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Kaun The Shri Ram?

ऍम के श्रोताओं को रमेश मुद्गल का नमस्कार आज हम अपने श्रोताओं के लिए लेकर आए हैं । गुरूदत्त लिखित श्री राम ऍम सोने जो मनसा श्री राम बहादुर श्री राम भगवान थे । यह परमात्मा का उतार थे या श्रीराम एक महापुरुष थे । हम कुछ भी मानने इतना अवश्य है कि उन्होंने अपने जीवन में वह कार्य किया जो एक महान आत्मा ही कर सकता है । ऐसा क्या क्या श्री राम ने ये है तो हम जानते हैं कि उन्होंने दोस्त राक्षसो और उनके राजा रावण का वध किया । क्या राक्षस दोस्त थे? क्या रावण इतना बुरा व्यक्ति था कि उसका मत करना पडा? रावण कोन था, डाॅन थे । कहते हैं कि लाखों वर्ष पूर्व पृथ्वी पर पहले आई थी और संपूर्ण प्रति जान में डूब गई थी । सब कुछ नष्ट हो गया था । केवल कुछ बात जो बहुत ऊंचे थे, जल्द से बाहर रह गए थे और वहाँ कुछ लोग बच गए थे । उस बच्ची हुई भूमि में देव लोग भी था । ऐसी मान्यता है कि यह वही क्षेत्र था जिसे आजकल तिब्बत करते हैं । देवताओं में एक रद्द तपस्वी ब्रह्मा थे जो उनके पिता माने जाते थे । डेव लोग का राजा इंद्र था । डेढ लोग में सुख और शांति थी । लोग परिश्रम करते थे और उन्नति करते थे परन्तु सब लोग एक समान योग्य नहीं होते । कुछ ऐसे भी थे जो काम योग्य थे और उनको उन्नति करने का अवसर नहीं मिलता था । इस कारण ये दुखी हो गए । ये पिताबास ब्रह्मा के पास गए और बोले पितामाह हम क्या करें । हमें यहाँ उन्नति करने का अवसर ही नहीं मिलता । ब्रह्मा जी ने देखा कि देव लोग की जनसंख्या बढ गई है और सब लोगों को उन्नति के लिए यहाँ पर्याप्त अवसर नहीं है । उन्होंने कहा, दक्षिण में भी कुछ द्वीप जल से बाहर है तो वहाँ जाओ, परिश्रम करो और सुख भोगों । उन लोगों ने कहा ठीक है पितामाह हम वहाँ जाएंगे और उन द्वीपों की रक्षा करेंगे । उनका आशय था की उन द्वीपों पर अधिकार का, वहाँ बसने वालों की जंगली जी वो मैं जंगली लोगों से तथा अपने नवनिर्माण की भी रक्षा करेंगे । ये लोग देवताओं के भाई ही थे । ये जब उन द्वीपों के रक्षक बने तो पहले उनको रक्षा की कहा जाता था परंतु कालांतर में उनका नाम बिगडकर राक्षस हो गया । उस समय राक्षस कोई बुरा शब्द नहीं माना जाता था । नहीं राक्षस का मतलब है कि उनके बडे बडे डाल थे या वे बहुत दबाव नहीं देखते परन्तु ऍम वर्षों बाद जंगली लोगों को देख देख कर वे भी बुरे काम करने लगे । यहाँ तक कि मनुष्य का मांस खाने लगे तब उनके शरीर बेडोन हो गए और मांसाहर के कारण उनके आगे के दादा बाहर निकलने लगे जिससे उनकी आकृतियाँ भयंकर हो गई । धीरे धीरे उन को में रहते हुए उन्हें कई सहस्त्र वर्ष और व्यतीत हो गए । तब तक देर लोग से जुडी धरती भी जल से बाहर सूख गई थी और वहाँ मानव बसने आरंभ हो गई थी जो अत्यंत परिश्रम कर उन्नत हो गए थे । आर्यव्रत देश उन मांगों का मूलनिवास था । यह आर्यव्रत ही आज भारत कहना था । आर्यव्रत के दक्षिण में ही राक्षस बसे हुए थे । इन राक्षसों के वंश में एक राजा हुआ विद्युत्केश । उसकी राजनीति सालक ऍम तो बहुत गिलास में लीन रहती थी तथा किसी की परवाह नहीं करती थी । जो भी उसके भोगविलास में बाधा डालता था, उसे मरवा डाल दी थी । इसी कारण जब उसका एक लडका हुआ तो बच्चे का पालन पोषण उसे झंझट प्रदीप हुआ । उसने अपने बेटे को भी मरवाने का यह क्या? उसने अपने सेवकों को उसका वध करने के लिए कहा । सेवक उस बालक को ले गए । जैसे हम उसकी हत्या करना नहीं चाहते थे अतः उसे मंदराचल पर्वत के शिखर पर छोड आए । उनका आशय था कि वहाँ चील करोगे आकर उसे खा जाएंगे । परन्तु उस समय कैलाश पति शंकर और देवी पार्वती अपने विमान में बैठे हुए भ्रमण कर रहे थे । ये कुछ ही समय पश्चात उधर से निकले तो उन्होंने एक छोटे से बच्चे को पृथ्वी पर पडे रोते हुए देखा तो विमान को नीचे भूमि पर ले आए । उस बालक को पार्वती ने उठा लिया । चीज पहचान गए कि वह विद्युत्केश का बेटा है । वे उसे अपने निवास स्थान कैलाश पर्वत पर ले गए । पार्वती ने बाला का पालन भोजन किया और इस बालक का नाम उन्होंने सुकेश रखा । विद्युत्केश के उन्हें कोई संतान नहीं हुई । इकलोते पुत्र के बिच छोडने से मैं ध्यान दुखी रहता था तो जब बडा हुआ तो उसे यह बताकर की तुम राजा विद्युत्केश के पुत्र हो । कैलाश पति ने उसे वापस भेज दिया । उसके लौटने के लिए उसे एक विमान उपहार में दिया । सुकेश का रंग रूप वो चलने बोलने की विधि राजा विद्युत्केश के समान ही थी । विद्युत्केश उसे देखते ही पहचान गया । मैं उसे युवराज घोषित कर दिया । सुकेश बहुत बलशाली मुद्दे मानता हूँ । परन्तु भगवान शंकर ऍम पार्वती द्वारा पालित होने के कारण तथा अपने पास विमान रखने के कारण उसमें अभिमान आ गया था । सुकेश के तीन पुत्र माल्यवान, माली और सोमानी तीनों ही बडे बलवान थे । उन्होंने घोर तपस्या की और शस्त्रों का अभ्यास किया । इस प्रकार ये स्वयं को अडतीस रेस्ट व्यक्ति मानने लगे । उनमें भी बहुत अहंकार आ गया है । अब उन्होंने दूसरे लोगों को तंग करना आरंभ कर दिया । अपने देश से बाहर निकल दूसरे देशों पर आक्रमण करना आरंभ कर दिया । एक समय आया की देवता, गंदर्भ, मानव इत्यादि सब की सब जातियां इन तीनों भाइयों के अत्याचार से त्राहि त्राहि कर उठे । कोई इनका विरोध नहीं कर सका । वास्तव में ये सब जानते थे की इनके पिता सुकेश शंकर के प्रिय है और यदि उन्होंने इन भाइयों से युद्ध किया तो शंकर उनके विरुद्ध हो जाएंगे । बहुत से पीडित लोग मिलकर विचार करने लगे कि क्या करें । यह निश्चय किया कि कैलाश पति शंकर के पास चला जाए और उनसे कहा जाए कि सुकेश को सन्मार्ग दिखाएं । सभी लोग उनके पास गए परंतु श्रीशंकर ने कहा तो केश देवी पार्वती का प्रिय है । मैं उसे कुछ नहीं कह सकता । आपसे हम उनसे बात करें । लोग देवी पार्वती के पास पहुंचे । परंतु पार्वती को जब पता चला कि लोग सुकेश के विरुद्ध शिकायत लेकर आए हैं तो उन्होंने उनसे मिलने से इंकार कर दिया । अब लोग परेशान हो उठे । ये पुनर्स् चली शंकर के पास पहुंचे और बोले भगवन पार्वती जी तो उनसे मिलती ही नहीं । अब आती बताइए हम क्या करें? कैलाश पति ने अपनी असमर्थता प्रकट कि परन्तु उपाय भी सजा दिया । आप श्रीविष्णु के बाद जाओ, वह निश्चित ही कुछ उपाय करेंगे । दुखी लोग सागर पति श्री विष्णु के पास पहुंचे । विष्णु देव लोग के राजा इंद्र का छोटा भाई था जो बहुत बलवान था और युद्ध विद्या में पारंगत था । वो और उसकी धर्मपत्नी देवी लक्ष्मी देर लोग से दूर महासागर में किसी जान सुनने टापू में रहते थे । महासागर में होने वाली किसी भी प्रकार की अनियमितता को रोकने में ये समर थे । उनके पास कई दिव्यास्त्र थे । इनमें सुदर्शनचक्र भी था । सुदर्शनचक्र जिस पर छोडा जाता था उसको मारकर से हम ही चलाने वाले के पास लौट आता था । जब दुखी लोगों ने अपनी कथा सुनाई तो विष्णु बोले, कैलाश पति ठीक कहते हैं कि वह तुम्हारी रक्षा नहीं कर सकते हैं । पार्वती जी सुकेश को बहुत प्यार करती हैं । इसलिए सुकेश के पुत्र भी उनको बहुत है । मैं ही तुम्हारी रक्षा करूंगा । इस प्रकार विष्णु ने राक्षसों पर आक्रमण की घोषणा कर दी । जब राक्षसों ने विश लोगों की घोषणा सुनी तो वे हस पडे । ये मानते थे कि जब तक माल्यवान, माली और सोमाली उनके साथ है उन को कोई हरा नहीं सकता हूँ । उन्होंने विष्णु के आक्रमण की प्रतीक्षा नहीं की । ये सेम विष्णु लोग पर आक्रमण करने चल पडे । विष्णु भी दिव्यास्त्र लेकर राक्षसों से लडने निकल गए । राक्षस संख्या में बहुत अधिक थे परन्तु जब विष्णु दिव्यास्त्र चलाने शुरू किए तो गाजर मूली की तरह फॅमिली सरीर कटने लगे । उनकी इतनी अधिक हत्या हुई कि उनके शवों के ढेर पर्वत के सवाल उनसे उनसे लग गए । फॅस घबराकर दक्षिण की ओर भाग खडे हुए और आपने लंका नगरी में घुस के श्रीविष्णु ने यहीं पर बस नहीं किया । मैं जानते थे कि जब तक बुराई को जड से समाप्त नहीं किया जाए, बुराई कभी भी पनप सकती है और किसी को शांति से जीने नहीं देती । राक्षस लंका में रहेंगे । वे बाहर निकल बने लोगों को तंग करेंगे क्योंकि यह बुरे लोगों का स्वभाव बन जाता है कि भले लोगों को मारकर उनकी संपत्ति हडप कर जाए और उनका मांस खा जाए जिससे कोई प्रमाण उनके विरुद्ध ना रहे । इस कारण विष्णु ने बुराई के स्रोत लंकापुरी पर आक्रमण कर दिया । लंकापुरी अजय मानी जाती थी । इस कारण राक्षस समझते थे की यहाँ पे विष्णु को परास्त कर सकेंगे । परंतु यहाँ उन्होंने अपना सुदर्शनचक्र निकाल लिया । माल्यवान वाह माली इस युद्ध में मारे गए । उन्हें मारा देख सभी बच्चे कुछ एॅफ लंकापुरी को छोड पाताल लोगों को भाग गए । इस प्रकार लंका जान सुनने हो गई । लंका जब खाली हुई तो देवराज इंद्र ने महर्षि पुलस्त्य के पुत्र ऍम को वहाँ का लोकपाल नियुक्त कर दिया । महर्षि रस्ते पति फौज में तथा अत्यंत ज्ञानवान थे । उनका पुत्र विषय हुआ और पोत्र वैश्यवर्ण भी अति बलवान तेजो में तथा ज्ञानवान थे । वैसे ओवन लंकापुरी में रहने लगा और राज्य संभालने लगा । यही वाॅर्ड बाद में कुबेर के नाम से प्रसिद्ध हुआ ।

1. Vidyutkesh Aur Yuvraj Sukesh

2. Sumali Ka Lanka Lautne Ka Prayas

श्री राम भाग दो पता लोग में जंगल ही जंगल थे । वहाँ हिंसक पशु पक्षी ही थे । वनस्पतियां सौरभ था । नवीन प्रकार की थी । राक्षस नहीं जानते थे कि क्या खाया जाए और क्या नहीं खाया जाएगा । सोमाली अपने पिता का विमान बचाकर ला सकता था । इस विमान में बैठकर मैं इस नए देश का सर्वेक्षण कर अपनी जातियों को बताने में सफल हुआ था । उसने यह पता कर लिया था कि कहाँ कहाँ फलों वाले सुरक्षा कहाँ भूमि कृषि योग्य है और कहाँ तीन योग्यजन मिल सकता है । इसपर भी वहां वहां खुशहाली नहीं थी, जो लंका में थे । माल्यवान, सोमाली और मालिक तीनों भाइयों में से सोमाली ही जीवित बचा था । उसका परिवार भी सुदर्शनचक्र की अग्नि में भस्म हो गया था । उस राक्षस अपनी पत्नियों और परिवार को बचा कर ले जा सके थे । उनके बसने में सोमाली ने पर्याप्त सहायता की । उसने अपने लिए भी एक छोटा सा निवास स्थान बनवाया और एक कन्या से विवाह कर नए परिवार की सस्ती आरंभ करती हैं । कालांतर में उसके एक लडकी हुई, जो बहुत सुंदर थी । कुछ राक्षस अपनी व्यवस्था से दुखी थी । वे पुन्न लंका में एक नया राज्य स्थापित हुआ देख वहाँ बस नहीं की योजना बनाने लगे । दो दो चार चार कर वे लंका में पहुंचने लगे और वहीं बसने लगे । कुबेर ने भी इन लोगों को बस ने से मना नहीं किया क्योंकि देवता और आर्यव्रत देश के मानव लंका में बस ने के लिए तैयार नहीं होते थे । वहाँ का जलवायु उनके अनुकूल नहीं था । राक्षसों को उन्हें लंका लोटते देख सोमाली को विचार आया कि वह भी क्यों न नोट जाए । परन्तु जिस देश का राजा रहै चुका था, वहाँ मैं साधारण नागरिक बन कर रहने के लिए मन को तैयार नहीं कर सकता । उसके मन में एक योजना बन गई । वह अपनी लडकी को विमान में बैठा लंका जा पहुंचा । उसका विचार था कि वह अपनी लडकी का लंका के अधिपति कुबेर से विवाह कर देगा तो वह राज्य में एक अधिकारी तो बन ही जाएगा । अतः लंका में एक स्थान पर ढेेर करवा राज प्रसाद ने राजा को देखने गया, परंतु वहाँ जाकर मैं समझ गया कि योजना सफल नहीं हो सकेगी । जब सो वाली राज प्रसाद के बाहर पहुंचा तो वहाँ पर एक बहुत बडा विमान खडा था । मैं उसे देख चकित रह गया । मैं भी उसे देख ही रहा था कि राजा अपनी रानी के साथ राज प्रसाद से निकला है । हुबेर अति सुन्दर और ओजस्वी युवक था और उसकी पत्नी एक देवकन्या थी जो उससे भी अधिक सुंदर थी । इनको देख सोमाली समझ गया कि उसकी लडकी का विवाह यहाँ नहीं हो सकेगा । यदि किसी भी दी से वो भी गया तो वह इस रानी की तुलना में मान प्रतिष्ठा नहीं पा सकेगी । अतः अपने निवास स्थान पर पहुंच उसने अपनी योजना बदल दी । उसने विचार किया कि इस युवक के पिता के साथ अपनी पुत्री का विवाह करते उससे जो संतान हो उसके द्वारा लंका पर अधिकार जमाले । इस विचार के आते ही विमान पर चढकर देव लोग जा पहुंचा और वहाँ किसी विषय हुआ के आश्रम के समीप विमान खडाकर इसी विषय हुआ को देखने चला गया । ऋषि एक कुटिया के बाद वृक्ष के नीचे आसन लगाए स्वाध्याय कर रहे थे । मैं आती ओ ज्वान सोमाली विमान पर लौट आया और आपने लडकी टैक्सी से बोला टैक्सी मैं तो मैं यहाँ अपने परिवार का एक भवन कल्याण करने के लिए लाया होगा । यहाँ एक अति ओजस्वी ऋषि रहता है । उसकी पहली पत्नी से एक संतान है । वह संतान अति सुन्दर और बलवान वह है इस समय लंका पर राज्य कर रहा है । वह राज्य किसी समय हमारा था । मैं चाहता हूँ की तो उसी से विवाह कर वैसी ही सुंदर और और दसवीं संतान प्राप्त कर इससे हमारा परिवार अपना पुराना राज्य उन्हें प्राप्त करने में सफल हो सकेगा । टैक्सी ने कहा मुझे ऋषि दिखा दीजिए । मैं उनको विवाह के लिए मना लूँ । ठीक है चलो में रहता हूँ । सोमाली ऍर इसी के सम्मुख जाना नहीं चाहता था । इस कारण उसने दूर से ही किसी को दिखाकर कहा अब तुम स्वयं से बातचीत कर लो । टैक्सी ने कुबेर को देखा था और उसके पिता को भी देखो । किसी उस समय आंखे मूंद ध्यान लगाए बैठे हैं । टैक्सी ने ओजस्वी किसी को पसंद किया और उनके सामने जा खडी हूँ । किसी का ध्यान भंग नहीं गए । हाथ जोड खडी रही और ऋषि द्वारा आंखे खोलने की प्रतीक्षा करने लगे तो मैं दो घडी बर्फ खडी रही । तब किसी की आप खुली ऋषि धवन के लिए और लोगों की इस अग्नि प्रदीप्त करने लगे तो उनकी दस्ती सामने खडी इस सुंदरी की ओर से लेंगे । दोनों की आगे मिली तो कैकसी की आंखे जुड गई । ऋषि पूछ लिया सुंदरी क्या चाहती हूँ, किस लिए हाथ जोडे खडी हो? टैक्सी बोली भगवन् वर्ष जाती हूँ मांगों हमारी समर्थन में हुआ तो देंगे । भगवन मैंने आपके पुत्र लंकापति जो अब कुबेर के नाम से जाना जाता है तो देखा है वैसा ही पुत्र पाने की अभिलाषा से खडी हूँ । परन्तु है तो ईश्वर के अधीन महाराज ईश्वर की प्रेरणा से ही आई हूँ और आपकी सामर्थ्य को जानती हुई आपकी सेवा में उपस्थित हुई है । ऋषि स्वयं भी लडकी के सौंदर्य पर मुग्ध हो रहे थे । इस कारण आंखे मूंद । कुछ समय विचार करते हुए तदुपरांत बोले इस सामने वाले आसन पर बैठ जाओ । टैक्सी आसन पर बैठे तो ऋषि ने अग्नि प्रदीप्त की और हवन आरंभ करती है । हवन समाप्त हुआ तो ऋषि ने शांति पाठ पडा । तदंतर सामने बैठी लडकी को कहा अब उठकर मेरे वामहस्त के साथ आसन पर बैठ जाओ । हमने तो मैं अपनी पत्नी के रूप में वर लिया है ।

3. Rishi Vishrava Ki 4 Santan

श्री राम बहुत तीन मुनि शुरुआत की । प्रथम पत्नी दो ही नहीं जो कुबेर की माँ थी कि अपनी कोटियां ऋषि के आश्रम में ही थी परंतु ऋषि की कुटिया से पृथक कुछ अंतर पर थी । ऋषि कैसी के साथ कई वर्ष तक सुखपूर्वक दांपत्यजीवन चलाते रहे । परिणामस्वरूप टैक्सी के चार संतान हुई । पहली संधान एक पुत्र था । जब इसका जन्म हुआ तो उस समय रात्रि थी भयंकर आंधी बिजली की कडक और वर्ष हो रही थी । बिजली की गरज से वन पशु है । बीस हो जी एक देश से लाते सुनाई दे रहे थे । इस पर भी लडका देखने में अति सुन्दर शरीर से सुदृढ तथा तर्क था । कुछ ही दिनों में यह स्पष्ट हो गया कि लडका मेघावी और संसार में प्रभुतासंपन्न होगा । उचित समय पर पिता ने इसके बुद्धि की प्रखरता देख इसका नाम दस ग्रीव रखती है । दस ग्रीव का अभिप्राय यही प्रतीत होता है कि उसके बुद्धि दस मनुष्य हो गया, बराबर थी दस ग्रीव की बाद में रावण के नाम से विख्यात हुआ । टैक्सी की दूसरी संतान भी एक लडका था परन्तु इसका शरीर बेडोल था । व्रत का एक बडे बडे कान और जब मुख से आवाज निकलती थी ऐसा प्रतीत होता था जैसे कुम्भ में आवाज बोल रही हूँ । इसका नाम कुंभकरन रखा गया । तीसरी संतान एक लडकी थी । मैं अति सुन्दर परन्तु टीके सौ वाली प्रतीत होती थी । उसका नाम सूर्पनखा रखा गया है । टैक्सी की चौथी संतान उन्हें एक लडका हुआ । यह दोनों भाइयों से अधिक सुन्दर था और मधुर स्वभाव रखता था । इसका नाम विभीषण रखा गया । विभीषण बाल्यकाल से ही तो मैं स्वभाव वाला और ईश्वर भक्त था । वह अपने पिता से शिक्षा पाकर ग्रुप गति से शास्त्र का ज्ञाता होने लगा । दस । ग्रीव और कुंभकरण शास्त्र शिक्षा से अधिक खेलकूद तथा मलयुद्ध में रूचि लेते थे । गैलेक्सी की लडकी तो दिन भर बहनों में घूमती रहती । सोमाली इस बीच अपनी लडकी से मिलता रहा था परंतु कभी ऋषि के सम्मुख नहीं आया था । दस गरीब अठारह वर्ष की व्यस् का हुआ तो एक दिन सोमाली एकांत में टैक्सी से मिलकर कहने लगा देखो कैसी अब समय आ गया है कि तुम उस योजना को आगे जलाओ जिसके लिए मैंने तो मैं यहाँ भेजा था । मैं क्या करो अपने पुत्रों को गम लोग में शिक्षा के लिए भेज तो वा युद्ध विद्या सिखाने का एक विशेष विद्यालय है । वहाँ इनको प्रवेश दिला दो परन्तु सुना है कि वहाँ देवताओं के अतिरिक्त अन्य किसी को प्रवेश नहीं मिलता । ये है मैं जानता हूँ परंतु ऋषि चाहेंगे तो तुम्हारे पुत्र वहाँ प्रवेश पा जाएंगे । वास्तव में हम देवताओं के भाई ही तो है और ये हमारा अधिकार दी है । पर बाबा यदि रिषी ने पूछा कि वहाँ बच्चों को भेजने का क्या उद्देश्य है तो क्या बताऊंगी? यही कहना कि यहाँ बच्चे उच्च दंगल होते जा रहे हैं और वे वहां पढकर विद्वान बनेंगे । सुमाली ने दस ग्रीव और कुम करण को भी समझाया । उस ने उन्हें एकांत में बुलाकर बताया कि वह कौन है । उसने यह भी कहा कि राक्षसों की संतान होने के कारण वास्तव में वे लंका के राजा है । वहाँ का राजा बनने के लिए उन्हें कुबेर को पराजित करना पडेगा और इसके लिए ज्ञानवान तथा शस्त्रविद्या में निपोन बनना पडेगा । उसने अंत में कहा मैं चाहता हूँ कि तुम हम लोग में चले जाओ । वहाँ सभी विद्याओं के विद्यालय है । उस विद्यालय के कुलपति ब्रह्मा जी से हम है तो मैं वहाँ जाकर युद्ध विद्या में पारंगत होना है । उसके लिए गोर तपस्या और विद्याध्यन की आवश्यकता रहती है । अब तुम यह करने के योग्य हो गए देखो बेटा तो वहाँ से शिक्षित हो जाओगे तो तुम्हें मैं लंका का राज्य दिलवा दूंगा । ऍम तुम्हारी सहायता के लिए वहां एकत्रित हो जाएंगे । सोमकरण इस कठोर तपस्या और सीट प्रदान प्रमुख देश में जाकर रहने के लिए तैयार नहीं होता । यदि दस गरीब उसे सचेत और प्रेरित नहीं करता, वह तो नाना की बात सुनता सुनता भी उन्होंने लगता है । जब सोमाली अपनी इच्छा कह चुका तो दसरी तुरंत तैयार हो गया । परंतु कुंभकरण से जब सोमाली ने पूछा तो उसने नाना की बात सुनी ही नहीं थी । उसने सचेत हो पूछा क्या कहा है नाना? दसवी ने बताया किसने आपकी बात सुनी ही नहीं । यह उस समय हो रहा था तो फिर दस ग्रीव ने उसकी पीठ में एक मुक्का लगाकर कहा अरे कुम्भ सुनो हमें अब यहाँ से चलना होगा कहाँ कुम? करण ने पूछ लिया हम लोग में शस्त्र अस्त्र की विद्या सीखने पर वहाँ तो बहुत सीट होगी । कुछ भी हो चलना होगा । पिता विश्रवा मुनि से ब्रह्मा के नाम पत्र बिना प्रयास मिल गया, जिसे ले दोनो भाई दम लोग में जा पहुंचे । पांच वर्ष की कठोर शिक्षा से दोनों भाई युद्ध विद्या में रिपोर्ट होंगे । इतने साल में बुद्धिमान दस ड्रीम तो वेदादि विद्या भी पड गया । दोनों की लगन से ब्रह्मा जी भी प्रसन्न हो गए । दोनों के लोटने से पुर उन्होंने दोनों को वार अभिप्राय यह है कि विशेष शास्त्र शिक्षा एवं दिव्या शास्त्र दिए । दोनों भाई लंबी यात्रा का पिता के आश्रम लौट आए । अपनी शिक्षा के प्रमाण तक अपने माता पिता को दिखाए । माता पिता प्रसन्न हो गई । उस दिनों बाद दोनों नाना के पास पहुंचे तो माली उनकी प्रतीक्षा ही कर रहा था । रुमाली को उनके प्रमाणपत्र और ब्रह्मा जी के वार का ज्ञान हो चुका था । दोनों को देखकर प्रसन्नता से बोला बहुत अच्छा हुआ तो आ गए हो । अब तुम मेरे साथ लंकापुरी को चलो और उसे देख लो । कितना सुंदर राज्य है तो मुझे उसके वास्तविक अधिकारी हो । पहले लंका का पूर्ण इतिहास ओ लोग लंका का हथियार सुन दोनों बहुत उत्सकता के साथ सोमाली के साथ लंका जहाँ पहुंचे । चारों ओर सागर से गिरी लंका पूरी और उसमें सुदृढ प्राचीरों से गिरा हुआ स्वर्ण तथा रतन जल्दी द्वारों वाला महल इस प्रकार शोभायमान हो रहा था । जैसे आकाश में सूर्य होता है तो वाली ने अपने नातियों को बोल लंकापुरी में घुमाकर उसके सौंदर्य एवं शोभा को दिखाया तो दस गली में उसे प्राप्त करने की लालसा जाग गई । उसने कहा नाना इसे विजय करने के लिए गौर युद्ध करना पडेगा । देखा जाएगा पहले तुम कुबेर के भाई के नाते इस पर अपना दावा करो । यदि वह स्वीकार नहीं होगा तब मैं इस देश में बस रहे सहस्त्रों राक्षसों की सहायता से विद्रोह करा तो मैं या अगर राजा बनवा दूंगा किसके पास दावा करूँ अपने पिता के पास उनको कहना कि तुम छोटे हो बडा भाई को भी देवताओं की सहायता से एक नया नगर बसा सकेगा परंतु तुमको देवता नया तो स्थान देंगे और नये ही अन्या सहायता । इस कारण यह राज्य तुम्हें सौंप दिया जाएगा । दसवीं में अपने पिता से जाकर का पिताजी अपने शिक्षा पूर्ण का मैं अब किसी राज्य का राजा बनने के योग्य हो गया हूँ । इस कारण बडे भाई को बेर को आप कहते कि वह लंका का राज्य मुझे दे दे और वह क्या करें? मैं आती धनवाल और योग्य व्यक्ति है । देवता लोग उसके ऋणी है । इस कारण उसे नवीन नगर और राज्य के निर्माण में कस्ट नहीं होगा । ऐसा करो । शर्मा ने कह दिया तुमको बेर के पास चले जाओ और राज्य कार्य में उसकी सहायता को तुम अपनी योग्यता से अपने बडे भाई से अधिक मान प्रतिष्ठा पास जाओगे । पर मैं तो अपना तक राज्य चाहता हूँ । जो अपने भाई की समृद्धि को देखकर एशिया करता है, उसकी तरफ में भारी निंदा होगी । पिताजी मैं निंदा से नहीं डरता । मैं तो यह कहता हूँ कि मेरा लंका के राज्य पर दोहरा दावा है । आपका पुत्र होने से मैं पित्रपक्ष श्रीलंका पर राज्य करने का अधिकार रखता हूँ । दूसरे यह नगरी मेरे नाना के पिता और भाइयों ने निर्माण की थी और बस आई थी । इस कारण मात्र पक्ष से भी मेरा इस राज्य पर अधिकार है परन्तु है राज्य कुबेर को इंद्रा ने दिया है । मैंने नहीं दिया इस कारण मैं इसको तुम्हें कैसे दे सकता हूँ । तब तो पिताजी ऍफ इंद्रा दोनों से युद्ध होगा । राज्य उसका ही होगा जो युद्ध में विजय प्राप्त करेगा । हटी दसरी बोला, परन्तु इंद्र तुम्हारी हत्या कर देगा, देखा जाएगा । यदि मेरा बस चला तो मैं केंद्र की हत्या कर दूंगा । इस झगडे में किसलिए पढते हो? तुमको बेर के पास चले जाओ और उस राज्य का भोग तुम सभी भाई मिलकर आनंद से करो । राज्य का उत्तरदायित्व उसके कंधों पर ही रहने दो । नहीं पिताजी मैं राज्य ही लूंगा । अच्छा अब तुम जाओ । मैं इस विषय पर बात करना नहीं चाहता हूँ । इसमें मेरा अधिकार भी नहीं ये शर्मा ने कहा । और मुख्य मोड लिया । दसवी उठा और कुटिया से निकल गया । संदीप टैक्सी बैठी पिता पुत्र का संवाद सुन रही थी । दस फ्रीज के चले जाने पर उसने कहा भगवान यहाँ अपने क्या कर दिया है? क्या कर दिया है भाई भाई में देश का बीस बोल दिया । ये मूर्ख बालक नहीं जानता हूँ कि मैं क्या कर रहा है । श्रीमान मैं अब हम लोग से गोर तपस्या तथा शस्त्रों की विद्या सीख कराया है । बडा भाई तो शायद इस पर दया कर दें । परन्तु इस युद्ध में संभावना तो बडे भाई के मारे जाने की है । देवता मारते नहीं परन्तु मार तो रहे हैं । विष्णु अब नहीं रहे बडे लिखे मोरक्को कौन समझाये कह कर ऋषि चुप कर

4. Lanka Ko Hatyane Ki Neeti

ऍम बहुत चाहूँ होनी भी शर्मा के आश्रम के वहाँ तो वाले दसग्रीव की प्रतीक्षा कर रहा था तो जब बाहर आया तो उसने पूछ लिया बताओ क्या कर आए हो गए आपकी योजना विफल हो गई । भाई के नाते मुझे राज्य नहीं मिल सकता हूँ । ये है राज्य देवताओं ने धनाध्यक्ष को दिया माता पिताजी इसमें मेरी कोई सहायता नहीं कर सकते । देवता ही मुझे राज्य दे सकते हैं और वह देंगे नहीं । परंतु दस भी राज्य कई प्रकार से लिया जा सकता है । इनमें साल, बल और प्रबल उपाय इस समय लंका के प्रजा में तीन चौथाई ॅ मेरे मित्र और सहायक उन्हें राक्षस राज्य की प्राप्ति के लिए राक्षसों का संगठन फोन कर चुके हैं । मेरा मित्र प्रहस्त है जिसमें प्रजा से संपर्क बनाया हुआ उसके सहायक है । मारीज, वीरू पक्ष और मैं होता, हम वहाँ चलते हैं । ये साथी प्रजा की सहायता से तुम्हारे भाई को राज्य त्यागने के लिए विवश कर देंगे । हमारे लोग किसी नेता की प्रतीक्षा कर रहे थे । अब तो माँ गई हूँ और सौरभ प्रथम वहाँ के राजा को हम जयवीर करेंगे । यदि इसमें कामना चला तो चल अथवा बल का प्रयोग करेंगे । मेरा अनुमान है कि तुम बिना भाई के हत्यारे कहलाए । राज्य पांच होगी । दसवी अपने नाना के साथ विमान में लंका जा पहुंचा । उसके दोनों भाई और बहन अभी माँ के पास ही रहेगा । श्रीलंका में दस ग्रीन के पहुंचते ही सोमाली ने रहस्त को बुला भेजा और दस को लेकर नगर के एक मकान में चला गया । वहाँ बहस के अन्यसाथी उपस् थित थे तो हसने नगर में यह सूचना भेज दी की उनके भूतपूर्व राजा सोमाली का नाती अपने नाना का राज्य प्राप्त करने लंका में आ गया । इस सूचना पर नगर के राॅड स्ट्रीम के दर्शन करने आने लगे । देव राज्य और राक्षस राज्य में अंतर यह था कि देव राज्य में परिश्रम का फल मिलता था और राक्षस राज्य में शक्तिशाली जो चाहे ले सकता था । इस कारण शरीर से छत्तीस ऍम इस घुटने संबंधित होकर लाभ उठाना चाहते थे । हमारी सीटी आदि ने यह विख्यात कर रखा था कि राक्षस यक्षों से अधिक बाल चली है । बाल तो दोनों का एक समान था परन्तु राक्षस दूर फॅमिली थी है । उनका स्वभाव बन चुका था । के बिना अब है के किसी नियम कानून हो नहीं मानते थे । तब जानते हैं कि यदि संगठित हो जाए तो राज्य उनका हो जाएगा । इस भाषा पर राक्षसों का संगठन बन गया । सभी बलशाली लोग दस ग्रीव को राजा बनाने के लिए तैयार हो गए । उनकी समझ में आने लगा कि राक्षस राज्य स्थापित होने से उन को सब प्रकार की तो सुविधा बनाया से मिलने लगेंगी । जब दस ग्रीन के निवास स्थान के बाहर ऍम की संख्या में बलवान राक्षस एकत्रित हो रहे थे तो प्रहस्त दसग्रीव का दूत बनकर कुबेर के राज प्रसाद में जा पहुंचा । उसने सूचना भेज दी की महाराज के कनिष्ठ बढाता दसग्रीव का मंत्री राज्य महाराज के दर्शन करना चाहता है । इस सूचना पर कुबेर ने ब्लाॅस्ट को भीतर गुना अपने समूह बैठा पूछ लिया । कहाँ है दसवीं महाराज नगर चौराहा है की एक भवन में ठहरा हुआ है यहाँ क्यों नहीं आया हूँ? इसी विषय में उनका एक संदेश लेकर मैं आया हूँ बताओ फॅसने अडतीस समय भाषा में कहा महाराज इस नगरी का अधिकतर निर्माण राक्षसों के राजा सुकेश और उसके पुत्रों ने किया था । उससे पहले यहाँ उनके पूर्वजों ने राज्य स्थापित किया था । पता राक्षस यह समझते हैं कि आपका यहां राज्य पद पर आसीन होना अनाधिकार चेष्टा है । अब राक्षसो ने आपके छोटे भाई और सुकेश के सुपुत्र सोमाली के नाती दस गरीब को अपना राजा स्वीकार कर लिया है । अगर नहीं चाहते हैं कि यह राज्य अब अब अपने छोटे भाई को देते कुबेर कह दिया परंतु यहाँ शासन मैं नहीं करता हूँ । यहाँ के नागरिकों की एक समिति शासन करती है । उस समिति में राक्षसी अधिक संख्या में है । मैं तो केवल उस समिति के कार्य में उस समय हस्तक्षेप करता हूँ जब समिति के सदस्य परस्पर सहमत नहीं होते हैं । इस कारण मुझसे शासन लेने का तो प्रश्न ही उपस् थित नहीं होता हूँ । दस को कहूँ कि नगर के भगवन को छोड दें और यहाँ आ जाएगा । महाराज मैं आपके रहते यहाँ नहीं आएगा । मैं चाहता है कि आप यहाँ से चले जायेंगे । यह राज्य राक्षसों का ही था । विष्णु ने राक्षसों की हत्या करके लंका पर अधिकार प्राप्त किया था । अब राक्षस उन्हें अपना राज्य वापिस लेना चाहते हैं । आप यह लंका राक्षसों को नोटा नहीं परन्तु जैसे स्वीकार नहीं करेगी । महाराज रास्ता नहीं कहा यह बात प्रजा द्वारा स्वीकार कर ली गई है कि उनका मनोनीत राजा दसग्रीव यहाँ राज्य करेगा । आप अभी अपना प्रतिनिधि है तेज पता कर लीजिए । सहस्त्रों की संख्या में नागरिक दसग्रीव के निवास के बाद एकत्रित हैं । उसकी जय जयकार बोल रहे कुबेर विचार मंगल होंगे हैं कुछ विचार का उसने कहा मैं कल मध्यांतर तक निर्णयात्मक बात करूंगा कि मैं बरसात छोडो अथवा अपने भाई को युद्ध के लिए ललकारो ब्लाॅस्ट अपना कार्य कर दस ग्रीव के निवास स्थान को लौट गया । कुबेर ने तुरंत पुष्पक विमान नहीं करवाया और दस ग्रीन के निवास स्थान के ऊपर एक चक्कर लगाकर वहां एकत्रित राक्षसों की महती ईड देखी । उस उत्तेजित भीड को देख मनी मान धैर्य बीस हो गया और तुरंत विमान द्वारा पिता के आश्रम को उड चला । ऋषि विश्रवा का आश्रम हिमालय की तलहटी में देव लोग की सीमा पर था । पिता के आश्रम में पहुंचकर उसने पूर्ण स्थिति का वर्णन किया और पूछ लिया पिताजी अब मुझे क्या करना चाहिए? तीसरी भी शर्मा ने पूछा कुबेर कब से राज्य कर रहे हो? वहाँ पैंतीस वर्ष से अधिक हो चुके हैं । इस काल में तुमने कितने लोग ऐसे निर्माण किए हैं जो तुम्हारे लिए लडने मरने को सदा तैयार हो । वहाँ अस्सी प्रतिशत से अधिक राक्षस जाति के लोग कैसे हैं? शेष बीस प्रतिशत में ट्राय कंदर, वैश्य और सुद्ध है । तुमने राक्षस को किस लिए वहाँ बसा रखा है । अन्य कोई वहाँ बस ने के लिए आता नहीं था । देवता तो अपने सीट प्रदान देश को छोड वहाँ उसमें और गीले वायुमंडल में जाकर रहना नहीं चाहते । गंदल और केंद्र एक स्थान पर टिककर रहते नहीं । ये थोडी सी संख्या में वहाँ रहते तो है परंतु युद्ध की आशंका होने पर ये वहाँ से चल देंगे । वहाँ समिति वनवासी मैं आदिवासी मानो की कई जनजातियों के लोग रहते थे । उनको किसी प्रकार का और लो बन देकर वहाँ बसाने का यह तो क्यों नहीं किया? और ये मानव तो वहाँ आती नहीं सोमाली थी आदि भाइयों के उत्पाद के पश्चात विन्ध्याचल से ऊपर के देशों में ही रहना पसंद करते हैं । अन्ना जनजातियों के लोग अति ऐसा हैं तो उनको शिक्षित कर काम सिखाना बहुत डेडी की है । राजस्थान उनसे अधिक बलशाली, अच्छे योध्दा एवं कार्यकुशल है । ऋषि ने क्रोध में अपने पुत्र को संबोधन कर कहा, वैष्णो वन तो मैं एक अयोग्य सांसद सिद्धू हुई हो तो हमारे अनुसार दस ग्रीव के साथ ही तुम्हारे राज्य में तुम्हारे साथियों से कई गुना भी है । अब अपनी अयोग्यता के दोस्त को मिटाने के लिए आपने अनुगामी वक्त की हत्या करवाओगे दीजिए तो मैं तब भी नहीं मिलेगी क्योंकि तुम्हारे सच्चे मित्र एवं साथी अत्यंत सीमित संख्या में है । युद्ध में वे सभी मारे जाएंगे । यह माँ बाप हो जाएगा तो यह नहीं समझ सके कि संरचित जंगली जातियाँ इन्फोटेल राक्षसों से अधिक विश्वास के योग्य है । उस जनता क्या स्वस्थता का स्थानापन्न हो सकती है? व्यस्तता जन्म जात होती है आपने पैंतीस वर्षों के राज्यकाल में उन श्रेष्ठ लोगों को शिक्षा, अभ्यास और अच्छी संगती से आपने कार्यकुशल, मित्र और सहायक बनाया जा सकता हूँ । आता है तुम राज्य के लायक नहीं होगा । कुबेर ने अपने मन की बात कह दी । उसने कहा पिताजी, मैं इंद्रदेव के पास सहायता के लिए जाना चाहता हूँ । वह क्या करेगा? व्यर्थ की हत्याएं? तुम जैसे अयोग्य शासक के राज्य की रक्षा करने के लिए मैं उचित नहीं मानता हूँ । इससे न तुम्हारा कल्याण होगा, न देवताओं का मेरी सम्मति । मान लो तुम अपने परिवार को लेकर वहाँ से चले जाओ । अपने लिए स्थान, कहीं देवलोक क्षेत्र में बना लोग । यहाँ भी बहुत स्थान रिक्त पडा है तो वेज पिता का मूवी देखता रह गया । पिता ने आगे गा भाई भाई, परस्पर लडकर एक दूसरी प्रथा को मत संभव । राज्य के लिए भाई भाई लडते हुए शोभा नहीं पाते । ऐसा तो पहले भी हो चुका है । कुबेर ने साहस पकडकर कहा ऍम और विष्णु लड चुके हैं । आदित्य और देखते भी कई बार लड चुके हैं । बाली और इंद्र का झगडा भी विख्यात है । वामन का छल से बाली का राज्य लेना भी इतिहास में लिखा मिलता है । ऋषि ने मुस्कुराते हुए गा । इसी से तो कहता हूँ कि तुम केवल अयोग्य ही नहीं वरना मोर भी हो नहीं । रक्षा के लिए अयोग्य राजा अब दूसरों से सहायता की भीख मांगेगा । सहायता मांगने से पूर्व स्वयं को देखो कि पैंतीस वर्षों के राज्य में कुछ सहस्त्र सहायक भी एकत्रित नहीं कर सके । सहायता उसे ही मिलती है, जो हम अपने बल पर कुछ करने योग्य हो । देखो वाॅक और विष्णु का भी वही झगडा था, जो विष्णु और माल्यवान का था । वहाँ राज्य का झगडा नहीं था । वहाँ संस्कृति और संस्कारों का झगडा था । वहाँ स्विस्टर ता और नरसल सत्ता का झगडा था । यही बात वामन और बाली की थी । प्रजा का धन ले लेकर बाली आपने यह ग्यों पर जय कर रहा था । यज्ञो में भी पात्र कुपात्र का विचार किए बिना दान दिया जाता था । वामन ने कुपात्रों को दान देने की उसकी मिथ्या उदारता की । व्यर्थता को दर्शाने के लिए ही मैं आयोजन किया था । नया तो विष्णु ने ऍफ का राज्य लिया और नए ही वामन ने बली का जब आदित्यों का राज्य दैत्यों ने छीनने का प्रयास किया तो आदित्यों ने श्री हम अपने बल बूते पर देवासुर संग्राम लडे थे परंतु तुम्हारी बात दूसरी है तो तुम राज्य में रहते हुए दुर्बल रहे हो । तुम्हारी प्रजा ही तुम्हारे विरुद्ध उठ खडी हुई है । तुम जैसे अयोग्य शासक के लिए कोई देवता भी सहायता के लिए नहीं आएगा । भाई भाई की बात तो मैंने अपने विचार से कही है । तुम दोनों में मेरे लिए कुछ अंतर नहीं है । वह अपने नाना की परंपरा चलाएगा हुआ नहीं कहा नहीं जा सकता आप तुमने देवताओं की परंपरा नहीं चलाई तो हमने देवता और असुर में भेदभाव नहीं रखा । अब तुम किस आधार पर देवताओं से सहायता मांग सकते हो अथवा मेरी सहानुभूति के पात्र हो हूँ ।

