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Transcript

जिम्मेदारी किसकी?- पुस्तक का सारांश

हाँ हूँ ऍम रहे हैं जिम्मेदारी किसकी लेखक ऍम पुस्तक का सारा कॅश सहज और सरल भाषा शैली में लिखें प्रस्तुत पुस्तक का हर एक पहलू इस और इशारा करता है कि विश्व की हर एक मानव रूपी समस्या का जिम्मेदार सिर्फ मानव भी है । हर मानवरूपी समस्या का जिम्मेदार मानव को इसलिए ठहराया जाता है क्योंकि इस संपूर्ण पृथ्वी जगत में भारत परिस्थिति मानव शक्ति के द्वारा ही उत्पन्न की जा सकती है । शायद यही कारण है कि भ्रष्टाचार, आतंकवाद, सहिष्णुता, जीवहत्या, दुष्कर्म, राजनीति, सांस्कृतिक, धार्मिक तथा नैतिकता जैसी अनेक समस्याओं का जिम्मेदार केवल मानव को ही ठहराया जाता है । अधिकांश से लेकर वर्तमान तक के मानव इतिहास पर यदि हम अनुसंधान करें तो हम पाएंगे कि जब तक मानव अपनी जिम्मेदारियों को ठीक ढंग से निभाता रहा, तब तक वो बहुत सुखी रहा । किन्तु जब जब मानव अपनी जिम्मेदारियों से हटा गया, तब तक उसे उसके कई दुष्परिणाम नहीं भुगतनी पडीं । प्रकृति के ऐसे कई नियम है जब प्रारंभ से लेकर वर्तमान तक आज भी उसी गति से कार्यरत है, जिस गति से उन की शुरुआत हुई थी । यही कारण है कि दिन राज, सर्दी, गर्मी तथा बरसात जैसी अनेक प्राकृतिक क्रियाओं में आज तक कोई परिवर्तन नहीं आया हूँ । मानव और प्रकृति का संबंध आज भी हमें यही दर्शाता है कि मनुष्य हमेशा ही प्रकृति के अधीन रहा है ना कि प्रकृति मनुष्य के अधीन । माना कि परिवर्तन का होना प्रकृति का नियम है । केंद्र कभी कभी कुछ परिवर्तन ऐसे भी होते हैं जो हमारे विनाश तक का कारण बन सकते हैं । उदाहरण केदारनाथ यदि हम पिछली पर आतंक मचा आएंगे तो इससे जनहानि होगी । यदि हम अपने मन में लालच पैदा करेंगे तो इससे भ्रष्टाचार ही फैलेगा । यदि हम प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट करेंगे तो इसका परिणाम भी भूकंप सुनामी ही होंगे । ठीक इसी तरह से जब परिवर्तन हमारे द्वारा किए गए हैं, उसके परिणाम भी हमें ये भुगतने पडेंगे । ऐसी स्थिति में यदि प्रकृति एक तरह से मशीन है तो मानव को वहाँ इसका संचालन करता तो ठहराया जा सकता है । विश्व में आज ऐसी कई समस्याएं हैं जिनकी उत्पत्ति प्राकृतिक रूप से न होकर मानवीय सोच के कारण हुई है । चाहे शिक्षा का व्यवसायीकरण हो, चाहे आतंकवाद या फिर धर्म आधारित समस्याएँ ही चुनाव हो । इन सब का जिम्मेदार सिर्फ मनुष्य ही हो सकता है । अगर ये सभी समस्याएं प्राकृतिक होती तो साथियों रहता युद्ध आरी कालों में भी मौजूद रहती साडियाँ पुराने धर्मग्रंथ आज भी हमें यही शिक्षा देते हैं । यदि हम इस पृथ्वी पर प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी की ढंग से निभाएंगे तभी हमारी पहचान और अस्तित्व जिंदा रह सकते हैं । अन्यथा फिर परिवर्तन तो प्रकृति का नियम है । कहने का सीधा जाता पर यही है कि यदि हम पृथ्वी पर अत्याचार करेंगे तो पृथ्वी हमारा अस्तित्व क्षणिक समय में ही मिटाने का साहस रखती है । हूँ । एक नई युवा सोच के साथ लिखी गयी प्रस्तुत पुस्तक एक जिम्मेदार नागरिक के अस्तित्व पर भावी प्रकाश डालती हैं तथा विश्व की मुख्य बुराइयाँ चाहे भ्रष्टाचार हो, चाहे आतंकवाद, राजनीतिक तथा धार्मिक करते हो, चाहे दुष्कर्म, शिक्षा, संस्कृति, विज्ञान, पर्यावरण हूँ, चाहे तो सहिष्णुता हूँ आदि । सभी के समाधान रुपये जिम्मेदारी आम जनता एक मानवीय सोच के साथ पुस्तक स्वर्ग पहुंचाने का प्रयास करती है । ये एक तरह से वास्तविक हकीकत है कि मानव की क्रियाओं के द्वारा ही युवाओं का निर्धारण होता है । यदि हम चाहे तो कलयुग है और यदि हम चाहे तो हो सकता है हूँ ।

Introduction

आप सुन रहे हैं कुक, ऍम और जिमाया के साथ सुनी जो मन चाहे जिम्मेदारी किसकी लेखक बालिस्टर सी गुलचैन लिख की अधिपत्य प्रस्तुत पुस्तक पूर्णतः मानवीय सोच पर आधारित है जिसका की किसी भी प्रकार की राजनीति धर्म अधिक पहलुओं से कोई भी लेना देना नहीं है । प्रस्तुत पुस्तक में जो भी बातें कही गई है वो एक आम जनमानस की सोच के हिसाब से ही कही गई है जो की काल्पनिक भी हो सकती है । इसलिए पाठकों को ये सलाह दी जाती है कि वह स्वयं के विवेक से निर्णय लें । पुस्तक में लिखित किसी भी कथन से यदि किसी व्यक्ति विशेष को कोई आपत्ति महसूस हो तो कृपया अपनी जाए । लेखक के पते पर अवश्य भेजे, जिसका एक ऊंची दायरे में जवाब दिया जाएगा क्योंकि हमारे पाठकों की संतुष्टि ही हमारा लक्ष्य है । लेखक का उद्देश्य किसी की भी भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं है बल्कि जिस प्रकार से आज हम अपना जीवन जी रहे हैं, उसी सोच को पुस्तक में स्थान दिया गया है । इस देश के सभी धर्मों, नागरिक गणों, सभी राजनीतिज्ञों का हम सारी रहे सलमान करते हैं । फिर भी यदि आप हमें अपनी राय भेजेंगे तो हम आपकी राय को आपका सम्मान समझाते हुए उसे स्वीकार करेंगे और आपकी राय का आपको सम्मानपूर्वक जवाब भी दिया जाएगा । धन्यवाद लेखक बालिस्टर सीधा गुलचैन गुजरात पुनलूर माधव प्लाजा के सामने, थर्राहट की गोट लश्कर ग्वालियर मध्यप्रदेश लिख का ईमेल आईडी हैं बालिस्टर सिंह गुर्जर एट जीमेल डॉट कॉम बी । ए । एल । आई । एस । टी । ए, आर एस आई । एन । जी, एच । जी, यू । आर । जे ऍम जीमेल डॉट कॉम एक नई युवा सोच के साथ लिखित पुस्तक प्रस्तुत वर्तमान में घटित हो रही मुख्य समस्याओं और उनके समाधान पर आधारित है । पुस्तक को मूर्त रूप देने में मैं यानी लेखक सर्वप्रथम उस परम पिता परमात्मा को धन्यवाद देखता हूँ जिसके असीम कृपा से न वर्तमान में घटित हो रही विनाशकारी समस्याओं की और ध्यान दे सका और उनके समाधान संबंधी विचारों को संक्षेप में एक पुस्तक स्वरूप आप सरे प्रिया पाठन गणों के समक्ष प्रस्तुत कर सकता हूँ । वैसे तो हर प्राणी का सर्वप्रथम ईश्वर उसका जन्मदाता ही होता है और इसमें सबसे पहला स्थान माता पिता का ही आता है । इसी लिए इसी क्रम के अनुसार नए यानी लेखक अपने माता पिता को पूरी श्रद्धा के साथ नमन करता हूँ, जिनके कार्य मुझे प्यारी दुनिया देखने का अवसर प्राप्त हुआ । कहते हैं कि ईश्वर इस धरती पर हर इंसान को खून के रिश्तों में मानता है ताकि इस पावन धरती पर हर इंसान के श्रेष्ठ समाज का निर्माण हो सके । मैं अपने परिवार के उच्च आदर्शों पर चलते हुए ही अपने विचारों का समागम कर सकता हूँ इसीलिए ये कहना उचित ही होगा मेरा सर्वश्रेष्ठ मार्गदर्शन मेरे परिवार के द्वारा ही संभव हो पाया । मैं अपने परिवार जनों का बहुत आभारी हूँ जिन्होंने मुझे मानवता भरे संस्कार प्रदान किए । ईंटो इस धरती पर वर्तमान में कई धर्म मौजूद हैं लेकिन जहाँ मानवता का धर्म विद्यमान हो जाता हूँ, वहाँ धर्मों की बंदी से होता है, टूट जाती हैं । मैं अपने छोटे से दो मित्र ताबिश वे तथा वसीम खान का सत्तर हिरदय से आभारी हूँ जिनकी सोच इतनी छोटी सी उम्र में भी मानवता भरी रही और उन्होंने मेरा उत्साह बढाया है । माना कि मानव जीवन में अनेक संघर्षों का सामना करना पडता है लेकिन हकीकत यह भी है कि कभी भी ईश्वर हमें बिना समाधान की समस्या भी नहीं देता । मुझे आश्रय देने वाले ग्वालियर शहर के दयाल बैंड के संचालक श्री अजीत सिंह कुकरेजा जी को मैं सर ही गए धन्यवाद देता हूँ जिन्होंने मुझे आश्रय प्रदान किया तथा ग्वालियर शहर की न्यू दयाल बैंड के संचालक श्री मुकेश सी कुकरेजा जी का भी बहुत आभारी हूँ । उन्होंने मुझे छोटे भाई की तरह प्यार दिया और मेरी सोच को महत्व प्रदान किया । मेरे समस्त गुरूजनों को साझा नमन करते हुए मुझे बडा ही हर्षोल्लास हो रहा है की मुझे उन्होंने कठोर परिश्रम से उच्च शिक्षा प्रदान की । ये इसी का परिणाम है कि मैं अपने विचारों को आप सभी प्री पाठक गर्म तक पहुंचाने में सफल रहा । धन्यवाद शुभकामनाओं सहित बालिस्टर सिंह अंकल छह

जिम्मेदारी किसकी? रूपरेखा

आठ सौ रहे हैं । कोई कोई फिल्म आरजेएम आया के साथ सुनी जब मन चाहे जिम्मेदारी किसकी बालिस्टर सी हंगुल छह पुस्तक की रूपरेखा पुस्तक की रूपरेखा इस प्रकार है संपूर्ण ब्रह्मांड में मौजूद आठ ग्रहों में से केवल पृथ्वी एक मात्र ऐसा ग्रह उत्पन्न हुआ है जिसपर जीवन सुख सुविधापूर्ण बिताया जा सकता हूँ और ईश्वर को ठीक तरह से सोचा और समझा जा सकता हूँ । पृथ्वी ग्रह ही एक मात्र ऐसा ग्रह है जहाँ पर स्वयं ईश्वर ने भी अवतार लिया था तथा अपने अनेक अंशों के रूप में मानव जाति को प्रकृति का आनंद लेने के लिए इसी ग्रह पर भेजा गया है । ईश्वर का पृथ्वी पर अवतरित होना इस और इशारा करता है कि वह जरूर ही मानव समाज के कल्याण हेतु पृथ्वी पर अवतरित हुए होंगे ताकि मनुष्य प्राकृतिक नियमों को ठीक ढंग से समझ सकें । अगर कहा ये जा सकता है कि जब तक मानव प्रकृति के नियमों का पालन करता रहा तब तक बहुत सुखी रहा । आज ही इसी का ही परिणाम है कि आज तक और आज से लाखों करोडों वर्षों पूर्व तक प्रकृति उसी गति से चलती रही हैं जिस गति से उसका प्रारंभ हुआ था । इसलिए कहा जा सकता है कि हर प्राणी वारिक शुरू से ही प्रकृति के अधीन रहा है तथा उसने प्रकृति के नियमों का भी भलीभांति पालन किया है । आज के समय की वर्तमान स्वरूप जिंदा हकीकत यही है की प्रकृति तो अपने नियमों में आज भी हमें बंदी हुई नजर आती है किन्तु मानव नहीं । आज के समय में कई वर्षीय से प्रकृति के नियमों का पालन करने वाली मानव जाति आज उसी प्रकृति को ही ललकार रही है । इसका परिणाम फिर अंततः यही होता है कि कहीं आपदा आती है, कहीं विनाशकारी भूकंप होते हैं । कहने का सीधा सारा यही है कि अगर हम प्रकृति के नियमों को तोडेंगे तो निश्चित ही प्राकृतिक घटनाएं हमें तोड मरोडकर रख देंगी । जितना महत्व मानव के लिए प्रकृति का है, उतना ही महत्व मानव समाज का भी है । समाज की उत्पत्ति भी एक विशेष नियम के तहत हुई है ताकि मानव के जीवन का संचालन लिखते ही चलता रहेगा । इसीलिए समाज के नियमों का पालन करना भी मानव जाति को अति महत्वपूर्ण था । मानव जाति के उत्थान में जितना योगदान सामाजिक पहलुओं का होता है, उतना योगदान तो किसी भी चीज का नहीं होता, क्योंकि मानव के जीवन की गति का पहला कदम समाज से ही शुरू होता है । सामाजिक पहलू ही वह पहलु होते हैं । जमानो को मानवता का पाठ पढाने में अहम योगदान रखते हैं । इसीलिए हमारी सोच भी अपने समाज का दिया हुआ उपहार ही तो होती है । हमें क्या सही करना है और क्या गलत करना है, ये सभी प्रकार की सोचे हमें सामाजिक संस्कारों सहित प्राप्त होती है । दुनिया भर में अपने नाम का परचम लहराने वाले व्यक्तियों के जीवन पर यदि हमें एक सरसरी नजर गडाए तो हम पाएंगे कि ये उनकी सामाजिक सभ्यता ही थी कि आज उन्होंने अपना नाम हर जगह रोशन किया है । आज भी भारतीय कवारी युग में हमें ऐसे कई लोग मिल जाएंगे जिन्होंने अपने समाज के आदर्शों पर चलकर बडी से बडी उपलब्धियां हासिल की है । हमें मिल कुल नहीं भूलना चाहिए कि हमारे अंदर मानवता को बढाने वाली शिक्षा यानी नैतिकता का विकास समाज से ही होता है । आधुनिक दुनिया आज जिस तरीके से आधुनिकता की और लगातार बढ रही है, वहाँ भी एक आधुनिक सोच होती है । लेकिन फिर वहाँ पडता है कि यदि हमारी आधुनिक सोच अच्छी है, वहाँ आधुनिकता का विकास होना भी उचित है । अरियरी हम अपनी आधुनिक सोच का इस्तेमाल अपने स्वार्थ हित के लिए करते हैं तब जरूर ही गलत तरीके की आधुनिक सोच हमें कहीं न कहीं नुकसान पहुंचाने वाली मानी जाएगी । आज ये मानवीय सोच का परिणाम ही है कि हमें आज विश्व में कई तरह के ऐसे परिवर्तन देखने को मिलते हैं जिनसे मानवता को ठेस पहुंचती हैं । आज आतंकवाद, भ्रष्टाचार, राजनीति, दुष्कर्म जैसी कई विनाशकारी समस्याएँ कोई नहीं बात नहीं है । ऐसी समस्याओं से हर कोई भली भांति परिचित हैं कि ये किसी तरह से लगातार अपनी अंधकार रूपी आंधी से हर प्राणी को ठेस पहुंचा रही हैं । जो राजनीति एक समय में जनहित को मध्य नजर रखते हुए की जाती थी, आज वही राजनीती स्वार्थ हित से ही की जा रही हैं । और तो आज आज धर्म परिवर्तन भी इस कदर चरम सीमा पर है कि मानव अब धर्म की बातें गुजरे हुए समय की बातें हो । हर तरफ हमें यही देखने को मिलता है कि कहीं दुष्कर्म हो रहे हैं तो कहीं भी हत्याएं हो रही हैं । कहीं आतंकवाद आम जन को निकल रहा है तो कहीं भ्रष्टाचार रूपी आंधी अंधकार फैला रही है । इन सभी परिवर्तनों से हमें यही प्रतीत होता है कि मानव हम स्वयं ही ऐसे परिवर्तन कर रहे हैं जो हमारे विनाश का कारण हो । पर्यावरण ीय तथा प्राकृतिक घटनाएं आज जिस तरीके से अपना कहर बरपा रही है उन से तो यही अंदाजा लगाया जा सकता है । जो विनाशकारी परिवर्तन प्रकृति में आज से पहले कभी नहीं हुए वो आज यदि हमें दिखाई दे रहे हैं तो निश्चित ही ये हमारे द्वारा किए गए कार्यों का ही परिणाम हो सकता है । वर्तमान में अबतक शायद शिक्षा भी मानव व्यवसायिकरण के हत्थे चढ गई हूँ । ऐसा कुछ कहना भी कोई गलत नहीं ठहरा सकता जो शीर्षा संस्कृति, सभ्यता, मानव में नैतिकता का विकास किया करती थी । आज ऐसा माहौल हमें कहीं कहीं पर ही दिखाई देता है । शायद यही कारण रहा होगा कि आज मानव के द्वारा किए गए परिवर्तन उसी के विनाश का कारण बनते जा रहे हैं और किसी को उससे कोई भी आपत्ति महसूस ही नहीं हो रही है । आज के माहौल में जिस किसी से भी अगर ऐसी समस्याओं के बारे में बात की जाए, हर कोई अपनी बात को कलयुग चल रहा है, ऐसा कहकर वही की वही खत्म कर देता है । लेकिन अगर वास्तविक हकीकत पर हम नजर डालें पाएंगे कि कलयुग भी कोई बोरा योग नहीं है । अगर कुछ हो रहा है तो वह सिर्फ हमारी सोच एक नई युवा सोच के लिए लिखी गई इस प्रस्तुत पुस्तक में हम विश्व पटल पर घटित होने वाली उन सभी बुराइयों के बारे में जानेंगे जब कहीं ना कहीं हमारी गलतियों की कारण ही उप की हैं और साथ ही साथ अच्छा पर घटित होने वाली समस्याओं का जिम्मेदार मानव वैल्यू किस प्रकार से हैं, ये सभी बातें हम अगले अध्यायों में आपको सुनाएंगे ।

Part 1

आप से नहीं हैं कुकू एफ एम आर जे माय के साथ सुनी जमीन चाहे जिम्मेदारी किसकी लेखक बाली स्तर सी गुरचैन बढता आतंक मारते लोग देखो ये जन्नत का खेल अगर आतंक मचाने से जन्नत नसीब होती तो इसमें कोई संदेह नहीं कि विश्व का हर नागरिक आतंकवादी होता और दुनिया भी कभी की मिट चुकी होती । बाली स्टैसी हाॅल उस दिन मानवता जरूर शर्मसार हुई होगी जिस दिन आतंकियों ने पाकिस्तान के पेशावर इलाके में आर्मी स्कूल पर हमला किया था जिसमें की एक सौ बयालीस बेगुना मौसम बच्चों की जाने चली गई । नवंबर का दिन शायद यही दिखा रहा था की अब जो आतंकिया जा रहा है और जन्नत के नाम पर किया जा रहा है और ज्यादा से ज्यादा आम आदमियों को आतंकी बनाकर पूरी धरती पर अन्याय करने के उद्देश्य से लगातार बढता ही जा रहा है । जब पाकिस्तान के पेशावर इलाके में नवंबर को आर्मी स्कूल पर हमला किया गया उस समय सभी बच्चे अपनी अपनी कक्षाओं में शिक्षा ग्रहण कर रहे थे । हिन्दू कुछ ही पलों में उन के साथ ऐसा अन्याय हो जाएगा ऐसा तो उन्होंने शायद कभी भी सोचा नहीं होगा । माझरा इतना आश्चर्यजनक था की एक माँ अपने बच्चे के घर वापस आने की राह देख रही थी तो अब भुजान बच्चे के उज्जवल भविष्य का सपना देख रहे थे । लेकिन यहाँ तक नीति को शायद कुछ और ही मंजूर था । जब अपने मृत मासूम बच्चे का मासूमियत भरा चेहरा उन माता पिताओं के सामने आया तो हर किसी की आंखों में चाहते हुए भी करना चाहते हुए भी आखिर आंसू निकल नहीं आए थे । पूरा विश्व उस घटना पर यही पश्चातात कर रहा था कि आखिर उन बेगुना बच्चों ने आतंकवादियों का क्या बिगाडा था । जोन बच्चों पर इस तरह का अन्याय किया गया । क्या आतंकवादियों की माँ बहन बच्चे नहीं होते? इस घटना ने एक और जहाँ आतंका क्रूर चेहरा सबके सामने लाकर खडा किया वहीं दूसरी ओर आतंकियों के लोगों को मारने से जन्नत नसीब होती है । लान के इस वाक्य नी पूरे मानव समाज को नीचे की ओर झुका दिया । वैसे तो ऐसी कई तरह के आतंकी घटनाएं घटित होती रहती हैं जिससे लोगों के हिंदी को क्षति पहुंचती हो । लेकिन कई तरह की आतंकवादी क्रियाएं ऐसी भी होती है जिनसे पूरी धरती भी रोने लगती है । हमें ये अक्सर सुनने में आता है की बहुत से घटनाओं में आतंकवादी ज्यादा से ज्यादा लोगों की जान लेने के चक्कर में स्वयं को ही बॉम से उडा लेते हैं । इसके बाद जन्नत नसीब होती हैं या नहीं ये तो ईश्वरी जानता है । एक आम राय से तो यही कहा जा सकता है कि दूसरे लोगों को मारने से जन्नत तो क्या जहन लंबी नहीं ऐसे नहीं होता । यानी अगर कोई इंसान ये सोचे कि लोगों पर अत्याचार करके उसे स्वर्ग की प्राप्ति होगी तो यहाँ उसकी मूर्खता ही सामने आती है । भला ऐसी स्थिति में तो यही कहा जा सकता है कि अगर लोगों पर अत्याचार करने से स्वर्ग मिल जाता फिर हर इंसान एक दूसरे पर अत्याचार ही करता । लिखता ऐसे लोग वास्तव में वो लोग होते हैं जिनका उद्देश्य इस पृथ्वी पर अत्याचार ही करना होता है । इसीलिए तो ये एक मत रूप से सही राय है कि अत्याचार करने वालों को स्वर्ग तो बहुत दूर की बात है, नरक में भी जगह नहीं मिलती । जन्नत यानी स्वर्ग के नाम पर आज जो खेल अत्याचारियों द्वारा खेला जा रहा है, उससे किसी भी मानव का कभी भी भला होने वाला नहीं है । लेकिन अगर इसे समय रहते ही मिटाया नहीं गया, ये छह पूरी मानव जाति पर है, विजय प्राप्त करने की ताकत रखता है । एक तरीके से पिछली पर मौजूद सभी धर्म अपने अपने मायने में सही होते हैं और कोई भी धर्म हमें आतंक मचाने की शिक्षा कभी नहीं देता । लेकिन आज आतंकवादी जिस तरीके से इस्लाम धर्म के नाम पर अल्लाहू अकबर के नारों के साथ जो आतंक मचा रहे हैं वो सिर्फ इस्लाम धर्म को बदनाम करने की ही साजिश हो सकती हैं । आतंकवादी अपने ज्यादा से ज्यादा संख्या बढाने के चक्कर में किसी विशेष धर्म का सहारा लेकर उठते हैं ताकि उस धर्म के अनुयायियों को बहला फुसलाकर अपना सदस्य बना लिया जाए । एक मानवता की दृष्टि से यही कहना उचित होगा कि आतंकियों का कोई धर्म नहीं होता । बस अगर उनका कोई धर्म होता भी है तो वह मानवता को ठेस पहुंचाने वाला ही धर्म होता है । आजकल आतंक का नाम सुनते ही लोगों की जिम्मा पर सबसे पहले इस्लाम धन का ही नाम आता है । लेकिन अगर हकीकत देशी जाए तो हम पाएंगे कि इस्लाम धर्म आतंक कभी नहीं फैलाता बल्कि आतंकवादी इस्लाम धर्म को अपने सहारे कल जरिया बना रहे हैं ताकि वे ज्यादा से ज्यादा आतंकी इस्लाम धर्म से ही पहना कर सके । अगर इस्लाम धर्म, आतंकी शिक्षा नेता तो इसमें कोई संदेह नहीं कि विश्व का हर मुसलमान आतंकवादी होता है क्योंकि आज हमारा धर्म होता है । हम उसी के सिद्धांतों पर ही तो चलते हैं । हाँ, हम जरूर कह सकते हैं कि यदि आतंकवादी इस्लाम धर्म का सहारा पाकर आतंक फैलाते हैं, मुस्लिम समुदाय को इसका विरोध तो करना ही चाहिए । आज हम देखते हैं कि आतंक में अपनी जडे इतनी मजबूत कर रखी है कि अब वह जगत्जननी कहीं जाने वाली महिला वर्ग को भी आतंकी बनाने में कोई कसर नहीं छोड रहे हैं । अगर हम दुनिया के सबसे खूंखार आतंकवादी संगठन इस्लामिक स्टेट पर नजर डाले तो हम पाएंगे कि ये संगठन कितना क्रूर हो चुका है की हमें इसमें महिलाओं की तैनाती भी देखने को आसानी से मिल जाएगी । वर्तमान स्वरूप आतंकी बढते अत्याचारों पर अगर हम ठीक ढंग से अध्ययन करें इसका यही निष्कर्ष निकलकर सामने आएगा कि यदि हमने इस पर समय रहते ध्यान नहीं दिया तो ये जरूर ही अपना मूल समय हमें दिखा देगा । विश्व के हर नागरिक तथा हर धर्म पर हावी होता आतंक आज यही दर्शाता है कि उसका कोई धन होता ही नहीं है । यदि आतंका पृथ्वी पर मौजूद धर्मों में किसी धर्म से संबंध होता तो आतंक उस धर्म पर तो कम से कम अत्याचार नहीं करता । जिस धर्म से उसका संबंध जुड जाता । इसीलिए समय के रहते हुए हमें आतंक को ठीक ढंग से पहचाना होगा । अगर ये हमारे धर्मों में से किसी धर्म को बदनाम करने की सोचता है तो सभी धर्मों के लोगों को मिलकर इस को करारा जवाब देना होगा ।

