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1. Mout ki Ghati

आप सुन रही कुछ हैं ये देश को बुक्स मारा लिखी किताब मौत की घाटी और मैं रश्मि शर्मा कुछ हैं सुनी जो मन चाहे दारू स्लम से आरुषा पहुंचा तो मेरी चेतना मुश्किल से आज शिलिंग रह गए थे । सर रनगति के जंगलों के भ्रमण की व्यवस्था करने वाली हूँ । पांच छह दिनों की यात्रा का प्रबंध करने के लिए हजार शिलिंग से कम पर राजी नहीं थी । हाँ, सीजन होने के कारण यात्री बहुत कमा रहे हैं । इसीलिए तो पूरी कार्या जीत का किराया मानते थे, जो मेरी सामाजिक स्थिति से बाहर की बात है । तरंगडी पूर्व अफ्रीका का सबसे घने जंगलों वाला इलाका है । वहाँ ही रन, जिराफ, नीलगायें आदि के साथ शेष भारतीय गैंडे अजकर जंगली वहाँ से आदि नहीं होते हैं । इन्हें देखने के लिए विदेशी काफी तादाद में आती है । सरकार ने उन्हें बीस प्रदेश में उनकी यात्रा और जंगली जानवरों की नस्य की रक्षा के लिए इन जंगलों का प्रबंध अपने हाथ में ले लिया था । आपने सर अंगूठी के जंगलों में जो अब मुश्किल से तीन सौ किलोमीटर रह गए हैं, घूमी बिना वापस जाना भी नहीं चाहता था । एक हजार शिलिंग देना मेरे बस से बाहर की बात बडी उलझन में पड गया आखिर कुछ सोच कर सर एनजीटी के रास्ते पर पैदल ही चल पडा । पैसे मुझे मालूम था कि सर संगती में पैदल घूमना मृत्य को निमंत्रण देने के बराबर ही है । क्या आरुषा तक पहुंचकर वापस चला जाता हूँ? नहीं भारत जाना मेरे स्वभाव ही नहीं एक बडी रूकावट संगती के बैरियर पर मेरे सामने आने वाले नहीं । बेरियर पर मुझे हर हालत में रोक लिया जाता क्योंकि जंगल में पैदल घूमने की इजाजत नहीं थी । फिर मैंने निश्चय कर दिया की मैं ॅरियर से दूर रहकर जंगलों में घुस जामकर चलते चलते सूर्य सिर पर आ गया । थकावट, प्रयास और ग्रुप के मारे चलना मुश्किल हो रहा था । पास के छायादार पेड के नीचे खाने और आराम करने के लिए तेरा क्या खाना खाने के बाद लेते ही नहीं थके लेकिन जल्दी ही एक भयानक सपना देखा हूँ मैं हडबडाकर उठ बैठ सडक क्यों नजर के ही तो देखा कुछ दूरी पर धूल सुनाती जी चली आ रही थी । मैं खुश हूँ और दोनों हाथ ऍम सडक के बीचोंबीच आकर खडा हूँ जीत मेरे पास आकर रुक के उसके एक अधीर उम्र का यूरोपीय जोडा बैठा था । थोडी बातचीत के बाद मालूम हुआ कि वे स्कॉटलैंड के रहने वाले हैं । फॅमिली की यात्रा के लिए जा रही मैंने पीछे चाहे मिस्टर स्कॉट ने पीछे की ओर इशारा करते हुए मुझे अंदर चलने का निमंत्रण दे दिया । मैंने जीत के अंदर कदम रखा ही था की जीत एक तक की किसी चल पडी । मैं अपना संतुलन का नहीं लग सका । जीत की पिछली सीट पर बैठी एक युवती पाॅड की सुंदर पुत्री थी । मैं क्षमा मांगकर उसके पास ही संभाल करते क्या हूँ इधर उधर की बातों के बाद उन लोगों ने अपनी प्रोग्राम की रूपरेखा बताई तो मैं झूठ हूँ इतनी सुंदर साथी और इतना शानदार ऍम शाम तक हमलोग निकोटिनिक गोरु के मुहाने के अंदर बनी सरकारी रेस्ट हाउस में पहुंच गयी । नहीं कोर्निकोवा जो शताब्दियों पहले का बुझा हुआ ज्वालामुखी संगती के बीचों बीच चट्टानों के उतार चढाव पर घास, झाडियां और वृक्षों के झुंड में संसार की भयानक जानवर पडे रहते हैं । रेस्ट हाउस के पास सरकार ने एक झोंपडी बनवा रखी थी झोंपडी के सामने एक बडी हूँ वहाँ शेष जीते हाथ गैंडे ही रहना जंगली वहाँ से आदि दिन रात पानी पीने और नहाने के लिए आती थी । कॅश चांदीराम में इस झोपडी में बैठकर जंगली जानवरों को देखने का प्रोग्राम थक दूसरे दिन नहीं कोर्नी गोरु के क्षेत्र में फैल पार्टी और विभिन्न प्रकार के पशुओं को उनके स्वाभाविक वातावरण के पास में देखने का प्रोग्राम था । तीसरे दिन वहाँ से कोडवा तिरंगी ने पाषाण युग के मनुष्य द्वारा चट्टानों पर बनाई गई चित्रकारी को देखने के लिए जाने का प्राॅक्टर दिन सर गंगटी के आसपास के क्षेत्रों में घूम कर गर्म पानी की चीजें गर्म पानी के सोते अफ्रीका के कबीलों का जीवन आधी देखने का भी कार्यक्रम । आखिरी दिन सरण सिटी के घने जंगलों में छह का शिकार करना था । इसके लिए मास्टर्स कार्ड के पास एक सरकारी लाइसेंस और दो राइफलें शाम के साढे पांच बज रहे थे । सूर्य ढल रहा था निकोल नहीं गुरु के ग्रेटर तक पहुंचने के लिए चढाई शुरू हो गई थी । अंधेरा होने से पहले हमें रेस्ट हाउस में पहुंच जाना चाहिए था । सडक की जान रही हूँ । ढलानों ने रास्ते को खतरनाक बना रखा था लेकिन मिस्टर का गाडी को उडा के लिए जा रहे थे । पूरी आशा थी कि हम रात होने से पहले कहाँ पहुंचाएंगे । चढाई खत्म होने से जरा पहले सरकारी एक काम नहीं और पीछे की ओर फिसल नहीं लगी हूँ । ऍम ब्रेक लगाकर गाडी खाॅ दबाकर इंजन चलाने की कोई लेकिन इंडियन ने साथ नहीं दिया । मिस्ट्रेस कार्ड ने फ्यूल की कोई पर नजर डाली । मैं जीरो पर टिकी हुई थी । हमने किलोमीटर पीछे ही पेट्रोल की टंकी भरी थी । फिर भी हमारे पास पेट्रोल के सबके बे खाली हो चुकी थी । किलोमीटर की यात्रा में लगभग दस ऍम पेट्रोल कैसे खत्म हो सकता था । अचानक मेरी नजर पेट्रोल के कहने के नीचे हूँ । वहाँ जमीन कारण बदला हुआ हूँ और उसी रंग की एक पतली मिलेगा । दूर तक पीछे जाती दिखाई दे रही थी । सारी बात समझ में आ गई । तब भी लिख कर रही थी । हमारे की पक्का के पास रुक गई । बग्गा स्थानीय बोल चाल में उनका को कहते हैं जो प्रसाद की कीचर भरी सडक पर गाडियों के गुजरने से बन जाते हैं और बाद में सूखकर पत्थर से भी ज्यादा सर्दी हो जाती । फॅमिली पीजी ऊपरी हुई जमीन पर लग कर की जा रही थी और पहले जमीन के ऊपर ये ऊपर घुमाने लगी थी । मैंने जमीन पर मुश्किल से पत्थर जैसे सख्त पीती को तोडकर बडे बडे टुकडे पहियों के नीचे डाले लेकिन देखा तो साॅफ्ट और मैंने मिलकर जीत उठके लगाई है लेकिन फिर भी नतीजा कुछ नहीं निकला । समस्या गंभीर हो गई । ज्यादा देर तक बाहर नहीं हफ्ते खडे रहना भी खतरे से खाली नहीं । ऍम भी बाहर आ गई । दोनों राइफलें लोटकर स्कॉट और उस चलाने राइफलें संभाल ली और हम दोनों गाडी को बाहर निकालने का उपाय सुश्री लगी । गाडी के अंदर और ऊपर से सामान उतार लिया गया । फिर हमने मिट्टी तोड तोडकर करधोनी डाली । छोटी छोटी लकडियाँ और खास इकट्ठा करके भी जा रहा हूँ । तो मैंने चारों पहियों को इकट्ठा चलाने वाला उपाय काम में लाते हुए फल स्टेट पर कार्य छोटी एक सख्त झटके के साथ गरम गरम करती गाडी गठ्ठे से जरा बहार सरकार लेकिन पहियों की तीव्र गति से मिट्टी घास पोस्ट और लडकियों के पीछे की ओर सरकारी फिर भी नहीं रुकी रही हूँ । एक दो बार ने सिरे से मैं देखा तो स्टाल कर कोशिश की । पच्चीस बाहर नहीं अचानक रेक्सी कि मोदी कहने की दो टुकडा हूँ, हमारे हाथ हूँ । उन्हें पहले यू के पीछे पडा दिया गया और फिर कोशिश की इस पर गाडी पक्का से बाहर निकल करेगी । गाडी की टंकी किसी नौकरी पत्थर से टकराकर पहले ही जख्मी हो चुकी नहीं किसे हम पूछ चुकी थी । अब तक सहारा पेट्रोल रह चुका था । मैंने मिस्टर स्कॉट को सूचित किया । उन्होंने ठीक फॅमिली में मुझे अपने आप को अपने अपने भाग्य को कोस सकते हम चारों गाडी को धक्के लगाकर समतल सडक पर लिया । आगे जाकर ढलान आ गई और हमारे अनुमान के अनुसार रेस्ट हाउस चार से पांच किलोमीटर ही रह गया था । इसलिए मैंने राइटी मिस्टर और मिस इस्कॉर्ट गाडी पर पहुंचेंगे तथा उर्सला और मैं जब की लगाते हुए कार्य को ले चलेंगे । इस प्रकार हम दोनों को थोडा खतरा तो था लेकिन इसके सिवा चारा भी क्या का? हमारे पास अंधेरा बढने लगा । चारों और धुंधलका चीजों को निकल नहीं हूँ । इतने में लगभग सौ दस दू सीडी नोकदार चट्टानों के आगे झाड झंखार ओके बीच से एक चमक पैदा हुई जैसे बिजली के दो बाल एक साथ जगमगा उठी हूँ और ये किसी शेरिया जीती भी हो सकती है तो उस लाॅकर उसी चिपट के खेर ने छलांग मारी । केवल तो छलांगों में हम तक पहुंचकर हमारा खत्म कर सकता हूँ । सोचने का समय नहीं । मैंने छत पर पिछला दरवाजा खोल और उस तरह को उठाकर हम करते हैं और खुद भी अंदर पूछ कर दरवाजा पंजा क्या बाहर घूम रहा था । क्या कितनी देर रूसलाह भय के मारे मेरे सीने से चिपकी रही । हम सब ने मिलकर उसे विलासादि तब कहीं जाकर उसकी जान नहीं जाना है । अब तो यह नहीं सिर्फ की रात जीत के अंदर ही बैठकर गुजारी चाहिए । होसला मेरे साथ सभी वैसी रात के सन्नाटे नहीं उसकी दिल की धडकन तक सुनाई नहीं हूँ । अंदर बैठे बैठे हम सब उन की नहीं लगी । ये नहीं कैसा अनुभव हुआ जैसे भूकंप आ गया । देखो एक बहुत बडा हाथ अपनी सुन से गाने को झटके दे रहा है । बिल्कुल उसी तरह जैसे हम बचपन में पेड को झटक झटककर छह तो उसकी रहते हैं । ऍफ मारकर मुझे ले पड गई करने से स्टार्ट नहीं मिस्टर स्पोर्ट की बातों को अपनी दोनों हाॅल सडक की बनी और कितना अच्छा था । अधिकारी उसे पलट जाती तो हमारी हस्तियों तक का पता नहीं चलता । हाथ का मुझे बढता जा रहा हूँ तो जाना ही है कि हमारी गाडी में एक के लिए का बडा सा अच्छा पडा है । हाथ खेले की बहुत शौकीन होते हैं और संभव है कि सुबह नहीं उसे यहाँ तक चीज कर रहे । मैंने केले का सारा कुछ आ उठाकर हाथ के सामने ऍम करता हूँ । हाथ हमारी गाडी छोडकर खुशी से चिंघाडता हुआ अकेले की ओर लगता और हमारी जान चुकी जैसी जैसी सवेरा हो और तो वो गाडी में छोडकर मिस्टर स्कॉट और मैं राइफलें उठाकर वो पेट्रोल का खाली तीन लेकर रेस्ट हाउस की ओर चले । सूर्य के कुमारी किरणों के प्रकाश में सामने का दृश्य न्यू लग रहा था जैसे अलिफ लैला की किसी कहानी ने वास्तविक रूप ले लिया हूँ । नुकीली चट्टानों की लगभग सात सौ मीटर नीचे दुनिया की सबसे बडे ज्वालामुखी का मुहाना पंद्रह से सोलह किलोमीटर में फैला हुआ था । लगभग चार सौ पचास किलोमीटर के क्षेत्र में जंगल झाडियाँ और झिलमिलाते खेले ऐसी लग रही थी जैसे को ये एक काम जादू की दुनिया में आपको चाहूँ रेस्ट हाउस में आकर हमने तीनों में पेट्रोल लिया और टंकी की मरम्मत का सामान लेकर वापस आए । टंकी का छेद जोडा क्या पेट्रोल बाॅर जीप रेस्ट हाउस की तरफ चलती? इस बीच रेस्ट हाउस की बहरीनी नाश्ता तैयार कर दिया था । हम लोग उस पर टूट पडी । सारा दिन हम उनके जानती और मचानों जैसी झोंपडियों में बैठे जंगली जानवरों के आने जाने का दृश्य नहीं दे रहे । कभी नर मादा हाथ ही बच्चे आपस में अठखेलियां करते हो जाती है । कभी हिरणों के झुंड घास चरते नजर आती तो कभी का रुका गैंडा भी नजर आ जाता हूँ । जी रास बडे बडे वृक्षों के पत्तों पर मुसलमान देखो सर्च आते शेर चीते जी में पानी पीने आते हैं और उन के आने से पहले ही गिरन चौघडियां भारती झाडियों में कम हो जाती है । झोंपडी के पहले कमरे में मिस्टर और ऍम विश्राम कर रही थी । बीच के कमरे में होसला की सोने का प्रबंध और आखिरी कमरे में मैं कराटे भर रहा था । अचानक दरवाजे पर खटखट हुई थी । पहले तो मैं समझा नहीं मेरा हूँ लेकिन खटखट जारी रही तो मैंने ऍम की बत्ती और बिस्तर से उठा देश के दरवाजे पर खटखट हो रही मैंने चिटकनी खुलती तो सलाह मेरे पहलू में आकर समाज कहने लगी मुझे डर लग रहा है तो मैं उसे सहारा देता हुआ पलंग काट लिया है और उसे बैठा हूँ । अचानक उसने मुझे अपनी बाहों में जकड कर एक लम्बा चुम्बन लिया । फिर धीमे स्वर में कहे रहे मैं भी चाहती तेल की गहराई क्यूँकि बोलो तुम भी मुझे चाहती हूँ मैं तुम्हारी आंखों में प्रेम की चमक देखे हैं । बोलो बोलो ना मैंने उसके रेशमी बालों पर हाथ फिराते हुए कहा । सच तो यह है कि जिस क्षण मैंने तो नहीं देखा है । उसी समय से मेरे दिल में प्रेम की चिंगारी सुलग रही हूँ । लेकिन रंग और धर्म का अंतर संभवत है । हमारे प्रेम की राह में तुम्हारी माँ बाप भी शायद से अच्छे से ना तो मेरे माँ बाप को गलत समझ रहे हैं । मुझे बात चाहती मेरी प्रेम का आदर करेंगे । ऍम के अनुसार हम नाश्ते से छुट्टी पाकर सैर और शिकार के लिए चल पडे तो चलती रही और हम दोनों दरवाजों के देशों से बाहर का दृश्य देखते रहे । फॅसे चमत् लगता था जैसे उसमें दो अच्छी चली या नहीं आ रही हूँ । मैंने धीरे से कहा तुम्हारी आंखों में झील की गहराई हैं कि चाहता हूँ मैं में डूबकर मरचा उसने मुस्कुराकर मेरे घुटने पर चुटकी निराशावादी कहीं उसके निगाहों में प्रेम उमर रहा था । इराक हुई आंखों में बात होने लगी । मैं करूँ नहीं लगा और मुझे ऐसा अनुभव हुआ जैसे उर्सला भी मेरे पास टाॅपर उसके हूँ । चमके शायद मिस्टर स्कॉट ने यह दृश्य जीत के ही नहीं थी । कॅश पीछे से मेरी कमीज का कॉलर पकडकर जब जोडते हुए गुस्से से हूँ मैंने तो नहीं लेते इसलिए नहीं दी की तो मेरी बेटी से इश्क लडाते हुए ऍम मुझे यह नहीं हो सका की कहता हूँ कि इस तो आपकी चाहिए थी, बेटी ही लगा रही है । मैं तो केवल उन चाहता था लेकिन मैंने सारी गलती अपनी से लेते हुए कहा मेरा नहीं हूँ । मरियम की पवित्रता का प्रतिबिंब हैं । मैं आपकी स्वीकृति से उस तरह का हाथ अपने हाथ में हमेशा के लिए लेना चाहता हूँ । मेरी बेटी किसी कार्य आदमी से विवाह नहीं करेगी । इससे पहले मैं उसे राइफल से उडा दूंगा । समझे इसी वक्त नीचे उतर चाहिए ताकि जंगली जानवर दो ही निवाला बनाकर अपनी पेट की आग बुझा सके । मैं जंगली जानवरों की डर से गलत नहीं कह सकता हूँ । फिर मैंने पिछला दरवाजा खोना और अपना किटबैग संभाल कर पता किया था । उस स्लाॅट कर मुझे रोकने की कोशिश मिस्टर स्कॉट ने उसे बालों से पकडकर ऍसे अलग कर दिया और फिर मैंने बाहर छलांग लगाते हैं ही एक झटके के साथ जमाना हूँ । मैंने सोचा की जिंदगी हुई तो कोई ना कोई वार्डन राम लगता हुआ मुझे पिक अप कर ही लेगा । मुश्किल से आठ दस मोहि मुराद की सामने से एक गेंद आता हुआ दिखाई दिया । उसकी और मेरे बीच लगभग तीस मीटर का फासला रहा हूँ । वापस मुडकर भागा तो कांदा क्षण दो क्षण में ही मुझे आता था । ऍम थी और बाॅडी नहीं । वो मैंने सुन रखा था कि गैंडे की नजर बहुत कमजोर होती है । इसलिए मैं सांस रोककर एक वृक्ष की तरह खडा हो गया । शायद मेरे पास से चुपचाप चर्चा ऍम बिल्कुल मेरे पास आएंगे । यहाँ तक कि उसकी गरम गरम सांसी मेरे शरीर को छू नहीं नहीं । मैं सोंग सोंग कर मेरा निरीक्षण करने लगा । फिर मेरी पसलियों में अपनी सीन नगर कर सहना नहीं हूँ । मुझे तो नहीं हो नहीं रही हूँ लेकिन मार्च सामने खडी हो हिलना डुलना मौत को निमंत्रण देना वो तभी न जाने कहां से एक रंगबिरंगी लम्बी तुम वाली चिडिया चाहते हुई कैमरे के सामने से उडान भरती हूँ आॅटो उसका यह साहस पुराना था और ये उसके पीछे वहाँ का मेरी जान बच करेगी । सडक चक्कर काटती हुई मुझे क्रेटर के नीचे घने जंगल में ले गई थी इससे पहले का समय । लेकिन जंगल इतना कहना था की शाम का भ्रम हो रहा । चलते चलते बहुत थक किया था । एक वृक्ष के नीचे बैठकर सुस्तानी की सोच रहा था कि सामने की लंबी लंबी घास के बीच से एक हाथ निकलकर बाहर आया हूँ । इतना लम्बा, चौडा और भयानक हाथ मैंने जिंदगी में कभी नहीं देखा था । मुझे देखते ही उसने ऐसी चिंघाड मारी । इस सारा जंगल गूंज उठा । बहुत सिर पर खडी हो तो दिमाग भी रजत से दे दिया जाती है । मैं पास की महोगनी बृक्ष के लौटते हुए तकनीकी और था । लेकिन जैसे मैं ना समझे बैठा था तो बहुत पढाई करती थी । वो इतना हूँ कि उसने अपनी धूम का काफी सारा हिस्सा एक बडे जितनी के गेर लपेट रखा था । इसके बावजूद उसके शरीर का बाकी हिस्सा कई दस नीचे हवा में छोड रहा था । फॅमिली से मुझ से लम्बी लम्बी सपाना बार बार बाहर निकाल रहा था । अब तो बचने की सारी आशाएं खत्म हो गयी । दोनों तरफ से मौत ने घेर रखा था । इतनी भयानक मौत की मैं आंखें मूंदकर खडा किया और उस क्षण का इंतजार करने का जब हाथ की मुझे अपने ताऊ के लिए कुछ चाहिए । क्या आजकल समूचा नहीं जाएगा? तभी हाथ की दर्दनाक चिंघाड सुनकर मेरा तीन पहले और मैंने घटनाक्रम हो जाएगी । अजकर हाथी की सूंड के अगले हिस्से को अपनी भूमि तक पूछ रहा था और हाथ भी बस होकर चिंघाड रहा था । हाथ अपनी दोनों पाउंड जमीन पर हराकर सिर और गर्दन को छत के दे देकर अपनी पूरी ताकत से सूट छुडाने की कोशिश कर रहा था लेकिन आज कर उसे हिलने भी नहीं दे रहा था । सून के रास्ते अजगर उसका खून जो था कि जब कुछ मिनट पहले मुझे को चलने आ रहा था । अब खुद एसपी बस कीडे की मौत की आखिरी गाडियाँ चल रहा था । दो तीन लगातार चलता और पडे छोटे खतरों को छिनता हुआ मैं जंगल को पार करने में सफल ही क्या आगे कहीं कहीं रूप है ब्रिक्स नहीं, सुखी झाडियां नहीं और फिर कुछ आगे बिलकुल ही बंजर जमीन ना नहीं । अभी का विशाल समुद्र नजर आॅपरेट बहुत गहरी नहीं थी फिर भी चलने में कठिनाई हो रही थी । खरीद तक रही थी लेकिन चाय प्रकृति को मेरी दशा करते है । बकरियां अच्छा नहीं नहीं हम आज भी पहले तीनी देती है । अचानक वातावरण में ठीक ही चीखें गूंज उठी मैंने चार । उन्होंने कहा दौडाई लेकिन जहाँ तक मैं चाहती हूँ रेट के सिवा कुछ नहीं आता था । जैसे जैसे हवा तेज होती चीखों की आवाज की तेज होती जाती हूँ । मैं डर के मारे काफी रखा और जहाँ खडा था नहीं बैठ गया । मैं ये बैठे अकारण ही एक चुटकी देख लेकर कुंडलियों से मसल नहीं लगा । ऍम उंगलियों से रेट के मसले जाने से भी चीखों की । वही आवास थी लगी मैं काम था आखिर क्या भाग गई मैं वहीं बेसुध साहूकर बैठ गया । आगे जाने की हिम्मत नहीं हुई लेकिन चीखों की आवाज से कम कैसे बंद कर ली था? हो सकता था की दो अफ्रीकी कबीलों की खूंखार जंग के बाद मरने वालों की आत्माएं अभी तक क्या कर रही है । उस वक्त दिमाग इतना खाली हो चुका था की मैं हर बात मानने के लिए तैयार था । मैं अपना ध्यान दूसरी ओर हटाने के लिए किट बैंक से गाइडबुक निकालकर पडने लगा । संगती के संबंध में पढते पढते थे । एक जगह इस रेगिस्तान का भी जिक्र आया था । हवा चलने परेड छोड दी से ठीक है उठ रही लेकिन इसका कारण अभी तक मालूम नहीं हो सकता हूँ । शायद ये कोई खास के रखी थी करने की कोई पास देखो ये पढकर जान भी जाना है और मैं मेरे पास पानी खत्म हो चुका था । अरे किस्तान की था नहीं थी । दूर दूर तक सेवा रेट के कुछ नहीं था तो रोज पानी की एक बूंद भी मुंबई नहीं गई थी । ऐसा लगता था जैसे बिलकुल मेरे सामने कुछ दूरी पर लोग पिकनिक मना रही पानी के दरिया बह रही ढाका हुआ जाता हूँ और सब पल भर में का हो जाता है मेरी सुपान सुख । कहीं कुछ देर बाद सांस्कृतिक और मैं बेहोश होकर के पढाओ होश आया तो देखा कि अफ्रीका की जंगली कभी ले के लोग मेरी चारों ओर बैठे खुशियाँ बनाएंगे । चावल की शराब चल रही थी । रूपरेखा सेवेन में साई कभी ले के लोग रखते थे कि लोग ताकि अफ्रीकियों से ज्यादा खूंखार होती है और इन कारण भी बाकी अफ्रीकियों से काफी साफ होता है । नाक नक्श मीठी होती हैं ये लोग मुझे बेहोशी में उठा लाये शायद जंगली जडी बूटियां खोलकर मुझे पिलाई गई । मेरी होश में आते हैं पास की ये गोल्ड झोपडी में मुझे कैसे क्या क्या मेरा खाना एक लडकी ला शायद ऐसा की बेटी थी मैं उसकी आंखों में अपनी टीम और हम डर्टी की भावनाएँ पता हूँ । धीरे धीरे हमारा अनजाना पन खत्म हो गया और उसने शहरों में मुझे बताया की पूर्ण मानसी की रात को जन्म के तेज ताकि सामने मेरा बलिदान किया जाएगा, पूरनमासी रहता है । मेरी झोंपडी के बिल्कुल सामने नेता की मूर्ति रखी, पशुओं की चर्बी से चिरांग होश नहीं अचानक की चांदनी और चिराग की रोशनी में युवक युवतियों ने नाथ शुरू कर दिया । नगारों की था आपसे सारा कॅश सरदार की बेटी से मुझे मालूम हो गया था कि यह ना आधी रात तक जारी रहेगा । मेरे बलिदान के बाद कभी ले की उन्नति के लिए प्रार्थना करते युवक युवतियों की छोडी नाचते गाते चिरागों की लपलपाती शिखाओं के प्रकाश से दूर अंधियारी की कोर्ट्नी छिप चाहिए कि इतनी तीन जिंदगी और माँ की कश्मीर कश्मीर बडी मुश्किल से गुजारे की चाहता था कि काश एक छन्नी माता जाते हैं और ये सब कशमकश खत्म हो जाते हैं । इतना लंबा इंतजार तरह जान कीमत लेकिन आज जब की जिंदगी और मौत के बीच केवल कुछ घंटों का अंतर रहता है । ये सब कुछ भूलकर खेती की बाहर मिसाइल युवक युवतियों का नीति दीप्ति में इतना मस्त हो गया कि यह भी याद नहीं रहा हूँ कि कुछ छत, बात ये ही लोग मेरे से हाथ संकर खुशियां देना चाहिए । मुझे काम कभी भी आ गई । खडे खडे लगा कि कोई मेरे पीछे बैठा मुझे बुला रहा हूँ । मैंने पीछे मुडकर देखा । सरकार की बेटी जमीन पर बैठ के मुझे बुला रही नहीं । उसी झोंपडी के बाहर एक इकट्ठा घोटाला था तो उस से इशारे से मुझे बाहर चलने को कहा । हम दोनों छोटों की तरह ही है और काफी दूर कर जमीन पर मिलती चले गए ही नहीं थी । फिर उठकर दौड नहीं लगी, ऍम चलेंगे । चांद की रोशनी हमें रास्ता दिखा रहे हैं । जैसे पडती कई घंटे तक हम भागते हैं, एक जगह है । उसने इशारों में बताया कि इस जगह से सीधे जाने से मैं सोना पहुंचाऊंगा । अपनी हाथ की दो बडे बहनों से उसने एक साला मेरे हाथ में थमा असाहारा पीएल भाला जंगली जानवरों से मेरी रक्षा करें । सातों के बीच जहरीली जडी बूटियों में बुझा हुआ यह संभाला जी से घायल कर देता है । उसे जिंदा नहीं रह सकता । मेरी उसे इशारे से अपने साथ चलने को कहा । यह भी कहा कि मैं उससे विवाह कर लूँगा, लेकिन उसने इनकार में से भी ला दिया । उसकी जिंदगी उसकी कबीर के साथ और वहीं जीना मरना है और कभी ले में इसी ही किसी की हो कर रहे हैं तो भी नहीं । जाने क्यों मुझसे लिपट के और मेरे शरीर को अपनी चुंबनों से दर्ज कर दिया । फिर लालसा भरी नजरों से मुझे विदा करते हुए वापस मोटे । मैं हक्का बक्का खाया था कि उसकी दर्दनाक ठीक सुनाई थी । मैं उसकी ओर लगता है । लेकिन उसका अपना भाना उसके सीने में ढल चुका था । उनका दुबारा उबल रहा था । मैंने पूछा ये तुमने क्या के लिए? ये कुछ जवाब नहीं पाए पर मुझे लगा उसकी आंखें कहते हैं तुम्हारा जो मृत्यु से भी बुरा होता है । इस धारा की चुभन से तुम कुछ मिनट में ही छुटकारा मिल जाएगा । लेकिन तुम्हारे वियोग की जो धन जिंदगी भर सीने को छलनी करती रहे एक लंबी हिचकी किसान नहीं ठंडी हो गई । मैं अपनी कम्बल सिंह सेठ ऍसे आगे चलकर

2. Vaigyanik ka Balidan

चीन ऍम हो चुका था । भारत का पहला नीति रिएक्टर असक्रिय उसी दिन प्राकट्यकाल उसका उद्घाटन समारोह संपन्न हुआ था । जैसा कि स्वाभाविक था हम सब फॅमिली काफी जोश और उत्साह से भरे हुए थे । उस रात कंट्रोल रूम में मेरी और सबूत की डी । टी लगभग एक प्रजाति अपनी सामान्य आदत के अनुसार सबूत हो गया । वहाँ शून्य कुछ नहीं हूँ । मुझे स्पष्ट होता था कभी हँसी कभी तरह रिसर्च में कभी उसका मन नहीं लगता था । सारे प्रोफेसर भी उससे नाराज नहीं । उसी प्रकार कर मैंने पूछा रीडिंग ही गा रही हूँ । चौकर ऊॅं ऍम थोडी देर बाद अचानक घबराई हुई आवाज नहीं । वो बोला मैं तो ये करें तो बढता ही जा रहा है । मुझे हंसी आंखें बोली ऐसा लगता है तुम्हें रिएक्टर फिजिक्स कभी पढा ही नहीं । चेंज रिएक्शन हो रहा है तो करंट पडेगा । नहीं किया सब बहुत चुप हो गया । कलॅर आपने उसका मजाक उडाने का अच्छा विषय मिल गया था । ये सोचकर बडी खुशी हो रही थी । सुबह शायद संतुष्ट नहीं हुआ तो कुछ कर डाॅक्टर फिजिक्स के किताब की लगा । उधर से ध्यान हटाकर मैं अपना काम करने लगी । मेरे पास आकर सबूत से बोला मतलब मेरी बात समझने की कोशिश तो करूँ? मैंने कहा देखो तो मुझे डिस्टर्ब मत कर । जो कुछ भी रीडिंग हो, नोट करते हैं । कल सुबह सुबह सब कुछ समझा दूँगा । गलती की आवास नहीं वो पूरा कल सुबह आएगी । तब तो एक घंटे के अंदर इस रिएक्टर में विस्फोट हो जाएगा । साथ ही सारा का सारा शहर तबाह हो जाएगा । अच्छा मजा लेते हुए मैंने कहा ये ऍम कोई साइंस फिक्शन तो नहीं देख रही हूँ । मधु की कहने लगा मेरी बात सुनो, मैं मानता हूँ कि तुमने मुझसे अधिक पढा है तो मुझे अधिक जानती हूँ हिंदू तुम्हारा मेरी रीडिंग तो देख लो । उस पर एहसान सा करती हुई मैं उठी । मैंने देखा तो मुझे भी आश्चर्य हो सामान्यतः करंट बीस एंपियर से अधिक नहीं होता किंतु करंट वापस की सूची अस्सी ऍम धीरे धीरे और बढ रहा था । हाँ मैंने सुना है रिएक्शन इतना तीस कैसे हो? क्या मैंने भी जल्दी जल्दी किताब पर तो समझ ही नहीं है । सबूत बहुत गंभीर होकर विचार कर रहा नहीं बोला ये स्थिति बहुत खतरनाक हिम्मत हूँ । ऍम नेता तीसरे नहीं होना चाहिए । ऐसा करते हैं । मैंने चिंतित हो । पूछा तुम जानती हूँ फॅमिली क्या अंतर होता है? चीन ऍम दोनों नहीं होता हूँ पर क्या हैं की ऍम बम में चेन रिएक्शन बहुत जल्दी जल्दी और निर्बाध गति से होता है जिससे बहुत अधिक ऊर्जा ईकाई टिंगल पडती है और सब कुछ विध्वंस करता हूँ । इसके विपरीत रिएक्टर में किसी मॉडरेटर की सहायता से चीन रिएक्शन की गति पर नियंत्रण रखते हैं ताकि ऊर्जा धीरे धीरे नहीं थी और उसका रचनात्मक उपयोग हो सकते हैं । अपना हाथ में सब कुछ होती जा रही थी जिसकी भी ठोपन का हम लोग सादा मजाक उडाया करते थे । परेशान हूँ । परिस्थिति की गंभीरता पर विचार कर रहा था । करेंट पहुंचा रहा है । अपनी हाथों पर सिर रखकर को बोला इसका अर्थ है कि चीन रिएक्शन की गति बहुत बढ गई है और बराबर पडती जा रही रिएक्टर में इसकी गति पर जो नियंत्रन रखा जाता है तो काम नहीं कर रहा हूँ । तो निश्चित है कि शीघ्र ही यह थिएटर एक विनाशकारी एटम बम बन जाएगा । बडी विषम परिस्थिति है मधु करोडों रुपये का नुकसान लाखों मनुष्यों कीमृत्यु मैंने तो रिएक्टर की रचना कभी ध्यान से नहीं पडी । समझ नहीं आता कि क्या करूँ । तुम फौरन जाकर टेक्निकल एक्सपर्ट को बुलाकर लाओ । चीन रिएक्शन को तुरंत रुकना पडेगा । कंट्रोल रूम से निकलकर भागी भागी में चीफ टेक्नीशियन की कमरे में गई होते हुए चपरासी ने बताया कि साहब करीब डेढ किलोमीटर दूर होटल में चाहती नहीं गई । पता लगा कि इंजीनियर सुपरवाइजर आती सब लोग साथ ही गई हैं । आखिर बडे आदमी नाईट ड्यूटी चाय नहीं पियेंगे तो रात भर जाकर काम कैसे करेंगे । हताश होकर पेस्ट कंट्रोल रूम में गई । सुबोध उस समय भी शांत पर गंभीर था । मैं बोला मधु करंट अब एक सौ पचास के पार हो गया है । दो सौ पचास होती होती स्थिति कामों से बाहर हो जाएगी । मैंने लगभग होकर का हूँ । कोई टेक्निकल सहायता नहीं मिल सकती है वो यहाँ से चलो कितनी दूर हो सकेगी । कहाँ चलो मैं बेहोश हो जाऊंगी । सुबोध बाजी सीक्रेटली चलो भी कार की बात मत करूँ । उसके मुँह से इतने करे शब्द मैंने कभी नहीं सुनी थी । मैंने अभी गाइड चार देखा है । समझ वाॅक में ठीक मात्रा में ड्यूटेरियम मोनोऑक्साइड ना रहा हूँ । यही तरह मॉडरेटर हैं जो रिएक्शन की गति को नियंत्रित करता है । इसके दो कारण हो सकते हैं । काम काम नहीं कर रहा हूँ अथवा फिल्टर पर गंदगी बढ गई । एक्शन की गति बढने का दूसरा कारण रिकॅार्ड ज्यादा तादाद में न्यूट्रॉन पहुंचना हो सकता है । सामान्यतः दो न्यूट्रॉन प्रति मिनट से अधिक नहीं आनी चाहिए । ये ही न्यूट्रॉन चीन एक्शन आरंभ करते हैं । हो सकता है न्यूट्रॉन उत्पादक सिलेंडर की स्ट्रीट अधिक चौडी हो गई हूँ । मैं स्तब्ध होकर सब सुनती नहीं । मैंने कहा किंतु ये तुम कैसे की कर सकती हूँ इसके लिए तो वही ट्रेक्टर के अंदर जाना पडेगा तो तो इसकी रचना भी नहीं मालूम हूँ । हाँ ऍम अंदर तो जाना ही पडेगा । गायक जात के चित्र से रिएक्टर की रचना का अंदाजा मुझे हो गया है । मैं पढने में कमजोर अवश्य हूँ पर बिलकुल अनाडी भी नहीं मगर अंदर जाओगे कैसे? मैंने पूछा हूँ रिएक्टर गैलरी की चाबी तो चीज फॅस ही । एक्शन सोचकर उसने उत्तर दिया ऊपर की ओर से जाऊंगा हूँ इन करंट प्रवाह की जहाँ पे क्योंकि मेन लाइन में करंट बहुत अधिक आता हूँ । इसलिए प्रवाह कों के लिए एक ही फॅमिली की छडी प्रयोग की गई हैं । ये छडी मेरा बाहर राजधानी से संभाल सकती हैं तो मुझे जल्दी से प्लास्टिक सूट पहना तो फिर से चला गया था । ठीक कर मैंने कहा तो ऐसा नहीं कर सकते । उन छडों में दो हजार वोल्ट के बिजली रहती है । देख गोभी की बातें मत करूँ मैं मुझे ऍम मैं जानता हूँ । प्लास्टिक सूट और रबर के दस्ताने पहन कर जा रहा हूँ । बिजली मेरा कुछ नहीं बिगाड सकती हूँ । उसके चेहरे स्पष्ट की वो अपनी पर हैं । यदि वह इतना गंभीर और सामने नहीं लगता तो मैं समझती कि वो पागल हो गया है । प्लास्टिक सूट पहनते हुए मैंने उसे अंतिम चेतावनी नहीं । बिजली से तुम बच्चा होगी लेकिन रेडियो रिया एक्टिविटी से यह प्लास्टिक की तुम्हारी रक्षा नहीं कर सकेगा । इससे तुम्हारी मृत्यु निश्चित हैं हूँ । उसने बडे आसान रहते नहीं जवाब दिया लेकिन मैं नहीं गया । तो इसलिए ऍफआईआर शहर का विनाश निश्चित है । फॅार के दस्ताने पहनने के बाद मैंने उसकी पीठ पर वायॅस मीटर और बैटरी का एक ट्रॅफी बातें ताकि बाहर से मैं उससे संपर्क स्थापित कर सकते । इस तरह तैयार होकर उसने करंट मापक पढने का हाॅल महाप्रलय में मुश्किल से तीस मिनट की दी थी । पहचानती जल्दी सीढियां चढकर रिएक्टर की छत पर क्या और उन तांबे की छडों के सहारे अंदर की ओर छूल । क्या मैं अपने वायरलेस सेट में कान लगाए बैठी थी? कुछ क्षणों तक उसका कोई संदेश नहीं आया । मैं बेचैन हो गई । मैं आउट बीस पच्चीस सुबह तुम कहाँ हो तो मेरी बात सुन रही हूँ । उसका उत्तर मुझे ये फोन में सुनाई दिया । इन छडों के सहारे चल रहा पहले लिक्विड मॉडरेटर के पास आप की ओर जा रहा हूँ । कृपाकर की थोडी देर तक कुछ मत्वपूर्ण थोडा तेज से मैं प्रतीक्षा करती रही । मेरी दृष्टि करंट मापक की ओर जमी हुई थी । सुजॅय लगभग पांच मिनट बाद सुबोध की आवाज आई । काम तो ठीक काम कर रहा है । फिल्टर कि गंदगी मैंने साफ करती है किंतु द्रव का बहाव टैंक की ओर नहीं हो रहा है । शायद विकास मलिका रेग्यूलेटर अधिक कस क्या है देखता हूँ मैंने रेग्यूलेटर बिलकुल ही हटा दिया है । अब तरफ काफी मात्रा में रियक्शन टैंक की ओर जा रहा है । आशा है इससे रिएक्शन की गति काफी धीमी हो जाएगी । हो सकता है रुक भी चाहिए करन की तरह समय मैंने देख कर उत्तर दिया करंट काम नहीं हो रहा है लेकिन बढ ही नहीं रहा । इस समय रेटिंग है दो सौ तीस ऍम एक मिनट के मान के बाद उसने फिर पूछा अपकरण कितना है तो स्वाॅट ये तो बहुत ही इसे कम करना पडेगा । उसकी कोलावा सुनाई थी । प्रयत्न कर रहा हूँ कि न्यूट्रॉन उत्पादक तक पहुंचा स्ट्रीट को बिलकुल ही बंद कर दूँ ताकि राॅय ही नहीं सकती हूँ ऍम मैंने आग्रह किया वो न्यूट्रॉन तुम्हारे शरीर पर पडेंगे । तुम्हारा शरीर रेडियोऐक्टिव हो जाएगा । इस पर उसके चीन हंसी की आवाज सुनाई थी । वही बोला है बच्चों जैसी बातें करती हूँ हूँ । अभी मेरा शरीर रेडियोएक्टिविटी से अछूता बजा । रेडियोएक्टिविटी तो रिएक्टर की हर इससे भी होती है । मेरी निगाह । करंट घुमा पक्की स्वीपर तेजी से जमकर दो सौ ऍम तक पहुंच गए । करंट स्थाई हो गया था लेकिन काम नहीं हो रहा था । इस रिएक्शन गति पर भी काफी खतरा था । थोडी देर बाद सुबोध ऍम मधु नाॅन उत्पादक के पास पहुंच गया हूँ । रेट मुझसे लगभग एक मीटर की दूरी पर है तो आप मुझसे चला नहीं जाता हूँ । इतनी देर लटके रहने के कारण मेरे हाथ बिल्कुल सुन पड गए हैं । मधु दया करके चुपचाप मत बैठो । कुछ पार्टी करती हूँ नहीं तो ये काम मत से नहीं होगा । ये स्लेट बंद करना पांच जरूरी मैं तुम्हारे साथ तो रुंधे गले से मैंने कहा तो खाली बहुत करेंगे । बहुत गरीब हूँ हूँ । फॅमिली न्यूट्रॉन मेरे ऊपर पढ रहे हैं । मेरे सारे शरीर में जलन हो रही है । मैं मार रहा हूँ मत हूँ की कारण फिर प्लास्टिक सूट निकल गया है । मैं तो मधु मुझे दिखाई नहीं बढ रहा हूँ ऍसे मेरी आंखें फूट कहीं मैं फिर से नहीं बन कर सकता अंतिम प्रयास करता हूँ बिल्कुल अंदाज से छलांग लगाकर न्यूट्रॉन उत्पादक सिलेंडर पर कुदूंगा यदि ठीक जगह ऍम हूँ मुझे सुन पा रही हो गया मेरा प्रयास सफल हूँ । करंट कितना है कि नहीं ऍम कुछ फॅमिली मेरी फॅमिली भी एक खुशी की लहर आ गई । ठीक कर मैंने सबूत को उसकी सफलता की सूचना ये कह रहे हैं काम कुछ बोलती क्यों नहीं मत ऍम किया ना? अब मैं कुछ और कर भी नहीं सकता । मैं कई बार अपनी फॅमिली किंतु वह सुन नहीं ऍसे । उसके काम खराब कर नहीं सकती । महान क्या कब फल भी पे शायद नहीं चल सकता है । सभी शहीदों के साथ ऐसा ही होता है । वह भी सिंध था । शीना आवास नहीं कह रहा था अभी कुछ झारखंड शेष सहमत हूँ । मन करता है काम से बहुत सी पार्टी करेंगे । फॅमिली में बहुत कम सोचा सपने मेरा मजाक उडा । हिंदू जब तुम मेरा मजाक उडा दी थी । मुझे बहुत दुख हुआ था क्योंकि मैं तुम्हें ऍम फॅमिली में बहुत तेज था । फिर इच्छा थी कि एक महान नहीं किया नहीं विज्ञान के लिए कुछ कर सकते हैं । इसलिए कोई नौकरी नहीं कर के रिसर्चर हम थी तो वैज्ञानि जीवन की विषमताओं से पे शीघ्र ही घर के थोडी सी ऍम वालों की कृपा हंसी नियमित रूप से नहीं ऍम मेरे सामने ही था ना भाव से पीडित मेरे वहाँ ऍम मेरे भाई बहनों की पढाई छूट है इससे मेरा दिल टूट गया पता नहीं आज अपनी निरुद्देश्य जीवन की भी चढाकर विज्ञान की कोई सेवा कर सका या नहीं मुझे कुछ दिखाई सुनाई नहीं पड रहा है । कितना लगता है कि तुम मेरे बहुत कठिन इतनी करूँगा कि मैं बीस ऍम ऍम कि किसी ने मुझे अपनी ऍम मेरी फॅमिली है ।