5. Dashgriv Aur Asuron Ka Tandav

श्री राम बहुत पांच गोभी को पिता की एक बात मन में लगी थी । वह यह कि उसके शासन में दोस्त था । इस अवस्था में मैं इंद्र के पास सहायता लेने के लिए नहीं पहुंचा । मैं उसी रात लंका पहुंचा और अपने परिवार को पुष्पक विमान में चढाकर पिता के आश्रम में आ गया । उसने अपने लिए नया निवास स्थान देव लोग की सीमा पर कैलाश के चरणों में बना लिया और वहाँ जाकर रहने लगा । श्रीलंका में अगले दिन नियत समय पर राज कुबेर का निर्णय जानने के लिए राज प्रसाद में पहुंचा तो प्रसाद को खाली देख समझ गया कि कुबेर लंका का राज्य अपने भाई दस ड्रीम के लिए छोड गया है । दसग्रीव रावण ने लंका पर अधिकार कर लिया तो उसकी माँ के पक्ष के सभी भाई बांधव, राष्ट्र समाज और प्रवर्ति के लोग वहाँ आकर बसने लगे । जब रावण राक्षसों सहित वार रहने लगा तो राक्षसों ने उसका अभिषेक कर उसको राक्षसराज की उपाधि से भी घोषित कर दिया । रावण लंकाधिपति वन शक्ति संचय करने लगा । माल्यवान इत्यादि राजाओं के काल में राक्षसों का व्यवहार अत्यंत उस संकल्प हो चुका था और पाताल देश में रहते हुए तो उन्होंने ऐसे सभ्यता और धर्माचरण ये स्वीकार कर लिया था । अब शक्ति संचित होने पर अपने आस पास के लोगों एवं राज्यों को ये दस पहुंचाने लगे और स्वभाव अथवा देवी स्वभाव के विपरीत आचरण करने वाले को असूर कहते हैं । भले ही दूसरों को उनके व्यवहार से कितना भी कस्ट तो जो लोग अपने इंद्रीय सुखों को सर्वोपरि मानते हैं उन्हें असूर कहा जाता है । धर्म मर्यादा छोडने के कारण ही इन राक्षसों को असूर कहा जाने लगा था । राक्षस जाती शक्ति संचय के साथ भयंकर उपद्रवकारी हो गई और जिन जिनके साथ इन राक्षसों का संघर्ष हुआ वही दुखी हो । त्राहि त्राहि करने लगा । जहाँ धनसंपदा दिखाई दिया राक्षसो ने उठा लिया । जहाँ सुंदर सुखद स्थान देखा उस पर अधिकार कर लिया । जहाँ कोई लो भाई मान वस्तु दिखाई दी उसे बलपूर्वक ले ली । यहाँ तक कि किसी भी स्थान पर सुंदर स्त्री देखी तो उसका अपहरण कर लिया । दसवी अपने लाना के जाती वालों की सहायता से ही लंका का राज्य पास रखा था । अतः पहला काम जो उसने क्या मैं राक्षसो और दानवों के अतिरिक्त अन्य सबको वहाँ से चले जाने का आदेश दे दिया । दक्षिण भारत के मानव अल्पसंख्या में ही वहाँ अगर बसे थे श्रीलंका छोडने लगे तो उनकी धन दौलत और स्त्रीवर्ग छीन लिया गया । यह मैं कहा गया कि यह देश की होती है । इसको वे देश से बाहर जाने नहीं देंगे । जब लंका में राक्षस राज्य स्थापित हो गया तब ऍम अपना पूर्व इतिहास और उसकी प्रभुता स्नानकर अभिमान से फूलने लगे । दसग्रीव ने अपने राज्य का बाल बढाने के लिए सभी जाती हो गया । सूत्रों से संबंध बनाया । अपनी बहन शूर्पणखा का विवाद काल दाना उनके पुत्र से कर दिया । इस संबंध में भूतल पर बच्चे कुछ डालो भी लंका में एकत्रित होने लगे । दसग्रीव ने अपना विवाह दैत्यों के परिवार में मैं की पुत्री तेज लोग में शिक्षित मंदोदरी से क्या लंका में अति सुंदर और सुखद बावन थे । वायुमंडल नाम होने के कारण धूल रही था मान वो वह अन्य सब जातियों को सताने के बाद अपने को पर्याप्त स्थान थे । इस कारण मंदोदरी के दोनों भाई भी लंका में ही रहने लगे । दस । ग्रीन ने अपने भाई कुंभ करण और विभीषण दोनों का विवाद भी अन्य फॅस परिवारों में कर दिया । दस गिरी अब विश्वविजय के सफल देखने लगा । इस समय तक लाखों की संख्या में राक्षस पाताल देश से लंका राज्य में और भारत के दक्षिण पांच सौ में आकर रहने लगे थे । वे लोट बार मचाते और कभी कभी विन्ध्याचल पर्वत तक चले जाते थे । इस बात को मंदोदरी का भाई मायावी पसंद नहीं करता था । मैं चाहता था कि सबसे पहले देव लोग पर आक्रमण कर उसे विजयी किया जाए तो उसने एक दिन दस दिन से कहा, श्रीमान! यदि देव लोग विजय करना है तो लंका और देवा लोग के मध्यवर्ती क्षेत्रों से शत्रुता नहीं करनी चाहिए । मैं तो पूर्ण भूमंडल पर राक्षसराज स्थापित करना चाहता हूँ । यह ठीक है तो हमारा यह नीति है की सुगमता से पराजित होने वाले को पहले विजय करना चाहिए । उस की शक्ति को आत्मसात करने के पश्चात डबल राज्य पर आक्रमण करना ठीक रहेगा । कौन दुर्बल राज्य है और कौन प्रबल राज्य है? विन्ध्याचल के बाद सोशल राज्य इस समय महान बाल का स्वामी है । उस से टक्कर लेने से पहले अपनी शक्ति बढानी चाहिए । कम से कम उसे सत्रों पक्ष में जाने का अवसर नहीं देना चाहिए । देवता दुर्बल हो गए हैं । ये अब परिश्रम नहीं कर सकते हैं । ये काम नहीं हो रही है । दिन रात भोगविलास में रत रहते हैं और उनमें अपने देवता होने का अभिमान आ रहा है । इसके विपरीत उत्तरी भारत के आर्य लोग एक निश्चित धरम व्यवस्था के अनुसार व्यवहार करते हैं । ब्रह्मचारी अपने धर्म जरिए का पालन करते हैं । मैं साधारण ग्रस्त विषयों की बनाई व्यवस्था का पालन करते हुए बलवान, बुद्धिमान बन रहे हैं । इसके अतिरिक्त देव लोग सौरभ सवाल सुंदर देश है । उस पर राज्यपाल जाना अत्यंत सौभाग्य की बात होगी । मायावी ने डेढ लोग के कुछ स्थानों का वर्णन इतनी लो भाई मान भाषा में क्या की? दस ग्रीन के मन में यह लालसा उत्पन्न हो गई कि देव लोग विजय होना चाहिए । आक्रमण से पूर्व वही से एक बार देखना चाहता था । एक दिन उसने अपने नाना वाला विमान लिया और देवा लोग के दर्शन के लिए स्पोर्ट्स चल रहा अपने पिता के आश्रम के ऊपर से उडान भरता हुआ मैं अमरावती यमपुरी कैलाश पर महादेव शिव जी के निवास स्थान की शोभा देखता हुआ घूम रहा था कि कैलाश पर्वत के चरणों में एक बहुत ही सुन्दर भवनों वाली नगरी को देख मैं उस पर मोहित हो गया । उसने अपना विमान एक निर्जन स्थान पर उतारा और उस सुंदर नगर की शोभा देखने लगा । विशाल उद्यान, सुंदर पुष्करणी उस वाटिकाएं, भिन्न भिन्न प्रकार के मनुष्यों से चहल पहल युक्त मार्ग और ऊंची ऊंची अट्टालिकाएं देखता हुआ दसवीं घूम रहा था । कि उसे एक उद्यान में कुछ लंदन आए मधुर संगीत और नृत्य करती दिखाई दी गई । मैं उनको देखने खडा हो गया । आते जाते अन्य लोग भी उनको देखते और फिर चल देते थे । दस ड्रीम तो उनके निर्णय पर इतना मुंह हुआ कि वहीं खडा रह गया । उस स्थान से कुछ अंतर पर ही एक अतिविशाल कुछ भवन बना था । नृत्य संगीत के उपरांत सब स्त्रियाँ उसी अट्टालिका की ओर जाने लगी तो दसवीं उन्हें आगे बढकर एक युवती से पूछ लिया । यह किस का स्थान है । वो स्त्री जिसमें से प्रश्नकर्ता का मुख देखने लगी । दस गरीब कह दिया मैं परदेशी व्यक्ति हूँ । अपने विमान में भूमंडल का भ्रमण कर रहा हूँ । इस कारण इस सुंदर स्थान को देख यहाँ उतर पडा हूँ । जब दस करीब इस युवती से प्रश्न कर रहा था तो करते हैं करने वाली अन्य स्त्रियां भी वहां एकत्रित हो । उन दोनों की बातें सुनने लगी थी । उस युवती ने उस स्थान का परिचय दे दिया । यह अलका पूरी है । किसी भी शर्मा के पुत्र वाॅर्ड ने इसे बसाया है । मैं एक समय भूमंडल की एक सुंदर नगरी लंका पर राज्य करते थे । अपने पिता का आदेश पाकर उन्होंने वह नगरी अपने छोटे भाई दस जीव रावण को दे दी और अब यहाँ इस लग रही वो बताया था । दस ग्रीव इस नगरी पर राज्य कर इन सब सुंदर ललनाओं को अपने रनिवास में रखने की इच्छा करने लगा । इस समय उसने पूछ लिया आप कौन है जो यहाँ अपना सौन्दर्य और लिया बिना मूल्य बिखेर रही हैं । उस स्त्री ने बताया हम इस प्रसाद में रहने वाले श्री वाॅर्ड के पुत्र नलकुबेर की दासियाँ है । हम यहाँ पर देवी रम्बा की प्रतीक्षा में खडी है । रम्बा वह कौन है? यहाँ की सर्वश्रेष्ठ अप्सरा है मैं महाराज नल कुंवर जी की पत्नी है क्या मैं भी उसके दर्शन कर सकूंगा । उसके आने पर सब लोग उसे देखते हैं, आप भी देख सकेंगे । परंतु महाराज आपने कहा है कि आप विमान जारी है । अब तो आप अवश्य ही कोई देवता होंगे । आप अपना परिचय दीजिए । दस ग्रीन ने अपना परिचय दिया तो सब ललनाएं उसे आदर की दृष्टि से देखने लगी । कुछ ही देर में एक अति सुन्दर रमनी अपनी रेनी में पार्टल का फोन लगाएगी और गले में रजंती पुष्पों की माला पहने मस्त चली आती दिखाई दी । दसग्रीव ने उसको देखा तो मंत्रमुक्त खडा रह गया । जब समीर आ गई तो दस ग्रीन ने आगे बढ हाथ जोड प्रणाम किया और अपना परिचय दिया । तदंतर कहा मुझे ज्ञात हुआ क्या? भ्रम भर कहते हुए लंबा ने भी प्रणाम किया और बोली आपका परिचय मिला मैं आपकी पता हूँ आपके भाई वैश्यवर्ण के पुत्र की पत्नी मैं आपसे कथक में एक बात कहना चाहता हूँ तो भीतर आइए । आप के भाई के लडके आपसे परिचय प्राप्त कर अत्यंत प्रसन्न होंगे । भीतर जाने से पहले आपसे एक बात करना चाहता हूँ इस समीप के कुंज में आइए रम्बा जी जाग रही थी । उसने कुछ कहा नहीं । मैं खडी विचार करती रही । दस । ग्रीव ने उसकी वहाँ अगर आग्रह करते हुए कहा देवी तनिक इधर आओ है, सार्वजनिक स्थान है । ध्यान मत करो तो मैं मैं कुछ दिखाना चाहता हूँ । अनिच्छा से नंबर घसीटी जाती हुई उस कुंज में चली गई । दस ग्रीन ने उसे अपनी लिस्ट बुझाओ में उठाया और उधर को भागा जिधर उसका विमान खडा था मैं समिति था दसवीं । मैंने उसे विमान में बैठाया और विमान आकाश में उडा ले गए ।

6. Ravan Ke Khilaf Hua Devlok

श्री राम भाग से नंबर को उठाकर ले जाने का समाचार बोल देव लोग में फैल गया । कुबेर हम लोग में ब्रॅान्ज पहुंचा और लम्बा के अपहरण का पूर्ण व्रतांत बताकर कहने लगा किसका अधिकार होना चाहिए? ब्रह्मा ने मुस्कुराते हुए पूछता हूँ थानाध्यक्ष तुम लंका छोड कर किस लिए चले आए थे । पिताजी कहते थे कि राज्य जैसे तुम वस्तु के लिए भाई भाई में युद्ध ठीक नहीं होगा और अब एक अप्सरा के लिए देव लोग में आग लगाना चाहते हो परंतु भगवान है विषय अबदेव लोग के नियमों पे नियमों को हो गया है । देव लोग में स्त्रियों पर बलात्कार नहीं होता । देवता इस घटना पर लंका दीप्ति से युद्ध नहीं करेंगे । इस पर भी मैं चाहता हूँ कि देवताओं को अपने भविष्य पर विचार करना चाहिए । एक देवसभा बुलाई जाए और उसमें देव लोग की वर्तमान स्थिति पर विचार किया जाएगा । तो महाराज आप हमारे पुरोहित है । आप बुलाइए, ठीक है । मैं देवसभा इंद्रा के प्रसाद में बुलाऊंगा । तुम भी आना अपने साथ हुए अन्याय का वर्णन करना । सभा में केन्द्र में पूछ लिया क्या दस गाली आपकी राज्य में सेना लेकर आया था? नहीं मैं अपने विमान में अकेला आया था । कुबेर का आपके पास भी तो भी मालूम था । आपने उसका पीछा क्यों नहीं किया है? यदि आप या नल कोवर्ट विमान लेकर उसका पीछा करता तो उसे लंका पहुंचने से पहले पकडा जा सकता था । आपके पास उस पर विमान था जो उससे कई गुना अधिक गति से उड सकता है । देखिये धनाध्यक्ष आप आपने मूर्खतापूर्ण उन लोगों के लिए देव लोग को युद्ध में घसीटना चाहते हैं या नहीं होगा । केन्द्र के निराशाजनक कथन से सब देवता निरूत्साह हो रहे थे । हम यह जानते थे कि वास्तविक तक क्या थी । मैं बोले वास्तविक बात यह है कि इस समय देवताओं में कोई नहीं जो दस ग्रीन से युद्ध कर सके, कुबेर किया और केंद्र क्या सब अपनी दुर्बलता को छुपाने के लिए नियुक्तियां दे रहे हैं । ये वास्तव में युक्तियां नहीं है । प्रतियोग आपने दुर्बलता छुपाने के लिए उत्तर है । एक साल था जब देवता अपने को भूमंडल में धर्म और न्याय के संरक्षक मानते थे । तब देव और मानव समाज एक था नियम सभी के लिए एक समान थे और उन का उल्लंघन सामाजिक अधिकारों का आनंद माना जाता था । देवराज और उसकी सेना अधिकारों का उल्लंघन करने वाले को तुरंत दंड देते थे । मैं ऐसा प्रबंध करते थे कि भविष्य में उन्हें ऐसा न हो । अब तो तुम्हारे अपने देश में एक पापा सारी आकर अपहरण कर चला जाता है और तुम उसको दंड देने की सामर्थ्य नहीं रखते हैं । तुम लोग मस्त विश्व में मुझे जाते थे और अब अपनी असमर्थता को प्रकट करने के लिए एक दूसरे को कोस रहे हो । मैं रद्द हो रहा हूँ और तुम सब के दोस्तों को जानता हूँ । तुम लोग आलसी, विलासी हो रहे हो इसलिए जानता हूँ कि तुम अब दसवीं का कुछ नहीं बिगाड सकते हैं । तुम्हारी रक्षा तो अब कोई सेंस मानव ही कर सकेगा । इस कारण अब तुम कुछ ऐसा प्रयत्न करो कि जिससे कोई मानव तुम्हारी रक्षा करने को तैयार हो । मुझे पता चला कि कौशल राज्य की राजधानी अयोध्या में एक यज्ञ किया जा रहा है । वहाँ का राजा दशरत उत्तर की कामना हेतु पुत्रेष्ठि यज्ञ कर रहा है । राजा दशत इस समय विश्व में सबसे स्मर्च राजा है । वह देवताओं की सहायता के लिए कई युद्ध करके जीत चुके हैं । उनकी सेना में दस ग्रीव से युद्ध का सामर्थ्य है परन्तु मैं स्वयं अधेड हो चुके हैं और संतान होने से हताश है । यहाँ राजवैद्य और सुनी कुमार बैठे हैं । उनको चाहिए कि महाराज दशरथ की इसमें सहायता कर दें । वे यहाँ से राजा रानियों के लिए विशेष पोशाक बनाकर भेजे तो वीर राजा के घर में जो संतान जम ले वह अति सुन्दर और बलवान शरीर वाली तथा मेधावी और साहसी हो । यदि वे ऐसा प्रबंध करते तो कोई परमात्मा की सेहत विभूति से युक्तात्मा उस कलेवर में चली जाएगी । समय भविष्य लगेगा परंतु वीर राजा की वह संतान निश्चय ही धर्म स्थापना के लिए इस असूर संस्कृति के पोषक ट्रस्ट ग्रीव का वध कर भू बाहर को हल्का कर सकेंगे । ब्रह्मा की सम्मति पर कार्य करने के लिए देवता लोग परस्पर परामर्श करने लगे और अश्विनीकुमारों को पोषक पाक तैयार करने के लिए कह दिया गया । यह समाचार मुनि भी शुरुआत के आश्रम में भी पहुंचा की देवता लोग दस दिन से अधिक शक्ति सहेली मानव के जन्म की योजना बना रहे हैं जो उसके को समाप्त कर सके । आवश्यकता पडने पर उसका वध भी किया जा सके । इस समय बाजार से दस ग्रीन की माता कैकसी को भर लग गया । उसने अपने पति से कहा महाराज क्या देवताओं की योजना सफल होगी? अवश्य होनी चाहिए, क्यों ना हो इस कारण की दस गिरी आपका पुत्र ब्रह्म लोग से वेद विद्या में शिक्षित है । कुशल योध्या का प्रमाणपत्र प्राप्त है और लाखों सैनिक उसके संकेत मात्र पर लड जाने वाले उसके पास है । इस पर भी देवी पाती है और पार्टी का विनाश होगा ही तो कुछ उपाय नहीं है । उपाय तो है कोई बात नहीं जिसका की प्रायश्चित न हो परंतु निरंकुश है मेरी मानेगा नहीं । मैं अपना अपमान नहीं करवाना चाहता हूँ । कैसी निराश नहीं हुई । इन दिनों कुबेर आश्रम में ही रह रहा था । अलकापुरी में नलकों ओवर राज्य करता था । ऍफ सी कुबेर के पास पहुंची और बोली कोबेद मुझे ज्ञात हुआ है कि देवता ब्रह्माजी दसग्रीव के विरुद्ध हो गए हैं । उन्होंने ऐसा आयोजन करने का निश्चय किया है कि महाराज दसरथ के घर में तुम्हारे भाई दस ग्रीव से अधिक विद्वान और शक्ति शाली योद्दा उत्पन्न हो जो दसवी को समाप्त कर सके । माताजी उसने सिस्टर जनों के व्यवहार का उल्लंघन कर दिया । रहे युवा है, बलवान है और अमित साहस रखने वाला है परंतु अपनी शक्ति का दुरुपयोग कर पापाचार कर रहा है । किसी गुरूजन की मानता नहीं । बहु बेटी का नाता नहीं मानता । इस कारण उसके पापों का निराकरण करने के लिए गुणों में उससे टेस्ट वीर योद्धा तैयार करने का आयोजन है । यह ठीक है उसको ऐसा करना ही चाहिए । परन्तु मैं यह चाहती हूँ कि तुम बडे हो । विद्वान, बुद्धिमान, दयालु और परिवार वालों से इसने रखने वाले हो तो मैं अपने परिवार के भूल कर रहे सदस्य को समझाना चाहिए । मेरी है कामना है कि तुम उसे अपने व्यवहार को सुधारने की ठीक दो । परन्तु माता जी उस ने आज तक मेरी मानी है । क्या जो हम मानेगा नहीं मानेगा तो मैं कोई अन्य विधि सोच होंगी । तुम्हारा तो कल्याण होगा क्योंकि तुम अपने परिवार के एक प्राणी को दूसरे तुम्हारे ऊपर चलना छोड देने की संबंधित हो गए और शांति का प्रयास तो करोगे हैं । कुबेर मान गया कि वह दिशा में यह तो करेगा । उसने अगले ही दिन एक दूर अपने एक पत्र के साथ रावण के पास भेज दिया । देहरादून कुबेर का पत्र लेकर लंका पहुंचा और वहाँ पहले विभीषण के पास गया । विभीषण को उसने वहाँ अनेक अपना उद्देश्य बताया । विभीषण दूध को लेकर रावण के प्रसाद में जा पहुंचा । सूचना भेजने पर रावण ने इनको अपनी भरी सभा में ही बुला लिया । कुबेर का दूध विभीषण के साथ सभा में पहुंचा । विभीषण ने कहा महाराज यहाँ हमारे बडे भाई धनाध्यक्ष कुबेर का भेजा हुआ दूध है । यह उनका एक संदेश लेकर आया है । मैं इसे यहाँ ले आया हूँ, जिससे यह शिवम संदेश आपको सुना सके । रावण ने भाई को बैठने के लिए भी नहीं । उसने तुरंत दूध को संबोधन कर कहा, बताओ मैं क्या कहता है महाराज दूध का मैं आप के बडे भाई महाराज धनाध्यक्ष कुबेर का दूध हो । मुझे आज्ञा हुई है कि आपसे निवेदन करूँ कि आपने जब से राज्य संभाला है तब से अनेक व्यक्तियों के साथ अत्याचार किया है । आपने अनगनित स्त्रियों से बलात्कार की है और इस समय आपने लंका से लेकर विन्ध्याचल पर्यंत सामान्य प्रजा को भी दुखी कर रखा है । धारा अध्यक्ष महाराज का यह कहना है कि आप अपने आप को सुधारें । पिताजी की प्रेरणा से यह राज्य आपके बडे भाई ने आपको दिया है । इस कारण उनका अधिकार है कि आपको कहें कि आप अपने व्यवहार में सुधार करें और यदि मैं उनकी बात मैं मानु तो तो देवता लोग यह या तंग कर रहे हैं कि नए केवल आपका जीवन समाप्त कर दिया जाए । वरना यह भी कि आपका नाम अनंतकाल तक भले लोगों में तिरस्कार पर घृणा का पात्र बना रहे हैं, तो यह तो मुझे साहब दे रहे हो । महाराज, इसमें मैं कहाँ से आ गया । मैं तो केवल एक दूध होने के नाते वही कह रहा हूँ जो आपके बडे भाई ने आपको कहने के लिए मुझे भेजा है । बहुत दस पता कर रहे हो तुम इसको हम सहन नहीं कर सकते । इस व्यक्ति का सिर्फ शरीर से पृथक कर दो और इसके की कोई समझे कि क्या हो रहा है । राहत ने तुरंत अपना खड निकाला और दूध का सिर्फ डाला । सभी राक्षस लंकाधिपति रावण की जयजयकार कर उठे और विभीषण एक भी सब अधिक कहे बिना वहाँ से चला गया । कुछ दिन पश्चात दूध का सिर्फ एक कपडे के थैले में लिपटा हुआ थानाध्यक्ष के निवास स्थल पर आगे रहा । कुबेर दूध के सिर को पहचान सब समझ गया । उस सिर को लेकर कुबेर अपनी भी माता के पास जा पहुंचा और सिर्फ दिखाकर उसने बता दिया की है उस दूध का सिर्फ है जिसे मैंने आपके कहे अनुसार संदेश देकर दस ग्रीव के पास भेजा था । टैक्सी चुप कर रही हैं । नहीं

7. Devlok Par Asuron Ka Aakraman

श्री राम बहुत सात इस दूध की हत्या के उपरांत रावण की सभा में इस करते गी प्रतिक्रिया पर विचार होने लगा । राष्ट्र का कहना था, महाराज देवता इसका प्रतिशोध लेंगे । वे नपुंसक मेरा कुछ नहीं बिगाड सकते हैं । वे लंका पर आक्रमण तो कर सकते हैं । अब उनमें विष्णु जैसा छोरे वाला कोई नहीं । महाराज मेरा ये कहना है कि युद्ध अपने राज्य में नहीं होना चाहिए । छत्रों के घर में जाकर लडना ठीक है । इस कारण देव लोग पर आक्रमण कर देना चाहिए । युद्ध तो अब होगा । इस कारण मेरी सम्मति यह है कि एक का एक देव लोग पर आक्रमण कर दिया जाएगा । यह तो रावण के मन की बात थी तो उसने कहा तो तैयारी कर लो । बस फिर क्या था रणभेरी बजा दी गई और काले बादलों की बाटी ऍम की अपार सेना देव लोग की ओर तो हडबडी धवन अपने लडके मेघनाथ को सेना ना एक बनाकर दो मास में देव लोग जाता हूँ । सबसे पहले अलकापुरी पर ही आक्रमण कर दिया । नल कुंवर ने डटकर आक्रमण का विरोध किया परंतु रावण की सेना बहुत अधिक थी और लडने का अब ध्यान सकती थी । अल्कापुरी की सेना को लडने का अभ्यास नहीं था । जब से कुबेर ने राज्य स्थापित किया था । लोग शांति और सुख का जीवन व्यतीत करते रहते थे । उसकी सेना सेना के सामने टिक नहीं सकी । नलकू और ऍम लडने के लिए आया परंतु घायल हो अच्छे हुआ तो उसके सेवक उसे उठाकर ले गए । रावन ने पूर्ण नगर को लूटा । वहाँ के स्त्रीवर्ग को अपने सैनिकों के हवाले कर दिया और वो वेयर के पुष्पक विमान को अपने अधिकार में ले दिया । अल्कापुरी के उपरांत कैलाश पर आक्रमण किया गया । यह महादेव शिव का देश था । शिव जी के गण लडने के लिए निकल आए । घमासान युद्ध होने लगा तो रावण को समझ में आ गया कि वह शिव जी पर विजय प्राप्त नहीं कर सकेगा । इस कारण रावण नहीं संधि का प्रस्ताव किया । सचिन जी ने भी सोचा कि और अधिक रक्त बात की क्या हो सकता है । देवी पार्वती को भी सुकेश के वंशज पर दया आ गई । साथ ही शिव जी को देवताओं पर भी रोज था कि वे युद्ध में उनके सहयोग के लिए नहीं आए । हत्या संधि कर शांत हो गए । इस का बारी बारी से भिन्न दिन देव राज्यों को व्यवस्था करता हुआ यम, वरुण और अन्य देवताओं पर विजय प्राप्त कर दस ग्रीव ने अमरावती पर धावा बोल दिया । केंद्र किसी अन्य देवता की सहायता के लिए नहीं निकला था । अतः अन्य किसी देवता ने भी अपनी सेना इन लोग की रक्षा के लिए नहीं भेजी । इस पर भी अति भयंकर संग्राम हुआ । राक्षस सेना की अपार क्षति हुई और यदि युद्ध उस दिन ओर चल जाता तो मैं पराजित हो जाते हैं । परंतु मेघनाथ ने धोखे से इंद्र को बंदी बना लिया । केन्द्र के बंदी बना लेने पर जहाँ राक्षसों के नेता लास्ट नास्कर परस्पर गले मिलने लगे, वहाँ देवताओं में मुर्दनी छा गई । पूरन देव लोग के विजय करने पर भी रावण अपना राज्य वह स्थापित नहीं कर सका । देव लोग चीत प्रदान देश था । केंद्र दिव्याग नहीं का रहस्य जानता था और उसने ऐसा प्रबंध किया था, जिससे अमरावती के निवासी नगरों और मकानों को रहने के योग्य गरम रखते थे । इसका रहस्य रावण नहीं जानता था । केन्द्र के बंदी होने पर संपूर्ण देव लोग चीज से फिट होने लगा । सागर के मध्य में एक टापू पर रहने वाले राक्षसों को इतनी भीषण शीत का अभ्यास नहीं था । अधिकतर सैनिकों को तो चीज लोगों ने जगह लिया था और वे छुट्टी लेकर लोटने लगे । रावण ने अपनी सेना के सेनापति मेघनाथ से सम्मति की तो वह भी वहाँ से लोट चलने के लिए कहने लगा । बंदी इंद्रा को साथ लेना लोटने की सोच ही रहा था कि ब्रह्मा समाचार पाकर वहाँ चले आए और रावण तथा इन्द्र में संधि करवा दी । परस्पर मैत्री रखने के वर्ष हो गए और इंद्र ने अपनी मुक्ति के मूल्य में कई दिव्यास्त्र मैं एक दिन शक्ति भी मेघनाथ को दी । यह दिव्यशक्ति जब छोडी जाती थी तो जो सामने वाले समीर हो तो तुरंत उनकी मृत्यु हो जाती थी । अंतर पर होने पर मुर्छित हो जाते थे और यदि शीघ्र ही चिकित्सा न हो तो भी उनकी मृत्यु हो जाती थी । अमरावती पर आक्रमण में रावण की सेना कि बहुत हानि हुई थी । कॅश बहुत अधिक संख्या में मारे गए थे । देव लोग का पार धन लूटकर रावण लंका को चल पडा ।

8. Marich Aur Ravan Bane Bandhi

श्री राम भाग ऍम ऍम देव लोग भी जैसे मदोन्मत्त हो रहा था । इस कारण वो मन में विचार करने लगा कि आर्यव्रत की विजय कहाँ से आरंभ करें । विन्ध्याचल पर्वत तक तो उसके राक्षस लूटमार और बाबादीन बजाते रहते थे । विन्ध्याचल से उत्तर की ओर विन्ध्या प्रदेश में नर्मदा के किनारे महेश माटी नगरी पर उसकी दस्ती गई । उसने सुन रखा था कि महेश माटी अमरावती से भी अधिक सुंदर लग रही है । वहाँ की धनसंपदा तो आर्यव्रत की सब लकडियों से अधिक है । इस बात पर विचार करते ही उसके मुंह से लार टपकने लगी । उसने कुबेर से विजित उस परिवार उधर ही घुमा दिया । विशाल पुष्पक विमान में उसके साथ सेना के कई अधिकारी और कई सहस्त्र सैनिक रावण का विचार था कि इंडिया राज्य को जीतने के लिए कितने सैनिक पर्याप्त है । वास्तव में मैं तो अपनी पूर्वजों का है दिखाकर ही महिष्मती नगरी के महाराज अर्जुन से कर प्राप्त करना चाहता था । उसने अपना विमान नर्मदा नदी के तट पर उतार दिया और वहाँ से अपना एक दो महिष्मतीपुरी के राजा के प्रसाद पर भेज दिया । यह दूध मारिच था । उस ने राज प्रसाद के द्वार पर जाकर महाराज से मिलने का अनुरोध किया । द्वारपाल का कहना था महाराज इस समय नहीं मिल सकते हैं । क्यों मैं अपनी रानियों के साथ जल्दी हार कर रहे हैं । इस कारण आज वह नहीं मिलेंगे तो उन को संदेश भिजवा दो । क्या संदेश लंका नरेश रावण जिसने देव लोग को विजय क्या है? नर्मदा के किनारे ठहरे हुए हैं । वह चाहते हैं कि विंध्य प्रदेश के राजा तुरंत उनसे आकर मिले और डेढ पूजा से उनका सत्कार करें । द्वारपाल लेगा । संदेश अभी भी जवाब देता हूँ परन्तु आज उनसे बैठ के संभावना नहीं है । इस पर मार इसने आवेश में कह दिया यदि आज भेड नहीं हुई तो हम आज इस सुंदर नगरी को लोड कर यहाँ पर अपना राज्य स्थापित कर लेंगे । मारीज द्वारपाल को इस प्रकार डरा धमकाकर अपने सेना शिविर में नोट हमारी जब भी शिविर में पहुंचकर रावण को राजा के रानियों के साथ जलविहार करने की बात बता रहा था और रावण इत्यादि उसके जलविहार की कथा को सोच ही रहे थे कि नर्मदा कर्जन चलने लगा । देखते देखते जहाँ वे लोग ठहरे हुए थे, बहस साल पानी से गिर गया । नदी में सामान्य बाढ आई समझ रावण कोई ऊंचा स्थान ढूंढने लगा । रावण और उसके सभी साथी देख रहे थे कि नर्मदा का जल बहने से रुक गया है । मान लो कहीं बांध लगा दिया गया हूँ । चारों ओर जल्दी हो गया था । आधी घडी में ही जल्द इतना अधिक हो गया कि वे तैरने लगी । उनके पास भूमि से नहीं लगते थे । विमान में जल भर गया और मैं उन के योग्य नहीं रहा । रावण की सेना डूबने लगी थी । दबीर सैनिक जिधर जिसको समझ आया भाग खडे हुए और अपनी अपनी जान बचाने के लिए समीर की पहाडियों की ओर तैरकर जाने लगे थे । रावण और मारीज भी तय करते हुए जान बचाने की चिंता में थे की नौकाओं में राजा अर्जुन के सुबह आए और रावण तथा मारीज को बंदी बनाकर राज प्रसाद ने ले गए । महिष्मतीपुरी और राज प्रसाद एक पहाडी पर स्थित था । नगरी के लोग नगर के बाहर राक्षसों के पैर तैयार कर जान बचाने का दृश्य देख रहे थे । जो कोई राक्षस तटपर पहुँच पाता था उसे पकडकर बंदी बना लिया जाता था । रावण और मरीज को बंदी बनाकर राज प्रसान में लाया गया तो वही द्वार बाद जिसे मारीज संदेश देकर गया था अपने स्थान द्वार पर खडा मिला । उसने मरीज को झुककर प्रणाम किया और व्यंग्य से मुस्कुराता रहता मारीज लग जा से गर्दन दवाई समीर से निकल गया । रावण उसके आगे आगे था । दोनों को कारागार में बंदी बनाकर रखा गया है । महाराज अर्जुन से भेंट अगले दिन ही हुई । दोनों बंदियों को राज्यसभा में उपस्थित किया गया । जब दोनों बंदी सामने उपस् थित हुए तो राजा ने लाने वाले से पूछा ये कौन है महाराज? कल ये अपने साथ दो सहस्त्र के लगभग सैनिकों को एक व्रत का । ये विमान में लिए हुए नर्मदा के किनारे पर उतरे थे । इनमें जो यह कुछ छोटे कद का व्यक्ति है । राज प्रसाद के बाहर द्वारपाल से कहने आया था कि वह लंकापति रावण का दूध है, रावण की आज्ञा से आया है और रावण चाहता है कि महाराष्ट्र तुरंत उसके पास भेड पूजा लेकर पहुंचे । यदि नहीं पहुंचेंगे तो ये पूरी पर आक्रमण कर देंगे । पूरी को लोट और यहाँ के राजा को बंदी बना अपने साथ ले जाएंगे तो तुम लंकापति हो । राजा ने दस गरीब से पूछता हूँ दस गरीब अपराधियों की भर्ती सामने खडा क्रोध से लाल पीला हो रहा था परंतु उसके हाथ पीठ के पीछे सुदृढ रसों से बंधे हुए थे । विवस उसने कहा हाँ क्या प्रमाण है नदी के किनारे खडा केंद्र का पुष्पक विमान जो देव लोग की विजय पर मुझे मिला है, उसमें ही केंद्र से प्राप्त कर की वस्तुएं एवं कर की राशि भी है । तो केन्द्र के उस खिलोने को लूटकर तुम समझते हो कि तुम्हारा अधिकार हो गया की सबसे भेंट पूजा प्राप्त करो । रावण चुप रहा । हम चाहे तो तुम्हारे विमान को आधे पल में फोन कर मासूम कर सकते हैं । हम तो तुम्हारे सब साथियों को वहीं अग्नि बाढ से फूल भस्म कर सकते थे । परंतु हमने समझा कि तुम्हारा या किलो ना टूट गया तो तुम रोने लगे और यदि तुम सबको मार डाला तो तुमको दंड नहीं मिलेगा । इस कारण हमने अपने किंचित मात्र प्रयत्न से ही तो मैं बंदी बनाना ही उचित समझा है । तो ये आपने हमें बंदी बनाया है । क्या है तो नदी की बाढ में हमें विवश कर दिया था । नहीं दसवी यह हमारे कुशल अभियंताओं की योजना और सैनिकों की कार्यकुशलता थी । उन्होंने नदी को बहने से रोक दिया था । फिर चाहते तो तुम्हें डूबाकर मार सकते थे । परन्तु हम तो मैं इस प्रकार अपने सामने बंदी बना खडा रहना देखना चाहते थे परन्तु वहाँ तो कोई नहीं था । आपने नदी का प्रभाव रोका कैसे उसे रोकने के लिए हमें जाने की आवश्यकता नहीं । हमारे संकेत मात्र से हमारे उपकरण श्रम कार्य करते हैं । हमारे उपकरण ही मेरे हाथ है । इन की सहायता से हम सहस्त्रबाहु तो मैं मालूम होना चाहिए था कि राजा और जो सहस्त्रबाहु इस राज्य की और आग भी उठाने वाला पच्चीस से उठ सकता है, मेरी यही बढे तो तुम्हारे जैसे सौरभ विजेता को स्वर्गवासी बना सकती है । चुनाव कल रात और आज रात है । खाने पीने को कुछ मिला है अथवा नहीं रावण को उत्तर नहीं दिया । हमारी बोल पडा श्रीमान अम् भी एक विस्तृत देश के राजा है । हमने अपने शोर्य से देव लोग को विजय किया है और हम आशा करते हैं कि हमारे साथ राजाओं कैसा व्यवहार किया जाएगा । ठीक है आप जैसे विमानों के साथ वही व्यवहार करना चाहिए जो आप हमारे साथ करना चाहते थे । आपको तो बंदी बनाकर रखा जाना चाहिए जब तक कि आपके राज्य में से हमें करना प्राप्त हो, कितनी धनराशि चाहिए? सात फोर्टी स्वर्ण मुद्रा और लिखित समा याचिका । उस याचिका में यह शर्त की राक्षस उन्हें विन्ध्याचल पार कर इस राज्य में पाव नहीं रखेंगे । यह हम नहीं देंगे । हमारी सेना के सेनाध्यक्ष राजकुमार इंद्रजीत मेघनाथ इधर से ही लंका लौट रहे हैं और यदि उन्हें यह पता चल गया कि हम बंदी है तो इस देश पर आक्रमण कर देंगे । तब यहाँ की तीन सैनिक बजा दी जाएगी । आने दो वह भी आपकी भारतीय पकडकर बंदी बना लिया जाएगा और फिर आपके ही आगार में रखा जाएगा । तब कर की राशि दोगुनी हो जाएगी । देखो राजा रावण हमारे दो सहस्त्र सैनिकों में से ऍम जल पलायन में डूबकर मर गए और शेष बंदी है । यदि पूर्ण सेना भी साथ होती तो उसके साथ भी यही होता है । यदि अब तोहरे राजकुमार यहाँ आएंगे तो हमारा वंश ही निःशेष हो जाएगा । अभी वही तो चल रहा है । हमारी सम्मति मालूम आपने छूटने का मूल्य दे दो और चल दो । इसके उपरांत बंदियों को पूरा बंदीग्रह डाल दिया गया । यह बात भूमंडल में विख्यात हो गई कि लंकाधिपति को विंध्यप्रदेश के राजा सहस्त्रबाहु अर्जुन ने बंदी बना रखा है । यह सूचना भी शर्मा आश्रम में भी पहुंची । टैक्सी को जब यह पता चला कि रावन बंदी बना लिया गया है तो वह अपने पति से विनय करने लगी कि उसके पुत्र को छुडाना चाहिए । उसके कार्य ही ऐसे है । इन घृणित कार्यों का फल तो मिलना ही था । इसमें मैं क्या कर सकता हूँ? मुन्नी ने पूछा टैक्सी जानती थी कि राजा और जो मोदी जी का सिर्फ शहर है, सुबह है और कभी कभी गुरु जी से देश लेने आश्रम में आया करता है । इस कारण उसने पति से कहा, भगवन! राजा और जोन आपका शिष्य है । अतः आप राज्य से कहकर अपने पुत्र को छुडवा सकते हैं । ऋषि विषय हुआ, स्वयं विंध्यप्रदेश में गए और उन के कहने पर राजा ने धन की मांग वापस ले ली और उन्हें आक्रमण नहीं करने का लिखित वचन ले रावण आदि को मुक्त कर दिया ।

9. Bali Aur Ravan Ka Aamna-Saamna

श्री राम बहुत वो जब मेघना अपनी सेना को लेकर देव लोग से वापस लंका में पहुंचा तो अपने पिता और पुष्पक विमान को वहाँ नया पहुंचा देख परेशानी अनुभव करने लगा । उसने यह पता करने के लिए कि उसका पिता कहाँ रह गया है, आपने दूध चारों ओर भेजे हैं । दूध उस मार्ग पर खोजते हुए देव लोग की ओर चल पडे जिधर से मेघनाथ के पिता के आने का कार्यक्रम था । ये दूध जब विन्ध्याचल क्षेत्र में पहुंचे तो उनको रावण अपने पुष्पक विमान को ठीक करते हुए मिल गया । उस वक्त विमान जान में डूबने के कारण छोड नहीं पा रहा था । उसे उन्हें ठीक करने में समय लगा । जब दूतों ने ताजा रावण से मिलकर अपने आने का कारण बताया तो रावण ने उन दूतों को भी साथ ले लिया और विमान के ठीक होते ही सब साथ हो सहित लंका में जा पहुंचा । वहाँ रावण ने अपने अपमान और रोज का वर्णन किया तो मेघना राजा अर्जुन से बदला लेने के लिए विंध्यप्रदेश पर आक्रमण कर देने का विचार करने लगा । परन्तु रावण ने बताया कि उसके पिता ने उसकी अर्जुन से संधि करवा दी है और उस संधि से मैं उसके देश पर आक्रमण करने की स्वीकृति नहीं दे सकता हूँ । इस पर भी मेघनाथ ने का पिताजी मैं क्यों आपकी संधि का पालन करूँगा और यदि तुमने यहाँ रहते हुए लंका की सेना द्वारा किसी देश पर आक्रमण किया तो देवता आर्यव्रत मुझे विश्वास के योग्य मान लंका पर सम्मिलित आक्रमण कर देंगे, यह ठीक नहीं होगा । परन्तु पिताजी अभिमान में डूबा । इंद्रजीत बोला यह ठीक क्यों नहीं होगा? हम इनको परास्कर विश्वविजयी हो जाएंगे । नहीं तो देवताओं और आर्य राजाओं के घटते हो जाने पर हम विजयी नहीं हो सकेंगे । तुम्हारी माया और इन बीमारियों पर चल नहीं सकेगी । वे छलकपट की नीति समझते हैं और तुम से अधिक मायावी है । परन्तु पिताजी हमें कुछ तो करना चाहिए । यदि हमने कोई समर नहीं चलाई तो हमारे सिपाही भी देवताओं के सैनिकों की बाटी भीरू, दुर्बल और प्रमादी हो जाएंगे । देखो मैंने और मार इसने लौटते हुए मार्ग में एक योजना बनाई है । हमें गुप चुप रहकर अपने राज्य की अग्रिम चौकियां इंजान चल के साथ साथ बना देनी चाहिए । हमारे सैनिक अपने गणवेश उतारकर सादा वस्त्रों में वहाँ रहना हम कर देंगे । इक्का दुका मानव तो दुर्बल होते हैं । उनको मार कर वहाँ आतंक फैलाएंगे तो सेल्स लोग स्वयं वहाँ से उत्तर की ओर भाग जाएंगे । हमें केवल उन सैनिकों को आतंक फैलाने की शिक्षा देनी है । वही बडा युद्ध अथवा आक्रमण नहीं होगा । अतः यह लंका राज्य का युद्ध नहीं होगा । हम दोषी नहीं माने जाएंगे । यदि कभी किसी ने हमारी और उंगली भी उठाई तो हम नगार देंगे । जब कोई क्षेत्र जान सुनने हो जाएगा तो उस पर अपना अधिकार कर लेंगे । तब एक निर्जन स्थान को अपने राज्य में सम्मिलित करने का दोष नहीं होगा । मारिच ने बताया है कि उसके साथियों ने उत्तर के दो बहुत बडे क्षेत्र मदद और का रूस किसी प्रकार जान सुनने कर दिए हैं । एक समय था की मदद और का रूस बहुत ही संपन्न जन थे मार इसकी माता ताडका एक तपस्वी सुकेतु की लडकी है । वह अतुल बल्कि स्वामिन् है । वहाँ अब ताड का और उसके पति सुनंद दोनों का राज्य नगर विद्वान हो चुके हैं । धीरे धीरे राजस्थान निर्जन होते जा रहे हैं और जंगल में परिवर्तित हो रहे हैं । अब केवल वहाँ कोई विश्वामित्र मुनि ही सिद्धाश्रम नाम के आश्रम में रहता है । हमारी जो ताडका ये माँ पुत्र दोनों न वक्त है किसी दिन उस मुनि और उसके साथियों को मारकर खा जाएंगे । मार इसकी समझती है कि ऐसी ही आतंकवाद की नीति पूर्ण विन्ध्याचल और उसके समीपवर्ती गांव पर चलाई जाएगी । उन का विचार है कि पांच दस वर्ष में यह पोल छेत्र जान सुनने हो जाएगा । तब हमारे सैनिक ऍम राज्य स्थापित कर लेंगे । परन्तु पिताजी मार्ग में पंपापुर पडता है । वह भी एक समृद्ध वन राज्य है । उसके बने रहते हम विंध्यप्रदेश में राज्य स्थापित नहीं कर सकेंगे । उस के विषय में भी मैंने एक योजना बनाई है । मैं चुप चाप संपन्न कर लूंगा । उस राज्य का राजा बाली अति सोरिया है । उसकी आंखों में इतना तेज है कि जिसकी ओर देखता है उसका बाल हो जाता है । मैं अकेला जाकर उसे चल से बंदी बनाऊंगा । एक बार बंदी हुआ तो पूर्ण राज्य हमारे आधीन हो जाएगा । इस योजना पर कार्य होने लगा । दो रख सेनापति खर और दूषण नर्मदा के तट पर दंड करने में भेज दिए गए और उन्होंने वहाँ एक विस्तृत जान पर बसाना आरंभ कर दिया और आतंक फैलाने में सक्षम सैनिक तैयार करने आरंभ कर दिए । एक दिन रावण अपने विमान पर पंपा सुर क्षेत्र के सागर तट की ओर गया । मैं वहाँ पर घूम रहा था । मैं देखना चाहता था की बाली ने वहाँ अपने राज्य को सुदृढ करने के लिए क्या क्या उपाय किए हैं । तटपर भ्रमण करते हुए रावण ने एकांत स्थान पर बाली को ध्यान अवस्थित बैठे देखा । इसे ईश्वर प्रदत्त अवसर मान रावण नेपाली को बंदी बनाकर लंका ले जाने की योजना बना दी । उसने अपना विमान जिसपर भ्रमण कर रहा था, बाली के ध्यान स्थल से कुछ अंतर पर उतारा और वहाँ से पैदल उस स्थान की ओर सनपडा जहाँ वाली अपने में लीन बैठा था । बाली अभी भी चिंतन कर रहा था । रावण धीरे धीरे बिना आवाज की बाली की ओर जाने लगा परंतु बाली ने उसे देख लिया था और उसे चोरी चोरी अपनी ओर आता देखा तो उसे संदेह हो गया कि यह व्यक्ति किसी प्रकार की कुटिलता करना चाहता है वाली आने वाले व्यक्ति की नियत पर तो संदेह कर रहा था परंतु नहीं जानता था कि वह क्या करना चाहता है । आने वाले व्यक्ति को दवे भाव अपनी ओर आते देख मैं आंधी मोदी आंखों से उसे देखता रहा । रावण बाली के सभी बहुत उसके पीछे से लगभग कर उसको बांध लेना चाहता था । बाली ने जब उसे अपने हाथ की पहुंच के भीतर आया जाना तो एक का एक घूमकर उसने रावण को पकडकर अपनी बगल में दबा लिया । रावण कुछ साल तक छोडने के लिए छटपटाता रहा परन्तु बाली उससे बहुत अधिक शक्ति चाली सिद्ध हुआ । मैं उसे पकडकर अपने राज्य की राजधानी किष्किंधा नगरी में ले गया । वहां उसे बंदी बनाकर बंदीग्रह में रख लिया । एक दिन वाली बंदीग्रह में पहुंचा । घर जानना चाहता था कि वह कौन है जो इस प्रकार इसके पीछे छुपकर वार करना चाहता है और क्यों करना चाहता हूँ । बाली उसको लॉटरी के बार पहुंचा जहां रावण बंदी बना कर रखा गया था । फॅमिली ने उससे पूछा तुम कौन हो? मैं लंकापति रावण बाली हस बडा गैर हस्कर बोला पर इसका प्रमाण क्या? जहाँ समाधि लगाए बैठे थे वहाँ से एक पोस्ट के अंतर पर रक्षा के झुरमुट में छुपाकर रखा । मेरा विमान मिल जाएगा पर तुम चोरी चोरी क्यों आए थे? मैं देखना चाहता था कि आप वास्तविक समाधि में थे अथवा ज्योति सवादी से । आप लोगों को धोखा दे रहे थे तो क्या समझा? मैं समझ गया हूँ की ये मेरी भूल थी । मैं कौन होता हूं समाधि का बेहद खोलने वाला । मैं वास्तव में आपसे संधि करने के लिए आया था । मेरी देवताओं से भी संदेह हो चुकी है । इसके उपरांत बाली ने रावण को अपने आती थी ग्रहण ठहरा दिया और कई दिन तक भगत दोनों में संधि वार्ता लाभ हुआ और फिर दोनों अभिन्न मित्र बन गए ।

