Made with  in India

Buy PremiumDownload Kuku FM

Transcript

भूमिका

आप सुन रहे है कुछ फॅस किताब का नाम है लोग का हवा तो में शतायु जीवन के सूत्र जिसे लिखा है ममता सादिक ने और मैं आपका दोस्त हरीदर्शन शर्मा ऍम सुने जो मन चाहे पहला सुख, निरोगी काया, पहला सुख निरोगी काया । वास्तव में हमारे पूरी जिंदगी इस कहावत के आसपास घूमती है । विद्वान कहते हैं कि हम जो कुछ भी करते हैं उसके पीछे सुख पाने का उद्देश्य होता है किन्तु सुख की पहले ही सीडी निरोगी काया अर्थात स्वस्थ शरीर होता है । यदि शरीर स्वस्थ नहीं है तो खाना पहनना मिलना, जुलना, घूमना फिरना किसी में भी सुख की अनुभूति नहीं होगी । इसलिए सुखी रहने के लिए पहली शर्त है कि हमारा शरीर स्वस्थ हो । आधुनिक जीवनशैली, बदलते पर्यावरण, खाद्य पदार्थों में मिलावट, भोजन के बाजारीकरण, पाश्चात्य संस्कृति में आकर्षण के कारण सामान्यतः हम स्वास्थ्य की और ध्यान नहीं दे पाते और व्यस्त जीवनशैली के चलते हैं । थोडी थकान पर भी किसी दर्द निवारक औषधि का प्रयोग करके अपनी थकान को दूर कर लेते हैं और कुछ समय बाद हम इसके अभ्यस्त हो जाते हैं जिसका परिणाम किसी भयंकर रोक के रूप में सामने आता है । मधुमेह, किडनी, स्टोन रया, गाद, सर्वाइकल जैसे भयंकर रोग हमारे अनियंत्रित जीवन शैली का ही परिणाम है । खान पान के बाजारीकरण और व्यस्त जीवनशैली के कारण सामान्यतः लोग अपने भोजन में डिब्बाबंद पदार्थों का उपयोग करते हैं जो भारतीय वातावरण् के लिए अनुकूल नहीं है । इन सबका पाचन तंत्र पर विपरीत प्रभाव पडता है । रात्रि में देर से सोना और प्रार्थना देर से उठता स्वास्थ्य एवं मनोदशा दोनों के लिए हानिकारक है । प्रकृति ने मानव शरीर की इस प्रकार से रचना की है कि साधारण भोजन से भी शरीर के लिए आवश्यक पोषक तत्व प्राप्त हो सकते हैं किन्तु कुछ लोग शक्तिवर्द्धक औषधियों का प्रयोग करते हैं जो कालांतर में स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव डालते हैं । यदि खान पान व रहन सहन प्रकृति के अनुकूल होते हैं तो शरीर की रोग प्रतिरोधी क्षमता बढती है । शरीर स्वस्थ होता है तो सुख की अनुभूति होती है । अपने खान पान व दिनचर्या को प्रकृति के अनुसार करके स्वस्थ और सुखी जीवन जीकर मनुष्य के सौ साल जीने के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है । जैसा कि लोकोक्ति कहावत में अनुभव के आधार पर कहा गया है भोजन आधा पेट कर दुगना पानी पी त्रिगुणा श्रम चौगुनी हसी वर्ष सवा जो जी कितनी साधारण से बात है की भूख से कम भोजन करें । पानी खूब है, श्रम करें और प्रत्येक दशा में प्रसन्न रहे हैं । ऐसा करने पर सवा सौ साल की आयु होना स्वस्थ शरीर के साथ संभव हो सकता है । तो विद्वान कहते हैं कि मनुष्य अपना हत्यारा स्वयं है । प्रकृति ने उसे सौ साल जीवन जीने के हिसाब से बनाया है किंतु वह अपने दिनचर्या वह खान पान को प्रकृति के विपरीत करके शरीर को कमजोर कर रोग रोधक क्षमता का विनाश करता है । मन में द्वेष व घर पालकर नकारात्मक ऊर्जा को जन्म देता है जिससे शरीर और मन एक दूसरे के विरोधी हो जाते हैं जिससे टेंशन, तनाव वो डिप्रेशन, अवसाद होते हैं । हमें अपने पुरखों से जो सांस्कृतिक विरासत मिली है वे अमूल्य है तथा हजारों वर्ष का शोक है इसलिए उसमें सच्चाई है । युगों से चली आ रही इस परंपरा का आधार अनुभव है और अनुभव से बढकर कोई या नहीं होता । पुरखों द्वारा जो स्वास्थ्य संबंधी कहावते कविता के रूप में कहीं गई है । इनके पीछे उनका यह उद्देश्य रहा है कि मानव मन पर कविता में कही गई बात का सीधा प्रभाव पडता है और कविता मानस मस्तिष्क में सदियों तक पीढी दर पीढी जीवित रहती है । हमारी सांस्कृतिक धरोहर जो हमें पीढी दर पीढी प्राप्त होती है । अब लुप्त हो रही है, क्योंकि समाज में संयुक्त परिवारों का अस्तित्व लगभग समाप्त है, जिसका परिणाम है कि हम सदियों से चली आ रही अपनी सांस्कृतिक विरासत से अनजान होते जा रहे हैं । इसी तारतम्य में लुप्त प्रायः सांस्कृतिक धरोहरों से लोगों का परिचय कराया जाना इस पुस्तक का उद्देश्य है । पाठक देखेंगे कि हमारे सीधे साधे पुरखों ने मन की बात कितने सीधे साधे ढंग से कही है । शिक्षित कहे जाने वाले हमारे महान पुरखों ने अपने अनुभव के आधार पर कितनी जनहितकारी शिक्षा दी है? पुरखों ने समझाया है कि सावधानी इलाज से श्रेष्ठ है सौ दवा, एक परहेज अर्थात परहेज कर लेना । सौ दवाओं से अच्छा बताया है । तंदुरुस्ती हजार नियामत पुरखों की कही गई ये बातें पाठकों के दिलों की गहराई तक पहुंचे ताकि उसे अपने जीवन में उतारकर इस अमूल्य धरोहर को व्यवहारिक बनाकर अपने आने वाली पीढियों तक पहुंचाया जा सके तो पुस्तक लिखने का उद्देश्य सार्थक होगा ।

दो शब्द

दो शब्द एक प्राचीन कहावत है कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन होता है । शरीर को स्वस्थ रखने के लिए जहाँ एक अच्छा वातावरण, अच्छे वस्त्र और अच्छे घर की आवश्यकता होती है, वहीं दूसरी ओर संतुलित आहार हमें स्वस्थ रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है । जलवायु, आकाश, स्थान और समय की प्रकृति के अनुसार किया गया भोजन हमें अनेक बीमारियों से सुरक्षित रखने में मदद करता है । इस संबंध में हमारे पूर्वजों ने समय समय पर और अनुभवों के आधार पर अपने द्वारा रचित साहित्य में अनेक सुझाव दिए, जो कालांतर में कहावत हूँ और लोकोक्तियों के रूप में जनमानस में आज भी प्रचलित एवं लोकप्रिय हैं । मुमताज था सादिक द्वारा समाज को खान पान, स्वास्थ्य और परिवार में शांति व खुशहाली रखने से संबंधित दी गई इनका हाओ तो और लोगों क्यों का संकलन एक अनूठा और प्रशंसनीय कार्य है । आशा है अधिक से अधिक पाठक इसका लाभ उठाएंगे । मुंबा सादिक जी को हार्दिक बधाई । डॉक्टर पन्नालाल

01 : वर्ष सवा सौ जी

वर्ष सवा सौ जी भोजन आधा पेट कर दुगना पानी पी तिगुना श्रम चौगुनी हसी वर्ष सवा जो जी भगवान था । कभी कहता है कि जितनी भूख हो उससे आधा भोजन करने वाला, दोगुना पानी पीने वाला, मेहनत तीन गुना करने वाला और चार गुना हंसने वाला व्यक्ति सवा सौ साल तक जीवन जी सकता है । स्पष्टीकरण जितनी भूख हो, उससे कम भोजन करें । बिना भूख के भोजन कदापि न करें । पानी खूब है किंतु भोजन के बीच में अथवा भोजन के तुरंत बाद पानी नहीं है । यथा योग्य वह यथोचित श्रम करना चाहिए । प्रत्येक दशा में मन को प्रसन्न रखना चाहिए । लाभ काम भोजन करने से पाचन तंत्र प्रभावी रूप से काम करता है, जिससे किसी प्रकार के उधर रोक नहीं होते । पानी अधिक पीने से शरीर के उत्सर्जन अंदर ठीक से कार्य करते हैं और विजातीय तत्व शरीर से बाहर निकल जाते हैं । सब करने से शरीर पुष्ट होता है, रक्त संचार ठीक से होता है और अंगों में लचीला बनाता है । सदैव खुश रहने से मन प्रसन्न रहता है । इस प्रकार तन और मन का तालमेल होने से हमें शतायु तक ले जाता है तथा इन बातों का ध्यान रखने से गठिया, मधुमेह, वह यकृत, आधी रोक नहीं होते । सारा अल्पाहारी रहकर खूब पानी पीने वाले, खूब मेहनत करने, वह सदैव हस्ते मुस्कुराते रहने वाले व्यक्ति सदैव लंबा वो सुखी जीवन जीते हैं ।

