Made with  in India

Buy PremiumDownload Kuku FM

Transcript

सभ्यता की ओर: भूमिका

तो को एफएम के श्रोताओं रमेश मुद्गल का नमस्कार आप सुन रहे हैं कुकू एफएम पर गुरूदत्त लिखित सभ्यता की हो ऍम सोने जो मनचाहे भूमिका हिंदी सब कोष में सभ्यता का अर्थ लिखा है सब होने का भाव फोर सब है कि अर्थ लिखे हैं सभा के योग्य चीज सु संस्कृत नम्र ऍम विश्वस्थ आज सभ्यता के व्यावहारिक ओर ही बन गई हैं । ये अर्थ है पक्के, बढिया मकान में रहने वाला, सबसे तथा स्वच्छ कपडे पहनने वाला, मीठी मीठी बातें करने वाला, दूसरों की किसी भी बात का प्रतिवाद नहीं करने वाला, लडाई झगडे में शांति स्थापित करने वाला, वैज्ञानिक उन्नति से लाभ उठाने वाला और नवीन वैज्ञानिक विचारों को स्वीकार करने का दावा करने वाला । इन अर्थों में बम्बई में रहने वाला मीलों का करोडपति मालिक, एक उच्च पदाधिकारी, एक बातों ने वकील, अपनी योग्यता को छुपाने में सफल डोक्टर इत्यादि सब माने जाएंगे । एक नगर में रहने वाला इस विचार से एक देहाती से अधिक सब समझा जाएगा तथा एक वनवासी दूर पहाड की गाडी में अकेला रहने वाला गडरिया काम सब समझा जाएगा । इसी कारण गडबड है की सभ्यता से वनवासी की ओर वनवासी से ग्रामीण तथा उससे भी अधिक टेस्ट एक नागरिक की सभ्यता समझी जाएगी । एक यूरोपियन का जीवन स्तर एक हिंदुस्तानी से उच्च माना जाता है । इसी कारण उसका जीवन अनुकरणीय समझा जाता है । आज हम ऊंचे उसे महल, भगवा, विशाल, सडके, बना हवाई जहाज अथवा मोटरे रखकर अपने को उन्नति और सब देता ये और ले जा रहे हैं । वास्तव में यह गति सब नेता की ओर नहीं है, जैसा कि ऊपर दर्शाया गया है । सब और सभ्यता के ये अर्थ नहीं । ये व्यावहारिक, सभ्य और सब रहता कि अर्थ गलत है । योग्य तीस संस्कृत वी नई और विश्वस्त व्यक्ति को ही सब मानना चाहिए । बस पद पर झूठ बोलने वाला, धोखाधडी करने वाला, अभी मान युग तथा मिलता का वफादार करने वाला, अपने से हीन को दुःख देने वाला । भले ही वह महलों में रहता हूँ, जब नहीं माना जा सकता हूँ और उस जैसा व्यवहार रखना, नगरों में रहना, मोटर और हवाईजहाजों में घूमते हुए बढिया वस्त्रादि पहनना तब देता नहीं मानी जाएगी । यह पुस्तक इसी विषय पर गुप्त विचारों को आधार बनाकर लिखा गया उपन्यास है । तब देर और सभ्यता का मापदंड मन और व्यवहार की हूँ । श्रेष्ठता है नहीं की दाल संपदा संपन्नता हो

सभ्यता की ओर: प्रथम परिच्छेद भाग 1

फॅस प्रथम परिच्छेद भाग एक ब्लाॅक समीर चलती है तो दूर सीधे अज्ञात स्थानों पर भी जा पहुंचती है । न्यूनता अधिक मात्रा में इसका प्रभाव सब पर होता है । भले ही कोई भाग्यहीन दूर किसी गुफा के और बिहारे में बडा हो, वह भी प्राथमिकी समीर के प्रभाव से बस नहीं सकता हूँ । भारत में भी लाते कि एक सुखद समीर चली तो राज्य मिला । एक सहस्त्र वर्ष की दासता की श्रृंखलाएं टूटी और भारत का मानव भी बंधित हो दो । सहस्त्र लंबा जोडा देश प्रसन्नता से देदिप्यमान हो गया । कलकत्ता और मुंबई सदृश्य प्रमुख नगरों में तथा दिल्ली, लखनऊ, पटना, मद्रास इत्यादि राजनीतिक हलचल के केंद्रों में तो सर राज्य मिलने की धूम थी ही । यह तो राजस्थान की उसको मरुभूमि में बसे तीन चार घरों के गांव तथा हिमाचल के दुर्गम मार्गों पर बनी गडकरी की झोपडियों में भी पहुंची । कैसे पहुंची और पहुंचने पर कैसी अनुभूति हुई यह वरना अंतित है परन्तु जब पहुंची तो एक नव उमंग तरंग को लिए हुए मानव के लिए स्वर्ग का द्वार खोलती हूँ, उसके सुख सपनों को साकार करने की आशा से भरी हुई जैसे बंदी की रेवडियां खुलने पर प्रथम क्या जो उसके मन पर होती है वह जकडकर बांधे हुए हम लोगों को फैलाता है, वैसे ही भारत में मानव ने सांस ली । उसने दीर्घ सांस ली और प्रभात के उस मलयानिल को अपने शरीर में भर लिया । कुमाऊं की पहाडियों में अल्मोडा से कैलाश के मार्ग पर मार्च से भी एक और हटकर गडरियों का एक परिवार रहता था । वहाँ परिवार वहाँ जाकर कब से रहने लगा और क्यों वहाँ गया ये कोई नहीं जानता था । उस परिवार का प्रमुख व्यक्ति जिसका नाम श्रीपाल था, बस इतना ही जानता था कि उसने अपने बाबा को इसी कोटिया में मारते देखा था । बाबा के पश्चात दादी मारी उसके पिता के तीन भाई और एक बहन थी । दोनों भाई परिवार छोड गए । एक तो इस पुरखा के वो संभालने से पहले ही चला गया था और दूसरा एक डोर वर्णीय यात्री के साथ कैलाश हो गया तो फिर लौटकर ही नहीं आया । पुरखो गए पिता की बहन वहाँ से दस को उसके अंतर पर एक अन्य परिवार में दे दी गई थी और उसका पिता उनके परिवार की एक लडकी को अपनी पत्नी बनाकर ले आया । पुरखा गए पिता के घर में एक लडका और दो लडकियाँ हुई थी । एक लडकी की अदला बदली तो एक अन्य परिवार की लडकी से हो गई । इस प्रकार उस और काजा विभाग हुआ और उसका परिवार चला । इसके दूसरी बहन के बदले में किसी लडकी के लिए कोई लडका नहीं था । लडकी बडी होने लगी और भाई को चिंता बढने लगी । एक दिन एक पादरी नीली नीली आंखों वाला सुनहरी बाल गोरा रंग चांदनी का सवाल से होगा । पहले और उस पर काला रस्सा कमर में बांधे हुए इस फुटिया के सामने से गुजरा और विवाहित युवती को अकेले बैठे थे । खडा हो गया । लडकी का भाई भेड और बकरियां इकट्ठी करने गया हुआ था । भाभी हो इंडिया के अंदर बैठी अपने नवजात शिशु को स्तनपान करवा रही थी । बादरी ने पूछा लडकी तुम्हारी शादी हो गई है । इस को सुन लडकी का मुख्य लज्जा से लाल हो गया और पादरी समझ गया । इस स्थान पर इतनी बडी आयु की विभाजित लडकी मिलनी रायॅल बादरी लोग जानते थे । जहाँ भी ऐसी लडकी होती है, वहाँ कुछ ना कुछ व्यवस्था करनी भूत होती है । उस व्यवस्था से लाभ उठा वो यीशु की भेडों की संख्या में वृद्धि के अवसर को हाथ से नहीं जाने देना चाहिए । उसने कहा चलो हम तुम्हारा विभाग करा देंगे तो वो यीशु की शरण में जाओ, वही तुम्हारी उगली पकड तुमको भगवान के द्वार पर ले जाकर खडा कर देगा । लडकी मुस्कुराई और पादरी ने अपनी उंगली आगे कर दी । वालो किसी बालक को साथ ले जा रहा हूँ । लडकी अपने भाई का उन्नीस आलू का ठीक कर रही थी । बादरी के कथन पर मनन का है । अपने स्थान से उठी और बिना अपनी भाभी को आवाज दिए उसके साथ चल पडी भावी भी डर बैठी फुटिया के बाहर इन दोनों में हो रहे हैं वार्तालाप को सुन रही थी । उसे यह समझ में आ गया था कि मुन्नी अर्थात उसकी ननंद जा रही हैं परंतु उसमें रोका नहीं । वो अवन में विचार कर रही थी । अच्छा हुआ भाई का बहुत हल्का हूँ भाई घर में आया हूँ तो पत्नी के मुख से बहन के चले जाने का वृत्तांत सोन उसकी आंखों में आंसू की दो बूंदे तब बडी इस पर भी विचार करता था कि परमात्मा ने उसके बुखार सोनली उदयपुर का अब अस्सी वर्ष का बूढा हो गया था । इसके भी संता ने हुई लडके मैदानों में जीवीकोपार्जन के लिए चले गए और लडकियों का विवाह कर दिया गया । एक आज संतान रोग होकर चिकित्सा के अभाव में काल के ग्रास भी हो गई । अब तो उसका एकमात्र होता ही शेष था । पत्नी और अन्य सब प्राणी बिखर गए थे है वाला की इस बोर्ड का एकमात्र आश्रय रह गया था । उसके पास आधा दी का भूमि थी वह भी छोटे छोटे टुकडों में । उस पर केवल धान और मक्का ही उपज सकती थी । बीस बाइस भेडे और कुछ बकरियां थी बकरियों का मांस खाया जाता था भेडों की उनके कपडे बनते थे अथवा बेची जाती थी । मक्का और चावल खाने के काम आते थे । यह था उसका जीवन और ये सामान्य तीन चार प्राणियों के लिए जीवन चलाने के लिए पर्याप्त था । जब देवरानी संख्या में बढते थे या तो वे किसी नगर की ओर चल पडते थे हुआ कोई रो अपना स्वागत कार्य हाथ बढाकर परिवार पर दयाकर उसका बोझ हल्का कर जाता । वो पडेगी पता हो बालक सुंदर की मादी बीमार हुई और चल बसी इससे तो वोडा फूट फूटकर रोया हूँ अपने पुत्र के मरण पर उस को इतना दुःख नहीं हुआ था जितना पता हूँ की मृत्यु पर वो थोडा मन में केवल एक आशा लिए कि सुंदर बडा होगा घर में बहुल आएगा और परिवार चलाएगा स्वयं जीवित रहा हूँ माँ की मृत्यु के समय सुंदर तीन वर्ष का था वो दे की लडकी उसके स्थान से बीस कोर्स के अंतर पर विवाद दी गई थी । जब से उसका विवाह हुआ था वह अपने बाप से मिलने नहीं आ सकी थी । अब एक दिन वह और उसका पति आए उनके कोई संतान नहीं नहीं । दामाद ने सेना में नाम लिखा दिया था और अपनी पत्नी को उसके बाप के घर छोड सेना में जाने के लिए यहाँ आया था । जर्मनी का द्वितीय युद्ध आरंभ हो चुका था । धूल और जर्मनी में फूट पड चुकी थी । जापान ने अमेरिका पर आक्रमण कर दिया था और साथ ही वह मलाया और गरमा के बाद से भारत की ओर बढने का विचार रखता था । इस विपत्ति के समय भारत सरकार ने ओ जी भर्ती तेज कर दी थी । सरकार के बढती करने वाले अफसर गांव गांव घूमकर रिक्रूट एकत्रित कर रहे थे । सुंदर के फूफा सुमेर ने भी सेना में नाम लिखा दिया था । जब उसको आज्ञा हुई कि वह रानीखेत में अमूक तिथि को उपस् थित हो जाए तो वह अपनी पत्नी को उसके पिता के घर छोडने चला गया । वो दे ना तो उससे कुछ विशेष बात पूछी नहीं । उसको अपनी लडकी के घर आ जाने से नए किसी प्रकार का हर्ज हुआ न? शोक ही मैं जानता था की लडकी खेत पर काम करेगी तो कुछ पैदा कर ही लेगी । इससे उसका भी निर्वाह होगा और भतीजे का पालन भी । स्वयं को दो । बोडा उस दिन का मेहमान समझता था । सुन्दर में तो अपने फूफा से प्रश्नों की झडी ही लगा दी । उसने पूछा कहाँ जा रहे हैं? फूफा हो फौज में वह क्या होती है? बहुत से आदमी इकट्ठे होकर जब लडने के लिए तैयार होते हैं उसे खोज कहते हैं ये क्यों लडते हैं । जब कोई बदमाश लोगों को तंग करता है तो उसको मारने के लिए लडना पडता है तो भगवान फॅमिली होता है उससे लडने के लिए बहुत से लोगों को लडना पडता है । हाँ वह कौन बकवास है जिससे तुम लडने जा रहे हो । जर्मनी का राजा हेडलर है वह बहुत बलशाली है । उफा जाओ उसको मारकर उसका सिर मेरे लिए ले आना फिर लिया हूँ । बाबा एक दिन बता रहे थे कि एक सौ रुपए खादी और एक लक्ष्मण था जिसमें उसके नाक कान काट लिए थे । बाबा कहते थे कि यदि लक्ष्मण उसका सिर काट लेता तो फिर रावण को पता चलता नहीं सीताहरण करता नहीं युद्ध होता हूँ इसलिए वो तो उसका क्या नाम बताया था तो उन्होंने उसका कुछ भी हो फिर काट कर ले आना ऍम पडा हूँ

सभ्यता की ओर: प्रथम परिच्छेद भाग 2

फॅमिली परिच्छेद भाग दो । सुमेर जिस समय सेना में भर्ती होकर रानीखेत के लिए गया था, सुन्दर उस समय पांच वर्ष की आयु का था । पांच वर्ष के पश्चात जब बहन रोटा तब तक सुंदर दस वर्ष का हो चुका था । उसकी फूफी भेड बकरियों का काम करती थी । प्रत्युत अपने सब के खाने के लिए मक्का चावल आदि भी उत्पन्न कर लेती थी । बूढा भी कुछ करता रहता था । सुंदर तो फूफी का सहायक पुत्र और सब कुछ था सुंदर को भी । जब वहाँ का वात्सल्य फूफी से प्राप्त हुआ तो वह प्रसन्न हो गया । जब सुमेर लोटा तो बोडा मारना सब पडा था । वहाँ बीस बीस को उस तक कोई डॉक्टर हकीम वैद्य नहीं था । केवल एक पादरी वर्ष में दो बार आया करता था और भगवान के पुत्र येसु मसीह की सुरक्षा प्रदान कर जाता था । वोडा इस अवस्था में जबर्दस्त हुआ तो सुंदर की फूफी ने उसी बादरी की दी हुई तो नींद की गोलियाँ अपने पिता को खिला दी । सोमेर के लौटने पर उसकी पत्नी और सुंदर को बहुत प्रसन्नता हूँ परन्तु घर में मृत्यु के लक्षणों से उनके मुख्य चिंता नहीं मिल सकी । को नींद देने से बोर्ड व्यवस्था सुधरने की अपेक्षा बिगडी हुई थी । सुमेर कुटिया में पहुंच बाबा को पुकारने लगा परंतु वह जीत पडा था । अब तो मैं एक आध गाडी का ही मेहमान रह गया था । धैर्य से मृत्यु की प्रतीक्षा करने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं रह गया था । तीन दिन तक अच्छे रहकर रद्द ने प्राण छोडे तो मेरे ने अपनी पत्नी की राय से वहीं अपने ससूर के घर में रह जाने का निश्चय किया । वहाँ बकरियां थी दे दे दी और कुछ भूमि थी, हाथ ही सुंदर जैसा कुमार पुत्र के समान था । परन्तु सुन्दर जब सोमेर से युद्ध की ओर फिर भारत में हो रहे आंदोलनों की बातें सुनता था तो उसको यह फुटिया थे और भेड बकरियां नीरस प्रतीत होने लगती थी । वह मन में वहाँ से भाग उस विशाल संसार में जाकर वितरण करने का विचार करता था । एक दिन सोमेर में सुनाया एक सुभाष बाबू हमारी पूरी की पूरी रेजिमेंट जापान की कैदी हो गई थी । वे आए और कहने लगे भाइयों हिंदुस्तान को स्वतंत्र कराना है । बताओ कौन सी भाई इस काम के लिए मेरे साथ आता है? हम सब ने राय की और भारत की स्वतंत्र सेना में भर्ती हो गए । इंफाल में एक लडाई लडी और भारत की सरकारी सेना को मार मार कर भगा दिया । फिर कुछ नहीं हुआ । जापान में हमारी सहायता नहीं की । हम वापस रोड आए । एक दिन हम अंग्रेजी सरकार के कैदी हो गए । जापान और जर्मनी दोनों हार गए । हम को कैद कर भारत में लाया गया । अंग्रेजी सरकार ने हम सब को गोली से उडा देने का आदेश दे दिया । परंतु पंडित जवाहरलाल नेहरू और देश के अन्य लोगों ने आंदोलन किया और हम छूट गए । आंदोलन किया । वाह! क्या होता है फूफा, वह एक तरह का दांव तेज होता है । पंडित जवाहर लाल ने दांव चलाया और हम छूट गए । दस वर्ष का बालक सभ्यता नाम की वस्तु से कोसों दूर । केवल भले बुरे गा नैसर्गिक क्या रखता हुआ सब समाज की इन बातों को सुनकर चकित रह गया । मैं कभी मन में विचार करता था कि यदि फिर कोई हिटलर जैसा बदमास पैदा हो, भले लोगों को तंग करे । भले लोग फिर युद्ध के लिए सेना में भर्ती हो तो अवश्य युद्ध में जाएगा और ऐसे सुंदर सुंदर स्थान देखेगा जैसे उसके फूफा ने देखे हैं । मैं सोरिया के ऐसे कार्य करेगा जैसे सेनानायक सुभाष बाबू ने की है । नहीं जाने वह कब तक युद्ध होने और उसके लिए श्रम सेना में भर्ती होने की प्रतीक्षा करता रहा । बहन तू उससे पहले ही उसको उस संसार में जाने का अवसर मिल गया । एक दिन कैलाश को जाने वाले मार्ग से कुछ लोग घाटी में उतरते दिखाई दिए । ये सब एक बाजा बजाते हैं और गाते हुए आ रहे थे । रेगी उसकी अपनी पहाडी भाषा में ही गाये जा रहे थे । उनके बाजे और गाने की आवाज सुन सुंदर जो उस समय खेत कोन िराने में सर लागू था, खडा हो उनकी ओर देखने लगा । ले आए तो उसके खेत के किनारे बैठ गए और गाने लगे ये जो गा रहे थे उसका अर्थ कुछ इस प्रकार रघु यीशु वैसी है निर्धन । तो क्या बीमार और अज्ञान के अंधकार में फंसे लोगों को मुक्ति दिलाने के लिए संसार में आए थे । आओ समय लगाओ, जीवन छोटा है, पीछे पछताना बढेगा । सुंदर की फूफी ने खेत से बुटे तोडकर वहीं पर आग जला उनको भूनना और उन सब को खाने के लिए दिए जब सुंदर की फूफी भुट्टे भूम रही थी । उस समय उस भजन मंडली का नेता सुन्दर से बातें कर रहा था तो उन्होंने कहा तुम्हारा बाजार बहुत मीठा लगता है । हाँ उसमें गी तो उससे भी मिला है । यही येशू कौन है? यह परमात्मा का पुत्र था है । इस दुनिया में सब के दो खरण के लिए आया था जो उस की शरण में जाता है । मैं उसको धन देता है, वस्तु देता है, मकान देता है और फिर अंत में स्वर्ग का द्वार उसके लिए खोल देता है । बहुत अच्छा आदमी है । हाँ, उसकी चरण में आओ तो सब कुछ मिलेगा । मिठाई भी मिलेगी था । जो चाहूँ मैं उस की शरण में आना चाहता हूँ तो ऐसा करो । रात को ऊपर उस बडे मार्ग पर पहुंचकर दाहिने हाथ को चल पडना । चौथाई को सलने पर हमारा कैंप मिलेगा वहाँ कल प्रातःकाल तक आ जाना । बस वहाँ अगर तुम भगवान के आश्रय में आ जाओगे । तत्पश्चात तुम्हारी देखभाल करना होगा । कम होगा । सुंदर के मन में बात बैठ गई । रात्रि में वहाँ उठा और जानने के प्रकाश में चलता हुआ प्रभु यीशु मसीह के गले में एक भेड बंद सम्मिलित हो गया । यहाँ उसके पहुंचते ही एक विशेष साथी के द्वारा उसको अल्मोडा भेज दिया गया । अगले दिन मेरे और उसकी पत्नी ने जब सुंदर को लापता पाया तो वे भागते हुए उन मिस नदियों के कैंप में गई परंतु उनके वहां पहुंचने से पूर्व ही ऍम कैलाश की ओर जा चुका था । निराश दोनों वापस अपनी कुटिया में चले गए । उस दिन की पैदल यात्रा करके सुंदर और उसका साथी अल्मोडा पहुंचे । सुंदर को स्नान कराया गया । उसके बाल बनवाए गए और साफ सुथरे कपडे पहनने को दे दिए गए । तत्पश्चात उसको पडने के लिए सेंट जो सब स्कूल में भर्ती करा दिया गया, ऍम स्कूल की पहली श्रेणी में पडने लगा । उसके क्लास में अधिकांश बच्चे चार चार पांच पांच वर्ष के थे । सुंदर को भूले करते देख वे उसकी खिल्ली उडाया करते थे । इससे सुंदर को लग जाती लगती थी और रोज भी आता था । बढाने वाली एक स्त्री थी । उसका नाम था वासंती है । श्री युद्ध पाल की धर्मपत्नी दी और गिरजाघर में और गन बजाने का कार्य करता था और स्कूल में बच्चों को गाना भी गाता था । पाल की पत्नी सुंदर को बहुत प्यार करती थी । पहले ही दिन जब सुंदर स्कूल में आया तो मिसेज बॉल उसको देखकर अति प्रभावित हुई थी । जांच करने पर उसको विधित हुआ कि प्रचार कार्य करने के लिए उत्तर की ओर गए बदली इस लडके को लाये हैं । जब सुंदर को उस की श्रेणी में बढती कराया गया तो वह बहुत प्रसन्न हुई । परन्तु ये है देखकर की वह अक्सर तक नहीं पहचानता । उसने उसको अपने घर पर बुलाकर विशेष शिक्षा देनी आरंभ कर दी । सुंदर आयु में ग्यारह वर्ष का मेधावी बालक था और द्रुतगति से उन्नति करने लगा था । परन्तु जब तक वह अपनी आयु के बच्चों जितना पढ नहीं गया उसकी खिल्ली उडाई ही जाती रही । कुछ नाथ

सभ्यता की ओर: प्रथम परिच्छेद भाग 3

हूँ । परिच्छेद एक बहुत तीन सुंदर को इस प्रकार उन्नति करते थे । श्रीमती पाल को अपना बाल्या कम मारना आने लगा था । वह अल्मोडा से दस मिल के अंतर पर उत्तर की ओर एक छोटे से गांव की लडकी थी । अभी छह वर्ष की थी कि उसके माता पिता का देहांत हो गया था । गांव की एक स्त्री ने उस पर दया कर अपने घर में रख लिया था । बहन तू उस स्त्री का घर वाला उसके इस दयापूर्ण कार्य से प्रसन्न प्रतीत नहीं होता था । जब स्त्री उसे खाने को कुछ देती तो वह कह देता हूँ सब इसी को देख होगी तो अपने बच्चों को क्या? दो एक दो बार स्त्री ने दबी जवान से कहा भी था अपने बच्चे अभी छोटे हैं, ये तो बहुत खा नहीं सकते । यह भी तो जरा सा ही खाती है । तो पहले उनका पेट भर लो फिर इस चटोरी को खिला देना हूँ । एक दिन पति और पत्नी में घर के भीतर के कमरे में वासंती के विषय में झगडा हो गया । बच्चे बाहर सो रहे थे । उस दंपत्ति के दो बच्चे थे । वे दोनों वासंती से छोटे थे । दोनों गहरी नींद में सो रहे थे और वासंती को अपना नाम बार बार कहा जाता है सुनाई दिया तो बस्तर हो सुनने लगी । पुरुष कह रहा था देखो तुम ने घर में एक मुझे और रखता हूँ, अच्छा नहीं किया । यहाँ अपने खाने को नहीं मिलता और ऊपर से यहाँ बला पाली है । तेरी का कहना था पर इसका कोई है ही नहीं । कहाँ है वो? इसे तो हम क्या करें पर हमारे घर में तो कोई कमी नहीं है । इसको खिलाने के उपरांत भी बाजार में बेचने के लिए और या तो बच जाएगा । क्या खाक बचेगा । पिछले वर्ष नगर में जाकर पचास रुपए ले आया था । उन पचास रुपयों में से दस तो जमीन का ही देना पडेगा । चालीस रुपयों से मुश्किल से वर्ष भर के लिए कपडों का प्रबंध हो सकता है । यह वर्ष इतना भी बस नहीं सकेगा । यह ठीक है । परंतु परमात्मा देखता है कि किसी अनाथ की सहायता में ही हो रहा है । इस कारण हैं कोई ओर साधन पैदा कर देगा । मैं तो कल इसे धक्के देकर घर से निकाल दूंगा । नहीं जी, यह ठीक नहीं होगा । वासंती सुनी बात को समझ रही थी परन्तु यदि थी इस कारण उसे नींद नहीं आ रही थी । स्त्री तो यह है कि यह ठीक नहीं होगा । चुप कर रही हूँ । परन्तु पुरुष अपने आप कहता रहा इस चौधरीने मेरा सब काम खराब कर दिया है । इसको मैं यहाँ रहने नहीं दूंगा । इस प्रकार पुरुष बोर्ड उडाता रहा । इस तरीके उत्तर देने से वह भी चुप कर गया । वासंती बहुत देर से सोई थी और सूर्य निकल आने पर भी हो रही थी । उसकी जाग खुली जब है पुरुष उसकी वहाँ अगर कम्बल से बाहर उसे घसीट रहा था । उसे रात की बात हो आई । पुलिस ने उसको धकेलते हुए घर से निकाल दिया । स्त्री द्वार पर बैठी थी । जब वासंती को वह पुरुष धकेलकर घर से निकाल रहा था तो वह हो रो रही थी । वासंती की आंखों में आंसू नहीं थे । मैं तो डरी हुई थी और विचार कर रही थी कि उसे ले जाकर किस खंड में न धकेलते । वासंती की जान में जान आई जब उस पर उसने उसे घर से बाहर कर उसे छोडा और फिर अपनी पत्नी की वहाँ पकडकर घर में घसीट ले गया और मकान का द्वार बंद कर दिया । वासंती को अपनी निस्सहाय व्यवस्था का ज्ञान होने लगा है । कितनी ही देर तक मकान की ओर देखती हुई खडी रही परंतु द्वार नहीं बोला । अब है वहाँ से तल गई । मकान के बाद एक आता था उसमें उस पर उसकी बकरियां बंधी रहती थी । वासंती का ये है नित्या का काम था । कितना बकरियों को खोल घंटे में जल पीला ले ले जाया करती थी और उसी समय ऍम भी सोचा दी होलिया करती हैं आज भी है । आते में गए और बकरियों को निकाल खड्डे वाले नाले की ओर चल पडी । रह नाले पर पहुंची तो बकरिया मैं करती हुई जल्दी नहीं लगी । ऍम शौचादि से निवृत्त हो । हाथ मुक्त हो कर घर लौटी तो नित्य की भर्ती उसे भूख लगाई थी । नित्या उसके आने पर रेस थ्री उसके लिए कलेवा तैयार रखती थी परंतु आज मकान का द्वार नहीं खुला । वह द्वार पर बैठ गई । बकरियां तबेले में चली गई और वहां एकत्रित किये पत्ते जब आने लगी सूर्य पहाडों की चोटियों से ऊपर दिखाई देने लगा था परन्तु आज घर का द्वार नहीं खुला । इतने में एक गोर वर्णीय वृद्ध वहाँ से गुजरा । उसकी दाडी शेव थी और वह श्वेतवस्त्र पहने हुए था । वासंती लालसाहब भरी दृष्टि में उसकी ओर देखने लगी । ऍम अल्मोडा के गिरजाघर का पादरी था जो सेंट जोसेफ स्कूल के साथ संबंधित था । यह तो उसे पीछे पता चला था परन्तु उस समय मन में विचार कर रही थी कि उससे कुछ खाने के लिए मांग ले । कदाचित उसके होंगे कि जेन में कुछ खाने को रखा हूँ । इस पर भी वह एक है । पर इस से कुछ मांग नहीं सकी । वह पादरी चलता चलता । लडकी को अकेले बैठे देख रुक गए । वासंती के मन में आया कि वह उठकर भाग जाए । परंतु कहाँ मकान का द्वार खुला होता तो मकान के भीतर से ली जाती है । एक का एक उस पादरी ने पूछ लिया, लडकी यहाँ बैठे क्या कर रही हो? उसके मुख से निकल गया । भूख लगी है । मौसी तो अभी कुछ खाया ही नहीं । अब तो बहुत दिन चढ गया है । मोसी ने घर से निकाल दिया है । क्यों वासंती कुछ उत्तर नहीं दे सकी । इस पर उस पादरी ने कहा और मेरे साथ तुमको खाने को दूंगा । इतना कर है । उसने उंगली पकडने के लिए बढा दी । वासंती ने उंगली पकडी और चल पडी । पादरी ने जब जेब से मीठी लाॅस निकाल कर उस को देते हुए कहा इनको तो मैं तुमको लोगों के घर ले चलता हूँ । वहाँ कोई भूखा नहीं रह सकता । ऊपर चलते हुए बडी सडक पर जा पहुंचे । कुछ दूर पर एक खुले स्थान पर एक खेमा लगा था, जिसमें दो दिन युवक बैठे थे तो रद्द पादरी ने कहा यह प्रभु यीशु की एक और भेड मिल गई है । इसे कुछ खाने को दो । उन लोगों ने वासंती को बिस्कुट और डबल रोटी के टुकडे मुरब्बे के साथ खाने को दी । वासंती को बहुत स्वाद लगा उसी दिन रहे । उनके साथ अल्मोडा सेंट जोजफ स्कूल के यतीमखाने में पहुंचा दी गई । अपने इस कथा को स्वर्ण का एक साइकल सुन्दर से उसने पूछा तो तुम्हारे माता पिता है नहीं मदद सब लडके उसे मदर कहते थे सुंदर भी अर्थ नहीं समझता हूँ उसे । मगर कहने लगा था तो तुम भी भूखे घर से निकाल दिए गए थे । नहीं मदद मेरे बुआ और फूफा थे । मैं दुनिया देखने के लिए चला आया हूँ तुम्हारे घर में और कौन है? बस मैं था और फूफा फूफी थे तो वापस जाना चाहते हो । हाँ मगर वहाँ पढाई नहीं हो सकती । मिसेज बाल सुपरहि उसकी अपनी कथा से सुंदर की का था । कुछ ही विलक्षण थी । वह भी कुछ दिन गया । तीन खाने में रहने के उपरांत घर जाना नहीं चाहती थी और यह भी नहीं जाना चाहता था हूँ ।

सभ्यता की ओर: प्रथम परिच्छेद भाग 4

फॅर बहुत चार सुंदर स्कूल की कमेटी के अधीन अनाथालय में रखा गया था । वहाँ पर सभी बच्चों को कठोर नियंत्रण में रखा जाता था । अनाथालय की फॅस था की एक स्त्री वेनिस मित्र थे । वह बच्चों को समय पर उसने समय पर स्नानादि से छुट्टी, खाना खाने और स्कूल जाने, फिर स्कूल का काम करने तथा रात को सोने पर विवश करती थी । सादा हाथ में बैंक लिए गोवा करती थी और उस बहत का देख खटके प्रयोग भी किया करती थी । मिसेज बाल सुंदर को पृथक बैंक्स पर बैठाती और पढाई के कमरे में उसको अपना पार्ट जो जब स्मरण करने अथवा लिखने का काम करने के लिए छुट्टी दे देती थी । सुन्दर अपनी श्रेणी के बच्चों से आगे निकल गया था । इस पर भी अपनी आयु के बच्चों से जो छठी श्रेणी में पढते थे, बहुत पीछे था । अनाथालय में कपडे, बिस्तर, खाना और फिर बीसीओ ही लडकों की संगत उसके अपने घर से विलक्षण थी । घर में तो दिन रात चावल, मक्की, आलू और डाल के अतिरिक्त कुछ भी खाने को नहीं मिलता था । वहाँ पर उसके अपने सिवाय अन्य कोई बच्चा भी नहीं था । यहाँ चाहे मक्खन, दोस्त, भंड, रोडी डाल बाजी, माँस, मछली इत्यादि खाने को मिलते थे । नीति नई वस्तुएं मिलती थी दूध, सवाल, शेर, बिस्तर की चादर, रजाई, कम्बल इत्यादि होते थे । पहनने के कपडे यद्यपि खाकी रंग के थे परंतु सप्ताह में दो बार दो भी से धुले हुए मिलते थे । यह सब कुछ बहुत ही सुख का रखा था । इस पर भी मन में कभी कभी एक अज्ञात चंचलता का अनुभव करता था । उसको कुछ ऐसा अनुभव होता था की उस की कोई वस्तु हो गई है । मन में विचार करता था कि वह क्या है परन्तु मैं समझ नहीं सकता था कि वह क्या वस्तु है जो उसको घर में प्राप्ति और यहाँ पर नहीं है । कई दिन तक विचार करने पर भी वह समझ नहीं सका । धीरे धीरे उसके हृदय में ये है । बाद हस्ती जा रही थी कि हर प्रकार के शारीरिक सुख प्राप्त होने पर भी वह बेजेल है । पहले तो उसने समझा कि अपनी बुआ और फूफा से दूर होने के कारण वह उदास है परंतु मिसेज पाल का व्यवहार तो उसको अपनी बुआ से भी अधिक सह्रदयता से परिपूर्ण प्रतीत होता था । यद्यपि मिस्टर पाल उसको सदैव उपेक्षा से देखता था और उसकी ओर देखते हुए कभी मुस्काता तक नहीं था परंतु मिसेज बॉल उसको देख सादा मुस्कुराती रहती थी और सिर तथा पीठ पर हाथ फेरकर प्यार भी करती रहती थी । घर पर तो उसकी आदत थी कि वह रात को देर तक जाता रहता था । आकाश के तारो अथवा चांदनी रात में चांद को देख मन में कल्पना के घोडे दौडाया करता था । उसके बाबा ने बताया था कि ये चांद तारे और सूर्य देवता है जो घूम घूमकर मनुष्यों को देखते रहते हैं और उनके अबसे अथवा बुरे कर्मों का फल देते हैं । यहाँ उसको कभी आकाश की ओर देखने का अवसर ही नहीं मिलता था । साढे चार बजे स्कूल से मिसेज बॉल के घर जाना होता था । उसके घर से आई पी उससे पढना होता था । रात को आठ बजे मैं अनाथालय में बहुत जाता था । वहाँ भोजन के पश्चात पढाई कर दस बजे बिस्तर में चला जाना होता था । नींद आएगी अथवा नहीं सब बच्चों को उस समय बिस्तर में चला जाना ही पडता था । इस कारण वह भी लेट जाता था । कभी कभी तो वह बारह एक बजे तक बिस्तर पर करवटें लेता रहता था । बिस्तर उसको काटता सा प्रतीत होता था परंतु मिसेज स्मिथ को भारत में बैठ लिए घूमते देख उसका साहस नहीं होता था कि सेनाने से फिर भी ऊंचा कर सके । उसने अपने साथियों में से कई लडकों को पिटते हुए देखा था । चांदनी रात में तो वह बोर्डिंग हाउस के सोने के कमरे से निकल बाहर खुले मैदान में बैठने के लिए लालायित रहता था । एक दिन उस से नहीं रहा गया है । आधी रात के समय बिस्तर से निकला और अपना धोनी कोट पहन कमरे से बाहर निकल गया । उसे किसी ने देखा नहीं रहे । इमारत के बाहर खेलने के मैदान में एक पत्थर भर बैठ गया और छिटकी चांदनी में मैदान पेडो और मकान को देख संतोष अनुभव करने लगा । दृश्य उतना लुभाए मान तो नहीं था जितना कि उसके अपने झोपडे के बाहर से होता था । इस पर भी पिछले एक वर्ष में एक बार भी बोर्डिंग हाउस से रात के समय निकल छिटकी जानने का दृश्य देखने का साथ नहीं कर सकता था । एक घंटा भर मैं बैठा रहा हूँ । जब उसको सर्दी लगने लगी तो वह उठा और बेहतर बिना मैट्रन के देखे बिस्तर में जा सो रहा हूँ । अब तो नीति ही वो उठकर रात को बाहर जाने लगा । जाते समय है । अपने बिस्तर पर कंबल के नीचे तक किया और कपडे ऊंचे रखकर चला जाता था । जिससे सब समझे कि कोई सो रहा है । अंधेरी रात आई तो उसने बाहर जाना बंद कर दिया । परंतु उन्हें चांदनी रातों में यह कार्यक्रम आरंभ हो गया । एक रात उसके एक साथ ही ने उसे देख लिया । वह भी उठा और उसके पीछे पीछे चल पडा । सुन्दर अभी पत्थर पर बैठा ही था कि उसके कमरे का साथ ही कृषि रॉबर्ट उसके सामने खडा हुआ । पहले तो सुंदर उसे मैट्रन समझ डरा परन्तु तुरंत ही पहचान पूछने लगा तो तुम भी चले आए हो तो कुछ बेवकूफ क्यों? चांदनी रात में तो पकडे जाओगे और फिर बहुत पीटे जाओगे तो मैंने क्या खराबी की है? सोने के समय तुम जाग रहे हो तो क्या हुआ? इसमें खराब भी किया है । रोबर्ट मुस्कुराया और उसे मोरक् समझ वहाँ से जल्दी सुंदर मन में विचार कर रहा था की चांदनी रात में आकाश और आसपास की वस्तुओं की छटा देखने में भला किसी की क्या हनी हो सकती है । वह अपने साथी की मन की बात को समझ नहीं सका । उसे बोर्डिंग हाउस के जैसे की बात होगा, अधिक ज्ञान नहीं था और उसका रात का ये है कार्यक्रम अधिक दिन तक नहीं चल सका