Part 2

आप सुन रहे हैं फॅमिली के साथ सुनी गेहूॅ जिम्मेदारी किसकी लेखक बाली करसी घर चले गए । आज के समय में हमारी सोच ऐसा लगता है कि मानव ताला ठहरा हो हो । आज के इतिहास में जिस तरीके से आतंक अपना अस्तित्व लगातार जमा रहा है, उससे तो यही लगता है कि हम इसका विरोध करने की मानो इच्छुक ही नहीं है । इसका अंततः परिणाम नहीं होता है । जब हमारे ही लोग इसके शिकार हो जाते हैं अर तब हमारी अंखी खुलती है । लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है । आतंकी खूनी खेल से आज हर कोई अच्छी तरह से परिचित है । हिन्दू कोई भी इस और ध्यान ही नहीं देने के लिए तैयार । हम अक्सर एक दूसरे के धर्मों पर आतंक का आरोप लगाते रहते हैं और आतंक हर धर्म पर अत्याचार कहता रहता है । इसके बाद भी हम ये नहीं जान पाते हैं कि वास्तविकता नीतू आतंका कोई घर भी नहीं होता । अगर हम सही मायने में बेगुनाह लोगों पर होते हुए अत्याचारों का विरोध कर सकते हैं नहीं । हमारी विशेष जिम्मेदारी होनी चाहिए कि सबसे पहले आतंकों बिना संकोच किए भर्ती नहीं बल्कि विश्व के सभी लोगों को एक साथ मिलकर तथा धर्म का भी भाव कि मेरा इस धरती से मीटा देना होगा क्योंकि इस तरीके से हमारे द्वारा किया गया का ये जिम्मेदार लोगों का कर्तव्य कहलाता है । रेल आतंका लवजिहाद इसमें कोई संदेह नहीं कि जहाँ लव जी आर को महत्व दिया जाता हूँ वहाँ ऐसे आतंकों जल दिया जाता है जो प्यार भरा आतंक होता हूँ और फ्रेंड के नाम पर प्रेमभरी दुनिया को मिटाने की साजिश रच ना हो । आज से लगभग बीस साल पहले कई लोग तो ये ना डेली नहीं थी कि लव बिहार आखिर होता क्या है? केंद्र समय के साथ साथ हुए बदलाव में इस प्रेमभरी दुनिया में एक नया शब्द और जोड दिया है जिसका नाम है लाभ । बिहार उर्दू के शब्द कोष से निकला बिहार नामक शब्द आज जिन लोगों की जुबान पर मौजूद हैं वो शायद यही सोचते होंगे कि लव जिहाद आपसी प्रेम संबंधों को जोडता होगा । लेकिन आज जिस तरीके से लव जिहाद का उपयोग किया जा रहा है उससे तो हर कोई यही कहेगा कि आतंक का एक हिस्सा लव जिहाद भी है । फिर चाहे हम उसे झूठा प्रेम या प्रेम के नाम पर आतंकी क्यों नहीं रहे हैं । अब भी हम कहीं से कहीं तक गलत नहीं होंगे । लव बिहार की बढती आवाज का उपसहारा है । शायद आज यही शिक्षा दे रहा है कि अगर हम इस पर थोडा समय पहले ध्यान दे लेते तो हमारे सामने आज जहाज रुपये समस्या मौजूद हैं । वह शायद कभी आते ही नहीं । लडकी यार ने आज कई नौजवान युवक युवतियों के भविष्य को पूरी तरह से बर्बाद करने में कोई कमी कोई कसर नहीं छोडी है । प्रेम विवाह करने वाले ज्यादा से ज्यादा लोग आज अपने किए पर सिर्फ पछतावा ही कर रहे हैं क्योंकि इस लवजिहाद रुपये राक्षस का असली चेहरा इसका सही समय आने पर ही दिखाई देता है । तब तक ये झूठ को सच में परिणत करके ही सामने वाले कुछ जूठा ढांढस बंधाता रहता है । वर्तमान में बिहार की समस्या भारत ही नहीं बल्कि लगभग मायने नहीं तो रेडी शो में ही हमें देखने को मिलती है । अब वो बात अलग हो जाती है कि किसी देश में काम है तो किसी देश में ज्यादा है । लेकिन फिलहाल ये मौजूद सभी जगह रही है । जिहाद को लव जिहाद के नाम से एक नई पहचान तब मिली जब कई लोग अपना नाम बदलकर प्रेम संबंधों का खेल खेलने पर उतारू हुए । असल में अगर देखा जाए तो सबसे ज्यादा महिला वर्ग को ही लव जिहाद का शिकार होना पडता है । ये मायने में भले ही कडवी हकीकत हूँ लेकिन सच्चाई यही है कि लव जिहाद का सबसे ज्यादा असर जिहादी किस्म की लोग जवान युवतियों पर ही दिखाते हैं । जो जिहादी किस्म के होते हैं वो लोग किसी धर्म विशेष के होते हुए ही अपना वास्तविक धर्म बदल कर कोई अन्य धर्म का स्वयं को बताने लगते हैं और जिसके साथ उन्हें लव जिहाद फैलाना होता है तो उसे धर्म विशेष को अपना धर्म बताने लगते हैं । ये रियल बिहार को थोडा गौर से देखी तो जिहादियों का मुख्य उद्देश्य आतंक को बढावा देना तथा किसी धर्म विशेष की जनसंख्या को बढावा देना होता है । यही कारण है कि कई लोग प्रेम सम्बन्ध के द्वारा युवतियों को अपने जाल में फंसाकर उनसे उनका धर्म परिवर्तन कराने की बात करते हैं तथा जो युवतियां उनकी बात मान जाती है वह जीवन भर उन्हें जिहादियों के दिशा निर्देश का पालन करना पडता है । ऐसी स्थिति में इसका परिणाम यही निकलता है कि जिहाद रूपी आंधी हर तरह से जिहाद के शिकार हुए लोगों को जीवन भर अंधकार में धकेल देती है । ऐसे कई घटनाएं हमें देखने को भी नहीं आती है । कि कई लोग बिहार सिर्फ आतंकी हिसाब से इसलिए फैलाते हैं ताकि ज्यादा से ज्यादा आतंकियों की संख्या बढाई जाए । विश्व भर के अनेक देशों के कई धर्मों के लोग इसके आसानी से शिकार होते जा रहे हैं । बिहारी लोग एक और जहाँ नवयुवकों को जिहादी शिक्षा देकर उनका भविष्य बर्बाद करते नजर आते हैं, वहीं दूसरी ओर जिहाद का शिकार हुए युवकों द्वारा युवतियों का भी भविष्य खतरे में डाल दिया जाता है । इसका अन्यथा परिणाम यही होता है कि आतंक और धर्म परिवर्तन जैसी कई खोली दिया अपना स्थान धीरे धीरे किसी भी देश को बर्बाद करने के उद्देश्य से बना ही लेती है । बिहार के संबंध ने हम चाहे कितनी भी अनुसंधान चौदह कर ले, हमेशा इसका निष्कर्ष दुष्परिणाम के अलावा खुद से भी नहीं मिलेगा । हमारे लव जिहाद को मिटाना नहीं चाहेंगे तो भी हमें अनुसंधान करने में खर्च की गई बुद्धि से भी ज्यादा बुद्धि की आवश्यकता होगी । क्योंकि लव बिहारी व्यक्ति को पहचानना हर किसी के बस की बात नहीं होती । अगर जिहादी व्यक्ति को इतनी आसानी से पहचान लिया जाता तो फिर ये समस्याएं उत्पन्न नहीं होती क्योंकि जी बिहार का शिकार कोई भी नहीं होना चाहता हूँ । सभी को आज के समय में इसके दुष्परिणाम तरह से मालूम हैं । इसलिए कहा जा सकता है कि चाहे हम कितनी भी लाभ परवाह क्यों ना हो, गिहार का नाम सुनते ही हमारे सामने धोखाधडी वाला खेल तो आ ही जाता होगा । वास्तव में जिस तरीके से लव जिहाद के परिणाम सामने निकल कर आ रहे हैं उनसे यही अंदाजा लगाया जा सकता है कि जानबूझकर तो कोई भी व्यक्ति इसके चंगुल में फंसना नहीं चाहता । हिंदी यह बात अलग है कि अगर हम अपनी गलतियों के कारण इसके शिकार हो बैठे हो और अपना पूरा जीवन अपना पूरा भविष्य बिहार के हवाले कर दें इसलिए इससे बचना तो हर इंसान की मजबूरी ही है । साथ हिसार अब तो ये हमारी जिम्मेदारी भी होनी चाहिए कि समय के रहते लव जिहाद नामक समस्या का हल ट्रोन कर पूरी मानवजाति को पूरे मानव समाज को इसके चंगुल से आजादी दिलाने का प्रयत्न करें । लव जिहाद और राजनीति प्रेम संबंधों की महिमा इस संसार में बडी ही विचित्र मानी जाती रही है । विषेशकर भारत देश में प्रेमिक और जहाँ हर मानव के जीवन में कई खुशियाँ लाता है, वहीं दूसरी और इस संसार के लोगों को एक खुशहाल जीवन जीने की कला भी सिखाता है । लेकिन ये सब कुछ तभी संभव हो पता है जब ट्रेन को प्रेम के तौर पर लिया जाए । अगर हम प्रेम संबंधों को अपने स्वार्थ खेत से निभाते हैं तो वहाँ जरूर ही कुछ न कुछ विषमता जनरली उठती हैं । ये इस जीवन की बिल्कुल ही सटीक हकीकत है की प्रेम ही वो आशा दीदी है जिसके बल पर इस संसार को जीता जा सकता है । हमें प्रेम संबंधों के ऐसे कई उदाहरण देखने को इस संसार में मिल जाएंगे जिनसे हर कोई खुशहाल जीवन जीने की शिक्षा ले सकता है । ये जरूरी नहीं है कि प्रेम सिर्फ आपसी लोगों से ही किया जाए बल्कि ग्रीन तो वह बूटी है जिसका असर सभी वर्ग के लोगों पर समान मात्रा और समान अनुपात नहीं होता है । इसीलिए ये कहना उचित ही होगा की अगर इस दुनिया को प्रेम भरे तरीके से किया गया है निश्चित ही इस संसार में ऐसी कोई विसंगति जान नहीं ले सकती जिससे कि किसी भी व्यक्ति को किसी प्रकार की कोई परेशानी का सामना करना पडे । प्रेम का इस संसार की हर एक भाषा में एक विशेष स्थान देखने को मिलता है । इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि विश्व का हर एक नागरिक प्रेम की महिमा को भली भर्ती जानता हूँ और पहचानता हो तभी तो प्रेम को अपनी अपनी भाषाओं में हर वर्ग के लोगों ने एक विशेष स्थान दिया है । वर्तमान की अगर हम प्रेम प्रसंग संबंधी बातों की ओर ध्यान दे तो इसमें कुछ विशेष प्रकार की जटिलता हमें देखने को अक्सर मिलती है कि कुछ लोग प्रेम सिर्फ अपनी स्वार्थ की पूर्ति के लिए करते देखते हैं । जब कुछ लोग प्रेम की सहारे हदों को पार कर जाते हैं, थ्री बिहार के रूप में परिवर्तित हो जाता है । फिर जिहादी प्रेम के ऊपर तरह तरह की राजनीति हमें देखने को भी मिलती है । इससे ये अंदाजा लगाया जा सकता है कि जब किसी प्रेम प्रसंग के ऊपर राजनीति होने लग जाती है, वहाँ जिहादी किस्म की ट्रेन को और भी ज्यादा बढावा मिल जाता है । कई राजनीतिक दल लव जिहाद की भनक लगते ही अपने अपने तर्क देते हुए नजर आने लगते हैं और फिर ये जिहाद रूपी आंधी हर तरफ अपना असर दिखाने लगती है । जो राजनीति एक देश हित को मद्देनजर रखते हुए करनी चाहिए वो राजनीति आज देश में कुछ विशेष को रीतियों को जन्म देने के उद्देश्य ही की जा रही है । इसके ठीक विपरीत भारतीय जनता को भी इससे कोई आपत्ति महसूस तक नहीं होती है । आज के इस भौतिकतावादी युग में जो जीवन यापन हम जिस तरीके से कर रहे हैं उससे किसी समस्या का कोई भी हल निकलने वाला नहीं बल्कि आने वाले समय के मद्देनजर हमें इसके दुष्परिणाम ही भुगतनी को मिल सकते हैं । इसके सिवाय कुछ भी नहीं । आप सुन रहे हैं कुछ कोर्स एम आरजेएम आया के साथ सुनी जब मन चाहे जिम्मेदारी किसकी लेखक बालिस्टर सी गुल जाएंगे दुश्य ताकि हर दुष्कर्म ये तो हम पूरे विश्वास के साथ ही कह सकते हैं । चाहे इंसान कितना भी लापरवाह क्यों ना हो लेकिन जब उसके लव जिहाद लेकिन जब उसके लव जिहाद की शिकार होने की बात सामने आती है तो उसके रोंगटे जरूरी खडे हो जाते होंगे । क्योंकि लवजी यार नामक बीमारी ऐसी उपजी है कि इसका असर सभी पर समान रूप से समान मात्रा में और समान अनुपात नहीं होता है । तभी तो कई समझदार व्यक्ति इसके चंगुल में आसानी से फंसते नजर आते हैं । अरब में समझदार होने का अफसोस करते हुए नजर आते हैं । इसलिए इन सभी लव जिहाद, रुपये, निष्कर्षों को ध्यान में रखकर इसको मिटाना हर किसी की जिम्मेदारी हो गई है । इतना भी मिल सकता है जब हर नागरिक इसको मिटाने की शपथ लेगा

Part 3

आप सुन रहे हैं कॅाम आरजेएम आया के साथ सुनी जब मन चाहे जिम्मेदारी किसकी लेखक बालिस्टर सी गुज्जर दुश्य ताकि हर दुष्कर्म ये तो हम पूरे विश्वास के साथ ही कह सकते हैं, चाहे इंसान कितना भी लापरवाह क्यों ना हो, लेकिन जब उसके लव जिहाद लेकिन जब उसके लव जिहाद की शिकार होने की बात सामने आती है तो उसके रोंगटे जरूरी खडी हो जाते होंगे । क्योंकि लवजी यार नामक बीमारी ऐसी उपजी है कि इसका असर सभी पर समान रूप से समान मात्रा में और समान अनुपात नहीं होता है । तभी तो कई समझदार व्यक्ति इसके चंगुल में आसानी से फंसते नजर आते हैं और आपने समझदार होने का अफसोस करते हुए नजर आते हैं । इसलिए इन सभी लव जिहाद, रुपये निष्कर्षों को ध्यान में रखकर इसको मिटाना हर किसी की जिम्मेदारी हो गई है । ये तभी मिल सकता है जब हर नागरिक इसको मिटाने की शपथ लेगा । दुष्कर्म का होना यही साबित करता है कि दुष्कर्मी ने अपना मानव तथा ईश्वरीय रूप त्याग दिया है । उस समय जरूर ही ईश्वर को ठेस पहुंचती होगी, जब मानव ईश्वर को पूरी तरह से अपने हिंदी से बाहर निकाल देता है और राक्षसी प्रवृति का स्वरूप अपने हिंदी में संजय लेता है सर्वत्र रमन्ते देवता हा । इस नामक वाक्य का नियमित उच्चारण करने वाला प्राणी जब इसके विपरीत कोई कदम उठाता है, वह अन्याय की हर हद को पार करता हुआ नजर आने लगता है । आज टेलीविजन समाचार पत्रों के माध्यम से ऐसी कई घटनाएं हमारे सामने उपस् थित होती हैं जिनको सुनने मात्र से मानवता शर्मसार होती है । कभी कभी तो हमें ऐसा सुनने को मिल जाता है जब कभी राक्षसी जाती नहीं भी नहीं किया हो और वही कुछ आज का भौतिकवादी मानव करने पर उतारू हैं । हमारी श्वास तो उस समय और भी ज्यादा फूलने लगती है जब हमारा समाज एक अपराधी को कोई सजा नहीं देता हूँ और ऐसे काम लगातार होते रहें । समाज ऐसे कर्मों को बढावा भी देता रहा हो । मारा के साथ साथ ईश्वर को भी ठेस पहुंचाने वाला कर दुष्कर्म आज हर तरफ अपने पैर जमाने के लिए अग्रसर ही नजर आ रहा है । इसके जरिये हमें इतनी मजबूत नजर आने लगी है । मानव अब उसकी जडों को काटने वाला कोई भी इस दुनिया में बचा ही नहीं । यदि किसी पेड की गढ इतनी घातक हो कि वह पूरी मानव समाज को शर्मिंदगी महसूस कर आए तो ऐसी स्थिति में उन जडों का नामोनिशान में जाना अनिवार्य तो होता ही है । हिंदू यहाँ कि परिस्थितियां कुछ दिन नजर आती है । पूरी समाज, पूरे समाज को शर्मसार करने वाला दुष्कर्मी चंद सरकारी कागजी नियमों में पाँच जाता है और कुछ ही पलों की सजा काटने के बाद अपना मन हो । चेहरा फिर से मानव समाज को दिखाने लगता है । कैसे दुष्कर्म मिल सकता है? अच्छा कहा यही जा सकता है कि अगर दुष्कर्मी को रिहा कर दिया जाए तो इससे दुष्कर्म तो मिलेगा ही नहीं, लेकिन मानवता जरूर मिल सकती है । पूरे विश्व में भारत को नीचा दिखाने वाली नई दिल्ली की निर्भया कांड वाली घटना आज भी यही दर्शाती है कि भारत के लोग अब राक्षसी प्रवृत्ति को ही महत्व देने लगे हैं । निर्भया कांड जिस तरीके से हुआ था, उससे भले ही भारत रोया हो या नहीं रोया हो, लेकिन ये हकीकत माननी पडेगी की इस घटना ने पूरे विश्व को जरूर रुला दिया था । ये कोई नहीं बात नहीं है कि अब भारत में भी ऐसी कई घटनाएं घटित होने लगी हैं जिस पर भारत चुप रहता है । हिंदू बाकी देश जरूर ही भावुक होते हैं । हम आज विश्व को जिस तरीके से अपना परिचय दे रहे हैं, वह बडा ही शर्मसार करने वाला है । हमारे समाज के शिक्षा वास्तव में अब इतनी कमजोर हो गई है कि अब मानव हवस के पुजारी बंदे जा रहे हैं । शाह यही कारण रहा होगा कि कई संत महात्माओं पर भी दुष्कर्म के आरोप अब साबित हो रहे हैं कि हम इस तरीके से अपना अस्तित्व बचा पाने में कामयाब हो सकते हैं । किसी भी हाल में तो क्या हर हाल में हमारी दुर्गति ही होगी? अगर यही सब होता रहा तो नारी को देवी का दर्जा देने वाला भारतीय समाज आज इतना क्रूर हो गया है कि शायद ही हमने कभी इसका अंदाजा भी लगाया होगा । पहले यही मान्यता विद्यमान थी कि जहां नारी की पूजा होती है, वहां ईश्वर भी विद्यमान रहते हैं । किन्तु आज तक सब कुछ भी प्रदीप ही नजर आ रहा है । जो दुर्दशा महिला वर्ग की आज के समय में हो रही है, ऐसी दुर्दशा कभी भी नहीं नहीं । जिस नारी को पूरी सृष्टि की जननी माना जाता था, आज वही नारी अपने आप में यही पछतावा कर रही है कि अब मैं ऐसे किस योद्धा भोजन दू मुझे इन शैतानों से मुक्ति दिला सके । आज के सरकारी नियम भी कुछ ऐसे पैदा हो गए हैं कि जिनसे हमें कोई आपत्ति भी महसूस नहीं होती हैं । चार पांच पन्नों के एक अध्याय वाला सरकारी कानून हर अपराधी को सरकारी तरीके से सजा लेता है, भले ही वो मानवता के लिहाज से न्याय हूँ । हो महत्व सिर्फ यही चलता है कि अगर कोई नाबालिग दुष्कर्मी क्रूरता की चाहे कितनी भी हदों को बार क्यों न कर दें, उसकी सजा को हमेशा बाल सुधार का नाम देखकर माफी किया जाता है । क्या हम ये भूल जाते हैं कि कोई भी क्रूर अपराध कभी होता है जब हम समझदार हो चुके होते हैं फिर वहाँ उसे कोई फर्क नहीं पडता है कि अपराधी बालिग है या नाबालिग । ऐसे ही कुछ विसंगतियां हैं जहाँ में लगातार शर्मसार कर दिया रहे हैं तथा हम चुपचार अपनी जुबान बंद किए बैठे रहे जाते हैं । इसका परिणाम यही होता है कि अपराध करने वाले बिना संकोच किए किसी भी हद को पार कर जाते हैं और अपनी क्रूरता की हद से पूरे मानव समाज को ये आखिर दिखा ही देते हैं कि हम वास्तव में कलयुग में ही जीवन यापन कर रहे हैं और एक तरह से अन्याय को भी साथ ही साथ सहन भी कर रहे हैं । वैसे तो निर्भया कांड जैसी ऐसी कई घटनाएं घटित होती हैं, जिनका हमें कुछ पता भी नहीं चल पाता । कितने जो घटनाएँ हमारे सामने उभरकर आती है, हमें सिर्फ उसी के बारे में पता चलता है । दुष्कर्म रुपये चाहे कैसे भी घटनाएं क्यों हूँ, वो जरूरी हमें नीचा दिखाने वाले ही होती है । इसलिए ये हमारा काम से काम करते होना चाहिए कि हम ऐसी घटनाओं को रोकने का प्रयास करें ताकि आज ही नारी अपना जीवन खुशहाली से जी सके और फिर से उसकी खोई हुई गरिमा उसे वापस मिल सकें । अगर हम वास्तव में नारी समाज को न्याय दिलाना चाहते हैं तो हमें हमारे समाज के अंदर छिपे हुए दुष्कर्मी का बहिष्कार करना ही होगा, तभी इस जगत की जनानी सुखी रह सकती है । हमें सभी राक्षस रूपी दुष्कर्मियों का नाम और निशान इस दुनिया से मिटा नहीं होगा । तभी हमारा समाज एक खुशहाल पूर्व जीवन जी सकें ।

Part 4

आप सुन रहे है कॅश के साथ सुनी जब मन चाहे जिम्मेदारी किसकी लेखक बालिस्टर सिंह और चेयर डर एक कडी रिहा की गए । जिस प्रकार मछली के अस्तित्व के लिए जल का होना महत्वपूर्ण होता है ही उसी तरह मानव का अस्तित्व भी बिला धर्म के जिंदा नहीं रह सकता । फिर वहाँ चाहे मानव धर्म ही क्यों ना हो, विश्व के लगभग प्रतिशत हिस्से पर जल पाया जाता है और शेष हिस्सा जो बचता है वहाँ पर मानव प्रजातियां निवास करती हैं । वो भी कई धर्मों के साथ । यानी कि हम ये कह सकते हैं कि इस पृथ्वी जगह पर जितने भी धर्म है वह सिर्फ पृथ्वी के अट्ठाईस प्रतिशत भाग पर ही पाए जाते हैं । जबकि शेष भाग पर सिर्फ जल्द ही पाया जा सकता है । अगर हम इतिहास को माने तो आज से लगभग पांच हजार वर्ष पूर्व विश्व में केवल एक ही धर्म था और वो था सनातन धर्म । किन्तु इन पांच हजार साल के भीतर ही अन्य धर्मों के विकास के साथ शहर में मिलते हैं । लेकिन आज अगर हम किसी भी धर्म के अनुयायी से ईश्वर के बारे में बात करना चाहे तो सब का एक ही जवाब हो सकता है कि सबका ईश्वर एक हैं फिर ही क्यों नहीं समझ पाते हैं कि जब सबका ईश्वर एक ही है तो हमारा धर्म भी तो एक ही होना चाहिए । तो फिर इसलिए हम अन्य धर्मों के जाल में फंसकर आपसी रंजिश पैदा करते हैं । आज अगर हम विश्व के किसी भी देश में क्यों ना चले जाएँ वहाँ में सबसे पहले धर्म ही दिखाई देता है बाकि सब बाद में आता है । भारत जैसे बहुधार्मिक देश में ही हम देखते हैं कि हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध धर्म के अलावा भी ऐसे कई धर्म मौजूद हैं जिनका हमें अभी तक पता भी नहीं है और बहुत से लोग तो हमें ऐसे मिल जाएंगे जिनका कोई घर ही नहीं । लेकिन ये जरूर कडवी हकीकत है कि जिन लोगों का कोई धर्म नहीं होता वहाँ उनका मानव धर्म जरूर होता है । क्योंकि बिना धर्म के इंसान तो क्या जानवर भी इस दुनिया में रह ही नहीं सकता । वैसे भी चाहे मानव या नहीं मालूम लेकिन धर्म के संबंध में जो भी बातें कही जाती है वो कितनी सही है, कितनी गलत है ये हम उचित नहीं ठहरा सकते । परंतु प्रारंभ से लेकर वर्तमान तक जितनी भी प्राकृतिक क्रियाएं होती आ रही है वह जरूर एक धर्म में बंद कर ही हो रही है । उदाहरण के तौर पर सूरज और चंद्रमा जिन नियमों का पालन करते हुए आज तक अपने अस्तित्व को बनाए रखने में कायम है वहाँ उनका भी एक धर्म होता है । सूरत । सुबह उदय होता है और शाम के समय व्यस्त हो जाता है । ठीक उसी प्रकार चंद्र दी आपने एक विशेष नियम के तहत शाम को उदित होता है और सिन है अस्त हो जाता है । यह घटनाक्रम जिस नियम के तहत चलता रहा है वहाँ प्रकृति का एक धर्म विद्यमान होता है जिसका पालन सूरज और चंद्रमा को भलीभांति करना पडता है । अभी तो अभी तक ये संपूर्ण प्रकृति आपने एक विशेष धार्मिक नियम के कारण जिंदा है । अच्छा हम ये कह सकते हैं कि सूरज का निकलना एक धर्म है । चंद्रमा द्वारा शीतलता प्रदान करना उसका धर्म है और सर्दी, गर्मी, बरसात सहेल अन्य प्राकृतिक घटनाओं का घटित होना भी एक धर्म है । अगर प्रकृति अपने धर्म का पालन नहीं करेगी तो इसमें कोई संदेह नहीं कि मानव भी अपने धर्म का पालन नहीं कर सकता । यहाँ अगर हम मानव के धर्म का प्रकृति के धर्म से जोडकर देखे तो हमें जमीन और आसमान का अंतर नजर आएगा । प्रकृति का धर्म है कि वो अपने एक विशेष नियम के तहत अपना धर्म निभाती हैं और यदि हम मानव के धर्मों को देखें तो हमें मानव घर में कई धर्म देखने को मिल जाएंगे वो भी अलग अलग नियमों का पालन करते हुए । जैसे हिन्दू धर्म में जीवहत्या करना मना है तो मुस्लिम घर में बकरी ईद को उचित ठहराया जाता है । ठीक उसी तरह अगर सीख धर्म में त्रिपाल और पगडी होना अनिवार्य है जो ईसाई धर्म में उसका विरोध किया जाता है । ऐसे धर्मों के आधार पर हमें कई उदाहरण देखने को मिल जाते हैं कि मानव के धर्मों में कहीं कहीं समानताएं पाई जाती है तो कहीं कहीं एक दूसरे के धर्मों के प्रति विरोध भी जताया जाता है । पुरानी धर्म आधारित मान्यताओं की अगर हम बात करें यही जो चकता हमारे सामने आती हैं कि पहले कई हिस्सों में अधिकतर लोग मानव धर्म को ही सर्वोपरि मानते थे और ये उनका वाक्य भी मानव धर्म सर, वो वही आज भी भी शायद है । परन्तु मानव धर्म सर्वोपरि नामक वाक फिर आज यथार्थ के पन्नों में ही सिमट कर रह गया है । ऐसा ही कुछ आज हमें प्रतीत हो रहा है । वर्तमान में धर्म के नाम पर जितनी भी हिंसा है, घटित हो रही है । उनसे हम यही अंदाजा लगा सकते हैं कि अब मानव धर्म का तो कोई अस्तित्व ही नहीं बचा । एक तरफ जहां धर्म के नाम पर जेब हत्याएं हो रही है, वही दूसरी ओर अपने अपने धर्म के झंडे पूरी दुनिया में ठहराए जाने के चक्कर में कई लोगों की हत्याएं की जा रही हैं । क्या हमें यही सिखाते हैं? हमारे घर की लोगों को कष्ट में डालकर हम अपने धर्म की जय जयकार करें । माना कि इस हकीकत को कोई नहीं ठुकरा सकता कि हर इंसान को अपने जीवन का उचित निर्वाह करने के लिए उसके धर्म का होना जरूरी है । हिन्दू आ गए हम अपने जीवन को निर्वाह करने के लिए अपने धर्म को एक गलत तरीके से प्रस्तुत करें तो इसमें कोई संदेह नहीं कि वहाँ धर्म की जगह सिर्फ अधर्म ही होता हूँ । विश्व विरासत में अधर्मी शेष धर्म को मानव धर्म के लिहाज से उपयोग में लाते हैं । तभी हमारा धर्म सही कहलाया जाएगा । इसके बिक्री हैं । हम अपने धर्म का उपयोग अन्य जीवों को कष्ट पहुंचाने के उद्देश्य करते हैं । अब हमारा धर्म उचित नहीं ठहराया जा सकेगा । आज के रोज बदलती हुई दुनिया में धर्म को लोग अपने धंधे के रूप में इस्तेमाल करते नजर आ रहे हैं । यही कारण है कि लोगों में एक दूसरे के धर्मों के प्रति नफरत लगातार बढती नजर आ रहे हैं और लोग एक दूसरे की जान तक लेने को उतारू हैं । आज की स्थिति ये बनी हुई है कि जो फिल्में मानव समाज के मनोरंजन का प्रतीक मानी जाती थी, आज वही फिल्मों ने धर्म को अपने हिस्से में शामिल करके अपना रोजगार बना लिया है तथा लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचाने में कोई कमी कोई कसर नहीं छोडी हैं । अगर बात राजनीति की जाए तो वहाँ भी हमें धर्म की झलक किसी ने किसी रूप में देखी जाती हैं । राजनीति करना जहाँ मानव कल्याण है तो उचित है, वहाँ आज धर्म की झलक हमें दिखाई लेती हैं । कोई अपने धर्म, जाति, वर्ग के कारण बहुमत से सत्ता हासिल करना चाहता है तो कोई अपने धर्म, जाति, वर्ग के काम अनुयायियों की वजह से सत्ता से वंचित हो जाता है । यही कह रहे है कि आज हमारे देश का विकास धीमी गति से हो रहा है । हमारा देश एक धर्म प्रधान देश है और जब तक हम एक दूसरे के धर्मों पर कीचड उछालना बंद नहीं करेंगे, तब तक ऐसा होना तो ऊंची थी हैं । धर्म को यदि हमें एक मानवीय हिसाब से प्रस्तुत नहीं कर सकते हैं तो वहाँ हमारी मूर्खता यही है कि हम ऐसा करके अपने धर्म को बदनाम ही करते हैं । सात हजार अपने देश के विकास में भी बाधा उत्पन्न करते हैं । भारत जैसे बहुधार्मिक देश ने हमें हर धर्म में ऐसे कई समाज मिल जाएंगे, जिन्हें अन्य समाजों से छोटा समझा जाता है । आज अगर हम अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति को अपने घर में ही छोटा समाज मानते हैं, वहाँ हमारी मूर्खता ही सामने आती हैं । जो जीवन ईश्वर ने हमें दिया है, वहीं जीवन अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों को भी तो दिया है । फिर हम ऐसा भेदभाव करके न सिर्फ अपने मानव धर्म की मूर्खता का परिचय दे रहे हैं, बल्कि हम यह भी सिद्ध करते आ रहे हैं कि हम से तो भला जानवर ही अच्छे, जिनका न तो कोई धर्म है और न कोई जाती । अगर हम वास्तव में चाहते हैं कि हमारा ये जीवन लगातार खुशहाली में भी दे और विश्व शांति कायम रहे तो हमें अपनी धार्मिक मान्यताओं का उचित परिचय देना होगा और विश्व के सभी धर्मों को समान दृष्टि से देखना होगा तथा मानव समाज की तथा मानव समाज की इस छुआछूत भरे को रीति को भी मिटाना होगा, तभी दुनिया का विकास संभव हो पाएगा । नहीं तो आज धर्मों के दुष्परिणाम हमारे सामने प्रत्यक्ष रूप से मौजूद ही हैं । धर्म एक प्रकार से वो चीज है जो की हर प्राणी को जीवन जीने की कला सिखाती हैं । आदिकाल से लेकर वर्तमान तक जितनी भी काम होते आए हैं, वो भी कहीं ना कहीं किसी एक धर्म विशेष में बंद कर ही होते आए हैं । चाहे कोई अच्छा काम हो, चाहे कोई पूरा कर हर काम का, किसी ने किसी धर्म से जरूर ही कुछ न कुछ संबंध होता हैं । यदि हम आज कोई अच्छा काम करते हैं तो वहाँ हमारा एक अच्छा धर्म होता है, इसे ठीक विपरी । यदि हम कोई पूरा काम करते हैं तो वहाँ भी हमारा एक धर्म अथर राक्षसी प्रवृत्ति का धन अवश्य ही होता है । धर्म संबंधी मामलों में आज के समय में यदि हम ज्यादा से ज्यादा गहराई में चले जाएँ तो पूरे विश्व में हिंसक घटनाएं तुरंत ही घटित होने लगती हैं । सभी धर्म के लोग अपने अपने धर्म को ही सही ठहराते हुए एक दूसरे पर कीचड उछालने लगते हैं । फिर इसका अंततः यही परिणाम होता है की राजनीति भी धर्मों के मसले में अपनी राय देने लग जाती हैं । राजनीति जब धर्म संबंधी मसलों में की जाने लगती हो तो वहाँ धर्मों की परिचर्चा और भी ज्यादा होने लगती हैं । हर तरफ पूरा का पूरा माहौल गरमाने लग जाता है । इसीलिए ऐसी स्थिति में विश्व शांति कायम रखने के उद्देश्य से यही कहना उचित हो जाता है कि जहाँ धर्म की परिचर्या होने लगे, वहाँ किसी भी प्रकार की राजनीति को बीच में नहीं लाना चाहिए । इसलिए ऐसी स्थिति में विश्व शांति कायम रखने के लिए उस उद्देश्य के लिए यही कहा जाना उचित होगा कि जहाँ धर्मों की परिचर्चा होने लगे, वहाँ किसी भी प्रकार की राजनीति को बीच में नहीं लाना चाहिए । पूरे विश्व में ज्यादा से ज्यादा लोग किसी न किसी धर्म को अवश्य ही मानते हैं । ऐसी स्थिति में हर राजनयिक कई करते होना चाहिए कि कभी भी किसी भी धर्म के ऊपर भडकाऊ किसमें के भाषण नाते इसके ठीक वितरि । ये पूरे मानव समाज की जिम्मेदारी मुख्य रूप से होनी चाहिए कि जब भी कोई राजनीतिज्ञ किसी भी धर्म पर गलत तरीके से अपनी राय दी तो उसकी बातों को नजरअंदाज कर दिया जाए । उस राजनीतिज्ञ का बहिष्कार जरूर किया जाए । धर्मों के ऊपर राजनीति करने वाले राजनीतिज्ञ वास्तव में वह राजनीति ये होते हैं जो कि वोट बैंक वाले सिद्धांतों को अपनाते हैं और एक राजनेता की कुर्सी पर विराजमान होते हैं । राजनीति करने का सिद्धा सा मतलब यही होता है कि सभी लोगों को समान दृष्टि से देखा जाए न कि जाति वर्ग, समुदाय की दृष्टि से देखा जाए । यही एक श्रेष्ठ राजनीति का आदर्श गोल होता है । आज अगर धर्म की को रीतियों के कारण किसी को कोई क्षति पहुंचती है तो ये हमारा कर्तव्य होना चाहिए कि हमें अपने आप में बदलाव लाना होगा । विश्व का कोई भी धर्म खराब नहीं होता, अगर खराब है तो सिर्फ हमारी सोच । धर्म एक और जहाँ इंसान को प्यार के बंधन में मानता है, वहीं दूसरी ओर हमें मानवता का रास्ता वीली खाता है । इसीलिए धर्म सिर्फ इंसानों का ही नहीं होता, अन्य जीव जंतुओं का भी होता है । अगर हम अपने धर्म का ठीक ढंग से अवलोकन करें, कहाँ में किसी भी धर्म में कोई भी पूरी थी दिखाई नहीं देगी । इसीलिए ये कहना उचित ही होगा कि हमारी सोच की कोरी दिया मानव समाज के धर्मों और जातियों की कोरिंथिया बन जाती हैं । आज के समय में धर्मों के कारण बढते अत्याचारों को मद्देनजर रखते हुए अब तक कम से कम हमारे ये जिम्मेदारी होनी चाहिए कि हमें अब अपनी सोच को मानवता भरी सोच में बदल देना चाहिए । तभी इस संसार में हर इंसान के लिए खुशियाँ संभव हो पाएगी ।