10. Divya Kheer

श्री राम है । भाग दस ऍम राम इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न हुए थे । एक सुबह को व्यवस्था मनो के पुत्र थे । वे जब संज्ञान हुए तो अवन में अयोध्या बुरी बसाकर रहने लगेगा । इनके वंश में पूरी वंशीय राजगुरु स्थापित हो गया । दशरथ के जरूर के समय यह परिवार ऍम वर्षों से अयोध्या में राज कर रहा था । दशरथ के पिता का नाम महाराज दर्शन धर्म में अगाध श्रद्धा रखने वाले शूरवीर ऍम बलवान राजा थे । लेकिन ट्यूशन राजा और वैदिक धर्म एवं संस्कृति में अगाध निष्ठा रखने वाले नरेश । इनके राज्य में न्याय और धर्म का आचरण होता था और सुयोग्य मंत्रियों द्वारा राज्य सुनाया जाता था । महाराज दस रात के आठ गुणवान मंत्री थे । ये मंत्री छात्र के तत्व को जानने वाले एवं बाहरी चेष्टा को देख कर ही मन के भाव को समझने वाले थे । ये सादा ही राजा और राज्य के हित में तथा लोक कल्याण में लगे रहते थे । वे सब आचार विचार से शुद्ध रहते हुए राजकीय कार्यों में संलग्न रहते हैं । इसी प्रकार उनके दो राजपुरोहित थी ऋषि वशिष्ठ और मुनि वामदेव । वास्तव में ये उपाधियां थी जो उनके गुणों के कारण मिली हुई थी । ये विद्याओं के जानने वालों के नाम है वशिष्ठ तो भ्रम के ज्ञाता को कहा जाता है और वामदेव सांसारिक विद्या के विद्वान की उपाधि । अभिप्राय यह है कि महाराज दशरथ ने अपने राज्यकार्य को दो विभागों में बता हुआ था । एक विभाग धर्म काम से संबंध रखता था । दूसरे विभाग में राज्यकार्य चलता था । इसके लिए आठ उपविभाग भी बनाए गए थे । प्रत्येक पर एक एक मंत्री नियुक्त महाराज दशरथ के कुछ मंत्री ऐसे भी थे जो समय समय पर बुलाए जाते हैं और कभी किसी जटिल समस्या के उपस्थित होने पर उनसे परामर्श किया जाता था । ये धर्म कर उनके जानने वाले ऋषिगण राजा के सभी मंत्री गवार टूशन और भली प्रकार परीक्षित । ये पोस्ट के संचय, उसके उपयोग तथा चतुरंगिनी सेना के सुधर में सर लागू रहते थे । ये राज्य के सत्पुरुषों का सम्मान नागरिकों की सादा रक्षा एवं उनकी समस्याओं का निवारण करते थे । विद्वानों और वीरों को आदर व सम्मान मिलता था । मंत्रियों का एक कार्य यह भी था कि प्रत्येक नागरिक की शिक्षा का प्रबंध करें और उनकी कार्यकुशलता के अनुसार उनके वरुण का निर्धारण करें । यदि कोई नागरिक सक्षम नहीं हो तो उसकी क्षमता अनुसार उसके लिए कार्य ढूंढा जाएगा । राजा सब मंत्रियों को गुरुतुल्य आदर प्रदान करता था और वे अपने सद्गुणों के कारण सर्वत्र विख्यात थे परंतु महाराजा दशरथ नि संतान थे । वे एक के बाद दूसरा और तीसरा विवाह कर चुके थे । इस पर भी उनको पुत्र सुख प्राप्त नहीं था । आपने अनेक सद्गुणों के कारण ही देवताओं ने महाराजा दशरथ के वंशज को धर्म परायण राक्षसराज रावण के विरोध के लिए तैयार करने का विचार किया था । अतः महाराज को पुत्रेष्टि यह करने की प्रेरणा दी गई और महाराज ने स्वीकार करनी ऍम अपने मंत्रियों विधि जो और अन्य महर्षियों की सम्मति से अश्वमेघ यज्ञ एवं पुत्रेष्टि यज्ञ किया । इस यज्ञ में देवताओं का भी एक दूध आया । उसने राजा दशरथ को संबोधित करके का नरेश्वर मुझे प्रजापति लोग का पुरुष डालो न बमबाजी की आज्ञा से यहाँ आया हूँ आप ईश्वर बाल तो देवताओं की आराधना करते हो । इस कारण यह देवताओं द्वारा बनाई हुई खीर आपको भेजी गई है । यह उत्तम संतान की प्राप्ति कराने वाली है । राजा ने दिव्य औषधि अपनी रानियों को खिलाई और समय पर तीनों रानियों संतान बडी । रानी कौशल्या के पुत्र का लाभ राम रखा गया । मंजिल ईरानी सुमित्रा के दो लडते हुए । नाम रखे गए लक्ष्मण और शत्रुवत । सबसे छोटी रानी के कई के भी पुत्र का जन्म हुआ । उसका नाम रखा गया । भारत अच्छा राजा के चारों मित्रो होगा । विधिवत लालन पालन होने लगा । वे ऋषि वासी स्थित है । मुनि, वामदेव इत्यादि गुरूजनों की देख रेख में बडे होने लगे तथा शिक्षित होने लगे । चारों राजकुमार समय पाकर ज्ञानवान और सद्गुणों से संपन्न हुए । उनमें भी राम संघ सबसे अधिक राहतकर्मी, तेजस्वी और जान जान के विशेष दिए थे । वे निष्कलंक चंद्रमा की बाटी अयोध्यापुरी में सोभा बातें चारों भाई होगा । आपस में बहुत नहीं था वे । वे अपनी तीनों माता हूँ । वो पिता का बहुत सम्मान करते थे । मैं उनसे दुलार पाते

11. Devraj Indra Ke Saath Hua Chhal

हूँ । आप सुन रहे हैं रमेश मुद्गल से गुरूदत्त लिखित छेदीराम को असन सोने जो मन सा है श्री राम बहुत ग्यारह । रावण के विंध्यप्रदेश के राजा अर्जुन द्वारा बंदी बनाए जाने के समाचार की भिन्न भिन्न स्थानों पर दिन दिन प्रतिक्रियाएं हुई । देव लोग में केंद्र को पता चल गया कि राजनीति और युद्धनीति में कहाँ अंतर है । व्यवहार मैं राजनीति अपने राज्य में रहने वालों से संबंध रखती है । मैं देश तथा जाती में धर्मानुसार प्रचलित होती है । छत्रों के साथ नीति भिन्न होती है । युद्ध में शत्रु माया का व्यवहार भी कर सकता है । आप की पराजय के पश्चात कोई सुनने वाला नहीं । मेघनाथ ने इंद्र को भी माया सही बंदी बनाया था । उस राक्षस सैनिकों को देवताओं के पहरावे में केन्द्र के पास भेज दिया गया और केंद्र को कहा गया कि देवताओं ने रावण की सर्वश्रेष्ठ नर्तकी को बंदी बना लिया और वह राजा इंद्र को अपना करते हैं और संगीत सुनाएगी । केंद्र छल्ला में फस गया और अपने थोडे से साथियों के साथ लडकियाँ देखने चला गया है वहाँ मेघनाथ नहीं उसे बिना प्रयास ही बंदी बना लिया । एक बार जब इन्द्र बंदी हो गया तो उससे अपनी मनचाही करते हैं । मान वाली नारद मुनि विश्व भर में भ्रमण करते थे और राय सब राजाओं से परिचित थे । उनसे देवराज इंद्र ने राजा अर्जुन की विजय का था सुनी की किस प्रकार नर्मदा के जल को बांध लगा रोकने का प्रबंध किया गया है और जिस से उस फोन नदी क्षेत्र में पानी का बहुत रोका या बढाया जा सकता है । इस विधि से बिना एक भी तीर चलाए रावण के तीन चौथाई सैनिक डूब गए । उस पक विमान जलभर जाने से बेकार हो गया था और डूबते रावण को बंदी बना लिया गया था । केंद्र समझ गया कि आर्य राजा देवताओं से नीति में बाजी ले गए है । उसमें आरियों को ही राक्षसों से भिडाकर रावण का वध करने का विचार बनानी है हम नारद ने कहा देवराज एंड राजा अर्जुन तो हो गया है । आपको स्मरण होगा कि कौशल नरेश राजा दशरथ ने पुत्रेष्टि किया था तो मैं बस पाँच वर्ष के थे । उनकी सबसे छोटी रानी भी उस समय चालीस वर्ष की थी । उसकी तीनों रानियों में से किसी के भी संतान थी । मैं ऐसी संघी ने यह करवाया था उसी अगर में पिता में ब्रह्मा जी के निर्देश पर अश्विनी कुमारों ने यहाँ से रोशन वाला अगर राजा के यज्ञ में भेजा था और उसे राजा दस अपने अपनी तीनों पत्नियों को खाने को दिया था । बडी रानी पचास वर्ष से ऊपर की आयोगी थी है । उसके गर्म में एक अति तेजस्वी पुत्र का जन्म हुआ था । दूसरी रानी सुमित्रा के दो पुत्र हुए थे और तीसरी रानी के लिए पुत्र हुआ था । चारों भाई देवी गुणों से संपन्न और कुशल योद्धा है परंतु उन के बाद दिव्यास्त्र नहीं है और नए ही उनमें उन दिव्यास्त्रों के प्रयोग की योग्यता है । नारद ने आगे बताया, पिता मैंने मुझे अपनी योजना आगे चलाने के बारे में बताया है कि राजा दशरथ का बडा लडका राम अब सक्षम हो गया है और वह रावण को पराजित कर सकेगा । अतः उसे दिव्यास्त्र प्रयोग करने का ढंग सिखाने का प्रबंध करना चाहिए । इस समय गंगा के दक्षिण की ओर विन्ध्याचल की तलहटी के वन में राजऋषि विश्वामित्र अपना असम बनाकर रहते हैं । उनके पास बहुत से दिव्यास्त्र था । मैं की योजना के अनुसार मैं उनके पास जा रहा हूँ और उनको उन अस्त्र शस्त्रों के प्रयोग का ढंग राम को बता देने का आग्रह करूंगा । परन्तु मेरा अनुमान है कि रावण को परास्त करने के लिए ऋषि विश्वामित्र के अस्त्र शस्त्र काम नहीं चलेगा । इसमें आप भी कुछ सहायता करते हैं । केंद्र ने कहा बात ये है की मम्मा के समूह मेरी रावण से संधि हो चुकी है । इस कारण मैं सहायता नहीं कर सकता । ठीक है आपको उससे युद्ध नहीं करना चाहिए परंतु आप ऐसे दिव्यास्त्र तो राम के पास पहुंचा ही सकते हैं जो राम जैसे युवक प्रयोग कर सके । ठीक है मैं यह कर सकूंगा परन्तु मुझसे एक भयंकर भूल हो गई थी और राजऋषि विश्वामित्र गोतम किसी के साथ किए गए मेरे उस स्थल के कारण मुझसे कुपित है । वह मुझ से मिलेंगे भी नहीं । लगता है उनके पास जाने से मेरी सहायता का बेहद खोल जाएगा । दंडकवन में सरभंग ऋषि का आश्रम है जो बहुत पहले लंका में आपने आज समय तपस्या करते थे । माल्यवान ऍसे पीडित ऋषि शरभंग महादेव के पास पहुंचे थे । वहाँ से सहायता नहीं मैं धूमने मुनि की सहायता से सागर पति विष्णु के पास गए थे । भैया विष्णु ने उन्हें दंडकवन में आज शाम बनाकर रहने की सहायता की थी । वहाँ रहते हुए कुछ अन्य ऋषियों के साथ तपस्या कर रहे हैं । ऐसा करता हूँ कि उन्हें मैं अपने शस्त्र दे दूंगा । मैं इस योग्य है कि उनके चलाने का ढंग सीख और सीखा सकें तो ऐसा करिए कि आप सरभंग ऋषि से संपर्क बनाइए और मैं विश्वमित्र जी से बात करता हूँ । नारद मुनि ऋषि विश्वामित्र के पास मदद और पुरूष नगरों के गुजर जाने पर बने वन में जा पहुंचा । राजऋषि विश्वामित्र उन दिनों एक यज्ञ कर रहे थे । उन के कुछ हिस्से भी उस यज्ञ में सम्मिलित हो रहे थे । ऋषि विश्वामित्र नारद को पहचानते थे । अतः देवऋषि नारद के आने की सूचना पर ऋषि विश्वामित्र उनके स्वागत के लिए आश्रम से बाहर आए और देवऋषि के चरण स्पर्श कर उन्हें आदर से आश्रम में ले गए । सम्मान से कुछ आसन पर बैठाकर हाथ जोड पूछने लगा, भगवान् कैसे आना हुआ? मैंने सुना है कि आप इस भयंकर वन में बैठे यह कर रहे हैं और यहाँ पर राक्षसों ने विभिन्न तथा बाधाएं डालनी आरंभ कर दी है । हाँ भगवन ये नित्य यह को ब्रस्ट करने आते हैं । मुझे और मेरे शिष्यों को तो हानि पहुंचा नहीं सकते । मैं अपनी रक्षा के लिए अपने सस्त्र प्रयोग कर लेता हूँ । कठिनाई है कि यहाँ पर बैठे हुए मैं किसी की हत्या नहीं कर सकता । किसी राजा की सेना यहाँ सहायता को आए तो इस आश्रम की शांति नष्ट हो जाएगी । आपकी कहते हो । नारद ने कह दिया मैंने भी ऐसा ही सोना है और मैं आपकी सहायता के लिए आया हूँ । मैं आपका अत्यंत आभारी रहूंगा । देखो रिसीवर आपको कोई सत्रीय कुमार चाहिए जो आपके दिव्यास्त्रों का प्रयोग कर सके और फिर इस वन को राक्षसों से मुक्त करा सके । ये है तो ठीक है परंतु मुझे यह है कि मेरे अस्त्र शस्त्रों का प्रयोग सीकर भले लोगों को भी कस्ट दिन आराम नहीं कर दे रिसीवर सोशल राज्य की राजधानी अयोध्या में राजा दशरथ अपने चार युवा पितरों के साथ रहते हैं । चारों ही दी रीलीज शिक्षित व उत्तम व्यवहार वाले हैं । उनमें सबसे बडा आराम है ऍम जा के सभी गुणों से संपन्न है और इस कार्य में सक्षम भी है । उसका छोटा भाई लक्ष्मण उसका भक्त है । दोनों ही बहुत सुभाव रखते हैं । निश्चय ही उनके हाथों में आपके सस्त्र सुरक्षित रहेंगे । आप राजा दशरथ से आपने यज्ञ की रक्षा के लिए उनको मांगला और यदि वे सुपात्र लगे तो उनको शिक्षा देकर तैयार को निश्चित ही वे आपके यज्ञ के निर्वेग होने में सहायक हो जाएंगे । तत्पश्चात मैं इस धरती को पार्टी वह दुराचारी राक्षसों से मुक्त कर सकेंगे । ये धर्मात्मा राजा के पुत्र धर्म की रक्षा करेंगे । परन्तु महाराज कसरत अपने पुत्रों को यहाँ इस भयंकर वन में भेजना पसंद नहीं करेंगे । इसका प्रबंध हो सकता है । आप राजा के पुरोहित वशिष्ठजी के सामने राजकुमारों को यह की रक्षा के लिए मांग लेना । मैं ऐसी वशिष्ठ आपकी सहायता कर देंगे । अपने गुरु पुरोहित की बात राजा टाल नहीं सकेंगे । इस प्रकार योजना बन गई । उसी दिन राजऋषि विश्वामित्र अन्य मुनियों के साथ अयोध्या के लिए चल नहीं हूँ ।

12. Rishi Vishwamitra Ne Dashrath Se Kiya Anurodh

श्री राम भाग बारह जब किस किन्दा नगरी में रावण और बाली में संदेह हो रही थी तो लगभग उसी समय विश्वमित्र अयोध्या में राज प्रसाद के द्वार पर बहुत द्वारपालों को कह रहे थे । महाराज को सूचना दो विश्वामित्र व कुछ अन्य मुन्नी बता रहे हैं राजऋषि विश्वामित्र के साथ उनके चार से छह भी थे । द्वारपालों ने ऋषि विश्वामित्र का नाम सुन रखा था अतः उनमें से एक आगंतुक ऋषि का नाम सुनते ही बागा और महाराज दशरथ को सूचना देने अंतर पुर में जा पहुंचा और दूसरा उनको आसन देकर जल इत्यादि के लिए पूछने लगा । अंतपुर को गया द्वारपाल दासी द्वारा भीतर सूचना भेज उत्तर की प्रतीक्षा में खडा रहा तासी गई और तुरंत ही लोटी उसने द्वारपाल को बताया महाराज की आ गया है कि ऋषि को आदर सहित अतिथि गृह में ठहराया जाए और उनके विशेष सेवा का प्रबंध हो । महाराष्ट्र हम वहाँ पहुंच रहे हैं । राजनीति का ऋषि यथोचित सत्कार और सेवा की गई । ऋषि अभी विश्राम कर उठे ही थे कि महाराज दशरत अपने पुरोहित, वशिष्ठ और मंत्रियों सहित अतिथि गृह में पहुंच गए । महाराज देशी के चरण स्पर्श कर आज जो सामने खडे हो गए । विश्वामित्र ने महाराज को आशीर्वाद दिया और सामने बैठने को कहा । जब महाराज और उनके साथ आए सब मंत्रीगण बैठ गई तो विश्व मित्र ने महाराजका महारानियों का तथा पुत्रों का कुशल मंगल पूछता हूँ । यथोचित उत्तर पापा । रिषी ने कहा हम एक विशेष कार्य से आए । उस कार्य में आपकी सहायता की आवश्यकता है । यदि आप मेरी बात मानने का वचन दे तो मैं हूँ रिसीवर । यह सब राजपाट और मैं भी परिवार आपकी सेवा के लिए उपस् थित हूँ । आज्ञा करिए । यहाँ से कोई भी व्यक्ति निराश नहीं जाता है । महाराज ऋषि में अपना आश्रय बताने के लिए कहा । भगवान आपका कल्याण करेंगे । मैं अपने सिद्धाश्रम में एक यज्ञ का अनुष्ठान कर रहा हूँ । उसमें कुछ राॅड डालते रहते हैं । मैं चाहता हूँ कि जब तक मेरा यह पूर्ण नहीं हो जाता हूँ मेरी तथा यज्ञ की रक्षा करने वाला कोई वीर पुरुष वह रहे । इस कार्य के लिए मुझे आपके दो पुत्र राम और लक्ष्मण उपयुक्त समझ में आए हैं । मैं चाहता हूँ कि आप उनको मेरे साथ भेज दें । यज्ञ होने पर मैं उनको यहाँ छोड जाऊँ । राजा दस जानते थे किस सिद्धाश्रम ऐसे वन में है जहां किसी राजा का राज नहीं वहाँ राक्षसों का बाहुल्य है । राजा का विचार था कि राम और लक्ष्मण अभी सूप कुमार है और वे राक्षसों से युद्ध करने में सक्षम नहीं । इस कारण है आवाज नहीं, ऐसी का मुख देखते रहेंगे । ऋषि विश्वामित्र ने कुछ देर तक राजा के उत्तर की प्रतीक्षा की और फिर पूछ लिया राजन क्या विचार कर रहे हैं? हूँ । मैं अपनी सेना के साथ तो हम आपके आश्रम की रक्षा के लिए चल सकता हूँ । राम और लक्ष्मण अभी बालक है । इन्होंने अभी तक कोई युद्ध नहीं देखा । नहीं । राजन आप नहीं समझते । यज्ञ की रक्षा के लिए सेना गई तो वैसे हम ही यज्ञ में विघ्न बन जाएगी । साथ ही मैं जानता हूँ कि जो कार्य ये दो बालक कर सकते हैं, आप की एक छोटी सेना भी नहीं कर सकेगी । मुझे आप के दोनों पुत्र चाहिए । बताइए एसवी का अथवा मैं यहाँ से निराश रोड जाऊँ । राजा ने वशिष्ठजी की ओर देखा । वह भी मोहन बैठे रहे । कुछ देर सन्नाटा छाया रहा । तब आदेश में विश्वामित्र उठ खडे हुए । इसका अभिप्राय यह था कि वह जा रहे हैं । उनके उठने पर राजा दशरथ बहत बीत होगी । उन्हें हो गया था कि विश्व मित्र नाराज हो जाएगा । फिर उनको वचन भी देख चुके थे । अतः उन्होंने राजनीति के पकड लीजिए और कहा भगवन मुझ पर दया करेंगे । मुझे मंत्रियों और रोहित जी से संबंधी कर लेने दीजिए । विश्वामित्र बैठ गए और राजा से बोले, यज्ञ की रक्षा किसी देश अखबारनगर की रक्षा के समान नहीं होती । मैं ऐसी बस इस बात को जानते हैं । वहाँ तो एक अथवा दो स्थित धनुर्धर ही चाहिए जो रक्षा का कार्य शांति से कर सके और जब वे सुरक्षा कार्य कर रहे होंगे तब हम शांतिपूर्वक कर सकेंगे तो मैं स्वयं प्रस्तुत हूँ । मैं साथ चलूंगा । राजा बोले नहीं राजन, अब आपकी आयु इस कार्य के लिए उपयुक्त नहीं राजी खुशी बोल । अब वासी सिंह जी ने राजा दशरथ को संबोधित कर कहा, काजल राजनीति ठीक कहते हैं । राम और लक्ष्मण मैं सब कुछ कर सकेंगे जो आप या आपकी पूर्ण सेना नहीं कर सकेंगे । मेरी सम्मति है ये राज देशी को पूजन कर इनको राम तथा लक्ष्मण के साथ विदा कर दिया जाए । इस पर राजा का मुख्य उतर गया । राजा ने दैन्य दस्ती से नाॅट और राजऋषि विश्वामित्र की ओर देख कर कहा भगवन! मुझे उनके जीवन का ध्यान लग रहा है । महाराज जहाँ राजऋषि उपस् थित होंगे वहाँ मृत्यु समीर भी नहीं आ सकती है । इस कथन के पश्चात राजा के पास कहने को कुछ नहीं रहा । सेवक द्वारा राम और लक्ष्मण को वहीं बुला भेजा और उनको समझाकर राजऋषि विश्वामित्र के साथ कर दिया । मार्ग में चलते हुए राजनीति ने राम और लक्ष्मण को अपने विषय में और अपने यज्ञ के विषय में समझाया । नारद मुनि के कथनानुसार विश्वामित्र ने काम इत्यादि वो रावण ऍम के साथ युद्ध के लिए तैयार करना था और इस युद्ध की तैयारी के लिए रावण से युद्ध करने की आवश्यकता की बात बतानी आवश्यक थी । इसके लिए दानव देव संस्कृति में अंतर बताने की भी आवश्यकता थी । इसी उद्देश्य से विश्वमित्र ने अपनी ही जीवन कथा से वार्ता आरंभ कि उन्होंने चलते हुए पूछा राम जानते हो कि मैं कौन हूँ? महाराज इतना ही जानता हूँ कि आप एक ऋषि है और सिद्धाश्रम ने एक यज्ञ कर रहे हैं । यह तो तुमको ठीक ही बताया गया । सिद्धाश्रम के मार्ग में एक ताडका वन है । उस वन का नाम एक ताड का नाम की महसूस तरीके नाम पडा है । वो स्त्री अति बहन कर योद्धा है और उसके साथ ही नर्म आस भी खाते हैं । अतः इस वन के आसपास के ग्रामों में ये किसी भी मनुष्य को बस ने नहीं देते । कोई आ जाए तो उसे लूटकर और मारकर उसका मांस भी खाते हैं । इससे धीरे धीरे वन क्षेत्र बढ रहा है । अतः यदि बातों में दिखती है तो नारी समझ दया नहीं करेंगे । गुरुजी सामने पूछा ये किसकी लडकी और किसके पत्नी है? वह सुकेतु नाम के शख्स की लडकी है । गोल्ड तपस्या के उपरांत उसके घर या लडकी उत्पन्न हुई थी । ये अति सुन्दर देवकन्या के सवाल थी । यस देव लोग के निवासी है । इसका विवाह एक धुंध नाम के व्यक्ति से हो गया । उन इस सुंदर स्त्री पर इतना मुझे हुआ कि वह सादा उसकी आज्ञानुसार काम करता है । ताड का और सुंदर कि संताल एक दुर्जन बाल सियाली उत्तर हुआ । उसका नाम मारीज हमारी मांसाहारी हो गया । इससे मैं जहाँ कहीं भी वन पशु मिलते हैं, उनको मार कर खा जाता है । एक बार मैं अगस्त ऋषि के आश्रम पर आया । अगस्त्य ऋषि उन दिनों देव पुत्रों को पढाने के लिए देव लोग में ही आश्रम बना कर रहते थे । वहाँ बहुत से हम लोगों को अच्छा से बिहार करते देख उनका मांस खाने की लालसा करता हुआ उस आश्रम के पास ही रह गया । वह नित्य आश्रम के लोगों को मार मार कर खाने लगा । रिषी ने उसे मना किया परंतु नहीं माना । इस कारण महर्षि ने मार इस को श्राप दे दिया । क्या शराब दिया सामने पूछ लिया उसको देश निष्कासन का श्राप दिया और इंद्रा ने मैं उसी के कथन का पालन करते हुए मार । इसको देव लोग से निकल जाने की आज्ञा दे दी तो यह शराब कहा जाता है हूँ । ऋषिमुनि किसी की हत्या नहीं करते और ऍम किसी को कोई दंड देते हैं, साहब ही देते हैं । शराब का भी प्राय यह है कि वे किसी पार्टी को उसके पाप का दंड सुना देते हैं और उस दंड का पालन राजा कराता है । यही बात मारीज के साथ हुई । मारीज को देव लोग से निकाल दिए जाने का दंड हो गया । ऋषि का या वचन देव राजेंद्र को बताया गया तो इंद्र ने अपने गण भेज मार इसको देव लोग से बाहर कर दिया । मरीज को देव लोग से निकाला गया तो उसकी माँ लडका को अति दुख हुआ । उसने अपने पति को कहा कि इस ऋषि से यह दंड वापस करवाई । फोन मुझे जी के पास पहुंचा और अगस्त्यजी माने नहीं । इस पर सुंदर ने मुनि जी को मार डालने की धमकी दे दी तो मोदी जी ने उसे मृत्युदंड का श्राप दे दिया । मैं केंद्र की आ गया से मृत्युदंड पा गया । इसपर तो ताडका रोज से भर गई और उसने अगस्त है । आश्रम को उजाडना और वहाँ के प्राणियों को मारना कम कर दिया । इस कारण ताडका को भी देव लोग से निकाल देने का शाप दे दिया गया । बारिश इस वन में रहता था । ताडका भी यहाँ गई और दोनों यहाँ सब प्रकार के उपद्रव करते रहते हैं । इनके मुख को नरमा इसका स्वाद लग चुका है । इस कारण जहाँ भी किसी अकेले या तो अकेले मान लोगों को देखते हैं तो उनको मार कर खा जाते हैं । मैं सन्यासी हूँ, जीवहत्या नहीं कर सकता और इस क्षेत्र में किसी राजा का राज नहीं है । अतः मुझे तुम्हारे पिता के पास जाना पडा । राजा दशरथ चक्रवर्ती राजा है । समझ पा रहे व्रत में जो भी क्षेत्र किसी राज्य में नहीं आता उस की सुरक्षा का दायित्व चक्रवर्ती राजा का होता है और तुम उसका प्रतिनिधित्व कर रहे हो । जब राम और लक्ष्मण इस वन में से गुजर रहे थे कि ताडका से साक्षात्कार हो गया । व्यस्त री मांसाहर के कारण बेडोल शरीर और आपने व्रत दांतों के साथ भयंकर रूप वाली प्रतीत हो रही थी । साथ ही वह युद्ध करना भी जानती थी । राम को पकडा मारकर खा जाने के विचार से लाभ की राम को राजऋषि विश्वामित्र ने सचेत कर रखा था । अतः राम ने उसे देखते ही धनुष पर बाण चलाया । वो राक्षसी की बातें घायल करती । इस पर रोज से भरी हुई राम को मारने के लिए थोडी तो राम ने उस पर बाढ वर्ष का उसे मार डाला । उस के मर जाने पर राम ने मैं उसी से पूछ लिया भगवन यह देवकन्या तो प्रतीत नहीं होती थी । इसका रूपवती विकराल था । आपने कहा था कि एक सुंदर देवकन्या थी परन्तु जब सुंदर से सुंदर व्यक्ति चिरकाल तक जरूर कार्य करता है तो उसका रूप विकृत हो जाता है । नरमा खाने से भी आकृति में विकराल पन उत्पन्न होने लगता है । तब से अधिक प्रभाव पडता है अपने करो और रहन सहन का । इस काॅपी शात्रों वाला था । यही कारण है कि इसकी सुन्दर गाया बद्दी व्यक्तिरूप हो गई थी । डाडका को मारकर उस वन में से निकल सिद्धाश्रम पर जा पहुंचे । बहुत पहुंचते ही राम और लक्ष्मण यज्ञमंडप की रक्षा का प्रबंध करने लगे और ऋषि अपने साथियों के साथ अपने अधूरे यज्ञ की पूर्ति में जुट गए ।

13. Ram Aur Lakshman Ka Shaurya

सुनीराम बहुत तेरह । जब वे ध्वनि उठने लगी एवं अग्नि से सुगंधित द्रव्यों का सुवासित दुआ उठने लगा तो राॅबिन डालने के लिए आने लगे । जो भी आता राम उस पर अपने बडो की वर्ष कर देते थे । जो भाग जाते हैं ये बच जाते हैं । जो नहीं भागते थे ये मर जाते थे । पहले दिन तो कुछ विशेष घटना नहीं हुई । उस राक्षस मारे गए, चेस भाग गई । रात के समय जब सब विश्राम करने के लिए तैयार हुए तो राम ने पूछ लिया गुरु जी आपका यज्ञ तो किसी प्रकार से भी यहाँ के रात हो कस्ट नहीं देता । इस पर भी ये बार बार इसमें विभिन्न डालने क्यों आते हैं? विश्व मित्र ने इसका कारण बताते हुए कहा सादा से यह नीति चली आ रही है कि दुर्जन लोग श्रेष्ठ दलों के श्रेष्ठ कार्यों में बाधा उत्पन्न करते हैं । टेस्ट लोगों के कारण उनके दूराचार उजागर होते हैं । वो उन का सार्वजनिक बहिष्कार होता है । इससे उनमें हीन भावना उत्त्पन्न होती है । इसका निराकरण करने के लिए वेस्ट वेस्ट जनों को ही मारने को तत्पर हो जाते हैं । आज लंकापति रावण जो यहाँ से चार सौ योजन के अंतर पर लंका पर राज्य करता है, सभी दुर्गुणों का प्रतीक है । उसने छल और बल से अपने भाई से लंका का राज्य हथियार तो अच्छा चल से देव लोग को विजयकर देवताओं से भी कर लेता है । उसने आर्यव्रत निवासी भार्इयों पर भी आक्रमण कर दिया था । वह आर्य राजाओं को राजीव नहीं कर सका । एक बार वह सेना लेकर विन्ध्याचल प्रदेश में जा पहुंचा । वह राज्य को विजय कर वहाँ अपना राज्य स्थापित करना चाहता था । इंडिया चल प्रदेश के राजा अर्जुन ने उसे सहजीव बंदी बना लिया । पीछे संधि हुई तो रावण को समझ आ गया कि वह आदिया राजाओं को पराजित नहीं कर सकेगा । अतः उसने आर्यव्रत को विजय करने का ढंग बदल लिया है । शस्त्रों से आक्रमण कर विजय न कर सकने पर उसने इस देश को विजय करने का एक दूसरा उपाय करना आरंभ कर दिया है । उसने ऍम यहाँ भेजे हुए हैं । वे गांव के गांव लूटकर बर्बाद करते जाते हैं । वो किसी से जमकर युद्ध नहीं करते हैं, छापे मारते हैं और आर्यो को लूट मारकर अकेले मिलने वालों को खाकर विन्ध्याचल के दक्षिण के वालों में जान सकते हैं । इस प्रकार पूर्ण विन्ध्याचल प्रदेश के गांव गुजर रहे हैं । लोग अपने घरों को छोड छोड कर भाग रहे हैं और जब कोई गांव अथवा नगर जान सुननी हो जाता है तब धीरे धीरे वहाँ वन बन जाता है । ये लोग तब वहाँ पशुओं को एकत्रित कर अपने खाने पीने का प्रबंध करते हैं और वहीं अपना निवास स्थान बना लेते हैं । मध्यप्रदेश अघोषित रूप से राक्षस प्रदेश बन जाता है । इस प्रकार वे अपनी संस्कृति को धीरे धीरे उत्तर की ओर बढा रहे हैं । इस वन के समेत बसे गांव को भी रावण के राक्षसों ने मारीज के नेतृत्व में उजाडा है और अब वे हमे भी खदेडना चाहते हैं जिससे यह वनस्थली भी सगन वन में परिवर्तित हो जाए । इस प्रकार इनकी राक्षस संस्कृति विस्तार बार रही है । यह है इसके मन में हमारे प्रति इनके व्यवहार का कारण । मारीज को जब अपनी माँ के मारे जाने की सूचना मिली तो वह अपने साथियों के साथ इस वन में आतंका । वह एक मुसल योग था । उसे जब पता चला कि उसकी माँ को मारने वाले दो युवक राजऋषि विश्वामित्र के आश्रम में है तो मैं उनसे युद्ध करने सलाया और युद्ध हुआ । दोनों ओर से डटकर मुकाबला हुआ । अत्याधिक राक्षसों का जन्म हुआ और मारीज घायल हुआ तो उसके साथ ही उसे उठा दम ले गए । इस पर यहाँ घूमने डालने वाले भागने लगे और यह चलता गया । शीघ्र ही सिद्धाश्रम का भवन राक्षसों से मुक्त हो गया और जैसी विश्वामित्र के यह की रक्षा में सफलता के साथ साथ राम लक्ष्मण का व्यवहार एक प्रकार से दोनों भाइयों की परीक्षा थी जिसमें वे दोनों सफल रहे । अब रावण के विरुद्ध युद्ध के लिए राम को तैयार करना था । भविष्य होने वाले राम और राक्षसराज रावण के युद्ध का संतुलन बनाने के लिए देशी विश्वामित्र को अपने दिव्यास्त्रों के लिए सुपात्र मिल गए थे । उनकी शिक्षा रामगढ लक्ष्मण को मिल लेते हैं ।

14. Janakputri Ka Swayamwar

हूँ । श्री राम भाग चौदह राजनीति जो से हम कभी राजा थे, कुशल योद्धा थे और आपने तब केबल से राजऋषि पद को प्राप्त हुई थी । दोनों भाई उनके पास एक वर्ष से अधिक रहे । वहाँ रहते हुए उन्होंने नए केवल राक्षसों से वास्तविक संघर्ष का मूल कारण भी जाना । वर्ग यह की रक्षा की, राक्षसों का ब्लॅक वोटा देखी और उनसे युद्ध करने का ढंग से खाते हैं । राजनीति से अनेक प्रकार के शस्त्रों के प्रयोग का ढंग से राम और लक्ष्मण अभी सिद्धाश्रम नहीं थे । जब ये समाचार मिला कि विधेयक के महाराज जनक अपनी पुत्री का विवाद सितंबर द्वारा कर रहे हैं । देश विदेश के राजा निकला के जनकपुरी में पहुंच रहे थे । इस सूचना से ऋषि विश्वामित्र के मन में एक विचार उत्पन्न हुआ और उन्होंने राम को का राम अब तुम्हारे लोटने का समय आ गया । हम लौटते हुए जनक पूरी चलेंगे वहाँ क्या है गुरु जी महाराज जनक की पुत्री का स्वयंबर हो रहा हूँ । मिथिला नरेश एक व्रत याग्रस् रहे हैं उसकी अगर में दूर दूर से आए राजपुरुष वो विद्वान ऋषि लोग पस्थित होंगे हमें भी चलना चाहिए । काम लक्ष्मण तथा सिद्धाश्रम के बहुत से मुनि मिथुला को चल पडे । मिथिलापुरी कुछ जाते हुए मार्ग में विश्वामित्र, राम, लक्ष्मण और सिद्धाश्रम के मुनियों के साथ मैं सीख गौतम के आश्रम के समीप से नहीं उस आश्रम का सौंदर्य देखो । राम और लक्ष्मण मुग्ध हो गए । राम ने मुनिश्रेष्ठ से पूछा फिर ओवर ये आश्रम इतना सुन्दर है परंतु निर्जन क्यों पडा है? क्या यहाँ कोई नहीं रहता हूँ? राजनीति जी विश्वामित्र ने उत्तर दिया है आज हम महर्षि गोदम का किसी समय यहाँ चहल पहल रहती थी । मैं उसी के धर्म और ज्ञानयुक्त प्रवचन सुनने के लिए दूर दूर से लोग आते थे । कोई न कोई न देश यहां डेरा डाले रहता हूँ । है आजकल सोना बडा इसपर भी वर्षों से यहाँ एक प्राणी रहता है ऍम ऐसी की पत्नी अहिल्या मैं यहाँ नहीं आती इस कारण अब यहाँ कोई नहीं था और माताजी यहाँ अकेली क्यों रहती हैं । जब पति से शापित बात ये है हुई कि उन दिनों जब आश्रम में चहल पहल रहती थी । एक दिन देवेंद्र गौतम ऋषि के दर्शन करने ऋषि कहीं गए हुए थे । केंद्र ने ऋषि पत्नी को देखा तो उस पर मोहित हो गया गहलोट हो गया परन्तु उसके मन में पाप समझ आ गया । इस पर गौतम ऋषि कासा देश बनाकर उन्हें आश्रम में चला गया । आश्रमवासियों ने उसको गोतम रुचि ही समझा और जिस किसी ने भी उसे देखा उन्हें ऋषि समझ आदर और सरकार से आज जोड नमस्कार करने लगा । आश्रमवासियों से ऋषि ही समझा जाने पर आश्वास्त हो केंद्र देशी की कुटिया में चला गया और ऋषि पत्नी के सामने जा खडा हुआ । ऋषि पत्नी उसे पहचान गई और बोली राजन आपने है छात्र देश किस लिए बनाया है और इस देश में आप यहाँ किस कारण आए हैं? केंद्र इस पतिव्रता स्त्री से पहचाना जाने पर चेंपा परन्तु उसने कह दिया सुंदरी मैं तुम पर मोहित हो गया हूँ और तुम से प्रेम करने लगा हूँ । ऋषि पत्नी केंद्र को अपने पर मुझे देख अपने सौंदर्य पर करूँ करती हुई स्वयं देवराज पर मोहित हो गई । केन्द्र के वहाँ से विदा होने से पूर्व ऋषि वहाँ पहुंच गए । उनके पहुंचने का अभी किसी को पता नहीं चला था परन्तु रिची ने केंद्र को छात्रों देश में अपनी कुटिया में देख लिया । नहीं आती ग्रुप हो गए । उन्होंने इंद्र के भोजन में ऐसी ओर साडी मिला दी जिससे मैं नपुंसक हो गया । साथ ही केंद्र को श्राप दिया कि उस दिन के पश्चात मस्त विश्व में कहीं भी किसी भी कारण से केंद्र की पूजा नहीं होगी । केंद्र वहाँ से भागा और सीधा देव लोग में पहुंचा और अश्विनीकुमारों से आज तक अपनी चिकित्सा करवा रहे । मैं ऐसी द्वारा दिए गए । आपको भी अब समझ ऋषि और मुनियों ने लागू कर दिया । जब केंद्र चला गया तो ऋषि ने पत्नी से पूछता हूँ तुम पहचान नहीं सकी इस दूर को ये है दूसरे व्यक्ति जो स्वयं को देवराज कहता है देश बदलकर धोखा देने यहाँ आया था । कृषि बदलने का उत्तर था । पहचान गई थी स्वामी परन्तु में इनके मोदी से प्रभावित हो उनसे ब्रेन करने लगी थी । अब गौतम पत्नी को पश्चाताप लगने लगा । इस कारण मैं अपने पति से क्षमा मांगने लगे । ऋषि तो उसे मृत्युदंड देना चाहते थे परन्तु उसको पश्चाताप करते देख केवल उसका त्याग मात्र ही क्या? इस घटना को कई वर्ष बीत गए । तब से ऋषि यहाँ से दो कोर्स के अंतर पर आपने नवीन आश्रम में रहते हैं और उनकी बडी त्यागता पत्नी यहाँ रहती है । मेहसी के दर्शन करने वाले अब नए आश्रम में जाते हैं तो ये है आश्रम सोना रहता है । मैं समझता हूँ कि वह अपने आप से बढकर राष्ट्रीय कर चुकी है परन्तु मेहसी वो तब आयु में मुझसे बडे हैं । मैं उनको समझा नहीं सकता । रामलक्ष्मण इस तथा वो सुन पति दुखी हुई । राम ने राजनीति से पूछा गुरुजी, उस माँ के दर्शन कहाँ होंगे? वह बहुत दुखी है । यहाँ मैं उसकी वाणी सुनने वाला कोई है नहीं । कोई उनसे बोलने वाला वर्षों से अकेले इस निर्जन आश्रम में अपनी भूल का गोर प्रायश्चित करती हुई मैं एक शिला सामान हो गयी । विश्वामित्र राम और लक्ष्मण को उसी आश्रम के एक कोने में बनी एक कुटिया में ले गए । वहाँ एक अति दीन चीन तपस्विनी आसन पर शोक मुद्रा में पत्थर वक्त बैठी हुई । राम ने उस दुखी स्त्री को देख झुककर नमस्कार किया और कहा माँ! मैं अयोध्या नरेश दशरथ का पुत्र राम हूँ । मेरे योग्य सेवा बताई । अहिल्या इस सहानुभूतिपूर्ण ऍम राजकुमारों का मुख देखती रहेगी । वो कुछ कहना सके । उसकी आंखों में पश्चाताप क्या शुरू गिरने लगे? विश्वामित्र ने उसके मन की गया था के विषय में राम को कहा नहीं । ऐसी गोथॅर्ड अस्या पर भी संतोष प्रतीत नहीं होते । गुरूजी उनको एक बार कहकर तो देखें कि आप समझते हैं की माताजी प्रायश्चित करके पापमुक्त हो चुकी हैं । विश्वामित्र को एक बात सोची । उन्होंने अपने एक साथी मुन्नी को महर्षि गौतम के आश्रम में कहलवा भेजा की ऋषि विश्वामित्र आए हैं और ऐसी गौतम के दर्शन की अभिलाषा करते हैं । विश्वामित्र ने यह भी कहलवा भेजा की उनके साथ इस वन को राक्षसों से मुक्त करने वाले ऍम उधारी अयोध्या नरेश चक्रवती महाराज दशरथ के पुत्र राम और लक्ष्मण भी महर्षि के दर्शन पाने की प्रार्थना कर रहे हैं । बात बन गई महर्षि गौतम आए । आते ही उन्होंने विश्वामित्र को प्रणाम करके है दिया भगवान मैं दूसरे आश्रम में रहता हूँ मैं जानता हूँ । विश्वामित्र ने कहा मैं आज से पूर्व जब भी आप से मिला हूँ तो इसी आश्रम में मैं यहाँ ही आपके दर्शन की अभिलाषा रखता था । आपने यहाँ कर अत्यंत फिर बाकी है फॅार सी राजकुमार राम आपसे कुछ निवेदन करना चाहते हैं । राम लक्ष्मण ने मैं उसी को तुमको परिणाम क्या ऋषि राम की ओर देख उसे आशीर्वाद दिया और कहा राजकुमार बताओ क्या चाहते मैं आपसे एक कृपा का प्रार्थी हूँ, कुछ मांगना चाहता हूँ परन्तु इस आश्रम को सोना देख अति दुखी हूँ । मांगों राजकुमार मेरे वर्ष में हुआ तो बच्चे तो भगवान माताजी क्षमा के योग्य और प्रायश्चित कर चुके है । मोनी वो चरण तक राम का मुख देखते रहे गए । राम ने ऋषि पत्नी की ओर संकेत कर कह दिया इनकी देनी व्यवस्था देखो भगवान आप दयालु हैं अब इन पर भी दया करिए । गौतम ने राम की ओर देख कर कह दिया मस्तू परमात्मा सबका कल्याण करेंगे । ऊं सामने आगे बढ ऋषि के चरण स्पर्श की और ऋषि पत्नी का हाथ पकडकर उसे आसन से उठाते हुए कहा माता जी! परमात्मा का धन्यवाद करिए । आपकी तपस्या सफल हुई । महर्षि जी ने साथ वापिस ले लिया । अहिल्या उठी और ऋषि के चरण स्पर्श करने के लिए जो की तो रिजी ने पत्नी को उठा उसके सिर पर हाथ रख धूंधी हुई वाणी से आशीर्वाद देते हुए कहा अब मैं इस आश्रम में आ गया हूँ और यही रहूंगा । राजऋषि विश्वामित्र नाम लक्ष्मण तथा अन्य तपस्वियों ने मैं ऐसी गौतम ऋषि पत्नी के आतिथ्य में कुछ दिन व्यतीत किए । इस प्रकार ऋषि पत्नी के उद्धार को मान्यता मिल गई । वैसे राजऋषि विश्वामित्र के साथ श्री राम को मिला हूँ ।

