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01 स्मृति -10 वर्ष बाद

ऍफ सुन रहे हैं तो कोई ऍम किताब का नाम है । स्मृति जिसके लेखक हैं श्री मनमोहन भाटिया । आरजे मनीष के आवाज में कॅाम सुने जो मन चाहें दस वर्ष बाद लगभग एक वर्ष बाद पेशे से बडे बद्री अपने गांव पहुंचा । बद्री की पत्नी रामकली गांव में रह रही थी । बद्री के विवाह को दो वर्ष हो चुके थे । वहाँ के पश्चात एक वर्ष बद्री और रामकली शहर में रहे । फिर बच्चे के जन्म के समय बद्री रामकली के संगाकारा गया । फसल काटने का समय था । बद्री ने अपने खेत में काम किया । अच्छी फसल के अच्छी रकम मिल गई जो परिवार में बढ गई । बद्री के हिस्से में भी अच्छी रकम हाॅफ । अच्छी रकम हाथ में आने पर बद्री ने मकान की टूटी छत को पक्का करवा लिया और कुछ दिन के लिए गांव क्या एक दिन गांव के समीप लकडी के लट्ठे ले जाता । एक ट्रक खराब हो गया । मंत्री ने रुपये देकर ट्रक ड्राइवर से कुछ लकडी के लट्ठे लगभग मुफ्त के भाव ले लिया । लकडी मिलने पर बद्री ने घर के नए दरवाजे, खिडकी, अलमारी, मेज, कुर्सियां और पलंग बना लिया । उसके हुनर को देखकर गांव के मुखिया ने ग्रामीण रोजगार योजना के अंतर्गत काम दिलवा दिया । मुख्य ने अपना काम मुफ्त में करवाया और ग्रामीण रोजगार योजना के काम में अपना हिस्सा भी रखता रहा । बद्री को गांव में भी रोजगार मिल गया । उसने शहर जाना छोड आस पास के गांव और कस्बों में काम पकडना आरंभ कर दिया । गांव का मुखिया नेताओं से जुडा था जिसकी बदौलत बद्री को काम की कोई कमी नहीं हुई । गांव में लगभग ना के बराबर में खर्च रहने पर बद्री ने काफी रकम जुटा ली और चार कार्यक्रम भी अपने अधीन रख लिया है । मंत्री तो काम के सिलसिले में गांव कस्बों में आता जाता था लेकिन रामकली बच्चे और चूल्हे तक सिमट गई थी । उसकी ख्वाहिश शहर में रहने की थी । रामकली शहर जाने के लिए बद्री पर दबाव डालती है । बद्री संघ में वहाँ से पहले रामकली गांव में ही रहती थी और गांव की सीमाएं समझती थी । विवाह के पश्चात जब उसने आजादी देखी तब से वो गांव में दोबारा रहना नहीं जा रही थी । शहर की चकाचौंध से आकर्षित करती बिना किसी टोकाटाकी के किसी के संग खास बोल लेना उस से अच्छा लगता था । मंत्री काम पर निकलता तब राम के लिए आजाद पंछी की तरह इधर उधर डोलती भर्ती दिल्ली महानगर में उसे अब आजादी मिली हुई थी । जो गांव में नहीं मिल सके वो खुद को बेडियों में जकडा हुआ महसूस करती थी । बद्री को जब घर में ही रोजगार मिलने लगा तब वो शहर जाने को राजी नहीं था । गांव में अपना खुद का घर और ऊपर से कोई किराया नहीं देना होता था । खाना पीना भी शहर के मुकाबले सस्ता था । बद्री ने रामकली को दो टूक जवाब दे दिया कि जब तक गांव में रोजगार है कुछ शहर नहीं जाएगा । एक दिन रामकली घर में अकेली थी । बद्री काम के सिलसिले में दूसरे कस्बे में था और पथरी के माता पिता बद्री की बहन से मिलने दूसरे गांव चले गए । रामकली ने अपने बच्चे सङक शहर की बस पकड ली । बद्री दो दिन बाद घर लौटा । घर पर कोई नहीं था । पडोस में पूछा तो पता चला परिवार के लोग उसकी बहन के घर गए । बद्री ने सोचा कि रामकली भी नहीं होगी । अगली सुबह जब बद्री के माता पिता वापस आए तब रामकली की खोज हुई कि वो कहाँ है । रामकली बद्री के माँ बाप से हो गई नहीं थी । बद्री ने सभी परिचितों से फोन पर रामकली के बारे में पूछा लेकिन असफल रहा । किसी को रामकली के बारे में कुछ मालूम नहीं था । उसने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई । बिना बीवी और बच्चे के बद्री लगभग पागल था । हो गया बदहावास बद्री काम पर भी नहीं गया । गुमसुम रामकली और बच्चे की तलाश में बहुत यहाँ वहाँ बटाटा रहता । समय सब का मौका हाल है जहाँ उसका काम चल रहा था । सब ने उसे समझाया की कामना छोडे । काम के साथ राम के लिए और बच्चे की तलाश जारी रखें । धीरे धीरे पत्री काम पर जाने लगा । बद्री का मैं टूट गया, लेकिन रामकली नहीं मिली । लगभग छह महीने बाद एक थाने से बुलावा आया कि नहर की सफाई के दौरान एक महिला और बच्चे की लाश मिली है क्योंकि रामकली और बच्चे की गुमशुदगी की रिपोर्ट आई थी । उनकी शिनाख्त के लिए बद्री को बुलाया गया । लाश बहुत बुरी हालत में थे । महिला के बदन पर कहने रामकली जाते थे जिनके आधार पर बद्री और उसके परिवार ने शिनाख्त करती और अंतिम संस्कार भी कर दिया । पत्रिका अशांत मन अब शांत हो गया की रामकली शहर में नहाने के लिए उत्तरी होगी और बच्चे समेत नहर के तेज पानी के बहाव में बह गई होगी । गबरू जवान बद्री का अपना मकान और अच्छी आमदनी देख विभाग के रिश्ते आने लगे । तन की भी बहुत हमारी होती हैं जिनको नजर अंदाज भी नहीं कर सकते हैं । बद्री ने दूसरा विवाह कर लिया । सुखी वैवाहिक जीवन से बद्रीराम काली और पहले बच्चे को भूल गया । नई जीवन की खुशियां घर आंगन में दौडने लगी । तीन वर्ष में दो बच्चे आंगन में मस्ती करने वाले हो गए । पत्रिका कम और आमदनी भी पहले से अधिक हो गई । खुशियों ने अतीत भुला दिया । दस वर्ष बीत गए । बद्री के माता पिता पर लोग सुधर गए । पत्री अब ठेकेदार बन गया जिसके और ही पच्चीस कार्यकर काम करने लगे हैं । उसने अपनी कंपनी बनाली और कम दिन तो नहीं । रात होने की रफ्तार से बढता गया । दो मंजिल का पक्का मकान बन गया । घर में सब सब सोदाये चारों और खुशियों की बरसात हो रही थी । रविवार की सुबह नाश्ता करके बद्री घर के दरवाजे पर खडा गली में खेलते हैं । बच्चों को देख रहा था । स्कूल की छुट्टी के कारण गली में बच्चों का जमावडा लगा हुआ था । पदरी के बच्चे भी खेल रहे थे तभी तो उन्होंने शोर मचा दिया भूत भूत । उसने बच्चों को घर के भीतर जाने को कहा । भूत शब्द सुनकर बद्री में हैरान और परेशान हो गया । उसने रात के समय भूतों के किस्से सुने थे । दिन के दस बजे भूत कहाँ से आ गया । खुद बहुत सुनकर बच्चे अपने घरों की और आपके और फटाफट घरों के दरवाजे बंद होने लगे । बद्री ने भी अपने बच्चों को अंदर किया लेकिन खुद कर के दरवाजे पर खडा रहा है । तभी गली के अंदर एक महिला ने प्रवेश किया जिसे देखकर गली के दो औरतों ने भूत कहना शुरू कर दिया । रामकली का भूत आ गया । प्रदान करने का भूत आ गया । छोटे बच्चों ने रामकली को कभी नहीं देखा था, लेकिन गांव के होते हैं, काम करने को पहचानती थी । उन्हें याद था किस तरह एक दिन रामकली गायब हो गई । फिर उसकी और उसके बच्चे की लाश लहर में मिली थी । आज वर्षों बाद रामकली को देख वही औरतें भूत भूत कहकर चिल्लाने लगी । जिन औरतों के सामने बद्री ने रामकली का दाहसंस्कार किया था वो कैसे वापस आ गई । उन की नजर में वह औरत रामकली का भूत ही देखते देखते गाली सुनसान हो गई । रामकली बद्री के सामने खडी हो गए । वो पत्री के घर को देख रही थी । एकदम आलिशान घर देकर रामकली ने कहा घर तो बहुत बडा और आलीशान बना लिया है । अंदर आने नहीं दोगे क्या? बद्री ने रामकली को देखा वो लगभग वैसी ही थी जैसे घर से गई थी । घर के दरवाजे के ठीक बीच खडा होकर बद्री ने रामकली के घर के अंदर जाने का रास्ता रोक रखा था । तुम कौन हो और क्या करने आया हूं? बद्री ने तीखी आवाज में पूछा नाराज हो मैं कौन होता हूं? नाराज होने वाला ऍम मैं बताती हूँ किसी अनजान को घर के अंदर की उन्होंने तो मैं रामकली हूँ । रामकली तो दस वर्ष पहले मर गई । अपने हाथों से उसका दाहसंस्कार किया था । तुम जरूर कोई भूत या चुडैल हो । मैं तो मैं घर के अंदर नहीं आने दूंगा । तो मेरी बात मानो मैं रामकली ही हूँ । मैं कोई भूत या चुडैल नहीं । अगर फुटबॅाल होती तब मुझे कोई नहीं रोक सकता था । बिना रोक तो कहीं भी आ जा सकती थी । मैं तुम्हारी पत्नी हूँ कौन? पत्नी कहा कि पति मेरे पति बबिता है, जो मेरे पीछे खडी तो मैं देख रही हूँ । मेरे तो बच्चे सहमे हुए माँ की संख्या हैं, डरे हुए हैं । मालूम नहीं भूत क्या करते हो? भूत के डर से दिन में भी पूरी गली संस्थान हो गई । खेलते बच्चे डर कर अपने घरों में दुबक गए । मैं तो मैं कर के अंदर नहीं आने दूंगा । मेरी पहली पत्नी रामकली मर चुकी है और पूरा गांव इसका गवाह । सबके सामने मैंने उसका अंतिम संस्कार किया था । इतना कहकर बद्री ने दरवाजा बंद कर दिया । लेकिन रामकली घर के दरवाजे पर बैठ गई । घर के अंदर भविता रामकली के बारे में पूछने लगी तो बद्री ने बेबस होकर का स्थान के वहाँ जिस औरत को देख कर मैं स्वयं परेशानी, इसके शक्ल, रंगरूप सब काम कहीं से मिलता है । काम करने का अंतिम संस्कार स्वयं अपने हाथों से किया था । ये रामकली नहीं हो सकती है । हम कल का बहुत जरूरी हो सकती है जो पहले के बहुत किस्सा सुना । मैंने टोटल किसी का भी रूप धारण करके कुछ मेहनत कर सकती है । ये मेरे से क्या चाहती ऍम छोड दिया । अब वही सब कुछ ठीक करेगा । बबिता भी आशंकित और डरी सहमी बद्री को देखती रही कुछ साहस के साथ होली सुनियोजित मुझे लगता है की किसी की साजिश है । कोई हमारे से बदला लेना चाहता है । हमारी धनसंपत्ति और खुशी का कुछ दुश्मन है उसने जादू टोना कर के ये चुडियाल कैसी है बागवान कुछ भी संभव मेरे दिमाग में काम करना बंद कर दिया है । ऐसा कौन हमारा दुश्मन हो सकता है । मुझे क्या मालूम बद्री की तरह बबिता के दिमाग में भी काम करना बंद कर दिया था । बद्री और बबिता को सहमा देख दोनों बच्चे भी माँ बाप से जब के बैठे रहे हैं । थोडी देर तक पूरी खामोशी रही कि तभी रामकली दरवाजा पीटने लगी । अब पथरी ने पिता से कहा ऐसे नहीं मानेगी जब जब जाएगी भी नहीं तो मुस्तैदी से लड लेकर चौकन्नी खडी हो जाएगा । मैं दरवाजा हल्का सा खोलूंगा तो उस पर लाॅरी सचिव तुम्हें पथरी की बात सुनकर बबिता एक मजबूत लट्ठ लेकर मुस्तैदी से दरवाजे की आड में खडी हो गई । बद्री ने आरी अपने हाथ में पकडी और धीमी सादा बे बहुत दरवाजे की कुंडी खोले । रामकली दरवाजा पीट रही थी । दरवाजे की कुंडी खोलते के साथ रामगली घर के अंदर आ गए । मुस्तैद भविता ने रामकली पर लाइट से दो बार की पहला बार रामकली की कमर पर पडा और लडखडाते हुए वो गिर पडी । लटका दूसरा बार कम तरीके पैरों पर पडा । दो बार के बाद रामकली के आंखों के सामने सारे नाचने लगे । वो कुछ भी नहीं सकते । अब बद्री ने मजबूती से आरी संभाली और उसकी गर्दन पर प्रहार करने वाला था । आपकी रामकली ने बचने की गुहार लगाई । मुझे मत मारो । उसने दोनों हाथ जोडकर माफी की गुहार की । बद्री की निगाहें उसके हाथों पर गुदे निशान पर पडी जिसपर पत्री राम लिखा था । यहाँ के तुरंत बाद पत्री और राम कल एक मेला देखने गए थे । जहां रामकली ने अपने हाथ पर बद्री और अपना नाम में आकर बद्रीराम करवाया था । बद्री वही रुक गया और उसने आर्य एकॉर्डिंग बद्री ने हाथ पकडकर उसे उठाया और चारपाई पर बिठाया । समीप रखे मटके सबसे गिलास पानी दिया । रामकली तीन गलास पानी पी गई । कुछ देर की शांति के बाद रामकली ना कहना शुरू किया पथरी मैं तुम्हारी रामकली हूँ, ये कैसे हो सकता है? सारे गांव के सामने तो मैं अग्नि में सौंपा था इसलिए सब तो में भूत कर रहे हैं । पथरी वो मैं नहीं थे । वो राम भरोसे की बीवी चमेली थी । ये किस हो सकता है । उसके साथ हमारा बच्चा भी था । उसको बच्चा भी चमेली का था । हमारा बच्चा वो नहीं है । मेरे यहाँ से जाने के थोडे दिन बाद डेंगू की बीमारी में चलता हूँ । मेरी कुछ समझ में नहीं आया तो क्या कह रही है और क्या कहना चाहती हैं । बस सब समझ लो । किस्मत का खेल है अब सोच क्योंकि मैं कठपुतली ही नहीं । तब कहा नाच गए पता ही नहीं चला । रामकली बोल कर चुप हो गई और बबिता और बच्चे भी बद्री के पास बैठ गए । कुछ बल्कि चुप्पी के पास चार रामकली ना कहना शुरू किया । मुझ पर शहर में रहने का भूत सवार था । मैं दिल्ली की बस में बैठ गई । हमारे पुराने कमरे में गई । उस कमरे के मकान मालिक ने किसी और को किराए पर दे दिया था । वो बद्रीनाथ बीच में । मैंने तो वो कमरा खाली कर दिया था । सारा सामान उठाकर मैं कम ले आया था । मैंने सोचा कि वो कमरा खाली होगा । वही साथ वाले कमरे में तुम्हारा कार्यकर राम भरोसे रहता था । उसकी पत्नी गांव गई हुई थी । उसने मुझे रुकने के लिए कहा । व्यवहार हो गई । कुछ दिन तक में शहर को भी फिर हम भर उसकी वीवी गांव से वापस आ गई । मुझे देखकर वह बडा गई । उसे राम भरोसे पर शक हो गया कि राम भरोसे और मेरा कोई चक्कर । तभी मैं तेरे बिना राम भरोसे के संग रह रही हूँ । पत्री ना राम करेगा हाथ पकड लिया मैं तुझे ढूंढने शहर भी गया था । लेकिन राम भरोसे वहाँ नहीं मिला था और किसी को भी उसके बारे में नहीं पता था । राम भरोसे मुझे छोडने के बहाने कहूं की ओर चलने लगा । राम भरोसे की बीवी और बच्चा भी साथ हो लिए । उसकी बीवी को पक्का शक था कि राम भरोसे मेरे संग भाग जाएगा । हम रात की बस में बैठे, रास्ते में नहीं, घर के पास किसी जगह बस रुकी । हम खाना खाने, ढाबे पर बैठे । राम भरोसे की नियत खराब हो चुकी थी । उसके भी ठीक सोच रही थी । खाने में उसने कोई नशे की दवा मिला दी । मैं रामभरोसी की बीबी, हमारा बच्चा और उसका बच्चा बेहोश हो गए । मुझे दो दिन बाद होश आया । मैं उसके साथ किसी अंजान जगह थी । उसने सभी को मुझे अपनी पत्नी के रूप में परिचित कराया और हमारे बच्चे को अपना बच्चा का । मेरे पूछने पर उसने बताया कि उसकी बीवी नाराज होकर बच्चे को लेकर अपने मायके चली गई । बेहोशी की हालत में उसने मेरे जिस्म से छेडछाड की । मैंने हथियार डाल दिए तो उसने शायद मुझे सम्मोहित कर लिया था । वो जैसे कहता गया मैं ऐसे करती गई । हम पति पत्नी की तरह रहने लगे । रामकली ने बताया, मुझे भूल गई थी । बद्री ने पूछा, शायद यही हुआ था । सालों बाद मुझे एहसास हुआ कि मैं क्या कर रही है । लेकिन तब तक मुझे गलती का प्रायश्चित करने का कोई साधन नहीं सुलझा की किस मुँह से तुम्हारे पास आऊँ । मैं राम भरोसे संघी रहने लगे । फिर एक साल में हमारी फॅमिली सब को डेंगू और चिकनगुनिया होने लगा । बहुत लोग मर गए, जिसमें हमारा बच्चा भी चला गया । हम लोग फिर शहर आ गया, लेकिन अब के बाद हम दूसरे स्थान पर रहने लगे हैं । हमारे बच्चे के चले जाने पर राम भरोसे कपरान हुआ और उसने लेकिन असलियत बताइए क्या बताऊँ जब रात को ढाबे पर हमारे खाने के बाद हम सब बेहोश हो गए थे, तब उसने मेरे गहने अपनी बीवी को पहना दी और नहर में धक्का दे दिया । फिर अपने बच्चे को भी धक्का दे दिया । बेहोशी में तो डूब गए । मेरे गहनों के कारण तुमने राम भरोसे की बेटी बच्चे को मुझे और अपना बच्चा समझकर अंतिम संस्कार कर दिया । इसलिए तो मारगांव की हर हालत मुझे रामकली का भूत समझ रहे हो । सांभर उससे को छोडकर यहाँ क्यों आई? पत्री ना रामकली से पूछा पिछले महीने राम भरोसे भी मर गया । उसे शराब की लत सस्ती शराब पीता था । पिछले महीना जहरीली शराब पीने से बहुत लोग मर गए हैं, जिसमें राम भरोसे भी था अब क्या करने आया हूँ राष्ट्रीय मेरी अपनी कर दिया थापिता और बच्चों संग मजे में जीवन भी पीता है । पास में कोई तूफानी लाना चाहता हूँ । मैं नौकरानी बनकर कोने में पडे रहेंगे । किसी को कुछ नहीं होंगे, काम करी के नहीं हो सकता । चाहे मैंने तुझे राम भरोसे की पीवी पर बच्चे समझकर अंतिम संस्कार किया हूँ । लेकिन अब हालात लग जाती तो तभी वापस आ जाती तब मैं तुझे अपना बना भी लेता हूँ । लेकिन अब हमारा बच्चा नहीं रहा और मैंने बाकी दसन सुखी रास्ते बचा लिया तो भी रामभरोसे संघ अर्धांगिनी बन कर रहा हूँ । तुम राम भरोसे के मरने के बाद मेरे पास आई हूँ । सब मेरी जिंदगी में तुम्हारा कोई स्थान नहीं हमारी रहा और जिंदगी जो है बिना किसी कारण तो मुझे छोडकर किसी और के संग राजी खुशी रही अब मेरे संग नहीं रह सकती है । मैं कहाँ जाऊँ, मैं क्या बताऊँ हमें तुम्हारी आर्थिक मदद कर सकता हूँ जिससे हम अपना गुजर बसर कर सकती हूँ । बाकी थोडा बहुत काम कर लेना जैसे मजदूरी कर का काम मुख्य से क्या दूंगा । रोजगार योजना में मजदूरी दिलवा देगा । रामकली बद्री, बबिता और बच्चों को देखते रहेंगे । पत्री ना कुछ रुपये रामकली को दिए और मंदिर के बरामदे में उस के रहने का प्रबंध कर दिया । मुखिया ने उसे मजदूरी दिलवा दी ।

