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1. Swami Vivekanand

फॅस मैं अभी आपने राजसी ऍफआईआर और आज बहुत ज्यादा विश्वास के साथ क्यूकि आज राज किस बनी सुनने आ चुका है आपको एक ऐसे इंसान की कहानी जो इस दुनिया के लिए ऊपर वाले का बनाया और भेजा हुआ एक वरदान था । एक ऐसे महापुरुष, किवदंती और ऐसे लेजेंड्री चरित्र व्यक्तित्व वाले एक ऐसे इंसान जिन्होंने दुनिया को सिखाया कि अगर ठान लो और अगर अपने मन में उस बात की गांठ बांध लोग जीवन में कुछ भी नामुमकिन मुझे सौ व्यक्ति दे दीजिए जिन्हें पता नहीं कि आलस क्या होता है और मैं ये देश बदल कर दिखाऊंगा । ये इनकी बात की ये इनका कथन था । ये इनका विश्वास था और आगाज घायल । ऐसी अंतरात्मा का एक जगह गुरु का जिनका नाम था जिनका नाम है और हमेशा रहेगा । जब तक ये प्रकृति उसकी आप घोष में है, ये प्रकृति जिंदा है । ये दुनिया जिंदा है और इंसानी आपको सूर्य और चंद्रमा की रोशनी दिख रही है वो नाम हमेशा अमर रहेगा और नाम स्वामी विवेकानंद आज हम जा रही हूँ ऍम की जीवनी के बारे में अलग अलग अध्याय ओ अलग अलग चैप्टर्स के रूप में और सीखेंगे जीवन का असली मूल्य । जीवन का असली अर्थ और इस जीवन में आपका कर्तव्य किया है । राजकीय पानी ऍम मनचाही सुन लें एक अमर गाथा चाहते ओवन पुरखी और बचपन छोटी अवस्था से ली में बडा साहसी था । अगर ऐसा न होता तो खाली हाथ सारी दुनिया घूमाना क्या मेरे लिए कभी संभव होता विवेकानंद जनवरी अठारह सौ प्रभात का स्त्रीपुरुष ओके दल के दल मकर सप्तमी के स्नान के लिए गंगा की ओर जा रहे हैं । इसी समय कलकत्ता के गणमान्य दस परिवार में पालक का जन्म हुआ जिसका नाम नरेंद्रनाथ रखा गया । आगे चलकर यही नरेंद्रनाथ विवेकानंद के नाम से प्रसिद्ध हुआ । बालक की माँ का नाम भुवनेश्वरी देवी था । नरेंद्र से पहले उन की दो लडकियाँ बेटी का मूवी देखने की उनके मन में बडी अभिभाषक इसलिए सुबह शाम शिव मंदिर जाकर प्रार्थना करने लगे । कहते हैं कि एक दिन वो पुत्र कामना में इतनी ध्यान मग्न हुई कि उन्हें कैलाशपति शिव सामने खडे दिखाई । धीरे धीरे उन्होंने शिशु रूप धारण किया और भुवनेश्वरी देवी की गोद में बैठ गए । इससे माँ का ये विश्वास बना की बेटी का जन्म में शिव के वरदान से हुआ है । इसलिए उन्होंने उसका नाम वीरेश्वर घर में यही राम चलता था और प्रियजन बीले कहकर पुकार को कलकत्ता में कायस्थ वंश की कई दत्त परिवार । इन परिवारों में बहुत से योग्य और विद्वान व्यक्ति पैदा हुए । विवेकानंद के समकालीन इतिहास का रमेशचंद्र गत उनमें से एक विवेकानंद का जन्म किसी का इस परिवार में हुआ था । बरो माम रोल सामने उन्हें छत्रिय वंश में उत्पन्न होना बताया शायद नहीं । भ्रांति इसलिए हुई की खुद विवेकानंद ने विदेश यात्रा से लौटकर अपने मद्रास के भाषण में प्रसंगवश कहा था । एक बात और मैंने समाज सुधारकों के मुखपत्र में पडा कि मैं शूद्र और मुझसे पूछा गया था कि एक शूद्र को सन्यासी होने का क्या अधिकार है? तो इस पर मेरा उत्तर यह है कि मैं उन महापुरुष का वंशधर हूँ, जिनके चरण कमलों पर प्रत्येक प्रमाण यहाँ धर्मराज्य स्तर गुप्ता आॅफ वहाँ चारन करते हुए पुष्पांजलि प्रदान करता है और जिनके वंशज विश्वयुद्ध छत्रिय यदि अपने प्राणों पर विश्वास, वो तो इन समाजसुधार को कुछ जा लेना चाहिए कि मेरी जाती नेम पुराने जमाने में अन्य सेवाओं केअतिरिक्त कई शताब्दियों तक आदमी भारत का शासन किया । यदि में जाती छोड दी जाए तो भारत के वर्तमान सभ्यता का क्या शेष रहेगा? अकेले बंगाल ही में मेरी जाति में सबसे बडे दार्शनिक सबसे बडे कवि सबसे बडे इतिहासज्ञ सबसे बडे पुरातत्वेत्ता और सबसे बडे धर्मप्रचारक उत्पन्न हुए । मेरी ही जाति ने वर्तमान समय में सबसे बडे वैज्ञानिकों से भारत वर्ष को भी घोषित किया है । इन निंदकों को थोडा अपने देश के इतिहास का तो ज्ञान प्राप्त करना था । ब्राम्हण, चस्तरीय तथा वैश्य इन तीनों वर्गों के संबंध में जरा अध्ययन तो करना था । जरा ये तो जानना था कि तीनों ही वर्णों, सन्यासी होने और वेद के अध्ययन का समान अधिकार ये बातें मैंने तो यु ही प्रसंगवश कहती वो जो मुझे शूद्र कहते हैं, इस की मुझे सैनिक भी पीता नहीं । मेरे पूर्वजों ने गरीबों पर जो अत्याचार किया था इस से उसका कुछ परिशोधित हो जाए । यदि में पेरिया नीट चांडाल होता तो मुझे और भी आनंद आता क्योंकि मैं उन महापुरुष का शिष्य जिन्होंने सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण होते हुए भी एक पैर या जान डाल के घर को साफ करने की, अपनी छपरखट नरेंद्र को विचार को तथा वैज्ञानिकों की समृद्ध परंपरा विरासत में मिली थी । उसके परदादा राममोहन दत्त कलकत्ता सुप्रीम कोर्ट के नामी वकील जहाँ धनेश्वरी और ख्याति प्राप्त थी, बहुत ज्ञान, चर्चा और शास्त्र चर्चा तीस परिवार की विषेशता, समय के साथ साथ चलते हुए अर्थ और मुख्य भोग और त्याग तथा आधुनिकता और प्राचीनता दस परिवार के स्वभाव तथा चरित्र में घुल मिल गई । राममोहन की एकलौते बेटे दुर्गाचरण ने समय की प्रथा के अनुसार जहाँ संस्कृत और फारसी पडी वहाँ काम चलाऊ अंग्रेजी भी सीखी थी और वे छोटी ही उम्र में वकालत के धंधे में पड गए पर उनका स्वभाव पिता से भिन्न था । धन कमाने में उनकी अधिक रूचि नहीं धर्मानुरागी युवक दुर्गाचरण सत्संग और शास्त्र चर्चा के अवसर सहयोग सोचते रहेंगे । परिणाम यह की जब उनकी अवस्था सिर्फ पच्चीस बरस की तो उत्तरपश्चिम प्रदेशों से आए वेदांती साधुओं से इतने प्रभावित कि घर बार छोडकर संन्यास ग्रहण कर लिया । पति वियोग में तडफती हुई जवान पत्नी के लिए गोल्ड का नन्हा बालक की एकमात्र सहारा रह गया । सन्यासी प्रथा के अनुसार बारह बरस बाद जब दुर्गा चरण अपनी जन्मभूमि का दर्शन करने आए तो पत्नी का एक साल पहले देहांत हो चुका था । उन्होंने अपने बालक पुत्र विश्वनाथ को आशीर्वाद दिया और चले गए । इसके बाद उन्होंने फिर कभी भी घर में कदम ना रखा ना किसी ने उन्हें ये विश्वनाथ ही नरेंद्रनाथ के पिता उन्होंने भी वकालत का पैतृक धंडा अपनाया था । लेकिन वकालत में व्यस्त रहते हुए भी पारिवारिक परंपरा के अनुसार शास्त्र चर्चा तथा अध्ययन के प्रति उनका विशेष अनुराग राजा राममोहन रॉय के समय से प्राचीनता और आधुनिकता में प्राच्य तथा पाश्चात्य मेरे संघर्ष शुरू हुआ । वह तीन रूप धारण करके एक निर्णायक स्थिति में पहुंच चुका है । राजा राममोहन रॉय जिस पुरानी शिक्षा पद्धति को बदलना चाहते थे, उसका स्थान अब मैकॉले की शिक्षा प्रणाली ने ले लिया । संस्कृत तथा फारसी की शिक्षा कौन हो गई थी और अंग्रेजी का बोलबाला राजा राममोहन रॉय क्या चाहते थे और मैं कॉलेज की शिक्षा प्रणाली ने हमें एक याद । इस पर हम आगे चलकर पूर्ण जागरण परिच्छेद में विचार करेंगे । यहाँ सिर्फ इतना कह देना काफी है कि राजा राममोहन रॉय प्राचीनता और आधुनिकता में समन्व्य और सामंजस्य की जिस स्वस्थ भावना को लेकर चले थे वो अपेक्षित और विकृत होती जा रही है । धर्मान्धता और रूढीवाद के स्थान पर गोल इतिहास, साहित्य, गणित तथा विज्ञान की शिक्षा, संकीर्णता तथा छिछले विद्यार्थ मान को जन्म दे रही है । चिंतन के छितिज पर ये भर स्पष्ट मंडरा रहा था की कहीं प्राची पांच चार से पराजित ना हो जाए । ब्रह्मसमाज वास्तव में संघर्ष का संगठित रूप था । अब इस भय के कारण आदिब्रह्मा समाज और अखिल भारतीय ब्रह्मसमाज दो में विभाजित हो गया । इन दोनों की आपसी संघर्ष का परिणाम ये था कि आदि ब्रह्मसमाज वाले प्राचीनता के खोल में सिकुडते जा रहे थे और अखिल भारतीय ब्रह्मा समाज वाले परंपरा से संबंध विच्छेद करके आधुनिकता के नशे में लडखडाते पांच चाहते की ओर झुक रहे पढे लिखे बंगाली युवक अपने स्वभाव और संस्कार के अनुसार इन दोनों में से किसी एक को चुन देते थे लेकिन ऐसे लोगों की संख्या भी दिन ब दिन बढती जा रही थी जिनका ना आदिब्रह्मा समाज से कोई सरोकार था और ना अखिल भारतीय ब्रह्मा समाज से और अगर था तो वह भी अत्यंत ही औपचारिक और ऊपर उन्हें ना प्राचीनता से कुछ लेना देना था और ना अपने को आधुनिक दिखाने की विशेष चिंता । व्यक्तिगत सुख साधन, उनके जीवन का एकमात्र आधार और शिक्षा तथा ज्ञान, चर्चा, धन और यश अर्जित करने का साधन मात्र व्यतीत और भविष्य की सर गर्दी मोलना लेकर निश्चित भाव से शरण में जीते थे । नरेन्द्र के पिता विश्वनाथ तीसरी श्रेणी के व्यक्ति धार्मिक कट््टरता का उनमें लेशमात्र नाथ अंग्रेजी साहित्य और इतिहास आदि के अध्ययन के अलावा उन्होंने फारसी हाफिज कविताएं उन्हें विशेष रूप से पसंद है । ऊंची खानदानों की कई मुसलमान वकील थे और फिर लखनऊ, इलाहाबाद, दिल्ली, लाहौर इत्यादि शहरों की यात्रा के कारण में अनेक शरीफ मुसलमान परिवारों के घनिष्ठ संपर्क में आ चुके हैं । युवे मुसलमान की रीति रिवाजों से भलीभांति परिचित थे और उनका सम्मान करते बाइबल पढकर उन्होंने इसाई धर्म के बारे में अच्छी जानकारी प्राप्त कर ली लेकिन इस जानकारी का तात्पर्य सिर्फ इतना ही था कि वह उन्हें एक व्यवहारकुशल तथा सफल वकील बनाने में उपयोगी सकता हूँ । उन्होंने जिस आदर्श का आजीवन पालन किया वो धडल्ले से कमाना और अधिकारिक सुख सुविधाएं जुटाना । घर पर अतिथियों तथा सगे संबंधियों की भीड लगी रहती थी । जरूरत से ज्यादा नौकर चाकर और गाडी घोडे रखकर ठाटबाट से जीना उनका स्वभाव बन चुका था । वे खुले हाथ से खर्च करती और खुले हाथ से दान भी दे देते । बचाकर रखने की भविष्य अथवा पर लोग की चिंता ही नहीं । एक वाक्य में यू पहली ये कि वह हो और त्याग का आधुनिक समिश्रण के उदार, स्वच्छंद और मिलनसार ठसके विपरीत भुवनेश्वरी देवी घर में पर आए । महिला नरेन्द्र के बाद जो छोटे भाई और दो बहने और माँ बेटी बेटियों की स्नेहपूर्वक देखभाल कर के रामायण, महाभारत, भागवत आदि पुराणों का पाठ में नियमित रूप से क्या करती थी और पति तथा पुत्रों से चर्चा चलाकर तत्कालीन हलचलों और आधुनिक विचारधारा से भी अवगत रहे नरेंद्र को माँ के मुख से रामायण और महाभारत की कहानियां बडे चाव से सुनने का शौक दत्त भवन में प्रायः प्रतिदिन दोपहर को रामायण और महाभारत की कथा होती थी । कोई बुढिया आज वह खुद भुवनेश्वरी देवी पडती और मोहल्ले की दूसरी और जिसमें नरेन्द्र वैसे चंचल स्वभाव का बालक था । लेकिन इस छोटी सी महिला सभा में वो चुपचाप और शांत बैठा रहा था । इन ग्रंथों की कहानियों का उसके मन पर गंभीर प्रभाव पडता इनके पात्र उसकी कल्पना में सजीव होते और वह घंटो मंत्रमुक्त सा बैठा सुना कर रमायण संधि सुनती । नरेंद्र को सीता और राम से इतनी श्रद्धा हो गई की वो एक दिन बाजार से उन दोनों की मूर्ति खरीद लिया है । मकान की छत पर एक सोने कमरे में उसने ये मूर्ति स्थापित कर दी और वो उसके सामने घंटों ध्यानमग्न बैठा रहा था । अपने कोच बांसी नरेंद्र बहत हिल मिल गया था । बालक को सीताराम से यह प्रेम देखकर वह कोचवान बहुत पसंद होता है । नरेन्द्र के मन में कोई समस्या, कोई प्रश्न उठता तो कोचवान मित्र ही उसका उत्तर दिया करता था । एक दिन अचानक व्यापर चर्चा सुनिए कोचवान को जाने क्यू यहाँ पसंद नहीं था । उसने ब्याज ऐसा भयानक चित्र खींचा कि नरेंद्र बेचैन हो था और रोता हुआ माँ के पास आया । माने बेटी से रोने का कारण पूछा तो उसने कोचवान की बात सुनाकर कहा हाँ मैं सीताराम की पूजा कैसे करूँ? सीधा तो राम की पत्नी थी । माँ ने उसे गोद में बैठाकर आंसू पहुंचे और बडे दुलार से का सीता राम की पूजा नाम भी करो कोई हानि नहीं । कल से शिव की पूजा करना ठीक है । बेटा मां किसी काम में व्यस्त हो गई तो नरेंद्र दबे पाँव ऊपर गया सीताराम की मूर्ति जो उसने इतने चावल श्रद्धा से खरीदी थी, कमरे से उठा लाया मुंडेर पर अगर उसने मूर्ति बिना संकोच नीचे फेंक भी जो गिरते ही चूर चूर हो गई । नरेंद्र बडा नटखट था उसके हम के मारे सबकी नाक में दम बडी बहने उसके पीछे दौडती की पकडकर पीटे । नरेंद्र चैट से नाली में उधर कर बदन पर कीचर लगा लेता बहने अपवित्र होने के डर से उसे छूना बाद वो विजय घर से ताली बजाकर कहता लोग पकडो मुझे घर में जाने कब से चले आ रहे देश आचर और लोकाचार के नियमों को नरेंद्र बचपन से ही नहीं मानता । इसके लिए मागज् चलाती है । डांट डपट थी तो निरीह भाव से पूछता की थाली छूकर बदन पर हाथ लगाने से क्या होता है? बाएं हाथ से गिलास उठाकर जल पीने से हाथ क्यों होना पडता है? हाथ में तो कर नहीं लगती माइंड प्रश्नों का कोई संतोषजनक उत्तर नाते पाती तो नरेंद्र उद्दंड होता और नियमों का उल्लंघन करता । विश्वनाथ की मुवक्किलों में एक पठान भी था । नरेंद्र के प्रति उसका विशेष नहीं था । उनके अपने की खबर सुनते ही नरेंद्र दौडा ज्यादा और उसकी गोद में बैठकर पंजाब और अफगानिस्तान के हाथियों और उठु कि कहानियां बडे चार्स कई बार वो उसके साथ जाने का अनुरोध करता था । वह मुसलमान से जान हसते हुए कहता तुम दो और बडे हो जाओ तब मैं तो मैं अपने साथ जरूर ले जाऊंगा । नरेन्द्र कभी कभी अगले ही दिन पंजों के बल खडा होकर कहता देखिए मैं रहता भर में दो गोली बडा हो गया हूँ । अब आप मुझे अपने साथ ले चाहिए । इस पठान मुवक्किल से नरेन्द्र का अनुराग इतना बढ गया कि वो उसके हाथ से संदेश फल लेकर निसंकोच खा लेता था । विश्वनाथ कट्टर नहीं थे । उनकी दृष्टि में सभी जाति के लोग समान इसलिए उन के नजदीक नरेंद्र का मुसलमान के हाथ से खाना कोई अपराध नहीं । पर परिवार के दूसरे लोगों को इस पर आपत्ति होती थी । वो भी बहुत बडी । नरेंद्र को तरह तरह के भय दिखाकर दूसरी जाति के हाथ का खानी से मना कर दी । पर ये बात नरेंद्र के मन में ना बैठ जाती भी उसके लिए नहीं ली । बन गया । वो सोचता एक व्यक्ति किसी दूसरे के हाथ का क्यों नहीं खाता? अगर कोई दूसरी जात बिरादरी के हाथ का खाले तो उसका क्या होगा? क्या उसके सिर पर छत टूट पडेगी? क्या वह मर जाएगा? अनिल जातियों के मुवक्किल मुकदमों के सिलसिले में दर्ज भवन आते रहते हैं । रिवाज के अनुसार बैठक घर के एक कोने में उनके लिए चांदी जुडा हुआ अलग अलग के रखे रहते थे । एक दिन उक्त विचार मन में लिए नरेंद्र बैठक घर में गया । वहाँ कोई दूसरा नहीं । नरेन्द्र ने एक एक होके को अपने होटों से लगाकर गुड बढाया । ये देख उसे बडा या शुरू हुआ कि वह जैसा पहले था वैसा ही बना रहा है । उसमें कोई परिवर्तन तो हुआ नहीं । एका एक विश्वनाथ बाबू उधर आने के लिए और बीटेक स्थिति में देख उन्होंने पूछा अरे ये क्या कर रहा है? मिले बेटे ने चैट कर दिया । मैं ये परीक्षा कर रहा था की अगर मैं जाती भेद नाम आलू तो मेरा क्या होगा । बाप ने सस्नेह बेटे की तरफ देखा । वो मुस्कुराते हुए पठन कक्ष में चले गए । लगातार रामायण और महाभारत सुनते सुनते नरेंद्र को उनका बहुत सब हात कंटेस्ट हो गया था । कथा के समय वह कई बार इन्हें अपने बल मधुर स्वर में श्रोताओं को सुनाता तो बहुत ही भला लगता । उसने भिक्षुक गायकों से राधा कृष्ण और सीता राम की लीला संबंधी कितने ही गाने सीख लिए । जब हुए हैं अपने मधुर स्वर में गाता तो सुनने वाले मुक्त हो थे । उसे सभी का लाड प्यार प्राप्त था । उस पर किसी तरह का कठिन नियंत्रण ना था । घर का वातावरण चाहे धार्मिक था पर किशोर नरेंद्र की स्वच्छंदता और स्वाधीनता पर किसी प्रकार का अंकुश नहीं था । नरेंद्र को रामायण का हनुमान बहुत पसंद था । उसके अलोकिक गाडियों की कथाएं मन लगाकर सुंदर फिर माने । उसे बताया कि हनुमान अमर है और अब भी जीवित । तब से वो उसे देखने के लिए बडा उत्सुक्ता पर देखिए तो कहाँ कुछ समझ में नहीं आ रहा था । एक दिन वो कथा सुनने गया तो कथाकार पंडित अपनी अलंकारिक भाषा में हास्यरस मिलाकर हनुमान के चरित्र का वर्णन कर रहा था । नरेन्द्र के मन में जाने क्या आई वो धीरे धीरे कथाकार के पास गया और पूछा पंडित जी आपने जो कहा है कि हनुमान केला खाना पसंद करते हैं और केले के बगीचे में रहते हैं तो क्या मैं वहाँ उनकी दर्शन कर सकता हूँ? पंडित ने बोले बालक को बहलाने के लिए उत्तर दिया हाँ बेटा, बगीचे में तो मैंने पा सकते हो । नरेन्द्र ने इसके बाद भी हनुमान को बगीचे में ढूंढा हो या न ढूंढा हो पर ये तय है कि वो हमेशा उनके प्रियपात्र बने रहे हैं । जैसे जैसे आयु बडी उनके प्रति श्रद्धा भी बढती गई । मृत्यु से कुछ महीने पहले शिष्य शरद चंद्र चक्रवर्ती ने जब पूछा हमारे लिए इस समय किस आदर्श को ग्रहण करना उचित है? तो उन्होंने उत्तर दिया महावीर के चरित्र को ही तुम्हें इस समय आदर्श मानना पडेगा । देखो ना विराम की आज्ञा से समुद्र लांघकर चले गए । जीवन मृत्यु की परवाह किए बिना महाजिद, केंद्रीय महा बुद्धिमान दास से भाग के उस महान आदर्श से मैं अपना जीवन गठित करना होगा । वैसा करने पर दूसरे भावों का विकास स्वयं भी हो जाएगा । अब नाम बनकर में योगी और दूसरा कोई पत्नी एक और हनुमान जी जैसा सेवाभाव और दूसरी ओर उसी प्रकार त्रैलोक्य को भयभीत कर देने वाला सीन जैसा विक्रम राम की सेवा के अतिरिक्त अन्य सभी विषयों के प्रति उपेक्षा । यहाँ तक की संगत ब्रह्मांड पर शिवत्व प्राप्ति के प्रति उपेक्षा केवल रघुनाथ के उस देश का पालेंगी जीवन का एकमात्र व्रत है, उसी प्रकार एकनिष्ठ होना चाहिए । ढोल, मृदंग, करताल बजाकर उछलकूद मचाने से देश पतन के गर्त में जा रहा है । एक तो ये पेट के रोगी मरीजों का दल और उस पर इतनी उछल कूद भला कैसे सहमत हूँ । काम ही लुत् साधना का अनुसरण न करके देश फोर तमोगुण से भर गया है । देश देश में गांव गांव में जहाँ भी जाओगे देखोगे, ढोल करताल ही बज रहे हैं । धुंध बीन गाडी क्या देश में तैयार नहीं होते पर ही भीरी क्या भारत में ही मिलती है वही सब गुरु गंभीर बनी लडकों को सुना । बचपन से जनाजे बाजी सुन सुनकर कीर्तन सुन सुन कर देश रियो का देश बन गया है । इससे अधिक और क्या अधःपतन होगा? गाडी में ब्रह्मा रूद्र ताल का धुंध विनाद उठाना होगा । महावीर महावीर की ध्वनि रखा हर हर बम बम सबसे दिख दिगंत कंपनी कर देना होगा । हनुमान को शिव का अवतार कहा जाता है । पांच वर्ष पूरे होने पर नरेंद्र की शिक्षा कुछ दिन घर पर भी इसके बाद उसे मेट्रोपॉलिटन इंस्ट्यूट में भेज दिया गया । वहाँ नरेंद्र को बहुत से हम उम्र से पार्टी मिले । नए साथ ही पाकर उसके आनंद की सीमा ना रही और उसने जल्द ही अपना एक छोटा सा दल संगठित कर लिया । उसके साथ ही सुबह शाम घर पर खेलना दत्त भवन का विशाल आमिर उनकी कोल्हा ऐसी गोंझू खेल में अगर कोई लडका किसी प्रकार की धांधली कर दाद नरेंद्र बहुत बिगडता और आगे बढकर फैसला करता । अगर देखता कि उसकी बातें नहीं मानी जा रही और लडकी आपस में मारपीट पर उतारू हैं तो वह निर्भिक भाव से बीच में खडा होकर उन्हें रोक देता । शारीरिक बल में नरेंद्र अपनी किसी भी हमजोली से ही जाना था बल्कि उसका असीम साहस देख बडे बडे दंग रह जाते हैं । खुलसा सी में निपुण होने के कारण दुष्ट लडके उससे दबते थे । जब उसकी अवस्था केवल छह वरिष्ठ की वो अपने हमजोलियों के साथ चडक का मेला देखने गया, मेला देखा और मिट्टी की बनी हुई शिव की मूर्तियां हैं । शाम को जब घर पर लौट रहे थे तो एक छोटा सा लडका दल से अलग हो गया और फुटपाथ से रास्ते में चला गया कि उसी समय सामने से घोडा गाडी आई जिसे देख बालक पर आ गया । राहत जल्दी रही, रुक गए और बचाओ बचाओ चिल्लाने लगते । शोरगुल सुनकर नरेंद्र पीछे की ओर देख और सारी स्थिति हूँ । एक क्षण भी देर नहीं लगाई । महादीप की मूर्तियां देखकर वह तेजी से लग का बालक खोडे के पैरों तले रौंदा ही जाने वाला था कि नरेंद्र से बाल पाल पचास हजार बालक को सुरक्षित देखकर लोग बडे खुश हुए और सभी ने नरेंद्र के साहस की दाद नरेन्द्र के अपूर्व साहस की ये घटना और है । कलकत्ता के दक्षिण मटियाबुर्ज में लखनऊ के भूतपूर्व नवाब वाजिद अली शाह की पशुशाला नरेन्द्र की उम्र कोई सात आठ बरस रही होगी की वो अपने हमजोलियों के साथ एक दिन ये पशु पाला देखने गया । लडकों ने आपस में चंदा करके चंद पालघाट से छोटी सी नाव किराये पर ली । लौटते समय एक बच्ची ने नाम में उल्टी कर दी । मुसलमान मल्लाह बहुत नाया और कहा ना साफ किए बिना किसी को करने नहीं दूंगा । किसी दूसरे आदमी से साफ करा लेने के लिए लडकों ने पैसे देने चाहिए पर वो नहीं माना और घाट के दूसरे महिलाओं को इकट्ठा करके उन्हें मारने पर उतार हो गया । झगडा बढते देखा तो नरेंद्र नाम से उतर गया । वह क्योंकि सबसे छोटा था इसलिए मल्लाहों ने उसे नहीं होगा । किनारे पर पहुंचकर नरेंद्र अपने साथियों की रक्षा को उपाय सोचने लगा । उसने देखा की दो पूरी सिपाही मैदान की रास्ते से टहलने जा रहे हैं । वो दौड कर उनके पास आया और नमस्ते करके एक का हाथ पकड लिया । अंग्रेज तो जानता ना था । नरेंद्र ने उन्हें इशारों से अपनी बात समझाई और घाट की तरफ चलने के लिए खींचने लगा । एक छोटी सी सुंदर बाले के इस आग्रह पाई बहुत खुश हुए । मुद्रण तनाव के पास आए और सारी बात समझ गए । उन्होंने हाथ का बेन उठाकर मल्लाहों टाटा और बच्चों को छोड देने का आदेश दिया । गोरे सिपाहियों को देखकर मल्लाह लोग करे और अपनी अपनी नावों में चले गए । यू नरेंद्र साथियों ने संकट से छुटकारा दोनों से पानी नरेंद्र के इस आचरण से बहुत प्रसन्न हुए । वो उसे अपने साथ थियेटर ले जाना चाहते थे पर वो अपने हमजोलियों के साथ लौटाया । नरेंद्र को भय दिखाकर किसी काम से रोकना असंभव इस सिलसिले की घटना इस प्रकार उसके पडोसी साथी के घर में चम्पक खून का एक पेड था । पेड की टहनी में पैर की गौर डालकर सिर और हाथ मुझे लटकाकर झूलना नरेंद्र का प्रिय । एक दिन वो पेड की ऊंची टहनी पर इसी प्रकार छूट रहा था कि उसके एक साथी का दादा उधर आ निकला । बूढे का हृदय भय से काम किया । एक तो ऊंचाई दूसरे नरेंद्र के उत्पाद से पहनी टूटने की काफी आशंका । बूढा ये भी जानता था कि नरेंद्र डराने धमकाने से मानने वाला नहीं । इसलिए उसने दुलार से कहा बेटा स्पेड कर्नाटर इसपर तो ब्रह्मा राक्षस रहते हैं । नरेंद्र बोला कहाँ है ब्रह्मराक्षस? हमने तो नहीं देखा । बूढे ने फिर कहा काम महाराष्ट्र दिखाई हो रही देता है, वो तो बिना दिखाएगी गर्दन जो पेट लेता है । बूढे ने ब्रह्मराक्षस की विकेट आकृति का वर्णन किया और क्रूर जा के दो चार धारण देकर समझाया कि वह अपने आश्रय पेड का अपमान कब से है नहीं करेगा । नरेंद्र को चुप देकर पूरे ने समझा सी कम कर हुई पर जैसी बूढा वहाँ से हटा नरेंद्र फिर उसी ऊंची चोटी पर चढ बैठा । लेकिन उसके साथ ही की हिम्मत नहीं पडी । वो फॅमिली होता से नीचे खडा रहा । भावनाओं पर नरेंद्र ने उसे कहा, नहीं भाई, ब्रह्मराक्षस की बात कौन जाने । नाम मालूम कब की डर से आकर गर्दन मरोड डाले । साथ ही कर दिया ढक तू ऍफ है । नरेंद्र बोला तेरे दादा डराने के लिए झूठमूठ बात बनाये गए । अगर पेड पर सचमुच ब्रह्मराक्षस रहता तो उसमें मेरी गर्दन कब की मरोड भी होती । नरेंद्र का यही स्वभाव सारी उम्र बना रहा । किसी भी बात पर विश्वास करने से पहले वो उसे तर्क की कसौटी पर कसता था । महेंद्र और पेंद्र उसके छोटे भाई भी हर तरह चुस्तदुरूस्त हूँ । नरेंद्र से उनका कोई मुकाबला मुझे नरेंद्र से स्वामी विवेकानंद बन गया तो बाल निकाल के बारे में उसने शिष्य से बातें करते हुए कहा मैं बचपन से ही जिद्दी शैतान था नहीं क्योंकि खाली हाथ सारी दुनिया को मारा संभव था ।

2. Swami Vivekanand

3. Swami Vivekanand

चैप्टर थ्री धवन सत्य जो केवल उन्हीं को प्राप्त होता है जो निर्भय होकर बिना दुकानदारी किए उसके मंदिर में जाकर केवल उसी के ही तो उसकी पूजा करते हैं । हाँ विवेकानन्द रामकृष्ण परमहंस एक सच्चे मनीषी थे । वो अपने मनन और भिन्न भिन्न समाधियों द्वारा इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि एक ही सत्ता एक साथ एक भी है और अनेक भी है और फिर घोषणा की थी कि हिन्दू मुसलमान इस साइड था । वैष्णव आदि संप्रदायों का धर्म के नाम पर आपस में लडना व्यर्थ है । उन्होंने एक ही सत्ता के ईश्वर, अल्ला तथा गॉर्ड अलग अलग नाम रख लिए है और अपने अपने मार्ग से एक उसी की खोज कर रहे हैं । अब अपने इस आदर्श को कार्यरूप देने के लिए उन्हें संगठन की जरूरत महसूस हुई । इसके लिए उन्होंने अठारह सौ चौरासी में शिष्य बनाना शुरू की है और अठारह सौ छियासी में आपने मृत्यु के समय तक पच्चीस शिष्य डालिए । नरेन्द्र उन सब में श्रेष्ठ था और परमहंस ने उसके निर्माण में अपनी पूरी शक्ति लगा । नरेंद्र से उनका प्यार जुनून की हद तक बढ गया था । प्रियनाथ सिन्हा अपने स्वर्ण में लिखते हैं, नरेंद्र बहुत दिनों से श्रीराम कृष्ण देव के पास नहीं गए थे । इसलिए वे स्वयं एक दिन सवेरे रामलाल के साथ कल घटना में नरेंद्र के तंग में आए । उस दिन सवेरे नरेंद्र की कमरे में दो सहपाठी हरिदास चट्टोपाध्याय और दशरथी सान्याल बैठेगा । ये लोग कभी पढते थे तो कभी वार्तालाप करते हैं । इसी समय है वह हरिद्वार पर नर्इ नरीन ये शब्द सुनाई पडेगा । स्वर सुनते ही नरेंद्र हडबडाकर तेजी से नीचे पहुंचे । उनकी मित्र ने भी समझ लिया कि श्रीराम कृष्ण देव आए हैं । इसलिए नरेंद्र इतनी अस्त व्यस्त हो कर उन्हें परस्पर साक्षात्कर हुआ । श्रीरामकृष्णन नरेंद्र को देखते ही अश्रुपूर्ण लोचनो से गदगद स्वर में कहने लगे तो इतने दिनों तक आया क्यों नहीं फॅारेन इतने दिनों तक क्यों नहीं आया? बार बार इस तरह कहते कहते कमरे में आकर बैठ के बाद में अंगोछे में बंदे संदेश को खोलकर नरेंद्र को खा खा कहकर खिलाने लगे । जब कभी नरेंद्र को देखने आते तो कुछ न कुछ अति उत्तम खाद्य वस्तुओं उनके लिए अवश्य मान कर लिया । बीच बीच में लोगों के द्वारा भी भेज देते थे । नरेंद्र के लिए खाने वाले तो थी नहीं । उनमें से कुछ संदेश लेकर पहले अपने मित्रों के पास गए और उन्हें दिए । फिर स्वयं है श्री राम कृष्णा । इसके बाद बोले अरे दिन गाना बहुत दिनों से नहीं सुना, जरा गाना तो गा । उसी समय तानपुरा लेकर उसका कान एंड स्वर बांध कर नरेंद्र ने गाना प्रारंभ ज्यादा वो वहाँ कुल कुंडलिनी जो भी गाना आरंभ हुआ, श्रीरामकृष्ण भी भावा होने लगे । गाने के स्तर स्तर में उनका मन ऊपर उठने लगा । आंखे भी अपलक हो गयी । अंग स्पंदन हीन हो गए । मुख्य ने अलौकिक भाव धारण किया और धीरे धीरे संगमर्मर की मूर्ति के सम्मान निस्पंद होवे निर्विकल्प समाधि में लीन हो गए । नरेंद्र के मित्रों ने इससे पहले किसी मनुष्य को इस प्रकार भाव आस नहीं देखा था । वे श्रीरामकृष्ण की व्यवस्था देखकर मन में सोचने लगे । मालूम होता है शरीर में किसी प्रकार की वेदना से ऐसा उत्पन्न हो गई है, इसलिए वे संज्ञाशून्य हो गए । वह बहुत डर दश्ती तो जल्दी जल्दी पानी लाकर उनके मुख पर छींटा देने का प्रयत्न करने लगे । ये देखकर नरेंद्र उनका रोककर कहने लगे उस की कोई आवश्यकता नहीं । वे संज्ञाशून्य नहीं हुए हैं । वे भावा हुए हैं । फिर से गाना संदेश देवी चेतनायुक्त हो जाएंगे । नरेन्द्र ने इस बार श्यामा विषय गाना प्रारम्भ किया । उन्होंने एक बार तीन मिनी तेरे मिनी ते मनी करे ना जो माँ श्यामा इस प्रकार के बहुत से शाम विषय कभी भावना हो जाते थे और कभी स्वाभाविक अवस्था प्राप्त कर लेते थे । नरेंद्र बहुत देर तक गाना गाते रहे । अंत में गाना समाप्त होने पर श्रीराम कृष्ण देव बोले दक्षिणेश्वर चलेगा कितने दिनों से नहीं गया है । चैनल फिर लौटाना । नरेन्द्र उसी समय तैयार हो गए । पुस्तक आदि उसी तरह पडी रही । केवल तानपुरे को यत्नपूर्वक रखकर उन्होंने श्री गुरुदेव के साथ दक्षिणेश्वर प्रस्थान किया । नरेंद्र अगर कुछ दिनों तक दक्षिणेश्वर नहीं जाता था तो रामकृष्णा बहुत व्याकुल होते थे । अठारह सौ छियासी की बात है । वो एक दिन बरामदे में बेचैन हो रहे थे और रोते हुए कह रहे थे मां उसे देखे बिना में रहे नहीं सकता । कुछ क्षण बाद उन्होंने अपने को संभाला और कमरे में शिष्य के पास आकर बैठ हैं । इतना रुपया पर नरेंद्र नहीं आया । वे बेसिस से कह रहे थे उसे एक बार देखने के लिए मेरे हृदय में बडी पीडा होती है । छाती के भीतर मानो कोई मरोड रहा है पर मेरी खिचांव को वो नहीं समझता । जब नरेंद्र आ जाता तो पहले उस से गाने सुनते और फिर खूब खिलाते पिलाते थे । कई बार से ढूंढने खुद भी शहर जाते थे । रामकृष्ण नरेंद्र को अपने शिष्यों में सबसे अधिक प्यार करते थे । उन्होंने सुरेंद्रनाथ के मकान पर पहली ही नजर में पहचान लिया था कि नरेंद्र एक सत्यनिष्ठ और दृढ चरित्र युवक है और इसमें लोक नायक बनने की बडी संभावनाएं रामकृष्णा ने अपनी अंतर्दृष्टि से भाग लिया कि उनके जितने मत उसने पत्थर सार्वभौम संदेश का प्रचार करने के लिए नरेंद्र एक योग्य अधिकारी है । सिर्फ इतना ही नहीं उनकी मैं थक सृष्टा समुद्र कल्पना नहीं और से सप्तर्षि मंडल में से एक नर रूपी नारायण बना दिया । जिस तरह रामकृष्ण परमहंस को देखकर नरेंद्र की एक राय बनी, उसी तरह नरेंद्र को देखकर परमहंस की जो राय बनी उसे उन्होंने यूज किया है । मेरे नरेंद्र के भीतर थोडी भी कृत्रिमता नहीं है । बजाकर देखो तो ठंड ठंड शब्द होता है, दूसरे लडकों को देखता हूँ । मानव आंख कान दबाकर किसी तरह दो तीन परीक्षाओं को पार कर लिया है । बस वही देख । उतना करते ही सारी शक्ति निकल गई है, परंतु नरेंद्र वैसा नहीं है । हस्ते हस्ते सब काम करता है पास करना उसके लिए कोई बात ही नहीं । वहाँ ब्रह्मा समाज में भी जाता है, वहाँ भजन गाता है, परंतु दूसरे भ्रमों की तरह नहीं । वही यथार्थ ब्रह्मज्ञानी ध्यान के लिए बैठते ही उसे ज्योति दर्शन होता है । उसे मैं यही प्यार नहीं करता । नरेन्द्र कि इन्हीं गुणों के कारण रामकृष्ण अपने शिष्यों में से उसे सबसे अधिक प्यार करते हैं और इसे अपना । अगर आपने युग कार्य के लिए तैयार करना चाहती थी, लेकिन नरेंद्र भी सहज में हाथ लग जाने वाला नहीं था । वहाँ भी दृढ संस्कारयुक्त गठन का असाधारण युवक था जिसके बहारी आचरण से लोगों से उद्दंड, हटी, दंभी तथा कैसे तडप रहा है और जीवन रह से पास जाने के लिए सुख भुगतो किया वहाँ प्राण तक होम कर सकता है । रामकृष्णा किसी भी व्यक्ति को जांच परख कर ही अपना शिव बनाया करते थे । नरेंद्र की असाधारण प्रतिभा को चाहे उन्होंने पहचान लिया था और चाहे भी उसे तन मन से प्यार करते थे, उसे देखे बिना चैन नहीं पडता था लेकिन शिष्य के रूप में ग्रहण करने से पहले उस की भी परीक्षा लेना आवश्यकता हो सकता है की दृष्टि ने धोखा खाया हो । इसी तरह जो व्यक्ति शिक्षा देने का योग के अधिकारी न हो, नरेंद्र उसे गुरु धारण करने को तैयार नहीं था । इसलिए उसने भी रामकृष्ण, स्वभाव और शक्ति की परीक्षा लेना आवश्यक समझा । योग वही है कि एक अद्भुत पुरुष और एक असाधारण युवक अपने अपने कक्ष पत्र में घूमने वाले नक्षत्रों की तरह से ऐसा एक दूसरे से आठ तक रहे और इन दोनों में गुरु शिष्य का संबंध होने से पहले एक दूसरे की परीक्षा लेते एक दूसरे को समझाते पडते रहे । नरेन्द्र दक्षिणेश्वर आने से पहले ब्रह्मा समाज का सदस्य था और उसके प्रतिज्ञा पत्र निराकार द्वितीय विश्व रखकर केवल उसी की उपासना करूंगा पर हस्ताक्षर भी किए थे । अब रामकृष्ण ने उसे अष्टावक्र संहिता अधिग्रहण पडने को दिया लेकिन इनमें व्यक्त मान्यताएं नरेंद्र की पूर्व संस्कारों तथा मान्यताओं के विपरीत थी । इसलिए वजन आउट मैं ये पुस्तकें नहीं पडेगा । मनुष्य ईश्वर कहना इससे बडा पाप और क्या होगा? ग्रंथ करता ऋषि मुनियों का मस्तिष्क अवश्य ही विकृत हो गया था नहीं तो ऐसी बातें कैसे लिख पाते । रामकृष्णा मृदु मुस्कान होठों पर लाकर शांत भाव से उत्तर देते हैं तो इस समय उनकी बातें ना लेना चाहे तो नाले पर ऋषि मुनियों की निंदा क्यों करता है । तो सत्यस्वरूप भगवान को पुकारता चल उसके बाद मैं जिस रूप में तेरे सामने प्रकट होंगे उसी पर विश्वास कर लेना । राखाल चन्द घोष नरेंद्र के साथ ही ब्रह्मा समाज का सदस्य बनाया था । अब नरेंद्र से कुछ दिन पहले ही वह दक्षिणेश्वर आने जाने लगा था । एक दिन नरेंद्र ने देखा कि वो रामकृष्ण के पीछे पीछे मंदिर में जाकर मूर्ति को प्रणाम कर रहा है । नरेंद्र का पारा चढ गया । उसने राखाल पर प्रतिज्ञा भंग करने का दोष लगाया और उसे मिथ्या जारी कहा । राखाल ने अप्रतिम होकर गर्दन झुका ली । उस से कह देना बंद पडा । लेकिन रामकृष्ण ने उसका पक्ष लेकर नरेंद्र से कहा, उसको यदि अब सरकार में होती हो तो वो क्या करेगा? तुम्हें अच्छा नहीं लगे तो तुम ना करो । पर इस प्रकार दूसरों का भाव नष्ट करने का तुम्हें कौन अधिकार देता है? रामकृष्ण अपने विचार किसी पर थोपते नहीं थे और अगर कोई दूसरा किसी पर थोपे तो वे उसका विरोध करते हैं । अपने शिष्य की वृद्धि, रामकृष्ण के व्यवहार के बारे में रोमांस बोला लिखते हैं, उस समय तक भारत वर्ष में गुरु का उसके शिष्य माता पिता से भी बढकर आदर करते थे । परंतु रामकृष्णा ऐसा कुछ ना चाहते थे । वे अपने आप को अपने शिष्य के समान समझते थे । मैं उनके साथ ही उनके भाई थे । वे घनिष्ठ मित्र के रूप में उनसे बातें करते थे और किसी प्रकार के बडप्पन का भाव प्रदर्शित नहीं करते थे । एक दिन की बात है कि केशवचंद्र सेन विजय कृष्ण गोस्वामी आदिब्रह्मा समाज की प्रसिद्ध नेता रामकृष्ण के पास बैठे थे । नरेंद्र भी वहां मौजूद थे । परमहंस भावावेश में उन की ओर देखते और बातें करते रहे, लेकिन जब भी चले गए तो रामकृष्णन ने अपने भक्तों को मुखातिब करते हुए कहा हाँ, अब में मैंने देखा एशिया में जिस एक शक्ति के बल पर प्रतिष्ठा प्राप्त की है, नरेंद्र में उस प्रकार की अठारह शक्तिया कृष्ण और विजय के मन में ज्ञानदीप चल रहा है । नरेन्द्र में ज्ञान सूर्य विद्यमान नरेंद्र ने प्रतिवाद किया । क्या कहते हैं कहाँ विश्वविख्यात केशव सीन और कहाँ? स्कूल का एक नगण्य लडका नरेंद्र लोग सुनेंगे फिर आपको पागल कहेंगे रामकृष्णन एमरित हास्य कर सरल भाव से उत्तर दिया मैं क्या करूँ? भला माने दिखा दिया । इसलिए कहता हूँ महान दिखा दिया या आपके मस्तिष्क का ख्याल है, कैसे समझे? नरेंद्र ने कहा मुझे तो महाराज भी ऐसा होता तो यही विश्वास कर लेता तो ये मेरे मस्तिष्क आ ही क्या है? आशियाकी विज्ञान और दर्शन ने इस बात को निःसंदेह प्रमाणित कर दिया है कि कान, आंख, आधी इंद्रिया कई बार हमें भ्रम में डाल देती है । ये हमें पद पद पर धोखा देती रहती है । आप मुझे प्यार करते रहते हैं और प्रत्येक विषय में मुझे बडा देखने की इच्छा करते हैं । इसलिए संभवतः था । आपको ऐसे दर्शन होते रहते हैं । जो बात तर्क की कसौटी पर खरी ना उतरे, उस पर विश्वास कर लेना नरेंद्र के स्वभाव के विपरीत था । वहाँ राम कृष्ण के हर शब्द को तो बोलता था और संदेह व्यक्त करने में सब कुछ आता नहीं । राम कृष्णा भी नाराज होने या बुरा मानने के बजाय इसी से उसे अधिक चाहते थे । नरेंद्र के आने से पहले उन्हें काली से ये प्रार्थना करते सुना गया था । हाँ, मैंने जो कुछ उपलब्धियां प्राप्त की है, उनमें संदेह करने वाले किसी व्यक्ति को मेरे पास भेज दो । नरेन्द्र विज्ञान और पांच शाह के दर्शन पडा था । उसने जब दक्षिणेश्वर आना जाना शुरू किया तो अंधविश्वास और मूर्ति पूजा से सख्त घृणा करता था । उस समय ना सिर्फ भक्तगण राम कृष्ण का अवतार मानते थे बल्कि वे खुद भी अपने को अवतार मान देते और शिष्यों से कहते थे जो राम था, जो कृष्ण था, वहीं अब रामकृष्ण है । लेकिन नरेंद्र ने इस बारे में उन्हें साफ साफ कहा, चाहे सारी दुनिया आपको अवतार कहे, पर जब तक मुझे इसका प्रमाण नहीं मिलता, मैं आपको वैसा नहीं करूंगा । रामकृष्ण ने मुस्कराते हुए नरेंद्र की बात का समर्थन किया और शिष्यों से कहा, किसी भी बात को केवल मेरे कहने के कारण स्वीकारना करो । तुम स्वयं हर एक बात की परीक्षा करो । रामकृष्णा अद्वैत सिद्धांत की जो ब्रह्मा की एकता सूचक शिक्षा देते थे, नरेंद्र उस पर तनिक भी ध्यान नहीं देता था, बल्कि कई बार उसका मजाक उडाते हुए अपने मित्र हाजरा से कहा करता था क्या ये संभव है? लोटा ईश्वर है, कटोरा ईश्वर है, जो कुछ दिखाई पड रहा है तथा हम सब ईश्वर है । नरेन्द्र की इस प्रकार की आलोचना से रामकृष्ण के भाग कर शिष्य उससे छूट गए थे । शुरू शुरू में वे उससे कठि तथा जानकारी समझने लगे थे । पर नरेंद्र का ज्ञान देखकर स्वयं रामकृष्ण का आनंद इतना तीव्र होता था कि वे बीच बीच में भावा नष्ट हो जाते थे । रोमांस बोला । लिखते हैं नरेन्द्र की तीव्र आलोचना और उसके आगे समय तर्क उन्हें आनंद से मग्न कर देते थे । नरेंद्र की उज्वल तम तर्कबुद्धि और सत्य के अनुसंधान के लिए उसकी अटक निष्ठा के प्रति उन गहरी श्रद्धा जी । वे उसे शिवशक्ति का प्रकाश मानते थे और कहते थे कि ये शक्ति ही अंत में माया को बराबर खुद करेगी । वो कहते थे, देखो कैसे अन्तर भी दी दृष्टि हैं । ये एक प्रचलित अग्निशिखा है । समस्त अपवित्रता को भस्म कर देंगे । महामाया स्वयं भी उसके पास दस कदम के अंदर तक नहीं हो सकती । उसने उसे जब महिमा दी है, उसकी शक्ति ही उसे पीछे रोक रखती है । यहाँ भी लिखा है । तथापि कभी कभी जब उसकी आलोचना दूसरों का कोई ख्याल न करते हुए कठोर भाव से प्रयुक्त होती थी तो उससे वृद्ध रामकृष्ण को दुःख होता था । नरेंद्र ने रामकृष्ण के ऊपर ही कहा था, आपके से जानते हैं कि आपकी उपलब्धियां केवल आपकी अस्वस्थ मस्तिष्क की उपज । यह केवल दृष्टि ग्राम मात्र नहीं है । इन मतभेद के बावजूद अद्भुत पुरूष और असाधारण युवक के आपसी संबंध दिन दिन कैसे घनिष्ठ और स्मिथ होते जा रहे थे, इसके दो उदाहरण लीजिए । नरेंद्र कोई दो सप्ताह से दक्षिणेश्वर नहीं आया था । रामकृष्णा उसे देखने के लिए व्याकुल हो उठे । कलकत्ता जाकर देखने का निश्चय किया । इतवार का दिन था । सोचा कि नरेंद्र शायद घर पर नाम ले । परेशान को साधारण ब्रह्मा समाज की उपासना में भजन गाने अवश्य जाएगा । अतेम रामकृष्ण शाम को ब्रह्मा समाज के उपासना भवन में उसे खोजने गए जब वे वहां पहुंचे उस समय आचार्य वेदी से व्याख्यान दे रहा था । वे अपनी सीधे स्वभाव से वेदी की ओर बढ चले । उपस् थित सर्जनों में से कईयों ने उन्हें पहचान लिया । खुसर पुसर शुरू हुई और लोग उच्चकुल चक्कर उन्हें देखने लगे । राम कृष्ण बेदी के निकट पहुंच करे से ऐसा भाव विष्ट हो गए । उन्हें इस अवस्था में देखने की उत्सुकता और भी बडी उपासनागृह में गडबडी मछली देख संचालकों ने गैस की बत्तियां बुझा दी । अंधेरा हो जाने के कारण जनता में मंदिर से निकलने के लिए हडबडी मच गई । नरेंद्र को रामकृष्ण के वहाँ आने का कारण समझने में देर नहीं लगी । उसने आकर उन्हें संभाला । जब समाधि भंग हुई तो वहाँ मंदिर के पिछले दरवाजे से किसी तरह ने बाहर लाया और गाडी में बैठाकर दक्षिणेश्वर पहुंचाया । ब्रह्मो ने रामकृष्णा के प्रति दैनिक भी शिष्टाचार नहीं दिखाया बल्कि उनका आचरण अभद्रता और उपेक्षा का था । नरेन्द्र के मन पर इससे चोट लगी और उसने इसके बाद ब्रह्मा समाज में जाना छोड दिया । रामकृष्ण ने नरेंद्र की परीक्षा लेने के लिए एक बार ऐसा भाव अपनाया की उसके दक्षिणेश्वर आने पर वे उसकी ओर कुछ भी ध्यान नहीं देते थे । ना उसका गाना सुनते और नौ से बातें करते । नरेंद्र ने भी इसकी कोई परवाह नहीं कि वहाँ आता और शिष्य से हज बोल कर लौट जाता । प्रतापचंद हाजरा से उसकी खास तौर पर पट्टी वहाँ कभी कभी उसके साथ बातचीत और बहस में तीन चार घंटे बता देता, जब इस प्रकार जाते जाते लगभग एक महीना बीत गया । एक दिन हाजरा से बात करने के बाद वो कुछ देर के लिए रामकृष्ण के पास बीज बैठा । जब नरेंद्र उठकर जाने लगा तब बोले, जब मैं उससे बात नहीं करता है तो फिर किस लिए आता है? नरेन्द्र ने चट कर दिया । आपको चाहता हूँ इसलिए देखने आता हूँ । बात सुनने के लिए नहीं । उसका ये उत्तर सुनकर रामकृष्ण भाव आनंद से गदगद हो उठे । आपने पर रामकृष्ण का इतना मेंहदी करेगी? नरेंद्र ने उनसे मजाक में कहा । पुराण में लिखा है राजा भरत दिन रात अपने पालित हिरण की बात सोचते सोचते मरने के बाद हिरण हुए थे । आप मेरे लिए जितना करते है, उससे आपकी भी वही दशा होगी । शिशु के समान सेटल रामकृष्णा चिंतित होकर बोले, ठीक ही तो कहता है तो फिर क्या होगा? मैं तुझे देखे बिना रह नहीं सकता । संदेह का उदय होते ही रामकृष्णा चट काली मंदिर में माँ के पास गए और कुछ दिनों के बाद हसते हुए लौट हैं । बोले अरे मूर्ख मैरी बात नहीं मानूंगा । माँ ने कहा टूस नरेंद्र को साक्षात नारायण मानता है इसलिए प्यार करता है । जिस दिन उसके भीतर नारायण नहीं दिखेगा उस दिन दूसरी उसका मूवी देखने के बीच में नहीं होगी । से से अठारह सौ चौरासी तक तीन वर्ष ऐसे ही चलते रहे । जब नरेंद्र ने दक्षिणेश्वर आना जाना शुरू किया तो उसे एफडीए की परीक्षा दी नहीं, तब तक वहाँ मिल आदि पार्शियल आती । नया इको के मतवार का अगेन बराबर जारी रखा । बी । ए पास करते करते उसने देखा करके हम बाद यूँ और बैंक है इनकी नास्तिकता अगले अवाद और आदर्श इच्छित वस्तु आज डार्विन का विकासवाद, कामटे और स्पेंसर का अज्ञेयवादी और आदर्श समाज की अभिव्यक्ति के संबंध में बहुत कुछ पढ लिया था । उन दिनों जर्मन दार्शनिको की बडी चर्चा थी इसलिए नरेंद्र ने बाॅन्ड फिफ्टी हेंगे । शॉप ने हावर के मतवादों से भी परिचय प्राप्त किया था । इसके अलावा स्नायु और मस्तिष्क की गठन एवं कार्य प्रणाली को समझने के लिए मेडिकल कॉलेज में जाकर व्याख्यान सुने और विषय का अध्ययन किया । लेकिन इस सबसे ज्ञान की प्यास बुझाने के बजाय और तीव्र होती । उसके हृदय में सत्य तत्व निर्णय करने का प्रबल अच्छा रहा था । एक तरफ पश्चिम का भौतिकवाद और दूसरी तरफ दक्षिणेश्वर का अध्यात्मवाद दोनों के बीच डोर रहा । उसका मन अत्यंत शांत था । बिना अनुभव किये ईश्वर को मानने की उपेक्षा । नरेंद्र नासिक बन जाना बेहतर समझता था । निर्णय कर लेना साइज नहीं था । घर का वातावरण और पारिवारिक परंपरा भी दो परस्पर विरोधी आदर्श प्रस्तुत कर रही थी । एक तरफ दादा का त्याग था, जिन्होंने सबकुछ छोडकर सन्यास धारण किया था । दूसरी तरफ पिता का भोगवाद जिन्होंने वकालत जमाई थी, ज्यादा से ज्यादा रुपये का माना और ठाठ से खर्च करना ही इनके जीवन का लक्ष्य था । पास शायद शिक्षा के प्रभाव से उन्होंने अतीत को भुलाकर वर्तमान में रहना सीखा था । वे संस्कृत नहीं जानते थे । इसलिए गीता और उपनिषद आदि का अध्ययन उन्होंने नहीं किया था और न करने की आवश्यकता ही महसूस की । विचार अपने को स्वतंत्र चिंतक मानते थे । पर आत्मा तथा शरीर का क्या संबंध है? ईश्वर है या नहीं ये जानने की चिंता उन्होंने कभी नहीं । फारसी की सूफी कवि हाफिज की कविता और बाइबिल में दर्ज ईसा मसीह की वाणी ही उनके आध्यात्मिक भाव की चरम सीमा थी । नरेंद्र को धर्म में प्रवृत्त देखकर उन्होंने एक दिनों से बाइबल उपहार में दिया और कहा ले धर्मकर्म सभी इसी में हैं । दरअसल हाफिज की कविता दत्ता बाइबिल बी वे मान बहलावे अथवा फैशन के तौर पर पडते थे । उनकी स्वार्थ प्रिया बुद्धि को इन दो ग्रंथों की भी और कोई व्यवहारिक उपयोगिता दिखाई नहीं दे दी थी । वे नितांत आत्मजीवी थे । धन और यश उनकी जीवन नौका के दो सपूत हैं । पहले आप सब भोग से रहूँ फिर जो धन बच्चे उसे दान में देकर दूसरों की दृष्टि में सुखी और श्रेष्ठ मनोज कलकत्ता के शिक्षित समाज में ऐसे ही लोगों की संख्या दिन दिन बढ रही थी । इन लोगों की यह धारणा बन गई थी कि विज्ञान, स्वतंत्र चिंतन और आध्यात्मिक भी अगर है तो पश्चिम के पास है । हमारे ऋषियों तथा शास्त्रों से अंधविश्वास और दुर्बलता के सिवा और कुछ नहीं सीखा जा सकता है । इसी पाश्चात शिक्षा के कारण ब्रह्मा समाज दो में विभाजित हो गई थी । भावावेश में आनंद विभोर हो जाने वाले रामकृष्ण का अद्वैतवादी ऐसा था जो आत्मत्याग ई और सत्यनिष्ठ युवकों को अपनी और आकर्षित कर रहा था । पर नरेंद्र की तर्कबुद्धि उससे भी अपना सामंजस्य स्थापित नहीं कर पा रही थी । नरेंद्र ने अठारह वर्ष की आयु में दक्षिणेश्वर जाना शुरू किया था । अब ये की परीक्षा देते समय उसकी आयु किस बस्ती यह तय था कि व्यक्तिगत सुख भोग को उसने अपने आदर्श के रूप में कभी ग्रहण नहीं किया था । सत्य का अनुसंधान, समाज, राष्ट्र और मानव जाति का कल्याण ही उसके जीवन का पर मत दिए था । अपने आप को इस दिए के अनुरूप बनाने के लिए जिस तरह सोना को थाली में पिलाया जाता है, नरेंद्र ने अपने मस्तिष्क को ज्ञान की कुछ खाली में पिछला डाला था । लेकिन इस चमक थी मचलती तरल पदार्थ को उठा ली से निकालकर ठोस रूप देने वाला आदर्श पुरुष उसे अभी नहीं मिला था और ये अधिकार उसमें अभी रामकृष्ण को भी नहीं दिया था । इंडियन ओवर पास जाते दार्शनिक हेमिल्टन से अधिक प्रभावित था । हैमिल्टन ने अपने दर्शन ग्रैंड के उपसंहार में लिखा है संसार का नियामक ईश्वर है । इस सिद्धांत का आभास पाकर मनुष्य की बुद्धि निरस्त हो जाती है । ईश्वर का स्वरूप क्या है, ये प्रकट कर रहे की शक्ति उसमें नहीं है । अतः दर्शनशास्त्र की वही पिछली है और जहाँ दर्शन की समाप्ति है वहीं अध्यात्मिकता का प्रारंभ है । दक्षिणेश्वर में वह रामकृष्णा की शिष्यों से इसकी चर्चा खूब करता था । देखा जाए तो जाने अनजाने में इस माध्यम से भी अद्वैतवादी सिद्धांत के निकट पहुंच गया था । अब थोडा ही फासला तय करना बाकी रह गया था । ऐसी मनोस्थिति में कई बार जीवन घटनाएं भी निर्णायक भूमिका अदा करती है । बी । ए । पास करने से पहले ही विश्वनाथ ने बेटी को प्रसिद्ध टोनी निमाई चरण बसु के पास जाकर कानून की शिक्षा पाने का आदेश दिया ताकि वह भी पिता की दराज सफल वकील बने । फिर वे ये भी चाहते थे कि नरेंद्र नाम कृष्ण की चक्कर से निकले और विभाग करके ग्रहस्थ बने । उसके स्वतंत्र स्वभाव को जानते हुए विश्वनाथ ने इस संबंध में सीधे बात करना उचित नहीं समझा और नरेंद्र को ढर्रे पर लाने का काम उसके प्रिय सही पार्टी मित्र को सौंपा । एक दिन नरेंद्र टंग में बैठा परीक्षा की तैयारी के लिए पाठ्यपुस्तक पड रहा था । उसका ये सब पार्टी मित्र आया और गंभीर मुद्रा धारण करके कहने लगा नरेन्द्र सात संघ धर्म अर्चना आदि पागलपन छोर ऐसा काम कर जिसे सांसारिक सुख सुविधा प्राप्त हो । तथाकथित अनुभवी व्यक्तियों से ऐसी बातें सुनते सुनते नरेंद्र के कान पक चुके थे । अभी एक प्रिय मित्र के मुझसे भी वही उपदेश सुनकर वह स्तब्ध रह गया । कुछ क्षण मौन स्थिर बैठा रहा और फिर बोला सुन मेरा विचार अच्छे एकदम भिन्न है । मैं संन्यास को मानव जीवन का सर्वोच्च आदर्श मानता हूँ । परिवर्तनशील अनित्य संसार की सुख की कामना मेरे उधर दौडने की अपेक्षा उस अपरिवर्तनशील सत्यम शिवम सुंदरम के लिए प्राणपण से प्रयास करना कहीं श्रेष्ठ है । पर मित्र दो उसे समझाने का कर्तव्य अपने ऊपर छोडकर आया था । वह उत्तेजित होकर बोला, देखो नरेंद्र तुम्हारी जितने बुद्धि और प्रतिभा है, उसे तुम जीवन में कितनी उन्नति कर सकते हो? दक्षिणेश्वर के रामकृष्णन ने तुम्हारी बुद्धि बिगाड दी है । कुशल चाहते हो तो उस पागल का सब छोड दो, नहीं तो तुम्हारा सर्वनाश हो जाएगा । नरेन्द्र पुस्तक छोडकर कमरे में टहलने लगा । मित्र अपनी बात कहता रहा और उसने रामकृष्ण के बारे में कई प्रश्न पूछे । नरेंद्र नरुका और शांत भाव से बोला भाई, उस महापुरुष को तुम नहीं समझते हैं । वास्तव में मैं भी उन्हें पूरी तरह नहीं समझ पाया । फिर भी उनमें कुछ ऐसी बात तो है कि मैं उन्हें चाहता हूँ । कई युवक सदस्य ब्रह्मा समाज को छोडकर रामकृष्ण के शिष्या बन गए थे । जब विजय गोस्वामी ने भी धर्म परिवर्तन करके साधारण समाज से संबंध विच्छेद किया तो ड्रामा नेता शिवनाथ ड्रामा को रामकृष्ण के पास जाने से रोकने लगे । उन्हें मालूम था कि नरेंद्र भी दक्षिणेश्वर जाता है । इसलिए एक दिनों से वहाँ जाने से मना करते हुए कहा वह सब समाधि भाग जो कुछ तुम देखते हो, उसने आयु की दुर्बलता की ही चिन्ह हैं । अत्यधिक शारीरिक कठोरता का ब्याज करने के कारण परमाणु उसका मस्तिष्क बिगड गया है । नरेन्द्र ने शिवनाथ बाबू की बात का कोई उत्तर नहीं दिया । वोट कर वहाँ चला गया । उसके मस्तिष्क में आंधी चल रही थी और नाना प्रकार के प्रश्न उठ रहे थे । ये सरल हृदय महापुरुष क्या है? क्या बाॅस विकृत मस्तिष्क हैं? मुझे ऐसे कुछ व्यक्ति से वे इतना प्यार किसलिए करते हैं? ये रहस्य क्या प्रमाण? समाज के अधिकांश नेताओं से नरेन्द्र का परिचय था । वहाँ उनके पांडित्य से प्रभावित था । लेकिन उनमें से किसी के प्रति भी नरेंद्र के मन में इतनी श्रद्धा नहीं थी, जितनी रामकृष्ण के प्रति थी । अब उन सबके चेहरे एक एक करके उसकी आंखों के सामने घूमने लगे । उसने अपने आप से पूछा की इतने दिन ब्रह्मा समाज में उपासना प्रार्थना कर की भी उसका हृदय शांत क्यों नहीं हुआ? कैन में से किसी को भी ईश्वर प्राप्ति नहीं हुई है । सत्येंद्रनाथ मजूमदार अपनी पुस्तक विवेकानंद चरित्र में लिखते हैं, एक दिन ईश्वर प्राप्ति के लिए तीव्र व्याकुलता लेकर नरेंद्र घर से निकल पडे । महर्षि देवेंद्रनाथ उस समय गंगा जी पर एक नौका में रह करते थे । नरेंद्र गंगा किनारे पहुंचकर जल्दी से नौका पर चढाए । उनकी जोर से धक्का देने पर दरवाजा खुल गया । महर्षि उस समय ध्यानमग्न थे । एकाएक शब्द सुनकर चौंक उठे । देखा सामने उन मत की तरह ताकते हुए नरेन्द्रनाथ खडे हैं । महार्षि को थोडी देर के लिए भी सोच विचार या प्रश्न करने का अवसर ना दे । वे आवे ग्रुप घंटे से बोल उठे महाशय है क्या आपने ईश्वर के दर्शन किए हैं जिसमें चकित महर्षि ने ना जाने क्या उत्तर देने के लिए दो बार चेष्टा की परंतु शब्द मुख में ही रह गया । अंत में बोले नरेंद्र, तुम्हारी आपकी देखकर समझ रहा हूँ कि तुम योगी हो । उन्होंने नरेंद्र को कई तरह के आश्वासन देकर कहा कि वे यदि नियमित रूप से ध्यान का अभ्यास करें तो ब्रह्मा ज्ञान के अधिकारी बन सकेंगे । नरेंद्र प्रश्न का कोई ठीक उत्तर ना पाकर घर लौट आया । घर लौटकर नरेंद्र ने दर्शनशास्त्र और धर्म संबंधी पुस्तकों को दूर फेक दिया । यदि वे ईश्वर प्राप्ति में उन्हें सहायता ना दे सकी । व्यर्थ में उनकी पार्ट से क्या लाभ? रात भर जाकर नरेंद्र कितनी ही बातें सोचने लगा । एकाएक उन्हें दक्षिणेश्वर के उस अद्भुत प्रेमिक की बात स्मरण हुआ । सारी रात असहनीय उत्कंठा में बिताकर नरेंद्र बोर होते ही दक्षिणेश्वर की ओर दौड पडे । गुरुदेव केशरी चरण कमलों के पास पहुंचकर उन्होंने देखा । सदानंद में महापुरुष भक्तों में घिरे हुए अमृत मधुर उद्देश् प्रदान कर रहे हैं । नरेंद्र के हृदय में मानव समुद्र मंथन आरंभ हुआ । यदि वे भी नहीं कह दे तो फिर क्या होगा? फिर किसके पास जाएंगे? अंदर रहा प्रकृति के साथ बहुत देर तक संग्राम करने के बाद अंत में जिस प्रश्न को एक अनेक धर्माचार्यों से पूछ चुके थे, पर आज तक कोई भी जिस प्रश्न का संतोषजनक उत्तर देने में समर्थ बना हुआ था, उसी प्रश्न को दोहराकर उन्होंने कहा महाराज! क्या आपने ईश्वर के दर्शन किए हैं? मृदुभाषी किसी महापुरुष का प्रशांत मुखमण्डल पूर्व शांति और पुण्य की आभासी उद्भासित हो होने सैनिक भी सोच विचार न करते हुए उत्तर दिया बेटा मैंने ईश्वर के दर्शन किए हैं तो मैं जिस प्रकार प्रत्यक्ष देख रहा हूँ, इससे भी कहीं अधिक स्पष्ट रूप से उन्हें देखा है । नरेंद्र का विस् में सौ गुना बढाते हुए उन्होंने फिर कहा क्या तुम भी देखना चाहते हो तुम मेरे कहे अनुसार काम करो तो में भी दिखा सकता हूँ । ईश्वर इस वाणी में विश्वास का बाल था । नरेंद्र ने रामकृष्ण परमहंस को मन से गुरु धारण किया । अपनी साहब विमान स्वतंत्रता उन्हें सौंपी और उनके बताया अनुसार साधना आरंभ कि थोडे ही दिन बाद उसके पिता हृदय रोग से अचानक चल बसे । नरेन्द्र के लिए ये भयंकर अज्ञात था । सारे परिवार पर मुसीबत का पहाड टूटा । विश्वनाथ ने धन बहुत कमाया था, पर जितना कमाते थे उससे कहीं अधिक खर्च करते थे । उनकी मरती ही कर्ज हुआ होने आगे रह कर चुकाना तो दूर रहा । छह सात व्यक्तियों के लिए अन्य जुटाना समस्या बन गई । कहा रईस ठाठ है और कहाँ फांकों की नौबत आ गई । नरेन्द्र ने पहली बार दरीद्रता का स्वाद चखा । मित्र भी आजमाए गए । सबने संकट में मुंह फेर लिया । नरेंद्र ही अब परिवार में सबसे बडा था इसलिए आजीविका का भार उसी पर आ पडा । इसके लिए जो दौड धूप करनी पडी और इन दोनों उसकी जो मानसिक दशा थी, उसका नरेंद्र ने स्वयं विस्तारपूर्वक वर्णन किया है । उसका कुछ अंश रो माम रूला ने इस प्रकार उस वक्त क्या है मैं भूत से मारा जा रहा था । नंगे पैर में दफ्तर से दूसरे दफ्तर तक दौडता परन्तु सब तरफ से घृणा के अतिरिक्त और कुछ ना मिलता । मैंने मनुष्य की सहानुभूति का अनुभव प्राप्त किया । जीवन की वास्तविकताओं के साथ ये मेरा प्रथम संपर्क था । मैंने देखा कि इस जगह दुर्बल, गरीब और परित्यक्त के लिए कोई स्थान नहीं है । व्यक्ति जो कुछ ही दिन पूर्व मेरी सहायता करने में गर्व अनुभव करते थे, उन्होंने सहायता करने की शक्ति के विद्यमान रहने पर भी अपने मुख फेर लिए । यह संसार मुझे शैतान की श्रृष्टि दिखाई देने लगा । एक दिन जल्दी दोपहरी में जब मैं मुश्किल से अपने पैरों पर खडा हो सकता था, मैं एक स्मारक की छाया में बैठ गया । वहाँ पर मेरे कई मित्र भी थे और और इसमें से एक मित्र भगवान कि अखबार करना का गान करने लगा । ये गाना मुझे अपने सिर पर जानबूझकर किया गया प्रहार जान पडा । अपनी माता और भाइयों की असहाय व्यवस्था याद कर मैं चिल्ला उठा ये गाना बंद करो । जो लोग अमीरों के घरों में पैदा हुए हैं और जिनके माता पिता भूख से नहीं मार रहे हैं, उनके कानों में ये गण सुधार वर्शन कर सकता है । हाँ, एक समय था जब मैं भी इसी प्रकार सोचा करता था । परन्तु अब जब मैं जीवन के अनिश्चितताओं के समूह खडा हूँ, ये गाना मेरे कानों में एक भयानक उपहास के समान चोट करता है । मेरे मित्र को इससे चोट पहुंची । उसे मेरी भयानक आपत्ति का कोई जाना था । अनेक बार जब मैं देखता था कि घर में खाने का पर्याप्त भोजन भी नहीं है । मैं अपनी माँ से यह बहाना करके की । मुझे एक दोस्त ने निमंत्रित किया है । भूखा रहना चाहता हूँ । मेरे धनी मित्र ने मुझे दुर्भाग्य के बारे में कौतुहलवश चिंता प्रकट नहीं की । मैं अपनी व्यवस्था को किसी पर प्रकट न करता था । नरेंद्र के चरित्र गठन में माँ का प्रभाव सबसे अधिक वे धर्मप्राण महिला थी । पर इस घोर संकट में उन का विश्वास भी डगमगा गया । एक दिन सुबह नरेंद्र बिस्तर पर बैठा प्रार्थना कर रहा था । माने चढकर कहा चिप करे झोपडे बचपन से ही भगवान भगवान केवल भगवान भगवान ही नहीं तो ये सब क्या है? माँ की ये बात नरेंद्र को पहुंच गयी । वह सोचने लगा क्या भगवान सच मुझे अगर है तो मैं जितनी प्रार्थनाएं करता हूँ वो सुनता क्यों नहीं? शिव के संसार में इतना शिव क्यों हैं? उसे ईश्वरचंद्र विद्यासागर के शब्द स्मरण हुआ है । यदि भगवान दया मैं और मंगल में है तो अकाल में लाखों आदमी बिना अन्य क्यों मर जाते हैं? उसके मन में ईश्वर के विरुद्ध प्रचंड विद्रोह की भावना उत्पन्न हुई और वह सोचने लगा इश्वर! यदि है भी तो उसे पुकारना व्यर्थ है क्योंकि इससे कुछ लाभ नहीं होता । अब नरेंद्र ठहरा, निडर और फिर थी मनोगत भावनाओं को छुपाए रखना उसके स्वभाव के विपरीत था । अपनी ईश्वर विरोधी भावना को उसने लोगों के सामने युक्ति द्वारा प्रमाणित और सिद्ध करना शुरू किया । परिणाम ये हुआ कि नरेंद्र की नाजिर नासिक के रूप में निंदा फैली बल्कि बात को बढा चढाकर कहा जाने लगा कि दुष्ट लोगों की संगत में पडकर वह शराबी और दुराचारी बन गया है । इस बेईमानी से नरेंद्र और हाथ पकड लिया और वह लोगों के सामने सगर्व कहने लगा कि अगर कोई अपना दुख कष्ट कुछ समय तक भूल जाने के लिए शराब पीता है या वैश्या के पास जाता है, समय इसमें कुछ भी दोष नहीं समझता, अगर वैसे ही उपायों से मैं भी अपना भूल सकू जिससे यह बात मेरी समझ में आ जाएगी । मैं भी ऐसे काम करने से पीछे नहीं हटूंगा । उसकी ये बातें विविध प्रकार से विकृत होकर दक्षिणेश्वर में परमहंस के शिष्या और कलकत्ता में उनके भक्तों तक पहुंची । लिखा है कोई कोई मेरी स्थिति जाने के लिए मुझसे भेंट करने आए हैं और जो निंदा पहली है वह पूर्णतः सही न होने पर भी उसमें से कुछ अंशों पर उनका विश्वास है । इस बात को वो इशारे से व्यक्त कर गए । मुझे लोग इतना हीन समझते हैं ये जानकर दंड पाने के भय से ईश्वर पर विश्वास करना । दुर्बलता का लक्षण मैं यू बिल्डिंग मिल काम के आदि पास शादी दार्शनिको के मतों का उद्यत करने लगा और ईश्वर के अस्तित्व का कोई प्रमाण नहीं है । यह दिखाने के लिए उनके साथ प्रचंड युक्ति तर्कों की अवतारणा करने लग जाता था । ये जानकर कि वे लोग इस बात पर विश्वास करके चले गए कि मैं पतित हो गया हूँ । मुझे प्रसन्नता ही हुई और सोचा कि ठाकुर भी उनके मुख से सुन कर इस पर विश्वास कर लेंगे । पर ऐसी चिंता मन में उठने से मैं फिर हजार हो गया । निश्चय क्या वे जो चाहिए माने मनुष्यों के माता मतों को मूल्य ही जब कुछ है तो उससे मेरी क्या हानि? पर इन तो बाद में सुनकर में सांबित हो गया कि ठाकुर ने उन बातों को सुनकर पहले कुछ नहीं कहा । बाद में भवनाथ ने रोते हुए जब उनसे कहा महाराज नरेंद्र की ऐसी गति होगी ये तो स्वप्ने में भी संभव नहीं था । तो उस समय ठाकुर ने उत्तेजित हो गए कहा था चुप रह अमूर । मैंने कहा है युवा कभी वैसा नहीं हो सकता । यदि फिर कभी ऐसी बात मुझसे कही तो मैं मेरा मूड नहीं देखूंगा । नरेंद्र को दूसरों की निंदा प्रशंसा की कोई परवाह नहीं । गर्मी के बाद बरसात आई और चली गई पर सब तरह बैठ सकते । रहने के बावजूद भी उसे कोई काम ना मिला । आखिर उसने सोचा कि साधारण मनुष्य की तरह धनोपार्जन के लिए उसका जन्म नहीं हुआ है । उसे अपने दादा की तरह सन्यास धारण करना होगा । जाने का दिन भी निश्चित हो गया । पर उसी दिन भर मांस पडोस के एक मकान में आए नरेंद्र उनकी दर्शन करने गया और वे उससे आग्रहपूर्वक अपने सात दक्षिणेश्वर लिया है । दक्षिणेश्वर पहुंचकर मैं दूसरों के साथ कमरे में बैठा था । इतने में ठाकुर का भावेश हुआ देखते देखते हुए का एक मेरे पास आया और मुझे प्रेम से पकडकर आंसू बहाते हुए गाने लेंगे का था कहीं थे ड्राई ना नहीं थे वो राई मैंने संदेह है मुझे तो माॅक हूँ । बाद कहने में डरता हूँ न कहने में भी डरता हूँ । मेरे मन में संदेह होता है कि शायद तुम्हें खो बैठी हूँ । अंतर की प्रबल भाव राशि को अब तक मैंने रोक रखा था । अब उसका वेट नहीं संभाल सका । ठाकुर की तरह मेरे भी नेत्रों से आंसुओं की धारा ऍम हमारे इस प्रकार के आचरण से दूसरे लोग आवाक रह गए । प्रकृतिस्थ होने पर उन्होंने हसते हुए कहा हम दोनों में वैसा ही कुछ हो गया । बाद में सब लोगों के चले जाने पर मुझे पास बुलाकर उन्होंने कहा जानता हूँ तो माँ के काम के लिए संसार में आए हैं । संसार में तो कभी नहीं रहेगा परंतु जब तक मैं हूँ तब तक मेरे लिए रहे । इतना कहकर वह हृदय के आवेग से पुनः सुना रोक सके । नरेन्द्र दक्षिणेश्वर से घर लौटा फिर वही आजीविका की चिंता इकट्ठे धोनी के ऑफिस में कुछ काम करके और कुछ पुस्तकों के अनुवाद से थोडा पैसा मिलने लगा । लेकिन इतने बडे परिवार के लिए ये काफी ना था । सूट सोचकर नरेंद्र दक्षिणेश्वर पहुंचा और हठपूर्वक ठाकुर से कहा माँ भाइयों को कष्ट दूर करने के लिए आपको माँ जगदम्बा से प्रार्थना करनी होगी । रामकृष्ण ने ससनी बहुत कर दिया । अरे! मैंने कितनी बार कहा है । माँ नरेंद्र का दुख कष्ट दूर कर गए तो माँ को नहीं मानता इसलिए मान नहीं सुनती । अच्छा आज मंगलवार है । मैं कहता हूँ आज रात को काली मंदिर में जाकर माँ को प्रणाम करके जो कुछ मांगेगा वही महत्व जीतेगी । मेरी माँ जिनमें ब्रह्मा सकती है उन्होंने अपनी इच्छा से संसार का प्रसाद क्या है? बच्चा है तो क्या नहीं कर सकती । परमहंस के आग्रह से नरेंद्र एक बार नहीं दो बार तीन बार मंदिर में गया । पर वह एक बार भी स्वार्थपूर्ति के प्रार्थना नहीं कर पाया । लिखा है मंदिर में प्रवेश करते ही लग जाने हृदय को व्याप्त कर लिया । मैंने सोचा ये कैसी कुछ बात हैं । मैं जगत्जननी को कहने आया । ठाकुर कहते हैं राजा की प्रसन्नता प्राप्त करके उनसे कह दू को मारना मांगना ये भी वैसी मूर्खता की बात है । मेरी भी वैसी बुद्धि हुई है । लज्जा से प्रणाम करते हुए मैंने फिर का मैं कुछ नहीं मान सामान केवल ज्ञान और भक्ति दो । आगे की बात परमहंस के वक्त तारापद घोष के मुख से सुनी है । आज दोपहर को दक्षिणेश्वर जाकर मैं देखा श्रीरामकृष्ण देव अकेले कमरे में बैठे हैं और नरेंद्र बाहर एक और पडा हो रहा है । पांच जगह प्रणाम करते ही उन्होंने नरेंद्र को दिखाकर कहा देख ये लडका बडा अच्छा है । इसका नाम नरेंद्र हैं । पहले माँ को नहीं मानता था, कल मान गया है कष्ट में है । इस कारण माँ से पैसा रुपया मांगने के लिए कह दिया था परन्तु मांग नहीं सका । कहा लग जाती है मंदिर से लौटकर मुझसे कहा माँ का गाना सिखा दीजिए माँ, मृतक ही तारा ये गाना सिखा दिया । कल रात भर वही गाना गाया पडा हो रहा है पैसे नजरा से हसते हुए उन्होंने कहा नरेन्द्र ने काली का मान लिया । बहुत अच्छा हुआ ना उन्हें । इस बात से बालक के समान आनंदित होते देख मैंने कहा हाँ महाराज बहुत अच्छा हुआ । कुछ देर बाद सुनाते हुए बोले नरेंद्र नीय माँ को मान लिया । बहुत अच्छा हुआ क्यों? उसी बात को बार बार घुमा फिराकर कहते हुए में आनंद प्रकट करने लगे । निद्रा भंग होने पर लगभग दिन के चार बजे नरेंद्र कमरे में आकर ठाकुर के पास बैठ गए । ठाकुरों ने देखकर भाव आष्टी होकर उनसे सटकर प्रायः उन्हीं की कोर्ट में बैठे और कहने लगे अपना शरीर और नरेंद्र का शरीर क्रमश शाह दिखाकर देखता हूँ कि ये मैं हूँ । फिर भी मैं सच कहता हूँ । कुछ भी भेज नहीं देख पा रहा हूँ जैसे करना के जल्मी । लाठी का आधा भाग विवाद देने से दूर भाग दिखाई पडते हैं । पर यथार्थ में दो भाग नहीं है । एक ही है समझा माँ के सिवाय और है ही क्या? क्या बातचीत में आठ बज गए । उस समय ठाकुर की भावा सारा काम होते देखकर नरेंद्र और मैं उनसे विदा लेकर कलकत्ता लौटाए । इसके बाद हमने नरेंद्र को अनेक बार कहते सुना है । अकेले ठाकुर ही प्रथम दिन की भेंट से हर समय समान भाव से मेरे ऊपर विश्वास करते आए हैं । अन्य कोई नहीं, अपने माँ भाई भी नहीं । उनके इस प्रकार के विश्वास और प्यार ही ने मुझे जन्म भर के लिए बांध लिया है । केवल वही प्यार करना जानते हैं और कर सकते हैं । संसार के दूसरे लोग केवल अपने स्वार्थ साधन के लिए प्यार करते हैं । मूर्ति पूजा से घृणा करने वाला नरेंद्र अंत में खुद मूर्ति पूजक बन गया । प्रेम से तर्क पराजित हुआ । बाद को जब भी नरेंद्र विवेकानंद बन गए थे तब उन्होंने कुमारी मेरी है । एल को लॉस एंजिलिस में अठारह जून उन्नीस सौ पत्र में लिखा था काली पूजा किसी भी धर्म का आवश्यक साधन है । धर्म के विषय में जितना कुछ भी जानने योग्य है, तुमने कभी भी उसके विषय में मुझे प्रवचन करते या भारत में उसकी शिक्षा देते हुए नहीं सुना होगा । मैं केवल उन्हीं चीजों की शिक्षा देता हूँ, जो विश्व मानवता के लिए हितकर है । यदि कोई ऐसी विचित्र विधि है, जो केवल मुझे पर लागू होती है तो मैं उसे गुप्त रखता हूँ और यहीं पर बात खत्म हो जाती है । मैं तो मैं नहीं बताऊंगा । काली पूजा क्या है? क्योंकि कभी मैंने इसकी शिक्षा किसी और को नहीं । शिक्षा में वे सिद्धांत ही को प्रमुख मानते थे । ये बात स्वामी थोडा कितान अच्छे को न्यूयॉर्क के लिखे चौदह अप्रैल अठारह सौ छियानवे के पत्र में भी स्पष्ट हो जाती है । रामकृष्ण परमहंस ईश्वर है, भगवान है क्या इस प्रकार की बात यहाँ चल सकती है, सब की है । नए में बलपूर्वक उस प्रकार की भावना को बद्धमूल कर देने का झुका मैं मैं विद्यामान हैं हिन्दू इसमें हम एक शूद्र संप्रदाय के रूप में परिणत हो जाएंगे । तुम लोग इस प्रकार के बैठने से हमेशा दूर रहना । यदि लोग भगवन बद्दी से उनकी पूजा करें तो कोई हानि नहीं है । उनको ना तो प्रोत्साहित करना और ना ही निरूत्साहित । साधारण लोग तो सर्वदा व्यक्ति ही चाहेंगे । उच्च श्रेणी की लोग सिद्धांतों को ग्रहण करेंगे । हमें दोनों ही चाहिए किंतु सिद्धांत ही सार्वभौम है, व्यक्ति नहीं । इसलिए उनके द्वारा प्रचारित सिद्धांतों को ही दृढता से पकडे रहो । लोगों को उनके व्यक्तित्व के बारे में अपनी अपनी धारणा के अनुसार सोचना । गुरु भाइयों के नाम सत्ताईस अप्रैल अठारह सौ छियानवे को इंग्लैंड से लिखे हुए एक लंबे पत्र में रामकृष्ण के व्यक्तित्व और सिद्धांतों पर उन्होंने इस प्रकार प्रकाश डाला है । मधु आदि के बारे में मुझे यही कहना है कि यदि कोई रामकृष्ण देव का अवतार आधी स्वीकार करें तो भी ठीक ही है । नरेन्द्र सच बात ये है कि चरित्र के विषय में भी रामकृष्ण देव सबसे आगे बढे हुए हैं । उनके पहले जो अवतारी पुरुष हुए हैं, उनसे वे अधिक उदार, अधिक मौलिक और अधिक प्रगतिशील ये है कि योग, भक्ति, ज्ञान और कर्म के सर्वोच्च भावों को सम्मिलित होना चाहिए जिसे समाज का निर्माण हो सके । प्राचीन आचार्य निसंदेह अच्छे थे तो ये इस युग का नया धर्म है अर्थात योग, ज्ञान और कर्म का समन्वय आये और लिंगभेद के बिना प्रतीत से प्रतीत तक में ज्ञान और भक्ति का प्रचार पहले के अवतार ठीक से परन्तु श्रीराम कृष्ण जी के व्यक्तित्व में उनका समन्वय हो गया है । ये प्रश्न उठ सकता है कि जब ईश्वर ही अवतार धारण करता है तो एक रफ्तार को दूसरे से ईश्वर का, ईश्वर से आगे अथवा प्रगतिशील होने का क्या? और विवेकानंद ने इस प्रश्न का उत्तर भी दिया है । उन्होंने एक बार अपने शिष्य से कहा था गुरु को लोग अवतार कह सकते हैं अथवा जो चाहे मान कर धारण करने की चेष्टा कर सकते हैं । पर इंदु भगवान का अवतार कहीं भी और किसी भी समय नहीं होता । एक ढाका ही में सुना है तीन चार रफ्तार पैदा हो गए । दरअसल विवेकानंद अवतार को आचार्य के अर्थ में लेते हैं । ये सच है कि का आचार्य के बाद दूसरा आचार्य आगे है । उनके द्वारा ज्ञान चाहे आध्यात्मिक हो या बहुत, उसकी निरंतर प्रगति हुई । अपने गुरु रामकृष्ण के बारे में भी लिखते हैं । श्रीरामकृष्ण अपने का अवतार शब्द के सूली अर्थ में एक अवतार कहाँ करते हैं? यद्यपि में ये बात समझ नहीं पाता था । मैं कहता था कि वे वेदांत की दृष्टि से ब्रह्मा है किंतु उनकी महासमाधी से ठीक पूर्व जब उन्हें सांस लेने में कष्ट हो रहा था । मैं अपने मन में सोच रहा था कि क्या इस वेदना में भी वे अपने को अवतार कह सकते हैं? तो उस समय उन्होंने मुझसे कहा अरे राम था आज कृष्ण था वहीं रामकृष्ण हो गया लेकिन तेरी वेदांत की दृष्टि से नहीं । नरेंद्र की कहानी को आगे बढाने से पहले ईश्वर दर्शन के बारे में भी विवेकानंद का अभिमत जान लेना चाहिए ताकि ब्रह्म क्रांति गुंजाइश ना रहे हैं । लिखा है यदि तुम मुझसे पूछोगे, ईश्वर है या नहीं और मैं ये कह रहा हूँ की हाँ ईश्वर है तो तुम झट मुझे अपने युक्तियां बताने के लिए बाध्य पर होगी और मुझे बेचारे को कुछ यूपिया पेश करने के लिए अपनी सारी शक्ति लगा देनी पडेगी इनको यदि कोइ सा सीए प्रश्न पूछता तो इसका तत्काल उत्तर देते । हाँ ईश्वर है और यही तो मीसा से इसका प्रणाम मानते तो निश्चय ही हिंसा ने कहा होता लोग एशवर्थ हमारे सम्मुख खडा है, कर लो दर्शन । इस प्रकार हम देखते हैं कि महापुरुषों की ईश्वर विशेष धारणा साक्षात उपलब्धि प्रत्यक्ष दर्शन पर आधारित है । तर्क जानने नहीं और फिर लिखा है ये महान शिक्षक इस पृथ्वी पर जीवन तो ईश्वर रूप है । इनके अतिरिक्त हम और किन की उपासना करें । मैं अपने मन में ईश्वर की धारणा करने का प्रयत्न करता हूँ और अंत में पाता हूँ कि मेरी धारणा अत्यंत शुद्र और मिथ्या है । वैसे ईश्वर की उपासना करना पाप होगा । रिजर्व में अपनी आंखें खोलकर पृथ्वी की महान आत्माओं के चरित्र देखता हूँ तो मुझे प्रतीत होता है कि ईश्वर विषय मेरी उच्च से उच्चतर धारणा से भी वे कहीं उच्चतर और महान वेदांत सिद्धांत के अनुसार प्रत्येक मनुष्य क्योंकि वहाँ आत्मस्वरूप है अपने को शिवोहम मैं ईश्वर हूँ । कह सकता है सिद्धांत का तात्त्विक विवेचन हम आध्यात्मिक अद्वैतवाद बनाम भौतिक अद्वैतवाद परिषद में करेंगे । प्रत्येक सिद्धांत क्यूँकि व्यक्तियों में मूर्त रूप धारण करता है । इसलिए नरेंद्र अर्थात विवेकानंद की जीवन कथा भी सिद्धांत को समझने का ठोस माध्यम है और हम अपनी इस कहानी को आगे बढाते हैं । कुछ दिनों बाद मेट्रोपॉलिटिन स्कूल की एक शाखा चाम्पा ताला मोहल्ले में हुई । ईश्वरचंद्र विद्यासागर की सिफारिश से नरेन्द्र वहाँ प्रधान अध्यापक नियुक्त हो गया । इससे पारिवारिक समस्या हल हो गई । इस संकटकाल में कुछ संबंधियों ने नरेंद्र और उसके घरवालों को खूब सताया । उन लोगों ने छलबल से उनके पैतृक मकान पर कब्जा कर लिया । हाँ, भाई और नरेंद्र को नानी के मकान में शरण लेनी पडी । नरेंद्र ने संबंधियों के विरूद्ध हाई को तक मुकदमा लडा जिसमें कई बार लगे और तब वो मकान नहीं मिला । रामकृष्ण के जितने शिष्य थे ये सब अठारह सौ तिरासी तक उनके पास आ चुके थे । वे उन्हें कम कंचन, भोगविलास आदि से हटाकर धीरे धीरे भक्ति के मार्ग पर ला रहे थे । एक दिन पर हम हैंस भक्तों से घिरे बैठे थे । नरेंद्र भी मौजूद था । इधर उधर की चर्चा और हसी मजाक हो रहा था कि वैष्णव धर्म की बात की । रामकृष्ण ने ई धर्म का सारा तक को बताते हुए कहा किस्मत में तीन विषयों का पालन आवश्यक बताया गया है । नाम में रूचि, जीवन के प्रति दया और वैष्णव पूजा । इसके बाद ये बताते हुए किसी भी का ये जगत संसार है ऐसी धारणा है जय में रखकर सब जीवों पर दया करनी चाहिए । ये भाव आविष्ट हो गए और कहने लगे जी पर गया जी पर गया धरती किटाणु की ठोकर तो जी पर्दे करेगा । दया करने वाला तो कौन हैं? नहीं नहीं जीवन पर गया नहीं । शिव ज्ञान से जब की सेवा भावना विष्ट, रामकृष्ण की ये शब्द सभी ने सुनी पर उनके गुड अर्थ को केवल नरेंद्र नहीं समझा । उसने कमरे से बाहर आकर शिवानंद से कहा, आज मैंने एक महान सकते को सुना है । मैं जीवित सकती कि सारे संसार में घोषणा करना और फिर व्याख्या की । आज ठाकुर से भावेश में जैसा बताया तो उसे जान गया हूँ कि वन के विधान को घर में लाया जा सकता है । सबसे पहले हमें यह बात समझ लेनी चाहिए कि ईश्वर ही जेफ और जगह के रूप में प्रकट होकर हमारे सामने विराजमान है । इसलिए शिवरूप जीवों की सेवा ही सबसे बडी भक्ति है । फिर तीन जुलाई अठारह सौ को शरद चंद्र के नाम पत्र में उन्होंने इसी विचार को यू प्रस्तुत किया है । हमारा मूल तत्व प्रेम होना चाहिए ना कि गया । मुझे तो जीवों की वृद्धि, दया शब्द, विवेक रहित और व्यर्थ जान पडता है । हमारा धर्म करना नहीं, सेवा करना है । इन दिनों नरेंद्र परमहंस के बताए उपाय से साधना कर रहा था । कभी कभी वह पंचवटी के नीचे रात रात भर ध्यान में लीन रहता । उसका ये अनुराग देख रामकृष्ण नहीं एक देने से अपने पास बुलाकर कहा, कठिन साधना द्वारा मुझे अष्टसिद्धियां मिली थी । उनका किसी दंगों, कोई उपयोग मैं तो कर नहीं पाया । जिले में भविष्य में तो बहुत कम है । नरेन्द्र ने पूछा, महाराज क्या उनसे ईश्वर प्राप्ति में कोई सहायता मिलेगी? रामकृष्ण ने उत्तर दिया नहीं, सुबह नहीं होगा पर ये लोग की कोई भी इच्छापूर्ण न रहेगी । नरेन्द्र ने निसंकोच कर दिया तब तक महाराज भी मुझे नहीं चाहिए । अच्छा सौ छियासी में रामकृष्ण की गले में कैंसर हो गया । डॉक्टर महेंद्र लाल सरकार का इलाज था पर रोक कम होने के बजाय बढता चला गया । उन्हें पहले कलकत्ता के मकान में और फिर काशीपुर के उद्यान भवन में रखा गया । नरेंद्र ने अगस्त महीने में अध्यापन कार्य छोड दिया था और दूसरे शिशियों के साथ काशीपुर में रहने लगा था । गुरुसेवा के अलावा गंभीर श्रद्धा के साथ उपनिषद अष्टवक्र संहिता, पंचदशी, विवेक, चूडामणि आदि ग्रंथों का अध्ययन भी हो रहा था । साधना पूजा पर काफी आगे बढ जाने के बाद नरेंद्र के मन में निर्विकल्प समाधि की इच्छा प्रबल होती । वो जानता था की परमाणु जिसके लिए मना कर रहे हैं फिर भी वो एक दिन साहस करके उनके पास जा पहुंचा । रामकृष्ण ने नहीं हमारी दृष्टि से उसकी ओर देखा और पूछा नरेंद्र क्या चाहता है? उसने उत्तर दिया शिवदीप की तरह निर्विकल्प समाधि के द्वारा सदेव सच्चिदानंद सागर में डूबे रहना चाहता हूँ । रामकृष्ण नरेंद्र को चाहे सबसे अधिक चाहते थे, पर वहाँ कृत्य स्वर में बोले । बार बार यही बात कहते मुझे लग जा नहीं आती । समय आने पर कहाँ तो वटवृक्ष की तरह बढ कर सैकडों लोगों को शांति छाया देगा । और कहाँ आज अपनी मुक्ति के लिए व्यस्त हो था । इतना छुद्र आदर्श दे रहा है नरेन्द्र की विषय इलाकों में आज सुबह दबाये और वहाँ आग्रहपूर्वक बोला निर्विकल्प समाधि न होने तक मेरा मन किसी भी तरह शांत नहीं होने का और यदि वहाँ ना हुआ तो मैं सब कुछ भी ना कर सकूंगा क्योंकि अपनी छह से करेगा जगदंबा देवी गर्दन पकडकर करा ले ही ना करे, तेरी हंडिया करें पर नरेंद्र की प्रार्थना कोवर्ट टाल नहीं पाए । अंत में बोले अच्छा जाए निर्विकल्प समाधि हूँ । एक दिन शाम को ध्यान करती करती नरेंद्र अकस्मात निर्विकल्प समाधि में डूब गया । शिष्यों ने देखा तो उन्हें लगा कि नरेंद्र मर गया है । दौडे दौडे रामकृष्ण के पास आए लेकिन उनकी बात सुनकर भी रामकृष्ण शांत रहे । थोडी देर बाद नरेंद्र की चेतना लौट है । उसका मुखमण्डल आनंद से खेला हुआ था । उसने अगर रामकृष्ण को प्रणाम किया, वे बोले बस अब तालाबंद पूंजी माँ के पास रहेगा । काम समाप्त होने पर पे खोल दिया जाएगा । दिन रात जाना भजन चलता रहा । नरेंद्र भावन मत हो गए । रामकृष्ण सीता राम चैतन्य देखो लीला संबंधी की गाकर भक्तों आनंद प्रदान करता रहा । उधर रामकृष्ण काली से प्रार्थना करने लगे माँ उसकी अद्वैत की अनुमति को तो अपनी माया शक्ति के द्वारा ढक रख मुझे तो अभी सैनिक कम करानी । जो बारह शिष्य घर बार छोडकर काशीपुर में रहते थे । गुरु सेवा करते करते उनमें प्रेम सम्बन्ध दृढ हो गया । एक दिन इसे उद्यान भवन में रामकृष्ण संघ की नींव रखी गई । अपने इंटर्नशिप को गेरुआ वस्त्र पहनाकर रामकृष्ण नहीं । उन्होंने संन्यास की दीक्षा दी और उनके नेता नरेंद्र से कहा क्या तुम लोग संपूर्ण मेरा विमान बनकर दीक्षा की झोली कंधे पर लिए राजपूतों पर भीक्षा मांग होगी । वो लोग उसी समय शाम नहीं निकल पडे उसी कलकत्ता में जिसमें उनका जन्म हुआ था और जिस कलकत्ता में जाने क्या क्या सपने मन में संजोकर उन्होंने पढना लिखना शुरू किया था । अब सन्यासी बनकर गली गली भीक्षा मांगी । जो अन्य मिला उसे पकाकर उन्होंने परिवहन के सामने रखा और फिर प्रसाद ग्रहण किया । उस दिन रामकृष्ण के आनंद का ठिकाना रामकृष्ण की तबीयत बीच में एक बार कुछ सुधरी थी । उसके बाद हालत बिगड गई । रो मामला लिखते हैं, नरेंद्र उनके शिष्यों कार्य और उनकी प्रार्थनाओं का निर्देशन करेंगे । उन्होंने गुरु से भी प्रार्थना की । उनके स्वास्थ्य लाभ की प्रार्थना में वे भी योग समान विचारों के पंडित के आगमन से उनके आग्रह को और भी बल मिला । पंडित ने रामकृष्ण से कहा, धर्मशास्त्रों का मत है कि आप जैसे संत अपने इच्छा बाल ही से अपनी चिकित्सा कर सकते हैं । रामकृष्ण बोली, मैंने अपना मान संपूर्ण तैयार भगवान को सौंप दिया । आप क्या चाहते हैं कि वो मैं वापस मांग शिशियों का उल्हाना था कि रामकृष्ण स्वस्थ होना नहीं चाहते हैं तो क्या समझते होगी । मैं अपनी इच्छा से कष्ट बोल रहा हूँ । मैं तो अच्छा होना चाहता हूँ पर वहाँ पर निर्भर तो वहाँ से प्रार्थना कीजिए । तुम लोगों का ये कह देना आसान है पर मुझे वे शब्द ही नहीं जाएगा । नरेन्द्र ने आग्रह किया हम पर गया करके ही आप कहीं गुरु ने मतलब भाव से कहा अच्छा मुझे जो बन पडेगा प्रयत्न करूँ शिशु ने और है कुछ घंटे अकेले हो जब वे लौटे ना । गुरु ने कहा मैंने माँ से कहा था माँ कष्ट के कारण में कुछ खा नहीं सकता । ये संभव कर दे कि मैं कुछ खास मारे । तुम सब की ओर संकेत करके मुझसे कहा इतने समूह है जिनके द्वारा खा सकता है । मैं लज्जित पर फिर से कुछ नहीं कहा । कई दिनों बाद उन्होंने कहा, मेरी शिक्षा प्रायः समाप्त हो गई है । मैं दूसरों को और शिक्षा नहीं दे सकता कि मुझे दिखता है कि सभी कुछ प्रभु मैं तब मैं पूछता हूँ मैं किससे शिक्षा रविवार पंद्रह अगस्त अठारह सौ छियासी को इस महापुरुष के जीवन का सूर्या हो गए । अपना समझते ज्ञान और खोल वो अपने सहयोगी उत्तराधिकारी विवेकानंद को विरासत में देखा । विवेकानंद ने इस ज्ञान का विकास और खोल का विस्तार कहाँ तक किया ये हम आगे देखेंगे । नरेंद्र को विवेकानन् बनाने में परमहंस ने जो भूमिका अदा तो मामलो लाने उसका उन लेकिन शब्दों में क्या जो धारा विवेकानंद की असाधारण नियति को कट रही तो धरती की पेट ही में समा गयी होती । यदि रामकृष्ण के अच्छे योग दृष्टि ने मानव मु बाढ की भर्ती पत रोचक चट्टान को फोडकर शिशी की आत्मा के प्रवाह को मुक्त ना कर दिया होता । रामकृष्ण को आशंका थी कि अगर असाधारण युवक नरेंद्र को विधान शिक्षा ना दी गई तो उसकी प्रतिभाएं कम ही बनी नहीं और वहाँ से अपने धर्म एक संप्रदाय संगठित करने में नष्ट कर सकता है । इसका क्या हुआ कि नरेंद्र रामकृष्ण परमहंस के संपर्क में ना आया होता तो उसकी वृद्धि में द्वय विशिष्टाद्वैत और अद्वैत का तीन और वर्तमान तथा प्राची और पांच चाचे का जो समन्वय हुआ शायद कभी ना होगा । लेकिन समय का तकाजा तो जैसे हुआ वैसे ही पूरा होना था । हम देखेंगे कि एक अनुगामी ऐतिहासिक कडी का अपनी पूर्ववर्ती ऐतिहासिक कडी में आकर मिलना अनिवार्य

