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लॉयड्स बैंक डकैती

आप सुन रहे हैं धूप ऍम सुनी जो मन चाहे किताब लाॅबी इस किताब के लेखक है तपन घोष हूँ । दुनिया भर के व्यापारी क्षेत्रों में लॉर्ड्स बैंक बहुत प्रसिद्ध है । दुनिया के लगभग सभी बडे शहरों में इसकी शाखाएं हैं । इसका बम्बई कार्यालय ध्यान भी रोड पर हैं । ये बम्बई का एक घनी आबादी वाला क्षेत्र है । डस्टर के तीन दरवाजों में से एक बडा दरवाजा हार नव रोड पर और बाकी दो आउट्रम रोड पर खुलते हैं । बैंक के काम और ईमानदारी की वजह से इसकी काफी साख है । काम का भी काफी जोर रहता है । खासकर सुबह अप्रैल उन्नीस सौ इक्यावन की । दूसरे हफ्ते में बडे सुंदर और कीमती वस्त्र पहने दो व्यक्ति बैंक के आते में चक्कर लगा रहे थे । एक ककुद् दरमियान था । उम्र कोई चालीस पचास से लगती थी । वो काफी सुर्खियों ऍम उसकी नजर ग्यारह थे । दूसरा लगभग तीस वर्ष का कुछ कुछ भारी सुजॅय था । संसदीय तौर पर देखने में वो दोनों अच्छे खासे व्यापारी जान पड देते हैं । दरअसल वो उन्होंने ये देखने आए थे कि बैंक का कारोबार किसी तरीके से चलता है । उन्होंने पता लगा लिया कि जब बैंक में जरूरत से ज्यादा रुपये इकट्ठे हो जाते हैं तो उसे रिजर्व बैंक भेज दिया जाता है । इस बैंक के नियमानुसार रिजर्व बैंक को रुपया भेजने से एक दिन पहले फिर खजांची और उसके सहायक के सौ सौ रुपये के सौ सौ नोटों की गड्डियाँ बना लेते थे और ऊपर तथा नीचे के वोटों पर हस्ताक्षर कर की मुहर लगा देते थे । इन सब के बाद जस्टिस केडिया को एक गुत्थी में पिरोदिया जाता था । जेटली रुपये रिजर्व बैंक भेजा जाता था । उस रोज डॉक्टर कि कर्मचारियों के साथ पुलिस की सशस्त्र टुकडे भी होती थी । बैंक की ये कर्मचारी रूपये के साथ जाते थे । दो सहायक खजांची, एक यूरोपियन ऑफिसर और एक चित्र से सब गुत्थियों को एक चमडे के थैले में बंद करके चपरासी की कमर में बांध दिया जाता था । इसके बाद स्टेशन रोड पर यानी लाउड्स बैंक के पिछले दरवाजे के सामने वाले टैक्सी स्टैंड से एक टैक्सी बुलाई जाती थी । लेकिन इससे पहले एक सशस्त्र सिपाही पिछले दरवाजे के सामने तैनात कर दिया जाता था । वो बंदूक तानकर वहाँ खडा होता तो चपरासी दरवाजे से बाहर निकल था । उसके पीछे बाकी लोग चौकस होकर चलते हैं और फिर जब टैक्सी में बैठ के रिजर्व बैंक के लिए रवाना हो जाते हैं । कमाल की चित्र ही और अपने व्यवहार से उन दोनों ने इस बारे में पूरा ब्योरा मालूम कर लिया था । इसके बाद उन्होंने बेशन रोड का अच्छी तरह से नहीं किया । बैंक के ठीक एक तरफ ऍम खुला आहत बडे मौके पर था कोई भी वहाँ जब तक चाहे खडा रहे, उस पर किसी को रत्ती भर भी शक ना होगा । सब देख कर उन तुमने योजना तैयार करके उसे अमल में लाने के लिए उन्होंने दूसरे शहर में आपने तीन और साथ ही बुला लिए और ठीक मौके का इंतजार करने लगे । बैंक को बैंक ऑफ ईरान से एक भारी रकम मिलने वाली है । ये भी पता लगा लिया कि बीस अप्रैल को बारह लाख रुपये रिजर्व बैंक में जमा कराए जाएंगे । बस फिर क्या था उन्नीस अप्रैल की रात को पांचो साथी बम्बई के एक आलीशान होटल में इकट्ठा हो गए और अगली सुबह का इंतजार करने लगे । सुबह हुई दिन और बैंक का सशस्त्र चौकीदार बालगोपाल कदम ट्यूशन रोड पर बैंक के पिछले दरवाजे पर बंदूक तानकर खडा हो गया । आगे हुई तो उसने टैक्सी के लिए आवाज दें टैक्सी आई । इसका नंबर बीएमटी वन टू नाइंटी उससे टैक्सी का ड्राइवर था । ऍम बैंक का दरवाजा खुला । अंग्रेज अफसर ऍम दूसरा है । खजांची सरकारी डॉक्टर तथा चपरासी राम मथुरा चपरासी की कमर में एक बडा थैला जंजीर से बंधा हुआ था । उसमें बारह लाख रुपये की नोट थे । टैक्सी का मुॅह सिनेमा की ओर था । सबसे पहले मिस्टर फॅमिली और फिर पीछे की सीट पर जा बैठे हैं । सरकारी जाकर ड्राइवर के साथ वाली सीट पर बैठ गया । राम मथुरा टैक्सी में बैठने की वाला था डॉक्टर टैक्सी कि वोट में दरवाजे पर आतंकी इस बात का इंतजार कर रहा था कि राम मथुरा टैक्सी में बैठे हैं । एक दूसरे ऍम टैक्सी के पासी फिर पास पर बैठा छुट्टी मना रहा था । मेजर किसी नाम के एक साहब बेशन रोड पर चले आ रहे थे और अब तो बात के नुक्कड तक पहुंच गए हैं । लेकिन किसी का ध्यान इस ओर नहीं किया कि दो व्यक्ति है । उसी फुटपाथ पर टैक्सी के बिल्कुल पीछे खडे इस सारी कार्यवाही को बडी हसरत भरी निगाहों से देख रहे थे । सामने के फुटपाथ पर तीन और व्यक्ति सुंदर कपडे पहने टैक्सी पर नजर जमाए हुए थे । उन्हें देख कर कोई भी यह कल्पना नहीं कर सकता था की ये लोग ॅ के साथ हैं । ऍफ उन दोनों व्यक्तियों में से एक बिजली की तरह टैक्सी कि तरफ लपका । उसने टैक्सी का दरवाजा खोला । अंदर चुका और पिस्तौल से दो फायर किए । एक गोली ड्राइवर करोडो जिसके गर्दन के नीचे लगी और वो केबल लुढक है । गोली चलाने वाला व्यक्ति घूम कर दूसरी तरफ ड्राइवर के साथ जाता था । गोली की आवाज सुनकर मेजर केसी फुटपाथ के नुक्कड पर ही चुके हैं । दूसरे टैक्सी ड्राइवर सर वर का कुछ और चार हाथ पर जा गिरा । बैंक की टेलीफोन ऑपरेटर में सुविधा और एक क्लब थिरकी की तरफ लपके । बैंक के सहायक मैनेजर मिस्टर खूमसिंह लपक कर खिडकी की बाहर देखने लगे । गोली चलाने वाली के दूसरे साथी में ड्राइवर का शनी टैक्सी से महान निकालकर उसकी निकलेंगे । बाद में शिनाख्त के वक्त पता चला कि इसका नाम रूबी दार था और ये पहले फॅस दिल्ली का बस ड्राइवर था । सामने वाले फुटपाथ पर खडे तीनों व्यक्तियों में से एक में दो फायर किए और उसके दो साथी आगे बढ कर टैक्सी के पीछे छिप हैं । इन दिनों के पास भीतरी वालो वर्थ है । पहले तो सरकारी समझा कि धमाका टायर के फटने का है । टैरो को देखने के लिए वो बाहर आया था और उस पर दो फायर किए गए लेकिन वहाँ खाली गए और वह ऍम रोड की तरह बात का ऍम भी टैक्सी से बाहर आये । पहले तो वो पीछे की ओर है और जब टैक्सी को घेरा पाया तो बेशन रोड और आउट टर्न बोर्ड के तो रहा है की तरफ बाकी उसी समय एक कार उधर से गुजर रहे थे । पर मिस्टर लॉन्ग के चिल्लाने पर भी वो नहीं देखी । सामने की फुटबॉल से गोली चलाने वाला मेटर टैक्सी के पास आया । पिछला दरवाजा खोला और बैठ गया । दूसरे डाकू टैक्सी के पिछले दरवाजे के पास है और वहाँ उसने डॉक्टर पर फायर किया । डॉक्टर का बायां हाथ जख्मी हो गया । कदम ने डॉक्टर को खतरे में देख कर अपना डंडा संभालना चाहते कि एक डाकू ने उसके दायें आप पर गोली चलाने सर मलखान ड्राइवर ने का दोस्त की तरफ जाने की कोशिश की तो एक डाॅॅ दिखाकर रोक दिया । कितनी में एक जगह तूने राम मधुर रह पर भी गोली चला दें । वो बेहोश हो गया । डाॅ उसकी कमर से थैला खींच लिया और उसे घसीटकर बार फिर दिया । पांच । डाकुओं की टैक्सी में बैठे ही डाॅॅ ऍम उस समय भीषण रोड पर ही खडे चिल्ला चिल्लाकर लोगों को इकट्ठा करने की कोशिश कर रहे हैं । रोजगार के चलते देखकर उन्होंने किनारे खडे एक मोटरसाइकिल को अपनी पूरी ताकत से धकेलकर सिर्फ के बीचोंबीच खडा कर दिया । लेकिन रोहीदास से कुशल ड्राइवर था वो बचकर निकल गया । देखते देखते टैक्सी आंखों से कुछ लोग ये सडक खेल पंद्रह मिनट में खत्म हो गया था । इन पंद्रह मिनटों में एक व्यक्ति मारा गया था । तीन बुरी तरह घायल हुए थे, बारह लाख रुपये लूट गए थे और डाकू बाग नहीं लेते हैं । फॅालोइंग ने एक और कुछ बैंक कर्मचारियों के साथ लेकर टैक्सी को ढूंढने की कोशिश की पर देखा उन्होंने ऍम एक घंटे केंद्र बडे बडे पुलिस अफसर घटनास्थल पर पहुंच गए । बॅालीवुड के सारे इलाके पर पुलिस का घेरा डाल दिया गया । जांच शुरू हो गए । स्थानीय और सीमा के सारे पुलिस वालों को हिदायत दी गई की टैक्सी नंबर ऍम की तलाश में है । लेकिन अप्रैल को भारत के सभी समाचारपत्रों में इस सनसनीखेज जाके की खबर छपे बम्बई कि होम मिनिस्ट्री चौकन्नी हो गई । अभी वह घटनास्थल का नक्शा तैयार कर ही रहे थे कि उन्हें सूचना दी गई की टैक्सी नंबर बनी क्यों नहीं मिल गयी वो दोपहर में कोई डेढ बजे कश्मीर होटल के कुछ दूर खानी पडी थी । डॅाट दूर खाने देखा कि उस पर भी गोलियों के निशान थे । एक इंजन के करीब दूसरा पिछले दरवाजे की बात कर रहा हूँ । मुस्लिम कोई सुराग नहीं छोडना चाहते थे । पर टैक्सी की तरफ जमीन पर स्पेक्टर खा को पैरों में गहरे निशान दिखाई पडे । जाहिर था कि टैक्सी में बैठने वाले सभी लोग बाई तरफ से ही उतरे थे और इतनी जल्दी में थे कि उन्होंने रिपुं के निशान तक नहीं मिटाएं । ये सब मिशन उस दिशा की ओर जा रहे थे जिस पर कोई चालीस कर्ज पर ॅ था । एक्स होटल की मैंने राॅकी पूरी तरह से सहायता की । उसने बताया कि उसी दिन दोपहर में बारह बजे दो मुसाफिर उसके होटल का हिसाब चुकता करके चले गए । रजिस्टर में इनके नाम मिले थे रोहिदास । राधेलाल और सीताराम दोनों एक ही कमरे में ठहरे थे । रजिस्टर के अनुसार रोजेदार शादीलाल दिल्ली से और सीताराम इलाहाबाद से आया था । मैनेजर ने ये भी बताया कि तीन और व्यक्ति भी इन दोनों से मिलने आए थे । भी इनके गहरे दूर तो मालूम होते हैं । उसे इन तीनों में टीम के नाम आदि के बारे में कुछ मालूम नहीं था लेकिन वो एक अन्य व्यक्ति का नाम जानता था जो कि रुतबेदार से मिलने के लिए दो तीन बार आया था । उसके नाम लाल चलता है । वही अप्रैल के पहले हफ्ते में इन लोगों को होटल में लाया था । मैंने के कहने के अनुसार लालचंद इन लोगों से मिलने के लिए आखिरी बार चौदह अप्रैल को आया था । उसी दिन दोपहर के बाद वो इन सब के साथ बाहर भी गया था । गुटर मैनेजर को ये मालूम नहीं था कि तुम दस और उसके साथ ही पुलिस अप्रैल को रात को कितने बजे लौटे क्योंकि वो ऍम मुझे घर चला गया था । दूसरे दिन यानी बीस अप्रैल को वो लोग सुबह आठ बजे के बाद होटल से चले गए थे । दोपहर के समय जब उन्होंने होटल का हिसाब चुकता क्या दूर जल्दी में दिखाई पडते रहे और उनके पास टीम के दो बडे बडे संदूक थे । उनकी कमरे का निरीक्षण करने के बाद स्पेक्टर खान को होटल के समान के अलावा कुछ और नहीं दिखाई । बडा अपराधी काफी चतुर मालूम होते थे । इंस्पेक्टर खान की नजरें घूमते घूमते अचानक खिडकी के नीचे फर्श पर पटक । वो तेजी से क्योंकि की तरफ गए और घुटनों के बल झुककर काफी दिन तक उस चीज का निरीक्षण करते हैं । फिर उन्होंने उससे कुछ वेट कर एक लिफाफे में डाला और जेब में रखे हैं । कुटल से जाने से पहले इंस्पेक्टर खाने मैनेजर को हिदायत दी कि लालजन जब भी आए फोरन इंस्पेक्टर को सूचना दी जाएगी । होटल से निकल काॅफी के पास है । उन्होंने उस जगह से चुटकी भरते दिखाई है जहाँ पैरों के निशान हैं । इस रेट का मिला उन्होंने जेमेल लिफाफे वाली से किया तो उन्हें विश्वास हो गया कि टैक्सी में बैठने वाले लोग ही होटल के कमरे में गए थे । दोनों स्थानों की भी तो एक जैसी थी । इंस्पेक्टर खा का ख्याल था कि डाक रोहीदास और उसके साथियों ने ही डाला है । बम्बई के सभी स्टेशनों को हिदायत दी जा चुकी थी कि बम्बई से बाहर जाने वाले सभी लोगों पर नजर रखी जाए और जिस पर भी शक हो उससे पूछताछ इंस्पेक्टर खाने जाके के और भी दस और सीताराम के होली के बारे में समाचार पत्रों में भी खबर शगुफ्ता दी थी और जनता से अपील की थी कि वो पुलिस की भरसक सहायता करें । बम्बई की पुलिस भी व्यस्त थी । उसने सभी बदनाम अंडो पर छापेमारी और सभी बदनाम अपराधियों की देश की पर सब देखा । पुलिस का एक जासूस दिल्ली और एक इलाहाबाद भेज दिया गया ताकि वो वहाँ रविदास सीताराम के बारे में जानकारी प्राप्त करें । दो तीन दिन बाद अचानक इंस्पेक्टर खाकर भाग्य चमका और ऍम उनसे मिल गया है । उन्होंने बताया कि बीस अप्रैल की रात को वो विक्टोरिया टर्मिनल से आपका जाने वाली मुंबई मेल के एक फॅस के डब्बे में सवार हुए थे । इससे डब्बे में एक और व्यक्ति बैठा था । उसके पास तीन के सिर्फ दो बडे बडे बसित हैं, बेचैन था । इसमें मिस्टर गट्टे का था इसलिए आकर्षित किया था कि उसके पास ट्रेनिंग तो थे पर बिस्तरबंद नहीं था । गाडी छोटे से कुछ मिनट पहले एक अन्य व्यक्ति कमरे में आया और वो दोनों एक दूसरे से इस तरह मिले की उनकी सारी घबराहट बिल्कुल दूर हो गई । मिस्टर डॉक्टर ने बताया कि राष्ट्रीय भर इन दोनों ने एक दूसरे को डूबी दास और अनोखे लाल के नामों से बुखार कर बातचीत की और वे इलाहाबाद स्टेशन पर गाडी से उतरे थे । मिस्टर गाते जब मुंबई या कडाके की खबर पडी तो फौरन पुलिस को सूचना देने पुलिस स्टेशन आ गए हैं । मई के पहले हफ्ते में फॅमिली या बाद पहुंचे और वहाँ की पुलिस । उन्हें पता चला कि अनोखीलाल पुराना अपराधी है और पहले भी बैंकों में ताकि डालकर कोई दो लाख रुपए लूट चुका है । कुछ दिन बाद इंस्पेक्टर खा के नेतृत्व में एक पुलिस दल ने इलाहाबाद के किसी देहाती इलाके में बिना और लिंग दिए एक बार आप पर छापा मारकर ॅ और अनोखे लाल को गिरफ्तार कर रहे हैं । बाद में जब भी नहीं हुई तो पता चला की अनोखी ही सीताराम के झूठे नाम से मुंबई आया था । पुलिस की जिला पर अनोखीलाल के बहुत बार गए उसके बयान के फलस्वरूप पंद्रह मई को इंस्पेक्टर खाने से इटावा के भागो वासी गांव में लेकर अनोखेलाल ने बालीराम को बुलवा भेजा । बालीराम ने अनोखीलाल के कहने पर्सन दूध पिला दिया जिसमें तीन पिस्तौल और दो डब्बे करते हैं । इसके बाद अनोखेलाल एक और घर में गया । अपनी पत्नी कमला को बुलाकर उसने लोहे का एक ट्रंक निकलवाया, जिसमें नोटों की छह छुट्टियाँ थी । इस तरह छह लाख सैंतालीस हजार चार सौ रुपये तो वसूल हो गए लेकिन बाकी रुपये अपराधियों ने खर्च कर दिए थे । एक अगस्त तक इस दल के दो डाकू हर नारायण, नानक चंद और रामकृष्णन कुछ ठन लाल पकडे गए थे । पांच छोटा को बाकी लाल देवी सिंह अभी ला बता था तीन अगस्त को मीटर्स जेल में ही मर गया । तीनों अपराधियों को ग्रेटर मुंबई के रिसन जज के सामने पेश किया गया था । जूली ने एक मत से फैसला किया कि उन पर लगाए गए आरोप सही हैं । अनोखेलाल और उसके साथियों की अपील बाद में आई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने भी रद्द कर दी और इस प्रकार भारत के इस सनसनीखेज जाके पर बता अच्छे पडा हूँ ।

क्या जसपाल को जहर दिया गया था

हमारा जीने के भरोली गांव का मुखिया सरदार रूपसिंह अपने बेटे जसपाल सिंह के साथ रहता था । जिस पाल का विवाह पलविंदर कौर से हुआ तो बच्चे भी उनके विवाह के कुछ दिन बाद ही जिस बाद में बात से नाता तोड दिया जाने क्यों उनमें पडती नहीं थी । लोगों का खयाल था कि ये सब बलविंदर कौर की वजह से हुआ था । जसपाल को रूपसिंह से आर्थिक सहायता बराबर मिलती रहे हैं । इसके अलावा वो बंदी और दूध बेचकर था । इधर उधर की काम करके कुछ कमा लेता था । उसे कई तरह के शौक थे । स्वीकार करने अक्सर जाया करता था । इस चक्कर में कभी कभी दो तीन दिन के लिए घर से भी हो जाता था जिससे जानवर की खाल लाता उसे रंग कर बेच देता हूँ । फोटोग्राफी का भी उसे खाता शौक था । यूँ कहा जा सकता है कि मोहिंद्र सिंह के आने तक सब कुछ ठीक ठाक चलता रहा । वो पलविंदर का चचेरा भाई था । अंबाला के बलदेवनगर कैंप में उस की दुकान थी । वो अक्सर भरेली में जसपाल के घर आया जाया करता था और जिस पानकी अनुपस् थिति में भी कई बार एक दो दिन ठहर जाता था । जसपाल की अनुपस् थित में मोहिंद्र सिंह का पलविंदर के साथ रहना चर्चा का विषय हो गया । लोगों में कानाफूसी होने लगी कि मोहिंदर और बलविंदर का अनैतिक संबंध है । आखिरकार ये खबर जसपाल तक भी पहुंच गए । वैसे कोई नहीं जान सका कि वह इस बात पर क्या करेगा, क्या करेगा? इसके कुछ दिन बाद अच्छे मुँह पचास को दोपहर को जसपाल गया हो गया चलता । रूपसिंह ने उसका पता लगाने की बडी कोशिश की । पलविंद्र से कुछ पता नहीं चला । उन दिनों उसे इस्टीविया कि दौरे पडते थे । शुरू में महिंद्र सिंह ने कुछ नहीं बताया । बाद में उसने कई बातें नहीं जिससे कोई सुराग नहीं मिला । लोगों का अंदाजा था कि पलविंदर की चरित्रहीनता पर लज्जित होकर उसने घर छोड दिया । इसलिए आठ मार्च उन्नीस सौ पचास को सरदार रूप सिंह ने दिल्ली मिलाप में एक विज्ञापन छपवाया जिसमें जसपाल के आने की प्रार्थना की गई थी क्योंकि उसकी अनुपस् थिति में उसकी पत्नी, बच्चों और माँ बाप का बहुत बुरा हाल हो रहा था । लेकिन कुछ हुआ खोजबीन का कोई नतीजा दिखता । पलविंदर अपने दोनों बच्चों के साथ अलग रहती थी । मोहिंदर सिंह उससे मिलने जुलने आता जाता और तब धीरे धीरे मामला ठंडा बढ गया । दस मार्च को भरेली ऍम छाता गांव में छोडते नहीं, पर पानी भरने कहीं नहीं लगा कि मेरे में काफी बदबू आ रही है । पीने के पानी में क्या गडबड हो गई । आखिर गांव के लम्बरदार को बुलाया गया । लोहे की जंजीर में रुक लगाकर कोने में डालने पर कोई भारी चीज उसमें फंस करें । तीन व्यक्तियों ने उसे खींचा । ग्रुप में फंसा । काफी बडा संदूक ऊपर आ गया । खोलने पर उसमें एक पुरुष की मृतदेह मुडी थोडी मिली शरीर का भी कर चुका था । बहुत बदबू उठा रही थी । देख पर पूरे वस्त्र थे । हालांकि कई जगह फटे हुए थे । जगह जगह गलते मांस पर कपडे चिपक गए थे । शरीर के नीचे सिंदूर में भी कपडे के कुछ टुकडे मिले हैं । दूसरे दिन सब इंस्पेक्टर बनता से घटनास्थल पर पहुंच गया । वहीं पर डॉक्टर ने पोस्टमार्टम क्या, शरीर जलाने से पहले शिनाख्त के लिए उसके कई चित्र ले लिए गए थे । हालांकि वह इतना चढ चुका था कि पहचानना मुश्किल था । शहीद पर और संदूक ने मिले कपडों को पुलिस ने आपने कब्जे में दे दिया । संयोग से बनता सिंह के साथ आए सिपाहियों में से लक्ष्मण सिंह जसपाल का पाँच निकला । लाश देखकर उसने ये संदेह व्यक्त कर दिया कि शायद ये जसपाल ही है । बाद में उसने रूपसिंह को भी खबर करते हैं । अगले दिन रूप से उठाने पहुंचा तो पता चला की लाश जिला दी गई है लेकिन कपडे देखकर उसने पहचान लिया कि वे डाॅॅ सिंह के है । इसे अपनाना पर पुलिस ने जसपालसिंह के हत्या का केस दर्ज कर लिया । हम जोर शोर से जसपालसिंह के हत्यारे की खोज शुरू के लोग तो अब तक इसलिए चुप बैठे थे कि वे जिस बात सिंह को जानबूझकर घर से गायब हुआ समझ रहे थे । जसपाल की लाश मिलने की खबर सुनते ही महिंद्र सिंह गायब हो गया । कभी ढूंढने पर भी कुछ पता नहीं चला । जांच पडताल के दौरान पुलिस ने पलविंदर कौर को महिंद्र सिंह के सहयोग से अपने पति जसपाल की हत्या करने के अपराध में गिरफ्तार कर लिया । सारा गांव आपका मक्का रहेगा या कुछ भी हक की बात पुलिस ने मुकदमा अदालत में पेश कर दिया । लंबी चल रहे हैं । हमें रन की पलविंदर का मुकदमा सबकी चर्चा का विषय हो गया । पंजाब के सारे समाचार पत्रों में रोज कार्यवाही को पहले पृष्ठ पर प्रकाशित किया गया था । मुकदमे की मुख्यमंत्री ये थे बलविंदर कौर के अपने चचेरे भाई मोहिंद्र सिंह के साथ अनैतिक संबंध हैं । इस बात पर गांव में काफी शुरू हुआ । उसके ससुर ने भी इस आचरण का निष्फल विरोध किया । इसकी खबर इसके पति को लगी और उसने सम्भवता से खत्म करने का तरीका सोच भी लिया । लेकिन अभिनंदन ने मोहिंदर से षडयंत्र करके अपने रास्ते का कांटा दूर करने का फैसला कर लिया । यही हत्या का उद्देश्य था तो सरकारी दवा हूँ । श्रीमती लक्ष्मी और ऍम ने इन तत्व समर्थन क्या कहा गया की छह फरवरी उन्नीस सौ पचास को पलविंदर और मोहिंदर नहीं जसपाल को फाॅर्स दिया । जसपाल की मृत्यु हो गई । मैं तो शरीर को एक बडे से संदूक में बंद करके उसे हमारा शहर की एक कोठी में रख दिया गया । फॅमिली को मोहिंदर सिंह बंदी हॅूं, अमरीकसिंह और करता सिंह के साथ आया और संधू को जीत में लेकर चला गया । उसे बलदेवनगर के दो टू में रख दिया गया । तीन दिन बाद मोहिंदर सिंह, पलविंद्र और और घरेलू नौकर लोग चंद के साथ वहाँ आया और संदूक को लेकर राजपुरा जाने वाली सडक पर कुछ मीन सफर करने के बाद कच्ची सडक से छाप के इलाके में पहुंच गया । वहाँ संदूक हुए में गिरा दिया गया । वहाँ से जी को गुरुद्वारा ले जाकर ऍम में सरकारी पक्ष ने पलविंद्र कोर की स्वीकरोक्ति पेश की जो उसने पंद्रह अप्रैल उन्नीस सौ पचास को एक प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट के सामने की थी । मेरा पति जिस पांसे, शिकार के साथ साथ फोटोग्राफी का भी शौक था । शिकार से वो जो भी खरीदा था उन्हें रन नहीं बैठा था । उसने निगेटिव की ढुलाई का काम भी शुरू कर दिया था । दिसंबर में एक दिन जिस बाल सिंह ने मेरे ताऊ के लडके महिंद्र सिंह से फोटो धोने का सामान लाने को कहा । महेंद्र सिंह ने बंदी हॅारर घर नाम सिंह से कैंट जाकर सामान लाने की बात है । हरनामसिंह जाकर सामान ले आया और मैंने उसे अपने पास रख लिया । वो दवा एक कागज पर चिपकी हुई थी इसलिए मैंने उसे एक छोटी बोतल में डालकर उसमें पानी भर दिया और बोतल अलमारी में रहते हैं । उन दिनों में पति के साथ हमारा शहर में एक कोठी में रहती थी । एक बार वो दो तीन दिन के लिए शिखर पर गए । वहाँ पेट में गडबडी होने के कारण उन्हें दस तलक है । तीन चार दिन तक डॉक्टर सोहनसिंह की दवा दी गई हैं । एक दिन मैंने दवा की शीशी उस अलमारी में रख दी जिसमें फोटो होने वाली दवा रखे हुए थे । मैं बाहर बैठी हुई थी । तभी उन्होंने पूछा कि दवा कहाँ रखी हैं? मैंने बता दिया की अलमारी में रखी है बस गलती से वो फोटो धोनी वाली दवा भी है । जब नीचे गिरे तो मेरा छोटा लडका उनके पास खडा था । वो चलाया । माँ पापा जी गिर पडे । मैं एकदम अंदर गई । देखा वो तरफ रहते हैं । थोडी ही देर बाद चल बसे । इसके बाद मैंने मोहिंद्र सिंह के पास जाकर सारी बात बता दी । उसने कहा कि जसपाल के पिता जी आ गए हैं । उन्हें खबर करनी चाहिए । लेकिन मैंने कुछ नहीं कहा क्योंकि उनकी रिश्तेदार हम दोनों यानी जिस बाल और बलविंद्र से ना लाते हैं डर का । मैंने उनका शरीर एक बक्से में बंद कर दिया । महिंद्र सिंह ने इसमें मदद की । चार पांच दिन तक ये संदूक वही कोठी में रख रहा हूँ । मैंने ही मोहिंदर सिंह से कहा कि अगर वो मेरी सहायता नहीं करेगा तो मैं हमारी जाऊंगी । उसने मेरे नौकर की मदद से संदूक मेरी कोठी से निकालकर जीत में रखा और बलदेवनगर ऍम की अपनी दुकान में ले गया । वहां अट्ठाइस दिन तक वो पडा रहा । उसके बाद एक दिन में फॅमिली जीत में संदूक रखवाया और मोहिंदर सिंह के साथ जाकर कोई ऍम मुझे याद नहीं कि जसपाल ने किस दिन ये दवा पी थी । शायद वो उन्नीस सौ पचास का जनवरी का महीना था । ये थी अपने पति की हत्या की । कथित अपराधी द्वारा कही की रोमांचकारी सरकारी वकील ने जिला करते हुए कहा कि इससे स्पष्ट हो जाता है कि आप में भावी अपराध को रहस्य में रखने के लिए वो किस तरह जसपाल को उसके पिता वा संबंधियों से दूर अंबाला की कोठी में ले गई थी । यह भी प्रमाणित हो गया की इस काम से पहले मोहिंदर सिंह के पास घातक पोटॅटो मौजूद था । इन सब बातों से एक ही ध्वनि निकलती है कि किसी ने अपने पति को रास्ते से हटाने का निश्चित स्टेडियम किया था । लेकिन स्वीकरोक्ति से ये होता था कि जसपाल की मृत्यु एक दुर्घटना मात्र थी जिसमें बलविंदर कौर का कोई हाथ नहीं था । क्या ये वाकई दुर्घटना थी? क्या जसपाल की मृत्यु के बाद उसका आचरण इस दुर्घटना की पुष्टि करता है? सरकारी वकील ने तर्क प्रस्तुत किया जिसे सिर्फ फॅसने मान लिया कि अगर ऐसा हुआ होता तो परविंदर कौर का आचरण बिलकुल भिन्न होता । वो मारते हुए जिस पाल के पास जाती रोती चिल्लाती और एकदम डॉक्टर को बुलाते हैं । जो पत्नी कुछ न जानती हूँ वो अपने पति को अपने आंखों के सामने इस तरह बनने नहीं ये अभी शुरू हो ऐसा लगता है । सुनवाई के दौरान पलविंदर ने अपनी स्वीकरोक्ति को अस्वीकार कर दिया । उसने कहा कि ये सब उससे जबरदस्ती कहलवाया गया है । उसमें सारी घटनाओं के प्रति अज्ञान प्रकट किया और कहा कि उसे अपराध की कोई जानकारी नहीं है लेकिन उपर्युक्त मजिस्ट्रेट के सामने स्वीकृ युक्त के आधार पर उसका अपराध प्रमाणित हो गया । ऍम ने उसे अपराधी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाते हैं । उसने पंजाब हाईकोर्ट में अपील करती है । विस्तृत निर्णय में सम्मानीय जज ने कहा कि इसका कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है कि पलविंदर या मोहिंदर सिंह अथवा दोनों ने जसपाल को फाॅर्स से संबंधित सारे प्रमाण एकदम परिस्थिति जान है । यद्यपि से बरामद मृत श्राॅफ जाने के कारण पहचान के लायक नहीं रह गया है लेकिन फिर भी लाश पर तथा संदूक में मिले कपडों के खिलाफ हो गई है कि जसपाल का ही शहीद था । इसके बाद जज ने अपराध की गवाही पर विचार किया । ये संभव है कि पलविंदर ने मोहिंदर सिंह से अपने संबंध बनाए रखने की इच्छा हूँ लेकिन इस प्रेम की कीमत उसने अपनी धन मोहम्मद और सामाजिक मान सम्मान से कभी नहीं चुकाना चाहिए होंगे । उसके मन में पति की हत्या की इच्छा हो सकती थी लेकिन इससे भावना पर अंकुश लगाने वाली शक्ति भी मौजूद थी । बारोली के भावी मुखिया की पत्नी होने की कामना इससे परिस्थित में क्या ये संभव नहीं था कि परिवंदर की सहमती और जानकारी के बिना केवल मोहिंद्र सिंह ने हत्या कर डाली हो । यदि उस पर भी काफी शक की गुंजाइश है लेकिन ये नहीं कहा जा सकता कि जहर उसी ने दिया और फिर पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर की रिपोर्ट यह प्रमाणित नहीं करती कि जिस बाल की मृत्यु ऍसे हुई बल्कि डॉक्टर की राय थे कि ऐसे कोई चिंता नहीं मिली जिनसे ये पता चले की बैठक को हजार दिया गया था । इसलिए हाईकोर्ट ने पलविंदर को हत्या के आरोप से तो बरी कर दिया लेकिन भारतीय दंड संहिता की दो सो नौवीं धारा के अंतर्गत उस पर ये आरोप लगाया कि उसने अपने मृत पति के शरीर को ये जानते हुए गायब कर दिया कि इस तरह वो अपराध कर रही है और उसे सात साल की कडी कैद की सजा सुनाई । बलविन्दर ने सुप्रीम कोर्ट में अपील करते देश के सर्वश्रेष्ठ वकील उसकी मुकदमे की पैरवी कर रहे थे, जिन्होंने दर्शकों से खचाखच भरे गोल्ड रूम में लंबे बयान थी है । बाईस अक्टूबर उन्नीस सौ बावन को सम्माननीय जैसा हमने मुकदमे का फैसला सुनाया । उन्होंने कहा कि जिन परिस्थितियों में है जिस बाल की मृत्यु हुई है, उस सदेव रहस्यमय रहेगी । प्रस्तुत गवाहियों के आधार पर उस रहस्य को सुलझाना संभव नहीं है । इस बात की पूरी संभावना है कि पलविंद्र और की जानकारी और सहमत के बिना महिंद्र सिंह ने हत्या करती हो या ये भी हो सकता है की हत्या उसके घर पर ना होकर बलदेव कैंप में हुई हो । और ये भी हो सकता है कि अकेले मोहिंद्र सिंह नहीं, मैं तो शरीर को छिपाया हो और बलविंदर की स्वीकरोक्ति छूट हो । मुकदमे की परिस्थिति प्रमाणों से इन बातों का कोई उत्तर नहीं मिलता कि जिस बाल में आत्महत्या की क्या गलती से विश्व पीने की कर मर गया, दोनों षड्यंत्रकारियों ने उसे कुश्तिया या अकेले मोहिंद्र सिंह नहीं, ये क्या? आत्महत्या की बात को यही नहीं डाला जा सकता । जिस व्यक्ति ने एक विश्वासघाती को खोजने के लिए अपने पत्नी की खाते रहे अपने और घर और संबंधियों को छोड दिया हो, उसके मानसिक स्थिति को देखते हुए आत्महत्या का विचार उसके लिए असम बहुत नहीं कहा जा सकता । स्वीकरोक्ति से भी इस धारणा को स्पष्ट सा समर्थन मिलता है । भारतीय दंड संहिता की दो सौ धारा के अंतर्गत आरोप लगाने के लिए प्रमाणित करना अनिवार्य था कि परिवंदर इस बात को जानती थी अथवा उसके पास इस बात के विश्वास के कारण मौजूद था कि जसपाल की हत्या की गई है और इस जानकारी के बाद अपराधी को कानूनी ठंड से बचाने के लिए उसने तो शरीर को गैप कर दिया था । ऍम आवश्यकता ऍम देने की वजह से हुई है । लेकिन इस बात का तो अंश मात्र भी प्रमाण नहीं मिलता था । निम्मलिखित जिस बाल की मृत्यु हुई उसका शरीर को ऐसे निकले संदूक से निकला और बलविंदर कौर ने उसका मृत शरीर छिपाने में सहयोग दिया । मृत्यु का कारण परिस्थितियों को प्रमाणित नहीं करते । यदि थोडी देर के लिए स्वीकरोक्ति को रिकॉर्ड से निकाल दिया जाए तो इस बात का कोई प्रमाण नहीं रह जाता कि जसपाल की मृत्यु कैसे हुई । ये सिद्ध हो चुका है कि महेंद्र सिंह के पासपोर्ट ऍम था और वो टी से स्थिति में भी था कि विश्व दे सकता और ऐसा करने का काफी बडा कारण भी उसके पास था लेकिन ये सभी प्रमाण ऍम महिंद्र सिंह के पास पाॅड होने की बात से जबकि जसपाल के मृत्यु शरीर में उसका कोई नहीं मिला । ये सिद्ध नहीं होता कि उसकी मृत्यु घातक रोशन से हुई । जज ने कहा कि किसी भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कारण से यह सिद्ध नहीं होता कि जसपाल कीमृत्यु जहाँ से हुई यदि पलविंद्र की स्वीकरोक्ति पर विश्वास किया जाए तो उसकी मृत्यु एक दुर्घटना मात्र थे । यदि उसकी स्टिक लोग कि विश्वास नहीं मारी जाए तो इस बात का कोई प्रमाण शेख नहीं रहता कि जसपाल की मृत्यु कैसे हुई । हाँ, जिस तरह मित्र शरीर को छिपाया गया उससे अवश्य कुछ संदेह होता है किन्तु केवल किसी आधार पर इससे निश्चित परिणाम पर नहीं पहुंचा जा सकता कि वो अस्वाभाविक मृत्यु थी । इसका बहुत सी घटनाएं हुई हैं । जब मृत्यु दुर्घटना से हुई और अपराधियों ने अजीब त्यौहार किए जिनके कारण उन्हें मालूम होंगे । उनमें से एक ये भी हो सकता है कि उससे पलविंदर को इस बात का डर हुआ हूँ की इस बात को लेकर उसके विरूद्ध झूठा मुकदमा ना खडा कर दिया जाए । केवल संदेहों के आधार पर चाहे वो कितनी भी स्पष्ट क्यों हूँ? नागरिकों के जीवन और स्वतंत्रता पर आघात नहीं किया जा सकता है । सब केवल निश्चित प्रमाणों के आधार पर किया जा सकता है और इस मुकदमे में इनका अभावा । जज ने अंत में कहा कि इस मुकदमे में जैसा कि हाईकोर्ट ने भी कहा है कि वह पुलिस के सब इंस्पेक्टर, सिपाहियों और ऍम गवाहों ने ही जानबूझकर झूठे बयान नहीं दिए बल्कि आरोप लगाने वाला पक्ष भी अपनी झूठी बात दूर से सत्य प्रमाणित करने वाली दवाइयाँ प्रस्तुत करने का दोषी है । इसलिए हमारा खयाल है कि प्रमाणों में से पक्षपातपूर्ण झूठी बाते निकाल देने के बाद जो कुछ पहुँचता है उस आधार पर अपीलकर्ता परविंद्र कौर को ढूंड देना ठीक नहीं । पलबिंदर कौर पर लगाए गए सब आरोप हटा लिए गए । वो एक बार फिर से स्वतंत्र हो गई जिस बाल की मृत्यु का रहस्य कभी नहीं खुला । अंबाला विश्वकांत कानूनी पेचीदगियों और सनसनीखेज होने के कारण हमेशा याद रखा जाएगा हूँ ।