02 स्मृति -पुरानी दिल्ली

पुरानी दिल्ली लगता है यहां कुछ नहीं बदला । वही पुरानी इमारत है । पुरानी सडकें और पुराना ढांचा जैसा छोडकर गया था । बिल्कुल वैसा ही है । वहीं भीडभाड, रिक्शा ऍम सभी एक दूसरे में पडे हुए सडक बात नहीं कर सकते हैं । पुरानी दिल्ली पुरानी रह गए । इन तीस सालों में तीस वर्ष और पूरी हो गए । तीस वर्ष पहले पुरानी दिल्ली को अलविदा कहकर विदेश किया था । आता रहा पुराने मित्रों और रिश्तेदारों से मिलता रहा । पहले तो सभी आसपास पुरानी दिल्ली में रहते थे । फॅमिली गालियाँ पार करके मिलने चले जाते थे । पुराने मित्र रिश्तेदार नई कॉलोनियों में फस गए । अशोक विहार, पीतमपुरा तो ही नहीं जाना । पुरे और द्वारका रहने लगे कुछ तो गुडगांव और नोएडा इस कारण पुरानी दिल्ली आना ही छूट गया । पुरानी दिल्ली का मुख्य रेलवे स्टेशन एक सिरे से हमारे की ओर जाती सडक बहुत बडी दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी जहाँ बचपन में स्कूल की छुट्टियां भेज दी थी । बस एक नई सुविधा पुरानी दिल्ली में नजर आई जो पहले नहीं मेट्रो के चलने से आना जाना सुविधाजनक हो गया । बाकी सब ऐसा ही रिहाइश कम हो गई और व्यापार हमारे तक की सडक वैसे ही हैं जब लिया और मैजेस्टिक सिनेमा तो बंद हो गए । सामने का पार्क पार्किंग मेट्रो में बदल गए हैं । मैजेस्टिक सिनेमा गुरुद्वारा शीशगंज के स्मारक में बदल गया । कुमार सिनेमा भी बंद हो गया और सब कमर्शियल बन गया । चांदनी चौक का मुख्य बाजार वैसा ही मिला । लालकिले से फतेहपुरी मस्जिद तक दोनों तरफ काट रहे हैं । पहले नीचे दुकान और ऊपर मकान के परंपरा टूट गई । स्कूल के मित्र इन्हीं कटरों कोचों में रहते थे । जाने पहचाने कूचे काटते और दलिया पूछा बैजनाथ कुछ घासीराम फॅमिली कटरा, नील कटरा सुभाष कटरा शरीफी कटरा नागपुर नई सडक ऊंचा पातीराम गांधी के लिए तलक बाजार चौथ मार्केट, पाक दिवार, दलियान गली, कटरा ईश्वर भवान नया बाजार वैसे कैसे हैं? परन्तु कोई रहता नहीं जानी पहचानी सीढियाँ मत कर के चढ गया । ऑफिस और दुकानों में परिवर्तन मकान में कोई नहीं रहता हूँ । मालूम भी नहीं कहाँ चले गए । मालूम था कि कोई पुराना परिषद मिलेगा नहीं, फिर भी उत्सुकता देगी । वो जगह है । आप कैसी है? मैं तो वैसे ही परन्तु अब कोई परिचित नहीं है । मकान तो नहीं मिले परंतु दुकाने वही परिचय, वही खाने की वस्तु में लजीज स्वादिष्ट सेंट्रल बैंक के पास नटराज भरने वाला दरबे के बाहर चले भी की दुकान ऊंचा घासीराम के बाहर शिव मिष्ठान की पूरी जलेबी और हाल पर पता पूरी मस्जिद परछन, आराम की मिठाई की दुकान, गोले, हड्डी के छोले भटूरे, फिर ज्ञानी का फालूदा और दाल का हलवा । क्लॉथ मार्केट के साथ नौ बजे सिनेमा बंद पडा है । अंकिता फिल्में देखे थे । पैदल रास्ता अगर से पीछे गली में रहते थे । श्यामा प्रसाद मुखर्जी मार्ग पहले भी था आज भी है पर कोई रहता नहीं है । मकान के नीचे पैर थक गए । कुछ देर सोचने के बाद सीढियाँ चढते ऊपर मकान में गया । ऑफिस बन चुके थे । कभी रहते थे । जन्म हुआ होगा । बच्चा भी देखने लगा कि कैसा इधर जहाँ जीवन के तीस वर्ष पीते हैं, खासकर का स्वामी कौन है पता नहीं । घर तो गोदाम और ऑफिस बन गया । बीचोंबीच सीढियाँ ऐसी है सीढियों के ऊपर दूसरी मंजिल पर जाने के लिए वैसे ही सीढियाँ । पहले सीढियों के दोनों ओर खुला डाला था । अब उस पर छत डाल चुकी थी । कपडे की गांठे एक दूसरे के ऊपर रखे थे । दालान के बाद दो कमरे और रसोई थी । गाठों के बीच में थोडा सा रास्ता था । उसमें से निकलने की कोशिश की तरह तो सफल रहा है । तब एक मजदूर चाय का गिलास हाथों में ले आया और पूछने लगा क्या काम है और किस से मिलना है । कभी घर में रहता था । आज लगभग तीस वाली बात यहाँ से गुजरा तो बस देखने आ गया की कैसा है अपना काम तो कोई नहीं । बस मन में जिज्ञासा हो सकता है । किसको देखने की जहाँ हुआ बचपन बीता और यहाँ तक कि विवाह भी इसी घर में हुआ था । कब रहते हैं? चाय की चुस्कियां लेते हुए उसने पूछा मैं मुस्कराकर बताने लगा तीस साल पहले कितना सुनकर वहाँ पे लगा इतना पुराना तो कोई आदमी नहीं मिलेगा या मैं दस साल से यहाँ रहता हूँ । कोई बात नहीं । मैं एक बार देखो देख लो मुझे बताओ कि पहले कैसा था और अब कैसा है । सीढियों के दोनों और एक ही गाता था । अब तो अलग अलग ऑफिस मीटर ट्रांसपोर्ट का गोदाम है और ऊपर ऑफिस बने हुए हैं । घर का पूरा नक्शा बदला हुआ था । सीढियों के सामने शौचालय था और दूसरा उसके साथ । अब सिर्फ एक था । दूसरे शौचालय के स्थान पर स्टोर रूम था । दोनों शौचालयों के बराबर स्नान करते हैं । वे अपने भी गोदाम में परिवर्तित हैं । पाकिस्तान घर के बाद दोनों तरफ तो रसोई थी पे भी कोई काम बन चुके थे । एक तरह बडी बैठक में एक दीवार पर महंगी फूलों के डिजाइन वाली टाइल्स लगी थी जिनके बीच में एक बहुत बडा आइना था । उस पर खूबसूरत नक्काशी की हुई थी । आईने के ऊपर खूबसुरत ताजमहल बना हुआ था । टाइम विदेशी टाइल्स और क्लास पूरे दीवार की शोभा बढाते हैं । अब गोदाम के लिए पूरी दीवारे थी । ऊपर कमरे और आगे खुली जगह थी परंतु एक इंच में खाली जगह रहेंगी । मायूसी हुई लेकिन मालिक के मर्जी की अपनी जायदा का उपयोग जैसे चाहे कर हमने घर भेज दिया । खरीदार अपने हिसाब और सहूलियत से गोदाम और ऑफिस बनाए हैं । पहले पूरे घर का मालिक था । अब हर कमरे का अलग ऑफिस और अलग मालिक घर देखकर नीचे आ गया । बाहर से वैसा ही घर जैसा छोड कर गए थे । परन्तु अंदर से हुलिया चुनाव आज ना कोई परिचित नहीं मिला तो नहीं परंतु दुकाने वही पुरानी पता है । पुरे मस्जिद चौराहे पर दातून बेचने वाले, मोतिया के स्कूलों वाली माला, कजरे फलवाले, पुरानी खाने पीने की वैसी दुकानें और स्वाद भी वैसा ही पूरा, ऐसा अट्ठाईस भरी हो । गोल हट्टी में बैठकर छोले भटूरे और ट्राइबल लगाया । वही पुरानी टेबल, कुर्सी और सजावट वही प्लेट चम्मच और मैं इस बार बाहर आकर मोतियों के फूलों की माला और फल खरीदते हैं । मुझे और पत्नी को मोतिया के सुबह से विशेष प्रेम था । मालूम कभी कचरा नहीं लगाया तो हमेशा खरीद कर मंदिर में ठाकुरजी को अर्पित करती थी । मंदिर में अर्पित फूलों की सुबह पूरे घर में फैल जाते थे और मन प्रफुल्लित हो जाता है । ज्ञानी की दुकान पर वही पुराने किस्म के गिलास और रबडी फालूदा एक गिलास ले ही लिया । चलो इस बात से मन प्रफुल्लित हुआ की घर नहीं रहे । पर दुकानें आज भी वही है । घर पहुंचा । आप में सामान और मोतियों के फूलों की माला देख पत्नी पूछ लिया कि नहीं दिल्ली गए थे । पहले की तरह फूलों को मंदिर में ठाकुरजी को अर्पित किए पुरानी सुरंग पूरे घर में फैल गई । पुरानी दिल्ली की बातें सुनकर पत्नी ने ख्वाहिश जाहिर की । बहुत साथ बैठकर खिलाने से खेल रहा था । उसने भी कहा कि वो भी चलेगा जहाँ दादा दादी रहते थे । बेटा वहाँ गोदाम और ऑफिस बने हुए हैं, लेकिन खाना खाने चलेंगे । रविवार को चलते हैं । जब बाजार बंद होंगे, भीड भाड । धक्का मुक्की से बचेंगे । मैं दिल्ली का लालकिला भी दिखा लाएंगे । रविवार को पौत्र महाशय सुबह ही तैयार हो गए कि सैर सपाटे के लिए कब चलेंगे । नाश्ता करने के पश्चात दिल्ली की पुरानी यादें ताजा करने के लिए प्रस्थान किया । कार छोड मेट्रो पकडी क्योंकि रिक्शा ऑटो में सफर करने की चाहते हैं । रविवार छुट्टी होने के कारण मेट्रो में भीड कम थी । आराम के साथ रोहिणी से कश्मीरी गेट तक का सफर कट गया । कश्मीरी गेट मेट्रो स्टेशन पर चार मंजिल नीचे अंडरग्राउंड मेट्रो पकडेगी अगले स्टेशन चांदनी चौक था । मेट्रो स्टेशन से बाहर निकले । सामने गुरुद्वारा शीशगंज था जहाँ माथा टेकते हुए लाल किले के लिए निकले । गौरीशंकर मंदिर में दर्शन करते हुए मंदिर के बडे हॉल में जोडियां बंदी देख पुरानी यादें ताजा हो गई । पत्नी के वोटों पर मुस्कान आ गई की जोडियां भगवान के घर से बनती है । पहले भी लडके लडकियां एक दूसरे को देखते थे । आज भी मंदिर के बहाने जीवन साथी को तलाशा जाता हैं । एक मशहूर की है उससे मिलने आई मैं मंदिर जाने के बहाने ऑल में सात आठ परिवार मिला आप के लिए तत्पर रहेंगे । लाल किले की आन बान और शान में कोई अंतर रहेगा । पहले की भांति पुराना द्वारा दिल्ली की शांति । इस बार आगे के पार्क अधिक खूबसूरत लग रहे हैं । लाल किले के अंदर का बाजार और भव्य प्राचीन लाल के लेकर परंपरा कायम है । पीछे रिंगरोड का खूबसूरत दीवाने आम और दिवाली खास के साथ लाल किले की खूबसूरती । लाल किला देखने के बाद रक्षा के शाही सवारी से फतेहपुरी मस्जिद पर उतरे गोले आंटी के पाला छोले छोले भटोरे और नहीं लगने की पुरानी पसंद रही थी । जब यहाँ रहते थे । आज के मॉल संस्कृति में पढ रहे बच्चों को पुरानी दिल्ली पसंद है । मुझे आश्चर्य हुआ और अच्छा भी लगा । देखो ले हफ्ते की छोटी सी दुकान पर पुराने समय के बर्तन प्लेट चम्मच के साथ पौत्र को खाना पसंद है । जब भी दादू बहुत है सडक पर खडे हो कर हाथ में रबडी फालूदे का स्वाद लेना भी पसंद आया । पत्नी को पता चल ही रही की पुरानी दिल्ली आना सार्थक रहा । पुराना स्वाद जो आज मॉल में नहीं मिलता । पिज्जा बर्गर भी इनके आगे फेल के हैं । दादू अब कहाँ चल रहे हैं अभी तो डेढ बज रहे चिडियाघर घूमने चलते हैं चलने का चिडियाघर बहुत बडा पर अच्छा है । शेयर कहना दरियाई घोडा पर बहुत किस्म के पाँच छह चांदर मिलेंगे । चिडिया घर के बराबर पुराना किला देखा पुराने के लिए की बोटिंग की एक अच्छे तरीके से विकसित चिडियाघर में लगभग हर किस्म के जान सकते हैं । क्या कर देखा था फिर अपने बच्चों को राजपत्र को दिखाया । एक सुखद अनुभूति होती है बच्चों के साथ समय बिताने और उनके पसंद को ध्यान में रखकर उनके साथ घूमने में । बच्चे अभिभावकों के निकट आते हैं और संबंध अधिक मजबूत होते हैं । चिडिया घर में पौत्र को सबसे अधिक आना लाया सफेद बाद जीता दरियाई को बडा बजकर सांप देखकर प्रफुल्लित होता शाम को चिडियाघर बंद होने पर इंडिया गेट है अमर जवान ज्योति से राष्ट्रपति भवन तक । राजपथ के दोनों और बाद आइसक्रीम की ट्रॉलियां । परिवार पिकनिक बनाते हुए युवा एकांत में प्रेम करते हुए खून जवानी, चटपटी चीजें भेजते हुए । वही पुराना माहौल । इंडिया गेट के लॉन में खास पर टहलते हुए जवानी के सुनहरे दिन याद आ गये जब मैं और पत्नी शाम के समय इंडिया गेट के लॉन पर घूमा करते थे । मैंने पत्नी की ओर देखा, उसने मेरी होते हैं करो उसको रहती हैं अच्छा

03 स्मृति -पुराने दिन

पुराने दिन रमन कार डीलर से फोन पर कारों के दाम मालूम कर रहा हूँ । पत्नी राधिका चाय की ट्रे के साथ आई और सोफे पर रमन के साथ बैठ गई । चाहे रमन के आगे रखी है, चाय पी लूँ, सर्दियों में ठंडी चलती हो जाती है तो मैंने फोन पर बात खत्म करके चाय का कप उठाया और पत्नी राधिका की ओर देखा क्या बात है ऐसे क्या दिख रहा हूँ? कुछ नहीं । बात मत छुपाओ जो दिल में है जुबान पर लेता हूँ । कौन से कर लें भ्रमण चाय की चुस्की उनके बीच राधिका से पूछा का आप कार बोला मैंने मना किया था ना कि अभी कोई कार्य नहीं खरीदनी है । सरकार की बात क्यों छेडी हैं । बिना कारके गुजारा नहीं होता । एक उद्योगपति टैक्सी में सफर करें, शोभा नहीं देता । कार से हमारे स्टेटस का स्तर का समाज को पता चलता है । हमारे स्टेटस का सबको पता है । किसी को देखा जैसे कोई ज्यादा काम नहीं हो जाएगा । जो है वही रहेगा । हमें खुद को देखना है किसी को दिखाना नहीं है । राधिका ने दो टूक कह दिया तो कहाँ थे । दोनों का एक्सीडेंट हो गया । अब तुम कार को हाथ लगाने नहीं देती । एक कार बच्चों के पास एक तुम्हारे पास कार तो चाहिए अभी नहीं तो मतलब अभी नहीं । मेरे स्टाफ के पास कार्य और मालिक के पास कार नहीं । कार से मुझे कोई आपत्ति नहीं परंतु कुछ समय रोक कर दो । कार आपके लिए थे अब नहीं । मुझे कार की परवाह नहीं । आज एक है कल दूसरी आ जाएगी । आपकी जान सबसे प्यारी हैं । आप दोनों एक्सिडेंट में बच गए । खरोच तक नहीं । भगवान का शुक्र है इसमें कुछ दिन का इस्तेमाल मत करो । पढना बच्चों के कार्य मेरी कार्य कोई बनाए । कुछ बन्दों को प्रकार ले रहा । प्रवचनकार खुद चलाता था । ड्राइवर सेफ राधिका और बच्चों के लिए रखा था । ड्राइवर के साथ मजबूरी में ही कभी कबार जाता था । एक रात पार्टी से रमन वापस आ रहा था । रात के साढे बारह बजे विपरीत दिशा से आती एक कार रोड डिवाइडर से टकराकर उछली और रमन की कार से टकरा गए । जबरदस्त टक्कर हुई क्योंकि अचानक से विपरीत दिशा की करा जाए तो कोई भी नहीं बच सकता । ऍम को बचा लिया, लेकिन कार क्षतिग्रस्त हो गई । पुलिस केस बना दूसरी कार्य का मालिक हर रोज भ्रमण के ऑफिस और घर के चक्कर काट रहा था कि समझौता करूँ ताकि कोर्ट के चक्कर और सजा से बच्चा गया । राधिका चाहती थी कि उस शराबी का उसके किए की सजा मिलनी चाहिए जिसमें शराब पीकर कार चलाई और खुद के कार्य के साथ रमन की कार को भी क्षतिग्रस्त किया । हालांकि भगवान का शुक्र है कि दोनों बच गए । दूसरी कार को ट्रक को चल गया । हुआ यूं के खाली सडक के किनारे कार रोककर रमन झाडियों के पास पेशाब कर रहा था । पीछे से अधिक तेज रफ्तार पटने सडक किनारे खडी कार को टक्कर मारी । कार के परखच्चे उड गए । ट्रक वाला भाग गया । रात का समय था । तुम ट्रक का नंबर भी नोट नहीं कर सका । एक महीने में दो करो कि एक्सिडेंट होने पर हार्दिका ने रमन को कार चलाने से रोक दिया । रमन भी कुछ कर गया । उसने तेरह की ड्राइविंग भी बंद कर दी । खुद स्वीकार नहीं चलाएंगे । दो बीएमडब्लू कारों का सत्यानाश हो गया । कार्य तो घर में और खडी है परंतु और आधिकारिक उस समय रुकने के लिए कहा कि कभी कभी बुरा समय होता है । कष्ट आया, कार ने सा जान बच गए । इसका जरूर ईश्वर की कोई मर्जी छुपी हुई है । इसलिए पूजा जरूरी है । ठीक है । राधिका माता की चौकी रखते हैं । तो फिर कार ले लेंगे । सामान्य राधिका को सुझाव दिया प्रमाण किसी शुभ मुहूर्त में ही माता की चौकी रखेंगे । मैं पंडित जैसे शुभ मुहूर्त निकल जाने के लिए कहती हूँ । ठीक है तब तक इंतजार करते हैं । थोडे दिन और टैक्सी में सफर करते हैं । रमन ने राधिका को देखा जो मंद मंद मुस्कुरा रहे थे । चालीस निगाहें कातिलाना चाह रहा हूँ कहते हुए रमन कमरे से बाहर चला गया । टैक्सी में सफर करते हुए रमन को अच्छा लगता है । बीच में टैक्सी छोडकर मेट्रो में भी सफर करने लगा । मेट्रो की भीड अमन को अच्छे लगने लगे । लोग क्या सोचते हैं, क्या बातें करते हैं । उनकी बातों को सुनकर लोगों को समझने की पहचान और अधिक हो गए । कॉलेज के युवाओं के हरकतें देख उसे अपने कॉलेज के दिन याद आ गए । क्या उसके अपने बच्चे भी ऐसा करते होंगे? ऑफिस में काम करने वाले युवाओं की जिंदगी को जाना उनकी जिंदगी और संघर्ष को समझा । संघर्ष तो उसने भी किया था । कॉलेज के पढाई के बाद व्यापार जमाने में परन्तु आज एक सफल उद्योगपति बनने के बाद रमन तो संघर्ष के दिन भूल चुका था । पुराने दिनों और बातों को याद करके रमन का स्वभाव भी बदल गया तो ऑफिस में जहाँ कोई स्टाफ सलाह देर से आता तो छुट्टी काट ली जाती है । अब रमन ने ऑफिस के कडे सख्त नियमों में ढील दे दी और लचीली समय सारिणी कपडा लिया । सुबह आठ बजे से रात आठ बजे तक । जवाब आठ घंटे की ड्यूटी देकर कहाँ जाऊँ? स्टाफ इस अभूतपूर्व परिवर्तन से खुश भी था और अचार्य चकित भी की ये चमत्कार कैसे हुआ गैर सभी खुश और पसंद है । अब रमन और बच्चों को भी मेट्रो से कॉलेज जाने की सलाह देता । राधिका के साथ भी मेट्रो का सफर करता । रविवार को सामान्य राधिका को मेट्रो से सफर करने को कहा । आज कोई खास बात है जो मेट्रो की भीड में धक्के खिलवाने की ख्वाहिश है । पुराने दिन याद करो जब मैं नौकरी करता था और शादी हुई थी । बस में सफर करते थे । इंडिया गेट पुराना किला घूमने जाते थे कभी बस मैं तो कभी आटो में नौकरी छोड के आधार क्या पहला स्कूटर लिया था स्कूटर में बैठकर घूमते थे यहाँ ऍम तभी अपने हाथों से रसोई बनाते थे । ऍफ करके देते हैं घर में आप कितने नौकर है ऍम अपने हाथों से बनाए खाने का ही पैक कर दिया था । आपको करना मैंने प्राधिकार को अपने समीप खींचा । हरादेका रमन फॅमिली रमन ने राधिका के काल पर एक नंबर क्या मैं कुछ नहीं बोली हूँ आप हो गए थे? हाँ ये सच है कि पुराने संघर्ष का समय भूल गया था । शायद उसे याद करवाने के लिए भगवान ने दोनों कारों का एक्सिडेंट करवा दिया कि अतीत मत हूँ । आज टैक्सी और मेट्रो में घूम कर पुराना समय याद करता हूँ और मुझे धरातल में एक बार फिर पढने के लिए भगवान से नाराज नहीं बल्कि उनका शुक्रिया अदा करता हूँ । ऍम और भगवान में जगहों से दूर जाते हैं तो वह किसी ना किसी बहाने हमें अपने नजदीक बुलाई लेता है तो घर चले हैं । एक आम आदमी बनकर उद्योगपति का चोला उतारकर जमाना राधिका चल पडे । अपने पुराने हटे पर जहाँ प्रेम से हाथ में हाथ डाले रोमांटिक पल व्यतीत करते थे, एक बहुत हो गए उधर से उन पलों को दिए हुए हैं । व्यापार के चक्कर में उसने प्यार को खो दिया था । मेट्रो में खडे होकर तो उन्होंने सफर किया और केंद्रीय सचिवालय उतरकर पहले बोटिंग की आधिकारिक शरारत से पानी को रमन के ऊपर उछाला । रमन ने भी राधिका के ऊपर पानी के छींटे डालें । वोटिंग के समय दोनों की शरारत चलती रही । पढते हुए मजाक करते हुए कुछ बीते दिनों को याद करते रहे । वोटिंग के पश्चात रमन और राधिका इंडिया गेट के लॉन पर हाथ में हाथ डाले चलते रहे । पुराने दिन याद करते रहे । आपने इन पलों को कैमरे में कैद करते रहे । पैदल चलते हैं । अमर जवान ज्योति तक पहुंच गए । चल रन पार्क की ओर देखकर वो दिन याद है जब बच्चों को बचपन में लाया करते थे । पुराना किला चले रमन ने राधिका से पूछा फिर कभी सब कुछ आज नहीं कल की बातें थोडा थोडा करके याद करेंगे । अभी घर वापस चलते हैं एक लंबी शहर मध्यमान ज्योति से केंद्रीय सचिवालय तक फिर हो जाएगा तो प्राधिकार आज इंडिया गेट प्रेमी जोडों की पसंद है । हमारे समय में भी था और आज भी हाँ देख कर तो ऐसा लगता है कि आने वाले दिनों में भी रहेगा । राधिका ने आसपास देखते हुए कहा ऍम भी वैसे ही है । रमन ने चाहता हूँ पर बैठे पिकनिक बनाते लोगों को देखकर का हम बनावटी जिंदगी जी रहे हैं । प्रकृति से दूर हो गया था । अब तुमने वापस मुझे रह दिखाई है । केंद्रीय सचिवालय मेट्रो स्टेशन से घर वापसी की मेट्रो पकडे, मेट्रो में घुसते ही सामने रमन के ऑफिस के स्टाफ रवीना एक युवक के साथ हफ्ते हुई । चिपक कर बातें करती देखें । रमन ने उसको नहीं देखा था और अधिकार के साथ बातें कर रहा था । अभी ना आपने बहुत अमन को देखकर छह गई । उसका उठकर सीट रमन को बाइक नहीं होती । रमन निरॅतर सीट पर बिठा दिया मैं धारा बिना फॅमिली । रमन ने राधिका को रवीना से मिलवाया । आप मेट्रो में फिर कभी फुर्सत में बताऊंगा । लंबी कहानी है पहले से मिलता हूँ सर ये रितेश रितेश कहाँ काम करते हो? फॅमिली में काम कर रहा हूँ । ऍम में बुलाकर रितेश और उसके संबंध के बारे में बात किया । रवीना घबरा गई । समझ ने उसे प्यार से समझाया । तभी ना तुम्हारी उम्र मेरे बच्चों जैसी है । अगर प्यार करते हो तो उसे आगे बढा हो तो वहाँ की सोचता हूँ परिवार में बात कर दिया । मुझे बताऊँ । मैं जो यथा सम्भव सहायता होगी करूंगा । अपने अनुभव से बात कर रहा हूँ तो हरी उम्र हो गया है । तभी व्यवहार नहीं करना चाहती तो छोड तो ऐसे समय में अपनी करूँ संबंधों को मजबूत करूँ । रवीना ने बताया कि वो वहाँ की ओर सोच रहे हैं पर उसके तन्खा का मैं धवन ने कहा, विवाह में पैसा नहीं देखना चाहिए । अगर मिल जाए तब देर नहीं करनी चाहिए । मुझे देखो । जब मेरी शादी हुई थी तब मैं भी छोटी नौकरी करता था । बस में सफर करता था । खाज उद्योगपतियों पर कल आम आदमी था । लक्ष्मी तो चंचल है । आज इधर तो कल उधर रमन ने उसे और देश को एक साथ अपने घर आने को कहा । रविवार तो रमन के घर आए थे । अमन और अधिकारी उन का मन टटोला । उनके प्रेम को जानकर तो उन्होंने उनको परवाह की सलाह दी । यदि तुम्हारे परिवार को कोई आपत्ति हो तो हम सहायता के लिए तैयार हैं । समन के सुझाव में अभूतपूर्व परिवर्तन देखकर राधिका को प्रसन्नता हुई । उसे शादी के समय वाला रमन वापस मिल गया । समान कार्य कर लेता हूँ । राधिका ने रमन को चाय का कप पकडाते हुए पूछा । चाय की चुस्कियां लेते हुए मैंने जवाब दिया ले लेंगे जब आपकी इजाजत होगी । अब तो पूरी मंजूरी है ले लो । तुम तो कह रही थी कि पंडित जैसे शुभ मुहूर्त निकलवाना है वो तो मैंने तो थोडे दिन रुकने के लिए कह दिया था । सारे दिन भगवान के हैं । जब ले लो हर पल शुभ है । अपने विचार और कर्म अच्छे होने चाहिए । प्रभु तो हमारे साथ सदा रहते हैं । रमन राधिका को देखता रहा ऐसे क्यों देख रहा हूँ मुझे चूना लगा दिया भगवान के नाम पर पब्लिक ट्रांसपोर्ट के धक्के खिलवाते तो मैं इस बहाने पुराने तमंत्री बन गए क्योंकि मेरी छाती अब अच्छा का पालन तो करना होगा । क्या मतलब है मतलब ये कि कहाँ तो लेनी है पी । एम डब्लू कारों का कचूमर निकल गया हूँ अब छोटी हूँ मारूति की दो का होगा दिखावा तो सिर्फ अपने मन के संदर्भ है । लोगों का काम तो कहना है कुछ भी कर लो कुछ ना कुछ मीनमेख निकालते रहेंगे मुझे बॉडीगार्ड दे रखे अपने लिए । मारूति स्विफ्ट ऐसा क्यों? बस सादा जीवन उच्च विचार किसी को अपना लिया है । दो कार्य अलग ब्रांड के लोग एक जैसे तो कर रहे हो काम रिकॉर्ड नंबर की और एक ही वन नंबर की । अभी सरकार ने ऑड ईवन स्कीम चलाई थी । क्या पता दोबारा लागू कर रहे हैं । उससे निपटने के लिए तो कार्य लो । ठीक है तो अभी कार डीलर को फोन करो । देर क्या राॅ को फोन किया और दो कारों के लिए बात की । अगले दिन रमन के घर के बाहर एक सफेद रंग की और दूसरे सिल्वर रंग की कार खडी थी । कार खरीदने के बाद रमन ने शनिवार रात को माता की चौकी रखे । चौकी के बाद काॅर्नर जिसके लिए उसने अपने सभी मित्रों, रिश्तेदारों, व्यापारियों और स्टाफ को आमंत्रित किया । टेनर के प्रबंध की जिम्मेदारी पत्र अनाधिकार स्टाफ प्रवीना को दें माता की चौकी पर रमन अराधिकारिक झूम करना चाहिए सबका स्वागत दिलखोलकर क्या सभी समूह पर एक ही सवाल था कि किस खुशी में माता की चौकी रखे हैं । दो घंटे की चौकी समाप्त होने पर हम ने सबको संबोधित किया । आप सपने मेरे साथ माता की चौकी में माता रानी की आराधना की और माता रानी का आशीर्वाद दिया । आपने एक प्रश्न पूछा के किस अवसर पर मैंने माता रानी की आराधना की । इसके दो कारण है । पहला मेरी तो बीएमडब्लू कारों का स्वाहा होना । मेरी तो कार्य एक्सिडेंट में खत्म हुए । मुझे खरोच तक नहीं आई । इसका शुक्रिया अदा करने के लिए मैंने माता रानी की आराधना की है । आप मुझे भला चंगा देख रहे हैं और अब मैं आपको अपनी कारों की तस्वीरें दिखाता हूँ । क्षतिग्रस्त कारों के हालत देखकर सभी नेता तो तले उंगली दबा ली क्योंकि अधिकांश कोई एक्सिडेंट के बारे में मालूम नहीं था । सब खुसर फुसर करने लगे । तभी रमन ने दूसरे करन की घोषणा की । दूसरा कारण है हमारे होनहार स्टाफ अभी ना कर होगा था । बिना के शादी उसके बहुत समय से मित्र रहे प्रदेश के साथ होने वाली है । माता रानी के आशीर्वाद से दोनों परिवारों को मैं आमंत्रित करता हूँ कि वे रोका की रस्में पूरी करें तो बिना प्रदेश की मंगनी हुई और सभी नहीं डिनर के लिए प्रस्थान किया । रमन और राधिका अतिप्रसन्न है कि वे उन पुराने दिनों में लौट आए हैं जबकि सबकी मदद को तत्पर रहते थे । अब जब साधन है तो उनको साकार किया तो आप को एक क्या है?

