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अनुपम खेर प्रस्तुत करते है भारतवर्ष : कबीर - 1

ऍफ सुन रहे हैं तो वो एफ एम किताब का नाम है । अनुपम खेर प्रस्तुत करते हैं भारतवर्ष । कभी इसमें लिखा है एबीपी न्यूज नहीं आरजे आशीष चैन की आवाज में कुकू ऍम सुने जो मन चाहे कभी आज हम एक ऐसे व्यक्ति की विराट छाया में खडे होने जा रहे हैं जिनके नाम का अर्थ होता है महान । कहते हैं कि पेशे से वह शख्स एक बुनकर था, कपडे बुनने का काम करता था । लेकिन अपने समाज के लिए वह ऐसी बातें बुनकर ऐसी बातें गढकर चला गया । उनके बगैर भारत की कहानी अधूरी रह जाएगी । व्यक्ति आज से छह सौ साल पहले हुआ था । कुछ लोग ये भी कहते हैं कि अच्छा ये है कि इस व्यक्ति की कहानी छह सौ साल पहले की है । अगर वह आज हुए होते हैं तो उन पर न जाने कितने मुकदमे हो गए होते । उसके बाद कबीर की है जिन्हें उनके चाहने वाले कभी खुद में ढूंढते हैं तो कभी खुद को कबीर में ढूंढते हैं । कबीर ने कहा था धीरे धीरे मना, धीरे सबकुछ हो माली सींचे सौ खडा ऋतु आए, फल हो गए । शायद कबीर को भी अंदाजा था कि आपने दौर में वो जो कह रहे थे उसे समझने में लोगों को वक्त लगेगा । वक्त तो जरूर लगा । आज छह सौ साल बाद लोग धीरे धीरे ही सही उनकी कही बातों को समझ रहे हैं । आज कबीर को समझने वाले लोगों में से कुछ कहते हैं कि कभी तो हम सब के अंदर है । जो भी शक्ति हमें इस दुनिया में देखे उसके अंदर कबीर है । कबीर के यहाँ ना आमिर का फर्क है ना गरीब का । कभी तो हर इंसान के भीतर है कबीर को हमें तो बस पहचानना है । किसी के लिए तब ईर्को समझना । उसका अपना एक साक्षा एहसास है तो किसी के लिए कभी असल में जीवन पद्धति यानी जिंदगी जीने का तरीका है । कभी का नाम लोगों को जहन में अलग अलग ढंग से पूछता है । कबीर के शब्द और शुरू में डुबकी लगाने के लिए लोग हजारों मील की दूरी तय करने के लिए तैयार रहते हैं । लेकिन दूरी को तय करने से पहले जरूरी है एक चोट खा रहा हूँ । कहते हैं कि कबीर को जानने से पहले कबीर की चोट लगती है, लेकिन चोट ऐसी है इससे लगने पर आनंद का अनुभव होता है । स्टोर्ट का जिक्र करते हुए शास्त्रीय गायिका कलापिनी कोमकली कहती हैं कि ये चोट शब् या कहीं की सबका की चोट है । जैसे जिन जाना दिन मना है भाई ये चोट ऐसी है कि जिसे लग गई तो लग गई । लगी होइ सो जाने हो सबका की ये समझ या शब्द कबीर के बडे शब्द हैं । यू तो कबीर पेशे से जुलाहा यानी बुनकर थे । लेकिन जो शब्द जो वाणी उन्होंने कडी और जिसमें जिन दोहों को उन्होंने बुना, उसकी छाप हम न जाने किस किस रूप में आज देखते हैं । अभी शब्दों का असर है कि कबीर को कुछ लोग भगवान मानते हैं । कुछ भगवान का अवतार, कुछ तो फटी या दरवेश । तो कुछ लोग भगवान राम का भक्त मानते हैं । कुछ लोग उन्हें वैष्णव संत मानते हैं । कुछ सब गुरु तो कुछ लोग कभी मानते हैं । इस लिहाज से कबीर सबके अपने हैं । वैसे कबीर तो कहा है मौको कहाँ ढूंढे रे बंदे मैं तो तेरे पास में न तीरथ, ना मूरत में ना एक काम निवास में मंदिर में न मस्जिद में लगता बे कैलाश में मैं तो तेरे पास में बंदे, मैं तो तेरे पास में । इसके बावजूद असली कबीर की तलाश जरूरी है । कबीर की तलाश में निकले तो काशी पहुंचना जरूरी है । काशी जिसे बनारस वाराणसी भी कहते हैं, कबीर ने भी कहा था तू भ्रमण में काफी का जुलाहा चिंतन मोर गया ना यानि तुम हो मैं काशी का जला रहा हूँ । मेरे ज्ञान को पहचान हो इस से ये बात साफ होती है । इस राशि में कबीर पले बढे काशी ही उनकी कर्मभूमि थे । हालांकि तब काशी के पहचान आज के काशी से अलग थी । कबीर से जुडे विषयों पर अपनी पकड रखने वाले और कबीर के जीवन और दृष्टि पर आधारित किताब अकथ कहानी प्रेम के लेखक प्रोफेसर पुरुषोत्तम अग्रवाल कहते हैं कि पंद्रह सोलह शताब्दी में काशी का माहौल आज के माहौल से बिल्कुल अलग था । वो तब धार्मिक केंद्र ही नहीं बल्कि एक बडा व्यवसायिक केंद्र भी था । उनका मुताबिक कुछ ऐतिहासिक प्रमाण तो इस बात के भी हैं कि दक्षिण और दक्षिणपूर्व एशिया के व्यवसायी व्यापार के लिए काशी में आते थे । इस हादसे काशी क्या कहिए कि बनारस आपने वक्त का एक बडा महानगर था जहाँ व्यापार के बहाने ही सही दुनिया भर के लोगों के साथ दोस्ती सभी के साथ बंधुत्व का विचार पड रहा था । इस तरह है माना जा सकता है कि बनारस के रहने वाले कबीर भी तमाम तरह की भाषाएँ बोलने लगे । अलग अलग धार्मिक मतों को मानने वाले लोगों के संपर्क में आए होंगे । यकीनन कबीर के बंधुत्व वादी विचारों की नींव को मजबूत करने में बनारस की इस आप हवा के असर को देखा जा सकता है । वैसे काशी में कबीर की तलाश करने पर आप पहुंचते हैं । लहरतारा तालाब के पास कबीर से जुडी कहानियों में लहरतारा, तालाब और कमल का जिक्र आता है । एक वक्त था जब लहरतारा तारा काफी बडा था और इसमें कमल के फूल होगा करते थे । अब लहरतारा तालाब का बस एक हिस्सा बचा है और बाकी तालाब को पाटकर कबीर मठ बना दिया गया है । मटके भीतर पहुंचेंगे तो वहां बने मंदिर में लगी मूर्ति है । कबीर के शुरूआती जीवन के बारे में बताती है इस मूर्ति की बनावट ने नवजात कबीर को कमल के फूल पर लेटा हुआ दिखाया गया है । अब यहीं से कभी को लेकर अलग अलग मान्यताओं की शुरुआत होती है । लोकमान्यताओं के मुताबिक कबीर एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से पैदा हुए । लग जा के मारे वो विधवा अपने नवजात शिशु को लहर तरह तलाक के पास फेंक गई थी । वहाँ उस बालक को देखकर नीरू और नीमा नाम का एक मुसलमान जुलाहा दंपत्ति उसे अपने घर उठा लाए और उन्होंने ही बालक को पाला पोसा । यही बाला आगे कबीर कहलाया । ज्यादातर लोग इस कहानी पर विश्वास करते हैं । लेकिन कबीर के एक विधवा की कोख से पैदा होने वाले विचार के विरोध में कबीरपंथी लोकगायक प्रहलाद टिपाणिया का तर्क कुछ और