अब्राहम लिंकन

जॉर्ज वॉशिंगटन के बाद अमेरिका के राष्ट्रपतियों में अब्राहम लिंकन का नाम लिया जाता है । आज हम लोग अमेरिका को जिस रूप में देखते हैं उसके लिए अब्राहम लिंकन ने ही रखे थे । उनके राष्ट्रपति काल में गृह युद्ध छिड जाने के कारण जरूर गडबडी फैल गई थी लेकिन उन्होंने जल्दी ही हालत को संभाल लिया । एक लेखक ने लिखा है कि दुनिया के शासकों में उनका हिरदय सबसे कोमल था । उन्होंने एक ऐसा रास्ता अपनाया जो उनके आधे देश वासियों को पसंद नहीं था । उस गुड फ्राइडे के सुबह राष्ट्रपति लिंकन बहुत खुश हैं । दास प्रथा समाप्त करने की घोषणा पर हस्ताक्षर करके उनकी एक पुराने इच्छा पूरी हुई थी । उस समय उन्होंने कहा था कि अगर कभी इतिहास में मेरा नाम लिखा गया तो इस काम के लिए और इसके प्रतिनिधि लगन के लिए लिखा जाएगा । डांस मुक्त राष्ट्र ने उन्हें दोबारा बहुमत से चुनकर ये दिखा दिया कि उनके मन में आपने सोलहवें राष्ट्रपति के लिए कितना प्यार है । अठारह उन्होंने केंद्र की के एक लगी बडे की झोपडी में जन्म लेकर अब्राहम लिंकन वाइट हाउस तक पहुंचे और इस तरह उन्होंने इतिहास पर अपनी लगन और अपने महान नृत्य क्योंकि छाप छोडती, समानता और ईमानदारी के बल पर उन्होंने राज्यों में बातें अमेरिका को संयुक्त राज्य बनाने का बीडा उठाया । पहली बार उनके राष्ट्रपति चुने जाने के बाद एक के ग्यारह वर्ष की लडकी ने उन्हें पत्र लिखकर सलाह दी कि अगर वो दाढी रखने हैं तो उनका दम नाम ओहो ज्यादा अच्छा लगेगा । उस समय तो उन्होंने इस बात को हंसी में टाल दिया लेकिन कुछ समय बाद ही उन्होंने दाढी बढानें काम शुरू करने के समय में अमेरिका के पहले दाढी वाले राष्ट्रपति थे । उस दिन सुबह बहुत खुश होने पर भी उनके चेहरे पर काफी उदासी दिखाई देती थी । लगता था जैसे कोई गहरी पीडा उनके मन को मत रही थी । गृहयुद्ध और उससे होने वाली जानमाल की बर्बादी ने उनकी खुशी छीन ली थी । कुछ दिन पहले एक अजीत सपना देखने के बावजूद वो खुश थे । सपने का जिक्र करते हुए उन्होंने अपनी पत्नी से कहा था कि थकी हुई होने की वजह से लेती ही मुझे गहरी नींद आ गई और मैं सपना देखने लगा । मुझे लगा जिसे मेरे चारों को बहुत ऍम । फिर भी मैंने कुछ लोगों को धीरे धीरे सिर्फ रखने की आवाजे सुनी । मैं सपने में ही उठकर नीचे गया और लेने का वहाँ भी मुझे से सही सुनाई पडी लेकिन कहीं भी कोई दिखाई नहीं दिया । मैं बारी बारी हर कमरे में गया, कहीं कोई नहीं था भी सिक्स क्यूँकि आवाज करोड थे, सब कमरों में रोशनी थी और वहाँ हर चीज को मैं जान सकता था । बस कौन रो रहा है ही नहीं दिखाई देता था । मैं बहुत परेशान हो गया और मैंने सिसकियों की वजह धूम निकालने की बात है । ढूंढते ढूंढते मैं पूर्वी कमरे में पहुंचा और दृश्य देखकर हैरान है क्या मेरे सामने फन मेंढक की एक लाश पडी थी गए सिपाही उसके बाद से पहले पर खडे थे और बहुत से आदमी खडे खडे लाश को देखकर जो रहे थे व्हाइट हाउस में कॉमर्स क्या मैंने एक सिपाही से पूछा राष्ट्रपति ये उसने जो आप दिया एक हत्यारे ने उन्हें मार डाला । तभी वहां खडे लोग जोर से चीख होने लगी है जिससे मेरी का काम है । अपने महान जीवन के अंतिम दिन सुबह उन्होंने मंत्रीपरिषद की मीटिंग में हिस्सा लिया । फिर एक मिलने वाले निकलू मिस्त्री को समय दिया । उसके बाद एक अपराधी को छमा करने किया गया दें । फिर गाडी मंगवाकर वो अपनी पत्नी मेरी के साथ अकेले ही निकल पडे । आज हम लोग अकेले ही जाएगी । उन्होंने कहा मेरी नहीं बाद में रोड होकर बताया कि राष्ट्रपति ने कहा था कि जितना खुश में आज हूँ उतना पहले कभी नहीं हुआ था । टहल के लौटने के बाद उनकी कोई काम करने की इच्छा नहीं थी । इसलिए रात का खाना जल्दी ही खत्म करके डाक देखने के लिए वो यहाॅं कहाँ खत्म होते ही अपनी पत्नी के साथ थियेटर देखने के लिए चल पडे हैं । उसके बाद वो व्हाइट हाउस में जीवित नहीं लौट सकें । फोर्ड थियेटर में हमारे आमिर की भाई देखने का प्रोग्राम सवेरे ही बना था । उनके साथ जनरल गांठ और उनकी पत्नी को भी जाना था । शाम के समय जब जनरल ग्रांड ने दूसरी जगह जरूरी काम होने की वजह से साथ चलने में अपनी मजबूरी दिखाई तो श्रीमती लिंकन ने हमारी क्लास हैरिस और मॅन जो एक किसान से सदस्य के बच्चे थे वो अपने साथ दे दिया । उन लोगों के थिएटर पहुंचने के पहले ही खेल शुरू हो चुका था । राष्ट्रपति के पहुंचते हैं खेल हो गया । अभिनेता चुप होकर खडे हो गए और बैंड पर स्वागत बजाएगी । बॉक्स में राष्ट्रपति पहुंचे और जनता ने खडे होकर उनका अभिवादन किया । लिंकन झुककर अभिवादन का उत्तर देने के बाद बॉक्स के पीछे के हिस्से में रखेगी । घूमने वाली कुर्सी पर बैठकें खेल शुरू हुआ और राष्ट्रपति कुर्सी पर धीमें धीमें झूलते हुए देखते रहे । उन्हीं के पता था की मौत दबे बहुत उनकी रूर बढती चली आ रही है । दस बज ने की कुछ बात एक छाया राष्ट्रपति के बॉक्स का दरवाजा देरी से खेलते हुए भी तर्कों से उसके हाथ में एक पिस्तौल थी और दूसरी में एक छोटा छान भारत में अपने शिकार की ओर देखा और फिर निशाना साथ कर गोली छोड दें । एक धमाका हुआ और लिंकन अपनी कुर्सी में बेजान होकर गिरते हैं । घबराकर मेरी जरूरत बोलने पीछे देखा । वो फौरन हत्यारे को पकडने दौडे, हत्यारे निभाए, हाथ में पकडा हुआ छूरा होने मार दिया । जख्मी होने पर भी जब मेरे ने उसे पकडने की कोशिश की तो वो बॉक्स को फलाना मिलता हुआ ग्यारह फीट के स्टेज पर कूद गया । इस स्टेज पर छत गिरने पर भी वो जल्दी से उठ खडा हुआ । चूरा दिखाते हुए वो चिल्लाया जालिम राजाओं का अमित शाह यही हाल होता है । ये फॅसने सीजर के सीने में खंजर मारते हुए कहा था और वो पर्दे के पीछे गायब हो गया । सर्दी के पीछे एक अभिनेत्री से टकराया और फिर भागता हुआ आगे बढ गया । नाटक में काम करने वाले एक और आदमी को उसने दो बार छूट हमारा और थियेटर की बाहर बात निकला । बाहर भागते हुई वो एक घोडी के साथ खडे आदमी को देखकर ठिठका । फिर एक बार पूर्वार् के साथ उसे गिराकर घोडी पर बैठ और सर पर बात हुई । अंधेरे में गायब हो गया । बात तो हो गया लेकिन वो पहचान लिया गया था । उस छब्बीस ही हत्यारे का नाम जॉन बिजली मजबूत होता । वो नाटक में काम करता था । लेकिन सिर्फ इस हत्या के कारण इतिहास में उसका नाम आ गया । जी कोई पागलपन का काम नहीं था । गांधी जी के हत्यारे नाथूराम गोडसे की तरह जानबूझकर भी पागल नहीं था । दोनों में उमर के अंतर होने के बावजूद एकसमानता थे । दोनों हुई के खयाल देश की भलाई के लिए उन महान नेताओं को मरना जरूरी था । दोनों ही ने आवेश में नहीं बल्कि खूब सोच समझकर और योजना बनाकर हत्या की थी । दोनों ने ही किसी व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए खुद नहीं किया । दोनों की इस काम को ठीक समझते थे और उसे बडा कम समझ कर अपनी जिंदगी बलिदान करने को तैयार हैं । लेकिन वो दोनों ही गलत रास्ते बात है । इसलिए इतिहास ने उन्हें हत्यारा ठहराया । हालांकि गोडसे ने अपना काम पूरा करके अपने आप को पुलिस के हाथों सौंप दिया था । मगर बूथ ने कैद से बचने की हर कोशिश की । दोनों एक जैसे घर काम करके दो महान व्यक्तियों को मिटाने की कोशिश की लेकिन मौत ने उनके नाम में चाचा लगा दिए हैं । लिंकन और गांधी की हत्या में कुछ और समानता है । दोनों की हत्या शुक्रवार को हुई और दोनों को आम जनता की इस जीत मिली हुई थी । दोनों ही ने पहले वकालत का काम शुरू किया था । हालांकि बाद में लिंकन में राजनीति में चलेंगे और गांधी जी महात्मा बंद है । बिहू राष्ट्रपति को तुरंत थिएटर से हटाकर पास के एक मकान में ले जाकर एक पलंग पर लिटा दिया गया । देखते ही देखती ये सनसनीखेज खबर शहर भर में फैल गए और रात भर और तरफ से हजारों की फिल्में लोग थिएटर के पास वाले मकान की ओर आते रहे हैं । लेकिन जिससे कमरे में राष्ट्रपति लेते हुए थे वहाँ सन्नाटा था । वो दर्द से भी खबर पडे थे । गोली पीछे की तरफ से उनके सिर को चीरती हुई रहनी आंख के पीछे अटक गई थी । इधर तो राष्ट्रपति मौत की गोद में पडे हुए थे और दूसरी ओर एक और दुखपूर्ण घटना हो रहे थे गुड फ्राइडे की ओ शाम को राज्य मंत्री विलियम से वर्ल्ड जी ने कुछ दिन पहले एक दुर्घटना में काफी चोट आई थी । आपने पलंग पर पडे उम्र हैं, उनके बदन पर जगह जगह पट्टियां बंधी थी । दस बजे की कुछ बात चुस्त कपडे पहने एक लंबा आदमी उनके घर पहुंचा और बिना पूछे तक अच्छे मंत्री की कंपनी की ओर जाने वाले सीढियों पर छोडने तथा नौकरी की आवाज सुनकर मंत्री के लडके फेडरिक सेवन ने आज कर रहे उस आदमी को रोकने की कोशिश । उस आदमी ने फौरन एक वालों निकाला और फिर ट्वीट की सिर के सामने लाकर गोली चला रहें फ्रैडरिक वहीं गया । वो दरवाजा खोलकर पलंग पर पडे मिलियम स्टेवर्ट पर टूट पडा । अपनी चाकू से उसने उनके चेहरे को बुरी तरह का डाला । पहले से जो ताये मंत्री ने बचने की हर कोशिश की लेकिन वो उठे बालों से पकडकर भरपूर हुआ करता रहा । सिर्फ लडका दूसरा लडका अगस्त और नौ काॅटन मदद के लिए दौडे हैं । वो पागलों की तरह चीखता हुआ उन पर झपटा । अगस्त स्टोर टकराकर दरी पर लुढक गया और रॉबिन्सन जख्मी होकर नीचे वाका उसके सीने और कंधे से खून बह रहा था हत्या कमरे से निकल कर चिल्लाता हुआ निश्चित हो रहा । मैं पागल हूँ मैं पागल हो एक और नौकर उसे रास्ते में मिला । उसके सीने में उसने चुरा बहुत दिया और सडक पर बात किया । वो नौकर वहाँ से बीते ही मर गया । कुछ ही मिनटों में वो शांत और आराम देख कमला लडाई का मैदान नजर आने लगा । चारों और खून फैला था । फर्नीचर उल्टा बिखरा पडा था । बदन के पास पडा सिम कार्ड करार आता था । अगस्टस उठने की कोशिश कर रहा था । रॉबिन्सन दर्द से चीख रहा था । सीढियों पर फेडरिक बेहोश पडा था और नीचे नौकर के लाख से खून बह रहा था । सारी रात राष्ट्रपति मौत से लडते रहे । अगले दिन सुबह सात बजकर बाईस मिनट पर मौत जीत किसी ने जो थी । गले से एक आपकी आवाज में कहा अब वो नहीं रहे हैं । इससे छोटी सी बात से बाहर खडी भीड में एक उदासी पहले झुकी गर्दनों और बस्ती आंखों से लोगों ने इन्हें अमेरिका के निर्माता को अपनी श्रद्धांजलि थी । अनाथ जनता की भीड उनका ताबूत लेकर बारह दिनों में लंबा सफर तय कर उनके पुराने घर फॅारेन की पहाडी पर पहुंचे जहां उन्हें दफनाया गया । वो हत्या बूत कौन था? क्या वो अकेले ही इससे हत्या के लिए जिम्मेदार था? उसने ये गलत काम क्यों किया? क्या लिंकन की हत्या और राज्यमंत्री पर होने वाले हमले में कोई संबंध था? क्या उनकी महान राष्ट्रपति की हत्या ठीक अमीर की जनता इन सवालों में उलझी हुई थी? और आज भी कई सवाल सवाल ही बने हैं । घोडे पे सवार होकर हत्यारे की भर्ती ही उसकी जोरदार खोलता हूँ । सेना, पुलिस, जासूस आदि सभी ने इस रहस्य का पता लगाने में जमीन आज मना कर दिया । हर सुराग का पता लगाने की कोशिश की गई । राजधानी से बाहर जाने वाले सभी रास्ते बंद कर दिए गए और बूट के भागने की चार घंटे के भीतर ही एक सुराग मिल गया । पूछताछ से पता चला कि उन दिनों बूथ डिपॅाजिट के साथ बहुत रहता था और लोग फाइव फोर वन ऍम स्ट्रीट पर अक्सर मिलते हैं । उस रात सुबह से काफी पहले ब्लॅक पर छापेमारी और तलाशी नहीं मगर जिन पर शक था बी लोगों के नहीं मिलेगा । जॉन की माँ श्रीमती सूरत से काफी सवाल जवाब कर के भी लोग लौट हैं । सत्रह अप्रैल की रात को वे लोग वहाँ रहने वाले सब लोगों को कैद करने का हुक्म लेकर लौट हैं । कुछ देर बाद एक लंबा तगडा आदमी सूरत के घर के दरवाजे पर पहुंचा । पुलिस ने उसे घेर लिया और पूछे को कौन है? उसने कहा श्रीमती सूरत ने आज सुबह मुझे नानी खोदने के लिए बुलाया था । तभी श्रीमती फिर भी वहाँ गयी । उनसे पूछने पर उन्होंने कसम खाकर कहा कि वो उस आदमी को जानती ही नहीं । ये सुनते ही वो घबरा गया । लेकिन चारों ओर तनी हुई दर्जनों दोनों को देखकर वो समझ गया कि भागना नामुमकिन है । उसकी तलाशी ली और उसकी जीत से मिले कम बच्चों से पता चला कि उसका नाम ऍम श्रीमती सूट और ऍम को थाने पहुंचाया गया जहां लोगों ने फॉर्म पहचान लिया की नहीं, सिमेंट के यहाँ हमला करने वाला है । दूध के बाद एक और अग्नि पकडा गया । उसका नाम था जॉर्ज आॅर्ट । हत्या करने के बाद वो एक खेत में छुपा था । शराब के नशे में जो बातें उसने कहा उनसे हत्या का रहस्य खुलने लगा है । बिना किसी कठिनाई के उसे खेत पर ही बिगड दिया गया । इधर श्रीमती ॅ और रोटी नौसेना सुरक्षा के जहाज सौ दस पर कहते थे और उधर हत्यारों की खोज के लिए हर संभव कदम उठाया जा रहा था । सेक्टर लोगों को कैद कर लिया गया । बहुत के रिश्तेदार को पकड लिया गया । यहाँ तक की दूर की रिश्तेदार भी नहीं छोडे हैं और उन्हें पूछताछ के लिए अनजानी जगहों पर भेज दिया गया । ये भी बता देना चाहिए कि बूथ का एक भाई चौदह अप्रैल से अमेरिका में नहीं था । सरकार ने बूथ को पकडने के लिए एक लाख डॉलर और डेवलॅप के लिए पच्चीस हजार डॉलर इनाम रखा और दो दिन के भीतर उनको ढूंढने वालों की संख्या दस हजार हो गए । गवाहियों से पता चला की हत्या के दिन दस से पैंतालीस के करीब बूत घोडे पर सवार होकर नेवी यार्ड पुलिस बार कर गया । कुछ छोड के बाद फिर आज भी उसी के पीछे गया जी तो ताजुब की बात है कि सब राष्ट्रीय रोकने के हो और पुल पर सेना के पहले के बावजूद वो दोनों उधर से बचकर निकलते हैं । उनसे समय जो सर्जेंट वहाँ पहले पर था उसने उन्हें इसलिए निकल जाने दिया क्योंकि तब तक उसे राष्ट्रपति की हत्या के बारे में पता नहीं चला था । ये बात उसने बाद में बताएं । नदी के बाद दोनों घुडसवार मिले और साथ साथ दक्षिण की ओर बढते हैं । लेकिन बूथ को चोट लग चुकी थी बॉक्स कुत्ते इस मैं पैर नहीं जाने की वजह से मूल स्टेज पर जाकर था और उसके भाई पैर के पंजे की हड्डी टूट गए थे । उस समय तो भागने की जल्दी और घबराहट में ध्यान नहीं दिया लेकिन नदी पार सुरक्षित जगह पहुंच जाने पर उसको बहुत तकलीफ होने लगे । हर झटके के साथ उसका दर्द बढता था । वाशिंगटन से दस बिंदु एक तस्वीर में एक बोतल शराब और कुछ हथियार खरीदने के बाद वो स्पोर्ट टोबैको किए बढेगा । लेकिन बूथ का दर्द बर्दाश्त के बाहर हो रहा था । तभी उसे ब्रेन टाउन के डॉक्टर सॅान्ग क्या जाएँ वो बेंट उनकी और मुझे ऍम की बात बडी करामा दिखाएँ । अगर उसे पैर की वजह से मजबूर होकर डॉक्टर मटकी यहाँ न जाना पडता तो शायद उसे मोहन भुगतना पडता जो बाद में हुआ । शनिवार की सुबह से कुछ पहले वो दोनों डॉक्टर लडकी यहाँ पहुंचे । मीटर डॉक्टर ने पैर की जांच की जो तक काटकर निकाल दिया और पहले की मलहम पट्टी करती । दोपहर होती होते डॉक्टर मड ने उसके चलने के लिए वैसा क्यों का इंतजाम कर दिया और वे दोनों घोडे पर सवार होकर भाग निकले । बूत को दर्द की वजह से आगे बढने में बडी कठिनाई महसूस हो रही थी । वो पैदल चल नहीं सकता था और घोडे पर सवार होने में भी झटके की करण उसके पैर में दर्द होने लगता था । आधी रात के करीब दोनो कर्नल बॉक्स के मकान पर पहुंचे और वहाँ शरण नहीं अपने घर से दूर मीन दूर एक दलदल वाले हिस्से में कर्नल ने उन्होंने कुछ पाया । ऍम विद्रोहियों की दल कॉनफेडरेशन का सदस्य था । दूसरी ओर खोज करने वाले भी मुश्किल नहीं बैठे थे । सोमवार होते होते हैं । वो उसे ठिकाने तक पहुंच गए जहां से फरार लोगों ने शराब और हथियार के लिए थे । वहाँ से ढूंढते ढूंढते हुए डॉक्टर मडके अभी जाते हैं । बहुत पूछताछ करने के बाद आखिरकार डॉक्टर मरीज आप को बताना पडा कि उसने बूट के पैर का इलाज किया था और उसे आगे भेजने में सहायता की थी । डॉक्टर मत को गिरफ्तार कर लिया गया । डाॅ तक पहुंचने में कठिनाई नहीं हुई थी । गद्दार कर्नल ने सरकारी अधिकारियों को उस दलदल का रास्ता बताकर अपनी जान बचाएं लेकिन उन लोगों की पहुंचने की कुछ देर पहले दोनों अपराधी वहाँ से माफ कर वर्जीनिया पहुंच चुके थे । ये घटना शनिवार की रात यानी हत्या की आठ दिन बात की है । वर्जिनिया में उन्होंने कर्नल के आदमियों की सहायता से चोरी छिपे स्पोर्ट रॉयल के निकट डाॅट की खेत पर जा पहुंचे । उनकी एक और साथ ही कैप्टन मिली चैट में उन्हें घायल सिपाही बताकर वहाँ ठहरा दिया । बुधवार की सुबह तक वो दोनों वही चीज रहे हैं । मंगलवार पच्चीस अप्रैल तक सरकारी जासूस ऊॅट और वैसा क्या जुटाने वाले आदमी की तलाश में है और एक जन सा फैला दिया था । गेट इस बात से घबरा गया और उसने बूट को तुरंत वहाँ से हटाने का निश्चय किया । लेकिन दोनों ने वहां से हटने से इंकार कर दिया क्योंकि वो जानते थे कि बार खतरा है । किसी तरह समझाने बुझाने पर भी तबाकू के खलियान में जाने को तैयार हुए हैं क्योंकि उन्हें विश्वास दिलाया गया था कि वहाँ छूट नहीं ना है की अच्छी जगह है । उससे तम्बाकू के खलियान में वो दोनों आखिरी वक्त तक रहें । बुधवार की रात को अधिकारियों ने काॅस्ट को घेर लिया और गोली मारते हैं । मरते समय से भूत का पता बताने का खुद दिया गया । जेट मर गया पर उसने बूट कर पता नहीं बताया । कुछ ही देर बाद अधिकारियों ने गेट के घर को घेर लिया । तुरंत दरवाजा खुलवाकर वहाँ के सब लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया । बूट कहाँ है उनसे सवाल किया गया फॅसने बताने में आनाकानी की तो उन्होंने कहा हम तो फिर नहीं फांसी पर लटका देंगे । मैं उसे घसीटकर एक पीडित के पास ले गए और गली में रस्सी बांध कर पेड से लटका लेने के तरीके रेट के लडकी ने उन्हें रोकते हुए धमाकों के खाद्यान पर पहुंचा दिया । खलियान खेल लिया गया लेफ्टिनेंट टी ने जो उस समय सबसे बडा अधिकारी था, दोनों को बात कर रहे हैं आत्म समर्पण करने का उपलब्धियां लेकिन इसका कुछ असर नहीं हुआ । किसी ने सलाह देखी खलियान में आग लगा दी जाएगी । सब लोगों को ये सलाह ठीक लगी और सिर्फ फाइल कालियान के पास लकडी और घर स्पोर्ट्स जमा करने लगे हैं । आग लगने की पहले ही पार्टी ने पुकारकर कहा की हम तुम्हें पांच मिनट का समय देते हैं । ये तुम दोनों के लिए आत्मसमर्पण का आखिरी मौका है । पांच मिनट भी बीत के अगर कुछ नहीं हुआ, समय खत्म हो गया । डोहर्टी ने जोर से कहा अचानक उन्हें की तेज और घबराई आवाज संगती बूथ कह रहा था मुझे थोडा मौका और दे दो कैप्टन मैं एक आप ही लग रहा आदमी हो अपने सिपाहियों को यहाँ से सौ गज पीछे आता लोग तो मैं बाहर आ जाऊंगा । मैं सिर्फ एक मौका और चाहता हूँ । उसके बाद एक आवाज और आई । मुझे जाने तो मैं आत्मसमर्पण करना चाहता हूँ । दरवाजा धीरे धीरे खुला और डेवलॅप ऊपर उठाए बाहर आया । सिपाहियों ने खुशी में दौड कर पच्चीस हजार डॉलर इनाम वाले अपराधी को पकडा और एक कित पेड से बांध दिया । गलियाँ अकेला बूथ रह गया और पागल की तरह चिल्ला चिल्लाकर सिपाहियों को एक एक कर लडने की चुनौती देने लगा । सिपाहियों ने खलियान में आग लगा दी और हवा से आज जल्दी जी भडक उठी और देखते ही देखते वहां ऊंची कोचीन लपटे उठने लगे । कनियान का भीतरी हिस्सा दिखाई देने लगा और वहाँ बैसाखियों के सहारे इधर उधर भागता बूत भी दिखाई दिया । आदमी पूरी तरह दिन जाने पर वो चीखने लगा । तभी उसको एक गोली लगी और वह जमीन पर गिरकर टर आपने लगा । बेहोशी की हालत में उसे खलियान से घसीटकर बाहर निकाला गया । होश आने के बाद जो शब्द उसने कहे वो कोई नहीं बोल सकता हूँ । वहाँ से कह देना मैंने देश के लिए अपनी कुर्बानी नहीं है । फिर वो बेहोश हो गया । दूसरे दिन सुबह होने से पहले वो मर गया । एक लाख डॉलर इनाम वाले उस अपराधिक इलाज को एक तत्व में मान कर एक पुरानी गाडी पर वाशिंगटन तक पहुंचाया गया । उसी पर रहे रॉड को भी बनाया गया । फिर थोडी सी जांच पडताल के बाद उसकी नाशकों वाॅर्नर में एक खाली जगह बंद कर दिया गया है । इस तरह आमिर के इतिहास के एक दुष्ट हत्या की मौत हुई है । उसके पीछे लोगों की तरह तरह की बातें, बरसों बात । कई लोगों के मन में यह संदेह हुआ कि क्या लाश वकील मूर्त की ही थी । बहुत खोजबीन के बाद उन संदेह के पक्का होने के बारे में भी कुछ सबूत मिले हैं । पहले तो ये कि जब आप खुद में दिया गया था कि बूट को जहाँ तक हो उसके जिंदा पकडकर लाया जाए तो उस पर गोली क्यों चलाई गई? ये भी कभी पता नहीं चला कि उस पर गोली किसने चलाई थी? क्या किसी खास वजह से गोली मारकर उसकी जुबान बंद कर दी गई थी? क्या किसी ने पैसा देखकर उससे हत्या करवाई थी? इन चौकानेवाले सवालों के जवाब में लोगों ने कहा उसमें खुद अपने आप को गोली मार लेते हैं । दूसरी बात ये कि उसे पकडने वालों में से कोई भी पूत को पहले से नहीं जानता था । उसकी मरते समय की अंजली शक्ल थियेटर वालों के पास से मिलने वाले स्टील ट्रैक्टर भूत की फोटो से बिल्कुल ही अलग नहीं । लाश की पहचान करने के लिए बूथ के किसी रिश्तेदार या उससे जानने वाले को क्यों नहीं बुलाया गया? दलीलों की कमी नहीं थी । हत्या देखके पत्नी जाने की खबर सुनते ही हजारों लोग सत्ताइस अप्रैल को दफनाने वाली जगह पर जमा हो गए हैं । तीसरे की उसकी जेब से पांच और की तस्वीरों के अलावा कोई और कागज नहीं मिला जिससे यह साबित होता की वो जॉन बिल की चीज बोल रही है । कई बडे अधिकारी भी इस बात पर संदेह करते हैं कि जिस आदमी को उस समय मारकर दफनाया गया था वो शायद कोई उनसे मिला हुआ सिपाही था । उनका ख्याल है कि असली बूट को सच्चाई छिपाने में दिलचस्पी रखने वाले कुछ बडे लोगों ने यूरोप की ओर लगा दिया था । तथ्यों के समय राष्ट्रपति के बॉक्स पर किसी पहरेदार करना होना भी ये साबित करता है की मूर्ति किसी बहुत प्रभावशाली व्यक्ति के कहने से करने गया था । बूट के रिश्तेदारों को उसकी लाश दे दी गई थी और उन लोगों ने बोल टीमोर कब्रगाह में उसे दफना दिया । इस पर भी लोगों का संदेह नहीं गया । क्या? सच पूछा जाए तो सौ बरस बीत जाने पर भी ये संदेह आज जो करता हूँ, बना हुआ है । उससे हत्यारे की बाकी आठ साथियों को मई में एक सैनिक अदालत के सामने पेश किया गया । कहा गया की हत्या के षड्यंत्र में बूथ का सबसे बडा हाथ था । बागियों के साथ मिला होने और बार बार उनकी हार होने की वजह से वो बहुत तैश में आ गया था । कहाँ गया कि लिंकन कुमार के वो विद्रोहियों को बढावा देना चाहता था । लाॅट और मेरी फॅमिली के उसकी खासा थे । सीधी साधी दिखने वाले ये सभी विद्रोही श्रीमती स्टूडेंट के अड्डे पर फरवरी अठारह सौ पैंसठ से ही मिला करते थे । पहले उनका इरादा और भी अजीत में राष्ट्रपति को उडा ले जाना चाहते थे । उन लोगों ने उन्हें फूट थिएटर से उडा ले जाने की स्कीम भी बनाई थी । सब बातें ठीक हो चुकी थी लेकिन इस बार अचानक राष्ट्रपति की पूरा बदन देने की वजह से कुछ नहीं हो सका । उसी कोशिश उन्होंने मार्च में की है । सिपाहियों को देखने के लिए अस्पताल जाते समय राष्ट्रपति पर विद्रोहियों ने छिपकर हमला करने की योजना बनाई थी । उन विद्रोहियों ने रास्ते में छिपकर राष्ट्रपति की गाडी का इंतजार करना शुरू कर दिया । लेकिन जैसा बाद में पता चला अचानक मोल छह से कुछ सिपाहियों के आ जाने की वजह से वो अस्पताल नहीं जा सके । उनकी तीसरी कोशिश भी बिक आ गयी क्योंकि उस बार भी राष्ट्रपति का किसी जरूरी काम की वजह से पूरा नाम बदल गया था । हर बार असफल हो जाने से फिर जानकारी परेशान होते हैं । बूथ और भी परेशान था । ठंडे दिमाग से सोच विचार कर वो इस नतीजे पर पहुंचा के राष्ट्रपति को उठा ले जाने की कोशिश बेकार है । उठा ले जाने के लिए गया । उन्हें मार डाला ही ज्यादा ठीक रहेगा । इस तरह उसने राष्ट्रपति को मार डालने का इरादा क्या? अचानक उसे पता चला कि चौदह अप्रैल की रात को राष्ट्रपति थिएटर जाने वाले हैं । उसने उसी समय हमला करने का निश्चय किया । षड्यंत्रकारी अध्यन सुबह ही सिगरेट के आमिर हैं । मीटिंग के पहले मुझे चुपके से फोर्ड थियेटर में घुसकर राष्ट्रपति के बॉक्स की जांच कराया । एक छोटे से चाकू से उसने दरवाजे में दरार बनाई और फिर उस जगह को साफ कर लौट गया । फिर एक डबल में जाकर शाम के लिए एक मजबूत गोरी किराये पर ते की और उसके बाद मीटिंग में पहुंच गया । गुड फ्राइडे की सुबह विद्रोहियों की यहाँ खास मीटिंग थे । हत्या की पूरी योजना अच्छी तरह तैयार कर ली गई थी और ये भी निश्चित हुआ था कि बूथ हत्या करेगा । साथ ही जो रोड के जिम्मे उपराष्ट्रपति जॉनसन को मारने का काम सौंपा गया और राज्य मंत्री से वर्ड को मारने के लिए और ऍम को तैनात किया गया । उन्होंने सोचा कि साढे दस बजे रात तक फिर फाइनल सरकार के सभी बडे बडे लोग मर जाएंगे और सरकार अपने आप खत्म हो जाएंगे । जब बूथ थिएटर में पहुंचा डबलिंग बॉक्स ऑफिस में पहुंच चुके थे और खेल चल रहा था । कुछ लोगों ने उसे वहाँ जाते देखा भी लेकिन बना उसे जाने माने अभिनेता पर कौन शक करता । सवेरे गलियारे में बढता हुआ वो चुपचाप राष्ट्रपति के बॉक्स तक पहुंच गया । ये बिल्कुल इत्तफाक की बात थी कि उसमें वहाँ पहरेदार भी नहीं था । इसके बारे में से कोई कठिनाई नहीं हुई । दरार से झांककर उसने देखा कि राष्ट्रपति निश्चिंत होकर नाटक देख रहे हैं । उस ने पिस्तौल निकाली और दरवाजा खोलकर भीतर घुस गया और देखती थी उससे समझ लें बर्बादी की शक्ति लेनी है । जॉर्ज रोट उपराष्ट्रपति को मारने का इरादा छोड कर हत्या की फौरन बाद पुराना हो गया । तीस जून को सभी मुजरिमों पर जुर्म साबित हुआ । डॉक्टर मर्ड, ऑरनॉल्ट और गुलाल इन को उम्रकैद की सजा मिले । बेंगलोर को छह बरस की सजा दी गई । बाकी चारों को फांसी देने का फैसला हुआ । सात जुलाई अठारह सौ पचासी ॅ और श्रीमती मेरी सूरत को फांसी दे दी गई । जॉॅब आ गया था । उस पर मुकदमा नहीं चल सका । कुछ दिन बाद वो इंग्लैंड में देखा गया । दिसंबर अठारह सौ छियासी मिस्र में वो पकडा गया और अमेरिका लाकर उस पर मुकदमा चलाया गया । पहली बार उसके मुकदमे में कुछ कानूनी गडबडी आ जाने की वजह से उस पर दोबारा मुकदमा चला । इस बीच कैद का वक्त पूरा हो जाने की वजह से उसे दिया कर दिया गया । षड्यंत्रकारियों में सिर्फ जॉन ही बदनसीबी की जिंदगी बिताने के लिए जिंदा बचा । अब्राहम लिंकन जैसे महापुरुष को मारे आज सौ साल हो गए । हमें याद करके ही उस महान मानवतावादी को श्रद्धांजलि दी जा सकती है । उनकी विचारधारा में सामान तक का महत्व बहुत अधिक था । उन्होंने एक बार कहा था मैं गुलाम बनना नहीं पसंद करता, इसलिए किसी को गुलाम बनाना भी नहीं पसंद था । मिल जाए में प्रजातंत्र का ये उसूल है जहाँ ये नहीं है वहाँ प्रजातंत्र नहीं हो सकता है । वो समानता के लीजिए और समानता के लिए ही बडे । आज अमेरिका जिस रास्ते पर चल रहा है वह लिंकन ने ही दिखाया था । दुनिया के इतिहास में अब्राहम लिंकन का नाम अकारण ही अमर नहीं हो गया हूँ ।