Part 5

आप सुन रहे हैं कुछ कोई फिल्म आरजेएम आया के साथ सुनी जब मन चाहे जिम्मेदारी किसकी लेखक, बाली स्तर सी गुज्जर भ्रष्टाचार से भ्रष्टाचार तक धर्म एक प्रकार से वो चीज है जो की हर प्राणी को जीवन जीने की कला सिखाती हैं । आदिकाल से लेकर वर्तमान तक जितनी भी काम होते आए हैं, वो भी कहीं ना कहीं किसी एक धर्म विशेष में बंद कर ही होते आए हैं । चाहे कोई अच्छा काम हो, चाहे कोई पूरा कर हर काम का, किसी ने किसी धर्म से जरूर ही कुछ न कुछ संबंध होता हैं । यदि हम आज कोई अच्छा काम करते हैं तो वहाँ हमारा एक अच्छा धर्म होता है । इससे ठीक विपरीत यदि हम कोई पूरा कर्म करते हैं तो वहाँ भी हमारा एक धर्म अथर, राक्षसी प्रवृत्ति का धन अवश्य ही होता है । धर्म संबंधी मामलों में आज के समय में यदि हम ज्यादा से ज्यादा गहराई में चले जाएँ तो पूरे विश्व में हिंसक घटनाएं तुरंत ही घटित होने लगती हैं । सभी धर्म के लोग अपने अपने धर्म को ही सही ठहराते हुए एक दूसरे पर कीचड उछालने लगते हैं । फिर इसका अंततः यही परिणाम होता है की राजनीति भी धर्मों के मसले में अपनी राय देने लग जाती हैं । राजनीति जब धर्म संबंधी मसलों में की जाने लगती हो तो वहाँ धर्मों की परिचर्चा और भी ज्यादा होने लगती हैं । हर तरफ पूरा का पूरा माहौल गरमाने लग जाता है । इसीलिए ऐसी स्थिति में विश्व शांति कायम रखने के उद्देश्य से यही कहना उचित हो जाता है कि जहाँ धर्म की परिचय दिया होने लगे, वहाँ किसी भी प्रकार की राजनीति को बीच में नहीं लाना चाहिए । इसलिए ऐसी स्थिति में विश्व शांति कायम रखने के लिए उस उद्देश्य के लिए यही कहा जाना उचित होगा कि जहाँ धर्मों की परिचर्चा होने लगे, वहाँ किसी भी प्रकार की राजनीति को बीच में नहीं लाना चाहिए । पूरे विश्व में ज्यादा से ज्यादा लोग किसी ने किसी धर्म को अवश्य ही मानते हैं । ऐसी स्थिति में हर राजनयिक कई करते होना चाहिए कि कभी भी किसी भी धर्म के ऊपर भडकाऊ किसमें के भाषण नाते इसके ठीक वितरि । ये पूरे मानव समाज की जिम्मेदारी मुख्य रूप से होनी चाहिए कि जब भी कोई राजनीतिज्ञ किसी भी धर्म पर गलत तरीके से अपनी राय दी तो उसकी बातों को नजरअंदाज कर दिया जाए । उस राजनीतिज्ञ का बहिष्कार जरूर किया जाए । धर्मों के ऊपर राजनीति करने वाले राजनीतिज्ञ वास्तव में वह राजनीति ये होते हैं जो कि वोट बैंक वाले सिद्धांतों को अपनाते हैं और एक राजनेता की कुर्सी पर विराजमान होते हैं । राजनीति करने का सिद्धा सा मतलब यही होता है कि सभी लोगों को समान दृष्टि से देखा जाए न कि जाति वर्ग, समुदाय के लिए दृष्टि से देखा जाए । यही एक श्रेष्ठ राजनीति का आदर्श गोल होता है । आज अगर धर्म की को रीतियों के कारण किसी को कोई क्षति पहुंचती है तो ये हमारा कर्तव्य होना चाहिए कि हमें अपने आप में बदलाव लाना होगा । विश्व का कोई भी धर्म खराब नहीं होता, अगर खराब है तो सिर्फ हमारी सोच । धर्म एक और जहाँ इंसान को प्यार के बंधन में मानता है वहीं दूसरी ओर हमें मानवता का रास्ता भी ली खाता है । इसीलिए धर्म सिर्फ इंसानों का ही नहीं होता, अन्य जीव जंतुओं का भी होता है । अगर हम अपने धर्म का ठीक ढंग से अवलोकन करें, कहाँ में किसी भी धर्म में कोई भी पूरी थी दिखाई नहीं देगी । इसीलिए ये कहना उचित ही होगा कि हमारी सोच की को रीतियां मानव समाज के धर्मों और जातियों की कोरिंथिया बन जाती हैं । आज के समय में धर्मों के कारण बढते अत्याचारों को मद्देनजर रखते हुए अब तक कम से कम हमारे ये जिम्मेदारी होनी ही चाहिए कि हमें अब अपनी सोच को मानवता भरी सोच में बदल देना चाहिए । तभी इस संसार में हर इंसान के लिए खुशियाँ संभव हो पाएगी । भ्रष्टाचार मान लो, आज के समय तक कडवा यथार्थ हैं या फिर आज के समय की मांग हैं । सरकारी अस्पताल हो या प्राइवेट अस्पताल का दिल्ली वीरू जो पट्टी हो या सांसद का वातानुकूलित कक्ष, शिक्षा ग्रहण करने वाला विद्यार्थी हो । चाहे शिक्षा देने वाला शीर्षक हो, गंगा का पवित्र जल हो, चाहे क्षीर समुद्र का खारा पानी, मानव हर तरफ भ्रष्टाचार का नारा ही गूंजता रहा हो । ऐसा है कुछ वर्तमान में हर किसी को प्रतीक हो रहा है क्योंकि इससे आज कोई भी अछूता नहीं रहा है । सरकारी कर्मचारी से लेकर निजी व्यवसाय तक हाईकोई भ्रष्टाचार में लिप्त थी नजर आता है । अब सवाल यह उठता है कि जब हर कोई भ्रष्टाचारी है, चाहे सरकारी कर्मचारी हो, चाहे निजी व्यवसाय हो तो फिर भ्रष्टाचार की मार झेल कौन रहा है? अगर हम इसके उत्तर के रूप में कहें कि भ्रष्टाचार की मार आम जनता झेल रही हैं, तब भी हम कहीं न कहीं गलत साबित हो सकते हैं । अगर आम जनता भ्रष्टाचार की मार झेलती रही होती है । फिर तो कहीं ना कहीं से तो भ्रष्टाचार की आवाज सकती, लेकिन यहाँ पर सब कुछ स् इंसान भरी स्थिति में नजर आता है । मानो ईश्वर नहीं तो सबका गूंगा बना दिया है या थे । भ्रष्टाचार की मार झेलने वाला ही खुद भ्रष्टाचारी है । ऐसा ही कुछ आज प्रतीत हो रहा है । फिर ये कैसे कह सकते हैं कि आम जनता भ्रष्टाचार को जेल रही हैं? ऐसी स्थिति में तो फिर यही कहा जाना चाहिए कि न तो कहीं भ्रष्टाचार है, न कहीं भ्रष्टाचारी हैं । अगर कुछ है तो बस यही है कि हम भ्रष्टाचार का नारा लगाकर यूँ ही देश की छवि खराब करने पर उतारू हो रहे हैं । अब सोच तो वहाँ और अधिक होने लगता है, जब विश्व मंच पर भ्रष्टाचार की सूची में विश्वगुरु कहलानेवाले भारत का नाम भी दिखाई देने रहता है । ऐसी स्थिति में तो हमारी ऐसे बुरी स्थिति हो जाती है कि हम चाहते हुए भी भ्रष्टाचार संबंधी बातें किसी अन्य देश के नागरिक से नहीं कह सकते, क्योंकि हम विश्वगुरु में निवास करने वाले नागरिक है और भ्रष्टाचार की सूची में हमारे भारत देश का जो नाम जुडा है, आज भारत की स्थिति है । जो भी हो, चाहे रिश्वत देने वाला भ्रष्टाचारी हो या फिर रिश्वत लेने वाला भ्रष्टाचारी हो, हमें से कोई फर्क पडता हो चाहे न पडता हो, लेकिन भारत की भ्रष्टाचारी हालत जब अन्य देश के लोग देखते हैं तब जरूरी भारत नामक शख्स पर बहुत ज्यादा फर्क पडता होगा । क्योंकि भारत जब की छवि पूरे विश्व में विश्वगुरु के नाम से दर्ज है, ऐसी स्थिति में अन्य देश यही सोचते होंगे कि भ्रष्टाचार जब स्वयं भारत में हो रहा है, फिर हमें भी इस मार्ग पर चलना होगा । इस में हमें कोई संकोच नहीं करना चाहिए । इनकी भारत हमारा गुरु है और गुरु के आदर्श पर चलना हमारा फर्ज है । लोगों को ऐसी बातें मजाक लगती होगी, लेकिन हकीकत यही कहती है कि चाहे मानव समाज के उच्च आदर्शों, चाहे विज्ञान का विकास सभी की सफलता का मार्ग भारत की शिक्षा से ही संभव हो सकता है । फिर अगर विश्व के कोई देशों में यदि भ्रष्टाचार है तो उनसे हमें कोई शिकायत नहीं होनी चाहिए, क्योंकि उन्हें शिक्षा देने वाले हम सभी भारतवासी हैं । अगर हम चाहते हैं कि विश्व मंच पर भ्रष्टाचार बंद हो जाए तो ये काम बहुत ही आसान है । अगर हम भ्रष्टाचार बंद कर दें तो पूरा विश्व भ्रष्टाचार से मुक्ति पा जाएगा क्योंकि हम विश्वगुरु ठहरे जब रश टाचार से मुक्ति पा सकता है क्योंकि हम जो आदर्श तथा जो शिक्षा हम विश्व को देंगे वहीं शिक्षा पूरा विश्व ग्रहण करेगा । एक बहुत पुरानी कहावत इस प्रकार से हैं कि अगर एक तालाब में एक गंदी मछली हो तो वह पूरे तालाब को गंदा कर देती है । मान कर चलिए अगर तालाब की सारी मछलियां मिलकर उस गंदी मछली को ही तालाब से बाहर निकाल दी तो कैसा रहेगा । निश्चित ही पूरा का पूरा तालाब ही गन्ना होने से बच जाएगा । यही कहना उचित होगा ना, लेकिन बाद यही तक सीमित नहीं है । अगर एक मछली पूरे तालाब को गंदा कर सकती हैं तो इसका सीधा सा मतलब यही हुआ कि ताला के अन्य मछलियों को भी उससे कोई परेज नहीं और सारी मछलियां एक गंदी मछली का साथ देने के लिए तैयार है । तभी तो तालाब गन्ना हो रहा है ना और सहयोग भी पूरा मिल रहा है । ऐसी स्थिति में यही कहना उचित होगा की अगर बुराई से किसी को कोई आपत्ति ही नहीं है तो सभी बुराई से सहमती होंगे क्योंकि बुराई कितनी भी बडी क्यों न हो उसे सिर्फ एक छोटी सी अच्छाई ही मिटा सकती है । अगर मैं जरूरी ऐसी सोच में पड गए होंगे कि जब छोटी सी सच्चाई तथा अच्छाई की किरण बडी से बडी बुराई को मिटा सकती है तो फिर ये भ्रष्टाचार, रूपये बुराई अभी तक मीडिया क्यों नहीं? क्या कोई भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वाला है ही नहीं? अब यदि हम ये कहें कि कई बार तो भारत में भ्रष्टाचार के खेला आवाज उठाई गई थी, फिर भी भ्रष्टाचार क्यों नहीं मिलता? लेकिन अफसोस यही है कि इतनी आवाजें भ्रष्टाचार के खिलाफ उठी और उसका परिणाम आज क्या हुआ? भ्रष्टाचार कम तो नहीं हुआ लेकिन बढा जरूर । फिर क्या उन उठने वाली आवाजों में सच्चाई नहीं थी? या फिर वह सब एक विज्ञापन ही था? यही प्रश्न हमारे मन में बोल सकता है । जब बडी से बडी बुराई एक छोटी सी छोटी अच्छाई की किलकारी से मिल सकती है । तब फिर ये भ्रष्टाचार तो फिर ये भ्रष्टाचार इतनी आवाजें उठने के बाद भी क्यों नहीं रहा? यही तो चिंता का विषय है कि किसी बीमारी का जब इलाज किया जा रहा हो और वो बीमारी ठीक होने की बजाय और भी ज्यादा बढने लगती है । एक और जहां भारत सरकार भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए करोडों रुपये दाब रही है वहीं दूसरी ओर भ्रष्टाचार और भी ज्यादा अमीर हो रहा है । ऐसी स्थिति में यही कहा जा सकता है कि क्या भारत सरकार को अपने सर्वे में ये नहीं देखता कि भ्रष्टाचार बढ रहा है या घट रहा है क्योंकि इतना धन बेवजह भ्रष्टाचार रोकने के नाम पर व्यय किया जा रहा है । अगर यही तरीका सही है तो फिर ये विश्वास करना ही पडेगा की इस तरह भ्रष्टाचार मिलने वाला नहीं है लेकिन भारत जरूर मिल जाएगा । अगर हम आदिकाल या प्राचीनकाल के समय के मनीषियों की बात करें तो हम पाएंगे कि उस समय भ्रष्टाचार का नाम तो कोई जानता ही नहीं था और ना ही कोई पहचानता था । असल में उस समय के मानव की सभ्यता सिर्फ मनुष्य के नैतिक मूल्यों पर आधारित थी और नैतिकता उनकी पहचान हुआ करती थी । यही कारण था कि प्राचीनकाल में न तो कोई भ्रष्टाचार था और न ही अन्य प्रकार की कोई कोरी दिया थी । अगर हम भ्रष्टाचार पर थोडा सा गौर करें तो हम पाएंगे कि जब मनुष्य को आवश्यकता से अधिक धन अर्जित करने की लत लग जाती हैं तब वहाँ मनुष्य अपने आचारों का उल्लंघन करने लगता है और उसकी बेईमान एसे धन अर्जित करने की लत भ्रष्टाचार कहलाने लगती है । वहाँ नैतिकता का तो कोई मूल्य ही नहीं रह जाता । ऐसी स्थिति में नैतिकता का झाड होने लग जाता है । वैसे भी इंसान के हिरदय रुपये मंदिर में सिर्फ एक ही चीज रह सकती है या तो अच्छाई या फिर बुराई एक रिश्वत लेने वाला व्यक्ति । ये ठीक तरह से जानता है कि मैं रिश्वत लेकर गलत काम कर रहा हूँ । लेकिन वह चाहते हुए भी वहाँ कुछ नहीं कर सकता है क्योंकि उसने अपने दिल और दिमाग में भ्रष्टाचार नामक बुराई को जस्थान दे कर रखा है । ठीक इसी तरह रिश्वत देने वाला भी सब कुछ जानते हुए भ्रष्टाचार की सूली चढ जाता है । यही कारण है कि भ्रष्टाचार ने आज अपने पैर हर तरफ फैला रखे हैं । उदाहरण के तौर पर अगर हम अपने देश का रुपया गैरकानूनी रूप से स्विस बैंक में जमा कर सकते हैं तो वह काला धन रूपी भ्रष्टाचार हुआ और अगर हम व्यापारी हैं तथा हम अपने उत्पाद एमआरपी से अधिक मूल्य पर बेचते हैं तब भी हम भ्रष्टाचारी लिस्ट में ही शामिल हुए । कहने का तात्पर्य यही है कि गैर जिम्मेदारी से कमाया गया धन भ्रष्टाचार ही कहलाता है । यही कारण है कि आज भ्रष्टाचार की मैं नीजि व्यवसायी से लेकर सरकारी दफ्तर तक आती हैं और इसका कान जिम्मेदार नहीं है । इसके बारे में किसी को कुछ अच्छे भी पता नहीं है । ये आज की एक कडवी हकीकत है । किसी भी देश को ठीक से संचालित करने के लिए वहाँ की शासन प्रणाली अति महत्वपूर्ण मानी जाती है । लेकिन जब शासन प्रणाली ही भ्रष्टाचार में लिप्त हो जाए तो वहाँ या तो सरकार भ्रष्टाचारी हैं या फिर जनता । यही कहना उचित होगा इसके कई प्रत्यक्ष उदाहरण ना में देखने को मिलते हैं । जब रेलवे स्टेशन पर हम टिकट लेने जाते हैं और हमारा टिकट अगर नौ रुपये का है । हाँ, वो टिकट अधिकतर स्थिति में निश्चित थे । दस रुपये में मिलता है ऐसी स्थिति में अगर टिकट काटने वाला भ्रष्टाचारी है और वो हम से एक रूपया खुलने न कहने के कारण बहाना बनाकर वापस नहीं करता तो हम भी अपनी शान के खाती एक रूपया उससे वापस नहीं मांग लेती । हम सोचते हैं कि एक रुपये से हमें कौन सफर पडने वाला है । एक रुपया तो हम भी कार्य को विधान देते हैं । यहाँ दो बाते सामने आ जाती हैं । पहले तो ये के टिकट काटने वाला सरकारी कर्मचारी तो भ्रष्टाचारी है ही साथ में दूसरी तरफ हमने और उसके हौसलों को पंख लगा दिए हैं ताकि वह एक रुपया हर इंसान से रोजाना लेकर एक दिन में हजार रूपये गैर जिम्मेदारी से कम मानसकि । अब हम के हैं कि भ्रष्टाचार बहुत ज्यादा है तो क्या हम सही है? ऐसी स्थिति में हम सरकारी कर्मचारी को भ्रष्टाचारी कहेंगे या फिर अपने आप को इसका जवाब शायद ही किसी के पास हो सकता है । हमें अपनी जिम्मेदारी का अंदाजा तो उस समय भी लग जाता है जब रेलवे स्टेशन पर मिलने वाली उदाहरण के रूप में आठ रुपये की चाय हम बिना संकोच दस रुपये में खरीदी लेते हैं थे । ऐसी स्थिति में हम ये कैसे कह सकते हैं कि सामने वाला भ्रष्टाचार पहला रहा है । हमारा भी उसमें शामिल होना नहीं है । अगर हम जो चीज नौ रुपये की है उसको केवल नौ रुपये में ही खरीद रहे हैं तथा दस रुपये देने के बाद हम सामने वाले से एक रुपया मांग भी रहे हैं । तब जरूर ही हम ये कह सकते हैं कि हाँ भ्रष्टाचार अब नहीं है । कहने का सीधा सा मतलब यही है कि अगर सामने वाला भ्रष्टाचारी है और अगर हम अपनी जिम्मेदारी ठीक तरह से निभा रहे हैं तो फिर वहाँ भ्रष्टाचार यानी कि भ्रष्ट आचार नहीं होता । वहाँ तो सिर्फ हमारी जिम्मेदारी ही दिखाई देती है । अगर भ्रष्टाचारी भ्रष्टाचार फैलाने की सोचता है, वो कहीं न कहीं हमारी लापरवाही को नजर अंदाज करते हुए ही सोचता है । जब तक हम ढोल में ढंग का नहीं मारते तब तक ढोल की आवाज भी नहीं आती थी । इसी तरह से यहाँ ढोल का संबंध भ्रष्टाचारी से हैं और हमारा संबंध डंग कैसे हैं? जब हम अपनी जिम्मेदारी ठीक से निभाएंगे तभी भ्रष्टाचार मिक सकेगा वरना ढोल में ढंग का पडता रहेगा और भ्रष्टाचार यु ही बढता रहेगा । सरकारी कर्मचारी चाहे छोटा हो या फिर बडा, ये सभी की जिम्मेदारी बनती है कि वे अपना उत्तरदायित्व थी, ढंग से निभाएं ताकि हमारे देश में आने वाले विदेशी पर्यटकों को लगे कि वास्तव में भारत महान है, अगर मान कर चलिए हम सरकारी कर्मचारी हैं और ये भी हम अपनी जिम्मेदारी का ठीक ढंग से निर्वाह कर रहे हैं तो निश्चित थी भारत में न तो भ्रष्टाचार रहेगा, अन्ना ही भ्रष्टाचारी रहेंगे । असल में बात यही है कि जब तक हमारा शासन अपनी जिम्मेदारी थी, तरह से नहीं निभाएगा तो फिर आम जनता तो नियम तो रही या थे । इसके विपरी आम जनता चाहे तो वह भी भ्रष्टाचार को मिल जा सकती है । बस जरूरत है तो सभी को अपनी अपनी जिम्मेदारियों को ठीक तरह से निभाने की । जब तक चालीस ताली नहीं बचेगी तब तक आवासी उत्पन्न नहीं होगी । वैसे ही भ्रष्टाचार की समस्या के समाधान के लिए कोई वैज्ञानिक तरीका तो है ही नहीं । नहीं हो सकता है कि भ्रष्टाचार एक प्रकार से नैतिकता पर आधारित होता है या फिर हम ये कहें कि हमारी मानवता ही भ्रष्टाचार को परिभाषित करती हैं । अगर हमारी मानवता अच्छी है तो फिर भ्रष्टाचार है ही नहीं । आज अगर हम भ्रष्टाचार संबंधी वार्ताएं करते हैं तो हम बडे आश्चर्य में ही पढते हैं कि ऐसा कल योगी भ्रष्टाचार शायद ही कभी उत्पन्न हुआ होगा । हम भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जितनी भी वार्ता करना चाहे उतनी ही कम है । क्योंकि आज तो सभी जगह भ्रष्टाचार है । चाहे राजनीति हो, शासन प्रशासन व्यवस्था हो, रेलबस, परिवहन, अस्पताल, कोर्ट कचेहरी हो, पुलिस मुक्तिधाम, शराब का ठेका व्यवसाई चाहे स्कूल ही क्यों न हो, हर तरफ भ्रष्टाचार रूपी दानव मौजूद हैं । शायद यही वजह रही होगी कि कभी कभी मीडिया और फिल्मों का सेंसर बोर्ड भी इससे पीडित नजर आता है । अगर किसी एक जगह भ्रष्टाचार हो तो हम उसका समाधान में निकाल सके । लेकिन यहाँ तो आपको छह भ्रष्टाचाररोधी हैं और तौर जिस मंच विशेष पर भ्रष्टाचार रूपी वार्ता हो रही होती है वह मंच मीटर भ्रष्टाचार से पीडित नजर आता है । फिर हम बच कहाँ जाते हैं और फिर कैसे इस भ्रष्टाचार, रुपये दानों का नाज कर पाएंगे? जब हर तरफ ये मौजूद हैं जिसमें आज मानवता तक का नाश कर दिया हो, उसका तो सिर्फ एक ही उपाय है कि हमें अपने विचारों को बदलना होगा तथा आवश्यकता से अधिक धन अर्जित करने की अपनी प्रवृत्ति को त्यागना होगा और मानवता तथा नैतिकता के गुणों को अपने हिरदय में लाना होगा । तब जाकर भ्रष्टाचार रूपी दानव देश और दुनिया को छोड पाएगा । अन्यथा ये आज इतना क्रूर बन चुका है कि इसके कारण कोई भूख खर्च होता है तो कोई निर्दोष होते हुए भी अपराधी बन जाता है । कोई आठ आठ होता है तो कोई भारत नामक शब्द पर सस्ता है । अगर हम चाहते हैं कि पूरा विश्व इससे स्वतंत्र हो जाए तो सबसे पहले हमें इसे मिटाने की शुरूआत करनी होगी और ये शुरुआत अपने देश यानि कि भारत देश से ही करनी होगी क्योंकि भारत आज खुद इससे बहुत पीडित है तो फिर बाकी देश तक पीडित है ही । अगर भारत भ्रष्टाचार से मुक्त हो जाएगा तो आप निश्चित ही मानी कि पूरा विश्व इससे मुक्त हो जाएगा क्योंकि दुनिया भारत के आदर्शों पर चलती हैं । अगर हम बुरे हैं तो दुनिया भी पूरी होगी । अगर हम सही है तो दुनिया भी सही ही होगी । भला हम विश्वगुरु जब है ।