04 स्मृति -पूर्वाभास

पूर्वाभास, मकान, चाय की चुस्की ले रहे थे । पत्नी और मिला दनदनाती हुई कमरे में आई । दोपहर में तो क्या ले रही हूँ । खाना कब आओगे? जवाब का होगा मेरी सुनता कौन हो? सुन रहा हूँ क्या करूँ? डॉक्टरों ने परेशान करके रखा हुआ ऍम करवाते जा रहे हैं कि इस को जटिल बना देते हैं । नॉर्मल काम तो करना ही नहीं है । उन्होंने भी पेट पालना है हमारा काटकर घुमाकर बात ना करूँ । सीधे बता हुआ क्या लूट रहे । आज के डॉक्टर तमतमाते हुए और मिला बोले बस बंदूक सीने पर नहीं रखते हैं वरना कोई कसर नहीं छोडी है । अपना घर भरने में लगे डर आते रहते हैं । ये हो जाएगा, हो जाएगा । ऐसा करना होगा, वैसा करना होगा । हमने भी बच्चे जानें । मसाले किसी डॉक्टर ने डराया हूँ । सीधे सीधे नॉर्मल तरीके से बच्चे का जन्म होता था । आज देखो दुनिया भर के जटिल और पेचीदा बन एक डिलीवरी में बता कर दिल का फाॅर करवा देते हैं क्या? अगर और मिला सुबह सुबह कर होने लगी । ये देखकर उमाकांत गंभीर हो गए । तभी कमरे में पुत्रबधु राशि ने धीरे से प्रवेश क्या सास को सुबह कर होते हुए देख वो खामोशी के साथ दीवान पर लेट गई हो । क्या बात है? राशि सब ठीक है ना आपका पर ठीक है । कुछ टेस्ट करवाने हैं, कल करवा लेंगे । फिर इस पर होने की क्या बात है । टेस्ट करवाने हैं, हो जाएंगे और मिला तमतमाकर उमाकांत के पास आई और तनकर खडी हो गई । आपका क्या है तो पैर के समय चाय की चुस्की ले रहे हो । हम साडी गर्मी में सजा भुगत रहे डॉक्टरों का तो छोडो आजकल की डॉक्टर में अभी उस्ताद बन गई है । सभी ने लूटने का धंदा बना रखा है । गंभीर स्वभाव के उमाकांत ने धीरे से पत्नी और बना से पूछा कुछ बताया तो सही आखिर बात क्या है? डॉक्टर कहती है बच्चा अपने स्थान पर नहीं है । बोलता है कि इस पेचिदा और जटिल है । टेस्ट करवाने फिर अस्पताल में दाखिल करना है । उमाकांत चुप रहा । कुछ सोचने लगा । तभी और क्या बोले बच्चे बोलते भी होते हैं । सीधे भी होते हैं । हमारे समय भी यही होता था पर मजा ले किसी डॉक्टर ने डराया हूँ । सब नॉर्मल तरीके से डिलीवरी होती थी । अब हर किसका ऑपरेशन से करना कराते रहते हैं । दिल को कुछ होता है और वो मकान थे और फिर आपको दिलासा दिया । कुछ नहीं होगा । सब ठीक होगा । डॉक्टर ने कहा है तो टेस्ट कल करवाते । सपना ऍम हमारे समय में साधन नहीं थे । अब वैज्ञानिक तरक्की ज्यादा कर लिया । आधुनिक उपकरणों से सब मालूम हो जाता है । समय की मांग है हमें टेस्ट करवानी चाहिए । घबरा मैं पहले जान के समय बच्चे और मां की मृत्यु दर अधिक होती थी । अब पेचिदा केस भी हाल हो जाते हैं । मृत्युदर भी कम हो गयी । मृत्युदर की बात सुनकर और मिलने उमाकांत के होठों पर हाथ रख दिया नहीं । हाँ बाते इस मौके पर नहीं करनी । फिर बाद आकर ठंडे दिमाग से काम करना है तो रोना धोना नहीं । कल सुबह टेस्ट करवाकर डॉक्टर की सलाह पर चलेंगे । कहकर उमाकांत हैं और मैं को शांत किया और मिला अपना बंद करके खाने की सोच हूँ लंच टाइम हो गया । साडी के पल्लू से मैं पहुंचकर उर्मिला ऍम और मिला के रसोई में जाने के बाद उमाकांत नहीं राशि को समझाया हूँ । बेटी घबराना मत । जैसा डॉक्टर कहे वैसा ही करेंगे । पहले और आज के समय में बहुत फर्क है । मैं मानता हूँ कि डॉक्टर आजकल व्यापार करते हैं । फिर भी आधुनिक तकनीक के सहारे हमें पहले से कई बीमारियों और जटिलताओं का पता चल जाता है । समय चलते बीमारी का ज्ञान होता है और उचित इलाज से उपचार हो जाता है । पहले बीमारी का पता ही नहीं चलता था कि कौन सी बीमारी है, मनुष्य चला जाता था । आज बीमारी का पता चलता है और उपचार भी होता है । बेटी तो चिंता मत कर, मैं उर्मिला को समझाता हूँ । उमाकांत ने और मिला और बहू राशि को तो समझा दिया परंतु खुद उसका चित्त अशांत था । रात को बिस्तर पर लेटने के बाद भी आंखों में नहीं नहीं थे राशि और आने वाले बच्चे की चिंता । सब कुशल मंगल हो जाए, कोई अनहोनी ना हो । आधी रात तक मन मस्तिष्क में आशंका कुमार को बढ रही है तो हो गयी । खुद रमाकांत को भी पता नहीं चला । मकान का मकान दोमंजिला था । होटल में उमा कान का परिवार और प्रथम मंजिल पर उमाकांत के छोटे भाई रमाकांत का परिवार रहता था । रमाकांत की मृत्यु पांच साल पहले हो गई थी । उमाकांत के कमरे की खिडकी गली में खुलती थी । खिडकी के साथ ही मकान का बिस्तर लगा रहता था । दिन में कमरा, घर की बैठक और हाथ में उमाकांत और मिलाकर शयन कक्ष बन जाता था । उस वक्त नहीं था । अब चेतन मन में उमाकांत को एहसास हो गया था । किसी ने खिडकी खटखटाई इतनी रात को कौन हो सकता है? तभी खिडकी के बाहर से आवाज आई ऍफ जाना पहचाना था अब चेतन स्थिति में उमाकांत नहीं खिडकी खोलेंगे फिर की के पास रमाकांत खडा था । हालांकि रमाकांत को परलोक सिधारे पांच वर्ष हो गए थे । तुरंत उमाकांत ने कहा हूँ लडकी के पास खडे हो हूँ क्या बात है ये सुनकर टाॅस पडा तो वहाँ इतना उदास मत हो तो कोई घबराने की बात नहीं है । मैं आ रहा हूँ कल जाते और हँसी खुशी राशि का टेस्ट करवा ये कहकर रमाकांत चला गया । उमाकांत की नहीं खुले सपने पूरी तरह से याद था । उमाकांत थोडा पसीना आ गया । उसमें उर्मिला को नहीं लगाया । सभी पडे जब से पानी क्लास में डाला और पी कर फिर से करवट बदली । कुछ देर बाद उमाकांत को नींद आ गई । रात देर तक जागने के बाद उमाकांत सुबह तेज तक होता रहा और मिलने उमाकांत को उठाया तो क्या बात है? हाँ उतना नहीं है जल्दी उठो सुबह की सैर आज कैंसिल करो क्योंकि टेस्ट करवाने राशि के हाँ ऍम अभी नहीं कराता हूँ । टेस्ट जरूरी है अस्पताल में राशि की टेस्ट हो रहे थे बाहर वेटिंग रूम में उमाकांत ने उर्मिला से रात के सपने का जिक्र किया । कल रात सपने में कमाया था । खिडकी के पास खडा था । कह रहा था कि वह मिलने आ रहे हैं । ये सुनकर और मिलना चाहते हैं । क्या हम आप ही सपने में क्या कह रहे थे? कह रहा था कि आ रहा है कब राम था अक्षय के टेस्ट करवा ये सुनकर और मिला के होठों पर मुस्कान आ गई । अभी तक चिंतित और मिला आराम से कुर्सी पर पैर फैलाकर हाथों को सर के पीछे रखकर कहने लगी अगर आपका सपना सच्चा है तो टेस्ट की रिपोर्ट ठीक आएगी । क्या कह रहे हैं आप तो चिंता से मारी जा रही थी । आप मुस्कुरा रही हूँ । ऐसे सपने सच होते हैं । आने वाले दिनों की सूचना दे जाते हैं । तभी राशि के टेस्ट समाप्त हुए । सभी घर आ गए । रात को फिर से रमाकांत उमाकांत के सपने में आया हूँ । कल रात रमाकांत करके के पास खडा था । आज वो सीधे कमरे में आया और उमाकांत को उठाकर कहने लगा छोटा उमाबाई तो मकान तोडकर बैठ गया । रमाकांत उसकी गोद में आकर बैठ गया । ये क्या मजाक है? नीचे तक रमाकांती सुनकर हंसने लगा । ऍम अब तो रोज तेरी गोद में सोचो, करूंगा । हस्ता हुआ रमाकांत गोल से उतर कर भाग गया और उमाकांत का सपना टूट गया । सुबह उमाकांत है उर्मिला को सपने की बात चल रही है । सुनकर और मिला । हस्ती हुई बोली अब मैं निश्चिंत हूँ, सब ठीक होगा । शर्तिया लडका होगा । टेस्ट को ठीक आई । रिपोर्ट हाथों में ना चाहते हुए और मिला । उमाकांत सच्ची बताऊँ सपने में रमाबाई आए थे । हम मजाक नहीं कर रहा हूँ । दो रात लगातार मेरे सपने में राम आया । कहता है कि गोद में रोज सोचू करूँ ऍम बडे भाई समझा करता है तोता बनकर आ रहा है । दादा की गोद में से उसे करने का पूरा हक बनता है । तू भी और मेरा मजाक कर रही है । फसती हुई और मिला चले गए तो महीने बाद एक सुंदर से बच्चे को राशी जन्म दिया । फॅसने बच्चे को उर्मिला की कोर्ट में दिया पहला हत्या ज्यादा का नर्स ने उमाकांत की गोद में बच्चे को दिया । बच्चे ने उमाकांत की । कोर्ट में आते ही सु सु कर दिया और मिलने नर्स को बाहर में पांच सौ रुपये दिए । हसते हुए और मिलने कहा ड्रामा भाई ने अपना वादा पूरा किया । कौन सा सूजी करने का क्या एक और मिलने बहुत बढिया देखो शक्ल रमाबाई से मिल रही है । सब कुछ है । उमाकांत अब लोग काम कर रहा था । अपने में वही होता है जो हम सोचते हैं वो अक्सर पूर्वाभास दे जाते हैं ।

