स्त्रियों का प्रेम अनेक से होता है चाणक्य नहीं । यहाँ पर कुल टाइम क्योंकि हावडा हूँ और चरित्र का स्पष्ट वर्णन किया है । जो व्यक्ति माया की मूह में वशीभूत होकर यह सोचता है कि अमुक स्त्री उस पर आशक्त है, वहाँ उस उस तरीके वर्ष में होकर खेल की चिडिया की भांति इधर उधर नास्ता फिरता है । आचार्य चढा के कहते हैं कि संसार में कोई भाग्यशाली व्यक्ति ही मैं से छूट कर मोक्ष प्राप्त करता है । उनका कहना है कि धन को प्राप्त करके ऐसा कौन है जो संसार में अहंकारी ना हो । इस पृथ्वी पर ऐसा कौन भी पुरुष है जिसका मान स्त्रियों के प्रति व्याकुलता हूँ । ऐसा कौन पुरुष है जिसे मृत्यु ने न दबोचा हूँ । ऐसा कौन सा अधिकारी है जिसे बडप्पन मिला हूँ । ऐसा कौन सा दोस्त हैं जो अपने संपूर्ण दुर्गणों के साथ इस संसार में कल्याण पथ पर अग्रसर हुआ हूँ । भाव यह है कि इस नश्वर संसार की मोहमाया से छूटना अत्यंत ही दुष्कर कार्य हैं । स्वर्ण पदक ना तो ब्रह्मा ने रचा था और ना किसी और ने । उसे ना तो बनाया गया था ना पहले कभी देखा गया था न कभी सुना गया था । श्री राम की उसे पाने की इच्छा हुई अर्थात सीता के कहने पर में उसे पाने के लिए दौड पडे । किसी ने ठीक ही कहा है विनाशकाले विपरीत बुद्धि जब विनाश कर आता है तब बुद्धि नष्ट हो जाती है । यहाँ चाइना की सिर्फ ये है समझाना चाहते हैं कि जब विनाश आता है तो बुद्धि उल्टी हो जाती है । आगे चल के कहते हैं कि व्यक्ति अपने गुणों से ही ऊपर होता है । सिर्फ ऊंचे स्थान पर बैठ जाने से कोई भी व्यक्ति पूछा नहीं बन जाता । उदाहरण के लिए महल की छोटी पर बैठ जाने से कम हुआ गर्व नहीं बन जाता है । आगे समझाते हैं कि गुंडों की सभी जगह पूजा होती है न कि बडी संपत्तियों की । क्या पूर्णिमा के चांद को उसी प्रकार से नहीं किया जाता है जैसे दुनिया की जान को भाव यह है कि चंद्रमा किसी भी रूप में रहे । विद्वान व्यक्ति की गुड की बाटी उसे हर स्थिति में नमन करते हैं । आगे कहते हैं कि दूसरों के द्वारा गुणों का बखान करने पर बिना गुड वाला व्यक्ति भी गुडी चलता किंतु अपने मुख से अपनी ही बडाई करने पर इंद्रा भी छोटा हो जाता है । भाव यह है कि आत्मप्रशंसा से कोई भी व्यक्ति बडा नहीं था । अभी तू जब दूसरों के द्वारा प्रशंसा की जाती हैं तभी वहां व्यक्ति गुडी कहलाता है । अपने मुंह मियां मिट्ठू नहीं बनना चाहिए । दिन गुणों की प्रशंसा दूसरे करते हैं । वे ही बढ सच्चे होते हैं । जो व्यक्ति विवेकशील है और विचार करके ही कोई कार्य संपन्न करता है । ऐसे व्यक्ति के गुण श्रेष्ठ विचारों के मेल से और भी संदर हो जाते हैं । जैसे सोने में जुडा हुआ रतन स्वयं ही अत्यंत शोभा को प्राप्त हो जाता है । आगे समझाते हैं कि जो धन अधिक कष्ट से प्राप्त हो, धर्म का त्याग करने पर प्राप्त हो, क्षेत्रों के सामने झुकने अथवा समर्पण करने से प्राप्त हो, ऐसा धन हमें नहीं चाहिए । कहते हैं कि आत्मसम्मान को नष्ट करने वाले धन की अपेक्षा धन का न होना ही अच्छा है । आगे समझाते हैं कि उस लक्ष्मी से क्या लाभ जो घर की कुल बन्दों के समान केवल स्वामी के उपभोग नहीं उसे तो एशिया के समान होना चाहिए जिसका उपयोग सब कर सकें । यहाँ चाहे की समझाना चाहते हैं की संपत्ति धन में वही वही