सभ्यता की ओर: प्रथम परिच्छेद भाग 5

हूँ हूँ प्रथम परिच्छेद भाग पांच इस घटना के तीसरे दिन सुंदर स्कूल में पहुंचा तो उसकी आंखें लाल हो रही थी । उसके गालों पर चपत लगने के चेन्नई थे । मिसेज बोलने देखा तो इसमें से उसका मुख्य निहारती रही श्रेणी के बच्चे आने लगे थे । इस कारण मिसिज बॉल का ध्यान बढ गया । उसने उस समय सुन्दर से इसका कारण नहीं पूछा हूँ । यह है समझी थी कि किसी लडके से झगडा हुआ होगा और उसने सुंदर को पीता होगा । परन्तु किस कारण झगडा हुआ है और क्यों पीता है मैं समझ नहीं सके । सुंदर रह जानती थी । दूसरो गए हंसी ठट्ठे की ओर ध्यान नहीं देता था है अपने ही विचारों में लीन रहता था तो फिर ये है आज क्या हुआ? वह जान नहीं सकी । स्कूल का समय समाप्त होने पर मिसेज बोलने सुन्दर से अपने साथ चलने के लिए कहा । बहन ठहर गया मॅन स्कूल के कार्यालय में गई और पांच मिनट में ही वहाँ से निकल आपने क्वार्टर की ओर चल बडी सुंदर उसके साथ साथ था । मार्ग में मिस कॉल ने पूछा सुंदर तुम उदास क्यों हूँ मदद मैं कहता कहता हूँ रुक गया निःशेष बोलने घूम कर उसकी ओर देखा तो चकित रह गई । सुंदर रो रहा था, क्या बात है सुन्दर तुम वो क्यों रहे हो? सुंदर कुछ बोल नहीं सका । अपनी जेब से रुमाल निकाल मैं आंखे पहुंचने लगा । मुँह बॉल ने मार्ग ने और कुछ पूछना उचित नहीं समझा । घर पहुंचकर मैं उसको अपने कमरे में ले गई और स्वयं कुर्सी पर बैठ उसकी अपनी गोदी में बैठा उसकी आंखें पहुंचते हुए पूछने लगी बेटा किसी के साथ तुम्हारी लडाई हुई है । सुंदर ने से हिलाकर इंकार कर दिया । अभी भी रोने से उसकी इस क्या बंदी हुई थी, यह बात नहीं कर सकता था । मिसेज बॉल देख रही थी कि अभी भी उसके कपोल सुलझे हुए हैं । राधा काल तो सूजन बहुत ही अधिक थी और उस समय उसके गालों पर उंगलियों के चेन्नई स्पष्ट दिखाई देते थे । इस समय पूरा दिन व्यतीत हो जाने पर उंगलियों के चेन्नई तो मिट गए थे परंतु कपोलों की लाली और सूजन अभी भी विद्यावान थी । कुछ देर प्यार देकर मिसेज बोलने फिर पूछा हूँ यदि किसी ने मारा नहीं तो यह तुम्हारे गालों पर क्या हुआ है? इस प्रकार का प्यार तो सुंदर को कभी उसकी बुआ ने भी नहीं दिया था । मैसेज बॉल की गोद में बैठे हुए और अपने सिर को उसके वक्ष स्थल पर रख उसके प्यार के सुख के प्रभाव से उसमें कहने का साहस हुआ आया और उसने कहा मैट्रन पीता है क्यों? तुम ने क्या किया था मुझको नींद नहीं आ रही थी । मैं बिस्तर से उठा और कमरे से निकलकर बाहर मैदान में जा बैठा । जाननी छिटक रही थी अपने घर पर भी मैं कभी कभी चंद को देखने कुटिया से निकल आया करता था । यहाँ भी मैं पहले कई बार ऐसा कर चुका था । इस प्रकार घंटों ही आसमान पर चांद और तारों को देखता रहता था । मुझे इसमें बहुत ही आनंद मिलता है । कल रात मैदान में आकर वहाँ पडे एक पत्थर पर बैठ अपने घर जैसा आनंद ले रहा था कि हमारे आना था लेगी । एक लडकी मिस सिमसन आकर मेरे पास बैठ गई । मैं अभी बिच में उस की ओर देख ही रहा था कि उसने मुझे अपनी बुझाओ में दबोच मेरा मुख्य चुन लिया । मैं हम तो उससे दूर पडता था पर वह मुझ से और अधिक छिपती जाती थी । इसी समय मेटल वहां पहुंची मुझको देख उसने कहा सुंदर इस पर वह लडकी मुझको छोड भाग गई । मेट्रो के हाथ में बेहद नहीं था । उसने मुझे जो चपत मारना आरंभ किया तो एक के पश्चात एक मारती ही गई । दोनों हाथों से दोनों गालों पर मैं मरती ही रही । मैं सब इसका कारण समझ नहीं सका और चुपचाप मार खाता रहा । उसने मारना बंद कर दिया । मैं समझता हूँ कि जब थक गई होगी मेरे सिर में चक्कर आ रहा था और जब उसने कहा जाओ लेट जाओ तो मैं अपने कमरे की ओर चल पडा । जब मैं भीतर लडकियों के कमरे के सामने से गुजरा तो बहुत सी लडकियां अपने कमरे के द्वार पर खडी थी । मुझको लडखडाते कदमों से जाते देख सब की सब खिलखिलाकर हंस पडी और पच्चास मेट्रो को आते देख उन्होंने अपने कमरे का द्वार भीतर से बंद कर लिया । आज प्रातःकाल जब बोर्ड ओके समूह मुझे खडाकर मेरा दोष वर्णन किया गया । यह कहा गया कि मैं रात को एक बजे अपने बिस्तर से उठ बाहर लॉन में एक लडकी से गले मिलता था । उसका मुख्य घूमता हुआ देखा गया हूँ । यह बात है और बोर्डिंग हाउस के नियमों के विपरीत है । इस कारण मुझको पब्लिक नहीं किया जाता है । मुझे इस झूठ पर रोज आ रहा था । मैं वहाँ से भाग जाना चाहता था परन्तु बोर्डिंग हाउस के तीन लडकों ने मुझे पकडकर मेरा मुर्गा बना दिया । मेट्रो ने आज बैंक गिनते हुए अपने पूरे बाल से मेरे दूसरों पर लगाए । इस वृत्तांत को सुन विशेष पाल का मुख रोज से लाल हो गया । उसने सुंदर की पीठ पर हाथ फेरते हुए उसके दोनों गालों को चूम कर कहा मेरा बेटा सुंदर इस अपमान की चिंता नहीं करेगा । उसका भविष्य बहुत उज्ज्वल है । घर पर मैं पढ नहीं सकता । यहाँ दस वर्ष में हमने कर लेगा, तब तक किसी स्थान पर बडा अवसर बनेगा और इस समय के सब कष्टों को भूल जाएगा । इस पर भी सुंदर इस पब्लिक केनिंग के अपमान को भूल नहीं सका । उसे विचार आया कि यह सब बदमाशी उसके कमरे के साथ ही कृशन रॉबर्ट की हो सकती है । उसने ही लडकी को सिखाकर भेजा होगा और फिर पीछे मेट्रो को सूचना दे दी होगी । उस दिन उसका चित्र पढाई में नहीं लगा । मिसेज बॉल भी अपने बचपन की बातों की स्मृति में कोई जा रही थी । उसको स्मरण था कि वह भी इसी यतीमखाने में बाली थी और इस प्रकार लडके, लडकियों के परस्पर प्रेम प्रलाप की वहाँ परंपरा है । उसके काल में एक दयालु हृदय रखने वाली मैट्रन थी । लडकियों और लडकों को समझाती रहती थी और उनको इस प्रकार से प्रेम करने के पास से बचाती रहती थी । इस पर भी संपर्क और संबंध तो बनते ही रहते थे । जब ग्यारह बारह वर्ष की थी तो उसे मैट्रन की बातें समझ में आने लगी थी तो वह अपनी सखियों सहेलियों से पूछने लगी थी कि मैटर हमें नीति ये है बात क्यों कहती है? पहले जो लडकियाँ उसके प्रश्न सुन हस देती थी । फिर लडकी ने उसे सब रहते की बात बता दी । रहस्य बताने वाली लडकी का नाम निर्मला पीटर था । मैं एक ईसाई की ही लडकी थी और मिस्टर पीटर अपने काम धंधे के कारण नीचे मैदान में गया था तो लडकी को यतीमखाने में छोड गया था । निर्मला ने जब सब बात वासंती को समझाई तो वासंती ने पूछ लिया तो क्या तुम भी ऐसा क्या करती हो? वह बोली मैंने तो अपना एक लडका निश्चय कर रखा है और मैं उस से ही विवाह करोगी इस आशा से कि मैं उसकी पत्नी बन होगी, मेरी दूसरे लडकों से रक्षा करता है और हम पापकर्म नहीं करते, केवल कभी कभी आलिंगन मात्र करते हैं और तुम उस से कम मिलती हो । वासंती का अगला प्रश्न था । इस पर उसने ये ऐसे भी बता दिया । उसने कहा हम एक दूसरे से संकेत कर स्थान और समय निश्चित करते हैं । एक दिन मेट्रो ने हमें आलिंगन करते देख लिया । इस पर उसने हम दोनों को सबसे प्रथक बैठकर समझाया । मैंने कह दिया मदर हमारी सगाई हो चुकी है । जो भी इसकी बढाई समाप्त होगी, हमारा विवाह हो जाएगा । इस पर मैं उन ने हमको नया तो पीडा और नए ही हमें बोर्डिंग हाउस से निकाला परन्तु उसने हमको प्रति सप्ताह कन्फैशन के लिए बुलाना आरंभ कर दिया । हम सब अपनी सत्य सत्य बाद उसे बताते रहते हैं । वो हम को परस्पर मिलने से मना करती रहती है । साथ ही हमारे लिए प्रार्थना भी क्या करती हैं । वासंती के साथ ऐसी घटना काफी बडी आयु तक नहीं हुई । उस पर किसी लडके की दृष्टि गए ही नहीं और ऍम इतना साहस नहीं रखती थी कि सोनम किसी से मित्रता उत्पन्न करेंगे । वह दसवीं श्रेणी में पडती थी जब मिस्टर बोल जो बरेली कॉलेज से अपनी शिक्षा समाप्त कर आया था, उसमें रूचि लेने लगा । जब है गिरजाघर में और गन बजाने के काम पर नियुक्त हुआ तो उसका उससे विवाह हो गया । वर्तमान मेट्रो की क्रूरता का प्रधान सोन वो अपनी पूर्ण सर्दियों में लीन हो गई थी । उसका चित्र पडने को नहीं किया और न ही सुंदर का चित बडने को कर रहा था । वह मदर की गोद में बैठा था कि बाहर से मिस्टर फोन आ गए । वासंती ने सुन्दर को गोद से उतारा और अपने पति से पूछने लगी आज आप जल्दी की वहाँ गए क्या गाना सिखाने वाली लडकियों की श्रेणी नहीं ले रहे हैं । आज मैंने उनको छुट्टी दे दी है । उस श्रेणी की एक लडकी आज साढे यहाँ चाय पीने आ रही है । कौन है अगर तुम देख लो गी इस पर मिसेस बोलने सुंदर को कह दिया तो आज जाओ कल पढा होंगी सुंदर अपनी पुस्तक ले पाल के बंगले से निकला तो सामने से वही लडकी आती दिखाई दी जो उसके साथ रात बाहर जान नहीं में आप बैठी थी । सुन्दर उसे देखता रह गया रहे । लडकी उसके समीप से गुजरने लगी तो खडी हो बोली समुन्दर मुझे पहचानते हो परन्तु मैं तुमको रात में मिलोगी सुंदर रात में मिलने के बाद सुन वहां से भागा । जो कुछ हो चुका था उसकी वह उमरावती नहीं चाहता था । ऍसे पार्ट पार्ट आठ बजे बोर्डिंग हाउस में वापस आया तो उसके कमरे का एक साथ ही उसकी प्रतीक्षा में खडा था । सुंदर के पहुंचते ही है । उसको लॉन में एक और ले गया और उसने लगा सुंदर क्या हुआ था । कल रात सुंदर ने वही व्रतांत जो उसने मिसेज बॉल को बताया था । अपने साथी को बता दिया । लडके का नाम था कॅश । मैं पंद्रह वर्ष की आयु का युवक था और कॉलेज में पडता था । सुन्दर की बात सुनकर वो खिलखिलाकर हंस पडा । सुंदर ने समझा कि शायद वो उसकी बात पर विश्वास नहीं कर रहा है । इससे वो डाइनिंग होली और गोमा तो रावर्ट ने सुन्दर के कंधे पर हाथ रखकर उसे रोक दिया । उसने कहा सुंदर मुझे तुम पर विश्वास है । मैं जानता हूँ तुम हमारे रिवाजों को जानते नहीं हो । हम तो जब भी किसी लडकी से मिलना चाहते हैं तो चांदनी रात में उसे लॉन में नहीं मिलते । हम उसको बरामदे के किसी अंधेरे कोने में ले जाते हैं । मिस सिमरन इस बात को जानती है कि उसको लोन में तुम्हारे पास कभी नहीं आना चाहिए था । मुझको विश्वास है कि सिमरन ने जानबूझकर तुम को फंसाने के लिए यह क्या है और मैं समझता हूँ कि यह सब सेवारत तुम्हारी है । मेरी कैसे तो तुमने मुझे पहले ही कहा था कि मैं पकडा जाऊंगा और पीता जाऊंगा । तो इसलिए मैंने पकडवाया है तो अभी जंगली ही हो । देखो मुझ पर विश्वास करो और मैं तुमको मिस सिमरन से मिलने का एक सुरक्षित स्थान बता दूंगा । पर मैं उस से मिलना नहीं जाता । रॉबर्ट हस बडा सुंदर इस बात को समझ गया । इससे तो उसको इस पूर्ण स्थान, वातावरण तथा यहाँ के निवासियों से घृणा हो गई । उसकी आंखों में फिर आंसू बडा उसमें केवल यह कहा, ऐसा उसने क्या किया? मैंने तो कभी किसी से देश किया ही नहीं । मैं जानता हूँ उसने यह क्यों किया है? रहे वास्तव में तुमसे प्यार करती है और तुम से मिलना चाहती है । गैर समझती है कि इससे तुम्हारे मन में उसके प्रति मोहब्बत पैदा होने लगेगी जिसके कारण तुम्हारा अपमान हुआ है । उससे तुम बदला लेना चाहोगे और एक लडका किसी लडकी पर बीजेपी प्राप्त करके ही अपने अपमान का बदला पूरा हुआ मान सकता है । सुंदर को रोबर्ट की बात पर विश्वास नहीं आया । मैं लडकियों के विषय में उस अधिक नहीं जानता था । इस पर भी बात समझता था की कोई लडकी इस प्रकार सोच नहीं सकती जैसा कि रोबर्ट ने बताया है । इस पर भी है तो सकते ही था । कि वह पीटा गया था । उसका मिस सिमसन से कोई संबंध नहीं था और वहाँ से हम भी उसके साथ ऐसा फॅमिली व्यवहार करने लगी थी । सबसे बुरी बात उसे यह लगी कि उससे इस विषय में एक सब तक नहीं पूछा गया और उसको दंड दे दिया गया । माननीय मन ग्लानि से भरता जाता था । वह समझता था कि उसका अपमान हुआ है और उसके साथ अन्याय हुआ है वो । उसने रावर्ट के कथन का कुछ भी उत्तर नहीं दिया और रात खाने के हॉल में चला गया । वहाँ मैं बहुजन पर बैठ गया । कुछ अन्य लडके और लडकियां पहले से ही बैठे खा रहे थे । उसके वहां पहुंचते ही सब लडकियाँ खिलखिलाकर हंस पडी । फंसने वालियों में सेम्सन सबसे आगे थी । इससे तो उसकी भूख ही मर गई । यद्यपि खाना परोसा जा रहा था परंतु लडकियों को तेजी दस्ती से अपनी ओर देख देख हसने पर इधर ही बेहतर ग्लानि अनुभव करने लगा था । भोजन परोसा गया और उसने एक दो ग्रास मुख में डाले भी परन्तु ग्रास निकलने में उसको ऐसे कष्ट करना पडा बालो है सुस्त लकडी का भूसा निकल रहा हूँ । आखिर उसने खाना छोड दिया तो वोट जल्दी कर ऍसे वोट पडा परंतु द्वार के समीप मैटर उनको हाथ में बैठ लिए । खडी देख बैठ गया और परेशानी से रोटी की ओर देखने लगा । जब सब खा चुके तो वह भी उठ पडा । सब बॉर्डर द्वार में से निकल गए । भी बिना किसी का मुख पर देखे । वहाँ से चला गया मेट्रो उनको देख उसे ऐसा अनुभव हुआ कि जो दो तीन ग्रास बहुजन के उसके बेड में गए हैं, वे भी उल्टी के द्वारा बाहर निकलने वाले हैं । वह अपने सोने के कमरे में जाने लगा था कि सिमसन उसका मार्ग रोककर खडी हो गई । सुंदर प्रश्न भरी दस्ती से उसकी ओर देखा तो बोली दैनिक किधर आओ सुंदर क्यों मैं तुमसे शमा मांगना चाहती हूँ । इस की कोई जरूरत नहीं । जरूरत है तो उनको नहीं मुझको इतना है । उसने अपनी वहाँ में बाहर डाल दी और उसे घसीटकर डायनिंग हॉल के पीछे वाले बरामदे में ले गई । वहाँ बहुत उसने कहा मुझे जमा कर दो, इतना है उसने पन्ना सुंदर का आलिंगन कर उसका मुख्य घूम लिया । ये है सब कुछ इतना जल्दी हो गया कि सुंदर संभाल नहीं सका । सेमसन ने कहा जमा कर दिया है ना इतना है तो वहाँ गयी हूँ

सभ्यता की ओर: प्रथम परिच्छेद भाग 6

परिच्छेद एक भाग से चंद्र थॉमसन के आज के व्यवहार से और भी क्रुद्ध होता था । रहे उसी अंधेरे कोने में खडा अपने और अधिक समय तक वहाँ रहने के विषय पर विचार करने लगा था । वह वहाँ के सुख आराम, विशेष बॉल केस ने का विचार करता था और आपने सबके सामने पीटे जाने से किए गए अब मान पर विचार करता हूँ । अभी है रोबर्ट और सिमसन के व्यवहार ने उसके मन में व्यवस्थान छोडने के निश्च लेगी, उसके ही की थी । यौनाकर्षण की अनुभूति उसके शरीर में होने लगी थी । इस अनुभूति को पुष्टि मिली थी स्कूल और बोर्डिंग हाउस के वातावरण से । उसके साथ ही लडके उसके सामने नि संकोच लडकियों की बातें करते रहते थे और उनसे मिलने के उपायों पर विवेचना करते थे । कई बार लडके जब मैटर उनको बेट थी तो उसमें गर्व का अनुभव करते और उसका वर्णन अपने साथियों के सम्मान करते थे । किसी लडकी के लिए पीता जाना उनके लिए गौरव का विषय होता हूँ । सुंदर के बाबा ने उसे बताया था कि लडकियों में से एक से विवाह किया जाता है । विवाह के पश्चात पति पत्नी हो जाते हैं । इसी प्रकार भगवान राम और सीता थे । विवाह से पहले सब लडकियाँ बहीन समान होती है और विभाग के बच्चा बदनी को छोडकर सब लडकियां और स्त्रियां माँ के समान होती हैं । अपनी पत्नी के अतिरिक्त किसी भी लडकी अथवा स्त्री से प्यार करना आप है और उस बात का फल नरक में जाकर भोगना पडता हूँ । एक दिन एक लडके ने उसको बताया था कि उसका अमुक लडकी से लव हो गया । सुंदर ने पूछा लव क्या होता है वह लडका विश्व में वो सुंदर का मुख देखता रह गया । तत्पश्चात यह स्मरण का कि वहाँ अंग्रेजी नहीं जानता, अभी नया रिक्रूट हुआ है । उस ने पूछा प्यार करना जानते हो? सुंदर ने अपने बाबा का कथन स्मरण कर कहा वही जो पति पत्नी करते हैं, हाँ! बस वही है परंतु तुम्हारा तो उससे विवाह हुआ ही नहीं हूँ । हम विवाह का अभ्यास कर रहे हैं । उसको नया तो इस अभ्यास का समझ में आया नहीं । विवाह से पहले की प्यार की बात रूचि कर प्रतीत हुए । उस ने कहा यह ठीक नहीं है तो अभी नये हो इसलिए नहीं समझते । कुछ दिन साथ रहोगे तो सबको समझ में आने लगेगा । इस कथन ने तो सुंदर के मस्तिष्क में विचारों की एक नवीन श्रृंखला उत्पन्न कर दी । क्या इनका सवाज उससे भिन्न है जिसमें वह रहता था । उसने अपने घर पर फूफा और बुआ को परस्पर प्यार करते कभी नहीं देखा था । उनको इस विषय पर कभी बात करते हुए नहीं सुना था । हाँ उसकी बुआ कहाँ करती थी कि सुंदर अब सज्ञान हो गया है । इसके विवाह के लिए लडकी धोनी चाहिए तोफा कह दिया करता था । मंगत की बडी लडकी इसके योग्य है । इस पर बुआ कहती वह लडकी कुछ पहले रंग की है । रूपरेखा भी कोई तीखी नहीं है । हमारा सुंदर तो बहुत ही सुंदर बहुल आएगा । इसके अतिरिक्त प्यार के विषय में कभी बात नहीं होती थी । इसके विपरीत स्कूल और बोर्डिंग हाउस में तो जब भी दो लडके पडने अथवा खेलने से अवकाश पाते रे लव लडकी, सौंदर्य, आँखे टांगे इत्यादि पर बातें करने लग जाते थे । लडके लडकियां इकट्ठे पढते थे परंतु रहते प्रथम प्रथम थे । दोनों के बोर्डिंग हाउस प्रथक प्रथक थे और रात को अपने अपने कमरों में बंद कर दिए जाते थे । बोर्डिंग हाउस के दोनों विभागों की एक ही मैटर थी और वह उनके परस्पर व्यवहार की खूब देखभाल रखा कर दी थी । इस पर भी लडके लडकियां ऐसे अवसर बोर्ड ही लेते थे जब बस पर मिल सकते हैं । इन सब बातों से यही समझा था कि वह एक नवीन समाज में आ गया है । इस पर भी वो अपने मन को इस नवीन समाज के रहन सहन से सहमत नहीं कर सकता था । इस पर बैठ लगने की घटना हुई और वह भी सब बोर्ड, ओके समूह । इस प्रकार कोई अपमान से वो गलता जाता था । रात को सोया तो उसको नींद नहीं आई । उसको ऐसा अनुभव हो रहा था कि उसके सारे शरीर का रख सिर को चढ गया है । है । अपने को अत्यंत दुखी और हीन मानने लगा था । इस से बचने का उसको एक ही उपाय सूझ रहा था और गया था वहाँ से चले जाना । उसने अपने मन में निश्चय कर लिया था कि रहे इस नवीन समाज में नहीं रहेगा । इस निर्णय के पश्चात वो सोचने लगा कि यहाँ से कहाँ जाया जाए और किस प्रकार निकला जाए । घर से तो है देश विदेश देखने की लालसा से निकला था । अब तक अल्मोडा का ऍफ स्कूल और अनाथ बच्चों के लिए बने बोर्डिंग हाउस के अतिरिक्त उसमें कुछ नहीं देखा था । इस कारण घर लोडकर जाने का विचार उसके मस्तिष्क में टिक नहीं सका तो कहाँ जाए, उसको कुछ सूझ नहीं रहा । था । उसने अपने साथियों से दिल्ली, लखनऊ, कलकत्ता, बंबई ईत्यादि, बडे बडे नगरों के सौंदर्य का वृतांत सुना था । परन्तु ये सब किधर है? यहाँ से कितनी दूर है वहाँ पहुंचने का साधन क्या है? इस प्रकार प्रश्नों की उलझन मैं समझा नहीं सका । अगला दिन रविवार था, गिरजाघर जाना था । अतः जल्दी जल्दी नित्यकर्मों से निवृत्त हो देख वास्ले ठीक नौ बजे लडकों की पंक्ति में जा खडा हुआ । सवा नो बजे पंक्तिबद्ध गिरजाघर के लिए चल पडे । लडकियों की पंक्ति उनसे तक थी । दो पंक्तियां सात सात गिरजाघर में प्रवेश हुई और साढे नौ से पूर्व अपने अपने स्थानों पर बैठकें । स्कूल और बोर्डिंग हाउस के अधिकारी भी अपनी पत्नियों और बाल बच्चों के साथ उनके लिए नियुक्त स्थानों पर बैठ गए । कुछ बाहर के लोग भी आए हुए थे । वे भी साढे नौ बजे से पूर्व अपने अपने स्थानों पर बैठकें ठीक साढे नौ बजे घंटा वजह दो मिनट तक बस तरह तत्पश्चात और गन बजने लगा । मिस्टर बोल मॉर्गन पर किसी गीत की धुन बजा रहे थे । पांच मिनट तक और गन बसता रहा । इस अवधि में स्थिति गढ, चुप, शांत और स्थिर भाव से बैठे रहे । अब बोर्डिंग हाउस की कुछ लडकियाँ जो सबसे अगली पंक्ति में बैठी थी । उठकर मंच पर आ गई और धर्म गीत गाने लगी । इनमें सिमसन भी थी । उसका स्वर्ण अति मधुर और अन्य सबके स्वरों से रसमें धर्म गीत में तब यीशु मसीह से प्रार्थना की गई कि वे संसार में बसे सब बहुत बालकों को उंगली पकडकर स्वर्ग का मार्ग बताया । वे इनको दस मुख्या पापकर्मों से बचाए । पांच मिनट तक गाना हुआ और तत्पश्चात बादरी फादर आॅल इन मंच पर उपदेश देने लगा । उसने मंजील में से एक पद पढा और फिर उसकी व्याख्या करनी आरंभ करती हूँ । पता था भगवान की दस आज्ञाएं इनके पालन करने से मनुष्य का कल्याण होता है । फादर एवलिन ने इन दस आ गया हूँ की व्याख्या की । इसमें एक आ गया थी जिसमें कहा गया था कि तुमको व्याभिचार नहीं करना चाहिए, इस विहार भी चार सबकी उसने व्याख्या की । इससे सुंदर के मन में उस प्रकाश होने लगा जो जो पादरी के खत्म कार समझता गया हूँ । तो बोर्डिंग हाउस के लडके लडकियों के व्यवहार पर आश्चर्य अनुभव करने लगा । देश हम आप उपस्तिथ । भारी परिवारों ने दान के डिब्बे में कुछ सिक्के डाले और सब लोग गिरजाघर से बाहर निकलकर परस्पर बातचीत करने लगे हैं और छः मिनट तक बातचीत होती रही हूँ । इस काल में लो वर्ड सुन्दर से मिलने के लिए आया । उसने पूछा सुंदर कल सेमसन तो उनसे मिली थी क्या? हाँ रज शमा मानती थी तो तुमने उसे बेहद लगाने का बदला क्यों नहीं मांगा? क्या मानता हूँ रोबर्ट खिलखिलाकर हंस पडा सुंदर जिसमें वो उसका मुख देखता रह गया । इस पर रोबर्ट ने कहा तुम तो मेरे गवार हो, तुम को बहुत कुछ सिखाना पडेगा । देखो सुंदर सब लडकियाँ तुमको बोर्डिंग हाउस के लडकों में सबसे सुंदर समझती हैं । ये सभी तुम्हारी मोटी मोटी आंखों पर नट्टू हो रही है । इस कारण तुम को भी सबसे सुंदर लडकी का चुनाव कर लेना चाहिए । बनना था भारी गडबडी मत जाएंगे, क्या गडबड हो जाएगी । प्रत्येक लडकी तुमको अपना मित्र बनाना चाहेगी और तुम में किसी के लिए दूसरी ना देख वे परस्पर लड पडेंगे और फिर तुम्हारी झूठी शिकायतें होगी । इससे शिकायत करने वाली लडकी की शिकायत होगी और सब लडकों के रहस्य खुल जाएंगे । यह तो ठीक नहीं है । अच्छी बात है, विचार करुंगा । सुंदर में निश्चय कर लिया कि वह स्कूल और बोर्डिंग उसको छोड देगा । मिसिज बोलने मिसेज स्मिथ से सुंदर के विषय में पूछा तो उसने बताया कि मैं रात को तीन चार बार उठकर सब लडके लडकियों को सोया हुआ देखा करती हैं । उस रात उसने सुंदर का बिस्तर खाली देखा । मैं तुरंत लडकियों के कमरे में गई । वहाँ सिमसन का बिस्तर खाली पडा था । ऍम लेकर उसको ढूँढने लगे । उसने उन दोनों को बाहर मैदान में पत्थर पर बैठे, परस्पर आलिंगन करते और मुख्य चूमते देखा तो वह क्रोध में उतावली हो वहाँ जा पहुंची । जब तक सिमसन भाग गई थी और उसमें सुंदर को वहीं पर खूब बेटा । अगले दिन सिमसन से पूछा तो उसने बताया कि वह पेशाब करने गई थी । सुंदर कहीं से निकल आया और उसको बलपूर्वक घसीटकर मैदान में ले गया । वह कह रहा था, चांदनी बहुत सुंदर है और उसको नव करता है । यह बात सिमसन ने पवित्र पुस्तक पर हाथ रखकर शपथ कहा कर दिया था । इससे मुझे उस पर विश्वास करना ही पडा । अतः बोर्डिंग हाउस के नियमानुसार मैंने उसका पब्लिक नहीं किया था । मिसेज बॉल इसका था । वो सुनकर रो पडी । वह मन में विचार कर रही थी कि वह सब झूठ है । सुंदर के कोमल मन पर इस झूठ था । कितना बुरा प्रभाव पड सकता है । सेमसन तो लडकी है, अभी तो दस पंद्रह वर्ष की होगी । वह इस प्रकार के झूठ के परिणाम को समझ नहीं सकती । परंतु मिसेज स्मिथ ने बिना भली प्रकार जांच किए दंड देकर सुंदर के मन पर ईसाई धर्म की महिमा को कम कर दिया है । वो विचार कर रही थी कि किस पर का मिसेज स्मिथ के मूर्खतापूर्ण व्यवहार के दुष्प्रभाव को काम करेंगे । उसने निश्चय किया कि सोमवार को स्कूल में वह सुंदर को समझाएगी और उसको धर्म की अच्छाई और मनुष्य की दुर्बलता में अंतर बताएगी । घर बहुत उसने मदर मरियम के समूह खडे हो चीज झुका । मन ही मन प्रार्थना की रहे । इस प्रार्थना में सुंदर के लिए कुछ मांग रही थी । प्रार्थना के समय उसके होट निरंतर हिल रहे थे । तत्पश्चात दाहिने हाथ से अपनी छाती पर, रोज का चेन्नई वाला जो अपने पति के पास चली गयी, बॉल पूछ लिया । अभी अभी तो तुम गिरजाघर से आई हो और फिर मदर के सामने प्रार्थना कर रही थी । अच्छा तुमने कोई भारी गुनाह क्या मालूम होता है? मैंने नहीं किया । ये है तो किसी अन्य नहीं किया है और मैं उसकी माफी के लिए प्रार्थना कर रही थी । किसके लिए वही लडकी है जिसको आप कल यहाँ चाय का निमंत्रण दे कर लाए थे । ऍन उसमें क्या गुनाह क्या है? इस पर वासंती न रहे । बाद जो सुंदर ने बताई थी बता दी और फिर मैट्रन मिसेज स्मिथ की बात बता दी । इससे तो सुंदर तुम्हारी प्रार्थना का पात्र प्रतीत होता है । फॅमिली में उस लडके से भला क्या लेना है? मुझे विश्वास है कि सुंदर देख कसूर भला कैसे? मैं तो समझता हूँ कि तो उस लडके से खुद मोहब्बत करने लगी हो हूँ, करने तो लगी हूँ परन्तु एक पुत्र की तरह मुझे ऐसा अनुभव होता है कि वह मेरा छोटा भाई अथवा बेटा ही है । यह सब बकवास है । मुझे तो कई दिन से तुम पर संदेह हो रहा था तो उसको गोद में उठा । उसे छाती से लगा बिहार करते हैं । तुम बात कर हूँ । मैं समझता हूँ कि तुमको रेड रेड गार्डन के सामने आज ही कन्सेशन के लिए जाना चाहिए । रहे तो अभी मैं कल गई थी और अपनी सब बात बताता हूँ । उसमें कुछ भी ऐसा नहीं था जो मैं आपके सामने नहीं बता सकती । मुझे किसी औरत पर विश्वास नहीं आता मगर डीएम हम तो पति पत्नी है । हमें परस्पर सत्य का व्यवहार करना चाहिए । ठीक है मगर मैं तुमको उस लडके के बहो जाल में फंस गया । समझने लगा हूँ । तुम प्रतीक्षा कर रही हूँ कि वह कुछ बडा हो जाये तो उसके साथ भाग खडी हो । यह सब जोड है । अब वासंती न कुछ आवेश में कहा मैं किसी दिन तुम को रंगेहाथ पकडकर तलाक के लिए ऍम रेड से होगा । तलाक कैसे हो सकता है? हम तो जीवन भर के लिए पति पत्नी के रूप में बंधे हुए हैं । यही तो मुसीबत है ।

सभ्यता की ओर: प्रथम परिच्छेद भाग 7

प्रथम परिच्छेद बहुत सात अगले दिन सुंदर क्लास रूम में नहीं आया । इससे मिस कॉल को चिंता लगी । क्लास छोडने पर कार्यालय में गई । वहाँ क्लर्क से उसने सुंदर के विषय में पूछा तो उसको पता चला पिछले दिनों बोर्डिंग हाउस से एक लडका भाग गया था । उसकी पुलिस थाने में रिपोर्ट भी लिखवा दी गई है । मैसेज बॉल में पूछा क्या नाम है उस लडके का नाम? पता नहीं सब कहते हैं । उस लडके को दूर कैलाश के मार्ग पर बस्तियों में से लाया गया था । ऍम स्मिथ का विचार है कि वह जंगली उन्हें अपने घर की ओर नोट गया होगा । पुलिस ने उसकी खोज में दो कांस्टेबल भेज दिए । विशेष बॉल को इस सूचना से पति दुख हुआ । उसका विवाह हुए पांच वर्ष हो चुके थे । वो उसके कोई संतान नहीं हुई थी । इस कारण उसको सुन्दर से पुत्र समाज सुने अनुभव होने लगा था । जब से उसे पीटा गया था वह अनुभव कर रही थी कि सुंदर अपने आप में अपमानित किया गया समझ रहा था । अब उसके लापता हो जाने से वह अपने जीवन में जो कुछ थोडा बहुत रस अनुभव करने लगी थी, विलुप्त हो गया था । एक छेन सी आशा थी कि यदि पुलिस वाले उसको मार्ग में मिल गए तो पकड लाएंगे । एक बात से वह डर रही थी कि सुंदर पुलिस वालों के साथ आने से इनकार करेगा । दो क्या होगा? चार दिन बाद थाने से सूचना मिली कि कांस्टेबल रोड आए हैं और लडका घर पर नहीं गया । लडके के फूफा सुमेर ने कहा है कि वह नहीं लौटा । उसके झोपडे की तलाशी ले ली गई थी । है वहाँ भी नहीं है । यह सूचना वासंती ने अपने पति को दी तो उसने घृणा की दृष्टि से पत्नी की ओर देखते हुए का तुम तो छोकरे के जाने से अपने को विधवा अनुभव करने लगी हो । शर्ट वासंती ने का मैं उस लडके के लिए यह झूठा आरोप नहीं सुन सकती । इसके उपरांत पति पत्नी प्रथक प्रथक कमरों में सोने लगे किन्तु सुंदर अपने घर जाने के लिए नहीं लौटा था । है । गिरजाघर से निकल लडकों की पंक्ति में बोर्डिंग हाउस में पहुंचा तो अवसर पर आते से निकल नगर की ओर चल पडा । मैं जानता था कि मैदान की ओर जाना चाहिए उधर बस जाती है परन्तु बस में जाने का बडा देना होता है भाडा उसके पास नहीं था । इतना जानते हुए भी मैं नगर में पहुंच बस के अड्डे पर जा पहुंचा । बहुत सी सवारियां चल रही थी । बोली उन का सामान उठाकर बस पर चला रहे थे । सुंदर के मन में भी आया । यहाँ मजदूरी कर कुछ रुपये बातें कर लेने चाहिए । इतने में एक भद्रपुरुष एक स्त्री और एक लडकी के साथ रिक्शा पर आया । एक अन्य रिक्शा में उसका सामान लगा था । दोनों रिक्शा बस के अड्डे पर आ खडी हुई । सुंदर ने लगभग कर आगे बढते हुए पूछा सामान उतारो साहब, ये ऍम सुनकर पुरुष इसमें से समंदर के मुख्य और देखता रह गया । उस स्त्री ने कहा तो उनसे नहीं उठाया जाएगा । मांझी उठान होगा इस पर पर उसने बोल लिया नए नए काम करने आए हूँ जी तो नौकरी कर लोग क्या काम करना होगा । साहब, घर की सफाई, बाजार से सामान खरीदना और कई अन्य किसी प्रकार के कार्य करने होंगे । कर लूंगा हमारे साथ मुंबई चलना होगा । चल चल होगा । उसने अपने जिसमें को प्रकट नहीं करते हुए का कितने रुपये लोगे जो आप उचित समझे दे दीजिएगा तुम्हारे माँ बाप का । मैं अनाथ हो । साहब कहाँ रहते हो? ऍम में रहता था । आज वहां से चला आया हूँ तो वे तुमको ढूंढ रहे होंगे क्यों ढूंढेंगे? मैंने उनका कुछ सुनाया नहीं है । यह कपडे उनके है परंतु जमा आया था तो मेरे पास भी अपने कपडे थे जो उन्होंने उतार लिए थे । अब तक एक अन्य कुली ने उन का सामान उतार लिया था और उसे बस पर चढा रहे थे । सॉरी ने उसको कुछ डाटने के स्वर में कहा सामान को तो देखो इससे सुंदर को खेत सा हुआ नहीं तो सामान्य उठाने को मिला और जो नौकरी की बात चल रही थी वह भी पूरी नहीं हो सकी । उस पर उसने पुलिस होगा एक गोली सामान गिनकर रखना इतना है उसने पुनर सुंदर की ओर देखा जो किसी अन्य का सामान उठाने के विषय में विचार कर रहा था । इसी समय उस पुरुष ने आवाज दी वो लडके इधर आओ क्या नाम है तुम्हारा सुंदर सब थी तुम सुन्दर हो चलो तुमको नौकर रख लिया । देखो चोरी नहीं करोगे तो तुम को बहुत ही नाम मिलेगा । इतना है उसने अपनी लडकी जो स्त्री के पास खडी थी से कहा भावना देखो यह है सुंदर है । इसको लो कर रख लिया गया है अपना बैक इसको पकडवा दो लडकी ने सुन्दर को देखा परन्तु बैग नहीं दिया और उस बस के टिकट खरीदने के लिए चला गया । उसके स्ट्रेंज सुन्दर से पूछा क्या नाम है तुम्हारा? सुंदर इस समय अपने मन में बम्बई नगर के उस चित्र पर मनन कर रहा था जो उसने अपने मित्रों के मुख से सुन रखा था । वह इतना तल्लीन था कि उसे उस स्त्री का प्रश्न सुनाई ही नहीं दिया । उसका उत्तर उसकी लडकी ने देते हुए बताया माँ! यह सुंदर है और आपने जिसमें में लडके के मुख की ओर देख कर कहा सुंदर हाँ है । तो सुंदर ही साढे तीन टिकट खरीद लिए गए । भावना अभी दस वर्ष से छोटी थी । उसका आधा टिकट लिया गया । वे लोग अल्मोडा से काठगोदाम और वहाँ से बरेली तदंतर दिल्ली और वहाँ से मुंबई जा पहुंचे । यदि थाने में रिपोर्ट लिखाने वाला पुलिस को यह मैं बताता हूँ कि भागा हुआ लडका अपने गांव कैलाश के मार्ग पर गया होगा तो पुलिस बस अड्डे के आसपास खोज करती संभव गया । वह काठगोदाम फोन भी करती है । इससे सुंदर पकड लिया जाता । परंतु पुलिस ने रिपोर्ट के आधार पर दो सिपाहियों को कैलाश के मार्ग पर भेज दिया । किसी में उन्होंने करते हुए का पालन पूर्ण समझ संतोष की सांस ली और सुंदर बिना किसी विघ्न वादा के मुंबई पहुंच गया । उस पुरुष का नाम यादव देव विक्रम जी था । वह है मुंबई में एक कपडा मिल का मालिक था । अल्मोडा में भ्रमण के लिए आया हुआ था और दो सप्ताह वहाँ रहकर अब मुंबई वापस जा रहा था । साथ में उसकी पत्नी राधा और पुत्री भावना भावना का कोई भाई नहीं था । यादव देव ने सुन्दर को देखा तो उसको वह बहुत ही भोला वाला था । मेरा अभी प्रतीत हो मार्ग में ही उसने सुंदर का पूर्ण परिचय प्राप्त कर लिया था । सुंदर ने बोर्डिंग हाउस में आपने पीटे जाने तथा लडकियों के व्यवहार का व्रतांत नहीं बताया था । उसको अपने अपमान और लडकियों की निर्लज्जता की बात बताने में संकोच हुआ था । उसमें केवल है । बताया कि बोर्डिंग हाउस की मैटल बहुत ही क्रूर स्वभाव की इस तरह है । उसके व्यवहार से तंग आकर ये उसने व्यवस्थान छोडा । यादव देव ने उससे पूछा कितना पढे हो घर पर तो कोई पढना लिखना जानता नहीं था । मेरे फूफा सुमेर सेना में भर्ती हो हिंदी उर्दू सीकर आए थे । मैंने जब उनसे कहा मुझे यह सिखा दो तो कहने लगे कि उस झोपडी में रहने वाले को इस पर मगर बच्ची करने की जरूरत नहीं । अनाथालय में मिसेज बॉल स्कूल तथा घर पर पढाया करती थी । वे कहती थी के दो वर्ष में मुझे पांचवी श्रेणी जितना पढ जाना चाहिए । छह मास में उन्होंने मुझको बंगले जी की प्राइम बर और आधी प्रथम पुस्तक बढा दी थी । गणित में गिनती और पहाडे जोड रेड तक सीख गया हूँ । इस समय गोला और भाग का अभ्यास कर रहा था । हिंदी सीखे हो वाह क्या होती है वहाँ हमारे देश की भाषा है । हमारा देश कौनसा है? भारत यादव देव को इससे जिसमें हुआ फिर है विचार की वह सरोथा वीरान स्थान से आया है । चुप रहा परंतु इसपर सुंदर के ऑपरेशन से तो उसके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा । सुंदर में पूछा सुभाष बाबू कहाँ है? यादव देव कई मिनट तक सुंदर के मुख पर देखता हूँ । फिर कुछ विचार कर पूछने लगा तो क्या जानते हो सुभाष बागों के विषय में मेरा फूफा भारत की स्वतंत्र सेना में रहा है । वह सरकार का कैदी हो गया था । पीछे पंडित जवाहर लाल जी के आंदोलन से है और उसके साथ ही छूट गए थे तो तब तो तुम बिल्कुल ये सब नहीं हो, यह सब देता और सभ्यता की विवेचना सुंदर की समझ में नहीं आ रही थी । इससे मैं आश्चर्य अगर अपने मालिक का मुख्य देखता रहा हूँ नहीं