4. Swami Vivekanand

चैप्टर टू शिक्षा क्यूकि हम लोगों ने अपना आधा जीवन विश्वविद्यालयों में बता दिया है अगर हमारा मन दूसरों के विचारों से भर गया है । हाँ, विवेकानन्द नरेन्द्रनाथ जब चौदह बरस का था तो उसे पेट का भयंकर रोक हुआ । ये रोक कई दिन तक रहा और इस शरीर सूखकर कांटा हो गया । उस समय उसके पिता अपने काम से रायपुर में थे और उन्हें वहाँ अभी काफी दिन रहना इस ख्याल से की हवा बदलने से स्वास्थ्य ठीक हो जाएगा । उन्होंने परिवार के लोगों को भी रायपुर बुला लिया । में नरेंद्र अपने पिता के पास रायपुर पहुंचे । रायपुर मध्यप्रदेश का एक नगर है । उस समय सारे मध्यप्रदेश में रेलगाडी नहीं इलाहाबाद और जबलपुर होते हुए कलकत्ता से नागपुर तक गाडी आती थी । नागपुर से रायपुर जाने में दो सप्ताह से अधिक लगते थे और हिंसक जंतुओं वाले घने जंगल में इसे बैलगाडी द्वारा जाना पडता था । बाद में इस यात्रा का उल्लेख करते हुए नरेन्द्रनाथ ने लिखा है वनस्थली का सौंदर्य देखकर मुझे रास्ते की कष्ट कष्ट ही मालूम नहीं । विंध्यपर्वत की आकाश को चूमती हुई चोटियां, फूलों और फलों से लदी हुई तरह तरह की बेले कुंज कुंज में जहाँ चाहते हुए रंग बिरंगे पक्षी जो कभी कभी आहार की खोज में भूमि पर उतर जाते थे । नरेन्द्र ने ये सब कुछ पहले बहुत देखा । देश की अति की कहानियां उसके मन पर पहले से ही की थी । अब उसका रूप उसका वैभव, विशाल दौर महान दागी अंकित हो गई । देश को और अधिक देखने की इच्छा भी यहीं से पैदा हुए । ये वो व्यवस्था थी जब चरित्र का निर्माण होता । नरेंद्र के चरित्र का वास्तविक निर्माण भी रायपुर में हुआ । उस समय वहाँ कोई स्कूल था इसलिए विश्वनाथ बेटी को खुद की घर पर पढाया करके उन्हें वहाँ तो अदालत जाना होता था और नाम वकीलों से माथापच्ची करनी पडती है । फॅसा थी पार्टी पुस्तकों के अलावा वो नरेंद्र को इतिहास, दर्शन और साहित्य संबंधी विभिन्न पुस्तके पढाने लगी । बेटे कि ग्राहक शक्ति देख गैर विश्वनाथ दंग रहे गए और उन्हें उसे पढाने में आनंद आने लगा । उन्होंने बडे परिश्रम से जितना ज्ञान अब तक अर्जित किया था, वो अपने इस योग के पुत्र को सौंप दिया । उनके घर में हर रोज रायपुर के गुडयानी व्यक्तियों कर जगह होता, साहित्य, दर्शन आदि विभिन्न विषयों पर चर्चा चलती थी । घंटों वाद विवाद होता और सूक्ष्म विवेचन किया जाता है । उस समय सुबह नरेंद्र भी वहीं उपस् थित होता और वाद विवाद ध्यान से सुना कर कर कभी कभी विश्वनाथ नरेंद्र से भी किसी विषय पर उस गिराए पूछ लेते हैं और यहाँ उससे विवाद में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करते । नरेन्द्र उम्र में चाहे छोटा था और उसके विचार करने साफ सुथरे और सुलझे हुए थे कि सुनकर बडे बूढे भी आनंद से जुडे होते हैं । विश्वनाथ के मित्रों में एक सज्जन बंग साहित्य के प्रसिद्ध लेकर थे । एक दिन जब भी साहित्य पर बात विवाद कर रहे थे तो उसमें भाग लेने के लिए नरेंद्र को भी बुला लिया गया । बस अब क्या था? नरेन्द्र ने थोडे ही समय में ये सिद्ध कर दिखाया कि उसमें अधिकांश देखो उसपे नासिर पढ ली है, बल्कि उनकी बहुत से अंश उसे कंटस् और वो उनकी तर्कसंगत आलोचना भी कर सकता है । उन लेखक महोदय ने विस्मय और आनंद में भरकर कहा बेटा, आशा है एक दिन बंगभाषा भारी द्वारा गौरवान्वित और अब ये कहने की कोई आवश्यकता नहीं । उन लेखक महोदय की भविष्यवाणी सही साबित हुए । नरेंद्र रायपुर में दो बरस तक रहा । इस बीच में उसने पुस्तकों और बाजवा द्वारा जो कुछ सीखा वह तो सीखा ही, पर इस संबंध में विशेष रूप से उल्लेखनीय बात यह है कि उसके किशोर मन पर प्रताप के व्यक्तित्व की गंभीर छाप पडी । एक दिन नरेंद्र ने जाने कैसे पता से पूछ लिया पिताजी, आप हमारे लिए क्या छोड रहे हैं? विश्वनाथ ने दीवार पर लगी आए नहीं की तरफ इशारा करते हुए उत्तर दिया था सेना में अपना चेहरा देख तभी समझेगा की मैंने तुझे क्या दिया । विश्वनाथ बेटों को सामंती ढंग से कभी डांटते डपटते या बुरा भला नहीं कहते थे बल्कि उन्हें सुधारने और उनमें आत्मविश्वास पैदा करने का उनका अपना ही ढंग आपने उद्दंड स्वभाव के कारण नरेंद्र ने एक दिन माँ को कुछ कटु शब्द कह दिए । विश्वनाथ ने इसके लिए बेटे को कुछ नहीं कहा पर जब नरेंद्र अपने सहपाठियों के साथ अपने पडने के कमरे में गया तो कोयले से दीवार पर ये लिखा मिला । नरेंद्र बाबू ने अपनी माता के प्रति आज इंदूर वजनों का प्रयोग किया है । नरेन्द्र की काॅपी और वह शिक्षा को उम्र भर नहीं स्कूल पर अगर कोई व्यक्ति नरेंद्र की युक्तिपूर्ण बातों को बच्चे की दृष्टता समझकर उपेक्षा करता तो वह क्रोध के मारे आपे से बाहर हो जाता है । उस समय से छोटे बडे का भी ध्यान नहीं रहेगा । कई बार वो अपने पिता के मित्रों तक को खरी खरी सुना । विश्वनाथ उद्दंडता के लिए बेटे को शमा नहीं करते थे । नरेंद्र को दंड देकर आगे के लिए सावधान कर देते थे । पर बेटी की आत्मनिष्ठा को देखते हुए मन ही मन ऍम विश्वनाथ पाक विद्या में भी निपुण थे । नरेन्द्र नियम से तरह भरा के भोजन बनाने से किए । कॉलेज में वो अपने मित्रों को समय समय पर अपने हाथ से भोजन बनाकर खिलाया कर दी । फिर जब स्वामी विवेकानंद बनकर विश्वभ्रमण पर गए तो विदेशियों को भारतीय खानों का स्वाद चखाया करते । अमेरिका में शस्त्र द्वीप उद्यान में दो महीने के सहवास में वो अपने सिपाहियों को प्रायः अपने हाथ से विभिन्न भारतीय व्यंजन तैयार करके खिलाते थे । दो बजे के बाद जब नरेंद्रनाथ रायपुर से लौटा, वह शारीरिक और मानसिक रूप से बहुत बदल चुका था । मित्रों से अपने बीच पाकर बहुत प्रसन्न हुए । वो स्कूल में दाखिल हुआ और नवी और दसवीं कक्षा की तैयारी एक साल में । लेकिन स्कूल में सिर्फ वही एक विद्यार्थी था जिसने मैट्रिक के परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास इससे ना सिर्फ सगे संबंधियों बल्कि स्कूल के अधिकारियों को बडी खुशी नरेंद्र शरीर से हष्ट पुष्ट था और सोलह बरस की आयु में बीस बरस का जान पडता था । कारण ये कि वह नियमित रूप से व्यायाम किया करता था । बचपन से ही वो कुश्ती का अभ्यास करता रहा था । ये राजनीतिक चेतना का युक्त सुरेन्द्रनाथ बनर्जी और आनंद मोहन बसु ने विद्यार्थी संघ की स्थापना कि की और वह नौजवानों को शारीरिक और मानसिक रूप से सफल होने की शिक्षा देते हैं । शिमला मोहल्ला में कौन वॉलस्ट्रीट के पास एक खडा था । हिन्दू मेले के प्रवर्तक नाम गोपाल मित्र ने उसकी स्थापना कि नरेंद्र नाथ अपने मित्रों के साथ वही व्यायाम का अभ्यास किया करता । बॉक्सिंग यानी कि मुक्केबाजी में वो एक बार सर्वप्रथम आया और से चांदी की पिछली पुरस्कार में । अपने समय में वो क्रिकेट का भी अच्छा खिलाडी था । उसे घोडे की सवारी का शौक था । पिता ने उसके लिए अच्छा सा घोडा खरीद दिया था जिस पर सवार होकर वह हवाखोरी के लिए जाया करता था । विश्वविख्यात लेखक रो माम रोला ने अपनी पुस्तक विवेकानंद में लिखा है नरेन्द्र का शैशव और माल निकाल यूरोपीय पुनर्जागरण काल के कला प्रेमी राजकुमार सर रहा । उनकी प्रतिमा बहुमुखी थी और सभी दिशाओं में उन्होंने उनका विकास किया । उन का रूप से तीस श्रावक कैसा प्रभावशाली और मृत छुआने साफ कोमल था । बलिष्ठ सुगठित शरीर कसरतों से और भी मंच गया था । कुश्ती घोडे की सवाल टेयर ने और नाम खेलने का । उन्हें चौक युवकों की वे नेता और फैशन के नियंत्र ता के नृत्योत्सव में भी कलापूर्ण नृत्य करते थे और उनका कंट्री बडा सुरीला था जिसपर अंतिर रामकृष्ण भी मुक्त हुए । उन्होंने चार पांच वर्ष तक हिंदू और मुसलमान सिंह चायों के साथ गायन और संगीत का अभ्यास किया । वो स्वयं गीत लिखते थे और उन्होंने भारतीय संगीत की दर्शन और विज्ञान पर एक संदर्भ ग्रंथ भी प्रकाशित किया । संगीत में नरेंद्र के मुसलमान स्टार बननी और हिंदुस्तान कांसी घोषाल थे । कांजी खुशहाल आदिब्रह्मा समाज की संगीत साधा में पखावज बजाया कर देते हैं । नरेन्द्र ने पखावज और तबला इन्ही से सीखा साहित्य, इतिहास और दर्शन पारिवारिक परंपरा इसी विषय में उसके गुरूभाई स्वामी सारदानंद ने अपनी पुस्तक श्रीराम कृष्ण लीला प्रसन्न इसमें लिखा है बडे होने पर परीक्षा की दो तीन माह पहले वे अपनी पार्टी पुस्तकों को पडना आरंभ करते थे । अन्य समय अपनी इच्छा के अनुसार दूसरी पुस्तक कि पढकर समय बिताते थे । इस प्रकार मैट्रिक परीक्षा देने के पहले उन्होंने अंग्रेजी और बांग्ला के अनेक साहित्यक तथा ऐतिहासिक ग्रंथ पर डाले थे वाला कहा । परीक्षा की पूर्व उन्हें कभी कभी बहुत अधिक परिश्रम करना पडता था । हमें स्मरण हैं एक दिन उन्होंने इस विषय का प्रश्न उठने पर हमें बताया था मेट्रिक परीक्षा के आरंभ होने के दूर तिन दिन पहले मैंने देखा कि रेखा गणित कुछ भी नहीं पढा गया है । तब सारी राज जाकर उसे पडने लगा और चौबीस घंटे में उसकी चार पुस्तके पढकर परीक्षा दिया । ईश्वर कृपा से उन्हें दृढ शरीर तथा पूर्व मेरा प्राप्त की इसलिए वैसा कर सके इसमें कोई संदेह नहीं । मेट्रिक पास करने के बाद नरेंद्रनाथ जनरल असेंबली कॉलेज में भर्ती हुआ और एस । ए में पडने लगा । इस समय उसकी उम्र अठारह बरस उसकी तेज बुद्धि और आकर्षक व्यक्तित्व नहीं अध्यापकों और छात्रों दोनों का ध्यान आकर्षित किया । थोडे ही समय में बहुत विविध भारती उसके मित्र बन गए । दरअसल विद्यार्थियों से अपना मित्र बनाने में गर्व महसूस करते हैं । प्रियनाथ सिन्हा नाम के मित्र सहपाठी ने इन दिनों के अपने स्मरण में लिखा है नरेंद्रनाथ हे दो तालाब के पास जनरल असेंबली कॉलेज में भर्ती हुआ और एस ए बहिन से पास किया है । उनके असंख्य दिनों के कारण बहुत सहपाठी उनमें अत्यंत से अनुरक्त । वो उनका गाना सुनकर इतना आनंदप्रद मानते हैं की अवकाश पाते ही नरेंद्र के घर पर उपस् थित हो जाते हैं बैठ कर एक बार नरेंद्र की तरफ यूपीए गाना बजाना आरंभ होते ही समय कैसे निकल जाता है ये समझ नहीं पाए । नरेन्द्र समय अपने पिता के घर केवल दो बार भोजन करने जाते हैं और शेष समय समीर की गली में अपनी नानी के घर में रहकर अध्ययन करते अध्ययन के लिए ही वहाँ रह रहे हैं । ऐसी बात नरेन्द्र एकांत में रहना अधिक पसंद करते कमरा बहुत छोटा था । नरेंद्र ने उसका नाम दंग रख लिया था और मित्रों से कहा करते थे चलो तंग में चले अब इस संघ की एक बैठक देखिए नरेंद्र आज मन लगाकर पढ रहे । इसी समय किसी मित्र का आगमन हुआ । लगभग ग्यारह बजे हूँ । भोजन करके नरेंद्र पढ रहे मित्र ने अगर नरेंद्र से कहा भाई रात में पढ लेना अभी जरा एक गांधी तो सुना दो । उसी समय नरेंद्र पुस्तक बंद कर उसे एक और सरकार तानपुरी की तारों संभाल कर उन्हें स्वर्ग में बांध कर गाना गाने से पहले उन्होंने अपने मित्र से कहा अच्छा जो तबला उठा । मित्र ने कहा भाई में तो बजाना जानता नहीं स्कूल में मेस का तबला बजा लेता हूँ क्योंकि तुम्हारे साथ तबला भी बजा सकूंगा । तब नरेंद्र ने स्वयं थोडा सा बजाकर दिखा दिया और कहा अच्छी तरह से देखने आवश्यक जा सकेगा । क्यों नहीं जा सकेगा कोई कठिन काम थोडी ना है । इस तरह बस ठेका दिए जा हो जाएगा । साथ ही साथ बजाने के बोल भी बदला दी । मित्र एक दो बार चेष्टा करने के बाद किसी तरह ठीका देने लगा । गाना आरंभ हुआ टाइम ले में उन्मुक्त होकर और दूसरों को उन बनाकर नरेंद्र ने रेस वर्षी स्वर में टप्पा ढप ख्याल, ध्रुपद बंगला, हिंदी और संस्कृत गानों का प्रवाह चलने लगा । गंभीर चिंतनशक्ति और तीसरा मुद्दों के कारण नरेंद्र सभी विषय बहुत थोडे समय में सीख लेता । संगीत, स्वच्छंद भ्रमण, मित्रों के साथ खेल कूद और हसी मजाक के लिए उसे काफी समय मिल जाता है । दूसरे लडके इससे ये समझ लेते थे कि नरेंद्र कि अध्ययन में बिल्कुल रूचि नहीं । उनकी देखा देखी जो दूसरी लडकी खेलकूद में समय बिताते उनके लिए इसका परिणाम अच्छा नहीं होता । पार्टी पुस्तकीय परीक्षा पास करने का साधन मात्र वरना जैसा की उसका स्वभाव बन चुका था । नरेन्द्रनाथ, साहित्य, दर्शन और इतिहास की पुस्तके अधिक पडता था । बेकार का अहमदाबाद यू और वेन की नास्तिकता, डार्विन का विकासवाद और इसके अलावा हरबर्ट स्पेंसर का अब ये बाद उसने एफ एक ही परीक्षा देने से पहले पर अदालत उसके मित्र बृजेंद्र बाबू ने प्रबुद्ध भारत पत्रिका में अपने संस्मरण लिखे जिसमें नरेंद्र की अशंति और ज्ञान पास अगर चित्र प्रस्तुत करते हुए उन्होंने बताया है कि नरेंद्र ने शीली की कविताओं, हेगल के दर्शन और फ्रांसीसी क्रांति के इतिहास का अध्ययन भी इसी अवस्था में कर दिया था । इसके अलावा संस्कृत कविता उपनिषद राममोहन रॉय की पुष्टि किए भी वो बडे चाव से पढा करते थे । पढते समय वह चंचल और खिलाडी नरेंद्र से एकदम भिन्न दूसरा ही व्यक्ति हो जाते । बृजेंद्र बाबू कॉलेज में नरेंद्र से दो तीन बार ऐसा पर इन दोनों में खूब पटती भी । दोनों दार्शनिक क्लब में जाया करते रोमांस बोला ने लिखा है कि बृजेंद्र फ्रांसीसी क्रांति से प्रभावित थे और अराजकता वाली । बाद में उन्होंने बुद्धिवादी के रूप में नाम पाया । मैट्रिक पास करती करती नरेंद्र की बुद्धि इतनी विकसित हो गई थी कि कोई पुस्तक पडने में अधिक समय नहीं लगाना पडता है । अपनी अध्ययन पद्धति की चर्चा करते हुए वो अपने गुरु भाइयों से कहा करता था अब से कोई पुस्तक पढते समय प्रत्येक पंक्ति क्रमश शाह पढकर ट्रेंट कर का वक्तव्य समझने की मुझे आवश्यकता नहीं हर चीज की प्रथम और अंतिम बंगिया पढते ही उसके भीतर क्या कहा गया है? मैं समझ लेता था ऍम है वह शक्ति परिपक्व होने पर मुझे हर अनुच्छेद पडने का भी प्रयोजन नहीं होता । हर पृष्ठ की प्रथम और अंतिम पंक्तियां पढकर मैं आश्रय समझ सकता था । फिर पोस्ट किस स्थान पर ग्रंथकार ने कोई विषय तर्क युक्तियों द्वारा समझाया है । वहाँ यदि प्रमाण प्रयोग की सहायता से किसी नियुक्ति के समझाने में चार पांच या उससे अधिक पृष्ठ लगे तो उस युक्ति का आरंभ मात्र पढकर यूनिक रिश्तों की सारी बातें में समझ लेता था । अपनी इस असाधारण प्रतिभा से नरेन्द्र ने विवेकानंद बनने पर जर्मनी के प्रसिद्ध वेदान्ती डॉक्टर डाइटिंग को कैसे चकित? क्या ये हम डॉक्टर डाइसन से भेंट के समय देखो । अध्ययन का उद्देश्य सत्य की खोज था और नरेंद्र जिसे सत्य समझ लेता था, उसकी जी जान से रक्षा करता था । जब देखता था की कोई दूसरा उसके विपरीत भाव्या मत व्यक्त कर रहा है । नरेंद्र चट विवाद पर कराता था और अपने सशक्त तर्को और युक्तियों द्वारा उसे परास्त करके दम लेता हूँ । पराजित व्यक्ति कई बार बिलबिला उठते थे और नरेंद्र पर दम्भी होने का आरोप लगाने में भी संकोच नहीं करते थे । पर नरेंद्र में मन में किसी के प्रति द्वेष भाव नहीं था और अपनी बात को ऊंचा रखने के लिए वो कभी कुतर्क का सहारा नहीं लेता था । उसे जो कहना होता था, दूसरे के सामने साफ साफ कहता था कोई उसकी बात से चढता है, उसके बारे में क्या राय रखता है या उसकी निंदा करता है इस बात की उसे जरा भी परिवार उसका हृदय शुद्ध था और वह खुद पीठ पीछे किसी की निंदा या बुराई नहीं करता था । धीरे धीरे जब उसका स्वभाव उजागर हुआ तो विद्यार्थी उसके बाद ध्यान से सुनते और उसका आदर करने लगे । जनरल असेंबली कॉलेज के अध्यक्ष विलियम गृहस्ती सर्जन होने के अलावा बडे विद्वान, कवि और दार्शनिक हो नरेंद्र, बृजेंद्र आदि कुछ प्रतिभाशाली विद्यार्थी नियमित रूप से उनके पास जाते और दर्शनशास्त्र का अध्ययन किया करते थे । ऐसी नरेंद्र की बहुमुखी प्रतिमा के बहुत प्रशंसक थे और इसलिए उसे सबसे अधिक चाहते थे । एक मर्तबा नरेंद्र जब कॉलेज के दार्शनिक क्लब में किसी मत विशेष का सूक्ष्म विश्लेषण किया तो ऐसी खुशी से झूम उठे और मुक्त कंठ विश्वविद्यालयों में एक भी ऐसा छात्र ही हैं जो इनके सम्मान मेधावी हो । अध्ययन और आयु बढने के साथ साथ नरेंद्र की जिज्ञासा तीव्र से तीव्र कर होती चली गई । मानव जीवन का उद्देश्य क्या है? क्या सच मुझे जड जगत को चलाने वाली कोई शक्ति मान सकता है? इस प्रकार के अनेक सवाल उसके मस्तिष्क में उठने लगे । पांच जाते विज्ञान और दर्शनशास्त्र ने उसके मन में संदेह उत्पन्न कर दिया । नरेन्द्र जब किसी धर्म प्रचारक ईश्वर के बारे में भाषण देते सुन दात झट घुसपैठ क्यों महाश् है आपने इश्वर की दर्शन किए हैं? हाँ या ना? हाँ या ना में उत्तर देने के बजाय धर्म प्रचारक उपदेश वाक्यों से उसे संतुष्ट करना चाहते हैं और अपना पुस्तक ज्ञान बघारने लगते हैं । नरेंद्र को तो प्रत्यक्ष बाद ही खोजती । धर्म प्रचारकों की रटी रटाई संप्रदाय जगत बोलिया सुनकर व प्रबल संदेह अवादी हो गया । पिता से विरासत में पाए हुई आलोचना वृत्ति पर पास जातीय विचारों इंसान चढ चुकी फिर उस तक क्या नरेंद्र को शांत नहीं कर पा रहा हूँ उसे अब एक जीती जाते आदर्श की खोज इसी खोज का वह कुछ मित्रों के साथ आदिब्रह्मा समाज का सदस्य बनाया । ब्रह्मसमाज चंद साल पहले आदि ब्रह्मसमाज और अखिल भारतीय प्रमा समाज में विभाजित हो गया । पहले के नेता देवेंद्रनाथ ठाकुर और दूसरे के एशिया चंद्र सी केशव बहुत बडे वक्त और इस समय उनकी ख्याति शिखर पर बंगाली नौजवान उनसे बेहद प्रभावित थे । विमान बोला का कथन है नरेंद्रनाथ उनसे ईर्ष्या करते थे और स्वयं केशव बनने की महत्वकांशा रखें । लेकिन इसके बावजूद उनके अखिल भारतीय ब्रह्मा समाज के सदस्य नहीं बना । कारण ये था कि अखिल भारतीय ब्रह्मा समाज राजा राममोहन रॉय की आदर्श और परंपरा से हट चुका । केशव और उनके अनुयायी ईसाइयत में रंगे हुए थे और उनका चालान सनातन हिंदू भर में कि उच्चतम मान्यताओं के प्रतिकूल था । लेकिन नरेंद्र की बचपन से ही इन मान्यताओं में आस्था संदीप वादी होते हुए भी उसमें दूसरे नौजवानों से उच्छ्रंखलता और अराजकता ना नरेंद्रनाथ ब्रह्मा समाज की रविवारीय उपासना में शामिल होता था और आपने मधुर कंठ से ब्रह्मा संगीत सुनाकर सदस्यों का मन प्रसन ने क्या करता? पर वासना के विषय में वो दूसरे सदस्यों से सहमत नहीं था । उसे ब्रह्मा समाज में क्या और धर्मनिष्ठा की कमी महसूस होगी? नरेन्द्र जो कुछ देखता था उसकी वह निर्भिक आलोचना करता था । उसका मन अब भी अशांत था और जिस जीती जाती सर्दी की उसे खोज थी तो यहाँ भी दिखाना पडता है । एक दिन देवेंद्रनाथ ठाकुर ने उसे उपदेश देते हुए कहा तुम्हारे अंग प्रत्यंग में योगियों के चिन्ह मौजूद । ध्यान करने से ही तो में शांति और सत्य की प्राप्ति होगी । नरेन्द्र लगन का पक्का था । उसी दिन सीधा आयरन रात में रह गया । थोडा खाना, चटाई पर सोना, सफेद धोती और चंद्र पहनना और शारीरिक कठोरता का पालन करना उसका नियम बन गया । उसने अपने घर के निकट नानी के मकान में एक कमरा किराए पर ले रखा था । परिवार के लोग समझते थे कि घर पर पढाई की असुविधा के कारण ही नरेंद्र अलग रहने लगा । विश्वनाथ बाबू ने बेटी की स्वाधीनता में कभी हस्तक्षेप नहीं किया था । इसलिए नरेंद्र अध्ययन, संगीत आदि ही चर्चा करने के बाद शेष समय साधना भजन में बताता था । सत्येंद्रनाथ मजूमदार अपनी विवेकानंद चरित्र पुस्तक में लिखते हैं, इस प्रकार दिनबदिन बीते गए निगरनी की सत्य को जानने की इच्छा तो नहीं हुई अपील तू अधिकारिक बढने लगी । धीरे धीरे उन्होंने समझा कि अतिंद्रिय सत्य को प्रत्यक्ष करने के लिए एक ऐसे व्यक्ति के चरणों के पास बैठ कर शिक्षा लाभ करना आवश्यक है । इसने स्वयं सत्य का साथ शाह कर क्या है? उन्होंने अपने मन प्राण से ये भी निश्चय कर लिया कि इसी जीवन में सत्य को प्राप्त करना होगा नहीं तो इसी प्रयत्न में प्राण दे देता हूँ । सुरेंद्रनाथ मित्र रामकृष्ण परमहंस के भक्त थे और वे शिमला मोहल्ला में ही रहते हैं । नवंबर सौ इक्यासी के एक दिन उन्होंने रामकृष्ण परमहंस को अपने मकान पर बुलाया और इस उपलक्ष्य में एक आनंदोत्सव का आयोजन कोई अच्छा गायक ना मिलने के कारण उन्होंने अपने पडोसी नरेंद्रनाथ को बुलाना रामकृष्ण परमहंस से यू नरेंद्रनाथ का पहली बार साक्षात्कर हुआ गाना सुना तो उन्होंने इस युवक की प्रतिभा को पहचान लिया । वो उठकर नरेंद्र के पास आए । कुछ देर बातें की और फिर दक्षिणेश्वर आने का अनुरोध करके चले गए । ऍम परेशान निकट नरेंद्र उसमें इतना व्यस्त रहा कि इस बात को भूल ही गया । परीक्षा सामान हुई तो पिता ने बिहार की बात चलायी । नरेंद्र का भाविन ससुर दहेज में दस हजार रुपये नकद देने को तैयार । पर नरेंद्र झंझट में कैसे पडता? वो मित्रों से कहा करता था मैं वहाँ नहीं करूंगा और तुम लोग देखोगे कि मैं क्या बनता हूँ । विश्वनाथ अपने बाबू बेटे पर किसी प्रकार का जवाब नहीं थी । अब इस मामले में नरेन्द्र राय जान लेने का काम उन्होंने अपने संबंधी डॉक्टर रामचंद्र दर्द को सौंपा । जब ये प्रसंग छिडाव नरेंद्र ने साफ ये दिया की मैं यहाँ के बंधन में नहीं बंधना क्योंकि मैंने जीवन का जो उद्देश्य बना रखा है क्या उसमें मादक बनेगा? उत्तर सेंटर डॉक्टर रामचंद्र ने कहा यदि वास्तव में सिटी की प्राप्ति ही तुम्हारा मूल्य देश है तो प्रमा समाज आदि में भटकना वेयर दक्षिणेश्वर में श्रीरामकृष्णन देख के पास जाओ । नरेंद्र को सुरेंद्रनाथ के मकान पर भी सीट याद आई और वह तीन चार मित्रों के साथ दक्षिणेश्वर फौज रामकृष्ण चीर परिषद की तरह सहजभाव से मिले । नरेंद्र को अपने करीब चटाई पर बैठा लिया और गाना सुनने को नरेन्द्र ने प्रमा समाज का मन चलो नॅान फिर नरेंद्र की अपने अनुसार जब कार्य समाप्त हुआ तो वो उसे हाथ पकडकर एकांत में ले गए । भीतर से कमरा बंद करके बोले अरे तो इतने दिन कहा रहा मैं कब सिथिल बाढ जो रहा हूँ विषय लोगों के साथ बात करते करते मेरा मूड जल गया । आज फेरे सामान सच्चे त्यागी के साथ बात कर के मुझे शांति नहीं । ये कहते कहते उनकी आंखों में आंसू बहने नरेन्द्र हद बुद्धि सा उनकी ओर ताकता रहा देखते ही देखती । रामकृष्ण परमहंस ने हाथ जोडकर नरेंद्र को सम्मान संबोधित किया । मैं जानता हूँ सप्तऋषि मंडल है न रुपये नारायण है । जीवों के कल्याण की कामना से तूने देहधारी नरेंद्र का कहना है कि उनके मुख से ऐसी बातें सुनकर में एकदम अफवाह पर संबित रहेंगे । सोचा ये तो नीरा पागलपन मैं विश्वनाथ दत्त का पुत्र मुझसे क्या कह रहे हैं? उन्होंने मेरा हाथ पकडकर दोबारा का मुझे वचन देख तू मुझसे मिलने फिर अकेला आएगा । वर्षी नरेंद्र ने इस अद्भुत स्थिति से छुटकारा पाने के लिए वचन तो दे दिया पर मन में सोचा कि फिर यहाँ नहीं हूँ । बैठक में लौट आए । वहाँ दूसरों की मौजूदगी में जो बातें हुई उनमें पागलपन का लेशमात्र भी ना । रामकृष्ण ने नरेंद्र की जन्म के बारे में अपने शिष्यों को भावेश में का अद्भुत कथा सुनाई थी । वो कथा रो मामा बोला ने अपनी पुस्तक विवेकानंद में जो बयान एक दिन समाधि में मैंने पाया कि मेरा मन प्रकाश के पद पर ऊंचा उतरा । तारा जगत को पार करके वो शीघ्र ही विचार सूक्ष्मतर जाती में प्रविष्ट हुआ तथा और ऊंचा उठने लगा । पद के दोनों ओर मुझे देवी देवताओं के सूक्ष्म शरीर दिख पडने लगी । उस मंडल को भी पार करके मन वहाँ पहुंच गया जहां प्रकाश की मर्यादा रेखा सापेक्ष्य को निरपेक्ष से प्रकट कर रहे हैं । उस रेखा का भी उल्लंघन करके मन वहाँ पहुंच गया जहां सर वो कुछ भी नहीं अपने अपने आसान पर ही संतुष्ट । इन दूषण भर बाद मैंने सात ऋषियों को समाधि लगाए बैठेगा । मुझे ध्यान हुआ कि इन ऋषियों ने ज्ञान और पवित्रता में त्याग और प्रेम में न केवल मांगों को वरुणदेव को भी पीछे छोड दिया है । मैं मुक्त भाग से उनकी महत्ता का चंदन करेंगे था की उस करू प्रकाश क्षेत्र के एक अंश ने घनीभूत होकर एक्टिव भी शिशु का रूप ग्रहण कर लिया । वहाँ शिशु हुए कृषि के समीप आकर उनके गले से लिपट कर मधुर स्वर से पुकारता हुआ समाधि से झुकाने का प्रयत्न करने लगा । समाधि से जाकर ऋषि ने आपने अवर दून मिलित नेत्र शिशु पस्थित कर दिए । उनकी वात्सल्य भरी मुद्रा से स्पष्ट था कि शिशु उन्हें कितना प्रिया आनंद रिपोर्ट होकर जिसने कहा मैं नीचे जा रहा हूँ । आप भी मेरे साथ चले । विष्णु उत्तर नहीं, पर उनकी वत्सल दृष्टि में स्वीकार का भागता शिशु की ओर देखते देखते वो फिर समाधिस्थ हो गए । मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि उनका एक से एक प्रकाशपुंज के रूप में धरती की ओर उतर रहा है । जब मैंने नरेंद्र को देखा तब देखते ही पहचान लिया । किसी करूँ नरेन्द्र घबराये और वैसे चिल्लाओ था जी आपने यह मेरी कैसे व्यवस्था कर डन मेरे तो माँ बाप अब बहुत पागल, सिर्फ इलागढ हस पडा और नरेंद्र का हाथ अपनी छाती पर रखकर बोला अच्छा तो फिर अभी रहने दे । इसके बाद रामकृष्ण परमहंस फिर सामान्य स्थिति में आ गए । उन्होंने नरेंद्र को पहले ही दिन की तरहा प्रेमपूर्वक खिलाया पिलाया । विभिन्न विषयों पर बातचीत प्यार और हास परिहास किया और शाम को जब नरेंद्र ने विदा चाहिए उन्होंने अप्रसन्न होकर कहा हो फिर शीघ्र ही आएगा लिखा है लाचार होकर पहले दिन की तरह वचन देकर की लौटना पडा नरेंद्र ने विस्मय की सीमा ना वो लौटते समय मनी मंजूर से लगा क्या के लिए पहले क्या है इस पहली को समझना ही होगा । नरेंद्र की इस समय की मन स्थिति को स्वामी सारदानंद ने अपने ग्रंथ श्रीराम कृष्ण लीला प्रसंग में व्यक्त किया है । जिस तरह मैं मुझे लगा की इच्छा मात्र से ये पुरुष यदि मेरे जैसे प्रबल इच्छा शक्ति संपन्न चितरपुर दृड संस्कार युक्त गठन को इस तरह तोड फोड कर मिट्टी के लॉन दे की तरह अपने भाव से ढल सकते हैं तो इन्हें पागल ही कैसे? केंद्र प्रथम दर्शन के दिन मुझे गांठ में ले जाकर इन्होने जिस प्रकार संबोधित करते हुए बातें की उससे इन्हें पागल के अतिरिक्त और क्या मान सकता हूँ । बुद्धि गांव में होने, अंदर खोज तथा तर्क युक्ति की सहायता से प्रत्येक वस्तु तथा व्यक्ति के संबंध में एक मतदान मत सिर्फ ये बिना मैं कभी निश्चित नहीं सकता । इसी स्वभाव में आज एक प्रचंडा अज्ञात प्राप्त हुआ है । इससे संकल्प था उदय हुआ । जैसे भी हो सके अद्भुत पुरुष इस वक्त आप और शक्ति की बात अवश्य ही समझ में हूँ । छह से लिए पुरुष ईवा जीता जाता । आदर्श था नरेंद्र जिसे खोजता हुआ दक्षिणेश्वर पहुंचा था । लेकिन इस दृढ संस्कारयुक्त युवक में इस अद्भुत पुरुष को तबतक गुरु के रूप में धारण नहीं किया जब तक उनके स्वाभाव और शक्ति को खाली प्रकार समझना लिया । अब देखना यह है कि इस अद्भुत पुरुष का स्वभाव और शक्ति क्या कि नरेंद्र ने उसे कैसे पहचाना और इस अद्भुत पुरुष ने नरेंद्र को विवेकानंद बनाने में क्या भूमिका निभाई । ये जैसे हमारा बल्कि भारतीय दर्शन के इतिहास का आवश्यक रोचक विषय है । गुरु और शिष्य रामकृष्ण और विवेकानंद व्यक्त नहीं युगपुरूष हमारे राष्ट्रीय विचार के विकास क्रम की ऐसी ऐतिहासिक कर दिया है जिन्हें समझे बिना और पहली को सुलझाना मुमकिन नहीं जिसे तथाकथित अध्यात्मवाद ियों ने पूरी तरह शादिया और तथाकथित वामपंथियों ने जिसके निरंतर अब खेलना तथा उपेक्षा

