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मेरी अर्धांगिनी उसकी प्रेमिका - 01

आप सुन रहे हैं तो कोई ऍम किताब का नाम है मेरी अर्धांगिनी । उसकी प्रेमिका इसमें लिखा है राजेश आनंद ने । आरजे आशीष जैन और आरजे सारिका की आवाज में कुछ हुआ है । सोने जॅान तो भी किसी लडकियाँ पसंद है । कॉलेज की कैंटीन में अपने खास मित्र के साथ मैं बैठा हुआ था । मेरे मन में सवाल उठा तो मैंने पूछ लिया । सवाल उसके कानों से टकराया तो जैसे किसी ने उसे हैरानी से लबालब भरे हुए समंदर में फेंक दिया गया हो तो कुछ देर तक मेरी और एक तक देखता रहा । शायद उसे अपने कानों पर यकीन नहीं हो पा रहा था । उसने अपनी कान में उंगली डाली, तेजी से हिलाया फिर मेरी और झुकते हुए बेसब्र अंदाज ने बोला क्या क्या तुमने ऐसे कहूँ? हमने सुना नहीं है । मुझे उसके संदर्भ पर हंसी आ गई । सुन तो लिया है मगर उसने मेरी आंखों से देखा मगर मेरी बहन चढ गई । जो सुना है उस पर विश्वास नहीं हो पा रहा है क्योंकि मैंने कोई गलत सवाल कर दिया । खरे नहीं यार । उसने मेरे हाथों को अपनी खुरदुरी हथेलियों में भर लिया । उन्होंने गलत तो कुछ नहीं कहा परंतु जो भी कहा वो सब तुम्हारे मुझसे सुनने के लिए मेरे काम तरफ गए थे । सच कहूँ तो कई बार मुझे ऐसा भी लगा था जैसे मैंने किसी अधेड से दोस्ती कर रही है । क्यों? क्योंकि लडकियों के बारे में छोडकर तुम दुनिया के हर मुद्दे पर बात कर सकते हो । मसलन अमेरिका ने हिरोशिमा में परमाणु बम क्यों गिराया? हमारी गैलेक्सी में कौन सत्तर से केंद्र से कितनी दूर है? वगैरह वगैरह । अच्छा जी तो धीरे समझ कराया अगर कोई नहीं मेरे तो इतने दिनों बाद ही सही । आज पहली बार तुम्हारी मुझे लडकियों का जिक्र सुन कर बहुत अच्छा लगा । अच्छा लगा कि मेरा यार लडकियों के बारे में भी सोचता है । मैं उसकी हैरानी को समझ सकता था । उसे मुझसे इस तरह के सवालों की उम्मीद नहीं थी । कम से कम मेरे पिछले कुछ सालों के बर्ताव को देखकर तो बिल्कुल नहीं । मैं अपनी सोच और संजीदगी की वजह से जिंदगी की उस किसकी उम्र में भी उसके सहित अपने तमाम दोस्तों के लिए एक अधेड उम्र की सोच रखने वाला उबाऊ इंसान था । इसे लडकियों में कुछ खास दिलचस्पी नहीं थी, जबकि व्यक्तिगत तौर पर मैं ऐसा नहीं था । मुझे दिलचस्पी थी मगर किसी लडकी के व्यक्ति का जीवन भावनाएँ और उसके निजी संबंधों को मैं अपने दोस्तों के बीच बैठकर उपहास या चर्चा का विषय मुझे पसंद नहीं था । वो चंद पलों तक एक तक मेरी और देखता रहा । संजीव मैंने से आवाज ही अलग । उसका नाम संजय हम अगर मैं उसे इसी नाम से पुकारता था । मैंने अपने सवाल को स्पष्ट करते हुए पूछा क्या गांव की लडकियाँ गांव का नाम सुना तो वह घरों से उछल पडा । मेरी और झुकते हुए बोला क्या आप सकते हो? या मैं मोटे मोटे चादर में ऊपर से नीचे तक लिपटी उन जिंदा मूर्तियों को पसंद करूंगा? अलर्ट बेवकूफ लडकियाँ उसके अपने आखिरी शब्दों में मेरे सामने अपनी सारी नफरत उडेलकर रखती है । उस की इस प्रतिक्रिया में मुझे हंसी आ गई । हालांकि मेरे लिए ये अस्वाभाविक नहीं था । मगर उसका अंदाजी कुछ ऐसा था की मैं हंसने से खुद को रोक नहीं पाया । मैं बताऊँ मुझे कैसी लडकियाँ पसंद हैं । चुटकी बजाते हुए मेरी और चुका उसकी आंखों में एक चमक आ गई । कैसी मेरे शब्दों में भी अच्छा उत्सुकता थी बडे बाप की बिगडी बेटियाँ वो सचमुच ठाकरे मारकर हंस पडा । अच्छी पसंद है तुम्हारी और क्या मुस्करा पडा । अचानक मेरी निगाहें आसपास की मेज में बैठे लोगों पर गई । तुम्हें सहन गया उनमें से ज्यादातर लोग हमें घूम रहे थे । शायद मेरी हंसी उन्होंने परेशान कर दिया था । मैंने अपनी नजरों को देर तक उन पर ठहर नहीं नहीं दिया । संजू की और देखते हुए धीरे से पूछा और क्या खासियत होती उनमें खासियत उन में कमल गट्टे की तरह उसकी आंखें फैल गई । भैया समूचे के लिए लाल चटनी नहीं है । एकाएक कैंटीन में वेटर का काम करने वाला छोटू हमारी मेज के पास आकर खडा हो गया । समूचे के साथ हरी चटनी लगा दूँ । उसने पूछा हरी चटनी । संजय की आंखों की चमक एकाएक गायब हो गई । उसने छोटू और घूरकर देखा और फिर डपटते हुए बोला, हम जानते हो ना कि लाल चटनी मुझे कितनी पसंद है । जाओ जाकर लाल चटनी लेकर आओ, वरना समझो कि समूह से ऑर्डर कैंसिल तैयार छूटने लाचारी भरी नजरों से मेरी और देखा । छोटों तुम्हरी चटनी ले आओ । मैंने छोटों को हल्के हाथ से धकेलते हुए कहा, छुट्टी की उहापोह ही में मैं उस माहौल को बिगाडना नहीं चाहता था । संजू हरी चटनी के साथ समय से खा लेगा तो संजू क्या बकते हो? या मुझे हरी चटनी खाते हुए तुमने कब देखा? संजय मेरी और घोलकर देखा । तुम तो मुझे बहुत अच्छे से जानते हो प्लीज रहम खाओ मुझ पर हाँ तुम कुछ कह रहे थे । मैं उसे देर तक चटनी पर केंद्रित नहीं रहने देना चाहता था । क्या उसने मुझे ऐसे देखा जैसे उसे पता ही ना हो कि मैं किस बारे में बात कर रहा हूँ । लडकियों की खासियत के बारे में मैंने कहा खासियत ओ हाहाहाहाहा अचानक उसका चेहरा खिल उठा । लगभग मेरे कानों तक झुकते हुए बोला । उनके तंग कपडों से छाते, उपहार अधनंगी, कमर जांघ तक खुली टांगे तो मैं नहीं लगती है तो तो इसलिए पसंद करते होने क्यों? ऍम बिल्कुल नहीं लेकर । चेहरा सख्त पड गया । मैं लडकियों को बिल्कुल नहीं पसंद करता जो ऐसा सिर्फ इसलिए करती हैं कि वह आधुनिक नजर आए । यार इसमें बुराई क्या है? अगर छोटे कपडों में वह आधुनिक नजर आती हैं तो आधुनिकता छोटे कपडों में नहीं सोच में होती है यार अब तो मैं ऐसे रंगीन मुद्दों पर भी अपनी बीसवीं सदी वाली फॅालो वो नाक सिकोडते हुए मेरी और देखा । तुम उनके जैसे वाले आधुनिक नहीं बन सकते तो कम से कम उन्हें अपने जैसे वाला आधुनिक मत बनाओ । ये उम्र जीवन में एक बारी मिलती है । उन्नीस का मजा लेने दो और उनका हमें भैया जी आपके समझे फॅमिली में काम करने वाला छोटू एक एक समूह से की दो पेटला करने इस पर रख देता है । मैंने मुस्कुराकर उसकी और देखा मगर नजरिए छलांग लगाती हुई एक बार फिर संजय के चेहरे पर आ टिकी । संजो मैं फिलॉस्पी नहीं पूछ रहा हूँ, अपना पक्ष रख रहा हूँ पर तुम्हें क्या लगता है कि जिन कपडों में मैं दूसरी लडकियों को देखना पसंद करता हूँ, उन्हीं कपडों में मैं अपनी बहन को देखना पसंद करूंगा । यहाँ तो जरूर मैं खुद को तुम्हारा वाला आधुनिक कह सकता हूँ । मैं कैसा है? मैंने संजय की आंखों में देखा । उसने अपनी नजरें झुका ली । मैंने अपनी बात जारी रखते हुए कहा संजोग हम समाज और अपने लिए अलग अलग पैमाने सेट नहीं कर सकते और मुझे सचमुच अफसोस है की हमारे समाज में ज्यादातर आधुनिक जानवर ऐसे ही हैं । आधुनिक जानवर वहीं पर फिर मेरी और घूमने लगा । शब्द का मतलब क्या तुमने लोगों को कभी ये कहते हुए सुना है कि छोटे कपडे नहीं तो भारी सोच है । अच्छा मुस्करा बडा तो मैं उन्हीं से ज्यादातर लोगों को आधुनिक जानवर कहता हूँ । समझे कुछ मैं समूचे को प्लेट पर मसलते हुए कहा लगता है छोटों ने समूचे को कडाही से निकालकर सीधे हमारी प्लेट पर रख दिया है । कितना धर्म है मेरी पेट की और देखते हुए संजय बडा समूह बनाया । मैंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी तो आधुनिक जानवर का मतलब समझाने वाले थे । समूचे से ध्यान आता तो मेरी और देखते हुए पूछा क्या मैं बस पडा चाहते? मैं सुना नहीं जो मैंने खैर छोडो तो नहीं समझोगे । मैं नहीं समझेगा क्यों? ऍम समझाओ तो फटी फटी नजरों से मेरी और देखने लगा । मैंने कुछ नहीं कहा । खर्च छोडो हमारी बातें तो भी जा रहा हूँ । अगर एक बार जान लो राज्य कोई का एक गंभीर हो गया भेजो । झुकते हुए बोला आज दुनिया बहुत आगे निकल गई है । हो सकता है कि जीवन को जीने की तुम्हारी सोच सही हो मगर परिवर्तन के साथ परिवर्तित हो ना हालत नहीं है । मुझे ना पुरानी सोच पसंद है और नहीं पुराने तरीके और राज देखना । मैं शादी भी ऐसी लडकी से करूंगा । पुराने नियमों और बंदरों से बंद ही ना हो । तभी का एक अतीत की यादों के सितारे टूटकर मेरे सामने बिखर गए । मैं जब अतीत के पन्नों से बाहर निकल गया तो इधर उधर हैरानी से देखने लगा । जैसे किसी ने मुझे अचानक आसमान से जमीन पर पटक दिया हो । मैं अपने घर के बालकनी पर बैठा हुआ । सुबह की चाय पीता हुआ अखबार पढ रहा था अचानक मेरी लेगा । अखबार में छपी उस तस्वीर गई जो अखबार में इसलिए छापी गई थी क्योंकि पुलिस को उस शख्स की तलाश थी । वो संजय मेरा बदन कहाँ था ये क्या कर डाला तुमने? ऐसा कितना जोर? देर तक अखबार में छपी अपनी सबसे खास तो उसकी तस्वीर को गौर से देखता रहा । लडकियों समेत कई मुद्दों पर हम दोनों के विचार अलग अलग होते हुए भी हम हमेशा अच्छे दोस्त रहे हैं । अखबार की खबर की मानें तो संजय पर उसकी ही बेटी के कत्ल का इल्जाम था जिसके लिए पुलिस उसकी तलाश कर रही थी । हालांकि उस पर लगा इल्जाम खिलौना था । तूने जाने क्यों मेरी अंतरात्मा अखबार की खबर को स्वीकार नहीं पर पा रही थी । संजय खुली फिजाओं में घूमती लडकियों का दीवाना जरूर था और कुछ मामलों में वह वरिष्ठ था । अपनी बेटी का कत्ल सिर्फ इसलिए कभी नहीं कर सकता की पत्नी से तलाक हो जाने के बाद उसकी बेटी पंखुडी भी माँ के साथ रहना चाहती है । खबर पढते पढते मेरी आंखें अचानक पढाई दिमाग में एक सौ कई सवालों ने कोहराम मचा दिया वो सब कहाँ होगा? किस हाल में होगा? नहाने कुछ खाया होगा या फिर भूखा ही खुद को संभालने की कोशिश कर रहा होगा? मेरी निगाहें देर तक अखबार में छपी उसकी तस्वीर पर टिकी रही । नहीं उसे ढूंढो भी तो कहा भी । मैंने पुकारा यहाँ शिवी मेरी शिविर मिल । धर्म पत्नी खूबसूरत ग्रामीण बाला उसे मैं इसी नाम से पुकारता था । हालांकि उसका असली नाम शिवानी था । शिवानी निवेशक शहर की खुली फिजाओं के बीच अपना यौवन संभाला था अपना मगर वो अपनी सादगी और रिश्तों की कीमत कभी नहीं भुला पाई । ये आई । अंदर से आवाज गूंजी और अगले ही पल मेरे सामने आकर खडी हो गई । मुस्कुराते हुए बोली आप ने बुलाया मुझे उसकी खूबसूरत चेहरे से टपकती भीनी भीनी से मुस्कराहट का मैं दीवाना था । कोई और वक्त होता तो तेजी से उठाकर उसे अपनी बाहों में भर लेता था । मैंने कहा मेरे से गंभीर था । जरा फोन का रिसीवर उठाला होगी । मुझे किसी से जरूरी बात करनी है । न कुछ सवाल, न कोई जवाब वो अंदर की और लौट गई और अगले पर ऋषिवर मेरे सामने था । हालांकि मेरे चेहरे को देखकर वो समझ गयी थी की मैं परेशान है और मुझे इस हाल में देखकर वह कई सवाल कर सकती थी परन्तु उसने नहीं किया । कुछ मामले में वह कतई जल्दबाजी नहीं करती थी । इस वक्त क्या कहना चाहिए और क्या पूछना चाहिए इस पर जैसे उसे महारत हासिल हो, वो खामोश खडी मेरे चेहरे पर हो रही उथल पुथल को एक तक देखती रहेगी । जी एक और चाय मिलेगी क्या? मैंने पूछा था लाती हूँ? उसने कहा, और भीतर चली गई । मैंने उस दौरान कई चुनिंदा जगहों पर फोन किया जहाँ पर मैं संजय के होने की उम्मीद कर सकता था । मगर कहीं से कोई अच्छी खबर नहीं मिली । मैं कुछ और जगहों के बारे में फिर सोचने लगा । आपकी चाहें । शिवी ने चाहे तक मेरी और बढाते हुए कहा मैंने चाहे थाम ले उसकी पारखी नजरें एक बार फिर उछलकर मेरे चेहरे पर टिक गई हूँ । ॅ सारा करते हुए कहा नहीं, यही ठीक हूँ तो भराई । आवास में बोली अरे आओ तो मैंने जोर दिया और मेरे बगल में आकर वो बैठ गई । मेरे उसके बीच कोई एक दो फीट की दूरी रही होगी । मैं सडक पर उसके बिल्कुल नजदीक पहुंच गया । जानबूझ कर की गई मेरी सरकार पर वो लगा गई । मैं बीवी को अखबार की इन पंक्तियों को दिखाते हुए बोला देखो की जो कुछ लिखा है मेरे दोस्त के बारे में है की तस्वीर भी । अखबार पर छपी तस्वीर और मैंने इशारा किया । उसने अखबार को मेरे हाथ से ले लिया । खबर पढते वक्त उसने कई बार मेरी और देखा ये ये वही संजय है ना जो कॉलेज में आपके साथ थी । उसने हैरानी से मेरी और देखा । उसकी आंखें डबडबाई गई थी । हाँ मैंने धीरे से कहा लेकिन इनका जो ऐसे कैसे कर सकते हैं ये उसने अखबार को मेरी और बढाते हुए कहा । नहीं भी मैंने उसकी और देखा । इस अखबार में जो कुछ लिखा है वो सच नहीं हो सकता । उन्होंने दोस्त है मुझसे बेहतर उसे कोई नहीं जान सकता हूँ । मेरी नजरिये एक बार फिर उसकी तस्वीर पर जाते की लेकिन शिवी ऍम देखा मैं तुम्हारी आशंकाओं को समझ सकता हूँ और यकीन मानो मैं उन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहता हूँ । इसलिए मैं खुद इस मामले की हड्डी का तक पहुंचना चाहता हूँ । तो क्या करने की सोच रहे हैं । वो लगभग रुआंसी हो गयी । सोचता हूँ लखनऊ चला जाऊँ तो क्या कहती हूँ आज ही अभी इसी वक्त नहीं खडा हो गया । थोडी देर तक मेरी और देखती रही फिर कुछ सोचकर बोली, मुझे लगता है आपको पहले फोन करके सही स्थिति का पता कर लेना चाहिए । श्री मैंने फोन किया था । किसी भी ठीक ठाक उत्तर नहीं दिया । मेरा दिल कह रहा है कि वह अब भी लखनऊ में ही कहीं होगा । उसका घर तो नहीं पता मगर उससे कुछ ठिकाने जरूर जानता हूँ । मैं वो चुप हो गई । श्री मैंने अपनी बात जारी रखी । जिन लोगों से मेरी बात हुई, शायद उन्हें डर है कि मैं कहीं उनमें से तो नहीं हूँ कि संजय को पकडवाना चाहते हैं । आपने अपना परिचय दिया तो होगा । उसने पूछा दिया तो था पर शायद उन्हें मुझ पर फिर भी यकीन नहीं हुआ । फिर ऐसी बातों को फोन पर तर्क वितर्क भी तो नहीं किया जा सकता है । मेरी बात के लिए उसकी खामोशी में निशक्त सहमती थी । मैं कपडा पहन ही रहा था कि वह भीतर चली गई । कुछ देर बाद लौटी तो उसके हाथ में अटैक चीज हमें हुई थी । मेरी और हम आते हुए बोली, मैंने इसमें आपकी जरूरत की सारी वस्तुएं डाल दी हैं । ठीक है कहते हुए मैंने अपने शुष्क वोटों को उसके होटलों में रख दिया । आज वह जरा भी नहीं लगाई । उसकी आंखें बरस पडी । हालांकि मेरे लिए ये नया अनुभव नहीं था । इसके लिए भी मैं घर से जितनी बार निकलता वो बस यूँही मूर्ति बनकर खडी हो जाया करती थी । मैं अपनी कंपनी उंगलियों से उन मोतियों को समझने का प्रयास करता हुआ घर से बाहर निकल गया । वहां पहुंचकर एक बार मुझे फोन कर दीजिएगा । उसमें दूर से आवाज नहीं ठीक है । मैं ठहरा नहीं । शाम ढलते ढलते मैं लखनऊ पहुंच गया । ये कैसा शहर का जहाँ पर काफी लोगों से मेरी जान पहचान थी थे । वहाँ मेरे बडे भैया भी तो थे जो सचिवालय में अफसर थे । मैं स्टेशन से बाहर आया । मेरा मोबाइल स्टार्ट हो चुका था । मैंने इधर उधर नजरें दौडाई तो वहीं पांच ही मुझे पीसीओ नजर आया । मैं उसकी तरफ पडा । तुम थोडी देर वही टाॅवर को फोन करता हूँ । तुम जल्दी ही तुम तक पहुंच जाएगा । फोन पर भैया ने कहा मुझे इंतजार में वही रोकना था । वहीं पांच लगे पान की दुकान पर पहुंचा । सिगरेट सुलगाई और पीने लगा । तभी अचानक मेरे पीछे कुछ और सुनाई दिया । हमारे घूम कर उधर देखा फॅस पीसीओ वाले से सिर्फ इस बात को लेकर बहस कर रहा था कि उसने लोकल डिस्टेंस पर सिर्फ एक ही कॉल किया है तो उसके लिए उससे दो उसके पैसे क्यों लिए जा रहे हैं? उसके सवाल पर पीसीओ वाला हर बार छह लाख चिल्ला कर ही कह रहा था कि वह सबके साथ ही करता है क्यों? सवाल पर थोडी देर चुप रहने के बाद पीसीओ वाले नहीं जरा सहन कर धीरे से बोला नहीं मर्जी कैसी मर्जी वो पीछे घट पडा जी मेरा फोन है इसलिए देखिए अगर साथ अचानक व्यक्ति मेरी और बडा क्या जबरदस्ती है? अरे भाई, खुदा से कुछ तो कहीं वो तुम पर्दे रहना हो जाए । वो अपने आखिरी अल्फाजों को कहते वक्त एक बार फिर पीसीओ वाले की और घूम गया । जबरदस्ती जबरदस्ती कर रहा हूँ । मैं कौन कहता मैं जबरदस्ती कर रहा हूँ । पीछे वाला पूरी तरह झल्ला उठा । अगर आपको फोन नहीं करना तो मत करिए । आपसे इसके लिए जबरदस्ती तो नहीं करता । मुझे उसकी बात कुछ हद तक वाजिब भी लगी । सही ही तो है उस जबरदस्ती कहाँ करता है? हाँ, लोगों की मजबूरी जरूर है जिसका वह फायदा उठा रहा है । ऐसे ही थोडे दुनिया हमें अविश्वास की नजर से देखती है । कुछ दिनों बाद अचानक मुझे याद आया कि उसने मेरे साथ भी तो ऐसा ही किया होगा । ये बात और है कि मैं समझ नहीं पाया मैं उसे पचास करोड कमाया । बदले में उसने कुछ नोटों के साथ छुट्टी भी वापस किए थे । जिन्हें बगैर गिरे हुए मैंने अपनी जेब में डाल लिया था । लगभग बीस मिनट हो गए । उस वक्त तक ऐसी कोई गाडी वहाँ पर नहीं आई जो मेरे लिए थी । हाँ, पांच मिनट पहले वो लाल गाडी जरूर मेरे पास आकर खडी हुई थी । मगर वह भैया की गाडी नहीं थी । उसमें अच्छे से पहचानता था । ऊबकर मैंने दुकानदार सेक्सिट और माली जलाई और जो भी होटों पर लगाया । गाडी का ड्राइवर धीरे धीरे चलता हुआ मेरे सामने आकर खडा हो गया । थोडी देर तक मेरी और देखने के बाद तो झुककर बोला राज्य रास्ता बातें उसके माथे से पसीना टपक रहा था । यहाँ मैंने हैरानी भरी नजरों से उसकी और देखा और कब से? मैं आपको देख रहा हूँ । वहाँ पे काम जीरा पूछते हुए उसने कहा आपको मैं उसके और पलटते हुए पूछा मैं साहब का ड्राइवर हूँ । उन्होंने आपको लाने के लिए भेजा है । फॅमिली मैंने हैरानी से गाडी की और देखा मगर ये गाडी तो भैया की नहीं है । वो वहाँ हो जोर से हंस पडा । मैं तो इस बात पर दिमागी नहीं थोडा है कि साहब ने बताया था जब से उन्होंने नई गाडी खरीदी थी आप यहाँ आए ही नहीं खाया आइए उसने बढकर कार का बायां दरवाजा खोल दिया । गाडी में इसी ठीक नहीं है क्या तो हम पसीने से भीगे हुए हो वो मेरी आशा को समझ गया हो करके हफ्ते में बोला ऐसी बात नहीं है साहब । दरअसल बडे साहब ने कहा कि जब अकेले हो तो इसी मत चलाया करो तो पेट्रोल ज्यादा लगता है ना हो अच्छा चाचा मैं मुस्कुरा पडा । रोड पर उफान भरते हुए मैं उस घर तक पहुंच गया जहाँ पर मैंने फोन किया था । घर के लोग मुझे बेहद सभी नजर आए । उन्होंने जिस दरियादिली से मेरा स्वागत किया उसने मुझे लखनऊ की मेहमान नवाजी की जातिवादी मैं लगभग आधे घंटे तक वहाँ ठहरा रहा मगर इस आधे घंटे के दौरान उन्होंने मुझे सिर्फ इतनी जानकारी दी की पत्नी से तलाक के बाद से लेकर बेटी के कत्ल तक की घटना के बारे में संजय ने फोन करके सिर्फ इतना कहा था इन सब मसलों पर उसे फंसाया जा रहा है मगर बाहर नहीं मानेगा वो जल्दी घर आकर उन सबसे बात करेगा । ये कहते कहते उस बुजुर्ग महिला की आंखें डबडबाई महिला से मिलने के बाद मुझे समझने में देर नहीं लगी । ये लोग संजय के बेहद करीबियों में से एक हैं । मैंने उसे रिश्ते के बारे में ज्यादा जिक्र नहीं किया । चलते वक्त मेरे द्वारा यह पूछे जाने पर इसके बारे में सही जानकारी मैं कहाँ से हासिल कर सकता हूँ । उन्होंने कहा, संजय कई बार आलम बाकी एक वकील के बारे में हम से जिक्र किया करता था । हो सकता है वो वकील उसका मददगार बन गया हो । जी धन्यवाद । वकील के बारे में कुछ और जानकारी लेकर मैं वहाँ से निकल गया । अगले पंद्रह बीस मिनटों में मैं वकील के घर पहुंच गया । ड्राइवर को बाहर ही रहने का इशारा करके मैं जो भी अंदर घुसा, हवा की गति से आ रही एक युवती अचानक मुझ से टकरा गई । ऍम वो कब और किस हाल में कह गई, समझ नहीं पाया । जब पलट कर उसकी और देखने का मौका मिला । वो आंधी सी खिलाती हुई दरवाजे की ऊंची सी लग रही थी । अधीरता उसके बारे में सोच कर अपना वक्त नहीं खराब करना चाहता था । ना हॉल पार करके जैसे ही एक सक्रिय गैलरी में दाखिल हुआ, एक दुबला पतला सा वृद्ध मेरे सामने आ गया क्या आप वकील अंसारी हैं? मैं जरा जीते हुए पूछा वो कुछ पलों तक मेरी और संदेहपूर्ण निगाहों से देखता रहा । फिर आपने सूखे पतले होठों को लहराते हुए बोला, जी आपका परिचय राज्य राज नाम है । मेरा संजय का दोस्त संजय को तो जानते हो गया । मैं दिल्ली से आया हूँ और संजय के बारे में मुझे अब से कुछ जानकारी चाहिए । क्या आप मुझे उसके बारे में कुछ बता सकते हैं? मैं की स्वास्थ्य में सब कुछ कह गया । एक साथ इतने सवाल उनके कानों से टकराएगा तो उसकी आंखें जैसे बाहर निकल आई । उसने नाथ तक सडक आए, अपने चश्मे को संभाला और फिर लम्बी दाढी के बालों को सहलाते हुए बोला महानुभाव मैं समझ गया आप संजय के मुकदमे के बारे में जानना चाहते हैं । जी जी बिलकुल ठीक समझा आपने । मैं अगला बडा चलिए साहब से मैं कई बार मिल चुका हूँ । बहुत अच्छे इंसान है । खुदान पर रहम करें । लंबी सांस खींचते हुए उसने ऊपर की और देखा । मुझे सचमुच भेद है कि अंसारी साहब उनसे नफरत करते हैं तो क्या मैंने हैरानी उसकी और देखा नहीं । उसने अपने दादा वही मूंग को खोल लिया । साहब सामने वाले कमरे में बैठे हैं । जाकर मिलनी चाहिए । उसने सामने कमरे की और इशारा क्या होने वाला है । मैं एक बार फिर अर्थपूर्ण निगाहों से उस वृद्ध की और देखा लेकिन आगे बढ गया । महानुभव सुनिए, एक को पलट पडा । मेरे पास आकर धीरे से बोला आप मुझ पर विश्वास करें तो मैं कुछ बोलने की इजाजत रखता हूँ । उसने एक बार फिर आपने चश्मे को ऊपर की और सरकार बोलिए । मैं समझता हूँ कि संजय साहब के बारे में वकील साहब से कुछ भी जिक्र करना सिर्फ उनके लिए परेशानी खडा करना है । क्यों ऐसा मेरे वोट लग रहा है? मैंने तो सुना था कि संजय के वकील साहब से अच्छे ताल्लुकात हैं । माफ कीजिएगा । मैंने आपको अपना परिचय नहीं दिया । उसने गलियारे में इधर उधर देखा । शायद उसमें कोई बाहर सुनी, कुछ भी नहीं । कहा । मैं अपनी साहब के लिए ही काम करता हूँ । उससे भी पहले से जब पहली बार संजय साहब पक्की हिसाब से मिलने आए थे वो यहाँ उसने थोडी दूर पर लगे एक पुराने दरवाजे की और इशारा किया । उसी दरवाजे के पास खडे खडे संजय साहब ने मुझे आवाज दी थी । मगर बुजुर्ग होकर भी मैंने अहंकार नहीं दिखा । खुद मैं खुद उनके पास थक गया । उन्होंने मुझे वकील साहब के आप इसके बारे में पूछा तो मैं खुद उन्हें वकील साहब के पास तक छोडकर आया था । बोलिये आप ये सब मानेंगे । मैंने कुछ नहीं कहा । खामोशी उसकी बातों को सुनता रहा । जरूरी थी उन्हें भी और जो नहीं थी उन्हें भी मुझे खामोश देकर रद्द कहने लगा आप मेरे ऊपर योगी विश्वास मत कर लीजिएगा । आप तसल्ली के लिए साहब से संपर्क करना चाहते हैं तो कर लीजिए पैसे थोडी देर पहले इसी मुकदमे के लिए एक औरत भी आई थी और ऍम पडा क्या वही और जो अभी दिन से टकराई थी? जी धन्यवाद! मैं पीछे की और पालता और बाहर के और तेजी से भागा । मुझे यकीन तब और संजय की करीबी है । फिर भले ही वो संजय के पक्ष में हो या विपक्ष में । मुझे यू पागलों सभाग अधिक रोड पर गाडी के पास खडा ड्राइवर हडबडाकर चीज पडा क्या हुआ साहब कुछ नहीं और बढाते दृश्यों से फुलाई । क्या तुमने अभी यहाँ से किसी औरत को निकलते हुए देखा है? हाँ हाँ साहब अभी अभी तो मेरे पास नहीं है किधर? इस और उसने पश्चिम की ओर जाने वाली सडक की और इशारा किया । उसका अपना निजी साधन था । मेरा मतलब कार या कुछ नहीं साहब टैक्सी से गई है । ड्राइवर ने कहा अच्छा तो चलो अपनी गाडी टैक्सी के पीछे लगाओ । मैं जैसे तैसे कार के भीतर घुसने में बोला हमारी गाडी सडक पर दौड पडी वो वो मुझ से लिफ्ट मांगी थी साहब फुर्सत में ड्राइवर खुद बताने लगा लेकिन मैंने इंकार कर दिया । गाडी की रफ्तार बढा और पीछा कर उसका तभी अचानक जोर का झटका लगा । खडी हो गई । क्या हुआ ऍम देखा टैक्सी मैंने भाई और गर्दन घुमाई । टैक्सी मेरे सामने थी । ड्राइवर तेजी से भागता हुआ टैक्सी के पास पहुंच गया । जी आप ड्राइवर को अधिक यूपी चौक पडी । अभी तो आप कह रहे थे कि अब दूसरी ओर जाएंगे । हम पहले को जैसा ही प्लान था आई आपको घर तक छोड देता हूँ क्या मैं जान सकती हूँ कि ये मेहरबानी किस लिए? वो टैक्सी से उतरते हुए बोली साहब को आपसे कुछ बात करनी है कौन साहब? एक मेरी कार की और लडकी तो तो आप हैं आंखों पर पहने बडे बडे काले चश्मे को ना के आखिरी छोड तक सरकाकर वो कार के अंदर छापे हुए बोली मैं जल्दी में थी ठीक से मैं आपको सारी भी नहीं बोल पाई तो अब बोल दीजिए । मैं धीरे से मुस्कुरा । बडा सच मुझे दोबारा से और सुनने आए हैं । उसने अपने चश्मे को निकालकर सर पर रखते हुए गौर से मेरी और देखा । यदि मैं कहूँ हाँ हूँ तो में दोबारा सॉरी बोल दूंगी । उसके होठों पर शरारत भरी मुस्कान बिखर पडी हो । मैं पडा वह आपसे कुछ काम था । उम्मीद है अपनी सहायता जरूर करेंगे । जी जरूर, वो भी मुस्कुरा पडी । नटखट अंदाज में बोली मगर महापुरुष क्या अब आप बताएंगे कि आपको हम से काम किया है । अच्छा तो सब कुछ आप ही पूछ लेंगे । मेरे होटलों में बिक्री मुस्कान कानों तक पहुंच चुकी थी । थोडी देर तक मेरी आंखों में कुछ खोजती रही । मेरे का एक पीछे की और पलटते हुए कार का बैक डोर अपनी और खींचा और उसके खुलते ही धर्म से मेरे पगल में बैठ गई । लगभग पंद्रह मिनट तक हमारी कर कई मोड मांगती हुई उसके घर के सामने जाकर खडी हो गई जी यही है मेरा घर । गाडी से उतर कर घर की ओर इशारा करते हुए वो मुस्कराई । मैंने गौर से देखा उस घर की और उधर नहीं एक रैली थी खूबसूरत फॅमिली । आइये घर का मुख्यद्वार खोलते हुए उसने मेरी और देखा जी मैं उसके पीछे पीछे चल दिया । हम रामदेव को पार करते हुए एक सीडी का सहारा लेकर घर के दूसरे तल की पोस्ट पर पहुंच गए । छोटी सी इस पंचाल के दौरान को युवती कई बार गर्दन घुमा घुमाकर गुलाबी मुस्कान मेरी और उछालती रही है । अपने उन कुछ मिन्टों की यात्रा के दौरान मुझे मानने के लिए मजबूर होना पडा कि वह व्यवहार कुशल औरत थी । मगर मैं जल्दी बाजी में किसी भी नतीजे पर पहुंचने का पक्षधर नहीं रहा । क्या आप यहाँ बैठना पसंद करेंगे? उसने मेरी और देख कर कहा फिर अचानक में जाने क्या हुआ? मैं कुछ उत्तर दे पाता । उससे पहले ही वह कहने लगे अब यहाँ मैं बैठी है सडक पर आ जा रही गाडियों के कारण क्या शोर बहुत है? चलिए हम ड्रॉइंग रूम में बैठ कर बात करते हैं । ठीक है मैं उठकर खडा हो गया । कुछ कदम चलते ऍम पहुंच गए मेरी निगाह एका एक दीवारों पर गई तो उससे चिपक कर रह गयी । वो बॉल को बेहद सुव्यवस्थित तरीके से सजाया गया था । वहाँ की सबसे खास चीज जो मेरे दिल कुछ हो गई वो थी दीवारों पर लगी पेंटिंग्स । खूबसूरत ऍम बैठे हम मैं कुछ नाश्ता पानी नहीं करती हूँ । हालांकि मेरा वहाँ नाश्ता पानी करने का कोई इरादा नहीं था । मगर फिर भी मैं मना नहीं कर पाया । वो अंदर चली गई । मैं दीवारों पर सब्जी पेंटिंग्स की और बढ गया । केस आर्टिस्ट की होंगी पेंटिंग्स और राजेशसिंह आनंद हाँ, यही लिखा था हर पेंडिंग में मैंने उन्हें छूकर देखा । सारी मूल पेंटिंग थी, महंगी होंगी । आर्टिस्ट का नाम भी तो काफी जाना पहचाना हुआ था । संजय की तस्वीर मैं क्यों पडा? हमारी पर रखे फूलदान को उठाकर देखने की लालसा में पता नहीं उस के किस हिस्से छिडककर वो तस्वीर फर्श पर गिर गई । मेरे खान खडे हो गए । उस घर से संजय का कुछ खास संबंध है । मुझे समझने में बहुत देर नहीं लगी । सच कहूँ तो पल भर के लिए लगा कि वह खूबसूरत युवती संजय की नहीं, मुझे अपने विचारों को वापस लेना पडा । इतनी खत्म, सरल, बिंदास, उभाव वाली औरत तलाकशुदा कैसे हो सकती है? खासकर जिसने अभी अभी अपनी बेटी हुई हूँ? नहीं, बिल्कुल नहीं हूँ । ऐसा दरवाजे पर स्वर गूंजा । मैंने उधर देखा । एक दुबली पतली सी लडकी होटलों में मुस्कान समझाते हुए धीरे सामने खडी थी जी मैंने कहा मैंने आपको नीचे गेस्ट रूम में बुलाया है । उसने कहा गैस्ट्रो में नीचे ठीक है मैं आता हूँ वो लौटते हुए आखिरी बार फिर मुस्कुराकर तिलस्मी निगाहों से मेरी और देखी और लहराती हुई सीढियों से नीचे उतर गई । क्या आशी हो सकता उसकी बेवजह मुस्कान का सोचते हुए मैं भी उसके पीछे पीछे सीढियाँ उतरता चला गया । जैसे ही मैंने बरामदे पर कदम रखा अचानक वो लडकी मेरी और घूम कर खडी हो गई वोटों पर वही कुछ कहती ही मुस्कान निगाहों में वही तिलस्मी पन मेरे मन ने कई अशुभ ख्याल उठे । मुझे कुछ था की मैं नजर अंदाज कर गया । केस में घर है मुझे विपरीत दिशा में जाते हुए देखकर वहाँ पडी पहले पलट कर उसके और देखा इधर था आंखों और भुजाओं का सहारा लेकर उसमें दोबारा संकेत दिया मैं वाकई शर्म से पानी पानी हो गया । अब तक मुझे उसके वहाँ खडे होने का कारण समझा गया । आइए बैठी है मेरे ऊपर निभा पढते ही सोफे से खडे होते हुए वो युवती जो हमारे साथ गाडी चाहिए थी मुस्कुराकर मेरा स्वागत किया । मैं बैठ गया । पल भर हम एक दूसरे की और देखते रहे । शायद उम्मीद ने की बात सामने वाला शुरू करें । मगर संजय की तस्वीर देख लेने के बाद मुझे सावधानी बरतना और भी जरूरी हो गया था एक आएगा उसके सामने संजय का दोस्त के रूप में जिक्र करना मुझे वाजिब नहीं लगा । चाहे ठंडी पड जाएगी आपकी एक उसे याद आया मैंने मुस्कराकर सामने ने इस पर रख चाय को हाथों में उठा लिया । आप भी उठाइए । मैंने कहा जी धन्यवाद मुस्कुरा बडी दरअसल मुझे ठंडी चाय पीने की आदत है । उसके बाद बात पर हंसने मुस्कुराने से एक बात तो मालूम हो गई थी कि वह बात कम और हसने की ज्यादा आती है । मेरा नाम राज है । मैं दिल्ली से आया हूँ । अपने परिचय के साथ मैंने बात की शुरुआत की यहाँ उसमें हैरानी से देखा मेरी और भी दिल धडक उठा मेरा नाम खुशबू है, खुश हूँ मैं एक उठकर खडा हो गया । क्या हुआ मिस्टर राज उसे हराने से मेरी और देखा हाँ मेरा नाम सुनकर चौक हो गए नहीं ऐसी कोई बात नहीं है । मैंने खुद को संभालते हुए कहा । दरअसल चाहे बहुत गर्म है चाय गर्म खुशबू एकट्ठा के मार कर हंस पडी हॅूं अकेले घुट नहीं होती । इतने बडे घर में अपनी हरकत से उसका ध्यान हटाने की कोशिश करते हुए मैं बोला आज एक पहुँच चुकी है । अब घर बहुत बडा है । कहते हुए चंद क्षणों तक मैं गेस्टरूम की चकाचौंध को निगाहों के जरिए उलट पुलट कर देखता रहा और अच्छा सजाया अपने अपने पूरे घर को । हाँ वो खिलखिलाकर हंस पडी । मुझे घर से जाने का बहुत शौक है । काफी देर हम दोनों इधर उधर की बातों में मुझे रहे । मैं समझ नहीं पा रहा था कि मैं अभी तक यहाँ किस लिए रुका हूँ । जब की वो घर उस और आपका है जिसकी वजह से मेरा दोस्त धर दर की ठोकरें खा रहा है । मगर एक बहुत और थी तो मुझे परेशान किए हुए थी । अखबार की खबर के मुताबिक संजय और खुशबू की बेटी पंखुडी का कत्ल हुए अभी दस दिन भी नहीं गुजरे थे । अगर जिस अंदाज में खुद को खुशबू होने का दावा करने वाली वो औरत खिलखिला रही थी, उसे देखकर मेरे लिए यकीन करना मुश्किल था कि वह संजय की पत्नी मैंने हमेशा सुना है कि एक माँ कितना भी गिर जाए, मगर वो इस हद तक कभी नहीं कर सकती । मैंने एक है संजय की तस्वीर उसकी और बढा दी । ये आपके पति है क्या? उसकी नजर जैसे ही तस्वीर हडबडी उसके खून कुछ कहने के लिए खुले । मगर शब्द नहीं निकला तो थोडी देर तक खामोश रही मेरी और देखती रही और फिर भराई आवास में बोली अब कौन लगते हैं इस घटिया आदमी के कहीं? आप तो अचानक उसे कुछ याद आया । उसके स्वर्ग की तीव्रता बढ गई । अपनी क्या नाम बताया था आपने राज्य है ना जी मगर मैंने बोले की कोशिश की ऍम क्यों नहीं लगाया? उसमें अपना माथा पकड लिया । इस घटिया आदमी ने मुझे बताया था आप के बारे में आप एक्सपोर्ट कंपनी वाले हो ना । मैं सब कुछ जानती हूँ आप के बारे में आप क्या जासूसी करने आए हैं? है ना । वो अचानक उठकर खडी हो गई क्या क्या कह रही हूँ जासूसी एका एक मछली बडा मैं जासूसी करने आया हूं । ऍम राज है और दिल्ली में रहता हूँ । मगर न तो मैं एक्सपोर्ट कंपनी वाला हूँ और नहीं शख्स को जानता हूँ । समझे अब तो ये तस्वीर इसीलिए हुए आप क्यों घूम रहे हैं? मेरी और ऐसे देखिए जैसे उसकी निगाहें मुझे नोच लेंगे । आपकी तस्वीर मैंने अपने चेहरे की गुस्से को हटने नहीं दिया तो मुझे आपके ड्राइंग रूम से मिली है और लंबी सांस खींचते हुए उसने अधूरी सी मुस्कान उछाला । मेरी और नहीं तो कुछ और ही समझ थी सारी राज वो सोफे में बैठे हुए बोली, मुझे माफ कर दीजिए । पता नहीं उसकी तस्वीर देखकर मुझे क्या हो गया था? कोई बात नहीं । मैंने उसने की कोशिश की मगर हसी आई नहीं है । ऐसा हो जाता है । ठंडी हो चुकी चाय को एक ही हूँ मैं खत्म करके मैं खडा हो गया । अधूरी मुस्कान के साथ मैंने उसकी ओर देखा । अब चलता हूँ । मुझे देर हो रही है । क्या वो अच्छे से मेरी और देखने लगी । आप कुछ काम से आए थे ना जी काम से थाना हाँ याद आया । काम काम से याद आया मैं मैं हडबडाहट नहीं । इधर उधर खाली खाली निगाहों से कॉस्ट्यूम की ऊंची दीवारों को देखने लगा और खूबसूरत है आपका घर । आप मेरा पूरा घर देखना चाहिए । वो उठकर खडी हो गई । उसके होठों पर अजीब सी मुस्कान थी । मेरे जैसे संकोची इंसान उसके अनुरोध को डालने का साहस नहीं कर पाया । जबकि हकीकत ये थी कि इतना कुछ होने के बाद अब मैं उस घर में पल भर भी नहीं ठहरना चाहता था । मेरा उद्देश्य संजय के प्रति उफान भरती उसकी नफरत के सामने टूट कर बिखर गया । मेरे लिए लौटना ही उचित था । वो आगे आगे चलती रही और फर्स्ट की डोर में बना हुआ उसके पीछे पीछे लडता रहा । उसे घर का जो हिस्सा अच्छा लगता है मुझे दिखाती रहती है । उससे जुडी हुई कोई कहानी हुआ करती तो रुककर सुना दिया कर दी घर में घूमने के दौरान हम कई सीढियाँ कई धर्मा से पार करते चले गए । ये ऍम है ऐसा एक कमरे के सामने ठहरकर उसने कमरे की ओर इशारा करते हुए बोली मैं आधी अधूरी नजरेें अंदर की और पढाई अच्छा ऍम मुझे जबरदस्ती कहना बडा अंदर आकर देखना चाहिए कि उसने प्रस्ताव रखा तो इस बार मुझे मजबूरन खेद जाहिर करना पडा । अब हम दूसरे कमरे तक पहुंच गए थे । ये संजय का रिजर्व कमरा था । संजय एक एक मैसेज चौका जैसे किसी ने निद्रा से मुझे जगह दिया हूँ । मेरे चौंकने पर भास्कर मेरी और देखी । फिर अफसोस जाहिर करते हुए बोली थी तो मुझे सोचना चाहिए था कि आपको संजय के बारे में जानकारी नहीं है । फिर मैंने बताया भी तो नहीं । यहाँ उस इंसान की बात कर रही है जिसकी तस्वीर मैंने आपको दी थी । अनजान बनने का अभिनय करते हुए कहा नहीं, थोडी देर मेरी और देखती रही । हाँ, वह तस्वीर जिसे आप पूछ रहे थे मेरे पति की तस्वीर है । मैं दरवाजे की और बढकर सरसरी निगाहों से उस कमरे के भीतर की और देखने लगा । अचानक ऐसा सुबह किस वक्त का इतना उतावलापन अभी ठीक नहीं है । मैं तेजी से खुश्बू की और पालता । अब हम घर के अगले छोड की बॉलकनी पर एक बार आ गए । उस समय रोड पर चीखती चिंघाडते हुई गाडियाँ हमारी नजरों में पिस रही थी । मिस्टर राज और खुशबु का था जी मैंने उसकी और देखा । मैं सचमुच उस वक्त किए गए अपने बर्ताव पर शर्मिंदा हूँ, लेकिन करो भी क्या? एक उसका स्वर्ण वहाँ सा हो गया । उस व्यक्ति से कुछ नफरत ही कुछ इस कदर हो गई है कि मेरे सामने कोई उसका जिक्र ही करता है तो मैं कुंतीभोज उठती हूँ । मैं सच को सोचती हूँ भगवान उस पर कभी दया ना करें, उससे बहुत दिल दुखाया है मेरा । मैं चुप रहा । मिस्टर राज क्या आप यकीन करेंगे कि ये कुछ कहना चाहा मगर उसकी आवाज गले में ही बस कर रह गई । आंखें छलक पडी, आप हो रही है मैं हडबडाकर उसकी और देखा मुझे सब कुछ अफसोस है कि मेरी खाते आपका दिल दुखा नहीं । नहीं राज अब ऐसा ना कहीं इसमें आप की कोई गलती नहीं है । एक का एक उसका संबोधन बदल गया लेकिन एक बात करूँ आपसे उसने अपनी हथेलियों से मेरी हथेली भर लेंगे कहीं मैंने कहा आज यहाँ रह सकते हैं । हाँ जी बच्चों पडा मुझे आपका मतलब? अरे आप तो घबरा गए, वो हंस पडी मगर आके अब भी भरी रही हम आपके साथ कुछ करने वाले थोडी है । दरअसल में सिराज अचानक गंभीर होते हुए बोली संजय से तलाक का अफसोस मुझे भी है । पर दू मेरी कुछ मजबूरियाँ थी जिन्हें कुछ बंदी से दूसरों से कहना सुनने से मुझे हमेशा रोकती रही । में रूप भी गई । मगर अब मेरे मन के लिए एक बोझ बन गई है । मुझे घुटन सी होने लगी है उससे । अब जब मैं उसे बताकर खुद के मन को हल्का करना चाहती हूँ तो कोई सुनने वाला नहीं । मैं तो नहीं आया कि चिंघाड करके है तो मगर मैं जानता था कि इतना उतावलापन मेरी मुश्किलें पढा सकता है । मैं चुप रहा । हो सकता है मिस्टर आज वो अपनी बात जारी रखते हुए बोली आपकी निगाहों में भी मैं ही गुनेहगार ढेर हो मगर फिर भी मैं बताना चाहती हूँ ठीक है मैं घर जाता हूँ मुझे काफी सोच विचारकर कहना बडा ऍम राज । हालांकि खुशी से एक का एक उसका यूज चीखना पर भल के लिए मुझे आशंकित कर देता था । मगर अपने दोस्त के लिए मैंने उसे नजर अंदाज कर दिया । मेरी जरा सी मशक्कत शायद कोई समाधान निकालते । मीना अकस्मात ही वो पुकार पडी और अगले पलवल दुबली पतली सी लडकी हमारे सामने खडी थी जाओ नीचे लॉन पर विश्वराज का ड्राइवर खडा है । उसे कहूँ कि वह साहब को लेने के लिए कल सुबह जाएगा, मिस्टर आ जाएगा, यही रुकेंगे जी मैंने वो पलट पडी । मगर उस से पहले एक बार वह फिर मेरी और चंचल मुस्कान उछल रही थी । मैंने सब पकाकर अपनी नजरे झुका ली । मिस्टर राज कुछ कहा दूसरों का दर्द बांटने की आदत बहुत कम लोगों में होती है । मुझे खुशी है आप ऐसे चुनिंदा लोगों में से हैं जी तो बैंक क्यूँ? वैसे एक बात कहूं आपसे मैं उसकी और प्रश्न सूचक नजरों से देखा । आप सोचते बहुत है, लगता है आप को ज्यादा बात करने की आदत नहीं है । जी नहीं ऐसी कोई बात नहीं है । आइए अंदर चल कर बात करते हैं । उसने कहा और मुड कर चल पडी । फिर पता नहीं क्या सोचकर वह एक ठहर गई । मेरी और देखते हुए ऑस्कर बोली ये चीन करे आपको मेरे साथ पसंद आएगा । जी मैंने उसकी हसी में अपनी हसी मिला दी । हम ड्रॉइंग रूम में एक बार फिर दाखिल हो चुके थे । आपकी ड्राइंगरूम की पेंटिंग भी बहुत प्यारी हैं । कितना भी तारीख करो काम है । सोफे पर बैठते हुए मैंने कहा जवाब उसके होठों पर रुकी हसी दौड पडेगी उसके पडता है उसे मैं समझ सकता था किसी इस बारे में चर्चा करना फिलहाल अच्छा नहीं लगा । यहाँ उसने पुकारा । मैं आपसे कुछ कहना चाहती थी चाहिए मिसिर आज आप एक बात बताए कि मुझे भी क्या बाहर जाकर दूसरी स्त्रियों के योवन से खेलने का अधिकार सिर्फ मर्दों को होना चाहिए और और दे सिर्फ रसोई संभालती रहे क्या क्या मतलब मेरा दिल धडक थोडा हॅूं । वो बिना मेरे किसी उत्तर की जरूरत समझे हुए खुद कहने लगी शायद आपको आश्चर्य हो की मैं एक प्रेस में काम करती हूँ । दस हजार तन्खा उठाती हूँ । फिर भी जब मैं वहाँ से लौटकर आती तो आपसे चाय पानी की फरमाइश मुझसे ही करता था । मैं मानती हूँ बिना मेरी और देखिए उस ने अपनी बात जारी रखी है । नौकरी वो भी करता था । दस बारह हजार रुपए वेतन उसका भी था । परन्तु क्या मर्द होने के नाते सिर्फ उसी अधिकार है कि वह घर में राजाओं की तरह बैठकर खनक है नहीं । मिस्टर राज उसके चेहरे पर सीखने उत्तेजना थी । मैं नहीं मानती है ऐसा । मैंने उनसे कहा था कि कम से कम एक शहर का खाना उसे बनाना होगा । मगर उसमें भी उसकी नानी मर जाती थी । मेरा चेहरा बिल्कुल शाम था, मगर दिमाग गुस्से में बोल रहा था । दिल कह रहा था कि अभी उठो और खींच कर दो तीन थे । पर उसे जड हूँ और चिंघाड करता हूँ कि जिस इंसान को तो इस तरह के घटिया अल्फाजों से नवाज रही है । दरअसल पूछ भी रहा अपना दोस्त है, मेरा यार है । मगर बात को देखते हुए फिलहाल सुलझे हुए अंदाज में मैंने पूछा क्या सिर्फ इतना ही कारण था आप लोगों के तलाक का? वो इस अंदाज में बोली जैसे वो सब कुछ उगल देना चाहती हूँ । शिकायत भरे लहजे में कहने लगी संजय सिंह देश जाया करता था । अगर मैं पूछती तो दूसरों की दुहाई दे देता । लेकिन मैंने से इस बात की कभी शिकायत नहीं की । फिर वो मुझसे पूछताछ क्यों क्या करता था? अंतिम शब्दों में उसके स्वर्का कम्पन पड गया । किस बात के लिए? मैंने पूछा तो और भी जोश में आ गयी । अपनी बात जारी रखते हुए बोली यहाँ में काम करती थी । वहाँ की सहयोगी कर्मचारी अधिकतर पुरुष थे तो मिस्टर राज उसने मेरी और गौर से देखा । आप समझते होंगे कि जहाँ दो विपरीत सेक्स होंगे, आकर्षित होना स्वाभाविक है । फिर इसमें कोई बुराई तो भी नहीं है । कुदरत ने हमें जीवन दिया है, खूबसूरती दी है, जवानी दी है, उस पर भी अपनी खुद की नौकरी है और ऐसे हाल में जब हम किसी पर निर्भर नहीं है फिर हमें कोई रोके टोके हमसे कहे की तो इससे ना मिलो, उससे मिलो । ऐसा ना करो, वैसा ना करो तो क्या करूँ? मैं उसकी बात मानकर जीना । छोटू ये मेरी जिंदगी है, इसे किस तरीके से जीना है ये मैं सोचूंगी हूँ । आप ही बताइए जी आप जबरदस्ती मुझे अपने ही मान के खिलाफ बोलना पडा । उसने मेरी बात हुई तो छे पडी राज वाक्य आधुनिक जमाने के इंसान हैं । मुझे सच मुझे पक रहे । यहाँ पर मैं चुप था । मैं उससे क्या बताता हूँ कैसे बताता की उस की हर बात शूल की तरह चुभ रही है । मुझे जानते हैं तो फिर बोल पडी संजय में वही कमी थी तो पुराने ख्यालात से कभी बाहर निकल ही नहीं पाया और न ही कभी भी भावनाओं को समझने की कोशिश की । मैं जिस दिन देश से आती है वह अपने सवालों की पोटली खोलकर बैठ जाता हूँ । में काफी दिनों तक सहन करती है । मध्य इस कब तक चलता हूँ । एक दिन मुझे साफ तौर पर कहना पडा कि मैं अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीना चाहती हूँ । अगर उसे आपत्ति है तो बेशक वो मुझे तलाक दे सकता है । मुझे उस की कोई जरूरत नहीं है । शारीरिक धूप के लिए बहुत दर्द है मेरे आस पास । हालांकि खुशबू के हर शब्द भी चुनौती थी मगर उसके आखिरी पंक्ति मेरे मस्तिष्क को जब दूर कर रख दिया, शारीरिक भूख के लिए बहुत मस्त है । मेरे आस पास क्या आप निर्भरता हमें यही स्वतंत्रता देती है? क्या हर आत्मनिर्भर औरत खुशबू की तरह सोचती है? देर रात तक के सवाल मेरे दिमाग को जब जोड जा रहा है अब आप ही बताइए वो उन्हें कुछ सोच कर कहने लगी हमारे समाज कब तक ऐसे ही रूढीवादिता को सर पर उठाते घूमता रहेगा । क्यों वो छोटी सी जिंदगी को रीति रिवाजों की एजैसियों में इतना कर दिया है कि मेरी जैसी तमाम औरतों का उसमें दम घुटने लगे । स्त्री और पुरुष दोनों ही इंसान है । फिर समझ थोडे अलग अलग ने कहा उसे क्यों देखता है? जी क्या किस के आखिरी सवाल पर कह दूँ आप भी सारे बच्चे अपनी कोख से क्यों पैदा करती है? क्यों नहीं अपने पति से इस बात के लिए लडती है कि कम से कम आधे बच्चे वो ना सिर्फ खुद पैदा करें बल्कि अपना दूध भी पिलाया । लेकिन उसका मैंने सिर्फ इतना ही कहा ऍम मैं क्या कह सकता हूँ । चंद पलों तक हम दोनों खामोश रहे । मैंने अखबार में आपकी बेटी के बारे में पडा था । पंखुडी नाम था उसका । मेरे स्वर उसके कानों से टकराएगा । उसके चेहरे पर अचानक वीडियो भराई पल भर के लिए लगा कि जैसे वो पडेंगी सत्तर कहने लगी वो मेरी एकलौती बेटी थी । बडे प्यार से मैंने उसका नाम पंखुडी रखा था । मगर फिर उसके बाद उसने जो कुछ भी बताया उसे मैं अखबार में पड चुका था ।