है । वो कहते हैं कि जिन लोगों को ये पता था कि कभी एक विधवा की कोख से पैदा हुई और वो लोकलाज के भय से उन्हें छोड गई, उन्हें ये भी जरूर पता होना चाहिए कि आखिर वो विधवा कौन थी, कहां से आई थी इस बात का तो कहीं कोई जिक्र नहीं होता लेकिन इस बात को सब नहीं माना जा सकता । ये केवल एक लोकोक्ति है और इसका कोई प्रमाण नहीं है । इसीलिए कहाँ कहीं में की गई बात हालत भी हो सकती है । कबीरपंथ की दूसरी धारा के मुताबिक कभी लहरतारा तालाब नहीं कमल के फूल पर बाल रूप में प्रकट हुए थे । यानी वो अभी का अवतार है और इस विचार का समर्थन करते हैं सब ग्रुप प्रकाट्य धाम लहरतारा से जुडे श्री गुजू एक हजार आठ अर्ध नाम साहेब कहते हैं कि कभी साहब इस लहरतारा तालाब में कमल के पुष्प के ऊपर नीरू और नीमा को प्राप्त हुए थे । उसकी पुष्टि साहिब की एक वाणी में आती है तो कहती है गगन मंडल से उतरी सतगुरु संत कभी जंज माही पोर्टन के सब तीरन के पीछे कबीर ने कहा है पानी केरा बुदबुदा अस मानस की चार देखा ही छिप जाएगा जो सारा परवाह यानी मानव जीवन पानी के बुलबुले के समान है तो थोडे ही समय भी नष्ट हो जाता है । ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार सवेरा होने पर प्रकाश के कारण आकाश मीटिंग जिमाते तारे छिप चाहते हैं । दिलचस्प बात है संस्थान ने जन्म और मरण के प्रश्नों के बीच अटके नश्वर जीवन को कभी महत्व ही नहीं दिया । उसके जन्म से जुडी कहानियों पर आज इतनी बहस होती है । इन वाद विवादों में कहीं कहीं इस बात का जिक्र भी आता है कि कबीर का जन्मस्थान काशी नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश के लिए बस्ती जिले का मगर और कहीं आजमगढ जिले का बिहारा गांव है । कबीर के जन्म से जुडे तमाम बहस मुबाहिसों के बीच प्रोफेसर पुरुषोत्तम अग्रवाल कहते हैं, करीब कहाँ पैदा हुए वो कमाल के पत्ते पर तैरते हुए मिले? क्या कहीं और वो अवतार थी या नहीं की तमाम प्रश्न और इन से जुडी अलग अलग कहानियां, ये सभी किसी ऐतिहासिक तथ्य की पुष्टि या फिर प्रमाण के लिए नहीं है । कबीर के संदर्भ में इनका महत्व ही तक है । जब तक वो एक नए सांस्कृतिक विचार या एक व्यक्ति की अपने जमाने से अलग सोच या फिर समाज की उससे की गई एक सकारात्मक उम्मीद को आगे बढाते हैं । आखिर सच तो यही है कि खुद कबीर को भी इससे कोई फर्क नहीं पडता कि उनका पालन पोषण करने वाले किस धर्म के थे । वो मुस्लिम थी या हिंदू हूँ तो तुम थे क्या? सनातन नहीं । ये सवाल कबीर के लिए बेमानी थे । उनकी जिंदगी के अहम सवाल तो कुछ और ही थे । उस समय के समाज में क्या चल रहा था जब क्या चलता आ रहा था । इसको लेकर कबीर किसी को भी छोडने वाले नहीं थे । समाज में मान्यताओं की दृष्टि से खूब उथलपुथल के इस दौर में मान्यताओं को चुनौती देने वाले कबीर का एक हिस्सा बताते हुए जाने माने कवि अशोक वाजपेयी कहते हैं, कभी नहीं दिन बनारस के एक हिंदू पंडित से कहा पांडे तो निपुड रसाई पांडे जी जैसे कट्टर भ्रमण को उसके किसी काम से नाराज होकर आई ना दिखाना और उसे रिपोर्ट कसाई कहकर संबोधित करना ये बहुत बडी हम्मद का काम था । वो भी पंद्रह सोलह शताब्दी के समय । में जब बनारस भारत में धर्म की राजधानी माना जाता था । एक जुलाहा एक पंडित जी को निपुण कसाई कहें ये काम, यकीन केवल कभी भी कर सकते थे । ऐसे निडर निर्भय कबीर जिस शुभ हुए उसे इतिहासकार मध्यकाल कहते हैं । ये वो काल था जब राजनीति में मुसलमान सामंत यानी छोटे राजा खुद को स्थापित कर रहे थे । दिल्ली की गद्दी पर लगभग दो सौ साल से मुस्लिम सुल्तानों का राज चला रहा था । उन से पहले ऐसे बाहरी आक्रमण भारत पर बार बार होते आए थे । लेकिन आक्रमणकारी चाहे वो करा हूँ फोन यवन या शक हूँ अपनी खासियत क्या विशेषता खोकर हर बार भारतीय समाज में घुल मिल गए थे लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ । इस्लाम खुद एक सौ संगठित संप्रदाय की शक्ल में था तो तब के समाज के ब्राह्मणों के वर्चस्व और उससे जुडे जात पात को चुनौती दे रहा था । इस लिहाज से सनातन हिंदू समाज और इस्लामी शास्त्रों के बीच एक संघर्ष की स्थिति चंद ले चुकी थी । प्रोफेसर पुरुषोत्तम अग्रवाल इस बारे में कहते हैं, तो क्या इस्लामी शासकों ने भारत पर राज करने के लिए बहुत ही आक्रमक रवैया अपनाया था? यकीनन उन्होंने अपने धार्मिक मत को अपने शासन के जरिए ठोकने की भी कोशिश की होगी । इस लिहाज से उनके शासन की शुरुआत से ही भारत के बहुसंख्यक हिंदू और उन शासकों के बीच तनाव की स्थिति बनी हुई थी । कबीर की भी एक पडती है हिंदू कहे राम हमारा तो कहे रहमाना, आपस में दो लडके मरत है मरम न कोई जाना । कबीर के सामने ही धार्मिक मतों के खाद्य दोनों तरफ से तनातनी की स्थिति बनी हुई थी, इसमें कोई शक नहीं है । जाहिर तौर पर मान्यताओं की इस पैसा कृषि के चलते काशी भी इन बदलावों से अछूती रही हो, ऐसा नहीं है । इन बदलावों का असर आज की काशी के कबीरचौरा तक भी नहीं पहुंचा था, जहां छह सौ साल पहले कभी नीरू और नीमा रहा करते थे । कबीर चौरा में नीरू और नीमा की समाधि आज इस बात की गवाह है । जुलाहा मुसलमान बुनकरों के लिए प्रचिलत नाम है । कबीर के जमाने में कपडा बुनने वाले तानेबाने के मध्यम आवास के बीच नेहरू और नाम आ के घर कभी राम की गूंज रहती थी । कभी जब बडे हो रहे थे, तब के हालात की आज से फंसा ही की जा सकती है । हालत तो खराब थी ही, ऐसा मुमकिन है कि कबीर के तेवरों ने ऊपर से उनके परिवार के मुश्किलात बढा दी होंगे । हिंदी कथाकार और नाटक कार भीष्म साहनी ने अपने मशहूर नाटक कबीरा खडा बाजार में तब के हालात की तस्वीर खींची है । नाटक का एक दृश्य खाता खींचता है । काशी के जुलाहों की बस्ती का सामने छोटे छोटे झोपडे हैं । कहीं सूत पटाया जा रहा है तो कहीं खडी चल रही है । ऐसे ही एक झोपडे के सामने नीरू जुलाहा सूत पढा रहा है । तभी उसी बस्ती का दूसरा जलाहा कंधे पर थान रखे बाहर से चलता हुआ आया और नीरू के पास ठहर गया । नीरू जुलाहा उसे देख कर बोला बडी जल्दी बहुत बाजार से । नीरू की बात सुनकर दूसरा जलाहा बोला अब क्या बताएं? धीरूभाई सभी दुकानदार कहते हैं कि अभी पहला ही माल बिका नहीं तो और मान ले कर क्या करेंगे? ये सुनकर नीरू ने उसकी थोडी हिम्मत बढाने के लिहाज से कहा कोई बात नहीं, कुछ कमाई तो कर लाए ही होंगे । नीरू की कोशिश का उस जला है परमाणु उल्टा असर हुआ । बोला एक फूटी कौडी नहीं मिली । इसरार करो तो कहते हैं तो हमारा माल धरा है, उठा कर ले जाऊँ हमें नहीं देखना है ऐसी मंदी आई है, कुछ पूछो नहीं । अरे बाजार में तो उल्लू बोल रहे हैं । उसके कुछ को देख कर नीरू ने तुरंत बाद बदल ली और पूछा अच्छा छोडो आप ही बताओ कभी रवा मिला रहा है । उसका भी कुछ माल बिकाऊ कहा क्या? नहीं । घर से तो सवेरे ही निकल गया था । दूसरे जुलाई ही नहीं एक सांसद और तुरंत बोला नीरू भाई, ये थान तुम्हारा ही माल है कि कबीर वाही हमें दिए हैं । जिला है की बात सुनकर नीरू हैरान होकर बोला, कभी रूम दिया है और कहे यह तो तुम है क्यों दिया? वो तो सवेरे ही बेचने गया था । ये सुनकर दूसरा जुलाहा बोला । वो कहता था घर पहुंचा देना और ये भी संदेशा दिया है कि शाम तक घर लौट आएगा । अब नीरू की त्योरियां चढाई थी । गुस्सा होते हुए बोला उनसे कहा मिला था का निर्वाह जुलाहा । आगे का पूरा ब्यौरा सिलसिलेवार बताने लगा । गोला बहुत वाली चौक के पास खडा था । उसे बहुत से लोग घेरे हुए थे । क्यों फिर कोई बात हुई है? नीरू ने का बनाकर उसे टोकते हुए पूछा । जुलाई में अपनी बात जारी रखी । सराफों के बाजार में से निकलकर मैं मस्जिद शरीफ की तरफ जा रहा था । तब मैंने कबीर को पहली बार देखा हूँ तो पूरा मजमा जमा कर रहा था । क्या कह रहा था वो? नीरू ने पूछा नीरू के सवालों से जुलाहा जैसे खींच गया था । उसने नेहरू की तरफ अजीब ढंग से देखा और बोला अरे वही रोज की बकझक और क्या अब धीरे भैया । कुछ लोग उसकी बात सुन सह लेते हैं और कुछ नहीं पाते । लेकिन यह क्या रहा था वो जुलाहा नीरू की बात सुनकर चुप रहा । उसकी चुप्पी ली । रूसे बर्दाश्त नहीं हुई । वो कहने लगा अरे भाई तुम क्यों छुपा रहे हो? सच सच बताओ ना कि कबीर वह क्या कह रहा था? एक पिता की उसके बेटे के लिए चिंता देखकर दूसरे जुलाहे नहीं आगे बताया नीरू भैया आज बडे महंत की झांकी सवारी निकल रही थी । वहाँ महंत के आदमियों ने किसी लौंडे को बेहद मारे । अविशी बात पर कभी रवा देश में कूद पडा । अब महंत के आदमी को बच्चे को तो छोड दिए उठते कबीर पर टूट पडे लेकिन तुम्हें बताएं आज ही इस से थोडी देर पहले एक मौलवी के साथ भी वो लग रहा था । नीरू हाँ पीसते हुए टकटकी लगाए कबीर के कारनामे सुन रहा है कि देख कर दूसरा जुलाहा बिना सांस लिए आगे बोलने लगा । नीरू भैया कभी रवा कह रहा था कि ये कहते कहते उसने देखा कि कबीर की माँ अचानक दरवाजे पर आकर खडी हो गई । उसे देख जुलाहा चुप हो गया । जुलाहे को अचानक चुप हुए देख नीरू समझ जाता है और दरवाजे की और पलट कर अपनी पत्नी और कबीर की माँ नीमा से कहता है तो सुन ली न तुमने भी अपने बेटे की बातें नीमा लाचारगी से वापस घर के भीतर जाती है । पडोस का जुलाहा अब दूर सलाम करके अपने घर की और चला जाता है । नीरू भी बढ बढाते हुए अपने काम में लग जाता है । उधर इन शिकायतों की परवाह किए बिना खडसे दो बाजार में कभी से अपना काम करना जारी रखा है । अपना काम यानी समाज को अपनी वाणी से नई रह दिखाना । असल में कबीर एक जो समाज देखा था, उसमें तरह तरह की विषमताएं थी । कौन किस जाति में जन्मा है, यही बात उसका भाग्य तय कर देती थी । व्यक्ति के बडा या छोटा होने का मापदंड उसका जान उसका कुल ही रह गया था । ब्राह्मण चाहे जितना दुराचारी हो उसके लिए सामान्य था । दलित चाहे जितना भी सदाचारी हो, उन्नीस ही समझा जाता था । कबीर ने इस आधार को नकार दिया इसके लिए कबीर ने कहा जाती पांसी पूछे नहीं । कोई हरी को बजे सोहरी को हुई यानी राम लोगों को कबीर की ये सीधी चुनौती थी । सामाजिक व्यवस्थाओं को ऐसी ही चुनौतियां देते । कभी एक दिन गंगा घाट के करीब चौक पर खडे थे । वो असल में तो यहाँ कपडे का गट्ठर बेचने के लिए लाए थे । लेकिन उन्हें देखकर वहाँ मोची और कुछ लोग इकट्ठे हो गए और उन से बातें करने लगे । तभी कबीर ने देखा कि नदी के किनारे पर कुछ पंडित स्नान कर रहे हैं और कुछ चंदन टीका लगा रहे हैं । बगल के अखाडे में उन्हें एक दो पहलवान पंडित जीत दंड खेलते हुए भी दिखे । अब इन ग्रामीणों को स्नान और चंदन टीका करते थे । जाने कबीर को क्या सूची की वो हम से बोल पडे हूँ जी नहाने धोनी से क्या लाभ जो मन का मैल नहीं जाए । पानी में मछली तो सादा ही पडी रहती है पर धोनी से क्या पास जाती है? कबीर की ये बात सुनकर अभी नहाकर ठंडे हुए पंडित जी तुरंत जैसे गरमा गए और गुस्से से बोले अरे जिला है तो क्या जाने शुद्ध होना हमसे दूर ही रहना नहीं तुम्हारी छाया बे पड गई तो हमें दोबारा नहाना पडेगा । पंडित जी की ये बात सुनकर उसके आस पास के लोग हंसने लगे । उन्हें हस्ता देख कभी भी मुस्कुराते हुए अपने साथ खडे लोगों की और बडे और कहने लगे बडी पडी के पत्थर भया लिखी लिखी भय आजू ईट कहे कभी रात ट्रेन की लगी ना एक कोच्चि होती पडी पडी जग मुआ मंडित भयानक कोई ढाई आखर प्रेम का पढे सो पंडित होए कबीर क्या बात दूसरे पंडित जी को भी छुप गई तो उसने कबीर को मान लो । ललकारते हुए कहा अरे जुला है क्या बोल रहा है जब हम भी तो सुने । कबीर की वाणी लगातार जारी थी अब ऊंची आवाज में अगली चोट पंडितों को और करारी लगी । जो भ्रमण तुम भवनी का जाया और राहत कहे ना आया । अब इसका मतलब बताते हुए कबीर बोले पंडित जी मैं कह रहा हूँ जिस तरह से और लोग इस जगत में आते हैं उसी तरह तो मानते हो । इतने बडे हो तो