15. Mithilapuri Pahunche Shri Ram

श्री राम भाग पंद्रह हूँ । श्री राम और लक्ष्मण द्वारा ऋषि आश्रम निकटवर्ती मन को राक्षसों से मुक्त करवाना अगर राम और राजऋषि विश्वामित्र द्वारा किसी पत्नी के उद्धार आतिथ्य ग्रहण करने का समाचार उनके मिथिलापुरी पहुंचने से पहले वहाँ पहुंच गया था । अदालन जान चली राम की वीरता महिमा और उदारता का यशगान करने लगे । जब ये लोग मिथिलापुर की राजधानी जनकपुरी में पहुंचे तो नगर निवासी इनके दर्शन को आने लगे । ये सभी जनकपुरी के एक उद्यान में ठहरे हुए थे । अब काम के सुगठित शरीर सोमनाथ स्वभाव रूप का वर्णन प्रत्येक नगरवासी के मुख पर था । महाराज नकदी राजऋषि विश्वामित्र और तेजस्वी कुमारों के दर्शन के लिए इनके निवास स्थान पर रहे । राजा जनक ने विश्वमित्र के चरण स्पर्श की और कहा भगवन! इन राजकुमारों द्वारा ताडका वक्त मैं ऐसी गौतम की पत्नी के उधार करने का समाचार यहां पहुंचा । हम इससे बहुत प्रसन्न विश्व मित्र ने महाराज जनक और शिवा दिया और बताया ये ऍम नरेश महाराजा दस लडके जे स्पुत्र, दिव्या शस्त्रधारी कम है और साथ में इनके छोटे भाई लक्ष्मण है । मैं इनको इनके पिता की अनुमति से अपने साथ यज्ञ की रक्षा के लिए ले गया था । सिद्धाश्रम में इनकी रक्षा से मेरा यह निर्देश हूँ समाप्त हुआ है ये दोनों भाई मेरे यह को सफल करवाकर मेरे कृपापात्र चिंता आश्रम से जुडा समस्त वन अब राक्षसी उत्पाद से मुक्त हो चुका है । अयोध्या को लौटते हुए ये राजकुमार और हम ब्रह्मांड आपकी इस सुंदर नगरी के दर्शन को आए । इस पर जनक ने बताया भगवन हमारी कन्या सीता भी अब विवाह योग्य हुई है । आप मेरा आतिथ्य स्वीकार करें और सीता को भी अपना आशीर्वाद देकर जाए । हम उसके लिए चेंबर परंपरा द्वारा वर्ग टूटने का या तुम कर रहे है । बात हमने सुनी है । राजऋषि विश्वामित्र ने कहा और इसी नियमित मैं इन दो राजकुमारों के साथ यहाँ आया हूँ । ईश्वर चाहेगा तो आपकी मनोकामना पूर्ण होगी । राजा ने गहरी दृष्टि राम पर डाली और सम्मोहित से हो बोले राम देखने में योग्य युवक प्रतीत होते हैं परन्तु सीता की इच्छा से उसके वर्ग के लिए एक पैमाना निश्चित किया गया है कि हमारे भवन में रखे शिव के धनुष पर जो बाढ चढा सकेगा पिता का विवाह उससे ही होगा । जॉॅब विश्व मित्र ने कहा यह शर्तो आती कठोर है । मैंने उस दिन उस को देखा है । मैं समझता हूँ कि इस युग में उस पर चिल्ला चढाने में कदाचित कोई ही समर्थ होगा । बहुत से राजकुमार यहाँ आ चुके हैं और अभी तक इस शर्त को पूरा करना तो दूर, उस धन उसको उठाने में भी कोई समर्थन नहीं हुआ । तो फिर कठोर सर किस लिए रखी है? सीता मेरी पालित मैं इकलोती पुत्री है । उसका विवाह किसी बलशाली, गंभीर वृद्धि रियोजना से हो और वह योद्दा, उसका सम्मान एक राजकन्या के समान ही करें । ऐसा भी निश्चयात्मक बुद्धि वाला होगा । ऐसी सीता की मान्यता है । निश्चयात्मक बुद्धि ईश्वर प्रदत्त होती है । ईश्वर ऐसी कृपा अपने सबसे बर्फ पर ही करते हैं । एक ईश्वर ने स्टीवर्ट मेरी पालिता पुत्री का कभी अपमान ना होने देगा । इस पर राम ने गुरूजी के कान में धीरे से कहा गुरु जी, मेरी इच्छा उस धो उसको देखने की हो रही है । विश्वमित्र एक्शन तक आंखे मूंद उन के खोल महाराज अलग को संबोधन कर कहा यह राज कुमार उस घर उसको देखने की इच्छा रखता है । ठीक है कल आप हमारा आतिथ्य ग्रहण करें । राजकुमार भी आपके साथ कल हमारे प्रसाद ने बता रहे हैं तो उनको बहुत अनुज दिखा दिया जा सकता है । यदि है उस पर बाढ चढाकर चला सके तो नहीं पसंद हैं, जीता इनको वार लेगी और रघुकुल के गोरों में कुमार के साथ संबंध बनने से हमारे परिवार का गौरव भी बढेगा । अगले दिन राम और लक्ष्मण विश्वमित्र के साथ राज प्रसाद ने पहुँच गए । वहाँ उन सभी का भव्य स्वागत किया गया । अल्पाहार के पश्चात शस्त्रागार में ले जाकर मैं रहता का धनुष दिखाया गया । राम ने सबसे पहले उस विशाल धन उसको गहरी दृष्टि से देख भगवान शिव का रण कर आंखे मूंद और जोडे । उस दिन उसको हाथ लगाने से पूर्व उसके बंधन को देखा । राम समझ गए कि वह बाल के साथ बुद्धि का प्रयोग भी आवश्यक है । उस भारी भरकम दोनों को सीधे ना उठाकर एक झटके से वृहत्ताकार घुमाते हुए उठाना है । ऐसा ही किया गया सहजीवन उसके हाथ में आ गया । यह दम उस बहुत भारी था । ऐसा प्रतीत होता था कि शताब्दियों से मैं हुआ था, पडा होगा । उस पर चिल्ला चढाना टेढीखीर थी । उस भारी वहाँ प्राचीन अस्त्र की पास ठोक चुकी थी । राम ने ऐसा दर्शाया की वह चिल्ला चढाना चाहते हैं । अच्छा धन उसका एक सिरा धरती पर रख दूसरे सीधे को अपनी पूरी शक्ति से दबा दिया और टूट गया । यही राम ने चाहा भी था, क्योंकि राम जानते थे कि यदि राजा की अनुपस्थिति में किसी गलत हाथ में पड जाता तो अत्यंत में लास्ट शादी सिद्ध होता है । इस प्रकार हम उसके उठा लेने पर राजा जनक ने सीता का विवाह राम से करना स्वीकार कर लिया और इस बात की सूचना अयोध्या भेजी गई और वहाँ से राजा दशरथ अपने परिवार, मंत्रियों तथा पुरोहितों से जनकपुरी आई । ईरान के विभाग के साथ उसके अन्य तीनों भाइयों का विवादी जनक के परिवार की कन्याओं के साथ हो गया । विवाह के उपरांत राजा दशरथ अपने पुत्र और पुत्रवधुओं सहित अयोध्या नोट गए । राज्यभर में राजकुमारों के विवाह पर खुशियाँ बनाई गई । राजा अगर सभी लोग पसंद थे हूँ

16. Devtaon Ki Chinta

श्री राम हाँ सोलह देवताओं और ऋषियों को इन सब घटनाओं से विश्वास हो गया था कि रावण के समान भगवान योजना तैयार हो गया परन्तु दोनों में युद्ध की घोषणा किस प्रकार हूँ और जोर बाली द्वारा बंदी बनाए जाने के बाद रावण कितना बहन भी था कि वह वालों से संघर्ष करने के लिए तैयार नहीं होता था । मैं तो मान लो वो धमचक का राक्षस संस्कृति में विस्तार चाहता हूँ । मैं समझता था कि जब मानव धर्मविहीन हो जाए या सांसारिक सुख भोग लीन हो जाए अथवा बलहीन हो जाए तब इन को परास्त करना सुगम होगा । इसी कारण उसने मानवों के धर्म के चालक ऋषि वहशियों के आसनों को नष्ट करने के लिए अपने भाई घर के अधीन चौदह ऍम भेजे हुए थे । रावण की इस योजना का प्रथम विरोध सिद्धाश्रम में राम द्वारा हुआ था । ताडका और सुबह हूँ बाहर डाले गए थे । राक्षण सेना अधिकांश मारी गई और शेष भाग गई थी । मारीज भी भाग गया था । इस समाचार से तो रावण और भी डर गया था मानो से सीधा संघर्ष नहीं करना चाहता था । अकेले रहने वाले ऋषि मुनियों अथवा अन्य मानवों के पास राक्षस स्त्रियाँ भेज देता था । वे स्त्रियां उनसे विवाह करने की अभिलाषा करती थी जो विवाह के लिए तैयार हो जाते थे । वे राक्षस संस्कृति की संख्या बढाने में सहायक होते थे । जो राक्षस स्त्रियों से विवाह करना ए स्वीकार कर देते थे उनको राक्षस मारकर खा जाते थे । राय लोग इस दूसरी श्रेणी में ही आते थे । यह प्रक्रिया बहुत धीरे धीरे चलने वाली थी । इससे राक्षस प्रसन्न नहीं थे और देवता हताश होते जाते थे परंतु कोई उपाय नहीं था । इस समय एक ओर घटना घटी । राजा दशरथ के मन में वानप्रस्थ आश्रम में जाने की अभिलाषा जाती थी । उन्होंने मंत्रियों और चीजों को भुलाकर अपना विचार बताया और यह प्रस्ताव रख दिया कि राम को युवराज पद पर असीन कर दिया जाए जिससे धीरे धीरे राज्य का भार उस पर डाल ऍम वानप्रस्थ आश्रम की तैयारी में लग जाएगा । सब मंत्रियों और ऋषियों ने इस विचार की सराहना की और इस शुभकार्य के लिए दिन नियत कर दिया गया परन्तु देवताओं का कार्य इन सब से चलने वाला नहीं था । कौशल राज्य गंगा के उत्तर में था । गंगा को पार कर दक्षिण की ओर कई छोटे छोटे राजा थे । उसके बाद यमुना थी । यमुना से बाद बीहड वन प्रदेश था और उसके बाद विन्ध्याचल था । विन्ध्याचल के दक्षिण की ओर उपद्रवी राक्षस रह रहे थे । प्रजा भाग भाग कर उत्तर के राज्य में आ रही थी । वहाँ की वो में उपजाऊ थी परंतु जनसंख्या कम थी । सोशल राज्य में तो अभी इसका प्रभाव नहीं हो रहा था । अतः राम का रावण से कभी भी आमना सामना होने की संभावना नहीं थी क्योंकि रावण अब लंका के बाद बहुत कम निकलता था । इस कारण देवता समझने लगे कि रावण और ऍम की पराजय का जो आयोजन ब्रह्मा ने किया है, सफल हो जाएगा । रावण को लंका का राज्य प्राप्त किए पच्चीस वर्ष के लगभग हो चुके थे और जो उपद्रव दक्षिण आर्यव्रत में मजा आ रहा था उससे प्रदेश गुजर रहा था और राक्षसी प्रवृत्ति और संस्कृति बढ रही थी । यह चर्चा केंद्र ने नारद मुनि से चलाई । नारद ने कहा था कि भारत का भ्रमण कर के आ रहा है तो इंद्र ने पूछ लिया तो राम रावण का युद्ध कब होगा । रावण अब द्वंद युद्ध नहीं करेगा । बाली द्वारा पकडे जाने के उपरांत उसे साहस नहीं हो रहा है कि वो किसी से भी द्वंद युद्ध करें । अतः रावण तो दोनों युद्ध करेगा नहीं हाँ राम उसे ललकारें ऐसे हुए बिना नहीं रहेगा । कैसे होगा यह युद्ध दोनों एक दूसरे से सात आठ सौ कोर्स के अंतर पर है । उसके लिए मैं या तो कर रहा हूँ । इस अर्थ में अयोध्या गया था और वहाँ एक पास हैं का आया हूँ । मुनि जी क्या पासा फेंक आए हैं । इंद्र ने उत्सकता से पूछ लिया बताने का नहीं है । मैं ऐसा समझता हूँ कि उस साल से राम फॅस देश में पहुंच जाएगा और तब दोनों मुख्य पुरुषों का आमना सामना हो जाएगा । यह वैसा ही होगा जैसे कि विष्णु भगवान् का युद्ध माल्यवान की सेना से हुआ था । परन्तु विष्णु के पास तो गरूड और सुदर्शन चक्र था । राम के पास ऐसे साधन है नहीं, ये साधन आपके पास है । आप उसे राम को देंगे है । आपको किसने का कहा तो किसी ने नहीं । मैं अपने मन में विचार कर रहा था की आपसे कहूँ कि आप इन शस्त्रों को राम को दे दे । नहीं मुनिजी ये साधन तो भगवान की उपाधि प्राप्त व्यक्ति के ही काम आ सकते हैं । अब क्या कमी रह गई है राम को भगवान घोषित करने में आप अम्मा जी से कहकर राम को भगवान की उपाधि से विभूषित करा दें । ऐसा करने की सामर्थ्य बमबाजी में है । अच्छा मैं विचार करूंगा । केंद्र उत्तर दिया कम से कम आप ब्रह्मा जी से इस विषय पर चर्चा तो करें

17. Naradmuni Ki Chaal

सिवि राम बाहर सत्रह नारद मुनि की चाल है थी कि राम को किसी प्रकार अयोध्या से निकलवाकर उन दिनों में भेज दिया गया, जहां राक्षसों को उत्पाद हो रहा था । इसके लिए मुन्नी ने मंत्रा को प्रभावित किया था । मंदिरा कह गए के मैं कैसे आई? वो लगी दासी थी । उसे तैयार किया गया कि वह रानी के कई को बताए कि कौशल्या के पुत्र राम को राज्य मिलने पर राजनाथ असर सन्यासी हो जाएंगे क्योंकि अभी तक राजा सबसे अधिक उसको जाते हैं तो उसकी अनुपस्थिति में उसकी स्थिति हो कर एक दासी के सम्मान और उसके पुत्र की स्थिति ऐसी हो जाएगी जैसे कि नगर में किसी साधारण स्त्रीपुरुष की होती है । यह बात मंत्रा उसकी एक अन्य दासी सकी द्वारा कह गए के कान में डाल दी गई । इस समय राम के विवाह परन्तु उसको युवराज बनाए जाने का समाचार राज्य के मंत्रियों के विचाराधीन ही था । सामान्य प्रजा को अभी या विधित नहीं हुआ था, जब मंत्रा मैं उसकी सकी नहीं । यह बात रानी को कही तो उसको विश्वास नहीं आया । उसका विचार था कि यह समाचार झूठ भी हो सकता है । इस पर भी कल्पना करने लगी थी कि यदि है समाचार ठीक हुआ तो क्या सकते ही उसकी भारत की ऐसी दशा हो जाएगी । परन्तु एक विचार यह भी था कि कुछ भी हो राम उसको बहुत ही सम्मान देता है और कौशल से अधिक स्ने कह कई को करता है । राम को भारत भी अतिप्रिय राम ही चारों राजकुमारों मेसेज उस दिन इसी असमंजस की स्थिति में बीत गए परन्तु कोई घोषणा नहीं हुई । रानी के मन में एक विश्वास है भी था कि राजा उस को सबसे अधिक माल देते हैं क्योंकि वो तीनों रानियों में सबसे सुंदर और छोटी है । पिछले युद्ध में उसने राजा की बहुत सहायता भी की थी और इसलिए कुछ भी बात हो राजा सबसे पहले उसे ही बताएंगे । कुछ दिन में बात आई गई हुई ही थी कि राज्यसभा में या निर्णय हो गया कि राम का युवराज के रूप में अभिषेक किया जाएगा । किसी अज्ञात कारण से यह समाचार उचित घोषणा से पूर्व सामान्य प्रजा में प्रसारित हो गया । मंत्रालय समाचार को अयोध्या नगर में और सोलाह से कहा जाता सुना । अतः इस समाचार को सुनते ही वह अपनी रानी कैकई के समूह उपस् थित हो बोली महारानीजी कुछ सुना है क्या काम के राज्यभिषेक वाली बात सत्य है और कल हो रहा है सकते हैं । मन के भाव छुपाकर रानी बोली ये है तो अत्यंत हर्ष की बात है । महारानीजी अयोध्या के उन्होंने कावडे भी इस समाचार की चर्चा कर रहे हैं । परन्तु यहाँ राज प्रसाद में इसकी गंध तक नहीं है । इसमें कुछ कारण रहा होगा । क्या कारण हो सकता है? मंत्रालय माथे पर पूरी तरह अगर पूछा कोई राजनीति की बात रही होगी? नहीं । रानी जी यह राजनीति की नहीं वार नहीं है । राज प्रसाद में चल रही नीति की बात देखिए आपको इस समाचार का ज्ञान नहीं और फिर है कल ही हो रहा है । इस समय आपका पुत्र यहाँ नहीं है । मैं ननिहाल में है । मुझे तो विश्वास है कि यह समाचार आपसे छुपाकर रखने के लिए प्रसाद ने किसी को नहीं बताया गया था । एक बात तो है समाचार आज से दो सप्ताह पूर्वी साधारण प्रजा जानती थी । मेरी एक सकी मैंने आपको बताया था परंतु आपको विश्वास नहीं हो रहा था । आज पचास खर्च मना रही है । आप आज भी अनजान यह देख वन विषाद से भर गया है । पर मंत्रा यह सब क्यों? महारानी मैं इसके कुछ वर्षों प्रांत की बात देख रही हूँ । महारानी कौशल्या राजमाता होंगी और आप तथा महारानी सुमित्रा एक सामान्य प्रजा किसी स्थिति में हो जाएंगे । जानती है आप की स्थिति क्या होगी । केवल मात्र निर्वाह करता की निर्वाह करता का भी प्राय यही होता है कि निर्वाह के लिए मिलने वाली व्रती पानी वाला महारानी सुमित्रा की स्थिति तो फिर भी आप से अच्छी होगी । उनका पुत्र लक्ष्मण राम के साथ उसके साइड की बहुत ही रहता है । राम अवश्य लक्ष्मण को किसी अधिकार युक्त कार्य पर लगा देगा परन्तु भरत तो बाल्यकाल से ही ननिहाल में रहते हैं और उनका राम से अधिक हेलमेल भी नहीं रहा । अतः उनकी और आपकी स्थिति बहुत ही हीन होने वाली है । कई नहीं । इस अभी दो मिल चित्र की कल्पना की तो उसका दिल भीतर ही भीतर बैठने लगा । इस समय तक रानी के मन में मंत्रा में उसकी सकी द्वारा डाला गया विश्व भी धडपकड रहा था । इस निराशा की व्यवस्था में उसने कह दिया मंत्रा कदाचित तुम ठीक कहती हो परन्तु देखो इसका दोस्तों में अपने भाग्य को ही दे सकती हूँ । यज्ञ में उपलब्ध देवीपद हम तीनों रानियों ने एक साथ ही खाया था परन्तु पुत्र कोशल्या के पहले हुआ जो करने की आवश्यकता नहीं । रानी जी अपनी अर्जित स्थिति से लाभ उठाना चाहेंगी । पश्चिम के असुरों के साथ वो युद्ध में आपने महाराज की सहायता की । यह सहायता उसी युद्ध में दो बार संपन्न हुई थी । उस समय महाराज ने प्रसन्न हो आपको दो वार दिए थे । आपके फेवर आज भी शेष और सुरक्षित है । आज अवसर है उन वर्गों को मांगने का, परन्तु उसके उपरांत तो युग बीत गया है । महारानी छतरियों का बचल चलता नहीं । न सूर्य अपने स्थान से चल सकता है, न सूर्यवंशी सत्रीय का वजन । राजाजी को उन वरों का मन कराइए और दो बातें मांगी । एक यह है कि राज्यभिषेक भरत का हो और दूसरा ये है कि राम को देश निष्कासन की आज्ञा दे दी जाएगी । यह है क्यों? इसका कारण कीरान यहाँ राज्य में रहता हुआ लोकप्रिय हो रहा है । भारत के राजा बन जाने पर वह भी राम की दया पर ही रहेगा । अतः कम से कम कितने साल के लिए, जितने में आप समझती है कि भारत का राज्य सुदृढ हो सकता है । राम को वनवास दिलवा दीजिए, फोन मानेगा इस बात को महारानीजी आप सत्याग्रह कर दीजिए, खाना पीना बंद कर दीजिए, अपने को शोक अभिभूत प्रकट कीजिए । अपने अधिकारों के लिए कुछ कस्ट सहना ही तो तपस्या कहलाती है । तपस्या एक देवी गुड है । आप यह करने में योग्य है जो ही मंत्रा की वाक चौधरी का प्रभाव कह रही पर हुआ कि उसके प्रसाद में ये बुझा दिए गए । रानी ने अपनी बेनी खोल दी भूषण उतार दिए और शोक के समय पहनने वाले सामान्य वस्त्र पहले भूमि पर लेट गई हूँ । श्री राम भाग अठारह

18. Rajya Abhishek

श्री राम भाग अठारह राज्य विषय की तैयारी के कारण वह दिन राजा के लिए बहुत अकाउंट वाला और नंबर मध्यरात्रि के समय महाराज दस रत को अवकाश मिला । रामके युवराज पद पर आसीन करने का समाचार सबसे पहले अपनी सबसे प्रिय रानी कैकई को सुनने के लिए पहुंचे परंतु कैकई के भवन की शोक युक्त व्यवस्था देख स्तब्ध खडे रहे गए । उन्होंने एक दासी से पूछा यहाँ अंधकार क्यों हैं? दासी जानती हुई भी बता नहीं सकी । उसने कह दिया महाराज, मैं नहीं जानती महारानीजी भीतर है । राजा जिसमें ग्रस्त भीतर के आगारों में पहुंचे तो वहां व्यवस्था और भी बुरी देख वो लम्बे लम्बे पक उठाते हुए अंतपुर में जा पहुंचे और वहाँ रानी के आगार में सर्वथा अंधकार देख आवाज देने लगा । महारानी महारानी कहाँ गए? उनके मन में भर समझ आ गया था कि किसी प्रकार की दुर्घटना हो गई है । महाराज के कई बार पुकारने पर एक धीमी सी आवाज आई । परमात्मा का धन्यवाद है कि आपको यहाँ आने के लिए अवकाश मिल गया है । आवाज की दिशा में दशरत गए तो अंधेरे में उनका पाओ किसी से टकराया और गिरते गिरते बचे । यह कह रही थी अरे तुम यहाँ किसलिए पडी हो? दशरत में पूछ लिया मैं वहीं हो जहाँ आपने मुझे पटक दिया है मैंने और ये अंधकार भी मैंने किया है क्या हमारा अब आप आए हैं तो प्रकाश कर दीजिए । दशरथ ने ताली बजाएंगे । दासी आई तो महाराज ने आज्ञा दी प्रकाश करूँ । अब उस बडे आगार में एक दिमासा प्रकाश कर दिया गया । महाराज रानी के समय भूमि पर ही बैठ गए और पूछने लगे क्या कस्टर देवी मुझे तुरंत सूचना क्यों नहीं भेजी? ढोल नगाडों के तुम नाथ में यहाँ के चेंज धोनी आप तक कैसे पहुंचती? जान नहीं उस बस बात करुँ । आज हम बहुत पसंद है । आज मांगो जो मन में आए । वर्मा को हम देंगे । पहले दिए वर्ग और वजन का क्या करोगे? कौन से वजन पूरे नहीं किए । अब कई कई उठकर भूमि पर बैठ गई और माथे पर थोडी चलाकर बोली तो अवस्था बडी हो जाने के साथ स्मृति भी होने लगती है । यह बात तो है परन्तु तुम तो बोली नहीं हुई । रानी स्वर्ण करा दो तो हम उन को भी पूरा कर देंगे । काॅन् करवाया । उसने कहा एक बार पश्चिम देश में असुरों से युद्ध करते हुए आप फसलों से गिर गए थे और आपका टूट गया था । आपको स्मरण है कि तब क्या हुआ था वो याद आ गया । उस युद्ध में दो बार तुमने हमारी जान बचाई थी और हम ने दो ओवर दिए थे । अच्छा पहले उन्हीं को मांगों बताओ हम क्या करें कि हमारी रानी इसको को छोडकर हम पर प्रसन्न हो जाएगा । मांगूंगी परमन जानती हूँ कि आप उस बात को पूरा नहीं करेंगे । ऐसे जानती हो कि हम अपना दिया वचन पालन नहीं करेंगे । कभी पहले भी ऐसा हुआ है । ऍम कह दिया हाँ, पहले तो आपने कभी अपना वचन भंग नहीं किया परन्तु हम मन कहता है कि आप वजन से बदल जाएंगे? नहीं । रानी मांगों रघुकुल की देती है । प्राण जा सकते हैं पर वजन नहीं । मांगों आज आपने दो वर्ष मांग ही लोग तो सुनिए हमारा मैं चाहती हूँ कि भारत को युवराज पद पर आसीन किया जाए और राम को चौदह वर्ष तक वनवास की अग्या दे दिया । राजा दस तो सन्न रह गए जैसे सीधे नफ्से धरती पर आएगी । आवाज रानी का मुख देखते रहेंगे । कितनी देर तक गांधी के चेहरे पर भीतर भीतर देखते रहे । तब रानी ने व्यंग्य से कहा छोडो राजन! आपने छत्रिय सूर्यवंश की परंपरा का विमान अपने वचन आप क्या पूरा करूँ । अब राजा दशरथ कैकई से युक्ति करने लगे । वह चाहते थे कि रानी कुछ और वस्तुओं मांग ले परन्तु कई नहीं मानी । जब बहुत समझाने बुझाने पर भी रानी नहीं मानी तो दशरथ मौन हो गए । इस पर कह रही नहीं उन्हें बताना देकर कह दिया बस हो गई बात पूरी । अब आप जाइए और भविष्य में रघुकुल की रीति की डिंग मत । हल्का करीब राजा मुझसे कह नहीं सके कि वह वचन का पालन करेंगे अथवा नहीं । कई को एक बात सुन उसने राम को बुला भेजा और उसके समूह उसके पिता के वचन वो उनकी मन स्थिति का वर्णन कर दिया । राम क्षत्रिय स्वभाव के पितृभक्त युवक थे । ऐसा वीर जिसके लिए जीवन और मरण एल सामान, उसके लिए राज्य जैसी वस्तुओं का त्याग बहुत ही सामान्य । बाद उसने कह दिया माता जी आप चिंता नहीं करें । पिता द्वारा आपको दिया हुआ वचन पूरा होगा । मैं कल प्रात है वन के लिए प्रस्थान करते हैं हूँ ।

19. Pran Jaye Par Vachan Na Jaye

हूँ । श्री राम भाग उन्नीस रामवन जाने को तैयार हो गए राम भक्त लक्ष्मण उस समय साथ ही तब क्रोधित लक्ष्मण का स्पष्ट कहना था, भाई राजा किया गया धर्मयुक्त नहीं है । अगर आप वन को मत जाइए और यदि भारत राजा बनता है तो मैं उससे तथा अयोध्या की संपूर्ण सेना से युद्ध कर उसको परास्कर । यह राज्य उससे छीन होगा । राम ने कहा लक्ष्मण यह समय क्रोध करने का नहीं है । मुझे राज्य का लोग नहीं है । मेरे लिए पिता के वचन का पालन ही धर्म है । पिता ने माता कैकई को जो वचन दिए हैं उनका पालन करना उत्तर का ही धर्म है । अतः मैं निश्चित जीवन को जाऊंगा । लक्ष्मण ने कहा भैया आप मेरे प्राण है । आपके बिना मैं जीत नहीं रह सकता । अतः आपकी सेवा के लिए आप के साथ चलूंगा नहीं । लक्ष्मण वनवास किया गया केवल मेरे लिए काम नहीं करता हूँ आप मुझे रोक होगी तो भी मैं आपकी आज्ञा का उल्लंघन करके आपके साथ चल होगा । समस्या चेता की उपस् थिति हुई । उसने भी स्पष्ट कह दिया पत्नी का धर्म है कि पति के साथ रहे अतः मैं भी वन जाऊंगी । मैं पति के सुख दुख की भागीदार हूँ । विवस नाम दोनों को साथ लेकर वन को जाने की तैयारी करने लगे । इस पर राज प्रसान में और हम मच गया । कुछ देर पहले जहाँ खुशियाँ नाच रही थी अब मातम साला हो गया । काम लक्ष्मण तथा पुत्रवधू सीता तीनों के वन को चले जाने का समाचार सुन राजा दशरत अति व्याकुल होते हैं । नाम की माँ को चलना राजा को बार बार उसने लगी । इस पर राजा दशरथ बोले, कौशल्या, अब अधिकमत कोसौंप अब और नहीं सह सकता । मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा है कि अब मैं जीवित नहीं रह सकता । जीवन में सुख दुख कारण नहीं होते हैं । मुझे उत्तर उपयोग हो रहा है । यह भी मेरी एक बहुत बडी भूल के कारण ही है । उसी को स्वर्ण कर मैं व्याकुल हो रहा हूँ और मुझे अपना अंतिम समीप दिख रहा है । अच्छा राजन! मैं कुछ नहीं कहूंगी, आप शांत हो जाइए । कोशल्या ने कहा देवी मैं अपना पापकर्म तुमसे कहकर ही शांत हो सक होगा । यही मेरा प्रायश्चित सोलो मैं सुनाता हूँ । राजा दशरथ ने अपनी युवावस्था की एक घटना सुनाती । अभी उनका विवाह नहीं हुआ था । उन्हें जंगली जीवों का शिकार अतिप्रिय धनुषबाण पर उन का बहुत बडा अभ्यास था । बिना लक्ष्य को देखे केवल आवाज सुनकर वह निशाना बाद तीन से लागत शिकार किया करते हैं । एक रात्रि वह जंगल में शिकार खेलने निकले । सरयू नदी के किनारे किनारे मैं जा रहे थे । दूर उन्हें पानी की आवाज सुनाई दी । यह समझ की कोई जंगली पश्चिम जल्दी नहीं आया है । उन्होंने आवाज को लक्ष्य अगर पांच छोड दिया पर अगले ही छड एक आदमी की पुकार सुनाई दी आए मैं मर गया । मुझे तुरंत अपनी भूल का क्या हुआ? यह तो कोई मनुष्य निकला जो पानी पीने आया था । मैं भागा भागा उसके पास जा पहुंचा । मैंने देखा एक युवक भूमि पर लेटा हुआ है और उसके वक्ष में बाहर लगता जय करा रहा था । मैंने अपनी भूल समझ उसे छमा मांगी और अपना परिचय दिया । उस युवक ने कहा राजन ये आपने क्या किया तो मैं यहाँ अपने अंधे माता पिता के पीने के लिए जल लेने आया था । मैं नहीं बताऊंगा । वे प्यार से तरफ रहे होंगे । आए उन्हें जल कौन की लाएगा? कुछ समय सांस ले । मैं बोला राजन, आप मेरे वक्ष से यह बात निकली जिससे मेरी पीडा शांत हो और मेरे प्राण शांति से निकल सकते हैं । फिर आप पात्र में जान ले जाए और मेरे माता पिता की प्याज हो जाएगा । यह कहकर उसने व्यवस्थान बता दिया जहां उसके माता पिता जल की प्रतीक्षा में बैठे थे । मैंने उसके वजह से बाढ निकाला और वह युवक अपनी पीडा से मुक्त हो मर गया । तब मैंने जल से भरा बात लिया और उस व्यक्ति द्वारा बताये स्थान पर चला गया । वास्तव में उस आदमी के रद्द माता पिता प्यार से व्याकुल बैठे उत्तर की प्रतीक्षा कर रहे थे । राजा ने जल से भरा बाद उनके सामने रखती है । जब व्यक्ति बोला बेटा तुमने देर क्यों करती है? हम प्यास इंडिया कुल हो रहे थे । माता पिता दोनों बन्दे थे । इस कारण वह मुझे अपना पुत्र ही समझ रहे थे । मैंने कोई उत्तर नहीं दिया । इस पर उस रद्द को संदेह हुआ । इसमें पूछा तुम कोल हो तो तुम हमारे बहुत सरवन तो नहीं हो, श्रवण का है । जल्दी बताओ नहीं तो हम ये जब नहीं पिएंगे । मैंने उत्तर दिया भगवान मैं दशरथ हूँ । भूल से मेरा वार्ड आपके पुत्र को लग गया और उसने यह जल आपके लिए भेजा है । यह आप ग्रहण कीजिए परंतु कहाँ है? उन्होंने पूछा मेरा उत्तर था उसने प्राण त्याग दिए हैं । मैं आती हूँ अब आप मुझे छमा कीजिए । ये है दोबारा समाचार सुन माता पिता दोनों रिहल हो रोने लगे । उन्होंने कहा, दसरथ, तुम हमें हमारे पुत्र के पास ले चलो । हम देख नहीं सकते पर हम उसके शरीर को छूट हो सकेंगे । इससे ही हमें शांति मिलेगी । मैं दोनों को श्रवण के शव के पास ले गए । माता पिता दोनों ने स्वर्ण के मुख पर तथा शरीर पर हाथ से रहा । इससे उनका दुख और बढ गए । उन्होंने विलाप करते हुए कहा दसरथ तुमने हमारा सबको छीन लिया । हमारा इकलोता बेटा हम बन्दों का एकमात्र सहारा समाप्त हो गया । अब हम जीवित नहीं रह सकते हैं । हम ऍम रहे तुम ने छमाई है परन्तु हम तो में न दंड दे सकते हैं न छमा । इस पर भी भगवान तुम्हें इसका दंड देगा । जैसे हम अपने पुत्र के वियोग में प्राण छोड रहे हैं उसी प्रकार तुम भी एक दिन अपने पुत्र के वियोग में कांड छोडो कितना है? दोनों ने वहीं प्राण त्याग दिए । दसरथ नहीं खता कौशल्या को सुनाई और कहा आज मैं अनुभव कर रहा हूँ कि उनका शाहब फलीभूत हो रहा है । कोशल्या अब मैं जीवित नहीं रह सकता । मेरा अंत आ गया है । तुरंत ही राजनीतिज्ञ को बुलाया गया परंतु उसके आने से खून भी राजा दशरथ के प्राण पखेरू उड गए हैं ।

20. Vanvas Chale Shri Ram

श्री राम भाग बीस दशरत मन से तो चाहते थे कि रामवन को न जाए परंतु इस बात को वह अपने मुख से नहीं कह सके । नहीं चाहते थे कि कोई कैकई को समझाएँ । कुछ मंत्रियों ने राम को समझाने का यत्न भी किया था की माता द्वारा मांगे गए इन अधर्मयुक्त वरों का पालन करने से इंकार करते हैं । युक्ती देने वालों में सबसे प्रबल तार लक्ष्मण का था । लक्ष्मण का कहना था कि यदि गुरु भी कोई युक्तियुक्त बात कहे तो राजा को उसकी अवज्ञा करना पाप नहीं होता । परंतु राम ने कह दिया मैं अभी राजा नहीं हूँ, मैं तो पिता का आज्ञाकारी पुत्र मात्र और इसमें युक्तिसंगत बात तो है ही नहीं । ये है तो मात्र पिता का दिया वजन है । इस प्रकार सुमंत ने भी राम को समझाया राम का उत्तर सारो था स्पष्ट था राज्य पिता का वचन भी पिता का जब राज्य का अधिकारी आप मुझे मान रही है तो वचन पालन का अधिकारी तो मैं हूँ मेरे लिए । इस तो उस राज्य पद से अधिक महत्वपूर्ण पिता का वजन है । अतः पिता के वजन को ऐ सत्य सिद्ध योग क्या राम ने वन जाना स्वीकार कर बोल की थी । ताजा दस रात को क्या अधिकार था कि वो राम के वनवास का वजन देते हैं । राम जीता और लक्ष्मण का रहन व्यवहार महान जीवनों उद्देश्य से संबंध रखता है । पिता ने किसी को एक वचन दिया था और बिना राम के वन गए पालन नहीं हो सकता हूँ । राम ने इस वजन को चित्र ही वाला तथा इसे उतारने के लिए वन जाना स्वीकार किया । चेताने पति के साथ रहना स्वीकार किया । यह भारतीय संस्कृति और सभ्यता के अनुरूप हो या न हो परंतु एक पत्नी द्वारा त्याग का अनुपम तो है ही । इसमें विशेषता यह है कि वनवास उसके पति को मिला था । उसके लिए वन में जाने की बात नहीं है या दी गई थी तो अपने जीवन साथी के प्रति अपना कर्तव्य और निष्ठा पालन करने के लिए ही उसने अपने को वास्तविक सुख दुख का साथी सिद्ध कर दिया । जीताने राम को यह नहीं कहा कि वह अपने पिता का वचन पालन नहीं करेंगे । यह कहना उसने अपने अधिकार के बाहर समझा । राम के साथ जाना अथवा नहीं जाना उसके अपने विचार का विषय था । उसने निश्चय राम के साथ जाने के पक्ष में किया था । इसमें उसे अपार कस्ट भी हुआ परंतु उसने चौदह वर्ष के वनवास के दिनों में या उसके उपरांत भी कभी मुझसे उस नहीं कहा जो सीता की महानता थी, जिससे उसका नाम अमर हो चुका है । आज युगों के पश्चात भी साधारण जान जैसी आराम या जैसी तारा रम कहते हैं । लक्ष्मण की समस्या भिन्न थी । वो राम से प्रेम करता था और उस पर श्रद्धा रखता था । उसकी मान्यता थी कि बिना राम के उसका कोई अस्तित्व ही नहीं । अतः बिना सोचे वन में राम को होने वाले कस्ट में भागीदार बनने के लिए चल पडा । यही कारण है कि राम लक्ष्मण का नाम एक साथ वीरता प्रेम का प्रतीक बन गया है । लक्ष्मण की पत्नी ने पति के साथ जाना स्वीकार नहीं किया कदाचित माता सुमित्रा की सेवा के लिए ये है अंतर तो और मिला और सीता के बहुत को प्रकट करता है और यही अंतर करन बन गया की उर्मिला गाना केवल इतिहास पढने वालों को ही गया था । उसका राम की कथा में कोई स्थान नहीं । वास्तव में कई को समझाने और उस पर दबाव डालकर रामके प्रति उसके घर का निवारण करने का उचित यतन नहीं किया गया । सुमंत ने एक बार क्या कही से कहा था कि है इतनी कठोर मांग नहीं करें परंतु कैकई ने उसे डांट दिया था । यदि यही बात वशिष्ठ कहते तो कदाचित कई मान जाती है और राम वन को नहीं जाते हैं । तब मैं राम रावण युद्ध होता और नही आज राम विश्व के फोर्टी गोटी मानवों के पूछे होते हैं । राजा दशरथ का देहांत हो गया । यदि वह भारत के लौटने तक जीवित रहते तो कदाचित गोत्र की प्रेरणा पर कह गए अपना वचन वापस ले लेती और पिता वन में जाकर पुत्र को वापस ले आता हूँ । जब श्री राम अयोध्या पुरी से वनवासियों के से वस्त्र पहने हुए निकलने लगे तो पूर्व वासियों ने मार्ग रोक लिया और इस गौर अनर्थ कार्यकारियों के लिए आकार करते हुए आग्रह करने लगे कि रामवन को नया जाएगा । श्री राम ने बहुत स्पष्टता से प्रजा और राजा की मर्यादा बताते हुए कहा आप प्रजाजन हूँ । आपको राज्य में रहते हुए राज्य नियमों का पालन कर अपने धर्म का पालन करना चाहिए । ताजा जो भी हो उसे प्रजा का पालन पिता के सम्मान करना चाहिए । हाँ, यदि भारत अधर्माचरण करने वाला सिद्ध हो तो उसको राज्य बहुत करने का अधिकार विद्वान ऋषि जनों का है । पुरवासियों के लिए तो यह युक्ति का विषय नहीं था । वे तो श्री राम से प्रेम बस कह रहे थे कि वह अयोध्या में ही रहे परन्तु जब राम नहीं माने तो वे सब बिना विचारे प्रेम वर्ष ही श्री राम के साथ साथ चल पडे । यहाँ उनकी श्रद्धा थी जो एक जननायक के प्रति रामदत्त को घेरे हुए । अयोध्या के रहने वाले सहस्त्रों ही नर नारी बाल रद्द अपना घर बार छोडकर साथ साथ चले श्री राम का रथ नगर और फिर नगर के बाहर गांव में से होकर निकला वो सूरत के साथ जाने वाली भीड बढती गई । तमसा नदी के तट तक पहुंचते हुए यह इतना बडा जनसमूह हो गया की रत को चलाने वालों के लिए यह चिंता का विषय हो गया । फॅालो नर नारियों तथा बच्चों के खाने पीने का तथा अन्य सुविधाओं का प्रबंध असंभव हो गया । अतः राम लक्ष्मण और सीता पुरवासियों को रात तमसा नदी के तट पर सोया छोड चुपचाप वहाँ से चले गए । कुछ दूर जाकर उन्होंने गंगापार की और ऋषि भारद्वाज के आश्रम में जा पहुंचे । ऋषि भारद्वाज का आश्रम गंगा यमुना के संगम स्थान दोनों महान नदियों के बीच में उस स्थान पर था जहां से दोनों नदियों का संगम दिखाई देता था । ऋषि ने उन्हें चित्रकूट में रहने की सम्मति दी और वहाँ का मार्ग बता दिया । भारद्वाजासन से चलकर राम और लक्ष्मण ने एक नौका से यमुनापार की और फिर चित्रकूट के वन में जा कुटिया बनाकर रहने लगे हूँ ।

21. Bharat Ko Shri Ram Ki Aagya

श्री राम भाग किस पति के देहांत पर कई को समझ आने लगा था कि उसने क्या भूल करती है । जब भारत ननिहाल से आया और पिता के संस्कार कार्य कर चुका तो कई कई को विधित हुआ कि जिसके लिए उसने राम को वन भेजा है, वह राज्य लेना ही नहीं चाहता हूँ । उसने अपने पुत्र के लिए राज्य मांगा था और इस मांग की प्रतिक्रिया स्वरूप उसके पति की मृत्यु हो गई थी । भारत ने मथुरा और माता के कई को पिता की मृत्यु का दोषी मानता हूँ और अपना राज्य विषय स्वीकार कर दिया और यह निश्चय पुरवासियों तथा माता कौशल्या को बताकर इस घटनाक्रम के लिए छमा मांगी और आश्वासन दिया कि वह श्री राम के पीछे पीछे वन में जाएगा और उन्हें वापस लिए बिना नहीं लौटेगा । कई अपने करते पर लज्जित थी । मैं पुत्र के इस विचार को सुन भारत के साथ बन जाने के लिए तैयार हो गई । भारत जब राम को वन से लौटा लाने के लिए चला तो अयोध्या का पूर्ण मंत्रिमंडल प्रमुख पुरवासी और एक बडा सैनिक दल साहब था । भारत के साथ उसकी तीनों माताएं अंतपुर की अन्य स्त्रियां छोटा भाई शत्रुघन भी गई । इस प्रकार एक विशाल जनसमूह राम को वापस लाने के लिए चल पडा । मार्ग में चलते हुए वे राम की वन यात्रा के चिन्ह देख रहे थे । उन मार्क्स जिन लोगों के सहारे चलते हुए वे सब दलबल सहित भारद्वाज आश्रम पर जा पहुंचे । मुन्नी ने जब भरत इत्यादि को देखा तो पूछ लिया भारत कैसे आए हो मुनीवर पितृतुल्य भाई श्रीराम को वापस ले जाने के लिए और सेना साथ लेकर भगवन भाई राम की अयोध्या वापसी को धूमधाम से सम्पन्न करने के लिए देना लाया हूँ मंत्रियों को साथ इसलिए लेकर आया हूँ की ये युक्ति से और धर्म व्यवस्था से भैया को समझा सके कि उनको अयोध्या लोड चलना चाहिए । अपने कथन को बलयुक्त बनाने के लिए मुख्य मुख्य पुरवासियों को भी साथ लाया हूँ । ऋषि के मन में विश्वास बैठ गया कि राम लोट जाएगा । किसी प्रसन्नता में उन्होंने भारत का उसके सब साथियों सहित आश्रम की ओर से भारी सत्कार क्या भारत राज्य परिवार मंत्रीगणों तथा पुरवासी हो और सेना के खाने पीने तथा रात्रि व्यतीत करने का सर्वोत्तम प्रबंध वही आश्रम में कर दिया गया । इससे सभी जन जो भारत के साथ थे अति आनंदित हो । अगले दिन भारत इत्यादि मुनिजी से चित्रकूट का मार्ग पूछने गए भारत ने सत्कार के लिए ऋषि का धन्यवाद कर दिया । भारत ने कहा भगवन! आपने तो अतिथि सत्कार में राजाओं को भी मात कर दिया है । भारत हम बहुत पसंद है कि तुम अत्यंत धर्मनिष्ठ व्यक्ति हूँ । जहाँ राम के त्याग, तपस्या और वितरण की बात सुन चित्र अतिप्रसन्न हुआ था वहाँ तुम्हारा धर्म के तब तो योग की आवाज से जित पहले से भी अधिक प्रफुल्लित हुआ है । इसी प्रसन्नता के अनुरूप ही हमारे आश्रमवासियों ने ये कुछ श्रद्धा के फूल तो ऊपर बरसाए हैं । मेरा आशीर्वाद है कि तुम्हारे इसने मैं क्या की भावना का उदाहरण युगो युगों तक तो मैं अमर कर देगा, तुम्हारी कामना पूर्ण हो । भारत ने मुनिजी से पूछा । यहाँ से आर्या राम किशोर गए हैं । मुनि जी ने बताया आजकल राम चित्रकूट पर्वत पर रह रही हैं जाओ और उन्हें वापस अयोध्या में ले जाकर राज्य सीन करूँ तुम्हारा कल्याण हो । भारत भारद्वाज मुनि का आशीर्वाद ले चित्रकोट को चल पडा । यमुना पार कर चित्रकोट पर्वत के चरणों में पहुंचे तो विशाल सेना तथा रथो छोडो इत्यादि के चलने से उडती हुई धूल से लक्ष्मण के मन में शंका होने लगी की कदाचित भारत उनकी हत्या करने के लिए वहाँ सेना सहित आया है । वहाँ एक वर्ष पर सडकर सेना के आगे आगे पूरे वंश होगा । ध्वज फहराया जाता । पहचान राम से अपनी आशंका प्रकट करने लगा । राम ने पूछा लक्ष्मण तुम्हे बुरी शंका इसलिए मन में ले आए हो भैया । लक्ष्मण ने कहा ये राजनीति है संसार में सब आप जैसे धर्म का मर्म जानने वाले नहीं है । आपका स्नेह और आदर माता कैकई के लिए कितना था । अपनी एशिया में वह क्या कर गई, यह देखकर मन में शंका उत्पन्न हुई है । देखो लक्ष्मण, मैं तो इसमें कोई चिंता की बात नहीं देखता हूँ । यदि भारत हमें मिलने के लिए आया है तो उचित ही है । यदि हमें वापस ले चलने के लिए आया है तो भी अब मैं उससे राज्य नहीं लूंगा । और यदि तुम्हारी आशंका सत्य है कि वह वन में देश भाव लेकर आया है तो मैं अयोध्यावासियों का इतना और आदर पान चुका हूँ कि उन पर बाण चलाते समय मेरी बाहें निस्तेज और बलहीन हो जाएंगी, भारत का नहीं । मैं सोच भी नहीं सकता । वो पिताजी का उतना ही प्रिय पुत्र जितना मैं रहा हूँ । ऐसा है लक्ष्मण । मुझे तो किसी भी दशा में चित्र में चिंता अथवा ध्यान नहीं देखो । अयोध्या नरेश के आने की शांति से प्रतीक्षा करूँ । लक्ष्मण भाई की युक्ति और मनोज गार सुन सुब कर गया और आने वालों के वहां पहुंचने की प्रतीक्षा करने लगा । एक का एक सुरक्षों के जोर मूड में से मुनि वशिष्ठ तथा अन्य मंत्रीगण निकलते हुए दिखाई दिए । उनके साथ भारत चतरगढ और माताओं को आता देखा तो तीनों आगे बढे और माताओं तथा गुरूजनों के चरण स्पर्श करने लगे । भारत और शत्रुघन आ गया, बडे भाई के चरण स्पर्श करने लगे । माताएं, तथाभारत इत्यादि सब सिस्टम वर्ग तीनों को वल्कल पहने सामने खडे देख ट्रेन और दुख के आंसू बहाने लगे । भारत नहीं जानता था कि किस प्रकार पिता के देहांत का समाचार सुनाएगा । यह बात करने में कठिनाई अनुभव करता हुआ चुप था । जब सब चुपचाप खडे आंसू बहा रहे थे तो मैं ऐसी वशिष्ठ आगे बढ राम की पीठ पर प्यार से हाथ फेरते हुए समाचार देने लगे । राम तुम्हारे पिता महाराज दशरत तुम्हारे वन को चले आने के उपरांत अति दुख अनुभव करते हुए और सिद्धार्थ गई हैं । भारत पिता के देवासन का समाचार पाकर अयोध्या आया । उनका दाह संस्कार तथा अंतेयष्टि क्रिया कर रहे है । अब राज्य विषय के लिए तो मैं वापस अयोध्या ले जाने के लिए आया है । इस शोक समाचार से तो तीनों ही हो रोने लगे । तभी इस शोक मिलन के उपरांत मंदाकिनी के किनारे पहुँच आत्मक दो वही नदी तट पर बैठकर वार्ता लाभ करने लगे । बाद भारत ने आरंभ कि उसने कहा भैया अयोध्या का सिंहासन सोना पडा है, अब आप चलो और उसे सुशोभित करूँ । भारत पिताजी अयोध्या का राज्य तुम्हें दे गए हैं । इस कारण मैं तुम्हें सुशोभित करना चाहिए । सिंगासन यदि अभी तक सोना पडा है तो भूल कर रही हो परंतु भैया अधिकारी तुम हो राज्य अधिकार कैसे प्राप्त होता है? इसके तीन ही उपाय है प्रथम है राजा का पुत्र होने पर उनके द्वारा अभिषेक करने से जीती है राज्य के विद्वानों द्वारा निर्वाचित करने से और तृतीय उपाय है समर में जीतने से तीसरा उपाय तो है नहीं हो सकता नहीं । अयोध्या नगरी महाराजा एक स्वा को के काम से आज तक अजेय रही है । दूसरा उपाय भी वर्तमान परिस्थिति में नहीं चल सकता है । महाराज की मृत्यु से पूर्व की इच्छा कोन अयोध्या का विद्वान स्वीकार करेगा । यहाँ केवल पहला उपाय ही सकते हैं । महाराज ने माता कह गए के पुत्र भरत को अयोध्या का राज्य सौंपा है । भारत तो अयोध्या पर राज्य करो, यही पिताजी की इच्छा थी पिताजी तुमको राज्य के अयोग्य नहीं मानते थे । मेरा अयोध्या के विद्वानों से आग्रह है कि स्वर्गीय महाराज की इच्छा की पूर्ति करे । जब तक तुम्हें वे कोई दोस्त नहीं देखते हैं, उनको स्वर्गीय महाराज की बात माननी चाहिए । यही धर्म व्यवस्था है । मैं पिताजी के दिए वचन को परमात्मा की आगे की तुलना मानता हूँ । इस कारण तुम जाओ और राजसिंहासन को संशोधित करें । श्री राम के युक्तियुक्त एवं धर्मानुसार वाॅ सभी निरुत्तर हो गए । इस पर वशिष्ठ मुनि बोले ये अयोध्या में चलकर विचार कर लेंगे । हम तुम वापस हो । माता का कई जो महाराज से तुम्हारे बन जाने की बात कह रही थी, अब पश्चाताप करती हुई तो मैं वापस ले जाने के लिए साथ ही आई है । अब तुम पर अयोध्या लौटने का प्रतिबंध नहीं है । पर मुझे इस प्रतिबंध माता जी ने लगाएगी कहाँ था? मैं ऐसा नहीं समझता । पिताजी अथवा माता जी ने मुझे या वन में आने की आज्ञा नहीं दी थी । ये है तो पिताजी का वजन था, जो मुझसे नहीं कहते थे । उनका मोन प्रेम वस्था परन्तु वचनबद्धता उनकी इस वचनबद्धता से उनको मुक्त करने के लिए ही मैं यहाँ चलाया हूँ । यह पितृऋण तो मुझे चुकाना ही हैं । माता जी को यदि कुछ वापस लेना है तो पिताजी से लेना । मुझे उन्होंने नया तो वन जाने की आज्ञा दी थी और नए ही मैं उनकी आगे से यहाँ आया हूँ । पिताजी के देहांत के उपरांत मैं उनका वचन भंग करूंगा तो जन्म जन्मांतर तक पाप का भागी बना रहा हूँ । गुरूवर मुझे क्षमा करें । मैं चौदह वर्ष का वनवास काल व्यतीत हो जाने के पूर्व किसी भी नगर में नहीं जा सकता । इस कथन ने बात समाप्त कर दी । सब एक दूसरे का मुख देखते रहेंगे, परंतु भारत विषाद में डूब गया । अपने मन में से हम को और अपनी माँ को सीता राम और लक्ष्मण के कस्ट का कारण मानता था । मैं तो किसी भी सूरत में राजा पर स्वीकार करने को तैयार ही नहीं था । अब आगे बढ राम से उसकी खडाऊ मांगने लगा । उसने कहा भैया ये पादुकाएं मुझे दे दो, इन को किस लिए मांग रहे हो? जब तक आप चौदह वर्ष के वनवास का व्रत पालन का लोड नहीं आते तब तक ये अयोध्या में आपका प्रतिनिधित्व कर राज्य करेंगे । मैं वहाँ पर केवल आपका सेवक बनकर ही रह सकता हूँ और तुम राज्य क्यों नहीं करोगे तो भैया मैंने मैं राज्य पिताजी से प्राप्त कर आपको लौटा दिया है । आप जब तक वहाँ नहीं आती ये राज्य सेन रहेंगी और इनका अनुचर बनकर मैं राज्यकार्य अधिक होगा । इस पर गुरु वासी जी बोल उठे हाँ यह ठीक है । पिता की आज्ञानुसार भारत राज्य स्वीकार किया अभी है । उसे बडे भाई के चरणों में अर्पण कर सकता है । भाई चौदह वर्ष तक आ नहीं सकते । इस कारण भाई के अनुसार तब तक कार्य चलाए । भाई की ये पादुकाएं तब तक अपने स्वामी का प्रतिनिधित्व करेंगी । इस प्रकार भरत और साथ ही वो राम ने लौटा दिया । भारत बडे भाई की पादुकाएं ले अयोध्या लोड गया ।

