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Transcript

Part 1

आप संग्रह है तो वो किताब का नाम है । समय सारा कॅश लिखा है । मनु शर्मा रहे और आवाज नहीं है आपके ऍम यू तो गंगा राम का नवजात शिशु मर गया पर पियरी नहीं उसे बचाने के लिए कुछ भी उठा नहीं रखा था । वो कई आठ अस्पताल में जाती रही हूँ और जब हमारे गया तो कुमारी से गाने लंका फूट फूटकर रो रीडिंग । उसी अश्रुधारा में पियारी का पुराना इतिहास भी पहले गया । अब कुमारी के लिए एक नई पी आई थी, नए संदर्भ में नहीं । जगह पर और नए पडोस में पहले तो माँ के कोठी चले जाने के बाद फॅारेन भर वहाँ रहे जाती है । रात को सोने भर को आती थी, पर सहयोग ऐसा हुआ कि शाम के धुन लगे में गंगा राम के स्त्री फिसल कर गिर गई । उसे चोट तो अधिक नहीं लगी, पर अम्बा हड्डी चोट मुसब्बर लगाने के बहाने जो वहाँ रुकी कि रात में भी रहने का उसके लिए एक बार खुल गया । बिहारी के लिए एक से दो घर हो गए । उधर सोमारू भी बनावटी जी के केस में जेल में डाल दिया गया । अब भी आ रही है । पहले की अपेक्षा अधिक पसर और पदक सकती थी । तो मैं वहाँ से संतुष्ट थी क्योंकि वह उससे पेंट छुडवाना चाहती थी । इतना सात महीने के बाद भी बीआरई उनके मन में चिपक नहीं पाई थी । फिर भी दुनिया यही जानती थी कि पीआर ही हमारे यहाँ ही रहती है । उसे खोजने वाले लोग भी मेरे यहाँ ही आते थे । तब वह बगल से बुला ली जाती थी क्योंकि रामनाथ के घर में बाहर ही लोगों के कहीं बैठने की जगह नहीं थी । मेरे नीचे का दालान उन्हें अधिक उपयुक्त पडता था । रामनाथ आजकल एक दैनिक में पेश का कम देखता था । गंगा राम भी वहीं काम तोजिंग सीखता था । उसी से मुझे देश विदेश की खबरें मालूम हो जाती थी । मेरी सामाजिक जागरूकता को इससे बडी तृप्ति मिलती थी । दिसंबर का महीना था । सांझ बहुत जल्दी अपना चल समेट लेती थी । पांच बजते बजते पीपा सरकारी पत्तियों में तेल भरने आ जाता था । आज दुकान के सामने की लालटेन पर सी लगाते हैं । पीपा चलाया । अरे साहब जी आपने कुछ सुना उसकी आवाज में ऐसा हो तो हाल था कि सौदा बेचते बेचते तो मेरे चाचा एकदम छोटा गया । उसकी खान खडे हुए । बोलता ने बताया जापान में हमला कर दिया । उधर से जर्मनी चढता चला रहे हैं । अब अंग्रेज ॅ वहाँ करें । मुझे तो लगा कि तुम कोई विशेष खबर लाए हो । खरे लडाई में हमें क्या लेना देना है? चाचा बोला और अपने ग्राहक को सौदा देने में पूर्वोत्तर लग गया । क्यों नहीं लेना देना है? उसने लैंप चलाकर सीढी कंधे पर रखते हुए कहा हूँ देखना हर चीज का बंदा आसमान होने लगेगा और विदेशी चीजें तो मिलेंगे नहीं । गांधीजी ने पहले ही विदेशी समानों का इस्तेमाल बंद करने का काम दे दिया है । ये आवाज दुकान पर बैठे और बीडी पीते हुए रमजान की थी । अरे विदेशी सामानों का इस्तेमाल अगर बंद कर दोगे तो मिट्टी का तेल कैसे चलाओगे? टीपा बोला तो अब समझा है सारी महंगाई मैच तुम्हारे तेल के लिए ये होगी । चाचा बोला और उसकी हसीम है । अपनी हंसी भी मिलाई । मेरे तेल के लिए नहीं बल्कि देश के तेल के लिए है । पी पानी कहा ऑर्डर आया है कि लालटेन की रोशनी मध्यम रखी जाए तो तब तो तुम काफी तेल बचा हो गए । ऍम नहीं भाई ऍम जितना तेल मिलता था, अब उसका आधा ही मिलेगा । अब तक रामकिशन भी आ गया था तो मैं सरकारी बिजली के बल्बों पर काला चोंगा भी पहनाया जाएगा । उसने कहा और ये भी बताया कि यह सब हवाई हमले से बचाव के लिए किया जा रहा है । रात में यदि दुश्मन के हवाई जहाज आए तो मैं धोखा खा जाएं । उन्हें बस्ती और उजाडता भाई हूँ । फिर रामकिशन ने हवाई हमले और अंग्रेजों की स्थिति की सिस्टर चर्चा की । रूस के ग्राहक भी दुकान पर आते गए बातों का सिलसिला जाॅब भारत को आजाद करने के शिवम अब अंग्रेजों के पास कोई ध्यान में चारा नहीं है । हम जान बोला ॅ तो ऐसी ही है । रामकिशन ने कहा ऍम सोने की चिडिया को ऐसे ही छोडने वाले नहीं है । इसके लिए तो हमें कुछ करना ही पडेगा । फिर उसने बताया कि हमारे मीटिंग हो रही हो सकता है आंदोलन और देख हो जायेगा । बडा आदमी इन करके करेंगे क्या? आप को तो करना वही होगा जो गांधीजी कहेंगे । फॅमिली नेता साफ गए दिया है कि हम नाजीवादी शासन और ब्रिटानी शासन में फर्क नहीं करता हूँ और फिर बिना देशवासियों की राय लिये भारत को यह मैच रोकने के वॅाक खिलाफ है । जहाँ केशन बोला माहौल अंग्रेज के प्रति घृणा से काफी बहुत दिन हो गया था । दुकान का वातावरण कितना गंभीर लगा कि जैसे अभी ही कुछ होने जा रहा है । मैंने गली के मोड पर देखा । गंगा राम इशारे से मुझे बुला रहा था । वो तो तुम को चुना । वह बोला मेरे मन में जापानी आक्रमण से उसके प्रश्न का संबंध जोडना आरंभ किया । किंतु उसने स्वयं बताया आज लाल को आखिर जेल जाना ही पडा हूँ । मेरा आश्चर्य प्रसन्नता नहीं डूबता गया तो बोलता रहा है । आज काशी समाचार कम । मुख्य समाचार यही है । लाला ने मजिस्ट्रेट के सामने आत्मसमर्पण किया और उस की ओर से जमानत की अर्जी दी गई है । फॅमिली इसका विरोध किया । वैसे चलती रही कि कोर्ट उठ गए । लाला को लाचार होकर जेल जाना पडा डाल इसके वकील ने विरोध किया । मुझे आशा था देखो साहब और नेवले की लडाई का अंत कहाँ होता है । मैं बोला मुझे क्या नहीं था । नहीं तो मैं पूछता हूँ कि पुलिस केस में डाल । इसको विरोध करने का क्या हक है? वास्तव में मैं कार्रवाई से बिल्कुल अनभिज्ञ था । असलियत यह थी कि पुलिस केस के अतिरिक्त डाल इसने लाला पर पांच मुकदमे और दायर किए थे । उसके वकील का कहना है कि मामले बडे संगीन हैं और लाला पैसे वाला बासवराज नहीं है । यदि उसे जमानत पर रिहा किया गया तो वे गवाहों को फोन लेगा । इतना सुनते ही मैं गंगा राम को छोडकर एकदम मोटे चला और था । लडाता हुआ समय चाचा के घर के भीतर पहुंचा हूँ । उस की दुकान पर बहस अभी चल रही थी और चल तो कान लगाए सुन रही थी तो अरे तो मैं कुछ कभी सुनी । मैंने प्रशन्नता में उनके दोनों कंधे पकडकर झकझोर दिया । उसने मुझे एकदम झटक दिया और चारों ओर शंकित नेत्रों से देखा । फिर बोली तो फॅमिली लेते तो तो क्या होता? जंबो की परिस्थिति की गंभीरता को नकारते हुए मैंने उसे समाचार से अवगत कराया । उसकी कल्पना में भी नहीं था वो की लाला कभी जेल जा सकता है । उसके चेहरे पर प्रसन्नता का सन्नाटा घर नहीं लगा हूँ । इसके आगे कुछ और बातें हुई ऍम इसकी आवाज है । वो मेरे आश्चर्य का बाहर आ एकदम चढ गया तब कि उन दिनों चलने वाला एक प्रकार का लाॅक उसकी रोशनी में उसकी मुस्कुराहट में विजय का उन्माद दिखाई दिया । हम तो भी उसे देखती रह गई । आपको खबर तो मिलेगा । योगी धानी बोला पूरा माहौल प्रश्न वाजी हो गया वो लगता है आपको करने आज का एक बार नहीं पडा । तब उसने लाला के जेल जाने की खबर और उस संदर्भ में अपने करतब का विस्तार से वर्णन किया । कुछ रुककर उसने रामकिशुन से कहा मुझे आपसे कुछ बाते करनी है और उसे लेकर ऍम के नीचे चला गया । मेरे मन में आ रहा था कि मैं दाने से जाकर लिपट जाऊँ और उसे इस विजयी पर बधाई । दो बसों में जा जा । उम्र थी धारा के बीच एक बडे शिलाखंड की तरह था । मैं डांस की वहां से हटने की प्रतीक्षा करने लगा । वो जो हीरो रामकृष्ण के साथ मेरे घर की ओर चला । तीसरा इसके पीछे छोटा और खेलने कटाकर बोला यहाँ तो मैं कमाल कर दिया वो पर उसकी प्रसन्न मुद्रा में अंतर नहीं आया । मेरी बधाई सागर में एक नदी की तरह हो, कहीं जाना है । अब मेरे द्वार पर आ चुका था ही नहीं, खराब आती होंगी । अभी समय हो गया । मैंने कहा कि तू घर में दिया तो चल रहा है । हाँ बिहारी होगी दो उसी को बुलाओ । मुझे उसी से बातें करनी है और नीचे के दालान में ही हम चारों की बैठक चल गई । बात का मुख्य विषय लाला की गिरफ्तारी था । दानिश का कहना है कि पुलिस लाला की जमानत का विरोध नहीं कर रही है तो मेरे वकील ने जी तोड बहस कि मजिस्ट्रेट आज इतनी दुविधा में पडा कि वह कोई निर्णय दे ही नहीं पाया तो अभी उसकी जमानत की अर्जी खारिज नहीं हुई । धाम केशवन बोला नए लोगों के चेहरे पर छाई कोई हम मुरझाने लगी पर दानिस के उत्साह में कोई कमी नहीं । इसका मतलब है कि कल उसकी जमानत मंजूर भी हो सकती है तो राम किशन ने का हो सकता है । दानिश ने कहा तो जरूर पर शीघ्र ही उसके उत्साह ने एक तूफान और लिया वो बार होगा । कहते हैं तो वाले को जेल के रोटी खिला करीब हम लूंगा । जब पुलिस विरोध नहीं कर रही है तब तुम क्या कर सकते हो? रामकिशन बोला और सर पर हाथ रखकर कुछ सोचने लगा हूँ । देखना याला के आज में लगे होंगे । ॅ को भी किसी न किसी तरह मिला लेंगे । पर ऐसा होगा नहीं । क्यों नहीं हो सकता पैसे से क्या नहीं हो सकता । रामकिशुन के इसका धन से डाल इसको हल्का सा धक्का लगा ऍम किन्तु शीघ्र ही बच्चों के खेल के मतवाले की तरह मैं धक्का खाकर भी जो उनका हूँ, पहले की तरह वो बैठा हूँ । मैं फिर से मिल चुका हूँ । उस ने कहा है कि जस्टिस होगी अब मजिस्ट्रेट का क्या मजाल है कि कलेक्टर की इच्छा के बडे हो जाए । पार्टी ऍम अल और दाल इसके बीच हो रही थी । मैं और प्यारी तो मुख्य होता थे और दान इसके व्यक्तित्व उस अन्नी सी चिंगारी पर चकित थे जो लाला के जंगल को भाषण करने के लिए बाहर ही हो चुकी थी । क्या हिम्मत ही उसमें इसके सामने कोई खडा नहीं हो सकता था? हाँ, हम तो काम जिसकी बुद्धि में हैं, उसी लाला के खिलाफ उसने पांच ऍसे दाखिल किए थे और उसका विश्वास था कि अगर न्याय हुआ तो लाला जरूर जेल की हवा खायेगा । वो दिन तो यही अगर मैं बिंदु था जिसका वहाँ विश्वास थोडा कहाँ छोटा था । पिछले कुछ करना चाहिए । उसने सोचा और उसके वकील ने भी राय दी । मजिस्ट्रेट के सामने यदि प्रदर्शन करा सको तो अच्छा हूँ किस तरह का प्रदर्शन? रामकिशन ने पूछा हो सकता है कि प्रदर्शन से मजिस्ट्रेट और चढ जाएँ तो अरे हम मजिस्ट्रेट के खिलाफ प्रदर्शन करने को कहाँ कहते हैं? हमें तो न्याय के लिए प्रदर्शन करना है । दानिश बोला फिर अपनी योजना को उसने विस्तार से बताया कि ज्यादा नहीं बीस तीस आदमियों को कल सुबह दस बजे के करीब हकीम के अन्य के पहले ही अदालत के सामने इकट्ठा हो जाना चाहिए । हमने आये चाहते हैं या शांतिपूर्वक नारा लगाना चाहिए और जोर देकर कहना चाहिए कि इन सफेद पोश मुल्जिमों पर कोई रियायत ना की जाए । सारी बातें सुन लेने के बाद रामकिशन एकदम गंभीर हो गया हूँ । ऍम यहाँ के मरीज के सामने धोने का पहाड खडा करने से ग्याल हब आश्चर्य हैं कि तुम्हारे वकील ने भी यही राय दी है । मैं बोला उसे तो कानूनी लडाई लडनी चाहिए थी ऍम पर क्यों कराया? बात ये है कि जापान के युद्ध में कूद पडने से अंग्रेज काफी परेशान हो गए हैं । मैं किसी भी वजह से हिन्दुस्तानियों को नाराज करना नहीं चाहते हैं । धान इसने बताया हूँ । हमारे वकील का कहना है कि इस प्रदर्शन से मजिस्ट्रेट पर नैतिक दबाव बढेगा कि यदि मुजरिम को जमानत पर रिहा किया जाता है तो जनता नाराज हो जाएगी । यो ही गांधी जी ने भारत को युद्ध में झोंकने का विरोध कारण अंग्रेजों के खिलाफ पलीते में आग लगा दी है । बस होने वाले की दे रहे बात को समझ में आई रामके शून्य बिहारी की ओर देखा जैसे पूछ रहा हूँ कि तुम्हारी राय क्या है? हमें ऐतराज नहीं है पर हमे ला अलग का नाम नहीं लेना चाहिए । टिहरी बोली ऐसा लगा कि वह नरपिशाच की कुटिल चालों से काफी डरी हुई है । वो नाम लेने की जरूरत क्या है? यानी बहुत कह रही थी कि हमें मौन प्रदर्शन करना चाहिए । तो क्या तुम रानी बहु के यहाँ भी गए थे? जैकिट होते हुए हैं । बिहारी बोली उसके विस्फारित हुए और इस तरह डालने से चिपक गए गोयात है किसी लंगडे को पहाड की चोटी पर देख रही हूँ । आ गया था इसमें ऍम क्योंकि मैं तो रानी बहु की नजरों में एक गिरा हुआ आदमी हूँ । दानिश थोडे आदेश में आया उसकी आवाज तेज हुई हूँ । मैं उन्हें बताने गया था कि जिस आधुनिक के कुचक्र ने मुझे गिरा हुआ आदमी साबित करने में कुछ भी नहीं उठा रखा था, वो आदमी खुद कितना गिरा हुआ है । इससे वह खूब अच्छी तरह जानते हैं । अचानक छोटी है आवाज मेरी माँ के थे, जो अभी अभी कोठी से आई थी और तन तन आती हुई बगल से निकल कर सीढियाँ चढने लगी थी ना तो उन्होंने किसी के अभिवादन का ठीक जवाब भी दिया और न किसी की और वो खाते हुई उनके व्यवहार से साफ जाहिर ता हूँ कि यह सब उन्हें पसंद नहीं दान इसकी आवाज धीमी पडी । मैं वहाँ के रुख को पहले से पहचानता था फिर भी उमडती धारा किसी बडे चट्टान के पडने से बहाना थोडे ही बंद कर देती है । भले ही रास्ता बदल दें । डांस की बातों ने रास्ता बदल दिया । अब उसने रानी बहुत से हुई बातों का ब्यौरा दिया । उसने कहा कि जाला के काले कारनामे मैंने बतायें और कहा कि एक समाजसेविका के नाते आपका भी कुछ करता है और आप सोचे ऐसे लोगों को जब तक सजा नहीं मिलेगी दब तक समाज का कोड कैसे दूर होगा । तब रानी बहु ने क्या कहा? बिहारी बोली पहले तो उन्होंने बडा आगा पीछा सोचा हूँ प्रदर्शन का नेतृत्व करने के लिए तैयार हुई हूँ । इन तो उन्होंने कहा हमें अपनी गरिमा और शालीनता का ध्यान रखना चाहिए । हम लोग अदालत के सामने नारे नहीं लगाएंगे बल्कि एक संगती में खडे हो जायेंगे । हमारे हाथों में तख्तियां रहेंगी जिन पर लिखा रहेगा कि हम न्याय चाहते हैं । बच्चों और मेरी अबलाओं की जिंदगी है । खिलवाड करने वाले को दंड दो आदि हो । अब हम लोगों का ध्यान बनियान के उन टूटे दबती के डब्बों की ओर गया जिन्हें दानिस बगल में दबाया था और बातों के दरमियान जमीन पर रख दिया था । इसलिए इन डाॅन ने मुस्कुराते हुए पूछा और क्या उसकी बात ही खेल गई? इन्हें छोटे सरकार की होजरी से ही इकट्ठा किया है । जाकर बोला रानी बहु ने भेजा ऍम तो दे दीजिए है किसकी मजाल थी जो ना देता हूँ क्या? छोटे सरकार वहाँ थे, उस साले हो जाउँगा । मतलब कटियानी देखकर वह नहीं कर रहा होगा या किसी अफसर को मक्खन लगा रहा होगा? बितना कहते कहते उसकी मुद्रा बाॅर चबाते हुए बोला वो कमीने हम गरीबों की मेहनत पर रंगरेलियां करते होने दो । स्वराज सालों को मुझे खाडका यदि शंकर पर गंगा ना काम आया ना तो मेरा नाम नहीं गजब के आदमी हो भाई । रामकेश उनके मुंह से निकल पडा । तुम्हारी हिम्मत की मिसाल नहीं चौरासी प्रशंसा पाते । ॅ और खुला क्या समझते हो? मैं तो अखबार के दफ्तर में भी गया था । वो संपादक से मिलावट मैंने साफ साफ कह दिया था कि सच्चाई को जनता के सामने लाना का धर्म है तो यकीन है कि आप लाला के मामले में अपने कर्तव्य का पालन अवश्य करेंगे । फिर क्या बोले संपादक मुलगांवकर उस कराने लगे और गोले आप विश्वास रखिए । ऐसा ही होगा प्लान । इसने कहा और पूछा आज शाम का अखबार आपने नहीं देखा । बडे विस्तार से खबर छपी है । इसके बाद बहुत देर नहीं रोका वो उसने कल की तैयारी करनी नहीं । कल सुबह आठ बजे तक जे बी मैं आता । स्कूल के फाटक पर पहुंचने का निमंत्रण देकर वो चला गया । फिर भी उसकी चर्चा चलती रहे हैं । सच मुझे हमारी जानकारी में ऐसा संघर्षशील व्यक्तित्व नहीं था । चट्टान की तरह अपने सिद्धांत पर अधिक विषम परिस्थितियों की लहरें आती हैं और अपना सिर फोडकर जॉब चाहती हैं । फॅमिली क्या उसका व्यक्तित्व मेरे सामने बादल की तरह पर करने लगा था । उस ॅ जिससे लाला तथा उसके गुंडों ने निचोड डालने की कोशिश में कुछ भी उठा नहीं रखा था, उससे पदनाम किया गया, फसाया गया पडता ऍम था । उसने अकेले ही उसकी बखियां उधेड दी । उसके बाद का भांडाफोड कर दे दिया । एक और लाला के दल का बाल और दूसरी ओर अकेला डाले एक और भाडे के टट्टुओं का गिरोह और दूसरी ओर महज एक जल्दी घोडा दूसरे दिन में सुबह से ही परेशान था । माँ से पूछो तो कैसे पूछूँ? मैंने बिहारी से कहा भी दिल्ली के गले में घंटी बांधने के लिए तैयार नहीं नहीं जाना चाहते हैं । जब माँ कोठी जाने लगीं । मैं उनके सामने खडा हो गया हूँ । क्या बात है उनकी आंखों से एक बाहर चिनगारी, फोर्टी और फिर बोझ नहीं तो उन्होंने मुझे बडे गौर से देखा था । मैं कुछ बोलने की स्थिति में नहीं था । उन्होंने सब कुछ समझ लिया और एक्शन तक मौन खडी नहीं लगा । जैसे वह परिस्थिति से समझौता कर रही हूँ । तुम जाना चाहते हैं फॅमिली के साथ चले जाना । फिर वह सीढियाँ करने लगी । अचानक रखते हुए उन्होंने मुझे पुकारा । देखो बहुत इधर उधर मत करना । रानी बहु के पास ही रहना, बस्ता लेकर जाना और काम खत्म होते ही स्कूल चले जाना । चलते चलते उन्होंने संदूक में रखे ऐसे मौके खेली है । पुराने खण्डार के कुर्ते और पहचान में कभी निकालने का संकेत क्या ऍम खेलो था? मुझे लगा माँ स्वयं यूनिफॉर्म पहनाकर मुझे विदा कर रहे हैं । जब हम लोग कह रही मैं पहुंचे तो हमारे साथ मुश्किल से साठ सत्तर आदमी रहे होंगे । ये भी कितनी कठिनाई से जुटाए गए थे, इसे तो ढाणी से बता सकता है, पर का चाहे डी के भीतर पहुंचते ही वह लोग वहाँ के लोगों का हुजूम हमारे साथ हो गया । इनमें अधिकांश टाॅपर कचेहरी के भीतर पहुंचने ही वहाँ के लोगों का एक हूँ हमारे साथ हो गया । इनमें अधिकांश तामाशा भी नहीं थे । पूरी कचहरी में कच्छ सनसनाहट ही फैल गई । कोई शोर नहीं, कोई नारेबाजी नहीं, आपसी बातचीत की नहीं जो आप मौन दो दो की पंक्ति में लोग बडे चले जा रहे थे । आगे आगे रानी, बहु तथा पीआरआई और उनके बीच में मैं मेरे हाथ में बांस की खपाती में लगी तख्ती जिस पर लिखा था हमें न्याय चाहिए । मेरे पीछे भी लोगों के हाथों में कई तख्तियां थीं जिन पर भिन्न भिन्न वहाँ के लिखेंगे तो उसके पहले शायद ही कचहरी में ऐसा मोहन हंगामा गुजरा हूँ । हर व्यक्ति के लिए यह जी था, विलक्षण था ऍफ का काम महज जुलूस को भीड से अलग करना था । वो आदमियों के जंगल में गुजरती आदमियों की दो शांत लकीरें आगे बढती चली जा रहे नहीं मजिस्ट्रेट के कमरे के सामने आकर हम लोग चुपचाप खडे हो गए हो किंतु भीड का सब वो तब तक हमारे ॅ, अचानक पीछे से आवाज, छोटे ऍम इन्कलाब और फिर गूंज उठा जिंदाबाद हो रहिये, चुप रहिए हमें एक भी नारा नहीं लगाना है । दानेश चलाया और भाग दौड करके भीड का मुख्य उधर दबाया हूँ । ये नारा इतना तेज था कि गोरा मजिस्ट्रेट एकदम अदालत से बाहर आ गया । मैं चाहता तो पुलिस को आर्डर देकर भीड को तितर बितर करा सकता था । पर उसने ऐसा नहीं किया । तो सब क्या चाहता है साहब भी रॉक में वो मुझे लेते हुए घर जाओ वैसे ही शांत भाव से रानी बहु ने उत्तर दिया हम चाहते हैं हमारी तख्तियों पर लिखा है डाॅन जाने में हो गए स्कूल के लिए हमें शमा कीजिए । बेरानी बहु ने हाँ जोडते हुए अपना सिर झुका दिया । एक अजीब खामोशी उभर आई । जानी बहु के मध्यम से संपूर्ण भीड नया बना हो गई यानी बहुत बोलती रहीं हूँ । हमारा कार्यक्रम कोई भी नारा लगाना नहीं था और न तो हम आपको डिस्टर्ब करना चाहते हैं । अनजान में हमने से किसी के मुझसे इन्कलाब निकल आया । हम उसके लिए फिर से माफी मांगते हैं । हमने देखा हूँ जानी बहु ने बडी होशियारी से उस भीड को अपना ही अंग बना लिया । अच्छा काम आप चुपचाप बैठ चाहिए । मजिस्ट्रेट बोला और सब वहीं जमीन पर बैठ गए । कुछ लोग किनारे किनारों पर भी खडे थे । तब तक शांति ढंग की आशंका से पुलिस की एक टुकडी भी वहां पहुंच गई और सुरक्षा की दृष्टि से पोजीशन लेकर खडी हो गई ऍम बडे गौर से तख्तियों पर लिखे वाकी पडता रहा हूँ और एक स्थान पर आकर फॅसा गया । इसका क्या मतलब है? वो बोला उसने एक विशेष व्यक्ति की ओर संकेत क्या वो साहब गाल आठ तारीख को सजा देने में कानून की बक्कड कहीं ढीली ना पड जाए । इतना लम्बा बाकी पढ सकती छोटी सी अक्सर अपनी हैसियत है । छोटे और बात अपनी है जैसे बडे मजिस्ट्रेट का समझना पाना संभावित था । उसने फिर पूछा क्या मतलब का आपको नहीं पडने की कृपा करें । बात खुद अपना मतलब बता देंगे । यानी बहुत है । मुस्कुराते हुए निवेदन किया उसने एक बार फिर रानी बहु को देखा मानो उसकी अफसरी धंधा करना चाहती हो । पर रानी बहु के शांत भाव के समक्ष पे चुकी रह गया । उसने शेयर खुजलाते हुए उस वाक्य को पूना पढा और बोला वो समझा हूँ उसके संदर्भ के जाल में व्यस्तता समझ की मछली फंस चुकी थी । आप यकीन करेगा कानून का पाक अड कभी ढीला नहीं होता । कानून थोडा है । इस की निगाह में हर एक बराबर है और आप परेशान ना हो, अपने घर जाओ । अंग्रेजी गोचारण में उसकी हिंदी बडी अच्छी लगी । मजिस्ट्रेट अब अदालत की ओर घूमा और बुदबुदाता हुआ आगे बढा ही पार्ट है लोग कैसे समझता है कि हमारा यहाँ जस्टिस नहीं होगा । बेटी हुई भी उठते ही विसर्जित होने लगी । फॅसने सबके हाथों से तख्तियां इकट्ठी कर ली और मुझे बुलाकर बोला वो वहाँ से एक पर ऍम घर लेकर जाऊँ शाम तक मैं आकर है ले लूंगा पर मैं तो उसको जाऊंगा । मैंने बस था दिखाया यदि एक दिन नहीं जाओगे तो क्या होगा? महान बिगडेगी दानिश कुछ बन बनाया । फिर उसने सारी तख्तियां बिहारी को सौंप दी और बोला और अदालत में चला गया । मैं रानी बहु के साथ पीछे पी आ रही थी । कुछ सकती है उसके हाथ में थी और कुछ रामकृष्णन के हाथ में वो वो लोग बडे कुतूहल है उन्हें देख रहे थे । एक कॉन्स्टेबल ने तीखी दृष्टि बिहारी पर डाली अरे वही पि ऍफ अब चिनाब नहीं हूँ, सुराजी होगा इलोना दूसरा बोला वो युवा खाए के पिलाई बगैरह तेल दोनों हंस पडे, निश्चित ही है कोई और नहीं पी आ रही का अधिक ही उस पर खिलखिला रहा था । तो ये पहला अवसर था जब रानी बहो खुलकर राजनीति में आई थी । शायद पहली बार लोगों ने मोटर छोडकर उन्हें एक के ऊपर चढते देखा था । इस की गंभीर प्रतिक्रिया हुई । जहाँ बनारस की जनता ने राजनीति के सिटिज पर एक नए नश्रत्र का दर्शन किया वहीं खुद उनकी प्रतिष्ठा का सिंधु आलोकित था । उठा था छोटे सरकार ने तो आसमान सिर पर उठा लिया था वो मैंने सुना कि उस दिन की घटना पर उसने रानी बहु को बहुत कुछ बुरा भला कहा था । पर रानी बहु का शिव साहब व्यक्तित्व सारा गाल पे क्या? दिन तू मैं झुकने की स्थिति में नहीं था । जमानी संदर्भ में उन्हें छेडा भी बडे शांत भाव से उबल पडी । जब सिर्फ दर्शाया भगवान नहीं खेली तब जी जी इस संसार में मेरा रही किया गया है । कभी मेरी वजह से लोगों की इज्जत पर बट्टा लगता है । तब क्यों नहीं मैं कोठी कोई छोड दो । महम में ये साहस नहीं था कि वह पूछे कि आखिर आप छोडकर कहाँ जायेंगे? फिर भी रानी बहुत शांत भाव से व्यक्ति नहीं क्यों नहीं मैं अनाथालय में चली जाऊं । आखिर इतनी अनाज स्त्रियाँ बाहर ही रह गए । बच्चे मैं तो मर्यादित की है । उन्हें तो इस कोठी की छाया मिलनी चाहिए और यदि नहीं नहीं मिलेगी तो भाग्य में जो लिखा होगा होगा । मैं बता रही थी की रानी बहुत को इतनी विद्रोही मना स्थिति में मैंने कभी नहीं देखा था । वो एकदम कागार पर थीं । जरा सा पैर आगे बढा थी । उन्होंने स्वयं को राष्ट्रीय भावधारा में समर्पित किया । जहाँ से लौटना फिर असम दाद होता हूँ । उनकी इस मानसिक स्थिति से पूरी कोटी ठहराव थी थी । उसी थरथराहट ने उनकी आवाज ही नहीं थी । अब वह मौन हो गए । नहीं छोटे सरकार अपनी जिंदगी जी रहे थे । बढानी बहु अपनी युवरानी बहू और छोटे सरकार ने दूरी पहले से ही थी बराबर उसका फैसला बहुत बढ गया था । कोठी का वातावरण पहले से बहुत भोजन हो गया था । छोटे सरकार की सारी फिर अगले बता सिमट गई थी । अब उनकी आईआईसी कोठी की थोडी नहीं लांघ नहीं अब उसके दिलफेंक दोस्तों की मैं मिलें बगीचे में ही जमती थी । अब रानी बहु भी लोगों से बहुत कम बोलती थी तो माँ के सामने वो अपने मन का हर राष्ट्र खोल देती थी । उस दिन कचहरी से लौटते समय मैं अपने स्कूल के सामने उनके से उतर गया था । उन्होंने पूछा ताॅबे बेटा उसको जाऊंगा । मैंने अपना बचता दिखाकर कहा पर तो बडी देर हो गयी है । फॅमिली के मास्टर तीर होने पर बहुत ऍम लूंगा । मैंने से नहीं चाहिए हाँ वही कहा मेरी ये बहुत उन्हें प्रभावित कर गई थी । मन का शिक्षा भी बडा अजीब होता है । कभी कभी मैं भावुकता की मामूली कंकडी से भी हो जाता है और कभी कभी गंभीर विचारों के हथौडे भी बेकार साबित होते हैं । शायद इसीलिए एक दिन बातों के सिलसिले में उन्होंने माँ से कहा जी तुम्हारा जब भी बडा होना लडका है भगवान उसकी रक्षा करें । फिर पता नहीं क्या है सोचते हुए चुप हो गयी वो लगाके हजारों अपाहिज लडकें उनकी आंखों के सामने कहने लगे क्षण भर में है उन की मुद्रा बोली उसके दिल में एक चिंगारी है जी जी जो निश्चित ही एक ना एक दिन जरूर आप बन जाएगी । आग से हमें क्या लेना देना हम तो गरीब लोग हैं, तमिल रोटी चाहिए हम आजादी लेकर क्या करेंगे माँ के विचार से ये आजादी का नारा उनके लिए ये है जिनका पेट भरा है गरीब को तो फिकर है पहले अपने बेटे की माँ की बात है और समय रानी बहु हंस पडी थी तो ऐसा बचती है की आजादी की लडाई और रोटी की लडाई अलग अलग है । पहले बदली आजादी के बाद रोटी की समस्या आपसे आप फल हो जाएगी । आजाद हिंदुस्तान में मैं कोई भूखा रहेगा और न लहंगा । फिर जब तू ऐसे बच्चों का भविष्य ही तो इस देश का भविष्य हैं । हमारे हमारे लिए क्या ऍम जाने हमारी जिंदगी में आजादी मिले या ना मिले पर ये बच्चे तो उसका फल भोगेंगे । आज सोचता हूँ तो लगता है की रानी बहुत जितने भी हम नहीं थी यदि वे आज होती तो मरीचिका के पीछे दौडने वाली उन हरिनी से लिपट घर में पूछता हूँ की क्या बात है की आजादी की लडाई जीतने के बाद भी भ्रम रोटी की लडाई हार गए पर मैं तो उस समय की बात कर रहा हूँ । था तो रानी बहु ने मुझे बुलाया था । बडे प्रेम से बोला हूँ पर कोठी में नहीं अनाथालय में और कहा हूँ किसी दिन शाम को उसे अनाथालय में भेज देना ऍम जाती हूँ गिन तू हमको तो यहाँ से छुटकारा नहीं मिल सकता हूँ । पर मैंने तो मैं तो बुलाया नहीं है । हसी किया हूँ क्योंकि तो तो मैं रोटी की लडाई लडना जानती हूँ । इस बाहर रानी बहू और जोर से हंसी महामुने देखती नहीं गई । शायद मैं उस हसी को समझ नहीं पाई । उन्होंने मैच इतना समझा की जान को काफी समझदार है । वो अकेला ही मेरे पास आ सकता है । चार से कुछ अधिक ही हुआ होगा । जाडे की संध्या धर थर्राहट में डूबने लगी थी । मैं अपना बस तालियाँ लाहूर आबीर की ओर बढा चला जा रहा था । एक बिजली के खंबे की नहीं दिए । क्रिश्चियन लाइब्रेरी के सामने कुछ भीड दिखाई थी । समझा कोई पादरी उपदेश कर रहा होगा पर निकट आकर देखा तो मेरे अनुमान को धक्का लगा । ये बनारस का उस समय का मजबूत कैरेक्टर था । नाम तो मैं तब भी नहीं जानता था और आज भी नहीं जानता हूँ । कुर्ते पर करता हूँ । कई करते एक साथ पहले माथे पर टिकुली लगाए अधिपत्य बालों के बीच महानगर कुछ सामान्य से अधिक गाडी भरी हुई थी । दोनों हाथों में खनन थी । हुई बहुत सारी रंगीन जोडियां और दाहिने हाथ में एक मोटा सा रोल लिया । मैं अर्धनारीश्वर सी सबके आकर्षण का केंद्र था । उसकी वेशभूषा और चार ढल से अधिक उसका ही व्यवहार भीड जुटा लेता था । मैं जहाँ खडा होता हूँ वहीं हाला अफसरों को गालियां देने लगता था हूँ । इस समय भी वह अंग्रेजों की फोर आलोचना कर रहा था और कलक्टर तथा गोथवाल के लिए हजार हजार गालियाँ निकाले जा रहा था । कभी कभी उन गालियों की बौछार लाटसाहब तक चली जाती थी । साथ ही में शहर की हाल की घटनाओं की चर्चा कर रहा था । रसाली अंग्रेजों का अब हालत खराब है । कुछ दिनों के मेहमान है । लाला जगजीवन दास के मामले में कलेक्टर की भी पड गए । उसे जेल जाने से वे बिना रुक सका । साला बडी डाॅ पहुंचाता था । वो सोचता था कि कलेक्टर हमारा बात है, जो चाहूंगा करा लूंगा । पर मादर को आखिर जेल हो ही गए । क्यों नहीं उसके बाप ने उसे रोक लिया । एक और गलत काम करोगे और बेचोगे नादान बच्चों की जिंदगी से खिलवाड करोगे और अफसरों को डलिया पहुंचाओगे । अरे कमीनो तुम्हारे शरीर में धीरे बढेंगे की भूलता रहा हूँ । मैं भी चुपचाप खडा होकर हूँ । कितना विलक्षण राज्यों को भी बुरा भला कहता था तो उन्हें का जरूर नहीं और चले स्वराज लेने । आखिर ये हैं तो इस तरह की विचित्र वेशभूषा में चौराहे चौराहे पर जो मन में आए लगता हुआ हूँ तो बनारस के हर व्यक्ति के लिए रहते मेरे मस्तिष्क के संदूक में वो आज भी रहस्य के पुतले की तरह बनने एकांत में या किसी अनमने शहरों में पुराने दस्तावेजों को देखने के लिए जब भी रह संधू खोलता हूँ, पुतला जहाँ घुटता है और आज भी अनर्गल प्रलाप करता दिखाई देता है, उस समय भी उस रहस्य को समझने की कोशिश कर रहा था । उसका आकर्षण मुझे खींच के लिए जा रहा था तो भीड में काफी ढाई चुका था । पर गरीब करीब उसके निकट आ गया था की किसी ने पीछे से मेरा कांदा झकझोरा और हाथ पकडकर खींचते हुए बोला चलो क्या क्यों खडे हो यहाँ राजधानी की थी मैं यहाँ कहाँ और कोई बात होगी? मैं बाहर निकल आया तो मैं मुझे लेकर भेड से आगे बढा ऍम इसकी भीड में मत खडे हुआ करो । फॅसने कहा क्यूँ ये ऐसी आईडी है । उसने इतनी गंभीरता से कहा जैसे बहुत बडा रहस्य बता रहा हूँ । पर यह तो बुजुर्गों को भी गालियाँ दे रहा था इसके लिए कि लोग इसकी असलियत जानना सकें । उसने कहा इसलिए देखते नहीं हो कैसे विकेट ढंग का वेश बनाए रखता है ध्यान इस पर विश्वास करने के अॅान कोई चारा नहीं था । बहुत से लोग उसे सीआईडी समझते थे पर मैं आज तक जा नहीं पाया की वाॅल मैं तो दिया लगते लगते । स्कूल से छोटा था और आज क्यों जल्दी चला आया ऍम इसको आशा था और फिर घर ना जाकर लहुराबीर की ओर क्यों जा रहा हूँ । जब मैंने उसे सारी बात बताई और कहा की रानी बहु ने मुझे अनाथालय में मिलने के लिए बुलाया है तब उसकी बात है खेल नहीं । और मेरी पीठ पर हाथ ठोकते हुए बोला ॅ अब तुम भी रास्ते पर आ रहे हो । नानी भी नहीं जा रहा था । एक ही जगह हम दोनों साथ ही अनाथालय पहुंचे तो जिस कमरे को दान इसने गगरानी बहु का कमरा बताया वह वहाँ नहीं पता लगा की किसी बच्चे को वह भी डर दवाई लगा रही थी । मैं पहली बार अनाथालय में आया था । उत्कंठा स्वाभाविक थी । दानिश को वहीं बैठा छोडकर मैं जहाँ ताक करता हुआ गलियारे में आगे बढाऊं पर सब के सब बिहारी की हथेली की तरह खाली थे । कुछ कमरों में बिखरे सामान वहाँ किसी के रहे चुकने का बहुत करा रहे थे । कुछ और आगे बढने पर बाप और मुडते ही एक बडा कमरा दिखाई दिया । छोटा मोटा हॉल भी कहा जा सकता है । इसी में दस पंद्रह बच्चे और लगभग इतनी ही स्त्रियां रानी बहु को घेरकर खडी नहीं । बीच में एक बडी बोरसी में आप चल रही थी वो मेरी उम्र के एक नंग धडंग लडके के शरीर पर जानी बहू अपने हाथ से गर्म हल्दी चूना लगा रहे थे । देखने में लग रहा था जैसे लडके को किसी ने खूब पीटा हो । पीठ पर भेद की साढे उपर नहीं पूरा सोच किया था । फटे हुए हॉट से रक्त बह रहा था । वह रोता हुआ कहना चाह रहा था पर बोल नहीं पा रहा था । मैं सिस्टर और रोना ही मेरे पल्ले पड रही थी । खरीदना उसके मुख्य अवश्य निकला । ऍम नहीं पाएगा । रानी बहुत है । उसे आश्वस्त किया । मैं एकदम उनके पैरों पर गिर पडा । उसकी काटरड दृष्टि एक बार फिर रानी बहू पर बडी मानो है । उनसे पूछ रहा हूँ टीवी खोजते हो जाएगा तो क्या होगा? कुछ नहीं होगा । घबराओ नहीं काम यही रहोगे । ममता भी उनके स्वर में । उन्होंने उसे उठाकर अपने सीने से लगा लिया । एक्शन के लिए शायद भूल गई कि इससे हल्दी चूना लगा है । याद आते ही उन्होंने उसे दूर हटाया और उनकी शवल पर उस बाला की पीडा की छाप उभर आई थी । उन्होंने एक बार अपनी शवाल की ओर देखा । फिर उस बाला के घावों को देखती रहे गए । आज मिठाई ऍम का उनके मुख से निकला । शेष शब्द वैकया बात ही रह गई । फिटकरी मिला दूध भी कर खूब अच्छी तरह कंबल उढाकर सुनने का निर्देश दे । वह वहाँ से उठी । अब उन्होंने मुझे देखा तो कब से आए थे और चार एक ढंग है । मुझसे बोझ कर वो अपने बाहरी कमरे की ओर बढे । निश्चित ही उनका चिंतन उस बालक से उन ही था । ऍम था उनकी ममता मुझे इतनी जल्दी नहीं छोडती हूँ । मैं भी उनके पीछे पीछे चला । कमरे में आते ही तारें कुर्सी पर से खडा हो गया और बिना किसी अभिवादन के ध्यानी बहु का गुबार निकलने लगा हूँ । आखिर क्या हो गया? आदमी को लगता है उसके स्वार्थ ने उसकी संवेदनशीलता को मार डाला है । ये निर्मोही हो गया है । एक दार्शनिक की मुद्रा में मैं बोलती नहीं हूँ और इसी क्रम में उन्होंने बताया कि जब क्यूँकि उम्र से छोटा ही एक लडका भागा हुआ आया है । वो ॅ स्टेशन के पास किसी होटल में काम करता था । पैसा देना तो दूर रहा हूँ । मालिक खाने को भी नहीं देता था और दिन रात काम लेता था । रोक लगी थी तो उसमें कुछ खा लिया । बस इसी पर मालिक ने इतना मारा कि उसकी सारी देर सोच कहीं कितना होने पर भी उसमें खाने के लिए चोरी नहीं की पराजित व्यक्ति की जीवित नैतिकता की । आप हाँ उनकी भागती पर खेलने लगी । ग्राहकों पर उसके समय उसने एक रोटी टेबल के नीचे की राजीव और मौका पाकर उसे उठाकर खाने लगा । ऍम पूरी कहानी सुनने के बाद दानिस उत्तेजित होने लगा । उसका बारूदी व्यक्तित्व, जरा सी चिंगारी, बातें ही विस्फोटक होता था । उसने बडी उत्तेजना में हूँ उसे होटल वाले को तो चल कर कल ही खेल लेना चाहिए और वहीं धरना देना चाहिए । इससे क्या होगा और किस किस के खिलाफ धरना देते तो प्रदर्शन करते फिर होगी । यहाँ तो कोई में ही भाग पडी है । हम तो सारे सामाजिक व्यवस्था बदलनी पडेगी और ये तभी होगा जब अपने देश में अपना राजू आज बदलने से क्या आदमी बदल जाएगा । वो राज को इस मर्जी की दवा समझने वाले दानिस आज कैसी बातें कर रहा है? या तो वह रानी बहूऍ बोल रहा था या उसकी दमित शंकाएं स्वयं मुखरित हो रही थीं । आदमी बदलेगा नहीं, पर उसके बदलने का उपक्रम किया जा सकता है । यानी बहुत बोली ऍम और लोग की अधिकता आदमी को जानवर बना देते हैं । धन्य लो, लो पता की धरती ही तोषण के तौर को जन्म देती है । मनुष्य की है प्रवत्ति तो स्वराज्य के बाद भी रहेगी । अरे प्रवर्ति भले ही रहे, पर उस पर नियंत्रण तो राज्य करेगा । यानी बहु ने कहा आजादी के बाद ये नहीं होगा कि देश के धन पर मुठ्ठी भर लोगों का ही अधिकार हो । अगर ऐसा हो गई नहीं की कोई खास खाकर मारे यशी करें और कोई एक रोटी के लिए भी मारा जाएंॅगी । बहु के कहने का ढंग ऐसा था कि मेरी आंखों के सामने सॉल्यूशन लगा कर अपनी मुझे घंटा हुआ । छोटा सरकार आ गया, उसकी रंगरेलियां गईं और उन्हें चित्रों के बीच से उभर आईं । उस बाला की पीठ पर बनी बोली फोन ही नहीं रहे । बेट की साठ और खींचकर मारे गए । थप्पड से सोचा हुआ कलॅर एक दूसरे के पेट पर मार रहा था । दूसरा अपने बेड द्वारा ही मारा जा रहा था । एक की विलासिता वैभव के विशाल भवन पर खडी मुझे नहीं थी और दूसरा उसी भवन की नींव में पडा । ठीक रहा था । डाॅन इस और रानी बहु में वादों का सिलसिला अब भी जारी था । पर मैं कुछ अधिक समझ नहीं रहा था । मैं भावना में बाहर जा रहा था । मेरी विचार सडनी तो उस समय छोटी जब धान इस ने पूछा आखिर उस लडके को यहाँ लेकर कौन आया हूँ उसका तो कहना है वे विद्यापीठ के मैदान में बैठ कर रो रहा था । वहाँ उस एक लंगडा भी मिला । वहीं यहाँ लेकर आया फॅमिली बहु ने बताया हूँ उस लंगडे ने लडके से यही कहा कि इस घर में चले जाओ सारा जो दूर हो जायेगा कभी बाहर मत निकालना नहीं तो फिर पकड लिया जाओगे । इतना कहकर लंगडा सामने के बगीचे में चला गया । मुझे लगा कि वही लंगडा मृत्यूंजय के हनुमान मंदिर में लाला के पीछे खडा हुआ है और उसकी विद्रोह ही मुझसे कह रही है इसका महीने के चक्कर में मत पडना भरना ये चला जाएगा । धीरे धीरे आदेश नाम पर आया । अब मेरी ओर मुखातिब हुईं । कौन से सीधे चले आए । मैंने मुस्कुराते हुए सिर हिलाकर स्वीकार किया तब तो भूक लगी होगी । उन्होंने कहा और टेबल पर रखी घंटे बजाए वो ये घंटे आज जैसे हॉल में नहीं थी । वो मरन पूजा की घंटी थी । उसको बजाते ही एक नौकरानी कमरे में दाखिल हुई हो । जरा भंडार में जाकर देखो जलपान के लिए कुछ है रानी बहु ने कहा पलक झपकते ही वो लौट कर आई हूँ और बडे संकोच के साथ सूचित किया हूँ और कुछ नहीं है । हाँ हम दही के गांव से आई ढूंढी जरूर है तो वो ले आओ । धूंधी के टुकडों से भरी एक छोटी सी थाली आ गई है और शीघ्र ही तीन गिलासों में पानी भी । हाँ लोग ॅ तो उन्होंने ढाली को मेरी ओर बढाया और स्वयं एक बडा उठाकर खाने लग रहीं हूँ । मैं तो उनका मूवी देखता ही रह गया । क्या वह वही कोठी की रानी हुए हैं जो मेरे और पकवानों की ओर ताकती तक नहीं? और जिनके जलपान में राम भंडार कि गंगा जल से बनी मिठाइयां रखी जाती है उनमें भी वह दो एक को छोडी देती हैं तो मुझे लगता है कृष्ण सुदामा के तंदुल जरूर बडे चाव सिखाए होंगे । मास्टर ने मुझे गलत नहीं पढाया है । मैं ढूंढ तो कम खाता रहा हूँ और रानी बहुत कम अधिक देखता रहा हूँ । एक बार उन्होंने टोका भी क्या देखते हो खाओ हिंदुस्तान की असली मिठाई यही है मेरे रहा एक टुकडा उठाने के लिए आगे बढा ही था की उन्होंने दूसरा टुकडा उठाकर वो मैं डाल लिया और हसते हुए बोली खाने में जिसमें संकोच क्या वो इस देश में भूखा ही रह जाएगा । उनकी हंसी के साथ ही हमारी भी हस्तियां शामिल हो कहीं स्पष्ट लगा की रानी बहुत से दूर चला जाने वाला डालें । अब लौट आया है उसके माथे पर लाला द्वारा गया कलंक काटी का मैं है आपका इतना निकट चला आया है कि एक ही थाली में बैठकर खा रहा है हिंदू और मुसलमान एक ही थाली में ये भारत का स्वप्न है यथार्थ मेरा भावुक मन तो यहाँ सोचने लगा मेरे मानस में तो दो रानी बहुत ही एक कोठे की रानी बहुत और दूसरी अनाथालय की मुझे यही दो हैं । इसमें असली कौन है नकली कौन? इसी बीच दरबान ने सूचना दी कि एक आदमी रानी उसे महिला जाता है । अभी थोडी देर से रोगों, उसका नाम और काम पूछो । रानी बहुत नहीं कहा मैंने पूछा था उसने कहा कि मैं मिलना चाहता हूँ नाम और काम उन्हीं को बताऊंगा क्योंकि मैं मुझे जानती नहीं । अच्छा जाओ मैं भी बुलवाती हूँ । धर्माण चला गया जल्दी जल्दी हम लोगों ने ढोढी खतम कर डालें । जानी बाहुल है वही पूजा की घंटी । फिर बजाए वही नौकरानी भी गाडी हुई आई यहाँ से ये सब हटाओ ऍफ करूँ । ढाई और गिलास की ओर संकेत करते हुए उन्होंने कहा और ऍम से कहो कि उस आदमी को भेजते पल भर में ही एक लंबा तगडा व्यक्ति धोती कुर्ता पहने कमरे में दाखिल हुआ । रानी बहु ने एक दृष्टि उस पर डाली जाॅब को समझ लिया हूँ । ॅ के सामने वाले होटल के मालिक तो नहीं हूँ । हाँ व्यक्ति सकपकाया कैसे? उन्होंने पहचान लिया बैठिए यानी बहु ने सामने की कुर्सी की ओर संकेत क्या कई है जैसे आपने तकलीफ की मेरे यहाँ से एक लडका भाग कर आपके यहाँ आया है । उसने कहा मैं मेरे यहाँ नौका है । होगा यहाँ का नौकर यानी बहु का स्वर्ग अप्रत्याशित रूप से शांत था हूँ । घंटों की मानसिकता इतनी शांत का सामना करने की नहीं थी रे थोडा असंतुलित हुआ । वह मेरे यहाँ से चोरी करके भाग जाएँ । भागा होगा चोरी करके उनकी आवाज में पहले जैसे ही शांति थी, मैं उस से मिलना चाहता हूँ । हाँ, जोर से मिलना तो जरूरी हो गई । एकदम गुरु गंभीर यानी बहुत पुनः पूछा हूँ । वह चोरी करके आया है या आपने उसे कुछ दिया है, मैं उसे लेकर जाता है । व्यक्ति कुछ बोल नहीं पाया । लगता है आपने उसे कुछ दिया है और वह उसे लेकर भाग आया । बस खडे गए जोर की तरह मैं फिर नीचे क्या ही बोल पडा हूँ? हाँ, बात को जैसे ही वो बडी कृपा होती यदि आप मुझे उससे मिला देती हैं, अवश्य मिली है । यदि आप की कोई वस्तु लाया है तो वे आपको मिलने ही चाहिए । इतना कहकर उन्होंने पूजा की घंटी बजाई और दाई को उस बच्चे को लाने का आदेश देकर वे एकदम मोहन हो गई । इस बीच धन इसमें कई बार उस व्यक्ति को खोलकर देखा तो ऐसा लगा कि वह उसे अच्छा जब आ जाएगा और रानी बहु की शांत मुद्रा ने उसके हाथ पैर कैसे पांधी । कम्बल से लिपटा है । लडका आया यहाँ भी उसे चला नहीं जा रहा था । अपने मालिक को देखते ही तो चिंघाड मारकर रो बडा मानव अप्रत्याशित मौत के सामने लाख खडा कर दिया गया हूँ हूँ । हो जाओ होने की कोई जरूरत नहीं । ॅ नहीं नहीं जा सकते । रानी बहु के स्वर में अधिकार की इतनी गंभीरता थी कि वह होटल का मालिक होने देखता रह गया । उसके मुख्य ये भी नहीं निकला कि मैं क्यों नहीं ले जा सकता हूँ । फिर भी लडका होता रहा हूँ । मैं तुमसे कहा ना कि डाॅ हो जाओ यानी बहुत है । लडके को फिर चुप कराया । इनका कहना है कि इन्होंने तो मैं कुछ दिया है और तुम उस से लेकर भाग आए हूँ लडका चकित साहब ने देखता रह गया बोलते क्यों नहीं चुप क्यों लडका अब भी मौन था पर लाए तो जरूर मुझे मालूम में एक रहस्यमयी मुस्कुराहट उनके अधरों पर उभरी पर जो तुम लाई हूँ उसी के लौटा सकते हो जब छोटे बालक का चेहरा भय से काला पडता जा रहा था वो दबाये गढती आवाज बडे नाटकीय ढंग से ज्ञानी बहुत से छोटे इसका नंबर हटाओ और जो ये लाया है उसे इसके मालिक को लौटा दो कम्बल हटा दिया गया की बाल के पत्ते सा बालक कम बता रहा हूँ उसके धन पर पडी मार के निशान की ओर संकेत करते हुए यानी बहु ने कहा यही है तुम्हारे यहाँ से लाया है क्या? ये तो मैं लौटाए जा सकता है, जरूर लौटाया जा सकता है । डालें एकदम बाहें चढा था हुआ खडा हो गया । इस साले को जब इसी तरह पटाकर माना जाएगा तब ये समझेगा कि दर्द कैसा होता है । यानी जितने आवेश में था कि यदि रानी राहुल ने बैठ जाने का संकेत नादिया होता तो मैं सोचा रहा तो जरूर देता हूँ । किन्तु नाम हुई आतिशबाजी की तरह भी मात्र फुरफुरा कर रहे गया । उस बच्चे को कम्बल बढाकर रानी बहु ने भीतर भेज दिया और बडी बेरुखी से उस होटल वाले से बोली आप आज नहीं है । जानवर बनने की कोशिश मत कीजिएगा । फिर आज का अखबार देखने लगी हूँ । इस उपेक्षा का मतलब था आप यहाँ से चलते बनी । वो भी होटल वाला बैठा ही रहा हूँ और उस मौन के घुटन भरे खूब पीटे ऍफ से लाया था । मैं एकदम भूल चुका था । फिर भी पता नहीं कैसे नहीं सहारा साहस बटोरकर बोला ॅ अब मैं ऐसी करती नहीं करूंगा या तो नहीं हो सकता । यानी बहु ने वैसे ही दीर गंभीर स्वर में कहा अब मैं तो तुम्हारे यहाँ नहीं जा सकता हूँ । फॅमिली जवान है, बोलता रहा हूँ पर नहीं जमता तो उसे मेरे यहाँ जाना ही चाहिए । उसने धीरे धीरे बताया उस लडके का बाद स्थानीय मवैया गांव का रहने वाला है । उसने अपनी माँ के मरने पर दो सौ रुपये उधार लिये थे । उसी के प्याज के एवज में लडके को मेरे यहाँ रखा गया है । जब रुपया लौट आएगा तब अपना लडका ले जाएगा । यानी बहुत सामने रहे गई उनकी खामोशी मानो सोनीजी नहीं हूँ । क्या आदमी के बच्चे को भी बंधक रखा जा सकता है । डालने शूट था बंद ज्वालामुखी की तरह किसी भी लैंप जलाकर दारी किनारे के डाकपत्थर गयी । वो आप को कैसे मालूम हुआ कि वे लडका मेरे यहाँ रानी बहु ने बातों का नया काम आरंभ किया । मुझे नरेंद्र बहादुर ने बताया है तो नरेंद्र बहादुर यही सामने वाले बगीचे में रहते हैं । मानने शर्ट भर के लिए सोच लिया वही लाला जगजीवन दास का नौकर नरेंद्र बहादुर डान इसकी मुख् सक्रियता से रहा । नहीं किया तो लिए उठा । मुझे लगा तो जेल की हवा खा रहे हैं । होटल वाले ने धानी की ओर गौर से देखा पर कुछ कहा नहीं पर जबानी कहने से कुछ नहीं होगा । रानी बहुल है बातों के छोटे सिलसिले को पुनः पकडा तो क्या प्रमाण है इसके पिता नें रुपया लिया था मैं लिखा का अगर दिखा सकता हूँ तब आप इसी समय उस कागज को लेकर पधारे व्यक्ति चला गया धान इसको देखती हुई रानी बहुत बडा पढी क्या हो गया? इस देश को विश्वास नहीं होता था कि देश बुद्ध और गांधी का है, राम और कृष्ण का है । जहाँ आदमी इतना स्वार्थी और खुदगर्ज हो गया है । वो खूंखार जानवरों से भी बदतर है । यह संदर्भ ही ऐसा झड गया था । उन की रानी बहुत है । मेरी ओवर बहुत ध्यान नहीं दिया । फिर भी मेरी उपस् थिति से प्रसन्न नहीं । मैं चाहती तो थी ऍम है । वह मुझे अपने सिक्के पर ही बैठा लें, पर उन्हें अभी देख थी । वह मुझे अकेला छोडते हुए भी डर रही थीं । उन्होंने कहा बेटा आज तो तुम से कोई बात नहीं हो सकी, पर अब तुम सीधे घर चले जाओ । मैं चल पडा । नहीं रुखों । उन्होंने एक आना देते हुए डाॅ । इसे किसी विश्वस्त इक्के पर बैठा तो मैं डाकिन उतारकर सीधे घर चला जाएगा । मैदागिन हो तरकर सीधे घर चला जाएगा । इसकी महत्व आ गई होगी । प्रचारिका बना रही होगी । मैं मुझे समझाते हुए बाहर तक नहीं देखो । बेटा बढना सबसे जरूरी है । खुद अच्छी तरह पढो । अच्छे से पास हो । हमारे जीवन का यही लक्ष्य होना चाहिए । यदि इस समय मिले तो कभी कभी यहाँ चले आना । लेकिन सावधान रहना, भेदना सचेत कर दी जा रही थी की लग रहा था । मुझे आदमियों के खूंखार जंगल से गुजरना है । दूसरे दिन का हाल मुझे दाने से मालूम हुआ । वहाँ होटल वाला कागज लेकर आया था और सच मुझे उसमें वहीं बात लिखी थी । इसकी चर्चा उसने की थी । फिर भी रानी बहु को विश्वास नहीं हुआ । उन्होंने कागज पर लेने के बाद उस लडके के बाद का नाम, गांव पता आदि नोट किया और बॉलिंग आप दो चार दिन और रुक इसमें रोकने की क्या बात है? आज उसकी आवाज में एंठन थी । इस बीच मेरे काम का जो हर्जा होगा उसे कौन देगा? बोस्ट होटल वाला तैयारी से आया था हूँ । अनाथालय के बाहर भी उसके कुछ आज भी टहल रहे हैं । सोचा हडकाकर कम निकालूंगा पर उसे क्या मालूम था कि स्वामिता की इस मूर्ति के भीतर एक कराना काली भी निवास करती है । उसकी बातें सुनते हैं । उन्होंने कागज मॉल मारकर बाहर फेक दिया और एकदम बरस पडी तो ले जाओ कागज पडता है तुम्हारे काम का मेरे ठेका थोडी लिया है, चले जा रहे हैं अब लडका तो मैं वापस नहीं मिलेगा । वो वहाँ से उठा लूँ और कागज पत्तर बटोरकर यानी बहुत खोलता हुआ चला गया सुना । उसी दिन उसने पुलिस में रिपोर्ट लिखवाई कि लालू नाम का एक लडका जो मेरे यहाँ काम करता था, कल ले से रुपए पौने तीन आना लिखा भागा है । अर्थ है अनाथालय में छुपा हुआ है । दूसरे दिन अनाथालय के मैनेजर रामकिशोर को खोजती हुई पुलिस अनाथालय आधुनकि पर रामकिशोर तो इधर महीनों से छुट्टी लेकर गांव गया था । रानी बहुत ही दो एक दिनों पर आज आती थी और लिखा पढी का काम को देख लेती थीं । किंतु इस पुलिस रिपोर्ट की सूचनाओं ने तुरंत ही गई मध्यान था । वसंत की तेज धूप अब काटने दौडती थी । जलपान की छुट्टी के बाद पांचवा घंटा खुले मैदान में नहीं लगता था । मास्टर बद्रीप्रसाद अब नींद की छाया में ही दो गोल पढा रहे थे कि चपरासी ने आकर मेरे लिए सूचना दी कि हेड मास्टर के कमरे में बुला हट है । उसकी मामी आई हैं मैं इमामी कुछ समझ नहीं पाया । वो दौडता हुआ जब हेड मास्टर के कमरे में पहुंचा तो रानी बहु को देखकर चकित रह गया हूँ । मैं मुझे देखते ही कमरे से निकल आई हूँ । तुम्हारा अवस्था कहा है । बोली मैं तो उसे कक्षा में ही छोड आया, उसे ले लो और मेरे साथ चलो । मैं समझ गया कि उन्होंने मेरे लिए हेड मास्टर साहब से अनुमति ले ली है । जब मैं बस्ता लेकर आया, उन्होंने तुरंत पूछा तो रामकिशन और दानिश का घर तो जानते ही होंगे । उनकी आवाज में ग्यारह सत्तर से अधिक शीघ्रता थी । मैंने श्री क्राफ्ट वक्त ढंग से उत्तर दिया । तब उनसे जाकर अभी कहूँ कि मैंने अनाथालय तुरंत बुलाया है और यदि उनमें से कोई ना मिला तो तब तुम बिहारी कोई भेज देना फिर मौन हो । कुछ सोचने लगी यदि फॅमिली तब क्या करोगी मैं क्यों? क्या उन कम हो देखता रह गया वो, तब तो मत आना किसी भी हालत में मतदाना चलो अच्छा जाओ हम दोनों । साथ ही स्कूल से बाहर निकले । बुद्ध बताती रही ही मुसीबत है रह उनकी शुरू हो गया । हो गया आज तक गोरा काला कभी नहीं हुआ । मैं घर की ओर चला जा रहा था । बडा प्रसन्न था मैं नहीं मैं सोचने लगा की जानी बहु कितना मानती है मुझे । मैं किसी नौकर से बुलवा सकती थी फिर स्कूल में आई थी तो हेड मास्टर से कहा की मैं उसकी माँ क्यूँ शाहब सुथरी धुली हुई खाती हूँ । सिल्क की साडी में उनका गौरव साइड कितना आकर्षण लगा होगा? एक मास्टर साहब को उनके अभी झाकते व्यक्तित्व का ही प्रभाव था की उन्होंने चलते समय उन्हें अपनी कुर्सी से उठकर विदाई दी हूँ । ऐसी महिला मेरी मामी क्या सोचा होगा हेड मास्टर साहब ने मेरे संबंध में मेरी माँ तो छब्बीस को नहीं नहीं उस बेचारी को समय ही कहा है । और फिर महिलाएं उन दिनों लडकों के स्कूल में नहीं आती थी । या तो छोटी जातियों की महिलाएं आती थी या प्रगतीशील एंट्री हूँ तो एक विपन्न के लिए संपन्नता का स्वाद नहीं, कितना मोहक होता है । मैं तो सपनों की नहीं वरन यथार्थ के अति निकट था । राजा की गोद गए भिखारी के पुत्र की तरह पहले ही में दत्तकपुत्र ना हूँ पर तब तक भांजा तो था ही । प्रसन्नता और उत्साह है । मेरे पक धरती पर नहीं थे । यू मैं दौड नहीं रहा था । गति बडी तेज थी । अपने में ही खोया चला जा रहा था कि लोहटिया के कुछ आगे बढने पर मुझे सुनाई पडा क्यों रे जब वो आज कल से भाग चला है । क्या मैंने मुडकर देखा? साइकिल से रामकेश्वर चला जा रहा था कि आप सहयोग था जिससे ना मिलने की संभावना थी, वो रास्ते में ही मिल गया । मैंने उसे रोका और जानी बहु का संदेश सुनाया । फिर अनाथालय के लिए रवाना तो हुआ पर इस बुला हाथ का कारण जानने की उसकी इच्छा का समाधान में नहीं कर सका तो मुझे डालने से भी संदेश कहना था । उसके चलते हुए मैंने बोला अभी अभी तो मेरे साथ ही था । मैं गौदौलिया की ओर गया है । शायद गांगुली के हाँ मिलने उसने कहा, और साइकिल पर सवार हो गये । जाने लगा । उन दिनों बनारस में रमा गति गांगुली नाम के एक सज्जन थे जो बडे क्रांतिकारी थे और सुभाष बापू है । उनका निकट का संबंध था । दानिस बहुदा के यहाँ जाता था । मैं गोदौलिया के पार्टी कहीं रहते थे पर मैं उनका घर नहीं जानता था । मान ने कहा कि अब डाल इसको छोडो रामकिशन चाचा तो जा ही रहे हैं । मैंने उनकी साइकिल रुकवाई और कहा आप मुझे बता दीजिए हूँ, स्कूल के सामने उतार दीजिएगा तो फिर कोई चलना चाहते हो । लगता है आजकल पढाई पर काफी जोर दे रहे हो । तेजी से पैडल मारते हुए रामकृष्ण बोला तो पढना ही मेरे लिए सबसे जरूरी है । मैंने कहा हूँ । मामी जी ने कहा है कि खूब अच्छी तरह पढो और अच्छे से पास हो । मामी जी ने किस माने जी ने हारे जैसे उसे विश्वास हो कि मेरी कोई मामी जीती हैं । यानी बहु ने मैंने स्पष्ट किया मैं तुम्हारी माँ है तो फॅमिली जोर से ऐसा कि क्या बताऊँ । दानिस का विचार था कि जब होटल वाला कागज लाया था तभी उसे फाडकर फेंक देना चाहिए था । ऍम और ना बजती बांसुरी साला क्या करता हूँ चलने दो करके चुप हो जाता हूँ । जड तो खत्म हो जाती है जिस पर आज इतना वितंडा खडा हो रहा है किंतु रानी बहु किस्मत की नहीं थी । कागज पाने का मतलब है विश्वासघात करना और विश्वास खाद सबसे बडा पाव है वो लेकिन बाबरी को परास्त करने के लिए अभी आप भी करना पडे तो करना चाहिए ध्यान इसका डर खता हूँ । आपसे पास सामान नहीं किया जाता हूँ मैं कल से मैं नहीं किया जा सकता । रानी बहु का कहना था साधन की अपवित्र साधे को भी अपवित्र कर देती है । जाने शुभ ही रह गया । मैं समझता था की रानी बहुत दिमाग पर गांधी जी का भूत सवार है । पर इस भूत से हिंदुस्तान का कुछ होने वाला नहीं । खैरुन्निशा ये हुआ कि उस बच्चे की डॉक्टरी करा ली जाए और उस की ओर से पुलिस में रिपोर्ट लिखाई जाएगा । उधर उसके बाद को भी गांव से बुलाया जाए । शाम तो मुझे आज तक नहीं बोली है । मैं स्कूल से सीधे उधर चलाया था । मुझे किसी ने बुलाया नहीं था पर पता चल गया था कि आज मैं आने वाला है । वासंती संध्या अनाथालय के लॉन में खेले गुलाबों पर मुस्कुरा रही थी । एक व्यक्ति तारतार हुई धोती पहने और भेड के पुराने कम्बल से उस स्वयं को लपेटे कमरे में आया । एक उदास सुनसान पडी किसी सूखी गाडी में आपसे आप जमाई घासों के जंगल की तरह उसकी झुर्रियों पर होगी । खिचडी दार ही से स्पष्ट लगा कि भरी जवानी में ही उसे बुढापे ने धर दबोचा है । ताइवान उसे पहुंचाकर चला गया । वो दरवाजे पर चुपचाप खडा तो मारा ही । नाम दशमी है । उसने सिर हिलाकर स्वीकार किया तो भी लालू के बात हूँ उसकी प्रतिक्रिया पूर्व रही हूँ वो मैं क्या? वो बडे संकोच पूर्वक जमीन पर बैठे लगा जमीन पर नहीं, कुर्सी पर बैठो, पर वह खडा ही रहा है उसकी आकृति प्रतिक्रिया शून्य थी । दृष्टि ऐसी सूखी सूखी सी जैसे आंखों कि घाटी ने बहुत दिनों से बादल देखा ही नहीं । संकोच बात करो बैठो । मुझे तुमसे कुछ जानकारी हासिल करनी है । फिर भी मैं कुर्सी पर नहीं बैठे । ऍम देखता रहा हूँ, मानो कुर्सी का विकल्प खोज रहा हूँ और वह उसे मिल भी क्या सामने की ओर ही पीछे बडी बेंच पर है । दुबक कर बैठ गया तो मैंने उस होटल वाले रामलाल से कुछ रुपये उधार लिये हैं । वहाँ सरकार फिर बिना किसी संदर्भ के गिर खिलाते हुए मैं बोल पडा हो सरकार हूँ हमारे ललित कुमार कर देगा यानी बहुत हंस पडीं मैं हमारे लडकी को क्या छोडे? क्या है मैं तो तुम्हारा ही है फॅमिली सरकार नहीं । रामलाल बात तो हमारी जान मार डाली है तो क्या तो फिर उसी होटल वाले को अपने लालू को सौंप दोगे । ऍम था वो पहला जारीकी उस शिखर पर दिखाई दिया जहां से लौटने का मतलब खाई में गिरकर चूर चूर हो जाना था । तो वे अपनी जान इतनी प्यारी है और आपने घायलों की नहीं । यानी बहु ने कहा पर वह कुछ समझ नहीं पाया हूँ । यानी बहुत तो उसकी अनदेखी टका अनुमान लग गया । उन्होंने घंटी बजाई हूँ और डाई को बुलाकर जोशपूर्ण सफर में बोली बोल ले आओ । लालू और सॉफ्टवेर बूढे को यदि है चाहता है तो ले जाए और उसे भाड में छोड दे । ऍम स्थिति थी जहाँ वेकेशन में था, डांस भी था और मैं भी और हम में से कोई कुछ बोल नहीं रहा था । सब निरपेक्ष तमाशबीन थे । देखो क्या होता है? लालू लंगडाता हुआ आया और अपने पिता को देखते ही दहाड मारकर रो पडा लिपट गया । अपने बाप से हैं, ये है उसका अप्रत्याशित मिला था आकास्मिक सहानुभूति की संभावना भाषओं की भाई को और अधिक बढा देती है । दस नहीं की आंखें भर आई हूँ वो तो नहीं बल्कि कपडा हटाकर लडकी के शरीर को देखो तो यानी बहुत बोली हो । अब बोले ने लालू के शरीर पर से कपडा हटाया और अपरिमित देखना शेष रखने लगा क्या ये तुम्हारे कर्मों का फल नहीं है? ध्यानी बहुत पूछा जरूर है । साहब कहते थे उसकी जुलाई चोट पडी । लडका आप भी उसकी छाती से लगता रहा । दोनों की ऍम भेद हो गए तो जानवर के पास ले जाओगे का आकार उनका साहब ऍम रूप से मुख्य हो । इसके पहले ही बालक ठीक उठा नहीं बापू अब हम नौकरियाँ नहीं जाओ, नहीं जाओ तुम्हारा बात जब तो भूखे भेडिये की मांद में ही छोडना चाहता है तो हम क्या करेंगे? हमारे पास तुम्हारे लिए जगह भी नहीं । रानी बहुत बोल रहीं हूँ । अब लालू पिता को छोडकर एकदम रानी बहु के चरणों में गिर पडा । ऐसा क्यों कहती है? मालकिन आपने तो कहा था कि अब तो मैं कहीं नहीं जाने दूंगी । पर जब तुम्हारा बाप भी कहता है तो मैं क्या कर सकती हूँ? बलि के रखने की तरह एक काटर दृष्टि लालू के पिता पर डाली हूँ । फॅमिली इतना लाचार इतना बेवस, इतना असहाय अपने जीवन में कभी ना हुआ हूँ । मैं अपना सिर थामकर होने लगा क्योंकि वो इतने परेशान क्यों का? कहीं मालकिन रुपया जो नहीं नहीं हुईं । रुपया लेने का क्या मतलब है तो अपने लडके को बंधक रख दोगे? रारह खित्ता काकर मैंने देखा ऐसा आज नहीं को कितना लाचार बना रहता है । उसने सकते हुए ही बताया हूँ । नहीं नहीं उस सौ रुपया मई की मौज पर लिया था । दस रुपये महीने तो उसका ब्याज हो जाता । इसी से तय हुआ कि जब तक रूपया लौटाउंगा नहीं लालू तुम्हारे यहाँ काम करता रहेगा । इसका मतलब है कि तुम ने दस रुपये महीने पर अपने लालू को उसका दास बना दिया तो चाहे जो कुछ भी करे उसके साथ बीच था हूँ । यदि रूपया उधार ना लेते तो क्या होता है? मैं तो मर ही गई थी उसका क्रिया कर्म कैसे होता? सर का दस नहीं कराया बिरादरी बोझ कैसे होता सरकार उसकी आत्मा कैसे तिरुपति सरकार तो डर गई । उसकी आत्मा शानू बहूऍ थी अपने लडके को बेचकर माफ की आत्मा को तार दिया तुमने कैसे लायक सबूत हो? फिर कुछ समय के लिए एक अजीब खामोशी पर, उसके कागज पर तो दो सौ रुपये लिखे । फॅसने छुट्टी हुई बात को पकडा । हाँ सरकार का अच्छा दो सौ रुपए का लिखवाया है पढ दिया है सौ रुपये ऐसा क्यों किया तुमने तो यानी बहु का प्रश्न था । यदि ऐसा न करता तो वह रुपया देता ही नहीं किया । ये बात तुम पुलिस के सामने कह सकते हो । पुलिस का नाम सुनते ही उसकी धोखा होती तो मैं कुछ बोल नहीं पाया । लगता है तो डर रहे हो यानी बहुत हैं । कहा पुलिस करने की कोई जरूरत नहीं है तो मैं कैसे कहें कि मैं पुलिस से नहीं बल्कि उससे डर रहा हूँ । उसके विस्फारित नेत्रों के सामने तो राम लाल कर रखा से रहना हिंसक पंजाब था । फिर भी दूसरे दिन किसी प्रकार पुलिस के सामने दसवीं द्वारा बयान दिलाया गया । रामलाल को भी थानेदार ने बुलवाया । यदि तुम सही सही कबूल नहीं करते तो मैं अभी डीएम को फोन करती हूँ । खानी बहु की एक धौंस ने रामलाल की सारी एकडी बुलवा नहीं हूँ । उसे स्वीकार करा लिया कि मैंने मास्टर्स और वही दिए थे तो इतने बडे अपराधी हो । दूसरों को डरा धमकाकर जो उठा का अगर बनवाते हो लाचारी करना जाए, फायदा उठाते हो तो शर्म नहीं आती । यानी बहुत है उसे फटकारना शुरू किया । उन दिनों एक संभ्रांत महिला का इस प्रकार खाने पर पहुंचाया और ऐसी बातें करना वो भी मामूली आदमी से नहीं बल्कि गैरमामूली शातिर बदमाश है । एक होनी बातें अपराधी मन स्वयं है और आशंकाओं का घर होता है । रामलाल को लगा की आवश्यक हीरानी बहुत ऊपर तक पहुंच है । मैं कुछ भी करा सकती है । उसका भाई अब बाहर निकल चुका था । मैं लगभग समर्पण करने स्थिति में आ गया हूँ । पहले आप उस कागज को मंगाई जानी बहु ने कहा और कुछ ही मिनटों में कागज था पर आ गया तो सौ का एक बडा सा कानून उन दिनों सौ का नोट आज के नोट से बडा होता था देकर यानी बहुत ने स्वयं उस कागज को लेकर फाड दिया । चिंदियां वर्षभर दिखाई नहीं । फिर लोग चलने को हुए हैं । अब उस मुकदमे का क्या होगा जो लालू की और उससे मुझ पर दायर हुआ है । तो हम लाल बोला वो कानून के अनुसार कार्रवाई होती रहेगी डाल इसने कहा जानी बहुत कुर्सी से उठ चुकी थी । उन्होंने उसकी ओर देखा तक नहीं हूँ । हम लाल पहले से ही आतंकी था । वो मैं दरोगाजी की और भी बार बार देखता रहा हूँ पर वह भी प्रतिक्रिया शुरू नहीं था । धर महीने पूजा पहुंचाने पर ये हाल है आपसी ये बहुत बडी पहुंच वाली हैं । राम लाल अब और अधिक सके में आ गया । वह रानी बहु को रोकते हुए गडबडाया आप चाहेंगे तो मामला रफा दफा हो जाएगा । क्या रफा दफा होगा । यानी बहुत रहते हुए बोली लालू को पहुंचाए गए छोटों से कैसा समझौता दो हो जोर आप थानेदार साहब की बेटी उठाएंगे और उतना ही मुझे भी घायल कर दीजिए । इससे क्या होगा? क्या तो मैं घायल करने से लालू की चोट अच्छी हो जाएगी । यानी बहुत की आवाज में एक नेता का हम और एक दार्शनिक की गंभीरता थी । तो हम तुम्हें घायल करके लालू को अच्छा नहीं कर सकते । फॅालो तो अच्छा होगा । तुम्हारे सहयोग और दवा दारू से रामलाल मौन हो और समझने की कोशिश करने लगा । पुरानी बहुत बोलती नहीं जानते हो । रामलाल कितना तक लग गया है उस बच्चे के चिकित्सा पर हम लाल कुछ बोला नहीं । रानी बहु की तेज व्यवस्था के समक्ष उस हिंसक पशु के नक् घंटे जैसे गलकर गिर गई हूँ । जर्नी चाहिए । उसी सौ के नोट को उसने धानी बहु की ओर बढाया । जैसे मैं कहना चाहता हूँ मैं और क्या सहयोग कर सकता हूँ । यानी बहुत से लेकर दशमी की ओर देते हुए बोली वो लोग अपने बेटे के पीटे जाने का मुआवजा और ले जाकर इसे फिर लगा तो अपनी माँ को उतारने में रानी बहु बाहर आ जगह नहीं । दशमी के हाथ में नोट था और आंखों के सामने नहीं उसके कागज की फटी हुई चिंदियां और मन में थी गांव का पहुंच पकडकर वैतरणी पार होती हुई माँ की शांत आत्मा ।