02 : तब रस वनै

तब रस वने सौ पर चले खाई कई जोडी तासों वैद्य पूछे कोई सौ पर चलके करें । उधर आठ साल ताको परमाणु सोलह सोलह बत्तीस हुआ है तब ॅ अन्य जो खाये भावार्थ कभी कहता है जो भोजन करने के बाद सौ तक चलता है । ऐसे व्यक्ति को वैध से कोई सलाह लेने की आवश्यकता नहीं पडती । सौ पर चलने के पश्चात उत्तानपाद आसन में लेट जाये और आठ सांस लें । फिर सीधी करवट लेकर बत्तीस साल लेने से क्या गया? समस्त भोजन रस्में परिवर्तन हो कर शरीर को ऊर्जा प्रदान करता है । स्पष्टिकरण शाम का भोजन करने के पश्चात थोडा टहलना चाहिए । टहलने के पश्चात कडे वह समतल स्थान तक यह पृथ्वी पर उत्तानपाद आसन की स्थिति में लेट जाना चाहिए और इसी स्थिति में आठ बार सांस लेने चाहिए । फिर सीधी और करोड लेकर सोलह बार सांस लेने और छोडने चाहिए । फिर बाई ओर करवट लेकर बत्तीस साल लेनी चाहिए । लाभ हूँ ये क्रियाए गैस बलदाव, बदहजमी, अपच में लाभकारी है सारांश साइक्लिन भोजन के बाद घूमना घूमने के बाद उत्तान स्थिति में लेटकर आठ साल सीधी करवट सोलह साल लेकर उलटी करवट बत्तीस साल लेनी चाहिए । इस से शरीर स्वस्थ रहता है

03 : बारह मासी परहेज़ - क्या न खाएं

बारह मासी परहेज क्या न खाएं चेते गोल्ड बैसा के तेल जेठे बाट साडे बेल सावन साल न बहुत तो दही कुमार करेला कार्तिक नहीं घन जीरा पूज घना माहे मिस्री फागुन चना जो कोई ऐसे परी हरे डाकघर वैध पैर न करे बाबार चाहत में गोल्ड वेसाख में तेल जेट में बात चलना आषाढ में बेलफल सावन में सात बातों में दही, कुमार में करेला, कार्तिक में घटाई अगहन में जीरा पूछ चावल मांग में मिस्री फागुन में चना कभी कहता है कि जो इन खाद्य पदार्थों का वर्णित किए गए महीनों में प्रयोग नहीं करता वहाँ सदर स्वस्थ रहता है और उसके घर में वैद्य के आने की आवश्यकता नहीं पडती । स्पष्टीकरण बहुचर्चित कहावत है कि परहेज इलाज से बेहतर है । एक दूसरी कहावत में भी कहा गया है कि एक परहेज हजार दवाओं से बेहतर है । यदि खानपान में परहेज रखा जाए तो निश्चित ही शरीर निरोगी और स्वस्थ रहेगा । इसी बात को ध्यान में रखते हुए लोककवि ने अपने अनुभव के आधार पर बताया है कि चेतमा वह में गुड वेसाक में तेल, जेट में दोपहर की पैदल यात्रा, अषाड माह में बेलफल, सावन में साग, अर्थर पत्ते वाली सब्जी, बहुतों में छाछ अथवा मट्ठा, दही कुमार में करेला, कार्तिक में खटाई, अध्ययन में जीरा, स्पोर्ट्स में धान था । चावल, माघमास में मिस्री, फागुन में चना आदि खाद्य सामग्रियों का प्रयोग नहीं करना चाहिए । इस प्रकार का परहेज करने वाले व्यक्ति का शरीर पूरे वर्ष स्वस्थ रहता है और उसे किसी प्रकार की बीमारी नहीं होती । इस कहावत में कवि ने मौसम के अनुसार भोजन की तासीर को ध्यान में रखकर परहेज की बात कही । चेत् वेसाक जेस्ट आषाढ माह ग्रीष्मऋतु में आते हैं था । इसको गर्म ताजी फिर यह प्रकृति के खाद्य पदार्थों के सेवन से मना किया गया है । जिस में भीषण गर्मी होती है । अतः दोपहर में पैदल चलने को मना किया गया है । आषाढ माह में बेलफल खराब होने लगते हैं । उसमें अमले बनने लगते हैं इसलिए मना किया गया है । सावन भादो बरसात के महीने हैं । इनमें मौसम में नमी की प्रचुरता रहने से हरी पत्ते वाली सब्जियों पर तीनों का प्रकोप होता है और दही, मठा, छास में हानिकारक अमृता आती है । घन पोष मार्क सभी शरद ऋतु के महीने हैं । इनमें सर्दी पडती है । इसलिए ठंडी प्रकृति या तासीर के खाद्य पदार्थों यह था जीरा, चावल, मिस्री को मना किया गया है । लाभ ग्रीष्मऋतु में गर्म प्रकृति वाले खाद्य पदार्थों से तथा शीत ऋतु में ठंडी प्रकृति वाले खाद्य पदार्थों से तथा बरसात में गरिष्ठ भोजन से बचने दू कवि ने सलाह दी है । इससे पूरे वर्ष शरीर में वात, पित्त, कफ का संतुलन बना रहता है और शरीर स्वस्थ रहता है । सारा लोककवि ने अनुभव के आधार पर कहावत में महीनेवार परहेज करने की सलाह दी है । तब अनुसार परहेज करके स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करना चाहिए ।

04 : बारह मासी भोज्य पदार्थ - क्या खाएं

बारह मासी भोज्य पदार्थ क्या खाएं सावन हरे बाहर जो जीता कुमार माय गुड खाओ । मीता कार्तिक मूली अगर तेल गौर करो दूध से मेल मार्ग मांस जी खिचडी खाय फागुन उठके प्रार्थनाएं । चैत्र मास में नीम से उदी वैसाखी में खाई बासमती जेठ माँ जो दिन में सोवे । ताको ज्वर आसान में रोवे भावार्थ सावन में हैड बातों में चित्र का छोडने, कुमार में गुड, कार्तिक में मूल्य, अगन में तेल पहुँच में, दूध मार्ग में घी के साथ खिचडी, फागुन में प्रातः सूर्योदय से पूर्व स्नान करना, चैत्र में नीम का सेवन, वैसाख में चावल, जेस्ट के महीने में दोपहर में आराम करना । ऐसा करने से शरीर स्वस्थ रहता है तथा आसार मार्च में होने वाले भयंकर बुखार से भी बचा जा सकता है । स्पष्टिकरण कवि का कहना है कि सावन के महीने में है हरितिका का प्रयोग करना लाभकारी होता है । पैर का नाम आयुर्वेद में धात्री भी कहा गया है, जिसका अर्थ होता है अर्थात है और माँ की भांति ध्यान रखने वाली है । खैर दो प्रकार की होती है छोटी और बडी दोनों प्रकार की है लाभदायक है किंतु छोटी को ज्यादा गुणकारी बताया गया है । इसका प्रयोग चूल्हे यशोधन करके किया जा सकता है । चित्रक जीता एक वन औषधि है जो पंजाबियों के यहाँ सहज सुलभ है । यह पाचन तंत्र को शक्ति प्रदान कर रोग रोधक क्षमता बढाती है । बातों में इसके प्रयोग पर बल दिया गया है । कुमार माह में गुड के प्रयोग तथा कार्तिक में मूली के प्रयोग की सलाह दी गई है । अगहन माह में सरसों के तेल तथा पूछ में दूध के प्रयोग के लिए कहा गया है । इस प्रकार खाद्य पदार्थों के सेवन से शरीर को ऊर्जा प्राप्त होती है और रोग रोधक क्षमता बढती है । माघ के महीने में बाजरे की खिचडी गी के साथ सेवन करने की सलाह दी गई है और फागुन में सूर्योदय से पूर्व स्नान करने की सलाह दी गई है । चैत्र महीने में नीम के सेवन तथा वैशाख महीने में बासमती चावल के प्रयोग को कहा गया । ये माँ गर्मी के हैं और नीम वो चावल ठंडी तासीर हैं और स्वास्थ्य लाभ है । दो लाख करी है । तब कभी कहता है जो व्यक्ति जेस्ट के महीने में दिन यानी दोपहर में सोएगा उसको आषाढ माह में होने वाला जरुर यानी बुखार नहीं होगा । लाभ सावन भादो बरसात के महीने हैं । इस मौसम में वातावरण में अदरक अब पर्याप्त होने के कारण पाचन क्रिया शुरू हो जाती है । हैड वन चित्र के प्रयोग से पाचन तंत्र को शक्ति प्रदान होती है । कुमार बरसात के बाद का महीना है । कुमार व कार्तिक स्वास्थ्य की दृष्टि से अच्छे महीने हैं । गुड तेल शक्तिवर्द्धक है । मूली पाचन तंत्र, यब्रत, जिगर, लीवर को शक्ति प्रदान करती है । मार्च में घी के साथ खिचडी भी शक्तिवर्धक है । फागुन में सूर्योदय से पूर्व स्नान अत्यंत लाभकारी है । चैट में नीम वह मजाक में चावल सीटल प्रकृति के होने के कारण स्वास्थ्य को लाभ प्रदान करेंगे और जेस्ट महीना तेज गर्मी का होता है । इस महीने में दोपहर के समय सोने की सलाह दी गई है । अर्था जेस्ट महीने में दोपहर में खेतों में या गर्मी में काम न करने को कहा गया है क्योंकि भीषण गर्मी में काम करने से आषाढ के महीने में भयंकर ज्वर का जो प्रकोप होता है उससे बचा जा सकता है । सराज कहावत में महीनेवार खाने की सामग्री के विषय में बताया गया है तथा अनुसारी अपना खान पान दिनचर्या रखनी चाहिए हूँ हूँ अच्छा