3. Vidhwa Sapin

जवानी दीवानी होते हैं और उस पर भी उठती जवानी दूसरों की बहुत तो मैं नहीं जानता हूँ पर मुझे लगता हूँ मान लो जितना बल मेरे शरीर में, उतना सारे संस्थान की प्राणियों को भी मिला करना होगा । एक घटना से आपको मेरी उस समय की मनोदशा का अनुमान हो सकेगा । अमलतास की सूची फल आप जानते हैं कि पत्थर से भी मुश्किल से ही टूटती है मेरा एक साथ ही वहीं अमलतास की सूखी फलिया संचार पांच गधा पच्चीसी करने वाले बैठी थी । बांधने घूमने की जगह मैं बोला कोई इसे मुक्का मारकर तोड सकता है । दूसरे किसी के कुछ कहने से पहले मैंने फली उसके हाथ से चीनी और पूरी की पक्की जगत पर रख कर सकता हूँ । फॅमिली तो क्या टूटनी थी ज्यादा जैसे हाथ साथियों की मजाक से बचने के लिए मैं वहाँ तो कुछ नहीं बोला, पर घर जाकर चुप जाम चारपाई पर लेंगे । पिता जी से कुछ नहीं तो रात घर गालियों का अविष्कार करने में नहीं व्यस्त रहे । उन्होंने कलसा भरवाया तो मैं एक हाथ आर दांतों से रस्सी पकडकर भर लाइन सभी पीली के समान सूजी हुई । हथेली देखकर पिता जी कैसी ये क्या हुआ । मैंने अज्ञानता प्रकट करते हुए कहा पता नहीं इन शायद सोते समय कोई नस चढ गई । मुझे बीजेपी के यहाँ ले गए । पता चला तीन हट्टियां तलैयों पर हो गई हैं । जो कष्ट हथेलियों को नीचे उतारने में हुआ उसे शायद में लेकर नहीं बताता हूँ । हाँ तो मैं उठती जवानी की बात कर रहा था । मुझे ऐसे काम करने में एक विचित्र आनंद आता था । ये नहीं दूसरे लोग कठिन या असंभव मानती हूँ । पर साथ मारने के लिए मैं उधार खाये रह था । बिना किसी की सिखाई ही मैं इस कला में परांगत हो गया था । सांप मारने के लिए किस प्रकार की लाठी चाहिए? कोई कल सात कैसे मारा जाता है? घर के सांप को किधर से छेडना चाहिए । इन सब विषयों में मैं अपनी निश्चित धारणाएं बना चुका था । लोग कहाँ करते हैं? तीसरा मारने वाले को सांप बहुत मिलते हैं । ये बात ठीक है, लगती है । ऐसा कोई ये दिन जाता होगा जब ये ऍम मेरे हाथों से मारा ना जाता हूँ । बरसात नहीं तो ऍम मेरी वजह से तमाम गांव के लोग सबको कीडा समझते थे । मैंने अगर पिताजी की गाडियों को अनसुना किया तो केवल इसी शौक कितनी साथ निकलने की झूठी सच्ची खबर पार्टी भोजन से भी उठकर भाग जाता था और पिताजी गालियों का धाराप्रवाह भाषण देते रहते थे । सबको गांव के लोग काल्कि रस्सी कहते थे । इसी से उसकी मारने की भयावहता का अनुमान किया जा सकता था । पहले चोट खाली जाने की भूल प्राण देकर ही ठीक की जा सकती है । हूँ । सांप का नाम सुनते हैं । मुझ पर ऐसा पागलपन सवार होता कि मैं सब काम छोडकर टंडा संभाल लेता था । एक बार ऍम था हाथ में किताबें लिए की । कुछ बच्चे साठ साल खिलाते खेत में से निकलेगी । मैंने पूछा कहाँ है सब बच्चों ने एक बाजरे कि झंड की ओर इशारा करती हूँ । मैंने कहा हूँ एक कांदा मुझे तो तुम लोग बाजरे के पूरे हटाकर अलग अलग रखो । योगी साहब निकलेगा ना मैं उसे, मैं तो बच्चों ने डंडा तो दे दिया । फिर पोला हटाना तो दूर, मेरे साथ वहाँ तक जाने के लिए भी राजी नहीं हुई । बिना और सांप को मारे आगे जाना मुझे बहुत ऍम । मैंने डंडा पास रखकर अपने आप बोले को हटाना आरंभ किया । तब तक खेत वाले तो तीन आदमी आकर बोले तो बिना बाबू जी बच्चों की बातों में आकर हमारा काम भर आती हूँ । अब हमें ये बोले फिर से रखने पडेंगे । मैंने अपना काम बंद किए बिना उत्तर दिया हूँ मैं खुद बार नहीं उन्हें ठीक से रख दूंगा वो लोग भी तमाशा देखने के लिए दूर बैठे हैं कुछ राहत चलते भी रुक गए तो वहाँ पे मैं पसीना पसीना हो गया काम नहीं निकला हूँ क्यों जो निराशा होती नहीं क्यों ऍफ बढ रही थी अब अंतिम तीन पूरे को भी मैंने किराया तो लगभग एक मीटर समीर में कुंडली मारे बैठे हुए कहाॅ फन फैलाकर खडा हूँ उसका एक मीटर ऊंचा फन देखते हैं दर्शकों की देर तक पूजकर मेरी मृत्यु निश्चित समझकर स्वयं को उसके दायरे से बाहर निकालने के भाग मैंने साहब के विश्राम में बाधा डाली थी । इसलिए नहीं ग्रोथ सी हो रहा था एक पुरस्कार मारकर मुझ पर वारकर इससे पहले मेरा एक अभ्यस्त बाहर पडा और फन कुचलने के साथ धडके दो टुकडे दो चाहिए । उसकी छोटों से मेरे पैर भेजते हैं जिनमें कई महीने खुजली होती नहीं । इतना भयावह और लम्बा था मेरी पहले कभी नहीं देखा । मैंने उस मरी हुई सांत के टुकडों की कुंडली बनाकर सडक पर रखती, कई लोगों से देखकर पीछे लौट के लेकिन मुझे सबसे अधिक परेशान किया । एक साथ ही नहीं परेशान किया । उस ने मेरा यह व्यसन या शाम कुछ भी नहीं छोडा । पैसे लोग कह कहकर हार के कि अरे भाई तुम पडे लेके आदमी होकर क्यों इस चक्कर में पढते हैं सर, आप मारने और पकडने वाले सात के काटने से ही मरती छोडो इस बाहर याद आदत को । पर इन बातों के लिए मेरे कान थी । लोगों ने बताया था कि आपने ऋतुकाल में जब साफ साफ इन एक दूसरे से लिपटी पडी हूँ तब ये नहीं नहीं । कोई खेल नहीं तो वे पूरे क्रोध नहीं आ जाती है । मैं इसी प्रकार की किसी पूरी क्रोध वाले सांप को मारना चाहता था । एकता सामान के महीने में हम लोग खेतों में घूमने देते हैं । छोटे भाई ने मुझे रोककर का हूँ । देखो भैया एक साथ के दो फन नहीं, नहीं तो तुरंत समझ गया किए हैं । सांप का जोडा सीन रहा है सीखना देहाती भाषा में गर्भाधान को कहते हैं मैं भाई को बहलाकर घर लौट आना है । घर में घुटनों तक का जूता पहनकर और अपनी चर्च साथ तीन लाठी को लेकर मैं चलती से फिर खेत में पहुंचा । साहब का जोडा उसी प्रकार कल्लोल कर रहा था । मैंने चार पांच दस दूर से खासा महंगा रहा हूँ, पर उन्होंने कोई ध्यान नहीं दिया तो मैंने एक मुट्ठी कंकडियां उठाकर उन पर बीमारी कंकडी लगने से वे स्वर्ग से मानो घरती करना पडेगा । मुझे देखकर अलग हुई और संस्कार मारते हुए हवा की चाल से भी तेज मेरी आठ तोडेंगे में पहले से ही तैयार उनकी क्रोध, घरी मुद्रा बहुत तेज क्या एक नजर भी नहीं देख सका की भी आप मेरे को एक ही बार में मार गिराने के विचार से लाठी छोड पाॅप बच गए । वो मेरे पैर में फन मारे या मुझे लग गई थी इससे पहले ही मैं लंबा कूदकर उसके पीछे जा पहुंचा मानने को लाठी उठाने से पहली मेरी पहुंच से दूर होगी । मेरा अनुमान की साहब का बदला लेने के लिए मुझ पर बात करें, फॅमिली से काम दिया । सात के बलिदान से शिक्षा ग्रहण की । अच्छा आॅनरेरी हाथ की सफाई और शक्ति से परिचित हो चुकी थी सांप इनके बच के चले जाने का मुझे बडा तो हुआ नहीं जानता हूँ कि नहीं । मुझे चैन से नहीं बैठी थी । इधर उधर ढूंढना व्यस्त जानकर लेकिन मन से घर की ओर लौट आया । गांव में घुसते भी नहीं पाया था कि सामने से एक आदमी चलाया भागो भागो तुम्हारे पीछे साथ हैं । उसकी बात सुनकर मैं और सांप एक साथ पीछे को पडेगी । मैं ही उठा भी नहीं पाया था कि वह आंखों से ओझल हूँ । अब मुझे खतरे के रूप में कुछ साकार सा दिखाई थी । और भी मतलब का सर दर्द । पान लेने पर पहली बार पश्चाताप नहीं लगा । मुझे यह आशा नहीं थी कि सांप इन इतनी जल्दी बदला लेने आई थी । में एक आध बार घायल सांपों के बदले की भावना से परिचित हो चुका था । पर इस सांप इतनी तो कमाल ही कर दिया था । घर पहुंचा । पिता जी नहीं चिंतित मुद्रा देख कर जवाब तलब किया क्या क्या है पिता जी वैसे चाहे कितनी गलियाँ बनी, पर मेरी सुस्ती मेरी उदासी या चिंता को सहन नहीं कर पाती । नहीं, मैंने अपनी शैतानी के विषय में उनसे पहली बार सच बात कही । उन्होंने सुनकर नाराज होने और गाडियाँ देने के स्थान पर ठंडी सांस करेंगे तो मैं पूरी तरह निराश किया । मैंने उन्हें इस प्रकार सांस घर पे किसी भी कठिनाई में नहीं देखा था । नहीं बोली तो में अच्छा नहीं । क्या? सांप इतना तो चैन से नहीं बैठने देगी ना खुद बैठे ये मिला तब तक नहीं मिलेगा जब तक तुम दोनों में से एक दुनिया को नहीं छोड देगा । अगर तुम्हें जिंदगी प्यारी हैं तो मेरी सलाह के बिना कोई काम मत करना जहाँ तक हो सके होशियार रहे कोई कपडा पहनने से पहले डंडे से जहाँ लेना उन तुमने क्या कर लगता है फल कुछ मुझे भी भोगना पडेगा कितनी होंगे मुझे जाना पडेगा पिता जी की बात सुनकर मेरी जवानी फिर मच्छी कहीं बिना नहीं रह गया । सोते समय की बात तो मैं नहीं जानता पर जाती और होशियार रहते रह क्या उसकी नानी भी आ जाएगा । एक हाथ से कचूमर निकाल जाएगा । आपके परेशान होते हैं मुझे और उसे भुगतने दीजिए ना? पर पिता कारीगर मानने वाला नहीं होता हूँ । रह भी पढे लिखे जवान पुत्र पिता का शाम तक किसी को भी सांप इनके आक्रमण की आशंका नहीं हूँ । मैं आई ही नहीं हूँ । इस बीच मैंने भी मोर्चा तैयार करते जाते समय की तो मुझे कोई चिंता नहीं । हाँ उसके सोते वक्त के आक्रमण की कल्पना से मैं था हूँ । मरने का दुख मुझे कुछ भी नहीं था । तब मैं कुत्ते की मौत नहीं करना चाहता था । अगर ऍम मुझे होते हुए कार्ड की तो मैं जाने से पहले ही समाप्त हो जाऊँ । मेरे सामने आती और मेरा वार बचाकर क्या सहकर चोट करती हूँ तो मुझे मरने में भी एक संतोष, एक आनंद मिलता था । अपने सोने के कमरे में से मैंने सब सामान बाहर निकाल दिया । वहाँ जितनी भी थी सबको ईंट पत्थरों से बंद कर दिया । घर में सबसे उनके पायों वाली जो जाती थी, उसे मैंने अपने सोने के लिए चुका हूँ । सोते समय साथ हटने के लिए एक ऐसा डंडा तलाश दिया जैसे घर में चलाने में कोई असुविधा नहीं हूँ । माता जी कई लोगों से सरसों और उडद पढाकर । तमाम घर में भी खेती नहीं । हरबीर की जोधपुर सैंकडों देवी देवताओं का चढावा पूरा और मुझे और पिताजी को इस पर विश्वास नहीं था । विशेष रहा । मैं तो अपने हाथों और ठन्डे के सहारे ही नहीं । सिंध पिताजी खाना खाकर शाम को जल्दी हो गई और मुझे निर्देश मिला कि दरवाजे की ओर मुंह करके पर हूँ । फॅमिली लगे तो उन्हें आवश्यक जगह हूँ । माता जी मेरे मना करते करते । दरवाजे के पास एक स गोरी में दूध रहेगी और पीसी हुई नमक की ऐसी रेखा बना गई कि उसे पार करके ही साबिन कमरे में पहुंच सकेगी । पढाई में मन नहीं लग रहा था की इच्छा होती थी कि समझना चाहिए और मेरे और उसके दो दो हार फुल बीच में कई बार नींद का झोंका हूँ पर मैं पिताजी को अधिकतर जगह आना नहीं चाहता था । इसी से जागने के लिए पडता था हूँ । लगभग दस बजे मुझे एक काला सा देना कमरे के सामने पडा हुआ हूँ । टेनिस चल पडा रहा हूँ । मैंने सोचा किसी बच्चे नहीं गिरा दिया हूँ । मेरा ध्यान किताब की ओर गया तो डंडा आगे कर रखा है । पहले तो मैंने समझा डंडा वहीं का वहीं उसका आगे आना मेरा भ्रम है । जब एक बार दरवाजे की एकदम पास आ गया और उसका काला रंग ऍम की रोशनी में चमक उठा तो मैं उसे सांप इन समझकर मन में हूँ । सान तीन सिंह जेठहरी के आशनी प्रदर्शित शायद समझ चुकी थी कि सावधानी की हालत में बदला चुकाना उसकी पूर्ति का नहीं था । मैंने भी ऐसी कोई ऐसा नहीं की जिससे कि रहे । समझ लो कि मुझे उसके आने का पता चल गया । बहुत तेज रुपये पर रहे । दरवाजे की ओर नहीं बढीं शायद जाते हुए पर आक्रमण करने का उसका विचार नहीं था । एक हाथ नहीं किताब था । उधर हूँ करके भी मेरी नजर सामपन पर और दूसरा ऍम इस तरह जब लगभग दो घंटे बीत गए तो मुझ से रहा नहीं गया । कुछ भी हिम्मत नहीं है तो आगे क्यों आती है? मरने से डरती है तो बदला क्यों लेना चाहती है । ठहरी रहे या तो मुझे अपने अरमान निकालने नहीं देखा क्या तू निकले मेरे इतना कहते ही वहाँ पे मेरी आवाज सुनकर पिताजी दौडे आएगी । शायद पे स्वयं ही जा चुकी थी । भोले सांप इन आई थी । मुझे उसके आने का पूरा विवरण सुनकर वहीं पूरी तरह भी करेंगे । आज ही मामला साफ बोला था पर तेरी बेवकूफी से सब बिगड गया । मैं वहाँ गया था और तुम्हारी और आने वाला था । उसी देख लेता । उसका ध्यान तुम्हारी और था । पीछे से मेरे आने का उसे क्या पता लगता हूँ । मेरी भी बडी निर्भीकता के साथ उस करती हूँ । पर मैं तो स्वाइन ही नहीं पढना चाहता हूँ । मैं नहीं चाहता हूँ कि मैं किसी दूसरे के हाथ में है । दुनिया छोडी हूँ । आपकी पिताजी काबू से बाहर हो गई तो ले तुम्हारा तो सिर्फ फिर गया है । जवानी हम पर भी आई थी । पर इस तरह मौत के मुँह में हमने ही को देखा है । मैंने भी उन्हें बहुत समझाएं कि अब स्टांपिंग नहीं आएगी । आप आराम से मैं होता हूँ । इस पर उन्होंने कि वार बंद करने की शर्त लगी । इसे स्वीकारना मेरी पोती का काम नहीं था । लगभग चार घंटे सो करेंगे । मैं जाता हूँ ऍम फिर नहीं लगा देंगे । अगले दिन स्कूल पर अभ्यास के विरुद्ध लाठी साथ रखती हूँ । दिनभर उसके आक्रमण की कोई संभावना नहीं थी । फिर भी मेरे ध्यान से नहीं थी । लौटने पर लेट ने साम की घिसटने के निशान अपने गांव तक देखता हूँ । मैं समझता हूँ कि सांप इन स्कूल में ही आज रात करने की कोई बात नहीं । मैंने पिताजी को सांप इनके घिसटने के निशान बताया तो वह पुलिस तो मेरे उनलोगों रात को चौकसी देखकर धोखा देने का प्रबंध कर रही है । आज हम तुम दोनों जाते हैं । शायद इस मुसीबत से छुटकारा मिल सके । रात भर सामने नहीं आई । सवेरे घर में उसके खिसकने के निशानों से अनुमान लगाया कि वह आई हूँ, पर हम लोगों को सावधान देखकर लौट के मुझे अब अधिक सावधानी की आवश्यकता जान पडी । क्योंकि सांप तीन बहुत ठीक असंतोष से कम नहीं रही थी । लेकिन इस प्रकार परेशानी पूर्वक सावधानी तब तक बनती जा सकेगी । मैं यही सोच सोच कर ऍसे मेरी आंख मिचौली महीनों से चल रही थी, पर हम दोनों में से किसी का दांव नहीं लगता है । उसने बदला लेने और मुझे धोखा देने के लिए जो जो चालीस चलूँ उनसे उसकी चतुराई पर दंग रह जाना पडता है । हमारे खेत में इतनी घनी भट्ट थी कि सारा खेत पेडों का जमा किया हुआ नंदा सा लगता था । एक दिन पिताजी कहीं बाहर गए और रात गयी । उनकी लॉटरी की आशा थी इसलिए पशुओं को भूखा न रखने के विचार से मैं ही भात काटी चला गया । भट्ट इतनी गरीब धोनी बिल्कुल दिखाई नहीं दे दी थी । सांप इनने मुझ पर छिपकर वार करने का इसी अच्छा अवसर समझा । पर उस बेचारी को क्या पता कि उसकी कुंडलाकार चलने से खेत के पास खास अंदाज से हिल रहे थे । पौधों का हिलाना देखकर मैं समझ गया कि सांप बना रही है । यदि में भटके पेडों से अलग हटकर उसके खाली खेत में आने की प्रतीक्षा करता तो कभी नहीं । इस से मैंने अनुमान से ही घट के पेडों में ही लाख की बीमारी लाठी भटके । पेडों ने रोक और सांप इन भागते लगता था । उसे कुछ चोट अवश्य आई थी क्योंकि लगभग पंद्रह दिन तक उसके दर्शन नहीं हुई । इसी प्रकार एक डिग्री के धुंधले उजाले में गुट्टी काटते समय उसने मुझे धोखा देना चाहता हूँ । बात ये है हूँ के हाथ में गंडासा लग जाने से पिताजी िवज थी और पशुओं का पेट भरने के लिए मुझे छुट्टी पर बैठना पडेगा । ऍम कब करीब में अच्छी थी पर उस दिन उसी धीरज नहीं बंद था । वे जल्दी ये मेरे हाथ के समीप आने को थोडी आगे सर मैंने देखा कि एक पटेरा कुट्टी में दवा जा रहा है । कितना मोटर पटेल है इसमें से छोटे भाई का पटका ठीक रहेगा । इस विचार से मैंने जो भी गंडासी का हल्का सा हाथ उस पर छोडा की फटे कटने के साथ साथ कहीं जमीन पर खुद जाए तो सांप इन बेताहाशा भागी । अगर तब तक गंडासा छूट चुका था । उसकी चार दंगल पूछ कट कर नहीं नहीं गई थी । छाता, जूता, बिस्तर सभी जगह पे छिपकर बैठ चुकी थी, पर मेरी सावधानी से उसकी टाल नहीं चल रही थी । इधर उसकी तेजी से मैं भी कुछ नहीं करता है । सांप इनने एक काम किया कि मेरे घर के अन्य किसी सदस्य परवाह नहीं किया अन्यथा वह भी सभी पशु स्त्री बच्चों को समाप्त कर सकती थी । बैलों की लड हँसी और भैंस के नाम भी इस भाषा में कई रातों पडी रही कि मैं सानी कर दी । वह टेस्ट मेरी बहन एक बार उसे अरहर की लकडियों के साथ चौके तक उठा लेगी पर उसने मुझे नहीं मारा । धीरे धीरे मैं भी इस तनाव बीच का अभ्यस्त हो चला था और मुझे इसलिए एक नया राजस्थानी रखा था । आप शायद विश्वास नहीं करेंगे उससे बारातों, रिश्तेदारियों और मेलों में भी मेरा पीछा नहीं छोडा हूँ । मेरी इस झंझट से लगभग सभी परिचित हो गयी थी । इसलिए मेरी कहीं जाने से लोग कतराते नहीं हूँ । एक दिन छोटे भाई भी सूचना नहीं आप की माता जी आज स्टांपिंग से खुशामद करने उसकी बाम्बे पर गई हैं । उसकी बांबी रामबास की झाडी नहीं थी । मैं दृश्य को देख नहीं चुपचाप लाख ही लेकर चल पडा । जोर से देखा माता जी हाथ आगे बढाएंगे, कुछ कह रही हैं और सांप इन सामने खडी जमीन तक फन मार रही है । माता जी की बातें सुनने की इच्छा से मैं आगे । सरकार मैं दर्द भरे स्वर में आज सुबह कर कह रही थीं । जो हो गया सो हो गया । अगर काटनी इसी तरह सांप लौट आए तो मुझे कहा की ना समझा पालक ही गलती कर के दोनों का समझौता हो जाने की संभावना मात्र सिंह मुझे असहाय वेदना हुई एक महीनों दांव खेलने वाली बहरीन को मारने का आनंद चला जाता रूसे इस प्रकार क्षमा मांगना मेरे साहस और बल के लिए लच्छा की बात थी । मैंने दौडते हुए कहा माता जी इससे अगर भी की मांगती हो तो यह मांग की मेरे सामने से भागे नहीं मेरे प्राणों की भीक मांगने का आपको क्या अधिकार है? फिर नागिन तो फुफकारती बाल खाती हूँ । रामबांध में घुसते माताजी मेरी बुद्धि को कोनसी माथा पीट की घर वापस हो उनके इस प्रकार क्षमा मानने की बात पिता जी नहीं भी पसंद नहीं है । मैंने कई बार लाख के लेकर सांप इनके स्थान तक है । बाम्बे के सामने खडे होकर कई बार उसे चुनौती दे चुका है पर वो इतनी मोटू नहीं होती होती । सर्दी का मौसम लगभग एक महीना लगातार सांप इनसे बदला लेने की कोशिश नहीं दिखाई नहीं मुझे बडा लंबा होता है । पिता जी एम अन्य बडे उन्होंने समर्थन किया या तो किसी ने उसे मार डाला होगा हूँ या उसने नया घर बसा लिया हूँ । ऐसा भी हो सकता है कि सर्दी के कारण आपने बिल में चैन से बैठी हूँ । सर्दी में प्रायास साथ बाहर नहीं निकल देखो । उसने परेशान होकर बदला लेने का इरादा छोड दिया तब भी कोई अचंभा नहीं । इतने पर भी मुझे विश्वास नहीं हूँ कि स्टांपिंग के आक्रमण से मैं सुरक्षित था । पहले की अपेक्षा उससे बचाव में लापरवाही बरती जा रही हूँ । पहले मैं अपनी सोने के कमरे में रोज देखा करता था की दीवार फर्शियां छत में किसी चूहे या अन्य जानवरों ने छह तो नहीं कर दिया पर कुछ दिन से इस प्रकार का निरीक्षण समाप्त हूँ । वैसे तो मैं सादा कुम्भ करनी नहीं करता था पर जब से सांप इनसे वास्ता पडा था, नींद की गहराई जाती रही थी । तनिक घट का ही मेरी आंख खोलने के लिए काफी था । एक बार आधी रात के समय छत की तरफ से मेरे ऊपर एक भारी रस्सी की ओर से समय बिहार को मैं चारों और ऐसे ही दवा लेता हूँ की उस से हटाई बिना कोई मुझ तक नहीं पहुँची । सांप इतिहास पर गिरकर समझ भी नहीं पाई कि मैंने किसी शक्ति से प्रेरित होकर अपनी बुद्धि के निर्णय से लिहाज सबूर । लबेद क्या छत्तरसिंह तो सांप इनके आक्रमण की आशंका अन्ना मैंने इस प्रकार के पचास की विषय कुछ सोचा था । मुझे अब तक आश्चर्य है कि मैंने एक से भी कम समय में अपना निश्चय करके उसे कार्यरूप में कैसी परिणाम ऍम मैं दोनों हाथों से रिहा आपको पकडे था और सांप इन उसपे फडफड आ रही सब कर रही थी । हाँ, उसकी रूई के कारण उसे जमीन तक पटक ना बेटे का और कमरे में उस पर लाठियां बरसाई जा नहीं सकती थी । जितनी देर मेरे हाथ की पकड ली करके लाठी उठाकर तब तक तो ना जाने मेरी क्या दशा करती थी । दरवाजा भीतर से बंद था, इसलिए टीना उसे खोले, किसी को बुलाया नहीं जा सकता और दरवाजा खोलने के लिए लिहाज की पकडा नहीं खाली करने पर परंतु एक सुविधा थी । दोनों हाथों से ले हाथ की सिरे पकडे । अपने पूरे बोझ से सांप इनको दबायें । मैं चाहे जब तक सोचने के लिए स्वतंत्र कोई कपडा ऐसा नहीं दिखाई दे रहा था, जिससे वह स्थान बंधा जा सकता था, जिसे मैं पकडेंगे ऐसी कोई थी नहीं और चरपाई में से रस्सी निकालने का अवकाश नहीं । अंत में मेरा ध्यान वृत्ति पर भी की चादर की । क्या उसे पैसे किसका कर? मैंने लिहाफ को ऐसे बांदिया कि सांप इनकी बाहर निकलने की कोई संभावना नहीं । तब मैंने निश्चिंत होकर के बार फूल और उस पटारी को लेकर बढाती सोचा ऍम मारती मारते थे । हाफ में ही उसका कचूमर निकाल पर ऐसा करना मुझे कहा है । मैं सांप इनको खुले मैदान में मारना चाहता था । पहले विचार किया कि दिन में उसी जी घर कर देखने के बाद मैं ठीक रहेगा । परंतु से दूसरे लोगों का कहना है मुझे ऐसा खतरा कभी मूल नहीं लेनी थी । लिहाफ में ही बेचारी सांप इनको समाप्त कर देंगे । रात उस ली थी, इसलिए सांप इनकी मैं दिखाई देने का कोई भाई नहीं था । मैंने बाहर रखकर लिहाज का बंधन ऐसा कहते हैं कि तनिक से सारी से खुल सकता लाठी से हिलाकर सांप इनसे कहा होशियार हो जाऊँ आज मेरा आखिरी फैसला फॅमिली के सिरे में उलझाकर चादर का बंधन अलग जैसा मैंने सोचा था संपन्न एक साथ नहीं, ताकि देखता है उस लिहाज की एक्सीनॅान मेहनत एक बलेश नहीं निकलता हूँ कि बांस की लाठी नहीं, उसका फन बेकार कर दिया । महत्व नहीं क्या चलने की यू की भी नहीं हूँ । मैंने फिर भी उस पर हाथ से अच्छी तरह से देख लेना चाहता हूँ । पूरी तरह से लिहाज से निकला और बाहर चक्कर हो रही थी । लांझी की आवाज सुनकर घरवाले भी जाते थे और उन्होंने लाना तीन जलाकर सांप इनके दर्शन किये नहीं अच्छे ऍम और सुस्त शरीर की लगभग तीन मीटर लंबी थी । मैंने इतना सुन्दर था पहली नहीं देखा था । मुझे उसे मारने का दुख हुआ पर दूसरा कोई चारा नहीं । कुछ देर बाद उसी पीतम करके धूरी पडती थी । मैं इतनी जहरीली थी कि उसका शव तक किसी दक्षिणी नहीं हुआ । सवेरे खोज हुई कि सांप इन कमरे में पहुंच किस रस्ते से देखा ऊपर छत ने उन्होंने छोड कर दिया है । इस तरह का उस विधा सांप इनसे पीछा छोटा जो अकेले ही एक सेना के समान खतरनाक । मैं ये दिन है कि आज का दिन मैंने काम पर हाथ नहीं उठाएं । मुझे सुंदर साबिन कुमार नहीं हूँ बहुत

4. Toofani Lahron ki God me

मुंबई का तटवर्ती प्रतियोगी वर्सोवा गोली जाती के मछुआरों की बस्ती है । गोलियों में भी तो जाती हैं थल कर कश्यप दोनों जातियों में खान काम तो चलता है पर विवाह संबंध नहीं थी यशवंत का लडका है वो साल पर पहले यशवंत लहरों की कोते समझ आ गया था वे ठंड स्थल कर जाती का कोई था ऍफ करती हूँ दोनों बचपन में फॅमिली नहीं बेथल सोनिया के सिवा किसी लडकी की तरफ देख तक ना मांगा जवान कमिट उसकी सामली, ऊंची प्रेशर सूर्य की केरनी उसी तरह फिसल सर जैसे कमाल के पत्ते पर पानी की उस की रग रग से शादी कब था? दो तो मन की लगती फूल की तरह था समुद्र में जानती था वे ठंड पर स्थल कर जाती की मुख्य करने पर ही सोचा था उसकी बेटी द्रौपती का न अगर विठ्ठल के साथ है तो उसे अपने बुढापे के लिए मजबूत लगती मिल जाए । फिर विट्ठल के लिए सोनिया ही उसका संसार एक दिन गनपत ने का कहाँ है? विक है तो थल कराए है सोनिया शिव करा है तो उसके साथ साथ ही नहीं कर सकेंगे हूँ हमारे यहाँ पूजा है तो कहा है कि उसके पीछे पडे ना गन पर की बात पे ठंड के मारे को कहते हैं आप भाई कोई नहीं था उसका रात दिन हड्डीतोड ऍम न कभी किसी से अधिक पास करता ना कोलियों की तरह शराबी में संसार में उसी तो ही चीजें किए थे । समुद्र की छाती पर अपनी ठोंगी में बैठकर मछलियों का शिकार करूँ और सोनिया की नाॅक गन पत्नी उसके नेता सरल स्ने को पीछे पडना कह दिया विट्ठल का मनमोहन वो ठेका जबडा तोड कर रखती हूँ पर वह अकेला था और गनपत धा सस्ता वेटल खून भी कर रहेंगे । पूरा पिक्चर नाइन परेला है हम उसके साथ सारी बनाएगा । धनपत को कुछ भी कहने का अवसर न देकर मैं तीन की तरह से चलता हूँ । धनपता पीसकर बोला देखेंगे साला तुमको सोनिया का बाबा तू कह रहा सोनिया की वहाँ की चिंता में था सत्तरह अठारह साल की हो चुकी सोनिया शिप करों की दूसरी लडकियों से बहुत अधिक सुन्दरता प्रकृति के उन्मुक्त वातावरण में रहने के कारण उसका अंग अंग योवन की अतुलनीय राशि से फिर था जाती की नहीं जाने कितने युवकों में दुनिया का हर पकडने की खोल लगी थी । पश्तूनी गनपत के पास से खाते है विट्ठल समुद्र के किनारे उसकी छोटी सी दूंगी किनारे के पत्थर से बंद ही समुद्र की लहरों से खेल रही थी । अन्य दिनों की अपेक्षा लेहरी आज अधिक शांति तो रात को समुद्र में जो आ रहे हो किनारे कीरीट भी गिरी थी हूँ वो विठ्ठल रात को जलभर मच क्या लाया था । सवेरे ही मुंबई जाने वाले ट्रक पर उसी दो टोकरी भरकर मच्छर और चार रुपये लेकर रहे । घर नहीं जाकर सो उतनी पर बाहर आया तो गनपत से टक्कर हो गई । विठ्ठल बहुत टू पार्ट ऊपर समझ नी एक तक घर पर जा कर रहे हैं । पानी में ते डालकर उसको दूर तक नहीं करता । समुद्र की छाती पर सूर्य की सीधी पड रही है चांदी की जहाँ चमक रहे पानी पर इक्की दुक्की लहरें थे रखती और शांत हो जाएंगे । सिंगर्स के गोले के चारों ओर बादलों की छोटी छोटी टुकडे कर रहे हैं । जब कभी देवती के गोले को अपने दामन में छिपा लेती तो चांदी की करनी हो जाते हैं । वेटर की पहरों के पास छोटी छोटी मछली थी । उसने बडी सतर्कता से पानी में हटा और तीन चार मछलियां पकडकर ऍम पीना पाने की मछलियां पड रही है । ऍम विठ्ठल चौक पर पीछे कडी सोनिया की आंखों में मछलियों की छटपटाहट देखकर करुणा का सागर रह रहा हूँ । वेटरन मुस्कुराती मच्छी बाहर की बेटी होकर मछलियों का तब अपना नहीं देख सकती तो सोनी सोनिया ने अपनी बडी बडी कंट्री रियां सी एक्टर की मुझ पर जमात बोली मच्छीमार की बेटी हूँ तो क्या हुआ ना ऍम दादाजी वापस पानी में हाइट देख कैसी चटपटा रही अभी जारी मित्थल ने हाथ की मछलियां पानीदार और कडी भाव पूना उनसे सोनिया के होते हैं । सोनिया ने अपनी दृष्टि चुका हूँ धीरे से बोल मैं भी कभी इस तरह तडप हूँ तो विट्ठल मैं चलने सोनिया का हाथ अपने हाथ लेंगे और भराई कल से बुरा नहीं पर अपनी दूंगा तुझे सोनी इन लहरों की कसम कभी ऐसा हुआ तो तेरा ये विट्टल जिंदा नहीं रहेगा हूँ सोनिया का सर्वे ठन के चौडे कंधे से क्या? हाँ बदमाश शेर की तरह दहाड उठा तो कर सोनिया बिजली की तरह तरह कैसी हो? तुकाराम के साथ गनपत था । उसके मुख परवेश पूछी । मुस्कान थी विठ्ठल उसकी ओर देखता ही रहेंगे । तुकाराम का चेहरा क्रोध में काला पड गया । उसने अपनी खाद का भरपूर झापड विट्ठल के चेहरे पर दिया । प्रज्ञा आँखों से खून कर रहे हैं । उसकी बकरी फट पता भी उसकी दृष्टि सफेद पडी सोनिया की ओर दूसरे ही पल उसकी आंखों कि आप पूछ उसे चेतना चुका नहीं तो आराम नहीं दो तीन थप्पड जड दिए विठ्ठल की झुके चाहिए फिर लाकर पूरा साला इधर को आकर बदमाशी करेगा तेरी जानने लेना सारा हमको समझता था है तो विक्टर के मूड प्रतिवाद के लिए काम कर रहे हैं । इसका प्रतिवाद करें उसी सोनिया के पिता का जो उसकी जिंदगी है । डन पत्नी तुकाराम को पहुंचेंगे । साला हमेशा का बदमाश है । छोकरा दूसरी जांच की झोपडी के पीछे पडेंगे । एक जगह समझा तो का पीछा नहीं करेगा । गनपत विट्ठल को सबका देना चाहता था । सोनिया कार्य गए तूफान में फंसी कश्ती की रहा काम रहा था उसकी आंखों के सामने वो ठंडी मार खाई थी । इतनी नीलांचल सही थी बहन लम्बा चौडा तगडा युवक समुद्र के ध्यान अक् लहरों से आंख मिचौली करने वाला था केवल उसी के लिए भाई की तरह था । सोनिया क्या की हूँ तो कहाँ हम खूब खिलाया खोपकर चाहूँ फिर सोनिया का हाथ पकडकर उसी खींचता हुआ नहीं क्या? गनपत बिरंगे से बोला फिर करेंगा फिर बुलाएगा उस चौकरी कर तो समझता हॅूं अपुन की ज्यादा की चांगला छोकरी लोग घरेलू है तो साला काइको उसके पीछे पडे है वो इकठ्ठा ले चुका हुआ चेहरा उठाया विश्व की ये बीच कर्नाटक नहीं हुई थी विठ्ठल की आंखें आपकी तरह जल्दी थी बोला हम मूॅग सब समझता है तुमको पन काका तुम्हारा इरादा पूरा नहीं होने देगा हूँ समझता तुमको हम सोनी को अपना बना के रहेगा फिर मुंह फेरकर विट्ठल डोंगी की रस्सी खोली लगा फॅमिली में सागर की कुमत में कश्ती नहीं करूँगा क्या थोडी सी हलचल की सागर की जाते हैं वितरण की अनुभवी आंखों ने इस कल्चर को भारतीय ऊपर आसमान की ओर पश्चिम का छितिज कालीन बादलों से घिरा हवा तीस हो गई पालिसी घूमती उसमें हवा भर के होंगी तेजी से बढ रही कि नारा हूँ झूठ किया था उस था मिली चल राशि के बीच रहता हूँ । तूफान की लक्षण दिखाई दे रहे थे पर वो जानता था तीसरी समय में यदि वह भी चलकर वापस चला जाएगा तो बोल मच्छी तीस पच्चीस किलो तक होती हूँ । ऐसे दो मछलियां भी वह पकड सका तो आठ तीन तक घर की की बाढ बंद करके सो तक आसमान काला हो नहीं हूँ । छोटी छोटी नहीं अब भयानक रूप धारण कर रही है ठरकी डोंगी छूट रहेगा हमारा कभी भी बढ गया विठ्ठल समुद्र में एक डेढ नहीं निकल गया । तीन चार बडे बडे लग थी उस की किस्ती में रखी थी कुछ और आगे जाकर उसने एक पर एक लट्ठा बांध कर समंत्र में जाना । जबकि मजबूती से जम गए तो उसने रस्सी लट्ठे पर लपेट और जान समुद्र के पानी में फैलाती । थोडी देर में अंधेरा खिलाया । दूर तक सेवा कालेपानी हवा प्रतिपल जोर पकडने लगी विठ्ठल की दृष्टि आसमान की ओर उठ के आज पूर्णिमा अपनी प्रियतम जान से मिलने के लिए लहरी विकराल हूँ । ठीक है सूजकर भी सरकारी ते कहाँ था प्लेयरों कि तांडव नृत्य से अच्छी तरह से परिचित पिछले साल ही नहीं की कोर्ट ने समझ आ गया था यशवंत उसकी भी मृत्यु उसी तरह होगी । एक पहचान था इसीलिए लहरों से उसे भाई नहीं लगता है नहीं इस तरह की दुलकर फिर बैठ गया । जाल पर बोझ पड रहा था । उस कार्य प्रसन्न हो था । डोंगी आगे की ओर झुकने लगी । सुनी दोनों पैर मजबूती से तली में जमा कर जाल की रस्सी को तांडिया बोझ प्रतिक्षण पड रहा था । दूर ऊंची ऊंची लहरें उठ रही थी उसकी पर आसानी में कुछ देर लगेगी । वो ठंडी रस्सी को खींचना आरंभ किया होंगी । एकदम दे रही हो गयी लगा । बस अभी वह ऍम विठ्ठल ने एक बार तो सोचा कि रस्सी छोड कर मछली की लाॅज ने फिर जोर मारा । पूरी ताकत लगाकर जान ऊपर खींचती लगा मस्त हाथी जैसी काली और ऊंची लहरें बढिया रही हूँ । श्रम के कारण बिट्ठल का सारा शरीर पसीने से तर हो गया । एक मिनट नसीब में नहीं तीस सीटों की आवासी पिट्टल । इस तरह चौका की जाल की रस्सी उसके हाथ से छूटकर वह समुद्र में किस्ते कितने बचा उसे पलट कर देखा तो उसके होश उड गई । चंद पूरी तरह से आसमान में खेला था और जैसी उसी को अपने आलिंगन में बांधने के लिए एक हार जैसी ऊंची रहे तेजी से चली आ रही थी । विठ्ठल लहरों से खेलता था, पर उसने वृत्तीय को इतने पांच पहले कभी नहीं देखा था । लहराकर इतनी तेजी से इस की किस्ती से टकराई की लट्ठों से बंधी रस्सी टूट गई । किसी को उसने तीन की तरह उठाकर फेंक दिया । मैं ठंड लुढक गया । उसकी साहस नहीं थे । मृत्यु को सीटें किया था । मैं उससे युद्ध करने के लिए तैयार हो गया । छोटी बडी असल खेलेंगे । समुंद्र में तांडव कर रही थी । वो ठंड चट्टान की तरह खडा था । उसके पास जब तू के सिवा और कुछ नहीं था । जब तो लेकर स्थल पर भले ही याद पर रक्षा की जा सके, पर चलके तूफान से मुकाबला नहीं किया जा सकता है । लहरों के साथ समुद्र की अन्य जलचर भी तभी कभी उस की किस्ती से टकराती तो फिर तक मंगा उठती । वेक्टर पूरी तरह ऐसा ही था एक लहर उस की किस्ती कुल चाहूँ फिर वही तेज सीटी ऍम फिर वही पहाड जैसी ऊंची विक रहने है विठ्ठल की मैं इस देश में एक विचार इस बार किस्ती जरूर ऍम और उसकी पलटने पर पानी के नीचे दब चाहिए कि हाँ तब जाने पर तो नहीं नहीं कर सकेगा पर सोचने का नहीं तेजी से बढी आ रही थी वे छलकी आंखें फैल के और उसकी मक्खियाँ कस के मात्र एक पर हूँ तू से ही पाल रहे कुछ ना और लहरों की कोर्ट्नी चाहूँगा समुद्र की लहरों में मनुष्य कभी टूटता नहीं वे गर्मी उसके साथ रहता चला गया कभी ऊपर आ जाता है कभी नीचे बहुत सारा खारा पानी उसके ना पीठ में चला गया जाने ऍम उसके शरीर के साथ साथ चलते रहेंगे । अच्छा लहरों से लडता हूँ ऍम सोनिया को तुकाराम ने घर लाकर बुरी तरह पीटा । हारकर वहाँ कोने में बैठ कर रो नहीं रखी तो कम बता रहा था, चला रहा हूँ और सोनिया मुंह लटकाए पत्थर की तरह बैठी थी तो कर हम पता नहीं क्या सोच रही है । तो सोनिया की माने बेटी को छाती बातचीत कर कहा टाई हो गई तो विट्ठल के पास कोथल कराए ही हम शिव करा है अब उन लोग का जात में बहुत चांगल चांगला छोकरा लोग हैं सोनी विकल्प इच्छु नहीं जाने का रे तेरे को सोनिया ने विट्ठल को अपनी आंखों के सामने पिटते देखा था उसी का हूँ वेट हल्का पिचों हम नहीं छोडेंगे तो बाबा से कहते हैं हमारी सारी उसी से हो जाएगा नहीं तो मौत से माँ की अकल कम हो गई । सोनी सोनी सोनिया और उसकी मानी चक्कर देखा एक्टर का छोकरा नौकर हफ्ता हुआ दरवाजे पर खडा था अमंगल आशंका से सोनिया की छाती कम थी । कायरे सोनी विट्ठल थोडी लेके समंदर में गए लेंगे समंदर में तूफान आए है । सोनी के शरीर का खून बर्फ की तरह जम क्या बोल नहीं बहुत की तरह ताकती रहेंगे । छोकरा समाचार देकर तुरंत ही जगह है । सोनिया की माँ पत्थर की मूर्ति की तरह खडी सोनिया को देख कर ये झोपडा जन का लागू है । सोनी अकेला कई को मरने को पहले हैं सो जा सोनिया की आंखों में तूफानी लहरों से भरा समंत्र और उनसे बुरी तरह से संघर्षकर्ता पिक्टर ना चोट । उसने घूमकर माँ की तरफ देखा फिर गंभीर कंट्रीब्यूट हम को जाने नहीं पाई की दर्ज सोनिया ने पैर है और पूरी बिठा की बात सोनी तो कम ॅ कोई सोनिया की मांग की । आंखे फटी की फटी रह गई । अरे सोनी जाती है किधर किधर जाती? अरे विट्ठल समुद्र में गए हैं तो फायदा नहीं है । सोनी को पकडो तो का राम उठकर भाग की जड से भरी सडक पर सोनिया भक्ति चली जा रहे तो का राम चला रहा था । सोनी रेसो नहीं थोडी देर में सारा काम चाहिए । आधे से ज्यादा लोग तूफान आए तो चिल्लाते हुए तुकाराम के पीछे पीछे भागे । सोनिया हफ्ते हुए किनारे पर पहुंची । समुद्र की छाती भयंकर वेक से कम रही । किनारे से लहरें जोर जोर से टकरा रही थी । छोटी बडी बहुत सीटों क्या पत्थरों से बनी थी? सोनिया ने पीछे देखा । भीड भागे चली आ रहे हैं । सब के आगे आगे हाथ उठाएगा तो कर रहा था सोनी नहीं जाने का रे तेरे को सोने रुपया वे ठन अभी तलक डूब गया ऍम विठ्ठल डूब जाएगा मैं उन जल से निकली मछलियों की तरह तरह की और वो ठंड की वजह कसम सोनिया ने जल्दी से रस्सी खुली भीड पास आ गई थी पर इससे पहले की तुकाराम सोनी को पकडता था उस की किस्ती लहरों के साथ साथ आगे बढ चुकी तोगाराम जमीन पर लोट पर सोनिया किस्ती के बीच खडी थी लहरों का कर्जन बहन करता था जानकी पीली रोशनी नहीं रहने सोने से लदे ऊंचे ऊंचे पहाडों की तरह दिखाई दी थी । इसकी बुरी तरह हिचकोले खा रहे हैं सोनिया ने दोनों हाथों की वो बनाकर हूँ के पास लगाई और पूरी आवाज में चलना पडेगा वे चार किनारे पर खडे लोगों के तेल इस तो कहाँ से ही धन पत्नी मिल रही तुकाराम की ओर देख कर रहे कि झुका नहीं तो काम सिसक सिसक कर लिया लौचा सोनी रे जोर से एक बडी लहर सोनिया की किस्ती से टकराएगा सोनिया कीपैड रखना है है कुश्ती में गिर पडी बुरी तरह काम कर किसी फिर सीटी हो गए तेरी कसम कहाँ गई विट्ठल सोनिया नहीं तो मैं चार तूफानी लहरों के बीच सोनिया की किस्ती कागज की नाव की तरह तक बता रही थी की नाराजगी बहुत दूर छोड चुका था । सोनिया के सामने उस पर राहत । काली जलराशि की सेवा अब और कुछ नहीं था । में खडी थी एक बहुत बडी मछली लहरों के साथ उस की किस्ती से टकराई । इतनी बडी मछली सोनिया ने पहले बाहर भेजी थी । उसकी रगों का पूर्ण चल गया । विठ्ठल की ओर से हटकर उसका ध्यान समुद्र की ओर । क्या तूफान? अब कुछ कंपनी लगा था विठ्ठल के जीवन की, उसे आशा नहीं, लेकिन सोनिया नहीं मछली की तरह नहीं करती थी । विचार उसी किस्ती में खडे खडे । पूरी रात पिताजी सोनिया ने समुद्र के सैंकडों जलचरों ने किस्ती पर अपनी पूछे फटकारी, उसे निकलने का प्रयास किया, किंतु किस्ती नहीं तो पूर्व में पूछा कि गुलाबी चुनरी की झलक टिक पडी तो सोनिया ने पूरी शक्ति से पुकारा । मैं चाय समुद्र शांत हो चुका था । दूर एक लकडी का तख्ता बाहर जा रहा था । सोनिया ने खडे होकर देखा था जैसे कोई है सकती पर, लेकिन अभी तक उसकी किसी अपने आप रहती आएगी । रखते को देखकर उसके मन में कहीं आशा की किरण जमा थी उसने चंबू संभाल तेजी से उस तरह की तरफ किस तीखी नहीं रही हूँ, वही बेटर है, मेरा वित्त है । सोनिया ने बहुत तीस हाथ चलायेगी । थोडी ही देर में किसी व्यक्ति की पास पहुंच गयी जगह बच्चे तहसील मुझे लहूलुहान शरीर लिए मूर्च्छित गट्ठर रखते पर पडा तो सहारा वहाँ जा रहा था सोनिया की आंखों में खुशी के आंसू हूँ उसमें जल्दी जल्दी तख्ते से किस्ती । सरकारी रस्सी खोलकर अपनी कमर पर नपी ताकि विठ्ठल को उठाने में मैं समंत्र में नहीं । पहले फिर रह चुकी । किसी तरह उसने विट्ठल के मोर्चे शरीर को किसी बच्चे हो और उसका सर अपनी छाती पर दबाकर तो नहीं कल से पूरी नहीं रे विट्ठल अपनी कसम नहीं थोडी तो मेरे सोनी सोनिया ने तुकाराम की आवाज पहचान नहीं तो बहुत सी किश्तियां दिखाई दे रही थी । सोनिया ने एक हाथ से अपनी आगे पहुंच का दूसरा हाथों पर उठा दिया । थोडी ही देर में किश्तियां पास चाहिए तोगाराम कोतकर सोनिया की किस टीनियां क्या रात घर में में है जैसे और भी बूढा हो गया हूँ सोनिया को अपनी छाती पर खींच कर फूट फूटकर रो पडा बोला सोनी रे वो दे रहा है बाबू गनपत था दूसरी किस्ती उसके ऊपर गहरे पश्चाताप की भावना छिपकर अर्थनग्न लहरों की कोर्ट्नी आज एक हो गई हूँ ।

5. Fauladi Insaan

सन उन्नीस सौ पंद्रह काशी अंचल की एक हवालात में एक नवयुवक है । थानेदार हो तो सिपाही थानेदार सिपाहियों को आदेश दे रहा था ये इस प्रकार नहीं मानेगा लगाओ इसके डंडा बेड हूँ । ठीक उसी समय कमरे में एक अन्य पुलिस अधिकारी ने प्रवेश किया एक सौ सत्तर सेंटीमीटर लंबा कर और उस पर तुर्रेदार पकडे हारा हुआ शरीर और उम्मीद ही हुई थी । तीसरी में हत्या कर लगता था । थानेदार बस सिपाहियों ने चुस्ती से खडे हो कर सकता हूँ किसको डंडा वे नहीं लगाने का हो रहा था तो मैंने मना किया था ना कि किसी भी राजनैतिक कैदी पर किसी तरह का अत्याचार नाम कोई चोर हो चुकी है कि खडसे हुकमा हो गया लगता फॅमिली तो भी शर्म नहीं आती । ये सब करते हुए दोनों जब मेरी आंखों के सामने से आने वाले अधिकारी ने धनराज काटता उसने फिर कैदी से पूछा तुम्हारे साथ ऍम होनी और तो कोई जाती नहीं थी ना कभी कोई बात हो कोई शिकायत तो बिना किसी झिझक के मुझे बुलवा लेना ठीक है तो छोडना मेरे पास के बाहर की बात पर यहाँ रहते हैं । मैं कभी कोई तकलीफ होने दूंगा इसका इंतजाम तो मैं कर ही सकता है । हूँ । मैं तो तुम कह रहा हूँ क्योंकि तुम मेरे बेटे की बराबर अगर आज मेरा बेटा जिंदा होता तो तुम्हारे ही बराबर होता है मेरा नाम प्रताप सिंह ऍम पिताजी का नाम ठाकुर केशर सिंह कहाँ के रहने वाले हो? ऍम परिवार में किसी का शाहपुरी जी तो मैं और तुम्हारे पिता जी एक साथ पडी मेरा नाम? रणवीर सिंह मैं सीआईडी इंस्पेक्टर तुम्हारा मामला मेरे ही वहाँ से कितने भाई नहीं हाँ अकेला हूँ । ठाकुर साहब आजकल क्या करती हूँ? जमीनदारी देखती है नहीं तो जेल में है, चीनी हूँ । राजद्रोह के अपराध भी उन्हें आजीवन कारावास हुआ है । कांस्य जेल में है ये तो पता नहीं पर स्वास्थ्य खराब होने के कारण उन्हें शायद काला पानी नहीं भेजा गया । जमीनदारी कौन देखता है? जमीनदारी सरकार नहीं सकते । अब तुम्हारी माता जी कहा जब मुझे पकडा गया था तब दिल्ली में थी । दिल्ली भी किसी दिल्ली में किसकी कोई संबंधी है क्या नहीं वो मेरे साथ ही रहते थे । उनकी देखा काम करता है । युवक खाना भी तो ठीक नहीं होता है ना किसी चीज की जरूरत हो तो बिना किसी संकोच के बताऊँ । मैं भिजवा दूंगा । नहीं किसी चीज की जरूरत नहीं है हूँ कौनसी बाहर ठंडा साहब को हमारा सलाम बोलो धानी ना के आने पर रहते हो । देखिए आज से इस लडकी का खाना मेरे यहाँ से आएगा । लंगर ऐसे नहीं और खयाल रखियेगा कि इसे अब किसी तरह की परेशानी नहीं हूँ । इस वक्त जाकर थोडी सी मिठाई और दूध मांगा था । प्रताप ने फैसला किया था कि वह किसी भी अवस्था में पुलिस वालों से किसी प्रकार की विषय सुविधा नहीं मिलेगा । ये दूध मिठाई थी नहीं खाना चाहता था परन्तु रनवीर सिंह की सज्जनता और अपना के सामने मैं अंत तक आपने निश्चित पर तो नहीं सकता । उस दिन रणवीर सिंह से कोई और विशेष बाते हैं उसके साथियों के बारे में तो उन्होंने इशारा भी ना । क्या प्रताप कजन धारण सौ तिरानवे भी मेवार राज्य के अंतर्गत शाहपुरी के जमींदार ठाकुर केशरी सिंह के यहाँ हुआ हूँ । मैं उदयपुर कि राणा के विशेष प्रियपात्र जीवन में जिम्मेदारी से ज्यादा और चाहिए भी किया था । परंतु ठाकुर जब भी देश की स्वतंत्रता के बारे में सोचते हैं तो उनका ऍम परिणाम वही हुआ जब प्रायः ऐसे लोगों का बताऊँ अंत नहीं पकडी गई और उन्हें आजन्म कारावास करना होगा । जमीनदारी अन्य संपत्ति जब्त कर रही नहीं । छोटे भाई की मेरी भी मामला पर वह फरार हो गया । एक ही दिन में प्रताप उसकी माँ को राजमहल से सस्ती पर उत्तर कराना पडा हूँ । वो आज इस संबंधी के यहाँ तो कर उस मित्र के यहां आश्रय झूठ नहीं परन्तु किसी ने का साहस था की एक राजद्रोही के परिवार को ढाई आश्रय देकर स्वयं भी सरकार का कोपभाजन पंजाब था तो प्रताप को पिता से विरासत में शारीरिक फॅमिली बचपन नहीं उसका संबंध दिल्ली की क्राॅस तेईस दिसंबर उन्नीस सौ बारह, चांदनी चौक ऍम परन्तु प्रमाण उनकी आभाव में छुटकारा पाने छूटने के बाद प्रताप दो उन्हें छोटी सी अंग्रेजी शासन को भारत से को खान देखने की बात नहीं चाहिए हूँ । उसका संपर्क बनारस की शचीन्द्र संज्ञान आने के साथ और ठीक नहीं हो गया । घांटा फूल जाने के कारण इनकी क्रांति योजना विफल अन्य षड्यंत्रकारियों के साथ प्रताप मुखबिर बनाने के लिए पुलिस वाले उसी नाना प्रकार के प्रलोभन देने लगी । प्रताप की एक कमजोरी थी और वह थी उसकी माँ प्रताप को छोडकर उस वृद्धा का और कोई सहारा नहीं था । मित्रों रिश्तेदारों से निराश होकर ते शक्ति माँ को दिल्ली ले आया था । जहाँ भी एक छोटा सा कमरा किराए पर लेकर नहीं रही प्रथा जो थोडी बहुत मजदूरी करना था । वहाँ बेटा उसी में गुजारा कर रहे थे । तीन चार दिन बाद प्रताप की पेशी फिर रणवीर सिंह के सामने हुई । मैंने तुम्हारी सारी फाइलें पडेगा । भारी साथियों के बयान से पता चलता है कि तुम राजबिहारी बस सान्याल बाबू के दाहिने हाथ नहीं नहीं इंकार करने की कोशिश मत करो । मैं तो केवल तुम्हें बता रहा हूँ तो मेरे पुरानी से ही पार्टी मित्र के पुत्र हूँ । मेरे लिए भी पुत्र के बराबर हूँ । मैं चाहता हूँ तो मैं किसी प्रकार इस मामले से बचाना । तुम्हारे लिए कुछ करना तो मेरा कर्तव्य है । वैसे भी तुम लोगों के साथ मेरी सहानुभूति है । जब तुम लोगों की विषय में सुनता हूँ तो सीना गर्व से फूल होता है । सोचता हूँ इस नौकरी को लात मार कर मैं भी तुम्हारे दल में शामिल हो जाऊँ । लेकिन फिर जब बच्चों और पूरी माँ की ओर देखता हूँ ना तो सारा जोश ठंडा पड जाता है । ऍम एक लडका था, वह पहले ही जा चुका है । दो लडकियाँ है माता जी सब देखभाल करती है परंतु उनके जीवन के और कितने दिन बचे हैं । अधिक से अधिक साल दो साल ना था । तुम्हारी माता जी के बारे में मैंने दिल्ली से खबर मंगवाई थी, मेरे एक मित्र हैं । उन्हीं को उतार दिया था । हमारे पकडे जाने के बाद उन्हें मकान छोडना पडा । उनके पास देने के लिए किराया नहीं था । मकान मालिक भी उन्हें अपने मकान में रखकर पुलिस का कोपभाजन बनने के लिए तैयार नहीं थी । एक सप्ताह तक एक धर्मशाला में रहे धर्मशाला भी छोडनी पडी क्योंकि धरमशाला वाला भी पुलिस से देखता था । एक सप्ताह से अधिक ऍम साला के नियम के विरुद्ध था, अब हूँ । फिलहाल तो स्टेशन के मुसाफिरखाने में ठहरी हुई है मैं उनकी खानी आदि का शायद ये कुछ तीन उन्होंने भूखे रहकर ही कराते ही एक मांगने से तो नहीं । अब उनको मजदूरी तो मिल नहीं सकती से बुखार के कारण चलने फिरने से भी मिलना चाहिए । मैं आज ही अपने मित्र को पचास रुपए भी जहाँ कम से कम कुछ दिन के लिए तो वो उनके लिए खाने दवा आदि का प्रबंध करते हैं । उनको अपने घर लाकर कहने का साहस तो मेरे मित्र में भी नहीं होगा । अब जब हम छोटे थे तो एक छोटा सा मकान लेकर उन की अच्छी तरह सेवा करना चाहता तो यह था कि हर माँ नहीं कुछ भेज और अपना जीवन क्राॅस परन्तु नौकरी जाने का डाॅॅ हर महीने महीने की नहीं रुपये इस बुढापे में नहीं नौकरी देगा भी कौन मजबूरी के आगे पैस नहीं जानता हूँ आपने जो इतना करती है वहीं पर मैं जिंदगी भर आपका आभारी रहूंगा । अच्छा यदि तो मेरी राय मानो तो इस बात का पत्नी चाय पैसा नहीं है परन्तु आज की स्थिति में इस से अच्छी कोई योजना वो भी नहीं सकते । प्रचार रणनीति की चीज नहीं होती हूँ तो तुम मुझे छोटा सा बयान लिखवानी मैं इसी में कुछ नहीं जाएगा और यदि जानता भी हो तो बताऊंगा तो मेरी बात सुनो भी या नहीं नहीं तुम से कब कहता हूँ की तो मुझे ऐसी बात तथा तुम्हारे जो साथ ही पकडे गए हैं उनके नाम लिखवा दूँ ये पकडे तो गई नहीं और विभूति आदि नहीं सब पे भी खोल दिए और केवल विभूति क्यूँ ही गिरीजा बाबू सचिन नाम दामोदर स्वरूप आदि नहीं तो बयान भी देखो यूपी करना था वो तो बिगड चुका हूँ सपने अपनी अपनी जान बचाने के लिए सारा अपरा दूसरों के से मार दिया तुम्हें तो उनमें से किसी ने नहीं छोडा तो उन के बारे में क्यों इतना भाव होते हैं जिसको जो सजा मिल नहीं मिले तुम्हारे बयान देने या न देने से कोई फर्क नहीं पडता । तुम्हारा बयान होने से मैं अधिकारियों से सिफारिश कर सकूँ असंभव कि तुम्हें छुडवाने में भी सफल हो जाऊँ । केवल तो नहीं हो तो आशा है कि तब मैं ठाकुर साहब को भी जुडवा सकूंगा और तुम्हारी संपत्ति भी वापस दिलवा दूँगा । यदि ऐसी ना नहीं देना चाहूँ तो कुछ इधर उधर के नाम लिखा हूँ । मुझे लोग देना बेकार में पहले ही कह चुका हूँ । इस विषय में कुछ नहीं बताऊंगा । जीते रहो तो वास्तव में बहादुर पिता की बहादुर संस्थान तुम्हारे मुझसे यही शोभा देता हूँ । पर मेरी बात का गलत अर्थ निकाल रही हूँ । मैं तुमसे कोई नई बात बताने के लिए नहीं कह रहा हूँ और बताने के लिए अब बाकी रह भी किया गया । अपनी भेदियों से हमने पहले ही सारे षड्यंत्र का पता लगा लिया था जो थोडी बहुत कमी थी । बे इन बयानों ने पूरी करनी है तुम्हारे बयान देने नहीं देने से सरकार को कोई लाभ या हानि नहीं । हम तुम्हारे बयान से मुझे लगा भविष्य ठाकुर साहब के जितने एहसान मेरे ऊपर हैं उनको तो मैं कभी नहीं चुका सकता हूँ । हम तो यही मौका मिला है जब मैं तुम्हारे और धाबी साहिबा के लिए थोडा बहुत कुछ कर सकते हो । मैं छोटा नहीं चाहता हूँ । मैं कुछ नहीं बता सकता हूँ । हमने क्या मुझे इतना मोट समझ लिया है कि मैं तुम्हें छुटकारा का लालच दे रहा हूँ । जिसे छूटने की लालसा होती है उन्हें लालच तीनी की आवश्यकता नहीं होती । वे तो समय में ही सारा भी दुगुने के लिए तैयार बैठी रहती हूँ । मैं चाहता हूँ की भावी साहिबा जीवन के अंतिम दिन अपने पिता पुत्र का मुख देखते हुए काटी जरा सोचता हूँ आज तुम्हारी माता जी पर क्या बीत रही हूँ । टीके रहते मैं भोग रही पुत्र के रहते ठोकर खा रहे महलों में रहने वाली को आज स्टेशन के मुसाफिर खाने में रहना पड रहा है । रोज हजारों का पेट भरने वाली टुकडे टुकडे को तरफ नहीं कहते कहते रणवीर सिंह की आवाज होनी प्रताप के सामने उसकी माँ का ऐसा करूँ और दैनि चित्र की चाहिए कि प्रताप अपनी आदतों पर काबू नहीं रख सकता हूँ । धोती के छोड से अपनी आंखें पहुंचते हुए प्रताप ने कहा अच्छा ठाकुरसाब मैं आज रात इस बात पर विचार कर बयान कर रणवीर सिंह को विश्वास था कि उनका अस्त व्यस्त नहीं जाएगा । आज नहीं तो कल विजय तो नहीं होगी । दूसरे दिन अभियुक्त का बयान लिखने के लिए मूंछों पर ताव देते और पदोन्निति के काल्पनिक चित्र बनाते हुए इंस्पेक्टर रणवीर सिंह वाला हूँ । लेकिन उनकी आशा के विपरीत तथा देखिए ठाकुरसाब मैंने बहुत सोचा विचार तुरंत अवांत में किसी निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ तो मैं कुछ नहीं हूँ अपनी माँ को बचाने के लिए । अभी तो केवल मेरी माँ ही कष्ट पा रहे हैं किंतु कुछ सामान नहीं बताने पर तो पता नहीं और भी कितनी युवकों की माताएं ठीक मेरी मांग की तरह ही कष्ट भाई तब एक माह की जगह कितनी माताओं का हाहाकार मैं इस जीवन में कैसे आप चाहिए बहुत ही हो सरकारी अत्याचार न सह सकने के कारण कुछ समय की इस बीच की मृत्यु हो गई । जेल अधिकारियों ने हमारी फॅमिली तरह चल रहा है ।