5. Swami Vivekanand

चैप्टर को देशभ्रमण हमारा सबसे बडा राष्ट्रीय बाप जन समुदाय की उपेक्षा है विवेकानंद नरेंद्र ब्रांड कृष्ण संघ के नेता स्वामी विवेकानंद रामकृष्ण ने विदा होते समय अपने शिष्य को विवेकानंद को सौंपते हुए कहा था इन बच्चों की देखभाल करना । गुरु की मृत्यु की थोडे ही दिन बाद काशीपुर का उद्यान भवन खाली करना पडा । रामकृष्ण के शिष्यों में दो तरह के लोग थे । एक वेज उन्होंने सन्यास धारण किया था । उनकी संख्या बारह थी और विवेकानंद में से एक दूसरे लगभग इतनी ही संख्या उनकी गृहस्त शिष्यों । अब ये समस्या सामने आएगी । तरुण संन्यासियों के रहने की व्यवस्था क्या हो? सुरेंद्रनाथ मित्र ने एक मकान बराहनगर में किराए पर ले दिया । नीचे की मंजिल निकाल थी । पर इन युवा सन्यासियों को जो कुछ मिल जाता था उसी में संतुष्ट रहते थे । अपने आप, आपकी बात उन्होंने कभी सुरेंद्र मित्र से जाकर नहीं थाली, बर्तन आदि कुछ नहीं था । वाले हुए कुंदरा के पत्ते और भारत अरबी के पत्तों पर रखकर खाते । इसके बावजूद पूजा अभियान जा बराबर चलता रहता था । उत्साह में भरकर कीर्तन शुरू करते तो बाहर सुनने वालों की भी लग जाता है । कई बार रस्ते भग बी बराहनगर के इस मठ में आते हैं । अपने गुरु भाइयों के साथ रामकृष्ण के जीवन और धर्म संबंधी चर्चा करते हैं । लेकिन अक्सर इधर उधर के अपरचित व्यक्ति भी गौत्र वर्ष मठ में चले आते पे इंटरन सन्यासियों से तर्क करेंगे । उन की परीक्षा लेते और कुछ ऐसे होते जो हसी ठिठोली और अशिष्ट आलोचना से भी बात नाते । इसके अलावा इन युवकों के अभिभावक उन्हें समझा बुझाकर घर लौटा ले जाने के लिए मठ में मैं उन्हें गृहस्थाश्रम की श्रेष्ठता और उज्ज्वल भविष्य की सबसे बात दिखाते हैं । विवेकानंद ने इस परिस्थिति का उल्लेख मेरा जीवन और ऍम भाषण में इस प्रकार क्या हमारे कोई मित्र थे? हमें सुनता भी कौन हो? कुछ विचित्र सी विचारधारा को लिए हुए छोकरे जो है ना? कम से कम भारत में तो छोकरो की कोई गिनती नहीं । जरा सोचिए लडके! लोगों को समय भी बडी, बडी बातें, बडे बडे सिस्तान और ये शेखी हाँ कि वे इन विचारों को जीवन में चरितार्थ साक्षात करेंगे था । सभी ने हसी ही हंसी करते करते हुए गंभीर हो गए हमारे पीछे पड गए उत्पीडन करने बालको की माता पिता हमें क्रोध से कारने लगे और जो जो लोगों ने हमारी खिल्ली उडाई युवतियो हम और भी दृढ होते गए पारिवारिक भाव भी दूर नहीं हुआ था । इसलिए विवेकानंद चाहे अधिकांश समय मठ में बताते हैं और गुरु भाइयों की शिक्षा दीक्षा तथा देखभाल का पूरा ध्यान देते थे पर भी रहते घर पर हैं । मकान का झगडा भी समाप्त नहीं हुआ । सम्बंधियों ने मुकदमे की अपील करनी थी । अपील का फैसला नहीं हुआ था और इस कारण भी उनका घर पर रहना आवश्यक हो गया । फिर घर वालों की जीविका चलाने वाले वही थे लेकिन विवेकानंद किए इस उदाहरण को लेकर कुछ दूसरे सन्यासी भी घर लौटकर परिवार वालों के साथ रहने और परीक्षा की तैयारी करने लगते । दूसरे मटकी टूट जाने का खतरा पैदा हो गया । अब नरेंद्र चौकी मच टूट जाएगा तो गुरु जो कार्य सौंप गए हैं वो कैसे संपन्न होगा और संघ नहीं रहेगा तो उनके विचार हवा में भी घर जाएंगे । लिखा है तभी ये अनुभव हुआ कि इन विचारों का नाश होने देने के बदले कहीं ये श्री इस करने की कुछ मुट्ठीभर लोग स्वयं अपने को मिटाते रहे । क्या बिगड जाएगा यदि एक मान रही यदि दो भाई मर गए तो ये तो बलिदान है, ये तो करना ही होगा । बिना बलिदान की कोई भी महान कार्यसिद्ध नहीं हो सकता । कलेजे को बाहर निकालना होगा और निकाल कर पूजा की वेदी पर उसे लहूलुहान चढा देना होगा । सब बातों को जानते हुए भी कार्यरूप में परिणत करना सहज नहीं था । मनुष्य पर पूर्व संस्कारों के जाने कितने बंधन होते हैं । सभी जंजीरों को एक साथ तोड देना संभव नहीं । विवेकानंद का पहलवान शरीर भी उन्हें नहीं तोड पाया । लेकिन अब सभी पारिवारिक संबंधों को झटककर उन्होंने देश चौबीस बरस की आयु में अठारह सौ छियासी के दिसंबर में स्थायी रूप में मठ में आकर रहना शुरू किया । विवेकानंद के बारे में दूसरों के मन में जो संदेह तथा भ्रम घाटियां उत्पन्न होने लगी थी, वे उनके बराहनगर मठ में आकर रहने से दूर हो गई । जो युवा संन्यासी अपने अपने घर चले गए थे, वो भी अपने हाथ में लौट है । विवेकानंद की सतर्क देखभाल में वे सब दर्शनशास्त्र, वेदान्त, पुराण, भागवत इत्यादि के पार्ट तथा जब ध्यान कठोरतम, मस्तियाँ आदि में लग गए । विवेकानंद सुबह सवेरे गुरु गंभीर ध्वनि में उन्हें बुखार थे । हेमरेज के पुत्रगण अमृतपान करने के लिए जाएगा जागरू जब ध्यान आदि के बाद विवेकानंद गुरु भाइयों को एक साथ बिठाकर किसी दिन उनके सम्मुख गीता का और किसी दिन टॉमस एक कैंपस के किसान शरण का पार्ट करते रो मामला लिखते हैं । एकांत बाज की इस काल को उन्होंने कठिन शिक्षा का एक उच्चतर के अध्यात्मिक विद्यालय का रूप दे दिया । उनकी प्रतिभा और उनकी ज्ञान की श्रेष्ठता ने शुरू ही से उनको अपने साथियों में अग्रणी का स्थान दे दिया । यद्यपि उनमें से कई उनसे अधिक उम्र के नरेन्द्र ने दृढतापूर्वक इस साधना केन्द्र का संचालन आरंभ किया और किसी को भगवत भजन में अलग से की अनुमति नहीं । सभी सदस्यों को वो निरंतर सतर्क रखते और उनके मन को निरंतर चेताते रहते । मानवीय चिंतन की आत्मक्रांति पढ कर उन्हें सुनाते विश्वास माँ के विकास का सदस्य समझाते सभी मुख्य धार्मिक और दार्शनिक समस्याओं पर नीरज किंतु उत्तेजित वादविवाद के लिए बात नहीं करते । निरंतर उस सीन सत्य के विशाल क्षितिज की ओर प्रेरित करते चलते जो जातियों और संप्रदायों से बडा है जिसमें सभी विशिष्ट सत्य एक आकर हो जाते हैं । किसी प्रकार डेढ साल बीत गया लेकिन अब एक नई प्रवृत्ति ने सिर उठाया । उत्साह और जिज्ञासा से ओतप्रोत तरुण सन्यासी कब तक निरस्त बाद विवाद में उलझे और निर्जीव पुस्तकों से सिर पटक दे रहे हैं । उस तक ज्ञान आवश्यक होते हुए भी पुस्तक मानव अनुभव का संकलन मात्र है । इन युवा सन्यासियों को भी मटकी चारदीवारी से बाहर निकलकर विस्तृत संसार का अनुभव सरस और सचिव ज्ञान प्राप्त करना था । उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस ने पुस्तकीय नहीं पडी थी । उन्होंने शास्त्र तथा संस्कृति का क्या है मौखिक रूप से ग्रहण किया था और फिर उस ज्ञान को हास परिहास और शैलेश मई भाषा में सरस और सजीव बनाकर मौखिक रूप से ही भक्तों तक पहुंचाया था । उनके शिष्य मात्र उस तक ज्ञान तक सीमित रहकर अपने को कैसे निर्जीव और आदर्शहीन बना लें । इसलिए दो एक संन्यासी चुपचाप बिना कानोकान खबर किए तीर्थ भ्रमण को चलने के लिए । फिर एक दिन जब विवेकानन् किसी काम से कलकत्ता गए हुए थे । बहुत छोटी उम्र का सन्यासी सारदा प्रसन्न स्वामी त्रिगुणातीत आनंद गुप्त रूप से मत छोडकर चला गया । विवेकानंद बडे व्याकुल हुए और उन्होंने राहुल से कहा तो म्यूजिक यू जाने दिया देख राजा मैं कैसी विकेट स्थिति में पड गया हूँ । एक संसार घर द्वार छोडकर यहाँ आया और यहाँ माया का एक नया संसार जोड बैठा हूँ । इस लडकी के लिए प्राण बडे ही व्याकुल वोट हैं । शारदा प्रसन्न जाते समय पत्र लिखकर छोड गया था । अब किसी व्यक्ति ने पत्र लाकर विवेकानंद को दिया लिखा था मैं पैदल श्री वृंदावन जा रहा हूँ । यहाँ पर रहना मेरे लिया संभव हो गया है । कौन जाने के समय मन की गति बदल जाए । मैं बीच बीच में माता पिता घर स्वजन आदि के सपने देखता हूँ । मैं स्वप्न में मूर्ति मतीम आया द्वारा प्रलोभित हो रहा हूँ । मैंने काफी सहन किया । यहाँ तक की प्रबल आकर्षण के कारण मुझे दो बार घर जाकर स्वजनों से मिलना पडा है । अच्छा अब यहाँ रहना किसी भी तरह उचित नहीं । माया के पंजी से छुटकारा पाने के लिए दूर देश में जाने के अलावा और गति नहीं । विवेकानंद ने पत्र पढकर समाप्त किया तो वह एक जबरदस्त झटका लगा और एक और जनजीव टूटकर गिर पडे । सोचा ये तो सभी तीर्थ भ्रमण का आग्रह कर रहे हैं । इससे तो मटका नाश हो जाएगा । ठीक है होने दो मैं उन्हें बांध कर रखने वाला उनका अपना मैन पिछले दो वरिष्ठ छोड निकलने के लिए छटपटा रहा ये क्या किया की उन्होंने घर द्वार की चांदी की जंजीर तो होगी और अब ये सनकी सोने की जंजीर पहने रहेंगे । इस प्रकार एक साथ रहते रहते सभी धीरे धीरे माया के बंधन में आबद्ध हुए जा रहे हैं । अटेक स्वयं उन्होंने भी बट छोडकर दूर चले जाने का संकल्प कर लिया । गुरु भाइयों का अनुरोध तक उन्हें नहीं रोक पाया । बीमा रामकृष्ण की विधवा पत्नी शारदामणि का आशीर्वाद लेकर तीर्थ भ्रमण को निकल पडे । अव्यवस्था यह की गई की दल का एक भाग हमेशा मठ में बना रहेगा । शशि स्वामी रामकृष्णन सीआई रूप में मंच में रहकर उसका संचालन कर दे रहे हैं । उन्होंने कभी उसमें से बाहर कदम नहीं रखा । विमत की दूरी और उसके एकनिष्ठ संरक्षक थे । दूसरे शिष्य चले जाते हैं और घूम घूमकर फिर इसी नींद में लौटाते । विवेकानंद छियासी में प्रथम भाग में बराहनगर में परिव्राजक रूप में भ्रमण के लिए चले । बिहार उत्तरप्रदेश में घूमते हुए मुख्य तीर्थ काशी पहुंचे और वहाँ कुछ दिन रुकने का निश्चय कर के द्वारका दास आश्रम में रहने रहे । जब ध्यान साधु संगर विद्वानों से चर्चा उनका नित्यकर्म था । एक दिन किसी सज्जन ने उनका परिचय पंडित भूदेव मुखोपाध्याय से करा दिया । युवा संन्यासी विवेकानंद के साथ धर्म समाजनीति तथा देश की उन्नति संबंधी चर्चा करके मुझे बाबू इतने मुक्त हुए कि उन्होंने उनसे जान से कहा इतनी छोटी व्यवस्था में इतनी गंभीर अंतर्दृष्टि मुझे विश्वास है कि भविष्य में एक महान व्यक्ति बनी । वाराणसी में उन दिनों स्वामी भास्करानंद के गुणों की बडी चर्चा विवेकानंद एक जन के आश्रम में भी गए थे । आपने शिशु तथा भक्तों से गिरे बैठे थे । विवेकानंद को सन्यास जीवन संबंधी आदर्श का उपदेश देते हुए भास्करानंद ने ये कह दिया कि कामकाज इनका पूर्ण रूप से कोई भी त्याग नहीं कर सकता । विवेकानंद ने इसका प्रतिवाद करते हुए कहा, महाराज! ऐसे अनेक सन्यासी है । संपूर्ण रूप से कम कंचन के मंदिरों से मुक्त है और उदाहरण के लिए उन्होंने रामकृष्ण परमहंस का नाम लिया । भास्करानंद हसते हुए बोले इस तो बच्चे हुए इस उम्र में वो बात नहीं । समस्या को फिर जब उन्होंने रामकृष्ण के चरित्र की आलोचना की तो विवेकानंद ने निर्भिक दृढता से उसका खंडन किया । स्वामी भास्करानंद की बडी ठाक थी राजे महाराजे, पंडित तथा ज्ञानी उनके चरण छूकर कृतार्थ होते थे । तरुण संन्यासी विवेकानंद के साहस और तर्क से सब स्मित रहे हैं । भास्करानंद उदार है । वैसे सन्यासी है । उन्होंने अपने शिष्यों तथा उपस् थित व्यक्तियों से कहा इसके करंट में सरस्वती विराजमान हैं । इसके हिरदय में ज्ञान आलू प्रदीप हुआ है । गुरु के संबंध में अन आदरसूचक शब्द विवेकानंद से सहन नहीं हुए । वितरण वहाँ से चले आए । कुछ दिन काशी में रहकर विवेकानंद बराहनगर मठ में लौट है । सत्येंद्रनाथ मजूमदार लिखते हैं, वाराणसी हिंदू भारत का हृदय केंद्र है यहां मद्रासी, पंजाबी, बंगाली, गुजराती, महाराष्ट्रीय, उत्तर प्रदेश व्यक्तिगत आचार में भारत भाषा की भिन्नता के बावजूद एक ही भाव के भावुक बनकर भगवान विश्वनाथ के मंदिर में सम्मिलित होते काशी धाम में स्वामी जी ने परमार्थिक ता से भ्रष्ट विचारविहीन एवम राम आचार पराया इन्नर नायउ के बीच भी धर्म की युग युगांतर से संचित महिमा की उपलब्धि । इसलिए हम देखते हैं बराहनगर मठ में लौटकर में ग्रुप भाइयों को प्रचार कार्य के लिए प्रोत्साहित करने लगे । भारत वर्ष को देखना होगा समझना होगा इन लाखों करोडों नर नारियों की जीवन यात्रा के कितने भिन्न भिन्न स्तरों में कौनसी वेदना कौन सा भाग दिन रात एक अपून लालसा की ज्वाला भडकाकर उन्हें दर्द कर रहा है वो समझना होगा इस कल्याण व्रत की साधना के लिए केवल स्वार्थ किया की नहीं बल्कि सर्वस्वत्यागी करना होगा । यहाँ तक कि उन्हें अपनी मुक्ति की कामना तक को भूल जाना होगा । मझसे विवेकानंद दुबारा काशी आए तो उनकी गुरुभाई अखंडानंद ने उनका परिचय प्रभुदास मित्र से करा दिया । प्रभु दादा संस्कृत भाषा, साहित्य और विधान दर्शन के प्रकांड पंडित थे । इनसे विवेकानंद कितने प्रभावित हुए और उनके मन में इनके प्रति कितनी श्रद्धा उत्पन्न हुई, इसका अनुमान बराहनगर कलकत्ता से सत्रह अगस्त अठारह सौ नब्बे को लिखे पत्र से सहज में लगाया जा सकता है । उन्हें पूछे बाद से संबोधित करते हुए लिखा है, आपने पिछले पत्र में लिखा है कि जब मैं आपको अगर सूचक शब्दों से संबोधित करता हूँ तो आपको बहुत संकोच होता है किंतु इसमें मेरा कुछ दोष नहीं । इसका उत्तरदायित्व तो आपके सद्गुणों पर है । मैंने इस पत्र के पूर्व एक पत्र लिखा था कि आपके सद्गुणों से जो मैं आप की ओर आकृष्ट होता हूँ उससे ये प्रतीत होता है कि हमारा और आपका कुछ पूर्व जन्म का संबंध है । इस संबंध में मैं एक गृहस्थ और संन्यासी में कोई भेद नहीं मानता हूँ और जहाँ कहीं महानता, हृदय की विशालता, मन की पवित्रता एवं शांति पाता हूँ, वहाँ मेरा मस्तक श्रद्धा से न हो जाता है । आज कल जितने लोग संन्यास ग्रहण करते हैं, वे ऐसे लोग हैं जो वास्तव में मान सम्मान के भूखे हैं, जीवन निर्माण की नियमित त्याग का दिखावा करते हैं और जब गृहस्थी और सन्यास इन दोनों के आदर्शों से गिरे हुए हैं, उनमें कम से कम एक लाख में एक तो आपके जैसा निकले ऐसी मेरी प्रार्थना है । मेरी जिन ग्रामीण गुरु भाइयों ने आपके सपनों की चर्चा सुनी है । ये सब आपको सागर प्रणाम करते हैं । इसके बाद शास्त्र संबंधी कोई संदेह कोई समस्या उठ खडी होती तो स्वामी विवेकानंद उसका समाधान उनसे पूछा करते थे । लेकिन आठ बरस बाद तीस मई के पत्र में अल्मोडा से लिखा है, यद्यपि बहुत दिनों से मेरा आपसे पत्रव्यवहार नहीं था परंतु औरों से आपका प्राया सब समाचार सुनता रहा हूँ । कुछ समय हुआ आपने? कृपापूर्वक मुझे इंग्लैंड में गीता के अनुवाद की एक प्रति भेजी थी । उसकी जिल्द पर आपके हाथ की पंक्ति लिखी हुई थी । इस उपहार की स्वीकृति थोडे से शब्दों में दिए जाने के कारण मैंने सुना कि आपको मेरी आपके प्रति पुरानी प्रेम की भावना में संदेह हो हो गया है । कृप्या इस संदेह को आधार रहे जानी है । संक्षिप्त स्वीकृति का कारण यह था कि पांच वर्ष में मैंने आपकी लिखी हुई एक ही पंक्ति कुसंगति जी गीता कि जिन पर देखी, इस बात से मैंने ये विचार किया कि यदि इससे अधिक लिखने का आपको अवकाश नहीं था तो क्या अधिक पडने का अवकाश हो सकता है? और दूसरी बात मुझे ये पता लगा कि हिन्दू धर्म की गोरान मिशनरियों के आप विशेष मित्र है और दृष्टि कालेज भारतवासी आपकी घृणा के पात्र हैं । ये मन में शंका उत्पन्न करने वाला विषय था । तीसरे मैं मिल इज शूद्र इत्यादि हूँ । जो मिले तो खाता हूँ वो भी जिस किसी के साथ और सबके सामने चाहे देश हो या विदेश इसके अतिरिक्त मेरी विचारधारा में बहुत विकृति आ गई है । मैं निर्गुण पूर्ण ब्रह्मा को देखता हूँ । यदि वे ही व्यक्ति ईश्वर के नाम से पुकारे जाएँ तो मैं इस विचार को ग्रहण कर सकता हूँ । परन्तु बौद्धिक सिद्धांतों द्वारा परिकल्पित विधाता आदि की ओर मन आकर्षित नहीं होता । जब बौद्धिक अंतर बढ जाए तो आपसी संबंध पुराने पड जाते हैं । तब उन पुराने संबंध को झटक कर आगे बढ जाना ही बेहतर होता है । अगर अग्रसर छियासी में स्वामी विवेकानंद काशी ही से तीर्थ यात्रा पर रवाना हुए उत्तर भारत के कई सीटों पर होते हुए सरयू नदी के तट पर स्थित अयोध्या पहुंचे । यहाँ आकर बचपन की अनीस मृत्यु उनके मन में जाग उठी । रामायण से उन्हें विशेष अनुराग था । सीताराम की कहानी उन्होंने माँ से सुनी थी और महावीर उनका चरित्र नायक था । अयोध्या में कुछ दिन रह गए और उन्होंने रामायण सन्यासियों से सतसंग किया और फिर वे लखनऊ और आगरा होते हुए पैदल ही वृन्दावन की ओर चलने के लिए आगरा और फतेहपुर सीकरी में उन्होंने मुगल इमारतों का शिल्प सौंदर्य देखा और फिर आगे बढे । वृन्दावन के मार्ग में उन्होंने देखा कि व्यक्ति के नारे पर बैठा तंबाकू भी रहा है । उन का मन भी कश लगाने को ललचाया और हाथ बढाकर उस आदमी से चेल्लम्मा महाराज मैं घूमी हूँ वहाँ संस्कार भीरु व्यक्ति बोला बेहतर विवेकानंद की भी जन्मगत संस्कार दे आएँ और बडा हुआ आज पीछे हट गया । जल्दी जल्दी कदम बढाते हुए आगे बढे पर कुछ ही दूर गए होंगे कि मान ने कारण अरे तूने तो जाती कुलमान सभी को त्यागकर संन्यास ले लिया है ना तो दोबारा उस व्यक्ति के पास है उससे चिलम भरवाकर बडे प्रेम और आनंद से तंबाकू क्या? इसके बाद अपनी यात्रा में वे भंगी चमार ओके झोपडे में रातों ठहरे और उनके मन में छुआछूत का विचार कर कभी नाया वृन्दावन में थोडे दिन रहकर जब हाथ र सहित वहाँ के नौजवान स्टेशन मास्टर शरद चंद्र गुप्ता से अचानक उनकी भीड हो गई । शरद उन्हें अपने घर ले गया और विवेकानंद ने गुप्ता परिवार में आपने कुछ दिन बता है जब वहाँ से चले तो शरद उन्हें छोडने को तैयार नहीं था । वहाँ पिता किया गया लेकर विवेकानंद का पहला शिष्य बना और दंड कमण्डलु लेकर उनके साथ चल चला । शरद चन्द्र का संन्यासी नाम स्वामी सदानंद रखा गया और बाद में उसने गुरु के बुलावे पर अमेरिका चाकर वेदान्त प्रचार में उनका हाथ बंटाया । शिष्य और गुरु एक साथ यात्रा पर चल पडे । लेकिन सदानंद सन्यासी जीवन और यात्रा की कठिनाइयों का व्यस्त नहीं था इसलिए वह बीमार पड गए । विवेकानंद उसे अपने कंधों पर उठाए उठाए जंगलों में घूमते रहे । अंत में वे आप भी बीमार पड गए और शिष्य को साथ लेकर हाथरस लौटाए । गुप्ता परिवार और उत्साही युवकों की सेवा सो शिक्षा से विश्वस्त हुए पहली हु और कुछ दिन बाद सदानंद भी अगस्त अठारह सौ छियासी में बराहनगर मठ में आ गया और रामकृष्ण संघ में सम्मिलित हो गया । अब विवेकानंद लगभग एक बरस तक बराहनगर मन तथा बागबाजार कलकत्ता में बलराम बसु के मकान पर रहे । ये समय उन्होंने गुरु भाइयों के साथ मैदान पानी नहीं व्याकरण तथा शास्त्रों के अध्ययन में बताया । इस बीच में उन्होंने प्रभुदास मित्रों को पत्र लिखे । उनसे मटके जीवन कार्या और उनको अपनी मनस्थिति पर भलीभांति प्रकाश पडता है । प्रवक्ता राज ने इन संन्यासियों को वेदांत तथा अष्टाध्यायी ग्रंथ दान दिए थे । इसके लिए कृतज्ञता व्यक्त करते हुए विवेकानंद ने उन्हें उन्नीस नवंबर अठारह सौ छियासी को लिखा था, आपने वेदांत का उपहार भेजकर ना केवल मुझे बहन श्रीरामकृष्ण की समस्त सन्यासी मंडल को आजीवन ऋणी कर दिया है, वे सब आपको सादर प्रणाम करते हैं । मैंने आपसे पानी व्याकरण की जो प्रति मंगाई है, वह केवल अपने लिए ही नहीं है । वास्तव में इस मठ में संस्कृत धर्मग्रंथों का खूब अध्ययन हो रहा है । वेदों के लिए तो यहाँ तक कहा जा सकता है कि उनका अध्ययन बंगाल में बिल्कुल छूट गया है । इस मठ में बहुत से लोग संस्कृत जानते हैं और उनकी इच्छा है कि वे वेदों के सहायता अभी भागों पर पूरा अधिकार प्राप्त कर ले । उनकी राय है कि जो काम किया जाए, पूर्व तरह किया जाए । मेरा विश्वास है कि पानी ने व्याकरण पर पूर्ण अधिकार प्राप्त किए बिना वेदू की भाषा में पारंगत होना असंभव है और एकमात्र पाणिनी व्याकरण ही इस कार्य के लिए सर्वश्रेष्ठ है । इसलिए इसलिए प्रति की आवश्यकता हुई । मुग्ध भूत व्याकरण, जो हम लोगों ने बाल निकाल में पडा था । लघु को मोदी से कई अंशु में अच्छा है । आप स्वयं एक बडे विद्वान है, अतएव हमारे लिए इस विषय में निर्णय अच्छी तरह कर सकते हैं । अच्छा यदि आप समझते हैं कि पानी कृत अष्टाध्यायी हमारे लिए सबसे अधिक उपयुक्त हैं तो उसे भेजकर हमें आप जीवन भर के लिए अनुग्रहित करेंगे । इस विषय में मैं ये कह रहा हूँ कि आप अपनी सुविधा और इच्छा का आवश्यक स्मरण रहे । इस मंच में अध्यवसायी योग्य और कुशाग्र बुद्धि वाले मनीषियों की कमी नहीं है । इन दिनों विवेकानंद ने वेदों के साथ साथ उपनिषद और शंकर भाषा का भी गंभीर अध्ययन किया । उनके मन में जो संदेह हो उठे उन्हें मिटाने के लिए वे बराबर प्रभुता दास मित्र को लिखते रहे । ये सब पत्र विवेकानंद साहित्य प्रथम खंड में संग्रहित हैं । सदर अगस्त अठारह सौ नब्बे के लम्बे पत्र में पूछे गए बारह प्रश्न में से हम यहाँ सिर्फ तीन का उल्लेख करते हैं । इससे विवेकानंद की विचार पद्धति का पता चलेगा । लिखा है यदि भी नृत्य है तो फिर इन कथाओं में कहाँ तक सकते हैं कि धर्म की वहाँ विधि वापर के लिए हैं और ये कलयुग के लिए इत्यादि इत्यादि । दस । जिस परमात्मा ने वेदों का निर्माण किया, उसी ने फिर बुद्धावतार धारण अगर उन का खंडन किया, इन धर्मोपदेशों में किसका अनुगमन किया जाए, पहले हो या बाद वाले को तंत्र कहते हैं कि कलयुग में वेदमंत्र व्यर्थ है । अब भगवान शिव के भी किस आदेश का पालन किया जाए । ब्याज का वेदान्त सूत्र में ये स्पष्ट कथन है कि वासुदेव संकर शादी, चक्रव्यूह, उपासना ठीक नहीं तो फिर वही ब्याज भागवत में इसी उपासना की गुणानुवाद गाते हैं । तो क्या व्यास पागल थी, हैं और तेरह दिसंबर का पत्र देखिए आपको लिखी हुई पुस्तिका मिली । जब से यूरोप में ऊर्जा संधारण की ऍफ एनर्जी के धान का अविष्कार हुआ है, तब से वहाँ एक प्रकार से वैज्ञानिक अद्वैतवाद फैल रहा है । हिंदू वो सब परिणाम बाद हैं । ये अच्छा हुआ कि आपने उसमें और शंकराचार्य के विवर्त बाद में भेज स्पष्ट कर दिया है । जर्मन अतीन्द्रिय वादियों के संबंध में स्पेंसर की विडंबना का जो उद्वरण आपने दिया है ये मुझे जचा नहीं, पेंसिल स्वयं उनसे बहुत कुछ सीखा है । आपका विरोधीगण अपनी होगी को समझ सकता है या नहीं इसमें संदेह है जो हाँ आपका उत्तर काफी तीसरा एवं पकाते हैं और चार जुलाई को अपने बारे में लिखा था परंतु मुझको तो इस समय अभी एक नया ही रोग है । परमात्मा की कृपा पर मेरा खंड विश्वास है, वो कभी टूटने वाला भी नहीं । धर्मग्रन्थों पर मेरी अटूट श्रद्धा है परन्तु प्रभु की छह से मेरे घर छह सात वर्ष निरंतर विभिन्न विभिन्न बाधाओं से लडते हुए भी थे । मुझे आदर्श शास्त्र प्राप्त हुआ । मैंने एक आदर्श महापुरुष के दर्शन प्राप्त किए हैं । फिर भी किसी वस्तु का अंत तक निर्वाह मुझसे नहीं होगा था । ये मेरे लिए कष्ट की बात है और विशेषतः कलकत्ता के आस पास रहकर मुझे सफलता पाने की कोई आशंका कलकत्ता में मेरी माँ और दो भाई रहते हैं । मैं सबसे बडा हूँ । दूसरा भाई ऐसे परीक्षा की तैयारी कर रहा है और तीसरा अभी छोटा है । परिवार की दरिद्रता और मकान के झगडे का उल्लेख करके आगे लिखा है, कलकत्ता के पास रहकर मुझे अपनी आंखों से उनकी दुर्व्यवस्था देखनी पडती है । उस समय मेरे मन में रजोगुण जाग्रत होता है और मेरे हम भाग कभी कभी उस भावना में परिणित हो जाता है । इसके कारण कार्य क्षेत्र में कूद पडने की प्रेरणा होगी । ऐसे शहरों में मैं अपने मन में एक भयंकर अंतर बंद हो गाना बहुत करता हूँ । यही कारण है कि मैंने लिखा था कि मेरे मन की स्थिति मिशन है । अब उन का मुकदमा समाप्त हो चुका है । आशीर्वाद बी जे की कुछ दिन कलकत्ता में ठहरकर उन सब मामलों को सुलझाने के बाद मैं सदा के लिए विदा हो सकता हूँ । इस बीच में उन्होंने छोटी छोटी यात्रा आएगी । फरवरी अठारह सौ नब्बे में वीरान कृष्ण की जन्मभूमि कामारपुकुर श्री माता शारदामणि की जन्मभूमि जयराम ट्वेंटी गए । वहां से लौटते समय में बीमार हुए और काफी दिन चारपाई नहीं छोडना है । जुलाई में शिमल तू और दिसंबर के अंत में वैद्यनाथ और इलाहाबाद गए । आठ सौ नब्बे में गाजीपुर की दो बार यात्रा की, जो दिलचस्प और महत्वपूर्ण है । इसलिए उसकी तनिक विस्तार से चर्चा करनी होगी । विवेकानंद जनवरी ऍम नब्बे को गाजीपुर पहुंचे । वहाँ पर बाहर ई बाबा नाम के प्रसिद्ध साधु थे, जो गुफा में बंद रहते थे । विवेकानंद बाबा जी से मिलने के लिए बडे उत्सुक थे, पर अवसर नहीं मिल रहा था । जनवरी के पत्र में प्रभुता दास मित्र को लिखते हैं, बाबा जी से भेंट होना अत्यंत कठिन है । मकान के बाहर नहीं निकलने इच्छानुसार दरवाजे पर आकर भीतर ही से बोलने हैं । अत्यंत ऊंची दीवारों से घिरा हुआ पद ज्ञानयुक्त तथा दो चिमनियों से सुशोभित उनके निवास स्थान को देख आया हूँ । भीतर जाने का कोई उपाय नहीं । लोगों का कहना है कि भीतर गुफा यानि तहखाना जैसी एक फट रही है जिसमें में रहते हैं । वो क्या करते हैं ये वही जानते हैं क्योंकि कभी किसी ने देखा नहीं । एक दिन में यहाँ बैठा बैठा कडी सर्दी खाकर लौटा था फिर भी मैं यतना करूंगा । इसके बाद चार फरवरी सात फरवरी के पत्र इस प्रकार है । बडे भाग्य से बाबा जी का दर्शन हुआ । वास्तव में भी महापुरूष हैं । बडे आश्चर्य की बात है कि इस नास्तिकता की युग में भी भक्ति एवं योग की अद्भुत क्षमता के अल्लाह के प्रति है । बहन की शरण में गया और उन्होंने मुझे आश्वासन दिया जो हर एक कि भाग्य में नहीं, बाबा जी की इच्छा है कि मैं कुछ दिन तक है, वो मेरा कल्याण करेंगे । अरे इन महापुरुष की अज्ञान उसार में कुछ दिन और यहाँ ठहरूंगा निसंदेह है । इससे आप भी आनंदित होंगे । घटना बडी विचित्र है । पत्र में ना लिखूंगा, मिलने पर जरूर बताऊँ । ऐसे महापुरुषों का साक्षात्कर किए बिना शास्त्रों पर पूर्ण विश्वास नहीं होता । सचित्र घटना क्या थी या प्रभुदास मित्र जाने अगला पत्र ही ये है बडा और हुआ बाबा जी आचार्य वैष्णव प्रतीक होते हैं । उन्हें योग भक्ति एवं विनय की प्रतिमा कहना चाहिए । उनकी कुटी के चारों ओर दीवार हैं । उसमें दरवाजे बहुत काम पर कोटा के भीतर एक बडी गुफा है जहां वे समाधिस्थ पडे रहते हैं । गुफा से बाहर आने पर ही वे दूसरों से बातचीत करते हैं । किसी को ये मालूम नहीं क्या खाते पीते हैं इसलिए लोग हैं तुम्हारी पवन का आहार करने वाला बाबा कहते हैं, एक बार जब पांच साल तक गुफा से बाहर नहीं निकले तो लोगों ने समझा के उन्होंने शरीर त्याग दिया है । किंतु फिर उठाएं पर अभी लोगों के सामने निकलते नहीं और बातचीत भी द्वार के भीतर से करते हैं । इतनी मीठी वाणी मैंने कहीं नहीं । वे प्रश्नों का सीधा उत्तर नहीं देते बल्कि कहते हैं दास क्या जाने पर हिंदू बात करते करते हैं मान उनके मुख से अग्नि के समान तेजस्वी वाणी निकलती है । मेरे बहुत आग्रह करने पर उन्होंने कहा कुछ दिन यहां ठहरकर मुझे कृतार्थ कीजिए, परंतु हुए इस तरह कभी नहीं कहते हैं । निसंदेह बडे विद्वान है पर कुछ प्रकट नहीं होगा । विश्वास रूकती, कर्मकांड करते । पूर्णिमा से संक्रांति तक होम होता रहता है । अतएव यह निश्चित है कि वे इस अवधि में गुफा में प्रवेश करेंगे । मैं उनसे अनुमति किस प्रकार मांगूं? वे तो कभी सीधा उत्तर देते ही नहीं । ये दास मेरा भाग्य इत्यादि कहते रहते हैं । विवेकानंद ने फलाहारी बाबा शीर्षक से लंबा ने बंद भी लिखा है । जब विवेकानंद साहित्य नवम खंड में संकलित है इसने बंद में उन्होंने प्रभारी बाबा के डीलडौल और विचित्र मृत्यु का वर्णन इन शब्दों में क्या है देखने में वे अच्छे चौडे तथा दोहरे शरीर के उन की एक ही आंख थी और अपनी वास्तविक उम्र में हुए कुछ प्रतीक होते थे । उनकी आवाज इतनी मधुर थी कि हमने वैसी आवाज अभी तक नहीं अपने जीवन के शेष इस वर्ष या इससे भी कुछ अधिक समय से लोगों को फिर दिखाई नहीं पडेगा । उनके दरवाजे के पीछे कुछ आलू तथा पूरा सा मक्खन रख दिया जाता था और रात को किसी समय जब समाधि में न होकर अपने ऊपर वाले कमरे में होते थे तो इन चीजों को ले लेते थे । पर जब एक गुफा के भीतर चले जाते थे तब उन्हें इन चीजों की भी आवश्यकता नहीं रह जाती । हम पहले कह चुकी है कि बाहर से धुआँ दिख पडने ही से मालूम हो जाता था कि वे समाधि से उठे हैं । एक दिन उस चलते हुए वैसे मांस के दुर्गंध आने लगी । आस पास के लोग इसके संबंध में अनुमान ना कर सके की हो क्या रहा है? अंत में जब वो दुर्गंध असहनीय हो गई और धुआँ भी अत्यधिक मात्रा में उडता हुआ दिखाई दिया तब लोगों ने दरवाजा तोड डाला और देखा कि इस महायोगी ने स्वयं को पूर्णाहुति के रूप में उसको मालिनी को समर्पित कर दिया है । थोडे ही समय में उनका वो शरीर भस्म राशी में परिणत हो गया । प्रस्तुत लेखक इस पर लोग गत संत के प्रति नरम ऋणी हैं । इस लेखक ने जिस श्रेष्ठतम आचार्यों से प्रेम किया तथा जिनकी सेवा की है उनमें से एक है । उनकी पवित्र स्मृति में ये पंक्तियां चाहे जैसी भी आयोग के हो, समर्पित करता हूँ, हमारे देश नहीं । न जाने ऐसे कितने अद्भुत और विलक्षण व्यक्ति पैदा किए हैं । उनमें सहमत असहमत होना अलग रहा, पर उनके चरित्र की दृढता और एक निष्ठा से तो इनकार नहीं किया जा सकता है । ये वही लोग हैं जिन्होंने ज्ञान के दीप को अपने खून से जलाया तो मैं आंधी के भयंकर तूफानों में भी पूछने नहीं दिया और जनसाधारण में अपनी संस्कृति तथा परंपरा के प्रति दृढ एवं अटूट आस्था बनाए । इस अद्भुत पुरुष बर्फबारी बाबा से विवेकानंद क्या चाहते थे और उनकी आपसी संबंध क्या थे, इस बारे में सत्येन्द्रनाथ मजूमदार विवेकानंद चरित में लिखते हैं, घनिष्ठ परिचय हो जाने से महान तपस्वी पर बाहर ई बाबा पर स्वामी जी बडे मुद्दे हुए । उन्होंने अपने मन में सोचा क्या कारण है कि भगवान श्रीराम कृष्ण की अहैतुकी कृपा के अधिकारी होकर भी आज तक मुझे शांति नहीं मिली । संभव है कि इन ब्रह्मांड पुरुष की सहायता से मैं शांति प्राप्त कर सकता हूँ । स्वामी जी ने सुना था की प्रभारी बाबा ने योगमार्ग की साधना द्वारा सिद्धि लाभ की थी । अतिरिक्त उनके हृदय में बहुत भारी बाबा से योग सीखने की इच्छा हुई । वे बाबा जी को पकडकर बैठ गए और कहने लगे आपको मुझे योग की शिक्षा दी नहीं हूँ । अत्यंत आग्रह देखकर फलाहारी बाबा ने भी हाँ कह दिया गंभीर रात्रि में स्वामी जी पर बाहर ई बाबा की गुफा में जाने के लिए तैयार हुए श्री राम कृष्णा या पयहारी बाबा । ये प्रश्न मन में आते ही उनका उत्साह ठंडा पड गया । निकालने हृदय से संदेहपूर्ण चिट से विवेकानंद भूमि पर बैठ है । सजल नेत्रों को उठाकर देखा दिव्य दर्शन के जीवन के आदर्श दक्षिणेश्वर के वहीं तो तेज मालवन के सामने खडे विवेकानंद आवाक रहे गए । एक प्रहर तक पत्थर की पूर्ति की तरह से जमीन पर बैठे ही रहे । राधा काल हुआ मन में संकल्प विकल्प होने लगा कि भगवान श्रीराम कृष्ण का प्रदर्शन मस्तिष्क की दुर्बलता ही का फल तो नहीं था । निदान अगली रात को फिर से प्रभारी बाबा के पास जाने का तैयार हुए, पर आज भी वही पहले की देखी हुई ज्योतिर्मयी मूर्ति उसी तरह उनके सामने आ खडी हुई । एक दिन, दो दिन, तीन दिन लगातार इक्कीस दिनों तक किसी प्रकार व्यतीत होने पर अंत में वे मार वेदना से भूमि पर लोट पोट होकर आर स्वर से बोले थे नहीं प्रभु, मैं और किसी के पास नहीं हूँ । रामकृष्ण मेरी एक मात्रा हो मैं तुम्हारा ही दास मेरी मानसिक दुर्बलता के अपराध को जमा करो हो जमा कर गुरु की जिस आसन पर रामकृष्ण परमहंस आसीन थे, उस पर किसी दूसरे को नहीं बिठाया जा सकता था । विवेकानंद ने गाता होगी मैं तुम्हें सुनने को कविता इसी घटना से प्रेरित होकर लिखी बाल केलि करता हो तब से मैं और क्रोध कर के तुम से किनारा कर जाना कभी चाहता हूँ किन्तु निशाकाल में देखता हूँ तुमको में खडे हुए चुपचाप आ के चल चलाई खेलते हो मेरे तो मुख् की ओर उसी समय बदल जाता । भाग है पैरो पडता हूँ पर शाम नहीं मांग तो नहीं करते हो, उत्तर हो तुम्हारा हूँ और कोई कैसे इस प्रकार ममता को सहन कर सकता है प्रभु मेरे ग्रांड सका मेरे कभी देखता हूँ मैं मैं तो व्यक्ति है तेरे को शांति देने की अच्छी कामना पलायन मेरा पलायन दृढ चरित्र एकनिष्ठ नरेंद्र अर्थात विवेकानंद के लिए ये संभव नहीं । गुरु केशव स्मरण हुआ है तेरी निर्विकल्प समाधि अभी ताले में बंद करके रख दी गई है । काम समाप्त होने पर ही मिलेगी और फिर तो जीवों पर दया करने वाला कौन है? शिव ज्ञान से जीवों की सेवा करो । गुरु के शब्दों की व्याख्या करते हुए नरेंद्र और सात विवेकानंद ही नहीं तो कहा था मैंने आज एक महान सत्य को पा लिया है । मैं जीवित सत्य की सारे संसार में घोषणा करूँ । नरेंद्र अर्थात विवेकानंद अपने ही इन शब्दों को कैसे छुट लाए वही अगर मन की शांति के लिए अपने वो गुफा में बंद कर ले और अंत में प्रभारी बाबा की तरह शरीर को हो माने की भेंट करते तो वन के विधान को घर में लाने और शिवरूपी जीरो की सेवा का कार्य कैसे संपन्न होगा? निश्चित ही पभारी बाबा का मार्ग विवेकानंद का मार करना था गाजीपुर में रविवार को जो धर्म सभा होती थी उसमें में हमेशा देश, समाज तथा राष्ट्र ही को ऊंचा उठाने की बात कहा । व्यक्तिगत मुक्ति तथा शांति उनकी जीवन का नहीं था । उन्होंने तो कई बार को बकारी बाबा से भी पूछा था कि संसार की सहायता करने के लिए वे अपनी गुफा से क्यू बाहर नहीं आती । बाबा अगर बाहर नहीं आए तो विवेकानंद स्वयं गुफा के भीतर कैसे चले जाते । वे गाजीपुर से जो आप अपने मन में लेकर लौटे उस काशी में रहता दास के सम्मुख इन शब्दों में व्यक्त किया मैं समाज पर बम की तरह फट जाऊंगा और समाज मेरे पीछे चलेगा । इस बार विवेकानंद का ये संकल्प उन्हें हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक पूरे देश की यात्रा करने में दृढ निश्चय कर बांध चुका था और जब तक यात्रा पूरी न हो जाये वे लौटकर मंट में नहीं आएंगे । गुरु भाइयों के आग्रह के बावजूद में अपने इस निश्चय पर अडिग रहे । जुलाई में वे अपने गुरुभाई अखंडानंद के साथ यात्रा पर रवाना हो । वे भागलपुर से देवघर और देवघर से काशी पहुंचे और समय उन्हें हिमालय आकर्षित कर रहा था । इसलिए काशी में में अधिक नहीं होंगे । वे अयोध्या, नैनीताल बद्री और केदार होते हुए अल्मोडा पहुंची । समाचार पाकर महास्वामी, सर्वदानंद और कृपानंद भी उनसे हम हैं । अब बराहनगर मटके अधिकांश सन्यासी पीर भ्रमण को निकल पडे थे । छह सात महीने विभिन्न तीनों पर रहकर उन्होंने हिमालय के प्राकृतिक सौन्दर्य का आनंद ग्रहण किया । कन्याकुमारी की ओर जाने के लिए फिर नीचे उतरे । मेरठ में जब भी सीट के बगीचे में ठहरे हुए थे तो उनके गुरुभाई भी एक एक कर के वहां पहुंचने नहीं युवा बगीचा एक तरफ दूसरा बराहनगर बट बन गया । कीर्तन ध्यान जब विधान की चर्चा शास्त्रा लाख पर आने वालों को धर्मोपदेश नीतिः की दिनचर्या हो गई । एक दिन विवेकानंद ने सोचा ये अच्छा खटराग है । मैं एक बंधन को तोडकर दूसरे बंधन में पड गया इसलिए उन्होंने गुरु भाइयों को एकत्रित करके कहा मैं जल्दी स्थान को छोड रहा हूँ, मेरी इच्छा के लिए यात्रा करने की है तो मैं ऐसे कोई भी मेरे पीछे ना आएं । फरवरी अठारह सौ में भी एक अकेले यात्रा पर चलने के लिए । संक्षेप में इस यात्रा का हाल तो मामा बोला के शब्दों में पडी है । उनका यात्रा पर उन्हें राजपुताना अलवर जोकि फरवरी मार्च के महीने में जयपुर, अजमेर, खेत्री, अहमदाबाद और काठियावाड सितंबर के अंतिम दिनों में जूनागढ और गुजरात पोरबंदर आठ नौ महीने का प्रवास द्वारका पालिताना हम बाते की खाडी से सटा मंदिर बहुत नगर रियासत बडौदा खंडवा, बम्बई होना । बेलगांव अक्टूबर ऍम सौ बयान बैंगलोर कोच हमारा बार रियासत त्रिवाणी स्कूल त्रिवन, त्रिपुरा, मथुरा ले गए । उन्होंने विराट भारतीय अंतरीप कान दिन छोड छू लिया जहाँ दक्षिण का वाराणसी, रामायण का रामेश्वरम और फिर उसके भी आगे कन्याकुमारी की समाधि तक चलते चलते ऍम उत्तर से दक्षिण तक भारत की प्राचीन भूमि पर देवी वीरता बिखरे पडे । इन तो उनकी असम के मुझे आवकी अभी योग्य पृथी केवल एक ईश्वर की प्रति विवेकानंद ने प्राण और मूर्ति के अनन्यता को समझा । उन्होंने उसे समझा सवर्ण और बढ नहीं, सभी प्राणियों से प्रत्या लाख करेंगे और यही नहीं उन्हें भी इसे समझना सिखाया । उन्होंने एक से दूसरे तक परस्पर सद्भाव का संदेश पहुंचाया । अविश्वासी आत्माओं, अमूर्त में आसक्त बौद्धिकों को उन्होंने प्रतिमाओं और देव मूर्तियों का आदर सिखाया । युवकों को भी पुराणादि प्राचीन गौरव ग्रंथों का और इससे भी अधिक आज के जनसमाज का अध्ययन करना है और सभी को उन्होंने सिखाया । संपूर्ण श्रद्धा से भारत माता के उद्वार के लिए आत्मोत्सर्ग करने का आनंद उन्होंने जितना दिया उससे कम नहीं पाया । उनकी विराट आत्मज्ञान अनुभव की खोज में एक दिन भी थक करो कि नहीं और उसने भारत की मिट्टी में बिक्री छिपी समस्त विचारधारा उधारण किया क्योंकि उन्होंने जान लिया था कि इन सब का उद्गम एक है । एक और खडे पानी के दुर्गंध बीच में लिप्त पुराण पंथियों की अंधी श्रद्धा से और दूसरी तरफ क्या शक्ति के रहस्यमय स्रोत हो? अनजाने ही अवरुद्ध करने में सन् लगने ब्रह्मा समाजी सुधार होगी । पथभ्रष्ट वैज्ञानिकता से वे एक समान दूर रहना चाहिए । विवेकानंद चाहती थी कि धर्मप्राण भारत देश की विविध धारराव के इस मिली जुली सरोवर को लीज कर परिष्कार कर डाले । जो रखने योग्य हो, उसे रखें । इतना ही नहीं वे कुछ और भी चाहते थे । मैं जहाँ जाती फॅस अपने साथ रखते । भगवत गीता के साथ साथ हिंसा के विचार भी प्रसारित करते और युवकों से भी आग्रह करती कि पश्चिम के विज्ञान का अध्ययन करें । यात्रा की कठिनाइयों का उल्लेख विवेकानंद ने अमेरिका में दिए गए भाषण मेरा जीवन और ढेर में इस प्रकार क्या है इस तरह चलता रहा । कभी रात के नौ बजे खा लिया तो कभी सवेरे ही एक बार खाकर रहे तो दूसरी बार दूर उसके बाद खाया । तीसरी बार तीन लो । उसके बाद और बार नितांत रूखा सूखा शहीद नीरस अधिकांश समय पैदल ही चलते बर्फीली चोटियों पर चढते कभी कभी तो दस दस मील पहाड पर चढते ही जाते । केवल इसलिए कि एक बार का भोजन मिल जाएगा । बताइए अधिकारी को भला कौन अपना अच्छा भोजन देता है । फिर सूखी रोटी ही भारत में उनका भोजन है और कई बार तो सूखी रोटियां बीस बीस तीस दिन के लिए इकट्ठी करके रखी जाती है और जब ईद ही नई खडी हो जाती है तब उनसे षड्यंत्र व्यंजन का हो संपन्न होता है । एक बार का भोजन पानी के लिए मुझे द्वार द्वार भीक मांगने फिरना पडता था । सच कहूँ वैसी रोटी से आप अपने दम तोड सकते हैं । मैं तो रोटी को एक पात्र में रख देता और इसमें नदी का पानी उंडेल देता । इस तरह महीनों गुजारने पडे पर मेरा स्वास्थ्य गिरता है । विवेकानंद ने अपनी इस यात्रा में भारत की जनता को हर रूप में देखा, दलित और नरेंद्र की झोपडी में नहीं । वे राजी महाराजाओं के प्रसाद भवनों में भी रहे जिन्होंने उन्हें फूलों की तरह रखा । विद्वानों की अतिथि बनकर उनके साथ ज्ञान चर्चा की और उनसे आदर सम्मान पाया । विच चोर उचक्कों तथा बट मारो की संगत में भी रहे और उनमें ऐसे ऐसे उद्दात्त चरित्र व्यक्ति देखे जिन्हें अगर उचित वातावरण तथा अनुकूल परिस्थितियां मिल जाती जाने क्या से क्या हो जाएंगे । इस यात्रा में उन्होंने बहुत कुछ सीखा । इसके विस्तार में जाने की गुंजाइश नहीं समझ लेने के लिए एक दो घटनाएं हूँ । खेतरी का राजा विवेकानंद का भक्त बन गया तो उसके पास रुके हुए थे । एक दिन रागरंग की मैं फिर थी जिसमें एक नर्तकी बाला को अपनी कला का अभिनय करना था । जब वो आई युवक सन्यासी उठकर दूसरे कमरे में चले गए । महाराज के अनुरोध पर भी नहीं रुके नजदीकी को ये तिरस्कार अखरा किसने गाया हूँ मेरे ॅ जितना घरो सामग्री ऐसी है नाम ऍर स्वामी जी समय पर इस पद के गाये जाने का भाव समझाते हैं । फिर भजन में आस्था का जो स्वर था वो उन पर जीवन भर के लिए छा गया । बाद में कई वर्षों तक उसके स्मरण हुआ । आने पर विभावि बोर हो जाते थे । वो तुरंत उठकर महत्व वाले कमरे में आये । सबके सामने नर्तकी बाला से क्षमा मांगी और फिर वहीं बैठकर उसका नृत्य देखा गाना है । हिमालय की लद्दाखी और तिब्बती जातियों में आज भी बहुपति प्रथा प्रचलित है । विवेकानंद वहाँ यात्रा करते हुए पहली बार जिस परिवार में ठहरे उसमें छह भाइयों की एक ही पडती थी । स्वामी जी ने अपने जोश में इन भाइयों को इस अनैतिकता का बोझ कराना चाहते परंतु वे लोग उनकी बात सुनकर दंग रहे हैं । कहने लगे महाराज, एक स्त्री पर अकेला पुरुष अपना अधिकार जमा रखे । इससे बडी स्वार्थपरता और क्या होगी? इस घटना से विवेकानंद को सदाचार की सापेक्षता का बहुत हुआ । उन्होंने जाना कि देश और काल के अनुसार नैतिक मान्यताएं बदलती रहती है और फिर एक देश तथा एक ही काल में विभिन्न परिस्थितियों में विभिन्न जातियों की नैतिक मान्यता अलग अलग हो सकती है । उनमें पाप उन्हें ढूंढना, फिर इस यात्रा में और फिर पश्चिम की यात्रा में जैसे जैसे उनके पूर्वग्रह टूटते रहे, वैसे वैसे में मनीषियों के साथ अपने संबंधों में सामंजस्य सीपी करते रहे । आगामी चार पांच वर्षों में उनके भीतर जो परिवर्तन आया, उसका उल्लेख आपने छह जुलाई अठारह सौ छियानवे के पत्र में उन्होंने इस प्रकार क्या है बीस वर्ष व्यवस्था में मैं हत्या के आज सही हूँ और कट्टर था । कलकत्ता में सडकों की जिस के नारे पर थिएटर है, मैं उस ओर के पैदल मार्ग से नहीं चलता था । अब वर्ष की उम्र में मैं वैश्याओं के साथ एक ही मकान में ठहर सकता हूँ और उनसे तिरस्कार का एक शब्द भी कहने का विचार मेरे मन में नहीं है । उन्होंने सोशल उत्पीडित वर्गों के अभाव और अपमान में हिस्सा बताया । उनके दुख दर्द को अपना दुःख दर्द समझकर महसूस किया । रामकृष्ण को भावावेश में ज्योतिर्मय कालीका साक्षात्कर हुआ और वह विवेकानंद को इस यात्रा में जीर्णावस्था ना भारत माता का साक्षात्कर हुआ । एक बार भी कलकत्ता में किसी व्यक्ति के भूख से मर जाने की खबर पढकर टूट फूट कर रहे हैं और कातर स्वर में चिल्लाओ थे मेरा दे रे मेरा देश इस से पहले अपने गुरुभाई रामकृष्णा ग्रहस्थ बहुत बलराम वस्तु के मरने की खबर सुनकर फूट फूटकर हुए थे । तब अहमदाबाद तूने कहा था ये क्या महाराज अब सन्यासी है । शो कार्ड होना आपको शोभा नहीं देता । विवेकानंद ने उन्हें कर दिया था । क्या सोचते हैं कि सन्यासी के हृदय नाम की कोई चीज नहीं होती? प्रकृत सन्यासी दूसरों के लिए साधारण व्यक्ति की अपेक्षा अधिक सहानुभूति का अनुभव करते हैं और मैं तो मनुष्य के अतिरिक्त और कुछ नहीं मेरे गुरुभाई होते हैं । उनके उपयोग में जो मैं कातर हूँ, उसमें विचित्र बात क्या है? पत्थर की तरह अनुभूति शून्य संन्यासी का जीवन मुझे नहीं चाहिए और वे सन्यासी देश में हमेशा अनुभूति शील मनुष्य बने रहे । उनका हृदय कोमल से कोमल डर होता चला गया जिसमें भारत की समूची सोच है पीडित दलित और दरिद्र जनता की पीडा समा गयी और फिर इस पीडा से वे आजीवन विशुद्ध और व्यापर रहे । सितंबर अठारह सौ छियानवे में बम्बई से पूना जा रहे रेल गाडी की जिस डिब्बे में बैठे थे उसमें तीन महाराष्ट्र युवक भी थे । वो सन्यास के विषय पर गरमा गरम बहस कर रहे थे । उनमें से दो नौजवान पांच यात्री जीवन पद्धति की श्रेष्ठता को मानने वाले रानाडे आदि सुधारकों के स्वर में स्वर मिलाकर संन्यास को डोम तथा व्यर्थ बता रहे थे । लेकिन तीसरा नौजवान प्राचीन सन्यासी महिमा का गुणगान करके प्रतिवाद कर रहा विवेकानन् कुछ देर चुप बैठे रहे । इन नौजवानों का तर्क वितर्क सिंदे रहे । अंत में वे भी तीसरे नौजवान का पक्ष लेकर बहस मकर पडे । उन्होंने धीर भाव से समझाया की विभिन्न प्रांतों में भ्रमण करने वाले संन्यासियों ने ही जातीय जीवन के कुछ आदर्शों का प्रचार समस्त भारत में क्या है? भारतीय संस्कृति की सर्वोच्च अभिव्यक्ति सन्यासी ही है जो शिष्य परंपरा द्वारा विघ्न बाधाओं के बीच इतने दिनों तक राष्ट्रीय आदर्शों की रक्षा करता आया है । हाँ ही है होंगी तथा स्वार्थी लोगों के हाथों सन्यास बीच बीच में लांछित और विकृत भी हुआ है । पर इसके लिए समझ सन्यासी साम्प्रदाय को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं । अंग्रेजी बोलने वाले इन सन्यासी विधता मेरे नौजवान बडे प्रभावित हुए और पूरा स्टेशन पर गाडी होगी तो तीसरा नौजवान स्वामी जी को अपने घर ले वाले गया । वेदादि शास्त्रों, पर्स, नौजवान का अधिकार देकर विवेकानंद भी आनंद हुए और कई दिनों तक उसके घर में रहकर वेद की गुंडा तत्वों की चर्चा करते रहेंगे । ये नौजवान लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक थे । दरअसल उम्र में विवेकानन् से साठ बरस बडे थे । भूपेन्द्रनाथ दत्त ने लिखा है कि पूना में बासुदेव ने उन्हें बताया कि विवेकानंद और तिलक की बातचीत के समय भी मौजूद उन दोनों में ये तहत आया तिलक राजनीति के मंच से और विवेकानंद धर्म के माध्यम से राष्ट्र को जगाएंगे । विवेकानंद ने शंकराचार्य के महाभाष्य का कुछ भाग इस यात्रा में राजपुताना की नारायण दास से पढ लिया था और जो शीर्ष था वो पोरबंदर के विख्यात विद्वान पंडित शंकर पांच रन से पढा । उसे समाप्त डर कि वे ब्याज के विधान सूत्र का अध्ययन करने लगे । इसी बीच में वहाँ पंडितों की एक विचार सभा हुई एकत्रित पंडित कितने ही प्रश्न पर आपस में सहमत नहीं थे । विवेकानंद ने मधुर कंठ से सुनियोजित संस्कृत में बोलते हुए बताया कि विधान के विभिन्न संप्रदाय परस्पर विरोधी होने की बजाय एक दूसरे के समर्थक हैं । विधान शास्त्र कुछ दार्शनिक मतवादों की समझती नहीं बल्कि साधन जीवन की विभिन्न स्थितियों में अनुभूत सत्यों का समूह उनके मुख से विधान की ये नहीं व्याख्या सनकर उपस् थित पंडित मंत्रमुग्ध तथा आश्चर्यचकित रहे गए । इस सभा के बाद विवेकानंद के अध्यापक पंडित शंकर पांडुरंग ने उनसे कहा स्वामी जी, मैं नहीं समझता कि इस देश में धर्म प्रचार द्वारा कुछ कर पाएंगे । समय और शक्ति व्यर्थ में मत दवाई । आप आसियान देशों में जाएंगे । वहाँ के लोग प्रतिभा और योग्यता का सम्मान करना चाहते हैं । अपने उधर विचार अभी कारण आप वहाँ अवश्य सफल । स्वामी जी ने दैनिक रुककर उत्तर दिया । हाँ, एक दिन प्रभाग में मैं समुद्र तट पर खडा तरंगों का नृत्य देख रहा था । एक का एक मन में आया मुझे कि इस विश्व समुद्र को लांघकर दूर विदेश में जाना चाहिए । देखो ये सात खबर कैसे पूरी होती है । फिर जब वे मैसूर के राजभवन में अतिथि थे तो पता चला कि शिकागो में धर्मसभा होने जा रही मैसूर का राजा वहाँ जाने का सारा खर्च वहन करने को तैयार था । स्वामी जी ने उनसे कहा, महाराज, मैंने हिमालय से कन्याकुमारी तक के भ्रमण का संकल्प ले रखा है । पहले मुझे से पूरा करना है तो फिर क्या करना और कहाँ जाना है । उसके बाद सोचूँगा । अक्टूबर में मैसूर से चले तो कोचिंग और मथुरा होते हुए दिसंबर में जब वे कन्याकुमारी पहुंचे तो बहुत थके हुए यात्रा में अंतिम चरण तक पहुंचने के लिए उनके पास नाक का किराया ना था, समुद्र में कूद पडे और शार्कों से भरे जलडमरूमध्य को तैरकर पार किया । धरती के अंतिम छोर पर बने स्तम्ध की छत पर चढकर जब उन्होंने इधर उधर दृष्टि डाली तो उनके भीतर आनंद की तरह की उठ रही थी । सामने समुद्र पीछे पहाड मैदान, नदियाँ महल, मंदिर झोपडियां भारत की पवित्र भूमि का एक के बाद एक दृश्य सामने आते चला । उन्होंने देखा धर्मक्षेत्र भारत वर्ष, दुर्भिक्ष, महामारी, दुख, दैन्य रोग शोक से जर्जरित है । एक और प्रबल विलास मोह में उन मत अधिकार, मत्स्य, मतवाले दैनिक लोग गरीबों का खून चूस कर अपने विलास कि बिपाशा को तृप्त कर रहे हैं । दूसरी ओर अल्पाहार से जीर्णशीर्ण फटे वस्त्र वाले मुखमण्डल पर युग युगांतर की निराशा लिए अगणित नर नारी बालक बालिकाएं हालांॅकि चित्कार से गगन मंडल को विदीर्ण कर रहे हैं । शिक्षा दीक्षा के अभाव में निम्न जातियों लोग पूरे संप्रदाय के वही कठोर व्यवहार से सनातन धर्म के प्रति श्रद्धा हीन हो गए । केवल यही नहीं हजारों व्यक्ति हिन्दू धर्म में ही को अपराधी ठहराकर दूसरे धर्म को ग्रहण करने के लिए तैयार है । करोड व्यक्ति अज्ञान के अंधकार में डूब रहे हैं । उनके हृदय में ना आशा है न विश्वास करना, नैतिक बल, शिक्षित नामधारी एक अपूर्व श्रेणी के जीत गढन के प्रति सहानुभूति प्रकट करना तो दूर रहा । पास चार शिक्षा से स्वेच्छाचारी बन उन्हें छोडकर नए नए समाज व सांप्रदायों स्थापना द्वारा धर्म के मस्तिष्क पर अग्निमय अभिशापों की वर्ष करने में लगे हुए हैं । धर्म केवल प्राणविहीन आचार नियामों की समझती कुसंस्कारों की लीलाभूमि हैं । परिणाम में वर्तमान भारत प्रयास यहाँ आशा उद्यम आनंद वह उत्साह के बिखरे हुये ध्वंसावशेष ओ से पूर्ण महाशमशान बना हुआ है । वो सोचने लगे हम लाखों सन्यासी भी के अन्य से जीवन धारण करके उनके लिए क्या कर रहे हैं । इन्हें दर्शनशास्त्र की शिक्षा दे रहे हैं । अधिकार है भगवान श्रीराम कृष्ण देव कहा करते थे खाली पेट में धर्म नहीं होता । साधारण अन्य मोटे वस्त्र की व्यवस्था चाहिए । भूख व्यक्ति को धर्मोपदेश देने के लिए अग्रसर होना मूर्खता मात्र है । धर्म उनमें यथेष्ठ हैं । आवश्यकता है शिक्षा विस्तार की चाहिए भोजन, वस्त्र की व्यवस्था परन्तु ये कैसे संभव होगा इस कार्य में अग्रसर होने के लिए प्रथम चाहिए मनुष्य और द्वितीय धन । अठारह सौ बयान के अंत में कन्याकुमारी के मंदिर के शीला पर बैठे हुए विवेकानन् अठारह सौ छियासी के आरंभ में बराहनगर मत से देश भ्रमण पर रवाना होने वाले विवेकानंद एकदम भिन्न तो नहीं लेकिन बहुत मैं चार वरिष्ठ थोडे समय में उनका जवाब बहुत मानसिक विकास हुआ । वहाँ केवल जनसंपर्क द्वारा ही संभव था । उन्होंने देश की धरती का चप्पा चप्पा अपनी भी है से स्पर्श किया और राष्ट्रीय समस्याओं को प्रत्यक्ष देखा । उस तक ज्ञान अनुभूत सत्य में और कल्पनाथ हो । सिद्धार्थ में परिणीत हुई ये सोच कर चले थे कि धर्मप्रचार बारात, भारत को सोते से जगाना और विभिन्न मतवादों से विभाजित जातियों, संप्रदायों तथा धर्मों में अद्वेत मैदान की शिक्षा द्वारा एकता स्थापित करना यही काम है जो रामकृष्ण परमहंस उन्हें सौंप गए । पर इस देश भ्रमण के दौरान उन्होंने अपनी आंखों से देखा कि भारत की जीर्णशीर्ण जनता अज्ञान के अंधकार में, अन्य के अभाव में भूख से तडप रही धर्म बाद की बात है पहला काम उसके अज्ञान और भूख को दूर करना । अपनी इस यात्रा में उन्होंने धनी राजा महाराजा से बार द्वार जाकर प्रार्थना की कि देश गरीबों, दीन दुखियों की सहायता कर, पर किसी ने उनकी प्रार्थना पर काम नहीं और मौखिक सहानुभूति के सिवा कुछ हाथ नहीं । अब उन्होंने सोचा कि पाश्चात्य देशों के पास धन बहुत हैं, पर धर्म का भाव मैं वहाँ जाकर नेवेडा की शिक्षा दूंगा और उसके बदले में मैं उनसे कहूंगा । भारत के अनपढ दरिद्र जनता के लिए थंडो धंधो और धन मिल जाएगा, जो आगे का कार्य निर्धारित हुआ । और भी शिकागो की धर्म महासभा में जाने का निश्चय कर के ही तैरकर समुद्र तट पर है । अब कन्याकुमारी से फ्रांस अधिकृत पांडिचेरी होते हुए मद्रास पहुंचे । मद्रास में उनकी कितनी शिक्षित उनसे अपना निश्चय बताया और अमेरिका जाने की तैयारी करने लगे । राज्य और महाराजे उन्हें विदेशी यात्रा के लिए सहायता लेना चाहते थे, पर उन्होंने अपने शिष्यों से कहा, मैं देश की जनता निर्धन जनता का प्रतिनिधि बनकर जा रहा हूँ, इसलिए मध्य वित्त जानता ही से सहायता लेना । उससे इसकी सूचना उन्होंने अपने बराहनगर मटके गुरु भाइयों को नहीं, पर एक तपाक से जाने से एक दिन पहले बम्बई के निकट एक स्टेशन पर उनकी भेज अब हैनन और सूर्यानंद से हो गई । मैं समस्त भारत की प्रदक्षिणा कर चुका हूँ । मेरे बंद हूँ अपनी आंखों से जनसमुदाय की भयंकर गलत रखा और पीडा देखने की वेदना मैंने अनुभव की है । आंसू संभाल नहीं सकता हूँ मैं अब मैं दृढता से कहता हूँ कि उस जनसमुदाय का खिलेश उसका काठ इंडिया दूर करने का यात्रा किये बिना उसको धर्मशिक्षा देना समर्था बियर! इसी कारण भारत के तरफ परिजनों की मुक्ति का साधन जुटाने मैं अमेरिका जा रहा हूँ । इकतीस नहीं अठारह सौ छियानवे बम्बई से अमेरिका के लिए जहाज पर सवार हुए स्वामी भी देखा है । उस समय उन्होंने रेशमी अंग रखा पहन रखा था और उनके सिर पर एक गेरुए रंग की पकडनी

6. Swami Vivekanand

ऍम विदेश यात्रा विस्तार जीवन है और संकोच मृत्यु । हाँ, विवेकानन्द भारत भ्रमण के दौरान विवेकानंद के पास सन्यासी होने के नाते दंड, कमंडलु तथा चंद्र पुस्तके रहती पर अब ट्रन, सूटकेस, बिस्तर, कपडे आदि काफी सामान था जिसे संभालने में काफी परेशानी उठानी पड रही थी । अपने स्वभाव के अनुसार जहाज कि यात्रियों से शीघ्र हल मिल गए और जहाज पर बनने वाले कई प्रकार के भोजन के भी बहुत धीरे धीरे आनी हो गए । मद्रास के अपने शिष्य आला सिंगा पेरूमल को लिखे पत्रों में इस यात्रा का वर्णन उन्होंने विस्तार से किया है । बेहतर होगा कि हम उसे उन्ही के शब्दों में उस वक्त करते । दस जुलाई अठारह सौ छियानवे याकोहामा जापान से लिखा है अपनी गतिविधि की सूचना तुम लोगों को बराबर ना देते रहने के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ । यात्रा में जीवन बहुत व्यस्त रहता है और विशेष तथा बहुत साथ सामान सब आप अपने साथ रखना और उसकी देखभाल करना तो मेरे लिए एक नई बात है । इसी में मेरी काफी शक्ति लग रही है । बम्बई से कोलंबो पहुंचा हमारे सीमर वहाँ प्राया दिनभर ठहरा था । इस बीच सीएम मार से उतरकर मुझे शहर देखने का अवसर मिला । हम सडकों पर मोटर गाडी से गए । वहाँ की और सब वस्तुओं में बुद्धदेव के निर्माण के समय की लिपटी हुई मूर्ति याद मेरे मन में अभी तक ताजी है । दूसरा स्टेशन पर नाम था जो माल प्रायद्वीप में समुद्र किनारे एक छोटा सा टापू है । मलय निवासी सब मुसलमान । किसी जमाने में ये लोग मशहूर समुद्री डाकू थे और जहाजों में व्यापार करने वाले । इनके नाम से घबराते हिंदू । आजकल आधुनिक युद्धपोतों की चौकी मार करने वाली विशाल तोप के भय से ये लोग डकैती छोडकर शांतिप्रिय धंधों में लग गए । पिनांग से सिंगापुर जाते हुए हमें उच्च पर्वतमालाओं से युक्त सुमात्रा द्वीप दिखाई दिया । जहाज के कप्तान ने संकेत द्वारा मुझे समुद्री डाकुओं के बहुत सेट लिखा है । सिंगापुर स्टेट सेटलमेंट की राजधानी है । यहां सुंदर वनस्पति उद्यान है, जिसमें ताड जाती की तरह तरह की शानदार पेड लगाए गए हैं । यहाँ पंक्ति अनुमा पत्तों वाले ताड के पेड बहुतायात से पाए जाते हैं, जिन्हें यात्री तालवृक्ष कहा जाता है और ब्रेड सूट नामक पेड तो जहाँ देखो वहाँ मिलता है । मद्रास में जिस तरह आम कि पेड बहुतायात से होते हैं, उसी तरह यहाँ ॅ तीन नामक फल बहुत होता है, पर आम तो आना ही है । उसके साथ किस बल्कि तुलना हो सकती है । यद्यपि वहाँ स्थान भूमध्यरेखा से बहुत निकट है । फिर भी मद्रास के लोग जितने काले होते हैं, यहाँ के लोग उसके अर्धांग निकाली नहीं । सिंगापुर में बढिया अजायब घर भी है । इसके बाद हांगकांग हैं । यहाँ चीनी लोग इतनी अधिक संख्या में है कि ये भ्रम हो जाता है कि हम चीन ही पहुंच गए । ऐसा लगता है कि सभी श्रम, व्यापार आदि इन्ही के नातों में हैं और हांगकांग तो वास्तव में चीन ही हैं । जो भी जहाज वहाँ लंगर डालता है कि सैकडों चीनी होंगे या कुछ विचित्र सी लगती है । मांझी डोंगी पर ही से कुछ काम रहता है । पतवारों का संचालन प्रायः पत्नी ही करती है । एक पतवार दोनों हाथों से चलाती है और दूसरे को एक पैर से और उन में से फीसदी और जो की पीठ पर उनकी बच्चे इस प्रकार बंदे रहते हैं कि वे आसानी से हाथ पैर बुला सके । मजे की बात तो ये है कि ये नन्ने नन्ने चीनी बच्चे अपनी माताओं की पीठ पर आराम से झूमते रहते हैं और उनकी माता है । कभी अपनी सारी शक्ति लगाकर पतवार कुमार है, कभी भारी बोझ खेलती है या कभी बडी फूर्ति से डोंगी से दूसरी धोनी में जाती है और ये सब होता है लगातार इधर से उधर जाने वाली डोंगी हो और वाश नौकाओं भीड के बीच हर समय उन चीनी बाल गोपालों के शिखा युक्त मस्तिष्कों के चूर चूर हो जाने का डर रहता है । पर मैंने इसकी क्या परवाह उन्हें इन बाहर की हलचलों से कोई सरोकार नहीं । वे तो अपनी चावल की रोटी कुतर कुतर घर खाने में मस्त रहते हैं, जो काम के झंझटों में बौखलाई हुई माओ नहीं देती है । चीनी बच्चों को पूरा दार्शनिक की समझो । जिस उम्र में भारतीय बच्चे घुटनों के बल भी नहीं चल पाते, उस उम्र में वह स्थिर भाव से काम पर जाता है । आवश्यकता का दर्शन वो अच्छी तरह सी और समझ लेता है । चीनियों और भारतीयों की नितांत दरिद्रता ही ने उनकी सभ्यताओं को निर्जीव बना रखा है । साधारण हिंदू या चीनी के लिए उसकी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति इतनी भयंकर लगती है कि उसे और कुछ सोचने की फुर्सत ही नहीं । सूची विवेकानंद क्या दिल और दिमाग लेकर यात्रा पर निकले थे ये पहनी और सूक्ष्म दृष्टि ये विशाल विराट से है । ये सौंदर्य प्री ये श्रम के प्रति आदर और यथार्थ विश्लेषण, उनकी यात्रा का वर्णन पढते हुए सबद्ध पाठक को ऐसा लगता है जैसे वह चित्र के महासागर में कह रही हूँ । हांगकांग से स्वामी जी कैंटीन गए । वहाँ से अस्सी मील है । लिखा है जिस छोटे से भूभाग पर हम लोग उतरे वहाँ चीन सरकार की ओर से विदेशियों के रहने के लिए दी गई हैं । हमारे चारों ओर नदी के दोनों किनारों पर यहाँ नगर बसा हुआ है । एक विशाल जनसमूह जिसमें निरंतर कोलाहल, धक्कम, धक्का चहल पहल और परस्पर स्पर्धा ही का बोलबाला दिखाई पडता है । लेकिन चीनी महिलाएं बाहर दिखाई नहीं देती । उनमें उत्तर भारत की के समान पर्दे कहाँ रखा है? केवल मजदूर वर्ग की औरते बाहर दिखाई पडती है । उनमें से भी स्त्री ऐसी दिखाई पडेगी जिनमें पाँच बच्चों से भी छोटे हैं और वर्लड बनाती हुई चलती है । वे लौटकर हांगकांग है और फिर जापान के पहले बंदरगाह नागासाकी पहुंचे । नागासाकी से जहाज द्वारा खूबे और कौवे से जापान का मध्यभाग देखने स्थल मार्ग से को हम आ गए लिखा है इस मध्य भाग में मैंने तीन शहर देखिए । महान औद्योगिक अगर ओसाका, भूतपूर्व राजधानी, क्योटो और वर्तमान राजधानी क्योंकि टोक्यो कलकत्ता से प्रयाग दुगना बडा होगा और आबादी भी लगभग दुगुनी होगी । जापान उस समय जर्मनी की ही तरह उत्साह और शक्ति से भरपूर जवान पूंजीवादी देश था । वहाँ आशियाकी देशों से हर बात में होड ले रहा था । इससे ठीक बारह बरस बाद उसने जारशाही रूस को युद्ध में हराया । जापान की उभरती और पैर फैला रही शक्ति का विवेकानंद ने यहाँ वर्णन किया है । जान पडता है । जापानी लोग वर्तमान आवश्यकताओं की प्रति पूर्ण सचेत हो गए हैं । उनकी पूर्ण सुव्यवस्थित सेना है जिसमें यही के अवसर द्वारा आविष्कृत तो पे काम में लाई जाती हैं और जो अन्य देशों की तुलना में किसी से कम नहीं । वे लोग अपनी नौसेना बढाते जा रहे हैं । मैं जापान इंजीनियर की बनाई करीब एक मील लंबी सुरंग देखी है । दियासिलाई की कारखाने तो देखते ही बनते हैं । अपनी आवश्यकताओं की सभी चीजें अपने देश में बनाने के लिए लोग तुले हुए हैं । चीन और जापान की भी चलने वाली जापानी सीमर लाइन हैं जो कुछ दिनों में बम्बई और याकोहामा के बीच यात्री जहाज चलाना चाहती है और एक क्षेत्र उनके राष्ट्रीय जीवन का भी देखिए जापानी लोग ठीक ने गोरी और विचित्र वेशभूषा वाले हैं । उनकी चार धाल हावभाव, रंग ढंग सभी सुंदर है । जापान सौंदर्य भूमि है । प्रायः प्रत्येक घर के पिछवाडे जापानी ढंग का बढिया बगीचा रहता है । इन बगीचों कि छोटे छोटे लगा वृक्ष हरे भरे घास के मैदान, छोटे छोटे जलाशय और नालियों पर बने हुए छोटे छोटे पत्थर के पूल बडे से सामने लगती है । इधर जापान का ये वैभव और उधर जीर्णशीर्ण भारत और उसका आत्मकेंद्रित स्वार्थ । खान शिक्षित वर्ग कलम घूमने गए कि खून में डुबोकर लिखा जापानियों के विषय में जो कुछ मेरे मन में, वह सब में छोटे से पत्र में लिखने में असमर्थ हूँ । मेरी केवल ये इच्छा है कि प्रतिवर्ष यथेष्ठ संख्या में हमारे नवयुवकों को चीन और जापान में आना चाहिए । जब पानी लोगों के लिए आज भारत वर्ष उच्च और श्रेष्ठ वस्तुओं स्वस्थ नाराज है और तुम लोग क्या कर रहे हो? जीवन भर केवल बेकार बातें किया करते हूँ व्यर्थ बकवास करने वाले तुम लोग क्या हो आओ इन लोगों को देखो और उसके बाद जाकर लज्जा से मुझे पालों युगों की सामाजिक अत्याचार से अपनी सारी मानवता का गला घोटने वाले भला बताओ तो सही तुम कौन हूँ और तुम इस समय कर ही क्या रहे हो? किताबें हाथ में लिए तुम सिर्फ समुद्र किनारे फिर यूरोपियन के मस्तिष्क से निकली हुई इधर उधर की बातों को लेकर बेसा मुझे दौरा रहे हो । अपनी इस लंबी यात्रा में देश को फॅमिली नहीं । अब भी अमेरिका जाने के लिए जहाज पर सवार हुए जो प्रशांत महासागर के उत्तरी भाग से होता हुआ बैंकूवर बंदरगाह पर्चा लगा । यहाँ से वे कनाडा के बीच में से तीन दिन की रेल यात्रा के बाद । शिकागो पहुंच आपने गेरुआ वस्त्र के कारण वे राह चलते लोगों के लिए तमाशा बन गए । वे ना सिर्फ उत्सुकता और कौतुहल में भरे देखते थे बल्कि घेर लेंगे और बताते थे बच्चे उनकी हंसी उडाते और शोर मचाते हुए उनके पीछे पीछे चलते थे । दूसरी मुसीबत ये कि बैंक हुए इसे धोखेबाजी और गिर सकती शुरू हो गई । जैसे जिसका दाव चलता था, वैसे उन्हें ठगने का प्रयत्न करता था । कुलियों की ही मूड भरना मुश्किल हो गया । होटल में ठहरे तो वहाँ भी यही परेशानी लिखा है मेरा और सिर्फ एक फोन हर रोज खर्च होता । यहाँ एक जुट ही का खर्च हमारे यहाँ की आई आने हैं । अमेरिका वाले धनी हैं कि वो पानी की तरह रुपया बहाते हैं और उन्होंने कानून बनाकर सब चीजों का दाम इतना अधिक रखा है कि दुनिया का और कोई राष्ट्र किसी तरह स्तर पर नहीं पहुंच सकता । साधारण कुली भी हर रोज छह से दस रुपया कमाता है और इतने ही खर्च करता है । अब मुझे असंभव स्थानों से संघर्ष करना पडता है । सैकडों बार इच्छा हुई कि मैं इस देश से चल और भारत लौटाऊं । सुनहरे सपने टूटने का कारण ये था कि अमेरिका पर अठारह सौ नब्बे से आर्थिक संकट के बादल मंडरा रहे थे और अब अठारह सौ छियानवे में ये बहुत गहरा गया । इसी के बारे में पंद्रह हजार फर्मों, बैंक और छोटे कारखानों का दिवाला पीता हजारों मजदूर बेकार हो गए और जो काम पर थे उन की मजदूरी घटा दी गई । विवेकानंद जिस अमेरिका से भारत के चरित्रों के लिए धन जुटाने गए थे, वहाँ पैसे के लिए हायतौबा मची हुई । अमेरिका के अभिजात वर्ग का जीवन कितना सतही तथा विडंबनापूर्ण था, इसके बारे में लिखा है वर्धा राव ने जिस महिला से मेरा परिचय करा दिया था, वे और उनके पति शिकागो समाज के बडे गणमान्य व्यक्ति है । उन्होंने मुझे बहुत अच्छा बर्ताव किया परन्तु यहाँ के लोग विदेशियों का जो सरकार करते हैं वो केवल और उसको दिखाने के लिए ही है । धन की सहायता करते समय प्राया सभी मूल लेते हैं । इन्हीं दिन शिकागो से मिशिगन झील के किनारे जैक्सन पार्क में विश्व प्रदर्शनी हो रही थी । ये प्रदर्शनी कोलंबस द्वारा अमेरिका की खोज की चौथी शताब्दी मनाने के लिए आयोजित की गई । इसलिए इसे विश्व कोलंबस प्रदर्शनी कहा जाता था । जिन चार सौ बडी इमारतों में ये प्रदर्शनी पहली मई से पहली नवंबर अठारह सौ तक छह महीने चली, उन का निर्माण दो बरस में हुआ था । इसमें देशों और अमरीका के तमाम राज्यों ने भाग लिया । कोलंबस के बाद से चार सौ बरस में पाश्चात्य देशों ने विज्ञान उद्योग और कलाम जन्नती की वहाँ प्रदर्शित हुई थी । धर्म महासभा भी इसी उपलक्ष्य में बुलाई गई थी । उसके अलावा शिक्षा, दर्शन, उद्योग और समाज संबंधी विषयों पर अलग अलग सम्मेलन हुए जिनमें लगभग छह हजार पत्र पडे गए और उन्हें सात लाख श्रोताओं ने सुना । विवेकानन्द शिकागो में ग्यारह दिन रुके और वे हर रोज प्रदर्शनी देखने जाते हैं । विज्ञान के नए नए आविष्कार, कई प्रकार के छोटे बडे यंत्र और तरह तरह की विचित्र वस्तुएं देख कर स्वामी बालक के सदृश्य सुन के मेले की इमारतें वास्तुकला का शाहकार थी । मुख्य इमारतों के मध्य जो विशाल चौक था, उसमें स्वाधीनता की भव्य मूर्ति थी । एक तरफ विशाल फब्बारा था और दूसरी तरफ स्तंभ पंक्ति । मेले की विशिष्ट वस्तु इंजीनियर डब्ल्यूजी फॅमिली था, जो खास तौर पर इसी अवसर के लिए बनाया गया था । विवेकानंद ने दस ग्यारह दिन तक इस प्रदर्शनी को देखा फिर भी मन नहीं भरा । विज्ञान और नए के प्रति उनके मन में जो आकर्षण था उसका एक और उधारण यह है कि चार बरस बाद जब सी वीर दंपत्ति के साथ इंग्लैंड स्विट्जरलैंड गए तो जिनेवा में एक कला प्रदर्शनी चल रही थी । उन्होंने इसे दिनभर चाव से देखा । अंत में बेलून देखकर में उसमें उडने के लिए मछली थे । बेलून एक नया अविष्कार और इसमें आकाश रमन जोखिम से खाली नहीं था इसलिए श्रीमती सीवी ने उसमें उठने पर आपत्ति की । लेकिन स्वामी जी कब मानने वाले थे पीना सिर्फ खुद खडे बल्कि सिवियर दंपति को भी साथ बैठाया । आकाश साफ सुथरा था ऊपर से सूरज डूबने का मनोहर दृश्य देखकर स्वामी जी बडे प्रसन्न बेलून जब धरती हुई जो दिलचस्प भी है और इससे कई बातों पर प्रकाश भी पडता है । ये घटना उन्होंने अपने पत्र में रोचक ढंग से बयान की है । अभी हाल में शिकागो में एक बडा तमाशा हुआ । कपूरथला के राजा यहाँ बता रहे थे और शिकागो समाज की कुछ लोग उन्हें आसमान पर चढा रहे थे । मेले में राजा के साथ मेरी मुलाकात हुई थी पर्व जो अमीर आदमी ठहरे, मुझे फकीर के साथ बातचीत क्यों करते? उधर एक सनकी साथ धोती पहने हुए महाराष्ट्र ग्रामीण मेले में कागज पर नाखून के सहारे बनी हुई तस्वीरें बेच रहा था । उसने अखबारों के संवाददाताओं से उस राजा के विरुद्ध तरह तरह की बातें कहती । उसने कहा था कि ये आदमी बडी नीच जाति का है और ये राजा गुलाम के अलावा और कुछ नहीं है । और ये बहुत दुराचारी होते हैं इत्यादि और यहाँ के सत्यवादी संपादकों ने, जिनके लिए अमेरिका मशहूर हैं । इस आदमी की बातों को कुछ वृद्धों देने के लिए अगले दिन के अखबारों में स्तंभ के स्तंभ रंग डालें जिनमें उन्होंने भारत से आए एक ज्ञानी पुरुष का उसका मतलब मुझ से था, वर्णन किया और मेरी प्रशंसा के पूल बांध कर मेरे मुँह से ऐसी कल्पित बातें निकलवा डाली की जिनको मैंने स्वप्न में भी कभी नहीं सोचा था । उस महाराष्ट्रीय ग्रामीण ने कपूरथला के राजा के संबंध में जो कुछ कहा था उन सबको उन्होंने मेरे ही मुख से निकला हुआ रख दिया । अखबारों ने ऐसी खासी मरम्मत की की शिकागो समाज में तुरंत राजा को त्याग दिया । इस से ये भी प्रकट होता है कि इस देश में धनिया खिताबों की चमक दमक की अपेक्षा बुद्धि की कदर अधिक उन्हें एक दिन पता चला कि धर्म महासभा सितंबर से पहले नहीं होंगी और ये भी पता चला की सभा की नियमावली के अनुसार किसी सभा सोसाइटी के परिचय पत्र के बिना कोई भी व्यक्ति प्रतिनिधि नहीं बन सकता और प्रतिनिधि बनने के लिए ये समय निश्चित था वह भी चुका है । मतलब ये स्वामी जी को हिन्दू धर्म के प्रतिनिधि के रूप में उसमें शामिल होना असंभव दिखाई दिया । उनके पास धन बचा था उसमें से अधिकांश होटल के दो हफ्तों के खर्च में उड गया । वहाँ की ठंड सहन करने लायक गर्म कपडे भी उनके पास नहीं थे । तो हैरान और परेशान शिकागो से हॉस्टल गए । कुछ भी हो वो अमेरिका ही में रहकर वेदांत का प्रचार करना चाहते थे । जब बॉस्टन से लौट रहे थे तो अचानक गाडी में एक धनी वृद्ध महिला से उनका परिचय हो गया । उसे जब पूछने पर मालूम हुआ कि विवेकानंद एक भारतीय सन्यासी अमेरिका में वेदांता प्रचार करने आए हैं तो वहाँ उन्हें अपने साथ एक करीब के गांव में ली गई और उन्हें वहाँ अपने घर पर आराम से रखा लिखा है । यहाँ पर रहने से मुझे ये सुविधा होती है कि मेरा हर रोज एक पॉइंट के हिसाब से जो खर्च हो रहा है अब बच जाता है और उनको ये लाभ होता है कि वे अपने मित्रों को बुलाकर भारत से आया हुआ एक अजीब जानवर दिखा रही है । जिंदू पत्रों साॅस लिए गए हैं कि विवेकानंद साहित्य के प्रथम खंड में संकलित है । स्वामी जी को इस वृद्ध महिला के घर पर रहने से और भी काफी लाभ पहुंचा । वो उन्हें एक महिला सभा में ले गई जिसमें उनका पहला व्याख्यान हुआ । महिलाओं की सलाह मानकर उन्होंने पूछा बदल ली । आम इस्तेमाल के लिए उन्होंने एक काला लंबा कोर्ट बनवाया । गेरुआ रंग की पगडी और चोखा व्याख्यानों के समय पहनने के लिए रख छोडे । स्त्री कारागार की सुपरिटेंडेंट श्रीमती जॉनसन से परिचय हुआ । उनके साथ जाकर कारागार देखा जिसे भी सुधर शाला कहते थे । बंदियों को समाज की उपयोगी अंग बनाने के लिए वहाँ उनकी साझ सुंदर बर्ताव किया जाता है । स्वामी जी ने अपने पत्र में उसका विस्तृत वर्णन किया है । फिर इस वृद्ध महिला के मकान पर उनका परिचय हारवर्ड विश्वविद्यालय में यूनानी भाषा के प्रोफेसर जेएस राइट से हुआ । थोडी देर की बातचीत में प्रोफेसर महोदय स्वामी जी से बहुत प्रभावित हुए । उन्होंने कहा आप शिकागो महासभा के अध्यक्ष अपने मित्र डॉक्टर बरोज के नाम उसी समय पत्र लिखा । ये पत्र लेकर स्वामी जी फिर शिकागो की ओर चले । रेल का टिकट प्रोफेसर महोदय ने अपनी जेब से खरीद कर दिया । विवेकानंद खुशी खुशी का बोला है । गाडी देर से पहुंची थी और उनके पास धर्म महासभा के दफ्तर का जो पता था वो कई रास्ते में हो गया था । अब इतने बडे शहर में वह दफ्तर का पता कैसे लगा । राहत जल्दी दो चार आदमियों से पूछा तो उन्होंने स्वामी जी को निग्रो समझकर घृणा से मुंह मोड लिया । रात का समय बर्फ देखना शुरू हो गया और ठहरने का कोई ठिकाना माल गोदाम के पास एक खाली पैकिंग बॉक्स मिल गया । उन्होंने उसी में घुसकर सारी रात सवेरे होते ही सडक पर निकल पडे । भूख के मारे बुरा हाल था । भीक्षा में कुछ आ जाने के लिए दर दर घूमने लगे । पर वो हिंदुस्तान नहीं अमरीका जहाँ भी गए वहीं उन्हें तो कार आ गया । लोगों ने देखते ही घृणा से दरवाजा बंद कर लेते थे और कईयों ने तो उन्हें हटाने के लिए बल प्रयोग किया । आखिर थक हारकर स्वामी जी एक सडक के किनारे बैठ गए । सामने के विशाल भवन की खिडकी से एक अपूर्व सुंदर रमनी ने उन्हें देख लिया । वहाँ उनके असाधारण व्यक्तिगत से प्रभावित होकर तुरंत नीचे आई और उनके पास आकर पूछा महाश् है क्या धर्म महासभा के प्रतिनिधि है? स्वामी जी ने अपनी विपत्ति इस रमणी को कहते नहीं और उससे डॉक्टर बरोज के ऑफिस का पता पूछा । ये रमणी उन्हें अपने घर में ले गई और कहा कि सुबह भोजन के बाद वह स्वयं उन्हें बात छोड आएगी । इस रमणी का नाम कुमारी मेरी है ना । वो उसकी माँ बाद में स्वामी जी की अनन्य भक्त बन गई और बडी सहायक सिद्ध हुई । भोजन और विश्राम के बाद कुमारी है । उन्हें धर्म महासभा के दफ्तर मिलेगी । उन्हें वहाँ हिन्दू धर्म के प्रतिनिधि के रूप में ले लिया गया और जिस मकान में प्रतिनिधियों के रहने की व्यवस्था की गई थी उसमें वे अतिथि के रूप में रहने लगे । धर्म महासभा में विवेकानंद की भूमिका भारतीय कट्टरपंथियों, इसाई मिशनरियों तथा पादरियों द्वारा उनके विरोध और अमेरिका तथा ब्रिटेन में धर्म प्रचार की बात हम धर्म महासभा परिच्छेद में अलग से लेंगे । अब हमें ये देखना है कि उन्होंने अपने इस प्रवास काल में अमेरिका तथा दूसरे पांच सात देशों में क्या देखा और क्या सीखा । उनकी यात्रा के दो पक्षों को आपस में गडबड कर देने से हमे डर है कोई भी बात स्पष्ट नहीं हो पाएगा । विवेकानंद ने अपने प्रवास के अगस्त अठारह सौ से अगस्त अठारह सौ पंचानवे तक और फिर नवंबर अठारह सौ पंचानवे से अप्रैल अठारह सौ छियानवे तक ढाई साल अमेरिका में मिलता है । बीजू सपने संजो कर आए थे आते ही टूट गए यहाँ की जीवन का उन पर पहला प्रभाव यह पडा ठगी और धोखाधडी के लिए ये बडी आदेश यहाँ के दशमलव नौ प्रतिशत लोगों की नीयत दूसरों से अनिश्चित लाभ उठाने की ही रहते हैं । आठ मोदी के पूरे गाये उन्होंने अपने को जल से बाहर मछली की तरह वर्क किया लेकिन उसके बावजूद उन्होंने बुद्धि को कुंठित नहीं होने दिया और वो जिस उद्देश्य से विदेश आए थे से हमेशा सम्मुख रखा । धीरे धीरे भले लोगों से परिचय हुआ जिनसे उन्हें आदर और स्नेहमिलन धर्म महासभा में प्राप्त सफलता के बाद तो उनकी श्रद्धालुओं तथा भक्तों की संख्या बहुत बढते सारे देश में घूम घूमकर भाषण दिए । जहाँ कहीं भी गए लोगों ने उन्हें अपने घरों में ठहराया । जैसे जैसे जनजीवन से संपर्क बढता गया वैसे वैसे उन्होंने इस नए राष्ट्र के गुण दोषियों का सम्यक विवेचन किया । पच्चीस सितंबर अठारह सौ चौरानवे को गुरु भाइयों के नाम पत्र में लिखते हैं, इस देश में ग्रीष्मकाल में सब समुद्र के किनारे चले जाते हैं । मैं भी गया था यहाँ वालों को नाम खेलने और यार चलाने का रूप है । यार ठीक प्रकार का हल्का जहाज होता है और यहाँ की लडकी पूरे तथा जिस किसी के बाद धन है उसी के पास है । उसी में पाल लगाकर वे लोग प्रतिदिन समुद्र में डाल देते हैं और खाने पीने और नाचने के लिए घर लौटते हैं । गाना बजाना तो दिन रात लगा ही रहता है । पियानो के मारे घर में टिकना मुश्किल हो जाता है । हाँ, तुम जिन जी डब्ल्यूएल के पते पर चिट्टियां भेजते हो, उनकी भी कुछ बातें लिखता हूँ । वृद्ध है और उनकी वृद्धा पत्नी है । दो कन्याएं, दो भतीजियां और एक लडका है । लडका नौकरी करता है इसलिए उसे दूसरी जगह रहना पडता है । लडकियाँ घर पर रहती है इस देश में लडकी का रिश्ता ही रिश्ता है । लडकी का विवाह होते ही वहाँ और हो जाता है । कन्या के पति को अपनी स्त्री से मिलने के लिए प्रायः उसके माँ बाप के घर जाना पडता है । यहाँ वाले कहते हैं सैन्य साॅस बेटा तभी तक बेटा है जब तक उसका बयान नहीं होता । पर बेडी आजीवन बेटी की रहती है । चारों का न्याय और युवती अविवाहिता है । विवाह होना इस देश में महासचिन कार्य हैं । पहले तो मान के लायक को दूसरे घर का हूँ । लडकी यारी में जो बडे पक्के हैं परन्तु पकड में आ रहे वक्त नौ दो ग्यारह लडकियाँ अनाज कूदकर किसी को फंसाने की कोशिश करती है । लडकी जाल में बढ रहा नहीं चाहते आखिर इस तरह लव हो जाएगा जब शादी हो जाती है । ये हुई साधारण बात पर दूर तेल की कन्यायें रूप होती है । बडे आदमी ही करनी हैं । विश्व विद्यालय की छात्राएं हैं ना ऐसे गाने और प्यानो बजाने में अद्धितीय कितने ही लडकी चक्कर मारने हैं लेकिन उन की नजर में नहीं चलते । जान पडता है विवाह नहीं करेंगे । तीस पर मेरे साथ रहने के कारण महा वैराग्य सवार हो गया है । वो इस समय ब्रह्मा चंदन में लगी रहती है । खेल की कन्याओं के नाम मेरी और ही रहे हैं और ऍम दोनों कन्याओं के बालसन हैले है और दोनों वीजियो की काले ये जूते सीने से चंडीपाठ तक सब जाती है । भतीजे के पास इतना धन नहीं है । उन्होंने किंडरगार्डन स्कूल खोला है लेकिन करने आये कुछ नहीं काम आती है । कोई किसी के भरोसे नहीं रहता । करोडपतियों के पुत्र भी रोजगार करते हैं । विवाह करके अलग किराये का मकान लेकर रहते हैं । कन्यायें मुझे दादा कहती है मैं उनकी माँ को माँ कहता मेरा सब सामान नहीं के घर में हैं । मैं कहीं भी जाओ वे उसकी देखभाल करती है । यहाँ के सब लडके बचपन ही से रोजगार में लग जाते हैं और लडकियाँ विश्वविद्यालय में पढती लिखती है तो इसलिए यहाँ सभाओं में नब्बे फीसदी स्त्रियाॅ उनके आगे लडको की दाल नहीं गल । मजे की बात यह है कि अमेरिका की आज से अस्सी बरस पहले के सामाजिक जीवन का ये जीवन से ऋण एक सन्यासी नहीं किया और इसी पत्र में आगे लिखा है इस देश की नारियों को देखकर मेरे तो हो सड गए मुझे बच्चे की तरह घर बाहर दुकान बाजार में लिए करती हैं, सब काम करती है । मैं उसका चौथाई हिस्सा नहीं कर सकते । ये रूप में लक्ष्मी और गुड में सरस्वती हैं । ये साक्षात जगदंबा इनकी पूजा करने से सर्वसिद्धि मिल सकती है । अरे राम राम जो हम भी भले आ रही है । इस तरह की माँ जगदम्बा अगर अपने देश में एक हजार तैयार करके मार सकते हो तो निश्चित हो कर मार सकता हूँ । तभी तुम्हारे देश की आदमी आदमी कहलाने लायक नहीं है तो हमारे देश के पुरुष इस देश की नारियों की बात तो अलग है । एक ही देश के अलग अलग शहरों का अलग अलग विशिष्ट चरित्र होता है । विवेकानंद की दृष्टि उसे भी समझने में नहीं लिखा है । मैं कुछ महीनों के लिए न्यूयॉर्क चाहे वो शहर मानव, संपूर्ण संयुक्त का मस्तक है, हाथ तथा कोषागार स्वरूप ये अवश्य है कि मौसम को ग्रामीणों, काशी मीडिया चर्चा का प्रधान स्थान कहा जाता है और यहाँ अमेरिका में हजारों व्यक्ति ऐसे है जो मेरी प्रति सहानुभूति रखते हैं । लेकिन फिर पेरिस और लंदन घुमाने के बाद जोसेफिन पहली कांड को लिखा यूरोप की साफ सिंदर नगरों की अपेक्षा न्यूयॉर्क बहुत गन्दा और विभिन्न लगता है अमेरिका का पारिवारिक जीवन अनर्गल दा की सीमा तक स्वच्छता इस मिथ्या धारणा का उन्होंने भरसक खानदान क्या उन्होंने साधिकार का कितने ये सुंदर पारिवारिक जीवन में नहीं, यहाँ देखें यहाँ की नारियों को उन्होंने हिम के सदृश पवित्र, असाधारण रूप से शिक्षा और मानसिक तथा नैतिक दृष्टि से उन्नत पाया । इसके अलावा अमेरिका की सामान्य जीवन का चित्रण देगी । यहाँ जैसी गर्मी है ज्यादा भी वैसा ही है । गर्मी कलकत्ता से दैनिक भी कम नहीं जारी की । क्या बाद समूचा देश दो दिन हाथ, कहीं कहीं तो चार पांच हाथ गहरी बर्फ में ढल जाता है । दक्षिण की ओर बर्फ नहीं पडती पद बर्फ तो छोटी चीज है । जब पारा बत्तीस डिग्री पर रहता है तब बर्फ गिरती है । कल कट्टी में पारा सात डिग्री से नीचे बहुत ही कम उतरता है । इंग्लैंड में कभी कभी शून्य तक भी जाता है परन्तु यहाँ पारा शून्य से चालीस पचास डिग्री तक नीचे चला जा रहे हैं । उत्तरी हिस्से में जहाँ कनाडा है हमारा जम जाता है उस पार महासागर का तापमान, वक्त यंत्र काम में लाया जाता है जब बहुत ही ठंडक होती है । आज जब पारा बीस डिग्री के नीचे रहता है तब नहीं थी । मेलघाट थी कि बर्फ गिरी की ठंड की हद हो गई । सोमवार नहीं बर्फ से रात काम ठंडे दिनों में अत्यंत ठंडक में एक तरह का नशा हो जाता है । गाडियां उस समय नहीं जल्दी बिना पहिए की । इसलिए नाम का एक यान सी किया जाता है जब को जमकर सख्त हो जाता है । नदी, नाले और झील पर से हाथ भी चल सकते हैं । नियाग्रा आवत प्रचंड प्रवाह वाला विशाल निर्झर जमकर पत्थर हो गया है परन्तु मैं अच्छी तरह पहले थोडा डर मालूम होता था । फिर तो गरज के मारे रेल से एक दिन कनाडा की समीर दूसरे दिन अमेरिका के दक्षिण भाग में व्याख्यान देता सकता हूँ । घर की तरह गाडियाँ भी भाग के नलों से खूब गर्म रखी जाती है और बार चारों तरफ वर्ग के अत्यंत सफेद ढेर रहते हैं । कैसी अनु की बडा डर था कि मेरी नागपुर कान गिर जाएंगे पर आज तक कुछ हुआ बाहर जाते समय ढेरो गर्म कपडे, उस पर समूह का कूट जूते फिर जूती पर एक और उन्हें होता । इन सब सामानों से ढककर जाना पडता है । साथ निकलते गी दाडी में जम जाती है उस पर तमाशा यह है कि घर के भीतर बिना एक डेली बर्गर दिए ये लोग पानी भी अरे भाई घर के अंदर गर्मी रहती है हर एक कमरा और सी आपके नलो से गर्म रखी जाती है ये लोग कला कौशल में अब ये है वो गिलास में अभी भी है धन कमाने और खर्च करने में अद्वितीय । यह उद्वरण देने का उद्देश्य अमेरिका की बहुत ही उन्नति और समृद्धि दिखाना नहीं बल्कि विवेकानंद की बहुमुखी प्रतिभा और लेखन शैली का आभास कर रहा है । इससे उनकी व्यापक तथा समय दृष्टि को समझने में मदद मिलती है और फिर इस से ही विज्ञान के विकास और खोल के विस्तार की प्रक्रिया को समझने में भी मदद मिले । अमेरिका में रहते हुए विवेकानंद ने जो धर्म प्रचार किया, इस भौतिक उन्नति सी क्या तालमेल स्थापित किया और तालमेल पैदा करने में उनके चिंतन का क्षितिज कहाँ था, ये बात विशेष रूप से समझने की है और ये हमारे अगले परिषद का विषय विवेकानंद अपने ही कथानानुसार दृश्य देखने वाले यात्री अथवा निरुद्देश्य पर्यटक नहीं थी । ये तो भारत की दरिद्रता का उपाय ढूंढने अमेरिका । इसलिए देश और देश की निर्धन जनता को उन्होंने कभी एक क्षण के लिए भी नहीं बुलाया । अमेरिका की ये उन्नति तथा समृद्धि देखकर चरित्र तथा विभिन्न भारत का चित्र भी उनकी दृष्टि में खेला जाता था । देखिए तब उन का दिल कैसे खून के आंसू होता था । इस देश में करोडों मनीष शियम होगा, आकर दिन गुजारते हैं और दस बीस लाख साधु और दस बारह करोड ग्रामीण उन गरीबों का खून चूस कर देते हैं और उन की उन्नति के लिए कोई चेहरा नहीं करते । क्या वो देश है? क्या करें? क्या वह हर में है या शास्त्र का कोई नृत्य भाई इस बात को और समझो में भारत वर्ष को हूँ, घूम कर चुका और इस देश को भी देखा क्या बिना कारण की कहीं कार्य होता है? क्या बिना पाप की सजा मिल सकती है? उन्होंने देखा, पूर्व पश्चिम में सारा अंतर यह है कि वे एक एक राष्ट्र है, हम नहीं अर्थात सफलता एवं शिक्षा का प्रसार वहाँ व्यापक सिर्फ साधारण में व्याप्त है । उच्च वर्ग के लोग भारत और अमेरिका में समाज । लेकिन दोनों देशों में निम्न वर्गों में जमीन आसमान का अंतर है । हमने निम्नवर्ग को शिक्षा तथा सुविधा से वंचित करके पंगु बना दिया । राष्ट्र का अंक ही नहीं रहने दिया । परिणाम यह है कि विदेशी हमलावरों के हाथों मुठ्ठीभर, विलासी, उच्च वर्ग की पराजय, सारे देश की पराजय बनके निम्न वर्गों ने हार जीत से कभी दिलचस्पी नहीं रहेगी । जब इतना चूसा, कुछ आ गया तो वे क्यों रखें? इसी से अंग्रेजों के लिए भारत को जितना आसान हो, उन्होंने देखा कि एक राष्ट्र बनने की हमारी आवश्यकता है । एयर ही एवं भौतिक शिक्षा शिक्षा का माध्यम आंखि नहीं, कान भी है । देश के लिए समर्पित शिक्षित नौजवान गांव गांव और दरवाजे दरवाजे जाकर अनपढ गरीब जनता को विभिन्न राष्ट्र के बारे में कहानियाँ एक माजिक लाॅग लू और नक्शा लेकर जाए और बातचीत द्वारा गोल गणित तथा इतिहास आदि के बारे में हरकत में आया बयान नहीं रुकेगा । हम देख चुकी है कि भारत भ्रमण के बाद अपनी इस योजना के लिए जब महाजनों तथा राजी महाराजा उसे धन पाने की कोई आशा नहीं रही तब अमेरिका है सेरेन विजय स्वामी को यहाँ भी वही निराशा हाथ लगी और इसे उन्होंने यहाँ व्यक्ति इस देश में पूरे साल भर तक व्याख्या देने पर ही मैं अपने कार्य के आरंभ के लिए धनार्जन की । आपने इस योजना में शराबी सफल ना, जिस प्रकार बिल्ली की नर्म नर्म खाल के नीचे तीखेपन जी छिपे रहते हैं । इसी प्रकार अमेरिका की बहुत ही कुंती तथा समृद्धि की चकाचौंध के पीछे दमन और शोषण के जो भयंकर छिपे हुए थे, विवेकानंद की पहली दृष्टि ने उनकी भी देख लिखा है पांच चार निवासी हमारे जाती भी की जाए, जितनी बडी समालोचना करें और उनके बीच एक ऐसा जाती भेज है जो सराहनीय अमेरिकावासियों के अनुसार सर्वशक्तिमान डॉलर यहाँ सब कुछ कर सकता है । अठारह सौ छियानवे के आर्थिक संगठने में और भयंकर रूप धारण कर लिया था । अमेरिका के लिए ये बुरा साल था अठारह सौ चौरानवे में बैंकरों की तादाद राष्ट्र के इतिहास में उस समय तक की किसी भी तरह आपको बार कर चुके हैं । निर्धन तथा विभिन्न लोग गिरोह डर गिरोह रोटी और रोजी की तलाश में देशभर में इधर उधर खूब रहे । अगस्त में पुलमैन कंपनी तथा रेलवे मजबूरों की जबरदस्त हडताल । हालांकि सुधारवादी ट्रेड यूनियन नेता जो व्यक्ति संपत्ति को नुकसान पहुंचाएगा अथवा खान तोडेगा मजदूरों का मित्र नहीं शत्रु है ये कहकर हडताली मजदूरों को शांत रखने का प्रयास कर रहे थे । इसके बावजूद मजदूर हिंसा पर उतर आए बडे पैमाने पर संपत्ति की तोड फोड भी और अदालतों में औपचारिक कार्यवाही करके उन्हें अंधाधूंध जेलों में कैसा है? हाँ विवेकानन्द नहीं ये सब अपनी आंखों देखा और देखिए निग्रो होने वाले अमानवीय, अच्छा तथा रंगभेद के ऍम रास्ता हटाने के लिए लडे हुये अमेरिका की गृह युद्ध का उल्लेख करते हुए विवेकानंद ने अपने मद्रास के क्षण में एक आजकल की दास इस युद्ध के पूर्व के दासों की अपेक्षा सौ गुनी अधिक पूरी दर्शा को पहुंच गए । इस युद्ध से पूर्व ये बेचारे नीग्रो कम से कम किसी की संपत्ति तो थे और संपत्ति होने के नाते इनकी देखभाल नहीं की जाती थी कि कहीं दुर्बल और बेकाम ना हो जाए । पर आज तो ये किसी की सम्बन्धी है ही नहीं । मामूली बातों के लिए ये जीती जी जला दिए जाते हैं, गोली से उडा दिए जाते हैं और उनकी हत्याओं पर कोई कानून लागू नहीं होता । क्यों? इसलिए किए निगर है मानवीय? मनुष्य तो क्या पशु नहीं । स्वाधीनता को राष्ट्रीय आदर्श घोषित करने वाला अमेरिका शासक वर्ग पिछले पचास बरस में विस्तारवादी बना हुआ था । अब साम्राज्यवादी शक्ति बनने की दौड में यूरोपियन देशों से किसी तरह पीछे नहीं था । इसी से बन जोला का सीमा विवाद था जिसमें दक्षिण अफ्रीका में फंसे सोने के कारण ब्रिटेन को छोडना पडा । इसी से स्पेन के साथ युद्ध छिडा और अमेरिका ने क्यूबा फिलीपाइन पर अपना अधिकार जमाया । चीन के बारे में खुले दरवाजे का सिद्धांत ऐसी नीति का परिणाम अमेरिका, डॅान अपने और दूसरे देशों की मेहनत कर जनता का खून चूसकर अपनी जोरिया भर रहे थे । पर मैं भारत के अनपढ गरीब जनता को एक शिक्षा देने के लिए आर्थिक सहायता पाने की आशा कैसे जा सकते? अबे तू धार्मिक रूढिवाद ही को बढावा दे सकती थी और भी रही है । आपने घनी मित्र ले गेट के साथ ॅ उसको न्यूयॉर्क से पैरिस पहुंच कला संस्कृति तथा भूख विलास उच्चतम केंद्र में लेकिन कब क्या देखने के लिए विवेकानंद लगभग दो से रुके और उसके बाद इंग्लैंड । चलिए वहाँ से कुमारी जो ऍम को उन्होंने लिखा मैं सकुशल लंदन पहुंच गया । भारत से लौटे बहुत से अवकाशप्राप्त जनरलों से मुलाकात भी मेरे प्रति बहुत विशिष्ट और मिनी प्रत्येक काले आदमी को निग्रो समझने का वहाँ अद्भुत ज्ञान यहाँ और कोई भी सडक पर टकटकी लगाकर मुझे नहीं देखता हूँ । और फिर एक महीने बाद श्रीमती लेकिन को लिखते हैं यहाँ के अंग्रेज बडी सहयोग है । कुछ एनजीओ इंडिया को छोडकर भी काले आदमियों से बिल्कुल घृणा नहीं करते । नाम मुझे सडकों पर झूठ ही करते हैं । कभी कभी में सोचने लगता हूँ कि कहीं मेरा चेहरा गोरा तो नहीं हो गया । केंद्र ॅ शक्ति को प्रकट कर देता है । आपको ये जानकर आश्चर्य होगा कि यहाँ बहुत से विचारशील स्त्रीपुरुष सोचते हैं कि सामाजिक समस्या का एकमात्र हल हिन्दू की जाति प्रथा है । आप कल्पना कर सकते हैं कि अपने मस्तिष्क में ये भाव रखते हुए वे समाजवादियों तथा दूसरे समाजवादी प्रजातंत्र वादियों से कितनी घृणा करते हैं । से यहाँ पुरुष अत्यंत उच्च शिक्षा प्राप्त भारतीय चिंतन में अत्यधिक रुचि रखते हैं किंतु स्त्रियाँ बहुत कम । अमेरिका की अपेक्षा इंग्लैंड अधिक संकुचित । जब क्लास लेना शुरू की तो आज सिंगर पेरूमल को अठारह नवंबर अठारह सौ पंचानवे के पत्र में लिखा, अमेरिका की अपेक्षा इंग्लैंड में मैं निश्चय ही अधिक कार्य कर सकता हूँ । दलके दिलाते हैं और इतने लोगों को बैठाने का मेरे पास खान भी नहीं रहता है । इसलिए वे सब लोग यहाँ तक कि सीरिया भी पालथी मारकर जमीन पर बैठी है । मैं उनसे कहता हूँ कि वे ये कल्पना करने का यत्न करें कि वे भारत के गगन मंडल की निजी फैले हुए वट वृक्ष की छाया चले गए थे और ये विचार अच्छा लगता है । अंग्रेजी की गुलामी और भारत में उनके अत्याचारों के कारण मन में उनके प्रति घृणा तथा अवज्ञा का जो भाव था वो यहाँ पर बदल गया । वे दिसंबर के शुरू में फिर अमेरिका चले गए और अप्रैल अठारह सौ छियानवे के अंत में लौट स्वदेश लौटकर कलकत्ता में भाषण देते हुए जाओगे । कुछ अंग्रेज शिष्य भी मौजूद थे । उन्होंने कहा था ब्रिटिश भूमि बर अंग्रेजों के प्रति मुझसे अधिक घृणा का भाव लेकर कभी किसी ने पैर ना रखा होगा । इस मंच पर जो अंग्रेज बंधु हैं, वे ही उसका साक्षी देंगे परन्तु जितना ही में उन लोगों के साथ रहने लगा जितना ही उनकी सात मिलने लगा । जितना ही ब्रिटिश जाती कि जीवन नियंत्र की कर लक्ष्य करने लगा । उस जाति का हिरेश पंदन किस जगह हो रहा है । ये जितना ही समझने लगा उतना ही उन्हें मैं प्यार । छह जुलाई के पत्र में फ्राॅड को लिखते हैं । ब्रिटिश साम्राज्य की कितने ही दोष क्यों ना हूँ पर भाव प्रसार का ऐसा कृष्ट यंत्र अब तक कहीं नहीं रहा है । मैं इस यंत्र के केंद्र स्थल में अपने विचार रख देना चाहता हूँ और सारी दुनिया में रह जाएंगे । लगातार काम करते हुए अभी बहुत थक गए इसलिए स्विट्जरलैंड में दो महीने विश्राम किया । वहाँ से गुडविन को लिखा मुझे बहुत ताजगी मालूम होती है । मैं खिडकी से बाहर दृष्टि डालता हूँ । मुझे बडी बडी नदियां दिखती है और मुझे अनुभव होता है कि मैं हिमालय में बिल्कुल शाह मेरे । इसमें आयो ने अपनी पुरानी शक्ति वहाँ प्राप्त करेंगे । संस्कृत के विख्यात विद्वान ऍम के निमंत्रण पर विवेकानन्द स्वाॅट जर्मनी बडे बडे शहरों तथा राजधानियों को देखते हुए कील पहुंचे । पॅाल विश्वविद्यालय में संस्कृत के प्राध्यापक थे । उनके साथ उपनिषद, वेदांत दर्शन और शांकर भाष्य पर विचार विनिमय हुआ । ज्ञान चर्चा के दौरान पर पैसे महोदय किसी काम से उठकर चले गए । थोडी देर बाद भी लौटे तो देखा कि स्वामी जी कविता की पुस्तक के पन्ने उलट रही । इस काम मेरे मतलब थी कि उन्हें प्रोफेसर की आहट भी सुनाएगा । पडे पुस्तक समाप्त हो गई । स्वामी जी ने तब उन्हें अपने पास बैठा देखा । बोले पुस्तक पड रहा था । संभव है कि आप बहुत देर से आए शाम कीजिए । चेहरा देख रहे स्वामी जी ने ये भाग लिया कि बॉल डाइसन को उनकी बात पर विश्वास नहीं हुआ । स्वामी जी ने उनका संदेह मिटाने के लिए पुस्तक में पडी हुई कविताएं सुनाना शुरू की । प्रोफेसर महोदय इसमें में भरकर बोले, आपने ये पुस्तक अवश्य पडी हुई नहीं कैसे संभव है कि दो दो पृष्ठों की पुस्तक आधे घंटे में याद हो जाए । स्वामी जी ने हसते हुए कर दिया मैं वही पुस्तक यहाँ देखी है मैं क्योंकि पूरे मनोयोग से पडता हूँ इसलिए सारे कुछ तक मुझे इसी तरह याद हो जाती है । कहावत है कि विद्या कंटकी और पैसा काटकर सन्यासी होने के कारण विवेकानंद पैसे तो अपने पास नहीं रखते थे लेकिन जो कुछ पढते थे में उन्हें कांत हो जा रहा है । बडा बहुत कुछ था और आपने इस वरन शक्ति के कारण से चलती फिरते विश्व पोस्ट धर्म महासभा में उन्हें जो असाधारण सफलता प्राप्त हुई, उसके एक मुख्य रूप कारण ये पांच जाती । देश की उन्नीस में उन्होंने दूसरी यात्रा की । बंगाल पत्रिका उद्बोधन के लिए यूरोप यात्रा की संस्करण लिखे थे । जर्मनी की उभरती हुई जवान शक्ति का मूल्यांकन उन्होंने इन शब्दों में लिखा जर्मनी की जनसंख्या वृद्धि प्रबल है, जर्मन बढेगी, कष्ट सहिष्णु हैं । आज जर्मनी, यूरोप का आदेश दाता है । सबसे ऊपर दूसरी जातियों से बहुत पहले जर्मनी । प्रत्येक निर्णयकारी का राजदंड का भय दिखाकर विद्या सिखाई । आज इस वृक्ष का फल भोजन बन रहा है । जर्मनी की सेना प्रतिष्ठा में सर्वश्रेष्ठ है । जर्मनी ने जान लगा दी है । युद्धपोतों में भी सर्वश्रेष्ठ पद प्राप्त करने के लिए जर्मनी व्यापार में भी अंग्रेजी को प्रयास कर दिया है । अंग्रेजी के उपनिवेशों में भी जर्मनी कारोबार जर्मन मनीष धीरे धीरे एकाद बच्चे लाभ कर रही हैं । जर्मनी के सम्राट की आज्ञा से सब जातियों ने चीन के क्षेत्र में सिर्फ चुका जर्मन सेनापति क्या नहीं स्वीकार जून हिस्सों में यूज होता है । पवित्रता तथा शांति संगठन चीनी किसानों तथा दस्तकारों का ग्रुप संगठन था । चीन से विदेशियों को मार भगाने के लिए सशस्त्र संघर्ष शुरू किया जिसे चीनी जनता का व्यापक समर्थक प्राप्त हुआ । इतिहास में संघर्ष को बक्सर विद्रोह का नाम भी दिया गया है जो होतवानी, इसकी शक्ति और देश व्यापी समर्थन का अनुमान इस बात से से है । इसमें लगाया जा सकता है कि उसने ब्रिटेन, अमेरिका, रूस, फ्रांस और जापान की संयुक्त सेना का लाख वह में घिराव किया और से तहस नहस करना । विद्रोहियों की इस वजय से सभी साम्राज्यवादी शक्तियों के हाथ पांव फूल गए और उन्हें चीन में अपना प्रभुत्व खत्म होता दिखाई दिया । अजय विद्रोह को कुचलने के लिए अगस्त में प्रोटीन अमेरिका जाता । जर्मनी, रूस, फ्रांस, इटली तथा ऑस्ट्रिया हंगरी समीर आठ देशों ने जोर मिनी कमान के अधीन संयुक्त मोर्चा बनाया । संघर्ष एक बरस तक चलता विद्रोही बडी वीरता से लडे लेकिन अंत में चीन की सामंती चिंग सरकार ने साम्राज्यवादियों के आगे हथियार डाल । विवेकानंद ने अपनी उक्त यात्रा वर्णन में इसी विद्रोह का उल्लेख किया है । इस से पता चलता है कि उनकी दृष्टि कितनी क्या और वे दुनिया की सारी हलचलों पर नजर रखते थे । ये दृष्टि जितनी व्यापक थी उतनी दूरदर्शी अगस्त अठारह सौ में फॅस जी । एस । राइट के मान पर ठहरे हुए थे । वहाँ चले गए बुद्धि जीवी उसी विवेकानंद की जो वार्ता हूँ, उसे श्रीमती राइट ने इतिहास का प्रतिशोध इस शीर्षक से भी बंद किया तो उसका कुछ दिन शाम यहाँ उस वक्त करते हैं जिससे स्वामी जी की दूरदर्शिता तथा मानव प्रेम और साम्राज्यवाद के प्रति तीव्र घृणा का पता चलेगा । लिखा है अभी कल की ही बात उन्होंने अपनी संगीत महत्व नी में कहा थी सिर्फ कल की चार सौ वर्ष से अधिक पूर्व नहीं । फिर उन्होंने एक गीर जाती और पीडित राष्ट्र के ऊपर की गई निर्भया था और दमन की कहानियां सुनाई और भविष्य में आने वाले निर्णय वो अंग्रेज । उन्होंने कहा, केवल कुछ समय पहले बर्बर स्त्रियों के शरीर पर ले रहे थे और अपने शरीर की घिनौनी दुर्गंध छिपाने के लिए सुगंध लगती थी । अत्यंत ऍम तभी भी केवल इस पर भरता में से एक नहीं । ये तो कम से कम पांच सौ वर्ष पहले की बात है और क्या मैंने नहीं कहा । जरा देर पहले मनुष्य की आत्मा की प्राचीनता को दृष्टि में रखने पर इन कुछ सौ वर्षों की क्या गिनती है? तब स्वर में एक विनम्र और औचित्यपूर्ण परिवर्तन करते हुए उन्होंने कहा वेंटास बर्बर भयानक शीट और उनकी उत्तरी जलवायु जन्म दिया भावर कष्टों ने उन्हें जंगली बनाना । उन्होंने कुछ अधिक भावना के साथ तेजी से कहा भी केवल मार डालने की बात सोचते हैं उनका धर्म कहाँ? वो उस पवित्र पुरुष का नाम लेते हैं । अपने मनुष्य भाइयों से प्रेम करने का दावा करते हैं । सबके बनते हैं इसाई धर्म के द्वारा नहीं । ये तो उनकी भूख है जिसने उन्हें सबसे बनाया उन की ईवन नहीं । नहीं मानव प्रिंट, केवल उनकी जवाब पर विजय पर केवल बुराई और हर प्रकार की हिंसा ही हिंसा । मेरे भाई मैं तुमको पुकारता हूँ, मैं तो मैं प्यार करता हूँ । तब कुछ और धीरे बोलते हुए उनका मदुल कंटिंग गंभीर होता गया और अंत में घंटा निनाद के सदृश टॅाप किन्तु ईश्वर के दंड का भागी बनना पडेगा । प्रभु कहते हैं कि प्रतिशोध मेरा है । मैं उसे चुका हूँ और विनाश आ रहा है । तुम्हारे साइट कितने हैं दुनिया की एक तिहाई नहीं उनको डी को भी चीनियों को देख ईश्वर का प्रतिशोध है । तुम्हारे ऊपर उद्दीप्त हो जाएगा । घोडों का एक और आक्रमण कुछ कुछ बताते हुए उन्होंने कहा इस समस्या यूरोप को पदार्थ प्रांत कर देंगे । वे एक भी साबित नहीं छोडेंगे । पूरे स्त्रियाँ और बच्चे सभी चल बचेंगे और अब यू फिर आएगा । उनके स्वर्ण में वरनाथ वेदना और करना तत्पश्चात अचानक उदासीनता पूर्वक आपने युगदृष्टा को अलग करते हुए उन्होंने कहा मुझे कोई चिंता नहीं हैं । दुनिया इससे और अच्छी होकर निकलेगी तो ये सब आ रहा है । ईश्वर का प्रतिशोध शीघ्र उनकी वार्ता में दैनिक भावुकता है, पर चिंतन कितना सही था? ब्रिटिश साम्राज्यवाद पीता सिकुडकर कोने में जा रहा सीधी सच मुझे एक विश्वशक्ति बनकर उभर आए हैं । विवेकानंद की मृत्यु के सत्तर बरस बाद जिस युग में जी रहे हैं और साम्राज्यवाद के संपूर्ण विनाश सहयोग है और आज क्रांति इतिहास की मुख्यधारा है । विश्वव्यापी वर्तमान महा अव्यवस्था तथा उथलपुथल से दुनिया निश्चित रूप से अच्छी होकर निकलेगी ।

