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Transcript

Introduction

हेलो नमस्कार, मैं राज राजकीय पानी आप सभी का स्वागत करता हुआ रात को ले चलता हूँ । चंद्रा नाम था के सफर में क्योंकि मैं और आप तय करेंगे तेईस बयानों के मद्देनजर के देवकीनंदन खत्री का लेखन हैं जिससे हम रूबरू होंगे और ऍम मान जाएगी ।

Chapter 1

बयान शाम का वक्त है । कुछ कुछ सूरज दिखाई दे रहा है । सुनसान मैदान में एक पहाडी के नीचे दो शक वीरेंद्र सिंह और तेज सिंह एक पत्थर की चट्टान पर बैठ कर आपस में बातें कर रहे हैं । वीरेंद्र सिंह की उम्र इक्कीस बाईस वर्ष की होगी । ये नौगढ के राजस्व रेंद्र सिंह का एकलौता लडका है । तेज सिंह राजस्व, रेंद्र सिंह के बी वान जीत सिंह का प्यारा लडका और कुंवर वीरेंद्र सिंह का दिल्ली तो बडा, चालाक और फुर्तीला कमर में सिर्फ खंजर मानते, बगल में बाॅल, हाथ में कमंडल ये बडी तेजी के साथ चारों तरफ देखता और इन से बातें करता जाता है । इन दोनों के सामने एक घोडा कैसा कैसा आया दुरुस्त पेड से बंधा हुआ है । कोर वीरेंद्र सिंग कह रहे हैं भाई तेजसिंह देखो मोहम्मद रफी के अपनी बना है जिसने सत्य पहुंचा दी । कई दफा तुम विजयगढ से राजकुमारी चंद्रकांता की जितनी मेरे पास लाये और मेरी चिट्ठी उन तक पहुंच जाएगा जिससे साफ मालूम होता है कि जितनी मोहब्बत में चंद्रकांता से रखता हूँ उतनी ही चंद्रकांता मुझसे रखती है । हालांकि हमारे राज्य और उसके राज्य के बीच सिर्फ पांच कोर्स का फासला है । इस पर भी हम लोगों के लिए कुछ भी नहीं बन पडता । देखो इस खत में भी चंद्रकांता ने यही लिखा है कि जिस तरह बने जल्दी मिल जाता हूँ । तेज सिंह ने जवाब दिया मैं हर तरह से आपको वहाँ ले जा सकता हूँ । मगर एक तो आजकल चंद्रकांता के पिता महाराजा जयसिंह ने महल के चारों तरफ सख्त पहरा बैठा रखा है । दूसरे उनके मंत्री का लडका क्रूर सिंह उसपर आशिक हो रहा है । ऊपर से उसने अपने दोनों यारों को जिनका नाम नाजिम अली और अहमद खान है इस बात की ताकीद करा दी है कि बराबर में लोग महल की निगाहबानी क्या करे क्योंकि आपकी मोहब्बत का हाल क्रूर सिंह और उसके यारों को बखूबी मालूम हो गया है । चाहे चंद्रकांता क्रूर सिंह से बहुत ही नफरत करती है और राजा भी अपनी लडकी अपने मंत्री के लडके को नहीं दे सकता फिर भी उसे उम्मीद बंधी हुई है और आपकी लगावत बहुत बडी माँ होती है अपने बाप के जरिए उसने महाराणा जयसिंह के कानों तक आपकी लगावत का हाल पहुंचा दिया है और इसी सबसे पहले की सत्यता की हो गई आपको ले चलना अभी मुझे पसंद नहीं जब तक कि मैं वहाँ जाकर फसादियों को गिरफ्तार नगर इस वक्त फिर मैं जयगढ जाकर चंद्रकांत और चपला से मुलाकात करता हूँ क्योंकि चपला यार और चंद्रकांता की प्यारी सखी है और चंद्रकांता को जान से ज्यादा मानती है सिवाय चपला के मेरा साथ देने वाला वहां कोई नहीं है । जब मैं अपने दुश्मनों की चालाकी और कार्रवाई देखकर लौटू दबा के चलने के बारे में राय कहीं ऐसा ना हो कि बिना समझे पूछे काम करके हम लोग वहाँ ही गिरफ्तार हो जाये । वीरेंद्र जब मुनासिब समझो कर मुझे तो सिर्फ अपनी ताकत पर भरोसा है लेकिन तुम को अपनी ताकत और तैयारी दोनों तेरे से मुझे ये भी पता लगा है कि हाल में ही क्रूर सिंह के दोनों यार नाजिम और अहमद यहाँ आकर पुनः हमारे महाराजा के दर्शन कर गए । ना मालूम किस चालाकी से आए थे । अब तो उस वक्त मैं यहाँ नहीं था ऍम मुश्किल तो ये है कि तुम करोड सिंह के दोनों यारों को फसाना चाहते हो और वे लोग तुम्हारी गिरफ्तारी की फिक्र में हैं । बरमेश्वर कुशल करें है । अब तुम जाओ और जिस तरह बने चंद्रकांता से मेरी मुलाकात का बंदोबस्त करूँ । तेजसिंह फौरन खडे हुए और वीरेंद्र सिंह को वहीं छोड पैदल विजयगढ की तरफ रवाना हुए । वीरेंद्र सिंह भी घोडे को डर से खोल कर उस पर सवार हुए और अपने किले की तरफ चल दिए ।

Chapter 2

विजयगढ में क्रूर सिंह अपनी बैठक के अंदर नाजीम और अहमद दोनों यारो के साथ बातें कर रहा है । रोड से देखो ना जी महाराज का तो ये ख्याल है कि मैं राजा होकर मंत्री के लडके को कैसे दमाद पर और चंद्रकांता वीरेंद्र सिंग हो जाती है । अब गांव की मेरा काम कैसे निकले? अगर सोचा जाए कि चंद्रकांता को लेकर भाग जाऊँ तो कहाँ जाऊँ और कहाँ अगर आराम करो फिर ले जाने के बाद मेरे बात की महाराज क्या तो दशा करेंगे । इससे तो यही मुनासिब होगा कि पहले वीरेंद्र सिंह और उसके एआर तेज सिंह को किसी तरह गिरफ्तार कर किसी ऐसी जगह ले जाकर खपा डाला जायेगी । हजार वर्ष तक पता नहीं और इसके बाद मौका पाकर महाराज को मारने की फिक्र की जाए । फिर तो मैं झट गजनी का मालिक बन जाओ । मार तब अलवत्ता अपनी जिंदगी में चंद्रकांता से फॅर । मगर ये तो कहो कि महाराज के मरने के बाद मैं गड्डी का मालिक कैसे बना? लोग कैसे मुझे राजा बनाएंगे? नागिन हमारी राजा की यहाँ बनिस्बत काफी रोके । मुसलमान ज्यादा है । उन सभी को आपकी मदद के लिए मैं राजी कर सकता हूँ और उन लोगों से कसम खिला सकता हूँ कि महाराज के बाद आपको राजामणि मगर चाहिए है कि कम हो जाने पर आप भी हमारे मैं सब मुसलमानी को कबूल करे । क्रूर से अगर ऐसा है तो मैं तुम्हारी शर्त दिलोजान से भूल करता हूँ । मैं बस ठीक है आप इस बात का इकरारनामा लिखकर मेरे हवाले गए । मैं सब मुसलमान भाइयों को दिखलाकर उन्हें अपने साथ में लालू क्रूर सिंह ने काम हो जाने पर मुसलमानी मजहब तैयार करने का इकरारनामा लिखकर फौरन नाजीम और अहमद के हवाले किया । जिस पर अहमद ने क्रूर सिंह से कहा अब जब मुसलमानों का एक दिल कर लेना हम लोगों की जिम में इसके लिए आप कुछ सोचिए? हाँ, हम दोनों आदमियों के लिए भी एक इकरारनामा इस बात का हो जाना चाहिए कि आपके राजा हो जाने पर हमी दोनों वजीर होकर किए जाएंगे और जब हम लोगों की चालाकी का तमाशा देखी की बात की बात में जवाना ऐसे उलट पलट कर देते । क्रूर सिंह ने चटपट इस बात का इकरारनामा लिख दिया जिससे वे दोनों बहुत ही खुश हुए । इसके बाद नाजीम ने कहा इस वक्त हम लोग चंद्रकांता के हाल चाल की खबर लेने जाते हैं क्योंकि शाम का वक्त बहुत अच्छा है । चंद्रकांता जरूर बाद में गई होगी और अपनी सकी चपला से अपनी विवाह का खानी कह रही होगी । इसलिए हमको पता लगा रहा कोई मुश्किल नहीं होगा कि आज कल वीरेंद्र सिंह और चंद्रकांता के बीच में क्या हो रहा है । ये कहकर दोनों यार करोड सिंह सुविधा हुए ।

Chapter 3

बयान तीन कुछ कुछ दिन बाकी है चंद्रकांता चपला और चंबा बाद में पहन रही है भीनी भीनी फूलों की । मैं धीमी हवा के साथ मिलकर तबियत को खुश कर रही है । तरह तरह के फूल खिले हुए हैं । बाद के पश्चिम की तरफ वाले आम के घने पेडों की बाहर उसमें से अस्त होते हुए सूरज की किरणों की चमक एक जी भी मजा दे रही है । फूलों की क्यारियों कि रवि शो में अच्छी तरह छिडकाव किया हुआ है और फूलों के दरख्त भी अच्छी तरह पानी से हैं । कहीं गुलाब, कहीं जूही, कहीं बेला कहीं मोटी है की क्या दिया अपना अपना मजा दे रही है । एक तरफ बाग से सटा हुआ शाम है और दूसरी तरफ सुंदर सुंदर बुर्जियां अपनी बहार दिखा रही है । चपला जो चालाकी किस फण्ड में बडी तेज और चंद्रकांता की प्यारी सखी है । अपने चंचल हाव भाव के साथ चंद्रकांता को संघ लिए चारों ओर घूमती और तारीफ करती हुई खुशबूदार फूलों को तोड तोडकर चंद्रकांता के हाथ में दे रही है । मगर चंद्रकांता को वीरेंद्र सिंह की जुदाई में ये सब बातें कम अच्छी मालूम होती है । उसे तो दिल बहलाने के लिए उसकी सखिया जबरदस्ती बाद में खींच लाई चंद्रकांता की सकी । चंपा तब अच्छा बनाने के लिए फूलों को तोडती हुई मालती लता की कुछ की तरफ चली गई । लेकिन चंद्रकांता और चपला धीरे धीरे टहलती हुई बीच के फव्वारे के पास जाने के लिए और उसकी चक्करदार टूटियों से निकलते हुए जल का तमाशा देखने लगी । चपला ना मालूम चलता कि डर चली गई । चंद्रकांत कहीं इधर उधर घूमती हो गया । चप्पल दो घडी से ज्यादा हो गया । तब से वो हम लोगों के साथ नहीं है । चंद्रकांता देखो आ रही है चपला इस वक्त उसकी चाल में फर्क मालूम होता है । इतने में चंपानेर यहाँ पर फूल हो गए । गुच्छा चंद्रकांता के हाथ में दिया और कहा कि देखिए एक ऐसा अच्छा कुछ अच्छा बना लाई हूँ । अगर इस वक्त कुंवर वीरेंद्र सिंह होते तो इसको देख मेरी कार्य गिरी की तारीफ करते और मुझको कुछ नाम भी देते हैं । वीरेंद्र सिंह का नाम सुनते ही एका एक चंद्रकांता का अजब हाल हो गया । होली हुई बात पर याद आ गयी कमल मुख्य मुरझा गया ऊंची ऊंची साल से लेने लेगी फॅमिली लगे धीरे धीरे कहने लगी ना मालूम विधाता ने मेरे भाग्य में क्या लिखा है ना मालूम है म्यूजियम में में कौन से से बात किए हैं जिनके बदली ये दुःख भोगना पड रहा है । देखो पिता को की आधुन समाई है । कहते हैं कि चंद्रकांत कुमार ही रखूंगा । वीरेंद्र के पिता ने शादी करने के लिए कैसी कैसी खुशा में देखी मगर दृष्टि क्रूर के बाहर कुंवर सिंह ने उसको ऐसा कुछ बस में कर रखा है कि कोई काम नहीं होने देगा और अगर कम बत्ती क्रूर अपनी ही लस्सी लगाना चाहता है एकाएक चपलांदी चंद्रकांता का हाथ पकडकर जोर से दबाया मानव चुप रहने के लिए इशारा किया जब जाके इशारे को समझकर चंद्रकांता चुप हो गई और चपला का हाथ पकडकर फिर बाद में टहलने लगे । मगर अपना रुमाल उसी जगह जानबूझकर गिराती थोडी दूर आगे बढकर उसने चंपा से कहा सकी देख तो फब्बारे के पास कहीं मेरा रूमाल गिर पडा है । चंबा रुमाल लेने फव्वारे की तरफ चली गई । तब चंद्रकांता ने चपला से पूछा रखी तो नहीं बोलते समय मुझे क्यों रोका? जब मैंने कहा मेरी प्यारी सखी मुझको चंपा पर शुभा हो गया है । उसकी बात और चित्रा वालों से मालूम होता है कि वह असली चंबा नहीं था । इतने में चंपा निर्माण लाकर चपला के हाथ में दिया चपलाना चंपा से पूछा रखी कल रात को मैंने तो उसको जो कहा था, सुधरने क्या? चंबा बोली नहीं मैं तो भूल गए जब जबला ने कहा था भला वह बात या तुम्हे ना या वो भी भूल गई । चंबा गोली बातें याद है । तब फिर चपला ने कहा भला दोहरा के मुझसे कह तो सही तब मैं जानो की तुझे याद है । इस बात का जवाब न देकर चंपा ने दूसरी बात छेड दी जिससे शक की जगह यकीन हो गया कि ये चंपा नहीं है । आखिर चपला ये के है घर की । मैं आपसे एक बात होंगी । चंपा कोई किनारे ली गई और कुछ मामूली बातें कर कर गोली था । बी तो चंपा मेरी कान से कुछ मजबूत नहीं आती क्योंकि कल से मेरी कान में दर्द है । नकली चंपा चपला के फेर में पड गई और फॅमिली लगी । चपला ने चालाकी से बेहोशी की बुक नहीं कान में रखता है नकली क्षमता को संघवादी जिसकी सोचते ही चंपा बेहोश होकर गिर पडा था । चपलाना चंद्रकांता को पुकारकर कहा आओ साकी अपनी चंपा का हाल देंगे । चंद्रकांता ने पास आकर चंपा को बेहोश पडी हुई देख चपला से कहा सखी कहीं ऐसा ना हो कि तुम्हारा ख्याल धोखा ही नहीं और पीछे चंपा से शर्म आना पडेगा? नहीं, ऐसा नहीं होगा । यहाँ अगर चपला चंपा को पीठ पर लादकर फव्वारे के पास ले गए और चंद्रकांता से बोली तुम सवारी से चुल्लूभर पानी स्कीम ऊपर डालो, मैं होती हूँ । चंद्रकांता ने ऐसा ही किया और चपलाह खूब रगड रगड कर उसका मूड होने लगी । थोडी देर में चंपा की सूरत बदल गई और साफ नाजीम कि सूरत निकलेगा । देखते ही चंद्रकांता का चेहरा से से लाल हो गया और वह गोली रखी । इसने तो बडी भी अनबिकी देखो तो मैं क्या करती हूँ यह कर चपलाना जीम को फिर पीठ पर लाख बात के कोने में ले गए । जहां बोर इसके नीचे छोटा सा तहखाना उसके अंदर बेहोश नाजीम को ले जाकर लिटा दिया और अपनी तैयारी के बटुए में से मोमबत्ती निकालकर चलाई । एक रस्सी से नाजीम के पैर और दोनों हाथ पीठ की तरफ खूब कसकर बांदी और डिबिया से लखनऊ कान गाल कर उसको सुंघाया जिससे नाजीम ने अच्छी कुमारी और जोश में आकर अपने को कैद और बेवस देखा । चपला कोटा लेकर खडी हो गई और मारना शुरू किया । माफ करो मुझे बडा कुछ दूर हुआ । अब मैं ऐसा कभी नहीं करूंगा बल्कि इस काम का नाम भी नहीं लूंगा इत्यादि । कहकर नाजीम चिल्लाने और रोने लगा । मगर चपला कब सुनने वाली थी । वह थोडा जवानी ही गई और बोली सब्र का अभी तो तेरी तो कुछ भी नहीं मिलती होगी । है तो यहाँ क्यों आया था? क्या तुझे बाकी हवा अच्छी मालूम हुई थी क्या बाकी सेरको जी रहा था क्या तो नहीं जानता था कि चपला भी यहाँ होगी रामजादे के बच्चे बईमान अपने पास की कहने से तो ये काम क्या देख मैं उस की भी तबीयत खुश कर देती हूँ । ये कहकर फिर मारना शुरू किया और पूछा था सच बताऊँ तो कैसे यहाँ और चंबा कहाँ गई? बाहर के खौफ ने नाजीम कौशल हाल कहना ही पडा । वो बोला चंपा को मैंने ही बेहोश किया था । बेहोशी की दवा छिडककर फूलों का गुच्छा उसके रास्ते में रख दिया जिसको सुनकर वह बेहोश हो गई । तब मैंने उसे मालती लगा कि कुछ में डाल दिया और उसकी उसकी सूरत बना उसके कपडे पहन तुम्हारी तरफ चलाया लोग मैंने सवाल के हथियार तो छोडो चपला ने कहा हैं छोटी हूँ मगर फिर भी दस पांच कडे और जमा ही दी है । यहाँ तक की नाजीम बिलबिला उठा । जब जब मैंने चंद्रकांता से कहा सकील तुम इसकी निगाहबानी का था मैं चमका को ढूंढकर लाती हूँ । कहीं वह बाजी झूठ ना कहता हूँ । जंपा को खोजने हुई चपला मानती लता के पास पहुंची और बत्तीस मिलाकर ढूंढने लग था देखा कि सचमुच अंपायर झाडी में वो बोझ पडी है और पतन पर उसके लगता भी नहीं चपला उसे लक लगा सुलगाकर कोष मिलाई और पूछा क्यों में जहाज कैसा है? खागी न तो का चंबा ने कहा मुझ को क्या मालूम था कि इस समय यहाँ तैयारी होगी । इन जगह फूलों का एक गुच्छा पडा था जिसको उठाकर सुनते ही में बेहोश हो गई । ना मालूम क्या हुआ फॅसने मुझे क्या मेरे कपडे फॅमिली बडी लागत की कपडे थे वहाँ पर नाजीम के कपडे पडे हुए थे जिनमें से दो एक लेकर चपला नहीं जमता का बजट होगा । तब ये कहकर की मेरे साथ मैं उसे दिखलाओ जिसने तेरे लिए हालत कि चंबा को साथ ले उस जगह आई जहाँ चंद्रकांता नाजीम थे । नाजीम की तरफ इशारा करके चपला ने कहा देख इसीलिए तेरे साथ ही बनाएगी थी । चंबा मोनाजीर सूरत देखते ही बडा क्रोध आया और कुछ अपना से पुलिस में है । अगर इजाजत हो तो मैं भी दो चार कुंडी लगाकर अपना गुस्सा निकाल लूँ । जब मैंने कहा हाँ हाँ जितना जी चाहे इस मुझे कुछ क्या लगा । बस फिर क्या था जम पानी मनमानी थोडे नाजीम को लगाए यहाँ तक कि नाजीर घबरा उधार जी में कहने लगा खुद ऍम क्रूर जिनको गारत करें जिसकी बदौलत मेरी ये हालत हुई । आखिरकार नाजीम कोसी थाने में कह कर तीनों महल की तरफ रवाना ये छोटा सा बाग जिसमें ऊपर लिखी बातें हुई महल के संग सटा हुआ उसके पिछवाडे की तरफ पडता है और खासकर चंद्रकांता की टहलने और हवा खाने के लिए ही बनवाया गया । इसके चारों तरफ मुसलमानों का पहला होने के सबका से ही अहमद और नानाजी को अपना काम करने का मौका मिल गया था ।

Chapter 4

तेज सिंह नरेंद्र सिंह से रुखसत होकर विजयगढ पहुंचा और चंद्रकांता से मिलने की कोशिश करने लगा । मगर कोई तार की मैं बैठी हूँ क्योंकि पहले वाले बडी होशियारी से पहला दे रहे थे । आखिर सोचने लगे कि क्या करना चाहिए? रात चांदनी है । अगर अंधेरी रात होती तो काम बंद लगाकर ही महल के ऊपर जाने की कोशिश की जाएगी । आखिर तेजसिंह एकांत में गए और वहां अपनी सूरत चोपदार । किसी बना महल की ड्यूटी पर पहुंचा । देखा कि बहुत से चोपदार और प्याजी बैठे पहरा दे रहे हैं । एक चोबदार से बोले यार हम भी महाराष्ट्र के नौकर हैं । आज चार महीने से महाराज हमको अपनी अर्दली में नौकर रखा है । इस वक्त छुट्टी थी । चांदनी रात का मजा देखते टहलते इस तरफ आने के लिए तुम लोगों को तंबाकू बीते देख जी में आया है कि चलो दो फुक हम भी लगा ले । अपील खाने वालों को तंबाकू की मैं जैसी मालूम होती है । आप लोग भी जानते ही होंगे । हाँ ये बैठे तंबाकू पीजिए क्या अगर चोपदार और प्यादों ने आपका तेजसिंह के आगे रखा? तेज सिंह ने कहा मैं हिंदू हो हो का तो नहीं पी सकता । हाँ हादसे जरूर पी लूंगा । ये कहकर चिलम उदार ली और पीने लगे । उन्होंने दो वो तंबाकू की नहीं दिए थे कि खास ना शुरू किया । इतना खासा की थोडा सा पानी भी मुझ से निकाल दिया और तब कहा मिया, तुम लोग अजब कडवा तंबाकू पीते हो । मैं तो हमेशा सरकारी दंबगो पिता हूँ । महाराजके हुक्का बरदार से दोस्ती हो गई है तो बराबर महाराज के पीने वाले तंबाकू में से मुझे कुछ दिया करता है । अब ऐसी आदत पड गई है कि सिवाय उस माकू के और कोई तंबाकू अच्छा नहीं लगता । इतना काहे चोबदार बने हुए तेज सिंह ने अपने बटुए में से चिल्लम तंबाकू निकाल कर दिया और कहा तुम लोग भी पी कर देख लो कि कैसा तंबाकू है । बाला चौकीदारों ने महाराज के पीने का तंबाकू कभी का ही को पिया होगा । झट साथ फैला दी और कहा लॉस भाई तुम्हारी बदौलत हम भी सरकारी तंबाकू पीले दम बडे किस्मत वार हो कि महाराष्ट्र के साथ रहते हो दुख खूब चयन करते होगे ये नकली चोबदार तेजसिंह के हाथ से तंबाकू ले लिया और भूख दोबारा जमा करते सिंह के सामने लाए । तेज सिंह ने कहा तो तुम सुनेगा फिर मैं भी ले लूंगा । अब हुक्का गुडगुडाने लगे और साथ ही कपडे भी उठने लगे । थोडी देर में सब चोबदार और प्यादों का सर घूमने लगा । यहाँ तक कि झुकते झुकते सब ऑन होकर गिर पडे और बेहोश हो गए । आप किया था बडी आसानी से तेजसिंह फाटक के अंदर घुस गए और नजर बचाकर बाद में पहुंचे । देखा कि हाथ में रोशनी लिए सामने से एक लॉटरी चली आ रही है । सिंह ने फुर्ती से उसके गले में कमाल डाली और ऐसा झटका दिया कि वह क्यूट अपना कर सके और जमीन पर गिर पडी है । तुरंत से बेहोशी की बुक नी सुंघाई और जब बेहोश हो गई तो उसे वहां से उठाकर किनारे ले गए । बटुए में से सामान निकाल मोमबत्ती जलाई और सामने आई नरक अपनी सूरत उसी के जैसी बनाए । इसके बाद उसे वही चीज वो उसी के कपडे पहन महल की तरफ रवाना हुए और वहाँ पहुंचे । जहां चंद्रकांता, जपला और चंपा दस मार्च लडकियों के साथ बातें कर रही नहीं । लॉटरी की सूरत बनाए हुए तेज सिंह भी किनारे जाकर बैठ गए । तेल सिंह को देख चपला बोली क्यों कि जिस काम के लिए मैंने तो उसको भेजा था की अब नाम तो कराई जो चुपचाप आ कर बैठ गई है । जब लकी बात सुने दे सिंह को मालूम हो गया कि जिस लॉंड्री को मैंने बेहोश क्या है और जिसकी सूरत बनाकर आया हूँ उसका नाम खेत की है । नकली के हाँ काम तो करने गई थी मगर रास्ते में एक नया तमाशा थी । तुम से कुछ कहने के लिए लौट आई हूँ । चपला ऐसा अच्छा क्या देखा तो उन्हें बता फॅमिली के सभी को मिटा जो तुम्हारे और राजकुमारी के सामने ही बात करूँगी । सब लौंडिया हटा दी गई और केवल चंद्रकांता चपला और चंबा रहे गई । अब केतकी ने हस्कर कहा कुछ नाम तो खुश खबरी सुना हूँ । चंद्रकांता ने समझा कि शायद वो कुछ वीरेंद्र सिंह की खबर लाई है । मगर ये भी सोचा कि मैंने तो आज तक कभी वीरेंद्र सिंह का नाम भी इसके सामने नहीं लिया । तब ये क्या मामला है? कौन सी खुशखबरी है जिसके सुनने के लिए ये पहले से ही इनाम मांगती है । आखिर चंद्रकांता ने गीत की से कहा हाँ इनाम दूंगी तो कहते सही क्या कुछ कपडे लाये हैं? केतकी ने कहा पहले दे दो तो नहीं तो जाती हूँ ये कहकर उठ खडी हो गई थी कि ये नखरे देख चपला से ना रहा गया और वह बोली थी गौरी की आज तो उसको क्या हो गया है कि ऐसी बढ बढ कर बातें कर रही है । लगाओ बोला जुट के केतकी ने जवाब दिया क्या मैं सबसे कमजोर वो जो लाख लगा देगी और मैं छोड दूंगी । अब चपला से ना रहा गया और केतकी का छोटा पकडने के लिए दौड यहाँ तक कि दोनों आपस में गूंद गई । एक तिफाक से चपला का हाथ नकली खेती की छाती पर पडा जहाँ की सफाई देखो खबरा हूँ की और झट से अलग हो गई । नकली के क्यों भर्ती हो गई आप लड्डू चपला अपनी कमर से कतार निकाल सामने हुई और बोली हो यार सच बता तू कौन है नहीं तो अभी जान नहीं डालती हूँ इसका जवाब नकली केतकी ने चपला को कुछ नहीं दिया और वीरेंद्र सिंह की चिट्ठी निकालकर सामने रखती चपला की नजर कि चिट्टी पर पडी और गौर से देखने लगी । वीरेंद्र सिंह के हाथ की लिखावट देख समझ गई कि ये तेज सिंह है क्योंकि सिवाय तेजसिंह के और किसी के हाथ वीरेंद्र सिंग कभी चिट्ठी नहीं भेजेंगे । ये सोच समझ चपला शर्मा गई और गर्दन नीची कर चुप हो गई । मगर जी में तेज सिंह की सफाई और चालाकी की तारीफ करने लगी बल्कि सच तो यह है कि तेजसिंह की मोहब्बत में उसके दिल में जगह बनाई । चंद्रकांता ने बडी मोहब्बत से वीरेंद्र सिंह का खत पढा और तब दीपसिंह से बातचीत करने लगी क्यों? तेजसिंह उनका मिजाज तो अच्छा है ना? मिजाज क्या खाक अच्छा होगा । खाना पीना सब छूट गया । रोते रो दिया कि सूज गई दिन रात तुम्हारा ध्यान है बिना तुम्हारे मिले उनको कब आराम है? हजार समझाता हूँ, मगर कौन सुनता है अभी उसी दिन तुम्हारी चिट्ठी लेकर मैं गया था । आज उनकी हालत देख फिर यहाँ आना पड । कहते थे कि मैं खुद चलूंगा । किसी तरह समझा बुझाकर यहाँ आने से रोक और कहा कि आज मुझ को जाने दो । मैं जाकर वहाँ बंदोबस्त करा हूँ । तब तुम को ले चलूँगा जिससे किसी तरह का नुकसान हो । चंद्रकांता अफसोस तो उनका अपने साथ ना लाएं । कम से कम में उनका दर्शन दू कर लेती । देखो यहाँ क्रूर सिंह के अरुण इतना उधम मचा रखा है कि कुछ कहा नहीं जाता । पिताजी को में कितना रोकती और समझाती हूँ कि क्रोड सिंह के दोनों मेरे दुश्मन है । मगर महाराज कुछ नहीं सकते क्योंकि क्रूर सिंह ने उनको अपने वश में कर रखा है । मेरी और कुमार की मुलाकात का हाल बहुत कुछ बढा चढाकर महाराज को नामालूम किस तरह समझा दिया है कि महाराजसिंह बच्चों का बादशाह समझ गए हैं वोह हरदम महाराज के कान भरता है अब मेरी कुछ भी नहीं सुनते हैं । हाँ, आज बहुत कुछ कहने का मौका मिला है क्योंकि आज मेरी प्यारी सखी चपला ने नाजीम को इस पिछवाडे वाले बाग में गिरफ्तार कर लिया है । कल महाराज के सामने उस को ले जाकर तब कहूँगी कि आप अपने क्रूर सिंह की सच्चाई को देखिए । अगर मेरे पहले पर मुकर्रर किया ही था तो बात के अंदर जाने की इजाजत किसने दी थी । ये कहकर चंद्रकांता ने नाजीम के गिरफ्तार होने और बाद के तहत खाने में कैद करने का सारा हाल देवसिंह से कह सुनाया । दीपसिंह चपला की चालाकी सुनकर हैरान हो गए और मान ही माइनस को प्यार करने लगे । पर कुछ सोचने के बाद बोले जब लाने चालाकी तो खूब की मगर धोखा खा गई । ये सुन चपला हैरान हो गयी । हाई राम मैंने क्या धोखा खाया पर कुछ समझ में नहीं आया । आखिर में ना रहा गया और तेजसिंह से पूछा जल्दी बताओ मैंने क्या धोखा खाया? तेजसिंह ने जवाब दिया क्या तुम इस बात को नहीं जानती थी कि नाजीम बाद में पहुंचा तो अहमद भी जरूर आया होगा । फिर बाद में ही नाजीम को क्यों छोड दिया? तुमको मुनासिब था कि जब उसको गिरफ्तार किया ही था तो महल में लाकर कैद कर दिया । उसी वक्त महाराज के पास भिजवा रही थी । अब जरूर अहमद नाजीम को छुडा ले गया होगा । इतनी बात सुनते ही चपला के होश उड गया और बहुत शर्मिंदा होकर बोली सच है बडी भारी गलती हुई है इसका किसी ने ध्यान ही नहीं किया । तेज सिंह ने कहा और क्यों कोई ख्याल करता तुमको चला बंदी हूँ यार आ के खिलाडी हो इसका ख्याल तुमको होना चाहिए कि दूसरों को ठीक है जाके देखो वो है या नहीं । जबला दौडी हुई बाकी तरफ गयी । तहखाने की पास जाते ही देखा कि दरवाजा खुला पडा है । बस फिर क्या था यकीन हो गया कि नाजीम को हम छुडा ले गया तो खाने के अंदर जाकर देखा तो खाली पडा हुआ था । अपनी बेवकूफी पर अफसोस करती हुई लौटाई और बोली क्या करूँ मुझे? हम नाजीम कुछ डाले गया । अब तीन सिंह ने छेडना शुरू किया । बडी आर बनती थी कहती थी हम चला है होशियार है ये है वो है बस एक आदमी यार एने नाकों में दम करना जब जिला उठी और चढकर बोली जपला नाम नहीं जो अब की बार दोनों को गिरफ्तार कर इसी कमरे में लाकर बेहिसाब ॅ तेज सिंह ने कहा बस तुम्हारी कार्य गिरी देखी गई । अब देखो मैं कैसे एक एक को गिरफ्तार कर अपने शहर में ले जाकर कैद करता हूँ । इसके बाद सिंह ने अपने आने का पूरा हाल चंद्रकांत और चपला से कह सुनाया और ये भी बता दिया कि फलाना जगह भर में खेती को बेहोश करके डाल आया हूँ । तुम जाकर ऐसे उठा लेना उसके कपडे मैं ना दूंगा क्योंकि किसी सूरत से बाहर चला जाता है । देखो सिवाय हम तीनों के ये हाल और किसी को ना मालूम हूँ नहीं तो सब काम बिगड जाएगा । चंद्रकांता ने तेजसिंह से साकेत की दूसरे तीसरे दिन तुम जरूर यहाँ आया करो तुम्हारे आने से हिम्मत बनी रहती है । बहुत अच्छा मैं ऐसा ही करूंगा । अगर तीन सिंह चलने को तैयार हुए । चंद्रकांता उन्हें जाते देख रोकर बोली छोटे सिंह क्या मेरी किस्मत में कुमार की मुलाकात नहीं बनी है? इतना कहते ही काला भराया और वह फूट फूटकर रोने लगे । तेरसिंह ने बहुत समझाया और कहा कि देखो ये सब बखेडा इसी वास्ते क्या जा रहा है जिससे तो भारी उनसे हमेशा के लिए मुलाकात हो । अगर तुम भी खबर आ जाओगी तो कैसे काम चलेगा? बहुत अच्छी तरह समझाबुझाकर चंद्रकांता को चुप कराया तब वहाँ से रवाना हो खेती की सूरत में दरवाजे पर आए । देखा तो दो चार प्यादे होश में आए हैं बाकी चित्र पडे कोई अंडा पडा है, कोई उठा तो है मगर फिर जो कि जाता है नकली के की ने डपटकर दरबानों से कहा तुम लोग चेहरा देखती हो या जमीन सुनते हो, इतनी अफीम क्यों खाती होगी? आपकी नहीं खुलती और सोते हो तुम उर्दू से बाजी लगाकर देखो । मैं बडी रानी से कहकर तुम्हारी क्या दशा करती हूँ जो चोपदार होश में आ चुकी थी की थी की बात सुनकर सन्न हो गए और लगे खुशामद करने देखो के कि माफ करो । आज एक नालायक सरकारी चोबदार ने आकर धोखा देकर ऐसा जहरीला तंबाकू पिला दिया की हम लोगों की ये हालत हो गई । उस पार्टी ने तो जान से मारना चाहता था । अलाने बचा दिया नहीं तो मारने में क्या कैसे छोडी थी? देखो रोज तो ऐसा नहीं होता था । आज धोखा खा गए हम हाँ जोडते हैं । अब कभी ऐसा देखो तो जो चाहे सजा देना नकली गई थी, ने कहा अच्छा आज तो छोड देती हूँ मगर खबर जाए जो फिर कभी ऐसा हुआ ये कहते हुए तेजसिंह बाहर निकल गए । डर के मारे किसी ने ये बिना पूछा कि केतकी तू कहाँ जा रही है?