Part 2

बाहर दो समय नहीं अंगडाई ली और परिस्थितियां बदलती चली गईं । सोमारू की सजा बहाल रही हूँ । याला जगजीवन दास की जमानत हाईकोर्ट से हो गई । इसकी सूचना हम लोगों को नहीं थी । इसी मंगलवार को सवेरे सवेरे खुद हनुमान जी का प्रसाद लेकर हासिल हुआ । उसके पीछे वहीं लंगडा नौकर था । जब उसने दरवाजा खटखटाया, वहाँ पूजा पर थी पी आ रहें नहीं रही थी । मैंने ही द्वार खोला । उसे देखते ही आवाक रह गया । वो तो सोचता ठाक है जेल में होगा हूँ और ये तो साक्षात हाजिर है । फॅसने भी हम लोगों को कुछ बनाया नहीं । मेरा आश्चर्य मन से उठकर आर्थो में केंद्रित हो गया था । मैं उसे एक्टर देखने लगा । ऍम मुस्कराया तो भारी माॅ पूजा कर रही तो क्या कर रही हैं और कोई नहीं पियारी चाहती है । अच्छा दुबियारी अब यही रहती है । उस की बात चल रही है । ऍम रहा नहीं तब तक तो लगता है मुझे ही रुकना पडेगा । इतना कहता हुआ भीतर घुसाया और दालान में पडी मारेगी चौकी की ओर बढा पीछे पीछे मैं नौकर भी था तो मैंने उसे देखा बल्कि अपनी नजरों से उसे कई बार गिरेगा भी और कोई प्रतिक्रिया नहीं । सारा उफान जैसे किसी अज्ञात निराशा में डूब गया हूँ । चौकी के सामने की जमीन पर लड्डुओं से भरी दौरी और पूजा के टोल जी लग कर बैठ गया । ॅ ऊपर जाकर के है तो की लाला जी आए हैं अपने गले में पडी गेंदे की गदराई माला पर हाथ फेरते हुए वह मुस्कराया मेरी दृष्टि लाला कीगो रही थी बस मैं सीढियाँ चढने लगा । मनुष्य की विक्सन शीलता जहाँ उसकी जीवंतता का प्रतीक है, वहीं अतीत से जुडे रहना उसकी व्यवस्था भी है । उस से अलग होने का सारा प्रयास उसकी मजबूरी की एक भवदीप जागती की तरह उस पर चिपक जाता है । आज वही चखती मुझे लाला पर जबकि दिखाई दी हूँ पर वहाँ उसके व्यक्तित्व के अलग आपको ढक नहीं पा रही थी । सूचना मैंने सबको टी पी । आ रही नहीं लेने के बाद भी नहीं उतरी । परमाणु जल्दी पूजा समाप्त कर चली आई । हमेशा की भांति विनम्रता होते हुए सदेश अदायें शब्दों में परमात्मा के प्रति हजार हजार आभार उसने व्यक्त किया भी । वह जेल से छूटकर चलाया है और फिर भी एक धर्म के सिद्धांत को दौर आते हुए बोला भाग्य में कलंक पता था । सोशल लकी गया । अब आप लोगों के आशीर्वाद और हनुमान जी की ग्राॅस फिर आप लोगों के बीच में आ गया हूँ । इतना कहते हुए उसने फिर नौकर को इशारा किया । उसने कपडे से ढकी तौर इसे एक दोना निकाला । वो लाला ने लेकर माँ को थमा दिया । मुझे आज है धोनी में सात लड्डू और तुलसीदल था । वो एक कोने पर महावीरी लगी थी । एक और लाला का ग्राॅस और दूसरी ओर प्रसाद की मैं माँ अजीब दुविधा में थी । पापी के हाथों में आकर भी गंगा जल अपनी महत्ता थोडे ही होता है । फिर प्रसाद तो प्रसाद है माने उसे लेकर माध्यम से लगाया और धन्यवाद देकर ऊपर चली गई । पीटीआर्इ जी क्या लाला अपना बाकी पूरा करें? इसके पहले ही माँ बोल पडी अरे इतना प्रसाद तो बहुत है, इसी में हो जाएगा । लाला ने फिर नहीं की वो उसने हाथ जोडकर चलते हुए निवेदन किया कि रविवार को आप सब लोग मेरे यहाँ पधारें और वहीं भोजन करें फिर देखा जाएगा । माँ जल्दी में किसी तरह पिंड छुडाना चाहते नहीं । और मैं इतनी सरलता से झडने वाला नहीं था । वो फिर गडबड आया हूँ । यदि आप ना सके तो जग्गू और पियारी को अवश्य भेजी है । उस दिन रानी बहु वगैरा सभी आएंग यानी बहुत का नाम ऐसा था की माँ को सोचना नहीं । अच्छी बात है । कहती हुई वहाँ ऊपर चली नहीं पर मैं लाला को पहुंचाने बाहर तक आया । लडकी भी तो यहीं कहीं रहती है । जब तुम्हारे साथ मंदिर में आती थी निश्चित रूप से उसका है चंपुओं सेना यदि कोई दूसरी स्थिति होती तो मैं थोडी अनाकानी करता । पर प्रसाद की बात थी उस माया मरक के पीछे चल पडा । सुमेर चाचा की दुकान खोल गई थी । पीपा महेश मिट्टी के तेल का कैनिस्टर बगल में रखें और सीढी जमीन पर दुख लायक दुकान पर बैठा बी डी पी रहा था । याला को देखते ही हाथ जोडकर दोनों खडे हो गए जैसे साक्षात भगवान आ गई हूँ । दोनों के लिए लाला की उपस् थिति अप्रत्याशित थी । दोनों के लिए लाला महान था क्योंकि धनी और शक्तिशाली था । हर पाप और अपराध के ऊपर उसका व्यक्तित्व चादर साफ फैल सकता था । दोनों को लाला इस समय पांच के पहाड पर देवता साथ खडा दिखाई दिया । बे लाला ने नौकर की दौरी से प्रसाद का दोना निकालकर सोमेर की ओर बढाया और बडे नाटकीय ढंग से बोला हो आपने बातों का प्रायश्चित कर रहा हूँ साहब जी प्रारब्ध में जो लिखा है वही होता है । भागी में जेल की रोटी बनाती थी तो खाया क्या? बताया था कि ब्रोम करते हुए भी हाथ चलता है । मैं तो गया था काले खत्म होने और खुद ही अपने मुख पर कालिख पोत ली । इतना कहते कहते उसकी आवाज भारी हो गई तो मैं समझ नहीं पाया कि लाला के संदर्भ में बोल रहा था परसो मेरे और भी पानी । दोनों सहानुभूति में सिर हिला रहे तो तुम्हारी लडकी को जग्गो के साथ देखा था । वो बेचारी भी पहले मंदिर जाती थी, सोचा उसे आशीर्वाद भी देता । चालू ॅ जरूर जरूर । इतने बडे आदमी की बात सुमेर कैसे टाल सकता था उसने धरती चंपा तो बनाया हूँ । सब जाती हुई भीतर से आई । लाला ने दो लड्डू निकालकर उसके हाथ पर रख दिया तो हनुमान जी के यहाँ दर्शन करने जाती थी ना लोग उनका प्रसाद आजकल तो हमारे दरवाजे आया है । चल तूने लड्डू चुप चाप ले लिए । ॅ जो मैं रह गया । जो मेन लाला की इतनी आलोचना करता था आज अपनी लडकी से पैर हुआ रहा है । पर वो आगे बढे इसके पहले ही लाला बोल पडा नहीं नहीं हम लोग लडकियों है पैर नहीं छुआते । वैदेही होती है देवी । इसके बाद उसने क्षमता को बाॅंटी से देखा साहब तो तुम्हारी लडकी सयानी हो चली है । लाला बोला और जंबो सबको चाहते हुए भीतर तरह गई । अब इसके हाथ पीले कर डालो । सोचता तो बहुत हूँ । वार गए के लिए सयानी । लडकी ऐसा पहाड होती है लाला जी, जिसका बोझ उठाए हुए समाज में रह ही नहीं पाता और उसे उतारकर फेक भी नहीं सकता । ॅ पर घबराओ मत साहब जी कोई बात होगी तो संकोच कहना मुझे जो हो सकेगा जरूर करूंगा । लाला नहीं चलते हुए दो लड्डू पी पा के हाथ में भी धरती दोनों परम कट हो गए । लाल आगे बढा ऍफ का घर तो जानते ही हो गए । उस ने बडे प्रेम से पूछा हूँ और मैंने सिर हिलाकर स्वीकार किया । ॅ बेटा एक दोनों यहाँ गया हूँ और कहना लाला जी मेरे यहाँ भी आए थे, तुम्हारे यहाँ भी आने वाले थे । पर देर हो चली थी, नहीं सके । याना बोलता रहा मेरी और से नहीं दे देना इसमें हालत क्या है यू आज शाम तक मेरा आदमी उसके यहाँ आवश्यक जाएगा, तब उसी से भेज दीजिएगा ॅ । अरे देश हो सकता हूँ पर तुम्हारे द्वारा भेजने का कुछ और मतलब तुम हमारे प्रतिनिधि होकर जाओगे था । मैं तो हमारा न कर ही रहेगा । ना । और फिर हसने लगे पर दानिश तो मुसलमान है उसे हनुमान जी के प्रसाद से क्या मतलब हूँ? प्रसाद से मतलब हो चाहे ना हो पर उससे मेरा मतलब है सच्चाई आपसे हाॅट पडी फिर उसने लीपापोती की । ऍम तो एक दूसरे का रहेगा । ई प्रसाद तो भगवान का है और भगवान हम सकता है । हाँ, मेरी समझ को बचकाना समझकर थपथपाता हुआ चला गया तो मैं दोनों लेकर लौट रहा था की माँ को भी के लिए निकल पडी । नहीं मुझे देखते ही वह ओवल पडी कितना लाल जी है तो मैंने सारी बातें उन्हें बता दूँ । मैं चकित भी नहीं और मुस्कुराईं ऍम भी है । फॅमिली हुई आगे बढी क्योंकि उन्हें देर हो रही थी । देश का राजनीतिक क्षितिज खान नहीं लगा था । हिटलर की युद्ध लो लोग । मदांधता ने जून उन्नीस सौ में रूस पर आक्रमण कर दिया हूँ । जिस विशाल देश की नेशनल प्रगति ने नेपोलियन के भी हौसले पस्त कर दिए थे, टेलर उसी को विजिट करने का दुस्साहस कर बैठा हूँ । इधर जापान ने टिकट दिसंबर को पर्ल हार्बर पर अचानक आक्रमण कर दिया और युद्ध में शामिल हो गया । फिर क्या था फिलिपिंस, इंद्रजीत, इंडोनेशिया, मलाया वर्मा एक के बाद एक जापान के समक्ष धराशाई होते गए । अंत में फरवरी उन्नीस सौ बयालीस में सिंगापुर पर और मार्च में रंगून पर भी जापानियों का कब्जा हो गया । तानी अंग्रेजों की प्रत्येक पराजय पर प्रसन्न होता हूँ । अपने मित्रों की सभा करता हूँ और मिठाई के नाम पर सूजी का हलवा खिलाता था । हूँ यदि पैसे की व्यवस्था ठीक हो जाती दो युद्ध हलवाई की जलेबी का पूरा थाल एम और लेके लडकों को पांच दिया जाता था । यह स्थिति केवल दान इसकी ही नहीं थी तो प्रत्येक सुराजी कुछ ऐसे ही मना स्थिति में था । रंगून के पतन कर समाचार सुनकर तो राम केशन ही रहू नाच नाचने लगा था रविवार गोद तीसरे ब्राॅन मेरे यहाँ आया बी आ रही थी और रामकिशन भी कुछ देर बाद सिर्फ देव भी चला आया । वो बहुत दिनों पर आया था किसी से उसे देखते ही प्यारी बोझ अरे आज की टाॅल के गया तो नहीं बोला सोचता हूँ किसी बुला रहे मैं तो नहीं डाला जा रहा हूँ फॅसने अब सब की शंका को वाणी दी और जो बहुत है कि लाला जी ने हमें इतने अनुनय विनय के साथ बुलाया है । यही तो हम भी नहीं सोचता रहे हैं । फॅमिली हो सकता है जेल की हवा खाने के बाद वो भी कच्चे दिखाने आ गयी । वो सौंप चाहे जंगल में चलता रहे हम मदारी की पिटार्इ में बंद हो जाये उसके विश्व में कोई फर्क नहीं पडता । बीजेपी दे बोला और विश्व तंत्र को तोड दिया जाए तो तब दो बच्चों का खिलौना हो जाएगा पर रहेगा । साथ ही सिर्फ देख हट नहीं लगा तो वहाँ पर आदमी में फर्क है । बिहारी बोली होकर खाकर कभी कभी सुधर भी जाता हूँ लगता है या पर भी गांधी जी का प्रभाव पड रहा है धान इसने कहा मैंने कई बार कहा है कि गांधीजी हिरदय परिवर्तन की बात तो करते हैं पर एक जिन्ना का हृदय परिवर्तन ना कर पाए किंतु हमने तो हिंदी परिवर्तन होते हुए देखा है । टिहरी बोली और उसने मनोहर का सारा संदर्भ दोहरा दिया हूँ पियारी के तरफ पर सब चुप हो गए । दिन तू लोगों का मन नहीं मान रहा था कि लाला में सचमुच कोई बदलाव आया है । ऍम तो एक दोहा भी सुनाया जिसकी दूसरी पंक्ति थी डाॅ बहुत हैं । नजरे जीता, जोर कमांड दुश्मन भी अधिक ने सरकार से बुलाए तो चलना चाहिए और फिर लाला तो दोस्त भी है, दुश्मन भी ऍफ का या मजाक प्रस्ताव बन गया और सब लाला के विश्ववेश्वर वाले मकान कर चल पडेंगे । हाँ अच्छा खासा जमा बडा था । हॉल तालान यहाँ तक कि चौक में भी लोग बैठे हुए थे । लाला बाहरी दरवाजे पर खडा सबकी अगवानी कर रहा था । वो टन इसको देखते उसे सीने से लगा लिया हूँ । ये भारत में लाभ भी अजीब था, दिल मिले चाहे ना मिले पर शरीर तो एक बार मिल ही गया वो उसने हम सब की भी अच्छी आवभगत की और हॉल में ले जाकर संभ्रांत लोगों के बीच बैठाया । वहीं अनाथालय के मैनेजर के साथ ही यानी बहुत ही बैठी थी और बगल में गांधी टोपी लगाए । छोटे सरकार भी नेपाली नरेंद्र बहादुर भी और एक गद्दीदार सोफे पर । कलेक्टर फिनले भी उन के बगल में ही कुछ और वो काम भी थे जिन्हें व्यक्तिगत रूप से पहचानता नहीं था । वो जान मैं अभी कुछ देर थी जो क्या बैठने की सजा, दान इसको कब कबूल होती है । उस ने मेरा हाथ पकडा और धीरे से हाल के बाहर आया हूँ । यहाँ मामला कुछ समझ में नहीं आ रहा है । तरह तरह के जानवरों को इकट्ठा किया है वो भी एक ही बाडे में । बात कुछ जरूर है इसके बाद मैं कुछ और पीछे आया वो जिससे उसकी आवाज मेरे कानों से टकराकर किसी और कान तक ना पहुंच पाए । देखते हो साले का चेहरा का हुआ है । उस ने फिल्म की ओर संकेत करके कहा जापान नहीं हो लिया दुरस्त कर दी है और अच्छा आते हैं कि हिन्दुस्तानियों को किसी तरह मिलाया जाये । ऍम मिशन आया था एक लुभावना सपना लेकर पर साले बैरंग लौटे ऍम थोडा भी गजब को भेजा रखता है उसने । उसके प्रस्ताव को पोस्ट ऍम क्या होता है पहले ही जानता था और ना मैंने उससे पूछा हूँ क्योंकि दानिस जब चालू हो जाता है ना तो उसे रोकना बडा मुश्किल होता है । हाँ, इसी मैंने बार बार अनुभव किया था और इस बार भी लगा था कि वह गांधी जी का आलोचक अवश्य पर उसके मन में उनके प्रति श्रद्धा की कमी नहीं है । उनकी देशभक्ति, उनकी ईमानदारी और उनके सत्य की मैं बहुत तारीफ करता है । पर उनकी अहिंसा उसकी समझ के बाहर है । आज कल सुभाष बापू सिंगापुर पहुंच गए हैं रे राजबिहारी बोर्ड से मिले देखना कोई गोल आवाश्यक खेलेगा । इसके बाद ही कुछ लोग उधर आ गए । फॅार साहब को प्यास लगी थी । ठंडी बीयर के लिए भाग दौड हो रही थी । अरे कितना भी ठंडा पिलाओ पर उसका कलेजा तार होने वाला नहीं है । कलेजे में तो आग लगी हैं । चेहरा धुआ धुआ हुआ जा रहा है । दानिश के बे मतलब बढ बनाने के पक्ष में मैं नहीं था तो कोई सुनेगा तो क्या कहीं का पर्व है । अपनी आदत से बाज आने वाला नहीं है । फिर भी उसने मेरी मनोस्थिति भात नहीं बढ । बढाना तो नहीं छोडा पर व्यवस्थान अवश्य छोड दिया । डाॅक्टर की ओर आया । निश्चित रूप से वह इस घर के जर्रे जर्रे से वाक्य था । वो इधर जनान खाना था । वहाँ पर तो के बैठने की व्यवस्था की । यहीं किनारे लालू भी बैठा था । वो हमें देखते ही बाहर निकाल आया । ॅ तुम दिया । मैंने कहा इन्हीं लोगों के साथ आया हूँ । उसने मुस्कराते हुए एक और संकेत दिया । वहाँ टाई के साथ अनाथालय की कुछ करते दिखाई थी हूँ । लालू का रोम रोम संतुष्ट तथा प्रसन्न था । शायद मेरे जीवन में पहली बार ऐसे समारोह में सम्मिलित हो रहा था । वो भी दर्शक बनकर नहीं वरन समारोह का एक अंग बनकर । फिर डानी वहाँ से भी एक दूसरे गलियारे की ओर मुडा जैसे लाला की पूरी कोटी ही मुझे दिखा देना चाहता हूँ । वहीं बगल का एक कमरा लगभग बंद था हूँ । हीटर से बिजली की रोशनी हूँ । उसने दराज से झांक कर देखा फिर मेरी गर्दन पर हाथ लगाकर मेरी भी आप दराज जब हटा दी । भीतर यशोदा मेकअप कर कपडे बदल रही थी मैंने जो ही अपनी गर्दन हाॅल बदल रही है उसने इतने जोर से कहा कि मैं वहाँ से कैसा क्या कहीं सुनने की तो क्या कहे कि मैं बाहर आ गया था और उसी ऑल की डैडी के भीतर हो गया जहाँ हमें पहले बैठाया गया था । तुम बडे डरपोक हो यार डाॅ फिर मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए कहा तो देश सोचते वही हो जो मैं सोचता हूँ । अंतर यही है कि मैं बोल देता हूँ और तुम मुझे बनाए जाते हो क्योंकि तुम गुलाम हो मैं गुलाम मैं कुछ बोला नहीं केवल मुस्कराया हाँ तुम गुलाम हो । जो मन की बात कहना सके उससे बडा गुलाम और कौन हो सकता है? और मैं उस की गुलामी का जुआ उतारकर पे चुका हूँ क्योंकि जब तक मैं भीतर की गुलामी से मुक्त ना हो तब तक बाहरी गुलामी से कैसे मुक्त हो सकता हूँ । डानिश बडबडाता रहा कि हांथ जोडे हुए लाला आया और विनय की मूर्ति की तरह बीच में खडा हो गया । हाल की दृष्टि उस पहुँच गयी हूँ मैं कुछ बोल नहीं वाला था की उस की निगाहें इन लोगों पर पडी ऍम भाई वहाँ के खडे हो आज तो हमारे बगल में बैठे उसके कहने का ढंग ऐसा था की ये खिलखिलाहट कई अधरों को छोडती निकल गई । हम दोनों उस भरी हुई चौकी पर किसी तरह जगह बनाकर बैठ रहा हूँ । लाला ने बोलना शुरू किया । भाइयों आज हमारा सौभाग्य है कि आप यहाँ पधार रहे हैं तो इससे भी बडा सौभाग्य यह है कि अपने कॅरियर साहब की ओर संकेत करके खुद से आने की तकलीफ उठाई है । आखिर मेरी हैसियत ही किया है एक मामूली व्यापारी की । वो भी एक ऐसे व्यापारी की जिसने बडी बडी छोटी अनेक गलतियाँ की हैं जिससे मैं मैंने एक कमजोरियाँ हैं । मुझे लगता है मैं पागल आदमी हूं, नीज हूँ फिर भी आप लोगों ने मेरे यहाँ आने की कृपा की । मैं आपका आभारी हूँ । लाला का गला भर आया था । इसके बाद और अधिक नहीं बोलता हूँ सारी सभा पर एक अजीब सन्नाटा । ॅ लाला अपनी प्रकृति के सर्वथा विपरीत दिखाई दे रहा था । मानव प्रायश्चित की मुद्रा में हूँ पर मुझे ऐसा लग रहा था क्योंकि उसने अपने भाषण में ये भी कहा कि आज देशभर गंभीर खतरा है । हमें आपसी भेदभाव भुलाकर एक हो जाना चाहिए । इतना कहते हुए उसने जहाँ कलेक्टर की ओर देखा, वहीं दानिश और रानी बहु को नजर अंदाज नहीं किया । वहाँ एक ढेले से दो शिकार कर रहा था । एक तरफ हमारी और दोस्ती का हाथ बढा रहा था । दूसरी ओर खतरे का बेंगल बजाकर कलेक्टर साहब को भी सन्तुष्ट कर रहा था । मुझे लगा पुराना लाला भी मरा नहीं । व्यवस्था के घेरे में लाचार अवश्य हो गया है । जरूर इन सब के पीछे उसका कोई बडा मकसद होता हूँ । कभी कभी अधिक जुडने से भी विरोधी को एक अलग जाती है । लाल आके आदेश है विनम्रता मालूम दाने से कहने लगी जो बच्चों है वरना बाजी बात है डालने सकपकाया पर चुप चाप अपनी जगह पर बैठा रहा हूँ । उसके चेहरे का रंग बदलता रहा हूँ । रहस्य का और अधिक उद्घाटन हुआ । कलेक्टर फिर ले के भाषण है । लाला के बाद उसने अपने अंग्रेजी टोन में बैठे हुए हिंदी में बोलना प्रारम्भ किया और संक्षिप्त भाषा में कहा तो हमें खुशी है कि कल तक अलग अलग रहने वाले आज एक जगह पर इकट्ठा हैं । एक दूसरे के दुश्मन आजकल मिल रहे हैं क्योंकि आपका ऐसा होना सबसे जरूरी है आजादी के लिए भी और आजादी की रक्षा के लिए भी । आज क्रिप्स मिशन को कामयाबी नहीं मिली, ना मिले पाए । किसी ना किसी मिशन कंट्रोल कामयाबी मिलेगी और आप आसान होंगे । इस पर तालियां बजी पर जब उसने यही कहा कि आपसी फूट के रहे थे, आप शायद उस मिली हुई आजादी को भी गवा बैठेंगे तो दानिस गन मनाया और उठने उठने को हुआ । पर मैंने उसका हाथ पकडकर दबा दिया । मेरा विवेक कलेक्टर के भाषण के बीच में तो करने की अनुमति नहीं दे रहा था वो अब कश्मीर साफ थी । सारे आयोजन के पीछे लाला और फिर लेगी मिली भगत ले । ऐसे शासक आसन में बाहर ही खतरे के सामने हमारी एकता को खडा करना चाहते थे । इनके लिए बता रहै तरह के प्रलोभन का सहारा ले रहे थे । दूसरी तरह उसका लाभ उठाकर लाला ऐसे लोगों को अपनी तस्वीर की गंदगी साफ करने में लगे थे । अब भोजन का समय आया पहली पंगत के लिए लाला ने अपनी दृष्टि से संभ्रांत लोगों को झाड झाड कर उठाया । सरकारी अफसरों के लिए बगल में बडे कमरे में कुर्सी टेबल का प्रबंध किया । किलो छत पर बिठाए गए । वो एक और प्यालियां खडकने लगी और दूसरी ओर पूर्वे वापस टलों की खडखडाहट आरंभ होगा । किन्तु पहली संगठनाें यानी बहुत को छोडकर हमारी गोल का कोई नहीं उठाया । जानी बहु को मैं अपनी गोल का क्यों का हूँ? तो हमारे साथ आए भी नहीं थी । धान इसको या अच्छा भी नहीं लगा तक बढाया । ॅ साले ने अपनी बातों खाने पर बैठा दिया । फिर उसने बिहारी की और संकेत कर रहा हूँ । आपको भी पहली पंकज के लिए नहीं उठाया गया । वो आप के साथ हूँ । बिहारी मुस्कुराते हुए बोली मेरे साथ होने से क्या होता है? पीआर तो है आपकी । दानिश ने इस ढंग से कहा और ऐसे दिलाया कि मुझे भी अच्छा नहीं लगा । थोडी देर बाद लाला दौडा हुआ आया लगता है उससे मेरी मनोस्थिति की गंद कहीं से लग गई थी उसने हाथ जोडकर का ऍम मिनट के देर है । संगत उठाने वाली है । आप लोग तो घरी के आदमी है । मैंने सोचा पहले बाहर वालों से निपट लू नहीं नहीं कोई बात नहीं इस बार ऍफ फिर भी घर चला गया । धान इसकी अगले बताओ अपने ही लोगों को भारी पड रही थी । पर इसमें ईमानदारी का इतना प्रकाश था की हम उस की आज को भी बर्दाश्त कर लेते थे । किंतु इस समय लाला के निवेदन पर वह भी शांत हो गया । वो बगल के कमरे से प्यालियों और चम्मचों की खडखडाहट ए कुछ तेज नहीं तो साफ जाहिर था कि साहबों का खाना खत्म हो चुका है । उस कमरे से भी एक बाहरी दरवाजा था । बोल लाला ने सबको अभिवादन करते हुए उधर से ही पैदा किया । उसी कमरे से हमीर निकला और हम लोगों के बीच आकर बैठ गया । ऍम मेरा आश्चर्य मैं इतना खेल पाया था कि उसने बताया कि सहारों का खाना अलग पकडा था और बावर्चियों की देख रेख में लगा था । उधर भी जो रायॅल खाने भी आ गए हम किशन ने कहा यही तो जिंदगी भर ॅ अपनी सच्चाई पर वाॅटर उसे लगा कि नहीं क्या क्या किया उसने फिर लीपापोती आरंभ कि आखिर घर घर कबतक अब तो सब एक ही है । पहली मंगत वोट चली थी । लोग पान चबाते और सिगरेट के शौकीन के ही आप पासिंग अशोका धुआँ उडाने नीचे चले आए थे । बगल की अंधी गली में झमझम की आवाज के साथ ही कुत्तों के भौंकने का स्वर्ण और बच्चों का कोलाहल सुनाई पडा तथा ऊपर से कोई चीज की जा रही है और कुछ लोग उस पर टूर पढ रहे हैं । दानिश के लिए ऐसी परिस्थितियां आज सहन हो जाती थी । वो एकदम बाहर निकल गया । पीछे पीछे में भी बाहर चला पर बिहारी द्वारा रोक लिया गया क्योंकि दूसरी पंकज के लिए लोग उठाए जा रहे थे । उसमें हमारी भी भरी थी । फिर मैं भी बाहर आ गया । छत के एक ओर की सफाई हो चुकी थी तो काट के लम्बी पट्टी पर लोग बैठाए जा रहे थे । दूसरी ओर के बदले बटोरकर उसी अंधी गली में फेंकी जा रही थी । मैंने ऊपर से ही देखा, उन पर कुत्ते लगाए और भिखमंगों के साथ ही आज बनाएंगे । गरीब बच्चे टूट पढ रहे थे तो उसके बहुत कर गायों को तो पीछा कर देते थे पर आदमी और कुत्तों ने जैसे समझौता कर लिया था, बिक मांगे झूठन से अपनी झोली भर रहे थे । किन्तु कुत्ते और बालकों की जीभें सामान रूप से झूठी पत्तलों पर चल रही थी । मैंने पहली बार देखा था की धोखा आदमी और जानवर का भेद मिटा देती है । दूर खडा चुपचाप डाॅॅ शायद यही देख रहा था । उसका स्थिर मॉल उसकी मूखर्ता से भयानक होता था । निश्चित रूप से वह किसी विस्फोटक स्थिति में था । तब तक मैं बिहारी द्वारा बुला लिया गया क्योंकि मेरी पंगत पर उसी जा चुकी थी । नाला ने कई बार हम लोगों को देखा और फिर पूछ ही बैठा ऍम कहाँ है? मैंने संकेत से उसे बताया । उसने ही खाली की और जहाँ का और ऊपर से चलाया ऍम भाई तो भारी पत्ता लगाए जा चुकी है । तो पहले आप बाहर वालों से निपट लें तो मैं तो घर का आदमी हूँ । अपने दोस्तों के साथ आखिरी बंगाल में बैठ जाऊंगा हूँ । नीचे से उठी दानिश की आवाज आते आते छितराकर हल्की पड गई थीं । लाला गंभीर हो गया । जरूर को सोचने लगा था पर कुछ बोला नहीं, खाना खिलाने की व्यवस्था में लग गया । सभी लोग तो बैठ रहे हैं फॅसने आखिर किन दोस्तों की बात कही है । ऐसा तो नहीं है कि उसने सोचा होगी मैं नहीं बैठा हूँ । फिर यदि वह मुझे अपने साथ बैठने के लिए कहेगा तो क्या कहूँ कहूंगा की बिहारी नहीं जबरदस्ती क्या मैं मुझे अपने साथ ही घर ले जाना चाहती थी । ये गाने भी बडा विकसित राज है । रामकिशन की है आवाज प्रतिक्रिया शून्य रहे गई और फिर भी आगे कुछ कह नहीं पाया । भोजन समाप्त कर जगह हम नीचे उतरे । डाॅ तो सीधे भागता हुआ बाहर आया । बाहर खडा दानिश भिखमंगों और इन गरीब बच्चों को जूठी पत्तलों से हटा चुका था । मैं उसे घेरे हुए खडे थे पसंद नहीं क्योंकि ॅ के दोस्त बन चुके थे । मैं उनसे कह चुका था कि तुम सब मेरे साथ खाना खाओगे । जैसे उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ । वो उन लडकों में से एक तो अपने दोस्तों को बुलाने के लिए ही होता जा रहा है । शायद अपने जीवन में इतना अच्छा भोजन में नहीं पा सके । लोगों को विदा देता हुआ लाला भी बाहर आया । उसने दाने से पुराना का मेरे यहाँ आप तो खाने चलते हैं । मैंने कहा ना मैं तो घर का आदमी हूँ दोस्तों के साथ सबसे बाद में बैठूंगा वो तुम्हारे दोस्त तो कब के खा चुके हैं । कहाँ खा चुके हैं वो तो मेरे साथ खडे हैं उन भिखमंगे और बच्चों के विस्फारित ऍम हालांकि आकृति पर डॅालर भी चुप चाप उन्हें देखता रहा हूँ । फिर कहे भी तो क्या कहीं दम नहीं तमाशा खडा कर देते होता नहीं लाला झुंझलाया और अपने क्रोध को दबाता हुआ भी कर कुछ किया हूँ । तमाशा ही फॅसा हूँ आदमी और कुत्ते में फर्क करना जरूर तमाशा है । जाहिर था कि दानिश का यह व्यवहार अधिकांश लोगों को अच्छा नहीं लगा । स्वयं रामकेशव और तैयारी भी उसके पक्ष में नहीं थे । जानी बहुत ही उसे समझाना चाहती थी । इस दे वक्त की शहनाई से क्या फायदा हो, पर म्याऊं का भुगतान पकडे सब जानते हैं कि दान इसका विद्रोह जब फनकार घर खडा हो जाता है तब फुंफकारने के सेवा और कुछ नहीं जानता हूँ । इसी से किसी ने कुछ विशेष नहीं कहा हूँ । हमीद भी बाहर निकाल आया था । उसने बडे ढंग से उसे बुलाते हुए कहा हूँ अरे दरा सुनना जी है । उसके पास क्या ताॅबे को उसे दिखाकर पूछा तो मैं ऐसे बहुत जानते हो । हमें समझ नहीं पाया की ढाणी क्या कहना चाहता है । ये सब तुम्हारे तरह है । हम ईद का चेहरा लाल होने लगा हूँ । यानी बोलता गया ॅ होने वाले कोई बात नहीं है । सच मुझे हमारा हमारा प्रतिनिधित्व करते ध्यान इस ने अपने को शामिल कर धनी क्रोध को दबा दिया । फिर भी मैं चकित हो उस की ओर देखता रहा । धान इस बोलता गया । इन कुत्तों की अर्थव्यवस्था भी हमें लोगों जैसी है । यदि हमारे तुम्हारे जैसे हैं तो वह देखो वो लाला जैसा है । उसने छोटे सरकार की कार की ओर संकेत क्या जिसकी पिछली स्टेट से उसका अल्सेशियन झांक रहा था । डाॅन के इस कथन पर लाला की प्रतिक्रिया बडी थी की थी तो देखिए दोनों का भी सीधी नहीं हो सकती क्योंकि उसने देखा डानिश को मिलाना या उसके मन में बनी अपनी तस्वीर पर नहीं रेखाएं खींच पाना पर लकीर खींचना है । काफी देर हो गई थी । मैं बिहारी के साथ चलाया तो दूसरे दिन पता चला कि हम लोगों के आने के बाद फॅसने हंगामा खडा कर दिया था । वे भिखारियों और गली के बच्चों को लेकर ही पंगत में बैठना चाहता था । पर लाला के आदमी इसके सख्त खिलाफ थे हूँ । हमेशा की तरह रहना अपने आदमियों को लगाकर फट गया था । इन सबको क्यों नहीं खिलाओगे धान इसमें रोकने वालों से पूछा तो हम लोगों ने कह सकता ठेका ले रखा है और आपको निमंत्रण है किंतु आप सडक के कुत्तों को कहीं है कि हम खिलाडी ये कैसे हो सकता है । तो क्या यह सडक के होते हैं और नहीं तो क्या हूँ? अगर ये कुत्ते हैं तो वे क्या है उन धान । इसने इस बार गुर्दों की ओर इशारा करके पूछा और जोर से हंसा वे भी होते हैं और ये भी कुत्ते हूँ । अरे हमारे लाला की नुमाइंदो अट्टाहास करता हुआ बोलता गया । उनको तो के काटने बार लाला दसौली जाकर अठारह सौ या लगाकर बढ जाएगा । पर जब ये कुत्ते काटेंगे ना तो लाला के साथ तुम सब लोग पागल होकर मरोगे । क्योंकि भूके इंसान के कांटे की दवा नहीं होती । इसलिए इन कुत्तों को खिला दो । मेरी बात मानो सुना है । इसके बाद भी वे लोग उन्हें पंगत में बैठाने के लिए तैयार नहीं हूँ । चार चार दुनिया और सब्जी बांटने के लिए किसी प्रकार राजीव ॅ इतने पर मानने वाला कहाँ था? मैं सबको लेकर लाला के फाटक को घेरकर सत्याग्रह कर बैठा । अभी डॉक्टर के लोग भीतर बाहर के लोग कहाँ है? अजीब स्थिति पैदा हो गई थी । ऍम किशन ने बताया कि लाला को अंत में झुकना ही पडा । उन सबकी पंगत बैठी सत्याग्रह है । विजयी हुई ऍप्स कृष्णा पर गरीबों को रोटी कांडी ही दिला सकता है । इस घटना की गंभीर प्रतिक्रिया हुई हूँ । अधिकांश लोगों का विचार था कि दान इसको ऐसा नहीं करना चाहिए था । यदि मान ना मिले तो आपना चाहिए और यदि आप जाते हैं तो आपको आप प्रदान नहीं करनी चाहिए । माँ का भी कुछ ऐसा ही मत्था पीटीआर्इ से सारी घटना सुन लेने के बाद बस इतना ही बोली गाय टिहरी के बजट को और ओटावा कपास किंतु कुछ लोग ऐसे भी थे जो दान इसके इस व्यवहार की आलोचना के साथ ही ये भी कहते थे कि लाला इसी का बात रहे हैं । जो भी कुछ हुआ अच्छा ही हुआ तो ही दिन देते होंगे । जुलाई की संध्या भी कर लतपत हो रही थी । बादल बढते जा रहे थे मैं लालटेन जलाकर डालन में पडने की तैयारी में था कि गंगा राम आज की ताजा खबर लेकर आ धमका मैंने उसे बैठाया पर बातें बहुत धीरे धीरे आराम वकील हूँ जो की माँ सुनेगी तो बिगडेंगी हूँ । मैं नहीं चाहती थी कि उनका लाडला पढाई की अतिरिक्त कहीं समय गवाएं हो । गंगा राम ने बताया कि हो सकता है आप आंदोलन तेज हो जाए और गांधी जी अंग्रेजों से भारत छोडने के लिए कहे किन्तु कहने से कोई बारह थोडे छोड देगा । धानी ठीक ही कहता है की आजादी खून बहाने से मिलती है वहाँ जोडकर गढ बनाने से नहीं मैंने कहा और फिर इसी संदर्भ की एक बहस में हम दोनों के बीच में नहीं चलते चलते उसने यह भी बताया कि लाला के यहाँ के दावत की खबर सद्भावना गोष्ठी के नाम पर छपी है । ये सद्भावना दोस्ती क्या होती है? भगवान जाने सहयोग कुछ ऐसा की जो ही गंगा राम निकला तो ही दानिश ने प्रवेश किया । एकदम भीगा हुआ सराबोर मेक दहाडता हुआ भरा रहा था । उसने आते ही कमीज उतारकर गा रही हूँ । आज रहे अपनी प्रकृति के सर्वथा विरुद्ध गंभीर दिखाई दे रहा था । जरूर कोई बात है । पहले कुछ बोला नहीं किन्तु जब मैंने उसे कपडा बदलने वाला बैठने के लिए कहा तब कुछ भरी और दबी आवाज में बोला वो नहीं मैं आऊंगा नहीं । कल किसी समय आ जाते हैं तो बडा अच्छा होता हूँ । क्यों एक बडी जरूरी बात है और वह चुप चाप कुछ सोचने लगा हूँ । अवश्य ही लोगों ने लाला के साथ उसके व्यवहार की आलोचना की होगी । अब जो हो गया उस पर इतना सोचने की क्या आवश्यकता हूँ । आवश्यकता तो नहीं थी पर सोचना पड रहा है । वह ऐसी ही गंभीरता से बोला हूँ । पर कुछ लोग ऐसा भी कहते हैं कि लाला इसी का बात था । मैंने कहा अब मुस्कराया, मेरी बात पर नहीं, वारंट अपनी भूल पर ऍम बात नहीं है । लाला तो उसी का पात्र था और है भी तब कौन सी बात है? मैं आने पर ही बताऊंगा हूँ और चलने को हुआ । मैंने उसे फिर टोका । पर कुछ लोगों का विचार है की तो मैं ऐसा नहीं करना चाहिए था । वाले ही लोगों का विचार हो । पर मैंने जो भी किया ठीक किया । फिर उसने विस्तार से मुझे समझाया हूँ । ये तो तुम जानते ही हो कि मैं संगत में बैठाया नहीं जाता हूँ क्यों? क्योंकि मैं मुसलमान हूं । मेरे बैठते ही बहुत सारे रोड जाते । देखो हम ईद भी पंगत में नहीं बैठा था । इसी स्थिति को बचाने के लिए मैं निकल आया और फिर लाला को बेनकाब करने का मौका भी मिल गया । मैंने सोचा इसका मुखौटा अच्छी तरह उतार ही दो दिन तो ये अवसर नहीं था । यही तो सबसे अच्छा दरधा उसने मुझे नकारते हुए कहना जारी रखा हूँ । इतने लोगों के सामने उसे नंगा करने का क्या मतलब था? उसकी स्थापित हो रही छवि को जोर कर बिकेट देना । उसके नाटक का पडता पार्श् करना हूँ और एक बात और हो गई । मैंने गरीब और सडक के आदमी को गांधी जी की महत्ता समझाई । धीरे धीरे वास्तविक रूप में आने लगा हूँ आ गई ताकि आंदोलन कुछ लोगों का ही आंदोलन है अधिकांश लोग इससे टेस्ट का वो उदासीन हैं । चकता क्या आंदोलन धरती का आंदोलन नहीं होगा, आम आदमी से जुडेगा नहीं । गरीब किसान और मजदूरों की इसमें हिस्सेदारी नहीं होगी तब तक आजादी की लडाई जीती नहीं जा सकती । मुझे का डानिश यथार्थ के धरातल पर बडी दृढता से खडा है । लेकिन जब उससे मैंने पुनहाना बैठ जाने को कहा हूँ फिर गंभीर हो गया । मानो कोई दार उसके भीतर झनझना उठा हूँ । कल आ जाते तो बडा अच्छा होता । उसने कहा पर बात क्या है मैं समझ नहीं पाया और नाम है बताने की स्थिति में था । जब चला पानी हम चुका था पर बादल अब भी पसीज रहा था । मैंने इस स्थिति की कल्पना नहीं की थी । स्कूल से छोटे ही मैं सीधे दान इसके घर पहुंचा हूँ । आज आसमान साफ था, संध्या अपना आंचल बटोर चुकी थी । बिना किसी झिझक के पहले ही दस्तक पर दरवाजा खोल दिया गया तो सलमा दिखाई नहीं हूँ । मुस्कुराती हुई नहीं बल्कि खोई हुई नहीं । ऐसा लगा जैसे कोई बात हो गई है मैंने ये दृष्टि चारों ओर दौडाई झूठ है बडता नाली पर पडे पडे आ गए थे जैसे कई दिनों से खाना बना हूँ । अम्मीजान अंधेरे नहीं जो चार डालन में लेती भी वो माहौल उदास और बोझ था भाई जान कहाँ है? मैंने सलमान से पूछा तो उसने दाहिनी ओर की कोटरी की तरफ इशारा किया ऍम आ रहे थे डॅडी लेता था क्यों इतने उदास क्यों? मैंने पूछा क्या बताऊँ? जानबूझ कर मुसीबत मोल ले नहीं फॅसने हाथ पकडकर मुझे अपनी बगल में बैठाया और धीरे धीरे खोलने लगा हूँ । उस दिन नहीं लाला यहाँ से तुम्हारे चले आने के बाद मैं फिर यशोदा के कमरे की ओर गया था । मैंने झांक कर देखा हूँ । मैं अपना श्रंगार उतार रही थीं वो जो ही गहने श्रंगार दान पर रखकर वे भीतर की कमरे में कपडे बदल नहीं गई । मैंने उसके गले का देश कीमती हार डालियाँ और धीरे से बाहर चला आया । वो इतना कहकर अपनी जेब से निकालकर जडाऊ हार मुझे दिखाया । ॅ तो कई हजार रुपए का होगा हूँ मेरे मुख से निकला हूँ हार उठाते समय तो मैं किसी ने देखा नहीं, नहीं बिल्कुल नहीं यहाँ तक कि भिखमंगों केवस पंगत में बैठकर भोजन करके जब मैं उठा तो यशोदा से मिला था और से बोला था मेरी तो अच्छा जी की आपको जबरदस्ती अपनी संगत में बैठ आता हूँ । पर आप समय दिखाई नहीं पडी । तब उसने क्या का जो रही थी? उदास थी और चिंतक धान । इसने उससे मिलने का कारण स्पष्ट किया । मेरा मकसद तो यही था कि उसका मेरे ऊपर कोई संदेह हो । इसलिए चलते समय भी मैंने उसे छेडकर बातें पर तुम्हें अच्छा नहीं किया । मैंने कहा हूँ अब मैं यही सोचता हूँ । पर उस समय ऐसा लग रहा था कि मैं ठीक कर रहा हूँ । तुम यकीन नहीं मानोगे जग्गु भाई । जब मैंने इतने देवराज एक जगह देखें तो मेरे भीतर बैठा कोई झटपटा उठा । मुझे लगा एक और इतनी दौलत और दूसरी ओर जूठी पत्तलें चाटते लोग तो क्यों नहीं है उन गरीबों में चर्चा पांच दिया जाए तो यह तो आजादी के बाद होगा । ये मैंने कहा पर चुराकर नहीं छीन कर बता जाएगा और दहाडते हुए कहा जाएगा कि इस पर अब तुम्हारा कोई हक नहीं है । ये सब गरीबों के पसीने की कमाई हैं, जिसको तुमने हरा करके रखा हुआ है हूँ हो गया हूँ । मैं कुछ जल्दी ही कर बैठा हो । कुछ दुःख गर्व बोलता रहा हूँ । सोचा जब कांतिकारी लोग पार्टी चलाने के लिए सरकारी खजानों पर डाका डालते हैं तब क्यों नहीं मैं भी कुछ इकट्ठा कर लोग रोज रोज चंदे के लिए, हर व्यक्ति के सामने हाथ फैलाने से तो छुट्टी मिलेगी । किन्तु जब हम चंदा मांगते हैं तब पैसा ही नहीं मानते । उस व्यक्ति की सहानुभूति भी मानते हैं और तुम जानते ही हूँ । किसी आंदोलन के लिए पैसे से अधिक जन सहानुभूति आवश्यक होती है । मैं बोलता हूँ फिर मांगने और चोरी करने में फर्क भी तो हैं । एक गंगा जैसा पवित्र और दूसरा गंदले नाले जैसा दोषित यहाँ है तो उसकी आवाज कोई डगमगाई हो । लेकिन जब जवान होती हुई सलमान मेरे सामने आती है तो कुछ सोचने लगता हूँ । इतना कहना था की अम्मी जहाँ एकदम कोठरी में घुस आईं तो क्या तो उसकी शादी चोरी करके करेगा । अरे कमीने! कभी ये तो सोचा होता है कि मैंने कितनी तकलीफ से तो मैं पाला पर कभी नहीं खराब नहीं । उन का ग्रोथ पडा । मुझे लग रहा था कि वह और सलमान बाढ में खडी होकर हमें सुन नहीं थी । काफी हुई । हम में जानकी दुर्बल दे भाव की और ग्रोथ आंखों से बहने लगा । ऍम बताती हूँ, मेरा दाहिना हाथ का कट कर मुझे चली पीछे पीछे दानिस और सलमान एक ऐसी सलमा इससे काठ मार गया था जिसे ज्ञान हो गया था कि मेरी बढती उम्र के कारण ही भाई जान को यह तो कर्म करना पडा है । दालान में जहाँ बकरियां बंधी थी वहीं एक बडी सी चक्की जमीन में खडी थी । वहीं आकर रुक गई और बोली हूँ इसी चक्की को बीस बीस कर मैंने इन दोनों को पाल आएं पर कभी बेईमानी नहीं । इसके बाद उसने अपनी मुसीबत की कहानी सुनानी शुरू की । इसकी अखबार जान बनारसी साडी के बडे अच्छे कार्य करते पर उनका अपना करेगा नहीं था । अहमद मिया की यहाँ बुनाई करते थे । मैं हमारे अच्छे दिन थे । दोनों वक्त की रोटी नसीब हो जाती थी । पर अल्लाहताला को कुछ और ही मंजूर था । दो दिन के बुखार में ही फॅसे । तब ये कमीना तीन साल का था और सलमान मैं छह महीने की हमें क्या करती? पदार्थ मशीन औरत थी जाती तो कहाँ जाती? मैं कुछ रुकी उनका मौन अधित की गहराइयों में खोता चला गया हूँ । बीबीसी घर के सामने गली के उस तरफ जहाँ अब एक पक्का मकान खडा है, वहीं जो पडी थी उसी में रम देखा परिवार रहता था । उसका शौहर मूंगफली बेचता हूँ और वह चक्की बेटी थी । उन दिनों पाँच सेर गेहूं की पिसाई तो पैसे मिलती थी, उसी रन देने यहाँ चक्की भी दी और बेचारी महाजन के यहाँ से ये हूँ भी ला देती थी । इतनी वाली है । मुझे स्पष्ट लगा कि वह भावुकता में डूबने लगी हैं । फिर सांस लेकर वह पुनः बोलने लगी । तीन बजे बैठ जाती थी । पांच सिर्फ पीसते पीसते सवेरा हो जाता था । लोगों ने ये भी राय दी कि आधार से गेहूँ निकाल कर यदि उसकी जगह सफेद जो गरीब भेज दे तो तुम्हें एक पैसे की और भी बचत हो जाएगी और किसी को पता भी नहीं चलेगा । पर मैंने ऐसा कभी नहीं किया । भूखी रह गई, पर नियत खराब नहीं । फिर किट किट आते हुए उन्होंने दाल इसकी और देखा और इसका मैंने चोरी की । लगता है जैसे मेरी औलाद दी नहीं है । आज तो छुट्टी होगी इसके अब्बा कीरू ऍफ उनकी आंखों से तब अपने लगा अम्मीजान का कहना था की दान इसको खुद हार्ले जा घर लौट आना चाहिए और लाला से माफी मांगनी चाहिए । ऍम इसके लिए तैयार नहीं था । प्रयास हार तो बता सकता था, पर माफी नहीं मांगेगा । आखिर उससे माफी क्यों मांगें? जिसके अपराध जिन्होंने खोले के ढेर की तरह उसकी आंखों के सामने सादा बिल बनाया करते हैं । उसने अबराज नहीं गलती की है । मैं उसे सुधर सकता है, लेकिन तो माफी नहीं मांगेगा । बढनी जन अपने निश्चय पर फॅस अपने निश्चय पर इस मानसिक खिंचावने घर के वातावरण में जहर खोल दिया । दो दिनों से चूल्हा नहीं जला । ॅ मेरे माध्यम से समाधान निकालना चाहता था । उसका कहना था कि मैं ले जाऊँ और लाला को देकर कहूँ कि उस दिन मैंने इस गलियारे में गिरा पाया था जिसका हो से आप सौंप दी । बनाया था तो उस समय लौटा देना चाहिए था । यदि लाला पहुंचेगा तो क्या कहूँ मैं बोलत पर अब तो कई दिन हो गए हूँ । मैं चुप हो गया । सोचने का मुझे कोई रास्ता नहीं सोच रहा था । लगा जैसे मैं अंधी गली में खडा हूँ । इसी समय पत्थर के तरह भी जान की आवाज मुझे टकराई हूँ क्या देना कि दाने चुराकर ले किया था । अगर तुम नहीं कहोगे तो मैं कोई में डूमर होंगी तो हम नहीं जान का करो । हद से बाहर था तो लगा की सच मुझे मैं कुछ भी कर सकती हैं । डाॅ गया उसके अहम की बर्फ पिघलने नहीं तुम कह सकते हो कि मैंने चुराया है ऍम अब मुझे ही कोयम्बेडु मरना होगा । फिर रहे उसी कोठरी में जाकर चुप चाप लेट गया । हाँ, अब नहीं था मेरे हाथ में हार था हूँ । सामने हम नहीं जानती । दिन लगा था और उस धुंध लगे में शर्मा के चेहरे पर चिपक । टीचर तो की आकृति थी तो मैंने स्थिति को संभालने की कोशिश की । इसे जरूर लाला को लौटा देना चाहिए । मैं जरा जोर देकर बोला पर एक बात में समझ में नहीं आएगा क्या? यही कि उस व्यक्ति के सामने सत्य की अहमियत क्या है जिसकी सारी जिंदगी झूठ पर टिकी है । अम्मी जान मुस्कराईं मुझे लगा कि तनाव कुछ जीरा पडा । फिर बडे विचित्र अंदाज में दिए की ओर इशारा करते हुए मैं बोली इस अंधेरे में उस दिए की अहमियत है नहीं, कितना छोटा कर दिया है और कितना बडा सा देर हो स्टार्क के समक्ष क्या कहता हूँ हम नहीं ध्यान ही बोलती चली गई वो तो सच कहकर देखो तो लाला पर क्या प्रभाव पडता है । क्या तुम लोग ना कह सको तो मैं ही सलमान को लेकर चली जाऊँ और कहूँ कि मेरे लडके से गलती हो गई है । माफ करो नहीं नहीं तो मैं नहीं जाना है वहाँ मैंने झटके से उठा और बाहर निकल आया । ॅ सलमा को लेकर कभी भूल से भी उसके घर मत जाना । वो आदमी नहीं जानवर है । नहीं नहीं आप के जाने की आवश्यकता नहीं । मैं पुणा संभालने की कोशिश करता हूँ । मैं घर जाऊंगा और आपकी भावना का आदर करते हुए जो भी संभव होगा करूंगा । किसी तरह अम्मीजान मान गईं । मामला ठंडा बडा अंधकार में आगे बढा चला जा रहा था मूल पर गली का ऍम आ रहा था होया अपना हीमो देख रहा हूँ रोशनी की दर्जा पर पि ऍफ हराया पर शीघ्र ही मेरे भीतर एक आवाज गूंजी तोहरे खेत में हजारों का हार है और तुम खेले हो यदि कोई छीन लेगा तो तुम क्या करोगे हूँ मेरा भाई ही मेरा पीछा करने लगा मेरे पैर और तेजी से आगे बढे वो मैंने कहने को तो कह दिया है पर अब क्या करूंगा? मैं सोचता रहा उस राज अधिकांश अता नरेंद्र मेरे सिरहाने ही बैठी रही बहुत कम में उससे लिपटकर हो सका ऍम सुबह स्टार छोडते समय इसी निष्कर्ष पर पहुंचा की सारी बातें प्यारी से कहूँ वही कोई रास्ता निकाले मेरे हस्बैंड की जेब में अब बाहर भी चुप चाप पडा था किंतु वह इतना भारी है कि अपनी उपास्थिति का एहसास हर गौर से देखने वाले को करा जाएगा । हो सकता है मेरी आशंका निर्मूल हो किंतु मैं अपनी माँ की प्रकृति से इतना नया तो था की रह रहे घर में रहा मुझे पर चला जाता था वो हिन्दू में क्या करूँ, कहाँ बताऊँ ले देकर मेरे पास एक ही जगह । वहीं ठाकुर के सिंघासन के पीछे अहमियत की गंदी किताब भी वहीं छिपाई थी । डानिश की क्रांतिकारी पुस्तक भी । वहीं अब क्या ये हार भी नहीं छिपा दूँ ना देख लेंगे । तब ऍम को तो उन्होंने देख लिया होगा जो हेमा रामकली दादी के यहाँ हनुमान जी का पूजन करने गईं । अवसर पाते ही मैंने अपना सारा अंतर मर्थन बिहारी के सामने उगल दिया । उस हार को देखते ही मैं चकित रह गईं तो बडा बुरा हो गया । मैं बोली थीं जो हो गया सो हो गया । आप इसे किसी तरह लाला को लौटा दीजिए नहीं तो अम्मी जान कोई में कूद कर जान दे देंगे । फिर मैंने विस्तार से दान इसके घर की परिस्थिति से उन्हें अवगत कराया । कुछ देर बैठ चुप चाप सोच ही नहीं फिर बोली हूँ मेरा ले जाना ठीक नहीं होगा । ऍम सोचने लगी । उस की मुद्रा से लगा कि वह कहना चाहती थी कि मुझे नहीं लेगा नहीं उसने मुझे लौटा दिया । तब उस ऐसान को चुकाने के लिए कुछ भी करना पड सकता है । अचानक उसकी मुद्रा बदली । अरे लाला बडा पैसे वाला है दो चार हजार के हार से गोचर की कौन सी टांग टूट जाएगी वो भी धान इसके ही मत की दिखाई थी कि से बैठकर पार्टी का काम चलाया जाए और अम्मी जान से कह दिया जाए कि लौटा दिया गया है तो बडी बच्चे हैं । लाला से जाकर पूछ कर सकती है । यदि ऐसी बात है तब तो मुझे लौटा ही दो । पर मैं क्या कहूं की इतने दिनों तक से मैं इसे रखे क्यों रहा हूँ? ऍम की उसे दिन लौटाने के लिए खोज रहा था पर आप मिले नहीं । फिर आज कल करते करते देर हो गई तो सरल है किंतु ऍम तैयार नहीं हो रहा था । ऊँचा हो जाओ, अभी चले जाओ, मिल जाएगा नहीं तो देर हो जाएगी तो वह भी घर से निकल जाएगा जहाँ वो जल्दी करूँ । कहाँ भेज रही है सवेरे सवेरे मान ने घर में घुसते हुए पूछा वो मुझे ऐसा लगा मैं एक बार फिर झारखण्ड छोड दिया गया । बिहारी ने एकदम बात बदल दी । ये कोई कभी देने अपने दोस्त के यहाँ जा रहा है । वहीं कह रही थी कि जल्दी करो जाओ जाओ नहीं तो स्कूल जाने में देर हो जाएगी । वहाँ कुछ नहीं बोली जो जहाँ पूजा के घर में चली गई । पीआरए ने संकेत क्या कि जल्दी से एक कॉफी निकालो और चलते वरुण हाथ में कॉफी लिए और जेब में हार दबाए । जब मैं घर से निकला हूँ तब आठ बच्चे थे । वो मेरे चाचा की दुकान खोल गई थी । मैं उधर बडा भी । अचानक मुझे याद आया कि आज मंगल है । हाला अवश्य मृत्यंजय के हनुमान जी का दर्शन करने आएगा । तब क्यों नहीं वहीं कार्य संपन्न कर डालूँ । मेरे रास्ता साफ था पर मस्तिष्क अनेक प्रकार की संभावनाओं और प्रश्नों में उलझ । क्या यदि लाला अभी मंदिर न आया होगा तो क्या करूंगा और यदि आकर लौट गया होगा तो यह होता तो होगी । उसी को हार देकर लौटाऊंगा । क्योंकि कुछ तोले का हार अब मेरे मन पर कई मन का बोझ डाल रहा था । उसे जल्दी से जल्दी किसी भी तरह में उतारकर एक देने के पक्ष में था । प्रभु की बडी कृपा की मंदिर के पास पहुंचती ही लाला का लंगडा नौकर डोलची लिए दिखाई दिया मैंने । मैं संजय महादेश को श्रद्धापूर्वक प्रणाम किया भगवान वही स्थिति से किसी तरह बारों और बीट है । हनुमान जी के मंदिर की ओर जलाऊं । दूर से ही देखा लाला लकडी की एक बडे बंदे के तहत मूर्ति के समक्ष डंड बता प्रणाम करते होगे । ढोलका यशोधा पीछे हाथ जोडे घडी है और मैं लंगडा सदा की भांति पिछले हमने के पास खडा मुझे हो रहा है क्यों? जो मैं पास आता जा रहा था । मेरा मन उद्वेलित होता जा रहा था । आखिर कहूँ तो कैसे कहूं? निकट आकर हनुमान जी को प्रणाम करता हुआ आंख मूंदकर हनुमान चालीसा का पाठ करने लगा । लाने देखा वहाँ पर कुछ बोला नहीं, फेरी करता है मेरा पांच चलता रहा हूँ किन्तु उसकी फेरी समाप्त हो गयी । वह चलने का हुआ । फिर भी मैं मुझे कुछ बोला नहीं और ना अन्य दिनों की भांति प्रचार ही दिया । ॅ जरूर उस दिन के दाने के व्यवहार से नाराज है । पार्ट के मध्य में मैं कभी किसी से बोलता नहीं था, पर उस समय मेरी रहता ही बोल पडे तो मैं आपके घर जाने वाला था, पर अच्छा हुआ जो आपसे भेंट हो गई । लेकिन अमृता ऊपर से और उसकी नाटकीय मुद्रा प्रश्न बातचीत हुई हूँ । मैंने ढंग है हार जीत से निकाल कर उसकी ओर बढाया हूँ । उस दिन के हार मैंने आपके यहाँ गिरा पाया था । आप को लौटाने आया हूँ । उसने हार हाथ में लिया देखा आठ से यशोदा की ओर बढा दिया । उसने एक रहस्यमयी दृष्टि मुझ पर देगी तो उस दिन और लौटाने आए । आज बॅास पडा स्थिति के लिए मैंने बडी तैयारी की थी फिर भी पसीना छोटे लगा हूँ । मैंने उसी दिन सोचा था कि आपको लौटा दूं । मैंने बहुत खोजा पर आप ना मिले और ना नहीं । मैंने यशोदा की ओर संकेत करके कहा और कहता गया फिर काम आता गया और देर हो गई । उसने हार लौटा हैं के लिए मुझे धन्यवाद नहीं किया बल्कि अजीब ढंग से हस्ता रहा हूँ । फिर उसने यशोधा को संबोधित करते हुए कहा हूँ की ऊंची तुमने तो कहा था कि जो ही में हार श्रंगार दान पर रखकर भीतर कपडे बदलने लगी रहे गायब हो गया । पर इसमें तो दालान में गिरा पाया है । अब तो मेरे पहले के नीचे की धरती खिसकने लगी हूँ । मुझे लगा कि मैं घर जाऊंगा । यशोदा की आवाज ने मुझे एक धक्का मार दिया । जी हां मुझे ठीक की आधे मैंने उतारकर श्रंगार कार्य पर रखा था और आपने तो कहा था की हार को सुबह खा ले गया है । बंगला बोला चुप हो जी निश्चित है की हार की चोरी उसी पर लगाई गई थी किंतु इस समय उसका मुंह बंद करने के लिए लाला उसे डाॅ । मैं ये नहीं कैसा का कि मैंने इसे दालान में पाया है । झूठ बोलने और उस पर जोड देने के लिए जिस साहस की आवश्यकता होती है उसका मुझे नितांत अभाव था । मेरे सब पक्ष शब्दों का इतना बढा अकाल कभी नहीं पडा था । लाला हस्ता जा रहा हूँ सामने हनुमान जी की प्रतिमा भी मुझ पर हसते दिखाई पडी । मानव कह रही हो झूठ के चक्कर में जो पढते हैं उनकी यही गति होती है अपनी हंसी के बीच में लाला ने एक विश्व भरी बीच वही लगता है यह तुम्हारी जान तो को अच्छा नहीं लगा । फिर मैं नहीं लगा और धन्यवाद देते हुए बोला अच्छा एक दिन तो हम उसे मेरे यहाँ ले आना । मैं अपने हाथ से उसे एक ऐसा ही हार पहनाऊंगा की बेहतर कुछ होगी । तुम भी खुश हो जाओगे और फिर उसकी हंसी से अचानक वाहन अच्छे लगने लगी । उस लाला ने मुझे प्रसार नहीं दिया । वर्णिक ऐसा भिजवा दे दिया जो रह रहेगा । मुझे आज भी साल टाॅक