6. Wah Daaku

राजस्थान का पा लिटिल हरा भरा और उपजाऊ कर दी है । दिल्ली अहमदाबाद रेलवे लाइन पर जब मारवाड जंक्शन सिंह आप रोड की ओर पढते समय अरावली पहाडी नहीं घुसती है तो दृश्य बिल्कुल बदल जाता है बालू केटीजे बबूल के पेड गायब हो जाते है हरे भरे लहलहा देखी और थोडी थोडी दूरी पर पैसे झूठी छोटे गांव मैं कर रहा हूँ दूर अरावली की चोटियां आकाश में अपना सिर उठाए खडी हूँ पहाडों के नीचे हरी भरी मैदानों में पैसे ये काम बडी सुंदर है लोग बडी सरल स्वभाव ही उनका जीवन बडा शांति मैं अधिकतर लोग खेती करते हैं । इन छोटी छोटी गांव में भी बडे धनी का से संग रहते हैं । उनकी वेशभूषा और सारी रहन सहन को देखकर खयाल भी नहीं आता हूँ कि इनके पास इतना धन होगा । ये लोग बडे मिलने आई और सीधे साधे होते हैं लेकिन ऐसा पैदा करने के लिए कहीं भी जा सकते हैं । इनके पास पैसा होता भी काफी दस साल पहले । इस इलाके में मीना जाति के एक डाकू तीन लाख का बडा आतंकी था ही सारा इलाका उसके नाम से था स्थर का था । सात साल से उसने इलाके में खाली में जा रही थी । पुलिस उस पर किसी भी तरह काबू नहीं पा रही है । हमेशा ही मैं पुलिस के सशस्त्र खेरे से साॅस धीरे धीरे टीम लाने पुलिस के हथकंडे जानती । अब तुम्हें ऐसा दिल हो गया की डंके की चोट पर टाका था बिल्कुल बेधडक लूट कमाल बटोरकर पहाडों में गायब हो अपना आतंक जमाने के लिए मकानों में आग लगा देता हूँ । और तो बच्चों और उन्होंने तक माँ सीट हूँ या उनके रिश्तेदारों को बांध नहीं जाता था और मनमानी रकम वसूल करके नहीं छोडना । उसका आतंक इतना बढ गया कि पुलिस सीटर नहीं नहीं उसके आने की भनक कानूनी पढ भी जाती है तो पुलिस दूर चली जाती है और जब रहता कुछ दल अपना काम अच्छी तरह समाप्त करके भाग नहीं था और खतरे की कोई बात नहीं तब कहीं जाकर पुलिस ऍम देश की बात की रस्म अदा सब निर्दोष गरीब गिरफ्तार किए जाते । सच्चे झूठे बयान होती । रोजाना मचों की खाना पूर्ति होती है और मामला ठंडा पड जाता है । एक बार उसे रेलवे स्टेशन और सेठ साहूकारों को लूटकर तो कमाल ही करती हूँ । पूरे दो घंटे तक बडे इत्मीनान से लोट होती रही । करन में बहुमूल्य सेवर, कपडे आदि लेकर डाकू भाग गई । जिस बस्ती को लूटा वहाँ दोनों तरफ की गलियों पर ऐसी नाकाबंदी कर दी गई । पुलिस आती भी तो मुंग की घाटी इस जाके नहीं सारे इलाके में तहलका मचा दिया हूँ । असेंबली में पुलिस की निष्क्रियता पर प्रश्न टी केंद्र सरकार तक खबर पहुंच पुलिस विभाग के ऊंचे ऊंचे पदाधिकारियों से स्पष्टीकरण मांगे गई और उनको चेतावनियां इंस्पेक्टर जनरल देवानाम् चौधरी को हिदायत दी गई कि अगर शीघ्र ही इस स्थिति पर काबू नहीं पाया गया तो उनका पद घटा दिया जाएगा । तेल वाला कुमार ने या जीवित गिरफ्तार के खेल आने वाले के लिए एक लाख रुपये की नगद इनाम और प्रशंसा पत्र की घोषणा हूँ उस प्रदेश की स्थिति को काबू में लाने के लिए अतिरिक्त पुलिस पर और अधिकारियों की नियुक्तियां सवेरे कि गाडी से सोचती हूँ एक बाबा जी और उनके दो चीज अपनी झोली और एक तो बोरियों में थोडा सा सामान्य तथा प्लेटफॉर्म के गेट की तरफ पर मुसाफिर आपने अपनी टिकट गेट पर खडे बाबू को देखकर वहाँ जा रहे हैं । चेलों की कानाफूसी के पास से खडे टिकिट बाबू को पता चल गया कि बाबा जी के कमंडल में तीस तोला फिल्म है । अब उसने बाबा जी और उनके खेलों को वही रोक लिया और रेलवे पुलिस के सिपाही को इशारा कर दिया की उन पर नजर रखता हूँ ताकि कहीं हो जाएगा । जब सब मुसाफिर जा चुकी तो टिकिट बाप हूँ । इन लोगों की ओर मुडा बाबा जी देर लगती देख बोरी बिछाकर उसपर आसन जमाएं । आंखे बनके ध्यान कर रही हैं । दोनों चली सकपकाई से चुपचाप खडी प्रतीक्षा कर रही थी कि कब उनको भी वहाँ जाने की इच्छा हो सकती है । टिकिट बात बोलूँ मुझे मालूम हो गया है कि तुम्हारे पास अभी हमे लाचार होकर तुम लोगों को पुलिस के हवाले करना होगा । दोनों झीलों की खुशी थी । उन्हें तो आशा थी कि भीड छटते ही बाबू नहीं, साधू संन्यासी समझकर तया करने का जाने देखा । लोगों के सामने कानूनी पाबंदी दिखाने और उन्हें जरा डराने के लिए रोक लिया है । जिससे आगे फॅमिली बातों का यह रूप देखकर दोनों खेले हाथ पहुँच होने लगी । बाबू जी हम लोग साधु कर कानून कायदे क्या जाने अपनी जरूरतों की चीजें साथ रखते हैं । बार बार थोडी थोडी कहाँ खोजते फिरें । हमारा क्या ठिकाना कभी नहीं इस बार माफ कर दूँ । फिर कभी ऐसा नहीं होगा । भगवान आपका भला करेंगे किंतु बाबू पर कोई असर नहीं हुआ । स्टेशन मास्टर को बुलवा लिया ऍम आया हूँ और पुलिस के सिपाही को बाबा जी की तलाशी लेने का हुक्म दिया । सिपाही एक बार तो बाबा जी का रिश्ता पुष्ट शरीर और रावेला चेहरा देखकर सारा चीज का । लेकिन स्टेशन मास्टर की डांट सुनकर आगे बढाऊं खेली । मना करने लगी । बाबा जी को हाथ मत लगाना वो नाराज हो जाएंगे तो नाश कर देंगे । हो हल्ला सुनकर बाबा जी का ध्यान टूटा और उन्होंने आंखें खुली । भीड भाड देखकर बोले क्या बात है फॅमिली भी बाहर क्यों? स्टेशन मास्टर ने कहा हमें आपकी तलाशी लेनी कमंडल इधर दीजिए । इसमें अफीम सुनते ही बाबा जी का पाना चाहिए । उससे यहाँ बबूला होकर एकदम उठ खडे हूँ और कमंडल आकाश की ओर उठाकर बुरे माँ काली लेजा । फिर कमण्डल स्टेशन मास्टर की ओर फेंकते हुए बोली ये लोग तलाश सब दीदी । सच मुझे उसमें से अपील गायब सब देखते रहेंगे । फिर बाबा जी नहीं चिल्लाकर का और दिखाओ । माँ काली का चमत्का कर दो तो मैं यही ठंडा अभी इसी दम हूँ । डर के मारे सबके रोंगटे खडे होंगे । स्टेशन मास्टर और टिकिट बापू ने तो बाबा जी के पांव पकड लिया और पुलिस वाला थर कांपती रखा । बडी मुश्किल से बाबा जी को दोनों चीजों ने शांति हम तो क्या पूछूं सब उनकी आवभगत चली इधर उधर ऍम हाँ और न जाने क्या क्या उनके नाश्ते के लिए हसी उधर स्टेशन के बाहर एक पेड के नीचे की जगह ली बोर्ड कर एक झोपडी खडी करती हूँ । उसी में तीनों को चाहेंगे बाबा जी की सीधी और चमत्कार की चर्चा । बिजली की तरह उस बस्ती और आस पास के गांव ऍम लोग दूर दूर से भीड पूजा लेकर उन के दर्शन करने यानी पूरा नीला सलकिया । तंग आकर बाबा जी ने कहा हूँ बच्चा यहाँ तो देवी के भजन पूजन में देखना पडता है । अच्छा यहाँ से किसी गांव में डेरा जमाया जब बाबा जी की गांव में जाने की इच्छा सिल कर कुछ लोगों ने बताया कि गांव में तो जो डाकुओं का पडा अगर घर नहीं जाएँ तो अच्छा है । बाबा जी ने हसकर का माँ काली त्रिशूल और घटक खप्पर लिए हमारे साथ हमारा बाल भी बांका नहीं होगा । हमें ऐसा गांव बताऊँ जहाँ नामी से नामी जो डाॅॅ भीड में से किसी ने मजाक नहीं का भी मना । जो शिमला का गांव है वहाँ पदारी भाबा जी ने कहा अच्छा बच्चा नहीं जाती हूँ जय ऍम लोगों ने बहुत माना लेकिन बाबा जी नहीं मानी । घंटे भर में तीनों ने सारा सामान बांध किया और रवाना लोगों ने एक दो किलोमीटर तक साथ जाकर आगे पगडंडी का रास्ता बता दिया । लौटाएं बाबाजी में खेले आगे बढ गई और शाम तक भी माना जाता है । बाबा जी तो बीमार ना बाद में पहुंची, लेकिन उनकी चमत्कार की चर्चा वहाँ पहले ही पहुंच चुकी थी । में मिले लोगों ने पहले ही गांव में बाबाजी के पधारने का शुभ समाचार ऍम लोग बडे खुश नहीं । उनमें से कई तो उनके दर्शन भी कर चुकी थी । काम की बाहर चाहकर लोग उन्हें स्वागत के साथ काम है । गांव से लगभग एक किलोमीटर पहले टीवी का एक टूटा फूटा सा सूनसान मंदिर था । बाबा जी ने उसी में रहने की इच्छा प्रकट की । उनके इशारे भर की नहीं थी । दो दिनों में गांव वालों ने मंदिर को साफ कर दिया । दोनों समय आरती हो नहीं दर्शन के लिए गांव वाले मंदिर में दोनों समय बडी श्रद्धाभाव से आने लगी की तो उनकी श्रद्धाभक्ति तेजी से भी अधिक आपाची पर भीम ना गांव में अधिकतर ये राष्ट्रीय जाति के लोग रहते हैं । इन की कोई एक देखनी, बस्ती नहीं ये लोग मीलों तक फैले हुए हैं । पर पहाडी धीरे पर इन की दो चार झोपडियां होती जादू दोनों और तंत्र मंत्र में इनका बहुत विश्वास होता है । रात को चोरी लूटपाट तारीख के लिए घर से निकलने के बाद ये देवी को मना कर और अच्छा शकुन लेकर आगे बढते हैं ये पूरे अंधविश्वासी और धर्म अमीरो होती हूँ मंदिर के भीतरी भागने बाबा जी एम ने जब तक में लेन रहे नहीं वह दिन रात मान धारण किए रहते सवेरे के समय थोडी देर के लिए क्या विशेष मांगों पर ही माॅर्निंग इन दिनों मैं कुछ तांत्रिक क्रियाएं करने लगी थी जिसका सारा समय रात का था । रात को वहाँ किसी को भी आने की इजाजत नहीं सबको बता दिया गया था की रात को कोई नई नहीं तो जान का खतरा हूँ । डर के मारे लोग अंधेरा होने से पहले ही फांसी चली जाती है । रात को मंदिर से भूत प्रेतों की भयंकर चीजें और अजीब अजीब आवाजे आ नहीं जो ठंडी रात में दूर दूर तक सुनाई नहीं । इन आवाजों को सुनकर काम वाले सहन जानी कभी कभी ही मंदिर की चौकसी, आपकी लव बेटियाँ, चिनगारियां आकाश में उडती दिखाई देगी । जोर के धमाके होती पर दर्द भरी जी थी और रोने पीटने की आवाज यहाँ भी । लेकिन दिन निकलने पर मंदिर कुछ और ही पूछा था । दर्शन करने के लिए लोग सवेरे ही नहीं लगती । शाम को भी लोग आते हैं लेकिन सवेरे की तरह भी नहीं । दोपहर को वहाँ जो भी लोग होते हो नहीं काम नी थल्ले और बेटा उनके लिए भी बाबा जी की तरफ से धान ठंडाई । तब टीम तंबाकू, गांजा, सुल्फा, पार्टी का इंतजाम दिन इधर ये लोग हाँ भगवत छत्तीस ज्ञान, चर्चा तथा उपदेश आदि तो कम होती । जमानी भर्ती करते थे तभी सरकार की आलोचना होती तभी पंचायत की पुणे तभी रिश्वत पूरी की चर्चा हो तो कर ली । पुलिस की काली करतूतों कैसे? कितनी ईनामी जो डाकुओं की उनकी बात जातों समेत जिक्र कितना मान कितना बंद किया, कितना भेज दिया गया सत्ता ब्योरा सामने आ जाता है । बिचारी खेलों को सबका दिल खुश हो सब की बातों में सेना पर किसी को फटकार कर या तेज बोल कर हटा भी तो नहीं । भगवान का दरबार चुटे रहे । कभी बाबा जी की सिद्धि का सिख खेले । बडी प्रेम से बाबा जी के चमत्कारों का वर्णन करती हूँ । बाबा जी को पिशाचिनी से भी थी और वह भूत तथा भविष्य की बातें बता दिया करते थे । मैं यहाँ आने के बाद भी कई बार मौसम की भविष्यवाणी कर चुके थे । उनके मुख से निकली बनी सजा सकते हो । तीसरे धीरे गांव वालों को बाहर आ जी पर इतनी श्रद्धा हो गई कि वे उनको एक बडा पहुंचा हुआ सिर्फ ढल और अवतारी पुरुष मानने लगे । महीने भर के भीतर ही मैं आस पास के गांवों में पूजे जाने लगे । एक और बाबा जी ने बताया कि गांव के सिर्फ ब्रह्म हत्या का पानी और एक ब्रह्मराक्षस गांव का सर्वनाश करने पर तुला है । पर महाकाली के प्रताप से उसकी काली छाया गांव पर नहीं पड रही है । किसी ने बताया कि ब्रह्महत्या करने वाले का एक माह के भीतर मृत्यु योग है । एक दाल नहीं सकता । इस की दो दिन था । शाम को एक व्यक्ति बाबा जी की खेलों से मिल नहीं है और एकांत हो जाने पर पूरा आप लोगों से बात करेंगे । मैं शिमला कि गिरोह का ला आप लोगों से मिलना चाहता हूँ । आप क्या? क्या तो शरण में आज उन्होंने बहुत मजे से उन्होंने इनसी । रूस रात को नौ बजे आने की अनुमति रात को यथा समय पर पि ऍफ वह बहुत पहले थी और खबर आया हुआ हूँ । चीनी उसे भीतर भाजपा जी के पास उसने ऍफ अकडकर फॅमिली तब ऍम मैं आपका टाॅप की शरण में और आपके चरणों में पडा मुझे भी बचा सकती है चाहे मारो चाहे जलाओ ऍम घर भी आपके ब्राहमण सेट की हत्या मेरे हाथों हुई है मुझे बचाओ हूँ पे मिला कि कादर वाणी सुनकर आबाजी को तो यहाँ करेगी उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बाबा जी पाॅल कोई ऐसा बात नहीं जिसका शास्त्रों में प्रयास कॅश टकारी योग नहीं जो जब तब और मंत्र बाल से सालाना जा सकें । हम महामृत्यंजय का जब बार नौ दिन तक टीवी का यह क्या करेंगे आधी रात को चुप चाप रोज आ जाऊँ वो शायद ये मैं अंतिम होती है । अपनी हॅारर चाहूँ महाकाली की कृपा से तुम्हारा बाल भी बांका नहीं होगा । नौ दिन यज्ञ की पूर्णाहुति होगी । सवा मनाते का पुतला बनाकर चिता में चला दिया जाएगा और इस प्रकार तुम्हारा ऍम जाएंगे अब जाओ निर्भर होगा चाहूँ और मेरे दोनों खेलों से बोझ कर यज्ञ की सब सामग्री जुटाने का प्रबंध कर कल शुभ महूरत है । कल से ही यज्ञ प्रारंभ हो जाएगा । शुभकार्य में देर करना ठीक नहीं । एक बार का ध्यान रखना सब काम इतना तरफ था कि किसी को भी कानून का खबर ना हमारी आज्ञाओं का पूरा पालन करना । यह महाकालीका महामृत्युंजय यज्ञ है सर अभी गलती हो गई तो तुम्हारी मौत हो जाएगी या पागल हो जाओ के अच्छा हूँ कल से रोज रात को बारह बजे यज्ञ में अपने हाथ से अंतिम पहुॅंचाया करूँ । चुप चाप सारी तैयारी हुई दूसरे ही दिन आधी रात से महा ये के शुरू हो गया । बाबा जी के आदेश के अनुसार पीपला रोज आती रात को मंदिर में चुपचाप अकेला था । बाबा जी मंत्र पढकर जल का छोटा शिमला पर डालकर पहले शुद्ध करते, फिर अपनी सामने आसन पर बैठा नहीं । मंत्र फाॅर्स वह कितनी के साथ यज्ञकुंड पांची फॅमिली अंतिम आहूति बाबा जी स्वयं पे मिला के हाथ से । इसके बाद पेमेला देवी कोशिश नहीं बाबा जी क्या क्या लेकर चुप चाप पहुंॅच चाहे हैं । यही काम चलता रहा अंत में यज्ञ का नौवां और अंतिम देना पहुंचा । आधी रात को ठीक समय पे मिला । मंदिर में यह हो रहा हूँ और उसने आहुतियां डाली जा रही पांच ही लकडियां चुनकर एक जीता बनाई गई जिसपर गूंधे हुए आटे की नोट बनाकर उसी चलाया जा रहा हूँ । प्रतिदिन की तरह अंतिम आप तीन मिला नहीं, यज्ञकुंड में डाला और फिर देवी की प्रतिमा के सामने सिर्फ चुका है । टीम लाने से उठाया तो नहीं था सामने बाबा जी छह फायर वाला रिवॉल्वर उसकी छाती की ओर तानकर खडे पहुॅचकर का खबरदार जो शराबी हिला गोलियों से कलेजा छलनी कर दूंगा । उन्होंने इशारा किया और दोनों चीजों ने पे मिला की मुश्किल दसवीं फिर उसके मुंह में कपडा ठूंस क्या घसीटकर बगल वाली कोठरी में डालकर दरवाजा बंद कर दिया । यह सब पलक झपकते ही हो गया । जंगल का आसाद छः पांच शिकारियों की जान में आपका था । दूसरे दिन सवेरे लोग दर्शन के लिए आने लगी तो पहले तक इनका आना जाना भी बंद हो गया । तीसरी पहल उनको डाकुओं का जमघट रखा हूँ । रोज मंदिर में आज व्यक्ति और धाम छानते, चिलम ठोकते आज खाना, तंबाकू आदि का कुछ विशेष प्रबंध हूँ । थोडी ही देर में सब गाफिल होकर नहीं पसंद है । दर्शनार्थियों ने सोचा आज कुछ ज्यादा भी गई इसलिए नशे में हो रही है थोडी देर में नशा हल्का होने पर उठकर घर का रास्ता नहीं हूँ । लेकिन नहीं यह पता नहीं था कि आज का न शाम उन्हें घर जाने देखकर बडे घर की सैर कराएगा । अंधेरा होते होते वहाँ रोज की तरह सन्नाटा छा गया । पुलिस की एक बंदा गाडी बिना आवाज की मंदिर की तरफ हँसी के सामने आकर होगी । उसमें से डिप्टी सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस और संगीनों से लैस सिपाही तीन ला अन्य बेहोश पडे छोडा थे । पुलिस की गाडी नहीं चाहती है बाबा जी उनकी खेलों ने भी अपना बोरिया बिस्तर दस हर मोटर ने सवाल है मंदिर को देवी के सब अपनी सीट की खुशियां मनाते और हंसते हंसाते मोटर बैठकर फॅमिली खान बाबा जी और उनके दोनों चेली खुफिया विभाग के शिव प्रसाद, गुमानाराम तथा बिशन सिंह के रूप में हो चुकी थी ।

7. Devi

कुछ हरी बिल्डिंग बडी विशाल है । कम से कम सात परिवार इसमें रहती है । सीट सेवाराम सर्राफ से लेकर नारायण प्रसाद अध्यापक शिवलोचन पुस्तक विक्रेता से नहीं ॅ की तबके के लोग यहाँ रहते हैं । बिल्डिंग के सामने डामर की चौडी सडकें हूँ जो आगे जाकर जाना ही से मिलती है । बिल्डिंग के डाॅ । बहुत से मकान नहीं सामने के मकानों में रहने वाले निश्चय ही गरीब लोग इन मकानों की दीवारी नीची कच्ची और बरसात के पानी से बदरंग ऍम रामदुलारी है । रामदुलारी अकेले ही रहती है वो है लडकी हूँ । एक नाता लडका रेलवे में नौकर होकर बहुत समेत पट्टी रामदुलारी से पुरखों की जगह नहीं छोडी चाहिए । फॅमिली बेटिंग में आकर आसन जमाते हैं कई घरों की और तो ऐसी दोस्ती गांठ रखूँ रामदुलारी चलता हूँ । जिन स्त्रियों से उसे मनचाहा डर नहीं मिलता उनकी कुछ की कुछ झूठी निंदा दूसरी ऍम रामदुलारी की पैठ । पंडित शिवलोचन दुबई पुस्तक विक्रेता के घर में भी हैं । बस घर में कुल पांच का नहीं है मंडे जी पंडिताइन चौबीस साल का पुत्र त्रिलोचन त्रिलोचन की बीस वर्षीय पत्नी टीवी और पंडित जी की विवाहयोग्य पुत्री कभी नहीं पंडिताइन और सावित्री तो रामदुलारी को सुहाती हैं । टीवी का रूप उसी तरीके से अच्छा नहीं हूँ । ऍम हाँ मैया कितनी बडी बडी आंखें है उसकी । मेरा तो देखते ही कलेजा बैठता है । इसे देखती है । जैसे आंखों से ही छह डाली कि सस्ता बोलना तो जैसे जानते ही नहीं । कुछ भी कहो बस टूक टूक देखे चली जाती है न कभी हूँ टोपे हसीना आँखों में बेचारे ते लोगन की जिंदगी कैसे नहीं रहेगी । इसके साथ बात किसी हद तक सच भी हैं । टीवी की आंखें पहली नजर में हर आरती को चौंका देती है । वो बडी बडी फॅमिली है । उसकी गंभीर वोटों पर दृढता रहती है । अंबेकर की सुंदर रामतलाई उससे चाहे कुछ भी शिकायत क्यों नहीं साथ ससुर ऍम उससे संतुष्ट हैं । केवल तिरलोचन अपनी पत्नी के गंभीर स्वाभाव के कारण उसे कुछ कुछ खबर ऐसा रहते हैं । वैसे स्वभाव से कुछ डरपोक है वो रामदुलारी कभी कभी खाद डाल करूँ अपने घर के दरवाजे पर आप देखती है शाम को कभी कभी जब सडक सी चोट, एलान, राशिद, चमना निकलता है तब स्वर में मिस्री गोलकर कहती हैं जयराम जी की भैया उत्तर मिलता ही जयराम की क्या हाल है? रामदुलारी राम ताॅबे सबकी भैया तुम्हारी यात्री पडी दया बनाए रखा । छोटेलाल, राशिद, जमंगला आदि मोहल्ले की गुंडे हैं । इस मोहल्ले में न तो सरकार की चलती है ना पुलिस की चलती है । चलती है तो बस गुंडों बिल्डिंग के आसपास बने घरों में रहते हैं । जो हुआ नोच खसोट इनकी रूसी रात को सिर से पांव भर खुशबुदार तेल डाले, गाल में गिलोरी ठोस आंखों में काजल लगाए पर कलाइयों और गले में कचरे डाले हमारी फॅमिली फेंकते सडक पर चलती ही इनका खूब तब तब हूँ कोर्ट हरी बिल्डिंग फॅमिली रहती हूँ फिर भी जबकि जाता है ये किसी से भी पांच दस रुपए एंड ले ही जाते हैं । वे शहरा करीबन चल रही पर काली की मूर्ति की स्थापना करनी है । काम सब करते हैं गुंडे चंदा उगाहने में इनसे अधिक प्रमीण । पांच कोई नहीं दशहरे से करीब तीस रोज पहले ये चंदा उगाही चाहिए । कोठारी बिल्डिंग के चक्कर लगाओ । जिससे जितना मांगा उसी चुप चाप क्या घूमते घूमते ये मंडल पंडित शिवलोचन के यहाँ पहुंचे । पंडित जी घर में थी तो लोचन दुकान गया हुआ था । नाम कोतोवा सलाम हुई । हर साल की तरह इस बार थी । उन्होंने बिना बातचीत के सौ रुपये निकालकर छोटेलाल की तरफ पडेगी । किंचित है उसका और सिर हिलाकर छोटेलाल बोला मैं पंडित जी अबकी बार हमने सोचा है कि आपसे एक हजार रुपया लिया जाएगा । आप मेहरबानी करके एक हजार रुपया देती पूछने का काम है । शिवलोचन ने ठंड है छोटे लाल की काजल से रंगे आंखों में देखा फिर फोडे नहीं भाई में हर साल सौ रुपये ही देता हूँ । नहीं थी इससे ज्यादा देना मेरे समस्य बाहर पीछे से चमन ना अपनी काले काले दांत निकाल कर रहा हूँ । पूरा भरे कितना कमाते हो? पंडित साल भर में एक ही बार तो देते हूँ ना सही दो किताबों का दाम शिवलोचन से मिलाकर पूरा नहीं । भाई सौ रुपये से ज्यादा मैं नहीं दे सकता हूँ । छोटेलाल भूमि सिकोडकर होना देर मत करो पडेगी हमें दूसरे घरों में भी जाना है । शिवलोचन के मुंह पर चर्चा राहत का भाई है मुझे कहाँ तो सौ रुपये से ज्यादा नहीं दूंगा । ऍम कोई भी तो हम मान नहीं रहे तो नहीं होगी । जब मानते हैं तो वसूल करने का हौसला भी रखते हैं । फिर से सोच हूँ शिवलोचन का मूॅग युक्तियां हिलाकर फॅमिली सौ बार कहता हूँ नहीं दूंगा नहीं दूंगा नहीं तो मैं धमकी के बल पर रुपया वसूल करते हैं । करना तुमसे करते बने । जब मेरा अगर खाली करते है छोटी लाने आॅल चलो भाई चले दाल नहीं चलते । चलते चलते चमन लाल किला क्या ठहर साले पंडितवा तो भी क्या याद रखेगा? पंडित जी बाहर आकर चला नहीं लगी हूँ । मोहल्ले में रहना आराम हो गया ना कोई देखने वाला नहीं सुनने वाला घंटों का राज है । एक जगह जानी मुश्किल है । नहीं रहूंगा इस घर में भले ही पेड के नीचे डेरा डालना । बडी बिल्डिंग में से कोई भी उनके स्वर में स्वर मिलने नहीं आया । पुलिस में रिपोर्ट की तो पुलिस कानूनी दो चार निर्दोष व्यक्तियों को पकडकर धौल धवाडे लगती और फिर कानूनी तेल डालकर बैठ गई । इस घटना के बाद एक हफ्ता शांतिपूर्वक पीता शिवलोचन कुछ सरक्षंक रहती थी । आप आश्वस्त हो नहीं रही हूँ ना मैं दिन रात को करीब दो बजे किसी ने उन का द्वार खटखटाया । शिवलोचन बाहर वाले कमरे में ही होती थी । नींद भरे भरे उन्होंने तरह से थोडा सा खुला दरवाजा खुलते किसी ने उनके दाल पकडा । उनका मूॅग शिवलोचन ने देखा जहाँ रहती थी छोटेलाल, राशिद, चमन और सर्च उन्होंने कपडा ठूसकर शिवलोचन का मुंबई क्या फिर हाथ पैर भी बांध थी । अपने हाथों में लाठियां लिए हुए थे । सबके मुंह से शराब की गंध आ रहे हैं । उन्होंने लातों से शिवलोचन पर प्रहार करना आरंभ किया । हीरो पावर केबल के नीचे गठरी की तरह शिवलोचन उनकी लाते खा खा कर लडते रहे । बहुत प्यार करते लोचन ने भीतर से आकर किवाड खोलकर था । राशिद ने उसे देखा तो गर्दन पकडकर पीछे आंगन में धकेल दिया । फिर छुरा निकाल कर पूरा शोर मचाया तो कर दूंगा । त्रिलोचन पत्नी के साथ सामने वाले कमरे में स्वयं दाहिनी तरफ वाले कमरे में उसकी माँ तथा बहन थी । हाँ, बाहर निकल कर आ गया । उसने जो राशिद को बेटे की तरफ छोडा निकालते हुए देखा तो वो हो गए नहीं त्रिलोचन घबरा क्या? हाँ छोडकर कमती आवास में बोला राशिद नहीं नाराज मत हो तुम जो कहोगी वही करूंगा वो शीट मुडकर पूरा हूँ ऍम उधर कोने में चुपचाप त्रिलोचन उठकर स्थर का तक वह कोने में जाते हैं । राशिद के पीछे पीछे चमन लाल और सर जो भी आंगन में आ गए छोटेलाल वहीं शिवलोचन पर पहला दे रहा था रशीदपुर अंक । चमन लाल पुल कुछ तो गरम कर ली । कितने में उसकी नजर दाहिनी तरफ की कमरे के दरवाजे से चिपकी सरस्वती पर पर देख कर उसके मुक्का भाव पतला सर चुके । कोहनी मारकर बोला बकडझोली सूरज आगे बढा तो तिरलोचन कसमसाया राशिद फिर छोडा उसके सामने तानकर बोला फिर और फिर तहत शांत हो गया । सर्च को तीन और बढती टेक सरस्वती एकता । अरे भैया चिल्लाई और फिर भावी भावी चिल्लाती हुई खाककर अपने भाई की कमरे में घुसकर उस कमरे में अभी तक अंधकार डेरी अपने पलंग पर पत्थर से बैठी आंखे फाड फाडकर आंगन का यही दृश्य ठीक रहेंगे । अचानक ननद को अपनी ओर आते देख उसकी तंद्रा टूटी । सरस्वती की बातों से थामकर उसे पलंग पर बैठा दिया सर जो सरस्वती के पीछे पीछे कमरे की ओर बढा जा रहा था । कमरे की जमीन ऊंची नीची थी । पलंग का एक पाया छोटा पडता था इसलिए देवी उसके नीचे तोडने का एक किलो का बाद रखिया करती थी । चांदनी ने सरचू को आते देखकर उसने टटोलकर पाई के नीचे से बात नहीं कर रहा हूँ । अच्छा वह पहली बार करने लगा । तब मत कर उसकी मौत ही पति मार सरचू कोष होकर कटे । ब्रिक्स दहलीज करके रहा राशिद चमन लाल की समझ में कुछ नहीं आया कि क्या हुआ तो अंधेरे में झांकने की कोशिश करते हैं कि इतने में कमरे में से गोली की तरह निकलकर देवी ने रशीद का गला पकड लिया । नशे में चूर राशिद देवी को लिए हुए भूमि पर लोड किया । अस्त व्यस्त देवी ने राशिद की छाती पर चढकर उसका काला दबाना आरंभ करती है । चमन लाल भौचक्का सब ये सब देखता हूँ । त्रिलोचन भी मंत्रमुग्ध जैसा निहारता रहेंगे । राशिद ने दो दिन तो जोर लगाए श्रीदेवी के हाथों की शक्ति की आगे मैं भी बस उनके उसके हाथ पाउंड धीरे पर आंखों की पुतलियां । फिर चमन लाल अब चौंका देखा ऋषि की जान जाती है । तिवार सिटी की लाठी उठाकर उसे पूरी ताकत से धूल बार देवी के घने केशों से धक्के सिर पर करती है । देवी के कार्य गानों से फिल्म की लाली निकलता है और उसका से धीरे धीरे रशीद के चेहरे पर छुट गया । त्रिलोचन को जैसे करंट लगा । एक का एक और चंदा कहकर उसने पास टिकी सूरज की लाठी उठाने और चमन लाल की ओर लगता हूँ चमन ना छोटेलाल के पास बैठ क्या चमन राष्ट्र निकल गया, लेकिन छोटे लाल एकाएक नहीं भाग सकता हूँ । त्रिलोचन पागलों की तरह छोटे लाल के ही सिर पर लाठी चलाना शुरू कर दिया और तब तक चलता रहा जब तक लाठी की दो टुकडे हो गई । छोटे रहा लंबा होकर फर्श पर किया हूँ लाठी का आधा टुकडा जमीन पर फॅमिली जल्दी जल्दी पिता के बंधन खोलेंगे । फिर उन्हें वैसे ही छोडकर ढाका हुआ आंगन ऍम सरस्वती रो रोकर देवी को रशीद के शरीर से खींचने की कोशिश कर रही थी । त्रिलोचन ने भी पडी कोशिश की तब कहीं जाकर नहीं । राशिद की गर्दन से देवी के हाथों को अलग कर रहे हो । फॅमिली जानते हो चुकी थी । सभी होती होती बिल्डिंग खबर सैंट शिवलोचन के द्वार पर भी लगते है । स्ट्रीम ने अपने पतियों के आगे हाथ लिया भाई! तुम मर्द खर्च पर पडे सोते रहते हूँ और उस बच्ची ने उनको उन लोगों को मार भगाया । शर्म नहीं तो भी युवकों का खून खून चमन लाल की तलाश की, उसका कहीं पता नहीं चला । उन्होंने चारों गुंडों के घर वो करते थे । चमन लाल के नाम ऍम किया, लेकिन उसने फिर कभी लौटकर शक नहीं था । सूरत सवेरे होश भी हो गया था । उसे पुलिस के हवाले कर दिया । क्या उसके बाद जांच के लिए राशिद छोटे लाल की राशि निकाली थी । फिर ऍम एक्सॅन स्टील नहीं थी । आज सुबह ही मलेनिया नहीं फॅमिली में अब शहर के गुंडे कोठारी बिल्डिंग के पास आने से घट जाती रामदुलारी की जैसे जबान झेल गई । बिल्डिंग में बहुत कम आती है तो जब आती है तब टेरिटेरी से रह नहीं किसी की निंदा नहीं करती हूँ । एक घर है जिसमें से एक बडी बडी आंखों मर सामने लोग चार देते अभी वहाँ चुप चाप कर रखते हैं । सरस्वती किया की जब तक रेस्ट ही रहती थी त्रिलोचन मोहल्ले के युवकों की दमनकारी तलका मक्खियाँ है ।

8. Bagh ka Shikaar

महिंद्रा ने डैशबोर्ड की रोशनी में खरीदी । बारह बजे अभी एक घंटे का समय और उसके पास था । उस दिन गाडी की रफ्तार पैंतीस से घटाकर तीस बहुत बुंदेलखंडी चारों की हवा दोनों ओर के जंगलों में से होकर साईं साईं करती तो तेज चल रही है । दूर से आपकी बेतवा की तेज धान की बहने क्या हुआ स्टेशन बैगन की इन जिनकी आवाज की पांचू नहीं थी । अगले मील के पत्थर की पास पहुंचनी पर इस इंकारी को थोडा कुमार कर रोका और सामने के शीशे को रोमांस ही संस्कृति स्तर पर लिख की दूरी पर ढोल नाले की पुलिया महासी कोई पैंतालीस किलोमीटर रखी थी और वहाँ से एक बजे पहुंचती थी । सामने की सीट पर ही बैठी मिर्ची सीधा तीन विजय आने महेंद्र की ओर एक बार प्रश्नवाचक दृष्टि से भी था । महिंद्रा ने ओवर कोट की ऊपरी जीत से स्वीकार निकालकर चलते हैं । फिर अभी एक घंटा हो ऍम अभी मैं आपको वापस रावी छोडकर ढांसा नाले की पुलिया पर एक बजे तक पहुंॅची मेरे पास वापस लौटी की छत इतना इतना ही नहीं मानी जितना घर पिताजी के पास पहुंचने की सूचना मुझे भी लोग एक बार सिर उठाने की तो भी क्या फर्क है ये बहुत ऍम से कह रहे हैं वो एक महीने पहले रायसिंह डाकू का दल उसके पिता के घर डकैती जानकर उसे उठाना है । उसकी शादी अगले महीने ही होने वाली है । पिता आनबान वाले ठाकुर थी यू लडकी को पढाया लिखाया था गुड सवारी की टाॅप बंदूक चलाने की सुविधाएँ थी, लेकिन हूँ इतने दिन । अपनी खानदानी दुश्मन और कुख्यात डाकू रायसिंह की कंपनी में रह कर वापस पिता के पास जाकर उनके लिए एक समस्या नहीं बनना चाहती थी ना उनके लिए जहाँ उसकी शादी देखो । फिर महेंद्र ने एक बार और सेना अपना पर समझा । जारी स्टार्ट करने से पहले उसने एक बार फिर मोटर में लगे चीज हमें अपनी छत्रपति खाकी रंग कर नीला बनाया हुआ ओवर कोट नहीं जिसकी कॉर्नर उठी थी । सिर पर काश्मीरी टोपी और उसके नीचे करीब करीब पूरे चेहरे को देखते हुए मसला है । महेंद्र को रात के अंधेरे में राघव सिंह मानने में किसी को कुछ हो, उस की सोच, उसकी लंबाई चौडाई, राजत सिंह जैसी ऍम सब वही राघव सिंह का पहले सिर्फ उसे अपने क्लीन शेव चेहरे पर राजस् सिंह जैसी छोटी छोटी मुझे लगाने पडेंगे । घर से जैसा बंबईया हिंदी बोलने में भी उसे कोई दिक्कत नहीं मैं जानता हूँ । राघव सिंह ट्राई सिंह चाकू के गिरोह था । फौज में मेडिकल कोर में नरसिंह निर्दली रह चुका हूँ और एक कंपाउंडर को मार कर फरार हो गया था । मैं दो साल से मुंबई में टैक्सी चलता था और अब जाहिरा किशनगढ के ठाकुर जंगबहादुर का नहीं आना चाहिए था हूँ उसका काम था या को रायसिंह द्वारा लूटे हुई मांग जंगबहादुर के जरिए इधर से उधर पास करना और जरूरत पडने पर चोट खाई डाकुओं की मरहमपट्टी करता हूँ उसकी सेवाओं के लिए रागर सिंह को विजया कुछ दिन के लिए इनाम नहीं दी गई हूँ जिसे उसने अपनी बहन के पास राबी में रख छोडा था । आज राहत सिंह रावी से विजय को लेकर किशनगढ जाने वाला था । रास्ते में ढांसा नाले पर रायसिंह और उसके दल के खास खास चार पांच लाख को मिलेगी ताकि मामूली लोगों को कुछ दिन के लिए पीटर पीटर कर दिया गया था । दलके, खासम खास लोग और सरगना कुछ दिन के लिए रावी के जंगल और खो हक्का छोडकर किशनगढ के जंग बहादुर सिंह की छत्रछाया में विश्राम लेंगे । इधर तीन चार महीनों से रायसिंह नेरावी और आसपास के कई जिलों को छलनी कर रखा था तो दिन दहाडे डकैती डालता और बडे जमींदारों और साहूकारों के बच्चों को उठा ले जाता हूँ । फिर फिरौती की लंबी लंबी रखने लेकर उन्हें छोड था कच्ची हिम्मत वाला पीस को राघव सिंह रावी के एक सस्ती होटल में शराब पीकर बता छत्ता जंगबहादुर कि स्टेशन बैगन सहित पुलिस के हाथ पकडा गया । हाँ और बढिया शराब की जोर से पुलिस ने उससे सारी बातें बाल भरी । महेंद्र की गाडी अब कोई पच्चीस किलोमीटर की रफ्तार से चल रही है । बिल्कुल खानी हो डाकू रायसिंह के मारे दिन छिपे बात सडक पर निकलने में पुलिस भी सबको जाती थी । विजय बिल्कुल चुप चाहते हैं कि बाहर कुंदेर ठंडी हवा तेज होती मालूम देती हूँ । अकसर जब हमें कोई काम होता है तो ऐसे ही हो जाता है । महेंद्र सोचता हूँ अपनी पुरानी सहपाठी पुलिस कप्तान आनंद के निमंत्रण पर तो कल ही तो ॅ तुम शिकार की शौकीन आनंद से लिखा था पर यहाँ शिकार की रात है । फिर आजकल तो यहाँ जंगलों में एक बढ का बाग घूम रहा है जिस का दूसरा नाम है राइस । कई बार मुझ से करवा चुका है कि कप्तान साहब अभी लांडे हैं, भडका बाद जिस दिन सामने आएगा सिट्टी पिट्टी भूल जाएंगे तो माँ तो एक साथ बढ के बाग का शिकार खेलेंगे । लेकिन महेंद्र जब पहुंचे तो पाया आनंद । इस बीच एक छोटा बाघमार कर लौटी हुई जी तो पेड से टकराकर हाथ का फ्रैक्चर लिए बैठे । अगले दिन राघव सिंह पुलिस के हाथ पड के कई स्कीमों पर खूब सोच विचार करने के बाद आखिर यही तय हो महेंद्र नागर सिंह बनकर उसी की स्टेशन मैं नहीं मीडिया को साथ बैठाकर चलेगा । ढांसा नाले पर राय सिंह और उसके साथियों को मिलेगा आगे रावी और किशनगढ की सीमा के पास सडक के किनारे एक टूटी मंदिर तक पहुंचने पहुंचती दारी खराब है और उतनी पडेगी । मंदिर में किशनगढ से आई काफी पुलिस चुकी हूँ जिसका बंदोबस् आनंद करती हूँ । उसके बाद महेंद्र को राघव सिंह बने रहने की कोई जरूरत नहीं है । ये भी सुझाव दिया क्या बेटियाँ साथ मुझे और महेंद्र उसको न लाने का कोई अच्छा बहाना रायसिंह से बनाती लेकिन मुझे नहीं मांगी । उसका कहना था की वह साथ हुई तो रायसिंह को बुरा लगेगा । दशक मैं महेंद्र पर बिगडे का तरह तरह की सवाल करेगा । किस से हो सकता है महिंद्रा का राज खुल जाएंगे । ये भी बात थी कि राघव सिंह की जगह तो महेंद्र सिंह मिल गया था लेकिन मैं क्या की जगह किसी और का मिलना संभव है । बीस किलोमीटर और निकल के वहाँ से दस किलोमीटर की पत्थर के पास रायसिंह का पहला स्काउट मिलेगा । फिर दो किलोमीटर आगे जाकर दूसरा दोनों जगह महेंद्र को मोटर रोक नहीं होगी जिससे इत्मीनान किया जा सके की मोटर में पुलिस तो नहीं । जरा सा भी शक होने पर हायर कर के दल को सावधान कर दिया जाएगा । रावी से सैंतालीस किलोमीटर पर गाडी रोकनी से पहले महेंद्र ने मीडिया की तरफ देख मैं वैसे ही निश्चल सी बैठी थी गाडी की धीमा होती है जैसे धरती में से उनका एक लंबा छह पदन का जवान छाया सा आ गया था । देखेंगे टॉर्च की रोशनी ठंड भी मोटर के अंदर का कोना कोना झडते और उसी से आगे बढने का इशारा मिला । गाडी की रफ्तार पढाते हुए महेंद्र ने अब मुझे से सिगार का लम्बा कश्मीर उसने भारी बारी से अपनी ओवर कोट की चेत में पडे दोनों रिवाल्वर छू करती तीसरे किलोमीटर पर वहीं खजूर का फिर हुआ हुआ । इस पर गाडी बढाते हुए महेंद्र ने हाल किसी का सुनकर उसी तरह बैठे बैठे भी जाने का मेरी फॅमिली फिर छोडा तो हूँ । राघव सिंह को मेरे अलावा मेरे पिताजी का यहाँ पर भी मिला था तो उसे भी रागर सिंह ने अपनी बहन के पास छोडी हूँ कहकर उसने पिस्तौल अब कोर्ट की जेब से निकाल के । महिंद्रा ने ये पूछने की जरूरत नहीं समझी की चलाना भी जानती हूँ ना इसके लिए वक्त था हूँ । रावी से पचास किलोमीटर का पत्थर किया था ढांसा नाले की पुलिया एक मिनट तक कुछ नहीं हुआ । तेरह मिनट महेंद्र को बहुत लंबा लगा । जंगलों में साईं साईं बहती हवा के अलावा जीत नीचे ढांसा नाले के बहने की आवाज उसी और लम्बा बना रही थी । उसने कार्य की लाइट बुझा थी पर इंजन बन नहीं किया । राघव सिंह ने बताया था यही करता हूँ एक आई एक पर फेस टॉर्च की तेज रोशनी मोटर में घूम लूँ । फिर उसी रोशनी से सडक की बाई तरफ चलने वाले जंगल की ओर कुछ इशारा हो । फिर वहीं घुप ऍम रागर सिंह ने यह नहीं बताया था कि गाडी रोककर उसी वहाँ उतरना होगा या बैठे रहना । अपनी यात्रा से उस वक्त उतरना ही मुनासिब समझकर महेंद्र उतर के अगर महेंद्र गाडी से मैं होता ही नहीं । क्या होता है ये काम तो ठीक हो पर साथ ही एक बडी भारी गलती भी हो गई । महेंद्र दाहिने हाथ से कुंवर कोर्ट की जीत से भी बोला था और बाईस थोडा बाकी बचा सीधा ऍम सब कुछ करता था । मैं स्वीकृति उस ग्रुप अंधेरी रात में फिगार का जनता हुआ सिर्फ मैं ही काफी तक दिखाई पडता है और इस बढियां स्वीकार चिकन हमा पर समारोह का नहीं जारी कहाँ तक पहुंचती होगी? ये झूठी छोटी बाघों का शिकार नहीं नहीं हो सकता था । लेकिन यह तो बढ की बाग का शिखर सर्दी की मारे उसके अंग अंग करती जाती थी । रिवॉल्वर पर लिपटी उसकी उंगलियां जमीन ही जाती थी । सडक के किनारे एक बडा पीस था जो अंधेरे में ऐसा लगता था महेंद्र रियांग जरा देर बाहर के अंधेरी की अभ्यस्त सके । इसीलिए की बीवियां उसकी सीट पर खिडकी की पांच जाकर बैठ के उसी की होती थी । फिर उसी सडक की भाई ओर बनी चन्दन से निकलकर मोटर की सामने की पांच छह छाया हूँ आती थी हूँ एक छाया जरा की थी मोटर की तीन बार तलाशी हो चुकी थी अच्छाई आई निश्चिंतता से बढ रही थी क्योंकि छोरी बुलाया ना आगे वाली छाया नहीं आगे बढते हुए पूछा हूँ । महिंद्रा से उस छाया का फैसला उस वक्त हुई पंद्रह मीटर होगा इससे पहले की महेंद्र को जवाब था मैं छाया कुछ ठिठकी अरे ये क्या मामला है ये सारा जो रूट छाया की हाथ की टॉर्च ठीक तरह जल्दी नहीं पाई थी कि हवा और बहते पानी की धाराओं की आवाजों को भेजती भेडिया की पिस्तौल चलने क्या हमारे स्कूल थी आगे वाली पीठ पकडते हुई नहीं चाँद घर में महेंद्र पेल की ऊंट हुई हो लिया अब तक गरीबी महेंद्र की बात अच्छी कारी महेंद्र की बारी आई उसके पेड के पीछे पहुंचती पहुंचती यहाँ मैं पहले खडा था वहाँ से होकर कम से कम दो गोलियाँ निकल चुकी ट्राई सिंह और उसके साथियों का ध्यान महेंद्र की तरफ था । चाकू निश्चिंत तो थी पूरी चलाने के लिए तैयार ही नहीं फिर भी पालक मारती एक पिस्तौल और बंदूक फायर करती होंगी तेल कितनी पर तेल गोलियाँ पर चुकी अंधेरे में महेंद्र के चार फायर पे कहाँ जा चुकी थी एक का एक लगा जैसे घटाटोप अंधेरे को चीट कर सूरज निकल आया हूँ । वेज यानी मोटर की रोशनी चलाती साथी बिना निशाना लिए दरवाजे से हाथ निकालकर धराधर तीन खाये पौधे पडा पडता बात और सडक पर जगह जगह पोजीशन लिए दो तीन और डाकू आसमी चली जाती दिखाई थी । एक अपनी स्टेनगन पर मैगजीन लगाने की कोशिश कर रहा था । दूसरा मैग्जीन लगाकर गन को कंधे पर ले जा रहा हूँ । दो खाली हाथ वाले बाई तरफ के जंगल में घुसते दिखेंगे । महेंद्र की एक रिवॉल्वर में दो ही गोलियां बच्ची थी एक मशीनगन वाले की कनपट्टी पर और उसमें से संसदीय दूसरे की लगी दिल से करानी चाहिए रहती लेती है । नवंबर में इतना हुआ और फिर मोटर की रोशनी बंद हो गई । बंद होती रोशनी में बन्दूक की गोली से मोटर कि सामने वाले शीशे का चकनाचूर हो ना! और टुकडों का उठना तो महेंद्र नहीं देखता है । लेकिन आवाज से स्पष्ट था कि ये पहला वार मोटर पर किया गया था । फिर कुछ देर सन्नाटा रहा । आखिर महेंद्र ने कई बार ध्यान से चारों ओर देख कर और कान लगाकर आहट लेने के बाद मोटर पर वापस जाने का नहीं किया । शायद बेटियाँ को गोली लगी हूँ । धीरे ठीक तो मोटर की तरफ पर तब बढ के बाग नहीं । आखिरी बार की मीडिया की गोली उसके पेट में लगी थी पर वह हमारा नहीं था । उसकी पेट में गोली ने लगी होती तो उसका निशाना चूकता नहीं लेकिन मैं चूका भी तो इतना कि ज्यादातर छर्रे महेंद्र की दाहिनी जांघ पर पडेगी । आखिरी फायर दूसरी रिवॉल्वर नहीं । क्या राय सिंह के लिए यह काफी था । काफी देर तक पडी रहने की बात किसी तरह खेल सकते हुए है । मोटर तक पहुंचा । यह तो महेंद्र को ठीक से याद नहीं रहा हूँ । ये जरूर याद रहा की मोटर में घुसकर उसी विजिया को अर्धचेतन अवस्था में पाया । कांच के टुकडों के लगने से उसके सिर पर माथे से खून निकल रहा हूँ । महेंद्र कुछ देर तक उसके बालों के कांच के टुकडे निकालता रहा । एकाएक महेंद्र कोलाका की बेटियाँ पे हो जाती है । फॅमिली खोली उसकी तरफ देख रहे हैं कहीं दूर जंगल में गोलियां चलने की आवासीय कारतूसों की हल्की रोशनी दिखाई थी । अब छुट्टी कितनी आती है । नहीं उतरने धीरे से बीच यानी लेते थे । बिना कुछ बोले अपना कॅरिअर उठाए । उसका चैंबर खुला । उसमें से एक का दोस्त था जैसे प्रयास न घर के । उसे किसी खास मकसद के लिए बचा रखा हूँ । महेंद्र ने रिवाॅल्वर ले लिया आज का तो उस चेंबर से निकालकर खेती डालिए । बीजी यानी सेंसर करने से चौकानी