Chapter 5

अहमद ने जो बात की पेड पर बैठा हुआ था । जब देखा कि चपला ने नाजीम को गिरफ्तार कर दिया और महल में चली गई तो सोचने लगा कि चंद्रकांता, छाबला और चंपा बस यही तीनों महल में गई है । नाजीम इन सभी के साथ नहीं किया तो जरूर हो इस पर नीचे नहीं कहीं कहते ये सोच वो पेड से उतार इधर उधर बोलने लगा । जब उस तरह कहानी के पास पहुंचा जिसमें नाजीम कैसा था तो भीतर से चिल्लाने की आवाज आई डॅाल उसने पहचान लिया कि नाजीम की आवाज खाने की तिवाड खोल अंदर गया । नाजीम को बंधा पा झट से उसकी रस्सी खोली और तहखाने के बाहर आकर बोला चलो जल्दी इस बच्चे के बाहर हो जाए तब सब हाल सुनेगी । क्या हुआ नाजीम और अहमद बच्चे के बना रहे और चलते चलते आपस में बातचीत करने । नाजीम ने चपला के हाथ पर जाने और थोडा खाने का पूरा हाल अहमद ने कहा भाई नाजीब जब तक पहले चपला को हम लोग न पकड लेंगे तब तक कोई काम ना हो क्योंकि चपला बडी चालाक है और धीरे धीरे चंपा को भी तेज कर रही है । अगर वो गिरफ्तार ना की जाएगी ही दिनों में एक की दो हो जाएंगे । जंपा भी इसी काम में तेज होकर चपला का साथ देने लायक हो जाएगी ना जी ठीक है ठीक है आज तो कोई काम नहीं हो सकता । मुझ से मुश्किल से जान बची है भाई खाना कल पहले यही काम करना है यानी जिस तरह से वो चप्पल को पकडना और ऐसी जगह छुपाना है कि जहाँ बताना लगे और अपने ऊपर किसी को शक्ति ना हो । ये दोनों आपस में धीरे धीरे बात करते चले जा रहे हैं । थोडी देर में जब महल के अगले दरवाजे के पास पहुंचे तो देखा कि की जो कुमारी चंद्रकांता कीलॉन्ग है सामने से चली आ रही दीप सिंह ने भी जो खेती के बीच में चले आ रहे थे ना जीम और अहमद को देखते ही पहचानने और सोचने लगे कि भले मौके पर ये दोनों मिल गए और अपनी भी सूरत अच्छी है । इस समय दोनों से कुछ खेल करना चाहिए और बन पडे तो दोनों नहीं एक को तो जरूरी पकडना चाहिए तेजसिंह जानबूझकर इन दोनों के पास से हो करने की नाजीम और अहमद ये सोचकर उसके पीछे हो लिए कि देखिए कहाँ जाती है नकली के तेज सिंह ने मोडकर देखा था हम लोग मेरे पीछे पीछे क्यों चले आ रहे हैं इसका गर्म कर रहे हो उस काम करूँ । अहमद ने कहा इस काम पर मुकदर है और क्या करें क्या जानती हूँ? केतकी ने कहा मैं सब जानती हूँ वही काम करो जिसमें छपडा के हाथ की जूतियां नसीब हो । जिस जगह हमारी मदद दारिक लॉंड्री तक नहीं है, बहुत भारी ली क्या होगा । नाजीम और अहमद की थी की बात सुनकर दंग रहे और सोचने लगे की ये तो बडी चालाक होती है । अगर हम लोगों की मेल में आ जाए तो बडा काम नहीं । इसकी बातों से मालूम नहीं होता है कि कुछ लालच देने पर हम लोगों का साथ नहीं नाजीब नहीं सुनो की हम लोगों का तो काम ही चला कि करने का है । हम लोग अगर पकडे जाने और मरने मारने से करे तो कभी काम न चल इसी की बदौलत खाते हैं । बाद की बात में हजार रुपये नाम मिलते हैं । हो गया की मेहरबानी से तुम्हारे जैसे मददगार भी मिल जाते हैं जिससे आज तो मिल गई । अब तुम को भी मुनासिब है कि हमारी मदद करो । जो कुछ हमको मिलेगा उससे हम तुमको भी हिस्सा देंगे गेट की नहीं कहा सुनो जी मैं उम्मीद के ऊपर जान देने वाली नहीं । अबे कोई दूसरे होंगे मैं तो पहले दामले दी अब इस वक्त अगर मुझे कुछ देर सबको तो में अभी तेज सिंह को तुम्हारे हाथ गिरफ्तार करा दूँ नहीं तो जाऊँ जो कुछ करते हो कर तेज सिंह की गिरफ्तारी का हाल सुनते ही दोनों की तबीयत खुश हो गई । नाजीम नहीं अगर तेज सिंह को पकडवा दो जो हूँ कि देखा एक हजार रुपये से कम ऍम अगर मंजूर हो तो लाख रुपए मेरे सामने रखो ना । जी ने कहा अब इस वक्त आधी रात को मैं कहाँ से रुपए हूँ कल जरूर दे दूँ ने कहा ऐसी बातें मुझसे नहीं कर मैं पहले ही कह चुकी हूँ कि मैं उधार सौदा नहीं करते । लोग मैं जाती हूँ । नाजीम आगे से रोककर कहता है तो तो तो खफा की होती हूँ । अगर तुम को हम लोगों का एक बार ना हो तो तुम इसी जगह है तो हम लोग जाकर रुपए ले आते हैं । अच्छा एक आदमी यहाँ मेरे पास रहे और एक आदमी जाकर पहले हूँ । नाजीम ने कहा अच्छा अहमद यहाँ हमारे पास ठहरता है मैं मैं जाकर रुपए ले आता हूँ । ये कहकर नाजीम ने अहमद को तो उसी जगह छोडा और आप खुशी खुशी क्रूर सिंह की तरफ रुपए लेने को चलेगा । राजीव के चले जाने के बाद थोडी देर तक के की और अहमद इधर उधर की बातें करते हैं । बात करते करते के कि नहीं । दो चार इलायची पर हुए से निकालकर अहमद को दी और आप नहीं खाई । अहमद को तीन सिंह के पकडे जाने की उम्मीद में इतनी खुशी थी कि कुछ सोचना सकता और इलायची खा गया मगर थोडी देर में उसका सिर्फ घूमने लगा । तब समझ गया कि ये कोई ये आए इस ने धोखा दिया । चैट कमर से खंजर की चीज बिना कुछ कहेगी की को मारा । मगर खेत की पहले से होशियार दाव बजाकर उस ने अहमद की कराई पकड ली जिससे अहमद कुछ नहीं कर सकता हूँ बल्कि जरा ही देर में बेहोश होकर जमीन पर गिर पडा । तेज सिंह ने उसकी मुश्किल बाद कर चादर में गठरी कैसी और पीठ पर लाद नौगढ का रास्ता ही खुशी के मारे जल्दी जल्दी कदम बढाते चले गए । ये भी ख्याल था कि कहीं ऐसा ना हो कि नानाजी माना जाए और पीछा कर इधर नाजीम रुपए लेने के लिए गया तो सीधे क्रूर सिंह के मकान पर पहुंचे । उस समय क्रूर सिंह गहरी नींद में सो रहा जाते ही नाजीम नौं बज रहे हैं । रोडसिंह ने पूछा क्या है जो इस वक्त आधी रात के समय आकर मुझे उठा रहे हो? नाजीम ने ग्रुप सिंह से अपनी पूरी कैफियत यानी चंद्रकांता के बाद में जाना और गिरफ्तार होकर छोडेगा अहमद का छुडाना ना फिर वहाँ से रवाना हो ना रास्ते में की किसी से मिलना और हजार रुपए पर तेज सिंह को पकडवा देने की बातचीत तय करना वगैरह । सब खुलासा हाल कैसा है रोडसिंह ने नाजीम के पकडे जाने का हाल सुनकर कुछ अब सोच तो किया मगर पीछे तीन सिंह की गिरफ्तार होने की उम्मीद । शंकर छल पडा और बोला ऍफ अभी हजार रुपए देता हूँ बल्कि खुद तुम्हारे साथ चलता हूँ । ये कहकर उसने हजार रुपए संदूक से निकले और ना चीन के साथ । जब नाजीम फ्रूट सिंह को साथ लेकर वहां पहुंचा जहां अहमद और खेती को छोडा था तो दोनों में से कोई नहीं नाजीम तो हो गया और उसके मुंह से छठ ये बात निकल पडी हो का हुआ गाओना जी क्या हुआ क्राॅसिंग था क्या करूँ वो जरूर के कि नहीं कोई तैयार जिसने पूरा धोखा दिया और अहमद को तो लेकिन क्या ग्रुप सिंह ने वो तुम तो बाद में ही चला के हाथ से पढ चुके थे । अहमद बाकी था तो वो भी इस वक्त नहीं जूते खाता होगा । चलो छुट्टी हुई राजीव दशक मिटाने के लिए थोडी तीर तक की जरूरत खोज भी की पर कुछ पता नहीं । आखिर रोते पीते दोनों ने घर का रास्ता

Chapter 6

बयान छठवा तेज सिंह को विजयगढ की तरफ पैदाकर वीरेंद्र सिंह अपने महल में आए मगर किसी काम में उनका दलना लगता हूँ । हरदम चंद्रकांता की याद में सिर्फ चुकाए बैठे रहना और जब कभी निराश हो जाना तो चंद्रकांता की तस्वीर अपने सामने रखकर बातें क्या करना है या पलंग पर लेट मूठ आप खूब रोना बस यही उनका काम अगर कोई पूछता तो बातें बना रहे थे । वीरेंद्र सिंह के बाद सुरेंद्र सिंह को वीरेंद्र सिंह का सब हाल मालूम था । मगर क्या करते हैं? कुछ बस नहीं चलता था क्योंकि विजयगढ का राजा उनसे बहुत जबरदस्त था और हमेशा उन पर तू मत रखता था । वीरेंद्र सिंह ने तेज सिंह को विजयगढ जाती बार कह दिया था कि तुम आज ही लौटाना । रात बारह बजे तक वीरेंद्र सिंह ने तेजसिंह की राह देखेगी । जब वो नहीं आए तो उनकी घबराहट और ज्यादा हो गई । आखिर अपने को संभाला और मसखरी पर लेट दरवाजे की तरफ देखने लगते हैं । सवेरा होने ही वाला था कि तेजसिंह पीठ पर एक गद्दा लादे हम पहुंचे । पहले वाले इस हालत में इन को देख हैरान मगर खौफ से कुछ कह नहीं सकते । तेज सिंह ने वीरेंद्र सिंह के कमरे में पहुंचकर देखा की अभी तक भी जाग रहे हैं । वीरेंद्र सिंग तीन सिंह को देखते ही उठ खडे हुए और बोले कहो भाई क्या खबर लाएंगे । ए सिंह ने वहाँ का सब हाल सुनाया । चंद्रकांता की चिट्ठी हाथ पर रखती अहमद को गठरी खोलकर दिखा दिया और कहा ये चिट्टी है और ये सौगात । वीरेंद्र सिंह बहुत खुश हुए । चिट्ठी को कई मर्तबा पढा और आठ सौ से लगाया फिरते सिंह से कहा सुना भाई इस अहमद को ऐसी जगह रखें जहां किसी को मालूम ना । अगर जयसिंह को खबर लगेगी तो फसाद बढ जाएगा । तेज सिंह ने कहा इस बात को मैं पहले से सोच चुका हूँ । मैं इसका एक पहाडी खोडा मेरा खाता हूँ जिसको मैं जानता हूँ । ये कहकर तेज सिंह ने फिर अहमद की गठरी बांधी और एक प्यारे को भेजकर देवीसिंह नामी ए आर को बुलाया जो तीन सिंह का शागिर दिल्ली रोज रिश्ते में साला लगता था तथा यारी के फन में भी तेज सिंह से किसी तरह काम ना था । जब देवीसिंह आ गए तब तेल सिंह ने अहमद कि कंट्री अपनी पीठ पर लादी और देवी सिंह से कहा आओ हमारे साथ चलो तुम से कम है । देवी सिंह ने कहा गुरूजी वो गठरी मुझे दे दीजिए मैं मेरे रहते ये काम आप को अच्छा नहीं लगता है । आखिर देवी सिंह ने वो कंट्री पीठ पर लाद ली और तेज सिंह के पीछे चल पडे । दोनों शहर के बाहर की जंगल और पहाडियों में पेचीदे राष्ट्र में जाते जाते दो कोर्स के करीब पहुंचकर एक अंधेरी खो हमें से थोडी देर चलने के बाद कुछ रोशनी में वहाँ जाकर तेजसिंह ठहर गए और देवीसिंह से बोले कंट्री रखता हूँ देवीसिंह गठरी रखकर । गुरु जी ये तो अजीब जगह अगर कोई आए तो यहाँ से जाना मुश्किल हो जायेगा । तेज सिंह ने कहा सुनो देवी से इस जगह को मेरे सेवायें कोई नहीं जानता हूँ तो उनको अपना दिल्ली दोस्त समझ कर ले आया हूँ । तुम्हें अभी बहुत कुछ काम करना होगा । देवी सिंह ने कहा मैं आपका ताबेदार तुम गुरु हो क्योंकि तैयारी तुम भी ने मुझको सिखाई है । अगर मेरी जान की जरूरत पडे तो मैं देने को तैयार देवसिंह सुनो और जो बातें मैं तुमसे कहता हूँ उनका अच्छी तरह ख्याल रखती हूँ ये सामने जो पत्थर का दरवाजा देखते हूँ इसको खोलना सेवाएँ मेरे कोई भी नहीं जाता या फिर मेरे उस्ताद जिन्होंने मुझको तैयारी सिखाई ले जाते थे । मैं तो अब नहीं है । मर गए इस समय सेवाएँ मेरे कोई नहीं जानता और मैं तुमको इसका खोलना बतलाए देता हूँ । जिस जिस को मैं पकडकर लाया करूंगा । ऐसी जगह लाकर कैसे क्या करूंगा जिससे किसी को मालूम ना वो हर कोई छोडा के बिना ले जा सकते हैं । इसके अंदर कैद करने से कैदियों के हाथ पैर बांधने की जरूरत नहीं होगी । सिर्फ बाजत के लिए एक गिलास ईबीडी उनके पैरों में डाल देनी पडेगी जिससे वो धीरे धीरे चल फिर सके । कैदियों के खाने पीने की भी स्वीकृत उनको नहीं करनी पडेगी क्योंकि इसके अंदर एक छोटी सी कुदरती नहर है जिसमें बराबर पानी रहता है । यहाँ मेवों के डर भी बहुत इसे आपको इसी में कैद करते हैं । बाद इसके महाराज से ये बहाना करके की आजकल मैं बीमार रहता हूँ । अगर एक महीने की छुट्टी मिले तो आबोहवा बदलाव महीने भर की छुट्टी ले लो । मैं कोशिश करके तुम्हें छुट्टी मिला तब तुम भेष बदलकर विजय कर जाओ और बराबर वही रहे । कर इधर उधर की खबर लिया कर जो कुछ मुझसे कहा करो और जब मौका देखो तो बदमाशों को गिरफ्तार करके इसी जगह लाभ उनको भी कैसे कर दिया करो । और भी बहुत सी बातें देवी सिंह को समझाने के बाद तेजसिंह दरवाजा खोलने चले । दरवाजे के ऊपर एक बडा सा चेहरा शेर का बना हुआ था जिसके मूह में हाथ हो भी जा सकता था । तेज सिंह ने देवी सिंह से कहा इस चेहरे की मुँह में हाथ डालकर इसकी जुबान बाहर ही हूँ । देवी सिंह ने वैसा ही किया और हाथ घर के करीब जवान कीजिए । उसकी खींचते ही एक आवाज हुई और दरवाजा खुल गया । अहमद की गठरी लिए हुए दोनों अंदर गए । देवी सिंह ने देखा कि वह खूब खुलासा जगह बल्कि कोस भर का साफ मैदान है । चारों तरफ ऊंची ऊंची पहाडियां जिन पर किसी तरह आदमी चढ नहीं सकता । बीच में एक छोटा सा झरना पानी का बह रहा है और बहुत से जंगली मेवों की तरफ तो से अजब सुहावनी जगह मालूम होती है । चारों तरफ की पहाडियाँ नीचे से ऊपर तक छोटे छोटे कर्ज भी घूम जी बेर म कोई ये चिरौंजी वगेरह की घने तरख् तो और लगाओ से भरी हुई है । बडे बडे पत्थर के ढो के मस्त हाथ की तरह दिखाई देते हैं । ऊपर से पानी गिर रहा है जिसकी आवाज बहुत गाली मालूम होती है । हवा चलने से पेडों की सरसराहट और पानी की आवाज तथा बीच में मोरों का शोर और विधेयको खींच लेता है । नीचे जो चश्मा पानी का पश्चिम से पूरब की तरफ घूमता हुआ बह रहा है, उसके दोनों तरफ जामुन के पेड लगे हुए हैं और पके जामुन चश्मे के पानी में गिर रहे हैं । पानी भी चश्मे का इतना साफ है कि जमीन दिखाई देती है, कहीं हाथ भर कहीं कमर बराबर कहीं उससे भी ज्यादा को पहाडों में कुदरती खोखा बने हैं, जिनके देखने से मालूम होता है कि मानव ईश्वर यहाँ सैलानियों के रहने के लिए कोठरिया बनानी है । चारों तरफ की पहाडियाँ हलवा और बनी वस्त्र नीचे ऊपर से ज्यादा खुलासा थी और उन पर बादलों के टुकडे छोटे छोटे शामियानों का मजा दे रहे थे । ये जगह ऐसी सुहावनी थी कि वर्षों रहने पर भी किसी की तबियत ना घबराए बल्कि खुशी मारूँ सुबह हो गई । सूरज निकल आया तेज सिंह ने अहमद की घटना हुई उसका यारी का बटुआ और खंजर जो कमर में बंदा था, ले लिया और एक बेटी उसके पैर में डालने के बाद होशियार क्या जब अहमद होश में आया और उसने अपने को इस दिलचस्प मैदान में देखा तो यकीन हो गया कि वो मर गया और फरिश्ते उसको यहाँ पे आए हैं लगा कलमा पढने तेज सिंह के उसके कलमा पडने पर हंसी आई बोले फॅसा आप हमारे कैदी है इधर देखिए अहमद ने तेज सिंह की तरफ देखा पहचानते ही जान सूखेंगी समझ गया कि तब ना मरे तो अब मारे बीवी थी कि सूरत आंखों के सामने फेल गई । आपने उसका गला ऐसा दबाया की एक हर भी मुझसे नहीं कर सकता । अहमद को उसी मैदान में चश्मे के किनारे छोड दोनों यार बाहर निकल आए । तेज सिंह ने देवी सिंह से कहा शेयर की जुबान जो तुमने बाहर खींच ली है, उसी के मुंह में डाला देवी सिंह ने वैसा ही किया । जबान उसके मुंबई डालते ही जोर से दरवाजा बंद हो गया और दोनों आदमी उसी पेचीदी रह से घर की तरफ रवाना शहरभर दिन चढा होगा जब ये दोनों लौटकर वीरेंद्र सिंह के पास पहुंचे । वीरेंद्र सिंह ने मुझे अहमद को कहाँ कैद करने ले गए थे? कितनी देर लग गई? तेज सिंह ने जवाब दिया एक पहाडी खो हमें कैद कर आया हूँ । आज आपको भी वह जगह दिखाऊंगा पर मेरी जाए हैं कि देवीसिंह थोडे दिन भी इस बदलकर विजयगढ में ऐसा करने से मुझे बडी मदद मिलेगी इसके बाद वो सब बातें भी वीरेंद्र सिंग ओके है । सुना ही जो हो हमें देवी सिंह को समझा ही नहीं और जो कुछ राइट हैरी थी वही कहा जिससे वीरेंद्र सिंह ने बहुत स्नान पूजा और मामूली कामों में फुर्सत पा । दोनों आदमी देवी सिंह को साथ लिए राज दरबार में गए । देवी सिंह ने छुट्टी के लिए आज क्या राजा देवी सिंह को बहुत चाहती थी । छुट्टी देना मंजूर ना था । कहने लगे हम तुम्हारी दवा यहाँ ही कराएंगे । आखिर नरेंद्र सिंह और तेज सिंह की सिफारिश से छुट्टी में दरबार बर्खास्त होने पर वीरेंद्र सिंह राजा के साथ महल में चले गए और तेजसिंह से अपने पिता जीत सिंह के साथ घर आएँ । देवी सिंह को भी साथ ले आए और सफर की तैयारी कर उसी समय उनको रवाना कर दिया जाती । दफा उन्हें और भी बातें समझाते । दूसरे दिन तेजसिंह अपने साथ वीरेंद्र सिंह को उस घाटी में ले गए जहां अहमद को कैद किया था । कुमार उस जगह को देख कर बहुत ही खुश हुए और बोले भाई इस जगह को देख कर तो मेरे दिल में बहुत सी बातें पैदा होती है । तेज सिंह ने कहा पहले पहले जगह को देख कर मैं आप से भी ज्यादा हैरान हुआ था । मगर गुरूजी ने बहुत कुछ हाल वहाँ का समझा घर मेरे दिल जमाई कर दी थी जो किसी दूसरे व्यक्ति आपसे कहूंगा । वीरेंद्र सिंग इस बात का शंकर और भी हैरान हुए और उस घाटी की कैफियत जाने के लिए जिद करने लगी । आखिर तेज सिंह ने वहाँ का हाल जो कुछ अपने गुरु से सुना था कहा । जिसे सुनकर वीरेंद्र सिंह बहुत प्रसन्न हुए । देर सिंह ने वीरेंद्र सिंह से कहा वो इतना खुश क्यों हुए और ये घाटी कैसी थी ये संभाल किसी दूसरे मौके पर बयान किया जाएगा । वो दोनों वहां से रवाना होकर अपने महिला कुमार ने कहा भाई अब मेरा फैसला बहुत बढ गया है । जी में आता है कि जयसिंह से लड जाऊँ । तेज सिंह ने कहा आपका हौसला ठीक है मगर जल्दी करने से चंद्रकांता की फॅमिली आप इतना घबराते क्यों गए? देखिए तो क्या होता है कल मैं फिर जाऊँ और मालूम करूंगा कि अहमद के पकडे जाने से दुश्मनों की क्या कैफियत हुई । फिर दूसरी बार आपको ले चलूँ । वीरेंद्र सिंह ने कहा नहीं अब की बार मैं जरूर चलो । इस रहा एकदम डरपोक हो कर बैठे रहना मरीजों का काम नहीं तेज सिंह ने कहा अच्छा आप भी चलिए हर्ज क्या है पकडे कम होना जरूरी है । जो ये कि महाराज से पांच चार रोज के लिए शिकार की छुट्टी लीजिए और अपनी सरहद पर डेरा डाल दीजिए वहाँ से कुछ ढाई को चंद्रकांता का महल रह जाएगा । तब भारत रहा का सुविधा होगा । इस बात को वीरेंद्र सिंह ने भी पसंद किया और आखिर यही राय पक्की ठहरे । कुछ दिन बाद नरेंद्र सिंह ने अपने पिता सुरेंद्र सिंह से शिकार के लिए आठ दिन की छुट्टी ले ली और थोडे से अपने दिल्ली आदमियों को जो खास उन्हीं के खेत माटी थे और उनको जान से ज्यादा चाहते थे । साथ ले रवाना हुआ थोडा सा दिन बाकी था । तब नौगढ और विजयगढ के सिर्फ आने पर इन लोगों का डेरा बढ गया । रात भर वहाँ मुकाम रहा और ये राय हैरी के पहले तेजसिंह विजयगढ जाकर हाल चाल ले आए ।