Part 3

भारतीय आसमान आग उगल रहा था । धरती था नहीं थी माहौल उबल । राहत जून की गर्मी से नहीं वरन खौलती हुई भारतीय राजनीति से अजीब होटल सीधी तूफान के पहले ही घोटाला दो हाँ उठने लगा था । ज्वालामुखी फूट नहीं थी । उस उलझी राजनीति को मैं बहुत अधिक समझने की स्थिति में नहीं था । सुना है एक गर्मा गर्म मीटिंग रानी बहु की अनाथालय में हो चुकी थीं । आज अनौपचारिक ढंग से रामकिशन ने कुछ लोगों को संध्या छै बजे कंपनी बाग में बुलाया था हूँ । ऐसा से ताऊ के कहने पर ही किया गया था । मैं भी विचित्र ऍम सुबह सिर्फ पालक का चौडी व छोले का बहुत अच्छा लगता था और शाम तो कुछ लोगों को लेकर कम्पनीबाग के घास के लॉन में बैठकर सुराजी बहस झाडता था । काफी लोग इकट्ठा हो गए थे । संख्या पीस चालीस के करीब पहुंच चुकी थी । अन्य सभाओं के तौर तरीके से दूर आप बिना जाॅनसन के और बिना सभापति के चुनाव के उस घाट पर ही बैठ कर बातें आरंभ हुई है । हमारा एक नेता है गांधी और जो वो कहेगा हम उसका पालन करेंगे । बिना किसी भूमिका के सिखाओ ने बातचीत नहीं हूँ फिर बाद में पांच निकलती नहीं हूँ । इस बैठक की एक विशेषता और थी कि इसमें डिप्टी भर नारायण सिंह भी उपस्थित है । वो कभी इस तरह की मीटिंगों में आया नहीं करते थे । पर आज पता नहीं क्यों चले आए थे । फायदे और ज्ञान रद्द होने के कारण सभी लोगों ने उनका सम्मान एक सभापति की ही तरह । क्या बात ये थी कि रंगून और सिंगापुर से पीछे हटते समय अंग्रेजी सेना ने वहाँ की सारी संपत्ति नष्ट कर दी जिससे दुश्मन उसका उपयोग न कर सके । इसे सुरक्षा की अर्थनीति कहते थे । भारत पर हमले की आशंका से अंग्रेज काफी घबराए हुए थे । युद्ध के भाई से ही बंगाल की नदियों में पडी हजारों नावे नष्ट कर दी गई थी । बंगाल की अर्थव्यवस्था बुरी तरह लडखडा गई थी । खाधान्न के बंटवारे में भी संकट उत्पन्न होने लगा था । दुश्मन द्वारा तो हमारे ही जाएंगे । अपने सैनिकों द्वारा भी बर्बाद किए जा सकते हैं । राष्ट्र का टूटा हुआ मनोबल यूज देव की आवाज में और फॅमिली लिए तो गांधी जी ने कहा है कि अब अंग्रेजों को चाहिए कि सत्ता हम लोगों को सौंप दें । धामके शुरू बोला, याद रखिए गांधी जी नहीं कहते कि अंग्रेजी सेना भारत से चली जाये तो हमें आजाद करें । हम दुश्मन को देख लेंगे तब शायद दुश्मन हमारे दुश्मन भी ना रहे । डाॅ बोला जापान या अधूरी राष्ट्र जर्मनी, इटली और जापान अंग्रेजों के दुश्मन हो सकते हैं । हमारे तो दुश्मन नहीं है जबकि दुश्मन होते तो सुभाष बाबू उन से मिलकर भारत को आजाद करने के बाद क्या सोचते? दानिस की मानसिकता सुभाष बाबू के लिए समर्पित थी और यही उसके चिंतन की सबसे बडी दुर्बलता टी बातें चलती रही । इसी समय हमीद के साथ भी दो आदमी आए और छुट जाता पीछे बैठ गए टान इसकी आशंका कुल बुलाई धीरे से मेरी बगल में किसका देखो ये साला हमे दवा भी आ गया । उसने मेरे कान में धीरे से कहा हूँ चुप रह गया । उसके साथ में तो आदमी कौन है पूछा हूँ मैं उन्हें जानता नहीं था । पहले अपनी फॅमिली वाले हैं फिर है गुमसुम सा बैठा उन्हें घोलता रहा हूँ । बातों का क्रम आगे बढता गया । क्या ये स्थिति ऐसी है कि हम अंग्रेजों को भारत छोडने के लिए काहे ऐसा व्यक्ति बोला फॅमिली जानता पर सुराजी लगता था हूँ । अब इतनी साहब को मौका मिला । उन्होंने बडी संतुलित भाषा में बातचीत से हटकर भाषण की शैली में बोलना आरंभ किया तो यही तो मैं भी सोचता हूँ । जवाहर लाल जी का कहना है कि ऐसा करने से नाजी ताकतों को शक्ति मिलेगी । किन्तु भारतवासी दोहरी मार सहने के पक्ष में नहीं है । उधर से दुश्मनों की भी मार खाएँ और इधर हारकर पीछे हटते समय अंग्रेज भी हमारे सत्यानाश करें । ऊं रामकिशन बोला देश को गिरा हुआ मनोबल अब केवल स्वराज से ही उठा सकता है । एक्शन के लिए खामोशी छा नहीं देखिए वर्किंग कमेटी क्या निर्णय लेती है? साहब नहीं कुछ सोचते हुए निर्णय स्पष्ट है जो गांधी जी चाहेंगे । वाही होगा तेज बोला क्या ऐसा नहीं हो सकता कि मामला कुछ समय के लिए टाल दिया जायेगा । ऍम साहब ने कहा ऐसा नहीं हो सकता । कदापि नहीं हो सकता । धाने सीखा हूँ क्योंकि गांधी जी ने स्पष्ट चेतावनी दे दी है कि यदि मेरी बात नहीं मानी गई तो मैं देश में ऐसा आंदोलन खडा करूंगा जो कांग्रेस भी बडा होगा । जीत संघर्ष की प्रस्तावना है और हाथ से गुजरी हुई है तो स्वयं में एक संघर्ष भी । तो इसी से दाने जब कोई हेल्प पकड लेता था तो लोग चुप हो जाते थे । इस समय भी ऐसा ही हुआ । बहस समाप्त हो गईं । कुछ थोडे से लोग दुविधा की स्थिति में आवश्यक है । पर अधिकांश का ऍम गांधी जी को ही जानते हैं । उन्हें कांग्रेस से क्या लेना देना? जो गांधीजी होगा में देंगे वहीं होगा । लोग क्या बोलते साथ गिराई थी चौदहवी की चंद ऊपर उठने लगा था वो अधिकांश लोग डिप्टी साहब को घेरकर आगे बढे । ॅ और रामकृष्ण के साथ हूँ । मैं पीछे रह गया । भार वाली बात शायद रामकिशुन को भी मालूम हो गई थी । उन्होंने उसी संदर्भ में कुछ कहना चाहता हूँ कि दानिश ने उनका हाथ दबाया । वो मैं हो गया । पीछे मुडकर देखा तो हानि भी चला रहा था क्योंकि अपने साथियों को छोड दिया । धान ऍम ढंग से बोला नहीं, उन्हीं के साथ होने के लिए तो तुम्हारे पीछे चला रहा हूँ हम तुम्हारे कब से साथ ही नहीं छुप हो गया । यहाँ भर बाहर ही बडी गंभीरता से बोला तो साथ ही तो हमेशा से रहे । पर हमारा तुम्हारा रास्ता जरूर अलग अलग था । अलग रास्ते के रही । कभी साथ ही नहीं होते । और यदि चौराहे पर दोनों राष्ट्रीय मिल जाए तब हूँ । जो से इतनी गंभीर उत्तर की आशा नहीं थी । उसकी आवाज और गंभीर हुई जानता । परिस्थितियां बनाती है और चलते हम हैं परिस्थितियों पर हमारा नियंत्रण क्या पास्ता लगा कि हमीद अपने और हमारे बीच एक बोल बना रहा है । दम आप समझते हो कि परिस्थितियां बदल रही हैं । इस बार रामकिशन बोला मैं क्या? ये तो पूरा देश समझ रहा है कि परिस्थितियां बदल रही हैं । देश की बात छोडो ये बताओ तुम्हारी सीआईडी क्या सोच रही है हम । किशन ने पूछा कि आईडीबीआई सोच रही होगी रही है । हमीर अपनी भाषा थोडा ही बोलता है । तब तक दानिश का हाथ हमीद के कंधे पर पहुंच गया था तो रास्ते मिले नहीं पर मिलते दिखाई दिए । एक दूसरे को टटोलती हुई बडी चतुराई से बातें चलती रहीं हूँ । हम अधिक तो नहीं खुला पर इतना जरूर बोला वो लगता है अंग्रेजों को भारत छोडना ही पडेगा । इसी से तुमने अभी से छोडने का प्रोग्राम बनाने लगे । गजब ऍम बोला हूँ, पर हमीद जरा भी छिपा नहीं । उसने पॉकेट से सिगरेट निकली और गुंजन पाने वाले की दुकान पर सुलगती नारियल की मोटी लगती रस्सी से उसे जलाकर पीने लगा भाई देखो अंग्रेजों का तो अपना देश है, वहाँ चले जाएंगे । पर हमें जो यही रैना और मारना है, मैं एक गहरा कश्मीर कर चिंतन की मुद्रा में हो गया । रामकिशन ने एक बार फिर उसे पहचानने की कोशिश की वो ना हो ये हामीद की जासूसी व्यक्तित्व नहीं हमें पर रखने की चेष्टा कर रहा हूँ । रामकिशन डाॅॅ बचाते हुए बोला बाॅर विश्वास नहीं है कि अंग्रेज इतनी आसानी से चले जाएंगे । आसानी ऍसे जाएँ जाना तो पडेगा ही । इसे अंग्रेज भी जानने लगे हैं और ऐसी स्थिति न होती तो मैं बोला भारत छोडो का नारा बुलंद न करता हूँ । हमीद बोलता गया । पूरा देश की नब्ज पहचानता है । आर्थिक स्थिति खोखली हो गई है । कर्मचारियों की तनख्वाह समय पर नहीं मिल रही हैं । डांस मुस्कराया तो तुम क्या करोगी? उसका बात कर रहा था कि जब पैसा ही नहीं मिल रहा है तब तुम्हारा खर्च कैसे चलेगा? किन तो हम ईद का उत्तर दूसरे ही संदर्भ में था । कल से कतर बहन होंगा । जोर से हंसा और अपनी अवसर वादा पर स्वयं एक शेर सुनने लगा । जैसा मौसम हम मुताबिक उसके मैं दीवाना हूँ । मार्च में बोल बोल तू जुलाई में परवाना हो । सभी लोगों ने अपने अपने घरों का रास्ता पकडा हूँ । मैं अकेला अपनी गली में मुडा बीरू के चबूतरे से ही दिखाई दिया । मेरे दरवाजे पर भी लगी है । कुछ पुलिस की वर्दी में भी लोग दिखाई पड रहे हैं । कोई बात तो जरूर है । निकट आकर मैं किनारे खडा हो गया । मां बाहर नहीं थीं । पुलिस बिहारी से कुछ पूछ ताछ कर रही थी । डर होगा और मान ही चारपाई पर बैठे थे । पी आ रही मेरे चाचा और मोहल्ले के कुछ लोग खडे थे । गंगा राम ने धीरे से बताया कि चंद्र और सोमेर हूँ । दोनों जेल से भाग गए हैं । उन्हीं की तयकी कात में पुलिस आई है तुम तो चंदा कि मुझे मम्मा तो होगा नहीं । बिहारी से पोछा बिहारी चुपचाप खडी रही । मैंने उसकी ओर देखा । चांदनी के धूमिल प्रकाश में भी उसका चेहरा सिंदूर होता दिखाई दिया । बोलती क्यों नहीं दम चंद्र की औरत नहीं हूँ । दरोगा नहीं थोडा जोर देकर अपना प्रश्न दोहराया ऍम भीतर के उबाल से बस एक शब्द कुछ अलग कर बाहर आया हूँ । पर लोग तो कहते हैं तो मुझे की ओर है तो ना मैं कभी उसकी औरत थी और ना आज हूँ पर उससे तुम्हारा संबंध तो कभी था ही कभी रहा होगा । पर अब कोई संबंध नहीं रह गया । ॅ क्या और संकोच से दबी हुई थी । आए । अब रखने लगी थी तो मेरे लिए बहुत पहले ही मर चुका है । इसके बाद उसने संक्षेप में वही घटना बताई । इसमें चंद्र ने उसे मारते मारते बेदम कर दिया था । मुझे मरा हुआ समझकर मैं कमीना भाग गया । इसके बाद से ही मेरा उसका नाडा टूट गया । जेल में भी तुम कभी उससे मिलने नहीं नहीं नहीं लेकिन जेल के रिकॉर्ड में अपने परिवार में मैं एक तुम्हारा ही नाम उसमें लिखवाया है और खुद को तुम्हारा शौहर बताया है, गलत है, चोट है । दरोगा कुछ सोचने लगा । उसने सुमेर चाचा से लालटेनों ऊपर उठाने को कहा और उसके प्रकाश में फाइल के पन्ने उलटने लगा । एक कागज पढते हुए बोला उसका पेशा तो जरायम लिखा है, जाति अहीर है फिर भी आप की ओर संकेत करके उसने पूरी हो तुम्हारी जाती क्या है? अभी आ रही क्या? जवाब दें नियति की दीमक द्वारा चार टी गए जिंदगी की किताब के कौन कौन पन्ने उधेडे मैं पसीने से डर बाॅस साहब और दो की भी कोई चाहती होती है । गाय और लडकी को जिस खूंटे से बांध दीजिए उसी की होकर रह जाती है । एक हल्की हाथ में चाचा ने प्रश्न को बाहर देने के सफल ऍम पर एक बूढा दीवान पी आएगी और देखकर पूरी तरह मुस्कुराया । निश्चित व्यवस् की पिछली जिंदगी से वाकिफ था । किसी शरूर अंजान थे । घर होगा । कुछ नहीं बोला । वो फाइल के दिनों में खोलता गया । किसी सूत्र को पकडने के खेलता में है, बेटर है परेशान हो । बस बताया बडी मुश्किल हैं उसके किसी दोस्त का कहीं कोई जिक्र नहीं । आखिर पता लगाया जाए तो कहाँ पता लगाया जाए और तुम भी उसके संबंध में कुछ बताते नहीं हूँ । क्यों नहीं मैं तो नहीं थाने ले चलूँ और साहब के हवाले कर दो । बिहारी कहाँ थी? आने जाने से नहीं वरन साहब के हवाले करने की बात है । उस की सबसे बडी विडंबना यही थी कि वह अपनी पुरानी तस्वीर से घृणा करती थी । गए । उसे निहायत घिनौनी लगती थी और अकेले मैं उस पर तो भी चुकी थी । पर हर पुराना पुलिस का आदमी पियारी को उसी शकल में देखता था । उसी बाजारों प्यारी के शकल मॅन सबकी खामोश ने कहा है पी आ रही पर आकर अचानक बढ गई । यदि कोई दूसरी औरत होती तो स्थिति से मुक्ति की याचना करते हुए दरोगा का पैर पकड लेती है । बस मैं तो अभी आ रही थी । हर परिस्थिति से जूझने का दमखम रखने वाली प्यारी उसने अपना बिगडता साहस बटोरा । आखिर मुझे बडे साहब के हवाले करने से क्या लाभ होगा? यह तो बडा साहब बताएगा ना हो तो मैं बोला दीवान पर फिर बडे बडे होते ढंग से मुस्कुराया बर्फ मुस्कराहट दरोगा जी से अच्छी होती रहेगा नहीं तो दरोगा के सामने लाचारी थी । जेल के कई कर्मचारियों की नौकरी खतरे में थे । चंद्र और सुमेरु का पता लगाना किसी भी हालत में जरूरी था पर कहीं से कोई सुराग नहीं मिल रहा था । उसने लालटेन को जमीन पर दबाते हुए फाइल बंद कर दी हूँ । आप एक शरीफ औरत लगती है इसीलिए मैं आपको अभी खाने नहीं ले जा रहा हूँ पर आप हमेशा तैयार रखियेगा किसी भी समय आप की जरूरत पड सकती है तो मेरे चाचा ने सोचा हूँ जो नहीं भटके हुए आदमी को गली के दूसरे मोड पर खडा कर दिया जाए । बोला सुमेरू का तो पता लगाया जा सकता है कैसे होगा की आँखें एकदम सोमेर के चेहरे पर लग गई । भलाला यहाँ का नौकर था पर लाला उसके संबंध में कुछ बताते नहीं रोका बोला बल्कि उन्होंने ही हमें यहाँ पे जाए । उनका कहना है कि सुमेर उन्हें मुश्किल से आठ दस दिन ही हमारे यहाँ काम किया होगा । इतनी कम अवधि में ही वहाँ इतनी बडी वारदात कर बैठा हमारे मुंह में कालिख पोतकर जेल चला गया । आठ दस दिनों से तो नहीं वरन सालों उसके नौकरी की है । वो डाॅ । रामनाथ ने स्वीकारात्मक ढंग से से हिला दिया तो जो आपने उस से यह नहीं पूछा कि आखिर सुमेरु के कौनसे दोस्त हैं कौन से लोग उससे मिलने चले आते थे । पूछा ना, तभी तो उसमें यहाँ का बंदा बताया रोका बोला मैं तो कहता है कि प्यार ही उससे मिलने आती थी । वो उसके जेल में बंद शहर का दोस्त है । ये सब झूठ है । लाला कभी पी आरी भवन एको थी कि चाचा ने उसका हार अकडकर उसे शांत कर दिया हूँ । उस पहला का आदेश में कुछ भी कह सकती है । ठीक है किस सुमेरु और चंद्र में दोस्ती थी और उन्होंने ये दोस्ती जेल में भी निभाई । सुवीर चाचा ने कहा परसों में रूसे बिहारी का कोई संबंध नहीं था । घरों का चुप हो । फिर सोचने लगा ये कहना अप्रासांगिक न होगा की दरों का कृष्ण बहादुर सिंह निहायत शरीफ आदमी थे । देखने से ही वह किसी बडे खानदान के मालूम पडते थे । कोतवाली में नए नए आए थे वरना उन दिनों पुलिस का एक मामूली सिपाही भी यमराज का दूत होता था जिसके दरवाजे पर खडा हो जाता था । उसकी जो कम थी, पुलिस की छाया तक कयामत लाती थी । पर ठाकुर साहब दरों का होकर भी आदमी थे । उनकी सौम्यता और उनके व्यवहार में जरा भी रोका पर नहीं था । शायद इसीलिए लोग उनसे इतना खुलकर बातें कर सकें । सुमेर चाचा के सामने तस्वीर साथ भी लगा कि वह जो कुछ कहना चाहते हैं, सबके सामने नहीं पा रहे हैं । उन्होंने बाहर के लोगों को हटाया और पुलिस के आदमियों को घर में ले आऊँ । नीचे दालान में वे थी । चौकी पर उन्हें आदर से बैठाया और मुझे एक रूपया देकर मिठाई और पान लाने का संकेत किया हूँ, जो आप परेशान ना हो । चाचा ने बडे इत्मीनान से कहा आप लाला को ही घेरे मेरे विचार से तो सारा मामला उसी के पेट में । इसी प्रसंग में लाला के व्यक्तित्व की सही तस्वीर भी चाचा ने उन लोगों के सामने कीजिए । बरौं दीवान का मुस्कुराते देखकर चाचा अधिक बोलना सका । लाला के व्यक्तित्व का आतंक तो उसके मन पर थाई और कहीं बात फोर जाएगी तो हो सकता है उसने अपने कहे पर भी ठीक नाना शुरू किया । मेरे कहने का मतलब है कि लाला भले आदमी है । मैं नौकरों का बडा ख्याल रखते हैं । ऐसा नहीं हो सकता किसको मेरो की उन्हें जानकारी ना हूँ । जलपान करके जब दरोगा साहब चले तब लगभग नौ बज चुके थे । उनके निकलते ही माने मुझे पीटना शुरू किया । इस मैच को कई बार बडा किया है की संध्या होते ही घर चला आया कर और मानता ही नहीं है तो देर तक घूमता ही रहता हूँ । महाजीत दी हुई और मुझे भेज दी जा रही थी यहाँ पे । इसके पहले भी मैं कई दिन इसी समय आया था । परमानेंट राज नहीं किया था । आज क्या हो गया माँ माँ इतनी नाराज क्यों हैं? यह क्या मैं बडा हो गया था और झटका देकर खुद को अलग कर सकता था और संस्कारों से खुद को कैसे अलग करता हूँ । फिर मेरी माँ नहीं किन्तु इस अप्रत्याशित बाहर से मैं कुछ झटके में आ गया तो मेरा मन उस मार के कारण के मूल में पहुंचे । इसके पहले ऍम मुझ पर हाथ बढते जा रहे थे । बिहारी ने इस बार छुडाने की कोशिश भी की । परमाणु पडती है तो हर जगह प्यारी मैं आज इसे मार्गरीटा होंगी । व्यक्ति से मारने से क्या मिलेगा? अरे मर जायेगा का महीना तो चार दिन आज सुबह होंगे जिंदगी पर बदनाम होने से चार दिन रो लेना चाहे किंतु प्यारी ने किसी तरह मुझे जुडा लिया, फिर भी दो चार हाथ धोना लग गए । माँ का भी और गालियाँ करती रही । पीआरए को कुछ आश्चर्य था कि आज नहीं हो क्या गया है । किंतु माँ जिस तरह प्यारी को छोडते ही नहीं उससे उसे तो पहले ही मालूम हो गया कि जी जी दो भी का गुस्सा गधे पर उतार रही हैं । बाद फॅसे भी मैं हो गया । पी आरी छाती से चिपकाकर मुझे अपनी कंट्री में ले आई । क्रोध की आंधी के पीछे आंसुओं की बरसात लगी रहती हैं । घंटे बर्बाद ही ये स्थिति आ गई थी । मैंने बाहर निकल कर देखा । हो रही फॅमिली के प्रकाश में उसके ऑफिस, कहीं मोटे मोटे आंसू गालों पर तुम कर सूखते जा रहे थे । पुलिस का घर पर आना माँ को बहुत बुरा लगा । वैदी चंद्र और सो मेरो के संदर्भ में भी उसके साथ की धवन था । पर जैसे कि चडने का गया दूसरी और माँ भयंकर रूप से आतंकी थी । जेल से भाग के हुए चंद्र और सुन मेरो उनके मन को पूरी तरह खेल चुके थे । उन्हें लग रहा था कि मेरा घर ही इन अपराधियों की कार गुजरी का कहीं अड्डा ना हो जाए इन तू भी आ रही मुझे लेकर जो सोई तो सो ही नहीं मैं बुलाती भी बडे प्यार से थी उसके पास होना मुझे अच्छा लगता था । जो देश होते पंखा भी चला थी उसकी नींद गर्मी से लडते लडते अभ्यस्त हो चुकी थी । भीतर भी डर राष्ट्र लगने लगा था । उसकी चिंगारी हम तक आ रही थी । लग रहा था की धरती एक ऐसे आंदोलन को जन्म देने जा रही है जो कांग्रेस से भी बडा होगा । पर साथ ही शहर में लाला की छवि भी निकलती जा रही थी । वो हर सुराजी क्रिया कलाप के बीच है । अपनी थैली लिया दिखता था और सारे अपराध भी उसी थैली में पलते नजर आते थे और उनकी तरह माँ को भी विश्वास था कि सो मारो और चंद्र लाला के ही पेट में है । पिछले उनका घबराना लाजमी था क्योंकि पीआई उनके साथ ही फिर तैयारी के लिए अवश्य कुछ न कुछ करेगा हूँ कि चढ में मारना भी खराब और की चढ की मार भी खराब है और कुछ नहीं हुआ तो छोटे तो पडेंगी, तब क्यों नहीं प्यारी को हटने के लिए कहा जाए । माँ का आज का दिन किसी मानसिकता में होगा था । वे बडी उखडी किसी दिखाई नहीं हूँ । पी आ रही ने उनसे कई बार बोलने की कोशिश की पर उसने सीधे वो बात नहीं रही है । उसे तो पहले ही आया था की पुलिस का आना ही ने अच्छा नहीं लगा है पर वह कर क्या सकती थी? आचार थी एक पिछली हुई नारी की अस्मिता गिरने के बाद भी खडी हो सकती है । पर हजार प्रयत्न करने पर भी वो अपने व्यक्तित्व पर लगी फैसला की चिपचिपाहट को नहीं हटा सकती हूँ । बाद में यही उसका इतिहास बन जाती है । बिहारी भी इस स्थिति से उतनी परेशान नहीं थी जितनी अपने इतिहास है । यही थी आज आज भी अपनी पूरी विभिषिका के साथ मां की आंखों के सामने नाचने लगा था । वो प्रत्यक्ष रूप से बिहारी से कुछ कह तो नहीं पाई । पर जब रामकली दादी के यहाँ हनुमान जी की पूजा करने गए तब उन्होंने रामकिशन से विस्तार से बातें कीं और कहा कि पीटीआर्इ को मेरा घर छोड देने के लिए वह किसी प्रकार राजी करें हूँ । माँ जब लौटी तो गंभीर थी चेहरा, उदाहरण और आगे फिर किसी की । आखिर इतने दिनों के साथ से मैं एकदम बोल रही थी । अपने शरीर में हो गए एक अंग को नोचकर फेंक देना चाहती थी । रहा को सहते हुए भी केवल रोक लग जायेंगे । भाई हैं कोठी जाते समय आज उन्होंने मुझे विशेष रूप से हर काम देखो । स्कूल से सीधे कराना यदि घर पर कोई ना रहे स्पष्टता हा उनका संकेत पीआई की ओर था । लेकिन बिहारी से उन्होंने कुछ कहा नहीं तो मेरे चाचा के यहाँ रह जाना बहुत खराब है । वहाँ पे चली गई । मैं स्कूल जाने की तैयारी करने लगा । कुछ देर बाद रामकिशन आतंका बिहारी को देखते ही वह मुस्कुराया एक खबर लेकर आया हूँ जैसे कोई सुखद समाचार हूँ । भीतर सेवन टीपीआई जो आप उसके सामने खडी हो गई । आपको कोई दूसरा घर खोजना चाहिए तो वह वैसी ही प्रसन्न मुद्रा में बोली ऍम घर होता है भैया और जब वहीं बिगड गया तब आपको कहाँ शरण मिलेगी? भीतर का उबाल पीटीआर्इ की आंखों में छलक आया । मैं ऐसी अभागिन हूँ कि मैंने अपने हाथ से ही अपने घर में आग लगाई ऍम हो गई पर रामकिशन पर इसका प्रभाव नहीं पडा । लगता है उसकी मानसिकता इसके लिए पहले से तैयार हैं । मैं जब जब डायलान में चौकी पर बैठ गया पी आ रही आंसू पोछते हुए बोलती रही हूँ । कल जब जीटॅाक कुक मारने लगी थी । अभी मैंने समझ लिया कि वह मुझ पर नाराज है और मेरा क्रोध उस पर उतार रही फिर उसके गले में है जैसे कोई चीज अटक गयी । वो ठोक निकलते हुए बोल नहीं मैं दोनों इनसे निकल कहा की कमी नहीं । नीचे ही फिर उन्हें लाला की छाया भी मिल गई है । एक तो लॉकी दूसरे नीम जडी जरूर कोई ना कोई खडा साथ होगी तो कुछ नहीं होगा । ऍम बोला भी मेरे साले जेल से भागे हैं । पुलिस खोज रही उन्हें खुद अपनी जान की पडी है हूँ तेरे क्या खुराफात करेंगे बिहारी के आंसुओं की बाढ थोडी थमी वो चिंतन में जो भी नहीं तो रामकिशन बोलता रहा हूँ । वास्तव में पुलिस का आना ही किसी पहले घर को कलंकित करने के लिए काफी है । फिर यदि वह दरोगा के साथ हो तो कहना ही क्या । जग्गू की माँ भी इसी से घबरा गई होंगी । हूँ हूँ क्या सोच रही हूँ घबराने की कोई जरूरत नहीं है । ना हो तो मेरे ही घर चलो नीचे की कोठारी अभी खाली पडी तो मारा आशा हो रही है । वो रामकिशन बोला बडे गौर से उसे देखता रहा हूँ । मैंने उसमें एक लालच देगी ऐसी ललक बिहारी के प्रति मैं कई बार उसकी आंखों में देख चुका हूँ । बिहारी ने अपनी कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की । सोचती नहीं कि जी जी नहीं खुद मुझसे नहीं कहा । शायद मैं मुझे कहीं नहीं पाईं और सर से जब पडी कोई न कोई राष्ट्रपति खोजना ही बढेगा । स्पष्ट था कि ऐसा प्रस्ताव इसके पहले भी कई बार रामकिशन प्यारी से कर चुका था और हर बार टाल गई थी । इस बाहर भी डालने की नियत से ही मुझे बोली हो चलो बेटा तो मैं खाना दे दूँ वरना स्कूल की तेरह हो जाएगी । रामकिशोर चुपचार चला गया । ऊपर आते आते मैंने बिहारी से पूछे दिया जो चाची जब तुम चली जाओगी या नहीं पडेगा बेटा आखिर कहाँ जाओगी? चाची यहाँ भगवान ले जाएगा । इतना कहते कहते उसकी आंखों का बाल तोड दिया है । मुझसे लिपट कर बडी देर तक रोती रही । मैं भी रोता रहा तो उस से जली पी आ रही । अब मठ्ठे को भी फोन कर रही थी । किसी पुरुष का आश्रय उसे प्रेतछाया सा आया दूर कर देता था । ज्यादा पीवे रामकेश उनको बाद निकट से जानती थी । उसके हृदय में टंगी अपनी तस्वीर पर उसकी प्रेमा डरता का भी वह अनुभव कर चुकी थी । फिर भी मैं उससे दूर ही रही हूँ क्योंकि गंदे नाले से निकल कर फिर दलदल में फटना नहीं चाहती थी । हैरानी बहु की यहाँ कहीं और रोग आकर किसी तरह उन्हें राजी कर लिया । उन्हें भी बिहारी ऐसी होशियार औरत की जरूरत ही उनके अनाथालय में एक आदत अनाथ और बढ गया हूँ । इधर उसका न होना हम माँ बेटे को बहुत खलने लगा । एक अकेला और सुना पर हमें घेरता रहा हूँ । आती बहुत से कम ही पडते जा रहे थे आप झाडू बुहरू कौन करें पानी कौन भरे? संजय भारती कौन दे हाँ कोठी चली जाती हूँ । आरबीआर्इ की याद एक बडे ताले की तरह बाहरी दरवाजे पर लटक चाहते हैं । मैं भी स्कूल से आकर सो मेरे चाचा की यहाँ ही रह जाता हूँ । पहले सांस की कालिमा बटोरती हुई माँ जब कोठी से लौट थी, मैं भी उनके साथ हो जाता । ताला खोलकर भीतर आ गई । हम दोनों साढे साढे करते अंधेरे में हो जाते हैं । वर्ष के दिन थे । दोपहर से ही मघा झकझोरकर बरस रही थी हूँ जब मैं तो मेरे चाचा की यहाँ भीड करजट था । जम्बो देखकर हंस पडीं । मजा आया । मैं बोली और मुझे देखती रही हूँ । मेरे संपूर्ण शरीर विन्यास, कपडे से चिपक कर उभर आया था । मुझे लगा उसकी आंखों से निकली हुई रश्मियां धीरे धीरे सहला रही हैं । कपडे उतारकर गारो और फिर उसे अरगनी पर डाल दो । बगल के कमरे से निकलती हुई चाची बोलीं मैं काम हडबडाकर कपडे उतारने लगा । हमको भी धीरे से लालटेन उठा तेल भरने चली गई । सारे कपडे तो अरगनी पर डाल दिए । अब बैंड कैसे बदलो? चाची उठीं चाचा के अधिकांश कपडे गीले थे । जब कुछ नहीं मिला तब उसने चल तो को ही एक पट्टी साडी दे दी ले किसी को लपेट ले मैंने साडी को दोहरी कर लाॅट को अरगनी पर डाल दिया मैंने कई बार साडी को देखा ॅ और गंदी थी वो उसे एक कांदा रही थी वो फिर भी मैं मेरे लिए लुभावनी नहीं वो ऍम लगाओ । कुछ ऐसा लगा जैसे साडी ही मत से लिपटी हूँ । आॅस्कर चिपक नहीं हूँ मैंने देखा चल तो मुस्कुरा रही थी मुझे बढकर पानी बरसना अब हो गया था । चाचा की दुकान के पास काफी पानी लग गया था । बौछार भी दुकान की तरफ थी । उसने बाहर का सामान उठाकर पहले ही भीतर कर लिया था । अब द्वार भी बंद कर दिया गया फिर भी पानी के छींटे भीतर आ रहे थे और कच्ची वर्ष की मिट्टी चिपचिपी होती जा रहे थे । चाचा भीतर आया और अन्य कोठियों के द्वार पर जो पैर पहुंचने के लिए टाइट के टुकडे विषय थे उन्हें उठाकर दुकान के बंद दरवाजे के पास लगाया । अब बौछार बोरे पर ही पडेंगे । जब पूरा भी जाएगा तो वह उसे उठाकर चौक मैंने छोड देगा । लगता है आज आसमान फट पडेगा । मेरे चाचा भी तरह कर बोला बेचारी मेहरा जिन आज कैसे आएंगी यदि ऐसे ही बढता रहा जाएगा तो शायद भिनाय । चाची बोली चाची की आशंका मेरे लिए लुभावनी थी । ऐसी बरसात भेजता हुआ मेरा और जनता कि मुस्कान इनमें से एक ही मुझे बांध लेने के लिए पर्याप्त था । यहाँ तो तीनों थे । मेरी इच्छा तो यहीं रह जाने की थी पर माँ के आ जाने पर ऐसा नहीं होगा । क्यों जी हमारे यहाँ कोई चीज खोली तो नहीं रखी है? चाचा बोला तुम्हारी खपरैल तो चल नहीं हो गई है । घर में पानी पड रहा होगा । कहने को कह तो दिया कि कुछ नहीं खुला है किन्तु शीघ्र ही आज आया कि डायरे पर कपडे पडे हैं । कैनिस्टर पर किताबें रखी हैं और रोटी का बैग गुना तो जमीन पर ही सुबह ढका गया था कौन जाने पानी में तैर रहा हूँ मेरी गरीबी की कडवाहट ऍम अंधेरा बढ गया । दोनों हथेलियों के बीच महराई दिया चलाएगी । कांटी रगड कर चल तो गरम करती रह गईं और एक ना चली । अंत में मैं उसे दिया सलाह लेते हुए बोला दे मुझे दो जला चुकी ऍम नहीं रहा । उसके बदन से टकराया । ऐसी हर उठा उसकी त्योरियां चढ नहीं जैसे वह कह रही हो कि सबके सामने ऐसा मत किया कर पर तू मानता ही नहीं है हूँ । ये अच्छी बात नहीं है पर मैं क्या करूँ? मैंने जाकर ऐसा तो क्या नहीं भारती है । लग गया तो कान तुम्हारा अंग्रेज गया । मैंने ये कहा नहीं नहीं सोच कर रहे क्या मैंने दूसरे ही क्षण सलाई जला दी एक अखिल बडी ऍम वो ही वो ही ढंग से मुझे डाटते हुए बोली हम सब पढें थोडी देर बाद एकदम भीगी हुई मई भी पूरी तरह लगभग दी । उन्होंने अपनी बगल से कपडे एक छोटी सी पोटली निकली । जो भी की नहीं थी उसमें पास के दो बडे बडे पराठे बनाए थे । तो मैं सोचता हूँ तो सिहर उठता हूँ । हाँ कितना भी कहीं पर पराठे नहीं भी की । जब भी जाते हैं तो हम क्या खाती हूँ । फॅमिली में सब की ना हो जाये पर आता भी लाना हो रोटी गिली नाओ माँ ताली ले तुरंत वहाँ से चल पडी । द्वार खोलकर मांझियों ही भीतर घुसी अंधकार में खो गईं । लगता है नाली में कुछ पास किया था । पूरे चौक में पानी भर आया था या परसपर करती आगे बढीं की फिसल कर धडाम से गिर पडी हो तो मेरा हाथ पकडे थी । मैं भी गिरा पर पराठे की पोटली अब भी ऊपर थे । माने संभालने और उठने के पहले ही पूछ रहा हूँ ऍम पराठे तो पानी में नहीं रहे हो नहीं ॅ संतोष की सांस ली । आज विचार ईपीआई होती तो कम से कम दिया । व्यक्ति तो करती हूँ भी उठते हुए बोली और फिर चुप हो गईं । ऊपर आकर माने कपडे बदले और बाहर छत पर बरसते पानी में ही फेंक दिया । मैंने भी चंपुओं की साडी उतारकर ऐसा ही किया था क्योंकि चौक में गिरने हैं । उसमें काफी मिट्टी लग गई थी । सभी कोठियां तेरे तरह हो रही थी । वो रोटी का बॅाय रहा था, तीसरी कोर्ट नहीं जिसकी फर्श पक्की थी और घोर बरसात से लडने में कुछ समर्थक नहीं । वहीं खा पीकर हम दोनों ने सोने की व्यवस्था की अरगनी पर पडे मेरे कपडे लगभग भी चिकित्सा ऍम स्टर परधानी पुस्तक है और कॉपियाँ बहुत कुछ सुरक्षित थीं । सोते समय मैंने बताया कि बिहारी हम लोगों को बहुत याद करती है अब तुम उसे बुला लो नाम आॅफ अब यहाँ नहीं आएगी । मैंने अनुभव किया कि हम दोनों अकेले नहीं है, माँ के पास भी आ रही है और मेरे पास चल तो पानी अभी बरस रहा था तो जब की खिडकी से हवा के झोंके हो कर आ जाऊँ । दूसरे दिन माहौल में गर्मी आई माहौल लेकर तनाव काफी बढ गया । शाम को गलियों का लैंप चलाकर लौटते समय पीपा चाचा की दुकान पर बीडी पीने के लिए रुका हो । कई लोग वहां बैठ गए थे । उनके हटते बढते ही उसने धीरे से चाचा का आठ सौ मेरो मिला था कहाँ चाचा के कान खडे हो गए । वहीं मृत्युंजय के पीछे वाली गली में टीपा कहता दिया लगता है उधर से ही कहीं से कच्ची भी करा रहा था । उसके बॅाल खडा रहे थे और मुझे भी दो घंटा आ रही थी ऍर उसे पुलिस सोच रही है और वह सारे हम घूम रहा है जहाँ जहाँ बोला यही तो आश्चर्य है महेश बोलूँ जब मैंने उससे बात चलाई और पूछा कहो सुमेरू का हो तो मैं एकदम तनकर खडा हो गया और बोला धमी देख लो । कहता हूँ सच मुझे पहले से काफी तगडा हो गया है । उसे जेल की रोटी राज पडी है तो तुम ने ये नहीं पूछा की जेल से कैसे आए ये तो नहीं पूछा और उसने स्वयं बताया हूँ की जमानत पर छोटा हूँ तब तक कुछ ग्राहक और आ गए । बातें वही रोक नहीं चाचा नहीं चाचा जी को बुलाया और उसे ग्राहकों को सौदा देने का निर्देश देकर दुकान से उठाया हूँ । आवश्यकता पडने पर मैं बहुत ऐसा करता था । उसने दीपक भीतर ही बुला लिया । उसका कैनस्टर और सीढी बाहर पडे थे यार बडी उखडी उखडी बातें कर रहा था पी पाने बताया हूँ वैसे ही कर रहे बोला कितना बडा हो गया हूँ फिर भी बडी जोर से आशा और मेरा कंधा दोनों हाथों से पकडकर अच्छी तरह हिलाते हुए बोला जानता है मुझे भी बडा है लाला का पेड जिसमें मैं बोल रहा हूँ और फिर हसने लगा इसी तरह नशे में वह पता नहीं क्या क्या बडबडाता रहा हूँ । मैंने देखा जांचा की आकृति का नाम बताने लगा और कुछ कह रहा था वो तुम्हारे संबंध में भी उसने कहा था उसने याद करते हुए सिर्फ कुछ लाया । पूछ रहा था साहब जी का क्या हाल चाहें लगता है अब उन्हें भी पंकजम् रहे हैं । अरे आॅल जा रहा था पी पा के लिए तो यह सच मुझे नशे की बकवास थी । पढ चाचा के नीचे की धरती किसकी जा रही थी । उसे लग रहा था कि मैंने दरोगा दीजिए । लाला के संबंध में जो बातें कहीं उसका पता लाला गोल लग गया है । उसके सामने उस बोर्ड है कि मुस्कान और अधिक विषैली होकर उसे चुभने लगी थी । तो फिर भी उसने अपनी मानसिकता का भांग पी पा को होने नहीं दिया । पियारी के संबंध में भी कुछ कह रहा था । चाचा ने बडी गंभीरता से पूछा हूँ । तैयारी के संबंध में तो उसमें कुछ कहा ही नहीं । पा कुछ सोचते हुए बोला । फिर अचानक उसकी मुद्रा बदली भरे आहार में उस शराबी कबाबी से किसी प्रकार पिंड छुडाना चाहता था । उससे बातें लगाने से फायदा महेश बाहर ही निकला होगा की माँ छोटी से आ रहीं चाचा ने सारी बातें उन्हें सुनाई । वो एक गंभीर मोहन उनके चेहरे बढते पड गया । उन्हें भी लगा कि लाला के खिलाफ धरोगडा से कहकर अच्छा नहीं किया गया । ॅ पहले घर पर कंकडी मारने से अच्छा था की हम चुकी रह जाते हो । अरे बहुत होता पीआरए को लोग थाने पर ले जाते हैं, हमारा क्या करते? माँ बोली उसी को ना ले जाने के लिए तो हमने ये खोला कोटा क्या जाने का? पर इससे हम से क्या मतलब था? ऍम मुझे मार चाचा चुप हो गया । वो सोचने लगा फिर में कहाँ की मुसीबत मोल ले ली पर साथ ही एक दूसरा स्वर्ण भी उसीके बेहतर टकराया । पियारी तो अपने परिवार की हो गई थी बिल्कुल भाई बहन की तरह । यदि उसके लिए मैंने कहा तो क्या बुरा क्या क्या उसका थाने पर ले जाना अच्छा होता हूँ क्या मोहल्ले वालों की नाक नाक करती? इसी संदर्भ में चाचा नहीं अपने कथन को न्यायोचित ठहराने का प्रयास किया हूँ । आने उसकी बात भी मानी पर गंभीरता से बोली मेरे लिए भी पी आर । पिछले कई वर्षों से घर का अंग हो गई थी । पर क्या करूँ और और घोडा जब एक बार फिसल जाते हैं तो फिर खडे नहीं होते । आप कुछ भी करें तो मेरे भैया बिहारी सही रस्ते पर चलकर भी किस लिए हुई औरत है । अब तो लगता है कि उसके उभरने का मतलब है स्वयं को डूबो देना । झाझा फिर आशंकाओं से घिर गया हूँ । अब तो गलती हो गई है । क्या करूं? जाकर लाला से मिलो और शमामा लूँ । एक गलती के बाद फिर दूसरी गलती । मैंने कहा अरे ऐसे तो नहीं सकते हो कि मैंने कहा नहीं किसी ने दुश्मनी वर्ष उडा दिया है । वो सोचता रहा हूँ अभी लाला ने तो कुछ नहीं कहा और ना ही कुछ कहलाया है नहीं तब क्यों परेशान होते हो? कान में तेल डालकर पडे रहो पर लाला करके आ सकता है करने को तो मैं तो आज कुछ कर सकता है । उसके पास पैसा है, सरकारी मदद है । जहाँ जा जब हाथ खडा रहा हूँ उसकी आंखों के सामने लाला की प्रेरित कराया । विशालतम हो गए हो क्या? सोचने लगे माँ की आवाज ने उसे झगडा हो रहा है । वो एकदम धरातल पढाया हूँ नहीं कुछ नहीं ॅ हो । जितना सोचोगे उतना ही परेशानी में पढोगे । माँ बोली वो तुम्हारा कर ही कह सकता है सभी लोग तो हमेशा घर में रहते हैं । डर तो मुझे हैं जिससे हमेशा घर के बाहर ही रहना है और मैं क्या कहूं इसको तो अपनी नेता नगरी से फुर्सत नहीं है । माँ मेरी ओर संकेत करके कहा ऐसा है तो कुछ दिन यदि संभव हो तो तुम रानी बहु का यहाँ ही रह जाऊं या जातियों जो सोचता जाता हूँ आतंक की छाया लंबी होती जाती हूँ मैं उसके गठन पर हस पानी कितने दिन दूसरों के भरोसे बच्ची रहा हूँ । अरे जैसे चलता है चलता रहेगा और जो पडेगा होंगी माँ के जुझारु व्यक्तित्व नहीं चाचा की बयान और मानसिकता को एक ठोकर लगाई और चली गयी । गंगा राम अपने दरवाजे पर चारपाई पर बैठा जैसे प्रतीक्षा कर रहा था तो फिर माँ को देखते ही बोला ऍफ आया था मैं चिट्ठी रह गया है । माँ की एनटीजी नजर मेरी और घूमी हूँ । मैंने भी समझा कि मुझे ही लिख कर दे गया होगा । तब तक गंगा राम ने पत्र माँ केवल बढाया जिसके चेक है उसी को दो माँ झुंझलाई और भडकर द्वारका ताला खोलने लगी है जिसकी चिट्ठिया उसी को तो दे रहा हूँ । गंगा राम ऐसा फॅार मुझे गाने से क्या मतलब अगर थमाते हुए माँ बोली ॅ गया था वहाँ से बिहारी ने आपके लिए भेजा जाये गंगा राम ने बताया दिया जलाते ही माँ पत्र पडने लगी हूँ आदरणीय जी जी जी अगर चरण पडी जब से मैं आई हूँ । आप लोगों की यहाँ बराबर आती रहती दिन तो किसी तरह भी जाता है पर शाम होते होते और जगह हुआ आँखों के सामने नाचने लगता है । लगता है कोठी से लौटने के बाद आप जरूर मेरी चर्चा करती हैं । भरना ऐसी घबराहट कभी न होती । एक हाथ से तली कभी नहीं बचती मेरी वहाँ से आने की जरा भी इच्छा नहीं थी, पर अभी मुझे नहीं आता हूँ । किन्तु की अगर परिस्थिति ही ऐसी आ गई इस समय भाग्य का ही खेल है । सोचा था की आपके साथ रहकर अपने पापों का प्रायश्चित करूंगी । और एक भले आदमी की जिंदगी झील होंगी पर लगता है भगवान को ये मंजूर नहीं । यहाँ यहाँ कोई कष्ट नहीं जानी । बहु ने भंडारे की सारी जिम्मेदारी मुझे सौंपी है और मेरे साथ लाडू को भी कर दिया है । प्रत्येक ग्यारह दिन भर में इस साथ लगा रहता है और राज को मेरे ही पास होता भी है । जैसे कभी जगह होता था सोते सोते भी । मुझे लगता है कि जैसे जब को ही हो रहा है पर जब आपकी खुलती है तब कुछ दूसरा ही बात भी हूँ । आखिर इतने दिनों का लगाव इतनी जल्दी थोडी छूटेगा, कभी कभी बडी रात तक जाती रहती हूँ । लालू पैर भी दवा आता है फिर भी नहीं नहीं थी । अपनी जिंदगी के संबंध में ही सोचती रहती ही दलदल से निकल कर फिर दलदल में तो ढकेलती नहीं जाउंगी । ॅ स्वराजजी के बाद सब ठीक हो जाएगा । भला स्वराज होगा भी । मुझे तो विश्वास नहीं होता हूँ । जब तक आदमी नहीं बदलता तब तक शासन बदलने से क्या होगा? हमारे देश में तो आदमी के चेहरे में बहुत जानवर घूम रहे हैं और अच्छी तरह जी रहे हो तो जब लालू अपने बारे में बताता है तो रोंगटे खडे हो जाते हैं । हैं कमीना रामलाल अभी भी अनाथालय का चक्कर लगता है । एक दिन उसकी चंद्र की झलक भी मुझे सामने वाले लाला के बगीचे में मिली थी । पहले तो आंखों पर विश्वास ही नहीं हुआ । खिडकी के झरोखे से मैंने बडे गौर से देखा हूँ । मैं संध्या के छोटे मोटे के छत पर दंड बैठक कर रहा था । मोटा कर साढे जैसा हो गया है तो मेरे झूठ कहता था कि वह बीमार है । दुबला हो गया है, मार रहा है । अच्छा हुआ कि मैं उससे चक्कर में नहीं आई । सोचती हूँ वहाँ क्या हो गया है । पुलिस को विचार और खोजती है और ये हैं मसूर चंड दंड लगा रहा है उस उसी के डर के मारे में बाहर नहीं निकलती हूँ । यदि उसने कुछ कर दिया होगा तो क्या कर होंगी? अभी पुराना की चल तो नहीं पाई । यदि नया की चल फिर उछाल दिया तो क्या करूंगी? कहाँ जाउंगी सोचती हूँ कि यदि फिर व्यक्तिगत सत्याग्रह चले तो मैं अपनी गिरफ्तारी दे दूँ क्योंकि यह संसार इस समय मेरे लिए एक बडा जेल जैसा हो गया है । शायद जेल में मुझे नया संसार मिल जाए । चलते समय ना तो मैं आपके चरण हो सकी और न माफी मांग सकी । इसका मुझे दुख हैं । मैं आपके उपकार को कभी बुलाया नहीं सकती । राज अभी मुझे याद है जब मैं अधमरी होकर खून से लथपथ आपके यहाँ आई थी । आपने मुझे दूसरी जिंदगी दी । अब मेरी माँ मैं कहाँ सुना माफ करें? गानी बहुत बहुत शाम को आती है और दिया जलते जलते लौट जाती है । क्या ऐसा नहीं हो सकता है कि किसी दिन आप भी उनके साथ चली आई? आपकी प्यारी मां मुँह पत्र पडती नहीं, गंभीर होती नहीं । अंतर आते आते उनकी आंखे बढाई और ऍम की आपकी तरह चलने लगी । लिखावट से मैं पहचान गया कि पत्र दान इसका ही लिखा है पि ऍफ आया हूँ क्योंकि वो लिख नहीं सकती । अनुभव और संघर्ष की अग्नि में उसके संस्कार परिक्रमा अवश्य है । उसकी वोर, कतार धुलती कहीं पर वह अक्सर ध्यान से अधिक ज्ञान नहीं पाई । धोर की अजान शुरू हो गई थी । अभी अंधेरा ही था ना मैं जगह था और ना मई । बाहरी दरवाजे की बडबडाहट के साथ ही शाॅप को की आवाज कई बाहर मुझे होती हुई निकल गई । फिर भी हमारे नींद ब्रह्मा माहौल की ठंडी हवा की गोद में अलसाई पडी रही बार बार की और तेज होती दस तक नहीं । हमें जगह कर ही दम लिया । अरे ये तो मेरे चाचा की आवाज है, जरूर कोई बात होगी वो करता में आंचल संभालती माँ नीचे नहीं पीछे पीछे मैं भी चला । गोला बेचकर हो गई थी क्या चाचा जाने लाया है, कब से दरवाजा बडबडा रहा है बल्कि बगल का रामनाथ भी बाहर निकल आया है । चाचा भुनभुनाता हुआ बेहतर चला गया और चौक में पैर रखते ही धीरे से भयातुर आवास में बोला बडा गजब हो गया तो हम उसकी भयग्रस्त मुद्रा ही देखते रहे गए । राज को चंद्र आया था । उन्होंने बताया राहत को अरे ऍम यही लगभग एक बच्चा होगा । चाचा बोला शराब के नहीं ले में लडखडाता दुकान का दरवाजा पहने लगा और ठीक हाँ ऍफ का बच्चा निकलता है या नहीं तब मुझे निकलना पडा । तब आपने क्या कहा? ॅ क्या हाँ जोड कर कहा वो चंद्र भैया यहाँ कैसे? तब बोला यहाँ नहीं हूँ । मैं तो लाला के पेट में हूँ । इतना सुनना था कि मेरे देखता ही खोज कर गए हूँ । मैं कुछ कह नहीं पाया हूँ केवल हाथ जोडे खडा रहा हूँ फिर खुद ही तडका हूँ ऍम खडा किया है निकाल पक्का अभी लाया कहकर में भीतर रेडी लेने चल पडा । तब तक मैं फिर बोला देख ही लाना यादव थी । चंद्र का बीडी को कहता था तो मैंने सिगरेट और दिया चलाई लाकर उसे दिया ऍफ जलाकर मेरी दुकान की ताकत पर पैर लटकाकर बडे इत्मीनान से बैठ गया । मैं चुप चाप खडा था फिर भैया जाना डाॅ क्या है? बैठता क्यों नहीं हूँ मैं सहमता सहमता उसके बगल में बैठ गया । जानता है मैं तेरे यहाँ इतनी रात को दूसरी बार आया हूँ । ज्यादा इसके पहले करवाया था उसने कष्ट खींचकर धुआँ सीधे मेरे ऊपर मारा । मैंने बताया कि कई वर्ष पहले होंगे के समय उस अंधेरे में भी उसकी बडी बडी आंखें झटक कर बाहर आते दिखाई थी । कॅश गया उस समय में आया था मिट्टी का तेल लेने और किस काम के लिए प्रश्न के साथ ही उसने ढूँढा फिर से मेरे ऊपर मारा फॅमिली का घर जलाने के लिए मैं हर प्रश्न का उत्तर यंत्र बता दिए जा रहा था क्योंकि इसके सेवा मेरे सामने कोई चारा नहीं था । हाँ उसकी आंखे एक बार फिर छटक कर बाहर आ रही हूँ और अंगार की तरह मुझे टकराई हूँ और आज आया तो और आज आया हूँ तेरा घर चलाने के लिए । उसके बाद मैं जोर से हसने लगा हूँ । यहाँ खडा खडा है कहता गया और माँ सुनती गईं । मैंने देखा चाचा अभी भयातुर हैं उसकी आंखों में रावण जैसा चंद्र का अट्टाहास अब भी काम रहा है । फिर आप ने क्या किया? मैंने पूछा आखिर में गया कैसे? मैं तो हाथ जोडकर माफी मांगता रहा हूँ मुझे यदि कोई भूल हो तो माफ करो चंद्र भैया । फिर भी वह क्रोधित साल की तरह गिर जाता रहा । ऍम चलाते हुए उसके पैर दबाने लगा । फिर उसी पटरी पर ढुला गया । अभी आधा घंटे के करीब हुआ है कि वह उठकर गया है । जाते समय फिर कुछ बोला मैं बाहर तो था नहीं । जहाँ जा रहे कहा उसके सोते ही मैं भीतर चला आया था । मैं चुप चाप उठा और चला गया फिर रात में हो तो सके नहीं होंगे कैसी बात करती हूँ । ऐसे में भला किसी को नींद आएगी । मैं तो दरवाजा बंद कर उसकी हाइट लेता रहा हूँ । झामपुर उसकी माँ विचारी तो इतना डर गई थी कि शायद ही उन्होंने किसी देवी देवता की मनौती छोडी होगी । पाँच चुपचाप सोचने लगती है तो हो सकता है ये सारा हुआ उसी दूरे दीवान का कोटा है और उसने बहुत बढा चाह अगर लाला से कहा है कमीनो को वहाँ से पैसा जो मिलता है, जितना नमक मिर्च लगाकर कहेगा उतना नहीं कैसी बनेगा और लाला उतनी दक्षिण देगा । खराब करना क्या चाहिए? चाचा की चिंतन व्याकुल होती है । सोचता हूँ की अभी लाला की कोठी पर चला जाऊं उसका पैर पकडकर माफी मांग हूँ नहीं तो यदि मेरे दुकान मेरे हाथ लगवा देगा तो हम बेमौत मारे जाएंगे । तालान में पडी चौकी पर अब हम बैठ चुके थे । माँ चुप चाप सिर पर हाथ रखे सोचती रही आखिर पुलिस क्या कर रही है ये ऍम रात के पहले का सिपाही भी उससे देखकर चुपचाप बगल से निकल गया हूँ । क्षणभर रुककर चाचा पुना बोला मुझे लगता है लाला से अवश्य मिलना चाहिए । पर मैं अभी उसके घर जाने की सलाह नहीं होंगी हूँ । देर करना भी खतरे से खाली नहीं । तब तो मैं काम करूँ माने उपाय निकाला हूँ । अभी जाओ ना होकर तैयार हों और करीब आधे घंटे बर्बाद तो मृत्युंजय के हनुमान मंदिर में जाओ । वहीं लाला दर्शन करने आता है । चरण शो कर अपने योग्य सेवा पूछना । यदि लाला कुछ खोलेगा तो माफी मांग लेना । और यदि नाला दर्शन का नहीं नहीं आया तो चाचा की मानसिकता विकल्प भी खोज के लिए भी तत्पर थी । नहीं नहीं मैं जरूर आएंगे । आज शनिवार है । मैंने कहा मेरे बोलते माने ऐसे घूरकर देखा हूँ को याद है जब आ जाएगी । वो नहीं चाहती थी कि मैं लाला के किसी संदर्भ में पढो । चाचा ऐसे समझ गया ऍम चला गया हर बात के बीच में बे मतलब तब तक पढना तुम्हारी इस आदत से मैं परेशान हो गई हूँ । हर साल बार मना किया है तो मानता ही नहीं । माने पहुॅच मैं मुझे इन सब चीजों से दूर रखना चाहती थी । उन का स्पष्ट निर्देश था केवल बढ्ने लिखने से ही मतलब रखूँ । करीब दो घंटे बाद चाचा फिर आया । उसके हाथ में हनुमान जी का प्रसाद था । माँ खाना बना चुकी थी । लाला तो मिला दोला बडे प्रेम से तो मैंने देखा चाचा की आकृति कर तनाव कुछ ढीला पडा है । उसने बताया कि मैं पहुंचा लाला हनुमान चालीसा का बात कर रहा था । पार्ट खत्म होते ही मैंने उसके चरण चुके हैं । उसने मेरे ठीक हो पाई । कुछ मुझे पूछा हूँ तुम लोगों के बारे में पूछा हूँ जब तुम ने क्या कहा ऍम क्या कहता? जो पूछता गया अगर बटाटा गया तो मैं माफी नहीं मांगी । उसने मौका ही नहीं दिया । ॅ समय उसने चंपुओं के विषय में जरूर कहा । कहीं लडका देखाया नहीं आपका जवान हो गई है उसके हाथ में लेकर दो तब तुम्हें क्या था? कहाँ की देख रहा हूँ सरकार जब चलने लगा दर मैंने इतना जरूर का जरा करपिया बनाए रहेगा । हुजुर तब क्या बोला केवल मुस्कुराया । हाँ जब आगे निकल गया तो पूजा के डोलची उठाने वाला उसका लंगडा नौकर आवश्यक उन बनाया उसे पूरा तो सुन नहीं पाया पर इतना कान में वर्ष पड गया । बडा का नहीं है । इस की कृपा भी बडी फॅमिली होती है । मेरी इच्छा हुई कि उस लगाने के संबंध में कुछ कहूँ पर माँ की ओर देखकर चुप रह गया । मैं सोचने लगी गजब का है लाला । इसके बाद और व्यवहार से जरा भी पता नहीं चला कि बूढे दीवान ने उससे कुछ कहा है या वे इसके संबंध में कुछ जानता है । एकदम अनजान बनता है और दूसरी ओर गुंडों से आतंकित भी करवाता है । गिरगिट की तरह रंग बदलने वाली उसकी मानसिकता कितने मुखौटे उतारती है और पहनती रहती है । मैं द्वारा नहीं जाने पर चाचा की घबराहट धीरे धीरे हल्की बढ गई थी । लाल को समझना हम लोगों की बुद्धि से परे तो मेरे भैया माने । उस समय नहीं कह कर चाचा हैं छुट्टी चाचा से तो मैं उस समय नहीं खुला पर सोते समय उन्होंने बताया लाला आज कोठी में आया था । मैं घंटों दीवानखाने में बैठा जानी बहु से बातें करता रहा हूँ । कुछ बार जरूर है तो इसके बाद मार्च हो गयी थीं । मैंने भी कुछ पूछा नहीं क्योंकि राजनीति के संबंध में ना ही मैं उनसे कुछ पूछता और ना ही मुझे कुछ पता नहीं । अब रामनाथ प्रेस में फॉरमैन हो गया था । उसे रोज एक अखबार दफ्तर से मिलता था । गंगा राम उसे ले आता था हूँ । मैं इस समय वही अखबार डिग्री की रोशनी में पढ रहा था । गर्मी काफी थी । हवा गुमसुम और आकाश में बादलों का नामोनिशान नहीं । अखबार से ही मुझे मालूम हुआ और मैंने ही माँ को पढकर सुनाया भी कि हर वार्ड में कांग्रेस कमेटियों का पुनर्गठन किया जा रहा है । उनके लिए अलग से ऑफिसों की व्यवस्था भी की जा रही है । वो रानी बहु के अनाथालय में भी एक कांग्रेस का मैं टिकाएं दफ्तर खुलेगा । परसों मार धार दो अगस्त को उसी का उद्घाटन है कांग्रेस डॉक्टर का या मनोहर कक्ष का माने टोका लगता है । उनसे रानी बहु की बातें हो चुकी थी । वस्तु था मैं समाचार समझने में कुछ बोल गया था । कुछ उसकी रिपोर्टिंग भी दोषपूर्ण थी । बात ये थी की रानी बहु ने अनाथालय के सबसे बडे कमरे की मरम्मत आदि कराकर उसका नाम प्रसिद्ध समाज से भी मनोहर लाल के नाम पर मनोहर कक्ष रखा था । उसी का उद्घाटन डॉक्टर भगवानदास करने वाले थे । बाद में इसी कमरे में वार्ड कांग्रेस कामेडी का भी दफ्तर खोला जाएगा । मैंने माँ को बताया कि उन्हीं की सूचना सही है । माँ सही पता चला कि डॉक्टर भगवानदास इस नगर के गौरव है, प्रसिद्ध दार्शनिक है और ऋषि तो ले उनका व्यक्तित्व । बात चली रही थी कि बाहर का दरवाजा खट का अंदाज लग गया कि गंगा राम अखबार मांगने आ रहा है । अपनी आकृति के अनुसार उससे उलट पलट कर देखा और मोडकर उसे थमाते हुए बोला आज बडी जल्दी अखबार लेने आ गए तो कुछ बोला तो नहीं केवल मुस्कुराया हूँ । उसने कार्ड मुझे थमा दिया हूँ । जब मनोहर कक्ष के उद्घाटन का निमंत्रण पत्र था, उस पर बकायदा मेरा नाम लिखा था । जयनाथ शर्मा महात्व टाॅस पडी क्या लोग? अब तुम्हारे नाम से भी निमंत्रण आने लगा । वो बोली और निमंत्रण से अधिक उन्होंने मेरे नाम को कई बार बडा कुछ सोचती रहीं । निश्चित ई में कुछ कहना चाह रही थी पर गए नहीं पाईं । लिखावट पर उन्होंने ध्यान नहीं दिया हूँ । मैं पहचान किया था की है, दानिश की है और इसे कौन दे दिया? मैंने पूछा एक आदमी आया था । उसने उस समय ये नहीं बता आया कि दानिश ने दिया है और मेरे यहाँ बैठा है । तब मैं उसी के लिए अखबार ले जा रहा हूँ । जीवन में यह मुझे पहला निमंत्रण पत्र मिला था । मेरे लिए सामाजिक मान्यता का सुखद सपना था और माँ के लिए रानी बहु की हार्दिक ममता का प्रतीक पर किसी को ये बाहर नहीं था कि ये महज दान इसका खिलवाड था । हमारे लिए तो उसका मौखिक आह्वाहन भी काफी था । मैंने उस निमंत्रण पत्र को खूब संभाल का एक पुस्तक में रख लिया । सोचा हूँ कल इसे सबसे पहले जनता को दिखाऊंगा फिर उसको ले जाकर अपने मित्रों को मेरी महत्वकांक्षा बाहर पकडने के लिए उतार ली थी । तुम तो जाओगी मैं । मैंने माँ से पूछा हूँ मैं क्यों जाऊं? क्या मुझे निमंत्रण पत्र मिला हूँ? मैं वहाँ की मुस्कुराहट की मिश्री में स्वच्छता की फास्ट थी । मैं चाहता तो कह सकता था कि निमंत्रण पत्र भले ही ना मिला हूँ । निमंत्रण तो मिला ही होगा वो पर मैं जो भी रह गया मैं बिस्तर ठीक करने लगी । जब तक मैं सोया नहीं निमंत्रण पत्र मेरे मस्तिष्क में पड पडा रहा हूँ । मैंने पहली बार डॉक्टर भगवानदास को देखा था । मीटिंग शुरू हो गई । नहीं है । बीच की कांट की ऊंची कुर्सी पर बैठे थे । एक और कलेक्टर मिले था और दूसरी हो रहा नहीं । बहुत इन कुर्सियों के सामने खादी के कपडे से ढका एक बडा टेबल था जिसपर भूल से भरे शीशे के दो गिलास फूलदान बना दिए गए थे । पी आ रही वंदे मातरम गा रही थी आज उसके अंगों की भंगिमा पहले जैसी नहीं थी । पर स्वर्ण में बडी प्रभावित ऍम मैंने देखा । डॉक्टर साहब मान स्थिर मुद्रा में ध्याना स्थित होकर सुन रहे हैं । भावातिरेक में उनकी दोनों आंखें चला ही । बीच बीच में आंखों के मोटी धुलाकर उनकी दारी के दुःख धवन जंगल में खोते जा रहे थे । अनाथालय का लॉस खचाखच भरा था । स्टीकर बाहर भी लगा दिया गया था । भीर सडक पर भी जमा थी जो ही प्यारी का गाना बंद हुआ । डॉक्टर साहब की मुद्रा टूटी । उन्होंने फोन डांस से फूल निकालकर आशीर्वाद स्वरूप प्यारी को थमा दिया । ताली बाजू थीं । पीआरए ने उसे मस्तक से लगाया हूँ । मैंने माफी और देखा । उन पर कोई प्रतिक्रिया नहीं थी । फूल लेकर बिहारी पीछे निश्चित ही मेरी माँ की ओर आ रही थी कि लाला ने आग्रहपूर्वक उसे रोक लिया और आपने बगल में ही बैठने को में वर्ष किया हूँ । एक फूल बडी असमंजसता में काटों के बीच ही सेट हो गया । सबसे पहले रानी बहु ने आगत बंधुओं का स्वागत किया और बडे विस्तार से मनोहर का परिचय दिया । उसकी बदली हुई मानसिकता और बलिदान की कहानी बताते बताते हैं उनका गला भर आया हूँ । यहाँ भी उनका भाषण लिखित था । फिर भी वह भावुकता में बहुत कुछ पहले जाते नहीं । बराबर अपनी पुरानी मान्यता को ही दौरा रही थी कि आज नहीं कभी खराब नहीं होता हूँ । प्रभु की अनुपम करती हैं । उसके विचार खडा हो सकते हैं, जिन्हें बदला जा सकता है । इसी संदर्भ में उन्होंने बाइबल से भी कई उदाहरण सुनाए और गांधी जी के भी है गए परिवर्तन की चर्चा की । मैंने देखा जब बाइबल और क्राइस्ट का जिक्र आया हूँ । फिर ले रानी बहु की ओर देखने लगा । पर जी वही गांधी जी का नाम आया था तो मैं गंभीर हो गया था । वो एक विचित्र बाद और थी । इस मीटिंग में जितने अवांछनीय तत्व थे, वे सब बुलाए गए थे । लाला नरेंद्र बहादुर, हमीर हर लालू कि बे तरह पीटने वाली रामलाल भी दिखाई पड रहे थे और सबको अच्छी तरह बैठाया गया था । मन कह रहा था कि ये यशोदा की ही कमी है, बस ही बहु की है । नीति कुछ जगह समझ नहीं आएगा । शायद इसी से नाराज होकर दानिश एकदम पीछे सुमेर चाचा के बगल में दीवार के सहारे बैठा था और छोटे सरकार वो भी जमीन पर ही विराजमान है । कलेक्टर साहब के पैर के पास और भी मुझे लडते हुए आज भी सोचता हूँ तो हंसी आती है । कैसे थे अंग्रेज परस्त लोग एक और मुझे भी रहते थे तो दूसरी ओर चरण चुमन भी करते थे । जानी बहु के भाषण के बाद ही दीप जलाकर डॉक्टर साहब ने कक्ष का उद्घाटन किया । उन्होंने अपने संक्षिप्त और गंभीर भाषण में जानी बहु के ही विचारों का समर्थन किया और देशवा समाज के लिए कुछ करने का आह्वान किया । इसी बीच मैंने देखा कि लाला के सामने वाले बगीचे का नौकर पंडित भीतर आना चाहता है । कुछ लोगों से रोक रहे हैं । उसके चेहरे से साफ जाहिर था कि कोई बडी बात हो गई । मैं काफी घबराया हुआ था । उसने इशारे से धान इसको बुलाया नहीं, पाॅच नहीं हुआ हूँ । किसी प्रकार पंडित बता के भीतर चला गया किंतु आॅल्टर साहब का भाषण शुरू हो चुका था । उसे एक कदम भी बढने नहीं दिया । ऍम नहीं लगेंगे । उनका भाषण आशा के विपरीत बडा ही सही था । हम लोग सोचते थे कि युद्ध की चर्चा करेंगे, उसमें सहयोग के लिए आवाहन करेंगे । लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया बल्कि रानी बहु की बात को ही पूरा किया और कहा कि है स्वयंसेवी संस्था है, बिना के सहयोग के नहीं चल सकती । है । इन की आपको रहे दिल से मदद करनी चाहिए । इतना सुनना था कि लाला खडा हो गया । एक केस रुपये मेरी और से डांसरो ग्रहण किया जाए । कहते हुए अपने अपने झोले से बटुआ निकाला और गिनकर एक एक के फॅमिली पर रखती है रानीबाग होने रुपया तो नहीं उठाया पर लाना को धन्यवाद आवाज दिया तथा अन्य लोगों से भी आर्थिक सहायता के लिए अपील की और कहा जिन्हें दान देना है वो सभा के बाद ऑफिस में पैसा जमा कर के ही ले लेंगे । फिर उन्होंने धन्यवाद देने के लिए दानिश को बुलाया । ये भी अप्रत्याशित था । हम लोग सोच रहे थे कि रामकिशुन या किसी और से गिलानी बहुत धन्यवाद दिलाएंगी । पर जो ही दान इसका नाम पुकारा गया, लोगों की डाॅ एकदम उसकी और चली गई । उसे खुद पता नहीं था कि उसे धन्यवाद लेना है । पहले तो उठा ही नहीं, फॅमिली हमारी किसी बात पर नाराज होकर पीछे बैठे । मैं उनसे आग्रह करती हूँ कि मैं मंच पर बंधा रहें और जिसके लिए हम सब देख रहे हैं, वे महत्वपूर्ण धन्यवाद् हमें दे बितना रहते ही हाथ का एक फव्वारा फूट पडा और दानिश भी धीरे से उठकर मंच की ओर बडा पंडित अब खडा नहीं रह सका । लाला से मिलने के लिए उसकी वॅार होती वो बढते बढते मेरे पास तक आया क्या वायॅर हो गया उसके मुख्य ॅ फिर जैसे उसने अपनी जवान को जबरन बंद कर लिया था । उधर दाने इसका भाषण चल रहा था । उस ने सभी आगंतुकों की उपास्थिति के लिए आभार प्रदर्शित करने के साथ साथ ये भी कहा संस्था अभी जान ले रही हूँ । आपके हर प्रकार के सहयोग की जरूरत पडेगी और विशेष रूप से आपके आर्थिक सहयोग की अधिक आवश्यकता पडेगी । पर संस्था उन्हीं का दान स्वीकार करेगी जिनका पैसा पवित्र हूँ । आपको मालूम होगा कि काशी हिंदू विश्वविद्यालय के लिए एक वैश्या ने अपनी सारी संपत्ति दे दी थी तो मालवीय जी ने उसे स्वीकार नहीं किया । उन का विचार था कि आप पवित्र पैसे से कोई पवित्र कार नहीं हो सकता हूँ । इतना कहते ही डानिश ने डॉक्टर भगवानदास की ओर देखा वैरी उसके गठन के समर्थन में सिर्फ ला रहे थे । अब क्या था? हाँ आपको की मिला डानिश और तेजी से भटका इसीलिए जिसका पैसा गंदा है । जो भी में मिलावट करते हैं, भोली भाली औरतों को भगाकर बेचने का धंधा करते हैं, गरीब बच्चों का अपहरण करते हैं और उन्हें अपाहिज करके भीख मंगवाते हैं । हमें उनको कर्मियों का पैसा नहीं चाहिए । ऐसे एक व्यक्ति के हजार रुपए की थैली पर हम रोकते हैं और उस एक पैसे को प्यार से मस्तक से लगाते हैं जो किसी गरीब की दारी से कम आएगा । है । जिस आवे और जिस ढंग से धान इसने कहा तालियाँ बज हो पर महान धीरे से बोली ये अपनी आदत से बाज नहीं आएगा । उधर रानी बहु भी लाने, इसका करता खींचकर भाषण समाप्त करने का संकेत कर रही थीं । किसी तरह दान इसका आवेश थमा । वैसे हम पर आया । उसने एक बार फिर आभार प्रदर्शन किया और बैठ गया हूँ । सवा समाप्त हुई । अब पंडित लाला से मिला । उसने कान में कुछ कहा लाला बाबा को था तो मैं क्या करो तो कर्म का यही अंजाम होता है । कुछ मौन रहेगा । लाला फिर बनाने लगा ही रहा ले । जैसे भागेंगे । गलत काम करेंगे तो मारेंगे नहीं तो क्या झंडा रहेंगे? मेरी दृष्टि में सो मारो और चंद्र की आकृतियां नाच गई । अलग खुद तो टेबल की ओर नहीं बढाऊं । किन्तु उसने पंडित की ओर से संकेत आवश्यक किया । उसने टेबिल पर पडे इक्कीस रुपये के सिक्के उठा लिए । किसी ने भी विरोध नहीं किया, किन्तु जब पंडित रुपया लाला को देने लगा तो उसने झुंझलाने का एक बार नाटक किया । अनाथों के नाम पर दिया हुआ रुपया अब भला में वापस लूंगा । ले जाओ ऐसे किसी अनाज की सेवा करूँ उसके कहने का आशय पंडित समझ क्या वह रुपए लेकर तीर्थ वहाँ से छोटा पर मैं समझ नहीं पाया की ना लाने के संदर्भ में उससे कहा इसी से लाला के गठन का पूरा ताकपर है । मेरे मस्तिष्क है बहुत दूर रह गया । अनजान में तो नहीं कह सकता हूँ पर लगता है लाला जानबूझ कर डाॅक्टर कराया तो लाख कर तो कम से कम अछूते मत मारों । उसने कहा और किसी उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना गया आगे बढ गया । बाहर से लेकर अर्दली दो साइकिलों के साथ खडा था, एक उसकी खुद की थी और एक साहब की । आपको जानकर आश्चर्य होगा कि उन दिनों फिनले भी साइकिल पर चलता था । लडाई के कारण पेट्रोल की कमी हो गई थी । जनता को पेट्रोल भी नहीं था तो उन दिनों मोटरों और बसों में एक भट्टी जलती थी और है उसी के सहारे चलती थी । पर अंग्रेज अफसरों को पेट्रोल मिल सकता था । फिर भी मैं उसका उपयोग नहीं करते थे क्योंकि उनके लिए पेट्रोल के नागरिक उपयोग का मतलब था अपनी सैनिक गतिविधि को कमजोर करना, देश के प्रति कटारी करना । अंग्रेज हमारे लिए चाहे जो रहे हो और अपने देश के प्रति गद्दार नहीं थे । फिर फिर ले । मैं तो एक फोन भी पेट्रोल खर्च करने के पक्ष में नहीं था । मैं कोई मामूली हस्ती भी नहीं था । कलेक्टर था जिले का मालिक उसके इशारे पर पत्ता खडकता था, फिर भी वैसी साइकिल से चलता था । लाला भी उसके साथ बाहर आया और बडे विनीत भाव है । गडबड आया तो जो आपको मैं अपनी बाकी से भेज दो, नहीं आपके पास कीजिए । लाला हु मूल लेकर रह गया । उसके बगल हटते ही छोटे सरकार खिदमत में आज हम क्या मुझे और अब आपको साइकिल से नहीं चलना चाहिए । उन्होंने कहा क्या हूँ चारों और क्रांतिकारियों की गतिविधियां तेज हो गए हैं । छोटे सरकार बोला इसका मतलब है कि हमें गोली मार दी जाएगी । फिल्म बोला और फिर ऍम मेरी मौत की चिंता नाकर । आप देश के जिंदगी की चिंता करें, बस में पुरा कहा और फिर आज नहीं लगा । मुझे लगा कि उसने हम सबके गाल पर जमकर चांटा मारा । हुआ पर छोटे सरकार डांटने फोर कर रहे या इससे अधिक उससे और आशा ही क्या की जा सकती है योगदान इसके भाषण की चर्चा सर्वत्र थी । ज्ञानी बहुत ही इस पक्ष में थी कि घर बुलाकर किसी को अपमानित नहीं करना चाहिए । मुझे धन्यवाद देने को क्यों नहीं कहा गया? मेरा नाटन और नाम मन किसी का गुलाम नहीं है । मैं जो भी उचित समझता हूँ कहता हूँ तनी बढाया है कब दबने वाला था की दो हमीद ने उसके भाषण की बडी तारीख की जाने से मिलकर उसने उसे बधाई दी हूँ । हमारी सबसे बडे व्यवस्था ये है कि हम किसी व्यक्ति को उसके इतिहास से अलग करके देख नहीं पाती हूँ बल्कि उसका इतिहास हमारे दृष्टि पद में पहले आ जाता है और व्यक्ति बाद में हमारे इतिहास बहुत नहीं । हम एक को उस बधाई संदर्भ में नियत संबंधी अनेक शंकाएँ उठाईं । हम समझ नहीं पा रहे थे कि अपने ही इतिहास से घटकर हमीद अब बदलने रहता है । इस बदलाव का कारण चाहे जो भी हो, हमें से ही मालूम हुआ किस्सो मेरो मारा गया । उसकी लाश रेलवे अस्पताल में पडी है । सुनने में आया की सोमारू और चंद्र एक मालगाडी पर साथ ही थे । चलती हुई ट्रेन से डब्बा काटने के प्रयास में सुमेरु फिसल गया और उसका पैर ट्रेन के नीचे आ गया हूँ । गठना जीवनाथ और रेलवे स्टेशन के करीब की है । चंद्र भाग निकला । दोनों पैर कट जाने के बाद भी सोमारू कुछ समय तक जीता रहा । उसने रेलवे पुलिस के सामने कोई बयान भी नहीं दिया । उसकी लाश लावारिस घोषित की जा चुकी है और मुगलसराय रेलवे स्टेशन अस्पताल में पडी है । मेरे मस्तिष्क लें । सहज ही अनुमान लगा लिया कि लाला और उसके आदमियों के लिए परेशानी का कारण क्या है? तो मेरे को चला गया और चंद्र जिंदा है अनिवार्य भगवान सुमेर चाचा बोलता हूँ लगता है उसके बाद का गाना अभी बडा नहीं । पापा मरैना खंड हर्ट है । हमीद ने तब भरना पडा और चाचा पार्टियों को भगवान भी जल्दी नहीं पूछता हूँ । पर रानी बहुतों ने पहुंचती है गांधी जी तो उन्हें पूछते हैं धान इस बोला और हस पडा उसकी हसी गांधी जी के हृदय परिवर्तन के सिद्धांत की हंसी उडाते निकल गई । मैंने देखा दूर खडा नरेंद्र बहादुर बडे गौर से हमें सुन रहा है तो हमेशा लाला के साथ ही रहता था । पता नहीं इस समय क्यों लाला उसे छोड दिया है हूँ ।

Part 4

भाग जाए । नॅार्थ था स्कूल बंद फॅमिली छुट्टी नहीं फाइनल की पढाई थी तो आज कुछ जल्दी कक्षा छोड दी गई थी । मैं घर की ओर लगता चला रहा था । लडकिया भी की और नाम थी । आज कार्यालय के नीचे भी लगी थी । बोर्ड पर चिपकाए गए अखबार के क्यारों और लोग जवान है । जैसे देश में कोई बहुत बडी बात हो गई हैं तो कहीं अखबार बिकता भी नजर नहीं आ रहा था । जिनके पास अखबार था उस पर कई आंखें एक साथ लगी थी । ऐसे कई झंड मुझे कम्पनीबाग के भीतर और बाहर दिखाई पडे । पर कहीं कोई कोलाहल नहीं । कहीं अशांति नहीं मैं एक हलचल मोहन अंतर्मुखी चल चल तूफान के पहले की शांति । उसी कंपनी बाग में हम ईद भी दिखाई दिया और दानिश भी हैं । ऍम में बैठा हुआ कुछ बोल रहा था । उसके भी सामने अखबार पढा था । लोगों से घेरे में ले रहे थे । मैं हमेशा की तरह है । अपना प्रभामंडल बनाया था । उस और मुन्ना मेरे लिए उचित नहीं क्योंकि काफी देर हो चुकी थी । वहाँ अवश्य रही होंगी । खबरें तो घर पर भी मालूम हो जाएंगी । अखबार तो गंगा राम लाल आता ही है । मैं सीधे घर आया हूँ । वहाँ की अनुपस्थिति द्वार पर काले के रूप में लटक रही थी । वो जहाँ में जान आई । चलो अच्छा हुआ हाँ अभी तक नहीं आई । मैं चाबी के लिए सुमेर चाचा की दुकान की ओर बढा ही था कि सामने से माँ भी दिखाई पडी । उनके साथ भी आ रही थी जनता है तो अभी आयोग । मैंने कहा तो इतना ही पर उनकी दृष्टि हमेशा की तरह वर्जन आओ कर रही थी । उन्होंने मेरी ओर चाभी बढाई और मैंने दरवाजा खोल दिया । देख भी आ रही है इसी को कह दे किस्मत का खेल महा बोलती रही जो जिंदगी भर अपने चारों ओवर गुंडे लफंगे को जमाए रहा और जो लाला से ऐसे टाइप का था जैसे वही उसका असली बारिश हो । मैं मेरा भी तो लाभार्थियों की तरह हूँ । हर लावारिस की तरह उसकी गिरिया भी हो गई होगी । पीआर की नाम आवाज ने माँ की बात पूरी की । कीरिया अरे कहीं लावारिस के भी कीरिया उठते हैं । मैंने कहा उससे वैसे ही गंगा में बहा दिया जाता है । पर रामकिशन तो बता रहा था कि लावारिश लाशों को जलाने के लिए फॅमिली में कुछ पैसे मिलता । निश्चित ही प्यारी ने सो मेरो की क्रिया के संबंध में और उससे पूछताछ ही थी । आखिर उसका लगाव तो धाही कभी दोनों एक ही नाव के सवार ऍम रास्ता अलग हो गया तो क्या हुआ वो छब्बीस नदियाँ जब वक्त की धूल झाडकर खडी हो जाती है तब वे वर्तमान को प्रभावित किए बिना नहीं रहती हूँ । इस समय तैयारी भी ऐसी ही प्रभावित थीं । नदियों का सैलाब आंखों उनको भी हुए जा रहा था जब उसने सुना कि म्यूनिसिपैलिटी का दिया हुआ पैसा कुछ लोगों की जेब में ही चला जाता है । फॅमिली आखिर तीस दिन के लिए आज भी बात पडता है । वो भी हमेशा आसमान सिर पर उठा लेता था और मेरा भी । कुत्तों की मौत नारी के लिए करो ना संक्रामक होती है । जहाँ उसने एक हेड कुछ हुआ, वहाँ दूसरा उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता हूँ । मैंने देखा माँ भी पिघलने लगी थी । दोनों अपने गालों पर हाथ रखे चारपाई पर कुछ समय तक बैठी रहीं हूँ । रानी हो कह रही थी कि मैंने अनाथालय की । मैंने जय राघव तो घाट पर भेजा था । माँ नहीं, मन भर क्या किस लिए जिससे सुमेरु की कीरिया हो सके । वहाँ बोली और विस्तार से बताया की मौत की खबर उसके गांव में पहुंचती थी क्योंकि वह मुगल सराय के पास के ही किसी गांव का रहने वाला था । उसके पट्टीदारी का एक भाई क्रिया कर्म के लिए गांव से आया था । उसने अपने को लाश का बारिश बताया । परपुलिस मानने को तैयार नहीं थी । मैं तो लाश के बारिश को घोषित कर चुकी थी तो बेचारे ने बडी मैं कोशिश की पर सब यार थक गया हूँ । सही है लाला के यहाँ भी गया था तो उसे डांट कर भगा दिया । दो लाख इसमें क्या कर सकता हूँ? ऍम पेश करता था उसका भाला कोई साथ देगा ऍफ का । जैसे बिहारी को विश्वास ही नहीं था तो अलग को समझती क्या हो । जब तक उससे उसका काम था तब तक है उसका था । अब उसकी लाश से उस को क्या लेना देना? गैर मैं उसकी तरफ दारी थोडी करेगा । ऍम को कानून के गिरफ्त में क्यों डाले? क्योंकि सुनाया है मरने के पूर्व के बयान में तो मेरे ने कहा है कि वह लाला का नौकर है और ये सब लाला के लिए ही करता है । लाला के ही लोग रेलवे की चोरी का मालवीय बेचते हैं । क्या आपको किस मालूम हुआ है? रानी बहु ने ही बताया है । फिर पुलिस उसके भाई को क्यों नहीं दे रही थी । दो पैसे चाहती रही होगी । बीस ॅ चलाने का पैसा खा जाते हैं । पुलिस लाइक देने के लिए पैसा चाहती है आदमी की लाश का आदमी सौदा कर हो क्या इस देश को पि ऍफ अत्याचार की चरम सीमा या तो मनुष्य की असम मैदा को ही क्या आवाज आती है तो यहाँ उसे विद्रोही बना देते हैं । ऐसा ही विद्रोह तैयारी में सुख दुःख गाने लगा था । मेरे मन में दान इसकी आवाज कॅश आने दवा जाती हूँ ये सब ठीक हो जाएगा । पर मैं जो भी रहा गया मान ही बताया की रानी बहु ने सीधे डीएम को फोन किया था और राघव को घाट पर भेजकर उसके भाई को राई पुलिस की कब जैसे दिलाई थी । मुझे ठीक याद है तो कुछ समय बाद माँ को सोचते हुए बडी गंभीरता से बोली थी आखिर एक औरत क्या क्या करेगी वो जीवित अनाथों की व्यवस्था करेगी अनाथ लाशों का उद्दार ऍर रानी वो इस विषय में भी सोच रहे हैं वो अनाथ लाशों की अंतेष्टि की संबंध में कुछ ठोस करने की चिंता में है । कुछ देर बाद ही गंगा राम अखबार लेकर आया और बडे उठता है । छूटते ही बोला गढाई शुरू हो गया है शुरू हो गयी अरे तो चल ही रही है वो । मैंने कहा गंगा राम ने बताया की उसका मतलब अंग्रेजों की लडाई से नहीं मैं तो आजादी की लडाई के विषय में कह रहा है कि वह शुरू हो गई है बम्बई के कांग्रेस महाधिवेशन में । गांधी जी ने देश को एक महामंत्र दिया है करो या मरो । अभी अभी जीवित रहना है तो आजाद हो घर ही जीवित रहो वरना देश के लिए मर जाता हूँ । मैंने सोचा तभी इस खबर को लेकर सारा शहरों बने लगाएँ बिहारी चारपाई पर ठंड की रही । माँ उठी और दीया जलाकर ले आई है उसके कहने पर मैं अखबार जोर से पडने लगा हूँ भारत छोडो प्रस्ताव पर अखबार वालों ने उतना जोर नहीं दिया था जितना उस प्रस्ताव पर गांधी जी द्वारा दिए गए भाषण पर भाषण क्या था? विस्फोट था एक निशांत ज्वालामुखी को आग बोलते मैंने पहले पहले देखा था । पार्टी सीधी और साफ तरीके से कही गई थी । अब हमारे और अंग्रेजों के बीच कोई समझौता नहीं । मैं नाम आपकी सुविधाएं क्या शराबबंदी लेने नहीं जा रहा हूँ । मैं तो जो चीज लेने जा रहा हूँ, आजादी है नहीं देना है तो कत्ल करें मैं गांधी नहीं जो बीच में कुछ चीजें लेकर आ जाए तो मैं आपको एक मंत्र देता हूँ करो या मरो । आप जेल को बोलता हूँ आप सुबह शाम यही कहें कि खाता हूँ, पीता हो साथ लेता हूँ तो गुलामी की जंजीर तोडने के लिए जो मारना जानते हैं उन्हें ही जीने की कल आती है । तो आज से तय करें की आजादी लेनी है तो नहीं लेनी है तो मारेंगे । आजादी डरपोकों के लिए नहीं है जिनमें करने की ताकत है वही जिंदा रहेंगे । ऍम जीतिया नहीं जो मसल दी जाए हम हाथ से भी बडे हैं हम शेर है की क्या दिया गांधी जी ने हम सबको आया था मार खाकर भी हाथ ना उठाने की बात तो वे कहते थे और मरने की बात पहले पहले उनके मुख से निकली है । शरूर आग लग जाएगी । लगता है देश में कुछ होने वाला है । माँ बोली पी आरी भी चार भाई पर उठकर बैठ गई थी । बीच नीचे का दरवाजा खोलने की आहट हुई । लगा कोई भीतर आया हूँ । राजधानी पहचानी नहीं हो यह तो रामकिशुन है । हम लोगों ने देखा वैसी रे चढकर ऊपर आ रहा था । गजब हो गया । राम के सुनाते ही बोला है गांधी जी अभी देश के सभी बडे नेता गिरफ्तार कर लिए गए और यही नहीं पता कि वह कहां रखे गए । देश में क्रांति हो गई है । एक साथ में वह कहता गया, आज के अखबार में यह सब तो नहीं निकला है । बिहारी बोली माने भी उसका साथ दिया आपका उडाई गई होगी? नहीं, ऐसी बात नहीं है । रेडियो से खबर आई है । ग्राम किशन ने कहा आज रात एक ही संबंध में रेडियो से लाॅरी भी बोलने वाले हमारे दिल धडकने लगे । एक विचित्र अनुभूति होने लगी । लगा जैसे हम सच मुझे आजाद होने जा रहे हैं । रामकृष्णन ने बताया कि थोडी देर बाद हम लोगों ने एक मीटिंग भी बुलाई है । इस समय मीटिंग किस लिए? मैंने पूछा । बात यह है कि गांधी जी गिरफ्तार हो गए हैं । उन्होंने कोई कार्यक्रम तो दिया नहीं है । आखिर कल सुबह हम क्या करेंगे? रामकिशन नहीं कहा हूँ हमें अपना तो कोई कार्यक्रम देना ही होगा । लडके उतावले देश का नया खून खौल रहा । गांधी जी ने तो कार्यक्रम दिया है करो या मरो । माँ बोली देश को आजाद कराओ या मार में तो बस यही तो एकमात्र कार्यक्रम हमारे पास है और कुछ नहीं । ग्राम केशन पांच बढाने का बहस करने की मुद्रा में नहीं था । उसे तो बिहारी को मीटिंग की सूचना भरते नहीं थी तो जल्दी ही आइयेगा । उसने चलते हुए भी आए हैं । कहा कहाँ हूँ आपके घर पर मीटिंग है क्या? नहीं मेरे घर पर नहीं वारंटी हरनारायण सिंह है क्योंकि सबके यहाँ तैयारी को आश्चर्य हुआ । वो तो पेंशन होगी है । जिसकी रोटी सरकार की कृपा पर निर्भर हो । उसके यहाँ सुराजी मीटिंग बात को समझ में नहीं आती । ऐसा समझती हैं । बात वैसी है नहीं । डिप्टी साहबी स्वराज के पक्ष में है । वो भी आजादी चाहते हैं । यह बात दूसरी है कि वैसे इसके लिए कुछ भी करना सकें । ऍम बोला और दूसरी बात ये है कि उनके पास रेडियो रात में प्रसारित होने वाला लॉर्ड अमरीका भाषण भी हम सुन सकेंगे । हमने समझ लिया की है दूसरी बात की मुख्य बात है सीडी तक बढ जाने के बाद वो ऍम जब वो तो मैं काम कर दोगे क्या सर अपने दोस्त दानिश यहाँ चले जाओ और उसे भी मीटिंग को सूचना दे तो गांव तो मेरे मन का था । मेरी अच्छा एक समय जाने से मिलने की थी पर बिना माँ की आज्ञा के मैं कैसे जाता हूँ । मैंने रामकिशन को कुछ उत्तर नहीं दिया । केवल माँ की ओर देखने लगा । गांव केश उनको मेरी की व्यवस्था का अनुमान लग गया । उसने माँ से कहा इससे जाने दो भाभी मेरे कुछ काम हल्का हो जाएगा । मुझे भी और कई जगह जाना है क्या? रानी बहू क्या जाओगे? नहीं उन्हें रात को कष्ट देने से क्या फायदा जो कुछ निश्चित होगा सुबह जाकर बता दूंगा । रामकिशन और मैं दोनों साथ ही घर से निकले हूँ । डांस का दरवाजा खोला था पर मैं घर में था नहीं । सलमान सामने दिखाई पडी । उसने बताया कि अभी अभी ढाई जान बाहर गए हैं, केवल बनियान पहने हैं । लगता है मोहल्ले में ही नहीं है । मैं भी ठीक हूँ क्या अम्मी जान दिए की धुंधली रोशनी में दालान में बकरी हो रही थी । मुझे देखते जैसे चेहरे पर ही हूँ ऍम इस बात की मुबारक अम्मीजान आजादी की हमारी खुशियाँ एक साथ जैसे चला खाई हूँ । ॅ रहा था कि कल परसों में देश आजाद हो जाएगा । मैं जो भी रह गया पर मन बोल उठा । आजादी की लडाई में सादा चार कदम आगे रहने वाला यदि उसकी उपलब्धि का अनुमान भी कुछ आगे घरे तो इसमें आश्चर्य क्या? आजाद होने के बाद क्या होगा? नहीं जान मैंने यूँ ही मुस्कुराते हुए पहुँचा हूँ । हमारे हम अपने देश के खत्म अख्तार हो जाएंगे तो हम किसी के गुलाम नहीं रहेंगे । मैंने वो धन लगे में ही देखा । उनकी मुखमुद्रा कि प्रत्येक झुर्री से इस एक स्वप्न झांक रहा था । बोलती जा रही थीं । दानिस बता रहा था कि आजाद होते ही हमारे सारे मसले हल हो जाएंगे । गृह होना बंद कर दूध की बाल्टी लेकर उठी और मुझसे बोली बैठो ऍम! मैं वहीं एक मछिया पर बैठ गया । थोडी देर बाद आने से आया हूँ मैं मुझे देखते ही जोर से चिल्लाया । ऍम बारह बाद भाई । हमारा बाद खुशी से गले मिलते हुए उसने मुझे लगभग जमीन से उठा लिया । किस चीज के लिए मुबारकबाद? मैंने पूछा आजादी कर ली है उसके लिए तो लडाई अब शुरू हुई है । आजादी अभी मैंने का भरे । महात्मा गाँधी ने कह दिया है अब हर हिंदुस्तानी अपने को आजाद समझे दानिस गांधी जी को बहुत कम महात्मा कहता था । लगता है आज तो गांधी जी पर बहुत खुश था । फिर मैंने डिप्टी साहब के यहाँ मीटिंग की बात कही और बोला मुझे तो विश्वास नहीं था कि तुम घर पर में लोगे । ऐसा माहौल और तुम अपनी मांद में लौटाओ । ऐसा हो नहीं सकता हूँ । मैं ऐसा और वो भी हसने लगा हूँ क्या करूँ ही जाने की समय बकरीद होती हैं और इनकी शख्त हिदायत है कि होते ही तुम दो पी लिया करो । लिहाजा इस वक्त घर पर रहना लाजमी हो जाता है । आजकल बडा शौक मानने लगे अम्मीजान का मैंने हसते हुए कहाँ वक्त यही एक बार ये मानता है अपनी जान बोली और सब हमास पडे हूँ धान इसको खुशी थी कि उसकी एक समस्या हालत हो गई हूँ है रात में बीबीसी सुनना चाहता था पिछले अभी अभी घर से गया था । दारानगर के रामनंद जी के यहाँ पर कोरा लौटा है । मैं घर पर नहीं ये भी हो सकता है कि उन्होंने रहकर कहलवा दिया उसके घर पर नहीं क्योंकि वह पक्के सरकार व्यस्त आदमी थे फिर दान इस को बुलाकर खतरा मोल क्यों लेते? दो दूध का गिलास मुझे थमाते हुए मैं बोला हूँ । सभी नेता गिरफ्तार हो गए । मैं रोज जी को बम्बई के ग्वालिया तालाब के मैदान में झंडा फहराना था । पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर मैदान के चारों ओर पहला लगा दिया । कडी चेतावनी के बाद भी अरुणा आसफ अली ने झंडा फहरा दिया । उत्साह में चिडिया के तरह उसकी आवाज को लग रही थी अब हम सरकार की हिदायत क्यों माने? अब हम आजाद है । फिर मुख्तार है मेरा माॅस् के वाइफ रिया उत्साह का साथ नहीं दे सका । मुझे तो एक नया नाम मिल गया था अरुणा फॅमिली हूँ मेरा मस्तिष्क उसी में उलझ गया । ऍम मैंने पूछ लिया ये अरुणा आसफ अली कौन है? फॅमिली को नहीं जानते हैं उसे । मेरे सामान्यज्ञान पर आशा था । फिर भी उसने बताया एक महान नेता अरे नेता तो होंगी पर ये बताओ और ऍम जोर से हंस पडा उसकी हम ही मेरा मजाक उडा भी निकल गई । पर मेरी जिज्ञासा ज्यों की त्यों बनी रही । जब मैंने दूसरी बार जोड दिया तब उसने बताया हूँ और अजय अरुणा नाम है उनका और फॅमिली उनके पति का । अरुणा का पति फॅमिली ऍम कुछ समझ में नहीं आई । मैंने कहा हूँ तो हिन्दू मालूम होती है हर पति मुसलमान तो इसमें तुम्हें आश्चर्य क्या बोला हरे पगले स्वराज के वहाँ इतना कोई हिंदू रहेगा और ना मुसलमान? यह सारी फिरका परस्ती खत्म हो जाएगी । आदमी महज आदमी रह जाएगा तो हिन्दू मुसलमान में शादी होने लगेंगे । ऍर होंगे । कितना विश्वास था उसकी आवाज में मैं पसंद है । उसकी आस्था पर मुस्कुरा उठा । मैंने मुडकर देखा । सलमा बडे प्यार से मुझे देख रही थीं । पानी का एक झोंका परस्कार निकाल चुका था । फिर भी बडी गर्मी थी । हवा गुमसुम थी । इतने दराई के लोग इकट्ठा हो जाएंगे । मुझे कल्पना नहीं थी । जहाँ एक और गांधी जी की जो आपने जीवी और आजादी को एक सुखद सपना मानने वाला तो चंद्रशेखर सिंह ऐसे लोग अपस्थित थे । वहीं ऐसे भी लोग थे जिन्हें आजादी से कुछ लेना देना नहीं था । वो आजादी का सही मतलब भी नहीं जानते थे । पर गांधी जी को देवता या अवतारी पुरुष मानते थे । एक ओर दीवार से सटे हुए तो मेरे चाचा थे । हमें था तो दूसरी ओर चार चार बीडी एक साथ सुलगाए हुए भारी भरकम गोलमटोल सुबह साफ डिप्टी साहब की माॅक उस खचाखच भरे बैठक में औरत के नाम पर एक मात्र प्यारी थी, जो शांत और उस माहौल में दबी सभी हूँ । मैं बैठक के भीतर अभी जा नहीं पाया था । कई बार जहाँ कार्य मेरी दृष्टि ने डाल इसको खोजने की चेष्टा की तो वह दिखाई नहीं दिया । इसी बीच मुझे शीतल मिल गया । ऍम मीटिंग में आया हूँ । मैंने पूछा नहीं मैं मुस्कराया तब यहाँ कैसे अब यही नौकरी करता हूँ । उसने बताया तो टीम में नहीं जाते हैं नहीं तुम्हारी माँ भी काम करती है । नहीं । उस ने कहा बेहतर कोठी नहीं है तो वहाँ की बातें पहले ऐसा फिर उसने बताया कि उसी बंबई तमाशे के फेर में मुझे हटना पडा । पहले तो मैंने बंबईया तमाशे का मतलब नहीं समझा । जब उसने बताया कि मैंने तो मैं एक बार दिखाया था दरवाजे की दरार से । तब मुझे हंसी आ गई । उसका कहना था कि छोटे सरकार रोज बम्बैया तमाशा करता है तो कोई ना कोई औरत आती है उसके कमरे में यही दोपहर के दो तीन बजे के करीब ऍम रोज दरार में झाकते रहे हो । मैंने कहा वो है मुस्कराया और बातों के क्रम में ही उसने बताया कि उस दिन झांकते समय वहीं लाला वाली कालीमठ कि पीछे से गुजरी । उस ने देख लिया फिर क्या ऍम गडी महार पढी होगी । मैं बोला हूँ मारना पडता है तो क्या फाॅर्स नहीं लगा मुझे शीतल बडा अच्छा लगा उस की आप कितनी ऍम और निर्दोष थी । उसने ये भी बताया यहाँ बडा आराम है । मुझे कोठी छोडने का कोई दुख नहीं तो किसी बात का है कि अब मैं बम्बैया तमाशा देखने को नहीं मिलेगा । वो इतना कर है हसते हुए मुझसे लिपट गया वो मोहल्ले में ही रहकर तो मुझ से मिले नहीं । शीतल मैंने पूछा मिलने की इच्छा तो बहुत हुई थी । कई बार मैंने तो देखा भी पर बोला नहीं सोचा चाची मेरी माँ और चाची कहता था बिगडेंगी क्योंकि मैं एक बदचलन लडका हूँ भैया । तमाशा जो देखता हूँ वैसे रखने लगा उसकी निर्विकार हसी कह रही थी देखने वाला बदमाश और वह तमाशा करने वाला नहीं । कितनी विचित्र है ये दुनिया । तब तक कपडे का बहुत साथ बैठ लिए । दूसरे ॅ यहाँ खडे हो तो मेरे साथ और वह मुझे भीतर ले गया । सभा शुरू हो गई । ग्राम के शून्य आपात बैठक के कारणों पर प्रकाश डाला और कहा स्तिथि विशन हो चुकी है । सभी नेता गिरफ्तार हो चुके हैं, जो नहीं हुए हैं तो आज रात विराट हो जाएंगे । गांधी जी ने करो या मरो का मंत्र दिया है । पर हमारे पास कोई कार्यक्रम नहीं है । हम क्या करें? सुना है अच्छे पटा धर्म जी बनारस में हैं । हमने उनसे संपर्क करना चाहते हैं । पर अभी तक उन से मुलाकात नहीं हो पाई । उडती उडती खबर है कि गिरफ्तार होते समय जब ग्यारह लाल जी ने गांधीजी से जनता के लिए कोई संदेश मांगा तब विशेष कुछ नहीं बोले । केवल इतना कहा हूँ कल से लोग करो या मरो या बहुत बांध हैं और इसी मंत्र पर चले हम लोगों ने वैसे तो बनवा ली है । इसके बाद उसने दाने से लेकर बैच दिखाया । वो कुछ वहाँ में बांधने के थे तो छोटे थे और उन्हें आलपिन से कमीज पर लगाया जा सकता था । इनके अतिरिक्त कुछ तख्तियां भी लिख कर तैयार की गई थीं । उन्हें भी दाने से लेकर रामकिशुन नहीं दिखाया हूँ । जिन पर लिखा था करो या मरो । अब हम आजाद हैं, कोई भी ताकत हमें गुलाम नहीं रख सकती हूँ । अंग्रेजो भारत छोडो आदि आदि । इन पंक्तियों को देखते ही मुझे मजिस्ट्रेट के सामने किया गया प्रदर्शन याद आया । रामकृष्णन बोल रहा था वो कल हम लोग बैठ लेकर जाएंगे, उपवास रखेंगे और एक बडा जुलूस निकालकर नेताओं की गिरफ्तारी के खिलाफ प्रदर्शन करेंगे । तब तक कोई न कोई कार्यक्रम तो हमारे पास आई जाएगा । हर बातें तो मेरी समझ में आती है पर उपवास की बात मेरे बल्ले नहीं पडती । आखिर उपवास से आजादी का क्या तुम लोग दान इस बीच में ही बोल पडा । इसे समझने के लिए वो ही चाहिए हम । केशव ने मुस्कुराते हुए बताया । गांधीजी के उपवास सिद्धांत का दार्शनिक पक्ष भी है और राजनीतिक भी । जब हम कोई महत्वपूर्ण कार्य करते हैं तो वह रखते हैं । हमारे यहाँ विवाह आदि शुभ संस्कारों के समय भी योग उपवास रखते हैं । इस दृष्टि से आजादी की लडाई को भी हम शुभकर्म ही समझते हैं । इससे हमारा मन पवित्र होने के साथ ही दृढ भी होता है । दूसरी बात यह है कि इससे एक राजनीतिक माहौल बनता है वहाँ पर मेरा इसमें विश्वास नहीं डानिश ने बुलाने का तो हमारा विश्वास नहीं है तो तुम खाना खा लेना । तुम को मना कौन करता है वो है ये क्षेत्र ढंग से जो भारत साहब ने जहाँ बीडियों का एक साथ कष्ट खींचते हुए धुल के ढोल के ही कहा कि लोग हंस पडे । आप क्या समझते हैं कि मैं बेटे या खत्म हो । यदि खुद होता तो आप जैसा ही भारी भरकम शरीर लेकर मसलने पर ढोलका रहता । धानी उत्तेजित हो उठा हूँ । व्यक्ति का बात नहीं, व्यक्तिगत बाद नहीं कई आवाज एक साथ उभरीं डाल इसको जो करा दिया गया हूँ स्थिति को रामकृष्णन ने स्वयं संभाला । अनेक लोग गांधी जी की बहुत सी बातों में विश्वास नहीं करते फिर भी उन्हें मानते हैं क्योंकि मान लेने में उन्हें कोई हर्ज दिखाई नहीं देता हूँ । मेरा खयाल है कि दाने जी भी मेरी बात मानेंगे किंतु ईमानदार आदमी हैं । अपनी आत्मा की आवाज कभी दबाते नहीं हैं और जो उचित समझते हैं उसे निसंकोच भाव से क्या डालते हैं? इस समय वाले ही वह विरोध कर रहे हैं । पर कल जितनी ईमानदारी से वे उपवास करेंगे, उतनी ईमानदारी से शायद हम भी ना कर सके । टेनिस का अहम जरा सी खेल से उस कार उठता था और कुछ करते हैं । पिटारे में बंद हो जाता था । इस समय भी ऐसी स्थिति थी । अरे भाई, एक हीरो जाते रहना है हर एक मुझे राज क्या मैं तो सिद्धांत की बात कह रहा था उसकी इतना के ही लोगों ने तालियां बजाईं । लगभग सभी ने रामकेश उनके कार्यक्रम का समर्थन किया । पर सुबह भारत साहब ने ऐसे ही लेटे लेटे योतिषियों के अंदाज में कहा हो सकता है कल इन सब की आवश्यकता ही ना पडे क्यों कि प्रियंका हमीद की तरफ से उठाई गई हो । जो भारत साफ कुछ बोला नहीं केवल बिजली पीता रहा हूँ । जब लोगों ने कई बार पूछा और जोर दिया तब उसने अपने शरीर को बडा कष्ट देकर थोडा सा उठाया और तटीय का सहारा लेते हुए बोला पहले आप लोग लाॅरी का भाषण ऍम जाने में आजादी की घोषणा करें । यदि आजादी की घोषणा करनी होती तो नेतागण गिरफ्तार न किए जाते हैं । दानिश बोला ही बात है तो हो सकता है फॅमिली जाएँ हूँ । भारत साहब ने कहा हूँ अगर हम भी गिरफ्तार कर लिया जाएंगे तो भी आंदोलन चलता रहेगा । जहाँ किशन ने बताया शहर कांग्रेस कमेटी इसकी व्यवस्था कर रही है । शंकाएं उठती रही, बहस चलती रही पर स्पष्ट तस्वीर किसी के सामने नहीं थीं । लोग अंधेरे वही आठ पाप मार रहे थे । लोग पसीने से तरबतर थे । धर्म से लडता बिजली का एक बडा पंखा चल रहा था । फिर भी पसीना शोक नहीं पा रहा था तो परेशान थे आप चिरप्रतीक्षित घडी आप पहुंची । इतनी साहब ने पहले से ही बीबीसी पर रेडियो की स्वीटी कर रखी थी । उन्होंने ही बताया कि अब लॉर्ड एंब्री बोलने वाले हैं । फिर एक गहराई आवाज में विलायती अंग्रेजी सुनाई पडा भरे के कान उधर लग गए पर शायद ही कोई उसे समझ रहा हूँ । मैं भी बडे गौर से सुन रहा था । इंडिया, गांधी रेवॉल्यूशन, रेल, टेलीफोन, डू और डाई आदि शब्दों के अतिरिक्त मेरे पल्ले कुछ नहीं पडा । तब भला सो मेरे चाचा या बिहारी आदि लोग यहाँ समझ पा रही हूँ । फिर भी उनकी मुख्य मुद्रा से लग रहा था मानव कोई बहुत बडी बात सुना रहे हैं । रेडियो के एकदम निकट कान लगाएँ । डिप्टी हरनारायण सिंह वो सुनते हुए कागज पर नोट करते जा रहे थे । हम लोगों ने तभी समझ लिया था कि एंटर मैं भाषण का सारा दिन सुनाएंगे और उन्होंने सुनाया भी अमरीका भाषण समाप्त होते ही रेडियो बंद कर दिया गया । निफ्टी साहब बडी गंभीरता से बोलने लगे । पहली बात तो आप लोग ये समझ लीजिए की सरकार आपको आजादी देने नहीं जा रही है । फॅमिली का कहना है कि सरकार इन नेताओं को गिरफ्तार करने के लिए विपक्ष हो गई थी क्योंकि गांधी जी के नेतृत्व में इन लोगों ने बगावत की योजना बनाई थी । अगर दिन गिरफ्तार न किया जाता तो देश में अराजकता फैल जाती हूँ । इन लोगों की योजना थी कि रेल रोक लोग संचार माध्यमों को नष्ट कर दो । टेलीफोन के तार उखाड दो सरकारी संपत्तियों को नष्ट डालू पुलिस स्टेशनों पर कब्जा कर डालो । सरकारी भवन पर यूनियन जाए घटाकर तिरंगा फहरा तो कितना रहेगा । डिप्टी साहब फिर अपना नहीं पडता है । एक घंटे के लिए शांति और गहरी हो गई । उसके बाद लौट साहब के भाषण का अधिकांश अन्य कांग्रेस और गांधी जी की आलोचना का है । तो पिसा बोले उन का कहना है कि जब देश पर दुश्मन मंडरा रहे हैं ब्रिटिश साम्राज्य संकट में तक इस तरह जनता को भडकाकर गांधी जी ने अच्छा नहीं किया बल्कि हमारे विश्वास की पीठ में छुरा होता है । फिर भी हम भारतीय जनता के साथ विश्वासघात नहीं कर रहे हैं । मैं शांति और धैर्य से काम लें । उनके नेता बडे आराम से रखे गए खानी पड बनाया वो विश्वासघात के सिवा । इन कमीनों ने हमारे देश और हमारे साथ क्या क्या है? पिछले युद्ध में हमारे साथ विश्वासघात नहीं किया । पिछले विश्वविद् की बात छोडो अब आगे की सोचो । डिप्टी साहब बोले उनकी उम्र तो अधिक भी साथ ही उनका व्यक्तित्व ऐसा गंभीर था कि दानिश ऐसा व्यक्ति भी उनके मूड नहीं लगता था । सभी उनकी इज्जत करते थे । लोगों ने उन्हीं से पूछा अब आप ही बताइए कि हम क्या करें? डिप्टी साहब और अधिक गंभीर हुए हैं । उनकी मुखमुद्रा पर कुछ आडी तिरछी रेखाएं बनी, फिर कुछ रुक रुककर असमंजस के स्वर्ग में बोलने लगे भाई क्या कहा जाए गांधी जी ने कोई कार्यक्रम दिया नहीं । कांग्रेस ने कोई कार्यक्रम दिया नहीं तो केवल भारत छोडो प्रस्ताव पर पास कर सकें । पर लॉर्ड एमरी के भाषण से लगता है कि कांग्रेस के पास कोई कार्यक्रम था । इतना कहकर डिप्टी साहब चुप हो गए । सब बडी उत्सुकता से उन की ओर देखते रहे गए । लगा की किसी रास्ते की ओर अवश्य संकेत दे रहे हैं । आज डिप्टी साहब काफी असमंजस में दिखाई थी । तब रामकिशोर नहीं पूछा हूँ आप किस कार्यक्रम की चर्चा कर रहे थे वो अरे लॉर्ड मैंने कहा ना कि कांग्रेस ने सरकारी भवनों पर कब्जा करना रेल की पटरियां उखाडने, दारवा टेलीफोन अधिक और ठप करने की योजना बनाई थीं । साथ ही डिप्टी साहब ने ये भी कहा इस कार्यक्रम में मेरा विश्वास नहीं होता । गांधी जी कभी ऐसा विदेश माता कार्यक्रम नहीं दे सकते हैं । क्या किसी को मेरी बात हो सकता था कि गांधीजी करो या मरो का भी मंतर देख सकते हैं । वो बडी आजाद के साथ दानिश बहुलावन बताया तो आप गांधी बदल चुका है । वह सुभाष बाबू के रास्ते पर आ रहा है । डिप्टी साहब को हाथ आ गईं । टन इसकी अगले बता पर नहीं तो हर उसके सुभाष प्रेम पाॅइंट में यही तय हुआ कि अभिनेता तो कोई नहीं है जो है भी वो कल तक आवश्यक गिरफ्तार हो जाएंगे । तब क्यों नहीं आंदोलन विद्यार्थियों को सौंप दिया जाए । उन्हीं को लॉर्ड अमरीका दिया हुआ कार्यक्रम दे दिया जाए और कहा जाएगी आप देश तुम्हारे ही हाथों में है तो सभी इसी निष्कर्ष पर समाप्त हुई हूँ । सभा किसी निष्कर्ष पर समाप्त हुई । लोगों की प्रतीक्षा थी । कॅश कौनसी आग लेकर पैदा होगा? पटाने बडे उत्साह था । डिप्टी साहब की बैठक से निकलते नहीं करते । वे हमेशा से टकरा गया हूँ । एक हमें हुआ अब हम लोग आजाद हो रहे हैं, अब तो क्या करेगा तेरे साथ में भी आजाद हो जाएगा । बर करेगा क्या? बेड कैसे चलेगा? आजाद हिंदुस्तान में कोई भूखा नहीं रहेगा । अमीर बोला और आजाद हिंदुस्तान में कोई पुलिस का दलाल भी नहीं रहेगा । डान इसने हमीद के स्वर में स्वर मिलाया और हसने लगा मैं अपनी गली की ओर मुड कर बीरू के चबूतरे तक आ गया । अचानक मेरी बगल में एक परिचित व्यक्ति आया और जो माल दिखाकर बोला हूँ कि तुम्हारा तो नहीं रहे नहीं दवा बता सकते, ये किसका है? लगता तो किसी वाले आदमी का है । ऍम तेज दिमाग के लडके का हो । जो मीटिंग में फॅमिली कराया था हूँ पहुँचता उसका संकेत धान इस की ओर था । ये आदमी भी डिप्टी साहब की बैठक में चुपचाप बैठा था हूँ । इस समय मेरे पीछे क्यों लग गया? बात कुछ समझ में नहीं आती हूँ और फिर कुछ विकसित ढंग से बातें करने लगा । जब तुम्हारे ऐसे बच्चे भी आंदोलन में भाग लेने लगे तब ये देश गुलाम नहीं रहेगा । राम किशोर जी बोलते अच्छा आएँ । निश्चित भविष्य के बहुत बडे नेता होंगे और मैं लडका डानी देश में जाने का मालूम होता है । लगता है क्रांतिकारी है ऍम दाने दाने इसका अर्थ होता है समझ सचमुच बडा समझदार है । लगता है कल वही नेता तो करेगा । कल कुछ होगा जरूर और होना भी चाहिए । बडा अच्छा लडका हूँ उसका घर तो तुम लोग जानते ही होगी पर मैं कुछ नहीं बोला हूँ । आॅडीशन भी तो रहते हैं । लगता है आप इस मामले में नहीं आए हैं । अब थोडा घबराया हूँ । मैंने कहा मैं भी आपको पहले पहले देख चुका हूँ हमारा मतलब मतलब यही की इस्तेमाल की तरह मैं भी आपको पहले पहले ही देख चुका हूँ । जोर से हंसा शायद मेरी सजगता को मैं उडा देना चाहता था । इतने में हामीद सिगरेट जलता हुआ पीछे से आ गया । उसने एक्सॅन व्यक्ति को थमाई और दूसरे से खास खींचते हुए बोला वो तो इतनी देर तक बिना सिगरेट के मीटिंग में बैठ रहा था । सिर में दर्द होने लगा । मैं भी कुछ ऐसा ही अनुभव कर रहा था । वहीं परिचित व्यक्ति ने कहा और लगातार कई काॅल खरीद के आने के बाद मेरा आगे बढना हो गया था । हम तीनों वही खडे रहे । अच्छा अब जाए तो पार्टी जी मैं तो हूँ ही । अमीर दो लाख और वे आदमी जो माल को अपनी जेब के हवाले करता हुआ बिना कुछ कहे सुने चलता बना, वो जब तक मैं जाता दिखाई देता रहा हम लोग तो क्या खडे रहे । गली से मूड जाने के बाद मैंने हमेशा से पूछा तो कैसे जानते हो मैं तो इसे जानता ही हूँ तो मैं से जानते हो या नहीं नहीं ये सीआईडी है हरी लाल त्रिपाठी धन ईद ने बताया हूँ । बडा ही शातिर और सरकार ऍम हूँ । मुझे की बात सही लग गया था । मैंने कहा तो मैं उसे कुछ बताया तो नहीं नहीं मेरे पास बताने को धाबी क्या कोई बातचीत तो है नहीं है । दानिश और रामकृष्णन चाचा का घर पूछ रहा था । अरे वहाँ राम ज्यादा सबका घर जानता होगा । तुम्हारी था ले रहा था, मेरा था ले रहा था हूँ । मैं कभी दिखाई देगा तो मैं उसके मोबाइल ही उसे जलील करूंगा । नहीं नहीं ऐसा मत करना । नहीं तो यही समझेगा की हम इतने ही मेरा भेद खोल दिया । हमीद बोला उससे हमेशा होशियार रहना हमें नहीं बताया । इस समय मैं ऑफिस गया होगा और मीटिंग की सारी रिपोर्ट देगा । हम लोग बातें करते गली के अगले मॉल पर आए थे और मेरे चाचा की दुकान पर भेड दिखाई थी । जरूर कोई बात है । मेरा मन बोला था । लगता है कि वहाँ भी कुछ ऐसी वैसी है । हमीद बोला कुछ आगे जाने पर उसकी आवाज स्पष्ट हूँ । मेरे तो चंद्र ऍफ सब साफ सुनाई पड रहा था । अरे तो मेरे भैया याद है उस पहली रात को मैं तुम्हारे यहाँ क्या करने आया था । वो मेरे चाचा चौक था हूँ । अरे बोलते क्यों नहीं की? मिट्टी का तेल मांगने आया था दूसरे का घर रोकने के लिए और दूसरी बार भी मिट्टी का तेल ही मांगने आया था तुम्हारा घर फूंक के लिए और मेरे भैया आज भी मिट्टी का डेली मांगने आया हूँ खुद को फोन करने के लिए । इसके बाद उसकी आवाज नाम हो गई हूँ । अब मेरे आगे पीछे कौन रह गया है जो मुझे तो करेगा । इसके आगे पीछे इतने लोग थे वो सुमेरु भी आखिर सच्चाई फेंका जा रहा था । इतना कहते कहते उसका गला भराया । हम दोनों दूर पर ही खडे होकर सुन रहे थे । मेरे मुँह से निकला लगता है पी कर आया है वही मैं भी दूसरे गौर से सुनना लगा था । फिर ऍसे बोला वो पश्चाताप में खुद एक नशा होता है । जब वो इस नशे में जब आदमी डूबता है तब उसे उसके को करते, ॅ बनकर खाने को दौडते तो तब आदमी अपने परिंग खींचता है, चिल्लाता है होता है मैं देख रहा था चंद्र होने लगा था इतना क्या सुबह और लाला के लिए और अंत में उसकी लाश को भी पहचानने से इंकार कर दिया उसने । आदमी कितना खुदगर्ज जैसे मेरे भैया! अब मैं समझ रहा हूँ ऍम समय कोई साथ नहीं जाता तो केवल अपना धर्म करा नहीं साथ रह जाता है । पर मेरे पास धर्म कर्म के नाम पर क्या है? भारत खाली का खाली वो भी अनेक बातों से रंगा हुआ हूँ जो बडे ऍम है थे । चंद्र को कोई कुछ बोल नहीं रहा था । उन्हें विश्वास नहीं था की है उसका पश्चाताप भैया नाटक है क्योंकि चंद्र की जो तस्वीर लोगों के मनों में बैठी हुई थी ये चंद्र उससे बिलकुल भिन्न दिखाई दे रहा था । ऍम इसीलिए अविश्वस्त भी था किंतु हमे कुछ और जानता था । उसने बताया कि सुमेरू के साथ किए गए लाला के व्यवहार से जान डर बडा दुखी हुआ था और प्रोजेक्ट थी उसने इतना बडा पत्थर उठा लिया था । हालांकि को मारने के लिए की क्या बताऊँ यह तो कहो कि बहुत से लोगों ने उसे पकड लिया । यदि है उसे पटक देता तो लाल टाइम हो जाता हूँ । ऍम के लोगों ने उसे मारा नहीं । मैंने पूछा किसकी हिम्मत जो वहाँ चलता क्या? चंद्र किसी से कमजोर है? हमीद बोला हूँ । अरे हजार गाली उसमें सुनाई लाला को पर लाला एक्चुली हजार जो लाला की ही वजह से तो छोटा सा बना घूमता है वरना जेल से भाग जाएँ । अब तक पुलिस पकडकर बंद कर देती हूँ । यह तो है ही है । हम ही बोला पर लाला का सारा कारोबार में तो चंद्र ऐसे लोगों की बदौलत चलता है । फिर लाला कि राई रत्ती भी जानता है, उससे नाराज कर रहे । कितने दिन चल सकता है । लाला के बिना ना चंद्र रह सकता है और न चंद्र के बिना लाला फिर भी कई समय बिल्कुल नाराज है । लगता है अब उसका लाला से कोई वास्ता नहीं रहा हूँ । आप भी अपने कर्मों के घेरे में ही कहता जाता है । एक के बाद एक है उस की ख्याति के धन पर । जब भी देख रहे नहीं यदि मैं सत्कर्म हुए तो उसकी सुबह से सारा समाज में हैं, कटता है । यदि वे दुष्कर्म हुए तो एक ना एक दिन व्यक्ति को अपनी ही गंजू आशाहीन हो जाती है । सारी तहों को नोचकर देख देना चाहता था और तब तक में इतनी दर्द हो जाती है कि उनके शरण को आंखों से बहने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं रह जाता हूँ । इस समय सच मुझे चंद्र की आंखों से उसका बाप भी बढ रहा था और पश्चाताप में डूबते हुए कोई ऐसा नहीं था जो हाथ पर कल घरों से उबर सकता हूँ । ॅ सहारे के लिए भी वृद्धावस् कर रहे गया

