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8.  Swami Vivekanand in  | undefined undefined मे |  Audio book and podcasts

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8. Swami Vivekanand in 

AuthorRaj Shrivastava
स्वामी विवेकानंद की अमरगाथा.... Swami Vivekanand | स्वामी विवेकानन्द Producer : Kuku FM Voiceover Artist : Raj Shrivastava
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चैप्टर, सेवन, वेदांत और विश्वबंधु समग्र मानव जाति कल्याण के लिए कार्य करते रहूँ । तुम एक संकीर्ण के अंदर बंदे रहकर अपने को शुद्ध हिंदी समझने का जो गर्व करते हो उसे छोड हाँ विवेकानन्द चार बजे का प्रवास हुआ । पंद्रह जनवरी अठारह सौ सन ध्यान में विवेकानंद कोलंबो पहुंचे । वहाँ लंका निवासी भारतीयों ने कोलंबो और पाँच दिन में उनका भव्य स्वागत किया । फिर भारत की भूमि पर रामनाथ मधुरा मद्रास कल के तहत त्यादि जहाँ भी गए उनका इसी तरह भाग्य स्वागत हुआ । रामनाथ अर्थात रामेश्वरम में उनका जुलूस निकाला । राजीव रीति के अनुसार ने सम्मान देने के लिए वहाँ का राजा उनके रथ में जो स्वागत सम्मान से उनके मन में जो उछाल उत्पन्न हुआ उसे अपनी चहीती बहन मेरी हेल के नाम अट्ठाईस की फिल्म के पत्र में जो व्यक्त किया है ये सारा देश मेरे स्वागत के लिए प्राण होकर उठ खडा हुआ । राजस्थान में हजारों लाखों मनीष नही जय स्वीकार किया । राजाओं ने में गाडी खींची, राजधानियों के मार्गों पर हर कहीं स्वागत द्वार बनाए गए जिनपर शानदार, आदर्श, वासिया, अंकित आदि आदि । एक तिफाक की बात है कि इन्हीं दिनों धर्म महासभा के अध्यक्ष बरोज बीसाई धर्म का प्रचार करने भारत है पर वे असफल लौटे । विवेकानंद अपने इसी पत्र में लिखते हैं, मुझे आशा है कि डॉक्टर बरोज इस समय अमेरिका पहुंच गए होंगे । विचारें यहाँ कट्टर ईसाई धर्म का प्रचार करने आए थे और जैसा होता है, किसी ने उनकी नासिक इतना अवश्य है कि उन्होंने प्रेमपूर्वक उनका स्वागत किया, परंतु मेरे पत्र के कारण ही था । मैं उन को भी तो नहीं दे सकता था । इसके अतिरिक्त भी कुछ विचित्र स्वभाव के व्यक्ति थे । मैंने सुना है कि मेरे भारत आने पर राष्ट्र निजी खुशी मनाई, उससे जलन के मारे में पागल हो गए थे । कुछ भी हो तो लोगों को उनसे बुद्धिमान व्यक्ति भेजना उचित था, क्योंकि डॉक्टर बरोज के कारण हिंदू के मन में धर्म प्रतिनिधि, सभा, एक स्वांग सी बंदी, अध्यात्म विद्या के संबंध में पृथ्वी का कोई भी राष्ट्र हिन्दुओं का मार्ग प्रदर्शन नहीं कर सकता । और विचित्र बात तो ये है कि ईसाई देशों में जितने लोग यहाँ आते हैं, वे सब एक ही प्राचीन मूर्खतापूर्ण तर्क देते हैं कि ईसाई धनवान और शक्तिमान हैं और हिंदू नहीं । इसलिए इसाई धर्म हिन्दू धर्म की अपेक्षा श्रेष्ठ है । इस पर हिंदू उचित ही ये प्रत्युत्तर देते हैं कि यही कार्य हैं, जिससे हिंदू मत धर्म कहला सकता है और इसाई मत नहीं । इस पाशविक संसार में अधर्म और धूर्तता ही फल दी है । गुणवान को तो दुःख भोगना पडता इसी संबंध में एक दूसरी घटना भी । उल्लेखनीय विवेकानंद जब कलकत्ता पहुंचे तो वहां अकाल पडा हुआ । लोगों का ख्याल था कि उनके स्वागत पर खर्च ना करके कुल पैसा दुर्भिक्ष निवारण फण्ड में चंदा दे दिया जाएगा । पर उन्होंने ऐसा न करके अपना जुलूस निकलवाना ही पसंद किया । बाद में जब एक शिष्य ने पूछा कि उन्होंने ऐसा क्यों किया तो स्वामी जी ने उत्तर दिया हाँ मेरी इच्छा थी कि मेरे लिए खूब धूम धाम हो । बात किया है । जानता है थोडी धूमधाम हुए बिना उनकी श्रीरामकृष्ण के नाम से लोग कैसे परिचित होंगे और उनसे प्रेरित कैसे होंगे? इतना स्वागत से मान किया मेरे लिए किया गया है । नहीं ये तो उन्हीं के नाम का जायजे कार हुआ है । उनके बारे में जानने की लोगों के मन में कितनी इच्छा जागृत हुई । जब लोग क्रमशः जानेंगी तभी तो देश का मंगल होगा जो देश के मंगल के लिए आए हैं, उन को जाने बिना देश का मंगल किस प्रकार होगा । उनको ठीक ठीक जान लेने से मनुष्य तैयार होंगे और मनीष यदि तैयार हो गए तो दुबे रक्षा आदि को दूर करना फिर कितनी देर की बात है । देश का मंगल ही उनके सब कार्यों में सर्वोपरि था । व्यक्ति निरपेक्ष होकर राष्ट्र में बन गए थे और राष्ट्र की आत्मा को झन जोडना जागृत करना ही उनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य उन्नीस सौ में जब दोबारा विदेश यात्रा पर गए तो सत्ताईस जनवरी को किसान देना कि शेक्सपीयर क्लब में मेरा जीवन तथा दिए विषय पर बोलते हुए उन्होंने कहा था, आपने स्वर्ण ढंग से जो कुछ भी मैं करता हूँ, उसको समझाने के लिए मैं तुमको कल्पना द्वारा भारत ले चलेंगे । विषय के सभी ब्यौरों और सूचना विवरणों में जाने का समय नहीं है और ना एक विशेष जाती की सभी जटिलताओं को इस अल्पसमय में समझ पाना तुम्हारे लिए संभव है । इतना कहना ही पर्याप्त होगा कि मैं कम से कम भारत की एक लघु रूपरेखा तुम्हारे समुख प्रस्तुत करने का प्रयास करूंगा । अपने ही देश में ऐसे बुद्धिजीवियों की कमी नहीं निकले की अपनी बेशिक शिक्षा द्वारा जिनका भारतीयकरण हो चुका है और वे इस धरती पर रहते हुए विदेशी बने हुए हैं, वे विवेकानंद हो चुका है । विवेकानंद के दर्द को क्या जाने, उनके उद्देश्य को क्या समझे । जब वे देश को देशी नहीं मानदेय तो उसके हजारों साल की जीवन की जटिलता हो । उस की समस्याओं से उन्हें क्या मतलब विषय था मेरा जीवन इस पर विवेकानन्द अपने विदेशी श्रोताओं को बता रहे थे । भारत खंडहरों में भीड हुई पडी एक विशाल इमारत के सुरेश पहले देखने पर आशा की कोई किरण नहीं मिलती । वो एक विगडर भगना वशिष्ठ राष्ट्र है पर थोडा और उनको रुककर देखो जान पडेगा इनके परे कुछ और भी हैं पर ये जो कुछ है उसे देखने के लिए दरकार है । जीने के लिए संघर्ष करती आ रही जनता के प्रति सहानुभूति, इतिहास तथा परंपरा का समय ज्ञान और उस ज्ञान से उत्पन्न दूरदृष्टि मेरे कारण कहते चले गए । अब भारत राजनीतिक शक्ति नहीं, आज दासता में बंदी हुई चाहती है । अपने ही प्रशासन में भारतीयों की कोई आवाज नहीं । उन का कोई स्थान नहीं । वे हैं केवल