Part 6

आप सुन रहे हैं कुक ऍम आरजे मायके साथ सिने जब मन चाहे जिम्मेदारी किसकी लेखक बाली स्तर सी घुल जाए अस्तित्व खोती राजनीति आज भ्रष्टाचार की समस्या से हर कोई भली भांति परिचित है कि किस तरह से ये अपना काला जादू हर तरफ भी खेल रहा है तथा देश को बदनाम करने पर उतारू है । भ्रष्टाचार का निष्कर्ष यही निकल कर आता है कि जब तक हम भ्रष्टाचार के प्रति जागरूक नहीं होंगे तब तक ये मिट्टी भी नहीं सकता है । इसीलिए ये हमारा कर्तव्य होना चाहिए कि हमें अब भ्रष्टाचार के खिलाफ जागरूक बनना ही पडेगा तथा अपनी मानवता को एक अलग ही ढंग से प्रस्तुत करना होगा । जब नेता को चुनने के लिए वोटिंग मशीन का इस्तेमाल किया जा सकता है तो फिर नेता को हटाने के लिए वोटिंग मशीन का इस्तेमाल क्यों नहीं किया जा सकता? पंद्रह अगस्त उन्नीस सौ सैंतालीस के पहले भी भारत स्वतंत्र और विशाल राष्ट्र था । भारत का दुर्भाग्य तब और ज्यादा बढने लगा जब भारत को पाकिस्तान, बांग्लादेश सहित कई अलग अलग हिस्सों में बांट दिया गया और भारत की पवित्र भूमि को अत्याचार करने के लिए स्वतंत्र कर दिया गया तथा हिंदुस्तान वाले हिस्से को वहीं की वहीं अस्तित्व के रूप में रहने दिया गया । आज इसका परिणाम यही हुआ की धरती का स्वर्ग कहा जाने वाला कश्मीर भी नारकीय हालात में वर्तमान स्वरूप हमारे सामने हैं । भारत की पवित्र भूमि कश्मीर का एक हिस्सा भारत के पास है तो कुछ हिस्सा पाकिस्तान के पास भी है । अब तो स्थिति यह है कि चीन ने भी कश्मीर का थोडा सा हिस्सा अपने कब्जे में कर लिया है । ऐसी स्थिति में हम कैसे कह सकते हैं कि पंद्रह अगस्त उन्नीस सौ सैंतालीस के बाद से ही हम पूर्ण स्वतंत्र हुए हैं जबकि हमारी भारत माता तो आज भी गुलामी की बेडियों में जकडी हुई है । जब हमारी धरती मा गुलामी की मार झेल रही हो, हमारा स्वर्ग नर्क भरी स्थितियों से जूझ रहा हो तब तो हम कहीं से कहीं तक भी स्वतंत्र नहीं हुए ना बस हमारी मानसिकता ही यह प्रदर्शित करती है कि हम सिर्फ मुगलों और अंग्रेजों से तो आजाद हो गए न कि राजनीति की गुलामी से । आज ये राजनीति का परिणाम ही तो हैं कि हम स्वतंत्र रहते हुए भी मुश्किलों और अंग्रेजी शासकों की गुलामी के हत्थे चढे हुए हैं और हमारा देश कई हिस्सों में बटा हुआ है । फिर हमारे मन को ढांढस बंधाने के लिए पंद्रह अगस्त उन्नीस सौ सैंतालीस का दिन स्वतंत्रता के रूप में मनाया जाने लगा । बडी विडंबना की बात है ये की दुनिया को शिक्षा का पाठ पढाने वाले भारतवासियों ने गुलामी की मार झेली और जिन लोगों ने हमसे शिक्षा ग्रहण की उन्ही ने हम पर अत्याचार किये । असल में भारत का विश्व गुरू कहलाना इस और इशारा करता है कि सर्वप्रथम शिक्षा तथा मानवता का विकास भारत में ही तो हुआ था । इसका शाखा साथ उदाहरण हमें हिन्दू धर्म से सीखने को मिलता है । देखने को मिलता है कि तीनों लोगों के स्वामी भगवान शिव शंकर जी ने इस सृष्टि का निर्माण किया तथा शिक्षा की जनानी मा सरस्वती जी ने मानव के मन मस्तिष्क का निर्माण किया । यही कारण है कि शिक्षा सबसे पहले भारतवासियों ने ही ग्रहण की थी और बाद में शिक्षा का विकास संपूर्ण जगत भर में हुआ । असल में वही शिक्षा ही सर्वोपरि मानी जाती है जो एक इंसान से दूसरे इंसान तक पहुंचे । यही वजह थी कि सबसे पहले शिक्षा का उदय भारत में हुआ था । फिर बाद में भारतवासियों के द्वारा अन्य देशों में भी शिक्षा का क्रम जारी रहा । इस प्रकार भारत की प्रेरणा से आज तक संपूर्ण जगत अपनी मानवता को पहचान पाया और विज्ञान तक का विकास आज हमारे सामने मौजूद है । अब जब हमें मालूम पडने लगा है कि भारत सैंकडों वर्षों से गुलामी की मार झेल रहा है और आज तक भी थोडा दुख का होना तो सामान्य सी बात है । फर्क सिर्फ इतना है कि आज से लगभग सत्तर साल पहले हम गुलाम थे लेकिन जब हम आजाद हुए तो हमारी भारत माँ तो आज भी गुलामी की मार झेल ही तो रही है । हो न हो गुलामी की इस जंग में हमारी राजनीति का जब महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है वह शायद ही किसी अन्य भूमिका कर रहा हूँ । यही कहना उचित होगा क्योंकि भारत की शासन व्यवस्था शुरू से ही राजनीति के रूप में ही रही है । प्राचीन समय में राजा शासन किया करता था तो आज प्रधानमंत्री शासन किया करते हैं । राजनीति की जिम्मेदारी एक और जहां अपने धर्म संस्कारों की और संकेत करती है, वहीं दूसरी ओर अपने कर्तव्यों का पालन करने की और भी इशारा करती हैं । यानी की जब तक कोई भी राजा या शासक चाहे प्राचीन हो या आधुनिक, अगर वह ठीक ढंग से अपने उत्तरदायित्वों को नहीं घाटा है, तभी तक उसकी प्रभुसत्ता और राज्य की शान बनी रहती हैं । लेकिन जब शासक अपने मार्ग का निर्वाह ठीक ढंग से नहीं करता तब उसका और उसकी प्रजा दोनों का अस्तित्व खतरे में पड जाता है । यही कारण तो आज भारत को ले ढूंढ रहा है । एक और हमारा धन अंग्रेजों और मुगलों द्वारा जमकर लोटा गया । वहीं दूसरी ओर भारत आज भी गुलाम का गुलाम ये रहा । आज स्थिति यह है कि भारत की सत्ता उनतीस राज्यों के रूप में बंटी हुई हैं और इसका मुख्यबिंदु भारत की राजधानी कही जाने वाली नई दिल्ली हैं । उनतीस राज्य में अलग अलग शासन करने वाले मुख्यमंत्रियों के अलावा सात केंद्रशासित प्रदेश भी आज हमें भारत में देखने को मिलते हैं । इसी कारण आज भारत का कहीं कहीं विकास नजर आता है, हर जगह नहीं । वजह है तो वह सिर्फ एक ही और वह भारत के अनेको राजनयिक दल और उनका अलग अलग समर्थन करने वाली भारत की जनता । अगर हम भारत का सबसे प्राचीन इतिहास उठाकर देखिए तो हम पाएंगे कि पहले तो राजा हुआ करते थे, वंश प्रधान हुआ करते थे और जनता भी उनका समर्थन किया करती थी क्योंकि राज प्रधान वरिष् उसी सदस्य को राज अधिकार देता था, जनता के हितों की सुरक्षा कर सके ऐसी स्थिति में प्राचीन राजनीति देश, धर्म और प्रजा के हितों की रक्षा करने वाली मानी जाती थी लेकिन आज की परिस्थिति थोडा हटकर नजर आती है । वर्तमान की राजनीति में या तो राजनेता अपनी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभा पा रहा होता या फिर उसे चुनने वाली जनता । ये दोनों ही मत इस और इशारा करते हैं कि जब जनता दवारा शासक चुना जा सकता है तो हटाया भी तो जा सकता है । अगर ऐसा होता भी है तो वो भी पांच साल बाद । हमारे मन में एक ही शंकर रहती है कि अगर हम ने एक बार नेता को चुन लिया तो अगले पांच सालों तक ही पदस्थ रहेगा । यही वजह है कि वर्तमान की जनता अपने राजनीति की के प्रति लापरवाह होती जा रही है और राजनीतिज्ञ अपनी मर्जी से चाहे जैसे मनचाहा शासन किया करते हैं फिर चाहे वह शासन जनहित में हूँ चाहे न हो । आज का शासक अगर अपनी जिम्मेदारी ठीक से निभा पाने में असमर्थ है तो हमें अपनी जिम्मेदारी तो कम से कम ठीक से निभानी आने ही चाहिए । वर्तमान में राजनीति सिर्फ एक लुभावने विज्ञापन और पैकेजों में ही सिमट कर रह गई है और पैकेजिस में ही सिमट कर रह गई हैं । कोई चुनावी मैदान में शराब बांटता है तो कोई लोई और कम्बल । कोई पैसे के दम पर जनता को लुभाता है तो कोई अंग घोटा चाप होने की दम पर चुनावी जंग में उत्तर चाहता है । हर तरह चुनावी माहौल में लाउडस्पीकर तो इस तरह से बचते हैं कि मानव रामराज्य का बिगुल बज रहा हो और स्वयं भगवान ही मानव अपनी जीत का शंखनाद कर रहे हो । लेकिन होता क्या है? होता यही है कि पहले हम एक स्मार्ट से चेहरे को वोट दे देते हैं, फिर अपने पछतावे पर रोने लगते हैं । हमें इतना भी एहसास नहीं होता कि सामने वाला प्रत्याशी अगर एक बार जांच नीति की कुर्सी पर विराजमान हो गया तो जितने पैसे उसने चुनावी मैदान में उडाये हैं और जितना ज्ञान उसने हमें चुनावी सभा में दिया है उससे कई ज्यादा धन वो हमसे ऐक्ने की हिम्मत रखता है । हम लगातार अपना और अपने देश का झाड करने में कोई कमी और कोई कसर नहीं छोड रहे हैं । यदि प्रत्याशी अंगूठा टेक और ये लुभावने विज्ञापन कर भी रहा है तो भी हम न तो उसका विरोधी कर पाते हैं और न ही उसका त्याग कर पाते हैं । यही कारण है कि जनता और राजनयिकों की वजह से राजनीति अपना अस्तित्व होती जा रही है । यही आज का कडवा सत्य हैं । इसके सिवाय और कुछ भी नहीं । आज हम अगर ईमानदार राजनेता को अपनी भी एक बुड्ढी का इस्तेमाल करते हुए चुन भी लेते हैं तो विपक्षी दल उसको शासन करने में अडंगा लगाने में कोई कसर नहीं छोड दे और हम विपक्षी दलों का विरोध तक नहीं कर पाते । जिन दलों को जनता पहले ही निष्कासित कर चुकी होती है, वहीं दल जनता द्वारा चुने गए दल पर राजनीति आरोप लगाते नजर आते हैं । वर्तमान में सांसदों की भी सभा में लाख घूसे चलना जैसे आम बात हो गई है । इन्हें लेकर तो ऐसे ही लगता है मानव पक्ष और विपक्ष दोनों ही देश का विकास करना चाहते हो । फिर सवाल यह भी उठता है कि गत सभी दल देश का विकास करना चाहते हैं तो फिर पक्ष विपक्ष का भेद भाव मिट क्यों नहीं जाता? क्योंकि सर्वे दल जनता को गुमराह किए जा रहे हैं । अगर सभी दलों का नारा देश का विकास करना ही है तो सभी दल मिलकर क्यों नहीं काम करते और क्यों नहीं देश का विकास करते हैं? चलो आखिर ये सब तो राजनयिक संबंधी बातें हैं । हमें इस से क्या लेना देना? अगर हमें लेना देना ही है तो सिर्फ अपने देश से हैं । इसलिए अगर हम चाहे तो कोई भी सत्ता तुरंत ही बन सकती है और हम चाहे तो तुरंत मीटिंग भी सकती हैं क्योंकि ये सब तो हमारे हाथ में ही तो होता है । बस अगर जरूरत है तो सिर्फ अपने देश के प्रति जिम्मेदार नागरिक बनने की । हमें ये बिल्कुल भी नहीं बोलना चाहिए कि अगर हम नेता को चुनने के लिए वोटिंग मशीन का इस्तेमाल कर सकते हैं तो फिर नेता को हटाने के लिए भी वोटिंग मशीन का इस्तेमाल किया जा सकता है ।

Part 7

आप सुन रहे हैं कुकू एस एम आर । जे । माया के साथ सुनी मनचाहे जिम्मेदारी किसकी लेखक बाल इस तरह सी गुरचैन बढती सहिष्णुता कितनी सही कितनी गलत? माना कि वर्तमान में किसी देश के विकास में राजनीति महत्वपूर्ण होती हैं किन्तु हकीकत यह भी है कि राजनीति का संचालन भी जनता द्वारा होता है । इसीलिए देश के हर नागरिक की यही जिम्मेदारी होनी चाहिए कि यदि हम अपने देश का विकास चाहते हैं कहाँ मैं उचित राजनीतिज्ञ तथा अपने कर्तव्यों का ठीक तरह से निर्वाह करना होगा । सहिष्णुता को सरलतम रूप से परिभाषित करने का यही तरीका उपयुक्त माना जा सकता है कि जब कई धर्मों की क्रियाएं एक दूसरे द्वारा विरोध करने लगे तब वहाँ सहिष्णुता का जन्म होता है । सहिष्णुता नामक शब्द का प्रयोग वर्तमान में जिस तरीके से किया जा रहा है, उससे यही अंदाजा लगाया जा सकता है कि आगे चलकर सहिष्णुता का पाठ विद्यार्थियों को भी पढाया जाने लगेगा । सहिष्णुता ने आज जिस तरीके से अपना कारनामा विश्व में दिखाया है, उससे किसी का भला तो होने वाला ही नहीं है । जहाँ तक संभव हो सकता है, इसके दुष्परिणाम ही हमें देखने को मिल सकते हैं । बाकी सब तो जो हो रहा है वह सही भी तो नहीं है । सहिष्णुता का नाम शायद ही पहले कभी हमने सुना हो किन्तु आज के प्रमुख मुद्दों में सहिष्णुता को शामिल करना इस और इशारा करता है कि विश्व में उत्पन्न होने वाली अनेक समस्याओं में से सहिष्णुता भी एक समस्या हैं । वैसे तो सहिष्णुता उत्पन्न होने के कई कारण हो सकते हैं लेकिन जो सहिष्णुता हमें वर्तमान में धर्म के नाम पर देखने को मिल रही है उसका कारण तो फिलहाल धारण ही हुआ । कलयुग की प्रमुख समस्याओं में अपना विशेष स्थान ग्रहण करने वाली सहिष्णुता एक और जहाँ मानव समाज को क्षति पहुंचा रही है, वहीं दूसरी ओर इसके दुष्परिणामों से देश तथा धर्म भी अछूता नहीं है । लोगों की धर्म के प्रति बढती गहन आस्था ने आज जब कारनामा मानवता को बदनाम करने के उद्देश्य से सहिष्णुता के रूप में क्या है, वो शायद ही किसी दानों ने भी क्या होगा? यही कहना उचित होगा कि जब हमारे धर्म के प्रति आस्था किसी अन्य धर्म का अपमान करने लगे तब वहाँ सहिष्णुता का माहौल उपजता है । अन्यथा अपने अपने धर्मों का सही प्रयोग तो हमें कभी सहिष्णुता किसी देता ही नहीं है । आज के भौतिकतावादी युग में हम अगर धर्मों की बात करते हैं में हर धर्म में ऐसे ही कुछ बातें नजर आएगी जो इससे पहले कभी भी हुई नहीं थी । उदाहरण के तौर पर आठ चाहे हिंदू धर्मों, चाहे मुस्लिम धर्म हो, चाहे इसाई धर्म या फिर सिख धर्मी क्यों ना हो, आज हर तरफ सभी धर्मों के अनुयायी एक दूसरे के धर्मों पर कटाक्ष शुरू पी प्रहार करते नजर आते हैं । कभी तो हर इतनी ज्यादा बढ जाती है कि एक दूसरे के धर्मों के विपरीत क्रियाएं होने लगती है तथा धर्मों का नंगा नाच पूरी दुनिया भले भर्ती देश भी नजर आती हैं । इसी कारण आज हमारे सामने सहिष्णुता, रुपये करन का जन्म मौजूद हैं की किसी तरह से ये संस्कृति का पाठ पढाने वाले सभी धर्मों को बदनामी की आर ले जा रहा है और पूरा मानव समय है इस से सहमत नजर आ रहा है । सहिष्णुता का अंदाजा हम इसी से लगा सकते हैं कि पहले जब धर्मों का माहौल था, अब वह कहीं से कहीं तक अमित दिखाई तक नहीं देता । आज से लगभग सैंकडों वर्ष पूर्व हर धर्म का अपना एक विशेष महत्व हुआ करता था । हर धर्म का अनुयायी जब कोई भी कार्य किया करता था तो वह सभी धर्मों की मान्यताओं को ध्यान में रखकर किया करता था ताकि किसी धर्म को कोई क्षति न पहुंचे । इसीलिए तो उस समय धर्मों का माहौल खुशहाली पैदा किया करता था और सभी धर्मों के विचार एक दूसरे के विचारों से सहमत ही नजर आते थे । किन्तु प्रश्न अब ये खडा होता है कि जब प्राचीन धर्मों में समानता थी तो वर्तमान में वह समानता कहीं क्यों नहीं दिखाई लेती? वह कौन है जिसने सभी धर्मों के नियमों को बदलकर रख दिया है जबकि धर्मों की उत्पत्ति तो एक ही बार हुई है । फिर ये मानवरूपी धर्मों का बदलाव किसने किया? वैश्विक धर्मों की परिचर्चा कई तरीके से सभी लोग क्या करते हैं? किन्तु जब वास्तविक हकीकत है उसे तो हम कहीं से कहीं तक भी नहीं झुठला सकते हैं । जैसे हम जानते हैं कि मानव में सोचने की शक्ति विद्यमान रहती हैं तो इसमें कोई संदेह नहीं । यह शक्ति तो मानव को जन्म से ही मिली होती है । फिर यदि हम कहें कि मानव में सोचने की शक्ति उसके जन्म से न होकर उसके जवान होने पर उसके अस्तित्व में आ जाती है, तब वहाँ हमारी मूर्खता ही तो दिखाई देती हैं । क्योंकि जो चीज प्रारंभ से किसी में विद्यमान होती है, वहां हम उसमें कोई परिवर्तन तो किसी भी हाल में देखी नहीं सकते और कर भी नहीं सकते । यदि परिवर्तन करना भी चाहें तो वहाँ हम अपनी मूर्खता को भी प्रदर्शित करते रहते हैं । ठीक इसी तरह का हाल सभी धर्मों का है । जो चीज यदि किसी धर्म में धर्म उत्पत्ति के समय मौजूद थी और अब यदि उसकी जगह कोई और चीज वहाँ विद्यमान है, तब हम यही कह सकते हैं कि वहाँ अब धर्म की जगह अध्ययन ही हैं । यदि धर्म से जो चीज हटा दी गई हो और अगर वो चीज अच्छी है तथा उसकी जगह कोई बुरी चीज को प्रस्थापित कर दिया जाए, तब तक वहाँ धर्म का कोई महत्व ही नहीं रह जाता । कहने का तात्पर्य यही है कि अगर किसी धर्म में मानवीय आधार पर धर्म के अनुयायियों द्वारा कोई परिवर्तन किया जाए तो वहाँ धर्म अपना अस्तित्व खो बैठता है तथा वहाँ सहिष्णुता नामक चीज अपना स्थान ग्रहण करने लगती हैं । सहिष्णुता एक मायने में ईश्वरीय शब्द नहीं है बल्कि ये ईश्वर को अपमानित करने के उद्देश्य से अपनाया गया शब्द है । सभी धर्मों का पाठ प्राचीन इतिहास में सभी को मानवता का अध्याय पढाता था किन्तु आज जो परिवर्तन हमें कई धर्मों में दिखने लगा है, उससे हम यही अंदाजा लगा सकते हैं कि अब वहाँ मानवता की जगह सहिष्णु होने का पाठ पढाया जा रहा है । यहाँ सबसे पहली बात तो यही उपस्थति है कि यदि धर्मों में परिवर्तन ईश्वर के बिना नहीं किया जा सकता तो फिर आज धार्मिक परिवर्तन उत्पन्न हो रहे हैं । उसका जिम्मेदार कौन है, होना हूँ, ये वही वजह है । जमानत समाज को लगातार कुरीतियों से भर रही हैं और उसके देश धर्म को खंडित करने की साजिश रची जा रही हैं । सहिष्णुता की गूंज हमें आज जिस तरीके से चार और सुनाई दे रही हैं, उसका परिणाम यही तो हो सकता है । उसका परिणाम नहीं हो सकता है कि अगर ये आवाज बंद नहीं हुई तो इसके दुष्परिणाम भी काफी भयंकर साबित हो सकते हैं । इसीलिए अगर हम धर्मों पर सही अध्ययन करके आपसी प्रेम बढाना चाहते हैं तो हमें सबसे पहले अपने धार्मिक कुरीतियों को अपने धर्म से मिटाना होगा । तभी हमारे धर्म का अस्तित्व जिंदा रह सकता है । अन्यथा ये तो हम फिर अच्छी तरह से जानते हैं कि इस पृथ्वी का नियम है कि यहाँ सिर्फ अच्छा धर्म ही रह सकता है । धर्म के लिए इस पृथ्वी जगत में कोई स्थान विशेष नहीं है । इसलिए ये कहना ही उचित है कि अगर हम अपने धर्म की छवि सभी धर्मों में बनाना चाहते हैं तो हमें अपनी धार्मिक विसंगतियों को मिटाना ही होगा । सहिष्णुता और राजनीति संयुक्तता एक और जहाँ किसी भी राष्ट्र को बर्बाद करने के उद्देश्य से पर्याप्त है, वहीं दूसरी ओर यदि सहिष्णुता के ऊपर कोई राजनीति की जाए तो और भी ज्यादा किसी देश को मिटाने के लिए पर्याप्त होती है । आज हम जानते हैं कि इस बहुधार्मिक युग में ज्यादा से ज्यादा लोगों की किसी ने किसी धर्म में जरूर ही गहन आस्था होती हैं और यदि हम इस युग में किसी एक धर्म का साथ देते हैं तो वहाँ तुरंत ही भेदभाव उत्पन्न होने लगता है । फिर अंत में इसका यही परिणाम होता है कि कई धर्मों के अनुयायी आपस में लडते झगडते नजर आते हैं और एक दूसरे पर कीचर उछालकर जरा जरा सी बातों को और भी ज्यादा बढा दिया जाता है । ऐसी तात्कालीन स्थिति में यदि कोई राजनीतिक बयान किसी धर्म के पक्ष में दे दिया जाए तो वहाँ और भी ज्यादा आग भडक नहीं लग जाती हैं तथा पूरा का पूरा माहौल खराब होने में बस चंद सेकेंड्स का समय भी नहीं लगता । वैसे एक हिसाब से यही कहना उचित होगा कि जब कभी भी देश में किसी धार्मिक पहलुओं की बात सामने आये तो किसी भी राजनीति यह को किसी एक धर्म के पक्ष में नहीं बोलना चाहिए । हमेशा ही सभी धर्मों की मान्यताओं को मद्देनजर रखते हुए कोई बयान जारी करना चाहिए । इसकी सबसे बडी वजह यही है कि एक राजनीति ये की आवाज को सारे देश में प्रसारित होने में कोई ज्यादा समय नहीं लगता । ठीक इसी तरह से जितना महत्व आज की जनता एक राजनीतिज्ञ के बयान को देती है, उतना महत्व वह किसी भी चीज को नहीं देती । सहिष्णुता रूपी आंधी में जब भी कोई जंग जनता और राजनीति के बीच में छुट्टी है तो सबसे ज्यादा नुकसान तो जनता को ही होता है ना कि राजनीतिज्ञों । वो तो अपनी कुर्सी पर पूरी सुरक्षा के साथ में बैठा हुआ होता है । बस एक हम लोग ही होते हैं जो कि बेवजह धर्मों के चक्कर में पडकर अपना और अपने अपनों का नुकसान कर रहे होते हैं । जबकि हकीकत में देखा जाए तो यही कहना उचित होगा कि इस संसार का कोई भी धर्म हमें उपद्रवी होने के शिक्षा तो कभी देता ही नहीं । आज अगर किसी कारण वर्ष किसी भी देश में सहिष्णुता उपज उठ है तो ऐसी स्थिति में मानव का परिचय देते हुए हमें मानवता भरी सोच से मानव को समझाना होगा । अभी सहिष्णुता का शांत होना संभव होगा और यदि ऐसी स्थिति में कोई राजनीतिज्ञ सहिष्णुता पर राजनीति कर रहा हो तो हमें उसकी बातों की और ध्यान न देकर उसकी बातों को वोट बैंक वाला सिद्धां समझाते हुए वहीं की वहीं छोड देना चाहिए । इस तरीके से किया गया कार्य ही समझता लोगों का कार्य कहलाता है ।

Part 8

आप सुन रहे हैं कुक वैकेशन आरजेएम आया के साथ सुनी जम्मन चाहे जिम्मेदारी किसकी लेखक बालिस्टर सी गुर जाएगा शिक्षा के साथ में शैक्षणिक व्यापार के बढते कदम एक सही मायने में जो व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी समझता है उसके लिए उसका सबसे बडा धर्म तो देश होता है और बाकी सब तो उसके लिए बाद में आता है । यही हमारा कर्तव्य होना चाहिए कि हम सबसे ज्यादा महत्व अपने देश धर्म को दी । यही वह धर्म होता है जो कि मानव धर्म कहलाता है । यही हमारी जिम्मेदारी होनी चाहिए कि हम अपने धर्म का निर्वाह उस तरीके से करें जिसमें कि देश धर्म को कोई क्षति न पहुंचे । यही हमारा पूर्ण विश्वास होना चाहिए कि अगर हम देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी ठीक से निभाएंगे तो असहिष्णुता का तो नाम और निशान पलभर में मिल जाएगा । शिक्षा मानव वर्तमान में अपने अस्तित्व से न्यूज रही हो, ऐसा ही कुछ आज हमें प्रतीत हो रहा है । जो इमारत एक साल में किसी कंपनी विशेष के लिए हुआ करती थी, आज उन्हें इमारतों में शिक्षा दी जा रही है । गुरुकुल का तो आज के इतिहास में कोई स्थान ही नहीं रहा । हर तरफ कांच की इमारतें हैं, जिनमें महंगी से महंगी कुर्सियां, स्कूल, कॉलेज के बच्चों को लाने ले जाने के लिए वातानुकूलित बस सेवाएं । इन सभी को देखते हुए यही कहा जा सकता है की जो शिक्षा मानव लिहाज से सर्वसुविधायुक्त है वो शिक्षा महंगी तो होगी तो फिर ये सब आम आदमी के बस की तो बात है ही नहीं । ये तो हमें ऐसे कई उदाहरण देखने को मिलता है कि कई गरीब लोग पैसों के अभाव में उचित शिक्षा ग्रहण नहीं कर पाते हो । लेकिन हमें ये भी तो साथ ही साथ देखने को मिलता है कि कई महंगे से महंगे शैक्षणिक संस्थान शिक्षा के पैमाने पर खरे उतरने में जीतना कम होते हैं । प्राचीन इतिहास आज भी यही दोहराता है कि शिक्षा को हमेशा शिक्षा के तौर तरीको के साथ ही देना चाहिए । अपने स्वार्थ हित से दी जाने वाले शिक्षा से आज तक किसी का भी कोई भी वाला नहीं हुआ । न तो शिक्षा देने वाले गुरु का करना ही शिक्षा ग्रहण करने वाले विद्यार्थियों का वास्तव में हकीकत कोई नहीं टुकडा सकता । शिक्षा का स्तर मानव की नैतिकता पर ही निर्भर होता है । जहाँ मानव के नैतिक मूल्यों का झाड होने लगता हो, वहाँ शिक्षा का कोई महत्व रहता ही नहीं है । आधुनिक शिक्षा आज जिन तौर तरीके से दी जा रही है वह नैतिक शिक्षा तो किसी भी हाल में नहीं हो सकती । आज जिस तरह का व्यवहार शिक्षक और विद्यार्थियों के मध्य हमें देखने को मिलता है और नैतिक व्यवहार न होकर आधुनिक शिक्षा का व्यवहार है । अधिकांश मामलों में हम ये पाते हैं कि कई शैक्षणिक संस्थाओं में इतनी हर हो जाती है कि शिक्षक विद्यार्थी के मध्य मार पेट तक की नौबत आ जाती है । इससे यही कहा जा सकता है की जो शिक्षा वास्तव में दी जानी चाहिए अब वो अपना अस्तित्व खो चुकी है । भारत सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद भी आज सरकारी स्कूलों कॉलेजों का शैक्षणिक स्तर और भी ज्यादा नीचे गिरता जा रहा है । इसकी वजह क्या हो सकती है और क्या नहीं, किसी को कुछ भी पता नहीं रहता । हमारी सोच आज सिर्फ निजी स्कूल और कॉलेज की तरफ ही जाती हैं क्योंकि हमने अपनी मानसिकता को उस सांचे में ढालकर रखा है जहाँ हमें लगता है कि प्राइवेट संस्था है, अच्छी शिक्षा देती हैं जबकि एक सही राय से तो यही कहना उचित होगा कि शिक्षा का पैमाना चाहे निजी रूप में अच्छा हो, चाहे सरकारी रूप में हमारा उद्देश्य हमेशा उचित शिक्षा के और ही होना चाहिए । आज शिक्षा का व्यवसायीकरण इतने जोरों पर नजर आता है कि शिक्षा का नाम सुनते ही आम आदमी के तो मानो रोंगटे खडे हो जाते हैं । असल में आज के समय में उच्च शिक्षा सस्ती तो कहीं भी नजर नहीं आती । जहाँ भी देखो उच्च शिक्षा पाने के लिए विद्यार्थियों को बडे बडे विज्ञापनों के सहारे गुमराह किया जाता है, फिर उच्च शिक्षा का महंगी होगी । आज इन्हीं विज्ञापनों के कारण गरीब घर में पैदा होने वाले कई कुशल विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण नहीं कर पाते हैं । इसके ठीक विपरीत अमीर घर में पैदा होने वाले कई विद्यार्थी ऐसे होते हैं जो शिक्षा ग्रहण करने में नाकाम होने के कारण अपनी जान तक दे रहे हैं । ऐसी स्थिति में इस महंगी शिक्षा से किसी को फायदा भी नहीं होता । न तो अमीर वर्ग के विद्यार्थियों को और न ही गरीब वर्ग के विद्यार्थियों को इसके साथ ही चाहते । कुछ हमारी कमियों के कारण भी शिक्षा का पैमाना गिर चुका है और हमने कुशल विद्यार्थीवर्ग को खो भी दिया है । कई मामलों में हमें देखने में ये आता है कि मामा अपने बच्चों को जबरदस्ती शिक्षा ग्रहण करने को मजबूर कर देते हैं । अगर किसी बच्चे की इच्छा प्रशासनिक अधिकारी या फिर कुछ और बनने की होती है तो माँ बाप उन्हें जबरदस्ती अपने अनुसार शिक्षा ग्रहण करने पर मजबूर कर देते हैं । इसका परिणाम यही होता है कि बच्चा अपने माँ बाप तथा पारिवारिक सलाह के अनुसार शिक्षा ग्रहण करता है और कई परिस्थितियों में तो बच्चे को अपनी जान तक देनी पडती हैं । ये कोई नई बात नहीं है कि पूरे विश्व भर में हमें ऐसी कई घटनाएं देखने को मिलती है कि कई बच्चे महंगी शिक्षा और पारिवारिक दबाव के चलते अपनी जान पर खेल जाते हैं । इससे हम अपना एक कुशल विद्यार्थी तो खो ही देते हैं साथ ही साथ अपने परिवार के सदस्य को भी गंवा बैठते हैं । गरीब वर्ग के विद्यार्थियों पर अगर हम एक नजर डाले तो हम पाएंगे कि भारत के इतिहास में सबसे ज्यादा परचम लहराने का श्रेय उन्हीं को जाता है क्योंकि वो लोग वही करते हैं जो उन्हें करना होता है । वो लोग किसी महंगी शिक्षा या पारिवारिक दबाव में शिक्षा ग्रहण नहीं करते हैं । गरीब वर्ग के विद्यार्थी एक और जहां अपने परिवार की आर्थिक स्थिति में हाथ बांधते हैं वहीं दूसरी ओर किसी छोटे से सस्ते स्कूल कॉलेज में पढ कर भी अपने कुशल नेतृत्व का उचित परिचय देते हैं । शिक्षा का सही मायने ये कहता है कि हम शिक्षा के लायक हैं, हमें वही शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए । किसी की सलाह पाकर या आपने बिना मन की शिक्षा हमें हमेशा नुकसान पहुंचाने वाली ही हो सकती है । वर्तमान में ऐसे कई शैक्षणिक संस्थान है जो कि विद्यार्थी वर्ग को लगातार अपनी और लुभाते हुए नजर आ रहे हैं और मोटी मोटी फीस के लालच में शिक्षा को अपना व्यावसायिक ढांचा बनाते हुए दिखाई दे रहे हैं । आज अगर हम शैक्षणिक संस्थाओं पर नजर डालें तो कई संस्थाएं ऐसी है जहां सारे सुख सुविधाएं तो मौजूद हैं परन्तु शिक्षा का स्तर बहुत ही घर दिया है । ऐसे शैक्षणिक संस्थाएं सिर्फ विज्ञापनों के दम पर ही चलते रहती हैं और शिक्षा के पैमाने पर खरा उतरने में वह असमर्थ हो जाती हैं । इसलिए वर्तमान स्थिति को देखते हुए उचित शिक्षा का निर्णय कर पाना और भी ज्यादा जटिल होता जा रहा है । इसका परिणाम यही है कि आज शिक्षा व्यापार रूपी जेल में कैद हो चुकी हैं तथा शिक्षा के सौदागर अब शिक्षा को अपने व्यवसाय के रूप में उपयोग कर रहे हैं । आज के वर्तमान परिस्थिति में विद्यार्थी वर्ग कुछ क्षति पहुंच रही है । वास्तव में ही चिंता का विषय है । वजह है कि आठ चाहे अमीर वर्ग का विद्यार्थी हो, चाहे गरीब वर्ग का विद्यार्थी हो, हर कोई शिक्षा पाने के बोर्ड से लगातार दबता ही जा रहा है । कहीं विद्यार्थी वर्ग को जबरदस्ती की शिक्षा पाने के लिए मजबूर किया जा रहा है तो कहीं फीस के अभाव में कई विद्यार्थी वंचित हो रहे हैं । ऐसी स्थिति में यही कहा जा सकता है कि विद्यार्थी वर्ग के साथ होने वाला इस तरह का व्यवहार कभी भी देश को आगे नहीं बढा सकता । इसलिए हमें अपने विद्यार्थी वर्ग को ठीक तरह से पहचान न होगा और एक उचित शिक्षा का बंदोबस्त भी उनके लिए करना होगा, ताकि हमारा विद्यार्थीवर्ग बिना किसी दबाव के शिक्षा ग्रहण कर सके और देश की प्रगति में अपना योगदान दे सकें ।