05 : मल त्याग

माॅक आलस गवाहोंं कीजिये । याद चाहे कम पडे वो हजार मल्की शंकर तुरंत मिटा वे ऐसा नर सुख पुणे पुणे पाले भावार्थ कभी कहता है कि यदि मल त्याग की शंका हो तो अविलंब मल त्याग करना चाहिए । इसमें अलग से नहीं होना चाहिए । चाहे आपको कितने ही जरूरी कार्य करने हो, माल की शंका होने पर उसका निवारण करने वाला व्यक्ति बार बार सुख प्राप्त करता अतहर निरोगी रहता है । स्पष्टिकरण माल की शंका होने पर माल का त्याग न करना भयंकर बीमारियों को आमंत्रित करता है तथा पेट में हानिकारक विषैली गैस बनती है जो बावासीर जैसे भयंकर लोगों का रूप धारण करती है । लाभ इसका हालत के माध्यम से कभी संदेश देता है कि समय पर माल त्यागकर बहुत से रोगों से बचा जा सकता है । सारा आज माल की शंका होने पर तुरंत माल क्या करना चाहिए? इसमें विलंब, आलस, वन लापरवाही बहुत सी जानलेवा बीमारियों का कारण बन सकती है ।

06 : शौच समय

शौच समय एक बार योगी दो बार भोगी तीन बार रोगी । भावार्थ कभी कहता है कि शौच के लिए चौबीस घंटे में एक बार जाने वाला व्यक्ति योगी के समान स्वस्थ है । दो बार जाने वाला व्यक्ति भोगी यानी ग्रस्ति होने का संकेत है और शौच के लिए तीन बार या इससे अधिक जाने वाला व्यक्ति रोगी है । स्पष्टिकरण शौच के समय के विषय में कभी का कहना है कि जो व्यक्ति चौबीस घंटे में केवल एक बार शौक जाता है, उसकी दिनचर्या एक योगी के समान है । जो दो बार शोर जाता है उसकी दिनचर्या एक सामान्य व्यक्ति अर्धा ग्रस्ति के समान है तथा जो तीन बार शौच के लिए जाता है उसका स्वास्थ्य सामान्य नहीं है । ऐसा व्यक्ति निश्चित ही किसी न किसी उधर रोग से पीडित है । लाभ इस कहावत के माध्यम से ऐसे लोगों को जो दो बार से अधिक शौच के लिए जाते हैं, उसे सचिव किया गया है । दो बार से अधिक शौच की शंका होने पर तुरंत उपचार करना चाहिए । सारा तीन बार या उससे अधिक शौच की इच्छा या शंका होने पर तुरंत योग चिकित्सक की सलाह लेनी चाहिए ।

07 : खाना, नहाना और सोना

खाना, नहाना और सोना ठंडा खाये गर्म नहाएं उस बचा के सोवे ऐसे नर के पिछवाडे में वैध बैठ के रो वे भगवान भोजन को ठंडा करके खाने वाले, गर्म गुनगुने पानी से नहाने वाले और उस बचाकर सोने वाले व्यक्ति को कभी भी वैध हकीम डॉक्टर की आवश्यकता नहीं पडती अर्थात ऐसे व्यक्तियों के पडोस में रहने वाला वैध दुखी रहता है । स्पष्टिकरण भोजन को ठंडा करके खाने से तात्पर्य है कि सामान्य ताप होने पर ही भोजन खाना चाहिए । अधिक गर्म खाना खाने से मुख की लार ग्रंथियां प्रभावित हो सकती है । लार ग्रंथि प्रभावित होने पर भोजन का पाचन प्रभावित होगा । गर्म पानी से स्नान करने पर तो जा के रंध्र छिद्र खुलते हैं, मिट्टी धूल साफ होती है और त्वचा के रंग भरोसे विजातीय तत्व जैसे नमक आदि बाहर आते हैं । शरीर में स्फूर्ति आती है । स्पोर्ट्स बचाकर सोने से तात्पर्य है की ओर पडने के मौसम में खुले में नहीं होना चाहिए क्योंकि सोते समय आसमान से पडने वाली ऑस् की नमी के कारण सास के साथ नहीं जाएगी । इससे बहुत से श्वसन संबंधी रोग जैसे नजला, जुकाम, खांसी, अस्थमा दी हो सकते हैं । लाभ ठंडा खाने से मूव तथा उधर संबंधी रोगों, गर्म पानी से नहाने से त्वचा रोगों, वह ओस बचाकर सोने से श्वास संबंधी रोगों से बचा जा सकता है । सारा भोजन को ठंडा करके खाना चाहिए, स्नान गरम पानी से करना चाहिए तथा आद्रता के मौसम में तो उससे बचकर होना चाहिए हैं ।

08 : प्रातः कालीन पानी पीने का महत्व

प्रातः कालीन पानी पीने का महत्व प्रातः काल घटिया ते उठी के जोनर पीवी पानी पटाके घर में वैध नावे बात घट ने जानी भगवान जो मनुष्य प्रातःकाल बिस्तर छोडने के तुरंत बाद पानी पीता है, उसके घर में वैध नहीं आता । ऐसी घाग की अनुभूति है । स्पष्टीकरण प्रातःकाल बिस्तर छोडने के फौरन बाद पानी बिना स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी है क्योंकि नींद से उठने पर मूवी लार जो रात भर निकलती है, पाचन तंत्र को सक्रिय करती है । इसके विपरीत आठ से दस घंटे नींद के बाद शरीर के स्नायु फिल हो जाते हैं जो पानी पीने से पुणे सक्रिय हो जाते हैं । इससे शरीर में स्फूर्ति आती है । लाभ बिहार में पानी लेने से उधर ये अम्लता यानी एसीडिटी नहीं । बढती पाचन तंत्र सही रहता है, गैस तथा कब नहीं होती पेट साफ रहता है । सारांश बॅाल बिस्तर छोडने के तुरंत बाद पानी स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी है ।

09 : गरिष्ठ भोजन

गरिष्ठ भोजन । जाको मारन चाहो, बिन मारे मर जाए । वहाँ को यही सलाह दो की हो या पूरी खाई बघवार कभी कहता है कि यदि किसी को हानि पहुंचाना चाहते हो तो उसे गुडिया यानी अरबी की सब्जी पूरी के साथ खाने की सलाह दे क्योंकि अरबी और पूरी का सेवन करने वाला व्यक्ति बिना मारे ही मर जाएगा । अर्धा बीमार रहने लगेगा । स्पष्टिकरण इस लोकोक्ति में कभी नहीं गरिष्ठ भोजन से बचने की सलाह दी है । अरबी की सब्जी और पूरी दोनों ही गरिष्ठ भोजन है और इनके सेवन करने से गैस, अपच आदि रोग हो जाते हैं । ऍफ अरबी बरसात एवं ग्रीष्मऋतु की सब्जी है । इस मौसम में पाचन क्रिया मंद रहती है, पूरी तेल में तलकर बनाई जाती है जिसके कारण पूरी अत्यंत गरिष्ठ भोजन है तो इस प्रकार के भोजन से बजकर शरीर को स्वस्थ रखा जा सकता है । सारांश गरिष्ठ भोजन से बचना चाहिए ।