दत्तू का क्या हुआ

नौ अक्टूबर को नागपुर के एक पुलिस स्टेशन में फिर एंड मालवीय नामक एक व्यक्ति नहीं । रिपोर्ट लिख हुआ कि उसके घर के एक भाग में रहने वाले दत्तू पटेल आठ अक्टूबर से गायब है । वो उस दिन दोपहर को तीन बजे के करीब साइकिल पर घर से रवाना हुआ था । बस उसके बाद वह नहीं लौटा था । इधर उधर काफी खोज के बाद मालवीय रिपोर्ट लिखवाने आया था । दत्तू पटेल मध्य प्रदेश के वर्ष जिले के तरो दा ग्राम का रहने वाला था । नागपुर में नौकरी करता था और अपने परिवार ऍफ में रहता था । पुलिस ने इधर उधर पूछताछ की लेकिन कुछ बताना चाह रहा हूँ । तरूणता ने भी कोई खबर नहीं । जब दस अक्टूबर भी पटेलिया उसकी साइकिल के बारे में कोई सूचना नहीं मिली तो पुलिस इंस्पेक्टर ने मामले की गंभीरता समझी । अब उसे संदेह हुआ कि कुछ गडबड जरूर है । धतु के घर पूछताछ करने पर पता चला की लडाई झगडे जैसे कोई बात नहीं हुई थी । तो सभी के साथ दत्तू के संबंध बहुत अच्छा था । इसलिए संभावना तो गलत ही थी कि वो इंस्पेक्शन से घर छोडकर चला गया है । इससे समस्या के समाधान में जो सबसे पहला प्रश्न आता था वो ये था कि आखिर पटेल के अनिष्ट से किसी लाभ हो सकता है । पुलिस इंस्पेक्टर को इसका उत्तर नहीं मिला । शहद दत्तू की कमरे की खोज से कोई सूत्र हाथ लगता है । यह सोचकर इंस्पेक्टर उसके घर पहुंच गया और आर मालवीय से तू पटेल का कमरा दिखाने को कहा । उसने सावधानी से कमरे का निरीक्षण करना शुरू किया । संदूकों को उलट कर उनमें रखी हर चीज की जांच की गई । कोने में रखी मेज के दोनों दराज देखेंगे । अब इंस्पेक्टर ने मेज पर रखे कागजों को जांचना शुरू किया । थोडी देर बाद वो हाथ में एक कागज लिए कुर्सी पर बैठ गया । उस कागज पर जो कुछ लिखा था वो इस समस्या का पहला सूत्र था । लिखा था दत्तू पटेल को नमस्ते ऍम मिलो आने से पहले सूचना दे देना । उस पर आज ही लिन्से के हस्ताक्षर थे और तारीख पडी थी । आठ अक्टूबर उन्नीस सौ ऍम बाहर आया और मालवीय से पूछने लगा की वह अर्जी लिन्से के बारे में क्या जानता है और पटेल से उसकी क्या संबंध है उससे जिनसे का पता पूछकर बोल इनसे के घर की ओर चल दिया । वहाँ जाकर इधर उधर कुछ पूछताछ की जिससे काफी अजीब बातें पहुँचने रामकृष्ण जीलिन सेना बुराई कोर्ट में एडुकेट था । आपने तीन महीने मकान में रहता था । दूसरी मंजिल पर उसका दफ्तर था जहाँ पर आपने वो किलो से मिलता था । तीसरी मंजिल पर बैठक थी जहाँ पर उसके दोस्त होते रहते थे । डाॅ । उसका दोस्त था और अक्सर उससे मिलने आया करता था । वो उससे अपनी पारिवारिक के समस्याओं पर भी राय लिया करता था । लिन्से की घर को शराबी और गज एडियों का अड्डा बताया गया । ये भी पता चला कि दत्तू और लिन्से के कुछ अन्य मित्र वहां बैठ कर गांजा और शराब क्या करते हैं । इस घटना से कुछ महीने पहले तो और लिन्से के संबंध बिगड गए थे और तुम से दूर दूर रहने लगा था । उसने लिन्से के खिलाफ प्रचार भी शुरू कर दिया था । उसी ने वीरेंद्र मालवीय व अन्य लोगों को बताया था कि लिन्से नए धोखाधडी करके उसके हजारों रुपये लिए हैं । वो चोरों के गिरोह से संबंधित है । चोरी के माल में उसका भी हिस्सा होता है । जिनसे भी इच्छुक नहीं रहा था उसने दत्तू पटेल पर आरोप लगाया कि वो उसके विरूद्ध झूठी बाते कहकर उसकी मानहानि कर रहा है । वो दत्तू को धमकी देने से भी नहीं चूका है कि अगर उसने अपना प्रचार बंद नहीं किया तो दत्त को जिंदा नहीं छोडेगा । इन घटनाओं की सूचना इंस्पेक्टर के लिए काफी थे । लिन्से से पूछताछ करने के लिए चल पडा लेकिन तभी कुछ सोच कर दे गया । उसने सोचा कि इस तरह एकदम जाना ठीक नहीं । पहले उससे पत्र के बारे में कुछ और पता चलना चाहिए । वो सोच रहा था कि जब लिन्से और दत्तू के संबंध इतने अधिक बिगडे हुए थे । तुम ऍम को खत लिखकर अपने घर क्यों बुलाया? क्या दत्तू ने कोई जवाब दिया था कि उसने लिन्से से भेंट का समय निश्चित कर लिया था? क्या वह आठ अक्टूबर को उससे मिला था? इन बातों का जवाब थोडे बिना लिन्से से मिलना उसे एकदम बेकार लगता है । वो अच्छी तरह समझ गया था कि अगर तत्त्व के अध्यक्ष होने में लिन्से का हाथ है तो फिर एक्टर बडे ही धूर्त आदमी से है । कुछ घंटों बाद इंस्पेक्टर सादे कपडों मिल इनसे के घर के आस पास चहलकदमी कर रहा था । कुछ देर यही टहलने के बाद उसे एक महत्वपूर्ण बात पता चले कि आठ अक्टूबर की शाम को लगभग पांच बजे दत्तू पटेल साइकिल पर लिन्से की घर आया था । उसके बाद किसी ने उसे घर से निकलते हुए नहीं देखा । उसी दिन रात में आठ बजे के करीब लिन्से के मकान की तीसरी मंजिल से छोटी भी चीज की तीज आवाज भी सुनाई पडी थी । पडोसियों ने जाकर पूछताछ की थी तो लिन्से की माँ ने ये कहकर लौटा दिया कि वह कोई खास बात नहीं है । इस जानकारी ऍम उसे ऐसी आशा नहीं । पांच बजे हमसे के मकान में घुसने के बाद दत्तू का क्या हुआ? पडोसियों को जो होती हूँ कि सुनाई दी थी वो आखिर किसकी थी । वो अच्छी तरह समझ रहा था की इन बातों का जवाब उसी मकान में रहने वाला कोई आदमी दे सकता है । दत्तू के अपहरण के पीछे लिन्से का हाथ होने की बात कुछ कुछ सही लगती थी क्योंकि उद्देश्य भी स्पष्ट था और अवसर भी मिला था लेकिन केवल किसी से कम नहीं होता था । अपराध का ऐसा निश्चित प्रमाण मिलना अनिवार्य होता है जो उद्देश्य और अवसर के साथ संबंध होकर अपराधी को पकडो आ सकें । इसी घटना के उद्देश्य और सर तो थे लेकिन अपराध का निश्चित प्रमाण कायरता और वो तो लिन्से के मकान में रहने वाला कोई व्यक्ति ही बता सकता था । लेकिन इंस्पेक्टर यही सोच रहा था लिन्से के परिवार के सदस्यों को तो उस सूची में रखना भी देखा था । हाँ, अगर ऍफ का कोई नौकर हो तो इस खोज के परिणाम अच्छा लिखें । ग्यारह अक्टूबर को एक पुलिस अफसर गनपत नामक एक पंद्रह वर्षीय लडकी को इंस्पेक्टर के सामने गया । वो लिन्से की घर में नहीं था । डर के मारे गनपत का बुरा हाल था । अनुभवी इंस्पेक्टर ने उसका चेहरा देखते हैं । आप लिया कि वह अवश्य कोई रहस्य जानता है । थोडी ही कोशिश के बाद इंस्पेक्टर को वो सब पता चल गया जो पत्र जाता था । आठ अक्टूबर की शाम को पांच बजे जब तू पटेल इनसे के घर आया तो लिन्से कृष्णा पत्नी का भतीजा और शालीग्राम मौके के साथ दूसरी मंजिल पर बने चेम्बर में बैठा था । दत्तू की आती है । उसे लेकर वो तीसरी मंजिल पर बनी बैठक में चला गया और उसके बाद तो कभी बात नहीं आया । शाम को आठ बजे के करीब जब गनपत रसोई में काम कर रहा था तो उसे ऊपर से किसी की चीज सुनाई थी । अरे बाब मैं हमारा वो उत्सुक होकर ऊपर भागा लेकिन दूसरी मंजिल पर लिन्से के चेंबर में कोई न मिला । इसके बाद वो तीसरी मंजिल पर मनी बैठक की तरफ दौडा । बैठक का दरवाजा बंद था । उसने खोलने की कोशिश की लेकिन अंदर से कुंडा बंद था । दरवाजे की दरार में से देखा कि दत्तू जमीन पर पडा था । शालीग्राम ने उसके पैर कर रखे थे और कृष्णा होने बाल थाम रखे थे । जिनसे हाथ में तलवार लिए उस पर झुका था । गनपत डरकर फोर नीचे आ गया । पुलिस ने लेने की घर की तलाशी भी ली तो पता चला की वो नागपुर में नहीं है । दो मंदिरों में से तो कोई आपत्तिजनक चीज नहीं मिली लेकिन तीसरी मंजिल पर एक कमरे से निकलती अजीब दुर्गंध से इंस्पेक्टर को कुछ शक हुआ हूँ । इंस्पेक्टर ने कमरे की तलाशी नहीं तो पता चला की दुर्गंध कमरे में बने एक चबूतरे से आ रही है । वो ईंट और सीमेंट से बना हुआ था और अभी अभी बनाया हुआ लगता था । जब उतरा तोडा गया तो उसमें एक गाना हुआ अश्विनी निकला जो दुकान था इसके खिलाफ उसके संबंधियों करते लिन्से का कहीं पता ना चला । हाँ चौदह अक्टूबर को कृष्णा को गिरफ्तार कर लिया गया । वो पुलिस को एक तथ्य गया जिसमें क्योंकि साइकिल के कुछ उससे बरामद कर लिए है । उसी दिन शालीग्राम को भी गिरफ्तार कर लिया गया और उससे भी दत्तू की साइकिल के दूसरे हिस्से सोलह अक्टूबर को बनाना इसमें लिन्से ने पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया । उसे कडी पहले में ना बुलाया गया । मामले की जांच पडताल पूरी करने के बाद लिन्से कृष्णा और सारे ग्राम को नागपुर के सेशन जज की अदालत में पेश किया गया । उन पर आरोप लगाया गया था तो उन लोगों ने आठ अक्टूबर उन्नीस सौ उनचास या उसके आसपास किसी तारीख को नागपुर में जानबूझ्झकर । तू पटेल की हत्या कॅाम से अपराधी नंबर वन ने अपनी सफाई में कहा कि मैं घर पर नहीं था । मैं नहीं आता कि दत्तू पटेल किस तरह मारा था और उस टाइम मैं तो मेरे घर में किस तरह दफना दिया गया । ये मामला आकस्मिक मृत्यु का लगता है । मेरी अनुपस् थित में किसी अन्य मित्र ने उसका मैं तो मेरे घर में दफना दिया । कृष्णा अपराधी नाम बन्दों ने भी लिन्से की फिल्मी का समर्थन किया । उस ने ये भी कहा कि तब तो चार अन्य व्यक्तियों के साठ दिन से की अव्यवस्थित में उसके मकान पर आया था । वहाँ दत्तू ने गांजा और शराब का सेवन किया तभी अकस्मात उसकी मृत्यु हो गई और उसका मैं तो शरीर वहीं अटारी में पढा रहे हैं । जब कृष्णराव से सफाई की मांग की गई तो उसने कहा कि गांधी पटेल, गनपत और अन्य लोगों ने देखा था की तो शराब पीने के बाद दिल की गति रुक जाने से मर गया । मैंने उन लोगों को पूरा भरा था । शादी रहूँ अपराध मतीन ने कहा कि वो इससे घटना के बारे में कुछ नहीं जानता । वो ये भी नहीं जानता की मृत्यु शरीर उस मकान में कैसे आ गया । उसने अपने आप को निर्दोष का अपनी फॅमिली के समर्थन में लिन्से ने एक बहुत बडा बयान दिया जिसके अनुसार वो आठ अक्टूबर को दोपहर में नागपुर से अमरावती के लिए चल दिया था दत्तू की उस मकान में आने से पहले और सोलह अक्टूबर को बनारस में आत्मसमर्पण से पहले नागपुर नहीं लौटा था सुनवाई और अपील अदालत में दिन से कि जल्दी की दलील तो रद्द कर दी इसके विपरीत इस बात की पूरी प्रमाण थे कि ग्यारह अक्टूबर की शाम तक और बारह बजे की खोज के वारंट जारी किए जाने तक दिन से अपने घर में ही था और ये की उस ने एक पत्र लिखकर दत्तू को आठ अक्टूबर को अपने घर बुलवाया था । मैं बात असंभव ही रखती है कि उसकी जानकारी और सहमत के बिना किसी व्यक्ति अथवा किन्हीं व्यक्तियों ने उसके घर की तीसरी मंजिल पर एक तो शरीर को दफनाने की हिमाकत क्या है? तेज इंस्पेक्टर पहली बार गया था कि लिन्से घटनास्थल से दूर होने की बात प्रमाणित करने की चेष्टा करेगा । इसलिए उसने ऐसे प्रमाण जुटाने शुरू कर दिए जिससे लिन्से की बात गलत सिद्ध हो जाए तो उसने सोचा एडवोकेट होने के कारण ना हुआ । बारह अक्टूबर के बीच किसी न किसी अदालत में लिन्से की कुछ मुकदमे अवश्य रहे होंगे । काफी मेहनत से करती आज आज पडताल करने के बाद उसे ऐसे प्रमाण मिल गए जिससे लिन्से की एलवी की बात एकदम गलत सिद्ध हो गए । लिडंसे ने नागपुर के एडिशनल डिप्टी कमिश्नर की अदालत में जहाँ ग्यारह अक्टूबर को उसका मुकदमा था, प्रार्थना पत्र दिया था । उसमें लिखा था, मुझे सत्यार्थी की ओर से उन्नीस सौ अडतालीस उनचास की मालगुजारी, अपील नंबर छह सौ दो और लेकिन तैंतीस सात के बारे में एक ग्यारह अक्टूबर उन्नीस सौ पचास को अदालत में पेश होना है । मैं पिछले चार दिन से बीमार होगा इसलिए मेरी प्रार्थना है कि उसकी सुनवाई किसी अन्य तारीख के लिए स्थगित करने की कृपा करें । उस पर लिन्से के हस्ताक्षर थे और ग्यारह अक्टूबर की तारीख पडी थी । अपने फैसले में इस बात पर विचार करते हुए अदालत ने कहा कि इस पत्र में लिखी गई बातें इस बात का पक्का प्रमाण है कि दिन से अपने घर में था जहाँ दत्तू का मृत्यु शरीर दफनाया गया । ग्यारह दस हजार तक हूँ सरकारी वकील ने सशक्त तर्क करते हुए कहा कि परिस्थितिजन्य प्रमाणों के अतिरिक्त गनपत के प्रत्यक्ष प्रमाण से यह बात सिद्ध होती है कि दत्तू की मृत्यु षड्यंत्र की कहाँ हुई है, जिनसे की सहमति के बिना दत्तू कशेली उसके घर में कहीं भी जब साया नहीं जा सकता था, वहाँ तो में इस सबका उत्तरदायित्व उसी पर आता है क्योंकि उसके पास इस बात का कोई संतोषजनक उत्तर नहीं है कि उसने तो शरीर को दफनाने के लिए ऐसा कदम क्यों उठाया । इसलिए इस बात पर विश्वास नहीं करने का कोई कारण नहीं है कि ये उसने अपना अपराध छिपाने के लिए क्या यदि मृत्यु स्वभाविक होती तो उस पर आचरण बिलकुल भिन्न होता हूँ । उसने दत्तू की मां और पत्नी को इस दुखद घटना की खबर दी होती है । अपने मित्र का दाह कर्म ठीक तरह से क्या होता हूँ? सरकारी वकील ने आगे कहा कि ग्यारह अक्टूबर को नागपुर से भाग जाना उसकी निर्दोषता की बात से मैं नहीं था । इसके अतिरिक्त दत्त की हत्या के लिए लिन्से के पास उद्देश्य मेरा दोनों के संबंध बहुत बिगड चुके थे । उसे अपना देश पूरा करने का अवसर भी मिला था । इस सनसनीखेज मुकदमे की सुनवाई के अंत में जज ने तीनों अपराधियों को दत्तू की जानबूझ कर की गई हत्या के लिए उत्तरदायी ठहराते हुए लिन्सी को मृत्यु की सजा सुनाई और बाकी दोनों को उम्रकैद की । तीनों बन्दियों ने नागपुर हाईकोर्ट में मृत्युदंड और आजीवन कारावास के निर्णय के विरुद्ध अपील की । आपने लम्बे निर्णय में हाईकोर्ट ने कहा कि हमें ये मान लेना चाहिए कि हमारे सामने ऐसी कोई बात नहीं है जो तत्त्व की मृत्यु का कारण बता सकें । बल प्रयोग कभी कोई प्रमाण नहीं मिल का अदालत नेग्लिजेंसी कि नौकर गनपत के बयान पर विश्वास नहीं किया । हो सकता है कि दत्तू की मृत्यु है, हृदयगति रुक जा रही अथवा मुश्किल से हुई हूँ । संक्षेप में इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि दत्तू की मृत्यु तो भाविक नहीं थी अथवा वो बल प्रयोग से हुई । अब तक जो बातें हमारे सामने आई हैं उनसे वही प्रमाणित होता है कि लिन्से के मकान की अटारी मेरे शव को दफनाने के लिए पहले से कोई तैयारी नहीं की गई थी । स्पष्ट है कि ये निर्णय उसकी मृत्यु के बाद ही हुआ । इसलिए अदालत में इन तीनों को संदेह का लाभ देते हुए गन्ने को रद्द कर के उन्हें बरी कर दिया । सरकार ने हाईकोर्ट के फैसले के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में अपील की । सामान्य जज श्री महाजन ने अपने निर्णय में कहा, अपने घर की तीसरी मंजिल पर दत्तू की कब्र बढाने के पीछे लिंसी का जो आचरण रहा है वो माटी ही कहा जा सकता है और ये इस बात का पुष्टि प्रमाण नहीं है कि उसी नेतृत्व की हत्या की । हालांकि इसमें काफी संदेह होता है । सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की अपील रद्द कर दिया और नागपुर हाईकोर्ट का निर्णय बाबा रखा है हूँ हूँ ।