सभ्यता की ओर: प्रथम परिच्छेद भाग 8

हूँ । प्रथम परिच्छेद बहुत आठ यादव देव ओलंपिक प्रोत् मिल का मालिक था और बाइकुला में एक बहुत बडे मकान में रहता था । घर में छेड जी के परिवार के तो केवल तीन ही प्राणी थे सेठ साहब, उनकी धर्मपत्नी राधा और लडकी भावना । इसके अतिरिक्त यादव देव के भाई का एक लडका रतन लाल अपनी पत्नी सुमित्रा के साथ उसी घर में रहता था है । एक्साइज विभाग में एक उच्चाधिकारी था । अपने चाचा के मकान में बहुत स्थान होने के कारण बिना किराया दिए ही रहता था । रतन लाल का पिता अहमदाबाद में व्यापार करता था और अच्छा धनि आदमी था । इसके अतिरिक्त राधा का छोटा भाई मणीलाल भी उसी मकान में रहता था । मनी लाल की आयु लगभग बारह वर्ष की थी और भावना से दो श्रेणी आगे बडता था । दोनों ऍम स्कूल में पढते थे । वे दोनों प्राय मोटर में इकट्ठे ही स्कूल जाते और आते थे । यादव देव पूजा पाठ में बहुत विश्वास रखता था । वह तथा उसकी पत्नी प्रति रविवार मंदिर में जा पूजा पाठ का दाल दक्षिण दिया करते थे । धर्मोपदेश में उनकी भारी निष्ठा नहीं पूर्णिमा के दिन घर पर सत्यनारायण की कथा कराते थे और घर के तीनों प्राणी श्रद्धापूर्वक कथा का श्रवण करते थे । अब इनमें एक चौथा व्यक्ति सुंदर भी सम्मिलित हो गया । रतन लाल तथा मणीलाल इस कथा कीर्तन में रूचि नहीं रखते थे । वे खता के समय प्राय कहीं की सब जाया करते थे । सुंदर को केवल दो काम बताए गए थे । एक तो तीन व्यक्तियों के कमरों की सफाई करना । इन कमरों में अन्य लोगों का वर्जित हो गया था और दूसरा काम था बाजार से घर के लिए सोता लाना जो एक रसोइया था । मैं महाराज के नाम से पुकारा जाता था और सुंदर के आने से पूर्व वही रसद पानी का प्रबंध करता था । दस वर्ष से वेस्ट सेठ जी की नौकरी कर रहा था और इन दस वर्षों में एक दुबले पतले युवक से बढकर उन्होंने तीन मनका मोटा महाराज बन गया था । वह जब भी घर जाता था एक दो ट्रंक अन्य वस्तुओं तथा कपडों से बढकर साथ ले जाया करता था । इस वर्ष महाराज जब अपने घर जाने लगा तो सेठ जी को संदेह हो गया कि इस बार एक ट्रंक कुछ बडा और सादा से अधिक बाहरी है । छेड जीने पूछ लिया महाराज! बहुत कुछ ले जा रहे हो इस बार हाँ जी भगवान की कृपा से आप जैसे दयालु स्वामी जिसे विले हो तो से क्यों ना ट्रंक भारी हो जाएगा? महाराज तनिक देखा हो तो सही की हमारी दया की सीमा कहाँ तक पहुंची है? छेड जी गया तो एक असीन वस्तु है । इस की तो कोई सीमा बांधी ही नहीं जा सकती लीजिए । आपकी दया है तो फिर सब कुछ है । फिर आपको दिखाने में क्या संकोच हो सकता? महाराज नेट्रम खोला उसमें देश में और सूती साडिया थी । सोने चांदी के आभूषण थे और बच्चों के लिए खेलों ने भरे पडे थे । महाराज के अपने वस्त्र थे और फिर ट्रंक के एक कोने में एक एक तोले के सोने के पास टुकडे रखे हुए थे । महाराज को पचास रुपया मासिक मिलते थे और रोटी कपडा सेठ जी के घर से ही दिया जाता था । इस ट्रक में तो केवल सोना ही पांच सौ रुपये लगा था । सोना चांदी के आभूषण भी दो तीन सौ रुपये के थे । एक घडी थी जो सौ रुपये से कम मूल्य की नहीं होगी । सब कुछ मिलाकर एक सहस्त्र रुपये का सामान था छेड । यादव ने मुझे बुलाया और बोला महाराज हमारे अतिरिक्त क्या कहीं अन्यत्र भी कुछ काम करते हो? हाँ सर जी मैं एक छोटा सा व्यापार भी करता हूँ । तो तुम को भी मुंबई की हवा लग गई है । सेठ जी यहाँ रहते हुए दस वर्ष हो गए । अनेक निर्धनों को लखपति होते देखा है और लखपतियों को निर्धन होते हैं । मैं कई दुकानदारों के कमिशन एजेंट के रूप में कार्य करता हूँ । वो सत्य किस किस दुकानदार के एजेंटी करते हो और इसके लिए तो मैं समय कौन सा मिलता है । जब आप के लिए बाजार से सामान खरीदने जाता हूँ तो दुकानदार मुझको बिक्री पर दस प्रतिशत कमीशन देते हैं और लगभग एक रुपये गी । मैं उनकी मासिक बिक्री करा देता हूँ । तब तो ठीक है था । पिछले दस मार्च में तुमने कम से कम दस सहस्त्र रुपये की बिक्री करवाई है । ये संदूक की वस्तुएं कम से कम एक सहस्त्र रुपये के लगभग की तो है ही । हाँ जी, सब धन जो मैंने इन वस्तुओं पर न्याय क्या है, वह ग्यारह सौ तीस हो गया था । छेड यादव देर चुप कर रहा । उसने घर के लिए उस पूर्ण सामान का मूल्य उनका जो महाराज के द्वारा लाया गया था । पिछले वर्ष लगभग तेरह सौ रुपये का था । इससे सेट समझ गया कि महाराज उसके माल पर ही दुकानदार से दलाली लेता रहा है । महाराज के घर जाने से पहले ही सुंदर आ गया था और उसके पीछे वह माल खरीदकर लाने लगा । खाने पीने का सामान, एक पाठशाला के निर्धन विद्यार्थियों के लिए अन्य मासिक सदाव्रत के लिए अंदर भी चीनी इत्यादि, छोटा वोटा, कपडा और घर के लिए अन्य आवश्यक वस्तुएं सब मिल मिलाकर लगभग ग्यारह बारह सौ रुपए महीने का होता था । दस बारह दिन में ही सुंदर सब दुकानदरों से परिचित हो गया था और नियत भाव परमान लाने लगा था । मासिक बिल भुगतान करने जब रह गया तो दुकानदारों ने उसको बता दिया कि सेठ जी का पहला नौकर महाराज उनसे दस प्रतिशत कमीशन लेता था । सुंदर ने कहा, इस बार मैं कमीशन आप दिलों में ही काम कर दीजिए, ये है हम नहीं कर सकते । ऐसा करने पर आगे वाले नोकर बिल कमीशन कटवाकर बनवायेंगे और फिर अपना कमीशन उससे प्रथक मांगेंगे तो अलग दे दीजिए । महीने के पश्चात जब सुंदर ने छह थानी को हिसाब बताया और अपने कमीशन के एक सौ तीस रुपये भी साथ रख दिए तो जेठानी समझ नहीं सकी । सुंदर ने वे सब बातें जो दुकानदार के साथ हुई थी बता दी, किंतु इस पर भी जेठानी कुछ समझे नहीं । रात को सेठ जी घर आए ज्यादा ने सुन्दर की सारी बात उनको बताई तो खिलखिलाकर हंस पडे । राधा ने पूछा क्या बात है जी तुम्हारा तुलसी की माला जपने वाला जोर इतने रुपए उस काम में से चुरा लेता था जिसके लिए उसको हम वेतन देते थे । सत्य तो बहुत बेईमान था है हाँ, तभी तो फूल कर कुप्पा हुआ जाता था । आप सोल्जर को क्या वेतन दे रहे हैं? अब तुम ही बताओ क्या वेतन देना चाहिए? मेरे विचार में तो वह दो सौ रुपये मासिक का काम कर रहा है । जेठानी हंस पडी और बोली घर के लोकर को दो सौ रुपये मासिक वेतन और सरकारी पढे लिखे बाबू को एक सौ बीस रुपया । हाँ राधा सरकारी बाबुओं को आता ही क्या है? वे बेचारे नित्य लोग घंटे काम जो करते रहते हैं, केवल चक्की पीसते हैं और ये है क्या करता है? तभी रात के समय देखा करो कि वह क्या क्या करता है, क्या क्या करता है । वह जब यहाँ आया था तो हिंदी का एक अक्षर नहीं जानता था । अंग्रेजी की पहली किताब पडता था । उसको आए डेढ माह हो गया है । इस काल में हिंदी की तीसरी पुस्तक पडने लग गया है और अंग्रेजी की दूसरी कहाँ से और कब पडता है । वह भावना से पडता है और रात को पार्ट याद करता है । तब तो वह बहुत अच्छा लडका है वहाँ पर मैं चाहता हूँ कि उसका वेतन तो पचास रुपए ही ठीक होगा और उसके कमीशन का रुपया तो पृथक बैंक में जमा करा दिया करो, किसी समय उसको दे देंगे । इस बार महाराज पाचक छुट्टी समाप्त हो जाने पर लोटा तो उसको रसोई बनाने का काम तो दिया गया परंतु बाजार से सामान खरीदने का काम सुन्दर से ही लिया जाता रहा । इस पर तो महाराज दुबला पडने लगा । मैं संतुष्ट और सुन्दर से झगडा भी करता दिखाई देने लगा । महाराज को सुंदर के विरुद्ध आरोप लगाने का कोई बहाना नहीं मिल रहा था । उसकी लगभग सौ सवा सौ रुपए महीने की ऊपर की आए सुंदर के कारण समाप्त हो गई थी । एक दिन उसने सुंदर को कमीशन लेने के अपराध से सावधानी जी की दृष्टि में पतित करने के लिए कह दिया । माजी यह सुंदर अच्छा लडका नहीं है । अच्छा जेठानी जीने जिसमें मैं पूछा क्या खराबी की है उसने? ये है बहन भावना के कमरे में घुसा रहता है । मुझे याद है वह उससे पढा करता है । मांझी ये ठीक नहीं हो रहा । देखो महाराज, तुम अपना काम देखो । तुम को दूसरों की निंदा अथवा प्रशंसा करने की आवश्यकता नहीं है । मैं जानती हूँ वह वहाँ क्या करता है । इस प्रयास में विफल हो । मैं एक दिन सुन्दर से साठगांठ करने लगा । उसने कमीशन का एक भाग लेने का यतन करने लगा । उसने कहा सुंदर भैया तुमको दुकानदर सामान पर कमीशन नहीं देता देता है । सुंदर ने कह दिया कितनी बन जाती है । आजकल तो पौने दो सौ रुपया मासिक तक हो जाती है और वह कहाँ रखते हो इसलिए पूछ रहे वो पंडित उसमें मेरा भाग भी तो है । तुम्हारा वाक्यों और कैसे बनता है? मैंने ही यह प्रथा चलाई थी । इस कारण इस में मैं भी भागीदार होंगे । पर मैं तो उसे सेठ जी का हक मानता हूँ और प्रतिमास सब रकम सेठानी जी के पास जमा करा देता हूँ । उनके पास क्यों वस्तुओं का दाम दे देती है? और उन पर कमीशन भी तो उन्हीं को मिलनी चाहिए । अब सुंदर ये है बात नहीं, ये बाजार में माल खरीदने जाए तो उनको कमीशन नहीं मिलेगी । यह तो नौकरों का भाग है । नहीं महाराज, मैं ऐसा नहीं मानता हूँ । है जिनका भाग है उनको दे देता हूँ । देखो मारा मुझे कुछ झगडा किया तो मैं यह सब बात माताजी के सामने शहद होगा और फिर लोकरी से निकाल दिए जाओगे । महाराज यहाँ से भी निराश हुआ तो रतनलाल के पास पहुंचे । उसने उसे सुंदर के विरुद्ध भडकाने का यह शुरू की है परंतु रतन लाल को अपने स्वार्थ की हानि नहीं पहुंचती थी । इस कारण उसने बात डाल दी । महाराज इस सुंदर का कांटा निकालने के लिए जब सब प्रकार के ज्ञान तनकर है सफल हो चुका तो भगवान से नित्य प्रार्थना करने लगा कि वह सुंदर को अपने घर बुलाने हूँ हूँ हूँ ।

सभ्यता की ओर: द्वितीय परिच्छेद भाग 1

आप सुन रहे हैं तो आपको असम पर गुरूदत्त लेकिन सब रहता कि ओ और मैं हूँ आपका साथी । रमेश मुद्गल ऍम सोने जो मन चाहे जीती परिच्छेद बहुत एक सुंदर को सेट यादव देव की नौकरी में आए तीन वर्ष हो गए थे । इन तीन वर्षों में वो मैट्रिक के बराबर हिंदी, अंग्रेजी, गणित, इतिहास और बोल पड गया था । भावना अभी आठवीं श्रेणी में ही पडती थी । ज्यादा का भाई मनीलाल मैट्रिक में पडता था । सुन्दर उसकी उसके लेकर पढा करता था । एक दिन सुंदर लाल तेल फॅर पड रहा था । इससे पहले कठिन शब्दों और वाक्यों के और आप भावना से पूछ लिया करता था । अब भावना भी उसको समझाने में कुछ कठिनाई अनुभव कर रही थी । सुंदर बहुत तेजी से पढाई में उन्नति कर रहा था । भावना ने एक कठिन शब्द गार्ड बताने में असमर्थता प्रकट की तो मणीलाल के बाद जा पहुंचा । बडी लाल ने हैं उसके प्रश्न को सुनकर कहा अंदर तुम घर का काम क्या करुँ? यह प्लेयर्स के पुस्तके पढने से क्या होगा? मणीलाल भैया मैंने अर्थ पूछा है पढने के लाभ और हानि के विषय में तो मैंने कुछ भी नहीं कुछ मैं कोई शब्दकोश नहीं हूँ, जाओ ऐसे अर्थ डिक्शनरी में देख लिया करो । वह क्या होती है? एक पुस्तक होती है जिसमें सब शब्दों के अर्थ लिखे हुए होते हैं । सत्य हाँ सुंदर । अगले दिन अपने वेतन के रुपयों में से दस रुपया मांग एक अंग्रेजी हिंदी शब्दकोश खरीद लाया । उसके लिए इससे ज्ञान वृद्धि का एक ओर द्वार खुल गया । जिस पुस्तक को भावना और मनीलाल से पूछ पूछकर पडने में एक मांस लगता था, वह अब पंद्रह दिन में ही समाप्त होने लगी है । परिणाम यह हुआ कि जब सोलह वर्ष का हुआ तो डिग्री इसकी तेल ऑफ टू सिटीज सुगमता से बढकर अर्थ लगा सकता था । अब वह कार्लाइल की फॅमिली था । इतना ही नहीं अब भावना उस से उसने आया करती थी । भावना को स्वर्ण था की किस प्रकार है । उनको अल्मोडा के बस स्टैंड पर कुली का काम करने के लिए उत्सुक परेशानी की स्थिति में मिलाकर और तब वह सब देखने वालों को सुंदर प्रतीत होता था । अब तो वह बोर्ड कुमार व्यवस्था की ओर से बोर्ड अद्भुत आकर्षण का केंद्र वह प्रात पांच बजे उठा करता था । अभी घर के रानी सोये होते थे कि स्नानादि से निवृत्त हो सेठ जी की बैठक और घर के अन्य कमरे साफ कर दिया करता था । जब सेठ जी पूजा ग्रह में आते तो पूजा का सारा सवाल या था । साल सजा हुआ उन्हें मिलता हूँ । जब वे अपने स्टडी रूम में जाते हैं तो प्रत्येक वस्तु करीने से लगी और अपने अपने स्थान पर रखी मिलती थी । सफाई की यह बात होती थी कि धूल का एक कण भी कहीं दिखाई नहीं देता । इसी प्रकार सेठानी जी तथा भावना के कमरे भी साफ सुथरे तथा सुसज्जित होते थे । अब कुछ मास में सेठ जी ने सुन्दर को अपने कपडे दो भी को देने और उसे लेने तथा उनकी मरम्मत कराकर संभाल कर रखने और आवश्यकता पडने पर निकाल कर देने का काम भी सौंप दिया था । सेठ जी साढे नौ बजे मिल को जाते थे । उनके जाने के उपरांत सुंदर को अपने स्वाध्याय का समय मिल जाता था । भावना और मनी लाल भी स्कूल चले जाते थे । इस समय हिंदी की पुस्तकें बढता । रामायण, महाभारत तथा भागवत इत्यादि पुस्तकें सेठ जी के पुस्तकालय से पढने को मिल जाती थी है । हिंदी शब्दकोश भी ले आया था और जहाँ कहीं अर्थ समझने में कठिनाई होती थी वह है शब्दकोश की सहायता से ले लिया करता था । ठीक है एक बजे पुस्तकों को अपने अपने स्थान पर रखकर वह उन्हें सेवा के लिए तैयार हो जाता है । सेठ जी भोजन करने घर आया करते थे । जब मैं सेठानी जी के साथ भोजन करते तब उनके पीछे खडा रहता और उनके भोजन पर उसने को देखता रहता हूँ । ये बहुजन कर उठ जाते तो वैसे हम भोजन करता हूँ । सेरजी ढाई बजे मिल लोड जाते तो वह रसोई का तथा राजधानी जी अथवा भावना दिन के समय जो बताया जाती थी, सामान खरीदने बाजार चला जाता हूँ । वहाँ से मैं छह बजे तक लोड था । सबको सामान पहुंचा अगर मैं सेठ जी के आने से पूर्व उनकी बैठक को एक बार तुम्हें हजार देता और अन्य आवश्यक सामान ठीक कर देता हूँ । सुंदर घर का एक विश्वस्त व्यक्ति माना जाता था । वह भावना ज्यादा इत्यादि के साथ ऐसे हिल मिलकर रहता था जैसे सेठानी जी का अपना जाया बच्चा हो । इस पर भी वो कुछ दिनों से घर के वातावरण में एक परिवर्तन अनुभव कर रहा था । रतन लाल सुंदर कोटेड इंडस्ट्री से देखता था । कभी सुंदर कुछ बात कहता तो बिना कुछ उत्तर दिए मुख दूसरी ओर मोड लेता था । मणीलाल भी अब उससे दूर दूर रहने लगा था । उसके बुखार ने का ढंग भी बदल गया था । मैं अब वो सुंदर कहकर पुकारने लगा था । सुन्दर घर के इस बदले हुए वातावरण पर चिंतित था परन्तु नए तो उसे इसका कारण किसी ने बताया था और न ही किसी से पूछ सकता था । वह समझता था कि यदि वह किसी से उसके व्यवहार के विषय में पूछेगा तो वह एक प्रकार से अपने आप को स्वयं ही दोषी सिद्ध कर देगा । उसे यह था कि लोग चोर की दाढी में तिनका वाली कहावत कहने लगते हैं परन्तु बात हो गई एक दिन भर बाजार से घर का सामान खरीदने चला तो रसोइया वाराज साथ हो लिया । उसे साथ चलता देख सुंदर रहे । घूम कर उसकी ओर प्रश्न भरी दृष्टि से देखा तो महाराज पूछने लगा सुंदर कब जा रहे हो? कहाँ मारा? नौकरी छोड कर मैं तो लोग भी छोड नहीं रहा तो जूतों से पीटपीटकर निकले जाओगे तो मैंने क्या अपराध किया है? तुमने सेठ जी की लडकी भावना से अनुचित व्यवहार किया है और उसने तुम्हारे पास शिकायत की है । मेरे पास तो नहीं परन्तु हुई है बात नौकर सागरों में विख्यात हो गई है । अवश्य ही उसने अब हुआ । जिस किसी ने भी देखा होगा सेठ जी से शिकायत की होगी । देखो पंडित सुंदर ने कुछ डांट के भाव में कहा मैंने ऐसी कोई बात नहीं । भावनाओं को मैं बहन मानता हूँ और उसके अनुरूप मैं उसका आदर करता हूँ । यदि तुमको इस बात जानते भी हो तो बताओ । अन्यथा मेरी बहन के विषय में जो कुछ मिथ्यावाद किया तो तुम्हें मैं पीटे बिना रहूंगा नहीं । अब तुम चले जाओ । मैं तुमसे बात नहीं करना चाहता हूँ । पंडित ने सुन्दर की आंखों में खून उतारा । देखा तो बेहद ही तो लोड गया पर सुंदर के मन में एक भय उत्पन्न कर गया । उसे संदेह हुआ कि कोई है जो उसकी शिकायत कर रहा है । मैं जानता था कि उस पर यह आरोप मित्तियां है और उसे विश्वास था की भावना उसके व्यवहार हो । कभी अनुचित कह नहीं सकती । सबसे बडी बात ये थी कि घर के सब लोग उसे देख गंभीर हो जाया करते थे । केवल भावना ही थी जो अभी भी उसे मुस्कराकर बात किया करती थी । महाराज के बाद सुनकर भी उसने यही उचित समझा की ओर से सावधान रहना चाहिए । किसी के मन में किसी प्रकार का संदेह उत्पन्न होने नहीं देना चाहिए की भावना से उचित से अधिक सामीप्य अथवा किसी प्रकार का अनादर का भाव रखता है । इस पर भी घर में रहते हुए अब पहले से भी अधिक घर के प्राणियों को अपने से विलग हो रहा अनुभव करने लगा था । सेट यादव और रहता अब उसकी बातों पर हसते नहीं थे और जब है कामकाज से एक कमरे से दूसरे कमरे में जाता तो उनकी आंखे उसके पीछे भी चेंज गोमती दिखाई देने लगी थी । सुंदर इस परिवर्तन का अर्थ नहीं समझ सकता था । इस पर भी पूर्व अपने कार्य में तत्पर रहता था । घर में अब केवल भावना ही थी जो उसे देख कर अभी भी मुस्कुराती और उससे उसी ढंग से बातें किया करती थी जैसे वह पहले करती थी । घर के अन्य प्राणी कहीं सामने होते तो वे इन दोनों को बातचीत करते देख गोल गोल कर देखा करते । एक दो बार सुंदर को उनकी तीव्र दृष्टि का अनुभव हुआ परन्तु क्योंकि वे कुछ कहते नहीं थे इस कारण रहा है । इसे अपने मन का भ्रम मान चुप रह जाता था । वास्तव में एक कास्था का समय आ रहा था । एक दिन रात का भोजन करते समय सुंदर सादा की बात थी । वहाँ उनके पीछे आकर खडा हुआ तो सेठ जी ने कह दिया सुंदर, अब तुम को इस प्रकार यहाँ आकर खडे होने की आवश्यकता नहीं है तो क्या मुझे नौकरी से निकालने का विचार कर रहे हैं? सेठ जी ने मुस्कुराकर कहा नहीं सुंदर, मैं तुम्हरी तरक्की करने का विचार कर रहा हूँ । मैंने सुना है कि तुम सेक्सपियर पढकर उस पर टीका टिप्पणी करने लगे हो । जी नहीं, मैं स्वयं को अभी इतना योग्य नहीं समझता हूँ परंतु मैंने तुम्हारे सेक्सपियर पर लिखे नोट्स देखे हैं । बहुत अच्छे लिखे हैं । हमारी भावना तो उन्हें समझ भी नहीं सकती हैं । जी इसमें कारण है । वह अभी तेरह वर्ष की बच्ची है । मैं सोलह वर्ष का हो रहा हूँ । ॅरियर मानना उद्गार लोगों के विषय में लिखता है । मैं भावना से अधिक जीवन की पहुँच देख और सहज चुका हूँ । इस कारण जो मैं समझता हूँ है उसके समझने से भिन्न है । मैं समझता हूँ कि यदि मुझसे भी बडी आयु का कोई व्यक्ति हो जो मुझसे भी अधिक समझेगा । मानव मन एक कथासागर है । इस की भावनाओं में जितनी गहरी डुबकी कोई लगानी जानता हूँ, उतने ही अधिक रतनू से प्राप्त होंगे । झेड सुंदर की बात नहीं हो रहा था । वह तो उस सुंदर की मूरत को स्मरण कर रहा था जिसको वह लोग कर रखने के लिए साथ लाया था । रहे अनुपम बाहर ही लडका अब ऍर पर टिप्पणी करने लगा था । देखो सुंदर कई दिन से मैं विचार कर रहा हूँ कि तुम्हें मिल में किसी काम पर लगा दूँ । परन्तु तो भारी योग्यता तुम्हारी आयु की अपेक्षा बहुत अधिक है । इस कारण जो भी काम तुम्हारी योग्यता के अनुसार है वह तुम्हारी आयु वाले को दिया नहीं जा सकता हूँ । मैं तो इससे यह समझता हूँ कि अब आप को मेरी सेवाओं की आवश्यकता नहीं रही । नहीं, यह बात नहीं सुंदर । इधर सामने आकार बैठो । उस समय खाने की मेज पर सेट सेठानी और भावना बैठे थे । भावना अपने माता पिता के बीस बैठी थी । सुन्दर उनके साथ बैठ कर भोजन करने में संकोच करता था । ऐसा पहले कभी हुआ भी नहीं था । इस कारण सुंदर ने कहा आप भोजन करिए, मुझे यहाँ खडा होने में किसी प्रकार का कष्ट नहीं हो रहा है । कस्ट का प्रश्न नहीं सुंदर तो आज हमारे साथ ही भोजन करूँ । अभी भी संकोच बस सुंदर वही पीछे खडा रहा । भावना हंस पडी हस्कर बोली बैठो ना पिताजी की आज्ञा का पालन नहीं करोगे । सुंदर किसी प्रकार अपना साहस बडो घूम कर मेज की दूसरी ओर जाकर बैठ गया । मेरे को कह दिया गया कि सुंदर के लिए भी खाना ले आए । अभी खाना परोसा ही जा रहा था कि रतन लाल और उसकी पत्नी आ गए । रात का खाना वे प्राइस सेठ जी के साथ बैठकर खाया करते थे । कभी सिनेमा या क्लब गए हो तो बात दूसरी थी । आज ये आए और सुंदर को मेज पर बैठा देख तथा उसके सामने भी खाना रखा देख खडे के खडे ही रहे गए । सेट यादव उनके मन की भावना को समझता तो था परन्तु उस और ध्यान नहीं देते हुए कहने लगा खडे खडे क्या देख रहे हो? रतन लाल कुछ है स्वाभाविक प्रतीत हो रहा है । आज सुंदर को यह मान प्रतिष्ठा किस उपलक्ष्य में दी जा रही है, इसका तुम्हारे खाने से क्या संबंध? वो जान तो महाराज नहीं बनाया है । चाचा जी रतन लाल ने अभिमान योगमुद्रा देखा, मैं एक सरकारी अफसर हूँ । मुझको डेढ सौ रुपया वेतन मिलता है । मेरे साथ बैठकर राज्य के मंत्रीगण खाना खाते हैं । ऐसी अवस्था में एक अज्ञात माता पिता के संतरे दो दो पैसे का सामान खरीदने के लिए रखे नोकर अनपढ गवार व्यक्ति के साथ बैठकर खाना खाने में मैं अपना मान समझता हूँ तो ऐसा करोड मतलब तो सेठ अभी अपनी बात समाप्त कर भी नहीं पाया था कि सुंदरलाल मेज पर से उठ खडा हुआ उठकर उसने कहा भैया आइए आप पहले खा लीजिए, मैं बाद में खान होगा । सेट इस स्थिति में कुछ उद्विग्न सा हो गया । उसने सुंदर को का बैठ जाऊ । सुंदर मैं आदेश देता हूँ तुम यहीं पर बैठ जाओ । आदेश का सब सुन कर सुंदर विस्मय में कभी सेट के मुख की ओर और कभी रतन लाल के मुफ्ती और देखने लगा । सेठ ने रतन लाल को कुछ कहने का अवसर नहीं देते हुए कहा ये है मेरा घर है क्या मैं अपने घर में भी अपनी इच्छा से किसी का मान नहीं कर सकता, कर सकते हैं । चाचा जी आप इस छोकरे का मान कर लीजिए । हम कहीं अन्यत्र जाकर भोजन कर लेंगे । सेट कुछ कहने ही वाला था कि रतन लाल और उसकी पत्नी डायनिंग हॉल से निकल गए । उनको जाता देख था नहीं उठ कर चली गई । सेठ अभी भी बैठा रहा । उसने मेरे से कह दिया माताजी का भोजन उनके कमरे में देखो और रतनलाल बाबू जी मैंने पूछा उनसे पूछ लो कहे तो उनका भी उनके कमरे में देव हाँ हूँ हूँ ।

सभ्यता की ओर: द्वितीय परिच्छेद भाग 2

हूँ । डीटीए परिच्छेद बहुत दो सेट । उनकी लडकी भावना और सुंदरलाल ही डाइनिंग हॉल में रह गए थे । सुंदर की आंखों में आंसू बह रहे थे । रहै समझ रहा था कि यह सब उसके कारण ही हुआ है । इस बात के समझने में कठिनाई नहीं थी कि उसके बीस घर में स्थान के विषय में मतभेद हो गया है । अपने मन में विचार करता था कि जिस परिवार ने उसके साथ इतना कुछ किया है, उसे एक पशु से मनुष्य बनने का अवसर दिया है । उसमें ही वैमनस्य का कारण बने । यह है उचित नहीं । इस समय उसको अल्मोडा के सेंट जोसेफ स्कूल की अध्यापिका मिसेज बॉल का वात्सल्य स्माॅल वहाँ पर हुए अपमान से बचने के लिए जब बाहर गया था तो उसे मिसिज बॉल से पृथक होने का भारी दुख था । यहाँ सेट यादव देव के घर पर तो उसको नए केवल वात्सल्य आता मिली थी । प्रत्युत मान और विश्वास भी मिला था । यहाँ से जाने पर तो उसको न केवल दुखी होगा, प्रद्युत वेस्टेड जी के भी दुख का कारण बन जाएगा । इस पर भी अपमान सहन करने की सामर्थ्य उसमें नहीं थी । अच्छे भावना और सुंदरलाल के सामने खाना परोसा गया । स्टेट ने एक ग्रास था अगर छोड दिया भावना और संदर्भ में तो छुआ भी नहीं । तीनों खाने से उठे और चुप जब अपने अपने कमरों में चले गए । सुंदर को पिछले कई मासके खिंचाव का कारण और उसका परिणाम स्पष्ट हो गया । मैं अपने मन में निश्चय कर बैठा था कि अब है इस घर को छोड देगा । मैं इस समय विचार कर रहा था आप की किस प्रकार छोडा जाएगा अब पढने से और पूर्वापेक्षा अधिक अनुभव होने से उसको निश्चय करने में उतनी देर नहीं लगी जितनी अल्मोडा के आना था । ले को छोडने में लगी थी । उसने निश्चय किया कि वह एक सिटी सेठ जी को लेकर छोड दें । इस विचार के आते ही कागज कलम लेकर पत्र लिखने बैठ गया । उसने सेठ जी के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करते हुए लिख दिया मैं आपके परिवार में राॅक का कारण बंद कर प्रतिघन बनना नहीं चाहता हूँ । मैं जा रहा हूँ मैं यहाँ पर देश रो सामान आया था और वैसे ही जावे रहा हूँ । इस पर भी आप के घर में रहकर जो कुछ मिला और जो मेरे मन और शरीर का भाग बन गया है उसे मैं अपने से पृथक नहीं कर सकता । मेरे शरीर में वृद्धि हुई है मेरे मन का विकास हुआ है । ये मेरे साथ आपकी कृपा और चाहिए ताकि समृति बढ मरण पर्यन्त रहेंगे । माता जी ने आज उसको पचास रुपए दिए थे । वे व्यय नहीं हुए । उन्हें मैं मेज की दराज में रखे जा रहा हूँ । भावना बहन ने मुझे एक कलम दी थी । वह मैं साथ ले जा रहा हूँ । बहन का उपहार वापस करने का साहस मुझें नहीं है । माताजी तथा भावना बहन को मेरा नमस्कार कह दीजिए । मेरे दोस्त को छमा कर बुला दीजिएगा आपका पुत्र तुल्य । वह अभी हस्ताक्षर करने ही लगा था कि पीछे से किसी ने उसका हाथ पकड लिया । उसने घूम कर देखा । भावना खडी थी । उसने विश्व में से उसके मुख पर देखा तो भावना में डबडबाई आंखों से कहा मैं तुमको यहाँ से कभी नहीं जाने दो क्यों बस मैं नहीं चाहती हैं परन्तु क्यों? क्या तुमको मेरा होता देख कुछ अच्छा लगता है । मैं उस तापमान को मान में बदलने का विचार रखती हूँ । कैसे तुम से अपने विवाह की घोषणा कराकर विवाह नहीं या नहीं होगा तो बच्चों किसी बातें करती हूँ छोडो मुझको वेयर्स की बात मत करो । तुम नहीं समझते सुंदर सुनो इस झगडे को चलते हुए बहुत समय हो गया है तो तुम जानते ही हो कि मणीलाल मेरे साथ मोटर में स्कूल जाया करता था । पिछले वर्ष से वे स्कूल छोडकर कॉलेज में भर्ती हो गया । इससे हम दोनों का इकट्ठे स्कूल जाना बंद हो गया था । दो माह हुए, एक दिन मेरे पास आया और मुझको मोटर में जो चलने के लिए कहने लगा । मैं पहले तो माननी नहीं परंतु उसके बहुत कहने पर मान गई । मोटर में ही उसने मेरे साथ सटकर बैठते हुए कहा भावना तुम तो अब बहुत सुंदर दिखाई देती हूँ । मैंने कहा ये है तो अच्छी बात है । मैं एक बात कहने के लिए आज तुमको इधर लाया हूँ । हाँ बताऊँ क्या कहना चाहते हो? पहले तुम बताओ कि मैं तुमको कैसा लगता हूँ । मुझको तो तुम वैसे ही बंदर जैसे दिखाई देते हो जैसे स्कूल में लगाते थे तो क्या मेरी सूरत शक्ल में कोई अंतर नहीं पडा? उस विशेष तो दिखाई नहीं देता । इस पर भी मैं लडका हूँ । हमारे कॉलेज की कई लडकियाँ मुझ पर डोरे डाल रही है किंतु मैं तो अपना जीवन एक लडकी से बांधने का निश्चय कर चुका हूँ । किससे दम से मैं उसका अभिप्राय समझती थी । मुझे उसके मानसिक प्रवर्ति पर संदेह हुआ था । इस पर भी बात न समझने का बहाना करते हुए मैंने कहा मुझसे तो तुम पहले ही बंदे हुए हो तो मामा हूँ मैं भांजी हूँ बट मैं तो मैं अपनी पत्नी बनाना चाहता हूँ, पर बहन जी तो लडकी के सामान होती है । यह समूर, ऐसा देर तथा अनपढ लोगों की बातें । हम आज डेमोक्रेटिक और स्वतंत्रता के युग में भी ऐसी बातें करें जैसे जंगली लोग प्रागैतिहासिक काल में क्या करते हैं तो हमको चुल्लूभर पानी में डूब मरना चाहिए । कुछ भी हो मैं तुमसे विवाह नहीं कर सकती है तो मैं बलपूर्वक तुम्हारा खरण करो तो मुझ पर बल प्रयोग करोगे तो मैं तुमसे बाल चली नहीं हो गया । इस पर मैंने अपने पूरे बाल से एक्सपर्ट उसके मुख पर लगाई और ड्राइवर को गाडी रोकने को कहा । ड्राइवर हमारी बातें सुन रहा प्रतीत होता था । उसने हस्कर गाडी खडी कर दी और नीचे उतर गाडी का द्वार को मणीलाल को कहने लगा मामा जी आप आगे की सीट पर आ जाओ, मणीलाल चुपचाप देगी मिलेगी । बाटी आगे ड्राइवर के पास जाता था । जब हम लोडकर घर पहुंचे तो सीढियाँ चढते हुए उसने कहा मैं जानता हूँ तो सुंदर को पसंद करती है । बकवास बंद करो । इतना कर मैं जल्दी जल्दी सीढियाँ चढ गई । मैंने उसी रात पिताजी को पूर्ण व्रतांत बता दिया । इस पर पिताजी बोले तो मणीलाल का कहना सत्य है कि तुम सुंदर को पसंद करती हो । मैं इस बात का कोई उत्तर नहीं दे सकता है । मैं वास्तव में तुमको मणीलाल से कई गुना अच्छा समझती हूँ । इस पर भी मैंने कहा पिताजी विवाह माता पिता करते हैं, जिसके साथ करियेगा वहीं पसंद हो जाएगा । इसके पश्चात माता पिता ने मेरे विवाह के विषय में बातचीत होनी आरंभ हो गई । मणीलाल और माताजी में तो निति ही घुल घुलकर बातें होती है । मणीलाल और रतन लाल में भी गुप्त गोष्ठियां हो रही है । मुझे लगता है कि पिताजी का विचार तुम को अपना दामाद बनाने का हो रहा है । एक दिन माताजी और पिताजी में बहुत हुए बातें हो रही थी । मुझको अपने कमरे में भी बोलने का शब्द सुनाई दे रहा था । इसपर भी वहां बैठ में समझ नहीं सकी थी कि किस विषय में बातें हो रही है । एक का एक मुझको मणीलाल का नाम सुनाई दिया । मेरे कान खडे हो गए और उनकी बातें स्पष्ट क्या सोने के प्रलोभन को छोड नहीं सकी । मैं उठ कर गई और उनके कमरे के द्वार पर कान लगाकर उनका वार्ता लाभ सुनने लगी हूँ । पिताजी कह रहे थे उसको भावना ने सब बातें बताई तो मैंने ड्राइवर से पूछा और उसने भावना के कथन का समर्थन कर दिया । मैं उस बदमास को इस घर से निकाल देना चाहता हूँ । युवक है । माता जी ने कहा भूल कर बैठा है । इस अवस्था में आपने क्या कुछ नहीं किया होगा? आपको शक्ति हो गई है तो पूजा पाठ, धर्म कर्म में आप रूचि लेने लगे हैं । पिताजी बोले यह ठीक है ज्यादा परंतु मैंने अपनी भांजी से संबंध जोडने का यतन तो नहीं किया था । यह नहीं सर की ज्ञान तो मुझको बचपन से ही था की बहन भांजी पत्नी नहीं बन सकती । हाँ मैं सेंट थॉमस स्कूल में नहीं पढा था । उस स्कूल में तो आपकी लडकी भी बडी है परंतु उसका बीज भले आदमी का प्रतीत होता है । तो क्या मणीलाल भले माता पिता की संतान नहीं है, यह मैं क्या जान लो उसके कारण तो तुमने सोने ही लिए है । तो आपने बीस के पैदावार की बात भी सुन लो । मैं अभी से सुन्दर से संबंध स्थापित कर चुकी है । मणीलाल ने कहा है ना नहीं । जतनलाल कहता है रहे तो आपके घर में सबसे अधिक पढा लिखा और समझदार लडका है । उसको ही बुलाकर पूछ लो राधा या झूठा लांछन तुम अपनी लडकी पर लगाकर ठीक नहीं कर रही हूँ । इस पर भी सोनू मैंने कई बार अपने मन में विचार क्या है? सुन्दर एक अच्छा दामाद बन सकता है परन्तु यदि तुम्हारा कहना सत्य हुआ तो उसका मुखकाल आकर घर से निकाल दूंगा । झूठ और सत्य का निर्णय कैसे होगा? मैं कल से चोरी, चोरी, लडकी और समंदर की गतिविधियों पर नजर रखूंगा । रतन लाल को भी कहूंगा कि आपने कहे हुए को सिद्ध करें ऐसी बात सिद्ध करनी और वह भी आप है । दस पक्षपाती व्यक्ति के समूह । यदि ऐसा संभव नहीं तो कठिन अवश्य ही है । तो बिना प्रमाण के मैं भी इतने बडे झूठ को मान नहीं सकता । इसके पश्चात से पिताजी, माताजी, जतनलाल और सुमित्रा भावी तुम्हारे प्रत्येक कार्य की देखरेख करते रहे हैं । पिताजी ने तुम्हारी पुस्तकों की तलाशी ली है, तुम्हारी लिखी कॉपियों को पढा है और तुम को रात होते हुए भी देखा है । तीन चार दिन की बात है तो मैं स्कूल गई हुई थी तो मैं बाजार सामान खरीदने के लिए गए हुए थे कि पिताजी और माताजी में कुछ बातें हुई प्रतीत होती है । उसी रात माता जी मेरे सोने के कमरे में आई और मुझसे कहने लगी भावना सुमित्रा के भाई मोहन से विवाह कर लो, इसमें तुम्हारा भी कल्याण होगा । हमारा भी मैंने पूछा कैसे कल्याण होगा? हाँ केवल इसलिए कि वह सुमित्रा का भाई है । देखो भावना रतन लाल की पत्नी का भाई है । कई बार यहाँ आया भी है । उसके विषय में रतनलाल कह भी रहा है । मैं इस संबंध को ठीक समझती हूँ । वरुन तूमा मेरे विवाह की चिंता क्यों लग गयी? अभी से हमारे स्कूल की मुख्याध्यापिका पैंतीस वर्ष से कम नहीं होगी । अभी तो उन्होंने शादी नहीं की है । होना है, अब कहीं करने का विचार कर रही है । मेरी आयु तो अभी चौदह वर्ष की ही हुई है । तुम्हारी मुख्याध्यापिका अवश्य ही किसी निर्धन घराने की होगी । यदि उसके बाप की भी कोई कपडा मिल होती तो उसका कभी का विवाह हो गया होता और अब तक तो उसके घर में पोता खेल रहा होता हूँ । तो क्या धन होने से भी बहुत जल्दी होना चाहिए? होना चाहिए अथवा नहीं? मैं यह बात नहीं कह रही परंतु हो जाता है तेरी हैं सुंदर भी तो घर में है । एक माँ बाप का लडका नस पति बन जाएगा । वह लखपति क्यों बन जाएगा? तो तुम्हारे पिता उससे तुम्हारा विवाह करना चाहते हैं और माँ तुम क्या चाहती हूँ मैं इतनी बडी संपत्ति एक नोकर पेश आदमी वह भी परदेशी के हाथ में जाने नहीं देना चाहते हैं तो माँ पिताजी और तुम मणीलाल को गोद ले लो, पिताजी के लाखों उसको मिल जाएंगे और मैं जो मेरे भाग्यम होगा, लेन होगी तुम्हारे पिता मानते नहीं है अन्यथा यह बात आज से बहुत पहले हो चुकी होती है । तो माँ पिताजी को मना लो, मैं तो अभी विवाद नहीं करूंगी । मेरा इस प्रकार स्पष्ट उत्तर सुनकर माँ मिरासी वहाँ से उठ कर चली गई हूँ ।