अच्छा है जिसका उपयोग सभी के हित के लिए होता है । यानी धन पर कुंडली मारकर एक ही व्यक्ति बैठा रहे और केवल अपने ही स्वार्थ के लिए उसे खर्च करें तो ऐसा धन किसी भी लापता नहीं । आगे आचार्य चाणक्य कहते कि संसार में आज तक किसी भी इंसान को प्राप्त धन से इस जीवन से, स्त्रियों से खान पान से पूर्ण ट्रपति कभी नहीं मिली । पहले भी अभी भी और आगे भी इन चीजों से संतोष होने वाला नहीं है । इनका जितना अधिक उपयोग किया जाता है उतनी ही तृष्णा बढती जाती हैं । मनुष्य की शिक्षा आनंद है, मैं कभी भी पूरी नहीं होती । एक शिक्षा के पूरे होने पर दूसरी सामने आकर खडी हो जाती है । तात्पर्य यह है कि मनुष्य अपने आप से कभी भी संतुष्ट नहीं होता । अतः संतोष ही सबसे बडा धन है । आगे जाना कि कहते हैं कि तिनका हल्का होता है, इनके से भी हल्की रही होती है । रुई से भी नल का अधिकारी होता है । तब वायु से उडाकर क्यों नहीं ले जाते संभवतः इस भय से कि कहीं ये उसे भी भीगना मांगले मांगने वाले से सभी डरते हैं । वहाँ उनसे कुछ न कुछ मांग बैठा है क्योंकि देना कोई नहीं चाहता हूँ । वैसे भी अधिकारी निंदा के योग्य ही है । आगे कहते हैं कि जो विद्या पुस्तकों में लिखी है और कंट्री नहीं तथा जो धन दूसरों के हाथों में गया है, ये दोनों आवश्यकता के समय काम नहीं आती था । पुस्तकों में लिखी विद्या और दूसरों के हाथों में गया धन पर कभी भी भरोसा नहीं करना चाहिए । विद्या को सदेव काॅस्ट करना चाहिए और धन को सदैव अपने हाथों में रखना चाहिए ताकि वक्त आने पर वहाँ हमारे काम आ सके । यहाँ पर समाप्ति होती है सोलह है कि अब हम बढते हैं अंतिम बरसत विध्या । क्या आप सुन रहे हैं फॅमिली के साथ ऍम तो

19. Top Se Aage Kuch Nahi

नहीं कर सकती हूँ । अभी तक आप सुन रहे थे चाणक्य नीति का सोमवार है अब हम बढते हैं सत्र में और अंतिम अध्याय क्यों? आप सुन रहे हैं कुछ फॅसा तो चलिए आरंभ करते हैं सत्रह अध्याय की शुरूआत मैच में जाना क्या गुरु का महत्व बताते हैं । वो कहते हैं कि जिस प्रकार परपुरुष से गर्भधारण करने वाली स्त्री समाज में शोभा नहीं पाती उसी प्रकार गुरु के चरणों में बैठकर विद्या प्राप्त न करके इधर उधर से पुस्तकें पढकर जो ज्ञान प्राप्त करते हैं वे विद्वानों की सभा में शोभा नहीं पाते क्योंकि उनका ज्ञान अधूरा होता है । आधुनिक ज्ञान के कारण विषेक रही बाहर के पात्र बन जाते हैं । आगे समझाते हैं कि उपकार का बदला उपकार से देना चाहिए और हिंसा वाले के साथ हिंसा करनी चाहिए । वहां दोष नहीं लगता क्योंकि दुष्ट के साथ दुष्टता का व्यवहार ही करना ठीक रहता है । चाहे अपने इस इस लोग में कहा है कि यू तो सबके साथ प्रीतिपूर्वक व्यवहार करना चाहिए पर दोस्ती के साथ प्रीतिपूर्वक व्यवहार करना उसकी दुष्टता को बढावा देना होता है । आगे कहते हैं कि तब मैं असीम शक्ति है तब के द्वारा सभी कुछ प्राप्त किया जा सकता है जो दूर है । बहुत अधिक दूर हैं जो बहुत कठिनता से प्राप्त होने वाला है और बहुत दूर स्थित है । ऐसे साथी को तपस्या के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है । तब के द्वारा तो ईश्वर को भी प्राप्त किया जा सकते हैं अगर जीवन में साधना का विशेष महत्व है । आगे कहते हैं कि लोग सबसे