बिलिसिया कांड

बिल्ली सी है । जैसी लावणी महीने होती के लिए नाम कुछ अटपटा लगता है वो बाईस वर्ष की दुबली पतली लंबी युवती तात्कालीन संयुक्त प्रांत सरकार के एक बहुत बडे अधिकारी ब्रजभूषण से आई सी एस के घर में आया का काम करती थी । एक केस अंदर ऐसा होता है जिसके प्रति सम्मान जाता है । मन में सद्भाव उठते हैं, दृष्टिकोण गंभीर होता है और एक ऐसा की देखते ही आग लगा दें । आमंत्रण देता था मदहोशी में दुबारा हुआ बिदेसिया का संदेह दूसरी तरह का था बच्चे भूषण सिंह एक कुशल प्रशासक हैं । उन दिनों उनकी पोस्टिंग लखनऊ में थे । मिश्र आईसीएस से उनके पडोसी नहीं । इन्हीं मिश्रा जी के तीसरी पत्नी मीरा मिश्रा अभिनेत्री के रूप में प्रसिद्ध थी । उन्नीस सौ सैंतालीस में ही सांप्रदायिक दंगों में उनकी मृत्यु हो गई थी । इन दोनों अधिकारियों के संबंध अच्छे नहीं थे और उन्हें खूब होल्ड चलती थी । जानकार लोगों का कहना था की उनके विवाद का एक कारण बिल्सी अभी नहीं । कल इसी को अपने मारक सौ के जादू का खूब पता था और वो उसका भरपूर फायदा उठाना भी चाहती नहीं । वो सिंह साहब के बंगले के आउट हाउस में रहती थी । बिल इसी के इरादों और कारनामों की भनक उसके मालिक के कानून में भी पहुंचे लेकिन आधुनिक विचारों की होने के कारण उन्होंने इस बात पर कोई मुश्किल सिद्धार्थ नहीं । सिंह साहब समझते थे कि वो जो कुछ करती है बंगले के बाहर और छुट्टी के समय में ही करती है । इसलिए उन्होंने उसे एक दो बार मामूली तौर पर डाट में बट करने के अलावा और कोई कदम नहीं उठाया । लेकिन मिलिसिया की हरकतें इतनी बढ गई कि मई तक वहाँ के वातावरण में काफी उत्तेजना आ गए हैं । ऐसा लगने लगा जैसे उस मकान के चारों ओर कोई खतरा बता रहा हूँ । और फिर छब्बीस मई उन्नीस सौ की रात को कलीसिया गायब हो गई । बाद में कभी भी जीवित या मृत दिखाई नहीं । फौरन ही पूछताछ शुरू हो गए । काफी लोगों ने इसमें दिलचस्पी नहीं उससे जैसे हिस्ट्री के बारे में ये कोई आश्चर्य की बात भी नहीं की । कितने लोगों की कितनी जल्दी उसके बारे में पूछताछ करने लगे थे । वैसे ये कोई नहीं आता था कि मिलिसिया कहाँ गई हो गई । उसे खोजने की छिटपुट कोशिश नहीं की गई । लेकिन विकास अब वही जरूर करे । खूब तेजी से पहले उसके बारे में पूछता । आज करने वाले अधिकांश व्यक्ति आस पास रहने वाले निम्र वर्ग किए थे । कोई कुछ कहता था तो कोई कुछ लेकिन एक बात की ओर सभी कर सके था और वो ये कि मिलिसिया की गायब होने में उसके मालिक ब्रजभूषण सिंह का आता है । उन दिनों श्रीमोदी संयुक्त प्रांत सरकार के चीफ सेक्रेटरी थे । ये अपवाहें उनके गानों तक भी पहुंची या यू गए पहुंचाएगी और इस काम में इन मिश्रा जी ने भी कभी दिलचस्पी नहीं । उस दिन प्रशासन में काली और गोरी ऐसी साहब के बीच काफी तनातनी गुरु, चीफ सेक्रेटरी आॅफिसर को अपमानित करने का अवसर हाथ से नहीं जाने दिया । बिल इसी के मामले में एकदम पुलिस से जांच का आदेश दे दिया । जैसे ही ये पता चला की पुलिस ने जांच शुरू की है इधर उधर बिखरी अब पुलिस तक पहुंच गई । इन अफवाहों के आधार पर खोश करते हुए पुलिस को कुछ उपकमांडर और उनसे सिंह साहब को मिलिसिया के है । हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया । चार अन्य वृद्धि भी बहुत बढिया है । उन चारों में एक था बहुत से मिसाइल सिंह की बहन का पति और सिंह का नौकर और दो बार से एक ऐसी ऐसे अवसर हत्या के आरोप में पकडा जाए । ये एक महत्वपूर्ण घटना थे । लखनऊ और नई दिल्ली दोनों ही स्थानों पर काफी चर्चा हुई । सिंह साहब की गिरफ्तारी के बाद आईसीएस वर्ग के दो दल हो गए । भारतीय आईसीएस सिंह को निर्दोष बताते थे और अंग्रेजी ऑफिसर उनकी इतना करते हैं । सुनवाई के लिए मुकदमा अंग्रेज स्टेशन जज की अदालत में आया । जब सिंह साहब को बंदी के रूप में अदालत लाया गया तो खचाखच भरे कोर्ट रूम में उपस्थित हर व्यक्ति के चेहरे पर उत्सुकता की ये देखा है नहीं गई । जज ने आरोप बढ कर सकता है । सरकार ने ब्रजभूषण सिंह पर हत्या के प्रयास का आरोप लगाया था लेकिन जज ने उसे बढाकर हत्या का आरोप कर दिया । सिंह पर केवल बिदेसिया की हत्या का आरोप नहीं था । उन पर क्या आरोप भी था की उन्होंने अपने को हत्या के आरोप से बचाने के लिए हत्या के प्रमाण नष्ट कर दिए । लाश गैर करते हैं हत्या के संबंध में अब तक सर्वाधिक गुप्त रखी गई थी इसलिए आरोप सुनकर दर्शक रोमांचित तोड हैं । चारों व्यक्तियों ने आरोप के उत्तर में अपने को निर्दोष बताया और इसके बाद सरकारी वकील ने आरोप पक्ष की ओर से मुकदमा शुरू किया । उसने यूरी के सदस्य को सलाह दी कि अपने दिमाग से ये ये खयाल निकालते की वो एक आई । सी । एस । के मुकदमे में बैठे हैं इसलिए पहले से सुनी अपनाए बुलाते हैं और अदालत में उपस्थित होने वाले गवाहों और सबूतों के आधार पर ही मुकदमे का फैसला दें । इसके बाद उसने मुकदमे का विवरण दिया । मुख्य बातें ये थी छब्बीस मई उन्नीस सौ को दिन में एक कथित अपराधी के घर में उसके एक बटलर सेमुअल के साथ बिदेसिया संभोग करती हुई पर गए । मिस्टर सिंह इस घटना से बहुत उत्तेजित ही और बिदेसिया की इस तरह की हरकतों को एकदम समाप्त करने का निश्चय लेकर अपने पति के लौटने की प्रतीक्षा करने लगे । शाम को साढे सात बजे सिंह साहब से लौटे तो होते हैं बिदेसिया के कारनामों की खबर दे दी गई । थकी मांदी और भूखे अवसर के लिए ये सुविधा बहुत हैं । उन्होंने उसे बुलाया और मारापीट । यहाँ आरोप पक्ष का खयाल था कि लडकी को मार मार कर अधमरा कर दिया गया था । इसकी एक घंटे बाद नहा धो कर कथित अपराधी आपने एक के मित्र के साथ डिनर पर चला गया और आधी रात के बाद लौटा । तब उसे पता चला कि मिलिसिया मारते हैं । इसके कुछ देर बाद एक कथित अपराधी अपने पत्नी और शोफर महावीर के साथ कार में बैठकर भंवरसिंह अपराधी नंबर तो घर साठ भेज दूँ जामगढ कुछ दिया गया बहुत सिंह की पत्नी मिस्टर सिंह की बहन थी । उनके घर बसंती नामक गद्दार से काम करते हैं जो बिदेसिया की चचेरी कहते हैं । आरोप पक्ष के अनुसार बिदेसिया का मृत शरीर घर के पिछले हिस्से में रखा था और इससे यात्रा का उद्देश्य उसकी लाश को ठिकाने लगाना था । संयोग की बात है की कार के पहिए पंचर हो गए और वह रामगढ गुलेरिया से एक मील इधर ही ठप हो गई । तभी एक बेलगाडी उधर से कुछ भी उसमें कुछ ग्रामीण बैठे हुए थे । गाडी रोककर उसमें बैठे ग्रामीणों से कहा गया है कि वे उन लोगों को भुवन सिंह के घर तक ले जाए । वो उन लोगों को भवन सिंह के घर पहुंचाकर आगे बढते हैं । ब्रजभूषण सिंह और पवन सिंह ने थोडी देर बाद जीत नहीं । इसके बाद भंवरसिंह ने अपने नौकर अपराधी नवति और दो पारसियों अपराधी नंबर चार और पांच को शोफर महावीर के साथ वहाँ भेज दिया जहां कार बिक्री पडी थी । वहां पहुंचकर इन चारों व्यक्तियों ने मिलिसिया के इलाज को उठाकर सडक से परे पेडों के झुरमुट में छुपा थी । इसके बाद उन्होंने लाश के टुकडे टुकडे कर दे रहे हैं । मांस को गीतों के लिए फेंक दिया और गड्डियाँ जंगल में इधर उधर छूट रहते हैं । इन हड्डियों के अलावा अब मिलिसिया का कोई निशान बाकी नहीं रहा था । दो दिन बाद पुलिस भुवानसिंह के घर पहुंची और पूछताछ करने के बाद भंवरसिंह, उसके नौकर और दोनों पार्टियों को गिरफ्तार कर लिया गया । नौकर और दोनों पासी पुलिस की जिला के सामने नहीं टिक सकें । उन्होंने अपना अपराध स्वीकार कर लिया और वे पुलिस को वहाँ लेकिन जहाँ मिलिसिया के शरीर की चीरफाड की गई थी । जहाँ हड्डियाँ से की गई थी वो स्थान भी उन्होंने पुलिस को दिखा दिया । पुलिस ने हड्डियाँ इकट्ठी कर ली और उन्हें मुकदमे के दौरान अदालत में पेश करते हैं । बाद में महावीर को भी गिरफ्तार कर लिया है । जब उसने देखा की वो कानून के शिकंजे से नहीं बच सकता है तो उसने भी अपना अपना अधिक स्वीकार कर लिया और जो कुछ जानता था पुलिस को बताते हैं बाद में कहीं वो मुकदमा जाए । इस आशंका से उसका बयान एक मजिस्ट्रेट के सामने लिया गया । सुनवाई के दौरान उसे एक गवाह के रूप में उपस्थि किया गया । मुकदमे के दौरान कई गवाहियां पेश्के गवाहों में प्रमुख थे । दो लोग आया है जिनमें एक हमे ला थी शो पर महावीर रात के समय रामगढ किलोरिया के पास, बैलगाडी में गुजरनेवाली ग्रामीण आदि । इन व्यक्तियों ने हत्या कांड की विभिन्न बातों पर ऍम लेकिन अदालत में महावीर मजिस्ट्रेट के सामने दिए गए पहले वाले बयान की कुछ महत्वपूर्ण बातों से इंकार कर दिया । इन बातों से उसके मालिक ब्रजभूषण सिंह पर अच्छी आती नहीं । सिंह साहब ने बडे ध्यान से दवाइयाँ सुनी । सरकारी पक्ष की दवाइयों के अंत में बज भूषण सिंह को कठघरे में बुलवाया गया । ब्रजभूषण सिंह जिस समय अदालत में बयान देने खडे हुए उस वक्त हर कोई उचक उचककर एक एक शास्त्र बडे ध्यान से सुने लगा । सिंह ने स्वीकार किया कि उन्होंने छब्बीस मई की शाम को मिलिसिया को मारा था लेकिन इस बात पर जोर दिया कि वह मारपीट बिल्कुल मामूली थी । केवल हाथों और बाहों पर जैसी खरोंचे लगी थी । जब वो भागने लगी तो एक चोट कमर पर भी पडी थी । उन्होंने कहा कि वह मिलिसिया की इस हरकत पर बहुत नाराज है क्योंकि कई बार इसके पहले भी उसमें ऐसा ही किया था । उसे पीटने के बाद वो अपनी पत्नी के पास गए और उस से कह दिया कि वह बिल इसी को फोर घर से निकाल रहे हैं । आधी रात में डाॅॅ पता चला कि बिदेसिया अभी तक घर में ही है तो उन्हें बहुत गुस्सा आया । वो उसे एक बाल के लिए भी घर में रखने को तैयार नहीं हुए और अपनी पत्नी और मिलिसिया को साथ लेकर भवन सिंह के घर चले गए हैं ताकि मिलिसिया को उसकी चचेरी बहन बसंती को सौंपा जा सकें । यहाँ तक सरकारी पक्ष और सिंह के बयान के जैसे मारपीट की मात्रा की अतिरिक्त अपराधी ने सरकार विपक्ष के विवरण को ही स्वीकार किया था । अंतर है वहाँ है जहाँ उन्होंने कहा था कि रात को लौटने पर उन्होंने मिलिसिया को अपने घर में पाया और उसके साथ भुवन सिंह के घर की ओर लखनऊ से एक कार में जाने वाली मिलिसिया जिंदा थी । क्या होता है आगे बयान देते हुए सिंह से हमें यह स्वीकार किया कि भवन सिंह के मकान से एक या दो मिल इधर उनकी कार पंचर हो गई थी । इसलिए ड्राइवर महाबीर को पंचर ठीक करने के लिए छोड कर वो उनकी पत्नी और मिलिसिया पैदल ही भवन सिंह के घर पहुंचे थे । जैसे ही महावीर ठीक करके भंवरसिंह के घर पहुंचा वैसे ही सिंहा बिदेसिया और अपनी पत्नी को वहीं छोडकर लखनऊ लौट हैं । उन्होंने कहा कि इसी बीच मिलिसिया सोच से निर्मित होने के लिए जंगल की तरफ चली गई और फिर कभी नहीं लौटी । उन्होंने उसे मारपीट कर जान से नहीं मारा और न ही उन्हें ये मालूम है कि वो कहाँ गायब हो गए । आपने मैं अन्य सिंह साहब ने बैलगाडी और उसमें बैठे ग्रामीणों की बात तथा चार व्यक्तियों द्वारा मिलिसिया के शरीर की चीज ऍम करके उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि पंजाब ठीक करने के लिए महावीर को पीछे छोड दिया गया था । गवाही खत्म होने के बाद सिंह से आपके वकील नहीं जीरा शुरू की है । उसने तर्क दिया की हत्या का अपराध प्रभावित करने के लिए की आवश्यक है कि अपराधी के मन में हत्या की इच्छा हो अथवा उसे ये पता हो कि उस प्रक्रिया से निश्चित रूप से किसी की हत्या हो सकती है । ब्रजभूषण सिंह के मन में मिलिसिया की हत्या की कोई इच्छा नहीं थी क्योंकि उन्होंने बहुत हल्की मारपीट की थी । ये हत्या का प्रयास भी नहीं था और साधारण या कोई भी व्यक्ति ये अंदाजा नहीं लगा सकता है कि इस से मारपीट से वो बढ सकती है या ये हो सकता है कि लडकी को कोई अंदरूनी चोट लगी हो जो रात में उभर आई हो और वो जब सोच के लिए गई हो तो उसकी मृत्यु हो गई हूँ । इस बात का भी कोई प्रमाण नहीं था की अदालत में जो हड्डियाँ प्रस्तुत की गई थी वो निश्चित रूप से फॅमिली, वस्तुतः और के श्रीनाथ असम बोलते हैं इसलिए बिल इसी की हत्या प्रमाणित नहीं होती थी और स्पष्ट की जिस अपराध का होना प्रमाणित ना हो तो उसके लिए किसी पर दूर नहीं लगाया जा सकता है । जूरी ने एक घंटे के विचार विमर्श के बाद सर्वसम्मति से अपना निर्णय दे दिया की किसी कथित अपराधी के खिलाफ कोई अपराध प्रमाणित नहीं था । जज ने हत्या के प्रमाण नष्ट होने के आधार पर जूरी का निर्णय स्वीकार करके बाकि अपराधियों को तो छोड दिया लेकिन वो सिंह साहब के विरुद्ध हत्या के अपराध पर जूनी की राय से सहमत नहीं हुए हैं । जैसे आपने लंबे फैसले में मुकदमे की सारी कार्यवाही पर विस्तार से विचार किया । बिल इसी की पिटाई के संबंध में उसने अपना मत इस प्रकार व्यक्त किया । ये तो पूरे तौर पर साबित नहीं होता कि मारपीट काफी जोर से की थी या मिलिसिया की मृत्यु मारपीट के कारण ही हुई । लेकिन मेरा ख्याल है कि दोनों पाया हूँ और खास तौर पर मुस्मात ॅ जिस तरह दवाई दी है उसे लगता है कि वह सच्चाई छुपा रही हैं । अभियोग पक्ष के बयानों पर विचार करते समय अवश्य दिमाग में रहना चाहिए । अपने फैसले के अंत में जितने ये धारणा व्यक्ति की थी कि बिदेसिया को पीते समय सिंह साहब बेकाबू हो बैठे और उन्होंने एक बडी लकडी से उसे बुरी तरह मारता है । मेरा ख्याल है कि मिस्टर सिंह ने ये जानते हुए कि उनकी मारपीट से बिदेसिया की मृत्यु हो सकती है, उसे बुरी तरह पीटा था । मार्केट की बात पर जज ने दो परस्पर विरोधी विचार प्रकट किए थे । इससे स्पष्ट था कि महत्वपूर्ण तत्पर वो भ्रम में थे । उसने बचाव पक्ष की ये बात अस्वीकार कर दी कि बिदेसिया की मौत किसी अंदरूनी चोट की वजह से हुई होगी । लाश ठिकाने लगाने के संबंध में जैसे उन ग्रामीणों की गवाही को अधिकांश सही मना जो टायर पंचर हो जाने के बाद उधर आने वाले थे । उसने कहा कि इससे गवाही से ये साबित होता है कि मिलिसिया उस समय साथ नहीं जज की इस धारणा से बचाव पक्ष का मामला काफी बिगड गया । सबसे अधिक उल्लेखनीय बात यह रही थी कि मिलिसिया को किसी भी करवाने नहीं देगा ना जीवित नमृता । हड्डियों के संबंध में जज ने गवाना पति और पांच की गवाही सही मानी और ये स्वीकार किया ॅ की हो सकती थी । वैसे उसे इस बात को साबित होने में देखा था । फॅसने बृजभूषण सिंह को हत्या के लिए नहीं बल्कि हत्या की कोशिश करने का दोषी ठहराया और छह साल के कडे कारावास का दंड सुना दिया । बहुत पूरा आईसीएसए ब्रजभूषण सिंह कोचिंग वर्ड्स की सजा भुगतनी के लिए जेल ले जाया गया । सजा की खबर सारे देश में फैलेगी । समाचार एजेंसी ने इसे विश्व के कोने कोने में पहुंचा दिया । ब्रजभूषण सिंह ने अवध के चीफ कोर्ट में इस फैसले के खिलाफ अपील की उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया है । लेकिन तब तो वो चार महीने की कडी कैद कर चुके थे । सभी तेजबहादुर सप्रू ने उनकी पैरवी की और बहुत खूबी से की । सर तेजी ने सरकारी मुकदमे की बुरी तरह नहीं ना कि उन्होंने कहा कि अभियोग पक्ष के अनुसार मिलिसिया का शरीर कार में रखा गया और कार में पंचर होने के स्थान तक ले जाएंगे । फिर वहाँ से सब लोग भंवरसिंह के मकान तक गए । यहाँ प्रश्न यह उठता है कि क्या उन्होंने कार में लाश को अकेले ही पडी रहने दिया होगा और वो भी एक ऐसी सडक जिस पर ट्रैफिक बहुत अधिक रहता है और फिर भवन सिंह ने जिस से पहले इस बारे में कोई खबर न थी फोर ही बिना सोचे विचारे अपने नौकरों को इससे बात की । अज्ञात दीदी की वो लोग महाबीर के साथ जाकर मिलिसिया का शरीर ऍम तीन अपर सीटों को अपना लाजा बनाने से पहले उसने कुछ भी नहीं सोचा । मोहन सिंह को कितना भी ध्यान नहीं है की इस तरह के काम से वो अपने और अपने परिवार की सुरक्षा को खतरे में डाल रहा है और फिर तीन तीन व्यक्तियों ने मिलिसिया के शरीर को छोड कर के उस की हड्डियाँ जंगल में की थी । वे भी बिना सोचे विचारे ऐसे बयान काम के लिए तैयार हो गए हैं । और फिर जिन तीन व्यक्तियों ने फॅमिली कि चीफ करके उस की हड्डियाँ जंगल में फेंकी थी वे भी बिना सोचे विचारे ऐसे भयानक काम के लिए तैयार हो गए हैं । उन्होंने एक बार भी ये नहीं सोचा कि उनके इस काम के परिणाम कितने भयंकर हो सकते हैं । सर तेज ने कहा कि मुकदमे का ये वंश पुलिस द्वारा बनाया गया है । देखते ही पता चल जाता है कि ये अंश असत्य और वास्तविक है । यदि एक ऐसी इस अवसर हत्यारा होता तो वो कहानी करने में इतनी ऐसा उडानी नंबर दत्ता इतनी भूले नहीं करता । चीफ कोर्ट ने सर तेज के डर के स्वीकार करते हुए अपने निर्णय में कहा कि लाख को नष्ट करने के संबंध में जो तथ्य दिए गए वे एकदम वास्तविक लगते हैं । उनमें कहीं भी वह सामान्य सूझबूझ नहीं चलती जो ऐसी स्थिति में आवश्यक होती हैं । इससे कहानी के बचा ही ये कल्पना कहीं अधिक स्वभाविक होगी की मृत्यु शरीर को यदि वो था तो मिस्टर सिंह और उनके शोफर महावीर ने रामगढ गुलेरिया पहुंचने से पहले ही ठिकाने लगा दिया होगा । चीफ कोर्ट के अनुसार लोकभवन सिंह के पास इसीलिए गए होंगे ताकि उस से मिलकर एक ऐसी कहाँ नहीं कर सके । चीफ कोर्ट के जजों ने राॅकी जूरी के सदस्यों की ट्राय को सही माना और कहा की अदालत में पेश की गई हड्डियों के बारे में ये प्रमाणित नहीं हुआ था कि वो बिल्ली सिया की थी । मारपीट के संबंध में जजों का ख्याल था कि सिंह साहब ने उसे इतना मारा जिससे उसकी मृत्यु हो गई और फिर लाश को कार में रखकर कहीं ले जाया गया । हालांकि ये प्रमाणित नहीं हो सका की मृत्यु शरीर को किस तरह नष्ट किया गया । मुकदमे में सबसे महत्वपूर्ण बात यह नहीं कि मृत्यु शरीर की कोई खोज खबर नहीं लग सके । मारपीट प्रमाणित होने की करण जी कोर्ट ने दंड को कायम रखा लेकिन उसकी अवधि घटाकर चार महीने करती । इतना दंड सिंह जहाँ पहले ही भुगत चुके थे इसलिए वो मुक्त हो गए । अब उन्हें जेल जाने की जरूरत नहीं थी लेकिन चीज कोर्ट में भी नहीं । हत्या के प्रयास में कहा अपराधी माना था । इससे अपने को निर अपराध घोषित कराने की उनके प्रयास में को बडा आघात पहुंचा । अब प्रिवी काउंसिल में अपील करने के अतिरिक्त सिंह साहब के सामने कोई और रास्ता नहीं था । उनके मित्रों ने उन्हें आर्थिक सहायता दी । उन्होंने सेम अपना भी सब कुछ दांव पर लगाने का फैसला करके चीफ कोर्ट के निर्णय के विरूद्ध टीवी कौंसिल में अपील करते हैं । प्रसिद्ध ऍम उनके मुकदमे की पैरवी की करके हिंदू प्रिंट के सहायक के रूप में कौंसिल में उपस्तिथ है । प्रीवी काउंसिल में वातावरण कुछ दूसरा ही था । वहाँ ना भारतीय अदालतों जैसा शोर शराबा था, ना अखबारों का भ्रामक प्रचार । पीवी काउंसिल की बेंच में सर जॉॅब ये तीनों जस्ट हैं । सत्रह अक्टूबर को मुकदमे का फैसला सुनाया गया । कोई भी काम सिलने, सफाई पक्ष की अंदरूनी चोट वाली धरना स्वीकार डालें । उसने कहा कि ये बात बिल्कुल विश्वास नहीं लगती है कि अगर अपराधी, ॅ ऑफिसर और उच्च वर्ग का सब संस्कृतिक व्यक्ति है, मिलिसिया को मार मार कर अधमरा कर दिया होता तो उसकी मरहमपट्टी की व्यवस्था कराए बिना ही बाहर चला जाता था और ऐसी स्थिति मना उत्तर के भावना के साथ साथ ये आशंका भी उसके मन में आवश्यक है कि इस लडकी की मृत्यु से वो बुरी स्थिति में फंस ऍम । लखनऊ में हुई दुर्घटनाओं का विश्लेषण करते हुए कौंसिल ने कहा कि इस बात का कोई गवाह नहीं है कि मिलिसिया को बुरी तरह पीटा गया । किसी ने उसे बेहोश जमीन पर गिरी हुई स्थिति में नहीं देखा । उसकी लाश देखने की बात भी किसी ने नहीं अभियोग पुछ के लिए बात भी प्रमाणित नहीं हो सकी की बिना किसी की मृत्यु निश्चित रूप से हो ही गई हैं कौनसी नहीं ये कहा कि चीफ कोर्ट में है । अभियोग पक्ष के मुकदमे के इस अंश की गवाई पर विश्वास करके गलती की । अपराधी के बयान पर विचार करते हुए काउंसिल ने कहा, अपराधी में आधी रात के समय मोटर यात्रा का जो कारण बताया था उसे तो भारतीय ऍम और वैसे भी ये बात अजीब लगती है कि अपराधी ने इतनी लंबी यात्रा केवल इसलिए की क्योंकि वो बिदेसिया के साथ उस घर में है, राहते बिताने को तैयार नहीं था । आधी रात के समय एक लंबी मोटर यात्रा की गई और उसके लिए गलत कारण बताया गया । इस बासी ये संदेह हुआ कि संभव है कि ये यात्रा लिसिया के मृत्यु शरीर को ठिकाने लगाने के लिए की गई होगी । ये संदेह को इस बात से और बल मिल गया की जब मोटर कार अपराधी के घर से रवाना हुई तब किसी भी गवाह ने मिलिसिया को जिंदा या मोटा नहीं देखा और फिर अपराधी ने ये भी स्वीकार किया कि वो अगले दिन गायब हो गए नहीं लेकिन संदेह साबित नहीं होता । इस बात पर निर्णय असंभव था की लंबी मोटर यात्रा और पुलिसिया के गायब होने से केवल यही एक अर्थ निकलता था कि अपराधी ने उसकी हत्या कर दी थी । लखनऊ की घटना में संदेह की गुंजाइश देख और लाश ठिकाने लगाने वाली बात साबित न होने पर टीवी काउंसिलें आपने देने में सिंह की अपील स्वीकार करके कारावास की सजा नामंजूर करें । ढाई साल के अपमानजनक जीवन के बाद ब्रजभूषण सिंह के सिर से मिलिसिया की हत्या का कलंक घट गया । उन्हें फिर से नौकरी में रखेगा गया लेकिन उनके जीवन में वह पुरानी बात फिर लौटे । इस बीच उनकी पत्नी की भी मृत्यु हो गए । मिस्टर सिंह मानसिक रूप से बहुत अस्त व्यस्त कोठे और प्रिवी काउंसिल के निर्णय के एक साल बाद उन्होंने आॅवर से आत्महत्या करने हूँ ।