7. Swami Vivekanand

चैप्टर, सिंह, धर्म महासभा बाधा जितनी होगी उतना ही अच्छा है । बाधा बिना पाए कभी नदी का एक बढता है । जो वस्तु जितनी नहीं होगी, जितनी अच्छी हूँ वो वस्तु पहने, पहले उतनी ही ज्यादा पाए । बाद आॅटो सिद्दीका पूरे लक्षण हैं । जहाँ बाधा नहीं, वहाँ से भी नहीं । विवेकानंद स्वामी विवेकानंद मद्रास से अमेरिका गए जाने से पहले उन्होंने वहाँ की सहायता समिति ट्रिप्लीकेन के सदस्यों के साथ अनेक विषयों पर चर्चा की । सदस्य उनके विचारों से बहुत प्रभावित हुए थे और अंत में इन सज्जनों की विशेष आग्रह और प्रेत नहीं सेवे । शिकागो धर्मसभा में हिन्दू धर्म के प्रतिनिधि के रूप में भेजे गए । चार साल बाद जब स्वदेश लौटे तो इसी साहित्य समिति में उन्होंने भाषण दिया था, जो विवेकानंद चाहिए । क्या पंचम खंड में हमारा प्रस्तुत कार्य शीर्षक संतुलित हैं? इसमें वह कहते हैं, बहुत धर्म की उदय के पहले ही चीन फारेस्ट और पूर्वी समूहों में मैदान का प्रवेश हो चुका था । फिर जब यूनान की प्रबल शक्ति ने पूर्वी भूखंडों को एक ही सूत्र में बांधा था, तब वहाँ भारत की विचारधारा प्रवाहित और इसाई धर्मावलंबी सभ्यता के डीन भाग रहे हैं । अभी भारतीय विचारों कि छोटे छोटे कणों के संग्रह के सिवा और कुछ नहीं । बहुत धर्म अपनी समस्त महानता के साथ जिसकी विद्रोही संतान है और इसाई धर्म जिसकी नगण्य नकल मात्र है, वहीं हमारा धर्म, युग चक्र फिर हुआ, वैसा ही समय फिर आया है । इंग्लैंड की प्रबल शक्ति ने भूमंडल के भिन्न भिन्न भागों, फिर एक दूसरे से जोर दिया । अंग्रेजों के मार्ग रोमन जाती कि मार्गों की तरह केवल स्थल भाग में ही नहीं, अटल महासागरों के सब भागों में भी दौड रहे हैं । संचार के सभी भाग दूसरे से जुड गए हैं और विद्युतशक्ति नव संदेशवाहक की भर्ती ही अपना अद्भुत नाटक खेल रही है । इन अनुकूल अवस्थाओं को प्राप्त कर भारत फिर जाग रहा है और संसार की उन्नति तथा सारी सभ्यता को अपना योगदान देने के लिए वह तैयार हैं । इसी के फलस्वरूप प्रकृति ने मानो जबरदस्ती मुझे धर्म का प्रचार करने के लिए इंग्लैंड और अमेरिका भेजा । हम में से हर एक कोई अनुभव करना चाहिए था कि प्रचार का समय आ गया है । चारों ओर शुभ लक्षण दिख रहे हैं और भारतीय आध्यात्मिक और दार्शनिक विचारों की फिर से सारे संसार पर विजय अतिरिक्त हमारे सामने समस्या दिन दिन बेहतर धारण कर रही है । क्या हमें केवल अब नहीं देश को जगाना होगा? नहीं ये भी कुछ बात है । मैं कल्पनाशील मनुष्य हूँ । मैं ये भावना है कि हिंदू जाती सारे संसार पर विजय प्राप्त करेगी । चार साल प्रवास काल में उन्होंने जो देखा, जो सीखा, धर्म महासभा में उन्हें जो असाधारण सफलता प्राप्त हुई । फिर उनकी जो विचार बने, ये भाषण उस सब का एक स्पष्ट चित्र प्रस्तुत करता है । जाते समय उन्होंने जो ये घोषणा की थी कि वे पाश्चात्य देशों से भारत की भूखी जनता के लिए आर्थिक सहायता मांगने जा रहे हैं । वो तीन उद्देश्य अस्पष्ट चेतना का विकृत बिंब एक ब्रह्मांड था । अच्छा हुआ कि धर्म महासभा उनके अमेरिका पहुंचने के एक महीने बाद शुरू हुई थी । एसपी उन्होंने पास शादी, जीवन और उनकी अर्थ लालसा को भलीभांति समझ लिया और उनका समय फैला । स्वप्ना अर्थात भ्रम टूट गया, विदेश जाएगा । उनका वास्तविक उद्देश्य उन इसाई मिशनरियों से लोहा लेना था, जिनके द्वारा विदेशी साम्राज्यवाद ने अपनी राजनीतिक विजय को तरह बनाने के लिए हम पर सांस्कृतिक आक्रमण शुरू किया । उन्नीसवी सदी में पुनर्जागरण की जो लहर उठी, जिस पर हम आगे चलकर विचार करेंगे । सी आक्रमण की प्रतिक्रिया यहाँ सिर्फ इतना ही कह देना काफी है कि विवेकानंद हमारे इस नवजागरण की चेतना की प्रवक्ता के रूप में ईसाई मिशनरियों से लोहा लेने शिकागो गए । ग्यारह सितंबर अठारह सौ छियानवे जब भी धर्म महासभा के मंच पर बोलने के लिए खडे हुए उनके मस्तिष्क में अपना ये उद्देश्य स्पष्ट था और हम देखेंगे कि उन्होंने इसाई मिशनरियों को अपने गढ में न सिर्फ मुंहतोड जवाब दिया बल्कि उनके दाद खट्टे की । महासभा के स्वागत अधिवेशन का चित्र और इसमें अपनी भूमिका आला सिंह और पेरूमल के नाम एक पत्र में स्वामी जी इन शब्दों में व्यक्त जिस दिन महासभा का उद्घाटन होने वाला था उस दिन सुबह हम लोग आठ पैलेस नाम एक भवन में एकत्र हुए जिसमें एक बडा और कुछ छोटे छोटे हॉल अधिवेशन के लिए अस्थाई रूप से निर्मित किए गए सभी राष्ट्र के लोग वहाँ पे भारत में ब्रह्मा समाज के प्रतिनिधि प्रताप चन्द्र मजूमदार महाशय है । बम्बई से नागर कराए थे जैन धर्म के लिए प्रतिनिधि ये चंद गांधी और थियोसॉफी की प्रतिनिधि श्रीमती एनी बेसेंट तथा चक्रवर्ती । इन सब में मजूमदार मेरे पुराने मित्र थे और चक्रवर्ती मेरे नाम से परिचित । चांदा जुलूस के बाद हम सब लोग मंच पर बैठाए गए । कल बना करूँ निजी बडा हॉल और ऊपर एक बहुत बडी गैजी । दोनों में छह हजार आदमी इस देश के चुने हुए सुसंस्कृत स्त्रीपुरुष हैं, खचाखच भरे हैं तथा मंच पर संसार की सभी जातियों के बडे बडे विद्वान नहीं कर रहे हैं । और मुझे जिसने अभी तक कभी सार्वजनिक सभा में भाषण नहीं दिया इस विराट समुदाय के समक्ष भाषण देना होगा । उसका उद्घाटन बडी समारोह से संगीत और भाषणों द्वारा हुआ । तदुपरांत आए हुए प्रतिनिधियों का एक एक करके परिचय दिया गया और वे सामने आकर अपना भाषण देने लगे । निसंदेह मेरा है धडक रहा था और जुबान प्रायास ऊब गयी थी । मैं इतना घबराया हुआ साथ ही सवेरे बोलने की हिम्मत ही नहीं हुई । मजूमदार की वक्तृता सुंदर रही चक्रवर्ती की तो उससे भी सुन्दर दोनों के भाषणों के समय खूब करते बनी । ये सब अपने भाषण तैयार करके आएंगे । मैं बोल था और बिना किसी प्रकार की तैयारी के बैठा था किंतु में देवी सरस्वती को प्रणाम करके सामने आया और डॉक्टर पे रोज ने मेरा नाम परिचय दिया । मैंने एक छोटा सा भाषण दिया मैंने इस प्रकार संबोधन क्या अमेरिका निवासी बहनों और भाइयों इसके साथ ही दो मिनट एक ऐसी घोर करकल बनी हुई कि कान में अंगुली देते ही नहीं । फिर मैंने आरंभ किया जब अपना भाषण समाप्त कर बैठा तो भावावेग सीमा रो में अवश्य हो गया था । दूसरे दिन सारे समाचार पत्रों में छपा की मेरी ही वक्त बताओ । जिन सबसे अधिक प्रदेश पर्शी मैं अवश्य हो गया था । पूरा अमेरिका मुझे जान गया । उस दिन से मैं विख्यात हो गया और जिस दिन मैंने हिन्दू धर्म पर अपनी वक्तृता पडी उसी दिन तो हॉल में इतनी अधिक भीड थी । इतनी पहले कभी नहीं एक समाचारपत्र का कुछ अंश उध्वस्त करता हूँ केवल महिलाएं ही महिलाएं कोने कोने में जहाँ देखो वहाँ ठसाठस भरी हुई दिखाई दे दी थी । अन्य सब सक्रियताओं के समाप्त होने तक में किसी प्रकार धैर्य धारण कर विवेकानंद की वक्तृता की बात चौथी रही इत्यादि । भारत के सन्यासी ने भद्र नारियों तथा पुरुषों लीडी जिन जेंटलमैन से संबोधित करने की लीग थोडी थी, बहनों और भाइयों फॅस में जो अपना था, सतत तालियों से उसी का स्वागत हुआ तो फिर ये शब्द मात्र नहीं । इनके पीछे सर्व संभावना का सिद्धांत विजय की उदारता और विश्वास की गरिमा थी और फिर संगीतमय स्वर में भाषण का आरंभ हुआ । आपने जिस सौहार्द्र वर्स नहीं के साथ हम लोगों को स्वागत किया है, उसके प्रति आभार प्रकट करने की नियमित खडे होते समय मेरा हे गए अवर्णनीय हर्ष से पूरा नहीं हो रहा है । संसार में संन्यासियों की सबसे प्राचीन परंपरा की ओर से मैं आपको धन्यवाद देता हूं । धर्मों की माता की ओर से धन्यवाद देता हूँ । अमेरिका जाने से पहले विवेकानंद ने समूचे देश का भ्रमण किया था । विद्वानों से बातचीत और शास्त्रीय बम इतिहास के अध्ययन द्वारा उसके महान अतीत और मानव सभ्यता में उसके योगदान को भलीभांति समझ लिया था । आते उनके स्वर में परंपरा का बाल और राष्ट्रीय गौरव छनकर हो । मैं ऐसे धर्म का अनुयायी होने में गर्व का अनुभव करता हूँ जिसने संसार को सहिष्णुता तथा सार्वभौम स्वीकृति दोनों की शिक्षा दी है । मुझे एक ऐसे देश का व्यक्ति होने का अभिमान है जिसने इस पृथ्वी के समस्त धर्मों और देशों के उत्पीडितों और शरणार्थियों को आश्रय दिया है । और फिर इतिहास मुझे आपको यह बतलाते हुए गर्व होता है कि हमने अपने वक्ष में यहूदियों के विशुद्धतम अवशिष्ट अंश को स्थान दिया जिन्होंने दक्षिण भारत आकर उसी वर्ष शरण ली थी, जिस वर्ष उसका पवित्र मंदिर रोहन जाती के ऐसे चार से धूल में मिल गया । ऐसे धर्म का अनुयायी होने से मैं कर का अनुभव करता हूँ जिसने महान जरथुष्ट जाति के अवशिष्ट आंश को शरण भी और जिसका पालन वो अब तक कर रहा है । डेढ दृष्टि की संक्षिप्त भाषण के अंतिम शब्द से सांप्रदायिक्ता हटधर्मिता और उनकी विभत्स वंशधर धर्मान्धता सुन्दर पृथ्वी पर बहुत समय तक राज्य कर चुकी है । वे पृथ्वी को हिंसा से भरती रही है, उसको बारंबार मानवता की रख से नहलाती रही हैं, सभ्यताओं को ध्वस्त करती और पूरे पूरे देशों को निराशा के गर्त में डाल दे रही है । ये दिए विमत सिद्धांत भी नहीं होते तो मानव समाज आज की अवस्था से कहीं उन्नत हो गया होता । पर अब उन का समय आ गया है और मैं आंतरिक रूप से आशा करता हूँ की आज सुबह इसी सभा के सम्मान में जो घंटाध्वनि हुई है वो समस्त धर्मान्धता का तलवार या लिखने के द्वारा होने वाले सभी उत्पीडनों का तथा एक ही लक्ष्य की ओर अग्रसर होने वाले मानवों की पारस्परिक कट्टरताओं का मृत्यु निनाद सिद्ध हो । एक दूर देश में विवेकानंद ने साहस और प्रतिभा का परिचय दिया । सुंदर शरीर, बहुत आकृति और आंखों में असाधारण चक्र । इस भारतीय सन्यासी की शान समय देखते ही बनती है । उन्नीस सितंबर को स्वामी जी का हिंदू धर्म का भाषण उस सभा के सब भाषणों में बेजोड उसमें उन्होंने जहाँ वेदांत दर्शन की तात्विक व्याख्या की, वहाँ पे ईसाई धर्म के मूलाधार पर प्रकार करने से नहीं चूके । ईसाई धर्म का मूलाधार है पापा को उसकी मान्यता है कि आदमी ने वर्जित फल खाने का जो पाप किया, उसके फलस्वरूप उसे हवा समेत स्वर्ग से धरती पर आना और इसी दृष्टि का हुआ । इसलिए बात मनुष्य का सहज स्वभाव है । वहाँ जब तक जियेगा पाप करेगा, पाप का प्रायश्चित करने के लिए ही से हिस्सा को मध्यस्थ बनाने तथा गिरजा जाने की जरूरत है । स्वामी जी ने अमृत के पुत्रों के मधुर संबोधन के प्रयोग की आज्ञा मांगते हुए कहा, निश्चय ही इंदु आपको पापी कहना स्वीकार करता है । आपको ईश्वर की संतान हैं । अमर आनंद के भागी है पवित्रा और पूर्ण आत्मा है आपस, मृत्यु भूमि पर देवता अब भला पार्टी मनुष्य को पाप भी कहना ही पास है वो मानव स्वरूप पर घोर लांछन आप उठे ऐसी हूँ टाइम और इस मिथ्या धारण को झटककर दूर से बेन क्या फेर हैं आप है आत्मा हमारे आत्मा मुक्त आनंद । मैं और नीतियां आप जड नहीं है, आप शरीर नहीं है, जड तो आपका दास है ना कि आप है दास चढेंगे इस साइड बादरी हमें मूर्तिपूजक बताकर हमें जंगली और ऐसा भी लेकर हमारी निंदा करते थे । वे कारण मैंने विनोद, उपहास, मेस निंदा का जो कर दिया वो सुनने लायक बचपन की एक बात मुझे याद आती है । एक इसाई पादरी कुछ मनीषियों की भीड जमा कर के धर्मोपदेश कर रहा था । बहुत तेरी मजेदार बातों के साथ को पादरी ये भी कह गया, अगर मैं तुम्हारी दीन मूर्ति को एक डंडा लगाओ तो मेरा क्या कर सकती है? एक श्रोता नेचर चुकता सा जवाब दे रहा हूँ, अगर मैं तुम्हारी ईश्वर को गाली नहीं तो मेरा क्या कर सकता है? पादरी बोला मरने के बाद उसमें सजा देगा हिंदू विजनगर बोल उठा तो मरोगे, तब ठीक उसी तरह हमारी देवमूर्ति भी तुम्हें दंड देगी । इसी प्रकार की बातों पर विशेष ध्यान देने की जरूरत सामजी भी दोनों बाये विशेष ढंग से वक्ष पर कैसे तनकर भेल रहे थे । दूसरे वक्तव्य जरा ईसाई धर्म और पास जाती । सभ्यता ने हमें बहुत कुछ सिखाया इत्यादि । भद्र चापलूसी की बातें कहने वहाँ नहीं गए थे और नावे मूर्ति पूजा के लिए किसी तरह लज्जित बल्कि इसी बात को लेकर प्रहार पर प्रहार करते चले गए । मूर्ति पूजा की नैतिकता, आध्यात्मिक और प्रेम कुल आसानी बताते हुए उन्होंने कहा अंधविश्वास मनुष्य का महान शत्रु पर धर्मांधता उससे भी मैं ईसाई गिरजाघर क्यों ज्यादा है? क्रूस क्यू पवित्र हैं, प्रार्थना के समय आकाश की ओर यूज किया जाता है । कैथलिक ईसाइयों के गिरजाघरों में इतनी मूर्तियां क्यू हो रही है । मेरे भाइयों मन में किसी मोदी के बिना कुछ सोच सकना उतना ही असंभव है जितना श्वास लिए बिना जीवित रहेंगे । सहजधारी नियमानुसार भौतिक मूर्ति से मानसिक भाव विशेष का उद्दीपन हो जाता है अथवा मन में भाग विशेष का उद्दीपन होने से तत्र मूर्ति विशेष का भी अमीर होता है । इसलिए तो हिन्दू आराधना के समय प्रमा प्रतीक का उसके मन को आपने ध्यान के विषय परमेश्वर में एकाग्रता से स्थिर रहने में सहायता देता है । वो भी बात उतनी अच्छी तरह से जानता है जितना आप जानते हैं कि वो मूर्ति ना तो ईश्वर है और ना सर्वव्याप्त । और सच पूछिए तो दुनिया के लोग सिर्फ व्यापक व का क्या अर्थ समझते हैं । वह तो केवल शब्द प्रतीक मान रहे क्या परमेश्वर का भी कोई क्षेत्रफल हैं? यदि नहीं जिस समय हम सर्वव्यापी शब्द का उच्चारण करते हैं, उस समय विस्तृत ता का आशय देश की ही कल्पना करने के सिवा हम और क्या करते हैं? ये भाषण क्या दिया स्वामी जी ने भीड ओके छत्ती को छेड दिया । धर्म सभा के कुछ प्रतिनिधि पंजी झाडकर उनके पीछे पड गए । उनका कहना था विवेकानंद ने जिस प्रकार आत्मा की महिमा घोषित है उसके संबंध में अधिकांश हिन्दुओं को जानकारी नहीं है । सूक्ष्मतर को युक्ति के द्वारा मूर्ति पूजा की दार्शनिक व्याख्या कर के पास जाती जगत की आंखों में धूल झोंक रहे हैं क्योंकि जड के उपासक बहुत तैलिक हिंदू इस प्रकार की व्याख्या स्वप्न में भी सोच सकते हैं । साथ ही उन्होंने ये प्रचार भी किया कि विवेकानंद नीच वर्ष में पैदा हुए हैं । जाती से निकले हुए नगण्य व्यक्ति है और धर्म की चर्चा उनके लिए अनाधिकार शेष कमाते हैं । हिंदुस्तान से आए किसी रेवेरेंड महोदय ने धर्मसभा के अधिकारियों से ये भी कहा कि उच्च श्रृंखल चरित्रहीन युवक को सभा से निकाल दिया जाए । निकाल देने की बात तो अधिकारियों ने नहीं मानी अलबत्ता विवेकानंद से कहा गया कि वे प्रतिवादियों द्वारा उठाई गई आपत्तियों मिल गए इसके लिए तो वो पहले से ही तैयार है । अरे बाईस सितंबर को उन्होंने भारत के वर्तमान धर्म समूह की आलोचना सभा में विरोधियों की विद्वेषपूर्ण युक्तियों का दृढता से उठ कर दिया । इसके बाद पच्चीस तारीख को हिन्दू धर्म का सार नामक भाषण देते समय बीच में रुककर उन्होंने श्रोताओं से पूछा । इस सभा में जो हिंदू धर्मशास्त्र के साथ प्रत्यक्ष रूप से परिचित है वो हाथ तो प्रायास सात हजार व्यक्तियों में से सिर्फ तीन चार आते थे । योद्धा संन्यासी विवेकानन् मस्तक ऊंचा करके विद्रुप भाषा मुस्कुराते हुए बोले तो फिर बताइए आप किस बांटे थे? हमारे धर्म की आलोचना करेंगे? विवेकानंद धर्म महासभा में भारत कि निर्धन तथा उत्पीडन जनता के प्रतिनिधि थी उस जनता के लिए जिससे पादरी लोग तरह तरह के लोग लालच सिखा करे । साई बनाने का प्रयत्न कर रहे बीस नंबर के ढाई तीन मिनट के भाषण में इन्ही पादरियों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा इसाइयों को सत आलोचना सुनने के लिए सदैव तैयार रहना चाहिए और मुझे विश्वास है कि यदि मैं आप लोगों की कुछ आलोचना करूँ तो बुरा ना मानेंगे । इसाई लोग मूर्तिपूजकों की आत्मा का उम्मीदवार करने के नियमित अपने धर्म प्रचारकों को भेजने के लिए इतने सुख रहते हैं । उनकी शरीर को भी भूख से बचाने के लिए कुछ क्यों नहीं करते? भारत वर्ष में जब भयानक अकाल पडा था तो उसे ॅ और लाखों हिंदू छुधा से पीडित होकर मर गए पर आप कसाइयों ने उनके लिए कुछ नहीं है । आप लोग सारे हिंदुस्तान में जैसे बनाते हैं पर पूर्व का महान भाभर में नहीं, उसके पास प्रयाप्त है । जल्दी हुए हिंदुस्तान के लाखों बुखार के लोग क्यूँकि दिल्ली से रोटी के लिए चला रहे हैं । वे हमसे रोटी मानते हैं और हमने देती है पत्थर चुभ । छात्रों को धर्म का उपदेश देना उनका अपमान करना है । भूख को दर्शन से खाना उनका अपमान करना है । भारत वर्ष में ये भी कोई पुरोहित दिनों की प्राप्ति के लिए धर्म को देश करें तो वह जाती से छूट कर दिया जाएगा और लोग उस पर देखेंगे । मैं यहाँ पर आपने वृत्र भाइयों की नियमित सहायता मांगने आया था पर मैं पूरी तरह समझ गए की मूर्ति पूछे को के लिए इसाई धर्मावलंबियों से और विशेष फिर उन्ही के देश में सहायता प्राप्त करना कठिन हिंदू कार है । नदी के इस और बसने वाले सभी मुझे ड्यूक आॅफ बीस सितंबर को लिखा था । अब धर्म महासभा स्थान पर पहुंची जहां तीव्र कटता उत्पन्न हो गयी । निसंदेह भ्रष्टाचार का पतला पर्दा बना रहा किन्तु उसके पीछे दुर्भावना विद्यमान रेवरेंड जोसेफ रुकने हिंदुओं की तीव्र आलोचना की और बदले में उन की भी आलोचना हुई । उन्होंने कहा बिना रचे गए विश्व की बात करना प्राया आश्रम में प्रलाप और एशिया वालों ने प्रत्युत्तर दिया कि ऐसा विश्व जिसका प्रारंभ है एक स्वयंसिद्ध बेतुकापन विषय जेपी न्यू माननी वो यू तट से दूर तक जाने वाली गोली चलाते हुए घोषणा की की पूर्व वालों ने मिशनरियों के प्रति भ्रांत कथन करके संयुक्त राष्ट्र के समस्त ईसाईयों का अपमान किया है और पूर्व वालों ने अपने त्तिजनक शांत और अति उद्यत मुस्कान के द्वारा उत्तर दिया ये केवल विषय का ज्ञान, ये उत्तेजित शांति और उद्योग मुस्कान विवेकानंद जी की विशेष तक पूर्व वालों के प्रमुख प्रवक्ता वही थे । वे पादरियों पिछले आरोपों का आचार्य की धीर गंभीर वाणी में उत्तर देते और साथ ही चुटकी भी लेते थे । सत्ताईस सितंबर के अंतिम अधिवेशन में उनका भाषण चाय स्वागत भाषण की तरह संक्षिप्त था । पर शैली यही भी इस प्रबुद्ध दृश्य होता । मंडल को मेरा धन्यवाद जिसने मुझ पर अभी कल के ऊपर ही है और जिसने मत मतदान शुरू के मनोमालिन्य को हल्का करने का प्रयत्न करने वाले प्रत्येक विचार का सरकार क्या है? इस समय सूरता में कुछ बेसुरी स्वर भी बीच बीच में सुने गए हैं । उन्हें मेरा विशेष धन्यवाद क्योंकि उन्होंने अपने स्वर्वेद आदित्य से इस समर्थता को और भी मदर बना दिया है । ये छिछले तथा निकृष्ठ पादरियों पर कटु था । फिर रामकृष्ण परमहंस का जितने मान उतने पद और तमाम धर्मों, सम्प्रदायों तथा मतवादों की एकता के सार्वभौम संदेश का । पश्चिम की वैज्ञानिक चेतना से सामंजस्य स्थापित करते हुए आचार्य के स्वर में विवेकानंद ने कहा बीरभूमि में बोल दिया गया और मिट्टी, जल तथा वायु उसके चारों रख दिए हैं तो क्या वो भी मिट्टी हो जाता है अथवा वायु या जल बन जाता है? नहीं, वहाँ तो वो ही रहता है । वहाँ अपनी वृद्धि के नियम के हिसाब से ही बढता है । वायु, जल और मिट्टी को अपने मैं बचाकर उनको बीज पदार्थ में परिवर्तित करके एक वृक्ष हो जाता है । ऐसा ही धर्म के संबंध में भी है । इसाई को हिन्दू या बौद्ध नहीं हो जाना चाहिए, ना हिंदू अथवा बहुत को एसाई पर हाँ, प्रत्येक को चाहिए कि वह दूसरों के सार भाग को आत्मसात करके पृष्टि लाभ करें और अपने वैशिष्ट्य की रक्षा करते हुए अपनी निजी बुद्धि का नियम के अनुसार वृद्धि को प्राप्त प्रबंध श्रोताओं ने विवेकानंद को धर्मसभा का सर्वश्रेष्ठ घोषित किया । अखबारों में उनकी भाषण पूरी पूरी प्रकाशित हुए और रणवीर प्रशंसात्मक टिप्पणियां लिखी गई । कोई एक साल बाद अर्थात पंद्रह नवंबर अठारह सौ चौरानवे को उन्होंने अपने पत्र में हरिदास देसाई को लिखा मैं धर्म महासभा में बोला था और उसका क्या परिणाम हुआ ये मैं कुछ समाचार पत्र और पत्रिकाआें मेरे पास है । उनसे उध्वस्त करके लिखता हूँ । मैं तीन नहीं आंकना चाहता परंतु आपके प्रेम के कारण आपने विश्वास करके मैं अवश्य कहूंगा की इसी हिंदू ने अमेरिका को ऐसा प्रभावित नहीं किया और मेरे आने से यदि कुछ भी ना हुआ तो इतना अवश्य हुआ है कि अमेरिका को ये मालूम हो गया कि भारत में आज भी ऐसे मनुष्य उत्पन्न हो रहे हैं जिनके चरणों में सब जैसे सभ्य राष्ट्र की नीति और धर्म का पाठ पढ सकते हैं । क्या नहीं समझते कि हिंदू राष्ट्र अपने संन्यास यहाँ भेजने के लिए पर्याप्त कर रहे हैं । कुछ पत्रिकाओं ऍम में नीचे उस बात करता हूँ । अधिकांश संक्षिप्त भाषण वा कप मत्वपूर्ण होते हुए भी किसी ने भी धर्म महासभा के तात्पर्य एवं उसकी सीमाओं का इतने अच्छे ढंग से वर्णन नहीं किया जैसा कि उस हिंदू संन्यासी नहीं । मैं उनका भाषण पूरा पूरा उध्वस्त करता हूँ परन्तु श्रोताओं पर सब क्या प्रभाव पडा इसके बारे में मैं केवल इतना कह सकता हूँ कि वे देवी अधिकार से संपन्न सकता है और उनका शक्ति मान, तेजस्वी मुख तथा उनके पीली गेरुए वस्त्र उनके गंभीर तथा लयात्मक वासियों से कुछ कर आकर्षक नाथ न्यूयॉर्क । उन्होंने गिर जोर क्लबों में इतनी बार भाषण दिया है कि उनके धर्म से अब हम भी परिचित हो गए हैं । उनकी संस्कृति, उनकी वाकपटुता, उनकी आकर्षण एवं अद्भुत व्यक्तित्व ने हमें हिंदू सभ्यता का एक नया आलोक दिया है । उन के संदर्भ तेजस्वी मुखमण्डल तथा उनकी गंभीर सुन ललित वाणी में सबको आना ऐसा अपने वर्ष में कर लिया है । बिना किसी प्रकार की नोटसि सहायता के ही वे भाषण देते हैं । अपने तथ्य तथा निष्कर्ष को वे अपूर्वा ढंग से एवं आंतरिकता के साथ सम्मुख रखते हैं और उनकी स्वतःस्फूर्त प्रेरणा उनके भाषण को कई बार पूर्व वाकपटुता से युक्त कर देती है । न्यूयॉर्क हाँ विवेकानन्द नशे ही धर्म महासभा में महानतम व्यक्ति है । उनका भाषण सुनने के बाद ये मालूम होता है कि इस विज्ञ राष्ट्र को धर्मोपदेशक भेजना कितनी मूर्खता है । हेड यहाँ का सबसे बडा समाचार पर इतना उद्धृत करके अब मैं समाप्त करता हूँ, नहीं तो आप मुझे घमंडी समझ बैठेंगे, परंतु आपके लिए इतना आवश्यक था क्योंकि आप प्रायः कुक मंडूक बने हैं और दूसरे तीनों में संसार किस गति से चल रहा है ये देखना भी नहीं चाहिए । मेरे उदार मित्र मेरा मतलब आपसे व्यक्ति शक नहीं है । सामान्य रूप से हमारे संपूर्ण राष्ट्र से उनकी इस असाधारण ख्याति से लाभ उठाने के लिए व्याख्यान कंपनी ने उनके सम्मुख ये प्रस्ताव रखा कि वे अमेरिका का दौरा करें और कंपनी नगर नगर में उनके भाषणों का प्रबंध करेगी । बिल्ली के भागों छींका टूटा । वे विश्वधर्म के सर्वभौम आदर्श को प्रचारित प्रसारित करने विदेश आये या व्याख्यान कंपनी के लिए साधन जुटा रही । इसके अलावा भारत में अपनी योजना को कार्यरूप देने के यतिश धन मिल जाने की भी आ जाती है । उन्होंने इसे सुनहरे अवसर की तरह जाना और कंपनी के साथ व्याख्यान देने का अनुबंध कर लिया । इस योजना के अंतर्गत अमेरिका के सभी राज्यों के बडे बडे शहरों में विवेकानंद के भाषण होने लगे । जहाँ कई भी ले जाते हैं वहीं उनका आदर सत्कार होता था । कौतुहल प्रिया दर्शकों की भीड लग जाती थी और भारी टिकट के बावजूद व्याख्यान भवन श्रोताओं से खचाखच पर जाते थे । विवेकानंद दोहरी तलवार थे । एक तरफ से अपने धर्म के उदार व्याख्या करके मनुष्यमात्र की एकता का संदेश देते और इसकी तुलना में इसाई धर्म की चिंता और संकीर्णता को उजागर कर देते थे । दूसरी तरफ मिशनरियों कि भारत संबंधी मूर्खतापूर्ण प्रचार और धूर्तता का भांडाफोड करने से भी बात नहीं आते थे, लेकिन अब उन्हें दो प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड रहा था । एक ही है कि अमेरिकी नगरों का वातावरण भिन्न भिन्न था । धर्म महासभा का वातावरण कही ना था और श्रोताओं की प्रायर ऐसे सुली बुद्धि तथा अंधविश्वासी लोग अधिक होते थे, जो हुल्लडबाजी पर उतर आते थे । दूसरे ईसाई मिशनरी विवेकानंद की लोकप्रियता को छति पहुंचाने के लिए निकृष्ट तत्वों की कुल्लड बाजी को ना सिर्फ प्रोत्साहन देते थे, बल्कि उन्हें सिखा पढाकर दर्शकों तथा श्रोताओं में भेजते । विवेकानंद की तीव्र दृष्टि ने इन निकृष्ट तत्वों और मिशनरियों के षड्यंत्र को पहचान लिया और उसके पीछे इन्हें साम्राज्यवाद का हाथ दिखाई दिया, लेकिन वह घबराने वाले व्यक्ति में से नहीं । उन्होंने यहाँ भी स्वभावगत साहस तथा निर्भिकता का परिचय दिया । रो मामला लिखते हैं तरुण अमेरिकी गणतंत्र की दूर जनशक्ति के प्रति उनमें पहले पहले जो आकर्षण और आदर उपजा था, वहाँ मंद पड चुका था । उसकी क्रूरता, अमानुषिकता, छूट रता, कट््टरता, प्रकांड मूर्खता एवं लम्बी मूर्धा के लिए विवेकानंद के मन में सहसा घृणा जाग उठी थी, जो विचारशील है । आस्थावान है और जीवन को दृष्टि से नहीं देखते । इससे मानव जाति का अब तरसे राष्ट्र देखता है । उन के विषय में ये कितने निर्लज्ज आत्मविश्वास के साथ अपनी राय देता है । तब फिर उनका धैर्य छूट गया । उन्होंने कोई मैं नहीं दिखाया । वे हिंसा, लूट और विनाश के तत्वों से पूर्ण पश्चिमी सभ्यता के पापों और अपराधों की भर्त्सना करने लगी । एक बार उन्हें बॉस्टन में आपने अत्यंत प्रिय धार्मिक विषय पर बोलना था । जल्दी पूरे दुनिया पूर महाशिव का खोखला और बरवर श्रोता सम्मान सामने देख कर उन्हें इतनी वितृष्णा हुई कि अपनी आत्मा का साहस से उन्हें देने से इनकार करके हटा उन्होंने विषय आंतर कर दिया । ऐसे ऐसे ईडर और भी डी जिसका प्रतिनिधित्व करें सभ्यता को उन्होंने हन डाला, भयंकर हायतौबा मची, सैकडों अशांत शुरू हुआ, सभा भवन छोडकर चल दिए और अखबारों ने लाल पीली आंखें दिखाई दे । छोटी साइज और पाखंड से विशेष तैयार हमने आप जितनी चाहे शेखी बघारते पर तलवार के बिना ईसाइयत कहीं सफल हुई है । आपका धर्म ऐश्वर्या का लोग दिखाकर प्रचारित किया जाता है । इस देश में मैंने जो कुछ सुना, सब ढोंग हैं । ये सब समृद्धि यही सब क्या खींचती की देन हैं जो खींचते को पुकारते हैं कि आगे पैसे बटोरने के अतिरिक्त कुछ नहीं जानते हैं । हमारे घर में ईद भी तकिया लगाने योग्य नहीं पाएंगे तो मिसाइल नहीं हो खींचती की शरण मिलो । एक सार्वजनिक भाषण से विरोध का तूफान और भी तेज हो गया । इधर अमेरिका में मिशनरी और उनकी अखबार उन्हें ठग और कपटी बताकर बदनाम कर रहे थे । वे लोगों के घरों में जा जाकर कहते थे कि भारत में इसका पत्नियों का हरम हैं और बच्चों की आधी सेना बहुत यहाँ आकर खाम खा सन्यासी बन गया है । उधर भारत में ये पादरी, लोग और धर्म महासभा में ब्रह्मा समाज के प्रतिनिधि प्रताप चन्द्र मजूमदार जो विवेकानंद के असाधारण की आदमी के कारण द्वेष की आग में जल भुन रहे थे । ये मिथ्या प्रचार कर रहे थे कि स्वामी जी अमेरिका के बडे बडे होटलों में रहते हैं, सब चीज खाते पीते हैं और विलासिता का जीवन बता रहे हैं । रूढीवादी और कट्टरपंथी हिंदुओं ने भी स्मृतियां प्रचार को बढावा दिया । विवेकानंद के शिष्यों तथा गुरु भाइयों को वास्तविकता स्थिति मालूम नहीं थी । वो इस प्रकार से बडे सड्टाी । उन्होंने स्वामी जी को इस बारे में लिखा और उनके खिलाफ लिखने वाले अखबारों की कतरनें भेजी । चौबीस जनवरी अठारह सौ चौरानवे को उन्होंने अपने मद्रास के शिष्या हो लिखा, मुझे तुम्हारे पत्र मिले । मुझे यह जानकर आश्चर्य हुआ कि मेरे संबंध में इतनी अधिक बातें तुम लोगों ने जो ले क्या है, उसे अमेरिकी जनता का रुख समझ बैठना । इस पत्रिका के विषय में यहाँ के लोगों को प्रायः कुछ मालूम नहीं और वे इसे नील नाक वाले प्रेस्बिटेरियन ओके पत्रिका कहते हैं, ये बहुत ही कट्टर संप्रदाय हैं, किंतु ये नील नाक वाले सभी लोग दुर्जन है, ऐसी बात नहीं है । अमेरिकी निवासीगण और बहुत से पादरी गन मेरा बहुत आदर करते हैं । जिनका सम्मान कर लोग आदर कर रहे हैं, उस पर कीचर उछालकर प्रसिद्धि प्राप्त करने के इरादे से ही इस पत्र ने ऐसा लिखा है । ऐसे छल को यहाँ के लोग खूब समझते हैं एवं यहाँ ऐसी कोई महत्व तक नहीं देगा । हिन्दू भारत के पादरी गन अवश्य ही इस आलोचना का लाभ उठाकर बदनाम करने का प्रयत्न करेंगे । यदि वे ऐसा करें तो उन्हें कहना यहूदी याद रखो, तुम पर ईश्वर का न्याय घोषित हुआ है । उन लोगों की पुरानी इमारत की नींव भी रह रही है, पागल के समान रोजगार रहे हैं । उन का नाश अवश्यंभावी है । उन पर मुझे दया आती है कि प्राची धार्मिक भावों के यहाँ अत्यधिक प्रदेश के कारण भारत में मौत से जीवन बिताने कि उनकी साधन नहीं हो जाए किंतु इनके प्रधान पादरियों में से एक भी मेरा विरोधी नहीं है । जो भी हो जब तलाक में उतरा हूँ, अच्छी तरह से स्नान करूंगा । हिंदू कट्टरपंथियों के लिए उन्होंने एक दूसरे पत्र में लिखा कि अगर उन्हें धर्म की इतनी चिंता है तो भारत से एक रसोई और खाने की सामग्री क्यों नहीं भेज देंगे? जब वे गार्ड्स एक पैसा खर्च करने को तैयार नहीं तो व्यर्थ की बातें बनाने से क्या ला? लेकिन विरोध कर तूफान दिन दिन ऊंचा उठता चला गया । ईसाई मिशनरी, हिन्दू, कटरपंथी, थियोसॉफी फर्स्ट सुधारवादी, ब्रह्मा समाजी और प्रतिक्रियावादी राजनीतिक तत्व इस विरोध में एक ही मंच पर इकट्ठे हो गए । अब विवेकानंद भी एक देशीय पति के व्यक्ति नहीं उन्होंने बखूबी समझ लिया की अब उपेक्षा मात्र से काम नहीं चलेगा । समय आ गया है कि मिथ्याप्रचार का उत्तर दिया जाए और इस विरोध को अपने उद्देश्य के प्रचार प्रसार के लिए प्रयोग में लाया तेल गर्म लोहे पर चोट करने, योजना स्थिर करके उन्होंने नौ अप्रैल अठारह सौ चौरानवे को हालत सिंह ना पेरूमल के नाम अपने पत्र में लिखा निसंदेह कट्टर पादरी मेरे विरुद्ध हैं और मुझसे मुठभेड करना कठिन जानकर हर प्रकार से भी मेरी निंदा करते हैं और मुझे बदनाम करनी मेरा विरोध करने में भी नहीं हिचकिचाते और इसमें मजूमदार उनकी सहायता कर रहे हैं । वहाँ दिवेश के मारे पागल हो गया है । लगता है उसने उन लोगों से कहा की मैं बहुत बडा, धोखेबाज और दूर हूँ और इधर वह कलकत्ता में कहता फिर रहा है कि मैं अमेरिका में अत्यंत आपको एवं लंपट जीवन व्यतीत कर रहा हूँ । भगवान उसका भाला मेरे भाई बिना रोज की कोई भी अच्छा काम नहीं हो सकता । क्या तुम मद्रास में रामनाथ की दीवान या अन्य किसी बडे आदमी की अध्यक्षता में एक ऐसी सभा आयोजित कर सकते हो जिसमें वहाँ मेरे हिन्दू धर्म का प्रतिनिधित्व करने के प्रति पूर्ण गया समर्थन एवं संतोष प्रकट किया जाए और फिर उस पारी प्रस्ताव को यहाँ के शिकागो वाॅशिंग तथा न्यूयॉर्क सिंह और डेट्रॉयड मिशिगन की कमर्शिल एडवटाइजर को भेज दिया जाए । शिकागो ऍम इसमें है । न्यूयॉर्क सिंह के लिए किसी विशेष विवरण की आवश्यकता नहीं डिट्रॉइट मिशिगन राज्य में हैं उसकी प्रतियां डॉक्टर में रोज को चेयरमैन धर्म महासभा शिकागो के पते पर भेजो । मैं उनका मकान नंबर भूल गया हूँ किन्तु मोहल्ले का नाम इंडियान एवेन्यू है उसकी एक प्रति श्रीमती जी जी बिजली डिट्रॉइट वाशिंगटन एवेन्यू के पते पर भी भेज इस सभा को जितना बडा बना सकते हो बनाओ धर्म एवं देश के नाम पर सभी बडे आदमियों को उसमें भाग लेने के लिए पकडो । मैसूर के महाराजा तथा दीवान से सभा और उसके उद्देश्यों का समर्थन करने वाला पत्र प्राप्त करने की चेष्टा । मतलब ये हैं कि जितनी बडी सभा और उसका शोर उठा सको उतना ही अच्छा प्रस्ताव कुछ इस आशय का होगा कि मद्रास कि हिंदू जनता में एक कामों के प्रति अपना पूर्ण संतोष व्यक्त करती है । मद्रास और कलकत्ता इत्यादि नगरों में विराट सभाएं हुई । इनमें ना सिर्फ विवेकानंद की काम को सराहा गया बल्कि इस काम पर गर्व व्यक्त करते हुए उन्हें अभिनंदित किया गया । इन सभाओं की कार्यवाही भारत तथा अमेरिका के अखबारों में छपी और इनमें पास किए गए प्रस्ताव उन लोगों को भेजे गए जिनके नाम विवेकानंद ले लेंगे । इससे पादरी गानों का झूठ उजागर हो गया । लेकिन विवेकानंद का उद्देश्य सिर्फ पादरियों का मूड बंद करना ही नहीं था । भारत की सोई हुई आत्मा को झकझोर ना जगाना अतेफ अभिनंदन के उत्तर में कलकत्ता की सभा के सभापति प्यारीमोहन मुखर्जी को विवेकानंद ने अठारह नवंबर अठारह सौ चौरानवे के पत्र में लिखा, लेन देन ही संसार का नियम है और यदि भारत कैसे उठना चाहे तो ये परम आवश्यक है कि वो अपने रत्नों को बाहर लाकर पृथ्वी की जातियों में बिखेर दी और इसके बदले में वो जो कुछ दे सके उसे सहर्ष ग्रहण करें । विस्तार ही जीवन है और संकोच मृत्यु प्रेम ही जीवन है और निवेश मृत्यु हमने उसी दिन से मारना शुरू कर दिया जब से हम अन्य जातियों से घृणा करने लगे और ये मृत्यु बिना इसके किसी दूसरे उपाय से रोक नहीं सकती कि हम फिर से विस्तार को अपनाएं जो जीवन का चिन्ह हैं । अतेफ हमें पृथ्वी की सभी जातियों से मिलना पडेगा और प्रत्येक हिंदू जो विदेश भ्रमण करने जाता है, उन सैकडों मनीषियों से अपने देश को अधिक लाभ पहुंचाता है जो केवल विश्वास तो एवं स्वार्थ बर्ताव कंट्री मात्र है और जिनकी जीवन का एकमात्र उद्देश्य ना खुद खाये, ना दूसरों को खाने देख कहावत के अनुसार अपना अपना हित करना है न बनाएगा । पांच जाती राष्ट्र ने राष्ट्रीय जीवन के जो आश्चर्यजनक प्रासाद बनाए हैं, वे चरित्र रूपी सुदृढ स्तंभ ऊपर खडे हैं और जब तक हम अधिक से अधिक संख्या में वैसे चरित्र नागर लेंगे, तब तक हमारे लिए किसी शक्ति विशेष के विरुद्ध अपना विशेष असंतोष व्यक्त करते रहना निरर्थक है । क्या वे लोग स्वाधीनता पानी योग्य है, जो दूसरों को स्वाधीनता देने के लिए प्रस्तुत नहीं? व्यर्थ का संतोष जताते हुए शक्ति शय करने के बदले हम चुप चाप वीरता के साथ काम करते चले जाए? मेरा त्वपूर्ण विश्वास है कि संसार की कोई भी शक्ति किसी से उस वस्तु को अलग नहीं रख सकती । इसके लिए वह वास्तव में योग्य हो । अतीत तो हमारा गौरव में था, पर मुझे हार्दिक विश्वास है कि भविष्य और भी गौरव में होगा । अपनी कमियों को समझे और दूसरों से सीखे । बिना आगे बढना संभव नहीं । लेकिन आत्मालोचना अपने जी के सम्मुख की जाती हैं । शत्रु के विरुद्ध संपूर्ण व्यक्तित्व के साथ लडना सिर्फ लडना होता है । विवेकानंद ने ठीक यही कार्यनीति अपनाई । शत्रु के सम्मुख उन्होंने मूर्ति पूजा तक की दार्शनिक व्याख्या की और अपनों की समूह कलेजा निकालकर रख दिया और खून के आंसू रो परिणाम ये की उदार बुर्जुआ और उनके बुद्धिजीवियों ने विवेकानंद को प्यार किया । सर आंखों पर बिठाया और ने अपना धार्मिक तथा सांस्कृतिक नेता मान लिया और आज तक माने हुए हैं । अध्ययन स्वदेश लौटने पर वे जहाँ भी गए, वहीं उनका भव्य स्वागत हुआ । आपने मद्रास के भाषण में अपनी ही देशवासियों के सम्मुख बोलते हुए उन्होंने दिल के फूल इस प्रकार को मैं समझता हूँ कि मुझे मैंने एक दोषियों के होते हुए थोडा साहस है । मैं भारत से पास जाते देशों में कुछ संदेश ले गया था और उस से मैंने निर्भिकता से अमेरिका और इंग्लैंड के सामने प्रकट किया । आज का विषय आरंभ करने के पूर्व में साहसपूर्वक तुम लोगों से कहना चाहता हूँ कुछ दिनों से मेरे चारों ओर कुछ ऐसी परिस्थितियां उपस् थित हो रही है । मेरी कार्य की उन्नति में, विशेष रूप से विघ्न डालने की चेष्टा कर रही । यहाँ तक कि यदि संभव हो सके तो वे मुझे एक बार ही कुछ लेकर मेरा अस्तित्व ही नष्ट करना है । मैं अगर तीन वर्षों से देख रहा हूँ कुछ लोग मेरी मेरी कार्यों के संबंध में, कुछ भ्रांत धारणाएं बनाए हुए जब तक मैं विदेश में था, मैं शुभ रहे । मैं स्पष्टीकरण करने के रूप में कुछ शब्द कहना चाहता हूँ । इन शब्दों का क्या फल होगा अथवा विश शब्द तुम लोगों के हृदय में किन किन भावों का उद्रेक करेंगे, इसकी मैं परवाह नहीं । मुझे बहुत कम चिंता है क्योंकि मैं वहीं सन्यासी हूँ जिसमें लगभग चार वर्ष पहले आपने दंड और कमंडलु के साथ तुम्हारे नगर में प्रवेश किया था और सारी दुनिया इस समय मेरे सामने पडी । देश विरोधी और राष्ट्रविरोधी तत्वों के लिए जब सी लिए तथा प्रत्यक्ष रूप से लडना संभव नहीं रहता तो मित्र का छद्म रूप धरकर हमारी पंक्तियों में घुस आते हैं । अभी तैसी रूप में हमारे चिंतन को गलत दिशा देकर विजय को पराजय में बदलने और हमारा स्थिति तक मिटा देने की चेष्टा करते हैं थी । उस ऑफिस जब सीधे आक्रमण में परास्त हुए और भारत के राष्ट्रीय तत्वों ने विवेकानंद को अपना धार्मिक नेता घोषित कर दिया तो इन लोगों ने यही हथकंडा उन्होंने ये कहना शुरू कर दिया कि उन्होंने विवेकानंद को हर तरह की सहायता दी और उनके कार्य को आगे बढाने के लिए रास्ता बनाया । विवेक बुद्धि वाले विवेकानंद शत्रु को मित्र भला कैसे समझ लेते हैं? उन्होंने भाषण जारी रखते हुए इस पाखंड का पर्दाफाश किया । बिना और किसी भूमिका की मैं अपने विषय को आरंभ करता हूँ । सबसे पहले मुझे थियोसॉफिकल सोसाइटी के संबंध में कुछ कहना है । शिकागो में होटल का दो हफ्ते का बिल चुकाने के बाद जब उन की हालत खस्ता हो गई थी, उसका उल्लेख करते हुए कहा, एक समय मेरे पास केवल कुछ ही डॉलर बच्चे थे । मैंने अपने मद्रास वासी मित्रों को तार की जाए । ये बात तो साफ सिस्टर को मालूम हो गई और उनमें से एक ने लिखा अब शैतान शीघ्र ही मर जाएगा । ईश्वर की कृपा से अच्छा ही हुआ । बना दूँ तो क्या यही मेरे लिए रास्ता बना देना था? मैं ये बात ही इस समय कहना नहीं चाहता था । हिंदू मेरे देशवासी ये सब जानने की छुट्टी इसलिए कहनी । पर ये बात यहीं पर खत्म नहीं हो जाएगा । मैंने धर्म महासभा में कई ऍम मैंने उनसे बातचीत करना और मिलने जुलने की चीज तक ही उन लोगों ने जिस अवज्ञा भरे दृष्टि से मेरी ओर देखा वो आज भी मेरी नजरों पर नाच रही मानवः कह रही थी ये कहाँ का छूट रखेडा यहाँ देवताओं के बीच में आ गया । मैं पूछता हूँ क्या यही मेरे लिए रास्ता बना देना? हाँ तो धर्म महासभा में मेरा बहुत नाम तथा यह हो गया और तब से मेरे ऊपर अत्यधिक कार्यभार आ गया । पर प्रत्येक स्थान पर इन लोगों ने मुझे दबाने की चेष्टा की । फॅमिली के सदस्यों को मेरे व्याख्यान सुनने की मना ही कर दी गई । यदि वे मेरी वक्तृता सुनने आते तो वहाँ सोसाइटी गुप्त विभाग ऍफ का यही नियम है कि जो मनुष्य उक्त विभाग का सदस्य होता है उसे केवल उधर में और मोरिया के पास ही से शिक्षा ग्रहण करनी पडती है अथवा इनके दृश्य प्रतिनिधि मिस्टर जज और मैसेज ऍसे मित्र भेज धारी देश शत्रुओं को स्वामी जी ने भलीभांति पहचान लिया था । इनके प्रति उनके मन में प्रचंड घृणा तथा आक्रोश था । इनके बाद पंद्रह मई अठारह सौ छियानवे के पत्र में लिखते हैं क्यों सौं लोगों ने मेरी चापलूसी और मिथ्या प्रशंसा करने का यह ना किया था क्योंकि भारत में अब मैं नेता माना जाता हूँ इसलिए मेरे लिए आवश्यक हो गया कि मैं कुछ बेधडक और निश्चित शब्दों में उनका खानदान करूँ मैंने ये क्या भी और मैं बहुत खुश । यदि मेरा स्वास्थ्य ठीक होता तो मैं इस समय तक इन नए उत्पन्न हुए पाखंडियों का भारत से सफाया कर देगा । कम से कम भरसक प्रयत्न तो करता ही है । इसी कडी फटकार और इस वक्त घृणा के बावजूद विवेकानंद को ख्याति से अपने को लाभान्वित करने के लिए तो ऑफिस सांप्रदायकि चालाक और मक्कार नेत्री एनी बेसेंट ने उनकी मृत्यु के बारह बरस बाद मार्च चौदह कि ब्रह्म आबादी पत्रिका में लिखा था महिमा में मूर्ति गैरिक से भूषित शिकागो नगर के धूम मलिन दूसरे रिक्शे पर भारतीय सूर्य की तरह नीतिमान उन्नत सिर मर्मभेदी दृष्टि पूर्ण आंखे चंचल वोट । मनोहरन भंगी धर्म महासभा के प्रतिनिधियों के लिए निर्दिष्ट कमरे में स्वामी विवेकानंद निर्यातको मैं प्रथम किसी रूपमें प्रतिमाह हुए थे । वे संन्यासी के नाम से विख्यात है परन्तु ये समर्थन है या नहीं है क्योंकि प्रथम दृष्टि में वे सन्यासी के बजाय यौद्धा ही समझे जाते थे और वास्तव में वो एक योद्धा संन्यासी भी थे । ये भारत गौरव राष्ट्र के मुख को उज्जवल करने वाले, सबसे पुराने धर्म के प्रतिनिधि, दूसरे उपस् थित प्रतिनिधियों में उम्र में सबसे छोटे होने पर भी प्राचीनतम् श्रेष्ठतम सतह जीती जाती मूर्ति रूपी दूसरे किसी से भी करना है । वृद्ध नतीश ई उध्वस्त पाश्चात्य जगत में दूध का काम करने के लिए अपनी जन्मभूमि की गौरवपूर्ण कथाओ को ना भूल कर भारत के संदेश की घोषणा की । शक्तिमान, दृढसंकल्प तथा उद्यमशील स्वामी जी में अपने मत का समर्थन करने के लिए काफी क्षमता थी । इस चापलूसी भरे शब्दजाल का यदि शुरू में विवेचन किया जाए तो साम्राज्यवाद कि धूर्त संधान ने धर्म महासभा में स्वामी जी की वास्तविक भूमिका राष्ट्रीय उद्देश्य उपेक्षा करके सबसे पुराने धर्म की गौरवपूर्ण कथाओ ही प्रमुखता प्रदान की है और इससे अलग पहले में जिसे यहाँ नकल करने की जरूरत नहीं, धर्म महासभा में उनके व्याख्यानों को अतुल्नीय धार्मिक वार्ता बताया है । इससे अधिक कुछ नहीं । क्या ये खोल को रखकर बंदे को नष्ट करने और विवेकानंद के अस्तित्व को मिटा देने की सोची समझी चेष्टा नहीं? क्या ये हमारे ध्यान को प्रमुख से हटाकर गौड पर केंद्रित करके हमारी राष्ट्रीय जीतना को कुंठित करनी एवं उसे गलत दिशा देने का ही बहुत ही षडयंत्र नहीं किया? इसे मित्र देश में क्षेत्रों की भूमिका के अतिरिक्त और कोई संज्ञा दी जा सकती है? हमें खेद है कि जो व्यक्ति एक ही वस्तु, एक ही प्रवृत्ति बधाई की सिद्धांत में बाद और प्रतिवाद के संघर्ष को नहीं समझती, वे षड्यंत्र को कभी नहीं समझ पाए । लेकिन विवेकानंद बाद और प्रतिवाद के एक दूसरे को कुछ डालने वाले संघर्ष को भलीभांति समझते थे और यही कारण है कि उन्होंने थियोसॉफी स्टोर तथा उन सरीखे रंगे सियारों छोटी प्रशंसा को घृणा से ठुकराया और भारतीय राष्ट्र के प्रति समूची मानवता के प्रति किए गए उनके गुनाहों को जीते जी कभी माफ नहीं । उन्होंने शाश्वत सत्य को पहचान लिया था कि इन विरोधी तत्वों को मिटा देने ही से अपने अस्तित्व की रक्षा संभव है । यही कारण था कि विरोध की इस प्रबल तूफान में वे चट्टान की तरह दृढ रहे । विरोधी समितियों और संप्रदायों ने उन्हें अपने साथ शामिल करने के लिए पहले प्रलोभन दिए और अंत में अनेक प्रकार के भय दिखाया । पर विवेकानन्द दस से मसला हुए और उन्होंने निर्भिक स्वर में घोषित किया । मैं सत्य का आग्रही और सत्य का उपासक हूँ । सत्य कभी किसी भी स्थिति में मित्तियां से समझौता नहीं करेगा । यदि सारी दुनिया भी आज एक मत होकर मेरे वृद्ध खडी हो जाए तो भी सत्य की ही जीत होगी । उस समय अमेरिका की आबादी छह करोड की करीब । इसमें साई एकतिहाई पर थियोसॉफी सिर छह सौ पचास या ईसाई भी कैथोलिक प्रोटेस्टेंट कॅरियर तथा क्रिश्चियन साइंस हत्यारी सांप्रदायों में पडे हुए थे । चलते पुर्जे दुनियादार लोगी प्राय का इनकी अनुयायी थे जिन्हें धर्म के सूक्ष्मता दार्शनिक तत्व से कुछ लेना देना नहीं । जो भोगविलास का जीवन बिता देते, जो नरक की आग में निरंतर चलने के भय से और स्वर्ग में अपनी सीट रिजर्व कराने के लिए धर्म को मानते हैं और यही वे लोग थे जो निकृष्टता, शुभ्रता, प्रकांड मूर्खता एवं दम भीम ऊर्जा को साकार बनाते थे और इन्हीं के प्रति विवेकानंद के मन में सहसा घृणा जाऊँ । ईसाइयों में भी जो विचारशील श्रेष्ठ तत्व के विवेकानंद का आदर करते थे, वो उनका भाषण सुनकर और उनसे विचारों का आदान प्रदान करके प्रसन्न होते थे । अमेरिका में अधिकांश लोग वेट के जो डार्विन के विकासवाद, हरबर्ट स्पेंसर के अज्ञ बाद तथा विज्ञान के नया अविष्कार से प्रभावित थी, जो सादा वादी, युग विवादी एवं नासिक थे और जो धर्म तथा धर्म के सभी कार्यों को कोठगी तथा कुसंस्कार कहकर निकालते थे, वे सब स्वाधीन चिंतन दल फ्री थिंकर सोसाइटी के सदस्य । ये लोग भी विवेकानंद का विरोध करते थे और मजाक उडाने में खूब सक्रिय ॅ कोई इनसे भले ही बाल मिला, पर इनका विरोध नहीं, इस बार निष्कपट और लोगों के विरोध से एक दम था । इन लोगों ने एक बार विवेकानंद को अपने समाज ग्रुप में भाषण देने के लिए आमंत्रित किया । उनके भाषण और बाद में पूछे गए प्रश्नों की युक्ति । संगत उत्तरों से ये लोग इतने प्रभावित हुए । दल के अनेक सदस्य विवेकानंद के शिष्या मन है । लैनिंग की धर्म पर विचार पुस्तक की भूमिका में लिखा है हम ज्यादा ये बता देगी अनीश्वरवाद मार्क्सवाद के बिना पूर्ण तथा निश्चित है स्तर की की पुष्टि । पूंजीवादी स्वतंत्र विचारकों के आंदोलन की अब नदी से होती है । विज्ञान का भौतिक बाद जहाँ भी ऐतिहासिक भौतिकवाद अर्थात मार्क्सवाद में विकसित नहीं हो पाता, वही उसका अंत आदर्शवाद ऍम में होना । साहित्य प्रदर्शन में प्रवीन इस दल के नेता रॉबर्ट इंगरसोल धर्म विरोधी होने के बावजूद इतने लोकप्रिय वक्ता के कि सिर्फ भाषण देकर लाखों रुपया का मालिक है । उस भाषण के बाद बेबी विवेकानंद के मित्र बन गए । सन्यासी विवेकानंद और भूख बार इंगरसोल । ये मित्रता बडी बचित्र थी । पर कालिदास के शब्दों में यानी ने ज्ञानी को पहली वार्ता में पहचान लिया था । हाँ, विवेकानन्द को नहीं दुनिया की कृष्ण विचारशील तत्वों से आदर सरकार प्राप्त हुआ और धीरे धीरे विरोध शाम हो गया । इस बीच में उन्होंने ये भी अनुभव किया कि अनमेल भीड के समूह भाषण देते करना है और व्याख्यान कंपनी के लोग अधिक से अधिक धन बटोरने की नियत से उन्हें सर किसकी घोडे की तरह करना चाहते कर रहे हैं । उनका उद्देश्य धन कमाना कदाचित नहीं था । मित्रों द्वारा उन्होंने कंपनी का अनुबंध रद्द कर दिया और न्यूयॉर्क में वेदांत पर निशुल्क क्लासिस लेना आरंभ । इससे भले ही आर्थिक हानि उठानी पडी पर सबके सामने उनकी निस्वार्थता प्रमाणित हो गई । न्यूयॉर्क में राज्यों पर उनके भाषण इतने लोकप्रिय हुए की जिस दिन ही कार्यक्रम रहता था उस दिन उनका छोटा सा कमरा नगर के दार्शनिको वैज्ञानिकों और अध्यापकों से भर जाता था । नहीं अठारह सौ पंचानवे स्वामी जी ने राज्यों पर अपनी प्रसिद्ध टीका मिस टेस्टी बाल तो बाद में सिस्टर हरी दासी को बोल कर लिखाई और इसके साथ पातंजलि के दर्शन का भाषा भी जोड दिया । यह पुस्तक इतनी पसंद की गई की कुछ सप्ताहों में इसके तीन संस्करण प्रकाशित हुए । उन्होंने अपने इस कार्य द्वारा कितने ही शिष्य और सहायक मित्र प्राप्त किए । पिछले एक डेढ साल में उन्हें कठोर परिश्रम करना पडा । अतीव आपने कुछ चुने हुए शिष्यों को साथ लेकर उन्होंने कुछ दिन सहस्त्र उद्यान हाउसिंग आइलैंड पाक में बिताए । वहाँ साॅस नदी के बीच उनकी शिष्य की सुंदर कोडिया नहीं । वहाँ स्वामी जी अपने शिष्य शिष्याओं के लिए आपने आज से भारतीय खाने तैयार करते हैं और शाम को भोजन के बाद दो ढाई घंटे की क्लास लेते थे । इस संबंध में कुमारी ऍम ने लिखा है इस गंधर्व राज्य में हमने आचार्य देर के साथ साथ सप्ताह दीप्ति आनंद से उनके अतींद्रः राज्य के संदेशों युक्त अपूर्वा वजन सुनने में वे भी किए । उस समय हम भी जगत को भूल गए थे और जगह को बुला देने के लिए कल्पना चाहे जितनी उडाने भरे अंत में उसे भौतिक जगत कि में लौट आना पडता है । कुमारी बॉल जो आगे लिखती है स्वामी जीएनसीएपी की राशी व कौतुक प्रिया और लास्ट के साथ परिहास करने में और बाद का तुरंत जवाब देने में वो आप व्यस्त थे । दो भी कभी मूर्त के लिए भी अपने जीवन के मूलमंत्र से लक्ष्य भ्रष्ट होते थे । प्रतीक चीज से ही वे बोलने या उदाहरण देने का विषय पाले पिस के और एक्शन में ही बिहार में आकर्षक हिंदू पौराणिक कथाओं से एक दम गंभीर दर्शन के बीच ले जाते थे । स्वामी जी, पौराणिक कथाओं का आशीष भंडार और वास्तव में प्राचीन आरियों से बढकर अन्य किसी भी जाति में इतनी अधिक पौराणिक कथाएं भी नहीं । वहाँ हमें उनका आदमियों को सुनाकर प्रसन्न होते थे और हम भी सुनना चाहते थे क्योंकि वे कभी उनका अनुपयोगी आठ में जो सत्य नहीं है, उसे दिखा देना तथा उसमें से मूल्यवान धर्म विषय उद््देश्यों का आविष्कार करना नाम होते थे या मेरी की शिष्या गंज जीवन जी रहे थे । उसकी आयु तीन सौ वर्ष से अधिक लंबी नहीं । उनका ना अपना कोई मैं थक, ना गंभीर दार्शनिक चिंतिन और ना ही समृद्ध उत्कृष्ट सांस्कृतिक परंपरा । उन्हें लिए देकर मार्कोपोलो और कोलंबस की यात्रा वर्णन की विरासत में मिले थे या फिर यूरोप से जो आया ले लिया । यही कारण है कि अमेरिकी चिंतन उतना चला है, उसकी साहित्य और कला भी खास परिहास तथा कौन तू कोई प्रधानता प्राप्त है? और तो इस समय हमारे समूह दो खंडों में जो बरहद अमेरिकी इतिहास रखा है, उसमें काजू नहीं मिलेंगे और न किसी अन्य राष्ट्र में उन्हें कभी इतना महत्व दिया है । सर आज ये है कि नईदुनिया इंग्लैंड, जर्मनी, स्पेन, हथियार, यूरोपियन देशों की सब्जियाँ तथा अर्ध सब जातियों का सम्मिश्रण अमेरिकी निवासियों के जीवन में मानव जाति के शैशव काल की निरीह कल्पना का नितांत अभाव था । वेदो, उपनिषदों और प्राणों की कहानियाँ और बहुत विवेकानंद की काव्यमय शैली में शिष्य जनों के लिए कितनी मनोरंजक होगी और भौतिक सुख साधनों से उकताए उनके मन के लिए, जगत को कुछ क्षण के लिए कि भुला देना कितनी राहत भी होगी, इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं । विवेकानंद ने एक बार आपने शिव से कहा एक महान देश लेकिन मैं यहाँ रहना नहीं चाहूंगा । अमेरिकी लोग पैसे को बहुत महत्व देती है । यह सब चीजों से बढकर पैसे को मानते हैं । तुम लोगों को बहुत कुछ सीखना है । जब तुम्हारा देश भी हमारे भारत की तरह प्राचीन देश बनेगा तब तो मैं एक समझदार बनाओ । इस संबंध में एक और घटना का उल्लेख भी आवश्यक है । जब राजीव पुस्तक छपी तो उस समय का प्रसिद्ध दास ने विलियम जेम्स उस से इतना प्रभावित हुआ कि वह विवेकानंद से मिलने आया । विलियम जेम्स को व्यवहार बाद प्राग मार्टिंसन का सिद्धांत प्रतिपादित करने का श्रेय प्राप्त सिद्धां के अनुसार सत्य वातावरण से जूझने के कार्यों में तत्कालिक देश की प्राप्ति का साधन मात्र है । अर्धा सिद्धांत का सारा तो ये है कि सत्य उपयोगी होने के कारण ही सकते हैं । साम्राज्य तथा व्यापार के विस्तार के लिए सरपट दौड रहे नई दुनिया के शासक वर्ग का यही सिद्धांत था और अब भी हैं । इस शासक वर्ग द्वारा राज्यों भी शुद्ध व्यवहारिक उपयोगिता की दृष्टि से भौतिक सामर्थ्य के साधन के रूप में देखा गया । आकार में डकैती और बुड्ढी में बालक के समान मेरी की जनता उसी सूज में रूचि लेती है जो सब कोई लाभ कर सके । तत्व मिमांसा और धर्म को बिगाड कर झूठे वैज्ञानिक प्रयोगों का रूप दिया जाता है । उद्देश्य होता है सत्ता की धन बल संसार सुखी दी हाँ विवेकानन्द से ये कब सहन होता है? उन्होंने लूट खसोट तथा स्वार्थ से उत्पन्न प्रवृत्ति कि सार्वजनिक रूप से निंदा की । पादरियों को विरोध का एक और अवसर मिला और उन्होंने आरोप लगाया कि विवेकानंद धर्म की आड में राजनीति का प्रचार कर रही है । अगस्त से दिसंबर अठारह सौ तक का समय उन्होंने इंग्लैंड में बताया । उसके बाद अमेरिका लौट वहाँ उन्होंने कर्मयोग, भक्तियोग, क्लासिस लेने के अलावा न्यूयाॅर्क, डिट्रॉइट आदि में व्याख्यान दिए । फ्राॅड की अध्यक्षता में विधान समाज की स्थापना कि जो कुछ समय तक न्यूयॉर्क में वेदांत आंदोलन का केंद्र बना रहा । ये केंद्र तो क्या बचना था अमेरिका में उन्होंने अपनी जो बहुत शिष्य बनाये थे एक दो छोड कर ये सब खोटे सिक्के साबित हुए । अप्रैल अठारह सौ छियानवे में विवेकानंद फिर इंग्लैंड आए और साल के अंत में स्वदेश लौटने तक वही रहे । क्या भारत को समझने वाले मैक्स मूलर सरीके विद्वानों से उनकी भेंट हुई थी । मैक्समूलर ने उनसे भेंट के बाद रामकृष्ण परमहंस पर एक लीग और फिर पुस्तक ली थी । यहाँ मिशनरियों ने उनका विरोध नहीं किया । अलबत्ता लंदन में उनसे किसी ने प्रश्न किया आप के पूर्व जगह मानव समाज को धर्म मतदान के लिए इतने उत्सुक थे तो इस देश में धर्म प्रचार करने क्यों नहीं है? स्वामी जी ने मृदुल भालसे मुस्कुराते हुए चैट से उतर गया । उस समय तुम्हारे पूर्वस्तर चांदी बरबर थी । बच्चों की हरे रंग से आपने उल्लंघन शरीर को रंग गैर पर्वतों की गुफाओं में रहते थे पे कहा धर्म प्रचार करने वैसे इंग्लैंड वासियों से उन्हें कोई शिकायत नहीं । फ्रांसिस लैंगेट के नाम पत्र में लिखते हैं, इंग्लैंड में ये कार्य चुपचाप पर निश्चित रूप से बढ रहा है । यहाँ पर और दूसरी पुरूषत्व स्त्री ने मेरे पास आकर मेरे कार्य के संबंध में बातचीत की । मेरा विचार है कि मैं धीरे धीरे उस व्यवस्था की ओर बढ रहा हूँ । यहाँ अगर खुद शैतान भी हो तो भी मैं प्यार कर सकूंगा और वे श्रीमति ऑल बिल को लिखते हैं । अंग्रेज जाती अत्यंत उदार है । उस दिन करीब तीन मिनट के अन्दर ये आगामी सर्दी में कार्य संचालन, आर्थ नवीन मकान के लिए मेरी कक्षा से डेढ सौ पांच का चंदा मिला । यदि मांगा जाता तो तत्कालीन पांच सौ पौंड प्रदान करने में किंचित मात्र भी नहीं सकते । यहाँ पर इस कार्य का संचालन करने के लिए हमें अनेक व्यक्ति प्राप्त करने होंगे एवं वे लोग क्या की भावना से भी कुछ कुछ परिषद है । अंग्रेजों के चित्र की गहराई का पता नहीं मिलता है । स्वदेश लौटते समय चार शिष्य सेवियर दंपत्ति गुड और भगिनी निवेदिता, जिनके साथ आए भी इंग्लैंड से मिले सीबीआई दंपति धनी व्यक्ति अल्मोडा में मायावती आश्रम उन्हीं के प्रयासों से स्थापित हुआ । गुडविन आशुलिपि ने पढे थे उन्होंने निःशुल्क अपनी सेवाएं अर्पित हाँ विवेकानन्द के बहुत से भाषण उन्हीं के द्वारा लिपिबद्ध होकर हमारी अमूल्य भी बन सकते । भगिनी निवेदिता मैं मार्ग्रेट नोबेल का नाम तो विवेकानंद के साथ ऐसा जुड गया है जिससे गुरु नानक के साथ बाला और मर्दाना का वहाँ दृढ चरित्र कि विदेशी महिला हमारे राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन में उस की वही भूमिका है जो चीन की क्रांति में भी वो बंदी उसने क्रांतिकारी आंदोलन को संगठित करने में अपना जीवन अर्पित कर दिया । खेल है कि हम यू ऍम और रेडियो को तो जो मित्र के वेश में शत्रु थे, श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं और जिस निवेदिता ने हमारी गुलामी की जंजीरे तोडने के लिए प्राण त्याग दिए, उसे हमने बना दिया । विवेकानन् को अमेरिका से जो मिल तम सहानुभूति प्राप्त हुई । कुमारी मेरी रेल, उसके सचिव प्रतिमा की विवेकानंद ने उसे बहन बनाकर हृदय का समस्त प्यार दिया । निवेदिता हमारे समूचे राष्ट्र की बहन है और उसकी पूर्ण स्मृति बसने तथा कृतज्ञता के फूल चढाते रहना हमारा राष्ट्रीय गौरव विवेकानंद ने अमेरिका और इंग्लैंड में चार बरस तक जो प्रचार कार्य किया, उससे उनके अपने व्यक्तित्व का जो निर्माण हुआ उस पर विचार कर लेना अत्यावश्यक है । पाश्चात श्रोताओं की समुख अपने विचार व्यक्त करने के लिए विवेकानंद ने अपने मस्तिष्क में जब कार्यपद्धति स्थिर की थी, फरवरी अठारह सौ छियानवे हो हाला सिंगा पेरूमल के नाम पत्र में उनका उल्लेख किस प्रकार क्या है? हिन्दू भागों को अंग्रेजी में व्यक्त करना फिर शुष्क दर्शन पेचीदी । पौराणिक कथाएं और अनूठे आश्चर्यजनक मनोविज्ञान से ऐसी धर्म का निर्माण करना जो सरल, सहज और लोकप्रिय हो और उसके साथ ही उन्नत मस्तिष्क वालों को संतुष्ट कर सके । इस कार्य की कठिनाइयों को वही समझ सकती है जिन्होंने इसके लिए प्रयत्न किया । अद्वैत के गुड सिद्धांतों में से नित्यप्रति के जीवन की ये कविता का रस और जीवनदायिनी शक्ति उत्पन्न करनी हैं । अत्यंत उलझी हुई पौराणिक कथाओं में से साकार नीति के नियम निकाल लें और बुद्धि को भ्रम में डालने वाली योगविद्या से अत्यंत वैज्ञानिक प्रक्रियात्मक मनोविज्ञान का विकास करना है । और इन सबको एक ऐसी रूप में लाना पडेगा कि बच्चा बच्चा इसे समस्या मेरे जीवन का यही कार्य है । ये कार्य सहज नहीं था । इंग्लैंड और अमेरिका के समुद्र श्रोताओं को अपनी बात समझाते समझाते ज्ञान का विकास और खोल का विस्तार निरंतर होता रहा । होना स्वाभाविक ही था । हाला सिंगारे रोमल जी के नाम एक और पत्र में में लिखते हैं, अब मैं तुम्हें अपने नूतन अविष्कार के विषय में बताऊंगा । समग्र धर्म वीरान ही में है । असाध् वेदांत दर्शन के विशिष्टाद्वैत और अद्वैत इन तीन सरोया भूमि गांव में है और ये एक के बाद एक आते हैं तथा म निश्चित ही आध्यात्मिक उन्नति की क्रमसे ये तीन भूमिकाएँ प्रतीक भूमिका आवश्यक है हिसार रूप से धर्म है भारत की नाना प्रकार की । जातीय आचार व्यवहार और धर्म मदों में वी दांत के प्रयोग का नाम है हिन्दू धर्म । यूरोप की जातियां विचारों में उसकी पहली भूमिका ऍफ का प्रयोग है । इसाई धर्म सेमेटिक जातियों में उसका प्रयोग इस्लाम धर्म अद्वैतवादी, अपनी योगा, अनुभूति के आकार में हुआ बहुत धर्म इत्यादि । अस्तियानी धर्म का अर्थ है बेदान उसका विभिन्न राष्ट्र के विभिन्न प्रयोजन, परिवेश, इवन, अन्याय व्यवस्थाओं के अनुसार विभिन्न रूपों में बदलता ही रहेगा । इससे मन में जो अच्छा उत्साह उत्पन्न हुआ था, उसे मेरी हेल्थ के नाम नहीं । अठारह सौ छियानवे के पत्र में लिखा है मैं सब कुछ नवीन देखना चाहता हूँ । पुराने ध्वंसावशेष के चारों ओर आलसी की तरह चक्कर लगाना, अतीत इतिहासों को लेकर सारा जीवन हाय आय करना था । प्राचीनकाल के लोगों की बातों का चिंतन कर निराशा की दिल विश्वास छोडने के लिए मैं कतई तैयार ना । मेरे खून में जो जोश है, उसके कारण ऐसा करना मेरे लिए संभव नहीं । समस्त भावनाओं को प्रकाश में लाने के लिए उपयुक्त स्थान, पात्र तथा सहयोग की सुविधाएं एकमात्र अमेरिका ही में है और मैं भी आमूलचूल नहीं देखना चाहता हूँ कि परिवर्तन विरोधी जेली मछली, किसी चिंता, उस विराट पूंछ के लिए मुझ से कुछ हो सकता है क्या नहीं? मैं उन प्राचीन संस्कार को दूर हटाकर नवीन रूप से प्रारंभ करना चाहता हूँ । एकदम संपूर्ण नवीन सरल किंतु साथ ही साथ सबल सर्दी आजाद शिशु की तरह नवीन तथा सकते हैं । मतलब ये हैं कि विवेकानंद अपने भीतर जो आग लेकर गए थे, पांच चार के विज्ञान के संपर्क में आकर हाँ प्रचंड से प्रचंडता होगी । उसने श्वेत शिखा का रूप धारण कर लिया । इस वे अग्निशिखा को हृदय में धारण किए इंग्लैंड से रोज होते हुए अठारह सौ के आरंभ में स्वदेश लौट आए ।