सभ्यता की ओर: द्वितीय परिच्छेद भाग 3

द्वितीय परिच्छेद बहुत तीन बाद महाराज ने ही चलाई थी । पिछले छह वर्ष से मस्जिद के तू है कि भारतीय दोबारा हो रहा था । उसे वेतन तो मिलता था परंतु उतने से उसका बनता कुछ नहीं था । ऊपर की आय का लडका लगा तो अब उसके बिना उसकी नींद हराम हो रही थी । एक दिन यह तो घटना से एक माह पहले की बात थी । महाराज ने मणीलाल को भावना की ओर लाल सपोर्ट दस्ती बात करते देखा तो छिद्र को देख उसके द्वारा अपने कार्य की सिद्धि की बात विचार करने लगा । उसी दिन उसने समय पागर मणीलाल से एकांत में बात कर दी । उसने कहा बाबू मणीलाल, मैं घर का पुराना लो करूँ । इस कारण घर की मान प्रतिष्ठा की चिंता करता रहता हूँ । अब बात को सीमापार लगती दिखाई दे रही है । इस कारण कहने का साहस कर रहा हूँ । मणीलाल ने पूछ लिया कहो ना क्या कहना चाहते हो भैया, यह सुंदर और भावना का मेलजोल घर के सब नौकरों को भला प्रतीत नहीं हो रहा । क्या खराबी मालूम हो रही है उसमें? युवा लडकी और लडके का मेलजोल भला नहीं समझा जाता तुमने उनमें किसी प्रकार की खराबी देखी है भैया हम लोग कर लोग उधर दस्ती भी नहीं कर सकते । इस पर भी हम मनुष्य है और हम भी जवान रह चुके हैं । इस कारण ऐसी स्थिति में जो स्वभाविक बात हो सकती है वह समझते हैं । मणि लाल ने उसे तो यही कहा । महाराज निराधार बातें नहीं की जाती हैं । अपने से बडों की बात परस्पर नहीं करते । महाराष्ट्र निराश हो चला गया परंतु मणीलाल के मन में चिंतन का विषय छोड गया है । यह समझे हुए था की उस की बहन ने उसे घर में इसी कारण रखा हुआ है की उसे गोद लेकर पूर्ण संपत्ति का मालिक बना देगी । परंतु गोद लेने की रसम होने में ही नहीं आती थी । अब महाराज के कहने का प्रभाव उसके मन में ये है वहाँ की यदि भावना से विवाह हो जाए तब तो गोद लेने की रसम की आवश्यकता ही नहीं रहेगी । तब स्वाभाविक रूप से भावना ही संपत्ति के स्वामी होगी और उसका पति होने से संपत्ति का भोग कर सकेगा । इस विचार से मैं अगले दिन ही कॉलेज से जल्दी लौट आया और बहन को अकेला देख उसके पास जा पहुंचा । उसने कहा, बहन मैं एक बार जानना चाहता हूँ, आप पूछो मैं यह समझा था कि तुम मुझे एक दिन गोद लेकर अपना उत्तराधिकारी बना होगी । छेडछाड के मन में यह बात थी, परंतु उसने मनी लाल को यह कभी बताई नहीं थी । इस कारण उसने जिसमें प्रकट करते हुए कहा, किसी ने तुमको मोर बनाया है, मूर्ख नहीं बहन, यह मुझे अपने आप ही समझ आया था तो तुम स्वयं ही मोरक् बन रहे थे । देखो मैं बिना सेट जी की इच्छा के किसी को गोद ले नहीं सकती । सेठ जी ने पूर्ण संपत्ति भावना को देने का विचार किया हुआ है, पर बहन, लडकी व्यापार कैसे करेगी? उसका घरवाला सब काम करेगा । मैं यदि भावना से विवाह कर लो तो मैं मालिक बन जाऊंगा क्या? पर कैसे विवाह कर लोगे, यह मैं उससे निश्चय करूंगा । मणीलाल ने समझा था की वह भावना की वासना को भडकाकर, उससे विवाह की स्वीकृति ले लेगा और फिर काम बन जाएगा । इसी विचार से उसने भावना को साथ लेकर जो हूँ कि शहर के लिए जाने की योजना बनाई थी । अपनी योजना में सफल हो । वह भावना से बदला लेने की बात विचार करने लगा । उसने रतन लाल से महाराज वाली बात कह दी । उस ने कह दिया, भैया रतन लाल, यह सुंदर भावना से बहुत हेलमेल रखने लगता है । रतन लाल ने मुस्कुराते हुए पूछा तुमको यह पूरा किसलिए लगने लगा है? मैं स्वयं अपने लिए यतन करना चाहता हूँ की इस बात का यतन करना चाहते हो भावना से विवाह का, पर तुम तो उसके मामा हो । भांजी तो बेटी के समान होती है भैया यह सब गए जमाने की बातें हैं । आज नई पीढी के लोग इस प्रकार के पूर्वग्रहों से मुक्त हो चुके हैं । ठीक है परंतु चाचा और चाची तो नई पीढी के लोग नहीं है । तुम कहीं ओर ध्यान करो यहाँ तुम्हारा विवाह ठीक नहीं । मणीलाल अजीत और निराश हो अपने कमरे में जब कोई ओर योजना विचार करने लगा परंतु रतन लाल का इसमें एक अपना स्वास्थ्य था । वह भी सुन्दर की घर में बढ रही प्रतिष्ठा से संतुष्ट नहीं था । उसके मन में एक अन्य योजना थी । वह भी अपने चाचा की संपत्ति पर वक्त जबरदस्ती रखता था । पहले तो है अपने किसी लडके के होने की प्रतीक्षा में था । उसका विचार था कि लडके को चाचा चाची की गोद में देकर स्वयं संपत्ति का स्वामी हो जाएगा परंतु उसे अपने घर में संतान की प्रतीक्षा करते छह वर्ष से ऊपर हो चुके थे । बहुत से डॉक्टरों की सहायता भी ली जा रही थी । परंतु सफलता मिल नहीं रही थी । अब उसकी पत्नी सुमित्रा ने एक अन्य योजना उपस् थित कर दी थी । उसने सुझाव दिया कि उसके भाई की सगाई भावना से हो जाए तो संपत्ति का वास्तविक स्वामित्व हमारा ही हो जाएगा । यह बात अभी रतन लाल के मन में ही थी कि मणीलाल ने उप बाद आकर कही । इससे रतन लाल को संदेह हो गया कि कहीं मैं पीछे ही न रह जाए और चाची अपनी बेटी अपने भाई को ही देने की बात पक्की न कर देंगे । इस कारण उसने अगले दिन ही सेठ जी से अपने साले का प्रस्ताव कर दिया । सेठ जी ने सहर सभाओं से ही कह दिया, भावना अभी भी वहाँ के योग्य नहीं हुई । मैं समझता हूँ कि उसे कम से कम बी ए तक की पढाई करनी ही है । पर चाचा जी दब तक यदि सुन्दर से अनुचित संबंध बन गया तो नहीं बनेगा । रतन लाल चुप कर रहा हूँ परन्तु उसने समय बागर चाची से सुंदर और भावना के विषय में संदेह बता दिया । किसी बात पर सेठानी ने पति से कहा था कि सुंदर ने भावना से संबंध बना लिया है । किसी पर सेठ जी ने सुन्दर की देख रेख तीव्र कर दी थी । इस दिन खाने के समय घटना ने बात को एक किनारे पर पहुंचा दिया था हूँ ।

सभ्यता की ओर: द्वितीय परिच्छेद भाग 4

हूँ हूँ द्वितीय परिच्छेद बहुत जादा भावना की बातें सुन सुंदर गंभीर विचारों में डूबा हुआ था । उसने भावना का पत्नी के रूप में कभी सोचा ही नहीं था । वे वहाँ तो भगवान के किए से होता है और विवाह जयपुर सब लडकियाँ बहिन सामान ही होती है है । उसके बाबा का कथन सदा उसके कानों में घुसता रहता था । जब अल्मोडा के अनाथालय में था तब उसमें अभी यौन प्रेरणा कुछ प्रबल नहीं हुई थी । अब उस बात को पांच वर्ष व्यतीत हो चुके थे और अब वह योवन की प्रेरणाओं को अनुभव भी करने लगा था । साथ ही बम्बई में लडके, लडकियों का संगाकार कर घूम पूरा मर्दों का परस्पर मेलजोल कामो उत्पादक होता था । परंतु सुंदर में बचपन के संस्कार प्रबल सिद्ध हो रहे थे और वह स्वयं पर नियंत्रण रखता आ रहा था । सुंदर ने सेठ जी को जो पत्र लिखा था उसे लपेटकर अपनी जेब में रख लिया और भावना से कहा । परन्तु इन सब बातों से यह कैसे सिद्ध हो गया की मुझे तुमसे विवाह करना ही चाहिए । पिताजी चाहते हैं परंतु तुम्हारी माताजी, तुम्हारे मामा जी, नाना, नानी, ताऊ, उनके लडके, रतन लाल, भावी सुमित्रा आदि कोई भी तो नहीं चाहता हूँ । ये सब मुझसे घृणा करते हैं । मेरे लिए तो पिताजी मुख्य है । वे मुख्य अवश्य है । इस पर भी विवा एक ऐसा कार्य है जिसमें पूर्ण परिवार की सहमती आवश्यक है । जब तक सब कम से कम परिवार के मुख्य मुख्य लोग सहमत नहीं हो जाते तब तक विवाद नहीं होना चाहिए । ये सब हो जाएंगे । सुंदर तुम जाओ नहीं यही रहो । समय पाकर सब कुछ हमारे अनुकूल हो जाएगा । सुंदर गंभीर विचार में पड गया । वह विचार कर रहा था की सेट यादव देव के परिवार की कृपा के प्रति कार में है । इसमें वैमनस्य उत्पन्न कर किसी भी भर्ती उचित नहीं कर रहा हूँ । भावना ने सुन्दर के हाथ पर हाथ रखकर कहा मेरा कहा तो तुम को टालना नहीं चाहिए । इतना कहकर वह सुंदर की आंखों में देखकर बोली, सुंदर कुछ समझो यह यह अगर मैं उसके कमरे से निकल गई । उसके अंतिम वाकया कार स्पष्ट था कि वह उस से प्रेम करती है । अगले दिन भावना सोकर उठी और आपने नित्यक्रम में लग गई । जब बहरा उसके लिए ब्रेकफास्ट लाया तो बोला भावना भी भी सुंदर नहीं है । पत्र तुम को देने के लिए कहा है । वह कहाँ है तो तुम को मालूम नहीं । वह बहुत सवेरे ही रसोई घर में आया था और मुझको यह पत्र देकर बोला भावना बीवी को दे देना । मैंने उस से पूछा था कि वह कहाँ जा रहा है । उसने बताया कि सेठ जी उसको किसी काम से पूना भेज रहे हैं । इतना कहकर वह चला गया । मैंने तो एक साधारण सी बात समझी थी किन्तु अब घर भर में यह विख्यात हो रहा है कि सुंदर नौकरी छोडकर चला गया है । रतन लाल बाबू कह रहे थे कि उसने चोरी की थी । राज्य चोरी पकडी गई और वह चुपचाप निकल गया है । मैं नहीं है पत्र तुमको देने से पूर्व सेठ जी को दिखाया था । वे एक ऐसे ही कागज पर लिखा और ऐसे ही लिफाफे में बंद पत्र खोलकर बढ रहे थे । उन्होंने पत्र को लिया । इसी प्रकार बंद ही इसको देखा और कहा यह भावना के लिए है उसे दे दो । मैंने कहा सेठ जी, यह सुंदर ने दिया है । मैंने सोचा कि आपके देखे बिना भावना बीवी को नहीं देना चाहिए । क्यों सेठ जी ने माथे पर डोरी चढाकर पूछता हूँ । मैंने छत लाते हुए कहा । रतन बाबू कहते हैं कि वह जोर और बदमास था । सत्य जी हाँ, मैं अपनी कसम खाकर कहता हूँ कि वे सभी नौकरों ऐसा ही कह रहे हैं । उन्होंने कहा जाओ है पत्र भावना बीवी को दे दो भावना की आंखे दर्द हो रही थी । इस पर बैरा ने पूछा बीवी क्या बात है? तुमने उसको चोरी करते देखा है? आवेश में भावना ने पूछा बीवी माफ कर दो मुझ से तो रतन लाल बाबू ने कहा था इसलिए मैंने सोचा सेठ जी को बता दूँ । इस समय तक वह नास्ते को दीपा ही पर रख चुका था और बिना कुछ और अधिक कहे कमरे से बाहर हो गया । भावना ने नास्ता करने से पूर्व सुंदर का पत्र पढना आरंभ किया । उसमें लिखा था भावना बहन मैंने तुम्हारी सब बातों पर रात भर मनन किया है और अंत में मैं किसी निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ कि मैं तुम्हारा भाई बनकर ही तो तुम्हारे अहसानों का प्रतिकार भलीभांति दे सकता हूँ । इस समय तो मैं एक अतिनिर्धन भाई हूँ परन्तु परमात्मा ने कभी सामर्थ्य प्रदान किया तो फिर बहन की सेवा के लिए सदैव तत्पर रहूंगा । मैं तुम्हारे तथा तुम्हारे माता पिता केस ने का यही प्रतिकार समझता हूँ कि इस समय चुपचाप देना किसी को बताए यहाँ से चला जाऊं । इसका अर्थ यह नहीं कि मैं करता हूँ । इसका अर्थ केवल यह निकलता है कि मुझको इसमें ही आप सबका कल्याण प्रतीत हुआ है । बहन सदा सुखी रहो । यही मेरी भगवान से प्रार्थना है । पढते, पढते भावना की आंखों से आंसू गिरने लगे । पत्र की अंतिम पंक्तियां उसे धुंधली प्रतीत होने लगी थी । वह उन्हें अपने पलंग पर जाकर लेट गयी । नाश्ता करने तथा स्कूल जाने का उसे दैनिक भी ध्यान नहीं रहा । मैं सुन्दर के पिछले पांच वर्ष के गवार और जीवन सीरिया पर विचार कर रही थी । मैं सोचती थी कि जब उसे उसने अल्मोडा में बस के अड्डे पर कुली का काम करने के लिए तैयार देखा था तो कितना सुंदर प्रतीत होता था और जब उसके पिता ने उसको नोकर रखने के लिए कहा था, कैसे वह मन में इच्छा कर रही थी कि वह कहीं उनकी नौकरी करने से इनकार नहीं करते हैं । इसका भावना को यह समझा जा रहा था कि उस पहले दस्ती में ही है, उससे प्रेम करने लगी थी । आज अपने मन में भावों का विश्लेषण का वह पहली ही नजर में ब्रेन कार समझ रही थी । उस समय वह अभी नो वर्ष की थी और नहीं तो प्रेम का अर्थ समझती थी और न ही विवाह बडने आदि को चलती थी । उस समय की मन की अवस्था का अर्थ आज भली प्रकार समझ चुकी थी । वह यह समझती थी कि सुंदर को पढाया करेगी परंतु दो वर्ष में ही है इतना पड गया था की उस की बोलों का सुधारने लगा था और अब तो किसी भी ग्रेजुएट से कम अंग्रेजी और अन्य विषयों का ज्ञान नहीं रखता था । पांच वर्ष में इतनी उन्नति उसकी प्रतिभा विशेष की ही सूचक थी । साथ ही वो कितना निष्ठावान है जो एक लखपति का अपनी लडकी से उसका विवाह वान जाने पर भी अपने विचार में उनके परिवार के कल्याण की भावना से प्रेरित सब कुछ त्यागकर जा रहा है है । इस प्रकार अपने विचारों में लेटी हुई छत की ओर देख रही थी कि सेट उसके कमरे में आया और उसको हाथ में सुंदर का पत्र लिए पलंग पर लेटे देख जिसमें मैं खडा रह गया तो पश्चात एक का एक बोला भावना स्कूल का समय हो गया है । बेटी मैं स्कूल नहीं जाऊंगी, क्यों उचित नहीं करता हूँ । इतना है उसने पिता की ओर से अपना मुंह फेर लिया । पिता उसके पलंग पर बैठ उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरते पूछने लगा बहुत प्यार हो गया है उससे भावना ने वह पत्र जो अभी भी उसके हाथ में था, पिताजी की ओर कर दिया । सेठ ने पत्र लेकर पढा पढकर उसने कहा देखो भावना मैं तो तुम्हारे लिए अपने परिवार क्या बेलना करने के लिए भी तैयार था परन्तु पर आए लडके पर तो मेरा अधिकार नहीं है । इस पर भी मैं तुमको वचन देता हूँ कि मैं उस को ढूंढ निकाला होगा और उस पर आपने दस्ती रखूंगा । समय व्यतीत होने पर आशा करनी चाहिए कि सब कुछ ठीक हो जाएगा परन्तु तो मैं इसमें मेरी सहायता करो, उठो पडो लिखो और स्वयं को उसके योग्य बनाने का यह तुम करूँ । एक बात समझ लो वह व्यक्ति धन दौलत की कुछ भी परवाह नहीं करता हूँ । है चरित्र वर्ड प्रतिभाशाली युवक है वैसे ही तुम्हे बन सको तो कुछ आशा की जा सकती है हूँ ।

सभ्यता की ओर: द्वितीय परिच्छेद भाग 5

द्वितीय परिच्छेद भाग बहुत सुन्दर रात भर विचार करने के पश्चात भी अपने निर्णय को बदल नहीं सका । वह मन में सोचता था कि यदि उसके परिवार का सहयोग भावना से हैं तो उसके घर छोड कर चले जाने पर भी हो जाएगा । साथ ही वह समझता था कि घर के नीच नौकर से सेट का दामाद बनने में बहुत अंतर है । इतनी ऊंचाई पर यदि एक ही छलांग में चढने का यह काम करेगा तो अवश्य गिरकर अंग भंग कर लेगा । पहले उस को स्वतंत्र रूप में किसी मान युक्त स्थिति पर पहुंचना चाहिए । तब यदि कोई भावना जैसी लडकी उससे विवाह की बात करें तो ये है प्रस्ताव विचार नहीं हो सकता है । जब भावना अपने भाव प्रकट कर उसके कमरे में से चली गई तो उसने सेठ जी का पत्र जेब से निकाला और नीचे हस्ताक्षर कर उसे एक बार को मैं बडा और पत्र के नीचे है और लिख दिया की मुझे भावना ने बताया है कि आप मुझ पर कितने दयालु हैं कि मुझको अपने परिवार में सम्मिलित करने का विचार रखते हैं । मैं स्वयं को इतनी बडी दया का पात्र नहीं समझता हूँ । अंग्रेजी की कहावत है डिजर्व बिफोर डिजायर अर्थात किसी वस्तु को पाने से पूर्व उसको प्राप्त करने की योग्यता ग्रहण करूँ । वह योग्यता मैं अभी स्वयं में नहीं देख पाता । इतना लिख उसने एक पत्र भावना को बिल्ली की दिया । दोनों पत्रों को बंद कर उसने समय देखा । लगता है कि चार बज रहे थे । वह शौचादि से निवृत्त हो दोनों पत्र लेकर अपने कमरे को बंद कर बाहर निकल आया । रसोई घर में गया तो बैरा अपने लिए चाय बना रहा था । उसने मेरे को पत्र देकर कहा यह पत्र भावना बहन को दे देना । मेरे ने इतने प्लाॅट उसको जाने के लिए तैयार देखा तो पूछ लिया तुम कहाँ जा रहे हो? सेठ जी किसी काम से मुझे पूना भेज रहे हैं । देहरा अभी उसकी बात पर विचार ही कर रहा था की सुंदर वहाँ से चला आया । घर के नीचे फाटक परसो केदार बैठा रामायण की चौपाई गा रहा था । उसने चौकीदार से कहा भैया, यह पत्र सेठ जी को दे देना । इस समय में पूजा कर रहे हैं । नहीं तो मैं स्वयं ही दे देता है । तुम कहाँ जा रहे हो? सुंदर किसी काम से पूना जा रहा हूँ । वहाँ से निकलकर सुंदर मैरिन ड्राइव की ओर सनपडा अभी बस इत्यादि नहीं चल रही थी । सडकों पर चलने फिरने वाले भी अभी अपने घरों से नहीं निकले थे । पटरी पर सोने वाले दिन निकलने की प्रतीक्षा में करवट बदल रहे थे । बम्बई के ऊंचे नीचे मकान रात गाल के घुस । मुझे प्रकाश में सुनसान बूथों के सवाल खडे दिखाई दे रहे थे । सुंदर इस विशालनगर के लाखों लोगों के बीच स्वयं को सर्वथा के ना पा रहा था । वह चला जा रहा था और कोई उसकी ओर देख भी नहीं रहा था । एक ने देखा रहा था पुलिस वाला मैरिन ड्राइव पर पहुंच वह समुद्र की ओर बनी । मुंडेर के समीप जाकर उस दोनों ने प्रकाश में सागर में हो रही उथल बुधन को देखने के लिए खडा हो गया । वहाँ अभी विचार कर रहा था की एक पैसा भी लेकर वह चला नहीं । अब निर्वास किस प्रकार किया जाए । नहीं जाने उसको कब और किस प्रकार का काम मिले तब तक रहेगा । कहा और क्या खाएगा वह अभी एक भी पशुओं का हाल नहीं सोच सकता था कि पीछे से किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा । उसने चौकर घूम कर देखा तो पीछे पुलिस वाले को खडा पाया । सुंदर ने प्रश्न भरी दृष्टि से उसकी और देखा तो पुलिस मैंने पूछा यहाँ क्या कर रहे हो । दिल और दिमाग की सुस्ती निकाल रहा हूँ । तुम जोर मालूम होते हो । तलाशी दो नहीं दो दो सुंदर में इस प्रकार कहे जाने को मजाक समझा था परंतु कम गया । जब उसने कहा तो तुम को पकडकर थाने ले जाऊंगा । इसपर सुंदर को क्रोध चढाया और उसने कहा तो ले चलो पुलिस । मैंने उसे वहाँ से पकडकर कहा चलो चलो क्यों ले चलना चाहते हो तो ले चलो पुलिस मैंने जेब से सीटे निकाल बजानी आरंभ कर दी । पटरी पर सोये लोग जाग बडे दूर से दो और कांस्टेबल सीटी की आवाज सुन भागते हुए आए । उन्होंने पूछा क्या हुआ है? यह जोर है तो ले चलो । थाने अपने आप चल नहीं रहा है । अब सुंदर की समझ में आया कि यह तो व्यर्थ में ही बवाल खडा हो गया है । उसमें शांति से पूछा तुम यह किस प्रकार कहते हो कि मैं चोर हूं तो तो ऐसे समय में यहाँ क्या कर रहे हो? भाई दिन चढाया है घर से घूमने निकला हूँ, कहाँ रहते हो? इस प्रश्न से तो सुंदर घबराया वेस्टेड जी का पता देना नहीं चाहता था । इस कारण चुप कर रहा । इस पर दो नए आए सिपाहियों ने भी सुंदर का हाथ पकड लिया और एक उसकी गर्दन पर हाथ रखा । उसे धकेलने लगा । सुंदर गाँव थाने में ले आए और वहाँ पे अगर उसके हाथों में रस्सा बंदा उसको लोहे की सलाखों वाले कमरे में धकेल दिया गया । कमरे में चार पांच बोर भी बंदी थी । कमरे के कोने में एक पेशाब कर रहा था । कमरे में पेशाब की दुर्गंध भरी हुई थी । सुन्दर अभी भी विचार कर रहा था कि सेठ जी का पता बताये अथवा नहीं । किसी भी सिपाही ने दरवाजा बंद किया और दफ्तर में रिपोर्ट लिखाने चला गया । दिन के ग्यारह बजे हवालात का दरवाजा खुला और उसको अन्य बंदियों के साथ निकालकर थानेदार के सामने उपस् थित किया गया । सुंदर सबसे पीछे खडा था और सब बंदियों से पूछे जाने वाले प्रश्न और उनके उत्तर सुन रहा था एक आपका काना और दे दे मुख्य वाला व्यक्ति सबसे आगे था । उसको देखकर थानेदार मुस्कुराया, बंदी भी खिलखिलाकर हंस पडा । हस्ते समय उसका मुख्य अतिथि भयंकर दिखाई देता था तो तुम घर पर आराम से नहीं बैठ सकते । थानेदार ने पूछा वो जूते घर वाले घर बैठने दे तो बैठो क्या कहती है वह पांच रूपया रोज मांगती है । बताइए मैं कहाँ से दो वो पटवर्धन? उसने सिपाही को आवाज दी और कहा इसको दलेल दो एक हस्त पुष्ट सिपाही आगे बडा बंदी को पकडकर सात के कमरे में ले गया । थानेदार ने दूसरे बंदी को देखकर पूछा क्या नाम है शेरा पांच सौ का मुचलका भरो अब तीसरा आदमी आया । थानेदार ने उसको देख माते पर चोरी चढाकर पूछा तो फिर आ गए हो । वो जोर जबरदस्ती पकड लिया गया हूँ । मैं तो सादा खिदमत के लिए हाजी रहता होगा । अच्छा इस साथ वाले कमरे में चले जाओ । इस प्रकार तीन चार और बंदियों का निपटारा कर सुंदर की बारी आई । उसको देख थानेदार ने सिपाई से कहा ये है तो कोई नया पक्षी दिखाई देता है । हाँ हुजूर क्यों पकडे गए हो? उस ने सुन्दर से पूछा नहीं जानता साहब, इसकी रिपोर्ट लाओ । उसने सिपाही से का पुलिस वाला दफ्तर से एक रजिस्टर उठा लाया । उसमें लिखा था सुन्दर पुत्र साधु रहने वाला गढवाल का मरीन ड्राइव पर संदेहात्मक स्थिति में पकडा गया । थानेदार रिपोर्ट पर माथे पर चोरी चडा पुलिस वाले से बोला हराम यह भी नहीं जानते की रिपोर्ट किस प्रकार लिखी जाती है । पुलिस मान सम्मान नियुक्त मुद्रा में सामने खडा रहा । इस पर थानेदार ने कुछ विचार कर सुन्दर से पूछा कोई वाक सियत दे सकते हो । इस पर सुंदर अपने सेट का नाम बताने के लिए विवश हो गया । थानेदार ने उसी समय सेठ को टेलीफोन कर पूछा सेट यादव देव जी है क्या मैं बोल रहा हूँ आप किसी सुन्दर नाम के व्यक्ति को जानते हैं आप क्या हुआ है उसको? यह संदेहात्मक रूप में मैरिन ड्राइव पर घूमता हुआ पकडा गया है । मैं ऐसी पांडे ऐसा तो बोल रहा हूँ । देखिए वहाँ हमारा विश्वस्त कर्मचारी है । हम उस को प्रातः काल से ही ढूंढ रही है । उसे छोड दीजिए । मैं अपना एक आदमी भेजता हूँ । आप उसको उसके साथ कर दीजिएगा । थानेदार ने सुन्दर को का सामने बेंच पर बैठ जाओ । सुंदर के हाथ का रस्सा खोल दिया गया है । बैंक पर बैठ गया । उसका विचार था कि सेट जिसे हम आएंगे तो उसको समझा बुझाकर वापस ले जाएंगे । रहे वन में विचार कर ही रहा था की किस प्रकार उनसे छुट्टी मांगेगा । उसको सेठ जी के घर से निकलते ही पकडे जाने पर बहुत लग जा लग रही थी और वह कोई उपाय नहीं सोच पा रहा था । आज के अनुभव के पश्चात वह यह भी नहीं समझ सका की जेब में बिना एक भी पैसे के मैं निर्वाण किस प्रकार कर सकेगा । लगभग आधे घंटे की प्रतीक्षा के बस याद एक बडा व्यवस्था का व्यक्ति धोती कुर्ता कोर्ट काली टोपी तथा चप्पल डाले हुए थाने में आया और जेब में से एक पत्र निकालकर थानेदार को देते हुए उसने कहा मुझे यादव देश जी ने भेजा है तो वो आपका आदमी बैठा है । मैं आदमी सुंदर के पास बैलेंस पर आया और बोला तो तुम ही सुंदर हूँ । चलो मुझे सेठ जी ने भेजा है । सुंदर समझ गया कि सेठ जी ने मिलकर कोई कर्मचारी भेजा है । मैं उठकर उस व्यक्ति के साथ चल पडा । थाने से निकलते हुए उस आदमी ने पूछा तुम तो होना जा रहे थे । सुंदर ने इस बात का कोई उत्तर नहीं दिया । थाने के बाहर सेठ जी की गाडी खडी थी । उस आदमी ने मोटर के पास खडे होकर कहा मेरा ना मोहनदास गांधी है छेड । जी ने कहा कि तुम्हारे वेतन के हिसाब में ये रुपया जमा है तो मैं इन को रख लो । इतना मोहन दास ने नोटों का एक बंडल आपने पोर्टमेन टू में से निकालकर सुंदर के हाथ में देते हुए कहा इनको भीतर की किसी जेब में रख लोग और बोलो । सेठ जी का कहना है कि तुम पूना चले जाओ, वहाँ कोई काम मिल जाएगा और कभी किसी वस्तु की आवश्यकता हो तो उनको लेकिन देना अच्छा, अब तुम जाओ । बिना गिने ही सुंदर ने लोटों का बण्डल अपनी जेब में रख लिया और रेलवे स्टेशन जानने के लिए एक गाडी कर उसमें सवार हो गया रहे । अभी गाडी में बैठा ही था कि थाने के दरवाजे पर खडा एक अन्य व्यक्ति जो पोलियो कैसे कपडे पहना हुआ था एक अन्य गाडी में बैठ सुंदर की गाडी के पीछे पीछे चल पडा मोहनदास जब मिल में बहुत तो सेट ने पूछा क्या करके आए हो उस को छोडा करो गया दे उसको पूना का रास्ता दिखा आया हूँ और माधव रहे भी दूसरी गाडी में बैठकर उसके पीछे चल दिया है । ठीक है अब

सभ्यता की ओर: द्वितीय परिच्छेद भाग 6

पीती है । परिचित भाग से भावना आज गोल नहीं गई थी उसकी माँ इस पर उसे उसने आई की उसका स्वास्थ्य तो ठीक है । वो भावना को इस घटना से ऐसा प्रतीत हुआ कि उसकी माँ का बहुत दिनों से को बुलाया हुआ मुख आज खेल होता है । वहाँ के पूछने पर भावना ने केवल इतना ही कहा माँ मैं ठीक हूँ तो स्कूल क्यों नहीं गई? छुट्टी करने के लिए मन किया है मध्यान का भोजन करने सेठ जी घर आए तो भावना ने एकांत में पिताजी से पूछ लिया कुछ पता चला है पिताजी हाँ बेटी वह सडकों पर बे मतलब घूम रहा था । पुलिस ने उसे संदेह पकड लिया । आने से उस के विषय में पूछताछ के लिए फोन आया तो मैंने मोहनदास को भेजकर छोडा दिया और उसके शेष वेतन का रुपया जो उसने लिया नहीं था उसके पास भेज दिया है । एक मिल के कर्मचारी को उसके पीछे लगा दिया है है । उससे स्वतंत्रता से मित्रता उत्पन्न करेगा और फिर उसका प्रदर्शन करेगा । मैं उसे अपने एक एजेंट नानूभाई सेवा माल की दुकान पर लो कर करा दूर तत्पश्चात हम देख लेंगे । तब तक तुम को खूब दिल लगाकर पढना चाहिए । रात के समय सेट साहब खाना खाने आए तो रतन लाल और उसकी पत्नी सुमित्रा भी आगे मणीलाल तो पहले ही बैठा था । छेड जी ने उनकी ओर ध्यान नहीं दिया और खाना परोसा जाने लगा । रतन लाल से चुप नहीं रहा गया, भोजन करते हो । उस ने कह दिया दाचा जी अपने और पराए में अंतर पता चला कि नहीं चल गया हैं । पहाडियां मीट किसके बहुत खाया और किसके सेठ जी ने मुस्कुराकर कहा रतन लाल सरकारी अफसरों में सब बता क्यों? वो साथ दी है? किस में ऐसा बेहता आ गई है तो मैं तुमने लोगों को यह बताया कि सुंदर चोरी करके भाग गया है, कौन सी वस्तु चुरा कर ले गया है । वह है वो तो अभी भी उसका जादू सिर पर सवार हैं और मैं तुमको कह देता हूँ कि एक सप्ताह के अंदर आपने रहने का कहीं प्रबंध कर लो अन्यथा इस घर का द्वार तुम्हारे और तुम्हारी बहू के लिए बंद होने वाला है । सत्य था तुम जैसे अभिमानी जो छोटे और मुर्गी के लिए नया तो यहाँ रहने को स्थान है और नए ही इस मेज पर खाने को बंद ऍम रतन लाल ने खाना छोड दिया और कहा आज ही से बंद क्यों नहीं कर देते हैं । इसलिए मैं तुम जैसा है सब नहीं हूँ । चाचा जी मैंने भावनाओं को गंदी नाली में गिरने से बचाया है । यही अपराध है ना मेरा यह तो भविष्य बताएगा मेरा तुमसे झगडा इस कारण नहीं । तुमने कल झूठे अभिमान का प्रदर्शन किया था । आज तुमने सत्य भाषण क्या है और अब तुम सुंदर के चले जाने पर अपनी बहादुरी प्रकट कर मुर्खता प्रकट कर रहे हो । इसका भावना से उसका विवाह होने अथवा नहीं होने का किसी प्रकार का भी संबंध नहीं है । तो हमारे गुण तो एक तक वस्तु मेरे गुड होगा । ज्ञान आपको कुछ दिन पश्चात होगा, तब तुम से छमा भाग होगा और तुम्हारे साथ वर्तमान व्यवहार के लिए दंड भर लूंगा । रतनलाल और सुमित्रा दोनों डाइनिंग हॉल से निकल गए । मणीलाल भी खाना छोड चाचा भतीजे की बातें सुन रहा था । जब रतन लाल गया तो वह भी अपने स्थान से उठकर खडा हो गया । सेठ जी ने उसे खाना छोड ते देखा तो कह दिया बर्फ हजार तुम भी जाना चाहते हो तो चले जाओ अपनी बहन से पूछ लेना कि वह तुम्हारा बम्बई में कहीं प्रबंध कर सकती है अथवा नहीं । इस पर सेठानी ने मणीलाल को डांट दिया । उसने कहा मनि बैठो, खाना खाओ । मणीलाल समझ गया और बैठ गया । अगले दिन माधव पूना से लोट आया और सेठ जी के सामने हाथ जोड क्षमा मांगते हुए कहने लगा सेठ जी मैं मुझे धोखा दे गया है । कह नहीं सकता कि उसने क्या समझा । मेरा विचार है कि मुझे प्रथक होने के लिए मैं किसी रास्ते के स्टेशन पर उतर गया है । हाँ हुजूर! जब मोहनदास उसको बता रहा था तो मैं समझ गया कि मुझे किसके साथ रहना है । जब उसने विक्टोरिया टर्मिनस स्टेशन तक जाने के लिए गोडा गाडी की तो मैंने भी कर ली । सेरजी लडका बहुत ही समझदार है । उसमें टिकट लेने के लिए रुपये टिकट घर के सामने नहीं निकले । स्टेशन पर बहुत मैं पेशाबघर में चला गया । लगभग पांच मिनट के पश्चात है । वहाँ से निकला । उसने पूना का थर्ड क्लास का टिकट लिया तो मैंने भी वही का टिकट ले लिया । मैं उसके पीछे बीचे उसी डिब्बे में जा बैठा जिसमें वह बैठा था । गाडी में बैठ जाने के पश्चात उसने मेरी और भूलकर देखा । मैंने बीडी निकली और सुलगाने के लिए उससे माचिस मांगने लगा । मैं सिगरेट बीडी नहीं देता था । इस कारण बोला माँ चीज नहीं है । मैं गाडी से उतरकर उससे बोला मेरे स्थान का ध्यान रखना । मैं मान चीज लेकर आता हूँ । मैं माफी लेकर वहीं बैठा । बीडी पीते हुए उससे बात आरंभ करने के लिए पूछने लगा । बाबू होना जा रहे हो । उसने संक्षेप में कहा, आप क्या वहीं रहते हैं? मैंने उससे बिलकुल अनभिज्ञता प्रकट करते हुए पूछा । उसने जिसमें से मेरे मुख पर देखा और फिर मुस्कुराकर बोला नहीं, वहाँ किसी काम के लिए जा रहा हूँ । मैंने हस्कर कहा परंतु लोग तो कम दोडने बम्बई आते हैं । बम्बई की जलवायु मेरे अनुकूल नहीं बैठी, चाहे कम पीते होंगे जायेंगे । बिना तो यहाँ कोई जी नहीं सकता । मैं चाहे नहीं । अभी तक उसने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया सिगरेट नहीं पीते, चाय नहीं पीते । शराब तो आजकल बिकती ही नहीं तो फिर जीते कैसे हो? तभी तो जलवायु अनुकूल नहीं बैठी है हूँ । वो ना मुंबई से अच्छा नगर है, वहाँ पे ठीक रहेगा । मैं पूना का ही रहने वाला हूँ । आप कहाँ ठहरने वाले हैं । वहाँ जाकर इस पर्व खिलखिलाकर हंस पडा और बोला मैं तो प्रदेश हूँ, कह नहीं सकता कि कहाँ ठहरूंगा मुझको इसकी चिंता भी नहीं है । सडक के किनारे सो लूंगा । जब कोई स्थान मिल जाएगा तो रहने का स्थान भी ढूँढ लूंगा । मैंने उससे कहा बाबू पटरियों पर सोना तो कुलियों के लिए ठीक हो सकता है परन्तु आप सफेद पोस्ट के लिए तो ये ठीक नहीं है । कोई सफेद पोस्ट पटरी पर सोया मिल जाए तो पुलिस समझती है कि कोई जेब खतरा है ऐसा मत करना बाबू फिर मैंने कुछ काल तक उसका मुख देखकर कहा मेरे साथ चलिए जब नौकरी लग जाएगी तो रहने के लिए भाडा दे देना जिससे आपको बहुत कष्ट होगा नहीं कस्ट की कोई बात नहीं । मेरे पास एक मकान बाद दादाओं का बनाया है । उसमें एक कोटरी आपको दे दूंगा और देखो वह मैं आपके काम धंदे के लिए भी मदद कर सकता हूँ । हमारी सेट है उनकी कपडे की बहुत बडी दुकान है । उनसे कहूंगा तो निश्चय ही वे कुछ न कुछ आप के लायक काम निकाल लेंगे । इससे वह गंभीर विचार में पड गया और उसने मेरी बात का कुछ उत्तर नहीं दिया । गाडी चल पडी थी और खटाखट भागने लगी थी । वह सीट के साथ फीट लगाकर आंखे मूंद बैठ गया । मेरा विचार था कि वह हो गया है । मैं भी यह समझ कि परिसर घनिष्ठ हो गया है । शेष होना चलकर हो जाएगा । आराम करने लगा मुझको इसमें जबकि आ गयी । पंखे चल रहे थे । ठंडी हवा लगी तो नींद आ गई । मेरी नींद शिवपुरी रोड स्टेशन पर गाडी खडी होने पर खुली और जब मैंने आग खोलकर देखा तो वह लडका अपनी सीट पर नहीं था । मैंने पहले सारा डिब्बा देखा और उसके पश्चात सारी गाडी का एक एक डिब्बा छान मारा किंतु उसका कहीं पता नहीं चला हूँ । मार्ग में गाडी कहीं खडी नहीं होती थी । वो किस प्रकार उतरा और कहाँ गया इसका कुछ पता नहीं चल सका । मैं बोलना तक उसी गाडी में गया । सब उतरने वाले यात्रियों को एक बार उन्हें देखा किन्तु उसका पता नहीं चला । मैं निराश लौट आया हूँ । मुझे जी ने कहा तो महामूर्ख हूँ । कार्ड से पूछना था गाडी कहीं बेकायदा तो नहीं रुकी थी । जिस स्टेशन पर घडी हुई थी वहीं जाकर पता करना चाहिए था । माधव राव ने अपनी बोल पर लज्जित हो आज जोडे खडा था छेड जी ने कुछ विचार कर कहा जाओ आज फिर पूना चले जाओ और उसको डोड्डे का यत्न करूँ रह उन्हें किसी दूसरी गाडी से पूना चला गया होगा । वहाँ दो तीन दिन ढूंढने का या तरुण करूँ । देखो अब उसके बाद रुपये हैं । वह पटरी पर नहीं सोएगा । तुमने उसको डरा दिया है । है । किसी धर्मशाला अथवा किसी होटल में ठहरेगा और दुकान दुकान पर काम जोडता गिरेगा । इस प्रकार माधव को गुना बोला देश सेठ अपने काम में लग गया । रात को जब सेट भावना को माधव की घटना सुनाई तो उसका मुख्य उतर गया । उस रात सेट यादव देवी की अपनी पत्नी से खुलकर बातचीत हुई । सोने से पूर्व भावना की माँ ने कह दिया, भावना के सामने सुंदर की बात बार बार करके उसके मन को दुखी करने से क्या लाभ है? मैं अच्छा था अथवा पूरा अब इस बात से कुछ मिलने वाला नहीं है । इस को भूल जाने दीजिए अन्यथा अध्याय है कि कहीं जीवन भर के लिए मैं इसके मोहजाल में फंसी ना रह जाए । मैंने कल उसको कहा था कि उसकी सोचना देता होगा । मेरा विचार है कि उसको ढोल निकालना अधिक कठिन । इस पर भी उसके विचार से भावना बढ्ने । लिखने में मन लगा सकेगी तो लाभ ही होगा । पर मैं चाहती हूँ कि हमको अब उसकी सगाई कर देनी चाहिए और अगले वर्ष उसका विवाह हो जाना चाहिए । रहे । अभी बहुत छोटी है । तीस वर्ष की आयु जयपुर उसका विवाह नहीं होना चाहिए । यदि सुंदर यह होता है तब तो शीघ्र ही उसका विवाह हो जाता हूँ या तुम को किसने कहा? देखो रादा भावना का विवाह मणीलाल से अथवा रतन लाल के साले से नहीं होगा । मैं यह नहीं कह रही हूँ । मैं तो यह विचार कर रही हूँ कि हमें अपनी संपत्ति का उत्तराधिकारी ढूंढना है । यदि मरने से पहले भावना के घर कोई लडका हो जाए तो हमारी यह समस्या सुलझ जाएगी है तो मैं सुलझा चुका हूँ । मैं अपनी मिल अपने जीवनकाल में देश दूंगा और सब धन का एक ट्रस्ट बनाया होगा । किस बात का ट्रस्ट बनाएंगे यह विचार कर रहा हूँ । मैं किसी ऐसे काम के लिए दस बनाना नहीं चाहता हूँ जिस पर सरकार का किसी भी प्रकार का अधिकार हो सके । आप अपने गांव में एक सुंदर लक्ष्मी नारायण का मंदिर बनवा दी छेड, हस पडा । वहाँ बोला आज की सरकार तो मंदिरों में भी हस्तछेप करने लगी है । उनके ट्रस्ट भंग कर उनके लिए कानून बनाने लगी है । यह तो घोर अन्याय हो रहा है । तो देवी जी यह कल योग हैं । श्रीभागवत में तो मैं पहले ही ली गई है कि कलयुग के राजा व्यापार करने लगेंगे तो वह होने लगा है । व्यापार के लोग भी । राजा जहाँ कहीं भी धन दिखाई देता है उसे अपने आधीन करने का यत्न करते हैं । मंदिरों में भक्तजनों का श्रद्धाभक्ति से लगाया धन पुजारी जहाँ अपने सुख भोग के लिए प्रयोग करने लगे हैं वहाँ सरकार राज्य कर्मचारियों के उधर करने लगी है तो क्या करेंगे । बताया तो है कि अभी कुछ समझ में नहीं आ रहा हूँ । यह धन मैंने अपने परिश्रम से कम आया है । दिन में पंद्रह सोलह घंटे काम मितव्ययता से जीवन यापन कर और बुद्धि का प्रयोग कर पांच सौ रुपये की पूंजी से यह कपडा मिल बनाई है । अब देशभर में अपने कपडे की दुकान खोल ली है । रुपया आने लगा तो सरकार ने टैक्स बढा दिया । जहर देकर भी मैंने उन्नति की है । इस पर सरकार ने मजदूरों के विषय में ऐसे कानून बना दिए जो मिल के प्रबंधकों को व्यर्थ के झगडे में डालने वाले हैं । इनको भी मानता हूँ । भगवान की कृपा है कि इस पर भी मेरी आये दिन प्रतिदिन बढ रही है । मेरी मिल में कर्मचारियों को सब कारखानों से अधिक वेतन मिलता है । इस पर भी कर्मचारी हडताल करते हैं, वियर्स के झगडे करते हैं और जहाँ इनके पक्ष में कोई उल्टी सीधी नियुक्ति मिल जाए तो अधिकारी हमारे सिर पर कूदने लगते हैं । इस पर भी मुझको लाभ ही रहता है । अब राज्य समाजवाद का बहाना बनाकर कारखानों का मालिक स्वयं बनना चाहता है । इसी कारण मैं कोई ऐसा उपाय विचार कर रहा हूँ जिससे राज्य के सब नियमों का पालन करते हुए जो कुछ भी मेरे पास बच जाता है उसका मैं अपनी इच्छा से प्रयोग कर सकूँ । यह सब बेकार है । जी हमारे मरने तक कुछ बचेगा अथवा नहीं । कोन कह सकते हैं आप एक बात कीजिए आपने धन को दान दक्षिणा में दे दीजिए, कुछ मुझको दे दीजिए कुछ भावना को इसी प्रकार कुछ मणीलाल के नाम और कुछ रतन लाल के नाम कर दीजिए । इससे से आवेश में आप पहले लगा इन संबंधियों को देना तो सरकार के हाथ में देने से भी अधिक पाप होगा । सरकार को मैं क्यों नहीं देना चाहता तो तुम को बताया है । मेरा धन सरकार मेरी इच्छानुसार नया नहीं करेंगे परंतु क्या ये रतन लाल इत्यादि मेरी इच्छानुसार ही व्यय करेंगे? सरकार तो फिर भी किसी के लाभ नहीं क्या करेगी? परन्तु ये तो वेश्यागमन हुआ तथा शराब पार्टियों में इस सबको स्वागत देंगे । नहीं मैं इन को अपना कमाया वादन कभी नहीं दूंगा ।