Part 9

आप सुन रहे हैं कुक वासन आरजेएम आया के साथ सुनी जब मन चाहे जिम्मेदारी किसकी लेखक बालिस्टर सी गुज्जर दुष्टता से जीम हत्या तक आज की शिक्षा से हम भलीभांति परिचित है कि किस तरह शिक्षा का अस्तित्व मिट रहा है । ये विश्व हकीकत है कि शिक्षा किसी भी देश के विकास के लिए जितनी जरूरी होती है उतनी ही मानव के विकास में भी अहम योगदान देती है । इसीलिए ये हमारा कर्तव्य है कि हम अपने बच्चों को वही शिक्षा ग्रहण करने दें जो की उनकी इच्छा है तथा बाजार में उपलब्ध उचित शैक्षणिक संस्थानों का चुनाव करके ही शिक्षा संबंधी निर्णय ले । झूठे विज्ञापन लुभावने प्रचार एक और जहाँ हमारे जेब पर भारी पड सकते हैं, वहीं दूसरी ओर विद्यार्थी वर्ग का भविष्य भी खतरे में डाल सकते हैं । वहाँ मानवता को जरूर ठेस पहुंचती होगी जहाँ निर्दोष जीव जंतुओं को अपने स्वार्थ के लिए मानव द्वारा बाली की भेंट चढा दिया जाता है । ये है सास तो हर किसी को होता है कि हमारे शरीर में जान है । हमारे दो आंखे हैं, दोपहर है, दो हाथ हैं । त्यारी अंग हमारे पास मौजूद है । अगर हमारे शरीर के किसी भी अंग में पीडा उत्पन्न हो जाती है तो हम उसका तुरंत ही उपचार करा लेते हैं तथा स्वस्थ होने पर स्वयं को भाग्यशाली समझकर ईश्वर को धन्यवाद देते हैं । यही हाल समस्त जीव जंतुओं का भी होता है । यदि हम किसी पी जेडे में कैद आकाशीय पंची को छोड देते हैं उस समय वो पाँच थी भी स्वयं को भाग्यशाली समझता होगा और अपने मन की अंतरात्मा से ईश्वर को जरूरी धन्यवाद देता होगा । यदि हम किसी पीजी दे में कैद अक्षय पंची को छोड देते हैं उस समय वो पंची भी स्वयं को बहुत भाग्यशाली समझता होगा और अपने मन की अंतरात्मा से ईश्वर को जरूरी धन्यवाद देता होगा । आज से लगभग सथ्यू त्रेतायुग जैसे युगों में जितना महत्व मानव जाति को दिया जाता था उतना ही महत्व समस्त प्राणी वर्ग को भी दिया जाता था । फिर वो प्राणी चाहे विशेष जलचर हो, चाहे थलचर आकाशीय प्राणी हो या जंगली जानवर । हर प्राणी मानव जाति के लिए विशेष महत्व रखता था । उस समय मनुष्य वर्ग अपने प्राणियों का इस तरह से खयाल रखते थे कि उन का दाना पानी से लेकर उपचार तक का खयाल रखा जाता था । इसका साक्षात उदाहरण हमें आज भी कई जगहों में देखने को मिलता है कि कई लोग सुबह के समय कुत्तों को डबल रोटी तो आदि खिलाते हुए दिख जाते हैं तो कई लोग अपनी छतों पर पक्षियों के लिए दाना पानी की व्यवस्था करते हैं । कई तरह के मामले में हमें ये भी देखने को मिलता है कि बहुत से लोग अपने जन्मदिन या किसी शुभ अवसर पर अपने घरों में पिंजरे में बंद आकाशीय पक्षियों को हमेशा के लिए पिंजरे से बाहर निकाल देते हैं । यही कारण है कि प्राचीन मानवीय सभ्यता सभी जीव जंतुओं को समान महत्व देती थी और इसका असर आज भी हमें कई जगहों पर दिखाई देता है । ये बात उन सभी बातों से भिन्न है जहाँ पृथ्वी पर मानव अपने स्वार्थ हित से कार्य क्या करते हैं । जैसे अगर हम पर वार किया जाता है तो हमें उसकी चोट का तुरंत एहसास होने लगता है । यही हाल अन्य जीव जंतुओं का भी है । जब हमारे कुछ पूरी तीपूर्ण रीति रिवाजों के कार्य हमारे द्वारा किसी जंगली जानवर पर वार किया जाता है तो उन्हें भी दर्द का एहसास जरूर होता होगा, क्योंकि अगर मानव में जान मौजूद हैं तो अन्य प्राणियों में भी जान होती है । ऐसी स्थिति में यही कहा जा सकता है कि जानवरों पर क्या व्यवहार जरूर ही मानव जाति को अभिषाक देता होगा क्योंकि ये क्रिया तो स्वयं मानव भी करता है । यदि हम किसी के साथ अन्याय करते हैं तो वो हमें वरदान तो देता नहीं । अगर कुछ देता ही है तो वह सिर्फ अभिशाप । आज हम कोई अपराध करके यदि जेल में कैद काटते हैं तो उस समय हमें जेल की चारदीवारी में रहकर ऐसा है, कुछ महसूस होता होगा । मानव अब तो हमारा संपूर्ण जीवन ही बर्बाद हो गया है । यहाँ हमारा कुछ न कुछ अपराध जरूर होता है । किंतु जब हम किसी बाजार आकाशीय पंची को एक पीजे गन्ने बंद कर देते हैं तो उस समय उसके दिल पर भी क्या बीतती होगी? क्या कभी हमने ये सोचा है पंची अपनी उडान भरकर हमारे चाहों और चहक फैलाकर हमारा मनोरंजन करते हैं । आज उन्हीं पक्षियों से हमने अपने स्वार्थ की खाते उनकी स्वतंत्रता को भी चीन लिया है । कलयुग में जीवहत्या कोई नई बात नहीं है । ये तो आजकल सामान्य सी बात हो गई है कि सरे आम जंगली जानवर का मांस भरे बाजार में बेचा जाता है और इस से किसी को कोई भी आपत्ति महसूस नहीं होती है । ये असल में हमारी मानसिकता के कारण ही संभव हो गाता है अन्यथा किसी में इतनी हिम्मत नहीं है कि कोई चींटी को भी मार कर दिखा दें । आज हम देखते हैं कि बाजार में जिस तरीके से जी हत्याएं की जा रही है उससे कई ज्यादा बहत्तर हालत मानव प्राणी की होती हैं । किस तरह आजकल मारा की हत्या कर दी जाती है और पूरा समाज इसे यूँ ही देखता रह जाता है । इसी वजह से हमारी मानसिकता अब ये बन चुकी हैं कि जब हम स्पष्ट आंखों से मानव हत्या को देख सकते हैं तो फिर जी हत्या को देखना तो हमारे लिए बहुत छोटी सी बात हो जाती है । कलयुग का झांसा देकर हमारी आवाज आज जिस तरीके से बंद पडी हुई है और हम में से जो लोग अन्याय को होते देख रहे हैं उन्हें की थी उन लोगों की तरह है जो किसी अन्याय, ये अपराध से समझौता कर लेते हूँ । कुछ अच्छे लोग भी शायद यही कहते नजर आते हैं कि जब किसी को कुछ आपत्ति नहीं है तो फिर भला मैं क्यों फटे में टांग अडा हूँ । आज हमारी इसी मानसिकता के कारण जीवों पर लगातार अन्याय बढता जा रहा है और अब तो इससे मानव भी अछूता नहीं रहा जिसका अगर मानव समाज ने बेजुबान जीवों पर अपराध शुरू किया है ठीक उसी तरह का अपराध मानव के साथ भी तो हो रहा है । हम कहाँ तक बच सकते हैं? यहाँ तो हर तरफ हिसाब बराबर ही नजर आता है । जैसे यदि हमने किसी पाँच ईको पिंजडे में बंद करने का तरीका निकाला है तो वहीं हमने इंसान को भी तो जेल रूपी पिंजडे से अलग नहीं रखा । अगर हम आज कई जंगली जानवरों की हत्या होते हुए देख रहे हैं तो वहीं मानवों की भी तो हत्याएं हमारे सामने मौजूद है । यदि हमें जीवों की हत्या से कोई आपत्ति महसूस नहीं होती है तो फिर हमें मानवहत्या ऐसे भी तो कहाँ आपत्ति महसूस होती है । मामला खैर जो भी है आखिर हिसाब तो बराबर ही हुआ ना । अगर अपराध और अन्याय की मार, जंगली, पर्श, विपक्षी आदि झेल रहे हैं तो ऐसा ही कुछ अन्याय मानव समाज के साथ भी तो हो रहा है । यह प्रकृति का नियम ही है । यहाँ पर हर चीज का एक आनुपातिक संतुलन का होना बेहद जरूरी है । यदि पृथ्वी पर मानव समाज कम हो जाता है और अन्य प्राणियों का वर्ग बढ जाता है तो भी प्रकृति का संतुलन बिगड जाएगा तथा यदि अन्य प्राणियों का अनुपात मानव समाज के अनुपात से कम होता है तब भी प्रकृति का संतुलन बिगड जाता है । इसीलिए इस पृथ्वी पर होने वाली घटनाओं में कुछ न कुछ हिस्सा तो प्रकृति का भी जरूर होता है । यहाँ हमें यही देखने को मिलता है कि एक और हमें यदि जंगली जानवरों को मार रहे हैं तो वहां प्राकृतिक घटनाएं हमें भी तो मारने में संकोच नहीं करती । यही कारण है कि प्राचीन प्राकृतिक संतुलन में और वर्तमान के प्राकृतिक संतुलन में बहुत ज्यादा अंतर हमें दिखाई देता है । प्राचीन सभ्यता यही दोहराती है कि उस समय का मानव जिन जिन प्राणियों का अपने हित के लिए इस्तेमाल किया करता था, चाहे फिर वो बैल हो, बकरी हूँ, तोता हो, चाहे सर्फि क्यों न हो, हर प्राणी पर सामान दया भाव भी खाता था और हर प्राणी के प्रति मानवों की करुणा मानवता की दृष्टि से हुआ करती थी । किंतु आज का माहौल तो ऐसा हो गया है मानो लोगों ने जीवहत्या को अपने धर्म में भी जगह दे रखी है और पूरे मानव समाज को शर्मसार करने में कोई कसर नहीं छोडी । जब बात यही तक सीमित नहीं रहती तो मानव ने जीवों पर सबसे बडा जलन तो उसके मांस को अपना व्यवसाय बनाकर ही क्या है? आज की जिंदा हकीकत था में यही सीख देती है कि जो जन और शारीरिक चेष्टाएं ईश्वर ने यदि मानव को दी है तो वहीं सुख सुविधाएं ईश्वर ने अन्य प्राणियों को भी प्रदान कर रखी है । इसीलिए यही कहना उचित होगा कि वे बेजुबान प्राणियों पर अन्याय करके न सिर्फ हम अपने आप को शर्म भी न करते हैं, बल्कि हम उस ईश्वर को शर्मिंदगी महसूस कराने में भी कोई कमी नहीं छोडते हैं । जी क्या है और राजनीति आज के समय में विश्व भर में ज्यादा से ज्यादा देशों का भविष्य राजनीति पर ही निर्भर है । ऐसी स्थिति में यही कहा जा सकता है कि जो भी राजनीति हमारे देश में की जा रही है, यदि वो राजनीति देश किताब है तो जरूर ही वह देश सभ्य नागरिकों का देश कहलाएगा । और यदि इसके विपरीत जिस किसी देश में स्वार्थरहित से कोई राजनीति की जाए तो वहाँ इसका जरूर ही बुरा प्रभाव देखने में आता है । चाहे किसी भी देश की राजनीति क्यों हो, हमेशा ही उस देश में मौजूद हर प्राणी को मद्देनजर रखते हुए ही जानी चाहिए । आज हम देखते हैं कि कई नेता लोग जानवरों पर भी राजनीति करने लगते हैं, होता ऐसा ही कुछ है कि यदि सरकार द्वारा किसी जानवर को मारने पर प्रतिबंध लगा दिया जाए तो अन्य नेता इसका विरोध करने लग जाते हैं । पक्ष विपक्ष में बहस होनी शुरू हो जाती है । कई नेता जानवरों को मारने पर प्रतिबंध लगाया जाए इसके पक्ष में दिखाई देते हैं तो कई नेता इसके विपक्ष में दिखाई देते हैं । हर नेता अपनी अपनी राय तो इस तरीके से रखता है । मानव पूरी पृथ्वी के संचालनकर्ता स्वयं ये ही है । इसके ठीक विपरीत यदि किसी व्यक्ति की संदिग्ध हालातों में मृत्यु हो जाती है तब वहाँ भी राजनीति होने लगती है । ऐसी स्थिति में हम ये कैसे कह सकते हैं कि हमारे राजनीति के सभी नेता उचित निर्णय करते हैं, होना हूँ । जब भी कोई बात पक्ष विपक्ष की आती हैं वहाँ पर कुछ नेताओं को हम सही ठहरा सकते हैं तो कुछ को गलत । जनता द्वारा जो भी नेता चुना जाता है हमेशा ही उसका कर्तव्य देश के हित को लेकर ही होना चाहिए । लेकिन आज जब हम ये देखते हैं कि देश के अंदर बिकने वाले जानवरों के मांस के ऊपर भी राजनीति होने लग जाती है । कलयुग के संसार में आज तक किसी भी नेता द्वारा जानवरों पर होते अत्याचारों पर उचित प्रतिबंध नहीं लगाया गया । वजह है तो सिर्फ एक ही वोट बैंक सिद्धांत । आज अगर हम अपने स्वार्थ ठीक से राजनीति करते हैं तो इससे किसी का भी भला होने वाला नहीं । ना तो हमारा और न ही हमारे देश की जनता का । फिर जानवरों पर तो अत्याचार होता ही रहेगा जो की पूरी तरह से अनुचित है । इस बात से हम भलीभांति परिचित है । इस पृथ्वी पर सबसे ज्यादा बुद्धिमान प्राणी केवल मनुष्य है । फिर ये हमारा कर्तव्य होना चाहिए कि हम किसी भी अन्य प्रकार के प्राणी की हिंसा न करके अपने बुद्धिमान होने का उचित परिचय दे । यही हमारी जिम्मेदारी कह अलानी चाहिए कि यदि हम अन्य प्राणियों में सबसे ज्यादा बुद्धिमान है, उनकी हिंसा न करके उन का खयाल रखना होगा । उनको अपने मित्र की तरह सम्मान देकर नर्सेज हम मानवता का गौरव बढाएंगे बल्कि ईश्वर को भी ये दिखा देने में कोई कमी नहीं छोडेंगे की इस कलयुग में भी मानवता जिंदा है ।

Part 10

आप सुन नहीं ही कुकर फिल्म आरजेएम आया के साथ से नहीं जो मेन चाहे जिम्मेदारी किसकी लेखक बालिस्टर सी गुज्जर गिरते नैतिक मूल्य जब मानव के हिरदे में किसी मोह के कारण लालच का भाव जगह बना लेता है, वहाँ उसके नैतिक मूल्य गिरने लगते हैं । आज हमारे आस पास कई समस्याएं ऐसी मौजूद है जिनका कार्य सिर्फ मानव के गिरते नैतिक मूल्य अथवा गिरती हुई नहीं देखता है । जैसे अगर कोई भ्रष्टाचारी है तो भ्रष्टाचार एक बुराई है । जब कि जिन कारणों से भ्रष्टाचार एक रिश्वत लेना होता है, वहाँ वो अपनी नैतिकता को जरूरी खो बैठता है । नैतिकता के कारण उपजी हुई कई बुराइयां आज सभी जगह हमें दिखाई देती हैं । चाहे गांव का इंसान हो या फिर शहरी मानव हो । आज जिस कदर हर इंसान ने अपने नैतिकता को गंवाया है, उसका साक्षात परिणाम हमारे सामने उपस् थित हैं । रिश्वत खोरी, मिलावट, धोखाधडी, आरी सभी वह कुरुनियान है जमानों में नैतिकता की कमी के कारण उत्पन्न हुई हैं । शायद यही वजह रही होगी कि भ्रष्टाचार ने अपने पैर सब एक जगह प्रसार रखे हैं । इससे अब कोई भी अछूता नहीं रहा । पहले ग्रामीण समाज के लोगों को सभी नागरिक होने का परिचय दिया जाता था, क्योंकि उनके आदर्श ही कुछ ऐसे हुआ करते थे जिनसे मानव समाज का कल्याण ही होता हूँ । किन तो आज की ग्रामीण स्थिति को अगर हम गौर से देखें तो हमें उसके हमें उसमें भी कुछ न कुछ पूरी दिया नजर आने लगेगी । अब तो यही कहना उचित होगा की बदलती हुई दुनिया का असर इतना व्यापक है कि अब इस से कोई भी अछूता नहीं है । चाहे शहरी नागरिक हो, याद है ग्रामीण व्यक्ति सभी पर कलयुग कर सामान नेतृत्व आसानी से देखा जा सकता है । लालच का जो जादू आज ज्यादातर परिस्थितियों में हर किसी के सर चढकर बोल रहा है उसका घातक परिणाम यही हो सकता है कि हमारी सभ्यता का हम लगातार राज करते जा रहे हैं । यू तो कहने को कई बातें ऐसी हो सकती है जहाँ में एक सभ्य नागरिक बनाती हो । हिंदू जो आदर्श बातें हैं वो यही हैं कि जब हमारे हिंदी में मोहग्रस्त विचार प्रवेश कर जाते हैं तब हमारे हिरदे की सारी अच्छाइयाँ स्वतः ही नष्ट हो जाती हैं । ये इसी का परिणाम है कि लालच के भाव ने व्यापारी वर्ग को भी लालची बना दिया है और मिलावट जैसी कई घटनाएं हमें दिखाई देने लगी है । हमें दिखाई देने लगती है । इसका अंजाम फिर यही होता है कि जो लालच का भाव रखता है वह तो भ्रष्ट है ही साथ ही साथ वह अन्य लोगों के जीवन पर भी अपना प्रभाव डालता रहता है । ये हम सब अच्छी तरह से जानते हैं कि आजकल जितना महत्व धन दौलत को दिया जाता है उतना महत्व किसी भी चीज को नहीं दिया जाता । क्योंकि इस समय हमने अपनी मानसिकता को बुरी तरह से प्रभावित कर रखा है और हम लगातार ज्यादा से ज्यादा संपत्ति के चाह में अपने आदर्श मूल्यों को भूलते जा रहे हैं । यदि कोई दूध वाला दो दो पानी की मिलावट करता है तो हम यही कहते हैं कि जरूर ही दूध वाले की मानसिकता ज्यादा धन कमाने की हो गई है । तभी तो वो हमें मिलावटी दूध दे रहा है तभी तो हमें भी तभी तो वहाँ मैंने तभी तो वहाँ में मिलावटी दूध दे रहा है लेकिन बाद यही तक सीमित नहीं है । एक तरफ जहां मिलावट करना नैतिकता के राज के अंतर्गत आता है, वहीं दूसरी ओर अवैध रूप से अर्जित किया हुआ धन भी नैतिकता के रांस के अंतर्गत ही आता है । अगर हम किसी को अपना काम निकलवाने की खातिर रिश्वत देते हैं तो वहाँ रिश्वत लेने वाले की और रिश्वत देने वाले की दोनों की ही नैतिकता का मूल्य गिराया लोली गिर जाता है । दोनों की ही नैतिकता का मूल्य गिर जाता है । गिरते नैतिक मूल्य आज हमें यही शिक्षा लगातार देते रहते हैं कि अगर इसी तरह से हम अपने कर्तव्यों के प्रति लाभ परवाह होते जाएंगे तो आने वाले समय में हम मानव कहलाने के लायक भी नहीं बचेंगे । जब हम कोई गलत रास्ता, अपने स्वार्थ हितों के कार्य अपनाने लगते हैं तो वहाँ हमारा मानव धर्म स्वता ही नष्ट हो जाता है और हम उस श्रेणी में आ जाते हैं, जहाँ धोखाधडी का खेल जाता हूँ । धोखाधडी का खेल चलता हूँ । वजह सबसे बडी यही है कि यदि हम अपने मानवीय कर्तव्यों का पालन न करके अपने स्वास्थ्य की खाते अपना जीवन बिताते हैं तो उसका असर अन्य लोगों पर भी होने लगता है तथा फिर मैं बुराई हर तरफ तथा फिर में बुराई हर तरफ धीरे धीरे फैलने लगती है । ये इसी का परिणाम है कि धान ली आज हर तरफ की जा रही हैं, क्योंकि इससे पहले कभी भी मौजूद नहीं थी । आज हमें पद पर पर ऐसे लोग मिलते जाएंगे जो सिर्फ पैसों की खाते जो सिर्फ पैसों को ही ज्यादा महत्व देते हूँ और आवश्यकता से ज्यादा धन अर्जित करने की खाते रे झूठ और फरेब तक का खेल खेलते नजर आने लगती हूँ । वास्तव में ये ऐसे लोगों की मानसिक बुद्धि का ही कारण है कि ज्यादातर लोगों में यह भावना व्याप्त हो जाती है कि जब तक हमारे पास पर्याप्त मात्रा में संपत्ति मौजूद नहीं होगी तबतक हमें कोई सम्मान भी नहीं देगा । ये इसी का परिणाम है कि आम जनता के साथ धोखाधडी न सिर्फ आम आदमी कर रहा है बल्कि बडे से बडे राजनेता और प्रशासनिक अधिकारी वर्ग भी इससे अछूते नहीं है । अब बार यही आप की नहीं । अब बात ये आती है कि जब सभी आवश्यकताएं ज्यादा से ज्यादा धन अर्जित करने पर निर्भर है तो फिर ज्यादा से ज्यादा धन हम सभी के सामने क्यों नहीं अर्जित करते हैं । इसलिए हम झूठा दिखावा दिखाकर मानवता को बदनाम करते हुए नजर आते हैं । मान लो यदि हम भ्रष्टाचारी है तो हमें सभी के सामने रिश्वत लेनी चाहिए । फिर किस लिए हम चोरी छुपे रिश्वत लेकर स्वयं अपने आप को लज्जित करते हैं । यदि हम किसी चीज में मिलावट करते हैं तो हमें सभी के सामने मिलावट करनी चाहिए ना ताकि लोगों को पता तो चल सके कि हमने अपने नैतिक मूल्यों को इस तरह से गिरा दिया है कि मानव अब धन के आदि हो गए हो । ये हकीकत है कि यदि हम कोई भी काम सभी के सामने करते हैं तो उसमें हमारी कोई बेईज्जती नहीं होती हैं । किन के फिर सभी को हमारी आदत कर पता चल जाता है । फिर हम में से कोई कुछ कहता भी नहीं है । अगर हम अपने मन में बेईमानी का भाव रखते हैं तो हमें इसका प्रदर्शन सरेआम करना चाहिए । तभी अन्य लोगों को पता तो चले कि बेईमानी का परिणाम क्या होता है । इसमें हमें सबसे बडा फायदा यही होगा कि हमारी बेईमानी को देखकर हमारे मनुष्य वर्ग में छुपे हुए कई बेईमान व्यक्ति समझ सकते हैं । कहने का सीधा साहब यही है कि यदि हम अपने समाज को एक आदर्श समाज यदि फिर से बना सकते हैं तो सबसे पहले हमें अपनी खोई हुई नैतिकता को वापस लाना होगा तथा अपने कर्तव्यों का पालन ठीक ढंग से करना होगा, तभी ये संभव हो पाएगा । अन्यथा कोई भी पूरी थी ऐसी नहीं है जो घटती हो । अगर हम किसी भी बुराई को मिटाना चाहते हैं तो हमें उसको रोकना होगा । तभी वह रुक सकती है । अन्यथा फिर बुराई तो एक प्रकार से मानव के विनाश का कारण तो होती ही है । नैतिक मूल्य राजनीति एक इंसान के लिए जो चीज उसके ऊचित चरित्र के लिए जरूरी है वह है उसके नैतिक मूल्य । यदि किसी व्यक्ति विशेष में ऊचित संस्कार नहीं हो तो व्यक्ति अक्सर ही गुरु तीपूर्ण होगा । मानव की नैतिकता एक और जहां उसके अंदर मानवता का निर्माण करती है वहीं दूसरी ओर उसे दयावान भी बनाती है । यह निश्चित है कि नैतिकता से परिपूर्ण हर व्यक्ति इस संसार के हर प्राणी को सम्मान दया भाव से देखता है । आज हम देखते हैं कि कई लोग इतनी बेईमानी पर उतारू हो जाते हैं कि जरा से लालच के चक्कर में अपना ईमान तक बेच डालते हैं । ये कोई नई बात नहीं है कि कई बडे से बडे सरकारी कर्मचारी भी अपना ईमान चंद रुपयों की लालच में बेच देते हूँ । लालच के भाव के कारण अपना ईमान दांव पर लगाने वाले वास्तव में वो लोग होते हैं जिनमें नैतिकता की कमी पाई जाती हो । जब की नैतिकता से परिपूर्ण व्यक्ति तो अपनी जिम्मेदारियों को उच्च प्रकार से निभाता हुआ आया है । वर्तमान में राजनीति में भी हमें कहीं कहीं नैतिकता की कमी दिखाई देने लग जाती हैं । जब की राजनीति जैसी चीज तो हमेशा ही नैतिकता युक्त होनी चाहिए । आज हम देखते हैं कि कई राजनेताओं पर भ्रष्टाचार जैसे कई घिनौने आरोप लग जाते हैं और जांच पडताल होने पर वह सही भी सिद्ध हो जाते हैं । ऐसे परिस्थितियों में हम कैसे कह सकते हैं कि हमारे देश की राजनीति एक साथ छवि वाली राजनीति है । ये स्पष्ट सच्चाई ही मानी जानी चाहिए कि यदि हमारे देश का हर राजनीतिज्ञ ईमानदार होता तो आज हमारा देश विकास की उन बुलंदियों पर होता जहाँ तक आज तक कोई नहीं पहुंच पाया हो । भारत जैसे सोने की चिडिया कहलाने वाले देश में धान की तो शुरू से ही कमी नहीं थी । बस अगर जरूरत भी तो सिर्फ देश के हर राजनीतिज्ञ को अपनी प्रतिष्ठा का उचित परिचय देने की परन्तु हुआ क्या? वा यही कि हमारे देश को अन्य लोगों ने तो कम लूटा लेकिन अपने अपनों ने ही सबसे ज्यादा क्षति पहुंचाई है । वजह थी कि हम अपनी नैतिकता को भूलकर अपने देश को ही लूटने में जुट गए । जो राजनीति देश के लोगों को ऊंचा उठाने के लिए की जानी चाहिए थी, वहीं राजनीति देश के लोगों को झुकाने के उद्देश्य से की गई जबकि एक राजनेता का धान तो अपने देश का गौरव बढाने का होता है न कि देश को लूटने का । ये आज भी कोई नई बात नहीं है कि कई राजनीति ये देश हित से हटकर देश में ही देश का पैसा लूटने के आरोप में पकडे जाते हो । आज अगर हम राजनीति के हिसाब से ही यदि सन राजनीति के हिसाब से ही यदि देश का विकास करना चाहते हैं तो हमें अपनी नैतिकता का उचित परिचय देते हुए एक साफ छवि वाला राजनयिक बनना होगा तभी इस देश की जनता का और देश का विकास होना संभव है । इस बात का तो समय भी साक्षी है कि जब तक मानव अपनी नैतिकता और आदर्श मूल्यों को अपने हिरदय में संजोय रहा तब तक हर समाज और देश सुखी रहा । किन्तु जब मानव अपने कर्तव्यपालन से दूर होता गया और अपने मानवीय मूल्यों को खोता गया, तब तक इसका परिणाम यही हुआ कि हमारी नैतिकता लगातार गिर दी गई । इसीलिए ये हमारा कर्तव्य होना चाहिए कि हमारे अंदर जब मूल्य मानव के लिए अति आवश्यक होते हैं वो तो होने ही चाहिए जैसे कि नैतिकता अथवा मानवी, नैतिक मूल्य