मेरी अर्धांगिनी उसकी प्रेमिका - 02

खाना पीना करते करते लगभग ग्यारह बज चुके थे । आपने सोना चाहता हूँ । मैंने इच्छा जताई । चलिए मैं आपका कमरा दिखा देती हूँ । वहाँ आपका बिस्तर लगा हुआ है । खुशबू ने कहा जी बिल्कुल । मुझे मेरे कमरे तक छोडने गई । मुस्कुराकर गुडाई कहा और लौट गई । बिस्तर पर पडे पडे घंटों गुजर गए । कुछ दिन नहीं आई । वैसे भी मुझे अक्सर नींद की गोलियाँ लेने की आदत थी । अगर आप नहीं ले पाया अटैची गाडी में ही रह गई थी । जब मैं परेशान हो गया और नींद फिर भी नहीं आई तो उठकर मैं अपनी पेंट की जेब को इस उम्मीद पर टटोलने लगा कि हो सकता है तो कैसे कभी रह गई हूँ । नसीब अच्छा था । मुझे गोली मिल गई है । मगर पानी मैं सोचने लगा इसको पुकारूं । मैं ऊपर इधर उधर टहलने लगा । शायद को स्विच । कोई ऐसा संकेत तो मेरे संदेश को वहाँ तक पहुंचा सकें । बिस्तर के बगल में मुझे कॅश नजर आई । मैंने दबा दिया । कुछ पल गुजारे । मीना मेरे सामने खडी थी । पानी की जरूरत थी बिना उसके और देखे हुए । मैंने कहा था दरवाजा बंद हुआ तो लौट गई । थोडी देर बाद जब उन्हें दस तक हुई तो खुद ब खुद खुल गया । मैंने उधर देखा । सामने सिल्की गांव नहीं, हाथ में गिलास थामे हुए दरवाजे पर खुशबू खडी थी । मैं कुछ कहता उससे पहले एक टांग की और जहाँ तक कटे हुए गांव में से तंग निकालकर आगे बढाते हुए बोली यहाँ आपको नींद नहीं आ रही है क्या ही मैं उठ कर बैठे हुए बोला हम को भी नहीं आ रही थी । उसके स्वर में शरारत और होठों पर अजीब सी मुस्कान बिखर गए न उसकी बेवजह कि मुस्कराहट पर कोई प्रतिक्रिया देता । उससे पहले वो मेरे बिल्कुल करीब अगर खडी हो गई । दरअसल नींद की गोली खानी थी इसलिए मुझे पानी मंगाना पडा । मैंने गिलास की तरफ हाथ बढाते हुए कहा आपको डिस्टर्ब करने के लिए मुझे सब कुछ खेद है । उसे पानी गिलास मुझे नहीं दिया । अपने हाथ को पीछे खींचते हुए बोली चलिए छोडेने औपचारिक बातों को गोली इधर दवाई मैंने थमा दिया । आज आपको गोली खाने की कोई जरूरत नहीं है । उसने गोली को फर्श पर कहीं दूर झटक दिया और पांच लगे सोफे पर हम से बैठ गई । घृत ये ये क्या? ये आपने मैं चला उठा । आपने मेरे गोली फेंक दी । आप नहीं जानती कि बिना नींद की गोली के मैं रात भर नहीं सुनाऊंगा । मुझे आदत है इसकी तो मैं तो ये उसने अपनी खुली तंग को दूसरी टॉपर रखते हुए बोली क्या हर रात सोना जरूरी है? वैसे घबराइए नहीं, आज हम है बातों ही बातों में ही रात कर जाएगी । आपकी लीजिए पानी पीछे हो । मेरे दिल की धडकन बढना शुरू हो गई । मैंने एक ही रूट में गिलास खाली कर दिया और बिस्तर पर उन्हें ले गया, जहां आप की शादी हो गई । उसने पूछा जी हाँ, भुवनेश्वर में रूखापन था । एक बात कहूं, आपसे कहीं आपकी पत्नी बहुत नसीब वाली है, जिसे आप जैसा पति मिला है । वरना जिसने रस्सी में संजय जैसा इंसान मिल जाएगी, उसकी जिंदगी बंजर बन जाती है । बात को अपने उद्देश्य की और मुडते देखा तो मुझे अपना रुख बदलना पडा । मैंने हस्कर पूछा क्या आप शादी नहीं करेंगे? शादी का नाम सुनते ही एकाएक उसकी आंखों में चमक आ गई । तीखे स्वर में बोली क्यों नहीं करूंगी? मैं शादी करूंगी और जरूर करूंगी । संजय को ये दिखा कर रहे होंगे कि मैं उसके बगैर भी उसी हालत में रह सकती हूँ, जिस हालत में कभी उसके साथ रहा करती थी । अगर आपका तो उस राप्ती भी आपको ऐसी पाबंदियों में रखे तब पल भर वो मेरी और देखती रही । पर हस कर बोली मिस्टर राज, आप मजाक कर रहे हैं ना? नहीं । मैं पूछ रहा हूँ वो ऐसा नहीं करेगा । अचानक उसके स्वर में कुछ उत्तेजना से आ गई । बेशक नहीं करेगा । मैं मैं मान लेता हूँ । मगर क्या? तो तो उसे भी छोड दूंगी । उसके स्वर्ग की उत्तेजना सातवे आसमान पर पहुंच गई । मैं आपकी आजादी से कभी समझौता नहीं करूंगी । हालांकि उस समय में चाहता तो उसे सवालों ही सवालों में और भी भयानक बना सकता था । परंतु ले जाने क्यों मुझे उस पर तरह से आ गया । क्या मैं आपके होने वाले पति का नाम जान सकता हूँ? शायद ये मेरा आखिरी सवाल था । देशक मुस्कुरा पडी थी । बैरिस्टर इकबाल अंसारी पांच अंसारी इधर हम सुना तो जैसे किसी ने मेरे सर पर हथौडा मार दिया हूँ । मैं कुछ सालों तक बाद आवाज उसकी और फटी फटी नजरों से देखता रहा । वो संभाला तो बोला यहाँ उसी अंसारी की बात कर रही हैं जिससे आज आप मिलने गई थी । हाँ, बहुत अच्छा इंसान है वो आॅफ उसने अपने अंग्रेजी शब्दों पर सारी उत्तेजना उडेलती । मैं उसके चेहरे पर रह रहे हजारों सपनों को महसूस करने लगा । यहाँ उसने पुकारा आपकी तो थी । उस से मिलने आपको कैसा लगा? अच्छा लगता है वो आपको पसंद नहीं आया । शायद उसने मेरे शब्दों में छपी नीरज था को भांप लिया था । मैंने उसे कोई जवाब नहीं दिया जबकि वह देर तक मेरी और देखती रही । एक बात पूछूं से थोडी देर बाद मैंने कहा पूछे आप धर्म परिवर्तन से परेज नहीं करती । धर्म परिवर्तन मेरी बात सुनी तो एक का एक जोर से हंस पडी । लगता है राज इस मामले में आप भी पुराने खयाल ही रहते हैं । कह सकती हैं आप? मैंने कहा मगर मुझे लगता है कि धर्म हमारे पूर्वजों की जागीर है जिसके लिए उन्होंने न जाने कितना बलिदान दिया होगा । तब जाकर इसे अपने मूल स्वरूप में इसे सहेजकर रख पाए हैं और जो अब हमारी जिम्मेदारी है । मेरे इस बात पर एकाएक उसकी खामोशी बता रही थी कि वो मेरी बात से सहमत नहीं थी । मुझे उसका ये व्यवहार अच्छा नहीं लगा । मैंने बिस्तर पर लेटकर करवा ली । चंद छडों तक वो कुछ सोचती रही । तेरे का एक अपने गांव को संभालते हुए उठी और तीव्रता से आकर मेरे बिस्तर में बैठ गई । मुझे उसकी हरकत अच्छी नहीं लगी । आउट कर बैठ गया । क्या महाराज उसके आहोम शरारत उतर आई थी । होली लगता है आपको और इतनी पसंद नहीं है या फिर उनसे डरते हैं? जी हाँ मैं डरता हूँ । बहुत करता हूँ मैं इतना बडा आप ऍम उसे ठीक है । ठीक है । बहुत तो बोली मैं जा रही हूँ अब घबराइए नहीं मैं ऐसा करने का कोई इरादा नहीं है । मैं तो वो बिस्तर से उतरकर फर्श पर खडी हो गई । फिर देर तक अजीब सी निगाहों से मेरी और देखती रही । उसके होठों पर मुस्कान अब भी बरकरार थी । यहाँ ऍफ बोल पडी वाकई आप अभी तक आपको किसी चीज का कोई असर नहीं हो । क्या मतलब? मेरा बदन झनझना उठा । बहस कर बोली । डॉक्टर ने तो कहा था पंद्रह मिनट में असर दिखना शुरू कर देती हैं । अरे वो तो मैंने संशय भरी निगाहों से उसकी ओर देखा । वो अचानक से कुछ याद आया । वो तीव्रता से बिस्तर पर चढी और अपने गांव के जल्दी जल्दी ऊपरी तीन चार बटन खोल दिए । बटन खुलते ही चौदह कपडों में सिमटी चांदनी मचल की तूफान भर्ती हुई । हवा मारे लहरा उठी । मैं उठ कर वहाँ से हट पाता । उससे पहले वह तेज ना मैं झुकाई थी । मेरी छाती तक रात कब और किस तरह गुजर गई थी । नशे में पता ही नहीं चला । जब तीन खुली तो सुबह का नौ बज रहा था । मैं बिस्तर से जल्दी जल्दी उठना चाहा तो एक बार भी लगा कि लडखडाकर फिर चाहूंगा । कृषि तरह संभलकर उठा और बिस्तर पर नजर गई तो मुझे अपना सर पीटना बडा । रात में बिस्तर को पूरी तरह रौंदा गया था । इसके निशान अब भी चीज जीतकर उसकी गवाहियाँ दे रहे थे । मैं तीर तक खाली खाली नजरों से बिस्तर की और देखता रहा । उस वक्त बिस्तर की हर भाषा मुझे समझ जा रही थी । तब ही अचानक टाॅपर मुझे किसी के कदमों की आहट महसूस हो । मैंने पलट कर देखा । मेरे सामने खुशबू हाथ में चाय का कप थामे हुए किसी अदाकारा की तरह मुस्कुराती हुई खडी थी मुझे अपनी और निहारता हुआ देखी तो उसके होटों परछाई मुस्कान का खर्चा हो पडता चला गया । हस कर बोली ऍम, आप ड्राइवर गेस्ट में आपका इंतजार कर रहा है । मैं उसकी आधी अधूरी बात सुनी भी नहीं, यकीन से नहीं कह सकता हूँ । मगर अंधेरी अंदर मैं कितना तडपा उसका मुझे जरूर अनुमान था । वो लहराती हुई जैसे ही मेरे इतने करीब भाई की मैं उसे छुपाता, मेरा हाथ हवा में लहराया । तरह तरह उसके गाल पर मेरे हाथों की तस्वीर छप गई । चाय का कप उसके हाथ से गिरा, टूटा फर्श पर बिखर गया । शिष्य कही की जांच भेजते हुए मैं चिंघाड पडा । सच कहूँ तो उस वक्त मेरी आंखों में खून कराया था उससे बेहतर तो बाजारू पडते हैं । कम से कम तुम्हारे जैसे शराफत का चोला ओढकर नारी समाज को इस तरह बदनाम तो नहीं करती । अच्छा युवा मेरा दोस्त आजाद हो गया तो हर साल से मैं तेजी से हंगर की और लगता था शर्ट निकली और से पहनता ऍम लगा ।

मेरी अर्धांगिनी उसकी प्रेमिका - 03

मुझे शीघ्र ही दिल्ली पहुंचना था । भैया के पास कुछ खास वक्त नहीं गुजार पाया । स्टेशन पहुंचकर मुझे लगा कि शिव जी को फोन कर लेना चाहिए । टीवी मेरा इंतजार कर रही होगी । फिर कल से उसे दो तीन कॉल से ज्यादा क्या भी तो नहीं था । पर कितनी चिंतित होगी मैं पीसीओ की और बडा उन पर शिविर जो कुछ बताया उस पर बाल भर के लिए मुझे तो विश्वास नहीं हुआ । मैं खुशी से हफ्ते हुए चला । श्री क्या तुम सच बोल रही हूँ । जी शिविर मुझे फोन पर बताया कि संजय हमारे घर आ गए हैं और मेरा इंतजार कर रहे हैं । मैं आ रहा हूँ संजय को घर पर ही रोक कर रहा हूँ । मैंने जैसे तैसे रिसीवर रखा । ट्विटर पर फोन का बिल देखा । उसमें दो रुपए अंकित था । मैं हडबडी में जेब से पांच का सिक्का निकाला । दुकानदार को थमाएं और आगे बढ गया । उस दिन मुझे पहली बार ऐसा लग रहा था कि दिल्ली कितनी दूर है । मैं अपने दोस्त से मिलने के लिए पागल था । जैसे जैसे शाम ढलते ढलते में घर पहुंच गया । मुझे घर पर जनरेटर की आवाज सुनाई पडी है । वो लाइट भी मन ही मन बडबडा । अगले पल मेरी उंगलियां लाइट बोर्ड पडती । अंदर डोरबेल चिल्ला उठी । कुछ ही पलों में शिविर मेरे सामने थी । नजरें टकराई तो मेरे दिल पर सलाह फट पडा । मुझे कह रही थी अब दरवाजा भी खुलेगा । ये यही शर्म आती होगी । मैंने हस्कर कहा । वो हाँ! जैसे उसे इकाई की याद आ गया हूँ । वो हंस पडी । दरवाजा खुलते ही मैंने उसे अपनी बाहों में झपट लिया । संजू का है ऐसा मुझे याद आया । गैस्ट्रो में बैठे हुए हैं । कुछ लिख रहे हैं दिख रहा है । मैंने हैरानी शिवि की ओर देखा । तभी अचानक मुझे याद आया कि वह क्या लिख रहा होगा । डायरी दिख रही किससे बचपन से ही आदत थी । मैं लंबे कदमों से लांघता हुआ गेस्ट रूम की और बढ गया । दरवाजे पर कदम रखा तो एक एक मेरी जान निकल गई । एक दुबला पतला इंसान मेरी निगाहों के सामने बैठा हुआ था । मैं हैरान उठा । क्या वो सब अच्छा ही है? मैं चन्द क्षणों तक तक उसकी और देखता रहा । संजू फिर अचानक मैंने आवाज दी वो मुड कर मेरी और ऐसे देखा जैसे मुझे जानता ही ना हो । मुझे लगा की डायरी लिखते लिखते अपने खयालों में डूब गया होगा । लेकिन देर तक जब अपनी धसी धंसी निगाहों से मेरी और बस ताकता रहा तो मुझे बोलना पडा क्या? संजू मैं हूँ तुम्हारा दोस्त राज्य राजू में और आज उसके सूखे हुए होठों पर ठीक ही से मुस्कान दौड पडेगी । मैं पहचानता हूँ या तो मैं अपना परिचय देने की जरूरत नहीं है । उस समय उसका ये व्यवहार मेरे लिए किसी आश्चर्य से कम नहीं था । मैं सारे रास्ते सोचता आया था । जब इतने दिनों बाद मिलेंगे तो कॉलेज के जमाने की तरह कुछ झपट कर मुझे पड जाएगा । देश पर तेजी से सब तब आएगा और फिर इतने दिनों से खबर ना लेने के लिए शिकवा शिकायत करेगा, नाराज होने को अभिनय करेगा । लेकिन उसने उसने क्या किया? ठीक से बोला भी तो नहीं । उस वक्त मैं अपने सारे सपने समेटकर वही दरवाजे पर दफन कर दिया और अपने गले में फंसी टाइको ढीली करते हुए आगे बढ गया । मैं जैसी उसके इतना करीब पहुंचा की वो मुझे छुपाता तीव्रता से उठा और छलांग लगाकर मेरे बदन से निपट गया । उसके मुझे अचानक एक सौ सत्तर चीख निकली और आके पे पानी उडेल उसने शुरू कर दिया । कैसे हो गया? संजू कहते हुए मेरा भी गला रोज गया मेरे रिवाॅल्वर सुने तो अपनी बाहों में मुझे और भी कर लिया और चिंघाड करो पडा । कहने लगा उस पर सारे झूठे आरोप लगाए गए हैं । मैंने कुछ नहीं किया । राज्य कुछ नहीं नहीं, कुछ नहीं किया मैंने उसे पचास हो राज्य पीस बचालो मुझे । संजय मेरी बाहों का प्रस्ताव पडता चला गया । ये बच्चा हो गया नहीं, नहीं बचाऊंगा फिक्र मत करो । कुछ देर किसान तो ना के बाद वो मुझ से अलग हो गया । पेट संजय उसका कंधा पकडकर मैंने उसे सोफे पर बैठा दिया । उसके दाहिनी हथेली चेहरे के सामने मुडी हुई थी । उसकी आंखों को देख नहीं पा रहा था । उसकी आखिरी शायद आंसूओं को अब भी नहीं था । हम पा रही थी संजय मैं थोडा उठा हो जिंदगी की एक बार उधर जाने से जिंदगी खत्म नहीं हो जाती । राज्य सही कहा करते थे की जिंदगी को गंभीरता से लोग अंधे बनकर आधुनिकता के पीछे मत भागो और राइट दिन यही जिंदगी तो मैं तबाह कर देगी । देखो राज्य मेरी जिंदगी में मुझे सचमुच तबाह कर दिया । मैं खामोश रहा । पंखुडी को कितनी बेरहमी से मारा गया है पर मैं जानता हूँ ये कब किसने किया है मगर फिर भी उसका कुछ नहीं कर पा रहा हूँ । हम ये है कि कपिल के चंद दिनों में ही पीडित गुनहगार बना बैठा है और उन अगर पीडित संजय तुम सब जानते हो की पंखुडी को किसने मारा है? हाँ मैं जानता हूँ किसने अचानक तेज थोडा बताओ बताओ संजय किसने मारा है? बालन जारी लंबी सांस भरते हुए देखा मेरी तरफ महाराज उसी ने मारा पंखुडी को वही है हत्यारा वही है ऍम । उसका नाम सुनते ही मेरा माता हो गया । अंसारी के लिए काम करने वाला उस वृद्ध का वो वाकया मेरी आंखों के सामने नाश्ते लगा महानुभाव मैं समझता हूँ साहब से मिलना संजय साहब के लिए और परेशानी खडा करने जैसा होगा । यही तो कहा था उसने । उस वक्त मुझे खुद पर गुस्सा आ रहा था । मैंने उस साल की सूरत क्यों नहीं देखी? संजय मैंने से बुखारा तुम कैसे कह सकते हो कि पंखुडी का कातिल वहीं है । कुछ दिनों तक संजय मेरी और एक तक देखता रहा । उसके चेहरे के भाव तीव्रता से बदल रहे थे । थोडी देर की खामोशी के बाद उसने कहा उसने अंसारी खुल गया था मेरे पास । वो कहने लगा कि वो लडकी मुझे जरा भी पसंद नहीं है । चलकर उठा लाओ से वरना आप हाँ तो तुम गए नहीं । मैं उस समय नहीं गया उसने शाम को बुलाया था । जब तुम पंखुडी के पास पहुंचे थे तो क्या हुआ? हो सकता है मर चुकी थी मेरे ही बेडरूम में उस वक्त खुशबु का हाथ पता नहीं शायद हाँ फर्स्ट थी । मैं इस से पहले अपनी बेटी को एक एक उठाकर उसकी लाश पर अपने आंसू बहा पाता । उसी एक खाई वहाँ पुलिस आ गई । फिर जो घटनाक्रम उसने बताया, उससे मैं बात अंसारी की साजिश समझ गया । अभी मैंने पुकारा आ रही हूँ । अंदर से आवाज आई अगले पर हाथ में चाहे की प्लेट था में शिविर मेरे सामने खडी थी । मैंने कुछ कहा नहीं, मगर चाय की ही तो मुझे तमन्ना थी तो हूँ शिविर एक सांस में मैं उसके नाम को कई बार दोहरा गया । मुझे बहुत प्यार आया था । संजय चाहे मैंने चाय का कप उसकी और बढाते हुए कहा चौक कर देखा । वेरी और पालक उठते ही पानी की चंद बूंदे फर्श पर टपक पडेंगे । इस बार मैंने कुछ नहीं कहा । उसने चाय थाम ले, नमकीन और बिस्किट के ब्राॅन उसकी और सरकारी पेट पर रखे हुए दूसरे कब को शिविर मेरी और बढा दिया तो भारी चाहिए । प्रश्न पूरक निगाहों से मैंने देखा उस क्या मीरा का पंद्रह किचन में हैं । हालांकि भी छठी की वो मेरे पास बैठ कर चाहिए । मगर शायद संजय की वजह से उसके अंदर को झिझक थी । देर तक हम चाय पीते रहे । हमारे बीच कोई संवाद नहीं हुआ । सिर्फ खामोशी, खामोशी और खामोशी । संजय मैंने काफी देर बाद उसे पुकारा । अब आगे का क्या प्लान है? मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा । मैं क्या करूँ? कहाँ कैसे? बच्चा खुद को? पुलिस मेरे पीछे पागल कुत्ते की तरह पडी हुई है । मेरे पास बहुत क्षमता नहीं बची भागने के लिए । मेरे यार मेरी चौहान रूपडी तो मैं परेशान होने की जरूरत नहीं है और नहीं कहीं जाने की जरूरत है । नहीं रुक मेरे घर पर अब मैं दौडूंगा जो करना होगा मैं करूंगा । मैं कानून तुम्हारे लिए खुद करुंगा । मेरा इतना आश्वासन सुनते ही वो भाव को उठा मेरे हाथों को अपनी हथेली में भरते हुए बोला क्या चीज आजकल तो वैसे ही हो । शराबी नहीं बदले । इतना तो होते हुए भी वही भरी आंखों से मैंने कहा दौलत इंसान को नहीं बदलती, सिर्फ रहने के ढंग को बदल देती है तो मेरी और देखने लगा राज्य में कभी कभी सोचता हूँ कौन हो तुम ऍम गुरूजी खुद भगवान क्या कहूँ सचमुच बहुत मसीना वाला हूँ । हर किसी को तो भरे जैसा दोस्त मिले उसके उस वक्त की बातों पर मुझे रोना आ रहा था । मेरे जरा से आश्वासन पर उसने अपने सर पर कितने बडे एहसान का पुलिंदा रख लिया था । संजय मैं कानून से लड सकूँ । इसके लिए मुझे पूरी घटना के बारे में विस्तार से जानने की जरूरत है । क्या तो मुझे इसके बारे में कुछ बता सकते हो । तू पलभर लिए खाली खाली आंखों से मेरी और देखता रहा । उसके आगे हम भी मिली थी । कहते हो तो से बोला राज्य मेरे होटल में इतनी हिम्मत नहीं बची है कि मैं तोहरे सामने उन भयानक वालों को दोबारा कह सकते हैं । तो प्रश्न सूचक निगाहों से मैंने उसकी ओर देखा तो उसने मेरी और अपनी डायरी बढा दी । बोला हो सकता है कुछ परिस्थितियों के दबाव में आकर में तुम्हारे सामने झूठ बोलता हूँ । मगर एक डायरी डायरी मेरी जिंदगी की घटनाओं का संग्रह है । झूठ नहीं बोलेगी इससे पढ लो समझे मैं चौंक पडा कि तुम्हारी जिंदगी के व्यक्तिगत और सार्वजनिक घटनाओं का पुलिंदा है । इसे मैं कैसे पढ सकता हूँ । आज तक मैंने तुमसे कोई बात नहीं हो पाई है । तो तुम आज ऐसा कह रहे हो । उससे भरी भरी नजरों से मेरी और देखा उनसे पढ सकते हो । मैंने अपनी फॅमिली उसे डायरी थाम ले । बातों ही बातों में घंटों गुजर गए थे । उस दौरान शिविर पार भी बाहर नहीं आई । बेचैन हो उठा । एक मिनट मैंने संजय से क्षमा मांगी और अंदर चला गया । शिविर आंगन पहुंचकर मैंने आवाज से जी आती हूँ फॅार मेरे कानों को छुआ तो मैं कहाँ था? मैं उसके रोने के कारण को समझ पाता । उससे पहले वाकर मेरे सामने खडी हो गई । लाला हैं मुरझाया चेहरा भेजी भीगी पलकें शायद वो भी रो कराई थी, हो रही थी । मैंने पूछा तो एकदम से आकर मेरे बदन से चिपक गई । किसी अनहोनी की आशंका पर मेरा बदन थर्रा उठा । श्री मुझे कोई गलती हो गई क्या? मैंने पूछा आप ऐसा मत कही उसकी पकड और मजबूत हो गई । ये मेरी खुशनसीबी है कि आप मेरी जिंदगी में आए हैं । मैं उसे खुद से अलग करने की कोशिश की और वो और मजबूती से मुझे जकड रही थी । रोते हुए बोली क्या इन सब मेरी करने लायक कुछ भी नहीं हैं जिससे मैं आपके आंसू को अपनी आंखों में भर लो वो सिसक उठे की आज मैं आपके आवासों को नहीं देख पाती ये आप जानते हैं ना खाशी जनता हूँ नहीं होने के कारण को समझ गया । वो दुखी थी संजय के हालात पर । मगर शायद उससे भी ज्यादा मेरी बेबसी पर क्यों इतनी अच्छी है? मैंने एक बार फिर उसे गले से लगा लिया । मेरी बाहों का कैसा बडा तो वह कसमसा उठी । कोई नया मौका नहीं था मेरे लिए । इसके पहले भी किसी बात को लेकर यदि मेरी आंखों में पानी की एक बूंद भी आती है तो शिविर की आंखें और उस पडती