बडा अवगुण हैं, परनिंदा सबसे बडा पाप है । सत्य सबसे बडा तब है और मन की पवित्रता सभी तीर्थों में जाने से बेहतर है । सब जनता सबसे बडा गुण हैं और यश सबसे उत्तम आभूषण है । आगे कहते हैं की शक्ति ही मनुष्य साधु होता है । धनहीन व्यक्ति ब्रह्मचारी होता है, रोगी व्यक्ति दे वक्त होता है और बूढी स्त्री पतिव्रता होती है । भाव यह है कि ये सभी लोग असमर्थ रहने के कारण से ही ऐसे हैं । तहत जो व्यक्ति प्रयास नहीं करता हूँ, परिश्रम नहीं करता, आलसी और निकम्मा होकर अपने आपको ऐसा बना लेता है । परिस्थितियों से घबराकर मोमोज लेना कायर मनुष्य का काम है । व्यक्ति को तो चाहिए कि मैं अपना कार्य पूरे मनोयोग से करें । सच्चे अर्थों में वही धर्म है । साहब के दात में विश्व है, मक्की के सिर में विश्व है, बिच चुकी पूछना होता है । लेकिन दूसरे व्यक्ति के पूरे शरीर अच्छा सारे अंगों में देश होता है । भाव यह है कि दुर्जन व्यक्ति हर प्रकार से सज्जनों को कष्ट पहुंचाने वाला होता है । उसका साथ किसी भी रूप में सुखकारी नहीं है । बुद्धिमान बेटी सदैव ऐसे दूसरे व्यक्ति से बचकर चलते हैं क्योंकि दुर्जन व्यक्ति के तो सारे अंग में भरा होता है । आगे समझाते हैं की हाथ की शोभा दान से होती है न की कंगन रहने से होती है । शरीर की शुद्धि स्नान से होती है ना कि चंदन लगाने से होती है । बडो की तरफ थी, सम्मान करने से होती है ना कि भोजन कराने से । शरीर की मुक्ति ज्ञान से होती है ना कि शरीर का शंकार करने से होती है । भाव यह है कि आज नंबरों से शरीर को शुद्ध नहीं किया जा सकता । दान देने, स्वच्छ जल से स्नान करने, बडों का सम्मान करने और उचित ज्ञान प्राप्ति के उपरांत ही मनुष्य का जीवन सफल होता है । जिन सज्जनों की हिरदय में परोपकार की भावना जाग्रत रहती है उनकी तमाम पत्तिया अपने आप दूर हो जाती है और उन्हें पद, पद पर संपत्ति एवं धन की प्राप्ति होती है । आगे समझाते हैं कि भोजन नींद, डर संभव ये सभी गुण मनुष्य और पशुओं में समान रूप से दिखाई और पाई जाती हैं । पशुओं की अपेक्षा मनुष्य में केवल ज्ञान मतलब बुद्धि एक विशेष गुण है तो उसे अलग बनाता है । अतः ज्ञान के बिना मनुष्य पशु के समान ही हो जाता है और आगे समझाते हैं कि नीचे की और देखती हुई एक अधेड वृद्ध स्त्री से कोई पूछता है कि अरे बोलो तो नीचे क्या देख रही हो? पृथ्वी पर तुम्हारा क्या गिर गया? तो वहाँ इस्त्री कहती है, अरे मूर्ख, तुम नहीं जानते हैं । मेरा युवावस्था रूपी मोटी नीचे गिरकर नष्ट हो गया है । कहने का अर्थ यह है कि योवन का मोटी एक बार नष्ट हो जाए और था जवानी एक बार चली जाए तो फिर लौटकर नहीं आती । इसलिए आप सभी अपनी जवानी का सही उपयोग कीजिए, अपने लक्ष्यों को प्राप्त कीजिए और अपनी जिंदगी में कुछ ऐसा हासिल कर जाइए के मरने के बाद भी आप लोगों के दिलों में रहे और यहीं पर समाप्त होता है चाणक्य नीति का अंतिम अध्याय । आशा करता इस यात्रा के दौरान आपको बहुत सारी चीजें सीखने को मिली होगी । अपनी जिंदगी को बदलने के लिए मिली होगी । बहुत ही जल्दी में आप सभी के लिए कुछ तो ऐसे पर लेकर आऊंगा । अगले मोटिवेशन सीरीज तब तक के लिए साइनिंग जी मोटिवेशन हूँ

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