05 स्मृति -ब्लूटरबन

ऍम टीवी पर न्यूज देखते हुए अचानक बचपन की यादें ताजा हो गई । समाचार पत्र में भी वही न्यूज कुछ दिनों से सुर्खियों में चल रही थी । ऑफिस के भाग दौड में सुबह घर से जल्दी निकलकर रात को देर से आना रूटीन बन गया था । ये मार्च का महीना अकाउंटेंट के लिए बहुत ही साल होता है । दम भर के फुर्सत नहीं मिलती है । सच कहा जाता है । कान खुजाने का भी समय नहीं होता । इकत्तीस मार्च को वित्तीय वर्ष समाप्त होता है । सारा पेंडिंग काम पूरा करना है । मैनेजमेंट को प्रॉफिट ऍम और बैलेंस शीट बना कर देनी है । मैनेजमेंट तो कह दिया कि कंप्यूटर है तो देर किस बात की, कौन समझाये के काम तो आदमियों को करना है । काम स्टाप में इधर उधर के काम भी करने और अकाउंट का भी समय पर काम कैसे होगा और छोडी है ऑफिस की यही कहानी है एक अप्रैल को काम समाप्त कर बैलेंस शीट मैनेजमेंट तो शाबाशी तो कुँवारा देता है । बोलते बातें करनी पडी है । एक दिन लेट हो गए । पूरी रात काम करते तो इकत्तीस मार्च खतम बैलेंस शीट बना सकते थे । लेकिन रात को सोना भी जरूरी है ना एक दिन घर नहीं जाते तो क्या जाता जानता नहीं चली जाती मैं अकाउंटेंट को यही बीमारी है । कम समय पर खत्म नहीं करते । लटकाकर रखने की बीमारी है । कौन जानता हूँ । अकाउंटेंट का था । पिछले दस दिनों से घर नहीं गए । ऑफिस में कुर्सी पर पसंद कर एक आध घंटा आराम किया ना । क्या सब एक पराठा बाइस बाइस घंटे काम किया जिसका परिणाम सिर्फ तार खाॅ सौंपकर दो टूक कह दिया । अब तीन दिन की छुट्टी चाहिए । शरीर में जवाब दे दिया । मैनेजमेंट छुट्टी करते हैं, लेकिन शरीर को भी आराम चाहिए । चौबीस घंटों मशीन कंप्यूटर भी चले तो वो ससुर भी हो जाते हैं । आदमी इस बात को नहीं समझ था । उसका बस चले तो दिन के चौबीस घंटों में अडतालीस घंटे काम करना है । घर आकर जब स्तर पर रहता तो चौबीस घंटे बाद भी नहीं नहीं हुई है । आंखें थोडी खुलती, लेकिन शरीर जवाब दे देता हूँ । पूरे छत्तीस घंटों बाद ही अलसाई सी हालत, नोटा, टूथब्रश लेकर बात हो गया । दादा को साफ करने के बाद सोचा कि नहा लिया जाए तभी होगा । जा सकता है बदला तीन दिन की छुट्टी तो नींद नहीं गुजर जाएगी । आ गयी । नहाने के बाद एकदम तरोताजा होकर कमरे में आया । वहाँ श्रीमतीजी पहले से विद्यमान थे । चाय का कप एक हाथ में और दूसरे हाथ में एक्ट्रेस के चाय की धीमी से । जिसकी लेकर मंद मुस्कराहट के साथ कुछ व्यंगात्मक अंदाज में श्रीमती जी बोलिए । नींद से जागे गए कुंभकरन के खानदान से ताल्लुक रखने वाले भारतीय पत्नियों की मान सकता कभी नहीं बदल सकती । मैंने कौन से खींचकर बैठे हुए गा, जिसमें भारतीय पत्तियों की बात कहाँ से आ गई । दो दिन खर्राटा मारते हुए कुंभकरण की नींद मैंने ना तो आपको चलाया नहीं था । क्या ताना मार कर भारतीय पत्नी की मानसिकता तो दर्शाई दी । ये नहीं सोचा कि बीस रोज के दिन रात के थकान कम से कम दो दिन आराम के बाद ही तो मिलेगी । ऐसी नौकरी का क्या फायदा जो घर की शक्ल बुलाते, सीना, सामान्य रोटी, कपडा और मकान में बिल्कुल सही गाना गाया था । तेरी दो टकिया दी नौकरी मेरा लाखों का सावन जाए छोड तो ऐसी नौकरियों ढूंढ लो, कोई दूसरी चाहे कम पैसे मिलेंगे । जानता हूँ जब हम तो बाल सुकून से बैठ कर बात कर सकें । कार लोन की किस्त अगले साल खत्म हो जाएगी, तब दूसरी तो होगा सर, पर बोझ नहीं होगा । अभी से ढूँढना शुरू करो । तब अगले साल तक मिल जाएगी । पढना मेरा अकेले इस मकान में दम कट जाएगा तो भारतीय पत्तियों का शुक्र करो जो ऐसे पतियों के साथ चरम चरम का साथ निभा दिया । अगर अमेरिका क्या शुरू में रह रहे होते हैं तो कब का तलाक हो गया था? पत्नी ने मुस्कुराते हुए गा मैं थोडा खींचता गया । अब इस बात में अमेरिका यूरोप के डर से आ गए, बस आ ही जाते हैं । जब पत्नियाँ चारों तरफ से हताश हो जाती हैं और कुछ भी नजर नहीं आता तब सोच नहीं पडता है और अमेरिका यूरोप की पत्तियों की याद आ जाती है । मैंने इस टॉपिक को बंद करना ही बेहतर समझा और बात कमाते हुए पूछा चाहे मिलेगी उसके लिए हमारे का यूरोप जाना पडेगा क्या हसीन सपने आ रहे थे? अमेरिका शुरू के जा रहे तोड दी है चल भारतीय पत्नी धर्म ने बातें कहते हुए पत्नी रसोई की तरफ चल पडे । पत्नी के रसोई जाने पर मैंने अखबार उठाया और टीवी पर में उस जाना लगाया । मुख्यपृष्ठ पर कुछ पाकिस्तान से आये सिख परिवारों के फोटो थी जो स्वात घाटी जहाँ से तालिबान के कहर से बचने के लिए अमृतसर आ गए और भारत सरकार से भारत में बचने के लिए अनुरोध कर रहे थे । टीवी न्यूज चैनल पर भी यही खबर दिखाई जा रही थी । अपना घर छोडकर विस्थापितों की दशा में अच्छी तरह समझ सकता था । अपना घर अपना व्यापार छोडकर दूसरी जगह बस ना कोई आसान का नहीं था । फिर भी हालात ऐसे हो जाते हैं कि मजबूरी में घर छोडकर कहीं दूर अंजान जगह बसना पडता है । प्रस्थापित परिवार करो बारे में शरणार्थी बनकर रह रहे थे । खबर सन और पढकर अपना बचपन याद आ गया । उम्र को समय लगभग पांच अच्छा वर्ष की रही होगी । लेकिन घटना अभी भी मस्तिष्क पटल पर अंकित थे । वजह थी कि माता पिता से बचपन में अनगिनत बार उस घटना को सुन चुका था । कुछ रह रहकर घटना मस्तिष्क किसी कोने से बार बार निकल आती है । जब भी कोई ऐसी खबर सुनता हूँ तो वह घटना खुद ही ताजा हो जाती है । पिताजी किसान हैं । भारत पाकिस्तान सीमा के नजदीक काम था उन्नीस सौ के जान से पहले माहौल बहुत करता था । हालांकि सब्जियाँ शुरू हो चुकी थी । धम धमकी । चारों तरफ से आवाज आने लगे । ऍसे आवाज आई की भागों बंद कर रहे हैं । बहुत का समय था । लगभग आठ बजे के आस पास समय रहा होगा । रात का भोजन समाप्त कर चुके थे । घर के बरामदे में मैं खाट पर बैठा हुआ था । आसमान में तारे नहीं आ रहा था और माता पिता का इंतजार कर रहा था कि वे भी घर का काम लगता करा जाए । तभी सोने के लिए घट कर ले लूंगा । अकेले होने पर डर लगता था । तीन तुम्हारी थी लेकिन सो नहीं पा रहा था । पांच साल की उम्र से खबर आ गया था । आवाज नहीं निकल पा रही थी । धम धम के आवाज के साथ बहुत ही धुआँ उठा । शिक्षक आसपास ही बम गिरा था । बिना किसी देरी के । फटाफट मम्मी पापा तेजी से घर से निकलकर मेरा हाथ पकड खाई की तरफ भागे । बिना किसी देरी के पास की खाई में छूट गए । कुलधर्म मम्मी ने हाथ पकडकर कहा था । तभी हमारे पडोसी भी खाई में गए । सात आठ बंदो को देखकर कुछ हिम्मत हुई । कुछ बात नहीं आप सात अंदर डर नहीं लगता । मैंने कहा युद्ध के बादल मंडरा रहे थे इसलिए गांव में कई स्थानों पर खाया बनाई गई थी कि संकट के समय खाइयों में सुरक्षा के लिए छुपा जा सके । अभी मशीनगनों से लगातार गोलियों के धन धनाधन आवाजे आने लगी । पडोसी को संबोधित करते हुए पापा ने कहा कुंचित लगता कि हमारे जवानों ने फायरिंग शुरू कर दी । अब जल्दी बमबारी खत्म होगी । हमका हमने आदतों पर बम देखते हैं । हमारे जवानों की जवाबी हमले पर डर के मारे भाग जाते हैं । कुल जीतने कुछ ऐसे जवाब दिया । लेकिन उस रात पायरिंग खत्म नहीं हुई है । पूरी रात जबरदस्त फायरिंग होती रही है । बीच बीच में दोनों तरफ से तो पैसे बम्पर । शादी होती रही । पूरी रात कोई नहीं हो सका । लगता था जैसे कान के पर्दे फट जाएंगे । हमने पडोसी कुलजीत के परिवार ने खाई में छुपकर रात गुजारी । सुबह के समय फायरिंग बंद हुई लेकिन काफी देर बाद ही हम लोग खाई से बाहर निकले । खाई से निकलने के पश्चात पापा मुझे और माँ को घर छोडने के बाद काम की चौपाल के लिए रवाना हो गए । गांव के सारे पुरुष चौपाल पर रात के दिल दहलाने वाली गोलीबारी पर चर्चा कर रहे थे । शुक्र था कि कोई हताहत नहीं हुआ । कितने में पहुँच गए तो अच्छा है । सात की भयंकर गोलीबारी के बाद सीमा पर तैनात पटा लिया नहीं गांव खाली कराने का निर्णय लिया पडे आपसे अपने बच्चों और औरतों को फौरन काम छोडने की सलाह सेना के दो तक किसी कार्य करने लगा दिए ताकी शाम से पहले सुरक्षित स्थान पर पहुंच सके । पुरुषों को सलाह दी गई । जरूरी सामान के साथ जितनी जल्दी संभव हो गांव खाली करते हैं । फौजी ट्रक में गांव के सभी और और बच्चों को बिठाया गया । माँ के साथ मुझे मैं बिठाने लगे । तब होने लगा कि मैं पापा के साथ जाऊंगा । बोलो बेटे तो माँ के साथ जाओ । हाँ पीछे पीछे अपने बैलगाडी में घर का सामान लेकर आ रहा हूँ । बाबा मुझे कुछ कहते हुए कहने लगे नहीं मैं आपके साथ जाऊंगा । कहते हुए मैं पापा से चिपक गया । कॅश नहीं करते हैं । देखो मैं तुम्हारे साथ हूँ तो मुझे ट्रक में बैठकर देखना कहकर बाबा ने फटाफट घर का जरूरी सामान पहली बारी में रखना शुरू किया । कौन जीत रखना बना होने में थोडी देर हो गए । तब तक बाबा ने बैलगाडी में सामान तक लिया था । फौजी टकरा बना हुआ और पापा ने पीछे पीछे बैल करी रहना चाहिए । पापा नहीं नीली पगडी पहनी हुई थी । गांव की कच्ची सडक पर धीरे धीरे ट्रक आगे बढने लगा । पीछे पीछे पापा बेल कारी में आ रहे थे । मैं पापा को देखते हुए हाथ हिलाता रहा हूँ । थोडी टाॅल गाडी की दूरी पडने लगी । पाता की शक्ल धुंधली देखने लगी लेकिन उनकी नीली पगडी देखकर में हाथ हिलाता रहा । बाबा की नहीं ली । पकडे मुझे दिलासा देती रही कि पापा मेरे आस पास है । धीरे धीरे ट्रक और बैलगाडी के बीच दूरी पडने लगी और पापा के मिली पकडे भी दिखाई देना बंद हो गए । तब पक्की सडक पर सपाटे लगाने लगा । टेन ढल चुका था । रात के कार्य माझा चुकी थी । मेरा मन अभी भी पापा के सूरत देखना चाहता था कि कहीं से पापा की नीली पगडी दिखाई देता है । लेकिन फैसला काफी हो चुका था । एक रात फायरिंग की वजह से और दूसरी रात ताजा की जुलाई से सोच नहीं सकता था । बार बार चक्कर देखता कि कहीं से दूरी हो । पापा के मिली पकडी पर फिर नजर आ जाए । बट ने से पहले ट्रक ने हमें एक स्कूल मिलाकर उतार दिया । सरकार ने एक स्कूल में सीमा पास काम वालों को ठहरने का बंदोबस्त किया था । धीरे धीरे स्कूल में मिला लग गया । एक के बाद एक करके बहुत सुंदर गाय जिनमें हमारे जैसे दूसरे कामों की और और बच्चे थे । हमारे आने के कारण स्कूल बंद कर दिया गया था । स्कूल में दो तरफ लाइन लगाकर कमरे थे और बाकि खाली मैदा, स्कूल कंपाउंड के बाहर भी काफी खाली मैदान जहाँ टेंट लगाकर हमारे रहने का इंतजाम किया गया था । मेरी निगाहें हमेशा स्कूल क्रिकेट पर रहती है और पापा के आने की आज सादा लगे रहते हैं । धीरे धीरे गांव के पुरुषों ने भी आना शुरू कर दिया था, अभी तक नहीं है । मैंने वहाँ से पूछा तो फिक्र मत कर रहा जाएंगे । कुलजीत के घरवाले भी नहीं है । एक साथ आएंगे । मैंने जवाब दे रहा है । बाकी बच्चे बाहर खेल रहे हैं तो भी उनके साथ खेल तब आ जाएंगे । लेकिन मेरा मन खेलने में नहीं लग रहा था । तो दिन बीत कर पापा नहीं है । मैं रोने लगा । मैं चुप कराने में लग गए लेकिन मेरा होना बहुत ज्यादा हो गया । मुझे इतना ज्यादा व्याकुल अधीर होकर होते देख बहुत सारी औरतें आस पास जमा होकर मुझे दिलासा देने लगे । एक और आपने मुझे कोई में उठाकर कुछ करते हुए गा तो बडा बहादुर बचाये क्यों होता है? देखो मेरा होगी तरह से कितना छोटा बडे मजे से खेल रहे हैं । उसके पापा भी अभी नहीं आए । लेकिन मेरा रोना बंद नहीं हो रहा था । मेरे पापा क्या करना और सोरों से होने लगा रोते रोते भी मेरी निगाहें स्कूल क्रिकेट पर देखी थी । मालूम नहीं कपडा बाजार अभी स्कूल के पर हल्के से परछाई उठे । नीले रंग की प्रद्धति से चढाया दिखाई देने लगी । मेरी उत्सुकता अधिक हो गए, पापा की नहीं बनायीं । ऍम था मेरे पापा हैं । फॅमिली पकडी के बाद पापा हल्के हल्के नजर आने लगे । नजदीक आने पर माने से लाकर कहा गोलू पापा आ गए । पापा ने आते ही मुझे कोर्ट में ले लिया । पाउँगा होता क्यों? कितनी देर से क्यों है? बहन गाडी तक से रेस्ट थोडी कर सकती है । इसलिए देरी हो गई । पापा निशान पनार तलाजा देते हुए मैं पापा से चिपक गया था तथा को पास पाकर ऐसा लग रहा था जैसे पूरा जहाँ मिल गया हूँ उधर से दूर हो गई थी । स्थित प्रसन्न होकर छलांग लगाने लगा के फटाफट दूसरे बच्चों के साथ खेलने भाग जाओ बगल कहीं माँ को परेशान किया । इतने छोटे छोटे बच्चे कितनी मस्ती से खेल रहे हैं और तो नहीं सब को परेशान कर दिया । खेलने नहीं जाएगा पापा ने कुछ मैं फौरन पापा की गोदी उछालकर कूदा और जोर से चिल्लाकर होगी की तरफ लगा होगी । मैं खेलने आ रहा हूँ । उस उम्र में बस खेल कूद से ही मतलब होता था खेल कर वापस घर आए तो माँ बाप का साथ । तीन । दुनिया से भी खबर युद्ध समाप्त होने के बाद अपने गांव लौटे बमबारी के कारण खेती लायक नहीं रहे थे । खेत जीविका की तलाश में शहर आ गए । गांव में बडा खेत पडा । घर जहाँ छलांगे मारते खेला करते थे । शहर के कमरे के मकान में दम करता था । जीवन का दूसरा नाम । शायद यही संघर्ष हस्ता खेलता पाल कैसे संकटों में घर चाहता है । कोई कल्पना ही नहीं कर सकता । अनिश्चितता से जीवन का हर पल गिरा रहता है । खांसी जैसे गायब हो गई थी । किसान बाबा मजदूर बन गए । दो दिन संघर्ष करने के पश्चात गांव की जमीन बेच पाए । हमने पौने दामों में जमीन भेजकर अनाज बेचने का काम शुरू किया । ना की मजदूरी समाप्त हुई । मेरी शिक्षा शुरू हुई तो गांव का आजाद । बचपन शहर की कठोर जिंदगी में बदल चुका था । दूसरी अंजान जगह जीवन को दोबारा सवारना कोई आसान काम नहीं है । राजा रंक हो जाते हैं । जब भी कोई ऐसी खबर सुनता हूँ तो खुद का बचपन और परिवार के था । यहाँ आ जाती है, ताज पे नहीं हुआ । पाकिस्तान चाहे सिख परिवारों के बैठा देखकर आंखों में पानी आ गया । कितने में वो चाय बना कर रसोई से आएगा । चाय बनाने के चंद पलों में चलचित्र की तरह मेरे मैंने पटल में यादे छा गई । चाय का का पकडाते हुए बोली काम करन के खानदानी जश्न । चिराग चाहे बिस्कुट के साथ हाजिर है, चाय का कप मेरे हाथों में लिया । उसने मेरी आंखों की नमी देख ली थी । पहले भी कई बार मेरी आंखों की नमी देख चुकी थी । सामने टीवी पर में उस देखकर वह सब समझ चुकी थी । मैं कुछ नहीं कह सकता हूँ तो सब समझ चुके थे ।

06 स्मृति -मोची

पहुंची । सुबह से हो रही बरसात मध्यम चुकी थी । ऑफिस आते समय की खबरें के लिए हो गए थे तो दोपहर तक सोकर जूतों में पानी भर गया था और किचन में दो तीन बार पैर पडने के कारण बदरंग हो गए थे । गीले जूते ऑफिस में क्लोवर के आगे रखकर सुखा ली है । लेकिन बदलने जूते अटपटे लगने लगे । लंच समय मैं ऑफिस के नीचे आया । सामने वाले ऑफिस के बिल्डिंग के कोने में एक मोदी का किया था । थोडी थोडी धूप निकलने लगी तो सोचा की छोटों की शक्ल अच्छी करवा ली जाए । मोदी के थे पर बहुत भीड थी । महिलाओं की अच्छी खासी भीड थे जिनके चप्पल सैंडल टूट गई थी और उनको छोड पाने के लिए महिलाएं बताया नहीं । भीड को देखकर वापस होने वाला था की आवाज आई बाबू जी को जल्दी कर दूंगा । मैंने देखा कि मोदी के समीप एक वृद्ध हाथ में बैठकर चप्पल ठीक करने लगा तो पूरा मोदी का पता था दो मुझे होने पर काम फटाफट होने लगा । एक सैंडल ठीक करने के बाद तो उसने मुझे आवाज दी है बाबू आइए अब आपके जूते ठीक कर देता हूँ । पिता मुझे मेरे जूते पॉलिश करने लगा । भाभू इतने खराब होते तो कभी नहीं होते थे । तुम्हारे इतना सुनकर मुझे एकदम झटका लगा और पिता मोदी को ध्यान से देखने लगा नद्दू तुम खाता हूँ, मैं तो नहीं तो तुम दिल्ली से मुम्बई कब आएगा? पंद्रह साल हो गए । ये मेरा बेटा है । पहले मेरा बेटा मुंबई आया । कुछ समय बाद मुझे बुला लिया । अब उम्र हो गयी है अकेले रहने से अच्छा है कि बच्चों के संग रहा जाए । ये तो ठीक है बाबू तुम्हें मुंबई आ गए नहीं मैं तो दिल्ली में ही हूँ । अभी मुंबई ट्रांसफर हुआ है फिर दिल्ली चले जाएंगे । बाबू का भी उसी मकान में रहती हूँ । नहीं मकान बदल दिया है । होता तो एकदम बेकार हो गया । कभी भी इसका चलाने कर सकता है । अभी ठीक कर देता हूँ । नया ले लो कितनी बरसात में नया भी बराबर हो जाएगा । इसलिए पुराना पहनकर ऑफिस आया हूँ । इसी सोचने सबको लाइन लगाकर यहाँ खडा किया हुआ है । बरसात में पुराने जूते चप्पल पहनकर निकलते हो और वह जब आते जाते हैं मैं मुस्करा दिया और बचपन की बातें याद आ गयी । घर की गली के नुक्कड पर न तो मोदी का किया था घर का हर सदस्य । न तो मोदी से हर रविवार जूते पॉलिश करवाता था तो खुद सुबह घर आकर जूते चप्पल, सैंडल ले जाता था और थोडी देर बाद पॉलिश और मरम्मत करके वापस दे जाता था । घर के हर सदस्य का नाम तत्व को मालूम था आपने ठेकी दीवार पर उसने न तो मुझे लिखवा रखा था, चाॅस जाता । तब हम से ही ड्राइंग के रंग और प्रश्न ले जाता हूँ और खुद दीवार पर रंगबिरंगा नहीं पहुंची । लिखता मुझे बहुत को चाहता था क्योंकि वह प्रश्न दीवार पर चलाकर खराब कर देता था और हम भी वापस नहीं करता हूँ । हम बच्चे से बडे हो गए, शादी हो गई । फिर मेरे साथ पत्नी और बच्चों के जूते चप्पल सैंडल भी नहीं तो मोदी ने ठीक है । फॅसे चला गया और उसकी जगह कोई और मुझे बैठने लगा । पूछने पर पता चला कि उसने क्या बेच दिया है । इस बात को आज लगभग पंद्रह साल हो गए । घर पर जब भी जूते चप्पल सैंडल खराब होते तब न तो मोची का जिक्र आएगी जाता था तो मुझे जबरदस्त था । छोटे छोटे जूतों को एकदम नया बता देता था । ऐसा मुझे फिर नहीं मिला । आज पंद्रह वर्ष बाद एक झटके में न तो मुझे ने मुझे पहचान लिया । हालांकि मैंने उसे तब पहचाना जब उसने मुझे बात होता है बाबू मेरे घर का नाम है तो मेरा नाम भी नहीं बोला हूँ बाबू अब देखो जूता हरियाणा तो तो मैं तो एकदम नया कर दिया तो नए जूते के पैसे बचा मैंने मुस्कुराते हो जाएगा लेकिन तुमको यहाँ कभी नहीं देखा अब बुड्ढा हो गया हूँ । तबियत भी ठीक नहीं रहती है । कभी कभी आता हूँ जब तबियत ठीक होती है घर पहुंचने पर पत्नी नहीं चलते हुए होते देखें तो पूछे दिया बरसात में नहीं होते क्यों लिए जूता पे पुराना है और पहुंचे भी पुराना मिल गया उसी ने जूता नया कर दिया ऍम उसका नाम निकल पडा कौन न तो फॅस के सामने उसके लडके का क्या है? कभी कभी आता है पत्नी मुस्कुराती और अगले दिन एक गायक में आपने तीन जोडी सैंडल ठीक करने के लिए रख तक मुझे पकडा रहे हैं