तीस करोड गुलाम और कुछ नहीं । भारतवासी की औसत आए डेढ रुपया प्रतिमाह है । अधिकांश जनसमुदाय की जीवन चर्या उपवासों की कहानी है और जरा सी आई कम होने पर लाखों कालकवलित हो जाते हैं । छोटे से अकाल करते हैं मृत्यु इसलिए जब मेरी दृष्टि उस ओर जाती है तो मुझे दिखाई पडता है । नाश असाध्य ना फिर भी जाती कि सजीवता इस देश का दिए धर्म है और क्योंकि धर्म पर अभी आगात नहीं हुआ । अच्छा ये जाती जीवित राजनीतिक और सांस्कृतिक लडाई धर्म के माध्यम से भी लडी जाती है और हर देश में लडी गई दूर जो की जरूरत नहीं । यूरोप के बुर्जुआ ने सामंतवाद के विरुद्ध अपनी लडाई धर्म के माध्यम से लडी । कौन नहीं जानता कैथोलिक मारते हुए सामंतवाद का और प्रोटेस्टेंट उभरते हुए पूंजीवाद का धर्म था प्रोटेस्ट इंडोको आदमी जीवित चलाया गया पर अंत में उनकी जीत हुई । फॅसने लिखा है प्रोटेस्टेंट धर्म इसलिए जीवित रहा कि उभरता हुआ बुर्जुआ जाएगा । अब बुर्जुवा काफी सुदृढ हो गया तो अपने शासकों के विरुद्ध उसके संघर्ष ने राष्ट्रव्यापी रूप धारण कर लिया । पहला महान आंदोलन जर्मनी में सुधारवाद कहलाया, पर इधर जर्मनी में लूट, फिर उधर फ्रांस में काल मीन हुआ । कालवी ने फ्रांसीसी तीक्ष्ण बुद्धि के बाद सुधार बाद के बुर्जुवा चरित्र को उजागर किया और वह चर्चा को प्रजातान्त्रिक रूप देने में सफल हुआ । जबकि जर्मनी में लू थ्री सुधारवाद भ्रष्ट हो जाने से देश का विनाश हुआ । कालपेनी सुधारवाद, जिनेवा, हॉलैंड और स्कॉटलैंड में प्रजातंत्र वादियों की पटाखा बन गया । हॉलैंड को स्पेन से और जर्मन राज्य से मुक्त कराया और इंग्लैंड की बुर्जुवा क्रांति के दूसरे चरण में विचारधारात्मक परिधान का काम दिया । फॅसने ये निष्कर्ष निकाला अतेफ हम देखते हैं धर्म जब अस्तित्व में आ जाता है तो उसमें परंपरागत तक वो हमेशा नहीं रहेगा । पर इस तत्व में होने वाले रूपांतर वर्ग संबंधों में उद्भव होते हैं । यानी जो लोग परिवर्तन लाते हैं उनकी आर्थिक संबंधों इसका कारण मंत्री उन्नीसवी सदी के उत्तरार्ध में हमारे देश में जो पूंजीपति वर्ग पैदा हुआ वहीं सुधार वर अथवा नवजागरण की मुख्य शक्ति था । वह विदेशी शासकों से राजनीतिक तथा आर्थिक क्षेत्र में लोहा लेने में अक्षम था । उस की संस्कृति पर भी बाहर और भीतर से आक्रमण हो रहा हूँ । सवाल ये था की वाइस आक्रमण का मुकाबला कैसे करें? वो अपने पूर्वजों से विरासत में मिली सभ्यता को विदेशी शासकों की औद्योगिक सभ्यता से बेहतर बताए तो कैसे? वो एक कठिन समस्या थी । देश भक्त बुर्जुआ ने इसका हल ये निकाला कि उसने अपनी सफलता को विशेष रूप से आध्यात्मिक बताया । बहुत एक साधनों के पीछे दौडना उसका लक्ष्य ना पहले कभी था वरना आगे कभी होगा त्याग और बैराम की हमारा प्रधान जीवन देश अतोएव राष्ट्रीय चेतना के प्रवक्ता हाँ विवेकानन्द हम बडे गर्व से कहते हुए सुनते हैं, मैंने पांच यात्री देशों में भ्रमण किया है और मैं भिन्न भिन्न देशों में बहुत सी जातियों से मिला जुला हूँ और मुझे लगता है कि प्रत्येक राष्ट्र और प्रतीक जाती का एक ना एक विशिष्ट आदर्श अवश्य होता है । राष्ट्र के समस्त जीवन में संचार करने वाला एक महत्वपूर्ण आदर्श कह सकते हैं कि वह आदर्श जीवन रीड होती है । परंत भारत का मेरूदंड राजनीति नहीं है, सैन्यशक्ति नहीं है । व्यावसायिक आधी पत्ती भी नहीं और न यांत्रिक शक्ति है वरन धर्म केवल धर्म ही हमारा सर्वस्व और उसी को हमें रखना भी है । जिस प्रकार उन्होंने मूर्ति पूजा की शिक्षा व्याख्या की थी, उसी प्रकार इस राष्ट्रीय भावना की भी ऐसी सुंदर और काव्यमय व्याख्या करना विवेकानंद का ही काम था । श्रोताओं में राष्ट्रीय गौरव जगाने के लिए उन्होंने बात जारी रखी । एक बात यहाँ पर ध्यान में रखने योग्य है । जिस प्रकार अन्य देशों के अच्छे और बडे आदमी भी स्वयं इस बात का गर्व करते हैं कि उनके पूर्वज किसी एक बडे डाकुओं के गिरोह कि सरदार थे, जिस समय समय पर अपनी पहाडी गुफाओं से निकलकर बट ओहियो पर छापा मारा करते थे, इधर हम हिंदू लोग इस बात पर गर्व करते हैं कि हम उन ऋषियों तथा महात्माओं के वंशज है जो वन के फल फूल के आहार पर पहाडों की कंदराओं में रहते थे तथा ब्रह्मा चिंतन में मग्न रहते हैं । भले ही आज हम अच्छा पति और पथभ्रष्ट हो गए हो और चाहे जितने भी पथभ्रष्ट होकर क्यों ना गिर गए हो, बहन की ये निश्चित है कि आज यदि हम अपने धर्म के लिए तत्परता से कार्य संलग्न हो जाए तो हम अपनी गौरव प्राप्त कर सकते हैं । किसी प्रकार जब भी लंदन में भारत के गौरव का बखान कर रहे थे तो किसी श्रोता ने पूछा भारत के हिंदुओं ने क्या किया है? वे आज से किसी जाति पर विजय प्राप्त नहीं कर सकते । नहीं कर सके नहीं चाहिए कि उन्होंने नहीं किया । स्वामी जी ने उत्तर दिया और यही हिंदू जाति का गौरव है कि उसने कभी दूसरी जाति के रक्त से पृथ्वी को रंजीत नहीं किया । वे दूसरे के देश पर अधिकार क्यों करेंगे? कुछ धन की लालसा से भगवान ने हमेशा से भारत को दाता के महिमा में आसन पर प्रतिष्ठित किया है । भारतवासी जगत के धर्मगुरु रहे हैं । वे दूसरों के धन को लूटने वाले डाकुना । इसलिए मैं अपने पूर्वजों पर कर्व करता हूँ और उन्होंने अपनी कलकत्ता के भाषण में कहा था प्रत्येक जाति के लिए उद्देश्य साधन की अलग अलग कार्यप्रणालियां हैं । कोई राजनीति, कोई समाजसुधार और कोई दूसरे विषय को अपना प्रधान आधार बनाकर कार्यकर्ता हमारे घर में की पृष्ठभूमि लेकर कार्य करने के सिवा दूसरा कोई उपाय नहीं । अमरीकी शायद समाजसुधार के माध्यम से भी धर्म समझते हैं परन्तु हिंदू राजनीति, समाजविज्ञान और दूसरा जो कुछ है सबको धर्म के माध्यम से समझाते हैं । जातीय जीवन संगीत कमांडो यही प्रधान सुंदर है और उसी प्रधान सफर के नष्ट होने की शंका हो रही थी । ऐसा लगता था मानो हम लोग अपने जातीय जीवन की इस मूलभाव को हटाकर उसकी जगह दूसरा भाव स्थापित करने जा रहे थे । अपनी चाहती है जीवन के धर्म रूप मेरूदंड की जगह राजनीति का मेरूदंड स्थापित करने जा रहे हैं । यदि इससे हमें सफलता मिलती तो इसका फल पूर्ण विनाश होता परन्तु ऐसा होने वाला नहीं था । यही कारण है इस महाशक्ति