मेरी अर्धांगिनी उसकी प्रेमिका - 04

बातों ही बातों में कितना वक्त गुजर गया, पता ही नहीं चला । लगभग ग्यारह बजे खाना पीना करके खाली हुए तो मैंने संजय को बिस्तर पर जाने का आग्रह किया और मैं संजय की उस डायरी को लेकर अपने बेडरूम की तरफ बढ गया । कह नहीं सकता मैं कितना उत्सुक था या फिर परेशान । हम पन्नों को पलटने जा रहा था, जिसके गर्भ में संजय की जिंदगी का एक लंबा दौर समाया हुआ है, जिसमें कैद थे उसके वो हालत उसके तलाक के कारण बन गए तो बेरहम पाल, जिन्होंने उसकी बेटी पंखुडी की जिंदगी छीन ली । उस डायरी में संजय के उन लोगों का भी जिक्र था, जिसमें कॉलेज खूबसूरत इससे सराहते हैं और हुई जुलूल हरकतें भरी हुई थी । प्रिया नीतू समेत ऐसी बहुत सी लडकियाँ जो उसकी विवाहिक जिंदगी में तो शामिल नहीं हो पाए, मगर उसके अतीत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रही हैं । उजारि के महत्वपूर्ण किरदार में मैं भी एक था । हालांकि उस की कॉलेज की जिंदगी का एक किरदार मैं जरूर था । इसलिए बहुत गुंजाइश है कि इस डायरी में राज की भूमिका के रूप में मेरा भी जिक्र हो । ठहरी संजय की है । इसलिए डायरी के प्रथम पेट से ही मैं शब्द का प्रयोग संजय के लिए निर्धारित होगा डायरी जुलाई की सुबह कॉलेज का प्रथम दिन । नए नए चेहरों से मुलाकात । रैगिंग की भयावह तस्वीर मैं यानी कि संजय पाठक अंदर से डरा हुआ था । अपने हर कदम पर मैं चौक पडता शायद कोई सीनियर छात्र मुझे रोकने की कोशिश कर रहा है । मैं डरी सहमी तार चीनी गांव से पीछे की ओर निहारता और किसी के ना होने के अहसास पर सुकून की सांस पडता । इससे पहले किसान सुलट कर लौट पार्टी फिर वही डर फिर वही कपकपी । अब तक मैं कॉलेज के डेट को लांघकर कॉलेज के कैंपस कोसिस से मैं दाखिल हो चुका था । यहाँ से कॉलेज की ऊंची हमारा शुरू हो रही थी छात्र छात्राओं की चहलकदमी से भरा हुआ गलियारा बीच बीच में एक दूसरे को छेड दिया गांव की चमक बिजलिया कॉलेज के आखिरी छोर की सीमाओं से बिखरे बगीचे की गाली को मैं अभी पार कर पाता । उससे पहले मुझे किसी का हाथ का ऐसा हुआ बदन थर थरा कर रह गया । समझ नहीं पाया कि एक का एक मेरे पीछे आ रहे वो सीनियर छात्र कहाँ से टपक पडे ॅ और मेरे पीछे से प्रस्फुटित हुआ सच कहूँ तो उस वक्त में इतना खबर आ गया था कि यदि मेरे सामने धरती भात पडती तो सीनियर छात्रों का सामना करने से बेहतर उसमें समा जाना उचित समझता ना पलट कर खडा हो गया । तरी सहमी निगाहों से उनकी और देखा नहीं हो । उनमें से किसी ने कहा बेटा अपनी नजरे तीसरी बटन पर हो । आपने शर्ट की तीसरी बटन स्वर किसी दूसरे छात्र का था । रैगिंग मैं कपडा उठा । फिलहाल उस वक्त मेरे लिए तीसरी बटन एक नया शब्द था । फिर भी उनका तात्पर्य में समझ गया सारे घेरा बनाकर मेरी चारों और खडे हो गए । हमारा नाम क्या है? उन्होंने मुझसे पूछा सवाल किस छात्र ने क्या मुझे पता नहीं चला? संजय पाठक मैंने उत्तर दिया आपका नाम दिनेश पाठक माँ शशीप्रभा पाटा अगर अच्छा नाम है और में से किसी एक ने कहा ऍम । अगला सवाल न होने की तसल्ली पर मैंने पूछा हरियाणा को इतनी जल्दबाजी का है बच्चा पढे हो वो तीव्र स्वर पीछे खडे हुए किसी और सीनियर छात्र का था तो हम सभी मिलता जाओ । मुझे ठहरना पडा । उसने अपने आगे खडे लडके को एक तरफ धकेल कर आगे आते हुए बोला सर से पूछो आपके बाल इतने लंबे क्यों हैं? मेरी निगाहें तीसरी बटन पर टिकी रही सहमी हुई आवाज से मैंने उनके द्वारा आदेश में मिले सवाल को दोहरा दिया । जी सर आपके वाले इतने लम्बे क्यों हैं? मेरी अंदाज पर सामने खडा छात्र बडा गया । उसके बगैर किसी लिहाज की खरीदारी पकडी और ऊपर उठाकर छात्र की ओर संकेत करते हुए कहा अबे यार इधर देखो इन से पूछ रहा है चंद्र छडों तक मैं उसकी और हैरानी से देखता रहा । वहाँ गई । उसके बाद एक मध्यम लम्बाई के बाल रखने वाली किसी लडकी से कम नहीं रहे होंगे । उन चंद क्षणों के दौरान अपने बालों को कई बार सवार रहा था । साथ आपके बारे में बडे क्यों हैं? मैं डरते हुए अपने सवाल को दोहरा दिया । तडा थोडा अकस्मात सीनियर कहाँ थोडा और मेरे वालों को खरोच हुआ निकल गया । मैं कुछ समझ पाता उससे पहले एक ने चिल्लाया निगाहें नीचे तीसरे बटन पर आप यकीन नहीं करेंगे कि सालों बाद आज किसी के हाथ इतनी बेरहमी से मेरे गालों कुछ हुए थे । मैं अंदर ही अंदर उबल पडा । जल्दी आंसू की शक्ल में आंखों से छल चला पडेगी । मैंने उन्हें रोकने की कोशिश में अपनी बल्कि गिरा ली । कॉलेज का दूसरा दिन रैगिंग का दूसरा अंदाज उसे मुझे इतना जरूर मालूम हो गया था की मिल कक्षाएं कितना रहे हैं उसके लिए सर अंतर मार्ग कौन सा अपना हूँ जो सीनियर छात्रों की निगाहों में न आ सकें मैं कॉलेज की लम्बी चौडी सीमाओं से लगी छोटी छोटी इमारतों को आठ लेता हुआ तीव्रता से आगे बढ रहा था ब्लॅक मेरी कक्षा के सामने दम तोडती हूँ सीढियों को अभी मैं छुपाता एक मेरे कानों पर तीसरी आवाज को पडी मैं रुक गया पीछे मुडकर देखा तो पता नहीं पर फिर झनझना उठा मुझे दस बारह मीटर की दूरी पर पथरीली दीवार से सटी एक लडकी जो लगभग मेरी उम्र की थी, बडी हसरत से मेरी और देखे जा रही थी । इधर आओ हवा में उसकी उंगली लहराई थोडी देर तक मैं वन जिसकी स्थिति में एक तक होता रहा पूरा छरहरा बदन तंग कपडे उलजुलूल जी से लडें गुलाबी होठों पर धूमिल किंतु काटल मुस्कान मैं बढावा सौ उसके पास चला गया । मेरी निगाहें तंग कपडों की सीमाओं से ही हुई छलती सजाओं को पार कर अंदर तक घुस जाना चाहती थी मगर एकाएक उसमें रोक लिया मुझे अपनी और यूट्यूब तकरीबन गांव से देखता हुआ ठीक कर वो चुटकी बजाते हुए बोली ऍम आपने नजरों को काबू में रखूँ मैं तुम्हारी सीनियर हूँ भेजना चाहिए बिजली की गति से ऐसे झुकी की पल भर के लिए लगा की जमीन को चीरकर नीचे पाताल तक पहुँच जाएंगे । ऍम मुश्किल से कहता है क्योंकि उसके तेवर ढीले बढ गए । छिपी निगाहों से मैंने उसके चेहरे को देखा । मुझे यू सहमा हुआ देखकर अचानक उसके चेहरे पर भी नी सी मुस्कुराहट छोड पडी । होली नाम जी मैंने पूछा तुम्हारा नाम क्या है? संजय पाठक ना इसमें है ना? संजय पाठक उसके स्वर्ग खाना खा रहे थे । फॅस मैंने आभार प्रकट किया तो वह खिलखिला पडेगी क्यों मैं समझ नहीं पाया । तभी एक का एक उसे कुछ याद आया । गुजरात गंभीर होते हुए बोली संजय क्या तो कॉलेज के नियमों के बारे में जानकारी कम है । मतलब मेरी नजर उसके चेहरे पर जाते गी टाइटनिंग ही क्यों है? उस टाइप पकडकर मुझे अपनी और खींचा इतने करीब की मैं जरा सा हिलता डुलता भी तो मेरा बदन उसके बदन को छु लेता । मेरा हाल ऐसा हो गया कि कुछ पलों के लिए जिससे मेरी सबसे ठहर गई हूँ मैं तक उसके चेहरे की और देखे जा रहा था । मेरी इस घबराहट जहाँ आप इस बात का कतई अनुमान में लगाइये गा । मेरे दिमाग में बर्फ जम रही होगी । वक्त जरूर असहज था, मगर मैं निगाहों की कृष्णा को शाम कर लेना चाहता था । मसलता की प्यासी मेरी निगाहें उसके चेहरे से सकती हुई । जोगी बदन के नाजुक हिस्से में घुसने की कोशिश की । उम्मीद धोनी को अपनी उंगलियों के सहारे से उठाते हुए बोली मिस्टर संजय अगर बदन की तपन से निगाहें से गई हो तो जरा हमारे चेहरे की और भी देख लीजिए । दोबारा पहचानने में आसानी होगी । उसके लव मेरे कानों से टकराया तो मैं घबराहट में बर्फ बन गया । मेरी इस अकस्मात की घबराहट पर उसके होठों पर एक बार फिर गुलाबी मुस्कान तैर पडी तो मेरी और झुकते हुए बोली संजय बात बताओगे क्या? मैं पूछना चाहा मगर होटलों ने साथ नहीं दिया । दरअसल वो मेरी इतने करीब आ गई थी कि कुछ सालों से ही मेरी गर्व इंद्रियों पर दौड रहा हूँ । शायद गर्म लावा बनने वाला था । उसने मेरी स्वीकृति की परवाह नहीं किया । शरारती अंदाज में बोली मैच में एक ऐसी रखती हूँ मैडम, मैंने अर्थपूर्ण निगाहों से उसकी और देखा । उस वक्त मुझे लगा हो ना हो । मगर मुझे ऐसा उस पर है जो उसे भी मेरे नजदीक आने के लिए मजबूर कर रहा है । मगर क्या मेरे पास इसका जवाब नहीं था । मैंने उसके सवाल का कोई जवाब नहीं दिया । संजय तो मेरी आंखों में चाहते हुए बोली कुछ बोलोगे खूबसूरत है । आप खूबसूरत ऍफ आउट है और ऍम मैंने बल्कि झुका ली । मगर निगाहें जैसे बगावत पर उतर आई हूँ । वह एक बार फिर उसके बदन के नाजुक हिस्सों तक फसल जाना चाहती थी । थोडी देर तक मेरे चेहरे की और देखती रही । शायद से पढना चाह रही थी संजय ऐसा वो बोल पडी । मैंने चौंककर उसकी और देखा । उसके होठों पर भी मुस्कान बिखरी हुई थी क्या तो इन्हें छोडना चाहोगे क्या क्या कहा आपने? मैंने अनजान बनने की कोशिश की । हालांकि मैं स्कूल के जमाने से ही उन लडकों में से था । इसे लडकियों के दिल की बात समझने के लिए शब्दों की जरूरत नहीं थी । मैंने पूछा मेरे बदन को छोडना चाहूँ कि बेफिक्र अंदाज में उसने एक बार फिर अपनी बात को दोहरा दिया । वक्त को बारीकी से परखने वाला शख्स आज अपनी भावनाओं को समझ नहीं पा रहा था । मैं अब तक ऐसी तमाम लडकियों से मिल चुका था जो कई बार मुझे ऐसा ही ऑफर दे चुकी थी । मगर इतनी छोटी सी मुलाकात में मिला जी पहला था मेहराम था । खुद को रोकना चाहता था मगर रोक नहीं पा रहा था । उसका रही थी । उसकी नजरें एकटक मेरे चेहरे पर टिकी रही । मैंने पल भर के लिए सहमी सहमी सी निगाहों से इधर उधर देखा । कॉलेज का वो हिस्सा लगभग सुना था । मैंने अपने थरथराते हाथ अभी उठाया ही था कि एक जोरदार थप्पड मेरे कानों को लाल कर दिया बत्तमीज कहीं के वही का एक्वीफर पडी तो यहाँ पढने आये हो या ये सब करने एक उसका स्वर्ग कर्कश हो गया । उसके होठों पर बिक्री मुस्कान की गायब हो गई होली इस कॉलेज में तो बहुत सी यू ही तंग कपडों में इशारा कर दी लडकियाँ मिल जाएंगे और उस दौरान हजारों बार तो मैं ऐसी ही इम्तिहान से गुजरना पड सकता है मगर दो उसके आके फैल गई तो एक बार भी नहीं झेल सकते हैं तुम्हें शायद मालूम ही की हर बार ऐसी अदा पर इशारा करते हुए वो लडकी तुम्हारी सीनियर छात्रा नहीं होगी जो तुम्हें राह दिखाए वो तुम्हारी सही पार्टी भी हो सकती है । मिस्टर पाठक हूँ मेरी जिंदगी का सब पहला दौर नहीं था जब लडकियों के मामले में मुझे ऐसी शर्मिंदगी झेलनी पडी हो ऍम लडकियाँ मेरी सबसे बडी कमजोरी थी इनके सामने आते ही अक्सर मैं बेसब्र हो जाया करता था । मगर ये सबका चलता है । इससे आगे शायद ही बोलता हूँ ।

मेरी अर्धांगिनी उसकी प्रेमिका - 05

मैं पसीने से तरबतर कक्षा की और भागा रक्षा शुरू हो चुकी थी । सर मैं कमेंट दरवाजे पर पहुंचकर मैंने हफ्ते हुए कहा सारी कक्षा हंस पडी । हालांकि अध्यापक ने कोई टिप्पणी नहीं की । मैंने कक्षा की एक छोड से दूसरी छोड तक निगाहें दौडायें कक्षा में छात्र छात्राएं यहाँ वहाँ छितराए हुए बैठे थे । छात्र छात्राओं का एक दूसरे के बीच यू बैठना मेरे लिए नया अनुभव था । इस से पहले छात्र छात्राओं की कक्षाएं तो अलग अलग स्वतंत्र रूप से चला करती थी या फिर एक ही रक्षा में बैठने की व्यवस्था अलग अलग हुआ करती थी । लेकिन मैं कहाँ बैठी हूँ? मुद्दा ये था मैं अपने लिए सीट तलाशने लगा । कक्षा के अंतिम पंक्ति से मुझे खाली सीट नजर आई तो मैं तेजी से उस और बता ये सुनो अचानक अध्यापक ने आवाज थी मुझे करना पडा । पीछे कहाँ जा रहे हो यहाँ हूँ । इधर तो अगली पंक्ति में सीट खाली है । मैंने गर्दन घुमाकर अगली पंक्ति में खाली सीट की और देखा । मेरे बदन में झुनझुनी दौड गई । उस पंक्ति में सारी लडकियाँ ही थी जिनके सबसे किनारे में इस सीट खाली थी । फॅमिली के बगल में बैठी हूँ । इतना परेशान उठा जी में आया अध्यापक से साफ तौर पर मना कर दो । मगर मैं ऐसा नहीं कर सका क्योंकि मैं जानता था कि ऐसा करने पर मैं पूरी तरह मजाक का मुद्दा बन जाऊंगा । चुपचाप बैठ गया । मैंने छुपी हुई नजरों से अपने बगल में बैठी हुई उस लडकी की और देखा मुस्करा रही थी । लेकिन क्यों कक्षा लगभग खत्म होने ही वाली थी । इस सवाल ने मेरे मन को एकाग्र नहीं होने दिया । मैं घर से भी डरा हुआ था कि मेरी जरा सी असावधानी पर मेरा हाथ कहीं उसे छोडा जाए । मगर उसी दौरान उस लडकी ने जानबूझकर कई बार किसी न किसी बहाने मुझे छूने की कोशिश की । किसी तरह रक्षा समाप्त हो तो उसे इस बात का एहसास दिलाने के लिए कि मुझे उसकी वो हरकत बिल्कुल पसंद नहीं आई, मैंने घूरती हुई निगाहों से उसे देखा ।

मेरी अर्धांगिनी उसकी प्रेमिका - 06

अगला दिन कक्षा में कदम रखते ही वो आप एक बार फिर मेरे गले पड गई । यहाँ वही लडकी जो कल मेरे बगल बैठी थी । मुझे देखते ही खिलखिला पडी । तुम पागल हो गया । गुस्से से सुनते हुए मैंने उसकी और देखा हूँ । पूरी बेहाई के साथ उसने कहा और आकर मेरे सामने खडी हो गई । बडबडाती नजरों से थोडी देर तक मुझे देखती रही और फिर मेरी और हाथ बढाते हुए बोली खाई आए । मुझे भी कहना पडा तो मैंने उसका हाथ नहीं दावा पलट कर जैसी पीछे खाली पडी सीटों की ओर बढने की कोशिश की । उसका रास्ता रोक लिया । बोली हाथों में लालू क्योंकि यहाँ मैं तुम से दोस्ती करना चाहती हूँ । सोचती मुझसे क्यों तो दोस्त बनने के लायक नहीं हूँ हूँ । मगर मेरे अलावा भी यहाँ और तमाम लडके हैं । नहीं क्यों? मैं ठहरकर पूछा बच्चा नहीं । हालांकि मैं स्कूल के जमाने से ही ऐसी दिलफेंक लडकियों का दीवाना था । अगर आज आज क्या कर रहा था? मैं मुझे खुद नहीं पता । एक दिन पहले सीनियर लडकी द्वारा दिलाए गए वो गुरु बच्चन रह रहकर मेरे मस्तिष्क पर कौन रहे थे? वो लडकी मेरी और उस वक्त जिस तरह से देख कर मुस्कुरा रही थी कुछ लगने लगा कि मैं ज्यादा देर तक नहीं रह सकता । मैं इन विचारों, विचारों में अभी भटक ही रहा था कि अचानक किसी बात को कहने के लिए वो मेरी मेज पत्ते एक लेते हुए छुट पर खडी हो गई । उसकी दोनों हथेलियों ने उसके गालों को ध्यान रखा था और दुपट्टा सडक कर दले में फस गया कराइए उस वक्त अपनी नजरों को संभाल पता तुम्हारे नाम क्या है? उसका मुस्कुराकर पूछा तब से मतलब एक बार मैंने फिर अपनी बेरुखी बरकरार रखने की कोशिश की । ये क्यूँ लडकियों की तरह भाव खा रहे हैं? पूरी चीज कर बोली मुझे अच्छा नहीं लगता तुम मेरे पीछे पडी हो । पता नहीं उसने शरारत से अपनी नाजुक उंगलियाँ मेरे गालों पर छुआ दी । पता नहीं कब क्या मतलब होता है । मैंने झल्लाकर उसकी और देखा बताया नहीं वो जोर से हंस पडी । ये तो कोई बात नहीं हुई तो मुझे अच्छे लगते हो । कहते हैं वो पलट पडेगा । अब कोई है उसके शरारत पर मैं बस खाली खाली ने गांव से देखता रहा । मेरे पास कोई जवाब नहीं था । हाँ तो तुम ने अपना नाम नहीं बताया तो चलते चलते अचानक ठहर गई । संजय पाठक मुझे बताना पडा गज तो मेरी और बढते हुए बोली अच्छा नाम है । संजय पाठक अच्छा तुम बताओ । उसने पूछा नहीं नाम क्या है? ऍम तो पूछो ना मटक कर उसने का पूछो तो दो बता दो तो फिर उनकी क्या अच्छा तरीका है नाम पूछने का और खुशमिजाज वो तो कमाल की है । आपकी बेरुखी तो कहीं आप पर नजर ही नहीं आती । मैंने कोई प्रतिक्रिया नहीं । अच्छे पाठक ॅ के बाद बताओगे क्या तुम मुझे बी रुकी से क्यों पेश आ रहे हो? लडकियाँ तो पसंद नहीं है क्या? या फिर लडकों में दिलचस्पी है । पागल होता हूँ मेरा नाम नीतू है । नीतू जैसवार पागल नहीं समझे में से पाठक अगर दोस्ती पसंद है तो बोलो वही ना मैं चली । इतना कहकर वह सचमुच पलट पडेगी । अरे एरोप् मैंने आवाज भी नहीं रुकी तो मैंने पुकारा नीतू तुमने मेरा नाम हो वो लगभग भागती हुई लॉटरी मेरी और एक बार फिर से पुकारों मुझे तुम्हारी दोस्ती मंजूर है क्या? तो मंजूर है, मुँह है, मंत्री है । वो ऐसे उछल पडी जैसे एक उसकी सबसे प्रिय वस्तु को किसी ने उसके सामने रख दिया होगा । तीव्र गति से मैं इसका चक्कर काटते हुई मेरे बगल में आकर धर्म से बैठ गई । उसके फोन से मैं सिहर उठा

मेरी अर्धांगिनी उसकी प्रेमिका - 07

नीतू जिस तरह महज एक एक्सीडेंटल मुलाकात में मेरे इतने गरीब आ गई थी, चंद दिनों में वो उसी तरह टूर जाती हुई भी नजर आई । प्रयोगात्मक कार्यों के लिए कक्षा में पांच पांच छात्र छात्राओं के समूह बनाए गए जिसमें मैं और नीतू न सिर्फ अलग अलग समूह में बल्कि अलग अलग लैब में भी बात किए गए थे । हम अपने समूह पांच विद्यार्थियों में से तीन लडके थे जबकि दो लडकियाँ । फिलहाल यहाँ अपने समूह के लडकों का जिक्र करना जरूरी नहीं समझता हूँ मगर लडकियों के जिक्र किए बगैर रह भी नहीं सकता । जब लिस्ट पार्ट मैंने, शिवानी और प्रिया दोनों लडकियों का नाम पडा तो बेचेने उठा । नीतू पिछले कुछ दिनों से ही मेरे काफी करीब आ गई थी और मुझे लग रहा था कि इन दोनों में से किसी एक की जगह पर नीतू को होना चाहिए था । प्रयोग के पहले दिन प्रयोगशाला से मैं कुछ जल्दी ही पहुंच गया । उस वक्त तक हमारे समूह का बस एक ही लडका पहुंच पाया था । आए टाइम संजय पाठक मैंने मुस्कुराकर उसे अपना परिचय दिया । राज्य राज मल्होत्रा गहरी मुस्कराहट के साथ उसने मुझसे हाथ मिला । उसके बाद कुछ दिनों तक छिडी चर्चा में प्रयोग से जुडे कई सवाल और बहुत सी समस्याओं का उस ने जिस अंदाज में बेहिचक जवाब दिया उससे मुझे मानना पडा कि वह एक प्रखर बुद्धि का संजीदा इंसान है । आपसे मिलकर बहुत खुशी हुई । मैंने पत्थर उसकी और हाथ पडा । मुझे भी तो दस मिनट बाद प्रयोगशाला में दूसरे समूह के छात्र लगातार दाखिल हो रहे थे । अगर हमारे समूह के एक लडका और दोनों लडकियाँ अब भी नदारत थे । हम दोनों ने कुछ ही मिनटों में प्रयोग करना शुरू कर दिया तो अभी एक का एक हवा की गति से दोनों लडकियाँ प्रयोगशाला में दाखिल होते हुए प्रयोग की में इसके पास आ खडी हुई है । मैंने उनकी तरफ नहीं देखा मगर उनके वहाँ होने के एहसास की वजह से दिल की धडकन अचानक पड गई । क्यों मैं नहीं जानता हूँ ये पिछली वाली ता धन शीरे से जुडना चाहिए । उन में से किसी एक लडकी ने टिप्पणी की तो मजबूरन मुझे अपनी नजरें उठाने पडेंगे ने कहा है उसके बदन को छुपाई तो मेरे दिल की धडकन जैसे धडकना भूल गई हूँ अंग कपडों में यहाँ वहाँ ढकी हुई वो खूबसूरत मल्लिका एक का एक दिना किसी दस तक केंद्र दिल में उतर आई मेरी बागावास निगाहें जहां की तहां ठहर कर रह गई । मुझे अपनी और यू तल्लीनता से निहारता देख वो लडकी बजाय लगाने, शरमाने के मेरे ध्यान को खुद से हटाकर कहीं और आकृष्ट करने की कोशिश करती हूँ । बोली आपने वो लाल वाली तार भी गलत जगह जोड रखे है । उसकी आवाज बेशन मेरे मस्तिष्क की नसों को छोडा मगर मेरी नजरों की एकाग्रता भंग नहीं कर पाएंगे । मेरी निगाहें अभी उसकी गर्दन के आसपास छोड लगती रही । फिर जैसे ही नजर रखते हुए ढलान को बार करती मुस्कुरा बडी बोली मिस्टर! आपका सारा प्रयोग ही गलत है जी मैं से चौक पडा । जैसे किसी ने सारा समंदर का पानी मेरे ऊपर उडेल दिया हूँ । हाँ कहाँ गए थे मेरे इस अकस्मात चौक करें और फिर हकलाने पर उसके पीछे छुपी खडी दूसरी लडकी जोर से हंस पडे । मैं उस कातिल हसी को करीब से देखता । उससे उसने शर्मा कर तो पत्ते से अपना चेहरा ढाप लिया । इन तारों को आपकी जोर दीजिए । इस पूरे स्यापे पर मैं कोई प्रतिक्रिया देता, उससे पहले राज बोल बडा जी आप जोड दीजिए । मैंने भी उसके बाद को हरा दिया तो फॅमिली और बढते हुए उसने कहा और वह झुककर तारों को फिर होने लगी । उस पर उनसे जाओ में कितनी बिजलियाँ पडती होंगी आप खुद अंदाजा नहीं लगा सका । बस पागलो सब चमकती ने गांव सुना देखता रहा निगाहों की तृष्णा पूर्ण तो शांत हो पाती उससे पहले एक आएगी हमारे ग्रुप का एक लडका ना जाने कहाँ से आ टपका अगर हमारी तरफ ध्यान दिए उस सीधा हो चुकी हुई लडकी की और बडा और लगभग डर अपनी हथेलियों से उसकी आंखों को ढक लिया तो कॅाल भर के लिए वो लडकी हडबडाई फिर खडी होती मुस्कुरा पडी बोली तो गाॅव तो प्रिया गौरव मुझे लगा उसके सामने आ गया तो मैं कैसे जान लिया की ये मैं ही हूँ । गौरव तुम्हारी ऐसी पहली शरारत थोडी है जो हम पहचान नहीं पाएंगे । शायद तुम्हें यकीन ना हो कि मिस्टर गौरव मगर हम हमारी आहट भी पहचान लेते हैं । समझे तू वो ऐसा पल भर के लिए चौंकने का अभिनय किया उसने पर फिर वो जोर से हंस पडा । उस पर मुझे उसकी किस्मत से कितनी जलन हुई होगी । एक तरफ करने वाला कोई सिरफिरा आशिक ये समझ सकता था । राज्य शिवानी दुरूप्रयोग में व्यस्त हो गए जबकि गौरव और प्रिया आपसी नोकझोंक में और मैं मैं देर तक एक तक गौरव की ओर देखता रहा । पगडंडियों की तरह टेडा मेडा सा बने उस इंसान में ऐसी कौन से खूबी थी तो प्रिया जैसी खूबसूरत लडकी को इतनी पसंद आ गई थी । आपको पर मोटा चश्मा, तिरछा लंबा सर, छोटे घुंघराले बाल, चेहरा इतना काला जैसे उस पर कालिख पोती हूँ । खडा होते वक्त वो एक सौ साठ अंश पर झुक जाया करता था । इतनी शिद्दत से मुझे अपनी और देखते हुए देख गौरव जरा सकुचाते हुए बोला माफ कीजिएगा । मेरी वजह से आप लोगों के प्रयोग में बाधा पहुंची । अरे नहीं, या ऐसा होता रहता है । मैंने जबरदस्ती मुस्कुराने की कोशिश की । थैंक यूँ कहते हुए उसने ना पर सडक आए । अपने मोटे चश्मे को ऊपर चढा और फिर खाली खाली ने गांवों से प्रयोग की मेज पर बिखरे सामान की और गौर से देखने लगा । प्रयोग करते हुए लगभग आधा घंटा गुजर चुका था । मगर एक भी रीडिंग ठीक ठाक नहीं हो पाई थी । क्या कर रहे हम मनी उन्होंने सोचता है और अंत तो जाकर मुझे वहाँ से हट जाने के लिए सोचना पडा । मैं बट कर वहाँ से कहीं जाने के लिए उद्यत होता तो ऐसा एक जानी पहचानी आवाज मेरे कानों को छेड गई । मैंने घूम कर उधर देखा मुस्कराती लहराती हुई नहीं तो मेरी और लडकी आ रही थी । अच्छाई उसने दूर से ही हवा में हाथ फहराया आए । मैंने भी अपना हाथ हिला दिया । बहुत सही तो मैंने पूछा कैसी हो ठीक हूँ । उसने मेरे दोनों हाथों को थाम लिया । बोली तुम सुनाओ मैं कब से तुम्हारा इंतजार कर रहा था? कहाँ थी तो मैंने शिकायत भरे लहजे में पूछा क्या उसे चौकर मेरी और देखा तो मेरा इंतजार और नहीं तो क्या मेरे स्वर में शरारत थी । मगर नीतू मेरे उन लडकियों से पार हो गई जब छोडो तक मुस्कुराती हुई मेरी आंखों में कुछ खोजने का प्रयास में करती रहेगी । फिर हस्कर बोली लगता है आज को ज्यादा मेहरवान है साहब हम पर नहीं है । ऐसा कुछ नहीं है । मैं मुस्कराया मैं सच बताऊँ तो तुम्हारे करीब रहते रहते कभी पता ही नहीं चला । दूर जाने का एहसास क्या होता है? संजय वो अचानक भाव कोठी दरअसल आज मेरा पहला प्रैक्टिकल था ना । इसलिए कुछ ज्यादा ही व्यस्त थी । पूरा हुआ कहाँ हुआ यार, वो धीरे से हंस पडे तो तुम्हारे बिना मन ही नहीं लग रहा था । जी में आया चलकर दोबारा हाल चाल ले लूं इसलिए चली आई । कहती हुई तो मैं इसकी और लडकी और प्रयोग की निगरानी करती हूँ । बोले जैसे संजय यही प्रयोग तो हम लोग भी कर रहे थे । कोई रीडिंग आई थी । हाँ, तीन चार रीडिंग सही से ही निकाल ही नहीं थी । हम लोगों ने कुल कितने निकालनी थी । हमारे सर तो छह सात रीडिंग के लिए कहा था । तभी अचानक उसकी नजर बहुत पर लगी । घडी की आ गई तो चौकर बोली सब मुझे जरूरी काम है । मुझे जाना होगा । मैं जल्दी तुम से मिलती हूँ । आंधी से आकर उसी रफ्तार मुस्किल लौट जाने पर मुझे ठीक से याद नहीं है । मेरी क्या प्रतिक्रिया नहीं । मगर प्रिया जिस अंदाज में हम दोनों को खुल रही थी उसकी वजह से मैं कुछ ज्यादा ही उत्साहित था । पर क्यों मैं नहीं जानता । प्रिया नीतु के लौटते कदमों को तब तक निहारती रही जब तक कि वो उसकी आंखों के सामने से ओझल नहीं हो पायेगी । नीतू का पीछा कर दी प्रिया की थकी हारी निगाहें जब वापस लौटे तो मुझ पर बरस पडी । कहने लगी मिस्टर संजय पाठक यही नाम है ना आपका । आपकी इस रासलीला की बदौलत हम सबका प्रैक्टिकल अधूरा रह सकता है । इस बारे में सोचा है हम तो मैंने क्या किया? मैंने हैरानी उसकी और देखा । कुछ की आपको वो लगभग खींचते हुए बोली आपने तो छोडिये मुझे आपसे बहस नहीं नहीं वो फ्री बिफरी निगाहों से मेरी और देगी और फिर कुछ से सुलह हुई । वहाँ से निकल गयी उसका यू मेरी और देखना उससे से पटक ना लडकियों की इस भाषा से मैं अच्छी तरह से वाकिफ था । उसके चले जाने के बाद मैंने गौरव की और देखा हमारी प्रिया तो रूठकर चली गई या हूँ मैं क्या करूँ? कहते हुए वो भी वहाँ से निकल गया । मैंने पलट कर राजकीय और देखा मेरे चेहरे की मुस्कुराहट बढ गई या किस्मतवाला इंसान है यार, ये गौरव इसमें द्वारा नहीं पैसे वाला है । राष्ट्र मेरी और देखा मतलब ये कि प्रिया गौरव के साथ उसकी किस्मत की वजह से नहीं । उसके पैसे की वजह से हमने गौरव की बाइक देखी है । नहीं तो तितलियां तो देखो हर रसीले फूल के इर्द गिर्द मंडराते हुए मिल जाएगी । देख लिया लडकियों तितलियों में कुछ खास फर्क नहीं होता । लडकियों के पीछे पैसे उडाओ खुद की गाडी में घुमा हूँ । रेस्टोरेंट में खाना खिला और भरते हो तो उन का हाल उप सूरत से खूबसूरत लडकियां भी तितलियों से मंडराएंगे । तुम्हारे चारों और हो लेकिन अगर लडका नहीं नहीं है तो तो पहले पैसे कमाना सी कोई अब फिर पैसे वाला बाप को जो मतलब अभी हमारा कोई चांस नहीं है । हो जोर से हंस पडा तो उन्हें खोजने अभी लडकी नहीं मिल पा रहे हैं या फिर उन्हें तो खुद नहीं हूँ । वहाँ तो कमाल हो यार तुम तो लडकियों की फिजिक्स केमिस्ट्री सब जानते हो । ऐसा नहीं है संजू संसार में इंसान की फितरत ही ऐसा बाद जहाँ फिजिक्स काम करती है न कैमस्ट्री मतलब इंसान की फितरत के सामने विज्ञान के सारे नियम फेल हो जाते हैं । उस मामलों में तो दौलत और खूबसूरत लडकियों के सत्रह एक जैसी हुआ करती है । जितना इन के करीब जाने की कोशिश करो ये तुम से उतना ही दूर भागती हैं । तो कैसे पास आएगी अगर इनसे दूर भागों दो हूँ क्योंकि दुनिया की सबसे इनसिक्यॉर चीजों में से लडकियां भी एक है और आप जब इनकी और भागते हैं उनका पीछा करते हैं तो ऐसे में अक्सर इंसिक्योर महसूस करती है । मगर इसके उलट जब आपको इनमें कुछ खास दिलचस्पी नहीं होती तो यही आप पर भरोसा करने लगती है । और आपने दिलचस्पी लेने लगती हैं स्वच्छ तभी एक उस की निगाहें घडी पर गई तो चौक कर मेरी और देखकर बोला यहाँ हम फिजिक्स केमिस्ट्री की बातें कर रहे हैं और वहाँ हमारी फिजिक्स की क्लास छूटने वाली है तो

मेरी अर्धांगिनी उसकी प्रेमिका - 08

राजकीय जाने के बावजूद मैं ठहरा रहा । मैं जानता भी कैसे? राजनीति और गौरव ने मेरे लिए कई सवाल छोड दिए थे । इसकी मुझे भी खाक छाननी थी । मैं समझना चाहता था इंसानी दिमाग को । यानी खुद को । अभी कुछ घंटे पहले तक मैं नीतू के लिए पागल था । क्यों? कुछ दिन पहले ही तो मिले थे । हम मेरे पास आई और अचानक दोस्ती होगी । मगर क्या सचमुच दोस्ती ही थी? अगर हाँ, तो फिर दूसरे दोस्तों के लिए वो पागलपन को नहीं था । दोस्त मेरे दूसरे भी गए थे । अक्सर लोग कहते हैं कि पहला प्यार आप कभी भूल नहीं सकते । मगर मुझे पहला तहर कब हुआ? नीतू से मिला था अभी अभी जब प्रिया से मिला उसके पहले ही किसी और से हो चुका जो मुझे अब याद नहीं या फिर अभी तक हुआ ही नहीं । मेरे भी तरह का जीत से घुटन थी । नीतू आई तो थी कुछ कहा भी था मगर क्या ठीक से याद नहीं आ रहा था और प्रिया मेरे दिल और दिमाग में ऐसे घुस गयी जैसे उसे मैं सालों से जानता हूँ । सच कहूं तो पिछले कुछ घंटों ने मेरे लिए इश्क की परिभाषा ही बदल डाली थी । शाम को कॉलेज के छूटने का वक्त हो रहा था । मैं प्रयोगशाला से निकलकर जैसे ही गेट की तरफ मुडा बाय भाई करती हुई एक बाइक मेरे बिल्कुल करीब आपका ठहर गई । इससे पहले मैं अपने सवालों से बाहर निकलता जानी पहचानी की आवाज फिर से मेरे कानों में टकराई पाय । संजय और गौरव का था बाय मैंने जवाब तो दिया मगर उससे पहले चीज टीचिंग भर्ती हुई । उसके बाइक आगे निकल गए । मैंने सर पडी नजरों से उधर देखा । गौरव के बाइक की पिछली सीट पर प्रिया बैठी हुई थी । उसमें कुछ नहीं कहा । त्रिची निगाहों से मेरी और तब तक देखती रही जब तक बाइक इतनी दूर नहीं चली गई की मैं ओझल हो जाता ।

मेरी अर्धांगिनी उसकी प्रेमिका - 09

कॉलेज का अगला दिन नीतू गेट पर मेरा इंतजार कर रही थी । हाई संजय मेरे ऊपर निभा पढते ही वो मुस्कुरा पडी है । मुझे भी उसका बडा ऍम निकल गए थे । आज शिकायत करते हुए वो बोली छुट्टी पर हम कितना ढूंढे टेंट में क्या कह रही हूँ मैं जोर से हंस पडा मैं यही गेट पर ही तो था तो भी नजर नहीं आई । संजय उसने तल कल रात नहीं गौर से देखा मेरी और तो मुझे बना रही हूँ नहीं तो अच्छा तो अब तो मुझे झूठ बोलोगे । अचानक उसकी आंखें फैल गई । मुझे याद है कल छुट्टी के बाद सीधे में यही इसी जगह पर आई थी और तुम यहाँ पे नहीं थे । समझे तो मैं मुस्करा बडा मेरे यकीन करो में यहीं पर था । इसी गेट पर तोहरा इंतजार कर रहा था । उसकी चमचमाती आंखे देर तक मुझे घूमती रही । फिर मेरी बातें पकडते हुए बोली सच है या झूठ? मुझे नहीं पता तुमने मेरा इंतजार किया । बस यही काफी है मेरे लिए । हालांकि मुझे पता था उससे मेरी बात पर कोई यकीन नहीं है मगर मैं उसकी परवाह करता हूँ । इस बात पर वो खुश थी । मेरा हाथ अपने हाथों में लेकर वह देर तक मैं जाने मेरी आंखों में क्या तलाशती रही । मिस्टर मेल मिलाप हो चुका हो तो प्रयोगशाला की तरफ दिया जायेगा । अच्छा रह जाना पहचाना सस्वर मेरे कानों को छोडा । मैं बिजली की गति से उधर बडा तो कुछ दिनों तक आंखों पर यकीन नहीं हुआ । प्रिया बिल्कुल मेरे पीछे पडी थी जी मैंने हैरान होते हुए पूछा मेल मिलाप के बाद प्रयोगशाला की तरफ भी आ जाइएगा । जी जी कल वैसे भी अब हमारे प्रयोग की ऐसी तैसी कर चुके हैं । कहते हुए वो आगे बढ गई । मैं तब उसे जाते हुए देखता रहा । संजय लडकी कौन है तूने मुझे जब जो रहा हूँ पता नहीं ।