किसी और तरीके से धरती पर आ जाओ । इतना सुनना था कि पंडित और उनके साथ ही कबीर की तरफ दौड पडे । कबीर ने अपना वक्तव्य जारी रखा एक बूंद, एक के मल मूत्र, एक काम एक गुदा एक जाती है सब उत्पन्ना वो भ्रमण को सूत्रा पंडित होते आसन मारे लंबी माला जपता है अंतर तेरे कपट कतरनी सो भी साहब लगता है ऊंचा नीचा महल बनाया । गहरी नींद जमाता है कभी यही नहीं रुके बोले रहे कबीर चेत्र भोंदू बोलन हारा तुरंत ना हिंदू यानी ऊपर वाला ना हिंदू है न मुसलमान । पंडितों से कबीर की झडप हो गई लेकिन काशी नगरी के लिए तो ये कोई नई बात नहीं थी । कबीर की कर्मभूमि काशी उस समय भारत का रह गई थी । सब धर्मों के अपने अपने मत थे । वहाँ ठाणे, ठाणे ऊपर मंदिर थे, मस्जिद थी लेकिन कबीर के पास कुछ नहीं था । केवल शब्द था और जब शब्द ऐसे जैसे पत्थर पूजे हरि मिले तो मैं पूजूँ पहाड वहाँ तो ये चक्की भली बीस खाये संसाल या फिर कंकड पत्थर जोरि के मस्जिद नहीं बनाए । ताज चढि मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदा है काशी में बैठकर चौधरी शताब्दी ने ऐसे निर्भर दो ही ऐसे बेबाक बोल बोलने वाले, कभी अच्छा गुरु की महिमा गाते तो सवाल उठता क्या फिर कबीर के गुरु कौन थे? और निकलता की ये सीख उन तक पहुंची कैसे? लोग इसका जवाब एक नाम से देते हैं । वो नाम स्वामी रामानंद का है । असल में काशी में जिस समय कबीर की वाणी में हडकंप पैदा करना शुरू किया उस समय वहाँ स्वामी रामानंद की बडी पूछती स्वामी रामानन्द दक्षिण भारत से काशी आए थे । स्वामी रामानंद के अनुसार भक्ति के पथ में जो आ गया उसके लिए जाति का बंधन व्यर्थ है । इस तरह सभी भाई भाई हैं । सभी एक जाति के हैं । बडा छोटा भक्ति से होता है जन्म से नहीं । स्वामी रामानंद के बारह शिष्य बताए जाते हैं जिनमें कबीर की गिनती भी होती है । कबीर ने अपने दोहे में कहा भी है काशी में हम प्रकट भरे हैं । रामानन्द चेताये है । एक बडा तबका है जो स्वामी रामानंद को कबीर का गुरु मानता है । लेकिन स्वामी रामानंद कबीर के गुरु कैसे बने या कबीर ने स्वामी रामानंद को अपना गुरु कैसे बनाया । इससे जुडी कई कहानियां प्रचलित हैं । ये कहानियां दरअसल तब के समाज और कबीर के सामने की चुनौतियों की भी कहानियां है । ऐसी ही कहानी तब की है जब कभी पहली बार गुरु रामानंद के आश्रम पहुंचे स्वामी रामानंद अपने आश्रम के बरामदे में शिष्यों को प्रवचन दे रहे थे । शिष्यों की इस भीड की तरफ कबीर के पांव बढ रहे थे । कबीर हो स्वामी रामानंद की तरफ आते देखकर स्वामी रामानंद कीशिशों में से एक ने पूछा कौन है तो शिष्य की आवाज सुनकर कबीर के बढते हुए कदम हो गए । लेकिन गुरु जी का दूसरा एक शिष्य शायद उन्हें पहचान चुका था । बोला अरे ये तो हो रहा है । ये सुनकर पहला शिष्य गुस्साते हुए बोला अरे जुडा है, वहाँ बढा रहा है । देखता नहीं यहाँ महाराज जी बैठे हैं । तब दूसरा शिष्य कबीर की मनोस्थिति भागते हुए कहता है महाराज लगता है ये दास शिष्य बनने आया है । ये सुनकर वहां मौजूद भीड जोर से हंस पडती है । भक्तों को जोर से हस्ता देख गुरु रामानंद के ध्यान में खलल पडा और उन्होंने कबीर तक देखा जो अब तक उनके पक्ष के दरवाजे पर पहुंच गया था । उन्हें ध्यान से बाहर आया देखकर कभी जैसे ही उनके पांव छूने के लिए आगे बढे । स्वामी रामानंद ने अपना हाथ उठाकर उन्हें रुकने का इशारा करते हुए कहा रुक जा गुरु का रुकने का इशारा पाते ही कभी चिटक गए । अब की बार अमानगंज उनसे पूछा कौन है तो कबीर बोले हूँ मेरा नाम कभी कभी अश्चर्य । रामानंद ने नाम दोहराया । फिर वो बोले कौन चाहता है जुलाहा हूँ हूँ । कबीर ने जवाब दिया जिस सुनते ही रामानंद चौके गुरूजी से कबीर की अनुनय विनय गुरु रामानंद के चैनलों को चुनौती मालूम पडी । उन्होंने अपने गुरूजी की आज्ञा का भी इंतजार नहीं किया और राम पर अपना भी हक जताने वाले इस चुना है को उठाकर आश्रम से बाहर फेंक दिया । स्वामी रामानंद के आश्रम में हुए कबीर के अपमान की अगली कडी का साक्षी बना काशी का पाँच गंगा घाट । पंचगंगा घाट वो घट था जहाँ रोज सुबह स्वामी रामानंद स्नान करने आते थे । अगले रोज तीसरे पहर कबीर उसी घाट पर पहुंचकर उसकी सीढियों पर लेट गए । कुछ ही पलों में सीढियों पर शोर मचाती खडा हूँ कि खटखट की आवाज से उन्हें पता लग गया कि स्वामी वहाँ पहुंच गए हैं । कबीर वैसे ही लेते रहे और अंधेरे में स्वामी के पांव कबीर के शरीर से टकराते हैं । स्वामी जी के मुंह से निकला ऍम राम राम राम राम । उन्होंने घबराते हुए पूछा कौन है? कबीर ने उसी तरह लेटे लेटे ही जवाब क्या मैं कबीर हूँ? प्रभु स्वामी ने झुककर अपने चरणों में गिरे कबीर को गले लगाने के लिए उठाया । उनके भूषण राम राम निकलता रहा । इसे सुनकर कबीर बोले राम रहा, अब यही मेरा गुरूमंत्र है । कबीर की ये बात सुनकर स्वामी एक दम रो पडे । उन्होंने छत से कबीर को सीधी से गले लगाते हुए कहा तो जीत गया कभी तूने मुझे अहम अभिमान, अन्याय और पांच के बंधनों से मुक्त कर दिया । कभी अंडा हो गया था । सारा ब्रह्मांड राम है । वह ये भेज तो मनुष्य के बनाए हुए हैं । उस ईश्वर के लिए तो सब बराबर है । वही राम तुम हो वहीं गंगा है हूँ । राम तो सबका है । एक मुस्लिम जिला है कि गुरु रामानंद का शिष्य बनने की खबर जल्द ही पूरे बनारस को लग गई । सबसे पहले कबीर के घर में ही सवाल उठा । बनारस के ही कबीर चौरा मठ के महंत विवेकदास कहते हैं कि कबीर नहीं गुरु की शरण लेने के बाद पहला रूप भी थोडा बदला । कबीर के माथे पर तिलक और चलेंगे । गुरु रामानंद जैसी कण्ठी माला देखकर कबीर की माँ ने कहा कि कभी तुमने तिलक और एक कंट्री माला क्यों पहनी? ये तो हिन्दू मूल्यों यानी हिंदू साधुओं का रूप है । तुमने रूप क्यों धारा । अब कबीर ने अपनी माँ को बताया कि उन्हें गुरु रामानंद ने दीक्षा दे दी है । कबीर की बात सुनकर माँ नीमा हैरान