रामकृष्ण का आर्विभाव हुआ । मुझे इस बात की चिंता नहीं है कि तुम इस महापुरुष को किस अर्थ में ग्रहण करते हो और इसके प्रति कितना आदर करते हो । इन तो मैच में ये चुनौती के रूप में अवश्य बता देना चाहता हूँ कि अनेक शताब्दियों से भारत में विद्यमान अद्भुत शक्ति का ये प्रकट रूप है और हिंदू के नाती तुम्हारा ये कर्तव्य है कि तुम्हें शक्ति का अध्ययन करो तथा भारत के कल्याण, उसकी पुनरुत्थान और समस्त मानव जाति के हित के लिए शक्ति के द्वारा क्या कार्य किए गए हैं, इसका पता लगा हूँ । मैडम को विश्वास दिलाता हूं कि संसार की किसी भी देश में सार्वभौम धर्म और विभिन्न संप्रदायों में ब्रात प्रभाव के उत्थान पे और पर यायोचित होने के बहुत पहले ही इस नगर के पास एक ऐसे महापुरुष थे जिनका सम्पूर्ण जीवन एक आदर्श धर्म महासभा का स्वरूप था । रामकृष्ण परमहंस के विश्वधर्म और विश्वबंधुत्व के सार्वभौम आदर्श की व्याख्या करते हुए उन्होंने आगे कहा, जैसे तुम लोगों ने कहा है हमें संपूर्ण संसार जीतना है । हाँ, हमें यही करना हूँ । भारत को बच्चे ही संसार पर विजय प्राप्त करनी है । इसकी अपेक्षा किसी छोटे आदर्श से मुझे कभी भी संतोष ना होगा । ये आदर्श संभव है । बहुत बडा हो और तुम में से अनेको । इसे सुनकर आश्चर्य होगा । हिन्दू हमें इसे आदर्श बना रहे हैं । या तो हम संपूर्ण संसार पर विजय प्राप्त करेंगे या मिट जायेंगे । इसके सिवा और कोई विकल्प नहीं जीवन का चिन्ह है विस्तार हमें संकीर्ण सीमा के बाहर जाना होगा । विजय का प्रसार करना होगा और ये दिखाना होगा कि हम जीवित है अन्यथा हमें इस पतन की दशा में सडकर मरना होगा । इसके सिवा कोई दूसरा रास्ता नहीं । इन दोनों में से एक चुन लो । सिर्फ जियो या मरो, छोटी छोटी बातों को लेकर हमारे देश में जो वेश और कला हुआ करता है वो हम लोगों में सभी को मालूम है । परंतु मेरी बात मानो ऐसा सभी देशों में हैं जिन सब देशों के जीवन का मेरूदंड राजनीति है । ये सब राष्ट्र आत्मरक्षा के लिए वैदेशिक नीति का सहारा लिया करते हैं । जब उनके अपने देश में आपस में बहुत अधिक लडाई झगडा आरंभ होता है तब भी किसी विदेशी राष्ट्र से झगडा मोल लेते हैं । इस तरह तत्काल घरेलू लडाई बंद हो जाती है । हमारे भीतर भी रहा विवाद है परंतु से रोकने के लिए कोई वैदेशिक नीति नहीं । संसार की सभी राष्ट्र में आपने शास्त्रों का सत्य प्रचार की हमारी सनातन वैदेशिक नीति होनी चाहिए । ये हम एक अखंड जाती के रूप में संगठित करेंगे । तुम राजनीति में विशेष रुचि रखने वाले सही मेरा प्रश्न है कि क्या इसके लिए तुम कोई प्रमाण चाहते हो । आज की सभी इसे मेरी बात का ये देश प्रमाण मिल सकता है । पूंजीवाद स्वाभाव वजह विस्तार चाहता है । हमारे उभरते हुए बुर्जुवा ने अपनी आध्यात्मिक शक्ति से संसार को जीतना अपना आदर्श घोषित किया । इससे एक तरफ उन्होंने साम्राज्यवादी अंधराष्ट्रवाद के मुकाबले बुर्जुआ अंधराष्ट्रवाद को प्रस्तुत करके अपने अतीत की रक्षा की और इसमें गर्व कार्यक्रम क्या दूसरी तरफ इसे सनातन वैदेशिक नीति बनाकर गृह विवाद मिटाने और एक अखंड जाती के रूप में संगठित होने का प्रयत्न किया । पश्चिम के पूंजीवाद ने जब साम्राज्यवाद का रूप धारण किया तो वह सैन्य और औद्योगिक सभ्यता में तो श्रेष्ठ आई लेकिन विजित जातियों को मानसिक रूप से निहत्था करने के लिए अपने धर्म को भी उनके धर्म से श्रेष्ठ बताया और इसाईयत को विश्व धर्म का सिद्धांत उन्ही के द्वारा गढा गया मिशनरी बीच है । मतलब ये है कि विश्व धर्म का सिद्धांत उन्हीं के द्वारा गढा गया । मिशनरियों का दावा ये था कि इसाई धर्म चूकी समृद्धि का और विजय गांव का धर्म है इसलिए सब धर्मों से श्रेष्ठ है । विवेकानंद ने अपने कुंभकोणम के भाषण में उनके इस दावे पर यह प्रहार किया । संसार में जितने भी धर्म हैं, उनमें प्रत्येक की श्रेष्ठता स्थापित करने के अनोखे अनोखे दावे सुनने का मुझे अभ्यास हो गया है । तुमने भी शायद हाल में मेरे बडे मित्र डॉक्टर बरोज द्वारा पेश किए गए दावे के विषय में सुना होगा । ईसाई धर्म भी एक ऐसा घर में हैं जिससे सार्वजनिक कह सकते हैं । मैं अब इस प्रश्न की मिमांसा करूंगा और तुम्हारे समंदर को को प्रस्तुत करूंगा जिन के कारण मैं मैदान सिर्फ वेदांत की को सार्वजनिक मानता हूँ और मैदान के सिवा कोई अन्य धर्म में सार्वजनिक नहीं कहना सकता । हमारे विदानसभा घर में के सिवा दुनिया कि रंगमंच पर जितने भी अन्याय धर्म है वो उनके संस्थापकों की जीवन के साथ सम्पूर्णता, संश्लिष्ट और सम्बन्ध है । उनके सिद्धां, उनकी शिक्षाएं, उनके मत और उन का आचार शास्त्र जो कुछ है, सब किसी ना किसी धर्म संस्थापक के जीवन के आधार पर ही खडे हैं और इसी से वे अपने आदर्श प्रमाण और शक्ति ग्रहण करते हैं । और आज श्री तो ये है कि उसी अधिष्ठाता विशेष की जीवन की ऐतिहासिकता ही पर उसकी सारी नहीं प्रतिष्ठित है । यदि किसी तरह उसके जीवन की ऐतिहासिकता पर आघात लगे जैसा कि वर्तमान युग में प्राया देखने में आता है कि बहुधा सभी धर्म संस्थापक को और अधिष्ठाताओं की जीवनी के आधे भाग पर भी संदिग्ध दृष्टि से देखा जाता है और जब ऐसी स्थिति है कि तथा कथित ऐतिहासिकता की चट्टान मिल गई है और ध्वस्त हो रही है तब संपूर्ण भवन अगर आकर गिर पडता परसदा के लिए अपना महत्व खो देता है । फिर अपना दावा पेश करते हुए उन्होंने कहा कि हमारा धर्म कुछ तत्वों की नींव पर खडा है । हमारे घर में में जितने अवतार, महापुरुष और ऋषि है और किसी धर्म में हैं । इतना ही नहीं हमारा धर्म यहाँ तक कहता है कि वर्तमान तथा भविष्य में और भी बहुत धीरे महापुरुष और अवतार आविर्भूत होंगे । हमारे देश में निष्ठा रूपी जो अपूर्वा सिद्धांत प्रचलित है जिसके अनुसार इनमान धार्मिक व्यक्तियों में से अपना इष्ट देवता चुनने की पूरी स्वाधीनता दी जाती है । तुम चाहे जिस अफतारी आचार्य को अपने जीवन का आदर्श बनाकर विशेष रूप से उपासना करना चाहूँ कर सकते हैं । यहाँ तक कि तुमको सोचने की भी स्वाधीनता है कि जिसको तुम ने स्वीकार किया है वो सब पैगम्बरों में महान है और सब अवतारों में श्रेष्ठ है । इसमें कोई आपत्ति नहीं परंतु