10 : गुड़ की महत्वता

गुड की महत्वता भोजन करके खाई मिठाई और वैदिक क्या दे दवाई भावार्थ कभी इस कहावत में भोजन के बाद मिठाई यानी गुड खाने वाले व्यक्ति के बारे में कह रहा है । इससे अच्छी स्वास्थ्य के लिए दवा वैदिक क्या देगा? अर्था भोजन के बाद थोडा गुड खाने वाला व्यक्ति सदैव स्वस्थ रहता है और उसे किसी प्रकार की औषधि की आवश्यकता नहीं पडती । स्पष्टीकरण भोजन के पश्चात गुड खाना पाचन क्रिया को बढाता है । गुड में अनेक पोषक तो होने के कारण शरीर को शक्ति प्रदान करता है । अपने खाने में चीनी की अपेक्षा कृत गुरु को प्राथमिकता देनी चाहिए । लाभ भोजन की बात गुरु को खाने से भोजन जल्दी बचता है । गोडसे शरीर को अतिरिक्त पोषक तो प्राप्त होते हैं, शरीर को पुष्ट करता है, ह्रदय मजबूत होता है तथा वात, पित्त व कफ को नियंत्रित करता है । सारांश भोजन के बाद गुड का प्रयोग अत्यंत लाभकारी है ।

11 : कम खाना - ग़म खाना

कम खाना गर्म खाना रहे निरोगी जो काम खाये, बिगडे काम न जो गम खाये भगवार वहाँ मनुष्य जीवन भर निरोगी रहता है । जो काम खाता है तथा उस मनुष्य का कोई कार्य नहीं । बिगडता जो धीरज, धैर्य वह संतोष को अंगीकृत करता है । स्पष्टिकरण एक पुरानी कहावत है कि संसार में जितने लोग भूख से मरते हैं उससे कहीं अधिक खाकर मारते हैं । कहावत महत्वपूर्ण है क्योंकि अधिक भोजन करने से अम्लीयता तथा अपच बढती है । फिर विभिन्न प्रकार के अलोपथी दवा लेनी पडती है जिसका पाचन तंत्र पर विपरीत प्रभाव पडता है । अधिक भोजन से अनेक प्रकार के उधर रोक पैदा होते हैं जबकि कम भोजन करने से उचित पाचन क्रिया होती है । शरीर भोजन का पाचन करके भोजन को पोषक तत्वों में विभक्त कर ऊर्जा प्रदान करता है । धर्यवान व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों में भी अपने को तटस्थ रखता है, अवसाद नहीं आने देता, क्रोध नहीं करता हूँ इसलिए वहाँ सुखी जीवन जीता है । अंतर की ऊर्जा उसके मनोबल को बढाती है जिसका प्रभाव शरीर पर पडता है और सुखी शरीर स्वस्थ शरीर होता है । लाभ भूख से कम भोजन करने से उधर संबंधी बीमारी नहीं होती है । जबकि धर्यवान व्यक्ति क्रोध जैसे विपरीत नकारात्मक विचारों से बच्चा रहता है इसलिए उसका कोई काम नहीं भी गडता । सारा मनुष्य को अल्पाहारी वह धैर्यवान होना चाहिए ।

12 : पैदल यात्रा के समय

पैदल यात्रा के समय कोर्स कोर्स पर बहुत हुए तीन कोर्स पे खाये ऐसे बोले भड्डरी मना देते जाए भावार्थ पैदल यात्रा करने वाला व्यक्ति यदि एक को चलने पर मुझे और चेहरा होता है और तीन को चलने पर कुछ खा लेता है, कभी भड्डरी कहते हैं कि ऐसा करने वाला व्यक्ति चाहे जितनी लंबी यात्रा कर ले उसे थका नहीं होगी । स्पष्टिकरण या कहावत सुदूर क्षेत्रों में लंबी यात्रा करने वालों के लिए कही गई है की पैदल यात्रा करते समय प्रत्येक को चलने पर यात्री को मुंह हाथ पैर धो लेना चाहिए तथा तीन को चलने पर कुछ खा लेना चाहिए । ऐसा करने वाला व्यक्ति चाहे जितनी लंबी पैदल यात्रा कर ले उसे थकान नहीं होगी । लाभ पैदल यात्रा करने से थकान होना स्वाभाविक है । यदि कभी की अनुभूति अनुसार निश्चित अवधि में हाथ पैर मुंह धो लिया जाए तो शरीर में रंध्र छिद्र खुल जाते हैं जिससे स्पूर्ति आती है । तीन को चलने पर शरीर को ऊर्जा प्रदान होती है । सारा तदानुसार क्रिया अपना कर पैदल यात्रा की थकान से बचा जा सकता है ।

13 : चने की महत्ता

चने की महत्ता खाये चना रहे बना भावार्थ जो व्यक्ति अपने भोजन में चने को सम्मिलित करता है, वहाँ सदेव बना रहता है अर्थात स्वस्थ रहता है । स्पष्टिकरण चला अत्यंत पोष्टिक खाद्य पदार्थों की श्रेणी में आता है । इससे दाल, आटा, बेसन के रूप में अनेक प्रकार की खाद्य सामग्री तैयार की जाती है । चने में प्रोटीन प्रचुर मात्रा में पाई जाती है जो शरीर में होने वाली टूट फूट की पूर्ति करती है । लाभ चने को विभिन्न खाद्य सामग्रियों में प्रयोग करके निरोग रहकर दीर्घायु प्राप्त की जा सकती है । सारा निरोग स्वस्थ रहने के लिए अपने भोजन में चने को उचित स्थान दिया जाना चाहिए ।

14 : अधिक भोजन हानिकारक

अधिक भोजन हानिकारक, आठ कट होता मट्ठा पीवे सोलह मखनी खाए उसके मारे ना रो ये घरे दिल अंदर जाए भावार्थ आठ कठौता मट्ठा यानी झांकिया, लस्सी पीने तथा सोलह मक्के की रोटी खाने वाले व्यक्ति की मृत्यु पर शोक मनाने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि ऐसा व्यक्ति परिवार के ऊपर केवल भारतीय सामान हो जाता है । अधिक भोजन करने वाला व्यक्ति आलसी प्रवृत्ति का बन जाता है और मानसिक व शारीरिक रूप से निष्क्रिय रहता है तथा परिवार पर एक तरह से बोझ ही रहता है । लाभ इस कहावत से कभी ने अधिक भोजन करने वाले व्यक्तियों को सचेत किया है कि ऐसे व्यक्ति को निष्क्रिय बताया है तथा अल्पाहारी होने की भी सलाह दी है । इस प्रकार कहावत को अंगीकार करके आलस्य प्रमाद से बचा जा सकता है और अल्पाहारी बनकर चुस्त दुरुस्त रहा जा सकता है । सारा राज भूख से अधिक भोजन नहीं करना चाहिए ।

15 : अधिक भोजन से हानि

अधिक भोजन से हानि ऍफ जो पेट भरे मार ये न तो पर ये रहे भावार्थ लोग कभी का कहना है कि जो व्यक्ति पेट को ठूस ठूसकर भरता है अर्थात भूख से अधिक खाना खाता है । ऐसा व्यक्ति यदि मारेगा नहीं तो बीमार अवश्य पड जाएगा । ऍम भूख से अधिक भोजन करना स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक है । अधिक भोजन या बिना भूख के भोजन करने से फुटबॉल हो जाती है और प्राणघातक हो सकती है । अधिक भोजन से गैस पाँच अम्लता या एसीडिटी स्वाभाविक है । लाभ इस कहावत के द्वारा कवि ने अधिक भोजन करने वाले व्यक्ति को मस्ती होने तक की चेतावनी देकर अल्पाहारी होने की सलाह दी है । सारा अधिक भोजन नहीं करना चाहिए तथा सदैव अल्पाहारी होना चाहिए । दिल्ली

16 : उकडू बैठ कर भोजन करना

उकडूं बैठकर भोजन करना उकडू बैठ भोजन करें । वायु बडे ना पेट बडे घटे वसा की मात्रा बढेगा टन का भार करें । बैठ कर उकडू भोजन अल्पाहार भावार्थ कभी कहता है कि जो व्यक्ति उकडू यानी पैरों के बल बैठकर भोजन करता है उसके शरीर में अतिरिक्त वसा या फैट की मात्रा नहीं बढती जिससे शरीर का अनावश्यक बाहर भी नहीं बढता । स्पष्टीकरण उकडूं बैठकर भोजन करने से पेट का विस्तार कम होता है । अंग ऊपर उधर का दबाव पडता है जिससे भोजन आवश्यकता से अधिक नहीं खाया जाता जो स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है । उकडूं बैठकर भोजन करना रक्तचाप एवं मधुमेह के रोगियों को अत्यंत लाभकारी है । लाभ उकडूं बैठकर भोजन करने से पेट की चर्बी नहीं बढती भोजन कम खाया जाता है । पाचन क्रिया ठीक रहती है । रक्तचाप तथा मधुमेह नियंत्रित रहता है । सारांश उकडूं बैठकर भोजन करना स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद है । पता उकडू मुद्रा में भोजन करना चाहिए