07 स्मृति -यादें

वो यादें, नाम सावित्र लगभग ऍम पति जीवन का साथ पहले ही छोड गए । दो विवाहित पुत्रियां अपने घरों में सुखी थी । घर में एकाकी जीवन व्यतीत कर रही थी । पुत्र पुत्रबधु थी । सबका अपना जीवन है । सब अपने कार्यों में व्यस्त हैं । दिनभर रसोई के कामों में व्यस्त रहती थी । तरह तो अकेले राजघाट ना कठिन कार्य था । कुल मिलाकर छह सात घंटे काम होता था । दोपहर में भी आराम हो जाता था । रात में तीन चार बार नहीं खुलती थी । कहा जाए तो दो ढाई घंटे की नींद के बाद उठना, घडी में समय देखना और फिर ख्यालों में गुम हो जाता हूँ । अक्सर पुरानी बातें और लोग याद आते थे । जीवन साथी की याद आती और सताती थी । उसके साथ के तकरार और नहीं क्योंकि आप कर मुस्कुरा देती । मन ही मन पार्टी कर रहा हूँ । रविवार की सुबह सावित्र की आंख लग गई । बच्चे छुट्टी के दिन देर से उठते थे इसलिए पांच बजे उसने बिस्तर नहीं हूँ । मैं तो हर सुबह पांच बजे सावित्री बिस्तर छोड देती थी तो आज बिस्तर में लेते हुए पुरानी बातें याद कर रही थी । तभी कॉलबेल बचेंगे । सावित्री सोचने लगी कि कौन हो सकता है इतनी सुबह दूध वाला आठ बजे से पहले आता नहीं । हमारे कुछ हाथ बार कहा कि जल्दी आया करेंगे । ऍम सुनता ही नहीं । रविवार छुट्टी के दिन इतने सुबह कौन हो सकता है? इसी सोच में उसे उठने में देर हो गई और तब तक फिर से घंटे बजे साबित्री नोटकर दरवाजा खुला । दरवाजे पर रमाकांत खडा था भाई तो हाँ कहकर रमाकांत और सावित्री एक दूसरे के गले मिलते हैं । टाइम आज कितने वर्ष बाद मिले? कुछ याद है? मैं नीचे तो तुम याद करके बताऊँ । मैं तो याद करता नहीं छोड देते हैं । निर्वाचन मुझे खडा रखना । घर के अंदर आने की अनुमति है या फिर बाहर से वापस चला जाऊँ । कैसी बात करता है रामा अंदर कहकर सावित्री दरवाजे के आगे से हटी और रमाकांत ने घर के अंदर प्रवेश क्या रमाकांत के पास एक अदाची और एक हैंडबैग था । रमाकांत साबित्री का छोटा भाई था । उम्र लगभग बचपन की थी । सावित्री से दस वर्ष छोटा । आज लगभग पंद्रह वर्ष बाद दोनों मिल रहे थे । रमाकांत कुमारा था । उसने भी वहाँ नहीं किया । मुंबई में एक फैक्ट्री लगाई थी । साबित्री ने सुनाता घाटा होने पर उसने फैक्ट्री बेच दी थी । इस बात को पंद्रह वर्ष हो गए थे । फिर रमाकांत की कोई खबर नहीं मिली । भाजपा अचानक हमा कान से मिलकर वो बेहद खुश हुए । रमाकांत साबित्री को बहन तो करता था और सावित्री उसे जमा चाय पियेगा रहा हूँ । सावित्री ने रमा से पूछता हूँ बोझ मत बनाते और बिस्कुट के साथ चला गया । सवितृ रसोई में चाय बनाने चली गई । रमाकांत कर का निरीक्षण करने लगा । कुछ देर बाद वहां वहां देखता रहा कि साबित्री चाय लेकर वापस आएंगे । चाय की चुस्कियों के बीच रमाकांत नहीं साबित्री से पूछा बहन मकान छोटा हो गया है ना? सावित्री ने मुस्कुराकर जवाब दिया भाई तेरा जीजा जल्दी चला गया । तीन बच्चे छोटे छोड दिया था कहाँ से घर घर पूरा करती है । पहले दुकान भी की और फिर आधा मकान देखा । बच्चों की परवरिश के और घर दोनों लडकियों की शादी की । अब मान लो कि शादी पिछले साल की है । मंदिर है । आज छुट्टी का दिन है । अभी सो रहा हूँ । थोडी देर से ही उठेगा । सावित्री का मकान का एक बडा हिस्सा बन चुका था । अब एक ही बच्चा था नीचे छोटा सा दालान, एक रसोई एक कम राजस्व साबित नहीं रह रही थी और ऊपर वाला हूँ । ऊपर प्रथम तल में तो कमरे, बाथरूम अच्छा दूसरे दल पर्स अच्छा था । चाय पीने के पश्चात साबित्री नहीं जमा कान से पूछता हूँ हूँ । आज पंद्रह वर्ष बाद मिल रहे हैं कहाँ रहा हूँ । कभी कोई खबर नहीं भेजे । कोई टेलीफोन नहीं किया । आज अचानक से कहा गया पहले मेरा गाना पसंद नहीं क्या? रमाकांत तनकर क्या आदत नहीं बदली तरी नाराज होने की । सारा सा पूछ लिया कि नाराज हो गया तो अब क्या नाराज हो ना इससे नाराजगी रखे हैं तू बडी है । पंद्रह वर्ष बाद अचानक से आपका खैरानी भी बनती है । नाराज की भी बनती है सब बताऊंगा देते थे अब समझ के सादा के लिए तेरे पास आ गया हूँ रहने के लिए सचिव यकीन नहीं हो रहा हूँ । अब की बार तो पक्का विश्वास का नहीं जाऊंगा नहीं तेरे पास रहेगा तो ये तो सच्ची में बहुत अच्छी बात है । चलो अब आराम कर लें । सफर की थकान होगी । रमाकांत साबित्री के बिस्तर पर लेटा रहा और उसे नींद आ गई । साबित्री अपने दिनचर्या में लगते हैं । आठ बजे मनो और पुत्रवधू मोनिका उठकर नीचे है । रसोई से कचौडी और सूजी के हलवे की भीनी खुशबू बन्दों को सीधे रसोई में खींच लाई थी । हाँ, आज सुबह रसोई में लग गई । आज तो छुट्टी है तो क्या हुआ हूँ । खाली बैठे थे । सच्चा नाश्ते की तैयारी कर लोग तो हरी मनपसंद डाल बालिका चौडी और सूजी का हलवा बना रही हूँ । तभी मोनिका रसोई मैं मम्मी कमरे में कौन हो रहे हैं? फॅस पर चाय का पानी रखा । उन्होंने कहा तुमने कभी देखा नहीं है ना अंदर कमरे में रमा मामा है । मोनिका ने ना कभी रमाकांत के बारे में सुना था और नहीं कभी देखा था । अभी एक ही साल हुआ था उसके विवाह हो । जमा गांध की चर्चा सावित्री ने कभी नहीं समाकांत । आज पंद्रह साल बाद आया था । उन्होंने बचपन में रमा मामा को देखा रहा हूँ । ग्यारह साल की उम्र थी जब उसके पिता का देहांत हुआ था । अंतिम बार रामा मामा को तब देखा था कभी कभी सावित्री रमाकांत को याद करते थे । मनो के मन पटल पर मामा मामा की छवि कोई खास अच्छी नहीं क्योंकि वो अक्सर अपने माँ के मकसद सुनता था कि उसके पिता कम उम्र में चलता है । गहरा वर्ष के खेलने की उसकी उम्र थी कि उसके पिता चले गए । एक भाई उसने भी मोड कर नहीं देखा जबकि खडी में उसने माँ को अक्सर होते देखा था । मनोहर मोनिका ने रसोई में ही चाय पी ली थी । मनोज चाय पीने के बाद ऊपर अपने कमरे में चला गया । होने का साबित्री का हाथ बताने के लिए नहीं । रुपये नौ बजे के आस पास रमाकांत था । सावित्री तब तक नाश्ता बना चुकी थी । रमाकांत में अपना सामान खोला और कपडे निकालने लगा है । बहन ना हालु पूछ रहे हो या वाकई नहाना चाहते हो । सावित्री कहते हुए तो इसे कमरे में आ गई । अगर मैं मना कर दो तो क्या नहीं न हो गए है कि वो मजाक कर रही हैं । कहते हुए रमाकांत नहाने चला गया । नहाने के बाद रमाकांत मनो से मिलाने ऊपर की मंजिल पर गया । रमाकांत उत्साह के साथ मनोहर मोनिका से मिला है । मामा रमाकांत से मिलकर बन्दों को कोई विशेष उत्साह नहीं था । मोनिका सिर्फ मुकदर्शक बने रहे हैं । रमाकांत हसमुख पर कपडे का इंसान था । साबित रही भाई से मिलकर चर्च चाहने लगी कि कम से कम कोई तो घर आया जिससे खडी दो गाडी दिल की बात कर सकेगी । नाश्ता करते हुए सावित्री बोली भाई ये तो छोटे बैग लेकर कहाँ हो ऍम? तेरे हाथ में अभी तक जादू है । लाजवाब स्वाद की कचौडी और हलवा बनाया । एक मुद्दा हो गई । घर का खाना खाई हो गए । नाश्ता समाप्त हुआ और रमाकांत ने बैग्स, एक डायरी और कुछ लिफाफे निकले । मनिका को आशीर्वाद देते हुए शकुन के रुपये दिए और फिर सावित्र के हाथ में के लिफाफा पकडाया । क्या इसमें कुछ रुपए हैं? जब तो चैन की जरूरत थी तब ना काम आ नहीं सका । तुरंत अब तेरी सहायता कर सकता हूँ । साबित्री ने लेता था खोलकर देखा उसमें एक लाख रुपए । इससे पहले साबित्री कुछ कहती रमाकांत ने साबित ने कहा पकड लिया और कुछ कहने से मना किया । ऍम कुछ कुछ बातें कहने की नहीं बल्कि समझने की होती । साबित्री चुप हो गए । दोपहर के खाने के समय रमाकांत ने सब को संबोधित करते हुए कहा आप सब सोच रहे होंगे मामा अचानक पंद्रह वर्ष बाद कहाँ से टपक पडा है? कुछ समय की बात होती है तो मजबूर थी और मैं भी मजबूत था जिस कारण मिलना नहीं हो सका । जीजा की अचानक पहुंच के बाद में वापस मुंबई लौट । क्या व्यापार बहुत अधिक ऊंचाई पर तो नहीं था पर अब तो ठीक ठाक चल रहा था ना अकेला था और अपने हिसाब से सब ठीक चल रहा था । अकेले रहते कुछ आदतें भी बिगड जाती है । मेरा भी वही हाल था क्लब जाना यारो । दोस्तों के साथ चुनाव पीना कुछ अधिक हो गया और व्यापार पर ध्यान कुछ का लाभ कम होता गया । बैंक से कर्ज लिया परंतु बहन का कर्ज चुकता नहीं कर सका तो सा लाभ नहीं हुआ बल्कि नुकसान हो गया । इस कारण बैंक का करता हूँ । ब्याज भी नहीं हो सका । व्यापार संबंध हो गया । सब कुछ बैंक वाले ले गए । पांच वर्ष बीत गए । सब प्यार तो छूट गए और पैसे गए । सब बिहार होते हैं । ऐसा कदम तो खत्म । सेहत पर असर पडा और मैं बीमार हो गया । मेरे बस सिर्फ हेल्थ पॉलिसी बजे थे, जिसने मुझे दूसरा जीवन दिया । अकेला अस्पताल में पढा रहता था । डॉक्टर ऍम ही मेरे संगी साथी थे । उनके साथ ही दिल का हाल चाल बांटता रहता था । कई बार अपने अनुभव बताता व्यापार का बहुत तजुर्बा रहा था । अपनी कुछ आदतों के कारण व्यापार चौपट हो गया । एक डॉक्टर ने नौकरी छोड कर अपना नर्सिंग होम स्थापित किया । मेरी सलाह से उसे हुआ । थोडे समय पश्चात तीन डॉक्टरों ने एक साथ नौकरी छोडी और एक अस्पताल पर अभी कि नहीं रखी है । मेरे बीस लाख से पहले डॉक्टर खुला हुआ था । किसकी सिफारिश पर मुझे सलाहकार नियुक्त किया? तीन वर्ष में अस्पताल बन कर तैयार हुआ । मुझे अस्पताल बनने के बाद भी एडवाइजर के पद पर रखा गया । अब डॉक्टर दूसरा अस्पताल । इसी शहर में बनाने वाले सरकार से जमीन मिल गई है और निर्माण थोडे दिन बाद शुरू होगा । अब जब आपने हैं तब कहीं और जो रहूँ तो मैं कोई आपत्ति है । तब मैं दो चार दिन कर चला जाऊंगा । ऐसा क्यों सोचता हूँ हमारे पास रहे । पिछली बाते छोडा । सावित्री ने मान लो की ओर देखा उसने मौन स्वीकृति दे दी । उन्होंने जब अस्पताल का नाम सुना जिसके लिए मामा काम कर रहे हैं तब उसका व्यवहार मामा के प्रति बदल गया । अस्पताल की भविष्य की योजनाओं के बारे में उसने समाचार पत्र में पडा था । मोनिका भी नौकरी करती थी । सबसे पहले मामा ने इन मोनिका की नौकरी अस्पताल में लगवा दी । रमाकांत ने एक हूँ क्या बिना किसी इंटरव्यू के मोनिका की नौकरी पहले से बेहतर तनख्वा पर लग गए । मनोहर मोनिका मामा रमाकांत के अधिक नजदीक हो गए । रमाकांत की कब था आपने? निष्ठा देखकर साबित्री मनोहर होने का आश्चर्यचकित हो गए क्योंकि उनका अतीत छुपा नहीं था । बच्चों और बडों के बीच एक स्वाभाविक दूरी होती है । दो पीढियों के बीच में जो अंतर होता है तो सावित्री का मनोहर मोनिका के साथ था । रमाकांत के साथ खुलकर सब की बातें करते हैं । छुट्टी की एक दोपहर के समय सावित्री को कुछ काम समझते हैं । रमाकांत पूछता हूँ क्या सोच रही हूँ मेरे चीजे की याद आ गई । तेल उदास हो जाता है । जब यहाँ रहती है वहाँ बहन ॅ याद स्वाभाविक है, ऍफ जाता रहता है । लेकिन याद रात को जरूरत नहीं है कि आकर हूँ । एक बात बताता हूँ तेरे साथ ऐसा नहीं होता है तो क्या हो गया है? किसके तो उन्हें तो नहीं बताया कहीं उडती बातें सुनी थी क्या नाम था? हाँ मारिया घर के नहीं बताया । उसके साथ कुछ खास कर रमाकांत ने कहा सोचा था परन्तु घर बसने का समय आया था । पैर व्यापार झडने लगा तो उसने भी वो फेर लिया । कुछ रुपये व्यापार का काम था और कुछ उसके पैर सफाई जिसने मुझे बीमार कर दिया यार ऐसी चीजें बहन की आ ही जाती है । एक चीज और तेरा पति पत्नी का संबंध कभी नहीं बोला जाता । तभी तुझे जीजा क्या क्या रहती है । मेरा उसके साथ प्यार तो बना पर अंतर्संबंध नहीं बना क्या तो आ ही जाती है । कभी कबार सुंदर थी । सुंदर थे सभी आप तो उसके दीवाने थे । मत्स्य सभी चलते थे । जब उस ने मेरा साथ छोडा तब हजार का पात्र भी बना । सब कुछ ठीक है छोड दिया । रमा सच तो यही है कि सब रहते हैं । हर उपाय है । चीज आ जाता था और आपसे रहते थे । दो दुकानें और बडा मकान जीजा गया । तब जीने के लिए दुकाने और आधे से अधिक मकान बिकाऊ रिश्तेदारों ने नहीं छोड दिया । बस अब तो जीजा की यहाँ रहती है मैं सोलह आने । सच कहूँ तो सब रिश्ते, रुपए रुपये, न कोई सखा, ना कोई नाता । बातों में दोपहर बीत गए । चार बजे मोनिका चाय बना लाये । सपने चाहे भी रमाकांत और सावित्री ने एक दूसरे को देखा और मुस्कुरा दी है । उम्र के इस पडाव में भाई बहन एक दूसरे का सहारा हो गए हैं । पहले खेलेगी फूल गई हूँ । खेलना सिखाते पहले खेलते थे । तेरे जीजा का तो बहुत शौक था । ताशका छुट्टी ताज में भेजती थी । बहन जीजा की याद आती है तो उसके शाह को जिंदा रखते हैं । जब टाॅक लेकर आया और रमाकांत, सावित्री, मनोहर, मोनिका ताश खेलने लगे ।

08 स्मृति -रिश्ता अनजाना सा

रिश्ता बन जाना था । प्रश्न किया था उसके साथ रिश्तेदारी भी नहीं, दोस्ती भी नहीं । कभी रिश्ता भी नहीं समझा । मैंने कभी अखबार नहीं किया । नहीं कभी सोचा पत्नी के साथ ही उसका समय व्यतीत होता था । सुबह जल्दी ऑफिस के लिए घर से निकलता था और रात को घर वापसी होती थी । रविवार और दूसरे अवकाश के दिनों में उसको देखता था । मैंने तो शायद कभी उससे बात की होगी । मुझे आदमी नाम उसका काम था । घर पर सफाई और बर्तन मांजने का काम करते थे । हमारे घर काम करने मेरे ऑफिस जाने के बाद ही आते थे । बच्चे भी स्कूल चले जाते थे । घर में पत्नी तब तसल्ली से सफाई करवाते थे । कभी रिश्ते के बारे में इसलिए नहीं सोचा क्योंकि कई सफाई का काम करने वाली बाई आती और चली जाती है । कोई तो महीना भी नहीं काम करती है । कोई छह महीने कोई एक साल काम करती हैं । गिनती करना भी मुश्किल है की कितनी भाइयों ने घर में काम किया । काम तो कुछ अलग थी । दूसरों से लगभग दस वर्ष तक उसने काम किया । उस पर भरोसा हो गया था । कई बार तो उसके बच्चों से घर छोडकर बाजार चले जाते थे । तो पढे लिखे नहीं थी पर अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में दाखिला करवाया । कम मौका पत्ती रक्षा चलता था तो पांच घरों में काम करती थी । किताबें भर्ती, दोपहर का खाना सब स्कूल से मिलता था । अच्छे कोई पडने में आधे खुश नहीं देंगे भी काम चलाऊ पढाई करते थे तो इसी में प्रसन्न रहती थी । पत्नी अक्सर फुर्सत के पलों में कम मौका जिक्र करती थी परंतु मैंने कभी अधिक ध्यान दिया नहीं । काम अपने पति के साथ रिक्शे में आती थी । उसका पति सोसाइटी क्रिकेट पर रिक्शा लगा देता था तो साढे आठ बजे ऑफिस जाने के लिए घर से रवाना होता । कम मौका पाते । एक सैल्यूट मारकर रक्षा के पास खडा हो जाता है । मेट्रो स्टेशन जाने के लिए मैं उसी के रिक्शा में सफर करता है । उसके सैल्यूट का जवाब ना मुस्कराकर देता और रक्षे पर बैठ जाता है । उसका रक्षा सोसाइटी का रक्षा बन गया । पति समेत सोसाइटी की हर महिला पडोस के मार्केट में आने जाने के लिए उसके रक्षक आपने वो करती है । बच्चे स्कूल जाने के लिए करते हैं । हमारी छोडकर वो तुरंत सोसाइटी क्रिकेट पर रक्षा खडा कर देते हैं । पत्नी से कम हो और उसके पति बच्चों के बारे में सुनने को मिलता रहेगा । जब कोई आग से दूर हो जाए तब दिल से भी उतर जाता है । यही कुछ हुआ और आज कई वर्ष हो गए । उसे दूर हैं । मैं तो खुल गया लेकिन पत्नी अक्सर याद कर लेते थे । बातों बातों में सिख रहा जाता था और मैं चुप चाप सुनता था । काम ओके चले जाने के बाद कई बारी आई पर गए कोई चार महीने तो कोई आठ महीने । क्या अधिकतम एक बार इसलिए भी पत्नी काम को याद करते कि कहाँ हुई? उसके जैसे मिल जाए कम चली गई । उसके पति ने आना छोड दिया । सुना था की वो बच्चों के साथ गांव चला गया । सुबह ऑफिस जाने के लिए बहुत रक्षा मिलते थे परन्तु सैल्यूट मारकर रिक्शा में बिठाने वाला कोई नहीं मिला । पत्नी को बहुत आराम था । उसके पति को सामान की लिस्ट पकडा देते थे और वो मार्केट से सब्जी फ्रूट और किराने का सामान खरीद लाता था । महिलाएं सुभाव से थोडी लापरवाह होती है । कभी चूडी बिस्तर पर पडी है । कभी काॅफी मिलती कम हो, पत्नी को हाथ में थमाते और ऍम लगती की महंगे जेवर संभालकर रखा कर हूँ । कभी किसी और के हाथ लग गए तब मिलने नहीं । जब जब काम होने मेरे सामने पत्नी को डांट लगाई । दिल प्रसन्न हो जाता था । पत्नी की मई उसे देख कर कोई तो है जो उसे भी रह सकता है क्योंकि हर पति की तरह मेरी भी कभी हिम्मत नहीं हुई की पत्नी को डाट लगाओ । ये तो प्यार की बात होती है कि कुलपति पत्नी को नहीं रखना वाला, कोई अपनी सबसे अधिक जहाँ से भी प्यार इकोनाॅमी, घर में कोई भी समारोह होता तो पत्नी कम और उसके पति को रोक लेती । सभी रिश्तेदार हंसकर कहते हैं कि कमों नौकर नहीं बल्कि घर का एक सदस्य लखनऊ ऑफिस के जोर से जाना हुआ । दो दिन का कार्यक्रम लम्बा हो गया और पूरा सप्ताह रुकना पडा । दो दिन के टूर के हिसाब से एक छोटे बैग में कपडे डाले थे । मैंने कपडों को होने के लिए होटल की लांड्री में दिया । पूरा दैन काम करने के बाद होटल वापस आया । रिसेप्शन पर कपडों का पूछा सर आप लोग में चलिए आपके कपडे अभी कमरे में भेज देते हैं । कमरे में टीवी देखना था तभी दरवाजे पर दस्तक दरवाजा खोला था । आज दरवाजा खुला है । लॉटरी से कपडे धूल कराए थे । कपडे लाने वाले व्यक्ति ने कपडे साइट टेबल पर रखे और मुझे देखकर नमस्ते कहा मैंने उसको देखा हूँ । वो अधेड उम्र का छोटे कद का आदमी था । मैं उसे पहचान नहीं सका । पर वो मुझे पहचानता था । उसका खडा रहना शायद यही बतलाता था । मैं खामोश रहा । बहुत समय बाद शायद उसे देखा इसलिए पहचान नहीं सका । हाँ से दूर व्यक्ति दिमाग से भी दूर हो जाता है । मेरी चुप्पी तोडते हुए उसने कहा साहब जी आपने मुझे पहचाना नहीं । बट चालू जम्मू का पति कम्मो शब्द सुनकर एक्स ओर से तगडा करंट का झटका लगा । पूरा शरीर काम किया । लगभग दस वर्ष बीत गए होंगे । कम हो गए हुए । आज कालू की जुबान से कम मौसम कैसा लगा के सामने कालू नहीं कम्मो खडे हैं । कभी ऐसा लगता भी नहीं था और कभी सोचा भी नहीं था । आपकी काम ऐसे इतनी जल्दी चली जाएगी । कालू की नमस्ते भी आ रहा नहीं । मेरा ऑफिस जाने का समय याद रखता था और उस समय आपने रक्षको सिर्फ मेरे लिए खाली रखता था । कई बार मैं देर हो जाता तब घर आकर पूछता है कि साहब कहीं जल्दी तो नहीं चले गए । कालू कैसे मेरे जैसे बूढे हो गए हो? कालू मुस्कराया और खासकर करना हिला दी पर बोला कुछ नहीं बच्चे कैसे ठीक है । अब तो बडे हो गए होंगे । जी बडे हो गए । दिल्ली में रिक्शा चलाते थे । यहाँ होटल में काम कर रहा हूँ । आप जीत जाती । समय तो भी हूँ । दिल्ली में रिक्शा चलाया । गमों के गुजर जाने के बाद बच्चे छोटे थे इसलिए लखनऊ आ गया । गांव के पास में और कई रिश्तेदार लखनऊ में काम करते थे इसलिए यहाँ बस गया । दिल्ली में बच्चों के संभालने की चिंता रहती थी । यहाँ होटल की लॉटरी में काम मिल गया और यही बस क्या दूसरी शादी कि छोटे बच्चों को संभालने के लिए दूसरी शादी की खुश हो तो चिंता काॅल ईश्वर के रचे खेल को कोई नहीं जानता हूँ । जैसे उसने कहा मिस कर रहे हैं । बस तीन शब्दों में जीवन की सच्चाई कालू ने बता दीजिए । कम होने दस वर्ष तक हमारे घर काम किया । घर का सदस्य बनकर रहती थी । पत्नी के साथ रसोई में हाथ बटाती थी । घर के हर प्रयोजनों में बढ चढकर हिस्सा लेती थी । छुट्टी भी ना के बराबर करती थीं । अंतिम दो तीन महीनों में कम मौसम दर्द की शिकायत करती रहती थी । खक्सा दर्दनिवारक गोली लेकर खाती थी । आज की भागदौड की जिंदगी में तनाव की जिंदगी में सभी को सर दर्द की समस्या रहती है । किसी ने गंभीरता से नहीं लिया । एक दिन अचानक को चक्कर खाकर गिर पडी । हल्का हल्का बुखार रहने लगा । बुखार, सिरदर्द और चक्कर के कारण अक्सर काम छुट्टी करने लगे । कमों पर पूरी तरह से आश्वस्त पत्नी भी बेचैन देखते हैं । एक महीने की बीमारी के बाद एक दिन पत्नी उसे अपने डॉक्टर के पास जैकब के लिए ले गए । टेस्ट कराने के बाद के बाद में सोचना टीवी कि बीमारी सामने आई । डॉक्टर ने कहा था कि दिमाग की सूजन का कम होना जरूरी है । यदि तबाह से कम नहीं हुई तब ऑपरेशन ही एकमात्र चला जाएगा । कालू और उसके कुछ रिश्तेदार झारखंड और तांत्रिक के चक्कर में पड गए । किसी ने जादू टोना कर दिया तभी दिमाग की बीमारी हुई है । पत्नी ने बहुत डांटा की बेकार की बातों में मतलब जो जब बीमारी का पता चल गया तो डॉक्टर के कहे अनुसार सवालों काम होता है कि बहकी सी बातें करने लगे और कालू और उसके रिश्तेदारों को पक्का यकीन हो गया कि कम्मो की तबियत ज्यादा होने से बिगडा है । वो तांत्रिक के चक्कर में पड गए । एक रात कामों की तबियत बहुत अधिक खराब हो गई । तब उसे घर के पास नर्सिंग होम मिलेगा । अगले दिन सुबह कालू रोते रोते घर आया और कमों की प्रकृति तबियत के बारे में बताया । नर्सिंग होम में काम मतलब रही थी । हमें देख कहने लगी मैं नहीं बचूंगी । मैं नहीं बच्चों । उसका तर्क और दयनीय हालत देखे नहीं गए । डॉक्टर से बात की परंतु कोई संतुष्ट जवाब नहीं मिला । तीन दिन में पचास हजार का बिल बना दिया । गरीब आदमी इलाज भी नहीं करवा सकता हूँ । उसमें हम से आर्थिक मदद कर लेगा । हमने यथासंभव मदद करते परन्तु हमारी भी मजबूरी थी । नौकरीपेशा की आधी तन्खा तो किस्तों में निकल जाती है । मकान के किस प्रकार की किस बच्चों की पढाई तीन दिन बाद सरकारी अस्पताल में दाखिल करवाया । जैसे मुझे इस पहले जगह की लाओ बढ जाती है । वैसे काम भी तो दिन खुश नजर आएगा । फिर एक रात और इस दुनिया से कूच कर गए कालू अंतिम संस्कार के लिए काम को गांव ले गया । उस दिन के बाद आज कालू मिला और सब पुरानी बातें ऐसे याद आई की जैसे कल की बात हो । खालू से कुछ देर तक बात होती रही । बच्चे बडे हो गए थे । लडका किसी दूसरे होटल में नौकरी कर रहा था । छोटी लडकी की शादी हो गई । दूसरी पत्नी से हुए तो नौ बच्चे अभी छोटे थे । रात को पत्नी से फोन पर बात हुई तो मैंने कालू से हुई मुलाकात के बारे में उसे बताया । पत्नी फोन पर बात करते करते अतीत में चली गई । उसके आंखों के सामने कम मौका चेहरा गया और आवास भराई एक अनजान रिश्ता आज भी उसके साथ बना हुआ निकला ।