सभ्यता की ओर: तृतीय परिच्छेद भाग 1

आप सुन रहे हैं कुकू एफएम पर गुरूदत्त लिखित सब रहता की ओर और मैं हूँ आपका । साथ ही रमेश मुद्गल को ऐसा होने जो मन चाहे तृतीय परिच्छेद भाग एक सुन्दर जब घोडा गाडी में सवार हूँ विक्टोरिया टर्मिनस स्टेशन की ओर चला तो उसने देखा कि एक व्यक्ति मजदूरों कैसे कपडे पहने हुए थाने के समीप दीवार का आश्रय लिया खडा है । जब वह एक घोडा गाडी में सवार हुआ तो उसने देखा कि वह दी एक अन्य गाडी को संकेत से गुलाब सवार हो गया । इससे सुंदर को संदेह हो गया कि उस व्यक्ति को पता चल गया है कि उसके पास वोटों का मंडल है कदाचित उससे रूपये छीनने की लालसा हूँ । वह उसके पीछे पीछे आ रहा है । कुछ दूर जाकर सुंदर ने घूम कर देखा । उसको अपने घोडा गाडी के पीछे एक अन्य गोडा गाडी आती दिखाई दी । उसका संदेह विश्वास में बदल गया । उसने रुपयों को सुरक्षित करने का विचार क्या उसकी समझ में यही आया कितने वोटों को गिन डालना चाहिए और सबको रो माल में बांधकर कुर्ती के अंदर की जेब में रख लेना चाहिए । बाहर दस बीस रूपये ही रखने ठीक होंगे हूँ । अतः वो स्टेशन पर पहुंच हिसाब घर में चला गया । वहाँ मोटों के मंडल में से चार पांच पांच सौ रुपये के नोट निकालकर बाहर की जेब में रख लिए । इसको तो माल में बाद भीतर की जेल में रख बाहर चला गया । टिकट घर के पास पहुँच उसी आदमी को जिसको उसने खाने के बाहर खडे देखा था । वहाँ खडा देख वह तो सतर्क हो गया । जब वह टिकट लेने लगा तो वह व्यक्ति भी टिकट लेने खडा हुआ । सुंदर ने वो ना का टिकट लिया तो उस आदमी ने भी पूना का टिकट ले लिया । इससे सुंदर के मन में विश्वास पक्का जम गया कि वह कोई जेब कतरा अथवा ठंड है । उसने उसी समय अपने मन में निश्चय कर लिया कि उस को धोखा दे उससे अलग हो जाएगा । रेलगाडी में उस व्यक्ति ने अपना नाम बताया, सुंदर का नाम पूछा और कामकाज होना जाने का कारण इत्यादि विषयों पर बात कर अपने घर ले चलने का प्रस्ताव कर दिया । तत्पश्चात सुंदर को नौकरी दिलाने का प्रलोभन भी उसने दिया । इस पर सुन्दर उस को चकमा देने का विचार करने लगा । जब वह बातें करता हुआ चुप हुआ तो सुंदर ने सेठ की पीठ पर आश्रय लेने के मूड सोने का बहाना ही है । उसने देखा की कुछ समय के पश्चात उसके साथ आने वाला व्यक्ति वास्तव में ही हो गया है । गाडी शिवपुरी रोड स्टेशन पर ठहरती नहीं थी । आज किसी कारण वश हैरी तो सुन्दर जब जब उठा और गाडी से नीचे उतर गया । उसने निश्चय कर लिया था कि अगली ट्रेन से फोन आ जाएगा । अगली ट्रेन पैसेंजर गाडी थी । वह उसमें सवार हो रात के दस बजे होना पहुंचा । उसका मन कहता था कि माधव उसकी इस गाडी से प्रतीक्षा करेगा किंतु है माधव राव के घर जाकर ठहरना तो दूर उसको अपना ठहरने का स्थान भी बताना नहीं चाहता था । इस कारण जब गाडी प्लेटफॉर्म पर पहुंची तो वह गाडी में छुपकर प्लेटफार्म पर देखने लगा । उसका अनुमान ठीक ही निकला । माधव प्लेटफार्म पर खडा तन्यता से गाडी की सवारियों में किसी को बोल रहा था । सुंदर छिपकर खडा रहा उसका डब्बा आगे निकल गया और मादा हो रहा हूँ पीछे रह गया । जब गाडी खडी हुई तो माधव लगभग कर स्टेशन से बाहर निकलने के द्वार पर जाता खडा हो गया । सुंदर आपने डिब्बे में से उसकी गतिविधि देख रहा था जब माधव फाटक के समीप खडा यात्रियों को निकलता देख रहा था । सुंदर गाडी के पिछली ओर से निकल दूसरी लाइन पर खडी एक अन्य गाडी में घुस गए । उसको लांगकर वह दूसरे प्लेटफार्म पर पहुंच गया । वहाँ मैं एक बेंच पर बैठ अपनी गाडी की सवारियों को बाहर जाता देखता । जब सब लोग चले गए तो पूरा अपनी गाडी में आ गया । वहाँ से उसने प्लेटफॉर्म की ओर देखा । उसने देखा कि माधव निराशा धीरे धीरे प्लेटफॉर्म से बाहर की ओर जा रहा है । अब सुंदर प्लेटफार्म पर निकल आया । वो टहलता हुआ एक तीस साल पर जा खडा हो गया । वहाँ पर एक प्याला चाय पि ऍफ स्टेशन से बाहर आया । तब तक माधव जा चुका था । उसने एक साइकिल रिक्शा वाले से पूछा यहाँ कोई धर्मशाला है? हाँ साहब चलिए ले चलता हूँ । सुन्दर उस रिक्शे में बैठ गया है । उस को घुमा फिराकर एक धर्मशाला में ले आया । वहाँ आठ आने रोज पर उसको एक कमरा और एक चारपाई मिल गई । रिक्शा वाले को आठ आने देकर सुंदर ने विदा कर दिया । अगले दिन से सुंदर ने लोग भी ढूंढनी आरंभ कर दी । अपने लिए कपडे बनवाए और एक क्लर्क के योग्य पहरावा बहन दुकान दुकान पर जाकर नौकरी ढूंढने लगा आए । उसे यही उत्तर मिलता था । यहाँ कोई स्थान नहीं है । कहीं कहीं कोई परिचय माँग लेता हूँ । एक स्थान पर ये भी पूछा गया कि वह बडा लिखा कितना है? इस प्रश्न के उत्तर में वह कहता मैं अंग्रेजी अच्छी तरह लिख पढ सकता हूँ । हिंदी और गुजराती भी जानता होगा । हिसाब किताब भी कर सकता हूँ । इस पर फिर प्रश्न होता कौन सी परीक्षा उत्तीर्ण की है? सुंदर गया था । मैं घर पर ही पढा हूँ । हमारे यहाँ नौकरी नहीं है । आप एक बार परीक्षा लेकर तो देख लीजिए । मैं समझता हूँ कि मेरी योग्य था । किसी ग्रेजुएट से कम नहीं है । गुजराती हो । जी नहीं । उत्तर प्रदेश कुमायूं डिवीजन का रहने वाला हूँ । गुजराती कैसे जाते? गुजराती सेट के यहाँ नौकरी की थी, वहीं पर सीखी थी । मराठी जानते हो नहीं किन तो शिखर ही सीख लोग नहीं । इसके बिना हमारा कार्य नहीं चलेगा तो तुम कोई और स्थान देख लेंगे । इस प्रकार नौकरी जोडते हुए तीन मास व्यतीत हो गए । इस अवधि में मैं लगभग डेढ सौ रुपया गया कर चुका था । सेट यादव देव ने उसके पास वर्ष के कार्यकाल का वेतन सब दिन गिनाकर तथा उसको आदि के लिए उसने जो कुछ लिया था वह काट कर कुल नौ सौ बीस रुपए उसके लिए भिजवाए थे । जिससे मैं सौरव था । निरुत्साहित तो नहीं हुआ और दिनभर नौकरी की खोज में घूमने से जीवन को दिल दिल कर व्यर्थ जाता देख घबरा उठा था । मैं समझता था कि यदि चालीस पचास रुपए महीने भी मिल जाएगा तो वह जीवन में स्थिर हो अपनी उन्नति का उपाय सोच सकता है । इस प्रकार विचार करते करते उसकी समझ में आया कि दिमागी काम की नौकरी तो मिलेगी नहीं । इसलिए अब शारीरिक परिश्रम का काम ढूंढना चाहिए । उसके मन में विचार आया कि यदि साइकिल रिक्शा सलाह ले तो कैसा रहेगा । इस विषय में वह गंभीरतापूर्वक सोचने लगा । साइकिल रिक्शा बिना लाइसेंस के नहीं चल सकती है । लाइसेंस देना सिफारिश और रिश्वत के नहीं मिल सकता है । नगर में बहुत से धनी लोगों ने साइकिल रिक्शा के लाइसेंस ले रखे हैं और चलाने वाले नित्य रिक्शा ठेके पर ले जाते हैं । दिन भर चलाते हैं और रात को रिक्शा लौटाकर ठेके का रुपया दे चेज धन से अपना निर्वाह करते हैं । अगले दिन एक रिक्शा के ठेकेदार के पास जाकर दो रुपया नित्य किराये पर उसमें रिक्शा ले ली । ठेकेदार ने वाकफियत मांगी परंतु सुंदर की सूरत शकल देख बिना आवासीय और जमानत के रिक्शा देने के लिए तैयार हो गया । केवल उसके ठहरने का पता लिख लिए । सुंदर प्राप्त सात बजे रिक्शा लेकर निकला और मध्यान तक उसने सात रुपये बना लिए है । उसी रिक्शा में अपने खाने के स्थान पर गया और वहाँ दूध, रोटी, साग भाजी खाकर रिक्शा ठेकेदार को वापस करने जा पहुंचा । उसने रिक्शा वापस दी । दो रुपया सात दिए और सराय की ओर चल पडा । ठेकेदार ने उसे पीछे से आवाज भी सुन्दर लौट आया । वो ठेकेदार के समूह खडा हो गया । ठेकेदार ने पूछा तुम सराय में रहते हो जी वहाँ क्या किराया देते हो? प्रतिदिन का आठ हजार फिर साइकल रिक्शा नहीं चला हो गई क्या? जी नहीं कितना पैदा कर लिया है और आपका किराया देकर तीन रुपये पांच आने मेरे पास । बच्चे मैं दिन का भोजन भी कर चुका हूँ । कोई बाल बच्चा नहीं है । सुन्दर हस पडा और बोला जी आधी विवाह नहीं हुआ । माता पिता है नहीं, अकेला ही हूँ । ठेकेदार जिसमें कर रहा था । जब सुंदर जाने लगा तो उसने कहा अब शेष समय में क्या करोगे? एक अन्य कार्य है मैं करूंगा क्या काम है हम भी तो जाने । मैं कुछ पढता लिखता भी हूँ क्या पढते हो? सुंदर ने ठेकेदार को टालने के लिए कह दिया । एक गाल की फिलोस्फी ठेकेदार समझा नहीं । वह इतना ही समझा कि यह कोई कम्युनिस्ट है । वही लोग इस प्रकार के कठिन शब्द बोला करते हैं । उसमें कुछ विचार कर कहा कहीं मकान ले लो तो ठीक रहेगा । धर्मशाला में तो किराया अधिक देना होता है । इसपर भी वहाँ आराम कहाँ मिलता है? आप ही कोई मकान बता दीजिए ना । मेरा ही एक मकान है । भाडा तो पंद्रह रुपया होगा परन्तु कमरे दो होंगे । टट्टी होगी । गुसलखाने के लिए तो बाहर आते में ही नहीं लगा है । मकान दिखा दीजिए । अब सुंदर समझ रहा था की चार पांच रुपये नित्य गवालिया करेगा । दिन का कुछ भाग मैं अपनी ज्ञानवृद्धि में लगाया करेगा । एक अभिलाषा उसके मन में थी कि वह भी पुस्तकें लिख सके । सब आ सके और अपने मन में फट रहे विचारों को अन्य व्यक्तियों तक पहुंचा सकें । परंतु वह विचार करता था कि वह अभी सत्रह वर्ष कि आयोग है । उसको पुस्तकों का तो कुछ ज्ञान है किंतु अनुभव बहुत कम है । इस पर भी विचार करता था कि उसके जीवन का यही उद्देश्य है और इस की प्राप्ति के लिए उसको तैयारी करनी चाहिए । आज विचार करने लगा कि अब वह क्या पडेगा और किस प्रकार भविष्य में अपनी ज्ञान वृद्धि कर सकेगा । एक सप्ताह में ही उसने ठेकेदार का मकान भाडे पर ले लिया । आपने पडने के लिए वह एक अंग्रेजी का शब्द कोष भी ले आया और इतिहास की पुस्तकें लाकर स्वाध्याय करने लगा । उसका यह सुबह भावना को पढते देख बना था । मैं अपने पढे हुए विषय को उन्हें संक्षेप में लिख लिया करता था और उस पर अपने पूर्व ज्ञान से टिप्पणियां लिखता रहता था । इस प्रकार उसके जीवन ओका आराम से चलने लगी । उसने डाकखाने में अपना सेविंग खाता खोल लिया । सप्ताह पश्चात जो कुछ बचता था है उसमें जमा करा दिया करता था ।

सभ्यता की ओर: तृतीय परिच्छेद भाग 2

तृतीय परिच्छेद भाग दो इस प्रकार कार्य करते हुए दो वर्ष व्यतीत हो गई । इस समय तक उसका बॅाल दो सौ रुपये तक हो गया था और एक सहस्त्र देगी । उसने पुस्तके खरीदकर बदले थी, रिक्शा उसकी हो गई थी । इस काल में एक बात और हुई थी । साइकिल रिक्शा चालक यूनियन का वह सदस्य बन गया था है । सादा ही यूनियन की मीटिंग में नियमित रूप से जाने लगा था । यूनियन का मंत्री कृष्ण राव नामक एक महाराष्ट्रीयन ब्राह्मण युवक था । मैं पढा लिखा और मार्क्सवाद का क्या था था? यूनियन के मीटिंग्स में वह रिक्शा साल को अपने ज्ञान का प्रसाद दिया करता था । सुंदर चुपचाप बिना अपनी सम्मति दिए मीटिंग्स में बैठा रहता था । यूनियन का झगडा ट्राय ठेकेदारों से होता था । उनके विरुद्ध वे नगर पालिका के अधिकारियों से मिलकर उनके लाइसेंस जब्त करवाले अथवा उनके रिक्शा ठीक रखने और सीधे चालकों को लाइसेंस देने के विषय में कहते थे आपने इन प्रियजनों में यूनियन के अधिकारी कुछ सीमा तक सफल भी होते जाते थे । इस पर भी कृष्ण लव वायलेंट के तार की भर्ती यूनियन को सदा तनाव की स्थिति में रखने में प्रयत्नशील रहता था । सुंदर ने यूनियन के प्रस्तावों का कभी विरोध नहीं किया था । इससे ऍम उसको एक मोर संरचित सदस्य के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं समझता था । एक दिन यूनियन में यह चर्चा चली की नगर के रिक्शा के ठेकेदारों ने भी अपनी यूनियन बना ली है । उसका नाम उन्होंने रिक्शा ऑनर्ज यूनियन रखा है । इससे वे रिक्शा साल को कि यूनियन की मांगों का विरोध करने का विचार करते थे । कृष्णराव इसको एक बहन कर साल समझता था । उसमें यूनियन में प्रस्ताव पस्थित किया कि अधिकारियों से मिलकर उनको इसकी बहन करता का परिचय कराया जाएगा और इस प्रकार इस यूनियन को असंवैधानिक घोषित करा दिया जाएगा । सुंदर आज दर्शन राव की नियुक्तियों को सुनकर वो मुस्कुरा रहा था । प्रस्ताव उपस् थित हुआ और स्वीकार कर लिया गया । सुंदर ने सादा की बात ही आज भी इस प्रस्ताव का कोई विरोध नहीं । क्या बहन तू मुँह चाहता था की सब लोग हाथ खडाकर प्रस्ताव का समर्थन करें । उसने कहा यह विषय अत्यावश्यक है । यह हमारे जीवन मरण के संघर्ष का श्री गणेश हमें इस बात को सहन नहीं कर सकेंगे कि खून चूसने वाले भी संगठित हो जाए । इस कारण आरंभ में ही इसका समूलनाश करने के लिए हम को अपना सर्वस्व निछावर करने के लिए प्रण करना है । मैं चाहता हूँ कि सब सदस्य हाथ खडाकर इस प्रस्ताव का समर्थन करेंगे । सुन्दर अभी भी मुस्कुरा रहा था । सबने हाथ खडे किए परंतु सुंदर तब चुपचाप बैठा रहा । कृष्ण राव है देख रहा था । इससे उसके माथे पर क्योरी चढ गई । उसने कहा एक सदस्य है जो हमारे इस संघर्ष से थक रहना चाहता है । आपका अनुमान ठीक है । सुंदर ने उसके उत्तर में कह दिया क्यो, मैं इस विषय में किसी प्रकार की भी नियुक्ति करना नहीं चाहता हूँ और था दो मोर को अपने हित ईद का भी तुम्हें कोई ज्ञान नहीं है । मुझे सब ज्ञान और जानता हूँ । मेरा हित और अहित किसमें है? हम भी सुनना चाहते हैं तो सुनो । सुंदर ने खडे होकर कहा, मैं नहीं चाहता था कि कोई ऐसी बात करूँ जिससे आप लोगों के मन में अपने संगठन के प्रति संदेह उत्पन्न होने लगे । मैं अपना और अपने सहयोगियों का यह अधिकार समझता हूँ कि हम अपने हितों की रक्षा के लिए यूनियन बनाए, अधिकारियों से मिले, उनको अपने हितों की प्रेरणा देने के लिए वकील करें । साथ ही ये सब अधिका मैं दूसरों को भी देना चाहता हूँ । उनको भी अधिकार होना चाहिए कि वे अपनी यूनियन बनाए वकील करें । अधिकारियों से मिले और न्यायसंगत यतन द्वारा अपने हितों की रक्षा करें । इससे तो अनर्थ होने की संभावना है । कृष्ण गांव ने कहा, इससे हमारा उतना ही आनंद हो सकता है जितना हमारे संगठन से उनका हम क्या आनंद कर सकते हैं । यदि मैं क्रिशन राहुल जी के कथन को दोहरा हूँ तो हम मांग कर सकते हैं कि जो चालक जिस रिक्शा को चलता है वो रिक्शा उसकी ही हो जाएगा । यदि कृष्णराव जी की यह मांग स्वीकार कर ले जाए तो इससे तो अनर्थ हो जाएगा परन्तु हमारी इस मांग को स्वीकार नहीं किया जाएगा क्योंकि यह नैसर्गिक न्याय के विपरीत है । यह भारत के संविधान के भी विपरीत है । किसी प्रकार जब रिक्शा मालिकों की यूनियन कोई न्याय और संविधान के विरुद्ध मांग करेगी तो वह मानी नहीं जाएगी था । संगठन बनाने से नए हम अगर कर सकते हैं और नहीं कोई दूसरा कर सकेगा । किसी को भी संगठित होने का हमारे संविधान में अधिकार है, इस कारण मैं इसका विरोध नहीं कर सकता हूँ । तो आप जो रोड ठगों को भी अपना संगठन बनाने का अधिकार देते हैं, जब चोरी करेंगे तो कानून भंग करेंगे । हुआ जब चोरी करने के लिए वे संगठित होंगे तो कानून इसमें हस्तक्षेप करेगा, उससे पहले नहीं । रिक्शा का मालिक होना कोई चोरी नहीं है । अपनी वस्तु को किराए पर देना भी कोई चोरी अथवा ठगी नहीं है । इस कारण ऐसा कार्य करने वालों का संगठन भी जोर अथवा ठगों का संगठन नहीं कहा जा सकता हूँ । दो वर्ष चुप रहने वाला, मुद्दों की भारतीय यूनियन की कार्यवाही को सुनने वाला तथा मूर्ख लगने वाला सुन्दर जब बोला तो कृष्णराव निरुत्तर हो गया । उसने अपनी अंतिम चार जाली और कहा रूस में ऐसे संगठन की स्वीकृति नहीं है । मैं रूसी शासन का सदस्य नहीं हूं । वे जो कुछ करते हैं वह भी मुझे पसंद है । यह कैसे जान लिया? मैं तो मानव को स्वतंत्रता तथा शिक्षा से विचरण करने वाला प्राणी मानता हूँ । उसकी स्वतंत्रता पर मैं केवल एक प्रतिबंध चाहता हूँ । वह यह है कि वह किसी भी स्वतंत्रता का विरोध ना करें । इस पर कृष्ण राव ने कह दिया इससे तो और अगर तुम बच जाएगा संसार में इतनी चीना जब होती होगी कि नर रक्त की नदियाँ रहने लगेंगी । इस पर सुंदर ने का इस सरल चित कम पढे लिखे मजदूरी कर पेट भरने वाले बेचारों को दो खा मत दो सौ जाओ मैं पूछता हूँ बताओ ऐसा कौन सा काम है जो अनर्थकारी हो परन्तु किसी दूसरे की स्वतंत्रता हनन नहीं करता हूँ । बताओ मैं तुमको चैलेन्ज करता हूँ है कोई ऐसा काम ऍम राव विचार करने लगा । उसको सुब देख यूनियन के अन्य सदस्य उसका मुख देखने लगे । इसपर सुंदर ने अपनी बात कह दी रिक्शा ओनर्स की अपनी यूनियन बनाना किसी भी दूसरे की किसी भी प्रकार से स्वतंत्रता नहीं । चिंता इस कारण उसके बनाने में मुझ को कोई आपत्ति नहीं है । जब यूनियन किसी प्रकार की कोई ऐसी बात करेगी जो हमारी अथवा किसी अन्य की स्वतंत्रता छीनना चाहेगी तो मैं आपको कहूंगा की उनकी इस बात का विरोध किया जाए । इस पर कृष्णराव बोला बात यह है कि हमारी सरकार सरमायादारों की सरकार है जिससे हम नहीं चाहते की सरमायादारों की यूनियन बने जिससे सरकार को हम पर अन्याय करने का बहाना मिल जाएगा । फिर वही धोखाधडी की बात भारत में सरमायेदारों की सरकार नहीं है । यह भारत के रहने वालों की सरकार है । प्रत्येक इक्कीस वर्ष से बडी आयु वाले को सरकार बनाने में राय देने का पूरा अधिकार है । इस कारण जो भी सरकार बनती है रहै । भारत में रहने वाले प्रत्येक मनुष्य की सरकार है । यदि वहाँ कम्युनिस्ट सरकार नहीं तो वह इसलिए कि जनसाधारण कम्युनिस्ट नहीं, पहले उनमें प्रचार करो । मुँह समझ गया कि सुंदर को जैसा समझता था, वैसा नहीं है । इस कारण उसने नीति से काम लेने की सोची और बोला, अच्छा छोडो इस बहस को क्या मैं यह समझो कि यह प्रस्ताव निर्विरोध स्वीकार हो गया है? इस पर एक साला कहने लगा नहीं साहब, अब हमको सुंदर वालों से कुछ और पूछना है । हम उनकी स्पष्ट सम्मति चाहते हैं कि वे क्यों इस प्रस्ताव के पक्ष में नहीं है । कृष्णराव नहीं चाहता था कि सुंदर को कुछ और अधिक कहने का अवसर दिया जाए तो उसने कहा, सुंदर बाबू को जो कुछ कहना था, मैं कह चुके हैं । इस पर एक अन्य साला कहने लगा, हम सुन्दर बाबू से पूछते हैं कि क्या वह और कुछ नहीं कहना चाहते हैं? विवस सोनावने सुंदर की ओर देखा तो संदर्भ पुणे उठकर कहने लगा, साथ ही हो, मैं यह समझता हूँ के रिक्शा के मालिकों की यूनियन बनने से हम को कुछ भी हानि नहीं होगी । हाँ, यदि हम कुछ बुद्धि से कम लेंगे तो इससे लाभ हो सकता है । कितने ही रिक्शा चलाने वाले रिक्शा के मालिक भी है, वे सब उनकी यूनियन के भी सदस्य बन सकते हैं । मैं स्वयं ऐसा ही करने जा रहा हूँ । मेरे साथ आप में से वे व्यक्ति जो मालिक और साल लग दोनों है उस यूनियन के सदस्य बन जाएगा । इस स्थिति में हम उनको किसी प्रकार का भी अन्याय करने से सफलता के साथ रोक सकेंगे । साथ ही हो मैं मालिक और नौकर में कोई ऐसी रेखा नहीं मानता जो पार नये की जा सके । अनेको लोकर मालिक हो गए हैं । इस कारण हम भी मालिक हो सकते हैं । उनके विरुद्ध कारण गहना करना अपनी उन्नति की निंदा करना है । इसके पश्चात डाॅ को अपना प्रस्ताव स्वीकार कराना कठिन हो गया । सवा विसर्जित हो गई हूँ हूँ ।

सभ्यता की ओर: तृतीय परिच्छेद भाग 3

तृतीय परिचय बहुत तीन यूनियन के मीटिंग के पश्चात डाॅ । सुंदर के साथ साथ चलता हुआ पूछने लगा बाबू! तुम्हें तो बोलने की अनुपम योग्यता है । कभी कभी हमारी मीटिंगों में चलकर भी तुम थोडी देर भाषण दे दिया करूँ कौन सी मीटिंग हमारी पार्टी की ओ कौनसी पार्टी है तुम्हारी कम्युनिस्ट पार्टी मुझको मोर बना रहे हो? करुँगा अब क्यों वोट बनाने वाली ऐसी कौन सी बात कही है मैंने मैंने कमी निगम का सिद्धांत और इतिहास पडा है । इससे मैं कहता हूँ कि विद्वान आदमी होता है जो दूसरों के होठ फडकते देख समझ जाए कि वह क्या कहना चाहता हूँ । एक मूर्खता तो तुमने मीटिंग में ही की मुझको चुप देख तो मैं पहले ही समझ जाना चाहिए था कि मैं यूनियन के अंदर सदस्यों की भांति अनपढ नहीं जो तुम्हारे अर्थहीन नारों के पीछे मरने के लिए तैयार हो जाता हूँ । तुम ने जब हाथ उठवाएं तो भी तुम को समझ जाना चाहिए था कि मैं प्रस्ताव के पक्ष में नहीं हूँ । तुम ने मुझे विवस किया कि मैं विरोध का कारण बताऊँ । जब मैंने बताया तो तुम मेरी बात का उत्तर नहीं दे सके । यह जानते हुए भी कि मैं मालिक और लो कर की प्रत्यक्ष श्रेणिया नहीं मानता हूँ । किसी मालिक का अन्याय चरण उतना ही संभव समझता हूँ जितना किसी नौकर का अन्याय करना । मालिकों अथवा नौकरों के अन्याय चरों को रोकने का टंग वह नहीं जो कम्युनिस्टों के गुरु कार नॉक्स ने बताया है उसका उपाय है एक सुदृड न्याय नेस्ट, निष्पक्ष और महात्मा के न्याय से डरने वाली सरकार का निर्माण करना । ऐसी सरकार बनाने के लिए मनुष्य को विचार और कार्य करने में वो स्वतंत्रता देनी आवश्यक है । तभी एक व्यक्ति अथवा श्रेणी का नए रोका जा सकता है । सुंदर तो परीक्षा क्यों चलाते हो? तुम तो इतने योग्य हो किसी भी कारखानेदार से एक सहस्त्र महीना बेहतर पाओगे तो उन की वकालत बहुत ही योग्यता से कर सकते हो । और सो जाओ तो बहुत ही बोले हूँ । मैं स्वतंत्र रहना चाहता हूँ । इसी कारण मैं किसी की नौकरी नहीं करना चाहता हूँ । मैं किसी की वकालत करता हूँ तो इसलिए नहीं कि मैं किसी का नोकर हूँ अथवा किसी का नोकर बनना चाहता हूँ । मैं वर्तमान युग में सरमायादारों को भी उतना ही पार्टी मानता हूँ जितना मजदूर मजदूर का नाथ करने वाले मजदूर नेताओं को । दोनों एक ही भूमि की उपज है । दोनों परमात्मा के वास्तविक रूप को नये मानने वाले हैं । दोनों नास्तिक है । अतः दोनों को ही एक अधर्माचरण भागता है । सुंदर अपने घर की ओर जा रहा था । मुँह इस रहस्य में युवक के रहस्य जानने के लोग में साथ साथ चल रहा था । जब सुंदर ने परमात्मा को अपनी युक्ति में लाभ उठाया तो कृष्णराव खेल खिलाकर हस पडा । उसने कह दिया यह रिक्शा चलाने में आस्तिक अथवा नास्तिकवाद कहाँ से आ गया? जब मंदिर में जाया करो तो अपने पूरे जोर से उस बहरे को पुकार लिया करूँ, किंतु यहाँ हमारे समूह तो कम से कम इंसानों किसी बात करो । ऍम मंदिर तो मैं कभी गया ही नहीं । वहाँ जाने की मुझे कभी आवश्यकता अनुभव नहीं हूँ । इस पर भी मैं मानता हूँ कि इस ब्रह्मांड में कोई एक ऐसी शक्ति है जो सबको देखती है और सबके साथ न्याय होने के कारण रूप इस कारण मैं एक मजदूर होता हुआ भी अपनी न्याय बुद्धि को नहीं छोड दूँ । मैं जब भी कोई कार्य ऐसा करने लगता हूँ जो किसी दूसरे को हानि पहुंचाने वाला अथवा किसी दूसरे की स्वतंत्रता का हनन करने वाला हूँ तो परमशक्ति वानकी उपस् थिति को अनुभव का वैसा कार्य करने से रुक जाता हूँ । यदि मालिक अन्याय करते हैं तो इस कारण करते हैं कि उनके मन में ये है । विश्वास होता है कि उनके कामों को देखने वाला कोई नहीं है, भले ही राम नाम की माला फेरते हो । यदि उनके मन में परमात्मा के अस्तित्व पर विश्वास होता तो वह मजदूरों के हक को कभी नहीं चीन थे । सरकार की पुलिस फोर्स और कानून का धोखा दिया जा सकता है । परन्तु परमात्मा जो सर्वव्यापक सर्वान् तो यानी सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान है, उसको धोखा देना कठिन । इसी प्रकार मजदूर नेता बोले वाले मजदूरों को झूठ बोल कर अपने वाक जाल में फंसाकर उनसे अन्याय करते हैं तो इस कारण कि वे समझते हैं कि मनुष्य अल्पज्ञ है, उस को धोखा देकर वे अपनी नेतागिरी कायम रख सकते हैं । यदि उनके मन में परमात्मा पर विश्वास होता तो वह ऐसा करने से डरते और वैसा कुछ नहीं कर सकते जैसा रूस के नेताओं ने हंगरी के लाखों बोले वाले लोगों को मोदी के घात उतराकर क्या क्या अपराधियों को दंड नहीं दिया जाना चाहिए? ये अपराधी थे क्या किस के विरुद्ध अपराध किया था? उन्होंने हंगरी की नियमित सरकार को उलट दिया था उन्होंने, किंतु रूस की सरकार को तो नहीं उल्टा था मैं यह है नियमित सरकार फॅस को दंड नहीं देना चाहती थी । बन्टू रूसी सेना और हवाईजहाजों ने साठ हजार हंगरी के रहने वालों की हत्या का डाली सुंदर तुम नहीं समझ सकते हैं इतनी दूर बैठे कैसे तुम जान सकते हो कि कौन दोषी था और वो नहीं ठीक है परंतु तो इतनी दूर बैठे वह सब कैसे जानते हो जो मैं नहीं जान सकता हूँ वहाँ पर गए लोगों के व्यक्तव्य पडने से पता चलता है मैं वहाँ के रूसी अत्याचार से बस का तथा भाग कर आए निर्वासितों के वक्तव्य पढकर कह रहा हूँ तो हम दोनों गलत हो सकते हैं । ठीक है इस बात को मानकर आज से जी और रूस के उदाहरण मत दिया करो । उन दोनों देशों ने बहुत उन्नति की है । किस बात में? विज्ञान में, विज्ञान से क्या करोगे? जब मानवों में मानवता ही नहीं रही वहाँ सब इतने ध्यान दीप है कि अपने मन की बात भी नहीं कह सकते । ब्लॅक की बात तो बहुत पुरानी हो गई । इस समय सुंदर लाल का घर आ गया था । एक आहते में कोई दो मंजिले मकान थे । छोटे छोटे करते डंटी और रसोई गाना साथ थे । एक ऊपर की मंजिल वाला मकान सुंदर ने लिया हुआ था । सुंदर ने एक कमरे में सोने के लिए एक लकडी की चौकी और उस पर एक चटाई बिछाई रखी थी । किसी कमरे में दीवार के साथ फूटी गड्डी थी जिसपर उसकी होती और अंगोछा तथा रिक्शा चलाने के समय के कपडे टंगे हुए थे । ताकत के पास एक छोटी सी चौकी थी जिस पर एक छोटा सा लोगों का सन दूध । उसमें मैं अपने कपडे रखता था । इस कमरे के साथ एक ओर कमरा था जिसमें लकडी के रैंक बने थे । उसमें पुस्तके तथा पडे हुए समाचारपत्र रखे थे । रैप के आगे भूमि पर एक लडाई भी चीज थी । चटाई पर एक देश था जिस पर लिखने का सवाल रखा था । सुन्दर कृष्ण गांव को अपने घर पर ले गया ऍम उसका पुस्तकालय देखने लगा । काॅल्स ऍम चले एक गाल डॅालर्स दयानंद शंकर विवेकानन्द था । ॅ लिखी पुस्तकें वहाँ भरी बडी थी । महाभारत, रामायण, उपनिषद इत्यादि ग्रंथ भी थे । यूरोप के बहुत से देशों के इतिहास के साथ साथ भारत के इतिहास के बीच कई ग्राॅस पुस्तकालय में विद्यमान थे । रैड पुस्तकों से ठसाठस भरे हुए थे । कृष्ण राव ने एक्स ले की एक पुस्तक निकली है और खोलकर देखने लगा स्थान स्थान पर उस तक में चिन्नी लगे हुए थे । जब ऍम उसके देखने लगा तो सुंदर रसोई घर में गया । वो स्टोव जलाकर चाहे बनाने लगा । कृष्णराव देख रहा था कि वह एक अति विद्वान परन्तु सादा जीवन व्यतीत करने वाले युवक के घर में आ गया है । स्थान अत्यंत ही साफ सुथरा परन्तु फर्नीचर रहित था । घर में बिजली तो लगी थी परंतु अन्य सूख सामग्री नहीं थी । जब सुंदर दो ख्यालों में चाय और विस्फोट लाया तो फॅमिली इसमें से उसका मुख देखता रह गया । उसने चाय का एक प्याला उसके हाथ से लेकर चटाई पर बैठते हुए कहा मैं नहीं जानता था कि तुम इतने पढे लिखे युवकों, वह एक सरमायादारों समाज को लानत है कि तुम जैसा विद्वान व्यक्ति रिक्शा चलाकर अपना पेट भरता है और मैं यदि किसी कम्युनिस्ट देश में होता तो आज से बहुत पहले किसी कल स्टेशन कैंप में जीवन दान कर चुका होता । तो फॅमिली देशों में ही संभव है कि एक विद्वान शिक्षा से पडता लिखता और बोलता है । रिक्शा चलाना कोई बुरी बात नहीं है । बुरी बात है अपनी आत्मा को बेचना जहाँ मैं नहीं कर रहा हूँ हूँ ।

सभ्यता की ओर: तृतीय परिच्छेद भाग 4

परिचय तीन भाग चार रेलवे स्टेशन पर सादा कम मिलता था । इस कारण सुंदर प्राप्त सात बजे वहाँ पहुंच जाता था । बैंगलोर से सवा सात बजे गाडी आती थी और इसमें बहुत भीड भाड होती थी । सुंदर अपनी रिक्शा लिए खडा था । एक औरत स्टेशन से निकली मैं ईसाई ओरतों कैसे कपडे पहने हुई थी । हाथ में एक छोटा सा सूटकेस था । सुंदर ने देखा तो पहचान गया वह मिसेज पालथी एक्शन उसको अपने काम पर लग जाती लगी परंतु दूसरे ही शरण है इस तीन भावनाओं को अपने में से निकाल आगे बडा और बोला मदद रिक्शा चाहिए मदद विशेष पालने चोकर सुंदर की ओर देखा और पहचान की । उसने कहा तुम सुंदर तुम रिक्शा चलाते हो? हाँ मदद आइए छोडो कहाँ चलना इतना है । उसने मिसेज पाल के हाथ से छूट के ले लिया । विशेज पाल को अपने एक दिए विद्यार्थी को इस प्रकार का कार्यकर्ता देख बहुत दुःख हुआ । उसी शरण उसे मिसेज स्मिथ के व्यवहार का स्मरण हुआ या इस आशा से की कदाचित अभी भी है, उसकी सहायता कर सके है । उसके रिक्शे में बैठ गई । सुंदर ने सूटकेस रिक्शा के होल्ड पर रख लिया और स्वयं लपक कर साइकिल की गद्दी पर बैठ पूछने लगा कहाँ चलो ऍम स्कूल के बोर्डिंग हाउस में तो आप यहाँ भी बढाती है । हाँ, मेरा यहाँ तबादला हो गया । उसको अभी यहाँ पे तीन महीने ही हुए हैं । यहाँ तुम कब से हो? मुझे यहाँ दो वर्ष से अधिक हो गए हैं । पहले कहाँ थे मुंबई में एक सेट के नौकरी करता था । विशेष बाल सुंदर के भागने के पश्चात की घटनाओं का स्मरण करने लगी । सुंदर समझ गया था कि कहाँ जाना है इससे रिक्शा दौडाता हुआ वहाँ जा पहुंचा । स्कूल के पीछे वहाँ की अध्यापिका हूँ के लिए क्वार्टर बने थे । जब शिक्षा बहुत ही तो एक लो कर क्वार्टर में से निकला और सूटकेस भीतर ले गया । मिसेज पालने भाडा देने के लिए अपना पर्स निकाला तो सुंदर ने हाथ जोडकर कहा मदद मुझे अभी आपका बहुत ऋण सुन गाना है । कहिए रोज घुमाने के लिए आ जाया करो । देखो सवेरे के समय पैसा लेने से इनकार किया जाए तो दिन भर मंदी रहेगी । इतना है मिसेज बोलने । पर्स में से पचास नए पैसे निकले परन्तु सुंदर ने भी नहीं लिए । उसने गुड्डे मदर कहा और जाने के लिए रिक्शा को वाई तो मिसेज पालने फब्बारा, सुंदर थैरो भीतर आ जाओ, तुमसे बातें करनी है सुंदर एक्शन तक विचार करता रहा । उसके पश्चात रिक्शा एक और खडीकर मिस कॉल के पीछे पीछे उसके ड्राइंगरूम में जा पहुंचा । मिसेज बॉल एक कुर्सी पर बैठ गई और उसको सामने बैठा पूछने लगी रोज कितना कमा लेते हो जब से आपने रिक्शा बनवाई है सात आठ रुपया निति मिल जाते हैं । मैं प्राप्त सात बजे से मत ध्यान । एक बजे तक काम करता हूँ । पश्चात बहुजन कर विश्राम करता हूँ । साइकल प्राइज चार बजे से रात के आठ बजे तक स्वाध्याय करता हूँ । फिर रात भोजन का आधा घंटा टहलता हूँ । तदंतर दस बजे सो जाता हूँ । रात तक चार बजे उठता हूँ । स्नानादि से निवृत्त हो पूजा अगर मैं साढे पांच बजे अवकाश पा जाता हूँ । एक घंटा पढकर दूध भी ठीक सात बजे काम पर पहुंच जाता हूँ । मैसेज बाल सुंदर के मुख से सात आठ रुपये रोज की आय की बात सुन विचार कर रही थी कि इतने रुपये रोज का काम है, उसको किस स्थान पर दिलवा सकती है जिससे की उसका ये रिक्शा चलाने का काम छूट जाएगा । उसमें सुन्दर से पूछा अब तुम कितना पड गए हो? मैं अंग्रेजी बहुत भलीभांति, पढ लिख और समझ सकता हूँ । दसवीं श्रेणी तक का गणित कर लेता हूँ । हिस्ट्री ज्योग्रफी भी बहुत स्टडी है । इसके अतिरिक्त चंदन लिटरेचर बहुत पडा है । कोई परीक्षा होते नहीं की क्या नहीं इसके लिए अवसर ही नहीं मिला । तुम को नौकरी नहीं मिल सकती । मेरा विचार है कि तुम किसी स्कूल कॉलेज में भर्ती हो जाओ । यहाँ रिक्शा चलाने का काम कुछ अच्छा नहीं है । गुजारे के लिए मैं प्रबंध कर दूंगी । धन्यवाद मदद जब मैं मुंबई से आया था तो नौकरी के लिए मैंने बहुत यतन किया था । दो महीने की भाग दौड के पश्चात मेरी समझ में आया कि नहीं तो मैं नौकरी करने की योग्यता रखता हूँ और न ही इस दुनिया को मुझ जैसे व्यक्ति को लोकर रखने का सौभाग्य प्राप्त हो सकता है । तो मैंने कोई मजदूरी का काम करने का निर्णय कर लिया । यहाँ का सुगमता से मिल गया और फिर मैं इसमें बहुत सीमा तक स्वतंत्र हूँ । मैं छह घंटे से अधिक काम नहीं करता हूँ । छह समय मैं अपनी मानसिक उन्नति में लगा हूँ और अब दो वर्ष के उपरांत मैं इस परिणाम पर पहुंचा हूँ की मुझे नौकरी की आवश्यकता नहीं है । तो क्या जीवन परीक्षा ही चलाते रहोगे? नहीं मदद मैंने अपने काम की योजना बना ली है । मैं लेखक बनने की तैयारी कर रहा हूँ, जो तो मैं देख ही लेता हूँ । किन्तु प्रकाशक मेरे कार्य की ओर ध्यान देकर मेरी डिग्रियों को देखते हैं । वो भी मेरे पास है नहीं । इस कारण मैं सेव में ही प्रकाशक बनने का विचार कर रहा हूँ । किस विषय पर लिखते हो मैंने उस तक भारतीय मिमांसा शास्त्र नाम से लिखी थी । पुस्तक मैंने आठ दस प्रकाश को दिखाई है । प्रायः मेरे नाम के आगे उपाधि न देख बिना पढे ही वह पांडुलिपि वापस कर दी गई । मैं एक प्रोफेसर साहब के बच्चों को निपटे ही स्कूल ले जाता हूँ और छुट्टी होने पर उनको वापस ले आता हूँ । उनको मैंने अपनी पुस्तक दिखाई थी । उन्होंने कुछ पन्ने पढकर कहा था, बहुत सुंदर लिखा है, सुन्दर परन्तु है । जनसाधारण के उपयोग की नहीं है । विद्वानों के पास उस लेखक की पुस्तके पडने का समय ही का है जिन पर किसी यूनिवर्सिटी की मुद्रा नहीं लगी हो जाता है । मैंने गोल्ड तत्वों के विषय पर नहीं लिख कर जनसाधारण के लिए और उनके समझने योग्य भाषा में उनके ही मतलब की बातें लिखनी आरंभ कर दी है और था । अब मैं उपन्यास लिखने का अभ्यास कर रहा हूँ । इसके छपवाने में भी बडी कठिनाई जो विद्वानों के लिए लिखी पुस्तक के सब करवाने में सम्मुख आई थी । उपन्यासों के प्रकाशक भी पूछते हैं कोन कोन उपन्यास पहले सपा है । जब मैं बताता हूँ कि पहला ये है इसे छपवाने आए तो वे कह देते हैं हमारे पास बीसीओ पहले ही रखे हैं । आप किसी अन्य प्रकाशक के पास ले जाइए । इस कारण मैंने विचार क्या है कि एक दो पन्यास पहले से हम ही छापों, इसके लिए रूपया कहाँ से लाओगे? उसका प्रबंध कर रहा हूँ । इस समय मेरे पास दो सहस्त्र से अधिक रुपये है । कुछ और इकट्ठा करना होगा तो फिर सपवाल होगा और यदि पुस्तक नहीं बिकी दो ऐसी संभावना तो नहीं है । इस पर भी कुछ गांव तक तो तपस्या करनी ही पडेगी । विशेष बॉल समझ गई कि सुन्दर उसकी सहायता की आवश्यकता की परिधि से निकल चुका है । वह तो डेढ सौ रुपए मासिक की नौकरी करती थी । उसने विचार किया था कि पचास साठ के चपरासी की नौकरी बस सुंदर को दिलवा देगी । हुआ यदि वह पढना चाहे तो तीस रुपया का उसको स्टाईफंड दिलवा देगी । वह मन में विचार करती थी कि ये है महान विडंबना है कि फिलोसॉफी पर लिखने वाला रिक्शा चलाता है और एक प्रोफेसर के बराबर दवाई कर लेता है । मिसेज बाल सुंदर के भीतर और बाहर की भिन्नता को समझने का प्रयत्न कर रही थी कि सुंदर में पूछ लिया मिस्टर बॉल कैसे हैं? वह यहाँ साथ नहीं आए । क्या इस पर मिसेज बोल चौखूटी? वह भीतर भीतर सुंदर का मुख देखने लगी । वास्तव में वह विचार कर रही थी । सुंदर को बताए अथवा नहीं । कुछ विचार करवाया । बोली वेम उसको छोड गए । तलाक हो गया । नहीं हम कैसे? लोगों में यह नहीं होता । सिमसन को दम जानते ही हो । वही जिसने जोड बोलकर तुमको बैंक लगाए थे, वह मिस्टर पोल से म्यूजिक सीखने लगी थी । फिर दोनों में संबंध हो गया । सिमसन बहुत अच्छा गाती है । अब वे दोनों भारत के टूर पर गए हुए हैं । वह गांधी है और मिस्टर पर उसके साथ बजाते हैं । सुना है उनका ये टूर कामयाब हो रहा है । मुझसे पिछले चार वर्ष से बोले नहीं है और नहीं मेरे साथ रहते हैं । बहुत ही दुखद घटना रहेंगे । मैं समझती हूँ कि मैं अब सुखी और कोई बेबी नहीं है । मदद इस परसे मिसेज बॉल की आंखे डबडबाई सुंदर नहीं है । देखा उसे अपने प्रश्न पर पश्चाताप हो रहा था । उसने का छमा करे मदद उसको विदित नहीं था कि मैं यह पूछ कर आपको दुख पहुंचा रहा हूँ । विशेष बोलने अपने बैग में से रूमाल निकालकर हाँ बॉस ली और उठकर बोली अच्छा कभी कभी मिलते रहा करो । रात को मेरे खाने का समय साढे आठ बजे होता है । तुम्हारा सदैव उस समय स्वागत है हूँ ।