मुग़ल स्ट्रीट कांड

मुगल स्ट्रेट रंगों में एक विशेष प्रकार की गोली से एक और की हत्या कर दी गई । अपराधी ही ओबामा में रहता था और उसके पास एक बंदूक बरामद हुई जिससे ठीक उसी प्रकार की गोली फायर की जा सकती थी । हत्या का उद्देश्य कोई ऐसा नहीं था कि इससे कोई आदमी किसी की कीमती जान लेने को तैयार हो जाए । सभी घटनाओं पर लहर से का करा पर्दा पडा हुआ था । सारा केस कुछ दवाइयों और उनसे निकाले गए निष्कर्षों पर टिका हुआ था । सारा मामला एक अनुभू पहली की तरह था । हत्यारे को किसी भी करवाने देखा नहीं था और वो इसे देख भी नहीं भी नहीं । सिर्फ एक व्यक्ति हत्यारे को जानता था और उसने उसे देखा भी था, लेकिन उस पर किसी को विश्वास नहीं था । ऐसी रहस्यमय स्थिति अदालतों के सामने कभी पैदा नहीं हुई थी । गणपत्ये के एक अमीर घराने में आम मीना का जन्म हुआ था । एक कट्टर परिवार की चारदीवारी के बीच उसका लालन पालन हुआ हूँ । किशोरावस्था में कदम रखते हैं । उसे बुर्का उडा दिया गया है । उसमें बाहर जाने की हिम्मत नहीं थी । िकांड अवसर पर जब वह कभी बाहर निकली थी तो उसका चेहरा बुर्के से ढका हुआ था । उसे सभी सामाजिक कायदे कानून सिखाए गए । अमीना को बताया गया की अपने खाविंद के सिवाय पर आॅर्ट से किसी प्रकार का भी संबंध रखना है । ऐसे ही परिवार के साझे में उसका चरित्र डालता गया । इस उलझे हुए हत्याकांड के रहस्य की गुत्थी सुलझाने में आमिना का आप संबंधी यही दृष्टिकोण और सम्मान की भावना सहायक हुई । उन्नीस सौ में आमिना की शादी कलकत्ता के अली ऍसे करती गई । उसका पति भी काफी मालदार था । इस तरह शादी बराबर की हैसियत वाले दो घरों में हुई थी । आर एफ एक उत्साही ही वो था । उसके विचार बहुत उदास है । वो विदेशी निवास पहनता था और बहुत से अंग्रेजी उसके साथ ही थी । एक बार वो इंग्लैंड भी हुआ आया था । वो प्रगतिशील विचारों का था और आपने जाती कि औरतों को पूरी आजादी देने के पक्ष में था । शादी के बाद उसने समाज के सामने एक आदर्श रखने की ठानी । उसके परिवार के स्त्रियों ने भी धीरे धीरे पर्दा छोड दिया था । इस संबंध में उसने भी पत्नी पर भी जो डाला और कुछ सीमा तक सफल भी हो गया । आमेना बिना पडने की बाहर जाने लगी लेकिन वो अपने पति को खुशल रखने के लिए ऐसा कर दी थी । इस बात से आरिफ और उसके साले दाउद पास में कुछ मनमुटाव पैदा हो गया । डाउन तो पुराने रीति रिवाजों को कट््टरता से मानने वाला आदमी था । उसके परिवार के लोग अभी तक इन्हीं बातों पर चल रहे थे । सार्वजनिक स्थानों पर आमिना को बिना वर्दी में देखकर उसे कॅाल शादी के आठ वर्षों में कोई महत्वपूर्ण घटना नहीं घटे हैं । इस बीच उनके यहाँ तीन बच्चे हुए हैं । ऍम चलेंगे वहाँ अपने चचेरे भाइयों के पास ऍम स्ट्रीट के लाल कोठी में रहने लगा हूँ । शहर के तीन और व्यस्त जीवन से सिर्फ जल्दी ही हो गया । देखे तो खुले मैदानों की आवाज के लिए उसका ऍम उन्होंने ये आवाम आ नामक देहात में एक मकान किराए पर ले लिया और वहीं रहने लगे । फिर अच्छा शिकारी था । उसके पास एक बंदूक भी थी । देहाती जिंदगी से उसे प्यार था लेकिन आमिना को भी ये पसंद था या नहीं इस विषय में कुछ कहा नहीं जा सकता । उसे अपने नजदीकी रिश्तेदारों के अलावा दूसरों से ज्यादा मिलना जुलना पसंद नहीं था । इसी कारण वो अकेले पड गई और यहाँ तक कि वहाँ कोई बात करने वाला भी नहीं मिला । वो अपने परिवार के लोगों के बीच शहर में ही रहना पसंद करती थी । ऐसे में मियां बीवी की अनबन होना सौभाग्य था । दोनों शुरू शुरू में बहुत खुश थे लेकिन शीघ्र ही अनुमान होने के आसार नजर आने लगी । वहाँ ऐसी एक बुरा सादे खराब रहता था । एक दिन झगडे के बीच शाम को अमीना इस बूढे के पास पति की शिकायत करने पहुंची । बात कुछ भी हो गई होगी वरना हम मीना जैसी पर्दा नशीन । औरत इस तरह किसी पराए मर्द के यहाँ ऐसे समय जाने की हिम्मत नहीं कर सकती थी । बात कुछ भी रही हो, सादे खानों से वापस घर छोडने किया । उसने आपको बहुत समझाया और उससे वादा करा लिया कि वो अब कभी अपने बीबी से बुरा बर्ताव नहीं करेगा और न ही उसे भी ठेका । लेकिन सम्बन्ध भी कर चुकी थी और अब उनका सुधारना मुश्किल था । थोडे दिन बाद ही अमीना तारीख को या वामा में ही छोडकर रंगो लौटाएं, पति पर निर्दय मारता हूँ करने का आरोप लगाकर उसमें तेरह जुलाई को एक वक्त क्लीन से दो टिस जारी करवा दिया । लेकिन इससे कुछ हुआ नहीं । दो दिन बाद हुआ नहीं । आप गूगल स्टेट के मकान नंबर अठारह में एक ही रहने के लिए चली है । अब उसके चौथा बच्चा होने वाला था और एक तब भी उससे नहीं मिला है । जुलाई को कलकत्ता चला गया तो तलाक पूरा हो चुका था । अगस्त के दूसरे सप्ताह में अमीना के बच्चा पैदा हुआ । उस समय तीनों बच्चों की सेवा आमिना के साथ नौकर फकीर अहमद, नौकरानी जैसी और बाद आॅडी देख रहे थे । एक बावर्ची इन और भी थी, जो अलग अपने घर में सोचती थी । हत्या की रात प्यारी ना मतलब चौथी नौकरानी भी उसी घर में मौजूद थी । मुकदमे में तीनों नोकर फकीर अहमद जैसी और प्यारी के बयान बहुत महत्वपूर्ण थे, क्योंकि वे ही मामले के असली बात हैं । इनकी गवाहियां झूठी सिद्ध करने के लिए अपराधी ने ये बताने में कुछ जल्दबाजी के लिए कि उस समय उस घर में कोई नौकर नहीं था । खुद के चश्मदीद गवाहों को इस प्रकार अलग कर देने से अच्छा ठीक करने का आरोप गलत सिद्ध करने में आसानी हो जाते है । प्रतिवादी की दलील कमजोर थी । मेरा को बच्चा हुए उन्नीस हुए थे और एक बच्चा होने के बाद इतनी जल्दी नौकरों के बिना कैसे रह सकती है, जबकि उसके पास पर्याप्त धन हो । आमिना के पास आर्थिक सात लोगों की कोई कमी नहीं थी, इसलिए पैसे की कमी का कोई सवाल नहीं उठता था । वो आसानी से आधा दर्जन नौकरों को रख सकती थी और ऐसी हालत में उसे नौकरी की आवश्यकता थी । आपने शारीरिक अवस्था के कारण एक रात भी वो बिना नौकरियों की अकेली नहीं जा सकते थे । फिर सारा भेद किया था । अगस्त को इतवार के दिन अठारह मुगल स्ट्रीट में आरिफ देखा गया । बो वहाँ क्यों आया था ये कोई नहीं जानता । वो सारा दिन आमिना के साथ रात भी उसी के साथ गुजार रही । अगले दिन सुबह का नाश्ता लेकर वो थोडी देर के लिए बाहर चला गया । वो दोपहर को खाने के लिए वापस आया और दो बजे के करीब फिर बाहर चला गया और ठीक सात घंटे बाद आ मीना की हत्या कर देंगे । उससे दुर्भाग्यपूर्ण रात को खाने के बाद वो जल्दी ही सोने के लिए जल गई थी । उस दिन भी दूरी नहीं खाना था । नौकर भी अपना खाना खा चुके थे । मुख्यद्वार और दूसरे सभी दरवाजे बंद कर नौकर भी सोने के लिए चले गए हैं । नौ बजे के लगभग दरवाजे पर दस्तक हुई । दरवाजा खोलने के लिए कोई नौकर नहीं उठा । अभी ना खुद उठकर दरवाजा खोलने आएँ । टिकट में भी तरह गया आधा घंटा और मालकिन के बीच कुछ तनातनी की आवाजे नौकरी को भी सुबह पडे कुछ हल्का सा हंगामा भी हुआ और उसके बाद एक जोर का धमाका सुनाई पडा । तीनों ही नौकर वकील अहमद जैसी और बाहरी डर के मारे ही वहाँ से भाग निकले और अपने अपने घरों में जा चुके हैं । अगली सुबह जब लौटे तो उनकी माल के जीवित नहीं थी, उसकी लाश पडी थी । इसकी कुछ उपरांत आमिना के परिचित एक बुजुर्ग महिला महाबुद्धि नहीं है । अपने नौकर फकीर पक्ष को आ मिनट के स्वास्थ का हाल पूछने के लिए भेजा ॅ नहीं लौटाया और उसने बताया कि आ मीना का घर भीतर से बंद है और लगता है की वहाँ सब सुन रहे हैं । उसने ये भी बताया कि घर में एकदम खामोशी छाई हुई है । महाबुद्धि आमिना को बहुत चाहती थी उसका उस खोना स्वभाविक था आपने । बावर्ची और दूसरे लोगों के साथ वो जल्दी ही आ मीना की घर पहुंच गए । मुख्यद्वार बंद था लेकिन एक बच्चे की रोने की आवाज उठे सुनाई दे रहे हैं । उसने दरवाजा खटखटाया और कई बार आ मीना का नाम ले लेकर आवाजे लगाएँ । भीतर से अमीना के पांच वर्षीय लडकी का स्वर सुनाई दिया की माँ सो रही है और मेरा हाथ गुंडी तक नहीं पहुंचता । वे लोग पिछवाडे की तरफ चले गए । पीछे का दरवाजा खुला हुआ था । वे भीतर घुसे और सीढियां चढकर मुख्य कमरे में आ गए । एक बडे से पलंग पर अमीना लेटी हुई थी । छोटी बच्ची ने सच ही कहा था लेकिन उसे ये नहीं पता था कि उसकी माँ इस से अब कभी नहीं जाते । हेंगे कमरे में सबसे पहले एक डॉक्टर कैसा हूँ? अमीना पीठ के बल बिस्तर पर लेटी हुई थी और उसकी ऍम मुद्दा शरीर पर लापरवाही से एक कपडा डाल दिया गया था । वो मर चुकी थी और उसे मरे हुए कई घंटे बीत चुके थे । चादर पर काफी मात्रा में खून बहा हुआ था । चादर पर सिलवटे नहीं थी । गोली छाती के पार हो गई थी और वहाँ एक सुराह दिख रहा था । छाती में गांव की जगह पर गोली के नीचे की तरफ झुका । उससे पता चलता था की हत्या देने गोली खडे होकर मारी थी और वह बैठी हुई थी । गांव के चारों तरफ कार्बन के निशान नहीं थे । सत्ता, हत्यारा, गोली, इरादे समय कुछ फासले पर खडा था । पीछे की तरफ दरवाजे के शीर्ष इनमें से गोली बार निकल जाने से एक छेद बन गया था । कुछ तांबे के सिक्के खून से सने बिस्तर पर पडे थे । आमनाथ के अंगूठे पर भी एक गांव था । गोली उसके शरीर से बाहर निकल कर दरवाजे की सीसी से टकराई थी और दरवाजे ऐसी स्थिति में थे की साफ पता चलता था की गोली लगाते समय आमिना बिस्तर पर नहीं थे । जहाँ तक अंगूठे की गांव का सवाल है ये था उस समय लगा होगा जब त्यारी ने उसे मारने के लिए बंदूक उठाई होगी और उसने बचाव के लिए अपना हाथ आगे क्या होगा । घटना कुछ ऐसी तेजी से घटी थी कि उससे बचकर निकल भागने ये सहायता के लिए शोर मचाने का भी मौका नहीं मिला था । हत्या के बाद हत्यारे में उसकी लाश को जमीन से उठाकर बिस्तर पर लेटा दिया । उस पर एक कपडा फेककर वो बात किया । इससे हत्या की खोज के लिए इंस्पेक्टर ब्राउन नियुक्त किए गए । कमरी का सूक्ष्म निरीक्षण करने के बाद उन्होंने वहाँ बहुत सी चीजें बिजली पाई । इससे पता चलता था की हत्या के बाद हत्यारे ने भागने में काफी जल्दी की थी । बिस्तर के बीच एक सिर्फ पर दो भरे हुए स्कूल कारतूस मिले बिस्तर के नीचे एक खाली का तो उस पडा हुआ था । कार्टून्स का निचला पीतल का हिस्सा लाश की टांगों के बीच पाया गया । काम भी जो व्यक्ति बाहर से आया था अब बंदूक अपने साथ ही लाया था । वहाँ घर में कोई बंदूक नहीं मिलेगी । हत्यारा बंदूक अपने साथ भी गया था । बिस्तर से जो चला हुआ कारतूस मिला था उस पर जांच करने पर पता चला की वो एक विशेष से प्रकार की बंदूक से चलाया गया था । वो बंदूक पैराडॉक्स सिस्टम की थी । ऐसी बन्दों के सारे वर्मा में कुछ लोगों के पास ही थी । अमीना की हत्या इस प्रकार के पैराडॉक्स बंदूक से एक की गई थी । हत्यारा दुर्घटना के समय बहुत भयभीत हो गया था । अगर ऐसा होता तो अपने पीछे एक भी सूत्र छोडना । ऐसे ही सूत्रों से पुलिस को अपराधी का पता लगाने में बहुत सहायता में इंस्पेक्टर बहुत बडी कुशलता और चतुराई से मामले की छानबीन कि उन दिनों विज्ञान इतना उन्नत नहीं था जिससे अपराधी की खोजबीन में आसानी होती है । मनोविज्ञान का जानकार और अनुभवी भी खोजबीन करके अपराध की गुत्थी सुलझा सकता था । ब्राउन में ये सभी योग्यताएं थी । दो महीने पहले ही आमिना और आपके संबंधों के आधार पर ब्राउन का संदेह ऍफ हुआ नहीं तो कोई चीज चोरी की गई थी और ना किसी प्रकार की कोशिश के निशान नहीं मिले थे । आमिना की हत्या करने में तारीख का कोई उद्देश्य हो सकता था । ग्राउंड को और भी कई ऐसे सबूत मेरे जिससे उसका संदेह ऍफ पर बढ गया । वो ठीक है रात के लिए या वहां पहुंचा ऍसे काफी पूछताछ की और उसकी बंदूक अपने कब्जे में लेकर जांच करवाएं । साथ ही हत्या वाले कमरे में से मिले कारतूसों की भी जांच के लिए भेजा गया । बंदूको और कारतूसों की जांच करने के बाद उसका संदेह और पता हो गया । हत्या के अपराध में आरिफ को गिरफ्तार कर लिया गया । आमीन ना की हत्या से वर्मा के मुसलमानों में काफी हलचल मची हुई थी और इसकी गिरफ्तारी पर एक हंगामा समझ गया । कलकत्ता से बहुत बडे बडे आदमी आ पहुंचे । गवाहों को बिगाडने के लिए वो जी जान से जुट हैं । हजार रुपये के लालच ॅ सारे मुसलमान दो दल में बढ गए । एक दल ऍफ के हाथ में था और दूसरा उसके विरोध में । अदालत में मुकदमा चलने से पहले ही दोनों दलों में बडी गर्मागर्मी शुरू हो गई थी । गवाहों को अपनी तरफ मिलने के लिए हर तरह से दबाव डाले जा रहे थे । तहकीकात में भी अनेक अडचनें डाली जाने लगी । ब्राउन की ईमानदारी और योग्यता के कारण ही तहकीकात किसी तरह पूरी हुई । मुकदमा हाईकोर्ट में आ गया । सारा मुस्लिम समाज आमीन है या आर एफ से किसी ना किसी प्रकार संबंधित था । इन सब बातों का ये असर हुआ कि जो भी गवाह अदालत में पेश हुआ उसने या तो एकदम सफेद छूट बोला या सच्चाई को बुरी तरह उलझाकर पेश किया । पचास के लगभग गवाहों की पेशी हुई लेकिन किसी की गवाही सच्ची नहीं थी । अनुमान के आधार पर रहस्य की गुत्थी जल्द ही सुलझा सकते हैं । अभियक्त की ओर से भारत और वर्मा के नामी वकीलों ने केस लडा, फॅमिली दुखारी और आज हम जैसे बेरिस्टर आने को बचाने की कोशिश कर रहे हैं । दूसरी तरफ सरकारी वकील के साथ काम मासी जी, कोर्ट मैन और ऍम मुकदमे की पैरवी कर रहे थे । वर्मा के मुख्य अदालत के चीफ जस्टिस ऍम करने की सुनवाई कर रहे थे । हत्या का एक ही चश्मदीद के बाद वो थी आमिना की बेटे । उसकी पांच वर्षीय लडकी ने गवाही दी की उसके पिता नहीं उसकी माँ पर गोली चलाई नहीं । उम्र के लिहाज से लडकी काफी समझदार है । दिसंबर कि सर्दियों की उस जिसने उस से छोटी कोरिया को अदालत में देखा था । वो आसानी से उसकी माँ की खूबसूरती का अनुमान लगा सकता था । बच्ची ने अपनी माँ को खून भरे बिस्तर पर देखा था लेकिन दुर्घटना की गंभीरता उसके छोटे से दिमाग में नहीं आई थी । उसने सोचा कि माँ सो रही है । उस बच्ची का मौत से कोई परचेज नहीं था । मैं तो शरीर का ठंडा इस वर्ष उसके लिए अनजान था । हत्या के बाद अमीना की घरवाले उस बच्चे को अपने यहाँ लिख रहे थे । बच्चे अपनी माँ को बहुत प्यार करती थी । पिता को तो उसने काम ही देखा था । बच्ची के नाजुक दिल पर चोट ना पहुंचने के ख्याल से उन्होंने बताया कि उसकी बात जिंदा है और अस्पताल में रह रही है । उन्होंने बच्चे पर जोर डाला कि अगर वो अपनी माँ से मिलना चाहती है तो अपने पिता के बारे में उसे हर चीज बतानी पडेगी । बच्चे सीमा से मिलने को तरस रही थी । अभिभावक उस पर जो डाल रहे थे कि उसे अपने पिता के बारे में सारी बातें कहनी पडेंगे । उस दिन अदालत का कमरा खचाखच भरा हुआ था । उदास बच्चे गवाही के लिए कमरे में दाखिल हुए । हर चीज में बता चुकने के बाद वो फूट फूटकर रोने लगी । अब्बा के बारे में सब बातें तो बता दी । अब तुम मेरी अम्मी को कब छोड रहे हो । सारा वहाँ कुमार में था जैसे माँ से मिलने के लिए वो बच्ची दडब रही थी । उसको ये बता देना कितना दुखद था कि वो अपनी माँ से कभी नहीं मिल सकेंगे । उसे पता नहीं था कि उसकी माँ को क्या हो गया है । उसकी गवाही से उसके पिता का क्या होगा ये भी उस बच्ची को नहीं पता था । बच्चे की गवाही सुनकर जज ने कहा कि जो कुछ बच्ची ने बताया वो उस की समस्या बाहर की चीज है । इससे बिचारि लडकी के दिमाग में ये सब बातें नहीं आ सकती । सारी बातें इसको हटाई गई हैं । उसमें इतनी समझ नहीं थी कि जो कुछ उसने देखा और जो कुछ उसे बाद में रखवाया गया उन दोनों के बीच में कोई अंतर मालूम कर सके । उस पर उसकी अभिभावकों का दबाव रहा । उसे वो गंभीर हटा दिया गया जो उस की लडकी की सदस्य बाहर है । बच्चे को इस प्रकार सिखा देने से उसकी गवाही पर एक प्रकार का संदेह बढ जाता है । अगर अभिभावकों और अभियुक्त के बीच दुश्मनी हो तो ये बात और भी खतरनाक सिद्ध हो सकती हैं । बच्चे झूठ और सच में अंतर नहीं कर सकते हैं । इस मुकदमे में तो ये संभव भी था की बच्ची ऍम इन आधारों पर बच्चे की गवाही पर कोई और नहीं किया गया । घर के नौकर में से सबसे पहले वकील अहमद की पेशी हुई । इससे छोकरी को अमीना ने नौकर पर रखा था । वो वहाँ से अधिक परिचित नहीं था । आमिना के घर में ही उसने आरिफ को इतवार और सोमवार की सुबह देखा था । सोमवार की शाम जब हत्यारे ने दरवाजा खटखटाया उस समय वो अपनी चारपाई पर लेटा हुआ था । उसने बताया कि किसी ने बाहर की सीढियों का दरवाजा खटखटाया और किसी ने उठकर खोल दिया । जैसी और प्यारी भी उसी कमरे में थी जिसमें वो सो रहा था । इसलिए दरवाजा उसकी माल की नहीं । चुनाव का दरवाजा खुलने के बाद मालकिन और आठ घंटे के बातचीत की भनक उसके कानों में पडी थी । वो आगंतुक असर नहीं पहचान पाया लेकिन उसे वो स्वर्ण थोडा थोडा आराम से मिलता जुलता अवश्य लगता था । फिर दरवाजा बंद हो गया था । उसके अपने कमरे का दरवाजा खुला हुआ था जिसका रुख मालकिन के कमरे की तरफ था । उस कमरे की चौखट तक वो आदमी चला आया । थोडी देर रुककर वो फिर मालकिन के कमरे में चला गया । दरवाजे पर खडे आदमी की एक झलक ही उसने देखी थी । उस आदमी ने कोट पतलून पहन रखी थी लेकिन उसकी सूरत हो नहीं देख पाया । होने की कमरे में मालकिन से बातचीत करता हुआ आदमी का स्वर्ण सुनाई दे रहा था । उनमें क्या बातें हो रही थी ये उसे कुछ भी सुनाई नहीं पडा । आदमी के सर में गुस्सा भरा हुआ था एक वहाँ के उसे सुनाई दिया तो होगी या नहीं? अमीर नहीं जवाब दिया मैं बहुत कमजोर हो गई हूँ । अभी तो बच्चा हुआ है चल फिर नहीं सकती हैं आप । मैंने गुस्से में अपने पवन जमीन पर पटके, अचानक आमिना का सरगुजा खुदा खुदा फिर एक जोरदार धमाका हुआ । डर बुक वगेरह मतलब पैसे कम कर गुड बढा जैसी और प्यारी के साथ वो पिछली सीढियों से उतरकर भाग गया । वो मैं तीसरी काली में भाग गया और अपने दोस्त के घर गया और मौलवी क्यों? वो सारा किस्सा ॅ । अगले सुबह वो घर की तरफ आया । वहाँ बहुत से लोगों को देखकर वो वापस लौट गया । इससे गवाह नहीं जज के सामने अपराधी की कपडे पहचानने की हमें भरी थी । लेकिन इराक करने पर वो इन सब बातों से मुकर गया । उसने बताया कि ये समाप्ति उसने दाऊद परिवार के दबाव में कहीं । वो दाऊद परिवार में कई दिन रहा और उनसे ये बातें वही सिखाई गए । उसे ऐसा कहने के लिए धमकाया भी गया था तो रहने के बाद एक जैसी की बारी आई । वो एक अधेड उम्र कि ईसाई जरूरत थी और आया का काम करती थी । मिसेस इनमें केंद्र हैं । आमिना की बच्चे की देखभाल के लिए उसे नौकर रखा गया था । अदालत में उसने फकीर अहमद की कहानी को दोहराया । लेकिन जो ही जीरा शुरू हुई इस औरत ने एक विचित्र बात कहकर सबको आश्चर्य में डाल दिया । जैसे ने कहा, जिस रात हत्या हुई थी, मैं आमिना के घर में नहीं थी । सोमवार को शाम पांच बजे मैं छुट्टी लेकर चली गई थी । अगले दिन सुबह तक मैं नहीं छोडती नहीं । ये औरत एकदम सफेद झूठ बोल गयी । बेवकूफ को ये पता नहीं था कि उसके इस तरह मुकर जाने से मामला नहीं निपट सकता हूँ । सरकारी वकील के बराबर पूछने पर वो एकदम ढीली पड गई और फिर से फकीर अहमद कि बताए हुए कहानी को दोहराने लगें । वो इस बात पर फिर छुट्टी नहीं कि दुर्घटना सोमवार को नहीं, इतवार को घडी थे । इससे बेवकूफ और से जिला करना था । आर । एफ । अन्य संदेह सोमवार को सुबह वहीं था और इतवार का पूरा दिन भी । वो आमिना के साथ ज्यादा धमाका और बाद में इसका बाहर निकलना शुक्रवार के दिन नहीं हुआ था । फिर भी सर भारत की गवाही से किसी ना किसी केस के बहुत से पहलू प्रकाश में आ गए हैं । इसके बाद मौके पर उपस्थित अंतिम गवाही प्यारी को पेश किया गया । उसने फकीर अहमद कि बताए भी कहानी दोहराएं । उसने बताया कि आखिर कमजोर होने की वजह से वो उस आदमी को नहीं पहचान सके थे । उसे सिर्फ और सिर्फ एक टोपी नजर आई थी । उस रात जैसी भी उसके साथ थे । बावर्ची दूरी समानता अपने मकान में अलग रहती थी । वो हत्या के बारे में कुछ नहीं बता सकती थी । लेकिन उसकी गवाही से हत्या वाले दिन आरेख के मूड के बारे में पता चला । मोदी ने बताया कि मिया बीबी में समझौता हो गया था और आरिफ ने इतवार का । सारा दिन मालकिन के साथ ही गुजरा था । दो महीने के कडवे अनुभव के बाद आर एफ आमिना के बाद से क्यों लौट आया था । कारण अज्ञात था नूरी ने बिस्कुट बेचने वाले के साथ हुई घटना भी बताएँ । इससे आरएफके चिडचिडे स्वभाव का पता चलता हूँ । उन्होंने बताया कि सोमवार की सुबह खाने का वोट बिगडा हुआ था । उसने बिना वजह एबॅट बेचने वाले को लाते मारकर बाहर ढकेल दिया था । वहाँ से क्या हासिल करना चाहता था हत्या वाले दिन की सुबह को उसे इतना क्रोध क्यों चढा हुआ था । रेलवे के अंग्रेज कर्मचारी मिस्टर विलीज ने सोमवार की रात को नौ बजे आपको रंगून स्टेशन पर उतरते देखा था । उसने उससे कुछ बातें भी की थी और इसके साथ बंदूक बन नाम और एक बंडल उठाए एक दरबार भी था । उसने मंगलवार की सुबह आठ बजे इन जिनसे लडते हुए आरिफ को गाडी पर चलते हुए भी देखा था । बाद में जिला के बीच में फॅमिली ने बताया कि मिस्टर शेर मिलनेर से गवाही बदलने के लिए पैसे का लालच छोड दिया था । ऍफ को सोमवार की रात उस गाडी से सफर करते हुए देखा था । उसने बताया कि फॅसे आठ बजकर सैंतालीस मिनट पर गाडी में सवार हुआ था । अगला गवाह टिकट बाबू मिस्टर बार्टन था । तहकीकात के दौरान उसने जो बयान दिया था अदालत में आकर वो उससे मुकर गया । जज के समय उसने बताया कि उसने अपराधी को पहले कभी नहीं देखा और न ही मंगलवार के सुबह गाडी में यात्रा करते हुए देखा था । इन सब दवाइयों के खिलाफ अपराधी ने अपने बचाव में जो होता प्रतिरोध किया । उसने कहा, मैं अपनी बीवी के बाद से गया ही नहीं था । मैं उसे कैसे मार सकता था । जिस दिन उसकी हत्या की मैं उससे देने या वामा में था । दाऊद परिवार ने अपने दुश्मनी निकालने के लिए सारी गवाहियां बनाई है । इसमें इंस्पेक्टर ब्राउन का भी आता है । पैसे के जोर से और सरकारी दबाव में गवाहों से झूठी गवाहियां दिलवाई गई हैं । अपने बचाव के लिए अपराधी में चाहता वह अदालत के सामने पेश की । इनमें से दो अंग्रेज मिस्टर और मिसेज शेरविन, एक मुसलमान फॅमिली और एक गर्मी तो की गई थी । अगर अदालत ये स्वीकार कर लेती कि अपराधी हत्या के दिन या वामा में था तो उस पर हत्या का आरोप सिद्ध करना होता है । अगर हत्या के समय वो या बामा में था तो उसी समय वोट अंगूर में अठारह मुगल स्ट्रीट में कैसे हो सकता था या वामा से रंगों तक ट्रेन से पहुंचने में एक सौ सैंतीस से मिनट लगते थे और इनसी स्टेशन से आरिफ का घर का भी दूर था और एक भैया बाबा से एट अनुकूल किस तरह पहुँच सकता था । फिर फोन से निकला हुआ अफसर था । पहले वो कलकत्ता में अस्सी रुपये महीने पर मेसर्स लेकिन तो ब्लॅड कंपनी में नौकरी करता था । बाद में आरएएफ की साझेदारी में एक व्यापार चलाने के लिए आ गया । ऍफ का ख्याल लेके डेरी फोन खोलने का था । मिस्टर शेरविन उसके मैनेजर बने और सारा रुपये आ रहने लग गया । वो हत्या से ठीक नौ दिन पहले बीस अगस्त के दिन अपने परिवार के साथ रंगों चलाया था और या वावा में आरएफके घर में ही रह रहा था । शेरविन ने अपनी के बारे में बताया कि ये उनकी या बामा आने की पहली रात को डिनर के लिए आरएफ ने दो बोल क्या आपने बंदूक से मात कर लाया था? हालांकि जब जिससे जो शेरविन अपनी गवाही दे रही थी वो मुर्गियों के शिकार के बारे में बताना भूल गई थी । लेकिन इस बात का मुकदमे में बहुत हुआ था । इकतीस अगस्त को मिस्टर श्रवण ने अपराधी की बंदूक अपने कब्जे में ले ली थी । बंदों की उस हालत के बारे में अपराधी से जवाब तलब खुद करना था । शिव इनके इंसान बन्दूक की दोनों बैरलों से फाइल किया गया था और दो मुर्गियों का शिकार किया गया था । शेरविन ने बताया कि अट्ठाईस अगस्त की शाम वो आर एफ के साथ रंग बनाया था और आपने आपने भी भी और बच्चों के लिए कुछ तो खरीदे रात को वो तो वापस से या वामा लौट गया और आर एफ अठारह गूगल स्ट्रीट मेरे रहेंगे । ऍफ ने उससे कुछ कपडे लेकर अगली सुबह आने के लिए कह दिया था । सोमवार की सुबह वो कपडे लेकर अठारह नंबर भुगतान सीट में आ गया । वहाँ देखने अमीना से उसका परिचय करवाया । दोपहर की एक या दो के बीच वो और आर्इफोन क्या वामा लौट हैं? शेरविन नहीं ये आबामा में गुजारे गई । उस शाम का एक मिनट के बारे में बयान दिया या वामा लौटने पर उन्होंने चाहे पी चाय पर कुछ दोस्त और फिट हैं । उनके चले जाने पर फॅमिली डिनर के लिए ठहर गए थे । साढे सात बजे डिनर शुरू हुआ । खाने की मेज पर वो आधे घंटे तक फॅार के बाद वे सीधे नीचे ड्राइंग रूम में गपशप के लिए चले गए । शेरविन बीच में बोल उठा था लेकिन थोडी देर बाद फिर अलग है । यहाँ के बीच मिसेज शेरविन ने बच्चे के साथ ऊपर की कमरे में चलेंगे । वे काफी राहत तक बातें करते रहे और फिर सोने के लिए चले गए । वो अकेला ही सीढियाँ चढ कराया । थोडी देर बीबी के पास बैठे बातें करता रहा और सिगरेट की तरह फिर सोने के लिए चला गया । फिर से अलग होते समय उसने घडी नहीं देखी थी । लेकिन उस वक्त नौ बज कर ऍम ट्रेन की घडघडाहट उसने अवश्य सुनी थी । मिस्र शेरविन ने बताया कि उनका पति दस बजे ऊपर आया था । कमरे में लगी हुई खडी ने उस समय दस बजे ऍम प्रति के ऊपर आ जाने के बाद भी नीचे आरएफके खास ने की आवाज सुनी थी । फॅमिली आर एस से कितने बजे अलग हुई हूँ ये ठीक ठाक नहीं बता सका । उसने कहा कि डिनर के बाद रात काफी हो गई थी । उसका नौकरी तो गई लालटेन लेकर उसे घर ले जाने के लिए आया । जब वो अपने घर पहुंचा उस समय उसने जेल की नजर को दस बजे से था ऍसे शेरविन उन्होंने अपने बयान में कहा कि उस टाॅपर नीचे कमरे में ही सोया था । पहले वो अपने ऊपर वाले कमरे में होता था लेकिन मिसेज शेरविन के बच्चे के लगातार तोडने से इस की टीम ने खनन पड रहा था इसलिए वो मैच चुकी कमरे में सोने के लिए चला गया । अगले सुबह शेरविन की तीन काफी जल्दी खुल गए थे । नीचे बात हो जाते समय सीढियों में ही से उसकी भेंट हो गई थी । समय कोई साढे छह कर रहा होगा । मिस्र ऍफ से सात बजे मिली थी । ये सारे गवा यह सिद्ध करने पर तुले हुए थे कि सोमवार को दो बजे से लेकर रात के दस बजे तक आ रहे हो या वहाँ वाले अपने घर में उनके साथ ही रह रहा था । ऐसी स्थिति में आठ बज कर पच्चीस मिनट की गाडी से वो रंगून नहीं जा सकता था । दूसरे मंगलवार के स्वच्छ, स्वच्छ और साथ के बीच भी फिर दिन दंपत्ति ने आर एफ को वही देखा था । इसलिए रन से आठ बजे की गाडी से लौट का हुआ आॅफ कैसे देखा जा सकता था । दोनों तरफ की गवाहियां एक दूसरे के विरुद्ध थी । कौन सा पक्षी सच बोल रहा था? सारे मुकदमे का दारोमदार किसी निर्णय पर टिका हुआ था । बचाव पक्ष के गवाह आरएफके मित्र हैं । वहाँ से दो गवाह तो हत्या के समय उसी घर में रह रहे हैं । तो की गई आरएफके पुराने दोस्त अगर नहीं था । आलेख को बचाने में इन सबका स्वार्थ था । शेरविन दंपत्ति को तो इसके पीछे विशेष प्रार्थना । आरएसी उनको कलकत्ता से यहाँ लाया था और वे आरिफ की मेहमाननवाजी पर रह रहे थे । वो सरकारी पक्ष के जिनको आपको नहीं सिर्फ रंगों में देखा था । उन का कोई भी स्वार्थ आने से नहीं था । मुकदमे का फैसला किसी के भी हाथ में हो इसमें उनकी कोई दिलचस्पी नहीं थे । अगर बचाव पक्ष की गवाही को उच्च सीमा तक सच भी मान लिया जाए तभी तारीख की रात को डिनर के बाद आरिफ को रंगून पहुंचने में कोई मुश्किल नहीं थी । डिनर के समय को साढे सात के बजाय सात बजे का देने से सब कुछ संभव हो सकता था । आपके पास साढे आठ बजे रंगों जाने वाली गाडी पकडने के लिए एक घंटा बचता था । फिर जिन गवाहों ने नौ बजकर चार मिनट पर आपको रंगों ने स्टेशन पर गाडी से उतरते हुए देखा था वे भी सच नहीं जा सकते थे । मुकदमे में अपने पक्ष में वजन लाने के लिए सरकारी पक्ष में हथियार विशेषज्ञ की रिपोर्ट भी पेश पायर नामक विशेषज्ञ ने बंदूक की जांच की थी । अदालत में उसने बताया कि बंधु की हाल ही में सफाई की गई है फिर भी कर डाइट के कुछ निशान देख जा सकते हैं । बंदूके जांच के लिए और मेरी साॅस के पास भेजेगी । उसने भी इस बात की पुष्टि की कि बंदूक हाल ही में साफ की गई है । बंदूके फॅमिली में ही कार्य डाइट के निशान है । सफाई करने के बाद में कर डाइट के दर्शन मद्दू के दिल्ली में छह सात दिन तक बने रहते हैं । उसने बताया कि दो तीन दिन पहले इस्तेमाल की गई बन्दों को साफ करने पर भी ये दिशा रह जाते हैं । इससे गवाही से पता चला कि आरे की बन्दों से दो तीन दिन पहले ॅ फाइल की गए थे लेकिन काम और का इसके लिए आरएफ शेरविन सफाई पेश की । शुक्रवार को दोनों नलियों से फायर करके मुर्गियों का शिकार किया गया था । लेकिन विशेषज्ञ की रिपोर्ट बता दी थी कि एक ही दिल्ली में थी कॅश डाइट के निशान मिलते हैं । दूसरी नली में कार डेट का एक भी निशान नहीं है इसलिए रिपोर्ट से दोनों की सच्चाई झूठ सिद्ध हो गई । एक ही नहीं से किए गए पैसे दो मुर्गियां मारी गई लेकिन उसके बाद भी एक का दो उँगलियों से और फायर किया गया था । इस संबंध में आप अपने बचाव के लिए कोई सबूत पेश नहीं कर सका । आपके पास जो बंदूक थी, मैं ऐसे बंदो पूरी वर्मा में गिने चुने व्यक्तियों की बात हुई थी । रंगून और हनी दावा हड्डी में इस प्रकार की तीन ही बंदूके थी । ये पैराडॉक्स बंधु की कहलाती है । पीतल के स्थिति वाले का तो उस ऐसी है बन्दों को में इस्तेमाल किया जाता है । इस प्रकार की गवाहियों से मुकदमे में एक विचित्र सी सनसनी फैल गई । दोनों पक्षों की दवाइयाँ एकदम संजीवी और एक दूसरे के विरुद्ध थी । तीनों नौकर और रेलवे कर्मचारियों की गवाहियां विरोधी पक्ष के चार गवाहों से कट जाती थी । लेकिन बन्दूक की एक ही दिल्ली में कार डाइट के तीन निशान एक ऐसा सबूत था जिनसे आधे का अपराध साफ सिद्ध होता था । आमिर की मृत्यु एक गोली में हो गई थी । अच्छा की रात बंद दरवाजे पर दस्तक देने वाला व्यक्ति कौन था? दरवाजे पर खडे होकर सामना नहीं किस से बात की थी । बिना किसी विरोध के अमीर आॅन कक्ष में घुस जाने वाला व्यक्ति कौन हो सकता था? इन सवालों का जवाब मिला के बासी थे परन्तु बढ चुकी थी । लेकिन उसका चरित्र जिंदा था और उसकी चालित नहीं विशेषताएँ आसानी से अध्यात्मिक नाम बता रहे थे । वो सारे मुकदमे के दौरान किसी भी करवाने, उसके चरित्र पर एक भी छोटा उडाने की कोशिश नहीं की थी । उसका सतीत्व भीड था । लेकिन डर को बचाव पक्ष के वकील ने पकडा और कहा है जहाँ तक मेरा ख्याल है कि वो व्यक्ति इस और का प्रेमी रहा होगा । लेकिन गवाहों के बयान में इस प्रकार की कोई संकेत नहीं थी । इसलिए बचाव पक्ष के वकील का ये तर्क डिनर थक समझा गया हूँ । इतनी रात के एक दृढ चरित्र वाली स्त्री अपने पति के सिवा किसी और को अपने शयन कक्ष में घुसने नहीं दे सकते हैं । किसी प्रेमिका हो ना किसी तरह सिद्ध नहीं किया जा सकता हूँ । समझता सरकारी वकील की इस दलील में बहुत जोर था । अमीना पाक चरित्र की इस तरी थी । अंतिम घडियों में भी वो अपने चरित्र पर कायम रहे हैं । उसके भाई और अभियुक्त की गवाहियों में उसके चरित्र पर जरा भी संदेह जाए नहीं किया गया था । इसलिए उसके चरित्र पर किसी तरह के आरोप लगाना मूर्खता के अतिरिक्त कुछ नहीं था । वो जब तक जिंदा रही, एक आदर्श ग्रहण की तरह अपने सतीत्व पर कायम रहेगा, इसमें कोई संदेह नहीं था । इसलिए उस रात उसने अपने पति के लिए ही दरवाजा खोला था । तीन नौकर उस समय पास के कमरे में मौजूद थे वो ये जानती थी इसलिए उसकी तरफ से बिना किसी तरह का प्रतिवाद किए हुए शहर कच्छ में घुस जाने वाला व्यक्ति पति ही हो सकता था हूँ । अमीना एक ऐसे परिवार में पली थी जिसमें होते कडी पर्दे के भीतर रहती थी । इसलिए उससे ये आशा नहीं की जा सकती कि वह दरवाजे पर खडे हो कर इस तरह किसी अजनबी से बातें करेंगे और फिर उसे अपने शहर कक्ष में घुस रहे थे । अगर अगर तुम को उसका प्रेमी भी मान लिया जाए तो उस प्रेमी के पास उसके पति जैसे बंदूक भी होनी चाहिए थी । प्रेमिका सर उसके पति से इतना मिलता जुलता होना चाहिए था जिससे आमिना के नौकर उसकी आवाज सकते हैं । लेकिन एक भी अपनी प्रेमिका की हत्या क्यों करता था? आमिना प्रसूति कल के बाद अस्वस्थ्य अवस्था में नहीं । ऐसी हालत में कोई प्रेमी चाहे कितना भी कुछ तेजित हो, अपनी प्रेमिका की हत्या नहीं कर सकता था । किसी प्रेमी की कल्पना करना अपने आप में एक झूठी और निरर्थक बात थी । अपने पक्ष को मजबूत बनाने के लिए ही बचाव पक्ष के वकील ने ऐसी थी दलीली थी । सारे मामले का सार ये निकला कि आगंतुको उसके शयन कक्ष में दाखिल होने का अधिकार हासिल था और वो उसका पति हारी थी । हो सकता था आमेना के चरित्र में ही अपराधी का नाम घोषित पत्तियाँ जूरी के सदस्य शीघ्र ही निर्णय पर पहुंच गए और एक मत से फैसला दिया कि ऍफ नहीं आपने बदलने की हत्या की है जिसने आरिफ को फांसी की सजा का समर्थन दे दिया । तारीख को फांसी की सजा दे दिए । लेकिन हत्या का उद्देश्य क्या था? आप बिना ने अपने वकील इनसे आरिफ को नोटिस दिलवाया था लेकिन बाद में दोनों में समझौता हो गया था । बुधवार को वो अपने पति से मिली थी और दोनों एक रात साथ गुजारे भी थी । इसलिए पहले दोनों में जो झगडे हुए थे उन्हें हत्या का कारण नहीं माना जा सकता है । है ना इतवार की रात इन दोनों में कुछ ऐसी बात हुई जिससे आपको क्रोध आ गया और इसी बिगडे हुए बोर्ड में उसने उसकी हत्या करते हैं । आर्थिक कठिनाइयां भी हत्या का कारण नहीं हो सकती । आरएफ की आर्थिक स्थिति उस समय भी बहुत अच्छे थे । वो आप बिना को तलाक भी नहीं देना चाहता था । उसने अपने बीबी से अपने साथ चलने को कहा जैसा कि एक नौकर ने सुना था । इसका मतलब ये भी था की वो हत्या के इरादे से नहीं आया था । लेकिन फिर बंदूक उसके पास कहाँ से आ गई ये अब तक रहस्य बना हुआ है । मामले पर गौर करने से ऐसा प्रतीत होता है कि आप सिर्फ अपनी इच्छा के अनुसार जिंदगी बिताने वाला मनचला नौजवान था । जब उसकी बीबी ने या वहाँ वापस से चलने से इनकार किया होगा तो आपे से बाहर हो गया होगा । इसी अंधे क्रोध में उसने अभी बीबी पर गोली चला दी होगी । इससे हत्या के बारे में यही दलील दी जा सकती है हूँ ।

मुझे मत मारो चाचा

कुमारी बीना शर्मा बडे ही रहस्यमय ढंग से ना बताओ गई और उसके गूम होने के चौथे रोज उसके चाचा किदार शर्मा को अपनी भतीजी की हत्या के इल्जाम में गिरफ्तार कर लिया गया । उस समय बिना शर्मा की उम्र केवल बीस वर्ष थी और वो अपने चाचा की थी । भावक तत्व नहीं रहती थी, चाचा हैं, अभी तक कुंवारे थे और उनकी उम्र अडतालीस वर्ष थी । मैं लोग एक घने जंगल में दो फल नाम की दूरी पर बने एक बंगले में है । आपने दो नौकरों के साथ रहते थे । इस बात का पता नहीं लग पा रहा था कि आखिर ऐसी क्या बात हो गए हैं जिससे कि चाचा को अपने भतीजे की हत्या करनी पडी । कुछ महीने पहले जब बीना शर्मा के मामा उससे मिलने के लिए उस मकान में गए थे तो केदार शर्मा वहाँ से चुपचाप खिसक आए थे और बाहर सडक के किनारे खडे होकर उनका इंतजार कर दे रहे थे । जब बीना की मामा उस से मिलकर लौटे तो किदार शर्मा ने उन्हें रास्ते में रोककर कडी शब्दों में फिर कभी ना आने की चेतावनी दी । वो अपनी एकमात्र भतीजी पर कडी निगाह रहते थे और उन्होंने उसे बाकी के सभी रिश्तेदारों से एकदम अलग रखा था । बीना को माँ देने के पीछे के राज शर्मा का एक बडा देख था क्योंकि शादी से पहले बिना की मृत्यु हो जाने पर उसकी सारी जायदाद का मालिक उन्हें ही होता था । केदार शर्मा पर अपनी भतीजी की हत्या करने के इल्जाम में चलाए जाने वाले मुकदमे नहीं । शहर में असाधारण सनसनी फैला दी । दो दिन की सुनवाई में केदार शर्मा के खिलाफ एक जबरदस्त मुकदमा तैयार हो गया था । बहुत से गवाह ने निम्रलिखित कहानी अदालत को सुनाई । कुमारी बीना शर्मा पंद्रह वर्ष की थी जब उसके पिता की मृत्यु हुई । वो एक उद्योगपति था । उसकी लाखों की ज्यादा कि मालिक उस की एकमात्र संतान बीना बनी । छोटे भाई केदार शर्मा को बिना का अभिभावक और उसकी वसीयत का एक्सॅन होना था । वसीयत में आगे लिखा था कि बिना के शादी के दिन किताब शर्मा का अभी भी वक्त तो समाप्त हो जाएगा और वो स्वयं ही पूरी ज्यादाद कि मालिक हो जाएगी । और अगर एक शादी से पहले ही बीना की मृत्यु हो जाती है तो सारी जायदाद का मालिक एक किताब शर्मा और उसके उत्तराधिकारी हो जाएंगे । बीना की मृत्यु के बाद केदार शर्मा बिना के पास रहने चलाया जब केदार शर्मा अपनी भतीजी के पास रहने है । या तो कुछ रिश्तेदारों ने भी ना गोल इशारा भी किया था कि उसका उसके साथ रहना उचित नहीं है । इसी तरह तीन साल बिना किसी खास घटना की उम्र है बिना अठारह वर्ष की थी । उस की शादी के लिए बहुत से प्रस्ताव है लेकिन केदार ने सबको यह कहकर ठुकरा दिया कि लडका बीना की योगी नहीं है और वह स्वयं अपनी भतीजी के लिए कोई अच्छा हुआ तलाश कर रहे हैं । इन परिस्थितियों से ये परिणाम निकला कि केदार शर्मा भी ना की शादी करने के पक्ष में नहीं था । इसके विपरीत जब कोई व्यक्ति उससे बिना की शादी के बारे में बात छेडता था तो वो उस पर नाराज हो जाता था । एक रोज शाम को वह समय से पहले घर लौट आया और उसने बिना को बाग में एक युवक से सटकर खडे देखा । वो लोग अपनी बातों में इतने डूबे हुए थे कि उन्हें अचानक उसकी वहाँ जाने का पता भी नहीं चला । वो तेजी से उनके पास आ गया और कडी आवाज में बिना को घर के अंदर चले जाने का खुद को दिया बिना चली गई । फिर उस नौजवान से पूछताछ की गई बसंतकुमार उसका नाम था । उसने अभी अभी इंटेंसिटी से डॉक्टर की परीक्षा पास की थी । वो बिना से शादी करना चाहता था । बिना भी राजी थी वो दोनों पिछले कई अब तो उसे आपस में मिल रहे थे । चाचा को पता चला तो उसकी आंखों में खोल बनाया । उसने बसंत कुमार को डाट फटकार करने का दिया और साथ ही धमकी दी कि फिर कभी इधर का रुख किया तो खैर होगी । इससे घटना के एक सप्ताह बाद केदार ने जंगल के किनारे एक मकान किराए बाल ले लिया और बिना तथा दो नौकरों के साथ तो वहाँ रहने चला गया । सभी ओर बेतरतीब झाडियां और ऊंचे सघन पेडों से घिरा हुआ था । मकान से दो फर्लांग की दूरी पर पश्चिम दिशा में एक घना जंगल था । इस मकान में आने के थोडे दिन बाद ही पीना लापता हो गई । उसकी तलाश की पता चला कि गूम होने वाले दिन वो अपने चाचा के साथ जंगल में गई थी । लेकिन जब वो लौट तो अकेला था बिना उसके साथ नहीं । इससे घटना की केवल एक दिन पहले डॉक्टर बसंत कुमार को उसके पास देखा गया था । नौकरियों में से एक नहीं शपथ लेकर कहा कि उसके गूम होने वाले मनोज दिन बीना ने डॉक्टर बसंतकुमार के साथ शादी करने के दृढ निश्चय की घोषणा कर दी थी और इसके उत्तर में उसके चाचा ने बडे जोरदार शब्दों में इस शादी का विरोध किया था । एक ग्रामीण बुढिया ने कसम खाकर कहा कि जिस दिन वह युवती लापता हुई उस दिन मैं जंगल में लकडी बीनने गई हुई थी और शाम को लगभग पांच बजे जब अपने घर लौट रही थी तो मेरे गांव में कहीं से ये शब्द बडे मुझे मत मारो चाचा मुझे मतलब तभी बहुत ही नजदीक बंदों की आवाज और उसके साथ ही एक औरत की चीज सुनाई दी जो पूरे जंगल में को छुट्टी थी । इसके बाद वो बडी तेजी से वहाँ से भाग गई थी । ये सब बात थी जो इस्तगासे से अभियुक्त केदार शर्मा के खिलाफ मुकदमे में प्रमाण शुरू पेट की थी । हत्या का उद्देश्य स्पष्ट था और परिस्थित जन्म प्रमाण भी मौजूद थे । इन सब बातों ने केदार का संबंध अपनी भतीजी की हत्या से जोड दिया लेकिन पुलिस की पूरी पूरी कोशिश के बावजूद बिना की लाश प्राप्त नहीं की जा सके । ऐसा लगता था कि डॉक्टर बसंतकुमार भी हत्या के दिन या उसके आसपास ही लापता हो गया था । अब अभियुक्त की बारी थी की वो अपने सफाई में कुछ कहे । उसने सफाई देने के लिए मुकदमे में कोई वकील नहीं किया था । उसने कहा था कि आपने सच्चाई और मेरे गुना ही साबित करने के लिए मुझे किसी की मदद नहीं चाहिए । मेरी सहायता तो ईश्वर ही करेगा जो सब कुछ जानता है । इस वजह से उसने अपने पक्ष में कोई गवाह भी पेश नहीं किया था । उसने राहत सर में कहा कि उस दिन वो बिना के आग्रह करने पर जंगल में उसके साथ घूमने गया था । उन्होंने वहाँ क्या किया था या किससे विषय पर बात चीत की थी । ये सब बनाने के लिए तैयार नहीं था । उसने अपनी बात को आगे बढाते हुए कहा कि हमारे बीच जो कुछ हुआ जो बातचीत हुआ एकदम घरेलु और व्यक्तिगत थी । बाद में जब भी लोग घर लौट रहे थे तो बिना सुक्ति से उसके पीछे पीछे आ रही थी और जैसे ही वो हुई उसने उसे जंगल में चारों को तलाश किया लेकिन वो कहीं नहीं मिली । उसने भर रहे हुए गले से अपनी बात खत्म करते हुए कहा कि उसे पता नहीं की भी रात इस समय कहाँ है । क्या उसके साथ क्या कुछ गुजर रही हैं । ये ही वो बाते थी जो अभियुक्त अच्छा जाने, अपनी सफाई के तौर पर कहीं और उसकी सफाई, एकदम सत्य और असम बहुत कहकर रद्द कर दी गई क्योंकि बिना कि बहुत से होने वाला फायदा बहुत शक्तिशाली कर रहा था । जब किदार शर्मा को फांसी की सजा सुनाई गई तो उसका लम्बा तगडा जिसमें तरह से घट गया और उसके दिमाग की नसें जिससे पडने लगी । बडी बडी आंखि एक और दूसरी ओर घुमाने लगी और अंततः चर्च पर जाकर ऍम नहीं नहीं मैं अपनी भतीजी की हत्या नहीं, मैं उसे प्यार करता था । मैं उनसे प्यार करता था हूँ । इससे पहले वो अपना हुआ के खत्म कर पाता से अदालत के कटघरे में से हटाकर वापिस जेल भेज दिया गया था । एक हफ्ते बाद जब केदार शर्मा ने मृत्युदंड के विरूद्ध कोई अपील नहीं की तो उसे फांसी दे दी गई और उसकी लाश लेने वाला कोई नहीं था । इसलिए जेल के अधिकारियों ने उसकी अंतिम क्रिया कर दिया । किदार शर्मा को फांसी दिए जाने के बारे में दिन बिना बाल चंद्रा एक्शन लौटी तो सभी लोग आश्चर्यचकित रहेंगे । बिना के साथ डॉक्टर बसंत कुमार भी था । अधिकारियों को ये जानकर बडा धक् गलत । अगले एक मेघना आदमी को फांसी दे दी गई थी । पता चला की गवाह होने जो कुछ कहा था वो सब सच था । बिना युवक डॉक्टर के प्रेम में पड गई थी और उसने उसके समक्ष शादी का प्रस्ताव रखा था । नहीं जाने क्योंकि दार शर्मा को डॉक्टर पसंद नहीं है इसलिए उसने उस शादी पर आपत्ति बिना की अरुणाय विनय, क्रोध और झगडों ने उसके चाचा को इस शादी के मामले में और अधिक कठोर ही बनाया । जब वे लोग जंगल के पास वाले मकान में आपकी रहने लगे तो उसके लापता होने के एक दिन पहले डॉक्टर उससे मिला और उन दोनों ने मिलकर ये फैसला किया कि अगले दिन शाम को दूसरे शहर आना चाहिए और वहाँ जाकर शादी करते हैं । जंगल के किनारे बने एक टूटी के मकान में अगले दिन मिलना किया गया । उस दिन दोपहर के खाने के बाद उसने खुद ही चाचा से कहा कि जंगल में घूमने चले हैं । चाचा बडे बेमन से माना था । शाम को वो लोग जंगल में यूँ ही इधर उधर घूम रहे थे तो उसने बीना से कहा कि बसंत से शादी करने की बात है, छोटे हैं । काफी बहस के बाद उसने कुछ गर्मी के साथ कहाँ था । मैं अपना फैसला कर चुकी हूँ । अगर उससे शादी नहीं करती तो ये मेरी मौत होगी इसलिए मुझे मत मारो चाचा पूछे हो । जैसे ही उसने ये शब्द कहे का नजदीक से जोर से बंदूक रखने की आवाज आए । इससे बिना के बहुत से चीज हो गई और फिर थोडी ही देर बाद पेडों के बीच से अपने हाथ में एक जिंदगी चिडिया लडका ये आधा एक शिकारी दिखाई दिया । उसने अभी अभी अपनी बंदूक से एक की चिडिया मारी थी । केदार और बिना जब लौट रहे हैं तब निश्चित मिलन स्थल के नजदीक पहुंचने पर बीना ने चाचा को आगे चले जाने दिया और खुद खिसककर निश्चित स्थान पर पहुंच गई । जहाँ डॉक्टर पहले से ही इंतजार कर रहा था फिर वो दोनों एक दूसरे शहर चले गए थे । वहां पहुंचकर वो एक मकान में रुके और उसी दिन उन लोगों ने अपेक्षा नहीं करें और लगभग एक हफ्ते में वे हम वो तो प्रमोद के लिए यात्रा पर निकल पडे और हनीमून के तौर पर उन्होंने देश के विभिन्न हिस्सों की यात्रा की । जब वे अपनी यात्रा से लौटे तो उन्होंने उस दुर्भाग्य के बारे में सुना जो उनकी लापरवाही और प्रमाण के कारण उन के चाचा पर टूट पडा था । बिना नहीं सकते हुए कहा, मेरा चाचा तो मुझे ज्यादा खरोच भी नहीं मार सकता था । वो मुझे अपनी सगी बेटी की तरह प्यार करता था हूँ ।