Chapter 7

बयान सातवाँ अहमद के पकडे जाने से ना जी बहुत उदास हो गया और क्रूर सिंह को तो अपने ही फिक्र पड गई कि कहीं तेज सिंह मुझको भी ना पकडने जाएगी । इसको आपसे वोह हरदम चौकन्ना रहता था मगर महाराज जयसिंह के दरबार में रोज आता और नरेंद्र सिंह के प्रति उनको भडकाया करता हूँ । एक दिन आजीवन एक रूम सिंह को ये सलाह दी कि जिस तरह हो सके अपने बाप भूपत सिंह को मार डालो और उसके मरने के बाद जयसिंह जरूर तुमको मंत्री यानी कि वजीर बनाएंगे । उस वक्त भारी हुकूमत हो जाने से सब काम बहुत जल्द होगा । आखिर करोड सिंह ने जहर गलवा कर अपने पाप को मरवा । महाराज ने कुंवर सिंह के मरने पर अफसोस किया और कई दिन तक दरबार में ना शहर में उपर सिंह के मरने का काम छा गया । क्रूर सिंह ने जाहिर में अपने बाप के मरने का भारी मातम किया और बारह रोज के वास्ते अलग बिस्तर जमा दिन भर तो आपने बात को रोता पर रात को नाजीम के साथ बैठकर चंद्रकांता से मिलने तथा तेज सिंह और वीरेंद्र सिंह को गिरफ्तार करने की फिक्र करता । इन्हीं दिनों वीरेंद्र सिंह ने भी शिकार के बहाने विजयगढ की सरहद पर हेमा डाल दिया था । जिसकी खबर नाजीम ने क्रूर सिंह को पहुंचाई और कहा वीरेंद्र सिंह जरूर चंद्रकांता की फिक्र में आया है । अब तो इस समय अहमद ना हुआ नहीं तो बडा काम निकल जाए हैं देखा जाएगा वाह वाह रोडसिंह सुविधा हो । बालादेवी तो लेने के लिए कस्ट करने के वास्ते चला गया । तेज सिंह नरेंद्र सिंह से रुखसत हो विजयगढ पहुंचे और मंत्री के मरने तथा शहरभर में कम खाने का हाल लेकर नरेंद्र सिंह के पास लौट है । ये भी खबर लाये की दो दिन बाद सूतक निकल जाने पर महाराज जयसिंह क्रूर को अपना दीवान बनाएगी । वीरेंद्र सिंह ने कहा देखो क्रूर ने अपनी बात को मार्डल अगर राजा को भी मार डाले तो ऐसे आदमी का क्या ठिकाना । तेज सिंह ने कहा सच है वो नालायक जहाँ तक भी होगा राजा पर भी बहुत जल्द हाथ भरेगा अस्तु अब मैं दो दिन चंद्रकांता के महल में ना जाकर दरबार ही का हालचाल लूंगा । हाँ इस बीच में अगर मौका मिल जाए तो देखा जाएगा । वीरेंद्र सिंह ने कहा तो सब कुछ नहीं चाहे जो आज मैं चंद्रकांता से जरूर मुलाकात करूंगा । तेज सिंह ने कहा आप जल्दी ना करें जल्दी ही सब कामों को बिगाडती है । वीरेंद्र सिंह ने कहा जो भी हो मैं तो जरूर जाऊंगा । तेज सिंह ने बहुत समझाया मगर चंद्रकांता की जुदाई में उनको खिला बुरा क्या सोचता था एक नामानि और चलने के लिए तैयार हो ही गए । आखिर तेज सिंह ने कहा है नहीं मानते तो चलिए जब आप की ऐसी मर्जी है तो हम क्या करें? जो कुछ होगा देखा जाएगा । शाम के वक्त ये दोनों टहलने के लिए खेलने के बाहर निकले और अपने प्यादों से कह गए कि अगर हम लोगों के आने में देर हो तो खबर आना टहलते हुए दोनों विजयगढ की तरफ रवाना कुछ रात गयी होगी जब चंद्रकांता की उसी नजरबाग के पास पहुंचे जिसका हाल पहले लिख चुके हैं, रात अंधेरी थी इसलिए इन दोनों को बाद में जाने के लिए कोई आश्चर्य ना करना पडा । पहले वालों को बचाकर कमंड फेंका और उसके जरिए बात किया । नये घरे बेड के नीचे खडे हो । इधर उधर निगाह दौडा कर देखने लगे । बाप के बीचोंबीच संगमरमर की एक साफ चिकने चबूतरे पर मोमी शानदान चल रहा था । चंद्रकांता चपला और चंपा बैठी बातें कर रही थी । चपला बातें भी करती जाती थी और इधर उधर तेजी के साथ निकाह भी दौडा रही थी । चंद्रकांता को देखते ही वीरेंद्र सिंह का जब हाल हो गया, बदन में कब कभी होने लगी यहाँ की बेहोश होकर गिर पडे । मगर वीरेंद्र सिंह की ये हालत भी तेज सिंह पर कोई प्रभाव ना हुआ । झट अपनी सारी बातें वैसे लख लगाने कहा सुंघा दिया और वो मिलाकर कहा देखिए दूसरों के मकान में आपको इस तरह बेसुध होना चाहिए । अब आप अपने को संभालिये और सी जगह है । मैं जाकर बात कराओ । तब आप को लेकर ये कहकर उन्हें उसी पेड के नीचे छोड उस जगह गए जहां चंद्रकांता, चपला और चंपा बैठी थी । तेज सिंह को देखते ही चंद्रकांता कोई क्या जी इतने दिन कहा रहे क्या ॅ आपकी आए तो खेली क्या? वास ऐसा ही था तो हाथ में छोडी पहन लेते हैं । शर्मिंदा होगा कि डीन कुमार देखो जब उनकी मोहब्बत का यही हाल है तो मैं जी कर क्या करूंगी? कहकर चंद्रकांत होने लगी । यहाँ तक कि हिचकी बन गई । तेजसिंह उसकी हालत देख बहुत घबराए और बोले बस इसी को नादानी कहते हैं । अच्छी तरह हाल बिना पूछा और लगी रोने ऐसा ही है तो उनको लिए आता हूँ । ये कहकर तेजसिंह वहाँ गए जहाँ नरेंद्र सिंह को छोडा था और उनको अपने साथ ले । चंद्रकांता के पास लौटे । चंद्रकांता वीरेंद्र सिंह के मिलने से बडी खुश हुई । दोनों मिलकर खूब रोइ यहाँ तक कि बेहोश हो गए । मगर थोडी देर बाद होश में आ गए और आपस में शिकायत मिली मोहब्बत की बात करने लगे । अब जमाने का उलटफेर देखिए घूमता फिरता ऑटो लगातार नाजीम भी उसी जगह पहुंचा और दूर से इन सभी की खुशी मारी । मजलिस देखकर जलमाना तुरंत ही लॉर्ड कर करोड सिंह के पास पहुंचा । करोड सिंह ने नाजीम को घबराया हुआ देख और पूछा क्या हाँ क्या बात है जो तुम इतना घबराए हुए हो? नाजीम ने कहा है क्या? जो मैं सोचता था वही हुआ । यही वक्त चालाकी का है । अगर अब भी कुछ ना बन पडा तो बस तुम्हारी किस्मत फूट गई । ऐसा ही समझना पडेगा करोड सिंह ने कहा तुम्हारी बात है तो कुछ समझ में नहीं आती । खुलासा कहूँ क्या बात है ना । चीन ने कहा खुलासा बस यही है कि वीरेंद्र सिंह चंद्रकांता के पास पहुंच गया और इस समय बाग में हसी के कहे रहे उड रहे हैं । यह सुनते ही क्रूर सिंह की आंखों के आगे अंधेरा छा गया । दुनिया उदास मालूम होने लगी कहाँ तो बात की जाहिरी काम में वह सर मुंडाए बरसाती मेंढक बना बैठा था तरह रोज कहीं बार जाने को हो ही नहीं सकता था । मगर इस खबर ने उसको अपने यहाँ पे में ना रहने दिया । फौरन खडा हुआ और उसी तरह लंग खतम आंधी हाडी सासर लिए महाराज जयसिंह के पास पहुंचा जयसिंह क्रूर सिंह को इस तरह आया देख हैरान हो रोडसिंह सूतक और बाप का काम छोडकर तुम्हारा इस तरह हाना मुझको हैरानी में डाल रहा है । क्रोड सिंह ने कहा महाराज हमारे पास तो आप उन्होंने तो पैदा किया परवरिश आप की बदौलत होती है । जब आप की जब मैं बता लगा तो मेरी जिंदगी किस काम की है और मैं किस लाएगी? ना जाऊँ जयसिंह गुस्से में आकर करोड से ऐसा कौन है जो हमारी जब बिगाडे क्रूर सिंह ने कहा एक अपना आदमी जैसे दाद पीसकर जल्दी बताओ कौन हैं जिसके सिर पर मौत सवार हुई है? वीरेंद्र सिंह क्रोड सिंह ने कहा जयसिंह ने कहा उसकी क्या मजाल जो मेरा मुकाबला करें । इज्जत बिगाडना तो दूर की बात है । तुम्हारी बात को समझ में नहीं आती है । साफ साफ जल्द बताओ क्या बात है? वीरेंद्र सिंह कहा है क्रूर सिंह ने कहा आपके चोर महल के बाद में ये सुनते ही महाराज का बदल हमारे गुस्से के काफी लगा तब कर दिया अभी जाकर बात को खेर हो । मैं कोर्ट की रहा, वहाँ जाता हूँ ।

Chapter 8

बयान आज वीरेंद्र सिंह चंद्रकांता से मीठी मीठी बातें कर रहे हैं । चपला से तेजसिंह उलझ रहे हैं । चंपा विचार इन लोगों का मूत आ रही है । अच्छा है कि काला कलूटा आदमी सिर से पैर तक आबनूस का कुंदा लाल लाल आंखें लंगोटा कैसे उछलता कूदता । इन सब के बीच में आ खडा हुआ । पहले तो ऊपर से नीचे के नीचे दाद खोल तेजसिंह की तरफ दिखाया । तब बोला खबरि भाई राजा को तुम्हारी सुनो गुरूजी में रहे । इसके बाद चलता पूछता चला गया जाती दफा चंपा की टांग पकड थोडी दूर घसीटता ले गया आखिर छोड दिया । ये देख सब हैरान हो गए और डर गए कि ये प्रशास कहाँ से आ गया? जंपा बिचारी तो चिल्ला उठी मगर तेज सिंह फौरन खडे हुए और वीरेंद्र सिंह का हाथ पकड के बोले चलो जल्दी उठो, अब बैठने का मौका नहीं । चंद्रकांता की तरफ देखकर बोले हम लोगों की जल्दी चले जाने का सिस्टम मत करना और जब तक महाराज यहाँ ना आए इसी तरह सब की सब बैठे रहना । चंद्रकांता ने कहा इतनी जल्दी करने का सबका क्या है? और ये कौन था जिसकी बात सुनकर भागना पडा । तेजसिंह जल्दी से बोला आप बात करने का मौका नहीं रहा । ये कहकर वीरेंद्र सिंह को जबरदस्ती उठाया और साथ ले कमंड के जरिए बाप के बाहर हो गए । चंद्रकांता को वीरेंद्र सिंह का इस तरह चला जाना बहुत बुरा मान आंखों में आंसू पर चपला से बोली ये क्या तमाशा हो गया कुछ समझ में नहीं आता उस प्रशासको देखकर मैं कैसी डर ही मेरी कल इसी पर हाथ रखकर देखो । अभी तक घर चला रहा है तुम्हें क्या ख्याल क्या जब लाने का कुछ ठीक समझ में नहीं आता । हाँ इतना जरूर है कि इस समय नरेंद्र सिंह की यहाँ आने की खबर महाराज को हो गई है तो जरूर आते होंगे । चंबा बोलेगी ना मालूम को मुझ से क्या दुश्मनी थी । चंबा की बात पर चपला को ऐसी आ गई मगर हैरान थी कि ये क्या खेल हो गया । थोडी देर तक किसी तरह की ताज्जुब परी बातें होती रही । इतने में ही बाकी चारों तरफ शोरगुल की आवाज यानी चपला ने कहा रंग बुरे नजर आने लगे । मालूम होता है बात तो सिपाहियों ने घेर बात पूरी बिना हो पाई थी कि सामने महाराज आते हुए दिखाई पडी । देखते ही देखते सबकी सबकुछ खडी हुई । चंद्रकांता ने बढकर पिता के आगे सर चुका है और कहा इस समय आप की का एक आने इतना कहकर चुप हो रहे हैं । जयसिंह ने कहा सोचना ही तो मैं देखने को जी चाहा इसलिए चले आए । अब तुम भी महल में जाओ यहाँ क्यों बैठी हूँ । ओस पडती है तुम्हारी तबियत खराब हो जाएगी । ये कहकर महल की तरफ रवाना हुए चंद्रकांता चपला और चंपा भी महाराज के पीछे पीछे महल में नहीं । जयसिंह अपने कमरे में आये और मन में बहुत शर्मिंदा होकर कहने लगे देखो हमारी भोली भाली लडकी को करोड सिंह झूठ मोड पर नाम करना है ना मालूम नहीं है कि जी में क्या समाई है । बेधडक कुछ बिचारी को ऐड लगा दिया । अगर लडकी सुनेंगे तो क्या कहेगी ऐसे शैतान का तो मुन्ना देखना चाहिए बल्कि सजा देनी चाहिए जिससे फिर ऐसा कमीना बनना करेंगे । ये सोच हरी सिंह नाम के एक चोपदार को उपमा दिया कि बहुत जल्द करोड सिंह को हासिल करें । हरीसिंह क्रूड सिंह को खोजता हुआ और पता लगता हुआ बाप के पास पहुंचा जहाँ वो बहुत से आदमियों के साथ खुशी खुशी बात को घेरे हुए । हरी सिंह ने कहा चलिए महाराज ने बनाया है जरूर सिंह घबराओ आपकी महाराज ने क्यों बोला क्या चोर नहीं मिला? महाराज तो मेरे सामने महल में चले गए थे । हरिसिंह से पूछा महाराज क्या कह रहे हैं? उसने कहा अभी महल से आए गुस्से से भरे बैठे हैं । आपको जल्दी बुलाया है । ये सुनते ही क्रूर सिंह की नानी मर गई । डरता का अब तक रोडसिंह महाराज के पास होना चाहिए । महाराज ने क्यूँ सिंह को देखते ही कहा कि वो बैक रूप प्रचारी । चंद्रकांता को इस तरह सूटबूट बदनाम करना और हमारी इज्जत में बता लगाना यही तेरा काम है । ये कितने आदमी जो बात को घेरे हुए हैं अपने जी में क्या कहते होंगे? नालायक गधा पाजी तुम्हें कैसे कहा की मैं नरेन्द्र हैं हमारे गुस्से के महाराज जयसिंह के होट काँप रही थी आखिरी लाल हो रही थी ये कैफियत एक रूट सिंह की तो जान सूख गई । खबर आकर बोला मुझको तो ये खबर नाजीम ने पहुंचाई थी जो आजकल महल के पहले पर मुकर्रर है । यह सुनते ही महाराज ने मार दिया । बताओ ना जी को थोडी देर में नाजीम भी हासिल किया गया । गुस्से से भरे हुए महाराज के मुझसे साफ आवाज नहीं निकलती थी । टूटे फूटे शब्दों में नसीम से पूछा क्या मैं तूने कैसी खबर पहुंचाई? उस वक्त डर के मारे उसकी क्या हालत थी वही जानता होगा । जीने से नाउम्मीद हो चुका था । डरता हुआ बोला मैंने तो अपनी आँखों से दिखाता हूँ शायद किसी तरह भाग गया होगा जयसिंह से गुस्सा बर्दाश्त हो सका तुकबंदियां पचास कोडे क्रूर सिंह को और दो सौ कोडे नाजीम को लगाए जाएंगे । मस्जिद में ही छोड देता हूँ आगे फिर कभी ऐसा हुआ तो सर उतार लिया जाएगा । क्रूर तो वसीर होने के लायक नहीं है । आप क्या लगे दो तरफ भी कोने पडने उन लोगों की चिल्लाने से महल कोई झूठा मगर महाराज का स्थान आ गया । जब दोनों पर कोडे पढ चुके हैं तो उनको महल के बाहर निकलवा दिया और महाराज आराम करने चले गए । मगर मारे गुस्से के रात भर नहीं नींद राय क्रूर सिंह और नाजीम दोनों खराब है और एक जगह बैठकर लगे जगह नहीं क्रूर नाजीम से कहने लगा तेरी बदौलत आज मेरी जेब मिट्टी में मिल गई । कल दीवान होंगे ये उम्मीद देना रही मार खाई उस की तकलीफ मैं ही जानता हूँ ये तेरी ही बदौलत हुआ । नाजीम कहता था मैं तुम्हारी बदौलत मारा गया नहीं तो मुझको क्या काम था । जहन में जाती चंद्रकांत और वीरेंद्र मुझे क्या बडी जीजू देखा था ये दोनों आपस में योगी पहाडों झगडते रहें । अंत में क्रूर सिंह ने कहा हम तुम दोनों पर लाना चाहिए अगर इतनी सजा पाने पर भी वीरेंद्र को गिरफ्तार नहीं किया था ना । चीन ने कहा, इसमें कोई शक नहीं कि वीरेंद्र रोज महल में आया करेगा क्योंकि इसी वास्ते वो अपना डेरा सरहद पार ले आया है । मगर अब कोई काम करने का हौसला नहीं पडता । कई फिल्में देखो और खबर करने वो दोबारा निकल जाए तो जरूर ही जान से मारा जाऊंगा । क्रूर सिंह ने कहा, तब तो कोई ऐसी तक की करनी चाहिए जिससे जान भी बच्चे पर वीरेंद्र सिंह को अपनी आंखों से महाराज जयसिंह महल में तो एक भी थे । बहुत देर सोचने के बाद नाजीम ने कहा चुनारगढ महाराज । शिवदत्त सिंह के दरबार में पंडित जगन्नाथ नामी छोटी सी है जो नॉर्मल भी बहुत अच्छा जाते हैं । उनके रमल देखने में इतनी तेजी है कि जब चाहो पूछ लो कि फलाना आदमी इस समय कहा है क्या कर रहा है या कैसे पकडा जाएगा । वो फौरन बदला लेते हैं । उनको अगर मिलाया जाये और वो यहाँ पर और कुछ दिन रहे कर तुम्हारी मदद करें तो सारे काम भी हो जाएंगे । चुनारगढ यहाँ से बहुत दूर भी नहीं है कुल तीस कोर्स है चलो हम तुम चले और जिस तरह बन पडे उन्हें ॅ । आखिर करोड सिंह ने बहुत से हीरे जवाहरात अपनी कमर में पांच दो तेज घोडे मंगवाना आजीम के साथ सवार हो उसी समय चुनारगढ की तरफ रवाना हो गया और घर में सब से कह गया की अगर महाराज के यहाँ से कोई आए तो कह देना की क्रूर सिंह बहुत बीमार है ।

Chapter 9

बयान नहीं वीरेंद्र सिंह और तेज सिंह बात के बाहर से अपने खेमे की तरफ रवाना हुई । जब खेमें में पहुंचे तो आधी रात भी चुकी थी । मगर तीन सिंह को कब चैन पडता था वीरेंद्र सिंह को पहुंचाकर फिर लौटे और अहमद कि सूरत बनाक रोडसिंह के मकान पर पहुंचे क्रूर सिंह चुनारगढ की तरफ रवाना हो चुका था । जिन आदमी को घर में ही पास सबके लिए छोड दिया था और कहा गया था कि अगर महाराज पूछे तो कह देना बीमार है तो उन लोगों ने एकाएक अहमद को देखा तो ताज्जुब से पूछा कहाँ कहाँ थी अब तक नकली? अहमद ने कहा मैं जहाँ उनके शहर करने के लिए अब लौट कर रहे हैं ये बताओ की क्रूर सिंह कहाँ है । सभी ने उसको पूरा पूरा हाल सुना है और कहा अब चुनारगढ गए हैं तुम भी वही जाती तो अच्छा होता । अहमद ने कहा हाँ मैं भी जाता हूँ आप करना चाहूँगा, सीधे चुनारगढ की पहुंचता हूँ, एक है वहाँ से रवाना हो अपने खेमे में आए और वीरेंद्र सिंह से संभाल का बाकी राधा राम क्या सवेरा होते ही नहीं । हाँ वो कुछ भोजन कार्य सूरत बदल विजयगढ की तरफ रवाना नंगे सिर हाथ पैर ऊपर धूल डाले । रोते पीटते महाराज जयसिंह के दरबार में पहुंच । इनकी हालत देखकर सब हैरान हो गया । महाराज ने मुझ से कहा वो जो काम है और क्या कहता है तेज सिंह ने कहा वो जो मैं क्रूर सिंह का नौकर मेरा नाम रामलाल महाराज से बागी होकर क्रूर सिंह चुनारगढ के राजा के पास चला गया है । मैंने माना गया कि महाराज का नमक खाकर ऐसा नहीं करना चाहिए जिस पर मुझको खूब मारा और जो कुछ मेरे पास था सब छीनी आए । मैं तो बिलकुल टूट गया । एक कौडी भी नहीं बचेगी । अब क्या खाऊंगा घर कैसे पहुंचूंगा? लडके बच्चे तीन बरस की कमाई खोजेंगे । कहेंगे कि राज्य वाणी की क्या कमाए लायेंगे उनको क्या दूंगा? दुआई महाराज की दवाई दुआई बडी मुश्किल से सभी ने उसे चुप कराया । महाराज को बडा गुस्सा आया हूँ मैं दिया क्रूर सिंह कहा है चोपदार खबर लाएगा । बहुत विमान है उठ नहीं सकते रामलाल यानी कि तेजसिंह बोला दुआई महाराज की ये भी उन्हीं की तरफ मिल गया । झूठ बोलता है मुसलमान सब उसके दोस्त है दुआई महाराज खूब तहकीकात की जाए । महाराज ने मुझसे कहा तुम जाकर पता लगाओ कि क्या मामला है । थोडी देर बाद मच्छी वापस आए और बोले महाराज करोड सिंह घर पर नहीं है और घर वाले कुछ बताते नहीं की कहाँ गए? महाराज ने कहा जरूर चुनारगढ गया होगा अच्छा उसके यहाँ किसी प्यार को बुलाओ तो पार्टी ही चोपदार गए और किस्मत के आने को पकडना । महाराज ने पूछा क्रूर सिंह कहाँ है? प्यार देने की पता नहीं दिया । रामलाल ने फिर कहा दुबई महाराज की बिना मार खाया ना बताएगा । महाराज ने मारने का नहीं पडने के पहले ही उस बदनसीब ने बदला दिया कि चुनारगढ गए महाराज जयसिंह को करोड का हाल सुनकर जितना गुस्सा आया बयान के बाहर है । खुद दिया क्रूर सिंह के घर के सब औरत मर्द घंटे भर के अंदर जान बचाकर हमारी सरहद के बाहर हो जाए, उसका मकान लूट लिया जाए । उसकी दौलत में से जितना रुपया अकेला रामलाल खाले जा सके, ले जाए । बाकी सरकारी खजाने में साथ क्या चाहिए? रामलाल अगर नौकरी का बोल करे तो दी जाए । हो पाते कि सबसे पहले रामलाल क्रूर सिंह के घर पहुंचा । महाराज के मन चीजों को मैं तामिल करने गया था । रामलाल ने कहा पहले मुझको रुपये दे दो की उठा ले जाओ और महाराज को आशीर्वाद बस जल्दी दो । मुझे गरीब को मत सता हूँ । मुंशी ने कहा गजब आदमी है इसको अपनी पडी है ठहर जा जल्दी क्यों करता है नकली । रामलाल ने चिल्लाकर कहना शुरू किया तो आई महाराज की मेरे रुपए मुझे नहीं नेता कहता हुआ महाराज की तरफ चला । मुझे का लो लोग जाते कहा हो भाई, पहले इसको ले दो । रामलाल ने कहा हर तेरी की मैं चिल्लाता नहीं तो सभी रुपये डकार जाता हूँ । इस पर सब हंस पडे । मुझे दो हजार रुपये आगे रखवा दिया और कहा ले ले जाओ राम नाली का तो कुछ याद है महाराज ने क्या हुक्म दिया है । इतना तो मेरी जेब में आ जाएगा । मैं उठा के क्या ले जाऊंगा मुझे झुंझला उठा नकली रामलाल को खजाने के संदूक के पास ले जाकर खडा कर दिया और कहा उठा देख कितना उठाता हैं । देखते देखते उसमें दस हजार रुपए सिर पर, बटुए में, कमर में, जेब में यहाँ तक की मूवी में भी कुछ रुपये भर लिया और रास्ता दिया । तब हसने और कहने लगे आज भी नहीं इससे राष्ट्र समझना चाहिए । महाराज के हुक्म की तामील की घर लूट लिया गया औरत मार्ग सभी ने रोते पीटते चुनारगढ का रास्ता तेजसिंह रुपया लिए हुए वीरेंद्र सिंह के पास पहुंचे और बोले आज तो मुनाफा कमा लिए मगर यार माल शैतान का है । इसमें कुछ आप भी मिला दीजिए जिससे पास हो जाए । वीरेंद्र सिंह ने कहा ये तो बताओ कि लाये कहाँ से? उन्होंने सब हाल का । वीरेंद्र सिंह ने कहा जो कुछ मेरे पास यहाँ हैं, मैंने सब दिया । तेज सिंह ने कहा था मगर शर्त ये है कि उससे कम नहीं हूँ क्योंकि आपका भेदभाव से कहीं ज्यादा है । वीरेंद्र सिंह ने कहा तो इस वक्त हासिल हैं । तेज सिंह ने जवाब दिया दमा, सिख लिख तो कुमार हस पडे और उंगली से हीरे की अंगूठी उतारकर दी हुई तेज सिंह ने खुश होकर ले ली और कहा परमेश्वर आपकी हर मुराद पूरी करें । अब हम लोगों को भी यहाँ से अपने घर चले जाना चाहिए क्योंकि अब मैं चुनारगढ जाऊँ । देखो तो शैतान का बच्चा वहाँ क्या बंदोबस्त कर रहा है ।

Chapter 10

बयान दसवा क्रूर सिंह की तबाही का हाल शहर भर में फैल गया । महारानी रत्नगर्भा चंद्रकांता की माँ और चंद्रकांता इन सभी ने भी सुना । कुमारी और सपना को बडी खुशी हुई । जब महाराज महल में गए तो हंसी हंसी में महारानी ने एक रोड सिंह का हाल पूछा । महाराज ने कहा वो बडा बदमाश तथा झूठा था । मुफ्त में लडकी को बदनाम करता हूँ । महारानी ने बात छेडकर कहा आपने क्या सोचकर वीरेंद्र का आना जाना बंद कर दिया? देखिए ये वहीं वीरेंद्र है जो लडकपन से जब चंद्रकांता पैदा भी नहीं हुई थी । यहीं आता और कई कई दिनों तक रहता था तो जब ये पैदा हुई तो दोनों बराबर खेला करते और इसी से दोनों की आपस की मोहब्बत भी बढ गई । उस वक्त ये भी नहीं मालूम होता था कि आप और राजस्व रेंद्र सिंह कोई दो है या नौ बढिया विजयगढ दो रजवाडे हैं । सुरेंद्र सिंह भी बराबर आपकी के कहे मुताबिक चला करते थे । कई बार आप कह भी चुके थे कि चंद्रकांता की शादी वीरेंद्र के साथ कर देनी चाहिए । ऐसे मेल मोहम्मद और आपस के बना कोर्स दृष्टि क्रूर ने बिगाड दिया और दोनों के चित्र में मैं पैदा कर दिया । महाराज ने कहा, मैं हैरान हूँ कि मेरी बुद्धि को क्या हो गया था । मेरी समझ पर पत्थर पडेंगे । कौन सी बात ऐसी हुई जिसके सबका से मेरे दिल से वीरेंद्र सिंह की मोहब्बत जाती रही । खाएँ इस क्रूर सिंह ने दब गजब ही क्या? इसके निकल जाने पर अब मुझे मालूम होता है । महारानी ने कहा देखिए अब चुनारगढ में जाकर क्या करता है । जरूर महाराज शिवदत्त को भडकाएगा और कोई नया बखेडा पैदा करेगा । महाराज ने कहा खैर देखा जाएगा परमेश्वर मालिक है । उस नालायक ने तो अपनी भरसक बुराई में कुछ भी कमी नहीं । ये कहकर महाराज महल के बाहर चले गए । अब उनको ये फिक्र हुई कि किसको दीवान बनाना चाहिए, नहीं तो काम नहीं चलेगा । कई दिन तक सोच विचारकर हरदयालसिंह नामी नायब दीवान वो मंत्री की पदवी और खिला दी ये शख्स बडा ईमानदार ने एक वक्त रहमदिल और साफ तबियत का था । कभी किसी का दिल इसने नहीं दिखाया ।