22. Chitrakoot

श्री राम भाग बाइस चित्रकोट का वन अति सुन्दर और बारह मास विकसित होने वाले उस फोन से लगा रहता था । मन्दाकिनी नदी में जल बिहार करते हुए वन पश्चिम अति लुभाए मान दृश्य प्रस्तुत करते थे । सीता अयोध्या को विस्मरण करने लगी थी । वहाँ साधु संत महात्मा थे । ये सब इन तीनों से हेलमेल रखने लगे थे । चीता को भी वहाँ का वातावरण और वहाँ रहने वाले साधु संत ऋषि अनुकूल ही प्रतीत होते थे । कमी थी एक ऋषि आश्रम था । उसके एक कुलपति भी थी । वह एक ऋषि थे । प्राय मध्यांतर कुलपति राम की कुटिया के बाहर आ जाते थे और राम तथा लक्ष्मण उनसे अनेक विषयों पर वार्ता लाभ किया करते थे । एक दिन कुलपति उस बस्ती का इतिहास बता दिया । कुलपति ने कहा हम यहाँ लगभग दो सौ करानी है । यहाँ से पूर्व हम दंड कार्ड में रहते थे । वह राक्षसों ने उधम मचाना आरंभ कर दिया तो हम उस को छोड पूर्व में इस और आगे लंकापुरी में रावण के सिंगासन रोड होने से पूर्व तपस्वी लोग दक्षिण के नीलगिरि पर्वत तक फैले हुए थे । रावण के लंका का राजा बनने के साथ ही हमें वह क्षेत्र खाली कर देना पडा । राम पहले में उन दिनों किस केंदा में एक वन में रहता था । वहाँ बाली नाम के एक राजा ने अपने भाई सुग्रीव की पत्नी को बलपूर्वक आपने अंतपुर में रख लिया और जब उसने सुग्रीव की हत्या करने का या टन क्या? तो सुग्रीव मैं उसके कुछ साथी राजधानी छोड वन में जाकर रहने लगे । बाली सुग्रीव को ढूंढता रहता है । उसके सैनिक वन वन तो ग्रीन की खोज करते हैं और इस खोज में वनवासी ऋषि मुनियों को कस्ट देते हैं । मैंने मैं स्थान छोड दिया । जब पंचवटी में पहुंचा तो रावण के सैनिक अगस्त देने लगे । दायक उन्होंने इस क्षेत्र को सुरक्षित देख यहाँ से लेयर यहाँ रहते हुए हमें पांच वर्ष के लगभग हो चुके हैं । अब राक्षस लोग इधर भी बढ रहे हैं । पिछले वर्ष महिष्मती के राजा अर्जुन का देहांत हो गया है और रावण को उसके साथ हुई संदीप से मुक्त हो गया । समझ उसके राज्य में भी राक्षसों को भेज रहा है तो अर्जुन का पुत्र उनको रोकता नहीं । बात यह है कि राक्षसों की नीति अब युद्ध करने की नहीं है । तेरा तो सेना युद्ध करती है परन्तु ये राक्षस लुक छिपकर युद्ध करते हैं । रात के समय अस्त्रशस्त्र ही लोगों पर आक्रमण कर देते हैं । एक परिवार पर पचास पचास आज हम रखते हैं उनके स्त्रीवर्ग को पकडकर ले जाते हैं । शेष परिवार की हत्या अगर उनका मांस खाते हैं, राज्य इसमें कुछ नहीं कर सकता । तभी राजा की सेना इधर आती भी है तो ये राक्षस भागकर जंगलों में घुस जाते हैं । सैनिक निर्जन स्थान को देख लोट जाते हैं । राक्षसों की नीति यह है कि वे यहाँ एक के कुटिया पर रात के समय आक्रमणकर्ता उसमें रहने वालों को मारकर दिन निकलने से पूर्व भाग जाएंगे । आप तो जानते ही है कि वन में हम सब एक स्थान पर इकट्ठे होकर रहना नहीं चाहते । इससे हमारे ध्यान में ऐ सुविधा रहती है और हमारे पूजा पाठ में देखना पडता है । एक बात और है, वह यह कि एक ही स्थान पर इकट्ठे होकर रहना चाहे तो भी तब तक नहीं जा सकते जब तक पक्के मकान, मार्ग और मलमूत्र को बाहर निकालने का प्रबंधन हो जाएगा । इससे आश्रम और बस्ती तो पुनर नगर के तुल्य हो जाएगा । हम लोग नगरों को छोड वन में इसी कारण आए हैं कि नगर का जीवन हमारे जब तब में बाधा डालता है, राम मुनियों के दृष्टिकोण को समझने लगे थे । वे लोग ब्रह्मण स्वभाव रखने के कारण राज्य निर्माण नहीं कर सकते । बडे बडे नगरों में यदि सुविधाएँ हैं तो सुविधाएं भी है । ये महानुभव उन सुविधाओं से बचने के लिए वन में कुटिया बनाकर रह रहे हैं । प्रत्येक परिवार ने एकांत पाने के लिए दो चुटिया बना रखी है । राम को गंभीर विचार में मग्न देख उन पति ने कह दिया, वन के मुनि लोग कुछ ऐसा विचार कर रहे हैं कि वे इस स्थान को छोड जाए और यमुना के किनारे पर जाकर रहना आरंभ करते हैं । हमारी समझती है कि आप भी हमारे साथ चलते हैं । राम ने कह दिया और यदि इन राक्षसों को यह विदित हो गया कि अब हम वहाँ निवास करते हैं तो वे वहाँ से भी हमें भगा देने का यत्न करेंगे । इस प्रकार भागने वालों के लिए तो कोई भी स्थान सुरक्षित नहीं दिया जाएगा । यदि स्थान बदलने पर भी इनने शास्त्रों का बहुत बना रहता है तो यहाँ से चले जाने में कोई तथ्य नहीं तो क्या किया जाए? आप महाराज भारत को लिख दे कि यहाँ पर एक सेना भेजते तभी हमारी रक्षा हो सकती है । देखिए, भगवान राम ने कुलपति को अपना निश्चय बता दिया । मैं भारत को यह नहीं लिख होगा क्योंकि यह महिष्मती राज्य का क्षेत्र जैसे एक म्यान में दो तलवारें नहीं संभाल सकती । वैसे ही यदि कोई भी दूसरे देश का राजा यहाँ सेना भेजेगा तो एक प्रदेश में दो सेनाएं एक साथ नहीं रह सकती । अब है दो आर्य सेनाओं में मैं कारण युद्ध हो जाएगा । इस कारण भारत यहाँ सैनिक कार्यवाही नहीं करेगा । मैं आप लोगों की भारतीय हाँ मोक्षमार्ग की खोज में नहीं आया हूँ । इस कारण मैं यहाँ से पलायन नहीं करूंगा । मेरी प्रवर्ति ऐसा करने को कहती भी नहीं । अब मैं यहाँ ही रहूंगा । मैं समझता हूँ कि हम दो भाई ही तो दो सौ राक्षसों का सामना कर सकते हैं, यह मैं जानता हूँ । आप अपने बल और तेज से सौ दो सौ क्या एक दो सहस्त्र को भी बता सकते हैं? परंतु आपके रहते राक्षस इधर आएंगे ही क्यों? तपस्वी लोग तो वन में फैसलों को उस तक फैले हुए हैं । इतना है कुलपति मोल हो गया । वन में रहने का ढंग कुछ ऐसा था की एक कुटिया दूसरी कोटिया से तो थाई मिल के अंतर पर थी । समीप समेत रहने की उन में रूचि नहीं थी । परिणाम होता था कि रात के समय एक परिवार की कठिनाई का दूसरे को पता भी नहीं चलता था । तीन चढने पर यदि कोई उस फुटिया की ओर जाता तो उसे पता चलता कि वह उजडी हुई है और उसके वासी मारपीटकर समाप्त किए जा चुके हैं । इस पर भी राम की सोच है थी कि भाग कर जहाँ जाएंगे क्या ये निशान सर वहाँ नहीं पहुंच जाएंगे । नए भी आए तो उनके लोड ने के बाद इन मुनियों का क्या होगा इस विषय पर लक्ष्मण से भी चर्चा हुई हूँ । लक्ष्मण ने कहा भैया यह सुनकर मेरे भुजदंड इनने शास्त्रों से जूझ ने के लिए व्याकुल हो रही मेरे वार्ड इनका रख देने की लालसा कर रही हैं । इस पर राम ने का लक्ष्मण तो मेरे मन की भावनाओं को ठीक समझे हो, बुराई से भागने पर बुराई पीछा करती है और भागते हुए को पराजित करने में सफल हो जाती है । इस कारण मैं यहाँ से भाग नहीं रहा परंतु मैं एक और पार्ट भी पढा हूँ । वही है कि आक्रमण करने वाले की प्रतीक्षा करने भी दूर बोलता है है । उसके द्वारा आक्रमण करने की प्रतीक्षा करने के स्थान पर अधिक उचित होगा कि उस पर आक्रमण कर दिया जाए और उसे समाप्त कर दिया जाएगा । सुरक्षा में लडने के स्थान पर आक्रमण करना अधिक ठीक है । परंतु भैया हैं कहाँ देखो लक्ष्मण पंचवटी से कुछ अंतर पर रावण के रिश्ते में एक भाई हर ने एक जन स्थान बसाया है । उसमें राक्षस सेना रहती है । हमें वहाँ ही चलना चाहिए । परंतु भैया क्या हम इन अस्त्र शस्त्रों से जो हमारे पास है, एक सैनिक जनपद को विजय कर सकेंगे और फिर बिना सेना की सहायता के ये है बात विचारणीय है । कुलपति ने कुछ दिन पूर्व ही बताया था कि दंड कार्ड में सरभंग नाम के एक ऋषि रहते हैं । उन्होंने उस युद्ध में भाग लिया था जिसमें विष्णु ने लंका राक्षसों से खाली कराई थी । उनके कार्य से प्रसन्न हो भगवान शिव ने उन्हें सुरक्षा के लिए कुछ दिव्यास्त्र दिए थे जो विष्णु के सुदर्शनचक्र के तुल्य घातक तो नहीं परन्तु उससे कम भी नहीं । उनमें से कुछ शास्त्र तो अत्यंत ही घातक माने जाते हैं और देखते ही देखते नगरों को समाप्त कर सकते हैं । मैं किसी अब हो चुके हैं और उन दिव्यास्त्रों के लिए तो पात्र की खोज में है । लक्ष्मण के भुजदंड फडकने लगे और उत्तेजना में उठ खडा हुआ और बोला तो भैया चलो यहाँ व्यर्थ में समय नष्ट करने से क्या लाभ है? राम ने सीता की ओर देखा तो उसने भी सहमती से सिर्फ खिला दिया । तब दोनों भाइयों ने अपने अस्त्रशस्त्र उठाए और तीनों दंड कार्ड की ओर चल पडे । वन में पगडंडियों पर आगे आगे राम पीछे लक्ष्मण और बीस में सीता दक्षिण की ओर बढने लगे ।

23. Nirbhay Shri Ram

श्री राम भाग तेईस रावण ने जब अपने को आर्यव्रत कि आदिया राजाओं पर विजय प्राप्त करने में असमर्थ पाया तो लूटमार आरंभ कर प्रजा को त्रास इत कर बगा देने का यत्न आरंभ कर दिया था जिसे हम आजकल की भाषा में आतंकवाद भी कह सकते हैं । उसमें अपने भाई घर को इसी नियमित दंड कार्ड में भेजा हुआ था । घर ने पंचवटी के समीप एक राक्षस जन्मस्थान स्थापित किया और रावण की नीति अनुसार राक्षसों को वहाँ बसाना आरंभ कर दिया । धीरे धीरे उन राष्ट्रीय सैनिकों की संख्या बढकर चौदह हो गई । उन में कौन से अपनी पत्नियों और बच्चों के साथ उस जन्म स्थान में रहते थे । कई राज्यों स्त्रियाँ तो क्रूरता में राक्षस परसों से बढकर थी । इस जन्म स्थान में राक्षसों की मंडलियाँ तैयार की जाती थी और दंड कार्ड को आतंक द्वारा खाली कराने का यतन किया जा रहा था । वन में जब मुनि गढ रात के समय अपने अपने आश्रम में आराम कर रहे होते थे तो ये लोग दल बनाकर दूर दूर किसी एक आश्रम पर बडी की संख्या में जाधव रखते थे, उससे और बच्चों को मारकर खा जाते थे और स्त्रियों को उठाकर ले जाते थे । दिन निकलने से पूर्व वालों में जान सकते थे । पडोस के आश्रम वाले तभी उस आश्रम की ओर से गुजरते तो आश्रम को जला हुआ तथा उजरा हुआ देखकर समझ जाते हैं कि रॅाक वहाँ अपना कार्य कर गया है । घर को राम लक्ष्मण सीता के वहाँ आने की सूचना मिल गई । उसे यह भी पता चला कि दोनों भाई धुरंदर योगदान है । मैं चाहता था कि राम और लक्ष्मण को धर्मवीर कर भगा दिया जाएगा । उसे डर था कि दोनों भाई अपनी सेना निर्माण कर वहाँ उसके विरोध में अपना राज्य स्थापित नहीं कर लेंगे । इस विषय में उसने रावण से भी बातचीत की परन्तु रावण का विचार दूसरा था । उसने खर को कहा, देखो घर वहाँ के वनवासियों को प्रसिद्ध कर बताते रहो । इससे राम सेना का निर्माण नहीं कर सकेगा और यदि तुमने सीधे रामलक्ष्मण पर आक्रमण किया तो फिर सोशल राज्य और लंका राज्य में ठंड जाएगी । तब वही स्थिति हो जाएगी जो हमारी महिष्मती के अर्जुन के कारण हुई थी । मैं इन मानव राज्यों से अभी युद्ध करना नहीं चाहता हूँ । इस संबंधी के अनुसार मोरनियों की मार काट होती रही । पीता के साथ होने के कारण वे धीरे धीरे आगे बढ रहे थे । बाहर हुए कई आश्रम मिले एक अति सुंदर और विशाल आश्रम दिखाई दिया तो राम इत्यादि उसमें चले गए । आसाराम अति स्वच्छ और फल फूल आदि के लक्ष्यों से अति शोभायमान हो रहा था । पूर्ण वातावरण मनोरम था । उस आश्रम में भ्रम के गया था । मुनि और हम जरिए के ओर से परिपूर्ण विद्यार्थी अगर इधर उधर घूम रहे थे । राम के आश्रम में प्रवेश करते ही आश्रमवासियों का ध्यान उनकी ओर आकर्षित हो गया । जी ओजस्वी राम, कांतिमान लक्ष्मण तथा उनमें अति सुन्दर जीता को आश्रम में प्रवेश करता देख उनकी ओर आई । उनमें से एक उन को हाथ जोडकर प्रणाम कर पूछने लगा भगवन, आप इस बन में इस प्रकार निर्भय होकर घूमने वाले कौन है? परिचय लक्ष्मण ने दिया । उसने बताया, यह मेरे बडे भाई राम है और ये मेरी बावन सीताजी है । मैं इनका अनुचर तथा भाई लक्ष्मण हूँ । हम सोशल नरेश स्वर्गीय महाराज दशरथ के सुपुत्र है और पिता किया गया से इस समय वनवास कर रहे हैं । दम के वनवास की कथा तो पूरे देश में विख्यात हो चुकी थी । अतः वनवासी उसीका था की मुख्यपात्र श्री राम को अपने आश्रम में आया देख बहुत प्रसन्न और उनको आदर के साथ उन पति के पास ले गए । कुलपति को जब राम इत्यादि का परिचय दिया गया तो वह भी बहुत प्रसन्न हुए । उन्होंने उठकर अभ्यागतों का स्वागत किया और आसन दे जलपान करने के लिए कहा । राम जब बैठ गए तो कुलपति ने पूछा राम इधर कैसे आ गए हो? यह वन तो अकेले और कोमलांगी सीता के साथ घूमने के लिए उपयुक्त स्थान नहीं है । भगवान राम ने कहा हमने बताया गया था कि यह दंड कार्ड ने राक्षसों से पीडित है परन्तु इस आश्रम को देख हमें अपनी सूचना पर संदेह हो रहा है । नहीं राम वन तो वैसा ही भयानक है जैसा आपने सुन रखा है । परंतु है आश्रम एक सुरक्षित स्थान है । हमने इस की रक्षा का प्रबंध कर रखा है और रात के समय इसके संरक्षक कई कई सोंग्स के अंतर पर नियुक्त होते हैं । रात के समय राक्षसों और संरक्षकों में प्राय मुठभेड होती रहती है । राम ने पूछ लिया तो आपने इस आश्रम की रक्षा के लिए सेना रखी हुई है? नहीं राम हमारे यहाँ कुछ न देशों के राजकुमार शिक्षा ग्रहण करते हैं और आश्रम की रक्षा का भार उन पर रहता है । उन्होंने आश्रमवासियों को इनने शासनों से सुरक्षित रखने का प्रबंध कर रखा है । उन्होंने इन आश्रमवासियों को प्रशिक्षण देकर एक संरक्षक दल का निर्माण किया है और वह धन निशाचर राक्षसों से आश्रम की सुरक्षा करता है । हमें अभी तक मार्ग में कोई राक्षस नहीं मिला । इस पर भी मैं आपको संबंधित होगा की आप इस आश्रम में ही रहे । आपके या रहने से हम भी अधिक सुरक्षित अनुभव करेंगे परन्तु हम तो पंचवटी को जा रहे हैं । इस प्रयोजन से सुना है कि वहाँ राक्षसों का कोई जनवास है जहाँ पर आतंकी प्रयाय इन नीतिशास्त्रों को तैयार किया जाता है । जो निशा के अंधकार में आतंक फैलाते हैं हम वहाँ जाकर यह सब देखने की इच्छा रखते हैं । इस सूचना से कुलपति विस्मित रहे गए राम ने अपना विचार बताया । मेरा विचार है की सुरक्षा व्यवस्था आवश्यक होते हुए भी यह निर्भय देने का उपाय नहीं है । निर्भया होने के लिए आतंकी त्रोत स्थान को ही विनष्ट करना चाहिए अतः हम वहीं जा रहे हैं परन्तु इस प्रकार केवल दो पुरुष एक स्त्री के साथ होते हुए दो ऍम योद्धा राक्षसों को कैसे निपट सकेंगे यह तो सिंगर की बाद में शस्त्ररहित उसने तुल्य हैं । हम वहाँ अवश्य जाएंगे । उनका विरोध करने के लिए हमारे पास उस दिव्यास्त्र है और हमारी सूचना है कि महर्षि शरभंग के बाद कुछ नवीनतम उन्नत व्यस्त है जो हम उनसे प्राप्त करना चाहते हैं । मेरा आग्रह है । उन पति ने कहा आप चौदह वर्ष तक इस आश्रम में ही रही है और वह समय व्यतीत यहीं करिए । हम आपकी प्रत्येक सुख सुविधा के लिए यतन करते रहेंगे । परंतु भगवान राम ने कहा है तो एक छोटा सा नगर है जिसमें चारों वर्ग के लोग अपने परिवार सहित रहते हैं और मैं पिता किया गया से दो वर्ष तक वन में रहने के लिए भेजा गया हूँ । इस कारण मैं यहाँ नहीं रह सकता । यह पिताजी किया गया था, उल्लंघन हो जाएगा । कुलपति राम की युक्ति को समझाते थे परंतु इस प्रकार वन में धवन करने वालों की सुरक्षा के लिए भी मैं चिंतित इस कारण नया तो राम की नियुक्ति का विरोध कर सके और नए ही उनके कार्यक्रमों को स्वीकार कर सकते हैं । तीनों एक रात आश्रम में रहे और अगले दिन सरभंग ऋषि के आश्रम का मार्ग उस जान पडेगा

24. Ram Ka Rakshas Viradh Se Saamna

श्री राम बहुत चौबीस जो लोग भोग की प्रवृत्ति रखते हैं, बहुत के योग्य वस्तु सम्मुख आए तो फिर उसका भोक करने से अपने को नहीं रोक सकते । यही बात राक्षसों की होने लगी । मनुष्य मास खाने वालों के समूह जब कोई कोमलांगी मन से आता था और जैसे मांसाहारी के मुख से किरण के बच्चे को देख लार टपकने लगती है वही अवस्था तीनों मांगों को देख उन राक्षसों की होने लगती थी । तन कार्नर में लोगों और अन्य वन पशुओं से भरे तथा सब प्रकार से सुरक्षित रहने योग्य स्थान को देख कर एक सरोवर के किनारे दोनों भाई और सीता बैठ वन की शोभा देख रहे थे कि पेडों के झुरमुट में से एक विशाल का ये भयंकर रूप वाला ऍम इन पर लाभ का और सीता को उठाकर एक ओर को भागा । लक्ष्मण ने उसे ललकारा और भाग कर उसका मार्ग रोक खडा हो गया । रामदेव लक्ष्मण के साथ जा खडे हुए और राक्षस का मार्ग रोग उसे चीता को छोड देने के लिए कहा । फॅसने समझा कि एक नहीं यदि तीनों को ही उठा ले जाए तो कई दिन का भोजन बन जाएगा । इस कारण उसने सीता को कंधे से उतार भूमि पर खडा कर दिया और हम उनके सामने खडा हो बोला उनको हो जो इस वन में घूम रहे हो । तुम दोनों के साथ एक स्त्री भी है । तुम भी जारी हो इस कारण तुम दंडनीय हो । राम ने उसे शांत भाव से कहा यह तुम्हारा भ्रम है । हम इस बंद में किसी प्रकार का अनाचार नहीं कर रहे हैं । जो कुछ हमारा अधिकार है उसका ही बहुत कर रहे हैं । यह धर्म से मेरी भारी है । इसे छोड दो और बताओ कितु में दंडाधिकारी किसने बनाया है परंतु ऍम के मन में दूसरी ही बात थी । उसने स्पष्ट कह दिया नहीं यह स्त्री मेरी पत्नी होगी तो मैं इसके योग्या नहीं । ये है क्या है मैं सीता की वहाँ अगर घने वन की ओर घसीटने लगा तो राम ने अपना धनुष कंधे से उतारकर कई बार उस पर छोडे परन्तु राक्षस का शरीर वज्र के समान कठोर था । बाढ उसके शरीर को छु कर एक और ऐसे गिर जाते थे ये मानव किसी लोहे की दीवार से टकराकर गिर जाए । इस पर भी जब राम और लक्ष्मण दोनों ने बाणों की वर्षा जारी रखी तो राक्षस उन पर न आपका और उनको वहीं मारकर खा जाने का विचार बना बैठा हूँ । फॅसने लक्ष्मण को जब पकडा तो राम ने अपनी खडका प्रभास उसकी वहाँ पर कर दिया । इस प्रहार से तो उसकी पक अड लक्ष्मण पर से छूट गई । लक्ष्मण ने मुक्त होते ही राक्षस की दूसरी वहाँ पर आपने खडसे प्रहार किया । जब दोनों भाई इस प्रकार प्रहार करने लगे तो उसका प्रभाव होने लगा । इस प्रकाश चार पांच प्रहारों से ही राक्षस के दोनों भाई कट गई । तब राम ने अंतिम रहा, उसकी गर्दन पे किया और वह धरा पर गिरकर मृत्यु को प्राप्त हो गया । मृत्यु राक्षस की व्रत और बलिस्टिक आया को देख दोनों भाई और सीता जिसमें कर रहे थे । बाद में किसी राहगीर मोनी से पता चला कि उस राक्षस का नाम विरदी था और अकेला ही उस वन में घूमता था । उस वन में नया तो कोई मुनि से रहा था और न ही कोई मुनि आश्रम । इस पर भी यह वन पति रमणिक और फल कंदमूल इत्यादि से भरपूर था । राक्षस के सबके भूमि पर गिरते ही सीआर का एक दल उसे नोट खाने को नमक पडा । राम ने कहा, यह इन सियारों के लिए कई दिन का भोजन है । लक्ष्मण ने कहा यदि इतने बडे शरीर और बाल से ही है, कोई उपकारी कार्य करता तो संसार में ख्याति प्राप्त कर सकता था । राम हसते हुए बोले आपने क्रूर स्वभाव से ये अभी क्या तो वैसे ही हुआ होगा परन्तु इतने बडे शरीर में मन और बुद्धि अति दुर्बल प्रतीत हुए हैं । जब राम वहाँ से चले तो सीता ने कहा यह वन अति रमणिक प्रतीत होता है । क्यों ना उस दिन यही में शाम किया जाए । राम का उत्तर था हमें सरभंग ऋषि के आश्रम पर चलना चाहिए । वहां पहुंचकर ही अपने स्थायी निवास स्थान का प्रबंध करेंगे । इस पर भी सीता के आग्रह पर उस वन में मुनियों से अधिक उन के अध जले अथवा टूटे होते आश्रमों पर विश्राम करते हुए धीरे धीरे तीनों आगे बढते रहे । इस प्रकार भवन करते हुए राम को एक बात अनुभव हुई है ही है कि राक्षसों के अत्याचार के समाचार तो मिलते हैं परन्तु वे राम के सामने नहीं आते थे । इस कारण उन्हें ज्ञात नहीं हो सका । कई दिन की यात्रा का तीनों सरभंग ऋषि के आश्रम पर पहुंचे । राम ने महर्षि शरभंग जी के विषय में पूछा तो वहाँ खडे वो में से एक ने बताया महसी जी बहुत हो गए हैं और वह आज संध्या समय फ्रांस छोडने वाले हैं । राम ने कहा, पर हम तो उन के दर्शन करने आए हैं । सूचना बेहतर भेज दीजिए । आप का शुभ परिचय क्या है? राम ने कहा अयोध्या निवासी महाराज दशरथ का पुत्र राम अपनी पत्नी सीता तथा भाई लक्ष्मण सहित ग्राम का परिचय सुन मैं ब्रह्मचारी जोकर राम के चरण स्पर्श करने लगा । राम ने उस बरमचारी को उठा गले से लगाकर कहा ये क्या कर रहे हैं? ऍम, आपकी ख्याति तो आपके आगे आगे चल रही है । इस समय और ये व्रत में कौन है जो आपका नाम नहीं जानता हूँ? आपके त्याग और तपस्या की तुलना में और किसकी तपस्या हो सकती है और फिर माता सीता के भी संसार गुणगान करता है? मैं ऐसी तो उत्सुकता से आपकी प्रतीक्षा कर रहे थे । उनकी बहुत अभिलाषा थी कि देवासन से पूर्व आपके दर्शन कर सके । वह ब्रह्मचारी भागा हुआ आश्रम के भीतर चला गया । चाहते जाते जो भी मार्ग में मिलता उससे वह कहता जाता दशरथ पुत्र श्रीराम आए हैं, आता है जो ही राम ने आश्रम में प्रवेश किया बहुत से आज सहवासी ना नारी राम की अगवानी करने वहाँ पहुंच गए स्वास्थ्य समाचार पूछा ही जा रहा था कि दूसरा ले जाने वाला आया और राम इत्यादि को लेकर मैं ऐसी जी की कुटिया में चला गया । सरभंग ऋषि अपने जीवन की अंतिम पूजा पाठ करने आसन पर बैठे थे । जब तीनों ने आगे वर्ड उनके चरण स्पर्श किए तो उन्होंने तीनों को आशीर्वाद दिया और सीता को गा बेटी जीवन पर्यंत सौभाग्यवती रहो । उनको बिठाया गया और अन्य सबको वहाँ से चले जाने को कह दिया गया । जब कुटिया में राम, सीता, लक्ष्मण और सरभंग ऋषि ही रह गए तो मुन्नी ने कहा, मुझे सूचना थी कि आप यहाँ पहुंच रहे हैं । आपके पहुंचने में विलंब हो रहा था । मेरे पास आपकी अमानत के रूप में कई दिव्यास्त्र थे । मैं अब बहुत हो चुका हूँ आपने नित्यक्रम ओ में भी ऐसा ही आज साइकल संध्या के समय मेरे दी है । वासन का समय है । इस कारण मैंने कल ही वे सब अस्त्रशस्त्र सुरक्षा के दृष्टिकोण से अगस्त्यमुनि के आश्रम में भेज दिए और उनको यह पहला भेजा है कि उचित प्रशिक्षण के साथ ये सब आपको दे देंगे । रमनजी अगस्त ही इस स्थान पर एक ऐसे योग्य व्यक्ति है जो तुम्हें उन अस्त्रों का प्रयोग बता सकते हैं । देखो राम तुम वन में आए हो, तुम्हारी ऍसे मुटभेड अवश्य होगी । यह भी संभव है कि पूर्ण सेना तुम अकेले पर चढाए ते तुम्हारे पास में दिव्यास्त्र और उनकी प्रयोग विधि होनी चाहिए । डीवीएस तरह के प्रयोग में एक विशेष बात ध्यान देने योग्य है कि इन का प्रयोग उस समय ही किया जाना चाहिए जब सत्रह बहुत अधिक संख्या में हो अथवा जब वह भी दिव्यास्त्रों का प्रयोग कर रहा हूँ । इस पर राम ने कहा, वृद्धि नाम के एक राक्षस से हमारा वन में झगडा हो चुका है और हमने सामान्य खड्डों से ही उसको मार डाला है । ठीक है जब एक का दुख का राक्षस आए तो इन अस्त्रों का प्रयोग मैं केवल इनको व्यर्थ गवाना होगा वरना इनके निर्माताओं की इच्छा का उल्लंघन करना भी होगा । इस कारण ये उस समय के लिए है जब सत्रह बहुत अधिक संख्या में हो । जहाँ शारीरिक बल कम हो वहाँ मानव निर्मित सादान साधनों का प्रयोग होना चाहिए । किसी ने कहा मैं अब भगवत भजन में लीन होना चाहता हूँ । इस कारण समय कुछ अधिक नहीं है । राम ने किसी के देह छोडने का समय समीप देख उनसे आशीर्वाद देने के लिए कहा और साथ ही देश में कुछ कहने की यातना कर दी । अंत में इतना ही कहना चाहूंगा कीजिये ध्यान में रखना कि मनुष्य सस्ती में दो ही प्रकार के प्राणी एक है धर्मानुयायी और दूसरे धर्माचरण में लीन तीसरी प्रकार के प्राणी नहीं है है । देखने में आता है कि प्राणी के कर्मों में धर्म के कारण भी होते हैं और धर्म के काम करने का तीसरा मार्ग नहीं है । मनुष्य के कर्मों का मूल्यांकन कर्मों में उसके अधिक कर्म, धर्म, युद्ध अथवा धर्मयुक्त होने से किया जा सकता है । इस कारण मनुष्य मारा जाने के योग्य है अथवा रक्षा करने के योग्य है है । उसके द्वारा किए गए कर्मों के धर्म अथवा धर्मयुक्त होने से ही निश्चय होता है । इस समय ऋषिन आकाश की ओर देखा और संध्याकाल को समीप देख मैं असम वासियों द्वारा बनाई एवं विधिवत सजाई जीता पर जहाँ बैठे और जाना व्यवस्थित हो गए सब आज सहवासी इनकी संख्या कई सहस्र थी वो सीता के चारों ओर एकत्रित हो गई थी । ऋषि अति वृद्धावस्था को प्राप्त होने पर भी अति कोर्स फोन व्यक्ति तो रखते थे और उनके मुख पर पोच प्रतिक्षण बढ रहा प्रतीत होता था । एक सूर्यास्त के समय किसी का अपना शरीर ही इतना हो गया कि उनमें से अग्नि की लपटें निकलने लगी । उस अग्नि से ही जीता की लकडियां प्रज्वलित हो उठी और सबके देखते ही देखते शरीर हो गया । राम ने का आश्रमवासी से पूछा भगवन्! ये अग्नि कहाँ से आ गई? कुंवारसी का कहना था है तो प्रत्येक प्राणी में प्राण के रूप में विद्यमान होती है । इन कारणों से ही मनुष्यों का शरीर कार्य करता है । मरने के समय ये थर्ड रानी के हर दिया कि अग्रभाग में एकत्रित हो जाते हैं और वहाँ से मैं जीवात्मा और सूक्ष्म शरीर को लेकर अगली योनि में चल देते हैं । परंतु मैं उसी का जीवात्मा शरीर छोडते ही मौत प्राप्त कर गया है । मुक्त लोग में तो फॅमिली साथ नहीं जाता । हतः जीवात्मा को प्राणों की आवश्यकता नहीं होती । वे प्राण ही अग्नि का रूप हो गई थी तो आपको ऐसा होता दिखाई दिया है । वह सूक्ष्म शरीर भी जीता में ही थूल शरीर के साथ चल गया है और वे प्राण तो शरीर में से विनिर्मुक्तो हुए हैं, जीता को प्रचलित करने में समर्थ थे । फिर तभी

26. Agaastyamuni Ke Ashram Pahunche Shree Ram

श्री राम बहुत पच्चीस राम इत्यादि सरभंग ऋषि के आश्रम में तीन दिन ही रहे । इस आज समय रहते हुए उनको नहीं शास्त्रों द्वारा रात के समय छापा मारने के समाचार मिलने लगे थे । आश्रम के व्यवस्थापक ने बताया हमारा आश्रम तो एक प्रकार का दूर इस दूर की प्राचीर बहुत ठीक नहीं है परन्तु इसकी रक्षा के लिए हमने एक ऐसी आध्यात्मिक राजीव घडी कर रखी है जो रात के समय अनुल्लंघनीय हो जाती है । अब राक्षस यह बात जान गए बहुत पहले दो तीन बार उनके कुछ एक झुंडों ने इस आश्रम पर आक्रमण किया तो वो उस प्राचीन की लपेट में आ गए और सब के सब वहाँ प्राचीर पर पहुंचते ही मृत्यु को प्राप्त हुए जाता है । उनके शव हमने उठवाकर दूर जंगल में वन पशुओं के आहार के लिए रुकवा दीजिए हूँ । अब ये हमारे आश्रम की ओर नहीं आती । जो छोटे छोटे आश्रम थे उन के रहने वाले इसी आश्रम में आ चुकी है अथवा इनने शास्त्रों द्वारा समाप्त किए जा चुके हैं । एकाकी व्यक्तित्व का आना जाना तो असंभव हो गया है तो अन्य वनवासी भी आपसे इस प्रकार की प्राचीन निर्माण का ढंग क्यों नहीं सीख जाते हैं । यह प्रबंध बडे बडे आश्रमों में ही संभव है । ऐसी प्राचीर का निर्माण उन्नत आध्यात्म द्वारा संभव है तो प्रत्येक व्यक्ति के लिए संभव नहीं । बात ही एक व्यक्ति जीवन में बोलता हुआ है, प्राचीन अपने साथ साथ नहीं ले जा सकता है तो एक स्थान को सुरक्षित रखने के लिए ही स्थापित की जा सकती है । अतः मुनि लोग वन में घूमते हुए पकडे जाते हैं और मार डाले जाते हैं अथवा रात के समय आरक्षित आश्रमों में फॅस पहुंच जाते हैं और आश्रमों को भाग लगा फोन देते हैं और उनमें रहने वालों का मांस भूनकर खा जाते हैं । जब आप महर्षि अगस्त्या जी से मिलेंगे तो आपको आपकी रक्षा के लिए इसकी भी दी दे सकते हैं । राम सीता और लक्ष्मण अगस्त्यमुनि के आश्रम को चल पडे उनका पद प्रदर्शन करने के लिए सर बंगा आश्रम के कुछ मनी, उनके साथ होली इस मार्ग पर जो जो हम इत्यादि आगे बढते गए, उन्हें नीतिशास्त्रों द्वारा संपन्न विनाशलीला के प्रमाण अधिक से अधिक मिलते गए और स्थान पर मनुष्य हस्तियों के ढेर और आश्रम होंगे । जलकर भस्म होने के चेन्नई दिखाई दे रहे थे । बाहर में पता प्रदर्शन के लिए चल रहे मुनियों ने उन्हें बताया कि वह फोन कौन ऋषि और किस किस काल में राहा करते थे उनमें कुछ आज सब तो सैकडों वर्ष पुराने थे जिनकी अब अवशेष मात्र ही रह गए थे । लक्ष्मण ने जिसमें से पूछा ये लोग इस आरक्षित अवस्था में इसलिए रहते थे उनको तो किसी राजा के राज्य में और नगरों में सुरक्षित स्थानों पर जाकर रहना चाहिए था । आज चल रहे एक मुन्नी ने बताया महाराज! यह वनस्थली, सुखकारक और शांति में स्थान है । यहाँ फल कंदमूल अनायास ही मिल जाते हैं और दिनभर ज्ञानो पार्जन का अवसर मिल जाता है । मानव और देव ऋषि आश्रमों में आते हैं और वस्त्रादि तथा अन्य अनाज दे जाते हैं । किसी महर्षि उनको देश देते हैं । इस प्रकार यहाँ का जीवन नगरों के जीवन से अधिक सुगम, सौं और हितकारी होता है । परन्तु इधर कुछ वर्षों से राक्षसों नहीं उत्पाद मसान आरंभ कर दिया है । समुंद्र का पूर्ण पश्चिमी तट और उसके समीपवर्ती राक्षसों ने अपने अधिकार में कर लिए हैं और अब पंचवटी तक बढ गए हैं । ऐसा प्रतीत होता है की यदि उत्तरी क्षेत्र के नरेशों ने इधर ध्यान नहीं दिया तो यह स्थान भी हम लोगों को खाली करना पडेगा और से रावण अपना एक नगर दंड कार्ड में स्थापित कर यहाँ भी राक्षसों की एक प्रबल सेना बैठा देगा तब इनको विन्ध्याचल के उत्तर में आतंक फैला सुगम हो जाएगा । पूर्वी तट अभी सुरक्षित है । वहाँ के नरेश बाली से रावण की संधि है और वह उस राज्य में अपने अनुसार नहीं भेज रहा हूँ परन्तु आर्यव्रत का हूँ । पश्चिमी समुद्र तट उसके आधीन हो चुका है । परंतु आप लोग यहाँ अपनी सेना निर्माण क्यों नहीं कर लेते हैं? हम लोग यहाँ ज्ञानार्जन के लिए आए हुए हैं । यदि हमें भी सेना सुबह इत्यादि रखने पडेंगे तो उनके लिए लगातार धन की आवश्यकता पडेगी । धान तो कर इत्यादि से ही उपलब्ध होता है जो नागरिकों के व्यापार इत्यादि पर लगाया जाता है । तब यहाँ भी नागरिक जीवन की कठिनाइयां उपस् थित हो जाएंगी । ऐसी स्थिति में हमें यहाँ रहकर क्या करना है? एक समय फॅार बंग अपने आश्रम को हिमाचल में ले जाने का विचार करने लगे थे परंतु महादेव जी ने कुछ सस्ता और अन्य रक्षा के साधन मुनिजी को दिए तो मैं इस स्थान को छोडने का विचार त्यागकर यहाँ ही रहने लगे थे । कई दिन की यात्रा के उपरांत वे सब अगस्त्य ऋषि के आश्रम में पहुंचे । वहाँ इनका भव्य स्वागत हुआ और आश्रम में इनको ठहरा दिया गया । अगस्त ऋषि के आश्रम में तीनों एक सप्ताह भर रहे और इस अवधि में उन सब दिव्य अस्त्र शस्त्रों के प्रयोग का ढंग राम और लक्ष्मण को सिखा दिया गया जो सरभंग ऋषि ने अपने दिया वासन के पूर्व अगस्त्य ऋषि को दिए थे । एक दिन राम ने अपने मन की छवि बताई । उसने कहा मैं इस बार अन्य को राक्षसों से खाली कराने का विचार रखता हूँ । किसी ने कहा परन्तु मेरी सूचना है कि इस बार अन्य में रहने वाले राक्षसों के नेता घर को यह आ गया है कि तुम्हें किसी प्रकार का कस्ट नहीं दिया जाएगा । मेरे दूतों ने यह भी समाचार दिया है कि रावण इंडिया के उत्तर में स्थित राज्यों से झगडा मोल लेना नहीं चाहता हूँ । वह अपनी संधि का पालन करेगा । इस अवस्था में क्या तो उससे सम झगडा करोगे परन्तु जब निरपराध व्यक्तियों को कस्ट दे रहा है तो क्या मेरा करते हुए नहीं की मैं उनकी रक्षा करूँगा? परन्तु राम मैं पूछता हूँ कि यहाँ के रहने वालों की रक्षा का भारतीयों को किसने दिया है । यह वन किसी के राज्य में नहीं और तुम किसी राज्य के कर्मचारी नहीं हो तो यहाँ के रहने वालों की रक्षा में दूसरों की हत्या किस अधिकार से कर सक होगी । राम समझ गए कि ये ऋषि लोग अति सुंदर उचित है और अपने कार्यों को धर्मांधों को सिद्ध करने के लिए धर्म का व्यावहारिक भूल रही है । राम ने अपने अधिकार की बात पहले की उसने कहा भगवन मैं एक चक्रवर्ती राजा का पुत्र और प्रतिनिधि चक्रवर्ती राजा का यह कर्तव्य होता है की धूम मंडल के अन्य राजाओं से धर्म का पालन करवाया और जो स्थान किसी राज्य के अंतर्गत नहीं हो वहाँ ऍम धर्म व्यवस्था स्थापित रखे । यह स्थान किसी भी राज्याधीन न होने से चक्रवर्ती राजा के आधीन है और ये है मैं चक्रवर्ती राजा का कर्तव्य मानता हूँ की यहाँ की निस्सहाय व्यक्तियों के परित्राण का उपाय करें इस पर भी मैं ये नहीं कह दिया । राम मेरी सम्मति है कि युद्ध में हत्याएं बहुत अधिक संख्या में होती है । अतः जहाँ तक संभव हो युद्ध से बचना चाहिए । इस कारण युद्ध केवल सुरक्षा में ही लडे जाने चाहिए और इन दिव्यास्त्रों का प्रयोग तब तक नहीं करना चाहिए जब तक राक्षसों की विशाल सेना का आक्रमण हो और उन का वक्त तब ही हो जब मैं कोई नरसंघार करें । श्री राम ने वचन दे दिया कि वह ऐसा ही करेंगे हूँ ।

27. Shri Ram Ki Jatayu Se Mulaqat

हूँ । छेदीराम बहुत छब्बीस एक सप्ताह तक राम ईत्यादि मेहसी के आश्रम में रहे । तब उनके मन में विचार आया कि पंचवटी में गोदावरी के किनारे चलकर रहना जाएगी । इस विचार के आते ही राम हसी जी के पास पहुंचकर अपना पूर्व संकल्प बताकर जाने की स्वीकृति मांगने लगे । अगस्त जी ने कहा, हम सुरक्षा तो मैं एक अन्य यंत्र और उसका ज्ञान एवं प्रयोग विधि देते हैं, जिससे तो तुम्हारे आश्रम ने अनिच्छित व्यक्ति घुस नहीं सकेंगे । इसे लगाकर जब तुम इसमें ऊर्जा का प्रभाव छोडोगे तो यह असम में आने का यत्रों करने वाले प्रत्येक अनिश्चित व्यक्ति का वध कर देगा । राम ने इस यंत्र की महिमा सुन रखी थी और इसको प्राप्त करने पर उन्होंने अगस्त्यजी के चरण पर्स की और धन्यवाद कर दिया । इस प्रकार अति उन्नत और घातक वस्त्रों से सुसज्जित सीता और लक्ष्मण सहित पंचवटी को चल पडे । पंचवटी में रहते हुए समय व्यतीत होने लगा । पंचवटी में उनका परिचय जटायु नाम के एक भरवा सी से होगा । जटायु एक दिन उनके आश्रम में आया और अपना परिचय देने लगा । उसने बताया कि वह महाराज दस सेहत का मित्र है । युवाकाल में वो महाराज के साथ समर पर गया था और वहाँ अपने सोरया और बुद्धिबल से महाराज दशरथ का मित्र बन सकाता । चटाइयों ने अपने कुल का वर्णन करते हुए कहा मेरा कुल पीडियों से ही वायुयानों के चालक का कार्य करता रहा है । कुछ वर्ष पूर्व युद्ध कार्य में घायल हो गया था अतः सक्रिय सहयोग करने के अयोग्य हो जाने पर वानप्रस्थ ले वन में ही रहता हूँ हूँ ।