मैं निर्दोष हूं

ये एक असाधारण मुकदमा है । मिलावट सरकारी वकील कह रहा था जो लोग इस मामले में फंसे है और जिस से नहीं हंसता से अपराध किया गया है । इस सब को देखते हुए इसे एक आम हो कमा नहीं कहा जा सकता है । मृतक मनमोहन जरा एक बडा जमीदार था । दिन्दू अभियुक्तों को अदालत के सामने पेश किया गया है । उनमें से एक उसकी पत्नी है । इस पर जिस हत्या का आरोप लगाया गया है वह सोलह जुलाई उन्नीस सौ इक्यावन को मुश्किल पुरा में रात डाली हुई थी । गर्मियों में कुंवर विक्रमसिंह वही रहा करते थे । दूसरा अभियोगी उसे ही मुख्य दोषी कहना चाहिए क्योंकि हत्या उसी के आप हो गई थी । रंजीत सिंह है । वो मृतक का चचेरा भाई है तो आरोप पक्ष यह प्रमाणित करना चाहता है कि उसने न केवल अपने भाई की पत्नी का अपहरण किया बल्कि उसके साथ मिलकर उसकी पति को मार देने का षड्यंत्र भी रचा हूँ । आरोप पक्ष का मुकदमा संक्षेप में इस प्रकार है कुमार विक्रम सिंह बहुत क्रोधी स्वभाव का व्यक्ति था । अमित शाह शराब और और तो के फेरे में रहने वाला । इसलिए पति पत्नी के बीच खाई धीरे धीरे बढती गई । उसने बदनी पर अत्याचार करना शुरू कर दिया । पिछले कुछ वर्षों से उन दोनों के संबंध बहुत बिगड गए थे । जब पति पत्नी का ऍसे चरम सीमा पर था तब रंजीत सिंह ने उनके घर में आना जाना शुरू कर दिया और धीरे धीरे इसके साथ कलावति मृतक की पीडित पत्नी की बहुत घनिष्ठता हो गई । आरोप पक्ष को पता चला है कि इस दुर्घटना से कोई दस दिन पहले मामला एकदम बिगड गया था । मुझे पुरा में कुंवर विक्रम सिंह ने सबके सामने अपनी पत्नी को थप्पड मार दिया । कहते हैं बात बिल्कुल मामूली थी । उस समय रंजीत सिंह भी वही था । कलावति इस अमानवीय व्यवहार को अब अधिक नाक से सके और उसमें रंजीत सिंह से मिलकर इससे दुखदायी व्यक्ति को अपने रास्ते से हटाने की योजना बनाई । युवान अगर हमारा ख्याल है कि इसका एक कारण और भी था उसे मारने से न केवल कलावति को पीडा से मुक्ति मिलती बल्कि वो दोनों कलावति और रंजीत सिंह प्रेम के रास्ते पर भी रुक तो चलने के लिए स्वतंत्र हो जाते हैं । जब सरकारी वकील ने पुराने हिमाचल प्रदेश के महसूस नगर के स्टेशन जज के सामने ये मुकदमा बेहोश किया तो जिम्मेदार हूँ अन्य धनि व्यक्तियों से खचाखच भरे कोर्ट रूप में सन्नाटा छा गया । अपराध का उद्देश्य और षड्यंत्र रचना में ये मुकदमा रानी झांसी के से बहुत कुछ जानता चुका है । घटना या उन कामना, क्रूरता, व्यभिचार यानी वो सब बातें, जिनसे कोई भी हत्या, सनसनीखेज और रहस्य नहीं बन सकती हैं, इस अपराध के पीछे थी । इस क्रूर हत्या की पूरी जानकारी के लिए काफी पुरानी बातें दोहरानी होगी, क्योंकि इस हत्या का बीजारोपण तो लगभग दस साल पहले हो चुका था । सोलन पुलिस थाने के अंतर्गत कुठार के राणा का भतीजा कुंवर विक्रम से काफी धनी जमीन था । उसका रोग तभी था, उसमें वो सभी बातें थी, जो एक सामंतवादी जमीदार नहीं होनी चाहिए । उदंडता, अहंकार और न जाने क्या क्या । वो फिर घर से बाहर रहा करता था । जिंदगी को अपने ही ढंग से जीने की आदत थी उसे अपने मन मुताबिक चलने लैग, पैसा और अहंकार दोनों ही चीजें । काफी मात्रा में उसके पास विवाह उसके लिए कोई पवित्र बंधन नहीं था । बंधन के नाम से ही उसे घृणा थी । नाडी उसके लिए केवल एक क्रय विक्रय की चीज थी । जब वो शिला पीता तो उसके रन धन अपने पूर्वजों जैसे हो जाते हैं । उसके पूर्वज उसी वर्ग के प्रतिनिधि थे, जिसने अपने ऐशोआराम के सामान जुटाने के लिए बुरी तरह से किसानों का शोषण किया था । गुंडागर्दी करना और औरते रखना यही विक्रम सिंह का काम था । होने से इकत्तीस में अपने कुल की परंपरा के अनुसार उसने कुमारी कलावति से विवाह किया । वो उस समय सत्रह साल की रही होगी । वो नालगढ के सुरगी राजा की एक हवा से पैदा भी लडकी नहीं है । छरहरे बदन की और बहुत खूब सारा गेहूं रंग और मान फुसलाने वाला लक्ष्य । लेकिन उसका पति अधिक दिन इससे मादक सौन्दर्य के बंधन में नहीं रह सका । विक्रम सिंह जल्द ही उससे गया । ये उसके लिए केवल बच्चा पैदा करने की मशीन भर बंद कर रहे हैं । आनंद बनाने, गुलछर्रे उडाने के लिए उसने कोई और जगह तलाश कर रहे हैं । उससे कलावति के चार बच्चे भी हुए लेकिन उसका प्रेम होना पा सकें । उसका एक बच्चा इससे दुर्घटना से पहले मर गया था । गहन ही उदासीनता अत्याचारपूर्ण व्यवहार से उनमें वेडनस की भावना इतनी बढ गई कि लगा शायद उन में कभी प्रेम हुआ ही नहीं था । जुलाई उन्नीस सौ सैंतालीस में एक दुखद घटना से ये दूरी और बढ रहे हैं । भावी दुर्घटना के आधार बनने लगे कलावति ने पुलिस थाने में अपने पति के विरुद्ध रिपोर्ट दर्ज करा दी कि उसने बच्चों को मारने की तब की थी । पुलिस ने जांच की और परिणाम स्वरूप विक्रम सिंह के हथियार जब्त कर लिए गए । उसका हथियारों का लाइसेंस रद्द कर दिया गया । कलावति ने इस बात की भी अर्जी दी की जमींदारी की देखभाल कोर्ट ऑफ वर्ड्स अपने हाथों में ले लें । मृतक ने अपने भाई बलबीर सिंह के लिखे पत्र में इससे घटना की पुष्टि की थी । मांॅ मेरे भाई आशा है तो सब ठीक होगे । मैं पांच छह दिन पहले यहाँ पहुंचा हूँ । तुम्हारी भाभी नालगढ चली गई । जरा सी बात पर झगडा हो गया । उसने यहाँ तक कह डाला कि मैं पिस्तौर से बच्चों को मारना चाहता था । अब तो भी सोचो कौन बेवकूफ अपने बच्चों को मारना चाहेगा । अगर मैं ऐसी बात कहता भी तो शायद तुम्हारी भाभी को भले ही कह देता । पर सोना पुलिस थाने में रिपोर्ट भी दर्ज करा दी गई है । हम दोनों के बयान कलमबद्ध कर लिए गए हैं और फिर रानी साहब आप से नालगढ ले गई । मैं के बाद सोनल जाऊंगा । तुम्हारी बाहर ही नालगढ में ही रह रही है । नाहरगढ जाते समय उस एक विद्यालय पर दूसरा ताला ठोक दिया । सबका उसी हमीरसिंह का है । इन बातों से कट टूटा घटने की बजाय और बढेगी मैंने ताला तोड दिया है । खैर तुम्हें भी सारी बातें पता चल जाएगी । सारा मामला सामने आ जाएगा । अब मैं उसे अच्छी तरह सबका पडा होगा । उसने तो सारे मामले को मजाक समझ रखा है । विक्रम सिंह पत्र में लिखा हुआ था इस गंभीर घटना के बाद दोनों ने कभी भी एक दूसरे के निकट आने की कोशिश नहीं । ऐसे बिगडी हुई स्थिति को और बिगाड के लिए रंजीत सिंह भी घृणा और ऍप्स से टूटे उससे परिवार में मौजूद होगा । लगभग परित्यक्तता कलावति में रंजीत सिंह ने प्रतिदान का संकेत पाया और वह निर्मोही होकर आगे बढ गया । देखने पालने में अच्छा था । कलावति से चार साल छोटा था । कलावति जिन परिस्थितियों के शिकार थी उनमें रंजीत सिंह उसे बहुत आया । उसमें वो सभी बातें मौजूद थे जिनकी कल्पना कभी उसने अपने पति में की थी । रंजीत किया है वर्ष शुक्रनीति दबी दबी इच्छा है फिर से सिर उठाने लगेंगे । शुरू शुरू में रंजीत उसका ऐसा अकेला मित्र था जैसे वह थोडी बहुत सहानुभूति की आशा कर सकती थी । पर धीरे धीरे रंजीत सिंह का आना जाना बढा और विक्रम सिंह की अनुपस्थि थी । वो अक्सर आनंद बनाने के लिए बाहर ही करता था । ऐसे में कलावति की दृष्टि की मांग सहानुभूति के बजाय प्यार बढता है । उसके पति ने तो हमेशा उसे ये अधिकार देने से मना किया था । वो जानती थी कि ऐसा करके वो बाप कर रही है लेकिन उसे ये भी पता था कि यही आप प्यार भी हैं । उनके इस अनैतिक संपर्क के संबंध में आरोप पक्ष ने प्रत्यक्षदर्शी गवा प्रस्तुत नहीं किया क्योंकि व्यभिचार का प्रत्यक्ष प्रमाण प्राप्त करना अगर असंभव नहीं तो कठिन अवश्य होता है । लेकिन उनके सभी संबंधियों ने इस बारे में अपना अपना शक अवश्य बताया । विक्रम सिंह का भाई बलवीरसिंह उसके मृत्यु पिता के रखे है । द्रोपदी कलावधि की बहन और बलबीर की पत्नी मान प्यारी और अन्य व्यक्तियों ने जो आरोप पक्ष की ओर से गवाही देने आए थे, अपना संदेह बताया कि उन दोनों का व्यवहार देखने से ऐसा लगता था कि उनमें ऐसा संबंध अवश्य है । इतना ही नहीं उनमें से बहुतों ने इस संबंध में विक्रम सिंह को चेतावनी तक दे डाली थी । अपनी स्वीकरोक्ति में दोनों अभियुक्तों ने पारस्परिक अनैतिक संबंध की बात मान ली थी । पति पत्नी का आपसी झगडा या बिगडे हुए संबंध समझौता एक हत्या का उद्देश्य नहीं बन सकते हैं । लेकिन जब किसी तीसरे व्यक्ति का बीच में प्रेम आ जाए तो हत्या का उद्देश्य काफी सब हो जाता है और इससे मामले में भी तीसरे व्यक्ति का प्रेम बीच में आया था । अगर कोई पत्नी इस आधार पर अपने पति के विरुद्ध पुलिस थाने में रिपोर्ट दर्ज कराए । केस ने बच्चों को मारने की धमकी दी है । जब की वो दोनों एक सम्मानित परिवार से हैं और उसके परिणामस्वरूप पति के हथियार जब्त कर लिए जाए तो यही समझा जा सकता है कि उनका दांपत्य जीवन बहुत कलापूर्ण है । कलावती ने बताया कि विक्रम सिंह ने उसे मारने की धमकी दी थी । अपनी स्वीकरोक्ति में उसने निरंतर अत्याचार के आरोप भी लगाए हैं । विक्रम सिंह द्वारा अपनी पत्नी को सबके सामने थप्पड मारने की घटना उस अमानवीय व्यवहार की एक के चरम सीमा थी । अब पंद्रह जुलाई होने सुबह क्या उन की बात की जाए । विक्रम सिंह के बच्चे सबसे छोटे के अलावा और कुमार बलबीरसिंह बनमा जरा गए थे । बलबीर की पत्नी मान प्यारे कुठार के राणा के यहाँ नहीं हुई थी । विक्रम अपने मकान की खुली छत पर चारपाई पर सो रहा था । उसके पडोसी कलावति कि चल भाई पीछे थी कि नौकरानियां बीस तीस वर्ष जहाँ मोहंती बारा वर्ष और शीला दस वर्ष भी वही सोच रही थी । नौकर मुख्यद्वार के बाहर हो रहे हैं । दरवाजा बाहर से बंद था । शाम के उमस के बाद अब ठंडी हवा बह रही थी । दो बज चुके थे । सब तरफ सन्नाटा था । कुत्तों का भूख ना भी धर्म चुका था लेकिन कलावति की आंखों में नहीं नहीं । अचानक किसी की आवाज से डिब्बे की नींद खुल गए । उसने देखा की एक काली छाया तेजी से उसे चारपाई के पास से तो सिर्फ छाया के दायें हाथ में कोई चमकदार चीज थी । वो छाया भागती हुई छत के किनारे पहुंचकर अदृश्य हो गयी । भंजाने भय से होकर भी बैठी रहेगी जी भी न सकें । काफी कोशिश करके वह चारपाई से उठी बहुत अलग के कदमों से छत के किनारे तक आएँ और नीचे सोते हुए नौकरों को जोर से आवाज लगाई गिरना बडे इस भय से उसने फॅमिली तभी उसने देखा की एक सीढी दीवार के सहारे टिकी नहीं वो पहचान जब ऊपर की मंजिल में रसोई घर बनाया था तो उसी सीढी का इस्तेमाल किया गया था । अब वो बुरी तरह काम रहे थे इसलिए नहीं कि अकस्मात एक काली छाया देखकर वो डर गई थी बल्कि इसलिए कि उसने उस व्यक्ति को पहचान लिया था । वो बडी और विक्रम सिंह की चारपाई की ओर देखने लगे । उसका मालिक के बाल छत पर पडा था । उसकी घबराई दृष्टि कलावति की चारपाई पर भी पडी । वो खाली थी । अब उस की हिम्मत नहीं बिल्कुल जवाब दे दिया । वो बडी और दौड कर बात के कमरे में घुस गए तो कभी किसी ने उसे पकड लिया । वो उसकी मालकिन थी गलावटी जो जोर से सांस लेते थे । सिब्बी ने बताया कि मालिक फर्श पर बडे हैं । शायद मर चुके हैं । उसमें उस काली चाय के बारे में भी बता दिया कि वह रंजीत सिंह था । इस नाम पर कलावति एकदम कपडा गई और फिर शिव जी का हाथ पकडकर उसे जोर से जब छोड दिया बिल्कुल बनाऊँ । उसने उसे सख्ती से डाल दिया । तुमसे जरूर गलती हुई थी । बेवकूफ वो रंजीत सिंह नहीं हो सकता हूँ कि उन्हें डाकुओं में से होगा जो उसे कलावति को वो जबरदस्ती नीचे ले आए थे और उसके जेवर छीन कर चलते बने थे हैं । उसने सिर्फ को समझा बुझा दिया भी उसे घूमती रही । आखिर वो कर भी क्या सकती थी । वो सिर्फ एक मामूली नौकरानी थी । वो समझ के एक से ये बात अपने तक ही रखनी थी । उसने किसी से कुछ नहीं कहा । जल्दी ही सब लोग जाकर तेज आवाजों और दौडते हुए कदमों की आहट से रात की नि स्तब्धता बंद हो गए । जब नौकर और आस पास के दूसरे लोग छत पर पहुंचे तो शिव जी ने बताया कि उसने एक आदमी को भागते हुए देखा था । उसने उसका नाम नहीं बताया । कलावति ने शिव जी की सुनाई कहानी दोहरा दी । सब ने उससे कहा कि वह जरा जाकर देखे तो सही की उसके पति को क्या हुआ लेकिन वो दस से मसला हुई । सब लोग विक्रम सिंह के पास है । लेकिन अब उसे किसी की सहायता की जरूरत नहीं । वो बढ चुका था । शोरगुल सुनकर कुठार का दुकानदार लायक राम वहां पहुंचा था । उसने दो आदमियों को बिशनपुरा की पुलिस चौकी में खबर करने के लिए भेज दिया । वहाँ हेडकांस्टेबल नरसिंहदास ने आम डायरी में नोट कर दिया । रिपोर्ट में लिखा था कि रात चार बजकर दस मिनट पर सहाय दूर चमान ने खबर दी कि बिशनपुरा में डकैती हो गई । कुंवर विक्रम सिंह की हत्या हो गई है । पुलिस को जल्दी ही घटनास्थल पर पहुंचना चाहिए । हेड कांस्टेबल ने घटनास्थल पर पहुंचकर कलावति से पूरी घटना मालूम कर लूँ । उसने उससे दुर्घटना का विवरण देते हुए शुरू में सूचना देने वाली कलावती के बारे में लिखा था कि उसके परिवार के सदस्यों के बारे में सूचनाएं थी और फिर घटना का विस्तृत विवरण था । विस्तृत विवरण में लिखा था कि रात को करीब नौ बजे कुंवर विक्रमसिंह कुठार के राणा के पास से लौटा । वो कलावति और नौकरानियां छत पर सोने चलेंगे । पास में ही नहीं कीर्तन हो रहा था । इस वजह से कलावति को दो बजे तक नींद नहीं आई । बाद में उसे एक सिखने लगाया और शादियां देने के लिए मजबूर किया । उसके बाद वो सिख और एक बाहर डी से निचली मंजिल पर लिया हैं । जब लोगों से नीचे ले जा रहे थे तो उसने देखा कि कोई एक व्यक्ति उसके पति की चारपाई को दोनों हाथों से था में हुए था । वो ये नहीं बता सके कि वह व्यक्ति उसका पति था या कोई और । निचली मंजिल में उसने पांच छह डाकुओं को देखा । वे उसे एक कमरे में ले गए और संदूकों से देवर और कपडे निकाल नहीं । तभी उसने छत पर झगडने की आवाज नहीं । उसके बाद सब डाकुओं इधर उधर बिगड रहे हैं । लगभग पंद्रह मिनट बाद जब लोग आए तो वो ऊपर हैं । वहाँ उसका पति चरपाई के पास से मरा पडा था । रिपोर्ट में उसने हीरे जवाहरातों के बत्तीस चीजों के नाम के रहते हैं जिन्हें उसके अनुसार डाॅॅ रिपोर्ट में उससे सिख का हुलिया भी बताया गया था लेकिन वह रंजीत सिंह से बिल्कुल अलग था । मनमोहन जरा का जिम्मेदार कौन से लगभग पडा था । खून, गर्दन, सिर और मोहन लगे गहरे गांव से निकला था पर पडे खून से जिसमें कुछ बाल भी थे ये पता चलता था की हत्या सोते हुए की गई थी । इससे दुखद दृश्य से मजबूत हेड कॉन्स्टेबल तक का दिल मिल गया । इतना खून फैला था की बस आदमी के शरीर में इतना खून हो सकता है इसकी कल्पना लोग जरा मुश्किल से ही कर पा रहे थे । कुठार के राणा के महल से टेलीफोन द्वारा सोनल पुलिस खाने में खबर दी गई । एक बजे सब इंस्पेक्टर पृथ्वी राम और डॉक्टर ज्योति प्रसाद घटनास्थल पर पहुंचे । इससे पहले हेड कांस्टेबल को उस मकान से लगभग तीन फर्लांग की दूरी बनाने के किनारे एक तलवार की बयान पडी मिली । सब इंस्पेक्टर के आने के बाद पुलिस के डिप्टी सुपरिटेंडेंट ठाकुर जगह सिंह की देख रेख में जांच पडताल का काम तेजी से शुरू हुआ हो । तारीख को एक नाले के पास पत्थर के नीचे से सनी कमी और जाकिया मिला । एक खेत से पगडी भी मिल गई । उन कपडों के खिलाफ धूम इन्हें रंजीत सिंह का बताया गया । इधर इन चीजों के खिलाफ हुई । उधर मृतक के संबंधियों ने भी रंजीत सिंह के बारे में अपना संदेह बताया । पुलिस को उस पर शक हो गया । बाइस तारीख को बंसल डेरा में रंजीत सिंह के मकान की तलाशी ली गई और पुलिस ने कुछ खत्म अपने कब्जे में ले लिए हैं । कुठार में उसे गिरफ्तार कर लिया गया । गिरफ्तारी के फौरन बाद पुलिस की लगातार के सामने वो टूट गया । वो डाॅट को विक्रम सिंह के मकान से कोई दस कदम की दूरी पर उठी झाडी के पास ले गया और वहां से एक तलवार निकालकर पुलिस को भी दे दें । उस पर लगा खून सूख गया था । छब्बीस तारीख को पुलिस ने विक्रम सिंह के घर की तलाशी में कुछ कपडे और रंजीत सिंह का फोटो बरामद किया । वो लोग कलावति को सोना ले आए । अगले दिन से अपने पति की हत्या के आरोप में गिरफ्तार करके सोनल के प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट की अदालत में रिमांड के लिए पेश कर दिया गया । वहाँ वहाँ हैरान परेशान हो बनाया । न्याय के सामने खडे थे । अपराध का बहुत से परेशान कर रहा था । उसके चेहरे पर दुख की घनी छाया थे । फिर अचानक पलभर में जैसे उसका आवरण हट गया । मैं अपराध स्वीकार करना चाहती हूँ । वो ऍम मजिस्ट्रेट ने उसे थाने वापस से भेज दिया । कहाँ की वो अपने को स्थिर करने का प्रयत्न करें ताकि अगले दिन सुबह उसकी की रोटी ऍम अट्ठाईस तारीख की सुबह उसकी क्योंकि रोकते लिख लिख नहीं । उसने बताया की रंजीत सिंह ने पहले उसके पति के साथ घनिष्ठता बढाई और फिर उसके साथ भी खुलने मिलने लगा । उसने ये भी बताया कि रंजीत सिंह और फिर उनसे पति की खोज से बचाया करता था । उसने बिना किसी हिचकिचाहट के ये भी बता दिया कि किस तरह हरिद्वार में उनका अनैतिक रुपया शुरू हुआ था । विक्रम सिंह उस पर जिस तरह अत्याचार करता था उससे रंजीतसिंह अक्सर विक्रम को मारने की बात सोचा था । उसने ये भी स्वीकार किया कि उसके पति को उन दोनों के संबंधों पर संदेह होने लगा था । उसने कहा कि बाईस जून और आठ जुलाई में सौ इक्यावन के बीच रणबीर सिंह बिशनपुरा में उनके साथ रह रहा था । इन्हीं दिनों में से एक दिन छह जुलाई को विक्रम सिंह ने सबके सामने कलावधि को तप्पड मारा था । वो इस असहाय पीडा को अधिक करना रह सके और उस घटना के फौरन बाद उन दोनों ने मिलकर विक्रम को मारने की योजना बनाई । बडी सावधानी से योजना तैयार हुई कि या तो जीत सिंग खुद हत्या करेगा अथवा किराये के आदमियों से वो ये काम करा देखा । इस बात की योजना बहुत सावधानी से बनाई थी कि सोते हुए विक्रम सिंह की हत्या किस तरह की जाए । ये निश्चित हुआ की हत्या के बाद रंजीत सिंह को ज्यादा से ज्यादा दूर जाने का समय देकर कलावति ही डकैती देखा । शोर मचाएंगे उसे ऐसी कहानी गढनी थी जिससे यह लगे की ये अध्यक्ष चोरी की करन की गई । डकैती प्रमाणित करने के लिए इतने जवाहरात के बत्तीस जीवन रंजीत सिंह को देती है और शोर मचा दिया की वो छोटी चले गए । योजना पर अच्छी तरह सोच विचार करके वो बच्चों से चीजे लेकर रंजीत सिंह आठ जुलाई को बिशनपुरा से रवाना हुआ । सिख रूप में इसके बाद हत्या की रात की घटनाओं का विवरण था । उसका पति नौ बजकर तीस मिनट पर कुठार से लौटा । वे सब छत्तरगढ लेकिन पास में कीर्तन होने की वजह से दो बजे तक सो नहीं सके । बाद में वो अवश्य हो गई होगी क्योंकि उसे याद आता है कि लगभग एक से दो घंटे बाद उसने पाया कि कोई उसका माथा छूकर उसे जगह रहा है । नौकरानी चोर चोर चिल्ला रही थी । उठकर उसने अपने पति की ओर देखा । वह फर्श पर पडा अंतिम सांसे ले रहा था । उसके बाद वो कमरे में चली गई और जब लायक राम हुआ अन्य लोग वहाँ पहुंचे तो उसने डकैती की कढी गढा एक कहानी सुनाती थी । उसने झूठ बोला था कि वो नहीं जाती थी कि उसके पति का हत्यारा था । जब उसे कपडे दिखाए गए तो उसने कहा कि इनमें से एक रंजीत सिंह का अपनी सिर्फ के अंत में । कलावति ने कहा कि मैंने जो कुछ किया है उसके दंड से मैं बिल्कुल भी आतंकित नहीं हूँ । मेरी आत्मा पर बाप का बहुत भारी बोझ लगता है । उसी को दूर करने के लिए मैं अपना अपराध स्वीकार करती हूँ । मैं अपने पति से घृणा करती थी । मैं उससे इसलिए घृणा कर दी थी कि वह पाशविक ढंग से शारीरिक संबंध स्थापित करता था । उसकी स्वीकरोक्ति की हर बात का समर्थन स्वतंत्र गवाही द्वारा हो गया । मृतक ने अपनी डायरी में लिख रखा था की रंजीत सिंह बाईस जून को आया था और आठ जुलाई को गया जुलाई को पुलिस ने रंजीत सिंह के घर से कलावति के बत्तीस जी ओवरो में से अट्ठाईस से बरामद कर ली है । स्वीट ग्रुप में कहीं के कई बातों के प्रमाण मिल जाने के बाद ये स्पष्ट हो गया कि वो सत्य है और अपनी इच्छा से दी गई है । तीन अगस्त को रंजीत सिंह ने भी मजिस्ट्रेट के सामने अपना अपराध स्वीकार करे । कुछ छोटी मोटी घटनाओं के अलावा तीन मुख्य बातों के बारे में दोनों के बयान में भिन्नता दें । एक तो ये कि दोनों ने अपने अपने बयानों में एक दूसरे को हत्या के षड्यंत्र के लिए उत्तरदायी ठहराया था लेकिन क्योंकि वह दोनों ही हत्या के षड्यंत्र के पीछे थे इसलिए बात कुछ विशेष से महत्वपूर्ण नहीं रहेंगे । दूसरे कलावति ने अपने बयान में कहा था की हत्या के लिए पंद्रह तारीख निश्चित हुई थी लेकिन रंजीत सिंह ने कहा की हत्या चौदह, पंद्रह या सोलह इन तीन तारीखों में से किसी भी दिन की जानी थी । ये अंतर भी महत्वपूर्ण नहीं था क्योंकि पंद्रह तारीख का जिक्र दोनों बयानों में किया गया था और हत्या पंद्रह की रात में हुई थी । इसलिए शायद कलावति ने दूसरी तारीखों का जिक्र करना विकास अच्छा हूँ । तीसरा अंतर हत्या की योजना पूरी करने के बारे में था । कलावति ने कहा था कि उसे नहीं मालूम की हत्या किसने और कैसे की । दूसरी ओर फॅमिली सिंह ने इस नृशंस हत्याकांड का सनसनीखेज ब्यौरा दिया था । वह घर के बाहर अंधेरे में छिपा हुआ कलावति के इशारे का इंतजार कर रहा था । जल्दी ही हत्या हो जाते लेकिन पास में क्लिंटन होने की वजह से अवसर नहीं आ सका । कुंवर विक्रम सिंह काफी देर तक जाता हूँ । सुबह तीन या चार बजे उपर सीढियों से कलावति ने तीन या चार बार टार्च से इशारा किया । यानी ऍम वो किसी का इंतजार करना था । वो बहुत नवादा हुआ घर की ओर बढा और अंदर घुसकर सीढी से ऊपर चढ गया । उसके हाथ में तलवार थे । शब्बर गलती भी उसके पास उसे अपने पति की चारपाई के पास ले गए और मच्छरदानी उठाकर ऊपर डालते हैं । विक्रम सिंह गहरी नींद में था । इसके बाद कलावती ने तिरछी दृष्टि से अत्याचार और उसकी तलवार की ओर देखा और फिर वहाँ से चलेंगे । रंजीतसिंह चारपाई के पास खडा हुआ और आपने असहाय चचेरे भाई को कुछ देर तक देखता ना घेर । उस समय उसके दिमाग में क्या विचार आ रहे होंगे? क्या वह अपराध के गंभीर परिणामों पर विचार करने के लिए ठहर गया था? उसने धीरे से नंगी तलवार उठाई । अचानक उसका हाथ खडा होता था और गहरा साफ खीजकर उसने पूरी तेजी से विक्रम सिंह के सिर पर ुवार कर दिया । पहले आघात से अधिक जागे मृतक का शरीर कुछ दिन अच्छा होकर बिस्तर से गिर पडा और तब उसे गांव से गया हूँ । हत्यारा खोतकर आ गया और उस पर विक्रम जोर से चिल्ला उठा । रंजीत बार बार हुआ करने लगा । आखिरकार विक्रम सिंह का चिल्लाना आप क्या? लेकिन इस अंतर से भी दोनों की स्वीकारोक्तियों की सत्यता में कोई फर्क नहीं है क्योंकि दोनों बयानों में मूल बाद का विवरण तो सत्यता आएँ । तलवार, खून से सने कपडे और कलावति के जीवन मिलने जाने से हत्यारे के बयान की पुष्टि हो गई । शिव जी के बयान पर काफी कुछ कहा गया । ये तरके दिया गया है कि उचित प्रमाणों के बिना मजिस्ट्रेट के सामने दिए गए उसके बयान पर विश्वास नहीं करना चाहिए । क्योंकि हत्या के बाद जब नौकर चाकर छत पर आए तो उसने रंजीत सिंह का नाम नहीं बताया, अपराधी का नाम बताने में इतनी देर करने से उसकी गवाही झूठी हो गई । इससे साबित होता है कि वह भी अपराध में सहयोग नहीं थी । लेकिन सुनवाई जज ने इस धारणा को स्वीकार नहीं किया । अपराधी का नाम बताने में देर करने का जो कारण भी ने बताया था, उससे वह संतुष्ट था । वो सिर्फ एक नौकरानी थी । अपने मालिकों के मामले में दखल देने का अधिकार उसे नहीं था । वह कलावति के आदेशों की अवहेलना करने का दूसरा हाथ से नहीं कर सकें । जब विक्रम सिंह जैसा शक्तिशाली और चतुर व्यक्ति भी उसकी मालकिन के हाथो नहीं बच्चे से कहा था तो उस जैसे नीचे जाता और कमजोर लडकी के लिए ये कहाँ सम्भवता की अपनी मालकिन के सामने सिर उठाते हैं । अपनी जान बचाने के ख्याल में भी उसके होटल सीधी हैं । हाँ, कलावादी की गिरफ्तारी के बाद स्थिति एकदम बदल गई । जब सारे तथ्य सामने आ गए तो उसे किसी का डर ना रहा । किसी बात को छिपाने की जरूरत नहीं रही और ये बात तो कलावति ने भी हैडकांस्टेबल के सामने दिए बयान और सीख रोकती । मैं मान नहीं थी कि उस रात भी छत पर मौजूद थे । सितंबर और इससे क्या उनमें सुनवाई होने के एक महीने बाद दोनों अभियुक्तों ने अपनी अपनी स्वीकरोक्ति यहाँ बदल दी और उन्हें झूठी क्या दिया तो यही आरोप पक्ष का मुकदमा था । अभियुक्तों ने अपनी ओर से किसी गवाह से पूछताछ नहीं की । अपने बयानों में उन्होंने अनैतिक ऍम और हत्या में पारस्परिक सहयोग आदि के आरोप मानने से इंकार कर दिया । रंजीत सिंह ने सफाई दी की हत्या की रात वो बस तेरा में अपने घर पर था । खून से सने कपडों और तलवार को अपनी मानने से इंकार कर दिया । अपने घर से बरामद हुए कलावति के जेवरों के बारे में उसने कहा कि वे पुलिस ने वहाँ रख दिए थे । दोनों अभियुक्तों ने एक स्वर में कहा कि बलबीर सिंह के कहने पर उन्हें झूठे हैं फसा दिया गया था । निर्णय घोषित करते हुए संजने रंजीत सिंह को हत्या के अपराध का दोषी माना लेकिन कलावति को उस आरोप से बरी कर दिया । उसने जेवरों की बरामद होने की गवाही को मारने से इंकार कर दिया और दोनों सीख रोक तियों को गलत ठहराया । शब्द की अकेली गवाही को आधार मानते हुए उसने रंजीत सिंह को मृत्युदंड दिया और कलावति को हत्या के आरोप से बरी करते हुए उसे इस बात के लिए पांच वर्ष की कडी कैद की सजा दी की उसमें डकैती की बात कहकर जानबूझकर हत्यारे को छिपाने की कोशिश की । सोलह जो उन्होंने सुबह उनको हिमाचल प्रदेश के जुडिशियल कमिश्नर चौधरी की अदालत में इस निर्णय के विरुद्ध अपील की गई । चौधरी ने आरोप पक्ष पर मुकदमा स्वीकार कर लिया । दोनों बदली हुई स्वीकारोक्तियों को भी ठीक माना । उसके अनुसार दोनों से रोक तियां सत्य थी और अपनी इच्छा से दी गई थी क्योंकि उनमें कहीं कहीं बातें प्रभावित हो गई थी । बरामद हुई चीजों के बारे में उसने कहा कि मेरा विचार है कि रंजीत सिंह के घर से जेवरों का बरामद होना बिल्कुल सही है कि पेज एवर कलावति के थे और कत्तर षड्यंत्र के संबंध में ट्रेन जीत सिंग को दिए गए हैं । संचेत में कमीशन ने कहा कि सत्य और अपनी मर्जी से दी गई स्वीकरोक्ति ियाँ, प्रत्यक्ष दर्शनीय सिब्बी की गवाही, रंजीत सिंह के घर से कलावति के गहनों का बरामद होना और हत्या के उद्देश्य आदि बातों के अपराध पर दोनों अभियुक्तों रंजीत सिंह और कलावति पर लगाया हुआ आरोप सही सिद्ध हो जाता है । शिशन जज की कलावति की हत्या के अपराध से बरी करने के फैसले को रद्द करते हुए कमिश्नर ने कहा, घटना के तुरंत बाद शिव बीने कलावति को पास के कमरे में खडी देखा । कलावति ने उसे डाटा और चुप रहने की हिदायत थी । इसके साथ ही कलावति ने फौरन झूठी डकैती की कहानी फैला दिया । इन सब बातों को देखते हुए मुझे इससे बारे में बिल्कुल भी संदेह नहीं की । हत्या होते समय कलावति बिलकुल पास में थी और कथित कहती की कहानी कर प्रचार कर उसने उसमें सहायता दें, कमिश्नर में उस पर हत्या के लिए प्रेरित करने का आरोप लगाया । लेकिन क्योंकि हत्या उसके हाथों नहीं हुई और फिर वो तीन बच्चों की मां भी है जिनमें से एक अभी बहुत छोटा है । इसलिए मेरा ख्याल है कि उसे कानून द्वारा निर्धारित दूर ठंडा होने से हर कहाँ डंडे मिलना चाहिए । अभियुक्तों की अपील नामंजूर करते हुए रंजीत सिंह को मिले मृत्यु दंड को ठीक माना गया और कलावति को आजीवन कारावास की सजा सुना दी । बुरे का अंतर बुरा ही होता है । एक गलत बात कभी सही नहीं हो सकती । माना कि कलावति पर अत्याचार किये गए, उसका शोषण किया गया लेकिन हत्या छुटकारा पाने का उपाय नहीं था । विभिन्न भावना का कारण दांपत्य संबंधों के आडे आ सकती है लेकिन हत्या उसका हर नहीं है । हत्या तो हत्या है, उससे किसी समस्या का समाधान नहीं होता । जल्दी से जल्दी छुटकारा पाने के चक्कर में किए गए एक मूर्खतापूर्ण प्रयत्न का परिणाम बुरा हुआ । दो जीवन मिल गए और तीसरा जेल की अंधेरी कोठरी में तिलमिलाकर चल रहा है क्या हूँ हूँ?