Chapter 11

बयान ग्यारवां क्रूर सिंह को बस एक यही फिक्र लगी हुई थी कि जिस तरह बने वीरेंद्र सिंह और तेज सिंह को मार डालना ही नहीं चाहिए बल्कि नौगढ कर राज्य ही गारत कर देना चाहिए । नाजीम को साथ लिए चुनारगढ पहुंचा और शिवदत्त के दरबार में हाजिर होकर नजर दिया । महाराज से बखूबी जानते थे इसलिए नजर लेकर हाल पूछा । क्रूड सिंह ने कहा महाराज जो कुछ हाल है मैं कांत में कहूंगा । दरबार बर्खास्त हुआ, शाम को तकलीफ एकांत में महाराज ने क्रूर को बुलाया और हाल पूछे । उसने जितनी शिकायत महाराज जयसिंह की करते बनी की और ये भी कहा लश्कर का इंतजाम आजकल बहुत खराब है । मुसलमान सब हमारे मेल में हैं । अगर आप चाहे तो इस समय विजयगढ को फताह कर लेना कोई मुश्किल बात नहीं है । चंद्रकांता महाराज जयसिंह की लडकी भी जो खूबसूरती में अपना कोई सानी नहीं रखती । आप ही के हाथ लगी ऐसी ऐसी बहुत सी बातें के है उसने महाराज शिवदत्त को उसने पूरे तौर से भडकाया । आखिर महाराज ने कहा हमको लडने की अभी कोई जरूरत नहीं है । पहले हम अपने यारो से कम लेंगे, फिर जैसा होगा देखा जाएगा । मेरे यहाँ छह तैयार हैं, जिनमें से चार तैयार हो के साथ पंडित जगन्नाथ ज्योतिषी को तुम्हारे साथ कर रहे थे । इन सभी को लेकर तुम जाओ देखो तो ये लोग क्या करते हैं पीछे जब मौका होगा हम भी लश्कर लेकर पहुंच जाएंगे । वो तैयार हो के नाम थे पंडित बद्रीनाथ, पन्ना लाल, रामनारायण, भगवान दक्ष और घसीटा । सिंह महाराज ने पंडित बद्रीनाथ, रामनारायण भगवान दर्ज पर घसीटा । सिंह इन चारों को जो मुनासिब था कहा और इन लोगों को क्रूर सिंह के हवाले किया । अब ये लोग बैठे ही थे कि चोपदार ने आकर और क्या महाराज डॅडी पर कई आदमी फरयादी खडे हैं । कहते हैं हमलोग रोडसिंह के रिश्तेदार हैं । इनके चुनारगढ जाने का हाल सुनकर महाराज जयसिंह ने घर बार लूट लिया और हम लोगों को निकाल दिया । उन लोगों के लिए क्या होता है ये सुनकर करोड सिंह के होश उड गए । महाराज शिवदत्त ने सभी को अंदर बुलाया और हाल पूछा जो कुछ हुआ था उन्होंने बयां किया । इसके बाद रोडसिंह और नाजीम की तरफ देख कर कहा अहमद भी तो आपके पास आया है । नाजीम ने पूछा अहमद वो कहा है यहाँ तो नहीं आया । सभी ने कहा वहाँ वहाँ तो घर पर गया था और ये कहकर चला गया कि मैं भी चुनारगढ जाता हूँ । नाजीम ने कहा बस मैं समझ गया वो जरूर तेजसिंह होगा । इसमें कोई शक नहीं । उसी ने महाराज को भी खबर पहुंचाई होगी । ये सब फसाद सीखा है । ये सुनकर क्रूर सिंह रोने लगा । महाराज शिवदत्त ने कहा जो होना था तो हो गया, सोच मत करो । देखो इसका बदला जयसिंह से मैं कैसे लेता हूँ तो मैं भी शहर में रहो । हम आम के सामने वाला मकान तुम्हें दिया जाता है । उसी में अपने कुटुम्ब होगा । रुपये की मदद सरकार से हो जाएंगे । जरूर सिंह ने महाराज के रूप में के मुताबिक उसी मकान में डेरा जमाए । कई दिन बाद दरबार में हाजिर होकर क्रूर सिंह ने महाराज से विजयगढ जाने के लिए और क्या सब इंतजाम हो ही चुका था । महाराज ने मैं चार तैयार और पंडित जगन्नाथ जो किसी के साथ क्रूर सिंह और नाजीम कोविद आ गया यार लोग भी अपने अपने सामान से लैस हो गए । कई तरह के कपडे लिए बटुआ तैयारी का अपने अपने कंधे से लटका लिया, खंजर बगल में लिया, ज्योतिषी जीने की पोथी, पतरा आदि और कुछ तैयारी का सामान ले लिया क्योंकि वह थोडी बहुत तैयारी भी जानते थे । अब ये शैतान का झुंड विजयगढ की तरफ रवाना हुआ । इन लोगों का इरादा नौगढ जाने का भी था । देखिए, कहाँ जाते हैं और क्या करते हैं ।

Chapter 12

बयान बारवा वीरेंद्र सिंह और तेजसिंह नौगढ की किले के बाहर निकल बहुत से आदमियों को साथ लिए चंद्रप्रभा नदी के किनारे बैठे शोभा देख रहे थे । एक तरफ से चंद्रप्रभा दूसरी तरफ से कर्मनाशा नदी बहती हुई आई है और किले के नीचे दोनों का संगम हो गया जहाँ कुमार और तीन सिंह बैठे हैं । नदी बहुत चौडी हैं और इस पर साखो का बडा भारी जंगल है जिसमें हजारों मोर तथा लंगूर अपनी अपनी बोलियों और किलकारियों से जंगल की शोभा बढा रहे हैं तो ओवर वीरेंद्र सिंह उदास बैठे हैं । चंद्रकांता की विरहा में मोहरों की आवाज तीर सी लगती है । लंगूरों की किलकारी वजह सी मालूम होती है । शाम की धीमी धीमी ठंडी हवा लू का काम करती है चुपचाप बैठे नदी की तरफ दे कुछ भी सांस ले रहे हैं इतने में एक साधु रामरज से रंगी हुई कफनी पहने रामनंदी तिलक लगाए हाथ में खंजरी लिए कुछ दूर नदी के किनारे बैठा ये गाता हुआ दिखाई पडा गए चुनारगढ क्रूर बहुरंगी लाए चार्चित तारी संगम में उनके पंडित देवता जो है सगुण विचारी इनसे रहना बहुत संभाल के रमल चलेहड थी का क्या बैठे हो तुम बेफिक्र हें, काम करो कोई भारी । ये आवास कान में पढते ही तेज सिंह ने गौर से उस तरफ देखा । वो साधु भी नहीं की तरफ होकर के गा रहा था । तेज सिंह को अपनी तरफ देखते दाद निकालकर दिखला दिए और उठ के चलता बना । वीरेंद्र सिंग अपनी चंद्रकांता के ध्यान में डूबे हैं । उनको इन सब बातों की कोई खबर नहीं । वे नहीं जानते कि कौन गा रहा है या किधर से आवाज आ रही है । एक तक नदी की तरफ देख रहे हैं । तेज सिंह ने बाजू पकडकर हिलाया । कुमार चौक पडे । तेज सिंह ने धीरे से पूछा कुछ सुना? कुमार ने कहा क्या? नहीं तो हूँ । तेज सिंह ने कहा होती है अपनी जगह पर चलिए जो कुछ कहना है वहीं एकांत में कहेंगे । वीरेंद्र सिंह संभल गए और उठ खडे हुए । दोनों आदमी धीरे धीरे किले में आया और अपने कमरे में जाकर बैठे । अभी कांत है सिवा इन दोनों के समय कमरे में कोई नहीं है । नरेंद्र सिंह ने तेजसिंह से पूछा कहूँ क्या कहने को थे? तेज सिंह ने कहा सुनिए ये तो आपको मालूम हो ही चुका है कि क्रूड सिंह महाराज शिवदत्त से मदद लेने चुनारगढ गया है । अब उसके बाहर जाने का क्या नतीजा निकला वह भी सुनी वहाँ से शिवदत्त ने चार और एक ज्योतिषी को उनके साथ कर दिया है । वह ज्योतिषी बहुत अच्छा रमल फेंकता है । नाजीम पहले से उसके साथ है । अब इन लोगों की मंडली भारी हो गई । ये लोग कम फसाद नहीं करेंगे इसलिए मैं आज करता होगी आप संभाल कर रही है । मैं आप काम की फिक्र में जाता हूँ । मुझे यकीन है कि उन्हें आरो में से कोई ना कोई जरूर इस तरफ भी आएगा और आपको फंसाने की कोशिश करेगा । आप होशियार रही है और किसी के साथ कहीं ना जाइएगा । ना किसी का दिया कुछ खाइएगा बल्कि इत्र, पूल वगैरह भी कुछ कोई देख तो ना सोंग रहेगा और इस बात का भी ख्याल रखिएगा कि मेरी सूरत बना के भी वे लोग आए तो ताजुब नहीं इस तरह मुझको पहचान लीजिएगा । देखिए मेरी आपके अंदर नीचे की तरफ एक दिल है जिसको कोई नहीं जानता । आज से लेकर दिन में चाहे जितनी बार जब भी मैं आपके पास आया करूंगा, इस तिलको छिपे तौर से दिखलाकर अपना परिचय आपको दिया करूंगा । अगर ये काम में ना करूँ समझ लीजिए गा की धोखा है और भी बहुत सी बातें तेज सिंह ने समझाए जिनको खूब गौर के साथ कुमार ने सुना और तब पूछा तो उन को कैसे मालूम हुआ कि चुनारगढ से इतनी मदद इसको मिली है । तेज सिंह ने कहा किसी तरह हमको मालूम हो गया उसका हाल भी कभी आप पर जाहिर हो जाएगा । अब मैं रुक्सत होता हूँ । राजा साहब या मेरे पिता मुझे पूछे तो जो मुनासिब हो तो कह दीजिएगा । पहर रात रहे तेजसिंह तैयारी के सामान से लैस होकर वहाँ से रवाना हो गए । जब ना बालादेवी के लिए मर्दाने भेज में शहर से बाहर नहीं आधी रात बीत गई थी । साफ छिटकी हुई चांदनी पीके का एक जी में आया की नौगढ चलूँ और तेज सिंह से मुलाकात करूँ । इसी ख्याल से कदम बढाए नौगढ की तरफ चलिए उधर तेजसिंह अपनी असली सूरत में आरी के समान से सजे हुए विजयगढ की तरफ चले आ रहा था । इत्तेफाक से दोनों की रास्ते में ही मुलाकात हो गयी । चपला ने पहचान लिया और नजदीक जाकर अपनी असली पोली में पूछा कहीं आप कहाँ जा रहे हैं? तेज सिंह ने बोली से चपला को पहचान और कहा वहाँ हुआ क्या? मौके पर मिल गई नहीं तो मुझे बडी मेहनत तुमसे मिलने के लिए करनी पडती क्योंकि बहुत ही जरूरी बातें कहनी थी आओ जगह बैठो । एक साफ पत्थर की चट्टान पर दोनों बैठ गए । चपला ने कहा हूँ वो कौनसी बाते हैं । तेज सिंह ने कहा सुनो ये कदम जानती हूँ की क्रूर चुनारगढ गया है । अब वहाँ का हाल सुनाओ । चार और एक पंडित जगन्नाथ ज्योतिषी को महाराज शिवदत्त ने मदद के लिए उसके संग कर दिया है और वे लोग यहाँ पहुंच गए हैं । उनकी मंडलिया भारी हो गई और इधर हम तुम दो ही है इसलिए अब हम दोनों को बडी होशियारी करनी पडेगी । वे आर लोग महाराणा जयसिंह को भी पकडने जाए तो ताजुब नहीं चंद्रकांता के वास्ते तो आएगी है । इन्हीं सब बातों से तुम्हें होशियार करने मैं चला था । चपला ने पूछा फिर अब क्या करना चाहिए? तेज सिंह ने कहा एक काम करो । मैं हरदयालसिंह नए दीवान को पकडता हूँ और उसकी सूरत बनाकर दीवान का काम करूंगा । ऐसा करने से फॅार सब नौकर हमारे हुकमा में रहेंगे और मैं बहुत कुछ कर सकूंगा । तुम भी महल में होशियारी के साथ रहा करना और जहाँ तक हो सके एक बार मुझसे मिला करना । दीवान तो बना रहूंगा ही मिलना कुछ मुश्किल होगा बराबर असली सूरत में मेरे घर था हरदयालसिंह के यहाँ मिला करना मैं उसके घर में भी उसी की तरह रहा कर होगा । इसके अलावा और भी बहुत सी बातें तेज सिंह ने चपला को समझाएँ । थोडी देर तक चहल रही । इसके बाद चपला अपने महल की तरफ रुखसत भी तेज सिंह ने बाकी रात उसे जंगल में काटी और सुबह होते ही अपनी सूरत एक गंधी की बना कई ही क्षेत्र को कमर और दो एक हाथ में ले विजयगढ की गलियों में घूमने लगे । तीन भारी धरोधर फिरते रहे । शाम के वक्त मौका देख हरदियाल सिंह के मकान पर पहुंचे । देखा दीवान साहब लेते हुए हैं और दो चार दोस्त सामने बैठे कपडे उडा रहे हैं । बाहर भी डर खूब सन्नाटा है । तेजसिंह इत्र की शीशियां लिए सामने पहुंचे और सलाम कर बैठ गए । तब कहा लखनऊ का रहने वाला गंदी हूँ । आप का नाम सुनकर आप ही के लायक अच्छे अच्छे इतने लाया हूँ । ये कह शीशी खोल वहाँ बनाने लगे । हरदयालसिंह बहुत राहम दिल आदमी थे । इधर सुनने लगे और वहाँ सोंग सोंग अपने दोस्तों को भी देने लगे । थोडी देर में हरदयालसिंह और उसके सब दोस्त बेहोश होकर जमीन पर लेट गए । तेज सिंह ने सभी को उसी तरह छोड हरदयालसिंह की कंट्री बांध पीठ पर लादे और मुंह पर कपडा हो नौगढ का रास्ता लिया । रह में अगर कोई मिला भी तो धोबी समझकर ना बोला । शहर के बाहर निकल गए और बहुत तेजी के साथ चल कर उसको हमें पहुंचे जहां अहमद को कैद किया था । किवाड खोलकर अंदर गए और दीवान साहब को उसी तरह बेहोश वहाँ रख मोहर की । उनकी अंगूठी उंगली से निकली कपडे भी उतार लिए और बाहर चले गए । बेड डालने और होश में लाने की कोई जरूरत ना समझे । तुरंत लॉट विजय गढाकर हरदयालसिंह कि सूरत बनाकर उसके घर पहुंचे । इधर दीवान साहब के भोजन करने का वक्ता पहुंचा । लांडी बुलाने आई देखा की दिवार साहब तो है नहीं । उनके चार पांच दोस्त गाफिल पडे हैं । उसे बडा ताजुब हुआ और एकाएक चिल्ला उठी उसकी चिल्लाहट से नौ करोड रुपया दिया पहुंचे तथा ये तमाशा देख हैरान हो गए । दीवान साहब को इधर उधर ढूंडा मगर कहीं पता नहीं लगा

Chapter 13

बयान तेरवा तीन बहर रात गुजर गई । उनके सब दोस्त जो बेहोश पडे थे वो भी होश में आए । मगर अपनी हालत देख देखकर हैरान लोगों ने पूछा आप लोग कैसे भी खुश हो गए और दीवान सब कहाँ है? उन्होंने कहा एक गंदी इतने बेचने आया था जिसका इंटरेस्ट सुनते सुनते हम लोग बेहोश हो गए । अपनी खबर ना रही । क्या जाने दीवान साहब कहाँ है? इसी से कहते हैं कि अमीरों की दोस्ती में हमेशा जान की जोखिम रहती है । अब कानून बैठते है कि कभी अमीरों का सामना करेंगे । ऐसी ऐसी ताजुब भरी बातें हो रही थी और सवेरा होने ही वाला ही था कि सामने से दीवान हरदयालसिंह आती दिखाई पडे । जाॅन श्री तेजसिंह बहादुर थे । दीवान साहब को आते देख सभी ने घेर लिया और पूछने लगे आप कहाँ गई थी? दोस्तों ने पूछा वो नालायक गंदी कहाँ गया और हम लोग बेहोश कैसे हो गए? दीवान साहब ने कहा वो चोर था, मैंने पहचान लिया । अच्छी तरह से उसका इतना नहीं सोऊंगा । अगर सुनता तो तुम्हारी तरह मैं भी बेहोश हो जाता हूँ । मैंने उसको पहचानकर पकडने का इरादा किया तो वह भागा । मैं भी गुस्से से उसके पीछे चला, लेकिन वह निकल ही क्या अब सबसे इतने मेलॉडी में आप क्या कुछ भोजन कर लीजिए? सब की सब घर में भूखे बैठे हैं । अब तक सभी का वक्त होते हुए ही गुजरा । दीवान साहब ने कहा अब तो सवेरा हो गया । भोजन क्या करूँ? मैं थक गया हूँ । सोने को जी चाहता है । ये कहकर पलन पर्चा लेते । उनके दोस्त भी अपने घर चले गए । सवेरे तय वक्त पर दरबारी पोशाक पहन गुप्त रीति से ए आर का बटुआ कमर में बांध दरबार की तरफ चले । दीवान साहब को देख रास्ते में बराबर दो पत्ती लोगों में हाथ उठने लगे । वो भी जरा जरा से । महिला सभी के सलाम ओं का जवाब देते हुए कच्चे हैरी में पहुंचे । महाराज अब नहीं आए थे । तेजसिंह हरदयालसिंह की खसलत से वाकिफ थे । उन्हीं के मामूल के मुताबिक वह भीतर बार के दीवान की जगह बैठ काम करने लगे । थोडी देर में महाराज भी आ गए । दरवार में मौका पाकर हरदयालसिंह धीरे धीरे अर्ज करने लगे । महाराजाधिराज ताबेदार को पक्की खबर मिली है कि चुनारगढ के राजा शिवराज सिंह ने क्रूर सिंह की मदद की है और पांच यार सात करके सरकार से बेहद भी करने के लिए इधर रवाना किया । बल्कि ये भी कहा है कि पीछे हम भी लश्कर लेकर आएंगे । इस वक्त बडी मुसीबत आन पडी है क्योंकि सरकार में आजकल कोई तैयार नहीं । नाजिम और अहमद थे सो वे भी क्रूड के साथ है बल्कि सरकार के यहाँ वाले मुसलमान भी उसी तरफ मिले हुए हैं । आजकल वीएआर जरूर सूरत बदलकर शहर में घूमते और बदमाशी की फिक्र करते होंगे । महाराज जयसिंह ने कहा कि है मुसलमानों का रंग हम भी बेठ अब देखते हैं फिर हमने क्या बंदोबस्त क्या? धीरे धीरे महाराज और दीवान की बातें हो रही थी कि इतने में दीवान साहब की निगाह एक चोपदार पर पडी जो दरबार में खडा छिपी निगाहों से चारों तरफ देख रहा था । मैं गौर से उसकी तरफ देखने लगे । दीवान साहब को गौर से देखते हुए पास वो चौपदार चौकन्ना हो गया और कुछ समझ आ गया । बात छोड कडक के दीवान साहब ने कहा पकडो चौबदार को उपमा बातें ही लोग उसकी तरफ पढे लेकिन वह सिर पर पैर रखकर ऐसा भागा के किसी के हाथ नहीं लगा । तेजसिंह जहाँ भी तो उसे आर को जो चोपदार बन के आया था पकड लेते । मगर इन को तो सब काम बल्कि उठना बैठना भी उसी तरह से करना था जैसे हरदयालसिंह करते थे इसलिए वो अपनी जगह से ना उठे । वो यार भाग गया जो चोबदार बनाया था । जो लोग पकडने गए थे वापस आ गई । दीवान सा हमने कहा महाराज देखिए जाॅर्ज किया था और जिस बात का मुझको डर था वो ठीक नहीं । महाराज को ये तमाशा देखकर खौफ हुआ । जल्दी दरबार बर्खास्त कर दीवान को साथ ले तकलीफ में चले गए । जब बैठे तो हरदयालसिंह से पूछा हाँ जी अब क्या करना चाहिए और स्पष्ट क्रूर ने तो एक बडे भाई को हमारा दुश्मन बनाकर उभारा है । महाराज शिवदत्त की बराबरी हम किसी तरह भी नहीं कर सकते हैं । दीवान साहब ने कहा महाराज में फिर करता हूँ कि हमारे सरकार में इस समय कोई तैयार नहीं । नाजिम और अहमद थे । सौ क्रूर जी की तरफ जा मिले यारों का जवाब बिना यार कि कोई नहीं दे सकता । वे लोग बडे, चालाक और फसादी होते हैं । हजार पांच सौ की जान ले लेना । उन लोगों की आप कोई बात नहीं है । इसलिए जरूर कोई ईमानदार ए आर मुकर्रर करना चाहिए । पर ये भी एका एक नहीं हो सकता । सुना है राजा सुरेंद्र सिंह के दीवान का लडका तेज सिंह बडा भारी आर निकला है । मैं उम्मीद करता हूँ कि अगर महाराज चाहेंगे और तेर सिंह को मदद के लिए मांगेंगे तो राजस्व रेंद्र सिंह को देने में कोई हर्ज होगा क्योंकि वे महाराज को दिल से चाहते हैं । क्या हुआ अगर महाराज ने वीरेंद्र सिंह का आना जाना बंद कर दिया । अब भी राजस्व रेंद्र सिंह का दिल महाराज की तरफ से वैसा ही है जैसा पहले था । हरदयालसिंह की बात सुन के थोडी देर महाराज गौर करते रहे । फिर बोले तुम्हारा कहना ठीक है सुरेंद्र सिंह और उनका लडका वीरेंद्र सिंग दोनों बडे लाया की इसमें कुछ शक नहीं कि वीरेंद्र सिंह वीर है और राजनीति भी अच्छी तरह जानता है । हजार सेना लेकर दस हजार से लडने वाला है और तेज सिंह कि चलाकी में भी कोई फर्क नहीं । जैसा तुम कहते हो वैसा ही है । मगर मुझे उन लोगों के साथ बडी ही बीमार रहती हो गई है जिसके लिए मैं बहुत शर्मिंदा हूं । मुझे उन से मदद मांग के शर्म मालूम होती है । इसके अलावा क्या जाने उनको मेरी तरफ से रंज हो गया हो था । तुम जाओ और उनसे मिले । अगर मेरी तरफ से कुछ मलाल उनके दिल में हो तो उसे मिटा दो । ओवर तेज सिंह को लाओ तो काम चले । हरदयालसिंह ने कहा बहुत अच्छा महाराज, मैं खुद ही जाऊंगा और इस काम को करूंगा । महाराज ने अपनी मुहर लगाकर एक मुक्तसर चिट्टी अपने हाथ से लिखी और अंगूठी की मुहर लगाकर उनके हवाले किया । हरदयालसिंह महाराज सुविधा हो अपने घर आए और अंदर जलाने में ना जाकर बाहर ही रहे । खाने को वहाँ ही बनवाया, खा पीकर बैठे और सोचने लगे कि चपला से मिलके सब हाल पहले तो जाए । थोडा दिन बाकी था जब सप्लाई एकांत में ले जाकर हरदयालसिंह ने सब हाल कहाँ और वह चिट्ठी भी दिखाई । महाराज ने लिखती थी चपला बहुत ही खुशी हुई और बोली हरदयालसिंह हमारे मेल में आ जाएगा । वो बहुत ही लायक है । अब तुम जाओ इस काम को जल्दी करो । चपला तेजसिंह की चालाकी की तारीफ करने लगी । अब वीरेंद्र सिंह से मुलाकात होगी की उम्मीद दिल में हुई है । नकली हरदयालसिंह नौगढ की तरफ रवाना हुए रास्ते में अपनी सूरत असली बनाना