रह गई । घर में चुप्पी छा गई । कुछ देर में ही पूरे बनारस में हल्ला मच गया । गुरु रामानंद का शिष्य बनने की कबीर की कहानी अपनी जगह है । लेकिन कई लोग ऐसे भी हैं जो मानते हैं कि कभी निग्रह थे यानी उनका कोई गुरु नहीं था । कबीर एक जगह कहा दी है, आप गुरू आपके चेला? साथ में ये निकाला गया है कि गुरु से उनका एकात्म हो गया है गुरु और उनमें पर नहीं है प्रहलादसिंह टिपाणिया कहते हैं कि कबीर ने तो गुरु किसी शरीर को माना ही नहीं । उन्होंने तो ये कहा ये सब गुरु हैं । हद के और बेहद के गुरु नहीं । बेहद आपे उपजे अनुभव के गुरुमाता हें । यानी संसार के अधिकतर गुरु हद यानी सीमा एक दायरे में रहने वाले हैं । ये गुरु बेहद के गुरु नहीं है । इस तरह अगर आपका गुरु खद में रहने वाला है तो फिर आप भी हद में बन जाते हैं । इसीलिए तो सही मायनों में बेहद है या नहीं । जिसकी कोई सीमा नहीं, वो हमारे खुद के भीतरी अनुभव से उपजता है । अब इसे अंदर महसूस करते हैं । कबीर को मानने वालों की दूसरी परंपरा के मुताबिक उन्होंने वैष्णो पीतंबर फील को अपना गुरु बनाया था । किस्मत के मुताबिक कबीर उनकी कुटिया पर सबसे के लिए जाते थे और उसे वह हज करना बताते थे । वो हिन्दू मुसलमान का भेद नहीं मानते थे । जबकि एक और परंपरा के मुताबिक कभी को शेख तक की का शिष्य बताया गया है । बहरहाल कि जानना जरूरी नहीं है कि कबीर के गुरु थे या नहीं, क्या पर थे तो कौन थे? इसलिए अब इन सवालों को यहीं छोडते हैं । ज्यादातर जानकारों में राय में इतना तय माना जाता है कि प्रवीर ने कभी अक्षर ज्ञान प्राप्त नहीं किया था और शायद उन्हें कभी इस की जरूरत ही नहीं पडी । खुद उन्होंने एक बार कहा था मैं कहता आंखन कि देखी तो कहता कागद की लेखी यानी मैं वही कहता हूँ जो मेरे सामने घट रहा है और तुम वो कहते हो जो कागज की पोथी में लिखा है । इस तरह कभी भी जो कहा वो डंके की चोट पर कहा एकदम साफ साफ कहा और धर्म से जुडे कर्मकांड, आडंबर और घोषणओं पर हमला किया । मजहबों की लडाई पर हमला किया । साथ हो देखो जब गौराणा सांची कहीं तो मारन धावे झूठे जब पथियाणा आज के दौर में झूठ का इतना बोलबाला है कि अगर किसी को सच कहूँ तो आप को मारने के लिए दौडता है समाज की यही त्रासदी कबीर के समय भी थी । इतिहास के जानकारों की राय ने पंद्रह सोलह शताब्दी की काशी यानी कबीर के वक्त की काशी धार्मिक संघर्ष काफी साक्षी था । हिंदुओं और मुसलमानों के बीच धार्मिक वर्चस्वता की आप सुलग रही थी । इससे कभी और उनके साथियों ने समझ लिया था । कहा जाता है कि कभी सबसे किया करते थे । इसमें समाज के तभी कुछ ले शामिल होते थे । कभी जहाँ जहाँ जाती वहाँ मजमा लग जाता था । आज कबीर के जीवन से जुडी घटनाओं का ऐतिहासिक प्रमाण तो नहीं मिलता लेकिन जन श्रुतियों में वो हमेशा मौजूद रहे हैं । हमारी बोल चाल में यहाँ तक कि हमारी सोच में भी मौजूद हैं । हिन्दू कहते राम हमारा मुसलमान रहमाना आपस में दो लडे मरत है मरम को नहीं जाना । हिंदू कहते हैं राम हमारा है । मुसलमान रहमान पर दावा करते हैं । आपस में वो खूब लडते हैं, लेकिन राम और रहमान का सच कभी जानने की कोशिश नहीं करते हैं । कबीर की इसी सबका चोट को कभी अशोक वाजपेयी भारत के धार्मिक सामाजिक खाने वाने का बुनियादी हिस्सा मानते हुए कहते हैं, भारत देश असल जिन तत्वों को मिलाकर बना है, उनमें से एक तत्व को हम कबीर तो कह सकते हैं । साथ में कबीर को जो दी हुई दुनिया है । जो दिया हुआ ढांचा है उसको मानने को वो कभी तैयार नहीं हुए । इस लिहाज से उन्होंने धार्मिक कट्टरपंथ को हमेशा चुनौती दी और धर्मनिरपेक्षता की झंडाबरदारी की तो भारत की रगो में है कबीर के जीवन से जुडी कुछ और । जनश्रुतियों के मुताबिक पंडित और मौलवियों से उनकी लगातार टक्कर होती रहती थी । कबीर के जीवन पर आधारित रांगी राघव के उपन्यास लोई का ताना में ऐसे ही एक प्रकरण का जिक्र आता है जिसमें शहर के मशहूर चौक पर मजमा लगा है । मुझे के भीतर कबीर अपना तंबूरा लिया बैठे हैं । भीड में कुछ मुसलमान, कुछ पंडित और ढेर सारे गरीब दिखने वाले लोग मौजूद हैं । तभी एक दढियल और कट्टर से देखने वाले मुल्ला जी कबीर के पास पहुंचे और ऊंची आवाज में बोले सुना है तो मुसलमानों के खिलाफ लोगों को भडका रहे हो । कबीर मुल्ला जी की बात का जवाब देते उससे पहले ही उनके सामने बैठा एक आदमी खडा होकर मुल्ला जी से बोला ये हमें भडका नहीं रहे । ये तो हमें समझा रहे हैं साहब । मुल्ला जी को शायद साध्वी के जवाब की जरूरत नहीं थी । उन्होंने उसे कोई जवाब न देते हुए अपने साथ आए । अपने मुरीद की तरफ देखा । मुल्ला जी का वो चेला उनकी टीडीडी गांव से ही सब होता गया और हकलाता हुआ बोला, नहीं नहीं चाहते ये जुलाहा कहता है कि दिन भर रोजा रहत है, रात हनत है गाय ये तो खून, वो बंदगी कैसे खुशी खुदा है । यह क्या हिंदू वाली बात नहीं हुई । चेले की बात सुनकर मुल्ला जी फिर कबीर की तरफ मुखातिब होकर बोले, तो तुमने ये कहा था अब की बार कबीर ने जवाब दिया तो बोले तो क्या किसी बेकसूर जानवर की जान की हिफाजत करना आदमी को हिंदू बना देता है? ये सुनकर मुल्ला जी से पहले उनका चेला बोला, लेकिन हिंदू काय को नहीं खाते हैं तो न खाएं । कबीर ने जैसे उसकी बात को पूरा किया, अब मुल्ला जी बीच में कब के? उन्होंने बहुत फॅमिली करते हुए कभी से कहा तो तू वैष्णो है? जी नहीं, कभी नहीं जवाब दिया । बोला जी झगडा गए । उन्होंने फिर कभी से पूछा तो फिर क्या हो? तभी चुप हो गए । उनके चेले भी चुके थे मुल्ला जीने अबकी बार मानो और ऊंची आवाज में कहा तो तो अल्लाह को नहीं मानता नहीं । कबीर सीधा जवाब दिया कबीर का जवाब सुनकर मुल्ला जी ग्रुप से तुम फुट है । उन्हें शायद इसी घडी का इंतजार था । उन्होंने अपने साथ आई भीड की तरफ रुख किया और बोले तो तुम सबने राजी के पास ले चलो । अपने को ना हिंदू कहता