राजा मान सिंह

सूर्य साल की ऊंची उच्च पिछडों के पीछे टूट गया । नीली आकाश से नीचे उतरते गहरे अंधकार ने इस सारी वातावरण को ढडरियां । भिंड के घने वनों में गोधरौली तो लगा जैसी कोई चीज नहीं होती है । वहाँ सूर्यास्त के बाद एक दम खाना अंदर का अच्छा जाता है । पुलिस के दूर से बात ही पेड के नीचे बैठे थे । उनकी राय भले बास पडी थी, मुख्य गश्ती दल से बिछुडने के कारण तब हुए अपने आपको न जाने कितनी बार कोर्स चुके थे । अचानक कर्मों की आठ सुनाए थे और उन्होंने अपनी अपनी राय पहले उठाने घनी झाडियों के पीछे से निकल कर दो व्यक्ति उनके सामने धमक है । गौर ऍम सिपाहियों ने बैठक किया । किसान तुरंत उत्तर ऍम दोनों आगंतुकों में से एक बूढा था । साफ सफेद धोती और बंडी पहने था । मुख् पर सफेद दाढी मुझे थी और माधवी पर चंदन की और गले में इन जाप की माला झूठ नहीं नहीं शरीर का रिंदगी हुआ था । उमर को देखते हुए काफी फुर्तीला जवान जाना पडता था । दूसरा काले रंग का रिश्ता पुष्टि योग था । बच्चों यहाँ क्या कर रहे हैं और उस वृद्ध ने पूछा हम मान सिंह को पकडने निकले हैं । सिपाहियों ने बताया क्या महान सिंह वाकई इतना बुरा है अजी हमें इस से क्या लेना देना हमें तो उसे पकडने से मतलब है लेकिन हूँ उससे वृद्धि । किसान ने पूरी उसे पकडने वाले को पंद्रह हजार रुपए का पुरस्कार मिलेगा इसलिए उन दोनों में अधिक उमर के सिपाही ने जब दिया उस वृद्ध की इस तरह ऍम एक अच्छी बस कान से इसकी खून तो हो गए । लगता है तुम लोग सुखी नहीं भला क्या करोगे? और रुपयों का जवान लडकी घर में बैठी हैं उस की शादी करनी है मैं तेरा गरीब आदमी खर्चा कहाँ से उठा और दिन पैसे लिए कोई शादी के लिए तैयार नहीं होता । दाढी वाला व्यक्ति कुछ सोचता खडा रहा । फिर बोला बेटे घर जाकर लडकी की बिहार की तैयारी करूँ इस सप्ताह के खत्म होने से पहले तुम्हें पैसे मिल जाएंगे सिपाही जोर से आज बडा लेकिन उसकी कुछ बोलने से पहले ही भूख काला व्यक्ति आगे बढकर दर्जा जब जानते नहीं हो की तुम राजा मानसिंह से बातें कर रहे हो । सिपाही की हँसी एकदम हम कहीं दोनों का सपोर्ट हैं आपकी एक बार की बन गए धरती जैसे घूमने की उन्हें लगा जैसे साल की लंबी लंबी ऍम पर आगे देंगे वो व्यक्ति उनके सामने खडा मुस्कुराता ना उससे शक्तिशाली व्यक्तित्व के सामने हुए नहीं होगें । उन्होंने हाथ जोडकर सिर्फ चुका थे । कुछ देर बाद जब उन्होंने आंखे उठाएगा तो मान से चला गया था । ठीक एक सप्ताह बाद उसे गरीब सिपाही को अपने कमरे में कपडे का एक थैला मिला । उसे थैले में तीन हजार रुपये आखिरी मानसिक था । किस तरह का व्यक्तित्व था उसे? राजा मान सब क्यों कहा जाता था? चार । प्रदेश में जनता का एक काफी बडा वर्ग उसका नाम सुनते ही भक्ति विभोर क्यों हो जाया करता था । आखिर उसके बारे में ये धारणा क्यों बन गई थी कि वह कभी नहीं पकडा जा सकता हूँ । सत्रह सौ सिपाही थी हिंसा तक आठ हजार वर्गमील के क्षेत्र में उसे पकडने में लगे रहे हैं । उसे पकडने के अभियान में डेढ करोड रुपए खर्च हुए थे । उसे पकडने पर पंद्रह हजार रुपये का पुरस्कार भी था । मान सिंह की कथा अद्भुत और अकल्पनीय है । शब्दों में से शायद समझाया न जा सके । मान सिंह का जन्म अठारह सौ नब्बे में आगरा जिले के एक छोटे से गांव में राठौड खेडा में एक प्रतिष्ठित और संपन्न राजपूत परिवार में हुआ था । गांव में अधिकांश आबादी राठौर वन श्रीराजपूत हो गई थी । युवक मानसिंह गोगांव के पास के जंगल के एकांत में ही आनंद मिलता था । ग्रामीण होने के कारण से खेतों को जोतने होने का काम बहुत अच्छा लगता था । उसके पिता बिहारी सिंह का गांव में बहुत सम्मान था और उन्हें गांव का मुखिया माना जाता था । हालांकि नवाज सिंह मानसिंह से बडा था लेकिन पिता के बाद मान सिंह ने ही सारा कामकाज संभाला । मान सिंह का विवाह छोटी उम्र में ही हो गया था । भिंड जिले के उछल अंतपुर ग्राम के प्रतिशत परिवार में उसके चार लडके हुए हैं । जसवंत सिंह, सुविधा सिंह, तहसीलदार सिंह और गुमानसिंह और एक लडकी की शादी । चौबीस साल की उम्र में वो आगरा डिस्टिक बोर्ड के सदस्य और अपने गांव का मुखिया चुना गया । एक अच्छे नागरिक के रूप में प्रथम महायुद्ध के समय उसने सरकार की खूब सहायता की । उसका जीवन बहुत शांति से बीत रहा था । काफी जमीन होने की वजह से उसकी बहुत आमदनी थी । प्रशस्त ललाट वाला वो लंबा तगडा युवा, फिर झगडा, जगह सफेद ग्राम में कपडे पहन सिर पर ऊंची । पहली बात कर जब डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के सभाओं में ज्यादा था या मुखिया के रूप में चबूतरों पर बैठकर झगडों का अन्याय करता था, तब कौन चाहता था कि एक दिन यही व्यक्ति समाचार के माल से हटकर ऐसा रास्ता अपनाएगा की समाज इससे घटना करने लगेगा हूँ । ये सारे देश में बदनाम हो जाएगा और अपने जीवनकाल में ही दंतकथाओं का नायक बन बैठेगा । मान सिंह तो बडा बनने के लिए ही जन माथा उसका हर परिस्थिति ही कहता है लेकिन उन्नति का मार्ग सरल तो कभी नहीं रहा । समाज का तो यही नियम रहा है कि जब भी कोई व्यक्ति उन्होंने पत्थर पर अग्रसर हुआ तो उसके विरोधी सामने आए हैं । उसे नीचे गिराने के षड्यंत्र चाह रहे हैं । मान सिंह के साथ भी यही हुआ । ऍम किसी धूमकेतु की तरह उसके जीवन को नवस्थापित कर गया । मान सिंह के परिवार का इतिहास बताता है कि किस तरह एक मामूली झगडे ने गंभीर रूप लेकर गांव के शांत जीवन को नष्ट कर दिया । कहीं परिवार मिलकर हैं और बडे पैमाने पर डकैतियां वह खून खराबे हैं जिनके कारण चार राज्यों की जनता वर्षों तक लोग त्रस्त रहे हैं । हाँ, इससे पहले मानसिंह एक अच्छे नागरिक के रूप में खूब उन्नति कर गया । लगभग पंद्रह वर्षों तक ग्राम में समाज में उसका नाम का मनमोहन सिंह के पिता बिहारी सिंह और कल फिर राम में जमीन पर मुकदमेबाजी हो रही थी कि गांव में डकैती हो गए । दल पी राम ने इस मौके का फायदा उठाने की योजना बनाने वो बिहारी सिंह के प्रभाव और मानसिंह की योग्यता से बहुत जुडा हुआ था । उस चार लाख ब्राह्मण ने पुलिस के सामने बयान दे दिया कि उसका शक बिहारी सिंह और मानसिंह पर है । पुलिस को तल्फी राम की बात पर विश्वास हो गया क्योंकि मान सिंह का बडा भाई तो आपसे पहले ही आवारा जिंदगी अपना चुका था । हालांकि चोरी डकेती में उसका कोई आता नहीं था । पुलिस ने जांच शुरू की बाप बेटे दोनों से खूब पूछताछ की । कई बार थाने बुलाया गया । उल्टी सीधी बातें कहेंगे युवक मोहन सिंह का जवान खून ये अपमान ना सका उसके दिमाग में ये ख्याल बन गया की किसी न किसी तरह बदला जरूर लेना है । छोडना नहीं है । पूछताछ के बाद उन दोनों की निर्दोषता सिद्ध हो गई । पुलिस ने उनका पीछा छोड दिया । अब मान सिंह ने कल फिर आराम से बदला लेने की योजना बनाए । उसने अपने बेटों भाई नवाब सिंह, एक संबंधी रूपा और कई मित्रों को इकट्ठा करके उन्हें सौ अट्ठाइस में एक दिन दल फ्रीडम के घर पर हमला कर दिया । तल्फी राम को मान सिंह के इरादों की मानक मिल गई थी । इसलिए वो तैयार था । जमकर लडाई हुई । मानसिंह जीत गया चल । फिर राम की तरफ से कई व्यक्ति मारे गए । बहुत से घायल हुए । बस यही से मान सिंह का जीवन बदल गया हूँ । भूनना मुखिया था न गांव का सम्मानित नागरिक पूरा को मान सिंह के रूप में प्रसिद्ध हो गया । अन्य लोगों के साथ मान सिंह भी गिरफ्तार हुआ । उस पर हत्या का आरोप लगाया गया और आजीवन कारावास की सजा सुना दी गई । एक मामूली से झगडे की इतनी भयंकर परिणाम नहीं । ये उसका पहला और अंतिम कारावास दर्द था । नवाब सिंह, जसवंत सिंह और उसका भतीजा दर्शन सिंह भाग निकले और लापता हैं । इधर मानसिंह सजा भुगत रहा था । उधर चल फिर हम अपनी हार का बदला लेने का अवसर खोज रहा था । मानसिंह के फरार साथी संबंधी मौका देखकर कभी कभार गांव में अपने घरवालों से मिलने आया कर देते हैं । एक शाम अंधेरा घिरने पर नवाब सिंह अपने साथियों के साथ अपने घर आया । तल्फी राम को खबर मिली तो उसने फौरन हल्ला बोल दिया । दोनों तरफ से गोलियां चलने लगी । लेकिन कोई फैसला होने से पहले पुलिसा पहुंचे । वो चतुर ब्लॅक तो अपने दल के साथ भाग निकला लेकिन नवाब सिंह फस गया । पुलिस के साथ हुई लडाई में मान सिंह का सबसे बडा लडका जसवंत सिंह और ऍम सिंह हमारे नवाब सिंह पकडा गया । मुकदमा चला और हत्या के आरोप में इनसे आजीवन कारावास की सजा सुना दी गई । पुलिस को खबर देने वाला खेल सिंह मान सिंह का दूर का रिश्तेदार और दल फिर आपका साथ नहीं । उन्नीस सौ बत्तीस में जेल से छूटकर मान सिंह था । तब तक काफी कुछ बदल चुका था । उसके परिवार की प्रतिष्ठा समाप्त हो चुकी थी । गांव वाले उसका सम्मान करने के बजाय उससे आतंकी फिर रहने लगे थे । मानसिंह अब उम्रकैद की सजा गार्ड कर लौटा एक हत्यारा था । जिस समाज में वो कभी अपना सिर ऊंचा करके चलता था वहाँ अब नजरें उठाना भी सबको नहीं था । उसकी इस अपमान के लिए कौन उत्तरदायी था । उसकी सबसे बडे बेटे की मृत्यु का दायित्व किसपर था । तब फिर राम और खेम सिंह और उसने बदला लेने का निश्चय कर लिया । उसने कल फिर राम और खेम सिंह के परिवारों को सताना शुरू कर दिया । इन दोनों के संबंध इतने बिगड गए थे कि पुलिस ने शांति और सामाजिक सुरक्षा के आधार पर दोनों को गिरफ्तार कर लिया । सिंह को तो छोड दिया गया लेकिन मान सिंह को नहीं । इससे उसका क्रोध और अधिक बढ गया नहीं उन्नीस सौ चालीस को उसका पीड और फिर सिक्यूरिटी समाप्त हो गया । इसके बाद चार जुलाई की रात को अपने तीनों के तो रुपए और दूसरे साथियों के साथ उसने दुश्मनों पर हमला बोल दिया । कहा जाता है कि घूमने सिंह ने अभी तलवार से खेल सिंह के दो संबंधियों के सिर कतर दिए । ऍम के परिवार में केवल दो व्यक्ति बच्चे बाकी सब को काट डाला गया । अब मान सिंह के सामने भागने के अलावा और कोई चारा नहीं था । उसे उसके बेटों और साथियों को फरार अपराधी घोषित कर दिया गया बस से । इसके बाद धीरे धीरे मान सिंह के कारनामें बढते हैं । वो भारत के डाकुओं का आदर्श सरदार बन बैठा । समाज से भागने के बाद मान सिंह के सामने ये समस्या आए कि वो क्या करें, कहाँ जाए और कैसे जीवित रहे । आखिर उसने चंबल के दुर्गम बीहडों में अपना अड्डा बनाया । आठ हजार वर्गमील का ये भी है उत्तर प्रदेश, मध्य भारत विंध्यप्रदेश अब मध्य प्रदेश और राजस्थान की सीमाओं को छूते हुए फायदा है । इसमें यमुना, चंबल कुमारी और उनकी सहायक नदियां बहती हैं । सदियों से इन नदियों का पानी यहाँ की भूमि को बुरी तरह ऍम अपना मार्ग बदलता था । इसलिए इस साल क्षेत्र में बहुत बडी बडी खाइयां बन गई हैं । बरसात में हर खाई छोटी मोटी नदी बन जाती है और उस पर पानी आडा तिरछा घूमता हुआ जमीन कटा हुआ मुख्य धारा से मिलता है । इसलिए यहाँ भी घर में कोई रास्ता नहीं है । बस में खाडी, तिरछी पानी और दलदली खाइयों से घिरी पगडंडियां ही आने जाने का एकमात्र साधन है । बबूल की झाडी और घास के अलावा यहाँ कुछ नहीं था, इसलिए आबादी बहुत कम है । कहीं कहीं पे भी हर पांच सौ फुट तक पहुंचे हैं । इतना दुर्गम स्थान होने के कारण यहाँ अपराधी अक्सर छुप जाया करते हैं । खाइयों की प्राकृतिक बनावट ऐसी है कि अगल बगल की खाइयों में छिपे व्यक्ति महीनों एक दूसरे को पता चले बिना रह सकते हैं । किसी जानकार व्यक्ति की सहायता के बिना यहाँ किसी को ढूंढना असंभव है । इसलिए दुर्गमता की करण मानसिंह यहाँ इतने दिनों तक छिप सकने में सफल हुआ । किसी भी घर में मान सिंह के लडके, उसके परिवार के अन्य सदस्य और दूसरे साथी उससे आमिर हैं । इसके साथ ही उत्तर प्रदेश के लिए चरणा और श्यामा, राजस्थान के पृथ्वी, शंकर और धवन, मध्य भारत के सुल्तान लाखन और अमृतलाल तथा विंध्यप्रदेश के प्रताप देवीसिंह ना को सरदार अपने साथियों के साथ मान सिंह के पास आ गए । मान सिंह को सबने अपना सरदार मान लिया और वो राजा मान सिंह राठौड और फैलाने लगा । शुरू शुरू में दल के मुख्य शिखा दल फिर और गेंद सिंह के संबंधी ही रहे हैं । अधिकांश को बडी निर्दयता से मौत के घाट उतार दिया गया । जब खेमसिंह का पोता समाप्त कर दिया गया तो उसके परिवार का नाम मिल गया । धीरे धीरे इन लोगों ने अपनी कार्यवाहियों का क्षेत्र बढाया और ऐसा आतंक फैला दिया की बस लेकिन गरीबों को कभी नहीं बताया । आमिर और पुलिस के जांच शुरू से इनके शिकार बनें । हत्या, डकैती और अमीरों का अपहरण आम बात होगी । इतने बडे दल को रोज मगर की आवश्यकताओं के लिए पैसे की जरूरत पडती थी जिसे वो डकैती हुआ, लूटमार हुआ, डरा धमका कर वसूला करता था । इस तरह उन भी है और दलदली खाइयों । मेडा को मोहन सिंह ने अपना दूसरा जीवन शुरू किया और सुपर में जब उसकी मृत्यु हुई तो उस पर दो सौ से अधिक हत्याओं और कोई एक हजार डकैतियों के आरोप इन पंद्रह सालों में पुलिस से उसकी अस्सी बार मुठभेड हुई और वो हमेशा बच निकला तो गरीब शोषित जनता मानसिंह से वास्तव मिस नहीं करती थी । इसलिए गांव का हर घर उसके लिए छिपने का था और हर ग्रामीण उसका जासूस था, जो उसे हरदम पुलिस की गतिविधियों के बारे में सूचना देता रहता था । आखिर इससे डाकू सरदार में ऐसी क्या आवश्यकता थी कि जिसमें उसे किसानों में इतना लोकप्रिय बना दिया । जब उस की मृत्यु का समाचार प्रचारित हुआ तो बहुत सी अश्रु छलक आए और कई होठ बुदबुदा, राउंड राजा मानसिंह, आनंद युगों तक बने रहे हैं । इससे बात ही रॉबिनहुड में कोई चारित्रिक दोष नहीं था । वो कट्टर निरामिष फौजी था और शराब को छोटा तक नहीं था । उसे सादा जीवन पसंद था । उस की प्रवृत्ति एकदम धार्मिक हैं । उसने हमेशा गरीबों की सहायता के लिए ही अमीरों को लूटा, जबकि माला हमेशा उसके गले में रहती थी । रोज चाहे मौसम कैसा भी हो, सुबह सूर्य निकलने से पहले नदी में नहाकर घुटनों पाने में खडे रहकर मंत्र पाठ करता था और उगते सूर्य को अर्घ्य देता था । उसके बाद काली के मंदिर में जाकर देवी की पूजा करता था । वह कोई हत्या तभी करता जब बिल्कुल वर्ष हो जाता था तो उसने पुलिस के जासूसों की हत्या आएगी क्योंकि दब अपनी सुरक्षा का प्रश्न प्रमुख था । उसने केवल उन्हीं को लोटा जिनके पास सिर्फ फालतू था और फिर उस धन को मंदिरों और स्कूलों के निर्माण पर खर्च कर दिया । बहुत से मंदिरों में कांस्य की बडी बडी घंटियां लडकी हुई हैं, जो मान सिंह ने उन्हें दाल में दी थी । उन पर उसका नाम खुदा हुआ है । उसके बारे में बहुत सी कहानियां प्रचलित है कि कैसे उसने एक गरीब व्यक्ति की लडकी की शादी के लिए गुप्त रूप से पैसा दिया था । वैसे तो खतरा उठाकर हर साल रक्षाबंधन के दिन एक मिस्त्री के बाद जाया करता था क्योंकि एक बार उस स्त्री ने उसे भाई कहकर पुकारा था । हर साल पुलिस की घेराबंदी को चकमा देकर वो बटेश्वरनाथ के मंदिर में कुछ सौ के दिन पहुंचे, ज्यादा था । अक्सर गांव वालों के बीच बैठकर हुक्का गुडगुडाते उनके मुखिया के रूप में बात किया करता था । समझौता इन कहानियों में सत्य की अपेक्षा कल्पना कि रंग करेंगे, लेकिन फिर भी लोगों ने इन्हें बेहिचक स्वीकार किया है । वह इन्हें सकते हैं, मानते हैं और में जब तहसीलदार सिंह पकडा गया तो उसके पास एक डायरी मिली जिससे पता चला कि कभी अगर एक सेल दूध या गेहूँ भी खरीदा गया तो उसका पूरा मूल्य चुका कर ही लिया गया । उस डायरी में दल के प्रति दिन का खर्चा हो रहा था । कभी किसी दुकानदार को इस बात के लिए विवश नहीं किया गया की वो अपने माँ का काम बोले लें । यही कारण था कि उसने लोगों का दिल जीत लिया था । वो जहाँ भी जाता लोग अपनी आंखें बिछा देते थे । उसके सामने हाथ जोडकर खडे हो जाते थे । उसका व्यक्तित्व कब था, छोटा होता नहीं उसके बारे में भिंड मुरैना कि अपराध संबंधी कमेटी ने कुछ महत्वपूर्ण बात कहे थे । मंदिर भारत सरकार ने उन्हें सौ तिरपन में इस कमेटी का गठन किया था । मान सिंह का मामला इस क्षेत्र की विशेषताओं में मुख्य है । कहा जाता है कि उसे कोई चारित्रिक दोष नहीं था । यहाँ के विकली प्रशंसा पूर्ण स्वर में फुसफुसाते हुए उसके लोरो की कहानियां सुनते हैं । मुखबिरों और पुलिस के सिपाहियों को वो तभी माता है जब वे उसका पीछा करते हैं । उन्हें व्यक्तियों का अपहरण करता है जो काफी धनी हैं । अपने को आशीर्वाद देने वाले ब्राह्मणों का सम्मान करता है और कभी कभी जमीदारों को परेशान करता है कि वे उसके मनपसंद कम स्कूल के भवनों के निर्माण में सहायक बने । उसके प्रशंसक अक्सर कहा करते थे कि उसकी डकैती का ढंग बहुत ही गौरवपूर्ण है । राजस्व चुंगी और शिक्षा विभाग के अधिकारियों को वो कभी कुछ नहीं कहता था । वो बेहिचक युवाओं में समृद्ध होता था । हाँ, अब वो लापता हैं, इधर उधर भागता फिर रहा है । इससे सबसे एक बात स्पष्ट होती है कि थोडी चतुराई से कम लेकर निर्माण अपराधों के प्रति उभरने वाले संभाविक इंजन विरोध को भी काम किया जा सकता है । बदला जा सकता है । कमेटी की राह में अपराध के प्रति जनमत का दृष्टिकोण होने वाले अपराधों से अधिक नहीं है तो कम से कम उतना गंभीर तो है नहीं । स्वतंत्रता से पहले अंतर प्रदेशी और अंतरराज्यीय कानूनों की पेचीदी क्यूँकि कारण अपराधियों के लिए एक राज्य में अपराध कर के दूसरे में बाहर जाना बडा आसान था । उनकी रक्षा इसी से हो जाए थे । मान सिंह का तरीका बहुत सीधा साधा था उसके दल की एक छोटी टुकडी किसानों के वेश में नगर में खोलती नहीं । वो इससे तो में रहती थी कि किसी अमीर व्यक्ति का एक लाख डॉलर का मिल जाये तो उसका अपहरण करके उसके घर वालों से एक बडी रकम मांगी जाए । वहाँ से व्यापारियों का अपहरण करके उन्हें उसके बीहन साम्राज्य में ले जाया गया । वहाँ उन्हें अपने घरवालों को ऐसे पत्र लिखने पर विवश किया जाता है कि अगर हमारी खैरियत चाहो तो पत्र वहाँ को इतनी ही रकम दे दो । ऐसे बहुत से मामलों में पुलिस को कोई खबर नहीं मिली । मानसिकता दल बहुत अच्छी तरह संगठित था । हर सदस्य में इमानदारी और दल के प्रति स्वामीभक्ति की भावना कूट कूट कर भरी थी । चरणा मान सिंह के सरदारों में सबसे बैंक करता था लाखन सिंह । ऐसे दारा सिंह और देवीसिंह दूसरे नंबर बंद हैं । वो हमेशा अगली टुकडी का नेतृत्व करता था । कुछ मजबूत लोगों को झाट कर उसने उन्हें गुरिल्ला युद्ध की ट्रेनिंग दी थी और आधुनिक हथियारों का इस्तेमाल सिखाया । ये टुकडी दल के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध हुई है क्योंकि ये हमेशा आगे चलकर पुलिस की गतिविधियों पर निगाह रखती थी और पुलिस की किसी भी आकस्मिक हमले का मुकाबला कर के मुख्य दल को भाग निकलने का अवसर दे देते हैं । मान सिंह अपने साथ सुदेव एक अंगरक्षक रखता था । वो किसी भूख है की तरह अपने सरदार के पीछे रहता था । अपराधी ही ओबामा में रहता था और उसके पास एक बन्दों को बरामद हुई जिससे ठीक उसी प्रकार की गोली फायर की जा सकती नहीं । डॉक्टर के पास तीन सौ तीन रायॅल और हथगोले जैसे आधुनिक हथियार थे और वह इनके प्रयोग में दक्षता ऍम सिंह माना हुआ निशानेबाज था । सब हथियार गैरकानूनी तौर पर प्राप्त किये गए थे और ये भारतीय सेना के थे । मान सिंह के एजेंटों ने हथियार जुटाए । पुलिसथानों पर हल्ला बोल कर भी उन्हें प्राप्त किया गया था । उन्नीस सौ पचास तक की स्थिति किए थे की आठ हजार वर्ग मिलके उस बीहर पर मान सिंह का आबाद शासन था । वहाँ की जनता उसे प्यार करती थी । उस पर श्रद्धा रहती थी । आतंकी तिन रही थी उस की हर आज्ञा मानती थी । मान सिंह जिस तरह बेहिचक गांव वालों के बीच बैठ कर बातें किया करता था उसके साथ ही जनता के साथ जिससे ईमानदारी और भाईचारे का व्यवहार करते थे और पुलिस से मुठभेड में उसका दलन जैसी वीरता दिखाता था, उन सबसे मान सिंह को लेकर दंतक करता है । प्रचलित होते देर ना लगी वो नायक बन बैठा हूँ । जनसाधारण की दिल में बसा वो व्यक्ति अपने ढंग का जीवन बिता था । हर व्यक्ति हर समय उससे मिल सकता था । अमेरिका से आए एक हमें है कि पत्रकार को उसका इंटरव्यू लेने में कोई परेशानी नहीं हुई तो उसे मान सिंह का शस्त्रागार भी दिखाया गया । इसके बाद मानसिंह अमेरिका में भी प्रसिद्ध हो गया । उसके द्वारा की गई हत्या है, उसके भीतर सच्ची जाती थी । डकैतियों को दान कार्य समझा जाता था क्योंकि वह दान दिया करता था और जब उन्नीस सौ सैंतालीस में देश आजाद हो गया, मान सिंह का दल सारी रात खुशियाँ मनाता था । उस अवसर पर सरकार ने बहुत से कैदियों को मुक्त कर दिया । उनमें नवाब सिंह था कैसे छूटते ही वो गांव गया, कहीं से बंदूक हथियाई और दल फिर आम के अंतिम दो संबंधियों को मार कर अपने भाई से आ मिला । इन राठौर भाइयों ने ऐसा उग्र प्रतिशोध लिया की तरफ फिर राम और खेम सिंह के वंश में कोई नामलेवा भी ना बच्चा हूँ । जिस व्यक्ति ने मुकदमों में उनके दल के विरुद्ध गवाही थे, मान सिंह ने से निर्ममता पूर्वक समाप्त कर दिया । मजिस्ट्रेटों ऍम को तब की आती है । स्वतंत्रता के बाद हिंडाल्कों का आतंक समाप्त करना अनिवार्य हो गया । लेकिन जब स्थानीय पुलिस इस दिशा में कुछ अधिक नहीं कर सकी तो कई स्थानों पर इस काम के लिए पीएसी के दस्ते तैनात कर दिए गए हैं । लेकिन डाकुओं को पीछा करना और पकडना कोई आसान काम नहीं था क्योंकि वह आधुनिक हथियारों से लैस थे और उनके प्रयोग में दक्षिण थे और फिर मान सिंह जैसे सहयोग नेता का नेतृत्व मिलने के साथ साथ उन्हें गरीब जनता का सहयोग भी प्राप्त था । कई बार सशस्त्र मुठभेडे हुई जिनमें दोनों ओर से लोग मारे गए । इसके साथ ही डाकू दल ऐसे सब व्यक्तियों को मारने पर सुना था जिन्हें वो पुलिस के जासूस समझता था हूँ । निसंदेह ऐसी कई व्यक्तियों को निर्ममतापूर्वक मार डाला । क्या नतीजा ये हुआ कि मुखबिर मिलने असंभव हो गए । गांव वालों ने सहयोग करने से इंकार कर दिया क्योंकि वह मान सिंह की भक्ति करते थे । साथ ही मानसिंह जिस बीहड क्षेत्र में छिपा था उसकी जानकारी न होने की वजह से पुलिस का काम बहुत मुश्किल हो गया और फिर मान सिंह व्यक्तिगत रूप से कभी कभार ही डाक्टरी में जाता था जहाँ राज्य के निश्चित भाग में इंजीनियर डाकोर क्षेत्र में राजा मानसिंह का राज्य का आ जाता था । यदि मान सिंह के दल के अलावा कोई दूसरा डाक्टरल डाॅकृति डालता था तो उसे लूट का कुछ प्रतिशत नजराने के रूप में मान सिंह को देना पडता था । डक्कू सरदार की आय का मुख्य साधन यही नजराना बन गया में अधिकारियों ने मान सिंह को पकडने का काम गंभीरता से करना शुरू किया । अंतरराज्यीय अडचनें दूर करके उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य भारत और विंध्य प्रदेश की सरकारों ने मिलकर पुलिस के सत्रह सौ चुनिंदा जवानों की एक टुकडी तैयार की है । इसका काम केवल डाकुओं का सफाया करना था । ऑपरेशन मानसिंह पूरी तेजी से शुरू कर दिया गया और पुलिस के डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल के अधीन बडी सोच कोशिश से इसका काम आगे बढाया गया । सीआईडी के बहुत से जासूस सादे कमरे में बीहड के आस पास के गांव में फैल कर मान सिंह की गतिविधियों की तो हो लेने लगे तब कोडल भी सत्तर हो गया और उसने भी कई सुरक्षात्मक तरीके अपनानी । डाकू दो दिन से अधिक कही नहीं लिखते थे हमेशा भागते रहते थे । उन्नीस सौ इक्यावन में जासूसों ने खबर दी कि खूंखार चरणा राजा खेडा गांव में अपनी पत्नी से मिलने आएगा । आप क्या था घेरे की तैयारी होगी । चलना अपने साथियों के साथ घर में घुसा ही था कि साठ सिपाहियों ने मकान खेल लिया । इस तरह घर जाने पर डाकुओं ने गोलियां चलानी शुरू करते हैं । पुलिस ने भी जवाब दिया चौबीस घंटे तो ये गोलाबारी अविराम चलती रहे । जब ये देख लिया गया कि डाकू आसानी से हार मानने वाले नहीं है तो और कुमुक मंगाई गई । पीएसी के चार सौ सिपाही आ पहुंचे । गोलियाँ चलती रही । एक और चौदह डाकू थे और दूसरी ओर पुलिस के विशेष रूप से प्रशिक्षित । चार जो जवान लेकिन फिर भी उन्होंने आत्मसमर्पण नहीं किया । अशोक गैस के गोले फेंके गए, लेकिन कोई असर ना हुआ । चरणा हार मानने को तैयार ना हुआ । बहत्तर घंटे बीतने पर फौज की डोगरा सैनिक बुलाए गए । उन्होंने रूप से दो गोले मकान पर डालते हैं । ये काम था उससे खंडहर मकान में नीरव ताज आ गए हैं । मलबे में चौदह डाकुओं के शो तो मिल गए, लेकिन चरणा का पता चला वो बच निकला था । चौदह विश्वासी साथियों ने अपने सरदार को बच निकलने का मौका देने के लिए अपनी जानें होम करते हैं । दो साल बाद उन्नीस सौ तिरपन पुलिस के साथ हुई दस घंटे की लडाई में है और डाकुओं के साथ चलना भी मारा गया हूँ । जानना की मृत्यु से मान सिंह का सबसे विश्वासी सरदार झेल गया ऍम जीने में हुई छिटपुट मुठभेडों में पुलिस ने और बहुत से डाकुओं को घायल कर दिया जहाँ सूसू ने खबर दी कि घायल लोगों को इलाज के लिए चंबल के बार इटावा में ले जाया जाएगा और डाक मान सिंह कुंवर खेर के बिहार में छुपा हुआ है । ये सारा इलाका तुरंत घेर लिया गया और नदी तट पर तथा तीन और स्थानों पर बहरा लगा दिया । दो दिन तक डाकुओं के बारे में कुछ पता नहीं चल सका । घेरा लगा रहा और पुलिस की एक टुकडी धीरे धीरे आगे बढ ही रहे हैं । दोपहर तक वो एक खाई के किनारे पहुंच गए । सिपाहियों ने एक आदमी को चिल्लाते हुए सुना बाबा पुलिस ने हमें घेर लिया है । इस पर किसी वृद्ध असर नहीं होता दिया, सुविधा करना को मार दी और बाकी सब तैयार हो जाए । करना पुलिस का जासूस था जिसे डाकुओं ने पकडा गया था । तभी गोली चलने की आवाज सुनाई दी और सब चुप हो गए । बाद में गन्ना का मित्र शरीर एक लोग ओर पडा मिला । शरीर पर गोली का निशान था । कुछ बात खाई में डॅान और तीन सौ तीन रायफलों से पुलिस कर गोलियाँ चल रही है नहीं सिपाहियों ने भी तुरंत आर्लेकर जवाबी हमला शुरू कर दिया । दोनों ओर से हथगोले फेंके गए । कुछ देर तक थोडा कोने डटकर मुकाबला किया लेकिन पुलिस का परिणाम मारी था । इधर जवान ज्यादा थे । पुलिस के हमले ने डाकुओं को खाई से बाहर आने पर विवश कर दिया । आप भी आना लेते हुए इधर उधर भागने लगे । जब ये इस तरह कर लेते हुए भाग रहे थे तो उनमें से कईयों को पहचान नहीं किया । उनमें से दो मान सिंह और रूपा थी । दोनों डाॅॅ चला रहे हैं । ढाई बजे तक लगातार गोलियाँ चलती नहीं । थोडी देर बाद पुलिस ने देखा कि पांच डाकुओं की है तो पूरी खाई से निकल कर भाग रहे हैं । उनमें से एक लाख घोडी पर सवार था । ये ऍम सिंह था । बाद में उसे पकड लिया गया । उसके पास से पांच सौ बोर की दोनाली बंदूक बरामद भी । वह बचकर भाग नहीं सका क्योंकि पहली छिटपुट झडप नहीं । उसके पैर में चोट आ गए हैं । चलना की मृत्यु ने राजा मानसिंह को कमजोर हो गया जैसे युवराज सिंह की गिरफ्तारी ने उसका दिल तोड दिया । लाखन सिंह का व्यवहार उसे निराश करके लाख और उसका जमाई था । जब वो जेल में सजा भुगत रहा था । तो उसकी पत्नी चांदी किसी से डाकू की ब्रेन में पड गए । महम सिंह को इसकी भनक लगी तो उसका सौ बेमानी मान ने विद्रोह कर उठा । उसने रानी के प्रियतम को मौत के घाट उतार दिया । जब लाखन सिंह लौट कर आया और उसे अपनी पत्नी के दुष्ट चरित्र का पता चला तो उसने अपने ससुराल से संबंध तोड लिया । अलग होकर डाका डालने लगा हूँ मानसिंह तेजी से बुड्ढा हो रहा था । उसके तीन विश्वासी सरदार उससे छीन गए तो उसे अपना भविष्य अंधकार में दिखाई दिया । वो उस गुजार जीवन से ऊब गया था । चोरी, डकैती और रक्तपात से घबरा उठा था । उसका मन चाहता था कि वो आराम की जिंदगी बिताएं । उसका भी घर हो जहाँ वो अपना अच्छे से जीवन बता सके । उसने भारत सरकार को एक स्मरणीय पत्रलेखा उसमें लिखा कि वो हत्यारा नहीं है, उसे डाक्टरो । समझना है अपनी इच्छा से उसने ये सब नहीं किया । परिस्थितियों ने उसे भी वर्ष कर दिया था । अगर सरकार से छमा कर दे तो वो आत्मसमर्पण के लिए तैयार हैं । उसने यहाँ तक कहा कि अगर सरकार दूसरी तथा उसके दल को मुक्त करते तो गोवा को विदेशी शासन के पंजे से छुडाने के लिए तैयार है लेकिन सरकार ने ठीक कदम उठाया । उस पत्र का कोई उधर नहीं दिया गया । मान सिंह के सामने कोई चारा नहीं था । तहसीलदार सिंह गिरफ्तार हो गया । चलना मारा गया और लाखन ने साथ छोड दिया तो बाकी डाकुओं का धीरज जाता हूँ । पुलिस की सफलताओं और रोज की घेराबंदी से उनके दिमाग में ये बात बैठकें की वो जरूर पकडे जाएंगे । अब हर एक को अपनी सुरक्षा की चिंता सताने लगी । दलगत संगठन की भावना धीरे धीरे तो चल ही था और एक एक कर सकते लगे । उन्होंने राजा को ऐसे समय छोडा जिस समय से उन सब की ज्यादा जरूरत है । अंत में केवल अठारह व्यक्ति उसके साथ रहेंगे हैं । जिन्होंने अंत तक उसका साथ दिया । उनमें से उसका बडा भाई नवाज सिंह, सुविधा सिंह और रूपा भी नहीं । निराश मानसिंह घायल शेयर की तरह इधर उधर मरा मरा ऍम जो लोग तहसीलदार सिंह की गिरफ्तारी की उत्तरदायी थे, उन पर उसकी खूब बिजली बनकर टूट पडा । केवल अठारह व्यक्तियों के साथ ही उसने ऐसा तहलका मचा दिया की सत्रह सौ जवान भी कुछ नहीं कर सके क्योंकि रहेंगे उन्हें से चौदह कुछ । डाकुओं ने पुलिस को खबर दी कि मान सिंह मर गया । खबर आपकी दही से मैं राष्ट्र ने चैन की सांस लिया । चलो बता नहीं पता चला कि भरवाना गांव में इसका अंतिम फिफ्टी संस्कार भी कर दिया गया हूँ । सरकारी घोषणा ने भी इस की पुष्टि कर दी । सब प्रसन्न होते हैं लेकिन अभी इससे प्रसन्नता को पाला मार गया खबर मिलेगी । मान सिंह ने एक डाका डाला है वो अभी जिंदा है । मारा नहीं । निराशा अधिकारियों ने इस खूंखार शेर को पकडने की दया दिया फिर से शुरू करते हैं । मध्य भारत के गृहमंत्री दीक्षित ने नवंबर में राज्य विधानसभा में घोषणा की कि अगर एक साल में मान सिंह और उसके दल को समाप्त न किया तो मैं त्यागपत्र दे दूंगा । इस काम के लिए उन्होंने सिपाहियों का एक से दस था तैयार किया । उसमें अधिकांश ये बात बिल्कुल कुत् रखी गई और बडे बडे अधिकारियों को भी मान सिंह की मृत्यु से पहले इसके बारे में कुछ पता नहीं चला । उत्तर प्रदेश सरकार ने मान सिंह को जिंदा या मुर्दा पकडने वाले को पंद्रह हजार रुपए का पुरस्कार देने की घोषणा की । मैं से ये बात बहुत अजीब लगती है लेकिन ये सत्य है कि पुलिस के पास मान सिंह का फोटो रखी थी नहीं था । उस क्षेत्र की सिलसिलेवार खोजबीन करते हुए पुलिस ने फरवरी उन्नीस सौ बचपन में उसे मुरैना जिले में देख लिया । गोलियां चली और कुछ देर बाद गड्डा को पीछे हट गए । वे मेरे पीछे कुछ स्टेनगन छोड हैं । हालांकि मानसिंह घायल हो गया था लेकिन फिर भी वो बच निकला । पुलिस अब तेजी से उसका पीछा कर रहे थे । डाकू दल के दिन प्रतिदिन गतिविधियों की सूचना मिल रही थी और उन के आधार पर पुलिस से आगे बढ रहे थे । अगस्त के पूरे एक सप्ताह तक पुलिसदल पीछा कर दे रहे हैं । सत्रह अगस्त को उसने दल को घेरने की कोशिश की लेकिन असफल रहे । अग्नि शाम तक चंबल के बीहडों से बाहर आने वाले सब रास्तों की नाकेबंदी कर दी गई । इक्कीस अगस्त को मान सिंह भिंड जिले में चला गया और उसे पवाई गांव में देखा गया । कुमारी नदी में बाढ आई हुई थी इसलिए वो दूसरी ओर नहीं आ सकता था । आखिर पच्चीस अगस्त को अंतिम भिडंत हुई है । पुलिस के जासूसों ने खबर दी की मांग सिंह मिल नगर से पांच में दूर भोजापुर गांव के बाद से देखा गया है । ऍफ के तीन प्लाटूनों की एक टुकडी कमांडर चेहली के नेतृत्व में जल्दी कि चिड भरे ऊबड खाबड रास्ते पर चलकर जब ये लोग भोजपुरा के बाहर पहुंचे तो मान सिंह ने उन्हें देख लिया और पहला हुआ घटिया मानसिंग सबसे अच्छा निशा निवास था जमाना हरभजन सिंह की कमांड में सैनिकों की टुकडी ने दामी करूँ और रायफलों से जवाब दिया आधे घंटे की भयंकर गोलाबारी के बाद जिसमें पटाखों की कोई आठ सौ राहुल चलाए, मान सिंह को पूरी लगते हैं वो गिर पडा । तब राजा के शरीर के लिए घमासान युद्ध छिड गया । अपने पिता के शरीर को पुलिस के हाथों से बचाने के लिए सारी सावधानी भूलकर सुविधा सिंह तेजी से आगे मांगा और तुरंत गोलियों से छलनी कर दिया गया । वो तो वो कर अपने पिता के पैरों पर गिरकर घायल रूपा नवाब सिंह हुआ । अन्यता को बच देखें आखिर व्यक्तिका हो गया जिसने पंद्रह वर्षों तक पुलिस को परेशान करना था । उत्तर भारत के सारे समाचार पत्रों ने मुख्य समाचार के रूप में मान सिंह की मृत्यु का विवरण प्रकाशित हुआ हूँ । चारों राज्यों में कुख्यात डाकू की मृत्यु घोषणा के लिए इस्तिहार प्रकाशित किए हैं । मान सिंह और सुविधा सिंह की गोलियों से छलनी शरीर कडे पहरे में भी ऍम खडी मुद्रा में चारपाइयों से बात कर उन्हें प्रदर्शन के लिए रख दिया गया । भिंड और आस पास के जिलों से कोई चालीस हजार भी देखते हैं । बहुत से व्यक्तियों ने राजा को अपनी अंतिम श्रद्धांजलि थी । सत्ताईस अगस्त को ये शरीर ग्वालियर ले जाएंगे । वहाँ लगभग साठ हजार व्यक्तियों ने भी नहीं देखा । मान सिंह को पकडने पर सरकारों ने तीन वर्ष तक प्रतिमाह अस्सी हजार रुपए खर्च किए । वैसे इसमें संदेह है कि मान सिंह ने इससे आधी दौलत भी लूटी होगी । मान सिंह की विधवा ने राठौर खेडा से दावा दायर किया कि इसके पति और पुत्र की मृत्यु शरीर उसे मिलना चाहिए ताकि उनका अंतिम संस्कार किया जा सके । तो तहसीलदार सिंह ने जैसे पिटिशन दायर किया कि उसे अपने पिता के मुखाग्नि संस्कार करने की अनुमति मिलनी चाहिए । मध्य भारत के गवर्नर ने दोनों ही आवेदन अस्वीकार कर दी है । सत्ताईस अगस्त को ही मृत शरीर शमशान घाट ले जाया गया । चारों ओर पुलिस का कडा पहरा था । जब शरीर भस्म नहीं हो गए । पुलिस के जवान खडे हैं । पुलिस विभाग में मान सिंह से संबंधित रिपोर्टों का वजन कोई एक टन है जिनके अनुसार उस पर एक हजार डकैतियों और दो सौ से अधिक हत्याओं के आरोप हैं । वैसे ये कहना मुश्किल है कि जितने अपराधों का आरोप उस पर लगाया जाता है तो उसने उसने किए होगी । मान सिंह के अधिकतर शिकार थे उसका पीछा करने वाले सिपाही, जासूस और बडे बडे रही गरीबों को उसने कभी नहीं बताया । आपने शान के खिलाफ कोई अच्छा काम भी नहीं किया । उन्नीस सौ सैंतालीस में मुक्त होने पर जब नामुराद सिंह उसके पास पहुंचा तो का भी बूढा हो चुका था, दुर्बल था और आंखों से बहुत कम देखता था । वो दल के लिए एक बार बन कर रह गया था । उसने कई बार मान सिंह से कहा कि उसे मारते क्योंकि रोज रोज इतना सफर करना उसके वर्ष का नहीं था । लेकिन मान सिंह ने उसकी बात नहीं मानी थी और आपने निर्मल भाई को बेसहारा नहीं छोडा था हूँ, हूँ नहीं ।