मेरी अर्धांगिनी उसकी प्रेमिका - 10

उस सुबह है जब मैं प्रयोगशाला पहुंचा । उस समय तक वहाँ पर एक रूम का वृद्धि छात्र छात्रा बहुत चुके थे । सेवाएं प्रिया गई । मेरा दिल जोर से धडक पढा हूँ । अभी अभी तो मुझे गेट के पास मिली थी । फिर भी पहुंचे क्यों नहीं? ऍम पास में है तो लेट भी तो नहीं हो सकती है । दूर नहीं, लेट हो सकती जान छडों के भीतर मुझे अपने ही सैकडों सवालों का सामना करना पडा । वक्त जैसे जैसे रेंगता हुआ गुजरता जा रहा था, मेरे भीतर की बेचैनी बढती जा रही थी । हालात ऐसे थे कि मैं किसी से जिक्र भी नहीं कर पा रहा था । मैं बार बार दरवाजे की और देखता हूँ । हर आहट परचम पडता है । इस दौरान कई बार शिवानी की तिरछी निगाहों ने मुझे पूरा मेरी बेचैनी रखने की कोशिश की । एक बार तो प्रयोग को लेकर हो रही मेरी झल्लाहट और मुस्कराई भी तो शायद मुझे पसंद नहीं आया । मैं देर तक खुद को संभालता रहा । लगभग आधा घंटा गुजर चुके थे । हम में से किसी ने एक बार भी प्रिया की अनुपस्थिति का जिक्र तक नहीं किया । मेरे धैर्य का बांध टूटने लगा । मैंने घूरती नजरों से गौरव की और देखा वो प्रयोग में लगी तारों को जोडने में जुटा पडा था । एक साल के लिए लगा की गौरव के मोटे चश्मे को छीनकर तो क्या उसे अपने छोटे पहले कुछ लालू ऍम टूट गया । ॅ तो मेरी और देखने लगा तू कर क्या रहे हो वही जो तुम नहीं कर रहे हो । उसने कहा और एक बार फिर उलझी हुई तारों को सुलझाने लगा । अच्छा तो सब कुछ मैं अकेले ही करूँ और आज प्रिया क्यों नहीं आई? प्रयोग तो उसका भी है क्या अचानक उसके हाथ रुक गए । फिर खडा होते हुए मेरी और ऐसे देखा जैसे वो यह मेरे सवाल को समझ नहीं पाया हो या फिर कुछ ज्यादा ही समझ गया । संजय ने पूछा कि आज प्रिया क्यों नहीं आई? राजमा मेरे सवाल को दोहराते हुए देरी और देखा । उसके चेहरे पर बिक्री मुस्कान कुछ पलों के लिए मुझे हैरत में डाल गई । मैं समझ नहीं पाया कि वह मेरी बेचैनी पर मेरे साथ खडा होने की कोशिश कर रहा है या फिर मेरा मजाक उडा रहा है । उसे आज घर लौटना पडा । गौरव ने घूरती नजरों से राजकीय और देखते हुए बोला क्योंकि मेरे सौं कानों से टकराया तो राज के चेहरे पर थोडी उसकी नजरें उछल कर मेरे चेहरे पर आ गई । बेरुखी भरे स्वर में बोला मुझे नहीं पता मैंने अभी कोई सवाल नहीं किया । मगर प्रिया अब भी मेरे जहन में समय हुई थी । मैं प्रिया के खयाल से बाहर आ पाता । उससे पहले हर रूस की तरह हस्ती खिलखिलाती हुई । अचानक नीतू वहां हम की कैसे हो? संजय उसने पूछा मैंने कोई जवाब नहीं दिया । बस मेरी निगाहें उससे कुछ कह दे रहे हैं । कहना मुश्किल था कि मेरी निगाहों में उसके वहाँ अचानक आ जाने के लिए शिकायत थी या फिर शुक्र गुजार ही तो इस तरह चुप हो । वो बिलकुल मेरे करीब आ गए हैं । छुट्टी हुई बोली प्रयोग परेशान कर रहा है तो मैं तो मैं उसकी और देखा हूँ । मुझे बात का आधार मिल चुका था । मैंने हकलाते हुए कहा हाँ तो दम सही कह रही हो । ब्लॅक परेशान करके रखा है मुझे । हालांकि मैं प्रयोग से काफी दूर खडा था । अगर याद आया कि मैं तो तीव्रता से मैं इसकी और बडा तभी मेरी नहीं था । गौरव पर पडी वो मुझे ऐसे घूर रहा था जिससे मुझसे पूछ रहा हूँ । हिसाब अब कौन सा प्रयोग कर रहे थे । झटपटाहट में मैंने बारी बारिश राज और शिवानी की और देखा शायद उनकी निगाहों में भी वही सवाल था । नीतू जोर से हंस पडी शर्मिंदगी से बचने के लिए मैं उसे वहाँ से दूर ले जाना चाहा मगर उम्मीद की ओर बढते हुए कौन सा प्रयोग है? संजय सारा हम भी तो देखिए उस दौरान एक बार मेरी निगाहें शिवानी की ओर को में उसके अपने चेहरे को दुपट्टे से ढक लिया था । शायद वो फस रही थी इसको तो हम कॉलेज में भी कर चुके हैं । नी तूने पलट कर मेरी और देखा यार ये तो बहुत आसान है । कब किया है तो मैं इस प्रयोग को गौरव ने बडी बडी आंखों सन्नी तू और देखते हुए पूछा । पिछले साल जब स्कूल में थी उनमें गौरव ने हैरानी से देखा मेरी और उसी यकीन नहीं हो पा रहा था कि ऐसा प्रयोग स्कूल स्टैण्डर्ड भी कराया गया होगा । जी हां स्कूल में क्या आपको नहीं तू आगे कुछ कहती मैंने उसकी बात को काटते हुए बोला आज क्या कर रही थी आज आज तो खिलवाड के अलावा कुछ नहीं किया है । हमने कैसे वो जोर से खिलखिला पडेगी क्योंकि आज का प्रयोग किसी को समझ नहीं आ रहा था और सर थे तो एक बार बताकर कहीं चले गए । फिर दोबारा आकर दर्शन ही नहीं तो क्या? अब तो कुछ नहीं करोगे । कम से कम आज तो इरादा नहीं है । मेरे करीब होगा । आज तुम्हारे पास ही रहने का मन है । यहाँ नहीं आपकी फैल गई । नहीं तो मैं हकला पडा । वो मुझे लगता है तो ये प्रयोग नहीं छोडना चाहिए । मेरी और देखने लगे । शायद मेरे आश्रय को समझ गई थी । उसकी चमकती आंखों में एक एक नहीं आ गई । रूकी आवाज में बोली हाँ संजय तुम सही कह रहे हो, मुझे प्रयोग नहीं छोडना चाहिए क्योंकि मेरे प्रयोग छोडने से तुम्हें तकलीफ होती है । है ना । उसके जज्बातों को समझकर मैं अपने अल्फाज ऊपर कुछ फेरबदल करता हुआ । उससे पहले नीतू दौडती हुई वहाँ से बाहर निकल गई । नहीं तू एक आये । क्यूट कर चले जाने पर मुझे झटका तो लगा नगर पता नहीं क्यों वो घुटन बहुत देर तक नहीं नहीं । शायद इसलिए कि मुझे यकीन था कि वह देर तक मुझसे रूठकर नहीं रह सकती । मैं पलट कर पूरी एकाग्रता के साथ प्रयोग की मेज की और हो गया

मेरी अर्धांगिनी उसकी प्रेमिका - 11

प्रयोग खत्म करके मैं कक्षा में शामिल होने चला गया । इस बीच राज मेरे साथ ही था । आज हमने पहली बार आपस में तो ढेर सारी बातें की थी । हालांकि इस दौरान रात में मेरे और नीतू के संबंधों के बारे में जानने की उत्सुकता जताई । प्रिया को लेकर मेरे अजीब से व्यवहार के बारे में भी पूछा । मगर हवा भी इतने अच्छे दोस्त नहीं थे कि मैं अपनी हर फिलिंग उसे शेयर कर पाता था । शिवानी के प्रति बढ रहे अपने आकर्षण को उसने जरूर मुझे शेयर किया । शिवानी का नाम सुनते ही मैंने फोटो खींच लिए । पानी भी कोई लडकी है जिसपर आकर्षित हुआ जा सके । जब देखो ऊपर से लेकर नीचे तक चादर में लिपटी रहती है, छोड देगा गला उसके गले तक कैसा रहता है और रही सही कसर उसका लंबा सा दुपट्टा पूरा कर देता है । सच कहूँ आपको लगाने शरमाने के अलावा उसका आकर्षण वाली कुछ भी चीज नहीं थी । हालांकि उस वक्त मैंने रात से कुछ भी नहीं कहा था । शाम ढलान बदली । कॉलेज छूटने पर मैं जैसे ही गेट पर पहुंचा अचानक ही नहीं तो भीड के किसी कोने से निकल कर मेरे सामने खडी हो गई । संजय पुराने अंदाज में ही वैसे मुस्कराई जैसे कुछ हुआ ही नहीं था तो मैं चौंक पडा । मैं जानता था कि वो बहुत देर तक रोटी नहीं रह सकती । तू इतनी जल्दी मान जाएगी । मुझे वाकई उम्मीद नहीं थी । मैं आगे कोई बात छेडता । उसने मेरे होठों पर उंगली रख दी और बोली छोडो ऍम उस मनहूस घडी को उसकी आंखों में प्यार छलक पडा । मैं रेडी पर लौट कर एक बार फिर नहीं मुड जाना चाहती हूँ मगर तुम ऍम में उस पर सच पूछता हूँ । मेरी बात बीच में काटते हुए उसने कहा फिर बातों के रूप को नया मोड देती हुई बोली पढाई कैसे चल रहे हैं? पढाई एक उसके भूसे कल्पनीय बात सुनी तो मैं चौंक पडा तो अभी अभी तो कॉलेज शुरू हुआ है होते हैं अपनी बात पर वो लगा गई ।

मेरी अर्धांगिनी उसकी प्रेमिका - 12

कॉलेज की अगली सुबह मैं जैसे ही अपनी कक्षा में घुसा, एकाएक प्रिया मेरे सामने आ गई तो उसे लगभग टकराते टकराते बची । संघीय मुझे सामने देख उस काम पटाखा फटा रह गया तो इस सेक्शन में हूँ हाँ और ये वो उछल पडी । मैं भी इसी सेक्शन में हूँ । कहती हुई उत्तेजना में वो मेरी तरफ अपना हाथ पढा रही थी । मैंने थाम लिया । फिर वो देर तक कुछ कहती रही मगर मैं उसकी गर्म हथेलियों के गर्माहट में दिखला जा रहा था । मुझे कुछ सुनाई नहीं दे रहा था । बस उसके होट खेलते रहे । संजय एक और उसने मुझे झकझोरा । अच्छा चलो फिर अभी प्रयोगशाला में मिलते हैं कॉलेज की । वह सुबह भी रोज की तरह थी मगर फिर भी बिलकुल नहीं । प्रिया के बदले हुए तेवरों ने जैसे मेरे अन्दर ताजगी का तूफान भर दिया हूँ । मैं आसमान में उड रहा था । आज प्रयोगशाला का माहौल कुछ बदला बदला सा था । हंसी ठहाकों के बीच हम एक के बाद एक रेडिंग दिए जा रहे थे । गौरव तारों को सुलझाने में तल्लीन था । अब मैं प्रिया के साथ रह रहेगा । ठाकरे लगाने में कभी राष्ट्रीय पानी से बात कर रहा था । प्रयोग लगभग आखिरी पडाव पडता था । अचानक एहसास हुआ । इस दौरान नीतू वहाँ एक बार भी नहीं आई जबकि दूसरे दिन अब तक वो एक तो चक्कर तो मारी जाया करती थी । मैंने प्रयोगशाला के चौदह दरवाजे के पार दूर तक देखा । उन्होंने नहीं आई कुछ और गुजरात तो अजीब सी बेचैनी होने लगे । आज क्यों नहीं है किसी बात से कहीं नाराज तो नहीं है क्योंकि इस बात से कल छुट्टी के वक्त वो मुझे मिली थी, कुछ नहीं । मेरे दिमाग घोडे जितने दौडा सकता था । मैं उतना ही परेशान होता जा रहा था । मैं समझ नहीं पा रहा था कि मेरी परेशानी का आखिर कारण कौन था । प्रिया इसके लिए निकल परेशान था या फिर नीतु इसके लिए मैं आज परेशान प्रयोग का समय खत्म हो चुका था । मगर बेचे निगाहें दरवाजे पर अडी अब भी नीतू का इंतजार कर रही थी सैन्य प्रिया ने आवाज नहीं दरवाजे किसी पूछ रहे हो नहीं किसी को नहीं । मैंने प्रिया की और देखकर मुस्कुराने की कोशिश की मगर हंसी नहीं आई । लाइन पर चल रहे हो और गौरव का हाथ थामे हुए बाहर जाने के लिए तैयार करी थी हम लोग जा रहे हैं फॅमिली मैं आता हूँ मेरी नजर एक बार ऍम किसी का इंतजार कर रहे हो । मेरी और घूमते हुए रात में पूछा नहीं बस ऐसे ही ठीक है । फिर हम लोग जा रहे अपना ख्याल रखना । राज मेरे कंधे को धीरे से दबाया और आगे बढ गया । चौहान इसके साथ ही थी । उनके जाने के बाद में तो काफी देर तक वहाँ ठहरा रहा गर्मी तो नहीं आई । आखिर में उकताकर मैं वहाँ से निकल गया ।

मेरी अर्धांगिनी उसकी प्रेमिका - 13

लंच अपने आखिरी पडाव पर था । मैं नाश्ता करके कैंटीन से वापस लौट ही रहा था की एक का एक मुझे महसूस हुआ कि किसी ने मुझे आवाज दी है । मैं शहर का इधर उधर देखा । मुझे ऐसा कोई छात्र छात्रा नहीं दिखाई दिया जिसे देखकर मैं कह रहा था कि वो मुझे बुलाना चाह रहा है । मैं आगे बढ गया । साॅस मुझे पुराने ठहरना पडा इस बार लेकिन आवाज स्पष्ट थी मैं जरुर प्रक्रिया को खोजने लगा । इस तरह से वो यही थी जिसमें मुझे पुकारा था । किस्मत आज सब मौज उस पर मेहमान भी मैं पल भर ठहर कर कुछ सोचा फिर तेजी से उसकी और बढ गया था । प्रिया काॅपियों के पास खडी थी । आप के पास पहुंचा तो उसका चेहरा खिल उठा । वोटों पर गिरी गिरी से मुस्कराहट थी मैं उसका क्या लगता? ॅ पास की सीढियों की ओर इशारा करते हुए को बोली मेरी नहीं, उसके चेहरे पर टिकी रही । मैं बैठ गया तो होगी । मैंने पूछा तो लगाकर पलकें झुका ली और मेरा चक्कर काटते हैं मेरे बगल में अगर बैठ गई सच में आज मेरी किस्मत का कोई जवाब नहीं था । मैं नहीं झडों की प्रतीक्षा कर रहा था जो आज ही अचानक मुझे मिल गए । तुम कल प्रयोगशाला गए थे । पल भर की खामोशी के बाद वो बोली गया था यार मैं कल नहीं पहुंच पाई थी । सीढी के पास पडे कंकड को उठाकर दूर फेंक हुई । वो गोली मुझे अचानक घर जाना पड गया था । हाँ बारह ने बताया था । मैंने कहा तो एक बार फिर उसकी निगाहें मेरे चेहरे की और लौटे । शिवानी कह रही थी भावनाओं में खुद देखना नहीं थी । कल तुम परेशान परेशान नजर आ रहे थे क्या किसी का नहीं । मैंने चौकर पूछा शिवानी ने मुस्कराई नहीं नहीं ऐसी कोई बात नहीं । मैं अगला बडा हूँ । उसके लिए । बात कहने का तात्पर्य मुझे थोडी देर बाद समझ आया । मगर तब तक देर हो चुकी थी । पता नहीं ऐसी कमसे लडकियों को देखकर मेरे दिमाग को क्या हो जाता है? मुझे कहना चाहिए था आप क्या? मुझे तुम्हारी वाकई बहुत यहाँ जा रही थी तो फिर कहता तो देखने की बहुत थी तब भी कुछ हद तक चल जाता है । लेकिन मैंने उसकी बातों के बहाव को ही दरिया में प्रभाव कर दिया तो चुप हो गई । उसकी खामोशी देखकर साफ नजर आया था । मुझे अब मेरा कुछ नहीं हो सकता हूँ । मैंने सामने रखी पकवान की थाली वापस कर दी है । शिवानी कह रही थी कि उस ज्यादा देर तक खामोश नहीं रह पाई । मुस्कराकर बोले तो मेरे जिक्र पर कुछ खासी दिलचस्पी ले रहे थे तो मुझे लगता है ही नहीं सकती ऍम कुछ कहते कहते वो अचानक चुप हो गई । फिर मेरी आंखों में झांकते ही बोली एक बात बताओ मुझे वो लडकी लगती कौन है तुम्हारी? कौन? मैं बाकी उसके शादी को नहीं समझ पा वही जो हर रोज प्रयोगशाला में तुमसे मिलने आती है । अच्छा तुम नीतू की बात कर रही हो था । शायद उसने जो सरलता के साथ सवाल किया था क्या जवाब कितना था? दिल की मान लो तो उस वक्त में किसी भी हाल में प्रिया को खोना नहीं चाहता था । मुझे नहीं पता कि उसके सवाल का मैं क्या? जवाब तो कुछ देर तक मैं सोचता रहा । इस दौरान उसकी नजरें तक मेरे चेहरे पर टिकी रही । क्या हुआ मैं कोई मुश्किल सवाल तो नहीं पूछ लिया? नहीं तुम चाहो तो सवाल को स्किप कर सकती हूँ । ये विकल्प है तुम्हारे पास वहीं जो गौरव तुम्हारा लगता है । मैंने चुटीले अंदाज में कहा । मेरी बात सुनते ही उम्मीद के खिलाफ वो जोर से खिलखिला पडी । अगर हम कहे कि गौरव हमारे लिए सिर्फ मौज मस्ती करने का माध्यम मात्र है तो तो फिर कुछ ऐसा ही नहीं तू के बारे में समझ लो सब लोग वो हमारी सबसे अच्छे वाले दोस्त है जिससे संजय उसे शरारती नजरों से देखा । मेरी और काफी दिलचस्प इंसान मालूम पडते हैं । वैसे मुझे तुम्हारी जैसे आधुनिक सोच रखने वाले लडकी पसंद है । दोस्ती करोगे बच्चे सहसा उसे मेरी और अपना हाथ बढा दिया । मैंने भी मुस्कुराकर हम लिया ।

मेरी अर्धांगिनी उसकी प्रेमिका - 14

वक्त तेजी से गुजर रहा था । अब तक प्रिया मेरे काफी करीब आ गई थी । एक समय तक हम गौरव अथवा नीतू की कम ही परवाह किया करते थे । एक बात के दौरान प्रिया ने मुझसे कहा वो भी कुछ दिनों तक गौरव से संबंध नहीं तोड पाएगी क्योंकि अभी उसे गौरव की जरूरत है । उसकी गाडी के सहारे आना जाना था । उसका मैंने भेज उसकी इस अपील को स्वीकार कर लिया । मैं जानता था कि गौरव ही एकमात्र शख्स है । उसके आने जाने के लिए अपनी गाडी मुहैया कराता है । मैं बेहद आधुनिक और खुले विचारों वाला इंसान था । मुझे किसी पर पाबंदियां पसंद नहीं थी । चाहे वो दोस्त हो, कल फ्रेंड हो या फिर पत्नी । उस दिन प्रिया बहुत खुश नजर आ रही थी । मुलाकात होते ही वह मेरा हाथ पकडी और मुझे कैंडी लेकर चली गई । मेज पर बैठते हैं, उस करके नहीं लगी । मुझे तो एक रहस्य की बात बताऊँ ऍम मैं चौका तो हस कर कहने लगी तो तुम राज को जानते हो । राज्य ॅ उसकी और देखा । अरे वही जो हमारे साथ प्रैक्टिकल क्या करता है? क्या कॅश छेडा फेरे नहीं यार मुझे होते हुए मेरी और देखा बोली गौरव के अलावा एक लडका और रह करता है ना सीधा साधा गंभीर का लडका हो, वो राज की बात कर रहे हो तुम और नहीं तो क्या बहुत पडी । इसलिए दिनों तक राज के साथ मैंने प्रैक्टिकल किया जरूर था, मगर उस दौरान मुझे एक बार भी कभी हस्ते हैं, मुस्कुराते हुए नहीं देखा । अगर कभी उसके होट खोलते भी थे तो प्रैक्टिकल से जुडे सवाल जवाब को लेकर वरना बस चुप्पी और चुप्पी । उसे दुनियादारी से कोई मतलब नहीं था । हालांकि वह भले ही मेरा बहुत खास दोस्त ना रहा हूँ । उधर अच्छा दोस्त जरूर था । कई बार मुझे उसकी ऐसी छुट्टी पर बहुत गुस्सा आता था । जाॅब प्रिया का गंभीर चेहरा मेरे कानों तक चुका है । कुछ हो जाते हुए बोली मिस्टर राज शिवानी को पसंद करने लगे हैं । यहाँ उसकी बात कानों पर पडी तो मैंने चौंकने का नाटक किया तो तू सच कह रही हूँ और नहीं तो क्या वो धीरे समझ कराई? मैंने खुद अपनी निगाहों से कई बार राजको शिवानी के और छुट्टी छुट्टी नजरों से निहारते हुए देखा है तो शिवानी भी पता नहीं अपना नाखून को देखते हुए बोली । मैंने शिवानी से कभी इस बारे में पूछा तो नहीं लेकिन उम्मीद तो यही है कि शिवानी थी उसे पसंद करती है तो हरी दोनों दोस्त है । उत्तर पूछना उससे मुद्देपर दिलचस्पी दिखाते हुए कहा ठीक है पूछ होगी नहीं नहीं ऍफ पडा उठा प्रिया ये ठीक नहीं तो उसे ऐसा कुछ पूछता हूँ तो वहीं से बुरा लग सकता है । मैं खुद रात से पूछ लूँगा । प्रिया अपनी तर्जनी को मुंह में दबाए हुए मेरी तरफ घूरने लगे ।

मेरी अर्धांगिनी उसकी प्रेमिका - 15

अगले दिन जब मैंने राजको लंच साथ करने का प्रस्ताव रखा तो बगैर किसी नानुकर के उसने स्वीकार कर लिया था । हालांकि उसकी जिंदगी में मेरी इतने दिलचस्पी को पागल पर नहीं कहा जा सकता है । परंतु दोस्त था मेरा । मैं करता भी क्या, बगैर पूछे दिल को चयन ही नहीं मिल पा रहा था । हम दोनों कैंटीन की मेज पर थे । मैं देर तक राज को इधर दूर की बातों में उलझाए रखा क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि वो इस बात पर गौर कर सके । उसे मैंने सिर्फ इसी उद्देश्य से आमंत्रित किया था । इस दौरान मैंने उससे अपने और प्रिया के संबंधों के बारे में भी ढेर सारी बात देगी । जब मैं पूरी तरह से आश्वस्त हो गया की अब मैं उससे शिवानी के बारे में पूछ सकता हूँ । मैंने कहा राज्य मुझे तुम्हारी निजी जिंदगी में दखलंदाजी करने का वैसे कोई हक नहीं है । लेकिन फिर भी दोस्त के नाते गुस्ताखी करना चाहता हूँ । वो अर्थपूर्ण निगाहों से मेरी और देखने लगा है । तुम बताओगी क्या तुम शिवानी को अभी भी सिर्फ दो समझते हो । यहाँ बात कुछ आगे इलाहाबाद को घुमा युवराज सीधे गुस्ताखी की मैंने बात आगे भी बडी का मतलब वो हैरान नजरों से मेरी और देखने लगा । शायद उसे कम से कम उस वक्त मुझसे ऐसे सवाल की उम्मीद नहीं थी । मतलब कभी उसके सब कुछ किया । यहाँ मेरे सवाल उसे कानों पर पडा तो अनायास ईको हंस पडा । संजय उनके सच में यही सवाल पूछना चाह रहे हो तो शायद हाँ शायद तो मुझे बता सकते हो कि ये सवाल तुम्हारे मन में आया कैसे? एक उसके चेहरे से हंसी गायब हो गए । पता नहीं बस योगी जुबान पढा गया मेरे दोस्त ऐसे सवाल जो भी जुबान पर नहीं आती तो ऐसा नहीं लगता कि ये कुछ ज्यादा ही व्यक्तिगत सवाल है, खासकर एक लडकी के लिए जो मेरी बहुत अच्छी दोस्त भी है । नहीं राज मेरा मतलब बिल्कुल नहीं था मुझे वाकई आपकी अफसोस संजय हमारे सवाल पर एक हाईकोर्ट कर खडा हो गया । आज उसकी ऐसी प्रतिक्रिया पर मैं हैरान उठा चलता हूँ । मेरी बात बीच में काटते ही वो तीव्रता से निकल पडा । मैं असहाय से उसके लौटते हुए कदमों को देखता रहा । मैं भारी मन से मेरे से उतना ही वाला था कि एक एक सामने पडी पुर्सी सर की प्रिया धाम से बैठ गई । क्या हुआ ऍम उसके और मेरे कानों से टकराई जरूर मगर मैं थोडी देर तक यही समझने की कोशिश करता रहा कि एक आएगा ये तूफान की डर जाया हूँ तुम ही नहीं थी क्या? मैंने पूछा फॅमिली तो सब छोडो, ये बताओ । राज ने कुछ बताया । मैंने प्रिय कुछ घटना के बारे में बताया तो वह जोर से हंस पडे । मुझे मालूम था कि राज कभी नहीं बताएगा । अरे उससे ज्यादा उम्मीद तो मैं शिवानी से करती हूँ तो मैं मुझे मना क्यों नहीं किया था? जबरदस्ती की बेइज्जती करवा बैठा मैं और दोस्तो नाराज हूँ इस वो अलग मैं कैसे मना कर दिया । फिर तुम ही कहते हैं कि मैं जिद्द कर रही हूँ । वैसे तुम कहो तो मैं अब भी सीवानी से पूछ सकती हूँ, नहीं तो किसी से कुछ मत पूछो । न जाने वो भी इस बात को बाद में खुद ब खुद एक दिन सबको सामने आ जाएगा । नहीं आया तो नहीं आया तो नहीं आया । कहते हुए मैं उठकर खडा हो गया

मेरी अर्धांगिनी उसकी प्रेमिका - 16

कॉलेज छूटने पर जो भी प्रिया मेरे पास गई ऐसा नहीं तू मेरे सामने अगर खडी हो गई भरी भरी आके सूखे हूँ । गालों पर पाउडर को धोती हुई बनी धारियां मुझे साफ बता रही थी कि वह अभी अभी रो कराई है हूँ । ऍम पडा उठे उच्चतम छणों तक खामोश खडी रही मेरे चेहरे को और देखती रही उसकी निगाहों में शिकायत थी मैं भी चुप रहा । शायद अगले पल आने वाली उथल पुथल के लिए खुद को तैयार कर रहा था । सिंह जी ऐसा उसके होट खुले । आज मेरे घर चल सकती हूँ क्योंकि खास वजह नहीं । बस यही पहुंचना चाहिए । लेकिन उसके होठों पर हंसी नहीं आई । आंखे पानी की बूंदों से भर गई जिन्हें छुपाने की कोशिश में उसने अपनी पलकें झुका ली । मेरा दिल ऐसे धडका की जैसे अभी सीधे कोचीन कर बाहर आ जाएगा । उनसे आंखे चुराते हुई आपने स्कूटी की चाबी मरोड रही थी । स्कूल स्टार्ट हुई थी तो उसने भरी भरी निगाहों से मेरी और देखा । मैं उसकी नजरों की भाषा को समझ सकता । भाई बिना कुछ कहे उसकी पिछली सीट पर बैठ गया । स्कूटी सडक पर तीस दौडने लगी । फिर तेज पेस और हर पल स्कूटी की रफ्तार बढती जा रही थी । लगभग पंद्रह मिनट लगातार हवा की गति में दौडती हुई स्कूटी एक पतली लडकी और बडी उसी गति की तीव्रता एका एक से कम हो गई । गाडी खडी होते ही मैं स्कूटी से उतर गया । मैं भी ठीक से खडा भी नहीं हो पाया । लगभग पैंतालीस से पचास साल का एक अधेड इंसान हमारी और दौड पडा । तंबाकू से पीछे पडे दांतों को खोलते हुए को बोला तो बेटियाँ यही है संजय बाबू अभी तो कुछ नहीं कहा । उसने झुकी झुकी नजरों से मेरी तरफ देखा और फिर अधेड व्यक्ति की और बढते हुए जबरदस्ती हंसने की कोशिश की । हालांकि उस अधेड के मुझसे अपना जिक्र सुना तो मैं चौंक पडा । मुझे ये बात मानने के लिए विवश होना पडा की जितनी साधारण बात समझकर मैं नीतू के साथ चलाया हूँ दरअसल वो बात उतनी साधारण नहीं है । सिंह है अंदर आ जाऊँ । नीतू मेरी और देखकर बोली ईश्वर का स्मरण करते हुए मैं भीतर चला गया । उस वक्त मैं जब घर पर बैठा हुआ डायरी लिख रहा हूँ अगर उसके घर की खूबसूरती को कागज पर उतारना भी चाहूँ तो असफल ही रहूंगा । मैंने जैसे ही दरवाजा पार करते हुए घर के गलियारे में दाखिल हुआ तो मेरी आंखें फटी की फटी रह गई । मुझे लगा जैसे मैं गलती से किसी राजा रजवाडे के घर में घुस आया हूँ । मैंने खाली खाली नजरों से नीतू की और देखने लगा । आंखों को यकीन नहीं हो रहा था । ये साधारण सी दिखने वाली लडकी ऐसे घर में रहती है । आओ संजय नीतू पीछे मूर्ति भी बोली । अब तक हम कई गलियारे और बरामदे पार करते हुए गेस्ट रूम में पहुंच चुके थे । वहाँ मैंने नाश्ता किया । जंक्शनों तक ठहरे रहे । फिर नहीं तो बोली चलो मेरे कमरे में चलकर बैठते हैं । मुझे उसके साथ जाना पडा । वहाँ देर तक खामोशी छाई रही । इस दौरान कई बार मेरी निगाहें नीतु के चेहरे को खरोष्ठी रहे हैं । वो बहुत खामोश थी । वो अपने ही कमरे को ऐसे घूमती रही जैसे वहाँ पहली बार आई हो । बीच बीच कई बार उसकी आंखें भराई थी, जिन्हें जमाने की कोशिश में उसे हर बार अपनी पलकें झुका नहीं पडेगी । तो मैंने साहस करके उसे पका रहा । वो पथराई नजरों से मेरी और देखने लगी । तुम हो रही हूँ । मैंने पूछा नहीं मैं जानता हूँ तुम रो रही हो । क्या मैं इसका कारण जान सकता हूँ तो खुद हो संजय वो अचानक बिफर पडी । मैं सहम गया । एक बात बताओ कि संजय मेरी और झुक गई । क्या मैंने कहीं पढा था कि और इस प्यार पाने के लिए सेक्स करती हैं और पुरुष सेक्स करने के लिए प्यार की सच है? क्या? जी मुझे नहीं पता । उसकी अजीब से सवाल पर एकबारगी में हर बडा गया सोचने समझने की क्षमता लौटी तो बोला झूठ है । फिर प्रिया में ऐसा क्या है जो कुछ भी नहीं है? उसका अगला सवाल मेरे कानों में पडा तो मेरा शरीर एक एक शून्य बढ गया । मुझे यहाँ लाने का कारण अब मुझे समझ में आया । मैंने खुद को संभालते हुए कहा तो ठीक ऐसा प्रश्न है । क्या तुम ये कहने की कोशिश कर रही हूँ कि मैं प्रिया के साथ नहीं? संजय मैं नहीं जानती मैं क्या कहने की कोशिश कर रही हूँ । बस तू मुझे इतना बता दूँ कि प्रिया में ऐसा क्या है जो जिस सवाल उचित नहीं है नहीं तो क्यों? संजय उसके सूखे होठों पर रोक ही से मुस्कान फट पडेगी तो जवाब जानते नहीं या फिर तीन नहीं चाहते । मुझे वाकई कुछ नहीं सूझ रहा था कि मैं उसके सवाल का क्या जवाब दो । मैं खामोश हो गया जब मैंने देर तक कोई जवाब नहीं दिया तो वह एकएक गडबडा कर सोफे से उठी । मैं कुछ समझ पाता उससे पहले बडी निर्दयता से उसने अपनी कमी से निचले छोड को पकडा और उतारकर से फर्श पर फेंक दिया । कुछ सेकंड में अचानक घटी इस घटना पर मैं कहाँ गया? करता कीजिए वो लडकियां अकेले कमरे में आपके सामने एक कपडे उतारना शुरू कर दे और वो भी ऐसे हालात पर भूति हुई । क्या गुजरेगी आप? उस वक्त घर से मैं कांपने लगा । मेरा दिमाग अपाहिज और शरीर संवेदनहीन हो गया । मेरे नजरिए जमीन परदर्शी जा रही थी । अनायास ही नहीं तू मेरे एक दम करीब आ गयी । मेरी थोडी को अपनी उंगलियों के सहारे ऊपर उठाते हुए बोली संजय इधर देखो मेरे बदन की और क्या नहीं है मुझे अगर जरूर से कपडों को छोड दिया जाए तो लगभग वह अर्धनग्न थी । अपनी बात को आगे बढाते हुई बोली तो इतनी नाजुक अंगों के दीवाने हो ना उसने अपने स्तनों की ओर इशारा क्या उसकी आंखों से आंसू टपक पडे । इन्हें छूकर देखो । संजय यह पे ऐसे कमरे में ही है । हाँ बस पर कितना है उसमें अपनी पलकें झुका लिया । वो हर पल तुम्हारी नजरों के सामने होते हैं और इन्हें देखने के लिए तो मैं पर्दा हटाना पडेगा क्योंकि ये पर्दे में होते हैं । मीरा के मारे उसके आवास केले में फसलें लगे । उसने जबरन मेरे हाथों को खींच कर उन पर रख दिया । छूकर देखो संजय होगी । मैं बर्फीले स्पर्श महसूस कर पाया । मेरे मस्तिष्क अत्तार तार झनझना उठा । मुझे लगा उस स्पष्ट है जैसे इकाई मुझे उस पागलपन के समंदर में फेंक दिया हो । जहाँ देर तक मैं डूबता उतराता रहा । सोचने समझने की क्षमता लौटी तो मैं तीव्रता से अपने हाथ समझता हूँ । खडा हो गया । एक क्या पागल पर नहीं, तू सिंह है तो मैं अभी पागल पर लगता है । फिर प्रिया क्या करती है? उसी पागलपन होंगे । पीडा और स्कूल का मिला जुला भाव उसके चेहरे पर दिख रहा था । उसकी आंखें तीसरी भराई की शायद मुझे साफ साफ देख भी नहीं पा रही होगी । तुम समझते हो मैं अपने दामन की नुमाइश कर रही हूँ तो हाँ संजय कर रही हॅू या फिर कहूँ कि करना पड रहा है । तो संजय अपनी बात जारी रखते हुए बोली मैं था पैसों के बीच पली बडी जरूर हूँ मगर अपने माँ बाप के इस बडप्पन को मैंने अपने दामन के बीच कभी नहीं आने दिया । मेरा दामन आज भी मेरे लिए ऊपर वाले कर दिया हुआ सबसे कीमती तोहफा है । जिसे मैंने नुमाइश का सामान नहीं समझा । इसे आज तक संभाल कर रखा हुआ है । क्यों? शायद ये मैं तो मैं समझा नहीं पाओंगे मगर संजय कभी फुर्सत मिले तो सोचना जरूर । मैं नहीं जानती कि तो मेरी इस हरकत का क्या मतलब निकाल होगी । शायद ये कि मैं तो मेरी जाने की कोशिश कर रही हूँ या फिर ये कि मैं बनावटी आंसू और अल्फाजों का सहारा ले रही हूँ । लेकिन संजय सफाई देने में कोई बुराई नहीं है इसलिए बता रही हूँ जिंदगी में आज ही पहला मौका है जब मैं किसी को इस हद तक अपने करीब लेकर आई हूँ, जानती हूँ हूँ । उसने फर्श पर पडे दुपट्टे को अपनी और खींचते हुए बोली क्योंकि मैं तो बताना चाह रही थी कि मैं भी वह सब कुछ दे सकती हूँ जिसको पाने की लालसा में तुम प्रिया के आगे पीछे भाग रहे हो । तुम चाहूँ तो मैं भी प्रिया की तरह तरह कपडों का सहारा ले सकती हूँ । उसमें लंबी सांस खींचे । संजय मैं प्यार करती हो तुम से कहते हुए वो उसी हाल में मुझसे चिपक है । उसकी आंखों से दपत्ति पानी के मुद्दे देर तक मेरे कंधों को भी होती रही । उसके वजन की कडवाहट से मेरा बदन आपने लगा पी तो मैंने आवाज चलो अपनी कभी इस पहनो अच्छा नहीं लगता है और वैसे भी काफी देर हो गयी है । वहीं तुम्हारे मम्मी पापा ना आ जाए । तू धीरे समझ से अलग हुई । तिरछी झुकी निगाहों से मेरी और देखी और लगभग कर उसने अपनी कमीज उठा ली । कमीज पहनकर बोली मैं नेता घर पर नहीं है तो आप घर पर नहीं है । मैं चौक पडा तो क्या तुम नहीं संजय मेरी बात को बीच में ही कर दी । बोले तो मुझे गलत मत समझना । मैं पापा को फोन करके बता चुकी हूँ कि मैं संजय को लेकर घर आ रही हूँ । घूमने के बहाने मम्मी और पापा दोनों बाहर चले गए हैं मेरी खातिर मगर क्यूँ ताकि तुम मेरे घर में असहज महसूस करूँ । किसी को भी हैरत में डाल देने वाले उसके शब्द मेरे कानों में टकराया तो मेरी हैरानी सातवें आसमान पर पहुंच गए । मैं देर तक उसके चेहरे की और ने हफ्ता रह गया । मुझे कि नहीं हुआ कि दुनिया में ऐसे भी माँ बाप हो सकते हैं जो भी जवान बेटी को इस हद तक छूट दे रखी हो जबकि उन्हें पता है कि मैं उसके लिए अजनबी हूँ और मौके का फायदा उठाकर उनकी बेटी के साथ कुछ भी कर सकता हूँ । शायद जिंदगी भर भारत होने वाली घिनौनी हरकत भी नहीं तो मुझे मना नहीं कर पाती । इन तमाम पलों के बाद भी मैं लगभग आधा घंटे वहाँ ठहरा रहा । उस दौरान भी तो कई बार मुझे को देरी रिछाई । तेवर ढीला नहीं पडा तो समझाने लगे अपने आखिरी सवाल पर आते आते हुए पर फिर रो पडी थी उससे और पीडा के मिले जुले स्वर में कहने लगी हूँ मान लेती हूँ कि तुमने मुझे कभी प्यार नहीं किया, लेकिन मैं करती हूँ बे पनाह करती हूँ । उसका क्या? क्या उसके कोई मायने नहीं है? हमें कुछ नहीं कहा । संजय खामोश मत रहो बोलो । कुछ देर तक मेरी आंखों में अपने लिए प्यार तलाशती रही । थोडी देर बाद मैं उस पर चल पडा तो वो भी मेरे पीछे पीछे बाहर तक आ गई । वो ढेड अब भी गेट पर ही बैठा था । हमारे कदमों की आहट सुनकर खडा हो गया । इस बार उसने तक जिन्दा मुंह नहीं खोला । बस फटी फटी निगाहों से मेरी और देखता रहा । चलता हूँ गेट के बाहर आकर मैंने कहा मैं, मैं, मैं चलो के तुम्हारे घर तक तो मैं छोटा हूँ । आपने सूख चुके होटों पर उसमें हंसी बिखेरने की एक नाकाम कोशिश की । नहीं मैं चला जाऊंगा । इतना कहकर मैंने आखिरी बार उस हवेली की और देखा । इसके दी तू इकलौती वारिश थी ।

मेरी अर्धांगिनी उसकी प्रेमिका - 17

अगले दिन जब मैं कॉलेज पहुंचा, मेरे अंदर अजीब सी घबराहट थी तो मैं क्या करुंगा अगर मेरे सामने नीतू आ गई या फिर इसलिए कि लंच होने वाला है । मगर अभी तक वो कहीं नजर नहीं आई । कहाँ और किस हाल में होगी वो? एक दिन पहले उसके घर में घटी घटना रह रहकर मेरे दिमाग की नसों में सावन कि बिजली की तरह कौन रही थी । पता नहीं उसके घर से मेरे लौटने के बाद उसने खुद को कैसे संभाला होगा । अध्यापक आए, लेक्चर दिया और चले गए । अगर मैं अपनी उलझनों से बाहर नहीं निकल पाया । मुझे याद नहीं उस दिन प्रिया ने मुझे कितनी बार झकझोरा और फिर नाराज होकर चली हो गयी । आज कल वो मेरी इतनी परवाह क्यों क्या करती है? फिर मुझे हुआ क्या था मैंने उस की परवाह क्यों नहीं शाम कि छुट्टी के वक्त मैं डेढ तक कॉलेज के गेट पर नीतू का इंतजार करता रहा हूँ । शायद वो आएगी । मगर साथ ही इस बात पर परेशान तक कहीं सामने आ गई तो घडी के दौर कि स्टूडियो के साथ वक्त हवा की रफ्तार से रहता रहा । इस दौरान कईयों ने आकर मेरे कंधे पर हाथ रखा । कुछ कहा फिर हाथ मिलाया और कल मिलने के वायदे के साथ वहाँ से चले गए । मुझे याद नहीं कि उन हाथ मिलाने वालों में प्रिया थी भी की नहीं । कुछ ही मिनटों में गेट पर कदमों की चहलकदमी धीरे धीरे हमने लगी और साथ ही मेरे दिल की धडकन भी । अरे संजय इस वक्त उमिया अचानक किसी ने पीछे से मेरे कंधे पर हाथ मारा । मैंने पलट कर उधर देखा मगर उसका चेहरा नहीं पहचान पा रहा था । थोडी देर तक मेरी बदहवासी को एक तक देखता रहा । बहस कर बोला आज घर नहीं जाना गया नहीं मैंने कहा और एक और फिर उसकी और पीठ करके खडा हो गया । मेरी हरकत पर वो थोडी देर तक हैरान नजरों से मुझे देखता रहा और फिर मेरा चक्कर लगाते हुए मेरे सामने आकर खडा हो गया । गुलाब हमारे यार उन्होंने पहचान नहीं पा रहे हो या कोई नशा वशा कर रहे हो । अरे हम तुम से कुछ पूछ रहे हैं क्या पूछ रही हूँ मैं उसे झडते हुए दो कदम पीछे हटा अगर उस दौरान मेरी नजरें उसके चेहरे पर जाते कि मेरे दिमाग की शिखर पड चुकी नसों में जैसे एक का एक चेतना लौट पडी हो । हैरान होते हुए बोला जयसिंह, तुम और यहाँ अच्छा पहचान गए । वही जी करके हस पडा । लेकिन तुम अभी यहाँ क्या कर रहे हो ना? यही तो हम तुम से पूछ रहे थे कि तुम अभी तक यहाँ क्या कर रहे हो? मेरा तो प्रैक्टिकल था जिसमें एक लडकी की वजह से देर लग गई । लडकी की वजह से ही पूछ लिया हाँ आया प्रयोग में वो मेरी ही टीम में थी, सुना है उसने भी आज से कॉलेज छोड दिया है और एक तो पहले से ही नहीं आ रहा था । अब ऐसे में हम दो लोग ही बचे हैं जिससे प्रयोग ने देर लग गई । अच्छा मैंने उसकी कहानी पर कुछ खास दिलचस्पी नहीं दिखाई । उसकी और हाथ बढाते हुए बुला सिंह मैं अब निकलता हो गया । ठीक है कहते उस ने मेरा हाथ थाम लिया । मैं उस से हाथ मिलाकर भी दो कदम भी आगे नहीं बढा था की एक मेरा दिमाग ठंडा उठा । मैं तेजी से उसकी और पालता उसका आवाज भी तो ठहर गया । उस लडकी का नाम क्या है? मैंने खबर ही आवाज में पूछा और जिले की उसने हैरानी मेरी और देखा वही जिसने आज कॉलेज छोड दिया है । नीतू जायसवाल ऍम अच्छा मैंने धीरे से कहा और जिस तेजी से पलट कर लौटा था, उसी रफ्तार से पीछे हो गया । मगर दो कदम चलते ही ऐसे लगा जैसे किसी किसी ने मेरे पैरों पर पत्थर बांदिया हूँ । कदम इतने भारी हो गए संजय उस दौरान जयसिंह ने मुझे कई बार आवाज लगाई, मगर मैं सुन नहीं पा रहा था । मैं नहीं रोका । उस दिन बहुत मुश्किल से मैं अपने कमरे पहुंचा तहक मेज पर फेंका और बिस्तर पर निढाल लेट गया । मैं समझ नहीं पा रहा था कि इस हालत में क्या करूँ । प्रिया मेरे जहन में इतने भीतर तक समझ चुकी थी कि मैं चाहकर भी उसमें नीतु के लिए जगह नहीं बना पा रहा था । हालांकि ये भी सच था । मैंने उसका दिल तोडा था । मगर क्या ये नया संगत है कि उसके दिल को सुकून पहुंचाने के लिए मैं अपना दिल तोड हर के सही अगर ये खुदगर्जी है तो यही चाहिए । मेरी आंखों के सामने सिलिंग पर लगा पंखा भर भर करता हुआ घूमने जा रहा था और मेरी भावनाएं किसी फुटबॉल की तरह उससे टकरा टकराकर खुद को लहूलुहान किए जा रही थी ।