शक्तिवर्धक योग

शक्ति वर्धक योग मार्च खाये मांस बडे भी खाये खोपडी दूध पी । ए से मांग उठे सौ बरस की डोर बडी भगवान कभी कहता है कि मार्च यानी उरद के खाने से मार्च बढता जी खाने से मस्तिष्क को शक्ति मिलती है, मेरा प्रबल होती है तथा दूध पीने से शरीर के समस्त अंगों को शक्ति प्रदान होती है । अर्था दूध पीने से वृद्ध अवस्था में भी शक्ति प्रदान होती है इसलिए दूध को संपूर्ण भोजन बताया गया है । लाभ दालों के प्रयोग से मांसपेशियां मजबूत होती है । जी के प्रयोग से मेघा शक्ति प्राप्त होती है तथा प्रज्ञा बुद्धि बढती है । दूध संपूर्ण भोजन होने के कारण शरीर को समुचित विकास कर शक्ति प्रदान करता है । तीनों खाद्य पदार्थ संतुलित भोजन के रूप में अपना कार्य करते हैं । सारा मार्च यानी उरद, रम, आस, लोबिया, राजमा भी वह दूध अपने भोजन में नियमित सम्मिलित रखना चाहिए ।

पानी की महत्ता

पानी की महत्ता पानी से हो पेट भरा गर्मी सर्दी क्या खतरा भावार्थ यदि पानी से पेट भरा है तो चाहे जेठ हजार मई जून की चिलचिलाती गर्मी हो । दिया माँग पोस्ट दिसंबर जनवरी की कडाके की ठंड तो शरीर, गर्मी अथवा सर्दी के दुष्परिणामों से शरीर बच्चा रहेगा । स्पष्टीकरण यदि पानी से पेट भरा है तो शरीर के समस्त उत्सर्जित अंग क्रियाशील रहते हैं, जिससे शरीर का ताप तथा अनुसार रहता है । लाभ पानी से पेट भरा होने पर गर्मी अथवा ठंड का शरीर पर विपरीत प्रभाव नहीं पडता । सारांश अधिक धनत्व । गर्मी के मौसम में उचित मात्रा में पानी पीना चाहिए ।

19 : स्वस्थ्य शरीर की पहचान

स्वस्थ शरीर की पहचान पैर गरम, पेट नरम, सिर्फ झंडा वैध हकीम के मारो डंडा भगवार कभी कहता है कि यदि मनुष्य के पैर गरम है, पेट नरम है और था, मुलायम है और सिर्फ ठंडा है तो वह पूर्ण रूप से स्वस्थ है । उसे किसी प्रकार के वैध हकीम अथवा इलाज की आवश्यकता नहीं है । स्पष्टीकरण पैरों का गर्म होना पेटकर, नरम यानी मुलायम होना और सिर्फ ठंडा होना स्वस्थ शरीर का संकेत है । उससे वाद, वृद्ध कब संतुलित रहता है, रक्तचाप सामान्य रहता है । इसके विपरीत लक्षण होने पर बीमार होने के संकेत है । लाभ उक्त कहावत के अनुसार लक्षण देखकर किसी के स्वस्थ अथवा अस्वस्थ होने का अनुमान लगाया जा सकता है । सारा किसी के पैर गरम, पेट नरम । वह सिर्फ ठंडा हो ना उसके स्वस्थ होने का संकेत है ।

20 : शक्तिवर्धक खानपान

शक्तिवर्द्धक खान पान माहवार कहाँ तक दूध लगन में आलू पोस्ट पान अरुण मार्ग रतालू फागुन शक्कर ही भरमाए चेतावना कच्चा खाये वैसा खेल में खाये करेला, जेठे दाक असारे केला, खार शतावर भादो रंग सावन ट्रिपल मधु के संग । कुमार मास में तिल गुड खा रहे हैं ऐसा जान बल बुद्धि पाले भगवान कभी कहता है कि कातिक में दूर अब गन में आलू पूछ पान मांग में रतालू फागुन में घी को शक्कर के साथ चैट में कच्चा वाला वेसाक में करेला, जेठ में दाख मुनक्का किसमें अंगूर अषाड में खेला सावन में त्रिफला शहद के साथ बहनों में खाडके साथ शतावर छोडने, कुहार में गोल्ड के साथ बिल खाने से बाल वह बुद्धि में वृद्धि होती है । स्पष्टीकरण कहावत में कभी द्वारा अनुभव के आधार पर प्रत्येक माह में खान पान को ऋतु के अनुसार भोजन करने की सलाह दी गई है । जैसे शरद ऋतु में गरम प्रकृति के खाद्य पदार्थ तथा ग्रीष्मऋतु में ठंडी प्रकृति के पदार्थ तथा बरसात में सुपाच्य भोजन सामग्री का प्रयोग करने की । ऋतु के अनुसार सलाह दी गई है । लाभ उक्तानुसार खाद्य पदार्थों के सेवन से बल बुद्धि बढती है । सारा शारीरिक एवम् मानसिक शक्ति के लिए उक्तानुसार खाद्य पदार्थों का सेवन करना चाहिए ।

21 : सुख के कारक

सुख के कारण भूया खेडे घर हो । चार । घर हो गो दिन गऊ दुहार रहर के डाल चढन के बाद गागल निबुआ और घी साथ दही खाएँ । गुड घर में हुए बाकी ॅ परसों जो घटी कहे सब ही सुख । झूठा वो छोड ऍम कुंठा भावार्थ गांव में भाइयों के चार घर हो और घरों में दूध देने वाली गाय हो, अरहर की दाल हो और जनधन के बाद यानि देशी चावल गागल रसदार नियमों और घर का बनाया हो । दही घट और गुड घर में तैयार किए हुए हूँ और ग्रहणी प्रेम से खाना खिलाती हो । कभी कहता है कि इस प्रकार के सुख के सामने संसार के सभी सूख झूठे हैं । इस प्रकार के ग्रस्त में ही स्वर्ग है । स्पष्टीकरण जो मनुष्य भाइयों से मिलकर रहता है, उसे कभी कोई परेशानी नहीं आती । समाज में सम्मान मिलता है । घर में गोधन पालने के लाभ से सभी परिचित है । बचने खेती के लिए मिलते हैं, खेतों को गोवर मिलता है और परिवार को भी दूध मिलता है । अरहर की दाल और देशी चावल स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी । वह स्वादिष्ट वह सुपर है और सादा भोजन है । खाने के साथ नियमों का प्रयोग पाचन के लिए लाभकारी है । गाय के दूध की दही शक्तिवर्धक और रोग निरोधक क्षमता को बढाती है । गुड और घट शक्ति प्रदान करते हैं । इन खाद्य सामग्रियों को घर में तैयार करने तथा प्रेम के साथ परोसने वाले परिवार में प्रेम बढता है, नकारात्मक ऊर्जा नष्ट होती है और सकारात्मक ऊर्जा का समय होता है । जिस घर में प्रेम वह विश्वास होता है वहाँ सुखी सुख होता है और ग्रस्ति स्वर्ग से सुंदर होती है । लाभ इस लोकोक्ति में कवि ने भाइयों से जुडे रहने, सादा भोजन करने, गौर, पशु पालन करने, शुद्ध खाद्य पदार्थ यथा डाल बात, दही, दूध, गुड खाद, निम्बू घर में रखने तथा उन का भोजन में प्रयोग करने, परिवार में आपसी प्रेम, विश्वास त्यागो, समर्पण की सलाह दी है । कवि का मानना है कि ऐसा करके ग्रस्ति स्वर्ग का रूप ले लेती है । सारांश परिवार के सदस्यों के साथ प्रेम से रहना चाहिए । भोजन में सादगी होनी चाहिए । खाद्य सामग्री की घर में व्यवस्था तथा परिवार में प्रेम वो विश्वास होना चाहिए ।