है ना बहुत और मुस्लमान की बुराई करता है । मुल्ला जी की मंजूरी करने वाला खेला भी उन की हाँ में हाँ मिलने लगा और बोला जी हूँ तुरंत चलिए मजाल तो देखिए भाई ये सब से सब का फिर हैं । चेले से मिली जी हुजूरी ने मुल्ला जी मैं और जोश भर दिया । वो कराते हुए कभी सब बोले है वो आप में हाथ डाल रहा है । बुला जी की चेतावनी पर कबीर के एक और साथी नहीं थोडी नरमी से पूछा वो कैसे मुल्ला साहब हो सकता है । बहुत समझाने ही पडेगी । मुल्ला जी ने जैसे मान मान ने कहा । फिर उन्होंने कबीर की तरफ मुखातिब होकर कहा चल बता तू कौन सा मुझे मानता है । अभी ने उसे जवाब देने की बजाय नई बात छेड दी तो मुल्ला जी से बोले तुम धुले हुए हो । अगर भगवान ने तो में सचमुच अलग अलग बनाया हो । अगर हिंदू और मुसलमान जन्म से अलग हो तो बताओ धोई । जगदीश चाहते आए कहूँ कोने भरमाया अल्ला राम करीब केशव हरी हजरत नाम धराया गहना एक अलग से कहना सामने भावना दूजा अहम सुनने को दो ही कर खाते एक नवाज एक पूजा वहीं महादेव वही मोहम्मद लम्बा आदम कहिए कोई हिंदू कोई तुक कहावे एक जमीन पर रही बेड किताब पडे कुतबा बे मौलाना पांडे रिजल्ट विकेट के नाम धराय ओ एक माटी के भांडे कह कभी देते दोनों भूले राम हूँ कि नहीं पाया वे खरसियां गाय कटा वे वादे जनम गवाया कहत कबीर सुनो भाई साथ हो अवीर किस गहरी चोट मारने वाली बात का मर्म समझने वाले आज तक समझते हैं । इसका असर कितना गहरा होता रहा है इस बात से इत्तेफाक रखते हुए कभी अशोक वाजपेयी कहते हैं कि अगर सौभाग्य या संभव कहा दुर्भाग्य से कभी रात जीवित होते तो शायद जिलों में सड रहे होते हैं । क्योंकि कबीर जिस तरह के सवाल उठाए जिस तरह की गहरी चोट की, वैसी बात से तो आज भी कभी भी किसी दस बारह लोगों की भावना आहत हो जाती है और पुलिस कार्यवाही शुरू हो जाती है । कबीर तो एक से फंडों और मौलवियों का माहौल बनाया उनकी जो मुहम्मद की है अगर वो आज करते हैं तो उनके विरुद्ध असम के मुकदमे चल रहे होते हैं । सच मच्छी ये कबीर के चरित्र की निर्भयता ही थी जो उन्हें समाज के बने बनाए, ताने बनी और रिवाजों के खिलाफ खडी करती रही । कबीर के इस गुण को हाँ शास्त्रीय संगीत की जानी मानी हस्ती कुमार गंधर्व नहीं शब्दों में गाया है । निर्भय निर्गुण रहे, गांव जाऊंगा मूल कमल दृढ आसनम् बांधूं जी उल्टी पवन चढाऊंगा, निर्भय निर्गुण रेखा हूँ । कबीर की निर्भरता के गुणों पर रची कबीरवाणी के इस पद को याद करते हुए कुमार गंधर्व की पुत्री और जानी मानी गायिका कलापिनी कोमकली कहती हैं कि उनके पिता नहीं कबीर के निर्भय होने को लेकर जो कहा है, वहीं असल में कभी को समझने की पहली शर्त है । कबीर का ये मानना था कि निर्भय होकर ही निर्माण की उपासना की जा सकती है । अगर आप निर्भर नहीं होंगे तो ये संभव नहीं है । यानी अगर आप हालत से डर गए तो आप कबीर और उनके विचारों को कभी नहीं समझ पाएंगे । यानी चाहे हिन्दू हो या मुसलमान, कभी नहीं । धर्म और उसके कर्मकांड का विरोध तो किया लेकिन व्यक्ति का साथ कभी नहीं छोडा । कबीर ने मानवीय प्रेम और ईश्वर में गहरी आस्था दिखाई । इस तरह से कभी भारत में धर्मनिरपेक्षता के पहले पैरोकार बने । उन्होंने कहा, हिन्दू मुसलमान नहीं, मानवीय प्रेम सबसे ऊपर है । कबीर ने कहा है जो राम है, ईश्वर है, अल्लाह है, जो निरंजन है उसे प्रेम के जरिए पाया जा सकता है । यह प्रेम ही सब कुछ है, प्रेम तक ही पहुंचना है । निराकार ईश्वर की उपासना और मानवीय प्रेम के भाव को सबसे ऊपर रखने वाले कबीर की इसी बात को आगे बढाते हुए कभी अशोक वाजपेयी कबीर के शब्दों को दोहराते हैं मौको कहाँ ढूंढे रे बंदे मैं तो तेरे पास में मैं तो सांसों की सांस में क्या नहीं तो मुझे कहाँ ढूंढ रहा है? मैं तो तेरे पास में ही हूँ । कबीर का ये कहना न सिर्फ कविता में क्रांति है और ये तो आध्यात्म में भी क्रांति है । इस हादसे ये कभी ईश्वर के विचार का जनतांत्रिक ीकरण करते हुए ये भी समझाते हैं ईश्वर तक पहुंचने का अधिकार सब का है । उस ईश्वर तक जाने के लिए किसी भ्रमण, किसी अनुष्ठान का, पिछली जग्य का, पिछली वेद पुराण का पिछले हज या कुरान का सहारा लेने की कतई जरूरत नहीं है ना मैं जब मैं ना मैं तब मैं नाम में भर तो पास में कबीरवाणी का ये पद बडी तन्यता से गाते हुए जाने माने सत्तर वादा उस्ताद शुजात हुसैन अपनी बचपन की यादों में हो जाते हैं । आपको कबीरवाणी से पहले अपना परिचय याद करते हुए बताते हैं कि जब वो दस बारह साल की उम्र के थे तब उनके माता पिता अलग हो गए थे । परिवार के लिए वह बडा कठिन समय था । ऐसे संकट के समय में उन्होंने पहली बार किसी के मुँह से सुना । दुःख में सुमिरन सब करें सुख में करेंगे कोई तब उन्होंने नेपाल की रहने वाली एक आया से जाकर सुमिरन का मतलब पूछा था । उस आया ने अपने गले से अपनी कंट्री माला निकली और बताया उन छोटे छोटे रूद्राक्षों में भगवान का वास होता है । उसने माला के साथ भगवान का नाम बोलने के लिए कहा कहा ऐसा करने से वह सब ठीक कर देंगे । इस बात का उन पर फॅार पडा और काफी कम उम्र होने के बावजूद वह इतना समझ गए थे कि उन्हें भगवान का नाम लेकर अपने संकटों से खुद ही पार पाना है । कबीर की कही हुई बात से इस पहले परिचय के बाद धीरे धीरे कबीर में शुजात हुसैन की दिलचस्पी बढती गई और इनकी वजह कबीर की आसान भाषा में कहीं गयी । एकदम आसान बातें थे । उस बात कहते हैं । कबीर मुझे हमेशा से बहुत पसंद आए क्योंकि जब भी मैं उन्हें पडता हूँ, मुझे ऐसा लगता है जैसे कोई बहुत आम इंसान मुझसे बातें कर रहा है । मैं कबीर के लेखन की तरफ इसीलिए खर्चा चला जाता हूँ क्योंकि वो तो मानो मेरे जैसे बिल्कुल साधारण आदमी के लिए ही लिखते हैं और उनकी लिखी या कहीं बातों को आम आदमी न सिर्फ समझता है बल्कि सादगी से कहीं गयी । वो बातें सीधे उसके दिल पर असर करती हैं । सादगी से घूम बातें