09 स्मृति -साँझ

साझा राकेश दो दिन की छुट्टी ले सकते हो । खरीदना ने रविवार की सुबह बालकनी में बैठकर चाय पीते हुए राकेश से पूछा क्या हुआ बहुत दिन? क्या मुझे लगता है कि साथ आठ वर्ष बीत गए होंगे? हमें छुट्टी पर कहीं बाहर गए हुए हैं । एक लंबा समय बीत गया होगा । पहले हम हर छह महीने बाद कहीं न कहीं अवश्य जाते थे । लगभग सभी जगह में देखिए ताकि वो तो थी गया शादी के बाद पूरा देश को मैं फिर बच्चे हुए तब उनके साथ घूम है । लेकिन अब तो सात आठ वर्ष से कहीं नहीं गए । घर में बन गए सेरेना अब हम पान प्रस्थ आश्रम में है । राकेश इन आश्रमों को छोडो कहीं एकांत में कम से कम दो दिन बताना चाहती हूँ । गृहस्ती में फंस कर रह गई हूँ । तुम तो सुबह ऑफिस के लिए निकलते हो तो रात को घर में वापस आती हूँ । रविवार की छुट्टी होती है दूसरा और चौथा शनिवार भी । छुट्टी मेरी कौन से छुट्टी होती है? रविवार तुम क्या बच्चे भी आराम करते हैं और मैं रसोई और घर के बाकी कार्यों में व्यस्त रहती हूँ । सोच क्यों? कई मशीन तो नहीं बन गई प्रेणा ऑफिस की जब छुट्टी होती है तब मैं कौन सा आराम करता हूँ । घर के सभी काम निपटा था । राकेश तभी तो कह रही हूँ कि कहीं चलो दो दिन ही सही, कुछ सुकून मिलेगा । आपको छाडकर दिनचर्या होगी तभी कोई तनाव नहीं होगा । अर्थात तनावमुक्त बिल्कुल सही जहाँ कोई जानता नहीं हूँ कहाँ चले मुझे कहीं घूमना नहीं सिर्फ तनावरहित वातावरण मिले चलूँ प्रकृति की गोद में राकेश ने कुछ सोच विचार मन ही मन की आपको छडों बाद रीना से कहा ना ऑफिस में काम की प्राथमिकता देख कर दो तीन दिन में कहीं जाने का कार्यक्रम बनाता हूँ । राकेश ने अगले दिन ऑफिस में काम की प्राथमिकता देखकर बुद्ध, वीर और शुक्रवार के छुट्टी लेनी है और चौथे शनिवार को ऑफिस बंद और रविवार भी छुट्टी है । कल पांच दिन हरियाणा और राकेश को एकांत में बताने के लिए मिल गए तो उन्होंने ऋषिकेश में ये दिन बताने की सोची । ट्रेन की टिकट बुक करवा लूँ । सेना ने आग्रह किया जनरल कोच में जाने की अभी हिम्मत नहीं है । इसी कोच में भेज देंगे । खार में चलते हैं ऍम लंबी यात्रा हो जाएगी । खुद ट्राइ करोगे तो थकान होगी । कम से कम छह घंटे की ट्राई तो हो ही जाएगी । सुबह चलते हैं । छह बजे तक सडकों पर ट्रैफिक नहीं होता । आराम से ट्राई होगी । मुझे आनंद आॅफ मुद्दत हो गई जब हम दोनों सिर्फ हम दोनों अकेले लम्बी ट्राई पर गए । कोई बात नहीं । छह घंटे लगेंगे साथ हमारा कोई व्यापार तो चल नहीं रहा । छुट्टी पर एकांत में मन की शांति के लिए जा रहे हैं । मौसम तो सूटकेस पैक कर और खाने पीने का थोडा सामान भी रख लेना । बुधवार सुबह छह बजे राकेश और रीना अपनी कहा से ऋषिकेश के लिए रवाना हुए हैं । अक्टूबर महीने की सुबह हल्की ठंड थी । सडके खाली । दिल्ली का ट्रैफिक अभी शुरू भी नहीं हुआ था । चालीस मिनट में दिल्ली छोड हमने उत्तर प्रदेश में प्रवेश किया । मनपसंद की सुनते हुए रास्ते में नाश्ते के लिए आधा घंटा रुक कर कुछ आराम किया । अंतर हल्का नाश्ता किया । मध्यम रफ्तार से कार चलाते हुए और लंबे सफर का भरपूर आनंद लेते हुए छह घंटे में दोपहर के बारह बजे पे ऋषिकेश पहुंचे कोयल घाटी में एक भवन में रुके थे । वहाँ से गंदा किनारे बने भवन के कमरे से मनमोहक दृश्य देख रहा था । बालकनी में कुर्सी पर बैठकर सफर की थकान दूर करते हुए सामने पर्वत श्रृंखला के नीचे पवित्र गंगा मध्यम गति से कल कल किस पर में पहनती जा रहे थे । दिल्ली में एक उतरती नजारा देखने को नसीब नहीं होता । आधे घंटे तक अमरीकी बालकनी से कुर्सी पर बैठे हुए प्राकृतिक दृश्य को देखकर आनंदित होते हैं । फिर दोपहर का खाना खाने नीचे उतरे हैं । भवन में खाना सिर्फ रसोई में बैठ कर खाने की अनुमति थी । डाइनिंग रूम बहुत बडा था । जहाँ दस टेबल लगी थी और हर लेवल पर ऍम वहाँ का आराम से एक साथ साठ व्यक्ति खाना खा सकते हैं । जब राकेश और रीना डाइनिंग रूम में पहुंचे तब लगभग बीस व्यक्ति पहले से खा रहे थे । उनकी कुर्सी पर रहते ही था । लिया गई तेल की गोल थाली और उसमें चार छोटी कटोरियाँ एक डाल दो । सबसे और रायते के साथ सलाह पापड, अचार, चावल और चपाती बिल्कुल घर जैसा हल्का भोजन । कम मात्रा में पहले सब्जियाँ देते हैं । मतलब जितनी भूख हडताल बार कटोरियाँ भर जाते हैं । राकेश और रीना को घर जैसा खाना खाकर आनंद आया । खाना खाने के बाद उन्होंने आराम किया । सफर की थकान के कारण नहीं था गई । चार बजे उठ कर दो ना फिर से डाइनिंग रूम गए और चाहे रात के खाने के लिए रसोई में अपना नाम लिखवा दिया । सावन में खाना रहने वालों और काम करने वालों के लिए ही बनता है । अधिक नहीं बनाते हैं । जितने लोग उतना खाना । बात सही भी है कि अधिक बनाकर बर्बाद करने से अच्छा है कि जरूरत के मुताबिक बनाया जाए । राकेश और बिना भवन के पीछे पैदल पद बनाया जाए । एकदम शांत पता बना । शाम की सहर के शौकीन ही टहलते हुए नजर आ रहे हैं । कुछ दूर चलने के पश्चात दोनों एक बेंच पर बैठकर शांत रहती । गंगा को निहारने लगे । शाम चल रही थी । गंगा के दूसरे छोर पर पर्वत श्रृंखला पर सूरज की सुनहरी धूप । धीरे धीरे भूरी छटा में परिवर्तन होने लगी । कितना अच्छा लग रहा है भी नहीं । हवा कल कल के मधुर संगीत के साथ मस्त चाल में चलती करूंगा । सामने पर्वत श्रृंखला और एकांत पैदल था । इन्हीं पलों को तुम्हारे साथ बताना चाह रहे थे । तीन ने राकेश के हाथों को अपने हाथों में लेकर का दिल्ली महानगर की भागती जिंदगी में काम जीवन बस बता रहे थे । उसको चीजें नहीं, हर जगह भीड भाड एकांत को तरह चाहते थे । यहाँ प्रकृति की गोद में जीवन का भरपूर आनंद उठाया जा रहा । राकेश ने पवित्र कंधा को निहारते हुए कहा जितनी पवित्र गंगा यहाँ है, मैं सही संदर्भ आता है । घर आके हम यहाँ नहीं रह सकते हैं । यही विडंबना है ना जो यहाँ रहते हैं वो शहर की और भागते हैं क्योंकि यहाँ शांति है पैसा नहीं । शहर में अधिक पैसा है तो शांति नहीं तो मैं इस भवन के मालिक को देखो । इतना बडा भवन बनवाया और अपने लिए कुछ कमरे बंद रखे हुए हैं । जब आते रहते हैं पता तो आते होंगे शायद वर्ष तो वर्ष में एक बार तो या चार दिन रुक कर वापस अपने व्यापार बोला जाते हैं और हम यहाँ रहना चाहते हैं पर हमारे पास साधन नहीं रह नहीं सकते हैं । कोशिश कर के देखो कोई भी एक दो कमरों का छोटा सा मकान जहाँ जीवन किसान चैन से भी थे । अच्छा तो लगता है कि किसी शांत जगह है । शांत और स्वच्छ वातावरण में रहने से भी अच्छा रहता है । घर के समीप ऑफिस या दुकान हो, आने जाने की चिंता भी नहीं और परिवार के साथ भरपूर समय बिताने का सुनहरा । अक्सर दिल्ली की जिंदगी बस भागदौड की है । सुबह उठते ही ऑफिस जाने की चिंता, डेढ घंटा ऑफिस जाने में ऑफिस में काम शामको, डेढ घंटे की थकान वाला सफर घर वापस आने के लिए, थकान से जोर से मुश्किल से आधा घंटा मैं तुम आपस में समय बिताते हैं । कुछ सोचो और कुछ करो कि जीवन किसान में बुड्ढा बुड्ढी तेल की कुछ बातें करें और शांत मन से स्वच्छ वातावरण में रहे हैं । बाहर तुम्हारी सही है परंतु जैसा हम सोचते हैं ऐसा होता नहीं है तो नकारात्मक क्यों सोचते हो? मेरी सोच सकारात्मक है । उन सब का हो गया हूँ । साठ में रिटायरमेंट होनी है । घर का होम लोन है, उसके किसमें आदि तन्खा निकल जाती है । सोचा था कि बच्चों का आर्थिक सहयोग मिलेगा । इसलिए बडा मकान लिया और रेंट पे अधिक ले लिया । घर के दूसरे खर्चे भी करने पडते हैं । बच्चे अपनी दुनिया में मस्त रहते हैं, अपने ऊपर खर्च करते हैं । घर के खर्चों में सहयोग मिलता नहीं । क्या करें जैसा समय आ रहे हैं बता रहे हैं कहकर आकेश गंगा के बहते जल को अपने हाथ में लगा बस आर्थिक मजबूरियाँ के इरादे राकेश ट्रेन अबे गंगा के बहते जल को निहारने लगी । वास्तविकता उसे मालूम थे इस कारण चुप रहे । कुछ देर की चुप्पी के पश्चात दोनों फुटकर चुपचाप पैदल पथ पर त्रिवेणीघाट की और चलती है । धीरे धीरे चलते चलते तो लगभग बीस मिनट में त्रिवेणीघाट पहुंचे । बिल्कुल खामोश कोई बातचीत में समय पौने छह बजे का हो रहा था । छह बजे के संध्या आरती की तैयारियाँ हो चुके थे । घाट पर पचास हो रही थी । तेरी ना और राकेश भजन सुनने बैठ गए । मधुर, मनमोहक सा और और आवास में भजन सुन राकेश और रीना मंत्रमुक्त हो गए । बुझा मन तरो ताजा हो गया तो उन्होंने एक दूसरे को देखा और मुस्कुराते हुए भजन सुनने में मतलब हो गए । ठीक छह बजे गंगा आरती आरंभ हुई । अतुलनीय, दर्शनीय और मनमोहक आरती ने राकेश और देना को मंत्रमुक्त कर दिया । आरती में सम्मिलित होकर बिना राकेश अपनी समस्याएं भूल गए । भर्ती समापन के पश्चात बाजार में घूमते हुए दुकानों को देखते हुए वापस भवन में आ गए । आठ बजे रात का भोजन तैयार था । पे टाइमिंग रूम में बैठकर रसोइये थाली भरोसे, थाने के पश्चात कमरे में बिस्तर पर बैठ टीवी देखते हुए दोनों सुखद यात्रा पर चर्चा करने लगे हैं । दिल्ली से ऋषिकेश का लम्बा सफर, एक लॉन्ग ड्राइव का आनंद और ऋषिकेश में कंधा का किनारा । मरीन ड्राइव परसेंट निकालो तो और अतुलनीय गंगा आरती में आनंदविभोर होना । दिल्ली की भागम भाग जिंदगी से विपरीत ऋषिकेश का शांत वातावरण, सीना और राकेश कैसे तय को परिवर्तित कर गया । मैं तो कई बार रीना और राकेश है । दिल्ली से बाहर छुट्टी मनाने निकले । परंतु एक लंबे अरसे के बाद एक अनोखा सुकून मिला तो वहाँ के पश्चात तो इतने आनंदित हुए थे कि आज लगभग पैंतीस वर्ष बाद तो उतना ही आनंद लौट कराया । बीच का समय, बच्चों के बार बारिश, उनके व्यवहार, परपौत्र पौत्री के लालन पालन । मैं खुद को दोनों फूल चुके थे । आज जीवन की सांझ में फिर एक दूसरे को समझने का एकांत समय मिला । कल सुबह आराम से उठेंगे ऍम सोई पर आदत के अनुसार सुबह साढे पांच बजे रीना की नहीं खोली राकेश सो रहा था । अपने दिनचर्या के अनुसार स्नान किया और ध्यान में बैठ गई । ध्यान के बाद रीना भजन गन बनाने लगे । हम तेरी मछली घायल कर जाती है । मुस्कान तेरी मीठी दिल को चुरा आती है जो होती सोने की तो क्या करते तो मोहन ये बात की हो कर के इतना कर पाती है शाम तेरी फॅमिली घायल कर जाती है । मुस्कान तितली थी दिल को छू रहती है । कर्णप्रिय मदर्स पर राकेश के कानों में पडे राकेश ने उठकर रीना को बाहों में ले लिया प्रभात पहला प्रभु बंधन की होती है, इश्क लडाने की नहीं । रीना ने अपने को राकेश की बाहों के बंधन से छुडाने की कोशिश की लेकिन राकेश ने चंबल रीना के कार्यों पर अंकित कर दिया । प्यार करने की कोई सीमा नहीं होती और समय का बंधन भी नहीं होता । राकेश ने रीना को बाहों के बंधन से मुक्त किया । कुछ उम्र का ख्याल करो ज्यादा बन चुके हो । ट्रेन के लिए उम्र नहीं देखना चाहिए । रीना रानी ही आ गए अभी डेढ साल ऐसा ध्यान में अभी सारे अट्ठावन करूँ तब साठ का हो जाऊंगा तब से होंगा । अच्छा ये डेढ साल का कारण स्पष्ट कीजिए तो साठ की उम्र होती है । सठियाने की साठ और सठियाना तभी तो रिटायरमेंट की उम्र साठ रखी है । आदमी सठिया जाता है । पठार कर रहे छोडो मजाक की बात गंगा किनारे चिंतन करने चलते हूँ चलो ऍम राकेश दस मिनट बात हो गया और फिर हीना के संग गंगा किनारे सुबह के साथ करने लगा । पैदल पथ पर एक्का दुक्का सुबह की सैर करने वाले आ जा रहे हैं । कुछ तेज गति से तीस हजार और कुछ धीरे धीरे शहर कर रहे थे । हाल किसी ठंडक थी । गंगा के दूसरे छोर की पर्वतश्रृंखला के छोटी के पीछे से लाले मारने लगे । सूर्य उदय का समय हो रहा था । कुछ दूर शहर करने के बाद तो नौ गंगा किनारे एक बेंच पर बैठ के सुबह हल्की ठंड के मौसम में कहते हुए रीना ने उठते सोने को नमस्कार । क्या स्वच्छ वातावरण, कोई प्रदूषण नहीं, गंगा का किनारा और तो सभी तटपर पर्वत श्रृंखला के कारण मौसम दिल्ली से बहुत अच्छा । यहाँ के स्थानीय लोग टाॅल पहने हैं । पर हम बिना गर्म कपडों में राकेश ने भी सोते को नमस्कार क्या? राकेश उधर सीरिया नीचे उतरने के लिए चलो काम करके तत्पर बैठते हैं क्या? खाना तो नहीं है पर गंगा के तट पर बैठे हैं और नहाने के लिए जगह बची हुई है । जल्दी नीचे उतरते हैं । हाँ घाट तो त्रिवेणीघाट रामझूला लक्ष्मणझूला है । चलो राकेश नीचे उतरते हैं । गन्दा के किनारे थोडी थोडी दूरी पर नीचे उतरने के लिए सीढियां थी जहाँ बडे पत्थरों से छोटे छोटे बैठेंगे स्थान बने हुए हैं । दस पन्द्रह व्यक्ति उस पर आराम से बैठ सकते थे । बिना और राकेश सीढियों से नहीं चाहते हैं तो वहाँ कोई नहीं था । आंखे बंद करके दोनों ध्यान में बैठ गए । धीरे धीरे प्राणायाम करने लगे । सूर्य की प्रथम किरण है तो ना पर पडी और होठों पर मुस्कान आ गए । हल्की ठंडी हवा परसोरिया की किरणें सुकून दे रहे थे । पंद्रह मिनट बाद राकेश ने आंखे खोली वो ही ना । अभी भी ध्यान मुद्रा में मतलब काम की व्यस्तता के कारण राकेश कम ही ध्यान में बैठ जाता था । लेकिन हाँ रीना को शाम के समय फुर्सत होती थी तथा अनुसार उसने संध्या वंदना और ध्यान का नियम बना रखा था । तीनों को ध्यान में मदद एक राकेश ने गंगा में अपने पैर रखे । पानी बहुत ठंडा था । शरीर में छोड ही उठी । पैर झट से गंगा से निकले । कुछ रुककर धीरे से पहले को कपडा में क्या आधे मिनट बाद गंगाजल का तापमान सामान्य लगने लगा । राकेश एक सीढी उतरकर गंगा के पानी में खडा हो गया । उसने घुटने तक पैर चल में कर ली है । राकेश ने हाथों में चलने कर्मो धोया और सूर्य को जल अर्पित कर नमस्कार क्या? रीना अब ध्यान से बाहर आ गई । राकेश को गंगा में खडे देख उसने भी गंगा में पैर रखे हैं । ऍम धूमने कैसे रखे हुए हैं? बिना ने चल से पैर निकालकर राकेश से पूछा धीरे धीरे रखो । एक मिनट में तापमान सामान्य लगने लगेगा । हाँ, ये तो है । रीना ने भी धीरे धीरे जल में बैर रखें और राकेश के समीप आ गई । पर फिर एक सीडी नहीं चौतरे रीना की कमर तक चला गया । रीना को देखा राकेश भी एक सिटी नहीं होता है । हाथ पकडकर तो एक से भी और उतरे । राकेश डुबकी लगाएंगे तब तो नहीं चुकी हूँ तो क्या होगा? गन्दा में खडे होकर गंगास्नान नहीं किया तो गंगा का अपमान हमारी यात्रा भी सफल नहीं होगी । ठीक कह रही हूँ । पहले हरिद्वार आते थे तब हर की पौडी में गंगा स्नान करते थे । आज पहली बार ऋषिकेश में गंगा स्नान करते हैं । दोनों ने एक दूसरे का हाथ पकडा और गंगा में डुबकी लगाई । शरीर में काम कभी से हुई हाथों में चलने का, सोने का अर्पितकर नमस्कार क्या फिर गंगा का नाम लेकर पांच छह डुबकी लगाई । राकेश और रीना स्नान के पश्चात बैठ गए तो कर लिया बदलने के लिए कपडे भी नहीं उठाए थे और ना ही बदल सिखाने के लिए तौलियां धूप निकल आई है तो दस मिनट शांत वातावरण में फिर ध्यान लगाते हैं । अभी कपडे सोच जाएंगे गीले कपडे तन से चिपक गए थे । रीना और राकेश गंगा की मंदगति और पद्मावत श्रृंखला के ऊपर होते सूर्या देखते हुए आपस में वार्तालाप करते रहे हैं । सेना कि छ ऋषिकेश में जीवन की समझ बताने के लिए राकेश भी कुछ ऐसा ही जा रहा था परन्तु आर्थिक मजबूरी के चलते है ऋषिकेश रहने की चाहत पूर्ण नहीं कर सकता था । खाते घंटे बाद हस्ते रहो तो नोट है और एक स्वर में बोले हैं जो हर इच्छा गीले कपडे बहुत हद तक सूख चुके थे । अंदर से जब के आवास तरह ढीले हो गए थे तो उन्होंने भवन लौटकर कपडे बदले और फिर नाश्ता किया । राकेश नाश्ते के पश्चात टीवी पर न्यूज देखने लगा जनाब टीवी देखना है ऋषिकेश नहीं है । चलो राम झूला स्वर्गाश्रम के और चले टीवी दिल्ली में देख लेगा चलते हैं थोडा आराम करने दो दो घंटे बाद चलते हैं, लंच नहीं कर लेंगे । चलो ना दिल्ली जाकर आराम करना कुछ घुमक्कड बनाऊँ । दिल्ली में आराम का भागम भाग ही होनी है । यहाँ आए थे आराम करने । यहाँ भी चैन नहीं । आराम बन को चाहिए तो कंदा के स्नान और शांत प्राकृतिक वातावरण से मिल गया । मन शांत हो गया । अब उठो और गृहस्ती के कर्तव्य निभाओ थालियां जाओगे । घर बच्चों के लिए शॉपिंग करनी है । महिला शॉपिंग करेंगे तो हो ही नहीं सकता । जंगल में भी जाएंगे तो वहाँ भी शॉपिंग जरूर करेंगे । जब करनी है तब करनी है । एक याद होती है की ये चीज हम ऋषिकेश से उस वर्ष में लाए थे । चलो राम झूला पर कार्यपाल की और बोर्ड से गंगापार स्वर्गाश्रम लक्ष्मण राम झूला पर कई बार पैदल गंगा भारतीय चलते । समय काल किसी कंपनी छोले की यात्रा को आनंद कर दिया । अब स्कूटर और बाइक पे छोले पर चलती नजर आई । वोट पर गंगा बाहर जाने का अपना एक अलग आनंद हैं । चूले दोनों छोड के खाते हैं । शांतभाव पर रहती पवित्र गंगा और पीछे पर्वत श्रृंखला का नयन लुभा मंत्र शेयर रोमांच से भर देता है । गंगा बार बिना और राकेश छोटे बाजार और मंदिर घूमते रहेंगे । गीता भवन में राकेश ने कुछ धार्मिक पुस्तके खरीदी और वस्त्र भंडार सेना ने परिवार के हर सदस्य के लिए खरीददारी की । शाम के समय सर त्रिवेणीघाट कि गंगा आरती में सम्मिलित हुए । रात को भवन के बालकनी में बैठ गंगा को शांत चाल पर मंत्रमुक्त हो गए । भवन की लाइट और पैदल पद की लाइटिंग से गंगा की चाल कल कल के मधुर स्वर से शांत वातावरण चितचोर हो गया । परिंदे हो चुके थे । आसपास के भवनों की रोशनी, रात के कालिमा को मिटाने में नाकाम रहने पर भी पीना और राकेश को मदहोश बना रहे हैं । दोनों शांत वातावरण में शांत गंगा की कल कल सनराइज हैं । अगले दिन सुबह सूर्य उदय से पहले तो गंगा तत्पर चट्टान पर बैठ गए । सब्जियाँ दे रहा था । रात के कालिमा कुछ पलों में घटने वाली नहीं । कल आसमान धीरे धीरे पूरा हो गया । पर्वत श्रृंखला नजर आने लगी । पर्वत श्रृंखला के पीछे से आजमान पूरे से संतरी में परिवर्तन होने लगा । सूर्य उदय हो गया । दिन हो गया । कालिमा पूरी तरह से झट गए । धीरे धीरे सूर्य पर्वत श्रृंखला के पीछे से ऊपर होने लगा तो उन्होंने एक साथ हाथों में गंगाजल लिए और सूर्य को अर्पित करके सूर्य नमस्कार । क्या सूर्य की पहली किरण ने दोनों के पदन को छुआ । गंगा के ठंडे जल में डुबकी लगाकर किनारे ध्यान में बैठ गए । मंदिर हवा के झोंकों पर सूर्य के गिरने, मदन पर पडती हुई सुकून दे रहे थे । एक घंटे बाद दोनों भवन वापस आएगा । राकेश भाजपा जाना होगा । मजबूरी है । आज अंतिम छुट्टी है । कल ऑफिस जाना हैं, फिर कब आना होगा, आना जाना तो लग सकता है । कभी यहाँ कभी कहीं और प्रकृति की कोर्ट है । बस यहाँ बसने की चाह रहे गए अपना घर स्वर्ग है । चाहे कितनी कमी हो, इंसान की हर अच्छा पूर्ण नहीं होती । कुछ मिलता है और कुछ लेकर जाता है । कुछ यहाँ चाहे और कुछ अच्छा आप का घर है । कमी हर स्थान में मिल जाएगी । एक वादा कर कि ऐसी आजीन प्रकृति की बातों में वर्ष में दो बार तो मुझे लेकर आ हो गए । फायदा क्या एक बार करने में और एक बार सर्दियों में पाता निभाओगे? खुलता नहीं । बच्चे बडे हो गए । उनकी अपनी दुनिया है । उम्र की सांस एक मैं और एक बच्चा किला छोडेंगे । पौत्र पौत्री को भी संभालना है बच्चों की खुशी में अपनी खुशी उनके साथ रहकर किसान हस्ते खेलते भी थे । यही तमन्ना क्यों चलो? दार्शनिक महोदय का स्टार्ट करूँ । बच्चे प्रतीक्षा कर रहे होंगे । राकेश ने कहा घाट के और अपने घर के लिए दिल्ली की ओर प्रस्थान किया