सनातन तत्व समूह ही पर तुम्हारे धर्म साधन की नहीं होनी चाहिए । यहाँ बहुत किये हैं कि जहाँ तक वे वैदिक सनातन सिद्धांतों के ज्वलंत उदाहरण हैं, वहीं तक हमारे अवतार मान्य हैं । भगवान कृष्ण कम हाथ मियां यही है कि वे भारत में इसी तत्ववादी सनातन धर्म के सर्वश्रेष्ठ प्रचारक और वेदांत के सर्वोत्कृष्ट व्याख्याता हुए हैं । संसार भर के लोगों को वेदान्त के विषय में ध्यान देने का दूसरा कारण ये हैं कि संसार के समस्त धर्मग्रंथों में एकमात्र वेदांत की ऐसा धर्मग्रंथ है जिसके शिक्षाओं के साथ आना प्रकृति के वैज्ञानिक अनुसंधान से प्राप्त परिणामों का संपूर्णा सामन जैसी है । रामकृष्ण परमहंस की आदर्श जितने मत उतने पर का मतलब है कि सभी धर्म सकती है और जो जिस धर्म को मानता है उसके लिए वही ठीक हैं । ये धर्मों का समन्वय नहीं समझौता है और भी कहीं की शांति में अस्तित्व का जीजू और जीने दो का सिद्धांत पर विवेकानन्द ने आक्रामक रुख अपनाया और दूसरों का विश्वधर्म का दावा रद्द कर के अपना दावा पेश किया । यहाँ क्रामक रुख उन्होंने धर्म महासभा ही मैं तैयार कर लिया था और अख्तियार कर लेना आवश्यक तथा अनिवार्य बिता क्योंकि नवजागरण की तरह मैंने उन्हें जबरदस्ती वहाँ का था और उन्हें धर्म के माध्यम से राजनीति की लडाई लडने नहीं । इस सिलसिले में उनका मस्तिष्क साफ था । वो स्वयं कहते हैं । सच्ची बात ये है कि धर्म महासभा का उद्देश्य लेकर अमेरिका नहीं किया । वहाँ सभा मेरे लिए गौरव वस्तु थी । उससे हमारा रास्ता बहुत कुछ साफ हो गया और कार्य करने की बहुत कुछ सुविधा हो गई । परंतु वास्तव में हमारा धन्यवाद । संयुक्त राज्य अमेरिका के निवासी सेंटर दें आती थी, महान अमरीकी जाती को मिलना चाहिए जिसमें दूसरी जातियों की अपेक्षा बृहत भाव का अधिक विकास हुआ है । पांच मई अठारह सौ पंचानवे को उन्होंने आला सिंगा पेरूमल के नाम अपने पत्र में लिखा था अगर तुम यूरो और अमेरिका में उपदेश देने के लिए बारह शिक्षित दृढ चेता मनुष्य को यहाँ भेज सको और कुछ साल तक उन्हें रख सको तो इस भर्ती राजनीतिक और नैतिक दृष्टि से दोनों तरह की भारत की अपरिमित सेवा हो जाए । प्रत्येक मनुष्य जो नैतिक दृष्टि से भारत के प्रति सहानुभूति है, वहाँ राजनीतिक विषयों में भी उसका मित्र बन जाता है । इसी पत्र में उन्होंने अपने इस नए अविष्कार की चर्चा की थी कि द्वैत विशिष्टाद्वैत और अद्वेत विधान दर्शन की तीन अवस्थाएं हैं और ये अवस्थाएं एक के बाद एक क्रमशः आती है । इसलिए समग्र धर्म वेदांती में आते हैं । ये समन्वय का सिद्धां है । इस पर वे पुस्तक भी लिखना चाहते थे, शायद लिख नहीं पाए । पर अपने इस न्यूटन अविष्कार के बाद उन्हें ये विश्वास अवश्य हो गया था कि वेदांत ही वीर सवेर विश्वधर्म बनने जा रहा है । और इसी पर भारत का और समूची मानव जाति का भविष्य निर्भर हैं और इसी से विश्वबंधुत्व कास्ट सपने साकार होगा । अतेम हमने उन्हें अपने मद्रास के भाषण में जिसे हम पिछले परिच्छेद में उत्पद कर चुके हैं, कहते हुए सुना क्या हमें केवल अपने ही देश को जगाना होगा? नहीं, ये तो कुछ बात है । मैं कल्पनाशील मनुष्य हूँ । मैं ये भावना है कि हिंदू जाती सारे संसार पर विजय प्राप्त करेगी और भारत लौटने से पहले लंदन में यही विचार व्यक्त करने पर इंडिया के संवाददाता ने सवाल किया था और भारत अंत में आपने विजेताओं पर विजयी होगा? हाँ, विचारों के क्षेत्र में इंग्लैंड के पास हथियार है, सांसारिक समृद्धि है, वैसे ही जैसे उससे पहले हमारे मुसलमान विजेताओं के पास फिर भी महान अकबर व्यावहारिक रूप में हिन्दू हो गया था । शिक्षित मुसलमानों, सूफियों को हिंदुओं से अलग कर पाना कठिन है । अटेर कल्पनाशील विवेकानंद भारत के दरिद्र जन के लिए आर्थिक सहायता पाने का स्वप्न देखते हुए विदेश गए थे, जो अमेरिका पहुंचते ही टूट गया और आध्यात्मिक विचारों के आधार पर विश्वविजय का स्वप्न देखते हुए स्वदेश लौटे । दरअसल ये उनका अपने स्वस्थ है । नहीं, हमारे उभरते हुए पूंजीपतियों और उनके बुद्धिजीवियों का सपना था । यही उनकी वैदेशिक नीति थी और इसी आधार पर गृह विवाद और कुसंस्कारों को हटाकर राष्ट्रीय एकता संगठित करने की बात सोची गई और हम विवेकानंद को हमारा प्रस्तुत कार्य नाम के भाषण में कहते हुए सुनते हैं इसलिए मद्रासी नवयुवको । मैं विषेशकर तो भी कोई नहीं याद रखने को कहता हूँ । हमें बाहर जाना ही पडेगा । अपनी आध्यात्मिकता तथा दार्शनिकता से हमें जगत को जीतना होगा । दूसरा कोई उपाय नहीं है । अवश्य में वैसे करो या मरो, राष्ट्रीय जीवन सतेज और प्रबुद्ध राष्ट्रीय जीवन के लिए । बस यही एक शर्त है कि भारतीय विचार विश्व पर विजय प्राप्त करें । कालिदास ने अपनी कभी कल्पना से मेरे को यक्ष का दूध बनाया और दक्षिण से उत्तर जाने का मार्ग बताते हुए उस भारत की महानता विशाल का तथा सौन्दर्य का मोहक आकर्षक चित्र प्रस्तुत किया, जिसके एकीकरण का ऐतिहासिक कार्य गुप्तवंश की तलवार द्वारा संबंध हो रहा था । फिर इसी एकता को भावात्मक स्तर पर सदृढ बनाने के लिए शंकराचार्य भी दक्षिण ही से उठे और उन्होंने बहुत कुसंस्कारों से संघर्ष करते हुए उत्तर दक्षिण पूर्व पश्चिम की चार दिशाओं में चार धाम स्थापित किए और तीसरी बार जबकि देश गुलामी की जंजीरों में जकडा हुआ था । आध्यात्मिकता तथा दार्शनिकता के आधार पर अखंड राष्ट्र एक का निर्माण करने का कार्यभार विवेकानंद ने अपने कंधों पर लिया और दक्षिण से उत्तर रामनाथ से अल्मोडा तक उन्होंने जो पता का फहराई उस पर मैदान का जन्म होश यत्र जीव तत्र शिव अंकित था । इस जान भूज की सैद्धांतिक व्याख्या उन्होंने योगी जब हम अपने आपको शरीर समझते हो तब तुम अनंत अग्नि की स्पेलिंग हूँ । जब हम अपने आपको आत्मस्वरूप मानते हो तभी तुम विश्व हूँ । अब वे देश की भूमि पर थे । विदेश में जो बातें उन्होंने नहीं कही, कहना उचित भी नहीं था । वो अब खुलकर कहीं भ्रम, भ्रांतियों को तोडने और कुछ संस्कार की जाली को काटने के लिए उन्होंने आलोचना और आत्मालोचना की खडका निर्भिकता से प्रयोग किया । इसके बिना जनसाधारण के बीच पहले अंतर्विरोध होगा, निराकरण संभव नहीं था, पाते । ढाका में दिए गए मैंने क्या सीखा? भाषण में कहते हैं यद्यपि मैं पश्चिम के बहुत से सबसे देशों में घूम चुका हूँ, पर अपने देश के इस भाग के दर्शन का सौभाग्य मुझे नहीं मिला था अपनी जन्मभूमि बंगाल की इस अंचल की विशाल नदियों, विस्तृत उपजाऊ मैदान रमणी ग्रामों का दर्शन पाने पर मैं अपनी कृतज्ञता प्रकट करता हूँ । मैं नहीं जानता था कि इस देश के जल और स्थल सभी में इतना सौन्दर्य तथा आकर्षण भरा पडा है । किन्तु नाना देशों के भ्रमण से मुझे ये लाभ हुआ कि मैं विशेष रूप से अपने देश की सौन्दर्य का मूल्यांकन कर सकता हूँ । किसी प्रकार में पहले धर्म जिज्ञासा से, नाना संप्रदायों में अनेक जैसे संप्रदायों में जिन्होंने दूसरे राष्ट्र के भावों को अपना लिया है, भ्रमण करता था, दूसरों के द्वार पर भीक्षा मांगता था । तब मैं जानता नहीं था कि मेरे देश का धर्म, मेरी जाति का धर्म इतना सुन्दर और महान है । कई वर्ष हुए । मुझे पता लगा कि हिन्दू धर्म संसार का सर्वाधिक पूर्ण संतोषजनक धर्म हैं । पता था मुझे ये देखकर हार्दिक क्लेश होता है कि यद्यपि हमारे देशवासी अप्रतीम धर्मनिष्ठ होने का दावा करते हैं, पर हमारे इस महान देश में यूरोपीय ठंड के विचार फैलने के कारण उन में धर्म के प्रति व्यापक उदासीनता आ गई हैं । हाँ, ये बात जरूर है और उसमें मैं भलीभांति अवगत हूँ कि उन्हें जिन भौतिक परिस्थितियों में जीवन यापन करना पडता है, प्रतिकूल है । इन प्रतिकूल भौतिक परिस्थितियों ने विभिन्न स्तरों के जिन विचारशील लोगों का निर्माण किया था विवेकानंद ने उनका वर्गीकरण इस प्रकार क्या है? वर्तमानकाल में हम लोगों के बीच ऐसे कुछ सुधारक है जो हिंदू जाति के पुनरुत् तीन के लिए हमारे धर्म में सुधार क्या योग रही है, पलट पलट करना चाहते हैं, निसंदेह है । उन लोगों में कुछ विचारशील व्यक्ति है लेकिन साथ ही ऐसे बहुत से लोग भी है जो अपने उद्देश्य को बिना जानी दूसरों का अंधानुकरण करते हैं । इस वर्ग के सुधारक हमारे धर्म में विजातीय विचारों का प्रवेश करने में बडा उत्साह दिखाते हैं । कहते हैं कि हिन्दू धर्म सच्चा धर्म नहीं है क्योंकि इसमें मूर्ति पूजा का विधान है । मूर्ति पूजा क्या है? ये अच्छी है या बुरी, इसका अनुसंधान कोई नहीं करता । केवल दूसरों की इशारे पर भी हिन्दू धर्म को बदनाम करने का साहस करते हैं । एक दूसरा वर्ग और भी है जो हिंदू के प्रतीक रीति रिवाजों में वैज्ञानिकता ढूंढ निकालने का लचर प्रयत्न कर रहे हैं । वे सदा विद्युतशक्ति जिम की शक्ति, वायु कंपनी तथा उसी तरहा की अन्य बातें किया करते हैं । कौन कह सकता है कि वे लोग एक दिनेश्वर की परिभाषा करने में उसे विद्युत कम्पन का समूह ना डाले । विदेशी शासकों ने हमारे धर्म पर ना सिर्फ इसाई मिशनरियों द्वारा बल्कि विज्ञान के द्वारा भी आक्रमण किया । धर्म पर आक्रमण का मतलब था संस्कृति और परंपरा पर हूँ । विवेकानंद समझते थे और मार्क्सवादी होने की तीन हांकने वाले फॅमिली जीवी भी समझ रखे की धार्मिक विचारधारा जब एक बार विभिन्न संस्थाओं का भौतिक रूप धारण कर लेती है और वर्ग विभाजित समाज के हजारों साल के इतिहास में उनसे ये रूप धारण किया है तो हर एक देश की संस्कृति और परंपरा भी संस्थाओं के माध्यम से विकसित होती है और नहीं में सुरक्षित है । जब बहुत उन्नति रुक जाने से संस्कृति और परंपरा का विकास रुक जाता है तो धार्मिक संस्थाओं को नष्ट करने का और मांगी हुए विदेशी विचारों को चाहे वे कितने ही उन्नत, श्रेष्ठ, तर्कसंगत तथा वैज्ञानिक क्यों ना हो, ऊपर से लाख देने का प्रयास हितकर नही । अहितकर क्यों? सुधार और क्रांति के नाम पर किए गए इस प्रयास का परिणाम होगा? आपने इतिहास और परंपरा को मिटाना, विकृत करना, त्याग देना, अपने अतीत और परंपरा कट जाने के बाद मनुष्य मनुष्य ना रहे, कर्बी रीड की प्राणी में परिणित हो जाता है उसके देश भक्त तत्व क्रांतिकारी बनने का सवाल ही पैदा नहीं होता अटेक विवेकानंद ने कहा कि मांगी हुए विचारों पर पालने वाले तथाकथित देशभक्तों और सुधारकों को तो ये भी मालूम नहीं कि धाव कहा है । ये लोग मूर्ति पूजा, विधवा विवाह और बाल विवाह दिपक गौड बातों को लेकर चिल्लपों मचा रहे हैं । विवेकानंद ने इनका वास्तविक रूप और अपना उद्देश्य को स्पष्ट किया । गत शताब्दी में सुधारों के लिए जो भी आंदोलन हुए हैं, उनमें से अधिकांश केवल ऊपरी दिखावा मात्र रहे हैं । उन्होंने केवल प्रथम दो वर्णों से संबंध रखा है, शीर्ष दो से नहीं । विधवा विवाह की प्रश्न से सत्तर प्रतिशत भारतीय सहयोगा कोई संबंध नहीं और देखो मेरी बात पर ध्यान दो, जो जनसाधारण का तिरस्कार करके स्वयं शिक्षित हुए हैं । इन लोगों ने अपने अपने घर को साफ करने एवं अंग्रेजों के समुख अपने को सुंदर दिखाने ही में कोई कसर नहीं आएगी । पर ये सुधर नहीं कहा जा सकता । सुधर करने में हमें चीज के भीतर उसकी चढ तक पहुंचना होता है । आग चढ में लगा और उसे क्रमश न ऊपर उठने दो एवं एक अखंड भारतीय राष्ट्र संगठित करूँ एक अखंड भारतीय राष्ट्र संगठित करना ही समय का प्रधान कार्य था । किसी को उन्होंने अपना जीवन व्रत बना लिया था और वो अपने जीवन व्रत को राष्ट्र का है । चाहने वाले सभी देशवासियों का जीवन व्रत बना देना चाहते थे । अरे इंग्लैंड में भारतीय अध्यात्मिक विचारों का प्रभाव भाषण में हम उन्हें वजह गंभीर स्वर में कहते हुए सुनते हैं, अपने जीवन के महान रत को याद रखो हम भारतवासी और विशेष तरह हम बंगाली बहुत परिमाण में विदेशी भावों से आक्रांत हो रहे हैं, जो हमारे जातीय धर्म की संपूर्ण जीवनीशक्ति को चुका डालते हैं । हम आज इतने पिछडे हुए क्यों हैं? क्यों हम में से निन्यानबे फीसदी आदमी संपूर्ण कहाँ पास या के भावों और प्रदानों से निर्मित हो रहे हैं? अगर हम लोग राष्ट्रीय गौरव के उच्च शिखर पर आरोहण करना चाहते हैं तो हमें इस विदेशी भाव को दूर फेक देना होगा । साथ ही अभी हम ऊपर चढना चाहते हैं तो हमें ये भी याद रखना होगा कि हमें पांच के देशों से बहुत कुछ सीखना बाकी है । पांच या के देशों से हमें उनका शिल्पा और विज्ञान सीखना होगा । उनके यहाँ के भौतिक विज्ञान को सीखना होगा और उधर