9. Janjiren Tod Do

अर्चना घर पहुंची तो दिल धरने को था आंगन में बेचे घाट पर मथुराप्रसाद से चुकाए बैठे दुनिया की उठाकर एक नजर अर्चना बता दिए फिर से चुका नहीं अर्चना का दिल धडका उसे तीन तीस कदमों से आंगन पार क्या आ गई फॅमिली सी कर्कशता आवास नहीं फुर्सत मिल गए आपको ऍन एसे एक दल के लिए उसके पहले ठीक है फिर बहती कमरे की ओर बढ के कपडे बदलती हुई इसकी सूचना ये तो रोज का तो नहीं है फिर भी उसका मन शोक से भरो था । उसकी कानूनी अब भी आंगन से आने वाली आॅफ काॅपर तुम्हारे कानों में जो नहीं नहीं थी तीन सी छोकरी है जिस तरह से लक्षण है एक लेना ये अपने साथ हमें भी डूब आएगी । कपडे बदलकर अर्चना चुपचाप रसोई घर में पहुंच गए और आता ही नहीं । तभी उसकी माँ ने तेजी से आकर पराठा सीखेंगे क्या और आनी जी फोर ही पर वो करना कसम कहेगा कहाँ की मोड गवार पल्ले पडी है हम अर्चना ऍम नाना यह तुम्हारा काम नहीं जाओ लिखो प्रेम के पत्ता अर्चना एक झटके के साथ हूॅं नहीं हूँ कि समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर उससे ऐसा क्या भारी अपराध हो गया । रोज कॉलेज से सीधी करती है । अगर आज देखा और रेल हूँ, मैटिनी शो के लिए जबरदस्ती नहीं करती तो क्या वो सिनेमा जाती? उनसे अधिक अच्छा करना भी तो ओछापन होता ना? कभी कभी आदमी को परिस्थिति क्या नुकसान काम करना पडता है तो मानना उसकी गलती हो तक ऐसी पार्टी माँ के लिए शोक नहीं थी । अगर एक दिन की बात होती तो भी ठीक रहता हूँ । फिर क्या आज की बात ही थी? नहीं इनका ना कश्यप का इतिहास उस घटना से शुरू होता है जो मामूली होते हुए भी अर्चना के जीवन को एक महत्वपूर्ण मूर्ति के उस दिन बैठक को भलीभांति सजाया गया था और अर्चना को भी मेहमानों के लिए चाहिए । ऍम वहां बैठी एक महिला ने उसे अपने सामने बिठा दिया । भर से फुलवानी और इंसानी की कोशिश करनी नहीं बार बार आदेश मिलती । आठ तो पूरी खोलो नहीं, पर उठाओ जोर से बोलो फिर इंटरव्यू शुरू हुआ गाना आता है अच्छी नहीं मैं तू ही नहीं मुझे नाचने गाने का शांति है तो क्या है? हाँ तुम्हारी हूँ जी पर नहीं कहा महिला निराशा से मुंबई का कर दूँ खाई बडा मर्दाना शौक है । पति के लिए पकाओ गी खिलाफ की क्या दफ्तर में नौकरी करोगी जी जरूरत पडने पर नौकरी भी कर सकती हूँ महिला एकदम हक्की बच्चे हो गए अपने पति से बोले सुनते हो जी नौकरी करने की बात इस सारी अग्नि परीक्षा के बीच अर्चना घरे के साथ बैठी रही उसका रूम रूम । इस बात के प्रति सचिव की कई जोडी आंखें उसकी हर चेष्टा को देखती हूँ । उसी लग रहा था जैसे उसके सारे शरीर पर कीडे रेंग रही । मैं अपनी माँ का संज्ञान करके उन्होंने कितनी ही प्रयास कर के उसे इस बात के लिए तैयार किया था । कितनी खुशामद की की कोई ऐसी वैसी बात करेंगे? पुलिस महीना क्या विशिष्टतम और अधिक सहना कर सकता हूँ । एक झटके के साथ खडी हो गई और फंसा इस्वर में बोली आप लोग इस तरह मेरा पापा नहीं कर सकते । ये सौदेबाजी बंद किसी और कृपा करके चलना चाहिए । मुझे शादी नहीं कर रहा हूँ उसे पता नहीं इसके बाद क्या हुआ? ऍम पिता के चेहरे पर एक चीज सी ई फॅमिली हुई थी । एक मध्य बल्कि घराने की लडकी का यह मेहमां मानव एक अनहोनी सारी मोहल्ले में आपकी तरह की खबर है । हर तरफ से छूट हूँ ठीक ठीक की आवाज आ नहीं रही एक सरोजनी मौसी थी जिन्होंने उससे सहानुभूति दिखाई हूँ । उसका पक्ष लिया और उसे अपनी बेटी की तरह समझाएँ । अब वही एक ऐसा घर जहां से शांति मिलती । नहीं तो हर जगह उपेक्षा और व्यंग्य बाणों से ही उसका सागत होता हूँ । लोग घोषणा करते इसकी आजादी जरूर खिलाई की है । लडकी मोहल्ले भर में ना कटाकर रहेगी हूँ अच्छा अपनी माँ बाप कतर समझती थी । उनकी अपनी मजबूरियां ऍन पर हूँ जो हमेशा बंधी बंधाई लीक पर आंखें मूंदकर चलती रहीं । रूढि क्रस्ट था । जिन्होंने समाज और लोकलाज को सादा पहले रखा । अपनी टिकट जीवन को पास हुई उनके लिए अर्चना का भी हमार अप्रत्याशित सहित फिर भी अपनी अकेली संतान से उन्हें ऍम उनके बाहरी रूखेपन के भीतर उसकी सुख और समृद्ध भविष्य की कामना छुपी हुई थी । लेकिन समाज कभी उनके सामने ही था । अर्चना भी क्या करे उसकी भीतर थी एक वन था । उसकी मानसिक शिक्षा, पारिवारिक संस्कारों और सामाजिक परंपराओं के साथ समझौता नहीं कर पाती हूँ । यही नहीं कि हर पुरानी चीज के प्रति उसके मन में अंदर विद्रोह हूँ बल्कि उसे हर बात को बुद्धि और तर्क की कसौटी पर तोड नहीं आदत सी पड गई थी । शुरू शुरू में छोटी छोटी बातों पर माँ बाद में मारपीट भी की । मैं अकेली घर के बाहर खतम नहीं हो । किसी लडकी से बात की नहीं की मांग की । फटकार पडेंगे जरा खुलकर हंसी की बाप का चलता हूँ । हैरान होकर सोचती हूँ कि गुडिया की फॅमिली गढाने से ही शक्ल टिकट चाहिए । फॅमिली छाप पडती थी कि वह इंसान नहीं किसी चिडिया, घर का कोई ऍम अपनी उसकी पढाई का विरोध किया तो ये समझ नहीं पाई की शिक्षा उसके लिए घातक सिद्ध हो सकती है । अगर प्रोफेसर मात्र का सहारा उसे नाॅन होती । माथुर साहब से उसके पिता का पश्चिम और वह हाई स्कूल में उनकी यहाँ पढ नहीं जाती थी । जब से गए कॉलेज पहुंची थी माथुर साहब के और भी निकट आने का अवसर मिला था । मैं उसी अंग्रेजी साहित्य पढाते थे हर पर वह अक्सर उनसे विचार विमर्श करते उनके सुलझे विचारों से बहुत प्रभावित हुई थी । मैं उसे अच्छी अच्छी पुस्तकें और पत्रिकाएं दी थी जिन्हें मैं घर लाकर पढा करती थी । उसके पिता को ऐसी पुस्तकों और पत्रिकाओं से खेलना थी । वह इन्हें चरित्र के लिए खानी भारत समझती थी । उन्होंने उसे टेंट डपट, पत्रिकाएं उठा उठा कर लेंगे पर अर्चना को यह विमान से भोजन शारीरिक भोजन से भी अधिक आवश्यक लगता है । उसकी मां उसे पुस्तकों में लीन देखकर कोसा करती, घर का चूल्हा संभालना ही उन का सबसे बडा आदर्श था । किस वातावरण के बीच अर्चना अपनी आपको अच्छा भी बनाती । मैं इन तत्वों से लाख सामांजस्य स्थापित करने की कोशिश करनी है । पर हर कोशिश उसे और भी व्यवस्थित करती थी । तभी उसे लगता है गलत पथ पर जा रही है, जहाँ मैं निपट अकेली है । दूसरे दिन पे प्रोफेसर मात्र की हाँ मेहमान स्टडी रूम में बैठे हैं । कुछ देख रही थी उसे देखते ही बोली ऍम मैं सोच रहा था कि तुम कई दिनों से क्यों नहीं आई भर में भी चाचा जी आपको आज जीभरकर तन करने आई हूँ । अर्चना उन के सामने कुर्सी पर चाहेंगे । माथुर साहब हस करेंगे हूँ । मैं जानता हूँ तो मुझे कैसे तंग करो कि शायद आज पे स्त्री जाति पर कोई भारी आप बताई है । अर्चना की मुस्कुराती मुख पर अच्छा चल कोई नहीं । सच नहीं जाने आई हूँ कि समाज में नारी का क्या स्थान पर आपका काम हरीश तो नहीं होगा ना? खरी नहीं नहीं मैं तो साहब ने देखना बंद करते हुए तुम्हारी बातों से मुझे भी सोचने की प्रेरणा मिलती है । हाँ, तुम अपने प्रश्न को स्पष्ट कर मेरा मतलब ये हैं कि हमारे यहाँ लडकियों पर शुरू से ही असम के बंधन लगा दिए जाते हैं । उन्हें मानवीय अधिकारों से वंचित रखा जाता है । एक कठपुतली की भांति अपने माँ बाप के हाथों से किसी के मध्य बडती जाती है । आंख के दमन और ये सारी प्रतिबंध क्या न्यायसंगत ठीक है । मैं पूछता हूँ वे न्यायसंगत क्यों नहीं? हर चीज को उसके उचित संदर्भ में देखने की आदत डालूँ । हमारे समाज का जैसा ढांचा है जमाने का जैसा रुख हैं अस्तरी के जीवन की जैसी परंपराएँ हैं उनके मद्देनजर हो तो माँ बाप की व्यहवार को ना केवल ठीक हूँ क्या आवश्यक पीता हूँ कि यह बात तो किसी के गले नहीं उतरेगी । माँ बाप अपनी हालत की दुश्मन होते हैं पर भी करें क्या आज का योग यौन शोधार्थियों है? अखबार उठाकर देखो तो रोज एक से भी खबर पडने को मिलेगी । घर से बाहर हर तरफ छलकपट और धोखाधडी हो तो माँ बाप लडकियों को घर के अंदर कैद क्यों रखी? लडकों का चरित्र नाम की चीज ही ना हो तो उनसे क्यों न मिल नहीं थी । सीधी सी बात ये हैं कि इस विश्वास कि योग ने किसी किस्म का खतरा मोल नहीं लेना चाहते हैं । आपकी बात से क्या में ये निष्कर्ष निकाल हूँ कि आप इन प्रगति विरोधी तत्वों के पक्ष में क्या लडकी के लिए इस की सेवा कोई रास्ता ही नहीं की मेरी जिंदगी भर शारीरिक और मानसिक गुलामी करती रहे? जहाँ तक निष्कर्ष की बात है तो निष्कर्ष इतनी जल्दी नहीं निकली जाते हैं तो उन्हें अगर लडकियों के लिए कोई आदर्श रस्ता सुझाव सकती हूँ तो कहूँ चुना कुछ देर सोचती नहीं पूरी क्यूँ क्या ये संभव नहीं कि वे भी लडकों की तरह उच्च शिक्षा प्राप्त करें । फिर नौकरी क्या स्वतंत्र व्यवसायी द्वारा आत्मनिर्भर बनी और आपने छह से रुचि के अनुकूल शादी करेंगे? माथुर साहब ऍम मुस्कुराती खाफी रोमेंटिक कल्पना है । तरस देते हैं कि देश, काल और वर्ग विशेष के अनुसार ही हम कोई ऐसा जीवन क्रम निश्चित कर सकती है । दूसरी परिस्थितियों में दूसरे समाज में ऐसा हो सकता है होता ही है तुम्हारी सोचने में गलती तो भूल जाती हूँ की परंपराएं पहले से ही विद्यमान है । उनकी जडें पहले से ही जब हुई है और हर लडकी उन्हीं परंपराओं के ऊपर होती है । इस घनी अपनी कल्पना के बीच होगी तो फसल तैयार नहीं होगी और अगर इस भूमि को ही खोल दिया जाए तो हम तो ऐसे कह रही हूँ कि अभी फावडा और कुदाल लेकर चलते होगी । मास्टर साहब के कह रहे में अर्चना ने भी योगदान दिया । फिर पुरे दरअसर स्त्री के कुछ प्रवृतियां दुर्बलताएं असीम आईं जिन्हें स्वीकार करना ही होगा । आर्थिक पराधीनता बेशक एक बडी हद तक उसकी पिछडेपन के लिए उत्तरदाई । फिर उसके बारे में उसी तरह से नहीं सोचा जा सकता है कि जिस तरह से हम पुरुषों के बारे में सोचते हैं, मनोवैज्ञानिक रूप से भी स्त्री पुरुष का सहारा चाहती हैं, उचित नियंत्रन के आभाव में उसका जीवन कुछ अंकल हो उठेगा, भटक जाएगी । मर्यादित रहना उसकी सहज आवश्यकता है । फिर तो बात नहीं की नहीं रही । अर्चना की चेहरे पर असंतोष की चिंता स्पष्ट होते । हम गलत समझ ही नहीं आता । कोई बुरी चीज नहीं । पुरुष के लिए भी मर्यादा का पालन वांछनीय प्रश्न है उस मर्यादा को हासिल करने के साधनों का और यही मैं हर प्रकार के दमन और बाधाओं का विरोधी हूँ । आपने भी चाचा जी काफी गोलमाल कर रहा हूँ । नहीं समस्या भी तो काम नाजुक नहीं । मैं तो केवल अपने विचार सामने रख सकता हूँ । मेरी राय में बाहरी थोपा । थापी से सेवा नुकसान की कुछ नहीं हो सकता लडकियाँ अपने चरित्र की सुरक्षा अथवा सामाजिक बुराइयों का मुकाबला किसी बाहरी हथियार से नहीं अपनी चारित्रिक बल से ही कर सकती है । माँ बाप को चाहिए कि उनके व्यक्तित्व के स्वतंत्र और स्वस्थ विकास की ओर योगदान भी ताकि वे आत्मविश्वास और साहस के साथ हर परिस्थिति का सामना कर सकें । उनके व्यक्तित्व को लेकर जमीन पर सीधी खडी नहीं हो सकेंगे । ऐसी स्थिति में खुद लडकियों का क्या कर्तव्य है? उनका कर्तव्य है व्यक्तिक स्वतंत्रता का सदुपयोग करना, माँ बाप को नई दिशा की ओर प्रेरित करना और स्वस्थ परंपराओं को एक नई भूमि तैयार करने में अपना योगदान देना । जब तक सेक्स चरित्र संबंधी मान्यताएं नहीं बदलेंगी, थ्री की दशा नहीं सुधरेंगे । पर ये मान्यताएं जरूर थी क्योंकि जमाना तेजी से बदल रहा है । आॅल हूँ अर्चना ताली बजाकर ऍम फिर आप मेरी बात पर ही आ गए । पर अब आप दोनों खाने की मेज पर आ जाइए । मिसेस माथुर नहीं अंदर आते हुए कहा दो चार चीजें ऍम चाचा जी ना दो रोटियां ज्यादा खाएंगे, काफी धक्का दिया है । नहीं नहीं इसकी कुछ हीरोज पान एक तब की ये घटना घटी हूँ जिसने अर्चना को माथुर साहब की बातों पर फिर से गौर करने को मजबूर कर दिया । पहले साइकिल पर कॉलेज जाए करती थी । नाट्य समय बजरिया के चौराहे तक एक दो लडकियों का साथ हैं पर आगे से वो अकेली पड जाती है । काफी ऐसे से वो नोट कर रही थी कि कॉलेज का एक आवारा लडका किशोर अक्सर उसके आगे पीछे नजर आता है । कभी कभी वो पान की दुकान पर बैठा बैठा तरह तरह की आवाजें ऐसा करता हूँ । कभी सामने पड जाने पर उसी सलाम था हूँ । अर्चना नहीं भी कबीन हरकतों पर विशेष ध्यान नहीं दिया । मुस्कुराकर की बस जाती व्यर्थ की चकचक क्या जोति पंजायत करना उसे ओछापन हूँ । आज सुबह चौराहा पार करके गली के पहले मोर से गुजर रहे हैं । पीछे से एक साइकिल टीजीसी आई और उसके आगे गाडी खडी हो गई । अगर अर्चना फौरन उतरना पडती तो टक्कर ऍम देखा । सामने किशोर बस हवा सा खाना है, ये क्या करेगा है? सिंह गुस्से से पूछा पहले तो किशोर कुछ बोल नहीं पाएगा फिर हफ्ते हुए कहूँ सुनी मैं आपसे कुछ कहना चाहता था तो अर्चना की हंसी छूट को हुई क्योंकि किशोर बुरी तरह से कम कॅर चाहिए । मगर जरा जल्दी मैं मैं किशोर पतला नहीं लगा फिर उसने अर्चना की । मुस्कुराते हुए चेहरे का जानी के आठ नगर की आगे बढकर उसकी कलाई पकडने खर्चना करना अगर उसने किसी तीस बुखार वाले व्यक्ति को छू लिया है उसकी आंख में रोष बनाएं और दूसरे हाथ से एक भरपूर तमाचा उसने किशोर की दुकान पर चलती है । समाचार खाकर जैसी किशोर का आत्मविश्वास लौट आए और उसकी पशु प्रवृत्ति जहाँ तुम शायद मुझे अच्छी तरह नहीं जानती हूँ । इस बार उसने अर्चना के दोनों भारत अपनी पंजी की दृढ पकड मेरे और अश्लील चेस ट्राई करते हैं । अर्चना की सारी शरीर में जैसे किसी ने अंगारी भर्ती ही नीची चुकी और पूरी ताकत से झटका लगा कर उसने अपने हाथ को छोडा दिया । फिर झटपट पैसे चप्पल निकली और अंधाधुंध किशोर पर पैसा नहीं किशोर हत्प्रभ हो गया क्योंकि कई जोडी हाथ उस पर पडने लगी । शोर सुनकर आदमियों की भीड इकट्ठी हो गई थी । न बच्चा और नानी के भाव से घर कर असनानी साइकिल उठाओ और आगे बढ गए जाती जाती उसकी कानूनी की शोर की भाॅति यहाँ बतलाना लिया तो मेरा नाम भी किशोर नहीं जब करता हूँ तो मैं बहुत दुखी मात्र साहब ने कहा था आज कहीं यौन सुधार पे सडक चलती हुई नवयुवकों और वयस्कों की भूखी नजर अपनी शरीर पर करती हुई महसूस कर क्या सच कुछ स्थिति इतनी ही सोच नहीं रहे तो इसे सहज मानवीय प्रवृति समझकर अब तक नजर अंदाज की हुई थी । नहीं हैं आज की घटना उसे अपने गले में कुछ अटका हुआ मैं सोच रहा था जिसे वह नहीं करना चाहती थी । मानसिक बातचीत करने का मन नहीं था । इसलिए उठकर सरोजनी मौसी की चलती है । फॅमिली बस उनका एक लडका था होने के पहले था क्योंकि पति जो कुछ जमा थमा छोडकर उसे पर बात करने में कोई कसर नहीं छोडी थी तो गुजर बसर मकानों की किराये आदि से होती थी । इसलिए उन्होंने यह पुराना मकान रख छोडा था जो दूसरे मकानों के बीच ऐसा लगता था जैसे युवकों के बीच कोई धकियाने । उसी पूरा ऊंची सीढियों को पार करने के बाद एक बडी डेढ ही पट्टी और वहाँ से आंगन तक पहुंचने के लिए एक लंबी कैलेरी से कुछ करना था । नीचे दो कमरे थे जिनकी आगे बनानी थी । शेष कोठरियों में ट्रंप ट्रम सामान भरा पडा रहता है । जमीन के नीचे तहखाना था, ऊपरी मंजिल लगभग हो चुकी थी । इस समय सरोजनी देवी आराम कर रही । अर्चना जब पहुंची तो हफ्ते लगी थी ये बोली मौसी तुम्हारा मकान भी अच्छा कैसा खेला है इस कैदखाने में दुनिया के लिए डर नहीं लगता हूँ । अब सारी जिंदगी डर नहीं लगा तो क्या लगेगा? बेटी एक कमरे में कोई किराये का क्यों नहीं रहती थी तो तुम्हारा मन भी लगा रहेगा । यहाँ जगह कहाँ है? फिर हमारे सपूत किसीको ठीक नहीं । नहीं नहीं अच्छा अच्छा तो क्या पिछला लेकर बैठे हार पता तो कैसी है तो मासी तुम्हारा हाल जानने आई हरी मेरा हाल क्या होगा? मेरे तो ये संन्यास लेने के दिन है । अच्छा कहाँ जा कर लोगी? संध्या ऍम ऍम वहाँ तो शायद हमारा माइका ही हाँ सोचती । कुछ दिन अपने भाई के यहाँ आ रहा हूँ तो क्या सच में जा रही हूँ मैंने अभी कुछ ठीक नहीं है । कभी कभी यहाँ से जाने की तबीयत होती है । चंद्र भाई साहब को अकेले छोडकर चाहूँ खरीद जैसा मेरे यहाँ रहने से उसको परवाह । मैंने खट्टे तो चाहता यही है कि मैं कल कीमत थी आज मर जाओ फांसी बुरा ना मानो तो एक बात कहूं पीटने का मन तो नहीं न तेरा तेरे किसी भी बात का बुरा माना है मैंने तो चंद्र भाई साहब को ठहरे पर क्यों नहीं डालती पडी नहीं तो कुछ कम ही करे । हाँ, जब तक उसके जो ए शराब के लिए घर में बच्चा कुछ देवर है ना उसे काम करने की क्या जरूरत है? सरोजनी देवी का स्वस्थ करवा हूँ तो क्या तेरे जीवन पर भी हाँ डालते हैं । तुम रोकती क्यों नहीं उससे कौन रोकेगा? बेटी हैं जेवर पर ही नहीं मुझ पर भी हाँ छोडने लगा । सरोजनी देवी थोडा रुककर तो फिर एक ठंडी सांस छोडकर पूरी एक ही साथ ही की इस घर में कोई चांस सी बहु आती तो मैं सुख चैन से मर सकती थी । कॅश नहीं किया कि वातावरण में एक तनाव पैदा हो गया । मैं सोच ही नहीं चाहिए । वॅाच छेड विषय बदलने के लिए बोली मानसी जिस बात के बारे में मैं तुम से सलाह लेने आई थी मैं तो रहेगी ऍफ सरोजनी देवी नहीं आंकी पहुंचती हुई हूँ हैं । आज जब मैं कॉलेज से लौट रही थी एक लडकी नहीं मेरी साइकिल से साइकिल लगती । अच्छा हूँ उत्सुक्ता सरोजनी देवी के चेहरे पर छत हो अर्चना सारा के साथ आदि से अंत तक समझती सरोजनी देवी पूरी तूने उसकी खूब मरम्मत कर दी ना । हाँ सी मरम्मत तो उसकी कुछ ज्यादा ही हो गई । नहीं भी समझ ही नहीं आता कि इस समस्या का यही हाल मुझे तो उस पर अभी भी तरह सारा है । बहुत थी तुम जैसी तरफ खाने वाली दो चार हो जाए ना तो उद्धार हो जाएगा और खरीद पतली । ऐसे मरदूद ओं का यही इलाज है ने बहुत ही क्या, अब अगर कोई मौका पडे ना तो चार जूते और चखाना आज की घटना सुनाकर अर्चना का कि हल्का हो गया । फिर भी एक संतोष उसके दिमाग था । सरोजनी देवी खाना बनाने की तैयारी में रखते नहीं । व्यस्त देखकर अर्चना बोला अच्छा मौसी मैं चलती हूँ । अरे बैंक भी चर्चे खाना बनाया जाता है, खासकर जाना । तब तक तो एक दाऊजी बुरा कर दी । मैं भी क्यों तुम्हारा ऍम नहीं कम ही कितना है । अर्चना मशीन लेकर पहुंच की सुई के धागे के साथ साथ उसके मस्तिष्क भी तानेबाने पूछते थे । अचानक आहट पाकर उसी से रूट हैं । चंदन कठोर दृष्टि से उसे देखा । अर्चना से नजर मिलते ही मैं वहाँ से हट गए । अच्छा थोडी ही देर बाद सरोजनी देवी उन्होंने अर्चना का हाथ पकडते हुए कहा अच्छा बेटी तो चाहिए खाना घर पर ही हूँ । कुछ नहीं समझकर अर्चना नहीं उनकी ठीक जाना । वे उसे लगभग खींचकर धकेलती हुई तरफ से हैं । लहसुन तेला को बेला, इधर आया कर्ज उन्होंने दरवाजा तेजी से बंद कर के रास्ते भर अर्चना सोचती रही कि चंद्र के सामने सरोजनी मौसी उसे हमेशा उठाने की कोशिश क्योंकि अर्चना उस घटना को भूली की जितनी ही कोशिश करती उतनी ही रहे उसके मन की पत्ते पर उधर उधर एक भारी असंतोष उसके भीतर बैठ गया था । जैसे कोई व्यक्ति नीट का प्रश्न बाद पार्ट निकलता है और अंत में दिए हुए उत्तर सीनियर मिलने पर झनझना उठता है । उसी तरह वो भी इन सारी बातों पर हर पहलू से गौर करते । कोई संतोषजनक परिणाम पाकर बीच हूँ । मैं एक सहज स्वस्थ जीवन बिताना चाहती थी । थी समाज भी किशोर जैसे तत्व जिनका सामना बर्बरता से ही किया जा सकता है । इसलिए उसका सरोजनी मौसी का भी हमार की उसी यह सोचने पर मजबूर था की इतनी संदेह हम लोगों की भी सहित चीन कितना इन बातों से वो परेशान नहीं अक्सर नहीं महसूस करती है कि उसकी माँ की मॉन्टेसरी उसकी चेहरी कुछ ठीक ही है । मथुरा प्रसाद के मुख पर वही कठोर हूँ । किसी की उपेक्षा सच है । ये दस तरह से शाम ठंडी आती खाना खाकर फिर बाहर निकल चाहते हैं उस रोज कितनी तीन काफी चढाया था पहुँचना कमरे में अल ऍम हाँ दो चार चक्कर लगा कर के फिर भी नहीं नहीं थी कमरे की छत पर एक टेस्ट नजर कर भी कुछ सोच रही हूँ । थोडी देर बाद माफ फिर अंदर रहे और क्या होना इस तरह क्यों पडी हूँ अर्चना को उनका स्वर्ण अप्रत्याशित रूप से नहीं था । उसने कहा होगी ऍम ठीक कैसे हूँ शरीर को इस तरह बुलाओ की तो कब तक चलेगा देती ऐसे रखनी बैठकर उसके बालों पर हूँ । कुछ ऐसी थी ऍम उससे अधिक आनाकानी नहीं माने बडी फॅमिली उसके शरीर पर टर्मिनल करो से नहीं लाई थी कंचन जैसी काया की क्या हालत कर ली है तो बाल सूट जाने पर में है उसकी छोटी करनी बैठे ऍम अल ऍम अर्चना को बडा हल्का हल्का सा लग रहा था हमारी ॅ करने का क्यों इतना बुरा मानती तो बहुत होली भी थी । हम लोगों की उमर गुजर के दुनिया के रंग ढंग देखती देखती । इसीलिए तो कहते हैं कि यहाँ बहुत संभलकर रहना चाहिए और मैं कुछ का कुछ हो जाता है जैसे हमारा कौन है तेरे तेरे खाने पहनने के, हर शाम पूरी करती तेरी सारे चांस, चोट को पचास करने के लिए तैयार रहते हैं । फिर तो हमें दुश्मन समझती इतने दिनों बाद साहनुभूति की तो बोल सुनकर फॅमिली नहीं दुश्मन तो तुम और बाबू समझती हूँ । ऐसे ही मेरी लाटो माने । उसे सीने से खींचती तो इस तरह अपना जीना दुखाया । अर्चना को लगा कि रेगिस्तान में दौडते हुए उसके मन की मुसाफिर को शीतल जल की किसी हरामी है । वह फूट फूटकर हो । नहीं नहीं ऍम गर्मी भी काफी पड गई ऍम ढाई बजे अर्चना कॉलेज से लौटी । कुछ अधिक थकी हुई थी और आराम करना चाहते हैं तो अभी घर के अंदर खुसी भी नहीं थी कि एक छोटा सा लडका हफ्ता हुआ है और घबराए स्वर में बोला अर्चना दीदी, अर्चना दीदी सरोजनी मौसी की हालत बहुत खराब है । एक बार आप को देखना चाहती है और मैं किस तरह है । उसी तरह वापस अर्चना समय रहते । सरोजनी देरी का घर में दो फिर नाम से ज्यादा दूर नहीं था थी । साइकिल पर ही मुझे मन ही मन है । सोच सोच करनजीत हो रही है कि एक ऐसी उसने उनकी खबर नहीं । वैसे तो उनका बुढापा था, पर ये उसके खयालात में भी नहीं था कि उनकी हालत इतनी खराब हो सकती है सरोजनी देवी के घर का करवा सकते हो ना उॅगली पांच करके आंगन में जाता हूँ मौसी मौसी उसने दो बार पुराना फिर उनकी कमरे की तरफ पर जहाँ ऍम पर सरोजनी देवी नहीं उसने आंगन में खडे होकर आवाजे लगाए पर कोई जवाब नहीं आए रसोई घर की खाने फॅमिली की तरफ वापस लाॅरी का ठिकाना नहीं उसने मेरी के दरवाजे में ताला पडा हुआ पाया । किसी भी आशंका से सेहत का उसी जीने का रुख रहती हूँ हूँ कहाँ फंस की उसके दिमाग की धुरी पर विचारों का पाँच तेजी से नहीं रखा की तरह फॅमिली पर पछता रही थी । दूसरी तरफ इस थाएं भाई करते घर के बाहर निकलने का उपाय सोच रहे हैं ये कहाँ चाहिए किसी पुकारी इस जहाँ तिवारी के बाहर तो उसकी आवाज भी नहीं पहुंच सकती । क्या अपनी बना इस समय? तेईस कहाँ किसकी मंदिर किस तरह आत्मरक्षा हूँ? पीपीएसी के आनंद में अचानक ऍम फीस सरोजनी देवी की कमरे में पहुंची और उसने दरवाजे को अंदर से बंद कर लिया । उसी मालूम था कि इस कमरे की पिछली दीवार में एक खिडकी थी और पहली तरफ करेंगे । यहाँ से वह गली में गुजरनेवाले किसी व्यक्ति, कुछ आपका सकती, एक विचित्र आत्मसंतोष की भावना है । उसी जल्बाजी सेटिंग कर अपनी आँखे बंद हूॅं । खुश तो ही ये किशोर जिसके होठों पर एक कुटिल मुस्कान छाई हुई थी । दोनों ने आगे बढकर उसे दोनों तरफ से पका दिया । किशोर ने व्यंग्यात्मक स्वर्णी का घबराइए नहीं, हम आपको ज्यादा देने ही रोकेंगे । आपकी बदनामी का भी हमें खयाल है । किसी को इस बात की हवा भी नहीं लगी । मैं विश्वास है कि आप भी खामोश रहना पसंद करेंगे । जैसे के हर शरीफ और समझदार लडकी करती है । उस क्षण अर्चना को लगा कि वह एक विशाल और भयानक समुद्र के किनारे तीन घर की था और उस निराशा से आप था उसके शरीर को जैसे लकवा मार किया । उसने गला फाड फाडकर चिल्लाना चाहा पर इसकी कलॅर, उसके प्राण जैसे उसकी आंखों में सेना चाहिए, जो एक तक कमरे की पंद्रह खिडकी को देख रहे हैं । पश्चिम को पता नहीं किस तरह घटता चाहिए, इसीलिए का कि वह किसी गहरी दम कोर्ट आॅफ हो । कभी रहे हैं अपने को खोलते हुए दलदल में गठन तक कैसी थी और बाहर निकल पाने की पेप्सी ऍम । मैं अपनी समस्त शक्ति और आक्रोश के साथ मजबूरियों के इस विशाल मलबे को हटाने की कोशिश करते पर उसी मालूम होता की इस कोशिश में उसका सहारा शरीर छिल किया और वह गरम गरम महू में काली तक डूब रही इस तरह में अपनी हथियों पर बैठी हुई महसूस करते हैं तो सीधा उसे अपना मांस अंगारों पर घूमता हुआ प्रति उसकी आवास था । उस व्यक्ति की तरह थी तुम्हारी छोटी से किसी ऍम चीन कमी इस आत्मग्लानि को कहाँ चिताएं आज इसे भरे बाजार में निर्वस्त्र कर दिया क्या हूँ आज ऐसी गंदगी की धोरे पर ऍम गिरा दिया गया था और उप कराइयों से उसकी सांस्कृति जा रही महान एसी देखते ही पीछे इतनी देर कहाँ लगा दिया हूँ? बापू जी अभी नहीं आई जल्दी बुलवाती अर्चना ने उनकी बात न सुनकर का क्यों क्या बात है वही मैं कह रही हूँ, जल्दी से बुलवा तो नहीं खर्चना लगभग जी पडी थोडी देर में लौटकर उन्होंने फिर पूछ मानी उसकी चेहरे की रंगत देखी तो खतरा होती ही चुप चाप पडोस में चली गई । थोडी देर में लौटकर उन्होंने फिर पूछताछ शुरू करती हूँ । बेटी प्रदान आ क्या? बात ही मानसी नहीं कहेगी । अर्चना चुकी थी । कुछ हुआ है जिसके बारे में तुरंत कुछ किया जाना चाहिए । इस अनुभूति की किस्ती पर बैठे हुए उसे क्यों किनारा नजर है था अपनी मांगता है । जैसे ही मथुरा प्रसाद घर में कैसे अर्चना की माँ वो जाग्रता के साथ उठ खडी हुई तो देखो तो हमारी बेटी को क्या हुआ? घंटे भर से पूछ रही हूँ कुछ बोलती नहीं अर्चना ने अपनी बोझिल बल्कि उठाएं सामने खडे मथुराप्रसाद नीरज दृष्टि से उसे देख रही नहीं उसका काला भराया है बहुत बडी मुश्किल से उसके मुँह से निकला हूँ । कुछ कीजिए बाबू जी चंद्र और किशोर नहीं हाई हाई उस की बातचीत पर और एक वहशत के आनंद में उस पर भी तोड स्वस्थानी कुल अच्छी नहीं कल ही यहाँ आने से पहले किसी पोखर में क्यों ना दो मारी मैं तो जानती थी तो हमारा सत्यानाश करके छोडेगी इससे तो अच्छा था पैदा होते ही तेरह गला घोट देते मच्छर प्रसाद काॅटन विकृत ईंट क्या अपनी पत्नी की चीजें सुनकर नहीं जैसे सजग होते थे टांडेकर पूरे फॅमिली हो क्या सारी दुनिया को औलाद का करतब दिखाना है? अर्चना की माँ जमीन पश्चिम पेट के हाथ टाचारी की स्थिति में रोने लगी मथुराप्रसाद कुछ टीचर करके आगे बढ सके । उन्होंने एक घृणित दृष्टि ऍम पडी अर्चना बता फिर उसे कर देखते हुए उसकी कमरे तक लेके अंदर धकेलकर उन्होंने कमरे का दरवाजा बाहर से बंद करके । इसके बाद बहरहाल झाडकर अपनी पत्नी के पास आई पूरी खबरदार जो इस कम्बख्त नहीं घर से बाहर कदम निकालना । मुझे इसका कोई भरोसा नहीं जाने क्या कर बैठे और हमारी रही सही नाक भी जाती रहे । छिछालेदर होते देर नहीं लगती तो क्या करूँ कि करना क्या है? जल्दी से कहीं रिश्ता देखकर इस नानायक्करा किस्सा पाकर जाने पर इसका काम फिलहाल तो इस बात को फैसले से रोकना इस मामले में खामोशी के अलावा कोई चारा नहीं । अगले से भी इसकी भनक किसी और के कान में ना पडी देता हूँ और मथुरा प्रसाद तेजी से बात नहीं करते । धीरे धीरे रचना जमीन पर खडी हो ऐसी क्लोरोफॉर्म का असर खत्म होते ही क्योंकि की पीडा बढ जाती है । उसी तरह अर्चना की मानसिक चढता है । जो जो दूर होती गई उसकी चौधरी की पडती है । उसी का किसके दिमाग में अनगिनत छेद हो गई जिनसे विचारों की करमाकर धाराएं आ जा रही है । अभी भी दिन धरने में काफी देर थी । फिर भी अर्चना को महसूस हुआ कि कमरे में अंधकार छाया इस समय प्रकाश चाहती थी । उसने भात कर सकती चलाती हूँ । कमरे की दीवारों पर कई अस्पष्ट छायाएं सीटों थी तक नहीं देखती रही । उसे अपने विचारों के लिए किसी आधार की जरूरत है । इसी निश्चय में कई क्षण को सकते । अचानक ही देखा कि छाया ने हाड मांस का रूप धारण कर लिया और कह रही थी दो क्रिश्चिन सहन करती हूँ । नहीं मैं नहीं बनना चाहते हैं भी मरना होगा और भी स्पष्ट हूँ । इस कलंक को लिए हुए तुम्हारा जीना दूभर हो जाएगा हूँ । अपने आगे फैले हुए पहाड से भविष्य के बारे में सोचा है । चारों ओर से तुम पर झूठे होगी तो शहर से जमीन में नहीं कर जाओगी । इतनी बडी दुनिया में तुम अपने आप को अकेला महसूस नहीं होगी । हाँ, तुम से सहानुभूति दिखाएगा, वहाँ तुमसे शादी करेगा । मेरा अपराध क्या है? पतिता हूँ वापिस हो । तुम्हारा चरित्र भ्रष्ट हो चुका है हूँ । मैं भ्रष्ट हो चुकी में सारी दुनिया से एक सवाल करती हूँ । छत से ठोक कैसे? क्या उसी की अपनी गलती से हो? लडकी पर ऐसी स्थिति आ सकती है तो क्या हमें मैं स्त्री होने की खातिर मरना होगा? क्या इतनी आसानी से मेरे चरित्र का ही चाहिए । वर्षों से अर्जित व्यक्तित्व खंडित हो गया । मेरी शिक्षा मेरे विचार मेरे मानसिक संस्का साॅस सिक्स की कारण मैं पूछती हूँ, ऐसे ही चरित्र हैं तुम्हारे पूछने से क्या होगा? योग योग नहीं । नारी का जो धर्म रहा है तुम्हारे लिए भी वही होगा ऐसी परिस्थिति में जो और करती हैं भी । तुम भी करोगे तो मंगवा नहीं पडती । कितनी लडकियाँ रोज आत्महत्या करती हैं । वे भी तुम्हारी तरह सुशिक्षित होती हैं । ये भी अपने विचार होते हैं । फिर भी वो जिन्दा रहना पसंद नहीं करती क्योंकि उनका सामाजिक तो ही खत्म हो जाता है । उन्हें जिंदा रहने का साहस नहीं होता । मार कर एक सामाजिक अपराध करती हैं । पश्चिम को बढावा देती हूँ । जब तक मैं तरह निर्मलता दिखाती रहीं, पुरुष उनकी निर्बलता का ना जाए, फायदा उठाते रहेंगे । ऍन छोटी मान्यताओं से नहीं, अपनी ठूस व्यक्तित्व से संचालित करना होगा । उन्हें अपराधियों को समाज के सामने लाना होगा । ये बताना होगा कि वे अब भी उतनी ही पवित्र हैं । समाज उनकी बात मान लेगा, उन्हें खोली छूट दे देगा । इस तरह तो भ्रष्टाचार का एक सिलसिला ही शुरू हो जाएगा । क्यों सदाचार और भ्रष्टाचार थी वहाँ पे एक शिक्षा पर निर्भर फिर व्यक्तित्व की जडी खोखली हूँ तो तुम लाख पंद्रह लगाकर थी । भ्रष्टाचार को रोक नहीं हूँ । हो सकता था हमें अपने पैरों पर खडा होना हमारे दम से ही सिख संबंधी मान्यताएं बदलेंगी । दृष्टिकोण बदलेगा तब ही एक स्वाॅट जीवन संभव । तुम अपनी लिए सिद्धांतों का सहारा ले रही हूँ । ये किताबी बातें हमारी जीवन में काम नहीं आती । साफ क्यों नहीं करती कि तुम आत्महत्या ऐसी रहती हूँ । तुम्हें अपना घृणित जीवन ही आ रहा है । पूछा हूँ इस ग्रंथि को लेकर खामोश बैठे रहो । मामला रफा दफा हो जाएगी । मैं कहा नहीं, अगर हैं कलंक है तो मैं इस कलंक को छुपाना नहीं चाहती हूँ । मैं चीनी का जांच हक मानना चाहिए तो जाऊँ कदम हो । हम भी देखी क्या करती हूँ? अर्चना कुछ दिन तक अमित सिखाएंगे । छाया उठकर ऍम हूँ । उन से कुछ नहीं होगा तो कुछ नहीं कर सकती तो तुम्हारी एक ही गति है । हाँ, अच्छा नानी । क्रोधित होकर छाया, पर हाथ चना, उसका हाथ टेबल लैंप की डोरी पर पाँच जो एक ठन्डे के क्षेत्र में स्कूटी से जा रही थी, उसी सहन कर पीछे हटाने की कोशिश की । पर उसी समय छाया लोग हैं कि अनगनित सेम जीरो में तक होते हैं, जिन्होंने उसे चारों ओर से जगह लिया । उसने अपनी सिर पर लटकते हुए सिंधी को देखा ही नहीं थी । उसकी पडता है । दिन ढल चुका था । माथुर साहब कहना नहीं जा रहे थे । उनकी दरवाजे की घंटी से घर खराब थी । धोनी देर में उनके कमरे में अर्चना प्रवेश क्या उसका चेहरा पूछना था? परन्तु उस पर एक दृढ निश्चय के चिन्ह स्पष्ट उसी शांत स्वाॅट मेरे साथ चलेंगे । कहाँ जाना है? क्या है बेटी मास्टर साहब उसकी हालत देखकर कर रहा हूँ । आज आपकी बेटी पर टू गुंडों ने हमला किया । उन्हें इसका दंड मिलना चाहिए । मैं माँ बाप की कैट तोडकर आपके पास आई हूँ । मुझे पुलिस स्टेशन जाना है । हाँ हम भी तो है । मैं एक फॅमिली को देखते तेजी से चहलकदमी करती रही । आखिर पहले की फिफ्टी से अपना बीत उतारा । उनके मुंह पर एक काम ऍम था ऍम । उन्होंने अर्चना के कंधे थपथपाया । हाथ में स्वर्णी ऍम

10. Sarkas ki Kalabaji

हमारी नगर में सर कैसा है तो मैं भी देखती हूँ । जरीना का नाम सर्कस के इश्तेहारों मोटे मोटे अक्षरों में लिखा गया था जनीना का जब मैंने कई करता हूँ में भाग लेते देखा तो उस के विषय में अधिक जानकारी पाने के लिए कुछ सुकून सर्कस खत्म होने पर फाटक से सीधा ना निकल कर पीछे की ओर चला गया । इधर सब कलाकारों और जानवरों की तब थी । इससे पहले कि मैं किसी से पूछता हूँ कुछ दूरी पर एक काम तू के सामने ही जरीना का रंगीन पोस्टर चिपकाए । पोस्टर में से जरीना का रंगीन फोटो और उसका नाम काटकर तंबू की बाहर चपटा है । बहुत मैं उसी और बढे और बाहर से वाले से हम आ सकता हूँ । जरीना मैं कम है क्या? योग सामने से एक लंबे तगडे जवान को अपनी ओर आते थे तो उस की ओर मुड कर मैंने पूछा सरीना में हूँ, किसी भी रहती हैं बॅास नहीं । उस जवान ने पूछा क्या काम है? मैंने बताया ऍम इतने बढिया और इतने सारे करतब दिखाती है कि मैं उनके इंटरव्यू लेना चाहता हूँ और सवेरे आकर अपने कैमरे से उनकी एक तस्वीर ही लेना चाहता हूँ । ऍम हाँ हाँ क्यों नहीं हाॅल इसीलिए तो यहाँ हम हैं कि रोज तीन तीन बार हाथ को अपनी छाती पर लाते हैं । आज तक हमारी तस्वीर खींचने एक आदमी भी नहीं हूँ । जरीना की तस्वीरें लेने सब आ जाते हैं तो मैं भी सोच रहा था कि इस युवक की सच्ची बात पर शर्मा हूँ या नहीं कि तुम दोनों का एक बल्ला उठाकर ऍम इजाजत होंगे । तभी टाॅस में तो शम्भू में और सही ना । तीनों हंस पडी । आश्रम हूँ । आगे निकल गया । जरीना से दूसरे दिन सुबह दस बजे का समय लेकर । समय पर में कैमरा लेकर सर्कस के पीछे वाली तरफ से भीतर दरवाजे की बाहर की तरफ हाथ झूल रही थी । भीतर की तरफ अस्तबल था । हाँ, बारह चौदह बढियां थोडे ही ना रहे । इसके आगे कलाकारों की तंबू शुरू हो जाती थी । एक को शहरों के पिंजरे थी । सारी वातावरण में एक अजीत सिंह थे । सब जानवरों उनकी लिट्टी हूँ । इधर उधर दौड रहे बच्चों की बीच की रस्सियों पर लटके हुए ही लेकर आस पास चल रहे छोड दूँ और उन पर पत्र ही भिन्न । सरकार कुल मिला । ये साॅस अन्य गंध उनसे भिन्न थी । एक बार जो बनाकर सर्कस में घुस जाता है, उसी यही कंड ऐसी पहुंचाती इसके भी ना उसी संस्कृति का लगता है । अभी किसी कारण वर्ष उसी सर्कस का काम छोडना पडे हैं तो इसी गंदे का हूँ । उसे तेज जरीना इंटरनेट के लिए तैयार हूँ । उससे मुझे अपने तंबू में बुला लिया और सामने पडी कुर्सी पर पैकिंग का इशारा करते हुए पूछा तो सीधा बाहर लेंगे यहीं काम भूमि आपने पूरा तस्वीर तो यहाँ भी ले सकता हूँ । पहले मैं आप के बारे में कुछ जानना चाहता हूँ । जरीना ने मुस्कुराते हुए पूछता हूँ क्या करना चाहती हैं आपने सर्कस का जीवन आरंभ किया तब से जरीना गंभीर तो मेरी तस्वीर तो भारतीयों को नहीं पर मेरी कहानी किसी में नहीं पूछा । आज आपने पूछा ये है तो मैं अपनी जिंदगी की कहानी आपको उसमें हूँ जिससे आपको मेरा सारा हाल मालूम हो जाएगा हूँ । उसने बताया कि सबसे पहले जब तेरह चौदह पर उसकी रही होगी उसके भाई ने सर्कस में कम से कम घर पर माँ के पास रहती थी और ढाई पैसे भेज दिया । कर तक हाँ बीमार, कडी अच्छा हो तो अपने भाई के पास ही सर किसके साथ साथ ही नहीं । तब तक उसका भाई अब्दुल एक मशहूर काला पास बन चुका था और सर्कस की छत के साथ झूलों पर अपनी करते दिखाता था । धीरे धीरे साॅफ्ट छुटपुट काम करती शुरू करती है । साथ में अपने भाई के साथ उन्हें झूलों पर काम करती नहीं । पांच किसानों नहीं यह सर भारत श्रीलंका, मैं हाँ, बैंकॉक, सिंगापुर आदि का चक्कर लगा क्या एक नया कलॅर उसी समय सर्कस में भर्ती हुआ हूँ और काफी होशियार तीनों ने यानि तुम ऍम ना ने मिलकर कई नहीं खेल खोजती हूँ ये डंडों पर छोडने का खेल जिसने भी देख पहली निगाह में तो कलाबाजों का इधर से उधर जाना बिल्कुल साधारण खेल साॅस तरह सावधानी से देख ही तो पता लगेगा कि कलाबाज का हर पैंतरा एक एक क्षण हूँ । एक डंडे से पकडकर कलाबाजी खाकर दूसरे डंडे पर छूटते काला पास के खातों हमने में शांत इधर इधर उधर हो तो आने वाला कल आवास लडक तफान नीचे चला जाएगा । इन तीनों ने काफी मेहनत और दूसरी बार भारत से निकलने से पहले इनका की इतना ही है कि श्रीलंका पहुंच कर ये ऐलान कर दिया गया की डंडों पर झूलने का खेल नीचे बिना जान लगाएँ । इसका हूँ कि तीनों कलाकार हर कुछ चंद टीवी पर ले रही थी । मैंने आश्चर्य से पूछा ऍम दिया गया था रीना नहीं बताया बिलकुल ही समझ क्योंकि भैया अब्दुल मुझे बहुत रमेश नहीं बच्चे ही समझती है । उन्होंने एक ओर थोडा सजान रहने दिया था । सीखने वालों को उसकी असलियत मालूम नहीं हो सकती है । लेकिन मैं ऐसी जगह पर था जहां मेरी एक खतरनाक छलांग मुझे कभी भी नीचे की ओर ले जा सकती । मैंने हसते हुए का हाँ बडा भाई तो हमेशा बडा ही रहेगा ना हो इसके कई फायदे भी हुए हमारी सरकार की शोहरत करके जहाँ जाती हर्षो भीड इतनी रहती है कि तिल धरने लायक ऍम तीनों का नाम बडे बडे लक्ष्य में छापा अब फॅमिली ना थ्री डाॅॅ यानी तीन लीटर था हूँ । मालिकों ने खुश होकर हमें पैसे भी अच्छे देने शुरू करती है और दो तब भी बीच भी ना हो बीच में उन्हीं के तंबू रहती है । सर्कस के माने हुए खिलाडी हूँ पर खुदा को ये मंजूर हो नहीं हमारे से लौटते हुए अनवर ने मासी ने कहा करती हूँ उसके दिल में शायद यह बाद पहले भी रही हूँ । फिर मैं तो खेलती हूँ अपने भाई का साथ देने में इतनी मजबूत थी कि मुझे अंदर की तरह इस मतलब से देखती है या इस तरह की बात सोचने का मौका ही नहीं हूँ । मैंने उससे साफ की मेरे दिल में इसके लिए मोहब्बत नहीं हूँ कि तो कहता हूँ इससे अंदर को बुलाना ऍम अब तुम अपनी बहन के लिए सब कुछ करने का नहीं था हूँ अभी तक जरीना को बच्चे ही समझ कर ये है जान नहीं पाया था कि सरीना भी ने कहा कि योगी हो गई है । उसने जरीना से पूछा तो जरीना ने साफ कह दिया की उसकी मंशा कभी ने कहा कि नहीं । कलकत्ते से लौटते समय जहाँ पर अंमरीका पांच रीना को एकांत ही नहीं किया और उसकी मना करने पर कुछ छेडखानी जरीना ने अपने भाई को ये बात तथा भी अब्दुलाह आपको बोला हुआ तो जरिया नहीं कैसे समझाएं और कुछ करने से मना कर दिया । वहाँ से हम लोग सीधा दिल्ली गई । दिल्ली में ही पहला मौका था जब लोगों के सामने हमने अपनी कला पास इयान नीचे जान लगाए बगैर नहीं थोडा सा जान अवश्य इसे हटाने के लिए मैं हमेशा खेलती रहती थी पर अब तुम भी या नहीं । जरीना ने समझाते हुए बताया आपकी हिन्दू पर झूले का खेल देखा हूँ तो अब समझ जाएंगे हम पहले काफी देर तो इधर से उधर जो थी तो मैं बीच में रहते थे । अभी दोनों तो धीरे धीरे बैंड के संगीत की आवाज तेज हो जाती है और हमारी काॅल पूरी तेजी पर आकर बैंड रुक जाता है । उस पर पूरी सर्कस में सन्नाटा छा जाते सब की नजर इन पर उठ जाती । मीन्स ऊंचाई पर यही लगता है कि सब की सांसें रुकेंगे मिस्टर मैं खाली डंडा अपनी ओर से छूटते अब तू उधर से अंदर के हाथों पर छोडते थे । मुस्टंडे को पकडकर मेरी हो रहती हूँ । अनवरी छलांग लगाकर उनका हाथ पकडा था और उसी एक छलांग लगाकर मैं उस ऍम मेरी यह छलांग खतरनाक और इसी के लिए एक हो रहे जारी नहीं मैं कभी छुट्टी जाऊँ तो सीधी ऍम एनसी खानी ठंडी की ओर छलांग लगाने वाले मैं ही प्रथम महिला क्योंकि ऐसी छलांग दुनिया के किसी सर्कस में किसी कला पास नहीं लगाई ये मुझे मालूम नहीं है । मैं उस डंडी पर झूलती हुई लौंटी तो अनवर मेरे हाथ थामकर इस और लौटा था और फिर उसके हाथ के साथ अतुल भाई लगभग करछुल चाहती । इस खेल का ये है सबसे आखिरी पहले होता था । इसके बाद ताजियों वेज गाडियाँ थी कि हमारी दिल की धडकने की हमें सुनाई देनी बंद हो जाती । बाजू की आवाज शोर सुनाई नहीं देती । घर खेल पर खुशी के मारे मेरी आंखें भर रहती । जान नीचे फैला लिया जाता है और हम तीनों बारी बारी छलांग लगा कर नहीं किया जाती । नीचे आकर में बीच में रहते हैं तो दोनों मेरे दोनों और तालियाँ फिर सर किसने काम करने वाली ही इन तालियों की कीमत जानते हैं, जिनकी खाती पे हर बार अपनी जान पर खेल जाती हूँ । दिल्ली में भी सर किसकी ढांचे हर शो में भी रही नहीं था । अनवर एक रात भी कर्मी नमभूमि गुस्सा है । मैं जाकर इसी शंभू पहलवान को बुला । लाइक जो आपने आने आया था शंभू अनवर को उसकी तंबू में छोडा । शायद उसी ने अतुल को भी बता दिया । दूसरे दिन भी वैसी ही थी जहाँ भी जगह पच्चीस नहीं और कुर्सियां किराए पर मंगवाकर भारती गई । अन्य खेलों के बाद हमारे खेल का नंबर है । हम तीनों भी रस्सियों द्वारा चढकर ऊपर पहुंच गए और कलाबाजियां शुरू करते हैं । हम ऊपर कलाबाजियां करते रहे और नीचे जाली लगी रही है । कलाबाजियां करने वाले दस बारह आदमी और तीन धीरे धीरे करके एक एक अलाहाबाद छलांग लगाकर नीति जाली नहीं चाहता था, चला जाता हूँ । आखिर में हम तीनों ही रहेंगे । नीचे बैंड के साथ साथ जाली को हटाकर एक और कर दिया क्या हूँ? बस केवल और थोडी सी जारी रहे गई । वहाँ हमेशा रहती थी । जाली हटने तक हम तीनों खडे नहीं । खाली हटने पर लोगों ने तालियां थी । शुरू से ही मुझे अब्दुल भाई का चेहरा उस दिन अच्छा लग रहा था । उनकी मुस्कुराहट कायम थी । इतनी सालों में पहली बार मैं उन्हें यहाँ देख रही थी । फॅमिली रहते हैं । एक खतरनाक हादसे के इंतजार था हूँ । पांचे बंद हो गयी । सबकी सांसे और नजरी ऊपर ही रह गई । अब्दुल घाई के इशारे पर मैंने इधर से छोले काॅल छोडा हूँ और उधर से अंदर के हाथों छूटे हुए अब तो उठाएगी उस पर रात नहीं । जब मेरी ओर से वह अनवर की ओर लौटने लगे तो मैं उनके चेहरे कुछ कहीं नहीं । उसी वक्त मैंने महसूस कर लिया था कि वह इधर को अपना झूला रोज से कुछ ऊपर ले गई थी । किसका मतलब ऍफ का हार उनके हाथ तक नहीं पहुंची का उस वक्त भी नहीं क्या क्या सोच लिया और कैसे अपनी की रोपाई ही नहीं हूँ । तो मैंने देखा कि अनवर का हाथ अतुल के हाथ को नहीं पकडता है । नहीं के लोग ठीक ही होंगे और बेहोश नहीं । पर मुझे उस सब का कुछ खुश नहीं । मुझे तो इतना पता है कि एक सेकंड में मैंने कुछ सोचा हूँ हूँ । मेरे पास भी फुर्सत कहाँ थी कि मैं सोचती हूँ कि मैं कुछ भी करने जा रही है जैसे उसका कोई नतीजा निकलेगा भी क्या नहीं । मुझे कुछ करना था । इतना कहकर सरीना चुका था मैं उत्सुकता भरी नजरों से उसकी ओर देखता हूँ । सांस देकर वो बोली मैंने तीस तेजी से छलांग लगाई और अनवर की तेजी से नीचे जमीन की ओर लुढकते हुए बदन को साथ लेकर उसे एक तिहाई मेले की चांदी की ओर धकेला । हम दोनों की बदन टकराए अनवर तो जान के अंदर पहुंच गया मेरे हाथों में जांच का कि नहीं जान पीछे की ओर जाकर क्यूँ फिर झटके से बाहर को आया तो मेरे हाथ से छूट गया ऍम को खींचकर पांचवीं हमारी जगह पिछले क्या मैं सीढी पाउंड की ओर से यूज नहीं की गई मानो? परन्तु सिक्योरिटी सामने पडी लोगों की सीढियों के डंडों से टकराई और हो हम तो नहीं होती थी और ऐसा लग रहा था मानव सारा वातावरण ही इस घटना को सुनकर छुट हो गया नहीं नहीं कुछ हुआ की दोनों टांगे जरूरी नहीं है । अनवर तो बिल्कुल बच गया पर मेरी दोनों तंग उनका जो घटा बना तो दोनों ही खाती पडी । कुछ और छोटी भी आई पर भी मांगी थी और इसकी बात की कहानी थोडी ही है । सर किसकी मालिकों ने ही मेरी बीमारी का सारा खर्च किया । आपने धीरे धीरे दूसरे खेलों में हिस्सा नहीं नहीं नहीं कुछ खेल मेरे अपनी जिन्हें अपनी टांगों के बगैर कर ली थी । ऍम मैंने पूछा खरीद दोनों उसके बाद बहुत अच्छे दोस्त हो गए । उन्हीं का नाम तो बदलकर जोरों डाॅॅ कर दिया क्या जो इन इश्तेहारों पर सकता हूँ शायद वहीं दोनों आ रही । गिरते हुए सेरेना ने तमलू के द्वारा की ओर देगा बल्ला उठाकर और दो तंदरुस्त युवक हसते हुए थे । जरीना ने उनकी हंसी का स्वर शायद संज्ञा था । जरीना ने दोनों का परिचय करें और मैंने उन दोनों को करीना की पहली वाली कुर्सी के पीछे खाकर तस्वीरें कीजिए । जरीना नहीं उन्हें बताया । मैंने उन्हें अपनी सारी कहानी भी सुना है । फॅर तब बस कहानी का आखिरी हिस्सा भी फिल्मों की तरह क्यों नहीं बयान करती थी । इनसे कहता हूँ कि तुम मुझसे ने कहा कह रही हूँ । जरीना बोल अब तुम इसलिए का होगे ना कि मेरी दोनों टांगे हैं । नहीं तो दूसरी औरतों के पीछे भागने की पूरी आजादी रही । ये सुनकर तीनों ने ढाका लगाया । घर मैंने तस्वीर चीज कर उनसे बितानी रास्ते पर सोचता है किसी ऐसे व्यक्ति को जान बचाने के लिए जिससे मोहब्बत थी ना । अगर कोई अपने प्राणों की फांसी लगती तो उसी को तो साहस के लेकिन ये साहस के नाम का विचित्र जानता हूँ । इतना काम क्यों पाया जाता है? कब पर कहाँ पाया जाता है, इसका भी कोई ठिकाना में ही रहता हूँ । इस खोज करने के लिए कितना परेशान थे, कितनी मानवीय समेत नहीं चाहिए घर पहुंचने तक मैं जरीना को अपनी कल्पना की आंखों से मौत के खेल खेलते देखता रहा और मुझे लगता है कि सरीना अब फिर कोई साहसपूर्ण कदम उठाकर किसी मारते हुए को बचाने के लिए कुछ नहीं वाली है । दुनिया की सब किस में बैठे हुए लोगों की सांसी रुक गई हैं और और कैस्टर टूरिस् ओर से बचकर ईकाई क्या नहीं