Chapter 14

बयान चौदह नौगढ और विजय गढकर आज पहाडी है जंगल भी बहुत भारी और खाना है नदियां चंद्रप्रभा कर्मनाशा घूमती हुई इन पहाडों पर बहती है जहाँ पूजा खोहर दर्रे पहाडों में बडे खूबसूरत गुजरती बने हुए हैं, पेडों में साथ हूँ तीन विजयसार नहीं कोरिया को आजा पे यार जितना आसन आदि के पेड है । इसके अलावा पारिजात कि पेट भी है मेल भर इधर उधर जाइए तो घरे जंगल में पाँच जाइएगा । कहीं रास्ता ना मालूम होगा कि कहाँ से आए और किधर जाएंगे । बरसात के मौसम में तो आज अभी कैफियत रहती है । कोर्स भर जाइए, रास्ते में दस नाले मिलेंगे । जंगली जानवरों में बारह सिंघम जीता भालू, तेंदुआ, चिकारा, लंगूर, बंदर वगैरह के अलावा कभी कभी शेयर भी दिखाई देते हैं मगर बरसात में नहीं । क्योंकि नदी नालों में पानी ज्यादा हो जाने से उनके रहने की जगह खराब हो जाती है और तब भी ऊंची पहाडियों पर चले जाते हैं । इन पहाडों पर है रन नहीं होते मगर पहाड के नीचे बहुत से अधिक पडते हैं । परिंदों में तीतर, बटेर आदि की अपेक्षा मोर ज्यादा होते हैं । गरज की ये सुहावने पहाड अभी तक लिखे मुताबिक मौजूद है और हर तरह से देखने के काबिल फॅसने जो चुनारगढ से क्रूर और नाजिम के संग आए थे । शहर में ना आकर इसी दिलचस्प जंगल में मई क्रूर के अपना डेरा जमाया और आपस में राय हो गई कि सब अलग अलग जाकर तैयारी करें तथा जब जरूरत हो जंगल जब फील बजा कर इकट्ठे हो जाया करें । बद्रीनाथ ऍफआईआर ओ में सबसे ज्यादा चालाक और होशियार था । ये राय निकली कि एक दफा सब कोई अलग अलग भेस बदलकर शहर में घुस तार बार और महल के सब आदमियों तथा क्लॉडियो बल्कि रानी तक को देख के पहचान आए तथा चाल चलन दस बीस का नाम भी याद कर लिए जिससे वक्त पर तैयारी करने के लिए सूरत बदलने और बातचीत करने में फर्क ना पडे । इस राय को सभी ने पसंद किया । नाजीम ने सभी का नाम बताया और जहाँ तक हो सका पहुँच नवाब ही दिया । वे आईआर लोग तरह तरह के भेज बदलकर महल में भी घुस आए और सब कुछ देखभाल आए । मगर तैयारी का मौका चपला की होशियारी की वजह से किसी को ना मिला और उनको तैयारी करना मंजूर भी ना था । जब तक की हर तरह से देखभाल नहीं थे जब वे लोग हर तरह से होशियार और वाकिफ हो गए तब तैयारी करना शुरू किया । भगवान दत्त चपला की सूरत बना नौगढ में वीरेंद्र सिंह को फंसाने के लिए चला । वहां पहुंचकर जिस कमरे में वीरेंद्र सिंह थे उसके दरवाजे पर पहुंच पहले वाले से कहा जाकर कुमार से कहो कि विजयगढ से चपला आई है । उसमें आ देने जाकर खबर दी । कुछ रात गुजर गई थी । कुंवर वीरेंद्र सिंह चंद्रकांता की याद में बैठे तबियत से युक्तियां निकाल रहे थे । बीच बीच में ऊंची सास भी लेते जाते थे । उसी वक्त चोपदार ने आकर और क्या पृथ्वीनाथ विजयगढ से सप्लाई है और डीओटी पर खडी है क्या होता है? कुमार चपला का नाम सुनते ही चौंक उठे और खुश होकर बोले उसे जल्दी उसे जल्दी अंदर ला हूँ । मैं मुझे चपला हाजिर हुई । कुमार चपला को देख उठ खडे हुए और हाथ पकडकर अपने पास बैठाकर बातचीत करने लगे । चंद्रकांता का हाल पूछा । चपला ने कहा अच्छी है सेवायें आपकी याद के और किसी तरह की तकलीफ नहीं है । हमेशा कहती रहती है कि बडे बेमुरव्वत है । कभी खबर भी नहीं लेते की जीती है या मर गई । आज खबर आकर मुझ को भेजा है और ये दो नाश पार्टियाँ अपने हाथ से छील काटकर आपके वास्ते भेजी है तथा अपने सिर की कसम भी है कि इन्हें जरूर खायेगा । वीरेंद्र सिंह चपला की बातें सुन बहुत खुश हुए । चंद्रकांता का इश्क पूरे दर्जे पर था, धोके में आ गए भले बुरे की कुछ तमीज न रही । चंद्रकांता की कसम कैसे टालते झट नाशपाती का टुकडा उठा लिया और मुझसे लगाया ही था कि सामने से आते हुए तेजसिंह दिखाई पडेगी । तेज सिंह ने देखा कि वीरेंद्र सिंग बैठे हैं । देखते ही आग हो गए । ललकारकर बोले खबरदार मूवी में मत डालना । इतना सुनते ही वीरेंद्र सिंग रुक गए और बोले क्यों किया है तेज? सिंह ने कहा मैं जाती बार हजार बार समझा गया, अपना सिर मार गया मगर आपको ख्याल ना हुआ । कभी आगे भी चपला यहाँ आई थी आपने क्या खाक पहचाना की ये चपला है या कोई यार । बस सामने रंडी को देख मीठी मीठी बातें सुन मजे में आ गए । तेज सिंह की खिडकी से नरेंद्र सिंह तो शर्म आ गए और चपला के मूंग की तरफ देखने लगे । मगर नकली चपला से ना रहा गया बस हो चुकी थी । छठ खंजर निकालकर तेजसिंह की तरफ दौड नरेंद्र सिंह भी जान गए कि ये यार है उसको खंजर ले । तेजसिंह पर दौडते देख लपक कर हाथ से उसकी कलाई पकडी, जिसमें खंजर था । दूसरा हाथ कमर में डाल उठा लिया और सिर से ऊंचा करना चाहते थे कि फेंके जिससे हड्डी पसली सब चूर हो चाहे तेज सिंह ने आवाज भी था हाँ पटक नामक मर जाएगा यार लोगों का काम यही है छोड दो मेरे हवाले करो । ऍम कुमार ने धीरे से जमीन पर पटक कर मुश्किल बांध तेज सिंह के हवाले किया । तेज सिंह ने जबरदस्ती उसके नाक में दवा ठूस बेहोश किया और कंट्री में बांध किनारे रख पाते करने लगे तो सिंह ने कुमार को समझाया और कहा देखिए हो गया तो हो गया मगर अब धोखा मत खाइएगा । कुमार बहुत शर्मिंदा थे इसका कुछ जवाब न दे । विजयगढ का हाल पूछने लगे । तेज सिंह ने सब खुलासा ब्यौरा कहा और चिट्ठी भी दिखाई जो महाराज जयसिंह ने राजस्व रेंद्र सिंह के नाम लिखी थी । कुमार ये सब सन और चिट्ठी दे एक उछल पडे । हमारे खुशी के तेज सिंह को गले से लगा लिया और बोले अब जो कुछ करना हो चलती कल डालो । तेज सिंह ने कहा था देखो सब कुछ हो जाता है कब राव मात्र इसी तरह दोनों को बात करते । तमाम रात गुजर गई सवेरा होने ही वाला था । जब तेजसिंह उसपे आर की गठरी पीठ पर लादे उसी तरह खाने को रवाना हुए, जिसमें अहमद को कैट कराए थे तो खाने का दरवाजा खोल अंदर गए, टहलते टहलते चश्मे के पास जाने के लिए देखा कि अहमद नहर के किनारे सोया है और हरदयालसिंह एक पेड के नीचे पत्थर की चट्टान पर सिर झुकाए बैठे हैं । तेज सिंह को देखकर हरदयालसिंह उठ खडे हुए और बोले हैं कि और तेजसिंह मैंने क्या कसूर क्या जो मुझको कैद कर रखा है? तेज सिंह ने हस्कर जवाब दिया अगर कोई कसूर किया होता तो पैर में बेटी बडी होती । जैसा कि अहमद को आपने देखा होगा, आपने कोई कसूर नहीं किया । सिर्फ एक देना रोक रखने से मेरा बहुत कम निकलता था । इसलिए मैंने ऐसी बेहद भी कि माफ कीजिएगा । अब आपको एक तैयार है कि चाहे जहाँ जाए मैं ताबेदार विजयगढ में नहीं ईमानदार हिसाब पसंद सेवायें आपकी कोई नहीं है इसी सब अब से मैं भी मदद का उम्मीदवार । हरदयालसिंह ने कहा सुनो तेजसिंह! तुम खुद जानते हो कि मैं हमेशा से तुम्हारा और कुंवर वीरेंद्र सिंह का दोस्त हूँ । मुझको तुम लोग खेत मत करने में कोई हर्ज नहीं । मैं तो आप हैरान था कि दोस्त आदमी को तेज सिंह ने क्यों किया? पहले तो मुझको ये भी नहीं मालूम हुआ कि मैं यहाँ कैसे आया । मार के आया हूँ या जीते जी पर अहमद को देखा तो समझ गया कि ये तुम्हारी करामा अच्छा ये तो कहूँ मुझको यहाँ रखकर तुम ने क्या कार्रवाई की और अब मैं तुम्हारा क्या काम कर सकता हूँ । तेज सिंह ने कहा मैं आपकी सूरत बनाकर आपके जलाने में नहीं गया । इससे आप खाकर जमा रहेंगे । हरदयालसिंह ने कहा तुमको तो मैं अपनी लडकी से ज्यादा मानता हूँ अगर जलाने में जाते भी तो किया था है हाल का तेल सिंह ने महाराज जयसिंह की चिट्ठी दिखाई । हरदयालसिंह के कपडे जो पहने हुए थे उनको दे दिए और अब खुलासा हाल कहकर बोले अब आप अपने कपडे सहज लीजिए और ये चिट्ठी लेकर दरबार में चाहिए । राजा से मुझको मांग लीजिए जिससे मैं आपके साथ चलो नहीं तो ए आर जो चुनारगढ से आए हैं विजयगढ को कारण कर डालेंगे और महाराज शिवदत्त अपना कस्बा विजयगढ पर कर लेंगे । मैं आपके सन चलकर उन्हें आरोप को गिरफ्तार करूंगा । आप दो बातों का सबसे ज्यादा ख्याल रखिएगा । एक ये कि जहाँ तक बने मुसलमानों को बाहर कीजिए और हिन्दुओं को रखिए । दूसरा ये कि कुंवर वीरेंद्र सिंह का हमेशा ध्यान रखे और महाराज से बराबर उनकी तारीफ कीजिए जिससे महाराज मदद के वास्ते उनको भी बुलाएंगे । हरदयालसिंह ने कसम खाकर कहा, मैं हमेशा तुम लोगों का क्या हुआ? जो कुछ तुम ने कहा है उससे ज्यादा कर दिखाऊंगा । तेज सिंह ने तैयारी की, कंट्री खोली और एक खुलासा बीडी उसके पैर में डाल तथा तैयारी का बट हुआ और खंजर उसकी कमर से निकालने के बाद से उसमें ले आए । उसके चेहरे को साफ किया तो मालूम हुआ कि वह भगवान तैयार होने के कारण चुनारगढ के समय आपको तेजसिंह पहचानते थे और वे सब लोग भी उनको बखूबी जानते थे । तेज सिंह ने भगवान दत्त को नहर के किनारे छोडा और हरदयालसिंह को साथ ले खोल के बाहर चले दरवाजे के पास आए हरदयालसिंह से कहा की मेहरबानी करके मुझे ज्यादा थे कि मैं थोडी देर के लिए आपको फिर ऍम तो खाने के बाहर होश में ले आऊंगा । हरदयालसिंह ने कहा इसमें मुझको कुछ हर्ज नहीं है । मैं ये नहीं चाहता की इस तरह खाने में आने का रास्ता देख ये तुम ही लोगों का काम है । मैं देख कर क्या करूँ तेरसिंह हरदयालसिंह को बेहोश करके बाहर ले आए और होश में लाकर बोले अब आप कपडे पहन लीजिए और मेरे साथ उन्होंने वैसा ही किया । शहर में आकर तेजसिंह के कहे मुताबिक हरदयालसिंह अलग होकर अकेले राजस् रेंद्र सिंह के दरबार में गए । राजा ने उनकी बडी खातिर की और हाल पूछा । उन्होंने बहुत कुछ कहने के बाद महाराज जयसिंह की चिट्ठी दी जिसको राजा ने इज्जत के साथ लेकर अपने वासी जीत सिंह को पढने के लिए दिया । चीज सिंह ने जोर से खत पडा । राजा सुरेंद्र सिंह चिट्ठी पढ कर बहुत खुश हुए और हरदयालसिंह की तरफ देखकर बोले मेरा राज्य महाराज जयसिंह का है जिसे चाहे बुला रहे मुझे कोई हर्ज नहीं । तेजसिंह आपके साथ जाएगा । ये कहे आपने वजीर जीत सिंह को हरदयालसिंह की मेहमानदारी का उस नदियाँ और दरबार पर खास दीवान हरदयालसिंह की मेहमानदारी तीन दिन तक बहुत अच्छी तरह से की गई जिससे मैं बहुत खुश हुए । चौथे दिन विमान साहब ने राजा से रुखसत मांग । राजा ने बहुत कुछ दौलत जवाहरात से उनकी विदाई की और तेज सिंह को बुला समझा । बुझाकर दीवान साहब के संग क्या बडे सात सामान के साथ ये दोनों विजयगढ पहुंचे और शाम को दरबार में महाराज के पास हाजिर हुए । हरदयालसिंह ने महाराज की चिट्ठी का जवाब दिया और सब हाल के है । सुरेंद्र सिंह की बडी तारीफ जिससे महाराज बहुत खुश हुए और तेज सिंह को उसी वक्त खिला सम्मान देकर हरदयालसिंह को खत्म दिया । इनके रहने के लिए मकान का बंदोबस्त कर और उनकी खातिरदारी और मेहमानदारी का पहुँच अपने ऊपर समझौते दरवार उठने पर दीवान सा तेज सिंह को साथ ले विदा हुए हैं और एक बहुत अच्छे कमरे में डेरा दिलवाया । नौकर और पहले वाले तथा प्यादों का भी बहुत अच्छा इंतजाम कर दिया जो सब हिंदू थे । दूसरे दिन तेजसिंह महाराज के दरबार में हासिल हुए दिवाल हरदयालसिंह के बगल में कुर्सी उन के वास्ते मुकर्रर की गई ।

Chapter 15

बयान हम पहले ये लिख चुके हैं कि महाराज शिवदत्त के यहाँ जितनी तैयार है सभी को तेजसिंह पहचानते हैं । अब तेज सिंह को या जानने की फिक्र हुई कि उनमें से कौन कौन शहर आए हैं । इसलिए दूसरे दिन शाम के वक्त उन्होंने अपनी सूरत भगवान दत्त की बनाए, जिसको ते खाने में बंद कराएंगे और शहर से निकल जंगल में इधर उधर घूमने लगे पर कहीं कुछ बताना लगा बरसात का दिन आ चुका था । रात अंधेरी और बदली छाई थी । आखिर तेज सिंह ने ठेले पर खडे हो कर सब फील हो जाएगा । थोडी देर में तीनो यार मैं पंडित जगन्नाथ जो सी के सीजन वहाँ पहुंचे और भगवान दत्त को खडे देखकर बोले क्या जी तो नौगढ गए थे ना? क्या क्या खाली क्यों चले आए? तेज सिंह ने सभी को पहचानने के बाद जवाब दिया तो वहाँ तेज सिंह की बदौलत कोई कार्यवाही न चली तो उन लोगों में से कोई एक आदमी मेरे साथ चले तो काम बने बनना अच्छा हम कल चलेंगे तुम्हारे सर आज चलो महल में वही कार्रवाई करें । तेज सिंह ने कहा था अच्छा चलो नगर मच को इस वक्त भूक बडे जोर की लगी है । कुछ खालू तो काम में जी लगे तो उन लोगों के पास कुछ हो तो लाओ । जगन्नाथ ने कहा पास में जो जो कुछ है, बेहोशी मिला है, बाजार से जाकर कुछ लाओ तो सब कोई खा पीकर छुट्टी करें । भगवान ने कहा अच्छा एक आदमी मेरे साथ चलो । पन्नालाल साथ हुए दोनों शहर की तरफ चलेंगे रास्ते में । पन्नालाल ने कहा हम लोगों को अपनी सूरत बदल लेना चाहिए क्योंकि तेजसिंह कल से इसी शहर में आया है और हम सभी को पहचानता भी है । शायद घूमता फिरता कहीं मिल जाए । भगवान रखने ये सोचकर कि सूरत बदलेंगे तो रोगन लगाते वक्त शायद ये पहचान जवाब दिया कोई जरूरी नहीं । कौन रात को मिलता है भगवान के इनकार करने से पन्नालाल को शक हो गया और गौर से इनकी सूरत देखने लगा । मगर रात अंधेरी थी, पहचान नहीं सका । आखिर को जोर से जब फील बजाई शहर के पास आ चुके थे यार लोग दूर थे जब फिल सुनना सकें । तेजसिंह भी समझ गए कि इसको शक हो गया । अब तेरी करने की कोई जरूरत नहीं है । छठ उसके गले में हाथ डाल दिया । पन्ना लाल ने भी खंजर निकाल दिया । दोनों में खूब जोर की भिडंत हो गई आखिर को तेज सिंह ने पन्ना को उठा के दे मारा और मुश्किल कस बेहोशकर कंट्री बांध ली तथा पीठ पर लाद शहर की तरफ रवाना असली सूरत बनाए । डेरे पर पहुंचे एक कोटरी में पन्नालाल को बंद कर दिया । और पहले वालों को सकता जीतकर आप उसी कोठारी के दरवाजे पर पलंग विश्वास हो रहे हैं । सवेरे पन्नालाल को साथ ले दरबार की तरफ चले । इधर रामनारायण बद्रीनाथ और ज्योतिषी जी राह देख रहे थे कि अब दोनों आदमी खाने का सामान लाते होंगे मगर कुछ नहीं । यहाँ तो मामला ही दूसरा था । उन लोगों को शक हो गया कि कहीं दोनों गिरफ्तार ना हो गए हो । मगर एक ख्याल में नहीं आया कि भगवान दत्त असल में दूसरे ही कृपानिधान थी । उस रात को कुछ नहीं कर सके, पर सवेरे सूरत बदलकर खोज में नहीं । पहले महाराणा जयसिंह के दरबार की तरफ चले देखा कि तेजसिंह दरबार में जा रहे हैं और उसके पीछे पीछे दस पंद्रह सिपाही कैदी की तरह पन्नालाल को लिए चल रहे हैं । उन्हें आरो ने भी साथ ही साथ दरबार का रास्ता पकडा । तेजसिंह पन्नालाल को लिए दरबार में पहुंचे । देखा कचेहरी खूब लगी हुई है । महाराज बैठे हैं वो भी सलाम कर अपनी कुर्सी पर जा बैठे कैदी को सामने खडा कर दिया । महाराज ने पूछा यहाँ तेजसिंह किसको लाए हो? तेज सिंह ने जवाब दिया, महाराज उन पांचों यारो में से जो चुनारगढ से आए हैं, ये गिरफ्तार हुआ है । इसको सरकार में लाया हूँ जो इसके लिए मनाते हो तो किया जाए । महाराज गौर के साथ खुशी भरी निगाहों से उसकी तरफ देखने लगे और पूछा तेरा नाम क्या है? उसने कहा मक्कार खाओ ऍम महाराज! उसकी टाई और बाद पर हस पडे हुक्म दिया बास । इससे ज्यादा पूछने की कोई जरूरत नहीं । सीधे कैद खाने में ले जाकर इसको बंद करो और सख्त पहरे बैठा हूँ । उपमा बातें ही । प्यादों ने उसे आर के हाथों में हथकडी और पैरों में बीजी डाल दी और कैद खाने की तरफ ले गए । महाराज ने खुश होकर तेज सिंह को सौ पीना में दी । तेज सिंह ने खडे होकर महाराज को सलाम किया और अशरफिया बटुए में रखी है । रामनारायण बद्रीनाथ और जोत्शी जी भेज पतले हुए दरबार में खडे ये सब तमाशा देख रहे थे । जब पन्नालाल को कैद खाने का उपमा हुआ पे लोग भी बाहर चले आए और आपस में सलाह कर भारी चला कि किनारे जाकर बद्रीनाथ ने तो तेज सिंह की सूरत बनाई और रामनारायण और जो देशी जी प्यारे बनकर तेजी के साथ उन सिपाहियों के साथ चले जो पन्नालाल को कैट खाने की तरफ लिए जा रहे थे । पास पहुंचकर बोलेंगे ऍम इसमें लाया की आर के लिए महाराज ने दूसरा हुक्म दिया है क्योंकि मैंने आज किया था कि कैदखाने में इसके संगी साथी इसको किसी ना किसी तरह छुडा ले जाएंगे । अगर मैं आपको अपनी हिफाजत में रखूंगा तो बेहतर होगा क्योंकि मैंने ही से पकडा है और मेरी हिफाजत में ये रहे भी सकेगा । तो तुम लोग इसको मेरे हवाले कर ज्यादे तो जानते ही थी कि इसको तेज सिंह ने पकडा है । कुछ इंकार न किया और उसे उनके हवाले कर दिया । नकली तेज सिंह ने पन्नालाल को ले जंगल का रास्ता लिया । उसके चले जाने पर उसका हालत करने के लिए प्यार फिर दरबार में लौट आए । दरबार उसी तरह लगा हुआ था । तेज सिंह भी अपनी जगह बैठे थे । उनको देख प्यादों के होश उड गए और अर्ज करते करते रुक गए । तेज सिंह ने इनकी तरफ देकर पूछा क्या क्या बात है उसे यार को कह कर आए ना प्याज ऍम जी उसको तो उसको तो आप ने हम लोगों से ले लिया । तेजसिंह उनकी बात सुनकर चौंक पडे और बोले मैंने क्या किया है? मैं तो तब सी सी जगह बैठा हूँ । यादव की जान डरता । जबसे सूप कही तो जवाब न दे सके । पत्थर की तस्वीर की तरह जैसे के तैसे खडे नहीं । महाराज ने तेज सिंह की तरफ देकर पूछा क्या हाँ क्या हुआ तेज सिंह ने क्या महाराज लोगों का कसूर नहीं यार, लोग ऐसे ही होते हैं । बडे बडो को धोखा दे जाते हैं । इन लोगों की क्या बिसात है? तेज सिंह के कहने से महाराज ने उन प्यादों का कसूर माफ किया मगर उस ए आर के निकल जाने का रंग तेर तक रहा । बद्रीनाथ वगेरह पन्नालाल को लिए हुए जंगल में पहुंचे । एक पेड के नीचे बैठकर उसका हाल पूछा । उसने सब हाल कहा । अब इन लोगों को मालूम हुआ कि भगवान दत्त को भी तेज सिंह ने पकड के कहीं छिपाया है । ये सोच सभी ने पंडित जगन्नाथ से कहा आप कमल के जरिए दरिया आप कीजिए कि भगवान दत् कहा है ज्योतिषी जीने रमल पडेगा और कुछ गेंद बनाकर कहा पेशक । भगवान दत्त को भी तेज सिंह ने ही पकडा है और यहाँ से दो कोर्स दूर उत्तर की तरफ देखो । हमें कैद कर रखा है । ये सुन सभी ने उसको का रास्ता लिया । ज्योतिषी जी बार बार रमल फेंकते और विचार करते हुए उस खो खो तक पहुंचे और अंदर गए । जब उजाला नजर आया तो देखा सामने फाटक है मगर ये नहीं मालूम होता था कि किस तरह खुलेगा ज्योतिष ऍम और सोच कर कहा ये ऍम के साथ मिला हुआ है और रमल ऍम में कुछ काम नहीं कर सकता । इसके खोलने की कोई तरकीब निकाली जाए तो काम चले । लाचार वे सब उसको हम बाहर निकल आए और तैयारी के फिक्र करने लगे ।

Chapter 16

बयान सौ सवा एक दिन तेजसिंह बालादेवी के लिए विजयगढ के बाहर निकले । पहले दिन बाकी था जब घूमते फिरते बहुत दूर निकल गए । देखा के पेड के नीचे कुंवर वीरेंद्र सिंग बैठे हैं । उनकी सवारी का घोडा पेड से बंधा हुआ है । सामने एक बारहसिंघा मरा पडा है । उसके एक तरफ आग से लग रही है और पांच जाने पर देखा कि कुमार के सामने पत्तों पर कुछ टुकडे कोस्ट भी पडे हैं । तेज सिंह को देकर कुमार ने जोर से कहा आओ भाई तेजसिंह तुमको विजयगढ ऐसे गए हैं कि फिर खबर बिना ली क्या हमको एकदम ही भूल गए तेरे से फस करेंगे । विजय गढ में मैं आप ही का काम कर रहा हूँ कि आपने बात का । वीरेंद्र सिंह ने कहा अपने बाप का ये कहकर हस पडे । तेज सिंह ने इस बात का कुछ भी जवाब नहीं दिया और हसते हुए ऍम कुमार ने पूछा का हो चंद्रकांता से मुलाकात हुई थी । तेज सिंह ने जवाब दिया इधर जब से मैं गया हूँ इसी बीच में गए यार को पकडा था । महाराज ने उसको कैद करने का उपमा दिया मगर कैदखाने तक पहुंचने ना पाया था कि रास्ते ही मैं मेरी सूरत बना । उसके साथ ही आरोप ने उसे छोडा दिया फिर अभी तक कोई गिरफ्तार ना हुआ । कुमार वे लोग भी बडे शैतान है । तेज सिंह ने कहा और तो जो है बद्रीनाथ भी चुनारगढ से इन लोगों के साथ आया है । वह बडा भारी चला मुझको अगर खाओ रहता है तो उसी का है । देखा जाएगा क्या हर्ज है ये तो बताइए आप यहाँ क्या कर रहे हैं? कोई आदमी भी साथ नहीं है । कुमार ने कहा आज मैं कई आदमियों को लेकर सवेरे ही शिकार खेलने के लिए निकला । दोपहर तक तो हैरान रहा । कुछ हाथ में लगा आखिर को ये बारह सिंगा सामने से निकला और मैंने उसके पीछे घोडा फेंका । इसने मुझको बहुत हैरान किया । संघ के सब साथ ही छूट गए । अब इस समय तीर खाकर गिरा है मुझको भूख बडी जोर ही लगी थी । इससे जी में आया की कुछ पोस्ट फोन के खाओ इसी फिक्र में बैठा था कि सामने से तुम दिखाई पडेगा । अब लोग तुम भी इसको बोलो । मेरे पास कुछ मसाला था उसको मैंने धो धाकर इन टुकडों में लगा दिया । अब तैयार करो, तुम भी खाओ, मैं भी खाओ मगर जल्दी करो । आज दिन भर से कुछ नहीं खाया । तेज सिंह ने बहुत जल्द कोच तैयार की और एक सोते के किनारे जहाँ साफ पानी निकल रहा था बैठकर दोनों खाने लगे । वीरेंद्र सिंग मसाला पूछ पूछकर खाते थे । तेज सिंह ने पूछा आप मसाला की पूछ रहे हैं? कुमार ने जवाब दिया पी का अच्छा मालूम होता है । दो दिन टुकडे खाकर वीरेंद्र सिंह ने सोते में से चुल्लूभर के खूब पानी पिया और कहा बस भाई मेरी तबियत भर गई । दिनभर होके रहने पर कुछ खाया नहीं जाता । तेर सिंह ने कहा आपका आइए चाहे ना आई मैं छोडता नहीं बडे मजे का बन पडा है । आखिर जहाँ तक बंद पडा खूब खाया और तब हाथ मुंह धोकर बोले चलिए अब आपको नौगढ पहुंचाकर फिर करेंगे । वीरेंद्र सिंह चलो कहकर घोडे पर सवार हुए और तेजसिंह पैदल साथ चलेंगे । थोडी दूर जाकर तेजसिंह बोले न मालूम क्यों मेरा सर घूमता है । कुमार ने कहा तो माँ ज्यादा खा गए हो । उसने गर्मी की है तो थोडी दूर गए थे कि तेजसिंह चक्कर खाकर जमीन पर गिर पडे । वीरेंद्र सिंह ने झट घोडे पर से कूदकर उनके हाथ पैर खूब कस के गठरी में बांध पीठ पर ला दिया और खोडे की बात थाम विजय गढ का रास्ता लिया । थोडी दूर जाकर जोर्ज अपील सीटी बजाए जिसकी आवाज जंगल में दूर दूर तक पहुँच गई । थोडी देर में क्रूर सिंह, पन्नालाल, रामनारायण और ज्योतिषी जिया पहुंचे । पन्नालाल ने खुश होकर कहा वहाँ जी बद्रीना तुमने जब बडा भारी काम क्या बडे जबरदस्त को फाॅर्स अब क्या है ले लिया क्रूर सिंह हमारे खुशी से उछल पडा बद्रीनाथ ने जो अभी तक कुंवर वीरेंद्र सिंग बना हुआ था । गठरी पीठ से उतारकर जमीन पर रखती और रामनारायण से कहा तो मैं घोडे को नौगढ पहुंचा तो जिस अस्तबल से चुरा लाए थे उसी के पास छोडा आप ही लोग बांध लेंगे । ये सुनकर रामनारायण घोडे पर सवार होकर नौगढ चला गया । बद्रीनाथ ने तेजसिंह की गठरी अपनी पीठ पर लादी और यारों को कुछ समझा बुझाकर चुनारगढ का रास्ता लिया । तेजसिंह को मालूम था कि रोज महाराज जयसिंह के दरबार में जाते और सलाम करके कुर्सी पर पैर चाहते हैं । दो एक दिन तक महाराज ने तेज सिंह की कुर्सी खाली देखिए फिर हरदयालसिंह से पूछा की आजकल तीन सिंह नजर नहीं आती क्या तुम से मुलाकात हुई थी दीवान साहब ने और क्या नहीं उस से भी मुलाकात नहीं हुई । आज देखिये आप करके अर्ज करूंगा । दरबार बर्खास्त होने के बाद दीवान साहब तेजसिंह के डेरे पर गए । मुलाकात न होने पर नौकरों से दरियाब क्या सभी ने कहा कई दिन से वो यहाँ पे नहीं है । हम लोगों ने बहुत खोज की मगर पता नहीं आएगा विवाह दरियाल सिंह ये सुनकर हैरान रह गए । अपने मकान पर जाकर सोचने लगे कि अब क्या किया जाए । अगर तेज सिंह का बताना लगेगा तो बडी बदनामी होगी । जहाँ से हो खोज लगना चाहिए । आखिर बहुत से आदमियों को इधर उधर पता लगाने के लिए रवाना किया और अपनी तरफ से चिट्ठी नौगढ के दीवान जीत सिंह के पास भेजकर ले जाने वाले को ताकीत कर दी की कल दरबार से पहले इसका जवाब लेकर आना । वो आदमी खत्म लिये । शाम को नौगढ को पहुंचा और दीवान जीत सिंह के मकान पर जाकर अपने आने की इत्तलाह करवाई । दीवान साहब ने अपने सामने बुलाकर हाल पूछा । उसने सलाम करके खत दिया । दीवान साहब ने कौर से खत को पढा दिल में यकीन हो गया कि तेजसिंह जरूर एआरओ के हाथ पकडा गया । ये जवाब लिखकर कि वह यहाँ नहीं है आदमी को विदा कर दिया और आपने कई जासूसों को बुलाकर पता लगाने के लिए इधर उधर रवाना किया । दूसरे दिन दरबार में दीवान जीत सिंह ने राजा सुरेंद्र सिंह से अरे क्या महाराज कल विजयगढ से दीवान हरदयालसिंह का पत्र लेकर एक आदमी आया था । ये दरियाब किया था कि तेजसिंह नौगढ में है कि नहीं क्योंकि कई दिनों से वो भी जगह में नहीं । मैंने जवाब में लिख दिया है कि यहाँ नहीं है । राजा को ये सुनकर ताज्जुब हुआ और दीवान से पूछा तेजसिंह वहाँ भी नहीं है और यहाँ भी नहीं तो कहाँ चले गया । कहीं ऐसा तो नहीं हुआ कि एआरओ के हाथ पकडा गया हूँ क्योंकि महाराज शिवदत्त के कई बिहार विजयगढ में पहुंचे हुए हैं और उन से मुलाकात करने के लिए अकेला तीन सिंह गया था । दीवान साहब ने कहा जहाँ तक मैं समझता हूँ वाह यारो के हाथ में गिरफ्तार हो गया होगा है । जो कुछ होगा दो चार दिन में मालूम हो जाएगा । कुंवर वीरेंद्र सिंह भी दरबार में राजा के दाहिनी तरफ कुर्सी पर बैठे ये बात सुन रहे थे उन्होंने अरे क्या अगर वह हो तो में तेज सिंह का पता लगाने जाऊँ । दीवानजी सिंह ने ये सुनकर कुमार की तरफ देखा और हस्कर जवाब दिया आप की हिम्मत और जवान मरती में कोई शक नहीं मगर इस बात को सोचना चाहिए कि तेजसिंह के वास्ते जिसका कम तैयारी है और यारो के हाथ फस गया है । आप हैरान हो जाए इस की क्या जरूरत है । ये तो आप जानते ही है कि अगर किसी ए आर को कोई ए आर पकडता है तो सिवाय कैद रखने के जान से नहीं मारता । अगर तेजसिंह उन लोगों के हाथ में पड गया है तो कैद होगा किसी तरह छूट ही जाएगा क्योंकि वो अपने फन में बडा होशियार हैं सिवाय इसके जो तैयारी का काम करेगा चाहे वो कितना ही चालाक क्यों ना हो । कभी ना कभी फस ही जाएगा । फिर इसके लिए सोचना क्या? दस पांच दिन सब्र कीजिये देखते हैं क्या होता है इस बीच में अगर वो नहीं आया तो आपको जो कुछ करना हो कीजिएगा । वीरेंद्र सिंह ने जवाब दिया था आपका कहना ठीक है मगर पता लगाना जरूरी है ये सोच कर के वो चालाक है, शूट आएगा, खोजना करना मुनासिब नहीं । जीत सिंह ने कहा सच है आपको मोहब्बत के सब आपसे उसका ज्यादा ख्याल है है देखा जाएगा ये सुन राजस्व महेंद्र सिंह ने कहा और कुछ नहीं तो किसी को पता लगाने के लिए भेज दो । इसके जवाब में दीवान साहब ने कहा कई जासूसों को पता लगाने के लिए भेज चुका हूँ । राजा और कुंवर वीरेंद्र सिंह चुप रहे मगर खयाल इस बात का किसी के दिल से ना गया । विजयगढ में दूसरे दिन दरबार में जयसिंह ने फिर हरदयालसिंह से पूछा । कहीं तेज सिंह का पता लगा? दीवान साहब ने कहा यहाँ तो तेज सिंह का पता नहीं लगता, शायद नौगढ में हो । मैंने वहाँ भी आदमी भेजा है । अब आता ही होगा । जो कुछ है मालूम हो जाएगा । ये बातें हो रही थी कि खत का जवाब लिए वो आदमी यहाँ पहुंचा जो नौगढ गया था । हरदयालसिंह ने जवाब पढा और बडे अफसोस के साथ महाराज से अर्ज किया कि नौगढ में भी तेज सिंह नहीं है ये उनके बाद जीत सिंह के हाथ का खत मेरे खत के जवाब में आया है । महाराज ने कहा उसका पता लगाने के लिए कुछ फिक्र की गई है या नहीं । हरदयालसिंह ने कहा हाँ, कई जासूस मैंने इधर उधर भेजे हैं । महाराज को तेज सिंह का बहुत अफसोस रहा । दरबार बर्खास्त कर के महल में चले गए । बात ही बात में महाराज ने तेज सिंह का जिक्र महारानी से किया और कहा किस्मत का फिर ऐसे ही कहते हैं । क्रूर सिंह ने तो हलचल मचा ही रखी थी । मदद के वास्ते तीरथसिंह आया था तो कई दिन से उसका भी पता नहीं लगता । अब मुझे उसके लिए सुरेंद्र सिंह से शर्मिंदगी उठानी पडेगी । तेजसिंह का चाल चलन, बातचीत, फिल्म और चालाकी परजब ख्याल करता हूँ । तब ये तुम बढाती है । बडा लायक लडका है, उसके चेहरे पर हैं । उदासी तो कभी देखी ही नहीं । महारानी ने भी तेज सिंह के हाल पर बहुत अफसोस क्या? इत्तेफाक से चपला उस वक्त नहीं खडी थी । ये हाल सन वहाँ से चली और चंद्रकांता के पास पहुंची तेरसिंह का हाल जब कहना चाहती थी जी ओ मनाता है कुछ कहना सकती थी । चंद्रकांता ने उसकी दशा देख पूछा क्यों? क्या है इस वक्त? मेरी अजीब हालत हो रही है । कुछ मुझसे तो है इस बात का जवाब देने के लिए चपला ने मुख् होना ही था की गला भराया । आंखों से आंसू टपक पडे तो जवाब दे सकती । चंद्रकांता को और भी ताजी हुआ । पूछा तो होती क्यों है? कुछ बोल भी तो आखिर चपला ने अपने को संभाला और बहुत मुश्किल से कहा महाराज की जुबानी सुना है कि तेज सिंह को महाराज शिवदत्त के यार उन्हें गिरफ्तार कर लिया । अब वीरेंद्र सिंह का आना भी मुश्किल होगा क्योंकि वही उनका एक बडा सहारा था । इतना कहा था कि पूरे तौर पर आंसू भर आए और खूब खोलकर होने लगी । इसकी हालत से चंद्रकांता समझ गए कि चपला भी तेज सिंह को चाहती है मगर सोचने लगी कि चलो अच्छा ही है । इसमें भी हमारा ही भला है । मगर तेज सिंह के हाल और चपला की हालत पर बहुत अफसोस हुआ । फिर चपला से कहा उनको छुडाने की यही फिक्र हो रही है क्या तेरे होने से भी छूट जाएंगे तो उसे कुछ नहीं हो सकता है तो मैं कुछ करूँ । चंपा भी वहाँ बैठी अफसोस भरी बातें चल रही थी और वो बोली अगर हो तो मैं तीर्थ सिंह की खोज में जाऊँ । चपला ने कहा अभी तो इस लायक नहीं हुई है । जमता बोली क्यों अब मेरे में क्या कैसे है? क्या मैं तैयारी नहीं कर सकती? चपला ने कहा हाँ तैयारी तो कर सकती है मगर उन लोगों का मुकाबला नहीं कर सकती जिन लोगों ने तेजसिंह जैसे चालाक ए आर को पकड लिया है । हाँ मुझको राजकुमारी उसमें दे तो मैं खोज में जाओ । चंद्रकांता ने कहा इसमें भी खून की जरूरत है । तेरी मेहनत से अगर भी छोडेंगे तो जन्मभर उनको कहने लायक रहेगी । अब तो जाने में देर मत कर जहाँ चपलाना चंपा से कहा देख मैं जाती हूँ पर यार लोग बहुत से आए हुए हैं । ऐसा ना हो कि मेरे जाने के बाद कुछ नया बखेडा बच्चे है और तो जो होगा देखा जाएगा तो राजकुमारी से होशियार रही हो । अगर तब से कुछ भूल हुई या राजकुमारी पर किसी तरह की आप बताई तो मैं जन्मभर तेरा मुन्ना देखो । जंपा ने कहा इस बात से आप खाते जमा रखें । मैं बराबर होशियार रहा करूंगी । चपला अपनी तैयारी के सामान से लैस हो और कुछ दक्षिणी ढंग के जेवर तथा कपडे ले तेजसिंह की खोज में निकली ।