पांच शातिर देशवासियों को हमारे पास आकर घर में और अध्यात्म विद्या की शिक्षा ग्रहण करनी होगी । हम हिन्दुओं को विश्वास करना होगा कि हम संसार के गुरु हैं । हम यहाँ पर राजनीतिक अधिकार तथा इसी प्रकार के अन्य बातों के लिए चला रहे हैं । अच्छी बात है परन्तु अधिकार और सुबह नीति केवल मित्रता के द्वारा ही प्राप्त हो सकते हैं । यदि एक पक्ष वाला जीवन भर भीख मांग रहे तो क्या यहाँ पर मित्र का स्थापित हो सकती है? ये सब बातें कह देना बहुत आसान है । पर मेरा ताकवर ये ये है कि पारस्परिक सहयोग के बिना हम लोग कभी शक्ति संपन्न नहीं हो सकते । इसलिए मैं तुम लोगों को भीक मांगू की तरह नहीं । धर्माचार्य के रूप में इंग्लैंड जाने को कह रहा हूँ । हमें अपनी सामर्थ्य के अनुसार विनिमय का प्रयोग करना होगा । यदि हमें इस लोक में सुखी रहने के उपाय बताएँ । जो लोग यूरोप की तरफ आंख लगाए हुए थे और उस की राजनीति यानी लोकतंत्र कि प्रशंसक थे उनसे विवेकानंद कहते हैं । राजनीति से संबंधित यूरोप की संस्थाएं, प्रणालियां तथा और भी शासन पद्धति क्या निकाने वादे समय समय पर बिल्कुल व्यर्थ सिद्ध होती रही है और आज यूरोप की ये दशा है कि वह पे चीन हैं । यही नहीं जानता कि अब किस प्रणाली की शरण लेंगे वहाँ आर्थिक अत्याचार असहनीय होते हैं । देश का धन तथा शक्ति उन थोडे से लोगों के हाथ में रख छोडी है जो स्वयं कुछ काम करते नहीं । हाँ, सिर्फ लाखों मनुष्य द्वारा काम चलाने की क्षमता जरूरत है । क्षमता द्वारा में चाहे तो सारे संसार को खून से प्लावित कर दें । धर्म तथा सभी अन्य चीजों को उन्होंने पददलित कर रखा है । वे ही शासक है और सर्वश्रेष्ठ समझे जाते हैं । आज पांच चाहती संसार तो ऐसे ही इन्हें इन्हें शा इलाकों के द्वारा शासित है और ये तो तुम वहाँ की वैधानिक सरकार, स्वतंत्रता, आजादी, संसद आदि की बातचीत सुना करते हो । वो सब मचाते है । विवेकानंद ने पश्चिम की बुराइयां ही नहीं अच्छा या भी देगी और जैसा की हम लिख चुकी है, अपने प्रवास काल में उनसे बहुत कुछ सीखा । आपने उदार हृदय, विशाल अनुभव तथा तुलनात्मक अध्ययन सेवे इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे की समूची मानव जाति का कल्याण हैं । पूर्व की आध्यात्मिकता और पश्चिम की भौतिकता के समन्वय सीखने, सिखाने और विचारों के आदान प्रदान पर निर्भर हैं । अटेर अपनी मुक्त भाषण को जारी रखते हुए उन्होंने कहा, पांच जाते देश तो असल में शायद लाखों के बोझ तथा के चार से जर्जर हो रहा है और अगर प्राची देश इन पुरोहितों के अत्याचारों से कातर क्रंदन कर रहा है, होना तो यह चाहिए कि ये दोनों आपस में एक दूसरे को संयमित रखें । ये कभी मैं सोचूँ की इनमें से केवल एक ही से संसार का लाभ होगा । समन्वय चुकी समय ज्ञान के आधार पर ही संभव है । इसलिए विवेकानंद ने एक तरफ शासक वर्ग ने हमें हीनता भाव लाने और अपने ही अतीत से विमुख हो जाने के लिए मैकाले की शिक्षा द्वारा जो भ्रांतियां फैलाई, उन पर चोट की और दूसरी तरफ पुरोहित प्रपंच के स्वार्थ द्वारा फैलाए गए वो संस्कारों को भी नहीं बख्शा । यही उनके स्वस्थ चिंतन का प्रमाण हैं और इसी से उनकी वाणी में बाल पैदा हुआ । सुनिए वे अपने देशवासियों से संबोधित है, उन्हें सतर्क और सावधान कर रहे हैं । हमारी दृष्टि में भारत के लिए कई आपदायें खडी हैं । उनमें से दो काइला और चेरी, वाइॅन्, घोर भौतिकवाद और उसकी प्रतिक्रिया से पैदा हुए गोरखू संस्कार से अवश्य बचना चाहिए । आज हम एक तरफ वो मुनिश्री दिखाई पडता है जो पांच लाख विज्ञान रुपये मदिरा पन से मत होकर अपने को सर्वज्ञ समझता है, वहाँ प्राचीन ऋषियों की हंसी उडाया करता है । उसके लिए हिंदुओं के सब विचार बिल्कुल दवाइयाँ चीज । हिन्दू दर्शनशास्त्र बच्चों का कलरव मात्र है और हिंदू मूल्कों का मात्र अंधविश्वास । दूसरी तरफ वो आदमी हैं जो शिक्षित है, पर जिस पर किसी चीज की सनक सवार है और वहाँ बोलती रह लेकर हर एक छोटी सी बात का अलौकिक अर्थ निकालने की कोशिश करता है । अपनी विशेष जातिया, देव देवियों या गांव से संबंध रखने वाले जितनी कुसंस्कार है, उनको उचित सिद्ध करने के लिए दार्शनिक, आध्यात्मिक तथा बच्चों को सुहाने वाले न जाने क्या अर्थ उसके पास सर्वदा ही मौजूद है । उसके लिए प्रति ग्राम में कुसंस्कार वेदो किया गया है और उसकी समझ में उसे कार्यरूप में परिणत करने पर ही जातीय जीवन निर्भर है । तुम्हें इन सब से बचना चाहिए । तुम में से प्रत्येक मनुष्य कुसंस्कार पूर्ण मूर्ख होने के बदले यदि घोर नास्तिक भी हो जाए तो मुझे पसंद हैं, क्योंकि नासिक तो जीवन में हैं तो मुझे किसी तरह परिवर्तित कर सकते हो, परन्तु यदि को संस्कार घुस जाये तो मस्तिष्क बिगड जाएगा, कमजोर हो जाएगा और मनीष विनाश की ओर अग्रसर होने लगेगा । तो इन दो संकटों से बच्चों हमें निर्भिक, साहसी मनुष्य का ही प्रयोजन हैं । हमें खून में तेजी और स्नायु में बल की आवश्यकता है । लोगों के पुट्ठी और बोला किसने आये चाहिए नाकि दुर्बलता लाने वाले, वाहियात विचार इन सबको त्याग दे सब प्रकार के रहस्यों से बच्चे विवेकानंद ने इस बात को भलीभांति समझ लिया था की संस्कृति ही युगों के आघात को सहन कर सकती है, मात्र ज्ञानराशि नहीं और उनमें ये समझना सिर्फ अपने देश, बल्कि दुनिया भर के इतिहास, दर्शन तथा साहित्य की गहरे अध्ययन से पैदा हुई थी । आपने समय का चलता फिरता विश्वकोश इनसाइक्लोपीडिया है, पर उन्हें अपने इस ज्ञान का नंबर नहीं था, बल्कि आत्मज्ञान, युग, स्मिथ, विनम्रता, सह्रदयता और सहनशीलता चाहे उन्होंने मार्क्स का कहीं उल्लेख नहीं किया, पर मार्च द्वारा कथित इस तथ्य को जान लिया था कि नया समाज कहीं ऊपर से नहीं, थप्पड था । उसका जन्म पुराने समाज के गर्भ से ही होता है । आमूलचूल परिवर्तन और जड में आग देने का अर्थ या कदाचित नहीं कि हमारे पास जो कुछ हैं, उसे नष्ट करता हूँ । शून्य से नया जीवन शुरू करो, नष्ट करना होता है भ्रम, भ्रांतियों और कुसंस्कारों अखंड राष्ट्रीय एकता के लिए मजबूत धीर, लोगों के पुट्ठे और सोलाह किसने आयु वाला नया मनुष्य सरकार था । इसके निर्माण के लिए जहाँ भ्रम, भ्रांति