मेरी अर्धांगिनी उसकी प्रेमिका - 18

वक्त आहिस्ता आहिस्ता गुजरता गया और वक्त के साथ ही नी तूने मेरे लिए अपना भविष्य दांव पर लगा दिया । इस बात की चुभन धीरे धीरे कम होती चली गई और जो कसर बची उसे प्रिया के साथ नहीं पूरी कर रही है । उस दिन जब एक बार प्रिया ने अपना टिफिन मुझे ऑफर किया तो मैं दिन भर गया । लाख जताते हुए बोला प्रयास तो मैं नहीं लगता कि हर रोज ऍम खाना मेरी बदनामी का कारण बन सकता है क्या? क्या कहा तुम्हें? कोई कर घूरकर मेरी और देखिए जरा पैसे का हूँ, मैं पास पडा । मेरा मतलब था तो रोज मेरे लिए यू टिफन लाती रहोगी । तब तो न जाने और कितने सीनियर छात्रों और टीचर्स की निगाहों में मैं आ जाऊंगा । ऐसे भी कुछ सीनियर छात्र मुझे पसंद नहीं करते । नहीं जानती हो ना नहीं विश्व पसंद क्यों नहीं करते हमारे चक्कर में मैं उन्हें लगता है तुम्हारी जैसी खूबसूरत लडकी मेरे साथ नहीं होनी चाहिए । ये सब तो ठीक है जहाँ बूझकर वो छोटी बच्ची थी । अलर्ट बनते हुए बोली मगर फील लाने से ऐसा कौन सा पहाड टूटने वाला है? हरे खाना ही बुला रही हूँ जो अपनी मेरी वैसी है । इस से किसी को क्या मतलब बडी बुद्धू लडकी हो तो तो हरी समझ में ना कुछ नहीं आता । दुलार करते हुए मैंने कहा प्रिया हर जगह हमारी मर्जी नहीं चलती है । हमारी व्यक्तिगत पहचान जरूर है मगर हमें समाज का हिस्सा भी हैं । इसलिए उसके बारे में भी सोचना पडता है । हमने कभी गौर किया जब मैं तुम्हारे साथ चलता हूँ । पता नहीं कितनी घूरती हुई निगाहें हमारा अच्छा करने लग जाती हैं । इससे तुम्हें क्या फर्क पडता है । टिफन का ढक्कन खोलते हुए वो बोली मुझे तो नहीं पडता हूँ मैं । बस एक बात जानती हूँ कि यहाँ कमी सबकी गन्दी है । इसलिए पर वहाँ मत करूँ और लोग तुम खाना खाओ । जबरदस्ती उसने मेरी और टिफिन बढा दिया । कई दिन गुजर गए । मैं कैंटीन नहीं गया । प्रिया ने चेतावनी दे रखी थी कि आपसे कैंटीन की सडी गली चाओ । मैंने डोसा पर हर हो । मुझे उसके घर का ताजा खाना खाना होगा । संजय खाते खाते ही एकाएक उसे कुछ याद आया । मेरी और देखकर बोली शायद मैंने तो मैं एक किस्सा नहीं बताया । पहुँचा रोटी जवाना बंद करके प्रश्न सूचक निगाहों से मैंने उसकी और देखने लगा मैंने तुम्हें बताया था ना कि राज और शिवानी के बीच कुछ तो है । वो बात बिल्कुल सही थी । इतने दिनों बाद एक है । कुछ पुरानी बात का जिक्र होते हुए थे । मैं चौक पडा । शायद तुमने गौर नहीं किया । बहुत बडे । जिस दिन तुम्हें राज को बुलाकर शिवानी के बारे में पूछा था उसके बाद से ही राज प्रयोगशाला आना बंद कर दिया था । याद है ना तो मैंने अर्थपूर्ण गांव से उसे देखा । मुझे पता है प्रिया राजनीति हरकत की वजह से प्रयोगशाला आना बंद कर दिया था । ये बात मुझे भी बताया है । आज उसने झल्लाने का अभिनय क्या बचा नहीं तो कहाँ गुम रहते हूँ । पहले मेरी बात तो सुनो । मैं कुछ और बताना चाह रही हूँ । ऐसा वो गंभीर हो गए और बोले जिस दिन राज पहली बार अनु पस्थित हुए थे, उस दिन छुट्टी के बाद एक नोट्स के सिलसिले में मैंने शिवानी से बात करनी चाहिए । जब मैंने उसके घर पर फोन किया तो लाइन पर उसकी माँ की मैंने फोन पर शिवानी को बुलाने को कहा तो कहने लगी या बेटी? आज कॉलेज में शिवानी से किसी का झगडा झगडा हो गया था क्या? क्यों नहीं इस सवाल पाॅलिसी होकर बोली पता नहीं क्यों आज शिवानी जब से कॉलेज से लौट कराई है बस अपने कमरे में बडी रोई जा रही है । पूछती हूँ तो कुछ पता भी नहीं रही हैं तो उसके रोने से तुम समझ गई की संजय प्रिया ने बीच में ही मेरी बात कार्ड मुस्कराते हुए बोली तुम बुद्धू कहते तो मुझे हो लेकिन वास्तव में हो तो जानते हो वो जोर से खिलखिलाई तो अब भी नहीं समझ पा रहे हो कि उस दिन शिवानी कॉलेज से लौट कर घर पर क्यों हुई? जबकि तुम्हें भी बता है और मैं भी जाती हूँ कि उस दिन राजकीय अनुपस् थिति के अलावा उसके साथ और कोई अस्वाभाविक घटना कम से कम कॉलेज में तो नहीं ही घटी थी जिसके लिए वो घर जाकर यू बेहाल होकर रोती हो सकता है । कुछ हुआ हूँ जिसके हमें जानकारी न हो बुद्धू उस दिन वो लगभग पूरे दिन मेरे साथ थी और दूसरी बार अगर इसके अलावा और कोई बात होती है तो क्या वो की माँ से कहना देती उसकी बात सुनी तो मैं पल भर के लिए आवास रह गया तो फॅस मैंने कहा और नहीं तो क्या एक उसकी आंखों में चौका आ गई तो प्रिया तो मैं पता है कि आजकल राज कॉलेज क्यों नहीं आ रहा है । कैसे वही वजह है जिससे वह प्रयोगशाला नहीं आ रहा है या फिर बात कुछ और ही है । तुम से किसी ने कहाँ वो कॉलेज नहीं आ रहा है । मतलब राज कॉलेज जाता है, इन फॅर ओ जाता है लेकिन वो अब हमारी ब्रांच में नहीं तो सिविल में उस घटना की तीन तीनों बाद ही उसने अपने ब्रांच बदलवा दी । उस ने खाना जवाना बंद कर दिया । मैंने झुककर बोले क्या तुम भी सिच् में पता नहीं था? नहीं मैं अचानक उठकर खडा हो गया प्रिया तुम्हें उसका सेक्शन पता है नहीं मगर तुम यूट कर जहाँ कह रही हूँ माफी मांग किया । रात से तुम पागल हो? हाँ नहीं, पता नहीं मगर मुझे अपनी गलती के लिए माफी मांगनी चाहिए । बहुत मुश्किल से हिम्मत जुटा रहा हूँ । तीस मुझे मतलब वो ठीक है पर खाना तो अपना खाते जाऊँ । मेरा पेट भर गया है । मैं जल्दी जल्दी अपना ब्लॅक में अपना हाथ पहुंचते हुए वहाँ से निकल गया । मेरी वजह से नीतू कॉलेज ही नहीं बल्कि पढाई छोड दी । राज अपना पूरा लक्ष्य बदल दिया और शिवानी मैं बहुत खुदगर्जी नहीं बोल सकता । लाॅन्च पहुंच गया । रात साम नहीं था । मुझे दूर से देखते ही वो हाथ उठाकर हवा में लहराया । मैं लगभग दौडता हुआ जाकर उसके सामने खडा हो गया । ऍम मुस्कराया आई कैसे हो ठीक हूँ मैंने जबरदस्ती मुस्कुराने की कोशिश ऍम उसने कहा मैं बैठ गया । कुछ देर तक हम खामोश रहे । शायद इसलिए भी बात शुरू करने का हमारे पास कोई ठोस मुद्दा नहीं था । राज्य जब देर तक खामोशी नहीं टूटी तो मजबूरन मुझे बात छह नहीं पडेगा । मैं उस दिन के लिए माफी मांगने आया था । अपनी गलती के लिए मैं शर्मिंदा हूं । बीज मुझे माफ कर तो हर है नहीं यार, कोई दोस्त से भी माफी मानता है । नहीं राज्य ऍम शर्मिंदा हूं । संजय उठकर खडा हो गया और बोला इतना भावुक होने की जरूरत नहीं है ना इस बात को कभी भूल चुका हूँ और फीस तुम भूल जाओ हो गया । ऐसे ही जैसे पुरानी रद्दी को तुम अपने घर से बाहर निकाल कर फेंक देते हो । तेरी वजह से तुमने अपने ब्रांच बदलने रुक रुक क्या था तो मैं वो ही का एक सूख गया । अपने दोनों हथेलियों को मेज पर रखते हुए लंबी सांस ली और बोला संजय मैंने ब्रांच तुम्हारी वजह से नहीं बदली तो उसके लिए दूसरी भी कई बजे हैं जिन्हें शायद मैं तुमसे नहीं बता पाऊंगा । नहीं उस की जरूरत नहीं है राज्य मैंने राहत की सांस हमारी इतनी बात सुनकर ही मेरे सर का बोझ काफी हद तक हल्का हो गया और सच कहूँ तो भूख भी जोरों की लगी है । कॅश तो के मुस्कुरा बडा

मेरी अर्धांगिनी उसकी प्रेमिका - 19

प्रिया और मेरी इतने दिनों की नजदीकिया एकएक यू टूट कर बिखर जाएंगे । मुझे यकीन नहीं हो रहा था । बात बहुत छोटी थी अपनी कक्षा की हर लडकी ने मुझसे नोट मांगे । वो भी उस दशा में जब हर और से निराश लौटकर भरी भरी आंखे लिए हुए मेरे सामने आकर खडी हो गई थी । पहले से नोटिस देने का वायदा कर दिया । जब ये खबर प्रिया को लगी तो उखड गई । कहने लगी नहीं तुम लोग किसी को नहीं होंगे । दरअसल वो नोट्स प्रिया के ही थे । काफी दिनों से मैं इस्तेमाल कर रहा था तो मैंने उसे अपने वादे के बारे में बताया तो चिंघाड बडी भाड में जाये तुम्हारा वादा । मैं इस मामले में जरा भी समझौता नहीं करेंगे । समझे हूँ अगर तुम्हें इतना ही शौकिन लडकियों की हमदर्दी बटोरने की तो पहले मेरी नोच मुझे वापस कर दो । फिर जो जी में आए करूँ जहाँ से पाओ पूरा करो अपना वादा उसके इस अनायास गुस्से पर पता नहीं क्यों मुझे हंसी आ गई थी । अखिल तुम एक नोट्स को लेकर इतना क्यों खट रही हूँ । अच्छा मैं ही हूँ उसको स्वर्ण और भी तीव्र हो गया । चलो मानती हूँ मैं उखड रहे हैं तो यही सही है मगर संजय तो उनसे बताए देती हूँ । तुम्हारी दूसरी लडकियों से हमदर्दी मुझे बिलकुल पसंद नहीं है । तुम चुप चाप मेरे साथ चलो मेरा हाथ पकडकर खींचने लगे । कहा कॅर कहा मुझे भूख लगी है और ऍम नहीं लाये । झूठ बोल रहे हो ना? हाँ झूठ बोल रहे लेकिन चलो यहाँ से उस वक्त मुझे जाना पडा । मगर अगले दिन वो लडकी जब एक बार फिर उसी हॉल में मेरे सामने आ खडी हुई । मैं उसे मना नहीं कर पाया । उसे नोट से दिए । ये बात जैसे ही प्रिया के कानों तक पहुंची, तूफान की रफ्तार से कक्षा में दाखिल हुए । मेरे बगल वाली सीट पर रखें । अपने बैग को उठाया और पीछे खाली पडी सीट की और बढ गई । हालांकि मुझे उम्मीद थी की ये खबर सुनने के बाद तो मुझ पर चिल्लाएगी शिकायत करेंगे और फिर भूल जाएंगे अगर यहाँ सब कुछ उल्टा पुल्टा हो गया । मैं थोडी देर तक बदहावास से देखता रहा पुरुष नहीं । बार भी मुझे मुझे नहीं मिला । अच्छा तो गुस्से में थी । थोडी देर बाद उसे रहा नहीं गया तो मैंने भी अपना बैग उठाया और जाकर उसके बगल वाली सीट पर बैठ गया । मेरे बैठते ही वहाँ से उठना चाहिए तो मैं उसका हाथ पकड लिया । प्रिया सुनो तो मुझे बात मत करो । उसमें तेजी से अपना हाथ झटका और चीखते हुए बोली और हाँ, अपनी गंदी जुबान से दोबारा मेरा नाम मत लेना । शोर सुनकर पूरी कक्षा हमारी और देखने लगे । मैंने धीरे सकता उठाया और कक्षा से बाहर निकल गया ।

मेरी अर्धांगिनी उसकी प्रेमिका - 20

उस दिन मैं बहुत परेशान था । छुट्टी के बाद भी घर जाने का मन नहीं कर रहा था । मैं टहलते हुए पांच ही बनाई । पार्क में घुस गया । दिसंबर की शाम थे । सूरज ढलान पर था । चारों और हल्की हल्की सी धूम छाई हुई थी । पार्क में इक्के दुक्के इंसान ही दर्ज टहल रहे थे । दिमाग नहीं है । प्रिया की चीज हुई तीस आवाज अब भी मेरे कानों में गूंज रही थीं । मैं किसी बदलाव आज की तरह लडखडाते हुए कदमों से चलता हुआ पार के बीचों बीच पहुंच गया । दिसंबर के आखिरी सप्ताह की जोरदार ठंड । शाम में भी मैं अजीब सी गर्मी महसूस कर रहा था । मैंने पाॅकेट उतारा और गुस्से में तेजी से पीछे की और छटक दिया यह क्या बदतमीजी है? किसी ने चिल्लाया साडे मैं तेजी से पीछे की ओर बडा ऍम उसके चेहरे पर जा गिरा था । आपको कपडों से फुटबॉल खेलने का शौक है तो पीछे देखकर खेलना चाहिए । कहती हुई उसमें तेजी से अपने चेहरे पर बडी जैकेट को खींचा । तू तो मेरे होटल बडा उठे । सामने दी तो खडी थी लेकिन मुझे सामने देखते ही अचानक उसका चेहरा पीला पड गया । हडबडाहट में बोली सॉरी मैंने आपको पहचाना नहीं कहती हूँ । वो तेजी से पीछे की ओर मुडी और लगभग दौडते हुए कदमों से वहाँ से निकल गई । नीतू मैंने आवाज भी नहीं मगर वो हवा की रफ्तार से मेरी आंखों के सामने से उधर हो गई । मैं कुछ नहीं कर पाया । लाचार घुटनों के बल वही जमीन पर बैठ गया । मैं कल आप फाडकर चिल्लाना चाहता था, लेकिन गली से कोई आवाज ही नहीं बस मेरी आंखें उबल पडेगी ।

मेरी अर्धांगिनी उसकी प्रेमिका - 21

दिसंबर आपने रेंगते कदमों से गुजरता हुआ लगभग आखिरी पडाव पर पहुंच गया और ये परीक्षाएं शुरू हो चुकी थी । उस दिन परीक्षा हॉल से निकलकर मैं जैसे ही बरांडे की और थोडा एक प्रिया मेरे सामने आ गई । मेरा दिल जोर से धडका जी में आया, नजरे घुमाकर निकल जाऊँ । लेकिन कमबख्त इन आंखों ने उस दिन तो खा दे दिया । नजर मिलते ही मैं मुस्कुरा बडा मगर उसके चेहरे में रूखापन बना रहा । वो बिना ठहरे ही वहाँ से चली गई । हालांकि इतने दिनों बाद अचानक उसे देख कर मेरे मुस्कुराने की वजह भी थी । मेरा पेपर काफी अच्छा हुआ था । मैं बेतहाशा खुश था तो भूल गया था कि कुछ दिनों पहले ही उसने पूरी कक्षा के सामने मुझ पर चिल्लाया था और फिर माफी भी नहीं मांगी । ऍम हजार था । आवाज उसके कानून में पडी तो ठहर गई । टेबल कैसा हुआ? मैंने पूछा । ठीक ही हुआ उसकी बेरूखी बनी रही तो महारा और अच्छा नस के बिल्कुल करीब पहुंच गया । अच्छी बात है कहती हुई वह एकदम पीछे हट कर खडी हो गई । शायद उसे मेरा इतना पास आना पसंद नहीं आया । उसकी निगाहें जमीन पर टिकी रही । हम अभी नाराज हूँ । मैंने हिम्मत करके पूछा क्यों अब क्या नया हो गया? उसकी नजरें एक छलांग लगाते हुए मेरे चेहरे पर आ जाएगी । नहीं मैं कुछ नहीं हुआ । बहुत दिन हो चुके हैं ना । इसलिए पूछ लिया कहकर वो चुप हो गई । उसका होना पडेगा । मैंने कहा मगर उसने छुट्टी नहीं थोडी सिंह जी इससे पहले मैं वहाँ से आगे बढने के लिए सोचता । उसने आवाज भी मैंने हडबडाकर उसकी और देखा क्या? तो अभी ये ही सोचती हूँ कि उस दिन तुमने जो कुछ भी किया वो सही था । पता नहीं वो थोडी देर तक अर्थपूर्ण नजरों से मेरी और देखती रही । फिर अचानक उसकी नजर घडी पर गई तो हडबडाकर बोली नहीं हूँ ।

मेरी अर्धांगिनी उसकी प्रेमिका - 22

वो इकत्तीस दिसंबर की दोपहर थी । पेपर छूट ही एक बार फिर ऍम प्रिया मेरे सामने आ गई । मैं नजर चुराने की कोशिश करता इससे पहले वो मेरी और बढते हुए चिल्लाई हाई संजय है हाय मैं ठहर गया पीपर कैसा हुआ? तुम्हारा ठीक हुआ है और तुम्हारा मेरे शब्दों में कल के उसके शब्दों की तरह देखो की बिल्कुल नहीं थी पाईं । उसने कहा हस्ती खिलखिलाती हुई एकदम मेरे करीब आगे उतने ही जैसे पहले आया करती थी । अचानक उसके व्यवहार में आया हैरान करने वाला था । इस वक्त जब घर पर बैठा हुआ डायरी लिख रहा हूँ तो सोच रहा हूँ की प्रिया जैसी मगरूर लडकी सिर्फ एक रात में इतना कैसे बदल सकती है । बोलता हूँ ठीक से बात भी नहीं कर रही थी और आज महीनों से बिक्री दूरी को चन्द छडों में समेटकर इतने करीब ले आई उस टाइम हमें पर फिर अतीत की तरह तीर तक इधर डर के बेफजूल बातें करते हुए हसते खिलखिलाते रहे । हम जब कॉलेज गेट पहुंचे तो एक बार फिर प्रिया नहीं गहरी नजरों से मेरी और देखा । लंबी सांसे भरी और बोली सिंह जी अब मैं चलती हूँ पैदल नहीं आॅक्सी से तो ट्रांसपोर्ट कार्ड कहा है । काॅल हाँ मैंने उससे बात करना बंद कर दिया है । क्यों? मैं काम पडा? वो छोडो कुछ बात हो गई है लेकिन बताओ तो मैंने जब की क्या बात हो गई थी कुछ नहीं हुआ था । बीस बताओ ना तो मुझे बात नहीं कर रहे थे । इसीलिए उसने शिकायत भरे अंदाज में मेरी और देखा तो प्रिया तुम सचमुच पागल हो । मैंने लाड जताते हुए कहा मुझ पर गुस्से की सजा तो न्यूज बिचारे को भी डाली तब क्या करती । अजीब सबूत बनाते हुए वो बोली तुमसे दूरिया और थोडी बढा नहीं थी उनसे दूरियां और थोडी बढा नहीं थी । उसकी जाॅन से टकराएगा तो चीरते हुए सीधे दिल तक उतारा गए । उस वक्त दिया को मैं आसमान में बैठा देना चाहता था । समझे मुझे खामोश देखकर वह बोल पडी तुम कहाँ हो गए कहीं नहीं ऍफ मिलने के लिए अपना हाथ बढाते हुए वो बोली शायद रोड पर आती हूँ टैक्सी उसने देख ली थी हर एक रुको तो मैं लगभग कर उसका हाथ पकडा । उसने भी टैक्सी को आगे बढ जाने दिया । क्या हुआ टैक्सी के झोंके से चेहरे पर आ गयी लडकों को संवारते हुए उसे मेरी और देखा । टैक्सी दूर निकल गई तो मालूम होना चाहिए था नया साल आज नहीं कल से शुरू हो रहा है । लेकिन मिस्टर शायद तुम्हें नहीं मालूम है कि कल से कॉलेज बंद हो रहा है वो भी अठारह दिन के लिए । दरअसल बात बात पर से मिस्टर कहने की आदत थी । बट हुए बोली और जनाब के पास फोन तो है नहीं कि हम फोन पर ही शुभकामनाएं देते, लेकिन तुम्हारे घर पर तो है था । मगर हमें ये भी पता है कि तुम तो हमारे घर पर वो नहीं करोगे । मेरे भाई से इतना डरते जो तुम्हारे भाई से जी हाँ मेरे भाई से बोलो जो गलत कह रही हूँ साहब, मैंने मुस्कुराकर अपनी सहमती जताई । अच्छा आप चलो तो तुम अब अठारह दिनों बाद मिल होगी । जी मजबूरी हैं क्या हम कल नहीं मिल सकते हैं । कल कॉलेज ऍम नहीं, नहीं बाहर बाहर कदापि नहीं । मिस्टर संजय वहाँ मचाते हुए बोली मुझे घर से बनवास लेने का शौक हुई है । अरे मम्मी पापा मुझे घर से निकाल देंगे । आज और मेरा भाई तो मुझे मारी देगा । अच्छा तो तुम भी अपने भाई से डरती हो । मैं बस पडा वो सब समझ भाई ही है ना । कहीं डॉन वाला भाई तो नहीं हैं, कभी मिलो से पता चल जाएगा कि कौन सा भाई है उसकी मर्जी के बगैर घर का एक पत्ता भी नहीं हिलता, बस करो यार । अब क्या मुझे डरा खरीदी होगी? वैसे भी मैं लडकियों के बाप से ज्यादा उनके भाइयों से लडता हूँ । क्यों एक द्वार चुके हो गया? नहीं मैं कुछ हकला पडा, अच्छे सुनो । एक बार फिर उसने मेरी और हाथ बढा । टैक्सी आ रही है मुझे अपनी करना है और हाँ खुशबू के घर वाले नंबर पर मुझे फोन करना ठीक है । खुशबू एक कंप्यूटर की छात्रा थी जिसकी पडोसी होने के साथ साथ उसकी अच्छी दोस्त थी । उसका नंबर उसने मुझे काफी पहले से ही दे रखा था । कभी लेट या फिर न पाने की दशा में मैं उसके घर के फोन पर कॉल करने की बजाय उसकी सहेली खुशबू के यहाँ ही फोन किया करता था । खुशबू से अब तक मेरी भी अच्छी खासी जान पहचान हो चुकी थी ।

मेरी अर्धांगिनी उसकी प्रेमिका - 23

नए साल कि वह ताजगी भरी सुबह थी । गलियों पर गुजर रहे लोगों के बीच ऍर की बधाइयाँ । मुझे बता रही थी कि नया साल सजाओं में दस्तक दे चुका है । सब कुछ पहले जैसा होते हुए भी नया नया सा लग रहा था और मैं अपने वायदे को कैसे भूलता । रात भर सपने संजोता रहा की मैं जाऊंगा, वो आएगी मिलेंगे, मुस्कराएंगे देंगे । और फिर तब एक का एक मेरा दिल धक चंदडा उठा । उसे कैसे कहूँगा कि मैं तो नहीं नहीं, नहीं नहीं पहले नहीं होंगा । दूसरी कहना होगा लेकिन फूल के पहले नहीं घुमा वो पता नहीं कौन पहले क्या करेगा? मैंने प्रस्तर पकड लिया । घडी की सुइयां धीरे धीरे से आगे बढ रही थी । मैं अपने खास मित्र के साथ उस पार पार पहुंच गया जहाँ पर आने के लिए उसने मुझसे वादा किया था । मैंने खडी की और एक बार देखा । साढे ग्यारह बज चुके थे और प्रिया का कहीं अता पता नहीं था । उसी ग्यारह बजे पहुंचना था । एक बार तो मेरी सारी उम्मीदें धूमिल होती नजर आएगा लेकिन मैं इतना निराशावादी बिल्कुल नहीं था । ये असहज भाव जिस तरह एका एक मेरे मन में उठे थे उसी तरह लोग हो गए । मैं अभी भी उसकी प्रतीक्षा के लिए तैयार था । एक बजे तक मैं वहाँ उसका इंतजार करता रहा । जब नहीं आई तो मनी मंदिर तडप उठा । एक बार तो लगा कि अपनी पाॅवरफुल निकालो और से मसल करते थे । एक दो मैंने जेब से फूल निकाला और देर तक उसे घुस जा रहा है । मगर मसलने की हिम्मत नहीं हुई । ग्यारह पर फोन मिला होगी कि अप्रिय को मैंने अपने मित्र से कहा तो वह बगैर किसी देरी के अपना मोबाइल निकाला । उसे नंबर पूछा डायल कर दिया । ऑनलाइन पर खुशबू थी हलो । मैंने कहा कौन? संजय जी उसकी आवाज की उत्तेजना बता रही थी । शायद उसे मेरे ही फोन का इंतजार था । हाँ, मैंने धीरे से कहा मैं आगे कुछ पूछना । उससे पहले वो कहने लगी डाॅॅ यही हैं । उसने फोन प्रिया को धमका दिया । हाई संजय फोन पर आते ही वह उस पडे तुम्ही नहीं मेरे स्वर में शिकायत थी । मैंने तो मैं कल अपने भाई के बारे में बताया था । याद है उसी की वजह से लेट हो गई थी । तो अब आर यू ना । मैंने जरा झल्लाकर पूछा हाँ मिस्टर आ रही हूँ, वहाँ पडेगा । शायद मेरी झल्लाहट का एहसास था । बस खुशबू के तैयार होने की देरी है को भी साथ लाने का इरादा है क्या? तो मैं क्या लगता है ना कि लिया होंगी उस भीड भाड में उसने फोन रख दिया । थोडी देर इंतजार कर दे रहे हैं अभी अचानक खूबसूरत बडी पार्ट के बॉर्डर से डेढ से दाखिल होते हुए हमारी और बडी उसके पीछे पीछे खुशबू थी मेरे सीने की धडकन का एक बढ गई मैंने जेब में बडे फूल को टटोला । अब तक हम बीस साल करते हुए खडा हो गया थाई संजय मुझे ही उसमें तुम से ही हाथ हिला भी अपने हाथ उठा दिया । इस दौरान मेरी निगाहें कुछ ऊपर भी थी । कॅश उसकी आवाज भी सुनी थी । आज पहली बार मेरे सामने आएगी । लोग आ गए हम प्रिया मेरे सामने आकर खडी हो गई । अभी ली और प्रिया सीमति उसका एक पीछे बढती हुई बोली संजय इससे मिल हमारी सबसे अच्छी दोस्त खुशबू आवाज तो कई बार सुना है तुमने आज मिल भी लो मैं उसकी और देखते हुए मुस्कराया, ॅ कैसे हैं मैं हूँ आप उसमें वोटों से कुछ नहीं कहा । पर सर को हिलाते हुए मुस्कुरा पडी । थोडी देर घर घर देखता रहा । फिर अचानक घुटनों के बल बैठते हुए अपनी जेब से फूल निकाला । अब दुनिया की और बढा दिया तो मुझे पूरे हूँ क्यों? उसने गहरी गहरी निगाहों से मेरी और देखा । रुको रुको संजय पहले तुम खडे हो जाओ हो गया आप बोलो कहीं ऍम चक्कर तो नहीं है ना? हाँ संजय अगर ऐसा है तो ये सब अपने दिमाग से निकाल तो उसके बिना मेरी बात सुने हुए अपनी बात जारी रखी है । ऐसा कुछ नहीं होने वाला । मैं तुम्हारी दोस्त यार सिर्फ टू कहती हूँ मेरे चेहरे तक जो भाई मैंने खाली खाली नजरों से उसकी आंखों में देखा तो चुप चाप वीरान खडी थी । मेरा दिल कांच की तरह टूट कर बिखर गया । मैं लडखडाते हुए पांच ही कुर्सी पर बैठ गया । इस दौरान मेरी नजरे खुशबू की और भी गई । उसके चेहरे पर हैरानी थी संजय वो मेरी और बडी और बोली तो लडकियों को सिर्फ प्रेमिका के रूप में ही देखना पसंद करते हो । दूसरी तुम्हारे लिए कोई मायने नहीं रखती है । मैं प्रिया तो फिर ये फूल ये घुटनों पर बैठा है कि सब क्या है । वो मेरे चेहरे तक झुकाई होली वैसे संजय तो मैं एक बात बताओ के कुछ हो तुम्हारे अंदर ये सब कब से पढ रहा था क्या? हाँ प्लीज सच है तो मुझे बनाने की कोशिश मत करो । तुम जानते हो मैं क्या पूछ रही हूँ । मुझे याद नहीं है । अरे धीरे से कहा ॅरियर लेकिन मेरी आवाज का कम्पन बढ गया । मैं कुर्सी से उठकर खडा हो गया और बोला एक बात बताओ मेरी और देखने लगी । खतम नहीं जानती थी कि नीतू और मेरे बीच किया था और उसे मैंने क्यों छोडा नहीं । प्रिया छूट मत बोलो । देखा एक मेरे स्वर में कुछ भी खबर हो गया । उन सब कुछ जानती थी ये भी कि उसने मेरे खातिर कॉलेज भी छोड दिया है । हाँ जानती थी मुझे यूट्यूब करते देखा तो वह घर आ गई । तो तुम ये भी जानती होगी कि मैंने उसे तुम्हारे लिए छोडा था और तुमने सबको जानते हुए भी मुझे मना नहीं किया तो उस तो तब भी बनी रह सकती थी । मैं मना करती है उसके स्वर में पडता है । सही कह रहे हो उनको मना करते हैं । नहीं ये वाली मुझसे दोस्ती जो करने के लिए मैं विफल । बडा कुछ यूनिफॉर्म देखो चुप हो गई । एक बात बताओ । मैंने अपनी बात जारी रखते हुए कहा दोस्ती के लिए कॉलेज में तो कोई लडकी नहीं मिली । दोस्ती तो लडकी से भी हो सकती थी यार तुम मुझे अच्छे लगते हूँ । अचानक मुस्करा बडी वहाँ पर गया । मेरे होठों पर रोक ही से मुस्कान तैर पडी मैं तो मैं अच्छा लगता हूँ अच्छा लगने क्या खूबसूरत तोहफा दिया है मुझे । क्या सगाई हो गई है? मेरी ठीक है तो भावुक हो गई । होली ऍम तो क्या मैं शादी कर लेती? तुमसे कसम से तो मुझे सच कुछ बहुत अच्छे लगते हो । सगाई जैसी उसका शब्द मेरे कानों को छुआ में गिरते गिरते बचा हूँ और खींच कर बोला तुम तो मजाक कर रही है । मुझसे नहीं सच है ये खुशी से पूछ लो । खुशबू की और देखा उससे हानि सर हिला दिया । मैंने आगे कुछ नहीं कहा । बस पथराई आंखों से उसे देर तक देखता रह गया और

मेरी अर्धांगिनी उसकी प्रेमिका - 24

मैं लगभग अपना होश खो चुका था । पांच से लौटते वक् सडक पर मैं पैदल ही भाग रहा था । मुझे याद नहीं उस वक्त इतनी गाडियाँ पहुँच करती हुई मेरे बगल से गुजरी हमला । तभी अचानक मेरे दोस्त ने पीछे से आकर मुझे जब चौरान दिमाग पर जोर पडा तो देखा मैं कार के बिल्कुल आगे खडा था और कार चालक मुझ पर चिल्लाया जा रहा था । अब अफीम भी रखी है क्या? मारना है तो कहीं बाहर जाकर मारो ना । नए साल के पहले दिन मुझे जेल भिजवाने का इरादा कर रखा है । संजय मेरे दोस्त तोडकर मेरे पास आया मुझे जब जोरा मैं फिर भी वहाँ से नहीं हटा हूँ तो उसने मुझे खींचकर सडक के किनारे ले गया । चीखते हुए कहा आ रही यार तुम अपने प्यार के चक्कर में हमारी जब कहीं उतार रहे हो तो भूल रहे । हमें उससे मेरे कंधे को जोर से दवा देखो । अपने चारों तरफ मैं नहीं ऍम । आस पास खडे समाज भी मुझे पागलों की तरह बुरे जा रहे थे । सलाह नहीं पता होता कि ये सब तमाशा होना है । अपने बाबू जी की कसम । हम तुम्हारे साथ इस नाटक में काम ही नहीं आती है । उसमें एक बार फिर मुझे ऍफ चलो । यहाँ से मैंने कुछ कहने की कोशिश की हम तो अपनी जवान बंदी रखो । उसने अपनी लाल आपको देखा मुझे असम से तुम्हारी खोपडी बहुत जोर से बना रही । साला एक साथ इतनी बेज्जती हमने अपनी सादी में भी नहीं महसूस की । फेरे से पहले हमारी होने वाली बीवी अपने आशिक के साथ भाग गई थी । मैंने हैरानी उसकी ओर देखा । अरे! आप कोरोमा शादी का प्रस्ताव लेकर हम उसके पास नहीं गए थे । उसका बाप आया था हमारे दरवाजे मिलना तय करने पर साला ये है उस ने माना जा क्या जहाँ पागलों की तरह दौड पडे सडक के बीचों भी लडकी ना हुई जिंदगी हो गई थोडी देर में हम दोनों मेरे बारह बारह फुट वाले किराये के कमरे में पहुंच गए । हम चाबी तो साला हम खोलते हैं आज तुम से ये भी नहीं हो पाएगा । उसने मेरी तरफ देखा कि कुछ सोच कर खुद ही फिर जेब में हर डालते हुए बोला हो मैं खुद निकाल लेता हूँ मैं तो आज शायद अपनी जेब बिना मिले ताला खोलते । उसने गुस्से में दरवाजे पर जोर से लात मारी । अब कौन तोड रहा मेरे दरवाजे को अचानक नीचे से आवाज आएगी किराये पर हमारे पापा का करने ये सॉरी अंकल गलती से दरवाजे से टकरा गया था । उसने हडबडी में कहा तो देख कर चला कर हूँ, वरना एक दिन तुम अपना सर भी बोलोगे और मेरा दरवाजा भी । मैं कमरे में घुसते ही सीधे बिस्तर पर लेट गया और वह वहीं चूल्हे के पास रखे । बर्तनों में सुबह की रोटियाँ बोलने लगा । मैंने रिकॅार्डिंग लिया । आंखों के सामने जैसी अंधेरा हुआ, प्रिया का चेहरा झिलमिला उठा । उसकी ठिठोलियां, उसकी चंचलता उसके साथ गुजारे गए । वो तमाम हसीन पल एक एक करके नहीं बंद आंखों के सामने दिख करते चले गए । सगाई हो गई है यार उसका ये बात किया । एक और फिर अचानक मेरे दिमाग में पूजा तो मैं रजाई को छोडते हुए ऊपर बैठ गया और आप क्या हुआ? फॅमिली और देखा तो कुछ नहीं । मैंने खाली खाली नजरों से इधर उधर देखा । इधर उधर क्या देख रहे हो गये । हमारा ही काम रहा है तो वो पिछले को फोन लगा तो हूँ अभी और बेज्जती करवानी है क्या यार उसे माफी मांगनी । अच्छा तो साहब को होश आ गया । उससे जेब से मोबाइल, गला और फिर कुछ सोचकर मेरी तरफ देखने लगा । वैसे एक बात बताओ तुम खुशबू से कौन से जो उनकी माफी मांगने वाले हो तो उनको लगाओ । पहले बताता हूँ उनका ही फिर से तो प्रिया से गिडगिडाने वाले नहीं हूँ हमें । अगर ऐसा है तो एक बार सुन लो हमारी तुमने खुद्दारी हो या ना हो मगर हमने बहुत है और हम ये बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करेंगे । कोई हमारे दोस्त की बेज्जती करे यार, तुम फोन लगाओ, लेक्चर मत दो । जोर देते हुए कहा बेज्जती की भी कुछ इज्जत होती होगी । आज उमर कितना करवाओगे? मैंने घूरकर देखा उसकी और चाचा लगता हूँ । अजय गुरुमत उसने फोन लगाकर मोबाइल को मेरी और थमाते हुए बोला लाॅ फोन थाम लिया हूँ । उधर से आवाज आई संजय बोल रहा हूँ, कैसे है? हाँ उसमें ऐसे पूछा जिससे कुछ हुआ ही न हो? ठीक हूँ हाँ प्रिया को बुलाऊं जी । मैंने कहा फिर अचानक में जाने जमा क्या आया और हडबडाकर बोला नहीं नहीं नहीं उस की जरुरत नहीं है जी मेरा मतलब । मैंने प्रिया के लिए फोन नहीं किया तो वो कि अचानक उसके स्वर में खाना आ गई । कैसी हूँ मैं ठीक हूँ । वैसे आप एक बार पूछ चुके हैं बहुत थोडे हैं । अच्छा उम्र खूब सुनी । उसने पुकारा जी अपने सिर्फ मेरा हाल चाल जानने के लिए फोन किया था । मैं अकेला पडा मेरे पास कहने के लिए कुछ था ही नहीं । मैं जैसे ही फोन काटना चाहे वो बोल पडी एक बात बोलो आपसे पुलिन जो कुछ भी पार्क हुआ अच्छा नहीं हुआ उसके लिए सौरभ मेरा दिल धडक उठा मैं उस घटना के लिए सब कुछ शर्मिंदा हो ही नहीं । आपका सॉरी बोल रहे हैं । बहुत जो कुछ भी हुआ उसमें आपकी गलती नहीं थी । प्रिया को अपनी सगाई वाली बात अब से पहले बता देना चाहिए थी । जी मुझे कानून पर यकीन नहीं हुआ । हाँ, वैसे अगर बुरा ना माने तो एक बात पूछूँगा आपसे पूछे ये नीतू कौन है तू ये नाम आते ही एक बार फिर अपने बेडरूम से अर्धनग्न घडी उसका रोता हुआ चेहरा मेरी आंखों में डर बढा मैंने फोन काट दिया ।