22 : दुःख के कारक

दुःख के कारण घर की खुन्नस जर्की । भूख खोट दामाद बडा है उनका लडका घटिया बट कट जो घर में बिटिया बडकी हुए छूट का प्रेम ना बढ का आदर पाओ देखें अपनी चादर संबंधों में स्वार्थ भरा हो, आपस का विश्वास मारा हो । सियाने संत फकीर बता ले ऐसे घर सुख पावन भगवार जिस घर में भाइयों में आपसी झगडा रहता हूँ । घर के सदस्यों में पैसे की भूख बडी हो, पैर काटने वाली खाट या चार भाई हो और बाद काटने वाली पत्नी हो । विवाह योग्य बेटियां हो । घर के सदस्य छोटों से प्रेम तथा बडो का आदर न करते हूँ । आपने चादर से अधिक पैर फैलाने की आदत हो, आपसी संबंधों में स्वार्थ हो और आपस में विश्वास न हो तो कभी कहता है कि ऐसे घरों में सुख कभी नहीं आता । स्पष्टिकरण परिवार में धन दौलत को लेकर आपसी झगडा सुख चैन छीन लेता है । दामाद का खोल भी परिवार के लिए असहनीय होता है । आम रास्ते पर एक बोलना भी सिरदर्दी का कारण बनती है क्योंकि रस्ते की एक का उजाड बहुत होता है । लम्बाई में छोटी चार भाई हो तो नींद ठीक से नहीं आती जो मानसिक रोगों का कारण बन सकता है । यदि पत्नी बात काटने वाली है तो इससे समाज में सम्मान नहीं मिलता । घर में विवाह योग्य पुत्री तथा छोटों से प्यार बडों का आदर न होना भी दुख का कारण बनते हैं । लाभ कवि ने लोकोक्ति के माध्यम से सचेत किया है कि उक्त भयंकर दुख देने वाले कारकों का यथाशीघ्र निवारण किया जाए । सारांश परिवार के सदस्यों को आपसी प्रेम विश्वास के साथ रहना चाहिए । आय से अधिक व्यय किसी भी दशा में उचित नहीं है और दायित्वों को समय रहते निवारण करना चाहिए ।

23 : हसी ख़ुशी रहना

फंसी खुशी रहना पालस नींद किसानों हुए कस्टर्न खोवे हँसी धक्का उनको कोनो खोवे जो खुश बारहमासी भावार्थ अधिक नींद और अलग से किसान को समाप्त कर देती है । हंसी हर प्रकार के कष्टों का विनाश कर देती है । महा कभी घट कहते हैं कि उस व्यक्ति का कोई विनाश नहीं कर सकता जो बारह महीने अर्थात सदैव हर हाल में प्रसन्न रहता है । स्पष्टिकरण किसान अधिक सोयेगा अथवा आलस करेगा तो उसकी खेती चौपट हो जाएगी । फंसी खुशी से जीवन बिताने वाले व्यक्ति के पास चिंता नहीं बढती बारहो महीने प्रसन्न रहने वाले व्यक्ति का बडी बडी परेशानी भी कुछ नहीं बिगाड सकती । लाभ आलस्य, अधिक निद्रा से बचकर तथा प्रत्येक दशा में प्रसन्न रहकर अपना जीवन सुखमय बनाया जा सकता है । सारा अलग से त्यागकर हर हाल में प्रसन्न में रहना चाहिए ।

24 : बासी भोजन से हानी

बासी भोजन से हानि । सतुआ दासी चौरे खांसी रोग, बिना से हसी गंगा उनके बुद्धिविधाता से जो खाये रोडी, बासी भगवार जिस प्रकार सन्यासी का दादाजी, चोर का खासी और रोग का हसी खुशी विनाश कर देती है, उसी प्रकार बासी भोजन करने से बुद्धि का विनाश होता है । स्पष्टीकरण इस कहावत में बाजी रोटी से तात्पर्य बासी भोजन से है क्योंकि रखे हुए भोजन में कई प्रकार के हानिकारक सूक्ष्म जीवों माइक्रोऑर्गेनिज्म में पैदा हो जाते हैं, जो हमारे शरीर के बल बुद्धि पर विपरीत प्रभाव डालते हैं । लाभ बासी भोजन न करके अनेक बीमारियों से बचकर हम शरीर, मन, मस्तिष्क स्वस्थ रह सकते हैं । सारांश बासी भोजन करने से बचना चाहिए ।

25 : सावन साग , भादो कड़ी - हानिकारक

सावन साग भादो कडी हानिकारक सावन साल बाद ओ कडी ताकि खटिया मरघट पडी भावार्थ कभी कहता है कि जो व्यक्ति सावन मास में सात याने पत्ते वाली सब्जी तथा बहादुरों में कडी खाता है उसकी घटिया यानी चारपाई निश्चित ही मार रिजल्ट में पडती है अर्थात उसे मृत्यु देने वाली बीमारियाँ घेर लेती है । स्पष्टीकरण सावनभादो चतुर्मास बरसात के महीने हैं । इसमें वर्ष के कारण मौसम में आर्द्रता यानी नहीं रहती है । सूरज कम दिखाई देता है इसलिए हरी सब्जियों में बहुत से कीडों के लार्वा वह सूक्ष्म जीव आदि पहनते हैं । इसके विपरीत कडी मट्ठा दही वट चने के बेसन से तैयार होती है । दही में चातुर्मास में अम्लता बहुत तेजी से बढती है जिससे बहुत से हानिकारक हमले बनते हैं जो स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव डालते हैं । लाभ सावनभादो के महीनों में साग, थरी, पत्ते वाली सब्जियां, वाह दही, मठा, छास आदि का प्रयोग करने से अनेक प्रकार की बीमारियाँ होती है । इस अवधि में इनका प्रयोग न करके इन बीमारियों से बचा जा सकता है । सारा बरसात के मौसम में हरे पत्तों वाली सब्जियाँ तथा दही वह मट्ठे से बने खाद्य पदार्थों के सेवन से बचना चाहिए ।

26 : यकृत (गुर्दा ) व ह्रदय को स्वस्थ्य रखने हेतु

यकृत, गुर्दा वह हृदय को स्वस्थ रखना है तो मितवा इतना रखना याद लघु शंका भोजन के बाद सो करवट करबाई और हृदय रक्षा होगी । और भावार्थ कभी कहता है कि भोजन करने के फौरन बाद लघुशंका निवारण, अर्थव् मूत्रत्याग नियमित रूप से करने तथा भाई और करवट लेकर सोने वाले व्यक्ति की गुर्दारोग तथा रह रोगों से रक्षा होती है । स्पष्टिकरण भोजन के बाद मूत्रत्याग करने से तथा भाई करवट लेकर सोने वाले व्यक्ति को यकृत रोग तथा रहे । रोक नहीं होता लाभ भोजन के बाद लघुशंका निवारण करने से यकृत, गुर्दा तथा यूरीनरी ब्लेडर संबंधी रोग जैसे गुर्दे की पथरी, पेशाब की जलन आदि रोग नहीं होते तथा बाई और करवट लेकर सोने से नींद अच्छी आती है और हृदय रोगों से बचा जा सकता है । सारा भोजन के बाद लघुशंका निवारण करना चाहिए । सोते समय बाई करवट लेकर सोना चाहिए ।

27 : व्यायाम (कसरत)

व्यायाम या कसरत आत्रे पात्रे दंड करें देवना मारे आए मेरे देखा देखी मत कर योग चीजे का या बारह रोग भावार्थ नंबर एक जो व्यक्ति नियमित रूप से दंड या कसरत नहीं करता, यह कभी कभी करता है फिर छोड देता है । इससे शरीर को भारी नुकसान होता है । नंबर दो बिना गुरु के किसी को योग करता देखकर योग नहीं करना चाहिए । इससे बजाय लाभ नुकसान हो सकता है । स्पष्टीकरण नंबर एक कभी का कहना है कि यदि कोई व्यक्ति कभी कभी दंड बैठक करता है तो उसको बजाय लाभ के हानि होती है । इसलिए दंड बैठक कसरत करने वालों को चाहिए कि वह नियमित कसरत करें । नंबर दो योग क्रियाओं के विषय में कभी द्वारा कहा गया है कि योग किसी योगाचार्य की देख रेख नहीं करना चाहिए । बिना गुरु के केवल किसी को देखकर योग करने से हानि हो सकती है । लाभ पहली लोकोक्ति में दंड बैठक कसरत करने वालों को नियमित कसरत करने की सलाह दी गई है तथा दूसरे लोगों टीमें किसी योग के जानकार की देख रहे कि मैं योग की जानकारी रखने वाले से सीखने के उपरांत योग करना चाहिए ।