रेल कार हत्याकांड

फॅमिली इसका जो चल रहा था, बोलती महायुद्ध का संघर्ष चक्र पूरी तेजी से घूम रहा था । जापानी भारतीय सीमाओं के बहुत निकट आ गए थे, इसलिए लोगों में बहुत घबराहट फैली हुई थी । देश में थी के यूरोपीय सैनिक अधिकारी गर्मी की इन्शुरन्स आने वाले महीने बिताने के लिए पहाडी स्थानों पर चले गए थे । ऐसे ही अधिकारियों का एक दल शिमला में एक पखवाडा बिताने के बाद अपनी अपनी पोस्टिंग के स्थानों पर लौटने की योजना बना रहा था । बीस जून की शाम को ये दलित कालका जाने के लिए प्लेटफॉर्म पर पहुंचा । फॅार बहाउद्दीन ने चौदह नंबर सरकार की मोटर कर निरीक्षण किया तो रेलकार में बारह यात्री थे । उनमें से आठ उच्च सैनिक अधिकारी थे, दो अर्द्धसैनिक व्यक्ति और दो इस लिया थे मेरे सब यूरोप ये थे छह बजे ये रेलकार शिमला से कार्य का के लिए चलते हैं । रात के दस बजे जब ये रेल का अच्छा और कालका के बीच घोडे के नाम के आकार की गुफा में घुस रही थी तो लगा जैसे रेलवे लाइन पर पत्थर रखे हुए हैं । यहाँ से कालका रेलवे यार्ड दिखाई देता था और जब कार की दाई और गोली चलने की आवाज सुनाई दी तो ड्राइवर में एकदम से रोक दिया । इसकी बात कहीं गोलियों के धमाके मुझे और इसके पहन के रेलकार यात्री ये समझ पाए कि ये क्या हो रहा है । उसका ड्राइवर और तीन यात्री ॅ विमॅन और उनका ऍम ये सब इतनी तेजी से हुआ कि बाकी लोगों के एकदम स्तंभित रहेंगे । गोली चलने बंद हो गई और बाईं ओर का सामने वाला दरवाजा एक झटके से खुला । फॅमिली के साथ बैठ कर देने वाला धमाका सुनाई दिया और लेफ्टिनेंट जेटली घायल होकर गिर पडा । खुले दरवाजे के रह एक व्यक्ति तेजी से भी तरह गया । उसका चेहरा एक कपडे से डाला था । केवल आंख दिखाई दे रही थी । उसके हाथों में एक बंदूक थी जो इसके लिए तैयार देखती थी कि कोई भी जरा ऍम उसकी इधर उधर दौडती तेज खोने, व्यक्तियों को गिना और वो बारी आवाज में चिल्लाकर बोलना ऍम ऍम यात्री पुतलों की तरह खडे हो गए और कार से बाहर आ गए हैं । उसे न कहाँ पोशाक, तैयारी की आवाज, गोची मनी और फॅमिली ने अपना बंद हुआ निकाल कर फेंक दिया । दूसरे ने भी यही किया । लूट कमाल इकट्ठा कर वो व्यक्ति जिससे रहस्यमय ढंग से आया था, उसी तरह घने जंगलों में विलीन हो गया । वो ॅ जीटॅाक कालका की ओर भाग रास्ते में कुछ गांव वाले मिली जो ने कालका बजा लेते हैं । वहां उन्होंने टैक्सी ली और लगभग साढे दस बजे रेलवे स्टेशन पहुंचे । तेल में पुलिस के सार्जेंट रेडी को इस घटना का समाचार दिया । सहायता के लिए एक रेलकार को घटनास्थल की ओर रवाना करके लोकोशेड में दुर्घटना का अलार्म बजा दिया गया । जब पुलिस तल दो पहाडियों से घिरे घटनास्थल पर पहुंचा तो मिस्टर मॉर्टन कोरेल कहाँ से पचास गज दूर कालका की ओर टोमॅटो के पास घायल पडे पाया । बोल ऍम यूबी तथा ऍम रेलकार में घायल पडे थे और कर्नल ऍम मरे पडे थे । घटनास्थल पर यात्रियों से की गई थोडी से पूछताछ से एक महत्वपूर्ण बात पता चाहिए । नकाबपोश हत्यारे के साथ एक नाटे कद का दुबला पतला आदमी और था । वो भारतीय था । उसके सिर पर कपडा बंधा हुआ था और वो भी बंदूक नहीं होता । फॅमिली विवाद में अंबाला कि ब्रिटिश मिलिट्री अस्पताल जा रही है । लेफ्टिनेंट जॅानी बच गए । कोली से छह व्यक्तियों की मृत्यु हो गई थी और दो घायल हुए हैं । पुलिस ने खोज शुरू की । पुलिस के पास कोई सूत्र नहीं था । कालका आने जाने वाले यात्रियों से जांच की गई और पूछताछ के लिए रोका गया । आसपास का इलाका छान मारा गया, पर कोई सूत्र नहीं मिला । अब केंद्रीय गुप्तचर विभाग के अधिक निपुण अधिकारियों को बुलाया गया । उन के आने से सराहत कालका जिला जैसे अधिक सक्रिय होता था । अनेक व्यक्तियों से घंटों पूछताछ की गई गई । सूत्रों पर चला किसी कार्रवाइयां की गई, पर कुछ पता नहीं चल सका । ऐसे संबंधी जुलते हत्याकांडों कि पुराने रिकॉर्ड निकले गए सब क्रांतिकारियों और कम्युनिस्टों की फैमिली देख डाली गई । उनकी बीस जून तक की गतिविधियों के वो भी लेने के कुछ संदिग्ध व्यक्तियों को पूछताछ के दौरान काफी यंत्रणाएं भी दी गई । सीआईडी अधिकारियों ने खोजबीन के दौरान कुछ ऐसी अमर्यादा भारती की सम्मानित व्यक्ति भी उनके सामने आने से कतराने लगे । मामला सिर्फ छह व्यक्तियों की हत्या का ही नहीं था, ये भी महत्वपूर्ण था कि वो सब वही जीरो पीते थे । लेकिन इतनी सरगर्मियों के बाद भी हत्यारों की एक अपर्याप्त और स्पष्ट होली के अतिरिक्त और कोई जानकारी नहीं मिल सकें । क्या इसे दो सिरफिरों का दुस्साहसपूर्ण पागलपन कहा जा सकता था? या दो दशक पहले जिस आतंकवादी आंदोलन का दौर था, वही फिर शुरू हो गया था । अंतिम रात को अधिकांश ने सही माना । उन दिनों का वातावरण भी किस्मत को पुष्ट करता हुआ लगता था । राष्ट्रीय नेताओं ने अरबी सरकार के युद्ध प्रयत्नों में सहायता देने से इंकार कर दिया था और सुभाषचंद मोशन भारतीय युवकों को जोश की आग में भडका रहते हैं और इस दुर्घटना के शिकार सब व्यक्ति यूरोप किए थे । इससे भी दूसरी धारा को ही बल मिलता था । खैर हत्यकांड का चाहे जो भी उद्देश्य रहा हो, हत्यारी कोई भी रहे हों, पर पुलिस इस मामले को नहीं सुलझा सकें । शिमला कालका रेल का हत्याकांड को अपरचित व्यक्तियों का कारनामा कहाँ गया और छह व्यक्तियों की हत्यारे पर आखिर है चार नवंबर को भटिंडा में एक दूसरा हत्याकांड हो गया । रामचंद्र वकील अपने दो मित्रों के साथ उधर के किनारे घूम रहे थे कि अचानक गोली चली और वो गिर पडे हैं । वो बुरी तरह घायल हो गए । उनकी दोनों साथ ही पुलिस को खबर करने दौडते हैं । जब पुलिस आई तो उसने वकील को मृत पाया । पैरों के निशान तथा कुछ सूत्रों के सारे पुलिस वहाँ स्थिति मील दूर बने छोटे से मकान के पास पहुंच गए । वो मकान लम्बे लम्बे पेडों से घिरा एक खुली जगह में बना हुआ था । पेडों ने ऐसे काफी छुपा रखा था । दरवाजे और खिडकियां अन्दर से बन्द थी । बाहर से देखने पर उसमें कोई हलचल मालूम नहीं पडती थी । खोजी दल के नेता इंस्पेक्टर देश आज ने मकान को चारों ओर से घेरने का आदेश देखकर मकान में रहने वालों को बाद में करने के लिए आवाज लगाएं । मकान में जरा भी हाल चल रहे थे । देश शायद ने दोबारा आवाज लगाई और इस पर उसे जवाब मिल गया । फिर की जगह से खुली और गोलियों की बहुत चार बाहर आए । इस पर अध्यक्षा छलनी होकर गिर पडा और तुरंत मर गया । तब पुलिस ने भी जवाब दिया । कुछ देर तक दोनों ओर से गोलियां चलती रहे । थोडी देर बाद मकान में से गोलियाँ आनी बंद हो गए । जम्मू को मुख्य आ गई तो पुलिस जबरदस्ती मकान में घुसकर अंदर एक पुरुष मृत्यु पडा था । उसकी बंदूक उसके पास थे । एक स्त्री बुरी तरह से घायल में उस आदमी का नाम अब्दुलकरीम था । उसके शरीर में लगे गांव को देखने से पता चला कि उसने आत्महत्या की थी । घर की तलाशी में कहीं छिपे हुए हथियार भी मिले । घायल स्थिति अब्दुलकरीम की पत्नी थी । इस संसार से विदा होने से पहले करीम ने उसे भी गोली मार दी थी । कुछ दिन बाद धीरे धीरे उस औरत की हालत सत्तर की और उसमें कुछ ऐसी महत्वपूर्ण सूचनाएं दी जिनसे आगे की खोज में पुलिस को काफी सहायता नहीं हैं । अब्दुलकरीम के कालका वाले घर की भी तलाशी हुई है । पहले मकान में जो हथियार मिले थे उनमें से दो बंदूकें रहते हैं । ये हाथ की बनी हुई थी और इन्हें कालका रेलवे वर्ग अपने लोग हैं की कतरनों से बनाया गया था । ये बात एक रहन से ही देरी की इन्हें बिना किसी की नजर पडे कैसे बना लिया गया । आखिर मु मामला जिसे सत्रह महीने पहले हंसोड कहकर फाइल कर दिया गया था । दूसरे केस की जांच पडताल के समय फिर भराया यद्यपि इस दूसरे मामले का उससे कोई संबंध नहीं था । बंदूक मिलने से तथा अब्दुलकरीम की भी दुआ द्वारा कुछ बातें बताने से पुलिस को लगा कि इन दोनों हत्याकांडों में कुछ संबंध जरूर है । उसने सोचा की संभावना यही अब्दुलकरीम रेल कर हत्याकांड का दोषी था लेकिन बहुत देर हो चुकी थी । अब्दुलकरीम पुलिस की पकड से दूर जा चुका था । जांच के दौरान पुलिस को पता चला कि अब्दुलकरीम बहुत क्रोधी स्वभाव का व्यक्ति था । रामचंद्र वकील से मेहनत आने के प्रश्न पर उसका झगडा हो गया था । इसी के लिए उसने उसे मार डाला । ये भी पता चला की वो एक लडकी के प्रेम में पड गया था । लडकी कबाब ये रिश्ता नहीं चाहता था इसलिए अब्दुलकरीम लडकी को किसी दूसरे शहर में ले जाकर शादी करना चाहता था और इस काम के लिए उसे पैसे की जरूरत थी । रेलकार को रोकने की योजना उसने पैसे के लिए ही बनाए थे । इस अद्भुत रहस्य उद्घाटन से पुलिस चौकी एक औरत को पाने की खत्म, उसने छह हत्याएं कर डालें । उच्च सैनिक अधिकारियों, एक वकील और एक पुलिस इंस्पेक्टर की हत्या कर के बहुत से व्यक्तियों को घायल करने के बाद खुद ऐसी जगह चला गया था जहां पुलिस उसे तो अकड सकती थी ना कोई जान तो उसे दंड दे सकता था । लेकिन क्या रेल कार्ड कहती में उसकी सहायता करने वाला कोई और नहीं था? यदि था तो कौन और पुलिस पूरे जोडो शोरों से उस दूसरे अपरचित व्यक्ति की खोज में लग गए । घोष के बाद पता चला कि अब्दुलकरीम का अब्दुल रही नामक भाई था जो डेरा इस्माइल खान में रहता है और काम करता था । जून उन्नीस सौ बयालीस में अब्दुलकरीम अपने भाई के साथ कालका के एक रेलवे क्वार्टर में रहता था । उन्होंने वो भी कार्यकाल के एक रेलवे वर्क शॉप में काम करता था । बाद में उसका तबादला कर दिया गया और भटिंडा में हुए हत्याकांड की तारीख में वो डेरा इस्माइल खान में काम कर रहा था । उस पर संदेह होना स्वाभाविक था । आठ नवंबर को वहाँ की पुलिस को तार भेजा गया कि वो से गिरफ्तार करके कालका ले आए । लेकिन शायद वहाँ उसे टेलीग्राम को समझने में कुछ गलती हो गए । कोई जवाब दबाकर तारीख को दूसरा तार भेजा गया कि क्या अब्दुलरहीम गिरफ्तार कर लिया गया है । दब उसे गिरफ्तार करके कालका लाया गया । सत्रह नवंबर को डेरा इस्माइल खान में उसके मकान की तलाशी ले गए । हथियारों के हिस्से एक फॅमिली और दो खत्म हैं । पत्र से कई महत्वपूर्ण तथ्य पता चला है कैंसिल की सिनाख्त के लिए कि ये उस रेलकार कि एक यात्री की है । अब्दुल रहीम ने उसे अपने घर का बरामदा होना स्वीकार कर लिया । उन पत्रों से ये पता चला कि अपराध का उद्देश्य क्या था । इसके बाद उसे हत्या और सशस्त्र डकैती के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया और उसकी जमानत भी नहीं हुई । जेल के सीखचों के पीछे बंद हो जाने पर बडी बडी हिम्मती अपराधियों में अजीब परिवर्तन आ जाते हैं । जेल की कोठरी का एकांत अपराधी के मन को इतना कमजोर बना देता है कि वो अपने अपराध का भार सहने लायक नहीं रह जाता है । अब्दुलरहीम के साथ भी यही हुआ । उसने कहा कि वह अपना अपराध स्वीकार करना चाहता है । इस पर उसे शिमला के अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट हरबंससिंह के सामने पेश किया गया । अब्दुलरहीम मुझे कल का में दुर्घटनास्थल पर ले गया और हत्याकांड से संबंधित स्थान दिख रहा है । रिलाइंस से कुछ दूर पर उसने वो स्थान दिखाया जहाँ और उसके भाई गाडी में गोलियां चलाते समय लेते थे । उसने कहा कि उन्होंने दिल्ली लाइन पर पत्थर रख दिए थे और फिर लेटकर रेलकार का इंतजार करने लगे हैं । जब गाडी पत्थरों से टकराकर रुक गई तो उन्होंने हमला दोनों गोलियां चलानी शुरू करते हैं । यात्रियों को इस तरह घबराहट में डालकर उसका भाई रेलकार में घुस गया और वो बार पहले पर रहा । माल इकट्ठा कर के कल का में अपने मकान में चले गए हैं । अपराध का उद्देश्य बताते हुए उसने कहा कि इसका भाई एक लडकी से शादी करना चाहता था । उन लोगों को लडकी को भागने के लिए मजबूर होना पडा था इसलिए नकद पैसे की जरूरत पडी और वो उनके पास नहीं था । जल्दी बाजी में कुछ पैसे जुटाने के लिए ये सब किया गया था । अदालत में सुनवाई के दौरान वो ये कहते हुए अपने पहले बयान से मुकर गया की पुलिस के अत्याचार से बचने का यही तरीका उसके पास था । लेकिन एक गवाही में उसके पहले बयान को सही प्रमाणित कर दिया । कृशन अब्दुलकरीम का पडोसी था । बीस जून की रात को आपने क्वार्टर के बाहर था क्योंकि गर्मियों में वो क्वार्टर के बाहर सोया करता था । उसने कहा कि लोकोशेड में खतरे की घंटी बजने से कोई आधा घंटे पहले उसने करीब और उसके भाई रहीम को रेलवे अस्पताल की तरफ से आते देखा था । किशन की गवाही में प्रमाणित कर दिया कि हत्याकांड की रात को साढे दस बजे करीब और उसके भाई घटनास्थल की ओर से आ रहे थे । अब्दुलकरीम के मुकदमे की सुनवाई शिमला के एक सेशन जज की अदालत में हुई । इस दौरान साठ दवाइयाँ और जोडी ने घटनास्थल देखने की इच्छा जाहिर की । उसे वो जगह दिखाई गई है । लम्बी रोमांचक जिला के बाद जोडी के सदस्य निर्णय पर विचार करने के लिए उठते हैं । उसकी वृद्ध ये बाधित हैं । बी जून की रात को कालका में अपराध होने की । कुछ देर बाद किशन ने उसे उसके भाई के साथ आते हुए देखा था और मोदी घटनास्थल कीदिशा उसके घर से बरामद हुई । प्रोफाइलिंग पेंसिल उसी रेलकार के एक यात्री मिस्टर बोस्टन ने अपनी बताया था । वो इस बात का कोई उत्तर नहीं देख पाया था कि वो उस रात बाहर क्यों गया और वो कहाँ से आ रहा था । उसके घर से बरामद हुए हथियार और साझे तथा उसकी स्वीकरोक्ति और उसके घर में मिले हुए पत्रों ने सारी बात स्पष्ट कर दी थी हत्या का उद्देश्य बता दिया था । दूसरी ओर ये भी था की रेलकार के बच्चे भी यात्री उससे नहीं पहचान पढे थे । केवल एक गवाह ये कह सकता था कि उसने रहीम को दो साल पहले दुर्घटना की रात को देखा था जो पहचानने में गलती भी कर सकता था और फिर उसने अपनी स्वीकरोक्ति से इनकार भी कर दिया था । तो प्लाइंग कैंसिल का उसके पास से बरामद होना इस बात के अलावा और कुछ प्रमाणित नहीं करता कि वो उसके अधिकार में थे । ये भी संभव है कि उसके भाई ने उसे वो पेंसिल हो और उसका भाई उस हत्याकांड में शामिल था । इस पर से यह सिद्ध नहीं होता कि उसने भी निश्चित रूप से उसमें हिस्सा लिया था । जूडि के चार सदस्यों ने से अपराधी घोषित किया और तीन में निर्दोष । उन तीनों में से एक अंग्रेज भी था जिसमें बहुमत मना और उससे फांसी की सजा संगठित है । लाहौर की हाईकोर्ट ने भी सजा बहाल रखें और जब उसने इंग्लैंड की प्रिवी काउंसिल में अपील की तो छब्बीस फरवरी उन्नीस सौ छियालीस को वहाँ से भी वो रद्द कर दी गई । कुछ महीने बाद अंबाला जेल में फांसी पर लटका दिया गया । इस मामले की सबसे अद्भुत बातें इसका उद्देश्य रहें । एक औरत के लिए इतने निर्दोष व्यक्तियों की हत्या हुई थी हूँ ।

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