सभ्यता की ओर: तृतीय परिच्छेद भाग 5

द्वितीय परिचय भाग और वासंती पर सुंदर को देख कुछ ऐसा अनुभव करने लगी थी कि वह मंझदार में तैरती हुई लकडी के लट्ठे का आश्रय पा गई है । यद्यपि मैं यह समझ नहीं सकी थी कि एक रिक्शा चालक से वह क्या आशा कर सकती है, परंतु सुंदर का सुदृढ, शरीर सुलझी हुई बुद्धि और विकसित मान देखकर मैं आश्वास्त अनुभव करने लगी थी । स्कूल का मैनेजर मिस्टर फ्रैंकलिन उसपर वक्रदृष्टि रखता हुआ प्रतीत होता था और वह अभी भी पर पुरुष से संबंध बनाने में पाक मानती थी । सुंदर ने मिस्टर पाल के विषय में पूछा तो उसके मन में पिछले आठ वर्ष की सब बातें हो उसके सामने नृत्य करने लगी थी । उसे सुंदर के अल्मोडा के स्कूल से भाग जाने के दिनों की बात हो रही थी । जब पुलिस थाने से यह समाचार मिला था कि सुंदर अपने फूफा के पास नहीं गया तो वह समझ गई थी कि सुंदर मैदान की ओर चला गया है और किसी प्रकार पुलिस को चकमा दे गया है । सुंदर के विषय में बात मिस्टर पॉल से भी हुई थी । उसने बताया था पुलिस को सुंदर का पता नहीं चला । इस पर पालने कह दिया था । उसके लापता हो जाने से तो तुम अपने को विधवा ही समझने लगी हूँ । वासंती को क्रोध आ गया था । उस ने कह दिया था शारदा इस पर मिस्टर बोलने एक क्षण तक घोलकर उसकी ओर देखा था और फिर कह दिया था आज से मेरा तुम से कोई संबंध नहीं रहेगा । मैं ऐसी स्त्री को अपनी पत्नी नहीं मान सकता, जो पति को ऐसे अब सब कह सकती है । पर अब सब तो आपने रहे हैं । वह सत्य नहीं है क्या? सत्य हो ही कैसे सकते हैं । वो है अभी बालक मात्र है उसका भाला । मुझ से क्या संबंध हो सकता है? रहै? देखने में तो युवा प्रतीत होता है । मैं समझता हूँ कि वह है भी, साथ ही तुम्हारा उसे गोद में लेकर बैठना । उसके गालों को थपथपाना भी यही प्रकट करता है । तो तुम ने मेरे गालों को तो कभी थपथपाया नहीं रहे तो मेरे साथ जो करते रहते हो तो नहीं करूँगा । मिसेज बॉल समझ रही थी कि यह स्थाई एशिया का परिणाम है, परंतु उस दिन के उपरांत बॉल प्रथक कमरे में भीतर से बंद कर सोने लगा । एक वर्ष तक किसी प्रकार से चलता रहा । इस समय उसे संदेह होने लगा कि उसका पति मिस थॉम्सन से विशेष अनुराग रखने लगा है । सिमसन उसके पति से विशेष रूप से गाना सीखने लगी थी । वह गाना तो चप्पल में जाकर सीखती थी । इस बात की स्वीकृति मैट्रन से ले ली गई थी । गाना सीखने के उपरांत वह नीति साइकल उसे अपने क्वार्टर में ले आता था और उसके साथ बहुत चाय लेता था । वे दोनों चाहे मिस्टर पॉल के बेडरूम में लेते थे, प्रत्यक्ष रूप से तो वासंती से रोज प्रकट करने के लिए ऐसा किया जाता था परन्तु वासंती को संदेह हुआ तो उसने दोनों को रंगे हाथ पकड लिया । उस दिन वासंती और पाल में झगडा हुआ और अंत में ये है निश्चय हुआ कि वह भी जिससे चाहे संबंध बना सकती है । पाल आपत्ती नहीं करेगा परन्तु वासंती ने इस पापकर्म से अपने को प्रथक रखना ही ठीक समझा । मिस सिमसन जो अब अच्छा गाने लगी तो पाल उसको लेकर सभा समाजों में घूमने लगा । इससे उत्साहित हो दोनों ने पूर्ण भारत के टूर का प्रबंध कर लिया । वे प्राय होटलो थिएटरों में संगीत समारोह करते हैं । ये प्रदर्शन यूरोपियन संगीत के नाम पर होते थे । वासंती के विषय में यह प्रख्यात हो गया की अब विधवा सामान रहती है । इस से उसने अपनी बदली करवाने का यत्न किया । इसके लिए उसे कुछ भाग दौड करनी पडी और पूना में वह नौकरी पा गई । यहाँ बहुत स्कूल के मैनेजर ने उसे अकेली आते देखा तो उसके मुख में नार्थ तब तक में लगी यह बात तो मिसेज पालने पहले दिन ही देख ली थी और जब पिछले तीन महीने से मिस्टर फ्रैंकलिन मिसेज पाल के चारों ओर चक्कर काटने लगा था । विशेज पाल को कुछ ऐसा अनुभव होने लगा था कि उसे या तो मैनेजर की भोग सामग्री बनना होगा अन्यथा स्कूल की नौकरी छोडनी पडेगी । पहले भी थी कि यदि नौकरी छूट गई तो क्या करेंगे? बहन तू अब सुंदर को देखकर घर समझने लगी थी कि बहुजन का आश्रय तो मिल ही सकेगा । इस पर भी उसके मन में यह सब कुछ भी एक स्पष्ट किसी कल्पना मात्र ही थी हूँ ।

सभ्यता की ओर: तृतीय परिच्छेद भाग 6

फॅमिली छे भाग छह । इसके पश्चात सुंदर सत्ता में एक बार मिसेज बॉल से मिलने के लिए जाने लगा । मैं अब भी सुन्दर से वैसा ही इसमें रखती थी, जैसा कि उसने अल्मोडा में रखा था । जब भी सुन्दर उसके साथ खाने पर बैठ था, बातें होने लगती । मिसेज बॉल ये है । उन लोगों करती थी कि सुंदर अब बालक मात्र नहीं रहा । अब वह मानव जीवन की गहनतम अभिव्यक्तियों को भलीभांति समझने लगा है । एक दो बार उसने उसको इसाई धर्म में पर व्यस्त होने के विषय में संकेत किया तो ऐसी बातें चली की मैं अपने में ऐसे भी ईसाई धर्म की निष्टा लुप्त होती हुई अनुभव करने लगी । उसने ऐसे ही विवादों में एक दिन पूछ लिया तो तुम किस धर्म को मानते हो? मानव धर्म हैं । कौन सा धर्म है, जो मनुष्यों ने बुद्ध ही से संग्रहित किया हुआ है? यह जगत एक असीम स्थान है । वैज्ञानिक इसकी सीमाओं तक पहुंचने का यह कर रहे हैं । जितनी दूर पहुंचते हैं यह जगत उस से भी आगे और ही आगे दिखाई देने लगता है । तीन जैसे द्वितीय प्रतिभा वाले व्यक्ति नहीं दी । इसकी सीमा ढूढते ढूढते थककर कह दिया था कि यह एक सर्कल में है, जो कुछ दूर और दूर दिखाई देता है । मैं समीर का प्रतिबिंब मात्र ही है । मैं समझता हूँ कि यह विज्ञान की पराजय स्वीकार करने के समान ही है । इस कारण मुझे उपनिषद की बात ही ठीक प्रतीत होती है । एक असीम सर्वव्यापक सर्वज्ञे आनंद में शक्ति है जिसको ईश्वर गोल्ड और खुदा एक दिया दी नामों से हम मनुष्य जानते हैं । यह सस्ती तो ये पसंद तारागढ इत्यादि । उसी अस्सी आनंद में शक्ति के रूप रुपांतर है । वास्तव में हम भी उसी का एक रूप मात्र है । हम जैसी अनेक योनियां जो इस पृथ्वी पर दृष्टिकोष हो रही है । इस पृथ्वी के अतिरिक्त अन्य अनेको स्थान है जहां उसके अन्य रूप अर्थात यूनियर है । हम उनकी गिनती नहीं कर सकते हैं । मनुष्य योनि बोर्ड आनंद में नहीं है । इस पर भी हम उस आनंद ज्योति के प्रयाप्त समीप प्रतीत होते हैं । हम उस शक्ति में घुल मिल सकते हैं आने को मैं मांस को का कथन है कि उस पर दम परमात्मा तक पहुंचने के लिए अभी कोई सो योनियां फोर है जिनको हम एक बार करना पडता है और कोई विद्वान कहते हैं कि हम परमात्मा के सौरभ था, सामान है । दूसरे कहते हैं कि किस में और उसमें थोडा बहुत अंतर है । कुछ भी हो हम लाखों योनियों से ऊपर उठ चुके हैं । इस पर भी जब हम उन्नति के शिखर पर चलते चलते थक जाते हैं तो फिर हम नीचे की ओर देखने लगते हैं । अपने से इतर योनियों की कुछ सुविधाओं को देख हम उनका अनुकरण करने लगते हैं । लोग जो ऊपर उठने में कठिनाई अनुभव करते हैं, वे अपने जीवन के समूह पशुओं के से जीवन को आदर्श बना लेते हैं । राय नास्टिक जिनमें वर्तमानकाल के कोटि कोटि जनों के पूछे काम बाकी एक है जो मनुष्यों को पशुओं की कोटि में ले जाना चाहते हैं । कुछ नास्तिक है जो मनुष्य को हिंसक पशुओं की भारतीय रहने की प्रेरणा देते हैं । कुछ अन्य है जो इस को पालतू पशु बनाना चाहते हैं । कुछ भी हो, इस प्रकार से विचार करने वाले बेचारे उन्नति के मार्ग पर चलते चलते थक गए प्रतीत होते हैं । उनके बाप आगे चलने की अपेक्षा नीचे की ओर खिसकने लगी है । वे यह समझ गए कि उनका स्थान नीचे ही है । विचार करते हैं कि उनको सिंह याद इत्यादि बनना है अथवा गायब अग्नि मैं मानव धर्म का अर्थ है समझा की ऊपर उठते हुए उस आनंद में परिस्थिति में बहुत चला है । जिसके हम भूले भटके हुए वंश मिसेज बॉल इस मस्तिष्क की उडान पर हस पडी । उसने कहा यही तो भगवान के इकलौते पुत्र यीशु मसीह कह गए हैं । मैंने कब कहा कि वैसा नहीं कहे गए । मैंने ये कहा है कि जितनी स्पष्टता से उपनिषद में वरना है वैसा कहीं अन्यत्र नहीं है । क्या सब हिंदू ऐसा ही मानते हैं? नहीं, इससे भिन्न विचार वाले लोग भी हैं । एक सौ में दयानंद हुए थे वे इस संसार का आदि अंत तीन मौलिक पदार्थों में मानते थे तो करती आत्मा और परमात्मा हमने प्रकृति यह शरीर है आत्मा इसमें चेतन सकती है । परमात्मा सत चित और आनंद है । आत्मा, सत्य और चित्रा और प्रकृति केवल उचित है परन्तु मदद सब हिन्दुओं में एक बात समान है वह है वर्तमान व्यवस्था में आत्मा की गाडियों में उपस् थिति मानना । जितने भी तरह सर्जन तू हैं, सब में आत्मा है, ये है आत्मा है जिसका शरीर के साथ नाश नहीं होता हूँ । मैं बार बार जन्म लेता है । जब तक मैं अपने ज्ञान और कर्म से इस संसार के मोहजाल से मुक्त नहीं हो जाता । आत्मा प्राणी में कर्म का करने वाला है और उन कर्मों के फल का भोक्ता है कर्म का फल तल नहीं सकता हूँ । मैं अवश्य मिलता है । हम तपस्या और प्रायश्चित से अपने बुरे कर्मों को मिलने वाले दुख को कम कर सकते हैं । इस पर भी फल तो मिलता ही है । यह है हिंदू फिलोस्फी का साथ हम सब हिंदू इस पर सहमत है । इस विचार से बहुत और जैन भी हिंदुओं की खरीदी में आ जाते हैं । मिसेज बॉल हिंदू फिलोसॉफी का ईसाई धर्म से मिलान कर रही थी । उसको स्वर्ण आ रहा था कि कैसे वह बचपन में जब अपने माता पिता से विहीन हो गई थी और उसके गांव में पादरी आया जो उसको मिठाई खिलाता हुआ अपने स्थान आना था, ले में ले आया था । वहाँ उसको पढाया गया और इसाई धर्म के संस्कार डाले गए । तत्पश्चात ऍम गांव गांव में हिन्दू धर्म के विरुद्ध प्रचार करने जाया करती थी । है । हिंदुओं की मूर्ति पूजा और राधा कृष्ण की लीला की हंसी उडाया करती थी । उसको स्वर्ण था कि वह बहुत तर्क देकर गांव के बोले बोले लोगों को पिसाई होने की प्रेरणा क्या करती थी? इस पर भी मैं एक भी ऐसी स्त्री अथवा पुरुष के विषय में नहीं जानती थी, जो उसकी अथवा उसके साथियों की युक्ति माल ईसाई हुआ हूँ । राय निर्धन लोग भोजन हाल शिक्षा पाने के लोग में बीसाई हो जाते थे । कोई कोई ऐसे भी होते थे जो पढी लिखी सुंदर लडकी अथवा लडके से विवाह करने के लोग में ईसाई होते थे । अधिकांश ईसाइयों के टीबडा खर्चीला रहन सहन देखकर धर्म परिवर्तन कर लेते थे । आज सुन्दर से बातें करवा समझ रही थी कि वह उन दिनों कितनी मोर थी जो इतने विचारशील जाती को एक अंधविश्वास के गर्द में गिराने का यत्न करती रही थी । रह समझ रही थी । तब सीधे सादे ग्रामीण उसकी युक्तियों को सुनकर क्यों हंस देते थे । उनकी आत्मा में दस ही हुई गीता और उपनिषदों फिलोस्फी उसकी युक्तियों कितना था, समझती होगी जब वह कहती थी परमात्मा सातवे आसमान पर बैठा हम प्राणियों के भले बुरे को देखता है तो वे लोग हस्ते होंगे कि यह पढी लिखी लडकी इतना भी नहीं जानती कि आसमान कोई छत नहीं है । जब वह कहती थी कि यीशु मसीह है, परमात्मा का एकलौता बेटा था, उन की शरण में जाने से मुक्ति मिलेगी तो वे मन में कहते होंगे सब संसार जब परमात्मा का बनाया हुआ है तो ये शुरू होती है उसका एकलौता बेटा कैसे हो गया? इस प्रकार के विचारों के बवंडर में पढ सुन्दर से बार बार मिल अपने मन में उठ रहे संघर्षों पर विचार करती रहती थी । जिससे दिन प्रतिदिन उसकी निष्ठा ईसाई मत जो सब धर्मों से श्रेष्ठ माना जाता था पर से उठती जाती थी । मिसेज बॉल तीस वर्ष की आयु की स्थिति थी । सुन्दर अभी बीस वर्ष का हुआ था । यदि वह को छोटे व्यवस्था की होती तो सुन्दर से विवाह करने का यह करती है उससे प्रेम करने लगी थी परंतु जब जब सुंदर उसको मदर कहकर पुकारता था उसको अपने विचारों पर लग जाने लगती थी हूँ हूँ ।

सभ्यता की ओर: तृतीय परिच्छेद भाग 7

ऍर ितीय परिचय बहुत साहब सुंदर की प्रथम पुस्तक सपने में एक वर्ष बोर लग गया । उस तक का नाम था । आगे को यह पुस्तक उसने हिंदी में लिखी है । यह उपन्यास था जो सुंदर ने कई बार संशोधन करके लिखा था और फिर उसे अपने खर्चे से छपवा दिया । इसे छपवाने में उसके लगभग पौने तीन हजार रुपये हो गए । इसको छपवाने के लिए उसको बम्बई के छापेखाने से संपर्क स्थापित करना पडा । इसके अतिरिक्त उसने अपनी प्रकाशन संस्था का नाम सौरभ मंगल प्रकाशन रखा और इसी नाम से पुस्तक छपवाई । उस घर जिसमें वह रहता था बाहर एक सौ मंगल प्रकाशन का बोर्ड लगा दिया गया । पत्रव्यवहार के लिए फार्म सव्वा लिए और पुस्तक विक्रेताओं से पत्र व्यवहार आरंभ कर दिया । सबसे पहले उसने बम्बई, नागपुर, हैदराबाद, जबलपुर इत्यादि बडे बडे नगरों में घूम घूमकर अपनी पुस्तक बिक्री की शर्त पर देखने के लिए रखी । साथ ही वो स्थानीय समाचार पत्रों में विज्ञापन भी दे आया । सुंदर जानता था की उस की पुस्तक अर्थ, योग और रस्में है । एक बार पाठकों के हाथ में गए तो फिर उसकी ख्याति फैलेंगे । इस कारण मास में पंद्रह दिन रिक्शा चलाता था और उससे जो कुछ भी बचा पाता था, मैं नगर नगर घूमने और विज्ञापनों में लगा देता था । छह । वास्के अनथक प्रयासों से उसने देखा कि बाजार में पुस्तक की मांग होने लगी है । इस समय उसने बिक्री की गई पुस्तकों का हिसाब किया तो विदित हुआ कि एक सहस्त्र के लगभग पुस्तके बिक चुकी थी । इसका रुपया बटोरने पर उसकी समझ में आया कि सब प्रकार के घर से निकालकर दो सहस्त्र रुपए उसके बैंक में फिर जवाब हो गए । अब उसने दूसरी पुस्तक लिखने आरंभ कर दी । इस बार उसको स्वयं पर विश्वास था । उसने पुस्तक का नाम रखा पिछडे हुए यह पुस्तक सकते और मार्केट में रखते रहते हैं । एक वर्ष और व्यतीत हो गया । अभी तक मैं अपने निर्वाह के लिए रिक्शा चलाता हूँ । स्वाध्याय और लिखने के समय में से कुछ समय निकालकर व्यवसाय की उन्नति करने में लगा रहता था । उसकी दूसरे कुछ तक जब मार्केट में आई तो इस बार उसको उतना यतन नहीं करना पडा जितना पहली पुस्तक के समय करना पडा था । अब तो पुस्तक पर सम आलोचनाएं भी आने लगी थी । इससे उत्साह में भरा है । तीसरी पुस्तक लिखने में लग गया । इस सब समय में वह ज्यादा काॅल से मिलता रहता था । मिसेज बॉल भी खुंदर के व्यवसाय में रूसी ले रही थी । जब तीसरी पुस्तक के सब करवाने का समय तो उसको रिक्शा चलाने के लिए समय मिलना कठिन हो गया । इस समय तक प्रथम पुस्तक का द्वितीय संस्करण निकलने वाला हो गया था । एक दिन मैं मिसेज बॉल के पास अपनी तीसरी पुस्तक की पांडुलिपि लेकर आया तो उसने पांडुलिपि को पडने के लिए अपने पास रख पूछा अब कारोबार कैसा है? मदद आज आपने प्रथम पुस्तक की अंतिम प्रति अपने स्टॉक में से तेज करा रहा हूँ । मेरा अभिप्राय है की अब मुझे उसका द्वितीय संस्कृत हुआ है । रुपया पैसे की क्या स्थिति है । बैंक में इस समय तीन हजार रुपए से ऊपर है । बिक्री के रूपये भी आ रहे हैं । मैं समझता हूँ कि काम तो बढेगा ही । एक बात हो गई है । अब मुझे रिक्शा चलाने के लिए समय नहीं मिल पा रहा है । इस की अब आवश्यकता भी तो नहीं रही ना । आवश्यकता तो एक वर्ष से नहीं थी परंतु अब इसके लिए अवकाश नहीं आशा है उसके बिना भी पूंजी बढती चली जाएगी । मैं समझती हूँ कि सिगरी दुबे प्रकाशन विभाग किसी अन्य के हाथ में दे देना पडेगा अथवा तुमको लिखने का भी अवकाश नहीं मिल पाएगा । इस संभावना की कल्पना कर सुंदर गंभीर विचार में पड गया । उसे चुप देख मिसेज बोलने कहा यदि तुम्हारा कोई भाई अथवा लडका होता है तो काम बन जाता है । अब क्या करोगे? किसी नोकर को रखोगे तो वह दिल लगाकर काम नहीं कर सकेगा । यह तो करना ही होगा । उसको दिल लगाकर काम करना होगा । फिर मुस्कुराकर कहने लगा मदद भाई पुत्र बाजार में बिकते होते तो मैं फोन खरीद कर ले आता । मिसेज बॉल को भी हंसी आ गई । बोली एक काम करो सुंदर क्या मदद? तुम विवाह कर ले कोई पटेली की पत्नी ले आओ जो तुम्हारे व्यवसाय ने हाथ बांट सके । सुंदर हस पडा । उसने कहा अभी तो अपने खाने की ही चिंता नहीं बेटी आप कहती हैं कि बीवी लिया हूँ काम वह कुछ करेगी या नहीं, कहाँ नहीं जा सकता हूँ । खाने को एक पेट हो रहा जाएगा तो ऐसा करो । अपनी मदर को काम पर लगा लो आपको । पर आप तो डेढ सौ रुपए मासिक वेतन पाती है । आपको मैं कैसे इतना वेतन दे सकता हूँ? डेढ सौ नहीं सुंदर होने दो सौ परन्तु तुम्हारे पास तो मैं वैतनिक पार्ट टाइम काम करूँ । नहीं मदद मैं आपको इस मेले में घसीटना नहीं चाहता हूँ । हाँ, एक सौ मेरे मन में हैं । जब आप स्कूल से रिटायर हो जाएगी तब तक मैं एक बाल बच्चेदार आदमी बन जाऊंगा । उस समय मदर को अपने घर में ले जाकर उसके ऋण से पूरे होने का यत्न करूंगा । मैसेज बॉल हस बडी हसते हुए उसकी आंखों में से आंसू था । लगाए अपने आंसू पहुंचते हुए उसने कहा परंतु मैं तो बोल ही होने से पूर्व ही अपने बेटे के घर में जाना चाहती हूँ । सबसे सुंदर ने आनंद उल्लास में कहा तो मदद मुझे आज शुरुआत दो कि मैं ऐसा कर सको और शीघ्र ही अपनी माँ क्या आशय पूर्ण करूँ । अगले दिन सुंदर ने अपनी रिक्शा बेस डाली और प्रातः से साइकल तक वहाँ अपनी पुस्तकों के काम में लग गया हूँ हूँ हूँ ।

सभ्यता की ओर: तृतीय परिच्छेद भाग 8

तृतीय परिच्छेद भाग आठ अब उसको पाठकों के पत्र आने लगे थे । कई लिखने वाले उसकी प्रशंसा करते थे । कई अनेक अनेक विषयों पर उससे प्रश्न पूछते थे । कुछ ऐसे लिखने वाले भी थे जो उसकी कहानी के परिणाम से बॅायकॅाट करते थे । एक दिन बहुत ही बढिया लिफाफे में एक पत्र आया । लिफाफा खोलने पर बहुत ही सुंदर कागज पर बढिया सुलेख में पत्र लिखा हुआ मिला । सुंदर ने पत्र पडने से पहले भेजने वाले का नाम वो पता देखा यह सब देख वैसा तब रह गया पत्र भावना का लिखा हुआ था पता सेट यादव देव जी का था । कितनी देर तक वह यह विचार करता रहा की भावना उसको पहचान गई है अथवा नहीं इसका निर्णय तो पत्र पडने से ही हो सकता है और वह पत्र पडने में जिस जगह अनुभव कर रहा था वह विचार करता था कि यदि उसके पिता को यह ज्ञान हो गया कि लेखक सुंदर उनका नोकर सुंदर है तब मैं क्या करेंगे? उसने पत्र पढा लिखा था चढा साल छिपा नहीं रह सकता । उस की शीतलता, सुंदरता और सफलता सबको अनुभव होती है । जो आंखें नहीं रखते वे भी अनुभव करते हैं कि किसी प्रकार का दस संसाद उनके शरीर में हो रहा है । यही बात एक प्रतिभाशाली लेकर की है । यह तो निर्जीव चंद की भर्ती अपनी कुमुदनी का प्रसार करता है । मैं नहीं जानता कि किस किस के हर देश को कम बाडों से दीन रहा अथवा किस किस के विरह जनहित संताप को सुरभित कमल दलों की भर्ती शांत कर रहा हूँ । अनेको पाठक ऐसे भी है जो अज्ञानतावश नहीं जानते की उनमें रस का संचार भी चंद रुपये लेखक की को मोदी देती है । कई पाठक बालक की भर्ती उस साल को पकडने के लिए उछल कूद मचाने लगते हैं परंतु पकट पाना तो दूर उस दूरी में जिस पर वह रहता है कुछ कर सकना भी उसके लिए संभव नहीं होता हूँ । इस पर भी बालक हाथ बडा वो छोड जाने का यत्न करता रहता है । एक बात तो है पहचान की को मोदी है जो उस बालक के मन में बहुत उत्पन्न करती है । आपकी द्वितीय पुस्तक तो पहले से भी अधिक रूचि कर लगी कदाचित चंद की एक कला बढ गई है । इन बढती कलाओं को देख कर तो पूर्ण चंद्र की कला देखने की लालसा जाग्रत हो । ठीक है उतरोत्तर बडती कलाओं में सुंदर लेखक को देखने के लिए कुछ सकता से प्रतीक्षा करती रहती हैं । आप आगामी काला में कब युक्त होने वाले हैं? मुझे पूर्ण कल आयुक्त चंद्र को देखने की लालसा मन में भर रही है । वहाँ कला विहीन चंद्र कहाँ था और कैसे कल आयुक्त होने लगा है । जानने की इच्छा जाग पडी है । लेखक होते हैं अपना इतिहास जिज्ञासा को लिखने की कृपा करें । मैंने आपकी पुस्तकों को इतना पसंद किया है कि मैं अपनी बीसीओ सखियों को उन्हें उपहार के रूप में देख चुकी हो । मेरी प्रार्थना है कि पत्रों तार आवश्यक । वास्तव में उत्तर में एक ही बात तो जानने की इच्छा व्यक्त की है और वह है आपका संक्षिप् जीवन परिचय । उसमें इसका विशेष रूप से उल्लेख हो कि आप लेखक किस प्रकार बने । पत्र लिखने वाली भी बहुत उच्च अभिलाषाएं रखती है और एक सफल लेखक से प्रोत्साहन पाना चाहती है । भावना सुंदर को विश्वास हो रहा था की भावना के मन में अभी निश्चित नहीं है कि यह वही सुन्दर है जो उस से अंग्रेजी और हिंदी पडता रहा है । उस को संदेह तो अवश्य हुआ है । वह विचार करता था कि उसके अज्ञातवास का काल समाप्त हुआ है अथवा नहीं । इस समय उसकी तीसरी पुस्तक ड्रेस में थी मिसेज बोलने पढकर निर्णय दे दिया था कि वह पिछले दो पुस्तकों से भी बढकर है । इससे मैं यह समझने लगा था की अब है स्वतंत्र मानवयुक्त जीवन व्यतीत करने के योग्य हो गया है । अब गतल बाबू को उसके साथ बैठकर खाना खाने में अपमानित होने का कोई कारण नहीं रहे गए हैं और मैं स्वयं भी सेठ जी से हाथ मिलाने में किसी प्रकार के संकोच का कारण नहीं देखता था । इस पर भी यदि सेठ जी के परिवार के लोग उससे घृणा करें तो उसके लिए चिंता का विषय नहीं है । मैं अपनी दुनिया सर था, प्रथक बना रहा है और वह सुंदर बन रही है । उसको एक माँ मिल गई थी । अब बीवी भी मिल जाएगी । इतना विचार कर उसने से हम को छिपाकर रखने में कोई कारण नहीं समझा । उसने भावना के पत्र का उत्तर देते हुए लिखा हूँ श्री भावना देवी जी । यह जानकर बहुत ही प्रसन्नता हुई कि आपने मेरी दो पुस्तकें बडी और पसंद की है । इससे मेरा साहस कई गुना बढ गया है । मेरी तीसरी पुस्तक नवजीवन मुद्रण के लिए चली गई है । आशा करता हूँ की वह अगले मास आपके हाथ में होगी । रहा आपके प्रश्न का उत्तर एक ग्यारह वर्ष का बालक अल्मोडा के बस के अड्डे पर खडा सेट यादव देव विक्रम जी द्वारा नौकर रखा गया । छेड जी उसे बम्बई ले आए । नौकरी करता हुआ वो सेठ जी की लडकी से पडता भी रहा । शेष तो आप जानती है आपकी शिक्षा के फलस्वरूप भगवान की असीम कृपा से वह सुंदर और लेखक हो गया है । यह लेखनकार्य कब पूर्णता को प्राप्त होगा? कहना कठिन पूरा होता तो भगवान का गुण है । उसको कदाचित इस जन्म में प्राप्त करना कठिन होगा । आशा है आप की माता जी तथा पिताजी स्वस्थ एवं प्रसन्न होंगे । उन दोनों आदमियों को मेरा करबद्ध परिणाम कह देना । मैंने उनका अन्य खाया है और उनकी सुगत छाया के नीचे पलकर मैंने अद्भुत उन्नति की है । इसके लिए मैं सादा उनका आभारी रहूंगा । यदि मोदी जैसा तो उस व्यक्ति कभी उनकी कोई सेवा कर सका तो मुझको अति प्रसन्नता हूँ । भाव दिए सुंदर हूँ ।

सभ्यता की ओर: चतुर्थ परिच्छेद भाग 1

हूँ । आप सुन रहे हैं कोई आसान पर गुरूदत्त लेकिन सब रहता की ओर और मैं हूँ आपका जाती रमेश मुद्गल को असम सोने जो मन चाहे हूँ । चतुर परिच्छेद बहुत एक सुंदर भावना से और पत्र पाने की आशा करता था । मैं समझता था की अधिक से अधिक उस पत्र में सेठ जी की ओर से यह आशा प्रकट की जाएगी कि वह यदि कभी बम्बई आए तो उनसे अवश्य मिलेगा । वह यह भी आशा करता था कि रतन लाल और मणि लाल का भी कुछ समाचार भावना के पत्र में आएगा परन्तु पंद्रह दिन तक कोई पत्र नहीं आया । उस तक सब कर जिन साठ के यहां चली गई थी और वह इसके लिए बम्बई जानना चाहता था । उसके पास लगभग चार सौ पुस्तकों की ऑर्डर आ गए थे और वह उनको मुंबई से ही भिजवा देने का प्रबंध करना चाहता था । वह मन में विचार कर रहा था कि यदि भावना का निमंत्रण आ जाता तो वह नहीं संकोच उससे मिलने जाता । पुराने इस मार दिया उसके मन में उभर आई थी । सुंदर ने जिंदगी सास को एक पत्र लिखकर पूछा था कि किस दिन उस तक तैयार करवा दे सकेगा । वह उसी दिन मुंबई जाना चाहता था । उत्तर की प्रतीक्षा में वैध ठहरा हुआ था । अब उसने पुस्तकों के स्टॉक के लिए अपने घर के नीचे की दो दुकानें भाडे पर ले ली थी । वहीं उसने अपना कार्यालय भी बना लिया था और गोदाम भी । मैं मध्यान के भोजन के लिए जाने वाला था । अभी तक उसने कोई नोकर नहीं रखा था । स्वयं पार्सल बनाता बाइसिकल के पीछे लाभ कर ले जाता और रेल पर अथवा डाकखाने में बुक करवा आता था तो ही चिट्ठी पत्री करता था और स्वयं ही हिसाब किताब का काम भी करता था । आते भोजन के लिए जाते समय दुकान बंद कर जाना होता था । वह अभी दुकान बंद कर ही रहा था की एक बहुत बडी मोटर गाडी उसकी दुकान के सामने आ खडी हुई । वह उत्सुकता से देखने लगा कि कौन आया है । उसमें से से यादव देव उतर रहा था । सुन्दर लपक कर बर्ड उसके चरण स्पर्श करने लगा । सेठ ने उसको उठाकर गले से लगा लिया और पीठ पर हाथ से राशि विवाद देखा । संदर्भ और चार वर्ष होने को आ रही है किंतु तुमने कभी भी अपना समाचार तक नहीं दिया । सुंदर मुस्कुराते हुए सेट के मुख की ओर देखकर बोलना बालक चंद का पकडने का व्यर्थ या तन नहीं करना चाहता था । चेतने भावना का पत्र और उसके उत्तर में सुंदर की ओर से भावना को भेजा गया । पत्र दोनों ही पडे थे । इस कारण मैं खिलखिलाकर हंस पडा । बोला दुकान बंद करके घर जा रहे थे । भोजन करने कहाँ करते हो भोजन होटल में और रहते गाओ रहने का आसान यही ऊपर ही है । ये दो दुकानें हैं चलो तुम्हारा घर और दुकान तो देख ले । सुंदर ने दुकान खोलकर सेठ जी को अपना स्टॉक करू और कार्यालय दिखाया । कार्यालय की मेज पर बैंक की पासबुक पडी हुई थी । स्टेट ने मुस्कुराते हुए पासबुक का निरीक्षण कर लिया । उस समय सुंदर के बैंक में दो सहस्त्र सात सौ अस्सी रुपये जमाते कार्यालय देखने के पश्चात सेट सुंदर गा घर देखने के लिए चल पडा । उसके कमरे में सोने के लिए लकडी का तक था जिसपर चटाई बीजी थी । तकिये के स्थान पर पुस्तकों का ढेर देखकर सेट खिलखिलाकर हंस पडा । जब सुंदर ने इस हसी को समझने के लिए सेट के मुख की ओर देखा तो सेट में उसकी पीठ पर हाथ से उसको शाबासी देते हुए कहा मेरी आशाओं से अधिक है । फिर बोला अच्छा चलो मैं भी प्रातःकाल का सलाह हुआ हो । भोजन नहीं किया है । मैं भी तुम्हारे साथ ही भोजन कर होगा । आपके लिए तो मेरा होटल उपयुक्त नहीं होगा परन्तु मेरा होटल तो तुम्हारे लिए उपयुक्त होगा ना लखजीत हो । सुंदर मौन रहा । ऍर सुंदर कॉटन होटल में जा बैठे । ड्राइवर को एक रूपया देकर खाना खाने के लिए भेज दिया गया । जब होटल में खाना परोसा जाने लगा तो सेट में बात चला दी है । उसने कहा मेरी दृष्टि में एक लेखक कभी लगती नहीं बन सकता है किंतु मेरी आकांक्षा तो मैं लखपति देखने की है । इससे क्या होगा? सुंदर ने समझाते हुए भी नए समझने का भाव बनाते हुए कहा । उसने अपने कथन की व्याख्या करते हुए कहा, एक परिवार के सुख और आराम के लिए तो लाखों रुपया नहीं चाहिए । उसका निर्वाह तो काम में भी हो जाता है । मैं समझता हूँ कि एक अच्छा लेखक एक मिल के मालिक से अधिक जनता का उपकार कर सकता है । यदि एक मिल का मालिक लाखों रुपया कमा सकता है तो एक लेखक क्यों नहीं है? परन्तु आज समाज में कुछ वैचित्र्य है । इसलिए मैं पूछता हूँ तुम लाखों क्यों नहीं पैदा कर सकते हैं । यह तो समाज की दुर्व्यवस्था के कारण है । इसमें एक कारण ओर दिए है । उत्पादन और मांग की बात लेखों का उत्पादन मान से अधिक हो रहा है । आज समाज में पडने वाले की संख्या बहुत गम है और बडे हो में बेकारी अधिक होने से लेखकों की संख्या बढ रही है । तुम ठीक कहते हो संदर्भ परन्तु एक बात और भी है हमारे देश में प्रकाशक इतने बुद्धिमान नहीं है कि वे अच्छे बुरे लेखक ने भेदभाव कर सके और सरकार अपनी पार्टी के विचार वाले लेख होगा । ब्रस्ट रोशन करती है, सुंदर स्टेट के विश्लेषण से सहमत नहीं था । उसका कहना था बजा तंत्र आत्मक राज्य पद्धति ने सरकार प्रजा को अपने विचार का समझती है और उस विचार के लेखों को बोहोत सान देना बजा के विचारों का समर्थन मानती है जो लेकर प्रजा में किसी नवीन अथवा प्रजा की रुचि के विपरीत विचार उपस् थित करता है है । प्रजा प्रकाशक अथवा राज्य के प्रस्तुत पोषण की आशा में नहीं करता हूँ । वह तो निर्धन रहेगा ही, उसको निर्धन रहने के लिए तैयार रहना चाहिए । लेखक क्या आशा करता है और क्या नहीं करता, इसके बाद में नहीं कर रहा हूँ । मैं देश की सरकार और धनी मानी लोगों के कर्तव्य की बात करता हूँ । ऍम विडंबना है कि हम प्रत्येक बात को राजनीति की कसौटी पर घिसते हैं । मनुष्यता के विचार से नहीं देखते । खाना समाप्त हुआ तो सेठ ने होटल का बिल देकर समंदर से कहा चलो तुम्हारे घर चले । मैं तुमसे एक बात कहना चाहता हूँ । आइए दोनों मोटर में सवार हो उन्हें सुंदर के कमरे में जा पहुंचे । वहाँ सोने के लिए लकडी की चौकी जिसपर सटाई बीजी थी । उस पर दोनों बैठ गए और बातचीत होने लगी । सेठ ने बताया भावना ने तुम्हारी प्रथम पुस्तक पडी तो उसने मुझे देकर कहा पिताजी इसको अवश्य पडी । मैं उपन्यास नहीं पढा करता परन्तु जब भावना ने आग्रह किया तो पडने लगा । पुस्तक को आरंभ से लेकर अंत तक पड गया । जैसे अपने जीवन से पृथक होकर सौंपी में बनते बिगडते चित्र देखने में कोई लीन हो जाता है । मैं ऐसा ही उस तक पढते समय हुआ । उस तक पडने के कई दिन पीछे तक भी उसमें लिखी घटनाओं के तारतम् में पर मैं मनन करता था । इसके कुछ दिन पश्चात भावना ने तुम्हारी दूसरी पुस्तक थी तो मैं पुस्तक विक्रेताओं से तुम्हारी पुस्तक की बिक्री के विषय में पूछने लगा । उनसे सादा संतोषजनक उत्तर पर मैं प्रसन्न था कि जनता एक अच्छे लेकर का मान करती है । एक दिन भावना ने मुझसे कहा की पुस्तकों का लेखक हमारा समंदर ही है । उसने अपना और तुम्हारा पत्र दिखाया । तब से ही मैं विचार कर रहा था कि तुम्हारे विषय में क्या किया जाए । मेरा अनुमान था की तुम इस समय आर्थिक संकट में होगी तो तीसरी पुस्तक प्रकाशित करने का विज्ञापन दे रही हूँ । अब मैं समेक सहायता के लिए पांच सहस्त्र रुपए जो तुम्हारे ही हमारे बाद जमा था लेकर आया हूँ । यहाँ पर मुझको पता चला है कि स्थिति उतनी संकट में नहीं है जितनी मैं समझता था । इस पर भी मुझे तुम्हारी व्यवस्था पर संतोष नहीं है । हम दोनों को मिलकर कोई उपाय ढूंढना चाहिए जिससे मुझको संतोष हो सके । मैं एक दो दिन में मुंबई आने वाला हूँ । अभी मैं अपने जिल्दसाजी के पत्र की प्रतीक्षा कर रहा हूँ । तब हुआ तीन चार दिन होगा और आप के प्रस्ताव पर विचारक लिया जाएगा । भावना बी ए पास कर चुकी है । वह तुमसे मिलने के लिए मेरे साथ आने वाली थी परंतु मैंने ही मना कर दिया । मैं समझता था कि यहाँ से तुम को ही साथ ले चलूँगा । मैं आपकी आज्ञा को कैसे डाल सकता हूँ । मैं आपके साथ ही चलूंगा । सेठ जी ने उसको रुपये देते हुए कहा ये अपने पांच फॅालो हिसाब किताब फिर होता रहेगा । ये रुपये मेरे कैसे हैं? मेरा वेतन तो आपने पहले ही भिजवा दिया था । ये है तुम्हारे कमीशन के रुपये हैं । जो प्रतिमास तुम भावना की माँ को दे दिया करते थे । वह उन रुपयों को बैंक में जमा करा देती थी । हमारा विचार था की तो पूना में आकर अपना पता भेज होंगे । तुम्हारे बम्बई से चलते समय हमने तुम्हारे पीछे एक आदमी भी तुम्हारी गतिविधियों को देखने के लिए भेजा था परंतु तुमने शायद उसे चोर समझकर चकमा दे दिया । तत्पश्चात बहुत या तन करने पर भी हम तुम्हारा पता नहीं पा सके । अन्यथा यह रुपया हम तुम्हें देकर होना में तुम्हारे लिए एक कपडे की दुकान करने वाले थे । सुंदर सकेत रह गया । उसने रुपयों का चेक वापस करते हुए कहा यह रुपया मेरा नहीं है । इस पर भी यदि आवश्यकता पडी तो आपसे सहायता लूंगा परंतु यह सहायता लेने भी बम्बई चलकर योजना बनाने के पश्चात ये निर्णय की जा सकेंगे । सुंदर ने अपना सूटकेस उठाया और सेठ जी के साथ हो लिया