8. Swami Vivekanand

चैप्टर, सेवन, वेदांत और विश्वबंधु समग्र मानव जाति कल्याण के लिए कार्य करते रहूँ । तुम एक संकीर्ण के अंदर बंदे रहकर अपने को शुद्ध हिंदी समझने का जो गर्व करते हो उसे छोड हाँ विवेकानन्द चार बजे का प्रवास हुआ । पंद्रह जनवरी अठारह सौ सन ध्यान में विवेकानंद कोलंबो पहुंचे । वहाँ लंका निवासी भारतीयों ने कोलंबो और पाँच दिन में उनका भव्य स्वागत किया । फिर भारत की भूमि पर रामनाथ मधुरा मद्रास कल के तहत त्यादि जहाँ भी गए उनका इसी तरह भाग्य स्वागत हुआ । रामनाथ अर्थात रामेश्वरम में उनका जुलूस निकाला । राजीव रीति के अनुसार ने सम्मान देने के लिए वहाँ का राजा उनके रथ में जो स्वागत सम्मान से उनके मन में जो उछाल उत्पन्न हुआ उसे अपनी चहीती बहन मेरी हेल के नाम अट्ठाईस की फिल्म के पत्र में जो व्यक्त किया है ये सारा देश मेरे स्वागत के लिए प्राण होकर उठ खडा हुआ । राजस्थान में हजारों लाखों मनीष नही जय स्वीकार किया । राजाओं ने में गाडी खींची, राजधानियों के मार्गों पर हर कहीं स्वागत द्वार बनाए गए जिनपर शानदार, आदर्श, वासिया, अंकित आदि आदि । एक तिफाक की बात है कि इन्हीं दिनों धर्म महासभा के अध्यक्ष बरोज बीसाई धर्म का प्रचार करने भारत है पर वे असफल लौटे । विवेकानंद अपने इसी पत्र में लिखते हैं, मुझे आशा है कि डॉक्टर बरोज इस समय अमेरिका पहुंच गए होंगे । विचारें यहाँ कट्टर ईसाई धर्म का प्रचार करने आए थे और जैसा होता है, किसी ने उनकी नासिक इतना अवश्य है कि उन्होंने प्रेमपूर्वक उनका स्वागत किया, परंतु मेरे पत्र के कारण ही था । मैं उन को भी तो नहीं दे सकता था । इसके अतिरिक्त भी कुछ विचित्र स्वभाव के व्यक्ति थे । मैंने सुना है कि मेरे भारत आने पर राष्ट्र निजी खुशी मनाई, उससे जलन के मारे में पागल हो गए थे । कुछ भी हो तो लोगों को उनसे बुद्धिमान व्यक्ति भेजना उचित था, क्योंकि डॉक्टर बरोज के कारण हिंदू के मन में धर्म प्रतिनिधि, सभा, एक स्वांग सी बंदी, अध्यात्म विद्या के संबंध में पृथ्वी का कोई भी राष्ट्र हिन्दुओं का मार्ग प्रदर्शन नहीं कर सकता । और विचित्र बात तो ये है कि ईसाई देशों में जितने लोग यहाँ आते हैं, वे सब एक ही प्राचीन मूर्खतापूर्ण तर्क देते हैं कि ईसाई धनवान और शक्तिमान हैं और हिंदू नहीं । इसलिए इसाई धर्म हिन्दू धर्म की अपेक्षा श्रेष्ठ है । इस पर हिंदू उचित ही ये प्रत्युत्तर देते हैं कि यही कार्य हैं, जिससे हिंदू मत धर्म कहला सकता है और इसाई मत नहीं । इस पाशविक संसार में अधर्म और धूर्तता ही फल दी है । गुणवान को तो दुःख भोगना पडता इसी संबंध में एक दूसरी घटना भी । उल्लेखनीय विवेकानंद जब कलकत्ता पहुंचे तो वहां अकाल पडा हुआ । लोगों का ख्याल था कि उनके स्वागत पर खर्च ना करके कुल पैसा दुर्भिक्ष निवारण फण्ड में चंदा दे दिया जाएगा । पर उन्होंने ऐसा न करके अपना जुलूस निकलवाना ही पसंद किया । बाद में जब एक शिष्य ने पूछा कि उन्होंने ऐसा क्यों किया तो स्वामी जी ने उत्तर दिया हाँ मेरी इच्छा थी कि मेरे लिए खूब धूम धाम हो । बात किया है । जानता है थोडी धूमधाम हुए बिना उनकी श्रीरामकृष्ण के नाम से लोग कैसे परिचित होंगे और उनसे प्रेरित कैसे होंगे? इतना स्वागत से मान किया मेरे लिए किया गया है । नहीं ये तो उन्हीं के नाम का जायजे कार हुआ है । उनके बारे में जानने की लोगों के मन में कितनी इच्छा जागृत हुई । जब लोग क्रमशः जानेंगी तभी तो देश का मंगल होगा जो देश के मंगल के लिए आए हैं, उन को जाने बिना देश का मंगल किस प्रकार होगा । उनको ठीक ठीक जान लेने से मनुष्य तैयार होंगे और मनीष यदि तैयार हो गए तो दुबे रक्षा आदि को दूर करना फिर कितनी देर की बात है । देश का मंगल ही उनके सब कार्यों में सर्वोपरि था । व्यक्ति निरपेक्ष होकर राष्ट्र में बन गए थे और राष्ट्र की आत्मा को झन जोडना जागृत करना ही उनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य उन्नीस सौ में जब दोबारा विदेश यात्रा पर गए तो सत्ताईस जनवरी को किसान देना कि शेक्सपीयर क्लब में मेरा जीवन तथा दिए विषय पर बोलते हुए उन्होंने कहा था, आपने स्वर्ण ढंग से जो कुछ भी मैं करता हूँ, उसको समझाने के लिए मैं तुमको कल्पना द्वारा भारत ले चलेंगे । विषय के सभी ब्यौरों और सूचना विवरणों में जाने का समय नहीं है और ना एक विशेष जाती की सभी जटिलताओं को इस अल्पसमय में समझ पाना तुम्हारे लिए संभव है । इतना कहना ही पर्याप्त होगा कि मैं कम से कम भारत की एक लघु रूपरेखा तुम्हारे समुख प्रस्तुत करने का प्रयास करूंगा । अपने ही देश में ऐसे बुद्धिजीवियों की कमी नहीं निकले की अपनी बेशिक शिक्षा द्वारा जिनका भारतीयकरण हो चुका है और वे इस धरती पर रहते हुए विदेशी बने हुए हैं, वे विवेकानंद हो चुका है । विवेकानंद के दर्द को क्या जाने, उनके उद्देश्य को क्या समझे । जब वे देश को देशी नहीं मानदेय तो उसके हजारों साल की जीवन की जटिलता हो । उस की समस्याओं से उन्हें क्या मतलब विषय था मेरा जीवन इस पर विवेकानन्द अपने विदेशी श्रोताओं को बता रहे थे । भारत खंडहरों में भीड हुई पडी एक विशाल इमारत के सुरेश पहले देखने पर आशा की कोई किरण नहीं मिलती । वो एक विगडर भगना वशिष्ठ राष्ट्र है पर थोडा और उनको रुककर देखो जान पडेगा इनके परे कुछ और भी हैं पर ये जो कुछ है उसे देखने के लिए दरकार है । जीने के लिए संघर्ष करती आ रही जनता के प्रति सहानुभूति, इतिहास तथा परंपरा का समय ज्ञान और उस ज्ञान से उत्पन्न दूरदृष्टि मेरे कारण कहते चले गए । अब भारत राजनीतिक शक्ति नहीं, आज दासता में बंदी हुई चाहती है । अपने ही प्रशासन में भारतीयों की कोई आवाज नहीं । उन का कोई स्थान नहीं । वे हैं केवल तीस करोड गुलाम और कुछ नहीं । भारतवासी की औसत आए डेढ रुपया प्रतिमाह है । अधिकांश जनसमुदाय की जीवन चर्या उपवासों की कहानी है और जरा सी आई कम होने पर लाखों कालकवलित हो जाते हैं । छोटे से अकाल करते हैं मृत्यु इसलिए जब मेरी दृष्टि उस ओर जाती है तो मुझे दिखाई पडता है । नाश असाध्य ना फिर भी जाती कि सजीवता इस देश का दिए धर्म है और क्योंकि धर्म पर अभी आगात नहीं हुआ । अच्छा ये जाती जीवित राजनीतिक और सांस्कृतिक लडाई धर्म के माध्यम से भी लडी जाती है और हर देश में लडी गई दूर जो की जरूरत नहीं । यूरोप के बुर्जुआ ने सामंतवाद के विरुद्ध अपनी लडाई धर्म के माध्यम से लडी । कौन नहीं जानता कैथोलिक मारते हुए सामंतवाद का और प्रोटेस्टेंट उभरते हुए पूंजीवाद का धर्म था प्रोटेस्ट इंडोको आदमी जीवित चलाया गया पर अंत में उनकी जीत हुई । फॅसने लिखा है प्रोटेस्टेंट धर्म इसलिए जीवित रहा कि उभरता हुआ बुर्जुआ जाएगा । अब बुर्जुवा काफी सुदृढ हो गया तो अपने शासकों के विरुद्ध उसके संघर्ष ने राष्ट्रव्यापी रूप धारण कर लिया । पहला महान आंदोलन जर्मनी में सुधारवाद कहलाया, पर इधर जर्मनी में लूट, फिर उधर फ्रांस में काल मीन हुआ । कालवी ने फ्रांसीसी तीक्ष्ण बुद्धि के बाद सुधार बाद के बुर्जुवा चरित्र को उजागर किया और वह चर्चा को प्रजातान्त्रिक रूप देने में सफल हुआ । जबकि जर्मनी में लू थ्री सुधारवाद भ्रष्ट हो जाने से देश का विनाश हुआ । कालपेनी सुधारवाद, जिनेवा, हॉलैंड और स्कॉटलैंड में प्रजातंत्र वादियों की पटाखा बन गया । हॉलैंड को स्पेन से और जर्मन राज्य से मुक्त कराया और इंग्लैंड की बुर्जुवा क्रांति के दूसरे चरण में विचारधारात्मक परिधान का काम दिया । फॅसने ये निष्कर्ष निकाला अतेफ हम देखते हैं धर्म जब अस्तित्व में आ जाता है तो उसमें परंपरागत तक वो हमेशा नहीं रहेगा । पर इस तत्व में होने वाले रूपांतर वर्ग संबंधों में उद्भव होते हैं । यानी जो लोग परिवर्तन लाते हैं उनकी आर्थिक संबंधों इसका कारण मंत्री उन्नीसवी सदी के उत्तरार्ध में हमारे देश में जो पूंजीपति वर्ग पैदा हुआ वहीं सुधार वर अथवा नवजागरण की मुख्य शक्ति था । वह विदेशी शासकों से राजनीतिक तथा आर्थिक क्षेत्र में लोहा लेने में अक्षम था । उस की संस्कृति पर भी बाहर और भीतर से आक्रमण हो रहा हूँ । सवाल ये था की वाइस आक्रमण का मुकाबला कैसे करें? वो अपने पूर्वजों से विरासत में मिली सभ्यता को विदेशी शासकों की औद्योगिक सभ्यता से बेहतर बताए तो कैसे? वो एक कठिन समस्या थी । देश भक्त बुर्जुआ ने इसका हल ये निकाला कि उसने अपनी सफलता को विशेष रूप से आध्यात्मिक बताया । बहुत एक साधनों के पीछे दौडना उसका लक्ष्य ना पहले कभी था वरना आगे कभी होगा त्याग और बैराम की हमारा प्रधान जीवन देश अतोएव राष्ट्रीय चेतना के प्रवक्ता हाँ विवेकानन्द हम बडे गर्व से कहते हुए सुनते हैं, मैंने पांच यात्री देशों में भ्रमण किया है और मैं भिन्न भिन्न देशों में बहुत सी जातियों से मिला जुला हूँ और मुझे लगता है कि प्रत्येक राष्ट्र और प्रतीक जाती का एक ना एक विशिष्ट आदर्श अवश्य होता है । राष्ट्र के समस्त जीवन में संचार करने वाला एक महत्वपूर्ण आदर्श कह सकते हैं कि वह आदर्श जीवन रीड होती है । परंत भारत का मेरूदंड राजनीति नहीं है, सैन्यशक्ति नहीं है । व्यावसायिक आधी पत्ती भी नहीं और न यांत्रिक शक्ति है वरन धर्म केवल धर्म ही हमारा सर्वस्व और उसी को हमें रखना भी है । जिस प्रकार उन्होंने मूर्ति पूजा की शिक्षा व्याख्या की थी, उसी प्रकार इस राष्ट्रीय भावना की भी ऐसी सुंदर और काव्यमय व्याख्या करना विवेकानंद का ही काम था । श्रोताओं में राष्ट्रीय गौरव जगाने के लिए उन्होंने बात जारी रखी । एक बात यहाँ पर ध्यान में रखने योग्य है । जिस प्रकार अन्य देशों के अच्छे और बडे आदमी भी स्वयं इस बात का गर्व करते हैं कि उनके पूर्वज किसी एक बडे डाकुओं के गिरोह कि सरदार थे, जिस समय समय पर अपनी पहाडी गुफाओं से निकलकर बट ओहियो पर छापा मारा करते थे, इधर हम हिंदू लोग इस बात पर गर्व करते हैं कि हम उन ऋषियों तथा महात्माओं के वंशज है जो वन के फल फूल के आहार पर पहाडों की कंदराओं में रहते थे तथा ब्रह्मा चिंतन में मग्न रहते हैं । भले ही आज हम अच्छा पति और पथभ्रष्ट हो गए हो और चाहे जितने भी पथभ्रष्ट होकर क्यों ना गिर गए हो, बहन की ये निश्चित है कि आज यदि हम अपने धर्म के लिए तत्परता से कार्य संलग्न हो जाए तो हम अपनी गौरव प्राप्त कर सकते हैं । किसी प्रकार जब भी लंदन में भारत के गौरव का बखान कर रहे थे तो किसी श्रोता ने पूछा भारत के हिंदुओं ने क्या किया है? वे आज से किसी जाति पर विजय प्राप्त नहीं कर सकते । नहीं कर सके नहीं चाहिए कि उन्होंने नहीं किया । स्वामी जी ने उत्तर दिया और यही हिंदू जाति का गौरव है कि उसने कभी दूसरी जाति के रक्त से पृथ्वी को रंजीत नहीं किया । वे दूसरे के देश पर अधिकार क्यों करेंगे? कुछ धन की लालसा से भगवान ने हमेशा से भारत को दाता के महिमा में आसन पर प्रतिष्ठित किया है । भारतवासी जगत के धर्मगुरु रहे हैं । वे दूसरों के धन को लूटने वाले डाकुना । इसलिए मैं अपने पूर्वजों पर कर्व करता हूँ और उन्होंने अपनी कलकत्ता के भाषण में कहा था प्रत्येक जाति के लिए उद्देश्य साधन की अलग अलग कार्यप्रणालियां हैं । कोई राजनीति, कोई समाजसुधार और कोई दूसरे विषय को अपना प्रधान आधार बनाकर कार्यकर्ता हमारे घर में की पृष्ठभूमि लेकर कार्य करने के सिवा दूसरा कोई उपाय नहीं । अमरीकी शायद समाजसुधार के माध्यम से भी धर्म समझते हैं परन्तु हिंदू राजनीति, समाजविज्ञान और दूसरा जो कुछ है सबको धर्म के माध्यम से समझाते हैं । जातीय जीवन संगीत कमांडो यही प्रधान सुंदर है और उसी प्रधान सफर के नष्ट होने की शंका हो रही थी । ऐसा लगता था मानो हम लोग अपने जातीय जीवन की इस मूलभाव को हटाकर उसकी जगह दूसरा भाव स्थापित करने जा रहे थे । अपनी चाहती है जीवन के धर्म रूप मेरूदंड की जगह राजनीति का मेरूदंड स्थापित करने जा रहे हैं । यदि इससे हमें सफलता मिलती तो इसका फल पूर्ण विनाश होता परन्तु ऐसा होने वाला नहीं था । यही कारण है इस महाशक्ति रामकृष्ण का आर्विभाव हुआ । मुझे इस बात की चिंता नहीं है कि तुम इस महापुरुष को किस अर्थ में ग्रहण करते हो और इसके प्रति कितना आदर करते हो । इन तो मैच में ये चुनौती के रूप में अवश्य बता देना चाहता हूँ कि अनेक शताब्दियों से भारत में विद्यमान अद्भुत शक्ति का ये प्रकट रूप है और हिंदू के नाती तुम्हारा ये कर्तव्य है कि तुम्हें शक्ति का अध्ययन करो तथा भारत के कल्याण, उसकी पुनरुत्थान और समस्त मानव जाति के हित के लिए शक्ति के द्वारा क्या कार्य किए गए हैं, इसका पता लगा हूँ । मैडम को विश्वास दिलाता हूं कि संसार की किसी भी देश में सार्वभौम धर्म और विभिन्न संप्रदायों में ब्रात प्रभाव के उत्थान पे और पर यायोचित होने के बहुत पहले ही इस नगर के पास एक ऐसे महापुरुष थे जिनका सम्पूर्ण जीवन एक आदर्श धर्म महासभा का स्वरूप था । रामकृष्ण परमहंस के विश्वधर्म और विश्वबंधुत्व के सार्वभौम आदर्श की व्याख्या करते हुए उन्होंने आगे कहा, जैसे तुम लोगों ने कहा है हमें संपूर्ण संसार जीतना है । हाँ, हमें यही करना हूँ । भारत को बच्चे ही संसार पर विजय प्राप्त करनी है । इसकी अपेक्षा किसी छोटे आदर्श से मुझे कभी भी संतोष ना होगा । ये आदर्श संभव है । बहुत बडा हो और तुम में से अनेको । इसे सुनकर आश्चर्य होगा । हिन्दू हमें इसे आदर्श बना रहे हैं । या तो हम संपूर्ण संसार पर विजय प्राप्त करेंगे या मिट जायेंगे । इसके सिवा और कोई विकल्प नहीं जीवन का चिन्ह है विस्तार हमें संकीर्ण सीमा के बाहर जाना होगा । विजय का प्रसार करना होगा और ये दिखाना होगा कि हम जीवित है अन्यथा हमें इस पतन की दशा में सडकर मरना होगा । इसके सिवा कोई दूसरा रास्ता नहीं । इन दोनों में से एक चुन लो । सिर्फ जियो या मरो, छोटी छोटी बातों को लेकर हमारे देश में जो वेश और कला हुआ करता है वो हम लोगों में सभी को मालूम है । परंतु मेरी बात मानो ऐसा सभी देशों में हैं जिन सब देशों के जीवन का मेरूदंड राजनीति है । ये सब राष्ट्र आत्मरक्षा के लिए वैदेशिक नीति का सहारा लिया करते हैं । जब उनके अपने देश में आपस में बहुत अधिक लडाई झगडा आरंभ होता है तब भी किसी विदेशी राष्ट्र से झगडा मोल लेते हैं । इस तरह तत्काल घरेलू लडाई बंद हो जाती है । हमारे भीतर भी रहा विवाद है परंतु से रोकने के लिए कोई वैदेशिक नीति नहीं । संसार की सभी राष्ट्र में आपने शास्त्रों का सत्य प्रचार की हमारी सनातन वैदेशिक नीति होनी चाहिए । ये हम एक अखंड जाती के रूप में संगठित करेंगे । तुम राजनीति में विशेष रुचि रखने वाले सही मेरा प्रश्न है कि क्या इसके लिए तुम कोई प्रमाण चाहते हो । आज की सभी इसे मेरी बात का ये देश प्रमाण मिल सकता है । पूंजीवाद स्वाभाव वजह विस्तार चाहता है । हमारे उभरते हुए बुर्जुवा ने अपनी आध्यात्मिक शक्ति से संसार को जीतना अपना आदर्श घोषित किया । इससे एक तरफ उन्होंने साम्राज्यवादी अंधराष्ट्रवाद के मुकाबले बुर्जुआ अंधराष्ट्रवाद को प्रस्तुत करके अपने अतीत की रक्षा की और इसमें गर्व कार्यक्रम क्या दूसरी तरफ इसे सनातन वैदेशिक नीति बनाकर गृह विवाद मिटाने और एक अखंड जाती के रूप में संगठित होने का प्रयत्न किया । पश्चिम के पूंजीवाद ने जब साम्राज्यवाद का रूप धारण किया तो वह सैन्य और औद्योगिक सभ्यता में तो श्रेष्ठ आई लेकिन विजित जातियों को मानसिक रूप से निहत्था करने के लिए अपने धर्म को भी उनके धर्म से श्रेष्ठ बताया और इसाईयत को विश्व धर्म का सिद्धांत उन्ही के द्वारा गढा गया मिशनरी बीच है । मतलब ये है कि विश्व धर्म का सिद्धांत उन्हीं के द्वारा गढा गया । मिशनरियों का दावा ये था कि इसाई धर्म चूकी समृद्धि का और विजय गांव का धर्म है इसलिए सब धर्मों से श्रेष्ठ है । विवेकानंद ने अपने कुंभकोणम के भाषण में उनके इस दावे पर यह प्रहार किया । संसार में जितने भी धर्म हैं, उनमें प्रत्येक की श्रेष्ठता स्थापित करने के अनोखे अनोखे दावे सुनने का मुझे अभ्यास हो गया है । तुमने भी शायद हाल में मेरे बडे मित्र डॉक्टर बरोज द्वारा पेश किए गए दावे के विषय में सुना होगा । ईसाई धर्म भी एक ऐसा घर में हैं जिससे सार्वजनिक कह सकते हैं । मैं अब इस प्रश्न की मिमांसा करूंगा और तुम्हारे समंदर को को प्रस्तुत करूंगा जिन के कारण मैं मैदान सिर्फ वेदांत की को सार्वजनिक मानता हूँ और मैदान के सिवा कोई अन्य धर्म में सार्वजनिक नहीं कहना सकता । हमारे विदानसभा घर में के सिवा दुनिया कि रंगमंच पर जितने भी अन्याय धर्म है वो उनके संस्थापकों की जीवन के साथ सम्पूर्णता, संश्लिष्ट और सम्बन्ध है । उनके सिद्धां, उनकी शिक्षाएं, उनके मत और उन का आचार शास्त्र जो कुछ है, सब किसी ना किसी धर्म संस्थापक के जीवन के आधार पर ही खडे हैं और इसी से वे अपने आदर्श प्रमाण और शक्ति ग्रहण करते हैं । और आज श्री तो ये है कि उसी अधिष्ठाता विशेष की जीवन की ऐतिहासिकता ही पर उसकी सारी नहीं प्रतिष्ठित है । यदि किसी तरह उसके जीवन की ऐतिहासिकता पर आघात लगे जैसा कि वर्तमान युग में प्राया देखने में आता है कि बहुधा सभी धर्म संस्थापक को और अधिष्ठाताओं की जीवनी के आधे भाग पर भी संदिग्ध दृष्टि से देखा जाता है और जब ऐसी स्थिति है कि तथा कथित ऐतिहासिकता की चट्टान मिल गई है और ध्वस्त हो रही है तब संपूर्ण भवन अगर आकर गिर पडता परसदा के लिए अपना महत्व खो देता है । फिर अपना दावा पेश करते हुए उन्होंने कहा कि हमारा धर्म कुछ तत्वों की नींव पर खडा है । हमारे घर में में जितने अवतार, महापुरुष और ऋषि है और किसी धर्म में हैं । इतना ही नहीं हमारा धर्म यहाँ तक कहता है कि वर्तमान तथा भविष्य में और भी बहुत धीरे महापुरुष और अवतार आविर्भूत होंगे । हमारे देश में निष्ठा रूपी जो अपूर्वा सिद्धांत प्रचलित है जिसके अनुसार इनमान धार्मिक व्यक्तियों में से अपना इष्ट देवता चुनने की पूरी स्वाधीनता दी जाती है । तुम चाहे जिस अफतारी आचार्य को अपने जीवन का आदर्श बनाकर विशेष रूप से उपासना करना चाहूँ कर सकते हैं । यहाँ तक कि तुमको सोचने की भी स्वाधीनता है कि जिसको तुम ने स्वीकार किया है वो सब पैगम्बरों में महान है और सब अवतारों में श्रेष्ठ है । इसमें कोई आपत्ति नहीं परंतु सनातन तत्व समूह ही पर तुम्हारे धर्म साधन की नहीं होनी चाहिए । यहाँ बहुत किये हैं कि जहाँ तक वे वैदिक सनातन सिद्धांतों के ज्वलंत उदाहरण हैं, वहीं तक हमारे अवतार मान्य हैं । भगवान कृष्ण कम हाथ मियां यही है कि वे भारत में इसी तत्ववादी सनातन धर्म के सर्वश्रेष्ठ प्रचारक और वेदांत के सर्वोत्कृष्ट व्याख्याता हुए हैं । संसार भर के लोगों को वेदान्त के विषय में ध्यान देने का दूसरा कारण ये हैं कि संसार के समस्त धर्मग्रंथों में एकमात्र वेदांत की ऐसा धर्मग्रंथ है जिसके शिक्षाओं के साथ आना प्रकृति के वैज्ञानिक अनुसंधान से प्राप्त परिणामों का संपूर्णा सामन जैसी है । रामकृष्ण परमहंस की आदर्श जितने मत उतने पर का मतलब है कि सभी धर्म सकती है और जो जिस धर्म को मानता है उसके लिए वही ठीक हैं । ये धर्मों का समन्वय नहीं समझौता है और भी कहीं की शांति में अस्तित्व का जीजू और जीने दो का सिद्धांत पर विवेकानन्द ने आक्रामक रुख अपनाया और दूसरों का विश्वधर्म का दावा रद्द कर के अपना दावा पेश किया । यहाँ क्रामक रुख उन्होंने धर्म महासभा ही मैं तैयार कर लिया था और अख्तियार कर लेना आवश्यक तथा अनिवार्य बिता क्योंकि नवजागरण की तरह मैंने उन्हें जबरदस्ती वहाँ का था और उन्हें धर्म के माध्यम से राजनीति की लडाई लडने नहीं । इस सिलसिले में उनका मस्तिष्क साफ था । वो स्वयं कहते हैं । सच्ची बात ये है कि धर्म महासभा का उद्देश्य लेकर अमेरिका नहीं किया । वहाँ सभा मेरे लिए गौरव वस्तु थी । उससे हमारा रास्ता बहुत कुछ साफ हो गया और कार्य करने की बहुत कुछ सुविधा हो गई । परंतु वास्तव में हमारा धन्यवाद । संयुक्त राज्य अमेरिका के निवासी सेंटर दें आती थी, महान अमरीकी जाती को मिलना चाहिए जिसमें दूसरी जातियों की अपेक्षा बृहत भाव का अधिक विकास हुआ है । पांच मई अठारह सौ पंचानवे को उन्होंने आला सिंगा पेरूमल के नाम अपने पत्र में लिखा था अगर तुम यूरो और अमेरिका में उपदेश देने के लिए बारह शिक्षित दृढ चेता मनुष्य को यहाँ भेज सको और कुछ साल तक उन्हें रख सको तो इस भर्ती राजनीतिक और नैतिक दृष्टि से दोनों तरह की भारत की अपरिमित सेवा हो जाए । प्रत्येक मनुष्य जो नैतिक दृष्टि से भारत के प्रति सहानुभूति है, वहाँ राजनीतिक विषयों में भी उसका मित्र बन जाता है । इसी पत्र में उन्होंने अपने इस नए अविष्कार की चर्चा की थी कि द्वैत विशिष्टाद्वैत और अद्वेत विधान दर्शन की तीन अवस्थाएं हैं और ये अवस्थाएं एक के बाद एक क्रमशः आती है । इसलिए समग्र धर्म वेदांती में आते हैं । ये समन्वय का सिद्धां है । इस पर वे पुस्तक भी लिखना चाहते थे, शायद लिख नहीं पाए । पर अपने इस न्यूटन अविष्कार के बाद उन्हें ये विश्वास अवश्य हो गया था कि वेदांत ही वीर सवेर विश्वधर्म बनने जा रहा है । और इसी पर भारत का और समूची मानव जाति का भविष्य निर्भर हैं और इसी से विश्वबंधुत्व कास्ट सपने साकार होगा । अतेम हमने उन्हें अपने मद्रास के भाषण में जिसे हम पिछले परिच्छेद में उत्पद कर चुके हैं, कहते हुए सुना क्या हमें केवल अपने ही देश को जगाना होगा? नहीं, ये तो कुछ बात है । मैं कल्पनाशील मनुष्य हूँ । मैं ये भावना है कि हिंदू जाती सारे संसार पर विजय प्राप्त करेगी और भारत लौटने से पहले लंदन में यही विचार व्यक्त करने पर इंडिया के संवाददाता ने सवाल किया था और भारत अंत में आपने विजेताओं पर विजयी होगा? हाँ, विचारों के क्षेत्र में इंग्लैंड के पास हथियार है, सांसारिक समृद्धि है, वैसे ही जैसे उससे पहले हमारे मुसलमान विजेताओं के पास फिर भी महान अकबर व्यावहारिक रूप में हिन्दू हो गया था । शिक्षित मुसलमानों, सूफियों को हिंदुओं से अलग कर पाना कठिन है । अटेर कल्पनाशील विवेकानंद भारत के दरिद्र जन के लिए आर्थिक सहायता पाने का स्वप्न देखते हुए विदेश गए थे, जो अमेरिका पहुंचते ही टूट गया और आध्यात्मिक विचारों के आधार पर विश्वविजय का स्वप्न देखते हुए स्वदेश लौटे । दरअसल ये उनका अपने स्वस्थ है । नहीं, हमारे उभरते हुए पूंजीपतियों और उनके बुद्धिजीवियों का सपना था । यही उनकी वैदेशिक नीति थी और इसी आधार पर गृह विवाद और कुसंस्कारों को हटाकर राष्ट्रीय एकता संगठित करने की बात सोची गई और हम विवेकानंद को हमारा प्रस्तुत कार्य नाम के भाषण में कहते हुए सुनते हैं इसलिए मद्रासी नवयुवको । मैं विषेशकर तो भी कोई नहीं याद रखने को कहता हूँ । हमें बाहर जाना ही पडेगा । अपनी आध्यात्मिकता तथा दार्शनिकता से हमें जगत को जीतना होगा । दूसरा कोई उपाय नहीं है । अवश्य में वैसे करो या मरो, राष्ट्रीय जीवन सतेज और प्रबुद्ध राष्ट्रीय जीवन के लिए । बस यही एक शर्त है कि भारतीय विचार विश्व पर विजय प्राप्त करें । कालिदास ने अपनी कभी कल्पना से मेरे को यक्ष का दूध बनाया और दक्षिण से उत्तर जाने का मार्ग बताते हुए उस भारत की महानता विशाल का तथा सौन्दर्य का मोहक आकर्षक चित्र प्रस्तुत किया, जिसके एकीकरण का ऐतिहासिक कार्य गुप्तवंश की तलवार द्वारा संबंध हो रहा था । फिर इसी एकता को भावात्मक स्तर पर सदृढ बनाने के लिए शंकराचार्य भी दक्षिण ही से उठे और उन्होंने बहुत कुसंस्कारों से संघर्ष करते हुए उत्तर दक्षिण पूर्व पश्चिम की चार दिशाओं में चार धाम स्थापित किए और तीसरी बार जबकि देश गुलामी की जंजीरों में जकडा हुआ था । आध्यात्मिकता तथा दार्शनिकता के आधार पर अखंड राष्ट्र एक का निर्माण करने का कार्यभार विवेकानंद ने अपने कंधों पर लिया और दक्षिण से उत्तर रामनाथ से अल्मोडा तक उन्होंने जो पता का फहराई उस पर मैदान का जन्म होश यत्र जीव तत्र शिव अंकित था । इस जान भूज की सैद्धांतिक व्याख्या उन्होंने योगी जब हम अपने आपको शरीर समझते हो तब तुम अनंत अग्नि की स्पेलिंग हूँ । जब हम अपने आपको आत्मस्वरूप मानते हो तभी तुम विश्व हूँ । अब वे देश की भूमि पर थे । विदेश में जो बातें उन्होंने नहीं कही, कहना उचित भी नहीं था । वो अब खुलकर कहीं भ्रम, भ्रांतियों को तोडने और कुछ संस्कार की जाली को काटने के लिए उन्होंने आलोचना और आत्मालोचना की खडका निर्भिकता से प्रयोग किया । इसके बिना जनसाधारण के बीच पहले अंतर्विरोध होगा, निराकरण संभव नहीं था, पाते । ढाका में दिए गए मैंने क्या सीखा? भाषण में कहते हैं यद्यपि मैं पश्चिम के बहुत से सबसे देशों में घूम चुका हूँ, पर अपने देश के इस भाग के दर्शन का सौभाग्य मुझे नहीं मिला था अपनी जन्मभूमि बंगाल की इस अंचल की विशाल नदियों, विस्तृत उपजाऊ मैदान रमणी ग्रामों का दर्शन पाने पर मैं अपनी कृतज्ञता प्रकट करता हूँ । मैं नहीं जानता था कि इस देश के जल और स्थल सभी में इतना सौन्दर्य तथा आकर्षण भरा पडा है । किन्तु नाना देशों के भ्रमण से मुझे ये लाभ हुआ कि मैं विशेष रूप से अपने देश की सौन्दर्य का मूल्यांकन कर सकता हूँ । किसी प्रकार में पहले धर्म जिज्ञासा से, नाना संप्रदायों में अनेक जैसे संप्रदायों में जिन्होंने दूसरे राष्ट्र के भावों को अपना लिया है, भ्रमण करता था, दूसरों के द्वार पर भीक्षा मांगता था । तब मैं जानता नहीं था कि मेरे देश का धर्म, मेरी जाति का धर्म इतना सुन्दर और महान है । कई वर्ष हुए । मुझे पता लगा कि हिन्दू धर्म संसार का सर्वाधिक पूर्ण संतोषजनक धर्म हैं । पता था मुझे ये देखकर हार्दिक क्लेश होता है कि यद्यपि हमारे देशवासी अप्रतीम धर्मनिष्ठ होने का दावा करते हैं, पर हमारे इस महान देश में यूरोपीय ठंड के विचार फैलने के कारण उन में धर्म के प्रति व्यापक उदासीनता आ गई हैं । हाँ, ये बात जरूर है और उसमें मैं भलीभांति अवगत हूँ कि उन्हें जिन भौतिक परिस्थितियों में जीवन यापन करना पडता है, प्रतिकूल है । इन प्रतिकूल भौतिक परिस्थितियों ने विभिन्न स्तरों के जिन विचारशील लोगों का निर्माण किया था विवेकानंद ने उनका वर्गीकरण इस प्रकार क्या है? वर्तमानकाल में हम लोगों के बीच ऐसे कुछ सुधारक है जो हिंदू जाति के पुनरुत् तीन के लिए हमारे धर्म में सुधार क्या योग रही है, पलट पलट करना चाहते हैं, निसंदेह है । उन लोगों में कुछ विचारशील व्यक्ति है लेकिन साथ ही ऐसे बहुत से लोग भी है जो अपने उद्देश्य को बिना जानी दूसरों का अंधानुकरण करते हैं । इस वर्ग के सुधारक हमारे धर्म में विजातीय विचारों का प्रवेश करने में बडा उत्साह दिखाते हैं । कहते हैं कि हिन्दू धर्म सच्चा धर्म नहीं है क्योंकि इसमें मूर्ति पूजा का विधान है । मूर्ति पूजा क्या है? ये अच्छी है या बुरी, इसका अनुसंधान कोई नहीं करता । केवल दूसरों की इशारे पर भी हिन्दू धर्म को बदनाम करने का साहस करते हैं । एक दूसरा वर्ग और भी है जो हिंदू के प्रतीक रीति रिवाजों में वैज्ञानिकता ढूंढ निकालने का लचर प्रयत्न कर रहे हैं । वे सदा विद्युतशक्ति जिम की शक्ति, वायु कंपनी तथा उसी तरहा की अन्य बातें किया करते हैं । कौन कह सकता है कि वे लोग एक दिनेश्वर की परिभाषा करने में उसे विद्युत कम्पन का समूह ना डाले । विदेशी शासकों ने हमारे धर्म पर ना सिर्फ इसाई मिशनरियों द्वारा बल्कि विज्ञान के द्वारा भी आक्रमण किया । धर्म पर आक्रमण का मतलब था संस्कृति और परंपरा पर हूँ । विवेकानंद समझते थे और मार्क्सवादी होने की तीन हांकने वाले फॅमिली जीवी भी समझ रखे की धार्मिक विचारधारा जब एक बार विभिन्न संस्थाओं का भौतिक रूप धारण कर लेती है और वर्ग विभाजित समाज के हजारों साल के इतिहास में उनसे ये रूप धारण किया है तो हर एक देश की संस्कृति और परंपरा भी संस्थाओं के माध्यम से विकसित होती है और नहीं में सुरक्षित है । जब बहुत उन्नति रुक जाने से संस्कृति और परंपरा का विकास रुक जाता है तो धार्मिक संस्थाओं को नष्ट करने का और मांगी हुए विदेशी विचारों को चाहे वे कितने ही उन्नत, श्रेष्ठ, तर्कसंगत तथा वैज्ञानिक क्यों ना हो, ऊपर से लाख देने का प्रयास हितकर नही । अहितकर क्यों? सुधार और क्रांति के नाम पर किए गए इस प्रयास का परिणाम होगा? आपने इतिहास और परंपरा को मिटाना, विकृत करना, त्याग देना, अपने अतीत और परंपरा कट जाने के बाद मनुष्य मनुष्य ना रहे, कर्बी रीड की प्राणी में परिणित हो जाता है उसके देश भक्त तत्व क्रांतिकारी बनने का सवाल ही पैदा नहीं होता अटेक विवेकानंद ने कहा कि मांगी हुए विचारों पर पालने वाले तथाकथित देशभक्तों और सुधारकों को तो ये भी मालूम नहीं कि धाव कहा है । ये लोग मूर्ति पूजा, विधवा विवाह और बाल विवाह दिपक गौड बातों को लेकर चिल्लपों मचा रहे हैं । विवेकानंद ने इनका वास्तविक रूप और अपना उद्देश्य को स्पष्ट किया । गत शताब्दी में सुधारों के लिए जो भी आंदोलन हुए हैं, उनमें से अधिकांश केवल ऊपरी दिखावा मात्र रहे हैं । उन्होंने केवल प्रथम दो वर्णों से संबंध रखा है, शीर्ष दो से नहीं । विधवा विवाह की प्रश्न से सत्तर प्रतिशत भारतीय सहयोगा कोई संबंध नहीं और देखो मेरी बात पर ध्यान दो, जो जनसाधारण का तिरस्कार करके स्वयं शिक्षित हुए हैं । इन लोगों ने अपने अपने घर को साफ करने एवं अंग्रेजों के समुख अपने को सुंदर दिखाने ही में कोई कसर नहीं आएगी । पर ये सुधर नहीं कहा जा सकता । सुधर करने में हमें चीज के भीतर उसकी चढ तक पहुंचना होता है । आग चढ में लगा और उसे क्रमश न ऊपर उठने दो एवं एक अखंड भारतीय राष्ट्र संगठित करूँ एक अखंड भारतीय राष्ट्र संगठित करना ही समय का प्रधान कार्य था । किसी को उन्होंने अपना जीवन व्रत बना लिया था और वो अपने जीवन व्रत को राष्ट्र का है । चाहने वाले सभी देशवासियों का जीवन व्रत बना देना चाहते थे । अरे इंग्लैंड में भारतीय अध्यात्मिक विचारों का प्रभाव भाषण में हम उन्हें वजह गंभीर स्वर में कहते हुए सुनते हैं, अपने जीवन के महान रत को याद रखो हम भारतवासी और विशेष तरह हम बंगाली बहुत परिमाण में विदेशी भावों से आक्रांत हो रहे हैं, जो हमारे जातीय धर्म की संपूर्ण जीवनीशक्ति को चुका डालते हैं । हम आज इतने पिछडे हुए क्यों हैं? क्यों हम में से निन्यानबे फीसदी आदमी संपूर्ण कहाँ पास या के भावों और प्रदानों से निर्मित हो रहे हैं? अगर हम लोग राष्ट्रीय गौरव के उच्च शिखर पर आरोहण करना चाहते हैं तो हमें इस विदेशी भाव को दूर फेक देना होगा । साथ ही अभी हम ऊपर चढना चाहते हैं तो हमें ये भी याद रखना होगा कि हमें पांच के देशों से बहुत कुछ सीखना बाकी है । पांच या के देशों से हमें उनका शिल्पा और विज्ञान सीखना होगा । उनके यहाँ के भौतिक विज्ञान को सीखना होगा और उधर पांच शातिर देशवासियों को हमारे पास आकर घर में और अध्यात्म विद्या की शिक्षा ग्रहण करनी होगी । हम हिन्दुओं को विश्वास करना होगा कि हम संसार के गुरु हैं । हम यहाँ पर राजनीतिक अधिकार तथा इसी प्रकार के अन्य बातों के लिए चला रहे हैं । अच्छी बात है परन्तु अधिकार और सुबह नीति केवल मित्रता के द्वारा ही प्राप्त हो सकते हैं । यदि एक पक्ष वाला जीवन भर भीख मांग रहे तो क्या यहाँ पर मित्र का स्थापित हो सकती है? ये सब बातें कह देना बहुत आसान है । पर मेरा ताकवर ये ये है कि पारस्परिक सहयोग के बिना हम लोग कभी शक्ति संपन्न नहीं हो सकते । इसलिए मैं तुम लोगों को भीक मांगू की तरह नहीं । धर्माचार्य के रूप में इंग्लैंड जाने को कह रहा हूँ । हमें अपनी सामर्थ्य के अनुसार विनिमय का प्रयोग करना होगा । यदि हमें इस लोक में सुखी रहने के उपाय बताएँ । जो लोग यूरोप की तरफ आंख लगाए हुए थे और उस की राजनीति यानी लोकतंत्र कि प्रशंसक थे उनसे विवेकानंद कहते हैं । राजनीति से संबंधित यूरोप की संस्थाएं, प्रणालियां तथा और भी शासन पद्धति क्या निकाने वादे समय समय पर बिल्कुल व्यर्थ सिद्ध होती रही है और आज यूरोप की ये दशा है कि वह पे चीन हैं । यही नहीं जानता कि अब किस प्रणाली की शरण लेंगे वहाँ आर्थिक अत्याचार असहनीय होते हैं । देश का धन तथा शक्ति उन थोडे से लोगों के हाथ में रख छोडी है जो स्वयं कुछ काम करते नहीं । हाँ, सिर्फ लाखों मनुष्य द्वारा काम चलाने की क्षमता जरूरत है । क्षमता द्वारा में चाहे तो सारे संसार को खून से प्लावित कर दें । धर्म तथा सभी अन्य चीजों को उन्होंने पददलित कर रखा है । वे ही शासक है और सर्वश्रेष्ठ समझे जाते हैं । आज पांच चाहती संसार तो ऐसे ही इन्हें इन्हें शा इलाकों के द्वारा शासित है और ये तो तुम वहाँ की वैधानिक सरकार, स्वतंत्रता, आजादी, संसद आदि की बातचीत सुना करते हो । वो सब मचाते है । विवेकानंद ने पश्चिम की बुराइयां ही नहीं अच्छा या भी देगी और जैसा की हम लिख चुकी है, अपने प्रवास काल में उनसे बहुत कुछ सीखा । आपने उदार हृदय, विशाल अनुभव तथा तुलनात्मक अध्ययन सेवे इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे की समूची मानव जाति का कल्याण हैं । पूर्व की आध्यात्मिकता और पश्चिम की भौतिकता के समन्वय सीखने, सिखाने और विचारों के आदान प्रदान पर निर्भर हैं । अटेर अपनी मुक्त भाषण को जारी रखते हुए उन्होंने कहा, पांच जाते देश तो असल में शायद लाखों के बोझ तथा के चार से जर्जर हो रहा है और अगर प्राची देश इन पुरोहितों के अत्याचारों से कातर क्रंदन कर रहा है, होना तो यह चाहिए कि ये दोनों आपस में एक दूसरे को संयमित रखें । ये कभी मैं सोचूँ की इनमें से केवल एक ही से संसार का लाभ होगा । समन्वय चुकी समय ज्ञान के आधार पर ही संभव है । इसलिए विवेकानंद ने एक तरफ शासक वर्ग ने हमें हीनता भाव लाने और अपने ही अतीत से विमुख हो जाने के लिए मैकाले की शिक्षा द्वारा जो भ्रांतियां फैलाई, उन पर चोट की और दूसरी तरफ पुरोहित प्रपंच के स्वार्थ द्वारा फैलाए गए वो संस्कारों को भी नहीं बख्शा । यही उनके स्वस्थ चिंतन का प्रमाण हैं और इसी से उनकी वाणी में बाल पैदा हुआ । सुनिए वे अपने देशवासियों से संबोधित है, उन्हें सतर्क और सावधान कर रहे हैं । हमारी दृष्टि में भारत के लिए कई आपदायें खडी हैं । उनमें से दो काइला और चेरी, वाइॅन्, घोर भौतिकवाद और उसकी प्रतिक्रिया से पैदा हुए गोरखू संस्कार से अवश्य बचना चाहिए । आज हम एक तरफ वो मुनिश्री दिखाई पडता है जो पांच लाख विज्ञान रुपये मदिरा पन से मत होकर अपने को सर्वज्ञ समझता है, वहाँ प्राचीन ऋषियों की हंसी उडाया करता है । उसके लिए हिंदुओं के सब विचार बिल्कुल दवाइयाँ चीज । हिन्दू दर्शनशास्त्र बच्चों का कलरव मात्र है और हिंदू मूल्कों का मात्र अंधविश्वास । दूसरी तरफ वो आदमी हैं जो शिक्षित है, पर जिस पर किसी चीज की सनक सवार है और वहाँ बोलती रह लेकर हर एक छोटी सी बात का अलौकिक अर्थ निकालने की कोशिश करता है । अपनी विशेष जातिया, देव देवियों या गांव से संबंध रखने वाले जितनी कुसंस्कार है, उनको उचित सिद्ध करने के लिए दार्शनिक, आध्यात्मिक तथा बच्चों को सुहाने वाले न जाने क्या अर्थ उसके पास सर्वदा ही मौजूद है । उसके लिए प्रति ग्राम में कुसंस्कार वेदो किया गया है और उसकी समझ में उसे कार्यरूप में परिणत करने पर ही जातीय जीवन निर्भर है । तुम्हें इन सब से बचना चाहिए । तुम में से प्रत्येक मनुष्य कुसंस्कार पूर्ण मूर्ख होने के बदले यदि घोर नास्तिक भी हो जाए तो मुझे पसंद हैं, क्योंकि नासिक तो जीवन में हैं तो मुझे किसी तरह परिवर्तित कर सकते हो, परन्तु यदि को संस्कार घुस जाये तो मस्तिष्क बिगड जाएगा, कमजोर हो जाएगा और मनीष विनाश की ओर अग्रसर होने लगेगा । तो इन दो संकटों से बच्चों हमें निर्भिक, साहसी मनुष्य का ही प्रयोजन हैं । हमें खून में तेजी और स्नायु में बल की आवश्यकता है । लोगों के पुट्ठी और बोला किसने आये चाहिए नाकि दुर्बलता लाने वाले, वाहियात विचार इन सबको त्याग दे सब प्रकार के रहस्यों से बच्चे विवेकानंद ने इस बात को भलीभांति समझ लिया था की संस्कृति ही युगों के आघात को सहन कर सकती है, मात्र ज्ञानराशि नहीं और उनमें ये समझना सिर्फ अपने देश, बल्कि दुनिया भर के इतिहास, दर्शन तथा साहित्य की गहरे अध्ययन से पैदा हुई थी । आपने समय का चलता फिरता विश्वकोश इनसाइक्लोपीडिया है, पर उन्हें अपने इस ज्ञान का नंबर नहीं था, बल्कि आत्मज्ञान, युग, स्मिथ, विनम्रता, सह्रदयता और सहनशीलता चाहे उन्होंने मार्क्स का कहीं उल्लेख नहीं किया, पर मार्च द्वारा कथित इस तथ्य को जान लिया था कि नया समाज कहीं ऊपर से नहीं, थप्पड था । उसका जन्म पुराने समाज के गर्भ से ही होता है । आमूलचूल परिवर्तन और जड में आग देने का अर्थ या कदाचित नहीं कि हमारे पास जो कुछ हैं, उसे नष्ट करता हूँ । शून्य से नया जीवन शुरू करो, नष्ट करना होता है भ्रम, भ्रांतियों और कुसंस्कारों अखंड राष्ट्रीय एकता के लिए मजबूत धीर, लोगों के पुट्ठे और सोलाह किसने आयु वाला नया मनुष्य सरकार था । इसके निर्माण के लिए जहाँ भ्रम, भ्रांति और कुसंस्कारों को नष्ट करना जरूरी था । वहाँ ये भी जरूरी था कि हमारी हजारों बरस की संस्कृति में जो कुछ स्वस्थ्य और जीवंत हैं उसे हम समझे और आत्मसात करके भौतिक शक्ति में परिणत करें । इसके विपरीत तथाकथित सुधार घर और धर्म से संबंधित रितिरिवाज पर प्रहार करते थे और अपने छिछले पातशाह विज्ञान के मध्य में ये समझ बैठे की इसी से विभिन्न जातियों तथा सांप्रदायों के बीच के अंतर्विरोधों का अंत होगा और इसी देश आगे बढेगा । उन्हें विवेकानंद गाल बजाने वाले चंचल बच्चों से अधिक महत्व नहीं देते । अतीव वीरान के मुख्य तत्वों की व्याख्या करने के बाद उन्होंने जाफना के अपने भाषण में कहा यद्यपि हमारा जाती भीम और अन्यान्य प्रथाएं धर्म के साथ आपस में मिली हुई दिखती हैं, ऐसी बात नहीं, ये प्रथाएं राष्ट्रीय रूप में हमारी रक्षा के लिए आवश्यक थी और जब आत्मरक्षा के लिए इन की जरूरत ना रह जाएगी तब सम्भव जहाँ वे नष्ट हो जाएगी । किन्तु मेरी उम्र जो जो बढती जाती है, ये पुरानी प्रथाएं मुझे बोली मालूम होती जाती है । एक समय ऐसा था कि जब मैं इनमें से अधिकांश को अनावश्यक तथा व्यर्थ समझता था परन्तु आयुवृद्धि के साथ इनमें से किसी के विरुद्ध कुछ भी कहते मुझे संकोच होता है क्योंकि उनका आविष्कार सैंकडों सभी यूके अनुभव का फल कल का छोकरा कल ही जिसकी मृत्यु हो सकती है । यदि मेरे पास आए और मेरे चीन गाल के संकल्प को छोड देने हो गई और यदि मैं उस लडकी के मतानुसार अपनी व्यवस्था पलट हूँ तो मैं ही मूर्ख बनाऊंगा और कोई नहीं भारतीय विभिन्न विभिन्न देशों से समाजसुधार के विषय की यहाँ जितने आते हैं, वे अधिकांश ऐसे ही है । वहाँ की ज्ञान बिमारियों से कहूँ तुम जब अपनी समाज का सिलाई संगठन कर सकोगे तब तुम्हारी बात मानेंगे । तुम किसी भाग को दो दिन के लिए भी धारण नहीं कर सकते । विवाद करके उसे छोड देते हो तो वसंत गाल में कीडों की तरह जन्म लेते हो और उन्हीं की तरह कुछ क्षण में मर जाते हो । बुलबुले की तरह तुम्हारी उत्पत्ति होती है और बुलबुले की भारतीय तुम्हारा नाश । पहले हमारे जैसा स्थाई समाज संगठित करो । पहले कुछ ऐसे सामाजिक नियमों और प्रभाव को संचालित करो जिनकी शक्ति हजारों वर्ष अशून्य नहीं तो तब तक मेरे मित्र तो मात्र चंचल पालक हो । मेरी क्रांतिकारी योजना भाषण में भी कहते हैं हम लोगों को तोड मरोडकर नए सिरो से दूसरे राष्ट्र के ढांचे में गन्ना असंभव है । मैं दूसरी कौमों की सामाजिक प्रभाव की निंदा नहीं करता । वे उनके लिए अच्छी है, पर हमारे लिए नहीं । उनके लिए जो कुछ अमृत है, हमारे लिए वही विश हो सकता है । पहले यही बात सीखनी हूँ । अन्य प्रकार के विज्ञान, अन्य प्रकार की परंपरागत संस्कार और अन्य प्रकार के विचारों से उनकी वर्तमान प्रथा संगठित हुई हैं और हम लोगों के पीछे हैं हमारे परंपरागत संस्कार और हजारों वर्षों के कर्म अदेय । हमें स्वभाव ना अपने संस्कारों के अनुसार चलना पडेगा और ये हमें करना ही होगा । और फिर अपनी कार्यप्रणाली प्रस्तुत करते हुए उन्होंने कहा अच्छा भारत में किसी प्रकार का सुधार या उन्नति की चेष्टा करने से पहले धर्म प्रचार आवश्यक है । भारत को समाजवादी अथवा राजनीतिक विचारों से प्लावित करने के पहले आवश्यक है कि उसमें आध्यात्मिक विचारों की बाढ लानी चाहिए । कोलंबो से अल्मोडा तक विवेकानंद ने जो भाषण दिए, उन सब में सर्वोपरि यही है । विवेकानंद के छोटे भाई भूपेन्द्रनाथ तक इन्होंने लिखा है कि बीसवीं सदी के पहले दशक में जो क्रांतिकारी गुप्त संगठन बने, वे इसी प्रचार के फल थी, तमाम प्राधिकारी नहीं । भाषणों से प्रेरणा लेते थे और पुलिस ने उन्नीस सौ सत्ताईस तक जितनी भी क्रांतिकारियों के घरों की तलाशी वाली उनमें विवेकानंद सहायता अवश्य मिलता है । विस्तार में जाने की गुंजाइश नहीं इनमें मेरी क्रांतिकारी योजना, हमारा प्रस्तुत कार्य और भारत का विश्व विशेष रूप से महत्वपूर्ण है । विदेशी शासकों ने हमारे इतिहास को विस्तृत करके बहुत सी भ्रांतियां फैलाई हैं और जनता के बीच व्यर्थ के अंतर्विरोध खडे किए हैं । उन्होंने अपने इन भाषणों में उनका निराकरण किया है । उदाहरण के लिए ये धारणा की गोरे रंग के आर्य लोग बाहर से आए और उन्होंने भारत के काली आंखों वाले आदिवासियों को पराजित कर के अपना दास बनाया और वर्तमान जाति प्रथा की नींव रखी । विवेकानंद ने सिद्धांत को मनगढंत बताते हुए लिखा है, इस समस्या की एकमात्र व्याख्या महाभारत से मिलती है । उसमें लिखा है कि सथ्यू के आरंभ में एक ही जाति ब्राह्मण थी और फिर पेशी के भेज सेवा भिन्न जातियों में बढती गई । बस यही एकमात्र व्याख्या सच और युक्तिपूर्ण हैं । भविष्य में जो सत्युग आ रहा है उसमें ब्राहमांड फिर सभी जातियां फिर ग्रामीण रूप में परिणत होंगी । इसी मिथ्या धारणा के आधार पर उत्तर और दक्षिण को आपस में लडाने और अलग अलग करने का प्रयास अब तक जारी हैं । विवेकानंद ने अपने मद्रासी श्रोताओं से कहा, एक मत है कि दक्षिण भारत में द्रविड नाम की एक जाति के मनीष जोधपुर भारत की आर्य नामक जाती से बिल्कुल भिन्न दिए और दक्षिण भारत के ब्राह्मण ही उत्तर भारत से आए हुए अन्य जातियां दक्षिणी ग्रामीणों से बिल्कुल ही पृथक जाती है । भाषा वैज्ञानिक महाशय मुझे क्षमा कीजिएगा की हमारी बिल्कुल निराधार है । भाषा का एक मार्च प्रमाण ये हैं कि उत्तर और दक्षिण की भाषा में भी है । दूसरा भेज मेरी नजर में नहीं आता । हम यहाँ उत्तर भारत और दक्षिणी भारत के लोग को चुनकर अलग करते । इसी तरह अगर उत्तर भारत के हिंदू, सिख, मुसलमान और इसाई अथवा ब्राह्मण, क्षत्रिय और अन्य निम्न जातियों के लोग किसी एक सभा अथवा मेले ठेले में एकत्रित हो तो आर्यो तथा काली आंखों वाले आदिवासियों को चुनकर अलग अलग करना संभव नहीं । और फिर पूर्ण कुषाण, तातर और यूनानी इत्यादि जातीय आई और आकर आपस में खत्म अलग हो गई । उन्हें भी अलग अलग पहचानना संभव नहीं है तो सिद्ध हुआ की इस धारणा का प्रयोजन कतील और सांस्कृतिक परंपरा के प्रति घृणा फैलाने मानता था । आर्य तो चूँकि कहीं नजर नहीं आती इसलिए घृणा ब्राम्हणों और संस्कृत भाषा से की जाती है । इस घृणा को तो इतनी दूर तक फैलाया गया है कि शोषण और पीडित शूद्र जाती कही जाने वाली जातियों की वर्तमान स्थिति के लिए नीतिकार मनो को जिम्मेदार ठहराया जाता है और प्रतिशोध के रूप में मनुस्मृति की प्रतियां जलाई जाती हैं । पर क्या प्रतिया जलाने से उनकी स्थिति में कोई परिवर्तन आया? क्या ये तलवार में हवा मारना और शक्ति का अपव्यय मात्र नहीं है? विदेशी प्रचार और हमारा अपना अज्ञान इन भ्रांतियों का कारण है । पुरातत्ववेत्ता इस निष्कर्ष पर पहुंच चुके हैं कि प्रारंभ में मंगोल आज नीग्रो लाभ सेमेटिक पांच घुमक्कड जा दिया । नहीं । उन्हें जहाँ कई बी अच्छी, चार गाहें तथा दूसरी प्राकृतिक सुविधाएं मिली वहीं जाकर बच रही बाद में ही जा दिया । उन्होंने मुगल, तातार, शक, कुषाण, डर तथा रविश इत्यादि उपजातियों में विभाजित और सम्मिश्रित होती चली गई । आरियों को अलग कैसे करूँ, द्रविड अलग जाती कहाँ से आ गई । ये ठीक है कि धीरे धीरे सवर्णों ने सारी सत्ता हथिया ली और जाति के चारों ओर रीति रिवाज की एक दीवार खडी कर दी । जन्म से मरण तक पूरे जीवन को कठोर नियमों में बांध कर रख दिया । छुआछूत पहली और हिन्दू धर्म चौके छोले का धर्म बनकर रहे गया । निम्न श्रमजीवी जाती होगी को नहीं वरन सवर्णों ने अपने वर्ल्ड की स्त्रियों को भी शिक्षा पर स्वतंत्रता के अधिकारों से वंचित करके दासों में बदल दिया । किसी देश के पतन और अब नदी का मुख्य कारण बताते हुए विवेकानंद ने मई में शिकागो से अपने पत्र में लिखा था परन्तु ईश्वर महान है, आगे या पीछे बदला मिलना ही था और जिन्होंने गरीबों का खून चूसा, जिनकी शिक्षा उनके धन से हुई । जिनकी शक्ति दरिद्रता परबनी अपनी बारी में हजार और सैकडों गिनती में दास बनकर भेजे गए, उनकी संपत्ति हजार वर्ष तक लूटती रही और उनकी स्तरिय और कन्याएं अपमानित की गई । क्या आप समझते हैं कि यह कारण ही हुआ? सवर्णों गाय का अधिकार टूट चुका है । दीदी बातों को लेकर चीखने चिल्लाने और आपस में लडने झगडने का कोई अर्थ नहीं । सवाल है कुछ ले हुए को उठानी और शिक्षित करने बाद तभी बनीं देश का भविष्य तभी सब रहेगा और विवेकानंद कहते हैं जनता को उसकी बोल चार की भाषा में शिक्षा को उसको भाव दो बहुत कुछ जान जाएंगे परंतु साथ ही कुछ और भी जरूरी है । उसको संस्कृति का बोल जातियों में समता लाने के लिए एकमात्र उपाय संस्कार और शिक्षा का अर्जन करना है जो उच्च वर्णों का बाल और गौरव है । यदि ये तुम कर सकोट जो कुछ हम चाहते हो वो तो मैं मिल जाएगा । धर्म बदल लेने मात्र से ना राष्ट्र बदल जाता है और न संस्कृति । विदेशी वह हैं जिसका आर्थिक और मानसिक संबंध विदेश से जुडा रहे । हमारे देश में जितने भी संप्रदायों तथा जातियों के लोग हैं उन सब का राष्ट्र एक हैं । संस्कृति एक है और उन सब को एक ही महान्ति से प्रेरणा लेनी है । सामूहिक संस्कृति का सिद्धांत मित्तियां तथा निराधार है और विदेशी शासकों द्वारा फूट बढाने के लिए गढा गया था । विवेकानंद भारत का भविष्य भाषण में कहते हैं, यहाँ आ रहे हैं, ग्रामीण हैं, तातार है, तुर्क हैं, मुगल है, यूरोपीय है मानव संसार की सभी जातियां इस भूमि में अपना अपना खून मिला रही है । भाषा का यहाँ एक विचित्र ढंग का जमाव पडा है । आज चार विभाग के संबंध में दो भारतीय जातियों में जितना अंतर है उतना पूर्वी और यूरोपीय जातियों में नहीं । हमारे पास एकमात्र सम्मलित भूमि है हमारी पवित्र परंपरा । हमारा धर्म एक मात्र सामान्य आधार रही है और उसी पर हमें संगठन करना होगा । यूरोप में राजनीतिक विचार ही राष्ट्रीय एकता का कारण है कि तू एशिया में राष्ट्रीय एक का आधार घर नहीं है । अतः भारत के भविष्य संगठन की पहली शर्त के तौर पर उसी धार्मिक एकता की आवश्यकता है । देशभर में एक ही धर्म सबको स्वीकार करना होगा । एक ही धर्म से मेरा क्या मतलब है? ये उस तरह का एक ही धर्म नहीं जिसका इसका योग मुसलमानों या बहुत हो । में प्रचार हैं । हम जानते हैं हमारे विभिन्न संप्रदायों के सिद्धांत तथा दावे कितनी ही विभिन्न क्यों ना हो । हमारे घर में में अद्भुत विविधता के लिए गुंजाइश हो जाती है और साथ ही विचार अपनी रूचि अनुसार जीवन निर्वाह के लिए हमें सम्पूर्ण स्वाधीनता प्राप्त हो जाती हैं । हम लोग कम से कम है जिन्होंने इस पर विचार क्या है, ये बात जानती हैं और अपने कर्म की ये जीवन प्रद सामान्य तत्व सबके सामने लाए और देश के सभी स्त्रीपुरुष बाल ब्रिंडल उन्हें जाने समझे तथा उन्हें जीवन में उतारें, यही हमारे लिए आवश्यक है । सर्वप्रथम यही हमारे कार्य, धर शब्द यहाँ व्यापक अर्थ में प्रयोग हुआ है । पूरा समाज, उसके रीती रिवाज, संस्कृति और परंपरा इसकी परिधि में आ जाती हैं । वेदांत दर्शन के जिस सिद्धांत का यहां उल्लेख हुआ है उसका दावा है कि मनुष्य देते हैं तथा जो कुछ भी हम लोग अपने चारों ओर देखते हैं, वहाँ उसी दिव्यता के बहुत हुआ है । अतीव वेदांत तथा विश्व के अन्य किसी भी मत के बीच कोई झगडा या विरोध नहीं है । मतलब ये कि विवेकानंद के अनुसार सिद्धांत की प्रचारित प्रसारित करने ही से भारत में राष्ट्रीय एकता की भावना मजबूत और फिर इसी आधार पर विश्वबंधुत्व का स्वप्न साकार होगा । आपने अधूरे लेख धर्म के मूल तत्व में उन्होंने लिखा है, अच्छा ऐसा लगता है कि अंततः मतों संप्रदायों का तिरोभाव ना हो गए । उन की वृद्धि ही तब तक होती जाएगी, जब तक प्रत्येक व्यक्ति अपने लिए एक संप्रदाय नहीं बन जाता है और फिर समझाते एकता की पृष्ठभूमि प्रस्तुत होगी । पुराण, गाथाओं और कर्मकांडों में कभी भी एकता ना सकेगी क्योंकि हम भाव क्षेत्र की अपेक्षा वस्तु क्षेत्र में एक दूसरे से अधिक विभिन्न रखते हैं । एक ही सिद्धांत को स्वीकार करते हुए भी लोग उसके आदर्श उपदेष्टा की महत्ता के संबंध में मतभेद रखेंगे । अब हम अगले परिषद में सिद्धांत का बेचन करेंगे, ताकि विवेकानंद के चिंतन में नहीं ही अंतर्विरोध और उनका वर्ग स्वभाव समझने में सुविधा हो सके ।