Part 5

भाजपा आएँ । सवेरे से ही एक प्रजक्ता सूरज वाला होगा नहीं था । एक और खांटी जन्म लेने के लिए झटपटा उठी थी । नेताओं की गिरफ्तारी पर आज पूर्ण हडताल थे तो दुकाने तक बंद ही सडकें अभागे भिखारियों की हथेलियों की तरह खुली और सुनसान बर्दाश्त नहीं नहीं आजादी के झारखंड से भरी हुई हूँ । धीरे धीरे लोग गलियों से सडकों पर निकल आए थे । पर कहीं पर भी पुलिस का नामोनिशान नहीं । मैदागिन के चढाये को भी पुलिस नजारा थी । ऐसा लग रहा था कि कहीं कोई शासन नहीं है । सारी ब्रिटिश सकता कपूर की तरह उठ गए हैं । गालियाँ आपने नित्यक्रम में ही व्यस्त हैं । वहीं बीरू के चबूतरे पर भी सरकारी बम्बई पर पानी के लिए छीना झपटी पर ऊंचे खंबे पर टंगा म्यूनिसिपैलिटी काॅपी धुआँ कर रहा था । पता है आज पी पा नहीं आया है । वो भी आजादी की खुशी मना रहा है । सुना है रामकिशन आज बहुत लडके आया है और बिहारी को कहीं ले गया है । क्योंकि कल डिप्टी साहब की मीटिंग के बाद पी आरी मेरे यहाँ ही रह गई थी । वो आखिर उतनी रात को जाती कहाँ हूँ? मैंने उठते ही सब के संबंध में माँ पूछा बिहारी चाची गई क्या? हाँ बिना मेरी और देखें । नितांत उपेक्षा भाव से माँ बोली हो, कहाँ नहीं जहाँ से आई थी । फिर मैंने उस से कुछ भी नहीं पूछा क्योंकि मुझे लगा कि इस समय माँ की मुद्रा ठीक नहीं भी अजीब थी । कभी कभी उनकी मानसिकता हिमालय की तरह गंभीर हो जाती हूँ और कभी सावन भादो की तरह रंग बदलने लगती । उनकी प्रकृति का यह संतुलन शायद लंबे अरसे तक उनके वैध भोगने का ही परिणाम था । जब मैं हमेशा की तरह कोठी जाने के लिए निकली दम मैं भी गली में आ गया और सीधे सुन मेरे चाचा की दुकान केवल बढाओ वहाँ भी अच्छा खासा जमा बडा था हूँ । द्वार पर ही चल तो खडी थी । उसने मुझे देखते ही पुकारा । यद्यपि आजकल वह मुझ से बहुत कमी बोलती थी, केवल कम से कम रखती थी क्या? मैंने उसके पास पहुंचते ही कहा मैं पहले मुझे चुपचाप देखती रही । फिर धीरे से बोली देखो आज सडक पर मचाना क्यों गोली चलेगी? उसकी भय से काम दिया आज मुझे छूकर जैसे फिर उसकी आंखों में ही सामान नहीं । मैं नितांत भयातुर दृष्टि से मुझे देखती रही । फॅमिली चलेगी तो चलने दो, यही होगा ना कि मैं शहीद हो जाऊंगा पर मैं जाऊंगा हूँ इस बार मैं नहीं मेरी दीवान ही बोली थी तो आप विश्वास नहीं करेंगे । मैं मेरा हाथ पकडकर मुझे देखती रह गईं जबकि उसका चलता तो मैं मुझे किसी कमरे में ले जाकर बंद कर दी थी । किंतु होना आग्रह कर के ही रह गई । मेरी बात मानो मध्य चाहूँ तुम्हारे एक आदमी के जाने मचाने को देश की आजादी पर कोई असर नहीं पडता हूँ । एक एक से तो ही बनता है । अनेक अनेक का सीधा संबंध है आजादी से । मैंने कहा मैं कुछ बोली तो नहीं केवल देखती रही मानो उसकी आंखें कह रही हूँ मेरा तो सीधा संबंध हैं मैं एक से अठारह तुमसे भीतर से । चाची ने तो कारण भी मेरा हाथ छोड कर चली गई और उसकी आंखें मुझे पकडे रही । बहुत दूर तक पकडे रही हूँ । दुकान पर पहुंचकर मैंने एक बार फिर भीतर की ओर झांका और भी मुझे देख रही थी वो सुना है आज स्कूली लडके अंग्रेजी शासन को उखाड कर फेंक देंगे तो मेरे चाचा की दुकान पर मंगरू बोला टेलीफोन के तार डाले जाएंगे, रेल रोक ली जाएगी । सरकारी इमारतों पर तिरंगा फहराया जाएगा । गए एक सांस में और जाने जाने क्या कह गया उसकी आवाज में तेजी उतनी नहीं थी जितना इनका लाभ भी उत्साह था । हूँ । आश्चर्य तो मुझे था कि मंगरू जैसा जाहिल जा पाट ये सब जन कैसे गया? आवश्यक ही पूरे माहौल में क्रांति की लहर दौडने लगी है । आज महेश भैया तुमने सरकारी रोशनी नहीं हो जाएगी और न सीढी लेकर निकले मेरे चाचा नहीं पी पा से पूछता हूँ सोचा जलने ही दो रोशनी नहीं तो आजादी कैसी भी बा बात टाल लेंगे । पढ रहे थे, कुछ था उसने भी सुन रखा था कि आज गोली लडके टेलीफोन कतार काटेंगे । ॅ नहीं मैं तेरे लेकर निकला और वही इनका रही से अपना कार्य आराम कर देंगे तो मैं क्या करुंगा? नौकरी तो खतरे में पड जाएगी इसलिए वह काम पर निकला ही नहीं । स्थिति विचित्र थी । कुछ लोग आजादी को अवश्यंभावी समझते थे । कुछ अतिवादी जो इसी झड से अपने को आजाद हो गया, अनुभव करते थे किंतु कुछ दीपा ऐसे लोग भी थे जिनके लिए ये महज आंधी थी जो कुछ उखाड कर कुछ कर कुछ तोड फोड कर चली जाएगी तब क्यों नहीं से बैठ कर ही कमा दिया जाए । आंधी आवे बॅाम्बे की नियर से ही आज भी पास सवेरे सवेरे चाचा की दुकान बढा नाम खाता और बातें लडा रहा था । अच्छा जब स्वराज हो जाएगा तब तुम क्या करोगे? समय भैया उसने यही पूछ दिया मैदागिन के तलाब में चलकर पानी पीटूंगा समय चाचा ने बडे विकसित ढंग से कहा और सभास् पडे । अरे बदले आजादी आने पर हमारी हमारी स्थिति पर भारत तो नहीं पडने वाला भारत तो आएगा बडे बडों की स्थिति में तो लालटेन जलता और तेल चुराता ही रह जाएगा । ऍफआईआर आ जाएगा । लोग हंस पडी । महेश को तेल चुराने वाली बात सार्वजनिक रूप से कहने पर जरूर पूरा लगा था हूँ है । उसने सुमेर चाचा की नियत पर सीधा प्रहार किया । पांच नहले पर दहला मान ली गई और मजाक उड गई । इसी बीच मेरी दृष्टि गली के मोड पर पडी हूँ । जवाहिरी इशारे से मुझे बुला रहा था । एक दिन सुमेर चाचा ने किसी बात पर उसे डांट कर भगा दिया था । तब से वह चाचा की दुकान पर नहीं आता था । मेरे पहुंचने ही रहे । बोला हूँ । फॅमिली पर झंडा तंग ने भी बोला और बताया कि नौ बच्चों के घंटे भर ही हरिश्चंद्र, डीएवी कॉलेज आदि के लडके वहाँ इकट्ठे होंगे और जुलूस बनाकर चलेंगे । भैया मैं भी जाऊंगा हूँ । सुना है गोली चलेगी । मैंने कहा मैंने भी सुना एॅफ उसके आगे आगे थोडी जाऊंगा जुलूस में रहूंगा जरूर कराऊंगा किनारे किनारे जहाँ भी गडबड हुई की गली में हो जाऊंगा मैं छुपी था मेरे चेहरे पर मुस्कुराहट डॉट कहीं मानो मैं कह रही हूँ तुमने जीवन भर तो यही किया है उसने मेरी मुखमुद्रा बाली और फिर अपने गठन भर पछताने लगा । आखिर अपनी और सुधारें तो कैसे सुधारें । कुछ देर मौन रहने के बाद है बोला फिर सोचता हूँ की क्यों नहीं में आगे आगे चलूँ और कचेहरी पर चढकर खुल झंडा तंग हो, बहुत होगा । पुलिस की गोली का शिकार हो जाऊंगा । जब तुम ही नहीं रहा होगी तब क्या होगा? मेरा दिया तो रहेगा । मेरी शवयात्रा में हजारों लोग जाएंगे । हर साल मेरी जयंती मनाई जाएगी तो मेरी प्रशंसा में गीत गाएंगे । मैं अमर हो जाऊंगा । जब तू हमारे मैंने देखा उसकी आंखों में स्वास्थ्य करने लगे । भले ही आरोपित ही रहा हूँ । इस बीच उधर से हमीरपुर रहा हूँ । मैं जहाँ माहिर को देखकर बोला अगर जवा हीरा कहाँ घूम रहा है, यहाँ सीधे घर से चला जाए । ॅ पर है तो उसमें जाएगा । उसके चेहरे पर झंडा टांगने । मैंने कहा ये साला क्या करेगा? पुलिस को देखते इसकी पैंट खराब हो जाती है है झंडा डालने के लिए पांच शेर का कलेजा चाहिए कलेजा तब का किसी ने पीछे से मेरी वहाँ पकडकर बडी बेरहमी सकती हूँ और मुझे जी पहले चली हूँ । ये मेरी माँ थी, अभी तो गई थी और अभी आई नहीं लगता है वातावरण की गंभीरता के कारण मैं रास्ते से ही लौट आई हैं जो बाद उन्हें अप्रिय ही हो गई थी । वो मैं कभी नहीं चाहती कि मैं हमीद और जो आखिर जैसे आवारा लडकों से बात करो । हिंदू जब मैंने बताया कि वे अचानक मिल गए थे और मैं खुद उनसे दूर रहता हूँ, तब परेशान हुईं । फिर भी उन्होंने पूछा कहाँ जाने की बात हो रही थी जुलूस में मैं धीरे से बोला मैं छुट्टी नहीं । फिर उन्होंने साढे बदली । अक्सर घर आने के बाद बाहर की साफ साढे उतारकर रख देती है और घर की दूसरी साडी पहन लेती हैं । अब मुझे विश्वास हो गया कि वह घर से नहीं जाएगी । मेरे लिए ये सबसे बडा बंद था । मुझे लगा कि मैं पहले कमरे में बंद कर दिया गया हूँ । एक बंदी की चेतना मेरे भीतर छटपटाने लगी है । कैसे माँ कहीं जाएं और मैं बाहर निकलो पर ये होने का नहीं । मेरे लिए समय भागने लगा था और सोलह स्थिर हो गया था । मैं अपने आंतरिक तापसे ही जलता जा रहा था । मेरी ॅ नहीं । मुझे मुखर ता के बिंदु तक धकेल दिया । जानते हुए भी मैंने पूछा मेरा खद्दर का कुर्ता किस बक्से मैं क्यों मैं उसमें जाऊंगा हूँ । माँ की इच्छा के विरुद्ध आगे बढने की मुझ में हिम्मत कहाँ से आई? हाँ चुकी थी है । मेरा मोड देखती रह गईं । सुना है गोली चलेगी । पीती पिटाई आशंका उन्होंने अपना दौरा दी तो मारा जाऊंगा । मैं बडे सहज भाव से बोल गया । ये क्या हो गया था मुझे ॅ दिया उन्हें ऐसे उत्तर की आशा भी नहीं नहीं होगी ना । मैंने भागने की बात कही न बचने की बात कहीं । सीधे सीधे मृत्यु का वरण मैं नहीं बोला था । मेरे मध्यम से एक पराधीन देश की विद्रोही आत्मा बोली थी । माँ का आश्चर्य अपने चरम बिंदु पर था । पहले तो उन्हें लगा किसी ने इसे सिखाया है किंतु मेरी मुद्रा करवानी की सहायता से मैं स्वयं समझ नहीं केस के भीतर इसका हो गया है । वर्तमान विद्रोही हो गया है और भविष्य की आशा वाॅक बुक आने लगी है । बडी देर तक मुझे देखती नहीं और सोच नहीं नहीं जो लो उसमें जाकर तुम क्या करोगे? कचेहरी पर झंडा तंग होंगा । यदि मारा गया तो इतिहास में जिन्दा रहूंगा हूँ । उसके बाद मैंने जाहिर का बोला गया संवाद क्यों का? क्यों दोहरा दिया? आवाक रह गईं । यह पहला अवसर था मेरा विद्रोह अपनी पूरी असमिता ऍम उनके समझ खडा था तो मैं समझ नहीं कि आंख की नदी पर बांध नहीं बनाया जा सकता हूँ । कुर्ता पैजामा से अच्छा है कि तुम पैंट कमीज पहनकर जाओ । उन्होंने कहा हूँ । यहाँ शब्द सुनते ही लगा कि मैं बंधन मुक्त हो गया हूँ । मेरे चारों ओर की दीवार भरभराकर बिखर गए हैं । मैं एकदम उछाल बढा और माँ अकेले पड गया हूँ । और हाँ बिल्कुल गंभीर उनकी आगे भरी । वहीं सपनों से नहीं हरण आशंकाओं से नहीं हूँ । ब्लॅक तो पहले ही था । कमीनी ऊपर से डाल ली और फिर से उठ जाने का हुआ हूँ । मैंने देखा माँ थियां के पच्चीस नहीं लगी । मैं उनका एकमात्र पुत्र था । पता नहीं किन परिस्थितियों का सामना करना पडे । मैं एकदम घबराई हुई थी हूँ । मैं आगे बढकर भी पीछे लौटा और उनके चरणों पर गिर पडा । उन्होंने मुझे उठाकर सीने से लगा लिया हूँ । आंखें झडती नहीं । उन्होंने तो अपने बच्चे को सीने से लगाया था । पर रोमांचक अनुभूति ऐसी हो रही थी मानो भारत वहाँ काम में लाल को सीने से लगाकर रण क्षेत्र में भेज नहीं हो । जो लोग ठीक दस बजे उठा लूँ, अंग्रेजी साम्राज्य की बदन में लगी क्योंकि तरह वो आगे बढने के साथ साथ धीरे धीरे बडा होता गया । कुछ लोगों ने बडी बडी रस्सियों में लोहे की अंक उसी जैसी कोई चीज बांधनी नहीं । किसी को लोग देखकर टेलीफोन के तार में फंस गए थे और जोर से खींचते थे । जब तक करतार डोर जाता था नारे लगातार और वंदे मातरम गाता हुआ जो आगे बढा बडा आश्चर्य था । आज वंदे मातरम गाने के लिए बिहारी नहीं थी हूँ । ये पहला सुराज ियों का जुलूस था जिसमें कोई औरत नहीं थी । लोग बातों पर खुली खिडकियों से आतंकी दृष्टि से झांक रहे थे, नारे लगाते हैं और उछलते होते थे । हम दीवाने आगे बढे चले जा रहे थे । कहीं कोई पुलिस नहीं थी वरना पुल तक जाते जाते एक पुलिस वाला दिखाई दिया तो हमारे नौजवान साथी उपल पडे, एक दो लाल पकडी खेल तो एक दो विचारा पुलिस वाला दुम दबा घर किसी गली में तो क्या नौजवान पसंद थे पर कुछ गंभीर लोगों को ये बात अच्छी नहीं लगी । उन्होंने एक नए नारे को जन्म दिया । पुलिस हमारे भाई हैं । अब पुलिस हमारे भाई हैं और अंग्रेजों भारत छोडो का नारा लगता जुलूस कचेहरी की त्रिमोहानी पर पहुंच चुका था । वहाँ हमें भारी संख्या में पुलिस दिखाई थी और सामने अफसर था उसे देखते ही सारा जो लो साॅस ये तो रमाशंकर श्रीवास्तव मालूम होता है । जरूर गोली चला देगा । फॅमिली अंग्रेज का पैदा है साला । पीछे से एक आवाज उभरी और सनसनाती हुई । हर एक कुछ होती निकल कहीं ये कमीना जहाँ भी रहा है वहीं गोली चलाई है । लोग वहीं रुक कर जुलूस को व्यवस्थित करने लगे और यहाँ का ये की किलेबंदी होने लगी हूँ । चार चार की लाइन में ही हम लोग आगे बढेंगे, सीना खोलकर आगे बढेंगे । देखिए साला कितनी गोली चलाता है अब प्रश्न था जुलूस के सबसे आगे कौन चलेगा? माओ का मुँह कौन पकडेगा मेरे भीतर जैसे कोई बोल उठा । आगे बढो ऐसा ही नहीं मिलेगा और मैं आगे चला गया । मैंने देखा दानिस भी मेरी हो रहा था । साथ ही तो नहीं जिंदगी से अधिक मौत के वक्त थे । हम इतने कान में कहा आगे मत जाओ यह श्रीवास्तव बडा हरामी है वो जरूर गोली चलाने का हुक्म दे देगा । पर मेरे भीतर से कब आ जा रही थी? क्या पीछे हटने के लिए ही तुम लोग आए हो? तुमने माँ से क्या गाता हूँ? अचानक चाहे मेरे मस्तक में दोहराया । मैंने हमीद से पूछा । जाहिर है उसने चारों ओर नजर दौडाई फिर उपेक्षा भरी आवाज में बोला हूँ वो सर हुआ यही अरे पुलिस को देखने फॅसने मुझे समझाया कि मैं पीछे चला जाऊँ उसे मेरी माँ का डर था । मैं सोचेंगी कि मैंने ही उसे बहकाकर सोलह पर चढाया है । उसने कहा जो तुम पीछे चलेगा तुम्हारी माँ तुमसे बिगडेंगे । उन्होंने तो मुझे जाए क्या कहा तुम्हारी माने तो मैं भेजा है । मैं चकित रह गया । हाँ विश्वास करो माँ की अनुमति लेकर ही आया हूँ । फिर कुछ नहीं बोला हूँ । मैं क्या नहीं सकता कि वह मुझ पर अविश्वास कर रहा था या मेरी माँ को फिर से समझने की कोशिश आप विश्वास नहीं करेंगे । बहुत से लोग हट बढ गए थे । अब जुलूस आधा रह गया था । यह शहीदों की एक बडी टोली थी । सबसे आगे मैं मेरे हाथ में तिरंगा, मेरी कमीज के बटन तो पहले से ही खोले थे । मेरी छाती साफ दिखाई दे रही थी । वो मानव पुलिस की गोली की प्रतीक्षा कर रही हूँ । मुझे लग रहा था मैं एक सपने की दुनिया की ओर बढ रहा हूँ जिसकी सुनहरी धरती मेरा पक्ष चूमने के लिए आतुर है । लोग नारे लगाए जा रहे थे । मैं बडी मस्ती में झूमता हुआ चला जा रहा था । दिन इन्कलाब मीनारों की हलचल के बीच एक गुनगुनाहट सुनाई पडी है यहाँ ये किसका लडका है? भारत माता का बता नहीं इसने उत्तर दिया था भरिए आवाज मुस्लिम चिपक गई थी एक नहीं तो भारत माँ का पुत्र हूँ बाकी सब भीड है मेरे पीछे चलने वाली मेरी जयजयकार करने वाली सच मुझे अब मेरे पैर धरती पर नहीं थे तो सपनों पर चल रहा था पारी देश में पहुंचाने वाले राजकुमार की तरह संकट से कुछ रहता हूँ । आगे बढा लोकचाओ रमाकांत श्रीवास्तव की कडकती आवाज हम से टकराई और जोर जोर होकर बिखर गई । हमारे आगे बढे कदम बढते रहे पर उसकी गति ऍम निश्चित था की गोली चलाने का ऑर्डर दे दिया जाता है और हम बोल दिए जाते हैं । तब तक फॅमिली आ गया । आप लोग क्या चाहते हैं फॅमिली उसके सामने खडा था । उसकी निर्भरता हम पर भारी पडी हो । हम के चेहरे पर झंडा लगाना चाहते हैं । पीछे एक आवाज खेले की तरह मारी गईं । ये दानिस बोला था तो मेरे बगल में ही पर अब कुछ पीछे चला गया था । इन लेने डाल इसको गौर से देखा तो वो उसे पहले से पहचानता था तो तुम्हारा झंडा लगाने से क्या ब्रिटिश हुकूमत समाप्त हो जाएगी? जरूर समाप्त हो जाएगी । किसी के बोलने के पहले ही मैं बोल पडा तो छाव लगाऊ फॅमिली आप होता पर मुस्कुराया और मुडकर श्रीवास्तव की और विशेष रहती से देखा । पुलिस मुड नहीं मैदान खो चुकी थी । मुझे लगा जैसे फिर लेने मुझे चैलेंज किया हूँ । ऍम छोटा हूँ ऐसा नहीं कर सकता हूँ । मैं जरूर झंडा तंग होंगा । मुझे उसका चैलेंज स्वीकार है । मेरा उत्साह लगता पढ रहा था । अब हम दीवानी कचहरी के प्रांगण में आ चुके हैं । पुलिस के हटके हीं भीड चौगुनी हो चुकी थी । पता नहीं कहाँ निर्धारति नहीं इतने लोगों को गाल दिया । प्रांगण ही नहीं उसके सामने का उद्यान भी भर गया । ऐसी ने आदेश नहीं दिया था । किसी ने कहा भी नहीं भर एक नारा लगता रह गया ॅ तो नहीं किया गया है । झंडा तो में ही लगना है और वहाँ पर जाने के लिए बॉडी को किसी भी चलने लगा । मेरे साथ कुछ और लोग भी चढे ऍम था शायद इसीलिए फिर ले मुस्कराया था क्या हूँ? सीढियाँ उत्तर कर मैं फिर भीड में आ गया । मैंने अपने हाथ का झंडा दूसरे को थमाया तो भीड नारा लगा रही थीं । घाटा खोलो चिल्लाती रही । किसी ने कहा सब मिलकर धक्का मारो, दरवाजा छिटक जाएगा । ॅ के सहारे चढकर ऊपर पहुंचा जा सकता है । मेरी बगल से ये आवाज आई थी या मेरे भीतर से कह नहीं सकता । पर मेरी दृष्टि उस ॅ नहीं जो पहली मंजिल से गुजरता हुआ धरती में समा गया था । मैं उसकी ओर बढा । सबसे पहले जवाहिर की तस्वीर मैंने सामने आई और फिर उसके भीतर से मेरी माँ नहीं देखा इसलिए तुम से कहा था कि कुर्ता पजामा मत पहनों वरना भटकर गिर जाते तो झंडा टांगना है ना मेरा उत्साह और बढा हूँ और मैं उछल कर्नल हुए पर चढ गया । अरे कहाँ जा रहे हो? दानिश नीचे से चलाया झंडा टांगने पर झंडा कहाँ है वो सचमुच मेरे पास झंडा नहीं था तो मैं या तो चढा ही चला जा रहा था । मैंने तो अपना झन्डा दूसरे को थमा दिया था । मैं मूर्ख दूर खडा मुझे देखता रहा हूँ । मैंने उसे अपने पांच बुलाया और नीचे थोडा सा उतर कर धर्म मुझे धरती पर गोद पडा । फिर झंडे से निकालकर वहीं झंडा दानिश ने मेरी कमर में बांटा हो जिससे चडने में किसी प्रकार की टिक करना पडेगा । अब मैं उस माहौल का हीरो था तो हर दृष्टि मुझे देख रही थी । जब आप बडे चलो की आवाज है मुझे ऊपर ढकेलती रहीं कब राणा मचा तो मैं नीचे हो एक टी की आवाज मुझे छुट्टी हुई । निकल कहीं मैंने नीचे की ओर देखा आपने लाल गमछे को दोनों हाथों में फैलाए हुए चंद्र लोग लेने की मुद्रा में खडा । एक तक मुझे निहार रहा था । मैं पहली मंजिल पर पहुंचा । धीरे से रेलिंग पार की । तालियों की गडगडाहट से सारा वातावरण गूंज उठा । घबराने की बात नहीं है अब ऊपर कि सीरिया पर दरवाजे नहीं है । सीधे ऊपर बहुत हूँ । ये आवाज भी भेज से ही आएगी । मैं लडखडाता हुआ छत पर पहुंच गया । यहाँ घर भी तिरंगा कैसे टांगो ऊंची मुंडेर के ऊपर कंगणू में लगी लोहे की छड से यूनियन जैक लहरा रहा था । मुंडेर पढ चढा और किसी तरह उस लोहे की छड तक पहुंचा । भीड ने फिर तालियाँ बजाई हूँ जैसे ऊपर से नीचे के आदमी छोटे हो गए थे वैसे ही है । कडकडाहट भी बहुत छोटी पड चुकी थी । सूत्रों की मोटी डोरी से यूनियन जैक बंदा था । पहले तो मैंने मुंडेर पर खडे होकर भांजे खोलने की कोशिश की फिर लगाया हूँ कोई पजामे का इजहार बंद थोडे ही था जो खुल जाता था । यूनियन जाए तो दुनिया के दो तिहाई भाग में उस समय लहराता हुआ यूनियन जाएगा । फिर आवाज आई हूँ घबराओ ऍम चमचमाता चाहूँ किसी ने नीचे से जोर से ऊपर फेंक दिया हूँ । चाकू छत पर गिरा हूँ और मैं मुंडेर से कूद पडा हूँ । ये पांच सौ एक नंबर का चाहता था जिससे मास्टर साहब कलम बनाते हैं । बडा तेज होता है चाहता हूँ । फिर क्या था मैंने रस्सी काटी । यूनियन जय को तारा और तिरंगा लगा दिया । भगवान कर हवा नहीं फहराने लगा ऍम वेदी! तालियों की ऐसी कडकडाहट ऍम रेडी! तालियों की ऐसी गडगडाहट मैंने कभी नहीं सुनी थी । वो कितना प्रसन्न था तो कैसे बताऊँ? फट सकता उछलता और सीढियाँ हो तडका पहली मंजिल पर आ गया । फिर रेलिंग लगने लगा हूँ । सोचता हूँ उसी नलवे के सहारे उतरना होगा । तब तक एक आवाज सुनाई पडी सीढियों से उतर कर चले आओ दरवाजा खोल दिया गया है हूँ ये आवाज अदालत के चपरासी की नहीं उसी ने मुझे सीढियों का एक रास्ता भी बताया हूँ जो ही मैं सीढी से उतर रहा था फिर ले मेरे सामने आया तो मैं बधाई है तो मैं क्या करूँ? क्या जवाब दूं मेरे लिए यह बधाई अप्रत्याशित थी मैं तो उसका मोदी घर है क्या की ठंडा मुझे दो । उसने यूनियन जैक मांगा तो नहीं दूंगा बोल कर नहीं केवल मुद्राओं से मैंने कहा तब क्या करोगे? क्या उत्तर देता हूँ था ऍफ का अपमान मत करना जैसे तिरंगा तो मैं जान से प्यारा है । वैसे ये भी मुझे अपनी जान से कह रहा है इसका अपमान मेरा अपमान होगा इसलिए तो मुझे मुझे दे दो । मैंने दिया नहीं भर उसके सामने ही तय करके कमीज के नीचे पैंट की बैट से दबा लिया । मुझे नहीं जाओगे । उसने पुलिस पूछा हूँ । मैंने नकरात्मक ढंग से सरे लाया ऍम इतिहास को दूंगा । वो नहीं कैसे कह गया । मुझे आज भी आशा रहे मेरे वहाँ से निकल रहा था कि मैं कर दूंगा । पर निकलते निकलते मेरा उत्तर अचानक बदल कैसे गया? बुद्धि की छोटी सी तराजू पर मैंने इतना बडा भार कैसे तोड डाला? मुझे देर होता देखकर जनता को संदेह हो गया कि मैं गिरफ्तार कर लिया गया । अजीब कोलाहल मचा लडके को छोडो, गिरफ्तार करना हो तो हमें गिरफ्तार करूँ । बहुत बालक को पकडकर सरकार अपने मुख् पाॅल लिखना लगाई । मेरे नीचे उतरते ही भीड ने सोचा कि हमारी विजय हुई । उसे क्या मालूम था कि हम क्यों रोक लिए गए थे । लोगों ने यूनियन जैक की मांग की । कुछ लोग दिया चलाई जलाकर भी मेरे पास आए । वो मैं उसे लेकर फोड देना चाहते थे । पर है तो मेरे सीने से लगा था । लोग मांगते रहे गए पर मैंने किसी को भी नहीं दिया । अब भीड दीवानी से फौजदारी की ओर चली । ब्रिटिश साम्राज्य की इमारत चरमरा रही थी । उस साहब होना तो भीड बाढ की नदी की तरह किनारा तोडती आगे बढी चली जा रही थी । सारा बगीचा ग्राउंड डाला किनारे लगाएगा कांटेदार तार कुछ पैरों में उलझकर ही अपने प्रति रोकता । क्षमता खो बैठे । उमर ते तूफान के आगे आने की किसकी हिम्मत थी फिर भी फिर ले वहाँ भी आगे वो आप लोग क्या चाहते हैं? हम फौजदारी का शहरी पर झंडा टांगना चाहते हैं । भीड चिल्लाई हो । कुछ देर तक पहले सोचना रहा हूँ । हलचल कुछ नहीं है । अच्छा आप में से एक आदमियों पर जाकर झंडा डाल सकता है । उसने कहा हो आगे के लोगों ने एक दूसरे काम हो देखा । वो लडका कहाँ है? फिनले निश्चय ही मुझे खोज रहा था । शायद यूनियन जैक को भीड को ना सौंपने का कारण है । मध्य पसंद था । इधर चंद्र दीवानी कचेहरी के लॉन में ही मुझे अपनी गोद में लेकर उछल रहा था । कुछ लोग उसके नाचने पर ताली बजा रहे थे । मैंने देखा उनमें मेरे मास्टर बद्रीप्रसाद भी थे । वे उतने ही खुश थे जितना चंद्र । मैं किसी तरह चंद्र कीप अकड से छोटा और उछल कर बाहर आया । मुझे आशा था कि आज चंद्र इतना बदल कैसे गया? नहीं । उस उसमें क्यों आया? गाडी में कोदा कर कठी अधिक रहकर याॅर्क । इसी बीच मंत्रीप्रसाद जी दौडे हुए मेरे पास आए बेटा बच्चा को मुझे तो मैं नहीं उसे फेंका था । मैं मुस्कुराते हुए बोले तो मैंने घर से छह में हाटा और चाकू निकालकर उन्हें दे दिया । उन्होंने उसे लेकर मानते लगाया जैसे धन्य हो चुका था । वो चाहते हो मैं इसे संभालकर रखूंगा । इसी की बदौलत आज यूनियन जैक धरती पर आ गया है । बद्रीप्रसाद जी की प्रसन्नता में इतिहास करवट बदल रहा था । मैंने देखा मेरे हटते ही दो आदमियों ने चंद्र को पकडकर एक ओर ले जाने की चेष्टा की पर उसने शटर दिया । नाटक में विष्णु बनने वाले व्यक्ति की तीसरी और चौथी जबकि हुई बुझा गीत है । दोनों झटका खाकर दो और गिरे तब तक कुछ और लोग दौडे और चंद्र को धंधा हो जाऊँ । ताज में हमीद नहीं बताया कि वे लोग सारे देश में पुलिस के आदमी थे । इधर वही बात लेने झंडा टांगने वालों से कहीं जो मुझसे कही थी तिरंगा टोमॅटो पर यूनियन जय का अपमान मत करना । इसके बाद उसने भीड को संबोधित करते हुए कहा आपको जो करना है शांतिपूर्वक कीजिये । पर याद रखिए कचेहरी का एक भी रिकॉर्ड भ्रष्ट ना होने पाए क्योंकि आजादी के बाद भी आपको उन रिकॉर्डों की बडी आवश्यकता पडेगी । उस समय तो झंडा शांत हो गयी पर बाद में जब व्यक्ति झंडा तंग कर उतरा तब भीड ने उसके हाथ से यूनियन है छीन लिया । उसे जूतों से रोंडा ऍम कर दी है । उसकी चिंदियां बडी बेरहमी से जलाई गईं । मानो यह ब्रिटिश शासन की क्रूरता का प्रतीक हो । अब फिलेमोन ना रह सकता हूँ । अपने राष्ट्रीय झंडे का अपमान एक देशभक्त कैसे रह सकता था । उसने आलू गैस के गोले छोडने और लाठियां बरसाकर भीड को तितर बितर करने का हुक्म दिया । बडी बेरहमी से पुलिस के डंडे चलने लगे । पुलिस हमारे भाई हैं का नारा बे असर हो गया । भगदड मच । कहीं सोचता हूँ मिलने सचमुच बडा भला आदमी था । इस स्थिति में भी उसने गोली चलाने का आदेश नहीं दिया । पहले मैं भीड में था हूँ । इस समय भीड मेरे भीतर थी । वो बाहर से एकदम अकेला कचहरी से जब लौटा पैर धरती पर नहीं थे । आकाश में उठता चला जा रहा था । वरना पुल पर आते आते सनसनी फैल गई कि कचहरी में गोली चल गई है । गणेश के प्रसिद्ध बांध वाली दुकान आदि खोली थी । फट से बंद हो गई । कुछ लोग वहाँ बैठे बात कर रहे थे । कमाल किया उस लडके ने जरा भी डरा नहीं । लोग देखते ही रह गए और उसने चढ काॅल दिया । लोगों ने मेरी ओर देखा भी नहीं, पर बात मेरे इस संबंध में थी । हर मैं कैसे कहता हूँ कि वह लडका मैं ही हूँ । अपनी प्रशंसा सुनकर मेरी कल्पना को पंख लग गए थे । मैं आजाद भारत का भावी नेता होकर उस धरती पर विचरने लगा जहाँ किसी आंख में भी अभाव का आंसू नहीं था । वो किसी पेट में भूख नहीं थी तो लगभग दो बज रहे थे । जब मैं घर पहुंचा हूँ मेरा दरवाजा दोनों पर खुला था । ऍम कोई आया था और लौटते समय घबराहट में खुला छोड दिया तो मैं सीधा माँ के पास पहुंच गया दे ठाकुर जी के सामने दीया जलाकर दुर्गा सप्तशती का पाठ कर रही थी तो मैं नहीं जानती नहीं । पिताजी के समय की ही एक पुरानी होती थी जिसमें हिंदी अनुवाद था वो मैं उसी का बात करती नहीं, हर विपत्ति और संघर्ष के समय में ऐसा ही करती थी । और कई बार ये धार्मिक आस्था ऐसी आपात स्थितियों को कुछ चलने में समर्थ भी हो चुकी थी । उनकी मदर बुदबुदा रहे थे और आंखों में आंसू की बाढ थी । मेरी आहट ने उन्हें जरा सा विचलित किया । उन्होंने मेरी और देखा और एकदम अपने प्रभु के समक्ष माथा देगी । तो फिर मुझे भी इशारे से बुलाकर मेरा शिल्पा गढकर मूर्ति के चरणों में डाल दिया । पर मैं बोली नहीं और ना उन्होंने आशा छोडा क्योंकि पार्टी पूरा नहीं हुआ था । अधूरा संकल्प है, कभी नहीं छोडती हूँ । मैं कुछ देर तक चुपचाप खडा था । फिर धीरे से किसका आकाश में बादल आ गए थे । हालांकि कुछ ठंडी और नाम थी वो मौसम को रखने लाया था । मैं तो मेरे चाचा के यहां पहुंचा । कांथी मंगरू मुझे देखते ही बोला अरे तो आ गए । बडी खोज रही थी तुम्हारी जो हूँ मैंने कुछ पूछा नहीं । उसी ने बताया कि मैं मोहल्ले में हल्ला हो गया है कि कचहरी में गोली चली है । कुछ लोग मारे गए हैं और कुछ लोग घायल होकर अस्पताल में आ गए । मेरे अभी अभी अस्पताल गया है । मैं समय खोजता हुआ तब तक कई लोग वहाँ गए । सबके विस्तारित नेत्रों ने मुझे देखा जैसे कह रहे हूँ अरे ये तो सही सलामत है । गोली नहीं चली है तो कुछ लोग लाठी चार्ज ऐसे घायल अवश्य हो गए । मैंने अफवाह का खंडन किया और सीधे चाचा के घर में घुसा हूँ । दरवाजे में घुसते ही क्षमताओं का उदास चेहरा दिखाई दिया । मुझे देखते ही सोने धान पर पानी पडा । खेलो नहीं मैंने कहा था ना कि कचहरी मचाना गोली चलेगी और तो मना नहीं । इतना कहते गये थे उसने मेरे गाल पर एक चांटा जड दिया । आप विश्वास कीजिए मुझे बिलकुल छोड नहीं लगी । अब मैंने कमेंट के भीतर से निकालकर उसे यूनियन जैक दिखाया तो मैंने सोचा मेरे लिए कोई कपडा लायी हूँ । ऍफ उठी मैंने उसे बताया यह अंग्रेजों का झंडा है । झंडा तो बहुत अच्छा है । उसने हाथ लगाकर उसके कपडे को देखा और इस पर लाल पट्टियां भी सुंदर लगती है । इससे तुम क्या करोगे? मुझे दो और तुम क्या करोगी? मैं इसका जमकर बनवाऊंगी । अब उसने उसे पूरा खोल कर देखा हूँ । अरे इसमें तो दो जंपर अच्छी तरह बन जाएंगे । अगली कहीं की जंपर बनाएगी । मैंने उसके हाथ से छीनकर फिर तय करना आरंभ किया तो क्या जाने की इसका मार्च हूँ । ये दीवानी कचेहरी पर पहने वाला झंडा है । आजादी के बाद इसका ऐतिहासिक महत्व होगा । तब इसका मूल्य हजारों में आपका जाएगा । अच्छा तो तू आजाद होने के बाद झंडा बेचेगा । उसने मेरी आकांक्षा को गुदगुदाना आरंभ क्या पढ । तब तक झाजी ने घर में प्रवेश किया । अरे तो आ गया । उसने एकदम मुझे छाती से लगा लिया । उसकी आंखें बता रही हूँ तो उसे लगा जैसे मैं खोया हुआ अचानक पा लिया गया हूँ । उसी की बात से मालूम हुआ कि वह मेरा पता लगाने रामकिशन के यहाँ गई थी । मैं भी अभी तक नहीं आया है । तो मेरे चाचा ने जब गोली चलने की बात सुनी तो कम घबरा गए । उसने सबसे पहले माँ से कहा माँ नहीं और भागने की उपेक्षा प्रभु की शरण में नहीं, पूजा पर बैठी हूँ और उसी घबराहट में चाचा बाहरी दरवाजे पर दोनों बट खुला छोड कर भागा देखती क्या है जाकर अटक कमाई की पूजा की तैयारी कर मुझे छाती से लगाए हुए ही जांची ने चंपुओं से कहा और चंपा मुस्कुराती हुई भीतर चले गए । ऍम आई सबका भला करें । चाची ने आंखें मूंदकर जैसे कुछ किया फिर मुझे छोडते हुए बोली जहाँ माँ को बोला अच्छा कमाई की पूजा होगी । इस समय कुछ पूजा पर बैठी हैं । मैंने कहा अच्छा तो जब उनकी पूछा खत्म हो तभी उन्हें बुला ले आना । चाची बोली और हाँ, गंगा राम के यहाँ से ढोल भी लेते आना । जब कोई अचानक आपदा आती थी, अब हम लोगों के यहाँ चक्का मई की पूजा मान भी जाती थी तो लोगों का विश्वास था की आकस्मिक विपदा हैं । आशंका मायके सेवा कोई मुक्ति दिला नहीं सकता हूँ । आज की स्थिति ने इस विश्वास को और अधिक बल दिया । हाँ जी के यहाँ पूजा की तैयारियाँ होने लगी, क्योंकि मान्यता थी कि जिस क्षण विपत्ति पहले उसी क्षण पूजा होनी चाहिए । अब माँ की पूछा लगभग समाप्त होने वाली थी । उन्होंने पांच समाप्त कर भगवान को अंतिम डाॅॅ फिर उठीं । मुझे तिलक लगाया तो क्या तुम सचमुच कचहरी तक चले गए थे? जैसे उन्हें विश्वासी न हो कि मैं वहीं से लौट करा रहा हूँ । मैंने उन्हें कमी से नीचे से निकालकर यूनियन जैक दिखाया । बताया दीवानी कचेहरी के गणगौर से उसे उतारकर मैंने ही तिरंगा फहराया है । सच मुझे तुम्हें क्या सच आश्चर्य की । चरम सीमा पर मानसिकता अविश्वास की मुद्रा में होती है । पर वह विश्वास खोती नहीं । माँ ऐसी स्थिति में थी । मैंने उन्हें इतना विफल कभी नहीं देखा था । मुझे छाती से चिपकाए हुए पूछा की मूर्तियों को एक तक देखती रहीं । जब उन्होंने मुझे छोडा तब यूनियन जैक को देखने लगी । फिर बोली वो रानी बाबू वही थी नहीं और बिहारी भी नहीं । मैंने बताया कि उस जुलूस में कोई भी औरत नहीं थी । फिर मैं आपको सोचने लगीं । मुझे कुछ ऐसा लग रहा था कि जैसे माँ चाहती हूँ कि मेरे इस पराक्रम को रानी बहुत ही देखती हूँ । जब मैंने उन्हें बताया की चाची ने चक्का मई की पूजा के लिए ढोल मंजीरा लेकर बुलाया है, तब उन्होंने यूनियन जय को दय करके संदूक में रखा । उसी संदूक में नेता भी एक पुरानी होती थी । उसे देखते ही मैं बोली ॅ होते तो कितने खुश होते हैं । वो भी तेरी तरह जीती थी । जो निश्चित करने चाहते उसे कर के ही छोडते थे । फिर उस पुस्तक में रखी पिताजी की तहरीर निकालकर वे कुछ समय देखती रही । व्यक्ति की भागता की बाढ में उसका वर्तमान ही नहीं अभी भी वहाँ चलता हूँ । इस समय माँ की आंखों से अॅान लगा था हूँ । गंगा राम के यहाँ से ढोल और मंजीरा लेकर मैं पहले ही पहुंच गया था । बाद में घर बंद करके मांग कडाही हुई और फिर सुमीर चाचा का खानदान जी थे । गूंज उठा मैया आनंद करनी बवाने मैया संकट हर नहीं बाबा ने आज मुझे हर व्यक्ति विचित्र दृष्टि से देख रहा था और उस समय मेरी और भी विचित्र स्थिति हो गई जब गंगा राम अखबार लेकर आया । अखबार के पहले भ्रष्ट पर ही एक चित्र छपा था जिसमें चंद्र मुझे अपने कंधे पर लेकर नाच रहा था । जिटल के नीचे लिखा था था कचहरी पर तिरंगा लगाने वाले वीरबाला को कंधे पर उठाकर नास्ता हुआ एक स्वराजजी । सबने उस क्षेत्र को बडे ध्यान से देखा और मेरे घर तक की सराहना की । मैंने अनुभव किया तो मेरे चाचा खुश तो हैं पर मैं ये नहीं चाहता था कि लोग मेरी और पीठ थपथपायेंगे । उसकी दृष्टि से तो मैं सफलतापूर्वक पुलिस उधर आया था । अब मैं नहीं चाहता था कि मैं फिर सोलह फिर चलूँ किसी बात वर्ग है, बोल भी पडा हुआ को और अधिक मचना वैया नहीं तो पागल हो जाएगा । ऐसे पागल और दीवाने लोग ही देश के लिए कुछ कर सकते । दीपा बोला लगता है तो मैं आज भी मेरे से पहले टीके लालटेन नहीं चलानी है । जहाँ चाहे बाज को दूसरी ओर मोडने की कोशिश की वो अरे जब देख रहा हूँ कि अंग्रेजों का ही चिराग गुल हो रहा है तब दो जहाँ टेन यानी म्युनिसिपैलिटी का ही चिराग नहीं चलेगा तो क्या होगा भी । पांच । आचार कि अधखुली दुकान पर बैठा बीडी का कश खींचता हुआ बडे इत्मिनान से बोला हूँ तो आप जानते ही हैं चाचा की दुकान कभी बंद नहीं होती । सारे शहर में हडताल रहेगी तब भी उसका एक पट खुला रहेगा क्योंकि उसके ग्राहक रोज कुमार खोदने और रोज पानी पीने वाले थे । दिनभर मेहनत मजदूरी करते हैं और शाम होते होते सीधा किसान लेने चले आते हैं किंतु आज है दुकान बंद कर मुझे खोजने निकला था । अखबार का क्षेत्र देखते हुए दीपा नहीं शुरू किया । आखिर चंद्र भी सुराजी हो गया, ये कैसे हो सकता है? चाचा ने प्रतिवाद किया पी पाने चाचा को पॅन दिखाया और नीचे की भारत बढकर सुनाई ऍम तो मैंने ध्यान ही नहीं दिया था । मुझे चंद्र है गांधी टोपी लगाकर तो पहचान में नहीं आया । जहाँ अच्छा बोला हर चीज देखता रहा हूँ । गंगा नोएडा भी गंगा में मिलकर गंगा हो जाता है तो मेरे भैया वो यदि सुराज ियों के बीच में चंद्र भी सुराजी हो जाए तो आश्चर्य क्या? मंगरू ने कहा चलो जिंदगी भर बात किया तो क्या हुआ अंत में गंगा तो मिली अखबार में तस्वीर छापी ये प्रतिक्रिया भी बाकी थी । सुमेर चाचा कुछ नहीं बोला हूँ क्योंकि है चंद्र से बहुत करता था कि मस्जिद देखता रह गया अब जाके उसे पता चला कि चंद्र गिरफ्तार हो चुका है । तब उसने इतना ही कहा कि ऐसे पापी को तार कर गंगा ने अच्छा नहीं किया हूँ चाचा ने अखबार मोडकर भीतर रखा ही था कि कतवारू सीधा लेने आ पहुंचा । वार बोला हूँ आज तो कोई कमाई नहीं हुई । सुमेर भैया मतलब साफ था कि आज का सामान है उधर ही लेगा तो कटवा रों सगडी खेलता है तो कोई बात नहीं कतवारू अगर आज कमाई नहीं हुई तो कल होगी या अच्छा बोला जुना है कल भी हडताल रहेगी क्योंकि सुर राज्यों पर लाठी चली है । जिंदगी से जूझते उसके स्वर में उदासी थी । यदि ऐसी बंदी चली तो पेट का क्या होगा? सुबह भैया अरे पतले पेट के लिए ही तो लडाई लडी जा रही है । स्वराज हो जाने पर कोई भूखा नहीं रहेगा । बडी वक्त तो भूक लगी है ना । वो ऍम दंगा के समय मिल रहा है । कतवारू बोला हो सोमेर चाचा को हंसी आ गई उसे कमालू की मेहनत कश्यप के लिए स्वराज की लडाई और दंगा दोनों बराबर है । वो धीरे धीरे अंधेरा बढने लगा हूँ । संध्या के खिसकने के साथ साथ बादल भी घने होने लगे । बूंदिया छोड पडी । ग्राहक अपना सामान लेकर हटने बढने लगे । महेश भी चलने को हुआ हूँ अब चलता हूँ मैं भैया बारिश आ रही है । अरे बाॅबी पाकिस्तान नेता मोटा आयल हाउस तो गलत गलत भी समय लगे तब तक का बदलने पड जाए । सुबह चाचा बोला और हसने लगा पीपा कुछ बोला तो नहीं धोडा दुकान में भीतर की ओर के साथ आया हूँ । उसने एक बीडी सुलगाई । बारिश कुछ और तेज हुई हूँ । महेश को भीतर कर चाचा ने अपनी आधी खुली दुकान पर दोहरे का पडता डाल दिया । महेश ने लालटेन की रोशनी में फिर अखबार में छपी वह तस्वीर देगी यार चंद्र का तो बन गया तो मैं बोला चलो जो अच्छा युवा चाचा की प्रतिक्रिया नहीं, चंद्र बदमाश भी है और गुंडा भी । इधर उसकी बदमाशी लाला के शहर पर अधिक पड गई थी । अब लाला की इसलिए समझ गया है भोला इसमें मुझे संदेह है । चाचा ने कहा और बातें चंद्र बलाला के इर्द गिर्द चलती रहीं हूँ । अचानक गली में भाग दौड नहीं हुई तो चाचा ने झांकर देखा । पुलिस आ जा रही थी । पता चला कि रामकिशुन को गिरफ्तार करके पुलिस आई नहीं पर वह घर पर मिला नहीं हो । दिन भर कॅश लडके धोनी पडी नहीं पर इस समय कितने सक्रिय हो गए । मेरा मन बोला भर मैं छुपी रह गया । चंपू नहीं आ रही है मुझे भीतर बुलाया । उसने बताया पीटीआर्इ को भी पुलिस खोज रही है तो मैं कैसे मालूम हूँ अभी मैं भी गयी हुई एकदम लतपत यहाँ आई थी चाँद तूने बताया मैं तो पुलिस के नाम से काफी है । पुलिस देखते ही डर गई । पीआर इसे बोली यहाँ तुम्हारा रहना सुरक्षित नहीं तो कहाँ पर बहुत से लोग आते जाते हैं । किसी ने देख लिया तो आप खडी हो जाएगी । तब मैं कहा नहीं गया तो नहीं मालूम पड गई है तुम्हारे घर की ओर ही हमको बोल कर चुप हो गई और मैं सोचता रह गया । बारिश में तो लोग दुश्मन को भी इस तरह देते हैं । फिर तो कुछ सोच कर आई होगी । चाची ने उसे हटाकर अच्छा नहीं किया और यदि माने यही रोक अखित्यार किया होगा तो बेचारी को कहाँ जाएगी? निश्चित ही गंगा राम के घर उसे शरण मिल जाएगी । क्षमताओं के सामने कुछ बोल नहीं पाया । भीतर ही भीतर कुल बडा कर रहे गया । फिर भी मैं था हूँ । मैं निश्चित ही अपने घर की ओर लगभग पडता हूँ । परमाण कह रहा था कि अखबार लेता चलूँ चित्रम् आपको दिखाऊंगा हूँ । मैं दरवाजा खोलकर दुकान में ही वो साधा क्या हाँ करेगा । सामने लाना खडा था उस पर छाता लगाए । उसके बगल में ही बडी बडी मूंछों वाला एक वरिष्ठ जवान था तथा उसके पीछे वैसे ही हट्टे कट्टे तो और लोग थे । इस समय बरसते पानी में भेजते हुए लाला कैसे चला आया ऍम था । उसके चेहरे पर भाई की छाया उभर आई थी । इसे संयोग ही कहा जाएगा कि जब भी मैं हाला की आलोचना करता तभी उसका कोई आदमी याद है स्वयं हो सकता हूँ । पी पा भी बैठा ही था । वैरी लाला को देख कर सकता कहा गया हो तो तुम यही हो मैं तो तो मैं बधाई देने आया था । आज तुमने वहाँ काम कर दिखाया । पडे बडे क्रांतिकारी भी नहीं कर सके ना मुझे देखते ही बोला । फिर उसने नाटकीय मुस्कराहट के साथ अपने आदमियों को बताया कि ये वही लडका है जिसने आज दीवानी कचेहरी पर तिरंगा फहराया है और जिसकी तस्वीर अखबार महीने के लिए है । साथ ही उसने यही बताया कि या इस घर का नहीं है । यहाँ तो इस की एक दोस्त रहती है । हम तो बडी अच्छी लडकी है, बेचारी एकदम सीधी सी बी आदि के लायक हो गई है । पर सुमेर साफ कान में तेल डाले बैठा हूँ । यहां करो सरकार कहीं अच्छा मार मिले तब तो चाचा हाथ जोडकर बोला हूँ अरे वो तो तुम्हारे घर में ही है डाला मुस्कराया जब दूसरे क्यों नहीं करा देते शादी बितना सुनते ही मेरी रगों में बिजली सी दौड नहीं अरे ये कैसे हो सकता है कहाँ ये ब्राह्मण और कहाँ मैं कानून बनियां आप जात पात कुछ नहीं रहेगा साहब जी आप देश आजाद होने वाला है तो मैंने सुना नहीं गांधी जी के लडके के साथ राजा जी की लडकी भी आई है । एक तेली और दूसरा प्रामाण बडे लोग हैं । सरकार समृद्धि का हो नहीं दो गुस्साई चाचा ने कहा हम लोग ऐसा करें तो पंचों का हो जाए जाती बाहर कर दिया जाए । और फिर चंपू जगह से बडी भी है क्या वो लाला आया था किसी दूसरी गलत हैं वो भी आगे की बात तो उसने यही शुरू कर दी थी । मैं चाहता है आठ मीयता जुटाने के लिए । मैं सोचता हूँ कि तुम्हारी माँ से मैं लेकर उन्हें भी बताए हूँ जिन्होंने ऐसा सपोर्ट पैदा किया है । नहलाने अपने उद्देश्य की गाडी को खींचकर पटरी पर क्या? और मुझे आगे कारण मेरे घर की ओर चल पडा लगता है तो मुझे नाराज हूँ और या अच्छी बात नहीं है । लाला ने चलते चलते सुमेर साफ से कहा और एक ऐसी नहीं गा से उसे देखा कि उसके देवता ही कुछ कर गए । लाला के पीछे चल रहे उसके आदमियों ने भी उसे तारे रहा लो बेटा तुम्हारे लिए मिठाई ले आया हूँ । कुछ लोग आगे बढते ही अपने आदमियों से लेकर मिठाई का एक बना हुआ दोनों से थमाया । तुमसे कहीं अच्छी तो चंद्र की तस्वीर छपी है तो बोला और ऐसे मैं ढंग से मुस्कुराया । चंद्र बेचारा भी भला आदमी हैं । वो करते ही पुलिस उसके पीछे पडी है । ये बहुत उसने मेरी प्रतिक्रिया जाने के लिए कही थी । पर मैं चुप ही रह गया । अंत में उसे खोलना पडा हूँ । कहाँ है चंद्र गिरफ्तार हो गया । फिर मैंने उसे सारी बात बताई और कहा की सादी वर्दी की पुलिस उसे पका नहीं गई तो मैं कैसे मालूम की सादी वर्दी के वे लोग पुलिस के ही आदमी थे । एक वकील की तरह उसने दिलाएगी । हमीद ने बताया था बितना सुनते ही उसके चेहरे की मुद्रा जैसे बादल कहीं तो उसने अपनी घडी कोई और देखा ऍम चुकी थी । अच्छा बेटा अपनी मां मेरा प्रणाम कह देना । समय काफी होगी । आया चलता हूँ । अच्छी बात जो मेरी माँ को बधाई देने आ रहा था । घर के पास आकर ही उसके समय की पूंजी एकदम से कहीं मैं वहाँ से ना मिलकर आगे बढ गया जबकि उच्छे पीछे लौटना चाहिए था । उसके आदमी पीछे लौटे भी तो मैं उन्हें अपने साथ लाते हुए बोला तो थोडी ही दूरी पर उसका घर है उससे सारी बात मालूम हो जाएगी । अब उसकी माया मैं समझ सकता हूँ मैं हमीद के घर जाएगा । उसे तो मोल्लाह चंद्र का पता लगाना है । बधाई देना तो मात्र उसका बहाना था । जब मैंने मास्टर सारी बातें बताईं तब उन्होंने भी मेरी धारणा का समर्थन किया । वो सुना है लाला से उसका झगडा हो गया है । बिहारी बोली और यही उसके लिए सबसे बडा खतरा है । लाला की सारी पोल पट्टी जानता है । लाला हरचंद कोशिश करेगा कि उसको मार्ग से कैसे हटाया जाए । चंद्र के लिए अच्छा ही हुआ कि वह गिरफ्तार हो गया । माँ बोली बिहारी गंभीर हो गई किसी माँ को मैंने अखबार में छपा है क्षेत्र दिखाया, प्राॅब्लम खेल होती माँ जैसे अपने बच्चे का हर कष्ट आगे बढकर खुद झेल लेना चाहती थी । वैसे ही वो उस की हर उपलब्धि को आगे बढकर अपनी उपलब्धि की तरह स्वीकार करती है । वो मेरी माँ को लग रहा था कि ये सब कुछ सच मुझे उन्होंने ही क्या है । उनके अधरों में मुस्कुराहट, आंखों में स्वप्ना और हृदय और लास्ट था । उनकी रंगों में इस समय रक्त का संचार बहुत तेज हो गया था । उन्होंने मैं क्षेत्र बार बार देखा और बीआरडी केवल बढा दिया पीटीआर्इ संज्ञाशून्य ही उसे देखती रही । थोडी देर बाद माननियों से झट जो रहा हूँ क्या सोच रही हूँ । उसने संभालते हुए कहा तो कुछ नहीं देख रही थी इसके जग्गु की चंद्र के बाकी स्टिक रोटी से बिहारी के चेहरे पर लगाई दौड गई ।