28 : बृह्म मुहर्त जागना

ब्रह्म महूरत जागना ब्रह्म मुहूर्त छोडे खाड नंगे पैर अन घूमे घास आयु हो चाहे सौ साल नए जोध हुए हरास ब्रह्म मुहूर्त जाग के भूमे नंगे पैर नये जोत कायम रखे हरी घास की सैर भावार्थ कभी कहता है कि ब्रह्ममुहूर्त में खाट चारपाई यह बिस्तर को छोड देने वाले वह हरी घास पर प्राध् अकाल घूमने वाले व्यक्ति की आंखों की रोशनी कम नहीं होती, चाहे उसकी आयु सौ वर्ष हो जाए । दूसरी लोकोक्ति में भी इसी प्रकार के अनुभव से अवगत कराया गया है । स्पष्टीकरण ब्रह्म मुहूर्त कालमें बिस्तर को छोडने वाले यानी नींद से जागकर नंगे पैरों से ओस वाली हरी घास पर सैर करने वाले व्यक्ति को दृष्टि दोष नहीं होता हूँ । ऐसी कभी की अनुभूति है क्योंकि प्रातःकालीन नंगे पैर हरी घास पर सैर करने से मन को शांति प्राप्त होती है । हरी घास पर पडी ओस की बूंदे तलवों को शीतलता पहुंचाती है तथा मस्तिष्क को शीतल करती है । घास पर नंगे पैर चलने से पैर के तलवों की मालिश होती है जिससे मानसिक तनाव व अवसाद जैसे रोग नहीं पडते हैं । ब्रह्म मुहूरत से सूर्योदय तक वायुमंडल में जीवन वायु यानी ऑक्सीजन की प्रचुर मात्रा रहती है जिससे फेफडे के रोग जैसे खांसी, दमा आदि से बचा जा सकता है । लाभ प्रातः नंगे पैर हरी घास पर घूमने से नए ज्योति में कमी नहीं होती तथा प्राथना वायुमंडल में ऑक्सीजन प्रचुर मात्रा में होने से हमारे फेफडे मजबूत होते हैं । सारा नियमित रूप से सूर्योदय से पूर्व बिस्तर छोडकर हरी घास पर नंगे पैर सैर करनी चाहिए ।

29 : केला सेवन

केला सेवन प्रातःकाल में खेला घायल स्वर्णभस्म जैसा गुड पाए मध्य दिवस में केला खाए रजत बस में जैसा बोल पाए सांध्यकाल में केला खाए ताम्र बस में जैसा गुण पाए शयनकाल में केला खाए मारक्विस जैसा गुण पाए भावार्थ कहावत में कहा गया है कि प्रातःकाल में केला सेवन स्वर्णभस्म के समान, दोपहर में रजत बस के समान सांध्यकाल में ताम्र बस में के समान गुणकारी है किंतु रात्रि में सोते समय केले का सेवन करना मारक विश्व के समान है । स्पष्टीकरण बे केला अत्यंत सुलभ एवं गुणकारी फल है । केले का सेवन सुबह नाश्ते के साथ शरीर को स्वर्णभस्म के समान शक्ति प्रदान करता है । दोपहर बारह बजे से दो बजे तक भोजन के साथ लेने से चांदी की बसों का गोल्ड प्रदान करता है अर्थात रजत बस में के समान गुणकारी है । शाम को छह से सात बजे के समय केला सेवन ताम्र बस में जैसा गुणकारी है तथा सोते समय यानी रात्रि में केला सेवन विश्व के समान हानिकारक है । लाभ केला प्रयोग से लोगों तक तो जैसे महत्वपूर्ण तत्व शरीर को प्राप्त होता है किंतु रात्रि के समय केले के सेवन से बचना चाहिए । सारा केले का सेवन प्रातःकाल में करना चाहिए । गरिष्ठ प्रकृति का होने के कारण रात्रि के समय केले का सेवन नहीं करना चाहिए ।

30 : स्वस्थ्य व प्रसन्न रहने के लिए

स्वस्थ वो प्रसन्न रहने के लिए सुबह शाम की सैर कर सौ उत्तरमें पैर कर नहीं किसी से बैर कर सबकी खाते खैर कर कभी ना होगा तो दुखी सादा रहेगा । मान चुकी भगवान कभी कहता है कि प्रातः वर्साय, कल सैर करने, उत्तर दिशा में पैर करके सोने से किसी से बैर मैं रखने से तथा सबकी भलाई करने से आपका मन प्रसन्न रहेगा और आप कभी भी दुःख का अनुभव नहीं करेंगे । स्पष्टीकरण सुबह शाम सैर करने वाला व्यक्ति प्रत्येक रोग से बच्चा रहता है क्योंकि सुबह शाम वायुमंडल में प्राणवायु यानी ऑक्सीजन पर्याप्त मात्रा में होती है । पैदल चलने से इंसुलिन ग्रन्थि सक्रिय होती है जिससे मधुमेह जैसे रोक नहीं होते । उत्तर दिशा में पैर करके सोने पर शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है जिससे शरीर ऊर्जावान बना रहता है । समाज में किसी से बैर भाव रखने पर सुखचैन समाप्त हो जाता है । इसलिए सबसे प्रेम भाव रखने के लिए कहा गया है । लाभ सुबह शाम की सैर करने से अनेक रोगों से बचाव उत्तर दिशा में पैर करके सोने से सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है जिससे अच्छी नींद आती है और मनवर शरीर स्वस्थ रहता है । रिश्ते नाते वो संवाद से दुश्मनी रखने वाला सदेव दुखी रहता है क्योंकि ग्राॅस से नकारात्मक ऊर्जा सर्जित होती है, जिसकी परिणति तनाव व अवसाद के रूप में होती है । सबका भला चाहने वाले व्यक्ति के अंदर सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न होती है, जिससे उसका मन सदैव प्रसन्नचित रहता है । सारा सुबह शाम घूमना, उत्तर दिशा में पैर करके सोना सबसे प्रेम करना । घृणा दो से बचना चाहिए ।

31 : हर दिन भोजन में

हूँ हर दिन भोजन में हर दिन एक सेब स्वस्थ शरीर हो हर दिन पांच तुलसी कैंसर से मुक्ति हर दिन एक निम्बू मोटापे पे कब हूँ घर दिन दूध आधा लीटर कमजोरी का नहीं ऐसा हर दिन तीन लीटर पानी, हर बीमारी काटे । कहानी बहुत बार हर दिन एक सेब के सेवन करने से शरीर स्वस्थ रहता है । हर दिन तुलसी के पांच पत्ते सेवन करने से कैंसर से मुक्ति मिलती है । हर दिन एक निम्बू के प्रयोग से मोटापे पर काबू पाया जा सकता है । घर दिन आधा लीटर दूध के प्रयोग से शारीरिक कमजोरी का असर नहीं होगा और हर दिन तीन लीटर पानी पीने से हर बीमारी दूर भागती है । स्पष्टिकरण सेम के सेवन से हृदय को बल मिलता है जिसके कारण शरीर स्वस्थ रहता है । तुलसी अनेक रोगों की रामबाण औषधि है और नियमित प्रयोग करने से कैंसर जैसे भयंकर रोग को भी पनपने नहीं देती । निम्बू प्रयोग करने से अतिरिक्त वसा की मात्रा नहीं बढ पाती जिससे शरीर चुस्त और फुर्तीला रहता है । दूध को संपूर्ण भोजन बताया गया है जो हमारे शरीर में आवश्यक खनिज लडो यानी मिनरल्स विशेष रूप से कैल्शियम की पूर्ति करता है । इससे हड्डिया वो मांसपेशियां मजबूत होती है हर दिन औसतन तीन लीटर पानी पीने से पाचन क्रिया ठीक रहती है । अमृता नहीं बढती तथा विजातीय तत्वों का उत्सर्जन सुचारु रूप से हो जाता है । लाभ भोजन के दिनचर्या उक्तानुसार करके अपेक्षित लाभ प्राप्त किये जा सकते हैं । सारा सेब, तुलसी, निम्बू और दूध के नियमित प्रयोग को उत्तम बताया गया है । ऍम

32 : छप्पन भोग

छप्पन भोग भोग भोगकर भोग को बडा नथन के रोग देश तुझे ही खा रहे तेरे छप्पन भोग भावार्थ कभी कहता है कि विभिन्न प्रकार के स्वादिष्ट वो विलासपूर्ण भोज्य सामग्री का पर्याप्त मात्रा में प्रयोग कर तो अपने शरीर में रोगों को बढने का अवसर प्रदान मत कर क्योंकि स्वादिष्ट गरिष्ठ वह विलासपूर्ण भोजन तेरे को पोषक तत्व प्रदान नहीं करते बल्कि तेरह शरीर का राज कर के रोग उत्पन्न करते हैं । स्पष्टिकरण एक बार में विभिन्न प्रकार की सामग्री को अपने भोजन में सम्मिलित करना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है । लोकोक्ति का तात्पर्य है कि भोजन सदेव, सादा और सुपर होना चाहिए । भोजन प्रकृति वो मौसम के अनुसार होना चाहिए । सादा और मौसमी भोजन शरीर को पोषण प्रदान करता है जबकि विभिन्न प्रकार की प्रकृति के भोजन एक साथ करने से भोज्य पदार्थों का पाचन सही प्रकार से नहीं हो पाता जिससे अमृता बढती है और अनेक प्रकार के उधर रोक जन्म लेते हैं । लाभ सादा वह मौसमी भोज्य सामग्री वाला भोजन करने से पाचन तंत्र ठीक कार्य करता है । शरीर को पर्याप्त पोषक तत्वों प्राप्त होते हैं और शरीर निरो वो स्वस्थ रहता है । सारा ज्यादा स्वादिष्ट तले हुए तथा एक साथ में विपरीत प्रकृति के भोज्य पदार्थों को भोजन में सम्मलित करना लाभकारी होने की बजाय हानिकारक है । अतः इनसे बचना चाहिए ।