कहने की कबीर की काबिलियत की मिसाल देते हुए उनका पद सुनाते हैं । पत्ता बोला रक्ष से शुरू लक्ष्मणन आए । अब के पतझड ना मिले तो दूर पडेंगे जाए । रक्षम ओला पत्ते से सुन पत्ते मेरे भाई यही जगत की रीत है । एक आए, एक जाए । कबीर ने जो देखा उसे दो टूक शब्दों में कह दिया तो समझा उसे समझा दिया । कबीर किसी ताकत के बारे में बताते हुए कलापिनी कोमकली कबीर के एक निर्गुण भजन का जिक्र करती हैं । तभी जी ने कहा युगल युगल हम जोगी आगे जा जाए, मेंटेना का बहुत सबका अनाहद होगी । युग युग हम होगी अब आप इसे नहीं नजर से देखिए तो क्या है? मैं युगों युगों से योगी हूँ । मैं कभी आता नहीं, कभी जाता नहीं । मुझे कोई खत्म नहीं कर सकता हूँ । मैं ही हूँ जिसने सब कुछ भूल भी लिया है । इसी तरह कलापिनी कोमकली अक्सर अपने कार्यक्रमों में कबीर का एक और चर्चित निर्माण भजन गाती है । चूनागढ शहर शहर घर बस्ती कौन सुनता कौन जाता है लाल हमारे हम लालन के तन सोता, भ्रम जागी है खाली गढ खाली शहर खाली घर में कौन सा होता है, कौन जाता है भगवान नहीं रहे हैं मैं भगवान का हूं होता है लेकिन मेरा भ्रम मा मेरी आत्मा हमेशा जाग्रत है अपने आत्म आपने हमको हमेशा जाग्रत मानने वाले कभी साधुओं की संगत में तो रहे लेकिन ज्यादातर लोग ऐसा नहीं मानते कि वह घर ज्यादातर साधु बन गए । कबीरपंथियों की एक धारा उन्हें गृहस्त मानती है । कहीं कहीं जिक्र आता है कि उनकी पत्नियां थे लोग और राम जलियां । लेकिन ज्यादातर जानकार यह मानते हैं की लोई और राम जलियां एक ही इंसान के दो नाम है और कभी नहीं । अपनी रचनाओं में पत्नी को अलग अलग नामों से संबोधित किया है उनके दोनों से । वैसे ये लगता है कबीर की जिंदगी गरीबी में गुजरा कभी भी अपनी गरीबी के बारे में कहा है । जब का भाई जान मियां कभी न पाया, सुख डाल डाल मैं करूँ पाते पाते तो दूसरी तरह कबीरपंथ किए धारा परिवार और उनके बच्चों जैसी बातों को बिल्कुल नहीं मानते हैं और इसका पुरजोर विरोध करती हैं । लेकिन कभी से जुडी हर धारा में कबीर की घुमक्कडी की बहुत चर्चा है । कहा जाता है कि कभी नहीं लंबी लंबी यात्राएं की थी । आईने अकबरी के अनुसार कबीर देशभर में खूब घूमें और कुछ दिन वो जगन्नाथपुरी में भी रहे । कबीर मंसूर नाम के ग्रंथ के मुताबिक उन्होंने बगदाद, समर्थन, बलख बुखारे आदि स्थानों की लंबी यात्रा की थी । कबीर की वाणी में देखने वाली अलग अलग भाषाओं के असर को इस संदर्भ में भी देखा जा सकता है । कालखंड की दृष्टि से कबीर को दिल्ली के सुल्तान सिकंदर लोदी का समकालीन माना जाता है । कहा जाता है कि कबीर की शिकायत सिकंदर लोदी से भी की गई थी । जी । एच वेस्टकॉट ने अपनी जानी मानी किताब कबीर एंड कबीरपंथ में लिखा है कि कबीर की साहब कोई ने उनके लिए चारों तरफ दुश्मन खडे कर दिए थे । कबीरपंथी मान्यताओं के मुताबिक उस समय के जाने माने मौलवी शेख तकि ने कबीर के खिलाफ मुसलमानों की भावनाओं को स्वर दिया । उन्होंने सिकंदर लोदी से ईशनिंदा के आरोप में कभी को सजाए मौत देने की फरियाद की । बादशाह ने फरमान निकालकर कबीर को दरबार में बुलाया गया था । उन्हें दरबार में सुबह हाजिर होने के लिए कहा गया था, लेकिन उस शाम होने को दरबाग में पहुंचे । काशी की कबीरचौरा मठ से प्रकाशित किताब कबीर जीवन कथा के मुताबिक सिकंदर लोदी के दरबार में जाने के लिए कबीर ने गले में तुलसी की माला पहनाई, माथे पर चंदन लगाया और सिर पर पगडी बांधकर उसपर मोरपंख की कल की खुसी जबकि ऐसा वेश कभी कभी नहीं बनाते थे । कबीर के सामने दिल्ली का सुल्तान था । तभी निर्भय निडर उसके सामने खडे थे । जब कभी मोदी के दरबार में खडे थे उस वक्त दरबार के काजी साहब आगे आए और कबीर से बोले बादशाह सलामत है, अहम दिल है । बादशाह को सलाम करूँ तो मैं माफ कर देंगे । काफी की बात सुनकर भी कभी चुप रहे । उन्होंने पूरे दरबार की तरफ नजरे भेजते हुए आखिर में तक पर बैठे सिकंदर लोदी की तरफ देखा लेकिन उसे सलाम नहीं किया । कबीर के हम आकर देखकर काजी नहीं चलाते हुए कहा का, फिर तो भाषा को सलाम क्यों नहीं करता हूँ । कबीर पर उसके चिल्लाने का कोई असर न होना था । ना हुआ ताजी फिर बोला था । फिर मुझे यह हिमाकत महंगी पडेगी । अब कबीर ने बडे शांत भाव से से जवाब दिया जो दूसरों का दुख, डर जान सकते हैं, वहीं पीर होते हैं । बाकी सब का । फिर कभी रात हुई पीर है । जो जाने पर भी जो पर तीस मैं जा नहीं सो का फिर देती । जवाब शंकर का जी सब पता गया, उसे कोई जवाब नहीं सूझा । अब दरबार में हर चेहरे पर शिकन । हर जुबान पर चुप्पी छा गई इस छुट्टी को सिकंदर लोदी की भारी आवाज में थोडा बादशाह ने कभी से कहा तो जैसा सुना था वैसे ही होता हूँ । मैंने तो मैं सुबह बुलवाया था हम शाम को क्यों हो? ऍसे में गुस्से की हल्की परत साफ देखी जा सकती थी । तभी रे बिना डरे सिकंदर की आंखों में आंखें डालकर कहा हूँ । मैंने एक नजारा देखा जिसे देखने में मैं थक गया । सिकंदर लोदी सुनकर हुआ । उसने पूछा ऐसा कौन सा नजारा हो सकता है तो मैं सुलतान के हो मुडुली करने को मजबूर करें । इस बार कबीर ने और भी हैरान करने वाला जवाब दिया । उन्हें मैंने हुई कि नौ से भी बारिश छह से कारवां गुजरते देखा क्या हमने सोई के नौ से भी बारिश छह से करवा गुजरते हुए देखा । सिकंदर लोदी ने कबीर की पूरी बात दोहराते हुए कहा, और फिर फस नहीं लगा । दरबार में मौजूद लोग भी उस की ये बात सुनकर बहुत सकते रह गए लेकिन सुल्तान पहुंचता देख वो भी हंसने लगे हैं । इस जोड में सिकंदर लोदी की आवाज फिर मुझे जोर से कबीर पर चलाया हूँ । फिर झूठ है हो । कबीर में उसकी बात पूरी होने से पहले ही जवाब दिया सुल्तान स्वर्ग और नरक के बीच में कितना बडा अंतर है । सूरज और चांद के बीच के अंतरिक्ष में अनगिनत हाथ और उन समय हैं और इस सब एक आँख की पुतली के नौ से देखी जा सकते हैं । और ये नौ हुई