मेरी अर्धांगिनी उसकी प्रेमिका - 25

रात के दस बजे के आस पास का समय था । मैं खाना बनाकर कमरे के बाहर बने । सार्वजनिक बातों में हाथ होने निकला ही था की सीढियां लगता हुआ किसन दूर से ही चला । संजय संजय वो मेरे मकान के बगल वाले मकान में किराए से रहता था तो छत के रास्ते भागते हुए आया था कहाँ लग गई यार इतना हाफ हो रहे हो होते हुए मैंने उसकी और देखा उन उनको मेरी तरफ बढाते हुए बुला इसका खुशबू बिना आवाज बहुत चला कर उसने इशारा क्या बोल रहे हो यार, हमारी आवाज चली गई क्या किसका फोन है मैं खुद हूँ कुछ लाते हुए मेरी और बडा मुझे खींचा और मेरी गीले हाथों में मोबाइल दबा दिया की क्या क्या तुमने मैंने कुछ ऐसे देखा उस की आज मेरा हाथ ढीला है । फोन खराब हो जाएगा और तुम पांच करो अपने फोन की फिकर हम कर लेंगे । मैंने फोन कान से लगाया तो श्री जैसे एक वर्ष में तब्दील हो गया । कैसी हो हम ठीक है । वो बोली आप का हालचाल जानने के लिए फोन किया था आप कैसे हैं? बेहतर होगा शुक्रिया । किशन मेरे पास ही खडा रहा । मैंने उसकी और देखा तो वह रिजर्व ऐसे देखने लगा जिससे उसका ध्यान कहीं और हो । तुम यहाँ खडे खडे क्या कर रहे हो? मैंने कहा तुम जाकर ऍम मैं बात करके आ रहा हूँ । कहते हुए मैं सीढियों की और बढ गया हूँ । उधर से आवाज आई समाज की जिएगा । मैं दोस्त से बात करने लगा था । आप कुछ कह रही थी मैंने सुना अभी आप कहाँ है? छठ आ गया हूँ । आप के दोस्त को बुरा नहीं लगेगा । नहीं वो बहुत मोटी चमडी का इंसान है । मैंने हस पडा बात को बोलते हुए पूछा खाना खा लिया आपने जी और आपने नहीं अभी नहीं खाया । बनाकर रख दिया गया है । अभी खालूबार वो तो पहले आप खा लीजिए तो फोन करती हूँ । नहीं नहीं मैं बाद में खा लूंगा । अच्छा जी फिर हम दोनों चुप हो गए । शायद हमारे पास बात करने के लिए और कुछ नहीं था । क्या इतना ज्यादा था कि समझ नहीं आ रहा था कि बात कैसे और कहां से शुरू की जाए हो उकताकर वो बोली जी कुछ नहीं अब तो बिलकुल खामोश हो गए । मैंने कुछ नहीं कहा । हाँ संजय जी अचानक उसे कुछ याद आया । अपनी सुधाकर जी को देख रहे हैं । नहीं हो नहीं आप नहीं जानते हैं । प्रिया की मंगेतर है । मैं मिल चुकी हूँ अच्छा । मैंने उस पर जरा भी दिलचस्पी नहीं दिखाई । आपको एक बात बताऊँ । वो बोले तो भैया की जगह मैं होती तो सुधाकर जी से कभी शादी नहीं कर दी । बहुत भोले हैं । बात करने में बिल्कुल नहीं आता । वैसे इंसान अच्छे हैं । आपको पता है भैया भी उनसे प्यार नहीं करती । भाई के कहने पर शादी कर रही है । आईटी कहने पर जी तो अपने भाई से बहुत डर की है । उन्हें बहुत पसंद है । आपकी बातें मुझे अक्सर करती रहती है । पहले तो मुझे भी अजीब लगता था । मगर जब आपको पहली बार पार्क में देखा तो बस देखती रह गई । आपको कोई भी पसंद करेगा? हेलो हूँ जी आप आप चुप क्यों है? मुझे फोन कट गया नहीं, मैं सुन रहा हूँ । मैंने कहा । प्रियांशु फिर कहती है कि बोलते बहुत है फिर इतनी चुप्पी क्यों? मेरी बातों से पूरी हो रही हो गया नहीं नहीं ऐसा बिल्कुल नहीं है । वो क्या है कि मैं समझ नहीं पा रहा हूँ की अपनी इतनी तारीख पर मैं क्या प्रतिक्रिया दो । नहीं तारीफ नहीं कर रही हूँ । जानती है एक और उसकी आवाज में खाना खा गई होली अगर आपने वो फूल मुझे दिया होता तो कसम से मैं उसी जिंदगी भर नहीं मुझे नहीं थी कि भर नहीं मुरझाने देती तो क्या कहने की कोशिश कर रही है । पहले इतनी तारीफ और अब मैं अपने दिमाग को बहुत नहीं चलने दिया । एक बार जल चुका हूँ । मैंने रूके मन से कहा यानी तो स्कूल भी नहीं लिया । अब उससे क्या कहूँ मैं वो कुछ भी कर दी । मगर उसका बर्ताव वो सचमुच मुझे अच्छा नहीं लगा । मैं आपसे इसलिए बात करना चाहती थी सोचा उसके उस बर्ताव के लिए मैं आपसे माफी मांग हूँ मगर हिम्मत नहीं पडी । फिर आपका फोन आया तो वो अचानक चुप हो गई । चंद पलों की खामोशी के बाद बोली वो दोस्त है मेरी आप उससे खफा रहेंगे । मुझे अच्छा नहीं लगेगा जी मैंने फोन काट दिया । इस कमरे में मेरा इंतजार कर रहा था । मैं जैसे ही कमरे में घुसा वो बिस्तर छोडकर खडा हो गया । उसका आते हुए बोला क्या गाया उसने कुछ खास नहीं माफी मांग रही थी अपने दोस्त के व्यवहार के लिए अच्छा कि आखिर फैल गई उनकी उतना खुश हो रहे हो । अब वो सब छोडो और जो हम कह रहे हैं वो मैंने हॉर्स उसकी और देखा । उसके अंदर कुछ तो था जो अंदर ही अंदर झलांग लिये जा रहा था । ये सब होता हुआ बोला हम सुन रहे हो ना । हाँ तुम बोलो पहले ये बताओ तुम्हें ये लडकी कैसी लगी हूँ । खुशबू फॅमिली मत करो, मैं खुशबू की बात कर रहा हूँ । अच्छी है अच्छी है तो ऐसे क्यों बोल रहे हो जैसे किसी की मैयत जा रहे हो । अगर आप खुश होकर बोलो हमारी मानो तो कुछ देर के लिए प्रिया कबूत सबसे उतार दो । कम बोलो हमने गौर से कुछ दूरी और देखा है । मैं जानता हूँ तुम्हें नहीं देखा मैंने । मैंने उसे देखा है उच्चतम दोनों के बीच महाभारत छोटी थी तब तो और खुशबू प्रिया से बहुत अच्छी है तो तो क्या वो गुरु गुरु कर मेरी और देखा या बहुत छोड दो और कोई मुझे प्यार कर लूँ क्या मैंने फटी फटी आंखों से पूरा अगर तुम पागल हो गए हो गया अगर तुम हो जो समझ नहीं पा रहे हो । अरे खुशबु तो उसे बिहार करने लगी है और उसमें ये सब तो भी कब बता तो उसने नहीं बताया । मगर अभी तुम से पहले उस से मैंने बात की है । उसकी बातों में ही तुम्हारे लिए प्यार झलक रहा था । और वैसे भी अब रिया की सगाई हो चुकी है । जरा देवदास, मुझे निशान । मैं कुछ गलत कर कहना चाह रहा था । भाई रात बहुत हो गई । मैं जा रहा हूँ । मुझे जो कह रहा था वह कह दिया । किशन चला गया मगर मेरे लिए हजारों सवाल छोड गया । मैं देर तक खाना चलता रहा । उस वक्त खुशबू, प्रिया और नीतू मेरे दिमाग के इर्द गिर्द घूमती रही । मैं समझ नहीं पा रहा था मेरे अंदर इतनी हुई धन क्यों है? तो यानी मुझे छोड दिया । इसलिए या फिर इसलिए की खुशबू आहिस्ता आहिस्ता मेरी और कदम बढा रही है तो मुझे क्या चाहिए?

मेरी अर्धांगिनी उसकी प्रेमिका - 26

मेरे दरवाजे पर दस्तक हुई तो मैं उठ कर बैठ गया । आखिर बोलते हुए घडी की तरफ देखा सुबह का छह बज रहा था और उस स्तर पर बैठे बैठे ही मैंने आवाज भी हम पहले दरवाजा खोलो फिर बताते हैं कि कौन है मैं? आवाज पहचान गया । तुम इतनी सुबह अपना बिस्तर से पूछ लो । सारे सवाल बोल रहा हूँ यार कहते हुए मैंने दरवाजा खोल दिया । सामने किशन खडा था अब किधर आग लगा कर आ रहे हो तुम । आप तो तुमने हमारी जिंदगी में लगा दी है । कल रात हो तुम ने हमारे फोन से किसी फोन किया था को क्यों? वो संजय हम अभी कार्य खाकर आ रहे हैं उससे मैं हमारा दिमाग अब भी बना रहा है । इसलिए हम से कमेटी मत करो, ये चीज बता दूँ । मैं किसी फोन किया था । खुशबू हो यार, हमारे सामने ही तो बात किए थे । अरे यार वो तो हम भी जानते हैं । उसके बाद किसी किया था । वो पूछ रहे हम उसके बाद चीज बात नहीं हुई । मैं बिस्तर में बैठते थे । बोला तो पैसे कट गए हैं क्या पैसे की बात नहीं है यार तुमने किसी का नंबर डायल किया था ऍम किया था । मगर बात नहीं हुई है । इसका नाम बताओ नीतु अभी नीतू कौन है? लडकी तो हम से कमेटी कर रहे हो । अरे यार, ये लडकी मुझे प्यार करती है । यहाँ एक और लडकी वो मुझे ऐसे पूरा जैसे खा जाएगा । मेरे बगल में बैठे हुए कहा अरे यार एक बात बताओ किसान हमारा नाम है और इतनी ढेर सारी गोपियां तुम घुमा रहे हो । चक्कर का है हूँ तो कोई आपत्ति है । अरे यार हमें कोई आपत्ति आपत्ती नहीं है मगर एक बात हमारी भी अपने दिमाग में मुझे तो रिश्ता हमेशा एक से ही अच्छा लगता है । इतनी गोपियां पालोगे ना तो किसी दिन यही तो मैं काट काट कर अपने अपने घरों के पिछवाडे वाले नाले में डाल देगी । फिर तुम ढूंढते रहना अपनी टांगे अपना हाथ कोई तो खोज रहा हूँ । मुस्करा पडा देख रहे हम । तभी शाम को एक से बात होती है सुबह वाली दूसरी का बाप मुझे संजय समझकर गाडियाँ देता है । ने बताया कि फोन संजय नहीं किया था । तुम ने मुझे बताया कि उसे फोन तुमने किया था नहीं तो क्या बताता उसे उसने गालियाँ दी और अच्छे बच्चे की तरह हमने कसम खा ली का मुझे पता होता है कि वह तुम थे तो बाबू जी की कसम सारी की सारी गालियाँ तुम्हारी तरफ ट्रांसफर कर देता हूँ । वो अचानक बिस्तर से उठकर खडा हो गया । छुट्टियों में बोला बात मानोगी हमारी तुम ना फोन लेलो अच्छा ये तो मैं फोन की तकलीफ है । फॅमिली कुछ नहीं छोडो डरपोक है इस मामले में पता नहीं सकते कितनी हालत खराब हो गई थी हमारी जब आदमी हम पर गालियां बरसा रहा था । जानते हो ना हम किसान के बेटे हैं, जिंदगी में कुछ बनना चाहते हैं । अच्छा तो क्या तुम्हें पता है कि कुछ बनने के लिए कुछ करना पडता है एकदम ये सब छोडो हम कह रहे हैं वो चुनाव तो मैं फोन लेलो, पैसे ना हो तो हम दे देंगे करने की फसल अच्छी हुई ऐसा हमारे लिए हम बाबूजी से झूठ भी बोल देंगे और कहोगे कि अपने बाबूजी से ही देंगे । कुछ किताबें लेनी है या कोई फॉर्म भरने का बहाना बना देंगे । अच्छा चलो तो हमारे लिए अपने बाबूजी से झूठ मत बोलो । हम कल मोबाइल भी आएंगे । सच मोच मैं मुस्करा बडा चलो चार बच्चे लंबी सांस भरते हुए वो चलने के लिए दरवाजे की और बडा कहाँ जा रहे हो । हम आईआर कोचिंग जाना है इसलिए जाकर खाना बना लूँ

मेरी अर्धांगिनी उसकी प्रेमिका - 27

कॉलेज पुनः खुल चुका था । पढाई का अगला सत्र शुरू हो गया । पाँच का टाइम था । मैं और प्रिया कैंपस में ही किनारे बैठकर लंच कर रहे थे । हमारे बीच वही उत्साह था । वहीं नजदीकी बरकरार रही । अगर कुछ नहीं था तो वो थी प्यार और मोहब्बत । हम दोनों जानते थे कि हमारे भविष्य के रास्ते बेहद अलग अलग है । इसलिए जितना सफर एक साथ कर सकते थे हसते मुस्कुराते हुए कर लेंगे क्या मैंने दुबारा हूँ रोटी जवाना बंद करके मेरी और देखने लगे । एक बात पूछूं तुमसे उसकी नजरें मेरे चेहरे बढेगी रहें कॉलेज में किसी अपरिचित लडके के साथ उसके अंदर गोली मिली रहती हूँ की बात तोहरे मंगेतर को पता है । मेरा सवाल सुनते ही उसके हैरानी हाँ स्मार्ट होने लगी । मेरी और जरा चक्कर बोली कहा तुमने जरा पैसे का हूँ कि मैंने बेहिचक अपने सवाल को पुनः दोहरा दिया । जवाब में वो कहने लगी तो नहीं क्या लगता है मैं? संजय मैं चोरी चोरी तुम्हारे साथ घूमती हूँ नहीं वो विजिट होगी । मैं सुधाकर से तुम्हारी बारी में पहले सब कुछ बता चुकी हूँ । को बुरा नहीं लगा । बिलकुल नहीं वो इतनी पुरानी सोच का इंसान नहीं । वो इस बात को अच्छी तरह से जानता है कि शादी के पहले हर किसी का कुछ ना कुछ गुजरा हुआ कल हुआ करता है । इसमें कुछ भी नया नहीं है । मैं चुप हो गया । जानती हूँ । वो अपनी बात जारी रखते हुए बोली, इस मामले में हमने एक दूसरे को पूरी तरह से आजाद कर रखा है और शादी के बाद भी अब ऐसे ही रहेंगे । ऍम मैं मुस्करा बडा ऐसी जीवन साथी भगवान सबको देंगे तो चिंता मत करो । संजय तो भारी जीवन साथी भी ऐसे ही है कि अच्छा जी उसमें रोटी का टुकडा मेरे मुंह में डालने की कोशिश की । लेकिन ठीक है उन की घंटी बजती । मेरा मूड खुला का खुला रह गया । उसने रोटी के टुकडे को वापस टिफन में रखते हुए बोली तो उनकी घंटे तुमने फोन खरीदा, बताया भी नहीं । मैंने कुछ नहीं कहा । उठकर खडा हुआ और जेब से फोन निकालता हुआ मैंने वहाँ से हटने की कोशिश की । प्रिया ने मेरा हाथ पकड लिया । मुस्काती नजरों से बोली लगता है जीवन साथी का ही फोन आ गया है क्या? मैंने चौक पर उसकी ओर देखा । उसने मेरा हाथ छोड दिया । मैंने फोन की स्क्रीन उसके और घुमाते हुए बोला खुशबू का फोन है उसका नंबर याद हो तो देखो मैंने भी तो वहीँ कहा । उसकी आंखों में शरारत थे । मैंने फोन उठा लिया और बात करते हुए वहाँ से दूर चला गया । उसकी नजरें मुझ पर टिकी रही हैं ।

मेरी अर्धांगिनी उसकी प्रेमिका - 28

रात के करीब आठ बज रहे थे । मैं कुर्सी पर बैठा था । सामने मेज में किताब खुली पडी थी । मैं हाल ही में शुरू हुए सत्र के मिले प्रोजेक्ट को समझने की कोशिश कर रहा था । तभी एक का एक मोबाइल पर घंटी घंटना पडेगा । हाई संजय उधर से आवाज आई कौन? जवाब मैंने कहा ना हाई हेलो सीधा कौन? ये तरीका है मिस्टर संजय क्रिया । मेरी आंखों में चमक आ गई । ये कहाँ का नंबर है और हमारी आवाज को क्या हुआ? कुछ अजीब सी लग रही है आपको प्रिया से प्यार व्यार तो रही हो गया आजकल आपको हाल किसीकी आवाज दिया की ही लगने लगी है तो मतलब ही इसकी मैं प्रिया नहीं हूँ तो तो पहचानी लोग मिस । आप जो भी हैं हमें आॅफ खेलने नहीं बैठा हूँ । मैं फिलहाल पढाई कर रहा हूँ । अगर कोई काम है तो बताइए बलराम फोन रखे हरे हरे । इतना सा देखिये आप इधर उधर बातों को मत घुमाई । कोई काम है तो बताइए जी एक काम है आप कुर्सी से उठे ये कौन सा काम हो इससे पहले होती है तो सही मैं उस पर खडा हो गया । आगे बोले अब कीजिए चाहिए मेरे हैं किचन नहीं । हमेशा जहाँ खडे हैं । यही हमारे किचन है । यही बैठी हूँ और यही स्टडी रूम भी अच्छा जी तो सामने देखिए, गिलास होगा उसे उठाई मतलब मतलब ये एक को हंस पडी । उससे पानी निकली और पी लीजिए आपका गुस्सा ठंडा हो जाएगा । क्या बकवास है? फॅमिली कितनी जल्दी भी किया है? देखिए मुझे इस तरह चलती फिरती लडकियों से बात करने की आदत नहीं समझे आप मैं फोन काटना चाहता था । तभी उसने मुझे पुकारा । संजय मैंने एक बार फोन की तरफ देखा, फिर काम से लगा दिया । आपको कुछ कहना है जी ऍम क्या किया था आपने? फॅालो सामने से कोई आवाज दी है । मैंने फोन की तरफ देखा । वो कट चुका था । मैं आकर पुनः अपनी कुर्सी पर बैठ गया है कि लडकी हो सकती है । फॅमिली तो सोचने लगा क्या नहीं हूँ । नहीं नहीं दिल्ली इंकार कर दिया था । उसकी आवाज ऐसी नहीं है । फिर वो युद्ध भी तो नहीं हो सकती है । फिर कौन? शायद निशा वो समझा क्यों करेगी? उसे तो हस कर बोलना भी महंगा पडता है । शिवानी तो हो ही नहीं सकती । अगर प्रिया नहीं है तो कौन । काफी देर तक मैं अपने दिमाग के घोडे दौडाता रहा नहीं । बाहर भी ऐसा ना मेरे दिमाग में नहीं आया । इसमें मेरे दिल को तसल्ली मिल सकती है । कॉलेज में अपनी परिचित लडकियों के नाम ढूंढते ढूंढते जब मैं थक गया और कॉलेज के बाहर निगाहें दौडाई तो एक मेरे मन में चेहरा उभर कराया । बहुत खुश हूँ । खुशबू की आवाज में सामने से ज्यादा फोन पर पहचानता हूँ । मेरे सबसे ज्यादा फोन पर उसी से तो बात की थी । जब कुछ समझ में नहीं आया तो मैंने ऋषि किए गए नंबर को डायल कर दिया । बात हुई तो पता चला कि ये नंबर तो पीछे पीछे हो का है ।

मेरी अर्धांगिनी उसकी प्रेमिका - 29

रविवार की दोपहर अभी डर ही रही थी कि प्रिया का फोन आ गया । नंबर गुजरी । शाम को आईफोन के नंबर से अलग था । संजय मैं क्या बोल रही हूँ ये नंबर कहता है । कुछ औपचारिकता निभाने से पहले मैं सीधे अपने मुद्दे का सवाल करना था । मेरे घर में है वो मेरे अजीब सवाल पर हंस पडी तो ये सब क्या पूछ रहे हो? कल शाम किसी लडकी की कॉल आई थी । मुझे लगा तुम हो हो तो फोन खरीदते ही लगता है लडकियों के बीच हमारी डिमांड बढ गई है । क्या बकवास है कल से मैं ठीक से सो भी नहीं पाया और तुम्हें मजा सुन रहा है । मेरी झल्लाहट पर वह खिलखिला पडे । इसमें मजाक की क्या बात किया तो खुद भी तो वही बता रही हूँ । अच्छी हूँ । वो बात को घुमाते हुए बोले आज छुट्टी कर रहे हैं क्या भाई घर पर नहीं हम कहीं घूमने चले कहाँ? कहीं भी जहाँ तो हूँ वो कंपनी गार्डन नहीं उधर नहीं हो । इंडो पाक कैसा रहेगा? ठीक है तो मैं तो मैं नहीं मिलता हूँ । ठीक है पहुंच नहीं ॅ हो गया । आधे घंटे बाद में पार पहुंच गया । प्रिया भी वहां नहीं पहुंच पाई थी । मैं बैठा हुआ उसका इंतजार करता रहा । लेकिन मेरा दिमाग अब भी उस लडकी पर ही अटका रहा हो सकती है । एक बार फिर मैं एक एक करके उन्हें तमाम लडकियों के बारे में सोचने लगा । फिर अचानक नीट ऊपर आकर अटक गया हो । नहीं, तू ही थी मगर कैसे? सवाल पर मेरा दिमाग शून्य पड गया । नहीं नहीं जितना उसे मैं जानता हूँ, ऐसा कभी नहीं कर सकती हैं । संजय जी आप आगे अकस्मात ही मेरे कानों पर एक आवास तैर पडी । मैंने सर उठाया तो खुशबू सामने खडी थी हम मैंने हैरानी उसकी और देखा लेकिन तुम्हें कैसे? क्या मतलब? मेरी इस स्वाभाविक सवाल पर वह कुछ चौकसी गई । अब मेरे मतलब तुम अकेले ही हो गया । कोई और नहीं आया । नहीं ऍम मुस्करा पडी थी । जीजू हाँ ॅ बताया नहीं आपको कहाँ है वो उधर उसमें संकेत क्या? मैं उधर घूम कर देखा । मेरी उम्र का दुबला पतला युवा सामने लगी कुर्सी पर बैठा बडी उत्सुकता से हमारी और देखे जा रहा था । क्या कहा है? मैंने पूछा हम दोनों भी पिया की ही इंतजार में है । पल भर चुप्पी के बाद बोले अभी वो आई नहीं शायद मगर ये तुम्हारे साथ हाँ । सुबह की ट्रेन से तो जिस से यही हैं नहीं नहीं स्टेशन से सीधे मेरे घर आ गए थे । पार्क में तो अभी भी आए हैं हम दोनों तो मेरे घर पर क्यों नहीं? मुझे उसका खुशबु के घर में रुकना अच्छा क्यों नहीं लगा? प्रिया के भाई को पसंद नहीं है शादी से पहले मिलना जुलना मेरे दोनों तक झुकाई होली । इसलिए उसने इन्हें यही पार्क बुला लिया । वो मेरा दिमाग ठंडा उठा तो ये है प्रिया के मिंटो पार्क आने की वजह से मैं मन ही मन कुंठित उठा । मैं समझ चुका था कि मैं एक बार फिर प्रिया का मोहरा बन चुका था । मैंने पलटकर खुशबू से कुछ नहीं कहा । हाई संजय एक क्रिया की आवाज गूंज बडी मैं प्रत्युत्तर में मैंने कुछ नहीं कहा । तेजी से मेरी और आई । मेरे कंधों को छुआ और बिना रुके सुधाकर की और बढ गई । उसका ऍम को पूरी गया । मैंने घूम कर थोडी दूर पर खडी खुशबू की और देखा वो भी असहज थी । क्यों नहीं? प्रिया उसके पास पहुंची तो वह कुर्सी से उठकर खडा हो गया । उस समय मैंने सुधाकर के चेहरे को गौर से देखा । उसमें मुझे जरा भी उत्सुकता नहीं देखिए । प्रिया ने उसे गले से लगाया तो उसने आंखें नहीं बंद की उसकी फटी फटी आके हमें घूमती रही फॅमिली मगर दिल किसी आज की तपन में व्यवस्था रहा । संजय प्रिया ने पुकारा मैंने नजर उठाई मेरे सामने खडी थी उसके हाथ अभी सुधाकर की बाहों को थामे हुए थे प्रिया सहरावन सुधाकर और उसके बदल के बीच पिस रहा था । मेरी निगाहें देर तक वहाँ नहीं ठहरी और सरपट दौडती हुई प्रिया के चेहरे पर जाते गी इनसे मिले । यही है मेरे मंगेतर डॉक्टर सुधाकर शर्मा ऍम उसने मेरी और हाथ बढाते हुए कहा दिल्ली से पीवीटी की ट्रेनिंग कर रहा हूँ । जानता हूँ मैंने बेरुखी से उसका हाथ थाम लिया । प्रयास के बारे में पहले ही बहुत कुछ बता चुकी है । अच्छा तो आप लोगों के बीच हमारी चर्चा पहले ही हो चुकी है । वो होकर के हंस पडा । मुझे उसकी बेवजह कि हंसी बिल्कुल अच्छी नहीं लगी । संजय एक बार फिर प्रिया ने पुकारा तो फोन पर कुछ पूछ रहे थे क्या मैंने प्रश्न सूचक निगाहों से प्रिया की और देखा तो मुस्कुरा बडी तो मैंने पूछा था ना कि कल तो मैं किसी लडकी ने फोन किया था । जयंतियों से ऍम ऐसे ही बता होंगे तो बच्चों से खिलखिला पडी । सुधाकर उसकी शरारत को एक तक देखे जा रहा था तो उन्हें शर्त माननी पडेगी । प्रशिक्षण पार्क में जो कुछ हुआ था उसके बाद मेरे अंदर उस बात के लिए कुछ खास उत्सुकता नहीं । बच्ची थी तो उसे कुछ का होगे नहीं । मैंने खामोश नजरों से उसकी और देखा बोलो संजय मंजूर है । ठीक ऍप्स तो फिर खडे हो जाओ और सामने देखो मैं खडा हो गया । दूर तक निगाहें डालें । एकदम खाली । वहाँ कोई नहीं था । मैंने घूम कर मुझे मुझे निगाहों से प्रिया होने का तो हम क्या करेंगे ना । मेरे साथ कोई नहीं है । नहीं । नहीं नहीं एक बार फिर देखो । मैं देखने लगा तो एक का एक हंस पडी । बोली वो तो बहुत दूर की देख रहे हो । अपने करीब देखो ना लिखा हैं । करीब आई तो मेरा सारा बदन झनझना उठा । मेरे सामने खुशबू खडी थी । मैं अर्थपूर्ण नजरों से प्रिया की और देखा । तुम कहीं कुछ के बारे में तो बात नहीं कर रही । प्रिया मेरी और देखने लगे । उससे पहले उसके मुँह से कोई जवाब निकलता । खुशबू हसते हुए बोली सिंह जी आपको इतना फूल बना रही है । मुझे कि अप्रेल है । मैंने वहाँ पर जो डाला वहाँ गई है । आज एक अप्रैल है । मैं शर्म से पानी पानी हो गया । मैं बारी बारी से प्रिया और खुशबू की और देखता रहा । उनकी आंखें देर तक एक दूसरे से इशारों में बातें करती रही ।

मेरी अर्धांगिनी उसकी प्रेमिका - 30

इधर कुछ दिनों से खुश्बू प्रेरणा मुझ से फोन पर बात किए हुए शायद ही कभी सोई हो । रात के साढे ग्यारह बजने वाले थे । अब तक उसका फोन नहीं आया । मैं पे चेंज होने लगा हूँ तो उस से बात किए बगैर मुझे भी नहीं नहीं आने वाली थी । उससे रहा नहीं गया । फोन लगा दिया हूँ । उधर से आवाज आई चलो मैंने कहा कैसे हो ठीक हूँ और आप हमारे फोन का इंतजार कर रहा था । वैसे अब तक कहती मैं कहाँ जाऊँ? उसने नीरज स्वर में कहा, फॅमिली जो यही ठहरे हुए हैं तो मुझे यहाँ चौक पडा । उस की बात बीच में ही काटते हुए पूछा । सुधाकर वही हैं था । उनके लेने की व्यवस्था कर रही थी । वैसे आपके मोबाइल का बैलेंस कट रहा होगा । आप पांच मिनट रुकिए । मैं आपको वापस काल करती हूँ । उसने फोन काट दिया । मोबाइल की और देखने के अलावा मेरे पास कोई विकल्प नहीं था । अभी चार मिनिट गुजरात है कि मोबाइल की घंटी बज उठी । मैं समझ नहीं पा रहा था कि क्या करूँ । पुरम फोन उठाकर अपनी बेचैनी जाहिर कर दूँ या थोडी देर तक घंटी बजने दो । ऍम उठा लिया । सारी उन गाते ही हुई । उन्होंने कहा आपको इंतजार करना पडा । आप कुछ कह रहे थे नहीं, कुछ खास नहीं । मैं पूछ रहा था कि सुधाकर वहाँ तब तक रुकने वाला है । कल सुबह ही वह गंगा गोमती से लखनऊ जाने वाले हैं । फिर वही से दिल्ली चले जाएंगे । अच्छा मैंने लंबी साझेदारी । मैं अब जब डायरी लिख रहा हूँ तो समझने की कोशिश कर रहा हूँ । उस समय मेरे दिमाग में कैसी उथल पुथल चल रही थी । सुधाकर प्रिया का मंगेतर था इसलिए वो मुझे नहीं अच्छा लग रहा था या फिर वो खुशबू के पास था । इस बात पर जलन हो रही थी मुझे संजय जी उस ने कहा अब कुछ सोच रहे हैं? नहीं नहीं मैंने अपनी भावनाएं दिल के अंदर ही दफन कर दी और हसते हुए कहा तो मैं ऐसा क्यों लगा था की खामोशी देखकर वहाँ पडी । वैसे आप गलत भी नहीं । अचानक वो चुप हो गई । फिर कुछ सोचकर बोली जानते हैं संजीव जी मुझे समझ नहीं आ रहा है कैसे करूँ । आप कुछ गलत नहीं सोचेंगे नहीं तो वैसे मैं ऐसी हूँ नहीं । मगर पता नहीं क्यों आज में इतना बुरा मान गई । मैं तो समझा नहीं वो चुप हो गई । पहले तो मैंने भी तुम कुछ कह रही थी । हाँ मंत्री बुरा मत मानी का मैं बस आपसे अपनी फीलिंग शेयर कर रहे हैं । बिल्कुल नहीं । हमारे में जो है तुम बेहिचक कर सकती हूँ । आपको याद है पार्क में प्रिया ने आपकी कंधे कुछ हुआ था । प्रिया को आपको यू छूना मुझे अच्छा नहीं लगा हूँ । मैं कुछ कहना चाहता हूँ । जानते होंगे जी मेरी बात को बीच में ही कर दी बोली में वहाँ से जब से लौटी हूँ, बस घुट रही हूँ । एक बार मन किया कि आपको फोन करके कहना लेकिन फिर डर गई कहीं या बुरा ना मान जाए और इसलिए आज फोन भी नहीं किया । किसको आपसी कहकर बहुत हल्का महसूस कर रही हूँ । मैंने कुछ नहीं कहा । शायद इसलिए कि मैं भी खुशबू के लिए वही महसूस कर रहा था जो मेरे ली कर रही थी या फिर इसलिए कि प्रिया के लिए मैं अपनी भावनाओं को समय कर रखना चाहता था ।

मेरी अर्धांगिनी उसकी प्रेमिका - 31

कॉलेज के आखिरी साल का पहला सत्र सितंबर वहाँ बादलों से घिरी दोपहर मैं नई मोटरसाइकिल खरीदने के बाद पहली बार कॉलेज गया था । उस दिन प्रिया बहुत खुश थी । लौवंशी घंटे बजते ही उसने मेरा हाथ पकडा और कॉलेज की इमारत के पीछे वाले सक्रिय बगीचे की और लेकर चली गई । उच्चतर अक्सर सुनसान हुआ करता था । ज्यादातर छात्र छात्राएं कैंटीन, प्लेग्राउंड या फिर एक और इमारत के बीच पहले बडे इससे बगीचे में ही पहनते हुए मिला करते थे । प्रिया इमारत की ऊंची दीवार से सटे रखे हुए ईटों की और बैठने के लिए बडी तो मैं चिल्ला उठा अरे तुम तो मुझे कहाँ जा रही हूँ? बहुत पुरानी है देखना उन के नीचे साहब के बिच सुना हूँ कि नहीं और आराम से जाकर उन पर बैठ गई । कुछ ये इनके नीचे मगर धूल तो है हो तुम भी । वो अचानक तेजी से उठी और मुझे अपनी और खींचनी बोली आॅटो और तुम धूल से कब से डरने लगे । उसके बगल में मैं भी बैठ गया । उसने मेरी बाहों में बाहें फसा लें । हम दोनों ने एक दूसरे की और नहीं देखा । हमारी नजरें जीर तक एकता सामने लहलहाती छोटी छोटी घास पर केंद्रित रही । उस समय एक दूसरे की और देखकर हम एक दूसरे को शर्मिंदा नहीं करना चाहते थे । सिंह है थोडी देर बाद अपनी बातें मुझे अलग कर दी हुई शिकायत भरे लहजे में बोली साहब की आज नहीं नहीं बाइक आई है तो कोई पार्टी साटी मिलेगी । क्यों नहीं मिलेगी जरूर मैं उसका हो क्या खाना चाहोगी? आज खाने वाला कुछ नहीं है । वो अजीब सब बनाते हुए बोले बच्ची हूँ मैं कुछ दिनों में शादी होने वाली है तो आज अपनी बाइक से लिए चलो हमें कहीं और कोई फिल्म दिखाओ आप? हवा ये हमारे बस का नहीं है क्यों? वो लेकर चौक पडी नहीं हमारे उन्हें पता चल गया तो पक्षी की भी नहीं । शायद छुट्टी भी हो जाए हमारी उन्हें उन्हें कौन? तो उसे याद आया तो खिलखिलाकर हंस पडी तो साहब उनकी इतनी दीवानी हो गए हैं कि उनकी घंटियों से भी डरना शुरू कर दिए हैं । भोजपूरी है मैं बस बडा चलिए मान लेते हैं । लेकिन इतना भूली मिस्टर संजय की आपके इस प्यार का सारा ताना बाना हमने ही बोलना है । वरना यही कॉलेज की नकचढी लडकियों के आगे पीछे ही मक्खियाँ मारते नजर आती । और हाँ कुछ भी नहीं लगता हूँ हूँ कितनी बुरी है क्या तब क्या तो अपने आप को हीरो समझते हो? पहले तो नहीं समझता था मगर ऍम आया तब से जरूर समझने लगा हूँ अच्छा बहुत बडी । फिर छोडो इन बातों को हम मजाक नहीं कर रहे हैं तो इतना बताओ आज फिल्म दिखाने लेकर चल रहे हो क्या नहीं उसके स्वर में वाकई रूखापन आ गया । ऐसे मना नहीं कर पाया । मैं यहाँ कर दिया तो फिर चलो पोस्ट कर खडी हो गई अभी और ऍम दूसरी मीटिंग की कक्षाएं नहीं करने क्या हर रोज तो करते हैं । अच्छा नहीं करेंगे तो बाहर नहीं टूटने वाला ।

मेरी अर्धांगिनी उसकी प्रेमिका - 32

हम यानी कि मैं और प्रिया सितंबर की दोपहर में सिनेमा हॉल की ओर जाने वाली सडक पर दौड ही रहे थे कि एक आएगा न जाने प्रिया को कौनसी धुन सवार हुई । उच्च लाख बोली संजीव गाडियों को क्या हुआ क्योंकि वो तो उसने मेरे कंधे पर जोर से हाथ मारा । मैंने मोटसाइकिल रोक नहीं गाडी से उतरी और आकर मेरे सामने खडी हो गई । क्या हुआ? मैंने पूछा ऍम अपने दोनों हाथों को कमर पर रखकर खडी हो गई । बोली क्या वाकई हम फिल्म देखने जा रहे हैं? क्या मतलब? बच्चों पडा तुम देख नहीं जाने वाली थी ना? कहाँ पहुंच पडी लेकिन मेरा मूड बदल गया हूँ । तो आप क्या कह रहा है तुम्हारा मूड? कहीं दूर घूमने चलते हैं । हमने ऍसे देखा, पागल हो गई हो देखती रही पागल किस तरह फिर आए हैं बजाने बारिश कब शुरू हो जाए कुछ पता नहीं । मैं बारिश का ही तो इंतजार कर रही हूँ । वैसे झूम उठी जैसे आपने इस बात को कहने के लिए वो मुझे यहाँ तक लाये हो । अपनी बात जारी रखते हुए बोली देखो ना संजय कितना खूबसूरत मौसम है । बादल किस तरह आपस में अठखेलिया कर रहे हैं और तो मुझे जाकर किसी टॉकीज में ऍम देखने के लिए बैठा दोगे या तो जानते उस संजय मेरी बात को बीच में ही काटते । आसमान की ओर देखते हुए बोली मुझे तो लग रहा है कि आज में हवाओं को चीरते हुए इनके गरीब तक पहुंचा हूँ । उन्हें करीब से देखो, इनके बीच खेलूं तो मौसम वादा मेरी और देखने लगे । मैं देर तक उसे हैरान नजरों से देखता रहा । क्या ही वहीं प्रिया है जिसे मैं जानता था । उसकी बहकी बहकी बातें मुझे डरा नहीं थी । बोलो संजय को मोटर साइकिल का हैंडल पकडकर जोर से हिला रही थी । बैठी हूँ मैं की भावना नहीं तोड पाया । वो उछल कर बैठ गई । गाडियाँ भी मुश्किल से एक किलोमीटर भी नहीं पार कर पाई थी । बारिश की नदी नदी बूढी टपकना शुरू हो गई तो बारिश, बारिश और तेज मारेगी । मैं भी पूरी तरह जोशना चुका था । सडक पर बह रहे पानी को चीरते हुए बाइक हर पल अपनी गति तेज कर दी जा रही थी । तभी ॅरियर कुछ कहा तो बाइक को अब अब क्या हुआ? मैंने पूछा फॅमिली में तकलीफ हो रही है । उसको स्वर में हल्की सी शरारत ऍम उत्तरी मेरी और देखकर मुस्कुराई और फिर बगैर कुछ बोले हुए अपनी टांगों को बाइक के दोनों तरफ लटका कर पुरुषों की बहुत ही बैठ गए । चलो उसने मेरे कंधे पर हाथ मारा । मैंने बाइक पुराना दौडा दी । बाइक दौडाते ही उसे अपने हाथों को एक पर हवा में लहराया और फिर पूर्ण समर्पण के साथ हाथों को मेरी बाहों के नीचे से घुमाकर कंधों में प्रसादी हुई । पूरी मजबूती से मुझ से चिपक गई । उस वक्त उसका गिला यौवन बडी बेरहमी से हमारे बदलों के बीच पूछ रहा था । सडक में बीच बीच उभरे छोटे छोटे ब्रेकर के कारण आती बाइक में हल्की उछालें । बीच बीच बाइक की गति का तो रेत और मंदिर होना । फिर उसे उत्थापन और खामोश हुआ । बहुत देर तक बर्दाश्त नहीं कर पाया । इससे पहले की मेरे कदम रहते मजबूरन मुझे कडा रुख अपनाना पडा प्रयास कि बैठने का कौन सा तरीका है । मेरी कमर से अपने हाथ में डालो, ऊपर ही ऐसा बारिश के हर बूम जैसे शराब बन कर फिर रही हो । बदन में कुछ नशे में मेरी वो भी पड पढाने लगी । मुझे इस बात का भी पूरी तरह से था कि अगर कुछ पल और मैं ऐसे ही आदमी दबता रहा तो मैं किसी भी सीमा का उल्लंघन कर जाऊंगा । प्रिया चाहे चाहकर भी मुझे रोकना पाए । संजय अचानक उसका कसाव बढ गया । कपकपाती स्वर में बोली आज मत रोको मुझे आज मैं जी भर की डूब जाना चाहती हूँ । इन बारिश की नाजुक फुआरों में महसूस कर लेना चाहती हूँ । उन तमाम लंबू जिनसे आज तक मैं ज्ञान थी तो कहते उसके बीच वोट बेरी गले तक चुका है । उनके नाजुक फोन का एहसास हुआ था । खुद को संभालते हुए तो आपके सोलह बोला थी । कॅश दूरंटो ऍसे मेरा हाथ छूटने वाला था । मैंने जोरदार बारिश के बीच वहीं बाइक रोक दी उतरो । गाडी से वो गाडी से उतरकर खडी हो गई । मैंने वही सडक पर अपनी गाडी को साइड स्टैंड पर लगाई और उसकी और मुडते हुए भरपूर निगाहों से उसे देखा । सिर से पैर तक बारिश में भीग चुकी थी । पानी की बूंदे उसके माथे से सकती हुई पलकों पर ऐसे ठहर जाती कि वह पलकों को ठीक से उठा भी नहीं पा रही थी । क्या मैंने कहा था मेरी आवाज सुनकर जैसे ही उसने अपनी भारी पलकों को उठाया, पानी की बूंदें लडते हुई उसके गुलाबी होटलों में ऐसे सच गई जैसे गुलाब की पंखुडी में उसकी बूंदी ठहर गई हूँ । मेरे बदन की श्राव में जमा हूँ एक घंटे लगा । इससे पहले वो अनियंत्रित होता । मैंने खुद को संभालते हुए कहा तुम दोस्ती की सरहद को लांग रहेगी हो । जवाब में उसने कुछ नहीं कहा । अपने पैर के अंगूठे से दूसरे पैर के अंगूठे को रगडती हुई बस एक मेरी और देखती रही । उसका बदन ठंड से कांप रहा था । मैं बाइक की ओर बढते हुए बोला चलो हूँ गाडी में हमें शहर की तरफ लौटना है । संजय उसने आवाज नहीं इससे पहले मैं उसके और पलट कर देखता हूँ । बिजली की रफ्तार से आई और पीछे से मुझे जकड दिया सकते । हुए बोली आज मुझे किसी शरहद की आदमी अकेला हूँ । आज में सिर्फ एक लडकी बनी रहना चाहती हूँ जिसे फिलहाल एक लडकी की जरूरत है । प्रिया तुम पागल हो गई हूँ । मैंने खुद को छुडाने की कोशिश की अगर उसकी पकड और भी मजबूत होती गई जैसी उसके बेचैन हो तो ने मेरे गले के पिछले हिस्से कुछ हुआ । मेरा धैर्य करने लगा । ऍर में कहा ऍम हत्या संयम हो रहा हूँ । ऍम तेजी से घूमते हुए मुझे आगे से जकड रही थी । उसका सीना मेरे सीने को चुकने लगा । उसने मेरे सर को पकडकर अपनी और झुकाने की कोशिश की तो मैं चिंघाड था । रिया तो नहीं जानती तुम क्या कर रही हो? अगर कुछ उल्टा सीधा हो गया तो जिंदगी भर तुम मुझे कोसती रहोगी कभी नहीं कोसेंगे । संजय उसने पूरी दृढता से मुझे अपनी और खींचा । जो हो रहा है उसे होने दो । पागल हो जाऊंगी । मैं ही सडक है, जहाँ कोई भी कोई भी आ सकता है । प्रिया ने एक पल के लिए धरोवर देखा । फिर हर तरह के होटल से बोली यहाँ कोई नहीं आएगा । हम शहर से इतनी दूर हैं । सुनसान सडक है । उस पर भी तीस बारिश कौन जाएगा? यहाँ कहते हुए वो एक एक कर मेरी शर्ट की बटन खोलकर चली गई । फिर हर्बल के साथ मैं एक भयानक आपका दरिया बनता चला गया । देर तक बादल बरसते रहे । पानी भरी हवा की तेज बौछारें हमारे बादल से टकराती नहीं । रिकाॅॅर्ड जोर से बिजली कडकी और मैं प्रिया के बाद उन से अलग हो गया । भरता हूँ । खामोशी छा गया । चम्मच दिनों तक वहाँ बारिश की बूंदों की जड जरा हट के अलावा कोई आवाज नहीं हुई । मेरा हंसता हुआ चेहरा आसमा की और था । इसमें पानी की तुम्हारे नहला रही थी क्या सामने बैठी हुई तक मुझे देखे जा रही थी । उसकी आंखों में न तो कोई अफसोस था और नहीं पर ज्यादा अगर मैं चाहकर भी प्रिया उससे नजरे नहीं मिला पा रहा था । संजय अचानक भइया ने आवाज भी मैंने अपनी गर्दन घुमाकर उसकी और देखा । उसके होटलों में अब भी मुसकान बिखरी हुई थी । धीरे से बोली क्या सोच रहे हो? मैंने कोई जवाब नहीं दिया । मेरी नजरें जमीन के अंदर धंसी जा रही थी तो क्यों इस तरह गुनेहगार बानी बैठी हूँ । इस समय में तुम्हारी क्या गलती थी? उस समय उस की आवाज मुझे खेल की तरह चल रही थी । मैं उसका और अपना सामना नहीं कर पा रहा था । मैं भी शर्ट के बटन बंद करता हुआ लडखडाते कदमों से उठा और मोटरसाइकिल की और बढ गया । प्रिया वही बैठी थी । वो भी मुझे लगातार घूमती रही थी । मैंने गाडी को हम आकर उसका मुंह शहर की तरफ कर दिया । प्रिया तब भी नहीं थी तो मैंने खफा खफा नजर उसकी और देखा तो मेरे सारे को समझ गई और लगभग तोडती हुई आकर मेरे सामने खडी हो गई बोलिंग । संजय कल भी मेरी थी । बारिश में घूमने के लिए प्लानिंग करने से पहले ये भूल गई थी कि तुम दोस्त के अलावा एक लडके भी हूँ और मैं एक लडकी ऍम मैंने कहा ऍम अचानक से याद आया तो तेजी से मेरे पीछे की और दौडे । कंधे में दंगे हुए, पैंट को निकाला, पहना और शर्माते हुए मेरे सामने आकर एक बार फिर से खडी हो गई । इस बार मैंने उससे नजरें नहीं मिलाई । संजय उसने मुझे बुखार आ मैंने सुना कर दिया तो मेरे हाथ को पकडने की कोशिश की । मैंने जोर से उसका हाथ झटक दिया और पीछे झुकते हुए बोला पीछे क्या बीस प्रिया मुझे मच्छी हो । तुम्हारी फोन मत सब बर्दाश्त नहीं हो रही है । ठीक है नहीं छोडेंगे उसके ऊपर हाथ समेट लिए लेकिन अपनी गाडी में तो ले चल होगी या यही छोड जाने का इरादा है । टैक्सी भी नहीं मिलेगी । यहाँ पर बैठे मैंने कहा