Part 6

भाजपा तेरह अगस्त उन्नीस सौ की रह संध्या अब भी मेरे मन में तहर जाती है । जब इन्कलाब भी जो लूज दशाश्वमेधघाट से निकला था ॅ उसी के पुल तक आते आते गोरी बटन पहुंच गयी थी जो खाती हूँ ट्विटर ट्विटर हो जाऊँ, अंग्रेज अफसर चलाया पर कोई भी नहीं आता था यदि आगे बढे तो गोली मार दी जाएगी । उसकी अंतिम चेतावनी थी पर इन आजादी के दीवानों कर क्या परवाह जो जो उसको बढना ही था वो मैं आगे बढा और गोली चल गई है बता चार व्यक्ति वही देर हो गए मुझे ठीक याद हैं उनमें एक मल्लाह हम जो मेरे पैर के पास ही गिरा था यहाँ तक नहीं नहीं छाती से खून का फव्वारा छूट पडा था पर हाथ है तिरंगा नहीं छोटा हो बल्कि मैं उसी के रखते फिलहाल हो गया था । ऍम में इस देश का झंडा लाल ही होगा । मेरे पीछे से आवाज आई अवश्य ही वो व्यक्ति रूस की क्रांति से प्रभावित रहा होगा क्योंकि इस इन कला भी बाढ में एक लहर समाजवादी विचार वालों की भी भी उनके गिरते ही भगदड मच । कहीं मैं उस लाश की बगल से आगे बढने वाला ही था । किसी ने मेरा हाथ जोरों से की इच्छा और मुझे लेकर काली जी के मंदिर की ओर जाने वाली गली में भागा कुछ नेपाल में मुझे आवाज हो गया हूँ कि हाथ पकडकर खींचने वाला और कोई नहीं हम भी है किंतु मैं उससे स्वयं को छोडा नहीं पाया बल्कि भागता ही चला गया क्योंकि मैं एक भगदड में था । भर्ती हुई भीड का एक अंग हूँ ही नहीं का इस और पत्ते भी भागते जा रहे थे वो अजीब भागम भाग आदमी और पशु दोनों साथ साथ वो कुछ दूर और निकल जाने के बाद हम लोग एक शिव मंदिर में पहुंचे । दब मैं प्राकृतिक होते ही हमीद पर झुंझलाया तो मुझे क्यों नहीं आए हूँ वो तो क्या तो मैं मरने के लिए छोड देता हूँ । हमी बोला जानते हो ॅ देखो और गोली मार दो । सरकार ने आंदोलन को कुचल देने का दृढ निश्चय कर लिया है और होगा भी ऐसा ही । शासन की पाशविकता अपनी चरम पर आ गयी थी । कहीं कहीं दस पंद्रह दिनों तक भारतीयों का ही शासन रहा हूँ की तो शीघ्र ही आंदोलन घायल सर्दी की तरह कुचल दिया गया । हाथ में आई आजादी उंगलियों के बीच बालों की तरह झड गई एक एक सौ राजी बीन बीनकर जेल में ठोस दिया गया । कुछ भूमिगत हो गए । उन्हीं में से एक दाने भी था कहाँ गया, किसके घर है कहीं कुछ पता नहीं पी आ रही तो मेरे यहाँ नहीं । उसने रानी बहुत है कि संपर्क किया पर उन्होंने भी असमर्थता दिखाई । ले देकर अनाथालय ही एक ऐसी जगह है जहाँ मैं तो मैं रख सकती हूँ पर वह सार्वजनिक स्थल है । हर कोई आ जा सकता है । फिर भी सबसे बडी बात ये है कि लाला का बगीचा सामने पडता है । कोई भी बात छिपी नहीं रह सकती । अब मेरे यहाँ रहने के सेवा उसके पास कोई चारा नहीं था । किंतु एकदम गोपनीय किसी को कानोकान खबर नहीं । यहाँ तक कि सुमेर चाचा भी इस तथ्य से अनजान माँ जब भी बाहर निकलती तो बाहरी ताला लटकाकर कौन जानता था कि उस साल के भीतर कोई कैब है । ऍम खाने में सरकारी कैदखाने से ज्यादा न तो सा होली थी और ना जगह थी । फिर भी बिहारी को वहाँ कोटरी अपनी लगती थी । आपने बकाई है, सुख भी मैं और मेरी मारो पी दो बिंदुओं का स्पर्श करता हुआ महज एक रिकॉर्ड बनाता था । इसी रिकॉर्ड में बिहारी का संसार सिमट कर बहुत छोटा हो गया था । एक दिन पता नहीं किस मूड में प्यारी ने माँ से कहा ऍम में एक विपत्ति है क्यो क्योंकि यदि में मर्द होती तो छिपने की ऐसी समस्या मेरे सामने नाती गंभीर हो गई । हाँ, अभी आॅर्ट के लिए खुद कुछ पाने से कहीं ज्यादा खुद को बचाने की समस्या रहती है । सोचती हूँ की अभी भगवान ने हमें औरत बनाया तो गाडी मुझे क्यों नहीं पियारी बोली और वहाँ जोर से हंस पडीं । कुछ सोच कर रहे बडी देर तक हस्ती रही । इसमें खर्च होने वाली क्या बात है? यदि हमें गाडी मुझे होती तो हम छब्बीस जाती और बच जाती । मैं ही रही । पीआईडी बोल दी गईं । यदि कोई आदमी इतने दिनों तक एकांतवास करता तो दाढी मोर्चों का ऐसा जंगल उसके चेहरे पर रुक जाता जो उसे खुद छिपा देता । पर मैं जो की तो हूँ हाँ, इस बार और जोर से हंसी धीरे धीरे समय सरकता गया । परीक्षा बीत गई तो हार भी दम तोड रहा था । ऍम की रामलीला शुरू हो गई थी । एक विचित्र घटना ने पियारी को कोठारी से निकालकर लोगों की आंखों के सामने खडा कर दिया । अपनी चरम सीमा पर जाकर सरकारी सतर्कता भी कुछ ढीली पड गई थी । सुराजी लोग भी लोगे चीज पे इधर उधर दिखाई पड जाते थे । रात बिरात घूंघट निकालकर बिहारी गली में निकलने लगी थी । कभी सुमेर चाचा के यहाँ जाती और कभी गंगा राम क्या जी आनुमान हो जाता हूँ । शाम एक अच्छी पाठ हूँ । एक अपरिचित और अपने पता नहीं कैसे बिहारी को देख लिया भी उससे लिपट कर रोने लगी । बहुत दिनों के फॅमिली आॅउट गए । तीन देखे बॅाल मुझे लेकर बात क्या होती जा रही थी । पी आ रही उससे अपने को छोटा भी नहीं सकीं और कुछ बोलना पाई हूँ । मोहल्ले के कुछ लोग इकट्ठा होगा । बिहारी ने बडी होशियारी की की उस भारत को लेकर घर में चली आई । फिर भी देखने वालों ने देख लिया चार चाहे वो भागने लगी हूँ । जिस औरत को लेकर प्यारी आई थी उसके संबंध में उस समय तो कुछ विशेष समझ नहीं पाया । पर आज उसकी हारे बात स्पष्ट होती जा रही थी । अब मैं समझता हूँ कि प्यारी के साथ उस समय उसका इतिहास ही लिपट कर मेरे घर में आया था और अब तो एक मात्र उसका प्रतीक थी । उस औरत का नाम आज तक मुझे नहीं मालूम । इतना समझ पाया था कि वह दालमंडी की एक वैश्या थी । आवश्यक ही संपन्न रही होगी । बचपन बिहार के किसी गांव में बीता था । माता पिता चंद्रगहण नहाने बनारस गए थे । लाला के लोगों को सुन्दर देखी । मैंने कहा पर चढ गई और मध्यरात्रि में ही भीड से उठा ली गयी । फिर शायद इलाहाबाद के मीरगंज की कोठी वालियों को सौंप दी गई । यही वह पेशे में उतनी रात को ग्राहक की और दिन में अपने मालकिन की गुलामी करती रही । पेशाब तो जिंदगी से चिपक गया था जबकि मालकिन की गुलामी वक्त आने पर वो ही गए । रजाई की तरह उतारकर की जा सकती थी संयोग कुछ ऐसा हुआ कि चंद्र उन्हीं दिनों लाला के काम है । इलाहाबाद आया था । अपनी प्रकृति के अनुसार वीरगंज के संगम में गोता लगाने पहुंच गया उस औरत से वहीं उसके मुलाकात हुई । नदी नाव संयोग हुआ और नाम बहती हुई बनारस चली आई । मैं कुछ दिनों चंद्र के साथ ही रहीं । यहीं उसका बिहारी से भी परिचय हुआ पर एक म्यान में दो तलवार कैसे रह सकती थी? पियारी की जवानी के तीखे देवर ने उसे फिर घर के कोठे पर भेज दिया । समय और परिस्थितियों की ते पर तह जमती चली गई और स्मृतियां धुंधली होती चली गई । किंतु इस समय उसे देखते ही प्यारी के मस्तिष्क में पारत दर परत खुलने लगी थी और वह अपने अतीत से ही डरती दिखाई दी । ऍसे जल्दी से जल्दी मुक्त होना चाहती थीं । पर्व है उसे छोडना नहीं चाहती थी, होती जा रही थी अब क्या होगा? मैं तो लूट गई । तब आशा ये है की पी आ रही उससे यह भी नहीं पूछ पा रही थी क्या लुट गई, क्यों लुट गई? कहाँ टूट गई मैं महज धीरज पांच रही थी और कह रही थी तो धीरज रखो अपने काम देखो । भगवान सब की करते का ऍम भगवान बनकर तो आया था । मैं कुछ तेज बोली पीटीआर्इ ने उसे चुप रहने का संकेत क्या? और जो जब उसे दालान में बैठी चौकी की ओर ले गईं । मुझे भी यह कहकर हटाया की तुम यहाँ खडे क्या कर रहे हो तो मैं पढना लिखना नहीं है हूँ । जिज्ञासा और सर पद को जितना काटी है बहुत नहीं तेजी से बढते हैं । मैं यहाँ से कटने के बाद दरवाजे के पीछे से सुनने लगा था । बिहारी ने कहा कि है भले लोगों का घर है, यही तुम जोर से बोलोगे तो मेरे ऊपर भी आप हटा जाएगी । निश्चित था कि प्यार ये नहीं चाहती थी कि इस संदर्भ मम्मा कुछ भी जाने ॅ और उसका गंदा दी थी और दूसरी और धुल धुल कर कुछ फल होता उसका वर्तमान कहाँ से? उस उज्ज्वलता में एक जिन्होंने डब्बे की तरह ये और अ चली आई । पी । आई की मानसिकता सच मुझे एक अप्रत्याशित उलझन का सामना कर रहे नहीं । दोनों के फुसफुसाहट से चलके शब्द मेरे कानों में पढते रहे, पर वह समझ के बाहर थे । हाथ सोचता हूँ तो बात हर बार साफ हो रही थी । कह रही थी मेरे कोठे पर एक ग्राहक आया, खूब खाया, खर्चा नहीं । उसने मुझे हार भी पहनाया रहे घिरेगा था कह रहा था अब तो लगता है वह कांच का ही रह गया होगा । इतना फॅसने लगी । फिर क्या हुआ? तैयारी बोल पडी क्योंकि वो जल्दी से जल्दी के साथ खत्म करना चाहती थी तो क्या तो छूट गई तो उसने औरत की सबसे बडी कमजोरी को पकडा और ऐसा नाटक फैलाया की मेरे बिना एक पल भी नहीं रह सकता । मैं उसकी ज्यादा वो मेरा कृष्ण है । कहने लगा हमारे ब्रांड तुम्हारी मुट्ठी में है । फिर क्या हुआ? बीआर इन दिनों से बुनो हारों का क्योंकि उसे लगा जैसे बात बढने लगी है लेकिन उसने खुद का आया तो आधे बहनों पे शाम मनमोहन ठुमरी शैली में उसने बडी अदा सिखाया था । गला तो उसका अच्छा थाई सौरभ ने फिर विस्तार लेना आरंभ किया और फिर बिहारी ने तो काम वो बोली उस ऍम राधा बना । मैंने उसके कपडे पहने और उसने मेरे मेरे सारे गहने भी उसने धारण कर लिए और एक एक सेट नहीं दो दो तीन तीन सेट क्या कहूँ बहन मैं अपने वर्ष में नहीं था । उसने ऐसा जादू मारा कि मैंने अपने सारे के सारे जेवर उतार कर देती है । मैंने देखा बिहारी बडी जी की आशा से उसे सुन रही थी । शायद मैं शीघ्र अतिशीघ्र इस रहस्यमई कहानी का अंतिम की ओर पकडना चाह रही थी और कह रही थी उस रात हम दोनों साथ साथ सोए थे । सब कुछ बडा अजीब सा लग रहा था राज्य में उसने मुझे अपने हाथ से पांच चलाया हूँ । बस इसके बाद ही मैं सो गई । फिर क्या हुआ मुझे नहीं मालूम । सुबह आठ बजे मेरी ने आकर दरवाजा खटखटाया तब कहीं जाकर आंखें खोलीं । देखा तो वह नदारद था । उसकी रोहतक का पता नहीं । तब से मैं पागल हो कर उसे खोज नहीं हूँ । उसने अपना कुछ अता पता बताया था या ये बताया था कि मध्यमेश्वर के डिप्टी साहब का रिश्तेदार हूँ । मेरे घर के लोग वहीं कह रहे तो उनके यहाँ पता लगाया था हाँ, उन्हीं की आवाज तो आ रही हूँ मैं बोली हूँ । उन्होंने कहा कि ऐसा कोई व्यक्ति मेरा रिश्तेदार नहीं है । इधर महीनों से कोई मेरे यहाँ मैं मान भी नहीं आया । ॅ की हाँ पुलिस का भी दरवाजा खटखटाया पर जो भी सुनता है वही मजाक उडाता है । दरोगाजी कहने लगे जब तुम्हारी राधा ही थी तो जो लेकर इसको ले गए उसका दिल तो तुम्हारी मुट्ठी में है । कभी न कभी देखा बचाकर फिर तुम्हारे यहाँ आ जाएगा । तब मुझे खबर करना उसे गिरफ्तार किया जाएगा । ऐसे बिना आता पता कि कहाँ पर हमारा जाए जो सरसरी तौर पर उन्होंने रिपोर्ट दर्ज कर लीजिए । फिर मैं अपने किए पर पछताने नहीं । डर भागी है कि तब तक मान नीचे आ गई हूँ । फॅसा रही हो आप लोग का तो कोई काम नहीं है क्या माँ का तेवर और झनझन आती आवाज है । दोनों सहम गईं । बिहारी घडी हो गई और उसे लेकर बाहर आई । विदा कर दरवाजा बंद कर लिया । गीजर से निकल कर कमल फिर कभी की छह से होने लगा था । माँ का गुस्सा अप्रत्यक्ष रूप से बिहारी पर उतरा । पीआरआई चुकी रह गई तो मैं ये नहीं पाई की झडी अधिक खुद कमाल की ओर जाए तो कमल क्या करेगा? तैयारी का ऑफर लगा कि अपने को बदलकर उसने क्या किया पर वह अपने इतिहास को बदलना सके । पियारी के ऊपर आते ही माने कहा देखो प्यारी रैंडी पर तोरिया घर में आए । ये मुझे बिलकुल पसंद नहीं है । माँ बोल रही थीं । अब तुम्हारी उपस् थिति की चारों ओर चर्चा करेगी और फिर पुलिस का छापा पडेगा । मैं खुद ही आनी होंगी । भरी भरी आवाज में प्यारी बोली मैं रहने लायक नहीं हूँ और फिर रखने लगी उसकी हर सिटकनी मानो कह रही हो की कमल को दो मूर्ति पर चढने का हक है पर चढ से मूर्ति आप पवित्र करने का किसी को आग नहीं । रामलीला देखने जाते समय चंपुओं में नहीं अपनी माँ के साथ जा रही थी । उसके साथ मोहल्ले के दो तीन और देवी थी । मुझे देखते ही चंपुओं की गति मंदिर पडी वो पीछे रह गई । सुना है तुम्हारे यहाँ बिहारी चाहती थी । जानते हुए भी उसने पूछा हूँ हाँ थी तो तब तुम ने मुझे बताया नहीं माने मना किया था । जैसे लगता है की तो माँ की हर बात मानती हूँ जम्प नाराजगी दिखाई जब तो मुझे इतना नहीं पाते हो तब मैं भी तो उसे कुछ नहीं बताउंगी हूँ । है हमको नहीं उसकी आत्मीयता का अधिकार बोल रहा था जिसके समक्ष में लगभग निरुत्तर था मैंने बात दूसरी ओर मोडी लेकिन मैं चली गई हूँ । कब गए अभी अभी अभी कुछ देर पहले ही तो मोहल्ले वालों को सूचना मिली और अभी चली गई । सूचना मिलने के कारण तो उसे जाना पडा अन्यथा पुलिसा चाहती वर्ग गए कहा होगी ये तो मुझे नहीं मालूम हूँ । हमारे यहाँ तो प्यारी मजे में थी । हमको सोचने लगी आखिर क्या बात हो गई कि उसे जाना पडा उस है उसकी एक पुरानी दोस्ती में लाये तो इससे क्या हुआ? ऍम थी हूँ तुम कैसी बातें करते हो? जानते हो रंडी किसी कहते हैं नहीं, कुछ तो जानता था । मैंने नकारात्मक उत्तर दिया और उसे से पूछा अच्छा तुम ही बताओ रंडी किसे कहते हैं मैं नहीं जानती है । झटके से बोली सरकार की खूब जानती है । खेल तो बताना नहीं चाहती हूँ । अच्छा जी तो मुझे छुपा रही हूँ और कहती हूँ कि तुम से कुछ नहीं पाती तो उन्हें भी तो मुझे प्यारी चाची की खबर छिपाई तो तुम मुझे उसका बदला निकाल रही हो । यही समझ लो, मैं मुस्कराई और एक लाती हुई औरतों के झंडे में चली गई । तारा नगर से मैदागिन जाते समय डांगी तरफ की पटरी पर करते बैठी थी और बाकी और मारते तथा बीज खुली । धरती पर रामलीला होती थी । पानी और टैक्सियां और बसें खडी होती थी । एक तरह से मैं उन दिनों का बजट था । कुछ रामलीला दर्शक उन बसों की छत पर भी सुविधा अनुसार बैठ जाते थे । हम तो सामने जमीन पर बैठी हूँ और तो कि अगली पंक्ति में थी और मैं एक बस की छत पर रह रहे कर मुझे देख लेती थी और मेरी भी नहीं कहा उस पर पड जाती थी । यह स्वभाविक था सहजता पर इससे मेरे ही आगे बैठे कुछ मनचले छोकरों को गलत फैमी हुई हूँ और मैं ऐसे एक ने अपने साथ में से कहा जहाँ तो तजबीज हो आओ चालू जरूर माल भी और राम है । दूसरा बोला गया यार वो बडी करारी ऍम, करारा माल, हाथ से चाइना देर चाहिए । उन सभी की बातें चल रही थी पर मुझे बडी घबराहट हो रही थी तो मैं कुछ बोलने की स्थिति में नहीं था । एक हमला चाहे एक दो अकेला फिर उन गुंडों के मुंह कौन लगेगा? सुनता रहा, सुनता रहा और जब सहन के बाहर हो गया तब धीरे से वहाँ से उतर आया ॅ मैंने रामलीला के भेज से निकल कर देखा है । तीन अब भी चलता हो रहे थे । मुझे लगा जैसे कोई चीज उनकी आंखों से छूटकर चल तो का स्पर्श करती हुई मुझे भेजती चली जा रही थीं । मैं बिजली था उठा मैंने सोचा हूँ मैं भीड में उस और घुस हूँ जिधर करते हैं और राम लीला के कार्यकर्ताओं से चल तो को दिखाकर कहूँ कि उस लडकी और उसकी माँ को बाहर भेजते । उनके घर से बुलावा आया है । मैं आगे बढा भी किसी बीच लक्ष्मण की शक्ति लग गई । राम खिलाफ करने लगे । बेड ही हलचल थम गईं । तब तक शक्ति नहीं छोटी कोई भी और मजबूत नहीं सकती हूँ । किसी भी कार्यकर्ता से कुछ कहना व्यर्थ था । मैं ऐसे स्थान पर चुपचाप खडा हो गया जहां से चंपत दिखाई पड रही थी । पर मैं मुझे नहीं दिख रही थी । उसकी दृष्टि अभी सामने बस की छत पर भटक रही थी । अवश्य ही वैध खोज रही थी कि मैं कहाँ चला गया । निराश होकर चंपुओं की आंखें अब रामविलास आपकी ओर लगी थी । सामने उनके संघर्ष शून्य लक्ष्मण का शरीर पडा था । ध्यान के इलाके साथ साथ अधिकांश और दो के नेत्र नाम हो गए थे । शक्ति छोटे ही फिर में हाल चाल हो ही बहुत से लोग उठ खडे हुए हैं । मैं एक झटके में चैंपियन के पास पहुंच गया । चलो अब काफी देर हो चुकी है । मैंने कहा और मेरे कहते ही चाची और पडीं । उनके साथ मोहल्ले की और औरते भी नहीं तो मैं को लेकर थोडा आगे हो गया । मुझे डर था कि कहीं पे लफंगे मेरा पीछा ना कर रहे हूँ । मैंने कई बार पीछे मोडकर देखा नहीं था । हम अपनी बदमाशी से बाज नहीं आते हैं । ऍम पर चढकर क्यों बैठ गए थे । मैंने उसका कोई उत्तर नहीं दिया । वाराणसी सीधे आरोप लगाया दुम्बी शराब से बाज नहीं आती । आखिर मैंने क्या किया? ॅ और क्यों ताक रहे थी? मैंने पूछा कि लखनऊ की ओर उसकी खानी मैं चला गया था । तब मैंने रफ्तार से उन के बारे में बताया । धुएंॅ चुप रह गईं । उसका संकोच ऍम स्वीकार कर पाया कि मैं तो मैं देख रही थी । उन सब को गलत फहमी थी । मैंने कुछ शब्दों और संकेतों का सहारा लेते हुए बताया कि मुझे बहुत बुरा लग रहा है उन का बोली बोलना । इसलिए मैं अगर उधर आया हूँ और मैं सोचा कि तुम कहाँ चले गए । हम तो बोली मैं बोला तो मैं छोड कर कैसे जाता? इतना कहते ही मैंने हाथ में चिकोडी गाडी निश्चित ही उसके चेहरे पर ललाई गोबर आई होगी लेकिन अंधेरे में मैं देख नहीं पाया मैंने पीछे का जहाँ जी अपनी सहेलियों से बात करने में मगर नहीं हूँ । बृहस्पति भगवान को भी नहीं छोडती कैसे बिलख बिलख कर राम जी रो रहे थे तो मेरा ख्याल है कि अब तो मैं घर से बाहर नहीं निकलना चाहिए । मैंने गंभीर होते हुए कहा क्यों क्योंकि अब तुम बडी हो गए हो तुम भी तो बडे हो गए तो लडका जितना बडा होता है उसे उतना ही घर से बाहर रहना चाहिए और लडकी जितनी बडी होती है उतनी ही घर के भीतर मेरी आवाज मुस्कुरा रही थी । चलो चलो अब तुम बडे बकवादी हो गए ऍम भी क्या सकती हूँ । उसके बाद हम गली में बडे और एक आवाज बडी बेरहमी से हमें डाॅट मालिक इतने भाग में ई माल बताओ हम अब आग्रह गए एक अप्रत्याशित भरेंगे हमारी गति बंद कर दी और जांच जी की और दोनों का समूह जब तक नहीं आ गया हम निश्चित नहीं हुए । ऐसा लगा कि कुछ समय के लिए राष्ट्रीय आंदोलन खोटी बार टांग दिया गया है । अब शाम को जब गंगा राम अखबार लाता तो उसके पडने में कोई मजा नहीं रहता हूँ क्योंकि खबरों पर सेंसर था । सरकार जो जाती थी वही झट्टा था । वो लडाई के समाचारों में भी हर जगह मित्र राष्ट्रों की जीत ही दिखाई देती थी और कहीं कहीं बडी बहादुरी से उनकी सेनाएं पीछे हट गई । मालूम पडती थी किंतु राष्ट्रीय आंदोलन तो वन दिनों अखबारों में दफना दिया गया था । सभी नेता जेल में थे । कौन कहाँ है इसका भी पता नहीं था । ऊं हाँ मुझ पर अब काफी नियंत्रन रखती हूँ क्योंकि मैं अखबारों की सुर्खियों में आ चुका था । अब किसी की नजर में था । एक दिन वचित्र घटना घट गई । मैं हो जा रहा था आज कार्यालय के कुछ पहले लोहटिया चौराहे पर पुलिस की एक लॉरी खडी थी । बता नहीं क्यों? मेरे मन में आया कि मैं वंदे मातरम लाकर देखो की क्या होता है । वो वंदे मातरम, वंदे मातरम मैं दो बार जोर से चलाया हूँ । इस चिल्लाहट के मूल में जगह भी राष्ट्रीयता का ब्रेक नहीं था और न जाना । मेरे मन में देशभक्ति जात पडी थी । ये महज मेरे बाल सभास् का चाट बल्ले था । सिपाहियों में से कुछ ने मुझे पहचान लिया कि कचहरी पर झंडा फहराने वाला यही था और पकडकर लॉटरी में बैठा लिया गया । किसी ने मुझे कुछ पूछा नहीं और न किसी प्रकार का मुझे कष्ट दिया गया । पर उन्होंने समझ लिया था कि मैं व्यक्तिगत सत्याग्रह कर रहा था । मैंने भी मान लिया क्या मैं जेल में डाल दिया जाऊंगा तो मेरी माँ का क्या होगा? वो एक दम अकेली हो जाएगी । उनकी बस्ती आंखों वाला चेहरा मेरे सामने आया और मत से कहने लगा मैंने मना किया था ना तो मैं झंझट में मत पडना फिर तुम नहीं है क्या किया हूँ । मन की गति बडी चंचल होती है । ऐसे अवसरों पर हर कोने खतरे में झांकने लगता है । मुझे लगा मेरे पिता की लाश पडी है । माँ का हाथ मारकर हो रही हैं जहां गाली दादी उन्हें समझा रही हैं । कुछ भरोसा रखो बहू जग्गू की और देखो ऍम किसी देखेंगे । मैं तो खेल जा रहा हूँ । शायद वो दहाड मारकर वैसे ही लोग पडेंगे । लॉटरी चली जा रही थी मेरे सामने मेरी माँ की जीत भी मासूमा करती थी तो मैंने बहुत कोशिश की उनसे मुक्त होने की । पर वह बने मुद्राओं में बार बार आती नहीं । आप स्वयं को संभाल पाना मेरे लिए असंभव हो गया था । मैं बिजली का उठा इस से तो अच्छा कि मैं माफी मांग कर मुक्त हो जाऊँ । मैं अपनी माँ को दुख नहीं दे सकता हूँ । मौका मिलते ही माफी मांगूंगा और दौड कर उनकी छाती से लग जाऊंगा । लगभग इस लडता की ओर बढता मेरा निश्चय उस समय धराशाई हो गया जब मेरी लॉटरी कचेहरी के परिसर में प्रवेश हुई हूँ । सामने दीवानी कचहरी थीं तो वहीं विशाल इमारत है । इस बार मैंने तिरंगा लगाया था । कितनी बहादुरी और कितने उत्साह से ऊपर चढा था । अब तो वहाँ फिर यूनियन जैक लहरा दिया गया । उस समय नीचे खडी भी मेरे अभिवादन मैं चला रही थीं । मेरे चित्र अखबारों में छपे थे । मेरा अहम ही मुझे दुत्कार नहीं । लगा ही नहीं तो मैं माफी नहीं मांगूंगा । फिर मेरी माँ का क्या होगा? भारत माँ की वंदना करने वाले लोग अपनी माँ की चिंता नहीं करते हैं । यहाँ आज कहीं से नहीं आई थी । मेरे ही भीतर उठी थी और भीतर ही घूमती रही । लॉरी से उधर कर मैं कलेक्टर साहब के सामने पेश किया गया हूँ । उसने घोलकर मेरी ओर देखा फिर उसे जैसे कुछ याद आया हूँ । हमने वनडे मातरम का नारा लगाया था । मैं मौनी रहा और स्वीकारात्मक ढंग से से लाया क्यों लगाया था ये मैं नहीं जानता हूँ । मैंने धीरे से कहा ॅ आया । मुझे लगा कि मुझे सत्य कह देना चाहिए । बात ये हुई कि पुलिस की लॉटरी देखकर मेरे मन में आया कि वंदे मातरम का नारा लगा हूँ । आखिर किसलिए? यही तो मैं नहीं जानता हूँ । हमने पुलिस का चिढाने के लिए नारा नहीं लगाया । नहीं ॅ राज्यों की तरह ब्रिटिश हुकूमत को ललकारने के लिए नारा नहीं लगाया तो नहीं हो तुम ने व्यक्तिगत सत्याग्रह नहीं किया । नहीं । डॉक्टर ने नारा क्यों लगाया? उसकी आवाज तेज थी । ठीक से बडी थी सहमत । अब यदि सत्य नहीं कहा जाएगा तो परिस्थिति विषम हो सकती है । तो मैं बोला केवल यह देखने के लिए मैंने वंदे मातरम कहा की देखिए क्या होता हूँ या तो तुम्हारी महज एक बचकानी हरकत है । उसने कागज पाॅवर उठकर भीतर चला गया । लंच का समय हो गया था । बाद में पता चला कि मुझे अदालत उठने तक की सजा हुई है । मुझे इसी अदालत में चुपचाप शाम तक खडे रहना है । और ये भी बताया गया की अभी फिर कभी ऐसी हरकत महीने की तो मुझे कडी सजा दी जाएगी । फिल्में मुझे जानता था यह भी वह वाला आदमी था वरना और कोई कलेक्टर होता तो मैं जरूर जेल भेज दिया जाता हूँ । मेरे पास केवल जलपान के लिए एक पैसा तो भूक लगी थी । कचहरी के बाहर पटरी पर एक खोंचेवाला प्याज की गरम गरम पकौडियां निकाल रहा था । मैंने अपने पैसे का सदुपयोग किया और पकौडियां खाकर भरपेट पानी दिया । जेब खाली हो गई । कचहरी से पैदल ही चल पडा वो दिन भर खडे रहने के बाद चलना भारी पड रहा था फिर भी लाचार था । धीरे धीरे संध्या से मर चुकी थी और घर आते आते अंधेरा हो चला था । यदि मेरी माँ को जगह दी इस विषय में स्थिति का आवाज होता तो मैं पूजा कर बैठी मिलती । फॅमिली कोठी से आई थी । उन्होंने मुझे देखते ही पूछा आज बडी देर हो गयी जब वो वो गोल के मास्टर साहब ने रोक लिया था । हाँ नहीं धीरे से का समय वक्त कैसा है फॅमिली का हो । जल्दी छुट्टी दे दिया करें । कुछ बोला नहीं क्योंकि चोट को विस्तार देना स्वयं को खतरे में डालना था । जो आप जी लगेगी चारपाई पर लेट गया । बहुत धक् किया था । मैंने कई बार खाने के लिए कहा फिर भी उठने की हिम्मत ना हुई । मुश्किल से आधा घंटा पीता था । अभी अंधेरा नहीं हुआ था । किसी ने दरवाजा खटखटाया हूँ वो जबकि सांकल बंद नहीं था । दूसरी गोठी में माँ कपडे बदल रही थी । मैं पढा था कोई बोला नहीं । आहट लगी की आगंतुक दरवाजा खोलकर चौक में आ गया । जब हुआ हूँ एक महीना और जानी पहचानी आवास मुझे छूती हुई निकल गई हूँ मैं था उधर से माँ भी आईं जाॅब एक महीना और जानी पहचानी सी आवाज मुझे छोटी हुई निकल गई मैं उठा उधर से माँ भी आई मैंने देखा नीचे जॉब में बोर खाओ रहे कोई खडी है माने मेरी और देखा वार बोली का क्या बात है उसने बुर्का हटाया ऍम अरे ये तो सही है अम्मी जानने जब तो भाई को बुलाया है और मैं बोली और अनासक्त भाव से मेरी ओर देखा हूँ । उसके बाद माँ ने अपनी जिज्ञासा शांत की और जान लिया कि है दान इसकी बहन है । मैंने कई बाहर मेरी और भी देखा मुझे पढ नहीं की कोशिश की मैं नहीं चाहती दीजिए मैदान इसके यहाँ हूँ किन्तु रात होते होते एक मासूम लडकी द्वारा बुलाया जाना किसी गंभीर समस्या का संदेह दे रहा था । असमंजस में उलझी उनकी मानसिकता बहुत देर तक मान रही । अंत में उन्हें कहना ही बडा अच्छा तुम चलो में जब दुख बेचती हूँ चली गयी । खाना खाकर मैं चलने को हुआ हूँ । इस बार उन्होंने मुझे कुछ विशेष सावधान नहीं किया । मैं स्वयं अनुभव कर रही थी की नियति की डोर मुझे अन चीन है और अनजाने नगर की ओर खींचती चली जा रहे हैं जिस पर उनका कोई वर्ष नहीं है । वो मात्र इतना बोली हूँ देखो बेटा जल्दी आ जाना डायलान के पुरानी तक पर बडी अपनी जेईसी में तार तार हुई दरी पर अम्मीजान पडी करा रही नहीं रहाने कि ओ डोरी पर जल रहा दिया रोशनी है कहीं अधिक धुआँ कर रहा था यार हमें जन का सर्दी आ रही थी ऍम यहाँ मैंने आश्चर्य से जिज्ञासा को धर दबाया तो मैंने उसे नमस्कार किया और उसने अपनी जान को छोडकर मुझे अपने साॅस ऍफ प्रकार की अनुभूति हुई हूँ ऍम कब से तो मैं याद कर रही थी सलमा बोली बर अम्मी जान अब भी करा हाथ ही नहीं । बाद में पता चला कि वह हफ्तों से बीमार हैं । बुखार छोडने का नाम ही नहीं लेता हूँ । आॅटो अम्मी जानने कराते हुए मुझे अपने पास बुलाया तथा मुझे और निकट खींचते हुए बोली बेटा ऍम कि ज्यादा दिन नहीं चलेगी । पता नहीं था इसका क्या हाल है । इतना कहते कहते उन्होंने गहरी सांस ली और कुछ दिनों के लिए चुप हो गई । फिर बोली सुना है मैं सारनाथ के आगे कादीपुर स्टेशन पडता है । वहीं किसी गांव में रमजान मियां यहाँ रहता है फिर चुप हो गईं । मानो मुझे पूछने का अवसर दे रही हूँ की आपको ये कैसे मालूम हूँ । एक दिन उसके आदमी से अपनी खैरियत उसने भेजी थी । बात इस बार भी एक टूटी हुई रह के साथ खत्म हो गयी । वो बोली तो कम ही पर जो कुछ मैंने समझा उसका अर्थ साफ था की घर की हर चीज चुप चुकी है । यहाँ तक की बकरी के लिए चारा भी नहीं है । लाये तो ऑनलाइन बिहारी बाहर निकाल नहीं सकती और पैसे भी कहाँ से आएगा । जब तक चांगर चलता रहा नसीर के कारखाने से मोजा चलने को लाती रहीं तो उन दिनों मुझे के पंजे पर एडी की सिलाई उसी का ताजा निकालकर हाथ से होती थी । अम्मी जानने बिहारी को भी सिखा दिया था तो बोलती नहीं हम दोनो उसी की बदौलत अपनी जिंदगी आपकी चल रहे थे । पर खुदा कोई बिना सुहाया । बितना कहने के बाद उन्होंने या लाख कहते हुए ऊपर खपरैल की ओर देखा और आंखे बंद कर नहीं जैसे अल्लाह से दुआ मांग रही हूँ । मैंने अनुभव किया कि उन्होंने कितनी व्यवस्था से सलमा को मेरे पास पहुँचा होगा, पर मैं क्या कर सकता हूँ । विषम परिस्थिति में सागर के किनारे मेरी ऐसा खडा उसकी उत्ताल तरंगे देखता रहूँ । अचानक मैंने कहा कहीं है तो कल मैदान इसका पता लगा हूँ क्या करोगे उसका पता लगाकर मुझे लगता था जो अम्मीजान अभी दान इसके लिए बॅाडी मैं क्या कह रही हैं? खुदा उसकी खैर करें । अम्मीजान की लडखडाती आवास भागे बढती गई । अगर सुनेगा तो घबरा उठेगा जरूर आएगा और मैं उस से खतरे में डालना नहीं चाहती हूँ क्योंकि हमारी जिंदगी से देश की आजादी कहीं ज्यादा जरूरी है । ऐसा है बोली मैं दम झनझना उठा मेरी रगों में यह है कोई चीज अचानक पिघल कर दौडने लगी । क्या कह रही है बूढी उनकी काफी और गंभीर आवास अब तक मेरे कानों में गूंज नहीं । आगे यही जज्बा तो डाल । इसको हिरासत में मिला था । बे हर मुसीबत झेल सकता था पर अन्याय और गुलामी नहीं कह सकता हूँ । थोडी देर बाद ऍम ने सलमा को बुलाया और संकेत से कहा कि अपनी दोनों बालियां उतारकर जगह को दे तो जैसे बातें पहले से ही निश्चित थी । उसे उतारते और देखते देर नाला की पीआरवी हथकढ ही देखती रह गई । बालियां मेरे हाथ में थीं तो सामने सलमा कम मासूम चेहरा था । उसकी बधाई आगे टपकने लगी थी मानव परिस्थितियों ने पत्थर ने छोडा हूँ, ले जाओ बेटा और माँ से कहना कहीं गिरवी रखकर या इसे बेचकर हमारा काम चला जाए । आगे अल्लाह मालिक हैं । अम्मी जान बोल नहीं अब मैं क्या करूँ? जी में आया की बालियों से लौटा दूं । सलमा के सोने सोने कान मुझे खोलने लगे थे । पियारी मेरी निस्सहाय से मुझे देख रही थी । इसी बीच बकडी भी नहीं आई । पारिजनों धीरे से जैसे उसने मम्मी आने की ताकत भी खोदी हो । जल्दी करो जागू नहीं तो रात अधिक हो जाएगी । कराहा में लिपटी हमें जानकी आवाज फिर मच्छर टकराई और ऐसा लगा जैसे कोई मुझे खेल रहा हूँ । विचल पडा सलमान द्वार तक मुझे पहुंचाने आई । मैं जो ही द्वार से निकला । सलमान ने मेरा हाथ दबाया । भैया इतना कहते है देखने लगी । मैं आज तक समझ नहीं पाया कि उसकी सिस्टम में दान इसके प्रति मोहम्मद जिज्ञासा थी या पराजित मन की हटाऊं अथवा मेरे प्रति कोई और भाग मैं गली में चला रहा था । सलमा किस किस क्या अब भी मेरा पीछा कर रही थीं । माने पहुंचते ही पूछा क्या बाद ही मैंने दोनों वालियों ने दिखाई और सारी स्थिति के उठाई । माँ आंध्र होती लगा । उन्हें अपने दिन याद आ गए जब उन्होंने अपनी बालियां बेचकर पिताजी की चिकित्सा की थी । मैं बहुत देर तक उन बालियों को देखती और कुछ भी नहीं । फिर उन्होंने मिनिस्टर से एक मोटे झोले में आता पडेगा । दूसरे कपडे में चावल की गठरी बांधी पर डाल की मंत्री तो खाली थी जब मेरे चाचा से कहते की माँ ने शेर वरदान और दो बोडिया जोशांदा का काढा मंगाई । उन्होंने कहा मैं चाचा के हाँ तो वो ही बात है इस समय तेरी माँ को दाल और जो शांति की क्या जरूरत आ पडी । अभी शाम को तो वैदर चाहिए गई थी तब तो उन्होंने कुछ नहीं कहा । जा अच्छा ने शंका व्यक्त की वो मुझे खोलना था । नहीं मैंने सब बता दिया मैं गंभीर हो गया । कुछ बोला नहीं वो कागज के होंगे में बिना ना पेजों के वैताल भरने लगा और अच्छी तरह भर कर दो जगह चार पहन के जो शान देंगे दे दी है । देखो ऍसे बुखार ना होता तो हमें बताना । चाचा की मुद्रा मुझे हर तरह की सहायता के लिए तक बढेगी और मैं कुछ कुछ उपयुक्त भी लगा हूँ । क्यों नहीं लगता कभी रहे दूसरों का घर फूंकने के लिए मिट्टी का तेल देने के लिए मजबूर किया गया था । आज दो से बेवस और मजबूर लोगों की पेट की ज्वाला बुझने का अवसर मिल रहा था । जांचे कुश्ती पियारी के संबंध में जन का अच्छा हुआ की आ रही वहीं है और उन लोगों के साथ रहकर खान पान करके उसका धर्म तो चला नहीं जाएगा है वही जहाँ जा कुछ बोला नहीं, उसको गंभीरता मानव कह रही थीं । अगली आजादी के बाद धर्म की ये चोंचले नहीं रहेंगे तब ना कोई हिंदू रहेगा । मैं मुसलमान आदमी मैच आदमी रहेगा हूँ । आते ही माने दाल और जो शांति के साथ आटे के झोले और चावल की पोटली कर रख कर एक बडी गठरी बांधी । मझोले काम पहले से ही बांध कर बैठी थी । फिर उसे उठाकार अंदाजा गठरी तो वह नहीं हो गई है, तुमसे चली जाएगी । मैंने उसे एक झटके से उठाकर सर पर रख लिया हो या ये क्या है इससे भी अधिक उठा सकता हूँ । फिर मान्य बालियां मुझे थमा दी । बोली इसे लौटा देना । अचानक बैठ की बालियां लौटा लेते हुए मैं बोली कह देना की बालियां माँ के पास है और उनकी भंगिमा बता रही थी की सुराजी लोग बडे स्वाभिमानी होते हैं । कहीं बालियां लौटा देने से मैं यह कट रही स्वीकार ना करें । एक बार माँ की राय हुए हैं कि मैं गंगा राम को भी साथ ले लूँ किंतु शीघ्र ही उन्होंने रायबरेली पीआईडी वही है गंगा राम है, बडा बडा बढिया हो सकता है उससे बात हो जाए । जिंदगी के इतने अंजील है और अनजाने रस्तों पर माँ चली थी । बिकनी अनिश्चतता हूँ के बीच से गुजर रही थी कि हर बात में आगाह पीछा सोचना उनका स्वभाव हो गया था । मेरे साथ सडक तक आई । गठरी तो मेरे सिर पर थी पर वह है उसको अपने हाथ से पकडे हुए उसका बोझ बता रही थी तो सडक पर आकर उन्होंने उसे छोड दिया । देखो जल्दी आना ऍम लौट गईं । जो ही दानिस घर मैं गुस्सा बकरी में भी आई है । उसकी प्रकृति थी । किसी भी आगंतुक को देखते हुए बोल पडती थी पर मुझे लगा महीनों में मुझसे कह रही हूँ कि सब के लिए तुम ले । आयोग पर मेरे लिए कहलाये हूँ । मेरी शीघ्रता पर लोगों को आश्चर्य था । उस बुखार में भी अम्मी झान उठकर बैठ नहीं और मुझे सीने से लगा लिया । जरूर उनकी धडक थी । घर समझाती के भीतर मेरी छवि उठाने से मिलकर एक हो गई होगी । मुझे ऐसा लगा उन्होंने जो शांति के पैकेटों को बार बार देखा हूँ और उन को भी दिखाया हूँ । देखो मेरे लिए दवाई लाया है । वो कितनी खुश थी, मुझ पर कैसे बताऊँ? बिहारी तो कंट्री खोलने में लगी थी, पर सलमान एक डाक मुझे देख रही थी । उसकी आंखों से कहीं अधिक उसके लगे गण बोलने लगे थे । जब मैं खाली झोला लेकर चलने लगा । अम्मीजान चल नहीं आ रहे हैं । हाल ही झोला नहीं लौटाया जाता पगली उसमें दो चार चार वाली डाल दें । सलमान मेरे लिए चावलों में है । एक मुट्ठी ले आई और झोले में डालते हुए भी मेरी ओर देखती रही हूँ । उस की दृष्टि में अभावा जन ने अब एक था । दरवाजे तक आते आते वह बोली पडी तुम्हारी माने मेरे संबंध में तो कुछ नहीं कहा नहीं आखिर मेरी माँ से क्या कहने की उपेक्षा थी बालियों का क्या हुआ? उसने पूछा हूँ अब उसकी पीडा का संदर्भ मेरी समझ में आया ऍम के पास है तो मैंने बताया ऍम कहते हुए उसने द्वार बंद कर लिया । फॅमिली में चला रहा था जहाँ के बढते हुए अंधेरे पर सलमा के कानों का सोना पाँच पिघल कर पसर गया था । स्कूल से लौट रहा था । आकाश बादलों से ढक गया था । घोर बारिश की आशंका थी इसीलिए छुट्टी को जल्दी हो गई थीं । तेजी से पैर बढाए चला रहा था की कोठी का नौकर नगीना आगे जाता दिखाई दिया हूँ । मैं दो गठिया लिए था । एक में पुराने कपडे बंद है, मालूम पड रहे थे और दूसरे मैं कुछ सामान लग रहा था कहाँ जा रहे हो नगीना पीछे से उसके निकट आकर मैंने पूछा तो रही है चलता ही माँ कहाँ है? आॅल नगीना बोला हम से पहले नहीं के घर पहुंचा अच्छा मोबाइल की तो मिल गए नहीं तो मेरे ऍम चला जाए तो शायद माने दान इसके परिवार की हालत गगरानी बहुत से बताई होगी । तभी उन्होंने धरना सामान भिजवा दिया था । मैं कपडे की गठरी खोलने का लोग संबंध नहीं कर सका । मैंने देखा कुछ मेरे लायक कपडे हैं, कुछ बडे बडे फ्रॉक और छोटे छोटे जंफर है । आवश्यक ईरानी बहु ने अपने बच्चों के कपडे भेजे हैं पर जम्प तो फ्रॉक नहीं पहनती, जरूर ये सलमा के लिए होंगे । फटी ना होने पर भी उम्र की समाप्ति कि झवर पर बडी कुछ गाडियां भी थी । थोडी देर बाद माँ नहीं और मुझे कपडे उधेडते देखकर झिडकी मैं जानती थी तो मैं ऐसे खोलकर देखे होंगे । नहीं नहीं हूँ मैं तो सही लगा कर रखता जा रहा हूँ । मैंने कहा हूँ मैं मैच कपडों की स्थिति देख रहा था और प्रसन्न हो रहा था । इस बार मिले कपडे फटे नहीं थे । केवल कुछ बटन छोटे थे और कुछ की कहीं कहीं सिलाई उधड गई थी तो अपने कपडे अलग कर लोग और बाकी को बांध कर रख दो । माँ बोली हूँ ये सब गाने के घर वालों के लिए है । इतने सारे कपडे वहाँ चले जाएंगे ये मैं नहीं मेरे भीतर से चंपा बोली थी माने जैसे सुना ही ना हूँ । मैं साडी बदलकर आई और उन कपडों को देखने लगी । निश्चित ही उन्होंने इसके पहले देखा नहीं था वो जो जो वह देखती जाती उनका लोग बढता जाता था हूँ । मैं उनकी मुख्यमंत्रा ही देख रहा था । अंत में साढे को देखते देखते उसके मुंह से निकल ही बढा हूँ । इनमें से तो सभी पहनने लायक है । उसने कुछ को छोडकर लगभग सभी साडिया को हटा लिया और मुझे चंदों को बुलाने के लिए कहा । मैं जरूर कुछ नाम तो के लिए भी निकाल देना चाहती थी । आज मेरे मन की थी मैं उसके घर की और लडका घाटा और घनी हो गई थी । वो अंधेरा बढ रहा था । कोई दूसरी स्थिति होती तो चाची कभी भी इस समय जनता को घर से बाहर नहीं निकलने देती हूँ पर मसला कपडों का था । अपनी बेटी की ललक को दवा नहीं पाई । चल तो मेरे साथ चली पर जल्दी आने का आश्वासन देकर उसमें सारे जंपर झाडली है और फ्रॉक छोड दिए वो तो उसने एक समीर एक तरह की मैक्सी भी अपने लिए ले ली या क्या करोगी? मैंने पूछा ऍम पुणे विस्तार से बताया कि इसे बहन कर रहे साडी पहनेगी उसके नीचे का हिस्सा साया का काम करेगा और ऊपर का जंफर का महास पानी क्षमताओं के लोग पर नहीं वरन उसके सोचने के ढंग पर इसे रहने दो । मैं तो मैं साया अलग से लाभ होंगी हूँ । माँ की दृष्टि में सलमा की नहीं रही । आकृतियों भरा ही उन्होंने समीर उसके हाथ से ले लेंगे । अब बारिश शुरू हो गई नहीं, वो भी काफी तेज लगता था । आसमान फट पडेगा, अप्रैल तक नहीं लगेंगे । माने आवश्यक चीजें उठाकर चारपाई पर खडे आदि पूछे स्थानों पर अपना आरंभ किया । अनुमान हो गया था कि इस बरसात को हमारा टूटा खड पहल संभाल नहीं पाएगा और कोठारी देखते देखते झील में बदल जाएगी । हम लोग भी कपडे की गठरी उठाकर चारपाई पर बैठ गए और ऊपर से दो छात्रों की नीचे उस चारपाई को ढकने की असफल चेष्टा करने लगे । घरे में दो ही चाहते थे । एक पिताजी के समय का एकदम पुराना लगभग छलनी समझे । दूसरा कुछ नया था । किसी के त्रयोदशाह में माँ को बढनी में मिला था हूँ । मैं दूसरी कोठरी में बिस्तर और अनाज को बचाने में लगी थी । इधर कमरे में पानी भरने लगा था, पर हमें कोई चिंता नहीं थी । हमें ऐसी जिंदगी जीने के आदी हो चुके थे । ऐसी अनेक बरसात ही रहते हमने चार पाएगी टापू में सिमट कर बताई थी । वर्क यही था कि आज संपत्ति और दूसरी ओर हमारे लोग की अरगनी से लटक रही उन कपडों की गठरी हमारी मानसिकता उन्हीं से लिपटी रही । यहाँ नहीं आपको अपने बच्चों के लिए कितने सारे कपडे सिलवा दी होंगी । हमको बॉलिंग ऍम इतना हम लोगों को देती हैं तब कितना भी उनके पास होंगे । ऍन में कई बार कपडे बदलते हैं । मैंने कहा हो जम्प हो चुकी थी उसकी मुखाकृति से लगा उसका मन बोल रहा है और हम लोग तो एक कपडा पहने रहते हैं जब तक फॅर ना हो जाये हूँ । दानिश कह रहा था कि स्वराज के बाद ऐसा नहीं होगा । मैंने कहा तो क्या सारे कपडे घाटा करके देश के हर व्यक्ति में बराबर बराबर बांट दिया जाएगा । हमको हंस पडी उसकी हाल ही में दान इसका विश्वास फडफडाता भी बडा हो तो हम तो एकदम हमीद की तरह सोचने लगी हो । तुम्हारा मतलब अमीर कह रहा था कि स्वराज ऐसे कुछ नहीं होता जब तक देश लाल झंडे के नीचे नहीं आता हूँ । ये लाल झंडा क्या है वो मैं उसे कैसे बताऊँ? मैंने हमीद के संबंध में कहना शुरू किया आजकल वह रूसी पार्टी का सादा से हो गया है । मैंने उसे बताया कि रूस में कम्युनिस्ट पार्टी है । उसने वहाँ के राजा को मार कर सकता, छीन ली तो वहाँ दूसरा राजा हो गया होगा वो बडे ही सहज बाहर से बोलिंग जो कहते हैं जनता ही राजा है भी । मैंने कहा जनता ने अमीरों की संपत्ति छीनकर गरीबों में बांटते हैं । हमीद कहता है, जब यहाँ भी लाल झंडे का राज होगा तो ऐसा ही होगा । जब हो चुकी थी पानी और तेज हो गया था वो घर पे हल्की टपकन के परिवर्तन के साथ ही साथ छाते को इधर उधर करती रही और उसका टन मेरे तन से टकराता रहा हूँ । तिरंगे झंडे से जुडा उसका मन निश्चित रूप से लाल झंडे के संदर्भ में बहुत दूर था । वो उसने निकट आने का कोई प्रयास भी नहीं किया क्योंकि हम ईद के संबंध में उसकी धारणा ही नहीं थी । तो मैं उसे आवारा और पुलिस का खुफिया से अधिक कुछ नहीं समझती थी । हमीद के कथन में उसे सरकारी चालकी ही कंधाई मेरे चाचा की दुकान पर शाम को बैठने वाले लोगों की बातें सुनते सुनते चल तो देश की गतिविधि से बहुत कुछ बाकी थी । वो स्वराज, गांधीजी आदि के बारे में थोडा बहुत जानती थीं । ऍम मानने को तैयार नहीं थी कि तिरंगे की अतिरिक्त कोई लाल झंडा विदेश में होगा । यदि मैं उससे ये कहता हूँ कि हम ईद अब सुभाष बाबू का भी गाली देता है । उन्हें फार्मासिस्टों का दलाल कहता है तो निश्चित ही बडा कुछ थी । भले ही मैं फास्ट शब्द का अर्थ ना समझती हूँ । इसी बीच बौछार के साथ ही देख हवा का झोंका आया और आने में किताब की आड में जल रही थी । वहीं काम कर बुझ गई । अब नहीं । अब बना बगल की कंट्री से माँ की आवाज सुनाई थी देखो खाडके नहीं कीमत उतरना जमीन की मिट्टी फूल गई होगी । फिसलकर गिर जाओगे । यही तो हम चाहते थे प्रकाश के अभाव में हमारे निकटता और बडी मेरा हाथ उसके तन के अनेक स्थलों पर आता जा रहा हूँ । मुझे रोका तो नहीं तो इतना वश्य बोली तुम बडे दुष्ट होते जा रहे हो हूँ । अचानक बडी तेज की चमक हुई और उसका पीछा करती दिल दहला देने वाली कडकडाहट ॅ एकदम मेरे बदन से चिपक गई । छाता हाथ से छोड दिया । ऐसा लगा आकाश के बिजली फडफडाती हुई मेरी नजरों में दौड गए हैं । मुझे एक अकल्पनीय अनुभूति हुए पर शीघ्र ही वॅार टेस्ट होते हुए सिमट गई । क्या हुआ कुछ नहीं लगता है । कहीं बिजली गिरी है । छाता ठीक करते हुए बोली थोडी देर बाद पानी कुछ कम हुआ हूँ वहाँ पे ही कोठरी में आएँ हम दोनों की सजगता ने अपनी बीच की दूरी ठीक नहीं माने दिया जलाया और मुझे बोली तुम चल तो को पहुंचा दो पानी कुछ धमा है, हो सकता है फिर हो जाये विलन और चौक में लगे पानी को बाहर करते हम किसी तरह समझाते में घर से बाहर निकले । छाता पकडे थी और मेरा हाथ उसके कंधे पडता हूँ । कमर तक जाते जाते नहीं धीरे से मेरा हाथ बटा दे दी थी तो ही नहीं कुछ आगे बढने पर हम लोगों ने देखा की गली के मौके पर एक आजमी छाटा लगाएँ । ऐसे किसी की प्रतीक्षा कर रहा है । सारे ये आदमी तो तब भी यही दिखाई दिया था जब मैं आ रही थी तो मैं से जानते हूँ । बन्दों ने पूछा नहीं मैं उसे कौर से देखता रहा हूँ । उसने अपनी कमर से कोई चीज निकली और उसे खोलने लगा हूँ । पहले ही वहाँ कोई दूसरा चीज रहा हूँ । पर मेरे भाई को मैं चाहता हूँ जैसा ही दिखाई दिया ना हो तो हम लोग और चले इस अंधेरे में आगे बढना ठीक नहीं । हम तो भी निश्चित रूप से डर गई थी । पर मैं कुछ बोली नहीं । उसकी जहाँ बहुत धीमी पड गई थी लगा कि वो लौट चलने का ही निर्णय लेने वाली है । तब तक पीछे से आदमी एक और आता दिखाई दिया जिसको देखते ही पहले वाला आदमी घर से गली में थोडा और कैसा क्या आप स्पष्ट हुआ कि सुमेर चाचा ही आ रहे हैं । पहचान में जाना नहीं जमता को ले नहीं आ रहे थे वो ।