9. Swami Vivekanand

चाहती हूँ । आध्यात्मिक अद्वैतवाद बनाम हो टिकट हुआ । मनुष्य प्रकृति पर विजय प्राप्त करने के लिए उत्पन्न हुआ है, उसका अनुसरण करने के लिए नहीं । हाँ, विवेकानन्द धर्म महासभा में हिन्दू धर्म पर बोलते हुए विवेकानंद कहते हैं, विज्ञानिक की खोज के सिवा और कुछ नहीं । जो भी कोई विज्ञान पुणे एकता तक पहुंच जाएगा, क्योंकि उसकी प्रगति रुक जाएगी, क्योंकि तब वो अपने लक्ष्य को प्राप्त करेगा । सुधारना रसायनशास्त्री यदि एक बार उस मूल तत्व का पता लगा लें, जिससे और सब द्रव्य बन सकते हैं, तो फिर वो और आगे नहीं बढ सकेगा । बहुत ही की जब उस एक मूल्य शक्ति का पता लगा लेगी । अन्य शक्तियां जिसकी अभिव्यक्ति है, तब वो वहीं रुक चाहिए । वैसे ही धर्मशास्त्र भी उस समय पूर्णता को प्राप्त कर लेगा, जब उसको खोज रहेगा, जो इस मृत्यु के लोग में एकमात्र परमात्मा अन्य सब आत्माएं, जिसकी प्रतीयमान अभिव्यक्तियां है । इस प्रकार अनेक कवर वैट में होते हुए इस पर मत वैध की प्राप्ति होती है । धर्म से आगे नहीं जा सकता । यही समस्त विज्ञानों का चरम लक्ष्य । अब देखना यह है कि धर्म का प्रारंभ कैसे हुआ और वह क्रमश विकास द्वारा आध्यात्मिक अद्वैतवाद की इस चरम सीमा तक कैसे पहुंच, क्या इसके बाद विचार के विकास पर विराम चलने लगा देना संभव है । मनुष्य मननशील प्राणी उसका मस्तिष्क कराने सभी प्राणियों की अपेक्षा अधिक उन्नत है और ये मस्तिष्क रही उसकी सबसे बडी शक्ति जबकि दूसरे प्राणियों ने आत्मरक्षा की सहज प्रवृत्ति से अपने आप को प्रकृति के अनुरूप डाला है । वहाँ मनुष्य प्रकृति से विद्रोह करके उसे अपने अनुरूप डाला है और निरंतर धारता चला जा रहा है । मनुष्य प्रकृति का दास नहीं जैसा उसने अपनी विचारशक्ति द्वारा आप पानी बिजली का प्रयोग कर के शस्त्र यंत्र का आविष्कार करके और प्रकृति के नियमों की खोज लगाकर अपनी इस विजय को संभव बनाया । प्रकृति को बदलने में वह स्वयं भी बताना अपनी संघर्षी मेवा पशु से मनुष्य हैवान से इंसान बना । मतलब ये कि उसके निर्माण में किसी देवी शक्ति का हाथ नहीं बल्कि अपनी संघर्ष के दौरान देव, दानव तथा ईश्वर, आदमी देवी शक्तियों का निर्माण स्वयं हो । सभी बी आर भौतिक परिस्थितियों से उत्पन्न हुए मनीष ने उन्हें व्यवहार की कसौटी पर परखा । उनके अनुसार तत्व को त्यागकर सारतत्व को भौतिक शक्ति में परिणत किया तथा सिद्धांतों का रूप दिया । यहाँ क्रमश जरा ज्ञान का साहित्य, कला, संस्कृति तथा धर्म का विकास हुआ । विवेकानंद आपने माया और ईश्वर धारणा क्रमविकास भाषण में कहते हैं, संसार के सभी धर्मों ने इस प्रश्न को उठाया है । संसार में यहाँ असामंजस्य क्यों है? संसार में ये अशुभ क्यों हैं? आदि । धर्म भाग के अवीर भाव के समय हम इस प्रश्न को छुट्टी नहीं देंगे । इसका कारण ये है कि आदि मनुष्य को जगत असामंजस्य पूरा नहीं लगा । उसके चारों ओर को या सामंजस्य नहीं किसी प्रकार का मतविरोध नहीं था । भले बुरे की कोई प्रतिद्वंदिता नी । उसके हृदय में केवल दो बातों का संग्राम हो रहा था । एक कहती थी ये करूँ और दूसरी उसी करेगा, निषेद करेगी । आदिमानव भावनाओं का दास था । उसके मन में जो आता था, वहीं शरीर से कर डालकर वहाँ इन भावनाओं के संबंध में विचार करने अथवा उनका संयम करने का बिल्कुल प्रयत्न नहीं करता था । देवताओं के संबंध में यही बात है । ये लोग भी अपनी भावनाओं के अधीन इंद्रा आया और उसने असर बाल को छिन्न भिन्न कर दिया होगा । किसी के प्रति संतुष्ट था तो किसी से रुष्ट क्या हूँ, ये कोई भी नहीं जाना है, जाना नहीं चाहिए । इसका कारण ये है कि उस समय लोगों में अनुसंधान की प्रवृत्ति ही नहीं । इसलिए मैं जो कुछ भी करते वहीं नहीं था । उस समय मेरे भले की कोई धारणा नहीं की । हम रेडू में देखते हैं कि इंद्र और अन्यान्य देवताओं ने अनेक बुरे कार्य किए हैं । नरेन्द्र के उपासकों की दृष्टि में बुरा काम कुछ भी नहीं । अच्छा वे संबंध में कोई प्रश्न नहीं करते । स्पष्ट है कि आदिम युग का मानव प्रकृति की भयंकर शक्तियों के विरुद्ध जूझ रहा था । वहाँ उन्हें समझने में असमर्थ था, लेकिन इसके बावजूद प्रकृति को बदलने और उसको अपने वर्ष में करने का संकल्प मन में लिए हुए उस समय उस की प्रमुख समस्या अपने अस्तित्व को बनाए रखना था । शिकार और पर जो भी मिल जाए, उसी पर रहता था । वहाँ प्रकृति को करना और कल्पना दोनों से बदलने का प्रयास कर रहा था । अतएव अपने इसी प्रयास में भयंकर शक्तियों में देवत आरोपित करके उनकी उपासना अर्चना की, ताकि वे उसके लिए अभिशाप के बजाय वरदान बन जाए और फिर कल्पना द्वारा ऐसी देवताओं की सृष्टि की, जो इन शक्तियों के विरुद्ध संघर्ष में उसकी सहायता करेंगे । उदाहरण के लिए हम वैदिक काल के मनुष्य को पास ना द्वारा वरुण धवन और अग्नि को रिझाने देखते हैं और ेंद्र अपने वज्र द्वारा उसके लिए पहाड तोड जा और असर बाल को छिन्न भिन्न करता है । वैदिक काल का मनुष्य निपट भौतिकवादी है, वहाँ भी इसी धरती पर है और इसके देवता भी धरती पर हैं । इस से परे इसी स्वर्ग नरक आत्मा परमात्मा का कोई भाग्य विचार उसके मन में नहीं, मृत्यु कब है और अमरत्व की इच्छा भी उसे नहीं सकता हूँ । जैसा वो खुद सीधा साधा है वैसे ही उसकी उपासन प्रार्थना भी सी बी सारे सुनी जीवेम श्रद्धा शतम् शुरू हो यहाँ से लग रहा था प्रवान शरद भ्रष्टतम दिन आसियान शाॅ हूॅं शरदा छता अर्थात में सौ वर्ष तक जीव सौ वर्ष तक सुनु सौ वर्ष तक बोलू और मैं सौ वर्षक दीनता रहे तो कर की फिर आकाश में घन घटाओ को देखकर वहाँ के है । उठता है काली वर्षकों पर जननियों पृथ्वी शस्य सलीमी देशों यम शुभ रहे तो मनवा निर्भय अर्थात मेरे समय पर बरसे धरती फसलों से भरपूर हो कि हर देश शोएब से रहित हो और सारे मानव निर्भय यजुर्वेद का जो राष्ट्रगान है उसका भावार्थ दिए हैं कि मनीष शास्त्र और शस्त्र मैंने पर हो ताकि वहाँ युद्ध में विजय प्राप्त करें और सभा में समाज रहे हो । उसके बाद हार्ड होने वाले स्वस्थ, मैं डूब देने वाली गांवाें और वायु के बीच से देश चलने वाले सुंदर खोडे जिस भाषा और कापियों में वेलू की रचना हुई, उसे विकसित होने में जाने कितनी सदिया लगेंगी और वेलू की रचना का समय भी हजारों साल लंबा है । इसी बीच में मनुष्य ने प्रकृति पर विजय प्राप्त की और विभिन्न दिशाओं में उनकी विचारशक्ति का जो विकास हुआ, उस बारे में विवेकानंद लिखते हैं । आरंभ में जाती में एक पूर्व जिज्ञासा थी, जिसका शीघ्र ही निर्भिक विश्लेषण में विकास हो गया । यद्यपि आरंभिक प्रयासों का परिणाम एक बार अंदर शिल्पी के अनाब व्यस्त हाथों के प्रयास जैसा भले ही हो, किंतु शीघ्र ही उसका स्थान विशिष्ट विज्ञान, निर्भिक प्रयत्नों, आश्चर्यजनक परिणामों ने ले लिया । निर्मिता ने आर्य ऋषियों को स्वनिर्मित यह कि कुंडू की हर एक ईद के परीक्षण के लिए प्रेरित किया । उन्हें अपने धर्मग्रंथ के शब्द, शब्द के विश्लेषण, ऑपरेशन और मंथन के लिए उकसाया । किसी कारण उन्होंने कर्मकांड को व्यवस्थित किया, उसमें परिवर्तन और पूरा परिवर्तन किया, उसके विषय में शंकाए उठाई, उसका खंडन किया और उसकी समुचित क्या क्या क्या देवी नेताओं के बारे में गहरी छानबीन और उन्होंने सर्वभौम सिर्फ व्यापक सिर्फ आंतर यानी सृष्टिकर्ता को अपने पैतृक स्वर्ग अस्त परम पिता को केवल कौन स्थान प्रदान किया । या उससे व्यर्थ कहकर पूर्ण रूप पे बहिष्कृत कर दिया गया और उसके बिना ही एक ऐसे विश्व धर्म का सूत्रपात किया गया जिसके अनुयायियों की संख्या आज भी अन्य धर्मावलंबियों की अपेक्षा अधिक हैं । विविध प्रकार की यज्ञ वेदियों के निर्माण में ईटू के विन्यास के आधार पर उन्होंने ज्यामिति शास्त्र का विकास किया और अपनी ज्योतिष के उस ज्ञान से सारे विश्व को चकित कर दिया जिसकी उत्पत्ति, पूजन एवं अर्घ्यदान का समय निर्धारित करने के प्रयास में इसी कारण अन्य किसी और वाची नि अ प्राचीन जाती की तुलना में गणित को इस जाति का योगदान सर्वाधिक हैं । उनके रसायन शास्त्र, औषधियों में धातुओं के मिश्रण, संगीत के स्वरों के सरगम के ज्ञान तथा उनके धनुषी यंत्रों के अविष्कारों से आधुनिक यूरोपीय सभ्यता के निर्माण में विशेष सहायता नहीं । उज्वल दंत कथाओं द्वारा बाल मनोविकास के विज्ञान का अविष्कार इन लोगों ने क्या इनका भाव को प्रत्येक सभी देश की शिशु चलाओ या पाठशालाओं में सभी बच्चे चार सौ सीट पे और इनकी छाप जीवन भर बनी है । वैदिक युग के बाद जब मनुष्य को प्रकृति के विरुद्ध अपने संघर्ष में कुछ फुर्सत मिली, सांस लेने और सोचने की सुविधा प्राप्त हुई तभी उसने आत्मा और परमात्मा का निर्माण किया । देखना यह है कि मनुष्य की सोच का आत्मा और परमात्मा के निर्माण का आधार क्या? हाँ, विवेकानन्द मनुष्य का यथार्थ स्वरूप भाषण में कहते हैं कवित्व में कठोर परिषद के प्रारंभ में हम या प्रश्न करते हैं । कोई लोग कहते हैं कि मनुष्य के मरने पर उसका अस्तित्व समाप्त हो जाता है और कोई कहते हैं कि नहीं, उसका अस्तित्व फिर भी रहता है । उन दोनों बातों में कौन सी सकती हैं? संसार में इस संबंध में अनेक प्रकार के उत्तर मिलते हैं । जितने प्रकार के दर्शन या धर्म संसार में हैं, वे सब वास्तव में इस प्रश्न के विभिन्न उत्तरों से परिपूर्ण हैं । अनेक बार तो इन प्रश्नों के परे क्या हैं? सत्य? क्या प्राणों की इस महती अशांति का अब दमन करने की चीज था? की गई है? तो जब तक मृत्यु नामक वस्तु जगत में हैं, तब तक इस प्रश्न को दबा देने की सारी चीज टाइम विफल रहेगी । विवेकानंद ने आत्मा परमात्मा विशेष जितने भी उदाहरण दिए हैं, उपनिषदों तथा गीता से दिए और भी उपनिषदों को भी बेल कहते हैं । वेदांत दर्शन की सैद्धांतिक व्याख्या करते हुए उन्होंने धर्म को कर्मकांड और ज्ञान कांड में विभाजित कर लिया है । एक जून अठारह सौ को फिर अल्मोडा से आपने किसी के नाम पत्र में लिखते हैं वेदू के विरुद्ध तुमने जो तर्क क्या है, वहाँ अखंडनीय होता यदि बीन शब्द का अर्थ संहिता होगा । भारत में यह सर्वसम्मत है कि वे शब्द में तीन भाग सम्मिलित, संविदा, प्रामण और उपमिशन । इनमें से पहले दो भाग कर्मकांड संबंधी होने के कारण अब लगभग एक ओर रख दिए गए सब मतों के निर्माताओं तथा तत्वज्ञानियों ने केवल उपनिषदों को ही ग्रहण किया है । केवल समझता ही वेज है । यह स्वामी दयानंद का शुरू किया हुआ बिल्कुल नया विचार हैं और पुरातन मतावलंबी या सनातनी जनता में इसको मानने वाला कोई नहीं । इस नए मत की पीछे कारण ये था कि स्वामी दयानंद ये समझते थे की सभ्यता की एक नई व्याख्या के अनुसार पूरे वेट का एक सुसंगत सिद्धांत निर्माण कर सकेंगे । परंतु कठिनाइयाँ योगी क्यों बनी रही? केवल वेब ग्रामीण भाग के संबंध में उठ खडी हुई और अनेक व्याख्याओं तथा प्रच इत्ता की परिकल्पनाओं के बावजूद बहुत कुछ शेष रहेंगे । डन के नजदीक वे समझता और उपनिषद की बात ही प्रमाण है आपने मद्रास के भाषण में वे कहते हैं तुम जानती होगी, वे दो भागों में विभक्त है । कर्मकांड और ज्ञान का कर्मकांड में नाना प्रकार की याद किया । यह की और अनुष्ठान पद दिया है, जिनका अधिकांश आजकल प्रचलित नहीं । ज्ञान कांड में वीडियो के आध्यात्मिक उपदेश ली भी बंद हैं । वे उपनिषद अथवा आवेदान के नाम से परिचित है और द्वैतवादी विशिष्टाद्वैत वादी समझदार सनी को और आचार्यों ने उन्ही को उच्चत तक प्रमाण कहकर स्वीकार किया है । हम समझते हैं कि वेदों को समझता कहकर उन्हें उपनिषदों से अलग कर देने का मुख्य कारण ये हैं कि उनमें मनुष्य की सो आध्यात्मिक न होकर एकदम भौतिकवादी है । मनीषी खुले आकाश के नीचे प्रकृति के संबंध में रहता है, प्रकृति से बहुत जूझता भी है और उसकी उपासना भी करता है । बस इसी से उसका चिंतन निर्धारित होता है तो रिश्तों की युग में पहुंचकर ही मनुष्य को ये सोचने का आकाश प्राप्त हुआ की मृत्यु क्या है? मृत्यु के उपरांत शरीर का कुछ शेष भी रहता है या सब यही समाप्त हो जाता है और क्या इस प्रत्यक्ष संसार के परेड भी कुछ हैं? उपनिषदों में भी आत्मा संबंधी नचिकेता, सत्यकाम, जड, भरत तथा इंद्र और विरोचन आदि की जो कथाए हैं, एक तो बहुत अटपटी और अन् उत्कृष्ट है और दूसरे उसमें आदमा शब्द की चर्चा ही चर्चा है । कोई निश्चित धारणा नहीं । यह धारणा जीता में प्रतिपादित हुई है और बाद में शंकराचार्य रामानुज, रामकृष्ण, परमहंस, विवेकानंद इत्यादि वेदांती उन्हें उसे आगे विकसित किया है । हमें अब इस धारणा और उस की विकास प्रक्रिया का ऐतिहासिक बहुत एक बात दृष्टि से अध्ययन करना है । गीता ही का उदाहरण चीज इस ग्रैंड का केंद्र बिंदु वही है जब अर्जुन कुरुक्षेत्र में गुरु सेना को सामने खडे देखकर हथियार रख देता है और अपनी सारथि कृष्ण से कहता है मैं नहीं लडूंगा क्योंकि मेरे सामने बंधु बांधवों को मारना पाक इस पर श्रीकृष्ण उसे उस देश के अर्जुन तो भ्रम में पढे हो । आज मामर हैं, उसे कोई नहीं मार सकता और नामक अभी मर की जिन्हें दम मारने की बात कहते हो, वे तो पहले ही मरे हुए हैं । इसलिए कायरता छोडो छतरी का धर्म लडना है । लड्डू चीज जाओगे तो धरती पर राज कर होगी और यदि मर जाओगी तो स्वर्ग का सुख हो । बात दरअसल कायरता की नहीं वैदिक युग में जिसे प्रारंभिक सामने बाद कहते हैं, लोग कबीलों में हैं, व्यक्तिगत संपत्ति नहीं की जो कुछ था, सम्मिलित था । कभी लू कबीलों में लडाई होती रहती थी पर एक ही कभी ले के भीतर किसी की हत्या तो क्या गाली तक देना पाप समझा जाता । कॉर्नर पांडर एक ही कबीले के लोग थे । अर्जुन की मस्तिष्क में कभी लेके पुराने संस्कार किए इसलिए उसने लडने से इंकार कर दिया था । पर जब महाभारत का युद्ध हुआ तो व्यक्तिगत संपत्ति का प्रादुर्भाव हो चुका था । कृष्ण राजा ननद के पुत्र होने के नाते व्यक्तिगत संपत्ति की नई विचारधारा से जुडे हुए थे । उसकी श्रेष्ठ प्रवक्ता संपत्ति के लिए भाई भाई की हत्या करे तो मन में ग्लानि उत्पन्न न हो कि वहाँ भाई की हत्या कर रहा है । इसी से आत्मा जन्मरहित हैं, वहाँ ना मार दी है और ना ही कोई मार सकता है । नई विचारधारा का जन्म हुआ व्यक्तिगत संपत्ति का समाज निचे ही प्रारंभिक साम्यवाद के मुकाबले उन्नति का युग था और नई विचारधारा मनुष्य को आगे ले जाने वाले अधिक श्री कृष्ण ने अर्जुन को न सिर्फ कबीले कि पुराने संस्कारों के बजाय प्रगतिशील विचारधारा दी बल्कि उसके दोनों खातों में लड्डू समाज, बेटा लडो चीज जाओगे तो यहाँ राज करोगे और मर गए तो स्वर्ग प्राप्ति होगी । इस व्यक्तिगत संपत्ति के उदय से समाज दो वर्गों में विभाजित हो गया । एक वर्ग वो था जो श्रम करता था जिनका संबंध श्रम से टूट गया था पर उन्हें जीवन की सारी सुख सुविधाएं प्राप्त थी और उन्हें अपनी विचारशक्ति द्वारा दूसरों पर शासन करना था । समाज वर्गों में विभाजित हुआ तो मनुष्य की सोच का आपकी करो और ना करो । श्रमजीवियों और संपत्ति सनियो की विचारधारा में विभाजित होना अनिवार्य ऍम विवेकानंद कहते हैं हमारे भीतर एक प्रकार की प्रवृत्तियां है जो इंद्रियों के द्वारा बाहर जाने की चेष्टा करती रहती हैं और उनके पीछे चाहे कितना ही शीर्ष क्यों ना हो, एक स्वर कहता रहता है बाहर मत जाना । इन दो बातों के संस्कृत नाम है प्रवृत्ति और निवृत्ति । ये ही हमारे समस्य कर्मों का मूल है । निवृत्ति से धर्म का आरंभ होता है । जहाँ यह मत करना नहीं वहाँ जानना की भर्म का आरंभ भी नहीं हुआ । इस मत करना से ही निवृत्ति का भाव आ गया और बरस पर युद्ध में रख देवतागण अराजत होने के बावजूद मनुष्य की धारणाएं विकसित होने लगी । सम्पत्ति स्वामियों को सारी सुविधाएं प्राप्त उन्हें हाथ से कुछ काम तो करना नहीं था । दिमाग से सिर्फ सोचना ही था । सुख की भावना के अनुपात ही से उनके मन में दुख की भावना भी बडी । मृत्यु के भय ने सबसे पहले उन्ही को परेशान किया और अमरत्व की छाबडियों नहीं के मन में उत्पन्न हूँ । आती इस परिवर्तनशीलता जगत से परे अपरिवर्तित की कल्पना कि उन्होंने लिखा है । इसके बाद मृत्यु रूपी भयानक थी, आता है । सारा संसार मृत्यु के मुख में चला जा रहा है । सभी मरती जा रहे हैं । हमारी उन्नति, हमारे व्यर्थ के आडम्बरपूर्ण कार्यकलाप, समाज संस्कार, विलासिता, ईश्वरीय ज्ञान इन सबकी मृत्यु ही एकमात्र गति हैं । इससे अधिक निश्चित बाद और कुछ नहीं । नगर पर नगर बनती है और नष्ट हो जाते हैं । साम्राज्य पर साम्राज्य उठते हैं और काल के गर्ज में समाज आते हैं । वहाँ आदि चूर चूर हो कर विभिन्न रहो की वायु के झोंको से इधर उधर बिखरे जा रहे हैं । इसी प्रकार अनाधिकार से चलता आ रहा है । इस सबका आखिर लक्ष्य क्या है? मृत्यु मृत्यु ही सबका लक्ष्य वहाँ जीवन का लक्ष्य है । सौन्दर्य का लक्ष्य है, ऐश्वर्या का लक्ष्य हैं, शक्ति का लक्ष्य है । और तो और धर्म का भी लक्ष्य साधु और पापी दोनों मारते हैं । राज और भिक्षुक दोनों मारते हैं, सभी मृत्यु को प्राप्त होते हैं । फिर भी जीवन के प्रति हविष्य आ सकती विद्यमान हैं । हम क्यों जीवन से आ सकती है? क्यों हम इसका परित्याग नहीं करवाते । ये हम नहीं जानेंगे और यही माया है । ठगी से जगह मित्तियां और ब्रह्मा सत्य की दर्शन का उदय हुआ । मायावाद के सिद्धांत पर हम बाद में विचार करेंगे और लिखा है कि जिस समय सर्वप्रथम गीता को देश दिया गया उस समय दो सांप्रदायों में बढा वादविवाद चल रहा है । इनमें से एक सांप्रदायिक वैदिक युग क्यों पशुबली तथा इसी प्रकार का अन्याय कर्मों का धर्म का सार सर्वस्व समझता था । दूसरे का विश्वास था कि समस्त कर्मों का त्याग और आत्मज्ञान की उपलब्धि ही मुख्य का एकमात्र मार्ग दरअसल यहाँ बौद्धिक वादियों और आदर्शवादी हो । आइडल इस का वादविवाद वैदिक युग से चले आ रहे भौतिकवादी विचार को इस सूक्ष्म चिंतन की अवहेलना करके उन्हें सूली रूप से यज्ञ तथा पशुबलि इत्यादि कर्मकांड के प्रतिनिधि बताया गया है । जो लोग सुख सुविधा तथा विलासिता का जीवन जी रहे थे, आत्मज्ञान की उपलब्धि तथा मूड ही उनकी महत्वकांक्षा जो दिन दिन अंतर्मुखी होते जा रहे और जिनके लिए और अनेक बहेलियों की अपेक्षा स्वयं मनीष ही सबसे पेचीदा पहली बन गया । भौतिक वादियों ने उनसे डटकर लुवा लिया । लोहा लेने वालों में बहुत ही सशक्त परंपरा चारवाहों की है । उनका दर्शन इतना लोकप्रिय था । वहाँ लोकायत यानी जनसाधारण की विचारधारा के नाम से प्रसिद्ध है । मतलब ये हैं कि चार बार श्रमजीवी जनसाधारण के प्रतिनिधि सा राशि है कि आदर्शवाद निवृति अर्थात ना करो का और भौतिकवाद प्रवृत्ति अर्थात करों का संधान । विवेकानंद लिखते हैं चारवाहों ने बडे भयानक मतों का प्रचार किया । जैसा कि आज उन्नीस शताब्दी में भी लोग इस प्रकार खुल्लमखुल्ला मंदिरों और नगरों में प्रचार करने दिया गया की धर्म मिथ्या है । वहाँ केवल पुरोहितों की स्वार्थपूर्ति का एक उपाय है । वेद केवल पाखंडी फूट निशाचरों की रचना है । ना कोई ईश्वर है ना आत्मा । यदि आत्मा है तो वह स्त्रीपुरुष आदि के प्रेम के आकृष्ट होकर लौट क्यों नहीं आती है? इन लोगों की धारणा थी कि यदि आत्मा होती तो मृत्यु के बाद भी उसमें प्रेम आने की भावनाएँ रहती और अच्छा खाना और अच्छा पहनना चाहती हूँ । ऐसा होने पर भी चार वह आपको किसी ने सताया । इसके विपरीत महाभारत में यहाँ बताती है कि पांडव जब कुरुक्षेत्र से विजयी होकर लौटे तो हस्तिनापुर के दरवाजे पर चार्वाक में युद्ध स्टेट से कहा आप किसी विषय पर फूले नहीं समाते । आपने अपने ही सगे संबंधियों की हत्या करके खोर बात किया है । स्वागत को आए हुए पंडितों ने ये मिस्टर को दिलासा दिया महाराज आप इस पागल की बातें करना चाहिए । आपने धर्म युद्ध लडा है । आप धर्मपुत्र हैं और चार वाँ को वहीं पथराव करके मार डाला । चार्वाक साहित्य नष्ट कर दिया गया लिखा है चार वाँ के अनुयायियों का । भारत में एक अत्यंत प्राचीन सम्प्रदाय । उसके अनुयायी घोर जडवादी नहीं । इस समय वह संप्रदाय मुक्त हो गया है और उसके अधिकांश ग्रंट भी लोग हो गए । उसके मतानुसार आत्मा और देख भौतिक शक्ति से उत्पन्न होती । इसलिए देखा का नाश का अस्तित्व है । इसका भी कोई प्रमाण नहीं । वहाँ केवल इंद्रीय जन्य प्रत्यक्ष ज्ञान स्वीकार करता है । अनुमान द्वारा भी ज्ञान प्राप्त हो सकता है, इसे वहाँ स्वीकार नहीं करता । शंकराचार्य का भाषा चार्वाक दर्शन के खानदान के अतिरिक्त और कुछ नहीं । भौतिकवाद ियों को वामाचारी और अनाचारी कहकर बदनाम किया गया । ये चाहे चोरी करके अथवा कर्ज लेकर ही पीओ इत्यादि युक्तियां उनसे जोडी गई और उन्हें पांचवी प्रकृति वाले मनुष्य बताया गया, जिनका सुख भोग इंद्रियों में आबद्ध रहता है । हालांकि इंद्रियों का सुख भोग भी संपत्ति स्वामी होगी । कोई अमृतसर था, श्रमजीवी साधारण जनता तो उससे एकदम पाँच थे । अध्यात्मवाद ियों ने चार बात का तो खंडन किया, लेकिन कपिल के सांख्य दर्शन में प्रवेश करने का उन्हें चोर दरवाजा मिल गया इसलिए उसका मंडन किया और उससे अपने चिंतन का सूत्र जोडा और इस महान विचार की असाधारण छाती से लाभ उठाया । हाँ, विवेकानन्द साल के दर्शन का अध्ययन इस भाषण में कहते हैं कपिल का साथ के दर्शन कि विश्व का प्रथम ऐसा दर्शन है जिसमें युक्ति पद्धति से जगत के संबंध में विचार क्या है? विश्व के प्रत्येक तत्ववादी को उसके प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करनी चाहिए । मैं तुम्हारे मन में यह भाव उत्पन्न करना चाहता हूँ कि दर्शनशास्त्र के प्रताप वहाँ के रूप में उनकी बातें सुनने के लिए हम बात ये है इस अद्भुत व्यक्ति इस अत्यंत प्राचीन दार्शनिक का श्रुति में भी उल्लेख है । ये भगवान आपने श्रृष्टि के प्रारंभ में कपिलमुनि को उत्पन्न किया । उनकी प्रत्यक्ष ज्ञान कितने आश्चर्यजनक थे और यदि योगियों की प्रत्यक्ष बूत संबंधी असाधारण शक्ति का कोई प्रमाण चाहिए तो ये सूत्र ही उसके प्रमाण है । उनके पास कोई अनुवीक्षण अथवा दूर एक्शन यंत्र नहीं था । तथा भी उनका प्रत्यक्ष बोध कितना कृष्ण था । उनका वस्तुओं का विश्लेषण कितना पूर्ण एवं अदभुत था । कपिल के अनुसार जगत का सृष्टिकर्ता कोई ईश्वर नहीं है । सब रज और तम प्रकृति के तीन ऐसे उपादान है जिनसे समग्र प्रमाण की सृष्टि होती है । बुद्धि बीच क्यूकि प्रकृति से उत्पन्न होती है, इसलिए प्रगति एक वस्तु है । अलबत्ता प्रकृति और बुद्धि से अलग तीसरी वस्तु पुरुष है, जो इन्हें गड्डी एवं चेतना प्रदान करती है । कपिल क्यूकि प्रकृति और पुरुष दोनों को अनादि तथा निरपेक्ष मानते हैं । इसलिए वेद वेद वानी है और प्रकृति को अनादि तथा निरपेक्ष मानने के कारण वे भौतिकवादी भी हैं । अध्यात्म वादियों ने कपिल के सिद्धांत में संशोधन करके पुरुष का नाम आत्मा रखा और उसे वेदांत दर्शन में रूपांतरित कर लिया । विवेकानंद कहते हैं संख्या वादियों के इस मत के विरुद्ध वेदान्त वादियों को प्रथम आपत्ति ये हैं कि सांची का यह विश्लेषण संपूर्ण नहीं । यदि प्रकृति एक निरपेक्ष वस्तु है, हम आत्मा भी यदि निरपेक्ष वस्तु हैं और जिन सब युवतियों से आत्मा का सर्वव्यापी होना प्रमाणित होगा, वे युक्तियां प्रकृति के पक्ष में भी प्रयुक्त हो सके, इसलिए वहाँ भी समग्र देश काल निमित्त कि अतीत होगी । प्रकृति यदि इस प्रकार की ही हो तो उसका किसी प्रकार का परिणाम अथवा विकास नहीं होगा । इससे निष्कर्ष निकला कि दो निरपेक्ष अथवा पूर्ण वस्तुए स्वीकार करनी होती है और यह असंभव है । विधान दर्शन के अनुसार प्रकृति देशकाल लिमिट के नियम क्या नहीं, इसलिए परिवर्तनशील और नश्वर है जबकि आत्मा देश काल निमित्त की अति अपरिवर्तनशील और अलग है और इस जगत के श्रृष्टि कर का निरपेक्ष और अनंत ईश्वर ही का एक अंश है । इसमें फिर कर में बाद और मायावाद के सिद्धांत जोडिए ये दोनों एक दूसरे के पूरक हैं और इससे शोषण तथा व्यक्तिगत संपत्ति की रक्षा का दर्शन पूरा हो जाता है । व्यक्तिगत संपत्ति की रक्षा के पूछ ग्रंथ गीता में हम श्रीकृष्ण को कहते हुए सुनते हैं अर्जुन मेरे और तेरे पहले बहुत हो उन सबको मैं जानता हूँ तू नहीं जानता किसी प्रकार माया के बारे में । वे कहते हैं मेरी है दी त्रिगुणमयी माया बडी मुश्किल से पार की जा रही हैं । जो मेरी शरण में आते हैं वे इस माया सी अति हो जाते व्यक्तिगत संपत्ति के साथ यदि मानव का भी जन्म हुआ यू सांग के दर्शन के आध्यात्मिक रूप ही का नाम वेदांत दर्शन छह वैष्णो बुद्ध जय गोरखपंथी कबीरपंथी नानक पनपी दाद बनती इतिहास हिन्दू धर्म के अंतर्गत जितने भी सांप्रदायिक है, सभी वेदांता बाद ईश्वर के अस्तित्व तथा उसके सगुण और निर्गुण रूप के बारे में उन में चाहे कुछ भी मतभेद हो, पर वे मोटे तौर पर वेद वादियों, विशिष्टाद्वैत, वादियों और अद्वैतवाद ियों में बडे हुए विधानसा दर्शन के सिद्धांत को क्रमश शाह विकसित करने वालों में शंकराचार्य रामानुज, रामकृष्ण परमहंस और विवेकानंद विशेष रूप से उल्लेखनीय विस्तार में जाने की गुंजाइश नहीं । हम सिर्फ द्वैतवाद, विशिष्ट अद्वैतवाद और अद्वैतवाद की संक्षिप्त व्याख्या करेंगे । द्वैतवाद धर्म की पहली सीढी है । इसके अनुसार ईश्वर स्वयं ही विश्व और आत्मा बन गया है । हम सब उसी के अंश है । हम सब एक हैं फिर भी मनुष्य और मनुष्य में मनुष्य और ईश्वर में कठोर व्यक्त ता है, जो पृथक है और प्रथक नहीं । अद्वैतवाद तीसरी और अंतिम सीढी है । इसके अनुसार आनन्द कांड नहीं हो सकता । यदि उस कॅश किए जा सकते हैं तो प्रत्येक अंश आनंद ही होगा । यदि ऐसा मान भी ले तो एक दूसरे को समीप कर देंगे और दोनों कि समीर हो जाएंगे । अतिरिक्त अनंत एक हैं अनेक नहीं और वही एक अनंत आत्मा प्रतिक आत्माओं के रूप में प्रतीत होने वाले असम के दर्पणों में प्रतिबिंबित हो रही हैं । वहीँ आनंद आजमा मनुष्य के मन का आधार भी है जिसे हम जी बात माँगे थे । हम पीछे कुछ कह चुके हैं कि विवेकानंद ने अमेरिका और इंग्लैंड में वेदांत दर्शन की व्याख्या करते करते उसमें क्रमविकास का सिद्धांत जोडा और बडी गर्व के साथ अपने इस अविष्कार की घोषणा की की मैं विशिष्टता है और अवैध धर्म की क्रमश रहा सोपान हैं । वेट न्यूनतम और अगर उच्चतम सोपान ऍम उच्चतम सोपान है । यह घोषणा करने में वे अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस से बहुत आगे जाते हैं । यहां बताते हुए की नहीं, उत्थान को भीतर ही से विकसित होना चाहिए । उन्होंने अपने शिष्य से कहा था इसलिए मैं केवल उपनिषदों की शिक्षा देता हूँ तो तुम देख सकते हो कि मैंने उपनिषदों के अतिरिक्त कहीं अन्यत्र से उद्वरण कभी नहीं दिए । उपनिषदों से भी केवल बाल का आदर्श वीवी वन मैदान का समस्त सारा तथा अन्य सबकुछ इस एक शब्द में नहीं है । बाल और अब है । मेरा आदर्श तो वहाँ संत है जो विद्रोह में मारा गया था और जब उसके हृदय में छोटूराम होगा गया तब उसने केवल यहाँ कहने के लिए अपना मौन क्या और तू भी वही है हिंदू पूछ सकते हो की इस योजना में रामकृष्ण का क्या स्थान? वे तो स्वयं प्रणाली है । आश्चर्यजनक अज्ञात प्रणाली उन्होंने अपने को नहीं समझा । उन्होंने इंग्लैंड या अंग्रेज के विषय में कुछ नहीं समझा । उन्होंने इंग्लैंड अंग्रेज के विषय में कुछ नहीं जाना, सिवा इसकी की अंग्रेजी समुद्र पार के विचित्र लोग हैं किंतु उन्होंने वो महान जीवन बताया और मैंने उसका अर्थ समझे । उन्होंने गुरु को समझा, अपने को समझा और फिर देश को समझा था । हम पहले कह चुके हैं कि वे धर्म के माध्यम से राजनीति की लडाई लड रहे थे । अरे जिस वर्ष शब्द पर उन्होंने बहुत जोर दिया है इससे पहले शिष्य के साथ एक वार्ता में उन्होंने इसकी व्याख्या क्योंकि तुम्हारे देश के लोगों का खून मानव हृदय में जम गया । पैसों में मानव रक्त का प्रवाह हीरो क्या सिर्फ वांग पक्षाघात के कारण ठील सा हो गया है इसलिए मैं रजोगुण की वृद्धि कर कर्म तत्पर्ता के द्वारा इस देश के लोगों का पहले इस लॉक एक जीवन संग्राम के लिए समर्थ बनाना चाहता हूँ । देख हमें शक्ति रही, हृदय में उत्साह नहीं, मस्तिष्क में प्रतिभा नहीं क्या होगा? रेंज एंड अपीलों से महिला डुलाकर स्पंदन लाना चाहता हूँ इसलिए मैंने प्राणांत ग्रहण किया है । वेदांत के अमोक मत्र के बाल से ही जगह होगा उत्तिष्ठत जाग्रत कुछ हूँ जागू इस अभय वाणी को सुनने के लिए मेरा जन्म हुआ है तो लोग इस काम में मेरे सहायक बनाऊँ जहाँ गांव गांव में देश देश में यहाँ है वाणी चांडाल से लेकर ग्रामीण तक को सुना । सभी को पकडो पकडकर जाकर कह दो तुम लोग अमित वीर्यवान हो, अमृत के अधिकारी हो । किसी प्रकार हपले रह रहा शक्ति का उद्दीपन कर जीवन संग्राम के लिए सबको कार्यक्षम बना । इसके पश्चात उन्हें वर्जन में मुक्ति प्राप्त करने की बात सुना । पहले भीतर की शक्ति को जागृत करके देश के लोगों को अपने पैरों पर खडा कर अच्छे भोजन, वस्तु तथा उत्तम भोग आदि करना भी पहले से है । इसके बाद उन्हें उपाय बता दे कि किस प्रकार से प्रकार की भूख बंधनों से मुक्त हो सके । निष्क्रियता, हीन बुद्धि और कपट देश पर छा गया है । क्या बुद्धिमान लोग या देकर स्थिर रह सकते हैं? रोना नहीं आता । मद्रास, बम्बई पंजाब, बंगाल कहीं भी तो जीवन शक्ति का चिन्ह दिखाई नहीं देगा । तुम लोग सोच रहे हो हम शिक्षित क्या खाक सीखी है दूसरों की बातों को दूसरी भाषा में रटकर मस्तिष्क में भरकर परीक्षण उत्तीर्ण होकर सोच रहे हो । हम शिक्षित हो गए कार है इसका नाम कहाँ? शिक्षा तो भारी शिक्षा का उद्देश्य क्या है? या तो क्लर्क बनना या एक दुष्ट वकील बनना और बहुत हुआ तो क्लर्क ही का दूसरा रूप एक डिप्टी मजिस्ट्रेट की नौकरी यही ना आराध्या । इससे तुम्हें या देश को क्या लाभ हुआ । एक बार आंखें खोलकर देखो, सोना पैदा करने वाली भारत भूमि में अन्य के लिए हाहाकार मचा है । तुम्हारी शिक्षा द्वारा उस न्यूनता की क्या पूर्ति हो सकेगी? कंपनी पार्टी आपके विज्ञान की सहायता से जमीन खोदने लग जा, अन्य की व्यवस्था कर नौकरी कर कि नहीं, अपनी चीज द्वारा पास जातीय विज्ञान की सहायता से नित्य नवीन उपाय का आविष्कार करेंगे । किसी अन्य वस्त्र की व्यवस्था करने के लिए मैं लोगों को रजोगुण की वृद्धि करने का उपदेश देता । अन्य वस्त्र की कमी और उसकी चिंता से देश बुरी अवस्था में चल रहा है । इस के लिए तुम लोग क्या कर रहे हो? फेंक दो अपने शस्त्र वास्तव गंगाजी में देश के लोगों को पहले अन्य की व्यवस्था करने का उपाय खाते हो । इसके बाद उन्हें भगवान का पांच सुनाना कर्मदत्त परता के द्वारा एक लोग का भाव दूर न होने तक कोई धर्म की कथा ध्यान से ना सुनेगा । इसलिए कहता हूँ पहले अपने में अंतनिर्हित शक्ति को जाग्रत कर फिर देश के समस्त व्यक्तियों में जितना संभव हो शक्ति के प्रति विश्वास जमा पहले अन्य की व्यवस्था कर बाद में उन्हें धर्म प्राप्त करने की शिक्षा अब अधिक बैठे रहने का समय नहीं । कब किसकी मृत्यु होगी, कौन कह सकता है? बात करते शो दुख और दया के सम्मिलित आवेश से । स्वामी जी के मुखमण्डल पर एक पूर्व तेज उद्भासित को उठा आंखों से मानो अपनी करने निकलने लगे । उनकी उस समय की दिव्य मूर्ति का दर्शन कर भाई और विस्मय के कारण शिष्य के मुख से बात नहीं निकल सकते । कुछ समय रुककर स्वामी जी फिर कहने लगे यथासमय देश में कर्म तत्पर्ता और आत्मनिर्भरता वर्षीय आ जाएगी । मैं स्पष्ट देखा डाॅट दूसरी गति ही नहीं जो बुद्धिमान है । विभाग तीन युगों का चित्र सामने प्रत्यक्ष देख सकते हैं । श्रीराम कृष्ण के जन्म ग्रहण समय से ही पूर्व आकाश में अरुण तय हुआ । समय आते ही दोपहर की सूर्य के प्रकरणों से देश अवश्य लोकेट हो जाएगा । वहाँ अठारह सौ ध्यान की बात है । उन्हीं दिनों कुछ विद्यार्थी उनके पास गए और उन्होंने स्वामी जी से कहा कि हमें गीता की शिक्षा दीजिए । स्वामी जी बोले, जाओ, मैदान में जाकर फुटबॉल खेलो । अभी तक खेलने की अपेक्षा फुटबॉल खेलने से स्वर्ग शीघ्र मिलेगा । देश को लोगों की पुट्ठे और कौन लाख के स्नायु वाले युवक चाहिए । ये शब्द कोई घर में प्रचारक सन्यासी नहीं, एक राष्ट्रनेता ही कह सकते हैं । धर्म के लिए गौर मस्त भी देश को राजनीतिक संघर्ष के लिए तैयार करना था । अरुणोदय की बेला है उस हो जहाँ को या संदेश घर घर पहुंचाना ही उनका प्राणांत । प्रणत अतीव उनका चिंतन दिन दिन वैज्ञानिक होता चला गया । उन्नीस सौ में वे दोबारा विदेश यात्रा पर गए । तब हम उन्हें बीस मार्च को सैन फ्रांसिस्को में कहते हुए सुनते हैं । क्रमश चला प्रकृति शब्द था । एक रुपया की धारणा का प्रयोग जीवन और मान के व्यापारों के संबंध में भी होने लगा । मनिस्टर पश्चिम और मैं निश्चित । तीनों का गुण, स्वभाव, प्रकृति का जीवन निश्चित नियमों के अनुसार चलता है और उसी प्रकार मान भी । विचार योगी उत्पन्न नहीं होते । उनके उदय, अस्तित्व और अंत का एक नियम है । दूसरे प्रकार में जिस तरह ड्रामा प्रकृति नियम से बताते हैं, उसी प्रकार आंतरिक प्रकृति अर्थात जीवन और मानव मन भी । यहाँ तो वो कहते हैं कि विचार योगी उत्पन्न नहीं होते । लेकिन अपनी पहली विदेश यात्रा के दौरान लंदन में दिए गए मनुष्य का यथार्थ रूप भाषण में उन्होंने कहा था, आजकल ये विवाद चल रहा है कि क्या पंचभूतों की समझती हर दी है की आत्मा, चिंतनशक्ति या विचार आदि नामों से परिचित शक्तियों के विकास का कारण है अथवा चिंतनशक्ति की बहुत पति का कारण हैं । निश्चय ही संसार के सभी घर में कहते हैं कि विचार नामक शक्ति ही शरीर की प्रकाश है और वे इसके विपरीत मत में आस्था नहीं रखते और जनवरी अठारह सौ चौरानवे को अपने मद्रासी शिष्यों के नाम होने शिकागो से पत्र में लिखा था जीवन में मेरी सर्वोच्च अभिलाषा यही है कि ऐसा चक्र प्रवर्तन कर दूँ जो उच्च एवं श्रेष्ठ विचारों को सब के द्वार द्वार पहुंचा दे और फिर स्त्रीपुरुष अपने भाग्य का निर्णय स्वयं घर में हमारे पूर्वजों तथा अन्य देशों ने भी जीवन के महत्वपूर्ण प्रश्नों पर क्या विचार क्या है यह सर्वसाधारण को जाने दो विषेशकर उन्हें ये देखने दो की और लोग इस समय क्या कर रहे हैं और तब उन्हें अपना निर्णय करने दो । रासायनिक द्रव्य इकट्ठे कर दो और प्रकृति के नियमानुसार भी कोई विशेष आकार धारण कर लेंगे । परीक्षम करो, अटल रहूँ और भगवान पर सदैव सकता हूँ । काम शुरू कर दो तीर सवेरे में आ ही रहा हूँ धर्म को बिना आनी पहुंचाये जनता की उन्नति, इसे अपना आदर्श वाक्य बनाना । धर्म की इस मान्यता के अनुसार विचारों का अपना अलग अस्तित्व है सारा ज्ञान आत्मा में नहीं ही है, जो निरपेक्ष सत्य ईश्वर का िकांश है । जिस किसी ने सिंद्री याचित सकती का साक्षात्कर कर लिया, वहाँ परमज्ञानी हैं, वह ज्ञान तथा हर प्रकार के बंधन से मुक्त है । यह सर्वोच्च मानव कोई काम नहीं करता । उसे कर्म करने की आवश्यकता ही नहीं जाता । वहाँ अपने विचार शक्ति ही से दुनिया पर शासन करता है । इस आदर्शवादी सिद्धांत के अनुसार बुद्ध और ईसा जैसे व्यक्ति इतिहास के निर्माता है । तेईस नवंबर को सर्वोपरि बाल विचारशक्ति से प्राप्त होता । जितना ही सूक्ष्मतर खत्म होता है, उतना ही अधिक वह शक्ति संपन्न होता है । विचार की मुख्य शक्ति दूरस्त व्यक्ति को भी प्रभावित करती हैं, क्योंकि मन एक भी है और अनेक भी । विश्व एक जाल है और मानव मन मकडियां । मतलब ये कि मनुष्य अपने को शीर्ष संजीत शेर बन जाएगा । अपने को गीजर समझ बैठे तो गीदड बना रहेगा और अपने वास्तविक रूप को पहचानकर अपने को प्रमाण समझ ले तो सर्वशक्तिमान प्रमा बन जाएगा । सत्याग्रह स्वराज तुम्हारे भीतर है, इसका प्रतिक्रियावादी सिद्धांत भी यही है । गांधी का कहना था कि अगर कोई व्यक्ति उपवास, त्याग तथा अहिंसक कर्म द्वारा अपने भीतर के चरम सत्य कुछ जग लेता है तो वहाँ पूर्ण सत्याग्रही बन जाता है, तब दुनिया की कोई शक्तियों से नहीं हरा सकता । यपूर्ण सत्याग्रही जब अपने शत्रु की आंखों में आखिर डालेगा, तो उसका मन शत्रु के मन को प्रभावित करेगा और तब वहाँ भी शत्रुता त्यागकर पूर्ण सत्याग्रही बन जाएगा । अश्वर अन्याय का प्रतिरोध गलत है, क्योंकि बुराई फैलती हैं । दुनिया को शुद्ध और पवित्र बनाने के लिए शुभ विचारों का प्रचार प्रसार ही उचित उपाय है, लेकिन हर देश के पूंजीवाद ने अपने राजनीतिक संघर्ष में धर्म के विरुद्ध विज्ञान को अपना शास्त्र बनाया है । पूंजीवादी क्रांति अठारह सौ इक्यानवे में सर्वप्रथम फ्रांस में संपन्न हुई । वहाँ के विश्व कोशियो ने जिनके नेता देनदारों थे, इसी के लिए भूमि तैयार की । फ्रांस कि ये विश्वकोष भौतिकवादी थी । इसके बाद सौ बरस तक भौतिकवाद पातशाह के बुद्धिजीवियों की मुख्य विचारधारा रही । लेकिन उन्नीसवी सदी के अंत में जब पूंजीवाद में अपनी प्रगतिशील भूमिका त्यागकर साम्राज्यवाद का प्रतिक्रिया आबादी रूप धारण किया, तब हम पहले कह चुके हैं, सिर्फ वही बुद्धिजीवी इस विचारधारा पार्टी के रह सके, जिनका संबंध मार्क्सवादी विचारधारा वाले वन वात नमक से जुड गया था । हाँ, विवेकानन्द हमारे उभरते हुए बुर्जुवा के सर्वश्रेष्ठ प्रवक्ता थे । उन्होंने अपनी विदेश यात्रा के दौरान विज्ञान के उत्कृष्ट तत्व को आत्मसात । क्या उन्हें साम्राज्यवाद से घृणा थी और वे देश की उत्पीडित, शोषित जनता को उठाना जगाना चाहते थे । इसलिए उनका अध्यात्मिक अद्वैतवाद की चरम सीमा का अतिक्रमण करना, विराम चिन्ह को लांघना स्वाभाविक था । आते वक्त हम उन्हें सान फ्रांसिस्को के उक्त भाषण में कहते हुए होते हैं ड्रामा और आंतरिक प्रकृतियाँ दो भिन्न वस्तु नहीं है । वो एक है, वे एक है । प्रकृति समस्त घटनाओं की समझती है । प्रकृति से आशय है, वहाँ सब जो है, वहाँ सब जो गतिशील है, हम जड, वस्तु और मन में अत्यधिक भेद मानते हैं । हम सोचते हैं कि मान जड वस्तु से पूर्णतः भिन्न है । वस्तुतः में एक ही प्रकृति है, जिसका अद्धवार्षिक दूसरे द्वार श् पर सतत क्रिया क्या करता है? जड पद्धार्थ विभिन्न संवेदनों के रूप में मन पर प्रभाव डालता है । ये संवेदनशील व्यक्ति के सिवा और कुछ नहीं है । बाहर से आने वाली शक्ति भीतर की शक्ति को आंदोलित करती है । ड्रामा शक्ति के प्रति अनुक्रिया करनी यात्रा उससे दूर हट जाने की इच्छा से आंतरिक शक्ति जरूर धारण करती है । उसे हम विचार द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के अनुसार मन अथवा मस्तिष्क पदार्थ का ही सुव्यवस्थित रूप है और हमारे समस्त विचार भौतिक परिस्थितियों से ही उत्पन्न होते हैं उनके उत्पन्न होने की जो प्रक्रिया है उसकी व्याख्या माओत्सेतुंग ने सही विचार कहाँ से आते हैं? लेख में इस प्रकार की वे सामाजिक व्यवहार से और केवल सामाजिक व्यवहार से ही पैदा होते हैं । तीन प्रकार के सामाजिक व्यवहार से पैदा होते हैं उत्पादन, संघर्ष, वर्ग संघर्ष और वैज्ञानिक अनुसंधान । मनीष टिका सामाजिक स्थित वही उसके विचारों का निर्णय करता है । जहाँ एक बार जनता ने आगे बढे हुए वर्ग के सही विचारों को आत्मसात कर लिया तो ये विचार एक ऐसी भौतिक शक्ति में बदल जाते हैं जो समाज को और दुनिया को बदलना है । अपने सामाजिक व्यवहार में मनुष्य विभिन्न प्रकार के संघर्षो में लगा रहता है और अपनी सफलताओं तथा सफलताओं में समृद्ध अनुभव प्राप्त करता है । मनुष्य की पांच ज्ञानेन्द्रियों आंख का ना जीम और त्वचा के जरिए वस्तुगत ब्रह्मा जगत की असंख्य घटनाओं का प्रतिबंध उसके मस्तिष्क पर पडता है । ज्ञान शुरू में इंद्रीय कराना होता है । धारणात्मक ज्ञान अर्थात विचारों की स्थिति में तब छलांग भी जा सकती है जब केंद्रीय ग्रामीण हाँ ज्ञान काफी मात्रा में प्राप्त कर लिया जाता है । ये ज्ञान प्राप्ति की प्रक्रिया है । ये ज्ञान प्राप्ति की समूची प्रक्रिया की पहली मंजिल है । एक ऐसे मंजिल है जो हमें वस्तुगत पदार्थ से मनोगत चीत ना की तरफ ले जाती है । अस्तित्व से विचारों की तरफ नहीं जाती है । किसी व्यक्ति की चेतना या विचार जिनमें सिद्धां नीतियां, योजनाएं अथवा उपाय शामिल है, वस्तु का ड्रामा जगत के नियमों की प्रक्रिया की दूसरी मंजिल आती है । एक ऐसी मंजिल जो हमें जीतना की तरफ ले जाती है, विचारों से अस्तित्व की तरफ ले जाती है तथा जिसमें पहली मंजिल के दौरान प्राप्त किए गए ज्ञान को सामाजिक व्यवहार में उतारा जाता है ताकि इस बात का पता लगाया जा सके कि ये सिद्धांत नहीं दिया योजनाएं अथवा उपाय प्रत्याशित सफलता प्राप्त कर सकेंगे या नहीं । आम तौर पर इनमें से जो सफल हो जाते हैं, वे सही होते हैं और जो असफल हो जाते हैं वो गलत होते हैं तथा ये बात प्रकृति के खिलाफ मनुष्य के संघर्ष के बारे में सच साबित होती है । कभी कभी आगे बढे हुए वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाली शक्तियों को पराजय का मुंह देखना पडता है । इसलिए नहीं कि उनके विचार गलत बल्कि इसलिए कि संघर्ष करने वाली शक्तियों के तुलनात्मक बल्कि दृष्टि से फिलहाल वी शक्तियां उतनी बलशाली नहीं जितनी की प्रतिक्रियावादी सकती है । इसलिए उन्हें अस्थाई तौर पर पराजय का मुंह देखना पड रहा है, लेकिन देर सवेर विजय अवश्य उन्हीं को प्राप्त होती है । मनुष्य का ज्ञान व्यवहार की कसौटी के जरिए छलांग भरकर एक नहीं मंजिल पर पहुंच जाता है या छलांग पहले कि छलांग से और ज्यादा महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि सिर्फ यही छलांग ज्ञान प्राप्ति की पहली छलांग अर्थात वस्तु ड्रामा जगत को प्रतिबिंबित करने के दौरान बनने वाले विचारों, सिद्धान्तो, नीतियों, योजनाओं अथवा उपमाओं के सही होने अच्छा कल होने को साबित करती है । सच्चाई को परखने का दूसरा कोई तरीका नहीं है । यही नहीं, दुनिया का ज्ञान प्राप्त करने का सर्वहारा वर्ग का एकमात्र उद्देश्य है । उसे बताया अक्सर सही ज्ञान की प्राप्ति, केवल पदार्थ चेतना की तरफ लौटने की प्रक्रिया को अर्थात व्यवहार से ज्ञान की तरफ अक्सर सही ज्ञान की प्राप्ति, केवल पदार्थ चेतना की तरफ लौटने की प्रक्रिया को अर्थतत्व व्यवहार से ज्ञान की तरफ जाने और फिर ज्ञान से व्यवहार की तरफ लौटाने की प्रक्रिया को बार बार दोहराने से यही मार्क्सवाद का ज्ञान सिद्धांत है । द्वंद्वात्मक भौतिकवाद का ज्ञान सिद्धांत अब देखिए विवेकानंद अपने उप भाषणों में आगे कहते हैं, जड पदार्थ और मन दोनों ही वास्तव में शक्ति ही है और यदि तुम उन दोनों का विश्लेषण गहराई से करो तो होगी कि मूलतः है, दोनों ही है । ब्रह्मशक्ति किस प्रकार आंतरिक शक्ति को प्रेरित कर सकती है, इसी बात से स्पष्ट हो जाता है कि वे कहीं एक दूसरे से संयुक्त होती है । वे अवश्यमेव अखंड हैं और इसलिए वे मूलतः एक ही अच्छा मन और जड पदार्थ को भिन्न समझने का कोई कारण नहीं है । मान जड पदार्थ के रूप में परिवर्तित होता है और जड पदार्थ मान के रूप विचारशक्ति ही स्नायु शक्ति, पेशी शक्ति बन जाती है और स्नायु शक्ति एवं शक्ति विचार प्रकृति ही यह सब शक्ति है । चाहे वह जड वस्तु के रूप में अभिव्यक्त हूँ, चाहे मन की प्रदार्थ चेतना में और चेतना पदार्थ में निरंतर बदलती रहती है । इस बनवा तक सिद्धांत को लेकर विवेकानंद मैदान का भौतिकवाद से समन्वय करने का यह प्रयास करते हैं । सूक्ष्मतम मन एवं सूक्ष्मतम जड पदार्थ के बीच केवल मात्रा ही कान है । अरे समस्त विश्व को माननीय जड दोनों कहा जा सकता है । इन दोनों में थे, आ गए हैं । यहां महत्व नहीं रहेगा तो मन को सूक्ष्म जड पदार्थ कह सकते हो अथवा शरीर को मन का स्थूल लू तुम किसी किस नाम से पुकारते हो, उससे कोई अंतर नहीं है । गलत ढंग से सोचने के कारण ही भौतिकवाद, इमाम आध्यात्मवाद के बीच संघर्ष से कठिनाइयां उत्पन्न होती है । वास्तव में दोनों में कोई भी नहीं है । मुझे और ही न्यूनतम ओवर में केवल मात्रा का अंतर है । सूर काम अभी हुआ, मैं अधिक कभी मैं उससे बुरा हो जाता हूँ । कभी सूर मुझसे अच्छा रहता है । दरअसल स्वामी जी कहना ये चाहते हैं कि मैं भी ब्रह्मा, तू भी ब्रह्मा, मेज भी ब्रह्मा, रोटी भी ब्रह्मा, चेतन भी ब्रह्मा, अध्यात्मवादी ब्रह्मा और बहुत इक वादी भी ब्रह्मा । फिर फिर कहा रहा सब एक ही माया है । पर अंत में उन्होंने जो माला खडी होगी वहाँ उनकी परीक्षित काव्यमय शैली में दूध में मक्खी सिया पडी, जो कह लीजिए कि उससे सारा गुड गोबर हो गया । इस समन्वय को भौतिकवादी तो को बोलेंगे ही नहीं । डर है कि अध्यात्मवादी भी नहीं कबूली । वेदांती उन्हें कहाँ स्वीकारा? गुरु भाइयों ने उनके जीवन में ही विरोध शुरू कर दिया था । लिखा है एक दिन सायंकाल बलराम बाबू के मकान पर स्वामी जी गुरु भाइयों के साथ वार्तालाप कर रहे हैं । इसी समय उनके एक संन्यासी गुरुभाई ने सहसा प्रश्न किया कि वे श्रीराम कृष्ण का प्रचार क्यों नहीं कर रहे हैं तथा श्रीरामकृष्ण की शिक्षा के साथ उनके द्वारा प्रचारित आदर्शों का सामंजस्य कहाँ है? एकांत भक्ति के साथ अनन्य चित्त होकर साधन भजन की सहायता से केवल ईश्वर की उपलब्धि की चेष्टा करना ही रामकृष्ण देव का आदर्श स्वामी जी पहले का मुस्कुराते रहे । पर जब उस गुरुभाई ने ये कहा कि लोकहित के उद्देश्य से मटर मिशन, वेदांत समिति, सेवाश्रम आदि की स्थापना करने का जो संकल्प आप कर रही है, स्वदेश प्रेम के बीच में से मानव सेवा के व्रत का जो प्रचार कर रही है, वहाँ सब पांच याद आदर्श जैसा लगता है । तब देख कर्ज कर बोले क्या तुम समझते हो कि श्रीरामकृष्ण को तुमने मुझसे भी अधिक समझा है? क्या तुम समझते हो कि ज्ञान शिष्ट पंडित के मात्र हैं जो हृदय की को मृत्यु का विनाश कर एक शुष्क उपाय के अवलंबन से उर्पाजन किया जाता है । तुम जिस भक्ति का उल्लेख कर रहे हो, वहाँ मूर्खो भी भावुकता मात्र है जो मनुष्य हो का पुरुष और कर्म प्रमुख कर डाल दी है । छोडो इन बातों कौन तुम्हारे श्रीरामकृष्ण को चाहता है? शास्त्र क्या कह रहे है या नहीं कह रहे हैं कौन सुनता है यदि मैं होर तमोगुण में डूबे हुए अपने स्वदेश वासियों को कर्मयोग के द्वारा अनुप्राणित कर वास्तविक मनुष्य की तरह अपने पैरों पर खडा कर देने में समर्थ हूँ तो मैं आनंद के साथ लाख लाख बार नरक चाहूँ मैं तुम्हारे रामकृष्णा याने किसी का चेहरा नहीं हूँ । जो लोग अपनी भक्ति मुक्ति की कामना को छोड दरिद्रनारायण की सेवा में जीवन को चक्रित करेंगे, मैं उन्हीं का छेला भेज दिया । क्रिकेट ऍम रामकृष्ण परमहंस के संदेश यत्र जीव तत्र शिव जीव की सेवा करो का अर्थ विवेकानंद ही समझ पाए थे और ये बाद भी वही समझ पाए थे कि उनके गुरु ऊपर से भक्त और भीतर से क्या नहीं थी । इसलिए विवेकानन् महीने गुरु से विरासत में मिले खोल का विस्तार और ज्ञान का विकास किया । उनकी ये गुरु भाई रामकृष्ण के संदेश को समझने और खोल के भीतर झांकने में असमर्थ थे और उनके लिए भक्ति मुक्ति, मुर्खतापूर्ण भावुकता ही सब कुछ । इसलिए उन्हें विवेकानंद का देश सेवा और चंद सेवा का प्राणांत प्रण पास चार के आदर्श जैसा चान पडना स्वाभाविक था । जाने अनजाने शासक शोषण का हित पोषण करने वाले ऐसे ही लोगों ने रामकृष्ण ही नहीं, विवेकानंद के भी सिर्फ फूल ही की मान प्रतिष्ठा, पढाई और उस पर मूर्खतापूर्ण भावुकता की नई नई पढते चढाये लेकिन इन दोनों महापुरुषों के ज्ञान को मोटी मोटी पुस्तकों और स्मारकों में रखना चाहिए । दफ्ना इसलिए दिया कि विवेकानंद हमारे राष्ट्रीय चिंतन को उन्नीसवी सदी के अंत तक विकसित करके भौतिकवाद के कगार पर ले आए थे । उसे अब और आगे बढाना सोशण की इस व्यवस्था के लिए खतरे का सिगनल जिस पर भक्ति मुक्ति का दर्शन निकाला है । लेकिन अगर हमें देश को वर्तमान स्थिति से आगे ले जाना है तो राष्ट्रीय चिंतन को जहाँ पहुंचाकर छोड कर गए हैं, उससे आगे ले जाना आवश्यक है । तेरे ऐतिहासिक भौतिकवाद के सिद्धांत द्वारा को देखो खोल से अलग करके ये देखेंगे कि विवेकानंद हमारे राष्ट्रीय चिंतन को किस बिंदु तक ले आए और उसे अब क्यों कर आगे बढना है । इसके लिए हमें उनके चिंतन के अंतर्विरोध को समझना होगा । जो वास्तव में उनका अपना नहीं, उस उभरते हुए बुर्जुवा वर्ग का अंतर्विरोध हैं, जिसके लिए प्रवक्ता थे । विश्लेषण के लिए हम उनकी उक्त सुबह वाली उपमा को लेंगे और देखेंगे कि मुझे और सुबह में केवल मात्र का अंतर है । सुगर कम अभिव्यक्त हुआ और मैं अधिक का खट रात । क्या वेदान्त दर्शन के अनुसार उच्चतम से लेकर निम्नतम और दृष्टिता मनुष्य तक में मनुष्यों में महानतम व्यक्तियों से लेकर हमारे पैरों के नीचे रेंगने वाले खेडे तक में शुद्ध और पूर्ण आनंद और सादा मंगलमय आत्मा विद्यमान चीजें में आत्मा अपनी शक्ति और शुद्धता का एक अनुकूल शुद्ध अंशी व्यक्त कर रही है और महानतम मनुष्य में उनका सर्वाधिक अंतर अभिव्यक्ति के परिमाण का मूल तत्व में नहीं । सभी आत्माओं में वही शुद्ध और पूर्ण आत्मा विद्यमान । मतलब ये कि चींटी, स्वर और मनुष्य में एक ही शुद्ध, पवित्र और पूर्ण आत्मा है क्योंकि वह शुद्ध, पवित्र और अनंत ब्रह्मा के अतिरिक्त कुछ और नहीं । अंतर सिर्फ ये है की छूटी में वहाँ सोवर से कम अभिव्यक्त और मनुष्य मैं सुबह से अधिक अभिव्यक्त है । कभी चींटी की आत्मा सोवर और सुबह की श्रेष्ठतम मनुष्य बन जाएगी । वो कैसे मनबहादुर पन है जिसमें आत्मा अपने को प्रतिबिंबित करती है । जैसे जैसे मान परिवर्तित होता है, उसका रूप विकसित एवं अधिकारिक निर्मल सा होता जाता है और वहाँ आत्मा का अधिक उत्तम प्रतिबिंब देने लगता है । यह क्रम इसी प्रकार चलता रहता है और अंततः वहाँ इतना शुरू हो जाता है कि वहां आत्मा के गुड का पूर्ण प्रतिबिंबन कर सकता है, समात्मा मुक्त हो जाती हैं । आत्मा का लक्ष्य मुक्ति है और मुक्ति प्राप्त करने के लिए उसे संसार में जितनी जी उतनी ही योनियों में से होकर गुजरना पडता है । एक जन्म से दूसरे जन्म में जाने का क्रम ये बताया गया है । आज माइक निम्नतर देहद धारण करके उसके माध्यम से अपने को व्यक्त करने का प्रयास जैसा करती है, वहाँ उस को अपर्याप्त पाती है, उसे त्यागकर एक उच्चतर देश धारण करती है । उसके द्वारा वो अपने को व्यक्त करने का प्रयत्न करती, वहाँ भी अपर्याप्त पाए जाने पर त्याग दी जाती है और वह उच्चतर दी आ जाती है । इसी प्रकार यक्रम एक ऐसा शरीर प्राप्त हो जाने तक निरंतर चलता रहता है जिसके द्वारा आत्म मुग्ध हो जाती है । विवेकानंद के अनुसार यक्रम निम्नतम जीव अमीबा से शुरू होता है । मनुष्य सृष्टि का श्रेष्ठ से श्रेष्ठ कम प्राणिक अर्थात देख तक पहुंचने पहुंचती । आज मैं अपने को इतना अधिक अभिव्यक्त कर लेती है कि मनुष्य को अपने आत्मस्वरूप होने का आभास हो जाता है और वो सब किसे चरम सत्य आपने ब्रह्मस्वरूप तक पहुंचने के लिए प्रकृति के वृद्ध संघर्ष करता है जो पशु पक्षी तथा दूसरे जीत नहीं करते पाते । लिखा है हम प्रकृति के सहायक होकर नहीं जान में वरन हम प्रकृति के विरोधी होकर जान में हैं हम ना मंदिर वाले होकर भी व्यर्थ बंदे जा रहे हैं या मकान कहाँ से आया । प्रकृति ने तो नहीं दिया प्रकृति कहती है जाओ जंगल में जा कर रहा हूँ । मनुष्य कहता है नहीं मैं मकान बना होगा और प्रकृति के साथ युद्ध करूँ और वैसा कर भी रहा है । मानव जाति का इतिहास प्रकृति नियमों के साथ उसके युद्ध का इतिहास है और अंत में मनीष ही प्रकृति पर विजय प्राप्त करता है । अंदर जगत में जाकर देखो, यहाँ भी यही युद्ध चल रहा है । पशु, मानव और आध्यात्मिक मानव, प्रकाश और अंधकार का ये संग्राम निरंतर जारी है । मानव यहाँ भी जीत रहा है । मुक्ति की प्राप्ति के लिए प्रकृति के बंधन को छीलकर मनुष्य अपने गंतव्य मार्ग को प्राप्त कर लेता है । प्रकृति के विरुद्ध अपने संघर्ष में मनुष्य उच्चतर से उच्चतर स्थिति को प्राप्त करता श्रेष्ठ से श्रेष्ठ कर बनता चला जाता है । आपने देवता आपने उपास से संबंधी उसकी धारणा भी उत्कृष्ट से उत्कृष्ट पर होती चली जाती है । इस संघर्ष में उपासक और उपास्य दोनों निरंतर बदलते आए हैं । लिखा है तुम से पृथक ईश्वर नहीं अठारह था, जो हो उससे श्रेष्ठतर ईश्वर नहीं है । सब ईश्वर या तीव्रता ही तुम्हारी तुलना में शुद्ध डर है । ईश्वर और स्वर्ग स्थपित आदि की समस्या धारणा तुम्हारा ही प्रतिबिंब मात्र है । ईश्वर स्वयं भी तुम्हारा प्रतिबिम् या प्रतिमा स्वर्ग है । ईश्वर ने मानव की आपने प्रतिबिंब रूप में श्रृष्टि ये भूल है । मनीष ईश्वर की नीच के प्रतिबंध के अनुसार श्रृष्टि करता है । यही बात सकते हैं समस्त जगत कि में हम अपने प्रतिबिंब के अनुसार ईश्वर अथवा देवगन भी श्रृष्टि करते हैं । भौतिकवादी जर्मन दार्शनिक फितूर बात यही कहता है कि मनुष्य ने अपनी कल्पना के अनुरूप ही ईश्वर की सृष्टि की आदि मारने प्रकृति का जैसा भयंकर रूप देखा, वैसे ही देवताओं की सृष्टि जब निरकुंश राजा अपने को धरती पर ईश्वर का प्रतिनिधि या प्रतिछाया कहता था, देवेश्वर स्वयं आकाश पर अर्थात स्वर्ग में रहता । जब लोकतंत्र आया और हर एक को मताधिकार मिला तो ईश्वर बिना सिर्फ धरती पर उतर आया, बल्कि हर एक घट घट में बस कर विवेकानंद ने न्यूयॉर्क में राज्यों पर भाषण देते हुए कहा था संपूर्ण जगत को वशीभूत करना और सारे प्रकृति पर अधिकार हासिल करना, इस बृहत का यही को योगी अपना कर्तव्य समझते हैं । एक ऐसी अवस्था में जाना चाहते हैं, जहाँ हम जिन्हें प्रकृति के नियम कहते हैं, वे उन पर कोई प्रभाव नहीं डाल सकते हैं । जिस व्यवस्था में वे उन सब को पार कर जाते हैं, तब आप ध्यान, तरीक और रम्मा प्रकृति पर प्रभुत्व प्राप्त कर लेते हैं । मनीष जाती की उन्नति और सभ्यता इस प्रकृति को वशीभूत करने की शक्ति पर ही निर्भर है और फिर जैसा की भी हमेशा करते थे, धर्म का विज्ञान से सामंजस्य स्थापित करने के प्रयास में कहा बहीर वादी और अंतर वादी अर्था बहुत इक वादी और आदर्शवाद जब विज्ञान की चरम सीमा प्राप्त कर लेंगे, तब दोनों अवश्य ही स्थान पर पहुंच चाहेंगे । जैसे भौतिकविज्ञानी जब अपने ज्ञान को चरमसीमा पर ले जाएंगे तो उन्हें दार्शनिक होना होगा । उसी प्रकार दार्शनिक भी देखेंगे कि वे अपने मन और भूत के नाम से जो दो भेद कर रहे थे, वास्तव में कल्पना मात्र है तो मैं एक दिन बिल्कुल भी हो जाएगा । लेकिन भौतिकवादी पूछते हैं कि अगर मनुष्य प्रकृति के विरुद्ध ही संघर्ष में परिष्कृत से परिष्कृत होता चला जा रहा है और जैसा की हम देख चुकी हैं, जैसे जैसे भौतिक परिस्थितियां बदल रही है, प्रकृति का विकास उत्तरोत्तर उच्चतर से उच्चतर संघात तो की ओर अग्रसर हो रहा है, वैसे वैसी मनुष्य के विचार भी बदलती तथा उत्कृष्ट से उत्कृष्ट तार होते चले जा रहे हैं तो उसमें आत्मा परमात्मा की कल्पित पंख लगा देना क्यों आवश्यक है? जो देश का नियमित से परे हैं, उसके अस्तित्व का क्या प्रमाण है? जो इंद्रिया तित है, उसका साक्षात्कर कैसे संभव? अगर एंद्रिया तित सत्य का साक्षात ही आनंद ज्ञान और अनंत सुख की उपलब्धि है तो हमें इंग्लैंड अथवा पातशाह के देशों से इस लोग में सुखी रहने के उपाय सीखने और बदले में उन्हें अनंतकाल तक सुखी रहने के उपाय बताने का अर्थ क्या है? पेरिस इंद्रिया तित सत्य ईश्वर का साक्षात करने की धुन में जंगल जंगल घूमने वाले योगियों को जब भूख लगती है तो वे गृहस्थी के द्वार पर जाकर क्यों अलग जगह हैं? क्यूसी के नाम से पेट नहीं भर लेते की अलग निरंजन कहकर वे अपनी ये पराजय स्वीकार नहीं करते की हमने उसे बहुत खोजा, पर देखा नहीं, उसे देख पाना संभव नहीं । किसी भी आदर्शवादी के पास इन और ऐसे ही अनेक प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं । उपनिषदों की आजमा संबंधी का गांव में जो सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है, उसमें भी नचिकेता जब हम से पूछता है की मृत्यु के बाद आत्मा रहती है या नहीं तो यह बालक के इस प्रश्न से भयभीत हो जाता है जब बहुत समझाने और प्रलोभन देने के बाद भी नचिकेता का आग्रह बना रहता है । यम खिन्न मन से उत्तर देता है । जिस आत्मा के संबंध में जिस पर लोकतत्र के संबंध में तुमने प्रश्न किया है, वहाँ वित्त मोह से मूड बालकों के हफ्ते में उदित नहीं हो सकता । मन को वृद्धा तरफ से चंचल करना उचित नहीं । कारण परमार्थ तत्व तक का विषय नहीं । वहाँ तो प्रत्यक्ष अनुभूति का विषय और यम के इस उत्तर की व्याख्या करने की जिम्मेदारी अपने ऊपर छोडकर विवेकानंद कहते हैं । हम लोग बराबर सुनते आ रहे हैं कि प्रत्येक घर में विश्वास करने पर बल देता हैं । हमने आंखे बंद करके विश्वास करने की शिक्षा पाई है । ये अंधविश्वास सचमुच की बुरी, बस इसमें कोई संदेह नहीं । पर यदि संघ विश्वास का हम विश्लेषण करके देखें तो क्या होगा की इसके पीछे एक महान सत्य ये महान सकते क्या है ये विवेकानंद भी नहीं बातें आपने एक दूसरे भाषण, तर्क और धर्म में वे धर्म का विज्ञान से सामंजस्य स्थापित करने के प्रयास में कहते हैं, हम पूर्ण गया एक हैं । हम भौतिक रूप से एक है, मानसिक दृष्टि से एक है और स्पष्ट हाँ, आत्मिक दृष्टि से तो एक ही है बशर्ते की हमारी आस्था हूँ तो आस्था अंधविश्वास के आगे तर्क का आपने टेक देना ही महान सके । हुआ इसका मतलब ये हुआ की और धर्म के अंधविश्वास और रहस्यवाद को मानो या ना मानो पर उपनिषदों के अंधविश्वास और रहस्यवाद को अवश्य और समझकर मानव की एक महान सकते हैं । क्या यह भक्ति मुक्ति की मूर्खता को प्रश्रय या देना नहीं है? दरअसल मूर्खतापूर्ण भावुकता धर्म का पहनना है, पर तर्क चूकी विवेकानंद के जीवन का संभाल रहा है, क्योंकि उनका चिंतन उस हद तक वैज्ञानिक था, जिस हद तक उभरते हुए वो युवा के उत्कृष्ट प्रवक्ता का होना संभव था और चूकी उन्होंने विद्यांत दर्शन, परक्रम विकास का सिद्धांत लागू किया है । इसलिए मैं उसे अपने ग्रुप भाइयों की तरह सहेज में बच्चा नहीं बातें व्यवहारिक जीवन में वे दान भाषण में भी कहते हैं । धर्म जो भी दावा करता है, तर्क की कसौटी पर उन सब की परीक्षा करना आवश्यक है । धर्म ये दावा करता है कि वह डर के द्वारा परीक्षित होना नहीं चाहता हूँ । ये कोई नहीं बदला सकता । तर्क के मानदंड के बिना किसी भी प्रकार का यथार्थ निर्णय धर्म के संबंध में भी नहीं दिया जा सकता । धर्म कुछ विभाग से करने की आज्ञा दे सकता है । धर्म के विपक्ष के रूप का इतिहास साक्षी है । विस्तार में जाने की गुंजाइश नहीं । हमारे धर्म का अनर्थ यह है कि उसने हमें आत्मकेंद्रित बना दिया । हाँ, विवेकानन्द खुद मानती हैं । अब तक हमारे भारतीय धर्म का बडा दोष दो शब्दों के ज्ञान में नहीं आ रहा । संन्यास और मुक्ति केवल मुक्ति की बात गृहस्थी के लिए कुछ नहीं । दूसरे भौतिकवाद भी अब द्वंद्वात्मक तथा ऐतिहासिक भौतिकवाद तक विकसित हो गया है । उसने भी इसी तथ्य को समझ लिया है कि संसार में जो कुछ हम देख रहे हैं, वह एक पदार्थ ही के अनेक रूप हैं । पदार्थाे वर्ष, सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान, अजय, अमर सत्ता है । अध्यात्म वादियों ने जिसका नाम ईश्वर रखा । अध्यात्मवाद ियों ने अपने कल्पित भगवान में जितने गुण आरोपित किए हैं, ये सब पदार्थ में मौजूद हैं । गति के बिना बदार का कोई स्थित नहीं । पदार्थ की अगति देश और काल में होती है । पदार्थ के बिना देश और कालका देश और काल के बिना पदार्थ का कोई असर बनेंगे, यही आइन्स्टाइन का सापेक्षतावाद है । वर्णात्मक भौतिकवाद का सिद्धांत बीस नियम का अपवाद नहीं हेगल ने अपने चिंतिन की चरम सीमा निर्धारित कर के क्रम विकास के सिद्धांत को झुक लाया था और विवेकानंद ने भी झुक लाया है । लेकिन भौतिकवादी मानव चिंतन की कोई सीमा निर्धारित नहीं करते, उस पर विराम चिन्ह नहीं लगाते हैं । वन धरात्मज भौतिकवाद का सिद्धांत, मार्क्स और फॅसने प्रतिपादित किया । लेनिन और माओत्से तुमने उसे विकसित किया और समृद्ध बनाया । उनके अलावा और अनेक मार्क्सवादी विचारक उसे कमोबेश विकसित कर रहे हैं और समृद्ध बना रहे हैं । ये विकास तब तक जारी रहेगा जब तक जीवन है । फिर द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के किसी भी स्तर पर मनुष्य प्रकृति के नियमों का उल्लंघन नहीं करता और ना वहाँ उनसे ऊपर उठता है, बल्कि वहाँ उन्हें समझकर उन्हें उपयोग मिलाता और उनसे लाभ उठाता है । वर्णनात्मक भौतिकवाद ने यह सिद्ध कर के गति और चेतना पदार्थाे के गुण हैं । अध्यात्मिक अद्वैतवाद को भौतिकवाद बना दिया है । यो दर्शन विज्ञान बन गया है और विज्ञान, दर्शन, ईश्वर कल्पना अर्थात अमृत्व की भावना ने जिस चोर दरवाजे से साल के दर्शन में प्रवेश किया था, वहाँ चूर दरवाजा बंद करवा दिया है । विज्ञान का धर्म से कदाचित कोई समझौता नहीं । मार्क्स कहता है किसी राष्ट्र का सिद्धांत उसी हद तक यथार्थ हैं, जिस हद तक वहाँ उस राष्ट्र की आवश्यकताओं का यथार्थ ठीक रन कर पाता है । इसी बात को मौत से तुमने योग कहाँ है? दर्शन का भविष्य सामाजिक वर्गों की आवश्यकताएं पूरी करने पर ही निर्भर है । वेदान्त दर्शन के सिद्धांत ने हमारे देश के शोषक वर्गों की सामाजिक आवश्यकताओं को कैसे पूरा किया? उसके इस व्यावहारिक पक्ष पर हम अगले परिच्छेद में विचार करेंगे । पर सैद्धांतिक पक्ष पर विचार करके हम ये देख चुके हैं कि मूख्य अथवा निर्माण की इच्छा पहले पहल शोषक वर्गों के मन में ही उत्पन्न हुई । शरीर और मन से परे आत्मा नाम की स्वतंत्र तत्व की कल्पना करने तथा उसे चोर दरवाजे से सांख्य दर्शन में प्रविष्ट करने वाले भी वही है । इस संदर्भ में विवेकानंद की ऐतिहासिक भूमिका यह है कि उन्होंने वेदांत दर्शन में क्रमविकास का सिद्धांत जोड कर इसे साम्राज्यवादी और तथाकथित सुधारकों के विरुद्ध लडने का शास्त्र बनाया और यहाँ से हमारे देश के उभरते हुए पूंजीपति वर्ग की सामाजिक आवश्यकता के अनुकूल बनाने का प्रयास और हम ये भी देख चुके हैं कि अपने इस प्रयास में में धर्म की चरम सीमा का अतिक्रमण कर जाते हैं । अतिक्रमण करना अनिवार्य था क्योंकि धर्म का विज्ञान से सामंजस्य मुंबई नहीं । अरे समझ विपक्ष अर्थात विज्ञान जब ये घोषणा करता है की आत्मा की स्वतंत्रता मात्र है । तब विवेकानंद अपने धर्म के मूल तक लेख में इसी सामंजस्य के चक्र में पढकर लिखते हैं । अभी और तो स्वतंत्रता को भ्रम घोषित कर उसकी सत्ता की स्वीकृति कोई समाधान नहीं । दूसरी ओर हम ये क्यों ना कहे की आवश्यकता अथवा बंधन अथवा करन का विचार अज्ञानियों का एक भ्रम मात्र है । कोई भी सिद्धांत जो विवेच्य कथ्यों में से उन सबको पहले काटकर अलग फेंक देता है जो उनके अनुकूल नहीं पढते और तब अपने अनुकूल व्यक्तियों को लेकर समग्र की व्याख्या का दावा करता है । स्पष्ट यहाँ एक भ्रामक सिद्धांत है, अशुद्ध सिद्धांत है । अतः हमारे लिए एकमात्र शेष मार्ग यही है कि हम स्वीकार करे की प्रतिबद्धता ना शरीर स्वतंत्र है और ना अच्छा ही बल्कि मन और शरीर दोनों से परे निश्चय कि कोई ऐसा तथ्य होगा जो स्वतंत्र हैं और सोचिए इसको होगा क्या यार ये विवेकानंद का अपना तर्क वितर्क आखिर में इस कदर दुविधा में पड जाते हैं कि और से आगे कुछ कहते ही नहीं बन पडता कहने कुछ था ही नहीं जब इस प्रकार दुनिया में पडे हुए थे हमारा तत्कालीन राष्ट्रीय का वीक्षक मस्त समझती पक्ष की घोषणा निसंकोच समर्थन करता है । जिंदगी क्या है उन असर में जरूरी तरती मौत क्या है इंडिया जजा का परेशान अर्थात जीवन क्या है? पंचतत्वों के संगठन की अभिव्यक्ति और ही तत्वों के विकेट । इनका नाम मृत्यु लेनिन का मत है । मनुष्य को एक ही जीवन रहने को मिलता है । वहाँ इस प्रकार चाहिए कि मरते समय मन में यहाँ खेल उत्पन्न हो कि मैंने इससे व्यर्थ खो दिया ।