Chapter 17

बयान सत्रह चपला कोई साधारण और अपना दी खूबसूरती और नजाकत के अलावा उसमें ताकत भी थी । दो चार आदमियों से लड जाना या उनको गिरफ्तार कर लेना उसके लिए एक अपना का काम था । शस्त्रविद्या को पूरे तौर पर जानती थी । तैयारी के फन के अलावा और भी कई उसमें थे । गाने और बजाने में उस्ताद नाचने में कार्यकर आतिशबाजी बनाने का बडा शौक कहाँ तक लिखें कोई फॅसा ना था जिसको चपलाना जानती हूँ रंग उसका गोरा बादल हर जगह स्टॉल नाजुक हाथ पाँव की तरफ ख्याल करने से यही जाहिर होता था कि इससे एक फूल से मारना खून करना है । उसको जब कहीं बाहर जाने की जरूरत पडती थी तो अपनी खूबसूरती जानबूझ कर बिगाड डाल दी थी या भेष बदल ली थी । अब इस वक्त शाम हो गई बल्कि कुछ रात भी जा चुकी है । चंद्रमा अपनी पूरी किरणों से निकला हुआ है । चपला अपनी असली सूरत में चली जा रही है । तैयारी का बटुआ बगल में लटकाए कमंड कमर में कैसे और खंजर भी लगाए हुए जंगल ही जंगल कदम बढाए जा रही है । तेज सिंह की याद में उसको ऐसा बेकल कर दिया है कि आपने पदन की भी खबर नहीं । उसको ये मालूम नहीं कि वह किस काम के लिए बाहर निकली है, क्या कहाँ जा रही है । उसके आगे क्या है पत्थर या गठ्ठा नदी है या नाला खली? पैर बढाए जाना ही यही उसका काम है । आंखों से आंसू की बूंदें गिर रही है । सारा कपडा भी गया है तो थोडी थोडी दूर होकर खाती है । उंगलियों से खून गिर रहा है मगर उसको इसका कुछ ख्याल नहीं । आगे एक नाला आया जिसपर चपला ने कुछ ध्यान नदी और हमने से उस नाले में गिर पडी । सिर फट गया । खून निकलने लगा । कपडे बदन के सब भी गए । अब उस को इस बात का ख्याल हुआ की तेज सिंह को छोडा नहीं खोजने चली है । उसके मुँह से झट से बात नहीं । हाय प्यारे मैं तुमको बिल्कुल भूल गई तुम्हारे छुडाने की फिक्र मुझको जरा भी नही उसी की ये सजा मिली । अब चपला संभल गई और सोचने लगी कि वह किसने कहा है । खूब गौर करने पर उसे मालूम हुआ कि रास्ता बिल्कुल भूल गई है और एक भयानक जंगल में आपसी है । कुछ क्षण के लिए तो वह बहुत डर गई । मगर फिर दिल को संभाला उस खतरनाक नाले से पीछे फ्री और सोचने लगी । इसमें तो कोई शक नहीं कि तेजसिंह को महाराज शिवदत्त के यारो ने पकड लिया है तो जरूर चुनारगढ ही ले गए होंगे । पहले वही खोज करनी चाहिए । जब ना मिलेंगे तो दूसरी जगह पता लगा होंगे । ये विचार कर चुनारगढ का रास्ता ढूँढने लगी । हजार खराबी से आधी रात गुजर जाने के बाद रास्ता मिल गया । अब सीधे चुनारगढ की तरफ पहाड ही पहाड चलने के लिए जब सुबह करीब हुई उसने अपनी सूरत एक मार्ग सिपाही किसी बना ली । नहाने धोने, खाने पीने की कुछ फिक्र नहीं सिर्फ रास्ता तय करने की । उसको धुन थी । आखिर भूखी प्यासी शाम होते चुनारगढ पहुंची । दिल में ठान लिया था कि जब तक तेज सिंह का पता नहीं लगेगा, अन्य जलग्रहण न करूंगी । कहीं आराम न लिया इधर उधर ढूंढने और तलाश करने लगी । एकाएक उसे कुछ चालाकी सूची उसने अपनी पूरी सूरत पन्ना लाल की बनाली और घसीटा । सिंह ए आर के डेरे पर पहुंची । हम पहले लिख चुके हैं कि छह यारों में से चार यार विजय बढ गए हैं और घसीटा सिंह और चुन्नीलाल चुनारगढ में ही रह गए हैं । घसीटा सिंह पन्नालाल को देखकर उठ खडे हुए और साहब सलामत के बाद पूछा खाओ पन्ना लाल अबकी बार किसको लाए? घसीटा । सिंह ने कहा, पन्नालाल ने कहा इस बार लाये तो किसी को नहीं । सिर्फ इतना पूछने आए हैं कि नाजिम यहाँ है नहीं, उसका पता नहीं लगता । घसीटा सिंह ने कहा यहाँ तो नहीं आया । पन्नालाल ने फिर कहा फिर उसको पकडा किसने? वहाँ तो आप कोई तैयार नहीं है । घसीटा । सिंह ने कहा ये तो मैं नहीं कह सकता कि वहाँ और कोई भी तैयार है या नहीं । सिर्फ तेज सिंह का नाम तो मशहूर था तो कैद हो गए । इस वक्त किले में बंद पडे होते होंगे । पन्नालाल कहता है है कोई हर्ज नहीं पता लग ही जाएगा । अब जाता हूँ रोक नहीं सकता । ये कहे नकली पन्नालाल वहाँ से रवाना हुए । अब चपला का जी ठिकाने हुआ ये सोचकर की तेज सिंह का पता लग गया और वह यही मौजूद हैं । कोई हर्ज नहीं । जिस तरह होगा छोडा लेगी वो मैदान में निकल गई और गंगा जी के किनारे बहत अपने बटुए में से कुछ मेवा निकाल के खाया गंगाजल पीके निश्चिंत हुई और तब अपनी सूरत गाने वाली औरत की बनाई चपला को खूबसूरत बनाने की कोई जरूरत नहीं थी । वो खुद ऐसी थी कि हजार खूब सूरतों का मुकाबला करें । मगर इस सब आपसे कोई पहचान ले उसको अपनी सूरत बदलनी पडेगी । जब हर तरह से लैस हो गई एक बंशी हाथ में ले राज महल के पिछवाडे की तरफ चाहे एक साफ जगह एक बैठ गई और चढी आवाज में बिरहा गाने लगी एक बार फिर स्वयं लगाकर । फिर उसी गीत को बंजी पर बजाती रात आधी से ज्यादा बीत चुकी थी । राज महल में शिवदत्त महल की छत पर मायारानी के साथ मीठी मीठी बातें कर रहे थे । एक आए गाने की आवाज उनके कानों में गए और महारानी ने भी सुनी । दोनों ने बातें करना छोड दिया और कान लगाकर कौर से सुनने लगे । थोडी देर बाद बंशी की आवाज आने लगी जिसका बहुल साफ मालूम पडता था महाराज की तबियत बेचैन हो गयी । छत लॉंड्री को बुलाकर हुक्म दिया । किसी को कहूँ अब उजागर उसको इस महल के नीचे ले आए जिसके गाने की आवाज आ रही है । उपमा पाते ही पहरेदार दौड गए । देखा कि एक नाजुक बदन बैठी गा रही है । उसकी सूरत देकर लोगों के होशोहवास ठिकाने ना रहे । बहुत देर के बाद बोले महाराज ने महल के करीब आपको बुलाया है और आपका गाना सुनने के लिए बहुत बेचैन है । जब लाने को जिनका करना क्या उन लोगों के साथ साथ महल के नीचे चली आई और गाने लगी । उसके गाने ने महाराज को बेताब कर दिया । दिल को रोकना सकें, हुक्म दिया कि उसको दीवानखाने में ले जाकर बैठाया जाए और रोशनी का बंदोबस्त हो । हम भी आते हैं । महारानी ने कहा आवासी औरत मालूम होती है क्या हर्ज है अगर महल में बुला ली जाए । महाराज ने कहा पहले उसको देख समझ ले तो फिर जैसा होगा किया जाएगा । अगर यहाँ लायक होगी तो तुम्हारी भी खातिर कर दी जाएगी तो क्योंकि दी थी सब सामान लैस हो गया । महाराज दीवानखाने में जाओ राज बीबी चपला नहीं होकर सलाम किया । महाराज ने देखा कि एक और न्यायिक हस्ती रंग गोरा सुरमय रंग की साडी और धानी बूटेदार चोली दक्षिणी ढंग पर पहने पीछे से लांग बांधी । खुलासा गडारी दार जोडा कांटे से बांधे जिस पर एक छोटा सा सोने का फूल माथे पर एक बडा सरोली का टीका लगाए, कानों में सोने की निहायत खूबसूरत जडाऊ बालिया पहने, नाक में सरजा की न एक टीका सोने का और घुंगरू दार पटरी गुंथन के गले में पहने, हाथ में बिना घुंडी का कडा वच्छ डेली जिसके ऊपर कालीन चूडियां, कमर में लच्छेदार करधनी और पैर में सांकडा पहने आज अब आनबान से सामने खडी है कहना तो मुक्तसर ही है मगर बदन की कढाई और सढौली पर इतना ही आफत हो रहा है । गौर से निकाह करने पर एक छोटा सा छुट्टी के बगल में देखा जो चेहरे को और भी रोनक दे रहा था । महाराज की खोज जाते रहे । अपनी महारानी साहब को भूल गया । जिसपर विजय हुए थे, छठ मुंह से निकल पडा । वहाँ क्या कहना है ट्रैक्टर की बन गई । महाराज ने कहा आओ यहाँ बैठो बीबी चपला कमर को बाल देती हुई अॅगुलियों के साथ कुछ नजदीक जा सलाम करना महाराज उसके हाँ उसने के रूप में आ गए । ज्यादा कुछ नहीं कह सके । एक तक सूरत देखने लगे । फिर पूछा भारा मकान कहा है कांड हो क्या काम है तुम्हारी जैसी औरत का के लिए राज के समय घूमना ताज्जुब में डालता है । उसने जवाब दिया मैं ग्वालियर की रहने वाली पतलापन कत्थक की लडकी हूँ । रंभा मेरा नाम है । मेरा बाप भारी गवैया था । एक आदमी पर मेरा जी आ गया । बाद की बात में वह मुझ से गुस्सा हो के चला गया । उसी की तलाश में मारी मारी फिरती हूँ क्या करूँ अक्सर दरबारों में जाती हूँ कि शायद कहीं मिल जाए क्योंकि वह भी बडा भारी गवैया है । सुनता जब नहीं किसी दरबार में हूँ । इस वक्त तबियत की उदासी में योगी कुछ गा रही थी की सरकार ने याद किया हासिल हुई महाराज ने कहा तुम्हारी आवाज बहुत भली है, कुछ गांव तो अच्छी तरह से हूँ । चपला ने कहा महाराज ने स्नान चीज पर बडी मेहरबानी की जो नजदीक बुलाकर बैठाया और लांडी को इज्जत दी । अगर आप मेरा गाना सुनना चाहते हैं तो अपने मुलाजिम सफर दारू साज बजाने वालों को तलब करें । वे लोग साथ दी तो कुछ गाने का लुत्फ पाए । पैसे तो मैं हर तरह से गाने को तैयार हूँ । ये सुन महाराज बहुत खुश हुए और उसमें दिया सब पर्दा हाजर किया जाए । प्यारी दौड गए और सुप्रभाव का सरकारी उतना सुनाया । वे सब हैरान हो गए कि तीन पहर रात गुजरे महाराज को क्या सूझी है । मगर लाचार होकर आना ही पडा आकर जब एक चांद के टुकडे को सामने देखा तो तबियत खुश हो गई । कूढे हुए आए थे । मगर अब खेल गए छट साज मिला । करीने से बैठे चपला ने गाना शुरू किया । अब क्या था साजोसामान के साथ गाना पिछली रात का सवा महाराज को बूत बना दिया । सफलता भी दंग रहे गए । तमाम मिल में आज खर्च करना पडा । बेवक् की महफिल थी । इस पर भी बहुत से आदमी जमा हो गए । दो चीज दरबारी की कराई थी कि सुबह हो गई । फिर भैरवी गाने के बाद सपना ने बंद करके और क्या महाराज अब सुबह हो गई । मैं भी कल की ढकी हूँ क्योंकि दूर से आई थी अब हो तो रख सकता हूँ । चपला की बात सुनकर महाराज चौक बडे देखा तो सचमुच सवेरा हो गया है । अपने गले से मोती की माला उतारकर इनाम में दे दी और बोले अभी हमारा जी तुम्हारे गाने से बिल्कुल नहीं भरा है । कुछ रोज यहाँ टैरो फिर जाना । रंभा ने कहा अगर महाराज कितनी मेहरवानी लॉंड्री के हाल पर है तो मुझको कोई हर्ज रहने में नहीं । महाराज ने रोक दिया कि रंभा के रहने का पूरा बंदोबस्त हो और आज रात को आम महफिल का सामान किया जाए । उपमा पाते ही सब सरंजाम हो गया । एक सुंदर मकान में रम्मा का डेरा पड गया । नौकर मौजूद सब तैनात कर दिए गए । आज की रात आज की महफिल थी । अच्छे आदमी सब इकट्ठे हुए । रंभा भी हाजिर हुई । सलाम करके बैठ गई । महफिल में कोई ऐसा नहीं था जिसकी निगाह रंभा कि तरफ ना हो जिसको देखों लम्बी साल से भर रहा है । आपस में सब यही कहते हैं कि वहाँ क्या भोली सूरत है क्या हूँ कभी आज तक ऐसी हसीना तुमने देखी थी रंभाने का आना शुरू किया अब जिसको देखिए मिट्टी की मूरत हो रहा है । एक गीत गाकर चपला नहीं किया महाराज एक बार नौ गार्ड में राजस्व सिंह की महफिल मेलॉडी ने गाया था । वैसा गाना आज तक मेरा फिरना जमा वर्ष ये थी कि उनके दिवान के लडके तेज सिंह ने मेरी आवाज के साथ मिलकर बीन बजाई थी । हाय मुझको वो महफिल कभी ना भूले दो चार रोज हुआ । मैं फिर नौगढ गई थी । मालूम हुआ कि वह गायब हो गया । तब मैं भी वहाँ लठैहरी तुरंत वापस चली आई । इतना कहकर रम्बा अटक गई । महाराष्ट्र उसपर दिलोजान दिए बैठे थे । बोले आजकल तो वो मेरे यहाँ कैद है और मुश्किल तो ये है कि मैं उस को छोडना नहीं और कैद की हालत में वह कभी बीनना बजाएगा । रंभा ने कहा जब मेरे नाम सुनेगा तो जरूर इस बात को कबूल करेगा मगर उसको एक तरीके से बुलाया जाए । वह अलबत्ता मेरा संघ देगा, नहीं तो मेरी भी न सुनेगा क्योंकि वो बडा जिद्दी है । महाराज ने पूछा वो कौन सा तरीका है? रंभाने कहा एक तो उसको बुलाने के लिए ब्राॅन जाए और वो उम्र में बीस वर्ष से ज्यादा न हो । दूसरे जब उसको लाभ भी दूसरा कोई संगना हो । अगर भागने का खौफ हो तो बीडी उसके पैर में पडी रहे । इसका कोई मुझे का आपत्ती नहीं । तीसरा ये कि बीन कोई उम्दा होनी चाहिए । महाराज ने कहा ये कौन सी बडी बात है । इधर उधर देखा तो एक ब्राह्मण का लडका चेतराम नामी उस उम्र का नजर आया । उसे हो कमा दिया कि तू जाकर तेज सिंह को लिया । मीर मुझे ने कहा तुम जाकर पहले वालों को समझा । दो की तेज सिंह के आने में कोई रोक टोक ना करें । हाँ, एक बेटी उसके पैर में जरूर पडी रहे । खुद पांच चेताराम तेजसिंह को लेने गया और मीर मुंशी ने भी पहले वालों को महाराज का हुक्म सुनाया । उन लोगों को क्या हाल था तेज सिंह को अकेले रवाना कर दिया । तेजसिंह तुरंत समझ गए कि कोई दोस्त जरूर यहाँ पहुंचा है । तभी तो उसने ऐसी चालाकी की शर्त से मुझ को बुलाया है । खुशी खुशी चेताराम के साथ रवाना हुए । जब मैं फिल्में आयें । अजब तमाशा नजर आया । देखा कि एक बहुत ही खूबसूरत औरत बैठी है और सब उसी की तरफ देख रहे हैं जब तेजसिंह महफिल के बीच में पहुंचेगा । रंभाने आवाज थी आओ आओ तेजसिंह रंभ कब से आप की राह देख रही है । भला वह बीन का भूलेगी जो आपने नौ गार्ड में बजाई थी । ये कहते हुए रंभाने तेज सिंह की तरफ देखकर बाई आंख बंद की । तेजसिंह समझ गए कि ये सपना है । बोले रम्बा तो आ गई । अगर मौत भी सामने नजर आती हो तो भी तेरे साथ बीन बजा के मरूंगा क्योंकि तेरे जैसे गाने वाली भला कहाँ मिलेगी? तेज सिंह और रंभा कि बात शंकर महाराज को बडा ताजुब हुआ मगर धुन तो ये थी कि कब तीन बजे और कब ड्रम भाग का एक बहुत उमडी । बीन तेजसिंह के सामने रखी गई और उन्होंने बजाना शुरू किया । रंभा भी गाने लगे । अब जो समा बंधा उसकी क्या तारीफ की जाए? महाराज सकती किसी हालत में हो गए और उनकी कैफियत दूसरी हो गई । एक ही गीत का साथ नहीं करती । सिंह ने तीन हादसे रख दी । महाराज ने कहा क्यों और बचाव तेज सिंह ने कहा बस मैं रोज में एक ही की क्या बोल बजाता हूँ इससे ज्यादा नहीं । अगर आपको सुनने का ज्यादा शौक हो तो कल फिर सुन लीजिए गा रंभाने भी कहा का महाराज यही तो इनमें एम है । राजस् रेंद्र सिंह जिनकी नौकर थे, कहते कहते थक गए । मगर इन्होंने एक न मानी । एक ही बोल बजा कर रहे गए क्या हर्ज है कल फिर सुन लीजिए गा महाराज सोचने लगे कि आज अब आदमी है भला इसमें इसमें क्या फायदा? सोचा है अफसोस मेरे दरबार में ये ना हुआ । रंभा ने भी बहुत कुछ खर्च करके गाना माँ खूब क्या, सभी के दिल में हसरत बनी रहे गई । महाराज ने आपको उसके साथ मजलिस बर्खास्त की और तेज सिंह फिर उसी चेताराम रामन के साथ जेल भेज दिए गए । महाराज को तो अब इसको हो गया कि तेजसिंह केबीन के साथ साथ रंभा का गाना सुने । फिर दूसरे रोज महफिल हुई और उसी चेताराम रामन को भेजकर तेजसिंह बुलाए गए । उस रोज भी एक बोल बजाकर उन्होंने तीन रन महाराज का दिल ना भरा । हुक्म दिया कि कल पूरी महफिल हो । दूसरे दिन फिर महफिल का सामान हुआ । सब कोई आकर पहले ही से जमा हो गए । मगर रंभा महफिल में जाने के वक्त से घंटे भर पहले डालूँ बचा चेतराम की सूरत बना कैदखाने में पहुंचेगी । पहले वाले जानते ही थे कि चेतराम अकेला तेज सिंह को ले जाएगा । महाराज का उप नहीं ऐसा है । उन्होंने ताला खोलकर तेज सिंह को निकाला और पैर में पीडित डाल सीतराम के हवाले कर दिया । सीतराम यानी कि चपलाना उन को लेकर चलते बने । थोडी दूर जाकर चेतराम ने तेज सिंह की बेटी खोल दिए । आप किया था । दोनों ने जंगल का रास्ता लिया । कुछ दूर जाकर चपला ने अपनी सूरत बदल ली और असली सूरत में हो गई । अब तेज सिंह उसकी तारीफ करने लगे । चपला ने कहा आप मुझ को शर्मिंदा ना करें क्योंकि मैं अपने को इतना चालाक नहीं समझती जितनी आप तारीफ कर रहे हैं । फिर मुझको आपको छुडाने की कोई गरज पीना थी । सिर्फ चंद्रकांता की बेमुरव्वत से मैंने ये काम किया । तेज सिंह ने कहा ठीक है तुमको मेरी गरज का है को होगी गंजू तो मैं कह रहा कि तुम्हारे साथ सफलता बना जो काम बाप दारू रहना किया था तो करना पडा ये सुन चपला हस पडी और बोली फस माफ कीजिए ऐसी बात करिए । तेज सिंह ने कहा हुआ माफ क्या करना मैं बगैर मजदूरी लिए नहीं छोडूंगा । जब मैंने कहा मेरे पास क्या है जो मैं तो उन्होंने कहा जो कुछ तुम्हारे पास है वही मेरे लिए बहुत है । चपला ने कहा है इन बातों को जाने दीजिए और ये नहीं है कि यहाँ से खाली ही चलिएगा या महाराज शिवदत्त को कुछ हाथ भी दिखाइएगा । तेज सिंह ने कहा इरादा तो मेरा यही था आगे तुम जैसा का हो । चपला ने कहा जरूर कुछ करना चाहिए । बहुत देर तक आपस में सोच विचारकर तो उन्होंने एक चालाकी ठहराई जिससे करने के लिए ये दोनों उस जगह से दूसरे घने जंगल में चले गए ।