Part 11

आप से नहीं ऍम आरजेएम आया के साथ नहीं जब मन चाहे जिम्मेदारी किसकी लेखक बाली स्तर सी गुज्जर भारतीय संस्कृति की दयनीय स्थिति इसमें कोई संदेह नहीं है कि पूरे विश्व में संस्कृति की झलक जो आज हमें दिखाई देती हैं, उसका जन्मदाता भारत देश को ही माना जाता है । पूरा संसार आज भी हमारी भारतीय संस्कृति का गुलाम है क्योंकि पूरे विश्व में संस्कृति का जन्मदाता हमारा भारतीय समाज ही है । ये बिल्कुल सटीक सच्चाई है कि एक तरफ जहाँ मानवीय विकास का आधार शिक्षा है, वहीं दूसरी और मानव के अंदर मानवीय गुणों का विकास संस्कृति से ही संभव हो पाता है । यही कारण है कि विश्व भर के तमाम देशों की अपनी एक अलग ही सांस्कृतिक सभ्यता होती है, जो कि वहाँ पर निवास करने वाले मानव समाज का बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है । आदिकाल से ही मनुष्य की मुख्य जरूरतें भले ही रोटी, कपडा और मकान रही हो, किंतु उसके जीवन को बढावा तो सांस्कृतिक कार्यक्रमों से ही मिलता रहा है । जितनी आवश्यकता हमारे जीवन में सुख सुविधाओं की रहती है, उतने ही आवश्यकता हमें हमारे मन मस्तिष्क रुपये विकास के लिए सांस्कृतिक सभ्यता की भी होती है । राजा महाराजाओं के शासनकाल पर यदि हमें नजर दौडाएं तो हमें उनकी जीवन शैली एक अलग से रंग लिए नजर आएगी । राज अधिकार करने वाले शासक अपने जीवन को हमेशा रंगीला बनाने की सोचते थे । उनका ऐसा मत था कि राजा और प्रजा के बीच जमा नेताएं मौजूद हैं और यदि इस परंपरा को जिंदा रखना आवश्यक है तो इसके लिए सांस्कृतिक वातावरण का होना बहुत जरूरी है । यही कारण था कि हर राजा के दरबार में एक सांस्कृतिक थल जरूर हुआ करता था, जहाँ पर पूरा राजपरिवार इकट्ठा हुआ करता था और जहाँ राजा और प्रजा में सांस्कृतिक बंधन के लिए रंगारंग कार्यक्रम प्रस्तुत किये जाते थे । वैसे भी वास्तविकता तो आज भी प्राचीन ही है । भले ही विश्व में कितने ही देश क्यों नहीं हर देश की वहाँ पर निवास करने वाले लोगों के आधार पर सांस्कृतिक पहचान तो होती ही है, तभी किसी देश की पहचान कायम रहती है । अन्यथा जिस देश की कोई संस्कृति ही मौजूद नहीं होती अन्यथा जिस देश की कोई संस्कृति मौजूद नहीं होती है वो देश अपने पहचान बनाने में असमर्थ ही नजर आता है । भारत जैसे विश्वगुरु कहलानेवाले देश की अगर हम बात करें तो इसके विश्वगुरु के रूप में पहचान होने का कारण इसके द्वारा दिया गया सभ्य ज्ञान ही तो है जिसको पूरी दुनिया ने अपनाया है । यही वजह है कि भारत का नाम पूरी दुनिया को अच्छी तरह से ज्ञात है । भारतीय सभ्यता ने जब जब अपना परचम लहराया है तो सब के मद्देनजर तो सबको मजा तो सब को मद्देनजर रखते हुए ही लहराया है । भारतीय संस्कृति इस चीज की शुरू से ही पहचान बनाने में कामयाब रही है कि बिना सभ्यता संस्कृति के मानव का जीवन चल ही नहीं सकता । नही, मानव जाति के मन मस्तिष्क का विकास संभव है । इसीलिए भारतीयों की उच्च सोच का परिणाम यही हुआ कि हमने पूरे विश्व को शिक्षा और संस्कृति का भली शिक्षा और संस्कृति का पाठ भली भांति पढाया तथा हर देश को उसकी अलग पहचान दिलाने में हम कामयाब भी हुए हैं । अगर हम भारत के सभी उनतीस राज्यों का अवलोकन करें तो हमें हर राज्य में कुछ न कुछ भिन्नता दिखाई देगी । हर राज्य का अपना सांस्कृतिक रंग रूप है और भारत की पहचान भी । शायद इसी कारण पूरे विश्व भर में मौजूद है हमारा देश । वास्तव में सांस्कृतिक रंगों का तो आज भी बात चाहे दुख सत्तावन में जरूर होने लगता है । जब हमें पता चलता है कि भारत कुछ मायने में अपनी सांस्कृतिक पहलुओं को नजरंदाज करता जा रहा है । आज हमारी आंखे इसलिए सबसे ज्यादा भर आती है कि जिन देशों को हमने संस्कृति का पाठ पढाया, वह देश आज भी अपनी संस्कृति को बचाने में कामयाब है । किंतु हमारा देश लगातार अपनी संस्कृति का झाज करता जा रहा है । इससे न सिर्फ देश की पहचान मित्र ही है बल्कि हमारा भारतीय होने का गौरव भी मिटने की कगार पर पहुंचा है । कितने शर्म की बात है कि हर देश अपनी सांस्कृतिक रक्षा के खाद्य उचित धन का निर्वाह करते हैं, जबकि भारत जैसे सांस्कृतिक देश में संस्कृति के नाम पर उचित धन का निर्वाह किया ही नहीं जाता । अर्थ और भारतीय समाज को भी इसकी कोई परवाह नहीं है कि हमारा अस्तित्व दिन प्रतिदिन लगातार मिलता ही जा रहा है । इससे तो यही कहा जा सकता है कि यदि हमारी सरकार अपनी संस्कृति की रक्षा करने में नाकाम है तो हम भी अपनी जिम्मेदारियों से भटकते हुए नजर आ रहे हैं । वैसे एक सही तरीका तो यही कहता है कि सरकार तो केवल चंद लोगों की वजह से तो चलती हैं, किन्तु अपनी संस्कृति की रक्षा करना तो हमारे हाथ में होना चाहिए और वैसे भी क्यों न हो, ये तो बिल्कुल ऊंची थी । मानना पडेगा कि किसी भी देश की संस्कृति का उत्तरदायित्व सबसे ज्यादा तो उस देश में निवास करने वाले लोगों का होता है, न कि वहाँ की शासन प्रणाली का । ऐसी स्थिति में यही कहा जा सकता है कि जो तरीका आज हम भारतीय लोग अपना रहे हैं, उससे हमारे देश का तो किसी भी हाल में भला होने वाला नहीं है । हमने अपनी सोच को इस तरीके से ढल कर रखा है कि हम पूरी तरह से आज सरकार पर निर्भर हो रहे हैं जो कि किसी भी उद्देश्य से उचित नहीं है । जिस तरीके का रवैया हमें देखने को मिलता है, उस तरीके का रवैया पहले कभी शायद रहा होगा । हम यही सोचते हैं कि अगर हमारी सरकार कोई काम करेगी, तभी हम कोई काम करेंगे । अन्यथा जो हो रहा है उस से हमें क्या लेना लेना । लेकिन कुछ मामलों में लेकिन कुछ मामलों में हमें जरूर भूल जाते हैं कि अगर इस देश की जिम्मेदारी हमारी सरकार पर है तो उससे कहीं ज्यादा जिम्मेदारी हमारे ऊपर है, क्योंकि हमें इस देश के रहिवासी हैं और हमारे देश के मान सम्मान की रक्षा सर्वप्रथम हमारे हित में ही होती है । अच्छा हम यही कह सकते हैं कि जब तक हम अपने देश के मान सम्मान की रक्षण नहीं करेंगे तब तक देश के सांस्कृतिक पहलुओं की रक्षा तो हो ही नहीं सकती हैं । इसके लिए हमें चाहिए कि हम अपने देश के प्रति अपना कर्तव्य अपनी जिम्मेदारियां समझकर निभाएँ । तभी हमारे सांस्कृतिक झलक पूरे विश्व को फिर से दिखाई दे सकती हैं । भारतीय संस्कृति आज राजनीति भारत देश में संस्कृति और मानव के बीच का जो संबंध हमें प्राचीन समय से दिखाई दे रहा है वो वास्तव में वह संबंध है जहाँ हमें लगता हो कि भारतीय विराजत एक अद्भुत विरासत है । प्राचीन इतिहास के हर राज दरबार में एक सांस्कृतिक स्थल अवश्य हुआ करता था जहाँ पर सारी प्रजा इकट्ठा हुआ कर दी थी तथा कई तरह के रंगारंग कार्यक्रम आयोजित किए जाते थे । ऐसा कुछ इसलिए होता था ताकि राजा और प्रजा के बीच आपसी संबंध बरकरार रह सके और राज दरबार की शान बनी रह सके । वास्तव है सांस्कृतिक कार्यक्रम एक और जहाँ देश की छवि को प्रस्तुत करते हैं, वहीं दूसरी और हमारे देश का गौरव भी तो बढाते हैं । जब बात भारतीय संस्कृति की आती है तो वहाँ हर नागरिक प्रफुल्लित मन से भारतीय संस्कृति की झलक को देखने के लिए बडा ही उत्सुक होता है क्योंकि जो छवि विश्व विरासत में भारतीय संस्कृति की है उतनी तो अन्य किसी भी देश की नहीं है । वजह है कि हमने ही अन्य देशों को सांस्कृतिक शिक्षा का पाठ पढाया है । ये सब जानते हुए भी कि हमने ही इस संसार में संस्कृति को जन्म दिया, लोगों को जीवन जीने की कला दी । उसके बाद भी आज हम अपनी संस्कृति से वो मोडते नजर आ रहे हैं जो कि हमारे देश के लिए बिल्कुल भी उचित नहीं । आज हमारा देश विकास की नई नई ऊंचाइयों को छू रहा है जो कि हमारे लिए गौरव बढाने वाला कार्य है । लेकिन यदि इस विकास की रफ्तार में हम अपनी संस्कृति को ही भूल बैठे हैं तो ये जरूर ही हमारे देश के लिए चिंता का विषय हो सकता है । क्योंकि भारत देश को क्योंकि भारत देश की जो पहचान संपूर्ण विश्व संस्कृति से है उतनी तो अन्य किसी भी चीज से नहीं है । ये आज हम सभी जानते हैं कि कि देश के विकास में सबसे बडा योगदान जनता का होने के साथ राजनीति का भी होता है । देश के पहलुओं की रक्षा के लिए जो भी ज्यादा से ज्यादा धन का निर्वाह किया जाता है वो हमारे देश की राजनीति के द्वारा ही निर्वाह किया जाता है । इसीलिए ऐसी स्थिति में देश की सरकार का ये पूरा कर्तव्य बनता है कि हमारे देश के विकास के साथ साथ संस्कृति का भी खयाल रखना चाहिए । जब तक सरकार द्वारा सांस्कृतिक पहलुओं की रक्षा नहीं की जाएगी तब तक हो सकता है कि देश की संस्कृति भी अपना विकास नहीं कर पाएगी । आज यदि हम अपने देश के गौरव को सारे संसार में ऊंचा उठाना चाहते हैं तो हमें एक साथ मिलकर अपनी संस्कृति की झलक पूरे संसार को दिखानी होगी, वो भी बिना किसी भेदभाव के तथा बिना किसी पक्ष विपक्ष के । यही देश के हर एक नागरिक की जिम्मेदारी होनी चाहिए क्योंकि ये देश हर नागरिक का है और हर एक नेता का भी । ये प्रत्येक देश के नागरिक का उत्तरदायित्व होता है कि वो अपने देश के प्रति यही अपना कर्तव्य ठीक ढंग से निभाएगा । तभी उस देश का मान सम्मान कायम रह सकता है । जब कोई नागरिक अपने देश के मान सम्मान पर ध्यान नहीं देता है तो वहाँ वो देश अपना अस्तित्व होने लगता है । इसीलिए इस राजनीतिक देश में सरकार के साथ साथ हर नागरिक की सर्वप्रथम जिम्मेदारी होनी चाहिए कि आपने सांस्कृतिक पहलुओं के साथ जरा सा भी खिलवाड न करें, तभी हमारी पहचान विश्व मंच पर कायम रह सकती हैं । हमें विश्वगुरु होने के लिहाज से अपनी जिम्मेदारी ठीक ढंग से निभानी होगी, क्योंकि हमने ही शिक्षा संस्कृति को जन्म दिया है और इसका प्रसार पूरे विश्व भर में क्या है? इसीलिए ये हमारे सर्वप्रथम जिम्मेदारी होनी चाहिए कि हम अपने देश के प्राचीन उत्तरदायित्वों को आज भी ठीक ढंग से निभाएं तथा अपने विश्वगुरु होने का परिचय संपूर्ण विश्व को सिरोंचा करके दें ।

Part 12

आप सुन रहे हैं कोई कोई फिल्म आरजेएम आया के साथ सुन एगेंजमेंट चाहे जिम्मेदारी किसकी लेखक बालिस्टर सिंह गुर्जर पर्यावरण का बिगडता संतुलन यदि पर्यावरण संतुलन बिगडने से मानव का संतुलन बिगड ता है तो ये विनाश का कारण हो सकता है । पर्यावरण का नाम सुनते ही हमारा मन हरी भरी खुशहाली से भर आता है । फिर में चार और पर्यावरण रुपये खुशहाली ही दिखाई देती है परंतु दुखता तब में ज्यादा होता है जब हमारे चार और हरियाली कि मैं हमें दिखाई नहीं देती हूँ । ये प्राचीन परंपरा हो सकती है कि मानव की मन की शांति के लिए हरा भरा माहौल कितना महत्वपूर्ण होता है तथा उसकी खुशहाली का ज्यादातर हिस्सा हरे भरे माहौल में ही निहित होता है । यही कहना उचित होगा की अगर हमारे चारों और प्राकृतिक खुशहाली है तभी हम एक खुशहाल जीवन का निर्वाह कर सकते हैं । इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जब हमें किसी फिल्म में हरे भरे पेड पौधे दिखाई देते हैं तब हमारा मन प्रफुल्लित होता हूँ और हमारे ज्यादातर मानसिक चिंताएं भी दूर हो जाती हो । अगर कहा ये जा सकता है कि जब हमारे सामने प्रकृति की झलक अप्रत्यक्ष रूप से मौजूद हो तब हमें इतनी खुशी मिलती हैं तो फिर प्रत्यक्ष रूप से तो हमारा मन वास्तविक खुशियों से भर सकने में सक्षम हो सकता है । युद्ध प्राकृतिक घटना है, कई बार घटित होती रहती है लेकिन कुछ घटनाएं ऐसी भी होती है जिनका जिम्मेदार केवल मानव होता है । जैसे अगर पेडों की ज्यादा कटाई से बारिश नहीं होती है तो बारिश के न होने का जिम्मेदार कौन हुआ । मानवीय पर्यावरण आज पर्यावरण समस्या विश्व के लिए लगातार खतरे का कारण बनती जा रही है । ऐसी परिस्थिति में यही कहा जा सकता है कि आज जो समस्या पर्यावरण का संतुलन बिगाड रही है उसका जिम्मेदार सिर्फ मानव ही नहीं है क्योंकि आज से पहले भी इस पृथ्वी पर मनुष्य वर्ग था । उस समय तो ऐसी कोई समस्याएं उत्पन्न नहीं हुई जो प्राकृतिक संतुलन बिगाड दी हो । आज हमारी लगातार बढती आदतों ने ही कहीं न कहीं प्रकृति पर अपना असर डाला है और इसका परिणाम दिया में भुगतना पड रहा है । प्राचीन मानव समाज का अगर हम उदाहरण ले तो उनके जीवन की आयु आज के समाज के मानव के आयो से कई ज्यादा हुआ करती थी । उस समय हर तरफ हरा भरा माहौल था जबकि आज के समय में ऐसा कुछ कहीं भी नजर नहीं जब की आज के समय में ऐसा कुछ कहीं कहीं ही भिन्न भिन्न दिखाई देता है । बात अगर खाने पीने की की जाए तो भी हमें प्राचीन भोजन और आधुनिक भोजन में कई गुना अंतर नजर आएगा । पहले सिद्ध और प्राकृतिक पौष्टिक पदार्थों को लोग अपनी दिनचर्या के हिसाब से उपयोग में लाया करते थे परन्तु आज के समय में प्राकृतिक पौष्टिकता तो मानव हमें गुजरे हुए परन्तु आज के समय में प्राकृतिक पौष्टिकता तो मानो हमें गुजरे हुए समय की बात लगती है । आज हमारी आदतों के कार्य कई जीव जंतुओं को बाली के हत्थे चढा दिया जाता है । फिर हम मृत शरीर से पौष्टिक पदार्थ निकालने की बात कहकर अपने आपको बेतूका ढांढस बंधाते हुए नजर आते हैं । आज अगर हम दुधारू पशुओं को अपने स्वास्थ की दृष्टि से मारने पर उतारू है तो फिर हमें दूध से मिलने वाले पौष्टिक पदार्थ तो किसी भी हाल में नहीं मिलने वाले । पर्यावरण संतुलन के लिए एक तरफ जहां प्रकृति कर संतुलन जरूरी माना जाता है, वहीं दूसरी और मानव के अलावा अन्य जीव जंतुओं का होना भी बेहद जरूरी है । यही कारण है कि पर्यावरण सभी जीव जंतुओं के संतुलन से चल पाता है और अपनी गति को निरंतर रूप से बनाए रखने में कायम हो पाता है । आज हमारे आस पास मौजूद पर्यावरण नीय समस्याओं में प्रदूषण की समस्या जितनी घातक है उतनी घातक तो शायद ही कोई समस्या उत्पन्न हुई हो । प्रदूषण का विनाशकारी खेल आज हर तरफ अपना करतब दिखा रहा है तथा हर प्राणी को ये बताने में कोई कमी नहीं छोड रहा है कि प्रदूषण कोई प्रकृति से जन्मी चीज नहीं है बल्कि प्रदूषण का जन्मदाता स्वयं मनुष्य वर्गी है । कई दर्शक कई देशों में तो ये स्थिति है कि पर्यावरण प्रदूषण से निपटने का उनके पास कोई उपचार बचा ही नहीं है । ऐसी स्थिति में तो यही कहा जा सकता है कि जिन संसाधनों का प्रयोग मानव अपनी सुख सुविधा की दृष्टि से करता रहा है और कहीं उनसे पर्यावरण प्रदूषण का जन्म होता है तो फिर उन संसाधनों का प्रयोग वर्जित करना ही होगा । अन्यथा आने वाले समय में इसके दुष्परिणाम इससे भी कई ज्यादा भयंकर साबित सिद्ध हो सकते हैं । प्रकृति एक और जहां मानवीय परिणामों की वजह से विघटित हो रही है, विघटित हो रही है, वहीं दूसरी और वैज्ञानिक उपकरण भी प्रकृति से खास होने का जिम्मेदार हैं । अगर हमारी आवश्यकता पर्यावरण पर भारी पडती है तो प्राकृतिक तबाही के जिम्मेदार भी हम ही है न कि प्रकृति । प्रकृति तो निरंतर ही अपना कुशल नेतृत्व निभाती है । परन्तु जब हम प्राकृतिक गति में अवरोध पैदा करने लगते हैं तब जरूर प्रकृति हमारे जीवन में अनेक अवरोधक पैदा करने का साहस रखती है । आज भूकंप सुनने, ज्वालामुखी जैसी अनेक विनाशकारी घटनाओं से हर कोई भली भांति परिचित है की ये किस कदर से तबाही मचाती है और मानव का जीवन क्षणभंगुर समय में ही मिटा देती है । ये बात विज्ञान भी सिद्ध कर चुका है कि प्राकृतिक घटनाएं तभी आती है जब किसी ने किसी रूप से प्रकृति का संतुलन बिगड जाता है । चाहे पेडों की कटाई हो, चाहे वाहनों से निकलने वाला धुआं या फिर कारखानों आदि से निकलने वाली विषैली गैस मलमूत्र आदि कुछ नहीं हो । किसी ने किसी रूप में प्रकृति का संतुलन मानवीय क्रियाएं ही बिगाडती है । आज के मानव की बढती हुई मांग सिर्फ यही दर्शाती है कि हमारे संसाधन ही इतने भयंकर है जिनसे प्रकृति का जांच होता है । वैसे तो यही हकीकत है कि पृथ्वी के आधे से ज्यादा हिस्से पर जल की अधिकता पाई जाती है किन्तु आज जल की समस्या दी हमें कहीं न कहीं नजर आने लगती है ये सर प्रकृति द्वारा दिया गया उपहार ही तो है कि उसने अपना एक चौथाई हिस्सा हमारे जीवन यापन के लिए हमें प्रदान किया है । अब यदि हम एक चौथाई हिस्से में रहने वाले लोग प्रकृति के संपूर्ण हिस्से को अपने कब्जे में लेना चाहे तो फिर गुस्सा तो प्रकृति को आता ही होगा । इसलिए कोई संदेह नहीं है कि अगर हम अपना जीवन यापन इसी तरह से करते रहेंगे तो आगे भविष्य ने हमें पर्यावरण के विनाशकारी परिणाम भी देखने को मिल सकते हैं । हमारा कर्तव्य अगर प्राचीन लोगों की तरह प्रकृति के प्रति होगा तभी हमारा अस्तित्व पृथ्वी पर जिंदा रह सकता है । अन्यथा प्राकृतिक दुष्परिणाम भी हमारे सामने प्रत्यक्ष रूप से मौजूद हैं । पर्यावरण और राजनीति संपूर्ण संसार की उत्पत्ति के साथ ही इस बात की पुष्टि तो हो गई थी कि पृथ्वी पर निवास करने वाले हर प्राणी के लिए प्राकृतिक माहौल अत्यंत ही आवश्यक हैं । साथ ही ये भी निश्चित था की हर प्राणी को उसके मन की शांति के लिए भी प्राकृतिक माहौल जरूरी था । इसीलिए तो आदिमानव काल से ही प्रकृति और मानव के बीच में घनिष्ठ संबंध रहा है । ये सर ठीक ही सत्य माना जाएगा कि प्रारंभ से ही मानव प्रकृति के अधीन रहा है और प्रकृति के नियमों का भी भलीभांति पालन किया है । प्राचीन सभ्यता और आज के वर्तमान सभ्यता में यही अंतर है कि प्राचीन लोग प्रकृति के प्रति एक जिम्मेदार नागरिक हुआ करते थे । जब की आज ऐसा माहौल हमें कहीं कहीं पर ही दिखाई देता है । प्राचीन समय का हर नागरिक चाहे फिर वह राजा हो, ये सामान्य नागरिक हर कोई प्रकृति से मित्रतापूर्वक व्यवहार किया करता था । इसके ठीक विपरीत आज के समय में हम देखते हैं कई लोग प्रकृति अथवा पर्यावरण के प्रति लापरवाह होते जा रहे हैं । चाहे आज का सामान्य नागरिक हो चाहे राजनेता अंत में फिर इसका परिणाम यही तो होता है कि कहीं भूकंप आते हैं तो कई अन्य प्रकार की विनाशकारी आप चाहे आती है । आज के समय में हर नागरिक केवल अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करने में लिप्त नजर आता है और जब पर्यावरणी जिम्मेदारी उसके जीवन संचालन के लिए जरूरी है उसके प्रति लगातार लापरवाह वो होता जा रहा है । यदि आज हम इस तरह से अपने दिनचर्या को चलाते जाएंगे तो यह निश्चित ही मानना पडेगा कि अब वह दिन दूर नहीं जब हमें कई पर्यावरणी समस्याओं का सामना करना पडेगा । इसके साथ ही साथ हम देखते हैं कि यदि कुछ जानता पर्यावरण के प्रति जागरूक नहीं है तो हमारी राजनीति भी कहाँ हमें पर्यावरण के प्रति जागरूक दिखाई देती है । जबकि सारे देश के संचालन में मुख्य योगदान तो राजनीति का ही होता है । आज के हर राजनीति ये का ये कर्तव्य तो होना ही चाहिए कि वो हमारे देश के विकास के साथ साथ पर्यावरण ीय पहलुओं की भी रक्षा करने में अपना योगदान करें । एक राजनीति ये वो होता है क्योंकि देश की हर एक समस्या पर ध्यान दे सके और जहाँ तक संभव हो उस समस्या का हल निकालने में सक्षम हो सके । इसीलिए देश के हर एक नागरिक और राजनीतिज्ञ का पर्यावरण के प्रति मित्रतापूर्ण व्यवहार ही हमें प्राकृतिक समस्याओं से छुटकारा दिलाने में सक्षम हो सकता है । प्रकृति एक तरह से प्राकृतिक रूप से ही जन्मी हैं, चाहे फिर हमें से ईश्वरीय बनावट भी चेंज पहले तब भी हम गलत नहीं हो सकते हैं । ये हम भी ठीक तरह से जानते हैं कि पर्यावरण तभी चलता है जब सभी तरह के प्राणी यहाँ मौजूद होते हैं । इसीलिए ये हमारा कर्तव्य होना चाहिए कि यदि किसी जीव जंतु की हत्या या प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट करने से पर्यावरणी समस्या उत्पन्न होती हैं तो हमें अपनी जीवन शैली तो हमें अपनी जीवन शैली में बदलाव करना ही होगा । साथ ही साथ हमें अपनी आने वाली पीढी के भविष्य को मद्देनजर रखते हुए अपने उन मानवीय संसाधनों पर रोक लगानी होगी जिनसे प्रकृति का संतुलन बिगड ता हूँ । यही हमारी जिम्मेदारी है कि हम अपने जीवन का निर्वाह पर्यावरण को ध्यान में रखकर करें । तभी हमें हमारे आस पास खुशहाली की गूंज सुनाई दे सकती है ।

Part 13

आप सुन रहे हैं कुक ऍम आरजेएम आया के साथ सुनी जो मन चाहे जिम्मेदारी किसकी लेखक बाली स्तर सी गल जाये विज्ञान और व्यवस्था अगर हम किसी व्यवस्था के कारण एक गलत तरीके से यदि विज्ञान का सहारा लेते हैं तो वहाँ हमें जरूरी क्षति पहुंचती है । वी अधिक ज्ञान नामक शब्द से बना विज्ञान आज चहु और अपने पैर पसार रहा है तथा मानव जाति को अपने चंगुल में लगातार फंस जाता जा रहा है । विज्ञान एक और जहाँ मानव के लिए वरदान साबित हो रहा है वहीं दूसरी और इसका अभिशाप भी हमारे आस पास मौजूद है । अब बात ये आती है कि अगर विज्ञान वरदान है तो फिर इसके अभिशाप होने का क्या मतलब होता है । जिस किसी चीज का अगर कोई अभिशाप वरदान से बढकर हो जाए तब फिर उस चीज का वरदान स्वरूप माना ही नहीं जा सकता है क्योंकि जहाँ अभी शाह वरदान से बढकर है । इसके परिणाम यही है कि आज मोटरसाइकल अगर विज्ञान ने मनुष्य को वरदान स्वरूप प्रदान की है तो इससे कहीं ज्यादा पर्यावरण को प्रदूषण के रूप में काफी क्षति पहुंची है । ये बात हम सभी भलीभांति स्वीकार करते हैं कि मानव जाति के जीवन विन्यास के लिए पर्यावरण काफी मायने में कितना महत्वपूर्ण है । अगर हमारी सिख सुविधाओं के कारण पर्यावरण को क्षति पहुंचती है तो फिर वहां हम अपना ही नुकसान कर रहे होते हैं । हम इस हकीकत तो आखिर नजर अंदाज नहीं कर सकते कि मानव जीवन को अगर सिर्फ सुविधापूर्ण बिताना है तो थोडी बहुत पर्यावरण को परेशानी तो होगी ही । लेकिन जब हम जरूरत से ज्यादा वैज्ञानिक संसाधनों का उपयोग अपने जीवन में करने लगते हैं तब जरूर हमारी सुख सुविधा हमारे लिए ही बहुत बडी परेशानी का कारण बन जाती हैं । कंप्यूटर की अगर हम बात करें तो ये मानव लिहाज से काफी महत्वपूर्ण तो है ही साथ ही साथ कई परेशानियों को हल करने में भी इसकी महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती हैं । ये सब तभी तक अच्छा लगता है जब तक हम कंप्यूटर से संसाधनों का प्रयोग अपने जीवन में आवश्यकता के अनुसार करते हैं । इसके विपरीत अगर हम ऐसे संसाधनों पर पूरी तरह भी वर्ष हो जाएँ तब जरूर ही इन का दुष्परिणाम इतना भयंकर होता है कि हम कभी सोच भी नहीं सकते हैं । वैज्ञानिक संसाधन अगर इंसान को रोशनी प्रदान कर सकते हैं तो उन्हें रोशनी चीन ने में भी कोई ज्यादा वक्त नहीं लग सकता है । वैज्ञानि आज लगातार दुनिया को सुख सुविधापूर्ण बनाने में प्रयासरत है और मानव जीवन को किस तरीके से उन्नत बनाया जा सकता है, उनका ये सार्थक प्रयास में काफी अच्छा है । किन्तु बात यही आकर नहीं ठहरती । यदि विज्ञान हमें कोई चीज उपलब्ध करा रहा है और यदि हम उस चीज का उपयोग अपने लिए एक प्रकार से औषधि के रूप में प्रयोग करते हैं, तभी विज्ञान के द्वारा उपलब्ध कराए गए साधन हमें एक नया जीवन प्रदान कर सकते हैं । अन्यथा विज्ञान के दुष्परिणामों से भी हम अच्छी तरह से परीक्षित हैं । आज हर देश के पास परमाणु हथियार मौजूद हैं और ये हम सभी अच्छी तरह से जानते हैं कि परमाणु हथियारों का परिणाम क्या होता है । दैनिक समय में ही पूरी दुनिया नष्ट हो सकती है तथा कुछ समय में ही हमारा अस्तित्व भी मिल सकता है । अब अगर परमाणु हथियार सुरक्षा के लिहाज से ही बने हैं तो इनका परिणाम सुरक्षा की दृष्टि से घातक भी तो सिद्ध हो सकता है । विश्व के हर देश में कुछ इसी तरह के तबाही मचाने वाले वैज्ञानिक उपकरण मौजूद है जिनका अंजाम मानवीय दृष्टि से घातक ही हो सकता है । इसके सिवाय और कुछ भी नहीं । आज अगर हम विज्ञान के बारे में चाहे जितनी भी वार्तालाप करें तब भी हमारे सामने इसके अच्छे परिणामों के साथ साथ कुछ बुरे परिणाम भी प्रत्यक्ष रूप से आएंगे ही । इसलिए यही कहना उचित होगा कि विज्ञान के बढते कदमों से हमें कुछ लाभ होता है तो हमें उसे लाभ के नजरिए से ही अपनाना होगा । और अगर इसके कुछ गलत परिणाम भी हैं तो हमें उस नजरिये को अपनाने से बचना होगा । अभी ये मानव विकास संभव हो सकता है । कटाह विज्ञान का उपयोग हमें अपने फायदे के उद्देश्य से ही करना होगा । आज के समय में भारत सहित पूरा विश्व लगातार ही अपने अपने विकास में प्रयासरत है और ये सार्थक काम तभी संभव है जब हम नई नई चीजों का विकास करेंगे । इसलिए हमें अपने देश के संपूर्ण विकास के लिए आज के समय में कई वैज्ञानिक उपकरणों की आवश्यकता तो पडेगी किन्तु हमें इन वैज्ञानिक उपकरणों का प्रयोग केवल अपने फायदे के उद्देश्य से अथवा एक औषधि के रूप में करना चाहिए न कि जरूरत से ज्यादा विज्ञान और राजनीति । आज हम सभी भलीभांति ये जानते हैं कि जितना विकास आज के समय में विज्ञान के माध्यम से हो पाया है उतना तक किसी भी चीज से नहीं हो पाया । यहाँ हम विज्ञान को उचित ही ठहरायेंगे कि आज के भौतिक युग में ज्यादा से ज्यादा विकास विज्ञान के द्वारा बनाए गए उपकरणों से ही संभव हो सकता है । आज हम जिस युग में जी रहे हैं उसे हम यदि विज्ञान युक्तियों कहें तब भी हम कहीं से कहीं तक गलत साबित नहीं हो सकते हैं । आज चाहे कितनी भी जटिल से जटिल गन्ना क्यों ना हो, उसे हम क्षणभंगुर समय में ही हल करने का साहस अपने पास रखते हैं । इंसान की रेंगती हुई जिंदगी को आसमान के सफर तक ले जाने का श्रेय आज विज्ञान को ही दिया जाएगा और किसी भी चीज को नहीं । इस मशीनीकरण के युग ने आज हम अपने पुराने धीमी गति से होने वाले सभी कार्यों को तो इस तरीके से प्यार चुके हैं कि मानो हमने कभी कोई कार्य अपने हाथों से किया ही नहीं हो । इसकी वजह यही है कि हर एक मानव की झा लगातार बढती जाती है तथा नई नई चीजों का विकास का न तो मानव का शुरू से ही कार्य रहा है । शायद आज के समय में यही कारण रहा होगा कि अब हमारी राजनीति भी वैज्ञानिक उपकरणों से पूरी तरह से युक्त हो चुकी है । पहले के समय में हम किसी भी उम्मीदवार को चुनने के लिए अपने हाथ का अंगूठा स्याही से लगाया करते थे । लेकिन आज हम सिर्फ अपने अंगूठे से मशीन के बटन को दबाकर ही अपना उम्मीदवार चुन लेते हैं । में इसमें कोई भी गडबडी होने की संभावना नहीं लगती । इसीलिए राजनीति और विज्ञान के संबंध में यही कहना उचित होगा की जो पद्धति हमने विज्ञान की राजनीति के क्षेत्र में अपनाई हैं वास्तविकता में ही सराहनीय कार्य है । कहते हैं कि परिवर्तन ही संसार का नियम है । इसी परिवर्तन को मद्देनजर रखते हुए आगे के आने वाले समय में अब वो दिन भी दूर नहीं होगा जब हम राजनीति के क्षेत्र में भी पूरी तरह से संतुष्ट होंगे । और ये सब कुछ संभव हो सकेगा आगे आने वाले और भी अत्याधुनिक वैज्ञानिक उपकरणों से जिसके माध्यम से हम हर राजनीतिज्ञ की गतिविधियों पर पूरी नजर रख सकेंगे और एक गलत राजनीतिज्ञ को तुरंत ही सत्ता से बाहर कर सकेंगे । हमें से भलीभांति परिचित है कि अगर विज्ञान हमारे लिए कई तरह की सुख सुविधाएं प्रदान कर सकता है तो फिर हमारा अस्तित्व भी कुछ ही पलों में मिटाने की हिम्मत अपने पांच संजय रखता है । इसलिए ये हमारा कर्तव्य है कि हमें विज्ञान के लाभदायक पहलू को ही अपनाना होगा और इसके वितरीत । अगर वैज्ञानिक संसाधन हमें और हमारे प्राकृतिक संसाधनों को मिटाने वाले हैं तो हमें इसका उपयोग बंद करना होगा । इसीलिए यही कहना उचित होगा कि केवल हमें विज्ञान का प्रयोग एक सीमित दायरे में अपने फायदे के लिहाज से ही करना चाहिए । हमारी जिम्मेदारी है कि हमें वैज्ञानिक संसाधनों का प्रयोग अपने जीवन में मानव के प्राकृतिक संसाधनों को मद्देनजर रखते हुए करना चाहिए ।