Part 7

भाग साथ समय का शाॅल नहीं लगा था हूँ । यूरोप के फ्रंट पर मित्र राष्ट्रों की विजय ने अंग्रेजों के हौसले बुलंद कर दिए थे । भारत भी उसके प्रभाव से मुक्त ना रह सका । बंदे नो मैं टीवी स्कूल का विद्यार्थी था । वी माने विक्ट्री अठारह ऍम चर्च चलने दो उंगलियों को मिलाकर भी बनाने का नया रिवाज निकाला था । अंग्रेज भाव उंगलियों के इसी बीस है । अब अभिवादन भी करने लगे थे । हमारे स्कूल में बडे बडे पोस्टर भी के लगाए गए थे । तो रोज अखबार बस विजय के ही समाचार झाकते थे । कुछ उंगलियों पर गिने लोग उनके विजय पर्व में शामिल होते थे । किंतु हमें ऐसा लगता था कि हमारी पराजय हो रही है । साधारण जनता के दिन बोलने लगे थे तो हमारी आजादी की उम्मीद का । चिराग तूफान को झेल रहा था कि बंगाल में भीषण अकाल पडा । सरकारी आंकडों के अनुसार मृतकों की संख्या पंद्रह लाख का पहुंच गई थी । पर ट्रॅफी चटोपाध्याय की गैरसरकारी रिपोर्ट के अनुसार पैंतीस लाख लोगों को दुर्भिक्ष निकल गया था । उन्हें बचाया जा सकता था । पर सरकार ने कारगर कदम नहीं उठाए । देश की आत्मा कर रहा उठी हूँ किन्तु कोई क्या कर सकता था । वो छोटे कार्यकर्ता से लेकर नेता तक जेल में ठूस दिए गए थे । निराशा और ऍम बोर्ड ने अजीब स्थिति पैदा कर दी थी । अमन सब भाइयों के सिर पर चढी । गांधी टोपी उतार कर अब फिर रद्दी की टोकरी में जा चुकी थी । उनकी गतिविधियां भी तेज हो गई थीं । पी पाने सुमेर चाचा को बताया, लाला ने अपने भविष्य में एक नया अनाथालय खोला है तो मैं कैसे मान लू नगर का शादी गुंडा बलदाऊ बता रहा था । पी पा बोला अब मैं भी वही काम करता है । गुंडा और अनाथालय ऍम और अस्पताल में वहाँ चाचा कुछ सोचने लगे । लगता है अब रानी बहुत अनाथालय बंद हो जाएगा । दोनों आमने कम नहीं है । चाचा ने कहा तुम तो जानते ही हो । एक ही जगह कि उठी दुर्गंध वहाँ की सुगंध को दबा देती है और तुम जी से दुर्गंध समझते हो । वही सुगंध हो तो बीडी के बंडल के लिए जब मन नहीं देखते हुए एक नया ग्राहक बोला जोर गाजी आधा जहाँ चाचा ने लाला के खिलाफ कुछ कहा, वहाँ कोई न कोई अपरिचित अवश्य आ धमका । उसे मात्र संयोग कहा जाए या लाला की सजगता की । उसने चाचा की गतिविधि को घेर रखा था तो चाचा सहमत हूँ । देश पैसे लौटाते हुए एक करते मुस्कान चेहरे पर चिपकाकर बोला तब तो सुगंध से ही सुगंध होगी । बाबू जी हूॅं हाँ बराबर रास्ते पर आए हैं । सब राहत ऍम अस कराया हूँ । मैं चलने को हुआ कि चाचा नहीं, इधर से तीन बीडी सुलगाकर एक उसे थमा दी । दूसरी पीपा तो और ये ऍम हूँ भैया । इसके पहले मैंने आपको कभी इधर नहीं देखा था, न देखा होगा बडी बेर खाई से मैं बोला चाचा की दहशत पर एक ते और जमीन । वे चाहता था कि इस नए ग्राहक को वह दुकान पर बैठाए, उसका कुछ और सरकार करें । पर उसने पुट्टे पर हाथ नहीं रखने दिया तो खडा ही रहा । जब चलने लगा तब चाचा बोले आप हमारे नए ग्राहक है । अब उसकी ठनने एक महापौर लिया गबरा मैं जल्दी पुराना हो जाऊंगा । बडी कृपा है आपकी जांचा कहना चाहता था की सेवा का अवसर दीजिएगा । किंतु उसके मुख से निकला जिस भी चीज की जरूरत होने संकोच मांगेगा, मांगूंगा या खुद ले लूंगा भाई बिल्कुल चिंता ना करें । वो अजीब ढंग से तरेरता चला गया । उसके चले जाने के बाद बहुत देर तक चाचा सोच में बता रहा हूँ । उसे लग रहा था उसके चारों और भय की अध्यक्ष दीवार उठती चली जा रही है और उनमें जडती जा रही हैं । उस नए ग्राहक की धुलती अगनित आंखें, उसकी वाणी उन्ही दीवारों में कैद हो गई थीं । वीडियो था उस्मान के मध्य ही उसने संकल्प क्या अब लाला के खिलाफ कुछ नहीं कहूंगा, उसका मन ही बोलने लगा था तो बोलना भले ही बंद करो, पर सोचना कैसे बंद कर सकते हो । आज अम्मीजान सलमा को लेकर आई थीं शुक्रियादा करने ना उनकी मुसीबत में काम जो आई थी । माँ प्रसन्न हो गईं । उन्होंने उनकी आवभगत की । उन्हें कोठी जाने को देर हो रही थी । फिर भी उन के लिए उन्होंने जल्दी से हलवा बनवाया । अब तो किसमें नहीं शिष्य की एक प्याली थी, वो भी फोर चुकी थी । घर के बर्तनों में दिया नहीं जा सकता था क्योंकि तो रुक जो ठहरे माने मुझे कहा क्या हनुमान मंदिर में पटरियां धोने पडे होंगे । डॉक्टर डाला रामकली दादी वाले हनुमान मंदिर की ओर दौड पडा । मैं तो अम्मी जान के यहाँ दान इसके साथ बैठकर कई बार खा चुका हूँ । मेरी ये कहने की हिम्मत ना हुई और मैंने जरूरी भी नहीं समझा । फिर मैं ही क्यों बताऊँ? ऐसे वक्त बताएगा ॅ धोनी में ही सही हलुआ तो हाल हुआ है ना उनका सरकार करके खुश थी । और उस समय तो इस सरकार के सिंधु में जैसे जो हार सहा गया, जब माने, नितांत विनीत भाव से सलमा की बालियां लौटाई । ॅ या भी आप के पास ही है । हम भी जान बोली मैंने तो इन्हें बेचने के लिए भेजा था, पर इन्हें कोई खरीदने वाला नहीं मिला । मैंने कहा और हंस पडी हूँ । अम्मी जानकी हंसी भी उसमें शामिल हो गई और सलाह उसका तो रोम रोम खिलखिला रहा था, किंतु वोट बंद थे । मेरे रह रहे घर मुझे देख रही थी तो हमारी माँ सच मुझे बहुत अच्छी है । तो तब इतने सारे अनाज का जो शांति का इंतजाम आपने क्या क्या ऍन बोली वो मैंने नहीं भगवान नहीं किया, ना मुस्कुराएं और रानी बहुत ही सहायता का उल्लेख किया । बडी मेहरबानी ॅ उनकी जगह का गोल करें । अम्मी जान के दोनों हाथ ऊपर उठे और आंखें आकाश पर तंग नहीं । जैसे मैं खुद अल्लाह को देख रही हूँ या एक कतर की के लिए उनकी हितैषी किसी देवता से कम ना होती । हो सकता है । रानी बहुत ही हमने जानकी भावुकता के समक्ष आ गई हूँ । सचिन वो चीज वो बेचारी गरीबों के लिए बहुत करती हैं । एक अनाथालय को ही लोग कितने अनाथों का भला होता है । खुदा उनका खैर करें । उनकी आंखें फिर आकाश की ओर उठीं हूँ । किन्तु जब वहाँ से मालूम हुआ क्या अनाथालय बंद होने वाला है? तो वैसे कब रह गईं? आखिर क्यों उनके मुंह से निकल पडा? परेशान हो चुकी है वहाँ बोली अब तक राज्य में उनके अनाथालय के आटे में मरे हुए कुछ देवर बिल्लियाँ भेज दी जाती रही हैं । कल किसी ने एक औरत कोई मार कर फेंक दिया । ऍम को ही मार कर फेंक दिया भाई! अल्ला क्या कह रही हूँ अभी जान के आश्चर्य का ठिकाना ना रहा । उसकी शिनाख्त तो हुई होगी । आखिर बैठी काॅलाेनी बहु बता रही थी की लाश श्रीनाथ चुकी काम मिल नहीं थी । उसका मुंह तेजाब से जलाकर अच्छी तरह से कुछ दिया गया था । अम्मीजान का सारा हरीर जैसे घनघना गया उनकी आकृति कि प्रत्येक झुर्री से इस फॅसे प्रति घना फट पडीं । किस कमीने ऐसी हरकत की होगी? किसको कहा जाए? बहन गगरानी बहुत बडी गंभीर औरत है तो मैं कुछ बताई नहीं हो सकता है । जानती भी हो, झमेला मोल लेने से फायदा ही क्या । पुलिस के यहाँ दौडों कचहरी में गवाही दो हजार आकर इससे अच्छा हें अनाथालय को बंद कर दिया जाए । घटना से भरे मौन का संक्षिप्त अंतराल परमाणु अब रुकने को तैयार नहीं थीं । उन्हें देर हो रही थी । रह दालान में बडी चौकी पर से उठ खडी हुई । जबकि आमिर खान और सलमा अभी भी बैठे ही थी । वो तो अनाथालय कि अनाथ औरतों का क्या होगा? अम्मीजान ने पूछा सुना है रानी बहु के अनाथालय के सामने एक और अनाथालय खुल गया है । मैं ये कहना चाहती थी कि मैं उन औरतों को लेने को तैयार हैं । बर अम्मीजान बीच में ही बोल पडी एक और अनाथालय आखिर किसका पातों के सिलसिले ने वहाँ को वहीं लाकर खडा कर दिया जहाँ मैं मना नहीं चाहती थी । उन्हें बताना पडा कि लाला के बागीचे में ही अनाथालय खुला है । लाला का नाम सुनते ही हमने जान को जैसे साफ हो गया । मैं कुछ पलों तक मौन थी । उनका शरीर का आपने लगा था । लगा कि कुछ पिघाल कर उनकी नजरों में बहने लगाए ऍम अब मैं समझ गईं ये सारी करामात उसी कमी नहीं है । उन्होंने अपने क्रोध से पढते होटल को ताकतों से दबाया । वो शैतान के खिलाफ कई मुकदमे भी तो चल रहे थे । अरे उसे मुकदमों का तो मुझे क्या परवाह है । जब तक सो राजी लोग थे, उस पर अंकुश था । इस समय तो वैकल् कर खेल रहा है । इतना कहते कहते माने एकदम बात बदल दी । इसमें हम लोगों का क्या लेना देना है । बहन जो जैसा करेगा, वैसा भरेगा । माँ की मानसिकता लाला के पांचवें व्यक्तित्व से रोज में भी थर्रा उठी थी । उन्हें दी । बाहर में भी कानून होते दिखाई देने लगे थे । किंतु अम्मीजान कुछ दूसरी ही धातुओं की बनी थी । मैं भी हो जब आती रही आजकल नहीं हमारा बेचारा दानी, वरना लोहे के चने उस कमीने को चबवा ही देता । जमी हुई नदी और थमी हुई जिंदगी किस काम की? आज कल मैं एक ही हुए हैं कि जी रहा था स्कूल जाना, धर जाना । बहुत हुआ तो कभी कबार अपनी जान से मिलकर दानिश की खोज खबर का लेना अन्यथा वही सो मेरे चाचा वही चंपू । अब मुझे अखबारों की खबर में भी कोई रख नहीं मिलता । ऍम नहीं हुई एकदम सीटी खबरें । एक दिन जिंदगी के रेट में एक नया पौधा उगता दिखाई दिया । अचानक मैं अद्भुत व्यक्तित्व संस्पर्श में गया हूँ । मेरे स्कूल के एक फिल्म मास्टर थे श्री रामदास । माणिक सप्ताह में महज दो घंटे उनके पडते थे । शुक्र और शनि को हो गए छठे पि ऍफ उनके कई घंटे तो यूँ ही बीत गए हो । बहुत कम है । अनुभव करता था कि वह मुझे गौर से देखा करते हैं । एक दिन उन्होंने हमारी कक्षा को खो खो खेल में लगा दिया । हम लोग को काम में मस्त थे और वैसे लीड के दक्षिणी छोर पर ईशम के पेड के नीचे पत्थर पर बैठ गए । वहाँ से भी उनकी दृष्टि मुझ पडी लगी थी । उन्होंने हाथ के इशारे से मुझे अपने पास बुलाया । जिस स्कूल से यहाँ तो उन्होंने पहुंॅच लगता । इसके पहले भी मैंने तो मैं कहीं देखा है । उनकी स्टाॅफ थी मुझे कुछ कुछ दे रही हूँ । मैं चुप चाप खडा रहा हूँ तो हाँ तो नहीं किस सन उन्नीस सौ बयालीस के आंदोलन में तो महीने दीवानी कचेहरी पर झंडा लगाया था । ऍम मुस्कुराते हुए स्वीकार किया ऍम खेलो जानते हो मैंने तो मैं कैसे पहचाना? मैंने अखबारों में छपी तुम्हारी तस्वीर किया । उन्होंने खर्च बताया कि उन दिनों में पीलिया में पडा था । भारतीय इच्छा होते हुए भी उस आंदोलन में मैं कुछ कर नहीं पाया तो इसके बाद उन्होंने मुझे अपनी बगल में उसी पत्थर पर बैठाया और प्रेम से बातें आरंभ कि उन्हें आश्चर्य था कि इतने बहादुर होते हुए भी तो बच्चों गए जबकि आज देश को तुम्हारी बडी आवश्यकता है हूँ । आखिर क्या किया जा सकता है । लडाई में अंग्रेजों की जीत हो रही है और नेता भूमिगत है, गिरफ्तार हैं । आंदोलन को दे तरह कुचल दिया गया है । मेरी आवाज में एक पराधीन मन की हिताषा थी हूँ वाणिक जी की मुद्रा और गंभीर हुई यह आंदोलन नहीं वरन एक साहब गुजरा गया है । पर वह शाह मरा नहीं है । बैठक बता रहा है, जाॅब बता रहा है और जानते हो अब जब उठकर काटेगा ना हो तो अंग्रेजों को लहर नहीं आएगी । इसके बाद उन्होंने विस्तार से बताया कि अखबारों में खबरें नहीं छपती । लेटर ठीक है कि यूरोप के फ्रंट पर मित्र राष्ट्र विजयी हुआ है पर जापान ने नाक में दम कर दिया है । इसके बाद उन्होंने कुछ बताया । उससे लगा कि हमारे संघर्ष का दीप तूफान चल रहा है पर वो जा रही हैं उसे तेल चाहिए और मालिक जी सही । पता चला कि कुछ तेल के लिए सुभाष बाबू ने गुहार लगाई है । वर्मा के फ्रंट सही ललकारा है तो मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा । ऍम आजाद हिंद सेना का नेतृत्व कर रहे हैं उनमें रेस सारे भारतीय सैनिक हैं, जिन्हें जापानियों ने बंदी बनाया है । अब सुभाष बाबू अंग्रेजों को परास्त कर आजादी दिलाएंगे । केवल हमें भीतर की दवाई आपको वार्ना है । वो उन्होंने ये भी बताया कि दो दिन पूर्वी वर्मा रेडियो से सुभाष बाबू का भाषण आया था तो अब हमें क्या करना चाहिए? उसके उत्तर में उन्होंने हमें कल घर पर बुलाया हूँ । जब पीरियड समाप्त हुआ और हम क्लास की और लौट रहे थे तो मेरे मित्रों में एक ही जिज्ञासा थी क्या बात कर रहे थे मास्टर साहब, अब मैं क्या बताता हूँ? इस तरह की बातें करना स्पष्ट रूप में आफत मोल लेना था । मैंने बहाना बनाया हूँ । मेरे पिता के परिचित थे । पूरा नहीं आॅफ हो गए । दूसरे दिन रविवार था । माँ के कोठी जाते ही मैं माणिक जी के घर पहुंचा । वॅार गुंडा के पास की ये गली में रह गए थे । मैंने दरवाजा खटखटाया । वो स्वयं बाहर निकले और मुझे भीतर ले गए । आशा था भी पूरे मकान में अकेले थे । गेवल एक बूढी औरत थी भी उनकी नौकरानी थी और कोई और क्या नहीं सकता हूँ । गृह अपनी बैठक में मुझे लगेगा । एक बडी चौकी पर दरी भी थी वो भी पूरी चौकी को ढक नहीं पा रही थी । बीच में बैठकर लिखने कि डस्ट थी । बगल में सुंदरलाल लेकिन भारत में अंग्रेजी राज नामक पुस्तक थी । टेस्ट के चारों और कुछ अखबार एवं पत्रिकाएं दिख रही हुई थी और दीवार पर राष्ट्रीय नेताओं के चित्र लगे हुए थे । पूरा कक्ष नहाने के जी के व्यक्तित्व के अनुरूप ही था, जहाँ अभाव युक्त सीलन थी । अंधकार था पर कोने अंतरे तक राष्ट्रीयता छिटकी थी । मैं मुझे बैठाकर भीतर गए । मैं सुन्दर लाल की पुस्तक उलटने लगा । चीनी की तश्तरी में दो बिस्किट और एक गिलास पानी लेकर आ गए । इस अप्रत्याशित और अनापेक्षित आप अगर मैं बडे संकोच में बडा ये भी नहीं कह पाया क्या रहे इस की क्या जरूरत थी? झट से मैंने पुस्तक छोडकर दशहरी और इलाज पकड लिया । तो यह तो स्टॉप थी इसमें अंग्रेजों की क्रूरता का और हमारे वास्तविकता खाई आधार था चित्रा है । इससे हर व्यक्ति को पढाना चाहिए भी बोलते रहे । इसीलिए तो सरकार ने इसे जब्त कर रखा है । शीघ्र ही रहे अपने विषय पर आए । हाँ मतलब की बात छेडी जिसके लिए उन्होंने मुझे बुलाया था तो तो यह जानती हूँ कि अखबार अब सरकारी खबरें छापते हैं । सही बात जनता को मालूम नहीं हो पा रही है इसीलिए इस नगर के एक बुलेटिन निकली जा रही है । इसका नाम है रणभेरी । यह सरकार की नजरों से छिपाकर निकाली जाती है । ब्रिटिश शासन के दस टीमें से निकालना पढा और यहाँ तक कि इससे वितरित करना भी गुनाह है । हम लोग चाहते हैं कि इस अधिक से अधिक लोग पढे । संदर्भ में उन्होंने रणभेरी के कुछ अंक भी मुझे दिखाया और कहा अब ये सप्ताह में एक बारी सकती है । वह भी किस दिन छपेगी ये किसी को मालूम नहीं होता हूँ । मेरी इच्छा है कि दस या पांच प्रति तुम ले जाओ और रात में छिपाकर किसी सार्वजनिक स्थल पर चिपका दिया करो । तुम्हारी इतनी सेवा ये समय राष्ट्र के लिए काफी होगी । मैं तो सोचता हुआ था क्या सोचने लगे सोचता हूँ की माँ से छिपाकर ही मुझे काम करना होगा जो तुम्हारे पिताजी उनके नेतृत् कुछ भी हुआ है । मैंने कहा मैं नहीं रहेगा और फिर अपने परिवार की स्थिति में ऐसा बता दी तब तुम पहले से ले जाकर अपनी माँ को ही पढाओ । उन्होंने कहा मैं नहीं चाहता की तुम अपनी माँ से छिपाकर कुछ करो तब शायद नहीं काम नहीं कर पाऊंगा तो तुम हमने हो । जिस माँ का बेटा एक खूंखार सत्ता के विरुद्ध आंदोलन में पुलिस की गोली की परवाह किए बिना दीवानी कचेहरी पर नलवे के सहारे चढकर झंडा तंग सकता है, मैं वहाँ आवासी ही वीर पशु होगी । पहले तुम उन्हें ही रणभेरी सुनाओ और यदि उन्होंने अनुमति नादी तो दो फिर मैं जाना हूँ । उनकी आवाज थोडी और गंभीर हुई और मुझे विश्वास है भी तुम्हारी माँ आवश्यक अनुमति देंगे । ऋषियों ने कहा है आठवां बजाय है पुत्रः पुत्र, माता पिता की आत्मा होता है तो मैं राष्ट्रप्रेम का बीज माता से आया है तो मैं इसलिए ऐसे ही होगी । तुम्हारी माँ भी ऐसी है । हो सकता है परिस्थितियों ने उन्हें बेबस कर रखा हूँ । मैं नहीं चाहता की तो उनसे छिपकर कुछ करो क्योंकि माता पिता से छिपाकर किया गया पूर्ण भी पास होता है । वो इस छोटी सी मुलाकात में ही वाणिक जी के व्यक्तित्व ने मुझे प्रभावित कर लिया । मैंने उनसे रणभेरी का एक अंक माँ को दिखाने के लिए मांगा । उन्होंने कहा परसों आना तो ताजा अंक दूंगा । उसमें सुभाष बाबू का भाषण में पूरा का पूरा छपा हुआ मिलेगा । बडे हो गए तो नर्सों में बिजली दौड जाएगी और सच मुझे भी । मैं भी ऐसा ही था । जब मैं वहाँ बढकर सुनने लगा तो उन्हें रोमांच हुआ आया और उस समय है एकदम चारपाई से उठकर खडी हो गयी वो जब मैं उन्हें भाषण का यही सुना रहा था । सुनो भारत हमें पुकार रहा है भारत की राजधानी दिल्ली हमें पुकार रही है हूँ हमारे देश के चालीस करोड जनता हमें बुखार रही है । हमारा खून हमें पुकार रहा है । उठो ये वक्त होने का नहीं है । हथियार उठाओ हूँ । हमारे सामने एक ही रास्ता है जिससे आजादी के दीवानों ने बनाया है तो उस रास्ते पर चलो । ये रास्ता औरों के रास्ते से अलग है, ये दिल्ली की ओर जाता है । ईश्वर ने चाहा तो हमारी सेना दिल्ली पहुंचेगी भरना हम इस रास्ते को चूमते हुए शहीद हो जाएंगे । दिल्ली का राष्ट्र आजादी का रास्ता है । दिल्ली चलो माँ की भागता बॅाल चला आई थी । मैंने अवसर देखा और मालिक जी के विचारों से उन्हें अवगत कराया तो एक मन जान व्यक्ति की उनके प्रति ऐसी धारणा हो सकती है । मुँह में उन्होंने सोचा नहीं था तो आपको जान का भाषा नहीं होगा कि उन्होंने खुद नहीं बनाकर इसे बुलेटिन पर पोतकर मुझे निर्देश दिया । इसे चुप जब अनपूर्णा गंज प्राइमरी स्कूल के फाटक पर चुकाओ । सडक तक मैं स्वयं मेरे साथ आई और गली में ही तो पक कर खडी हो गई । मुझे देखती रहीं । दिन के बाद माडी जी से मिलने का मेरा रास्ता साफ हो गया । इसके साथ ही मेरे और माँ के बीच जो झूठ की दीवार आ जाती थी वो भी लगभग हो गई । अखबार से पता चला कि हमीद को कुछ लोगों ने पीट दिया है । समाचार के अनुसार उसे कुछ गुंडों ने बुरी तरह मारा । यदि एंड मौके पर पुलिस ना पहुंच जाती तो मैं जान से ही मार डाला जाता हूँ । पर गंगा राम बता रहा था कि आजकल कम्युनिस्ट लोग सरकार के पक्ष में और धुरी राष्ट्रों के खिलाफ पर्व है । प्रचार करते काफी भीड जुटा लेते हैं । ऐसे ही एक एक एक पर अपने दो साथियों के साथ हमीर भी था । वो जोश में आकर एक पर खडे होकर सुभाष बाबू के संबंध में ठंड वंड कहने लगा । बस भीडने नीचे खींच कर उसे पीटना शुरू किया और आओ देखा ना आता हूँ । जिसको भी मौका मिला धो उसे जमाता चला गया । काफी चोट आई थी । आगे के दो दांत भी उखड गए हैं तो कोई पकडा नहीं गया । पुलिस के आते ही भीड तितर बितर हो गई और मारने वाले हूँ चक्कर गंगा राम बोला वो फिर गवाही गांव देता हूँ । खबर इस तरह से बढा चढाकर जहाँ भी गई थी जैसे कोई सरकारी आदमी मरा गया हूँ । हमीद को जानने वालों में उसकी छवि भी सरकार परस्तों जैसी थी इसलिए किसी को भी दुख नहीं हुआ । यहाँ तक कि मंगरू भी किसी से नहीं कह रहा था । अच्छा बयाल किस तरफ? आॅल हमेशा चाहे जो रहा हूँ पर मेरे लिए कभी बुरा नहीं था । बचपन से उसने अपनी बुराइयाँ मेरी और उछाली जरूर तो किसी और नियत से नहीं वरन अपना बनाने के लिए मैं उसका नहीं हुआ । ये सकते हैं पर वह मुझे अपना समझता रहा हूँ । शायद यही कारण था कि मैं उसके पीछे जाने से असैन्य नहीं था । आज स्कूल में तीसरा और चौथा पीरियड खाली था क्योंकि इन पेडों में अंग्रेजी की पढाई होती थी और उसके अध्यापक त्रिपाठी जी छुट्टी पर थे । चौधरी के बाद ड्रेसस था । काफी समय मिल रहा था ऍम मैं वाचनालय में ना जाकर सीधे अस्पताल पहुंचा हूँ । अमीर वार्ड नंबर तीन के बेड नंबर पांच पर पडा था हूँ । हाँ ऍम पर पट्टियां बंधी थी । ऍन पट्टियों के अनुपात में पी रहा बहुत कमी थी क्योंकि उसकी चारपाई के पास जो दो चार आदमी बैठे थे उनसे वह बडी सरलता से बात कर रहा था । वो ॅ उसने एक कर आवश्यक भरी । हिन्दू मुझे देखकर उसकी भाषा खेल गई । मैं ऍम ऍम स्टूल पर जगह न होने के कारण बच्चों का ज्ञान बैठकें पैदा नहीं बैठ गया हूँ । लगता है स्कूल सिंह चले आ रहे हो । मेरे हाथ में किताब और काम क्या देख घर हमें बोला हूँ और फिर मुझ से ही बात करने लगा हूँ । स्टूल पर बैठे बैठे तीनों व्यक्ति मेरे लिए अपर है । बडे गौर से मुझे देखते रहे । उनके नेत्रों की ऐसी ही क्या है? मेरा ऍम चुका था हूँ क्योंकि मैं अखबार की सुर्खियों में आ चुका था इसलिए हर नजर मेरा पीछा करती थी । मुझ पर छाती थी, मैं जानने की कोशिश करती थी और फिर अपने भीतर बैठा लेती नहीं हूँ और अपरिचितों का मौन अंतरराल लंबा नहीं था क्योंकि सामने सही यशोदा आती दिखाई थी । वहीं लाला वाली यशोदा और उसके पीछे वहीं लंगडा नौकर सुब्रहमण् हाथ में दोनों से भरी डोलची लिए हुए तो आइए आइए यशोदा तो देखते ही मैं तीनों खडे हो गए । अच्छा तो हम लोग चले उनमें से एक ने कहा और यशोदा से विनीत भाव से बोला आप अन्य बना लीजिए । हम लोग बडी देर से बैठे तो छणों तक यशोदा मुझे देखती नहीं हूँ और मैं उसे देखता रहा हूँ । निश्चित रूप में उसकी आंखों मुझसे अधिकांशत था । वो सोच रही थी कि मैं हमीद के पास कैसे यह दो विरोधी चोरों का मिलन । वो हमारे संबंधों के इतिहास से परिचित नहीं थी । बडी कृपा की अपने प्रदर्शन दिया । नितांत औपचारिक ढंग से हमे बोला वे अपनी साडी सगाई अदा में मुस्कराते हुए बोली पिटाई खिलाने के लिए आई हूँ । लाल खाने की खुशी में हमेशा की हंसी के साथ ही उसकी हंसी वर्ल्ड के अनेक पलंगों को छूती निकल गई हूँ । नहीं सरकार की विजय की खुशी में यशोदा ने बताया तो इधर अंग्रेजी पहुंचे लगातार जीती चली जा रही है । इसलिए हम लोगों ने हनुमान जी को लड्डू चढाया है । उसने लंगडे की डोलची से निकालकर एक दोना हमीद की ओर बढाया और मुझे बोली तुम्हारा ऐसा सुमीर सास को दे आयु ॅ इसी में से ले लो तुम्हें । हमीद ने दो ना मेरी ओर क्या और मेरा हाथ उठा नहीं मुझे लगा मेरी ही आजादी के ध्वस्त होते साहनों पर खडे हो गए । कोई ॅ आ रहा है मेरे मुख्य निकल पडा हो ले लूंगा । यूरोप में जरूर अंग्रेज जीत रहे हैं । पर वर्मा के फ्रेंड पढ तो हमारी हार हो रही है । मणिपुर तक आजाद हिंद फौज चली आई है । कलकत्ते में भगदड मच गई है । हनुमान जी की कडवा होगी तो उधर भी फतह होगी । यशोधा बोली परिवार है हनुमान जी के भक्त तुम्हारे हनुमान क्या पराधीन भारत में रहना चाहते हैं । मेरा मन बोलने के लिए छटपटा रहा था । पर मैं चुकी रह गया क्योंकि यशोधा के विरोध का मतलब था लाला का विरोध करना और उस विरोध से जहाँ तक हो सके हम दूर ही रहना चाहते थे । शीघ्र ही यशोदा चली गई तो हम भी बढाया । साले कलेक्टर को खुश करने के लिए प्रसाद बांट रहे हैं । कमीनो अपनी राजनीति में भगवान को क्यों घसीट रहे हो? मार्च भी कहता है कि भगवान की धारणा ही बुजुर्ग हुआ मस्तिष्क की देन है । ये बुजुर्ग हुआ क्या है? अचानक मेरे मुख से निकल बडा ही समाज का वह अल्पसंख्यक वर्ग जो धर्म के नाम पर, संप्रदाय के नाम पर रूडी और परंपरा के नाम पर सर्वहारा का अधिकार चीन्ना अपनी मुट्ठी में रखता है । आप गए थे कहते हमें आवेश में आकर भाषण देने की मुद्रा में उठ बैठा । मैंने उसे यह कहकर शांत किया की इस समय तो मैं अधिक नहीं बोलना चाहिए । वो प्रशांत तो हुआ किंतु ये आश्वासन लेकर कि मैं उसका दिया ये ट्रेचर पढूंगा । उसका कहना था की टाॅर्चर पढोगे तो तुम्हारी आंखें खोली जाएंगी । बहुत जल्दी सारी दुनिया में सर्वहारा की लडाई झडने वाली है वो हम सबको उस लडाई में हिस्सा लेना होगा । सर्वहारा की विजय का दिन ही सच्ची आजादी का दिन होगा । बातचीत से लगा कि वे अंग्रेजों को भी दुश्मन मानता है और लाला जैसे लोगों को भी । अंग्रेज यानी उसके दुश्मन नंबर दो है तो लाला जैसे लोग दुश्मन नंबर तीन फॅमिली दुश्मन तो इस समय नाजी फास्टेस्ट और उनके सहयोगी लोग हैं । फिर तुम अंग्रेजों का साथ क्यों दे रहे हो? साथ नहीं दे रहा हूँ बल्कि दुश्मन से लड रहा हूँ मुस्कराया एक ना एक तो हारे गाई फिर हमारी लडाई उसके जितने वाले से शुरू होगी । मैं बडबडाया कुछ ऐसी बातें भी बोल गया जो उस समय मेरी समझ के बाहर हूँ । मुझे आश्चर्य था की है सब उसने जहाँ कैसे उसकी तो कभी पढने लिखने में रूचि रही नहीं फिर भी ज्ञान की धारदार नदी में किसके बूते कह रहा है हूँ । मुझे लगा कि उस की परिस्थिति ने उसे गन्ना शुरू कर दिया है और बहुत जल्दी ही हमें एक ऐसा हमी दिखाई देगा, जो पिछले हमेशा से बिल्कुल भिन्न होगा । अदीब हमारी धरोहर है, पर कभी कभी है, धरोहर ही बोझ बन जाती है । तब हम उसे उतारकर फेंक देते हैं । हम एक लगभग भेज चुका था । अब वह वर्तमान बटोर रहा था । इस प्रयत्न में रोज उसकी कंट्री में अधिक आ गया था तो उसकी क्रांति और वहाँ की राजनीति से अधिक प्रभावित था । तो ये कहती हूँ बोलते बोलते थक चुका था ताकि ये बर्ड लगाते हुए उस ने सिगरेट जलाई और अपेक्षाकत कुछ धीरे से बोला । फॅमिली पत्नी भी हैं कि लोग मुझे गलत समझते हैं । मैं सुभाष बाबू का व्यक्तिगत विरोधी नहीं हूँ । उस आदमी के देश प्रेम के संबंध में किसी को भी संदेह नहीं हो सकता हूँ । तब तो उनका विरोध क्यों करते हूँ? क्योंकि उनका गलत है तो बोला ऍफ का साठगांठ से देश को आजाद कराना चाहते हैं । उन्होंने उनसे दोस्ती की है, जो अंग्रेजों से ज्यादा खतरनाक है । अंग्रेजों से कौन अच्छा है और कौन खतरनाक, इसे क्या तो नहीं समझ सकते हो । क्या इसे समझने की ताकत सुभाष बातों में नहीं? मैंने कहा जैसा तुम सोचते हो क्या ऐसा ही वह नहीं सोच सकते । ये बुराई की मदद लेकर उससे बडी बुराई को समाप्त किया जाए । ये नहीं हो सकता । उसने बडे विश्वास ने कहा और सिगरेट का एक कश खींचा । गलत माध्यम से कभी सही माध्यम नहीं हो सकता हूँ । मुझे हँसी आ गई आठ सोचता हूँ उसके विचारों में परिपक्वता नहीं थी । उसने तो विचार बटोरे थे, बचाया कहाँ था? की परिपक्वता होती । आखिर तो मैं गांधी का ही सहारा लेना पडा । इसका मतलब है कि तुम्हारे मार्क्स को समझने के पहले हम गांधी के ही पास जाएँ । अब मैं क्या कहता हूँ? उसे लगा अपने दांव परिचित हो गया है । कुछ दिनों तक ऍम पीता रहा हूँ और मेरी मुस्कुराहट देखता रहा हूँ । फिर बडे अन्य मंसद भाव से बोला तो मानो चाहे ना मानु आजादी मिलने से कुछ होने वाला नहीं है । इसके बाद भी हमें एक लडाई लडनी होगी और वह होगी अमीर गरीब की लडाई । मैं बात बढाना नहीं चाहता था क्योंकि वह बोलते बोलते उत्तेजित हो जाता था और अस्पताल के वॉर्ड में भाषिक उत्तेजना के लिए कोई स्थान नहीं होता हूँ । दूसरे मेरे मस्तिष्क मेरे सास का घंटा बज रहा था वो भी रह गया हूँ । मैं उठ कर चलने को हुआ । अभिवादन करके दो एक कदम बढा भी था कि उसने मुझे बुलाया और मेरे पास आने पर बडी गंभीरता से बोला तो तुमसे बात कही नहीं थी । क्या वो मुझे कुछ ऐसा लगता है कि लाला तो मेरे हिसाब से कुछ नाराज है ये तो मैं कैसे मान लू । यह मेरा सिर्फ अंदाज है, वो मैं कुछ विशेष नहीं कह सकता हूँ । उसने अपने अनुमान के आधार पर नहीं बताया किन्तु मेरे मानने पूर्व गठित घटनाओं के क्रम को अपने ढंग से बैठा लिया । इस संबंध में मेरा गंभीर हो जाना स्वाभाविक था । क्या सोचने लगे उसने मेरी चिन्ता ना फोटो का कुछ नहीं । मेरे ये कहने पर भी उसने समझाया । इस विषय में कुछ अधिक सोचने की आवश्यकता नहीं है । केवल सुमेर साफ से कह देना की व्यर्थ में लाला से झगडा मोल लेने से क्या फायदा? सुर राज्यों की गिरफ्तारी और अंग्रेजों की जीतने उसके पंख होगा दिए हैं । आज का लाला उड रहा है । उसके खौफनाक डाॅ पूछते चले जा रहे हैं मैं जब स्कूल आया ड्रेसेस चल रहा था । दो पीरियड खाली होने से मेरे क्लास के लडकों ने वॉलीबॉल निकाल लिया था । खेल जमा था मैं किनारे आकर खडा हो गया । साथियों ने सोचा होगा कि मैं खेल देख रहा हूँ । मेरा मस्तिष्क लाला की उडान देख रहा था । एक ऐसे आदमखोर पक्षी की उडान जो मानवता के सारे मूल्य निकल जाता है और डकार तक नहीं लेता हूँ जिसके खतरनाक ट्रेनों की नीचे शहर का सारा अपराध ॅ पडता है । मैं सोचता रहा लगा उसका देना बढता चला रहा है । वह तो मेरे चाचा की दुकान तक चला आया है कि अचानक बॉल बहकर मेरे सिर से टकराया और एक समृद्ध खिलखिलाहट मुझे झकझोर बैठी हूँ । मैं क्या हूँ? पांचवां घंटा चल रहा था सामान्य विज्ञान का घंटा निहायत अनुभवी और कौशल अध्यापक पाँच मतदास जल जंतुओं के बारे में बता रहे थे । इसी क्रम में उन्होंने ऑक्टोपस की चर्चा छेड दी । ये एक भयानक समुद्री जीव है । इसके आठ हाथ पैर होते हैं अत्यंत ही होना । ये जी जी वर्षीय समुद्र के तल में, चट्टानों पर या जल में चुपचाप पडा रहता है, अपने शिकार को तक विजेता रहता है और जो ही इसके प्रभाव में कोई जीव आता है, फॅमिली मुलायम पहने जैसे इसके हाथ बढते हैं और उससे धंदा बोलते हैं । बडा भयानक होता है या तो पर क्योंकि पकड में आने के बाद फिर मछलियाँ ही बचती हैं । जानते हो समुद्र में जहाँ तो फस होते हैं । बाहर लाल रोशनी से लोगों को आगाह कर दिया जाता है । इसी सिलसिले में मास्टर साहब ने बताया कि ऑक्टोपस पर ही अंग्रेजी की एक बडी अच्छी फिल्म बनी है । ऍम यदि कभी आए तो उसे जरूर देखना । उस फिल्म में समुद्र के किनारे एक खुशहालनगर दिखाया गया है । पर दुर्भाग्य से कहीं से ऑक्टोपस पहुंच जाता है जहाँ किसी व्यक्ति या वस्तु को अपने प्रभाव क्षेत्र में देखता है । समुद्र से उसके हाथ निकलते हैं और शरण में उसका सर्वनाश हो जाता है । यहाँ तक की मोटर गाडियों पर आधी में हाथ रखता है तो वह भी चरमराकर चोर हो जाती है । नगर की सुख शांति को उसके आठ तो हाथ धर दबोचते हैं । पंचम दादाजी विस्तार से उसका वर्णन करते जा रहे थे । वो विद्यार्थी मंत्रमुक्त से तिलिस्मी कहानी जैसा आनंद ले रहे थे । हो सकता है कुछ नहीं जिज्ञासाएं भी व्यक्ति हूँ पर मैं चुप था । एक फॅमिली तो आप दो बस पर लाला की तस्वीर को देख रहा था । अब लाला एक भयानक ऑक्टोपस की तरह मेरे सामने था । आठ ही उसके अगणित हाथ मुझे दिखाई पड रहे थे कितने भयंकर है यहाँ जो भी इसके नीचे आया उसका सर बनानी फिर मेरे मानस में रानी बहु की अनाथालय के आटे में पडी विकेट लाॅ और मैं कहाँ था मैं सच मुझे उस समय शरीर से अलग हो गया था हूँ नगर की सुख शांति को दबोचते लाला के विशाल हाथो हवा में कह रहे थे मुझे लगा ढाई और आतंकी छाया बहुतों पर पडती जा रही है । लोग हर हर काम रहे हैं मेरे मन में उस समय भूकंप आया हूँ । मैंने देखा कि इस वक्त तो बस का एक ट्रेंड सुमेर चाचा की ओर बढ रहा है । निश्चित ही मैं भी कोटा किंतु मैं हो गया था एक दम मूर्ति व्रत भारतो जनार दम बताओ मास्टर साहब क्या आवाज मुझे ले की तरह मारी गईं मेरी जितना हर बढाकर प्रकार स्थित हुई तो लगा क्या? तो बस बहुत पहले ही समाप्त हो गया है । उसके आगे भी बहुत कुछ पडा दिखाई दिया । लाॅट खत्म हो गया है । अब मास्टर साहब प्रश्न पूछ रहे हैं पर मैंने तो प्रश्न भी नहीं सुना । उत्तर क्या देता? मूर्खो सा खडा हो गया तो रहे थे क्या मैंने नकरात्मक ढंग से सिर हिलाया हो तब दिमाग कहाँ आता हूँ? मैं क्या जवाब दे पाता कि कहाँ था? जो भी रहा हूँ, अच्छा तो आप कृपा कर पीछे चले जाइए । मेरे प्रति आदर सूचक शब्द के प्रयोग ने अन्य छात्रों के अधरों पर मुस्कुराहट ऍम पीछे चलाया । साथियों के मुस्कराहट के सोनियां मुझे चारों ओर से चलती रही । आप विश्वास कीजिए वो कभी क्लास में इतना अधिक अपमानित नहीं हुआ था । मेरे सिर चकराने लगा । मैंने पीछे की दीवार का सहारा लिया । एक एक बाल भारी हो गया था । यदि शीघ्र ही घंटा ना बजता तो शायद मैं अचेत होकर गिर पडता हूँ । राजनीति फिर रंग बदलने लगी । कलकत्ता में भगदड मच गई थी । चुना है वहाँ । जापानियों ने हवाई जहाज से पर्चे गिराए थे कि हम हिन्दुस्तानियों के दुश्मन नहीं है । आप तो हमारे मित्र हैं । हमारे असली दुश्मन तो है । अंग्रेजो हम हिंदुस्तान से उन्हें भगाकर ये दम लेंगे । इसलिए आप कलकत्ता खाली कर दीजिए, नहीं तो हार घर भागते अंग्रेज आपको नष्ट करते जाएंगे । इन की यही नीति रही है । इसका की नीति योग भागने लगे थे । आतंकी भर्ती छाया उन का पीछा करती मालूम हो रही थी । मालगाडी तक में लोग लदे फंदे चले जा रहे हैं । अंग्रेज परस्तों के चेहरे एक बार फिर मुड जाने लगे और सामान्य जनता के लिए मुरझाए मनो पर हरियाली का एक झोंका आ गया । एक दूसरा ही माहौल बनने लगा तो यहाँ तक की एक शाम आवेश में आकर तो मेरे चाचा अपनी दुकान की बैठक में बाहर रहा था । जनता बेचारी कलकत्ता से भाग रही है, प्राणों के लाले पडे हैं और ये साले मारे खुशी के हनुमान जी का प्रसाद बांट रहे हैं । मुझे लगा मेरे सिर पर फिर किसी ने हथौडा चलाया । मुझे दिखाई दिया तो बस के खाते हुए वहाँ पर मैं उससे कुछ कहने की स्थिति में नहीं था । वाणिक जी एस भगदड को प्रत्यूष वेला की हलचल कहते हैं । जागरण का पूर्वाभास सूर्य निकलने वाला है आजादी का सौ जिसका प्रकाश हमारे हर दुख और हर नरेंद्र को शोक लेगा । अब उनकी रणभेरी और आग करने लगी थी । आज मैं दस प्रतियां ले आया था और माँ नहीं उन को चिपकाने के लिए लेनी भी बनाई हूँ तो मैं सब एक साथ कैसे ले जाओगे? गंगा राम को भी साथ ले लो । माँ बोली वो नहीं जाएगा, डरता है इसके पूर्व में उससे बात कर चुका हूँ । मैंने बताया हूँ पर कोई बात नहीं । मैं सो लेता जाऊंगा । डिप्टी साहब के सामने जो पीपल का पेड हैं उसी की कोटर्नी पांच रख दूंगा । जब शेष पांच का दूंगा तो उसे भी निकालूंगा । ठीक हें उस पेड के तने पर भी अंत में एक चिपका देना । माँ बोली और आठ बजे रात जब मैं चला तब माँ मुझे पहुंचाने डिप्टी सहारा ऍम हो सकता है मुझे कुछ हो जाये । माँ को छोडते हुए मैंने कहा क्यों वो सोचता हूँ हमने जान के यहाँ बोलूँ कई दिन हो गए । मैं कुछ बोली नहीं । एक ही मेलन में अम्मी जानने जैसे उन्हें मोह लिया था । अब मैं वहाँ जाने का विरोध भी नहीं करती हूँ । जल्दी आने का निर्देश देकर लौट गईं उन पांच में से आखिरी रणभेरी अन्य पूर्णा गंज स्कूल के फाटक बच्चों का रहा था । मैं यार अभी काफी जल्दी में था फिर भी मुझे लगा कि मेरे पीछे कोई खडा है जो ही आगे बढा । किसी ने मेरे कन्धे तो जोर से दबाया हूँ । मैंने शीघ्र ही अनुभव किया । किसी हट्टे कट्टे जवान की के राष्ट्र में मैं पूरी तरह आ गया हूँ बे मेरी बायां हाथ खींचते हुए दलि में ले चला हूँ उसे भाई ताकि हो सकता है सडक पर कुछ लोग इकट्ठा हो जाएँ । फॅमिली में उसकी उखडी उखडी और रुकी बातों से लगा की वैसी आई डी का आदमी है । मैं समझ गया कि अब क्या होने वाला है । इस बार में किसी भी प्रकार छोडा नहीं जा सकता हूँ । मुझे सच्चा होगी चाहे ऍम की हो या जेल की हो किंतु मैं बढाया नहीं क्योंकि घबराने से स्थिति और बिगड सकती थी । मेरे विवेक ने बडे समय से साथ दिया । आप मुझे इतनी जोर से पकडे हुए क्यों हैं जिससे धूम भागना जाओ हूँ? आपने मुझे कोई चोरियां भगवान समझाया क्या मैंने मुस्कुराते हुए बडे सहज बाहर से कहा यदि भागना ही होता तो मैं ऐसे जोखिमपूर्ण कार्य में हाथ डालता हूँ । उसकी पकड और चार दोनों कुछ धीरे बढेंगे । मुझे लगा मेरी वगैरह था और सहजता ने उसने मुझे कुछ तो हाल में डाल दिया था । मैं तो बहुत पहले से जानता हूँ । उसका संकेत दीवानी कचहरी वाली घटना से था । और आप ये भी जानते हैं कि मैं कहीं से भागा नहीं हूं । कुछ बोला नहीं अभी हाँ पकडे था तब मेरा हाथ छोड दीजिए और बताइए कहाँ चलना है । हम लोग अगल बगल दोस्तों की तरह चले । मैंने कहा क्योंकि अखबार में दोस्त होना ही है । तो हमारा मतलब मतलब साफ है हम दोनों भारतीय इसी धरती ने दोनों को पैदा किया है । ईश्वर ने चाहा तो हम दोनों एक ना एक दिन इसी धरती पर ही मारेंगे । ये दूसरी बात है कि आप अपनी परिस्थिति से लाचार है और हमने उस लाचारी का उतार कर फेंक दिया है । तो मैं इतना गंभीर और जितना तक स्थित था भी उतना ही पिछले छोडने लगा । फिर भी उसने अपनी ठंड बरकरार रखी और मेरी बातों के संदर्भ से हटकर बोला मैं तो मैं कोतवाली ले चल रहा हूँ और जानते हो तो मैं इसका अंजाम क्या भुगतना पडेगा । अंजाम अच्छी तरह जानता हूँ पर अंजाम की परवाह किसी ऍम अस कराया तो यही अंजाम की परवाह होती तो मैं भी सरकार की गुलामी कर रहा होता हूँ । बाहर उसने फिर मुझे बडे गौर से देखा और म्यूनिसिपैलिटी के लाइन के पास खडा हो गया । मेरे आदमियों से छुट्टी मुस्कराहटों से भेजती चली गईं । उस की मुद्रा से लगा कि भीतर से घायल होने लगा है । खडे हो गए शहर मराठी उसके दृढता तो मैंने एक आधार और दिया । तुम बडे विचित्र मालूम होती हूँ । मैं बोला सरकारी टुकडों पर पलने वाले को आजादी का दिवार पर कुछ ही मानव मुद्दा है तो जितने दे रहे हो तुम्हारी जवान उससे ही ज्यादा देर है । फॅमिली में लाया और मुझे लेकर एक झटके के साथ आगे बडा हूँ मुझे लगा हूँ हो रहा कुछ अधिक पड रही है आप मुझे कोतवाली ले जा कर क्या करेंगे? कुछ दूर चलने के बाद मैं पुनः बडे शांत भाव से बोला वहीं देखना कि क्या होता है मैं गुराया लगता है कि मेरी कोई बात आपको लग रही है । हो सकता है क्योंकि हम लोग किसी से बात नहीं करते केवल काम करना जानते हैं । मैंने कहा यदि आपको मेरी किसी बात है, तकलीफ पहुंची हो तो शाम प्रार्थी हूँ तो अपनी करने के लिए भी हम मान सकते हो नहीं क्योंकि मेरी करनी गलत नहीं । मैंने कहा ऐसा लगा कि मेरी किसी बात से आपको बहुत पीडा पहुंची है । इसीलिए मैंने छमा मांगी है । क्योंकि गांधीजी के अनुसार किसी को पीडा पहुंचाना भी प्रकार की हिंसा है । इस बाहर मैं ठीक जगह पर होली रखी थी । अब हम लोग सडक पर आ गए थे । यदि कोतवाली पहुंचकर तो मैं किसी प्रकार की पीडा पहुंचाई गईं तो इसका मतलब मैं भी हिंसक हो । नहीं आप हिंसा कदापि नहीं । आप तो कर्तव्य परायण है । सरकार के वफादार जाकर हैं । मैंने कहा आप विश्वास कीजिए मुझे वहाँ पहुंचाने पर किसी प्रकार की पीडा भी नहीं होगी तो मैं कौडे लगाए जाएंगे । फिर भी पेडा नहीं होगी । नहीं मुझे अपनी मिडिल के मास्टर साहब की नारियल वाली बात यादव आएँ । मैंने एक करते मुस्कुराहट अपनी आदतों पर पुनः लगाई । वो मेरा मोड देखता रह गया हूँ तो मैं थोडे मारे जाएंगे और पीडा नहीं होगी । मेरी बात उसे विश्वास के परे लगी । जैसे चंद्रशेखर आजाद को पीडा नहीं हुई थी । वे हर कोने पर मुस्कराता था । वंदे मातरम का नारा लगता था मुझे लेकर फिर गाली केवल मूॅग कोतवाली जाने का कोई रास्ता नहीं । मुझे कहा ले जाना चाहता है कि तुम्हें मोहन था । कुछ सोचते हुए मौत था हूँ । सोचता हूँ आज नहीं क्रिकेट था । किसी भी झडपें कर सकती है । मैं जो उसे उचित चाहिए और मैं आज पैदा कर चुका था । कुछ दूर चलने के बाद मैं टाइम बोला यदि मैं तो मैं छोड दूँ तो तो मैं आपका धन्यवाद कहूँ । केवल रहने वाले हो गए तो अपना काम नहीं छोडेंगे नहीं क्योंकि ये काम मेरा नहीं तो संकल्प है । व्रत है वो क्या है? वो काम तो होता है जिससे रोटी चलती है । मैंने फिर उसको चिकोटी काॅपर । इस बार मैं जरा भी दाल में लाया नहीं, अपनी बेबसी का अनुभव करता रहा । थोडी देर बाद बोला हूँ अच्छा तो मैं तो मैं छोडता हूँ । मैंने उसे धन्यवाद दिया, प्रणाम किया और डिप्टी साहब के पीपल के पेड तक पहुंचाने के लिए एकदम लौट पढा । मैंने मोडकर देखा भी नहीं । फिर भी मुझे लगा कि उसकी सहानुभूतिपूर्ण दृष्टि काफी देर तक मेरी पीठ फैलाती रही । वोटर में पडे पांच रन भेडियों की लेे लगभग हो गई थी फिर भी मैं उन्हें चिपका कर ही घर लौटा दूं । रात के दस बज चुके थे । गली में घूमते ही मैंने देखा द्वार पर खडी मेरी माँ प्रतीक्षा कर रही थी । अम्मी जान से मिले टाॅक कुछ हाल मालूम हुआ । पहुंचते ही माने पूछा हूँ अम्मी जान के यहाँ जा नहीं सका । तब मिट्टी देर कहाँ लगा दी वाणिज्य की याद आई भाजी पानी से फायदा क्या मैंने सब कुछ सही सही माँ को बता दिया । मैंने भावातिरेक से विधायल होगा मुझे छाती से लगा लिया जो तो अनेक बार में उसके सीने से लगा हूँ और आज उनमें एक दूसरी धडकन थी । इसके थोडे दिनों बाद एक धमाका हुआ और हमारे सुख चैन की झील पर पहाड टूट पडा हूँ । हम तो दबकर हो गयी । हम मलबे से उसे खोजते और अपनी बेचैनी होते रहे । वो शारदीय नवरात्र था । भाई सुबह चार बजे उठी थी और नहा धोकर चलती ही पूजा समाज कर लेना चाहती थी । चाची वजन तो के साथ देवी दर्शन के लिए निकल आती थी । साथ में मोहल्ले की और भी और से निकल आई । नहीं सूर्योदय तक घर लौटा दी थी । आज लग रात का छठा दिन था । संकठा जी के पास आत्म विश्वेश्वर में उठकर तैयार हो गयी । आग्रह करने पर भी माँ मुझे नहीं नहीं नहीं ऍम क्योंकि वे बेहुदा ऐसा करती थी । साठ आई धनिया ने भी यही बताया कि वैर आधार के साथ एक दुकान पर देखी गई थीं । समय सरकता गया घंटे पर घंटे भी रहेगा । ये माँ छोटी चली गई और मैं भी खोल आया हूँ । आज हाजिरी देना जरूरी था क्योंकि आज के बाद ही दशहरे की छुट्टी हो रही थी । शाम को पहुंचा तो देखा चाचा की दुकान बंद है । भागदौड मची है । हम तो अभी तक नहीं आए गया । मेरा माथा ठनका फिर वही अब तो बस मेरे सामने था । मैं एक दम घबरा गया हूँ । एक ऐसे बिंदु पर खडा मैं स्वयं को अनुभव करने लगा जिससे बहुत सारे रास्ते निकलते हैं पर सभी आगे बन रहे हैं । वो किसी और बढने की स्थिति में नहीं हूँ । तब तक मुझे कुछ ऐसा लगा की चाची बुला रही हैं । मैं घर पहुंचा मूल्य की औरते चाची को घेरकर बैठी थी हूँ । चाची चुप थी पर उसकी दोनों आंखें टपक रही थीं । बाॅल अभी आप हुई है । जवाहिर की माँ ने चाची को ढांढस बंधाया । अच्छा का माइका वृत्त मान दाॅये कोई घंटा भर में आज जला मंगरू ने समझाया जितनी औरते उतनी मान्यताएं उतने उपाय पर सबका विश्वास था कि मैं सकुशल है और रात होते होते जरूर आ जाएगी । कुछ पढे लिखे तो है ही, उसे बहकाया नहीं जा सकता हूँ । यदि फिर भी नहीं आई तो लकडिया बाबा के यहाँ चला जाएगा । मैं सब सही सही बता देंगे । वहीं मुझे मालूम होगा कि चाचा लहराता गया है आपने साडों के हाँ हो सकता है । मंदिर में किसी और अब के साथ मिला हूँ और मैं मौसी के यहां पहुंच गया हूँ । पर इन सारी संभावनाओं से मैं दूर था । मुझे लग रहा था कि यह सब हुए में हाथ मारना है मेरे सामने तो रख से लटपट ऑक्टोपस के जिन्होंने हाथ हैं वो क्यों? क्या इसी चौक के किनारे से जानने वाली सीढी पर बैठ गया तो तुम्हारी माताएं या जानकार की माँ इस समय कहाँ होगी? याची ने मुझे कुछ पूछा । मैं बोली अच्छा होता है कि तुम उन्हें भी बुला लेते । मेरा जी बहुत घबरा आए । चाची ने मेरे विद्युत होकर मुझसे कहा और बोली अच्छा होता तो उन्होंने बोला लाते मेरा जी तो बहुत घबरा रहा है । चाची ने मेरे बहुत निकट आकर ये कहा था कि तू मेरी आंखें उसे निकट आया देख नहीं पाई थीं क्योंकि वे एक भयानक सपने से ढकी नहीं । चाची की आवाज की गंभीर था और उसकी रखा था । ये बता रही थी की आवाज ही वह कुछ ऐसा कहना चाहती हैं जिसने सुनने और समझने वाले का यहाँ कुछ भी नहीं छोडा । मैं तीर की तरह फूटा और कई घंटे तक पहुंच गया हूँ । मेरी अचानक स्थिति में माँ को कुछ संध्या रहे हुआ हूँ । मैं अपना काम छोड कर मेरे पास आई हूँ । मैंने क्षमता के ना लौटने की खबर उन्हें सुनाई और कहा हूँ । चाची ने हम और कहा कि चार जी ने तो मैं भी बुलाया फॅस अंधा का जो तैयार कर रही थी । जल्दी जल्दी उन्होंने हाथ बढाया । ऍम उन्होंने किसी और से कुछ नहीं कहा । फिर भी वे गतिविधि से उनका व्याकुलता का अपमान कोठी के और नौकरों का भी हो गया था । नगीना ने मुझसे पूछा कहाँ बात हो गैया? प्रमिला भी दिखाई ना पडी । आंखों से अच्छी तरह टटोल लेने के बाद मैंने माँ से धीरे से पूछा आज मामी जी नहीं है क्या? अभी तो थी । लगता है छोटे सरकार की तरफ नहीं कितना है घर में फिर अपने काम में लग गई । मैं किसी विशेष मतलब से मामी जी को खोज रहा था । पर कुछ बोला नहीं, क्योंकि वहाँ कुछ और नौकर भी थे । जब सब कुछ पता सीट आई को सहेजकर माँ चली गई । तब सीढी पर एक आठ देखकर मैंने कहा ऐसा तो नहीं की क्षमताओं को गायब करने में लाला के लोगों का ही हाथ हूँ । मैं काम आ गया । मैं इसीलिए मामी जी को पूछ रहा था । यदि हो सके तो मैं कुछ कर सकें । अब पहले जैसी स्थिति नहीं है । बात करना तो दूर अब लाला को देखना भी पसंद नहीं करती हूँ । मैं बोली और लूट लूट ईसी ने सहायक की तरह सीढियां उतरने लगे । लौटने पर उन्हें एक आंध्रा में ले जाकर चाची ने मेरी शंका अपने शब्दों से व्यक्त की । यदि ऐसा हुआ तो अब चल तो कभी नहीं आएगी । जांची माँ से लिपट कर फूट फूटकर रोने लगी । माँ को तो जैसे काठमांडू गया था । वे चक्रवार तक रहे हैं । पुराने वृक्ष की तरह झकझोरे खा रही थी और जांचे उनसे लिपट कर रोती जा रही थी । इसी भी चार जी की छोटी बहन लखपत्ती भी आ गई और वह भी रोने लगी । अब स्पष्ट हो गया कि चम तो मौसी के यहाँ भी नहीं गए हैं क्या अच्छा आते ही बाहर ताकत पटोला क्या मंगरू और पीपा उसकी पहले से ही प्रतीक्षा कर रहे थे वो कुछ लोग और भी आ गए । आखिर गए तो कहाँ गए । हर व्यक्ति किसी विषय में सोचता हूँ और अपने अपने ढंग से अनुमान लगता रहा हूँ । कोई झगडा हो गया तो नहीं हुआ? मारापीटी तो नहीं की गई थी । किसी ने पूछा जांचा ने नकारात्मक ढंग से सिर हिलाया हो । विश्वास ज्वालामुखी की तरह भीतर से धडकता हुआ सिर पर हाथ रखे भवन बैठा रहा हूँ । केवल हाँ नहीं का उत्तर संकेत है देता रहा । हर व्यक्ति का ॅ एक ही प्रकार का होता है और उसका अनुमान भी एक ही तरह का लगता है किसी रिश्तेदार क्या चली गई है और किसी और चीज में फस कर नहीं आई है वो कल सवेरे तक जरूर आ जाएगी । शहर के हर रिश्तेदार के यहाँ तो देखा गया जहां हाइट नहीं बोल पाया हूँ और फिर किसी गहरे विचार में डूब गया । गल इतवार भी है सवेरे सवेरे हमारे साथ चलो चेतगंज के चुन्नू फकीर क्या उस पर हरिद्वार और मंगल को पीर साहब की सवारी आती है? बडा सही सही बताता है । सुबह नहीं अपनी राय व्यक्त की । अभी मन ना कि भेज गायब हो गई थी । उसने गांव तक का आता पता बता दिया और मैं मिल भी गई । पर मंगरू का विश्वास लकडियाँ बागा में था और कतवारू कटोरा चलवाने की बात कर रहा था । मणि कर्णिका घाट के पास एक घर रहता है । जिस दिशा में वह होगी, उधर ही कटोरा चलने लगेगा । पी पा की आस्था नहीं बस्ती के लिए एक पंडित जी पढी थी जो गडा बांधते ही और जाने वाला लौटकर आ जाता था । यदि नहीं आता तो सप्ताह के भीतर उसके चिट्ठी आवासीय आ जाती थी । पर चाचा पर इन सारे सुझावों का कोई प्रभाव नहीं था जो नेता और रिक्तता का गंभीर बोध कराने वाले उसके चेहरे पर जैसे धुआं हो रहा था । प्रतिक्रिया हीन उसके मोहन से साफ लग रहा था कि इन सुझावों पर ध्यान देना तो दूर फिल्म नहीं सुन भी नहीं रहा है । संध्या घनी होती कहीं लोग अपनी सहानुभूति प्रकट कर घटने बढने लगे । अंत में चाचा नहीं दुकान खुलवाई और मंगरू तथा पीपा को लेकर आया । फिर दुकान का बाहरी दरवाजा बंद कर लिया गया । आप चाचा ने माँ को भी बुलाया । माँ के साथ मैं और चाचा दिया हैं । चाची दुकान की भीतरी चौखट पर ही बैठ गईं । जहाँ जहाँ नहीं हो सकती थी सब जगह हुआ है और वह कहीं नहीं मिली तो बेचारी तो घर से कहीं जाती भी नहीं थी । तो इतना कहते कहते डाॅॅ टूट गया और विस्फोट फूटकर रोने लगा । माफिया थी छल चला नहीं जहाँ जी तो पहले से ही नहीं, चाचा का रोना सुनकर मौसी भी चौक में से आ गई और लगी अपनी बहन के आंचल से फिर डाॅॅ अजीब स्थिति थी आंखों से बेहतरीन िराशा का । ऐसा संवेद प्रवाह मैंने कभी नहीं देखा था । मेरा गमरा जाना स्वाभाविक था । मैं दीवार के सारे खडा ही रहा हूँ । मुझे रह रहे कर लग रहा था कि चौक से चल तो झांक रही हैं । वे संकेत से कह रही है उन बडे बुजुर्गों के बीच खडे क्यूँ यहाँ चले आओ इतना निराश होते हो तो मैं भैया डाॅ रखो तो हम लोग हो जाये करते हैं कहीं ना कहीं तो उसका पता चले गए । दीपा ने चाचा को संभालने की कोशिश की अब कहाँ खो जो है महेश तैयार हूँ मैं सब जगह हो जाया हूँ क्या? क्या आपको पूछते हुए बोलना रहा हूँ मेरी चाॅस हमेशा इसी छोटे पर बांधी रही । किसी कसाई के फंदे में फंस गईं ॅ और जब उसने कहा मैं कभी नहीं आ सकेगी । तब चाची दहाड मारकर रोपणी । जहाँ जा की शंका थी कि लाला ने अपने नाराजगी का बदला ले लिया । उसे इस बात पर भी आश्चर्य था कि आज जो भी मुझे देखता था, वही पूछता था की फॅमिली ही है । खबर इतनी जल्दी कैसे फैल रही? फिर उसने मुझे पूछा तो देश को चले गए थे । किसी से कुछ कहा तो नहीं । नहीं जरूर इसमें कोई रहते हैं । वे लाला के ही जाल में फंस गए और उसी ने उसके गायब होने की खबर भी प्रचारित करवाई । ताजा में पुलिस में रिपोर्ट लिखवा देनी चाहिए । ऍम बोला परेश क्या होगा? चाचा की यहाँ छुट्टी और उसके चारों और खडी व्यवस्था की दीवारों से टकरा नहीं । माँ भी रिपोर्ट लिखवाने के पक्ष में नहीं थी क्योंकि उनकी जस्टि में ऐसा करने से चंपुओं के जीवन को खतरा हो सकता है । माँ का विचार था कि व्यर्थ में अंधेरे में टटोलने और माता मारने से क्या फायदा? तो मेरे भैया कल सवेरे खुद लाला से मैंने उनके चरणों पर गिरकर गाॅव अपने लिए मैं बच्चा ही है और हम माडॅल जाए और कहीं लाला नहीं है । सोचा कि मुझे फंसाने की चेष्टा की जा रही है । तब पी पानी शंका उस बनने की माँ सोचने लगी । तब तो लाला से यही कहना चाहिए कि हम तो कहीं गायब हो गई है । उसे किसी तरह से खुलवा दीजिए, मैं आपका बडा एहसान मानूंगा परिष्ठ उसे कोई लाभ नहीं दिखता हूँ फिर तुम क्या करोगे? पुलिस में रिपोर्ट लिखवाएंगे पडी की पडी रह जाएगी लाला के खिलाफ तो इतनी रिपोर्ट लिखवाई नहीं क्या हुआ उन का माँ बोली हूँ जहाँ जा चुप रह गया बंद गली के आखिरी मकान की ड्यूटी पर उसकी मानसिकता सिर्फ पत्ते पत्ते लाचार हो चुकी थी तो अब उसके सामने माँ का प्रस्ताव मारने के सिवा कोई चारा नहीं था । पर मैं ही नहीं जाएगा । क्या कहेगा? कैसे कहेगा? बस के मुख से आवाज नहीं छूटेगी हूँ । तब तुम जब को भी अपने साथ लेते जाना माँ का ही प्रस्ताव था । पिछली घटना के बाद ना मेरे वाकचातुर्य पर कुछ भरोसा करने लगी थी । चाचा ने मॉन्स भी करती थी । तब माने पी पैसे का यदि हो सके तो आप सवेरे सवेरे ऑफिसर गंगी के पंडित जी के यहाँ चले जाइयेगा । मैंने भी उनकी बडी तारीफ सुनी है और आप से उनका परिचय भी है । बीमा चुप रह गया ऍम सोचने लगा कि सवेरे सवेरे उसका जाना कैसे संभव हो सकेगा? ऍम हो जाएगा । यदि कहीं इंस्पेक्टर ने दिन में भी दिये जलते देख लिया तो नौकरी सोली पायलट आ जाएगी । आज नहीं पेट के सामने कितना लाया जा रहे । पीपा चाहकर भी स्वीकार नहीं कर पाया । उसने एक रास्ता निकाला । आजकल नवरात्र है । पंडित जी सुबह खाली मिलेंगे नहीं । मैं दस बजे तक चला जाऊंगा । उस समय तक पूजा पाठ से खाली हो जाएंगे । पीपा की बात मान ली गईं । तब उसने कहा चंदों का कोई कपडा इसी समय दे दीजिए । सवेरे में अपना काम निपटाकर सीधे उन्हें क्या पहुंचाऊंगा । इसी क्रम में उसने ये भी बताया कि पंडित जी गायब हुए व्यक्ति के पहले गए वस्त्र के माध्यम से कोई तांत्रिक प्रयोग करते ऍम पीपा और मंगरोल भी चलेगा । एक चटाई बिछाकर चाचा चौक में ही लेट गया । दिन भर का भूखा प्यासा ऍम अपनी सोनी सोनिया से आकाश देखता हुआ हूँ । अचानक है पुना बडबडाया अब मैं नहीं पाएगी जगह की मांग अगर मच के पेट में चली गई । बाहर से शांत रहने वाला चाचा भीतर से उभर रहा था इसी उबाल के कुछ बीच बीच में झलकाते थे माँ ऍम थी रही माँ नहीं उसका मुंह धुलवाया और गुड खिलाकर पानी पिलाया । ऍम बाल दिनों में से कोई खाने को तैयार नहीं था । पर माँ का कहना था बिना खाए पीए आंसू बहाते रहना शुभ है और वो के रहने से फायदा क्या कुछ खाइए । पीजिये पेट में अन्य रहेगा तो शरीर भी कार्य करेगा और बंदी भी हाँ स्पष्ट नहीं कह पा रही थी । यद्यपि में अनुभव कर रही थी की लडाई लंबी हो सकती हैं । आकाशमंडल और ऍम है कहाँ तक लडी जा सकती हैं । मैंने कुछ बनाकर खिला देने का उपक्रम आरंभ किया और मैं अभी आया कहकर बाहर जाने लगा हूँ । वहाँ द्वार की और लडकी और मेरे निकट आकर बोली देखो अब मेरी ओरी के चक्कर में मत पडना । समय वक्त ठीक नहीं है । आज उनकी आवाज भय से बोझ थी । मैं बिहारी चाची को खबर देने जा रहा हूँ । तब मैं आश्वस्त हुई तो गली में रामलीला देखने जाने वाली और तो और बच्चों की चहल पहल थी और भीतर चौक में निढाल पडा हुआ चाहता हूँ । आपने जलते मन का धुआँ चल रहा था । सहज ही अनुमान लगाया जा सकता था की राजा दशरथ का निधन किस मनोस्थिति में हुआ होगा जब मैदान इसके घर पहुंचा । बडी उत्सुकता से सलमान है दरवाजा खोला । मेरी दस तक उसके लिए जानी पहचानी हो गई थी और यही उत्सुकता का कारण भी था । हम लोग अभी अभी तुम्हारी चर्चा कर रहे थे । वो बोली हूँ मैंने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं चुप क्या आगे बढाऊं मैं बोल दी गई । मैं मैदागिन की रामलीला देखना चाहती थी । मोहल्ले की औरते मुझे ले जाना चाहती थी पर अम्मी जानने जाने नहीं दिया मोली तुम जाओ तो मोहल्ले की औरतों के साथ ही पर यदि जगह भी साथ रहे तो अच्छा हूँ । मैं भी छुट था और भरते हुए दालान तक चला आया था । पीआरडी बकरीद हो रही थी और अम्मी जान खाना पकाने के लिए चूल्हा जला रही थी । मुझे देखते ही उन्होंने सलमा की ही बात आगे बढाई और नहीं तो क्या बिना किसी अपने खास आदमी के साथ हुए मैं सलमा को कैसे भेज सकती थी? बडा खराब आगे आए, कैसा बडे कैसा ना पडे । मान अपनी जान के विचारों का समर्थन कर रहा था पर मुँह से एक शब्द नहीं निकला । मुझे लगा मैं बस की छत पर कुछ लफंगों के साथ बैठा हूँ । सामने कुछ दूरी पर चलता है । मैं उस पर बोलियाँ कर रहे हैं तो आज मैं उसे उठाकर ले गए । मैं कुछ नहीं कर पाया हूँ । रामलीला चलती रहीं और ऑक्टोपस ने पंजाब बढा दिया । आपने लगा मेरी मुक्ता से कहीं अधिक मेरी बेचैनी पसीने की जवान से जीतने लगी । क्या पिक्चर को बडे परेशान लगते हो? जम्प वो चली गई । इससे अधिक मैं कुछ नहीं बोल पाया और इतना उन लोगों को परेशान करने के लिए काफी था । दोनों की जिज्ञासाओं पर सारी घटनाएं मैंने संक्षेप में सुनाई । ऍफ से ना कुछ था ही उसने अपना बदला निकाल लिया । पियारी छोटे ही वहीं पहुंची जहाँ हम लोग पहले ही पहुंच चुके थे । अब कहाँ रहा झूला सोखना और कहाँ रहा तो दोनों दोनों मेरे पास चली आई सलमा हक्का बक्का थे तो कर क्या रहे और हम लोग अम्मीजान ने पूछा करेंगे क्या खो जाए? हो रही है तो इसमें रिपोर्ट क्यों नहीं करते? मैंने माँ के विचार से उन्हें अवगत कराया तो हमारी माँ ठीक सोचती है । पियारी बोली तब एक काम करो तुम डॅान चले जाओ उसको खबर दो । कोई न कोई उपाय अवश्य निकालेगा । उस बात जांच के होश तो दिखाने लगा ही देगा । किन्तु प्यारी अम्मी जान के पक्ष में नहीं नहीं उसके विचार से दान इसको खबर करना ठीक नहीं था । एक तो उधर मैं खुद बीमार चल रहा है । यह सुनते ही वह बिजली डाउट रहेगा और कहीं आप ऐसे बाहर हुआ और लाला के सिर पर आधा उनका तो गिरफ्तार भी किया जा सकता है । तो फिर क्या होगा? अम्मीजान कुछ ना कुछ करने के पास में थीं । उनका सोचना था कि जूझे देर होती जाएगी । मामला हाथ से बेहद होता जाएगा । बिहारी भी सोचती नहीं, जहाँ के लिए अनेक अपशब्द उसके मुझसे नहीं करते रहे । चेहरा क्रोध से लाल होता गया । अच्छा चाहूँ अम्मा सिखा हूँ कि ध्यान रखें और लोगों को ढांढस बंदा है ऍम खून का घूंट पीकर बोल दी गई । मैं जल्दी ही कोई ना कोई उपाय सोचती हूँ । मैं लौटा और गाडी हो गई थी । आज मौनीबाबा के न काटे । क्या थी मेला देखने वालों की चहल पहल से गाली जाग रही थी । कोई भी व्यक्ति यदि मेरे पीछे या बगल में चलता मालूम होता तो लगता जैसे वो मेरा ही पीछा कर रहा है । मनुष्य अपने बाहर के भाई की अपेक्षा अपने भीतर के भय से ज्यादा परेशान होता है । मेरे भीतर का ही भाई इस समय भारत व्यक्ति को शंका की नजर से देखता हूँ और मुझे आतंकित कर देता था । तो रात भर मुझे नहीं नहीं आई । हरशरण चमको मेरे सपनों नहीं थीं । मनुष्य से कहीं अधिक विशाल ऍम बैठा होता है । उसके अभाव में ऊपरी स्मृतियों का सागर । मेरा मन उसी में डूबने लगा तो इस समय चंपुओं से संबंधित घटनाएं एक के बाद एक मेरी आंखों में उतरती गई । मैं करवटें बदलता रहा हूँ । नींद से नहाने टहलती रहीं । विचित्र बात ये थी की माँ मेरी व्यवस्था समझते थे फिर भी मुझे लगातार सो जाने के लिए कह रही थी और वह खुद सो नहीं पा रही थीं । मध्यरात्रि के बाहर बाहर बोस पडने लगी । मैं मुझे लेकर भीतर चली आई हूँ । अब मैं उन के बगल में था । उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रखते हुए कहा अच्छा आंखे बंद करो, मैं तुम्हारा सिर्फ चलाती हूँ । सुझाओ कल तो मैं जल्दी उठना है ना चाचा के साथ जाओगे नहीं । कितना सोना था कि मेरी स्थिति और बिगड गई । आप केवल चल तो ही मेरे सामने नहीं थी । जाने वाली बात से ऑक्टोपस के रख है रनिंग । इन्होंने हाथ भी उस अन्धेरे मैं छोडने लगे थे । मुझे लगा उसने चलता को बुरी तरह दबोच लिया है तो मैं कहाँ था और माँ के आंचल में दो बार गया हूँ । क्या बात है बेटा घर लग रहा है वो । उनके बाद साले ने मुझे ढूंढने की कोशिश की । मुझे यहाँ बचपन में जब भूत प्रेत की कहानियां सुनकर डरता था तब भी माँ ऐसे ही मुझे अपने सीने से लगाकर सुला देती थी । इस बार भी उन्हें सफलता मिली । एक बार तो सुनाई दिया कब सोया और कब तक होता रहा पता नहीं । अचानक एक भयानक सकने ने मुझे झकझोरकर जगा दिया । मैंने सपने में देखा कि मैं संसार घंटे है बढ चला जा रहा हूँ । तब तक एक विकलांग लडका दिखाई दिया । मैंने इसे शायद इसके पहले भी कहीं देखा है । याद आया वही लडका जिससे बचाने में मनोहर ने अपनी जान दे दी थी । मुझे देखते ही ठीक बडा ॅ हम लोग उस खंडहर में भूल भुलैया नाम आ एक मकान में घुसते हैं । एक अंधेरे कमरे में दो आदमी क्षमता को बुरी तरह पकडे । तीसरा आदमी लाल तपाया ओ वालो है कि छाड उसकी आंखों कि वार बढाता और कहता तो आप कहाँ करेंगे कि नहीं? पंजाब में डबी गौरैया की तरह ठीक थी । रहीं ही नहीं । नहीं बारे मैं कुछ नहीं कर पाती किंतु मुझे देखते ही उसमें न जाने कहाँ है । ताकत आ जाती है है उन दोनों को एक झटके में ढकेल घर मेरे पास आ जाती है । मुझे बचाओ जब रूबाईयां भरना ये राज्यसभा जाएंगे । मैं लडका दोनों बचाने की कोशिश करते हैं । तब तक फिलहाल धडकता लोहा मेरी आंखों के सामने आने लगता है तो मैं नहीं नहीं कहता हुआ आंखों पर आंख रखता हूँ, जीतता रहता हूँ । मेरी नहीं खुल जाती है तो मैं बात करता हूँ कि मेरी सास हैं । काफी तेज चल रही थी पर मैं अपनी माँ के बदन से बेहतर रहा । लिखता हूँ क्या बातें बेटा सपना देखा क्या माँ के मामा ठीक हैं? एक बार फिर मुझे संभालने की चेष्टा की । मैं अभी भी उन्हें जोर से पकडे रहा हूँ । साथ में खलती रही हूँ । प्राकृतिक होने पर मैंने उन्हें सपना सुनाया । माँ की जमुहाई बता रही थी कि रवि रात भर सोई नहीं है । सपना सुनते ही मैं बोली लगता है आजकल चंद्रकांता संतति पढते हो । नहीं महा विश्वास करो झंपर पत्ती । मैं इतना कहते कहते मेरी क्या बंद नहीं हूँ । निश्चिन्त है । माँ की आंखें भर आई होंगी, पर उस अन्धेरे नहीं । मैं देख नहीं पाया हूँ । मैं मुझे छाती से लगाए हुए ही उठ बैठी और कुछ ही देर बाद मोड लाने के लिए बाहर ले आई । गौर की हवा शकील और ठंडी पड चुकी थी । ठंडी बहुत से भीगी हुई षष्टी का चंद्रमा बहुत पहले ही गायब हो चुका था । मेरे जैसे लोगों के आंसुओं की व्याकुलता आकाश में टिमटिमा रही थी । हो सकता है बैठे पत्ती में ही हूँ । पर अब घबराने से तो कुछ बनने वाला नहीं है । हमें तो धैर्य और संयम से काम लेना चाहिए । आज तुम चाचा के साथ लाला के यहाँ जा रहे हो । देखो मैं क्या कहता है ध्यान भर के लिए । चुप रहने के बाद उन्होंने मच्छी पूछा, जब तुमने बिहारी को सारी बातें बताईं तब उसने क्या का कहाँ देखो? कोई उपाय निकालती हूँ । तब तो मैं इतना क्यों रहते हो? बिहारी से अधिक लाला को कोई पहचाने वाला इस समय हमारे पास कोई दूसरा नहीं है । मैंने माँ को भी अद्भुत पाया है तो सामान्य अवसरों पर बले ही रह