सभ्यता की ओर: चतुर्थ परिच्छेद भाग 2

चतुर परिचय भाग दो । जब से सुंदर सेट तथा भावना के नाम पत्र देकर बम्बई से चला था तब से सेट के परिवार में भारी परिवर्तन हो रहे थे । रतन लाल तो अगले दिन ही मकान छोडकर होटल में रहने के लिए चला गया । उसने एलफिंस्टन होटल में एक कमरे का सेट दो सौ रुपया वहाँ बार पर किराये पर ले लिया था और लगभग तीन सौ रुपया महावार खाने के लिए देकर रहने लगा । रतन लाल ने अपने पिता को लिख दिया कि वह अपने चाचा का मकान छोड होटल में रहने लगा है । उसके पिता ने इसका कारण पूछा और इससे संबंधित एक पत्र अपने भाई को भी लिखा । सेट यादव ने इसके उत्तर में केवल है लिखा कि रतन लाल की आय इतनी अधिक हो गई है कि उसको घर का साधारण खाना और रहन सहन पसंद नहीं है । इसके विपरीत रतन लाल ने अपने पिता को भावना के विषय में बहुत कुछ लिखा था । यह सब पढता लाल का पिता रघुवीर मुंबई चला गया । मैं पहले भी जब आता था अपने भाई के पास ये ठहरा करता था । इस बार भी उसने यही उचित समझा । रतन लाल ने लिखा था की भावना घर के एक नौकर से अनुचित संबंध रखती प्रदीप होती है । कम से कम उसका उस के प्रति गहरा लगाव तो है ही । उसके पिता उसका विवाह करना नहीं चाहते और बात इतनी बिगड गई है कि मैंने वहाँ रहना उचित नहीं समझा । रघुवीर सुंदर को देखा था और सुंदर की सूरत शक्ति तथा उसका भावना से मेलजोल का विचार कर रतन लाल की बात पर विश्वास कर लेना कोई कठिन बाद नहीं थी । वह जब मुंबई आया तो सेट उस समय घर पर नहीं था । वह मिल को गया हुआ था । भावना स्कूल गई थी । ज्यादा घर पर थी । सेठ ने भावी से रतन लाल के विषय में पूछा तो उसने सारा बता बता दी है । उसका कहना था, सुमित्रा अपने भाई की सगाई भावना से कराना चाहती थी । भावना के पिता इस बात को मान नहीं रहे थे । इस पर झगडा शुरू हुआ था । मुझे तो रतन लाल का साला मोहन बहुत पसंद है, किन्तु मेरी सुनता कौन है? इस घर में रघुवीर ने भी मोहन को देखा था । पांच भाई और दो महीने थी । मोहन के पिता की सर्राफे की दुकान थी । सोना चांदी का व्यापार होता था । इस पर भी परिवार इतना लम्बा चौडा था कि बंटवारा होने पर किसी के पहले कुछ विशेष नहीं आता । साथ ही मोहन शरीर से भी अति दुर्बल प्रतीत होता था । इस समय रणवीर को सुंदर की याद आ गई । उसने पूछा बहू है तुम्हारा लोग कर सुंदर कहाँ है? वह तो नौकरी छोड गया है जो गतल लाल ने भावना के पिताजी को भावना और सुंदर के विषय में कुछ बताया । इससे उसके मन में सुंदर के विषय में जांच पडताल करने की इच्छा उत्पन्न हो गई । इससे पहले तो सुंदर के भावना से किसी प्रकार के संबंध की बात नहीं उठी थी । जब रतन लाल के साले वाली बात नहीं मानी गई तो उस नहीं है लांछन लगा दिया । भावना के पिता ने देख रेख और जांच की तो उनको सुन्दर एक योग्य और ईमानदार तथा पढा लिखा लडका प्रतीत हुआ । इतना ही नहीं वे उसे दामाद बनने के योग्य भी समझने लग गए । वे उसको मिल में किसी अच्छे काम पर नो कर कर उसकी योग्यता की परीक्षा लेना चाहते थे । यह रतन लाल को पता चल गया । इससे चाचा भतीजे में तू तू मैं हो गई । इस झगडे को सुंदर ने भी देखा और इसका कारण समझ एक रात चुपचाप यहाँ से चला गया । अब हमने से कोई नहीं जानता कि वह कहाँ है? क्या यह सत्य है की भावना और सुंदर में कोई संबंध था? मैं नहीं जानती । मैंने ऐसी कोई बात कभी नहीं देखी जिससे मैं इस परिणाम पर पहुंचती । आपके भाई ने क्या देखा है? उन्होंने मुझे बताया नहीं है । केवल इतना कहते थे कि सुंदर बहुत ही योग्य और चरित्रवान लडका है । वो कहते थे कि उसको मिल में किसी अच्छे पद पर लगाकर उसको व्यापार का ज्ञान करवाएंगे । जब कमाने खाने लगेगा तो उसका विवाह भावना से कर देंगे । बहुत क्या तुम को भी यह बात पसंद थी । मैं को रत हूँ घर से बाहर की बात मैं क्या जानूँ? मुझ को इस संबंध में केवल यह आपत्ति प्रतीत होती थी कि सुंदर अपनी बिरादरी का नहीं है । वह अपने देश का भी नहीं है । हम यह भी नहीं जानते कि वह कौनसी जाति का है और किस धर्म को मानता है । सुना है बचपन में मैं ईसाइयों के अनाथालय में रहा । क्या जाने उसके मन में इसाई धर्म की छाप हो । राधा के कथन से लाला रघुवीर को चाचा भतीजे में इतने बडे झगडे का कारण जिससे भतीजा घर छोड आठ नौ सौ रुपए महीने का खर्चा सिर पर बांध बैठाओ समझ में नहीं आया । मध्यान् के समय सेट यादव घर पर खाना खाने के लिए आया तो अपने भाई को वहाँ देख प्रसन्न हो चरण स्पर्श कर बोला दादा कैसे आए, आने की सूचना भी नहीं दी । स्नानादि क्या अथवा नहीं । हाँ स्नान कर चुका हूँ । तुम्हारी बहू से तुम्हारे और रतन लाल के झगडे की कथा जैसी बता सकी । सोम चुका हूँ । देखा यादव रतन लाल भाग्य से एक बडी सरकारी पदवी पर पहुंच गया है । हमको उसके कथन का आदर करना चाहिए । हम व्यापारी लोग सरकारी अफसरों से झगडा नहीं कर सकते हैं । दादा तो ठीक कहते हो । मुझसे कहो तो मैं उसे छमा माल लेता हूँ परन्तु एक बात विचार कर लो । पिताजी ने अपने जीवनकाल में केवल एक ही सीख दी थी । वह यह कि सत्य का व्यवहार करने से मनुष्य सुखी रहता है । रतन लाल ने झूठ का आश्रय ले लिया है । इससे मुझे उस से किसी प्रकार के भी कल्याण की आशा नहीं है । क्या झूठ कह रहा है? सबसे पहले उसने भावना की सगाई अपने साले मोहन से करवाने के लिए मुझे झूठ बताया कि वह यह पास कर चुका है । दादा मेरे मन में सरकारी डिग्रियों का कुछ भी महत्व नहीं । इस पर भी रतन लाल ने मुझे धोखा देना चाहिए । वह स्वयं सरकारी लो कर रहे है । कदाचित उसके मन में यूनिवर्सिटी की डिग्रियों की भारी महिमा । इस कारण उसने अपने चाचा को भी अपनी भारतीय मोर सामान यह झूठ बोल दिया । इसके अतिरिक्त उसने भावना पर जूठा लांसर लगाया कि उसका सुन्दर से अनुचित संबंध है । जब जिसे मैं सिद्ध नहीं कर सका तो सुंदर पर झूठा आरोप लगाया कि वह चोर है और मुझको लूट रहा है । अंत में जब सुंदर यहाँ से गया तो उसने यह विख्यात कर दिया कि वह मेरी चोरी करके भाग गया है । दादा मेरा धन अपने साले को दिलवाने के लिए यह सब झूठ का आश्रय लिया गया है । मैं इसको नया तो अपने लिए और न ही उसके लिए हितकर समझता हूँ । मैं नहीं उसको कहा था कि वह हम उसे छमा वागे अन्यथा मेरा घर छोडकर चला जाएगा । उसमें घर छोड चला जाना ही उचित समझा है । इस पर रघुवीर को अपने छोटे भाई यादव के घर से बाहर आने की घटना स्वर्ण हुआ । यादव उन दिनों सोलह सत्रह वर्ष का था और रघुवीर बीस का । रघुवीर को क्लब में जुआ खेलने की लत लग गई थी । एक बार है लगभग एक हजार रुपया हार गया तो पिताजी की जेब से एक हजार रुपये के नोट चुराकर कर्ज चुका है । पिता को जब पता चला तो उसने इस के विषय में पूछताछ शुरू कर दी । रघुवीर में झूठ बोल कर कह दिया कि उसमें यादव को कोर्ट के पास खडे देखा था । इस पर यादव को बहुत पीटा गया । यहाँ तक कि उस मार से मैं दो दिन तक जोर दस्त रहा हूँ । जब ही हुआ तो घर छोड बम्बई चला है । बिताने समझा कि चोर होते घर से भाग गया है । यह ठीक ही हुआ । रघुवीर को संतोष था की चोरी के दर्द से बच गए यादव मुंबई के एक भले और समझदार मिल मालिक की नौकरी पा गया । सत्य और ईमानदारी का आश्रय पा उन्नति करता करता । पंद्रह वर्ष में से हम एक मिल खोल बैठक । उसको उन्नति करते देख राधा के पिता ने जो उसके साथ ही मिल गई नौकरी करता था, उस को अपना दामाद बना लिया । विवाह तो मिल मालिक बनने के पश्चात हुआ । विवाह के समय यादव तीस वर्ष की आयु का हो चुका था । यादव का व्यवहार सबके साथ सत्य और ईमानदारी का रहा था । बम्बई के वातावरण में मनो विनाद का वो खा यादव एकाकी जीवन से उभकर कभी इधर उधर वासना तरफ ही करता रहता था । इस पर भी व्यापार में वहाँ कभी बच्चों नहीं हुआ । विवाह के पश्चात हो गए ढीले जीवन को छोड अपनी पत्नी में निष्ठा का जीवन व्यतीत करने लगा था । ज्यादा वो एक बार अपने पति की वांछित जीवन का ज्ञान हुआ तो यादव ने अपना सारा जीवन भर तल उसके समूह खोल दिया । इससे पहले तो ज्यादा को दुःख हुआ परंतु अपने पति का पिछला जीवन सुल वो संतोष कर बैठी । घर में भावना उत्पन्न हुई तो यादव ने अपने बडे भाई रघुवीर से सोलह गर्म रघुवीर तो आपने झूठ की बात भूल गया था परंतु यादव को सब बात स्मरण थी । इस पर भी जब भाई ने देखा कि यादव उन्नति की ओर अग्रसर हो रहा है तो सुलह कर बैठा हूँ । इस समय पिता का स्वास्थ्य बहुत बिगड चुका था । यादव ने भी पिता के अंतकाल में मन का रोज निकाल उनकी सेवा सूचना करने का यतन किया था । भावना के उत्पन्न होते समय ज्यादा बहुत बीमार हो गई थी और डॉक्टरों की सम्मति से राधा का गर्भाशय निकलवा दिया गया था । इसके पश्चात भावना के अतिरिक्त ज्यादा की अन्य कोई संतान नहीं हुई । राधा ने कई बार कहा की संतान के लिए उसका पति उन्हें विवाह कर ले परंतु यादव को संतान में रूचि नहीं थी । परिणामस्वरूप भावना का पालन पोषण बहुत लाड प्यार से होने लगा । भावना जब पांच वर्ष की थी तभी रतन लाल मुंबई में नोकर हुआ था । वह अपने चाचा के मकान में ही रहने लगा । रतन लाल ने इकोनोमिक्स में पीएचडी की डिग्री प्राप्त की थी । इस उपाधि के बल तथा मेलजोल के कारण रतन लाल देखते उन्नति करने लगा है । रीजनल एक्सपोर्ट ऑफिसर बन गए । कुछ ही दिनों में उसका विवाह पोर्ट ट्रस्ट के एक अधिकारी की लडकी से हो गया । युवा हुए छह वर्ष व्यतीत हो गए थे किंतु उनकी कोई संतान नहीं । इससे सुमित्रा बहुत चिंतित रहने लगी । उसका स्वभाव भी बहुत चिडचिडा । वो स्वार्थ में होता जा रहा था । सुमित्रा एक अच्छी, सुंदर और समझदार और पढी लिखी लडकी थी । अपने पति को वर्ष में रखने का ढंग भलीभांति जानती थी । अपनी संतान के अभाव को पूरा करने का उपाय वह अपने भाई का भावना से विवाह मान बैठी और इसके लिए यतन करने लगी । रतन लाल भी उसके हाथ में कठपुतली बन रहा था और इस कारण ये सारी घटनाएं गठित हुई जिनके लिए लाला रघुबीर मुंबई आया था ।

सभ्यता की ओर: चतुर्थ परिच्छेद भाग 3

चतुर्थ परिचय बहुत तीन रघुवीर चाहता था कि यदि रतन लाल का कोई लडका हो जाए तो वह उसको यादव का धर्मपुत्र बनाकर घर की संपत्ति घर से बाहर नहीं जाने दे । इस विचार को मन ही मन छिपाकर वह पहले यादव और रतन लाल में सुलह करा देना चाहता था । इसके लिए उसने रतन लाल के कार्यालय में फोन करके यह निश्चय कर लिया कि वह उसे प्रथक में ग्रीन होटल में साढे पांच बजे मिले । उसने बताया कि वह उससे एक अत्यावश्यक विषय पर बातचीत करना चाहता हूँ । सायकल ग्रीन होटल के रेस्टोरेंट में एक मेज पर चाय का ऑर्डर दे । पिता पुत्र विचार भी नहीं मैं करने लगे । पिता ने कहा जाता हूँ मैं तुम्हारी चाची और चाहता से बात कराया हूँ । उनसे जो कुछ सुना है उससे तो तुम ही अपराधी प्रतीत होते हूँ । पिताजी यह तो अपने अपने दृष्टिकोण की बात है । मैं उन सब कामों को उचित और ठीक मानता हूँ जिनसे ने एक उद्देश्य की सिद्धि हो । मैंने सुंदरगढ विषय में झूठ बोला था परंतु उसमें उद्देश्य यह था की भावना और सुंदर प्रथक प्रथक रह सके । दोनों यौवनावस्था प्राप्त कर चुके थे तथा उन में किसी प्रकार का रोहित संबंध बन जाना कठिन नहीं था परंतु रतन लाल तुम्हारा उद्देश्य ठीक था अथवा गलत है तो दूसरी बात है लेकिन तुमने एक मच्छर को मारने के लिए बन्दूक की गोली का प्रयोग किया है । सुंदर को घर से निकालने में तुम से हम घर से निकल आए । इतना पढ लिखकर भी तुम अपना हित समझ नहीं सके । देखो यदि तो वहाँ रहते और तुम्हारे घर में अब तक कोई लडका हो जाता तो मैं यतन का उस लडके को यादव की गोद में दे देता हूँ । रही भावना के विभाग की बात उसका सुन्दर से विवाह होता है अथवा मोहन से इससे तुमको क्या विवाह किसी के साथ हो वह अपने भाग की संपत्ति ही तो लेगी । पिताजी यह बात नहीं है । यह मेल और चाचा जी की पूर्ण संपत्ति उनकी अपनी अर्जित की हुई है । वे वसीयत कर इसको किसी को भी दे सकते हैं । मैं यह चाहता था कि मोहंदाबाद बन जाए तो हम चाचा जी को वसीर में मोहन का नाम भी लिख देने को कहते हैं । परन्तु इससे तुमको क्या मिलता? मेरे संता नहीं हो सकती । मैं सुमित्रा को तलाक दे नहीं सकता । अतः विवाह की बात पक्की हो जाती तो मैं मोहन को अपना धर्मपुत्र बना लेता हूँ और था अपनी बहन का विवाह अपने लडके से कर देते हैं ये नहीं विवाह पहले हो जाता और पीछे में उसका अपने घर में अपना दामाद था लडका बना रख लेता । रतन लाल तुम कुछ मोरक् होते जा रही हूँ कैसे? पिताजी भावना कसने अपने माता पिता से होता है और वह अपने पति को उनके घर में रखती और कदाचित उन झूठे लांछनों के कारण जो तुमने उस पर लगाए हैं है अपने पति को तुम्हारा शत्रु बना देती हूँ । मैं तो अब भी कहता हूँ कि अपने चाचा से जमा वह लोग भावना के साथ सहानुभूति का भाव बनाओ और अपने बीवी को किसी योग्य लेडी डॉक्टर को दिखाकर एक लडका उत्तपन्न कर लूँ । तब ही चाचा की संपत्ति में एक अंश के तुम सौ नहीं बंद होगी । देखिए पिताजी मैं इस समय एक उच्च श्रेणी का सरकारी अफसर हूँ । सहस्त्रों व्यक्ति मेरे अधीन काम करते हैं यदि मैं चाहूँ तो लाखों रूपये रिश्वत ले सकता हूँ सहस्त्रों व्यापारियों से मेरा वास्ता पडता है । इस कारण मैं इन सब लोगों के हाव भाव और रहन सहन का अनुभव रखते हुए यह समझ सकता हूँ चाचा जी की संपत्ति का मुझे कुछ भी बहुत नहीं मिल सकेगा । हाँ एक अन्य उपाय मुझको सुजा है उस पर मैं यह तो कर रहा हूँ यदि मेरा दाव चल गया तो चाचा जी कोकोडी कोडी के लिए मोहताज बना दूंगा । क्या करोगे यह मेरा रहस्य है । समय पर आपको पता चल जाएगा । रघुवीर को अपनी झूठ बोलने और यादव को पिटवाने की बात मारा हुआ । वह मन में विचार करता था कि क्या इस प्रकार की कोई बात उसका लडका भी करने वाला है । पिता के झूठ से उसका छोटा भाई पिता की संपत्ति से वंचित हो गया था । इसके किसी जोड से उसका जाता और मिल के स्वामित्व से वंचित हो जाएगा । वह यह स्मरण कर काम उठा और चुपचाप अपने पुत्र का मुख देखता रह गया । रतन लाल ने अपनी योग्यता का परिचय देते हुए कहा पिताजी मैं इतने बडे दस्तर को यूँ ही नियंत्रन में रखे हुए नहीं हूँ । मुझे कुछ योग्यता है, मेरा संबंध है । मेरे पास पैसे भी है और मैं पहले बीसीओ के दिवाले निकलवा चुका हूँ परन्तु रतनलाल यह तो मिलता है अपनी पत्नी का लाभ उठाकर यह आप करते क्या कर रहे हो? रतन लाल खिलखिलाकर हंस पडा । उसने कहा जब तक मैं मंत्रिमंडल में आपने हिमायती रखता हूँ तब तक मुझ को किसी बात की चिंता नहीं है । केन्द्र के मंत्रिमंडल में यदि मेरे पक्ष में तीन मंत्री नहीं होते तो मैं अब तक मुंबई की सडकों पर मिट्टी शांत होता है । दोनों चाहती रहे थे । रघुबीर की समझ में आ रहा था कि घर का भेदिया ही घर की नीवों पर तेल डाल रहा है । उसने कहा देख लोग तुम सज्ञान हूँ, एक उसी पद पर पहुंचे हुए हो । कहीं ऐसा ना हो कि दूसरों को गिराते गिराते तुम्हारा अपना पाव ही हो जाए और वो मिट्टी में मिल जाए । आप चिंता नहीं करें पिताजी यह सब ठीक होगा । चाचा ने मुझको जूठा मोर तथा अभिमानी का । मैं इस अपमान का बदला लिए बिना नहीं होगा । चाय अभी समाप्त नहीं हुई थी । रघुवीर में बहरे से बिल लाने के लिए कह दिया । जतनलाल मुक्त देखता रह गया । उसने विस्मय से पूछ लिया और नहीं देंगे पिताजी । बस मेरा पेट भर गया था पर मुझे तो अभी भी नहीं है तो तुम्हारे पास चाय के पैसे नहीं है । क्या खाओ पीओ मौज करो । मैं आज रात की गाडी से अहमदाबाद के लिए लोड रहा हूँ । बेहतर टेबल पर से पेस्ट्री की प्लेट उठाकर ले गया । बिल बनवाने के लिए उसका ले जाना । आवश्यकता इसपर रतन लाल को क्रोध चढाया । मैं वहाँ से उठ । जेब से रूमाल निकाल वो पहुंचता हुआ होटल से बाहर निकल गया । रघुवीर होटल का बिल चुका । टैक्सी पर सवार हो अपने भाई के घर जा पहुंचा । उसने अपनी भावी से का मैं अभी जा रहा हूँ । मालूम नहीं यादव कब तक आएगा मुझको अहमदाबाद में काम है । आप उनसे फोन पर बात कर लीजिए । गाडी में तो अभी काफी समय है परंतु रघुवीर फोन नहीं किया । वो मन में सोचता था कि आपने साधु प्रगति के भाई के साथ झूठ बोलना ठीक नहीं होगा । नहीं अपने पुत्र की निंदा करनी उचित है । इस कारण बिना बात किए उसने अपना सूटकेस उठाया और स्टेशन के लिए चल दिया । यादव आज मिल से जल्दी ही लौट आया था । उसका विचार था कि भाई ने रतन लाल को बुधवार रखा होगा और उससे बातचीत होगी । वह अपने मन में विचार करता था । किसी ना किसी प्रकार उनसे सोलह कर लेनी चाहिए । इससे जीवन सरलता से चलने लगेगा । परंतु घर बहुत उसको पता चला कि उसका भाई स्टेशन चला गया है । इससे उसने अपनी घडी में समय देखा । गाडी जाने में अभी तीन घंटे से थे । इससे उसका माथा ठनका । मैं समझ गया । पिता पुत्र में कोई बात हुई है जिससे पिता अपने छोटे भाई का मुख देखना भी पसंद नहीं करता हूँ । राधा ने बताया कि उसने टेलीफोन पर बात करने के लिए कहा था किंतु हुए मानने नहीं । इस बात से उनका मुख्य पीला पड गया था और वे बिना बात किए चुपचाप चल दिए थे । यादव कुछ देर विचार करता रहा । तत्पश्चात वोटर में वैट मुंबई सेंट्रल स्टेशन पर जा पहुंचा । वहाँ उसने प्रतीक्षालय में अपने भाई को गंभीर विचारों में निम्बा गुड देख सामने खडे हो पूछा दादा नाराज हो गए क्या? नहीं यादव मैं तुमसे नाराज नहीं हूँ । इस पर भी इतना समझ लो कि जो कुछ मैं एक सरकारी अफसर से सुन कर आया हूँ, उसे हजम करने में बहुत समय लगेगा । किन्तु दादा यह क्या? बिना किसी प्रकार की सूचना दिए तो अचानक पुरातनकाल आए और उसी दिन बिना किसी प्रकार की बात किए और सूचना दिए तुम साइकल वापस जा रहे हो । क्या सरकारी अफसर का बाप होने से सभ्यता भी लोग हो जाया करती है? नहीं, यह बात नहीं यादव कुछ कहने सुनने को रहे नहीं गया । वहाँ बैठने की अपेक्षा यहाँ एकांत में स्थिति का मनन करने के लिए सलाह हूँ और यहाँ उसने अपने चारों ओर प्रतीक्षालय को यात्रियों से खचाखच भरा हुआ देखकर कहा बहुत एकांत मिला है ना आपको? देखो दादा यदि लडना है तो स्पष्ट बता दो कि मैंने क्या अपराध की है । मैं सत्य हर जैसे कहता हूँ । मैंने किसी को बुरा चिंतन नहीं किया । ठीक है यादव इस समय मेरा मस्तिष् काम नहीं कर रहा है । कुछ दिन पश्चात मैं तुम को पत्र लिखूंगा । सेट यादव ने देखा उसका भाई कुछ भी बताना नहीं चाहता हूँ । उसमें समझा कि पुत्र पिता के कान भरे हैं और पिता को भाई से पुत्र अधिक विश्वस्त प्रदीप होता है है । यह भी समझा के पुत्र ने अवश्य ही जीभरकर अपने चाचा चाहती और उनकी लडकी की निंदा की होगी । कुछ समय तक तो भाई का मुख देखता रहा फिर बिना कुछ कहे प्रतीक्षालय से बाहर निकल गया हो हूँ ।

सभ्यता की ओर: चतुर्थ परिच्छेद भाग 4

है । चतुर परिच्छेद बहुत चार । इसके पश्चात सेट यादव ने अपने भाई को पत्र नहीं लिखा और न ही उसके भाई ने अपने मन की बात उसे लिखी । इतने बडे घर में शून्यता का आवास हो गया । मणीलाल को छात्रावास में प्रविष्ट करा दिया गया था और वह मास में एक आध बार ही अपनी महीन से मिलने आता था । मणीलाल की पढाई और छात्रावास का व्यस्त सेट यादव ही वहन करता था । इसके अतिरिक्त उसकी बहन उसको अपने पास है । कुछ रुपये जेब खर्च के लिए दे दिया करती थी । घर में पूरा महाराज रसोई की बनाई थी वहीं बाजार से वस्तुएं लाया करता था । इस प्रकार छह वर्ष के पश्चात बोले उसके भाग्य का सीतारात समझ उठा था । रतन लाल बॉम्बे क्लब का सदस्य था । वहाँ उसका मेलजोल ब्राय सभी सरकारी अधिकारियों से होता रहता था । बम्बई प्रदेश के लेबर ऑफिसर से बातचीत हुई तो उसने रतन लाल को आश्वासन दिलाया कि अवसर मिलते ही ओलंपिक मिल के मालिक को नाको चने सब हुआ देगा । इसी समय एक घटना यह घटी की रतन लाल का स्थानांतरण देश के उत्तरी विभाग में हो गया । उसको अब दिल्ली जाना पड गया । इसपर भी वह अपने मित्र लेबर ऑफिसर को लिखता रहता था । बहुत प्रतीक्षा के पश्चात मैं अब सर भी आया जतनलाल से सेट यादव का झगडा हुए तीन वर्ष और उसको दिल्ली गए । दो वर्ष हो चुके थे । इस समय ओलंपिक लो तमिल में हडताल हो गई । हडताल का कारण गया था की मिल का मैनेजर मोहनदास गांधी गुजराती था । मिल के मालिक गुजराती से परन्तु अधिकांश कार्य करने वाले महाराष्ट्रीयन थे । भारत सरकार ने मुंबई प्रांत के विषय में एक विशेष नीति का अवलंबन किया था । प्रदेश पुनर्गठन समिति ने तो सौराष्ट्र प्रांत को कुछ बडा करने की सम्मति दी थी और मुंबई के साथ मध्य भारत का कुछ भाग मिलाकर महाराष्ट्र प्रांत के निर्माण का मत दिया था परन्तु भारत की केन्द्रीय सरकार को यह स्वीकार नहीं हुआ । मुंबई नगर के विषय में झगडा आरंभ कर दिया गया । मुंबई नगर सौराष्ट्र में जा नहीं सकता था महाराष्ट्र में जाने से गुजरातियों को जिनके हाथ में बम्बई का प्राइस, सारा व्यापार और दस्तकारी थी, आपत्ति थी । इस कारण बम्बई राज्य को बढाकर इसमें स्वराष्ट्र मिला दिया गया । कुछ मध्य भारत के भाग भी इसमें संबंधित कर लिए गए और इस प्रकार मराठी और गुजरातियों में लट्ठ बाजी चल गई । बम्बई में मराठों ने जुलूस निकाले । पुलिस पर पत्थर फेंके और गुजरातियों के पेट में छोरे को अपने आरंभ कर दी । भारत सरकार ने अपनी नीति के समर्थन में युक्ति दी । भारत के प्रधानमंत्री ने व्यक्तव्य दिए और व्याख्यानों में अपनी नीति का समर्थन किया । महाराष्ट्रीयन ओ और गुजरातियों को उपदेश दिए गए परंतु दोनों में से कोई भी पक्ष संतुष्ट नहीं हुआ । इस प्रकार एक ओर महागुजरात समिति और दूसरी ओर बहन महाराष्ट्र समिति बन गई है । इन दिनों मोहनदास गांधी पर एक महाराष्ट्रीयन युवक ने छोटे से आक्रमण कर दिया । उसको पकडने का यतन किया गया किन्तु है मिल के कर्मचारी यूनियन के कार्यालय में भाग गया और जब मोहनदास अपने साथ मिल के कुछ चौकीदारों को लेकर उस युवक को पकडने के लिए यूनियन के कार्यालय में पहुंचा तो यूनियन के मंत्री ने कह दिया कि यहाँ पर इस प्रकार का कोई भी युवक नहीं आया । विवस मोहन दास ने पुलिस में रिपोर्ट लिखा दी तुरंत ही इसकी जांच आरंभ हो गई । मोहन दास के हाथ पर छोरे का गहरा घाव आया था । हत्या के यात्रियों का मुकदमा बना और यूनियन के मंत्री पर हत्यारे की रक्षा करने का केस बनाया गया । जो भी यूनियन का मंत्री पकडा गया कारखाने के कर्मचारियों ने हडताल करने का निश्चय कर लिया । कारखाने में नब्बे प्रतिशत कर्मचारी महाराष्ट्रियन थे । लेबर ऑफिसर भी महाराष्ट्रीयन था । साथ ही रतन लाल का मित्र भी था । उस नहीं है । अवसर देख अपना एक विश्वस्त कार्यकर्ता कर्मचारी के पास भेजकर उनको भडका दिया । अतः हडताल का नोटिस दे दिया गया । मैनेजर ने सेठ जी की राय से नोटिस की नकल और उसका उत्तर जो यूनियन को दिया गया था सरकारी अधिकारियों के पास भेज दिया । उत्तर में लिख दिया गया था कि यूनियन के मंत्री को पुलिस ने पकडा है । मिल का इसके साथ कोई संबंध नहीं है । अतः इस कारण मिल में हडताल करना सर्वथा नियमित होगा । इस पर भी हडताल हो गयी । मिल बंद हो गई । जब यह समाचार रतन लाल को मिला तो वह अपने कार्यालय से छुट्टी ले बम्बई आ गया । दूसरी ओर यूनियन के मंत्री पर मुकदमा चला । हत्या करने का यतन करने वाला युवक पकडा गया । चौकीदारों ने पहचान लिया और उस पर भी मुकदमा चलने लगा । मुकदमा सेशन सुपुर्द हो गया । वहाँ हत्या का यतन करने वाला युवक कोर्ट से शमा वाली और बताया कि यूनियन के मंत्री नहीं उसको मोहन दास की हत्या करने की प्रेरणा दी थी । हत्या का यतन करने वाले ने स्वीकार किया कि उसने भूल की है उसको जमा कर दिया जाएगा । इस बयान के पश्चात यूनियन के मंत्री पर तफा बदल गई । पहले तो केवल हत्यारे को छिपाने का दोस्त था अब हत्या की प्रेरणा देने का तथा हत्या करने में सहायता देने का अपराध लगाया गया और उसके अनुसार दफा बदल गई । पहले अपराध में तो अधिकाधिक पांच वर्ष की कैद का दंड था और इस नए अपराध में आजन्म कारावास का दंड भी हो सकता था । इससे कर्मचारियों ने जो तीन माँ से हडताल पर थे और अब भूखे मरने लगे थे, मिल को आग लगाने की योजना बना ली है या तन पुलिस ने जो हडताल के आरंभ से ही मिल पर नियुक्ति विफल कर दिया । आखिर हडताल का विषय जो सुलह के लिए बोर्ड के पास दीन माँ से लटक रहा था अब सालस् बोर्ड के पास भेज दिया गया । दोनों बोर्ड का चेयरमैन राज्य का लेबर ऑफिसर था और उसका यह था कि मिल जितनी अधिक से अधिक गांव तक बंद रह सके उतना ही उचित होगा । मिल के वकील सेट की राय सही है, पक्ष ले रहे थे की हडताल नियमित है । उन्होंने ये नोटिस दे दिया था कि यदि हडताली प्रमुख अतिथि तक अपने कार्य पर उपस् थित नहीं होंगे तो वे डिसमिस कर दिए जाएंगे । निश्चित तिथि पर जब कोई कर्मचारी उपस् थित नहीं हुआ तो सबको निकाल दिया गया और उनको कह दिया गया कि वे पुन है । प्रार्थना पत्र देकर कार्य पर आ सकते हैं । साला बोर्ड का अध्यक्ष समझता था कि कर्मचारियों का मुकदमा ढीला है और इस हडताल से ये तबाह हो जाएंगे । इस कारण मैं सेट के वकीलों को डरा धमकाकर समझौता कराना चाहता था । कर्मचारियों को तो कठिनाई थी, मालिक को भी भारी छती हो रही थी । क्लर्क और प्रबंध विवाह के सेवक हडताल पर नहीं थे । वे नीति आकर कार्यालय में अपनी स्थिति लिख जाया करते थे । उनके वेतन का जोड दी । पंद्रह हजार रुपए मासिक से अधिक हो जाता था । इसके अतिरिक्त कारखाने का कार्य चालू रखने के लिए एक भारी मात्रा में कोई मोल ले ली गई थी । वह हुई बैंकों के रुपये से मोल ली गई थी है । बैंकों के गोदाम में रखी हुई थी और उस पर ब्याज पड रहा था । सेठ के घर का खर्चा और मुकदमे पर भी धर्म का हो रहा था । पांच मार्च तक मिल बंद रहने के पश्चात सालस् बोर्ड ने निर्णय दे दिया । मजदूरों नहीं है नियमित हडताल धोखे में आकर की है । मालिकों की ओर से केवल यूनियन के पत्र का उत्तर देकर संतोष कर लिया गया था । मालिकों को चाहिए था कि वे प्रचार के लिए विज्ञप्तियां छपवाकर अथवा लाउड स्पीकर से मिल मजदूरों की बस्तियों में घोषित करवाते और अनपढ मजदूरों को समझाते की हडताल नियमित है । आता है यह बोर्ड दोनों पक्षों इस दुर्भाग्या मैं घटना में सामान रुपये उत्तरदायी मानता है । इस कारण यह निर्णय देता है कि पांच मास में से तीन मार्च का वेतन मालिक दे और एक सप्ताह के अंदर मिल को खोल देंगे । इस काल के व्यतीत होने पर भी यदि कोई कर्मचारी उपस् थित नहीं हो तो बोनस इत्यादि देकर उस को छुट्टी दे दी जाएगी । सेठ के वकील इस साल से फैसले के विरुद्ध हाईकोर्ट में अपील करने की राय दे रहे थे । छेडने बोर्ड के सामने यह कह दिया मेरे साथ न्याय नहीं किया गया । इस कारण मैं इस निर्णय के विरुद्ध हाईकोर्ट में अपील करूंगा । इस पर लेबर ऑफिस करने का परसेंट जी कारखाना तो खोल दो, मैं उन कर्मचारियों में से एक को भी नहीं रखना चाहता हूँ । ये सब अपराधी है । मैंने पांच मास पूर्व भी उनको काम पर से निकाल दिया था और अब मैं उनके वेतन नीतिया दी का उत्तरदायी नहीं । इससे आपकी भी दिन प्रतिदिन हनी हो रही है । ठीक है पर वो तो ये है तो बोर्ड को पहले ही विचार कर लेना चाहिए था । अब जबकि मेरा दिवाला पीठ सुबह है, इस प्रकार की बातें करने का अब कोई लाभ नहीं है । लेबर ऑफिसर इससे मन में प्रसन्न था । वह देख रहा था कि यदि साल से बोर्ड का फैसला मान भी लिया जाए तो भी कर्मचारियों को ढाई तीन वास की हानि होगी । इस कारण उसने यूनियन के नवीन मंत्री को बुलाकर कहा इससे अच्छा निर्णय तुम्हारे पक्ष में नहीं हो सकता हूँ । इस कारण रात को सेठ जी के मकान पर एकत्रित होकर उनकी मिन्नत चामत कर आगे अपील न होने दो । लेबर ऑफिसर के सुझाव के अनुसार ही कार्य किया गया थे तो मिल खोलने के लिए तैयार था । परंतु है यूनियन की ओर से आश्वासन चाहता था की उन की ओर से किसी प्रकार की अपील नहीं की जाएगी । यूनियन ने ये आश्वासन दे दिया और मेल खोल देंगी । सब हिसाब लगाने पर विधित हुआ कि मिल को लगभग बीस लाख रुपये की हानि हुई है । छेड जी इसको कडवा कोट समझकर दी गई परन्तु भविष्य में इस प्रकार की दुर्घटना से बचने का उपाय करने लगी । वे लेबर वेलफेयर ऑफिसर के पद पर किसी योग्य व्यक्ति को रखना चाहते थे । इसके अतिरिक्त वे अब अपनी मिल में उत्तर प्रदेश और मद्रास के ही कर्मचारियों को अधिक स्थान दे रहे थे । जब भी कोई स्थान रिक्त होता वहाँ पर महाराष्ट्र और गुजरात प्रदेश के बाहर का ही व्यक्ति नियुक्त किया जाता हूँ । इस समय मिल की कर्मचारी यूनियन आॅफ बोर्ड के निर्णय के विरुद्ध हाईकोर्ट में अपील करती