Part 14

आप सुन रहे हैं कुक ऍम आरजेएम आया के साथ सुनी जम्मन चाहिए जिम्मेदारी किसकी लेखक बाली स्तर सी गुज्जर दिन प्रतिदिन बढती गरीबी और अमीरी लगातार बढती हुई गरीबी और अमीरी यही दर्शाती है कि दोनों चीजों में से अमेरिका पडा ज्यादा भारी है । वह समय बडा ही भाग्यशाली था जब भारत को सोने की चिडिया के नाम से पुकारा जाता था । वो इसलिए कि भारत में सबसे ज्यादा धन पाया जाता था । उस समय हर भारतीय के पास इतनी संपत्ति हुआ करती थी कि परिवार का भरण पोषण सभी सुख सुविधाओं के साथ आसानी पूर्वक हो जाया करता था तथा हर किसी का जीवन खुशहाली से भरा पूरा हुआ करता था । ना तो किसी को गरीब कहकर बेइज्जत किया जाता था और ना ही किसी को अमीर कहकर श्रीमान का दर्जा दिया जाता था । इसकी वजह यही थी कि उस समय इंसान को दर्जा उसकी बुद्धिमानी के लिए चार से प्राप्त हुआ करता था । जैसे कोई पंडित किसी से धन संपत्ति के मामले में थोडा कम है और यदि वह बुद्धिमान है तो उसको सभी ज्ञानी पंडित जी कहकर पुकारते थे । भारत देश की ये शुरू से ही परंपरा रही है कि हर इंसान को उसके जन्म के आधार पर नहीं बल्कि उसके कर्म के आधार पर सम्मान दिया जाता था । प्राचीन समय में भारतवासियों के पास इतना धन होने के बावजूद भी जिस सम्मान हमें देखने को मिलता था, वास्तव में एक प्रकार से हमें गौरवान्वित करने वाला कार्य हुआ करता था । हर किसी को बिल्कुल उचित महत्व देना यही प्रदर्शित करता है कि हमारे गुड हमारी सभ्यता को दर्शाते हैं । सोने की चिडिया कहलाने वाले भारत में अगर किसी के पास किसी चीज का अभाव हुआ करता था तो उसके आस पास रहने वाले लोग उस व्यक्ति की जरूर ही सहायता करते थे और उस समय हमें ये भी देखने को मिलता था कि लोग जो भी उत्सव त्यौहार मनाया करते थे, वह सब मिलजुलकर मनाते थे । वहाँ अमीरी तथा गरीबी का कोई महत्व नहीं था । अब यदि हम सोने की चिडिया कहलाने वाले आधुनिक भारत पर नजर डालें तो हमारी आंखों में जरूर ही अश्रुधारा बहने लेगी । जिस भारत में एक समय में अमीरी और गरीबी को कोई महत्व नहीं दिया जाता था, आज उसी भारत की ये हालत है कि आमिर और भी ज्यादा अमीर होता जा रहा है तथा गरीब और भी ज्यादा गरीब । आज जिस तरीके से अमीर और गरीब में जो भेदभाव वर्तमान में हमें दिखाई देता है । शायद ही इस तरीके का भेदभाव हमने पहले कभी देखा होगा । आज भी किसी गरीब घर में पैदा होने वाला विद्यार्थी किसी स्कूल या कॉलेज की फीस भरने में असमर्थ है । लाखों करोडों सालाना कमाने वाले शिक्षक उसे शिक्षा देने से इंकार कर देते हैं । वैसे भी हमारे लिए ये कोई नई बात नहीं है कि कई विद्यार्थी ऐसे होते हैं जो पढने में तो अमीर वर्ग के विद्यार्थियों से भी बुद्धिमान होते हैं किन्तु धन के अभाव में शिक्षा ग्रहण नहीं कर पाते हैं तथा अपनी गरीबी के कारण अपने आप पर पछतावा करते रहते हैं । आज के समय में जो आमिर अपने आपको अमीर मानते हैं वो शायद ये भूल जाते हैं कि गरीबों की मेहरबानी के कारण ही कोई अमीर बन पाता है । अन्यथा यदि गरीब लोग सहयोग नहीं करें तो कोई भी अमीर गरीब बन सकता है । चाहे बडे से बडे उद्योग धंधे हो, चाहे बडे से बडा व्यापार हो या फिर ऐसा कोई भी काम जहाँ मजदूर वर्ग के लोग काम करते हैं, हर का मजदूरों की वजह से चल पडता है । इसीलिए सोचना चाहिए कि इन मजदूरों की खून पसीने का ही परिणाम है कि आज हमारे पास उचित मात्रा में धन आता है और हम सर्वसुविधायुक्त जीवन यापन कर सकते हैं । दुःख तो वहाँ अधिक होने लगता है जब कोई मालिक अपने यहाँ काम करने वाले व्यक्ति को कमजोर समझकर डरता है क्योंकि हमारे यहाँ जो मजदूर काम करता है वह किसी ना किसी मजबूरी में ही काम करता है । यदि उसके पास पर्याप्त मात्रा में धन होता तो क्या वो हमारी बेवजह कि डाट फटकार को सहन कर पाता? बिल्कुल नहीं । बाल मजदूरी नहीं आज के समय में कोई नई बात नहीं है । ऐसे कई छोटे छोटे बच्चे होते हैं जिनकी जो उम्र खेलने कूदने की तथा पढने लिखने की होती है वो उस उम्र में मजदूरी कर रहे होते हैं । और जिस किसी इंसान के यहाँ बच्चे मजदूरी करते हैं उस लखपति सेठ जी को उन पर इतनी भी दया नहीं आती हैं कि यदि कोई बच्चा अपनी पढाई लिखाई की खर्च के कारण मजदूरी कर रहा है तो वह उसे मानवता के हिसाब से पढने लिखने का खर्च देखकर उस पर अपनी कृपादृष्टि बनाये रखें । लेकिन वर्तमान में ऐसा होता ही कहाँ है कि यदि कोई बच्चा अपने पढाई की फीस भरने के चक्कर में मजदूरी कर रहा हो और हम उसे बिना मजदूरी के लिए पढाई की फीस दे रहें ऐसा कुछ नहीं कर सकता है जो शिक्षा को महत्व देता हूँ । गरीबी की मार आज जिस तरह से बेबस इंसान झेल रहा है उससे तो यही लगता है कि शायद अब मानवता बच्चे ही ना हो । उदाहरण के तौर पर अगर हम देखें तो पाएंगे कि ऐसे कई डॉक्टर होते हैं जो फीस देने के अभाव में किसी गरीब व्यक्ति का उपचार करने से इनकार कर देती हूँ । जिस डॉक्टर को भगवान का दर्जा दिया जाता है वो सिर्फ चंद पैसों की खाते रहे किसी गरीब व्यक्ति का मुफ्त में इलाज करने से इंकार कर देते हैं । क्या यही हमारी वो मानवता है जिसे की हर वर्ग का मानव चाहे अमीर हो, चाहे गरीब ईश्वर का दर्जा देता है और हम उन्ही लोगों के साथ में धान की खाते भेदभाव कर बैठते हैं और एक डॉक्टर होने के नाते किसी गरीब को न चाहते हुए भी मौत के मुंह में ढकेल देते हैं । ऐसी कई घटनाएं आज दिन प्रतिदिन घटित होती रहती हैं कि कई गरीब समुदाय के लोगों के साथ इतना अन्याय किया जाता है कि मानव मानव कहलाने के लायक नहीं रह जाता है । आज ही कोई नई बात नहीं है कि कई अपराधी ऐसे होते हैं जो गरीबों पर अत्याचार करने के बाद भी कोर्ट कचहरी, पुलिस थाना जेल आधे से पैसे के दम पर बिना सजा पाएं आजाद हो जाते हैं और उच्च पदस्थ अधिकारीवर्ग भी पैसों के लालच में एक अमीर को रिहा कर के अपने पद को अपमानित करने के साथ साथ गरीब फरियादी को दो हजार जख्म दे बैठते हैं । इस से तो यही अंदाजा लगाया जा सकता है कि आज के समय में जब महत्व पैसे को दिया जा रहा है, उसकी तुलना में तो मानवता का कोई भी स्थान विशेष नहीं बचा । सीधी सी बात तो यही है कि अगर कोई व्यक्ति धन के लालच में अपने पद का दुरुपयोग करता है तो वहाँ मानवता तो स्वता ही नष्ट हो जाती हैं । चाहे फिर कोई व्यक्ति निजी सिंहासन पर बैठा हो या फिर सरकारी सिंहासन पर कर्तव्य तो सबका यही बनता है कि हम जिस जगह जिस सिंहासन पर विराजमान है, उसका सही तरीके से उपयोग किया जाए, ताकि उस पर विशेष की गरिमा बरकरार रहे । अन्यथा परिणाम यहीं देखने को मिलता है कि यदि कोई पुलिस अधिकारी अमीर बनने के लालच में आम जनता से रिश्वत रूपी भीख मांगता हुआ पाया जाता है तो सब लोग उसकी खाकीवर्दी को रिश्वतखोर का नाम देकर बदनाम कर देते हैं । ऐसा करने से न केवल पूरे पुलिस वाले बन नाम हो जाते हैं बल्कि कुछ अच्छे पुलिस वालों को भी हमारी गलतियों की सजा भुगतनी पडती हैं । यानी कि इसको मद्देनजर रखते हुए हम यही कह सकते हैं कि अक्सर लोग ज्यादा से ज्यादा धन कमाने के चक्कर में अपने पद तक को अपमानिक कर बैठते हैं । ये इसी तरीके से अमीर बनने के लालच का कारण है कि हर तरफ भ्रष्टाचार पनप रहा है । कई व्यापारी मिलावट खोरी करते नजर आ रहे हैं । कहीं सरकारी रुपये गरीबों में न बाटकर सरकारी लोग आपस में ही बांध कर खा लेते हैं । इससे हो न हो, देश का विकास तो होने वाला नहीं, लेकिन आमिर लेकिन अमीरों का विकास तो जरूर हो रहा है । यह में जरूरी आश्चर्य में डालने वाली बात है कि आज के ऐसे माहौल में यदि हमने धन का लालच अपनी सोच से नहीं मिटाया तो आगे चलकर हमारे इस तरह की सोच हमें इतना शर्मसार कर देगी कि हम अपना सर ठीक से उठा भी नहीं पाएंगे । आवश्यकता से ज्यादा धन अर्जित करना न सिर्फ हमें घमंड पैदा करता है, बल्कि हमारे विनाश का कारण भी कभी कभी बंद ही जाता है । भारत की आज इसी सोच का परिणाम है कि विदेशियों द्वारा कई बार भारत पर आक्रमण किया गया है और कई गुना हमारा भारतीय धन विदेशी लोगों की तिजोरियों में हमेशा के लिए बंद हो गया है । इतना सब कुछ जानते हुए भी हम आज भी अपने स्वार्थ की खाते गरीब को और गरीब तथा गरीब के धन से अमीर को और भी ज्यादा अमीर बनाने में कोई कसर नहीं छोड रहे हैं । आज कालाधन का बढता संचालन यही दर्शाता है कि लोग अब कितनी बेईमानी पर उतारू है कि अपने देश का रुपया अन्य देशों के बैंकों में पहुंचा रहे हैं और अपने ही देश को कंगाली के उस मोड पर खडा करने में कोई कमी नहीं छोड रहे हैं जहाँ आने वाले समय में हमें धन के अभाव में दर दर की ठोकरे खानी पडे । इसीलिए यही कहना उचित होगा की अगर हम भारत को फिर से सोने की चिडिया बनाना चाहते हैं तो हमें अपना लाल की स्वभाव छोडना ही होगा । अगर हम अपना लाल किस वजह छोड देंगे तो फिर हम अमीर गरीब का भेद भाव की बिना हर किसी को समान महत्व देंगे । और फिर भारत का हर नागरिक शिक्षा से सराबोर होकर भारत जैसे महान देश को उसकी खोई हुई पहचान दिलाने में कोई कमी कोई कसर नहीं छोडेगा । फिर भारत तो सोने की चिडिया और विश्वगुरु जो होने का ही ठहरा । गरीबी, अमीरी और राजनीति अ मेरी एक और जहाँ एक राजनीतिज्ञ के लिए आज के समय अतिमहत्वपूर्ण मानी जाती है, वहीं दूसरी और गरीबी एक कुशल गरीब राजनीतिज्ञ के लिए किसी अभिशाप से कम नहीं है । आज हम देखते हैं कि चुनाव प्रचार के दौरान जितना धन एक राजनीति ये द्वारा खर्च किया जाता है उतना धन तो अन्य किसी भी चीज पर खर्च नहीं किया जाता । ऐसी स्थिति में चुनाव प्रचार के दौरान फिजूल खर्च करने वाले राजनीतिज्ञ को हम क्या कहेंगे? एक अमीर राजनीतिज्ञ या एक देशभक्त राजनीति? क्या ये निश्चित ही है कि जितना धन चुनाव प्रचार में खर्च किया जाता है उतने ही धन से कितनी ही गरीब बच्चों के लिए स्कूलों का निर्माण कराया जा सकता है । लेकिन ऐसा होता कहा है । यहाँ एक प्रश्न यह भी खडा होता है जब चुनाव उम्मीदवारों का संपत्ति के ब्यौरे का फॉर्म भरा जाता है । उस समय कई उम्मीदवारों की इतनी संपत्ति तो नहीं होती है जितनी संपत्ति उपचुनावों के दौरान खर्च करते हैं । फिर चुनावों में जो धन उम्मीदवारों द्वारा खर्च किया जाता है वह धन उनके पास आता कहाँ से हैं? वहीं दूसरी और आज यदि एक गरीब घर का कोई ईमानदार व्यक्ति चुनावी सभा में खडा हो भी जाता है, धन के अभाव में वह कहीं न कहीं पीछे ही रह जाता है । ऐसा होता ही इसलिए है कि उस गरीब उम्मीदवार के पास इतना धन नहीं होता है कि वह आज की जनता के सामने आधुनिक तरीके से अपना प्रचार प्रसार कर सकें । इसके साथ ही साथ उस गरीब के पास में इतना भी कुछ नहीं होता है कि वह चुनावी सलाह के दौरान जनता को लुभाने के लिए भरपेट खाना खिला सके । लोई और कम्बल बांट सके इसका अंततः यही परिणाम होता है कि कई कुशल उम्मीदवार अपनी गरीबी के अभाव में चुनाव हार जाते हैं और कई बेईमान अमीर उम्मीदवार जनता को पैसों के दम पर लुभाकर चुनाव जीत जाते हैं । ऐसी स्थिति में पूरी की पूरी गलती जनता की मानी जानी चाहिए कि हम एक कुशल उम्मीदवार की योग्यता का पता नहीं कर पाते हैं और थोडे से धन के लालच तथा लुभावने विज्ञापनों के चक्कर में पढकर अपना मत एक गलत जगह डाल कर अपना और अपने देश का भविष्य खतरे में डाल देते हैं । आज हम अमीरी और गरीबी की बरी भाषा से भलीभांति परिचित है कि अमीरी और गरीबी का भेदभाव एक और जहां मानवता को मिटा रहा है, वहीं दूसरी और हमारे देश की बदनामी का भी कारण बन रहा है । अगर हम वास्तविकता में भारत को फिर से विश्वगुरु तथा सोने की चिडिया बनाना चाहते हैं तो हमें सबसे पहले जो जिम्मेदारी मिली हुई है, उसे उचित तरीके से मानवता के लिहाज से निभाना होगा तथा अमीरी गरीबी के लालच, रुपये दानों को अपने दिल और दिमाग से हमेशा के लिए मिटाना होगा । यदि हम ऐसा कर सकते हैं तो इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत के तो शुरू से ही अच्छे दिल रहे हैं । अगर हम अपनी जिम्मेदारियों को ठीक ढंग से निभाएं तो

Part 15

आज सुन रहे हैं कुछ पॅन आरजे माय के साथ सुनी जमीन चाहे जिम्मेदारी किसकी लेखक बाली स्तर सी गुज्जर स्वच्छ भारत स्वस्थ भारत जिम्मेदारी किसकी एक कदम स्वच्छता की ओर हमें इस पर विश्वास करना ही होगा कि जहां स्वच्छता होती है वहां देवता भी वास करते हैं । स्वच्छता का नाम सुनते ही हमारे सामने ऐसा माहौल उपस् थित हो जाता है जहाँ चार और खुशहाली भरा जीवन हो । स्वच्छता एक मायने में जहाँ होती है वो जगह किसी स्वर्ग से कम नहीं होती है । स्वच्छ जगह पर निवास करने वाले लोगों का जीवन भी स्वर्ग के समान हस्ता खेलता हुआ होता है । हम भी अक्सर नरक और स्वर्ग की व्याख्या स्वयं अपनी ही विमान से करते हुए नजर आते हैं कि जहाँ गंदा माहौल होता है उसकी तुलना हम नरक से करते हैं और जहाँ स्वच्छ माहौल होता है वहां हम उस जगह को तुरंत ही स्वर्ग कहकर सम्मानित किया करते हैं । और वैसे भी हो भी क्यों ना जहाँ स्वच्छ वातावरण होता है वहां स्वच्छ माहौल तो वो नहीं हैं । इसमें कोई संदेह नहीं है कि जहां स्वच्छता पाई जाती है वहाँ पर निवास करने वाले प्राणियों का जीवन स्वस्थ पाया जाता है । वैज्ञानिक दृष्टि से अगर हम देखिए तो ज्यादातर बीमारियाँ तो स्वच्छता के अभाव में ही फैलती हैं । यानि की हमारे आस पास उपस् थित माहौली हमारे स्वस्थ जीवन का आधार हैं । यदि हमारे चार और का वातावरण गन्ना है तो हमारे स्वास्थ्य पर इसका प्रभाव जरूर ही कहीं न कहीं दिखाई देगा । एक और जहां स्वच्छता हमारी जिंदगी को स्वच्छ बनाती हैं, वहीं दूसरी और हमारे देश की गरिमा को भी गौरवान्वित करती है । अगर हम इस बात को अपने ऊपर ही लेकर समझे तो हम पाएंगे कि यदि हम किसी भी देश में कहीं घूमने के उद्देश्य से जाते हैं और अगर वहाँ पर साफ सफाई हमें दिखाई देती है तो हम यही कहते हैं । तो ये देश वास्तव में ही अच्छा है । ये एक वास्तविक हकीकत ही है कि जहाँ भी साफ सफाई होती है वहाँ पर सुंदरता तो स्वतः ही उत्पन्न हो जाती हैं । अगर हम भारत देश की ही बात करें तो जो जगह साफ सुथरी होती है तो वहाँ पर एक अलग ही माहौल हमें दिखाई देता है । यदि किसी रेलवे स्टेशन पर गंदगी है तो हम यही कहते हैं कि ये स्टेशन बहुत ही बनना है । फिर वो स्टेशन किसी राजधानी का ही क्यों न हो । इसके विपरीत यदि किसी छोटी सी । सी । टी । का रेलवे स्टेशन स्वच्छ है तो हम उसकी जमकर तारीफ करते हैं । यानी कि अगर किसी छोटे से गांव कस्बे में सात सफाई होती हैं तो वह जगह अपनी सुंदरता के कारण हर किसी को अपनी और आकर्षित कर ही लेती है । विदेशी जगहों से आने वाले पर्यटकों की संख्या यही दर जाती है कि जहाँ वह जाते हैं वो तो सिर्फ उस जगह के अच्छे माहौल के कारण ये जाते हैं । भारत देश में जो विदेशी पर्यटक घूमने के उद्देश्य से आते हैं वो तो सबसे पहले हमारे भारत देश में स्वच्छता का माहौल देखते हैं । यदि हमारे देश में हर तरफ साफ सफाई है तो विदेशी लोग अपने देश में जाकर भारत की जरूरी सराहना करते हैं । इसीलिए यही कहा जा सकता है कि किसी देश की सुंदरता उस देश के स्वच्छ माहौल पर ही निर्भर करती है । आज कुछ कुछ जगहों पर हम देखते हैं कि इतनी गंदगी होती है कि वहाँ पर इंसान तो क्या जानवर भी जाने से कतराते हैं । हकीकत तो यही है कि हम लोगों के कारण ही कोई भी जगह स्वर बन जाती है और कोई भी जगह नर्क बन जाती हैं । आजकल तो ये आम बात हो गई है कि हम लोगों की चलती फिरती सडकों पर कोई भी चीज किसी भी जगह फेंक देते हैं । इसका परिणाम यही होता है कि हमें देखकर अन्य लोग भी ऐसा करने लगते हैं । फिर धीरे धीरे गंदगी का ढेर इकट्ठा होने लग जाता है और इस कारण हर जगह दोषी माहौल उभर आता है । उसके बाद कई बीमारियाँ आने को ये ठहरी अभी हाल ही में वर्ष में स्वच्छ भारत के उद्देश्य से भारतीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ही द्वारा शुरू किया गया कार्यक्रम स्वच्छ भारत, स्वस्थ भारत यही दर्शाता है कि हमारे देश में स्वच्छता का माहौल तब तक नहीं बन सकता है जब तक हम जागरूक नहीं होंगे । भारतीय होने के नाते भारत देश को स्वच्छ रखने की जिम्मेदारी हम सभी नागरिकों की होनी चाहिए, फिर चाहे हम अमीर हो या गरीब । क्योंकि स्वच्छता अस्वस्थता एक तरफ जहां गरीब लोगों के लिए जरूरी है तो उतनी ही इसकी जरूरत एक आमिर इंसान को भी होती है । इसलिए स्वच्छता के लिहाज से हमें अपनी जाति, वर्ग, समुदाय को बीच में नहीं लाना चाहिए कि हम बडे हैं या छोटे हैं । ये तो हर किसी का कर्तव्य है कि अगर हम स्वस्थ रहना चाहते हैं तो स्वच्छता को प्राथमिकता हमें देनी ही पडेगी तभी हमारे देश का और हमारा स्वास्थ्य ठीक रह सकेगा । इसमें कोई संदेह नहीं है कि जो देश स्वच्छ होगा वह जिम्मेदार नागरिकों का देश होगा । इसीलिए अगर हम अपने देश को सुन्दर, स्वच्छ तथा स्वस्थ बनाना चाहते हैं तो हम सबको स्वच्छता को प्राथमिकता देनी ही होगी । स्वच्छता और राजनीति अभी हाल ही में वर्ष में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी द्वारा स्वच्छ भारत के उद्देश्य से शुरू किया गया अभियान स्वच्छ भारत, स्वस्थ भारत बडा ही सराहनीय कार्य माना गया । ये निश्चित है की ऐसे कार्यक्रम यदि भारत देश में पहले से तय किए जाते तो इसमें कोई संदेह नहीं था कि अभी तक तो भारत का नारा पूरे विश्व भर में गूंजने लगता है । ऐसा इसलिए क्योंकि भारतीय विरासत की एक अलग ही पहचान संपूर्ण विश्व भर में एक अनूठे ढंग से रही है । इसकी सबसे बडी वजह यही है कि भारत ने सारे संसार को शिक्षा का पाठ पढाया और इस तरह संसार के लोगों को जीवन जीने की प्रेरणा भी दी । कहते हैं कि समय के साथ साथ हर चीज बदल जाती है किन्तु फर्क वहाँ पडता है जब हम समय के बदलाव में अपनी जिम्मेदारियों को भूल जाती हूँ । यह कडवी हकीकत ही मानी जानी चाहिए कि जब हम अपने आवश्यकताओं को लगातार बढाते जाते हैं उतनी ही हमारी कई जिम्मेदारियाँ भी बढ जाती है । यदि हम समय के बदलाव की लहर में अपनी जिम्मेदारियों को ठीक ढंग से निभाते जाएँ तो वहाँ बदलाव का होना उचित माना जाएगा और यदि इसके विपरीत ये समय के बदलाव में अपनी जिम्मेदारी से कहीं भटक जाए तो निश्चित ही वहाँ बदलाव को उचित नहीं ठहराया जा सकता है । स्वच्छ भारत स्वस्थ भारत कार्यक्रम भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा शुरू करने का शायद यही कारण रहा होगा कि भारतीय जनता की जितनी आवश्यकताएं लगातार बढ रही है उस हिसाब से जिम्मेदारी बढ नहीं रही है । यदि भारतीय जनता अपनी आवश्यकता के अनुसार अपनी जिम्मेदारियों को निभाती तो आज प्रधानमंत्री को भारतीय जनता को जागरूक करने के हिसाब से स्वच्छ भारत नामक कार्यक्रम नहीं चलाना पडता । आखिर में स्वच्छ भारत के उद्देश्य से जब कार्यक्रम प्रधानमंत्री द्वारा शुरू किया गया है, उसे हम एक जिम्मेदार प्रधानमंत्री का कर्तव्य ही मानेंगे । ऐसा इसलिए है क्योंकि आज तक किसी भी राजनेता या मंत्री ने भारत देश की छोटी छोटी बातों पर इतना गौर नहीं किया जितना कि तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने किया है । आज ही यदि स्वच्छ भारत के उद्देश्य से जब कार्यक्रम चलाया जा रहा है और यदि उस पर किसी राजनीतिज्ञ द्वारा कोई राजनीतिक की जाए तो वहाँ राजनीति को उचित नहीं ठहराया जा सकता है क्योंकि जब बार देश हित की आती हो तो वहाँ की जाने वाली राजनीति को देश के विकास में अवरोध पैदा करने वाली राजनीति ही मानी जाएगी । एक मानवीय सोच से तो यही कहना उचित होगा कि स्वच्छ भारत अभियान के नाम से जिस कार्यक्रम भारतीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी द्वारा शुरू किया गया है, उसमें हमें प्रधानमंत्री का साथ देना ही चाहिए । भारत के हर एक नागरिक को और हर एक राजनीतिज्ञ को क्योंकि ये देश अकेले प्रधानमंत्री का नहीं है बल्कि ये देश हर भारतीय नागरिक और हर एक भारतीय राजनेता का भी देश है । इसीलिए हम सभी को भेदभाव की बिना अपने देश को स्वच्छ बनाने में प्रधानमंत्री का साथ तो देना ही चाहिए । ये निश्चित ही है कि इस तरीके से किया गया हरकार ये एक जिम्मेदार नागरिक तक कार्य कहलाएगा । निफ्टी ही दिन प्रतिदिन की भागदौड भरी जिंदगी में हमारे