11. Manhoos

उसका असली नाम दो चार बडे बूढों को छोडकर गांव में और किसी को मानना था सब उसी मनहूस के नाम से ही तो करती थी । उसके इस नाम की भी का हूँ । उसको इन संसार में आए चंद घंटे ही हुई थी कि उसकी माँ की मृत्यु हो गई कि मुझे पिता जी ही चल । वैसे लोगों ने का निर्गमन मुँह है माँ बाप को खा गया । मनहूस की विधवाओं हुआ उसी मनहूस के पालन पोषण का ध्यान रखती से मेरी है परमाणु हूँ । छह साल का भी नहीं हुआ ऍम तो सबको शक हो गया की लडकी में कोई ना कोई खराबी जरूर । अब तो कोई भी उसकी देख खान के लिए तैयार था । चाचा ऍम सभी ने उसे अपने घर में रखने से इंकार कर दिया । सभी के दिल में यह हो गया की चीज घर में मैंने दूसरे ही का उसका सत्यानाश, फिर मांॅग कुत्ते की तरह तर तर फटा हुआ कश्मीर कुछ पडा हुआ तो एक दिन अचानक होना चाहिए । कहाँ चला गया । फिर कई साल पॅाल तो वापस ॅ नहीं । उसके साथ बीस बाईस साल की एक भी हट काली और ग्रुप लडकी भी मैं हो उस की टीम अब सब्सिडी नहीं नहीं लेकिन सुख तो जैसे उसके भाग के भी लिखा ही नहीं था । गांव आने की कोई चार महीने तक उसकी पत्नी के प्रचार हुआ । अच्छा अच्छा बच्चा दोनों का ही एक साथ देहांत हो गया । अब तो उसकी मनोज होने में किसी को भी जरुरत शक नहीं रहेंगे । गांव कि पंडित फतवा कर दिया है लडके का बारह हमारा शनि है जो मित्र की ओर शत्रुभाव से देख रहा है । किसकी ओर ये प्यार से देखेगा उसे तो भी रहता भी नहीं बचा सकते । लोगों का उसकी छाया से भी बचती नहीं । उसके घर के पास के लोगों ने निकलना छोड दिया । जिधर से वह व्यवस्था उधर से भाई घृणा और क्रोध से भरी आंखि उसका पीछा करते हैं । कोई से ठीक से बात नहीं करता हूँ तो से आता देखकर सक्रिय बच्चों को घरों में छुपा देती । सारा दिन तो छुट्टी के बाहर तिवार से पीट लगाए । लम्बी लम्बी ही भरता । उसके लंबे लंबे रुक के बाद हवा में लहराते और उसके वाॅर दूर आकाश इतिहास ठीक है सूचना आत्महत्या कर ली ऍम नदी में बाढ मीलों तक पानी पानी फैल क्या कर रही हूँ, शोर मचाता हो ऍम पाएंगे । जो जीवन का आधार राज वही जीवन को समाप्त करने पर तुला चारों ओर कह रही जैसा था हजारों एकड पकी हुई खडी फसल तबाह हो गई जिंदगी से घूमते हुई सीख रुका हूँ चल मत हो गई सडकें नहीं बनी हुई रेलवे लाइनों का कहीं पता नहीं चल रहा था पिछली ऍम सब कुछ तहस नहस किया था सैंकडों आदमियों को जलसमाधि मिल चुकी सैंकडों को साथ ने काट खाया था । हजार होते घर हो गए थे । हजार हूँ वृक्षों, मकानों की छतों या दूसरे ऊंचे स्थानों पर शरण लिए हुए थे ऍम पर मुसीबत में कल सेकंड खोर वर्ष हो रही थी । चारों ओर से पानी से घिरे लोग प्यार से वर्ष में भेजते थे । मौत से लड रहे थे । कल शाम से राजापुर गांव के पूर्वी छोर पर बनी रामो नंबरदार के तब के मकान की छत तमाम आदमी फंसे बैठेंगे । मकान में सात फुट पानी भरा हुआ था । दूसरे मकान गिर चुकी थी । एक यही पक्का होने के कारण अब तक खडा था सात फुट गहरे पानी में डूबा ये हम आकार कल शाम से वर्ष और पानी की तेज लहरों का मुकाबला कर रहा था लेकिन अब है और अधिकतर तक खडा रहेगा इसकी कोई संभावना नहीं थी । शहरों की निरंतर टकराते रहने के कारण उसकी दीवारों में जगह जगह दरारें पडने लगी । उधर पानी लगातार चढता जा रहा था । अपना काम गिरकर इस आधा चलनी समाचार था । उस पर शरण लिए हुए तीस डॅाट मौत की गहरी बात ही नहीं हो जाएंगे । ये कोई नहीं कह सकता था । माँ ने अपना निर्मम शिकंजा उनतीस प्राणियों की गर्दनों पर कर दिया था । उनकी फॅमिली बोलना और उठकर खडे होना भी असंभव हो गया था । सफेद पत्थर के बहुत फनी भी खामोश बैठी थी । उनकी आंखें लगातार पानी में चारों और कुछ ढूंढ रही थी । शाहित कई नाम आ रही हूँ हूँ मैं निराश हो जाती है । कल से लगातार होती बारिश उनकी कष्टों और भी पढा रही थीं । हमारी चिंता ही किसी कोई करेगा भी क्या हूँ हो तो हमें भी थोडी सी और है । थोडी नंबरदार को मकान से कोई दो सौ दस दूर पानी नहीं डालियों से कुछ नीचे तक डूबे पेड के एक पेड की ओर एक तक देखते देखकर पांच बैठे अधेड ने कहा नहीं मैं नाओकी प्रतीक्षा कर रहा हूँ । मैं कुछ और सोच रहा हूँ । नंबर आने अधेड से पूछ लूँ हूँ हूँ इस पेड का तना कितना लम्बा होगा । भला हूँ मीटर से कुछ काम ही होगा सहायता ना तो पानी में नहीं तो वहीं नंबरदार खामोश गए थे । थोडी देर तक सोचते रहे । फिर बोली मुझे तक की सूची चाहे हम सभी बच्चे आएंगे, सब की नहीं । एक दम नंबर ऍम देखकर उन्होंने फिर कहना आरंभ किया सामने मुझे प्लीज का पेड है ना उसका तनम करीबी मीटर है । पानी में सारा इतना नहीं तो आज सवा हाथ । बाहर ही इसका मतलब यह हुआ कि पानी की गहराई वहाँ ढाई तीन हाथ हैं । बीस का ये पेड शामलाल वाली टिकरी पर उठा हुआ है । टीकरी यहाँ से सीईईडी रानीपुर की लंबी बढ तक चली गई । यहाँ से वहाँ तक जमीन की सतह लगभग एक जैसे इसलिए हमने की गहराई भी एक जैसी ही होगी । मैं कुछ लोग होते हैं यहाँ से लेकर बेच तक पानी बहुत गहरा है । अगर हमने से कोई बहादुर आदमी तैरकर उस पानी को पार कर ली तो फिर वह पानी में चलता हुआ आसानी से रानीपुर की लंबी बढ तक पहुंच सकता है । लम्बी बढ के साथ ही रानीपुर बनाना है । वहाँ का पानी चेहरा तो है । ये तीसरी बहुत होगा, इसे भी तैयार कर ही पार करना होगा । बनाने के पांच जमीन धीरे धीरे सूची होती चली गई । नाला पार करके बिल्कुल बढ की सीट नहीं चलती जाना । पानी अधिक से अधिक घंटों के मंदिर तक पहुंचा होगा । महान नामों का भी कुछ ना कुछ इंतजाम जरूर होगा । कहते है बूढी नंबरदार चुप हो गई । छत पर सन्नाटा छा गया । नहीं पहने की घरघराहट और बारिश के आवाज के अलावा कोई आवाज सुनाई नहीं हूँ । सबके चेहरों की ओर बारी बारी देखते हुए नंबरदार ने काम बोलते हैं किसी में हिम्मत किसी भी जवाब नहीं अभी देता भी क्या, समुद्र की तरह पहले था आपा पानी को पार करना ऍम नहीं तो साथ साथ में तीसरी टक्कर लेना था । मैं तो बचने की कुछ आशा भी थी । हो सकता है मकान लगी है और पानी उतरना शुरू हो जाता हूँ तो मौत निश्चित ही थी । हमारे में जा फंसे क्या टाॅल टूट गए । सांप ने काट खाया और मर गए । ध्यान बूझकर मौत की भूमि कौन पढना चाहता हूँ । सब खामोश बैठे रहे । ऍम इस तरह मना किसी ने उनकी ऍम सबको खामोश देखकर नंबर दान नहीं जानता हूँ किसी भी हिम्मत नहीं तो फिर मारो सब यहाँ मुझे भी अब दम नहीं, नहीं तो मैं जाता हूँ हूँ । बहुत पूछे लूट किसी की दृष्टि ऊपर नहीं उठे । सांस की भी रुक रुक कर ले रहे हैं । मानव डर रहे हैं की कहीं दूसरा नहीं सुनते । एक तीसरी सीएनएनसी मिलने में उन्हें अच्छा अनुभव हो रही है । कोई पांच बजे टोटल । इसी तरह का दम घोटने वाला वातावरण ऍम फिर अचानक एक हरियावां सूची मैं जाता हूँ । सबकी नजरें ई काम पर नहीं बोलने वाले के चेहरे पर जाती है, हूँ नहीं । जिसके बीच में उनकी धारणा थी कि जिस घर में रह रहेगा, उसी का सत्यानाश हो जाएगा । इसके लिए गांव के पंडित रामजीदास में फतवा दिया था कि जिसकी ओर वो प्यार से देखेगा उसे भी धाता भी नहीं बचा सकती । इस फॅमिली समय भी जिसे उन्होंने अलग बैठा रखा था, उसी मन्नू, उसके चेहरे की ओर सबकी आंखें एक थी । लेकिन आज उन आंखों में नहीं था, क्रोध नहीं । रीना नहीं थी तो केवल तीस था । प्रशंसा की कुमार था । मनहूस की कमजोर धूप से निधान और सर्दी से होते हुए शरीर में शक्ति का सागर हिलोरें लेने लगा । कभी किसी ने उसी ऐसी नजरों से नहीं देखा था । जन्म से ही लोगों से खेलना करते आए थे । आज पहला दिन था कि वे उसकी वो ऐतिहासिक देखे । उसका दिल स्पूर्ति और उत्साह से घर में कौनसी लगता है ये थोडा सा पानी तो कोई चीज ही नहीं इन ढोले भली इंसानों को बचाने के लिए उसकी ओर इतनी आशा और श्रद्धा से देख नहीं महसागर पार कर सकता है । आदमी हो सकता है पर सीधा की ऊंची ऊंची पर्वत लांग सकता था मैं जब मैं सागर के सहारे तैरकर ये पानी तार कर लूंगा, फिर डंडे के सहारे चलता हुआ लम्बी बढ तक पहुंच जाऊंगा और से नाला भी इसी तरह गाजर की सहारे पार कर लूंगा । कुछ नहीं । उसके पास पडी पीतल की गागर उठा । एक लम्बा झंडा हाथ में पकडा और इससे पहले की कोई कुछ पूछे तो पानी नहीं बना । पीठ के पास पहुंचकर मनमोहन पाउंड धरती पर लगती बूढी नंबरदार का अंदाजा बिल्कुल ठीक पानी इसकी छाती तक समझ लेने के लिए थोडी देर में पेड के पाँच सौ का गांगर को डंडे वाले हाथ में पकडकर दूसरी हाथ से अपना चेहरा पूछा । पीछे मुडकर एक छुट्टी सी दृष्टि सामने छत्तर बैठे, लोगो पटा । उसे अपनी ओर देखते देखकर लोग हाथ हिलाने लगे । मैंने उसका दिल दुगने उत्साह से भरो था । उस ने भी हाथ हिलाकर उत्तर उसके पास सुनना गागर । कंधे पर रखे डंडे से पानी नहीं हुआ । आगे बढने लगा । बाहर ज्यादा तीसरे ही था । लेकिन पानी ऍम वर्षा की बूंदें की की बाणों की तरह उसकी सेल चेहरे और कंधों पर पट रही थी । लेकिन उसे इस की बिल्कुल परवाह नहीं थी । उसी तो बस की की चिंता शेख अतिशी रानीपुर की लंबी बहस तक हूँ । बेहती पानी की ओर देखने से चक्कर आ जाता है । आदमी ले सकता है ये मनोज जानता था इसलिए बिलकुल सामने नजर रखी चला जा रहा था । पानी नहीं, उसकी छाती तक रहता नहीं कर लेते नहीं छुट्टी तक और कहीं थोडी से भी ऊपर चढ नहीं लगता । थोडी से ऊपर चढ नहीं लगता तो वह गांगर छाती के नीचे रखी था । ते मिला था । थोडी दूर तक तय कर रहे थे । पाउंड धरती से लगा कर देख था यदि लग जाती तो फॅमिली इसी तरह से कभी पैदल कभी टाॅप नहीं बढता जा रहा हूँ । चलते चलते कभी अचानक उसका पहले किसी कंटीली झाडियाँ पर पड जाता है । उसका सारा शरीर सहायता से ईद था । नीचे छुपकर तो वह कांटे निकाल नहीं सकता था । इसलिए गांव को जोर से धरती पर रखा था । पहले से भी अधिक तीन होती क्योंकि फाॅर फिर आगे बढने लगता । एक जगह उसका बायां ऍम और वहाँ पर उसके मुंह कानून अमरनाथ में पानी भर के आंखों कि आगे लाल पीले तारीख ना चुकी थी काफी कोशिश करने पर अंत में वह संभाल तो क्या, लेकिन इस कशमकश मी काफी टूट गई । प्रांगड का टूट जाना तो आधी ताकत खत्म होने के बराबर था । मगर अब वो क्या सकता था उसे ढूंढने का प्रयत्न करता तो केवल समय करता हूँ करता हूँ । इसलिए दो तीन बार स्थित इधर उधर छटक कर उसने कानों से भरा पानी निकाला । तीन चार पर सांसदीय और उनकी चलते हैं बारिश । कुश्ती नहीं हो गयी टन टन फटती लगी पश्चिम में सूर्य ने बांध लों का पचपन साठ कर अपना पीला चेहरा बाहर निकालना मच मैना पानी रिक्त म्यूट दृश्य और भी भयानक हो गया मैंने हूँ गहरी चिंता में हो गया तीन थोडा रह गया था उसे भी काफी दूर जाना था तो देती चांस तीस कर दी लम्बी पर अब बिलकुल सामने नजर आ रही थी जमीन यहाँ से कुछ पहुंची थी पानी इसकी कमर से कुछ ही ऊपर तक था उसका दिल उत्साह प्रसन्नता से घर के आधा मार्ग से तय कर लिया था । अचानक बर्फ सी बी ठंडी कोई चीज अंकल उसके दाएँ हाथ से टकराई और चिपट के उसने जल्दी से हाथ ऊपर उठाएं । उसके ऊपर का सांसें ऊपर और नीचे का नीचे रहेंगे । एक बहुत बडा सरकाना सांप उसके हाथ को जकडे हुए थे । बडी मुश्किल से उसने अपने आप को बेहोश होने से बचाया और पूरी जोर से हाथ झटक सांप छठ कर दूर चाहिए । लेकिन जाते जाते हाथ की पिछली और काट के जानता हूँ कि हिंदी देखते ही देखती । हाथ नीला पडने लगा बिना एक क्षण की भी देरी किए बिना मनमोहन सिर पर बंदी चांदर को फाडकर बाजू की कोहनी को कुछ नीचे कस करता हूँ और इस तरह मानव कुछ हुआ है आगे बढ गया मैं लंबी बढ तक जा पहुंचा बढ करीब डेढ मीटर के ही पानी में खडी थी उसकी तनी और शाखाओं से सैंकडों कालेज हाँ छुट्टी हुई थी । फांसी झाडी नहीं तीन लाशें फंसी रही, एक आदमी की आ रही थी और एक बच्चे तीनों लाश आपस में ही हुई थी और उनकी ऍम की थी यह भयानक और करना जनक दृश्य देखकर मन हो उसका कलेजा दहल गया । अंक मियां हुआ लेकिन जल्दी ही उसने उधर से ध्यान हटा लिया । मैं लाठी से टटोलता हुआ बढ के गिर बने पत्थरों के चबूतरे पर चढ गया और धानापुर के मंदिर की ओर देखती लगा । मंदिर का सुनहरा करें । वर्ष से धुलकर और भी चमक उठा था । मंदिर के तीनों और दूर तक सैंकडों सबूत नीति जिससे प्रतीत होता हूँ कि पानी वहाँ तक नहीं पहुंचा है और वहाँ सहायता का भी अच्छा प्रबंध हैं । सामने लाने से दस दस फुट ऊंची उडती विक्रांत लहरों को देखकर एक तो कम था लेकिन दूसरे ही क्षण छत पर बैठे मृत्यु की चंगुल में फंसी ट्रेक अपनाएं एक दम तीस ऍम के सामने फॅमिली है, कुछ नहीं है । उसी मंदिर तक पहुंचने फॅस बहुत नहीं थी । बस हाथ पैर मारना आता था उसे । मैं छोटा था तो गांव के दूसरी लडकों के साथ नदी में तरह करता हूँ । एक बडा लडका किसी तैनात इतना नहीं आता था । उन्हें सिखाया कर तक भी कुल सीधे नहीं करना चाहिए । तीसरे तीसरे करना चाहिए । नेहरू के ऊपर उठ के साथ ऊपर उठा और नीचे गिरने के साथ नीचे गिरना चाहिए । बचपन किसी खेल पाती आज का नहीं । इस चीज के क्षेत्र चाहता हूँ । लहरों के साथ ऊपर उठा और नीचे गिरता हूँ पानी का । वहाँ बहुत तीस मेरी ऊंची उठ रही । कई धार्मिक शहरों के साथ ऊपर नहीं उठता था और नहीं उसके ऊपर से गुजर चाहते हैं । उसकी आंखों के आगे अंधेरा छा जाता था । ऍम किसी ने उसे जमीन के नीचे तक में कर दिया । लेकिन शीघ्र ही मैं समझ जाता हूँ । उससे कहती है अब बहन लम्बी पर से काफी दूर आ गया था । उसकी सांस ढांकने की तरह चल रही है । छाती और काम पत्तियों में जोर की पीडा हो रही थी । कानूनी सांस थांकी आवास मिल रही थी । एक हाँ तो उसका पहले ही बेकार हो चुका था थी । दूसरा था टांगी में ही काम करना बंद करने नहीं । कुछ देर तो उन्होंने बिल्कुल हिलने से इंकार कर दिया । मैं टूटने ही वाला था कि कुछ दूरी पर उसे एक लडकी का तख्ता तैरता हुआ दिखाई थी । तख्ता पांच आने पर उसका उत्साह लौटाएं । सांस लेने के लिए कुछ तेज तक बहस बिना हाथ पैर हिलाए तख्ती पर लिखा रहा । फिर दुगनी वेक से तहते लगा यहाँ नहीं नहीं, नहीं नहीं, पानी बेहतर जा रहा था । तक का सहारा नेता हुआ । तेजी से टेस्ट तरह सूरी या तो छिप चुका था । यह छिपने वाला था और वह किसी भी कीमत पर अंधेरा होने से पहले धनपुर के मंदिर पहुंचना चाहता था । एक स्थान पर पहुंचकर अचानक उसका तेल प्रसन्नता से भरो इतनी प्रसन्नता । किसी को सोना मिलने पर भी ध्यान नहीं किया हूँ । जितनी से इस समय उसके पाउंड धरती से जाना नहीं किनारे लग गया था । न्यायाधी घंटे बाद सामान और आदमियों से भरी तीन नामी धन क्योंकि मंदिर से राजापुरकर की ओर तेजी से बढ जा रही थी । यहाँ मृत्युशैया पर लेता हूँ । पीछे से उनकी मुहं सुरक्षित पहुंचानी की प्रतीक्षा कर रहा था ।

12. Dwand

कांगडा चिली के गर्ली कस्बे के नजदीक अनुभव ड्रामा के गांव है गांव । चारों ओर से गहरे नालों से घेरा हुआ है । जिस दिन में भी नाम था मुश्किल है । इसकी समीर थी । एक घना जंगल है जिसमें भयंकर सांप, बाघ जीते आधी रहते हैं । यह दिन में भी इतना अंधेरा रहते हैं कि हाथ को हाथ में ही सूचना एक तरी से जंगल में कहीं से एक बाघ । आपसी बात तो पहले भी कई आई थी पर लोहियों से कोई नहीं भर सकता हूँ । तो यह तो ऐसा था कि हर रोज गांव यहाँ तक अरे कान, भेड बकरी, फॅस का बच्चा या कुत्ता बिल्ली जो भी उसकी चपेट में आता हूँ । अच्छा था जंगल में जो पशु चलने जाये करती थी, कभी कभी बाहर एकांत उनमें से भी उठाने था । लोगों ने उसे पकडने के अनेक प्रयत्न किए । एक्टर मिलकर शिकायत भी खेला, पर बाघ का कुछ पता नहीं चलता हूँ । लोग टांग से बहुत चिंतित रही । नहीं लगी घरों में सारी रात पहला पर बांध के आने का किसी को पता नहीं चलता हूँ । चुप चाहता था पर अंधेरे में ही किसी पशु को उठा कर ले जाता । लोहियों की बंधु कि भरी भरी रह जाती है उन्हें उस समय पता चलता जब कहीं से साहस आवाज आती हो गया हो गया । राणों की कुत्ते को ले गया दोनों दौडो इतनी भी बाग अपनी मांग भी पहुंचा था । गांव के लोगों ने एडी चोटी का जोर लगाए, लाख प्रयत्न की । शनिश्वर बांध कभी पालकी बम करना कर सके । लोग उसके बारे में तरह तरह की आशंकाएं करने लगी । उन्हें संदेह होने लगा कि कहीं भूरी ही ना हो । घोरी वहाँ के लोग उसे कहते हैं जो एक्शन में ही अपना चोला बदल लेता है । यह भी की मदद होती है कि जब कोई इस पर गोली चलाने लगता है तो एक गाय का रूप धारण कर लेता है । वास्तव में होता मनुष्य । परंतु कठोर तपस्या के कारण उसी यह सिद्धि प्राप्त हो जाती है । उसी मानव जीवन से तीन नहीं रहे और वह मास्टर अक्षत बन जाता है । ये भी अंधविश्वास है कि जिस गांव में खोरी रहने लगे, वहाँ उन लोग बोल नहीं लगते हैं । होरी का निवास स्थान मनुष्य के लिए हानि का लग । पच्चीस गांव के नजदीक कह रहे, नहीं लगे उसे छोड देना चाहिए । जब लोग सभी युतं करके हार के तब उन्होंने तंत्र मंत्र का सहारा लिया । कांगडा के लोग तंत्र मंत्र में बहुत विश्वास करते थे । उनका विश्वास है कि इसके द्वारा शांति भी सिद्ध हो जाता है । मंत्र झाडने वाले को यहाँ छेना कहती है । पर ये हैं दीप्ता की तरह पूजा जाता है लोग की निवासी चेरी को बुलाना । उसने तीन दिन अखंड । पांच । क्या संयुक्त सी इन तीनों देख बाग भी नहीं आया । गांव वालों को उसकी साधना पर विश्वास होंगे । तीसरी रात चेले ने पांच समाप्त करके गांव के चारों ओर पानी की धारा बनाते और लोगों को विश्वास दिलाएं कि अब बाग इस देखा नहीं करेगा । यदि पांच करेगा तो मर जाएगी और वह अपनी मजदूरी लेकर चलता था । ना लोग अगली डाॅगी भर उसी रात बाघ राज्यों के बकरे को उठा लेंगे । दूसरे दिन गौरीशंकर की दस बकरियां गोहरा इनमें मरी पाई नहीं । गांववासी बिल्कुल हताश हो गयी । साहस और पर सब जाते रहे । डर के आगे उन्होंने कृति देख दिए हैं । गांव छोडने की सेवा उनके पास कोई चलाना था एक एक करके सबका छोडने लगी और काम सुना सुना सा हो गया । भाद्रपद का महीना काली काली रहती । आज गांव के मुख्या राज्य मेहता ही गांव में रह गया था । उसे भी अगले दिन मित्र के यहाँ चले जाना था । उसकी तीन लडकियाँ और दो छोटी छोटी लडकी थी । उसके पास दस बाॅल और इतनी ही भी नहीं बकरियां मिलेगी । इतने बडे परिवार और सामान के साथ दूसरी जगह जाना । राज्यों को पहाड सब देख रहा था परन्तु अकेले गांव में रहना भी खतरे से खाली नहीं था । रह चुके पति का नाम था की सब लोग उसे सीखनी कहते थे । वे थी भी बडी, साहसी और मीठा नहीं । राजू मेहता हाल में ही डोगरा पर्यटन से रिटायर हुआ था । पांच वर्ष तक ऍम था । बुढापे में भी रहे रिश्ता पुष्ट युवावस्था मी बाघ कोदंड में पचास तक इसकी उसे दोनाली का दूसरी बंदूक और अनेक पदक इनाम में मिली थी । रात का कहर आंध्र का था, चाहता हूँ और इतना सन्नाटा था कि सोई कितने की भी आवासा चाहिए । राजू ऍम दोनों बिस्तर पर लेटे बातें कर रहे थे । पास की चारपाई पर बच्चे हो रही थी । राजू ने कुत्ते को अपनी चारपाई के पाय के साथ पांच रखा था । दोनों की बातचीत से ऐसा लग रहा था जैसे धोना चाहिए थी । आज बाग उनके घर अवश्य आएगा । ऐसी नहीं आशंका नहीं । राजू ने कहा केसरी अंदर से बंदूक लिया और हाँ घर में भी नहीं । कोर्ट की जेब से दो कारतूस भी रहना जरूरत के वक्त काम आएगी । अच्छा जी जय कर के लिए अंदर के और अंधेरे में ही दो कार्ड दूर भर लायेगी और का टूर टीटर । बटेर मारने वाले बाद बांटी वाले नहीं । उसने प्रद्योत लाकर राज्य को थमा दी । अपने बिस्तर पर लेट । इसके बाद राजू तो चलती ही खर्राटे नहीं नहीं लगा तो केसरी को नहीं नहीं आ रही है । मैं खुद एक नहीं उसका दिल बैठा जा रहा था । सोने का प्रयत्न करते हैं परन्तु निष्फल बिस्तर पर पडी पडी रह आकाश की ओर देखती रही । शांत वातावरण में उसे केवल राज्यों की खर्राटे सुनाई देती हूँ । बच्चों को जब मच्छर काटेंगे तो उसमें कर रखती हूँ और कभी कभार चमगादड की चीज ऊँचे हूँ की ध्वनि उसे सुनाई पडती है । इस प्रकार रात्रि का एक पहर पीठ क्या अब केसरी को डर लग नहीं रहा हूँ । उसी राज्यों को उठाकर कहा मुझे डर लगता है कुछ अनिष्ट ऐसा आभास होता है । मेरा दिल नहीं मानता हूँ । आज की रात मत सब हम बंद ऊपरी तैयार रखूँ । यहाँ के आने का समय ही हो रहा है । आनी थी तो सोने भी नहीं देखो कहते हैं ऍम सोता भी क्यों नहीं पिछले चार रातों से निरंतर पहला देता हूँ की तरह फिर अपनी कल्पनाओं में खो गई हूँ । वहाँ घर के आने की कल्पना से ही सिहर उठती उसी तरह सोचते सोचते आधी रात हो गयी के करीब अब बैंक नहीं रखी थी वो भी पीछे भी सचेत हो जाती हूँ इतनी में चमगादड की क्यूँ क्यूँकि आवास से सारा वातावरण काम था । चारपाई से बंधा कुत्ता भी भूख नहीं लगा । अब तो केसरी को बांध के आने की पूरी सूचना मिलते कल्पना ही कल प्रणामी एक पांच से हारे थे और उसकी रोंगटे खडे हो गए । पुनर्स् सतर्क अपने आप को संभालकर जोडी की ओर एक तक देखे थे हूँ उसी मोटर कहाँ की टीम की तरह ड्यूडी के बीच दो पदार्थ समझ ही नहीं हूँ बांक बिल्कुल उसके सामने उसी देखते ही केसरी की घबराहट एक छन्नी जाती है बाकी की अकिनचंद बता रही हूँ कुत्ती पर दृष्टि जमाए था इसे भी नहीं कुछ नहीं मार कर राज्य को जगाया रूकती आवाज नहीं बोली जी बहुत ही फिर प्रयत्न किया । उसने बोली जी ऍम आ गया चुपचाप लेटी रहे हैं अब कुछ नहीं चलती है । अजी लो बंदूक आदान दू किसी शेखी की क्या बात है देखते क्या हूँ? पांच ही तो बैठा ही सीधा निशाना फॅमिली में चित्र हो जाएगा हूँ बात कभी ऐसी मारी जाती निशाना चूक गया तो खैर नहीं कुत्ते को खाता है तो खाली नहीं थी अंजाम तो बच्चे की कुत्ता और ले लेंगे नहीं बहुत छमा का है ऐसे टांग पर तंग कर सोई रहने से भी भला क्या बनेगा ऐसा मौका बार बार नहीं आता हूँ हूँ हूँ तीसरी नहीं हठपूर्वक राजू ने उसकी बात का कोई उत्तर नहीं, कुछ नहीं तब तथा चाय है बाकी उनकी बातचीत सुन कर ही नहीं सस्ता किया भीगी बिल्ली बन गया हूँ वास्तव मैं जोरबाग था जो अवसर की ताक में रहता है । जब समय हाथ सकता है झट से पशु उठाकर भाग जाता है । तीसरी ने फिर कहा मैं कहती हूँ गोली चला दूँ, नहीं खराब थी उस से नहीं होगा । कम से कम बच्चों का तो खयाल कर पगली हूँ हूँ । तीसरी चिंता पिंटू शिकायत हाथ से निकल जाएँ ये खुसी सहायता उसने भी बंदूक नहीं चलाएंगे वरना अभी तक नहीं बात को उडा देते । उसकी रूम रूम में बिजली का संचार हुआ । हाथ मचल उठे । ऍम धमनियों गरम खून दौडने लगा उससे रहना, बंदूक उठाए और बाकी की ओर तक की निशाना चूक के बाग कुचलकर केसरी पर चलता । अपनी रक्षा के लिए केसरी ने बन्दों का भी कर दी में भाग नहीं घूमी जाएंगे । उसी दूसरी गोली बाग के मुँह में ही तंग बागने गुस्से से नली को कर कस करके चबा दिया । नहीं छूट चूर हो गई । राजू और बच्चे अब तक अंदर भाग चुकी थी । चाहूँ किसी को ढूँढने लगे रहे तो वहाँ ही नहीं राजू को बाहर चारपाइयों की खडखडाहट सुनाई पड नहीं सहन के पहचान किया की केसरी अभी संसार में नहीं रहे । बांध के पंजी में आया हुआ बडे से बडा शक्तिशाली जान से हाथ धो बैठता है और वो तुम्हारा तकलीफ को मैंने कितना समझाया उसके कान पर जूं नहीं रेंगी । खूनी तो होकर ही रहती है । किसी की थाली नहीं चलती । राजू ने बच्चों को कोठी पर चढा क्या अब की बार खुल ठीक बात पिछले पाउंड केबल खाना है और केसरी निर्भीकतापूर्वक लकडी वाला हिस्सा उसकी सर पर मारे जा रही है । उसका साहस आगे जाने का नहीं हुआ । केसरी ने कुछ हथियार मामला तो वह भी उसने भीतर से ही फेंक दिया । केसरी के हाथ भी नहीं था । अच्छा बाघपुर की फिल्में बंद होने लगा । बार परिवार होने लगी । इतने में कुत्ता बाग पर चलता है परंतु एक ही लपेट में यमपुरी पहुंच गया । राज्य को खडे खडे पसीना गया और बच्चे चीखने चिल्लाने लगती । पर केसरी जान की परवाह किए बिना पांच से की गई एक और नियुक्ति केसरी अब दूसरी ओर लम्बे लम्बे न क्यों वाला था, दोनों ही दूसरे को गिराने पर तुली थी । अंधेरी में राज्यों को छटपटाहट के सिवा कुछ भी दिखाई नहीं देता । मैं दुविधा में पढा रहा । कर्तव्य और लाड उसके मस्तक में उथल पुथल मचा रही थी कि इस तरी को बचाई । जब बच्चों की रक्षा करें तो मन ही मन सोचा । यदि केसरी मर भी गया तो मैं उसके बाद बच्चों, पशुओं और खेती बाडी की रक्षा कर सकूंगा । यदि तुमको इसकी भेंट चढ गई तो पच्चीस तिलक अलग करना चाहिए । अंदर ही अंदर रो पडा । एक आध बार आगे बढने का प्रयास में भी किया । परंतु मृत्यु के भय और बच्चों की ममता ने उसे पीछे धकेल क्या आज पहली बार मैं किसी तरह पलटन अभियान बरसाती तोपों के मूड में जाने से भी रहे, कभी नहीं कराया था, परन्तु आज नहीं जाने की उसी क्या किया था । अंगद में ठंड चल रहा था । राजू ने सोचा केसरी अब संसार में नहीं, प्रातः उसके अंग प्रत्यंग आंगन में भी खेलता हूँ तो उसने सोचा क्या यह मेरी कमजोरी नहीं जो पत्नी को आंखों के सामने मार नहीं दिया । नीच पाल कहाँ गया कहाँ क्या तेरह मानुषी खून चुल्लू भर पानी में डूब मरो स्वर्ग में बैठे केसरी तुझे कोसे की ठीक कार है तुम नीच को यदि साहस और बल था तुज में तो वहाँ की क्यों नहीं आया । उसी समय मुर्गी ने बनी थी आंगन में खामोशी छा गई । राजू ने सोचा बाग तक चला गया होगा परन्तु अपत्तियों से भूमि पर कुछ अस्पष्ट सा प्रदार्थ हिलता हुआ दिखाई दिया । रहने की आवाज सुनकर राजू अश्चर्यचकित रहे क्या केसरिया भी चीज थी । तब आपको बाहों में झगडे हुई थी । पाक अंतिम सांस ली चुका था । पडी मुश्किल से राज्यों ने केसरी को उससे अलग क्या? अलग होते ही केसरी मूर्छित होकर गिर पडीं । त्रान चुने, उसके ऊपर पानी छिडका । उसे कुछ होश आया और फॅमिली हुई तो नहीं । फिर वही राजू नहीं देखा । बाघ आंगन में मरा पडा । सिर्फ एक ही मिनट लंबा शरीर चित कपडा गोलियों से भी डर लगी थी । टीटर पटेल मारने वाली गोली से उसका क्या भी करना था कि इस तरीके जगहों से खून बह रहा था । मैं पूरी तरह घायल हो गई थी । आंगन में भी रक्त का लेट हो गया था । राजू केसरी को सहारा देकर अंदर लेकिन अभी भी उसी बाग कंटर था । होश आने पर वह बाग कहती फिर बेहोश हो जाती । रात तक ये है समाचार आपकी तरह निकटवर्ती गांव में फैल गया । झुंड के झुंड केसरी के दर्शन के लिए वहाँ जमा होने लगी । वो केसरी के साहसिक कार्य पर चकित थी और उसकी प्रशंसा कर रहे थे । समाचार सुनकर में भी स्कूल से भागा भागा वहां पहुंचा । बाद को देखकर मेरे मुंह से तो ठीक ही निकल पडेंगे । हाँ उसकी खडी सब व्यक्ति खिलखिलाकर हंस पडे हमें शर्म से करते हैं । थाने में भी अब तक समाचार पहुंच चुका था । सिपाही केसरी को ज्वालामुखी थानी लेकर वहाँ उनसे पांच सौ रुपये का पुरस्कार और एक स्वर्ण पदक मिला, जिस पर ये शब्द अंकित थी । कांगडा की विरांगना

13. Namak ki Laaj

हूँ । सत्तर साल की दूरियाँ जन्म से ही दुःख या थी हादसे ठीक आठ साल पहले सफेद मलमल की धोती पहने पहले से यमुना तट के बंगले में पनाह लेने आई सुखिया दूर के रिश्ते में सेठ यमुना दत्त की बहन लगती थी । चांदी की चमक रहने पर तो पर आई थी, आपने हो जाते हैं परंतु गरीबी सभी संबंधों को तोड की थी । पहले पहले जब यमुना तट को मालूम हुआ कि सुखिया हमेशा के लिए उनके यहाँ रहने आई है तब वह बहुत तेल मिला है । न जाने कहाँ से ये बला टपक पडेंगे । साथ लेकर आने वाले से बेन जैसे बोल बडी गया की अपनी जो सुखिया को यहाँ पे आई सुनकर सुखिया लग चार प्लानिंग करते हैं । उसे अपने आप से घृणा हुआ है परंतु उसका कहीं ठिकाना भी तो नहीं था । मायके और ससुराल में भी तो कोई नहीं । यमुना की बात का अर्थ समझने पर भी सुखिया कर रहे ही । तय ही दीनता से बोला पर्याप्त सागर है सरकार दो जून जल्दी देने से आपका कुछ नहीं भी करेगा की वो नौकर आपके हम चलते हैं आप बचा कुचा जूठा भी दे देंगे । ना कोई है अपना जीवन चुपचाप का उसकी चापलूसी भरी बातों से यमुना दत्त खोलकर और उन्होंने सुखिया को अपने यहाँ पनाह थी । सेठी रे धीरे घर के सभी कामों का ध्यान सुखिया पर पर कहने के लिए तो वह यमुना दत्त की बहन थी पर उसकी इस एक माँ कराने से अधिक नहीं थी । मैं बिना तनख्वाह की नौकरानी थी । तनख्वाह के बदले उसे मिलती थी ताडना और यंत्रणा । परन्तु सुखिया ने कभी किसी से शिकायत नहीं जबकि धाता नहीं उसके साथ खिलवाड किया । तब किसी से किला करने से लाभ ही क्या बेहतरीन यमुना दत्त के लिए कान का दिन था । लगभग तीसरे पहर ने खबर में की उनकी रूई की मिल में आग लग गयी है । कोशिश करके भी बचाया ना जा सकता है । तेरे सिर पकडकर बैठे मील भी उन की उन्नति का एकमात्र सहारा अपनी सारे जीवन की पूंजी के अतिरिक्त कई लाख रुपये उधार लेकर उन्होंने इस मिल में लगाए थे । उन्हें पूरी उम्मीद थी कि कुछ ही दिनों में सबका उधर चुका देंगे । परंतु सागर पार करने से पूर्व ही पतवार टूट गया और उनकी नाव बीच भवन में चक्कर काटती है । मील की आपने उन की इज्जत को भी अपने दामन में लपेटना आरंभ करती है । धीरे धीरे पैसा लेने वालों ने उन्हें आगे रहा और भी अदालत की डिग्री लेने की धमकी देने लगे । बचने की केवल एक ही रहेंगे कि वे हैं अपने को दिवालिया घोषित कर दिया । परन्तु यमुना दत्त को ये मंजूर था । भिखारी बनकर जीने की अपेक्षा नहीं मिट जाना अधिक पसंद करती थी । अच्छा बहुत कोशिश कर के और अपने बंगले को रहन रखकर उधार चुकाने लायक रकम इकट्ठी करते हैं परन्तु विपत्ति के लिए नहीं ऍम करती है । यह सलाह भी चली नहीं थी कि उन्हें एक दुखदाई तारीख था । स्टार हाथ लिए एक कमरा आए हुए अपनी पत्नी के पास पहुंची । धोली अब ये भी मुंबई सितारा है । राकेश का एक्सीडेंट हो गया । हालत चिंताजनक है । सुनकर सुजाता के हाथों की तोते और यमुना तक आगे बोले एक घंटे में मुंबई का जहाँ जाने वाला है मुझे उसमें जाना होगा । परन्तु परन्तु क्या सुजाता चिंतित हूँ । कल पैसे लेने वाले अपना रुपया लेने आएंगे । हरी अपना एकलौता बेटा परदेश में दम तोड रहा है । तुम्हें फ्रेंड चुकाने की पडी कल रुपया नहीं होगी तो कौन सा पहाड टूट पडेगा, ऍम की नहीं हो जाता है । यमुना तक सशंकित मित्रों से इधर उधर ताकते हुए पूरी देने के लिए रूपया काफी है । इतनी बडी रकम बंगले में लगता तो ठीक नहीं कितनी रकम? हाँ हाँ हाँ सुजाता क्या ऍम फीस अब इंतजार करने का भी वक्त नहीं । रात भर का ही मामला है । कौन सा धीरे हमारे एटॉर्नी आकर सबकी कर देंगे? सारी रकम ऊपर दीवार वाली गुप्त तिजोरी में है संभालने का सारा भारत तुम्हें छोडी जाता हूँ और जवाब का इंतजार किए बिना लंबे लंबे तक भर्ती हुई यमुना दस चल पडी सुजा तक कोई भी उत्तर नहीं दे सकता था ही नेत्रों से एक टिकती नहीं शरबत का गिलास थामे सामने से कुबडी बढियां सुखिया को धीरे धीरे यहाँ सुजाता चौक पडी । हर पाॅल अवश्य इसे समझ पाती । सुनती हूँ कितनी काइयां शपथ लाने का इसे और कोई वक्त मिलता ही नहीं है । घर की खबर पकडने करने में किसी कहाँ रहता है सुख इयाॅन था इस जाता नहीं गिलास पर जोर की एक ठोकर मारे जान चलाकर शीर्षक का खिलाफ चूरा चूरा होते तो चाहिए गुस्से में बोल रहने के लिए इतनी बडी कोठी के मिल गई तो उसमें रहने की तमीजी सीखो । सुखियों नहीं मालिक इनकी तिरस्कार को चुपचाप ीलिया बढ सहलाती फर्श पर बैठे टूटे शीशे के टुकडों को इकट्ठा करती नहीं । शहर के आंचल में गंगा के बिल्कुल किनारे सी यमुना दत्त की तीन मंजिला आलीशान कोठी अंधेरी रात में भी चमक रही हूँ । चारों सन्नाटा छाया हुआ था । सभी सुख की नींद सो रही थी परन्तु सुजाता की नींद हो चुकी थी तो राकेश की चिंता उस पर इतनी बडी रकम की जिम्मेदारी अपनी कमरे की खिडकी में खडी तो गंगा की शांत लहरों को देख रहे हटा गंगा मशाल की रोशनी से आलू की थोडी थी । मुस्टंडे जवानों से लदी हुई चार नौकाएं तेजी से उनकी कोठी की तरफ पर ही चली आ रही है । सुजाता कुछ समझे कुछ नहीं है । उसके नीचे फाटक पर कुछ ओर सुनाई थी । उस कार्य गए किसी अज्ञात आशंका से कम था । लडखडाती कमरों को पार करती नहीं टेलीफोन की तरफ था । पर हम तो टेलीफोन उठाती ही नहीं । समझ गए कि ताज क्या है? टेलीफोन को रखकर ही थी कि एक काले लंबे चौडे शरीर को देखकर भी चीज पर पुलिस को खबर तो कर ही दी है । तो इतना घर बनाने की क्या बात है? नहीं कौन हो तुम अपनी को बेहोश होने से बचाती हुई पूरी शक्ति से सुजाता की रोटी के अंदर आने की इजाजत तकनीकी सिंधी क्या तुमने डाकू मानसिंह का नाम नहीं सुना? आज तक उसने सबको इजाजत दी है । ली नहीं । सुनकर सुजाता थक रहे । शिकारियों की जान में फंसी इतनी सी सहायक हैं, इधर उधर तक नहीं । देखते ही देखते सारी कोठी निंदा को पहले सभी नौकरों की मुश्किल कस्ती डाकू मानसिंह के नाम से भला कौन परिचित नहीं । उसका नाम सुनकर कोठी के रक्षकों की रही सही हिम्मत की जाती है । छह फुट का लम्बा चौडा जवान बिजली की रोशनी में इस प्रकार रॉब से खडा हो गया जैसे पहला उसकी बात कर रही हूँ । सुजाता को धीरे धीरे पीछे सकते हुए मैं इसकी दरार खुलते देखकर मान सिंह के मुख पर कुटिल मुस्कान खेल के अधिक चला बनने की कोशिश करूँ । एक पद भी पीछे हटाना अपनी मौत को बुलाना होगा । परन्तु सुजाता ने उसकी बातों को अनसुना कर फट से दराज खोलती उसने खाना हुआ पिस्तान परन्तु पिस्तौल उठाने से पूर्व हीं दो मजबूत हाथों नहीं उसे पीछे से जकड लिया सोचा था की तरफ कर रही थी छोड दो छोड मुझे बदमाशो सुजाता की, परन्तु उसकी चीखपुकार का मान सिंह पर कोई असर नहीं हुआ । में अधिकारपूर्वक स्वर्ण भी बोला रकम कहाँ है? हमारे पास कोई रकम नहीं, झूठ मत बोलो । मान सिंह ने जिस चीज को चाहा है उसे हासिल करके ही छोडा है । मुझे भेज दिया करो सुजाता सकती नहीं हमारी जब जाने का यही एक अंतिम सहारा है । इससे मच्छी नहीं । दया शब्द मेरे शब्दकोष में नहीं, वक्त निकला जा रहा है । रकम कहा है चलती बताओ नहीं बताऊँ नहीं बताऊँ तो मुझे मार दाल तो नहीं बताउंगी तो जनता नहीं पागलों की तरह चीखते हुए लेकिन तो में बताना ही पडेगा । ध्यान रखना । अभी तो छोटा तार देकर मैंने तुम्हारे पति को बाहर भेजा हैं । अगर तुमने मेरी बातों का उत्तर न दिया तो तार को सच करना भी खूब जाना था । सुजाता की अखिेलश चेहरे से खुली की खुली रहे । क्या कहता टूटा था ऍम नहीं हुआ है हस्ती क्वेटा को मान सिंह ने उत्तर दिया हाँ तो ठीक समझे भारी बेटे को अभी कुछ नहीं हुआ है । अगर मुझे वहाँ रकम नहीं मिली थोडा की इसका एक्सीडेंट होते देर नहीं लगेगी । राकेश के विषय में सुजाता परेशान थी पर बाल पति की तार का इंतजार कर रही थी । परंतु आप डाकू मानसिंह की बातें सुनकर उसकी सारी चिंता दूर हो गए । उसके पति को बंगले से दूर भेजने कि यह केवल एक जन थी । सुजाता राकेश की राजी खुशी जानकर एक सीन शक्ति का अनुभव कर नहीं । अब उसी डाकू मानसिंह के एक भी प्रश्न का उत्तर न देने का निश्चय कर लिया । उसी समय मान सिंह की गंभीर आवास पहुँच थी तो तुमने क्या निश्चय किया है? मेरे प्रश्नों का उत्तर मुझे मिलेगा या नहीं? नहीं मैं तुम्हारे प्रश्नों का उत्तर नहीं हूँ । अपनी इज्जत में अपने हाथों से नहीं चला सकती । ठीक है नहीं बोला अगर तुम नहीं चला सकती तो मुझे ये काम करना पडेगा । फिर अपने साथियों की तरफ मोडकर आदेश भरी स्वाॅट सपना को इसी तरह बना रहने दो और बंगले में आग लगा दो देर नहीं कर यह काम सवेरा होने से पहले ही हो जाना चाहिए । बीस उनका हो जाता हूँ । सभी नौकरी के ऊपर हवाई होने लगी । देखते देखते बंगले के चारों ओर मिट्टी का तेल छिडक क्या मान सिंह ने दिया? सिलाई के टीली निकली फॅमिली ही बना था एक फॅमिली हीरो सभी की ऐसी उस तरह फट कहीं नहीं सुखिया थी । चुकू बर को संभालें । लाठी देखते हुए धीरे धीरे सीढियाँ चढ जा रही थी । सत्तर वर्ष की पूछा जिसके पास सन की तरह सफेद हुए थे । शरीफ छुट्टी दार चमडी लटक रही थी और पीठ झुककर कमान हो गई थी । सभी न्यू से उपेक्षा भरी दृष्टि से देखो । धीरे धीरे लाठी देखती हुई सुखिया डाकू मानसिंह के सामने आकर खडी हो गई । उसे टिमटिमाती हुई नजर उसके चेहरे पर कर सकती । मेरे प्रभाव से मान सिंह ने कहा बुढियां क्या चाहती है तो प्लेन उनसे सुखिया नहीं जवाब दिया मैं चला गया चाहे की लेने तो ही आया है, क्या लेकर ही जाएगा? हाँ मैं दृढता से बोला मुझे वो रकम मिलनी चाहिए ना मिली तो सबको मीठा कर ही काम का । इतनी से बात तो तेरी पहले ही बात पूरी होगी । सुखिया की बात सुनकर सुजाता चल गई तो यहाँ आखिर क्या रही है? कहीं सखियाँ तो नहीं मैं घर हम क्या इसे दिन के लिए तुझे इस घर में आश्रय दिया था । उपेक्षा वही दृष्टि मालकिन कटौती हुई । सुखिया पुलिस हम आज की छुप मालकिन की बच्ची क्रोध भी पागल होती हो जाता कि कलपहरी बाजार में बोली बोल बोलकर जब बंगले का सामान नीलाम होगा तो फॅमिली आएगी तो दिवालिया बनकर हम कहीं भी मूर्ति खाने लायक नहीं रहेंगे । ऐसे जी कर मरने से कई अच्छा है कि हम मार कर दी जाएगी । गलती आपने की है तो फिर पर हम क्यों होगी? आपका अपनी लगाई है तो हम सब क्यों चले है तो न्याय नहीं है ना माल के फिर आगे बढकर सुखिया ने सुजाता की आंचल से एक अजीब तरह की लंबी चाबी निकाल नहीं सुखिया की वियन भरी पांच संकर सुजाता तडक कर रहे नहीं जाने किस जन्म का पैर निकाल रही है । यह बडी रकम कहां छिपाई है यह भी इसके सिवा और कोई नहीं जानता । शरबत लाने के बहाने अवश्य इसे सारी बातें सुन नहीं हूँ । पूरी सुखिया लाठी देखते हुए धीरे धीरे मुझे और डाकू मानसिंह को साथ आने का संकेत करती हुई पूरी आओ मेरे साथ मैं बताउंगी । वह रकम कहाँ है? डाकू मानसिंह शान भर ठिठका । अपने विचारों को झटके से तरफ करते हुए सोचा ही नहीं कर तोडियां मैं जैसे जवान का भला कर ही क्या सकती है और नहीं तो क्या की पीछे पीछे चल पडा लाठी ठक ठक करती हुई सुखिया मान सिंह को कोठी की सबसे ऊपर वाली मंजिल पर लेकिन छोटे से मजबूत लोग है कि कमरे को उस लंबी चाबी से खोलकर सुखिया ने अंतर प्रवेश किया । कमरा चारों तरफ से मोटी लोहे की चादरों से बना हुआ था । कोनी में छोटी खिडकी थी जिससे करूंगा कि ठंडी ठंडी हम कमरे में आ रही थी । कमरे में कहीं कुछ देखकर मान सिंह जिसमें धोकर पूरा चारों तरफ तो दीवार दीवार ऍम जब आपने सुखिया ने कमरे के एक कोने में लगी छोटी सी खेल को दबा दिया था । कुमार सिंह का मुंह अश्चर्य से खुला रह गया । सामने लोग ही की चादर के बीच से एक छुट्टी चोरी नहीं करेंगे । इस तिजोरी के विषय में तो उसने सोचा भी नहीं था हूँ की चोरी की तरफ इशारा करती हुई सुखिया पूरी वहाँ है । तुम्हारी रकम पूरे ढाई लाख आपको मानसिंह कियांग की खुशी से जमा करती हूँ । एक ही उछल में फिर तिजोरी के पास जा पहुंचा हूँ । तिजोरी की परीक्षा करनी नहीं चुका ही था की बढिया सुखिया के पैरों में बिजली से तेजी आ गयी । उसकी लंबी चाबी से लो ही के द्वार कोसी अंदर से खटाक बंद कर दिया । द्वार बंद होने की आवाज सुनकर जब तक मान सिंह थोडा तब तक लपक कर सुखिया खिडकी के सामने जा पहुंची और चाहती को खिडकी से बाहर फिर क्या टी टी नहीं चाहती । गंगा की कूदने कहीं हो गई । दिन भर में डाकू मानसिंह सबकुछ समझ गया । कितनी आसानी से इस फंदे में फंस किया था क्रोध से उसका चेहरा तमतमा आउट हूँ यौवन का तेज कुछ भी नहीं कर सकता तो बढिया ने एक ही चार में मारती थी ये तुमने क्या क्या कॅश वही मुझे करना चाहिए । मान सिंह ने जानता हूँ फिर की की ऊंचाई गंगा से करीब तीन सौ फुट की थी । खिडकी के नीचे सपाट दीवार सीधे नीचे तक चली गई थी उतरने की सभी रही थी बंद की फिर खिडकी की उन मोटे मोटे सीकचों को काटना भी आसान नहीं था । हाँ निकलने का कोई रास्ता नहीं था फूल होने में अब और देर नहीं थी । दूर छितिज का अंधेरापन मिटता चला गया । कठघरे में बंद शेर की तरह मानसिंह इधर से उधर चक्कर काटती लगा हूँ । जब उसे कुछ नहीं सूझ पडा तब उसकी उंगलियां धीरे धीरे सुखिया की गर्दन की तरफ पडने लगी तथा तो सुख इयाॅन उसके मुख पर एक जीत सकते चमक रहा हूँ । इसकी जाते हुए मान सिंह की चौडी उंगलियों ने सुखिया की कमजोर किर्तन को लपेट यहाँ पे अगर मुझे कुछ हो गया तो मेरे साथ ही उसका बदला लेकर ही रहेंगे । हो की हंसी रखते हुए सुख इयाॅन का कुछ नहीं बिगाड सकते रेल का इंजन जबकि कार्ड हो जाता है पीछे के सैंकडों तब भी ठप पड जाते हैं वो सशक्त उंगलियाँ धीरे धीरे से कुछ नहीं लगी हो तो सुखिया के चेहरे पर एक शिकन तक नहीं आई । मैं उसी प्रकार थोडी समझती थी तो केवल मूर्ख खानदान तो मालूम हुआ कि तुम तो उससे भी एक सी ऊपर मेरी लाज के साथ जब तुम पकडे जाओगे ना ॅ तुम्हारा इंतजार करेगा । अच्छा ही होगा शांतिप्रिय जगत को तुम्हारी जैसे ही विमान से हमेशा के लिए छुटकारा मिल जाए । ऍम हुआ फल कैरी कि था आज छूट चाहूँ तो फिर क्या है सुकिया की बातें ठाकुर मान सिंह की कानून तक पहुंच गया नहीं खानी चाहिए परन्तु मानसिंह अपने ऊपर चीज ऍम वर्तमान की क्रोध भविष्य की परिणाम को बिल्कुल देखना कि वेट रोज से अंधा हो गया । हत्या की गर्दन पर उसकी ऍम सूचना की नेत्रों से कोई झडियां नहीं लगी । ऍम करन तो मन ही मन में है । तो बता रही थी हीं मार्क्स मैंने नमक इलाज रखी है । पीढियां ऍम मान सिंह ठाकुर सकता । उसके साथ ही में जब अपनी सरकार तीसरी में फंसी थी तभी सभी भारतीय हाँ तो मान सिंह बूढी सुखिया की लाश जब उठी तक सुजाता उस स्तर पर झारख्ंाड करके पानी पूरी मुझे माफ कर तो सुखिया मैंने तो सच मुझे तुम पर बहुत गर्म केश करन सुखी कहाँ थी वो तो हमेशा के लिए अनंत पत्र पर चल चुकी थी ।