10 स्मृति -स्वामी लाला

स्वामी लाला दोपहर का समय तो उनकी घंटे बज रही थी । निर्मला उस समय हो रही थी । खाना खाने के बाद दोपहर आराम का समय हर रोज की तरह निर्मला हो गए । निर्मला गया घर की सारी औरतें रसोई और दूसरे काम निपटाकर आराम कर रहे थे । निर्मला फोन के पास हो रही थी । उनके घंटे ने सब के आराम को भी आराम कर दिया । मैं ऍम आज अगर उठा लेना । बिल्लो ने निर्मला से कहा । आधी नींद में निर्मला ने करवट बदली और थोडा खिसककर फोन उठाया हूँ । लो दूसरी ओर कोई आवाज नहीं । निर्मला ने तीन चार बार हाल होगा परन्तु कौन पर दूसरी तरफ छुपे चाय खामोश । उनको कांस्य लगाए हुए निर्मला ने कुछ देर बाद फिरसे हाल होगा । फोन पर तो कोई बोलता था ना ही कोई हो सकता था । फोन चालू था । फोन की घंटे और निर्मला के हाथों से बिलो की नींद खुल गई । कोई नहीं बोल रहा तो फोन रख दे ऍम खोल दी ऍम होगा दो टाॅप बोलता कोई नहीं है । मुझे लगता है लाला का होगा । मेरी आवाज सुनता रहता है । कुछ कहता नहीं है । लाला फोन करता है तो बोलता क्यों नहीं खाना जाए । किसी ने रोका तो है नहीं अपने आप आ जाता है, फिर चला जाता है । किस्मत की बात है । बिल्लोर जो लिखा है वही होता है । सभी बिजली गुल हो गए । बिल्ली का पारा सातवें आसमान पर चला गया । कोई आराम भी नहीं करने देता हूँ । पहले मारा फॅमिली भी पूरी दुश्मनी निकाल रही है । बिल्ली की तीखी आवाज से निर्मला चढ गए लोग इसमें लाला को कोसने की क्या बात है? उसका क्या कसूर जो बिना वजह चला रही हो? मैं चला रहा हूँ । जमाना ही खराब है । एक तो सच बोलूं फॅमिली और दूसरी तरफ कर लिया मैं क्या समझती नहीं । ताने किसको मार रही है । घर बना के आवास में तेजी नहीं इतना सुनते बिल्लो का है । पिछली में भी गजब के पिछले वाले फटती से । चार फॅमिली और निर्मला के बाल पकडे क्या कह रही है, मैं नहीं देती हूँ । तब सुनने के लिए चाहिए । किस मुझे सुनेगी क्या तेरे में कुछ भी नहीं जो मर्द को पल्लू में बंदा रख सके तो उस पर तेरे में कमी रही । तभी तुम्हारा घर छोड कर भाग गया । एक दुकान चाहते चिपक जाता है, मजा ले कभी दूसरी को देखा हूँ । अब उन्होंने जो बोलना शुरू किया तो चुप हो आज तो पूरी भडास निकालने पिल्लो के तानों से परेशान निर्मला घर के दरवाजे पर बैठ गई तो व्यक्ति नर्मला को देख कर दो चार पाॅप हो गए । दोपहर का समय पिछले कुल ऊपर सिंदूर मिलाकर होना आस पडोस की ओर इकट्ठी हो गए । पाँच लिखी थी जिस कारण किसी को कोई काम नहीं था । समय व्यतीत करने की खातिर सभी नर्मला के सुर में सुर मिलने लगे । मेरे में क्या कमी है कि हमें और अत्युक्ति क्या कर निर्मला जोश में आ गई । अचानक उसको अपनी सोच नहीं अपने स्थान पर खडे हो गए । कपडे टाॅपिक कर रहे थे, संभाले नहीं समझता था । अंक नजर आ रहे थे । पडोसन कुछ कह नहीं रही थी परंतु मजे पूरे ले रही थी । तभी उसकी पुत्री सुकन्या स्कूल से आई । उसके हाथ में चॉकलेट और एक खिलाना देखकर निर्मला ने पूछा कि किसने दिन उत्तरी सुकन्या ने गली के मोड की ओर इशारा करते हुए कहा कि वहाँ पर एक अंकल खडे उन्होंने दिया कितनी बार बना क्या? जिसको जानते नहीं उनसे कुछ लेते नहीं तो फिर क्यों लिया वो हम कल कह रहे थे कि आप को जानते हैं मुझे भी जानते हैं । देखो ना हम में गली के मोड पर छुपकर खडे हैं । इतना सुनकर निर्मला सतर्क हो गए । कहीं वो हाथ में लाल तो नहीं अवश्य लाला ही होगा । अभी फोन भी आया था । बडा फट गली के मोड की तरफ भागे । कोई सोच नहीं थी कि शरीर कहाँ और कम पडेगा । साडी निकलकर अलग हो गई । पेटीकोट ब्लाउज में सरपट दौडे । लाला लाला आवाज देती फर्राटे से भागकर गली के मोड तक पहुंची । व्यक्ति लाला ही था । दाडी बडी हुई अस्त व्यस्त हो लिया । निर्मला को पास आते देखकर उसने भागने की कोशिश की । परंतु निर्मला ने उसका कुर्ता बताई । ताला गिर पडा । निर्मला उसके ऊपर गिर पडी है । उसने अपने हलाला को एक ही नजर में पहचान लिया । लाला लाला की आवाज सुनकर सभी पडोसी पीछे पीछे वहाँ पहुंच गए । बहुत सारी औरतों के बीच केरे लाला को एक पहलवान की कुश्ती की तरह बचत करके निर्मला उसके ऊपर जीत का जश्न मना रहे थे । मेरा लाला आ गया । मेरा लाला आ गया और उसी भी टुकुर टुकुर देख रही है । हाँ ये तो साला ये कितने साल बनाया । सभी अटकलें लगा रही थी कि लाला कितने साल बाद आया । लाला पूरे चार साल बाद आया था । निर्मला लाला के साथ कराई और चलाने लगे । मिल लो देख लाल आया कहती थी । मेरे में कमी है, मार्च को बात नहीं सकती है । लाला को खींच कर लाऊं बिल्लोर एक लाल आया कहाँ आ चुकी है । फॅमिली में चुकी है । बारह देख मेरा लाला आया है तो बोल सुनकर आके मल्टीपल लो बाहर आई और लाला को देखकर चुप हो गए । निर्मला जश्न मना रही थी । पिल्लो चुपचाप अपने कमरे में चली गई । निर्मला पुत्र सुकन्या को देखकर कह रही थी की देख तेरे पापा जो अन्य चुपचाप देखती रही पतला वाला के पास नहीं रही । पांच साल के सुकन्या पहली बार तापा लाला को देख रही हैं वो चुप चाप माँ की गोद में चढ गए । एक साल की थी सुकन्या जब लाला घर छोडकर गया था । विवाह के दो साल बाद लाला घर छोडकर चला गया और आज चार वर्ष बाद आया था लाला का नाम । वैसे तो ललित था पर घर में सबसे लाला कहकर पुकारते थे लाला कस्बा बचपन से ही अंतर्मुखी अपने ही धन में रहने वाला जब की उसका छोटा भाई चरण का बाप बहिर्मुखी, चंचल और हरफनमौला था । पिता के किराने की दुकान थी, खूब चलती थी । स्कूल की पढाई के बाद दोनों भाई दुकान पर बैठ गए । हरफनमौला चरण दुकान के हर काम में बढ चढकर काम करता रहा हूँ । लाला ढीला ढाला रहता था । दुकान के कामों में चित नहीं लगता था । बुजुर्गों ने सलाह दी कि विवाह के बंधन में भाग दौड खूंटे के बंधेगा घूमना फिरना बंद होगा । वहाँ के बाद पत्नी काम काज में लगा देगी । विभाग के बाद बडे बडे काम चोर भी काम धंधे में लग जाते हैं । यहाँ के बाद लाला निर्मला के बंधन में बंद हो गया परंतु दुकान के काम काज में चित नहीं लगता है । आपको निर्मला को प्यार से नहीं । वो कहता था पिता के थाने सुनने पडते हैं । छोटा भाई चरण भी रॉक डालने लगा । सालभर बाद सुन्दर से कन्या सुकन्या ने लाला निर्मला की जिंदगी में पदार्पण किया । लाला निर्मला और सकल ना के प्यार में दोबारा था । बच्चा भी हो गया । दुकान के काम में हाथ पटाया करो । दुकान सही चल रही है क्यों करती है वो तो ठीक है पर अपना हाथ जगन्नाथ होता है । काम से ध्यान हटाकर तो बडे बडे साहूकार भी कंगाल हो जाते । तेरे को करने की कोई आवश्यकता नहीं । मैं तो खान जाता हूँ । शहर के मशहूर बाजार के चौराहे पर पहली दुकान है तो सुबह से शाम तक ग्राहकों की कतार लगी रहती है । काम करने के लिए न करें । हमें तो सारा दिन कल ले पर ही बैठा है । उसी को फिर भी पिताजी चरण भाई आपको दाने मारते रहते हैं कि आप काम नहीं करते हैं । वो खुद कौन सा काम करते हैं । दुकान पर बारी बारी से चलने पर ही बैठना है । लाला दुकान पर काम बैठता था । चरण दुकान चार एक पैसे उठाने लगा । पिताजी विचारण का अधिक पक्ष लेने लगे हैं । लाला को सिर्फ जरूरत के हिसाब से ही हर का खर्च दिया जाता है । निर्मला कुर्ती पर कर्ज कर नहीं सकती है क्योंकि लाला दुकान पर बहुत कम जाता था । बीवी बच्चे, यार, दोस्तों के साथ अधिक समय बिताता था । उसे कम की कोई परवाह नहीं । जरूरत के लिए पैसे मिल जाते थे । चरण के इरादे भाग नहीं सका । लाला को कम पैसे देता, खुद अधिक उठाता परन्तु बही खातों में लाला के नाम अधिक दिखाता है । अपने नाम कम लगता है । ये देखकर पिताजी ने लाला को खूब डांटा । फटकारा । लाला ने अपनी सफाई दी, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ । आग में एक ही चरण में डाल दिया । लाला को खलनायक बना दिया । उस की कोई बात नहीं सुनी गई । एक तो दुकान पर बैठता नहीं ऊपर से पैसों को पढाने लगा है । निर्मला ने भी चरण पिताजी की बातों को यही समझ लिया क्योंकि लाला दोस्तों के साथ ज्यादा रहता था । उसका चेक बढने लगा । एक दिन चरण बीमार पड गया । पिताजी ने लाला को दूसरे शहर व्यापारियों सारा काम वसूलने के लिए भेजा । व्यापारियों ने चरण के साथ दिखा दिया तो पूरी रकम का भुगतान कर चुके हैं । वास्तव में चरण ने रकम वसूल कर लीजिए । तुरंत सारी रकम खुद रख ली और दुकान में जमा नहीं कराए । लाल आने के बाद बताई तो चरण उल्टा चोर कोतवाल की तरह लाला पर चढाई कर दी और चलना चलाकर लाला को चोर बना दिया कि वो खुद रकम दबाकर चरण के मध्य इल्जाम लगा रहा है । ये सुनकर निर्मला ने खुद को कमरे में कैद कर लिया । लाला को सबने झूठा घोषित कर दिया । निर्मला को दूर बजा देख लाला का जब सुखडिया सात को घर छोडकर चला गया । तीन चार दिन तक तो किसी ने लाला की कोई सोच ही नहीं । सिस्टर निर्मला कॅश पिताजी से कहा चारों तरफ थोडा गया तभी दोस्तों, रिश्तेदारों, ठिकानों पर तलाश हुई परन्तु लाला का कोई पता नहीं चला । चार महीने बाद वही तो व्यापारी दुकान पर सौदा लेने आए । उस समय चरण दुकान पर नहीं था । पिताजी ने कहा कि पहले पुराना हिसाब चुकता करेगा, फिर नया सौदा मिलेगा । ये सुनकर दोनों व्यापारी चौका ही की रकम का भुगतान ऍम को कर दिया था । उन्होंने पिताजी को रसीद दिखाओ । पिताजी चाहूंगा कि ये क्या हो गया । लाला पर उन्होंने छोटा इल्जाम लगाया । चरण की करतूत लाला के मध्यवर्ती पिताजी को गलती का एहसास हुआ । उन्होंने चरण को तो कुछ नहीं कहा, पर अंतर दुकान में उसका हिस्सा घटाकर पच्चीस पैसे कर दिया । लाला का पता नहीं था निर्मला का हिस्सा पचास पैसे और भाग्य पच्चीस पैसे खुद का रखा । अपनी मृत्यु के बाद पच्चास पैसा सुकन्या के नाम कर दिया । चरण कुल मिलाकर के भी कुछ नहीं कर सकता हूँ । गलती उस की थी । दुकान के काफी रकम गलत तरीके से हडप कर रहे थे । घर में किसी को लाला के बारे में पता नहीं था । वो कहाँ है, क्या कर रहा है तथा जिन्हें छोडती थी । परंतु निर्मला वो तो पत्नी थी । उसने आज पूरी रखे हैं । दो साल बीत गए । थोडे थोडे दिनों बाद टेलीफोन पर घंटी बजती है तो कोई बोलता नहीं था । निर्मला को पूरा विश्वास था कि लाल आई फोन करता है आज उसका विश्वास पूरा सच बन गया हूँ । उनके बाद लाला घर आ गया । पिताजी को जैसे लाला के घर आने की खबर लगी तो काम छोडकर फटाफट लल्ला से मिलने घर है ना रात को गले लगाया हूँ । चार वर्ष लाला कहाँ रहा कि आ गया । किसी ने कुछ नहीं पूछा । डाला ने थोडी देर आराम किया । शाम को नहाने के पश्चात संध्या चना की उसकी ताडी बडी हुई देखकर निर्मला ने कटाने को कहा मैं भारी तो मेरी पहचान हो गई । इसको कठाने को मजबूर कौन से पहचान बिना गाडी के ज्यादा सुन्दर लगते थे लाला बस मुस्करा दिया लाला के वापस आने से । निर्मला चाहे मैं लगे पिताजी भी खुश हैं । अरे तो चरण और वेल्लोर के चेहरे की मुस्कान गायब हो गए । अब लाला कर से नहीं गया पर चुकी रहता हूँ पुत्री सुकन्या पर बिहार उडेलता क्या बात है खुद को प्यार कर रहे हो पर मेरे से दूर क्यों नहीं रहा हूँ? एक दिन निर्मला ने पूछा शांतभाव में? ललित ने कहा चार साल घर से दूर रहा । कुछ पुरानी बातें याद आ रही है । कुछ चार साल की बातें याद आ रही है । पुरानी बातों को बनाने की कोशिश कर रहा हूँ । मध्य दिमाग से जाती नहीं । क्या नाराज हो मुझे । निर्मला ने पति ललित के चेहरे को हाथों में लेकर प्रेम से पूछा । ललित ने जवाब में प्यार पर जाते हुए निर्मला का चेहरा हाथों में लिया और माथा चूम लिया । निर्मला करते हो गई । उसकी खुशी का कोई ठिकाना ना रहा । वो मुझे प्रफुल्लित होकर सातवे आसमान पर विचरन कर रही थी तो झूम करना । छोटी कुदरत का करिश्मा देखिए । उमसभरी गर्मी में बादल हमारा बारिश की बूंदे करने लगे । निर्मला आंगन में आकर नाचने लगी । बारिश तेज हो गई तो पूरी भी करेंगे । उसने पाते ललित को खींचा । मंद मुस्कान के साथ ललित पे बारिश में निर्मला का साथ देने लगा । माता पिता का साथ सुकन्या भी देने लगी । निर्मला की सारी मुरादे पूरी हो रही थी । छोटे पर्दे का साथ पाकर धन्य हो गए । बारिश तेज हो गई थी । तमेश कुटिया में आया । उसने लाइट चलाई । बताने को आवाज देकर चाय बनाने को कहा । आज लगभग बाईस दिन हो गए । पानी की लौट कर नहीं आई । कुछ बताया भी नहीं कि कहाँ जा रहे हैं । जाने से पहले बस इतना कहा था कि दो तीन दिनों में वापस आ जाएंगे । कुछ परिजनों से मिलना है । कितने में रानी चाय बना कर लियाई चाहे की चुस्कियों के बीच । रमेश स्वामी जी के बारे में सोच रहा था कुटिया रमेश का तो मंजिल का मकान था जिसमें वो पत्नी रानी और तीन बच्चों के साथ रहता था । मकान की छत पर एक बरसात निर्माण छोटा सा कमरा था जहाँ स्वामी जी पिछले दो साल से रह रहे हैं । स्वामी जी रमेश के परिवार का एक अहम हिस्सा बन गए थे । बिना स्वामी जैसे पूछे कोई बडा काम नहीं होता था । रमेश का मसालों का थोक सप्लाई का काम था । दो साल पहले रमेश का व्यापार घाटे के कारण लगभग समाप्ति की कगार पर पहुंच चुका ना उधारी चुका नहीं पा रहा था । घर का खर्च चलाना मुश्किल हो गया था । बच्चों की स्कूल फीस भरने की स्थिति में नहीं । लेनदारों के लगातार पडते दबाव में एक दिन रमेश ने अपनी जीवन लीला समाप्त करने के लिए नहर के पुल से छलांग लगा दी । वहाँ से गुजारते कुछ व्यक्तियों ने आवाज लगाई है देखो कूद गया कूद गया । स्वामीजी पुल के नीचे नहर के किनारे ध्यानमुद्रा में बैठे थे । चौबीस जी ने पास रुकी हुई नाव में सवार होकर रमेश को टूटने से बचाया और नजदीक के अस्पताल में दाखिल कराया । हमेश बच गए । आपने मुझे क्यों मचाया? जीवन जीने के लिए समाप्त करने के लिए नहीं बनाया । इस पर गया तो मुझे ना क्यों नहीं चाहते । रमेश की व्यथा सुनकर स्वामी ने कहाँ का लगाया और उसे सालपुरा देते हुए का भी बस खबर आ गए । जीवन के संघर्ष से तो मैं अपने लिए नहीं बल्कि परिवार के लिए जीना है । वहाँ के बाद आदमी का जीवन उसका नहीं जाता, बहुत समर्पित हो जाता है । पत्नी और बच्चों के लिए तो मर गए तो वो चीजें जी मर जाएंगे । क्या करेंगे तो उनके भविष्य का सोचो । छोटे बच्चों को किसके सहारे छोड कर जा रहा हूँ । तो मैं जीना होगा अपने परिवार के लिए, उन को जीवित रखने के लिए । मैं लेनदारों का पैसा वापस करने की स्थिति में नहीं कैसे जीवन को जी सकूंगा । चलो मैं तुम्हारे लेनदारों से मिलता हूँ । ईश्वर पर भरोसा रखो तो एक मुझ से बस्ती है तो हम भी रहेगा । अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद स्वामी जी रमेश के साथ उसके घर पहुंचे और समस्त लेनदारों को बुलाकर कहा कि रमेश को कुछ समय थे । अभी वो पैसे चुकता करने की स्थिति में नहीं है । सभी ने कहा मकान बेचकर रकम वसूल करेंगे । तब स्वामी जी ने कहा कि एक बार रकम वसूल कर सकोगे । अगर बार बार करना चाहते हो तब मेरे बताये फॉर्मूले से चलो । चारों खाने तुम्हारे और बाहर बार प्याज कमा सकूँ और रकम बडे लेनदार चुपचाप स्वामी जी का मुंह ताकने लगे । स्वामी जी ने आगे कहना शुरू किया, अभी रमेश की आर्थिक स्थिति खराब है, उसे उभरने का मौका दिया जाएगा । आप रमेश को कुछ रकम उधार और व्यापार घर से आराम करेगा और धीरे धीरे एक साल में आप सब का भुगतान कर देगा । आप मुझे स्वामी समझते हैं तब आप मेरी स्थान पर विश्वास रखें । सिर्फ एक साल की मोहलत दीजिए । आप तो यहाँ रहेंगे नहीं और रमेश ने भुगतान नहीं किया । तब यही प्रश्न सपने एक साथ किया । स्वामी जी ने कहा था मेरी जुबान पर आपको इतना विश्वास है तो मैं तब तक रमेश के साथ ऐसे मकान में रहूंगा जब तक की आपका लोन चुकता नहीं होता तो स्वामी जी की बात पर भरोसा करके सभी कुछ और रकम रमेश को लोन पडती आपको कैसे व्यापार करेगा और लोन चुकाएगा । रमेश सोच में पड व्यापार की कमजोर कडी मैं तो मैं बताता हूँ तो आपको निजी खर्च में अधिक लगाते हूँ जिससे व्यापार की पूंजी व्यापार मैं ना लगकर निजी खर्च में लग रही है । मेरा सिर्फ इतना मंत्री की जितना लाभ हो उसका सिर्फ पच्चीस प्रतिशत घर के खर्च में उठाते । पच्चीस प्रतिशत से लोन को वापस करोंगे । बाकी का पचास प्रतिशत व्यापार में लगाओगे जिससे पूंजी पडे थे । अधिक पूंजी से अधिक व्यापार और अधिक लाभ होगा । आज तुम कर्ज के बोझ में हूँ । आने वाले दिनों में तो दूसरों को लोन दे सकते हैं । रमेश को दूसरा जीवनदान स्वामी जी ने दिया था । उसे जीने की प्रेरणा दी । रमेश स्वामी जी के लिए मूलमंत्र का पालन करता रहा । वो एक साल में तो नहीं पता तो दो साल में उसने सबका लोन चुका दिया । रमेश के साथ हमेश के लिए अंदर रिश्तेदार मित्र भी स्वामी जी के भक्त बन गए हैं । रमेश के मकान की छत पर बने छोटे से कमरे में स्वामी जी रहने लगे । इतना शांत और ध्यान में रहते थे । उनकी कोई आया नहीं । जो भी श्रद्धा से समर्पित करता फिर बच्चों की पढाई और वृद्धों के मेडिकल हेल्प में खर्च कर देते थे । दो साल के बाद जब रमेश का सहारा लोन चुकता हो गया तब एक दिन स्वामी जी रमेश को ये कहकर चले गए कि उन्हें कुछ अधूरे काम पूरे का अब यहाँ अधिक नहीं रख सकते हैं । यहां रहने का उन का कारण पूरा हो गया था । तमेश रोने लगा कि वो उन के बिना अधूरा है । स्वामी जी, नेता मेष कर समझाया कि पहुंचे बताए हिसाब से जीवन बताए । कोई समस्या आएगी तो जरूर मिल रहे हैं । साथ ही में रमेश से एक महीने बाद मिलने जरूर आएंगे । ललित अपनी पत्नी निर्मला और पुत्र सुकन्या के साथ जीवन बता रहा था । निमोनिया लाला से कुछ नहीं कि वह पिछले चार साल का हरा कैसे रहा । उसी डर था कई लाला तो बाहर आना चला जाए । लाला अभी दुकान पर काम जाता था । अधिक समय पर ध्यान में बताने लगा । दुकान जाकर खाते जरूर देखता । चरण के घोटालों से वो बाकी था परन्तु तो पता नहीं कैसे कारण उसके पिताजी ने वाला समझाना । इसलिए वो चुप रहना । पिताजी भी कुछ नहीं कहते कि कहीं दोबारा लडका घर से नाम निकल जाते हैं । तो महीने बाद उसने धर्मशाला से कहा, मैं मैं चार साल का हरा कभी पूछा नहीं । आप मेरे साथ उससे अधिक कुछ नहीं चाहिए । आपको कष्ट नहीं देना चाहती है । मैं तुमको बहुत सारी जगह दिखाना चाहता हूँ । जहाँ मैं चार साल बाद उनको अपना परिवार दिखाना चाहता हूँ । निर्मला और सुकन्या के साथ ललित लाला अपने अतीत के सफर पर निकल पडे । मैं मैं बनिया के घर पैदा हुआ । यही पाला और पडा होगा । मेरी नस नस में व्यापार बचा है । स्कूल की छुट्टियों में पिताजी दुकान ले जाते थे । वहीं से ट्रेनिंग शुरू हुई । मेरा चरण का स्वभाव अलग रहा । आम बोल चाल की भाषा में मैं सीधा जा रहा था और चरण चालू माल इसे फर्क के कारण मुझे घर छोडना पडा । मैंने कोई गलत काम नहीं किया था । खातों में कोई हेराफेरी नहीं । चरण ने खुद रख हम अपने पास रखकर इल्जाम देने पर लगा दिया । पिछले तब वो जब तुमने मुझे ऍम करना छोड दिया । यदि तुमने मुझे क्या होता तब मैं सबसे लड जाते जीवन साथी का भरोसा और साथ ही जीवन की कठिनाइयों से सूचना सिखाता है और कठिनाइयों का सामना करने की शक्ति प्रदान करता है । तुम्हारा साथ दबाकर मैं विचलित हो गया और घर छोड कर दो साल भर सकता है । पहले हरिद्वार ऋषिकेश घूमता रहा, कुछ आश्रमों में रह परन्तु चैन नहीं मिला । कुछ आगे हिमालय के तारीख पहाडी में भी गया स्थान पर पहचानी राजनीतिक रहा की प्रवेश खडा न प्रति देगी । जो साधु संत फकीर, भाईचारे, शांति का संदेश देते हैं उनको करीब से देखा । सबका नया चेहरा ही नजर आया । कुछ बताने के बदले रखा बैठते थे । अधिकतक नशे की लक्ष्य मस्त हैं । गांजा अफीम का नशा करते थे । सुंदर लडकियों को भजन मंडलियों में शामिल कर शारीरिक और मानसिक शोषण करते थे । उनके भक्त अनुयायी अनगिनत लाखों की तादाद में होते थे । नेता भी उनसे मिले हुए होते थे । चुनावों में उनसे कहते कि उनका प्रचार करें जिसके बाद में उनको रकम मुफ्त में आश्रम खोलने के लिए जमीन थे । तैयार होता, राजनीतिक पद भी दिया जाते थे । किसी ना किसी पार्टी से हर कोई जुडा हुआ है । ऍम अपने को भगवान का स्वरूप कहता करता था । उस करके नाना रूप देखा । मैं दोपहर को विश्राम करने के लिए पसंद के आश्रम के बाहर पेड के नीचे चादर बिछा कर लेता ही था की एक युवती की लगातार रोने की आवाज सुनाई दे अपने परिवार के साथ और इमारत को चुप करवा रहा था । यह भी बहुत सारी हुई । गश्त खा रही थी और चिल्ला रही थी मुझे यहाँ से ले जाओ । तभी आश्रम के कारणों ने उन को वहां से खदेडा के दोबारा नजर ना पढना जान भी जा सकते हैं । ऍम रह गया जान बचाने के लिए सभी वहां से भाग निकले । मुझे उत्सकता हुई कि आखिर सारा माजरा क्या है? उनके पीछे बजट होता गया और उनसे बातचीत के आतंकर ना दंग रह गया हूँ के नीचे से जमीन खिसक गई । परिवार वो संत का अनुयायी था और बरसों से संत बाबा के आश्रम में आ रहे थे । परिवार के पुत्र के व्यवहार के बाद पुत्र मधु पसंद बाबा का आशीर्वाद दिलवाने परिवार कहाँ आया था? वो युक्ति जो हो रही थी उस परिवार के पुत्रबधु थी और अत्यंत खूबसूरत हैं । उसको देखकर ऐसा लग रहा था कि भगवान ने उसे किसी सांसद फिलहाल कर निकाला जब युवती संतानता का आशीर्वाद लेने समीप गई । अब पापा ने उसे का कि कल सबके संतरा प्रति को छोडकर मेरे पास आओ आनी बना कर रहे हो । कितना सुन्दर युवती ढोंगी बाबा के मन में उमडे करते विचारों को भाग गई और तुरंत बिना कोई हो तब दिया मुड गईं पर बाहर अगर होने लगे क्योंकि बाबा के दुःख और चैनलों ने उसे अपने को पकडकर खींचना जहाँ पर बोलके बकर को छुडाकर भागने में सफल हो गए । ज्योति को हाथ से निकलता देख उन्होंने उस परिवार को खदेडते आप चुप रहने की सलाह दी । पढना परिणाम बुरे होने की धमकी दी । मेरा मन हो गया और उस समय मैंने सोचा कि मैं और नहीं बट होगा और घर में अपने परिवार के साथ रहूंगा । तो उस परिवार के साथ बस में बैठ गया तो परिवार अपने गंतव्य पर उतर गया । कुछ दूर बाद बस खराब हो गई । जहाँ बस खराब हुई वहाँ एक नहर दी विश्राम करने के लिए नहर के किनारे बैठ गया और ध्यानमुद्रा में अवलोकन करने लगा कि तभी रमेश आत्महत्या के लिए नहर में कूद गया । लोगों ने शोर मचाया मैं यहाँ बैठा था, वही एक नहीं होती है । मैंने वाले के साथ उस स्थान पर गया जहां रमेश कुदादा उसको बचाया बनेगा, औलाद हूँ । व्यापार में कम रुचि रही, पर सत्ता पेट समझता हूँ तो सालों के पास मैं ये सोचकर बाहर आके मैंने तुझे कष्ट दी है । प्रवेश का जीवन समार कर कुछ परिचित कर लूंगा । आज रमेश ठीक है और मैं अपने नियमों के साथ हूँ । सुबह के छह बज रहे हैं । लाला ने मोहर सुकन्या के साथ रमेश के घर पहुंचा । दरवाजे की घंटी बजाई । रमेश नींद में था । खडी देखे तो छह बज रहे थे तो चाॅइस बात उठकर दरवाजा खुला । स्वामी जी हाँ आॅफ आपका लेकर गए थे । कुछ दिनों में आ जाएंगे । तीन महीने बाद आप आए । मैं रीना को कहकर नाश्ता लग जाता हूँ । नहीं उसको मतलब मुझे बताया कि रविवार को आप सब देर से होते हैं । आज बच्चों का स्कूल भी बंद होगा । अब तो आराम करने दो । रमेश देखो मेरे परिवार से मिला हूँ । मेरी पत्नी निर्मला और पुत्री सुकन्या हाँ मुझे आपने कभी अपने परिवार के बारे में बताया ही नहीं । कहकर रमेश ने रीना को आवाज लगाई । देखो स्वामी जी आए । अपने परिवार के साथ सेना फटाफट बिस्तर से उठे और बैठक में आकर स्वामी जी को देखा । उनके चरण स्पर्श क्या बिना स्वामी जी के परिवार से मिलकर दिक्कत हो गए । उनके लिए चाय नाश्ता तैयार किया । स्वामी जी आप नाश्ता करके थोडा आराम कर लीजिए । सफर की थकान दूर हो जाएगी । रीना ने अनुरोध किया स्वामी पीना ठीक कह रही है ना तो बातों में भूल ही गया । बहुत दिनों के बाद आपसे मुलाकात हो रही है इसलिए बिहानी नहीं रहा । स्वामी के ऊपर उसी कमरे में विश्राम करने का जहाँ पिछले दो सालों तक रहे थे । निर्मला और सुकन्या ने भी आराम किया । जब आराम के बाद से बैठक में आये तब बैठक में स्वामी जी के अनुयायी एकत्रित हो गए । आंधी की तरह उनके आने की खबर फैली और सभी एकत्रित हो गए हैं । निर्मला हैरान हो गई कि जस्ट पति को बने घंटों समझती थी । वो इंसान देवता की तरह पूजा जा रहा है । स्वामी जी एक कुर्सी पर बैठ गए और सबको संबोधन करते हुए कहा आप सब मुझे इस नहीं से स्वामी जी कहते हैं । मैंने पहले भी कई बार आपसे अनुरोध किया कि मैं कोई स्वामी नहीं बल्कि आप जैसा साधारण इंसान मेरा नाम ललित हैं । घर में सब मुझे लाला बुलाते हैं । कुछ हसते हुए उन्होंने आगे का मेरी पत्नी निर्मला भी मुझे लाला कहकर बुलाती । ललित सबको अपना अभी बता रहा हूँ । सब लोग चुपचाप स्वामी जी को सुन दे रहे हैं । सब की आंखों में आंसू आ गए । यही पर होता एक अहम खास आदमी में आम आदमी सिर्फ अपने लिए जीता है और खास आदमी जैसे स्वामी जी रमेश के लीजिए । कौन लगता रमेश स्वामी जी का वो रमेश वो आत्महत्या कर के खुद की जीवन लीला समाप्त कर रहा था । उसे जीने की राह दिखा । आज रमेश खुद भी संपन्न और दूसरों की भी मदद करता है । सपने एकमत निर्णय लिया कि स्वामी जी को पूरा अधिकार है कि वे अपने परिवार के साथ हमें स्वामी जी के बताए मार्ग पर चलना चाहिए क्योंकि हमारे सारे ऋषिमुनि बृहस्पत हैं जिन्होंने गृहस्ती में रहकर तपस्या की और हमें जीने के लिए मार्ग बताया हूँ । हम अपने ऋषि मुनियों के मार्गों को भूल जाते हैं । ऐसे मौकों पर स्वामी जी जैसे इंसान जन्म लेते हैं । स्वामी जी हमें आपकी जरूरत कदम कदम पर पडेगी । मैं आपको अपना फोन नंबर दे रहा हूँ । जब चाहे फोन कर सकते हैं । मुझे अपने पास बुला सकते हैं, मेरे पास आ सकते हैं । स्वामी जी एक सप्ताह रहे हैं । लोगों का तांता लगा रहा है । निर्मला लोगों के उसके पति ललित लाला पर अटूट विश्वास को देखकर धन्य हो गए । एक सप्ताह बाद जब स्वामी जी रवाना होने लगे तो लोग फूट फूटकर रो रहे थे । हर किसी के हाथ में स्वामी जी के लिए तो पाता । रमेश ने स्वामी जी के लिए नई कार खरीदी और सब फॅमिली को उनके घर तक होगा । चौबीस जी ने कहा अपने पास रखने से मना कर दिया कि उनको इस की कोई जरूरत नहीं है परन्तु रमेश ने कार सुकन्या को बाहर में नहीं साथ ही साथ अपने व्यापार का पच्चीस प्रतिशत निर्मला और सुकन्या के नाम कर दिया क्योंकि स्वामी जी ने उसे ग्रहण करने से मना कर दिया । लोकसभा में जी से मिलने आते रहे मिले उपहार और पैसे गोस्वामीजी जरूरतमंद बच्चों की शिक्षा और बुजुर्गों के चिकित्सा में खर्च करते हैं । दुकान पर कभी कभी बैठते हैं । रमेश हर महीने स्वामी जी से मिल गया था और विचार विमर्श करता । उसने एजुकेशन और हेल्थ प्लस पर आया, जिससे स्वामी भी जरूरतमंद बच्चों की शिक्षा और बुजुर्गों के चिकित्सा का खर्चा उठाते हैं । चरण की आदतें सुधरी नहीं । ललित उसके आदतों को नजर अंदाज करता रहा लेकिन चरण ललित के विरोध कुछ बोलता नहीं था क्योंकि उसको डर था कि कहीं घर और दुकान से बाहर न कर दिया जाए होंगी । बाबा चौंकने को भगवान का स्वरूप कहते थे, जिन्होंने उस अंदर युक्त एक अपने हरम में आने की दावत दी थी । आज हवालात में बंद था । कोई सोच नहीं सकता था कि वो बाबा इसे राजनीतिक संरक्षण प्राप्त था । उसके पीछे कई राज्यों की पुलिस लगी थी । कई महिलाओं ने यौन शोषण के आरोप लगाए । पहले पुलिस ने केस दबाया परन्तु जनता के रोष के बाद क्योंकि बाबा हवालात में बंद हो गया । कल का लाला लाला आज के स्वामी जी बन गए हैं परन्तु किसी का शोषण नहीं किया । सब की मदद को तैयार रहते हैं ललित पांच तब मैं एक रास्ते के अंदर राय कर अपने ज्ञान को लोगों में भाजपा