मेरी अर्धांगिनी उसकी प्रेमिका - 33

उस घटना के बाद दो दिन गुजर गए । मैं कॉलेज नहीं गया कि जानते हुए भी कि मेरे और प्रिया के बीच उस दिन जो कुछ भी हुआ उसमें कम से कम मेरी कोई गलती नहीं है । फिर भी प्रक्रिया का सामना करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था । इस समय जब डायरी लिख रहा हूँ तो समझने की कोशिश कर रहा हूँ कि क्या वाकई वासना के समुन्दर में उठी लहरें इतनी प्रबल होती हैं इतनी अनियंत्रति जिनके सामने मानव का अतुलनीय मस्तिष्क भी कोऑर्डिनेटेड देता है । रिया को जितना मैं जानता हूँ, खुले मिजाज की जरूरत थी लेकिन उसमें खुद को लेकर इतना नियंत्रन खान की वो उस हद तक करने से खुद को रोक सके । रोका क्यों नहीं? ऐसे न जाने कितने सवाल मुझे कचोट रहे थे । तभी ऍम ऍम फोन बज उठा । राउंड मोबाइल की टॉपिंग स्विच ऑन करते हुए मैंने कहा था ये संजय साहब उन पर खुशबू की आवाज आ रही थी । उस दिन के मौसम का मिजाज कैसा था? किस दिन ऍम । आज पहली बार उसने मेरे लिए साहब जैसे शब्द का प्रयोग किया था । इस से पहले ये शब्द अक्सर प्रिया ही इस्तेमाल करती आई है । अरे जस्टिन नहीं नहीं बाइक लेकर पहली बार बाहर पिज्जा में, लेकिन निकले थे मेरे दिल धडक उठा सुना था उसने मेरी बात बीच में ही करती साहब की पिछली सीट भी भरी थी रियाद के साथ में उसकी जो हमें प्रियंका नाम आते ही मानव मोबाइल हाथ से छूटकर गिर पडेगा । मैंने खुद को संभालते हुए पूछा है ये बात तो मैं अच्छा इसमें बताइए ऍम लडखडा गई । मुझे उसके पूछने के अंदाज से पूरी तरह साफ हो गया कि वह भले ही बात को घुमा फिराकर कहने की कोशिश कर रही हो, लेकिन उस घटना के बारे में उसे भी जानकारी है । उन पर पल भर के लिए खामोशी छाई रही है । उसमें कोई जवाब नहीं दिया । शायद वो कुछ छुपाने की कोशिश कर रही थी । कुछ वो मुझे ही बोलना पडा । मैं तुमसे शिवक मिलना चाहता हूँ । इससे पहले कि मामला आगे बढे, मैं खुशबू के सामने उस दिन की हकीकत गोल देना चाहता था । कहाँ उससे पूछा नहीं भी जहाँ पहुँचा हूँ मैं आपकी कमरे हूँ । ठीक है मैं तुम्हारा इंतजार कर रहा हूँ और उसने फोन काट दिया । अभी दस मिनट भी नहीं गुजरे होंगे कि अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई । इससे पहले मैं दरवाजा खोलता में सोचने लगा । यही क्या इतनी जल्दी आ गई? लेकिन उन तो स्त्री ॅ किया था ठट्टा दोबारा दूसरा कोई अरे थोडा रुको मैं जरा झल्लाकर बोला खोल रहा हूँ । हाई संजय दरवाजा खुलते ही जानी पहचानी की आवाज मेरे कानों में गूंज पडेगी । यह तो मेरे मुझे आकस्मात ही दबी सी ठीक निकल गई । पदम थरथरा गया? जवाब वो सिर्फ मुस्कराई, वहाँ कुछ नहीं क्या मेरे यहाँ जाना कहाँ जाने से तो मैं बुरा तो नहीं लगा? संजय मेरी बात बीच में ही काटते हुए बोले तो दो दिन से कॉलेज नहीं है तो सोचा हम खुद ही तुमसे मिलने तो तुम्हें तो हमारी याद आने सही अंदर जाओ । मैंने बेरुखी भरे स्वर में कहा थैंक यूँ सामने बडी कुर्सी खुद ही सरकार कर वह बैठ गई । थोडी देर तक मेरे कमरे के चारों तरफ देखती रही जैसे कुछ खोज रही हो । अगर मेरी नजरें उसके चेहरे पर टिकी रही । मुझे उम्मीद थी शायद उस घटना के लिए माफी मांगी लेकिन उसने देर तक कुछ नहीं कहा । क्या उसकी चुप्पी जब मुझसे बर्दाश्त नहीं हुई तो मुझे बोलना पडा । कोई नहीं आने की क्यों मेरी और देखने लगी और बोले तो महारे आने के लिए भी मुझे वजह चाहिए । टीम मेरा वो मतलब नहीं था । संजय मैं जानती हूँ की तुम मेरा यहाँ शायद अच्छा नहीं लगा मगर तो दो दिन से कॉलेज नहीं आए तो मैं क्या करती है? बॅाल अभी हाँ खुशबू आने वाली है इसलिए पूछ रहा था । मैंने धीरे से कहा तो उम्मीद थी और ऐसे देखी जिससे मुझे निकल जाएगी दोनों को इस तरह यहाँ आकर वो पूजा सीधा सोच सकती है । मेरे स्वर्ग के कानों पर पडे तो हंस पडी । बोली संजय हम दोनों आपस में से दोस्त है । इस बात को बहुत अच्छे से जानती है । बोलते ऐसी कुछ नहीं सोचने वाली मैं खामोश हो गया । मेरी नजर एक बार फिर उसके चेहरे को पढने की कोशिश करने लगी । कितनी बदल चुकी है प्रिया तो प्रिया तो कभी सिद्धांतों की बातें किया करती थी । रिश्तों की सीमाएं लांघने में भी गुरेज नहीं कर रही है । चंद पलों तक कमरे में खामोशी छाई रही । प्रिया मुझे बोलना पडा तो उस घटना पर शराबी अफसोस नहीं है । तुम याद रखना चाहिए कि तुम किसी की मंगेतर हो । संजय के तो मेरी बात को समझ सकती हूँ । वो ही कर गंभीर हो गई तो बिना मेरी और देखे हुए कहने लगी उस घटना के बाद हमें क्या करवाया है काश तुम समझ पाते हो अगर तुम समझते हैं तो ये सवाल तो मार्च कम से कम हम से तो नहीं करते हूँ । मतलब मेरा हूँ । गले में ही अटक गया संजय अचानक उसके होटल में रुकी से मुस्कानों भराई आंखों में उबल रहे पानी को थामते हुए बोली क्या तुम यकीन करोगे? ये सब अचानक होकर भी अचानक ही हुआ । सच्चाई ये है कि वह सैकडों वेदनाओं और हजारों आंसूओं की कीमत थी । ये सब करने के बाद हमारे बारे में तुम्हारी राय बदल जाएगी । हम जानते थे फिर भी क्या हमें उसकी आंखों से पानी की चंद बूंदें टपक पडी । रुंधे हुए स्वर में बोली तो बताओ उससे पहले हम क्या थे तुम्हारे लिए? आज तो हम से किस तरह बात कर रहे हो? आप पहले प्रश्न सूचक निगाहों उसकी और देखा नहीं तुम ये कहने की कोशिश तो नहीं कर रही होगी । हमारे बीच उससे जो कुछ भी हुआ फिर मेरी गलती थी । नहीं संजय मैं ऐसा कुछ नहीं सोचती । उसके स्वर में अचानक बढता गया । उस दिन जो कुछ भी हुआ उसमें हमारी मर्जी की और इसी अगर तुम गलती कहते हो तो गलती भी हमारी ही थी । मगर संजय पूरे होशोहवास में हमने अपनी नादानी की वो कीमत चुकाई, कीमत भी आके फैल गई । हडबडाकर बोला ये तुम किस भाषा में बात कर रही हूँ? प्रिया मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है । तुम ही आदि । संजय उसी पार्क में तो हम दे रहे थे और हम ने उसे ठुकरा दिया था । मगर मैं इस बात को कब का भूल हाँ सच है । ये उस नादानी की कीमत ही थी । उसमें बीच में ही मेरी बात कार्ड मेरी और गहरी निगाहों से देखते हुए बोली संजय बच्ची नहीं हूँ, मैं सब कुछ समझती है । उस घटना के बाद तुम्हारे दिल पर क्या गुजरी होगी? मुझे एहसास है जानते हूँ उसने । पर फिर अपनी नजरे झुका नहीं । मैंने किसी बहुत याद किताब में पढा था कि औरत अगर एक पर किसी मर्ज की नीचे आ जाती हैं तो जिंदगी भर फिर उससे ऊपर नहीं उठ पाती । अगर ये सच है ना । संजय तो में अपने इस फैसले पर कभी अफसोस ही करूंगी दिया । मैं कुछ समझ नहीं पा रहा था मगर उसके आंसुओं को देखकर मेरा हरा भरा है यहां पागल पाॅड मैं कुछ समझ नहीं पा रहा हूँ । संजय मेरी बात को अनसुना करते हुए वो बोले जिंदगी में भले ही तो में मुझे लाख गुना बेहतर लडकियाँ चूना मिल जाती है । मगर उस दिन अगर तुम मेरे शरीर को ना पा लेती तो शायद नए वर्ष के पहले दिन जब तो उससे मिलने पार्क में आए थे । मेरे द्वारा फुल ठुकराने की उस घटना को उस अपमान के अहसास को जिंदगी भर ना भूल पाते । इसलिए अच्छा है ना कि दर्द । जिंदगी भर मैं सोती रहूँ । सच कहूँ तो उस वक्त मैं कुछ समझ नहीं पा रहा था की प्रिया क्या कहने की कोशिश कर रही है । वो वाकई डरा हुआ था । खुशबू कभी भी आ सकती थी । मैं चाहता था कि प्रिया किसी भी तरह कम से कम उस वक्त वहाँ से चले जायेंगे । मैं अंदर आ सकती हूँ दरवाजे पर अगर स्वाती आवाज को जुटे, आवाज खुशबू की थी भरे आओ मैं झटके से कुर्सी से उठकर खडा हो गया तो अंदर आ गई । मैं तो मैंने अपनी कुर्सी की ओर इशारा करते हुए कहा खुद बिस्तर पर बैठ गया । दरअसल मेरे घर में सिर्फ दो ही कुर्सियां थी प्रिया एकता मेरी और देखे जा रही शायद से मेरा खुशबू के लिए विशिष्ट व्यवहार अच्छा नहीं लगा । उस दौरान प्रिया और खुशबू के बीच कोई संवाद नहीं हुआ । सिर्फ पल भर के लिए उनकी आपस में निगाहें टकराई । खुशबू के हो टोमॅटो ठीक इसी मुस्कान बिखर गई जबकि प्रिया के चेहरे पर सूनापन छाया रहा । उनके बीच की खामोशी मुझे परेशान कर सकती थी । नहीं खुशबू कप्रिया और मेरे बीच हुई उस वक्त तक पता तो नहीं चल गया । इस वहाँ वो भी में बहुत देर तक खामोशी छाई रही । मुझे लगता है वो खामोशी तोडते हुए मैंने कहा प्रिया हमें जाना चाहिए । वैसे भी काफी देर हो गयी है । तुम्हारे घर वाले परेशान हो रहे होंगे मेरे लिए अस्वाभाविक शब्द प्रिया की कानून पर पडे तो वह मेरा सवाल जवाब के उठकर खडी हो गए । हरे संजय प्रिया को क्यों बना रहे हूँ खुशबू हैरान होकर मेरी और देखिए मैंने कोई जवाब नहीं दिया । संजय मुझे भगाने ही रहा है । मैं खुद जा रही हूँ । चलते चलते प्रिया ने बेहद तीखे अंदाज में मेरी और पूरा ऍम नहीं मिलाई । उसके जाने के बाद मैंने दरवाजा बंद कर के जैसे ही पालता कुछ मुस्कुराते हुए बोले यहाँ भी प्रिया हमसे पहले पहुंच गई । मतलब मेरी सैलॅरी कुछ नहीं, कुछ नहीं । मेरे चेहरे को गौर से देखा तो फोन पर कुछ कह रहे थे । वहाँ पे थोडी देर सोचने के बाद मुझे याद आया तो नहीं । किसने बताया था कि उस दिन साथ में जाती थी चीफ में ही पूछने के लिए मुझे बुलाया था कुछ के चेहरे पर कुछ ऐसी ही दौडाई और कुछ नहीं होंगे । और क्या मुझे लगा तुम गुलाब लाख दोगे? कुछ कम होंगे कुछ चुनाव के, मगर तुम तो उससे अपने हो भेज लिए । मैं कुछ समझा नहीं मैं प्रश्न सूचक नजर उसकी और देखने लगा । हाँ वो संजय जी मुँह पडी पी आ गए आपको बुद्धू कहती है तो गलत नहीं कहती । कहती हुई वह कुर्सी से उठी और मचलती हुई मेरी गोद में समा गयी । मेरे गानों को अपनी उंगलियों से छूटे हुए बोले मैं कब से तुम से मिलने के लिए उतावली थी और तू कहाँ अभी तक प्रिया की बातों में उलझे हुए हो । मतलब शादी करोगे हमसे की क्या बात है? मैं कुछ पूछ रहा हूँ तुम से मैं भी तो कुछ पूछ रही हूँ की शादी करो हम से ऍम

मेरी अर्धांगिनी उसकी प्रेमिका - 34

अगले दिन शाम के लगभग चार बज रहे थे । अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई । मेरा दिल धक मचा हो ना हो यह प्रिया ही है । तो उन्हें मोदी में रखी हुई किताब को बिस्तर में रखते हुए मैंने पूछा अमा यार, हम है हम तुम दरवाजा खोलो । स्टेशन मैंने फटाक से उठकर दरवाजा खोल दिया । अच्छा हुआ तो आ गए, क्या हूँ आज हमारे घर में आग लग गई क्या अब वहाँ बैठो । मैंने उसकी छुट्टी ले पर ध्यान नहीं दिया तो हम जाएंगे ही । अगर पहले तुम बताओ आजकल तुम हमारे अपने कमरे में अंडा अंडा दे रखा है । क्या कोई इधर उधर देखने लगा कह रहे हैं यहाँ अरे अंडे हमने सुना कई दिनों से कॉलेज भी नहीं जा रही हूँ । किसान मैंने बता रहा हूँ । मजाक छोडो हमारी बात सुनो । अब हम यहाँ तुम्हारी बात ही सुनने आए । मगर पहले तुम हमारी चुनाव कुर्सी का चक्कर काटते हुए मेरे बगल में बैठ गया । आस पर रहते हुए बोला बाजी के सत्तर में तुम अपनी पढाई चौपट करने में कहे । लगे रहे इंजीनियरिंग अंतिम सत्र है, पास कर लो । उसके बाद कहीं नौकरी नौकरी मिल जाएगी तो यार छोकरी भी खोल लेना वो लिया । कुछ हुआ तो मैंने कहा मैं बोलू नहीं अभी कहना तो बहुत कुछ था मगर कोई नहीं । पहले तुम ही बोलो तो मेरी और मु करके बैठ गया हूँ । मैंने कहा तो आज खुश हुआ कि यहाँ प्रिया भी आई थी । कहते हुए अचानक उसकी नजर पांसी अलमारी में रखे हुए विस्फोट पर चली गई । तेजी से उठा ऍम भूमि डाल दिया । बोला ये सब हम जानते हैं । कोई नया हो तो बताओ ये सब तुम्हें कैसे पता? अरे तुम्हारे मकान मालिक कल उसी समय नीचे बना रहे थे और क्या एक बार फिर मेरी और पालता? वो तो ऊपर भी आ रहे थे । तभी हम उधर से आ गए और उन्हें रोक लिया । मैंने उनसे कहा कि आप रहने दीजिए, हम समझाएंगे अपने दोस्त को । फिर कल हम ही नहीं पाए । मैं कोचिंग में आज टेस्ट था और तुम जानते हो हम किसान के बेटे हैं इसलिए पढाई के साथ कोई बकैती नहीं कर सकते हैं । हम जानते हैं तो किसान के बेटे और से पार बार दोहराने की जरूरत नहीं है । समझे हूँ आॅडीशन हम बहुत परेशान हैं इसलिए पीस अभी कोई काम ही नहीं । अंकल बक बक करते हैं तो उन्हें करना तो उन्हें इतनी गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है । वैसे भी हम इस रूम को जल्दी छोडने वाले हैं । कब अचानक उसके कान खडे हो गए और तुम जाकर आ रही हूँ तो वो सब छोडो जब जाएंगे तो बता देंगे फिलहाल अभी की सुनो मगर तुम होना है एक का एक मुझ पर चिल्ला बडा अच्छा बोला उसने अपने हथियार डाल दिए हो तो तुम जानते हो ना तुम्हारी निगाहें वो कैसी लडकी है वो सब हम बता देंगे लेकिन तुम बताओ ये सब पूछ कह रहे हो हमारी आज शादी करना चाह रहे हैं उससे और कहाँ पूछेंगे सच्ची अचानक मुखर्जी जोडकर खडा हो गया । हम कह रहे थे ना की खुशबू प्रिया से बेहतर है । वो तो उम्मीद है कि प्रिया को अपने कमरे में घुसने दिया । अरे हम होते तो बाबू जी की कसम उसे दरवाजे से लौटा देते हैं । उसमें पार्क में इतने लोगों के सामने फूल ठुकराकर जो तुम्हारी इज्जत उतारी चाहिए उसे हम अब तक नहीं भूल पाए । उस संजय तो यहाँ इसलिए आएगी उसी गलती की माफी मांग आप बात है यार तुम तो उसे घुटनों पर ला दिए । बहुत हवा में उड रही थी बनाया हम उसके बारे में क्यों बात कर रहे हैं । ऍम भी नाराज था मगर न जाने क्यु प्रिया के बारे में उस की ऐसी बात सुनकर मुझे अच्छा नहीं लगा । मैंने कहा पैसे भी वह यहाँ नहीं है । तभी एकाएक उसके फोन की घंटी बजती है । वो फिर मिलने का संकेत करता हुआ वहाँ से चला गया । मैं दरवाजा बंद कर के जैसी लौटा मेरे फोन की घंटी घनघना उठीं नंबर के पीछे होगा था । मैंने फोन उठा लिया । लाइन पर क्रिया थे । संजय उधर से आवाज आई मेरी छोटी सी गलती का इतना बडा सिला दूंगी तुम जानते नहीं जब तू कॉलेज नहीं आती तो मैं कैसा महसूस करती हूँ । संजय मेरे सबसे अच्छे दोस्त हो इसलिए मेरे लिए तो कॉलेज में छोडो पीछे जो भी कुछ हुआ है उसे गुजरा हुआ कल का एक हादसा समझकर भूल जाओ ना तुम जानते हो मेरी सगाई हो चुकी है और चंद दिनों में शादी भी होने वाली है । फिर दिल्ली चली जाऊंगी । उसके बाद में कहाँ होंगी । कहते कहते अचानक उसका कलर हो गया । रोहासी आवाज में कहने लगे संजय तुम चाहूँ तो मुझे कोई सजा दे दो मुझे मगर भगवान के लिए तो आपकी पढाई मत घर । अब करूँ तो कॉलेज जाया करो । संजय आया करो कॉलेज अपने अंतिम शब्दों उसने मेरे सामने पीडा का सहारा समुन्दर रेल दिया । इसमें समय ही नहीं पाया आऊंगा । ऍम पडेगा वो देर तक कुछ बोलती नहीं मगर मैं कुछ भी नहीं सुन पा रहा था । इतना दर्द, इतनी वेदना, इतनी विरह, इतना पश्चाताप सच कहूँ तो उस पर मुझे ऐसा लगा जैसे किसी ने आएगी । उसके लिए मेरे सारे शिकवे गिले मन से निकालकर कहीं दूर फेंक दिया हूँ । उसके फोन कटने के बाद भी मेरी आंखें जहाँ हजार होती रही और मैं सुकून के सागर में समता चला गया ।

मेरी अर्धांगनी उसकी प्रेमिका - 35

अगले दिन में कॉलेज गया मगर साइकिल से बाइक ले जाने की हिम्मत नहीं पडी । दिल घबराया हुआ था आपने पहले दिन ही इसी बाइक ने मुझे किस मोड पर लाकर खडा कर दिया था । मैं जो भी कॉलेज की सीमा में दाखिल हुआ, एक मुझे साइकिल रोकने बडी प्रिया कर मेरे सामने खडी हो गई हूँ और यहाँ गेट के पास इसका इंतजार कर रही हूँ । तुम्हारा वो भरी भरी आंखों से मुझे ऐसे निहारा जैसे मैं वर्षों बाद किसी काम से लौटा हूं । बेहद कमजोर सफर में बोली पूछ रही थी तुम आओगे भी की नहीं । प्रिया का ये एक नया रूप था । उससे पहले मैंने उसे इतना मायूस कभी नहीं देखा हूँ । मैंने कहा तो अपने आंसुओं को थामते हुए मेरे पीछे पीछे चल रही है । अभी हम दस कदम चल जी की अचानक वो ठीक थक गई । क्या हुआ? मैंने पूछा तो अभी साइकिल खडी कर क्या है? मैं कक्षा में चलती हूँ । ऍफ बडे मैंने गौर किया शायद वो अपने आंसू नहीं संभाल पा रही थी । उन्होंने दुपट्टे में पहुंचते हुए अचानक कक्षा की और भागने लगे । मैंने भी नहीं रोका । कक्षा में पहुंचा तो एक कई आवास कूच पडी थी । किसी ने कहा था अरे संजय भाई उस दिन की दोपहर के बाद गायब हुए तो तीन चार दिन देखे भी नहीं रहा थे तो कहीं से आवाज आई । कहाँ हो गए थे संजय जी? कुछ ने कहा संजय उधर कहाँ जा रहे हो जरा? हम सभी तो मिल तो इस तरह कई आवाजों को अनसुनी करता हुआ मैं सीधे प्रिया के पास पहुंच गया । एक में इसका सहारा लिए हुए वह खडी एक तक मेरी और देखे जा रही थी । उस वक्त हर किसी की निगाहें हम पट की थी । इस बात का प्रिया को बिल्कुल अहसास नहीं था । मैं चलते शर्माते हुए जाकर उसके पास खडा हो गया । फिर हम देर तक खामोश रहे । सिंह जी उसके आवाज की खनक से अकस्मात है । हम दोनों के बीच की खामोशी टूट कर बिखर गई । क्यूँकि हंसी के साथ को बोले एक शायरी पडने का मूल्य पर हूँ । संजीत में लगता है कि क्लास के किशोर शायरी का माहौल है तो पीछे बगीचे में चले । वैसे भी कक्षा शुरू होने में भी काफी वक्त है । ठीक है, हमने अपना बैग उठाया और कॉलेज की इमारत के पीछे बने बागीचे में चले गए । पास लगी बेंच परफॅार्म मैंने उसकी और देखा था । अब चुनाव उसमें भरपूर लिखा से मेरी और देखा । फिर होली लंबा लंबा वक्त गुजर जाएगा । हाथों से किसी का दामन छूट जाएगा । अभी वक्त है दो बातें कर लीजिए । हमें पता है आपकी जिंदगी में कल कोई और आएगा । उसकी अल्फांस मेरे कानों से टकरा है तो मेरी आंखों में आंसू छलक पडे । थोडी देर तक बिना कुछ कहे उसकी आंखों से एक तक देखता रहा तो मेरी आंखों में क्या देख रहे हैं? वो शर्मा गई । कुछ खोज रहा हूँ मैं । क्या वो असहज हो गई? मैंने नजरें नहीं हटाई । एक बात बताओ क्या? मैंने पूछा खाना उस टॉपिक गर्दन झुकानी, तुम्हें उससे प्यार हो गया ना? क्या क्या कहा तो वो ऐसे पेश आई जैसे उसमें कुछ सुना ही ना हो । मैंने अपने शब्दों को दोहराया नहीं, बस उसके चेहरे पर बनती बिगडती लकीरों को देखता रहा हूँ । थोडी देर तक खामोश बैंक पर अपनी उंगलियों से कुछ लिखने का प्रयास करती रहीं । फिर एक का एक लंबी सौ से बढते हुए भावुक हो गई । बोली संजय अगर करती भी होगी तो उसका कोई मतलब नहीं है । जिंदगी के दोनों छोर बहुत आगे निकल गए हैं । दिया मैंने पुकारा, उसने नजर नहीं उठाई । एक काम करो कि संजय चप्पलों की खामोशी के बाद उसने मेरी और देखा । अगर हम तुम्हारे प्यार में कभी कमजोर पर जाएँ, तुम्हारे सामने गिर गिर जाए तो उसे अपने प्यार मांगे । मगर तुम कमजोर मत पडना । खुशबू हमारी दोस्त है, अच्छी लडकी है उसे हमारी कभी मच्छू ना हम जानते हैं वो तुम से बहुत प्यार करती है । शायद हम से भी ज्यादा प्रिया की बातें वैसे भी मुझे कुछ काम ही हो जाती हैं । पता नहीं वो और मेरा दोस्त राज कौनसी किताबे पढते हैं । उसकी बातें सुनकर कुछ देर के लिए मैं बदहवास उसकी और देखता रहा । एक बात और कहीं संजय बुरा तो नहीं मानोगे । थोडी देर तक चुप रहने के बाद वह उन्हें कहने लगे, मुझे बचपन से ही उपन्यास पढने का शौक रहा है । मैंने बहुत चली खूब पडा है । केआरके मसले में सब ने एक ही बात लिखी है । प्यार वो जज्बात हैं जो आंखों से शुरू होकर दिल में उतर जाता है । मैं बचपन से ही लडकों के साथ नहीं हूँ । मगर मैं आज तक किसी भी लडकी के साथ ऐसा महसूस नहीं किया जिससे मैं बिहार कह सकता हूँ और सच कहूँ तो तुम भी उन्हीं में से थे । शायद इसलिए मुझे कभी फर्क नहीं पडा कि मेरे घर वाले मेरी शादी कहाँ कर रहे हैं? मैं सोचती थी कि जिंदगी ही तो जानी है, कहीं भी गुजार लेंगे और संघीय सच भी है । एक बार बच्चे हो गए । फिर कहा याद रहता है कि आपके बाप में आपको किसकी सांत्वाना दिया है । जिन बच्चों को अपने अपने गर्भ से पैदा किया, फिर वही आपकी पूरी दुनिया बन जाते हैं । फिर किसी लडकी के लिए क्यों बिना वजह परिवार को दुखी कहना वहाँ गई है? मेरे पास उन की बातों का कोई जवाब नहीं था । मैं चुप रहा । माॅस् वो बिना रुके अपनी बात जारी रहेंगी । मुझे प्यार का पहला एहसास कब हुआ? जब तुमने मेरे शरीर को छुआ, उसी झकझोरा हर रिश्ते से दूर सिर्फ एक लडका बनकर मुझे किसी की बहन या बेटी नहीं बल्कि सिर्फ एक लडकी होने का एहसास कराया । लेकिन क्या है? तो मैं तो कहा था कि वो तुम्हारी नादानी की कीमत थी । हाँ संजय वो सच था मगर आधा भेजा लाश की तरह ढांचो सीट पर बैठ गई । बोली बाकी आधा सच मुझे वह कीमत चुकाने के बाद पता चला तब जब मुझे तुमसे प्यार हो गया गया । अचानक मेरे दिल की धडकनें बढ गई । उसके झुकते मैंने कहा तुम जानते हो ना कि मेरे और खुशबू के बीच क्या है और उसे मैं दूसरी डी तू बनाने के लिए तैयार नहीं होगा । तुम घबराओ नहीं संजय अब हम लौटकर तो भारी और खुशबू के बीच नहीं आने वाले हैं । सुधाकर से शादी करके हम दिल्ली चले जाएंगे और फिर वहीं बस जाएंगे । उसकी आंखें एक बार फिर चला । बडी तो क्या होगी? तो हम तुम्हारे दोस्त बने रहेंगे । पढना उस हक को भी खुशी खुशी छोड देंगे । लेकिन मानव हमारा दिल बहुत बडा है । आखिरी शब्दों में तो वोटों पर एक रूम किसी मुस्कान तैर पढेंगे नहीं प्रिया दोस्ती का हक छोडने के लिए मैं तो कभी नहीं करूँगा । चलो अच्छा है । संजय इतना तो हक दे रहे हो गया है । मैं हर उठा वो पल सचमुच अकल्पनीय थे । मैं अब जब डायरी लिख रहा हूँ तो समझने की कोशिश कर रहा हूँ । उस वक्त मैं इसके बारे में ज्यादा सोच रहा था । रिया के बारे में या फिर पशु बहुत मेरे दिल के करीब ॅ अचानक उठकर खडी हो गई । पुराने अंदाज मेरा हाथ पकडकर खींचते हुए बोली चलो नहीं बाहर बैठते हैं । जैसे ही हमारी निगाहें टकराई उसने झटके से मेरा हाथ छोड दिया । क्या हुआ मैं चौंक पडा । कुछ नहीं उससे नजरे झुका ली और बोली गलती से हमने तुम्हारा हाथ पकड लिया । भूल गई थी कि अब हम से दोस्त है तो मुझे गुरेज गुरेज करो ला रही हूँ । प्रिया अचानक नहीं आपको बाल पडी । मैंने उसके हथेलियों को अपनी हथेलियों में भर लिया और बोला दोस्ती की सीमाएं कितनी भी सिमटी हुई नहीं होती है कि तुम मेरा हाथ भी नहीं कर सकते हो । मेरी आवाज मेरे गले में घुसने लगे । कहीं तो मुझे किसी बात का ऐसा तो नहीं दिला रही हूँ अहसास पुरवासी नजरों से मेरी और देखी बोलिंग कैसी पागलपन की बातें कर रहे हो तुम? संजय हम तुम्हें कौन सा है साल दिलाएंगे आज सच यह हैं की हम खुद एक अहसास बनकर रह गए हैं । उसकी आंखें आंसुओं को संभाल नहीं पाई । पानी का नाम ना खतरा । उसके गानों तक सडक आया । कहने लगी हम ठीक ही कह रहे हैं लेकिन संजय एक बात मानों कि हमारी आप बोलो । मैं हीरो था हम दो सेना ये हक कब से कभी मच्छी ना हो? कभी नहीं और तुम्हारे हाथ पकडने का अधिकार भी है । नहीं संजय हम इतने खुदगर्ज नहीं है । अम् रिश्ते की हद समझते हैं । कहते हैं एक का एक उसके होठों पर मेरा भरी मुस्कान तैर बडी अपनी बात को जारी रखते हुए बोलिए प्यार इंसान को उतना ही सीखा देता है जितना नफरत उससे छीन लेता है । इसलिए अब समझदार हो गए हैं । मैं समझ नहीं पा रहा था कि भाई क्या करूँ । खुद रूम जो उसे समझाओ कितनी पागल सी बन चुकी थी वो दोस्ती की सीमाएं समेटकर उसने उसे कितना छोटा बना दिया । मैं एक झटके से उसे अपनी और खींचा और अपनी छाती से चलता लिया । फिर इतना दबाव इतना दबाव की जैसे मुझे खुद भी सामान लेना चाहता हूँ मेरे दिल में उस वक्त उसके लिए सिर्फ प्यार ही प्यार था ना उससे बता देना चाहता था कि ये सीमाएं तो वहाँ तक हो सकती हैं । तो थोडी देर तक मेरी बाहों में ऐसे पिसती रही जैसे से सारी दुनिया मिल गई हो । फिर हो हमला तो छटपटाकर वो चीज पडी सिंह जी हमें छोडो किसी और की अमानत है हम ऍम ढीला पडा तो झटके से अलग हो गई । कुछ दिनों तक हम एक दूसरे की और देखते रहे । फिर वो भरे मन से बोली संजय अगर तुम हमें इतना अधिकार दे दोगे तो हमें मोहब्बत हो जाएगी । तुम से फिर ये मत कहना कि हम खुशबू की जगह लेने की कोशिश कर रहे हैं । क्या मन ही मन में तडप उठा कॅश तुम्हारी सगाई ना हुई होती । काश मैं तुम्हारे लिए एक और खुशबू को कुर्बान कर पाता ।

मेरी अर्धांगनी उसकी प्रेमिका - 36

कॉलेज से लौटकर मैं अपनी साइकिल खडी कर रहा था तभी मुझे ऐसा सुबह के मेरे पीछे कोई है छोडकर देखा पीछे खुशबू खडी थी अच्छाई नजर मिलाते हैं वो मुस्कुरा पडी तो इस वक्त अचानक उसे वहाँ देखकर में चौक पडा क्यों नहीं होना चाहिए था? नहीं मेरा वो मतलब नहीं था अपने शब्दों को मैंने समय क्या, उसने आगे कुछ नहीं कहा । ऊपर आओ साइकिल पर ताला लगाकर सीढियों की ओर बढते हुए मैंने कहा नहीं मैं जल्दी में हूँ ऊपर नहीं पाओंगे ऊपर नहीं होगी । पलट कर उसकी और देखा फिर क्यों आई थी मम्मी का संदेश लाई थी उन्होंने आपको बुलाया है वो उसके लिए तो तुम फोन भी कर सकती थी । फिर अचानक जब उसके शब्दों पर ध्यान गया तो मैं हर बडा उठा क्या था तो मैं तुम्हारी मम्मी ने बताया मुझे जो हूँ मेरे इस तरह हडबडाने पर वो अपने हसते हुए वोटों को अपनी हथेलियों में छुपा लिया । बोली ऍसे पूछ लेना लेकिन यू अकस्मात अब सारे सवाल आप यही कर लेंगे घर तो ये कहती हुई वह बिजली की रफ्तार से पीछे की ओर बडी और हाँ पहुंचाना ठहरी जरा जल्दी आइयेगा अभी हम चलते हैं वो अपनी आदत के मुताबिक हस्ती खिलखिलाती हुई फिर लौटकर मैं ऊपर आया नहाया कपडे बदले और खुशबू के घर के लिए निकल पडा है उसके घर पर मैं कोई घंटा बैठा रहूंगा । उस दौरान काफी बातें होती रही । कई सवाल भी उठे । मसलन आपके पिताजी क्या करते हैं? मैंने साफ तौर पर कह दिया वो मेरे लिए मर चुके हैं । मेरी बचपन से ही गुजर गई थी इसलिए समझे अब मैं अकेला हूँ । इस दुनिया में पिता से नाराजगी का कारण मैंने बताने से साफ इंकार कर दिया । वो लोग अच्छा भर मेरे जज्बातों को टटोलते रहे । हर मुद्दे को एक नया मोड देते हुए पूछा सरकारी कब की रखने आप जब चाहे कहते हुए मैंने खुशबू की और देखा वो धीरे से उसका पडी ।

मेरी अर्धांगनी उसकी प्रेमिका - 37

सगाई की रस्म पूरी होते ही सबसे पहले मैंने खबर प्रिया को दी । ये खबर सुनते ही वह चलना उठे । बधाई और संजय । बधाई हो खुशी से वाकई उसका कलर उडाया था । हमारी साॅल्वर खुश होगी । मेरे लिए विश्वास करने लायक बात बिल्कुल नहीं थी । अगर उस वक्त उसे अपनी माँ के द्वारा किसी जरूरी काम से पुकारा ना गया होता । उद्यत तक वो खिलखिला खिलखिलाकर उससे बातें करती रहती है । डायरी देखते हुए अब तो मैं याद करने की कोशिश कर रहा हूँ तो ज्यादा आ रहा है । शायद उसने यही कहा था । बिलकुल ही कहा था संजय मम्मी, मुझे बुक आ रही है । इस वक्त मुझे जाना होगा । मैं अभी तुम से बात नहीं कर सकती । वैसे भी मेरी तबियत भी कुछ ठीक नहीं है । क्या हुआ? मैंने पूछने की कोशिश की तो शायद हो । उसके हाथ से गिर गया था । फोन कटने से पहले जोर की आवाज आई थी । जैसे किसी ने जानबूझकर जोर से फोन पटक दिया हो । वो अगले तीन चार दिनों तक कॉलेज नहीं आ पाई । मैं फोन पर उससे बात करने की कोशिश की, लेकिन वो फोन पर पहले तो नहीं आई । मैंने सब की तो सहना पडा । उसने मुझे कहा बात नहीं किए धूकर बोली संजय मुझे तेज बुखार है । मैं अभी बात करने की स्थिति में नहीं हूँ । वो कट गया । कम्बख्त बुखार भी कितना कमजोर बना दिया है । उसकी आवाज को को भी कोई बदल दी गई थी । हालांकि मैं बाद में सोच रहा हूँ कि क्या उसे सब कुछ बुखार था या फिर मेरी सगाई की खबर में उसे तोड दिया था ।

