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बहुत दो आखिरी हर जवाब दस्खत को पढ रहे होंगे तो मैं इस दुनिया को अलविदा कह चुका होगा । मैं अब इस दुनिया में रहना नहीं चाहता । अगर हो सके तो मुझे माफ कर देना । मैं इस समाज में रहने के लायक नहीं हूँ । इसका कारण मेरी हकलाहट की समस्या है जो कि मुझे बचपन से थी और इसमें मेरा कोई दोष नहीं था परन्तु फिर भी इस वजह से समाज में मेरी समस्या का मजाक बनाकर मेरा जीना मुश्किल कर दिया था । मैं अपने ऊपर किए जा रहे मजाक से तंग आ गया हूँ । मैंने अपनी समस्या से उभरने के लिए कई कोशिशें की परंतु सब व्यर्थ साबित हुए हैं । मैं चाहकर भी इस समस्या से उबर नहीं पा रहा हूँ जिस वजह से आज मैं अपना जीवन समाप्त कर रहा हूँ । मैं अपने इस फैसले के लिए एक बार फिर आप सबसे माफी मानता हूँ । धन्यवाद आपका अभागा चिराग वडेरा, चिराग वडेरा जोकि अब शायद इस दुनिया में नहीं रहा । भगवान उसकी आत्मा को शांति दे । उसने ये खत्म अपने आखिरी समय में इस समाज के नाम लिखा था । अपने इस आखिरी खत में उसने इस समाज के प्रति अपना गुस्सा जाहिर करते हुए साफ तौर पर अपनी मृत्यु का जिम्मेवार समाज को ठहराया था जिन्होंने उसके हकलाहट की समस्या का मजाक बना कर रख दिया था । आखिरकार उसका कसूर किया था पर सही ना कि वो बोलते समय थोडा रुक जाता था या यूं कहें कि वह पकडा था । परन्तु इसमें उस बिचारे का क्या दोष था, सब उस पर हसते थे और उसकी बातों को मजाक का विषय बनाकर अपना मनोरंजन का साधन बना लेते थे । जिस वजह से उसने अपने नर जैसे जीवन से छुटकारा पाने के लिए अपने जीवन को ही खत्म करने का फैसला लिया । बेशक अब चिराग का ये फैसला इस समाज को गलत लगता हूँ परन्तु उसको ये कायरतापूर्वक फैसला लेने के लिए इस समाज में ही बाधित किया था । जरा वडेरा जैसे कई लोग आज भी अपनी हकलाहट की समस्या का कारण नर जैसी जिंदगी व्यतीत कर रहे हैं और इसके जिम्मेवार हम लोग यानी हमारा समाज है । यहाँ तक की फिल्मी कलाकार भी अपनी फिल्मों में हास्यरस पैदा करने के लिए हकलाहट के विषय का प्रयोग करते हैं । मैं हकलाहट के अध्यापन के तौर पर कार्य करता हूँ, जानी हकलाहट की समस्या से निजात पाने के बारे में अध्यापन कराता हूँ । मेरे पास ऐसे कई केस आते हैं जिनके हकलाहट का सीधा संबंध समाज से जुडा हुआ होता है । उदाहरण के तौर पर मेरे पास राघव नाम के लडके का केस आया । उसने बताया कि उसे हकलाहट की समस्या बचपन से थी और अपनी समस्या के हल के लिए कुछ वर्ष पहले स्पीच थैरेपी करवाई परंतु स्पीच थैरेपी करवाने के कुछ महीनों तक तो उसकी समस्या ठीक रही परंतु कुछ ही महीनों बार उसकी हकलाहट की समस्या की स्थिति पहले जैसी हो गई । यही नहीं जब मैंने राधा को उसकी हकलाहट की समस्या के हल्के अपना इजाद क्या तरीका बताया तो भी ऐसा ही हुआ या नहीं । मेरे बताए तरीके से कुछ समय तो उसकी समस्या ठीक रहती है परंतु कुछ ही महीनों बाद उसकी स्थिति पहले जैसी हो गई । राघव ने निराशा पूर्वक मुझसे सवाल किया की ऐसा क्यों हो रहा है? हकलाहट की समस्या से निजात पाने के लिए किसी भी प्रकार की कोई भी स्पीच थैरेपी लेने से कुछ देर तक तो ठीक रहता है । बहन तो बाद में उसकी स्थिति पहले जैसी क्यों हो जाती है । अब उसके सवाल का जवाब मेरे पास नहीं इस समाज के पास है क्योंकि राजाओं के अपनी हकलाहट की समस्या पर काबू पा लेने के बाद भी ये समाज उसके साथ वैसा ही बर्ताव करता है जैसा वो पहले करता था । मसलन राघव के इर्द गिर्द रहने वाले लोगों के बर्ताव में राधव के प्रति कोई अंतर नहीं आता । वो राधा को छोडने के लिए जिन नामों का प्रयोग करते थे उसके ठीक होने के बाद भी यानी उसके हकलाहट की समस्या को काबू कर लेने के बाद भी राघव को उसी नामों से छेडकर तंग करते थे जिस वजह से वह डिप्रेस रहने लगा । और जैसा की हकलाहट की प्रवृत्ति है ये टेंशन और डिप्रेशन की अवस्था में फिर से उभरकर सामने आ जाती है । जिस वजह से राघव की हकलाहट की समस्या जो की क्यूँ बनी रहती है । अंत में मैं यही कहना चाहूंगा कि हकलाहट की समस्या का पैदा होना कुदरत के हाथ में है परंतु इस समस्या को बढाने और काम करने में हमारे समाज का बहुत बडा योगदान है । अगर ये समाज किसी हकलाने वाले व्यक्ति की मनोदशा समझकर उसकी स्थिति का मजाक न बनाए तो उस हकलाने वाले व्यक्ति की मनोदशा समझकर उसकी स्थिति का मजाक ना बनाए तो उस हकलाने वाले व्यक्ति के हकलाहट की समस्या काफी हद तक उसके काबू में आ सकती है है ।
Writer
Sound Engineer