28. Shurpanakha Ki Padi Ram Par Nazar

श्री राम बहुत सत्ताइस रावण के निर्देशानुसार जहाँ एक ओर राक्षस श्री राम की कोटिया की ओर उपद्रव करने नहीं आते थे, वहाँ राम भी अपने वचनानुसार कारण किसी पर शास्त्र उठाना नहीं चाहते थे, परंतु होनी अति प्रबल है । संयोग वर्ष रावण की विधवा बहन शूर्पणखा जो घर के साथ उसके जन्म स्थान में रहती थी । एक दिन वन में भ्रमण करती हुई राम की कोटिया की ओर आपको कौनसी राम और सीता चिल्लाओ पर बैठे गोदावरी नदी की शोभा देख रहे थे कि रावण की बहन की दृष्टि उन पर पड गई । देशी कन्या होने के कारण रूपला वनडे में चोर पंखा एक सुंदर स्त्री थी । उसे राम एक अति सुन्दर और ओजस्वी पुरुष प्रतीत हुआ । चूर था सीता और राम के सम्मुख आकर खडी हो गई । राम ने उठकर उसका सत्कार क्या और उसका परिचय पूछा दूर पंखा ने बताया मैं लंकाधिपति रावण की विधवा बहन शूर्पणखा हूँ । आप इस निर्जन वन में किस कारण घूम रही है? मैं समीति राक्षस जान स्थान में रहती हूँ । आज इस वन तथा नदी की शोभा देखने यहाँ आई हूँ । राम ने फल फूल से उस स्त्री का सम्मान किया, परंतु तो ऊपर खा के मन को राम एक इच्छित वर समझ आया । क्या बोली मुझे आप बहुत ही सुंदर प्रतीत हो रही हैं । यह ईश्वर की महिमा है । जगत कि सब सुंदर और श्रेष्ठ वस्तुएं उसी की बनाई हुई है । आप दो पुरुषों के साथ एक स्त्री को देखकर जिसमें होता है, इसमें इसमें करने के लिए स्थान नहीं है । मेरा छोटा भाई लक्ष्मण हम दोनों अयोध्या के भूतपूर्व नरेश महाराज दशरथ के पुत्र है । यह है सीता । मेरी धर्मपत्नी यह है जिसे राज जनक की पुत्री है । आप मुझसे विवाह कर लें परन्तु हमारी परंपरा में अनावश्यक दूसरी पत्नी वर्जित शूर्पणखा लक्ष्मण की ओर भूमि उसे मैं राम से भी अधिक सुंदर और युवा प्रतीत हुआ है । उसके पास जब मौसी लक्ष्मण एक पात्र में जल लिए फूलों की क्यारियों को सीज रहा था, फॅमिली दस्ती से देखने लगा । शूर्पणखा ने उसे अपने वहाँ आने का प्रयोजन बता दिया । लक्ष्मण ने कह दिया, मैं नहीं है व्रत लिया हुआ है कि जब तक मैं वन में रहूंगा, धर्म चाहिए का पालन करूंगा । इस कारण मैं विवाद नहीं करूंगा परन्तु क्या मुझ जैसी सुंदर स्त्री भी आपके व्रत को भंग नहीं कर सकती? तुम सुंदर अवश्य हो, परंतु व्रत तो व्रत है । मैंने एक पत्नीव्रत लिया है और मैं उसको भंग नहीं करना चाहता । यह पाप हो जाएगा । निराज शुरू का उन्हें राम को आग्रह करने लग गई । परंतु राम ने कहा मैं विवाहित हूं थी । मैं कारण एक से अधिक पत्नियां रखना ठीक नहीं समझता । इस कारण मैं अपनी प्रिय पत्नी से वचनबद्ध हो कि मैं उसके अतिरिक्त किसी स्त्री को पत्नी के रूप में नहीं देख होगा । दूर पड खाने विचार किया कि यदि वह सीता को मार डाले तो राम उससे मुक्त हो जाएगा और फिर उससे विवाह कर लेगा । सीता राम के समीप एक अन्य शिला पर बैठी थी, छोटा था उस की ओर लाभ की और उसे दांतों तथा नाखूनों से नोचने लगी । अचानक हुए इस हमले से सीता चीखें मार थी । शीला से गिर पडी लक्ष्मण अपना काम छोड भागता हुआ आया और सीता को छुडाने लगा । राम ने कह दिया इस इस तरी को आठ पढाना चाहिए कि हमारी ये लोगों में जीवन पद्धति वह नहीं जो राक्षसों में है । लक्ष्मण के हाथ में उसको की क्यारियों में से घासनी हारने के लिए हंसिया पकडा हुआ था । उसके मन में आया कि इस स्त्री का गला कार्ड देना चाहिए । परन्तु एक स्थिति की हत्या से अधिक कठोर दंड यह समझ आया कि इसे कुरूप कर दिया जाएगा । एक स्त्री के लिए उसे कुरूप कर देना मृत्युदंड से भी अधिक भयंकर था । लक्ष्मण कोई ऐसा विचार करने में देर नहीं लगी । उसने अपने हाथ में पकडी हंसिया से चोर पढा था के कान और नाक काट दिए । नाक और कान कटने पर तो सुन पंखा ऊंचे स्वर में अपने भाई घर को पुकारती हुई जान स्थान की ओर भाग गई । लक्ष्मण ने कहा भैया! हत्या के पाप से बचने के लिए मैंने यह क्या है? इसने मार डाले जाने योग्य अपराध किया था । ये है बात भी की हत्या करने का यात्रा कर रही थी । इसका प्रतिकार हत्या ही था, परंतु मैंने उसे पश्चाताप करने के लिए जीवन दान दे दिया है । राम ने मुस्कुराते हुए कहा यह ठीक किया परन्तु लक्ष्मण अब इस वन में शांतिपूर्वक जीवन सुनना कठिन हो जाएगा । यह नकदी अपने भाई के पास गई है और मैं इसकी दुर्दशा देख बिना इसका कारण पता किए हमारी हत्या करने आएगा तो क्या हम उसका विरोध करने की क्षमता नहीं रखते? मैं समझता हूँ कि हमारा वन के इस भाग में आने का प्रयोजन सिद्ध हो रहा है ।

29. Ravana Aur Shurpanakha Samvaad

हूँ । श्री राम भाग अट्ठाईस जिस दिन सूर्पणखा को घायल का असम से बनाया गया था उससे अगले ही दिन नाम के आश्रम को घर के सेनापति ऋषि राणा अपने सैनिकों सहित घेर लिया । राम और लक्ष्मण उस किसी प्रकार की घटना की आशा करते हैं । युद्ध हुआ । राम ने ब्रिज जीरा को युद्ध में मार गिराया तो उसके साथ ही ध्यान दी । लोगों की भर्ती खडे । इसके कुछ ही काल उपरांत हरने सेनाध्यक्ष दूषण और चौदह ॅ सेना ने एक साथ आश्रम पर धावा बोल दिया । घोर युद्ध हुआ विष्णु अस्त्र ने अपना कार्य ऐसे क्या मानो एक आ रही के सामने लकडियाँ करती चली जाती है अथवा भयंकर आंधी के समूह बहुत उडता चला जाता है तो सहस्त्र सेना उन तरह समाप्त हो गई । इस युद्ध में घर और राम का गंदगी हो गया गार्डोँ से और पीछे खरबों से युद्ध हो और राम ने शीघ्र ही घर का वध कर दिया । सेनाध्यक्ष दूसरा अकेला रह गया तो वहाँ आराम से लोहा लेने के लिए आगे बडा ऍम को मारने में उतना कष्ट भी नहीं उठाना पडा जितना कि खर्च और त्रिशिरा के वक्त में हुआ था । होने से पूर्व बोल जन्म स्थान में भगदड मच गई । फॅस लिया और वजन समझ गए कि रघुकुल के ये दोनों वंशज अपने अस्त्रों से बोल जन्म स्थान को पूछ सकते हैं । रात ही रात में जन्म स्थान खाली हो गया । राॅ सैनिकों की स्त्रियाँ अपने बाल बच्चों के साथ सीधे सागर तट की ओर भागे । वहाँ नौकाओं द्वारा लंका को प्रस्थान करेंगे । अगले दिन प्रातः काल तक जन्म स्थान के खाली हो जाने का समाचार फोन दंड कार्ड में फैल गया और और अन्य के शेष बचे आश्रमों में दो लगा रही इस विजय को बनाने के लिए बजाये जाने नहीं बडे बडे यह को और भोजों का आयोजन होने लगा और इसे ही पूर्ण विजय का लक्षण समझ कुछ मुनि राम का धन्यवाद करने । उनके आश्रम में आप से श्री राम ने मुनियों का स्वागत किया और उनके मनोज गानों को सुन कह दिया, मुनिवर रोग का मूल कारण जब तक बना है, रोग पीडा देता रहेगा । इस कारण आप लोग मेरे लिए परमात्मा से प्रार्थना करते रही । मैं समझता हूँ कि यह अभी आरंभ ही है । घर के मारे जाने और पंचवटी वाले राक्षसों का जन्म स्थान के गुजर जाने का समाचार उन रावण के विरोध का पैदावार नहीं था । यह समाचार लाने वाली रावण की बहन शूर्पणखा ही चोर पढ का रावण के आगार में जाओ । अपना घायल मुझ दिखाकर बताने लगी देखो भाई मेरी क्या दूरदर्शन हुई है? कैसे हो गई तुम्हारी दुरदर्शा? पहले तो तुमने मेरे पति काल के प्रमुख को अपने विरुद्ध आवाज उठाने पर मार दिया । सभी काल के को श्रीलंका से भगा दिया । उन्हें सुदूरपूर्व और पश्चिम के द्वीपों में छुपकर रहना पड रहा है । एकाकी जीवन व्यतीत करने को मुझे मजबूर कर दिया गया है । कोई भी उठकर मेरा अपमान कर देता है । अब तो बात सीमा से पार हो गई है । मेरे अंग भंग कर दिए गए हैं किसने? क्या ये सब पंचवटी में गोदावरी के तट पर दो कुमार एक सुंदर स्त्री के साथ रहते हैं । अपने को कौशल नरेश दशरथ के पुत्र कहते हैं । उनमें से छोटे ने अपने हाथ से है खूब करते क्या है? तो यहाँ क्यों आई हो? खर और दूषण कहाँ है भैया वे दोनों और उनके अधिकांश सैनिक युद्ध में मारे गए । जन्मस्थान में बच्चे, बच्चे, लोग के मारे राजस्थान सोट लंका को आ रहे हैं और उनके साथ कितनी सेना है? वे केवल दो भाई हैं । रावण विचार करने लगा कि यह कैसे संभव हो गया । मैं जानता था कि उसके नाना के भाई ने जिस्मों से युद्ध किया था और विष्णु ने सुदर्शन सकता नामक के अस्त्र से सहस्त्रों की संख्या में राक्षसों को एक ही बार में गाजर मूली की भर्ती कर डाला था । रावण ने सुन रखा था जिसमें की मृत्यु हो चुकी है और सुदर्शन सकते उस के अतिरिक्त अन्य कोई प्रयोग नहीं कर सकता । इस कारण विचार करता था कि इन राजकुमारों के पास भी क्या कोई सदस्य चक्र है । रावण को परेशान देख सूर्पणखा नहीं भी बताया मैंने सुना है कि यह ही रखती है जिसने मारीज कीमा ताडका का वध किया था और मार इसको सैकडों योजन दूर दक्षिण में आना पडा । इस पर रावण ने पूछा तो तुम क्या जाती हूँ? मैं चाहती हूँ कि तुम उसकी पत्नी सीता को अपनी भारिया बना लो । उसे तुम्हारी दासी बने देख मेरे को शांति मिलेगी । उसी के कारण तो उन्होंने मुझे यह गांव दिए । ऍम रावण ने कहा और बोला यह हो जाएगा परंतु उन सबसे पहले हमारे चिकित्सक ऍम के पास जाओ और अपनी उचित चिकित्सा का प्रबंध करूँगा । बहन को भेजने के पश्चात रावण मन ही मन विचार करने लगा था की किस प्रकार इन वनवासी राजकुमारों का मान मर्दन हो सके । लंकाधिपति रावण की बहन को घायल करने का प्रतिकार तो ठीक वही हो सकता था जो बहन ने बताया था । सीधे सीधे युद्ध से मैं बताना चाहता था कुछ सोचता हुआ रावण मारीज के पास उसके असम में जाते हो जाएगा । मैं चाहता था कि किसी प्रकार की सुनना के लिए जाए जिससे साहब भी मर जाए और लाठी में ना । हमारी माँ के वक्त के पचास ऍम लंका द्वीप में सागर तट पर रहता था और अपना जीवन भगवद् वजन में व्यतीत कर रहा था । रावण को अपनी कुटिया पर आया देख मैं उठ कर उसका स्वागत करने लगा और सम्मान सहित अपनी कुटिया में ले गया । उसे बिठाकर पूछने लगा महाराज किस प्रयोजन से यहाँ आने का कष्ट किया है । रावन ने सोपन खा के साथ घटी हुई घटना और हर तथा दिलशन के मारे जाने का बताऊँ खुला दिया । इस पर मार इसने पूछ लिया परंतु बहन सिर्फ था । उन तपस्वियों के पास गए ही क्यों थी? देवन् में आपने दुर्भाग्या का साल व्यतीत कर रहे हैं । ये अवश्य उनको दस्त देने गई होगी । ये है तो मैंने पूछा नहीं की वह है वहाँ किस काम से गई । चोर खाने वजह से उन को कष्ट दिया होगा जो उन्होंने बहन के नाक कान काटे हैं और हर दूसरा तथा तो राॅक सैनिकों का क्या? परन्तु बहन के भाई को अपनी बहन के अपमान का बदला लेने का अधिकार तो है, यह ठीक है । परन्तु लंकेश मैंने सुन रखा है कि इस देश का एक राजा है उसका नाम रावण है । राजा की सब प्रजा अपनी संतान और संबंधी होती है । सबके साथ समान भाव रखना राजा का करते हैं, कर्तव्य रहे है जिसके पालन करने की समर थे होगा । तो महाराज आपकी सावर थे, क्या करना चाहती हूँ बहन से किये गये अपमान का मैं प्रतिकार हो गया और मैं समझता हूँ कि उसके लिए कुछ बनना खेल नहीं पडेगी । क्या सुनना खेलना चाहते हैं? मैं साधू के रूप में उनकी कुटिया पर जाना चाहता हूँ और उसकी भारिया का अपहरण कर अपने प्रसाद की सोभा बढाना चाहता हूँ । पाप होगा राजन आप उन का फैसला राजा करता है और बुढापे में तुम्हें पाप उन्हें याद आ रहे हैं । तुम होते कोनो मुझे शिक्षा देने वाले ठीक है राजन परन्तु आप वहाँ जाएंगे कैसे? मैंने सुना है कि उनकी कुटिया उसी यंत्र से सुरक्षित है जिससे अगस्त्यजी का असम सुरक्षित है और महाराज जानते हैं कि उस यन्त्र के लगे होने पर बिना स्वर्णी की इच्छा की कोई व्यक्ति भीतर जान नहीं सकता है । साथ ही दोनों भाइयों में से कोई ना कोई उस स्त्री की रक्षा के लिए फुटिया पर अवश्य रहता है । मैं इसके लिए ही तुम्हारे पास आया हूँ । तुम कोई ऐसा स्थल करो जिससे दोनों भाई एक साथ कुटिया से दूर हो जाये और मैं उस यन्त्र की कार्ड का यत्न होकर उस स्त्री का अपहरण कर सकूंगा । ये कार्य ऐसे रहित नहीं है, किस बात का है, उन पर सलाह पसंद नहीं सकेगी और यदि उनको पता चला कि वे ठगे गए हैं तो गैस हम ना खेलने वाले की हत्या भी कर सकते हैं तो तुम मरने से डरने लगे हो । तब सोलो तुम यदि मेरे कहे अनुसार नहीं करोगे तो मैं तुम्हारी अभी हत्या कर दूँ और तुम मुझे क्या करने को कहते हो? तुम एक अति सुन्दर स्वर्ण की आवाज वाला किरन वहाँ केंद्र वही रण को जीवित पकडने लगेंगे । मुझे इन आर्यो के स्वभाव का ज्ञान है । ये अपने निवास में विचित्र वस्तुओं का संग्रह करते रहते हैं । इस कारण यदि तुम अति लो भाई मान रूप रंग का हिरण लेकर जाओगे तो वे उस हिरण को जीवित पकडकर अपने आश्रम में बांध रखने का यत्न करने लगे । किस प्रकार तो उन दोनों भाइयों को फुटिया से बोले जा सकते होंगे । उस समय मैं वहाँ बहुत उस स्त्री का हरण कर लूंगा । परन्तु उस देवी की पुटिया की प्राचीर का क्या करोगे? मैं उसे पार करने का उपाय करूंगा । जब चलना करनी है तो इसका भी उपाय ढूंढा जा सकता है । परंतु लंकेश मुझे इस समय भय लगता है । मरने का जीवन अति दुर्लभ वस्तु । इसके रस अतीत रही है । इनको छोड जीवन समाप्त करने को जी नहीं चाहता हूँ तो मैं अभी तुम्हारा जीवन समाप्त कर देता हूँ । रावण ने खडक निकाल लिया । मारीज को मृत्यु सामने दिखाई देने लगी । इस कारण वह तैयार हो गया । उसने विचार किया कि यदि मरना ही है तो आपने राजा की आज्ञा पालन करते हुए मरने में लाभ संभव है । आपने सलना कार्य में सफल हो जाएगा अन्यथा रावण की खंड सामने दिखाई दे रही है । मैं जानता था कि यह क्रूर प्रवृत्ति का व्यक्ति अपनी इच्छा पूरी करने के लिए उसकी हत्या करने में संकोच नहीं करेगा । इस प्रकार विचार करता हुआ मैं रावण की योजना में सम्मिलित हो गए हूँ ।

30. Ravana Ne Kiya Sita Ka Haran

श्री राम भाग उनत्तीस मार इसने अपने आश्रम में पालित एक अति सुन्दर मार लिया । उस पर सुनहरी लेप क्या उस को उसने श्री राम और सीता की कुटिया के समीप छोड दिया । वहां हम रख कुछ बहुजन ईत्यादि की लालसा में राम के आश्रम के समीप होने लगा देता की दृष्टि वो सुनहरी आभायुक्त रंग पर पडी तो वह सरक विलक्षण प्रतीत हुआ और वनवासी जीवन में मनोरंजन की वस्तु समझ आया । इस कारण है उस तो नहरे हिरन को पाने की इच्छा करने लगी । सीता ने राम से का इसे पकड लाइए । मैं इसे अपने आश्रम में पाल होंगी और यदि पकडना सका तो यह तीव्र गति से भागने में सक्षम हैं । तो आइए इसे मारकर इसका शरम ले आई है । मैं अपनी कोटिया की सजावट में प्रयोग करोंगे । राम ने विचार किया कि इतने वर्ष के विवाहिक जीवन में जीता नहीं है । एक वस्तु ही तो मांगी है इस कारण अपना धनुष मान उठाकर लक्ष्मण को सावधानी से रहने के लिए कह हिरन को पकडने चल पडेंगे । किरण तो राम को चलने के लिए ही लाया गया था । जब श्रीराम उसे पकडने को लाभ के तो भी लग मारीज की ओर भागा । मारीज योजनानुसार रक्षा की कोर्ट लेता हुआ राम की गुडिया से दूर भाग मार इसका उद्देश्य था हीरन पकडा न जाए और कुटिया से बहुत दूर चला जाएगा । किसी में वह अपनी भलाई समझ रहा था है चलो हम भी छुपा हुआ किरण को भगाता हुआ कुटिया से दूर भागा जा रहा था । जब और मारीज भागते हुए कुटिया से पर्याप्त दूर चले गए तो मार इसमें उपयुक्त समय समझ ये सीटें लक्ष्मण का सब बहुत जोर से क्या इस समय राम को समझ में आया कि हिरण इस व्यक्ति के संकेत से भागता चला जा रहा है । राम व्यर्थ हत्या नहीं कर हिरन को जीवित पकडना चाहते थे परन्तु जब एक व्यक्ति को सीता और लक्ष्मण को पुकारते सुना तो उन्हें समझ आ गया कि यह कोई षड्यंत्रकारी है और उस व्यक्ति को उन्हें ए सी ते ये लक्ष्मण का शोर करते तो उस पर बाढ समागत उसको मरनासन्न कर दिया । जब घायल हो मारीज भूमि पर गिरा और तडपने लगा तो राम उसके समीप जा पूछने लगा तो कोन हो और लक्ष्मण तथा सीता को किस लिए पुकार रहे हो इस पर मार । इसने कहा महाराज मैं ताडका का पुत्र मारीज हूँ । आपने मेरी माँ की हत्या की थी यह तो ठीक है परन्तु तुम सीता और लक्ष्मण को क्यों पुकार रहे थे? कुछ विशेष बात नहीं हमारी इसने अभी भी चलना खेलते हुए कहा मैं मरने से पूर्व उनके दर्शन करना चाहता था । ये तो यहाँ से बहुत दूर है । मेरी आवाज बाहर तक अवश्य पहुंच गयी होगी । ये अवश्य आएंगे इससे तुम्हें क्या लाभ होगा । यह मन की भावना राम ने समय व्यर्थ गंवाने के स्थान पर वापस जाना उचित समझा और मरीज को यह है यदि उनके यहां पहुंचने तक जीवित रहे तो दर्शन कर सक होगी । परंतु हमारी तो प्राण छोड रहा था । राम वन में कुटिया से बहुत दूर चले आए थे । वापस लौटते हुए अभी आधा मार्गी पार किया था कि लक्ष्मण लंबे लंबे डग भरता हुआ था दिखाई दिया । राम ने इसमें से उसके मुख पर देखते हुए पूछा क्या बात है? लक्ष्मण इधर कहाँ जा रहे हो भैया, ये आतंकवाद किसने किया था? हमें बहुत दूर से ये शब्द सुनाई दिए थे ए सी ते ये लक्ष्मण और ये सब देख फॅसने किए थे जिसे मैंने मार डाला है । परन्तु तुम सीता को अकेला छोड क्यों चले आए? भैया मैं तो आना नहीं चाहता था परन्तु जब माता सीता को या विश्वास हो गया कि आपका कुछ अनिष्ट हो रहा है तो उन्होंने मुझे डांट फटकारकर आपके पीछे भेज दिया है । मैं आते हुए मैं प्राचीन रक्षा यंत्र छुट्टिया की रक्षा के लिए लगाया हूँ । मैं समझता हूँ यह ठीक नहीं हुआ । हमें वापस चलना चाहिए । दोनों भाई वापस क्या की ओर लपके परन्तु उनके कुटिया तक पहुंचने से पूर्व वहाँ का नाटक खेला जा चुका था । गुडिया के कुछ संतर पर हाय राम आए राम का पात्र हो रहा था । लक्ष्मण कोटियां में गया रांची सुरक्षा यंतर निष्क्रिय था और रोटियाँ खाली पडी थी । लक्ष्मण ने जब बताया की कुटिया में माता सीता नहीं है तब दोनों ऍम के सब की ओर गए । वहाँ घायल जटायु मरणासन्न भूमि पर पडा था । चटाइयों ने बताया देवी सीता की चीखों का सब सुन मैं अपनी कुटिया से यहाँ आया तो एक साधुवेशधारी व्यक्ति उनको वहाँ में पकट घसीटकर एक छोटे से विमान की ओर ले जा रहा था । मैंने लगभग कर सीता को छुडाने का यतन क्या तो उसने सीता को विमान में धकेल उसका द्वार बंद कर मुझसे लडना आरंभ कर दिया । वह मुझ से अधिक बलवान और मुझसे शरीर में भी अधिक लंबा चौडा था और मैं वस्त्रहीन था । इस कारण उसने अपनी तलवार से मुझे घायल कर दिया । जैसे ही मैं भूमि पर गिरा तो उसने मेरी दोनों बात काट दी और विमान पर चढकर दक्षिण की ओर चला गया है । दोनों भाई इसका था वो सुन जटायु का मुख देखते रहेंगे । चटाइयों ने जल मांगा तो लक्ष्मण भागता हुआ कुटिया में गया और एक कमंडल में जान ले आया । चल पीने के कुछ ही देर बाद जटायु बेहोश हो गया । उसी भी उसी में उसके प्राण निकल गए । दोनों भाईयों ने जटायु का आधार संस्कार क्या तदंतर विचार करने लगे की ये फोन हो सकता है जिसमें सीता का अपहरण किया है । इतना तो निश्चय ही था बारिश का कोई साथ ही होगा अवश्य वाॅयस होगा । वह विमान रखता है । इन बातों से दोनों भाई इस परिणाम पर पहुंचे थे कि वो रावण ही हो सकता है ।

31. Shri Ram Ne Dilayi Kabandha Rakshas Ko Mukti

हूँ । श्री राम भाग तीस इनके पास विमान नहीं था और रावण की नगरी लंकापुरी के बारे में केवल सुना था की वह दूर दक्षिण में कहीं सागर के मद्देनजर उन्हें वहाँ की रह का पता नहीं था । वे कब तक उसे ढूंढकर वहां पहुंचेंगे और तब तक नेता का क्या अनिष्ट हो चुका होगा? यही विचार दोनों को साल रहे थे । इस पर भी राम और लक्ष्मण दक्षिणाभिमुख हो चल पडे हैं मार्ग में चलते हुए जब निदास से भर जाते थे तो रामविलास करने लगते लक्ष्मण अपनी भूल पर पश्चाताप करता हुआ वो पडता । वहाँ उस निर्जन वन में कोई तीसरा दिखाई नहीं देता था जो उनको साहस बता सके । इस पर भी मानव प्रकृति से विवस में दक्षिण की ओर चल रहे थे । मार्ग में उन्हें फॅमिली विशालकाय एकदम कृशन वर्ग बिखरे के मैं कच्चा मांस खाने से बडे हुए तथा विकृत हुए दार जो मुझ से बाहर निकल रहे वहाँ इस्त्री दो सुंदर युवकों को देख अति विकराल हंसी हस्ती हुई । दोनों भाइयों के सामने खडी हूँ राम और लक्ष्मण इस नारे हूँ । इस प्रकार सामने खडी देख मार्ग से एक और हट जाने के लिए कहने लगे । उस स्त्री ने अपने मुख पर हंसने का भाव बनाते हुए कहा मुझे इस बन में रहते हुए कितने ही वर्ष हो गए हैं । मैं तुम दोनों से विवाह करेंगे । उस भयंकर मूर्ति स्त्री को देख राम ने पूछा तो कौन हो? हमें तुम पर दया आती है? मैं अयोमुख ही हूँ । दया तो मैं तुम पर कर रही हूँ । तुम शरीर से अधिक कोमल प्रतीत होते हो । तुम्हारे मासके कोमलता का अनुमान लगा । मेरे मुंह से लार टपक रही है परन्तु मैं तुमसे विवाह करूंगी और तुमको मारूंगी नहीं । इतना कहते कहते उसने लक्ष्मण को पकड लिया । लक्ष्मण ने तुरंत अपना खडक निकाला और उसके कान कार्ड मैंने इस पर रख से लतपत चीखें मारती हुई लक्ष्मण को धक्का दे बहन वन में भाग गई । दोनों भाई उसे भागता देखते रहे । इस वन में किसी मनुष्य से मिले भी तो विचित्र स्थिति में । इसके बाद पुना पश्चिम दक्षिण को उन की ओर चल पडे । वन बहुत सगन था परन्तु उस निर्जन वन में बता सकते, बट सकते आगे बढते रहे । कई दिन के उपरांत एक विचित्र प्रकार का पूछ भी मिला । शरीर से वहाँ एक रूम राॅकी बहुत ही लगता था । उसकी बातें बहुत लंबी और बहुत चली थी । गर्दन लगभग नहीं थी । उसका सिर तो जैसे उसके सीने में ही घुसा हुआ था । विशाल पेट वाले उस राक्षस को दूर से देखने पर केवल उसका बेट ही बेड दिखाई देता था । ऐसा प्रतीत होता था कि उसकी आंखें पेड के ऊपर ही जोड दी गई हूँ । दोनों भाई उसकी आकृति पर विस्मित रहे गए । उसने तुरंत अपनी लंबी लंबी बाहों को फैलाया और दोनों भाइयों को पकड लिया । दोनों भाईयों ने अपने अपने खडक निकले और उसकी बातें काट दी । इस राक्षस का नाम कब बंद था? उसने जब देखा कि मैं मार रहा है तो उसने पूछा आप कौन है? इस वन में तो इस प्रकार के सशस्त्रों को रखने वाला पहले कोई मिला नहीं । राम को उस पर दया आ गई और उसमें पूछा तो तुम यहाँ कब से रहते हो? उसने बताया मैं इस प्रकार का ग्रुप शरीर नहीं रखता था । मैं इस वन में इस कारण आया था की यहाँ किसी प्रकार के नागरिक आचार विचार के प्रतिबंध के बिना रहा जा सकता था । पहले पशुओं का मांस खाता था और नीचे जब भी कोई मन से मिल जाता हूँ तो उसे पकडकर खा जाता था । एक बार मेरा एक जैसी से सामना हो गया । उसके कोमल शरीर को देख मुझे उसका मांस खाने के लालसाहब जाग पडेगा । मैंने उसे हुआ ही था कि उसने जोर से अपना हाथ मेरे सिर पर मारा और मेरा से मेरे धर्म में फस गया । मेरी गर्दन तो जैसे रही ही नहीं । आंखे ना मुझे तो ऐसे हो गए जैसे पेट पर लगी हूँ । मेरी टांगे सुन्न हो गई और मैं तब खडा रह गया । मैं चल फिर भी नहीं पा रहा था । मैं दया से उस किसी को देखता रहे गए । मैंने उस दिन इसी से कहा मैं चल नहीं पा रहा हमारा इस प्रकार तो मैं भूखा मर जाऊंगा । तब उस किसी ने मेरी भुजाओं में यह शक्ति दे दी जिससे यह है दूर तक बढ सके । मैं अपना भोजन प्राप्त कर सकते हैं । अब आपने मेरी बात ही काट दी है । इससे तो मैं अपना भोजन ही पास होगा और मैं भूख से तडपकर मरूंगा । आप मुझ पर दया कर इस शरीर से मुक्ति दो । रुपया मुझे मृत्यु राम इस शरीर में बंदी जी को मुक्त करने के विचार से उसे मार डालने के लिए तैयार हो गए । परन्तु इससे पूर्व उससे पूछने लगे, हम यहाँ किसी ऐसे मानव की खोज में है जो हमारे कार्य में सहायता कर सके । आपका क्या कार्य है । इस पर राम ने अपना संक्षिप्त परिचय तथा अपने साथ हुई दुर्घटना का वर्णन कर अपनी खोज का लक्ष्य बता दिया । कबंध नाम के उस व्यक्ति ने कहा यहाँ से पूर्व दक्षिण की ओर जाइए । उधर ही आपको मालूम की बस्तियां मिलेंगे । पंपापुर उस करने के किनारे उसी नाम के स्थान पर कुछ लोग रहते हैं । वहाँ आपको सहायता मिल सकती है । तब बंद जब मर गया तो उसका दाह संस्कार किया गया और दोनों भाई उसी दिशा मिल चल पडे जिधर कबंध ने मनुष्यों की बस्ती की संभावना बताई थी ।

32. Ram Ne Khaye Shabri Ke Ber

ऍम जो जो राम लक्ष्मण दक्षिण की ओर चलते हैं उन्हें वन काम और नदी नाले तथा मैदान सुहावने दिखाई देने लगी । भैया वो लक्ष्मण ने किस किन्दा क्षेत्र के शोभा को देखकर कह दिया । यहाँ वन नदियां, घाटियां और संपूर्ण पर्वतीय क्षेत्र अत्यंत सुन्दर है । लक्ष्मण, देश, भूमि, पर्वत, नदी, नाले ये सब जीव पदार्थ ये स्वतः तो सुख देने वाले होते हैं और नहीं दुःख कर देश में रहने वाले लोग ही वहाँ के निर्जीव पदार्थों को सुहावना, सुखकारक और सुगंधी में बना देते हैं । परंतु जब मन अशांत हो तो उस समय कोई अनुभूति नहीं होती और इस समय मेरा मन अशांत जब पर्वत की चोटी पर पहुंचे तो पर्वत पार का मनोरम दृश्य तब उनको दृष्टिकोष हो । उस पर्वत के पर पंपापुर नगर था । यह पंपापुर सरोवर के किनारे बसा हुआ था । सागर के अनुपात में तो ये एक साल ही था परन्तु सामान्य तल के अनुपात नहीं है । सरोवर कहा जा सकता हूँ ऍम अति मनोरम था । दोनों भाई सरोवर की शोभा देख मोहित हो गए । वे कितने ही काल तक सरोवर की शोभा उसमें किले कमल और इस नगर की सौरभ युग वायु में मोहित से खडे रहेंगे । राम के मुख से एक का एक निकल गया । जल पर तैरती इन कमल कांंवडियों को देख मुझे कमाल ओसला सीता की याद आने लगी है । ऍम नहीं इस समय मैं क्या करती हूँ इस कल्पना से मेरी हर देश विदेश हो रहा है । अभी लक्ष्मण की दृष्टि दूर सुरक्षों के जोर मूड में से उठते धुएं पर पडी लहर दुल्हे को देख चौंक पडा और उसने राम का ध्यान उस और कर कहा वहाँ किसी मनुष्य का वास प्रतीत होता है । हमें वहाँ चलना चाहिए । जानने भी दोनों देखा तो अपने मन की व्यथा को दबा दिया । दोनों भाई सुरक्षों के उस झुरमुट में जा पहुंचे जहां से दोहा उठता दिखाई देता था । वहाँ आम, जामून और बेर के घने रक्षा लगेंगे । उन के बीचों बीच एक कुटिया बनी थी और उस कुटिया के बाहर सुरक्षों की छाया में ताप स्थान पर आसन जमाए एक गद्दा बैठी थी तो है उस समय ध्यान अवस्थित थी दोनों भाई को श्रवणीय असम में इस वजह सुनी तपस्वनी को ध्यान में मग्न दें, चकित रहेंगे । पिछले कई दिन के भयानक और नी दस अनुभवों के उपरांत वर्तमान सुरंग दस्य अत्यंत सूखा दौड चिपको फिर करने वाला था तो तपस्विनी के सामने यज्ञ की अग्नि अभी भी चल रही थी । उसमें से तो गन्दी दो वहाँ के पूर्ण वायुमंडल को सुरभित कर रहा था । एक का एक तपस्वनी ने आंखे खोली और दोनों भाइयों को कुछ अंतर पर सामने खडा देखा तो हाथ के संकेत से समीर बुला सामने भूमि पर बैठने के लिए कहा । दोनों भाईयों ने हाथ जोड परिणाम क्या और सामने बैठ गए । तपस्वनी ने आशीर्वाद सूचक हाथ उठाया और पूछ लिया तुम राम और लक्ष्मण होऊं, आम आता जी । लक्ष्मण ने उत्तर में कहा हूँ रह कहने ही वाला था कि वे अयोध्या नरेश महाराज दस के पुत्र है कि उस श्रद्धा ने कहा तुम्हारा पूरन इतिहास है, विख्यात है । यहाँ के लोग यह भी जानते हैं कि बडे भाई की पत्नी सीता का अपहरण हो गया । यहाँ अनुमान लगाया जा रहा है कि अपहरण करने वाला लंकाधिपति रावण है । देखो राम मैं एक माँ से तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही हूँ परन्तु तुम भटकते हुए अपना समय व्यर्थ गंवा रहे थे । भगवान की कृपा से अब तो मैं इस और आने की प्रेरणा मिली । मैं समझती हूँ यहाँ तुम्हारे कल्याण के साधन स्थित है । मेरा नाम सब रही है । मैं आदिवासी दिलों में उत्पन्न एक महसी की शिष्या हूँ और उनसे ही मैंने योग सामना का मार्ग पाया । अभी इस सरोवर में स्नान करो । इस समय रक्षियों से उतरे इंताज, एबे, रोका, अल्पाहार स्वीकार करो और तब जैसा मैं कहती हूँ वैसा करूँ । मैं समझती हूँ कि तुम्हारा कल्याण होगा । तंत्र राम तथा लक्ष्मण ने पंपापुर के निर्मल जल में स्नान किया है । मान के उपरांत सबली ने उन्हें सलाहार कर रहा हूँ । जब दोनों भाई फलाहार कर रहे थे तो सबरी उनके सम्मुख बैठ बताने लगी । यहाँ के निवासी अत्यंत सीधे हैं । वे पर्वतों की कंदराओं या पेडों पर मचान बनाकर वानरो के समान रहते हैं । अतः दूसरे प्रदेशों के लोग इन्हें वानर ही रहते हैं । इनका राजा एक बलशाली व्यक्ति है जिसका नाम वाली है रह राज्यकार्य में कुशल है और वैसे ईश्वर, भक्त और रन तो उसकी बुद्धि पर उसका मित्र रावण छाया हुआ है । उस ने अपने राज्य में से राक्षसों को उत्तर की ओर बढने का मार्ग दे रखा है । इस सुविधा के प्रति का में रावण ने इस राज्य में कभी कोई उत्पात नहीं मचाया । इस प्रकार शांति प्राप्त कर मैं राज्य का सूप प्रबंध करता है, परंतु इस प्रकार ऍम ही विकृत राक्षसों की क्रूरता मैं धर्म का प्रचारक बना हुआ है । मैं समझता है धर्म बलशालियों द्वारा निर्मित विधि विधान का नाम है । हालांकि उसके राज्य में स्वीट प्रबंध है । यह विचारधारा से वह रावण की अधर्म व्यवस्था का पोशाक बंद कर कुछ कुछ अनु कारण भी कर रहा है । परन्तु दोनों में अंतर यह है कि रावण की महत्वाकांक्षा बहुत ऊंची है और वह देव लोग में शिक्षा प्राप्त होने के कारण महा अभिमानी भी है । इसके विपरीत बाली रावण से चतुराई और बाल में काम न होने पर भी अभिमानी नहीं और बहुत मिस्रवासी है । इस पर भी दोनों का जीवन पर एक ही है देखो राम रावण से सीता को छोडा सकना तुम्हारे अकेले के मन की बात नहीं, तुम्हारे बात विष्णु भगवान का सुदर्शन तक नहीं । इस कारण जो कुछ भगवान विष्णु ने आज से कई वर्ष पूर्व अकेले किया था, तुम कर नहीं सकते । सुबह सेंसेक्स केन्द्र के पास है परन्तु उसे विश्वास नहीं कि तुम उस चक्र का प्रयोग भी कर सकते हो जो उसका प्रयोग नहीं जानता, अपने को भी उसमें भर शुरू कर सकता है । यदि तुम सीता को छुडाना चाहते हो तो रावण और उसकी सेना को परास्कर समाप्त करना होगा । इन राक्षसों ने कई कई विवाह किए हैं और कितने ही अप राहत नारिया इनके पास रहने को मजबूर हैं । इनके पुत्र पुत्रियों की संख्या अनगिनत होती है और सभी नरभक्षी हो रहे हैं । जब तक तुम एक पीडी समाप्त करोगे तब तक ये कई गुना अधिक पैदा हो जाएंगे । अतः चीता को छुडाने के लिए रावण को समाप्त करने की आवश्यकता है और रावण की रक्षा के लिए कोटि कोटि राक्षस, अस्त्र शस्त्रों से तो सज्जित कटिबद्ध उपस् थित है तो मैं किसी भी राज्य की सहायता लेनी पडेगी । यदि तुम भारत को संदेश भेजते हो कि वह तुम्हारी सहायता के लिए चतुरंगिनी सेना लेकर आए तो उसमें कई महान तो लगेंगे ही साथ ही बाली संधि के अनुसार रावण की सहायता के लिए तैयार हो जाएगा । तब सीता को सुनने के लिए दो राज्यों के विरुद्ध युद्ध कर विजय प्राप्त करनी असंभव नहीं तो कठिन अवश्य होंगे । विशेष रूप से अपनी राजधानी से इतने दूर युद्ध करना अति कठिन है । यहाँ बाली का भाई सुग्रीव देश से निर्वासित वन में सपा हुआ रहता है । उसके पास दस साथी उसके साथ हैं । धर्मात्मा व्यक्ति है, था है और उसके सभी साथी विन्ध्याचल में देशी आश्रमों में शिक्षा प्राप्त हैं । उनके पास सुबह जाना चाहिए । तुम सुग्रीम की सहायता करो और मैं तुम्हारी सहायता करेगा । जब राम तथा लक्ष्मण का तीसरी सत्कार हो चुका दो । शबरी ने कहा मैं अब पती हो गई हूँ और यह शरीर अब वो प्रतीत होता है । मैं तो एक महत्वपूर्ण ही यह शरीर त्यागा देने वाली थी परंतु मेरे गुरुवर महर्षि ने अपने प्राण त्यागने से पहले मुझे बताया था कि मैं मरने से पूर्व किसी महान आत्मा के दर्शन करूंगी और जब मुझे क्या हुआ की आप इस फोन आ रहे हो तो मैं इसी पुण्य बेला की प्रतीक्षा में बैठी थी । मैंने आपको यहाँ की परिस्थिति से अवगत करा दिया है और उससे लाभ उठाने का मार्ग भी बता दिया है । परमात्मा आपकी सहायता करेगा । अब मेरा इस लोग का कार्य समाप्त हुआ और मैं अनंत यात्रा को जा रही हूँ । इतना है उसने दोनों भाइयों को पुणा शुरुआत दिया और अपने अंतिम संस्कार के लिए दोनों भाइयों को अपनी जीता जो उस ने बहुत पहले ही तैयार कर रखी थी, दिखा दी । तदुपरान्त तपस्विनी ने प्रणायाम द्वारा स्वास्थ्य खींचा और प्राण त्याग दिए । शबरी की मृत्यु के बाद श्री राम ने चिता की अग्नि को प्रज्वलित किया और उसमें उनकी पार्थिव देगा अंतिम संस्कार करती है । रामलक्ष्मण समझ गए थे । यह महान आत्मा मोक्ष अवस्था को प्राप्त कर गई है । शबरी के दाहसंस्कार के उपरांत वे दोनों सुग्रीव के छूटने के स्थान की ओर चल दिए । जहाँ सब्जी ने जीता विमोचन कार्य की कठिनाई बताई थी । वहाँ उसने कार्य को सम्पन्न करने का उपाय भी बताया था । अब राम विलम तो ग्रीव से मिलकर इस कार्य को संपन्न करना चाहते थे ।