ज्यादा बोल दिखाए थे । पर असमान्य अवसरों पर मैं आवश्यकता से अधिक गंभीर और अभी अगर दिखाई देती थी ज्वालामुखी को वह असाधारण हाल ही आ रहे हैं । एक लेती थी वस्तुतः परिस्थितियों की चपेट सहते सहते वो चट्टान हो गई थी । मेरा हाथ मोधुल करवाया तो नहीं अभी तक ले आई और दिया जलाया फिर मुझे सुनने की चेष्टा करने लगी । उन्हें लगा कि मैं अंधेरे से डर रहा हूँ । आखिर माँ का ही रहना । उसे क्या मालूम था कि आप तो बस के जिन्होंने हाथ प्रकाश में भी मेरा पीछा नहीं छोडते हैं । चाचा बडी अन्य मान सकती थी, में था । फिर आज घर में और अधिक टूट चुका था । उसे ऐसा लग रहा था कि अब कहीं जाने से कोई फायदा नहीं । अब उसकी जिंदगी में पडे रहना और खोलना बस यही शेष है । जांच जी ने बहुत समझाया और कहा एक बार जाओ तो सही देखो क्या कहता है पर मैं उससे कहूंगा क्या रिजल्ट की माने जो कहा है वही कहना तो मैं पटलकर बात को लेकर नहीं यदि बांधी लेकर तो अब रह गया गया है । एक हताशा उसके उससे छोटी और काम भी हुई आकाश में विलीन हो गयी मानसिक रूप से तैयार होने में चाचा ने बडा समय लगाया हूँ और जब चला दिन अच्छी तरह चढाया था । जो मिलता है वही चलता के बारे में सोचता हूँ । चाचा बेघर ने की स्थिति में होता हूँ । नकारात्मक उत्तर देते हुए अपनी को समय था और आगे बढता रहा है । लाला के आवास पर पहुंचने ही जोडीदारों ने रोका जाए । ज्यादा कुछ नहीं बोला । मैंने ही बताया कि कुछ व्यक्तिगत काम से लाला से मिलना है वो भी जोडी दार भीतर चला गया तो मैं खडा ही था कि राधा अंदर से आते दिखाई नहीं हूँ । उसने हम लोगों को देखते ही खुंगर निकाल लिया और फिर लौट गईं मेरा माता ठनका यह कमीनी भी यहाँ से जुडी है । मैंने चाचा की और देखा हूँ । वेस्टर्न नीचा किए हुआ का सोच रहा था तो अच्छा हुआ कि उसकी निगाह राधा पर नहीं पडी भरना है जरूर ठीक पडता हूँ । नीरज मेरा ही उधार खाकर मेरे गले पर छोडा चलाती है मेरे मोहल्ले की गोडके उभरे चकत्तों में एक नाम है राधा कोई बाल बच्चा नहीं है । पति चौकाघाट की कॉटन मिल में बिनाई का काम करता है । कभी दिन की ड्यूटी होती है तो कभी रात की । ड्यूटी तो आठ घंटे की होती हैं और घर से आने जाने में उसे नौ घंटे लग जाते हैं । इस बीच राधा परम स्वतंत्र रहती है क्योंकि वह पति के कब जैसे कुछ बाहर ही है । क्योंकि योग बताते हैं वो अपने पति से दो जर्दा ज्यादा पडी है । थोडी देर बाद दे जोडीदार भी डर से आया और हमें ले जाकर गलियारे में एक बेंच पर बैठा दिया और बोला अभी लाला जी पूजा पर हैं । थोडी देर बाद इधर से ही गुजरेंगे तो मिल लेना हूँ । मैं चला गया और हम घंटों प्रतीक्षा में बैठे हैं । मुझे लग रहा था कि मैं तो बस के प्रभाव क्षेत्र में हूँ । उसके एक हाथ के रूप में अब राधा का व्यक्तित्व था हूँ । मेरे मस्तिष्क में लालबत्ती चलने लगी जो मुझे वो समय बीतता गया । मेरी घबराहट भट्टी कहीं अंत में लाला उसी लंगडे नौकर के साथ उधर से निकला चाचा उसे देखते ही उसके चरणों पर गिर पडा रह उधार कीजिए । इतना ही बोल पाया और होने लगा । किंतु लाला एकदम अनभिग्य ऐसा बोला तो वो भाई क्या बात है बोलो बोलो ना आखिर वो दे क्यों? पर चाचा रोता जा रहा था । अब उसने मुझे पूछा मैंने संक्षेप में क्षमता के गायब होने की बात बता नहीं । ऐसा नाटकीय व्यक्तित्व तो मैंने देखा ही नहीं है । साला उसी बेंच पर बैठ गया । चाचा उसके पैर पकडे जमीन था हूँ । एक ओर मैं खडा था और मेरे ठीक सामने लगा नौकर सुबह था । उसकी भक्ति आठ है । मुझ पर बनाया नहीं । मैंने कहा था ना किस मगर मच्छर से दूर रहना । वरना ऐसा नहीं मिलेगा कि डकार तक नहीं लेगा । इधर लाला अपने ढंग से चाचा को समझा रहा था । मैंने कहा था ना कि उसके हाथ पीले का दो । अरे आखिर जवान लडकी है तब तक तुम्हारी बन देश में रहती फिर साले जबसे कलकतिया भाग भाग कर आए हैं जहर का वातावरण खराब हो गया है । आज मैं कलेक्टर साहब यहाँ जा रहा हूँ उनका ध्यान से और पूछूंगा । चाचा भौचक्का सालाना कम हो । देखता रहेगी वो । अब तक तो हमने क्या किया? नहलाने चाचा से पूछा करता क्या पागल फॅार उधर खोज रहा हूँ । पुलिस में रिपोर्ट क्यों नहीं लिखा आई? जांच आने नहीं करते हुए से लाया बडा अच्छा किया । ॅ खुद संतोष के साथ ले रहा हूँ या दी रिपोर्ट लिखवाते तो पुलिस पूछती हूँ कि किस पर तुम्हारा संदेह है तो मेरा नाम लिखवा देते क्योंकि लोगों ने तुम्हें मेरे खिलाफ भर रखा है । लाला ने बडे भी मौके काटे । चाचा टेल मिला तो गया पर संभालते हुए ही गिर बुलाया नहीं सरकार आप पर कौन संजय कर सकता है और संजय करेगी भी शहर में रह सकता है । क्या वो चाचा ने फिर चरणों परसेंट डाल दिया । बटर पिघल सकता था पर लाला नहीं । उसके व्यक्तित्व पर चाचा के गिर बनाने का कोई असर नहीं हुआ । वे चिंता मुक्त निर्द्वंद्व भाव से बेंच पर बैठा रहा हूँ । इस बार उसने मुझे पूछा तो क्या कर रहे हो? कुछ नहीं । कुछ नहीं ऍम हुए बोला वो इतनी अच्छी दीवानी कचहरी पर बाहर ही न लू के सहारे चढकर तिरंगा टान सकते हो, पर अपने दोस्त का पता नहीं लगा सकते । ऍम मुस्कराया हूँ रिश्ते बोझ मुस्कुराहट आज भी मुझे बेचैन कर देती हैं । उस समय तो मैं खून का घूंट पीकर रहे क्या भी कुछ सोचते हुए पुना बोला ऍम रिपोर्ट ना लिखवाकर तुमने दृष्टि से अच्छा क्या बिना हमारे कुछ पूछे पूछे तो बटाटा गया यदि तुम पुलिस में रिपोर्ट लिख वायॅर यदि तुम्हारी लडकी किसी गुंडे या लफंगों के हाथ पडी होती तो वह निश्चित ही मार कर फेंक दी जाती हूँ । इतना सुनते ही चाचा की कतार डस्टी एक बार फिर सहानुभूति की आज ना करती हुई ऊपर उठीं पर वह अपने ढंग से बोलता रहा हूँ तुमने देखा नहीं । मेरे सामने वाले अनाथालय में एक औरत की लाश पडी पाई गई और आज तक उसका पता नहीं चला । पुलिस वाले साले कुछ करते थोडे यदि करते ही होते तो ये अलग होती । वो बातों में ऐसे ही उलझाए रहा हूँ । फिर उठकर चलने का हुआ हूँ चाचा पुराना गिडगिडाया सरकार आखिर हमारे लिए क्या हुकुम है तो ऍफ को देखो कुछ मैं कुछ किया जाएगा । आज मैं कलेक्टर के यहाँ जा रहा हूँ । उनसे बात करूंगा । जांचा कोरा का कोरा लौटाने की स्थिति में आई रहा था कि उसे जोडीदार फिर आकर सोचना नहीं । सरकार आपसे एक मुसलमान औरत मिलने आई है मुॅह की आज चाहती है या तो मैं नहीं बदला थी किंतु बुर्के में अच्छा अभी उसने नहीं चाहिए । बैठाओ डाला का स्पष्ट संकेत था वो जब हम लोग चले जाएँ तब उसे बुलाया जाए । बुर्के वाली सुनते ही मेरे मानस में अपनी जान का तो बाहर आया हूँ । मालूम तो उनको सब है पर क्या है यहाँ सकेंगी? मैं इसी उधेडबुन में था की एक बुरखे वाली फडफडाती हुई ऊपर चली आई हूँ । लाला के सामने आकर खडी हो गई और बडे आवेश में उसने बुर्का उतारा हूँ । अरे ये तो बिहारी है आप लोग परेशान हो रहे चालक को आप नहीं मैं जानती हूँ । पीआई बडे क्रोध में देखी वो चपाती हुई लाला को तरेरती जा रही थी । अब हमारा बैठना वहाँ घोषित नहीं था । हम उठकर चल पडे । फॅमिली से हमने तैयारी की आवाज सुनी । कमीने तो शर्म नहीं आई तो जब भी सहमा नहीं गरीब माफी इकलौती बेटी को अपने नरक कर के खाना बनाते हुए तेरी वासना और हवस इस उम्र में ऐसी है पी आरी बडी तेजी से बोल रही थी मेरी तो इच्छा थी कि मैं थोडी देर और सीढी पर खडा रहूँ । पर चाचा खबरे आ गया । उसे लगा कि झूमने पर पानी पडने लगा है । थोडी ही देर मैं खोलते हुए छोटे का लाला एक ओर तो पुलिस से कुछ घबराता मालूम हुआ । दूसरी ओर बार बार कलेक्टर का नाम लेकर हम पर डांस भी जमाता रहा । परोक्ष रूप से उसने हमें धमकाया भी कि अभी रिपोर्ट लिखवाई तो जम तो की । वही दशा होगी जो और लगी हुई जिसकी लाश भी पहचानी नहीं जा सकती । ऍम नाटकीयता के बावजूद मामला उसके पेट में ही क्या तो हुआ और हम ये भी अनुभव करने लगे कि हमको जहाँ भी है जिस भी स्थिति में है फॅमिली आकृति का तनाव कुछ ढीला मालूम हो रहा था । हिन्दू है, गुमसुम सा चला जा रहा था । एक बार तो वह गली के फॅसे बचा हूँ । स्पष्ट लगा कि वह कुछ और सोच रहा है । उन का मन नहीं था तो केवल शरीर चल रहा है । घर आते ही वह जो जान चटाई पर डाला गया हूँ । याची नहीं उत्सुकतापूर्वक पूछा क्या हुआ कुछ नहीं । चाचा के मुख्य एक वहाँ छोटी नवरात्र की है । सोलह पूर्ण दोपहरी चाचा चाची के लिए जितनी मनहूस और वो दाल थी, उससे कहीं अधिक मेरे लिए व्यग्रतापूर्ण में खिचडी खाकर भीतर लेता था । पर मेरी आंखों के सामने राधा थी । कैसी भी सारी लगती है पर इतने छल प्रपंच और धोखाधडी से बनी हुई हूँ । आॅखें जरूर चल तो के बहकाने में इसका हाथ रहा होगा । आज रामकृष्णन चाचा यदि होते तो सब कुछ मालूम हो जाता हूँ । दुर्भाग्य है कि मोहल्ले में कोई प्रभावशाली व्यक्ति नहीं रहा हूँ । बिहार नारायण जी से कुछ काम हो सकता है किंतु लाला का नाम सुनते ही यदि है भी तटस्थ हो गया तो तो प्यारी को ही राधा की बात क्यों नहीं बता दूँ । हो सकता है ना ही कोई रास्ता निकाले । संकल्प विकल्प के थपेडे खाता मैं भीतर ही पढा रहा हूँ । चाची चौक में सहानुभूति व्यक्त करने आई आसपास की औरतों के बीच में ही थी और चाचा दुकान में अब पीपा सवेरे का काम खत्म कर खाना होना खाकर यहीं आता जाता था । वो और संध्या तक बंदे हुए ग्राहकों का सौदा देना चाचा केवल बडा रहता हूँ और सुर लगाते हुए हृदय का धुंआ अगर बाहर से गंगा राम ने पुकारा लगता है आज जल्दी ही फॅसे चलाया । उसने निकलते ही अखबार थमाया और बडे कुतूहल से बोला देखो आज क्या हो गया । काशी समाचार वाले भ्रष्ट पर डबल कॉलम की हैडिंग भी लाला जगजीवन लाल घायल, पीआरडी गिरफ्तार समाचार में बताया गया था कि डी जोडीदारों के रोकने पर भी बिहारी धडधडाती हुई । ऊपर लाला के पास पहुंच गयी । पुरखा हो रही थी जिससे पहले किसी ने उसे पहचाना नहीं । ड्राइंग रूम में रखे । पीतल के एक बडे गमले का उठाकर उसने लाला पर पटक दिया । हालत का सिर फट गया । नौकरों ने दौड कर बीच बचाव किया तो मौके पर पुलिस पहुंची और बिहारी गिरफ्तार कर ली गई । यहाँ तक वो है की प्यारी के लिए पहले से वारंट था पर वो फरार थी । पूरे समाचार में इसका कहीं जिक्र नहीं था कि पीटीआर्इ ने लाला को क्यों मारा? लगता है लाला ने उसके साथ कोई बदतमीजी की होगी । गंगा राम बोला हो सकता है वह लाला के यहाँ भी छिपी रही हूँ तो तुम भी की ऐसी बात सोचते हो । गंगा राम जो लाला की शक्ल देखना पसंद नहीं करती वो भी आ रही लाला क्या छिपने जाएगी तो कहा जो कुछ हो गया उसी पर मेरा आपका हूँ जो गंगा राम पर झुंझलाहट बनकर पडता हूँ । फिर मैं लाला क्या हो गई । यही तो रहस्य है तो मैं क्यों पकडा? उससे बतियाता क्योंकि मैं जानता हूँ गंगा राम के पेट में कोई बात नहीं पचती । मैं अखबार लेकर सीधा चाचा के यहां पहुंचा । मैंने उसे पढ कर सुनाया हूँ । पी पा के मुझसे निकला हूँ । अच्छा हुआ साला मारा गया । हिंदू चाचा के चेहरे पर चिंता और गहरी दिखाई थी ये अच्छा नहीं हुआ । महेश चाचा बोला क्यों चाचा चुप रह गया । मैं सुबह का संदर्भ पी पास राज्यपाल है क्या करना? चाचा कहता हूँ जिससे हमारी बेटी खतरे में पड जाएगी । वो प्यारी की चोट का बदला कहीं जम कोसेना निकले और पूर्वा हवा पर उठते गुहार के बादलों के साठ दिन भी था । पडा था निकाल गया है । संध्या हो गई । बी पांच चलने को हुआ हूँ या गुरु तुम्हें आज ग्राहकों को निपटा दो । चाचा बोला क्योंकि अब संकट वालों के आने का समय हो गया था । बंधे बंधाए ग्राहक बंधा बंधाया सौदा और बंधा बंधाया दम मुझे कोई परेशानी नहीं हुई । तब तक महंगू और कतवारू भी आ गए थे । और चल तो के अब तक ना मिलने से आज सबके चेहरे और निराश हो । सारी आशा घंटा मर चुकी थी । आते ही माँ चाची के पास गईं । वाह महाकालीका प्रसाद और चांदी का एक रुपया उसे देते हुए बोली इस रुपये को सहेजकर रख दो । यह मानता का रुपया है । मैंने मानता मानती है कि माँ जो ही मेरी बेटी आ जाएगी, मैं तुम्हारे खप्पर में लाकर चांदी की बेटी डाल दूंगी । चाचा जी ने प्रसाद को मस्तक से लगाया और आकाश की ओर देखती हुई कुछ बुदबुदाए जब हमारी कल्पना पर आघात लगता है ना । या मन में जब बनी किसी प्रति मैं हमारी छवि टूटती है तब हमारी चिंतना विश्वमय के तल पर धराशाई हो जाती है कि मुझे राधा के संबंध में सुनते ही वहाँ आवाज हो गई । उनके लिए राधा एक भली औरत थी हूँ काम काली दादी के हनुमान जी का दर्शन करने । वो मैं वहाँ बहुत आती हैं । वहीं माँ से भी उसका परिचय हुआ था । गोरी सी पतली दुबली हनुमान चालीसा पडती हुई माँ के मानस में समाई राधा अब अपना रूप बदलने लगी थी । माँ की मुद्रा कुछ छडों तक है रूप परिवर्तन ही देखती रह गईं फिर बुदबुदाई हो सकता है ना इस समय घर पर ही हूँ और कोठी से लाये पराठों कि पुतली न घर चल पडी मैं भी साथ होलियां पहले रामकली दादी के यहाँ पहुंची दादी डर कुमारी बुखार से परेशान थी । तीन आंखों के बाद आज ही उन्होंने जूस लिया था । माने सारी बातें बताई । उन्हें तो ये भी नहीं मालूम था कि चम तो पिछले दो दिनों से गायब है तो मेरे की जिंदगी उजड गए । उनकी पहली प्रतिक्रिया थी तो इसमें राधा का हाथ हो सकता है । इसे मानने के लिए दादी तैयारी नहीं थी । फिर भी राधा को बुलाने के संबंध में सोचने लगे । बडे बुलाने की बात कुछ और होगी । अगर हम उसके यहाँ चले तो दबाव पडने पर मैं खोल सकती है । मैं बोली ऍम दादी की हालत देखकर अधिक जोड देने के पक्ष में नहीं था । इतना अवश्य कहा मुश्किल से दस का दम पर तो उसका घराें यदि आप चले तो टेक आकर लेती । चलो ही तैयार हो गयी खटखटाने पर राधा नहीं दरवाजा खोला । दादी को माय दिखाई नहीं हूँ । राधा ने आगे बढकर उन्हें संभाला किंतु जैसे उनकी निगाह मुझ पर पढूं, सकपकाई और मेरी और दृष्टि हटाते हुए उसमें दादी का कुशल छेम पूछना आरंभ किया हूँ । अजीब स्थिति थी कभी उसके घर न जाने वाले हम लोग अप्रत्याशित पहुंचे थे । उसे हमारे आने का कारण पूछना चाहिए था । पर मैं कुशल समाचार में ही लोगों को चाय रखी । दालान में पडी चारपाई पर ही दादी ढुला कहीं और माँ । वहीं जमीन पर बैठने लगी । दब राधा दौड कर चटाई ले आई तो थोडी देर तक इधर उधर की बातें और चली । पर राधा ने अभी भी नहीं पूछा कि आप लोग कैसे चलेंगे । शायद इसी संदर्भ का सामना करने के लिए मैं अपना मन तैयार कर रही थी । सामने साइकिल पडी थी । स्पष्ट लगा कि इसका पति ड्यूटी से आ चुका है, पर वह कहीं दिखाई नहीं दिया । अंत में माँ नहीं बात छेडी । मैं एक विशेष काम से तुम्हारे आई हूँ । उत्सुकता शून्य उसकी मुद्रा अगले बाकी की प्रतीक्षा करने लगी । तो मैं तो ये मालूम है कि चल तो दो दिनों से लापता हैं । नहीं तो जैसे वह तो जानती हो । हाँ या कहीं कहा सारी दुनिया में खबर फैल गई और तो मैं नहीं मालूम हूँ । हाँ बोली नहीं विश्वास करो । चाची मुझे बिल्कुल नहीं मालूम । ऍम कार्तियानी का दर्शन करने गई थी । माँ की आवाज तेज हुई । ॅ तुम्हारे ही साथ एक दुकान पर देखी गई थी । आप गडबडाई कुछ सोचते हुए बोली हाँ, दुकान पर तो मेरे साथ ही थी पर इसके बाद कहाँ चले गए? मैं नहीं जानती । इतना कहते कहते थे एकदम खडी हो गयी । अरे तुम कहाँ हो? आपको लगा हूँ । खांसी से पकडी गई नागिन छुडाकर भाग रही हो, पर वह जलपान लेकर तुरंत आ गई । वास्ता अपना आसन में परिस्थिति से घबरा रही थी । इस प्रसंग को बदलने के लिए ही उसने जलपान का सहारा लिया । इतनी देर से हम लोग आए हैं तो तुमने जलपान की नहीं सूजी अब जब मैंने बात शुरू की तो तुम जलपान लेने चली गई । मैंने चाहा कि उसे उधर उधर ही रख दु । इसी क्रम में उन्होंने कहा सुनाये आजकल तुम लाला यहाँ भी आती जाती हूँ । एकदम होती तो हम ॅ क्या? लालायित जगजीवन लाल की यहाँ नहीं बिल्कुल नहीं तो यह कहाँ? आपने सुना तो मैं कल वहाँ लडको ने देखा था और इसे देखते ही तो अपना मोह घूंघट में छिपाकर लौट पणी माने बडे बेमौके गवाही से मुझे पेश किया । अब मैं मेरी ओर मुखातिब हो रहीं हूँ । वैसे भी खाता बेटा मैं बात थी नहीं अब मैं क्या कहता हूँ मैंने खुद को संभाला आपकी ही तरह एक औरत वहाँ दिखाई पडी थी मेरी ही तरह की औरत ऐसी साडी पहनी थी वह साडी थोडी की क्या बात करती हूँ जी माँ झुंझलाई और यह बताओ कि तुम वहाँ थी कि नहीं तब खत्म हुई विश्वास करो चाची मैं पांच आती नहीं । जग्गू को कहीं से हो गया है तो बात हुई माउंट कर चलने को नहीं । मेरी दादी को सहारा देकर उठाने लगीं । फॅार हैं । उठते हुए दादी ने पूछा ड्यूटी से तो मैं आ चुके लगता है । पान खाने सडक पर गए, कहीं गप्पे लडा रहे होंगे । राधा बोली चलते समय उसने एक बार फिर जलपान के लिए आग्रह किया । आज मेरा औरत है माँ बोली तो यहीं पर इतनी बेरुखी से गोया वह कह रही हूँ तुम्हारे ऐसे बाकियों के हाथ से पानी भी नहीं पीना चाहिए और दादी ने भी अपनी बीमारी की आड लेते हुए उसका जलपान नहीं हुआ । किंतु राधा मुझसे जलपान के लिए नहीं कह सकीं । लगता है काफी घबरा गई थी जैसे किसी ने उसका चादर खींच कर उसे लगा कर दिया हूँ । अपनी पाप अग्नि के धोये में बुरी तरह गिरी थी । हम लोग उठे रहे थे कि तुम हार की खटखटाहट सुनाई पडी । साधा दरवाजा खोलने के लिए लगी । भोपाल ने प्रवेश करते ही कहा फॅार मिला था मैं बहुत गया गया है लाल नहीं तो मैं भी बुलाया है । दुर्भाग्य सौभाग्य बडी यह कहते हुए गोपाल ने हमें नहीं देखा पर जब हम आगे बढे तब हम ने देख लिया कि राधा उसके मुँह पर हाथ रख रही थी । आपसे पार्टी समय चल चल सकता है । इसका आधार उसे नहीं था । धीरे धीरे दिन फसल देगा । हम तो नहीं आई और ना उस की कोई सूचना नहीं हूँ । योतिषियों की भविष्यवाणियां गलत साबित हुई हूँ, फिर भी उसके जीवित रहने का विश्वास मन से नहीं हटा हूँ । हम उसके कौशल छह उनकी प्रार्थना भी करते रहे और इसके अधिक ही जा सकते थे । लोग निराश हो चुके थे किंतु मेरा मन पता नहीं क्यों कह रहा था कि वहाँ एक ना एक दिन अवश्य मिलेगी । मेरी आशा नियताः कई है । परिणाम था कि सिनेमा के फाटकों पर मेलों में यहाँ जहाँ कहीं भी भीड दिखाई देती, मेरी दृष्टि ऍम तो की खोज में लग जाती है । कभी कभी ऐसा भी हुआ हूँ कि मैं दौड कर किसी लडकी की ओर गया भी किंतु बात जाने पर पता चला कि वह हमको नहीं कोई और है । आप मेरी सक्रियता पर रात जमने लगी थी । मेरी गतिविधियां भी बहुत सीमित हो गई थीं । स्कूल जाना, घर आकर पढना चाचा की दुकान पर बैठना और बहुत हुआ तो कंपनी बता घूमाना, बहुत बितने में मेरी दिनचर्या सीमित हो चुकी थी । इसमें एक दिन हमेशा से मेरी मुलाकात हुई । मैंने उसे अपनी सारी बातें बताई हूँ । उसने स्वीकार किया कि घटना से वाकिफ है तो तब तुमने उसे खोजने की पिक्चर तक नहीं की और एक बार भी हमदर्दी जताने के लिए नहीं आई । मैं झुंझलाया जब चली गई तो क्या खोजना और झूठी हमदर्दी में मेरा विश्वास नहीं । मैंने अनुभव किया कि उसकी मानसिकता ही कुछ दूसरे ढंग की बनती चली जा रही है । तो मैं बोलता रहा यह सब बुजुर्ग हुआ । सोसाइटी का विश्वास है भाई जब तक समाज नहीं बदलेगा तब तक ये सब होता रहेगा । इसलिए चल तो को खोजने से अच्छा है तो सोसाइटी बदलने की फिक्र करो । इसका मतलब है कि यह ही प्यास लगे तो तत्काल पाने के लिए व्यवस्था ना करो । कुमार खोदने की फिक्र करनी चाहिए । भाई के आज का स्थायी हल तो हुआ ही है । तो मैंने देखा मेरे झुंजलाहट का भी उस पर कोई प्रभाव नहीं था । वह तो विचार के ऐसे खूंटे से बांध दिया गया था जिसके चारों ओर चक्कर लगाने की सेवा मैं बढ ही नहीं सकता था । फिर भी बहुत जगह छोडने पर उसने कहा घबराओ मत, यदि कहीं पता चला तो तो मैं जरूर खबर करूंगा हूँ । चलते चलते उसने पूछा हूँ आजकल दानिश कहाँ है? वो मुझे नहीं पता हूँ । ये तो मानना ही नहीं जा सकता हूँ । कमतों का भले ही तो मैं पता नहीं हूँ पर दान इसकी भी जानकारी न हो यह बात विश्वास से पढे हैं मैं हम तो के लिए वैगरह हूँ और वैधानिक के लिए मैं जीवन के लिए व्यग्र हूँ और ये राजनीति के और शायद कम्यूनिज्म की है । सबसे बडी कमजोरी भी है कि वह राजनीति के माध्यम से जीवन को देखता है । जीवन के माध्यम से राजनीति को नहीं । मेरी निष्क्रियता और उदासीनता का अनुमान माणिक जी को लग गया था । मैं बहुत रेल के पीरियड में भी नहीं जाता था । यदि कहीं सामना भी होता तो प्रणाम कर बगल से कट जाता था । उन्होंने सोचा अंग्रेजों की निरंतर विजय ने मुझे हताश कर दिया है । एक रविवार की संध्या को मेरा घर पूछते पूछते स्वाइन चले आएँ । उस समय तक माँ नहीं आई थीं और मैं मेरे चाचा की दुकान पर था । घर पर लटकते ताले से टकराकर में दुकान पर ही चले आए । अब तुम दुकान पर भी बैठने लगे । उसने मुस्कुराते हुए पूछा हूँ । आवाज सुनते ही मेरी दृष्टि उनकी ओर गई । अप्रत्याशित होने खडा देखकर मैं पुडिया बांधना छोड करोड गया हूँ । अभिभादन के बाद मैंने सम्मान उसी तख्ते पर उन्हें बताया । चाचा से परिचित कराया । उसने उन्हें नमस्कार किया और फिर खुद पुडिया बांधनी लगा हूँ । मुझे मुक्ति मिली । चाचा की स्थिति अब विचित्र सी हो गई थी । आप जो है बहुत कम बोलता था और गुमसुम सा पडा रहता था । कभी कभी तो एक बात को कई बार उससे कहना पडता था । जैसे भी सुनता है ना वो निरंतर बढती हुई जनता के नीचे उसकी राॅड बहुत छटपटाती रहती है और कभी कभी हो जाती थी शायद इसीलिए माणिक जी की है आओ भगत नहीं की जो उसे करनी चाहिए थी । ऍम है । घर की ओर बढते हुए वाणिक जीने चाचा के संबंध में पूछा तो पहले मैंने सतही तौर पर और घर पर पहुंचने पर चाचा के वर्तमान संदर्भ से उन्हें विस्तार से परिचित कराया । गहरी चिंता में डूब गए । उनका मौन बडा लाचार दिखाई नहीं ऍसे तो मेरा भी परिचय मैं भी बात कर सकता हूँ । इतना कहने के बाद वह कुछ रुके । फिर बोले इस विषय में मुझे बात करना कुछ ठीक नहीं होगा । जब की तुम लोग उस से मिल चुके हो सोचेगा कि मेरे खिलाफ प्रचार हो रहा है तो प्रचार किया हूँ । हर व्यक्ति की यही धारणा है कि इसके मूल में वही है । ये ठीक है । मैं भी मानता हूँ कि वह लडकी उसी कमीने के पेट में है । इस समय शहर में उसके ऐसा सफेदपोश अपराधी दूसरा नहीं आॅर्डर है । गॉड फादर गॅाडफादर जानते हो ना गया कुछ भी कार्यक्रम करा सकता है । अब तक तुम लोगों ने जो भी किया ठीक हैं । अभी संभावना है कि वह उसे उगल देखो । जरा सी गडबडी हुई कि मैं भीतर ही बिल्डर ऐसा पचास आएगा कि उसकी डकार भी सुनाई नहीं देगी । मैंने देखा माणिक जी जैसा व्यक्ति भी ऑक्टोपस की जहरीली छाया से दूर रहना ना चाहता था । मैं नहीं चाहता था कि उससे किसी प्रकार की छेडछाड की जाए और फिर ऐसी छाया दो । मायावी दान हो की तरह हर जगह पहुंच जाती हूँ । जिस के नीचे पापपूर्ण ने दोनों पर देखो । ये बात दूसरी है कि पुण्य का प्रतिशत आप से कम हो और हो भी क्यों नहीं हूँ । आप उसकी प्रकृति है, उसका बहुत है और पुल है उस नाम आये भोग के लिए । आखिर पास की भी अपनी सामाजिकता होती है । उस को भी जीवित रहने के लिए बोलने का जामा पहनना होता है । शायद इसीलिए लाला विद्यार्थियों असहाय हूँ और सेवा समिति को खुलकर चंदा देता है । माणिक जी ने स्पष्ट स्वीकार किया कि मेरी सेवा समिति को इस बाहर के ग्रहण पर लगने वाले केंद्र के लिए लाला ने दो सौ रुपए का चंदा दिया है । अगली पूर्णिमा को चंद्र ग्रहण लग रहा है । मध्य रात्रि का पूर्ण चंद्रग्रहण तो उसकी कट कट आंटी रात जगह जगह अलाव जलाएंगे । दिन में जलाने की लकडियां भी लाला अलग से देगा । उस की शर्त बस एक है कि हर शिविर पर लिखा रहे लाला जगजीवन लाल के सौजन्य है । इन सब में कोई झमेला भी नहीं है । उसके आदमी ही शिविर बनाएंगे और दही लाला के नाम का बैनर भी लगाएंगे । यदि और आदमियों को भी जरूरत पडेगी तो लाला उस की भी व्यवस्था करेगा, क्या करेंगे? आदमी मेरे मुख से निकला हूँ । ग्रहण के भूले भटके लोगों को रास्ता दिखाएंगे कि लाला के आदमी हूँ । बोले बैठकों को रास्ता दिखाएंगे ये ऍम मैं माणिक जी का मूवी देखने लगा । उनकी समझदार आंखों ने मेरी मुद्रा बढ नहीं तो तुम ठीक सोचते हो पर क्या किया जाए? समिति के पास न तो पैसा है और ना इतने स्वयंसेवक । पुरुष तो स्वयंसेवा का काम करने के लिए मिल भी जाते हैं । पर करते तो एकदम नहीं मिलती । फिर ऐसी स्थिति में समिति चलाने की जरूरत ही क्या है? तो कहना चाहते थे कि जनता के बीच रहने के लिए किसी ना किसी सामाजिक संस्था से जुडा रहना जरूरी है । किंतु मैं ये नहीं कह पाए उनका मौन निरुत्तर साल आएगा । थोडी देर बाद उन्होंने बाद घर रुख बदला । इन्हीं सब के लिए तो तुम्हारे पास आया हूँ । मैं जाता हूँ रहने की राज के लिए अपने साथियों के साथ तुम भी स्वयंसेवक बन जाओ । हमारे जितने अधिक स्वयंसेवक होंगे लाला के आदमियों की कारस्तानी उतनी कम चलेगी । चलते चलते उन्होंने एक बात और बताई कि ग्रहण में बाहर से काफी लोग आएंगे, बहुत अधिक भी होगी । बहुत संभव है हम तो भी कहीं दिन बढिया ऍफ में झाडियों में दबी फंसी लकडियों भी बहुत कर आ जाती हैं । शायद ऐसी ही संभावना की और माणिक जी का संकेत रहा हूँ । मुझे आश्चर्य है कि उस दिन माणिक जी ने ना स्वराज की बात की और ना रणभेरी की । वाणिक जी के भीतर का आदमी उस दिन बडा, कमजोर, लाचार और विमर्श दिखाई दिया हूँ । चाचा इधर बहुत अधिक अंतर्मुखी हो गया था । लगता है वह सोचता बहुत है और बोल नहीं पाता है उसका इस तरह गुमसुम साहब पढा रहे ना उसकी उदासी उस दिन से बहुत बढ गई है जिस दिन मैं मेरी माँ के साथ पंचगंगा घाट के एक नेपाली ज्योतिषी कहाँ गया था । माने उस ज्योतिषी की बडी तारीफ सुनी थी । वह रोगियों को आयुर्वेदिक औषधि भी देते थे और ग्रहों की गति के अनुसार भविष्यवाणी भी करते थे । उनकी एक हाँ कुछ खराब थी । इसी से वह कनवा बाबा के नाम से भी विख्यात हैं । गेरुआ वस्त्र और पक्की दाढी मूंछ वाला उनका व्यक्तित्व हूँ । आप तो नहीं था पर एक साथ देखता का उनमें आकर्षण अवश्य था । सही मायने में वह साधु थे, किसी से कुछ नहीं लेते थे । किसी ने औषधि का कुछ दाम देना भी चाहते तो एक आने से अधिक नहीं लिया । वो भी एक अन्य हाथ से नहीं हुई अपनी आराधना काली की खबर में डलवा जी उस माहौल लेके बहुत से लोग बताते हैं कि बाबा रात रात भर काली क्या राजना में बता देते हैं । कभी कभी काली जी के स्वयं उन पर हमारी आती है वो दिन चढते चढते उनके यहाँ भीड हो जाती है । इसीलिए माँ और सुमेर चाचा गौरे बोले उन के यहाँ पहुंचे उस समय बाबा अपनी आराधना में लगे थे । घंटे बर्बाद बाबा की दृष्टि चाचा पर पडी हो बडे परेशान मालूम होते हो हमारा आज चाचा एकदम बाबा के चरणों पर लेडिया बाबा नहीं । एक बार पुनः माँ काली की प्रतिमा की ओर देखा और फिर मेरी माँ से बोलने का संकेत किया । मैंने सारी बातें बता दी । उन्होंने सामने दीवार पर टंगी घडी को देखा । फिर बगल से एक कागज उठाकर नोट किया और वहाँ से ही पूछा जिस समय तुमने उस लडकी को अंतिम बार देखा था इसके बाद मैं यहाँ नहीं दिखाई दी । उस समय कहे बजा रहा होगा । यही नौ के आस पास का समय था, बाबा नहीं । उसी कागज के टुकडे पर कुंडली चक्र बनाया, ग्रहस्थिति लिखी और बडे गौर से देखते रहे । फिर बोले इस समय के अनुसार प्रश्न लगने से बात बनती नहीं है । जिस समय लडकी गायब हुई थी उस समय रशिक लगता था और उसमें नीच का चन्द्रमा बैठा है । निश्चित रूप से वह लडकी कुछ नीचे के चंगुल में फंस गई है पर लग्नेश मंगल है जो ग्यारहवें भाव में सूर्य के साथ बैठा है इसलिए उसके जीवन पर आज नहीं आनी चाहिए । हजार खत्म होंगे पर सब चलते जाएंगे । फिर कुछ गंभीर होते हुए सोचते हुए बोला उसका सुखेश शनि है जो सिस्टम में बैठा है । निश्चित रूप से वह आजकल बडे कष्ट में हैं और यही कष्ट उसके जीवन की धारा को मोड देगा । जिस कष्ट से छुटकारा पाने का कोई उपाय चाचा बॉल पढा, मैं तो माँ ही बता सकती हैं बागवानी एक बार फिर प्रतिमा की ओर देखा । माँ की आराधना के अतिरिक्त कोई दूसरा उपाय नहीं जो कुछ संसार में होता है । सब माँ की कृपा से होता है और माँ सबके ऊपर दया करती है । मनुष्य तो अपने कर्मों का फल रोकता है । फॅार्म ऐसा है महाराज जो मुझे इतनी बडी सजा मिली है । चाचा की आवाज पडने लगी उसकी आंखें नम हो गईं । मनुष्य को इसी जन्म का नहीं पूर्वजन्म का विफल रोकना पडता है क्योंकि कर्मों की डोर तो जन्मजन्मांतर से बंधी रहती है । बाबा गंभीर हुए, कुछ समय तक मान रिस्ता रहा आखिर उसके लौटने का भी तो कोई जो है चाचा की ऍम गिराहों के अनुसार तो नहीं चाहता हूँ सकते हुए बाबा के चरणों में घायल का बहुत की तरह के बडा माँ को तो जैसे काठ मार गया था उनकी स्थिति दृष्टि काली प्रतिमा की ओर लपलपाती जी और खबर बढ नहीं हो कब राव नहीं माँ के चरणों में आए हो तो स्वयं को माँ को ही अर्पितकर तो वही तुम्हारी बेटी का मंगल करेंगे । चाचा ने सर उठाया दोनों हाथ ऊपर करते हुए मैं कुछ बताया और फिर प्रतिमा के चरणों पर डोला क्या चाचा चर्च चलने का हुआ तो बाबा ने फिर से उसे संतोष दिलाया हूँ । घबराना नहीं । तुम्हारी बेटी किसी के मारे नहीं मरेगी और हो सकता है मकर संक्रांति के बाद उसका समाचार भी मिले । तब से चाचा भीतर ही भीतर से लगता रहता है । अपना ही उसकी आंखों से लावा पिघल कर बैठा है और ना उसकी वहाँ से धुआँ निकलता दिखाई देता है । देदिया बाकि और सन्नाटे बडे रेगिस्तान के नीचे एक ज्वालामुखी को दवाई रहता है । वक्त उस पर हरियाली नहीं होगा सकता । बाहर से वो बंद कर गए । घाव भी डर नासूर होता गया । अब चाचा चटाई पर पडता रहा हूँ । दुकान पर सुबह शाम थोडा बहुत बैठा हूँ । दोपहर में भी आ जाता हूँ । जब कोई नहीं रहता तो चार जी दो एक जरूरी ग्राहक निपटा देती अन्यथा दुकान बंद रहती । चौबीस घंटों में सोलह घंटे खुली रहने वाली दुकान के जब दोनों पल्ले बंद रहते तब ऐसा लगता कि चाचा के व्यक्तित्व का सन्नाटा उस पर आकर चिपक गया है । बात करना तो दूर अब चाचा किसी के सामने जाना भी पसंद नहीं करता हूँ । यदि कोई उससे बातें करता तो उसके मौन से टकराकर शब्द छोड चूर हो गए । घर जाते हैं उसका प्रतिक्रिया । शून्य व्यक्तित्व केवल जम तो का नाम सुनते ही बडबडाने लगता हूँ । कभी भी अपने बाल नोचते हूँ पर कभी हॅूं । उसकी इस स्थिति से परिचित व्यक्ति अब उसके सामने चल तो का नाम तक नहीं लेता हूँ । चाची इतनी असामान्य नहीं थी तो उसे भी था । चल तो की बात चलती ही । वैभवी रोने लगती । पर शीघ्र ही चाचा की सुधि आते ही वहाँ से पूछ लेती । वे अपनी परेशानी से चाचा के परेशानी को और बढाना नहीं चाहती । भीतर ही भीतर घुटती और आंसू पीती रहती । चाचा के समक्ष जब बातें चली जाती तब बडे अनासक्त भाव से कहती ऍम हो गया हो गया । मेरी बेटी जहां भी होगी, प्रसन्न होगी । गंदा बाबा ने कहा है ना महाकाली उसका कल्याण करेंगे । लोग कहते हैं उस बाबा की बात कभी छुट्टी नहीं होती । हादिया थी उसकी सारी नाटकीयता चाचा को बहलाए रहने के लिए थी, वो हूँ । एक दिन एक विचित्र घटना घटी । स्कूल में किसी अध्यापक के पिता का देहांत हो गया । परंपरानुसार शोक सभा के बाद छुट्टी हो गई । मैं चाचा की दुकान पर आ गया था । पी पा पहले से बैठा जोर जोर से सुखसागर पड रहा था तो मैं सुना तो रहा था चाचा को । पर चाचा जून ने मान सकता चटाई पर पडा था और उसकी आंखे दुकान की छत की ओर लगी थी । दी शायद सुखसागर का एक बूंद भी वैगरह नहीं कर पा रहा था । पर पीपा बढता जा रहा था । दुकान पर बैठा बैठा मैं दो एक ग्राहकों को निपटा भी रखा था हूँ । उसके बाद अचानक राधा आदम की मैं साफ नहीं है क्या बोली बता नहीं मैं कोई सौदा लेने आई थी या ऐसे कुछ कहने पर उसकी आवाज सुनते ही चाचा के शरीर में भूकम्प आ गया । वे हडबडाकर उठ बैठा हूँ आप जी है साहब है साहब जी हैं बोल कमी नहीं क्या चाहती है हम जाती जुडे ऍम जांचा आवेश में ही कैसी गाली बहुत से निकले, लगा ज्यादा हक्का बक्का थी मुझे आखिर कौन सी गलती हो गई जो आप इतने पीले हुए जा रहे हैं कहीं कहीं की अभी गलती पूछ लिया । इतना कहते कहते चाचा ने तराजू ऊपर से उठाकर एक पहुॅचकर माडॅल राधा के सिर कुछ होता हुआ निकाल दिया तो फिर भी मैं अपने सिर पर हाथ रखकर जो चिल्लाती हुई सामने चबूतरे पर भागी चाचा करोड से कहा कहा था उसने दूसरा बट खराब भी मारने के लिए उठाया । इसपर पी पाने, उस कहाँ पगडंडियाँ और उसे शांत करने की कोशिश की । पर मैं काम आने वाला था और उसमें एक भीषण आवेग जन्म ले चुका था । उसने पी पा को एक झटका दिया और दुकान से कूदकर गली में आ गया । वहाँ डालूंगा तुझे साली । वो गाली देता हुआ राधा की ओर झपटा हूँ । पी पा के साथ मैं भी उसे पकडने के लिए । साथ ही दुकान से खुदा और देखते देखते बी पाने उसकी कमर में धान डाल कारों से बेकाबू कर दिया । फिर भी वह बंदे हुए कृत साढे की तरह फुफकारता और थोडा घर निकलने के लिए की ओर मारता रहा हूँ । उधर राधा भी हटने वाली नहीं थी । भरन रोती हुई सहायता के लिए गुहार लगा रही थीं तो थोडी देर बाद अच्छी खासी भी लग कहीं कुछ लोग चाचा को शांत करने में लगे पर उस पर तो भूत सवार था हैं । नहीं नहीं, ऐसे आवेग में उसे कभी नहीं देखा था । पसीने से लथपथ झूठ कर भागने के लिए तैयार । पता नहीं क्या क्या बकता जा रहा था । उसकी आवाज भी धीरे धीरे अस्पष्ट होती गई और जो कुछ सुनाई पड रहा था उसमें तारतम् में भी नहीं था । उधर लोग राधा को समझाने में लगे थे । मार ही दिया तो क्या हो गया है तुम्हारी बात की उम्र का है । जब से चल तो गए । बेचारे का दिमाग ठीक नहीं है । नहीं तो सुबह साहब ऐसा नहीं था । ऐसा संजीता आदमी और क्या हो गया? उस बेचारी को राधा को समझा । वो जाकर लोगों ने विदा किया और उनकी मदद से पीपा चाचा को दुकान में ले आया और फिर चटाई । पर डोला क्या पी पा भी नष्ट हो चुका था । चाचा चटाई पर पडा हमेशा की तरह पहले गुमसुम हुआ । फिर उसकी जोर जोर से से चलने लगी । ॅ क्या हुआ? जांची दौडी हुई आई चाचा बेहोश हो चुका था । मेरे अतिरिक्त किसी ने नहीं समझा कि राधा को देखते ही चाचा इतना उबल के पडा था । पर मैं कुछ बताने की स्थिति में नहीं था । चाहिए काम खबर आ गई थी । मैं लोटे में भरकर पानी ले आई । इस सर्दी में पानी मच्छी को तो ये अभी होश में आ जाते । तीफा बोला ये सदमे का दौरा ॅ नहीं बताया । जब सजवाण दिल की गहराइयों में डूब जाता है तब ऐसे ही दौरे पडते हैं जाजी पंखा झलती रही । धीरे धीरे उसकी सांसे सामान्य हुई और थोडी देर बाद उसने पानी मांगा हूँ । चाची पानी काॅपी पानी पूछा वो जिंदा हूँ । छोटा सा उत्तर देकर रहे फिर गुमसुम हो गया । बोस की पूर्णिमा और मेरे से बडा ही विशाल नाम से ही बूंदाबांदी हो रही हैं । आधी राज के बाद ग्रहण लगेगा । इस समय सात आठ बच्चे होंगे पर भीड अभी से छपी जा रही थी तो एक दूसरे का हाथ पकडे थे । हाथियों का झुंड का झंड धो भगवान का नाम नेता हुआ । चौकसे गौदोलिया की ओर बढता चला रहा था । करीब पांच छह घंटे बाद चंद्रदेव पर विपक्ष पडने वाली हैं । इन भोले भाले ग्रामीणों की प्रार्थना का संवेद स्वर उस विपक्ष है । उन्हें आवश्यक मुक्त करा रहेगा ये आस्था इन्हें पता नहीं कितनी दूर से खींच लाई है । विश्वास भले ही अंदर हो है लगाना नहीं होता हूँ उसे अपने लक्ष्य पर उसके चरण बडी शीघ्रता से पढते हैं वो स्नानार्थियों को देखने से तो ऐसा ही लगता है । काट काटता जाडा हैं । पूर्वनिश्चित योजना के अनुसार सेवा समिति की ओर से जगह जगह अलाव जला दिए गए हैं । शिविरों का क्रम रेलवे स्टेशन से ही आरंभ हो जाता है । सबसे बडा शिविर टाउन हॉल के मैदान में लगा है जिसके चारों और तंबू से लटकते हुए बडे बडे बैनर लगे हैं जिन पर लिखा है लाला जगजीवन लाल के सौजन्य से उन पर बिजली की इतनी रोशनी पड रही है जितनी शिविर के भीतर नहीं है और सेवा समिति का नाम वो तो लाला के नाम के नीचे क्या है? या तो हम कार्यकर्ताओं की बाहों पर बंधी पट्टियों पर चिपक गया है और जाने भीड में डूबती उतराती चंपुओं दिखाई पड जाए । इस मरीचिका के पीछे दौडती हुई माँ भी चली आई थी और सेवा समिति की सेविकाओं में अपना नाम लिखवा दिया था । लाचारी आदमी से क्या नहीं करा देती जो माँ भीड में चलने से घबराती थी उन्होंने भीड को संभालने का रख लिया पर उनकी आंखें भीड टटोल दी जा रही थी किसी सेवा की भावना से नहीं मैं आपको के लिए दृष्टि का ही कर्म कहीं तो कहीं संकल्प कहीं गौदौलिया के पास । भारत सुंदरी धर्मशाला में लगे शिविर में माणिक जी ने मुझे नियुक्त किया था । यह काफी बडा शिविर था । इसमें महिलाओं के लिए अलग अलग व्यवस्था थी जिसकी देखभाल में मेरी माँ लगा दी । कहीं वहाँ दो तीन बंगाल इन और देवी थी । भूले भटकों के अतिरिक्त शिविर में घायलों की चिकित्सा की भी व्यवस्था थी । बगल के ही कक्ष में एक डॉक्टर वर्ष एड का बडा सा संदूक दो पडेंगे और मरहमपट्टी के लिए ऊंची लम्बी चौकी नहीं । इस शिविर में लाउडस्पीकर की भी व्यवस्था नहीं क्योंकि भीड का सबसे अधिक जमाब इस धर्मशाला के बाहर की सडक पर था । इसके दस कदम के बाद ही दशाश्वमेध जाने वाली सडक पांच और बल्लियों से दो भागों में विभाजित कर दी । कहीं नहीं एक रास्ता आने वालों के लिए था और दूसरा जाने वालों के लिए भटके लोगों का नाम पता बताकर उनके घर वालों को लाउड स्पीकर पर बुलाया जाता था हूँ । ये भी जिंदगी का एक अजीब अनुभव था । अनेक ऐसे थे जो अपना घर पता भी नहीं बताता रहे थे । एक बुढिया थी जिसने बताया कि हम यहाँ आये ढाई ली चली आवत रहेली कि गांव के लोग बदल गए । लाॅ गश्त हुआ दिए कि किसी तरह उसके गोयल के लोगों से उसका ना छूट गया । तुरंत उसने दूसरा हाथ पकडा । फिर पता चला की है उसके गोल के लोग नहीं । उसने उससे पूछा गया कहाँ हिलाओ ऍम के साथ विचित्र थी वे बढियां जहाँ लोग उसके बाद पर हस रहे थे । वहीं मैं चुप चाप बैठी । बडे निर्विकार धार से आप रही थी वो थोडी देर बाद जब एक औरत आई उम्र यही पच्चीस छब्बीस वर्ष की गौर वर्ण और खूबसूरत होती नहीं पर शरीर यष्टि माँ चलता से भरा हुआ हूँ । यौवन का उभार फटी पुरानी सवाल के भीतर से अपनी ऍम थापित करता हुआ हूँ तो उस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया । कुछ देर बाद हम लोगों की दसवी उधर कहीं वॅाक पकाई नजरों से हम सबको देख रही थी । मेरे एक मित्र नहीं उससे पूछा हूँ, आप क्यों बैठी है तो कहीं नहीं उधर बैठा हूँ । हम आवाज आई । पूछते ही वह सहम गई और जवाब देते हुए भी उसको चाहिए हुई बॅाल । इस पर वह कुछ बोलना सकी । घबराहट में सिर पर से गिरे घूंघट को ठीक करती हुई हॉल में स्वयं को और अधिक पानी की चेष्टा की । माँ को कुछ शंका हुई ना इसके माथे पर बिंदी है और ना मांग में सिंदूर जरूरी है । दवा है फिर भी है । लाने वाले का नाम पूछने पर है । उन्होंने का संबोधन क्यों कर रही है । ऐसा तो सरवाही अपने पति के लिए करती है । दाल में कुछ काला जरूर है । हाउस के निकट आई और उसे टटोलना शुरू किया । फिर धीरे से उसे एक कोने में ले गईं । उससे बडी देर तक बातें करती रही । बाद में उसी बेंच पर माने बैठा दिया जब उसकी आंखें भर आई थी । फिर भी मैं चुप थी तो नहीं तुम की जगह आ गई हूँ । तुम्हारा कल्याण होगा और लोगों की भी दृष्टि उस पर पडी हूँ । अधिकांश नहीं जिज्ञासा की पर माने । सबको यह कहकर डाल दिया की कोई बात नहीं है । विचारी भटक गए है । घबरा रही धो थोडी देर बाद माने मुझे कह घर चाहे मंगवाई । धर्मशाला के भीतर चाय की व्यवस्था हम स्वयंसेवकों के लिए थी । मैंने भी सोचा मान स्वयं देना चाहती हैं किंतु जब उन्होंने पूर्व मुझ से लेकर उस औरत केवल बढाया तब मुझे आश्चर्य तो नहीं हुआ तो हाल अवश्य हुआ । पहले लेनी रही थीं लेकर पी लो अब नहीं आएगा माँ बोलूँ उसने पूर्वा लेटो लिया पर अब वैसे रखने लगी थी यारों ने फिर जिज्ञासा व्यक्त की क्या बात है, कोई विशेष बात नहीं है । बेचारी घबरा गई है । ये क्या आशाओं की भीड को माने । फिर एक बार पीछे धकेला समय सरकता गया । भीड घनी होती गई । बूढे तो हो चुकी थी पर आकाश अब भी बादलों से ढका था हूँ । शीत का प्रकोप पडता चला जा रहा था । लोग यहाँ इस बदली को कोस रहे थे । वहीं हाँ संतुष्ट थी क्योंकि मेरी राशि वाली के लिए ग्रहण देखना वर्जन था पर मैं देखने से कहाँ बात जाने वाला था । मैं अपनी प्रकृति से लाचार था । जब मेरी ही घेरे रहेंगे तब ना चन्द्र का पता रहेगा और ना ग्रहण का न बात रहेगा और ना भाषा नहीं बचेगी । केवल एक मेरे शिव के लिए लोगों को कष्ट मिले तो सोचता हूँ माँ का वह फैलने हैं । ये धापी स्वार्थी नहीं था फिर भी बढा संकुचित था । जब भी भीड में कोई लडकी चंपू जैसी दिखाई देती मेरी आंखें उसके पीछे दौड थी और जो की तरह से पक जाती है किंतु आशा रखता के अभाव की अनुभूति होते ही है जो आप उदास हो क्यों से छोड देती हूँ । यही स्थिति माँ की भी थी । शिविर में उस भारत को बैठाकर माँ धर्मशाला की चाहरदीवारी के पास एक स्कूल पर खडी हो गई । रात के उस मध्यम प्रकाश के घंटों उनकी आंखे पता नहीं कितने चेहरों का स्पर्श करती रहीं हूँ । अचानक ठीक पडी जैसे उन्होंने अभी सिर्फ पीलिया हो मैं तोडकर स्कूल के कोने पर चढ गया हूँ । देखो तो उसने गौदोलिया चौराहा है की ओर संकेत क्या सचमुच चंपू जैसी एक लडकी दिखाई थी साडी भी उस की वैसे ही थी और चाल भी बिल्कुल चंपुओं से मिलती जुलती हूँ मैं आपका पर भीड को चीरकर उस तक पहुंचना कोई हँसी खेल नहीं था । कुछ समय तक तो वह दिखाई देती रही । बाद में एक रेला आया और हो गई अब क्या करूँ काम तो काम तो अरे वो चल तो होता हुआ आगे बढता जा रहा था भरे कहाँ है हम तो एक गृहस्ती आवाज ने मुझे पकडिया मैंने बगल में मोडकर देखा रेड इसी के पुल पर पीपल के बगल की चाय की बडी दुकान पर खडा लाला मुस्कुरा रहा ऍम कपडे का बना रंगीन भूल सा सेवा समिति का बडा बैज अपनी शेरवानी पर लगाया था । उसके साथ ही एक डर होगा और पुलिस के कुछ जवान भी भीड और व्यवस्था का निरीक्षण कर रहे थे तो मैंने उसे बताया कि लगता है चल तो भीड में आ गई है तो मैं फिर हस पडा । उसने तुरंत अपने को संभाला और डर होगा जिसे बोला था ये बडा होनहार लडका है । इसकी बहन हो गयी है तो सके तो आप थोडी मदद करते हैं । पुलिस का एक जवान मेरी सहायता के लिए लगा दिया गया । मैं चिल्लाता आगे बढा और लडकी की खोज में निकला हूँ । पर दुर्भाग्य मेरी मनोस्थिति ने फिर मेरे साथ धोखा दिया । ऍम को नहीं नहीं ॅ लाला मुझे वहीं से तस्वीर खा रहा । लौटते ही बोल पडा मेले ऍम कुछ नहीं कर पाया क्योंकि अब मैं उसकी हाथ का अर्थ समझने लगा था । मैं कुछ कहूँ यहाँ क्या आगे बढ गया हूँ । इसके पहले ही उसने मेरे हाथ पर बंदे सेवा समिति के बैच की ओर संगीत कर रहा था है तुम भी स्वयंसेवा खो किस काॅपर ड्यूटी है तो हर सुंदरी धर्मशाला में गर्ड उसकी नाटकीयता ने नया मोड लिया तो अपने मोहल्ले से अकेले हो या कोई और भी है, माँ भी आई हैं आप ही गंगा नहाने तो आई ही होंगी नहीं स्वयंसेविका बनकर आई हैं हमसे रिका बनकर बच्चा कितना हो गया तो मैंने उन्हें क्योंकि स्थितियां यह बडे झमेले का काम है । चलो अच्छा है मैं आता हूँ प्रतीक्षा करती माँ को जब हम तो के ना मिलने की सूचना मिली तब उनकी आशा की बांध की सीढी चरमराकर टूट गई और हमसे धरती पर गिर गई । कुछ देर तक सोती रही, फिर है शिविर में बैठाई गई और उस भारत के पास चली आई तो मैं भी कष्ट हो रहा हो तो मैं तो मैं इसी बेंच पर उधर मो करके लेता जाऊँ । कुछ तो नहीं बोली किंतु एक स्वयंसेवक ने पूछा हूँ क्या ग्रहण नहाने नहीं जाएंगे? नहीं की तबियत खराब है । डॉक्टर को दिखा दीजिए, दिखाया जाएगा ना डॉक्टर को तुम अपना काम करो । महाने उसे झिडक दिया हूँ ही चला गया । मेरी भी जिज्ञासा जोर मार रही थी । पर लोगों को झडते देखकर मार्च से कुछ पूछने का साहस नहीं हुआ । दूसरे ही दिन माँ उसके बारे में चाची को बता रही थी कि वह विधवा थी और उसने चार महीने का था तो मैं उसके पट्टी नारी के भाई से ही ठहर गया था । जब घर में कानाफूसी होने लगी तब उसी पट्टीदारी के भाई ने पेट गिराने के बहाने एक दूसरे आदमी के साथ उसे बनाना भेज दिया । आदमी बडी होशियारी से उस शिविर में बैठाकर चला गया हूँ । घर से कोई और नहीं आया था । चाची ने पूछा । उसने बताया था कि माँ, चाचा जी आदि भी ग्रहण नहाने आने वाली थी । माँ बोली आई भी होंगी और घर जाकर कह देंगे । ग्रहण में कहीं है राय गयी सच मुझे थोडी देर बाद नाला पुलिस और अपने साथियों के साथ आ गया । वो वहाँ से बडे प्रेम से मिला ऍम तो कम मुआयना किया । जो स्वयंसेवक माँ है उस औरत के बारे में घोल विनोद कर रहा था । उसी ने लाला के खान में कुछ कहा लाला उस औरत के पास गया घबराओ मैं तुम्हारी व्यवस्था कर दी जाती है । उससे बडे प्रेम से बोला जहाँ में फंसी हिरणी की भर्ती भी बडे निर्वीर्य भाव से आपने शिकारी को देखती रही । ये तो पुलिस केस है, इसको पुलिस को ही देना होगा । माने कितना साहस बटोरकर लाला से कहा हूँ चालाने एक गंभीर दृष्टि माँ की ओर डाली है तब तक और बडी व्यग्रता से ठीक होती थी । नहीं ना, ये पुलिस के नहीं तो नहीं नहीं तो पुलिस क्या नहीं भेजा जाएगा । तो तुम्हारी ऐसी व्यवस्था कर दी जाएगी कि तुम खुश हो जाओगी । लाना बोलते हुए मुस्कुराते हुए माँ की ओर देखता है । उसकी मुस्कुराहट में विजयी मानसिकता का एक ठीक था अहम था । शीघ्र ही लाला ने फिर अपनी मुद्रा बदली और माँ से बोला आप जैसी संभ्रांत महिलाओं के लिए ये काम नहीं है । जब तू बेकार ही आपको इस मेले में ले आया । फिर उन्होंने पुलिस की एक जवान से माँ की ओर संकेत करते हुए का देखो बहुत जी को जरा आराम से स्नान कराने की व्यवस्था करा देना । ठीके बाबू जी पुलिस का जवान बोला । फिर लाला ने तीन चार स्वयंसेवकों से कुछ बात की । उधर लाला गया और इधर स्वयंसेवक उस औरत को ले चलेंगे । अब हमें भान हुआ कि लाला के आदमी स्वयंसेवकों में आधे से अधिक हैं । माउस औरत का धीरे धीरे सहमते हुए जाना देखती रह गई । मैंने माँ को इतना असहाय और लाचार इसके पहले कभी नहीं देखा था । जांची से मैंने बताया था की स्थिति में मुझे जरा भी आवाज नहीं था वरना मैं उसे विश्वास ना दिला दी कि तुम्हारा कल्याण होगा और हो गया उसका कल्याण हो । ये घटना मेरी माँ को गंभीर रूप से सालती रही । बाद में रानी बहुत से भी उन्होंने इसकी चर्चा की । उन्हें अखबार कष्ट हुआ । उन्होंने बडे आवेश में मेरी माँ से कहा था क्या कहूँ तुम सब जानती हूँ जी जी, मेरी पारिवारिक स्थिति यदि मेरे अनुकूल होती तो मैं मैदान में कोर्ट पर थी । सामाजिक स्थिति की मैं बिल्कुल हाँ पर्वा करती । जो होता उसे देख लेती पर अपने विचारों से लाचार हूँ । मेरे हाथ पैर बंदे हैं सुना है । इसी संदर्भ में रानी बहु ने गांधी जी को भी एक लंबा पत्र लिखा था । जब उसका जवाब आया था तब उन्होंने माँ को दिखाते हुए कहा था कि बाहर महादेव देसाई के निधन से गांधी जी भी शारीरिक दृष्टि से टूट चुके हैं । बेचारे आजकल बीमार है इसलिए सरकार ने उन्हें रिहा कर दिया है । पर मानसिक दृढता ने जरा भी कमी नहीं की है । उन्होंने लिखा बहुत कमी है पर है बडा मार्मिक प्रिया बेटी तुम्हारा पत्र मिला, तुम्हारी समस्याओं को जाना । सत्य के लिए लडने वालों के सामने ऐसी समस्याएँ तो आती रहती है । मीरा के सामने भी आई थी पर धैर्य रखूँ, समय की प्रतीक्षा करूँ । अंग्रेजों के भारत से चले जाने के बाद इन सामाजिक बुराइयों से ही हमें लडना रह जाएगा । तब हम सब एकजुट होकर लडेंगे । बापू के आशीर्वाद तुम्हारा मोहन दास कर्मचंद का नहीं । उस दिन माँ बहुत देर तक भीड का रैली देखती रहीं हूँ । अब कुछ ही गाडी में ग्रहण लगने वाला है । कैंप में भूले भटकों की संख्या बढने लगी थी तो बोला हाल बढता जा रहा था । लाउडस्पीकर वार घोषणाएं भी लगातार हो रही थी पता नहीं क्या सोचकर मांग हर सुंदरी धर्मशाला के भीतर चली गई और जहाँ स्वयंसेवकों के लिए चाय बन रही थी, वहीं बेंच पर बैठ भी नहीं हूँ । मैंने पूछा क्या बात है? हाँ तबियत घबरा रही है फॅमिली पर हाथ का वह कुछ समय तक बैठी रही हूँ । किसी भी माणिक जी आ गया हूँ, शायद है चाय पीने आए थे । माँ को ऐसे बैठे देख कर बोल पडे क्या बात है । तबियत घबरा रही हैं । मैंने कहा रखता है सीट लगता है डॉक्टर साहब से कहूँ वाणिक जी के बोलते ही माने से उठाकर उनकी ओर देखा हूँ । क्या ज्यादा तबियत खबरे आ रही है? वाणिक जी ने पूछा नहीं माँ बोली सोचती होगी हम लोग बोले भटकों को रास्ता दिखाने के लिए यहाँ ये रास्ते से भटकाने के लिए क्या बात है? मानी जी को समझ नहीं पाए । माँ भी चुप हो चुकी नहीं । उनकी शालीनता ने उनके मुंह पर हाथ धर दिया था । इसी बीच बाहर जोर का बोला हाल हुआ हूँ । अरे बेहोश हो गया है, एक आवास नहीं । साथ ही उसका पीछा करती हुई दूसरी आज भी आई । अरे नाटक कर रहा है मारो साले को हम समझते देर नहीं लगी कि कोई बार जरूर हो गई है । बाहर आने पर पता चला कि किसी व्यक्ति को चिकित्सा कक्ष में ले जाया गया है । माणिक ही उधर लडके पर हम धर्मशाला के बरामदे में ही खडे रहे । क्या हो गया भाई? मैंने एक स्वयंसेवक से पूछा सुना है लाला जी को एक आदमी ने कुछ बुरा भला कह दिया । अब उसके बाद पूरी भी नहीं हो पाई थी कि दूसरा बोल पडा और पूरा वाला कहते हो । साला गाली दे रहा था । काली पुलिस ने एक हाथ दिखा दिया की जमीन चुम्मे लगा, यह तो होगी । लाला ने बचा लिया वरना बच्चों को गोलियां देने का पूरा मजा मिल जाता । पुलिस के ही एक आज से वह बेहोश हो गया । पहले स्वयं सेवक ने शंका कि साला नाटक करता है । दूसरा बोला ज्यादा देता है, देता उस ने बचा लिया नहीं तो कचूमर निकाल जाता हूँ । पहले अचानक क्या क्या बकने लगता साल फिर गालियों की बौछार लगती हैं, जैसे दौरा पड गया हूँ । दौरा शब्द सुनते ही माँ को बिजली का करंट हो गया । मैं एकदम चिकित्सा कक्ष की और बडी भीतर पहुंचते ही देखा । सुमेर चाचा स्टेशन पर बेहोश पडा है तो कोई उसकी नाक दबा रहा है । कोई जूता समझा रहा है । कुछ मत कीजिए, आप लोग कृपाकर यहाँ से ही चाहिए । माँ की आवाज इतनी तेज भी की लोग हटने बढने लगे ना आप स्वयं स्ट्रक्चर उठाने लगेंगे । ये देखते ही वहाँ खडे स्वयंसेवकों ने हाथ लगाया और चाचा को उसी लम्बी चौकी पर लिटा दिया । तब तक लाउड स्पीकर पर घोषणा दोहराई जा चुकी थी । एक बेहोश आज भी उठा कर लाया गया है । यदि उसके साथ का कोई हो तो हर सुंदरी धर्मशाला में चला जाएगा । घोषणा बंद करा दीजिए और कहीं है कि उनके साथ की आदमी आ गए । मैंने एक वरिष्ठ स्वयंसेवक से कहा । पहले तो उसने चार ओवर देखा तो नहीं आई । आज भी तो नहीं दिखाई दे रहा है । क्या सचमुच कोई आया है? उसने प्रश्न किया यहाँ आया ये आप मेरा विश्वास कीजिए और घोषणा बंद कराइए । आप कुछ मत कीजिए डॉक्टर साहब, मरीज अभी ठीक हो जाएगा । माँ बोली डॉक्टर चुपचाप पीछे हट गया और उसकी दृष्टि मरीज पर ही थी । गरीब आधे घंटे बाद चाचा की तेज चलती सांस सामान्य होने लगी और कुछ दिनों बाद मैं बोल पडा ग्रहण लग गया । नहीं अभी लगने वाला है । वहां बोली नहीं लगी आए । जग्गू की माँ राहु ने चंद्रमा को ग्रस लिया है । अब कभी मौका नहीं होगा । आपको चंद्रमा को कभी नहीं छोडेगा । कभी नहीं । चाचा बढ बनाता रहा । माँ की गंभीर मुद्रा उसे देखती रहीं । पीछे से एक स्वयंसेवक बुदबुदाया ॅ चंद्रमा तो कभी नहीं छोडेगा । मैं कह रहा था ना कि पागल है । सूखी डाल पर ठहरे घोसले की तरह । अब सुमीर चाचा लोगों के लिए दर्शनीय हो गया था । बहुत लोगों से देखने और साफ बना देने आते थे । चाचा सब की सुनता और पडा रहता था । उस की मानसिकता धारा में बडे एक लट्ठे जैसी थी । जो थपेडे खाता होगा । बेहतर रहता था । चाचा भी समय के प्रवाह में महज बह रहा था । कोई प्रतिरोध नहीं, कोई प्रतिक्रिया नहीं और दुकान उसी धारा में पत्र बाहर ही नाम हो गई थी । कभी खुलती कभी बंद रहे थे । फिर दुकान खोलने भर की होती तो समस्या ही नहीं थीं । मेल जुटाए तो कौन जुटाई विश्वेश्वरगंज और दो अलादीन अनाज से कौन सामान लाएगी? पडता कौन मिठाई ऍम बांधे भी है सब क्या भी जाए तो किसके लिए एक विचित्र रिटर्न ना से चाची का मन बैठ चुका था । फिर भी वह बंधे बंधाए ग्राहकों को छोडना नहीं चाहती थी । ऐसे अधिकांश ग्राहक उधार के थे छोडने से रुपया डूब जाने का भाई था । जब मैं चाचा के पास रहता या दोपहर को दीपा जाता, चाचा सुखसागर का रामायण सुनने लगते हैं तो बच्चा जी दूसरे तीसरे बाजार जाती, सामान लाती वो भी महज दुकान को जिंदा रखने के लिए । एक बार लगभग निश्चित हो गई थी कि आप चाचा को अकेला नहीं छोडना चाहिए । पता नहीं कब दौरा पड जाए । क्या स्थिति हूँ । एक विचित्र और बात हैं । चाचा को देखने जितने लोग आते थे । जांच जी को एक घंटे में ले जाकर कोई ना कोई सलाह अवश्य देते । कोई कहता किसी डॉक्टर को देखा हूँ इस तरह कब तक पडे रहेंगे । कोई कहता कि सोडिया के बैठ जी के पास दिल और दिमाग की अच्छी दवाएं किसी को कुछ नहीं सोचता तो मगज पर चढी गर्मी के लिए ठंडा तेल रखने की सलाह देता हूँ । एक दिन शाम को स्कूल से छोटे ही माणिक जी भी आये थे । मैंने स्कूल में ही सारी इशारे से उनसे कहा था । चाचा को देखने के बाद उनका निष्कर्ष था कि सच में की कोई दवा नहीं होती । धीरे धीरे समय ही इस गांव को भरता जाएगा । उस दिन में माणिक जी को अपने घर लाकर लाला के संदर्भ में कुछ विशेष बातें करना चाहता था । पर लगा कि वो बहुत जल्दी में भट्ठा नहीं है । जल्दी में थे । आइस परिस्थिति का अनुमान लगाकर उसे झेलने से कतरा रहे थे । उनके चलते चलते वहाँ भी आ रही थीं । उन्होंने तो यहां तक कहा कि एक दिन में आपसे कुछ बातें करना चाहती हूँ । अवश्य पर आज नहीं । किसी दूसरे दिन रखिए तो बडी नम्रता से बोले और तय हुआ कि वह अपने आने के पूर्व सूचना मेरे द्वारा माँ को भिजवा देंगे । जो जो समय बीतता गया क्षमता हो के न लौटने की धारणा लगभग निश्चित होती गईं । माँ और चाची दोनों की निराशा उस समय आंखों से उमर पडती शब्द दोनों एक कांड में मिलती थी । पर चाचा के सामने एक बनावटी मुस्कुराहट अपने दोनों होंठों पर चिपकाए रहती हैं । मुखौटे हमेशा दूसरों के लिए होते हैं, अपने लिए नहीं । यही कारण है कि मुखौटे लगाकर जीने वालों की जिंदगी जब अकेले होते हैं तो जेल हो जाती है । वो दिन में चाचा को अपनी आशावादी मुखौटों से सुला देने वाली मां रात रात पर जाती रह जाती है । मैं भी दिन में लोगों को संभालना और रात को अपने आप को पर दूसरों को संभालने की उपेक्षा अपने को संभालना कठिन है । इसका अनुभव मुझे उसी समय हुआ था तो रात होती । हम तो मेरे साथ होती तो हस्ती खेलती चल तो युवती चढाती । चंपू प्यार से सराबोर चल तो सपने घरती हो मुझे मुझे आगे गीत करके चंदपुर युक्त हो जाती हूँ और रह जाते । वही पत्र है सपने जिन पर मैं सिर पटक के भीतर ही भीतर रोता । आज एकता पर उस सन्नाटे का कोई भी झंड मुझ पर तरस नहीं खाता । फिर दूरी दादी की तरह राज का तीसरा पहले उतरता और मुझे धमकियां देकर सुला देता था । इस बीच एक दिन मां पंचगंगा घाट के कनवा बाबा के यहाँ भी गई थीं । वहाँ पर उन्होंने चाचा की सारी स्थिति बताई हूँ । बडे दुखी हो । वहाँ की अनाज ना कर उन्होंने एक जगह कर दिया और कहा कि इसे सुन इयर के गले में पहना देना । इसका काला धागा कितना लंबा रखना कि उसके सीने पर जनता लडता रहे, इससे उसे जरूर शांति मिलेगी । इसके साथ ही सुबह शाम शहद के साथ चाटने की एक दवा भी उन्होंने दी और बताया कि चौबीसों घंटे बडे रहना उनके लिए ठीक नहीं है । दिन में एक दो बार अवश्य ही मैं घर के बाहर निकला करें । क्या लडकी का कोई समाचार अब तक नहीं आया । उन्होंने पूछा नहीं महाराज मकर संक्रांति भी बीत गई जैसी माँ की इच्छा बितना कहने के बाद बाबा मौन हो गए । उन्होंने बडे गौर से काली प्रतिमा की ओर देखा । जैसे देने की आंख से आंख मिला रहे हूँ बता रही थी उस समय उनकी आंखों से गजब की जो निकल रही थीं । फिर बाबा ने माँ से नारियल मांगा हूँ । माँ तो कुछ लेकर कहीं नहीं थी । उनकी असमर्थ था । लचित हो इससे पहले ही उन्होंने दर्जनहीं गांठकर कई धूंध रक्त माँ काली के चरणों पर चढा दिया । उसी रक्त को एक पत्ते पर उठाकर माँ को देखते हुए बोले इसे ले जाकर सुबह के मस्तक पर लगा देना । तब से माँ के मन में बाबा के बने चित्र की रेखाएं और गहरी हो गई थीं । बडी श्रद्धा और विश्वास से माने उनके गठन का अच्छा शाह पालन किया । इससे इतना लाभ तो हुआ कि चाचा को अब नहीं लाने लगी । वो दिन में भी खाना खाने के बाद एक आध झपकी ले लेता हूँ । अब मैं घर के बाहर भी नहीं करता हूँ किन्तु कोई न कोई उसके साथ जरूर होता हूँ । अधिकतर ये कार्य मुझे ही करना पडता कभी कंपनी बाद में टहलाता और कभी किसी मंदिर में ले जाता हूँ । दौडे की आशंका बराबर बनी रहती है और उस समय में एक विचित्र स्थिति में पड गया मैं जडेगी गलन भरी संध्या सिकुडती जा रही थी । चाचा मृत्यंजय का दर्शन कर हनुमान मंदिर की ओर बढने लगा था । वो मूर्ति के पास आते आते रह लगा बढाने तो अनुमानों, हनुमान ने तो सीता की खोज की थी । तुम चल तो कभी पता नहीं लगा सके । हनुमान ने रावण का अन्य नहीं खाया और तुम कैसे कैसे रात चीजों का भोग ग्रहण करते हो? या तो तुम नीच हो गए हो या स्वार्थी हो या पत्थर हो बैठा हूँ । मैं तो ठोकता हूँ । आप तो अच्छा लगातार मंदिर के सामने ठोकते रहे । अन्य लोग भी तमाशा देखने के लिए दौडाएं । मैंने दूर रहने का संकेत किया हूँ । भले थे मेरी बात मान गए । मैंने किसी तरह चाचा को वहीं बैठा दिया हूँ क्योंकि जानता था कि दौरे के आखिरी चरण में बेहोशी आती है और चाचा गिर पडे । उसके मस्तक पर पसीना चुप का आया था और वह बेहोश हो चुका था । दौरे के दरमियान छूटकर गिरे हुए मतलब को मैंने फिर गले में लपेटा, थोडी हुई चाहता ठीक की खबर पुजारीजी तक पहुंच चुकी थी । वो वे बेचारे दौडे हुए आए और एक कंबल चाचा के शरीर पर डाल दिया । इस बार का दौरा पिछले दौरों से हल्का था । अधिक बुक भी नहीं हुआ और जल्दी खोज भी आ गया । पुजारी जीने मांग कर मृत्युंजय का जल दिया । चाचा ने बडी श्रद्धांजलि ऍम अब तबियत कैसी है? पुजारी ही ने पूछा हूँ उसका सदा सदा या छोटा सा उत्तर था हूँ । इस घटना के दो ही तीन दिन बाद मैं संध्या को दुकान पर बैठा रोज के ग्राहकों को निपटा रहा था की महंगू का छोटा लडका एक लिफाफा ले आया हूँ । उस पर चाचा का नाम बता लिखा था । लिखावट देखते ही लगा कि रहस्य के जिस ज्वालामुखी पर बैठा हूँ, स्पोर्ट नहीं वाला है । मैंने उसे उलट पलट कर देखा । डाकखाने का कहीं कोई मुहर तो नहीं हूँ । ऍम थी मैंने उस लडके से पूछा हूँ । तब उसने बताया की गली के पास ही सडक पर एक आदमी मोटर से उतरा । उसने पूछा कि तुम सुमेर साफ को जानते हो, मैं यहाँ कहाँ? तब छुट्टी थमाकर बोला तुम इसे उन्हें दे देना और मोटर में बैठ कर फिर हो गया । चिट्ठी पर जंबो की लिखावट थी । अब कहाँ ग्राहक और कहाँ दुकान? मैं छलांग में भीतर आया हूँ और एक चंपुओं की चिट्ठी आई है । मैं ठीक उठाओ मैंने लिखा था पडा अब तक घर के तमाम लोगों से मैं गिर चुका था । स्वति श्री पत्री जो लिखा बाबू जी और माता जी को चरणस्पर्श पांच हूँ । आगे समाचार यह है कि मैं कुशल से हूँ, आपकी कुशलता भगवान से नहीं चाहती हूँ । अब मुझे किसी प्रकार का कष्ट नहीं है । आप बिलकुल मेरी चिंता मत करना । बस यही समझना कि मैं जहाँ भी हो ही हूँ और जिंदा हूँ । शायद जिंदगी में कभी मिलना भी हो इसके लिए जरूरी है कि हम लोग जिंदा रहेगी । जब उन को समझाते रहेगा आप की । हम तो पूरी चिट्ठी में इसका कहीं सुराग तक नहीं था कि वह कहा है की स्थिति में लिखी गई है । चिट्टी पढते ही चाचा रोने लगा, फूट फूटकर रोया हूँ वो तो सबकी आंखे भरी थी फिर भी हम चाचा का रोना देख रहे थे और संतोष का भाव अनुभव कर रहे थे कि इतने दिनों का गुवार छोडकर भेज रहा है । चाचा जरूर इससे हल्का हो जाएगा ।