और कुसंस्कारों को नष्ट करना जरूरी था । वहाँ ये भी जरूरी था कि हमारी हजारों बरस की संस्कृति में जो कुछ स्वस्थ्य और जीवंत हैं उसे हम समझे और आत्मसात करके भौतिक शक्ति में परिणत करें । इसके विपरीत तथाकथित सुधार घर और धर्म से संबंधित रितिरिवाज पर प्रहार करते थे और अपने छिछले पातशाह विज्ञान के मध्य में ये समझ बैठे की इसी से विभिन्न जातियों तथा सांप्रदायों के बीच के अंतर्विरोधों का अंत होगा और इसी देश आगे बढेगा । उन्हें विवेकानंद गाल बजाने वाले चंचल बच्चों से अधिक महत्व नहीं देते । अतीव वीरान के मुख्य तत्वों की व्याख्या करने के बाद उन्होंने जाफना के अपने भाषण में कहा यद्यपि हमारा जाती भीम और अन्यान्य प्रथाएं धर्म के साथ आपस में मिली हुई दिखती हैं, ऐसी बात नहीं, ये प्रथाएं राष्ट्रीय रूप में हमारी रक्षा के लिए आवश्यक थी और जब आत्मरक्षा के लिए इन की जरूरत ना रह जाएगी तब सम्भव जहाँ वे नष्ट हो जाएगी । किन्तु मेरी उम्र जो जो बढती जाती है, ये पुरानी प्रथाएं मुझे बोली मालूम होती जाती है । एक समय ऐसा था कि जब मैं इनमें से अधिकांश को अनावश्यक तथा व्यर्थ समझता था परन्तु आयुवृद्धि के साथ इनमें से किसी के विरुद्ध कुछ भी कहते मुझे संकोच होता है क्योंकि उनका आविष्कार सैंकडों सभी यूके अनुभव का फल कल का छोकरा कल ही जिसकी मृत्यु हो सकती है । यदि मेरे पास आए और मेरे चीन गाल के संकल्प को छोड देने हो गई और यदि मैं उस लडकी के मतानुसार अपनी व्यवस्था पलट हूँ तो मैं ही मूर्ख बनाऊंगा और कोई नहीं भारतीय विभिन्न विभिन्न देशों से समाजसुधार के विषय की यहाँ जितने आते हैं, वे अधिकांश ऐसे ही है । वहाँ की ज्ञान बिमारियों से कहूँ तुम जब अपनी समाज का सिलाई संगठन कर सकोगे तब तुम्हारी बात मानेंगे । तुम किसी भाग को दो दिन के लिए भी धारण नहीं कर सकते । विवाद करके उसे छोड देते हो तो वसंत गाल में कीडों की तरह जन्म लेते हो और उन्हीं की तरह कुछ क्षण में मर जाते हो । बुलबुले की तरह तुम्हारी उत्पत्ति होती है और बुलबुले की भारतीय तुम्हारा नाश । पहले हमारे जैसा स्थाई समाज संगठित करो । पहले कुछ ऐसे सामाजिक नियमों और प्रभाव को संचालित करो जिनकी शक्ति हजारों वर्ष अशून्य नहीं तो तब तक मेरे मित्र तो मात्र चंचल पालक हो । मेरी क्रांतिकारी योजना भाषण में भी कहते हैं हम लोगों को तोड मरोडकर नए सिरो से दूसरे राष्ट्र के ढांचे में गन्ना असंभव है । मैं दूसरी कौमों की सामाजिक प्रभाव की निंदा नहीं करता । वे उनके लिए अच्छी है, पर हमारे लिए नहीं । उनके लिए जो कुछ अमृत है, हमारे लिए वही विश हो सकता है । पहले यही बात सीखनी हूँ । अन्य प्रकार के विज्ञान, अन्य प्रकार की परंपरागत संस्कार और अन्य प्रकार के विचारों से उनकी वर्तमान प्रथा संगठित हुई हैं और हम लोगों के पीछे हैं हमारे परंपरागत संस्कार और हजारों वर्षों के कर्म अदेय । हमें स्वभाव ना अपने संस्कारों के अनुसार चलना पडेगा और ये हमें करना ही होगा । और फिर अपनी कार्यप्रणाली प्रस्तुत करते हुए उन्होंने कहा अच्छा भारत में किसी प्रकार का सुधार या उन्नति की चेष्टा करने से पहले धर्म प्रचार आवश्यक है । भारत को समाजवादी अथवा राजनीतिक विचारों से प्लावित करने के पहले आवश्यक है कि उसमें आध्यात्मिक विचारों की बाढ लानी चाहिए । कोलंबो से अल्मोडा तक विवेकानंद ने जो भाषण दिए, उन सब में सर्वोपरि यही है । विवेकानंद के छोटे भाई भूपेन्द्रनाथ तक इन्होंने लिखा है कि बीसवीं सदी के पहले दशक में जो क्रांतिकारी गुप्त संगठन बने, वे इसी प्रचार के फल थी, तमाम प्राधिकारी नहीं । भाषणों से प्रेरणा लेते थे और पुलिस ने उन्नीस सौ सत्ताईस तक जितनी भी क्रांतिकारियों के घरों की तलाशी वाली उनमें विवेकानंद सहायता अवश्य मिलता है । विस्तार में जाने की गुंजाइश नहीं इनमें मेरी क्रांतिकारी योजना, हमारा प्रस्तुत कार्य और भारत का विश्व विशेष रूप से महत्वपूर्ण है । विदेशी शासकों ने हमारे इतिहास को विस्तृत करके बहुत सी भ्रांतियां फैलाई हैं और जनता के बीच व्यर्थ के अंतर्विरोध खडे किए हैं । उन्होंने अपने इन भाषणों में उनका निराकरण किया है । उदाहरण के लिए ये धारणा की गोरे रंग के आर्य लोग बाहर से आए और उन्होंने भारत के काली आंखों वाले आदिवासियों को पराजित कर के अपना दास बनाया और वर्तमान जाति प्रथा की नींव रखी । विवेकानंद ने सिद्धांत को मनगढंत बताते हुए लिखा है, इस समस्या की एकमात्र व्याख्या महाभारत से मिलती है । उसमें लिखा है कि सथ्यू के आरंभ में एक ही जाति ब्राह्मण थी और फिर पेशी के भेज सेवा भिन्न जातियों में बढती गई । बस यही एकमात्र व्याख्या सच और युक्तिपूर्ण हैं । भविष्य में जो सत्युग आ रहा है उसमें ब्राहमांड फिर सभी जातियां फिर ग्रामीण रूप में परिणत होंगी । इसी मिथ्या धारणा के आधार पर उत्तर और दक्षिण को आपस में लडाने और अलग अलग करने का प्रयास अब तक जारी हैं । विवेकानंद ने अपने मद्रासी श्रोताओं से कहा, एक मत है कि दक्षिण भारत में द्रविड नाम की एक जाति के मनीष जोधपुर भारत की आर्य नामक जाती से बिल्कुल भिन्न दिए और दक्षिण भारत के ब्राह्मण ही उत्तर भारत से आए हुए अन्य जातियां दक्षिणी ग्रामीणों से बिल्कुल ही पृथक जाती है । भाषा वैज्ञानिक महाशय मुझे क्षमा कीजिएगा की हमारी बिल्कुल निराधार है । भाषा का एक मार्च प्रमाण ये हैं कि उत्तर और दक्षिण की भाषा में भी है । दूसरा भेज मेरी नजर में नहीं आता । हम यहाँ उत्तर भारत और दक्षिणी भारत के लोग को चुनकर अलग करते । इसी तरह अगर उत्तर भारत के हिंदू, सिख, मुसलमान और इसाई अथवा ब्राह्मण, क्षत्रिय और अन्य निम्न जातियों के लोग किसी एक सभा अथवा मेले ठेले में एकत्रित हो तो आर्यो तथा काली आंखों वाले आदिवासियों को चुनकर अलग अलग करना संभव नहीं । और फिर पूर्ण कुषाण, तातर और यूनानी इत्यादि जातीय आई और आकर आपस में खत्म अलग हो गई । उन्हें भी अलग अलग पहचानना संभव नहीं है तो सिद्ध हुआ की इस धारणा का प्रयोजन कतील और सांस्कृतिक परंपरा के प्रति घृणा फैलाने मानता था । आर्य तो चूँकि कहीं नजर नहीं आती इसलिए घृणा ब्राम्हणों और संस्कृत भाषा से की जाती है । इस घृणा को तो इतनी दूर