10. Swami Vivekanand

चैप्टर नहीं विधान बनाम ऐतिहासिक भौतिकवाद हमने एक विषय में मुख्य वस्तु को भूलकर से छिलके ही लेकर बहुत कुछ उछल कूद मचाते हैं । विवेक आना । विवेकानंद ने इस बात पर बार बार जोर दिया है कि हमारे राष्ट्र का मेरूदंड रीड की हड्डी धर्म है । दरअसल धर्म किसी प्राची अथवा पार शाह की राष्ट्र का मेरूदंड नहीं, हमारा भी नहीं और नाइस पर हमारा कोई विशेष अधिकार है । इस विषय संबंधी मार्क्स की व्याख्या ये है तथ्यों की मित्तियां व्याख्या का नाम धर्म है । हम देख चुके हैं कि मनीष ने प्रत्येक देश में प्रकृति की वृद्ध अपने संघर्ष में जहाँ प्रकृति को अपने कर्म द्वारा बदला है, वहाँ कल्पना से भी कम लिया अपनी अल्पज्ञान के कारण तक क्यों कि मित्तियां व्याख्या की है । जैसे जैसे समाज का विकास हुआ और जैसे जैसे उत्पादन, संघर्ष वर्ग संघर्ष और वैज्ञानिक अनुसंधान द्वारा मनुष्य ने तथ्यों को जितना समझा उसके वास्तुविज्ञान की मात्रा उतनी ही बढती गई और वृद्धि की इसी मात्रा के अनुपात से मिथ्या धारण अर्थात धर्म से अनुसार हटता गया और उसमें सारतत्व जुडता चला गया आती है । जैसे जैसे समाज का विकास होता रहा, उत्पादन संबंध तथा आवश्यकताएं बदलती रही, धर्म का भी यथार्थ इकरन होता चला गया और उसका व्यवहारिक रूप निरंतर बदलता रहा । ऐतिहासिक भौतिकवाद का यहाँ नियम जैसे सब देशों पर लागू हुआ, वैसे ही हमारे देश पर भी लागू हुआ । यह एक निरपेक्ष सकते हैं जो किसी भी देश की विशिष्ट परिस्थितियों पर लागू होते समय साहब पे तो बन जाता है पर कोई भी देश इसका अपवाद और हमारा नहीं । इसलिए धर्म किसी भी प्राची या पातशाह राष्ट्र का विशेषाधिकार नहीं । हमारा नहीं और होना भी नहीं चाहिए क्योंकि मितिया पर विशेषाधिकार जताना नीरी मूर्खता है । मूर्खता के सिवाय कुछ नहीं । इसी मोर्चा के फलस्वरूप हमारा देश गुलाम बना और जिस धर्म पर हम इतना गर्व करते हैं, वहाँ भी गुलाम बना । बुद्धिमता की बात अब ये देखना है कि हमारे हजारों साल के इतिहास में वेदांत का विभाग करू क्या रहा और उसमें हमें जो कुछ विरासत में मिला उसमें सारतत्व क्या है? आसार क्या है? छिलका किया है जिससे हमें फेंकना है और मुख्य वस्तु किया है जिससे हमें रखना और आगे विकसित करना है । तभी हम अपनी राष्ट्रीय समस्याओं को यथार्थ रूप में समझ पाएंगे । कभी भविष्य का कार्य और विकास की दिशा निर्धारित होगी । विवेकानंद का महत्व उनके धर्म प्रचार में नहीं बल्कि उनका महत्व इस बात में है कि वे हमारी इस राष्ट्रीय विरासत को समझने अपनाने में और समस्याओं के समाधान में हमारी मदद करते हैं । हम वरुण का एहसास ये है कि उन्होंने आज से पौन सभी पहले छिलके को अलग कर के मुख्य वस्तु पर राष्ट्र का ध्यान केंद्रित किया । देश का दुर्भाग्य ये हैं कि उन के बाद हमने मुख्य वस्तु से ध्यान हटाकर छिलके पर केंद्रित किया । धर्म को राष्ट्र का मेरूदंड बताने में उनका जो आशय था, राष्ट्रविरोधी तत्वों ने उसे भ्रष्ट करने, धूमिल बनाने और हमारी दृष्टि से ओझल रखने का षडयंत्र रचा और हम मंजिल से भटक गए । लेकिन कहावत है कि सुबह का भूला अगर शाम को घर आ जाए तो भूला नहीं कहना था । पांचवी हमारे इस महान राष्ट्र के जीवन में क्षण के बराबर है । आइए हम विवेकानंद के चिंतन से अपने चिंतन का सूत्र जोडे और जिस रास्ते से हम भटक गये हैं उस पर वापस हम कह चुके हैं कि कर्मवाद और मायावाद वेदांत दर्शन के आधारिक स्तम्भय । अब देखना यह है कि सामाजिक जीवन में उनका व्यवहारिक रूप क्या है और देश की भौतिक तथा आर्थिक स्थिति से उनका द्वंद्वात्मक संबंध क्या है? गीता तथा मैदान के दूसरे ग्रंथों में पुनर्जन्म अथवा करमाबाद की कुछ भी व्याख्या की गई हो पर इसकी उत्पत्ति का भौतिक आधार यह है कि व्यक्तिगत संपत्ति के साथ साथ भारतीय समाज वर्गों में ही नहीं वर्णों, जातियों में भी विभाजित हुआ ब्राह्मण, क्षत्रिय, सवर्ण तथा श्रेष्ठ माने जाते थे और उन्हें ही जीवन की सुख सुविधाएं प्राप्त थी । शेषराम करने वाले सभी बढ रही नत्वा शूद्र माने जाते थे और सब कुछ पैदा करने के बावजूद भी भूख और दरिद्रता का जीवन जी रहे हैं । कर्मवाद के सिद्धांत ने शोषक और शोषित दोनों को संतुष्ट किया । सवर्णों ने ये मान लिया कि उन्होंने पिछले जन्म में जब पुण्यकर्म किए थे उन के फलस्वरूप में उच्चवर्णीय श्रेष्ठ कुल में उत्पन्न हुए हैं और इसी से उन्हें दूसरों के श्रम पर्ची ने का अधिकार प्राप्त हैं । शोज तो अर्थात शूद्रों को ये आश्वासन दिया गया कि सारे दुख और कष्ट तुम्हारे पिछले जन्म के बुरे कर्मों का फल है । अगर जमे जिनमें में आपने वर्ल्ड धर्म का पालन करते हुए हमारी निष्काम भाव से सेवा करोगे तो तुम भी अगले जन्म में उच्चवर्णीय अथवा श्रेष्ठ कोई में उत्पन्न होंगे और कठोर श्रम से छूट जाओगे । वर्णव्यवस्था हमारे समाज संगठन का विशेष रूप है इसलिए कर्मवाद का सिद्धांत भी हमारे ही देश में विकसित हुआ । दूसरे देशों की धार्मिक विचार उनकी विशेष भौतिक परिस्थितियों के अनुसार विकसित हुए लिखा है आत्मा की प्राचीनतम कल्पनाएं स्कूल शरीर में एक सूक्ष्म शरीर की भी स्कूल के अगोचर हो जाने पर सूक्ष्म कोचर हो जाता है । मिस्टर देश में सूक्ष्म शरीर का भी निधन हो जाता है । स्कूल शरीर के बिखर जाने पर सूक्ष्म शरीर भी बिखर जाता है । यही कारण है कि उन्होंने पिरामिडों का निर्माण किया और अपने पुरखों के मृत शरीर को आली प्रवेश ममीफिकेशन किया और ये आशा की की मरे हुए लोग इस क्रिया से अमरत्व प्राप्त करेंगे । मुसलमान और इसाई अपने मृत शरीर को दफनाते हैं क्योंकि उनका विश्वास है कि वे कयामत के दिन उठेंगे और तब अपने अच्छे बुरे कर्मों के हिसाब से स्वर्ग तथा नरक में जाएंगे । स्वर्ग नरक का विचार हिंदुओं में भी मनाया जाता है और इसके अलावा चंद्र लोग आदि कितने ही सीनों की कल्पना की गई है जिनमें आत्मा को अपने कर्मों के अनुसार रहना पडता है लेकिन यहाँ महत्वा दियो की कल्पना है विवेकानंद का इसमें विश्वास नहीं है । वे लिखते हैं स्वर्ग तथा अन्य सीनों से संबंधित धारणाएँ भी है किंतु उन्हें द्वितीय श्रेणी का माना जाता है । स्वर्ग की धारणा को निम्नस्तर ये माना जाता है उन का उद्भव भोग की एक स्थिति पानी की इच्छा से होता है । हम मूर्खतापूर्ण समग्र विश्व को अपने वर्तमान अनुभव से सीमित कर देना चाहते हैं । बच्चे सोचते हैं कि सारा विश्व बच्चों से ही भरा है । पागल समझते हैं कि सारा विश्व एक पागल खाना है । इसी तरह अन्य लोग इसी प्रकार जिनके लिए यह जगह केंद्रीय संबंधी भूख मात्र है । खाना और मौज उडाना ही दिन का समग्र जीवन है । उनमें तथा नृशंस पशुओं में बहुत कम अंतर है । ऐसे लोगों के लिए किसी ऐसे स्थान की कल्पना करना स्वाभाविक है जहाँ उन्हें और अधिक भूख प्राप्त होंगे क्योंकि यहाँ जीवन छोटा है, भूख के लिए उनकी इच्छा सीम है । आते वे ऐसे तीनों की कल्पना करने के लिए विवश है जहाँ उन्हें इंद्रियों का आबाद भोक प्राप्त हो सकेगा । फिर जैसे हम और आगे बढते हैं । हम देखते हैं कि जो ऐसे सीनों को जानना चाहते हैं, उसका स्वप्न देखेंगे और जब स्वपन कांत होगा तो एक दूसरे स्थान का स्वप्न देखेंगे जिसमें भोग प्रचुर मात्रा में होगा और जब वहाँ स्वप्ने टूटेगा तुम्हें किसी अन्य वस्तु की बात सोचनी पडेगी । इस प्रकार से ज्यादा एक स्वप्ने से दूसरे स्वप्न की ओर भागते रहेंगे । मतलब ये कि मनुष्य की चेतना उसकी सामाजिक स्थिति से निर्धारित होती है, जिन्हें इस लोग में सुख भोग के साथ प्राप्त थे । उन्ही लोगों ने अपने लिए पर लोग में भी स्वर्ग की कल्पना की और जो लोग इन साधनों से वंचित थे, ताकि वे उनके सुख भोग में बाधा ना डाले । व्यक्तिगत संपत्ति को हानि पहुंचाने वाले सभी कर चोरी, बईमानी को अशोक बताकर उन्हें नरक के भाई से डराया । पुनर्जन्म का सिद्धांत भी ऐसी ही कल्पना है । पर वेदांत का आधार स्तंभ होने के कारण विवेकानंद उसे यहाँ स्वीकारते नहीं । फिर भी चिंतन वैज्ञानिक होने के कारण उनका विश्वास यहाँ भी डगमगा जाता है । पुनर्जन्म के पक्ष और विपक्ष में दिए जाने वाले मतों का विवेचन करने के बाद इसी शीर्षक के अपने लिख के अंत में मैं जो कहते हैं, इस प्रकार हमारे लिए पुनर्जन्म का सिद्धांत बहुत महत्वपूर्ण बन जाता है, क्योंकि पुनर जनम और कोशिकाओं द्वारा आनुवंशिक संक्रमण के मध्य जो विवाद है, वहाँ यथार्थ में अध्यात्मिकता और भौतिकता का विवाद है । यदि कोशिकाओं द्वारा आनुवांशिक संक्रमण समस्या को हल करने के लिए पूर्ण था, पर्याप्त है, तब तो बहुत टिकता ही अपरिहार्य हैं और आत्मा के सिद्धांत की कोई आवश्यकता ही नहीं । यदि वहाँ पर्याप्त नहीं है तो प्रत्येक आत्मा अपने सात जन्म में भूत कालिक अनुभवों को लेकर आती है । यह सिद्धांत पूर्णतः आ सकते हैं पुनर्जनन में । अब भौतिकता इन दोनों में किसी को मानने के सिवा और कोई गलती नहीं है । प्रश्न यह है कि हम किसे मानें? इस प्रश्न सुनने पर विचार कीजिए । क्या एक सन्यासी एक धर्म प्रचार के लिए ये साहस की बात नहीं है? मार्च उन्नीस हो सानफ्रांसिस्को में जीवात्मा एवं परमात्मा शीर्षक भाषण में उन्होंने कहा, दो प्रकार की जाती हैं देवी सम पदावली और आसुरी संपदा वाली । पहले का बच्चा है कि वे स्वयं जीवात्मा तथा परमात्मा के स्वरूप है । दूसरी का विचार है कि वे शरीर मात्र है । प्राचीन भारतीय तक चिंतकों ने जोर देकर कहा है कि शरीर नश्वर हैं । जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर अन्य नवीन वस्त्र को ग्रहण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीर को छोडकर अन्य अन्य नवीन शरीरों को प्राप्त करती है । जहाँ तक मेरा सवाल है, वातावरण एवं शिक्षा दीक्षा के परिणाम से मैं कुछ विपरीत ही सोचने को विवश हुआ था । मेरा अधिक संपर्क ईसाई मुसलमानों से रहा, जो विषेशकर शरीर से भी होते हैं । विवेकानंद के पिता होगा दी थी । धर्म उनके लिए गौण वस्तु थी । इसलिए चाहे उन्होंने रामकृष्ण परमहंस को गुरु बनाकर दूसरा जन्म धारण किया, पर इसके बावजूद पिता की विरासत को वो झटक नहीं पाए । क्षेत्रीय खुल के चंचल नरेंद्र ही बने रहे । बुद्ध के बारे में कहानी है कि बुद्ध ने मानव जाति के पर इतराता के रूप में जिनमें लिया हिंदू जब वह राज प्रसाद की विलासिता में अपने को भूल गया तब उसे जगाने के लिए देवदूत ने की दिखाया जिसका मार मार इस प्रकार है हमें एक प्रवाह में बहते चले जा रहे हैं । हम अविरत रूप से परिवर्तित हो रहे हैं, कहीं निवृत्ति नहीं है, वही विराम नहीं है बुद्ध ही को जो एक राजकुमार था, मृत्यु के भय ने विचलित किया और बुद्ध ही ने घर त्याग करने के बाद इस छनछन परिवर्तित हो रहे संसार में अमृत्व की झाव का दामन करके निर्माण हासिल करने की बात सूची आत्मा परमात्मा में आज था ना होने के बावजूद बुद्ध में भी पुनर्जनन को मना । गीता के अनुसार आत्मा की बाद एक जनमत धारण करती है । लेकिन बहुत मत के अनुसार एक जन्म के संस्कार दूसरे जन्म में जाते हैं और दूसरा जन्म पिछले जन्म के कर्मों के अनुसार होता है । नाक सीधे हाथ से पकडो या उल्टी से बाद तो एक ही है । वैदिक समाज व्यवस्था में ब्रह्मचर्य, गृहस्थ और वानप्रस्थ के बाद अंतिम आयु में सन्यास धारण करने की प्रथा थी । युवास्था में संन्यास लेने की प्रथा मुद्दे ने चलाई अतेम और सब बातें गौण मोक्ष प्राप्ति ही चीज का मुख्य छह बन गई । इससे जोहानी हुई इतिहास उसका साक्षी है । हाँ, विवेकानन्द कहते हैं बुद्ध ने हमारा सर्वनाश किया और ईसा ने ग्रीस और रोका । विवेकानंद ने बडी विनम्रता से अपने को बुद्ध का दास अनुदान भी कहा है । उसे विशाल उदार तार मना है । लेकिन जब उनका चिंतन अधिक वैज्ञानिक अधिक वस्तु पर हुआ तब उन्होंने बुद्ध के द्वारा देश के सर्वनाश की बात कही और इसकी व्याख्या क्योंकि जिस समय बहुत राज्य में एक एक मठ में एक एक लाख साधु हो गए थे, उस समय देश ठीक नाश होने की ओर अग्रसर हुआ था । बहुत इसाई, मुसलमान, जैन सभी का ये भ्रम है कि सभी के लिए कानून और एक नियम है । ये बिल्कुल गलत हैं जाती और व्यक्ति की प्रकृति भेज से शिक्षा व्यवहार के नियम सभी अलग अलग हैं । बलपूर्वक उन्हें एक करने से क्या होगा? बौद्ध कहते हैं मोक्ष के सदृश्य और क्या है सब दुनिया मुक्ति प्राप्ति करें तो क्या कभी ऐसा हो सकता है तुम रहते हो तुम्हारे लिए? ये सब बातें बहुत आवश्यक नहीं है तो मैं अपने धर्म का आचरण करो । हिन्दू शास्त्र यही कहते हैं । हिंदू शास्त्र कहते हैं कि धर्म की अपेक्षा मूंग अवश्य ही बहुत बडा है किंतु पहले धर्म करना होगा । बहुत होने, इसी स्थान पर भ्रम में पडकर अनेक उत्पाद खडे कर दिए । अहिंसा ठीक है । निश्चय ही बडी बात है । कहने में बात अच्छी है । पर शास्त्र कहते हैं तो गृहस्त बहुत भारी काल परियारी को ये ठप पड जाएं और यदि तो उसका जवाब दस थप्पडों से ना हो तो तुम बात करते हैं विस्तार में जाने की । गुंजाइश नहीं । इतना ही कह देना काफी है कि बुद्ध क्रांति से भर भी पुनरुत्थानवादी था । उसकी ऐतिहासिक भूमिका प्रगतिशील नहीं, प्रतिक्रियावादी है । जनमत का श्रृषि करता । ईश्वर में विश्वास नहीं लेकिन उनका विश्वास है कि शुभकार्य प्रत्येक आत्मा ईश्वरत्व को प्राप्त कर सकती है । महावीर स्वामी सी है । धोनी से सीधी मनुष्य योनि में आए थे । जैनी हिंसा और संग्रह के बजाय अपरिग्रह पर सबसे अधिक जोर देते हैं । लेकिन व्यवहार में जैनी की सबसे अधिक संग्रह करते हैं और चीटियों को आटा खिलाने और पानी छानकर पीने वाले चैन ही सुखोर्इ, मुनाफाखोरी इत्यादि घृणित कर्मणि संकोच करते हैं । मतलब ये है कि सिद्धांत और व्यवहार में जमीन आसमान का अंतर है । शोषक और शासक वर्ग ने एक बुद्ध, एक महावीर और एक भृर्तहरि अपने उच्च वर्ग के पांच दस व्यक्तियों को त्यागकर बैराक के आदर्श बनाकर प्रस्तुत किया । पूजा कराई और व्यवहार जो था उसके बारे में विवेकानंद लिखते हैं राज्य रक्षा आपने भोगविलास, अपने परिवार की पृष्टि और सबसे बढकर पुरोहितों की तुष्टि के लिए राजा लोग सूर्य की भांति अपनी प्रजा का धन शोक लिया करते थे । बिचारे वैश्य लोग ही उनकी रसद और सुधार हो गए । बुद्ध का कथन है यदि यहाँ दृश्य जगत न हो तो हमारी माँ करो ना, किसके लिए सक्रिय हो । लेकिन इस महा करुणा के महान आदर्श ने मेहनत कर जनता को जिस दयनीय अवस्था को पहुंचा दिया है । हाँ, विवेकानन्द ने यूरोप से लौटकर कुंभकरण के भाषण में उनका योगदान किया । भाइयों मैं तुम लोगों को दो चार कठोर शक्तियों से अवगत कराना चाहता हूँ । समाचार पत्रों में पढने में आया की हमारे यहाँ एक व्यक्ति को किसी अंग्रेज ने मार डाला है अथवा उसके साथ बुरा बर्ताव किया है । बस ये सब पढते ही सारे देश में हो हल्ला मच गया । इस समाचार को पढकर मैंने भी आज सुबह पर थोडी देर बाद मेरे मन में ये सवाल पैदा हुआ कि इस प्रकार की घटना के लिए उत्तरदायी कौन हैं? क्यूकि में वेदांत वाली हूँ में स्वयं अपने से ये प्रश्न किए बिना नहीं रह सका । हिंदू सजा से अंतर्दृष्टि पर आ रहा है । वहाँ अपने अंदर ही उसी के द्वारा सब विषयों का कारण ढूंढा करता है । जब कभी मैं अपने मन से ये प्रश्न करता होगी उसके लिए कौन उत्तरदायी है? तभी मेरा मान बार बार ये जवाब देता है कि इसके लिए अंग्रेज तरदायी नहीं बल्कि अपनी दुर्व्यवस्था के लिए अपनी अवनति और इन सारे दुःख कष्टों के लिए एकमात्र हमें उत्तरदाई हमारे सिवा इन बातों के लिए और कोई जिम्मेदार हो ही नहीं सकता । हमारे अभिजात पूर्वक साधारण जनसमुदाय को जमाने से पैरों तले कुचलते रहे । इसके फलस्वरूप विचार एकदम असहाय हो गए । यहाँ तक कि अपने आपको मनुष्य मानना भी भूल गए । सदियों तक विधवानी महारानियों की आज्ञा सिर आंखों पर रख कर केवल लकडी काटते और पानी भर दे रहे हैं । उनकी यह धारणा बन गई की मानो उन्होंने गुलाम के रूप में ही जन्म लिया और यदि कोई व्यक्ति उनके प्रति सहानुभूति का शब्द कहता है तो मैं प्रायः देखता हूँ कि आधुनिक शिक्षा की टीम हांकने के बावजूद हमारे देश के लोग इन पददलित निर्धन लोगों के उन्नयन के दायित्व से तुरंत पीछे हट जाते हैं । यही नहीं, मैं भी देखता हूँ यहाँ के धनी मानी और नव शिक्षित लोग पाश्चात्य देशों के अनुवांशिक संक्रमण, वाद ऍम आदि अंड बंद कमजोर मतों को लेकर ऐसी दानवीय और निर्दयतापूर्ण युक्तियां पेश करते हैं कि यह पददलित लोग किसी तरह उन्नति ना कर सके और उन पर उत्पीडन एवं अत्याचार करने का काफी सुबह का मिलेगा । गीता में कहा गया है विषयासक्त अज्ञानी मनुष्यों को ज्ञान की शिक्षा देकर उनमें भ्रम ना उत्पन्न करना चाहिए । बुद्धिमान मनुष्य को स्वयं कर मन में लगे रहकर अज्ञानी लोगों को सभी कार्यों में लगाए रखना चाहिए । विवेकानंद अपने अधिकार वाज के दोष भाषण में गीता केशिश लोग का हवाला देते हुए कहते हैं, पुरातनकाल कि ऋषियों के प्रति मेरी असीम श्रद्धा होते हुए भी मैं उनकी लोग शिक्षा पद्धति की आलोचना किए बिना नहीं रह सकता । उन्होंने सर्वदा ही लोगों को कुछ नियमों का पालन करने के लिए आदेश दिए और उन्होंने जानबूझकर उनका कारण ना बतलाया था । ये पद्धति नितांत दोषपूर्ण थी और इससे उद्देश्य की पूर्ति हुई नहीं । केवल लोगों के सिर पर निरर्थक बातों का बोझ साल लग गया । लोगों से उद्देश्य को छिपा रखने का उन का कारण ये था कि यदि उन लोगों को उसका अर्थ समझा भी दिया जाता तो भी वहाँ समझ नहीं सकते क्योंकि वे उसके अधिकारी नहीं अधिकारवादी । इन समर्थकों ने इस महान सकती की उपेक्षा कर दी की मनवा आत्मा की शमता सीम है । प्रत्येक मनुष्य ज्ञान प्राप्त करने में सक्षम हैं । यदि शिक्षा उसे उसकी ग्रहण शक्ति के अनुसार शिक्षा दी जाएगी । यदि कोई शिक्षा किसी को कुछ समझा नहीं सकता तो उसको स्वयं अपनी ही योगिता पर होना चाहिए कि वह लोगों को उनकी ग्रहण शक्ति के अनुसार शिक्षा नहीं दे पाता, बजाय इसके कि वहाँ उन लोगों को कैसे को से और कहीं की तुम लोग अज्ञान और कुसंस्कार के बीच पडे सडते रहो । क्योंकि उच्चतर ज्ञान तुम लोगों के लिए नहीं है । निर्भयता पूर्ण सत्य की घोषणा करो, ये ना हो कि इससे कमजोर भी वाले भ्रम में पड जाएंगे । सवर्ण चाहते ही नहीं देखी शूद्र वर्ण व्यवस्था में होंगी, जमा ही नहीं । नहीं धोबी, लोहार, तरखान सभी मेहनतकश अछूत थे । आज भी है । शास्त्र की विद्या प्राप्त करें एक लडकी ने अपने ही प्रयास से धनुष विद्या सीख ली थी तो द्रोणाचार्य ने गुरूदक्षिणा के नाम पर उसके दाहिने हाथ का अंगूठा कटवानी । वे तो चाहते थे कि मेहनत कर जनता ब्रह्म भ्रांतियों और आदिम कुसंस्कारों में बडी देवी देवताओं की पूजा करती रहे । श्री कृष्णा फिर कहते हैं यानि तुम ग्यानी भी हो तब भी अज्ञानियों के बाद सुलभ विश्वास को मध्य दिखाओ । जो लोग अन्य देवताओं की पूजा करते हैं, वस्तुतः मेरी पूजा करते हैं । शूद्रों के लिए पश्चिम तू लिया बिना सोचे समझे कर्म करते रहने का ही उद्देश्य । हालांकि सवर्णों के अपने सब कम से कम होते थे । उठो और युद्ध कर कहने के साथ ही श्रीकृष्ण ने अर्जुन के दोनों हाथों में लड्डू थमा दिए । जीतेजी राज और मरने पर स्वर्ग लेकिन शूद्रों के लिए निष्काम कर्म सिर्फ काम कर जो करते हुए कि निर्मित करते थे, के रूप में क्या जाता है, वहीं कर्म के बंधनों का नाश कर सकता है । शूद्रों से कहा जाता है कर्म करने ही का अधिकार तुम्हें है उसके फल का नहीं । दरअसल कर्म का फल उनके लिए था ही नहीं तो संसार के दुख सुख की परवाह न करके निष्काम भाव से कर्म करें । उनकी तो भक्ति भी निष्काम होनी चाहिए । दुख इस जगत में अवश्य है किन्तु इस कारण में ईश्वर को प्रेम करना नहीं छोड सकता । मैं उसकी उपासना इसलिए नहीं करता कि वहाँ मेरे दुख को हर्ले । मैं उसको इसलिए प्रेम करता हूँ कि वहां साक्षात प्रेम प्रेम को भी तर्कबुद्धि से परेश्वर की तरह मूर्ति बना दिया । दुख और कष्ट तो मनुष्य के पिछले कर्मों का दंड है । मोहमाया से कर्म और दुख से मुक्त हो जाने के लिए वहाँ कर भी निष्काम भाव से करें और प्रभु भक्ति विदेश कम भाव, उसे ज्ञान की अपने कर्म और उसके फल को समझने की जरूरत ही क्या है? अमेरिका पहुंचने के बाद विवेकानंद ने बीस अगस्त अठारह सौ को हाला सिंगा पेरूमल के नाम पत्र में लिखा था, पृथ्वी पर ऐसा कोई धर्म नहीं जो हिन्दू धर्म के समान इतने उच्च स्वर में मानवता की गौरव का उपदेश करता हूँ और पृथ्वी पर ऐसा कोई घर में नहीं है जो हिन्दू धर्म के समान गरीबों और नित जाती वालों का गला ऐसी क्रूरता से खोलता हूँ । प्रभु ने मुझे दिखा दिया है कि इसमें धर्म का कोई दोष नहीं, पर हम दोष उनका हैं । जुट होंगी और दम भी है, जो परमार्थिक और व्यवहारिक सिद्धांतों के रूप में अनेक प्रकार से अत्याचार के अस्त्रों का निर्माण करते हैं । ये अत्याचार के स्तरों का निर्माण करने वाले विदेशी शासकों से मिलकर भारत की उस श्रमजीवी जनता को चूस रहे थे, जिसे विवेकानंद ने अपने देश भ्रमण के दौरान जिंदगी का एक एक दिन भूमियों पर गिनते देखा था । अमेरिका में भी यह भयंकर दृश्य उनकी दृष्टि में था और वे इस लंबे पत्र को जारी रखते हुए आगे लिखते हैं, उसकी नींद किसी तरह से टूटती ही नहीं । साडियों के अत्याचार के फलस्वरूप जो पीडा, दुख हीनता, दरिद्रता की आप भारत गगन में पूछ रही है, उससे उनके सुक्कड जीवन को कोई जबरदस्त आघात नहीं लगता । युगों की जिस मानसिक, नैतिक और शारीरिक अत्याचार ने ईश्वर की प्रतिमा रूपी मनुष्य को भारवाही पशु भगवती की प्रतिमा रूपी नी, रमणी को संतान पैदा करने वाली दासी और जीवन को अभिशाप बना दिया है, उसकी वे कल्पना भी नहीं कर पाते । आम लोगों में वेदांत दर्शन को उपनिषद्, महाभारत तथा पुराणों की कथाओं द्वारा प्रचारित प्रसारित किया गया । नमूने की कथा देखिए, जिसका विवेकानंद ने ज्ञानयोग पर प्रवचन में प्रयोग किया । एक समय एक संन्यासी किसी पेड के नीचे बैठता था और लोगों को पढाया करता था । वहाँ केवल दूध पीता, ओवर फल खाता और संघीय प्राणायाम क्या करता है था । अपने को बहुत पवित्र समझता था । उसी गांव में एक कुलटा स्त्री रहती थी । प्रतिदिन सन्यासी उस तरी के पास ज्यादा और उसे चेतावनी नेता की उसकी दृष्टता उसे नरक में ले जाएगी । विचार इस्त्री अपने जीवन का ढंग नहीं बदल पाती थी क्योंकि वही उसकी जीविका का एकमात्र उपाय था । फिर भी वहाँ भयंकर भविष्य की कल्पना से सहम जाती थी । जिसे सन्यासी ने उनके समक्ष चित्रित किया था, वो हर होती थी और प्रभु से प्रार्थना करती थी कि वह उसे शमा करें । आखिर एक दिन मस्ती और सन्यासी दोनों ही मारे, स्वर्गदूत आएँ और स्त्री को स्वर्ग ले गए । जबकि सन्यासी को यमदूतों ने पकडा । वहाँ लाया ऐसा क्यों? क्या मैंने पवित्र जीवन नहीं बताया और लोगों को पवित्र होने की शिक्षा नहीं दी । मैं नरक में क्यों ले जाया जा हूँ? जबकि यह कुलटा स्त्री स्वर्ग में ले जाई जा रही है । हमने उत्तर दिया वहाँ पवित्र कार्य करने के लिए विवस थी, पर उसका मन सदैव ईश्वर में लगा रहता था और वह मुक्ति मांग की थी । जब उसे मिली है किन्तु इसके विपरीत तुम यद्यपि पवित्र कार्य ही करते थे और केवल आपका विचार करते थे और अब तुम्हें उसी स्थान को जाना पड रहा है जहाँ केवल पाप ही पाप है । अब इस कथा का विश्लेषण कीजिए । पहली बार यह थक मानवता का गौरव गान करने वाले समाज में कोई भी स्त्री शरीर बेचने, ऐसा घृणित कार्य करने के लिए विवश क्यों? दूसरे वैश्यावृत्ति शोषण की व्यवस्था का अभिन्न अंग है । इसलिए उसे हटाने का प्रयास करने के बजाय शरीर भेजने वाली विवश कुलटा स्त्री को उसे ही क्या, सभी उत्पीडित तथा शोषित श्रमजीवियों को सांत्वना दी गई कि तुम्हारा कार्य कितना ही ग्रंाट और कष्टदायक हो, तुम उसे निष्काम भाव से करते रहो और प्रभु में मन लगाए रहो तो तुम स्वर्ग में जियो । तीसरे नाशिक देखो ना शुभ सुनो ना शुरू बोलो अर्थात बडे आदमियों की दृष्टता पर ध्यान मत दो वरना तुम दूध पीने और फल खाने और पवित्र कहलानेवाले संन्यासी की तरह नरक में जाओगी, जहाँ सिर्फ पाप ही पाप है । चौथे हाँ विवेकानन्द स्वर्ग नरक को सुख सुविधा प्राप्त धनी वर्ग की कल्पना मात्र मानते हैं । इसका प्रयोजन यह है कि एक तरफ चरित्र जन को ये आश्वासन दिया जाता है कि पवित्र बनाया हूँ तब तक जन्म मरण के बंधन से मुक्त होकर स्वर्ग जाओ और दूसरी तरफ कहीं असंतुष्ट होकर उपद्रव या विद्रोह ना करें । इसलिए नरक का भय दिखाया जाता है । देख पराई चोपडी मत । तार साओजी रूखी सूखी खाये की ठंडा पानी पी अपने लिए और निम्न वर्ग के लिए नैतिकता के मापदंड अलग अलग थी । महाभारत और रामायण की बडी महिमा है । निश्चित रूप से न सिर्फ भाषा और साहित्य के विकास में बल्कि समाज गठन में उन का बहुत बडा योगदान है और ये दोनों वहाँ का भी हमारी अमूल्य संस्कृति है । लेकिन इनका आधार विधान प्रदर्शन है और इनके द्वारा वहीं दोहरी नैतिकता प्रचारित प्रसारित हुई है । विश्लेषण के लिए महाभारत के मुख्य बात धर्म पूछ रही दृष्टिहीनो लीजिए । कहते हैं कि उसने आजीवन कभी झूठ नहीं बोला । इसलिए वहाँ सिर्फ स्वयं शरीर स्वर्ग में गया बल्कि अपने भाइयों और कुत्ते तक को साथ ले गया । लेकिन जब कुरुक्षेत्र में पांडवों पर संकट आया था और झूठ बोले बिना द्रोणाचार्य की हत्या संभव नहीं थी तब श्रीकृष्ण षड्यंत्र रचा । धर्मपुत्र युधिष्टिर से कहलवाया था अश्वशक्ति महातेजा नरोवल कंजरूर अर्थात् अश्वत्थामा मारा गया । जब मिनिस्टर ने इतना कहा तो शेष भाग मैं नहीं जानता कि वहाँ नर था या पशु शंकर घडियाल बजाकर कोलाहल में दबा दिया गया । जब युधिष्ठिर को मालूम था कि अश्वत्थामा नाम के हाथ की हत्या, षड्यंत्र को सफल बनाने की नियति ही से की गई तो क्या धर्मपुत्र इसमें सहयोगी नहीं बना? श्रीकृष्ण द्वारा इस्तेमाल नहीं हुआ । फिर कौन सी नैतिकता है? कौन सा असत्याचरण हैं वही इनके महाकवि तुलसी की बात समझत को नहीं । दोष गुसाई अब लीजिए रामायण की बात । कहते हैं कि दशरथ ने राम का राज्याभिषेक करने के लिए प्रजा से अनुमति प्राप्त की थी । अगर प्रजा की बात का इतना ही सम्मान था तो उसे एक के कई के विरोध पर रद्द क्यों कर दिया गया? दूसरे आदर्श चरित्र राम ने बडा त्याग किया । पिता की बात रखने के लिए गड्डी ठुकरा दी । भारत ने भी बडा त्याग किया कि उस पर खुद बैठने के बजाय बडे भाई की खडा रख दी । सवाल यह हैं त्याग किसने किस के लिए? क्या गड्डी किसी धोबी या तार खान के पास चली नहीं गई? दशरत के बेटों में ही रही प्रजा पर उन्हीं का दुशासन रहा । तीसरे दशरथ ने जब राम को राजा बनाने के लिए प्रजा की राय पूछी थी । अगर प्रजा राम के नाम की मंजूरी ना देकर अपने में से किसी सुबह और सुयोग्य व्यक्ति का नाम लेती तो क्या उसे राजा बना दिया जाएगा? विवेकानंद लिखते हैं, प्रजा को करुंगा हनी राजेगार में मतदान मत प्रकट करने का अधिकार ना हिंदू राजाओं के समय में था ना बहुत शासकों के समय । यद्यपि महाराजा युधिष्ठिर वारणावत में वैश्विक और शुद्रों के घर गए थे । अयोध्या की प्रजा ने श्रीरामचंद्र को युवराज बनाने के लिए प्रार्थना की थी । सीधा के वनवास तक के लिए छिप छिपाकर सलाह भी की थी तो भी प्रत्यक्ष रूप से किसी स्वीकृत राज्य नियम के अनुसार प्रजा किसी विषय में नहीं खोल सकती थी । वो अपने सामर्थ्य को अप्रत्यक्ष और अव्यवस्थित रूप से प्रकट किया करती नहीं । शक्ति का ज्ञान उस समय भी उसे नहीं था जिस कौशल से छोटी छोटी शक्तियां आपस में मिलकर प्रचंड बाल संग्रह करती है । उनका भी पूरा अभाव था और लिखा है इसमें कोई संदेह नहीं कि ग्रामपंचायतों में गणतांत्रिक शासन पद्धति का बीज अवश्य था और अब भी अनेक सीनों में हैं । पर वहाँ भी जहाँ बोया गया वहाँ अंकुरित नहीं हुआ । यह भाग गांव की पंचायत को छोडकर समाज तक बढ ही नहीं सका । वर्तमान भारत नाम की जिस लीक्स योद्वा रन लिए गए हैं वहाँ विवेकानंद ने अठारह सौ में लिखा था और उत्कृष्ट बांग्ला साहित्य में इसका प्रमुख स्थान है । पहले में आदर्शवादी दृष्टि से बुद्ध और इसका सही के व्यक्तियों को इतिहास बनाने वाले मानते थे, पर इस लेख में वह कितना बदल गए, उसका प्रमाण लीजिए लिखा है । समाज का नेतृत्व चाहे विद्या बाल से प्राप्त हुआ हो, चाहे बाहुबल से या धनबल से, पर शक्ति का आधार प्रजा ही है । शासक समाज इतना ही शक्ति के आधार से अलग रहेगा, उतना ही वहाँ दुर्बल होगा । परन्तु माया की ऐसी विचित्र लिया है, जिनसे परोक्ष रीति से छलबल कौशल के प्रयोग से अथवा प्रतिग्रह द्वारा शक्ति प्राप्त की जाती है । उन्हीं की गणना शासकों के निकट शीघ्र समाप्त हो जाती है । जब पुरोहित शक्ति ने अपनी शक्ति के आधार प्रजा वर्ग जैसे अपने को संपूर्ण अलग किया, तब प्रजा की सहायता पाने वाली उस समय की राजशक्ति ने उसे पराजित किया । फिर जब राजशक्ति ने अपने को संपूर्ण स्वाधीन समझकर अपने और अपनी प्रजा के बीच में गहरी खाई खोद डाली, तब साधारण प्रचार की कुछ अधिक सहायता पाने वाले वैश्विक खुलने राजाओं को या तो नष्ट कर डाला या अपने हाथ की कठपुतलियां बनाया । इस समय वैश्विक कुल अपनी स्वार्थ सिद्धि कर चुका है, इसलिए प्रजा की सहायता को अनावश्यक समझ वहाँ अपने को प्रजा वर्ग से अलग करना चाहता है । यहाँ शक्ति की भी मृत्यु का बीज बोया जा चुका है । ऐतिहासिक भौतिकवाद की दृष्टि से जनसाधारण ही इतिहास के निर्माता है । सभी क्रांतियों के पीछे मूल शक्ति वही रही है, लेकिन क्रांति के फल को एक के बाद दूसरी शोषक वर्ग ने हथिया लिया । विवेकानंद ने भी यही लिखा है और प्रारंभिक साम्यवाद के बाद वर्ग विभाजित समाज के दासियों, सामग्रियों और पूंजीपति युग को विद्याभवन, बाहुबल तथा धनबल के युग कहकर कितनी सम्मेत व्याख्या की है कि वैश्विक मिलने भी अपने को प्रजा वर्ग से अलग कर लिया है और परिणाम ये हैं की शक्ति की भी मृत्यु का बीज बोया जा चुका है । पूंजीवाद अपनी प्रगतिशील भूमिका अदा कर के साम्राज्यवाद में बदल चुका था । लेनिन ने साम्राज्यवाद पूंजीवाद का अंतिम चरण ऍम उन्नीस सौ सोलह में लिखा था, जिसमें उन्होंने जेईई हॉप सिंह की अंग्रेजी पुस्तक साम्राज्यवाद से मदद ली थी और उच्चतम चरण को पूंजीवाद की मृतप्राय अवस्था बताया था । क्या विवेकानंद ने हॉप्स इन और लेने से पहले ही अठारह सौ में साम्राज्यवाद के बारे में सही भविष्यवाणी नहीं की थी? क्या उन के प्रथम कोटि का भविष्य वह रस्ता विचार खोनी में कुछ संदेह है । क्या किसी धर्म प्रचारक द्वारा यह भविष्यवाणी संभव है? विवेकानंद आगे लिखते हैं, साधारण प्रजा सारी शक्ति का आधार होने पर भी उसने आपस में इतना भेद कर रखा है कि वहाँ में सब अधिकारों से वंचित है और जब तक ऐसा भाव रहेगा तब तक उसकी यही दशा रहेगी । साधारण कष्ट घृणा या प्रति आपस में सहानुभूति का कारण होती है । जिन नियम से हिंसक पशु दल बंद हो, शिकार करते करते हैं, उसी नियम से मनुष्य भी मिलकर रहते हैं तथा जाती या राष्ट्र का संगठन करते हैं । स्वार्थी स्वार्थ त्याग का पहला शिक्षक व्यक्ति के स्वार्थ की रक्षा के लिए ही समझती के कल्याण की ओर लोगों का ध्यान जाता है । स्वजाति के स्वार्थ में अपना स्वार्थ है और स्वजाति के हित में अपना है । बहुत से काम कुछ लोगों की सहायता के बिना किसी प्रकार नहीं चल सकते, आत्मरक्षा तक नहीं हो सकती । स्वार्थ रक्षा के लिए यह सहकारिता सब देशों और जातियों में पाई जाती है पर इस स्वार्थ की सीमा में खेलते हैं । भारत की वर्तमान प्रणाली में कई दोस्त हैं पर साथ ही कहीं बडे गुड भी है । सबसे बडा गुण तो ये है कि सारे भारत पर एक ऐसे शासक यंत्र का प्रभाव है, जैसा इस देश में पाटलिपुत्र साम्राज्य के पतन की बात कभी नहीं हुआ । वैश्य अधिकार की जिस चीज ना से एक देश का माल दूसरे देश में लाया जाता है, उसी चीज का के फलस्वरूप विदेशी भाव भी भारत की अस्थि मज्जा में बलपूर्वक प्रवेश पा रहे हैं । इन भावों में कुछ तो बहुत लाभदायक है । कुछ हानिकारक और कुछ इस बात के परिचायक है कि विदेशी लोग इस देश का यथार्थ कल्याण करने में आगे विदेशी साम्राज्यवादी शासन के गुण, दोषियों का कितना समय तथा सुंदर विवेचन । यह विवेचन वेदान्त दर्शन द्वारा नहीं, ऐतिहासिक भौतिकवाद द्वारा ही संभव है । रामकृष्ण परमहंस ने जिन अंग्रेजी शासकों को सिर्फ गोरी जाति के रूप में देखा था, विवेकानंद ने इंग्लैंड में रहकर उनके साम्राज्यवादी चरित्र को और भारत में उनकी भूमिका को भलीभांति समझ लिया जाए और लिखा है, परन्तु अंग्रेजों की मन में यह धारणा होने लगी है कि भारत साम्राज्य यदि उनके हाथों से निकल जाए तो अंग्रेज जाति का विनाश हो जाएगा । इसलिए भारत में इंग्लैंड का अधिकार किसी किसी प्रकार जमाए रखना होगा और इसका प्रधान उपाय अंग्रेज जाति का गौरव भारतवासियों के हृदय में सादा जागृत रखना समझा गया है । इस वृद्धि की प्रबलता और उसके अनुसार चेष्टा की अधिकारिक वृद्धि देखकर हर्ष और खेल दोनों होते हैं । मैकाले की शिक्षा प्रणाली इसाई मिशनरियों और रूडयार्ड किपलिंग सरीके कवियों तथा लिख को द्वारा अंग्रेज जाति के इसी गौरव को भारतवासियों के हृदय पर अंकित करने, उन्हें कालिदास और कबीर की परंपरा से तोडकर मेल्टन और शेक्सपियर की परंपरा से जोडने का और यहाँ बचाने का भरसक प्रयास किया गया कि गोरे प्रभु हम काले जंगलियों को सभ्य बनाने के पवित्र मिशन पर सात समुद्र पार से आए हैं । अंग्रेज अपने इस प्रयास में काफी हद तक सफल हुए और परिणाम यह निकला कि हम उसका दंड उनके चले जाने के तीस बरस बाद भी भुगत रहे हैं और उनकी औपनिवेशिक शिक्षा प्रणाली द्वारा हमारा अब भी बराबर भारतीयकरण हो रहा है । विवेकानंद उसी वर्तमान भारत लेख में आगे लिखते हैं, ऊपर कहा जा चुका है कि परदेशियों के संपर्क से भारत धीरे धीरे जाग रहा है । थोडी सी जागृति के फलस्वरूप स्वतंत्र विचार का थोडा बहुत उदय भी होने लगा है । एक और आधुनिक बादशाह के विज्ञान है जिसका शक्ति संग्रह सबकी आंखों के सामने उसे प्रमाणित कर रहा है और जिसकी चमक सैकडों सूर्यों की ज्योति की तरह आंखों में चकाचौंध पैदा कर देती है । दूसरी ओर हमारे पूर्वजों का पूर्व वीरे असाधारण प्रतिभा और देवदुर्लभ अध्यात्म तत्व कि वे कथाए हैं, जिन्हें अनेक स्वदेशी और विदेशी ने प्रकट किया है । जो युग युगांतर की सहानुभूति के कार्य समस्त समाज, शरीर में जल्दी दौड जाती है और बाल तथा आशा प्रदान करती है । हमारे अतीत में दोष नहीं, गुण भी हैं बल्कि गुण अधिक हैं । कोई व्यक्ति सिर्फ गुणों से ही नहीं, अपने दोस्तों से भी महान बनता है । इसी प्रकार राष्ट्रपति कौन है और दोनों दोनों से महान बनता है । हमें अपने पुरखों के गुणों से तो सीखना ही सीखना है, दोषियों से भी सीखना है । वर्ग विभाजन के बाद यहाँ व्यक्तिगत संपत्ति द्वारा अध्यात्मिक तथा सांस्कृतिक समृद्धि भी आई । हमारी तेज माला हमारी विलक्षण कल्पनाशक्ति का प्रमाण है । वास्तु करा चित्रकला, साहित्य, संगीत, नृत्य, त्यागी सभी ललित तलाव का बहुत विकास हुआ । वेद, उपनिषद, कपिल का सांख्य शास्त्र, गौतम का न्यायशास्त्र, व्यास का मिमांसा, रामायण, महाभारत, चाणक्य नीति, शुक्रनीति, मनस्मृति, पंचतंत्र, कथा, सरित्सागर, अजंता एलोरा और ताजमहल इत्यादि हमारे हजारों साल के वर्ग विभाजित समाज की देन है । कल्पना कीजिए ये सब कितनी बडी साधना का फल है । विवेकानंद भारत का ऐतिहासिक क्रमविकास लेख में अपने इस महान ईद पर गर्व करते हुए लिखते हैं विश्लेषणात्मक शक्ति एवं काव्य दृष्टि की निर्भरता ये ही हिन्दू जाति के निर्माण की दो अंतरवर्ती शक्तियां है जिन्होंने इस जाती को आगे बढने की प्रेरणा दी है । ये दोनों मिलकर मानव राष्ट्रीय चरित्र के मुख्य स्वर्ग हो गए । इनका सहयोग इस जाती को सदा इंद्रियों से परे ले जाने के लिए प्रेरित करता है । वहाँ उनके उस गंभीर चिंतन का रहते है जो उनके श्री पीओ द्वारा निर्मित इस्पात की उस छोरी की भर्ती है जो लोहे का छड काट सकती थी । हिंदू यहाँ इतनी लचीली थी कि उसे वृत्ताकार मोडा जा सकता था । सोने चांदी में भी उन्होंने कविता डाली मणियों का कुछ संयोजन संगमर्मर में चमत्कारपूर्ण कौशल, रंगों में रागिनी महीन पर जो वास्तविक संसार की अपेक्षा स्वप्न लोग का अधिक प्रतीत होता है । इन सब के पीछे किसी राष्ट्रीय चरित्र की अभिव्यक्ति के सहस्त्रों वर्षों की साधना निहित है । कला एवं विज्ञान यहाँ तक कि पारिवारिक जीवन के तथ्य भी काव्यात्मक भावों से परिवेश ठीक है जो सीमा तक आगे बढ जाते हैं कि ेंद्रीय अतीन्द्रिय का स्पर्श करले स्कूल यथार्थता भी अयथार्थ ताकि गुलाबी आभार से अनुगूंजित हो जाये । अंग्रेज शासकों द्वारा हमें अपनी इस महान सांस्कृतिक परंपरा से तोडने का हमारे भारतीय करन का जो प्रयास किया गया, उस पर विवेकानन्द ने भारत का भविष्य में योग प्रकाश डाला है । यह शिक्षा केवल तथा संपूर्ण तथा निषेधात्मक है । निषेधात्मक शिक्षा या निषेध की बुनियाद पर आधारित शिक्षा मृत्यु से भी भयानक है । कोमल मति बालक पाठशाला में भर्ती होता है और सबसे पहली बात जो से सिखाई जाती है वहाँ यहाँ कि तुम्हारा बात मूर्ख है । दूसरी बार जो सीखता है वह यह है कि तुम्हारा दादा पागल है । तीसरी बात यह है कि तुम्हारे जितने शिक्षक और आचार्य है, पाखंडी है । और चौथी बात ये कि तुम्हारी जितने पवित्र धार्मिक ग्रंथ है, उनमें छूटी और कपूल कल्पित बातें भरी है । इस प्रकार वहाँ निषेध हो कि खान बन जाता है, उनमें न जान रहती है और नागरिक शिक्षा का मतलब ये नहीं कि तुम्हारे दिमाग में ऐसी बहुत सी बातें इस तरह ठूस दी जाए कि अंदर बंद होने लगे और तुम्हारा दिमाग उन्हें जीवन भर पचाना । तीन जनवरी अठारह सौ को विवेकानंद ने शिकागो से जस्ट सुब्रमण्यम के नाम पत्र लिखा था । भारत की शिक्षित समाज से मैं इस बात पर सहमत हूँ कि समाज का मूल परिवर्तन करना आवश्यक है । पर ये किस तरह किया जाए? सुधारकों की सब कुछ नष्ट डालने की रीति व्यर्थ सिद्ध हो चुकी है । मेरी योजना ये है । हमने अतीत काल में कुछ बुरा नहीं किया । निश्चय ही नहीं क्या हमारा समाज खराब नहीं बल्कि अच्छा है । मैं केवल चाहता हूँ कि अब तक जो तुमने किया तो अच्छा ही किया । अब इस समय और भी अच्छा करने का मौका आ गया है । खत्म लंबा है । इसमें आपने वेदांत दर्शन द्वारा वर्ण व्यवस्था की व्याख्या उन्होंने योगी है । जात पात की ही बात लीजिए । संस्कृत में जाती का अर्थ है वर्ग या श्रेणी विशेष । यह सृष्टि के मूल ही में विद्यमान हैं । विभिन्न वेदों में इस प्रकार की बात पाई जाती है । सृष्टि के पूर्व में एकत्व रहता है अर्थात जाती का है । श्रृष्टि सृष्टि हुई कि वैविध्य शुरू हुआ । यदि यहाँ विविधता समाप्त हो जाए तो सृष्टि ही का लोग हो जाएगा । जब तक कोई जाती शक्तिशाली और क्रियाशील रहेगी तब तक वहां विविधता अवश्य पैदा करेगी । जो ही उसकी ऐसी विविधता का उत्पादन करना बंद कर दिया जाता है, क्यों ही वहाँ जाती नष्ट हो जाती है । जाती का मूल अर्थ था प्रत्येक व्यक्ति की अपनी प्रकृति को अपने विशेषत को प्रकाशित करने की स्वाधीनता और यही और हजारों वर्ष तक प्रचलन भी रहा । आधुनिक शास्त्र ग्रंथों में भी जाती होगा । आपस में खाना पीना निषेद नहीं हुआ है और न किसी प्राचीन ग्रन्थ में उनका ब्याह शादी करना मना है । तो फिर भारत के आधा पतन का कारण क्या था? जाति संबंधी इस भाव का त्याग जैसे गीता कहती है, जाती नष्ट हुई कि संसार भी नहीं हुआ । अब क्या यह सत्य प्रतीत होता है? किस विविधता का नाश होते ही जगत का भी नाश हो जाएगा? आजकल का वर्ग विभाग यथार्थ में जाती नहीं है, बल्कि जाती की प्रगति में वहाँ एक रुकावट है । वास्तव में उसने सच्ची जाती अथवा विविधता की स्वच्छता को रोक दिया है । मतलब ये हैं कि जब तक हमारा राष्ट्र प्रगति के पथ पर अग्रसर रहा जाती, गुडगाँव बनी रही और प्रत्येक व्यक्ति की अपनी प्रकृति के प्रकाशित होने की विकास प्रक्रिया भी निरंतर जारी रही, पर जब विदेशी आक्रमणकारियों के हस्तक्षेप से राष्ट्र की प्रगति वृद्ध हुई तो जाती गुड घटना रहे कर जन्मगत अथवा वंशगत बन गई । उसने रूट वर्ण व्यवस्था का रूप धारण किया और यही बात हमारे अधःपतन का कारण बनी । अत्यंत आगे लिखा है, हमारा जातीय प्रासाद अभी अधूरा ही है । इसलिए सबकुछ भद्दा दिख पड रहा है । साडियों के अत्याचार के कारण हमें प्रासाद निर्माण का कार्य छोड देना पडा था । अब निर्माण कार्य पूरा कर लीजिए । सब कुछ अपनी अपनी जगह पर सजा हुआ सुंदर दिखाई देगा । यही मेरी समस्त कार्य योजना है । मैं इसका पूरा कायल हूँ । अब देखिए तीस मई अठारह सौ को अर्थात दो बरस बाद उन्होंने परमदास मित्र के नाम अल्मोडा से लिखे पत्र में अपनी इस कार्ययोजना और वेदांत दर्शन की व्याख्या इस प्रकार की है इसके अतिरिक्त मेरी विचारधारा में बहुत विकृति आ गई । स्वीकृति में व्यंग्य ध्वनि है क्योंकि विकृति प्रमदा दास मित्र के ख्याल से थी । वास्तव में यहाँ विकास था । मैं निर्गुण पूर्ण ब्रह्मा को देखता हूँ । यदि वे ही व्यक्ति ईश्वर के नाम से पुकारे जाए तो मैं इस विचार को ग्रहण कर सकता हूँ परन्तु बौद्धिक सिद्धांतों द्वारा परिकल्पित विधाता आदि की ओर मन आकर्षित नहीं होता । ऐसा ही ईश्वर मैंने अपने जीवन में देखा है और उनके आदर्शों का पालन करने के लिए जीवित हो । अभिप्राय रामकृष्ण परमहंस से है । स्मृति और पुराण सीमित बुद्धि वाले व्यक्तियों की रचनाएं हैं और भ्रम, त्रृटि, प्रमाण भेज तथा द्वेष वृद्धिमान हैं । ग्रहण करने योग्य है । शेष सब कत्या कर देना चाहिए । उपनिषद और गीता सच्चे शास्त्र है और राम, कृष्ण, बुद्ध, चैतन्य, नानक, कबीर आदि सच्चे अवतार हैं क्योंकि उनके हृदय आकाश के समान विशाल थे और इन सब में श्रेष्ठ है रामकृष्णा, रामानुजन, शंकर इत्यादि । संकीर्ण हृदय वाले केवल पंडित मालूम होते हैं । वहाँ प्रेम कहा है । वहाँ विजय जो दूसरों का दुख देखकर प्रवित, पंडितों का शिष्ट विद्या विमान और जैसे जैसे केवल अपने आप को मुक्त करने की इच्छा परन्तु महाशय क्या यह संभव है? क्या इसकी कभी संभावना थी या हो सकती है? क्या है भाव? कल पांच भी रहने से इसी चीज की प्राप्ति हो सकती है । मुझे बडा विभेद और दिखाई देता है । मेरे मन में दिनों दिन विश्वास बढता जा रहा है कि जाती भाव सबसे अधिक भेद उत्पन्न करने वाला और माया का मूल है । सब प्रकार का जाती भेज चाहे वह जन्मगत को या गुड गठ बंधन नहीं है । कुछ मित्र ये सुझाव देते हैं । सच है मन में ऐसा ही समझो परंतु बाहर व्यवहारिक जगत में जाती जैसे भेजो को बनाए रखना उचित है । विवेकानंद समझौते की कायल नहीं थे । जब तक जाती कि गुंजत आधार को सही समझा, तब तक उसकी व्याख्या उसी दृष्टि से की और जब ये समझ लिया की गुणवत् मान लेने में भी दोष है तब जाती मनुष्य मनुष्य में भेड का कारण है । तब वे उपनिषदों और गीता की बात भी भूल गए । उन्हें किसी शास्त्र का प्रमाण प्रिया ना था । राष्ट्रीय एकता प्रिया थी । अतोएव लिखा है मन में एकता का भाव कहने के लिए उसे स्थापित करने की कातर, निर्वाह, चेष्टा और ड्रामा जगत में राक्षसों का नरक मृत्य अत्याचार और उत्पीडन, निर्धनों के लिए साक्षा की हमराज परन्तु यदि वही अछूत काफी धनी हो जाए तो अरे! वहाँ तो धर्म का रक्षा धर्म के ठेकेदारों, जांच पांच के समर्थकों की पाखंड व्यक्ति को विवेकानंद ने अब बखूबी समझ लिया था । धर्म के विधि निशेल में अपनी को लीनता की रक्षा और भक्ति मुक्ति में उनके वर्ग स्वार्थ को भी भलीभांति देख लिया था । इन्हीं लोगों ने विवेकानंद पर विदेश में मालिक शो का खान पान अपनाने का आरोप लगाया था । वे उनके इस छिछले आरोप का उत्तर देते हुए लिखते हैं, सबसे अधिक अपने अध्ययन से मैंने यह जाना कि धर्म के विधि निषेध आदि नियम शुक्र के लिए नहीं है । यदि वहाँ भोजन में या विदेश जाने के कुछ विचार दिखाए तो उसके लिए वहाँ सब व्यर्थ है । केवल निरर्थक परीक्षण । मैं शूद्र हूँ, मलेच्छ हूँ इसलिए मेरा इस सब झंझटों से क्या संबंध? मेरे लिए मालिक का भोजन हुआ तो क्या और शूद्र का हुआ तो क्या पुरोहितों की लिखी हुई पुस्तकों में नहीं, अपने पूर्वजों की कार्य का फल पुरोहित को भोगने दो । मैं तो भगवान की वाणी का अनुसरण करूंगा, क्योंकि मेरा कल्याण उसी में हैं । एक और शक्ति जिसका मैंने अनुभव किया है, वो ये है की नि स्वार्थ सेवा ही धर्म है और ब्रह्मा विधि अनुष्ठानादि केवल पागलपन है । यहाँ तक कि अपनी मुक्ति अभिलाषा करना भी अनुचित हैं । मुक्ति केवल उसके लिए एज दूसरों के लिए सर्वस्व त्याग देता है, परंतु वे लोग जमीन मुक्ति की अहर्निश रट लगाए रहते हैं । वहाँ अपना वर्तमान और भावी वास्तविकता कल्याण नष्ट कर इधर उधर भटकते रह जाते हैं । ऐसा होते मैंने कई बार प्रत्यक्ष देखा है । विविध विषयों पर विचार करते हुए आपको पत्र लिखने का मेरा मन नहीं था । इन सब मतभेदों के होते हुए भी यदि आपका प्रेम मेरे प्रति पहले ही जैसा होता तो इससे बडे आनंद का विषय समझूंगा । अठारह सौ छियानवे में इन्हीं ब्रहमदास मित्र को विवेकानन् ने पूछे पास से संबोधित किया था और इस संबोधन की व्याख्या करते हुए उनकी विद्वता को श्रद्धांजलि अर्पित की थी, लेकिन अठारह सौ में ही प्रेमदास मित्र को विवेकानंद ने प्रिया महाशय से संबोधित किया और उनकी विद्वता पर व्यंग्यात्मक भाषा में कडा प्रहार किया । कारण ये कि शास्त्र वाकी के्रट लगाने और अपनी ही मुक्ति की चिंता करने वाले विद्वान तथा पूरोहित लोग अपने को होंगे की तरह विद्वता के खोल में बंद कर लेते हैं, बल्कि यहाँ कहीं की विकास क्रम की उल्टी प्रक्रिया द्वारा मनुष्य से कुछ मंडप में परिणत हो जाते हैं । लेकिन विवेकानंद ने जीवन सेवा और जीवों में भी देश की शोषित उत्पीडित जनता को जगाने, उठाने और आगे बढाने का प्राणांत प्रण ले रखा था । उनके लिए ज्ञान का अर्थ निर्जीव तथा शुष्क विद्वता बगाना नहीं, बल्कि राष्ट्र की तत्कालीन ज्वलंत समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करना था । उनके समुख जंजीरों में जकडी भारत माता थी और था राष्ट्र का आधा पतन, जिसे देख उन्होंने आठ आठ आंसू बनाए थे । राष्ट्र से जुडकर विवेकानंद इतिहास से जुड गए थे । इससे उनकी विचारधारा एक और व्यक्तित्व का निरंतर विकास तेजी से हुआ था । छब्बीस सितंबर अठारह सौ अट्ठानबे को समाज के गुण दोषों को विस्तार से विश्लेषण करते हुए श्रीमती मृणालिनी बसु को एक लंबे पत्र में लिखा है, शिक्षा किसे कहते हैं? क्या वहाँ बटन मात्र हैं? क्या वहाँ नाना प्रकार का ज्ञानार्जन हैं? नहीं, ये भी नहीं । जिस संयम के द्वारा इच्छा शक्ति का प्रवाह और विकास वर्ष में लाया जाता है और वह फलदायक होता है, वहां शिक्षा कहलाती है । अब सोचो की शिक्षा क्या वह है जिसने निरंतर इच्छा शक्ति को बलपूर्वक पीढी दर पीढी रोककर नष्ट कर दिया है, जिसके प्रभाव से नए विचारों की बात ही जाने दो । पुराने विचार भी एक एक करके लोग होते चले जा रहे हैं । क्या वहाँ शिक्षा है जो मनुष्य को धीरे धीरे यंत्र बना रही है, जो स्वयं चालित यंत्र के समान सुकर्म करता है, जो उस की अपेक्षा अपनी स्वतंत्र इच्छा शक्ति और बुड्ढी के बाल से अनुचित कर्म करने वाला मेरे विचार से श्रेयस्कर हैं । जो मनुष्य मिट्टी के पुतले, निर्जीव यंत्र या पत्थरों के ढेर के सत्र खुश हो, क्या उनका समूह समाज के हिला सकता है? इस प्रकार का समाज कैसे उन्नत हो सकता है? यदि इस प्रकार कल्याण संभव होता तो सैकडों वर्षों से दास होने के बदले हम पृथ्वी का सबसे प्रतापी राष्ट्र होते और ये भारत मूर्खता की शान होने के बदले विद्या के अनंत स्रोत का उत्पत्ति स्थान होता तब के आत्मत्याग गुड नहीं है । बहुतों की सुख के लिए बलिदान करना क्या सर्वश्रेष्ठ पूर्ण कर्म नहीं है, अवश्य है । परन्तु बंगला कहावत के अनुसार क्या जिसने मांगने से रूप उत्पन्न हो सकता है, क्या धरने बांधने से प्रति होती है? जो सादा ही भिकारी है उसके त्याग से क्या गौरव जिसमें केंद्रीय बाल ना हो, उस केंद्रीय संयम में क्या गुण है जिसमें विचार का अभाव हृदय का भाव हो, उच्च अभिलाषा का भाव हो जिसमें समाज कैसे बनता है? इस कल्पना का भी अभाव हो उसका आत्मत्याग ही क्या हो सकता है? विधवा को बलपूर्वक सती करवाने में किस प्रकार से सतीत्व का विकास दिखाई पडता है? कुसंस्कारों की शिक्षा देकर लोगों से पूण्य कर्म क्यों कराते हो? मैं कहता हूँ मुक्त कर जहाँ तक हो सके लोगों के बंधन खोल दिए जाए क्या खीचड से कीचर धोया जा सकता है? क्या बंधन को बंधन से हटा सकते हो? ऐसा उदाहरण कहा । फिर वेदांत दर्शन की चर्चा के बाद अंत में लिखा है सप्रेम से कम उपासना पहले आती है । छोटे की उपासना से आरंभ करो, बडे की उपासना स्वयं आ जाएगी । मातम चिंतित मत हो, प्रबल वायु बडे वृक्ष से ही टकराती है । अग्नि को कुरेदने से वहाँ अधिक प्रज्वलित होती है । साफ मारने से पन उठाता है । यानि जब हृदय में पीडा उठती है जब शुरु की आंधी चारों ओर से घेर लेती है । जब मालूम होता है कि प्रकाश फिर कभी ना होगा । जब आशा और साहस कप रायन लूट हो जाता है तब इस भयंकर आध्यात्मिक तूफान में ब्रह्मा की अंतरज्योति चमक होती हैं । वैभव की गोद में पाला हुआ फूलों में पूछा हुआ जिसने कभी एक आंसू भी नहीं बढाया । ऐसा कोई व्यक्ति कभी बढा हुआ है, उसका अंतर नहीं । ब्रह्मा भाव कभी हुआ है, तुम होने से क्यों डरते हैं रोना ना छोडो रोने से नेत्रों में निर्मलता आती है और अंतर्दृष्टि प्राप्त होती है । उस समय भील की दृष्टि मनुष्य, पश्चिम वृक्ष आदि धीरे धीरे लोग होने लगते हैं और सब सीनों में सब वस्तुओं में अनंत ब्रह्मा की अनुभूति होने लगती है । तब सामान पश्चिम ही सर्वत्र समाप्त स्थित मलेश्वरम ना ऍम अनाथ नाम ततो याति परांगत थी । सर्वत्र ही ईश्वर को संभाव से उपस् थित देखकर आत्मा को आत्म से हानि ना पहुंचाकर परमगति को प्राप्त करता है । विवेकानंद ने राष्ट्र के आधा पतन पर भारत माता को गुलामी की जंजीर में जकडी देखकर हमेशा आठ आठ आंसू बहाए । इस सेवन के नेत्रों में निर्मलता आई और वे सचमुच दूरदर्शी बन्दे चले । उन्नीस में जब मैं दोबारा विदेश यात्रा पर गए तो उन्होंने यूरोप यात्रा संस्मरण में भारत के उच्च वर्गों को संबोधित करते हुए लिखा, आर्य बाबा का दम भरते हुए चाहे प्राचीन भारत का गौरव गान दिन रात करते रहो और कितना भी डम डम कहकर गाल बचाओ तो मुझे भी जाती वाले क्या जीवित हो तुम लोग हो दस हजार वर्ष पीछे के मम्मी जिन्हें सचल शमशान कहकर तुम्हारे पूर्व पुरुषों ने घृणा की है । भारत में जो कुछ वर्तमान जीवन है, वहाँ उन्हीं में है और सचिन शमशान हो तुम लोग तुम्हारे घर द्वार म्यूजियम है तुम्हारे आचार व्यवहार, चाल चलन देखने से जान पडता है । बडी बीवी के मुझसे कहानियाँ सुन रहा हूँ तुम्हारे साथ प्रत्यक्ष वार्ता करके घर लौटा हो तो जान पडता है चित्रशाला में तस्वीर दिखाया भविष्य के तुम लोग शून्य एक लोग लू भूत भारत शरीर के रक्त मास हीन कंकाल कोई तुम लोग क्यों नहीं जल्दी थूली में परिणत हो, वायु में मिल जाते । तुम लोग शून्य में विलीन हो जाओ और फिर एक नवीन भारत निकल पडे । निकले हल्की मुठिया पकडे किसानों के झोपडे जाली मोझी महत्व रोकी झोपडियों निकल पडे बनियों की दुकानों से भुजवा के बाढ के पास से, कारखाने से हाथ से बाजार से निकले झाडियों, जंगलो, पहाडों, पर्वतों से इन लोगों ने सहस्त्र सहस्त्र वर्षों तक नीरव अत्याचार सहन किया है उससे पाई है पूर्व सहिष्णुता सिंहासन दुख उठाया उसने पाई है अटल जी वनशक्ति कठिन ये लोग मुट्ठी भर सकते खाकर दुनिया उलट दे सकेंगे आधी रोटी मिली तो तीनों लोग में इनका तेज नाते गा ये रक्तबीज के प्राणों से मुक्त है और पाया है सादा चार बजे जो तीनों लोगों में नहीं है इतनी शांति, इतनी फ्री पी इतना प्यार मेजबान रहकर इतना घटना और काम के वक्त सीख का विक्रम प्रतीत के काम काज समूह यही है तुम्हारे साल में तो महाराणा भूटिया फेंक दो इनके बीच जाओ सिर्फ कान खडे रहो तुम जोडी मिलियन होगे उसी वक्त सुनोगे कोट ईजी भूत बंदिनी ट्रैन लो क्या कम्पन कारिणी भावी भारत के उद्बोधन बनी वाह गुरु की पता है पर फिर दूर सदियों दूर इतिहास में झांकते हुए आगे लिखा है सोच कर देखो बात क्या है वे जो लोग किसान है वे कोरी जुला है, जो भारत के नगण्य मनीष है वी जाती विजीत स्वजाति निंदित छोटी छोटी चाह दिया है । वहीं लगातार चुपचाप कम कर दी जा रही है । अपने परिश्रम का फल भी नहीं पढ रही है । परन्तु धीरे धीरे प्राकृतिक नियम से दुनिया में कितने परिवर्तन होते जा रहे हैं । देश, सभ्यता तथा सत्ता उलट पुलट ते जा रहे हैं । ये भारत के श्रमजीवी हो तुम्हारे नीरव सादा ही निंदित हुए परिश्रम के फलस्वरूप पा बिल ईरान ऍम रिया ग्रीस रोम वेनिस जिनेवा बगदाद समरकंद स्पेंड पुर्तगाल फ्रांसीसी दिन एम आर डॉक्टर अंग्रेजी का क्रम मानवीय से अधिक बात हुआ और ऐश्वर्या मिला है और दो कौन सोचता है इस बात को स्वामी जी तुम्हारे पितृपुरुष दो दर्शन लिख गए दस का भी तैयार कर गए हैं । इस मंदिर आ गए हैं और तुम्हारी बुलंद आवाज से आकाश पड रहा है । अर्जुन की रणधीर स्त्राव से मनीष जाती कि यह जो कुछ उन्नति हुई है, उनके गुणों का गान कौन करता है? लोग गए धर्मबीर, रणवीर, काव्य वीर सबकी आंखों पर सबके पूछे हैं परन्तु यहाँ कोई नहीं देखता यहाँ कोई एक वह वहाँ भी नहीं करता । जहाँ सब लोग घृणा करते हैं, वहाँ वास करती है । अपार सहिष्णुता, अन्य प्रीति और निर्भिक कार्यकरी ता हमारे गरीब घर द्वार पर दिन रात में बनकर कर्तव्य करते जा रहे हैं, उनमें क्या वीरत्व नहीं है? बडा का पुरुष भी सहज में प्राण दे देता है । घोर स्वार्थ पर कभी निष्काम हो जाता है, परन्तु अत्यंत छोटे से कार्य में भी सब के अज्ञात भाव से जो वैसी ही निस्वार्थता, कर्तव्य परायणता खाते हैं, वे ही धन्य है । तुम लोग हो भारत के हमेशा के पैर तले कुछ ले हुए श्रमजीवी हो तुम लोगों को मैं प्रणाम करता हूँ । यहाँ वेदान्त नहीं, द्वंद्वात्मक भौतिकवाद है । श्रमजीवियों को वेदांत ने कब इतिहास के निर्माता तथा पूजा मना । उसने तो उन्हें नीजर शूद्र ठहराया । वेदांत ने कब आपने परीक्षण का फल ना पाने वाले के लिए आंसू बहाए । उसने तो उन्हें निष्काम भाव से पशुवत भारत होने ही की शिक्षा की । विवेकानंद के इतना कहने पर भारत के श्रमजीवियों तुम लोगों को मैं प्रणाम करता हूँ । लकीर के फकीर मैदान की ओर तथाकथित सुधारकों ने उन्हें उलहाना दिया कि तुम नी जातियों कि ग्रेनेड शुद्रों की खामखाह खुशामद करते हो । विवेकानंद ने इस उन्हाने का उत्तर यहाँ दिया । इन लोगों से मैं एक बात पूछना चाहता हूँ की इस देश के लोगों की खुशामद करके मुझे क्या लाभ होगा । यदि भू को मार जाऊ तो देश के लिए एक मुट्ठी अन्य भी नहीं देंगे । उल्टे विदेशों से अकाल पीडितों और अनाथ को खिलाने के लिए मैं जो माँ जांच कर लाया हूँ, उसे भी वे हडपने का प्रयत्न करते हैं । पागलों को जो दवा खिलाने जाएगा, उसे वे दो चार लप्पड थप्पड देंगे । पर उन्हें सहकर बीजों ने दवा खिलाता है, वहीं उनका सच्चा मित्र कहलाता है । अच्छा, फिर अठारह सौ को भारती की संपादिका श्रीमती सरला घोषाल के नाम पत्र लिखा था । मैंने जापान में सुना कि वहाँ की लडकियों को ये विश्वास है कि यदि उनकी गुडियो को हृदय से प्यार किया जाए तो वे जीवित हो जाएंगे । जापानी बालिका अपनी गुड्डियों को कभी नहीं तोडती । हे महाभागे! मेरा भी विश्वास है कि यदि हत श्री अभागी निरुद्धि, पददलित चीज, मुख्य झगडालू और शालू भारतवासियों को भी कोई विजय से प्यार करने लगे तो भारत पुनर्जाग्रत हो उठेगा । भारत तभी जागेगा जो विशाल हृदय वाले फॅमिली पुरुष भोगविलास और सुख की सभी इच्छाओ को विसर्जन कर मन, वचन और शरीर से उन करोडों भारतीयों के कल्याण के लिए सचेष्ट होंगे, जो दरिद्रता तथा मूर्खता के अगाध सागर में निरंतर नीचे रुकते जा रहे हैं । देश से और देशवासियों से प्यार करना । कोई विवेकानंद से किसी प्यार के कारण उन्होंने सैद्धांतिक रूप से वेदांत दर्शन की चरम सीमा को पार किया और इसी प्यार के कारण व्यवहारिक रूप से वे धर्म के विराम चिन्ह को लांघकर कई कदम आगे बढ गए और कहा कि मैं सोचा लिस्ट हूँ क्योंकि भूखे रहने से आधी पेट खा लेना बेहतर है । उन्होंने वर्ग चेतना और वर्ग संघर्ष की बात चाहे नहीं की पर अपने इस प्यार के कारण उन्हें वे अंतर्दृष्टि मिली जिसने पांच जा के पूंजीवादी समाज के सारे प्रपंचों को छेद कर या भलीभांति देख लिया की लोकतंत्र अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए थैलीशाह होगी, तानाशाही है और ये ही लोग अपन स्वार्थ सिद्धि के लिए अपनी मंडियों और मुनाफों के लिए युद्ध छेडते और गरीब लोगों को उसमें ईंधन की धारा छोड देते हैं । राज्य और पांच चार लेख में में लिखते हैं ये ठीक है कि वो बैनेट आदि द्वारा प्रचारको एक प्रकार की जो शिक्षा मिलती है उसे हम नहीं बातें किंतु राजनीति के नाम पर चोरों का दल देशवासियों का रक्त छूटकर समस्या यूरोपीय देशों का नाश करता है और स्वयं मोटा ताजा बनता है । वहाँ दल भी हमारे देश में नहीं हैं । घूस की बहुत हूँ । वहाँ दिन दहाडे लूट जो पांच लाख के देशों में होती है । यदि भारत में दिखाई पडे तो हताश होना पडेगा । घर की जो रूम बर्तन मांझी, गणिका लड्डू खाए गली गली है, कोरस फिरता मदिरा बैठ दिखाए । जिनके आज में रुपया है, राज्य शासन को अपनी मुट्ठी में रखते हैं, प्रजा को लूटते हैं और उसको छूटते हैं उसके बाद है । सिपाही बनाकर देश देशांतरों में मरने के लिए भेज देते हैं । जीत होने पर उन्हीं का घर धन धान्य से भर जाएगा किन्तु प्रचार तो उसी जगह मार डाली गई तुम घबराओ नहीं । आज शेयर भी मत प्रकट कर एक बात पर विचार कर देखो मनुष्य नियमों को बनाता है या नियम मनुष्य को बनाते हैं । मनुष्य रुपया पैदा करता है या रुपया मनुष्य पैदा करता है । मनुष्य कीर्ति और नाम पैदा करता है या कीर्ति और नाम मनुष्य पैदा करता है । सदी में विज्ञान का दबाव बढ जाने से जब धर्म को अपना अस्तित्व बनाए रखना कठिन हो गया तब हेगल ने आदर्शवाद से धन्यवाद का सिद्धांत जोड कर उसे तेजी से बदल रहे समाज की नई परिस्थिति के अनुरूप बनाया है । एक का मत था कि समाज विचार का प्रतिबिंब है । जो जो विचार का विकास हो रहा है उसमें से आयुक्त फॅमिली झड रहा है । जब समस्या आयुक्त झगडे के बाद विचार का चरम विकास निरपेक्ष सत्य से उसका एक कांकर होगा तो समाज भी उन्नति कि उच्चतम शाश्वत स्थिति को प्राप्त कर लेगा । हेगल ने यह भी कहा कि जर्मनी की तत्कालीन सामंती रशियन सरकार नदी की उच्चतम शाश्वत स्थिति है । उसमें अब कोई परिवर्तन संभव नहीं । क्रूशियल सरकार को उन्नति कि उच्चतम शाश्वत स्थिति बनाने के कारण ही जर्मनी के बाम पक्षियों ने हेगल को सरकारी चिंतक कहा और उसके समूचे दर्शन को रद्द कर दिया । लेकिन मार्क्स ने उन्हें समझाया कि खोल के साथ गुलाबी फेंक देना उचित नहीं । आदर्शवाद में धन्यवाद जोडना हेगल की बहुत बडी उपलब्धि है । केरल का सिद्धांत सिर के बल खडा है । उसे पैरों के बल खडा करने की जरूरत है । मार्क्स का कहना था कि समाज विचार का प्रतिबिंब नहीं बल्कि विचार समाज का भौतिक परिस्थिति का प्रतिबिंब है । समाज क्यों? नदी के साथ साथ विचार का भी विकास होता आया है । कोई सामाजिक स्थिति शाश्वत नहीं और विचार के विकास की भी कोई निरपेक्ष सीमा नहीं । यो मार्क्स ने ही गल के द्वंद्वात्मक आदर्शवाद को द्वंद्वात्मक भौतिकवाद बनाया अर्थात उसे पैरों पर खडा किया और भविष्यवाणी की कि जिस प्रकार सामंत बाद से पूंजीवाद का जन्म हुआ है, पूंजी बात से समाजवाद का जन्म होगा । मार्क्स यहाँ भविष्यवाणी सही सिद्ध हुई । मानव व्यवहार ही किसी सिद्धांत को परखने की एकमात्र कसौटी हैं । विवेकानंद की उपलब्धि यह है कि उन्होंने वेदांत दर्शन में क्रमविकास का सिद्धांत जोड । उनका भी यही मत है कि पहले विचार का विकास होता है और फिर उसके अनुसार समाज और उसकी विभिन्न संस्थाओं का विकास होता है । अमेरिका की ब्रुकलीन नैतिक सभा में एक प्रश्न के उत्तर में कहते हैं, मेरे मत में ब्रह्मा जगत की आवश्यक सत्ता है । हमारे मन के विचार के बाहर भी उसका यह समग्र विश्व उन्नति के पथ पर अग्रसर हो रहा है । चैतन्य का यहाँ ग्रामविकास लडके क्रमविकास से पृथक है । जड का ग्रामविकास जय करने की विकास प्रणाली का सूचक या प्रतीक स्वरूप है किन्तु उसके द्वारा इस प्रणाली की व्याख्या नहीं हो सकता । वर्तमान पार्थिव परिस्थिति में वहम रहने के कारण हम अभी तक व्यक्तित्व प्राप्त नहीं कर सकते । जब तक हम उस उच्चतर भूमि में नहीं पहुंच जाते हैं । जहाँ हम अपनी अंतरात्मा के परम लक्षणों को प्रकट करने के उपयुक्त यंत्र बन जाते हैं, तब तक हम प्रकृति व्यक्तित्व की प्राप्ति नहीं कर सकते । यह भी द्वंद्वात्मक आदर्शवाद है और पैरों के बल खडा होने के बजाय सिर के बल खडा है । जिस तरह मार्क्स ने हेगल के सिद्धांत को पैरों के बल खडा किया था और दर्शन को विज्ञान बना दिया था उसी तरह हमारे देश में भी विवेकानंद के द्वंद्वात्मक आदर्शवाद को पैरों के बल खडे करके आतंकवाद मत भौतिकवाद में बदलने की जरूरत थी जिस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया । परिणाम हमारे सामने । वैसे हम देख चुके हैं कि विवेकानंद सैद्धांतिक तथा व्यवहारिक रूप से हेगल और फिर बाइक से आगे जाते हैं । कारण ये कि हेगल और फिर बाक ने अपने को राजनीति से अलग रखा जबकि विवेकानंद ने धर्म के माध्यम से राजनीतिक लडाई लडी । दूसरे उन्नीसवी सदी अंत तक मार्क्सवाद युग की प्रबल विचारधारा बन चुका था । चाहे विवेकानंद ने मार्क्स और एंगेल्स के नामों का उल्लेख नहीं किया पर ये संभव नहीं था की उन सरीके चिंतक में इस विचारधारा के बारे में कुछ पडा और समझा । सोचा ना उन्होंने समाज का ऐतिहासिक भौतिकवादी विवेचन किया है और उनकी दृष्टि ना सिर्फ छोटे से छोटे सूक्ष्म परिवर्तन पर रहती थी बल्कि उन्होंने भविष्यवाणी भी है । श्रमबल की व्यवस्था की भविष्यवाणी भी इन शब्दों में ही है तो भी ऐसा समय आएगा जब शूद्र तत्व सहित शूद्रों का प्राधान्य होगा । अर्थात आजकल जिस प्रकार शुद्र जाती वैवश्वत क्षत्रियत्व आप कर अपना बाल दिखा रही है, उस प्रकार नहीं, बल्कि आपने शुद्ध रोचक धर्मकर्म सहित और समाज में आधी पद के प्राप्त करेगी । पांच जाती जगत में इसकी लालिमा भी आकाश में दिखने लगी है और इसका फलाफल विचार कर सब लोग घबराए हुए हैं । सोशल आॅस्टिन आदि साम्प्रदाय इस विप्लब की आगे चलने वाली बचाये हैं । युगों से प्रचाकर शूद्र मात्र या तो कुत्तों की तरह बडों के चरण चाहने वाले या हिंसक पशुओं की तरह निर्दय हो गए हैं । फिर सदासिवन की अभिलाषाएं निष्फल होती आ रही है । इसलिए दृढता और अध्यवसाय उनमें बिल्कुल नहीं । श्रमिकों में दृढता और अध्यवसाय पंद्रह आत्मक भौतिकवाद की विचारधारा से जुडकर उसे आत्मसात कर लेने के बाद ही आता है । उधर, ठीक