कि नौ से भी बारीक है उसका हनी के मुताबिक कबीर के जवाब से बात शाम बहुत खुश हुआ और उन्हें छोड दिया गया । जबकि दूसरी प्रचलित कहानियों के मुताबिक पांच चाहने उन्हें कभी जंजीरों से बनाकर गंगा नदी में फिकवाया तो कभी पागल हाथ से कुछ डलवाने की कोशिश की तो कभी जिंदा जलाने के । जब अपनी तमाम कोशिशों में और सफल रहा है । तब सुलतान सिकंदर लोदी को अपनी भूल का अंदाजा हुआ । उसके बाद भी कबीर के खिलाफ साजिशें बरकरार रही । कभी साहब की जिंदगी को जितना जानने की कोशिश की, उससे कुछ बातें बिल्कुल साफ है । भारत वर्ष में जो दबे कुचले थे, दलित है, उनके लिए आवाज देने वाले वो पहले व्यक्ति लगते हैं । आज से छह सौ साल पहले वो जाती धर्म को तोडकर समाजसुधार की बात कर रहे थे । तुम खत्म हमन हम कब शुरू हम कत्लो हूँ । तुम काट दूर गरीब चाहे वो किसी भी धर्म का हो, वो ईश्वर प्रेम का बराबर का अधिकारी है, हकदार है । ये बात उन्होंने अपने शिष्यों को समझाए । कबीर ने धर्म के बंधे बंधाए विश्वासों की चक्रम को चुनौती दी । वो धर्मों के प्रत्यर्पण के घोर आलोचक थे । हिंदू ना मुसलमान होने की घोषणा करने वाले सब कभी पहले कभी थे जिन्होंने धर्मनिरपेक्ष समाज की । कल्पना कबीर की । धर्मनिरपेक्षता के मिसाल तो मगर भी है । मगर उत्तर भारत के संत कबीर नगर जिले का कस्बा है । यहां समाधि और मजार दूर साथ साथ है समाधि भी । कबीर की मजार भी कबीर काशी से मगहर क्यों आएगा ये अपने आप में बडी कहानी है । एक बात ये है कि कबीर अपने आखिरी दिनों में काजी कोतवाल पंडितों से परेशान होकर मगर चले आए । एक जगह कबीर कहते हैं जो काशी तम तजे कबीरा तो राम ही कवर नहीं हो रहा । अभी किस बात का मतलब समझाते हुए कबीर चौरा मठ वाराणसी के आचार्य विवेकदास कहते हैं, कबीर का आशय यह था कि अगर काशी में मरने से ही मोक्ष में ज्यादा तो जीवन भर राम राम करने का क्या फायदा और अभी काशी में ही मरना था तो प्रभु के नाम को जब आपने का भी कोई लाभ नहीं । इसी तरह एक जगह वो कहते हैं कि क्या काफी क्या मगहर अगर ऋषय राम जो हुई दरअसल उन लोगों को चुनौती थी जो ये कहते थे कि काशी में मरने से ही मुक्ति मिलती है । कबीर के इस फैसले के बारे में कभी अशोक कहते हैं । असल में कबीर ने जीवन के अंतिम क्षणों तक समाज की रूढियों और चले आ रहे नियमों के खिलाफ बगावत के करीब के समय में भी कहा जाता था की अगर बनारस में आपकी मृत्यु हुई तो आप बहुत सागर कर गए तो कबीर तो कबीर थे । वो इस बात को कहाँ मानने वाले थे । अंत समय नजदीक आया तो उन्होंने कहा कि मैं तो मगर में जाकर मरूंगा । अगर मेरे घर में ऐसे हैं तो जिनसे मुझे मुक्ति नहीं मिल सकती है तो फिर गंगा में नहाने से ही कैसे मिल सकती है । अगर मेरे कर अच्छे नहीं तो गंगा के तट पर मेरी चिता जलने से ही मुझे मुक्ति कैसे मिल जाएगी? अपने इस निर्णय से कबीर यही कहना चाह रहे थे कि अगर काशी में शरीर त्यागने भर से मुक्ति मिल जाए तो जीवन भर सदाचार या राम का नाम लेने से क्या फायदा । अगर आपने इंसान है तो मोक्ष मिलेगा ही । इसमें राम का कोई ऐसा नहीं है । वैसे कुछ लोग अंत समय आने पर कबीर के काशी छोडकर घर आने के फैसले के पीछे घर से जुडी उसके वदंति को भी जिम्मेदार मानते हैं । इसमें कहा जाता था कि मगहर में भरने वाले को मोक्ष नहीं मिलता लेकिन मगर में मोक्ष न मिलने और काशी में निश्चित मुख्य मिलने की बनी बनाई बातों के विरोध में ही कबीर काशी छोडकर मगहर आए । बताया जाता है एक सौ बीस साल की उम्र में कभी भी शरीर त्यागा क्या उनके शब्दों में कहीं तो चोला उतारा । कबीर की मृत्यु के बाद ऐसा कहा जाता है कि कबीर के हिंदू और मुसलमान चेलों में इस बात पर झगडा हुआ कि कबीर के शव पर इसका हक है हिन्दुओं का क्या? मुसलमानों का? जब रात भर लडने के बाद भी इस बात का फैसला नहीं हुआ तो अगली सुबह कुछ ऐसा हुआ जिस कबीर का फैसला मानना पडा कहाँ जाता है । अगली सुबह जब कबीर के शव के ऊपर से चादर हटाई गई तो वहां शव की जगह बस कुछ फूल देखते बडे थे । उस परम हंस आत्मा का शरीर फूल में बदल चुका था । कबीर के दोनों धर्मों के चेले नहीं वो फूल ही आपस में बात । यह हिंदू ने उन फूलों को रख कर कबीर की समाधि बनाई और मुसलमानों ने उन्हें बाजार में सजा दिया । शायद इसी दिन के लिए कबीर ने कहा था उड जाएगा हंस अकेला जगदर्शन का मेला गुरु की करनी गुरु जाएगा जेले की करने चेला प्रोफेसर पुरुषोत्तम अग्रवाल कबीर के अंत की इस घटना को एक नए नजरिए से देखते हैं । वो कहते हैं, अगर कोई समाज कल्पना करता है कि कबीर की मृत्यु के बाद उनकी दे है, स्कूलों में तब्दील हो गई तो मेरी दिलचस्पी इस बात में है कि हम इस घटना कार्ड समझे । मेरा मानना है कि ये किदवंती हमें इस बात की सूचना देती है कि कबीर ने जीवन भर समझाया हिंदू और मुसलमान में भेद नहीं है और दोनों धर्मों में भेद की बात ही व्यर्थ है । लेकिन कबीर की मृत्यु के बाद जो हुआ उसे देखकर लगता है कि कबीर के दोनों ही धर्मों के अनुयायी ही एक सीमा के बाद इस बात को पचा नहीं पाए । और इस लिहाज से मुझे ये कहानी कबीर के व्यक्तिगत दुकान यानी पर्सनल ट्रेजिडी लगती है । कबीर का शव नहीं मिला, पर फूलों का ही बटवारा हो गया उन फूलों से । अब मगर में मजार भी है और समाधि भी है । कहानी शत प्रतिशत सही हो तब भी है और काल्पनिक हो तब भी कबीर की तलाश में हमारी मदद करती है । कभी हमारे बीच अपने शब्दों के जरिए जिंदा है । इन कहानियों के जरिए कोई उन्हें कभी कहता है तो कोई समाजसुधार । कोई संत कहता है तो कोई उन्हें अवतार मानता है । कोई भगवान मानता है तो कोई उन्हें धर्मनिरपेक्षता का सबसे पहला झंडा बरदार मानता है । ये सारी बातें सही हैं क्योंकि कबीर होने का मतलब ही महान होना है ।

अनुपम खेर प्रस्तुत करते है भारतवर्ष : कबीर - 2

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