Chapter 18

बयान अठारवां अब महाराज शिवदत्त की महफिल का हाल सुनी । महाराज शिवदत्त सिंह महफिल में । हाँ राजे रंभा के आने में देर हुई तो एक चोपदार को कहा कि जाकर उसको पाला है और चेतराम राम मन को तेज सिंह को लाने के लिए भेजा । थोडी देर बाद चोपदार ने आकर क्या की? महाराज रम्बा तो अपने डेरे पर नहीं है, कहीं चली गई । महाराज को बडा ताजुब हुआ क्योंकि उसको जी से चाहने लगी थी । दिल में रंभा के लिए अफसोस करने लगे और उप नदियां फौरन उसे तलाश करने के लिए आदमी भेजे जायेंगे । इतने में चेतराम ने आकर दूसरी खबर सुनाई की कैद खाने में तेजसिंह नहीं है । अब तो महाराज के होश उड गए । सारी महफिल दम हो गई कि अच्छे गाने वाली आई जो सभी को बेवकूफ बनाकर चली गई । घसीटा सिंह और चुन्नीलाल यार नहीं किया महाराज बेशक कोई यार था जो इस तरह अगर तेज सिंह को छुडा ले गया । महाराज ने कहा ठीक है मगर काम उसने काबिले नाम के क्या यार मैंने भी तो उसका गाना सुना था । मैं फिल्में मौजूद ही थे उन लोगों की अगले पर क्या पत्थर पड गए थे कि उसको ना पहचाना । लानत है तुम लोगों के यार कहलाने पर ये है महाराज कमर गुस्से से भरे हुए उठकर महल में चले गए । महफिल में जो लोग बैठे थे उन लोगों ने अपने घर का रास्ता लिया । तमाम शहर में ये बात फैल गई । जगह देखिए यही चर्चा नहीं हूँ । दूसरे दिन जब गुस्से में भरे हुए महाराज दरबार में आए तो एक चोपदार नर्स क्या महाराज वो जो आने वाली आई थी । असल में वह थी थी वो चेतराम मिश्र की सूरत बनाकर तेज सिंह को छुडा ली गई । मैंने अभी उन दोनों को सिलाई वाले जंगल में देखा है । ये सब महाराज को और पिताजी हुआ । उपमा दिया कि बहुत से आदमी जाए और उनको पकडा । लावे पर चौपदार नहीं किया महाराज इस तरह से भी गिरफ्तार ना होंगे । भाग जाएंगे । हाँ घसीटा सिंह और चुनीलाल मेरे साथ चले तो मैं दूर से इन लोगों को दिखलाया दूँ । ये लोग कोई चालाकी करके उन्हें पकडने । महाराज ने इस तरकीब को पसंद करके दोनों यारों को चोपदार के साथ जाने का हुक्म दिया । चोबदार ने उन दोनों को लिए उस जगह पहुंचा दिया जिस जगह उसने तेज सिंह का निशान देखा था । पर देखा की वहां कोई नहीं है तब घसीटा । सिंह ने पूछा अब किधर देखें । उसने कहा क्या ये जरूरी है कि वे तब से अबतक किसी पेड के नीचे बैठे रहे हैं? इधर उधर देखिए । कहीं होंगे ये सेवन घसीटा सिंह ने कहा अच्छा चलो, तुम ही आगे चलो मेल होगी । जर्जर ढूंढने लगे । इसी समय एक यही ड्रीम सर पर खर्च ये में दूध लिए आती नजर पडी । चोपदार ने उसको अपने पास बुलाकर पूछा की तो उन्हें जगह का एक औरत और एक मार्ग को देखा है । उसने कहा हाँ, उस जंगल में मेरा अडार है । बहुत सी गायब । ऐसी मेरी वहाँ रहती है । अभी मैंने उन दोनों के पास दो पैसे का दूध बेचा है और बाकी दूर लेकर शहर बेचने जा रही हूँ । ये सुनकर चोपदार बतौर इनाम के चार पैसे निकाल उसको देने लगा । मगर उसने इनकार की और कहा कि मैं तो सेंस के पैसे नहीं लेंगे । हाँ, चार पैसे का दूध आप लोग लेकर पीले तो मैं शहर जाने से बच्चों और आपका एहसान मान । चोबदार ने कहा क्या हर्ज है तो दूधी दे दे । बस सही रहने खांचा रख दिया और दूध देने लगी । चोपदार ने उन दोनों यारों से कहा आइए अभी लीजिए । उन दोनों यारों ने कहा हमारा जी नहीं चाहता वो बोली अच्छा आपकी खुशी चोबदार नहीं तूतिया । और तब फिर दोनों यारो से कहा वहाँ क्या दूर है? शहर में तो रोजा पीते ही है भला । आज इसको भी तो पीकर मजा देखिए । उसकी जिद करने पर दोनों यारों ने भी दूसरी है और चार पैसे दूध वाली को दिए । अब ये तीनों तेज सिंह को ढूंढने चले । थोडी दूर जाकर चोपदार ने कहा, न जाने कि मेरा सिर घूमता है घसीटा । सिंह बोले मेरी भी वही दशा है । चुनीलाल तो कुछ कहना ही चाहते थे कि गिर पडी । इसके बाद चोबदार और घसीटा । सिंह भी जमीन पर लेट गए । दूध बेचने वाली बहुत दूर नहीं गई थी । उन तीनों को गिरते देख दौडती हुई । पास आई और लख्खा सुंघाकर चोपदार को कुछ यार क्या वहाँ चौपदार तेजसिंह थे जब होश में आए अपनी असली सूरत बना ली । इसके बाद दोनों की मुश्किल बांध गठरी का सेक चपला को और दूसरे को तेज सिंह ने पीठ पर लादा और नौगढ का रास्ता लिया ।

Chapter 19

बयान उन्नीसवां तेजसिंह को छुडाने के लिए जब अपना चुनारगढ गई तब चंपानेर जी में सोचा कि यार तो बहुत से आए हैं और मैं अकेली हूँ । ऐसा ना हो कभी कोई आप बता जाए ऐसी तरकीब करनी चाहिए जिसमें ए आरो का डरना रहे और रात को भी आराम से सोने में आए । यह सोचकर उसने एक मसाला बनाया । जब रात को सब लोग हो गए और चंद्रकांता भी पलंग पर जा लेटी । तब जम्पा ने उस मसाले को पानी में घोलकर जिस कमरे में चंद्रकांता सोती थी उसके दरवाजे पर दो गज इधर उधर लेप दिया और निश्चिंत हो राजकुमारी के पलंग पर जाने थी । इस मसाले में ये था कि जिस जमीन पर उसका लेप किया जाए सूख जाने पर अगर किसी का पैर जमीन पर पडे तो जोर से पटाके की आवाज आए मगर देखने से ये ना मालूम हो कि जमीन पर कुछ लेना क्या है । रात भर चंबा आराम से सोई रही कोई आदमी उस कमरे के अंदर ना आया । सुबह को चंपा ने पानी से वह मसाला धो डाला । दूसरे दिन उसने दूसरी चला की मिट्टी की खोपडी बनाई और उसको रंग रंग आ कर ठीक चंद्रकांता की मूरत बनाकर जिस पलंग पर कुमारी सोया करती थी । तकिए के सहारे वो खोपडी रखती और धडकी जगह कपडा रखकर एक हल्की चादर उस पर चढा दी है । मगर वो खुला रखा और खूब रोशनी करो । चारपाई के चारों तरफ वही ले कर दीया कुमारी से कहा आज अब दूसरे कमरे में आराम करें । चंद्रकांता समझ गए और दूसरे कमरे में जा लेटी । जिस कमरे में चंद्रकांता सोई उसके दरवाजे पर भी लिख कर दिया और जिस कमरे में पलंग पर खोपडी देखी थी उसके बगल में कोटरी थी । चिराग बुझाकर आपस में हो गई । आधी रात गुजर जाने के बाद उस कमरे के अंदर से जिसमें खोपडी रखी थी, पटाखे की आवाज आई । सुनते ही चंपा झट बैठी और दौड कर बाहर से किवाड बंद कर खूब गोल करने लगी । यहाँ तक की बहुत ही लौंडिया वहाँ पर इकट्ठी हो गई और एक ने जाकर महाराज को खबर दी कि चंद्रकांता के कमरे में चोर घुसा है । ये सुन महाराज को दौडे आए और रोक दिया कि महल के पहले से दस पांच सिपाही अभी आए । जब सब इकट्ठे हुए । कमरे का दरवाजा खोला गया । देखा कि रामनारायण और पन्नालाल दोनों यार भीतर है । बहुत से आदमी उन्हें पकडने के लिए अंदर घुस गए उन्हें आप ने एक अंजर निकाल चलाना शुरू किया । चार पांच सिपाहियों को जख्मी क्या आखिर पकडे गए महाराज ने उनको कैद में रखने का हुक्म दिया और चंपा से हाल पूछा । उसने अपनी कार्रवाई कहे सुनाई । महाराज बहुत खुश हुए और उसको इनाम देकर पूछा चपला कहा है । उसने कहा वो बीमार है । फिर महाराज ने और कुछ पूछा, आपने आरामगाह में चले गए । सुबह को दरबार में उन्हें आरोप को तलब किया । जब वे आए तो पूछा तुम्हारा नाम क्या है? पन्नालाल बोला सर दोड सिंह महाराज को उसकी पिटाई पर बडा गुस्सा आया । कहने लगे गी ये लोग बदमाश है, जरा भी नहीं डरते है । ले जाकर इन दोनों को खूब होशियारी के साथ कैद रखो । उपमुख्य मुताबिक में कैद खाने में भेज दिए गए । महाराज ने हरदयालसिंह से पूछा । कुछ तेज सिंह का पता लगा? हरदयालसिंह ने कहा महाराज अभी तक तो पता नहीं लगा । ये ए आर जो पकडे गए हैं उन्हें खूब पीटा जाए तो शायद ये लोग कुछ बताइए । महाराज ने कहा ठीक है, मगर तेजसिंह आएगा तो नाराज होगा कि ये आरोप को क्यों मारा । ऐसा कायदा नहीं है । कुछ दिन तेज सिंह की रह और देख लो । फिर जैसा मुनासिब होगा किया जाएगा । मगर इस बात का ख्याल रखना वो ये है कि तुम फौज के इंतजाम में होशियार रहना क्योंकि शिवराज सिंह का चढाना अब ताज्जुब नहीं है । हरदयालसिंह ने कहा, मैं इंतजाम से होशियार सिर्फ एक बात महाराज से इस बारे में पूछनी थी, जो एकांत में अर्ज करूंगा । जब दरबार बर्खास्त हो गया तो महाराज ने हरदयालसिंह को एकांत में बुलाया और पूछा वो कौन सी बात है? उन्होंने कहा, महाराज दीपसिंह ने कई बार मुझसे कहा था बल्कि कुंवर वीरेंद्र सिंह और उनके पिता नहीं भी फरमाया था कि यहाँ के सब मुसलमान क्रूर की तरफ दार हो रहे हैं । जहाँ तक हो इन को काम करना चाहिए । मैं देखता हूँ तो ये बात ठीक मालूम होती है । इसके बारे में जैसा होता हूँ किया जाएगा । महाराज ने कहा, ठीक है, हम खुद इस बात के लिए तुमसे कहने वाले थे है । अब कह देते हैं कि तुम धीरे धीरे सब मुसलमानों को नाजुक कामों से बाहर कर दो । हरदयालसिंह ने कहा बहुत अच्छा ऐसा ही होगा । ये कह महाराज से रुखसत को अपने घर चले आए

Chapter 20

बयान बीसवां महाराज युवराज सिंह ने घसीटा । सिंह और चुनीलाल को तेज सिंह को पकडने के लिए भेजकर दरबार बर्खास्त किया और महल में चले गए । मगर जब उनका रंभा के जुल्फों में ऐसा फस गया था कि किसी तरह निकल ही नहीं सकता था, उस महाराणी से भी हस्कर बोलने की नौबत ना आई । महारानी ने पूछा आपका चेहरा सुस्त क्यों है? महाराज ने कहा कुछ नहीं जागने से ऐसी कैफियत है । महारानी ने फिर से पूछा आपने वादा किया था कि उसका आने वाली को महल में लाख कर तुम्हें भी उसका गाना सुनाएंगे तो क्या हुआ? जवाब दिया वहाँ हमी को लो बनाकर चली गई तो उनको किसका गाना सुना है । ये सुनकर महारानी कलावति को बडा ताज्जुब हुआ । पूछा कुछ खुलासा कहिए क्या मामला है? इस समय मेरा जी ठिकाने नहीं है । मैं ज्यादा नहीं बोल सकता । ये कहकर महाराज वहाँ से उठकर अपने खास कमरे में चले गए और पलंग पर लेटकर रंभा को याद करने लगे और मन में सोचने लगते हैं रम भाग कौन? इसमें तो कोई शक नहीं कि वह थी और फिर तेज सिंह को क्यों छोडा लेंगे । उस पर वो आशिक तो नहीं थी जैसा कि उसने कहा था हाईड्रम था तूने मुझे घायल कर डाला क्या इसी वास्ते तू आई थी क्या करूँ? कुछ पता भी नहीं मालूम जो तुमको ढूंढ लूँगा । दिल की बेताबी और रंभा कि ख्याल में रात भर नींद ना आई । सुबह को महाराज ने दरबार में आकर पर्याप्त क्या घसीटा । सिंह और चुन्नीलाल का पता लगाकर आया । नहीं मालूम हुआ कि अभी तक में लोग नहीं आए । ख्याल रंभा ही की तरफ था । इतने में बद्रीनाथ, नाजिम, ज्योति ही जी और क्रूर सिंह पर नजर पडी । उन लोगों ने सलाम किया और एक किनारे बैठ गए । उन लोगों के चेहरे पर सुस्ती और उदासी देखकर और भी रंज बढ गया । मगर कच हैरी में कोई हाल उनसे ना पूछा । दरबार बर्खास्त करके तकलीफ में गए और पंडित बद्रीनाथ, क्रूर सिंह, नाजीम और जगन्नाथ ज्योतिषी को तलब किया । जब वे लोग आए और सलाम करके अदब के साथ बैठ गए, तब महाराज ने पूछा कहो तुम लोगों ने विजयगढ जाकर क्या क्या? पंडित बद्रीनाथ ने कहा बुजुर्ग काम तो यही हुआ कि भगवान दत्त को तेज सिंह ने गिरफ्तार करें और पन्नालाल और रामनारायण को एक चंपा नामी और आपने बडी चालाकी और होशियारी से पकड लिया । बाकी मैं बच गया । उनके आदमियों में सिर्फ तेजसिंह पकडा गया, जिसको ताबेदार ने उस ओवर में भेज दिया था । सिवा इसके और कोई काम ना हुआ । महाराज ने कहा ए सिंह को भी एक और छोडा ले गई काम तो उसने सजा पाने लाया किया । मगर अफसोस ये तो मैं जरूर कहूंगा कि वह थी थी जो तेज सिंह को छुडा ले गई । मगर कौन थी ये ना मालूम हुआ । तेज सिंह को तो लेती ही गई जाती दफा चुन्नीलाल और घसीटा । सिंह पर भी मालूम होता है कि हाथ फेरती गई । वे दोनों उसकी खोज में गए थे, मगर अभी तक नहीं आए । क्रूर की मदद करने से मेरा नुकसान ही हुआ है । अब तुम लोग ये पता लगाओ कि वह भारत कौन थी, जिसने गाना सुनाकर मुझे बेताब कर दिया और सभी की आंखों में धूल डाल करते सिंह को छुडा ले गए । अभी तक उसकी मोहिनी सूरत मेरी आंखों के आगे फिर रही है । नाजीम ने तुरंत कहा, कुजूर में पहचान गया, वो जरूर चंद्रकांता की सखी चपला थी । ये काम सेवायें उसके दूसरे का नहीं । महाराज ने पूछा क्या चपला चंद्रकांता से भी ज्यादा खूबसूरत है? नाजिम ने कहा महाराज चंद्रकांता को तो चपला क्या पाएगी? मगर उसके बाद दुनिया में कोई खूबसूरत है तो चपला ही है और वह तेजसिंह पर आशिक भी है । इतना आसन महाराज कुछ देर तक हैरानी में रहे । फिर बोले चाहे जो हो, जब तक चंद्रकांत और चपला मेरे हाथ में लगेगी मुझको आराम ना मिलेगा । बेहतर है कि मैं इन दोनों के लिए जय सिंह को चिठ्ठी लिखो । क्रूर सिंह बोला महाराज जयसिंह चिट्ठी को कुछ ना मानेंगे । महाराज ने जवाब दिया क्या हर्ज है । अगर चिट्टी का कुछ ख्याल न करेंगे तो विजयगढ को पता नहीं करूंगा । ये कहकर उन्होंने मीर मुंशी को तलब किया । जब वहाँ आ गया तो हुकमा दिया राजा जयसिंग के नाम मेरी तरफ से खत्म लिखो कि चंद्रकांता की शादी मेरे साथ कराते और दहेज में चपडा को दे देंगे । मीर मुंशी ने मुझे बुक मके खत लिखा जिसपर महाराज ने मोहर करके पंडित बद्रीनाथ को दिया और कहा तो भी इसी चिट्ठी को लेकर जाओ । ये काम तुम्ही से बनेगा । पंडित बद्रीनाथ को क्या हर था खत लेकर उसी वक्त विजयगढ की तरफ रवाना हो गए

Chapter 21

बयान इक्कीसवां दूसरे दिन महाराजा जयसिंह दरबार में बैठे हरदयालसिंह से तेज सिंह का हाल पूछ रहे थे कि अभी तक पता लगा या नहीं की । इतने में सामने से तेज सिंह एक बडा भारी कट्टर पीठ पर लादे हुए आ पहुंचे । गठरी तो दरबार के बीच में रख दी और चोकर महाराज को सलाम किया । महाराज जयसिंह तेजसिंह को देख कर खुश हुए और बैठने के लिए इशारा किया । जब तीन सिंह बैठ गए तो महाराज ने पूछा क्यों जी इतने दिन कहा रहे और क्या लाए हो तो तुम्हारे लिए हम लोगों को बडी भारी परेशानी रही । दीवान जीत सिंग भी बहुत घबराए होंगे क्योंकि हमने वहाँ भी तलाश करवाया था । तेज सिंह ने आज क्या महाराज ताबेदार दुश्मन के हाथ में फस गया था । अब बुजुर्ग के इकबाल से छूट आया है बल्कि आती दफा चुनारगढ के तो यारों को जो वहाँ से लेता आया है । महाराज सुन कर बहुत खुश हुए और अपने हाथ का कीमती कडा तेजसिंह कोई नाम देकर कहा यहाँ भी दो यार को महल में चंपा ने गिरफ्तार किया जो कैद किए गए हैं । इनको भी वहीं भेज देना चाहिए । ये कहकर हरदयालसिंह की तरफ देखा । उन्होंने प्यादों को गठरी खोलने का हुक्म दिया । याद उन्हें कंट्री खोली तेज सिंह ने । उन दोनों को होशियार के और प्यादों ने उन को ले जाकर उसी जेल में बंद कर दिया जिसमें रामनारायण और पन्नालाल तेज सिंह ने महाराज शेयर किया । मेरे गिरफ्तार होने से नौगढ में सब कोई परेशान होंगे । अगर इजाजत हो तो मैं जाकर सभी से मिला हूँ । महाराज ने कहा हाँ जरूर तुमको वहाँ जाना चाहिए जाओ मगर जल्दी वापस चले आना । इसके बाद महाराज ने हरदयालसिंह को मार दिया तो मेरी तरफ से तोहफा लेकर तेज सिंह के साथ नौगढ जाओ । बहुत अच्छा है कि हरदयालसिंह ने तौर पे का सामान तैयार किया और कुछ आदमी संग ले तेज सिंह के साथ नौगढ रवाना हुए । चपला जब महल में पहुंची उसको देखते ही चंद्रकांता ने खुश होकर उसे गले लगा लिया और थोडी देर बाद हाल पूछने लगी । चपला ने अपना पूरा हाल खुलासा तौर पर बयान क्या थोडी देर तक सपना और चंद्रकांता में चुहल होती रही । कुमारी ने चंपा की चालाकी का हाल बयान करके कहा कि तुम्हारी शागिर दाने भी तो यारों को गिरफ्तार किया है । ये सुनकर चपला बहुत खुश हुई और चंपा को जो उसी जगह मौजूद थी गले लगाकर बहुत शाबाशी । इधर तेजसिंह नौगढ गए थे । रास्ते में हरदयालसिंह से बोले अगर हम लोग सवेरे दरबार के समय पहुंचते तो अच्छा होता है क्योंकि उस वक्त सब कोई वहाँ रहेंगे । इस बात को हरदयालसिंह ने भी पसंद किया और रास्ते में ठहर गए । दूसरे दिन दरबार के समय ये दोनों पहुंचे और सीधे कचहरी में चले गए । राजा साहब के बगल में वीरेंद्र सिंह भी बैठे थे । तेज सिंह को देखकर इतने खुश हुए कि मानव दोनों जहाँ की दौलत मिल गई हो । हरदयालसिंह ने शुक्कर महाराज और कुमार को सलाम की और जीत सिंह से बराबर की मुलाकात तेज सिंह ने महाराज सुरेंद्र सिंह के कदमों पर सर रखा । राजा साहब ने प्यार से उसका सिर उठाया । तब अपने पिता को पाल आगन करके तेजसिंह कुमार के बगल में जहाँ बैठे हरदयालसिंह ने तोहफा पेश किया और एक पोशाक जो कुंवर वीरेंद्र सिंह के वास्ते लाए थे वो उनको पहनाई जिसे देख राजा सुरेंद्र सिंह बहुत खुश हुए और कुमार की खुशी का तो कुछ ठिकाना ही ना रहा । राजा साहब ने तेजसिंह से गिरफ्तार होने का हाल पूछा । तेज सिंह ने पूरा हाल आपने गिरफ्तार होने का तथा कुछ बनावटी हाल आपने छूटने का बयान किया और ये भी कहा आती दफा वहाँ के दो यारों को भी गिरफ्तार कर लाया हूँ जो विजयगढ में कहते हैं । ये सुनकर राजा ने खुश होकर देर सिंह को बहुत कुछ नाम दिया और कहा तुम अभी जाओ महल में सबसे मिलकर अपनी माँ से भी मिलो उस बेचारी का तो भारी जुदाई में क्या हाल होगा । वहीं जाती होगी बमो जब मर्जी के तेजसिंह सभी से मिलने के वास्ते रवाना हुए हैं । हरदयालसिंह की मेहमानदारी के लिए राजा ने जीत सिंह को लेकर घर बार बर्खास्त किया । सभी के मिलने के बाद तेज सिंह कुंवर वीरेंद्र सिंह के कमरे में गए । कुमार ने बडी खुशी से उठकर तेजसिंह को गले लगा लिया और जब बैठे तो कहा आपने गिरफ्तार होने का हाल तो तुमने ठीक बयान कर दिया मगर छूटने का हाल बयां करने में झूठ कहा था । अब सच सच बताओ तुम को किसने छुडाया? तेज सिंह ने चपला की तारीफ की और उसकी मदद से आपने छूटने का सच्चा सच्चा हाल कह दिया । कुमार ने कहा मुबारक हो । तेजसिंह बोले पहले आपको मैं मुबारकबाद दे दूंगा तब कहीं ये नौबत पहुंचेगी की आप मुझे मुबारकबाद नहीं । कुमार हस्कर चुप रहे । कई दिनों तक तेजसिंह हसी खुशी से नौगढ में रहे मगर वीरेंद्र सिंह का तकाजा रोज होता ही रहा कि फिर जिस तरह से हो चंद्रकांता से मुलाकात करा हूँ ये भी धीरज देते रहेंगे । कई दिन बाद हरदयालसिंह ने दरबार में महाराज से हर्ज क्या? कई रोज हो गए ताबेदार को आए वहाँ बहुत हर्ज होता होगा । अब रुक्सत मिलती तो अच्छा था और महाराज ने भी फरमाया था की आधी दफा तेजसिंह को साथ लेते आना अब जैसी मर्जी हो । राजा सुरेंद्र सिंह ने कहा बहुत अच्छी बात है तो उसको अपने साथ लेते जाओ । ये कह खिलाफ दिवार हरदयालसिंह को दिया और तेज सिंह को उनके साथ विदा किया । जाते समय तेजसिंह कुमार से मिलने आए कुमार ने रोका उनको विदा किया और कहा मुझको ज्यादा कहने की जरूरत नहीं है मेरी हालत देखते जाऊँ । तेज सिंह ने बहुत कुछ दिया और यहाँ सुविधा हो उसी रोज विजयगढ पहुंचे । दूसरे दिन दरबार में दोनों आदमी हाजिर हुए और महाराज को सलाम करके अपनी अपनी जगह बैठे हैं । तेजसिंह से महाराज ने राजा सुरेंद्र सिंह की कुशलक्षेम पूछी जिसको उन्होंने बडी बुद्धिमानी के साथ मैं क्या । इसी समय बद्रीनाथ भी राजा शिवदत्त की चिट्ठी लिए हुए वहाँ पहुंचे और आशीर्वाद देकर चिट्ठी महाराज के हाथ में दे दी । जिसको पडने के लिए महाराज ने दीवान हरदयालसिंह को दिया खत पढते पढते हरदयालसिंह का चेहरा हमारे कुत्ते के लाल हो गया । महाराज और तेजसिंह हरदयालसिंह के मूंग की तरफ देख रहे थे । उसकी रंगत देखकर समझ गए कि खत्म में कुछ बेहद भी की बातें लिखी गयी हैं । खत पढकर हरदयालसिंह ने क्या ये खत तकलीफ में सुनने लायक है? महाराज ने कहा अच्छा पहले बद्रीनाथ के टिकने का बंदोबस्त करो, फिर हमारे पास दीवान खाने में हूँ । तेज सिंह को भी साथ ले आना । महाराज ने दरबार बर्खास्त कर दिया और महल में चले गए । दीवान हरदयालसिंह पंडित बद्रीनाथ के रहने और जरूरी सामानों का इंतजाम कर तेज सिंह को अपने साथ ले कोर्ट में महाराज के पास गए और सलाम करके बैठ कर महाराज ने शिवदत्त का खत्म बनाने का हुक्म दिया । हरदयालसिंह ने खत को महाराज के सामने ले जाकर अर्ज किया कि अगर सरकार खत पढ लेते तो अच्छा था । महाराज ने खत पडा, पढते ही आंख मारे, गुस्से के सुरु हो गए खत्म फाडकर फेंक दी और कहा बद्रीनाथ से कह दो की इस खत का जवाब यही है कि यहाँ से चले जाएंगे । इसके बाद थोडी देर तक महाराज कुछ देखते रहे तब रंज भरी धीमी आवाज में बोले, क्रूर के चुनारगढ जाते ही हमने सोच लिया था कि जहाँ तक बनेगा वह आग लगाने से ना चुकी थी और आखिर यही हुआ है । मेरे जीते जी तो उसकी मुराद पूरी न होगी । साथ ही आप लोगों को भी अब पूरा बंदोबस्त रखना चाहिए । तेज सिंह ने हाथ जोडकर क्या? इसमें कोई शक नहीं कि शिव तब जरूर फौज लेकर चढाएगा । इसलिए हम लोगों को भी मुनासिब है कि अपनी फौज का इंतजाम और लडाई का सामान पहले से कर रहे हैं । यहाँ तो शिवदत्त की नियत तभी मालूम हो गई थी जब उसने यारों को भेजा था, पर अब कोई शक नहीं रहा । महाराज ने कहा, मैं इस बात को खूब जानता हूँ कि शिवदत्त के पास तीस हजार फौज है और हमारे पास सिर्फ दस हजार मगर के अंदर जाऊंगा । तेज सिंह ने कहा, दस हजार फौज महाराज की और पांच हजार फौज हमारे सरकार पंद्रह हजार हो गई । ऐसे गीदड को मारने को इतनी फौज काफी है । अब महाराज दीवान साहब को एक खत देकर नौगढ भेजे । मैं जाकर फौज ले आता हूँ, बल्कि महाराज की राय हो तो कुंवर वीरेंद्र सिंह को भी बुला ले और फौज का इंतजाम उनके हवाले करेंगे । कर देखिए क्या कैफियत होती है दीवान हरदयालसिंह बोले कृपानाथ इस राय को तो मैं भी पसंद करता हूँ । महाराज ने कहा तो ठीक है मगर वीरेंद्र सिंह को अभी लडाई का काम सुपुर्द करने को जी नहीं चाहता । चाहे वो इस फंड में होशियार हो मगर क्या हुआ जैसा सुरेंद्र सिंह का लडका वैसे मेरा भी मैं कैसे उसको लडने के लिए कहूंगा और सुरेंद्र सिंह भी कब इस बात को मंजूर करेंगे । तेज सिंह ने जवाब दिया, महाराज इस बात की तरफ शराबी ख्याल न करें । ऐसा नहीं हो सकता कि महाराज तो लडाई पर जाए और वीरेंद्र सिंग घर पर बैठे आराम करें । उन का दिल कभी ना मानेगा । राजा सुरेंद्र सिंह भी वीर है, कुछ कायर नहीं । वीरेंद्र सिंह को घर में बैठने ना देंगे बल्कि खुद भी मैदान में बढकर लडे तो ताजुब नहीं महाराज जयसिंह तेजसिंह की बात सुनकर बहुत खुश हुए और दीवान हरदयालसिंह को हुक्म दिया तुम राजा सुरेंद्र सिंह को शिवदत्त की कुछ ताकि का हाल और जो कुछ हमने उसका जवाब दिया है वह भी लिखो और पूछो की आपकी क्या राय है? इस बात का जवाब आ जाने दो । फिर जैसा होगा किया जाएगा और खत्म भी तो भी लेकर जाओ और कल ही लौटाओ क्योंकि अब देर करने का मौका नहीं । हरदयालसिंह ने मुझे मके खत लिखा और महाराज ने उस पर मोहर करके उसी वक्त तो दीवान हरदयालसिंह को विदा कर दिया । दीवान साहब महाराज सुविधा होकर नौगढ की तरफ रवाना हुए । थोडा सा दिन बाकी था जब वहां पहुंची सीधे दिवान जीत सिंह के मकान पर चले गए । दीवान जीतसिंह खबर पाते ही बाहर आए हरदयालसिंह को लाकर अपने यहाँ उतारा और हालचाल पूछा । हरदयालसिंह ने सब खुलासा हाल कहाँ? जीत सिंग गुस्से में आकर बोले आजकल शिवदत्त के दिमाग में खलल आ गया है । हम लोगों को उसने साधारण समझ लिया है । है, देखा जाएगा कुछ हर्ज नहीं । आप आज शाम को राजा साहब से मिलेगा । शाम के वक्त हरदयालसिंह ने जीत सिंग के साथ राजस्व महेंद्र सिंह की मुलाकात करने गए । वहाँ ओवर भी बैठे थे । राजा साहब ने बैठने का इशारा किया और हालचाल पूछा । उन्होंने महाराज जयसिंह का खर्च दे दिया । महाराज ने खुद उस चिट्ठी को पढा । गुस्से के मारे कुछ बोलना सके और खत्म कुंवर वीरेंद्र सिंह के हाथ में दे दिया । कुमार ने भी उसको बखूबी पडा । इनकी भी वही हालत हुई । क्रोध से आंखों के आगे अंधेरा छा गया । कुछ देर तक सोचते रहे । इसके बाद हाथ जोडकर पिता से अर्ज किया मुझको लडाई का बडा हौसला है यही हम लोगों का धर्म भी है । फिर ऐसा मौका मिले या ना मिले इसलिए खत्म करता हूँ कि मुझ को खुश हो तो अपनी फौज लेकर जाऊँ और विजयगढ पर चढाई करने से पहले ही शिवदत्त को कैद कर लूँ । राजस्व महेंद्र सिंह ने कहा उस तरफ जल्दी करने की कोई जरूरत नहीं है । तुम अभी विजयगढ जाऊँ । क्षत्रियों को लडाई से ज्यादा प्यारा बाप बेटा, भाई, भतीजा कोई नहीं होता इसलिए तुम्हारी मोहब्बत छोडकर उपमा देता हूँ की अपनी कुल फौज लेकर महाराज जयसिंह को मदद पहुंचाओ और नाम कम हूँ । फिर जीत सिंह की तरफ देख कर फौज में मुनादी करा दो की रात भर में सब लैस हो जाए । सुबह को कुमार के साथ जाना होगा । इसके बाद हरदयालसिंह से कहा आज आप रह जाए और कल अपने साथ ही फौज तथा कुमार को लेकर तब जाए ये उपमा देकर राज महल में चले गए । जीत सिंग दीवान हरदयालसिंह को साथ लेकर घर गए और कुमार अपने कमरे में जाकर लडाई का सामान तैयार करने लगी । चंद्रकांता को देखने और लडाई पर चलने की खुशी में रात की डर गई । कुछ मालूम ही ना हुआ