14. Jhootha Farishta

रिलीज कमेटी के दफ्तर से लौटकर मैं जल्दी ही बैठकों में पहुंचना चाहता था । मैं तेजी से चल रहा था, कर रखता था कि बैठने की भी उतनी तेजी से आगे रख रही । आज तीन छिपते ही कैंप की दुनिया में प्रलय मछली वाली है कई पांच हजार हूँ घर कबायली हमारी कैंप के पास में हो चुके हैं । मैंने कल्पना के आंखों से देखा की पांच हजार दरिंदे थोडी ही देर में ग्यारह बारह हजार पीडितों को चीर फाड कर फेंक । लगभग पांच किलोमीटर लंबी पहाडी के दमन में दो किलोमीटर लंबा और आधा किलो मीटर चौडा ये इस तरह मिट जाएगा माना कभी हम वहाँ छूट सारे कैंप की सुरक्षा के लिए तीस सैनिकों की कंपनी यों लगी थी जैसे अकेला चना धाड फोडने चला हूँ । जमादार महंगा रामदी लम्बी काली तभी उठा करें । अपने साथियों से बलिदान का आश्वासन मांगा । तीस पीछे चेहरों पर जोश नमक उठा साठ बुझाओ की मछलियां फडक उठी । हरियाणा के जाटों की वे साठ मजबूत बही ते कल मेरे ऍम एक्शन के लिए ही सही हूँ अभी तीन । वहाँ पहली क्रूरता और बर्बरता के बादल हमारे गांव पर प्रलय उठा चुके थे । तमाम घटनाएं आंखों के सामने उभर रही हूँ । सचिन चौधरी प्रांतों में कृपान दबाई एक छत से दूसरी छत पर कोर्ट का दिवार से जा टकराया था तीन दिन से भूखा प्यासा सचिन तीन मीटर की दूरी ना कुछ साॅस हमलावारों ने जानवरों की तरह उसकी फॅमिली हूँ फिर गुंडों ने उसकी हवेली का फाटक तोड डालता हूँ गांव के चालीस कुनबे वहाँ पर पडी थी क्या हूँ ये अठारह के लिए? उनमें से एक ही नहीं धो हाँ खालसा का साठ हाथ गहरा कुमार आर्थो की लाशों से भर गया था नहीं जाने कितनी औरते बलात्कार का शिकार बन गई । शायद उन्हें कोई फॅमिली जैसे ना जाने कितने मासूम बच्चे पी रहमी के साथ मौत की खान था कि लोग हो गए थे बाहरी हो गयी थी दो सौ घरों का काम मैं क्या उम्मीद हो गया था मेरी थपथपाई आंखों के सामने मेहता रूपचंद्र खडा हूँ मानो आज मई की तीस तारीख हूँ मार्च की तारीख मेहत्तर रूपचंद मिलिट्री के ट्रक से उतरा तो लगता था ऐसे कपडे से निकल कर कोई मोर्चा खडा हुआ हूँ । कठिनाइयाँ आँखों से जैसे किसी ने दुनिया को पेस्ट जानने की कोशिश कर रहा था । लडखडाती आवास ही लगता है फॅस तो तीन काॅप यही कोई दो तीन सौ मीटर की दूरी पर था मास का शुरू होने ऍम कुछ तुम्हारी में इकट्ठे होकर कुछ फॅार एक ऊंचे टीले पर था मैं वहाँ जान सकता मैंने मवेशियों को खोलकर खाॅ पिछले ऍम शाम तक क्रिस्टी के तमाम घटना हुई थी पक्की बल्लू टॅाप पेट नहीं भरा दूसरे दिन पाकिस्तान जिंदाबाद और अन्ना हुआ पाँच की ना रूम की थी कुंडू ने और दोहरा खेत क्या पर वही पिंटू मेहता और चौधरी चेतसिंह की बंदूकों की कोरियों कि बाढ के कारण पीछे पीछे दूसरे दिन घर के सामने पगडंडी पर कुछ करने वाले लोगों की बातों से पता चलता है कि टीले के नीचे से लगाई के सुरंग गुरुद्वारे के बडे तरफ से तक पहुंच चुकी है । थोडी देर बाद ही हर हर महादेव और चुप पूरे सोनी के नारों से जगह पहुँच गए । ठीक प्रकाश सुनाई पडने लगी एक का एक मेरा सहन भारी कदमों की आवासीय पहलू काफी कहीं भाग क्या है किसी का माल मत्ता तो होगा देखते क्या तोड दो ताला एक फॅमिली अब हमारी मौत अंदर कॅश मैं काम पता सहम तब मुझे गाडी की खिडकी से बाहर को पडा हाँ और पत्नी को बाहर निकालना दोनों मासूम बच्चों को बाहर निकाला घसीटकर हम के देख पढते थोडी दूर पर एक चट्टान कि उठी जाता ऍम मकानों से आपकी लपटी उठ रही थी । हाँ अच्छा अच्छा खुद सोच के ही हूँ कि राहत का पत्ता कब तक रहेगा । पत्नी ने खतरे की ओर इशारा किया चालू की यहाँ चलना चाहिए माननी सच है लालू मेरा सहपाठी था साथ ही लंगोटिया यार भी दूसरा विश्व युद्ध छेडने पर तो सेना में भर्ती हो गया था तरक्की करते करते सूबे था क्या आठ दिन पहले से ही छुट्टी पर घर आया था वृक्षो चट्टानों और झाडियों की ओट लेते हुए हम लाल खान के घर की ओर चल पडे रहा पकड में नहीं आ रही थी फिर भी मस्त था क्या हो हम चलते ही नहीं आहट पाकर कोई पंची फडफड तो कलेजा मुंह पहुँचता हम संघ खडे रह जाती है हेलो एक रॉक शाहनामा सुनाई पड मुझे जैसी पूरी लगते मार्च तक स्कूल के खेरे में फंस गई थी मूल टोल करती समय जैसी कसाई जानवरों की जिसमें को टटोलता है वैसे ही पे रहने के साथ हमें तो टटोलकर देख सकें काफी लोगों को सुविधा के पास ले जाओ एक यहाँ देश हम बच्चों की नोकपर मशीन की तरह चलने नहीं स्कूल की खुले आंगन में दो बडे बडे कडाही चूल्हों पर चले थे मकानों से उतारी के शक्ति रहें कडियाँ चटक चटक उठती थी कडा होने पडा तेलकड कराओ दीवार के साथ कतार की कतार बच्चे पूरे और सिया बिठाई गई थी एक छोड पर हमें भी बैठा दिया गया शुरू करूँ ग्रुप के साथ ही एक छपाक बिल दहलानेवाली चीज कढाई में संयुक्त दिया गया आदमी तडप तडप कर चलके काली लाश तेल पर ऐसे ही नहीं से निकाल कर क्या क्या ऍम मैंने आंखों के सामने अंधेरा छा गया विदेशियों के ठहाके मेरे एक कान की पत्ती पड रही थी नहीं रहा लालू हाँ इस साल थी सामने खडा आदेश देने वाला ही लालू था मैं उसकी ओर बढा कि एक बच्चा मेरी छाती पत्थर आने दो नालू की आदेश पर पर अच्छा मेरी छाती से हट गया यूपी तुम खान डाल खान भाई लालू केसकर प्रकार की होती है यहाँ से चले जाओ लालू अंगारों जैसी आंखों से खून कर कर कुछ जाओ कहाँ जहाँ मैंने कहाँ जॉब करता हूँ कुछ नहीं जहाँ में उसने पहले पढ सकती हुई हूँ तुम्हारे हादसे मरूंगा । मैंने तरफ से कहा जहन्नम क्या बहिश्त भी मंजूर नहीं । मैंने उसकी कोर्ट का दामन मजबूती से पकड लिया । शेरू इन सबको घर ले जाइए । लाॅकर अपने छोटे भाई से इन का फैसला कल होगा । आगे आगे पीछे पीछे मेरा तरीका है उनकी नहीं । हमें अपने घर पहुंचाकर शेरलॉट । मेरी माँ और शेरों की माँ बडी देर तक सगी बहनों की तरह लिपटकर रोती नहीं । तीन दिन तक हम लालू के घर में छिपे पडेगी । शुक्र है एक दोस्त की जान बचा सका । चौथे दिन मिलिट्री के ट्रक पर चढाते हुए लालू नहीं कहा तो वो ही कुछ था । उसकी आंखों में आंसू झिलमिला नहीं लगेगा । अचानक ही एक नौजवान हफ्ते हुए आकर पूरा ब्लॉक चार में मीटिंग हो रहे हैं । आपको कितनी देर से खोज रहा हूँ तो या तो बताना बना टूट गया हूँ । वयोवृद्ध मेजर हरगोपाल की अध्यक्षता में कैंप के गिने चुने व्यक्तियों की सभा चल रही महा नहीं । इधर आगे अच्छा हूँ । अपनी कस्बे की सूबेदार मेजर जगन्नाथ मुझे पीछे ऍफ करता हूँ । हमने फैसला दिया है कि भेड बकरियों की तरह नहीं मारेंगे । मर्दों की तरह डटकर मारेंगे । कैंप का हराती तुम्हारे ऑर्डर पर चलेगा । ॅ चारों ओर देखकर मेजर हरगोपाल के चेहरे पर आम के घर आते हुए मेजर साहब की मौजूदगी नहीं, ये हम सब का फैसला हैं । कई आवासी एक साथ सुनाई पडी । कोर्ट के कोहन की तरह उभरी । पांच किलोमीटर लंबी पहाडी पर अपनी बीस सशस्त्र जवान भेज गए । जमादार महंगा राम भी पहुंच गया हूँ हम तो उन्होंने मिलकर जी तोड मुकाबले की योजना बनाई हूँ । शाम तक पांचों मोर्चों पर कैंप के नौजवान और अधेड व्यक्ति जब कहीं कबाइली दरिंदों से लोहा मान लेना था हर मोर्चे तक नायक और अपना एक नियुक्त होगा । ऍफ कमांडर के बुलावे पर उनके यहाँ पहुंचा तो देखा मैं परेशान होकर कमरे में चक्कर लगा रहे थे तो तीनों छावनियों को टेलीफोन पर टेलीफोन कर चुका हूँ । पीछे आंखों कि कोरों को मार से पूछते हुए पूरा हूँ । कहीं से जवाब ही नहीं मिलता । डीजे साहब छह बजे यहां पहुंचने वाले हैं । उन्होंने फोन किया है फिर लंबी सांस खींचकर ऍम पता हूँ क्या क्या किया मैंने सब कुछ कह सकते हैं । कुत्तों की मौत मरने से तो यह बेहतर ही होगा । उन्होंने चाय की प्याली मेरी ओर पढाई मेरी तुम्हारी उठाकर की लगी तभी टेलीफोन की घंटी बजती हूँ । इराकी चौधरी सईद अहमद का फोन था ताज के खाने से कह रहे थे कि वह प्राण कैम्पी पहुंच नहीं उनके लिए कैंप का बडा फाटक खोल देने का आदेश देकर कैंप कमांडर फिर हाथ मलते हुई कमरे का चक्कर काटते लगाओ । हाँ ऑन सुनकर हम कमरे से बाहर निकले । चौधरी साहब की थी उन्होंने कार में बैठे बैठे ही रहा हूँ । इधर वाले फाटक के करीब अमराई के इलाके के सफेद पोश नंबरदार हूँ जेलदार पहुंच चुके होंगे । मैं उनके साथ बात करूंगा । आपके साथ चली अस्तरी नहीं । उनका संकेत पाकर पिछला के खुला कमांडर साहब ने मुझे भी कार में बिठा लिया हूँ । डूबता हुआ सूरज मुझे तेजी से दौड डाला हूँ की ली थी की धूप आम के पत्तों पर आंख मिचौली खेल रही हूँ । इलाकेके संपन्न व्यक्ति और कुछ मुल्ला मौलवी थी । अमराई कि घाटों पर बैठे अपनी लंबी गाडियों पर हाथ भेज रहे थे । उनके चेहरों पर कठोरता थी । चौधरी साहब के पहुंचने पर सभी थोडा उठकर फिर फॅमिली हूँ । चौधरी साहब ने अपने पडोसियों तथा शरण में आए लोगों के प्रति सच्चे मुसलमान का बस बताया हूँ । मैं पौन घंटे तक बोलते रहेंगे तो कोई असर नहीं पड रहा था कि हाथ को रोकने वाले के साथ कैसा सलूक करना चाहिए । एक हुसैन मुल्ला हनुमान शैतान ने अपनी साथी को कोहनी मानते हुए कहा चौधरी साहब नी माथे से पसीना पहुंचा । कुछ उत्तेजित होकर पूरी इसका खामियाजा भुगतना के लिए लोग ही का कलेजा चाहिए लोहे का मुझे धमकी का सहारा नहीं हूँ । हाँ हाँ देखेंगे करीब करीब सपने हूँ कार भरते हुए चौधरी साहब की चुनौती को चुनौती थी । सभी तेज और भारी कदमों की आहट से सन्नाटा टूट गया । आनी बनाई बांका सजीला सिख जवान था । उसने पहुँची अंदाज से साहब को सलामी थी । उसमें तेज आवाज नहीं आ रही । हमारी पलटन ने कैंप का चार संभाल लिया है । एक हजार से खून की पल्टन रात भर में पठानों से निपटने बहन की सडकों पर ट्रकों की गडगडाहट के साथ बोले सो निहाल के नारे । सिख फौजी सलामी देकर लम्बे लम्बे कदम रखता कैंप की ओर रात के चौधरी साहब उठ खडे हुए थे । हाथ करने वालों में खलबली मच गई । रही हूँ तुम उधर मेरे वहाँ तुम इधर डॉॅ करता हूँ जो सिखों कि पर्यटन पहुंच गयी है । हो गया बताओ सबको कैंप से लौटते वक्त यही आवाजें कानों से टकराती रही । सलाम वाली कार से उतरते हुए चौधरी साहब ने हर तरह को तो कह रहा हूँ हुजुर सलामत अली दौडता हुआ कमरे से बनाए । मैं अपनी चढी दाढी खोल रहा था । पहुंची वर्दी अभी तक उसकी शरीर पर ही थे तो सलामा कहीं तुमने हजारों इंसानों की जान बचा ली । उसकी पीठ ठोकते हुए चौधरी साहब ने कहा हूँ काम फरिश्ते हो, फरिश्ते फरिश्ता कहकर कॅश नहीं । धोनी आवाज के सलामत देने का कुंवर इतनी उम्र हो सके, कभी झूठ नहीं । पूरा खर्च बहुत छूट होना है । सलामत अली तेज तक आपने छूट पर आंसू बहाता रहा है । देश के बंटवारे के दिनों में मजहबी जुनूनियों नहीं । क्या क्या कयामत ही नहीं हूँ । दिनों के सख्त समय के मार हमने भर्ती केवल सलामा, तली जैसे छोटे फरिश्ते की कमी नहीं, इधर नहीं थी अपना है । यही वजह है कि आज भी इंसानियत सिंधा उसका से ही चाहिए ।

15. Sher ka Dil

रात को आना । आपका शोर सुनते ही मैं झपट कर बाहर निकला । मुझे लगा कि आग सर्कस नहीं लगी है । मैं अपनी रात की कपडों में ही । उधर दौर पर सर्कस मेरे घर से लगभग डेढ सौ मीटर पर था । ऐसा लग रहा था मानव आग हमारे पडोस के मकान में ही लगी हूँ । हम सर्कस देखने का शाम तो हर बच्चे को होता है । मुझ पर तो जैसी इसकी सनक सवार थी । तब मैं मांडले वर्मा में रहता था । शहर में पहले पहल सर्कस आया तो मेरी उम्र कोई तेरह चौदह साल की रही हूँ । इस बात को कई वर्ष बीच चुके हैं । कभी मेरी जान पहचान सर्कस के शेर के शिक्षक सैयद के साथ हूँ । उसका पूरा नाम क्या है ये मैंने ना कभी उससे पूछा न कहीं और से पता नहीं था । सभी उसे संयुक्त के नाम से जानते थे । पहली मुलाकात मुझे अभी तक याद नहीं । सर्कस के खेल में हमारे घर से सौ मीटर की दूरी पर ऍम सिनेमा के मैदान में लगे थे । उन दिनों स्कूल की छुट्टी थी । सुबह से शाम तक सर्कस के खेमों के आस पास ही मेरा दे रहा था । यहाँ तक कि दोपहर का खाना भी कुछ नहीं मिलता । हूँ । शाम को माम मेरे लिए दूध भी नहीं भेजते थे । नाकर सिनेमा के मैनेजर के कमरे में भोजन या दूध रखकर खेमों के चारों और मुझे ढूंढता फिरता सिनेमा का मिलनी चाहिए । हमारे ही मकान के निचले तरह में रहता था इसलिए वहाँ की सब लोग मुझे जानती थी । पैसे मुझे दूध पिलाने के लिए माँ को निर्णय नहीं कितनी में नहीं करनी पडती है । पर उन दिन मैं दूध गटागट भी जाता है और फिर खेमों की ओर डॉट था । एक दिन में शेरों की पिंजरे के पास खाना ढही कोतूहल दृष्टि से उनको आराम से लेता देख रहा था की मुझे डील टोन बना । एक बहुत काला आदमी मुझे इशारे से अपने पास बोला । नहीं नहीं मैं क्या चाय तो मेरी कमजोरी भाग गया । हस पर उसके दांत बडे सुंदर हो सकती है । शायद उसके शरीर का रंग बिहट काला होने के कारण मैं इतनी सफेट रखते थे । पता नहीं मुझे ऐसा लगता था मानो गहरी काली रात में बिजली जमा कोठी हूँ । जब जब पहुँचता हूँ मुझे यह नहीं आता हूँ । उसके साथ मेरी घनिष्ठता होगी । शेरों का मालिक सैयद शेरों का नाम लेकर उन्हें हूँ । अपनी ही सीखचों के अंदर डाल कर शेरों के मुंह और गर्दन पर धीरे धीरे हाथ था । शेर पतले में उसके हाथों पर अपनी मुझे इस तरह रगडती हो शेख नहीं लिया । मुझे इसमें है और विश्वास से भरा यह खेल तो बहुत अच्छा है । साथ ही अच्छी लगती वहाँ की सूखी था, हाथ हूँ पर इन शेरों की मेरी छुट्टी मैं घंटों तैयार है । इस बार सर्कस में मैं सहायक मैनेजर के रूप में काम कर रहा था । मालिकों को से पचास नहीं है इसलिए इसे पेंशन के रूप में यह सहायता दी जा रही थी । कल जब मैं सर्कस के खेमों की ओर क्या तो सैयद हीरो के साथ सीकचों से काफी दूर घर अपने शिष्य को देख रहा था । उसका शीर्ष शहरों के साथ उसी स्नेह और विश्वास के साथ खेल में मस्त हूँ । सैयद ने मुझे बताया ये संक्षेप पुरानी मुझसे सीखे हुए हैं । मैं अब इनके पास नहीं जाता हूँ क्योंकि एक ही व्यक्ति से इन कसने उचित होता है । अच्छा तो अपने शिष्यों को उन शेयरों के पास देखा था तो उसकी आंखों में ईशा अच्छा फ्रेश नहीं, गर्व की झडप थी । अपने समय में सैयद शेयरों के विश्वविख्यात शिक्षकों में से था । आज तक शेयरों कि शिक्षक उसका लोहा मानती थी । उसका अपना ही ढंग था । खेल दिखाते समय पेशेवरों पिंजरे में भी भडकीली पोशाक पहनकर जाना पसंद नहीं करता हूँ । अपनी शाम के सूट नहीं होता मानो शेयरों का खेल नहीं टेनिस का खेल है । घर में की हाथ में केवल एक नरम लकडी रखता हूँ जिसमें शेर अपने नुकीले दांत कर रहा सकती थी । हम जेब में मांस की छोटे छोटे टुकडे रखता हूँ । जो शरीर अच्छा काम करता हूँ या जो बिल्कुल कुछ न करने की मोट में होता हूँ प्रेरणा देने के लिए एक आठ टुकडा उसी दिन आज भी आवश्यक नहीं समझता था कि शेर हमेशा सामने ही रहने चाहिए । अक्सर पिंजरे के बीचोंबीच कुर्सी लेकर कहना चाहता हूँ और संगीत की मधुर ध्वनि के साथ नहीं सीखा था । कभी कोई शेरनी पीछे से आकर उसकी जेब पर अपनी नाक रगड थी तो सैयद प्यार से कहता हूँ बिगडती जा रही हूँ । मान अपनी नटखट लडकियों से बात कर रहा है । मैं बताता हूँ शेर बडी मोटी होती हैं और भी हूँ । इसलिए न तो किसी पर अधिक ध्यान देना चाहिए न काम बटना । इनके बिगडने का डर रहता हूँ । सबका बराबर ध्यान रखा जाना चाहिए । इस सब दे रहे हैं और का भूमि रहे इसके लिए यह भी जरूरी है कि शिक्षक कभी खबर आई नहीं । शेरों को शिक्षा देने के लिए शेर का ही दिल होना चाहिए । सैयद हमे शांति शेरों को तभी चिंता छठी तक की होती तो शुरू से ही उनकी आदतों को देखता हूँ और पहला पाठ देने से पहले ही तय कर ली थी कि कौन सा शीर अन्य शेरों के साथ मिलजुल कर काम कर लेगा और कौनसा स्वतंत्र रूप से अच्छा काम करेगा । मैंने घंटो उसे मेरो को सिखाते देखा । तब ये यकीन करना मुश्किल हो जाता था कि ये कभी भयानक भी हो सकती है । मुझे बहत इनकी अच्छी तरह नहीं है । जब मैं सैय्यद की तंबू में गया था, नहाकर लौटा था । उसके पूरे शरीर पर घावों के अनगनित परेशान हूँ । छाती गंधी गर्दन का निचला हिस्सा ही टांगी । शरीर का एक हिस्सा ऐसा नहीं था । वहाँ का मान ऍम सांग तो इतना बडा काॅन् उसने मेरी ओर कहते हुए मेरी बच्चियों से कभी गलती नहीं हुई । ये तो मेरी ये किसी गलती के कारण हुआ हूँ । मुझे याद है एक बार रहे सर्कस मंडली ऐसे नहीं क्यों किया था । वहीं सैयद के जीवन की सबसे बडी दुर्घटना हुई थी । इस दुर्घटना का पूरा विवरण मुझे बहुत ऍम सर्कस की ही एक नर्तक ही मार्टिना उनसे मिला था पे सरपट दौडते हुए चार चार घोडों पर नहीं तय किया करती थी । उसने बताया था मुझे दुर्घटना इस तरह याद है मानो कल ही हुई हूँ क्योंकि मेरे जीवन में सर्कस की सबसे बडी दुर्घटना रही थी । मार्टिना होनी चाहिए की पत्तियों का उबला पानी पीते हुए पता हूँ । शायद सैयद को अत्याधिक आत्मविश्वास हो गया था । उसे अपनी सबसे पीछे शेख नी क्लियोपेट्रा से ऐसी आशा नहीं थी । मुझे क्लियोपेट्रा किया था । इस तरह से कुत्ती जैसे कोई चिडिया हवा में कलाबाजी कर रही हूँ । जब वह छलांग लगाकर ऊंचाई पर होती तो उसके पांव से तो एक सीट भी होती लगता । मानव कुछ क्षणों के लिए हवा स्थिर हो गई हूँ । सैयद ने उसे एक खेल से खाया था जिसमें वह एक रिंग अपने सिर के ऊपर था था । क्लियोपेट्रा पिंजरे की एक ओर से उस रिंग में होती हूँ, दूसरी ओर हो जाती है । इससे बडा खतरा था । अगर कभी क्लियोपैट्रा एक इंच भी इधर उधर होती तो ठीक सैयद के ऊपर की थी । सिखलाते वक्त कई बार सैयद के ऊपर गिरी थी पर उसने अपने नाखून कभी नहीं निकले और नहीं सैयद के शरीर पर खरोंच आनी थी, चुपचाप पीछे लुढक चाहिए । कभी सैयद उसे बीच में ही अपनी खत्म पकड लेता हूँ और मांस का एक टुकडा देकर कहता हूँ कई बात नहीं बेटी ध्यान रखना । मार्टिना होनी मेरा और अपना कब फिर चाय के पानी से भेज दिया । पूरी फॅमिली जानी क्या चाय बिजली वाली नेपल ठीक जगह पर नहीं लगाई थी और सैयद क्लीयोपेट्रा की आंखें चौंधियां थी । मैं जाने क्या हुआ । सैयद तो कहता है कि उसी की गलती भी उसकी आंखें जबकि और इधर क्लियोपेट्रा होती चलती में सैयद ने झटका दे दिया । दूसरी एक्शन है खून से लगभग पीछे पडा था आशीष जी बाहर परिवार की जा रही थी । उस घटना की याद से ही पार्टी नाम की कंपनी छूट गई । चाय पानी से काम कभी दूर करने की कोशिश करते हुए इसने बताया वो सैयद का सहायक बंदूक लेकर पिंजरे के बाहर खडा हूँ । सैयद को बचाकर क्लियोपेट्रा का निशाना साथ राहत सैयद खून में लगभग उठ खडा । उसकी वहाँ तो मानों अलग होकर लटक गई थी । पर इसलिए दूसरे हाथ से क्लाॅज दशकों की ठीक हूँ और शोरगुल में भी सैयद नी क्लियोपेट्रा को प्यार से डांटा और उसे पिंजरे में भेज दीजिए । उसकी टन की ठीक करके पांचों शेरों को भी पिंजरे में भेजकर तोडते । मैंने मार्टिना उनकी चुरुट सुनता हूँ और अपनी सीक्रेट फिरते तक हम चुपचाप बैठे रहे हैं । पहले मार्च ना ही पूरी जैसे ही सैयद को होश आया उसने मालिकों से प्रार्थना की कि गलती उसी की इसलिए क्लीयोपेट्रा को कुछ नहीं किया जाएगा । जोशी एकबार चित्र हो करते, उसे गोली से मार किया जाता है । अपना अन्य शेरों सेठी हाथो फॅमिली का अंदेशा रहता है । उसकी दर्शती कर मालिक को ऐसा वचन देना पडा हूँ । नीलामियों से हमारा सरकार लाशो से होता हुआ रंगून पहुंचा हूँ । मेम ियों के अस्पताल से सैयद सीधा रन उन पहुंचा तो महीने आराम करके मान लिया हूँ । मैंने पूछा था क्लियोपेट्रा का क्या होगा? मार्टिन ने बताया हूँ सैयद के सहायक भी एक बार तो प्रयत्न किया पर क्लियोपैट्रा नहीं उसके पास भी नहीं फटक दिया । सबसे कोर अलग पिंजरे में पडी रहती है । मैं जानता था कि सैयद इसके बाद कभी शेरों की पिंजरे की ओर नहीं किया । नहीं मानता था की गलती से ऐसी गलती तापमान तथा इसीलिए शेरों के पास में ही जाता था । उसकी स्वस्थ हो जाने पर जब सर्कस के मालिकों ने उसे फिर काम पर बुलाया तो उसने कह दिया । लगता है मुझे फेरों के पास जाने की हिम्मत कभी नहीं और जब मालिक ने देखा कि सैयद हर रात शेरों का खेल देखने पहुंच जाता है तो उसने उसे सहायक मैनेजर के पद पर नियुक्त कर दिया । सौ डेढ सौ किलोमीटर की दूरी कोई दूरी नहीं मैं अभी तक जबकि आदमी दौड रहा हूँ पर सर्कस की और डॉॅ । मेरे सामने सारी घटनाएं इस तरह चलती रही मानो मैं सिनेमा देखा हूँ । पास पहुंच कर मैंने देखा कि आग लगभग सभी काम पूर्ण तक पहुंच चुकी थी । एक तो मान ले कि करती है और फिर तंबुओं में लगी आग सब कुछ सूखी घास की तरह चल रहा था । उप सी मान ले के आग बुझाने वाले चीनी अपनी नींद खराब होने की अधिक चिंता हो रही थी । तमाम जानवरों की मिलीजुली चीज सिंघार थी, उन्हें अपना काम करने से रोक रही थी । जानी किस कोर्से कौनसा खूंखार जानवर भी करेंगे । इसलिए रक्षा का सारा भाई सर्कस वालों पर यहाँ पडा मैं भी साथ किया क्योंकि मुझे पता था कि किस ओर कौन सा जानवर है और उसे कैसे बचा जा सकता है । कोई दो मजबूत खोल लिया और किसी ने उन्हें शेरों की पिंजरे के साथ छोड दिया तो उन्होंने घोडों को हांक खेलकर तंबू से बाहर निकाल दिया । इस प्रकार शेरों के सारे पिंजरे बाहर पहुंचा दिए गए । लगते तक आकाश छोडने लगी थी । तंबू के आखिरी छोर पर केवल क्लियोपेट्रा का पिंजडा रह गया क्योंकि दीवार लांघकर भीतर जाना और पिंजरे को बाहर लाना असंभव था । इतने में मुझे सैयद दिखाई पडा हूँ कि उसे क्लियोपेट्रा की चिंघाड भी चेंज कर रही थी । उसी लगभग कर आग बुझाने वाले से लोहे की टोपी लेनी है और हम में से कोई कुछ कह सकता हूँ । क्या उसे रोक सकता हूँ? इस से पहले ही वो लगता के पीछे गायब हो गया । उसके लौटने की उम्मीद थी । क्या हो सकती थी? हम निराश सहायक खडे उन लगता के पास देखने का असफल प्रयास करती रहीं । अचानक वो बाहर है, अकेला नहीं । उसने क्लियोपेट्रा को अपने कंधों पर इस तरह उठा रखा था जैसे वो अपना खेल समाप्त होने पर उसे कंधों पर उठाकर दर्शकों की तालियों की गडगडाहट के उत्तर भी अभिवादन दिया करता था । मैं क्लियोपेट्रा के मुंह और गर्दन पर हाथ दे रहा था और कह रहा था खतरा नहीं भेजती हूँ । अभी ठीक हुआ जाता है । उसने क्लियोपेट्रा को बाहर पडे एक खाली पिंजरे में डांस थी और दरवाजा बंद कर दिया । ठीक है, हम साथी सैयद को देख रही थी । यहाँ तक की आग बुझाने वाले भी भूल गए थे कि वहाँ बुझने आई सैयद का चेहरा धुएं से काला हो रहा था और शरीर कई हिस्सों से झुलस गया था । उसे फौरन अस्पताल भेज दिया गया । उसके बाद सैयद ने फिर अपनी टीम बनाई । शेरों को शिक्षा थी । पर अब मैं हम मार में ही नहीं, अपनी टीम के साथ कई बार विश्व की यात्रा भी कर चुका है । एक बार किसी शेख में उस पर हमला करना चाहिए तो क्लियोपैट्रा नहीं चिंघाड कर उस चीज को खरीद के मुझे याद आती है । उस बात की विश्वास नहीं और उत्साह ये काम आते हैं । शेरों को शिक्षा देने के लिए हम मैं सोचता हूँ । साथ ही शेर का दिल भी होना जरूरी है, जिस सबके पास नहीं होता ।

16. Devta ki Maut

नौकरी और नानुकुर का कोई मिल नहीं । इस सच्चाई को मैं उस दिन समझ पाया जब मुझे कल सी चकत्ता रोड पर गाडी से जाने का आदेश भी । पहली बरसात के मौसम बडे साहब ने मुझे बुलाकर कहा उस साइड की सडकें, बरसात पीठ भी खराब हो जाती हैं कि उधर गाडी ले जाना मामूली ड्राइवर के वर्ष की बात नहीं है । मुझे तुम पर भरोसा है इसलिए संगठन की छुट्टी के दिनों में उस तरफ तुम्हारी ड्यूटी लगा दी गई थी । मैं चाहकर भी विरोध ना कैसा था कुछ चीज जरूर उठा था मेरा साथ ही कंडक्टर रात ही इस साइड के लिए पुराना था । बोला यार क्या मुहर में सूरत बनाए हैं । कई ढाणियों से देश में जा रहा है । रास्ते बंद हूँ तो पास के किसी गांव में जा कितना खूबसूरत पीना शिकार खाना आज वह खिलखिलाकर हंस पर दूसरी टीम से ही ड्यूटी नहीं तो कल से के ऊपर का रास्ता सचमुच बहुत खराब था । ऐसे कच्चे पहाड टूट टूट काॅल्स की कच्ची सडक पर मिट्टी के जाने कितनी पत्ते जम चुकी थी पर फिर भी पहाडों से मिट्टी और पत्थर रास्ते पर देते ही रहते । सिर्फ आठ मील के रास्ते में ही कई गैंग काम कर रहे थे । मगर पहाड तो जैसे मनुष्य के हाथ हूँ और उसकी बुद्धि से होड बंद था । जी जी, मिट्टी और कंकड पत्थर के हम बात की और लगातार टूट टूटकर झगडा हुआ वहाँ और दूसरी ओ गहरी भयानक जाॅब जाए तो भरी सडक सैंकडों फुट नीचे कटेंगे । निशान तक में मिले गाडी का बीच सडक पर कहीं तो इतनी तेज धारा में बहता पानी की गाडी नहीं थी । नानी कोई भरोसा नहीं और कहीं सडक के बीचोंबीच बडी खतरनाक घरारी जैसे सीता की गुहार पर धरती पत्ती को तैयार हूँ । सही तक ही रास्ता देख खराब है तो उसके आगे चकराता तक रास्ता तो अच्छा ही है । एक रात चकराता रहेगा, वापस देहरादून लाता था । वहाँ पर सही है तो पहुंच गए मगर आगे कालसी तक का रास्ता पंथा घाटी ले जाना असंभव था । एक तो रोज तक रास्ता ठीक होने की संभावना भी न थी । बारिश तो कुछ अधिक नहीं हुई, लेकिन पहाडी तीन बच्चे हैं की जरा सी बौछार से ही पुंथुरा जाते हैं । उस रात हमी सहिया में ही रहना था । राधे तो यहाँ के लिए पुराना था । होटल वालों लाला लोगों और जान साडी उसे काफी खुला मिला था । एक तो मैं नया नया था और दूसरे में किसी से अधिक हिल में नहीं था । राधी ने बता दिया कि ये जो लोग मैली फटा कमी टोपी पहनी ढीला सा लंगोट बांध ही गांधी पर टाट जैसे कपडे का कोर्ट लटकाए घूम रहे हैं ना यही जानकारी मामा ही और ढीला ढाला कमी । सुमा कुर्ता शोक रंग का घाघरा पहने, सिर पर स्काउटों की तरह काफी की तरह ढाठू बांध चेहरे पर अजीत सभा ली । फॅमिली ढाकिया या मानियां जिनके बारे में साथ घर बिना क्या सुहागन मशहूर है छोटा सा जैसे दो गुल का पैसा जिसकी एक हद गेट बनाना है और दूसरी बाजार उस बडे से वट वृक्ष की चारों ओर ही स्थित है जिसके नीचे तीन चार बे । साथ ही माल बिछाई बसी आने की प्रतीक्षा करते हैं । सामने ही जात खाना है । एक तो छोटे मोटे होटल, आटा, दाल वगैरह की दुकानें हैं, दूसरी और मिलिट्री की बहरे की हैं । खुद ही बैरकों में से एक नहीं सहकारी समिति का तब तक ही हैं इसलिए तो गाडियां आती हैं और भीड बैठ के एक गेट भी घट जाती हैं और गेट छूटने पर एक अजीब सुनापन भी नहीं बचा था तुम्हें गांव को मालाएं राधे के प्रश्न पर मैंने अस्वीकृति में से हिलाते । मुझे उसकी वह पार्टियाँ थी । अरे दोहा गांव में आज मुंडा बना है ये जानकारी त्यौहार भी देख लो । एक साल मेरे लिए जगह भी नहीं थी । हरी नाम की कुछ कुछ सत्तासी भी थी । पूछा क्या होता है? मैं देखता की पूजा करते हैं, लेकिन इसमें होता क्या है? खुद ही देख लेना । मैं नहीं खाती थी । दिन भर का बरसात का पानी जैसे दम लेने को रोक क्या था? कोहरे के साथ देने के लिए अंधेरा भी । उमर पराठा में राधे और दो चार चनी और हाथों में टार्च छाती हैं । दोहा गांव के लिए चलती जूती और बजा में उतारकर सैयद से कुछ ही दूर बहने वाली नदी पार कर गंदी फिसलन वाले रास्तों से टॉर्च की रोशनी के गोल वृत्त को लक्ष्य करती । हफ्ते चार मील की चढाई तय करने तो वहाँ पहुंचे तो बारिश फिर से शुरू हो गई थी । छात्रों के बावजूद हम भीगते भीगते उस पंचायती घर में पहुंचे, जहां आयोजन होना था । पंचायती घर की उस बडे से कम भी नहीं । बत्तीस लोग बैठे हुक्के गुडगुडा रहे थे । बीच में यहाँ चल रही थी । दस पंद्रह जन सारी स्त्रीपुरुष नाच रहे थे । उन मच से अपने शरीर को बुरी तरह से कम पा रहे थे एक अजीब से स्वर्ग में नहीं जाने कौन सा बजा बज रहा था वातावरण् तंबाकू और शराब की देखेगा कर्वे धुएं से जैसे भारी उठा था प्राधि नी बताया इन लोगों पर देता है इन सब पर जो नाच रही मैंने आश्चर्यमिश्रित गृहं जैसे कहा क्या देखता फटकर इन सब पर आ गया है । रात ही चुका हूँ हूँ अंधविश्वास मैं बहुत उठाया । तीन हो तो जरूर राधे नी कोई बीमारी जिन पर देता आया था वे लोग कमरे के बीचोंबीच बिना किसी गति लय के नाच रहे थे । कहना चाहिए फूहडपन से उछल कूद कर रहे थे तो जारी जैसे ये लोग जागरी कहते हैं । अजीब सी भाषा में अजीब प्लाई धुन पर कुछ कह रहा था । मुझे ना तो उसका जाना अच्छा लगता है ना कुछ समझ नहीं । राधे ने बताया महाभारत का प्रसंग कर रहा है । नाचने वालों में पुरुष भी थे । स्त्रियाॅ हर उम्र के सब शराब के नशे में धुत नशे से बहकर लडखडाते हुए मटक रहे थे । वहाँ की लोगों ने भी खूब शराब पी रखी थी । नाचने वालों में से कभी कोई कभी कोई जरा रुक कल शराब पी लेता और दुगुनी जोर से नाचने लगता हूँ । बनना जानी कैसा हो नहीं । जाकरी पडी जोर से कम का कर नाचने वालों का उत्साह बढा रहा था । मेरे का एक नहीं जाने क्या कहने लगा । ये उन सब के नाम पूछता है कातिर उनाव महाराज अर नाचने वाला उस देखता का नाम बताएगा जो उस पर हैं । लोग उस नाचने वाले पर आए थे । एकता को भुगतान देंगे । काउंट हुई मनौतियां करेंगे, जयजयकार करेंगे । राधे बता रहा था मैंने प्रत्यक्ष देखता हूँ लगा मैं न्यूज भी देख रहा हूँ । सामने पर्दे पर चित्र बन रही और प्लेबैक आवास विवरण करते हुए सुनाई पड रही है सहजा तेज गोला हाल ने सबका ध्यान खींचा । देखा सब नाचने वाले एक सी पर देखते हुए चपट रही । आधी नहीं बताई । हेलो पूछ रही हैं कि उस पर कौन सा देखता है । अगर ये है औरत नेता का नाम नहीं बताती तो ये लोगों से पीटेंगे । लोगे कि गर्म सलाह छुआकर इस औरत को आठ पर चलाकर उस देवता का नाम पूछेंगे क्या था उसका प्रेमी हैं जिसका नाम ये लोग इस प्रकार जानना चाहते हैं क्या यह औरत बोलता है? नहीं पता था मैं तो फंसवा नहीं समझता हूँ । इस तरह ये लोग परीक्षा लेते हैं कि उस पर सच कुछ देता आया है मैं बन रही रात ही पडता है कमरे के बीच चलती उस आदमी और अधिक लकडियाँ जानती नहीं काफी ऊंची उठ रही थी स्त्री जैसे संज्ञाशून्य सी थी एक मुझ पहुंचकर आप की ओर ले जाया जा रहा था । लगता था कि उसे आग में धकेल ही दिया जाएगा फ्री छीन साहब प्रतिकार कर रहे थे वातावरण् जैसे सब हूँ हूँ आसमान टूट पडे धरती ठंडक उठे थे सब हत्प्रभ से रहते हैं किसी का क्रोध ना भरता किसी का भी ऍम यानी हूँ मैं कमरे के बीचोंबीच आपके पास था इसी इलाके खेमकर मैं उन धकेलने वालों पर टूट पडे सब आश्चर्यचकित सिंह एक और हटकर यहाँ चाहता था । लकडी एक ओर फेंक कर कठोर स्वर में ठीक है मोर हूँ ये त्यौहार हुआ करते हैं ऐसे बनाई जाती है यहाँ इस अप्रत्याशित घटना से सब स्तंभित हो गई । सिर्फ जाकरी क्रोध से किंतु सहमते हुए बोला आप नेता की पूजा में देखना डाला है देवता का कोर्ट जरूर बिजली बनकर गिरेगा । तुम पर मुठ्ठी और तुम्हारी जैसे देखता हूँ । पूजा ऐसी की जाती हैं मैं कर सकता हूँ । तभी राधि मेरे पास आकर मुझे वहाँ से निकालना है । फिर डरे स्वर में बोला ये तुम्हें अच्छा नहीं किया जानी क्या होने को है? कुछ नहीं होगा । अंधविश्वास और काल्पनिक देखता क्या कर सकते हैं किसी का इस घटना के कारण हमें गाओं में कहीं जगह नहीं मिली । रात को ही हमी सैया वापस आना पडा । दूसरे दिन रास्ता ठीक हो गया था । जिन स्थानों पर मलबा गिरा था वहाँ बुलडोजर रास्ता साफ कर दिया था । एमबीबीएस के एक कर्मचारी के कथनानुसार अबकारी कालसी तक पहुंच सकती थी । सुबह गेट का समय पानी नौ बच्चे हैं मगर साढे दस बजे तक भी किसी को गाडी ले जाने का साहस का हुआ था । मैं खडा गाडी का इंजन देख रहा था और यह भी लक्ष्य कर रहा था की साफ धुले कपडे पहनी एक सज्जन गाडी के चारों ओर घूम रही है । जैसे सोच रही हूँ कि मेरी तन्मयता में बाधा डाली या नहीं तो मेरे पास आकर बोली ट्राइ ऍम साढे दस बच्चों की गाडी नहीं जाएगी क्या? मैंने एक दिन जरूर नहीं था बोला रास्ता खराब है, ऐसा गाडी कैसे जाएगी अगर मैंने तो सुना रास्ता ठीक हो गया है ना । मैं तो इस साइड के लिए नया हूँ । कंडेक्टर से पूछ लीजिए । मैंने रहा रही की ओर इशारा किया मगर उसके कुछ कहने से पहले ही राधे बोल उठा नहीं नहीं जारी नहीं जाएगी । भूल गई जागरी ने क्या कहा था हूँ । अरे यार, तुम भी अजीब आदमी हो, बेकार में डर रही हूँ । मैंने लापरवाही से कह रहा हूँ, लेकिन उस आदमी को क्या लेना था, इन बातों से बोला हूँ मेरा देहरादून जाना बहुत जरूरी है । कालसी तक पैदल चलकर भी मैं समय पर देहरादून ना पहुंच सकूंगा । हर घर में टेंडर खुलने की वक्त ना पहुंच सका तो पचास हजार रुपये का नुकसान हो जाएगा । नहीं आपके पचास हजार के लिए हमें गाडी गड्ढे भी नहीं गिरानी । राधे ने रूखे स्वर, मीका और बहुत बताया । सारी बातें सारी अगर पहुंच जाएगा देता को फिट है उसका कोर्ट बिजली बनकर गिरेगा । उसकी कहाँ था उसके अंधविश्वास पर मैं शुद्ध होता था, फिर ना जाने क्या हूँ । मैंने उन साहब से कहा तो कोशिश जारी जाएगी । राधी ग्रोथ सिटी का । तुम पागल हूँ जारी नहीं जाएगी । ठीक है फॅमिली राधी व्यवस्था से बुदबुदाया । वहाँ जानी क्या होने को भर से कम आ रहा है । गाडी छोडकर जाते ही नहीं सकता था । मजबूरन साथ चलना पडा । उसे दूसरी गाडियों के ड्राइवर भी अभी तक हिम्मत बांध पाए थे । सब आश्चर्य फिल्में देख रहे थे । दो तीन जनि जिन्हें देहरादून में बहुत जरूरी काम था, गाडी में बैठे थे । मैं ड्राइविंग सीट पर बैठ गया और जारी स्टार्ट कर दी । तूने वाले डालेगा वहाँ बहुत ही तेज था । कल की नाले में फंसी गाडियां आज सुबह बडी मुश्किल से निकाली गई थी । नाला देखकर सवारियां और राधे का छूट नहीं करूंगा । मेरा भी दिल कांप उठा था मगर हिम्मत बांधकर गाडी मैंने बहाव में डाल दिया । गाडी के पहिए तेजबहाव से प्रतिरोध करते करते धीरे धीरे सरक रहे थे । एक बार तो लगा वही धन से ही तारीख से ही उस समय जाने क्या हुआ नहीं जानी मैंने क्या ऐसा क्या की गाडी नहीं जा पाते थे मेरे साहस की जैसे लाज रहेंगे खेला का गाडी के पहिए सच मुझे आगे बढने से इंकार कर रही मैं हैरान रह गया । पानी के बाहर से बाहर दलदल जैसी देखनी गाडी के पहले धंस गई थी मैंने मशीनरी को बहुत आजमाया मगर कुछ बन पडा । गाडी से नीचे उतर रहा है अपराधी और समारिया तो पहले ही उतर गए थे । रात ही बता रहा हूँ नहीं कहता था हाँ पहले तो काम से ज्यादा जान प्यारी है । किसी मैं चुप हो दस पंद्रह अपनी इकट्ठे हो गए उन्हें बुलाया और ड्राइविंग सीट पर पहुँच गया । सब की मिली जुली कोशिशों से गाडी कुछ सकती राधि नी पहले के पीछे लकडी का गठ्ठा लगाए फिर जोर लगाओ । गाडी फिर सर और आधी नहीं दोबारा कट लगाए । फिर एक तो बाहर की कोशिश नहीं तारीख को दलदल से निकाल दिया । सवारियां और राधे बैठे और गाडी फिल्म चल पडेगी । मामूली पीठ पर गाडी ले जा रहा था । नहीं दृश्य एको टूट से पहाड और दूसरी तरफ गहरी भयानक खाएंगे । पहाड से की टीम की सडक पर इकट्ठी हो रही थी । थोडी मिट्टी के ढेर पर से तो गाडी भी निकल गई । वजह ढेर पर से गाडी न निकल पाती । वहाँ मजदूर काम कर रही थी । सही से लगभग पांच किलोमीटर पर जहाँ मलबे की वजह से निकलना कठिन था । मजदूर लगे थे और बुलडोजर काम कर रहा था । पांच ही खाना फॅमिली इसका ओवरसियर मिलिट्री टेस्ट पहने काम कर रहा था । हमारी गाडी की आवाज सुनकर मजदूर हटके बुलडोजर एक तरफ कर लिया । तारीफ हुई । धीमी हुई तो ओवरसियर ने कहा ट्राइबस घबराओ नहीं सडक की को रही । जरा ध्यान से गाडी चलाना मैंने सिर हिलाकर जवाब क्या अच्छा साहब और गाडी आगे बढाते । मैंने स्पष्ट अनुभव किया । पीछे रात ही हनुमान चालीसा का जाप कर रहा था । यात्री भी भगवान को याद करते मनौतियां मांग रहे थे । अपनी मुझे रास्ते में मशीनरी के अलावा कुछ नहीं दिखाई देता हूँ । कुछ नहीं सोच रहा था । हल्की स्पीड पर में गाडी ले जा रहा था । सही ऐसी पांचवें और छठे मेल के बीच हमारी कार्य थी । संस्था बगल में बैठाते ठीक है । ट्राॅली को वहाँ टूट रहा है । नहीं नहीं देखा डालेंगे और पहाड से मलबा खेल सकते हैं । लगता था कुछ क्षणों में गाडी चकनाचूर हो जाएगी । एक बार तो दिल कांप उठा, फिर एक्सीलेटर दबाएं । उस भयानक रास्ते पर गाडी फर्राटे से दौड पडे । दूसरी ही पीछे की ओर गाडी की बॉडी पर कुछ लगा स्टेयरिंग अपनी यहाँ पर काबू रखकर गाडी रोकी जाती । पीछे का दरवाजा खोलकर चीखा ही भगवान बार बार बच्चे मैंने नीचे उतर कर देखा । पीछे के दरवाजे पर लगा लकडी का चौक था । आधे से ज्यादा टूट गया था । बॉडी पर कुछ पत्थर लगने के कारण निशान पड गए । दस का पीछे रास्ता मलबे से इस तरह भर गया था कि आदमी तक नहीं कर सके । रात ही बता रहा था हूँ । थरथर कांप रहा था । आंखों से आंसू छलक आए । यात्रियों का तो और भी बुरा हाल था कि कभी मुझे कभी रास्ते को और कभी अपने आप को कोस रही थी । मौत छूकर लौट गई थी । फिर दिन थामकर सीट पर बैठ गया । रात ही कुछ बुरा रखता हूँ । मैं कहता था नहीं देखता, कुपित है और उसका को पिछली बनकर गिरेगा ही । कोहरा इतना घना था के हाथ भर दूर की भी दिखाई नहीं । मैंने हैडलाइट चला ली थी और उस रोशनी में रास्ता देखता तो धीरे धीरे गाडी चला रहा था । तीन किलोमीटर ही चले होगी की रात ही चीज पडा ककाडी खर्च भयानक हो रहा है । जरा ध्यान से मैंने देखा । ताई ओडकी घाटी से पानी की काफी चौडी धारा सडक पार करके खाई नहीं दे रही थी । धानी के वहाँ टिकट कर सडक के बीचोंबीच दो पांच बन गई थी । सपने डर से आंखे बंद करके जैसी मौत का देखता भयानक भेज में आ रहा हूँ । राधे चीख रहा था । मैं कहता था ना नेता को फिट हैं, उसका कोर्ट के रहा है । तुम्हारे ऊपर लो तो अविश्वास का अपने साथ हमें भी ले लो । मुझे लगा मेरा साहस जवाब दे रहा है । मेरे हाथ पांव मेरी थी । सब मेरा साथ छोड देंगे । फिर वहाँ थी तो जाने क्या सूझा की गाडी डॉक्टर पर छोड स्टेरिंग मजबूती से हमें काम आता रहेगा । गाडी धक्के खाती, ऊंचा यात्री और राधे सीटों पर लुढकते पढते चीज चला रहे हैं । मगर मेरा ध्यान इन चीजों की अपेक्षा मशीनरी पर अधिक था । नीचे नीचे रास्ते पर घट और ऊपर से आते मृत्यु के देखता था । मेरा रात में विश्वास के साथ दे रहा था । मेरे हाथ यंत्रवत कलपुर्जों पर घूम रही थी । तेज पीठ में गाडी को धंसती का अवसर ही नहीं किया । गाडी नाला पार करके नहीं होती है । जोर का धमाका हुआ । सब तीस हो गए । लगता मानो गाडी पर पहाड टूट पडा सुनी जमीन निकल रही हूँ । कुछ देर में समझा तो देखा बहुत बडा पत्थर जड से उखड कर सडक के पूछते के लिए सैंकडों फुट गहरी खाई में जा गिरा है । कुछ दूर तक सडक ही गायब हो गई थी । पर राय गले से चिल्लाया क्या हुआ देखता क्या रैली जैसी यंग जैसे कहा अगर है कि उस साम्राज्य में व्यंग्य का अस्तित्व ही ना