33. Hanuman Aur Shri Ram Ki Mulaqat

श्री राम भाग बत्तीस दोनों भाई शबरी द्वारा बताई दिशा की ओर चल पडे । उन्हें कुछ अधिक दूर नहीं जाना पडा हूँ । पंपापुर के तट पर तुम फ्री अपने कुछ साथियों के साथ वन के स्थगन भाग में रहता था । वास्तव में तो गरीब छुपकर वन में रह रहा था और किसी परिचित व्यक्ति से मिलता नहीं था । जब भी कोई अपरिचित व्यक्ति बन में आता तो वह अपने किसी साथी को भेज उसका परिचय प्राप्त कर लेता था । अनुचित व्यक्ति अथवा संदिग्ध गतिविधियों वाले व्यक्तियों को उसका भेजा दूत मिथ्या मार्ग पर डाल देता हूँ । इसी प्रकार रामलक्ष्मण से परिचय हुआ । दोनों भाई वन में सुग्रीव की तो लेने के लिए भटक ही रहे थे कि एक पति और दसवी और हस्त पुष्ट शरीर वाला वनवासी उन के समीप आया और प्रश्न भरी दृष्टि से उनके मुझ पर देखने लगा । लक्ष्मण ने उससे सुग्रीव के विषय में जानने के लिए पूछा वीर पुरुष! हम राजा सुग्रीव की खोज में घूम रहे हैं । उस वनवासी ने उत्तर देने के स्थान पर प्रश्न पूछ लिया, आप कहाँ से आ रहे हैं? आपको यहाँ के रहने वाले प्रतीत नहीं होते । उत्तर लक्ष्मण नहीं दिया । हम तपस्विनी शबरी के आश्रम से आ रहे हैं । देवी सबरी ने अपना शरीर छोडने से पूर्व हमें बताया है कि राजा सुग्रीव इसी वन में पंपापुर के तट पर कहीं रहते हैं और वही हमारा कार्य सिद्ध करने में समर्थ है और आपका क्या कार्य? यह मेरे बडे भाई अयोध्या पुरी के महाराज दशरथ के बडे सुपुत्र है । यह पिता के वचन का पालन करने के लिए चौदह वर्ष के लिए वनवास कर रहे हैं । इनके धर्म पत्नी साथ ही थी दो माह हुए उनका किसी ने अपहरण कर लिया हमें तपस्विनी शबरी ने बताया है कि उनका अपहरण लंकाधिपति रावण ने किया है और उससे माता जी को छुडाने के लिए सुग्रीव हमारी सहायता करने का सामर्थ्य रखते हैं । इस पर उस वनवासी ने जब का राम के संस्पर्श किए और कहा महाराज आपके वनवास का पूर्ण बताना हम जानते हैं । रावण के घृणित कार्य के विषय में भी हमें एक घटना वर्ष पता चल गया । लगभग दो महापुर एक स्त्री का अपहरण एक विमान में क्या जा रहा था जो ये राम राम कहती हुई मिलाद कर रही थी । हमें भूमि पर बैठे देख उसने कुछ भूषण उतारकर विमान से नीचे फेंक देती हूँ । उन भूषणा को देख कर ही हम अनुमान कर रहे थे कि वह माता सीता है हूँ । हमने ही तपस्विनी शबरी को यह घटना बताई थी और वह कह रही थी कि आप माता सीता को ढूंढते हुए इधर अवश्य आएंगे तो हम आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं और आप कौन है? आपका उच्चारण अति शुद्ध है । आपकी बजा सुद्ध देवभाषा और आपका व्यवहार एक आर्य के समान आमने प्रश्न किया महाराज मेरा नाम हनुमान मैंने मैं ऐसी अगस्त है कि आश्रम में शिक्षा मैं युद्ध विद्या प्राप्त की है । मैं उसी ने मुझे भी मान आदि उडाने का प्रशिक्षण देवताओं से दिलवाया था । उनसे वार्ता लाभ करते करते मुझे शुद्ध देवभाषा आ गई । मैं अपने राजा बाली के व्यवहार से रूस हो किस किन्दा छोड बाली के छोटे भाई तो ग्रेजी की सेवा में आ गया हूँ हमारा विचार बाली के स्थान पर अंग्रेजी को यहाँ पर राजा बनाने का । उसके लिए हम सेना तैयार करने की सोच रहे हैं परन्तु सेनाओं के युद्ध से गृह युद्ध आरंभ हो जाएगा । एक ही जाति के घटक परस्पर एक दूसरे की हत्या करेंगे । इसका विकल्प भी है । राम नहीं रहा हूँ क्या अब तीनो कम लक्ष्मण और हनुमान गहन वन में एक कंधार की ओर चलते हुए वार्ता कर रहे हैं । जब हनुमान ने प्रश्न किया हूँ कि गृहयुद्ध का विकल्प क्या है? तो राम ने कह दिया दोनों भाइयों में वंद । यूँ अनुमान इस सुझाव पर गंभीर हो गया । उसने केवल इतना कहा मैं आपको दुगरी जी से भेंट कराने के लिए ले चल रहा हूँ । है सो जाओ आप ऍम तो ग्रेट जी को ही दें । एक कंधार के द्वार पर एक वो दस युवक तीन अन्य साथियों के साथ बैठा था । अनुमान को वनवासियों के देश में दो दसवीं व्यक्तियों को लेकर आते थे तो गरीब समझ गया । उसे शबरी का कथन समझ आ गया कि श्रीराम अपनी पत्नी की खोज में अपने भाई के साथ यहाँ आएंगे और उसकी सहायता करेंगे । उसने आगे बढ राम के चरण स्पर्श किए तो राम ने उसे उठाकर गले लगा लिया । जब अतिथि सत्कार हो चुका है तो सुग्रीव ने उन भूषणा को दिखाया जो विमान पर अपहरण की जाती । सीता ने इन की वो कहते थे राम ने सीता के भूषण पहचाने तो सुग्रीव ने कहा इस क्षेत्र में रावण के अतिरिक्त अन्य किसी के पास ऐसा विमान नहीं है । अतः इन बॅाल इस्त्री का अपहरण करने वाला ऍम विचारनीय बात ही है कि वह श्रीलंका में ले गया है । हुआ उसने इसी क्षेत्र में कहीं छुपा कर रखा है । यदि उसने कहीं इधर ही रखा है तो सीताजी को छुडाना अधिक कठिन नहीं होगा । यदि वह लंका में दुर्ग के भीतर पहुंच गई है तो फिर लंका विजय करनी पडेगी और लंका विजय के लिए एक राज्य की शक्ति ही चाहिए । वो व्यवस्था में आपको किसी राज्य से गठबंधन करना होगा । इतना कहकर सुग्रीम ना अपनी समस्या का वर्णन कर दिया । सुग्रीव ने बताया इस किन्दा राज्य फोर पूर्व दक्षिण पठार में फैला हुआ था । परंतु बाली ने तो पूर्वक राज्य करने के लिए पठार के पश्चिम समुद्र तट के साथ एक सौ योजन थोडी पट्टी रावण को देखकर उससे संधि कर ली है । रावन ने इसके प्रतिकार में इस किन्दा राज्य को लंका निर्मित वो मिला सामग्री व्यस्त प्रचूर मात्रा में देने का वचन दिया था । सैनिकों का असर इस बहुत मिला । सामग्री के कारण अत्यंत ब्रस्ट होता जा रहा है । इस कारण उस वर्ष और रजा में विद्रोह हुआ था । इसका कारण देना का अत्याचार है । विद्रोह उग्र हो गया । रजा और सेना में छुटपुट झडपें आरंभ हो गई । मैं भाई वाली को समझाता था सेना में अनुशासन व्यक्ति इस कारण बाली ने समझा । ये प्रजा में उत्पन्न पद्रह मेरा हाथ है । मुझे प्रसाद में बंदी बना दिया गया और मेरी पत्नी तारा हो उस ने अपने रनिवास में रख लिया । मैं तो प्रसाद से भागने में सफल हो गया हो परंतु तारा को उसकी भारिया के रूप में वहीं रहना पड रहा है । कई मित्रों द्वारा उसके करोड संदेश मुझे मिलते रहते हैं । मुझे अपनी मृत्यु का ध्यान नहीं है परन्तु चाहता हूँ की बाली के हाथों मरने से पूर्व अपनी पत्नी को एक बार स्वतंत्र वैश्या करवा लूँ । मेरे ये साथ ही कह रहे हैं कि मुझे प्रजा में विद्रोह का नेतृत्व करना चाहिए और स्वयं राजा होने की घोषणा कर देनी चाहिए । मैं यह जानता हूँ आपकी सामान्य भले नागरिक मेरे शासन को पसंद करेंगे परंतु सैनिकों को जो विशेष सुविधाएं मिली हुई है उनके लोग में सैनिक बाली का पक्ष लेंगे तो मुझसे द्वंद युद्ध में क्यों नहीं ललकारते? राम ने पूछा मुझसे अधिक बलशाली है परंतु उन युवा हूँ, संयम भी हो और ईश्वर भर तो है । तुम को परास्त नहीं कर सकता । आपने उसे देखा नहीं । रावण कितना विशालकाय ऍम अत्यंत बलशाली है । वह भी बाल में उसे हीन सिद्ध हुआ था । एक बार वाली जब सागर तट पर उपासना कर रहा था तो रावण उसे बंदी बनाने के विचार से उसकी हो रहा है । बाली ने उसे अपनी बगल में दबा लिया और तब तक दबाए रखा जब तक कि उसकी उपासना समाप्त नहीं बल्कि अतिरिक्त बाली सम्मोहन विद्या का ज्ञाता है । उसकी आंखों में ऐसी सकती है कि उससे आज मिलने वाला श्रियम् शक्ति हो जाता है । इस पर भी मैं समझता हूँ कि विजय कुमारी होगी तो ग्रीव इससे प्रोत्साहित प्रतीत होता था । यद्यपि वह अपनी दुर्बलता का अनुमान लगाकर करता था । बाली की पूर्ण खता राम ने वन में देशों से सुनी थी, अतः उनके मन में एक संकल्प बन रहा है तो ग्रीन को उत्साहित करते हुए राम ने कहा देखो भाई, मैं यही कह सकता हूँ कि निर्बल के बलराम और था । आप अपना बाल मुझे देंगे । हाँ राम ने मुस्कुराते हुए कहा यह संभव है क्या? सुग्रीव संशय व्यक्त करते हुए पूछा दृढसंकल्प हो तो कुछ भी असंभव नहीं । राम का विचार था कि एक से अधिक पत्नियां रखने वाला अवश्य दुर्बल से होगा । उसने सुग्रीव को उत्साहित किया और तो गरीब अपने साथियों के साथ इस किन्दा को चल पडा । राम और लक्ष्मण भी उसके साथ तो गरीब के साथ ही जयघोष करते हुए इसकी निंदा में पहुंचे तो सहस्त्रों की भीड एकत्रित हो गई । सुप्रीम ने बाली के प्रसाद के समूह खडे हो भाई को ललकारा । बाली के सेवक ने सुग्रीव को कहाँ भी बाली उससे अधिक बलवान है और मतलब ये भारतीयों से मार डालेगा परन्तु सुग्रीव कह दिया क्योंकि वह अपनी पत्नी की रक्षा नहीं कर सकता है । इस कारण लांसर युग जीवन से मर जाना अच्छा समझता है । बाली माल युद्ध के लिए तैयार होकर निकल आया । यह विचार करने लगा था कि इस कांटे को सदा के लिए निकाल दे तो ही ठीक है । तो ग्रीव के मन में विश्वास हो चुका था कि वह धर्म का पक्ष ले रहा है । इस विश्वास से अपने में अपूर्वा बाल का संचार अनुभव करता था । प्रजा जो दोनों भाइयों में युद्ध देखने एकत्रित हो गई थी । मन में सुग्रीव की विजय की कामना करती थी परंतु मोन क्योंकि सुग्रीव की विजय में संदेह था वो बाली के क्रोध से भी डरते थे । दोनों भाइयों में युद्ध हुआ । यद्यपि सुग्रीव ने आशातित सोरी है और बाल का प्रदर्शन किया और अंतू युद्ध में बाली की असीम शक्ति के आगे वह फसाड खा गया । बाली ने तो उसे पूरे बाल से पांव की ठोकर हमारी और सुग्रीव को मारने लग का तो गृहभूमि से उठा और दूर खडे राम की ओर भाग निकला । उसे बहुत सा देख बाली अपने विजय की घोषणा करने लगा । दुबरी श्री राम के बाद जाकर दीन स्वर में बोला प्रभु! निर्बल की सहायता के लिए राम का बाल नहीं आया । श्री राम ने उसे प्रेरणा देते हुए कहा देखो सुग्रीव तुम्हारा बडा भाई हाफ रहा, उसका बाल चीज हो रहा है और तुम अभी भी स्वस्थ हो । घबराओ नहीं । एक बार पूरा ललकारो तुम दोनों भाइयों की रूप राशि एक समाज है । राम पहचान नहीं सका कि वह अपना बाल किसको देख तो गए । राम की बात सुन उनका मुफ्त देखता रह गया । राम ने अपने गले की पुष्पमाला उतार सुग्रीव के गले में डालते हुए कहा तुम जैसे पहनकर युद्ध कर और अब राम तुम दोनों में तुमको पहचान सकेगा और बाल तुम डाल देगा । सुग्रीव उत्साहित हो । लोड चुके बाली के निवास के बाहर जाकर उसे पुनर ललकारने लगा । पाली क्रोधित हो अपने निवास के बाहर आकर तो ग्रीन की ओर लगता । दोनों अपने दांव लगाने लगे । अचानक तो ग्रीस फैसला तो बाली ने सुग्रीव को उठा लिया । जैसे ही मैं सुप्रीम को भूमि पर पटकने वाला था कि राम ने अपना धनुष कंधे से उतारा और बांछडा बाली के हर देवस्थल को लक्ष्य बना छोड दिया और एक स्थान पर लगा और बाली मारना आसान हो भूमि पर गिर पडा । बाली के भूमि पर गिरते ही सुग्रीव ने हर चीज से घोषित कर दिया भगवान राम की जय हो । खरदूषण और उनके फॅार राम और लक्ष्मण की विजय का समाचार विख्यात हो चुका था । अतः राम का नाम सुनते ही सैनिक घबराये हुए । वहाँ से भागने के लिए सेना से त्रसित रजाबी तो ग्रीन के साथ श्री राम की जय का उद्घोष करने लगी । राम ने उसी समय के सर ले सुग्रीव को तिलक देते हुए इसकी निंदा का राजा घोषित कर दिया । बाली ने अपने अनुचर को भेज राम को बुला लिया । राम मर रहे प्राणी की अंतिम इच्छापूर्ण करने के लिए उसके समीप जा खडा हो । बाली ने पूछा तुम फोन हो, मैं अयोध्या नरेश महाराजा दशरथ का पुत्र राम होगा । तुम यहाँ इसलिए आये हो आया तो था रावण द्वारा अपनी ऐसा पत्नी को ढूंढने परन्तु यहाँ मैं तुम्हारे द्वारा अन्याय और अत्याचार होते देख तुम्हारे भाई की सहायता के लिए आया हूँ तो बोर हो । यदि तुम अपनी बहारिया को छुडवाने के लिए मुझे कैसे तो मैं रावण को उसे मुक्त करने के लिए विवस कर देता हूँ परन्तु भले मनुष्य जब तुम से हम अपने भाई की पत्नी का अपहरण किए हुए हो तो कैसे मैं आशा कर सकता हूँ कि तुम मेरी फॅमिली का उद्धार करना चाहोगे । बाल लेने का तुम धर्मात्मा बने करते हो । भला यह कहाँ का धर्म है कि दो व्यक्तियों में हो रहे बंद युद्ध में तुम हस्तक्षेप करूँ और फिर सुबह कर एक की हत्या कर दो । राम ने बाली के लांछनों का समाधान करने के लिए कहा । बाली धर्म की शिक्षा वह दे सकता है जो धर्म का पालन करता हूँ । अभिप्राय यह है कि अधर्माचरण करने वाले को दंड देना भी धर्म होता है । तुम राजा होते हुए भी अपने भाई की पत्नी को बलपूर्वक अपनी पत्नी बनाकर रखे हुए थे । राजा धर्म व्यवस्था रखने के लिए होता है । यदि वह अधर्माचरण करने लगे तो महापापी होता है तो तुम महापापी थे । तुम्हें दंड देना आवश्यकता मुझे विश्वास है । राम ने आगे कहा कि मैंने किसी प्रकार का अधर्म नहीं किया । तुम दोनों में युद्ध सामान साधनों से नहीं था । किसी कारण से तुम्हारे सस्ती तो ब्रीफकेस अस्त्रों से श्रेष्ठ थे । मैंने तो उसके हीन शस्त्रों की पूर्ति ही की है । देखो वाली यह शरीर और इन्द्रियाँ साधन ही है । भाग्यवश सुग्रीव तुम जैसा सुदृढ शरीर भी नहीं रखता । मैंने उसकी इस न्यूनता को ही पूरा किया है । परंतु या बलवान और ऍम रखना क्या इस बात का सूचक नहीं कि मुझे यहाँ का राजा होना चाहिए । तुम्हारी बात का तात्पर्य है हुआ कि जिस प्रदेश में एक भी बलशाली राक्षस रहने लगे तो उसे वहां का राजा घोषित कर देना चाहिए नहीं वाली । यह सोच दूषित है । राजा का राज्य न्याय, दया भाव और धर्म का सूचक होना चाहिए । साधन और शक्ति तो उन न्यायाधी धर्मों के पालन में सहायता देने के लिए है । तुम अपने बलवान शरीर से अन्याय युग राज्य कर रहे थे । बाली निरुत्तर हो गया और अपने आपको स्मरण करता हुआ देख त्याग कर गया ।

34. Sampaati Ne Bataya Ravana Ka Pata

श्री राम भाग तेतीस तो गृह इस किन्दा नरेश अभिषेक हुआ पाली का लडका अंगद तो गृह का महामंत्री और युवराज नियुक्त हुआ । अनुमान सेनाध्यक्ष बनाया गया और सुग्रीव का कार्य चलने लगा । राज्य विषय के उपरांत प्रथम कार्य यह किया गया कि दक्षिण पठार के फोन क्षेत्र में गुप्चर भेजे गए जिससे पता चले कि रावण ने सीता को कहाँ छुपा रखा है । समुंद्र के इस बार जिधर आर्यव्रत था, भली प्रकार देख लिया गया । चीता के होने का समाचार नहीं मिला तो फिर किसी को लंका में भेजने का कार्यक्रम बना । उन दिनों चटाइयों का भाई संपत्ति अपने भाई की फौज में वहाँ आया हुआ था । मेंहदी पक्षियों की भर्ती आकाशचारी था । वह भी जताई क्यूँकि भारतीय जी सर अभियान को उडाता था । वहाँ सीता की फोर्स में गए अनुमान एवं उसके साथियों को मिला । हनुमान ने उसे बताया कि उसके भाई को रावण ने मारा है और अनुमान है कि सीताजी को लंका में बंदी बनाया गया है । हनुमान ने सागर पार जाकर सीता जी को ढूंढने का अपना निश्चित भी बताया । संपत्ति को अपने भाई की हत्या करने वाले रावण पर रोज आ गया । उसने हनुमान से पूछा क्या तुम विमान उडाना जानते हो? हाँ, मैंने शिक्षा प्राप्त करते हुए देव लोग में यह सीखा था । ठीक है तो मेरा विमान लोग और इसके द्वारा एक उडान में सागर नाम जाओ उसी सहायक आता रिसर्च पक विमान द्वारा अनुमान समुद्र पार कर लंका में जा पहुंचा । विमान को एक अंधेरे निर्जन स्थान पर घने वृक्षों में छुपाकर लंकापुरी में गुप्त रूप से प्रवेश कर गया । ठीक रही लंका में हनुमान ने एक शोकमग्न महिला को स्वर्ण प्रसाद के पीछे बनी अशोक नामक सुरक्षों की वाटिका में घने वृक्षों के नीचे बैठे देखा । श्री राम द्वारा सीता का वर्णन जिस प्रकार किया गया था, अनुमान उससे तुरंत उस महिला को पहचान गया कि यह महिला सीता के अतिरिक्त कोई नहीं हो सकती है । परंतु अनुमान चीता जी से मिलने से पहले कोई निश्चित प्रमाण चाहता था । ऍम काल के गहराते अंधकार में छुपकर उस घने वृक्ष पर चढ गया और उसके पत्तों में छिपकर बैठ गया, जिसके नीचे सीताजी समाधिस् बैठी थी । अचानक रावण जिसे हनुमान पहचानता था, जीता से मिलने आया और हनुमान को दोनों में हुए संवाद को सुनने का अवसर मिला । रावण के साथ इतनी ही दासियाँ थी । उसके मन में आया कि इसी समय रावण पर कूद पडे और उसका गला घोटकर उसको यम द्वार पर पहुँचा देगा । परन्तु जिस कार्य से मैं आया था वह रावण की मृत्यु से संभव नहीं था । रावण लंका का राजा अवश्य था परन्तु लंका का राज्य अन्य सहस्त्रों राक्षसों के प्रबंध से चलता था । उन सभी के रहते सीताजी को लेकर भाग निकलना संभव नहीं था । अतः अपना क्रोध मन ही मन में पी विवस, हनुमान, रावण, सीता जी में हुए संवाद सुनने लगा । रावण कह रहा था तो मैं सुन्दर देश की इस सुंदरनगरी में इस अति उत्तम वाटिका में अशोक सुरक्षा के नीचे बैठी शोक मनाकर अशोकवाटिका और अपना अनादर कर रही हूँ । इन सबके स्वामी देवी, लोग, यक्ष, लोग, गंधर्व, लोग यहाँ तक कि हम और वरुण भी विजय करने वाला रावण का उन्हें गिरफ्तार नहीं करना चाहिए । देवताओं की कन्यायें मुझ पर बलिहारी जाती हैं । एक तुम हो जिसकी पिछली कई मार्च से मैं कानूनी विनय कर रहा हूँ और तुम मानती ही नहीं । क्या रखा है उस मोर वनवासी राम में जो अपनी सौतेली माता के मोह में फंसे बूढे पिता क्या न्याययुक्त वासन पर राजपाट फोर्टी वन को चला आया है? देखो सीटें यदि मैं चाहूँ तो तुम्हें बलपूर्वक अपनी पत्नी बना सकता हूँ । सीता ने आंसू बहाते हुए कहा तो मेरी ओर से अपने मन को हटा लो । जैसे पापा शादी सिद्धि प्राप्त नहीं कर सकता, उसी प्रकार तो मेरी साहब के योग्य भी नहीं हूँ । मैं एक टेस्ट आर्यकुल की कन्या हूँ और एक अतिश्रेष्ठ आर्य परिवार की पता हूँ और तुम एक अपहर्णकर्ता मेरे पति को तो मूर्ख कहते हो परंतु तुममें साहस नहीं । तुम उनके सामने अपने बल और वैभव की कीर्ति बखानकर सकूँ । तुमने चोरी चोरी सुनना से मेरा अपहरण किया है । मुझे विश्वास है जिस समय उन्हें पता चला कि तुमने मुझे यहाँ छुपा रखा है, है, यहां पहुंचेंगे और तुम और तुम्हारी सेना चीजे उसी नाम के द्वार को जाएगी जिसपर विजय का दम तुम भर रहे हो । यदि तुमने मुझ पर बलात्कार करने का यत्न किया तो मेरी मत देह को ही पास होगी । यह जीवात्मा तो श्री राम के जीवात्मा से संयुक्त हो चुकी है । अब इस मन और तन का किसी अन्य से संपर्क नहीं बन सकता । देखो रावण यदि अब भी तुम अपना कल्याण चाहते हो तो मुझे उनके पास पहुंचा । अपनी व्यस्तता के लिए उनसे समामा हे शरणागत वत्सल है । चरण में आए कि सादा रक्षा करते हैं । मैं तुम्हारा प्राप्त जमा कर देंगे । यह तो मैं तुरंत करना चाहिए? नहीं ऐसा ना हो कि तुम्हारे उनके शरण में जाने से पूर्वी है । यहां पहुंचे और तुम्हें वह तुम्हारे राक्षसों से ही इस लंका को जला डाला । इस प्रकार निरस्त और गहना की भावना से परिपूर्ण शब्दों को सुन रावण का स्रोत बढने लगा है । इस प्रकार की सम्मति और डांट डपट की बात सुनने का अभ्यस्त नहीं था । मैं क्रोध से काम था । हुआ बोला एस्ट्रि तो निर्धन, अनाथ हवा मोर मनुष्य का अनुसरण कर रही हो और ऐसी स्त्री का जो परिणाम होता है, मैं तुम्हारा भी होगा । तो मेरे बहुत की सामग्री भी बनोगी और यहाँ की नीति दासियों की बातें रखी जाऊंगी । रिजेंटा रावण ने सीता पर नियुक्त दासियों की मुखिया को कहा इस इस तरीके हाथ पांव बांधकर मेरे प्रसाद ने पहुंचा दो । मैं आज इसका विमान दूर जोर करूंगा । देखूंगा कि इसका कंगला वनों में भटकने वाला पति इसकी क्या सहायता करता है? रिजेंटा अभी रावण का मुझे देख ही रही थी की पटरानी मंदोदरि जो रावण के साथ अशोकवाटिका मैं आई थी और जिसे रावण अन्य स्त्रियों के साथ कुछ अंतर पर छोड आया था, आगे बढाई और रावण से बोली नर्स रेस्ट क्रोध में कुछ नहीं करना चाहिए । इसे कुछ समय और दीजिए, जिससे इसको अपनी स्थिति का ठीक ठीक ज्ञान हो सके । जब है आपके वैभव और शक्ति को समझ जाएगी तो उस समय यह स्वतः प्रसन्नतापूर्वक आपकी पत्नी बनना स्वीकार कर लेगी । यहाँ प्राय स्त्री स्वभाव है । रावण क्रोध से कांप रहा था । मंदोदरी अन्य साथ आई स्त्रियों की सहायता से रावण को वहाँ से पकडना अशोकवाटिका से बाहर ले गई । जाते हुए रावण कहा गया मैं तो मैं और एक मास का समय देता हूँ । यदि तब भी तुम अपने हाथ पर चढ रही तो तुम्हारा स्थान मेरी निकृष्ट दासियों में होगा । सीता अपनी स्थिति पर अत्यंत निराश और अग्नि प्रज्जवलित कर अपने को उसमें बहुत कर देने का विचार करने लगी । रिजेंटा उन सेवी गांव पर मुखिया नियुक्ति जो सीता की निगरानी पर रखी गई थी । रावण के चले जाने पर सीता ने उसे कहा त्रिजटा! यह अग्नि प्रदीप्त करो । मैं अभी शरीर को छोड देना चाहती हूँ । इसलिए देवी त्रिजटा ने कुछ इस निकृष्ट असूर के मेरे तन पर बलात्कार करने से पूर्व ही मैं इस देश को छोड देना चाहती हूँ । है । मुझ को ऐसा है कि श्रीराम को अर्पित इस तन को कोई अन्य पुरुष थे, वो भी जाएगा । रिजेंटा मंदोदरी की ही सेविका थी और उस पर धर्मात्मा विभीषण का प्रभाव था । वहाँ सीता का निर्णय सुन हाथ जोड बोली देवी निराश होने में कारण नहीं, परमात्मा पर विश्वास रखो, उसकी शक्तियां काम करेंगे और उनका विरोध कोई देख दाना या मनुष्य नहीं कर सकता हूँ । रावण कितना भी बलशाली क्यों ना हो मैं परमात्मा की इच्छा के विरोध अपनी शक्ति से नहीं कर सकेगा । भगवती तुम्हारा उद्दार समीर भी प्रतीत होता है । हमारे राजा गा कुपित विचार सफल नहीं हो सकेगा । मैं जानती हूँ आप नहीं मानती । इसी से कहती हूँ कि देवी धैर्य अदालन कर अपने संकल्प पर रहना चाहिए । जैसा मैंने सुना है कि श्रीराम परमात्मा की आभा से सुशोभित उन पर विश्वास रखें । मुक्ति का समय अब निकट ही है । जीता कोई संवाद सुप्रतीक हुआ त्रिजटा पूना बोली देवी परमात्मा जो सब स्थान पर व्यापक है का आश्रय लेकर अब विश्राम करूँ । रिजल्ट आने दासियों को आज्ञा दी । दूर चली जाओ । नेता जी अब सोयेंगे । इतना कहकर भी सीता को वहाँ छोड वाटिका से बाहर चली गई

35. Ashok Vatika Mein Sita Aur Hanuman Samvaad

श्री राम बहुत चौंतीस अनुमान रक्ष पर बैठा यह सब देख रहा था जीता सोई नहीं फॅसा के कथन पर साहस पलट परमात्मा का चिंतन करने लगी । एक का एक उसके मुख से उसके अंतर्मन की वो निकल गई रहत है उठी ये राम बहुत देर हो गयी ग्राउंड अब और सहन नहीं किया जा सकता है । जी ताजी के होने का प्रमाण अनुमान को मिल चुका था । अनुमान को मैं आ गया कि श्री राम ने सीता जी की खोज के लिए चलते समय उसे अपनी एकाउंट ही दे दी थी जिससे अवसर पडने पर राम का दूध होने का प्रमाण दे सके । उसने वहाँ गई थी चीता जी की झोली में फैलती जीता का ध्यान भंग हुआ । अपनी झोली में कुछ गिरते देखा तो उसने उसे उठा लिया है । अंगूठी को पहचान गई और जिसमें करने लगी कि यहाँ से आ गई है । उसने ऊपर रख की ओर देखा तो हनुमान ने अपना परिचय देना उचित समझ बहुत धीमी आवाज में कहा माता मैं श्री राम का दूध हूँ, उन का दूध यहाँ समक्ष आओ चलना तो नहीं खेल रहे देखो जो भी तुम हो मैं एक नि सहाय अबला हूँ । मुझसे टूट और सुनना खेलना उचित नहीं है । अनुमान रख से नीचे उतर आया । आकर उसने सीता के चरणों के समीप की भूमि को छूकर और अपने माथे से लगाकर कहा माता मैंने कभी जोर नहीं बोला और महात्मा की सौगंध पूर्वक यह कहता हूँ कि मैं राम जी का दूध हूँ । उन्होंने इस नगरी पर आक्रमण करने के लिए एक विशाल सेना तैयार कर ली है । बहत जानना चाहते थे कि आप किस स्थान पर? यदि आप कहीं लंका से बाहर है तो वहीं पर आक्रमण किया जाएगा । यहाँ के नागरिकों को व्यर्थ का कस्ट नहीं दिया जाएगा । इसी अर्थ हम बहुत से लोग आपको ढूंढने निकले थे और मेरी नियुक्ति लंका में आपको खोजने की थी । श्री राम ने चलते समय मुझे अंगूठी दी थी जिससे आपको विश्वास दिला सकता हूँ कि मैं उनका दूध हूँ । वैसे मैं अभी अकेला ही आपको यहाँ से बाहर निकालने का या तो कर सकता हूँ परन्तु लाखों राक्षसों से पार पाना आती दुस्तर कार्य होगा और मैं नहीं चाहता की आपके यहाँ होने की सूचना में कोई विलंब हो । मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि आपके यहाँ होने की सूचना पर श्री राम दलबल सहित अतिशीघ्र आएंगे और आपको मुक्त करवाएंगे । ठीक है मैं तो तुरंत त्यागने का विचार कर रही थी । अब फुल है, आशान्वित हो जीने की लालसा करने लगी । सीता ने जाम की अंगूठी अपने पास रख ली और अपनी एक चूडी जो तपस्विनी अनुसैया ने उसे दी थी, काम को पहचान के लिए दे दी । श्री राम उस थोडी को पहचानते थे । सीता ने चूडी देते हुए कहा अब तुम यहाँ से जाओ । यहाँ अधिक काल तक तुम्हारा रहना मुझे से रहित नहीं । यदि तुम्हारा कुछ हो गया तो उस महान कार्य में जिसके नियमित तुम यहाँ आए हो, विभिन्न पडेगा अब तुम जाओ । हनुमान ने पुणे चरणों के समीप की भूमि स्पर्श की और सलांग लगा वाटिका की प्राचीर पर जा पहुंचा । उसी मार्ग से मैं आया था । अब कार्य की सफलता से उत्साहित हो । वह भूख अनुभव करने लगा । राशि पर पहुंचते ही उसकी दृष्टि वालों के उद्यान की ओर चली गई । फल देखकर अनुमान सब कुछ भूल गया । मैं तुरंत उद्यान में फूट पडा और जल्दी जल्दी भिन्न भिन्न प्रकार के फल तोड तोडकर खाने लगा । जो फल कच्चे तथा खट्टे होते है उनको चक्कर एक देता और अन्य फल तोड देता था । इस समय उद्यान के एक पहली की दस्ती उस पर पड गई और उसने हल्ला कर दिया । परिणामस्वरूप उस वाटिका के संरक्षक सैनिक उसे पकडने को लगभग बडे हनुमान ने जब अपने को गिरा हुआ पाया तो एक राक्षस की गजासीन गुमाने लगा और अकेला ही ईसीओ प्रहरियों से लडने लगा । इससे तो और अधिक हमला हुआ वाटिका के बाहर के सैनिक भी नवागन्तुक को पकडने का यत्न करने लगे । भगवान ने अकेले ही अधिकतर सैनिक मार डाले उसको घायल का डाला । इस पर तो नगर का संरक्षक मेघनाथ तो हम इसको पकडने के लिए कई सौ सैनिक लेकर घटनास्थल पर भाव और अब हनुमान बराज इसको पकडा गया । इस समय तक दिन निकल आया था उसे रावण के सम्मुख उपस् थित किया गया । वाटिका के पहले ही नहीं आरोप लगाया है जब दी इंसान के रूप में कोई वाना रात भर इसलिए वाटिका के लक्ष्यों पर वानरों के समान उछल कूद मचाई और फल तोड तोड कर फेंक दिए । जब इसे रोकने के लिए रह गए तो इसने उनमें से कईयों को मार डाला और अनेक को घायल कर दिया है । इस पर पूछना नगर संरक्षक राजकुमार के पास भेजी गई । उसके आने पर यह पकडा जा सका है तुम कौन हो गावं इस व्यक्ति के इतने शोर्य की बातें सुन अति प्रभावित हुआ था । वह हनुमान के अपराध को नहीं देख रहा था है उसके बलिष्ठ शरीर मैं उसके शोर्य की महिमा पर चिंतन कर रहा था । हनुमान ने अपना परिचय दिया और कहा महारानी सीता का समाचार लेने आया था और उन्हें यह कहने आया था की अब उनका उत्तर निकट है । श्री राम का कार्य संपन्न कर वापस जा रहा था की मुझे भूख लगी थी । पार्टी का में फल लगे थे मैंने तोडकर खाई है, कोई अपराध नहीं है । आप के सैनिकों ने मुझे मारना चाहता हूँ । मैं उनसे अधिक बाल का स्वामी था इस कारण मैंने उन्हें मार डाला तो तुम हमारी सेवा स्वीकार कर लो । हम तुम्हारे सोरिया के कार्य से अपनी पसंद है परंतु राजन मैं तो श्री राम का सेवक और आपको शत्रु मानते हैं । इस कारण आप मेरे भी शत्रु वाला सत्रह की सेवा कैसे कर सकता हूँ और दो तुम्हें दंड देना पडेगा । विचार कर लोग हमारा दंड पति भयंकर होगा । महाराष्ट्र ठीक है जी मैं जानता हूँ मैं आपसे दया की यात्रा नहीं कर रहा है और उनको समझ लीजिए कि मैं दूध हूँ और दूध को ठंड नहीं देते, सम्मान देते हैं आपका । मुझे किसी प्रकार का दंड देना आप पर भी भारी हो सकता है । राक्षसराज यदि अपना भला चाहते हो तो महारानी सीता वो श्री राम के पास वापस भेज दो । बाद ही श्रीराम से क्षमा याचना करो । भविष्य के लिए अपना आचरण सुधारने का वजन दो जिससे कि तुम को जीवनदान मिल सके । रावण को क्रोध आ गया । उसने कह दिया तब तो मैं दंड देना ही होगा । हम आप क्या देते हैं कि इस छुद्र जी को आग में जीवित भर शुरू कर दो । रावण किया गया हुई तो अनुमान को जला डालने की तैयारी होने लगी । उसके शरीर पर तेल से भी कोई कपडे वाले जाने लगी । एक का एक अनुमान ने योग से परिपक्व अपने शरीर को ऐसा विस्तार दिया कि बंदर जिससे उसे बंदा हुआ था, फूट गए और मुक्त हो गया । जब तक कोई है समझे कि क्या हुआ होते ही मैं उस वक्त पहले भवन की प्राचीर पर तदुपरान्त छत पर सडकर दैनिकों की पहुंच से दूर हो गया । जो सामान उसे जला देने के लिए एकत्रित किया गया था, उसने उसी से आसपास के बहुत लोगों को आग लगानी आरंभ कर दी । अनुमान के शोर्य और प्राक्रम को तो फॅमिली ही देख चुके थे । अतः उसे बंधनमुक्त दवा देख सभी सैनिक भाग खडे हुए और हनुमान को भवनों और नगर के मुख्य भागों को आग लगाने का अवसर मिल गया । देखते ही देखते स्थान स्थान पर लंकापुरी दो दो कर चलने लगी । लोग और सैनिक आग बुझाने में लग गए और हनुमान सागर किनारे पर पहुंचकर छुपाये रिसर्व अभियान पर झड समुंद्र पार कर आर्यव्रत की मुख्यभूमि जो उडान भरने लगा । अनुमान के साथ ही समुद्र के इस बार अनुमान की प्रतीक्षा कर रहे हैं । जब हनुमान का यान इधर आता दिखाई दिया तो वे उत्सकता से विमान के उतरने की प्रतीक्षा करने लगी । हनुमान ने यान से उतरकर लंका का समाचार दिया तो सब अति प्रसन्न हो । भूत भूत करना हर्ष प्रकट करते हुए अनुमान की जय जयकार करते हुए इसकी निंदा की ओर जल बढ नहीं हूँ ।

36. Samundra Par Ram Setu Ka Nirmaan

श्री राम भाग पैंतीस अनुमान को लंका जाने और वहाँ से लौटने में दो मार्च के लगभग लग गए थे । इस काल में तो ग्रीन ने इस किन्दा के नागरिकों व अन्य आस पास के वनवासियों की विशाल सेना तैयार कर लीजिए । जब हनुमान लोड कराया तो वह भी तो ग्रीन के आह्वान पर सेना का जमाव देख चकित रह गया । जबकि इसके ना में इस समाचार ने विस्तार पाया की राजा सुग्रीव राक्षसों पर आक्रमण कर रहा है । राक्षसों के विरोधपूर्ण देश में उत्साह और उत्तेजना आ गई । युवक होता है सेना में प्रवेश के लिए इस किन्दा में पहुंचने लगे थे । अनुमान ने लंका में जो कुछ देखा था और जो कुछ उसने किया था तब श्रीराम को कह सुनाया । जहाँ सीता की दुखी व्यवस्था का सिद्धांत सोना राम की आंखों में अश्रु बहने लगे । वहाँ अनुमान की वीरता की कहानी सुन उनके भुजदंड बढने लगे । लंका आक्रमण में सबसे बडी बाधा समुंद्र की थी । इसी कारण ही रावण और लंका वासियों का मस्त देश के आसमान पर चढा हुआ हूँ । अनुमान का लंका में प्रवेश पा जाना और श्रीलंका को होकर सुरक्षापूर्वक चलाना । लंका निवासियों और रावण के सैनिकों के मन में चिंता उत्पन्न करने वाला तो हाँ, परन्तु रावण और उसके सैनिक है । सोच कर मन को संतोष दे लेते थे कि एक आद व्यक्ति का चोर के भारतीय आना और वहाँ पर कुछ हानि पहुंचाकर चला जाना यह सिद्ध नहीं करता हूँ कि लक्ष्य लक्ष्य राक्षस सैनिकों से युद्ध करने के लिए इतने ही सैनिक लंका में आ सकेंगे । परन्तु रावण के जिसमें का ठिकाना नहीं रहा जब एक का एक पता चला कि आर्यव्रत का दक्षिणी कौन लंका से सेतु द्वारा जोड दिया गया है और एक लक्ष्य के लगभग सैनिक लंका में आप पहुंचते हैं । समुद्र तट के संरक्षकों की जानकारी के बिना श्री राम की सेना सागर पार आ गई । ये है देख रावण की नींद खुली और तुरंत एक युद्ध सभा बुलाई गई । दबा में विभीषण, कुंभकरण, मेघनाथ परस्त, दुर्मुख वजह दस्त निकुंभ रज हनु इंडिया दी । वह रावण के अन्य सभी संबंधी और सेनापति उपस् थित थे । रावण ने बताया कि इस राम ने दो कैसे बाली को मार डाला है और उसके छोटे भाई सुग्रीव को राज्य दिलाकर उसे अपना सहायक बना लिया है । अब राम के उकसाने पर तो गृह सेना लेकर लंका में घुस आया है । होना है कि उन्होंने समुद्र पर देख तू बांध लिया है अब उस की सेना और सैनिक सामग्री लंका भूमि पर आ रही है । रावन ने अपने मंत्रियों को बताया की बीना एक विशाल युद्ध के यह सेना लंका द्वीप के बाहर नहीं की जा सकती है । वो महाराज इंद्रजीत मेघनाथ ने कह दिया मेरा भी प्रॉन्स ओनली जी मैं राम और लक्ष्मण को यमद्वार पहुंचाने का वचन देता हूँ । अंत में विभीषण ने कहा भैया एक बार मेरी भी सुन ले राम एसजीपीए योद्दा और पुरुषोत्तम है, वो है ये है । आप उसे युद्ध में परास्त नहीं कर सकेंगे । नर्मदा की अर्जुन और किस किन्दा के बाली को आप पराजित नहीं कर सके । काम जो उनके सैकडों दोनों अधिक धैर्यवान, बलवान और नीतिवान है उसे आप कैसे पराजित कर सकेंगे? इस कारण मेरी सम्मति माने और सीता को मान प्रतिष्ठा से वापस कर देंगे । आराम से समा यातना कर ले । मैं समझता हूँ कि इससे आपकी कीर्ति में वृद्धि होगी और व्यर्थ की राष्ट्रीय सत्य रोकिंग । इस कथन पर सभा के सब के सब सभासद एकदम बोल उठे । नहीं नहीं यह अपमानजनक होगा । इसका उत्तर इंद्रजीत ने दिया । राम केंद्र से बढ कर सकती और बुद्धि का स्वामी नहीं है । मैंने तो उस इंद्र को भी बांधकर पिताजी के सामने उपस् थित कर दिया था । मैं तो उस समय भी ब्रह्मा की बात मानता नहीं और इंद्रा को बंदीग्रह में डाले रखता हूँ । मेरी सम्मति यह थी कि ब्रह्मा को भी बंदी बना लिया जाए और देवा लोग पर अपना राज्य स्थापित कर लिया जाएगा । परन्तु पिताजी को बोल दे ब्रह्मा पर दया आ गई और इन्होंने शहर जी संधि कर ली । मैं भी यही संबंधित होगा कि इस किस किन्दा वासियों को मार मार कर भगा दिया जाएगा । ये हम से क्या लडेंगे, अपना घर तक बना नहीं सके । वानरो की तरह आनंदराव और सुरक्षों पर बने मचानों पर रहते हैं । इनके द्वारा बनाई सेतु पर अपना अधिकार कर भारत विजय का आयोजन किया जाएगा । पूर्ण सभा में इंद्रजीत और रावण की जयघोष हो गई, परंतु रिलेशन ने लंका के जलने की घटना का स्मरण करा मेघनाथ से पूछा और मेघनाथ! उस समय तुम कहाँ थे? जब एक ही किसके इंदावा सी हमारे नियंत्रण में नहीं आया । मैं वहीं था परन्तु वानर की तरह पूछ फोन कर रहा था । आग लगाकर भाग गया और मैं कुछ नहीं कर सका । युद्ध के मैदान में होता तो बताता है । अरे इंसान है ही नहीं है तो वानर है । हाँ हाँ, वानर है, वहाँ वाॅर्नर है । राम और सुग्रीव वानरों की सेना लेकर आए हैं । कहते हुए रावण के सभी सेनानायक बसने लगे । मेरी चेतावनी सुन लो कि तुम्हारे द्वारा घोषित यही तथाकथित वानर लोग लंका को विनष्ट कर सीता को लेकर चले जाएंगे और तुम मुख देखते रह जाओगे और सात आप उसके चरण स्पर्श कर छमा यात्रा करते फिरेंगे । मुझे अपनी दादी पर संदेह होने लगा कि उसने किस भीरू से आपको गर्म में लिया था । आप हमारी संस्कृति के नहीं हैं । लंका का सुख वैभव आपकी योग्य नहीं है । साथ क्या आप साहब दे रही है । इससे पहले की लगे हिसाब से कुछ कहे आप मेरी सुन ले । लेकिन नाथ ने आगे कहा हमारी विजय के बाद तो आप और आपके परिवार वालों के लिए इस सुंदर और सुप्रभ भूमिका बोर्ड नहीं रहेगा । यदि कहीं इसके विपरीत स्थिति उत्पन्न हुई और अन्य राक्षस भी आपकी भारतीय भेरू तथा दुर्बल से दो तो निश्चित जानो कि राम आपको राज प्रसाद के समूह सूली पर चढा देगा । आप जैसे भाई बंधुओं से द्रोह करने वाले का नए इस राज्यसभा में कोई स्थान रहेगा । नयाराम की चंडाल चौकडी में तब आप की स्थिति विकट होगी । तभी रावण ने भी कहा कि लंका का प्रसाद छोड दो अन्यथा तुम्हारा स्थान कारागर में होगा । विभीषण उठा और चुपचाप राज्यसभा से बाहर चला गया हूँ हूँ ।

37. Vibhishana Pahunche Shri Ram Ke Paas

ऍम श्री नाम बहुत छत्तीस । जो भी सेना और युद्धसामग्री चेतू से इस पार पहुंची । राम ने सुग्रीव और अंदर सेनानायकों की सभा बुलानी । राम का विचार था कि लंका दूर पर आक्रमण की योजना बनाई जाए । यह दूर अजय समझा जाता था । इस कारण इसे तोडफोडकर भीतर गए । बिना पिता का उद्धार संभव प्रतीत नहीं होता था । कुछ एक सेनानायकों का विचार था की बाली सुग्रीव के युद्ध की भर्ती यहाँ भी रावण राम का द्वंद युद्ध हो जाए । इस समय सभा में अनुमान सूचना लाया महाराज रावण का भाई विभीषन आपसे भेंट करने के लिए आया है तो ग्रीन ने कहा यह किसी प्रकार की छलना खेलने आया है । अनुमान ने कहा जब मैं महारानी सीताजी की खोज में लंका में घूम रहा था तो मुझे रिलेशन के प्रसाद को देखने का अवसर मिला । उनका प्रसाद यज्ञ के सुगंधित दूर से सुवासित हो रहा था और प्रसाद के भीतर एक आगार से वेद मंत्रों की धनी आती सुनाई दे रही थी । लंका में लोग इन्हें धर्मात्मा व्यक्ति मानते हैं । इस कारण मेरा अनुमान है कि ये अपने भाई रावण से लडकर चलाया । रावण को अनुमान की सूझबूझ पर बडा विश्वास था । इस कारण उसने रेडिएशन को उसी सभा में बुलवा लिया और परिचय के उपरांत आने का प्रयोजन पूछा । विभीषन ने कहा मैं चाहता था कि यह भयंकर युद्ध नहीं हो । इस युद्ध को टालने का मैंने भरसक की । यह काम क्या है? परंतु मेरी सम्मति ऍम ने कभी नहीं मानी । वहाँ सभा में आपको और मुझे भी जली कटी सुनाई गई और राजा सुग्रीव वो उनके सेनानायकों को वानर घोषित कर यह निश्चय किया है कि आपसे युद्ध किया जाए इस कारण नहीं । लंका का त्याग करके आ गया हूँ तो आप हमें युद्ध के लिए मना करने आए हैं । नहीं श्री राम मैं ईश्वर भक्ति आस्तिक हूं । मैं सीताहरण का विरोधी हूँ तो मैं युद्ध में न्याय का पक्ष लेने आया हूँ । मैं आपकी शरण में आया हूँ । यह कहा जाता है कि भले लोगों की शरण में रहने से कभी एक कल्याण नहीं होता । इस पर भी मैं इस युद्ध को रोकने के लिए एक प्रयास करने के लिए कहूँ । क्या चाहते हैं वही जो सभी सब लोग करते हैं । लंका पर आक्रमण से फूल शांति के लिए एक दूध बिजी है । आप की शुभकामना लंका निवासियों के प्रति लेकर जाए और जाकर कहे कि उस शुभकामना का फल प्राप्त करने के लिए लंकाधिपति चीता को मान सहित यहाँ पहुंचा दे और अपना आचरण सुधारें तो अभी भी आशा है कि रावण भले लोगों के मार्ग पर आ सकता है । ये ग्रीव का प्रसिद्ध था महाराज । आशा किंचित मात्र भी नहीं, इस पर भी इससे आपकी शोभा है और कीर्ति अनंतकाल तक होती रहेगी हूँ । नरसंहार से पहले सब लोग उससे बचने का प्रत्येक उपाय करते हैं । इसमें मेरा भी स्वार्थ है । मेरे भाई बंधु वहाँ लंका में है । वहाँ भी भले विचार के लोग हैं । यद्यपि वहाँ के राज्य प्रपंच के अधीन उनका और सुनाई नहीं पडता । यदि वे लोग बच सके तो मुझे प्रसन्नता होगी । राम ने कुछ विचार किया और तदंतर अपना निर्णय बता दिया । उसने कहा हाईवे बेशन ठीक कहते हैं । हमें शांति दूत रावण की सभा में भेजना चाहिए । उसे अंतिम अवसर अपने आपको तथा अपने देश वासियों को बचाने का देना चाहिए । परंतु कौनो मानव पक्षियों के सम्मुख जाएगा । इस बार पाली के पुत्र अंगद ने जाना स्वीकार किया । अंगद जब रावण की सभा में उपस् थित किया गया तो रावण ने उसे अपने मित्र का पुत्र घोषित कर एक उच्च आसन पर सुशोभित कर फॅमिली के पुत्र हूँ । बाली मेरा मित्र था डाॅन तो मेरे पुत्र सवाल हो तो मुझे वनवासियों के जाल में कैसे फंस गए हो । मैंने सुना है कि तुम्हारे पिता को इस वनवासी ने छुप कर बाढ द्वारा घायल किया था थे । उनकी मृत्यु हो गई थी । भला तुम ऐसे छल्ली की सेना में क्या कर रहे हो? अंगद ने विनम्र भाव में कहा आप पिताजी के मित्र है, इस कारण ही आपकी सेवा में आया हूँ । पिताजी तो अपने दुष्कर्मों के कारण यौवनावस्था में ही स्वर्ग सिधार गए । आपके पिताजी के पद के अनुसरण कर रहे हैं । इस कारण वैसे परिणाम से आपको बचाने के लिए मैं आपकी सेवा में व्यवस्थित हुआ हूँ और मैं सबसे छोटा हूँ परन्तु मेरी बात ध्यान देकर सुने । जब तक जीवन है आप सदस्य लोग तो को ही ध्यान समझते हैं । इन्हीं सुखों के लिए ही आप अपना जीवन लंबा करें । पीता माता के लिए अपने जीवन को समय से पूर्व छोडना बुद्धिमता की बात नहीं । मुझे भेजा गया है कि मैं आपको युद्ध के भयंकर परिणामों से बचाने का या तो युद्ध में फैसलों, युवक मारे जाएंगे, देश में युवकों का अभाव हो जाएगा । मृतकों की पत्नियां विधवा हो जाएगी । उन विधवा स्त्रियों का जीवन नरक तुल्य हो जाएगा । जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वे दूसरे पत्तियों की खोज में भटकेंगी अथवा यदि चार का मार्ग स्वीकार करेंगे । इससे शेष पुरुष वर्ग भी पतन की ओर चल पडेगा । इस प्रकार पूर्ण जाती पतन को प्राप्त होगी तो तुम यह कहने आए हो की मैं भूमि चाटता हुआ राम की सभा में पहुंच जाऊँ और हाथ जोडकर नमस्कार करूँ और कहूँ मुझे क्षमा करें और यदि केवल यही तीन अच्छा मुझे जमा करें बोलने से आपका जीवन लक्ष्य भोगविलास आपको प्राप्त होता रहे तो क्या हानि है । देखो वाला रावन ने स्पष्ट कहा मैं ऐसा कुछ भी नहीं करूंगा । तुम जाकर अपने पिता के हत्यारे को कह दो कि यहाँ चलना से काम नहीं चलेगा । यहाँ तो युद्ध होगा उसकी और मेरी सेना के भीतर राज्य सेना अपार है । उसका पार पाने के लिए कोई देवता भी सक्षम नहीं । भला पत्नी के लिए विलाप करता वन वन में बढने वाला छुद्र वानरों की सेना से सूत्र जीव क्या युद्ध करेगा? उसे कह दो कि वह जाकर अभि तपस्या करेंगे । मैं राजनीति जानता है और मैं युद्धनीति । अंगद ने विनम्रता के भाव से कहा मैं आपका संदेश सुना दूंगा परंतु आपके पिताजी से विशेष को स्मरण का मैं अपनी ओर से है । दो सब कहना चाहता हूँ कि जो बोल पिताजी ने की थी वही आप नये करें । उन को यह सूचना मिली थी कि राम महाबली और दिव्यास्त्रों से युक्त है । इस कारण राम से शत्रुता नहीं करे और अपने छोटे भाई राजा सुग्रीव को प्रसाद में स्थान दे क्या हुआ है? अभी एक लंबे काल के लिए राज्य हो सकेंगे । उन्होंने इस बात को नहीं माना और जब मरनासन्न भूमि पर पडे थे तब भी श्रीराम पर दोषारोपण लगाने लगे थे कि उन्होंने तो कैसे उस पर बाढ छोडा है । श्री राम ने उन्हें यही उत्तर दिया था की एक दूसरे और चरित्रहीन व्यक्ति को देने का अधिकार नहीं । जीवन सुख लेना है तो अपने और अपने साथियों के कल्याण को भलीभांति समझे । इस कारण हे ता मैं आपको समझाने आया हूँ कि युद्ध में आपकी विजय नहीं होगी, धर्म की कभी पराजय नहीं होती, दूर जान पीछे अपनी पराजय के बहाने ढूंढा करते हैं और परमात्मा पर दोषारोपण करते हैं परन्तु दूर बल्कि जीत होगी क्या? रावण ने पूछा धर्म कभी दुर्बल नहीं होता । कुछ धर्मात्मा मूर्ख होते हैं जो धर्म के विधि विधान को न समझते हुए अपने को अधर्म के पंजे में निस्सहाय डाल देते हैं ताकि धर्म मोहन सकती है । उसका एक छोटा सा दर्शन मेरे बडे भाई सवाल अनुमान आपको पहले करा गई है आपकी कोटि कोटि तू भट्टों से भरी नगरी उस एक परमात्मा के भक्त का बाल भी बांका नहीं कर सकी । होना है आपकी सुंदरनगरी को बहुत पानी पहुंचा गए हैं । मैं भगोडा युद्ध करने की सामर्थ्य नहीं रखता । हुआ पीठ दिखा गया था । जाते जाते वायॅस अपनी कूद भाव से निर्दलों के जो अपनों को आग लगाकर फिर पर पावरकाॅम भाग गया था । नया बागा होता तो मेरे योद्धा उसके हाथ पांव बांधकर उसका वध कर देते हैं । अंगद ने हसते हुए कहा हम वानरों के हाथ और पापा भी हमारे हथियार हैं । आप की सभा को मैं चुनौती देता हूँ । मैं सिर पर पांव रखकर नहीं भाग होगा । मैं यहाँ तब वहाँ के मध्य में खडा होता हूँ और आपको आपके इस तथाकथित योद्दाओं का बाल दिखाना चाहता हूँ कि यदि आपका कोई योद्धा मेरे इस को मिलाकर भी दिखा दे तो मैं मान जाऊंगा कि आपके योद्दा बडे सामर्थ्यवान है क्या कहा उठाने की बात तो मैं हम एक मक्की की बात थी । उठाकर समुद्र पार फेक सकते हैं । साथ ऐसे नहीं आप की सभा में कोई योद्धा हो तो उसे कहे कि मेरे इस पैर को खिला देंगे । इतना कहते कहते अंगद ने अपने आसन से ओर दबा के मध्य में अपना पांव जमा दिया । रावण उस देर तो मुस्कुराता रहा परंतु उस विचार कर एक सौ वर्ड से बोला दोनों इस वानर के बच्चे वो उठाकर समुंद्र में से एक दो दोनों उठा और अंगद की टांग को पकडो उठाने लगा । जब दाल नहीं उठा सका तो उसकी कमर में हार डाल उस स्थान से हिलाने का यापन करने लगा । उसे कुछ ऐसा समझ आया कि अंगद एक दृढ लोस तब की बात ही खडा है जो हिल नहीं सकता । दुर्मुख को अपने कार्य में सफल होते देख गावंडे अन्य योद्धाओं से यह कार्य करने को कहा । एक एक कर फिर दो दो कर तदंतर कई इकट्ठे मिलकर भी जब अंगद के पांव को खिला नहीं सके तो आवंट रोज से पागल हूँ तो हम अंगद का पांव को उठाने के लिए उठ खडा हुआ । जब रावण झुककर अंगद की टांग को छोडने लगा तो अंगद ने पापा उठाकर पीछे कर लिया और कहा मेरे पास पढने से छुटकारा नहीं हो सकता । यदि पहुँच होना है तो चलो श्रीराम के पांव पकडो और मैं अपने पिता के मित्र की सहायता कर दूंगा कि वह आपके दोस्तों को जमा करते हैं । इस पर रावण लज्जित अनुभव करने लगा । एक चीज गया और बोला, देखो अंगद, अब तुम यहाँ से जाओ और अपने स्वामी से जाकर कह दो कि लंका में मोर वानर नहीं बचते हैं । यहाँ अदिति के वंशज और स्वर्ण लोग के विजेता राक्षस रहते हैं । यदि उसे अपना जीवन है तो वो वापस लौट जाएगा । युद्ध उसके मान का नहीं है । देव लोग विजयी रावण को एक वनवासी लाखों वानरों के झुंड के साथ मिलकर भी पराजित नहीं कर सकेगा । अंगद तो पहले ही आशा करता था, परंतु विभीषण के सुझाव पर श्रीराम ने यह अंतिम प्रयास किया था, जिसे युद्ध जैसा भयंकर का हो ।