Part 8

भाग यूरोप की आग बच चुकी थी पर पूर्व एशिया में रखी नीचे अभी युद्ध की चिंगारी सुगबुगा रहे थे । ब्रिटेन में शासन बदल गया । लेबर पार्टी की सरकार आई । भारत के प्रति उसका रो बदला हूँ । सोलह हो उन्नीस सौ सैंतालीस को कांग्रेस कार्य समिति के सदस्यों को रिहा कर दिया गया हूँ । इसी के बाद धीरे धीरे सत्याग्रह हूँ की रिहाई का क्रम भी जारी हुआ हूँ । आज बनारस सेंट्रल जेल से भी हमारे नेता जुटेंगे । जेल के फाटक पर ही उन्हें माला पहना है । जाने के निश्चय के साथ ही हमारे उत्साह की एक नई लहर का जन्म हुआ हूँ । कार्यक्रम दिनों में दस बजे का नाम हूँ किन्तु आठ बजे ही मैं घर से निकल पडा था हूँ । इसी के बाद धीरे धीरे और सत्याग्रहियों की रिहाई का क्रम भी जारी हुआ हूँ । आज बनारस सेंटर जेल से भी हमारे नेता छूटेंगे । जेल के फाटक पर ही उन्हें माला पहनाए जाने के निश्चय के साथ ही हमारे उत्साह की एक नई लहर का जन्म हुआ । कार्यक्रम दिन में दस बज जाएगा था किंतु आठ बजे ही मैं घर से निकल आया था । अभी गर्मियों की छुट्टियां चल रही थी तो फिर भी हम कॉलेज में काफी संख्या में इकट्ठा हो गए थे । जब भारत माता की जय बोलता और राष्ट्रीय गीत गाता हमारा जुलूस आगे बढा हो तब गलियों और सडकों की हजार हजार के कुछ ले और मुरझाई हुई राष्ट्रीय चेतना की नई धडकन का स्वागत करने के लिए खेलो टी सेंट्रल जेल के फाटक पर हजारों लोग इकट्ठा हो गए थे । धूप तिल चला रही थी । भीड नारे लगा रही थी । मैंने देखा अलाला भी अपने आदमियों के साथ वहाँ पर स्थित है । उसके पीछे एक नौकर फूलों की सुंदर महिलाओं से भरी एक टोकरी लिए खडा है । हम में से किसी की माला उतनी सुंदर नहीं है कितनी लाला की मेरा साथ ही बोला माला से क्या होता है यार भावना होनी चाहिए । भावना ये दूसरी आवाज बोली ऍफआईआर भावना कौन देखता इस भीड में किसी तीसरे ने कहा हूँ, कितनी मोटी माला होगी उतना मोटा मक्खन लगेगा । मैंने अनुभव किया कि मेरी नजरों में ही नहीं बल्कि अनेकों की नजरों में लाला मक्खन पर्पस चलती जिंदगी का प्रतीक बन चुका है । समय के साथ साथ भीड बढती जा रही थी और हमारी प्रतीक्षा की घुटन भी । तब तक मैंने देखा कि अव्यवस्थित, बडी दाढी और मुझे वो वाला एक व्यक्ति मेरे बगल से बडी तेजी से निकला और भीड को चीरता हुआ लाला के पास पहुंचा हूँ । उसने लाला के नौकर की डोलची ढीली उसमें से एक माला निकालकर बडे प्रेम से लाला को थमाई और शेष मालाएं भीड पर उछालने लगा आप वो आप इतनी मालाएं लगभग बीस पच्चीस रही होंगी । वो भी मोटे मोटे गजरे फेंकने वाला भी अजीब ऍम कर भीड के हर कोने पर उछल रहा था । अंत में एक माला उसने अपने लिए भी रख ली हूँ । किसी भी घटना की अप्रत्याशित ता बहुत विस्मय बन जाती है । लाला और उसके आदमी है । सब चकित हो देखते रह गए और जब होश में आया तब उस व्यक्ति का समूह विरोध आरंभ किया । पर व्यक्ति भी दबने वाला नहीं था । उसने अपने कुत्ते की बातें चढाई और लगा जोर जोर से बोलने भाइयों मैंने कोई गलती नहीं है । अब आजादी आने वाली है । कल हिन्दुस्तान में जो कुछ होने वाला है वही मैंने आज क्या है? जैसे आज मैंने मालाएं लेकर जनता में बांटी हैं । इन पूंजी पंथियों का पैसा लेकर जनता में बांटा जाएगा । इतना सुनते ही जोर से तालियां बाजू थी और एक सपना हमारे सामने होता दिखाई दिया । आवाज से मैंने पहचान लिया । ये तो दानिश है । पर ॅ एकदम बदल गई हैं । पहले से अब ये काफी दुबला भी हो गया है । वो बोलता जा रहा था दोस्तों आज हमारे नेता जेल से छूट रहे हैं । उन्हें पैसे वाले को माला पहनाने का जितना हक है उतना ही गरीब को भी क्योंकि आने वाले हिंदुस्तान में अमीर गरीब का फर्क नहीं होगा । आदमी आदमी के बीच कोई दीवार नहीं होगी और उस दीवार को मैंने अभी से तोडना आरंभ कर दिया । ऐसा था उसका वाक्य । इस बार भी तालियाँ बच्चे लाला पहुंचा का साथ धान इसको देखता ही रह गया । मैं बोले तो क्या? बोले और करें तो क्या करें? ऐसी मार्च खाएगा उस की उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी । थोडी देर बाद ही सेंट्रल जेल का पाटा खुला और हमारे नेता निकलकर बाहर आए । डॅान आगे बढा और शायद पहली माला उसने ही पहना ही कुछ लोग और बडे इसके पहले ही दान । इसने लाला का हाथ खींचकर आगे क्या और बडे नाटकीय ढंग से परिचय कराते हुए बोला आप लोग इनसे मिलिए आप ही है । लाला जगजीवन लाल शहर के मानेंद्र नहीं है और हर एक को माला पहनाकर गौरव प्रदान करने वाले महापुरुष दानिश के इस व्यंग्य पर भी खिलाओ नहीं । अगर लाला साहब जैसे लोग न होते तो आपके इन सूखे घंटों में इतनी मालाएं भी इतनी अच्छी कहाँ से आती? लाला जिन्दाबाद ये हादसे विस्फोट अविस्मरणीय था । जेल से छोटे नेताओं में अधिकांश खिलखिला पडे क्योंकि लाला को सभी जानते थे उन्हीं के मनो में सुरक्षित लाला के चित्रों पर और गहरी रेखाएं खींचकर धाने भाषिक कार्टून बना रहा था । लाला का हाथ खींचते हुए वे लौटा भी और धक्का देते हुए आगे निकलने को ही था की मुझे देखते ही झटका की आपत्ति मेरी करते हो जबकि मैंने कुछ किया नहीं था । वीर भी मैं मुझे अंड संड कहते हो । मैं था ॅ जानते नहीं हो या तुम्हारा दोस्त जगह हुआ है । फॅार्म मुझे धक्का देता है । लगता है पागल हो गया है । वस्तुतः मैंने उसे धक्का भी नहीं दिया था । जब वो जब से घूम है । बेचारा दिमागी संतुलन खो बैठा है । आॅल जब तो गुम हो गई । आप क्या कह रहे हैं लाला जी और आपके रहते गुम हो गई । जबकि शहर में एक पत्ता भी आपकी इच्छा के बिना नहीं मिलता । लाला तब रह गया जिस किसी के कहने की हिम्मत नहीं थी । दानिश ने खुले आम के दिया लाला एकदम निर्वसन होने की स्थिति में था । वो अपने को समेटा, आगे बढा फिर भी दानिश ने उसका पीछा नहीं छोडा । आज लाला के पीछे एक ऐसी छाया लग गई थी जिससे मैं सबसे अधिक घबराता था । नारे लगाते लोग आगे बडे रामकिशोर चाचा और चंद्र भी उसमें थे पर मैं वहीं खडा रहा हूँ । मेरी आंखे तो कुछ और ही खोज रही थी और मैंने उसे पाडलिया जेल की बनी और के फाटक से तैयारी आती दिखाई थी महिलाओं के नाम पर । बस अकेली पि ऍफ मेरे पास कोई महिला भी नहीं थी । हाँ पहनाई गई महिलाओं से कुछ फूल टूटकर धरती पर अवश्य बिखरे पडे थे । मैंने उन्हीं में से एक को उठा लिया और पहुंचते ही उसे थमाया तो कितनी खुशी हुई । सब कैसे बताऊँ? क्या चंपुआ आई । उसने मिलते ही पहला प्रश्न यही किया और मेरे नहीं कहने पर अत्यंत गंभीर हो गई । उसी पीडा भरे मौहन में डोभी में आगे बढे । थोडी देर बाद उसमें पूछा जी जी मेरी माँ नहीं आई हैं मेरा फिर नकारात्मक उत्तर था । जहाँ की देखी मैं जेल से निकलते ही उनका चरण स्पर्श करूँ । फिर उस की मुद्रा में कुछ परिवर्तन हुआ । उसने मेरे दोनों गायब तपाए मेरे दिए हुए फूल को बडे जोर से चोमा मुझे लगा जैसे मैं मुझे चुभ रही हो । हो सकता है उसने मेरी माँ के अद्रश्य चरणों को चूमा हूँ । हम लोग बातें करते आगे बढे । आज की दान इसकी हरकत बताई ऍप्स बडी परचम तो का संदर्भ आते ही पुना गंभीर हो गई । अब हम शिवपुर की सडकों पर पहुंच चुके थे । सडक के दोनों ओर खडे लोग हमें बडे गौर से देख रहे थे । बिहारी भी जेल से कुछ निखर कर ही निकली थी । श्वेत खादी की साडी में लिपटा उसका आकर्षक व्यक्तित्व मंदिर के दीप की तरह अलग अलग आ रहा था । कांग्रेस कमेटी की सारी सवारियां पुरुषों को लेकर चली गई थीं । हम किसी की खोज में थे की रानी बहु की बग्गी आती दिखाई दी । उन्होंने उतरते ही प्यारी को सीने से लगा लिया । पीआर इसे सब बडी आत्मीयता का अतिरेक आंखों से बहुत चला था । यानी बहु का अच्छा आलू से समेटता रहा । अब हम बात ही नहीं थे । सामने रानी बहु की बगल में प्यारी थी । यह पहला अवसर था जब हमने दोनों को सामान स्तर पर बैठे देखा था । कुछ दिनों पूर्व की दान इसकी आवाज मेरे कानों में गूंजने लगी । अवश्य दीवार गिरेगी और गरीब अमीर बराबर हो जाएंगे । सोचता हूँ आदमी ने अपनी पश्चिम हो कितना बुला रहा है कि आज ॅ उठी है । हिरोशिमा हो गया । नागासाकी चल रहा है । लडाई मर चुकी है । अमानुषिकता की बुझी हुई रात के नीचे उसे दक्षिण दिया गया है । अंग्रेजों की विजय पर खुशियाँ मनाई जा रही हैं । दिवाली मनाने के लिए आज सरकारी आदेश है । फॅमिली उन्नीस सौ पैंतालीस की बादलों से घिरी वह शाम यहाँ भी उदास ना थी फिर भी उस की हर जगह तभी दबी महसूस सी भरी हुई हूँ । धानी साया उसने मां के चरण हुए महाने उसे आशीर्वाद दिया और मुस्कुराते हुए बोली फरार होने के बाद आॅडी बढाकर तुमने अपना वेशी नहीं बदला सुना है और तुम नाटक भी अच्छा कर लेते हैं तो निश्चित ही माँ रिहाई के समय की घटना के संदर्भ में बोल रही थी क्या करूँ चाचीजी मामला बडे नाजुक दौर में है । जराबी गडबड हुई कि जनता के प्राण के लाले पड जाएंगे । धान इस बोला हूँ क्या तुम भी समझते हो कि चम तो के गुम होने में लाला की ही कार्य स्थानी थी । अरे इसमें भी कोई शाखा है । दानिश ने कहा उस भीड में जब मैंने लाला से कहा कि तुम्हारे रहते हुए ये कैसे हो गया तो उसका चेहरा हो चुका था । बाद में उसने अपनी गाडी में बैठे हुए ये भी कहा था भाई चंपुओं के मामले में सब तो संदय करते ही थे । अब तुम भी करने लगे तब तुम ने क्या कहा? माने पूछा कहाँ तो कुछ नहीं पर मेरे चुप रहने से मैं वहीं समझ गया जो मैं कह कर समझाता हूँ । अब मैं उसे समझौता कर लेना चाहता हूँ क्योंकि उसके हाथ पैर इतने विशाल है कि उनको काटा नहीं जा सकता । हाँ भी डर ही भी डर घन की तरह लग कर उन्हें चलाया जा सकता है मेरे मानस में फिर ऑक्टोपस के लम्बे लम्बे जिन्होंने हाथों पर आए यहाँ पीरदान इसको जल्दी थी माँ की बात है उसके स्वास्थ्य ताकि सीमित नहीं फिर भी उसने मालिक जी का संदर्भ उठा ही दिया और फिर आ गई मेले में भटक कर आई हुई उस औरत की कथा भ्रष्ट के कोटर में पडे एक मासूम पक्षी की सडी लाश की तरह ये घटना माँ के मन में पडी पडी अब भी अपनी दुर्गंध मार रही थी उसने बरस उधर दीदी डानिश ने सब कुछ सुना और गंभीर रह गया हूँ । मुझे लगा कि भूमिगत अवस्था में उसके चिंतन में बडी गंभीरता आ गई । हर परिस्थिति को ललकारकर छेडने वाला उसका व्यक्तित्व अब भोगने और झेलने में विश्वास करने लगा है । वो सब कुछ सुन लेने के बाद मैं कुछ सोचते हुए बडे धीरे से बोला क्या किया जाए? पैसे के मोर्चे पर हम सब मार खा जाते हैं और हमें समझौता करना पडता है । इसका मतलब है कि हम हार पर हर घर बैठे रहे और आंखों के सामने अन्याय होता रहे नहीं इसका मतलब ये खराबी नहीं है बल्कि हम प्रतीक्षा करें और अवसर आते ही इस सामाजिक बुराई के खिलाफ बिहार बोल दें क्योंकि एक लडाई के कई मोर्चे एक साथ खोल देना अपनी ताकत को भी घेरना है । माँ चुप हो गईं और दानिश मुझे लेकर चल पडा । कंपनीबाग से थोडा आगे गया होगा कि हमीद आता दिखाई दिया । वो आते ही दाने से लपेट गया हो । हर आखिरी के जीवन से लौटने के बाद ये उसकी पहली मुलाकात थी । कहाँ जा रहे वाइॅन् हमीद ने पूछा लाला जगजीवन लाल की यहाँ सुना है उसके घर दीवाली है? डान इसकी इस बात पर हमीरवास पडा और उसके साथ ही बोला हूँ पर साथी बादल आ गए थे और बूंदाबांदी शुरू हो गई थी । एक घुटन भरी उमस तेज वर्षा की संभावना बना रही थी । दिवाली तो कहीं नहीं थी पर कुछ एक दुकानों पर दो चार दिए अपनी किस्मत पर रोते अवश्य दिखाई दी है । लाला का भवन बिजली की रोशनी से जगमगा रहा था । तनीष और हमीद को एक साथ देखते ही वह बोल पडा यह और पेट्रोल एकसाथ कैसे? कमरा ये नहीं किसी का घर भोकने । हम लोग नहीं चले हैं बल्कि जलते हुए घर माफ कीजिएगा । दीपों को सलाम करने आया हूँ । सलाम करने आपको जाने । लाला ने मुस्कुराते हुए पूछा बोलो भाई आमिर डाला क्या पूछ रहे हैं? धनेश चौकी पर बडे मंसद को खींचते हुए बोला हूँ नहीं तो मैं सलाम करने आया हो न बुझने । हमीद ने विस्तार से अपनी पार्टी की नीति एवं उसके सिद्धांतों की चर्चा की और कहा हमें खुशी जरूर है नफा शिष्ट शक्ति के पर आज होने की । पर अंग्रेजों की जीत पर मैं प्रसन्न नहीं हूँ बल्कि हमारी असली लडाई अब शुरू होगी । आधे रही है लडाई ऍम बोला देश की आजादी के लिए इसका मतलब है हमारी तुम्हारी नीतियों में धन्यता होते हुए भी उद्देश्य कर चलो कोई बात नहीं आजादी के स्टेशन तक तो हमारी तुम्हारी गाडी एक है । फिर बदल दी जाएगी हमारा तुम्हारा तो ये देश निश्चित है, स्टेशन निश्चित है पर लाला जी किस गाडी पर सवार है । हम इतने बातों का क्रम दूसरी और उछाला । लाला जोर से हादसा अरे भाई मैं तो व्यापारी व्यापारियों को किसी गाडी से लगाव नहीं होता । उससे लगाव होता है । अपने व्यापार से हमारा व्यापार जिस गाडी से चलेगा वहीं अपनी गाडी नहीं तो दूसरे पर सवाल फिर खेल खिलाया हूँ । मैंने अनुभव किया कि लाला के भीतर एक तो फसी नहीं अवसर पर रंग बदलने वाला विषैला गिरगिट भी जी रहा है । लाला देखना यदि हमारा शासन होगा तो तुम्हारे जैसे लोगों के लिए निजी व्यापार के दरवाजे बंद हो जाएंगे । हम इतने थोडे आवेश में कहा हूँ । इसका मतलब है कि तुम्हारा शासन होगा ही नहीं । लाला हसते हुए उठा । उसके हसी बता रही थीं कि जिसका मैं चाहूंगा उसी का शासन होगा हूँ । अरे कहाँ चले लाला जी डाॅ । टोका तो उन लोगों का मुंह मीठा कराने की व्यवस्था करने इसी बीच राधा दिखाई थी । आज उसमें पहले की तरह ना संकोच था ना पास बल्कि वह मुझे खोलते हुए मेरे सामने से निकल गई । मैंने जब नमस्कार किया तो उसने बडी शान से सिर झुकाया । मैंने डालने से उसका सारा संदर्भ बताया गम्भीरता से सुनता रहा हूँ । थोडी देर बाद ही जलपान भी आया और लाला भी ऍम मिठाइयों का संबंध लडाई से न जोडते हुए इन्हें स्वीकार अगर ये तो तुम भी बडे विचित्र ऍम खाओ । गुठलियाँ गिरने से क्या फायदा? हम बोला हम लोग जलपान में लगे थे कि दादा उधर से फिर लौटी ऍफ का आप तो मध्यमेश्वर में रहती है ना । ज्यादा सकपकाई से बोली हम तो क्या मैं जान सकता हूँ की जंगल की एक आज आज मीडिया इस सोने के पिंजडे में क्यों चली आई टन इसके कहने के ढंग पर राधा एकदम सबके में आ गई । उसे लगा जैसे कोई उधेडकर रख देना चाहता हूँ मैं घबराहट में कुछ बोल नहीं पाई । अरे आॅफ पूछते हो सोच रही ॅ होने के पिंजडे में ना तो कहाँ जाती राधा की स्थिति को हमी ने संभाला । चाहो अपना काम करो राधा चली गयी लाला भी गंभीर हो गया आप मैं ये नहीं चाहता था कि हम लोग उसके यहाँ और देर रुकें क्योंकि उसने कुछ लोगों को आज विशेष दावत पर बुलाया था । खानसामों की हरकते और किचन की हाँ राहत से हम वाकिफ हो चुके थे । जोडीदार ने आकर सूचना दी । छोटे सरकार की सवारी आ रही है । अरे वा रे सवारी जैसे साला कोई राजा हूँ । दानिस मन ही मन बुदबुदाया । तब तक छोटे सरकार आज के थे । हम लोगों को देखते ही उन्होंने मुँह बिचका आया । जैसे विलायती गोंद से खडी की गई । मुझे खुद को नहीं को कट गई हूँ । लालाओं ने लेकर बगल के ड्रेसिंग रूम में चला गया और फिर बहुत देर तक गुम हो गया । फिर हम लोगों को देखने भी नहीं आया । नौकरों से कहकर काम चल रही है । उम्मीद की धरती पर चिंता का जहरीला पानी अचानक गिर गया । पूरे नगर की मानसिकता एक अप्रत्याशित तूफान शिक्षक जोर दी गई । सुबह से ही लोग अखबार के दफ्तरों के पास जमा होने लगे । दोपहर होते होते आज कार्यालय के बाहर इतनी भीड हो गई कि लोहटिया की सडक जाम हो चली थी । पुलिस व्यवस्था में लगी थी, फिर भी मैं कुछ नहीं कर पा रही थी । अंत में आज कार्यालय से एक घोषणा हुई । हमें खेद के साथ सूचित करना पड रहा है कि नेताजी सुभाषचंद्र बोस अब नहीं रहे । रंगून से टोक्यो जाते समय उनका विमान दुर्घटना हो गया । आदमी यही सूचना बडे बडे अक्षरों में झांककर कार्यालय के बाहर अखबार चिपकाने कीबोर्ड पर लगा दी गई । भीड घटने बढने लगी थी कि एक सिक्के पर खडे होकर दानिश भाषण देने लगा । भाइयों ये खबर एकदम छोटी है । एकदम झूठी जैसे नेताजी हमेशा अंग्रेजों को चकमा दिया करते थे । आज भी वैसे ही वह चकमा देकर निकल भागे हैं । नेताजी कभी मार नहीं सकते, वे हमारा हैं । नेता जी अमर है । नेताजी अमर है । उसमें कई बार इस बात को दोहराया और बाद में वही भीड का नारा बन गया । इस परसे वेकेशन लाता और सडक पर भीड चला थी । सडक एकदम जाम ना हो जाए इसलिए एक्टर को गोला देकर आगे बढाकर अस्पताल के सामने वाली खुली जगह पर जाने के लिए पुलिस में आग्रह किया । अब कबीरचौरा के किंग ऍम आज का शिव प्रसाद गुप्ता हस्पताल के सामने आकर फिर भाषण देने लगा । मुझे ठीक याद है सत्रह अगस्त उन्नीस सौ पैंतालीस को ये दुर्घटना हुई थी और हाल उन्नीस अगस्त का रविवार ऍम स्कूल कॉलेज बंद इसलिए इस भीड में विद्यार्थी अधिक थे । उनका मन तो सुभाष बापू की मृत्यु को मानने को तैयार ही नहीं था पर दुखी दिखाई सब दे रहे थे । अंत में थक कर दानिस बैठ गया । एक चिंता दुर मोहन भीड भड छा गया उसी में एक हल्की सुख दुख हट गई थी । होनी को कौन रोक सकता है? मैं कभी भी हो सकती है और किसी के साथ भी हो सकती हूँ । किसी भी एक दूसरा खद्दरधारी व्यक्ति पर खडा हुआ उसने घोषणा की ये आज दशाश्वमेध के जितना रंजन पार्क में एक लोकसभा होगी । उसके इतना कहते ही दान इस पर खडा हो गया । नहीं नहीं लोकसभा नहीं होगी । जब नेताजी मारे ही नहीं तब शोकसभा कैसी? उस व्यक्ति ने आप स्वयं को सुधारा हूँ, लोकसभा नहीं । नेताजी के जीवन पर प्रकाश डाला जाएगा । वो भी हटा नहीं । मैं भी लौट पडा । दोपहर के लगभग तीन बजे धान फिर मेरे यहाँ आया । मुझे इशारे से उसने चाचा की दुकान पर से बनाया हूँ । मैंने गली में कुछ दूर आकर देखा डाल । इसके साथ गोपाल भी खडा है । फॅमिली बोला हूँ हम लोग हमारे घर चल रहे हैं । चाहते है ना मैं राहत जी पर गया भर मैंने ऍम पर मैं कुछ समझ नहीं पाया कि आखिर ये लोग हमारे घर चल कर क्या करेंगे? दालान में पडी चौकी पर बैठते ही दानिश बोला हूँ देखो भाई गोपाल मोहल्ले का मामला है । हम लोग नहीं चाहते कि कोई दूरतम बाढ हो । तुम राधा से पूछ लोग भी अभी तक मैं स्पष्ट समझ नहीं पाया था । फिर जब दानिश ने कहा कि पूछ लो जग्गु भाई से आपकी चंद्र को चिट्टी आईडिया नहीं । तब मैं संदर्भ के निकट में पहुंचा । उसमें लिखा था ना कि मुझे और कुछ जानने की आशा मत करना । विशेष राधा बुआ ही बता सकती है दानिश ने फिर मुझे नौकरी बनानी चाहिए हूँ । मैं असमंजस में पडा बोलते क्यों नहीं? यहाँ तो मैं कौन सा डर पढाए भी पडता पर मैंने दबाव में स्वीकार कर लिया । ॅ जो हो गया सो हो गया । वो जरूआ सोसाइटी में ये सब होगा ही । हमीद ने कहा पर अब यदि पता चल जाता है तो चलता को हम लोग घर तो ले आये । अभी भी हमें विश्वास नहीं होता कि चल तू के मामले में राधा कहाँ है । जल्दी होता तो मैं कभी न कभी मुझे जरूर कुछ कहती भोपाल बोला हूँ मैं राधा के हाथ होने की कहाँ कह रहा हूँ । मैं तो बस इतना कह रहा हूँ कि राधा को मालूम जरूर है नहीं तो हमको उसका जिक्र अपने पत्र में क्यों करती? गोपाल कुछ देर तक सोचता रहा हूँ फिर बोला हूँ अच्छा तो मैं उससे पूछ कर ही कुछ कह सकता हूँ । वो पानी चला गया और हम तो के पत्र में राधा वाली बात कहानी की है । मैंने दाने से पूछा क्या होता है? यदि नहीं लिखी थी तो भी मैंने उसमें लिख दी । दानिश मुस्कुराया हॅाल परेड से ही पर एक का पकडा जा सकता है । इस पर हम ईद भी हसने लगा । निश्चित है कि ये बात अब गोपाल और राधा ताकि नहीं रहेगी बल्कि फैलेगी और ये भी रूप ले सकती है । हो सकता है गवाही में चिट्ठी पेश करने की नौबत आ जाये । हमीद ने भी मेरी बात का समर्थन किया । ॅ टी कोई गायब कर देना चाहिए । दान इसका अंतिम निष्कर्ष था । पर जो चिट्ठी सुमीर चाचा को प्राणों से भी तैयारी हो, दिन में जैसे वह कई बार देखता हो, उसे एक आया कैसे किया जाए और गायब करने के बाद उसके दिल पर क्या गुजरेगी? किंतु डाल इसके अनुसार उसे हटाए बिना कल्याण नहीं था क्योंकि झूठ को खडे होने के लिए भी दूसरे झूठ का सहारा चाहिए । संध्या हो चली थी । गंगा राम अखबार लिए सीधे मेरे घर में दाखिल हुआ । वो लोगों ने सुना सुभाष बातों की मृत्यु की शंका व्यक्त की है । उनका कहना है कि हो सकता है कि विमान दुर्घटना की बात मनगढंत हो । इतना कहते हुए उसने अखबार आगे बढा दिया हूँ । मैंने पहले ही कहा था दान इसकी पांच खेल गई और वे अखबार पढते लगा ही नहीं चाहते हुए बोला देखा आगे मेरी बात सही निकली । हिन्दुस्तानियों को कौन कहे? अंग्रेजों को भी विश्वास नहीं है कि सुभाष बाबू मारे गए हो सकता है युद्धबंदी होने से बचने के लिए उन्होंने ये सारा नाटक रचा हूँ । पहले से ही दान इसके चेहरे पर चिंता की कोई देखा नहीं हूँ तो वह अजीब उल्लास से बढ गया । अब मैं चलता हूँ चित्तरंजन पार्क वाली सभा में यही कवर अखबार से पढकर सुनाऊंगा । वे इतने उत्साह था कि चलते समय हमीद से भी कुछ नहीं बोला । तो मैं तो इस खबर है तो की हुआ होगा । दानिश के चले जाने के बाद मैंने हमीद से कहा की खबर से ऍम सुभाष बाबू के जीवित रहने की खबर से जो क्योंकि वे पास्ट के दोस्त गए इसलिए बडे दोस्त में हमारे आजादी के हैं । उनका रास्ता गलत था, इससे तो खुद स्वीकार कर रहे होंगे पर वे महान है । उनकी कुर्बानी महान है । लेनिन का कहना है कि सम्राज्यवाद के विनाश के लिए यदि साम्राज्यवादियों को भी सहयोग लेना पडे तो लेना चाहिए । मुझे लगा कि हमीद और दानिश दोनों दो किनारे भले हूँ पर है । एक ही नदी के मैंने सारी परिस्थिति माँ को बताऊँ । मैंने चाचा को पता नहीं क्या समझाया कि चाचा राजी हो गए । उसकी और चाचा की जानकारी में माँ चल तो की चिट्ठी उसके यहाँ से उठा ले आई हूँ । अब जब वहाँ नहीं रहती मैं उस चिट्ठी को संदूक से निकालकर पडता हूँ मुझे यहाँ के बार बार चुकता जब को जरा समझाते रहेगा इतने लोग हैं उसने और किसी के संबंध में क्यों नहीं लिखा? जरूर में उसे याद आता होगा । जरूर मेरी कल्पना से लिपट कर होती रही होगी । तो धीरे धीरे लगाते तो लगते राधा का संदर्भ आठ बन चुका था । मेरे घर में दानिस और गोपाल की बातचीत के बाद किसी ने किसी से कुछ नहीं कहा हूँ । पर बात कैसे फैल रही हूँ सबको आशा था । पूरा मोहल्ला अब राधा पर ठोकने लगा था । आपका दिन में दिखाई भी नहीं देती । कुछ राहत गए आती हैं और घूंघट में मुझे पाए सिर नीचे किए सीधे अपने घर चली जाती हूँ । सामान आदि लेने के लिए अब गोपाल ही दिखाई देता है । वो भी लोगों के ताने सुनता हूँ और व्यंग्य बाढ सहता हुआ । इधर चाचा का घाव अभी भरा नहीं था पर वक्त की उंगलियों द्वारा लगातार सहलाए जाने से उसकी तेरा काम अवश्य हो गई थीं । क्षमताओं के पत्र ने भी चाचा को संभालने में बडा काम किया था । अब वह लोगों से बोलता भी था और दुकान पर बैठता था । अब दौरे भी कम पडते थे किंतु जब पढते थे तो दौरों की अवधि लंबी हो जाती थी । उन दिनों आजाद हिंद फौज पर लाल किले की फौजी अदालत में सुनवाई हो रही थी । आजाद हिंद फौज के अफसरों फॅालो और शहनवाज को इस फौजी अदालत ने फांसी की सजा सुनाई । नहीं । सरकार की दस टीमें ये देशद्रोही थे । पर जनता की दस टीमें परम देशभक्त सरकारी वकील उन सैनिकों पर जो आरोप लगाते हैं, हमारी राष्ट्रीयता और देश भक्ति की बारूद पर चिंगारी का काम करते हैं । उन खबरों को पढते पढते हम उत्तेजित होते थे । आजकल अखबार ऐसी खबरों से भरे रहते थे । गंगा राम सीधे अखबार लेकर चाचा की दुकान पर आता हूँ । उसे मैं वहाँ लोगों को पढकर सुना था हूँ । मान ले कि बहुत सारे लोग इकट्ठे हो जाते हैं । वो बढते बढते मैं आवेश में खडा हो जाता था । अनेक वाॅ तो ऐसे होते थे जिनके बाद में लोग तालियाँ बजाने लगते थे । तो आपने बुलाने के लिए चाचा को एक अच्छा मौका मिल गया था । हाँ रे बोरसी सुलगाँव आता और अखबार समाप्त होने के बाद भी लोग बहस करते हुए फरवरी की ठिठुरती राज का प्रथम पहर ॅ कल पूरे देश में हडताल होगी । इसके टांगे भी नहीं चलेंगे । टन तक की दुकानें नहीं खुलेंगी । इससे क्या होगा मैं । उन्होंने पूछा सरकार पर दवा पडेगा । मैं आजाद हिंद फौज के इन अफसरों को फांसी देने से डरेगी भरना बेचारे लटक जायेंगे । बार इसी पर चल रही थी कि गोपाल आया एक से नमक देते हुए सुमेर साफ उसने दो नहीं देगी । चाचा चुपचाप नमक डालने लगा । इतनी रात को नमक लेने चले आए गोपालभाई महंगू बोला हूँ कल हडताल होगी ना और नमक बिना काम चलने वाला नहीं है हूँ । सुना है तो नमक की मूल्य नहीं चुकाते । महेश बोलने के साथ ही साथ मुस्कराया पहले ही दो अन्ना देख चुका हूँ । भोपाल । बोला हूँ क्या नमक की मूल्य महज एक दो अन्य ऍसे क्या पूछते हो? यू तो बोलेगा ये तो सीधा साधा आदमी नमक अदा करना जानती है । इसकी महेरिया राधा सबके समाज पडे । गोपाल बेचारा नमक लेकर चलता बना दूँ तो अभी कुछ दूर गया था कि जाहिर बोला ऍम का इनका डाॅलर बडे बडे से लुटेरा भी अपने गांव मोहल्ले का ख्याल रखता हूँ हूँ कुछ और बढ बढाता हूँ यदि महेश उसका जोर से हाथ ना तब आॅन रहा होगा क्या करेगा साला सुनके अब तो स्वराज्य आने वाला है इसके आका लाला को भी दिन में तारे दिखाई देने लगेंगे । इस साल की हस्ती क्या गडगडाती जाडे की राज का ब्रह्ममूहुर्त हूँ आज मैं मां के जागने के बहुत पहले ही जा गया हूँ और रजाई के भीतर बडे बडे ही दानिश की प्रतीक्षा कर रहा हूँ क्योंकि उसके साथ ही मुझे ॅ स्टेशन जाना है और वहां यात्रियों को समझाना हैं कि आज शहर में हडताल है इसके टांगे नहीं चलेंगे । सैकडों लोगों की जरूरत पडेगी हो सकता है उन लोगों का सामान भी गंतव्य तक धोना पडे । यू यात्रियों को कमी आना चाहिए क्योंकि हडताल देशव्यापी है और इस की सूचना भी काफी प्रचारित हो चुकी है । अचानक दरवाजे की खडखडाहट सुनाई पडी सोचा डाले रखा गया मैं दरवाजा खोलने के लिए लग का पर मेरे पूर्वाभास को धोखा हुआ । मैं राधा थी । मैं कुछ दिनों तक उसे देखता रहा और मैं मुझे मेरे प्रणाम करने के बाद ही उसने पूछा हूँ । बिहारी बहनें हैं, बेटा या नहीं रही थी तब कहा रहती है । मुझे नहीं मालूम फॅमिली है तो मैं नहीं मालूम हो सकता है मैं जानती हूँ । मैंने कहा पर हो रही हूँ अभी तक चल कर बैठे में अभी बुलाता हूँ । व्यस्तता दरवाजे की दस्तक होते ही माँ जब गई थी तो मैंने राधा के आगमन की सूचना दी । क्या बात है? मैं भी उसके असमय ऍम आकास्मिक आगमन पर चके थी । जब तक वे नीचे आए तब तक राधा जा चुकी थी । शायद है । माँ का सामना करना नहीं चाहती थी । पर उसकी भी शाम थी कि रास्ते में डालने से मिल कहीं का ये स्टेशन चल रही हैं । डांस नहीं । मिलते ही पूछा नहीं कहती । हुई में आगे बढना चाहती थी कि दानिश ने उसे घेर लिया । आखिर दिनभर घर में बैठ कर क्या करेंगे? बहुत करेंगे । लाला की सेवा में चली जाइएगा । हालांकि सेवा से कहीं अच्छा है देश की सेवा कीजिए । किसी लडकी को भागने से कहीं अच्छा है । वो भागी हुई लडकी को घर पहुंचा ये उसके माता पिता का आशीर्वाद लीजिए । ऍम बता रहा था कि वह बडा बडा थी, रही और चुपचाप चाहिए नहीं । उसमें प्रतिवाद करने का भी साहस नहीं रहा हूँ । स्टेशन पर व्यवस्था अच्छी नहीं । व्यस्तता ये सिर्फ कांग्रेस का ही नहीं बल्कि जनआंदोलन हूँ के लिए जनता लोगों के सहयोग के लिए उमर पडी थी । जो शहर के यात्री थे उनकी समस्या तो किसी तरह हाल हो जा रही थी । किंतु जो दूसरी जगहों यात्री थे और ट्रेन बदलने के लिए स्टेशन पर पडे थे, उनके भोजन, जलपान आदि की व्यवस्था का प्रश्न था क्योंकि हडताल ऐसी थी कि कुछ भी मिलने वाला नहीं । सेव समिति का कैंप लगा था । उसी में चाय बन रही थी । डाला के अनाथालय के आदमी तोडी और सब्जी तैयार करने में लगे थे । बलदाऊ अपना मोटा डंडा लिए कैंप के बाहर भी इधर आ जा रहा था । प्लेटफॉर्म पर टहलते हुए उस की आकृति हर यात्री के चेहरे का कई बार स्पर्श कराई थी । उसे देखते ही दानिस मुझे अलग हो गया और उसे इस तरह से बातें करके लगा जैसे वह उसके वर्तमान से बिल्कुल वह किसी ना हूँ । अरे बलदाव सरदार बहुत दिनों पर मिले । मैं तो आपसे मिलने वाला था । दानिस बोला बलदाऊ ने मुस्कुराते हुए अपनी मुझे अब तो पुरानी बातें ही सब खत्म होती जा रही हैं । सरदार कभी आप लोगों की गुडाई का शहर में दबदबा था । क्या मजाल की किसी की बहु बेटी पर कोई नजर उठाये? पर आज तो बात ही बदल गई । किसी की बहू बेटी की इज्जत सुरक्षित नहीं । तनीष ने बनारसी गुंडों के शानदार अधिक पर उंगली धर दी थी । अब बलदाव की मानसिकता अपने झूठे अहम में डूबने लगी थी । कॅश आ रहा था हूँ । देखिए ना मैं साहब की जवान बेटी को दिनदहाडे लोगों ने कहा कर दिया । बेचारा पागलों की जिंदगी जी रहा है अब सरदार तो अभी समझो । बनारस के गुंडों के माथे पर यह कलंक नहीं तो तुम्हारे ऐसे लोगों के रहते ये घटना हो गई हूँ । दाने स्टीर पर तीन मारे जा रहा था और बलदाऊ बेंद्रे लगा था । ले जाकर कमीनो ने कहीं भेज दिया होगा या किसी कोठे पर बैठा दिया होगा । मैं तो समझ नहीं पाता कैसे हो गया ये तुम सबके रहते आखिर तुम भी तो थे बलदाऊ होता हूँ मैं कहाँ था? मैं तो फरार था । सरदार विश्वास करो यदि मैं होता ना तो ये घटना होती ही नहीं । नहीं जवान लडकी थी । कलकतिया लोगों के चक्कर में पड गए । बलदाव ने लाला की बात हो रही कलकतिया लोगों की क्या हिम्मत है जी साले विपत्ति के मारे खुद कलकत्ता से भागे, कहीं भाग आए लोग भी किसी को बता सकते हैं । अरे वह तो अपने ही लोगों का शिकार हुई है । फिर उसने चंपुओं की चिट्ठी और उसमें लिखी राधा के नाम की चर्चा की बलदाव गंभीर हो गया । उसे लगा कि जिस काली छाया को मैं बहुत दूर समझता था, मेरे पीछे ही चली आ रही है । दानिश बोलता जा रहा था आप जैसे लोग जब इस मामले को हाथ में नहीं लेंगे तब तक उस लडकी का उधार नहीं होगा । तभी लोग जब सब करें तो सुराजी लोग क्या करेंगे? भीतर से बुद्ध होता होगा । बलदाव मुस्कुराया हम सब राज्यों का तो अभी एक ही उद्देश्य है अंग्रेजों को भगाओ । आजादी के बाद तो हम इन कमीनों को अच्छी तरह देख लेंगे । तब तक एक लडका दौडा हुआ आया और बलदाऊ से बोला वो आपको लाला जी बुला रहे कहाँ है लाला जी बलदाव को जैसे विश्वास ही नहीं था कि लाला जी वी स्टेशन पर आ सकते हैं वो लडके ने उसे बताया कि वह ऍम बैठे बलदाव के कैंप में जाते ही डाॅ । प्लेटफॉर्म की दूसरी ओर से मेरे पास आया । उसने सारी बातें बताई । इस नाटकीयता से क्या लाभ हुआ? मैंने पूछा तो तुम जानते नहीं हूँ । आदमी को अहम की शराब पिलाते जाओ कभी ना कभी तो उस पर अहंकार करना चाह चडने लगेगा और तब अपने रास्ते से बता कर तुम्हारी मुट्ठी में आ जाएगा । यदि जरा सा और मौका मिलता ना तो बलदाऊ खुलने लगता हूँ । ये तुम्हारा भ्रम है । वो लाला का खास आदमी है । तो मैंने कहा कोई किसी का खास आदमी नहीं होता । जग्गू परिस्थितियां ही उसे खास और आम बनाती हैं । इसका मतलब है कि परिस्थितियों ने ही हमें और तो मैं खास आदमी बनाया । धनेश चोपडा और परिस्थितियां बदलते ही हमारी दोस्ती भी बदल सकती है । डांस भी चुप था और परिस्थितियां बदलते ही हमारी दोस्ती भी बदल सकती है । डालने अब भी चुकता हूँ । राधा ने मोहल्ला छोड दिया । कहाँ गए पता नहीं । एक दिन चंद्र चाचा से मिलने आया था है उससे लिपट घर होने लगा । सुमार ओके मरने के बाद चंद्र मैं है परिवर्तन आया बे बदलता गया बदलता गया एकदम पतला हुआ चंद्र हमारे सामने था पाप के चरम शिखर से जब पश्चाताप की नदी बहती है तब अजीत का सारा कूडा करकट बाहर ले जाने की चेष्टा करती हैं । इस समय चंद्र की आंखों से वहीं खोला रह रहा था । चाचा भी रोने लगा था । जब दोनों की यहाँ के थमी तब चंद्र बोला कितने घरों को फोक ने के लिए तुम्हारे यहाँ से मिट्टी करते ले जा चुका हूँ तो मेरे भैया पर आज मैं खुद जल रहा हूँ । मेरी आत्मा चल रही है, इच्छा होती है मैं उस घर को भी जला हूँ जिसकी चिंगारी लेकर मैंने अपने घर चुके हैं । चाॅइस में था । उसका कहना था की सोमेर साहब तो गेहूँ के साथ उनकी तरह ब्रिज गया वरना उस कमीने का उसमें क्या बिगाडा था? और उस शाम के बाद चंद्र बहुत दिनों तक दिखाई नहीं दिया । दूसरे दिन राधा भी मौल्ला छोड कर चली गई । सुना उस रात चंद्र राधा के घर गया था क्या? नहीं कहा उल्टा सीधा जो भी मन में आया घंटो बता रहा हूँ । आस पास के घर के लोग भी निकल आए पर चंद्र को देख कर कोई कुछ नहीं बोला । राधा इतनी नहीं की रह । सुबह सुबह सीबीआई की खोज में मेरे आ गई थी । उसे कमा लूँ कि वाह वाह छाया का सहारा लेने आई है । जो चंद्र से बहुत पहले जो हो चुकी है । इसके ठीक तीसरे दिन लाला ने सो मेरे चाचा को बुलाया । चाचा उस दिन समय हो गया तो नहीं पर उसका मस्तिष्क बुलाए जाने के संभावित कारणों में बोला जा वर्ष किया था । ऐसा तो नहीं कि राधा ने मेरी शिकायत की हो नहीं तो चंद्र से कुछ कहा भी नहीं था । उस की मानसिकता टाल जाने के पक्ष में नहीं । ॅ इन्होंने हाथ झूलते हुए फिर मेरी दृष्टि में नाते तो शायद मैं भी चाचा को लाला केहान जाने ना देता हूँ । जब चाचा लाला के यहां पहुंचा मेरे बडे प्रेम से मिला वो अच्छी खासी आवभगत ही हाल चाल पूछ आवर बडी आत्मीयता से बोला हूँ कि वो हमेशा सुना है । नाम तो की जितनी भी आई है चाचा ने स्वीकारते हुए से दिलाया । सारे शहर ने जान लिया पर तुमने मुझे कुछ नहीं कहा । लाला मुस्कराया लगता है तुम भी मुझे पराया समझते हो । अब उसने मेरी और संकेत क्या? और तुमने भी मुझ से कुछ नहीं कहा । मैं भी चुकी रहा हूँ । कोई बात नहीं ये तो बताओ अच्छी तरह ना चाचा ने बडी गंभीरता से उसका कुशल छेम स्वीकार की । हाँ आखिर क्या लिखा है चल तो बिटिया ने मैंने अनुभव किया की बडी होशियारी से लाला पत्र के संदर्भ में पहुंचना चाहता था । चाचा बोला कोई विशेष बात नहीं लिखी है । यही राजी खुशी है । मैंने देखा मामला गडबड आना चाहता है तो बीच में ही बोल पडा । विशेष जानकारी के लिए उसने राधा बुआ का नाम लिखा है । लाला एकदम गंभीर हो गया । पैसा होने के बावजूद जो मेरे चाचा की ईमानदारी में विश्वास करता था हूँ मेरे गठन का चाचा ने प्रतिभाग भी नहीं किया वरन उसका लोग समर्थन लाला को बहुत भारी बडा मैंने इसीलिए तो मैं बुलाया था । डाला ने अपनी मुद्रा बदली हूँ । सोचता था कि एक दिन खुद चलो पर काम से फुर्सत मुश्किल चलो जम्प की खबर मिली । बडी अच्छी बात है । मैं कौशल से है और जिंदा है । इससे अधिक तुम्हें और क्या चाहिए । एक बाहर को बेटी की खबर नहीं भर उसकी बेटी चाहिए लाला जी चाचा की आंखे बढाएँ एक पिता का है । पिघल कर आंखों में म चल गया । लाला का कहना था की लडकी नहीं मिल रही है तो उसके कुशल समाचार में ही संतोष करो तो उसने अपनी पुरानी बात फिर दोहराई भैया मानो चाहे मत मानो उसने किसी का हाथ पकड लिया है वो मैं तुमसे अब भी खुद को छिपा रही है तो यह छिपाना ना चाहती हूँ तो अपना पता ठिकाना तो लिखती । मुझे तो लगता है कि राधा वाली बात अभी तो मैं उलझन में डालने के लिए लिखी है । चाचा चुपचाप सुनता रहा हूँ । राधा का नाम आते ही उसकी आंखे लाल होने लगी । मुझे डर लगा कि कहीं दौराना पडे मैं फिर बीच में ही बोल पडा । जो भी हो पर उसने राधा का नाम तो लिखा ही है । कॅापी तो तुम्हारे पास होगी । लाला ने मुझे पूछा मैंने स्वीकार किया यदि हो सके तो मैं कॉफी और चल तो की चिट्ठी मेरे यहाँ भिजवा दो । मैं पहले उसकी लिखावट की जांच करा हूँ । मुझे तो दाल में ही कुछ काला मालूम पडता है । वो हो सकती है चिट्टी चंपू की लिखी न हो । लाला ने संदेह का एक बीच चाचा के मन में छोडना चाहता हूँ पर वहाँ इतनी जलन थी कि वह बीच पडने के पहले ही चला गया । अंत में तय हुआ कि आज या कल संध्या को लाला चिट्ठी के लिए अपना आदमी भेजेगा । अब संध्या को चाचा की दुकान पर फिर कुछ लोग झुमने लगे । फिर पहले जैसी देश विदेश की चर्चा होती । गंगा राम अखबार ले आता हूँ, उसका वाचन होता हूँ । बातें लडती जांचा भी हूँ । करता रहता पर अब उसमें रस नहीं लेता था । वो मैं तो उस वातावरण की दीवार से पुराने चप्पल की तरह मुखर चुका था । आज गंगा राम कुछ विशेष खुशी में उछलता हुआ आया हूँ और अखबार देते हुए बोला हूँ आशा हिन्द फौज के लेफ्टिनेंट राशिद की सजा को लेकर भारतीय नौसेना ने विद्रोह कर दिया । नौसैनिक बेडों से यूनियन जैक उतारकर फेंक दिए गए । सेना में विद्रोह निश्चित है । अंग्रेज इस देश में रह नहीं पाएंगे । एक विस्फोटक स्थिति का कम्पन हमारे बीच से गुजर आया । मुझे हुए शोले भी पाँच देने लगी । अखबार पढते पढते अच्छी खासी भी लग गई । नौ घंटे तक गोलाबारी हुई है । सालों को अब पता चला होगा कि भारतीय सैनिकों को भी अब दबाकर रखा नहीं जा सकता हूँ । पी पा बोला है । इसका अनुमान तो इंग्लैंड की नहीं, लेबर पार्टी सरकार करी चुकी होगी । तभी तो मैं आजादी देने की योजना बना रहे हैं । रामकिशन नहीं कहा । बात चली रही थी कि नरेंद्र बहादुर आ धमका । उसका आना सबके लिए अनहोनी बात थी । वो लाला का नौकरी नहीं, व्यक्तिगत सहायक था । लोगों से देखते ही चुप हो गए । इस चुप्पी के बीच से गुजरते हुए लोगों के मानसिक दुराव का अनुभव नरेंद्र बहादुर ने भी किया हूँ । पर मैं गंभीर सीधे चाचा से बोला वो लाला जी को कोई चीज आपने देने को कहा था । कहाँ कहाँ था? इतना कहते हुए चाचा भीतर आया । मैंने समझ लिया कि चंपुओं के पत्र का ही संदर्भ है तो मैं भी भीतर की ओर बढाओ । क्या कहा जाए? उस है यह दीजिए कि कहीं लग गया है इस समय मिल नहीं रहा । मिलते ही भिजवा दूंगा । इसका मतलब है कि कुछ दिनों बाद लाला फिर उससे मांगेगा क्यों नहीं बात ही खत्म कर दी जाए । चाचा सोचने लगा और फिर दुकान में आकर बोला मैं यहां आज सवेरे से गुजारा कर रहा हूँ पर मिल नहीं पा रहा है । ऐसा तो नहीं कि साउथ में लपेटकर किसी ग्राहक को दे दिया हूँ । चाचा नहीं गंभीर बनावट बोर्ड कौन सी चीज है सुबह सौ रामकेश उनसे रहा नहीं गया मैं जरूरी चीज भाई क्या कहा जाए? कभी कभी डूबते को संभालने वाला तेल का भी खो जाता है । चाचा क्षण भर के लिए काम भी हुआ तो अच्छा आप चले । मैं मिलते ही पहुंच बाद होंगा । नरेंद्र बहादुर चला गया । जांचा किए नाटकीय था उसकी बदली हुई प्रगति के सर्वथा प्रतिकूल भी । पर कभी कभी आदमी ऐसा भी कर गुजरता है जिसकी ना तो उसमें सामर्थ्य होती है और ना उससे आशा की जाती है । चाचा और नरेंद्र बहादुर की बातों का रहस्य शायद ही कोई समझ पाया हूँ । लोगों ने जिज्ञासा भी की पर चाचा बडी होशियारी है डाल गया लगता है लाला सुबेर सास को पटिया आने में लगाए रामकिशन बोला चला होशियार रहना साहब । कुछ लोगों की दोस्ती भी बुरी होती है और दुश्मनी भी । यहाँ पर ना दोस्ती का सवाल है और न दुश्मनी का । अरे लाला बखरवा बनाए रखें, यही बडी बात है लाला की के पास से अभी आधा ही नहीं क्या सुमेर बूढे मंगलों की आवाज उसके मर्म कुछ हो गईं । चाचा कुछ गंभीर हुआ, अन्य लोगों ने भी बात बदल देना ही उचित समझा हो हूँ । फिर कर उस माहौल की मानसिकता फिर नीवी विद्रोह पर आ गई । मैं अखबार लेकर वहाँ से किसका सोचा? इस खबर को जल्दी से जल्दी धान इसका सुनाऊं खुश हो जाएगा । इधर दो चार दिनों से फिर उसे ज्वर आने लगा है । फरारी के समय ऐसी बीमारी लगी कि शरीर टूट गया । शराबी सर्दी गर्मी बर्दाश्त नहीं करवाता हूँ किन्तु दिल और दिमाग में वैसा ही देवर है । गंगा राम बाहर दिखाई नहीं दिया । हाँ रामनाथ आपने के लिए कौडा सुलगा रहा था । माँगेंगे तो कह दीजिएगा मैदान इसके आ जा रहा हूँ मैं घर मैदान इसके घर की ओर लगा । फरवरी का ज्यादा कट कट आ रहा था । कॅाल पछुआ हवा का सनसनाता झुका उन्नीस वेटर के भीतर भी चुकता जा रहा था । पियारी दान इसका सिर दबा रही थीं । सलमा और आदमी चार दालान में जल रहे चूल्हे के पास नहीं मेरे हाथ में अखबार देखते ही दानिस कंट्री के भीतर सही बोला कोई नहीं बात है क्या? भारतीय नौसेना ने बगावत कर दी । मैंने कहा बगावत फौज ने बगावत कर दी । वो एकदम उठ बैठा हूँ । हमने जान अमेजान कमाल हो गया । पागलों सचिन आया हूँ कहाँ बुखार और कहाँ से डाॅॅ देखा नेताजी का करिश्मा जो चिंगारी वर्मा के फ्रंट पर मुझे मुझे जान पडी । वो बम्बई में विस्फोट घर बैठे अम्मीजान पहले आई और सलमान बोरसी में अंगारे भर कत बाद मैं अपनी जान पहले आई और सलमान बोरसी में अंगारे भरकर बाद में मैं डिबरी की रोशनी में अखबार बढकर सुनने लगा गई । बार बडी हुई खबर को मेरे आवेश ने नहीं नाटकीयता प्रदान की लोगों की नसे पडने लगी ॅ नहीं है कमाल कर दिखाया अम्मी जान बोलीं दान इसके मस्तिष्क ने अपने अनुसार घटना का क्रम बैठाया हूँ । निश्चित है नेता जी दुश्मनों को चकमा देकर बनवाई चले आए होंगे तभी तो ये ज्वालामुखी फूट आए । अरब सागर उबल पडा पर सोचने की बात यह है यहाँ अंग्रेज सांप्रदायिकता भडकाने में लगे हैं भर होली और मोहर्रम के दंगे होते हैं । वहाँ कैप्टन राशीद के मामले में सारी सेना एक हो गई तो मैंने अपनी जान के मन की बात नहीं है । इसी पहलू पर सोच रही थी तो सवाल हिन्दू मुसलमान का नहीं आजादी का है ध्यान इस बोला सारा झगडा इस गुलामी ताकि है आजादी के बाद फिर हिन्दू मुसलमान का सब हिंदुस्तानी हो जाएंगे तब चाय पानी भी नहीं रहेगा । बिहारी ने पूछा अम्मीजान हंस पडी गाय कहाँ हजार पर मेरे तेरे कौन जात पात रह गया । इस बात पर हम सभास् पढें । सलमान बडे गौर से मुझे देखती रही । उसकी बहुत दा बडे सहज विभाग से पहुँच गए थे । तब तो हिन्दू मुसलमानों में शादी व्याह भी होने लगेंगे जरूर धान । इसने कहा हूँ, जब मैंने सलमा की ओर देखा वो एक दम से बता गई । उस की बडी बडी आंखों में लग जा की लगाई उतर आई थी । फिर भी मैं आंखे मुझे जब की थी । सलमा की दोनों आंखों का बोझ आज भी मेरे मन पर है और उसी मन में अपना के लंबे इतिहास के साथ चंपुओं की सिसकियां भी बडी हैं । एक होने से आवाज आती है परिस्थितियों की निष्ठ पडता नहीं तो मैं मुझे बहुत दूर कर दिया । ठीक इसी समय सलमान की दो बडी बडी आंखें मुझसे पूछती हैं यहाँ परिस्थितियां कभी ऐसी भी हो सकती हैं कि हम दोनों करीब आ सकी । ये महज आवाजों की तक राहत नहीं वरन मैंने मन का तनाव भी है । कल माँ कह रही थी कि राधारानी बहु के आई थी, फूट फूटकर हो रही थी । उसका कहना है कि हर आज भी मुझे संदेह की दृष्टि से देखता है । कुछ लोग बोली भी बोलते हैं अंदर से भी काफी डरी हुई है । सोचता है मौका मिलते ही वह मुझे मार डालेगा । मैंने सोचा डाल इसकी जहाँ काम कर गई । मैंने पूछा तो तब रानीबाग तूने क्या कहा? रानी वालों ने शायद कहा है कि तुम लोग कुछ दिनों तक बाहर निकलो तब बोली की मैंने ऐसे करके भी देख लिया है । अकेले में मेरा मन नहीं । मुझे कोस्टा है । रात में सोते सोते भी ठीक उठती हूँ । मुझे लगता है कि कोई मेरा गला दबा रहा है । इसका मतलब है कि उसकी अपराधी आत्मा स्वयं उस को कोसने लगी है । मैंने कहा लगता कुछ ऐसा ही है । माँ बोली तब तो चंपा के मामले में उसका स्पष्ट हाथ मालूम होता है । इसमें भी कोई संदेह डबराणी बहुत से पूछती क्यों नहीं है तो क्या समझते? उन्होंने पूछा नहीं होगा तब क्या कहती हूँ? मैं तो ले और सिर पटकने के सिवा कुछ नहीं थी । माँ बोली, रानी बहुत कह रही थी कि वह बॉर्डर हुई है । हर शब्द के साथ उस से यह रहता है कि उसे कोई सुन तो नहीं रहा है या मैं जरूर कह रही थी कि चंपुओं ने मेरा नाम लिख कर मेरी जिंदगी बर्बाद कर दी । अब मैं कहीं की नहीं रही । उसने जमता की जिंदगी नहीं बस बात की । मैं बोला तो यही तो आदमी नहीं सोचता । जब बादल परसवार होता है तब भगवान को भी नहीं पडता । और मैं नहीं समझता कि है पागल पन हमेशा नहीं रहेगा । भगवान तो हमेशा रहेगा । इसी संदर्भ में मान ने बताया कि अब लाला भी उसे अपने यहाँ रखना नहीं चाहता हूँ । लाला तो हर आंख से हाथ सकता है और जहाँ भी वहाँ धूम वाली लगती है उसे हटा देता है । इस समय राधा का व्यक्तित्व धुआ ही नहीं भूल छोड रहा था तो मैंने सोचा मैं भोपाल के साथ क्यों नहीं रहती? तो मिल में वहाँ के कर्मचारियों को तो क्वार्टर भी मिले हैं । पर हाँ सही पता चला हूँ कि जो जो लाला के संबंध बढते गए वह तो भारतीय भी अलग होती । कहीं अब दोनों के बीच एक अलग ही दूरी है तो लगता है सुनेर चाचा से भी माँ इसी विषय में बात कर रही थी । मैंने मात्र इतना ही सुना था । ये रास्ता इतना खराब है भैया की जब एक बार उस पर कोई बढ गया तो पीछे लौटना बहुत मुश्किल होता है । अब राधा लौट नहीं सकती और आगे निकल जाने के लिए घना अंधेरा है । ऍन उसका कल्याण करें । चाचा बोले ऍम कि राधा को देखते ही कृत सांड जैसे झपटने वाले चाचा की प्रति हिंसा आज अचानक द्रविड कैसे हो गई? तृप्ति की मार सहते सहते एक स्थिति ऐसी भी आती हैं जब दूसरों की विपत्तियां भी अपनी लगने लगती हैं । अब चाचा राधा की मानसिकता झेलने लगा था । उस दिन के बाद राधारानी बहुत से नहीं मिली । लगता है हैरानी बहुत यहाँ कहीं आश्रय के लिए तो नहीं आई थी भरण उसके अंतर कहाँ? कार अपना उचित श्रोता खोजता चला आया था फिर और कहीं भी दिखाई ना पडे हम में से जिस किसी को भी राधा की इस परिवर्तित मनाते थी और स्थिति की जानकारी हुई वही उसकी खोज में दौडा किसी सहानुभूति के कारण नहीं ऍम इस भाषा में की शायद जम तो का कोई सूत्र मिल जाए । फॅमिली फॅमिली जा रहा था, बडी गुलाबी बनकर प्रगति पर चिपक गया था । आज रंग भरी एकादशी थी, कॅश था । उन्होंने मुझे बुलाया भी था पर उनके यहाँ जाने की मेरी इच्छा ना हुई क्योंकि मालिक जी का व्यक्तित्व पहले मुझे जितना आकर्षक लगता था, अब वैसा नहीं रह गया था । उनकी सारे क्रांतिकारिता पारिस्थितियों की शहद समझौता करती हूँ । अपनी सारी ऊर्जा खो चुकी थी हूँ । मेरा तो निर्माण वे परिस्थितियां ही कर रही थीं जिन्हें टूटना श्रीकार था, पर झुकना नहीं तो ये भी आप दानिस पूर्ण स्वस्थ था । पी बिहारी भी यदा कदा मेरे यहाँ चली आती थी तो कोई बहाना न होते हुए नहीं । मैं देश सुधा दान इसके यहाँ पहुंच जाता था क्योंकि सालमा की आंखों का दबाव मुझ पर बराबर बना रहा हूँ और मैं उसकी ओर खींचता चला जाता था । आज मैं पहुंचा तो सलमान ही दरवाजा खोला । मुझे देखते ही उसकी सारी आवागन और आत्मीयता, कुछ मुस्कुराहट तथा कुछ सलज नेत्रों से पकडता में बदल गईं । उसने इंद्रधनुषी रंग की साडी पहन रखी थी । मैं उसे देखते ही बोल पडा आज बडी रंगीन साडी पहली तुमने ऍम भरी जो है वो खिलखिला बडी पर रंग भरी तो हमारा त्यौहार है तो भी नहीं कहते थे कि अब हमारे तुम्हारे में कोई फर्क नहीं रहेगा । अब हम तुम एक हो जाएंगे । एक कहते कहते पता नहीं क्या सोचकर उसके कपोल और लाल हो गए और भीतर चली गई । हमीद पहले से ही मौजूद था । मैदान इसके साथ अल्यूमिनियम की एक ही थाली में रोटी और घंटे का छोटा बना रहा था । मुझे देखते ही वह चाहे छोटा हो, बधाई हो, बधाई हो, किस बात की बधाई । आप भारत निश्चित रूप से आजाद हो जाएगा भी हो जाएगा की बधाई । मुझे ऐसी आ गई । ऐसे कौन सी बात है? है तो मैं इतना विश्वास भर दिया । रूस के विदेश मंत्री फॅालो तोडने भी अंग्रेजों को ललकारा है कि अब अगर कोई भी शक्ति भारत को गुलाम बनाकर अधिक दिनों तक नहीं रख सकती हूँ । मुझे हंसी आ गई । साथ में दानिस बिहार हूँ । इस साल को जब तक रूस ने नहीं कहा तब तक विश्वास नहीं हुआ । हम लोगों ने इतनी कुर्बानी दी । उस बारिश का भरोसा नहीं । गाने सिर्फ था और हमीद की पीठ पर एक धौल जमाते हुए बोला, ऍम, अभी अंग्रेजी का दिमाग ठिकाने नहीं लगा है । आंदोलन के दवाब से उन्होंने टाइगर दे लोअर रहने वाज की फांसी की सजा ये माफ कर दी । पर इतना बडा नेवी विद्रोह होने पर भी कैप्टन रहीं भी । फांसी की सजा सात साल के कठोर कारावास बदल कर रहे गईं । इसका कारण जाते हूँ । हमीद ने उत्तर भी दिया । नौसैनिकों ने अपने कच्चा में दो वापस ले लिया । गांधी जी के कहने पर ऐसा हुआ । मैंने कहा और मिस्टर जिन्ना की भी यही राय थी । तो गांधी और जिन्ना ने ही उनकी सजा माफ करवाई । एक्शन अगर हमीद फिर बोला सात वर्ष की सजा हो या सत्तर साल की । हाँ, जहाँ आजादी मिली की सब ऍफ नहीं मिलेगी । जब तक रूस नहीं चाहेगा टन इसने एक गहरी जी गोटी काटी । हमीद भीतर ही भीतर तेल में लाया । पर मैं जो भी रह गया तब तक अपनी जानने रोटियाँ लाकर थाली में डाल दी । आप दानिश ने थाली मेरी और बढाई ले तो भी शुरू कर नहीं नहीं ऐसे झूठा मत खिलाओ । मैं से अलग लाकर देती हूँ । रोटी के लिए इसका धर्म भ्रष्ट मत करो । हम भी जान बोली हो तो क्या समझती हम? मैं हमीद बोला रोटी ही आदमी की सबसे बडा डर मैं यही रेट है, कुरान है, इंजील है और यही दे रही है । उसके मुँह में लाते हुए दानिश बोला और हम तीनों हस पडे तो तुम सब भले ही पैसों पर मैं पूछता हूँ कि खाली पेट आदमी किस धर्म का पालन करेगा । जो भी तो आदमी की फॅसा है पर धर्म तो उसके मन की स्वीकृति है । पहली बार उसके दार्शनिक चिंतन में शामिल हुआ तो जब शरीर ही नहीं रहेगा तब मन किया हड्डी पर कबड्डी खेलेगा । हमीद ने कुछ ऐसे ढंग से कहा कि हमारे ही खिलखिलाहट एक बार फिर हमसे टकराएगा । अन्य जानने रोटी और बडता लाकर मेरे सामने रख दिया । अब हमीद ने हाथ पकडकर अम्मी जान को भी इसी चौकी पर बैठा लिया । ॅ एक बात बताओ ॅ जब आजादी होगी तब तो क्या जाएगी? हम इतने पूछा ही बादलों जैसी बात करता है । अम्मी झान हस्ती रही । पहले आजादी हो तो सही तो निश्चित समझ में अब देश आजाद होकर ही रहेगा । हमे बोला और उसने अपना प्रश्न पुराना दौर आया । अच्छा तो सही सही बताओ कि तू आजादी के बाद क्या चाहेगी? हमने अब भी हस्ती रही हूँ । हमीद ने अपने भ्रष्ट पर कई बार जोड दिया । तब कहीं विवश होकर बोली मैं बोला क्या चाहूँ मेरी जिंदगी कितनी है? करारे का डेढ हूँ, आज मारो या कल दूसरे दिन जो भी चाहूंगी वह सब तुम्हें लोगों के लिए तो हम लोगों के लिए तुम क्या क्या होगी जहाँ आप भी संकोच मुस्कुरा नहीं थीं । हमीद के बार बार जोड देने पर बोली भरे चाहूंगी क्या यही कि तुम में से कोई दरोगा हो जाये? गोई गोथवाल हो जाये मजदरों का कोतवाल देखी ना? कलेक्टर कमिश्नर नहीं । तनीष बोला ये बडी बडी पोस्ट तो बडे बडे लोगों की होंगी । सब तुम ही लोग ले जाओगे तो नेहरू आजाद सरदार जैसे लोग क्या करेंगे कहाँ जाएंगे इस बार हनी भी हंसी और देखती हूँ । माँ के अज्ञान पर नहीं उनकी आकांक्षा की लगता पर वो बडी देर तक खिलखिलाता रहा । फिर बोला अच्छा आजादी के बाद हमारे लिए तुम क्या चाहती हूँ? इसे तो जान गया पर सलमा के लिए तुम क्या चाहोगी? अपनी गुडिया के लिए एक अच्छा शादी आने लग जा के मारे अम्मी जान के आंचल में अपना मुझे पा लिया । कैसे? शादी आपके लिए अच्छी होगी । आप अपनी लडकी की शादी कहाँ करना चाहेंगी? हरे हटाओ यार तुमने भी सवेरे सवेरे कहाँ का भगवान लगाई दाने झुंझलाया तक आवाज नहीं है भाई । मैं जानता हूँ कि आज का हिंदुस्तान क्या सोच रहा है । आमिर ने कहा अच्छा बताओ में जान तुम अपनी बेटी की शादी कहाँ करना चाहोगी? मेरी बिटिया तो हिन्दू की आ शादी करना चाहती है । इतना सुनना था इस सलमान हमने की आंचल से वो निकाल कर भागे क्यो हमीद ने पुराना पूछा हूँ इसलिए हिंदुओं में बुर्के की रिवाज नहीं है और सलमा पडता करना नहीं चाहती । अम्मीजान बडे लाइट मूड में हसते हुए बोली परिस्थितियां खोलती नहीं । उनके भाग के उसने नाम झोंकों में दिन उडते चले गए । गांधी जी के न जाने पर भी भारत का विभाजन हो गया । दान इसको दुख था । सुभाष बाबू नहीं रहे । पढना या कभी नहीं होता हूँ । कोई बात नहीं । जब भी सुभाष बाबू आएंगे दोनों देश एक हो जाएंगे । प्रस्तावित पाकिस्तान से हिंदुओं की वापसी और जगह जगह हिंदू मुस्लिम दंगे आजाद हिंदुस्तान की हमारी कल्पना कि नी नहीं ला रहे थे । इस गंभीर माहौल में जब लोग जांच बारा बजे के करीब हमारे यहाँ से उठे पानी बन रहा था । मौसम की यह पहली बरसात काफी झकझोर रही थीं । सुबह डेढ तक होता रहा हूँ । माने जब मुझे जगाया है काफी घबराई हुई थी । उन्होंने कहा आज नहाकर तो भी पूजा कर देना । मैं जा रही हूँ । मैं कुछ समझ नहीं पाया । आखिर बात किया है । मैंने माँ से पूछा हूँ उनकी आपके चल चला ही कुछ संकेतों से और कुछ पास स्पष्ट शब्दों से उन्होंने बताया कि चौकाघाट पुल के पास एक औरत की लाश कटी हुई मिली है । सुमेर साफ और कलावती उधर गए हैं । इतना मेरी माँ एक साथ में कैसे भूल गई मैं बता नहीं सकता हूँ । इसके बाद तो वहाँ के पूछनी चली गई । हम तो अचानक मेरे मानस में कहने लगी मैं उद्विग्न हो उठा हूँ । आज मान अब भी टपक रहा था । हवा गर्म और नम थीं । याद आॅफिसों की तरह ना हूँ, पूजा करूँ इसके पहले ही मैं गली में आया हूँ । भेजवा की मांग की तरह गली एक दम उदास होता है, कहीं कोई नहीं जैसे परिस्थिति ने सबको बटोर लिया था । सुमेर साफ की दुकान की ओर दौडा । वो दुकान बंद थी और एक बडा सा ताला घर के मुख्यद्वार पर भी लटक रहा था । ऍम आता हुआ मेरे से पहले टीका न हम अपने अस्तित्व का सपोर्ट कर रहा था । जाहिर था कि पीपा अभी नहीं गुजरात था । उसकी सीढी सुमेर साफ के बंद सांग खेल से बंद ही दिखाई पडी जरूर पी पा आया था और वे भी अपना काम छोडकर चाचा के साथ चला गया है । वो निश्चित ही कोई विशेष बात हो गयी । आशंकाएं अपना आधार पानी लगी हूँ । एक बार फिर हम तो की कटी लायें अब तो बस के हाथों में झूलती हुई मेरी आंखों के सामने नहीं तो मैंने हडबडी में ही पूजा समाप्त की और कपडे बहन कर जब चलने लगा तब याद आया कि जहाँ ग्राम को तो स्नान कराना ही बोल क्या? एक बार तो मन में आया की ऐसी ही छोडकर चला चाहूँ कि तो दूसरे झंड धार्मिक विश्वास है । भयभीत हो कहीं उस उपेक्षा से देवता को कितना हो जाएगा । मैंने फिर अपनी कमीज पैंट उतारी, मुड का पूजा के लिए रखा । देश में मतलब बेटा और विद्वत शालीग्राम को नहलाकर बैठाया और जल्दी जल्दी में हुई भूल के लिए क्षमा मांगी । डाला लगाकर चलते समय मैंने गंगा राम के लिए आवाज लगाई भी नहीं था और ना उसके पिता शामनाथ बता चला । थोडा पहले ही कहीं गए हैं तो कुछ दूर आगे बढने पर बुदनी की माँ यानी मंगलों की औरत दिखाई पडी इस कहानी और अब तो देखते ही मुझे लगा की खैरियत नहीं कोई आशुभाषण है । फिर बोल पडी कब तक आएगी क्या मेरा बहुत देखती रह गई धो थोडी देर बाद बोली शायद हमें मालूम नहीं चंपुओं की कटी लाश मिली है ना । उसी के संबंध में पूछ रही थी कि वह कब तक आएगी । मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई । ऍम कुछ बोल नहीं पाया मेरी आँखों के सामने तो बस के उन्होंने हाथों में फंसी एक औरत भी ऍम बुधनी की माँ बोलती नहीं हूँ । आज तडके ही मोहल्ले में एक सिपाही आया था । उसी ने बताया कि चौकाघाट पुल पर एक औरत की कटी लाश पडी है । भारत गर्भवती मालूम पडती है । उसी की खबर सुनकर तो सुमेर साहब और उनकी मेरिया पागलों से दौड गए । मैं सुनता रह गया जब वो गर्भवती हो गई । ये नहीं हो सकता हूँ वो इतनी दूर तक उसे कोई नहीं ले जा सकता हूँ । मैं मुझे दूर अवश्य हो गई । पर क्या मैं मुझे छोड कर चली गई? यदि ऐसा हुआ होता तो क्यों लगती है कि जब को जरा समझा ये मेरी ज्ञान बोलता आवश्यक है, उसके अंदर छटपटा रही होगी । फिर वह संघर्ष और जीवन से भी परास्त होने वाली नहीं । मेरी तंद्रा उस समय टूटी जब बगल से निकलने वाले सिक्के पर बैठा हमी बोला तो क्या सोच रहा हूँ मेरे साथ? चलो आप मैंने अनुभव किया कि मैं सडक पर आ गया हूँ नहीं की माँ बहुत पहले ही मुझे छोड चुकी हैं । कहाँ चल रहे हो और जाना कहाँ चाहते हो तो अमित बोला कहाँ चल रहे हो? यहाँ दो चलना चाहते हो? हमी बोला हूँ अब मुझे दिखाई दिया कि एक के के दूसरी ओर रामकिशोर चाचा भी बैठे हैं । एकदम ऍम । उनकी जनता पर भय एवं आशंका ऐसी लिपटी थी कि वह आदमी से अधिक आदमी की मूर्ति बन गए । उनकी इस मनोस्थिति ने बता दिया कि हमारे और उनके गंतव्य में कोई अंतर नहीं । मैं ये पर बैठ गया । सोचता हूँ मेरी देखता ने मुझे कितना अंतर्मुखी कर दिया था कि मैं हमीद कीडो करने के बावजूद रामकिशुन को ना देख सकता हूँ और एक के पर बैठा भी तो हम दोनों एक दूसरे से कुछ नहीं बोले । चिंतन के खोल में कछुए की तरह दुःख के थे । इसके आगे बढता रहा हूँ । इक्कीस से उतरते ही मैंने देखा चौकाघाट के ओवर ब्रिज पे राजधानी की ओर बढते ही एक स्थान पर काफी भीड लगी है । कुछ लोग आज भी रहे हैं । मैं और करते ही उस और लाख का हमीद और रामकेश्वर धारा देने के लिए पीछे रुक गए । उधर से आया एक आदमी अपने साथ ही से कह रहा था लगता है वह रेल के नीचे नहीं करती है । यदि कटी होती तो लाश पटरी पर होती । दूसरा जब हम पहला कहता जा रहा था पटरी पर कहीं भी मांस या रक्त का कोई चिंता नहीं है । लगता है हत्या कहीं और की गई है और लाश लाकर रख दी गई है । अब तक रामकिशन और हम ईद भी आ गए थे । हम लोग आगे बढे । दो चार कदम जाते ही हमें दिखाई दिया की पुलिस के जवान एक आदमी को उठाकर ला रहे हैं । उसके पीछे रोती हुई कलावती चाहिए, माँ है और मोहल्ले के कई लोग भी तब तो यह समय चाचा ही है । आवश्यकीय देखते ही बेहोश हो गया होगा । मेरे पैर धड कराएंगे लग रहा था कि भूचाल पर चल रहा हूँ । धरती हिल रही है । कोई दूसरी स्थिति होती तो मैं निश्चित रूप से जमीन पर बैठ जाता हूँ । पर इस समय मैंने हमीद का कंधा पकडकर अपने सारे शरीर का भार उस पर डाला । वो मेरे देश चलती सांसों को उसने भी अनुभव किया और भी कुछ समय के लिए खडा हो गया । आप मेरी माँ की नजर मुझ पर पडी । उन्होंने मेरी स्थिति देखी और मेरी और लडकी आते ही उन्होंने बताया हूँ कि चल तो कि नहीं राधा की लाश हैं । मैंने अनुभव किया कि भूकंप का झटका मेरे ऊपर से गुजर चुका है । तब सुमेर चाचा की है । हालत क्यों हुई तो वो इलाज देखते ही फूट फूटकर रो पडा हूँ । उसका कहना था की ज्यादा बेटियाँ की है । हालांकि मेरी वजह से हुई है और उसके रोने से कलावधि मेरी धरोटधार हो गई है । मैंने बताया हूँ सुमेर की मानसिकता वास्तविकता राधा की कटी लाश में चम तो को देखने लगी थी रोते रोते यह कहता जा रहा था हूँ एक ना एक दिन मेरी बिटिया चंपुओं को भी यही दिशा होगी मैं आगे बढकर देखना चाहता था और मैं बोली क्या करोगे उसे देख कर ॅ और वह मुझे अपने साथ ले चली । हमीद मुझे छोडते हुए बडबडाया ऍम तो की लाश होया राधा की हमारे लिए विशेष फर्क नहीं है । जब तक समाज की पूंजीवादी व्यवस्था रहेगी ऐसे हादसे होते रहेंगे । माँ चाचा के पीछे पीछे चली जांचा को ले चल रहे पुलिस के जवानों से ही मालूम हुआ । अभी लाश चीरघर जाएगी । ये झील घर की हो जाएगी । मैंने पूछा वहाँ डॉक्टर इसकी मौत का पता लगाएंगे कि कैसे मौत हुई । मौत का कारण तो साफ दिखाई देता है । मैंने कहा पुलिस का जवान मेरी अबोधता पर्पस पडा फिर बडी गंभीरता से बोला हूँ । हमारा कानून बडा विचित्र है । बेटे जो साफ दिखाई देता है मैं उसे देखना नहीं चाहता हूँ बल्कि जो नहीं दिखाई देता है उसी को वो अपना आधार बनाता है । मृत्यु जीवन को ही नहीं कभी कभी जीवन के पुलिस को भी नष्ट कर देती हूँ । आपको राधा की स्मृति हम सबके समक्ष ऍम उसके चरित्र की काली माँ उसके साथ जा चुकी थी । सुबह चाचा तो मानता ही था कि हमें लोगों ने उसकी जान ले ली । एक रात सोते समय किसी बात पर सिलसिले में माँ बोली तुम लोगों ने चिट्टी के साथ ही यदि राधा का नाम ना जोडा होता तो शायद उसकी मौत होती । मेरी मुक्ता स्वीकार करती थी कि दो बस के पंजे में तो वैसे ही डाल के नाटक नहीं । उसे मौत की मौत धकेल दिया । हो रही है । अपनी उसी के सर क्यों माना जाए हूँ यहाँ मैं उसकी प्लानिंग में नहीं था । अपराधबोध ने मेरी जवान बंद कर दी । मैं वहाँ से तर्क करने की स्थिति में नहीं था । माँ ने इसी संदर्भ में कहा था चोट का फल कभी अच्छा नहीं होता हूँ और मैं इसे मानने को तैयार नहीं । मैं देखता हूँ झूठ बारह हरे वाले ही अच्छा फल भोग रहे हो तुम देखना उन का भी अंत अच्छा नहीं होगा । इसके बाद हो गए बात आई गई और पुरानी पड गई और मेरे चाचा की उधर ही पुरानी नहीं पडी है और अधिक दुखी दिखाई देने लगा जिससे मैं जान से मार डालने के लिए कभी तैयार हो जाता हूँ । उस राधा की मृत्यु पर कभी इतना दुखी हो सकता है इसका भी वह नहीं किया जा सकता । रिटिज ता की ओर बढती हुई सुमेर चाचा की मानसिकता तो वहाँ वो लगने लगी क्योंकि मैं राधा की विकेट लाश की भी व्यवस्था में चंपुओं का भविष्य देख चुका था । इधर दौरे भी कुछ अधिक बडने लगे थे । अब तो है बिना की बाहरी उत्तेजना की । सोचते सोचते बेहोश हो जाता हूँ । अब उसे कोई रहा नहीं रह गई थी । लोगों से मैं बहुत कम बोलता था । लगता था चाचा आप चारों ओर से अपने को समेत चुका है । बडी से बडी घटना का समाचार उसे झूमता और फिर चलता हुआ चला जाता हूँ । मैं एक भी तरह ही की तरह संसार सागर के ज्वारभाटे को देखता रह जाता । लगता है अब हिंदुस्तान का विभाजन हो जाएगा । चाचा ने इस खबर को भी चुपचाप सुन लिया । लोग बहस करते गए पर चाचा का इसमें क्या मतलब? अगस्त का महीना शुरू हुआ हूँ । पर साथी माहौल में स्वतंत्रता की घर पर ही चली गई । वो सपने कहने लगे वो मुस्लिम बहुल प्रदेश जो पाकिस्तान के अस्तित्व के मोल में था, संप्रदायिकता से चलने लगा था । हिंदू निकाले जा रहे हैं । उनके लिए आजादी का क्या मतलब? अखबार पढते हुए एक शाम को मैंने बात छेडी लगता है यहाँ भी दंगा होगा । सकडी खींचने वाला मंगरू आता और दाल बोलते हुए बोला मैं या हम तो अपने गांव चले । जब भारत में जाए । सेना जादी जिसमें दो ही रोटी की कमाई भी मोहाल हो जाये । चाचा की कोई प्रतिक्रिया नहीं । मैं ये भी नहीं कैसा का की उधार पैसे देकर ही गांव जाना चाहिए । आकाश में बादल छाने लगे । आकाश में बादल छाने लगी । थोडी देर बाद ही भूनते दूध पडी अखबार सुनने आए लोग घटने बढने लगी अंधेरा बडा मैं लालटेन जलाकर ले आया हूँ । अब सुराजी बहस को समेटकर रामकिशुन चाचा भी जा चुका था । दुकान में मैं चाहता हूँ और चाची मैच तीन ही लोग रह गए थे । चाचा कम ऑन चाची को भी अपने साथ का बेटा था । मेरी निगाहें जो जातक अखबार बन लगी भी बढ बढ नहीं रहा था । मेरी दृष्टि में तो दंगे के पुराने क्षेत्रों भर रहे थे । मैं सोच रहा था कि यदि इस बार दंगा हुआ तो क्या होगा? दानिश का घर तो हिंदुओं के मोहल्ले में है । यह बात दूसरी है कि उसके घर के आठ दस घर बाद ही मुस्लिमों की बस्ती शुरू हो जाती है । भर बैठना निर्भीक है और लोग उसे इतना मानते हैं कि उसके लिए तो कोई खतरा नहीं हो किंतु दंगे के समय आज में की बुद्धि दिखाने कहाँ रहती है और यदि रहेगी तो दंगा क्यों? संप्रदायिकता आदमी को शैतान बना देती है । इन शैतानों की घूम कार चढाई क्या दान इसका परिवार बर्दाश्त कर सकेगा? धानी तो कहीं भी जी लेगा । जब अंग्रेजों की आंखों से ओझल रहकर उसने फरारी के दिन काट लिए तब उसे दंगे की क्या परवाह हूँ और उसके परिवार का क्या होगा? तब क्यों नहीं मैं उसे अपने आरख लू मेरे नीचे का डायलान और उसके बगल की कोठी में काफी जगह हो गई तो बंदी पडी रहती हैं । किन्तु क्या मेरी बात मानेंगे? पीटीआर्इ को तो स्वीकार कर लेंगे पर मुसलमान घर में रहे, ये कैसे होगा? फिर मेरा क्या होगा? मुझे लगा कि अखबार के भीतर से झांकती हुई सलमा की दो अदद आंखें मुझसे पूछ ही नहीं । नहीं मान्य उस दिन कहा था ना कि मेरी बेटी हिंदू से शादी करना चाहती है । इसका मतलब तुम समझते थे वहाँ मैं समझता हूँ समझता हूँ मेरा मन बाॅलर मेरी आंखें अखबार पर ही लगी थी और मैं जब था जल्दी जल्दी बदलते इस देश के राजनीतिक मिजाज को कोस रहा था । वो अभी चार दिनों पूर्व ऐसी हिन्दू मुसलमान एकता और आज दंगे की आशंका इसी बीच भी पा अपना काम खत्म कराया और रोज की तरह चाची से उसने मिट्टी के तेल का कनेक्टर मांगा हूँ । आपने मिनिस्टर का शेष तेल उसमें उन्हें लगा हूँ जहाँ जहाँ बडी गंभीरता से देखता रहा हूँ । हाँ तेल के लिए जाने के बाद बोला एक बात ही क्या? अब तुम अपने बचे हुए तेल की व्यवस्था कहीं और करो हूँ । अब मैं मिट्टी का तेल नहीं बेचूंगा । ऍम थी मैं संथा होना है । दंगा होने वाला है । चाचा की आवाज एकदम घटाई । दंगे में मिट्टी के तेल लिंग गजब ढाया है मैं । अब मैं अपनी दुकान में मिट्टी का तेल नहीं रखूंगा । और भी चोरी का । अरे इस जन्म में तो अपनी करनी का फल होगी । रहा हूँ । अब अगले जन्म के लिए तो कुछ करने दो । चाचा का घंटे भराया । आंखों में तो सहसवां समझाने लगे पंद्रह अगस्त उन्नीस सौ सत्ता हस्तांतरण ऍम पिछली रात माँ भले ही कुछ क्षणों के लिए सोई हूँ पर मैं एकदम नहीं हो पाया हूँ क्योंकि मुझे लग रहा था कि हम कितने भाग्यशाली है । हम स्वतंत्रता था, प्रकाश देखेंगे । हम देखेंगे मुक्त आंखाें जिसमें हमारी कल्पनाएं, नए पंख लगाकर बोलेगी । जब हम देखेंगे मुक्त जीवन जिसमें से किसी की दास्तान, किसी की गुलामी नहीं होगी जिसमें अत्याचार नहीं, उत्पीडन नहीं । अमीर गरीब नहीं हिन्दू मुसलमान नहीं तेरह मेरा नहीं जिसमें सब कुछ अपना और चीज अपनी कहाँ आज जब तो होती तो वो भी नहीं हो पाती । मैं उसे सो नहीं नहीं देता हूँ । हम दोनों मिलकर झंडियां बनाते और सूरज की पहली किरण के पहले ही अपने दरवाजे को सजा देते । अचानक एक आवाज मुझे नहीं लगी । नहीं मैं सोई नहीं हूँ । विश्वास करो चक्कू में सोई नहीं हूँ । चाहते मुझे सोने के लिए है भी नहीं । आठ दिन है तो मुझे काटने दौडता है । आज रात बारह बजे मिलने वाली आजादी का शायद मेरे लिए कोई मतलब नहीं । क्योंकि गुलाम भारत में ही उस लाला के बच्चे नहीं एक ऐसी गुलामी मुझ पर मार दी जिससे मैं स्वतंत्र भारत में भी उतार कर फेंक नहीं सकती थी । उस रात एक बार फिर घबरा करोड गया । यह हम तो क्या मुझे कहाँ सुनाई पडी लगता है मेरा अवचेतन ही बोल रहा था । बडे लोग कहते हैं कि किसी को हिदायत है यदि याद करो तो वह भी उसे याद करने लगता है हूँ । निश्चित ही चंपू मुझे याद कर रही होगी । अवश्य ही वह किसी फंदे में फंसी है तो इससे मुक्ति हो पाना उससे दुष् कार लग रहा होगा और वह कमीना लाला होने दो आजाद कल के बाद ही देखना तो हमारे प्रति किए गए व्यवहार का उस साले सेफ है । बदला लूंगा की जन्मजन्मांतर तक याद रखेगा तो मैं भावेश बडबडाता हुआ टहलने लगा था । माँ को आहत लगी वो करवट बदलते हुए वहीं क्या है जब वो कुछ नहीं मान आज प्रभात फेरी में जाना है तो सोचता हूँ तैयारी करूं बहुत सवेरे लोग आ जाएंगे पर अभी तो आधी रात ही बीती है तक ले जाकर सो जाओ । माँ के कहने पर मुझे बुलाना चारपाई पर आना पडा हूँ । आजादी का हर्षवीर एक नरेंद्र को पीछे ढकेलता रहा हूँ । कभी कभी छब्बीस ही लग जाती थी । पर बीच बीच में आंखें खुलती रहीं । समय के बहुत पहले ही उड गया । वहाँ धोकर चक तैयार हुआ । तब कोतवाली से गजर के साथ चार घंटे बजाएं । निश्चित ही अभी काफी जल्दी है पर घर बैठ कर करूंगा क्या? आसमान साफ था और मौसम सुहावना हो । मैं माँ को सोता छोडकर धीरे से घर से बाहर निकला हूँ और दानिश के घर की और चला गलियाँ सुनसान दो एक लावारिस गायों और को तो क्या करें तो राम राम कहती गंगा स्नान के लिए जाती हुई एक बढियां अवश्य मिली और कहीं कुछ नहीं । मुझे थोडी हैरानी जरूर थी । जिस आजादी के आगमन के उल्लास ने हमें सोने नहीं दिया उसी में सारा शहर सो रहा है । धान इसका भी दरवाजा बंद है । दरवाजे से झांककर देखा तो जागरण का कोई सुराग नहीं । बहुत खटकाने और अम्मी जाने दरवाजा खोला आज मोहन दे रहे चले मैं बोली ही आजादी मिलनेवाली है ना मेरा कॅाल का और आप लोग हो गए मिला करे आजादी बडी उपेक्षा थी हमने जानकी बोली में ऑर्डर घर लौटकर दालान में पडी अपनी जिलांग चारपाई पर लेट कहीं कुछ समय नहीं पाया । युगों से बाली आजादी का नारा उत्खनित था । आज अचानक उन उलझाने क्यों लगी? अम्मी जान से हुई बातचीत से पता चला कि लोग रात में काफी देर से सोये हैं । बात ये थी कि मोहल्ले के मुसलमानों की राज में मीटिंग थी । उन्हें आशंका थी कि अब उन्हें हिन्दुस्तान छोडना पडेगा क्यो क्योंकि हिन्दुओं को पाकिस्तान से निकाला जा रहा है तब पहला हिंदू इस देश में क्यों रहने देंगे? हम अपनी जान की आवाज भारी हो गयी । प्रयास शादी हमारे किस काम की जिसमें हमारा देश हमारा नहीं रह गया तो सच कुछ हमें देश छोडना पडेगा । ये मासूम आवाज अलमा की थी जो अब तक सोई थी और अचानक जान पडी जवान से कहीं अधिक उसकी आंखें मुझे पूछती नहीं नहीं नहीं कुछ नहीं होगा मैं वो तो इतना निकला हूँ और आंखों ने क्या कहा है शब्दों की परिधि के बाहर है पर अम्मी जान मानने को तैयार नहीं देश मैं जब के आधार पर बांटा गया हिन्दुओं का अलग देश को क्या मुसलमानों का अलग देश हो गया तब हम हिंदुओं के देश में क्या रह सकेंगे? जरूर रहेंगे बैली हम लडाई के साथ यह गर्जना दानिस की थी । फिर क्यों? क्योंकि ये देश केवल हिंदुओं का नहीं है बल्कि उन सबका है जो देश में रहते हैं । हो रहा था कि दानिश हमने जान के डर से उठा था तो नहीं पागलों की बात में आ जाती । होमा पैदा यही हुआ है । जिंदगी नहीं गुजारी । बाप दादा यही रहे आप चाहो तो कहाँ जाऊँ? क्या बाप दादों की कपडे भी उखाड कर ले जाए जा सकती हैं । अम्मी जान चुप हो गई उनका ऍम एक तक के मैं चूर हो गया । भाई भी कोई भले ही देश छोड दे तो मैं तो अपनी चाची को छोड कर कहीं नहीं जाऊंगी । इतना कहते हुए सलमान इठलाती हुई उठी और पी आरी से जाकर लिपट गईं । बिहारी तो महज एक प्रतीक हो गई थीं । फॅमिली उसकी कई नहीं, पर मुझे एक विशेष प्रकार की अनुभूति हो रही थी । घंटों इस संदर्भ में बीत चुके थे । आकाश में लाली आ गए नहीं । सूरज की पहली किरण अब झांकने ही वाली थी कि अचानक लगा कि कुछ लोग दरवाजे के बाहर इकट्ठा हो गए । लगता है बारिश हो रहा है । बाहर किसी ने कहा हो सकता है मैं प्रभातफेरी में शामिल हो । दूसरे ने कहा क्यों हो? क्योंकि कुछ मुसलमान स्वतंत्रता दिवस को काला झंडा दिखाने वाले हैं । उसी आदमी ने कुछ रुक घर पर कहा हूँ । उनका कहना है कि इस निर्णय में मुसलमानों के साथ न्याय नहीं हुआ । वो न्याय तो पूरे देश के साथ नहीं हुआ, पर आजादी तो मिलने दो । हम अपनी समस्या खुद सुलझा लेंगे । फॅारेन बातों से क्या फायदा? दरवाजा तो खटखटाओ साफ मालूम हो जाएगा कि दानिश क्या चाहता है । दरवाजे की खटखटाहट शुरू हुई । सलमा नहीं दरवाजा खोला । ऍफआईआर क्या नहा रहे हैं आप लोग मेरे में बुलाती हूँ । दानिश भीगे कपडों में हाजिर हुआ । माफ करना देर हो गयी । हम लोगों ने सोचा शायद तो झंडा लगाने में लगे हो । झंडा आईटी कर रहा था ऐसा झंडा काला या तिरंगा जिंदगी भर तो तिरंगा था । आज काला कैसे हो जाएगा? कुछ लोगों ने तो अपने झंडे का रंग बदल लिया है । वे हरामजादे कमी नहीं है ही के कपडे में ही दानिश ने ऐसे आदेश में कहा कि वहाँ खडे हर व्यक्ति का मोह छोटा हो गया । अब बातें बढाना उन्होंने नहीं समझा । अन्य पूर्ण गंज गोल से ही धर्म प्रभात फेरी शुरू करेंगे । आप जल्दी वहाँ पहुंचने की कृपा करें । निर्देश देकर वो सब चले गए । हमारे साथ तैयारी चाची भी नहीं । हमें उन की उतनी आवश्यकता नहीं थी । कितनी उसके कंटकी थी । बंदे वाड्रन गीत की थी । हम मस्ती में गाते उछलते कूदते गलियों में घूमते रहे क्योंकि हमारे सोचने के अनुसार ये ऍम प्रभात फेरी थी । स्वतंत्र भारत में प्रभात फेरी की आवश्यकता क्या? जब हम अपनी गली में आए तब गंगा राम भी हमारे साथ हो गया । आज तो प्रेस बंद होगा । मैंने पूछा नहीं पहले हम लोग सोचते थे कि बंद रहेगा । किन्तु बाद में हमारे संपादकों ने सोचा कि जैसे देश के इतिहास में यह दिन फिर कभी नहीं आएगा, वैसे ही अखबार के जीवन में ये दिन फिर आने वाला नहीं है । आज के अखबार की एक एक लाइन इतिहास बन जाएगी । गंगा राम के इस कथन पर हम लोगों नहीं कोई विशेष ध्यान नहीं दिया । हम नाचते गाते आगे बढे । धर घर पर झंडे लगाए जा रहे थे । मोहल्ले में अजीब पूछ रहा था । बेहरू के चबूतरे पर पानी भरती औरते कह रही थी कि अब रहिल गाडी में चढने के लिए टिकट नहीं खरीदना पडेगा क्योंकि रेलगाडियां अपनी हो जाएगी । कुछ ऐसे ही बात बुधनी की माँ भी सुनी नहीं की आप लगान नहीं लगेगा क्या मीन अपनी हो जाएगी जवाहिर का छोटा लडका दो डर किसी की खुशी में था कि आप सिनेमा में भी टिकट नहीं खरीदना होगा । ऐसे ऍम कैसे? आकांक्षाएं तीन लोगों की सूरज की किरणों के साठ दिन की रंगीनी भी बढने लगी थी । इंडिया टांगी जा रही नहीं । पछुआ हवा में राज्यों पर लगे तिरंगे लहरा रहे थे और लास्ट जैसे धरती सिर्फ वोट पड रहा था किंतु हमारी डोली हूँ जब सो मेरे चाचा की दुकान पर पहुंची तो तब है बंद थी आधा आगे के भाग्य की तरह काम ज्यादा की जवान की तरह पीटीआर्इ का गीत भी वहाँ पहुंचाने के पहले हम गया था उसने और उनको भी चुप कराया हूँ दो ली को आगे बढने का संकेत करके मुझे लेकर गया तो मेरे चाचा के घर के भीतर पहुंॅच मैं या कहाँ है? तालान में बैठी गलावटी से उसने पूछा हूँ । कलावति ने चुपचाप कोठारी की ओर इशारा किया । भीतर चाचा चौकी पर मौन पढा एक धर्म की ओर देख रहा था । पी बिहारी ने भीतर घुस नहीं पुकारा थैया जाए तबियत कैसी है वो ही रहा हूँ उसकी आज कितनी टूटी और लडखडाती हुई थी । किधर है अपने अस्तित्व का बहुत तो अच्छी तरह कर रही हो । शक्ति और ऊर्जा नहीं हो आज उठेंगे नहीं क्या भैया पियारी नेपुरा पूछा क्यों हो क्या कुछ विशेष बात है? आजादी मिलनेवाली है । व्यास नहीं लगा बडी ऋत् रूप होती थी । उसकी और तो नहीं पढा था और उसका माॅगलिक नहीं लगा । पी बिहारी ने भी वैसा ही अनुभव किया और जो क्या बाहर निकल आई उदास कलावधि को प्रणाम कर हम चल पडे । बडी तेजी से चलते हुए हम अपनी झोली भरे । चंद्र कॉलेज के पास में फॅमिली के आगे आप आकर बिहारी फिर गाने लगी । पर उसके स्वर में वह बात नहीं थी । टाउन हॉल तक बढते बढते हमारे मन को जैसे किसी ने झकझोर दिया । हमने देखा कि दूसरी ओर से आने वाली टोली का नेतृत्व लाला और छोटे सरकार कर रहे थे की स्थिति है । हाँ, दोनों के सिर पर गांधी टोपी फिर सवाल हो गए । दोनों खादी में अंतर यही है कि लाला करता धोती पहने और छोटे सरकार की खाई कमाई तोंद पर धोती ना ठहरने की असमर्थता के कारण पजामा प्रतिष्ठित है । मुझे वैसे ही गोद लगाकर खडी की हुई जान धार वाले हों । परेशान धारना लगी थाने से रहना गया । उसने मेरे खान में धीरे से कहा । देखते हो ये दोनों कमीने फिर आ गए और उनके पीछे सारे सुराजी लोग । इनमें कुछ जेल जाने वाले भी हैं । कहीं हमारी आजादी इन चीजों की मुट्ठी में बंद तो नहीं हो जाएगी । दानिश की बात सुनते ही सुमेर जान जाऊँगी विद्रुप हँसी फिर मेरे कान में गूंजने लगी । टाउन हॉल में ही प्रभात फेरी की टोलियों का व्यवस्था जानता हूँ । एक संगम था जहाँ चारों और बहती हुई विभिन्न धाराएं धीरे धीरे मिल रही थीं । जगह जगह का पानी दिखाई दे रहा था । रामलाल, रामदेव ॅ नरेंद्र बहादुर आधी लाला के आदमियों के साथ ही लालू भी अपनी आप टाइम ही कहाँ पकडे दिखाई दिया । लालू दौडा हुआ मेरे पास आया, दसवीं दूरी खडा रहा हूँ । उस दवाई के मन नहीं का सैड संकोच अपने और मेरे बीच की दूरी को लांघना सकता हूँ । मैं स्वयं मजदूरी को समेटता हुआ उस तक पहुंचा और उसने बोला कब आए कल लेकर आए हैं तो मैं मुस्कुराया और बडे सहज भाव से बताया हूँ । सुनते ही आजादी मिला था । वही देखते हुए बडे चले आए । मेरे पीछे से एक जानी पहचानी खिलखिलाहट छोटी मैंने मुडकर देखा भी नहीं । फिर भी हम इतने मेरे कंधे पर हाथ मारते हुए कहा हूँ । इन होने वाले देहाती लोगों के लिए आजादी अनुभव कि नहीं, मैच देखने की वस्तु है । ये उसे देखने के लिए गांव छोडकर बना रहे चला आया है । यही हालत हमारे गांव के अस्सी प्रतिशत लोगों की है, जिन्हें शहरों में ही आजादी दिखाई गई है । जहां खाओ उससे अछूते रहे गए । अब दानिश भी चलाया था । हमीद अभी बोलता जा रहा था इसलिए मैं कहता हूँ कि ये लडाई अधूरी है । एक तरफ ऐसे भोले भाले लोग हैं और दूसरी तरफ आजादी मिलने के पहले ही उसे चबा जाने के लिए तैयार है लोग । उसने मंच की ओर संकेत क्या लाला प्रभाव फेरी की टोलियों को संबोधित करने के लिए मंच पर जा चुका था । कुछ भी हो पर आजादी हमारी ही है और हम इसके लिए सैकडों वर्षों से कुर्बानी देते आए ये हमारे आंखों की रोशनी है । हमारी श्वासों में वायु का प्रं कम्पन हैं । हमारे जीवन की उष्मा है इसमें थोडी कमी भी हो, थोडी तृतीये भी हो तो भी हमें इसका स्वागत करना चाहिए । ये सकते है कि हमारा चाहा हुआ है । सब कुछ नहीं हुआ हूँ पर बहुत कुछ हुआ हूँ इसलिए हम दुखी ना हो और पूरी हार्दिकता से इसका स्वागत अभिनंदन करिए । मुझे ठीक याद है कल के संपादकीय के मुख्य विचार । यही नहीं यही धारणा जनता में घर कर गई थी । लोकसभा से ही आजादी के उत्साह में मांगने थे । आज दोपहर को चंद्र भी सोमेर चाचा के यहाँ आया था साहब जी अब तो कुछ भी हुआ उसे भूल जाओ । खुले दिन से आज की खुशी में शामिल हो कौन जाने सामूहि खुशी के भीतर ले कई हमारी खुशी भी छाती हो । चंद्र ने चाचा की बुझी हुई आशा को पुना जलाने का प्रयास नहीं किया । मैं चले तो नहीं मैं आप पकडकर रहे गई । टीपा, मंगरू आदि के कहने पर चाचा मान गया । तय हुआ की हम सब लोग जुलूस में चलेंगे क्योंकि वो दिन फिर आने वाला नहीं है । जो जो दोपहर डालने लगी, दिन चहकने लगा मुझे वहाँ का हिलौरे लेता । सागर । जिसमें अदालत वृद्ध सभी डूब उतरा रहे हूँ । मैंने अपने जीवन में कभी नहीं देखा था । दोपहर की कोई से आने के बाद माँ ने भी संदूक से पुरानी खादी की साडी निकली । उसके फटे अंश जिले और उसे साबुन से धोने लगी । यही उन्होंने मेरे सारे कपडों के साथ भी किया । तो तेवर पहचान में एक विचित्र बात और हुई । आते ही माँ कपडों के सफाई पर जुड गईं । उन्होंने पोटली में बंद पराठे आने पर धरती है क्योंकि उन्हें आशंका थी कि कहीं बादल ना जाएं । जो भी खाती देर में सकती हूँ । मैं भी उन्हीं के साथ लग गया था । पराकाष् खोला था । पादनों के दो चार टुकडे तैर अवश्य रहे थे । कपडे फैलाकर कोठरी में गए । तब देखा आले से बोट ली गिराकर दिल्ली पराठे खा रही हैं वो हमें देखते ही भाग नहीं यद्दपि । नाभाग थी तो मैं उसे हटाती भी नहीं क्योंकि है उसे देखकर हंस रही थीं । अब हम आजाद हो रहे हैं तो यह दिल्ली भी क्यों ना आजाद हो के लिए पूर्व माँ बिल्ली की ऐसी हरकत इतनी खुशी का भी वहाँ पर नहीं हुई थी । इसके पूर्व ना दिल्ली की ऐसी हरकत पर इतना खुश कभी नहीं हुई थी । शाम होते ही प्यारी और सलमा भी मेरे यहाँ आदयगी और अंधेरा होने के कुछ पहले ही हम घर से निकल पडे । आज पहला अवसर था जब माने चादर नहीं हो रही थी । मैंने टोका भी । मैंने कहा जानी बहुत कहती है कि आज से बढता हटाओ और गुलामी की तरह इसे भी उतार फेंको ना मुस्कुरा रही नहीं । सलमान डाली बीट कर जोर से हंस पडी क्योंकि माँ का गठन उसकी रूचि के अधिक निकट था । अंधेरा होते ही नगरी जगमगा उठी हूँ जैसे कई दीपावाली या एक साथ मिल कर चली आई हो नहीं शुक्रवार फॅमिली आकाश में एक जन का कहीं बना नहीं लगा । वही टुकडे टुकडे होकर धरती पर बिखर जाएगा हूँ । झंडे और झंडियां नारे और एक धो लक और शहनाई तथा नगाडे ऑटो रही हैं । हर्शोल्लास थी ध्वनियों के बीच को झडता एक मैं आज जुलूस और उसी में हम सब लोग लगे थे आगे आगे महिलाएं जानी बहुत प्यारी और सलमान के साथ सैकडों और थे जो कभी मु खोलकर बाहर नहीं निकली । आज सडक पडती हूँ । उनके पीछे पुरुषों की अंतिम पम्पी हाथों में आजादीकी मशाले लिए हुए थे । जिलों में उत्साह का ज्वार समेटे और आंखों में स्वतंत्र भारत के सपने संजोय रोशनी की है । नदी दशाश्वमेधघाट से टाउन हॉल की ओर सरकार थी । चली और गंतव्य पर आकर एक बडी प्रकाश की झील में परिवर्तित हो गयी । मशाले अभी चल रही थी । आजादी के जन्म के उच्च वाश का धुआ संवेद होकर आकाश के और बडता चला जा रहा है । टाउन हॉल का मैदान खचाखच भरा है । सामने मंच पर लाला छोटे सरकार और उनकी गोल के लोग पहले से ही विराजमान है । इसके बाद भी कितने लोग उस पर चढ गए हैं कि मंच टूट जाना चाहता है । अब स्वयंसेवकों ने रोकना आरंभ कर दिया है । अब कोई भी व्यक्ति मंच की ओर ना बडे जो जेल ना गया हो । माइक से आवाज आई । दानिश धक्का मुक्की करके आगे बढते बढते बचाना छोटा गया । यही स्थिति महिलाओं की ओर से आगे बडने वाली रानी बहू और प्यारी की हुई । रानी बहुतों हिदायत सुनते ही बैठ गई, पर प्यारी खडी होकर कुछ सोचती नहीं । तब तक लाला ने उसे देख लिया और माइक से ही उसे बुलाया तो दो ही महीना सही है, जेल तो गई थी । मैं जान समुद्र के एक बुलबुले की तरह उत्तराई और तैरती हुई मंच कि वार बडी अब दानिस कुलबुलाता हुआ हमारे पास आया हूँ । लगता है अब आजाद हिंदुस्तान में जेल जाना ही एक सर्टिफिकेट हो जाएगी । तुम्हारे ऐसे लोगों की सेवा का भी कोई मार्च में नहीं जिसने जान जोखिम में डालते हुए नलवे के सहारे चढकर दीवानी कचेहरी पर तिरंगा लगाया था । उसने वजह संबोधित करते हुए कहा पर मैं चुप था । सच पहुंच उस भीड में आज मुझे कोई पहचाने वाला देना देखा । पांच वर्षो में ही मैं बोला दिया गया था जनता की स्मृति इतनी दुर्बल होगी मुझे विश्वास नहीं हूँ । मेरे ही बगल में चाचा मंगरु पी पा आधी खडे तमाशा देख रहे थे । अब तक कम्युनिस्टों का भी जुलूस आ गया जो अपने झंडे के साथ साथ रोटियां भी टांगे हुए थे । उनके लिए ये राजनीतिक आ जाती अब तक अधूरी थी जब तक हम पूरे हिंदुस्तान के लिए रोटियाँ मुहैया न करा सकें । भीड काफी बढ रही है । आप चाहे वहीं बैठ जाएं केवल जेल जाने वाले लोग मंच केवल बडे लाला पूना मंच से चलाया अबे साले तू कौन जेल गया डाॅ ठीक लगाई आस पास के लोग हर बडे एक फुलझडी छोटी बर फिर क्यूँकि क्यूँ अब सभा की कार्यवाही शुरू होने जा रही है । लाला ने अध्यक्ष पद के लिए छोटे सरकार का नाम प्रस्तावित करते हुए कहा हमारा सौभाग्य है कि इतने बडे समाजसेवक दीन दुखियों के हमदर्द, चिंतक और विचारक हमारे बीच उपस्तिथ है । आखिर ये सब क्या हो रहा है? डाॅ । बुलाया पर सब जो थे जहाँ जा आवश्यकता से अधिक गंभीर दिखा । छोटे सरकार अध्यक्ष के आसन पर विराजमान हो चुके हैं । महिलाएं मालाएं पहनाई जा चुकी थी । पराधीन भारत में उनकी खडी मुझे जिन्हें उखाडने की हमने बार बार शपथ ली थी वो रफ्तार से खडी थीं । लाला बोलता जा रहा था यह सुखद सहयोगी है कि आज शुक्रवार है । शुक्रवार के ही दिन ईसा पैदा हुए थे । इसे दिन हमारा रहनुमा गांधी पैदा हुआ है और इसी दिन आजादी भी पैदा हो रही है । तालियों की गडगडाहट हुई पर तनीष चलाया । जिस तरह तुमने हिस्सा को सोली दे दी उसी तरह तुम गांधी को भी सोलह पर चढाओगे और इस आजादी को जब आ जाओगे । इस बार कुछ लोगों ने धान इस की ओर देखा हूँ किन्तु भीड अपनी प्रकृति के अनुसार ज्यों की त्यों वाला बोलता जा रहा था । आजादी आ रही है इस देश में अब कोई भूखा नहीं रहेगा, कोई नंगा नहीं रहेगा । अब किसी की बहू बेटी की इज्जत पर कोई खतरा नहीं होगा । नहीं नहीं है सब झूठ है पर ये मैं ये कमीना इस आजादी के ही छत पर खतरा बन खडा हो गया है । इतना कहते कहते सुमीर चाचा का आदेश बार बडा यानी मेरी चल तो को निकल गया राधा को जब आ गया अब हमारी आजादी को भी निकल जाएगा चाचा इतने जोर से चिल्लाया की आसपास खलबली मच गई और फिर मैं देख रहा काम नहीं लगे । मुझे भी लगा कि पैदा होने के पूर्वी हमारी आजादी ऑक्टोपस के उन्होंने पंजों के भीतर फंस गए हैं । पर दानिस निराश नहीं था । आने दो सौ भाजपा आपको इन कमीनों में से एक एक को मैं समझाऊंगा अब तक चाहे आप बेहोश होकर लडखडाया यही मरीचिका की और दौडता दौडता कोई मैं दाग घर जोर होगी चुका हूँ हम लोग जब उसे उठाकर बोरले चली भीड से एक आवास फोर्टी पागल है । उसे ऐसे ही दौरे पडते हैं

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