17. Thanda Khoon

एक मुकदमे के सिलसिले में मुझे एक सप्ताह इलाहाबाद रुकना पडा । वहाँ से लौटा तो स्टेशन पर ही बाबू त्रिलोकीनाथ डाॅॅ पच्चीस होता है इस गाडी से उतर रही है फिर आप को क्या मालूम होगा? अजी साहब ये कलयुग जो ना करा देना हो रहा हो बात हैं महापाप कुली सामान उठा चुका था ये दैनिक में अस्थिरता से पूछ आखिर कुछ कहेगा भी गरीब है तो चलाने से क्या होता है आप एसी सतियों बनाई मैं थोडा पांच साखर पूरी बनने का शेर टाइगर मारा गया । नालायक का दिमाग फिर गया था जो ऐसी औरत हमे ला बिठा रेहता औरत होती तो उसे आदमी का दुख होता हूँ, निकलता होती लेकिन ऐसी बाजारों औरतों का क्या है साथ जो ठिकाने करती है ही रह हैं । जिस आदमी ने सहारा दिया उसी का फोन कर दिया स्टेशन के बाहर मुझे इस बात पर विश्वास ही इस तरह से छूट टीवी ऐसा नहीं कर सकती । फॅमिली जानता हूँ कि सात तक घर पे ही विश्वास करते हैं लेकिन मैं डॅाल दोनों को जानता हूँ । खुद समझता हूँ डिबिया सही हो । मैं ऐसे नृशंस कार्य की कल्पना भी नहीं कर सकती, ट्राई करती नहीं । शेर है बडे ही जीवन का सुबह शाम खाने में हड्डियाँ तोड ता तीन भर मुहल्ले की खैर खबर रखता है । उसके शरीर में हाथ जैसा बाल है फिर भी मोहल्ले के लोगों की वह इस वक्त करता है । दुर्बल से दुर बन आदमी के सामने भी चुप का चलता है । लेकिन मोहल्ले पर कोई भी पत्तियाँ पडे तो शेष हो सकता है । हालांकि के घर कुर्की आई तो सुबह से ही इसके दरवाजे पर पहरा देता रहा हूँ । जब साहूकार आदमी को ले जाकर बाकी की कह रहे तो यह टाइगर का ही दम था की एक एक को उठाकर मोहल्ले के बाहर फेंका था । हमारे देश में हिंदू मुसलमानों के दंगे हुये । पटाई कर की बदौलत मोहल्ले में सुख और शांति का साम्राज्य स्थापित है । उसकी एक हुंकार के सामने बडे बडे सूरमा पानी भरती हैं । मैं अकेला है सेवा मोहल्ले वालों की उसका कोई नहीं । एक सुबह बहुत अच्छी बात हुई । जिसने भी देखा सुना उसके ऍम लोगों के मन में तरह तरह की आशंकाओं ने घर कर लिया । जब बात उठते उठते टाइगर के कानों में पहुंची तो उसने जो समाधान कर दिया । हाँ उसके एक मित्र की लडकी है उमर तेवत दिव्या का हाथ उसके हाथ भी पकडा गया था । क्यों बात आई गई हो जानी चाहिए थी । पर एक दिन किसी ने मोहल्ले में बुरा ऍम टाइगर इसी शिवरामपुर के दंगल से भगाना अच्छी बात फैलती देर लगती हैं पर लगता है जैसे पूरी बात की होती है टाइप ऍम जहाँ कोई दूसरे का नाम लेकर कहता कि फलाना नहीं यह कह रहा है टाइगर बीच की बात राहटकर छाती ठोंक करके जिसकी माने दूध पिलाया हूँ साले सामने आकर कहे एक एक का मुखौटा उतार ऍम तो असल की आ जाती है ये ससुरे तिलक धारी पंडित और लाना दिन के उजाले में गला फाड फडकर ऐसे धर्म और मर्यादा की दुहाई देते हैं जैसे धर्म और समाज का ठेका यही लिए हूँ कि रात के अंधेरे में यही लोग ऐसे ही तमाम लोग कोठेवालियों की तरह चाहते हैं । ये पूरा हॅूं ये सारी मोहल्ले में आग लगाता रहा बेटी और बीवी में जिसके लिए कोई फर्क नहीं है । समाज सुधारक बनाए अक् लेकिन धोनी सालों को भ्रष्टाचार विरोधी समिति का मंत्री बना दिया है । आज तक जो भी लडकी अपने सतीत्व की रक्षा ही तू इनकी शरण में पहुँचा हूँ । मैं फिर सतीत्व लुटाकर ही लौटी । हमर का बच्चा है तो मुझसे भिडकर देखिए, सारा मंत्री पर नहीं निकाल दो ना तो फिर कहीं एक दो बार दिव्या हमारे घर दिया चुकी थी । उसके व्यहवार बातचीत से हम सभी बहुत प्रभावित हूँ । मेरे दिल में उसके लिए सहानुभूति थी कि देवी आई भारत है खरीद मैं फिर से पहले वह और अधिक राहत निवेश । यदि वह पूछना चाहती है तो दुनिया का कौन समझ था? कौन से सभ्यता यही कहती है कि उसे उठने न दिया जाए? कितनी घिनौनी है हमारी सभ्यता, जो भारत को वैश्विक तो बना सकती हैं, लेकिन एक दशक को भारत नहीं बना सकती । पर इससे क्या तीनों की बाबू की कथन की पुष्टि घर पहुंचकर आशा ने भी वही बात कही । मोहल्ले वालों से भी हूँ, डिब्बियां नहीं, टाइगर का खून किया और वह अपराध स्वीकार भी कर चुके हैं । मैं तो सोचता रहा ये कैसे हो सकता है? ढाई कर का खून दिव्या ने नहीं किया तो उसने गिरे स्वीका कैसे कर लिया खून कि सैंकडों मुकद्दमें लडेंगे? नहीं नहीं ऐसा कहीं नहीं देखा की एक औरत एक आदमी को प्यार करती है । फॅमिली उसे अपने घर ले आता है । फिर क्यों में औरत उस आदमी का खून करती है? डबल तो खून कर ही नहीं सकती और यदि वही करती भी है तो इस स्थिति में कैसी इतवार की सुबह जेल के कैदियों से मिलने का दिन होता हैं भी नियत समय पर सेंट्रल जेल जा पहुंचा और दूर से आती थी मेरे को देखकर किंकत्र्तव्यविमूढ हो कर रहे क्या की आंखों में कहीं की दुख तेरह प्रयास एक आप का कोई भावना था एकदम शून्य गंभीर कुछ देर तक रहे पास आकर थोडी अपने दोनों हाथों को देखती रही । मेरी ओर देखे बिना ही तरह रोकी स्वाॅट जो अच्छा ही हुआ था जब आप साइंस मेरे भाई बनकर यहाँ तक आई हैं यह नाता जोड लिया है तो मैं आज आपको वकील साहब कहकर इस संबंध से दूर नहीं ले जाना चाहती हूँ । आपने भी बेकार में इतना कष्ट किया मेरा मन उखड पढा हूँ क्या कहते हैं चोट के पास ही होते हैं लोग लाख कहाँ करेंगे की तो नहीं टाइगर का खून किया है लेकिन मैं नहीं मानता हूँ । मैं चाहता हूँ कि मैं तेरा मुकदमा लडूँगा फिर देखता हूँ कानून एक बेगुनाह के सिर्फ फोन कैसे मार सकता है? भी गुना भेजना कौन है यहाँ का था आपको क्या अभी तक विश्वास ही? लेकिन इसमें विश्वास जैसी बात क्या है? हफ्ते दोनों हाथ मेरी ओर बढाकर हूँ, बोलिए यही हाथ हैं जिनसे टाइगर का खून किया है । अब ध्यान से देखो उसके ईमान जलील कमीने टाइगर के ठन्डे खून से मेरी हथेलियां इस वक्त भी पर सीखी तूफान का एक तेज झोंका जैसे पेडों को झक छोड दिया मेरे विश्वास की जडी धीरे से ही हूँ रखते रखते शाहिद यही दो शब्द मेरे घर से भर्ती है आपकी दोनों हथेलियां जोर से रहते हुए पूरी खान था ठंडा होनी इतनी जलालत पर उतर सकता है खून भला नारी को क्योंकि रह सकता है टिबिया को भाव देखकर मॅजिनी सबका टाइम किसी के असंबद्ध टाइगर का बहुत संबंध रहेंगे लेकिन यह एक लंबी कहानी है । हाँ, दादा क्यों? देखने में ये कहानी भी मामूली हो तो क्या हैं? तो उस से लिपटी बात समस्या तो छोटी नहीं क्योंकि उसका कोई समाधान नहीं है । तो शैतान की आपकी तरह जिसका कोई ओर छोड नहीं मैं कुछ रुककर फोर्टी वैश्य होना, टाइगर का खून करना तो उन्होंने टाइगर के साथ खाने से पेट में शिवरामपुर की रंग क्यों कि एक परिवार उसके पहले हरिद्वार के एक दे वाले में थी । हाँ, उसके वाने में आने से पहले मैं कहाँ थी? पिछले कुछ भी आती थी कभी कभी मुझे लगता है मैं कहीं अच्छे परिवार भी थी । एक धुंधली सीट्स नीति कभी कभी समय की धूल झाडकर सामने आती है की छोटी बच्ची थी चार या पांच साल की । हम लोग कुंभ के मेले में हरिद्वार आएंगे । अचानक ठीक नहीं । मैं अपनी माता पिता से छूट जाती हूँ । बच्चे तीन दिन बाद मीडिया खुली तो देखा एक लम्बा चौडा आती । खूब बडी ही कंधी पाॅल गेरुआ वस्त्र पहने, मेरे सिर पर हाथ ऍम कि तुम्हारी माता पिता को गंगा माने अपनी कोर्ट ने ले लिया । आज से यही तुम्हारा घर है । तुम्हारा परिवार मैं रोई, चीखी चिल्लाई, हाथ पैर पटक नहीं लगी तो उस आदमी ने एक कपडा मेरी हूँ बता रहा हूँ फिर शायद इंसान जीतेजी कब तक हो सकता है । जब जब मैं उठती चीखती चिल्लाती बाहर को भागती तो फिर वही कपडा जबरदस्ती मेरे मुँह में डाल दिया जाता है । आखिर बेचा क्या? और अधिक नहीं सोना चाहती थी तब तो साथ ही नहीं मुझे देवी माँ के चरणों में पहुंचा दिया आप पार्टी से दूर एक देवाले में देवी माँ और अपनी उम्र की लडकियों धीरे धीरे बिना मंदिर हाँ नटराज की एक विशाल प्रतिमा के समय में हम सभी लडकियों को नाचने गाने की शिक्षा दी जाती है हमारे साथ कुछ पडी लडकियों नहीं हम सब कुछ कृत्यादि सिखाती आधी रात तक यही कार्यक्रम चलता हम कर छूट जाती । सारी बेहतर से पत्ती होती तो हम छोटी लडकियों को एक कमरे में बंद कर दिया जाता है और साथ ही बडी लडकियों को तेरी माँ कर रहे हैं । स्वामी माया अपनी साथ बराबर वाले कमरे में नहीं चाहिए ऍम रीना के भाव और कही होती थी । मैं कहने लगी फिरता था हम सभी लडकियाँ सोचती कि हम लोगों को बडी लडकियों से अलग क्यों रखा जाता है । टीवी माँ कीमत से अधिक क्योंकि सात की सभी लडकियों ने में सबसे सुंदर थी यहाँ साइन थी । मैंने साहस करके पूछा कि देवी में हम लोगों को आप अपने साथ क्यों नहीं रखती? गर्मी देवी मानेका तो भी अंदर आया अभी से इतनी बेचैन की होती है । सब हो जाता हूँ देखना तेरह बिंदु तेरह यौवन देखकर तो नटराजन की पत्थर की मूर्ति में भी जाना जाएगी । अभी तो नहीं तो अमृत के कूट पीने के लायेंगे मैं स्वामी मायानंद कि आध्यात्मिक चर्चा ही समझते की तुझे पता है प्रमुख का आनंद प्राप्त करने के लिए तो अभी बहुत छोटी थी । उस समय देवी माँ की बात नहीं जरूरत ही नहीं समझी ये सामली हूँ के साथ ऍम आनंद सब कल्पना की बात की थी इतनी ऍन वहाँ भी बडी हुई इतनी बडी की जो कुछ टीवी मानी पता हूँ इस की एक ही पहुँच किसी तरह पांच छह वर्ष बीट इस बीच सब बडी लडकियाँ के ही दूसरी जगह भेज दी गई । बहुत पूछताछ करने पर भी इतना ही मालूम हुआ कि वे सब दूसरे देव आने में काम कर रही है । हमारे कमरे में कुछ छोटी लडकियों आ चुकी थी फिर वहाँ खडी नहीं होंगे । भूमि साठ वाली कमरे में टीवी मांग और स्वाॅट के साथ था । तीन शाम से देवी मानी हम लोगों का कोर्ट श्रृंगार थी । ऊपर सिंघार नहीं हम सभी एक दूसरे से बाजी मार रही थी । मैंने श्रृंगार आज के बाद ही में अपनी छवि देखी होगी । मुझे लगता था अब सुनाई भी मेरे सामने कुछ नहीं । हम सब अमृत की पीठ आध्यात्मकि । चर्चा अग्रम के आनंद की सुखद स्वर्ग फॅमिली टूटी हुई जब कमरे के अंदर पहुंचे तो रहता ही जा चुकी थी टीवी मानी अंदर से दरवाजा बंद किया हम समाज की रात शपथ हूँ कि जो कुछ भी तुमसे कहा जाएगा नहीं हूँ । प्रमुख को जानने के लिए उसके आनंद की प्राप्ति के लिए आवश्यक है । मनुष्य मायारूपी चीज को दूर फेंकते एक बार भगवान कृष्ण नी नदी में ना हाथ गोपियों के वस्त्र चुरा ली थी और से आग्रह किया ऍम यदि तुम सब मुझ से प्रेम करती हो और ड्रम यानी मुझे क्लीन हो जाना चाहती हूँ तो फिर अपनी इसी रूप में जान से बाहर हूँ । किस प्रकार माया आत्मा को ढके रहती है, उसी प्रकार ये वस्त्र तुम्हारी शरीर को ढके माया ये वस्त्र ही तो बाधक हैं । चुप रानी को ब्रहमलीन होने से रोकते हैं । हाँ, फिर फोन को उस अवस्था नहीं कह रहा हूँ । एक्शन रुककर देवी महीने का अब तुम्हें भी उसी ब्रह्मा से मिलना है । किसी भी संकोच होकर अपनी अपनी वस्त्र उतार थे और इस अमृत पात्र में से एक एक प्याली चल नाम रखती हूँ ताकि आत्मा शुद्ध हूँ और चित्रा एक कम हो सके । हम सभी लडकियाँ लात से गए है । भूत की तरह अपनी अपनी जगह खडी थी तो स्वामी माया में न्यूज कर हमारी उन्हें खींचते हुए कहा ऍम आध्यात्मकि राहनी लाड संकोच कर सकते की बीमारी भी स्वामी मायानंद का हाथ पर जाये । हमारी इलाज की ढेरी एक कोने में रखती थी फिर हम से है जैसी कडवा पाटीदार अमृत का पान कराया गया ऍम से सारी शरीर लेता हूँ डीएवी महाने अमृत के चार फॅमिली अब तुम सब स्वामी जी के चारों ओर इस प्रकार हो की तुम्हारी स्वामी जी के अंगों से स्पर्श करते किसी ऐसा नहीं किया । उसी बहते हुए छोटी अहम महान शक्ति प्राप्त नहीं होगी । हम सबको उस वक्त जानी क्या होंगे? अंसारी कदमों से बढकर स्वामी जी के पास बैठ के स्वामी जी ने हमारे शरीर साथ देती थी । आज हम घर अपनी फॅमिली हाँ आज की रात सिर्फ दिव्या को भी आध्यात्म का प्रवचन दिया जाएगा तेरी माने हाथ चोट जैसी प्रभु की फिर मैंने देखा टिबिया की सांसें तेज होते नथुनी फूल के नहीं दोनों हाथों से जमीन खरोंचते हुए हैं । साॅस फिर सब में टी हो क्या स्थितियां ठीक रहा बनाती हूँ हूँ तो उस स्थिति लूंगा । तीसरे दिन सोना और यह क्रम रूस जानता रहा है । सब ठीक रहा बनाती थी अपनी जगह शराब की काॅपी भट्टी हम सब को तबाह ऍम स्वामी मायानंद उन पक्का इतना मजबूत थी उसके बाद हमारी जिंदगी में बहुत कुछ है ही नहीं । फॅमिली समझती हूँ तेरी फॅमिली हाथ उसका स्कूल की व्यापारियों की हम ताकि कहीं किसी ठीक रे की पहचान ना मैं अभी भी इसी के बिना ठिकाना शिवरामपुर गांव में फॅमिली मायानंद दोनों ही खुश थी । फिर आपकी मालिकों को कुछ नहीं करता है । शिवरामपुर में खर्चा धनिया मंदिर था तो मेरे पास आता हूँ फिर ना था क्योंकि मैं अपने कार्य में दर्ज नहीं थी । जैसे जैसे रात की स्याही पडती मेरा खून जब नहीं लगता मैं मुर्दा पडी रहती है और रात भर का मालिक भेजकर चला जाता हूँ क्योंकि उससे तो आना चाहिए नहीं तो फिर पलट करना । धीरे धीरे मेरे खरीददारों कैसा मालूम हुआ कि मैं शरीर के व्यापार के लिए भी हूँ । बजे खूब मार खानी पडती है । तब मेरा मन होता है कि कहीं भाग जाऊँ, लेकिन इसका नहीं मिला । घर में उसी नरक में घुटती रही । फिर इस घटन को भी रहा हूँ । शिवरामपुर में बैसाखी का मेला बहुत धूम धाम से होता है । फॅमिली खेल तमाशे में ही मैंने टाइम क्रिकेट ठीक कितने दिन शरीर का व्यापार करने की बात भी कोई आदमी मुझे वो अहंकारी नहीं भरता है । टाइगर कि एक ही नजर ने सारे शरीर में हमारे तेरे पर भी आया । उस रात मैं उसी की थी । किसी मैंने एक हिमाचल में अपना सब कुछ दे दिया था । पहले ही निकल जाने पर थोडा ब्रेक एकत्र जोहरी ही जानता है । ये साले भी होंगे । कुमार क्या जानी आज शहर में होती तो बडे बडे हकीम काम राजा नवाब और मिनिस्टर तक तेरे कदमों में पडे होती हूँ । ये ट्राई करके आंखों में झांका पीछे वो सब कुछ नहीं चाहिए । मैं तो उस आदमी की तलाश में हूँ तो नहीं । एक पर घर पेट नहीं आधा पेट ही खाने को देते हैं लेकिन उसमें इतनी ताकत हूँ कि मुझे और अधिक नहीं रही थी । तेरा क्या पहलवान आदमी ठहरा । भारत की लालसा, उसकी भावना क्या समझे? टाइगर के मन में इस समय क्या था? मैंने समझ सके कि जब उसने मुझे अपनी बाहों में भरकर पूछा कि देख लिया पिछले औरत बनने की हिम्मत है तो मैंने कहा होता तो तिनके का सहारा खोजता है, मिले तो सही हूँ । उसी रात टाइगर मुझे उसके अंदर की सिलिकाॅन की सांस की हर एक ऐसा आदमी चाहती हैं जिसके विशाल वक्षःस्थल और बलिष्ठ बाहों की छाया में मैं अपने आप को सुरक्षित समझ सके । लेकिन यहाँ पर देखा कि मैं सुरक्षित नहीं हूँ । मुहल्ले में मेरे पुरानी जिंदगी की खूब चर्चा होती । इंसान कितना ही दूर भागे तक जहाँ मैं पहले उसे फूल नहीं करता हूँ । जैसी जैसी चर्चा बस्ती स्वामी मायानंद के प्रति मेरे भीतर सुधरती कहाँ रहती है ना में है । हॅूं टाइगर की होती थी । कितना बहादुर है अच्छे अच्छे लोगों को कीडे मकोडे की तरह मसल देता है । कमजोर होता तो क्या यह होने आम मुझे रख सकता हूँ । लोग कहते हैं हमेशा समाज का एक गंदा किनौना सडक लांग है । कितना कहा था क्या शरीर का कोई हम स्वयं करना चाहता है? नहीं हूँ बल्कि स्वामी मायानंद जैसे सिद्धपुरुष ढोंगी पे शायद तब में जितना ही सोचती अंतर क्या थॉमसकुट्टी पहले मैंने सोचा की टाइगर को बचाकर अपने अपमान का पतला ले लो । लेकिन उस वक्त टाइगर कि उन्होंने मुझे रूकती हार का खाली बस तुम स्वयं ही टाइगर से छोडा, चलाना सीखी लगी है । पूछता तो कहती थी भारत को अपनी रक्षा के लिए सीखना चाहिए । फॅमिली जानी कभी ऐसा वक्ता पडता टाइगर किसी काम के लिए दो दिन के लिए पसंद किया । इस बीच में हरिद्वार जा पहुंची हामी मायानंद गंगा घाट पर बैठे हरी बहुजन में मतलब थी मुझे देखा तो गदगद होती थी । टिकिया पेटी कल्याण हूँ । कैसे कष्ट किया मैंने धीरे से सामी की आज की रात में आगे की बात स्वामी मायानंद समझे । उसी रात उनकी कुटिया से जब बाहर रहे तो मेरे हाथ ठंडे खून से सुनी थी । माननी दमखल का था मेरा सबसे पहले तो समाज के लोगों को सुनने वाला एक खीरा मर गया था तो उसे देखेंगे कहाँ नहीं? समाप्त नहीं फॅमिली की बात करती हूँ । उठा था कई साथियां नहीं कभी कभी वो बहुत ही होता । मजाक करते हैं कुछ नहीं कहता हूँ मैं बहुत शिकायत करती तो हस्ते था खरीदी थी । तब यहाँ आकर यहाँ सती सावित्री वाला चरित्र नहीं देखा तो तुझे जो समझ रहे हैं आखिर तो अभी है । तो वहीं मैं उसके दोनों काम पकड ली थी । मुझे पीजी पहना नहीं तो भला किसी की क्या मजाल को यहाँ उठा कर देख सके । ले नहीं टाइम का मुखौटा भी खेल सकता देखेंगे । वो चाहता था की मैं हर आदमी के साथ ऐसा ही मेहमान ऍम उसके साथ मैं यह नहीं कर सकती । अगर यही करना होता है तो मैं उसके साथ आती ही हीटिंग टाइगर का मुखौटा भी हमेशा के लिए । उत्तर क्या आपने जो बनना चाहती थी टाइगर मुझे वो नहीं बनाना चाहता हूँ कि मुझे पूछना चाहता था । अच्छी कीमत पर यह बात साफ साफ सामने उस वक्त आई जब हैं किसी से धीरे धीरे कह रहा था तक आज के रह के काम हो जाना चाहिए तुमको एक वक्त पर गाडी लेकर आ जाए हाँ जी जानता हूँ होती है देखता हूँ कैसे नहीं चाहती हूँ की टाइगर का हाथ है तो उसके साथ एक गोली उसकी हालत में उत्तरी नहीं की फिर सैंकडों किलोमीटर निकल जाने पर ही साल क्या लेगी हूँ यहाँ का काम मेरे सिंह आगे संभालना तुम लोगों का काम टाइगर पांच हजार की नोटों की गठ्ठे हाथ में दबाया अंदर है जारी जारी दिव्या मुद्दों की तरह मुंह लटकाए हैं हरी देख कितना रुपया दो मुद्दे में भी जान खून देता है मैं अपना गुस्सा तीन सकूँ तो ली मूर्ति में जान खडे ही डाले खतम हो इंसान को जरूर मार देता हूँ । ऍम वापस चला गया । प्रदेश तक सोचती रही अंधेरे के सिवा मेरी आंखों के सामने और कुछ भी नहीं था ही थी बाल सी कर ली जा रही थी । ठीक स्वामी मायानंद था तो सच्चाई करेंगे तो उनकी तरीके अलग अलग ही तक काम ऍम फिर इसका भी तो वही होना चाहिए तरह तो मुझे लगा था कि मैं ऐसा नहीं करता हूँ की ढाई काॅल मैंने कहा हूँ ये कैसा क्या, कैसी चाहिए नहीं ये कमजोरी मैं भेज सकती हूँ । हाँ ऍम जिसे मैंने प्यार किया है तब ही करूँगा जिसका नाम खून की मुझे चाहती तो स्वामी मॅन सी बी अधिक ठंडा है मैं तेज तक स्वामी मायानंद के खून पीने वाले अच्छा आपको देखती नहीं हूँ कभी टाइम क्या हर सुनाई दी टाइगर ही था इतनी चलती से छोटे वाला हाथ साढे में छिपा पेन नशे में धुत पागलों की तरह होने भर करते हो तो अच्छी करता है तो खूब प्यार करूँ फॅमिली है जैसी ही उसकी बहन की प्रकट ऍम हो चुकी थी । नहीं नहीं बातचीत तो वहाॅं कुछ बोलता क्यों नहीं? पश्चिमी टूटा बेहतर पढाई तब कहना क्या है कब बाकी की शत एक चीज हो गई एक झटके के साथ मैंने छोडा चर्चा ट्राई कर जैसे उस ना मत काय की ठंडे खून से मिलने जेल का घंटा बचा हूँ । मिलने का समय पूरा हो चुका था । तिथियां उठी मैं निश्चेष्ट फॅमिली डिक्लेयर का मुकदमा में नहीं लगा । एसोसिएशन से उसे सात साल की सजा दी गई । मैं सोच रहा हूँ की जिंदगी के साथ लंबे वर्ष खेल से काटकर जब वापस बाहर आई की तो उसकी उम्र अठाईस उनत्तीस साल की होगी, उसके बाद उसका क्या होगा? कहाँ जाएगी? स्वामी मायानंद लौटाई करेंगे दोनों का तो उसने फोन किया तो क्या उस ठंडी उनको बहाकर भी नहीं । किसी के खून में इतनी गर्मी ला सकती है जो उस से पहले सियासी हूँ । लेकिन लगता है जैसे समस्या का कोई समाधान नहीं, कोई अंतर नहीं ।

18. Avishwas ka Fal

सुमन का पत्र ही लिखा है लिखित बहुत सी बातें हैं किन्तु में नहीं पडता है जिस पर मेरी आंख बार बाहर जाकर अटक जाती है । एक अव्यक्त वेदना से मेरा मन भर भर जाता है फिर पढ नहीं लगती नमः अपनी एक पुत्ररत्न को जन्म दिया है तो वहीं बधाई तुम्हारी एक साडी पक्की हो गई तो दूसरी आज तक तो है लेकिन बाहर ही नहीं तो क्या लिखा होकर पांच सोचती हूँ तो नहीं तो नहीं भी साझेदार बना लूँ उसके ऍम भाभी को देख देख कर मुझे हो रही थी तुम्हारा सी तो वहाँ भी प्रथमत से कही थी ही तो अपने भाई साहब की प्रवृत्ति को जानती हूँ । आजकल रह मुक्त पाँच छे की भांति खुले आकाश में हो रही हैं । इतना ऊँचा हो रही हैं की भावी विवश होती है । जैसे आपने कटे पंखों को देख कर कोई पंचर हो थे । होना नहीं चाहिए तो भाई साहब को अपनी पहुंच से दूर करना भी नहीं चाहिए । मानसिक और शारीरिक दोनों वेदनाओं के बीच आजकल उनका शरीर तिल तिल खुल रहा हूँ । फॅमिली होता है । मुझे जितना खुल रहा है तो मुख् पर उतनी यहाँ वहाँ बढती जा रही है । उन का सामान थे और भी नहीं कर रहा है जिसमें आत्मविश्वास की ज्योति चकमक आती रहेगी कि तीन दिन जानी कैसे तीन हुई थी सुनील तुम्हारे भाई साहब तो कम देखती हूँ मैं दुकान की सारी आमदनी थी बाहर हवा में उड जाती है सकता है दुकान डूब जाएगी साथ ही हमारा घर भी पत्र पढकर जानी कैसी घुटन से हुई है आंखों के सामने को हसा छानी रखा को जैसे मेरे वर्तमान को से आवृत करलिया हूँ रहती है कभी कभी हम भी हंस था कमल जैसा मुख्य स्पष्ट हो गया थापी तेरी पडोसन सुमन मेरी सहपाठी तीनों बडा सेहत की तो भारतीय पे सागर से भी अधिक प्रिय हर बात सभी भाभी का आभाव मुझे कभी नहीं खटका युद्धादि को बात सभी वहाँ भी शायद से अधिक मुझे कदापि नदी पार्टी कुछ भी खाने के लिए बना दूँ मिठाई खीर कोई भी बडी अच्छी है । जब तक मुझे बुलाकर मैं खिला दी थी स्वयं खा ही ना पार्टी मुझे पास बिठाकर खिलानी । उन्हें किस आनंद की अनुभूति होती? मैं आज तक समय से नहीं छपने ठीक हो गई और सारा का सारा स्वयं भारत लेती हूँ तो बहुत होती नीति चोटी पकडकर खींचती, गुस्सा जमाती मेरे हाथ सेक्रेट चीन चीन लेती पीना पूछे कराई जा रही जानती है वहाँ भी तेरे बिना खा नहीं बात ही कुछ कल से बना के रखा है । पर तो ऐसे खाओ है कि ससुराल जाएगी तो कैसे चलेगा खाओ बनेसिंह और घाटी का यह क्रोध था कि ये हमारा भावी का ये तरफ ना मुझे पडा था मैं खाती चाहती हॅू पहले भी स्वयं खाती नहीं खानी के स्वाद से अधिक मुझे खाफी केस ऍम बीस सच मुझे भोर हो जाएंगे, वहाँ भी नहीं खाती हूँ । पर उस समय नहीं उस समय तक तो भाईसाहब से उनका पुनर्विवाह खोजकर्ता इसी कारण मोहल्ले की स्त्रियां से ऐसे घबराती थी जैसे कोई डसने वाली हो । पता नहीं क्यूँ मेरी और सुमन की माननी एक दिन भी हमें भाभी के घर जाने से नहीं होगा मोहल्ले की कई स्त्रियों ने कई बार मासी का बहन जी आपसे आनी लडकी को वहाँ क्यों जाने देती हैं? भारत चार चरण की अच्छी नहीं उस समय मेरा मेन काम चाहते हैं । नहीं कैसे जिएंगे । ऐसा ही प्रतीत होता था कि सोमन और भाभी के बिना जीवित रहे ही नहीं । पाओंगे एक आध दिन नहीं भी जाती । तीसरे दिन वहाँ भी बोला ही भेज कब भागी की कहानी कहने के लिए उनके पति राजा बाबू का जिक्र जरूरी है । भावी की कहानी की धुरी तो भाईसाहब भी थी ना । भाई साहब छह वर्ष की थी जबकि ताकि प्यार और माँ की ममता की बेडियों से मुक्त हो गए । एक बडे भाई थे । केवल सोलह वर्ष की फॅमिली लगा पाई । यहाँ किसी भी तरह दो जून की रोटी जुटा दी थी । चार वर्ष किसी तरह भी ठीक है । बडे भाई कहीं क्लर्क होकर अपने भविष्य की सुनहरी तनी बनी बनने में उलझ गए । भाई राजकुमार दिनभर सडकों पर आवारा लडकों के साथ खेलते थे । हुए के लिए एक दिन लोटा बेच दिया तो शाम को बडे भाई ने खूब मारपीट कल बाहर धकेल दिया । राजा पापु के शब्दकोश में लग जा लानी जैसे शब्द से ही लिखित करना जानी । किस प्रेरणा सी है आगरा भाग गई और वहाँ किनारे बाजार में एक सेट के यहाँ बर्तन मांजने की नौकरी कर ली । दोनों जून रुखा सूखा भोजन में नहीं जाता । फेट की कपडे की दुकान थी । राजा परिश्रमी थी । धीरे धीरे ते दुकान के एक आवश्यक अंग बन भेज सेठ को वह जो राई देती उससे सेट को दुगना लाभ होता है । हम मानती तो उन्हें पछताना पडता । सीट के हृदय और उनके घर दोनों जगह राजा पापों का मान बस था क्या मैं भूल के यही छोकरा कभी दो रुपये महीने पर पतन मांजकर तथा सीट उनका जूठा तक खाते थे । ऐसे भक्त हो गए पर इन्होंने सेटको बनाकर अपनी ओर से आंखें नहीं मूंद जब तक क्योंकि बाद सीट पूरी तरह हो गई । जब सीट पूरी तरह सो गए तो उन्होंने कम्बल डालकर लोग क्या क्यूटा? पर ऐसा नहीं की । सेट समझ लेते पे जागने पर भी लूट से अनभिज्ञ ही रही । इधर सुनते हैं कुछ डाकुओं से भाई साहब का संबंध हो गया । सीट की दुकान की अलग थी । उनकी कई धंधे दी लक्ष्मी उन पर हर हराकर पहुँच रही है । लक्ष्मी की कृपा हूँ और बडों की छत्रछाया न हो तो नाम आप बे मुल्क साथ ही जुट ही जाते हैं । भाईसाहब होनी लगी है । उनके लिए संसार रंगीन सपने की भांति सुन्दर था । जैसे जैसे छप्पर फाडकर धन प्रस्तान । वैसे वैसे वह छप्पर फाडकर पूछे और ऊंचे उन नहीं नहीं । फिर भी उन्होंने एक पैर हमेशा जमीन पर जमा था । लक्ष्मी की चमक देखी तो बडे भाई चम्पक कि भारतीय किस से चले आए । पर राजा की यह दशा देखकर उन्होंने उनके लिए एक पिंजरा घोषणा शुरू कर दिया । उधर वहाँ भी अपनी सुशिक्षित अवसर पति को गाने से पहले खुद बैठी थी । आठ बच्चों के पिता अपनी सत्रह वर्षीय लाडली मुरली पर वह वज्रपात सहन ना करता है उन राजा पापु और मुरली का एक दिन एक दूसरे से बाँध के इस विवाह के पश्चात वहाँ भी हमारे पडोस में फंसी आपने सातवीं कक्षा में थी था अत्यंत रूपसी थी फिर उन के रूप में को मिलता नहीं थी एक ज्योत्स्ना की शीतलता नहीं थी ना उसमें मध्यान् की सूरज की दाहक जा रही थी उनका साम्थर्य तू हजारों की प्राथमिकी सुनी सुनी धूप और बहुत उनका रूप गांव की स्वच्छंदता अलग हर युवती की भर्ती था जिसके अंग अंग से कठोर परिश्रम एवं दृढ चरित्र का आभास था तो भाईसाहब उडनी बने पच्चीस खींचने का आकर्षण तीन ही वर्षों में काम हो नहीं सकता था । अभी दो शिशुओं की माँ बनकर पुरानी से लगने लगे अट्ठाईस आह अपनी फिर से उठना आरंभ कर दिया । एक दिन भाभी के गहराई तो देखा खूब सच रही मैं पदों की तरह पाउडर कॅश लिप्स्टिक बहनों का अंबार ऍम भी कुछ कमी नहीं थी । मैं समझी की शादी में जा रही है । किसी के यहाँ तो अच्छा तो बोली सिनेमा जा रही ऍम मन को तो हाल और भी रख दी से भरो हूँ कितना सच कर सिनेमा पर मन को दो हाल पर्चे क्या सफर पे रखती पर मुस्कान का आवरण डाल दिया मैंने पूछा किस पर बिजली गिरी क्या लगता है कल पेपर में निकले का हूँ । सिनेमा हॉल भस्म हो गया बिजली गिरते ही हूँ बिना रानी किसी यानी से हंसी हस्ती रहती हूँ जिस पर पिछले की रानी चाहिए किसी पर गिरा सकते तो बहुत है चढ सिनेमा हॉल को भस्म करके क्या मिलेगा मुझे थोडा ठहरकर फोर्टी पिछले किराने वाली को देखना चाहूँ तो उस कमरे में चाहूँ जिसकी वाला में आज हमारा सारा घर धू धूकर की जाए । अभी क्या कह रही हूँ ऍम ठीक कह रही हूँ हूँ जाऊ ना देखो उत्सुक्ता वर्ष चली गई तो उसे कहते हैं ठीक है एक बहुत साधारण कुछ अनाकर्षक सी स्त्री थापी के पलंग पर पडे आराम से लेती है खोलकर देखा अगर बट पता है मुझे जाने क्यूँ आपका या नहीं लगी ऍम ऍम कैसी बातें कर रही हूँ तो मैं इतनी हंसी का ही आ रही है । अभी कुछ रुष्ट हो गई । मीना रानी मेरे दोनों कंधी कसकर पकडेंगे भाभी और हम खमियां की धान करता हूँ कभी कभी हम जाते हैं इसलिए नहीं रोना पडे देखती रहेगी लगा जैसे तूफान उठा हूँ पूछता हूँ किसी भी सब कुछ दिन की की भांति हो खाते हैं बुरी तरह चक्कर खा रही हूँ जैसी समझने के लिए अपने कंधे पर रखिए पहाडी के दोनों हाथों पर मैंने अपनी हाँ भावी कि सुनिये हूँ हंसते अधरों को देख कर वहाँ भी मुरझाया गुलाब यदि सुंदर कमरे में सजा दी तो ये सुंदर नहीं लगता है ये तुम्हारे कहने की साढे मेरे हाथ के नीचे से धीरे से अपनी हाथ सरकारी कुछ लोग कमरों से ही प्यार करती खोला हूँ गुलाब बन नहीं जा सकते हैं ना । अरे वही तैयार हो गई भाई साहब का मीठा स्वर्ण मेरी कानूनी पढा ही नहीं देखा भाई साहब उस के कमरे में घुसकर देखा थापिनी मुस्कुरा कर रखना चाहिए तो सी ओर क्या फॅमिली घर चलिये उस दिन तो महान ईरान था तुम लोग कई क्यूँ मुझसे पूछे बिना कहीं जाने की जरूरत नहीं पूरी पांच हमें धीरे धीरे कई दिनों में मालूम राजाबाबू तीन दिन से घर ना ना दुकान के नौकर चाकर कम देखते रही हूँ । एक बात हो गई भाई साहब भी पहला लडका होने के बाद ही अपनी दुकान खोली थी । पूरी नौकरों से जो खर्चा भी देने आया करती थी । भाभी ने पता लगाया कि राजूबाबू का कोई मित्र कहीं से एक स्त्री लाकर उन्हें साफ किया है । हर कुछ चंपत हो गया । भाई साहब तीन दिन से उसी के साथ होटल में पडी । तीसरे रोज रात के अंधेरे में ही तो कान से एक नौकर को साथ लेकर धाबी सीधा होटल पहुंची हूँ । बडी शांति बडे इसमें ही से फॅमिली बडी खातेदारी की भावी नहीं क्यों दाॅये देखकर भाईसाहब कट कट हो तो अच्छी थी । हुई हूँ ऐसा तो नहीं लगता हूँ । दिन भर के आवभगत के बाद शाम को सिनेमा का प्रोग्राम हूँ । खाफी बिल्कुल नई नवेली बन गई । सिनेमा हॉल में ही दोनों में नहीं जाने क्या क्या सलाह हो गई । मैं जाने कैसे पटाया भाविनी भाई को क्यों उसी रात उन श्रीमती की को गाडी पर सवार करा दिया । धामिनी चैन की सांस तीन चार दिन में उन्होंने घर की उस विषाक्त हवा को मिटाने के लिए समस्त घर का काया काल करता हूँ । फिर एक दिन स्कूल से लौटते वक्त मुझे रोकती फॅमिली लड्डू निकालते निकालते बोली बिल्कुल हवा हो गई तो पांच छह दिन हो गए । एक बार भी सुन नहीं आई तो छब्बीस मुझे भावी की अपनी वेदना को छिपाकर में हस्ती ऍम देखे । हम तो सुंदर सुंदर लोगों का मुंह देखते हैं । तुम्हारी वह सौ धापी कि निर्मल हंसी झंड पडी भोली सात को तलाक दिलवा दिया । सौ रुपये भी दिलवा कर भाभी के हंसी देखकर पडी हूँ था कि नहीं बुरा नहीं लगता है सर तुम नहीं तो सीता सावित्री को भी मात कर दिया । शहरों ठीक है तो वहाँ छोटी उन्होंने पीना मेरे साथ सती सावित्री की तुलना करके उन्हें कलंकित मत करो । फिर एक्शन बाद प्रवित होकर पूरी मीना चोरी तो पहले से ही पत्थर बना दिया गया । होना इतनी साधारण करने से भी घर नहीं सकता हूँ । हाँ, थोडी गर्मी जरूर आ जाती है आप की कैसी बातों से? जहाँ एक ओर मेरी उलझन बस्ती भी, दूसरी ओर उनमें श्रद्धा पडती जाती । क्षण क्षण सकता जा रहा था, खास बन सकता है, मिल जाए तो बांधूं उन क्षणों को फिल्म ठीक है की को भी नहीं करनी थी । एक को भी मिल सकती है उन क्षणों को जिनमें मेरी भाभी की होती थी । इतिहास सुमन और मधुर साथ मैं और सुमन इंटर पास हो गए । एक बार फिर आनन हमारे चारों ओर हिलोरी दे नहीं लगा फिर एक दिन भी नहीं हुई थी कि हमारी यह प्रसन्नता आंसू में खो गई । पापा की पिछली दिल्ली होकर हमें दस दिन बाद आगरा छोटी था । सुमन थके वेदना और रूदन के अथाह सागर कि डूब गए हमें दिल्ली आना हो सुमन बी ए मिनाखेल हो गई थी मेरी पढाई छूट सुमन के लिए कॉलेज जाती रोती घर पडे पडे होती हद पत्रों का सहारा है हमारे मिलन सेतु । हमारे पत्र ही आश्चर्य होता है । धापी मुझे यह सब क्यों छिपाया? क्या इन आठ महीनों में ही में इतनी पढाई हो गई हूँ । आखिर भागने मुझसे ये सब क्यों छुपाया है का जैसे दुकान के स्थानी का कारण ही हूँ । इतना भाभी साढे देने को कहती थी तो काम को हानि पहुंचती । वहाँ भाभी मुसीबत में पढा था किंतु अपने पत्र में ही में भर्ती को कुछ नहीं देख सकी । मैंने केवल पुत्र होने की बधाई दी थी । हमारी किसान मैं लिख कर सके, खाफी का पत्र है । छोटे लिखा था मीना हूँ तो उन्हें भतीजे की बधाई मुझे भेजी है पर ये बधाई मेरी तेरी दोनों की ये है ना तो किस बात का है कि तो वहाँ भी को एक काम पर आया । समझ थी साढे की बात आखिर क्या सोचकर नहीं देखी? क्या बाहर ही एक साडी भी तुझे नहीं दे सके की ऐसा समझ लिया कृषि देखने को मन था रखता है देखो तुम आओगी क्या कभी क्या तुम्हारी साडी नहीं भेजता हूँ तेरे अनुसार शिशु का नाम ज्योति ही रखा है शायद अंधेरे होती ही बनी पत्र सादा सा था उत्तर में पढकर बहुत हुई आजकल ना जाने क्या पागलपन चाय रहता है कभी एक्शन को भी फॅमिली को नहीं बना पाती । सब भूमि में बैठक थी । बैठक थी आगरा पहुंचाती सुबह फिर वही वेदना, कहीं छटपटा किसी तरह पांच महीने पीते होगी कि सुमन का छोटा सा था ना किसी भी प्रकार आ जाओ एक बार नहीं जानी क्या होने वाला है । लगता है वहाँ भी कहीं चले जाएंगे आपको देखा नहीं चाहता हूँ । किसी भी तरह हूँ एक पाकिस् खाफी का हम दोनों के सिवा कोई नहीं ऐसा ही समझो हाँ हूँ माँ पापा सी मेरी ओर से प्रार्थना कर लेना लेकिन आना हूँ मैं ही मुश्किल से मैंने मैं अकेले ही आगरा गयी । आप ही का बडा मुन्ना गलत कर पांच वर्ष का एक छुट्टी मिली सी बनियान पहनी चबूतरे पर खेल रहा था । कुछ आया देख कर भाग दौड हैं खाली और काला ब्लाॅक था । बिल्कुल वनदेवी जैसी लग रही थी ना पिलांकर पैरों में चांदी के पीछे की अतिरिक्त उनके तन पर कोई भी कहता नहीं था । था भी नहीं । मुझे चिपटा किया तो नहीं । पहले से बोली पिछले लगता था मीनू तो अवश्य की कुछ पूरी हो गई । आप की कारण अभी चली गई तो धीरे धीरे सुमन और उसकी ओमानी सारी बातें बताई । भाजपा अपनी दुकान से केवल पैसा लेने भर का सरकार रखा है । मैं कभी भी दुकान पर नहीं बैठे । तीन तीन दिन घर नहीं आती । अभी दुकान के नौकरों के सहारे जासूसी करके उन्हें पकड पकडकर नाती तो घर आकर मारपीट करते हैं । कभी कभी काम आते हैं की भावी बेहोश हो जाती है । तब बच्चे इधर उधर खाना खाती हूँ । वहाँ भी नहीं । दुकान का हिसाब किताब देखा तो पता चला की दुकान पर बहुत सारा कर चढ गया है । भाई साहब के साथ अब रही नहीं । किसी भी तीन दुकान और घर की कुर्की हो सकती है । सबको जानकर थापिनी सारा सामान घर से हटवा दिया ऍम थापी पर आफत का पहाड टूट पढाई क्या होगा तीसरे दिन भाभी के हम बैठे हैं कि भाई साहब आ गए, हाथ हुई और कपडे पता नहीं नहीं मेरी कमी सुधार कर भावी की ओर होनी चाहिए । कमी इसके गिरने से पहले जमीन पर कुछ कांग्रेस की पडी आप ही नहीं था कहाँ है और कुछ नहीं पीना पाने सी थी । किसी मोड मारकर भाईसाहब भी जीतने धोखा दिया था । पालिसी देखकर वहाँ भी चौपट । ये क्या है? भाभी नहीं कुछ दुकान का बीमा करा लिया । भाई साहब धाबीः फ्लिपकार्ट थी इस साडी दुकान के लिए तो मैं बीमा कराने की क्या जरूरत है? कहाँ है कि बीमा कराने में से दुकान में आग वार लग जाए तो उसका हर्जाना मिलता है । फॅमिली जोश में आकर अपनी छाती ठोककर पूरे देखो ये है राजाबाबू । कहाँ ऐसा कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे? हाँ एक काम कर रहे हो । देखो अब कि सांप मारेगा नहीं और लाठी के भी टुकडे हो जाएंगे । इतनी सी बात कहने में वहाँ पे लगी मैं नहीं दे रही हूँ कि अब मेरे बच्चों की जिंदगी बर्बाद मत करो क्या क्या कहा भाई साहब एकदम अंगार होती थी । मैं तेरे बच्चों के लिए ही सब कुछ कर रहा हूँ । बच्चों के लिए जो कुछ करना था कर चुके । अभी ऐसा मत करो । मैं बस यही कर रही हूँ तुम से मैं और कुछ नहीं चाहती तेरे चाहने न चाहने से क्या होगा । मेरे मन में जो आएगा करूंगा तो तो तो सुनो तुम्हारी मन की अब मैं नहीं होने दूंगी । मैं तुम्हें क्या नहीं होने देगी । कहकर भाईसाहब ने सिल्का लोढा उठाकर भाभी पलटीमार एक चीज के साथ धाबी बेहोश हो गए । अस्थाई साहब घर से बाहर उन्हें शायद मेरा खयाल है मीटर के मारे डुबकी खडी रही । वस्तुतः मुझे भारी पर ही क्रोध आ रहा था की क्यो यह सोती बाप को छुट्टी हाँ अभी की चीज के साथ में दौड कर रहा । अभी से घट गई । फिर सुमन के अम्मा को बुलाया नहीं कराया । लगभग दो घंटे बाद भाभी को वो शायद छोटे अधिक नहीं लगी थी । दिल पर पडा कहा हो गया था राहत को नौ बजे दुकान का मुनि घनशाम आया । बहुत खबरें हाँ अभी क्या क्या पाकर मेरे ही सामने फुसफुसाते हुए क्या है? क्या आज दुकान का क्रिया कर्म होगा? रात को बारह बजे तक सारा सामान आपके भाई के ट्रक पर मथुरा चला जाएगा । प्रसाद के दिन है अधिक परेशानी होगी नहीं कौन देखता रहेगा । सुबह तीन बजे तक सब समझ अभी एकदम से उठ गई थी । क्या कह रहा है नहीं । कल शाम में भाभी की पैर छू खाती बाल बच्चेदार रात में हूँ तुम्हारा नमक खाया है तो बतानी चलाए आज काम पर साहब पिस्तौल जेब में डाले हैं कह रहे थे अगर किसी ने दादा की तो जाते जाते उसे भी साफ कर चुका चाहता हूँ भाभी बाबू साहब को नाम मालूम पडेगा बिरयानी की बात इन शाम की बातें सुनकर मेरा दिल जोर से धडकने लगा थापी प्रभावी को इतनी शांत थाउसी लेटी में कुछ आश्वस्त होते हैं । अच्छा भाभी ने परिस्थिति से समझौता करने का निश्चय कर ही कि आखिर कर क्या सकती ऍम हुई हूँ अभी उठकर सुमन के घर चले की मैं उठी तो पूरी तो बच्चों की फॅमिली लगभग सात मिनट पांच । हाँ! बीस उनके साथ हाथ में कुछ करते थे । उनमें से कश्मीरी सिल्की, नई साडी तथा प्राउड तीन दिन चाहिए साढे तो तुझे नहीं पहले पर पर अबे हल्की सी ही से ऍम हूँ भावी तुमने मुझे तकनीक समझ लिया है । मैं साडी नहीं होंगी । अच्छी पागल हुई हो गया । हाथ ने मुझे निपटा लिया साढे तुम्हें ज्योति की दे रही हूँ दुकान को क्या एक वर्ष लाभ होता है तो अगले वर्ष वही होता है । तो आज हो रहा है नहीं ज्योति को छू अच्छा ये साडी पहनकर तो दिखाओ कैसी लगती है खाती नहीं आदेश दिया नहीं होती रही ऍम तय ही नहीं थी कितना क्रूर उपहास इस दुकान के लिए भाभी ने साढे देने को कहा था आज आपकी लब्धियों से निकल चाहिए मैं साडी पहनकर पेट हूँ भाभी के बहुत कहने पर ये साडी पहन सकते पडोस की घडी नहीं दस बज जाएंगे कहाँ फॅमिली जैसे स्वयं तो दादा उठो चलना चाहिए कहाँ ऍम लाल तीन की मध्यम रोशनी में उनका मुख गुणकारी की तरह चमक रहे नेत्रों उमेंद्र नीचे था सुनु तुम दोनों आज रात ही सोलह ये बच्चों को धरे ले जा । मैं अभी आधे घंटे में आई जाती हूँ । हाँ ज्योति रोई तो अलमारी में दूध रखा है दिला देना मैंने बहुत ही फोकस करता हूँ । नहीं इस समय नहीं कहीं नहीं जाने दो सागर हुई हूँ मैं चाहूँ तो कुछ नहीं होगा जाओगी तो मैं भी तुम्हारे साथ हूँ तो कैसे जा सकती हूँ । मेरे भैया को बुलाती हूँ । उनके साथ जाना सुनने का जानती थी कि भाग्य अटल नहीं, सुमन नहीं किसी और को भी साथ लेकर नहीं होंगे । फिर कुछ रुककर बोली हाँ यदि कोई कुछ पूछे तो कहती है कि भाभी कहीं काम से कहीं कुछ भी कहने की जरूरत थी । हम देखते रहेंगे आप तीन की तरह नहीं मिलते हैं । झूले में भाई साहब की जरूरी कपडे लेंगे नहीं । सुन के घर से नहीं मैं और सुमन बैटिंग फॅमिली कब सुबह पता भी नहीं चलता हूँ तो छोटी चीज की हो रहा था तो लूट, दूध कर्म किया और ज्योति को खिलाती । अब घोषणाएं अभी नहीं आई । अब तक घडी देखी तो चार बच्चे हैं । हम दोनों ढक सीरियल मन चीज ठीक कर हो रहा था । तकलीफ सुनना ली इस तरह से खुलकर रोज ही नहीं सकती । तभी बहुत धीरे से किसी ने कुछ भी घटकर ऍम प्रमाण भाभी के स्थान पर घनशाम को देखकर ऐसी चंपई मानव सात पाँच पैसा क्या खर्चा से चुका था वहाँ? अंदर नहीं तो सुमन से अंदर बुलाया तो धीरे से आया और एक ही सूरसेन उन लोगों के मिलते हैं जैसे उनकी रूनी से ही समझ के घनशाम क्या कहना चाहता है? क्या कह रही हूँ? कहाँ गई वहाँ भी मैं और सुमन दोनों ही अपनी सुख्खू होना तो कल शाम में हमें जो कुछ पता है उसे सुनकर रोंगटे खडे हो गए । पेन चीज उसी नहीं हूँ । बहन की यहाँ किसी तो कहीं ये भेज है सिर्फ आप दोनों को बता सकता हूँ आप से बढकर उनका कोई नहीं था । वहाँ भी दुकान पर पहुंची तो हम लोग कपडे बान नहीं जा रही थी मैं आपको साहब और भाभी के भाई शंकर आपने पिछला दरवाजा ही काॅल अंतर नहीं तो बडी शांति से बोल शंकर तो मैं इस समय यहाँ क्या कर रहे हो? चलो चलो शंकर एकदम चौंक पडा । उससे कुछ भी उत्तर देते हैं । बना ऍम काम किस किया गया से आई हूँ चलो घर जा अभी इसी दम बडी फॅमिली हाॅल पी तबियत घबरा रही थी मैं चली आई नहीं थी आज दोपहर तुम सुमन के घर से पिस्तौल लाई थी । नाम पिस्तौर मुझे देखो घर चली जाऊँ हाँ टीका संशययुक्त भरा हुआ था । मोटी भी कहता हूँ ये क्या बक बक लगा रखी है नहीं काम कर दी थी । फॅमिली तो कुछ अभी था । फॅमिली जल्दी कर मैंने कपडे उपर से उठाने के लिए स्टोर लगाए तो भारतीय स्तर फॅमिली क्या काम हो रहा है । इस समय ऍम मुरली बाबू साहब ने बडी कठोर पर था तो निकलो यहाँ से हमें देर हो रही है । मैं तो साहब विचलित होती थी । तो क्या तोहरा प्रोग्राम आज ही का है । तभी शंकर का चका है होगा क्यों देखो अपना हाथ छोड दो होगा कभी नहीं चुकता यही काम पुलिस की तो तो मुझे पुलिस में देखिए बाबू साहब डीजीसी मानो भाभी की गणतंत्र पूछ लेंगे । मैं तो पुलिस में क्यों कि ऐसे ही हूँ मैं । मैं तो पुलिस से बचाने आई हूँ । फिर हम भी शांत गर्मी का तुम जाओ मुरली नहीं तो मैं नहीं तो तुम क्या करोगी था? फॅमिली बाबू साहब छिटके नहीं, मैं सारा जगह खत्म कर दूंगा । समझे गुरुर आकर बाबू साहब ने पाकिस्तान निकलेगी मुझे मार्केट झगडा समाप्त नहीं होगा, शुरू हो जाएगा । समझे वहाँ भी निर्भीकता से ना पिस्तौल मुझे मुरली बाबू साहब बडी शक्ति से कुछ नहीं तो नहीं होगी नहीं दृढ स्वर में भाग लेने का मेरे जीते ही है । आपको कर्म तो नहीं कर सकते । मैं तो लेंगे चक्कर । बाबू साहब ने पिस्तौल था पर शंकर ने उनका पिस्तौल वाला हाथ पकडकर खींच दिया । किस्तम झूठ पर हाथ खींचने के कारण उसकी नली नीचे हो गई । पूरी धाबी के पहले ही चलेगी । आपकी स्टोर से नीचे गिर पडीं पर नहीं कमाल की हिम्मत है सोच से किसी की भी नहीं परंतु संभलकर थोडी शंकर ऍम कह देना दस बजे से पहले ही मथुरा चले गए थे । हाँ तो सबको भूषण मुरली किसकर उन्होंने भाभी को पकडेंगे ऍम खून के पास साहब चाहूँ मेरी बात बच्चों को देख कर बस आओ जल्दी हाँ संकर जाऊँ नहीं तो तुम दोनों होगे । शंकर तेजी से बाबू साहब को खींचता हुआ बाहर निकल गया । घनशाम तुम पुलिस को बुला फौरन ध्यान दे दिया । विभाग का पुलिस उन्होंने उस समय में सोच भी नहीं पाया । मैं कर सकता हूँ थोडी दूर भर्ती पर एक पुलिस कांस्टेबल मिल गया । उसी को लेकर वापस आएगा । उसी को भाभी ने बताया कि आपको साहब मथुरा जाने वाली थी नहीं देने के लिए कपडे लाएंगे । पाकिस्तान पहले ही जा चुकी थी । अपनी पिस्तौल में है । घर पहुंचाने के लिए घनशाम को दे आए थे । उसे पिस्तौर वहाँ भी को सौंप थी । उसकी पूरी भी है क्या? फॅमिली कैसे गुंडा तब क्या हाॅल? फोन बहुत जा चुका हूँ । दुकान में खून ही खून दिखाई देता है । इसी तरह उन्हें अस्पताल पहुंचाया की डॉक्टर आई और उन्हें ठीक करने और खून चढाने की तैयारी करते हैं । ऍम खाॅ फूट फूटकर रुपए मथुरा बता दिया है । वहाँ भी बेहोशी में पड बना रहे नहीं ना, अभी नहीं पहन के दिखा देंगे । फिर तुझे बढिया सी साडी जरूर बैठा हूँ । नहीं फूट फूटकर