38. Lanka Mein Hone Lagi Yuddh Ki Taiyaari

श्री राम बहुत सैंतीस अंगद केएस सफल नोट आने पर युद्ध अवश्यंभावी हो गया । वैसे सुग्रीव इत्यादि तो अंगद के जाने से पूर्व भी यह समझ रहे थे कि युद्ध अब्दल नहीं सकता । अंगद का भेजा जाना तो विभीषन की प्रेरणा का परिणाम । जब अंगद ने रावण की मानसिक अवस्था का चित्रण किया तो राम और लक्ष्मण अपने आसन से वोट आपने धनुष मान को ठीक करने लगे हैं परन्तु तो गरीब में हाथ जोड कहा महाराज, अभी आप बैठे उन्होंने हमें वानर का है तो जिस तरह वानर मधुमक्खियों को उनके सबसे से निकाल कर सकते है, अधिकार करते हैं, उसी तरह हम उन्हें लंका से बाहर निकालने का आयोजन करेंगे । क्या अभिप्राय लंका में सुरक्षित बैठे राक्षसों को प्राप्त करने में तो वर्षों लग जाएंगे । हमें चाहिए कि लंका में इतनी गर्मी उत्पन्न कर दी जाए कि राक्षस अपना सुरक्षित स्थान सो दूर से बाहर आ जाएगा । एक बार रावण बाहर युद्ध के मैदान में आ जाएगा तो उसको मार डालने पर युद्ध समाप्त हो जाएगा । सेना को आज्ञा हो गई कि लंका दूर की प्राचीर को तोड फोड दो । साथ ही साथ लंका की प्राचीर के बाहर रहने वाले तथा घूमने फिरने वाले राक्षसों को जीवित अथवा मृत दीवार के भीतर कर दो । अब वानर सेना टिड्डी दल की बात ही लंका दूर पर नमक पडी । दो दिन के घमासान युद्ध के उपरांत भर के राक्षस लाखों की संख्या में लंका दूर के भीतर अपनी रक्षा जहाँ पहुंचे पूरी के बाहर उद्यान, भवन मार्ग और जल के स्रोतों पर अधिकार कर लिया गया । लंकापुरी में भर के लोग सामान नहीं सकते थे । नागरिकों और सेना में छुटपुट झडपें होने लगी । विवस सेना हम श्रीलंका के द्वार खोल बाहर मैदान में आकर लडने को तैयार होगी । घमासान युद्ध आरंभ हो गया । वानर सेना उत्साह से भरी हुई थी और राक्षस सेनापति अनुमान अंगद के शक्ति प्रदर्शन से भयभीत हो चुके थे ।

39.Ravana Ne Ram Se Sandhi Karne Se Kiya Inkaar

श्री राम बहुत अडतीस जब राम की सेना लंका के द्वारों पर प्रहार पर प्रहार कर रही थी और द्वार अति सुदृढ होने पर भी वानर सेना के निरंतर दिन रात के प्रहारों से टूटने फूटने लगे तो युद्ध विषय पर विचार करने के लिए रावण ने सभा बुलानी । सभा में रावण ने कहा पूरी का उत्तरी द्वार जर्जर हो गया है और समाचार है कि किसी भी समय वानर सेना उधर से नगर में घुस आएगी । एक बार शत्रुसेना नगर में घुस आई तो फिर लंका छोड भागना पडेगा । नगरवासी नवीद हैं और मुझे यह है कि राम की सेना को देखते ही ये लोग उसकी जय जयकार करने लगेंगे । राजस्थान का कहना था महाराज यह नागरिकों का दोस्त नहीं है । नागरिक एक व्यक्ति जिसे हम वानर कह रहे थे द्वारा गठित विनाश को देख चुके हैं और जब सहस्त्रों की संख्या में वैसे ही वानर नगर में वहीं कुछ करने लगे जो एक वानर कर गया है तो फिर कौन अपने पक्ष को प्रबल मानेगा । हम से भूल हुई है कि हमने इसे उपद्रव के पश्चात जीवित छोड दिया । इस पर मेघनाथ ने का उस समय हमने यतन तो किया था कि उसे जीवित जला डालेंगे परन्तु उसको जलाना हमारे ही विपरीत सिद्धू हुआ था । हम तो उसे जला नहीं सके । इसके विपरीत उसने ही लंका को फोन करने का प्रयत्न किया था । रावण ने इस विवाद को बंद करते हुए कहा, भूत के विषय में जो विचार करते रहते हैं, वे सदा विफल होते हैं । पीछे को देखने वाले आगे नहीं चल सकते हैं । परन्तु नाराज अपने अनुभव से जो लाभ नहीं उठाते हैं, वे भविष्य को भी बना नहीं सकते । और नीति भी यही कहती है कि जो भविष्य में दूर तक नहीं देखता होकर खाकर गिर पडता है । रावण इस प्रकार काल्पनिक सिद्धांतों पर बहस करना नहीं चाहता था, है । वर्तमान संकट को डालना चाहता था । इस कारण उसने उतावली में पूछ लिया, रहस् तुम बहुत बुद्धिमान माने जाते हो । इस संकट को टालने गा, कोई उपाय बताओ? इस पर फॅसने हाथ जोडकर कहा, महाराज, मैं उपाय बताने के लिए यह पृष्ठभूमि तैयार कर रहा हूँ । मेरा ये कहना है कि लंका छोडकर भागने के स्थान पर यह अच्छा होगा कि लंका द्वार पर छह पता का फहरा दी जाएगी । क्या अभिप्राय है तुम्हारा? मेरा अभिप्राय यह है ये राम से संधि कर ली जाए, सीता को वापस कर दीजिए और उनको अपनी वानर सेना लेकर लंका द्वीप छोड जाने की शर्त रख दीजिए तो पराजय स्वीकार कर लू महाराज, यह पराजय नहीं होगी । आप उन्हें अपना सांस्कृतिक कार्य चला सकेंगे । हमें सुग्रीव से उन्हीं शर्तों पर संधि कर लेना चाहिए जिस पर उसके भाई वाले ने की थी । आप लोग नहीं मानेंगे । रावण ने कहा, महाराज, यदि आप योजना में तथ्य समझते हैं तो आज्ञा करिए । मैं यात्रा करता हूँ । रावण एक्शन तक विचार करता रहा । फिर एक का एक भवों पर क्योरी चढाकर बोला, एक बार संदीप चर्चा आरंभ हुई तो राक्षसी मेरे विरुद्ध हो जाएंगे । आता है, इसका प्रश्न ही नहीं उठता । इस पर मेघनाथ बोल उठा, महाराज, मेरी सम्मति है कि कल से नगर से बाहर निकलकर युद्ध किया जाएगा । इससे नागरिकों के व्यतीत होने से सेना प्रभावित नहीं होगी । सेना लडेगी और नागरिक जीतने वाले की प्रतीक्षा करेंगे । वे तो जीतने वाले के गले में उस मालायें डालने के लिए सादा तैयार रहते हैं । ठीक है, ऐसा ही हो । रावण किया गया हो गई और मंत्रीगण कुछ कह नहीं सके । इस पर भी सैनिक वर्ग पसंद था । वास्तव में लंका में सैनिक राज्य को ही राम और वानरो ने आक्रमण द्वारा चुनौती दी थी । जितने भी असैनिक मंत्री थे, वे राम से मैत्री कर लेने के पक्ष में थे परन्तु चली सैनिक वर्ग की उनका नेता रावण था जिसकी प्रभुता उसके कुशल सैनिक होने के कारण थी । जब यह दोस्ती हो रही थी । मंदोदरी सीता से मिलने आई हुई थी । सीता पूर्व अशोक उसके नीचे आसन बिछाए बैठी थी, उसके केस बोले थे और वह परमात्मा का चिंतन कर रही थी । मंदोदरी को देख सीता ने हाथ जोडकर नमस्कार किया और उसे समीप आसन पर ही बैठने का निमंत्रण दे दिया । सुनाओ बहन कैसी हो मंदोदरी ने पूछ लिया रीजन से आज का समाचार सुन मैं शीघ्र ही महारानी का आती थी और छोडने की आशा कर रही हूँ । क्या बताया है फिर जुटाने यही कि लंका पुरी चारों ओर से गिरी हुई है । पूरी का उत्तरी द्वार घमासान युद्ध क्षेत्र बना हुआ है । उसने यह भी बताया है की रक्षा सैनिकों के शवों से पूर्ण मार्ग भर गया है और वे पांच सौ जिन परफाटक टिके हैं, तेरह गए हैं । सब भाषा कर रहे हैं कि कल यदि वानर सेना ने उन्हें दरवजा से आक्रमण किया तो नि संदेह द्वारा टूट जाएगा और वानर लंकापुरी में प्रवेश कर पीता रहा जाएंगे । फ्री जेठ कह रही थी कि लंका के इतिहास में लंका की पराजय जीते बार होने वाली है । एक बार पहले भगवान विष्णु ने लंकापुरी पर आक्रमण किया था तो यहाँ प्रचंड अग्नि का प्रकोप हुआ था । उस अग्नि से बचने के लिए राक्षस भागकर पाताल देश में चले गए थे । अब भी वैसा ही होगा, परन्तु इस बार राक्षस भागकर पाताल देश में नहीं जा सकेंगे । उस समय विष्णु अकेले थे और राक्षसों के भागने के कई मार्ग खुले थे । इस बार लंका को श्री राम के सेनानायकों ने घेर रखा है और यहाँ से लोग भाग कर लंका से बाहर कहीं नहीं जा सकेंगे । मंदोदरी पूछ लिया परन्तु क्या दुर्ग टूट जाएगा और रामविजय ही होंगे । जब से हैं, लंका को फोन करने वाला परम वीर हनुमान यहाँ से हो कर गया है । तब से मुझे विश्वास होता है श्रीराम के सैनिकों की जीत होगी और मैं अपने उचित स्थान पर पहुंच सकू । मंदोदरी चुप रही । वह चिंतित प्रतीत होती थी । सीता ने पुणे कहा, मुझे दुख है कि आपके पति देव की पराजय हो रही है परन्तु होना ही था । इसमें मुझे संदेह नहीं था । कारण ये है कि सत्य और धर्म की सदैव विजय होती है । यदि संदेह था तो इस बात का कि मैं इस कलेवर में पति दर्शन पास होंगी अथवा नहीं । अब इसमें भी संदेह नहीं रहा । इस परिवर्तित परिस्थिति में तुम्हारे जीवन की रक्षा हमारा कर्तव्य हो गया है । एक राक्षस स्कूल की स्त्रियों के मन में सब आ गया है कि यदि सीता से किसी प्रकार का दुर्व्यवहार किया गया तो उसका प्रतिकार उसी रूप में लंका के राज्य परिवार की सभी स्त्रियों से लिया जाएगा । उस तरह का परिणाम यह है हुआ है ये ऍम स्कूल की अधिकांश महिलाओं ने मेरे पास आकर कहा है कि जब तक वर्तमान युद्ध का अंत नहीं होता तब तक सीता का किसी प्रकार का सिस्टम हो । उनको अपने मरने और अपने को कस्ट दिए जाने का भय सता रहा है । यहाँ राक्षसों द्वारा अपराध महिलाओं से किया गया दुर्व्यवहार देख चुकी है । अतः वे नहीं चाहती कि विजिट सेना उनके साथ भी उसी प्रकार का व्यवहार करें । सीता मुस्कुराकर चुप रह गई बात मंदोदरी नहीं आगे चलाई उसने कहा, मैं अपने मरने से नहीं डरती । मैंने स्त्री धर्म के विपरीत कभी कुछ नहीं किया । मेरे कारण ही मेरी प्रिया दासी और सकी त्रिजटा सदैव तुम्हारा मनोबल उच्च रखने का प्रयास करती रही है । अपनी सामर्थ्यानुसार पति देव को भी सन्मार्ग पर आरूढ रखने का यतन क्या है? इस कारण मैं जानती हूँ मेरा शेष जीवन प्रभु भक्ति में और अगला जन्म सुखकारक होगा परन्तु हमारे परिवार की अन्य स्त्रियां ऐसा कुछ नहीं समझती । वे इसी जन्म को मानती है और इसके सुख दुख के भोग के विषय में ही सोचती है । इस कारण उन्हें मरने का और वह भी बहुत कस्ट पाकर मरने का विषय है । वो चाहती है कि मैं तुम्हारी तब तक रक्षा करो जब तक राक्षसों की पूर्ण विजय नहीं हो जाती । और यदि हमारी विजय नहीं होगी तो राम के यहाँ पर तुम उसको सुरक्षित फोड दी जाएगी । और महारानीजी सीता ने पूछ लिया आपको अपनी राक्षस विचारधारा पर विश्वास नहीं है । नहीं मेरी माँ देव लोग की रहने वाली थी और मेरे युवा होने तक मैं उसके पास रही है । उसकी शिक्षा का ही प्रभाव है कि मुझे जीव के अगर अमर होने पर विश्वास है, मेरे देवर डिविजन भी ऐसा ही मानते हैं है । अपने भाई को छोड तुम्हारे पति की चरण में चले गए हैं । मुझे विश्वास हो रहा है कि विजय राम की सेना की होगी । रात सेना के साथ कुछ भी हो परन्तु मैं मानती हूँ के राक्षस स्त्रीवर्ग की स्त्रियों की मान मर्यादा राम के सैनिकों के हाथ में भली भारतीय सुरक्षित है, उनको इसके लिए नहीं करना चाहिए ।

40. Meghanada Ne Chali Apni Chaal

श्री राम बहुत उनतालीस मेघनाथ को पूरी के उत्तरी द्वार पर वानरों की विजय से नींद नहीं आ रही थी । इस कारण मैं आधी रात को ही युद्ध के लिए चल पडा और राम लक्ष्मण के शिविर पर विमान में मर जाते हुए उसने अपना माया बाढ समाया माया बाड केवल एक बार प्रयोग किया जा सकता था और आमने सामने के युद्ध में प्रयोग होने पर सामने वाले को ही मारने में सक्षम था । विमान से उस बाढ को चलाने पर उसका असर कम हो गया और राम लक्ष्मण और कई सैनिक उससे असर हो गई । अन्य सैनिक युद्ध से पूर्व ही दोनों को अच्छे देख शोकमग्न हो गए । ऊपर आकाश से मेघनाथ को ऐसा प्रतीत हुआ कि दोनों मृत्यु को प्राप्त हो गए हैं । इस पर मैं अपने पिता रावण के आगार में जा पहुंचा । जब उसने राम लक्ष्मण की मृत्यु का समाचार दिया तो रावण की आज्ञा से उन लंका में बाजे बजने लगे । रावण की आज्ञा से सीता को विमान पर बैठाकर राम के शिविर पर उडान कराई गई और वहाँ की हलचल दिखाकर यह समझाने का यतन क्या कि दोनों भाइयों की मृत्यु हो चुकी है । सीता जो ग्रस्त हो गई रिजल्ट आ । साथ ही थी । उसको एक बार राम लक्ष्मण के शिविर पर दिखाई दी । उनके शिविर पर ध्वजा अभी भी पूर्ण ऊंचाई पर फहरा रही थी । रिजल्ट आने जब सीता को वह दिखाई तो चित्र में स्वस्थ हो उन्हें नीचे देखने लगी । उस समय तक राम और लक्ष्मण सचेत हो गए थे और उनके सैनिक वैद्यों ने यह घोषणा कर दी थी कि दोनों भाई और अन्य अचेत सैनिक सभी प्रकार से स्वस्थ है । देखते ही देखते वानर सेना में प्रसन्नता के लक्षण दिखाई देने लगे । विमान में लौटते हुए सीता मन में साहस अनुभव कर रही थी । लंका में भी राम लक्ष्मण के जीवित होने का समाचार गया तो होने वाले युद्ध की तैयारी होने लगी । दो दिन से श्री राम के सैनिक लंका पर आक्रमण करते रहे थे और दो दिन के भयंकर आक्रमण के परिणामस्वरूप वे आशा कर रहे थे कि पूर्व राक्षस सुरक्षात्मक युद्ध करते रहेंगे और श्रीलंका में घुसने में असमर्थ हो सकेंगे । परन्तु दिन चढने पर उन्होंने देखा कि राक्षस सेना काले बादलों की बाटी पूरी में से निकल मैदान में व्यू रचना करने लगी है । इस पर वानर सेना भी उसी प्रकार के युद्ध की तैयारी करने लगी । दिनभर दोनों सेनाओं में युद्ध होता रहा । अनेक बार मेघनाथ ने राम लक्ष्मण को भडकाकर अपने सामने बुलाने का यत्नों की है परन्तु रात में घायल के कारण वे पूर्णतः स्वस्थ नहीं थे अतः युद्ध में सम्मिलित नहीं हुए थे । इस कारण मेघनाथ दिन में कई बार ललकारने पर भी राम लक्ष्मण को युद्ध में नहीं की सका । इस दिन युद्ध का पलडा श्री राम के सैनिकों का भारी रहा था । इस कारण उनमें उत्साह की लहर थी और सारे होते ही अपनी वायॅस प्रवर्ति के कारण आस पास के फलोद्यान ओ में उछल कूद मचाने लगे और फल इत्यादि तोड तोड कर खाने लगे । अगले दिन अनुमान आक्रमण करने की योजना बनाने लंका के उत्तरी द्वार के समीप खडा विचार कर रहा था कि दो प्राप्त को पहचान गया । श्रीलंका में आग लगाने के पश्चात उसका इस सुबह से अशोकवाटिका के द्वार पर आमना सामना हुआ था । उस दिन उसने एक मुक्का उसकी कनपटी पर जमा कर ही संतोष कर लिया था । आज उसे देश बदलकर अपनी सेना के आसपास घूमते देख उसे गले से पकट पूछने लगा भाई, इस छद्मवेश में यहाँ क्या कर रहे हो? वो तो तुम पहचान गए हो । उस दिन तो तुम भाग गए थे । अब द्वंद युद्ध कर सकते हो, बस फिर क्या था दोनों में दांव तेज मुक्का मुक्की होने लगी । दोनों में अब निर्णयात्मक युद्ध हो गया । एक घडी भर में ही हनुमान ने उसको यह लोग पहुंचा । अगर उसका शव उत्तरी द्वार पर खडी राक्षस सेना के समीप बिकवा दिया । रावण को दो प्राप्त की मृत्यु का समाचार मिला तो उसने सूरवीर सेनानायक वजह दस्त को एक भारी सेना सहित वानरों को लंका से खदेड नहीं किया गया, देकर युद्धभूमि में भेज दिया । युद्ध लंकापुरी से बाहर मैदान में होने लगा । राक्षस सेनापति, वज्र दस्त फॅस अजीत रथ पर सवार होकर सेना खोले युद्ध करने लगा । अभी दिन के तीन प्रहर भी समाप्त नहीं हुए थे कि अंगद और वज्र दस्त का आमना सामना हो गया । दोनों में भयंकर द्वंद युद्ध होता देख दोनों सेनाएं लडना छोड इन दोनों का युद्ध देखने लगी । परन्तु अंगद ने वज्र दस्त को मार गिराने में अधिक समय नहीं लिया । उस दिन का युद्ध वानरों में अपार उत्साह वृद्धि का कारण बन गया परन्तु रावण ने विलंब एक नवीन सेना के साथ अकंपन को युद्धभूमि में देश दिया । रावण का विचार था कि नई सेना भेजने से कि वानर सेना युद्ध नहीं कर सकेगी और बहुत खडी होगी, परन्तु हुआ इसके विपरीत वानर सेना का दिन के पूर्व भाग में हुई विजय से उत्साह बढा हुआ था और अकंपन को मारने और उसकी सेना को खदेडने में बहुत देर नहीं लगी । अब रावण ने भी रात के समय युद्धविराम रखना ही उचित समझे हूँ ।

41. Sanjeevani Booti Lekar Aaye Hanuman

श्री राम भाग चालीस अगले दिन रावण स्वयं युद्ध का संचालन करने युद्धभूमि पर आया परन्तु लाख यत्रों करने पर भी राम लक्ष्मण का सामना प्राप्त नहीं कर सका । उनकी सेना पहले ही बहुत विशाल थी जिसमें उत्तरोतर वृद्धि हो रही थी । दूर दूर से राक्षसों द्वारा पीडित वनवासी योद्दा आकर श्री राम की सेना में प्रवेश पा रहे थे । उन्होंने रावण को चिडी रामलक्ष्मण तक पहुंचने ही नहीं दिया । राक्षस सैनिकों के शवों के ढेर लग गए थे और अब सैनिक घर से भी कम होते जा रहे थे । अतः रावण ने निश्चय किया कि पहले साधारण वानर सैनिकों को मार मार कर काम किया जाए तभी रामलक्ष्मण को मारा जा सकेगा । इस कारण अगले दिन नारायण तक देवांतक, अतिकाय, त्रिशिरा और महापाप को बारी बारी सेनापति बना युद्ध में भेजा परन्तु वे वानर सेना को कुछ भी विशेष हानि नहीं पहुंचा सके और दिन के तीसरे पहर तक सभी मार डाले गए । इससे रावण बहुत ही व्याकुल हुआ और अपने पुत्र मेघनाथ को युद्ध में जाने की प्रेरणा देने लगा । इंद्रजीत मेघनाथ के पास केंद्र से विजिट मास्टर भी था जो कम अंतर से प्रयोग करने पर सामने खडे सभी के लिए निश्चित मृत्यु से होता था परन्तु उतावले मेघनाथ ने युद्धभूमि में पहुंचते ही दूर खडे लक्ष्मण पर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर दिया । परिणाम गया हुआ कि उसका असर आधा रह गया और राम के सैनिक केवल घायल और अचेत होने लगी । लक्ष्मण मूर्छित हो गए । रात घेरा आई थी और मेघनाथ लक्ष्मण को मत समझ लो । टूट चुका था । घायलों की सेवा करते हुए वैद्यराज जामवंत भी घायल हो गया था । वो है इस अस्त्र से घायल हो कि चिकित्सा जानता था । उसने बताया कि संजीवनी नाम की बूटी लाई जा सके तो लक्ष्मण और अन्य सभी घायलों का उपचार किया जा सकता है । विभीषन के साथ उसका मित्र फॅमिली लंका छोडकर आया हुआ था । उस से परामर्श किया गया तो उसने जाम्वन्ध के निदान का समर्थन किया और बताया कि वहाँ संजीवनी बूटी उपलब्ध नहीं आता है । यदि हिमालय पर्वत से दिव्या संजीवनी लाये जाये तो उसका प्रभाव अत्यंत चमत्कारी है । तुरंत योजना बन गई । उसी समय हनुमान को विभीषण के विमान पर हिमालय पर भेज दिया गया । वहाँ वो साडी ढूंढने में कठिनाई अनुभव हुई तो हनुमान सब की सब बूटियों के बडे बडे गठन एकत्रित कर विमान में ले आया । उस दिव्य वो सिद्धि संजीवनी की सुबह से ही मास्टर से घायल स्वस्थ हो । उठ खडे हुए । अगली प्राप्ता तक लक्ष्मण सचेत हो उन्हें युद्ध के लिए तैयार हो गया । उन्हें मेघनाथ से उसका युद्ध हुआ । ब्रह्मास् निःशेष हो चुका था । इस कारण अब सामान्य सशस्त्रों से युद्ध हो रहा था । इस पर लक्ष्मण ने मेघनाथ को मार डाला । रावण अब फिल्म युद्ध में आने से डरने लगा है । अपने सेनापतियों को ही भेज रहा था । स्वयं प्रसाद से बाहर ही नहीं निकलता था । उसे युद्धभूमि पर लाने के लिए लंका को जला डालने की योजना बना दी गई । लंका दूर के भीतर के क्षेत्रों को अग्नि में भस्म किया जाने लगा तो वहाँ के रहने वाले लंका दुर्ग के भीतर महल की परिधि में घुसने लगे । जब जनसंख्या वहाँ बढने लगी तो रावण को नगरवासियों से विद्रोह का डर लगने लगा और विवश हो बच्चे कुछ राक्षस सैनिकों को लेकर युद्धभूमि में खडा हुआ । अब श्रीराम तथा रावण दोनों में युद्ध हुआ और अपने नवीन सशस्त्रों की सहायता से राम ने रावण को मार गिराया । रावण के धाराशाही होते ही राक्षस चारों और भागने लगे । जिस और जिसको मार्ग मिला उसी और भाग खडे हुए । इन भारतीय ऍम सैनिकों का पीछा कर राम के सैनिक जय श्री राम का उद्घोष करते हुए उन्हें समाप्त करने लगे । युद्ध के अंतिम दिन देवता भी अपने अपने विमानों में बैठे हुए युद्धभूमि पर हुए इस पूर्व संघर्ष का अंत देखने आए थे और रावण के मार कर भूमि पर गिरते ही विमानों से राम लक्ष्मण और उनकी सेना पर उसको वर्ष करने लगे थे । इसके उपरांत तो एक घडी में ही लंका के द्वार खुल गए और वानर सेना श्रीराम का जयघोष करती हुई श्रीलंका में घुस गई । जैसी की आशा की जाती थी । वानर सेना के साथ लंका के नागरिक दी श्री राम और महाराज विभीषण की जय जयकार करने लगे । इस हर्सोल्लास में राम ने लंका का राज्य अधिवेशन को दे दिया । निवेशन की इच्छा थी कि श्रीराम लंका में प्रवेश करें और वहाँ पर उसे सिंगासन रोड करें । परंतु राम ने स्पष्ट कहा, मेरे वनवास की अवधि अभी बोल नहीं हुई । इस कारण बिता की आज्ञानुसार मैं किसी नगर में प्रवेश नहीं कर होगा । अतः राज्यभिषेक यहाँ रणभूमि पर ही होगा । जय श्री राम वैर नवीन राजा विभीषण का राज्यभिषेक देखने लंका के निवासी सहस्त्रों की संख्या में रणभूमि से कुछ हटकर एकत्रित थे । इनमें अधिकांश स्त्रियाँ थी । बलशाली रावण मैं उसके पुत्र इंद्रजीत मेघनाथ का सभी अन्य सेनापतियों सहित वध करने वाले श्री राम का सोम रूप तू गठित बलिष्ठ तन बहुत से विकृत बुद्धि वाली स्त्रियों के मन में सीता के प्रति ईर्ष्या देश उत्पन्न कर रहा था । ऐसी स्त्रियां यह समझ रही थी कि यदि सीता जैसी सुंदर स्त्री इस संसार में उत्पन्न होती तो लंका का विनाश ना होता । कुल सिर्फ मनोवृत्ति वाली इन स्त्रियों ने ईर्ष्यावश प्रचार करना आरंभ कर दिया कि रावण सीता को पतित कर चुका है । रावल राज्य में अनेक लो भी और पार्टी थे, जो रावण की को नीति से लाभ उठाते थे, है । दुस्प्रचार उनके मन को संतोष देने वाला प्रतीत हुआ और वे सभी इस बात को फैलाने लगे । जाॅनसन वन की अग्नि की भारतीय फैल गया और वानर सेना को भी सुनाई दिया और उनके द्वारा राम के कारण गोचर भी हुआ है । इसके बंधती से श्री राम के मन में एक विषम दुविधा उत्पन्न हो गई । उनके मन में विचार उत्पन्न हुआ कि अयोध्या वापस लौटने पर भारत उन्हें उन्हें राज्य गद्दी पर बैठाने के लिए है । उनकी प्रतीक्षा कर रहा है जहर कौशल न देश और प्रतिष्ठित इक्ष्वाकु वंश के वंशज और रघुकुल के उत्तराधिकारी है । एक लांछन वाले इस तरी को महारानी बनाने पर सारा कुल निरादर पाएगा । इस जीजा में फंसे हुए राम ने अनुमान को कहा अनुमान तुम विजयी सेना के सेनापति हो । तुम्हारी सेना ने लंका विजय की है और रावण को पराजित कर सीता को उसके पंद्रह से मुक्त करवाया है । इस कारण यह तुम्हारा ही अधिकार है कि तुम अब सीता देवी के पास जाओ और उसे इस युद्ध के परिणाम से सूचित करूँ । उसे कहो कि रावन ने रघुकुल की एक स्त्री का अपहरण कर कुल को कलंकित किया था और मैंने उसको एक घोर युद्ध में पराजित कर रघुकुल पर लगे इस लांसर वो धो डाला है । अब वो रावण की बंदी नहीं, इस पर भी यह अब उसका अधिकार है की मुझे बताए कि वह क्या चाहती है । अनुमान ने अशोकवाटिका में श्री राम का संदेश सीताजी को दिया । जीता इस बात से बहुत तक अनुमान का मुख्य देखती रह गई । उसने विचार कर अनुमान से पूछा क्या वह नहीं जानते हैं कि मैं क्या चाहती हूँ? माता जी अनुमान ने कहा था मैंने अक्षरस श्री राम का संदेश सुना दिया । जीता ने मुझ पर कठोर मुद्रा बना कह दिया । श्री राम से कह दो कि मैं अपने पति के दर्शन की अभिलाषा व्यक्ति हुआ । इस उत्तर पर राम ने लंकेस विभीषण को कहलवा भेजा है कि वह सीता को भेज दे । सीता आई तो राम ने उसे लंका में विख्यात किवंदती सुनाकर कहा इस निंदा के कारण मैं तुम्हें अपने साथ अयोध्या नहीं ले जा सकता हूँ परन्तु आपको इस बात का विश्वास कैसे हो गया कि यह सत्य है? जीताने प्रश्न सत्य है, सत्य का न होकर लोक निंदा का है । आपने शुद्ध पवित्र होने का कोई प्रमाण तुम को देना होगा जिससे यह निंदा समाप्त हो । मैं यही कह सकती हूँ कि मैं यदि जीवित हो तो मेरी रक्षक त्रिजटा द्वारा मुझे साहस प्रदान करने के कारण इस पर भी यदि मेरे साथ दुर्व्यवहार किया गया होता तो मैं अब तक अपने को अग्नि में बास मिल कर चुकी होती है । मैं इसका प्रमाण भी दे सकती हूँ की नहीं तो मुझे इस देह का कोई वो है और न ही अग्नि कब है । केवल इस जन्म में आपके दर्शन की अभिलाषा थी है आज पूर्ण हुई मैं इन निंदकों के सामने जीवित जीता में प्रवेश कर अपने साहस की परीक्षा दे सकती हूँ परन्तु इससे तो तुम जीवित नहीं रहूंगी । मेरा यह शरीर नहीं रहेगा । यह अग्नि परीक्षा तो इसी कारण दे रही हूँ जिससे सभी को पता चले की मुझे इस तन और इसके विषयों से मोहन नहीं है तो ठीक है भैया । लक्ष्मण चीता ने समीर खडे लक्ष्मण की ओर देख कर कहा, शीघ्र सीता तैयार करो । मैं अब किसी के मन में यह संशय नहीं रहने देना चाहते हैं । लक्ष्मण इसलिए चौदह वर्ष से जीता किया गया था । ऐसे पालन करता था जैसे वह अपनी माँ की आज्ञा का पालन करता था । मैं करुँगी दस्ती से राम का मुफ्त देखने लगी । सामने कहा जीता का आदेश मानना चाहिए । लक्ष्मण ने उन्हें राम के मुख की ओर देख कर कहा भैया लक्ष्मण यह करना ही होगा । तुम नहीं करोगे तो मैं स्वयं ही सीता के लिए चेता तैयार करूंगा, दिवस हो । लक्ष्मण ने लकडियाँ एकत्रित करनी आरंभ कर दी ।

42. Mata Sita Ne Di Agni Pariksha

श्री राम बहुत इकतालीस इस दिन से दो मासलपुर जब अभी तू बंदा जा रहा था तो लंका विजय पर संदेह प्रकट किया जा रहा था । इस कारण जब पूर्ण ऍफ नेतृत्व विनाश को प्राप्त हो गया तो संदेह करने वालों को यह स्वाॅट ही दिखाई दे रहा था । इस पर भी यह वस्तु स्थिति थी । रावण की मृत्यु हो चुकी थी । राम ने युद्ध भूमि पर ही विभीषण का राजतिलक कर दिया था । श्री राम की सेना में बहुत और संतोष के ढोल बजाए जा रहे थे । इन सब उत्सवों पर गिरी राम की पक्ष की सेना में प्रसन्नता से नाराज रंग हो रहे थे । इस समय एक का एक सेना के हाथ पर तुषार पड गया । उन सेना में यह समाचार फैल गया कि सीताजी के सतित्व पर राम ने संदेह क्या? इस कारण सीताजी पति के इस संदेह के प्रति रूप अग्नि में जीवित होने जा रही है । यह विख्यात हो गया कि लक्ष्मण को राम का आदेश हुआ है कि सीता के लिए चीता तैयार करते हैं और लक्ष्मण आंखों से विदाल आंसू बहाता हुआ जीता सजा रहा है । लक्ष्मण को ही जीता सजाने की आज्ञा हुई थी । इस कारण इस शोभनीय कार्य में कोई दूसरा सहायक नहीं हो रहा था और इसमें समय लग रहा था । चीता के और राम खडे थे और दूसरी ओर सीता खडी थी । दोनों के मुख पर रजमुद्रा बनी हुई थी । इस दुखद घटना का समाचार लंका में भी पहुंचा और वहाँ के शेष निवासी बी सीता को चिता में बस होते देखने के लिए आ रहे थे । यह समाचार विभीषण को मिला । मैं इस समाचार को सुनते ही रथ पर सवार हो चीता के चारों और खडे विशाल जनसमूह में से मारक बनाता हुआ राम और सीता के बीच में खडा हुआ । उसने हाथ जोड राम को नमस्कार कर कहा तब यह क्या हो रहा है मैंने राम ने गंभीर भाव से कहा । देवी सीता से कहा है कि लंका में यह बात विख्यात हो रही है कि आप के भाई रावण ने इसको पतित कर दिया है । इस लांछन का स्पष्टीकरण देने के स्थान जीवी थी । जीता में बस हम होना पसंद करती है अतः इसके कहने पर ही यह जीता बन रही है । परन्तु महाराज यह बात मित्र है । यह देवी सीता को कहना चाहिए । राम विभीषण से कुछ रोज में कहा आप ये विपरीत व्यवहार कर रही हैं । आपको देवी सीता पर इस प्रकार का लांछन लगाने वाले को कहना चाहिए कि वह इस लांछन का प्रमाण देख आप को अपनी अर्धांगिनी जिसकी परीक्षा अब चौदह वर्ष के वनवास में कर चुके हैं, पर श्रद्धा और विश्वास करना चाहिए । राजा विभीषण राम ने दृढता से कहा यह मेरा निजी व्यवहार है । इसमें आपको हस्तछेप करना नहीं चाहिए । पति पत्नी में विवाद निजी व्यवहार नहीं हो सकता । यह है दो व्यक्तियों में झगडा है और ये राजा के न्यायाधिकरण का विषय है । आपने ही मुझे यहाँ का राजा बनाया है और मैं यहाँ अपना अधिकार मानता हूँ कि इस मामले में हस्तक्षेप का रूप मैं आपको यह स्वीकृति नहीं दे सकता कि आप किसी को आत्महत्या के लिए प्रेरित करें । राम सोनू आपने रावण पर विजय पाई है । इसका यह अर्थ है कि यहाँ रक्षा संस्कृति समाप्त हो गई है । अब यहाँ वैदिक धर्म व्यवस्था लागू हो चुकी है । इस देश का राजा नहीं हो और मैं आदेश देता हूँ कि चीता बनानी बंद कर दी जाएगी । लक्ष्मण यदि तुम्हें कर्म आगे करोगे तो मैं तुम्हें बंदी बनाकर लंका के न्यायाधीश के समूह उपस् थित किए जाने की आज्ञा दे दूंगा । परन्तु राजा विभीषन राम ने कह दिया, मेरी आज्ञा के विरुद्ध आज्ञा देकर तो मुझसे भी युद्ध करोगे क्या? हाँ राम पहले सीता को मुक्त कराने के लिए अब युद्ध कर रहे थे । अब उन की रक्षा के नियमित मैं युद्ध कर होगा परन्तु पराजित सेना का विजयी सेना से युद्ध हो सकेगा क्या नहीं यह विजयी सेना मेरी ओर से आपके विरुद्ध लडेगी । इस विषय में धर्म मेरी ओर है और हनुमान ने हाथ जोडकर का । मेरे सब सैनिक उससे युद्ध करेंगे जो माता सीता पर किसी प्रकार का संदेह करता है । रिलेशन राम ने कहा, यहाँ लंका में तुम्हारा राज्य हैं और किस किन्दा में सुग्रीव का? परन्तु यह तो अयोध्या में जाना चाहेगी वहाँ तुम लोग इसकी रक्षा कैसे कर सकोगे? राम रिविजन का कहना था, हम माता सीता वो यहाँ से तब तक जाने नहीं देंगे जब तक उनकी सुरक्षा के प्रति हम आश्वास नहीं होंगे । हम किसी भी सूरत में किसी निरपराध की हत्या होते नहीं देख सकते हैं और एक सौ तीस आदमी के लिए हम सब अपने प्राणों का फोन करने के लिए तैयार है । इस विवाद को समाप्त करने के लिए सुग्रीव ने कहा, प्रभु अयोध्यावासियों को विश्वास कराना देवताओं का कर्तव्य है । जब तक वो ऐसा नहीं करते हम आपको और माता सीता को अयोध्या नहीं जाने देंगे । इस समय आकाश में विमानों की गडगडाहट सुनाई देने लगी और सब की दृष्टि आकाश की ओर चली गई । केंद्र वरुण, शिव और ब्रह्मा तथा अन्य कई देवगढ विमानों से उतर राम के सामने आ कहने लगे । राम चीता सूर्या के समान उज्ज्वल और सतित्व के ओर से दे । देखते हैं, मान है और तुम व्यर्थ में लोक निंदा से डरते हो । इस तपस्विनी पर किसी प्रकार का लांछन नहीं लग सकता । देखता हूँ की इस घोषणा पर बोर्ड विजयी सेना और लंका निवासियों में माता सीता की जयजयकार होने लगी । ब्रह्मा ने कहा बेटी सीता! तुम श्रीराम से छोटी हो, अतः तुम पति के चरण स्पर्श करूँ । मैं घोषित करता हूँ कि तुम कमल समान निर्मल और निर्दोष हो जीता । ब्रह्मा किया गया । मान चरण स्पर्श करने को झुकने ही लगी थी कि श्री राम ने उसे रोककर कहा, सीटें! मुझे एक पल के लिए भी तुम्हारे सतीत्व पर संदेह नहीं हुआ है तो हमारा स्थान मेरे पास में है, चरणों में नहीं । जनसाधारण के बीच तुम्हारी प्रतिष्ठा के लिए ही मुझे देवताओं की साक्षी की आवश्यकता थी । आज के बाद युगो युगों तक सीता को साथ ही के रूप में याद किया जाएगा । अकेले राम का तो कोई महत्व नहीं । राम का महत्व तो चीता के राम से ही है । श्री राम और सीता के इस मिलन पर सभी नाथ नास्कर हर्ष प्रकट करने लगे । ब्रह्मा ने वहां से विदा होते हुए कहा, जाम तुम्हारे वनवास की अवधि समाप्त हो चुकी है । रावण का वध हो चुका है । अब तो मैं अयोध्या की सुध लेनी चाहिए ।

43. Ayodhya Laute Shri Ram, Laxman Aur Sita

श्री राम भाग छियालीस विभीषन नहीं । लंका राज्य की ओर से बहुत से उपहार राम और लक्ष्मण को दिए और राज्य का पुष्पक विमान राम को देते हुए कहा अब आपको अयोध्या इसमें ही जाना चाहिए । राम सीता लक्ष्मण सुवीर अंगद हनुमान निवेशन और उनके साथ सैकडों मना और ऍम अनुचर विमान में सवार वो चल पडे । लंका से चल वे महर्षि भारद्वाज के आशीर्वाद के लिए प्रयागराज में उनके आश्रम पर पहुंचते । भारद्वाज ने राम का स्वागत किया और आश्रम में उनको ठहराया । हनुमान को एक तीव्र अशुभ पर अयोध्या में राम के आने की सूचना देने भेज दिया गया । नंदीग्राम में जब हनुमान ने भारत के सम्मुख उपस् थित हो राम के अगले दिन आने का समाचार सुनाया तो भारत प्रसन्नता से शुरू बहाने लगा । उसने तुरंत नगर में घोषणा करवा दी । अयोध्या के राजा भैया श्री राम, महारानी सीता और लक्ष्मण सहित कल यहाँ पहुँच रही हैं । अयोध्या नगरी को सजा हूँ और उनके भव्य स्वागत की तैयारी करूँ । श्री राम के आने की सूचना वो अयोध्या में सूर्य के प्रकाश सामान फैल गई । घाटो पार्ट तो महलो अटारियों घरों के भीतर और बाहर पूर्ण नगरी में हर्सोल्लास के नाथ वो ढोल नगाडे बजने लगे तो वर्ष से सोई नगरी जांच पडी पूर्ण अगर सजाया जाने लगा । अगले दिन राम का पुष्पक विमान अयोध्या के ऊपर चक्कर काटता हुआ नगर के बीच मैदान में उतारा । नगर के गणमान्यजन, राज्य परिवार के सदस्य और मंत्रीगण वहाँ स्वागत के लिए खडे थे । अयोध्या का प्रत्येक नागरिक हर उसमें मग्न हो । नाथ गा रहा था । पूर्ण अयोध्या नगरी में डीप माला की गई थी । मैं मिठाइयाँ बांटी गई । तब से प्रतिवर्ष किसी दिन संपूर्ण भारत में दीपों के त्योहार के रूप में दीपावली मनाई जाती है । आप सुन रहे हैं रमेश मुद्गल से गुरूदत्त लिखित श्री राम ऍम सुने जो मन चाहे

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