11 स्मृति -हवेली

हवेली वही भव्य मारा । सूरज उस इमारत के पास रुक गया । सुबह के साथ बच रहे थे । सडक खाली नहीं । लोगों की भीड भाड बहुत कम थे । वही बडा सा भारी भरकम मोटा दरवाजा और उसके अंदर एक छोटा सा दरवाजा छोटा दरवाजा खुला हुआ था । सूरज उस खाते हमारा जिसपर चंदगीराम के आगे ले लिखा था, के अंदर छोटे से दरवाजे से प्रवेश हुआ । तालान के बीच में हुआ था जिसमें से एक व्यक्ति पानी निकाल रहा था । सूरज ने उस व्यक्ति से मांग कर पानी पिया । मीठा ठंडा पानी पीकर सूरज का चित प्रसन्न हो गया । वहाँ अभी भी ठंडा और मीठा जल दे रहा था । ये जानकर सूरज को प्रसन्नता हूँ । कभी के हवेली चंदगीराम का निवास होती थी । आज एक ट्रांसपोर्ट कंपनी का ऑफिसर को दाम बना हुआ था । तू रचने पानी निकालने वाले व्यक्ति से पूछा कि ट्रांसपोर्ट कंपनी का ऑफिस कितने बजे खुलता है । दस बजे कहकर व्यक्ति अपने काम में लग गया । कल जो आपने हवेली शहर के मशहूर है, हमारी चंदगीराम का निवास होती थी । आज एक मशहूर ट्रांसपोर्ट कंपनी का गोदाम बना हुआ था । उसे कल की ही बात लगती है कि यहाँ उसका बचपन बीता था । शादी हुई थी । पहले पुत्र का जान भी किसी हवेली में हुआ था । माता पिता और बहन के साथ बाहर रहता था । वो बनाकर रहते थे और आज ट्रांसपोर्ट कंपनी के मजदूर रह रहे हैं । वहाँ ऑफिस बना हुआ है । नीचे गोदाम में पेटियन बोरियाँ और इकट्ठे पडी थी । मुआयना करने के बाद सूरज हवेली से बाहर आ गया । सडक बार एक चाय की दुकान खुल गई थी तो अच्छा है की दुकान पर रखे बेंच पर बैठ गया । सुरज बीस साल बाद ऍम चाय वाले में दुकान लगाई । सूरज को बेंच पर बैठा ने पूछा आबू चाय भी हो गया । सडक से बनाता हूँ बाबू । पहले कभी देखा नहीं प्लेसियो । यहाँ प्रदेश ही समझ लो । पहले रहते थे । अब तो मुद्दा बाद आया हूँ । सूरज ने मुस्कुराते हुए कहा । कहने के बाद सूरज आस पास का मुआयना करने लगा । फॅमिली ट्रांसपोर्ट कंपनी बाॅन रोड पर बारे मकान कमर्शियल बन चुके थे । रिहाइश तो पूरी सडक पर नजर नहीं आ रही थी । सब जगह ऑॅटो खाने बन चुकी थी । सूरज को इधर उधर देखते हुए चाय वाले ने फिर पूछा कि आप खोज रहे हो? उस हवेली को देख रहा हूँ । ट्रांसपोर्ट कंपनी का ऑफिस दस बजे खुलेगा । वहीं कुछ का आप वो बस अब तो पुरानी बातें ही याद है । हमें भी कभी की जमा धमाका आज इतिहास की गर्दन में डूबी हुई है कि आज तुम फॅमिली के बारे में जानते हो चाहे बनाते हुए चाहे वाले ने कहा यहाँ बात करते हो बाबू, अपनी आँखों से हवेली का बनते हो जाते देखा है चाय वाले की बात सुनकर सूरज चौक्के की अगर चाहे वाला क्या क्या है तो उसे अच्छी तरह याद है कि बीस साल पहले जब उसने हवेली छोडी थी अब चाय वाला । यहाँ ऐसा नहीं था तो झूठ बोलेगा ऍम टाइमपास करते हैं । रहे बाबू यहाँ बताया हवेली के मालिक है चंदगीराम ऍम तो देखिए हवेली के दरवाजे के ऊपर लिखा है चंदगीराम निवास सूरज नगर दानुपर करके देखा नाम ले खाता । पर स्कूल से सुना होगा जब रहते थे हर वो सफाई होती थी । अब पासपोर्ट कंपनी के नौकर क्यों करेंगे सफाई? पहले तो मालिक होता था कि हर रोज पूरी हवेली की सफाई होती है । लगभग तीन चार घंटे लग जाते थे । सफाई पूरी नौकरों की पल्टन हवेली के अंदर रहती थी । सूरज चाहे वाले की कहानी सुन मिलेगा आप पूछे सेट के नाम से जाने जाते थे बडे भलेमानस कोई जरूरतमंद आ जाएगा तो उसकी छोली भर देते थे । आप मेरी चाय की दुकान उन्होंने चालू करवाई । कहाँ से आया था तो फूटी कौडी थी नहीं चाहिए । मैं तो से जी के नाम के हर रोज माला जगता हूँ । मैं सुबह की गाडी से आया था । भोजन के समय चलता थी कि क्या था । एक पैसा चेयर में नहीं था । मेरे घूमता घूमता यहाँ पहुंचा तो देखा की लाइन लगी । सबको अपने हाथों से भोजन करवा रहे हैं । जब मेरा नंबर आया तो मैं उन्हें लगा से पूछा तो क्या बात है? मैंने कहा कि मैं भिखारी नहीं मेहनत करके अपने पैरों पर खडा होना चाहता हूँ । बस फिर क्या रहा ट्रेड जी ने मुझे यहाँ चाय की दुकान खुलवा देते हैं तो दिन था और आज का दे रहे हैं । हर रोज कितनी बार सेठ जी के नाम की माला जप ता हूँ बता नहीं सकता । कहकर उसने सूरज को चाहे दी सूरत चाय की चुस्कियां लेते हुए हवेली की ओर देख रहा था । उसे हवेली की ओर देखते हुए चाय वाले ने फिर से हवेली खता शुरू कर दी । बाबू क्या बताया तुमको किसे जी कितने भलेमानस है । उनकी हालत एकदम उल्टी निकली । पुराने जन्मों के कर मौत उन्ही को इस जन्म में भुगतना पडता है । दो वाला दे थी एक लडका और एक लडकी है क्या? और आप देने के लिए भगवान बचाये । ऐसे हालातों से किसी को ना देसी वाला दे कहकर उसने कानों को हाथ लगाए । सूरज इतना सुनकर परेशान हो गया कि आखिर क्या कर दिया उसने और उसकी बहन नहीं है । सूरज ने उत्सकता से चाय वाले से पूछा आखिर औलादों ने क्या कर दिया? मत पूछो तो आपको मैं बता नहीं सकूंगा । अब बताओ तो सस्पेंस पत्रकों । कलेजे पर पत्थर रखकर बता रहा हूँ । जिस परमात्मा ने मुझे चाय की दुकान खुलवा दी, उसके बेटे ने हवेली बेच दी । पेटी घर से बाहर गए । ये सुनता इस चीज को खोदा था परन्तु उसने रखा की देखते हैं चाहे वाला कितनी कब सुनाता है । कम से कम सुन ले के क्या जहर यहाँ बैठे खोल रहा है । चाय वाले ने आगे कहना शुरू किया जी का लडका पूरा करता कोई काम नहीं करता । आंख बाद में खुलते थे । बदल पहले खेलते थे । सुबह से रात तक नशे में डूबा रहता था । हर किस्म के नशे की आदत थी । शराब ऍम हमें नाम भी नहीं पता तो लडकी भी कौन सी कम थी यार के साथ भाग गई । किसी काम में से जिस वर्ग सुधर गए और हवेली पे कहीं चाहे वाले की बात सुनकर सूरज के दिमाग का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गए । चाय का कप जमीन पर पटक कर को दे थोडा क्या शराबी नजर आता हूँ ऍम नियति मैं सूरज ने चाहे बारे कोसोर से दो थप्पड रसीद कर दी है चाहे वाले थप्पड खाकर सर घूम गया जाए के भट्टे पर वह गिरते गिरते बचा हूँ बाबू तो कब तोड दिया वो पता मारपीट करते हो मुझे । शराबी कबाबी कहते हैं सेठ जी को मारा हुआ क्या है? कहकर सूरज चाय वाले से गुत्थमगुत्था हो गया । एक दूसरे का कपडे फट गए । पहले तो आस पडोस वाले तमाशा देखते रहे हैं । जब लडकर तरह खेले पडे तब बडा से आए और दोनों का क्या चाय वाले ने शोर मचाकर कहाँ छोडूंगा नहीं तो पूरा ज्यादा होगा । तब क्या मैं छोड दूंगा । अच्छे फॅमिली को मार दिया । मानहानी का मुकदमा होगा, अगले ठिकाने आ जाएगी तो क्या हुआ भाई साहब बताओ तो सही दो तीन आदमियों ने सूरत से पूछा तो रचने उनको बताया कि वह सेट चंदगीराम का लडका सूरज आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण अपीली गिरवी रखकर बॅाल हो लिया था । लोन नहीं चुका पाने के कारण ऍम जहाँ आज ट्रांसपोर्ट कंपनी है थोडा सा लोन रह गया था वह चुका दिया और हवेली के ऊपर का हिस्सा आज बैंक से वापस लेना है । किसी को सूरज की बातों पर विश्वास का हुआ क्योंकि सभी उस चाहे वाले के बातें सालों से सुनते हैं । अब दस बचाये तो दुकाने खुलने शुरू हो गयी । सूरज के आने के खबर फैल चुकी थी । सभी सूरज के अंतगर्त एकत्र सूरत से बातें कर रहे हैं । सूरज ने बहन फोन किया और कपडे बदलकर बहन चला गया । ॅ पूरी करने के बाद सूरज ऍम अधिकारी के साथ अबे लिया है । हवेली के दरवाजे से सूरज ना चाहे वाले का आवाज भी की । अगर खुलते हवेली के ऊपर वाले हिस्से का कब्जा मिल रहा है चाहे गलत नहीं आया पर आसपास के दुकानदार जरूर आ गए । सोचने हवेली के ऊपर बने कमरे का कब्जा लेकर अपने ताले लगाए । सूरज कब्जा लेने के बाद चाय वाले की दुकान पर बैठ गया और एक सोर की आवाज लगाई । ॅ मैं सूरज पहचाना व्यक्ति आवाज सुनकर हो गया हूँ और सूरज दो सालों बाद मिल रहे हो । कैसे हो चल लगी कैसा है तो भी ठीक गया । थोडा बीमार चल रहे हैं । कैसे आना हुआ? सूरज ने बताया कि हवेली के ऊपर वाले हिस्से का कब्जा ले लिया है । ये काम बहुत अच्छा किया । चाचा सब वक्त करवाता है । हम तो उसके हो उनके गुलाम है । सच कहती हूँ बैठा हूँ कहकर बुजुर्ग व्यक्ति चला गया । सूरज ने कडक चाय पी और वापस चला गया । उस दिन के बाद चाय वाले की हवेली कथा पुराण समाप्त हो गए हूँ हूँ ।

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