Chapter 22

बयान बाईस वहाँ सुबह होते ही कुमार ना हाथ होकर जंगी कपडे पहन हथियारों को बदन पर सजा । माँ बाप सुविधा होने के लिए महल में गए । रानी से महाराज ने रात की संभाल कह दिया था । वो इनका फौजी ठाठ देख कर दिल में बहुत खुशी हुई । कुमार ने दंडवत कर विदा मांगी । रानी ने आंसू भरकर कुमार को गले से लगाया और पीठ पर हाथ फेरकर कहा बेटा जाओ वीर पुरुषों में नाम करो क्षत्रिय कुल का नाम रख फतह का डंका बजाओ । शूरवीरों का धर्म है की लडाई के वक्त माँ बाप ऐसा राम किसी की मोहब्बत नहीं करते तो तुम भी जाओ ईश्वर करे लडाई में बाहरी तुम्हारी पीटना देखें माँ बाप सुविधा होकर कुमार बाहर आए । दीवान हरदयालसिंह को मुस्तैद देखा । आप भी एक घोडे पर सवार हो रवाना हुए । पीछे पीछे फौज भी समुद्र की तरह लहर मारती चली । जब विजयगढ के करीब पहुंचे तो कुमार घोडे पर से उतर पडे और हरदयालसिंह से बोले मेरी राय है कि इसी जंगल में अपनी फौज को तार ओवर सब इंतजाम कर लो तो शहर में चलो । हरदयालसिंह ने कहा आपकी रहे बहुत अच्छी है । मैं भी पहले से चलकर आपके आने की खबर महाराज को देता हूँ, फिर लौटकर आप को साथ लेकर चलूंगा । कुमार ने कहा अच्छा जाइए हरदयालसिंह विजयगढ पहुंचे । कुमार के आने की खबर देने के लिए महाराज के पास गए और खुलासा हाल बयान करके बोले कुमार सेना सहित यहाँ से कोर्स भर पर उतरे हैं ये सब महाराज बहुत खुश हुए और बोले फौज के वास्ते वो मुकाम और अच्छा है । मगर वीरेंद्र सिंह को यहाँ पे आना चाहिए तो यहाँ के सब दरबारियों को ले जाकर इस्तकबाल करो और कुमार को यहाँ ले आओ । बस मुझे बुक मके हरदयालसिंह बहुत सरदारों को लेकर रवाना हुए । ये खबर तेज सिंह को भी हुई । सुनते ही वीरेंद्र सिंह के पास पहुंचे और दूर से ही बोले मुबारक हो तेज । सिंह को देखकर कुमार बहुत खुश हुए और हालचाल पूछा । तेज सिंह ने कहा जो कुछ है सब अच्छा है जो बाकी है बन जाएगा । ये कहते सिंह लश्कर के इंतजाम में लगे इतने में दीवान हरदयालसिंह मैं दरबारियों के आ पहुंचे और महाराज ने शुक्ला दिया था । कहा कुमार ने मंजूर की ओर सबसे जाकर घोडे पर सवार हो एक सौ फौजी सिपाही साथ ले महाराज से मुलाकात को विजयगढ चले । शहर भर में मशहूर हो गया कि महाराज की मदद को कुंवर वीरेंद्र सिंह आए हैं । इस वक्त किले में जाएंगे । सवारी देखने के लिए अपने अपने मकानों पर औरत मर्द पहले से ही बैठ गए और सडकों पर भी बडी भीड इकट्ठी होगी । तभी की यहाँ के उत्तर की तरफ सवारों के इंतजार में थी । यह खबर महाराज को भी पहुंची कुमार चले आ रहे हैं । उन्होंने महल में जाकर महारानी से सब हाल कहा जिसको सुनकर वे प्रसन्न हुई और बहुत सी और तो के साथ जिनमें चंद्रकांता और चपला भी थी । सवारी का तमाशा देखने के लिए ऊंची अटारी पर जाता है नहीं महाराज भी सवारी का तमाशा देखने के लिए दीवान खाने की छत पर जा बैठे । थोडी ही देर बाद उत्तर की तरफ से कुछ धूल उडती दिखाई दी और नजदीक आने पर देखा की थोडी सी फौज सवारों की चली आ रही है । कुछ अरसा गुजरात साफ दिखाई देने लगा । कुछ सवार जो धीरे धीरे महल की तरफ आ रहे थे फौलादी जिर कवच पहने हुए थे जिसपर डूबते हुए सूर्य की किरणें पडने से अजब चमक दमक मालूम होती थी । हाथ में झंडे दार नहीं जा लिए ढाल तलवार लगाए जवानी की उमंग में आंकडे हुए बहुत ही भले मालूम पडते थे उनके आगे आगे खूबसूरत, ताकतवर और जेवरों से सजे हुए घोडे पर जिस पर जडाव जीन कसी हुई थी और अटखेलियां कर रहा था । पर कुवर विरेंद्र सिंह सवार थे सिर पर फौलाद ईटो जिसमें एक हुमा एक कल्पित पक्षी के पर की लंबी कल की लगी थी मदन में वेशकीमती लिबाज के ऊपर फौलाद सुंदर पहने हुए थे । गोरा रंग बडी बढियां के गालों पर सुर्खी छा रही थी । बडे बडे पन्ने के दानों का कंठा और भूज बंद भी पन्ने का था जिसकी चमक चेहरे पर बढकर खूबसूरती को दुगना कर रही थी । कमर में चढाओ पेटी जिसमें बेश कीमती हीरा जुडा हुआ था और पिंडली तक का जूता जिस पर कौन ये मोदी का काम था चमडा नजर नहीं आता था पहने हुए डाल तलवार खंजर तीरकमान लगा एक गुर्ज कर बूझ में लटकता हुआ हाथ में नी जा लिए घोडा को जाते चले आ रहे थे ताकत जवाब मार दी डिलेवरी और रुवाब उनके चेहरे से ही मुझे लगता था दोस्तों के दिलों में मोहब्बत और दुश्मनों के दिलों में खौफ पैदा होता था । सबसे ज्यादा लग तो ये था कि जो सौ सवार संग में चले आ रहे थे वे सब भी उन्हीं के हम सीधे शहर में भीड लग गई जिसकी निगाह कुमार पर पडती थी । आंखों में चकाचौंध सी आ जाती थी । महारानी ने जब नरेंद्र सिंह को बहुत दिनों पर स्थान और रुवाब से आते देखा, सौंपनी मोहम्मद आगे से ज्यादा बढ गई । वहाँ से निकल पडा । अगर चंद्रकांता की लायक वार है तो सिर्फ नरेंद्र चाहे जो हो मैं तो इसी को दामाद बनाउंगी । चंद्रकांता और चपला भी दूसरी खिडकी से देख रही थी । जब प्लानेट रेड्डी ने कहा उसे कुमारी की तरफ देखा । वो शर्मा गए । दिल हादसे जाता रहा । कुमार की तस्वीर आंखों में समाधि । उम्मीद हुई कि अब पास से देखूंगी । उधर महाराज की टकटकी बन गई । इतने में कुमार के लिए के नीचे आ पहुंचे । महाराज से ना रहा गया । खुद उतर कर आए और जब तक मैं किले के अंदर आए महाराज भी वहाँ पहुंच गए । वीरेंद्र सिंह ने महाराज को देखकर पैर हुए उन्होंने उठाकर छाती से लगा लिया और हाथ पकडे सीधे महल में ले गए । महारानी उन दोनों को आते देख आगे तक बढाई । कुमार ने चरण हुए महारानी की आंखों में प्रेम का जल भराया । बडी खुशी से कुमार को बैठने के लिए कहा । महाराज भी बैठ गए । बाई तरफ महारानी और दाहिनी तरफ कुमार थी । चारों तरफ क्लॉडियो की भीड थी जो अच्छे अच्छे गहने और कपडे पहने खडी थी । कुमार की नीति निगाहे चार तरह घूमने लगी । मानव किसी को ढूंढ रही हो । चंद्रकांता भी किवाड की आड में खडी उनको देख रही थी मिलने के लिए तबियत खबरे आ रही थी मगर क्या करें लाचार थी । थोडी देर तक महाराज और कुमार महल में रहे । इसके बाद उठे और कुमार को साथ लिए हुए दिवान खाने में बहुत अपने खास आराम कहाँ के पास वाला एक सुंदर कमरा उनके लिए मुकर्रर कर दिया । महाराज सुविधा होकर कुमार अपने कमरे में गए । तेज सिंह भी पहुंचे । कुछ देर चुहल में गुजरी चंद्रकांता को महल में ना देखने से इन की तबियत उदास सोचते थे कि कैसे मुलाकात हो किसी सोच में आग लग गई हूँ । वहाँ जब महाराज दरबार में गए वीरेंद्र सिंग स्नान पूजा से छुट्टी पार दरबारी पोशाक पहने कलंगी सर्पेंट समेत सिर पर रख तेजसिंह को साथ ले दरबार में गए । महाराज ने अपने सिंहासन के बगल में एक जडाव कुर्सी पर कुमार को बैठाया । हरदयालसिंह ने महाराज की चिट्ठी का जवाब पेश किया । जो राजा सुरेंद्र सिंह ने लिखा था उसको पढकर महाराज बहुत खुश हुए । थोडी देर बाद दीवान साहब को कुक नदियाँ की कुमार की फौज में हमारी तरफ से बाजार लगाया जाए और गलने वगैरह का पूरा इंतजाम किया जाए । किसी को किसी तरह की तकलीफ हो । कुमार ने अर्ज किया महाराज सामान सब साथ आया है । महाराज ने कहा क्या तुमने इस राज्य को दूसरे का समझा है? समान आया है तो क्या हुआ? वो भी जब जरूरत होगी, काम आएगा । अब हम कोई फौज का इंतजाम तुम्हारे सुपुर्द करते हैं, जैसा मुनासिब समझो । बंदोबस्त और इंतजाम करो । कुमार ने तेज सिंह की तरफ देख कर कहा, तुम जाओ मेरे फौज के तीन हिस्से करके दो दो हजार विजयगढ के दोनों तरफ भेजो और हजार फौज के दस टुकडे कर के इधर उधर पांच पांच कोर्स तक फैला दो और खेमे वगैरह का पूरा बंदोबस्त कर दो । जासूसों को चारों तरफ रवाना करो । बाकी महाराज की फौज की कल कवायत देखकर जैसा होगा, इंतजाम करेंगे । खुद पाते ही तेजसिंह रवाना हुए । इस इंतजाम और हमदर्दी को देखकर महाराज को और भी तसल्ली हुई । हरदयालसिंह को मार दिया कि फौज में मुनादी करा दो की कल कवायद होगी । इतने में महाराज के जासूसों ने आकर अदब से सलाम कर खबर थी कि शिवराज सिंह अपनी तीस हजार पहुंच लेकर सरकार से मुकाबला करने के लिए रवाना हो चुका है । दो तीन दिन तक नजदीक आ जाएगा । कुमार ने कहा कोई हर्ज नहीं समझ लेंगे तो फिर अपने काम पर जाऊँ । दूसरे दिन महाराज जयसिंह और कुमार एक हाथ पर बैठकर फौज की कवायद देखने गए । हरदयालसिंह ने मुसलमानों को बहुत कम कर दिया था तो वो भी एक हजार मुसलमान रहे गए । कवाया देकर कुमार बहुत खुश हुए मगर मुसलमानों की सूरत त्योरी चढ गयी । कुमार की सूरत से महाराज समझ गए और धीरे से पूछा इन लोगों को जवाब दे देना चाहिए । कुमार ने कहा नहीं निकाल देने से ये लोग दुश्मन के साथ हो जाएगी । मेरी समझ में बेहतर होगा की दुश्मन को रोकने के लिए पहले ही लोगों को भेजा जाएगा । इनके पीछे दो खाना और थोडी फौज हमारी रहेगी । वेलो इन लोगों की नियत खराब देख लिया । भागने का इरादा मालूम होने पर पीछे से तो मारकर इन सभी की सफाई करना ले । ऐसा ऑफ रहने से ये लोग एक दफा तो खूब लड जाएंगे । मुफ्त मारे जाने से लडकर मरना बेहतर समझेंगे । इस राय को महाराज ने बहुत पसंद किया और दिल में कुमार की अगले की तारीफ करने लगे जब महाराज नरेन्द्र कुमार नहीं किया । मेरा जी शिकार खेलने को चाहता है, अगर इजाजत हो तो जाऊँ । महाराज ने कहा अच्छा दूर मत जाना और दिन रहते जल्दी लौट आना । ये कहकर हाथ बैठ पाया । कुमार उतर पडे और घोडे पर सवार हुए । महाराज का इशारा बाद इवान हरदयालसिंह ने सौ सवार सात कर दिए । कुमार शिकार के लिए रवाना हुए । थोडी देर बाद एक घने जंगल में पहुंचकर दो सांबर तीर से मारकर फिर और शिकार ढूँढने लगे । इतने में तेज सिंह भी पहुंचे । कुमार से पूछा है क्या जब इंतजाम हो चुका जो तुम यहाँ चले आए? तेज सिंह ने कहा कि आज ही हो जाएगा कुछ आज हुआ कुछ कल दुरुस्त हो जाएगा । इस वक्त मेरी जी में आया की चले जरा उस तरह खाने की सैर कराया है जिसमें अहमद को कैद किया है । इसलिए आपसे पूछने आया हूँ कि अगर इरादा हो तो आप भी चलिए हाँ मैं भी चलूँगा । कहकर कुमार ने उस तरफ घोडाफेर तेईस सिंह भी घोडे के साथ रवाना हुए बाकि सभी को उपमा दिया की वापस जाए और दोनों सांभरों का जिस कार किए हैं उठा ले जाए । थोडी देर में कुमार और तेजसिंह तहखाने के पास पहुंचे और अंदर से जब अंधेरा निकल गया और रोशनी आई तो सामने एक दरवाजा दिखाई देने लगा । कुमार घोडे से उतर पडेगी । अब तेज सिंह ने कुमार से पूछा खिलाइए, कहीं की आपकी दरवाजा खोल भी सकते हैं कि नहीं? कुमार ने कहा क्यों नहीं इसमें क्या कार्यक्रम है ये कहकर झट्टा के बढ शेयर की । मुझसे जुबान बाहर निकाल ली । दरवाजा खुल गया । तेज सिंह ने कहा यह तो हैं । कुमार ने कहा क्या मैं भूलने वाला हूँ? दोनों अंदर गए और सैर करते करते चश्मे के किनारे पहुंचे । देखा कि अहमद और भगवानदास एक चट्टान पर बैठे बात कर रहे हैं । पैर में बेटी पडी है । कुमार को देख दोनों उठ खडे हुए । शोक कर सलाम के और बोले अब तो हम लोग को कसूर होना चाहिए । कुमार ने कहा हाँ थोडी रोज और सब्र कर । कुछ देर तक वीरेंद्र सिंह और तेज सिंह टहलते और नियमों को तोडकर खाते रहे । इसके बाद तेज सिंह ने कहा अब चलना चाहिए देर हो गयी । कुमार ने कहा चलो दोनों बाहर चले । तेज सिंह ने कहा इस दरवाजे को आपने खोला है, आप ही बंद कीजिए । कुमार ने ये कह गए अच्छा लोग हम ही बंद कर देते हैं । दरवाजा बंद कर दिया और घोडे पर सवार हुए । जब विजयगढ के करीब पहुंचे तो तीन सिंह ने कहा अब आप जाइए मैं जरा फौज की खबर लेता हुआ हूँ । कुमार ने कहा अच्छा जाओ । ये सुनते तेजसिंह दूसरी तरफ चले गए और कुमार किले में चले आए । खोडे से उतर कर कमरे में गए । आराम किया थोडी रात बीते तेजसिंह कुमार के पास है । कुमार ने पूछा कहूँ क्या हाल है? तेज सिंह ने कहा सब इंतजाम आपके मुताबिक हो गया । आज दिन भर में एक घंटे की छुट्टी ना मिली जो आपसे मुलाकात करता । ये सुन वीरेंद्र सिंग हंस पडे और बोले दोपहर तक तो हमारे साथ रहे । इस पर कहते हो कि मुलाकात हुई । ये सुनते ही तेजसिंह चौक बडे और बोले आप क्या की थी है । कुमार ने कहा कहते क्या है मेरे साथ उस तरह खाने में नहीं गए थे जहां अहमद और भगवान दत्त बंद है । अब तो तेज सिंह के चेहरे का रंग उड गया और कुमार का मूवी देखने लगे । तीसरी की ये हालत देखकर कुमार को भी ताजूब हुआ तो सिंह ने कहा भला ये तो बताइए कि मैं आपसे कहाँ मिला था, कहाँ तक सादगी और कब वापस आया । कुमार ने सब कुछ कह दिया । ऍम बोले, बस आपने चौका, फिर अहमद और भगवान की निकल चलाने का तो इतना काम नहीं है । मगर दरवाजे का हाल दूसरे को मालूम हो गया । उसका बडा अफसोस है । कुमार ने कहा तो क्या कहते हैं वो समझ में नहीं आता तो तेज सिंह ने कहा ऐसा ही समझते तो धोखा ही क्यों खाते? तब ना समझे तो अब समझिए शिवदत्त के आरोपित होगा । दिया और तरह खाने का रास्ता देख लिया । जरूर ये काम बद्रीनाथ का है दूसरे का नहीं जो भी उसको रमल के जरिए से पता देता हैं । कुमार ये सुन दंग हो गए और अपनी गलती पर अफसोस करने लगे । तेज सिंह ने कहा आप तो जो होना था हो गया उसका आपसे उसका है का मैं इस वक्त चाहता हूँ । कैदी तो निकल गए होंगे और मैं जाकर ताले का बंदोबस्त करूंगा । कुमार ने पूछा काले का बंदोबस्त क्या करोगे? तो सिंह ने कहा स्पार्टक में और भी दो तले हैं जिससे ज्यादा मजबूत है । उन्हें लगाने और बंद करने में बडी देर लगती है इसलिए उन्हें नहीं लगता था मगर अब लगाऊंगा । कुमार ने कहा मुझे भी वो ताला दिखाऊँ । तेज सिंह ने कहा, हाँ अभी नहीं । जहाँ तक चुनारगढ पर पता नहीं पाएंगे ना बताएंगे नहीं तो फिर होगा होगा । कुमार ने कहा अच्छा तुम्हारी मासी तेजसिंह उसी वक्त हैं । खाने की तरफ रवाना हुए और सवेरा होने के पहले ही लौट आए । सुबह को जब कुमार सोकर उठे तो तेज सिंह से पूछा कहो तो खाने का क्या हाल है? उन्होंने जवाब दिया तो निकल गए । अगर डालेगा बंदोबस्त कराया हूँ । हाथ होकर कुछ खाकर कुमार को तेजसिंह दरबार ले गए । महाराज को सलाम करके दोनों आदमी अपनी अपनी जगह बैठ गए । आप जासूसों ने खबर दी कि शिवदत्त की फौज और पास आ गई हैं । अब दस कोर्स पर है । कुमार ने महाराज चर्च क्या अब मौका आ गया है कि मुसलमानों की फौज दुश्मनों को रोकने के लिए आगे भेजी जाएगी? महाराज ने कहा अच्छा भेज दो । कुमार ने तेजसिंह से कहा अपना एक तो खाना भी इस मुसलमानी फौज के पीछे रवाना करूँ । फिर कान में कहा आपने तो खाने वालों को समझा देना कि जब फौज की नियत खराब देखे तो जिंदा किसी को ना जाने दे । तेजसिंह इंतजाम करने के लिए चले गए । हरदयालसिंह को भी साथ लेते गए । महाराजनगर बार बर्खास्त किया और कुमार को साथ ले महल में पधारे । दोनों ने साथ ही भोजन किया । इसके बाद कुमार अपने कमरे में चले गए । छटपटाते रहे गए मगर आज भी चंद्रकांत की सूरत में देखी लेकिन चंद्रकांता नाॅन को देख लिया ।

Chapter 23

बयान तेईस हाँ, शाम को महाराज से मिलने के लिए वीरेंद्र सिंग गए । महाराज ने अपनी बगल में बैठाकर बातचीत करने लगे । इतने में हरदयालसिंह और तेजसिंह भइया पहुंचे । महाराज ने हाल पूछा । उन्होंने अर्ज किया कि फौज मुकाबले में भेज दी गई है । लडाई के बारे में राय और तरकीब होने लगी । सब तो उसने विचार से आधी रात गुजर गई । एक आई कई चोपदार ने आकर अर्ज किया । महाराज चोर महल में से कुछ आदमी निकल भागे जिनको दुश्मन समझकर पहले वालों ने तीर छोडे । मकर भी जख्मी होकर भी निकल गए । ये खबर सुन महाराज सोच में पड गए । कुमार और तेज सिंह भी हैरान थी । इतने में ही महल से रोने की आवाज आने लगे । सभी का ख्याल उस रोने पर चला गया । पर मेरे होने और चलाने की आवाज बढने लगी । यहाँ की तमाम महल में हाहाकार मच गया । महाराज और कुमार वगैरह सभी के मुंह पर उदासी छा गई । उसी समय लौंडिया दौडती हुई आई और रोते रोते बडी मुश्किल से बोली चंद्रकांत और चप्प्ल घर सिर काटकर कोई ले गया । ये खबर तीरके सामान सभी को छेड गई । महाराज हुई का एक हाई क्या है कि गिर ही पडे कुमार की भी अजब हालत हो गयी । चेहरे पर मुर्दनी छा गई । हरदयालसिंह की आंखों से आंसू जारी हो गए । तेजसिंह काट की मूरत बन गए । महाराज ने अपने को संभाल और कुमार क्या जब हालत देखकर गले लगा लिया । इसके बाद रोते हुए कुमार का हाथ पकडे महल में दौडे चले गए । देखा कि हाँ कार मचा हुआ है । महारानी चंद्रकांता की लाश पर पछाडे खा रही है । सिर फट गया । खून जारी है । महाराज भी जाकर उसी लाश पर गिर पडे । कुमार में तो इतनी भी ताकत नही की । अंदर जाते । दरवाजे पर ही गिर पडे । ताज बैठ गया । चेहरा दर्द और मुर्दे किसी सूरत हो गई । चंद्रकांत और चपला की लाश पडी थी सिर्फ नहीं थे । कमरे में चारों तरफ खून ही खून दिखाई देता था । सभी क्या जब हालत थी महारानी रो रोकर कहती थी बीटी तो आगे उसका कैसा कलॅर जी कर क्या करूंगी ही? वर्ष इतना बखेडा हुआ और पूरी ना रही तो अब ये राज्य क्या हो? महाराज कहते थे अब क्रूर की छाती ठंडी हुई शिवदत्त कुमराह मिल गयी है तो अब आये विजयगढ का राज्य करें हम तो लडकी का साथ देंगे । एक का एक महाराज की निगाह दरवाजे पर गई देखा वीरेंद्र सिंह पडे हुए हैं । सिर से खून जारी है । दौडे और कुमार के पास आए तो बदन में दम नहीं ऍप्स का पता नहीं । जोर से महाराष्ट्र लाउड थे । गच्चक हो गया । हमारे चलते नौगढ कर राज्य भी कारण हुआ । हम तो समझते थे कि वीरेंद्र सिंह को राज्य के जंगल में चले जाएंगे । मगर हाई विधाता को ये भी अच्छा नहीं लगा । अरे कोई जाओ जल्दी तेजसिंह गोलेवाला कुमार को देखें हैं ये अब तो इसी मकान में मुझको भी मारना पडा । मैं समझता हूँ राजा सुरेंद्र सिंह की जान बी सी मकान में जाएगी । आए अभी क्या सोच रहे थे क्या हो गया बे जाता तूने क्या किया? इतने में तेजसिंह आए । देखा कि वीरेंद्र सिंह पडे हैं और महाराज उनके ऊपर हाथ रखे रो रहे हैं । तेज सिंह की जो जान बची थी वह भी निकल गई । वीरेंद्र सिंह की लाश के पास बैठ गया और जोर से बोले कुमार मेरा जी तो रोने को भी नहीं चाहता क्योंकि मुझको अब इस दुनिया में नहीं रहना है । मैं तो खुशी खुशी तुम्हारा रास्ता दूंगा । ये कहकर कमर से खंजर निकाल और पेट में मारना ही चाहते थे की दीवार फांद करेगा । आदमी ने आकर खाद पकडा गया । तेज सिंह ने उस आदमी को देखा जो सिर से पैर तक सिंदूर से रंगा हुआ था । उस ने कहा काहे को देते हो जाए मेरी बात सुनो देखा ये सब खेल ठगी को मान लाश देख कर लो पहचान उठो देखो भालूओं वो जो फौज निकालो ये क्या है वह ऍम दिखलाता उछलता कूदता हट गया पहला अध्याय समाप्त ये सुना और समाप्त किया हम लोगों ने चंद्रकांता का पहला अध्याय तेईस बयानों की मद्देनजर देवकीनंदन खत्री का लेखन राजकीय जुबानी ऍम सुने जब मन चाहे

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