19. Beech Jungle me

सीतापुर के पास ही लाख पूरी एक छोटा सकता हूँ । वहाँ रामलाल किसान रहता था । प्रति पति और पुत्री बस इतना ही परिवार था । पुत्री मंगला जवान हो चुकी थी । राम लाल को भी उसकी विवाह की बहुत चिंता चाहिए । पिछले दो वर्षों से वो मंगला के लिए वर्ष की तलाश में मारा मारा फिर रहा था । उसे बहुत दौर दूध की पर निराशा ही हाथ नहीं । ये बात नहीं थी के आस पास के गांवों में लडकों की कमी या मांगना में कोई आया था । रामलाल अपनी पुत्री का घूम रूप देकर पूरा नहीं समझता था । कभी कभी मंगला की माँ को पुत्र का आभाव पूरी तरह खता था । रामलाल ने इस बारे में सोचा तक नहीं हूँ । मंगला पर उसका बहुत सी मंगला कभी माँ का काम संभाल की, खेतों में पिता का हाथ बटाती । निराई गुडाई यादि सब काम है पुरुषों से बढ कर के उसका कोहरा, मुख खून की अधिकता के कारण ऐसा लाल सुर्ख सकता था की लगता हाथ लगा देने से ही घूम टपक पडेगा । प्रकृति की गोद में बाल कर रहे बडी हुई जब फसल पककर तैयार हो जाती है और उस की रखवाली करने के लिए रामलाल खेत में मचान बैंड कर सोता तो लाख मना करने पर भी मंगला पिता के साथ रात भर जाकर खेतों की रखा जी कर नहीं पिता को जबरदस्ती सुनाती और स्वयं सारी रात जागकर करती थी । हितों से छूट गया था । चार में ऐसी तेजी और लापरवाही की गांव के युवकों से ठीक कर अपने धडकते सीने को था नहीं सकते और कई स्त्रियों के दिलों में शायद आप सुना हूँ ऐसी पुत्री को । रामलाल किस कलेजे से किसी ऐसे वैसे युवक के हाथ सौंप था । मैं अपनी ही रीको किसी ऐसे अनाडी के हाथों नहीं देना चाहता था । किसी कांच हीरे की परख ना हो । उस के ऐसे रवैये को देखकर लोग उस पर हस्ती लगते हैं । क्या कहते हैं कि वे तो बेटी किसी राजकुमार से ब्याहेगा । रामलाल, सुनील सुनील करके कांति था । आखिर एक दिन उसका परिश्रम सफल हुआ । मैं मंगला का विवाह छह गांव वाले सुखन डाल किसान के इकलौते पुत्र शंकरदयाल के साथ तय करके आया था । शंकरदयाल सब तरह से मंगला की यू के घर भी अच्छा खाता पिता था । रामलाल इस रिश्ते से बहुत संतुष्ट था । काम माननी जगह पर को पवाह मंडप में मौत और पीले रेशमी धोती से सजे हुए देखा तो राम लाल की खुशी और गर्व अकारण नहीं मालूम हुए हाथों में चांदी की कडी शोभा बना रही थी । एक राजकुमार सा लग रहा था । सब ने एक स्वर में कहा की दोनों की जोडी बहुत सुंदर है । माता पिता को रोज दर्ज हूँ । मंगला पति के देश चली राम लाल का कलेजा तो उसे फटा जा रहा हूँ । बेटी को इतना छाबर मिला है । इसे सारा गांव सराहना है । यह सोचकर उसने दिल को ढांढस बंद है । पति पति मंगला की विदाई का दुख भूलकर अब उसकी वापस आने की प्रतीक्षा में एक एक दिन का भी लगे । विवाह के अनुसार पंद्रह दिन बाद मंगला पति के साथ लाल साडी पहनी मई किया । इसका गुलाब की बहुत खेल रहा है । बडी बडी कजरारी आंखों में चंचलता की जगह फॅमिली शंकर उसे छोड दो दिन बाद काउन चल है । रामलाल ने महीने भर पात मंगला को वापस पहुंचाने का वादा किया । पी थी मैं आपके घर कितनी भी सिसकती नहीं बैठा हूँ । आज मंगला ससुराल जाने की तैयारी कर रही थी । उसकी माँ आंखों में चल घर की बेटी के लिए गुड वाली चावल की रोटियाँ सेक रही थी । मैं अंधेरी उठी थी फिर मंगला को भविष्य के रंगीन सपनों में हुई थी । छट आया था उसे नजदीक के लिए कहकर रोटी बनाने बैठकें रामलाल ने आकर तब जल्दी मचाया तो माँ बेटी मिलकर सामान ठीक करती नहीं चलती । करते करते भी बहुत देर हो गई हूँ । सूरज ऊपर चढाया हूँ । मंगला और रामलाल जल्दी जल्दी कदम बढा रहे थे । कुछ तो जाकर तो आम रास्ते से हटकर एक छोटी सी फॅमिली बच्चन नहीं लगी । आम रास्ता काफी घुमावदार था । उधर से जाने पर रात दस बजे से पहले भी नहीं पहुंच सकती हूँ । बद्धन की के रास्ते से दिया पट्टी के समय तक घर पहुंचाने की उम्मीद थी । पतली पगडंडी शांत की । भारती बाल खाती बहुत दूर तक चली गई थी । उस सुनसान रास्ते पर बाप बेटी अपने ही विचारों में मग्न चले जा रही है । अधिकतर लोग इस रास्ते से जाना पसंद नहीं करती या रास्ता बीच जंगल से होकर जाता था । जंगली जानवरों का काफी खतरा था । जंगल में सन्नाटा छाया था । कभी कभी कोरैया कि भूल उठने से यह सन्नाटा टूट जाता है । जैसे जैसे यहाँ की बस्ती रास्ता और तंग होता पनाश के बडे बडे वृक्ष किसी दाना की भारतीय सिर उठाए खडे थे जहाँ उनका सन्नाटा और गहरा हो गया था । हवा चलते चलते होंगे उसी थी जैसे किसी आने वाले खतरे का अहसास किया । हर चीज अपनी जगह खामोश हो । मंगला को इकाई गर्मी से महसूस कर उसी साढे की छूट से पसीना पहुंचा हूँ । जैसे ही कदम है हम नहीं थी उसके शरीर में छोटी छोटी सी डॉट की उसकी मुख से ठीक नहीं थी । पैर पर किसी नरम से चीज का स्पर्श अनुभव करते हैं । उसने घबराकर पैर पीछे हटा दिया । उसने छुप कर दीजिए खरीद घास पर एक्साम्स सीधा होकर पडा था । उसकी चीज की काम आ सुनकर की । फॅमिली मंगला ने फिर गौर किया । सात का केवल पिछला हिस्सा ही दिखाई दे रहा है । सामने पनाश की दो बडी बडी पेड आपसी बिलकुल सटे हुई थी । पीडीपी केवल इतना स्थान था कि सांप जैसी कोई पतली की हो सकती है । दोनों की इतनी इतनी चौड थी कि उस की कोई चीज दिखाई नहीं दे रहे हैं । मंगला के मन में कुछ संदेह हो उठा । डाॅ । उसी दोनों तीनों के बीच सांस्कृतिक उसकी आठ ही चांदी करते हैं । रामलाल धीरे धीरे चलता हुआ आ रहा था । नहीं, बहुत पीछे छूट गया था । मंगला की चीज सुनी तो वह पद हवा सा दौडता । दौडता आप पहुंचा मंगला का पीला उतरा चेहरा देखकर उसे एक साथ कितनी ही प्रश्न कर जाएँ । कुछ समय मंगला किंकर्तव्यविमूढ सी खडी रही । फिर उसे परिस्थिति का ज्ञान हुआ । उसी छह बजकर पिता के मुंह पर हाथ रखा है । चुप रहने का इशारा किया उसी मंगला की होती है मंगलानी सामने की दोनों वृक्षों की ओर इशारा फॅमिली छुप करेंगे और दूसरे शिक्षण उसका हूँ । मंगला की घाटी पीला पड गया । तीनों पेडों के उस पार एक खाना था सो रहा था । सूरज की रोशनी में उसका पीला शरीर चमक रहा था । अजय शान से पढा हुआ था । मैं मीठी नींद ले रहा था उसकी मुझे उसकी पूछ दोनों पेडों के बीच से निकलकर बाहर पकडने पर पडी थी । इसी पूछ को मंगला ने साफ समझ दिया था । अब स्पष्ट होने पर मंगला और रामनाथ इस प्रकार अंक ही भाडे खडे थे । जैसे सचमुच उन्हें साफ सुन क्या पचपन साल की जिंदगी में रामलाल पर ऐसा मौका कभी नहीं आया था । आज अचानक इतनी भयानक परिस्थिति सामने आके तो उसका मजबूत कलेजा भी दहल उठा । बहुत दोनों को होश आया की इस समय एक एक्शन बहुत चीन की है । किसी तरह से वहाँ भाग कर ही तो अपनी जान बचा सकती थी । पर अब तो बाकी जा चुका था । भागना असंभव था । नहीं रहकर कोई ऐसा उपाय सोचना था किसी उन दोनों की जान कर सके । रामलाल के पास उस समय कोई हथियार नहीं था जिसके दम पर बाग से भेजा था । केवल एक लाख की उसके हाँ लाठी किसी भी मजबूत हो । उसके साथ बाहर का मुकाबला तो नहीं किया जा सकता हूँ । रामलाल मुंबाई खडा था की समझ में नहीं आ रहा था की क्या किया जाए । अपनी से भी चिंता उसे मंगला की नहीं बिल्कुल कुंस उनसे खडी थी । उसकी मुख्यमंत्रा से लग रहा था कि वह किसी सोच में है । मगर यहां सोच बचाने का समय कहाँ बाकी की नहीं चाहती । चाय दूसरे मनुष्य की गंदी हूँ । अपनी आंखों को चटकाते हुए उसने एक अंगडाई ली और उठ खराब उसकी मुझ से हल्की सी घुटना हटनी । इससे पहले की बाग एक भी कदम आगे बढाता मंगलानी तीर की तरह न पकडकर उसकी पूछ को पकड लिया । रामलाल कुछ ठंड तो हक्का बक्का सा रहेंगे । उसके समझ में नहीं आया कि मंगला क्या करना चाह रही है । मंगलानी अपनी पकड को मजबूत करते हुए दोनों टांगे फैलाकर दोनों पेडों के तनों से हटा दिया । फिर उसके मुँह से टूटी हुई आवासी जल्दी करो । बापू लाठी से बात की सिर पर वार करूँ । बंगला का स्वर ऐसा बदला हुआ था कि क्षण तो रामलाल भी चौकियां श्रृंखला के साहस पर रामलाल का कलेजा दहल क्या उसे ठीक करा कर के सामान्य और फेंका और लाठी हाथ में थाम खून कर वह भाग के सामने आ गया तो उसका क्रोध फॉर खर्चना देखकर रामलाल की छाती जंगल का राजा क्रोध से पागल हुआ जा रहा है । उसे देखकर कच्चे कलेजे का आदमी वहीं दम तोड । रामलाल ने हिम्मत करके लाठी का एक भरपूर हाथ बात की संस्कृति अगले ही क्षण पाक भयंकर खर्चना करके जोर से पूछना । रामलाल घबराकर धडाम से चारों खानी, चित्र समीर चाहिए । उसी सांस रोक पाक अब आया कि दबाया मगर पांच तो छोटे से मैंने बंदर की तरह चल कर रहे क्या अपने आप को छुडाने की उसने बहुत कोशिश की पर पी का रामलाल ने चपट कर अपनी लाठी फिर से संभाली । बाप का क्रोध ठीक भी लाया था उसके साथ ऐसी गुस्ताखी करने का किसने साहस क्या? उसकी तो बता रही थी कि अब उसके पंजे से कोई नहीं बच सकता । रामलाल घबरा कर दो कदम की क्या बागने अपनी जिसमें को तोलते हुए पांच जोर से गर्जना की जंगल का था । हमारा रुकते परिंदों नीचे चाहना बंद कर दिया । जंगल में भयानक खामोशी झांकेंगे गर्मी अचानक बहुत पढ के हर चीज को जैसी प्रतीक्षा थी कि क्या होता है बात भी इस पर दहाड मारकर इतनी जोर से अपनी पूछ छुडाने की कोशिश की कि मंगला कर लगा कि उसके हाथ की घटती चरमराकर टूट चाहिए । पीडा से उसका मुख विकृत होंगे । पूछ को छोडते ही मौत सर पर हो जाएगी । जैसे हैं जानती बांधनी से सारी ताकत इकट्ठी करके छलांग लगाने का प्रयत्न किया, पर वह एक इंच ठीक आखिर पढाया जंगल का राजा बेबस हो गया था । रामलाल अपनी पूरी ताकत से लाठी बता रहा था । उनकी थार बाग के शरीर से बढ रही थी । इस तरह से घायल हो क्या घायल बाग नहीं । एक बार पीछे हटकर अपने साथ कुछ ताकि करने वाले को दबोचना चाहिए । मगर दोनों तेल आपस में इस तरह सटे खडे हुए थे कि उनमें से बात तो क्या तब ही नहीं नहीं कर सकता । रामलाल की लाठी की छोटी खा खाकर बांक भरा हो गया । सारा जंगल उसकी चीखों से कांप रहा हूँ । मंगला तो जैसे पत्थर बन गया हूँ, किसी बात का उसी होश नहीं था । अपनी उंगलियों को बाग की पूछ के पास कसती जा रही थी । उसकी इच्छा नहीं कहाँ का अमानुषिक बनाया गया था । उस घायल और क्रोधित बाग के हर झटके को बर्दाश्त कर रहे थे । दांतों को निचले होठों पर उसी कस्टर भेज दिया था । उसके होंठों से खून भी निकला था । सारे शरीर का रक्त उसके हाथों की ओर हूँ । मस्तिष्क की रखी इतनी गर्म हो गई कि उसे लगता था कि ये अभी फट जाएंगी । बात क्रोध सीधा हटा रहा । रामलाल की लाठी लगातार उस पर बस्ती रहे हो । रामलाल ने एक भरपूर वहाँ बाघ के मुख पर क्या और उसकी लाठी के दो टुकडे हो गयी । पीर से छटपटाते हुई बाकी थी । एक पहुंचते रामलाल की होती है और फिर उसका शरीर जमीन पर ठीक हो गया । कुछ देर तक राम लाल बाग का मुद्दा शरीर आंख ही फाड फाडकर देखता हूँ । जब से विश्वास हो गया कि वो मर गया है तो उसने चैन की संस्कृति फिर मंगला की ओर । मैं उसी हालत में जा रहे थे । राम नाम नहीं कहा । उठ मंगल मुसीबत टल के आवाज सुनकर मंगलानी चौंककर फटी आंखों से राम नाम की होती का उसके मुख्य से कोई आवाज सुनी थी । ऍम रामलाल नीति रामास् मंगलानी । आपकी कोई उसका चेहरा बिल्कुल सफेद हो गया था । वोट था रह रही कि पारसी घबराकर चार हूँ । फिर आपकी उसके नाम नाॅन रामनाथ मंगला कुछ भी कई आवाज थी पर वह पत्थर से पढे हैं । रामनानी चाहा कि धीरे से पूछ को उसके हाथ से छुडाते छुडाना सकता । राम नाम का चीज रहता है । उसकी समझ में नहीं आया कि क्या करीब कभी सोचता गांव जाकर किसी को बुलाना है और मंगला को बांध समेत उठाकर पहुँच जाएगी । ऍम कल में अकेला छूट ऍम ही असमंजस पडा रहा । फिर उसे एक उपाय सूझा । उसकी जेब में छोटा सच्चा कुठार रामलाल ने से निकालकर बाग की पूछ को देखा हूँ । अब आधा हिस्सा भी मंगला की मूर्तियों में भी हुआ था । अस्सी बेटी को कंधे पर उठाए और गांव की ओर चल दिए । नाम लाल की पत्ती नहीं बेटी की ये हालत देखी तो पागल सी हो गयी । उसका कर अपना देखा नहीं चाहता था । रामलाल मंगला को खाद पर टालकर सीधा भारतीय का कुछ समय बात रहे । डॉक्टर को लिए पहुंचा डॉक्टरी मंगला का मुआयना किया हूँ । किसी धमाकी जरूरत से ही यह हो चुकी है । ज्यादा परिश्रम करते से बात हुई है

20. Mutha Mai ki Beti

तो दोपहर का समय आकाश में धोरे काले पादशाही अब ये भी वर्षा हुई सडकें नहाकर शरीर सुखा रही तो ठंडा पानी गरम सांस छोड रहा है वातावरण में उमस बीजेपी झोपडी में बैठा हूँ हम याद आया ये झोपडी मेरी अपनी नहीं इसी सरकार ने बनाया है । छोटी क्या है छुट्टियों पर बना हुआ एक बडा ही इसलिए मेरा अकेला नहीं मेरे ही जैसे पचास साठ और भी व्यक्ति तो फॅमिली दो बच्चे मेरे भी एक है चार वर्ष का सिथति और दूसरी हैं छह वर्ष की ललिता खनन तो बच्चों की माँ है । माँ नहीं है घर की नहीं । हाँ घर द्वारे रुपये पैसे गृहस्थी अभी कुछ दिन पहले तक सब कुछ खराब नहीं है । आज सरकारी तब तक भर में हाँ बच्चे ही पर उनके नाम सामने थोडी दूरी पर नहीं रह रहे हैं । हम उठाने आगे संगम है मुठा और मुलाकात सिंह मुठा मई और मुलायम आई तो छोटी छोटी नहीं थी । दोनों दो विभिन्न दिशाओं से उछलती को तीन रेट का सोना भी खेती धन जाने कब से बहती चली आ रही है । किनारों पर घने घने जंगल है । आम, कटहल, नींबू जैसे सरस मीठे फलों से लदे ही चाहिए । दोनों दूर दूर तक पहले धान की खेती, उस धान को जो कोंकण का ब्रांड और इन सब के बीच मुठा और मुलायम कि हरे भरे आंगन में अनेक छोटे छोटे का कुछ पहले पहले से कस्बे और एक के दुःख के बडे शहर भी पूरा जैसी तो होना चाहिए । हम ही तो जो मुठा और मुन्ना के संगम पर पैसा हैं और जहाँ ये सरकारी तब पाँच है जिसपर मैं बैठा हूँ । इतने पर पचास साठ हाथ नहीं घर मेरे तो उनकी माँ मेरी ने कहा ही सामने के लम्बे चौडे मैदान पर जहाँ तक है समतल चौरस में था जिसमें आज पेड का नामोनिशान भी नहीं धरन तो वहाँ कुछ दिन पहले विशाल संभाजी पास था । किसमें हरे हरे घनी पूल फलों से लदे पेड पौधे थी हरी हरी नन्नी कोमल दूब थी । हिंदी से बने हुए हाथ ही घोडी गाय और बकरी बच्चों को लुभाया करती थी । कोन कोन ऍम अल टी कोनी क्यारियों खेलते मुस्कुराते हूँ । उछल उछल करते हस्ते खेलते बच्चों को उतने साथ हस्ती बोलने के लिए बुलाया करते एक छोटा सा मत, साल भी मिठाइयाँ सरकारी मत सा नहीं जिसके नीले स्वच्छ पानी में स्कर्ट के कपडे की डिसाइन जैसी रंग बिरंगी मछलियां लहराएं करती थी । सतरंगी मच की छोटी नहीं हूँ ऍम चीन का और न जाने कौन कौन से नहीं जाने की थी । मत्स्यालय के सामने ही मिटटी का बनाया हुआ एक नन्हा सा खिलाना शहर था जिसमें पक्की मारती थी राज था राजा था रजत नौकर चाकर राजकर्मचारी पाक बगीचे पांच शहर में एक रेलगाडी कई पुलों को पार करती हुई शहर भर में घूमा करती पूरा शहर लिलिपुट लगता था ऐसी ही मारती । ऐसे ही अच्छे से देखते खुश होते कुछ खेलते थे । सोचती हम भी बडे होकर ऐसा ही शहर बसाएंगे । कभी कभी कोई बच्चा अपनी मां की गोद से फिसलकर खिलाना गाडी में बैठ की किसी करने लगता है । माँ से पुचकारती चुनती बहलाती और कहती पीट ये गाडी बहुत छोटी इसी तुमसे नहीं बैठा जाएगा । पर हम तो बच्चा नहीं मानता हूँ । हर तक मान झेलना कर बोल छुट्टी चुके हैं नहीं तो मुझे मई वहाँ कर ली जाएगी । बच्चा से हम कर पांच सी बहती हुई मुठा नदी की ओर देखता हूँ, चुप हो जाता था । मुझे नहीं थी जिसके तहत पर कभी बहर लीलीपुट जैसा खिलाना था पर नहीं क्यूँ और भी बहुत सी चीजें नहीं तो केवल मुठा नदी और सरकारी टप्पर जिसपर में बैठा हूँ मैं और पचास साठ आती । हाँ मेरे तो बच्चे तो उनकी मांग पिताजी सुधीर आकर मेरी पीठ पर सवार हो जाता है । पिता जी ललिता आकर मेरी कोठी में बैठ जाती है । माँ कब आएंगे? पिता जी सुधीर कुछ हम घर वापस कब चलेंगे? पिता जी ललिता ललिता करके परन्तु मैं उन्हें कोई जवाब नहीं दे सकता हूँ । जवाब दे ही नहीं सकता । सुधीर और ललिता के प्रश्नों का जवाब देने की शक्ति यदि किसी में है तो वही है, मुठा नहीं । मुठा मई तो सामने कह रही है जहाँ कि गहरे सन्नाटे की तरह बिल्कुल अच्छा घडी के घंटे वाली सुई के समान पडी थी नहीं हूँ जिसकी धीमी धारा के तरह चल मैं चाहता हुआ संगीत कानों को सुनाई नहीं पडता । जो मन कुछ होता है मस्तिष्क को छोड छोड था क्योंकि नहीं भूल रहा हूँ क्या हो? याद नहीं था ठीक है कोई कोई बात केवल इसीलिए भुला दी जाती है कि वह पेश किया था । बहुत सी बातें खुल क्या सरकारी टप्पर कि वो पचास साठ निवासी बहुत सी हो गई । सुधीर जयललिता भी बहुत कुछ हो चुके हैं । फिर सुबह माँ को नहीं हुआ । ललिता घर को नहीं । हाँ खर्च और मुझे मुठा का किनारा हूँ । किनारे का संभाजी पार्क पार्क सी लगी सडक उन दे कम खाना तो जहाँ मेरा खर्चा नहीं जो ललिता को यहाँ हर उसकी माँ और उस घर में ही सुधीर ऍम मेरे प्रति ऍम वह प्रतीक जो भी थी अरब नहीं है पत्ती नहीं बच्चों की माँ नहीं है नहीं ये तो की उठाना है सरकारी था जिस पर मैं बैठा हूँ और पचास साठ हम मेरे तो फिर उनकी हूँ हाँ । सुधीर ऍम हाँ याद आया हूँ कुछ दिन दिन किया था हूँ क्या था उस दिन तो नहीं नहीं दो ही नहीं थी तो वो जुलाई को तो ससून अस्पताल में मेरा ऑपरेशन हुआ था । ऍम उस समय तो मेरी पति थी सुधीर और ललिता की माँ थी क्योंकि इतना ही तब ऍम यहाँ यहाँ शायद मगर या ताज धोखा दे रही है । नहीं । हाँ, ठीक है बारह जुलाई थी उसे । दो नहीं बारह जुलाई दो दिन पहले ही मैं अस्पताल से लौटा था । अस्पताल का कहाँ तो भर चुका था तो सूखा नहीं था ठीक मुठा नदी की तरह जो अब बिलकुल उतली आठ बिजली है, सूखी नहीं मगर ये किसी टीम बहुत कह रही हूँ । इतनी गहरी जितना पहले दिन धीरे ऑपरेशन का घाम, अच्छा का पानी बांध तोडकर पहले क्या था ऐसे ही जैसी खाओ से खून पहले क्या था? हाँ ऑपरेशन सुख चुका है । रक्त बंद हो चुका है । मुठा कर रहे रखते आब एक भी ना जाने कहां समझ आ गया है तो केवल उठाना नहीं । यह सरकारी टप्पर है जिसका ऍम मैं और प्रचार साॅस उनकी मांग पिताजी मांग के बिना हमें बहुत बुरा लगता है । सुधीर सिसक उठता हूँ पिताजी का चलिए हमें अच्छा नहीं लगता । ललिता कर हाँ छुट्टी है अच्छा नहीं था क्यों वो भी पूरा उठता हूँ । माँ नहीं है ना? सुधीर सुबह ही लगता है ऍम माँ भी नहीं फिर भी नहीं है तो पहले ही मेरा अपना नहीं था । जिमखाना रोड संभाजी पार्क के ठीक सामने हरे भरे फूलों से चोट सुंदर तिमंजिला पंद्रह की उतना के साथ रहती कि सुंदर पीला पीने वहीं लगाई थी दांपत्यसुख हीटर, चाय तो सोंचो ही की तेल समय पाकर फूली एक के बाद एक कुश्ती तो फूल लेकिन तो नहीं सुकुमार मोहत सुधीर फॅमिली था । उन्होंने पाकर मानो पिरी जीवन की सारी कामनाएं पूरी हो गई थी और उन तो बच्चों को जन्म देकर ज्योत्स्ना ऍम बांध तोडकर पहले था ऍम तोडके ठीक उठा नहीं था । सरकारी कैंटीन में भोजन की घंटी बज चुकी थी । बच्चे खाना खाने की जिद कर रहे थे परंतु मुझे भूख नहीं एक स्वयंसेवी का आकर बच्चों को ले जा रही है । पीछे मुडकर आरपार मेरी मूंग की ओर देखते हैं तो से अधिक उनकी आंखों में ठीक हूँ । कौन सी भूख है वो उन्हें भागते ही क्या चाहिए? सबसी नहीं नहीं चाहिए पे रोटी की नहीं ममता की भूख ही हैं, स्वयंसेविका पीसती है पर वह उन्हें रोटी दे सकती है क्या नहीं हूॅं माँ का प्यार चाहिए मुझे भूख नहीं मुझे भी रोटी नहीं चाहिए, तुरंत मुझे हूँ । ठीक उसी तरह की भूख हम उठाते थे । मुझे तो जिसमें हजारों का प्यार समेटकर अपने हृदय में सामान लिया है जिससे अपना पेट भर कर पूछे और मेरे बच्चों को धोखे मरने के लिए छोड के किस कितनों को उजाडकर । आज सरकारी टप्पर में रहने के लिए बात कर लो । मैं असली बात फिर भूल गया । बारह जुलाई की बात कर रहा था । मैं दिन का करीब एक बच्चा था, उन्हें बिस्तर पर पडा था । सुधीर और ललिता पडोस में खेलने चले गए । क्यों टाॅपर मेरे पास आ बैठी थी । मेरे ऑपरेशन के कारण वह बहुत परेशान थे । राहत तीन मेरी सेवा से शुरू में जुटे रहकर उसने अपना स्वास्थ्य बिगाड लिया था । ऑपरेशन मेरा हुआ था परंतु उसके समस्त टीडा उस ममता में नारी के विजय में समा गयी थी । शीतल चांदनी जैसे मृदु मुस्कान देखकर चुप मेरे पास आती तो मुझे लगता मानव संसार का सारा सुख भाव ज्योत्स्ना बनकर मेरे घर के कोने कोने में समाचार सुधीर और ललिता की नन्दिनी बाहों में बंदी ज्योत्सना की छवि ठीक कर विश्व के स्तर पर प्रथम माह की कल्पना कर नहीं रखता हूँ क्योंकि मुझे पाकिस् प्रसन्न थी फिर मैं तो उसी पाकिस् ठंड था वो भी पहना नहीं था । टीरा बीच बीच में जहाँ कुछ नहीं मुझे बडी बेचैनी महसूस होती है तभी ज्योत्सना मुस्कानों की नहीं कितने बिखराकर कोई ऐसी बात छेड देती है जिससे भी सारा कृष्ट दूर हो जाता हूँ । उस दिन मेरा मन नहीं जाने क्यों था की थे । जैसी भी आपको लेता के बोझ नहीं दबा जा रहा था जो तनी प्यार से देखते हुए हो देखा आज का मौसम कितना सुहाना हूँ । हल्की हल्की धूप हूँ उदयकालीन, पाटल, वाइॅन् परन्तु यही सुंदर को हार कल अपना तांडव नृत्य करती रही है जो इन उदय काले बादलों ने कुछ घंटे पहले आपने घोर कदम धडकन से कानों की पडती फाड डालेगा वहाँ पे कितनी वर्षा हुई है रात भर पिछले चौबीस घंटों में पंद्रह इंच पानी तो उसमें बुराई कौन सी हुई तो ना की सारी गंदगी कुछ ही देर में साफ हो गई कहते हुए खिलखिला कर सकते हो और उसके इस खेल के हाथ के साथ मेरे विजय का सारा पूछ ठीक मुठा के बाढ की तरह उतर के ज्योत्सना की मुक्त कुर्सी पर उस दिन मेरी उदासी भी शर्मा कर लौट के परन्तु में है उदासी दो ही मिनट के बाद फिर लौट आई मेरी पडोसी खांडेकर ने आकर का आना तुमने सुना कुछ क्या ज्योसना पाँच छह मान टूट गया पांच चीत बांध पिछले किसान उठाने दी पर बांधा गया था सारे पुणे शहर को वहीं से पानी पुरा जा सकता बांध टूटने का पूना का क्या सोमर जाना चिंतित होकर में पूरा परन्तु आज के एक बार में तो ऐसी कोई खबर नहीं तुम कैसी हो वृत्ति जाए तभी ना रात को दस बजे उसमें दरार पड गई । वर्ष नहीं तो कल कमाल कर दिया ना मिट्टी का बांध कोई गोवर्धन वहाँ तो है नहीं जो सिर उठाए और केंद्र का कोर्ट से हटा रही ऍम चल रहे हैं बांध भी कुछ खराबी होती तो शहर की जलापूर्ति पर कुछ तो असर पडता ही है । ज्योत्सना नेशन काउंट असर पडेगा कहाँ सी पूरे तीन सौ आदमी करार बंद करने की कोशिश कर रहे हैं । भाई सारी रात काम चलता रहा तरार पडने से नल को खतरा थोडी है अपना तो शहर को ही मुझे तो पूरी कप मालूम होती थी । शहर को खतरा होता तो कुछ हलचल होती । इतनी बडी बात कैसे जीत सकती हैं मैं बोलता हूँ घर बैठे शहर का हाल थोडी मालूम होता है ना? पूना के हर बूढे बच्चे की जमान पर यही बात है । इस बीच तेजी से छोडना चाहिए । भागो भागो खाण्डेकर ज्योत्सना और में एक दूसरे की ओर प्रश्न सूचित दृष्टि से देखती लगे । खांडेकर तीन की तरह बाहर भागा और पालक मारते आंखों से ओझल हो गया । ज्योत्सना का चेहरा काला पड गया । सुदी ललिता चिल्लाती हुई वो पहाड था । दोनों बच्चे ऊपर से उतर आई । क्या है? हाँ कुछ नहीं । यही बैठो । ज्योत्स्ना दोनों को कमरे में घसीट रहीं उन्हें अपनी छाती से सटाकर उसने कोर्ट में भी । कुछ ही क्षणों में खांडेकर हफ्ता हूँ । मेरी कमरे में आया उसका मुंह पीले पांच की तरह भई से पीला पड गया था । जैसे तैसे उसी का आना ताई बाढ भागों ऍम ऍम ज्योत्सना ने टिक स्वर्णी का पांच सौ और खडकवासला दोनों बार टूट के ताई मुझे मई में तीस तीस फुट ऊंची लहरें उठ रही पुलिस कूल घूम कर लोगों को आगाह कर रही है । यहाँ तक पानी आती ज्यादा देर नहीं लगेगी । जिमखाना से लेकर शिवाजीनगर तक लोग जान बचाने की फिक्र में पागलो की तरह भाग रहे हैं सिंह की और मौत के बीच सिर्फ कुछ कदमों का फांसला है ऍम होती है खांडी कल का अंतिम बाकी सीढियों पर पहुँच गया । ऊपर अपने फ्लैट की और वहाँ का उनकी आंखों के सामने अंधेरा छा महाराष्ट्र की रानी प्रेरणा की बाढ में डूब जाने की कल्पना मात्र से मेरी फॅमिली ऑपरेशन से अशक्त शरीर को मुझे मई की बाढ के आक्रोश से बचा सकने में मैं अपने आप को बिल्कुल समझ पा रहा था । असहाय होकर मैंने ज्योत्सना को देखा तो तब रहे क्या उसके चेहरे पर नारी की बेहतरीन था । उसका नहीं निश्चेत कहना चाहता हूँ जिसे पहाड से टकराने, तूफान से जूझने और विश्व को चुकाने की क्षमता होती है । फॅर कोर्ट से उठाते हुए उसने कहा ऊपर जाकर छत पर मैं भी नहीं आती हूँ । बच्चों को भी आने वाली विपत्ति का कुछ आभास हो गया था । पी चुपचाप ऊपर चले गए । उनके जाने के साथ ही प्रतिक्षण पास आता हुआ घन खोटकर जनसुनाई क्या सडक पर लोगों की भाग दौड ठीक प्रकार से मुझे समझाते देखना नहीं की भीषण लहरों और मेरे घर में कुछ खत्म कान तक है अपने भाई से सिहर उठा । पर तभी ज्योत्सना के शब्दों ने मुझे चौंका दिया । मकान में पानी भरने लगा है । सभी जगह पर जा रही है । बच्चों को मैंने भेज दिया है तो भी चलेगा । फिर ऊपर नहीं चढ सकूँ । मैं जानती हूँ आप चल फिर नहीं सकती । मैं तो चल सकती हूँ । सीढियाँ चढ सकती हूँ । अब कंधे पर बैठ चाहिए । सोचने का समय नहीं है जल्दी चलिए देखते हुए उसने मेरे दोनों हाथ पकडकर मुझे अपनी कंधे पर चढा बाहर कदम रखते हैं । बाढ के पानी ने ज्योत्स्ना के पैरों को छुआ और तो ही सीढियों की बात । मुझे लगा कि पानी भी हमारे साथ पीछे चलता रहा है । क्रोधित हो उठा मई कच्चे आज बिल्कुल शांत कर उस दिन उस्ती राक्षसी की तरह हम लोगों का पीछा किया था पहुँच उतना मुझे काम के ऊपर उठाएं । सीढियाँ चलती करेगी । चलती पसीने से लगभग हारती हुई ज्योत्स्ना ने मुझे छत्तर पहुंचा का ही था । मकान के सभी लोग छत पर जमा हो गई थी । खांडेकर मुझे छोडकर मकान में उस समय पुरुष तो थी नहीं, सब काम पर गई थी । कुल मिलाकर पंद्रह सोलह व्यक्ति छत्तीस की । अधिकतर स्त्रियां और बच्चे सब के सब चिंतित । स्त्रियाॅ बच्चे को ज्योत्सना ने मुझे छत पर पडी एक कुर्सी पर बिठा दिया । तेजी से जाकर ईधर उधर से बहुत सारी चीजें बटोर लाई हूँ । छत पर से पहले बार मैंने चारों ओर देखा । नागिन से लगता पाते हुई जीत के समान मुठा की लहरी सारे शहर को निकलने के लिए उतावली हो रही थी । पहले अंकर जल बच्चे पूरा ही नी तोश अपराधी का फर्क भूल कर जो भी सामने आता उसे उधर अस्थितरता जा रहा था । चिकन खाना की वैभवशाली बंगले बाढ से ऊपर झांकती हुई छतों द्वारा अपनी मेरी अस्तित्व का परिचय दे रहे थे । गिराई पर तनी अल्का टाकीज की रंग बिरंगी इमारत का कोई पता नहीं था । यदि कुछ शेष रह गया था तो छतों पर खडे हुए थे । वर्ष ब्याकुल बैठी ताकि खंबों के सिर विशाल का इधरिच कुछ दस की फांसी पर स्थित रानी लक्ष्मी पाई कि तुम प्रतिनिधि और उन पर बंद करने वाला पहन निर्मल आकाश किसी पिछले चौबीस घंटों में हूँ के हेल्प बरसाकर पंचेत बांध की अच्छी हो ना खडकवासला बांध की नींव हिला दी थी और मुठा मई की जहरों को सहयात्री की चोटियों पर चढा दिया था । चरण चुंबी बाढ का पानी धीरे धीरे ऊपर चढता रहा हूँ । कुछ देख भी हमारा मकान भी पानी से पूरी तरह घिर किया कि केक काट के सभी मंजिलें पानी में डूब गई । होली होली पानी छत को छूने लगा । सबका धैर्य छूट गया तो अच्छी नहीं लगी हूँ । हम असहाय मृत्यु का इंतजार करती लगी । तभी खांडेकर की दृष्टि कुछ कदम दूर ऊंचे टीले पर सिर उठा बरगद के पेड से लटक गई । उसने देखा तो युवक टेंट पर बैठी हूँ तो उसकी आॅक्सी है है कि नहीं । बहुत सी चीजें बटोर के लाइन कहते हुए ज्योत्सना ने कोने में पडे रस्सी की ओर उंगली उठाती थाई तो में आज में बचा लिया खाण्डेकर ने प्रंशात सात मकसद मीका छत पर रहना खतरे से खाली नहीं । इस भीषण बाढ में कच्छ टूट जाए या मकान ढह चल इसका कोई ठिकाना नहीं तो सामने का बरगद का पेड काफी मुझे और सुरक्षित है । वहाँ पहुंच सके तो जान बच सकती सभी प्रश्न कि पहले किसी पीर पार पहुंचाया जाए । खण्डे करने खतरे की सूचना सबके मुख बन करती थी तो वेज समय पर पात मत करो, पहले अपना पेट तक पहुंचाया जाए । उसने आदेश दिया आना मेरी पीठ पर जमकर बैठ सकती हूँ । उसने मुझसे का इनमें पहुंचाऊंगी ज्योत्स्ना बीच में ही बोल पडे तो सबके मुंह से एक साथ निकल पडा । तुम लोग मुझे समझाते क्या मैं कोंकण की संतान हैं, मुठा बाई की बेटी हूँ । आज मुठा मई से लड कर अपनी सिंदूर की रक्षा करूंगी । मुठा मई मुझे भले ही उजाडते मेरी मांग के सिंदूर को जाने की हिम्मत नहीं, उसके निर्भीक स्वर्ग ने सबको अफवाह कर दिया, जो स्थानी कुछ रस्सियों का फंदा बनाकर कुर्सी समेत मुझे रस्सा पुर में मजबूती से लटका दिया । पांच सुबह ललिता घबराना मैं मैं अभी लौटी कहती हुई वह स्वाॅट एक हाथ से जैसा पकडे दूसरे हाथ से कुसी किसका थी वह अंततः हूँ मुझे बरकत कि पेट तकनीकी तीन काफी बडा था और आरामदेह था । मुझे वहाँ पहुंचाती समय उस पर क्यों कि मैं पता नहीं कि मैं नहीं करने इस सारी टप्पर में जीवित रहते हुए हो । सरकारी में मैं और पचास समझाती हूँ कि तू धर्म की मम क्यूकि मुझे पहुंचाकर क्यों ऍम उसकी भारत की की एक धूम टू करके उसने सब बच्चों को अपनी पीठ पर पांच कर पेट तक पहुंचा दिया । सुधीर ऊॅट अच्छा पार्टी पहुंचाई थी क्यों? स्थानी अपनी जान हथेली पर रखकर सबको जीवन दान किया । मैं इतनी ठंडी कर ऍम मैं भी सांस की नहीं ले पाई थी कि सामने के अनाथ हमने से बच्चों का करुँ क्रंदन सुनाई पडा नहीं देखा छत पर कई बच्चियों सहायता के लिए चिल्लाती हूँ हाथ के इशारे से बना रही हूँ जो टाॅल करोड से भर क्या भाई पीछे ऍम टूट जायेंगे कर रहा हूँ पर हम कर भी क्या सकते हैं जो नहीं नहीं पानी धीरे धीरे आकाश को छूने का प्रयास में कर रहा हूँ मेरे मकान की छत उठा के विध्वंस कार्य क्रूड के सामने नतमस्तक होने को मजबूर हो रहे थे थाने की पुरानी कमजोरी भारत अपनी आज श्री तुमको सर पर उठा उन्हें बचाने की कोशिश ज्योत्स्ना क्या उन्हें किसी तरह बचाना चाहिए? क्यों विपत्ति मूल् लेती हूँ टाइम शहर में हजारों व्यक्ति किसी प्रकार मौत की मुंबई फंसी किस किस को बचाने चाहूँ कि हमारा परिवार पर चाहिए यही गनीमत है पीठ पर बैठ कर हम बच्ची जाएंगे इस्काॅन खांडी करने का प्रयास करना हमारा कर्तव्य हूँ । ज्योत्सना बोली हूँ पर जानबूझ कर आग में कूदना बुद्दिमानी नहीं मौत को आमंत्रण भिंडी तर्क दिया मृत्यु का जीवन को आवाहन नहीं उठा । मई अपनी संतानों के बाल और साहस की परीक्षा नहीं रही है । यदि समय हम मृत्यु से हार गए तो उठा मई हमें कभी क्षमा नहीं करेंगे । ज्योत्सना ने उत्तर दिया अनाथालय की छत से उठती गगन भेदी चीखों से हम पहले उठे पी के नेत्रों से हमने देखा कि एक गुडिया से सुंदर लडकी छत्तीस से फिसलकर मुठा की अनंत चल राशी में बिलियन हो गई । मोठा कॅश चल रहा है उसी मुठा की जो यहाँ से सरकारी टक्कर के सामने छुप छा गई थी जा रही हूँ था और ये सरकारी टप्पर जिसपर में बैठा हूँ मैं और पचास साठ हजार और मेरे तो बच्चे कर उनकी मांग हाँ तो महान ई क्यों नहीं उस बच्ची को फिसलती देखा प्रतीक छाती की जारी पच्चीस में अपनी जान पर खेलकर भी तो नहीं बचा हूँ की कहते हुए उसने कुर्सी की बंधी रस्सियां निकली सुधीर फॅमिली बच्चों का कुछ ख्याल करो, ज्योत्स्ना मच्छरों मांचल हूँ । पीवी मेरी बच्चियाँ हैं कहते हुए ज्योत्स्ना बिजली की गति से रस्सी पर फिसलती हुई हमारे मकान की छत पर हूँ वहाँ से अनाथालय कि छत्तीस कुल पास ज्योत्स्ना नीरस सीखने की । देखते ही देखते अनाथालय के दस पंद्रह मिनट की हमारी छत्तीस हो जो एक के कुर्सी के सहारे बरगद के पेड पर पहुंचानी साथ फॅमिली पांच छह बरस की एक नन्ही बच्ची को अपनी साडी से पीठ पर टाॅस रस्सी के सहारे भेज दिया पानी हमारी मकान की छत पिक्चर चुका था ताकि बच्चे पानी में डूब रही थी ज्योत्सना आपकी पीठ पर लडकी लडकी को लिए रस्सी पर छूट गई थकान उसके चेहरे पर अपना सिक्का जमा चुकी थी । पहुंच और दूसरे ही क्षण चरमराहट के साथ हमारी फॅमिली रहेंगे । ज्योत्सना बच्ची को साथ ये अकाश चाॅस मकान की फॅमिली शेष बच्चियाँ एक विजय विदारक ठीक हिस्सा लहरों पीठ हमारी अपनी फॅमिली गई सैनाथ पहले की मेरी बालिकाओं को लेकर बेटी ने क्रुद्ध मानसी लडते लडते खेल खेल में अपने जीवन का बलिदान देती है नहीं थम बलिदान ही तो ऍम पुरूष की रक्षा करते हैं की नारी का था पीठियों की रक्षा करने की माँ का हो उसकी बहुत सब शामिल हो गया कुछ ही घंटों में उठा मई का क्रोध ऍम उतरना था चलता है सिर्फ करना भी पडता है । मुठा की चलती हुई पाठ्य बाॅन्ड ही सब लोग घट गए तो हो सके मैं उत्तर की खांडेकर होता है सुधीर ऍम प्रिया और अनाथ खाने की पच्चीस थे तीन पर चढा होना शहर हो वहाँ वहाँ जिस सरकारी तब पर पर बैठकर इस शांत मुठा नदी से पूछ ही ज्योत्स्ना तोहरी बाढ में उतरी थी एक पीपल्स सहाई बच्ची को लेकर बताओ मुठा मई तो कहाँ है? कहाँ है मेरी ऍम पर मुठा शांत इस सरकारी टप्पर के लोग भी शांति नकद नहीं उनके हृदय के तहत नी जल प्रवाहित हो रहा है मेरा मन हो रहा है सुधीर और ललिता क्या खेल हो रही हर सूची हुई आंखों से सुधीर अब भी पूछ रहा है पिता जी मांग के बिना हमें अच्छा नहीं रखता हूँ माँ कब आएंगे पिता जी हूँ हूँ जीते कहाँ की फूट पडता है मैं रुंधे हुए कंट्री से उत्तर देता हूँ ऍम बच्चान सौ भरे उदास नए नौ से मुठा की ओर देखता है मानो पूछ रहा हूँ माँ कब आएंगे मुठा मई पर मुठा चाहते हो चुके हैं स्कूल

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