33 : अनिंद्रा के लिए

अनिद्रा के लिए नींद आएगी । रात भर गहरी रूके बगैर ताजा जल से धोये के सोये हाथों पैर भावार्थ कभी कहता है कि वह व्यक्ति रात भर बिना विरोध के गहरी वह आरामदायक नींद लेता है । जो सोने से पूर्व अपने हाथ पैरो वह चेहरे को पानी से दो खर्च होता है । स्पष्टिकरण जो व्यक्ति रात्रि में सोने से पहले अपने हाथ पैर व चेहरा ताजा जल सामान्यत आप पर धोखा होता है, उसे रात भर बिना विरोध के गहरी नींद आती है । पैर दखने पैरों के जोड से ऊपर तक हाथ कोनियो तक तथा चेहरा पूरा मुख्य माथा कान के पीछे गर्दन तक होना चाहिए लाभ हाथ, पैर और चेहरा । ताजा जलसे धोनी से दिन भर की थकान दूर होती है । इससे शरीर में स्फूर्ति आती है और रात भर गहरी नींद आती है । सारांश गहरी नींद नाना स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक है तथा उक्त प्रयोजन अवश्य करना चाहिए ।

34 : कायाकल्प हेतु

काया काल पाॅकेट प्याज रस शहद संघ सेवन दिन चालीस बढती उम्र पचास भी हो जाए पच्चीस भावार्थ कभी कहता है कि सफेद प्याज का रस शहद के साथ चालीस दिन प्रातःकाल सेवन करने से पचास वर्ष की अधेड आयु में भी शरीर पच्चीस वर्ष के युवा की भर्ती ऊर्जावान बना रहता है । स्पष्टिकरण आयुर्वेद में सफेद प्याज के रस व शहद को समान मात्रा में प्रयोग करने से चालीस दिन में अप्रत्याशित लाभ मिलता है । यह योग काया कल्प का कार्य करता है और बढती आयोग का असर नहीं होने देता । लाभ सफेद प्याज का रस एक चम्मच तथा शहद एक चम्मच समान मात्रा में मिलाकर प्रयोग करने से शारीरिक शक्ति की वृद्धि होती है । सारा आज प्रत्येक आयु वर्ग के लोगों को इस योग का लाभ उठाना चाहिए ।

35 : मदिरा निषेध

मदिरा निषेध घर आनंद झगडे बडे घटे सामाजिक मान तन मन का मस्तिष्क का दुश्मन मदिरा पान भावार्थ कभी कहता है कि मदिरापान करने से ग्रस्त में झगडे होने लगते हैं । समाज में मान सम्मान नहीं रहता । मजीरा, पान करना शरीर, आत्मा और मस्तिष्क तीनों का दुश्मन है । स्पष्टिकरण जिस घर में लोग मदिरापान के आदि हो जाते हैं, उस घर में दैनिक पति पत्नी के झगडे होते हैं, आर्थिक स्थिति बिगड जाती है, समाज में कोई सम्मान नहीं रहता । शराब के पीने से आत्मा, शरीर और मस्तिष्क तीनों ही मृतप्राय हो जाते हैं क्योंकि शराबी समाज की नजरों से तो गिरता है या स्वयं अपनी भी नजरों से गिर जाता है । लाभ उक्त लोगों को अपने जीवन में उतारकर मदिरापान के सेवन के दुष्परिणामों को ध्यान में रखकर इस बुरी आदत से बचा जा सकता है । सारा आज प्रत्येक मनुष्य को शराब तथा इस के समान नशों से बचना चाहिए तथा अन्य लोगों को भी बचाना चाहिए ।

36 : वहम (संदेह) लाइलाज

वहम यानी संदेह लाइलाज ज्ञाता आयुर्वेद का या हिकमत का खास नहीं मिलेगी वहम की दवा किसी के पास । भगवान कभी कहता है कि चाहे कोई आयुर्वेद का ज्ञाता हो और चाहे हिकमत याने यूनानी ज्ञान में कितनी बडी महारत रखता हूँ । वहम याने संदेह व्यक्ति की दवा किसी के पास भी नहीं है । स्पष्टीकरण वहम यानी संदेह वृद्धि एक ऐसी बीमारी है जिसमें रोगी प्रत्येक स्थिति को संदेह की दृष्टि से देखता है । कभी कहता है कि ऐसे व्यक्ति का कहीं भी और किसी भी डॉक्टर वैध या हकीम के पास इलाज संभव नहीं है । ऐसा व्यक्ति सदस्यों नकारात्मक सोच में डूबा रहता है और घर परिवार रिश्ते ना तो दोस्त तो किसी पर भी विश्वास नहीं करता जिससे वहाँ समाज से अलग थलग पड जाता है । समाज से पूरी तरह कटने पर अवसाद जैसे भयंकर बीमारियों से ग्रस्त हो जाता है लाभ लोकोक्ति के माध्यम से समझाया गया है कि वह यानी संदेह व्यक्ति से ग्रसित व्यक्ति को विश्वास के साथ सकारात्मक सोच पैदा करनी चाहिए । विश्वास वह सकारात्मक सोच ही वहाँ उनकी बीमारी का इलाज है । सारा किसी के प्रति निराधार संदेह कर वहम ना पालें तथा प्रत्येक व्यक्ति के प्रति सकारात्मक सोच रखें हूँ ।

37 : भोजन करने का ढंग

भोजन करने का ढंग खूब चबाकर लीजिए । हर भोजन का स्वाद जल का सेवन कीजिए । एक दो घंटे बाद भगवान कभी कहता है कि अपना भोजन आराम से खूब चबा चबाकर स्वर्ण लेते हुए करिए और भोजन करने के दो घंटे बाद जल का सेवन करिए । स्पष्टिकरण खूब चबा चबाकर भोजन करने से हमारे मुख की लार्गन दिया सक्रिय हो जाती है, जिससे लार का मुख्य में पर्याप्त मात्रा में स्वजन होता है, जो पाचन क्रिया में सहायक होती है । भोजन के बीच में या तुरंत बाद में पानी पीने से उधर की जगह नहीं शांत हो जाती है, जिससे पाचन क्रिया पर विपरीत प्रभाव पडता है । लाभ भोजन खूब चबा चबाकर करने से पाचन क्रिया सुचारु रूप से होती है तथा भोजन में उपलब्ध पोषक तत्व आसानी से शरीर को प्राप्त होते हैं । जल सेवन एक दो घंटे बात करने से उधर में अम्लता नहीं बढती सारांश भोजन खूब जवाब जब अगर खाना चाहिए बिना चबाए जल्दी जल्दी भोजन करना पाचन के लिए हानिकारक है हूँ ।

38 : भोजन की मात्रा

बहुजन की मात्रा भोजन करिए, प्राथना को जैसे बडा अमीर भोजन करिए । सहायको जैसे एक फकीर भगवान कभी कहता है कि प्रातःकालीन भोजन अमीरों की भांति तथा सायंकालीन भोजन फकीरों की भर्ती करना चाहिए । स्पष्टिकरण लोकोक्ति में प्रातःकालीन भोजन को अमीरों की भर्ती करने से आशय है कि सुबह मैं आप अच्छे पकवान वो स्वादिष्ट भोजन भरपेट कर सकते हैं क्योंकि प्रातःकाल के भोजन में पिछले भोजन का अंतराल बडा होता है और दिन में प्रत्येक व्यक्ति क्रियाशील रहता है । इसलिए प्रातःकाल में थोडा बहुत गरिष्ठ भोजन भी किया जा सकता है । किंतु सहाय काल के भोजन के पश्चात रात्रि में क्रियाशीलता नगर नहीं रहती है इसलिए हल्का भोजन करना चाहिए ताकि भोजन का पाचन सहज और सुचारु रूप से हो सके । अतः शाम का भोजन सुपाच्य और हल्का ही करना चाहिए । लाभ प्रातः कालीन भोजन में शक्ति वर्धक भोजन शामिल करके तथा सायंकालीन भोजन में हल्का वह सुपाच्य भोजन लेने से पाचन क्रिया सही रहती है तथा शरीर स्वस्थ रहता है । सारांश प्रातःकालीन भोजन में शक्ति वर्धक सामग्री तथा सायंकालीन भोजन में हल्का सुपाच्य भोजन प्रयोग करना चाहिए हूँ ।

share-icon

00:00
00:00