तक फैलाया गया है कि शोषण और पीडित शूद्र जाती कही जाने वाली जातियों की वर्तमान स्थिति के लिए नीतिकार मनो को जिम्मेदार ठहराया जाता है और प्रतिशोध के रूप में मनुस्मृति की प्रतियां जलाई जाती हैं । पर क्या प्रतिया जलाने से उनकी स्थिति में कोई परिवर्तन आया? क्या ये तलवार में हवा मारना और शक्ति का अपव्यय मात्र नहीं है? विदेशी प्रचार और हमारा अपना अज्ञान इन भ्रांतियों का कारण है । पुरातत्ववेत्ता इस निष्कर्ष पर पहुंच चुके हैं कि प्रारंभ में मंगोल आज नीग्रो लाभ सेमेटिक पांच घुमक्कड जा दिया । नहीं । उन्हें जहाँ कई बी अच्छी, चार गाहें तथा दूसरी प्राकृतिक सुविधाएं मिली वहीं जाकर बच रही बाद में ही जा दिया । उन्होंने मुगल, तातार, शक, कुषाण, डर तथा रविश इत्यादि उपजातियों में विभाजित और सम्मिश्रित होती चली गई । आरियों को अलग कैसे करूँ, द्रविड अलग जाती कहाँ से आ गई । ये ठीक है कि धीरे धीरे सवर्णों ने सारी सत्ता हथिया ली और जाति के चारों ओर रीति रिवाज की एक दीवार खडी कर दी । जन्म से मरण तक पूरे जीवन को कठोर नियमों में बांध कर रख दिया । छुआछूत पहली और हिन्दू धर्म चौके छोले का धर्म बनकर रहे गया । निम्न श्रमजीवी जाती होगी को नहीं वरन सवर्णों ने अपने वर्ल्ड की स्त्रियों को भी शिक्षा पर स्वतंत्रता के अधिकारों से वंचित करके दासों में बदल दिया । किसी देश के पतन और अब नदी का मुख्य कारण बताते हुए विवेकानंद ने मई में शिकागो से अपने पत्र में लिखा था परन्तु ईश्वर महान है, आगे या पीछे बदला मिलना ही था और जिन्होंने गरीबों का खून चूसा, जिनकी शिक्षा उनके धन से हुई । जिनकी शक्ति दरिद्रता परबनी अपनी बारी में हजार और सैकडों गिनती में दास बनकर भेजे गए, उनकी संपत्ति हजार वर्ष तक लूटती रही और उनकी स्तरिय और कन्याएं अपमानित की गई । क्या आप समझते हैं कि यह कारण ही हुआ? सवर्णों गाय का अधिकार टूट चुका है । दीदी बातों को लेकर चीखने चिल्लाने और आपस में लडने झगडने का कोई अर्थ नहीं । सवाल है कुछ ले हुए को उठानी और शिक्षित करने बाद तभी बनीं देश का भविष्य तभी सब रहेगा और विवेकानंद कहते हैं जनता को उसकी बोल चार की भाषा में शिक्षा को उसको भाव दो बहुत कुछ जान जाएंगे परंतु साथ ही कुछ और भी जरूरी है । उसको संस्कृति का बोल जातियों में समता लाने के लिए एकमात्र उपाय संस्कार और शिक्षा का अर्जन करना है जो उच्च वर्णों का बाल और गौरव है । यदि ये तुम कर सकोट जो कुछ हम चाहते हो वो तो मैं मिल जाएगा । धर्म बदल लेने मात्र से ना राष्ट्र बदल जाता है और न संस्कृति । विदेशी वह हैं जिसका आर्थिक और मानसिक संबंध विदेश से जुडा रहे । हमारे देश में जितने भी संप्रदायों तथा जातियों के लोग हैं उन सब का राष्ट्र एक हैं । संस्कृति एक है और उन सब को एक ही महान्ति से प्रेरणा लेनी है । सामूहिक संस्कृति का सिद्धांत मित्तियां तथा निराधार है और विदेशी शासकों द्वारा फूट बढाने के लिए गढा गया था । विवेकानंद भारत का भविष्य भाषण में कहते हैं, यहाँ आ रहे हैं, ग्रामीण हैं, तातार है, तुर्क हैं, मुगल है, यूरोपीय है मानव संसार की सभी जातियां इस भूमि में अपना अपना खून मिला रही है । भाषा का यहाँ एक विचित्र ढंग का जमाव पडा है । आज चार विभाग के संबंध में दो भारतीय जातियों में जितना अंतर है उतना पूर्वी और यूरोपीय जातियों में नहीं । हमारे पास एकमात्र सम्मलित भूमि है हमारी पवित्र परंपरा । हमारा धर्म एक मात्र सामान्य आधार रही है और उसी पर हमें संगठन करना होगा । यूरोप में राजनीतिक विचार ही राष्ट्रीय एकता का कारण है कि तू एशिया में राष्ट्रीय एक का आधार घर नहीं है । अतः भारत के भविष्य संगठन की पहली शर्त के तौर पर उसी धार्मिक एकता की आवश्यकता है । देशभर में एक ही धर्म सबको स्वीकार करना होगा । एक ही धर्म से मेरा क्या मतलब है? ये उस तरह का एक ही धर्म नहीं जिसका इसका योग मुसलमानों या बहुत हो । में प्रचार हैं । हम जानते हैं हमारे विभिन्न संप्रदायों के सिद्धांत तथा दावे कितनी ही विभिन्न क्यों ना हो । हमारे घर में में अद्भुत विविधता के लिए गुंजाइश हो जाती है और साथ ही विचार अपनी रूचि अनुसार जीवन निर्वाह के लिए हमें सम्पूर्ण स्वाधीनता प्राप्त हो जाती हैं । हम लोग कम से कम है जिन्होंने इस पर विचार क्या है, ये बात जानती हैं और अपने कर्म की ये जीवन प्रद सामान्य तत्व सबके सामने लाए और देश के सभी स्त्रीपुरुष बाल ब्रिंडल उन्हें जाने समझे तथा उन्हें जीवन में उतारें, यही हमारे लिए आवश्यक है । सर्वप्रथम यही हमारे कार्य, धर शब्द यहाँ व्यापक अर्थ में प्रयोग हुआ है । पूरा समाज, उसके रीती रिवाज, संस्कृति और परंपरा इसकी परिधि में आ जाती हैं । वेदांत दर्शन के जिस सिद्धांत का यहां उल्लेख हुआ है उसका दावा है कि मनुष्य देते हैं तथा जो कुछ भी हम लोग अपने चारों ओर देखते हैं, वहाँ उसी दिव्यता के बहुत हुआ है । अतीव वेदांत तथा विश्व के अन्य किसी भी मत के बीच कोई झगडा या विरोध नहीं है । मतलब ये कि विवेकानंद के अनुसार सिद्धांत की प्रचारित प्रसारित करने ही से भारत में राष्ट्रीय एकता की भावना मजबूत और फिर इसी आधार पर विश्वबंधुत्व का स्वप्न साकार होगा । आपने अधूरे लेख धर्म के मूल तत्व में उन्होंने लिखा है, अच्छा ऐसा लगता है कि अंततः मतों संप्रदायों का तिरोभाव ना हो गए । उन की वृद्धि ही तब तक होती जाएगी, जब तक प्रत्येक व्यक्ति अपने लिए एक संप्रदाय नहीं बन जाता है और फिर समझाते एकता की पृष्ठभूमि प्रस्तुत होगी । पुराण, गाथाओं और कर्मकांडों में कभी भी एकता ना सकेगी क्योंकि हम भाव क्षेत्र की अपेक्षा वस्तु क्षेत्र में एक दूसरे से अधिक विभिन्न रखते हैं । एक ही सिद्धांत को स्वीकार करते हुए भी लोग उसके आदर्श उपदेष्टा की महत्ता के संबंध में मतभेद रखेंगे । अब हम अगले परिषद में सिद्धांत का बेचन करेंगे, ताकि विवेकानंद के चिंतन में नहीं ही अंतर्विरोध और उनका वर्ग स्वभाव समझने में सुविधा हो सके ।

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स्वामी विवेकानंद की अमरगाथा.... Swami Vivekanand | स्वामी विवेकानन्द Producer : Kuku FM Voiceover Artist : Raj Shrivastava