सभ्यता की ओर: चतुर्थ परिच्छेद भाग 5

और जब दूर परिच्छेद भाग पांच हाईकोर्ट में अभी मुकदमा चल ही रहा था कि सेठ जी पूना गए और सुंदर को साथ ले आए । सुंदर ने देखा की भावना आवेगपूर्ण युवती प्रतीत होने लगी है । उसका सौन्दर्य और भी निखर आया है । जेठानी ज्यादा बूढी हो गई । उसे मधुमेह का रोग लग गया था । मैं नीति ही इंसुलिन के इंजेक्शन ले रही थी । उसका स्वास्थ्य दिन प्रतिदिन गिरता जा रहा था । छेड साहब! भारी आर्थिक हानि होने पर भी और मुकदमे की चिंता लगी रहने पर भी प्रत्यक्ष रूप में वैसे ही दिखाई देते थे । जैसे सुंदर के पूना जाने से पूर्व सुंदर आया तो उसने सेठानी जी के चरण स्पर्श की और हाथ जोडकर पूछने लगा, आप तो बहुत ही दुर्बल प्रतीत होती है । स्वास्थ्य ठीक नहीं है क्या सुंदर अब तो व्यवस्था बहुत बिगड गई है । किसी भी दिन परमात्मा बुला सकता है । भावना ने बताया माता जी को डायबिटीज हो गई है और सब प्रकार के उपचार करने पर भी स्वास्थ्य बिगडता ही चला जा रहा है । सुंदर ने कहा, मांझी हमारे यहाँ के लोगों में यह बात विख्यात है कि यह रोग भारत के तीर्थों की पैदल यात्रा करने से निर्मूल हो जाता है । तुमने इस प्रकार किसीको ठीक होते हुए देखा है क्या? नहीं देखा तो नहीं इस पर भी ये किवंदीती पर चल लेते हैं । राधा ने लालसाहब रही दृष्टि से छेड जी की ओर देखा । एड जी ने कह दिया मुकदमा समाप्त हो जाए और सुंदर मेरे स्थान पर कारोबार देखना स्वीकार करने तो मैं यह चिकित्सा भी करवा सकता हूँ । जेठानी ने मुस्कराते हुए सुंदर से पूछता हूँ बोलो सुंदर स्वीकार करते हो । सेठ जी का काम तो मैं नहीं कर सकता । इस पर भी अन्य कर्मचारियों की सहायता से कम का प्रबंध तो मेरे बिना भी हो जाएगा । ये चारो बैठक में बैठे बातें कर रहे थे । सेठ ने गंभीर होकर कहा मिल का प्रबंध अब बहुत ही कठिन हो गया है । इस वर्ष बीस लाख की हानि हो चुकी है । इस पर भी यूनियन के अधिकारियों को संतोष नहीं हो रहा है । परन्तु सुंदर तो मेरी भर्ती कुशलता से प्रबंध तो कर ही लोगे । इसके अतिरिक्त एक अन्य उत्तरदायित्व मेरे कंधों पर है । वह तो केवल तुम्हारे करने से ही पूर्ण होगा । वह क्या है? सेठ जी बताऊंगा अभी आज तुम आराम कर लूँ । कल आपने जिल सात से मिल लोग । इसके पश्चात मैं तुम्हें अपनी योजना बताऊंगा । रात हो गई थी । रात को भोजन कर सब सोने के लिए चले गए । सुंदर को पहले तो सीढियों के पास एक बहुत ही छोटा सा कमरा मिला हुआ था । आज उसको रतन लाल वाला कमरा दिया गया । उस कमरे के साथ ही प्रथक स्नानागार, शौचालय और पाकशाला थी । सुंदर को जभी है । कमरा दिखाने भावना आई तो उसने जिसमें प्रकट करते हुए कहा भावना मेरा वाला पुराना कमरा खाली नहीं है क्या मैं खाली तो है । उसमें आपकी पुस्तके रखी हुई है । किंतु पिताजी किया गया है कि अब आपको यह कमरा दिया जाएगा ये उन्होंने अब कहा है क्या नहीं । यह तो वे जाने से पूर्वी कह कर गए थे । मैं उनके साथ जाने वाली थी । परंतु कहने लगे कि आप को साथ लेकर आएंगे और मैं यह कमरा साफ करवा रहे है । परन्तु अब सेठ जी मेरे रहने का कमरा देख आए हैं । इससे उनका विचार बदल गया होगा । यदि ऐसा होता तो मैं बता देता हूँ । यह तो हम सब को समझने में कोई कठिनाई नहीं हुई की आपकी आए अभी साधारण ही है । पिताजी हिसाब लगा रहे थे की डेढ वर्ष में आपकी पुस्तक का प्रथम संस्करण भी का है । आपने दो सहस्त्र सफाई थी अर्थात बारह हजार की पुस्तके लिखी हैं और सब प्रकार के खर्चे निकालकर लेखक और प्रकाशक की मिली हुई आए बीस प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती हूँ और था । डेढ वर्ष में तो भी सौ रुपयों के लगभग आई हुई है । दूसरे शब्दों में सवा सौ रुपये मासिक आई हुई है । इतनी आय में आपकी अवस्था कैसी है इसका अनुमान तो जाने के पहले ही पिताजी ने लगा लिया था । तब भी पिताजी नहीं है । कमरा आपको ठहराने के लिए नियत किया था । वे कहते थे कि लेकर परमात्मा का रूप होता है । यह बात दूसरी है कि कोई लेखक सोलह कला परिपूर्ण नहीं हो तो भी उसमें परमात्मा का अंश साधारण व्यक्तियों से अधिक होता है । वे अभी अभी माताजी से कह रहे थे कि हमारे घर में वालो भगवान आ गए हैं । इस समय तक कमरे में पहुंच गए थे और भावना ने लोकर को बुलवाकर पलंग के समीर जल्द से भरा नोटा और गिलास तिपाई पर रखवा दिया । इसके पश्चात उसने कहा अब मैं चलती हूँ । आशा करती हूँ कि पहले की बातें अब आप चुप जा भाग कर नहीं जाएंगे । इस पर दोनों हंस पडे । भावना ने फिर कहा अब आप सदैव यहीं पर रहने के लिए अपने मन को तैयार कर लीजिए । क्यों? अब मैं घर के नीचे से ताला लगवाकर ही होंगी । जेल का दारोगा तो बहुत ही कठोर दिखाई देता है । आपका अनुमान ठीक अगले दिन सुंदर अपनी पुस्तकों के पार्सल बनवाकर भिन्न भिन्न स्थानों के लिए वो कराता रहा और उस दिन छेड । यादव हाई कोर्ट में व्यस्त रहेंगे । आज दोनों और के वकीलों की बहस थी । हाईकोर्ट ने बहस उनका निर्णय की तिथि निश्चित कर दी । अगले दिन सेठ जी सुन्दर को मिल में ले गए और वहां के भिन्न भिन्न काम बताते रहे । उसी सहायका छेड जी ने सुन्दर को एकांत में बैठाकर कहा मेरा तुमसे निवेदन है कि तुम मुंबई में ही रह जाऊं । मैं मिल में लेबर वेलफेयर ऑफिसर का कार्य तुमको दूंगा और मैं समझता हूँ कि तुम श्रमिकों को संतुष्ट रखने में सफल भी हो जाओगे । काम बहुत हल्का है इस कारण छह समय में तुम अपने पढने लिखने का कार्य चालू रख सक होंगे । छपवाने तथा बेचने का काम किसी अन्य को दे देना उस विषय में भी विचार कर लेंगे तो पहले इतना काम कर लो । फिर तुम से एक अन्य कार्य करवाना है । भावना का तो तुम्हारे हाथ में पकडा ना । जब भी है कर लोगे तो फिर मैं भावना की माँ को लेकर तीर्थ यात्रा के लिए चल पडेगा । मुझे एक वैद्य नहीं यही बताई थी जो तुमने बताई है । आप की आज्ञा का पालन करूंगा । इस पर भी मेरा निवेदन है कि आप भी कुछ दिन के लिए इस विचार को स्थगित कर मेरे विषय में और अधिक अध्ययन कर लीजिए । बहुत तरीके परिचित जाति गोत्र के व्यक्ति को इतनी ऊंची पदवी देकर बाद में कहीं पश्चाताप नहीं करना पड जाएगा । वो तो मैंने बहुत विचार कर लिया है । इस पर भी मैं तुमको समय होगा जिससे तुम अपने कार्य करने का अभ्यास कर लूँ । तुमको अब अपने सब ग्राहकों को यहाँ का पता दे देना चाहिए और अपना कार्यालय ही यही ले आना चाहिए ।

सभ्यता की ओर: चतुर्थ परिच्छेद भाग 6

चतुर्थ परिच्छेद भाग छह ऍम देखा था की एक गौरवर्ण युवक ट्राय नीति मिसेस बॉल के पास आता है । उसे कुछ संदेह होने लगा कि वह कहीं इस अध्यापिका से गणेश संबंध नहीं रखता हूँ । इस संदेह के कारण वह जहाँ स्कूल की अध्यापिका के बदलाव होने से स्कूल की बदनामी से चिंतित हुआ वहाँ उसे अपने मन की इच्छापूर्ति का मार्गी दिखाई देने लगा । मैं एक दिन साइकल चाय के समय मिसेज बॉल के क्वार्टर में जा पहुंचा । मिसेज बॉल अपनी मेज पर चाय तैयार कर चाय के बर्तन लगा रही हैं । उसने मैनेजर को देखा तो उठकर बाहर आ गई और उनका िवादन कर पूछने लगी डॉक्टर चाय पिएंगे हाँ, इसीलिए तो आया हूँ क्या? आज छोकरा नहीं आया कौन छोकरा लम्बा लम्बा गोरा गोरा जो पहले रिक्शा चलाया करता था और आप हमारा गिरती करता है । इस समय दोनों भीतर बैठक में पहुंच गए । ऍम अलमारी में से एक प्याला निकाला और डॉक्टर के सामने रख उसमें चाय बनाने लगी । डॉक्टर फ्रैंकलिन ने अपनी बात जारी रखी । उसने कहा मैं यह समझ कर आया था कि वह यहाँ आया होगा और मैं उसको नौकरों से पिटवाकर यहाँ से निकलवा दूंगा । किस लिए डॉक्टर उसमें क्या क्या है उसने तो मैं भ्रष्ट कर दिया है । उसके तुम्हारे यहाँ आने से स्कूल के बन नाम हो जाने का है । ये आपको किसने कहा है है बात बिल्कुल गलत है । वह मुझे अपनी माँ मानता है, अल्मोडा में मुझसे पडता रहा है । यह तो सब बोलते कहती ही है । अपने लवर को भाई बाप बेटा बनाते ही रहती है । देखो वासंती उस आवारा लडके के यहाँ आने से भारी बदनामी हो रही है । मैं आवारा नहीं है । डॉक्टर मैं समझती हूँ कि वह आपसे अधिक पढा लिखा और योग्य लडका है । क्या परीक्षा पास की है उसने तो परीक्षा विद्वता का मापदंड है क्या उसने कोई परीक्षा पास नहीं कि परन्तु ॅ चले और कैंसर पर टिप्पणियां लिखता रहता है । डॉक्टर हस पडा बस कर बोला तो मुझे इस प्रकार ठग नहीं सकती । देखो मेरा एक प्रस्ताव है । डॉक्टर ने सामने बनी चाय के प्याले को उठाकर एक उसकी लगाई और कुछ साहस करो का मैं जब से इस स्कूल का मैनेजर बन कर आया हूँ, मेरा किसी से संबंध नहीं बना । यदि तो मुझे छोकरे से संबंध रखना चाहती हो तो तो मैं मुझे प्रसन्न करना चाहिए । आखिर वह क्या है और तुम्हारे लिए क्या कर सकता है । मैं तो तुम्हारी इतनी तरक्की कर सकता हूँ कि दो वर्ष में ही तो मैं यहाँ की हैडमिस्ट्रैस बन सकती हूँ । तब तुम्हारा वेतन ऑन सौ रुपया महीना हो जाएगा और तुम यहाँ की मुख्य अध्यापिका होने से सहस्त्रों कि आय कर सकता हूँ और यदि मैं आप के प्रस्ताव को ऐसी कार्य करो तो तो मैं तुम्हारे विरोध फॅमिली का मुकदमा बना तो तुम को न केवल स्कूल से निकलवा दूंगा । वरुण तो मैं ॅ करवा दूंगा जिस से तो मैं घर की रहोगी और मैं घट की पर आप मुझ पर इतना अन्याय क्यों करेंगे? मैं तो बिलकुल बेकसूर । मैं अपने धर्म पर विश्वास रखती हूँ और यही कारण है कि मैं अपने पति के अतिरिक्त अन्य किसी के साथ संबंध बनाना नहीं जाती है तो वह लडका तुम्हारा पति नहीं है । नहीं डॉक्टर, मेरा विद्यार्थी और बेटे । सवाल है तो झूठ बोलती तो मुझ पर चार सीट लगाकर मिशन की फॅमिली कमेटी के सामने मेरा मुकदमा कर दो । देखो वासंती डी मैं तुम से प्रेम करता हूँ । मैं तुम्हारी बहुत तरक्की कर सकता हूँ । यदि एक बार मैंने आरोप लगाकर शिकायत भेज दी तो यहाँ की रहने वाली सब अध्यापिकाएं मेरे कथन की साक्षी देंगे । इससे मैं चाहता हूँ कि तुम सायका मेरे क्वार्टर पर आ जाना । तुम्हारे लिए बहुत बढिया डेंजर तैयार रहेगा । डॉक्टर इतनी जल्दी नहीं । मुझे कुछ दिन विचार करने के लिए दो । मेरा मन नहीं चाहता की आपका प्रस्ताव मालूम परंतु बात मैं मानने का जो परिणाम होने वाला है वो भी मैं समझ रही हूँ । इस कारण मैं दैनिक विचार करना चाहती हूँ । इस पर डॉक्टर को समझ आ गया कि वह मान जाएगी । इस कारण उससे पूछ लिया निश्चित तारीख बता दूँ जब तो मुझ पर कृपा करोगी । अभी में वजन नहीं देती और मैं विचार करने के लिए समय चाहती हूँ । मैं आपको चार पांच दिन में अपने मन की अवस्था बता सकूँ । मैं यह सत्य कहती हूँ कि मेरे मन में उस लडके, समंदर के लिए उत्तर की भावना ही है । इस पर भी मैं जानती हूँ की आप जैसा बडा व्यक्ति कहीं मेरे विरुद्ध हो जाएगा तो मेरी क्या व्यवस्था हो सकेगी । इससे मेरा यह निवेदन है कि आप मुझे विचार करने का समय दीजिए । अच्छी बात है । आज शनिवार है । आगामी शनिवार को तो मैं अपने घर डिनर पर नियंत्रण देता हूँ । उस समय हम दोनों अकेले ही होंगे । मैं आशा करता हूँ की तुम मुझे निराश नहीं करोगे । इसके उपरांत डॉक्टर अपनी योग्यता और सामर्थ्य की प्रशंसा करता रहा हूँ । एक घंटा बस मैं वहां बैठ चला गया । उसके जाने के उपरांत मिसेज बॉल उठी । उसने अपने चौकीदार को घर का ध्यान रखने के लिए कहा और स्वयं सुन्दर से मिलने उसके मकान पर जाउं । वह घर पर नहीं था । दुकान और मकान दोनों बंद थे । उसने एक पडोसी से पता किया तो पता चला कि उसका मकान और दुकान बंद पडे । चार दिन से ऊपर हो चुके हैं परन्तु उसने पूछा उसने मकान खाली तो नहीं कर दिया । नहीं दुकान में माल भरा है और उसके घर में उसका सवाल रखा है । वासंती ने समझा कि वह पुस्तकों की बिक्री करने गया है । पता है वह नीति ही उसके घर पर आकर उसे देखने लगी । बुधवार के दिन सुंदर उसे स्वयं मिलने आया । उसे देखकर उसकी जान में जान आ गई ।

सभ्यता की ओर: चतुर्थ परिच्छेद भाग 7

चतुर परिच्छेद बहुत साहब तीन चार दिन में अपनी पुस्तकों को भेजने का कार्य समाप्त कर और शेष पुस्तकों का स्टोक अभी पूना नए भेजने के लिए कह सुंदर पूरा लोट आया । होना पहुंच अपने कार्यालय को समझाते हुए । अगले दिन वह अपने बम्बई जाने का निर्णय बताने के लिए विशेष बॉल के पास गया । मिसिस बोलने पूछा, कहाँ गए थे सुंदर मैं तुम्हारे घर पर गई थी, जो मदद क्या कुछ काम था? हाँ, तुम से बहुत कुछ विचार करना था । यहाँ एक नई परिस्थिति उत्पन्न हो गई है । क्या बात है? नौकरी छोड दी है क्या? हाँ, कैसे जाना? तुमने लगभग एक माह हुआ । जब मैं पिछली बार मिलने आया था तो स्कूल का मैनेजर मिस्टर फॅस थित था । मैंने देखा था कि वह एक विचित्र ढंग से आप की ओर देख रहा है । मेरा अनुमान था कि आप से प्रेम करने लगा है । आप विवादों करेंगे नहीं और इससे आपका उस मैनेजर के अधीन कार्य करना कठिन हो जाएगा । सुंदर तुमने ठीक समझा है । पहले तो मुझे घूर घूरकर ही देखा करता था । कुछ दिनों से वह मेरा अपमान करने पर तुला हुआ प्रतीत होता है । एक दिन मेरी उस से बात हो गई है तो मुझ पर बलात्कार करने के लिए आया प्रतीत होता था । फिर न जाने उसके मन में क्या विचार आया कि मुझे तुमसे अनुचित संबंध रखने का आरोप लगाने लगा । अंत में बोला कि मैं उस से भी संबंध बना लो, अन्यथा मेरे विरुद्ध आरोप लगाकर मुझे बदलाव कर स्कूल से निकलवा देगा । और फिर लार्ड डिश अब को कहकर मुझे धर्म चिप घोषित करा देगा । मैंने उसे एक सप्ताह का समय मांगा है । मैं तो उसी दिन ही यह स्थान छोड तुम्हारे साथ रहने के लिए गई थी । परंतु तुम वहाँ थे नहीं । मैं नित्य जाकर पता करती रहती थी । ईश्वर का धन्यवाद है कि तुम समय रहते ही आ गए हो, अन्यथा तो तुम्हारे घर का ताला तोडकर । मैं वहाँ घुसकर रहने का विचार कर रही थी । अब तुम आ गए हो और मैं त्यागपत्र देकर यहाँ से तुरंत चली जाना चाहती हूँ । मैं जानती हूँ कि तुम्हारी आर्थिक दर्शा अभी बहुत अच्छी नहीं है । इस पर भी मैं तुम्हारे का रेलेवे चपरासी का काम तो कर ही सकती हूँ । आशा करती हूँ कि आपने बहुजन भर के दाम का काम कर दिया । करूंगी मदर मैं परमात्मा पर आगाध विश्वास रखता हूँ । इससे अपनी आत्म की प्रेरणा का अनुसरण करता हुआ शेष परमात्मा के अधीन छोड देता हूँ । आपको यहाँ से कब छुट्टी होने वाली है । मैनेजर में कह दिया है कि जब चाहूँ यहाँ से जा सकती हूँ तो ऐसा करिए । कल यहाँ से सामान उठवाकर मेरे घर चली चली । शेष वहाँ पर विचार कर लिया जाएगा । मिसेज बॉल जिसमें में सुंदर का मुख्य देखती रह गई । इस पर सुंदर ने अपने भावी जीवन के कार्यक्रम के विषय में बताते हुए कहा मैं मुंबई जाकर रहने का निर्णय कराया हूँ । ये हैं कारोबार भी वही ले जा रहा हूँ । मैं तो एक दो दिन में ही यहाँ से चला जाऊंगा । यदि आप मेरे काम की देखभाल करेंगे तो कारोबार योग्य वहाँ स्थान मिलते ही आप को भी वहां बुला लूंगा । मेरे इस व्यवसाय में जितना प्रकाशन का भाग है, मैं आप ले लीजिएगा । यदि इससे भी निर्वाण हो सका तो बम्बई में और भी प्रबंध हो जाएगा । मुंबई घूमना की अपेक्षा महंगा स्थान हम दोनों का निर्वाह वहाँ पर इस व्यवसाय से हो सकेगा क्या? इस पर सुंदर ने सेट यादव जी से अपने संबंध की पूर्ण घटना सुना दी । साथ ही भविष्य में बनने वाले संबंध का वर्णन कर दिया । माॅल इससे बहुत ही प्रसन्न हुई । उसने कहा तब तो ठीक है । यह तो हम पर प्रभु की कृपा दृष्टि का सूचक है । इसके पश्चात अगले दो दिन बम्बई जाने की तैयारी में और मिसेज बॉल को व्यवसाय की कुछ बातें समझाने में व्यतीत हो गए हैं । सुंदर ने मिसेज बोल को अपने बैंक का अकाउंट ऑपरेट करने का अधिकार दे दिया । साथ ही उसको छोडो आने पर माल भेजने के विषय में सब समझा दिया । तीन दिन में मैं मुंबई जा पहुंचा । निःशेष बोल अब उसके घर में जाकर रहने और उसके कारोबार की देखभाल करने लगी । मुंबई में सुंदर की प्रतीक्षा की जा रही थी । मैं सेम सेठ जी के मकान में रहने लगा और मिल में लेबर वेलफेयर ऑफिसर का कार्य संभालने लगा । पहले दिन उसने सेठ जी को मिसिज बोल के विषय में और अपने उससे संबंध के विषय में बताकर अपना प्रकाशन कार्य उसके आदेश छोड आने की बातें बता दी । सुंदर ने बताया वे मुझसे माँ का साथ नहीं रखती है । जब प्रकाशन विभाग के लिए बम्बई में स्थान मिल जाएगा तो वह यहाँ आकर उस व्यवसाय की देखभाल करेंगे । अच्छी बात है यदि वे तुम्हारी माँ तुल्य है तो उनके लिए भी इस घर में स्थान बनाना होगा । इस विषय में भी मैं किसी अन्य के आधीन होने वाला हूँ । मैं समझता हूँ कि उस की इच्छा ही सर्वोपरि मानी जानी चाहिए । यह तो होगा ही । मैं समझता हूँ की भावना को इससे सुख ही मिलेगा । यदि वह उसकी सास का स्थान ले सके तब इस अभाव की पूर्ति भी हो जाएगी । मिल का कार्य इतना सुगम नहीं था जितना सुंदर समझता था । एक और उसको कर्मचारी यूनियन के अधिकारियों से संबंध बनाना था और दूसरी ओर लेबर विभाग के सरकारी अधिकारियों से पहले ही दिन कर्मचारी यूनियन के मंत्री बहुत लंबी थोडी बातें हुई । यूनियन के मंत्री का कहना था, आप हमारे कार्यों में हस्तक्षेप करेंगे तो झगडा होगा । क्या काम है आपका मिल में काम करने वाले छोटे दर्जे के कर्मचारियों के हितों की रक्षा करना और ऊंचे दर्जे के कर्मचारियों के हितों की रक्षा करना क्यों नहीं नहीं, वह हमारा काम नहीं है तो वे नौकर नहीं है । क्या यह है बात नहीं । वे इतना वेतन पाते हैं कि उनको रक्षा की आवश्यकता ही नहीं । क्या वे नौकरी से निकाले नहीं जा सकते हैं? हमारा उनसे संबंध नहीं है । वे अपने विषय में स्वयं सोचकर प्रबंध करने की योग्यता रखते हैं । देखिए, आपकी जो इच्छा हो करिए, मैं आपको विवस नहीं करता हूँ की आप किसको अपनी संस्था का सदस्य बनाएगा और किसको नहीं परन्तु मैं यहाँ पर काम करने वाले नौकरों के ही तो और उनकी भलाई का ध्यान रखने के लिए नियुक्त हुआ हूँ । इस कारण यदि आप ऊंचे दर्जे के नौकरों को अपनी यूनियन में संबंधित करना नहीं चाहते तो मैं उनको अपनी एक पृथक यूनियर बनाने के लिए कहूँगा । जब उनकी यूनियन बन गई तो उस को भी मान्यता मिलेगी और दोनों यूनियनों का समान अधिकार हो जाएगा । इस प्रकार सुंदर ने उसी दिन मैनेजर, इंजीनियर, क्लर्क इत्यादि को बुलाकर उनकी एक पृथक यूनियन बनाने का प्रस्ताव कर दिया । इसी समय हाईकोर्ट का निर्णय भी सुना दिया गया । न्यायाधीशों ने अपने निर्णय में लिखा था साल से बोर्ड के निर्णय को दोनों पक्षों ने मान लिया था परन्तु पीछे यूनियन की ओर से अपील की गई । इस पर मिल के मालिकों की ओर से यह प्रार्थना की गई की जब साल से के निर्णय को एक पक्ष नहीं मानता हूँ तो दूसरे पक्ष को भी उसके विरुद्ध अपील की स्वीकृति दी जाएगी । यहाँ सर्वथा युक्तियुक्त थी । अतः साल से बोर्ड के पूर्ण निर्णय पर उनको अवलोकन की स्वीकृति दे दी गई । दोनों पक्षों के झगडे के आदि और अंत पर बहस हुई । दोनों पक्षों को सुनकर जजों को साल से बोर्ड के निर्णय पर जिसमें हुआ साल सी बोर्ड ने सुलह कराने वाले बोर्ड का काम किया था । किंतु दोनों बोर्डों के कार्य भिन्न भिन्न थे । जब सुलह कराने वाला बोर्ड सोलह नहीं करा सका तो फिर साल से बोर्ड का करते हो गया था की न्याय और कानून के आधार पर निर्णय देता । उसका काम सुलह और लेन देन की बात करने का नहीं था । साल सी बोर्ड न्यायकर्ता था, सुलह करता नहीं । फैसले में यह कहा गया । साल से बोर्ड ने यह मानना है कि हडताल नियमित थी । यदि नियमित थी तो हडताल के समय का कुछ भी वेतन दिलवाला अन्याय संगत है । यदि साल से बोर्ड कर्मचारियों पर दया करने का विचार रखता था तो उसको यह मामला उन्हें सुलह कराने वाले बोर्ड के पास भेज देना चाहिए था । न्यायकर्ता दया करता नहीं हो सकता । दया करना राष्ट्रपति का कार्य है, एक न्यायालय का नहीं । लेबर नियमों में दया और नीति, लाभ और हानि इत्यादि का विचार करने का अधिकार सुलह कराने वाले बोर्ड को है, साल से बोर्ड को नहीं । साल से बोर्ड का निर्णय की हडताल के तीन वास का वेतन कर्मचारियों को दिया जाए किसी कानूनी आधार पर नहीं है । अतः हमारा यह निर्णय है की हडताल के दिनों का वेतन कर्मचारियों को जो काम से अनुपस्थित थे, नहीं दिया जाना चाहिए । जो वेतन साल से बोर्ड के वैज्ञानिक आज्ञा से कर्मचारियों को मिला है उसको वापस पाने के लिए मालिकों को कानूनी कार्रवाई करने का अधिकार है । कर्मचारियों की नौकरी उस दिन से छूट गई समझी जाएगी जिस दिन मालिकों के काम पर आने के लिए नोटिस की तिथि समाप्त होती है । यूनियन का मंत्री कह रहा था कि हाईकोर्ट के निर्णय की अपील सुप्रीम कोर्ट के सामने करनी चाहिए । इस पर लेबर ऑफिसर का कहना था की उस अवस्था में मालिक किसी प्रकार की भी रियायत करने को तैयार नहीं होंगे । परिणाम क्या हुआ की पुरानी यूनियन के अधिकांश सदस्य नवीन यूनियन में सम्मिलित हो गई । पुरानी यूनियन में केवल वही लोग रह गए जो कम्युनिस्ट पार्टी के भी सदस्य इन सब प्रकार की बातों में छह मास लगे । सुंदर के निरंतर एक दिशा में काम करने का परिणाम क्या हुआ कि यूनियन बन गई जिसमें मैनेजर से लेकर भंगी तक सब सम्मिलित तो इसमें कुछ पढे लिखे, समझदार और संपन्न व्यक्तियों के आ जाने से यूनियने एक विचारशील संस्था बन गई । इस अवधि में पारिवारिक परिवर्तन भी हो रहे थे । सेट यादव जी ने अपनी लडकी भावना का विवाह अपनी मिलके वेलफेयर ऑफिसर सुंदरलाल के साथ कर दिया । मुँह बॉल जो वासंती देवी के नाम से विख्यात थी, सुंदरलाल की माँ समझी जाती थी । मेंहदी सेठ जी के घर में ही रहती थी और फोर्टी एरिया में एक गोदाम लेकर उसमें प्रकाशन का कार्य करती थी । सुन्दर की तो वर्ष में एक दो पुस्तकें ही तैयार होती थी परन्तु वासंती देव ने अपने प्रबंध से प्रकाशन कार्य को बहुत उन्नति दी । छः मास में ही उस विभाग में आठ नई पुस्तकें प्रकाशित हो गई थी । जब सुंदर और भावना का विवाह हो गया तो सेठ और सेठानी तीर्थ यात्रा के लिए चल पडे । उनका यह निश्चय था कि वे पांच से मिल नित्य पैदल चलकर यात्रा करेंगे । उनका अनुमान था कि देश के सब तीर्थ स्थानों की यात्रा में तीन वर्ष लग जाएंगे । एक दिन सुंदर अपनी पत्नी भावना और माँ वासंती देवी को अपने बाल्या का और बाबा तथा फूफा फूफी की बातें सुना रहा था । इस पर वासंती देवी ने पूछा, सुंदर क्या तुम्हारा अपने जन्म भूमि और फूफा फूफी को देखने के लिए मन नहीं करता हूँ । वहाँ करता तो है परन्तु मैं हम को उस तैरने वाले की भर्ती पाता हूँ जो नदी की मजेदार में पढ रहे पॉवर में फस गया हूँ । मैं भवर से निकलना चाहता हूँ परन्तु भवर मुझको परिधि से बाहर नहीं निकलने देता हूँ । इस पर वासंती देवी ने कहा मेरी तो इच्छा है कि दो सप्ताह की छुट्टी लेकर यहाँ से चले हवाई जहाज से दिल्ली वहाँ से मोटर में अल्मोडा, अल्मोडा से गोरों पर अपने अपने गांवों को वहाँ एक एक दिन रहकर दो सप्ताह तक नोट आएंगे । वासंती देवी के इस कार्यक्रम से तो भावना ने इस यात्रा में विशेष रुचि लेना प्रारंभ कर दी । उसने अपने पति से कुछ अधिक पूछताछ किए बिना तैयारी कर दी । एक मोटर ड्राइवर के साथ पहले ही दिल्ली भेज दी और निश्चित तिथि को जिसकी सूचना सुंदर को एक सप्ताह पहले दी गई थी । सब लोग प्रात पांच बजे के हवाई जहाज से चलकर आठ बजे दिल्ली पहुँच गए । वहाँ रहता का अल्पहार ने मोटर में जो उनके लिए एयर ड्रम पर बहुत ही हुई थी । सवार हो रात में नैनीताल पहुंच गए । वहाँ आराम कर अगले दिन मध्यान तक अल्मोडा और वहाँ से घोडे कर वे लोग कैलाश के मार्ग पर जा पहुंचे । पहले वासंती का गांव आया । वहाँ तो वासंती की जान पहचान का कोई व्यक्ति नहीं था । उसको घर छोडे । पच्चीस वर्ष से ऊपर हो चुके थे । उसके गांव में दिनभर आराम करके वे आगे बढे । उसी दिन साईका वे उस स्थान पर पहुंचे जहाँ सुंदर के फूफा की कुटिया को खुद डंडी जाते थे । पगडंडी अभी अभी बनी थी उस स्थल पर जहाँ से पगडंडी आरंभ होती है । अस्त होते सूर्य के प्रकाश में दो व्यक्ति खडे अल्मोडा की ओर देख रहे थे । इनमें एक पुरुष था दूसरी स्त्री एक पहाडी मोड के घुमाव पर ये दोनों खडे उसी ओर जिधर से आ रहे थे, देखते दिखाई दिए । सुंदर को इस स्थल की भली भारतीय पहचान थी । वह पहाड पर के तीनों को पहचानता चला जाता था । उसका विचार था की पगडंडी को ढूंढने से कस्ट होगा और वह पगडंडी प्रयोग ने आने के कारण प्राइम मिट्टी गई हूँ । जब उसने एक स्त्री पुरुष को वहाँ खडे देखा तो उसको संदेह हुआ कि कहीं पे, उसके फूफा फूफी हो । उसने घोडा खडा कर दिया । इस पर साथ रहने वालों ने भी घोडे रोक दिए । दे भी पगडंडी के स्थान से आधे फरलांग के अंतर पर थे । सुंदर ने ध्यान से देखा तो उसको अपना संदेह ठीक प्रतीत हुआ । पुरुष मिला फटाक परन्तु आईएनए की वर्दी वाला कोट पहने हुए था । सुंदर ने वासंती देवी से कहा हूँ हाँ देखो वे मेरे संबंधी प्रतीत होते हैं परन्तु ये यहाँ क्या कर रहे हैं? ऐसा प्रतीत होता है कि तुम्हारी प्रतीक्षा हो रही है । मेरी क्या है? कैसे हो सकता है? सुंदर ने घोडे को तेज कर दिया । इस पर भावना और वासंती देवी ने भी गोडे तेज कर दिए । दोनों पहाडी इन गोडो वाता देख उत्सुकता से इन की ओर देखने लगे थे । ये समझ रहे थे कि ये कोई यात्री है । कदाचित रात को वहीं डेरा लगाएंगे । वे मन में विचार कर रहे थे कि इनकी वे क्या सेवा कर सकेंगे । इस समय तक वे गोड सवाल उन के समीप आकर खडे हो गए । अब तक सुंदर ने उनको पहचान लिया था इसलिए बारह वर्ष में वे बहुत बोले और दुबले हो चुके थे । दोनों के बाद सर था शहीद हो चुके थे । मुख पर जूरियां पड गई थी । कपडे तो फटे पुराने धेहि सुंदर में थोडे से उतरते हुए आवाज दी बुआ बुआ मैं हूँ । सुंदर आवाज सुनकर दोनों उसकी ओर लपके दे । उसको पुकारने का यत्रों कर रहे थे । परंतु मुख से आवाज नहीं निकल रही थी । सुंदर ने आगे बढकर फूफा और बुआ के चरण स्पर्श कि परन्तु उन्होंने उसको उठाकर गले से लगा दिया । तीनों बिना कुछ बोले बार बार गले मिलते थे । उनकी आंखों से सतत आंसू बह रहे थे । इस समय तक वासंती और भावना भी घोडों से उतर समीप खडी इस क्रेमिलन के दृश्य को देख रही थी । सुंदर के फूफा और गोवा वहीं पगडंडी पर बैठ गए और सुंदर को आपने समीर बैठा प्यार देकर पूछने लगे तो कहाँ गए थे बेटा? इस समय सुंदर ने अपनी पत्नी का परिचय कराना उचित समझा । उसने कहा बुआ यह देखो तुम्हारा बहु है ना । भावना अभी तक खडी थी । इस कारण सुंदर की बुआ उन्हें खडी हो । बहु को समीप खुला उसके मुख पर देखने लगी । भावना इस निरीक्षण से बचने के लिए जो कर चरण स्पर्श करने लगी । सुंदर की बुआ ने उसको उठाकर सिर पर हाथ रखकर प्यार देते हुए कहा दे टी आंखों में आंसू होने से भली प्रकार दिखाई नहीं दे रहा था । किसी से समीर से देखने लगी थी कि सुंदर की बहु कैसी है । सुंदर बहुत वो बहुत सुन्दर ले आए हो, कहाँ से लाए हो इसका कुछ उत्तर न देते । सुंदर ने कहा बुआ उधर देखो ये है मेरी माँ है बीज राओ बहन तुम को भी देखो । वासंती ने इस पर हाथ जोडकर परिणाम कर दिया । हुआ अब नीचे चले हम सब घर में ठहरेंगे । आओ बेटा सोमेर स्वागत करते हुए कहा । सुमेर ने बताया सुंदर जिस दिन से तुम गए हो हम तुम्हारे लोट आने की आशा लगाए हुए थे । ये गोरे ईसाई आपने धन और वाकचातुर्य से ऐसा मोजा डालते हैं कि वहाँ फसा व्यक्ति फिर निकल नहीं सकता है । परंतु मेरा विश्वास था कि हमारा सुंदर इतना बुद्धू नहीं होगा और आखिर भगवान में हमारी प्रार्थना सोने ही ली । हम नित्य साइकल उस मुख्यमार्ग पर जाते थे और कितनी ही देर खडे हो तुम्हारी प्रतीक्षा किया करते थे । युग बीत गया है बेटा ऐसा करते हुए परंतु उस प्रभु को धन्यवाद है कि तुम हमको भूले नहीं, तुम आ गए हो । अब हम प्रभु के घर जाने की सोचेंगे । तुम्हारी प्रतीक्षा थी वह पूर्ण हुई । उस रात को कोई नहीं सोया । सब सोम और उसकी पत्नी की इसने मेरी वाणी सुनते रहे । सुंदर ने भी अपनी बारह वर्ष की पूर्ण का था सुना दी । कुटियां बहुत मजबूत बनी थी । सुमेर में अपने संसार के ज्ञान से उसको टिया में कुछ सुधार ही किया था । सब के लिए भूमि पर बिस्तर लगा दिए थे । परंतु किसी को सोने में रूचि नहीं । चांदनी रात थी । भावना और वासंती फुटिया से बाहर एक पत्थर पर बैठ जानने के प्रकाश में उस पहाडी स्थान की सोवा देखती रही हैं । सूर्य की लालिमा दिखाई देने लगी थी । भीतर तीनों बातें करते करते चुप हो गए थे । वे बैठे बैठे ही सो रहे थे । भावना और वासंती अब भीतर आई और कम्बल ओढ हो गए । सुंदर की उत्कट इच्छा थी कि वह अपनी बुआ और फूफा को बम्बई ले चले परन्तु वे दोनों जाने के लिए तैयार नहीं हुए । उनका एक ही उत्तर था अब हमारा अंतकाल समीर है । बेटा हमें शांति से यही मरने दो, तुम जाओ जब तुम अगली बार यहाँ होगे तो तो मैं यहाँ हमारे स्थान पर हमारे कंकाल ही पडे मिलेंगे । तीन रात वहाँ रहकर मुंबई से आई मंडली लोट गई जाने से पूर कपडे, कंबल और अन्य सूप सुविधा का सवाल जो कुछ भी वे रखते थे और उनके काम किए थे, दे गए जाने से पूर्व सुंदर ने कहा, फूफा, मैं एक वर्ष के पश्चात ठहराऊंगा । जब तक अपने मन को मुंबई चलने के लिए तैयार कर रखना है, मैं तब आपको साथ ही ले चलूँगा । सुमेर ने कहा सुंदर भगवान तुम्हारा वाला करें । अपने जैसे ही बाल बच्चों के पिता बन दीर्घ जीवन व्यतीत करो । अब यहाँ आना हम नहीं मिलेंगे । लोटते समय भावना ने अपना अनुमान बता दिया । उसने कहा ऐसा प्रतीत होता है कि आपके फूफा और बुआ को मैं भली प्रतीत नहीं हूँ । नहीं भावना । कल नदी के किनारे बैठे बैठे बुआ ने कहा था सुंदर तो इतने बडे आदमी हो गए हो कि हम जंगली जो खाने का ढंग जानते हैं । मैं पहनने का तुम्हारे साथ आकर तुमको लज्जित करना नहीं चाहते । तुम जाओ और सुप से अपना जीवन यापन करूँ । ये अपने को ऐसा सब समझते हैं । वासंती ने पूछ लिया, मैं इसके विपरीत ही समझ रही थी । हम नगर निवासी, धन और भोगविलास के पीछे भागने वाले उनसे कहीं अधिक है, सब है । ये निर्धन कहे जा सकते हैं । परन्तु ऐसा तो है नहीं । देखो सुंदर । उन्होंने इन तीन दिनों में एक दिन भी नहीं पूछा कि तुम ईसाई हो गए हो अथवा हिंदू ही हो । वे तुम को अपना भतीजा मातृ समझते तथा मानते रहे हैं । भावना ने बताया, आपकी फूफी मुझसे कल कह रही थी बेटी सुंदर को प्रसन्न रखना । हम तो इस देखभाल का प्रतिकार तुमको दे नहीं सकेंगे परंतु भगवान तुमको उसकी सेवा का फल देगा । अल्मोडा पहुंचते वासंती ने कहा सुंदर हम वापस तो चल रहे हैं परन्तु मेरे मन में शांति नहीं हो रही है इसलिए क्या यहाँ से जाने का चित नहीं करता हूँ? हाँ, मुझे यह स्थान देख अपना बाल्यकाल स्वर्ण हुआ है । यह भी उस समय पिता के घर में इतनी सुख सुविधा नहीं थी जितनी अब मुंबई में है । परंतु यहाँ का वातावरण, ये पहाड और यहाँ का सब कुछ ऐसा जाना पूजा प्रतीत होता है कि इन को छोडने का चित नहीं करता । सुंदर हस पडा और बोला मदद तो यही रहे जाओ मेरे फूफा के पास रहना चाहूँ तो तुमको यहाँ मकान बनवाकर दे सकता हूँ । साथ ही खाने पीने का प्रबंध कर सकता हूँ । जब यहाँ रहते रहते मन ऊब जाए तो पत्र भेज देना मैं आकर तुमको ले जाऊंगा । बात तो ठीक है । ये वृद्ध जल्दी इसमें सुख अनुभव करेंगे । इस पर भावना ने कह दिया पर मदद मैं तो कुछ और ही विचार कर रही हूँ । क्या मैं समझ रही हो कि हम कितने स्वार्थी जीव है की इतनी दूर से आकर भी इनको साथ नहीं ले जा रहे हैं । देखिए अब भावना ने सुन्दर की ओर मुखकर कहा बारह वर्ष से ऊपर हो गए हैं । आपको घर छोडे हुए विचार कीजिए कि बाहर वर्ष से वे नित्य पगडंडी से सडक तक आकर आपकी राह देखते रहे हैं और आप आए और तीन दिन तक रहकर चल दी । पर हमने उन्हें कहाँ तो था कि वे हमारे साथ बम्बई चले । उन्होंने से हम ही वहाँ जाने से इंकार किया है । भावना क्या की तरह हो रही थी? उसने कहा, मैं समझती हूँ कि हमने बाली बातें नहीं कहा । हमारे अपने मन में ही चोर प्रतीत होता था कि वे ऐसा बोलते हैं और हम उनसे संपर्क रख है । सब माने जाएंगे । मेरा तो चित्र करता है कि कल फिर लोट वहाँ पहुँच जाऊं और फिर उन को साथ लेकर ही चले और यदि वे नहीं माने तो सुंदर का प्रसिद्ध था । कैसे नहीं मानेंगे? मैं वहां धरना दे दूंगी और कहत होंगी की यदि वे नहीं चलते तो मैं उन के द्वार पर अनशन कर प्राण त्याग दून सुंदर गंभीर विचार में मग्न हो गया । उसे मोंदे वासंती ने कह दिया, बेटा सुंदर अब तो देर हो गयी है । कल फिर वहाँ चलना चाहिए । उनके लिए पालकी का प्रबंध करके ले चलना चाहिए । यह निश्चित हो गया । सुंदर इत्यादि अल्मोडा में पाइंट होटल में ठहरे हुए थे । उन्होंने डैड को कहकर दो डांडियों का प्रबंध कर बहुत प्राप्त है उस सडक पर भेज दिया जो वहाँ से कैलाश हो जाती थी । उनका अनुमान था कि डांडी वाले सांयकाल तक वहाँ पहुंच जाएंगे । वे सेम गोडो से प्रातःकाल बाहर ले चल पडेंगे । वे लोग साढे चार बजे तक उस स्थान पर जा पहुंचे जहां चार दिन पूर्व उन्होंने वृद्ध और वृद्धा को दक्षिण की और मुख्य खडे देखा था । आज वहाँ कोई नहीं था । सुंदर और दोनों ओरतों ने घोडों से उतर उनकी लगा में पकड ली और पगडंडी से नीचे उतरना आरंभ कर दिया । वेज इसमें कर रहे थे कि जो पडा सूनसान क्यों प्रतीत होता है । सुंदर झोपडी के बाहर बहुत उत्सुकता से बुआ को मुकाबले लगा । जब भीतर से कोई उत्तर नहीं आया तो वह भीतर घुस गया । भीतर जा वहाँ व्यवस्था देख मैं स्तब्ध रह गया । उसने भावना आवाज दे दी । भावना भावना भी तो आ रहा हूँ । दोनों ओर भीतर गयी तो उन्होंने देखा कि वे रद्द और वृद्धा चटाई पर एक दूसरे के गले में बाहें डाले बडे हैं । इस प्रकार लेटे लेटे ही दोनों के प्राणांत हो गए हैं । दोनों शवों के मुख पर संतोष की मुद्रा प्रतीत होती थी । उन को देखकर यही कहा जा सकता था की दोनों किसी अति शुभकर्म को सम्पन्न कर ऍसे सो रहे हैं आपने सुनी गुरूदत्त लिखित सब रहता कि को असम सुने जो मनसा हूँ हूँ ।

share-icon

00:00
00:00