11. Swami Vivekanand

चार्टेंड नवजागरण हमारे यहाँ के आगे पीछे नहीं । हाँ विवेकानन्द स्वदेश लौटने के बाद विवेकानंद ने अपने कलकत्ता के भाषण में कहा था, इसके साथ एक और बात में समझनी होगी वो ये कि आज ऐसी ही वस्तु हमारे सामने मौजूद हैं । इस तरह की अध्यात्मिकता की एक बाढ के प्रबल वीक से आने के पहले समाज में कुछ कुछ छोटी छोटी तरंगे उठती दिख पडती है । इन्हीं में से एक अज्ञात अनजान अकल्पित तरंग आती है । क्रमशः प्रबल होती जाती है । दूसरी छोटी छोटी तरंगों को मानव निकल कर वो अपने में मिला लेती है । और इस तरह अत्यंत पूल का और प्रबल होकर वो एक बहुत बडी बाढ के रूप में समाज पर एक से गिरती और कोई उसकी गति को रोक नहीं सकता । इस समय भी वैसा ही हो रहा है । यदि तुम्हारे पास आके है तो तो मुझे अवश्य देखोगी । यदि तुम्हारा हृदय खुला है तो उसको अवश्य ग्रहण करोगे अंधा बिल्कुल अंदाजा है वह जो समय के चिंता नहीं देख रहा है । क्या तुम नहीं देखते हो वो दरिद्र ब्राह्मण बालक जेक दूर गांव में जिसके बारे में तुम में से बहुत कम ही लोगों ने सुना होगा जन्मा था । इस समय संपूर्ण संसार में पूजा जा रहा है और उसे वे पूछते हैं जो शताब्दियों से मूर्ति पूजा के विरोध में आवाज उठाते आए हैं । ये किसकी शक्ति है? ये हमारी सकती है या मेरी नहीं, ये किसी और की शक्ति नहीं । जो शक्ति यहाँ श्रीरामकृष्ण परमहंस के रूप में आविर्भूत हुई थी, ये वही सकती हैं और मैं तुम साथ महापुरुष यहाँ तक कि अवतार और संपूर्ण ब्रह्मांड भी उसी न्यूनाधिक रूप में पूंजीभूत शक्ति की लाली मात्र है । इस समय लोग अंत होने के पहले ही तुम लोग इसकी अधिकारी का शरीर महिली लाये देख पाओगे । भारत के पुनरुत्थान के लिए शक्ति का आविर्भाव थी कि समय पर हुआ जम्मू जीवनीशक्ति भारत को सदस्य पूर्ति प्रदान करेगी । उसकी बात कभी कभी हम भूल जाते हैं । मैक्सिम गोर्की ने उन्नीसवीं शताब्दी को प्रकाश कि शताब्दी कहा है । पूंजीवादी क्रांति ने जो अठारवीं शताब्दी के अंत तक संबंध हुई, न सिर्फ सामंतवाद और उसके आर्थिक आधार को बल्कि उस की धार्मिक मान्यताओं को भी ध्वस्त कर दिया था । मानव चेतना ने रूढीवाद रंग विश्वास के बंधनों से मुक्त होकर लंबे लंबे तक भरे थे । विज्ञानं कि नए नए आविष्कारों ने दृढ आत्मविश्वास और गौरव की भावनाओं को जन्म दिया था । सारांश ई है की अठारह शताब्दी में विज्ञान और बुद्धिवाद का जो विकास हुआ, उसका प्रकाशक चारों ओर फैल रहा था । इससे हमारे देश में नवजागरण की जो तरंग आई, उसकी सबसे पहले प्रमुख प्रवक्ता राजा राममोहन राय है । उनके बारे में रो मामला नहीं लिखा है । राममोहन रॉय वो असाधारण पुरुष थे, जिन्होंने इस प्राचीन महाद्वीप के आध्यात्मिक इतिहास में एक नए युग का प्रारंभ किया था । वहीं वास्तव में भारत में सबसे प्रथम विश्व नागरिक थे । अपने जीवन के साठ वर्ष से भी कम समय में प्राचीन एशिया की महान पौराणिक गाथाओं से लेकर आधुनिक यूरोप के वैज्ञानिक बुद्धिवाद तक, सभी विचारों को अपने अंदर समावेश कर लिया था । सत्रह सौ बहत्तर में राममोहन रॉय का जन्म एक धनी ब्राह्मण परिवार में हुआ था । ब्रामण होने के बावजूद उन्होंने पटना के मदरसे में अरबी और फारसी सी थी और चौदह वर्ष की की अवस्था में कुरान के अलावा अरस्तू और यूक्लिड का अध्ययन किया । उसके बाद उन्होंने चौदह से सोलह वर्ष की उम्र में बनारस जाकर संस्कृति की और वेदादि शास्त्रों का अध्ययन किया । इससे पहले वे हिन्दू धर्म और दर्शन के बारे में कुछ नहीं जानते थे । एक प्रकार से ही उन का दूसरा जन्म था । सुख विवाद का प्रभाव उन पर पहले ही पड चुका था और अब विधान पर लेने से भी एकेश्वरवादी हो गए और उन्होंने फारसी में तो फिर तूल में खुदरा दिन इस नाम की पुस्तक लिखी जो मूर्ति पूजा के विरुद्ध थी । इससे उनकी रूढिवादी पिता छेड गए और बेटे को घर से निकाल दिया । उन्होंने चार बरस तक भारत और तिब्बत का भ्रमण किया । तिब्बत में बुद्ध मत के रूढीवाद और कट्टरता की कडी आलोचना कर देने के कारण वे लामा के अनुयायियों के हाथों मरते मरते बचे । जब वहाँ बीस बरस के थे तो पिता ने उन्हें घर बुला लिया और उनकी शादी कर दी । लेकिन जब उन्होंने सतीप्रथा के विरुद्ध आंदोलन शुरू किया तो पोंगापंथी ब्राह्मणों की प्रेरणा से पिता ने उन्हें में फिर घर से निकाल दिया । चौबीस वर्ष की आयु में उन्होंने अंग्रेजी, हीब्रू, ग्रीक और लैटिन सीखना प्रारम्भ किया और फिर बाइबल पडे । सभी धर्मों का तुलनात्मक अध्ययन इस समय तक यूरोप में भी किसी ने नहीं किया था । अठारह से तीन में पिता की मृत्यु के बाद घर वालों ने उन्हें वापस ले लिया । अठारह सौ पांच से लेकर अठारह सौ पंद्रह तक उन्होंने कई स्थानों पर कलेक्टर के नीचे काम किया । इस बीच में उन्होंने शंकर भाष्य तथा पांच उपनिषदों का बंगाल में अनुवाद किया और वेदांत चर्चा जारी की । में अवकाश प्राप्त करके स्थायी रूप से कलकत्ता में रहने लगे । अब उन्होंने अपना सारा समय समाजसुधारक घर में सुधार के लिए अर्पित कर दिया । अंग्रेजी राज्य स्थापित होते ही ईसाई मिशनरियों के दल के दल देश में आने लगे आना अनिवार्य था । उन्होंने श्रीरामपुर में बहुत बडा प्रेस लगाया और बंगाल भाषा में साहित्य छापकर ही देना है । दिन को अंधकार से आलोक मिलने का काम बडे उत्साह शुरू किया । इन मिशनरियों का प्रचार ये था कि हिन्दू धर्म, हिंदू समाज, उनके आचार व्यवहार और रीति रिवाज सभी निंदनीय क्रूड और प्रशासिक ता से भरे हुए हैं । इसी कारण में इस लोग में सुख समृद्धि चाहते हैं और मृत्यु के पश्चात सहयोग स्वर्ग राज्य में जाने के इच्छुक है तो वीसा और मेरी की शरण में आए इसाई धर्म ग्रहण गए । उनके लिए मुक्ति का यही एक मार्ग है । पहले बंगला सीखना और फिर उनके द्वारा प्रचार करना मिशनरियों के लिए कठिन कार्य था और बहुत उपयोगी भी नहीं था । प्रचार कार्य में आने वाली विघ्न बाधाओं को देखते हुए उन्होंने ये योजना बनाएगी । शिक्षा के प्रसार के लिए स्कूल खोले जाए और स्कूल के जरिए प्रचार का काम अधिक सरलता से चल सकेगा । ये दूसरा तरीका पहले की अपेक्षा सच मत सफल रहा । उस समय की परिस्थिति का विश्लेषण करते हुए विवेकानंद लिखते हैं, जिन बच्चों ने नई शिक्षण संस्थाओं में शिक्षा दीक्षा पाई, पातशाह के पद्धति पर चलने के लिए और बचपन ही से उनके आदेशों में पक गए और इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं की, प्राचीन पद्धति के संबंध में उनके मन में तर्क वितर्क होने लगे । तू संस्कारों को एक और हटाने तथा सत्य का अनुसंधान करने की अपेक्षा उनके लिए बस यही माँ का व्यक्ति की कसौटी हो गया । इस संबंध में पास जाती की क्या राय है? धर्म गुरु को भगा देना चाहिए, वेदों को जला डालना चाहिए क्योंकि पांच यात्री ने ऐसा कहा है । इस प्रकार की खलबली के भावों से भारत में कैसी लहर उठी जिसे हम तथाकथित सुधर के नाम से पुकारते हैं । इस समय राममोहन रॉय ने भूमिका अदा की । वहाँ तथाकथित सुधारकों से गंभीर निधि उन्होंने अनुसंधान का मार्ग अपनाया और मिशनरी क्योंकि कुछ सिर्फ प्रचार का डटकर मुकाबला किया । उन्होंने अठारह सौ बीस में बाइबल के आधार पर शांति, वहाँ आनंद के पथ प्रदर्शक, ईसा की शिक्षाएं फॅस पुस्तक लिखी जिसमें उन्होंने मिशनरियों से पूछा कि अगर ईश्वर कबूतर के रूप में जान में ले सकता है तो गरुड के रूप में क्यों नहीं ले सकता? राममोहन रॉय ने मिशनरियों को बताया कि हिन्दू धर्म की तुम जो व्याख्यायित करते हो, रिसर्व दाम में ध्यात्वा भ्रांतिपूर्ण हैं । वेद और उपनिषदों में मूर्ति पूजा का कहीं उल्लेख नहीं । वेदांत दर्शन के अनुसार सभी जीवों में एक ही आत्मा है । अठारह सौ पंद्रह में कलकत्ता आकर राममोहन रॉय ने कुछ प्रेमी सज्जनों के सहयोग से आत्मीय सभा नाम की एक संस्था गठितकी । इस संस्था द्वारा उन्होने पुस्तके और ऍम प्लेट लिख कर एक तरफ हिन्दू धर्म की कुसंस्कारों तथा मूर्ति पूजा के विरूद्ध और दूसरी तरफ मिशनरियों द्वारा प्रचारित सारहीन मतवादों के वृद्ध प्रचार शुरू किया । उनका कहना था की वास्तविकता हिन्दू धर्म एकेश्वरवादी और विश्वबंधुत्व पर आधारित है । उनके इस प्रचार का प्रभाव यह पडा कि कहाँ तो मिशनरी हिंदू ईसाई बनाने की सोच रहे थे और कहाँ विलियम आर्डन नाम की प्रसिद्ध मिशनरी ने ईसाई मत के तृत्व वाद को छोडकर राममोहन रॉय की ईश्वरवाद को अपना लिया । अब मिशनरी बडा बौखलाएं उन्हें पता चला कि हिन्दू धर्म मूर्ति पूजा और आचार व्यवहार ही पर निर्भर नहीं है । उसका मूल विधान प्रदर्शन है बस अब क्या था श्रीरामपुर के मैच मैन और केरी आदि मिशनरी वेदान्त पर टूट पडे । उन्होंने जो कुछ लिखा आपने छिछले ज्ञान और बुद्धि के कारण अनर्गल लिखा । लेकिन राजा राममोहन रॉय ने बाइबिल, वेदांत और दूसरे धर्मों का गहरा अध्ययन किया था । इसलिए उन्होंने धीर गंभीर भाव से मिशनरियों के प्रचार का जो खानदान क्या वो अत्यंत युक्तिसंगत था । उनका ये वेदान्त युद्ध एक विख्यात ऐतिहासिक घटना है । मूर्ति पूजा, अंधविश्वास और कुप्रभाव के विरुद्ध राजा राममोहन रॉय के प्रचार से हिंदू कट्टरपंथी भी चौकी उन्होंने राजा से राधा कान के नेतृत्व में धर्मसभा स्थापित की । वे मूर्ति पूजा और सती दाह का समर्थन करते थे और उनका कहना था की राजा राममोहन रॉय सुधार चाहते हैं वो शास्त्र की प्रतिकूल है और उससे हिन्दू धर्म नष्ट हो जाएगा । अ देवीदान आंदोलन के प्रतिवाद में सर राधाकांत का दल भी व्यर्थ की छींटा कशी करने लगा । लेकिन इस बार विवाद का परिणाम यह निकला कि पूरे बंगाल में जागृति की तरह दौड गई । जिन प्राचीन शास्त्र को बुला दिया गया था उन का फिर से अध्ययन शुरू किया । विरोधियों की संख्या चाहे बहुत अधिक थी पर राजा राममोहन रॉय को उत्साही नवयुवको और एडवर्ड हाइट तथा डेविड हेयर आधी उदार विचारों के अंग्रेजों का सहयोग प्राप्त हुआ । सतीप्रथा वृद्ध बारह बरस से आंदोलन करते आ रहे थे । आखिर उसे सफलता मिली चार दिसंबर अठारह सौ बयासी गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम ने कानून द्वारा सती दाह बंद कर दिया । राममोहन रॉय के परामर्श से जनरल ने गंगा में संधान फेंकने की भी मना ही कर दी । राजा राममोहन रॉय ने सब अपना प्रचार कार्य शुरू किया । जब बंगाली समाज की जो हालत थी उस बारे में सत्येन्द्रनाथ मजूमदार लिखते हैं, अंग्रेजी राज्य की प्रारंभ में धनी और बाबू बंगालियों का चरित्र कई तरह से भ्रष्ट हो चुका था । धन रहने पर वे पत्नी या पत्नियों के सामने ही कई उप पत्नियाँ रखते थे । विद्या सुंदर की कविताओं से अलग आशु कवियों के अश्लील एवं पूर्व रुचिपूर्ण संगीत मैं वाक युद्ध किया । मैंने ऐसे होते थे कलकत्ता के बाबू लोग बुलबुल की लडाई, पतंगों के पेंच तथा चमकीली भरदार पोशाक पहन वेश्याओं के साथ बगीचों में मौज उडाने में ही मस्त रहते थे । और जब राममोहन रॉय का आंदोलन आगे बढा और नवजीवन की तरफ दौडी तो बाबू के बैठक खाने में भट्टाचार्य की चौपालों में गांवों के चंडी मंडपों में जहाँ देखिए वहाँ राममोहन रॉय की ही चर्चा अंतर पुर के अन्दर बी सी प्रवाह की लहरें अपना असर करने से खाली नहीं रही । राजा राममोहन राय जानते थे कि लोगों में जागृति आएगी तभी वे अपने राजनीतिक अधिकारों के लिए संगठित हो सकेंगे । तभी बंगाली समाज को प्रभाव तथा कुसंस्कारों से मुक्त हो सकेगा । अरे उसको देश को सम्मुख रखते हुए उन्होंने आधुनिक शिक्षा फैलाने का भरसक प्रयास किया । उधर विचारों के आपने अंग्रेज मित्रों की सहायता से उन्होंने अठारह सौ सत्रह में हिन्दू कॉलेज की स्थापना कि जिसमें साहित्य, इतिहास, गणित, भूगोल और विज्ञान हत्यादि आधुनिक विषयों की शिक्षा दी जाने लगी । राममोहन रॉय ने एकत्र सभा के तत्वाधान में एंग्लो हिंदू स्कूल की स्थापना कि डेविड है और ऍम की देख रेख में ये स्कूल सफलतापूर्वक चला । इसमें प्राची तथा पातशाह के विद्याओं की शिक्षा एक साथ दी जाती थी । स्कूल का सारा खर्च राममोहन रॉय खुद करते थे । राममोहन रॉय ने अपने विचार के प्रचार प्रसार के लिए संवाद को मोदी नाम का एक बंगाली साप्ताहिक पत्र निकाला । इसमें उन्होंने अठारह सौ इक्कीस से अठारह सौ चौबीस में वैज्ञानिक विषयों पर जैसे शून्य में गूंज चुंबक के वन मछली होगा, आचरन और बलून की कहानी आदि कई लेख लिखें । इसके अलावा उन्होंने बंगला में व्याकरण भूगोल, नक्षत्र, विद्या और बीजगणित आदि पर पाठ्यपुस्तक लिखी और विरान, अर्द्धविराम इत्यादि अंग्रेजी आदि चिनो का प्रयोग करके बांग्ला भाषा को आधुनिक बनाया । इसके अलावा उन्होंने कई प्रकार के पैम्पलेट लिखे और यौन बांग्ला भाषा को सरल, सुवेद और समृद्ध बनाने में उनका बडा योगदान है । अपने साप्ताहिक पत्र में उन्होंने ब्रिटिश सरकार से अपील की कि वह फॅालो हिंदू स्कूल जैसे स्कूल खोले जिनमें बच्चों को शिक्षा मुफ्त दी जाए । जब कंपनी सरकार ने पुराने ढंग की संस्कृत पाठशालाएं ही खोलने का निर्णय किया तो राजा राममोहन रॉय ने इसका कडा विरोध किया । इस पर भी कई कट्टरपंथी चलना है कि राममोहन रॉय हमारी धार्मिक संस्थाओं को नष्ट कर देना चाहते हैं । ये बात समझ लेने की है कि समाज सुधारकों और भारतीयों को आधुनिक शिक्षा देने में विदेशी सरकार को तनिक भी दिलचस्पी नहीं । पुराने ढंग की संस्कृत पाठशालाएं खोलने में उनका उद्देश्य केवल ये था कि हमारे देश की जनता भ्रम, भ्रांतियों और अंधविश्वास में ही पडी रहे । इसलिए उनका अभिप्राय जिंदा को शिक्षित बनाना नहीं, कट्टरपंथियों को संतुष्ट करना था । कट्टरपंथियों की तादाद कहीं ज्यादा थी । उन्होंने राममोहन रॉय के खिलाफ तूफान खडा कर दिया । उन्हें बुद्धि जीवी तक नहीं मानते थे और प्राचीन पद्धति को जियो का क्यों बनाये रखना चाहते थे । पर राजा राममोहन रॉय और उनके मुट्ठी वार देशी विदेशी समर्थकों ने इस विरोध का डटकर मुकाबला किया । नए और पुराने विचारों का संघर्ष तीव्र से तीव्र होता चला गया । राजा राममोहन राय यह बात भलीभांति समझते थे कि सामाजिक अन्याय, कट््टरता और अंधविश्वास को दूर करने के लिए आधुनिक शिक्षा आवश्यक है और वे उससे अधिक से अधिक फैलाना चाहते थे । लेकिन इसका ये अर्थ कदाचित नहीं कि वे निकले की वर्तमान औपनिवेशिक शिक्षा प्रणाली के समर्थन थे । वर्तमान शिक्षा प्रणाली उनकी मृत्यु के बाद आई और मैकॉले ने इसे लागू करने का उद्देश्य स्पष्ट शब्दों में बताया । गंगा तट पर रहने वाले काले रंग, युवक मेटिन और शेक्सपियर पडेंगे और हमारे साहित्य बर्गर करेंगे । इस शिक्षा का उद्देश्य हमारा भारतीयकरण करना और हमें मानसिक रूप से दास बनाना था । वो उसने बनाया और आज तक बना रही हैं । इसके विपरीत राजा राममोहन रॉय ने भारतीय संस्कृति और परंपरा को कभी नजरों से वो अच्छा नहीं किया । यही कारण है कि उन्होंने अठारह सौ पच्चीस में विधान कॉलेज की स्थापना कि जिसमें प्राचीन शास्त्रों की सुविधाएं जुटाई गई थी, आधुनिक शिक्षा पद्धति से उनका उद्देश्य था नए पुराने विचारों का समन्वय और राज्य दर्शन तथा पाश्चात्य विज्ञान का सामंजस्य । उन्हें मैं कौन शिक्षा प्रणाली का समर्थक बताना गलत है और उनके नाम पर एक मिथ्याप्रचार हैं । अठारह सौ तीस में मुगल बादशाह ने उन्हें अपना राजदूत बनाकर इंग्लैंड भेजा । वहाँ ही ईस्ट इंडिया कंपनी को नई सडक देने के संबंध में हाउस ऑफ कॉमन्स में होने वाली बहस में हिस्सा लेना था । अठारह सौ इकतीस के अप्रैल में इंग्लैंड पहुंचे लिवरपूल, मैनचेस्टर, लंडन और राज दरबार में उनका सरकार हुआ । वहाँ उन्होंने बैंटम सरीके प्रसिद्ध व्यक्तियों से मित्रता का संबंध स्थापित किया । वहाँ से भी कुछ दिन के लिए फ्रांस गए और सत्ताईस सितंबर अठारह सौ तैंतीस को मस्तिष्क द्वार से ब्रिस्टल में उनका देहांत हो गया । वहीं उनकी समाधि बनी जिस पर लिखा है, परमात्मा की एकत्र में विश्वास करने वाला एक सच्चा वद्र व्यक्ति । उसने अपना समस्त जीवन मानव एकता की उपासना में बताया । इंग्लैंड में आपने अंग्रेज मित्र की प्रार्थना पर राममोहन रॉय ने अपनी संक्षिप्त जीवनी लिखी थी जिसमें वे कहते हैं, सोलह वर्ष की अवस्था में ये मैंने मूर्ति पूजा के विरुद्ध एक पुस्तक लिखी । इस पर संबंधियों के साथ मतभेद के कारण मुझे घर छोडना पडा और तब भारत में कई प्रांतों की यात्रा की आखिर ब्रिटिश शासकों के विरुद्ध तीव्र घृणा ने मुझे भारत के बाहर दूसरे देशों में घूमने पर मजबूर किया । उन्हें इस बात का बडा दुख था कि भारत का एक के बाद दूसरा प्रांत ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकार में चला जा रहा है । ब्रिटिश शासकों की अंधी लूट उन्होंने अपनी आंखों से देखी थी और इसी से उनकी प्रतीक रहना हुई, पर उनके स्वदेश प्रेम में संकीर्णता की गंध तक नहीं । यही कारण था कि उन्होंने उदार विचारों वाले भले अंग्रेजों के साथ मित्रता के संबंध स्थापित किए और ब्रिटिश शासन के कारण आधुनिक यूरोप से जो संपर्क स्थापित हुआ था, उससे देशवासियों को पूरा लाभ उठाने के लिए प्रेरित किया । बंगला था । फारसी के पत्रों द्वारा देश वासियों को पूरा लाभ उठाने के लिए प्रेरित किया । बंगला तथा फारसी पत्रों द्वारा देशवासियों की राजनीतिक जीतना में वृद्धि करने में उन्होंने कोई कसर नहीं छोडी । इंग्लैंड जाते समय उन्होंने इसलिए फ्रांसीसी जहाज से यात्रा की, क्योंकि वे सत्रह सौ नब्बे की फ्रांसीसी क्रांति से बहुत अधिक प्रभावित थे और उसकी स्वाधीनता, समानता तथा बंधुत्व के आदर्शों को उन्होंने अपना आदर्श बना रखा था । उन्हें अठारह सौ तीस की फ्रांसीसी क्रांति से भी पूरी सहानुभूति थी । नडाल बंदरगाह पर जब वे जोश में भरकर फ्रांसीसी तिरंगे झंडे को सलामी देने के लिए बेहद ताशा दौडे तो उनके टखने की हड्डी टूट गई । संसार की राजनीतिक घटनाओं पर उनकी दृष्टि बराबर रहती थी और विदेशों की स्वाधीनता संग्रामों में उनकी गहरी दिलचस्पी थी । अठारह सौ इक्कीस में स्पेन में जब लोकतांत्रिक सरकार की स्थापना हुई तो उन्होंने अपनी हार्दिक प्रसन्नता व्यक्त करने के लिए टाउन हॉल में सार्वजनिक बोझ दिया । यहाँ पर ये बता देना संगत नहीं होगा कि जब पश्चिम यूरोप की सामंती व्यवस्था टूट रही थी और पूंजीवादी विश्व क्रांति की बाढ यूरोप तथा मैरी की देशों में तेजी से फैल रही थी, तब स्पेन के सामंती औपनिवेशिक राज्य ने इस बाढ को रोकने का भरसक प्रयत्न किया । हालांकि पूंजीवादी क्रांति को कुचलने और अपनी सामंती सत्ता बनाए रखने के लिए स्पेन की इस बर्बर सरकार ने अमानवीय अत्याचार है, अमेरिकी देशों में लूट खसोट के आधीन हथकंडे अपनाएं, गुलामों का व्यापार किया और उनकी आर्थिक नीति में बडे लम्बे समय तक बाधा बनी रही । स्पेन की इस बर्बर सामंती साम्राज्य ने अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए मानव समाज के सामंतवाद से पूंजी बाद में संक्रमण की राह में हर तरह की बाधाएं डाली । लेकिन इतिहास की पहिये को पीछे की ओर मना संभव नहीं । परिणाम ये कि हॉलैंड की जनता के क्रांतिकारी आघातों ने साम्राज्य की नींव हिला दी । लैटिन अमेरिकी उपनिवेशों के मुक्ति संग्रामों और अपने ही लोगों की क्रांति ने सामंती साम्राज्य और उसके ऍफ को धूल में मिला दिया । इसलिए स्पेन की क्रांति का विशेष ऐतिहासिक महत्व था और इसलिए राममोहन रॉय ने उसकी इतनी खुशी मनाई थी । आयरलैंड के स्वाधीनता संग्रामियों के साथ भी उनकी पूरी हमदर्दी थी । फिर जब उन्होंने नेपाल के विप्लवी क्यों कि असफलता का समाचार सुना तो एक अंग्रेज मित्र के साथ साक्षात्कर करने से इंकार करते हुए कहा यूरोप से ताजा खबर आई है, उस से मेरा दिमाग ठिकाने नहीं है । बाद में उसे लिखा । इस अशुभ समाचार से मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ कि यूरोप के और एशिया के राष्ट्र को स्वाधीन देखने का मेरा स्वप्न पूरा नहीं होगा । विशेष रूप से यूरोपियन उपनिवेश है । उन्हें कुछ ज्यादा अधिकार नहीं मिल पाएंगे । इन परिस्थितियों में मैं नी पुल के संघर्ष को और उसके शत्रु को अपना शत्रु समझता हूँ । स्वाधीनता कि शत्रु और निरकुंशता के मित्र ना कभी सफल हुए हैं और ना होंगे । राममोहन रॉय ऐसे देशभक्त और ऐसे विश्वमानव थे कि उस युग के प्रसिद्ध कवि मीर तकी मीर ने शायद उन्हीं के बारे में लिखा था । खंजर चली, किसी पर लडते हैं हम अमीर सारे जहाँ का दर्द हमारे चिकन में । राममोहन रॉय बहुमुखी प्रतिभा के समाज सुधारक थे । वे धर्म और राजनीति दोनों को लेकर चले लेकिन उन्होंने असत्य और वो संस्कार से कभी समझौता नहीं किया । जो कदम भी उठाया, दृढता और निडरता से उठाया । उस समय जब समुद्रयात्रा पाप समझी जाती थी । उनका विलायत जाना बडे साहस का काम था । राममोहन रॉय विवेकानंद के योग के पूर्ववर्ती थी । उन्हें अगर आधुनिक भारत का निर्माता कहा जाए तो इसमें तनिक भी अतिशयोक्ति नहीं । विवेकानंद ने उनकी शिक्षाओं के तीन मूल सूत्रों का निर्देश क्या है पीरदान ग्रहण स्वदेश प्रेम तथा हिन्दू और मुसलमान से सामान अफरीदी राममोहन रॉय को ब्रह्मा समाज का प्रवर्तक कहा जाता है पर ये भ्रांति मात्र है इसमें कोई सत्य नहीं । उन्होंने जो आत्मीय सभा स्थापित की थी उसे अठारह सौ अठाईस में ब्रह्मा सभा में बदल दिया गया था और उसका आधार वेदांत दर्शन था । उनकी मृत्यु के पश्चात उनके परम मित्र और सहयोगी द्वारकानाथ टैगोर और रामचंद्र विद्या वागीश ने जैसे जैसे इसे जारी रखा लेकिन इससे ब्रह्मा समाज का नाम देने वाले और इसमें न प्रांत रुकने वाले द्वारका नाथ टैगोर के बेटे रविंद्रनाथ टैगोर के पिता देवेंद्रनाथ टैगोर थे । उन्होंने अठारह सौ बयालीस में अपने बीस मित्रों की सात प्रमार धर्म की दीक्षा ली । रोमांस बोला । लिखते हैं वास्तव में वहीं ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने प्रमा समाज को संगठित किया और उसका नेतृत्व करने लगे । उन्होंने ही इसके विश्वास, आदर्श और अनुष्ठानों का निर्माण किया । उन्होंने उसी नियमित पूजा का संगठन क्या पुरोहितों की शिक्षा के लिए धर्मशास्त्र विद्यालय की स्थापना कि वे स्वयं युक्त विद्यालय में शिक्षा के व्याख्यान देते थे और सन अठारह सौ अडतालीस में उन्होंने धर्म विश्वासियों की । शिक्षा के लिए संस्कृत में ब्रह्मा र्द्धन नाम की पुस्तक थी, जो धर्मनीति शास्त्र का आस्तित्व ग्रंट है । उन का अपना ये विश्वास कहा कि ये ग्रंट भगवत प्रेरणा से लिखा गया है । देवेंद्रनाथ टैगोर का ये ब्रह्मांड हम राजा राममोहन राय के आदर्श के अनुसार नहीं था । ठाकुर भी चाहे उपनिषदों को मानते थे, पर उन्होंने अपने इस धर्म की नींव पश्चिम के तर्कवाद पर रखी थी । प्रसिद्ध साहित्यकार अक्षय कुमार दत्त और राजनारायण वासु उनके प्रमुख सहयोगी थी । मूर्ति पूजादि कर्मकांड को इन लोगों ने त्याग दिया पर समाजसुधार में उनकी कोई रूचि नहीं थी बल्कि रक्षण शील, देवेन्द्रनाथ हिंदू समाज के साथ मील की भावना से ही अपने नए धर्म का प्रचार करते थे । इस प्रचार का प्रभाव यह पडा कि हिन्दू कॉलेज की जो विद्यार्थी नास्तिक अथवा संदेह वादी बंदे जा रहे थे वो वापिस नहीं घर में में आने लगे । अठारह सौ पचास में देवेंद्रनाथ ठाकुर ने अक्षय कुमार और राजनारायण के परामर्श से वेद की अपौरुषेय था तथा सम भ्रांता के सिद्धांत को प्रमाण समाज से निकाल दिया जिससे वह हिन्दू धर्म हमेशा के लिए अलग हो गया । लेकिन आधुनिक शिक्षा प्राप्त नवयुवकों ने इस नए धर्म को अपनाया और वह बडी तेजी से पूरे बंगाल में फैल गया । अठारह सौ अट्ठावन केशवचंद्र सेन ब्रह्मा समाज के सदस्य बनेगा । देवेन्द्रनाथ के पुत्र सत्येंद्रनाथ केशव की सहपाठी थे और वहीं उन्हें ब्रह्मा समाज में लाए । केशव चंद्र शिक्षा समाप्त करके बैंक में क्लर्क भर्ती हो गए थे पर वे अपनी तीसरे प्रतिभा और भाषण पटना के बल पर परिणामों के नेता बन गए । अंग्रेजी, बांग्ला और हिंदी में उनके जोड का वक्त था । उस समय कोई दूसरा नहीं था और नवयुवक ऊपर केशव का बहुत अधिक प्रभाव था । देवेंद्रनाथ ठाकुर ब्राह्मण समाज के प्रधानाचार्य थे । उन्होंने के शिव को उनकी प्रतिमा और प्रभाव को देखते हुए आचार्य नियुक्त कर दिया । केशव चंद्र क्यूँकि निम्न जाति के थे इसलिए उन्हें आचार्य बनाने के विरोध का तूफान उठ खडा हुआ । दक्षिण शील ठाकुर में इतना साहस नहीं था कि वे इस तूफान का मुकाबला करते । उन्होंने विरोधियों को शांत करने के लिए केशव को आचार्य के पद से अलग कर दिया । इस पर नवयुवकों ने जो तूफान खडा किया, उसका परिणाम यह निकला कि ब्रह्मा समाज दो भागों में विभाजित हो गया । एक भाग जो देवेंद्रनाथ ठाकुर के नेतृत्व में रहा, उसका नाम आदि ब्रह्मसमाज पडा और जो भाग केशव के नेतृत्व में अलग हुआ, उसका नाम अखिल भारतीय प्रमाण समाज पर केशव का आचार्य के पद से हटाना तो ऊपरी घटना थी । ब्रह्मा समाज में विभाजन का वास्तविक कारण तो उसके भीतरी अंतर्विरोध थे, जो दिन दिन तीव्र से तीव्रतर होते जा रहे थे । इन अंदर विरोधियों को समझने के लिए तनिक पीछे जाना होगा । डेविड है और डी रोजियो समाजसुधार के क्षेत्र में राममोहन रॉय के उत्साही सहयोगी थी । डेविड हेयर स्कॉट निवासी थी और व्यापार के लिए भारत आए थे । पर यहाँ आकर उन्होंने अपना सारा धन शिक्षा के प्रचार प्रसार में लगा दी और अपनी आपको समाजसुधार के लिए अर्पित कर दिया । डेरोजियो एंग्लो इंडियन थे । वहाँ अठारह वर्ष की आयु में हिन्दू कॉलेज में अध्यापक नियुक्त हुआ था । वह प्रतिभाशाली लेखक तथा कभी था फ्रांस के विश्व कोशियो से प्रभावित था । उसका किसी भी धर्म में विश्वास ना था । वो एकदम भौतिकवादी था । उसकी कभी और आकर्षक व्यक्तित्व के कारण कॉलेज के अधिकांश विद्यार्थी स्वच्छंद और विद्रोही बन गया । सिर्फ मूर्ति पूजा और कुसंस्कारों की की बात नहीं में हिन्दू धर्म और समाज की से घृणा करने लगे । पास शाती प्रणाली तथा अन्य निरपेक्ष व्यक्ति स्वातंत्र । बाद से प्रभावित ये नवयुवक ब्रह्मा समाज में गए तो बुद्धि और धार्मिक अंतर्दृष्टि को मिलने वाले अठारह महीने महालय के शिखर बरी गांध में बिताने वाले मध्यमार्गी देवेन्द्रनाथ और उनके अनुयायियों से नवयुवकों का टकराव स्वाभावित । इसी टकराव से अंदर विरोध पैदा हुए और अंत में इसी से प्रमा समाज विभाजित हुआ । अठारह सौ सडसठ में जो अखिल भारतीय ब्रह्मा समाज अलग हुआ, उसके नेता केशव चंद्र की माँ बचपन में मर गई थी और उनका पालन पोषण एक अंग्रेजी स्कूल में हुआ था । उन्होंने संस्कृत बिल्कुल नहीं पडी थी । ईसा उनके आराध्य और बाइबिल सर्वोत्तम धार्मिक रंग था । परिणाम यह की उन्होंने अपने नए समाज को यहाँ तक इसाईयत के रंग में रंग दिया कि उसके उपासना मंदिर के अगले भाग पर क्रास नुमान गुर्ज बनवाया जिसके कारण साधारण लोग उसे केशव का गिरजा कहने लगे । कहावत है कि नया मुल्ला ज्यादा अल्ला लगता है की शिवचंद्र का उत्साह इतना प्रबल था कि वे मित्रों तथा सहयोगियों से अपने को इशु दूध या ऐसा का सेवक कहकर पुकारने का आग्रह करते थे और क्रिसमिस का त्यौहार उपवास के साथ मनाते थे । उन्होंने अपने उपासना मंदिर का द्वार सभी देशों और सभी जातियों के मनुष्य के लिए खोल दिया और आपने उपासनागृह में बाइबिल, कुरान और चेंदा वक्त के अंश शामिल किये । लेकिन केशव और उनके अनुयायियों का आज का विशेष रूप से इसाई धर्म नहीं की ओर था इसलिए ब्रह्मा समाज की धार्मिक सदर में पाप बोध पाप है । पश्चताप और भावावेश में रोना इत्यादि को आध्यात्मिक उन्नति का सहायक माना जाने लगा । ब्रह्मसमाज का कार्यक्षेत्र समाजसुधार केशवचंद्र और उनके अनुयायियों ने रात्रि स्कूल हुई स्त्री शिक्षा और स्त्री स्वाधीनता पर बल दिया । खान पान में पुराने विधि निषेधों का उल्लंघन की और अ स्वर्ण विवाह की प्रथा डा जिससे ब्रिटिश सरकार ने में कानून द्वारा मान्यता प्रदान की । लेकिन ब्रह्मा समाज के प्रचारकों की इसाई धर्म के प्रति प्रीति और ईसाई नीति बाद के प्रति आकर्षण यहाँ तक बढ गया था कि वे अपने भाषणों में हिंदू समाज उसके रीती रिवाज हो और प्राचीन शास्त्रों पर भीषण आक्रमण करने लगे । उनमें उदारता तथा सहिष्णुता नाममात्र को नहीं । उन्होंने प्रचार की संगीनता और कट््टरता के स्थान पर दूसरी प्रकार की संकीर्णता और कट्टरता अपना चर्च । चंद्र चट्टोपाध्याय ने अपने उपन्यासों में जहाँ हिंदू समाज की आलोचना की है, वहाँ ब्रह्मा समाज, योगी संकीर्णता और कट्टरता का भी आधार चित्रण किया । जहाँ लिया है वही प्रतिक्रिया भी है ब्रह्मा समाज के इन आक्रमणों से अपनी रक्षा के लिए प्राचीन पंथियों ने भरी सभा स्थापित पंडित जसाधर तारक सुनामणि और गए दादा संप्रदायिक स्वामी कृष्णानंद उनके प्रवक्ता थे । उन्होंने यज्ञोपवित, शिखा और दान दक्षिणा कि आध्यात्मिक व्याख्या की । ड्रामा समाज पांच शादी प्रणाली से प्रभावित मध्यवर्ग का आंदोलन लिए और हरिसभा उच्च वर्ग के भरे पेट लोग की संस्था जिनमें जीवन और साहने इस वर्ग की निकृष्टता का उसके प्रचार में व्यस्त होना स्वाभाविक था । बारह वर्ष के बच्चे भी नई सभा की वेदी से गरीब भक्ति की महिमा के संबंध में भाषण देते थे और दर्शकगण ताली बजाकर उन्हें आकाश पर चला रहे थे । एक और प्रमाण समाज की वेदी से आचार्य और उपाध्याय वर्ग हिंदू के धर्म एवं समाज के सिर पर अग्नि मैं अभी शाबू की वर्ष कर रहे थे और दूसरी ओर कट्टरपंथियों के नहीं हो रस, कील कविताओं और कहानियों के माध्यम से ब्रह्मा समाज की दिखावटी साथ गाता बडी पूरी भाषा में प्रतिवाद करने में लगे हुए इस बात प्रतिवाद के फलस्वरूप एक ऐसे निंदनीय कूर, वो चीज मुझे साहित्य की सृष्टि हुई जो बंद साहित्य के ललाट पर एक अमिट कलंक । कलकत्ता जब इन आंदोलनों की क्रिया प्रतिक्रिया से विशुद्ध हो रहा था तभी दक्षिणेश्वर से रामकृष्ण की शादी धीरे धीरे पहला शुरू हुई । हम देख चुके हैं कि वे एक अपन प्रतिभा से और विवेकानंद के शब्दों में ऊपर सिद्धस्त भीतर से ज्ञानी उन्होंने प्राचीन शास्त्रों को मौखिक रूप से सुना और उनके उत्कृष्ट तत्व को वाली भारतीय आत्मसार किया था । वो अपनी शैलेश मई भाषा में जो सुबोध और सरल भाषण करते थे । ब्रह्मा समाज और हरी सभा में होने वाले भाषणों की उनसे कोई तुलना नहीं । जनसाधारण की तो बात की क्या प्रत्येक साम्प्रदाय के साधु संत और प्रोफेसर और विचार उनके पास नीचे चले आने लगे । रामकृष्ण ने पास शादी की बाढ को रोककर ब्रह्मा समाज और हरी सभा के बीच में ऐसा मार्गप्रशस्त क्या जिसने उत्साही और जिज्ञासुओं नवयुवकों को अतीत और परंपरा से जोड दिया और जिसने आस्थावानों की पच्चीस ऋंखला और कट्टर का दोनों की रक्षा की । रामकृष्ण परमहंस मूर्तिपूजक औरन, एकेश्वरवादी होते हुए भी अपने समय के सभी धर्म प्रचारकों और विचारकों से अधिक लोकप्रिय हो गए । ईश्वरचंद्र सीन अठारह सौ पचहत्तर में उन के संपर्क में आए तो वे उनसे प्रभावित हुए बिना ना रहता है । उन्होंने अपनी सेंडी मेरठ पत्रिका में लिखा कि हिंदुओं की मूर्ति पूजा मुक्त रूप धारण किए हुए ईश्वरीय गुणों के अतिरिक्त अन्य कोई वस्तु नहीं अच्छा फिर इस मूर्ति आकृति का त्याग कर दिया जाए तो शेष रह जाता है । वह सुंदर प्रतीक है । हमने ये जान लिया है कि प्रत्येक मोटी इसकी हिंदू पूजा करते हैं । ईश्वर की किसी गुट विशेष का प्रतिनिधित्व करती है और प्रत्येक गुण को किसी विशेष नाम से पुकारा जाता है । नव धर्म में विश्वास रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति कोन समस्त गुणों की एकमात्र अधिकारी ईश्वर की पूजा करनी चाहिए । जिन गुणों का हिंदुओं ने तैंतीस करोड देवताओं में प्रतिनिधित्व दिखलाया तेज सिद्धसेन अठारह सौ सत्तर में इंग्लैंड की यात्रा पर गए वहाँ उन्होने अपनी सेरेल अंग्रेजी में चालीस हजार व्यक्तियों के समूह भाषण दिए । पश्चिम के आध्यात्मिक सहयोगी और पूर्व में ईसा के संदेश वाहक के रूप में उनका स्वागत हुआ । वहां से लौटते हुए अपनी ख्याति की परिकाष्ठा पर सरकार की सदभावना से उनकी ब्रह्मा समाज को विशेष लाभ हुआ था । इलाहाबाद । मुझे लखनऊ, मुंबई, शिमला और लाहौर इत्यादि शहरों में उनकी शाह साइड कोई नहीं । केशव ने अठारह सौ में इस नवीन धर्म के भाई बहनों में एकता स्थापित करने के लिए सारे भारत क्या इस यात्रा के दौरान उनके मन में ब्रह्मा समाज को अधिक लोकप्रिय बनाने का विचार आया । अति महाभक्त्या चैतन्य के रहे सेवादार संकीर्तन को ब्रह्मा समाज धर्म मंदिर के अंदर प्रवेश कराया गया । अपराध प्रकार से लेकर रात्रि समय तक वैश्विक संगीत वादियों के साथ प्रार्थनाएं वस्त्रो धोका पाएं और भगवान कम हो त्सव होने लगा । विकेशन जिनके बारे में ये कहा जाता था कि वे कभी न रोए थे, शुरू प्लावित, मुक्के साथ सब आयोजनों में गुरुगोविंद का कार्य करते । इससे अखिल भारतीय ब्रह्मा समाज में भी अंतर्विरोध पैदा हुए । और जब केशव चंद्रा ने अपनी नाबालिग कन्या का ब्याह पूछ बिहार के राजा से किया तो उन पर आदर्शों को त्याग देने का आरोप लगाकर सदस्य की बडी संख्या ने अलग होकर साधारण ब्रह्मा समाज की स्थापना साधारण ब्राह्मण समाज के नेता नगेंद्र नाथ चट्टोपाध्याय हरिसभा कि पंडित जसाधर ने उनसे विवाद किया और कहा कि मूर्तरूप के बिना भगवान की पूजा संभव नहीं है । अपनी धारणा को कोई न कोई आकार तो देना ही होगा । ये विवाद पुराना है । सगुण और निर्गुण की साकार और निराकार की बहस हिंदू के विभिन्न संप्रदायों में भी होती आई और इसाई और हिंदू में बडे दिनों तक चिन्दी रही । बहुत मत सब धर्मों से अधिक दार्शनिक और तर्कसंगत बुद्ध ने आत्मा और परमात्मा के स्थिति को भी स्वीकार नहीं किया । लेकिन कालांतर में यह बौद्ध धर्म महायान यास है । जियान और नाथपंथ चार मदों में बढ गए । महायान मत द्वारा ही तिब्बत, चीन और जापान में ईश्वर संबंधी धारणा विकसित महायान मत में ही शक्ति पूजा की तांत्रिक विधि चलाई । हिंदू में मूर्ति पूजा और मंदिरों में बडे बडे मोत् सव मनाने की प्रथा चौथी ईसवी शताब्दी में बहुत हो से ही हुई । पश्चिम बंगाल में महायान संप्रदाय इसका अधिक प्रभाव कालीन विभिन्न प्रकार की मूर्तियां बनाकर शक्ति पूजा इसी महायान के प्रभाव से शुरू हुई । कहती है कि नागर्जुन ने भूटान की जिस एक जात देवी की आराधना का सूत्रपात किया उसी का नाम का है । कहने का तात्पर्य यह है कि धर्म जाए प्रारंभ ईश्वर को नामानि यदि पुनर्जन्म को मानता है तो अनंतो बनवा उसे अपने अनुयायियों हुए ईश्वर एक आराध्या देना पडेगा । धर्म के प्रवर्तक क्या विचार कैसे निर्गुण और निराकार कहते रहे लेकिन साधारण अपन अनुयाई उसे अवश्य सरवन और साकार बनाने क्योंकि तथ्यों की मित्तियां व्याख्या का नाम ही धर्म है । इसलिए धर्म चाहे किसी भी देश और किसी भी युग का हो, उसकी मान्यताएं अंधश्रद्धा और अंधविश्वास पर टिकी हुई । इसलिए जब तक धर्म है धर्माण का भी किसी न किसी रूप में अवश्य ही वर्ग विभाजित समाज में शोषण और शासक वर्ग अपने निहित स्वार्थों की रक्षा के लिए शोषित और शासित को धर्म की तीन पिलाते हैं और पीला दे रहे हैं । मूर्ति पूजा धर्मांधता के अनेक रूपों में से एक है । इसाई मिशनरियों से भी पहले मुसलमानों ने अपने को भूत शिकन कहकर मूर्ति पूजा के खिलाफ चिनार बोला । ब्रह्मसमाज और आर्य समाज ने मूर्ति पूजा की कलंक धो देने का बहुत प्रयास किया । लेकिन देखते हैं की खुद मुसलमान ईसाई, ब्रह्मा समाजी और आर्य समाजी मूर्ति पूजा से तीन निकृष्टतम धर्मांधता का परिचय दे रहे हैं । जहाँ तक मोदी पूजा का संबंध है वो भी जो कि उद्योग बनी हुई है । न सिर्फ अपन जनसाधारण बल्कि एमएससी पास करने वाले और इंजीनियर तक हनुमान के मंदिर और वैष्णव बीबी जाते हैं, काली की पूजा करते हैं । हमारे शिक्षित बंधु विशेष अगर अपने को प्रगतिशील कहने वाले बुद्धि जीवी विवेकानंद की ऐतिहासिक भूमिका को समझने का तनिक प्रयास नहीं करते, वे विवेकानंद को सिर्फ इसलिए प्रतिक्रियावादी के है देते हैं कि उन्होंने मूर्ति पूजा का समर्थन किया । सवाल यह है कि अगर राजा राममोहन रॉय, दयानंद और केशवचंद्र सेन की प्रचार से मूर्ति पूजा दूर नहीं हुई तो एक विवेकानंद के विरोध से दूर हो जाती है । ये तथाकथित बुद्धिजीवी काम नहीं समझ पाएंगे कि विवेकानंद एक व्यक्ति निरपेक्ष राष्ट्रनेता, अच्छा मूर्ति पूजा का विरोध करके उन्हें अपने आपको प्रगतिशील और महान विचारक सिद्ध नहीं करना था, बल्कि उन्हें मूर्ति पूजा का पक्ष लेकर भारत की अपन नरेंद्र साधारण जनता की साम्राज्यवाद के सांस्कृतिक आक्रमण से रक्षा करनी थी और वह होने की तीस अक्टूबर अठारह सौ निन्यानवे को वे अपनी प्रिया मैं, लेकिन मैं कुमारी जेल के नाम से पत्र में लिखते हैं, जहाँ धार्मिक संप्रदायों का प्रश्न है, ब्रह्मा समाज, आर्य समाज तथा अन्य व्यर्थ की खिचडी पकाते विमान तार अंग्रेजी मालिकों के प्रति कृतज्ञता की दुनिया हैं, जिससे वे हमें सांस लेने की आजादी सके । हम लोगों ने एक नए भारत का श्री गणेश किया है । एक विकास इस बात की प्रतीक्षा में आगे क्या होता है? हम कभी नहीं विचारों में आस्था रखते है । जब राष्ट्र उनकी मांग करता है जिसका हमारे मालिक अनुमोदन करें । हिन्दू हमारे लिए उस सकते है जो भारतीय बुद्धि और अनुभूति द्वारा मंडित संघर्ष आरंभ हो गया है । हमारी एवं ब्रह्मा समाज के बीच नहीं क्योंकि वे पहले से ही निष्प्राण हो गए हैं । बल्कि इस बार इससे भी अधिक कठिन गंभीर एवं भीषण संघर्ष, रमा समाज और उन सरीखे दूसरे पढे लिखे लोगों ने अपने राष्ट्रीय गौरव लाकर अंग्रेज के गौरव को ओर लिया था । वो आपने यदि इतिहास और परंपरा को था ताकपर रखकर विशुद्ध आधुनिक बंदे जा रहे हैं । अंग्रेजी जिस चीज की प्रशंसा करे वहीं उत्कृष्ट और सत्य नहीं मूर्तिपूजक रामकृष्ण परमहंस ने पश्चिम की इस अंधे अनुकरण की बढती प्रवृत्ति को रोका । विवेकानंद ने अपने वर्तमान भारत लिख में लिखा है एक काम बुद्धिवाला लडका श्रीरामकृष्ण देख के सामने सादा शास्त्रों की निंदा क्या करता । उसने एक बार गीता की बडी प्रशंसा की । इस पर श्रीरामकृष्ण देव ने कहा किसी अंग्रेज विद्वान ने गीता की प्रशंसा की होगी इसलिए ये भी उसकी प्रशंसा कर रहा । प्रश्न मूर्ति पूजा का नहीं प्रश्न राष्ट्रीय गौरव, राष्ट्रीय संस्कृति और परंपरा की रक्षा का जो सिर्फ मूर्ति पूजा की बात करते हैं, वो इस प्रश्न के प्रधान तो समझने में असमर्थ है । आपने इतिहास के बारे में उन का क्या हाल उतना ही है जितना अंग्रेज पढा गया है । वो ये नहीं जानता कि विदेशी मुस्लिम शासकों ने भी अपने को बुतशिकन कहकर बुतपरस्त काफिर उपबंध विश्वास से निकालने के नाम पर हमारे राष्ट्रीय गौरव, संस्कृति और परंपरा पर इसी प्रकार आक्रमण किया । मध्य युग का भर्तियां अनुरानी से आक्रमण की प्रतिक्रिया थी । कबीर, दादू, नानक चैतन्य और तुकाराम ने साक रमन से जनसाधारण की रक्षा की और उन्होंने अपने व्यक्तिगत पास से रामअवतार बना लेने वाले तुलसी को भी चिट प्रतिक्रियावादी कह दिया जाता है । और इस बात का तनिक भी ध्यान नहीं रखा जाता कि तुलसी ने इस विदेशी सांस्कृतिक आक्रमण के विरुद्ध शेयर से शूद्र कब का संयुक्त मोर्चा स्थापित करने की महत्वपूर्ण भूमिका डर विवेकानंद ने इतिहास को क्योंकि आपने दृष्टि से पडा था इसलिए में लिखते हैं भारत में पूर्व सुधार की विचारधारा उस समय आई जब ऐसा प्रतीत होता था कि मानव भौतिकवाद की तरह है जिसने भारत पर आक्रमण किया था । इस देश के प्राचीन आरे ऋषियों की संस्कृति एवं शिक्षा को पहाडी पर हिंदूराष्ट्र पहले क्रांति की ऐसी हजारों तरह की छोड रह चुका था । पर ये तरंग अतीत की तरंगों की अपेक्षा हल्की एक लहर के बाद दूसरी लहर देश को दबा दे रही थी । तलवारें चमकी थी और अल्लाह वो पर नारों से भारत का आकाश को जुटा था । परंतु धीरे धीरे ये लहरें शांत हो गई और राष्ट्रीय आदर्श पूर्ववत बने रहें । गेट ही है कि अर्थव्यवस्था किसी भी समाज का मुख्य आधार होती, पर ऊपरी ढांचे, संस्कृति की उपेक्षा करना, चीज इतना और पदार् के द्वंद्वात्मक संबंधी अपेक्षा करना, संस्कृति और परंपरा राष्ट्रीय एकता को बनाए रखने के लिए सीमेंट का काम करती है । इसलिए प्रत्येक विदेशी विजेता विजित राष्ट्र की संस्कृति और परंपरा को नष्ट करने का प्रयास करता है क्योंकि इसके बिना उसकी राजनीतिक विजय आई नहीं हो सकती और उसे सजा चुनौती का खतरा रहता है । मुस्लिम विजेताओं ने भारतीय समाज को भीतर से नष्ट करने के जो प्रयास किए उन के विस्तार में जाने की गुंजाइश नहीं । लेकिन इससे जो समस्याएं पैदा हो गयी है उन्हें समझ लेना आवश्यक क्योंकि बिना समझे समाधान संभव नहीं मुस्लिम शासकों ने संस्कृति और परंपरा को आरोपित करने का प्रयास किया । परिणाम यह कि शासक वर्ग का बुद्धि जीवी विदेश से आता रहा । इसके अलावा मुस्लिम शासक भारतीयों पर अधिक भरोसा नहीं करते थे । इसलिए विदेश से सैनिक भर्ती बराबर होती है । इस प्रकार जो बुद्धिजीवी और सैनिक अधिकारी बाहर से आते थे, वे अपने को भाषा, संस्कृति आदि हर एक बात भी स्थानीय हिंदू और मुसलमानों से श्रेष्ठ मानसिक विलायती शब्द उन्ही के लिए प्रयोग होता था । ये मिले अति तत्व हमारे राष्ट्रीय जीवन का अंग नहीं बन सके । सादा विदेश ही बने रहे । हमारे अपने देश में भी ऐसे तत्व भेज इन्होने दरबार दारी को अपना पेशा बना रखा था । उनमें गायब और कश्मीरी ब्राह्मण विशेष रूप से उल्लेखनीय है । उनके लिए विद्या राज दरबार में रसोई का साधन मात्र की और इस की सेवा कोई प्रयोजन नहीं था । मुसलमानों के आने से पहले वे संस्कृत सीख के राजाओं की दरबारी कर देते । जब मुसलमान आए तो उन्होंने पारसी सीकर मुसलमानों के निर्माण की और फिर जब अंग्रेज आये तो वे चैट अंग्रेजी सीटर उनकी दवाई करने लगे । शासक वर्ग की भाषा और संस्कृति ही उनकी भाषा, संस्कृति, भारत के अभी इतिहास और परंपरा से उन्होंने अपना संबंध विच्छेद कर लिया था । जनसाधारण के शोषण और दमन में किसी भी शासक वर्ग का सहयोगी बन जाना और चापलूसी करना उनके जीवन का मूलमंत्र था और अब भी है जो भक्ति आंदोलन संस्कृति की रक्षा के लिए शुरू हुआ था, उसने आखिर पंजाब और महाराष्ट्र में सशस्त्र संघर्ष का रूप धारण किया और इसके परिणामस्वरूप सिख और मराठा सरकारें अस्तित्व में आई । लेकिन विवेकानंद के शब्दों में मराठा या सिख साम्राज्य के पूर्व प्रवर्तित धार्मिक महत्वकांक्षा पूरे दया, प्रतिक्रियावादी पूरा या लाहौर के दरबार में उस बौद्धिक गरिमा की किरण भी नहीं मिलती थी जिससे मुगल दरबार घेरा रहता । मालवा या विजयनगर की बौद्धिक जगमगाहट की तो बात ही क्या । बौद्धिक विकास की दृष्टि से यकाल भारतीय इतिहास का सबसे अंधकारपूर्ण युग था । ये दोनों अल्पजीवी साम्राज्य घृणास्पद मुसलमानी शासन कोल्ड देने में सफल होने के तुरंत बाद ये अपनी सारी शक्ति हो बैठे क्योंकि ये दोनों ही संस्कृति से पूर्ण घृणा करने वाले तथा सामान्य धर्मांधता के प्रतिनिधि रहेंगे । फिर से एक बार अस्तव्यस्तता का योगा गया मित्र शत्रु, मुगल साम्राज् एवं उसके विध्वंसक तब तक शांतिप्रिय रहने वाले विदेशी, फ्रांसीसी और अंग्रेज पारस्परिक लडाई में चुके हैं । पचास वर्षों से भी अधिक समय तक लडाई मार मार काट के अतिरिक्त और कुछ नहीं हुआ और जब पूरा हुआ दूर हो गया अंग्रेजी शीश सब पर विजय के रूप में प्रकट अंग्रेज व्यापारी शासक बहुत चालाक उन्होंने जनता के बीच के अंतर्विरोधों को तीव्र बनाया और तीन प्रकार के दलाल तो पैदा किए । व्यापार द्वारा दलाल पूंजीपति कार्ड वाले, इसके स्थाई बंदोबस्त द्वारा दलाल सामन और मैं कॉलेज की शिक्षा द्वारा दलाल बुद्धिजीवी इन तीन प्रकार के दलाल तत्वों में मुस्लिम काल के उक्त विदेशी और देशी तत्व सहज में घुल मिल गए । वे अपने वर्ग स्वभाव से जनविरोधी और परंपरा विरोधी थे । इन लोगों ने अंग्रेजी शासकों के आगे संपूर्ण रूप से आत्मसमर्पण कर दिया और गोरी प्रभु के सामने अपने को साफ सुथरा बनाकर पेश करने के लिए यही लोग सुधारक बन बैठे । ये विवेकानंद ही थे जिन्होंने जनसाधारण का पक्ष धारण करके अंग्रेज शासकों और उनका अंधानुकरण करने वाले लोगों को एक साथ मकारा जो अंग्रेज शासक हमें सभ्य बनाने कि डीन हंसते थे, उनसे विवेकानंद ने कहा कि हमारे इस महाराष्ट्र के दो गुण है एक जिज्ञासा और दूसरे काव्यमय अंतर्दृष्टि । हमारी साहसी जाती ने अपूर्वा जिज्ञासा के साथ अपनी यात्रा आरंभ कि और उसने गणेश शास्त्र, फैसला एशा, चिकित्सा शास्त्र, संगीत शास्त्र एवं धनुष विद्या के अविष्कार में यहाँ तक कि आधुनिक यूरोपीय सुविधा के निर्माण में किसी भी अन्य प्राचीन अथवा अर्वाचीन जाती से कहीं अधिक योगदान दिया । फिर उसने अपनी दूसरी विशेषता से अपना धर्म, अपना दर्शन, अपना इतिहास, अपना नीतिशास्त्र, अपना राज्य शास्त्र, सबका मई कल्पना के पुण्य कुछ से सजा दी है । और ये सब चमत्कार है उस भाषा का जिसे हम संस्कृत कहते हैं । जिस के अतिरिक्त किसी अन्य भाषा में उन्हें इससे अधिक अच्छी प्रकार व्यक्त करना संभावना था ना है । यहाँ तक की गणित शास्त्र के कठोर तथ्यों की अभिव्यक्ति के लिए भी उस भाषा ने हमें संगीतमय अंक प्रदान किए । इन्ही दो विशेषताओं के बल पर हमारे ये जातीय आज भी जीवित है । यदि हमारी नीति भी खराब होती तो इतने दिनों में हम लोग नष्ट क्यों नहीं हो गए? विदेशी विजेताओं की चीज ना मैं क्या कह रही है, तब भी सारे हिन्दू मारकर नष्ट क्यों नहीं हो गए? अन्य असभ्य देशों में भी तो ऐसा ही हुआ है । भारतीय प्रदेश जैसे मानव जनविहीन क्यों नहीं हो गए? विदेशी उसी तरह यहाँ पर खेती बाडी करने लगते, जैसा कि ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका तथा अफ्रीका आधी में हुए हो रहा है । तब वे विदेशी तुम अपनी कुछ इतना बलवान समझते हो वो केवल कल्पना ही हैं । भारत में भी ब्रह्मा है, सार है इससे पहले समझ लो कि अब भी हमारे पास जगत के सब पिता भंडार में जोडने के लिए कुछ है । इसलिए हम बच्चे और अंग्रेज का अंधानुकरण करने वालों से कहा इसी तुम लोग ये अच्छी तरह समझ लो जो भीतर बाहर से साहब बन बैठे हो तथा ये कहकर चिल्लाते घूमते हो हम लोग नर पशु है । यूरोपवासियों हमारा उद्वार कर और ये कहकर धूम मचाते होगी हुआ अगर भारत में बैठे हैं वो बंद हूँ । यहाँ इस ऊबी नहीं आया है जिस हुआ भी नहीं आए और न आएंगे वे इस समय अपने घर संभाल रही है हमारे देश में आने का उन्हें अवसर नहीं है इस देश में । वहीं बूढे शिवाजी बैठे हैं । यहाँ काली मई मालिक खाती है और बंसी धारी बंसी बजाते । ये जो हिमालय पहाड है, उसके उत्तर में कैलाश है । वहाँ बूढे शिव का प्रधान अड्डा, उसके इलाज को दस सिर और बीस हाथ वाला रावण बिना हिला पाया । फिर से हिलाना क्या किसी पादरी सादरी का काम है? वे बूढे शिव डमरू बजाएंगे, यहाँ काली बाली खाएगी और श्री कृष्ण बंसरी बजाएंगे । यही सब देश में हमेशा जी तो में अच्छा नहीं लगता तो कट जा तुम दो हजार लोगों के लिए के सारे देश को अपना सर्वनाश करना होगा । इतनी बडी दुनिया बडी है किसी दूसरी जगह जाकर क्यों नहीं चलते? ऐसा दो कर ही नहीं होंगे । साहस कहाँ है इस बूढे शिवकांत दिखाएंगे नमक हैरानी करेंगे और ईसा की जयमनी डिकाॅय यूरोपियनों के सामने जाकर गिडगिडाते हैं की हम आती नीच है हम शूद्र है हमारा सब कुछ खराब है पर हाँ ये बात तुम्हारे लिए ठीक हो सकती है । तुम लोग अवश्य सत्यवादी हो । तुम अपने भीतर सारे देश क्यों जोड लेते हो? भगवान एक इस देश की सभ्यता है । मार्च उन्नीस सौ में ढाका में दिए गए भाषण में विवेकानंद ने इन दलाल तत्वों की श्रेणी से अपने को अलग करते हुए कहा था उत्तर विचार वालों के विपरीत एक और वर्ग है । ये प्राचीन वर्ग कहलाता है कि हम लोग तुम्हारी बाल की खाल निकालने वाला तर्कवाद नहीं जानते और ना मेरे जानने की इच्छा है । हम लोग ईश्वर और आत्मा का साक्षात्कार करना चाहते । हम सुख दुख में संसार को छोडकर इसके अतीत प्रदेश में जहाँ परमानंद जाना चाहते हैं यह वह कहता है कि स । विश्वास गंगा स्नान करने से मुक्ति होती है । शिव, राम, विष्णु आदि किसी में ईश्वर बुद्धि रखकर श्रद्धा भक्तिपूर्वक उपासना करने से मुक्ति होती है । मुझे गर्व है कि मैं इन दृढ आस्था वालों की प्राचीन वर्ग का । इससे पहले आपने रामनाथ के भाषण में इस कथन की व्याख्या योग मुझे बडे दुख से कहना पडता है कि आजकल नाम बादशाह की भावनाओं से अनुप्राणित जितने लोगों के उदाहरण पाते हैं वे अधिकार असफलता की । इस समय भारत में हमारे मार्ग में दो बडी रुकावट हैं एक हमारा प्राचीन हिंदू समाज और दूसरी तरफ अर्वाचीन यूरोपीय सब था । इन दोनों में यदि कोई मुझसे एक को पसंद करने के लिए कहता है तो मैं प्राचीन हिंदू समाज को ही पसंद करूंगा क्योंकि अक्षय होने पर भी आपको होने पर भी कट्टर हिन्दू के हृदय में एक विश्वास है, एक बाल है जिससे वो अपने पैरों पर खडा हो सकता । हिन्दू विलायती रंग में रंगा व्यक्ति सर्वथा मेरूदंड बीन होता है । वहाँ इधर उधर के विभिन्न स्रोतों से वैसे ही कृत्रित किए हुए अब परिपक्व विश, श्रृंखल, बेमेल भागों की असंतुलित राशि मात्र वह अपने पैरों पर खडा नहीं हो सकता । उसका सिर हमेशा चक्कर खाया रहता है । वहाँ जो कुछ करता है क्या उसका कारण जानना चाहते हैं? अंग्रेजों से थोडी शाबासी पर जाना ही उसके सब कार्यों का मूल प्रेरक है । वह हमारी कितनी ही सामाजिक प्रभाव के विरुद्ध थी, पर आक्रमण करता है । उसका मुख्य कारण ये है कि इसके लिए उन्हें साहबों से वाहवाही मिलती है । हमारी कितनी प्रथा इसलिए दोषपूर्ण है कि साहब लोग उन्हें दोषपूर्ण कहते हैं । मुझे ऐसे विचार बस नहीं, अपने बल पर खडे रहे, चाहे जीवित रही या मारी है । यदि जगत में कोई बात है तो वह है दुर्बलता । दुर्बलता ही मृत्यु है । दुर्बलता ही पाप है । इसलिए सब प्रकार से दुर्बलता का त्याग कीजिए । ये असंतुलित प्राणी अभी तक निश्चित व्यक्तित्व नहीं ग्रहण कर सके और हम उनको क्या कहे? स्त्री पुरुष तथ