Part 16

आप सुन रहे हैं कुक ऍम आरजेएम आया के साथ सुनी जब मन चाहे जिम्मेदारी किसकी लेखक बाली स्तर सी गुज्जर धारा तीन सौ से जूझता कश्मीर रूपी स्वर्ग । इसमें कोई संदेह नहीं है कि जहाँ स्वर्ग होते हुए भी यदि हम स्वर्ग की महत्ता को नहीं समझ पाते हैं तो वहाँ हम नारकीय जिंदगी बिता रहे होते हैं । संपूर्ण विश्व में ऐसी कई जगह मौजूद हैं, जहाँ आसमान से बर्फ गिरती हो और जिलों में मीठे पानी की धारा प्रवाहित होती हो । ऐसे वातावरण में जब हमारे सामने कश्मीर का नाम आ जाता है तो हम पूरे विश्व की जगहों को भूल बैठते हैं और फिर हमारे सारी की सारी इंद्रियां स्वतः ही कश्मीर नामक शब्द पर केंद्रित होती है । ऐसी स्थिति में यही कहा जा सकता है कि जब कश्मीर का नाम सुनते ही हमारा पूरा ध्यान कश्मीर की और आकर्षित होता है तो फिर यदि हम कश्मीर को प्रत्यक्ष रूप से देखी, तब तो हमारा पूरा मन मस्तिष्क की प्रफुल्लित हो उठेगा । हमारे सोचने विचारने की क्षमता के आधार पर ही आज भी हम भारत में एक राज्य के रूप में विद्यमान कश्मीर को धरती का स्वर्ग कहकर सबसे बडा दर्जा देते हैं, क्योंकि स्वर्ग उसी जगह को कहा जा सकता है जिस वर्ग कहलाने के लायक होती है । शायद यही कारण रहा है कि कश्मीर में स्वर्ग जैसी खूबियों को देखते हुए आज भी पूरा विश्व भारत में स्थित कश्मीर को भारत की धरती का स्वर्ग न कहकर संपूर्ण धरती का स्वर्ग मानता है । संपूर्ण विश्व की दृष्टि में कश्मीर के अलावा ऐसी कोई जगह नहीं है जिसे लोग स्वर्ग का दल जात दे सके । ये बात इस बात का साक्षात उदाहरण पेश करती है कि इस कश्मीर में बारह महीने गिरने वाली बर्फ का परिणाम ही है कि बर्फ गिरने के साथ साथ कश्मीर में भगवान शिव की प्राकृतिक बर्फ की पिंडी साल में एक बार निकलती हैं जिससे कि लोग अमरनाथ धाम के नाम से पुकारते हैं । इससे बडा उदाहरण कश्मीर के इस वर्ग होने का भला और क्या हो सकता है कि उस जगह पर प्राकृतिक रूप से भगवान की मौजूदगी हर साल में एक बार हमें दिखाई देती हो और लाखों की संख्या में लोग उस जगह के दर्शन करने भी आ जाती हूँ । है हकीकत जो भी हो लेकिन धरती पर निवास करने वाले सभी लोगों ने एकमत होकर जिस उद्देश्य से कश्मीर को स्वर्ग का दर्जा दिया है, उसमें जरूर ही कुछ न कुछ सच्चाई होगी ना । जब सभी लोग मिलकर किसी चीज को कुल विशेष दर्जा देते हैं तो दर्जा प्राप्त चीज ने जरूरी हकीकत होती है तभी उससे सभी लोग सहमत नजर आते हैं । अगर हम कश्मीर के संपूर्ण इतिहास पर नजर डालें तो ज्यादातर परिस्थितियों में हमें ऐसी कोई भी को रीति नजर नहीं आएगी जिसमें की हमें लगता हो कि कश्मीरी को कोई ठेस पहुंची हो । इसके अलावा जो छोटे बडे अत्याचार होते रहते हैं, मोटर समय की घटनाएं होती हैं जो कि समय के रहते स्वतः ही मिल जाती है । इसीलिए कश्मीर के सभी पहलुओं पर अगर हम ध्यान दें तो भारत के गुलाम होने पर भी कश्मीर जैसी स्वर्गीय जगह पर गुलामी का भी कोई ज्यादा असर नहीं हुआ । लेकिन भारत के संपूर्ण इतिहास की हम अगर बात करें तो हम पाएंगे की गुलामी के पहले वाला भारत भी स्वतंत्र कहलाता था और गुलामी के बाद वाला भारत भी स्वतंत्र कहलाता है । केंद्रीय दी हम संपूर्ण भारत की स्वतंत्रता पर प्रकाश डाले तो हमें बहुत ज्यादा भिन्नता नजर आएगी । वो इसलिए की गुलामी के पहले ही स्वतंत्रता यह दर्शाती हैं कि उस समय पूरा भारत और पूरे भारत के लोग आजाद थे । लेकिन गुलामी के बाद की स्वतंत्रता पर हम नजर डालें । हम पाएंगे की गुलामी के बाद की स्वतंत्रता में भारत का सिर्फ एक छोटा सा टुकडा ही स्वतंत्र हुआ है, जिसे हम हिंदुस्तान नाम से भी बुक आते हैं । अगर भारत के हिंदुस्तान नामक हिस्से को आजादी भी मिली तो वह भी कई नियमों में बंद कर मिली । यदि हमने उन नियमों का उल्लंघन किया तो हमें उसकी सजा भी तुरंत ही मिल जाएगी । ऐसी स्थिति में तो यही कहा जा सकता है कि हम भारत के छोटे से हिस्से में रहने वाले लोग आज भी उन नियम कानूनों के गुलाम है जो हमारी पूर्ण स्वतंत्रता में बाधक बने हुए हैं । इसके अलावा यदि हम भारत की गरिमा बढाने वाले आधुनिक कश्मीर पर नजर डालें तो हमारी आंखों के सामने कश्मीर की छवि उभर कर आएगी । जिसका कभी न तो हमने और नहीं कश्मीर ने अनुमान लगाया होगा । जो कश्मीर अखंड भारत का मुख्य केंद्र बिंदु बना हुआ करता था तथा हर इंसान को अपनी महक से आकर्षित किया करता था, आज वही कश्मीर आतंक के केंद्र बिंदु के रूप में अपनी पहचान बना चुका है । अब उसकी महक इतनी भयंकर हो चुकी हैं कि जो कभी लोगों को आकर्षित किया करती थी । आज उस महक को महसूस होने पर भी हर इंसान उससे किनारा कर लेता है क्योंकि वर्तमान में कश्मीर का माहौल ही कुछ ऐसा बन चुका है कि चारों ही तरफ सिर्फ बंदूक की गोलियां और तोपों की धुन सुनाई देती है । आज के समय में आज के समय में कश्मीर की उस जगह को बडा ही भाग्यशाली समझा जाएगा जिस जगह पर किसी मंदिर की घंटे की आवाज सुनाई देती हो । भारत जैसे अखंड देश को कई टुकडों में बांटने वाले लोगों का मन जब भारत के कई टुकडे करने के बाद भी नहीं भरा तो उन्होंने मानवता की इतनी ने पार कर ली कि वह कश्मीर को भी कई हिस्सों में बातचीत के । जब बात यही तक नहीं ठहरी तो जो कश्मीर हिंदुस्तान रुपये भारत के हिस्से में आया उस पर भी अपनी दुर्गंध रूपीज शाही से धारा तीन सौ सत्तर की मोहर लगा दी और ये आम जनता को बता ही दिया कि भारत भाग्य विधाता कहलाने वाला भारत अब कभी किसी का भाग्य नहीं बचा पाएगा क्योंकि अब वह हमेशा ही अपने भाग्य पर रोता हुआ नजर आएगा । चाहे फिर तुम आपने मन की शांति के लिए स्वयं को स्वतंत्र मान लो लेकिन जब वास्तविक स्वतंत्रता है वो तो भारत के पास रहने वाली है और न ही भारत के लोगों के पास । भारत में लगातार बढती राजनयिक साजिशों के कारण न तो हम ठीक ढंग से आजाद हो पाये हैं और नहीं हमारा भारत देश । भारत के संविधान को पूरे विश्व के संविधानों में विशाल संविधान माना जाता है, जिसमें हर तरह के लोगों का भविष्य विद्यमान हैं । इंसान के जन्म से लेकर मृत्यु होने तक के नियम कानून भी हमें इस प्रकार से देखने मिल जाते हैं कि मानो अब हमारी संविधान के अनुसार चलने की जैसे मजबूरी ही बन गई हो । ठीक इसी तरह की मजबूरी हमारे कश्मीर की भी है कि कोई चार पांच पन्नों में ही धारा के रूप में कश्मीर का भविष्य तय कर दिया गया हो और उस पर धारा की मुहर तो इस प्रकार से लगा दी गई कि मानव अब वह कभी भी नहीं मिल सकती हो । कुल मिलाकर अगर सही बात हम करें तो धारा के हटने की मुख्य वजह है तो सिर्फ राजनीतिक उथल पुथल और राजनीति करने वालों का वोटबैंक वाला सिद्धांत भारत में वर्तमान में मौजूद है । ऐसे कई राजनयिक दल हैं जिनके कारण न तब भारतीयों का विकास

Part 17

आज से नहीं कुक ऍम आरजे माया के साथ सुनी । जो मन चाहे जिम्मेदारी किसकी लेखक बाली स्तर सी गुज्जर माना कलयुग पर जिम्मेदार कौन? इसमें कोई संदेह नहीं है कि जमानी समाज कलयुग में हैं । वहीं सत्युग में भी था अगर कलयुग है तो ये कहीं न कहीं मानवीय सोच के कारण ही है । हमें इस बात से बिल्कुल सहमत हो सकते हैं कि वर्तमान का समय कलयुग रूपी समय है किंतु यहाँ प्रश्न खडा होता है कि इस कलयुग की उत्पत्ति कैसे हुई । ऐसी हमारे कौन सी क्रियाएं हैं जिन्होंने प्रारंभ से लेकर अभी तक निरंतर उसी गति से चलने वाले समय को कलयुग का नाम दे दिया है । सीधा सा जवाब यही है कि जो समय द्वापर युग, त्रेतायुग, सतयुग में था वहीं समय आज भी है जो सूरज चंद्रमा सतीश में थे वो आज भी मौजूद हैं । फिर कलयुग का असर इन सभी पर क्यों नहीं देखता मानवीय क्यों इससे पीडित समय चलता है । अगर कलयुग होता तो चंद्रमा गर्मी उत्पन्न करता तथा सूरज धुंधला सा नजर आता है । लेकिन यहाँ तो हमें सभी प्राकृतिक चीजें वैसे ही दिखाई देती हैं जो अन्य युवाओं में वित्तीय मान थी । हाँ इसके साथ एक ही ये जरूर कहा जा सकता है कि अगर कलयुग ने अपना असर डाला है तो सिर्फ प्राणियों पर ही डाला है वह भी उनकी गलतियों के कारण । क्योंकि कलयुग नाम को जन्म देने वाला तो मानव ही है । यही कारण है कि कल यू की काली छाया सिर्फ मानव जाति पर ही दिखाई देती है अन्य किसी अन्य किसी प्राणी जगत अथवा किसी प्राकृतिक चीज पर नहीं । सत्य में ऐसा माना जाता था कि मनुष्य का कर्तव्य होता है जो किसी को क्षति नहीं पहुंचाता हो तथा मानव द्वारा किया गया हर कार्य मानव कल्याण ही होना चाहिए था । इसी वजह से मानव की श्रीष्टि क्रियाओं के कारण सत्य युगीन समय सत्युग कहलाता था । जब मानव अपने कर्तव्य मार्ग से निरंतर भटक गया तब ये स्थिति उत्पन्न हुई । उसे एक नया नाम कलयुग दे दिया गया । फिर क्या था कलयुग का राग छेड छेड कर कुछ अच्छे लोग भी अपने स्वार्थ हित को जन्म देने लगे और धीरे धीरे आज ये स्थिति उत्पन्न होने लगी कि मानव चाहते हुए भी अपना अफसोस नहीं जानता । पार रहा है तथा निरंतर कल युगीन जाल में फंसता जा रहा है । आज स्थिति इस तरीके के उत्पन्न हो चुकी है कि कई धर्मात्मा भी अब अपने स्वार्थ के कारण अपनी नैतिकता को भूल बैठे हैं और सुर से सुर मिलाकर कलयुग के विनाशकारी पहलू को अपनी और खींच रहे हैं । मजबूरी की व्यवस्था का उदाहरण देने वाली फिसल पडे तो हर हर गंगे नामक कहावत आज लगभग सभी पर सटीक बैठती हुई नजर आती है । इसका साक्षात उदाहरण यही है कि कई जगह धर्म का चोला पहनने वाले कई पुजारी धर्म के नाम पर धंधा करते हैं तो कहीं जनता की सेवा करने वाले राजनीतिज्ञ अपने स्वार्थ ईटकी खाते, झूठा वादा करते झूठा वादा जनता से करते हुए नजर आते हैं तो कहीं अपना कर्तव्य ठीक ढंग से निभाने वाली मानव जाति चंद रुपयों की खाते झूठे राजनीतिज्ञों की बातों में आकर अपना ईमान तक बेचते हुए नजर आती हैं । यानी कि हम ये कह सकते हैं कि हमने कलयुग रूपी लहर में ईश्वर तक पर कि चढ उछालने में कोई कमी कोई कसर नहीं छोडी हैं । मानव का हित फिर बार की बात होती है । जिस ईश्वर को हम सभी हिरदय में रमा हुआ मानते हैं, आज हमने उसी के प्रति नफरत फैला रखी है । ये कोई नई बात नहीं है कि आज के समय हर धर्म का एक नया पेशेवर बन जाता है तथा सभी धर्म अपने ईश्वर को ही महत्व देने लगते हैं । इससे तो यही कहा जा सकता है कि शायद इस दुनिया के निर्माण में कई ईश्वरों की भूमि कर रही होगी । जो ज्ञान किसी संत महात्मा द्वारा मानव जाति को उनके कल्याण के हिस्से दिया जाता था, आज उसी ज्ञान का मूल्य धन के रूप में निर्धारित होते थे । शायद ईश्वर को भी शर्म आती होगी । जो काम एक राजनेता का जनता और देश के प्रति होता था आज वही काम राजनेता के स्वार्थ की हत्या चढ गया है । जिस जल को पहले लोग धरती की माँ का दूध मानते थे, आज वही जल अपने किए का पछतावा कर रहा है । और तो और जिस धरती को लोग अपनी माँ का दर्जा दिया करते थे, आज वही लोग उसी धरती पर कई तरह के अन्याय और अत्याचार कर रहे हैं । इससे यही अंदाजा लगाया जा सकता है कि जितनी भी प्राकृतिक घटनाएं इस कलयुग में घटित होती है, वह शायद मानव को सुधारने के लिहाज से ही घटित होती होंगी कि तुम्हारे किए का परिणाम आज तुम्हारे सामने प्रत्यक्ष मौजूद हैं । जिस तरीके से प्रकृति अपना विनाशकारी रूप वर्तमान में हमें दिखा रही है, इससे पहले किसी भी युग ने उसने अपना ऐसा चेहरा नहीं दिखाया । अच्छा कहा यही जा सकता है कि ये कहीं न कहीं हमारी सोच का ही परिणाम है कि जो परिणाम हमने इससे पहले कभी नहीं देखी वह सब आज हमें देखने को मिल रहे हैं । ये कहीं ना कहीं सही साबित होगा कि हमारे बढते स्वार्थ का जो योगदान इस कलयुग बढावा देने में हैं, ऐसा योगदान हमारे किसी अन्य चीज का तो नहीं है । मान लो यदि हम अपने स्वार्थ की खाते पेडो को काटते हैं तो भूकंप तो नहीं है । ठीक इसी तरह से ऐसी कई बातें हैं जो कलयुग की व्याख्या करने में बिल्कुल सटीक बैठती हैं । कलयुग वास्तव में कोई पूरा युग नहीं है किन्तु हमारी बुरी आदतें कलयुग को भूरा बना देती हैं और इसका परिणाम भी हमारे सामने तुरंत मौजूद हो जाता है । आज चेन्नई के बाद ये है कि हम सब कुछ जानते हुए भी अपनी सोच में बदलाव नहीं करना चाहते हैं । यदि इसी तरह से हमारी सोच ठहरे हुए तालाब के जल की तरह रही तो हमारे हिरदय से प्रकृति को भी दुर्गंध आने लगेगी और अंतर कहा इसका परिणाम यही होगा कि हम अपने पूरे मानव समाज का अस्तित्व इस देश और दुनिया से मिटा चुके होंगे । कलयुग और राजनीति राजनीति का संचालन एक प्रकार से सामयिक क्रियाओं के अनुसार ही होता आया है । यही कारण है कि हर राजनीतिक पहलू समय के साथ साथ बदलते रहते हैं और यही एक वास्तविक राजनीति की हकीकत भी है । चाहे प्राचीन राजनीति हो चाहे आधुनिक राजनीति हर एक तरह की राजनीति हमेशा से ही समय की पगडंडियों पर ही चलती हुई आई है । जब प्राचीन सभ्यता हुआ करती थी उस समय भी राजनीति प्राचीन पहलुओं को मद्देनजर रखते हुए की जाती थी । लेकिन आज यदि आधुनिकता है तो राजनीति भी आधुनिक तरीके से ही की जाती रही है । इसीलिए यही कहना उचित होगा कि राजनीति का समय के साथ जो परिवर्तन का संबंध रहा है वह प्रारंभ से ही रहा है तथा हम चाहते हुए भी उसमें किसी प्रकार का कोई भी परिवर्तन नहीं कर सकते हैं । अगर हम राजनीति के तौर तरीको में वर्तमान को देखते हुए यदि कोई परिवर्तन करना चाहते हैं तो फिर इसके लिए सभी लोगों को एक मत रूप से सहमत होना पडेगा । तभी राजनीति में परिवर्तन संभव है अन्यथा जो तरीका प्रारंभ से चला रहा है उससे तो कोई कभी बादल ही नहीं सका । आज के समय की राजनीति जिस आधार पर की जा रही है उस आधार को हम यदि कलयुग इन आधार कहकर संबोधित करें तब भी हम कहीं से कहीं तक भी गलत साबित सिद्ध नहीं हो सकते हैं । इसकी वजह यही है कि राजनीति हमेशा से ही समय के साथ पेशी की जाती रही है । कल योगिन आधार वाली आज की राजनीति का साक्षात उदाहरण यही है कि आज के समय में बडे से बडे राजनेताओं पर लगने वाले कई तरह के आरोप यही साबित सिद्ध हो रहे हैं । जबकि एक राजनेता को तो हमेशा ही निष्कलंक इत होना चाहिए । आज का राजनीतिक इतिहास हमें यही शिक्षा दे रहा है कि यदि कोई राजनीति ये अपनी जिम्मेदारी ठीक तरह से निभा रहा होता है तो कई बदमाश राजनीतिज्ञ उस उस साफ छवि वाले राजनीतिज्ञ के रास्ते में कई तरह से अवरोध पैदा करते हैं और जनता चिपटा सारा का सारा खेल नोक दर्शक बनी देखती रहती हैं । इस तरीके से की जाने वाले राजनीति वास्तव में वो राजनीति मानी जाएगी जिसमें कि जनता द्वारा यदि एक बार नेता चन लिया गया तो फिर अगले पांच साल तक जनता का न तो राजनीति से कोई संबंध रह जाता हूँ और न ही अपने दिए गए मत का जनता को कोई मूल्य ज्ञात रहता हो । ये इसी का परिणाम है कि आज हम लोगों ने यदि वर्तमान समय को कलयुग कह दिया है तो हर चीज कलयुग के हिसाब से ही हो रही है । जबकि वास्तविकता तो यही है कि हमारे कर भी किसी भी काल का समय निर्धारित करते हुए आए हैं । ये सभी का मत है कि प्रकृति का अधिकांश संचालन मानव जाति के द्वारा होता है । फिर ये हमारे कर्तव्य को बनाती ही है कि हम वहीं काम करें जिससे इस प्रकृति पर अन्याय नहीं हो । हमारे बुद्धिमानी होने की ये जिम्मेदारी है कि हम अपनी जिम्मेदारी मानवता भरी सोच से निभाएं । ऐसी स्थिति में यही कहना उचित होगा कि इस संसार का कोई भी युग पूरा नहीं होता है । अगर कुछ पूरा होता है तो सिर्फ हमारी सोच । इसलिए यदि हम चाहे तो शत युग है और यदि हम चाहे तो कलयुग है ।

Part 18

आप नहीं कुक ऍम आया के साथ सुनी जब मन चाहे जिम्मेदारी किसकी लेखक बालिस्टर सिंह गुर्जर भारत नोटबंदी विशेष दिनांक आठ नवंबर से संपूर्ण भारत में नोटबंदी लागू भारतीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा घोषित आज भारत को आजाद हुए लगभग सत्तर साल हो चुके हैं । इन सत्तर सालों में भारत का कितना विकास हुआ और कितना नहीं शायद ही कोई होगा जो कि इसका सटीक जवाब दे पाए । हर कोई ये नहीं बता सकता है कि भारत के आजादी के सत्तर सालों के इतिहास में देश का विकास समान मात्रा और समान अनुपात में सभी जगह हुआ है । वर्तमान में बदलते हुए जमाने के साथ साथ आज हमारा देश भी बदल रहा है । ये हमारे लिए गौरव बढाने वाला कार्य है किन्तु यदि इस बदलती हुई रफ्तार में किसी प्रकार का धोखा हमारे साथ हो रहा हो तो ये जरूर ही हमें चिंता में डाल सकता है । आज के इस भागदौड भरी रफ्तार में हर इंसान इस प्रकार से व्यस्त है कि वह अपना ख्याल भी ठीक तरह से नहीं रख पाता है । फिर वो देश की गतिविधियों पर तो ध्यान ही नहीं दे सकता । यानी कि जब हमें अपना ही खयाल नहीं रखना चाहता हूँ । ऐसी स्थिति में हम अपने देश का खयाल तो किसी भी हालत में नहीं रख सकते हैं । अभी हाल ही में तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा नोटबंदी लागू की गई थी । उस नोटबंदी पर पूरे देश में बहुत जोरों पर बहस होनी शुरू हो गई थी । कोई प्रधानमंत्री द्वारा लिए गए नोटबंदी के फैसले को ऊंची ठहरा रहा था तो कोई इस फैसले से असहमत भी नजर आ रहा था । इस फैसले की सबसे बडी कडवी हकीकत यही थी कि इस फैसले से ऐ सहमती जताने वाले लोगों में सबसे ज्यादा वो लोग थे जिन्होंने कालाबाजारी करके धन इकट्ठा किया हुआ था । इसके बाद दूसरे नंबर पर असहमति जताने वालों में कई विपक्षी दलों के नेता थे । तीसरे नंबर पर असहमत लोग वो थे जिन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के चुनाव के समय में अपना मत ही नहीं दिया था । जब भारतीय मीडिया ने कई लोगों से नोटबंदी के ऊपर चर्चा की तो ज्यादातर लोग प्रधानमंत्री के फैसले से सहमत ही नजर आए थे । अब ऐसी स्थिति में हम ये कैसे कह सकते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी जी द्वारा लिया गया नोटबंदी का फैसला अनुचित था । ये सत्य है कि जब भी किसी देश में कोई उचित फैसला सरकार द्वारा लिया जाता है तो सबसे पहले उस फैसले को विरोधियों द्वारा नकारा जाता हैं । उसके बाद विरोध किया जाता है और अंत में उसे स्वीकार कर लिया जाता है । ये राजनीति का ही असर है कि कभी भी सभी दल मिलकर देश हित में अपना हाथ नहीं बताते हैं । उन्हें तो सिर्फ एक ही काम आता है वह एक दूसरे पर आरोप लगाना और देश के विकास में बाधा उत्पन्न करना । कई राजनीतिज्ञ ऐसे भी होते हैं जैसे मीडिया के सामने आकर जनता को गुमराह करने के सिवाय और उन्हें कुछ नहीं आता । प्रधानमंत्री मोदी जी द्वारा आज जो नोटबंदी लागू हुई है वह कहीं न कहीं देश हितार्थी मानी जानी चाहिए क्योंकि जब से नोटबंदी लागू हुई है तभी से सभी कालाबाजारियों का भांडाफोड हुआ है और उनकी सारी की सारी काली कमाई देश के सामने उजागर भी हुई है । चाहे फिर वह कालाबाजारी करने वाला आम नागरिक यू नो आम नागरिक ही क्यों न हो या फिर कोई राजनीति यही क्यों ना हो । हमारे देश की अर्थव्यवस्था जिस गति से सन से से आरंभ हुई है और यदि हम अपनी अर्थव्यवस्था की रफ्तार को थोडा बढाना चाहते हैं तथा अपने देश का शीघ्र विकास करना चाहते हैं तो हमारे सामने थोडी बहुत परेशानियों का आनंद मामूली से बात ही मानी जाएगी । हम आज तक ठीक तरह से जानते हैं कि कुछ पाने के लिए थोडा बहुत तो हमें खोना ही पडता है । इसीलिए अगर प्रधानमंत्री के नोटबंदी के फैसले से हमें थोडी से परेशानी हुई है तो ये हमारे आने वाले भविष्य के लिए उचित ही सिद्ध होगा । भारतीय राजनीति के इतिहास में ऐसा कोई भी राजनीति की आज तक नहीं हुआ जोकि एक कडक फैसला देश हितार्थ ले सके तथा ये सिद्ध भी कर सके कि यहीं की यदि एक बार फैसला ले लिया ले लिया नरेंद्र मोदी जी ने जो फैसला देश के हित में ले लिया है उसे वास्तव में ही एक उचित और कडक फैसला मानना चाहिए क्योंकि इस फैसले से कोई भी अछूता नहीं रहा है । चाहे एक आम नागरिक हो चाहे बडे से बडा पैसे वाला ही क्यों न हो । हर कोई पैसे की लाइन में खडा दिखाई दिया है । नोटबंदी और राजनीति पंद्रह अगस्त उन्नीस सौ के पहले भी भारत देश में राजनीति हुआ करती थी और आज भी राजनीति होती रही हैं । हमें वहाँ कोई फर्क नहीं पडता है कि हमारा देश एक राजनीति ये देश रहा है बल्कि फर्क वहाँ पडता है कि जो राजनीति हमारे देश में की जा रही है वह कितनी सही है और कितनी गलत है । वर्तमान राजनीति के संदर्भ में यही कहना उचित होगा कि आज की राजनीति एक विरोधी राजनीति हैं । आज देश में सैंकडों राजनीतिज्ञ दल है और अगर ये सभी दल चाहते तो आज भारत का डंका पूरे विश्व में गूंजने लगता । लेकिन होता क्या है? होता यही है कि उदाहरण के रूप में सफर राजनीतिज्ञ दलों में से एक राजनीतिज्ञ दल की सरकार देश में बनती है और हारे हुए दल जीते हुए एक दल पर पूरे राजनीतिक के समय में आरोप ही लगाते रहते हैं । आज तक की राजनीति में हर दल का नारा देश का विकास करना होता है किंतु जब बात विकास की आती हो तो ज्यादातर राजनीतिज्ञ अपना मूड छिपाए हुए नजर आते हैं । तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबंध में यही कहना उचित होगा कि उन्होंने नोटबंदी का जो फैसला लिया है, ये फैसला हर तरह से देश के हित में है । क्योंकि हर राजनीतिज्ञ दल हर एक बडे से बडे विपक्षी दलों के नेताओं को इस फैसले से नफरत सी हो रही है और जिस जनता से प्रधानमंत्री मोदी जी को अपना मत देकर जीत दिलाई थी वह उससे खुश नजर आ रही है । अब ऐसी स्थिति में हम किसी भी हाल में ये नहीं कह सकते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी जी द्वारा लिया गया फैसला एक गलत फैसला है । यदि भारत की एक सौ पच्चीस करोड जनता मोदी जी से खुश हो और केवल एक सौ पच्चीस राजनीति ये मोदी जी से खुश न हो तो ऐसी स्थिति में हम नरेंद्र मोदी जी को क्या कहेंगे? सही या गलत? निश्चित ही जब एक सौ पच्चीस करोड भारतीय जनता को नोटबंदी के फैसले से कोई ऐतराज नहीं हो और यदि केवल एक सौ पच्चीस लोग इसका विरोध कर रही हूँ तो जनता का बहुमत ज्यादा होने के कारण प्रधानमंत्रीको ही सही ठहराया जाएगा । न किचन लोगों की वजह से गलत क्योंकि हम ज्यादा से ज्यादा बहुमत वाली चीज को ही सही मानते हैं, सही ठहरा सकते हैं । आज विश्व के सभी देश लगातार विकास की नई नई ऊंचाइयों को छूते जा रहे हैं । इसमें हमारा देश भी शामिल हैं । किन्तु हमें सबसे बडा दुख वह होता है जब भारत के ही लोग भारत के ही विकास में बाधा उत्पन्न करते हैं । यह आज का कडवा सत्य है कि देश के विकास में सबसे ज्यादा बाधा कई राजनीतिज्ञ ही लगाते हैं जबकि उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए । आज अगर हम चाहते हैं कि हमारा देश विश्व के सभी देशों में आगे हो तो देश के हर नागरिक तथा हर राजनीतिज्ञ को देश के विकास में अपना योगदान देना होगा और ये निश्चित ही है कि जिस दिन देश को हर एक व्यक्ति का योगदान मिल जाएगा, उस दिन सारे विश्व में भारत ही प्रथम पायदान पर होगा । आज हमें ये सभी लोग ठीक तरह से जानते हैं कि किसी समय में हमारा देश विश्वगुरु हुआ करता था । किन्तु समय की कुछ गलतियों के कारण हम कहीं न कहीं कुछ गलतियां कर बैठे हैं और हम से हमारा विश्वगुरु का दर्जा ही कई भटक गया । इसलिए ये कहना उचित ही होगा की अगर हम विश्वगुरु कहलानेवाले भारत के नागरिक हैं तो हमारे अंदर उस सारी शक्तियां होंगी जिन के दम पर हम विश्वगुरु कहना है और ये निश्चित की है कि यदि हम चाहे तो भारत को फिर से विश्वगुरु बनाने में कुछ समय लगेगा । यदि हम सभी देश के विकास में अपना योगदान दे तो इसके लिए जरूरी है तो सिर्फ अपनी जिम्मेदारियों को समझने की, एक जिम्मेदार नागरिक बनने की तथा देश के प्रति समर्पित होने की भावना

Conclusion

आप सुन रहे हैं कुक्कुटासन आरजेएम आया के साथ सुने जम्मन चाहे जिम्मेदारी किसकी लेखक बाली स्तर सी गुर गया लेकिन क्या जो है जिम्मेदारी? हमारी प्रस्तुत पुस्तक के अध्यायों में हमने यही देखा कि पृथ्वी पर घटित होने वाली हर समस्या का जिम्मेदार सिर्फ मानव ये है । इसके सिवाय और कोई नहीं । वास्तव में हकीकत तो यही है कि पृथ्वी पर मौजूद समस्त प्राणियों में केवल मनीष ही ऐसा प्राणी है जो सोच सकता है, हताहत तथा हर पहलू को भली भांति समझ सकता है । इसलिए मनुष्य को ईश्वर का अंश स्वरूप माना जाता है । हमें दुख तो वहाँ पर जरूरी होता है, जब मानवी मानव के पतन पर उतारू हो जाए । यदि मानव ही मानव का पतन करने लग जाएं तो वहाँ यही समझ लेना उचित होगा कि अब इस दुनिया में मानवता का तो कोई महत्व ही नहीं । बच्चा आज ये हमारी मानसिकता का ही परिणाम है कि हर तरफ ऐसी घटनाएं घटित हो रही है जिनके कारण मानव के साथ साथ ईश्वर को भी शर्मिंदा होना पड रहा है । चाहे दुष्कर्म हो, चाहे सहिष्णुता हो, चाहे जीवहत्या हो, चाहे भ्रष्टाचार हो, चाहे राजनयिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, आधे कई समस्याएं ही क्यों न हो, ये तभी संपन्न हो सकती है जब हम अपनी जिम्मेदारी जब हम अपनी जिम्मेदारियों से भटक जाते हैं । इसीलिए एक मानव सोच को बद्ध नजर रखते हुए लेखक ने एक युवा सोच के साथ अपने विचार आप सभी के सामने प्रस्तुत किए तथा जहाँ तक संभव हो सका वहां तक प्रस्तुत पुस्तक में यही बताने का प्रयास किया गया है कि यदि हम सभी लोग अपनी अपनी जिम्मेदारियां ठीक ढंग से निभाएं तो इस पृथ्वी से हर बुराई स्वता है, मिट जायेगी तथा हर तरफ स्वर्ग जैसा माहौल भी हमारे द्वारा उपस् थित हो सकेगा । चाहे फिर कलयुग भी क्यों न चल रहा हूँ । आज हम ये सभी लोग भलीभांति जानते हैं कि हमारा भारत देश प्राचीन समय से ही विश्वगुरु रहा है और प्राचीन से ही सारा संसार भारत देश के आदर्श विचारों पर ही चलता रहा है । इसीलिए इसके अंदर में यही कहना उचित होगा कि भारत के हर नागरिक का पहला कर्तव्य अपनी जिम्मेदारियों को ठीक ढंग से निभाना होना चाहिए ताकि फिर से सारा संसार भारत के उच्च संस्कारों को ग्रहण कर सके और भारत की प्राचीनतम कोई हुई गरिमा उसे वापस मिल सके । ये तभी संभव हो पाएगा जब भारत का हर नागरिक अपने कर्तव्यों का निर्वाह ईमानदारीपूर्वक करेगा । चाहे फिर उस सामान्य नागरिक ही हो या राजनीतिज्ञ हूँ ।

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