मेरी अर्धांगनी उसकी प्रेमिका - 38

क्या यार संजीव सगाई कर ली और हमें बुलाया भी नहीं । एक फोन पर राज कर ढाका गूंज उठा । राष्ट्र हूँ आश्चर्य मेरा मुंह खुला रह गया । पूरे साल बर्बाद ज्यादा ही मेरी रहा हूँ । आज कल मैं कुर्सी से उठकर खडा हो गया था । दिल्ली से बोल रहा हूँ दिल्ली उन दिल्ली में उस वक्त हाँ उसके हंसने का स्वर सुनाई दिया । राज्य बात पूछूं मुझे से कौन सा गुना हो गया था । अचानक मेरे मन में शिकायत का भाव आ गया । तुम चुपके से ले निकल गए और जाने से पहले एक बार मिलने की कोशिश भी नहीं कि कम से कम उन पर ही बता दिया था । ॅ पल भर के लिए उसके स्वर में गंभीरता गई । रसल सबकुछ अचानक ही हो गया था । शाम को मेरे चचेरे भाई का फोन आया और उन्होंने कहा कि मैं अगली सुबह ही दिल्ली के लिए निकल पडो और जब वहां पहुंचा तो पता लगा भैया मुझे वहाँ हमेशा रहने के लिए बुला रहे थे और हमने उनकी बात मान भी ली और एक कम से कम अपनी पढाई पूरी कर लेते । फिर दिल्ली चले जाते हैं । दिल्ली थोडी ना कहीं जाने वाली थी, नहीं यार, सच कहूँ तो मेरा मन पढाई में नहीं लग रहा था । जाने कैसी घुटन सी महसूस होने लगी थी मुझे और ये बात नहीं अभी जान चुके थे कि मैं पढने का इरादा छोड चुका हूँ तो हमने बुला लिया हूँ । क्या कर रहे हो तो वहाँ ही है की एक्सपोर्ट कंपनी है बस उसी की जिम्मेदारी संभाल रहा हूँ । एक्सपोर्ट कंपनी तुम्हारी अपनी आश्चर्य व्यक्त करते हुए मैंने कहा हूँ कह सकते हो । बेहद सधे हुए अंदाज में उसने जवाब दिया तो तुम बडे आदमी बन चुके हो गया था तो जोर से ठहाका मारकर हंस पडा । ऐसी बातें करते हुए हैं । मैं भी वही राज हूँ । उसके साथ मैं भी हंसने लगा । फिर अचानक कुछ याद आया तो मैं पूछ पडा ब्रजराज मेरा फोन नंबर कम से मिला । जवानी से मांग लिया था । उसने सीधे कह दिया तो सफाई के बारे में भी उसने बताया होगा । हाँ, मेरे यू पूछने के आशय को समझा तो वह फंस पडा । दो दोस्तों की अकस्मात मुलाकात इतनी छोटी कैसे हो सकते हैं? हम लोग फोन पर लगभग पैंतालीस मिनट तक बात करते रहे । उस दौरान मैंने उसे बताया था कि मेरी सगाई इतनी जल्दबाजी में हो गई थी जिस पर किसी को गुलाब आना मेरे लिए संभव नहीं हो पाया । फोन कॉल के आखिरी मिनटों में फोन करने की मुख्य वजह बताते हुए उसने कहा, संजू मैं शिवानी से शादी कर रहा हूँ । अट्ठाईस जून को हम दोनों की सगाई है और उसमें तुम्हें जरूर आना है । शादी शिवाली से मैं चौक पडा हुआ नहीं अच्छी लडकी है यार, उसने मेरे हराने को पकड लिया । बोला तो मैं चौंक रहे हो । अरे नहीं मुझे गलत मौसम जो मेरा वो आशा नहीं था । मैं मजाक कर रहा था । मेरी सकपका हट पर बहुत बडा बच्चा, सगाई की तारीख मत बोलना और आ जाना ठीक है । मैंने स्वीकार करते हुए कहा उस तारीख पर अगर हम जहाँ ना पडा तो जरूर आऊंगा । वो ध्यान हुआ तो अपने दोस्त की शादी भी छोड दोगे क्या अब हमारे पास तुम्हारे जैसी एक्सपोर्ट कंपनी थोडे हैं, शादी कर रहा हूँ । नौकरी नहीं मिली तो परिवार कैसे पलेगा? अच्छा चिंता मत करो । इम्तिहान के वक्त शादी की तारीख नहीं रखने वाले रही बात परिवार की तो चिंता मत करो । हमारे भाई की कंपनी है । उसमें दोनों लोगों के परिवार पाल जाएंगे ।

मेरी अर्धांगनी उसकी प्रेमिका - 39

मई की चिलचिलाती दोपहर पूरी तरह सब आपने थी । हवाओं में अंगारे बरस रहे थे । उस घडी अगर हम सडक पर घूमने का मन बना ले तो सच मच्छी हमसे पागल और कोई नुकसान नहीं हो सकता है । मगर उसी चिलचिलाती धूप में चलता पिघलता वह शक्ति मेरे सामने आकर खडा हो गया । मैं थोडी देर तक उसे पहचानने की कोशिश करता रहा । कुल झब्बाल चश्मे के पीछे से छाती थकी थकी आंखें पसीने से तरबतर चेहरा हो सकता है । मैं भी अपने दिमाग से लग ही रहा था कि उसने अपने सूख चुके होटों पर जीत घुमाते हुए बोला ऐसे है मिस्टर संजय । उसकी आवाज मेरे कानों से टकराई तो मतलब दिमाग अचानक जाग उठा । मैं दरवाजे से बाहर निकल कर चौक में बुला रही । सुधाकर बाबू आप इस वक्त मैंने निभाई डर डर घुमाई । मुझे कोई साधन नहीं दिखा । शायद वो पैदल चलकर आया था । आई आइए इधर आइए मैंने पूरे सम्मान से उनका स्वागत किया । हालांकि जब मेरे कमरे के भीतर घुस रहा था, उस वक्त मेरा जल्द दूर दूर से धडक रहा था । जो मैं नहीं जानता । वो बिना कुछ बोले अंदर आ गया । मैं कूलर के सामने उसी लगता हुआ बोला अब यहाँ बैठे हैं बुरी तरह से पसीने से भीग चुके हैं । आप थोडी राहत महसूस होगी । धन्यवाद । उसने मेरी और भरपूर निगाहें डाली है । मैं आपके लिए जलपान का प्रबन्ध करता हूँ । शुक्रिया उसके होट लहराए । इस की कोई जरूरत नहीं है । मैं नहीं रुका । चंद्रग्रहणों तक उसकी नजरें मेरा पीछा करती रही । फिर पसीने से गीले हो गए । चश्में को उसने आपको से उतारा और अपनी तो मान से साफ करता हुआ बोला । ऐसा संजय ठहरकर उसकी और देखने लगा । सच कहूँ तो हाथ तेदारी मुझे आपकी करनी चाहिए । वो कुर्सी में बैठे हुए बोला आप के पास इतना बडा काम जो लेकर आया हूँ । मैं अर्थपूर्ण गांव उसकी और देखा अच्छा काम आइए, आप भी बैठे सामने बडी कुर्सी की ओर संकेत करते हुए उसने बोला था मैंने उस की निगाहों को परखने की कोशिश की रहता हूँ क्या कर में सामने की अलमारी से कटोरी उठाई । उस पर क्रीम के चलते बिस्कुट रखे थे और अभी हाल ही में खरीदी पुरानी फ्रेंड्स है । ठंडी बोतल निकालकर उसके सामने रख दिया । बैठे । उसने पर फिर कहा ठीक है । मैं उसके बगल में पडी दूसरी खाली कुर्सी पर बैठ गया । सुधाकर थोडी देर तक कटोरी पर पडे बिस्कुट की और देख कर रहा है । फॅमिली और घूमते हुए कहा, मैंने आपको बेवजह तकलीफ थी । कॅश संजय ऐसी बातें करते हैं । मैं मुस्कराया और कटोरी के और संकेत करते हुए बोला, छोड दीजिए जी बिलकुल । उसने उठाकर मुंबई डाल लिया और फिर देर तक उसी मिस्टर को चबाता हुआ कुछ सोचता रहा । दादर बाबू कैसे खाते हैं? मैंने उस कर कहा, अभी तक एक बिस्कुट भी खत्म नहीं कर पाए मेरी इस बात पर उसने हंसने की कोशिश भी की, मगर वोटों ने साथ नहीं दिया । उस समय उसके मन में कोई तूफान है, जो अंदर ही अंदर तबाही मचा रहा है । आप तो खाई नहीं रहे हैं । काफी देर बाद उसके होट बोले, अभी आप किसी काम की बात कर रहे थे । मजबूरन बात मुझे छोडनी पडी । वहाँ पानी की क्लास को उठाते हुए वो बोला, मुझे संजय जहाँ तक मैं जानता हूँ, आप प्रिया के अच्छे दोस्तों में से एक हैं । मेरा हाँ, आप ऐसा कर सकते हैं । मेरा सेल एक बार फिर धडक उठा । अब तक मैं समझ चुका था कि जल्द ही मैं प्रिया के साथ की गई दोस्ती कीमत चुकाने वाला हूँ । मैंने एक बार फिर अपनी पारखी निगाहों से उसे देखा । सुधाकर में मुझसे नजरें नहीं मिलाई क्या आप मुझे बता सकते हैं कि प्रिया किसी लडके से प्यार करती हैं? पानी पीने के बाद उसने मेरे सामने सवाल रख दिया । सवाल सुना तो बाल भर के लिए लगा कि जैसे मेरे पैरों तले से जमीन खिसकने वाली है । खुद को संभालते हुए मैंने कहा किसने कहा से जानता हूँ । उससे अपनी चश्मे ऊपर सरकाते हुए बोला और इसीलिए आपके पास आया हूँ । मुझे निराज माल भेजेगा लेकिन मेरे पास क्यों? मैंने लडते हुए पूछा क्योंकि उसके सारे दोस्तों में से सिर्फ आपको ही जानता हूँ । खुशबू के अलावा उसने अपने आखिरी शब्दों को कुछ पलों बात कहा । आपने खुशबू से पूछा नहीं मिस्टर संजय मैं कोई तमाशा नहीं चाहता हूँ । वैसे भी लडकियाँ बातें बहुत देर तक अपने पास नहीं रख पाते । उस वक्त समझ नहीं पा रहा था की मेरे सामने बैठा वो मासूम इंसान वाकई मासूम है या फिर मेरे साथ कोई खेल खेल रहा है । मैंने एक बार फिर आपने बिखर चुकी हिम्मत समिति और हंसने की कोशिश करते हुए कहा क्रिया आप से प्यार करती है सुधाकर बाबू आपसे वो ज्यादा मार करना पडा । आप नहीं हूँ कहाँ मिस्टर संजय प्रिया हम से प्यार करती है । हम से उसके स्वर में अजीब पागल था । मेरे का एक उसकी आंखों में आंसू छलक आए । उसने बाल कर चुका है और धीरे से बोला जवाब दे आप उस लडके को नहीं जानते हैं । मुझे पूछा आपसे बहुत उम्मीद थी वोट कर खडा हो गया । चलने के लिए उद्यत होते हुए बोला उम्मीद थी कि अगर वह मिल गया तो मैं उससे जाकर निवेदन करूंगा । शायद वो लडका मुझ पर तरस खाकर मुझे मेरी जिंदगी वापस लौटा देगी । ऍम उसके रुआंसे चेहरे पर मुझे सचमुच तरफ आ गया । आप इतना परेशान मत हुई है आप नहीं जानते । मिस्टर संजय कुर्सी में बैठते हुए वो बोला प्रिया ने मुझसे शादी करने से इंकार कर दिया है । यहाँ कब मेरे पहले के नीचे सतलुज जमीन खिसक गई और शाम को फोन किया है और मेरे फोन उठाते ही कहने लगी कि वो किसी और से प्यार करती है । इसलिए आपको मुझसे शादी नहीं करना चाहती । हालांकि सुधाकर यही नहीं रुका । वो आगे भी कुछ कहता रहा मगर ये खबर सुनकर पत्थर बन गया । मेरी पथराई आंखें उसके हिलते हुए वोटों को देर तक देखती रही । मगर थकान छूने पड गए । कुछ पलों बाद जब होश हमला तो वो कह रहा था । अब सोच रहे होंगे कि मैं एक डॉक्टर होकर भी प्रिया को पाने के लिए कितना लाचार दिख रहा हूँ । यहाँ वहाँ जाकर लोगों से गिडगडा रहा हूँ तो ये सच नहीं है । मिस्टर संजय मेरी पढाई खत्म होने वाली है और जल्द ही मैं सरकारी डॉक्टर बनने वाला हूँ । आप नहीं जानते की एक सरकारी डॉक्टर की तनख्वाह कितनी होती है । बच्चा हूँ तो प्रिया जैसी कितनी लडकियों को अपना दीवाना बनाकर छोड सकता हूँ । जिससे चाहो उससे शादी कर सकता हूँ । मगर रहा जाकर ऐसे मोड पर खडा हो गया हूँ कि कुछ नहीं कर पा रहा हूँ । जानते हैं क्यों उसमें भरी भरी आंखों से मेरी और देखा मैंने कुछ नहीं कहा क्योंकि वो अपनी बात जारी रखते हुए बोला प्रिया के साथ मेरी सगाई हो चुकी है । शादी के कार्ड न सिर्फ छप चुके हैं बल्कि बांटे भी जा चुके हैं । अब आप की सोची अगर इस वक्त की शादी टूटती है तो लोग कैसे कैसे सवाल करेंगे मुझसे और मैं किस किस को क्या क्या जवाब देता भरूंगा क्या चाहिए कि मेरी होने वाली बीवी किसी और से प्यार करती है या फिर ये कि वो किसी और के साथ भाग गई है । कहते कहते उसने एक लंबी सांस भरी लोग हंसी उडाएंगे मेरी एक बार फिर उसके आखिर चल चला पडी । उसने उन्हें छुपाने की कोशिश में बल्कि झुका लेंगे । मैं क्या को समझाने की कोशिश करूंगा आप आप समझा सकते हैं उसे एक और उसने बल्कि उठाई तो पानी की चंद बूंदे लडती हुई उसके गालों पर छितरा गई । उसने उन्हें छुपाने की कोशिश नहीं की । खडा होते हुए बोला ठीक है अब समझाइए । नौ से तो आप के दोस्त है । अच्छी दोस्त आपकी बात जरूर मानेगी । कहते हो वो बिना मेरी और देखे हुए तेजी से दरवाजे की और पालता और बाहर निकलकर दलि की भीड में कहीं हो गया ।

मेरी अर्धांगनी उसकी प्रेमिका - 40

सुधाकर के जाते ही मैंने थके मन से दरवाजा बंद किया और बिस्तर पर उनसे मुलेट गया । उस समय मेरे दिल और दिमाग में कितना तूफान था उसे मेरे अलावा शायद ही कोई नहीं देख पाता । शिवाय मेरी माँ के सच कहूँ तो उस वक्त मैं अपनी माँ को बहुत मिस कर रहा था । उस जिंदा होती हैं अचानक मेरे निभा बिस्तर पर पडे मोबाइल पर पडी तो पता नहीं क्या सोचा मैं उठ कर बैठ गया । मोबाइल लिया और नंबर डायल कर दिया । पोल लगा लाइन पर कोई नहीं था । मैंने उससे प्रिया को बुलाने के लिए कहा और आ गई । प्रियंका मेरे घर हो सकती हूँ । मैंने पूछा आज पढी नहीं संजय उसने रूपये स्वर्ग कहा । मेरा स्वास्थ्य ठीक नहीं है । इस समय मैं कहीं भी आने जाने की स्थिति में नहीं हूँ । मैं जाऊँ नहीं । नहीं नहीं अकस्मात ही वो घबरा गए तो वहाँ बताओ मेरे भाई को तुम्हारा आना अच्छा नहीं लगेगा । तो अब तो तुम्हारी शादी तय हो चुकी है । फिर भी हाँ फिर भी ठीक है चलो नहीं आती । उन कॉलेज कब आओगे कोई निश्चित नहीं । अगर जब भी ठीक हो गई तो जरूर आउंगी । से तो हुआ क्या था तुम नहीं समझोगी । संजय ये औरतो की निजी बात है । कॅरियर क्या निजी बात है तुम्हारी इतना इतना बडा था संजय हम पर गुस्सा मत करो । अचानक उसका गला रुंध गया । सच बताऊँ तो मुझे खुद नहीं मालूम कि मुझे क्या हुआ है । कुछ नहीं हुआ तो मैं मेरे स्वर्का, कम्पन और बढ गया । नौटंकी कर रही है तो हर किसी से अपनी बात मनवा लेने का अच्छा तरीका है तुम्हारा संजय चलो यही सही ऐसा हो सकता है । हम तो मैं मना भी नहीं कर सकते । ऐसा सोचने से मैं खामोश हो गया । मेरे पास और कुछ नहीं था कहने के लिए । मैं मोबाइल को देर तक कान पर्स उम्मीद लगाए रखा था । शायद वो कुछ कहेगी, अच्छा फोन रखूं । थोडी देर बाद उस ने कहा बेशक रख सकती हूँ मैं बडा मैं कौन होता हूं मैं रोकने वाला हम तो वही करोगी ना जो तुम चाहोगी कोई क्या सोचता है क्यों सोचता इससे तुम्हें कोई फर्क नहीं पडता फॅस संजय वो बडी आती हूँ बोलो कहानी कहीं भी अपने घर मेरे को मैं आ रही हूँ ।

मेरी अर्धांगनी उसकी प्रेमिका - 41

उस दिन मेरी बेसब्री कुछ ऐसी थी कि मैंने दरवाजा खुला छोड दिया । दरवाजे पर्पस पर्दा टंगा रहा जो पंखे की हवा में लहरा रहा था । प्रिया जाने में बीस मिनट से ज्यादा वक्त नहीं लगने वाला । मेरी निगाहें दीवार पर लगी घडी पर टिकी रही तो टिक टिक करती हुई दौड रही थी । तभी एक पर्दे पर मुझे परछाई नजर आई । बिस्तर से उठकर बैठ गया लिया । उसने जैसे ही पडते को सामने से हटाया मेरी भरपूर निगाहें उसके चेहरे पर पडेंगे । मेरे दिल की धडकनें जैसे एक का एक ठहर गई हूँ क्योंकि हूँ हूँ मिल सच चेहरा जो विजयपाल उसकी खूबसूरती को पूरी तरह से तबाह कर चुके थे । उसका ये हाल देखकर मेरा गुस्सा एकाएक हवा में उड गया । जी बातचीत जी करो पढो लेकिन मैंने खुद को संभाला । वो डगमगाते कम उस चलती हुई । फिर बिस्तर के करीब डेढ मीटर की दूरी पर आकर ठहर गई । बिल्कुल खामोश चुकी हुई बल्कि मैंने उसे ऊपर से नीचे तक देखा । आज इसके बदन में वैसे कपडे नहीं थे जिन्होंने सालों से देखता हूँ तो फिर से पाँच तक एक साधारण से देखने वाली लिवास से ढकी हुई थी । महज पांच सात दिनों में वो इतनी बदल जाएगी मेरे लिए यकीन करना बेहद मुश्किल था । आप बैठो बिस्तर में किनारे की और सडक नहीं है । मैंने कहा उसने चुकी जो की निगाहों से मेरे चेहरे की और देखा । फिर धीरे से बोली किस लिए बुलाए हूँ बैठो तो मैंने मुस्कुराकर कहा हमें खडा ही रहने दो । संजय हमारे स्थान नहीं है, इसी के काबिल है । मैं हर उठा की क्या पागलपन है? ठीक ही तो कह रहे हैं तो मैं बुरा क्यों लग रहा है? अच्छा तो भी बताओ और कहाँ है हमारा स्थान? यहाँ मेरे करीब बिस्तर पर हाथ ठोकते हुए बोला चलो चलो अब रहने भी तो और एहसान अब मत करो हम पर संजय तुम्हारे अहसानों का हम और बोझ उठा नहीं पाएंगे । सीधा बताओ किस लिए बुलाए हो हमें उसके शोर में पीडा और आक्रोश का मिला जुला भाव था । गया । क्या तुम रास्ते पर यही सोचती आई होगी? जाते ही टूट पडेंगे संजय पर हम तुम पर टूट रहे हैं कहाँ टूट रहे हैं हम तो ऊपर एकएक उसके स्वर में पीडा घुल गयी रोहासी आवाज में बोली नहीं टूट रहे हैं संजय हम तुम पर तो ये क्या था पहले उसे बहलाने की कोशिश की । हम तो बस ये चाह रहे थे कि सिर्फ मुद्दे पर बात करें । बे वजह इधर उधर की बातें हमें पीडा देती है जिसे अब और सह पाना हमारे लिए मुमकिन नहीं है । वैसे भी हमारी तबियत आज कल ठीक नहीं रहती है । ठीक है नहीं करते । इधर उधर की बातें अगर तुम बैठे हो सकती हूँ वो खामोश नजरों से मेरी और देखने लगे या फिर कहो तो मैं ही खडा हूँ । मैंने कहा नहीं नहीं रहने दो तो खुद को तकलीफ मत दो । अच्छा बताओ हम कहाँ बैठे जिससे तुम्हें तसल्ली हो । यहाँ कहते हुए वह कुर्सी की और लडकी यहाँ इधर मेरे पास उससे पर बैठे लाॅरी और धर्म से बिस्तर और बैठ गई हो गई जैसे ली अब बोलो मैं कुछ देर खामोश निगाहों से उसे देखता रहा । शर्मा के वोटों पर रोक ही मुस्कान लिया । बोले अब बोलोगे भी या फिर यू ही हमारे चेहरे की ओर ताकते रहोगे । किसी बात को कब और किस तरीके शुरू करनी चाहिए इस काम में मुझे महारत हासिल देर तक उसके अंदर हो रही उथल पुथल को देखता रहा । सोचता रहा समझता रहा । जब मुझे पूरी तरह तसल्ली हुई तो मैं उसे पुकारा । रिया काम हमें सगाई करनी है । जानती हूँ पढाई नहीं होगी फॅार पूछा तो मौका दिया है इसके लिए सगाई में बुलाया तक नहीं हमें फोन पर तुमने बताया तो हमने भी फोन पर बधाई दी । संजय याद है न तो नहीं हाँ याद है मैंने उसकी और देखा और सगाई में बुलाया क्यों नहीं? और कुछ उन्हें मना कर दिया था । क्यों घूरकर मेरी और देखी थी? कहीं उसकी सौतन ना बन जाए? इस बात से वो डर रही थी नहीं । घर से उसका ख्याल था कि जब हमने किसी को नहीं बुलाया तो तो मुझे बुलाएंगे । उसने मेरी बात बीच में ही कर दी । ऍम पैसे उसने तुम्हे तो बुला लिया ना । मैं चुप था । मैं और नहीं उकसाना चाहता था हूँ । थोडी देर तक वहाँ खामोशी छाई रही हूँ । फिर एक का एक मेरी निगाहें छोडती । टूटी हुई प्रिया के बदन पर जा पडी । प्रक्रिया मैं कुछ कहना चाहता था । उससे पहले वो उसी हाल में बल्कि झुकाए बोली इस गैस को मेरे भाई ने मेरे जन्मदिन पर दिया था । मैं चौंक पडा । उसे कैसे मालूम कि मैं उसकी ड्रेस का जिक्र करने वाला हूँ । मैंने हंसने की कोशिश करते हुए कहा बहुत बहुत अच्छी लगती है तुम पर अब तुम ऐसे ही कपडे पहना करो । हम जान सकते हैं कि हमें किस रिश्ते से ये सलाह दी जा रही है । एक उसकी अर्थपूर्ण निगाहें उछल कर मेरे चेहरे पर जाते थे जिससे वो इतनी सहजता से पूछ गई । उस सचमुच मेरे लिए बेहद मुश्किल सवाल था क्या जवाब दूं मैं अभी सोच रहा था कि वो धीरे से हंस पडे । हमारी बात का बुरा मान गए क्या? पहले हमने तो यू की पूछ लिया था मैं तो मैं भी यही मुस्कुरा दिया उस पर प्रिया का मुस्कुराना, अपनी गलती पर खेद जाहिर करना मेरे लिए बहुत सुकून की बात थी । मुझे यकीन हो गया था की अब मैं मुद्दे की बात कर सकता हूँ । दिया धीरे से कहा है हाँ, हमने कल शाम को सुधाकर को फोन किया था । हाँ हमने कुछ कहा था हम से । हाँ हम ने कहा था कि हम आपसे शादी नहीं करना चाहते । कहते हुए वाॅरंटी मेरी और रोहांसी आवाज में बोली मगर संजय हमारा इरादा ऐसा बिल्कुल नहीं है । हम शादी सुधाकर से करेंगे । करेंगे अभी शादी वो आज हमारे पास आए थे । मैंने कहा यहाँ की दिल्ली से एक को चौपडे बहुत दुखी थे तो मैं इस तरह का दिल नहीं दुखाना चाहिए था । हाँ हम जानते हैं संजय की हमने गलत किया, मगर क्या करते? उस वक्त हम इतना बोली थी कि हमारा दिमाग अस्थिर हो गया था । हम समझ नहीं पा रही थी कि हमें क्या करना चाहिए । हमारे बगल में ही फोन रखा हुआ था । हमने लगा दिया । मगर संजय उसकी आंखों में आंसू देर पडेगी । बच्चे की तरह शिकायत करते हुए बोली, उन्होंने भी तो हमारा दिल दुखाया था । हमने उनसे कहा था कि हम इस समय इलाहाबाद में नहीं रहना चाहते । ये शहर में काटने को दौडता है । हमें आकर दिल्ली ले जाओ । मगर वो मान ही नहीं कहने लगे । शादी से पहले ऐसा ठीक नहीं है तो कहा था उन्होंने तुम बेवजह उनकी बात का बुरा मानने अच्छा तो तुम भी उन्हीं का पक्ष लेने लगे । फॅमिली कोई हमारा पक्ष क्यों नहीं लेता? संजय के सच मुझे इतने बुरे हैं । इतनी बुरी सोच रखते हैं हम । क्या उसकी पीडा पर मैं भी तो ऐसा हो गया । उसके हाथ का अपने हथेली में भरते हुए बोला तो बुरी नहीं हो गया तो बहुत अच्छी हो । बहुत अच्छी कौन कहता तुम्हारी सोच बुरी है । हम तो कहते हैं तुम्हारे इरादे तो हरी सोच सब बहुत अच्छे हैं । चलो चलो बस करो संजय । अब इतना भी मत बना दो कि हमारे पास जमीन पर ही ना पडे, हवा में उडने लगे और संजय हम जानते हैं तो झूठ बोल रहे हो अब बच्चे नहीं दिया चंद को जाम कहना छूट बोलना नहीं होता है । संजय कम से कम अब तो हुई थी बात करना बंद कर दो उसके स्वर में एक का एक वेदना लौटाई, बोली तो जानते हो हम तुम्हारी इन्हीं बातों का अर्थ अपने ढंग से निकालना शुरू कर देते हैं । जबकि हमने हर बाद अहसास क्या है की अक्सर तुम्हें कुछ और कहाँ होता है? फिर जब हम तुम्हारा अभी प्राइस समझ पाते हैं तो हमें दुखी होना पडता है और वैसे भी बहुत बोलिये । हम अब और मत बुलाओ हमें क्या? हम तो मैं कब बुलाते हैं? मैं तडप उठा अभी हम कहेंगे तो फिर तुम का होगी कि हम ऐसा कहते हैं । संजय जब हम तुम्हें दो समझते थे तो मैं प्यार नहीं करते थे । तब तो शिकायत थी कि हम तो मैं प्यार नहीं करते और फिर जब करने लगे तो तुमने वॅार पडेगी फिर थोडा रुककर खुद को संभाला । गला थोडा खुला तो बोली क्या क्या तुमने बताओ संजय तो मतलब की तरह निकाल कर फेंक दिया । हमें अपनी जिंदगी से अब इससे भी ज्यादा और कुछ करने का इरादा था । क्या तुम्हारा उस पर मुझे ऐसा लगा जैसे मैं भी सारी रस्में सारे बंधन तोड कर रहा हूँ । मैं तेजी से बिस्तर से उठा और सामने बनी आलमारियों में कुछ ढूंढने लगा । कुछ देर तक कुछ नहीं मिला तो लौट कर एक बार फिर बिस्तर पर बैठ गया क्योंकि इस दौरान प्रिया की निगाहें एक तक मुझ पर टिकी रही । वो का एक मेरे यू खडे हो जाने पर खबर आई हुई थी । प्रिया मैंने पुकारा तो बच्चों से भी लगती हुई झपट कर मुझे चिपक गई । मैंने उसके सर पर हाथ फेरते हुए कहा पिछले कुछ दिनों में बने हालात के सामने मैं सच मुझे बहुत मजबूर हो । हम भी बहुत मजबूत है । संजय अपने दिल से सच कहे तो हम जरा भी नहीं चाहते कि हमें तुमसे प्यार हो । मतलब पता नहीं क्यों हम खुद को रोक ही नहीं पाते । हर बार तुम्हारी और खींचे चले आते हैं । हम आंखे बंद करते हैं तो तो खोलते हो तो दिन रात हमारी आंखों के ईर्दगिर्द बस तुम्ही रहते हो संजय ऐसे में अब तो बताओ हम क्या करें तो उसे कैसे पीछा छुडाएं क्या तो मानों कि संजय की तुम से पीछा छुडाने के लिए हम अक्सर सुधाकर को याद करने की कोशिश करते हैं । अगर पता नहीं क्या उसकी जगह आंखों में तुम झिलमिला पडते हो । लेकिन क्या ऐसे खयाल ठीक नहीं है? हमारी सगाई हो चुकी सुधाकर से हम जानते हैं कि हम बुरा कर रहे हैं । मगर क्या करें? कैसे दूर जाए तुम्हारी यादव से उसका चेहरा पूरे हसन से भी गया । बात को जारी रखते हुए बोली अब देखो ना अक्सर क्या होता है । क्या ये नहीं है कि लोग दिल के जरिए जिसमें तक पहुंचते हैं? पहले तो तुम संजय तो जिसमें के जरिए मेरे दिल तक आ गए हो या ये क्या पागलपन की बातें हैं ना इस बात को वहीं थाम लेना चाहता था । सच को सच कहने में क्या बुराई है? संजय जो सच है हम वही तो कह रहे हैं । सहसा उसके स्वर में कुछ दिखा बनाया गया था । वो अपने आंसुओं को पूछते हुए कहने लगे संजय तुम सुधाकर को कह दो कि वह जल्दी से हम से शादी कर लिए । हम उनके साथ दिल्ली चले जाएंगे और तुम भी शादी कर लो जिससे तो भी याद करने ये तुम तक पहुंचने के सारे दरवाजे बंद हो जाएगा और अगर तब भी याद आये, हम तो कैसे ज्यादा होगी । अकस्मात उसकी भीगी आंखों में जमा करा गई । बोले हम सुधाकर से कह देंगे की हमें जल्दी से ढेर सारे बच्चे पैदा करने हैं । फिर तो हम उन्हें मैं इतना व्यस्त हो जाएंगे कि तुम्हें याद करने का समय ही नहीं रहेगा । हमारे पास ज्यादा अच्छा है । मैंने कहा ।

मेरी अर्धांगनी उसकी प्रेमिका - 42

वक्त तेजी से गुजर रहा था । पढाई, परीक्षाएं और फिर शादी की तिथियां । शादी से पहले एक दिन अचानक मेरे पापा मेरे कमरे पर आ धमके । उन्हें अपने सामने पाकर मैं राम था । सालों बाद आज मैंने उन्हें देखा था । एक दो बार उन्होंने मुझे फोन जरूर किया था मगर मैंने उसे कुछ ज्यादा बात नहीं की । मैं उनसे बहुत नाराज था । उन्होंने मेरी मम्मी को बहुत तकलीफ थी । मां के अंतिम यात्रा में भी वो अपना बिजनेस छोड कर नहीं पाए । मैं बिस्तर से उठकर खडा हो गया तो मेरी माँ के अच्छे पति कभी नहीं बन पाए थे । मगर चाहिए तो मेरे पापा मुझे अभिवादन में उनके पैर छूना चाहिए था । लेकिन नफरत इतनी थी कि मैं चाहकर भी उन के सामने झुक नहीं पाया । अंदर आने के लिए नहीं होगे । उधर से पर ही खडे रहे और शादी होने वाली है । बडे हो गए हो । तुम काम से इतनी शिष्टाचार की तो उम्मीद कर ही सकता हूँ । अब यहाँ तक आ गए हैं तो कौनसी तक भी आ सकते हैं । मैंने अपनी नफरत नहीं छोडी तो तुम अभी नाराज हो । मुझ से वो कुर्सी पर बैठे हुए बोलेगा । तुम्हारी माँ को गुजरे हुए सालों हो गए कब तक उन पुरानी गलतियों के लिए मुझे जलील करते रहोगे । पता नहीं वो फेरते हुए मैंने कहा थोडी देर तक मेरी और देखते रहे । फिर कमरे में इधर उधर नजर दौडाते हुए बोले प्रदेश कमरे में एक्टर नहीं होती । इस बात के पूछ रहे हैं मुझे तो वही मुझे नहीं होती तो शादी ही से करोगे नहीं । मैं एक नया घर किराये पर खोल रहा हूँ और पापा क्या उसे भी किराये पर खोज रहे हो । मैंने अर्थपूर्ण निगाहों से उनकी और देखा । उनकी आंखों में अच्छा सुना था । थोडी देर की छुट्टी के बाद बोले अच्छा ये बताओ शिक्षा मैं बोला हूँ या तो बुला हो गई रिक्शा क्योंकि तो मैं भी घर चल रहे हो । अचानक उन का स्वर्ग हो गया तो भरा अपना घर तुम्हारा इंतजार कर रहा है । और हाँ, हमारी शादी भी वहीं से होने वाली है । जी नहीं, मैं नहीं जा पाऊंगा । पीस मुझे मजबूर मत करिए तो ठीक है । मैं यहाँ ठाठ जाता हूँ । उस की जरूरत नहीं है । इतनी हमदर्दी आपको मेरी माँ के साथ दिखानी चाहिए थी । ऑफ पॉप और अचानक भडक उठे संजय तुम कब तक गुजरे हुए कल को अपने सर पर होते रहोगे? मैं लाख बुरा सही मगर तो हमारी मर्जी के खिलाफ । मैंने तो मैं अपने पास आने के लिए कभी मजबूर नहीं किया । तुम हमेशा कहते रहे तो मैं मेरी शकल पसंद नहीं है । मैं तो मैं कभी अपनी शक्ल नहीं दिखाई । लेकिन संजय अब शादी कर रहे हो और मैं तुम्हारा बाप हूँ । मेरे भी कुछ अपने अरमान हैं । ठीक है उसके स्वर में लाचारी छा गई तो भारी सामने गिडगिडा रहा हूँ । माफी मांग रहा हूँ । अब तुम चाहते हो कि तुम्हारे पैर छू तो वह भी कर सकता हूँ वो लोग फिर वो देर तक कुछ कहते रहे और मैं बिना किसी सवाल जवाब के उन्हें सुनता रहा । अचानक मेरी निगाहों उनकी आंखों पर गई तो मैं तब उठा वहाँ से भरी हुई थी । मैं आपसे पहले उन्हें कभी इतना लाचार नहीं देख पाया । मैं खुद को रोक नहीं पाया । चपट कर उनके सीने से चिपक गया हूँ । डर के मारे मेरे मुंह से चीख निकल गई । पापा मेरा और मेरी पढाई का खर्च उठा रहे थे । इससे ज्यादा हम लोगों के बीच और कोई रिलेशन नहीं था । इतने सालों में न वो कभी मुझसे मिलने आए नहीं । मैंने कभी कोशिश की शायद इसलिए की माँ की करीबी मुझे कभी उन के करीब जाने नहीं देती थी । उनके आंसू देर तक मेरे कंधे को होते रहे

मेरी अर्धांगनी उसकी प्रेमिका - 43

जॉन्सटाउन के अपने घर में घुसने से पहले मैं जी भर के उसे देख लेना चाहता था । दूरियाँ रंग में रंगा हुआ वो घर मेरी माँ की जिंदगी की कीमत पर बनाया गया था । आप अपने बिजनेस में इतना बिजी थे कि वो मेरी माँ को फोर सबके चार पल भी कभी नहीं दे पाए । माँ की बीमारी से लेकर उनकी मौत तक पर एक बार भी घर नहीं लौटे । मैं अपनी आखिरी सांस के वक्त भी पापा को देख नहीं पाई । अपने अपने किराये के घर में कम्पनीबाग जाते वक्त अक्सर यही से गुजरा करता था । मगर इस घर की और कभी नहीं देखा । वहीं दरवाजे पर खडे हो गए । एक पापा ने आवाज नहीं आ रहा हूँ । मैं थक जाते हुए आगे बढ गया । इस घर को बनाते बनाते मैंने बहुत कुछ हुआ है । उन्होंने मेरी और देखा । शायद इतना कि उतना बोझ मैं अपने काम से जिंदगी भर नहीं उतार पाऊंगा । लेकिन क्या तुम जानते हो कि उन था मेरे अंदर आई कैसे? उन्होंने नजरे झुका ली । उनकी और देखने लगा । उनकी आंखें भर आई थी, मेरे कंधे पर हाथ रखते हैं । उन्होंने कहा उच्चतम पैदा हुए थे । उस वक्त हम लोग सोहबतियाबाग में किराये के घर में रहते थे तो कोई दो तीन महीने के रहे होंगे । हमारे मुँह के अंदर छाले आ गए थे । उस दिन तुम सारी रात होती रहेगी । मुझे अच्छे से याद नहीं है लेकिन शायद रात के दो या तीन बजे होंगे । मकान मालिक ने दरवाजा खटखटाया, मैंने खोला मेरे दरवाजा खोलते ही वो हम पर बरस पडे । मेरी बहुत पेड से हैं और तुम्हारे बच्चे के रोने के चक्कर में वो सो नहीं पा रही है । संजय क्या तुम यकीन करो? उन्होंने एक बार फिर मेरी और देखा । आधी रात को वो औरत सुबह ही कमरा खाली करने का हो सुनाकर चली गई और अचानक उनकी आंखों से पानी चला पडा तो देवेश्वर में बोले अभी सुबह ही कमरा खाली करना होगा । उस दिन मैंने एक बात और उसी की आप दूसरों के घर में थोडा बहुत हो सकते हैं । मगर होने के लिए आपको अपना ही घर चाहिए । मैं आवाज पापा की और देखता रहा । शायद वो अपनी सफाई देने से ज्यादा मुझे जिंदगी के बेरहम चेहरे के बारे में बताने की कोशिश कर रहे थे । मेरी आंखें छरछरा पडेगी । माँ ने मुझे इस घटना के बारे में कभी जिक्र नहीं किया था तो भारी माँ को आपने तीन महीने के बच्चे के साथ पूरे दो रातें और तीन दिन इलाहाबाद रेलवे स्टेशन पर गुजारनी पडेगी । अपनी बात जारी रखते हुए उन्होंने कहा मैं सारा दिन बादलो सब पैसे और कमरे के इंतजाम में यहाँ वहाँ भटकता रहा । तीसरे दिन शाम को जाकर मैं तुम दोनों के लिए कमरे का इंतजाम कर पाया । मैं कमरा कुछ खास नहीं था लेकिन तुम्हारी मां डेढ तक भरी भरी आंखों से उन दीवारों को घूमती रही । पता नहीं क्यों बाबा हूँ मेरा दिल फट पडा । उस वक्त पहली बार मुझे घर और पैसे की कीमत समझ जाएगी । इससे पहले मैं पैसे को सिर्फ जीवन गुजारने का स्वाद नहीं समझ रहा था, लेकिन उस दिन समझाया कि पैसा साधन नहीं । दरअसल ये खुद अपने आप में एक जिंदगी है और उसके बाद जब मैं पैसे कमाने के लिए घर से निकला तो चलते चलते इतनी दूर चला आया । वहाँ पर लौटना बहुत मुश्किल हो गया । हमारी माँ की चिंता को मैं भी नहीं दे पाया । जानते हो ना हूँ मैं झपट कर उनसे चिपक गया । चाहते हो संजय उन्होंने मेरी पीठ पर हाथ गिरते हुए कहा, जिंदगी में मैंने बहुत स्ट्रगल किया है । समस्याएँ भी बहुत आएंगे । मगर उस वक्त हर बार मेरी आंखों के सामने हमारे बचपन का होता हुआ चेहरा जाया करता था और उसने मुझे कभी हार नहीं नहीं दिया । मैंने एक बात दिल पर ठान ली थी कि मेरा बेटा भले ही गरीबी और अभाव में पैदा हुआ हूँ, मगर मैं उसे गरीबी में जीने नहीं दूंगा साहब जाए एक का एक एक अधेड उम्र का इंसान हाथ में चाय के ब्रेक था में हुए आकर हमारे सामने खडा हो गया । चलो चाय पीते हैं । आपने मुझे खुद से अलग करते हुए कहा मैं अपने आंसुओं को पूछता हूँ, उनके पीछे पीछे चल दिया । मगर मेरे जहन में राजेश आनंद की कविता गूंज दे रहे हैं । पिता के प्यार को आधार बनाते हुए उन्होंने लिखा था टूटकर भी मेरे चेहरे पर मुस्कान क्यों हैं? इस सवाल पर हर शख्स परेशान क्यों है? अक्सर होता हूँ आप को काम कर मैं एक आंसू मेरे दर्द की पहचान क्यों है? सामान्य ने क्या काम सफाया है मुझे उसे ही आपने दर्ज पर अभिमान क्यों हैं? होता रहा हूँ वगैरह हर बार भारत के लिए इस बात पर सब इतना हैरान क्यों है? जल रहा हूँ धूप में जिनका घरोंदा बनकर मेरे पसीने से वही इतना परेशान क्यों है? कैद हो अगर तुम घर की दीवारों के बीच तो बेघर से पूछ दीवारों कारमा क्यों है? दो गज जगह भी नहीं मिली धरती में मुझे हम पूछते हो कि पिता आसमान क्यों है?

मेरी अर्धांगनी उसकी प्रेमिका - 44

उस रात जब अपने बेडरूम पहुंचा तो आंखें चौथी आ गई तो कमरे मेरे किराये के कमरे से लगभग जहाँ गुना बडा था, जिसे कीमती समानों से सजाया गया था । उप सूरत, फॅमिली बिस्तर, खिडकी से सटी हुई स्टडी टेबल और दूसरे किनारे पर लगा तीन सीट वाले सोफे ने कमरे की सजावट में जान भर दी थी । थोडी देर तक जहाँ तरह ऐसे घूरता रहा जैसे मैं किसी अजनबी के बैडरूम पर घुस आया हूँ । मैं चलता हुआ खिडकी के पास पहुंच गया । एक ही पर लगे पडे चमचमा रहे थे । थोडी देर तक उन्हें अपनी उंगलियों में महसूस करता रहा । तरीका एक उठी किनारे की तरफ सरकाते हुए खिडकी के सामने खडा हो गया । मेरी नजरें खिडकी के नीचे से गुजर रही सडक पर ठहर गई । ऐसा लगा तो मैं अपना बेडरूम अचानक पीछे से आवाज आई । मैं मुडकर पीछे देखा । दरवाजे पर पापा खडे थे । पापा कैसा लगा अच्छा, बस अच्छा हें । वाकर मेरे साथ ही खिडकी के सामने खडे हो गए । मुस्कराकर बॉलिंग मैं खुद खडा होकर से तैयार करवाया हूँ तो हमारे लिए नहीं । सब मुझे अच्छा है । छठ अच्छा लगा । ये जानकार की मेरा गिफ्ट में पसंद आया । पैसे तो नहीं तस्वीर देगी । उन्होंने बैठ के ठीक ऊपर लगी तस्वीर की और इशारा किया मैंने पलट कर देखा । तस्वीर पर एक औरत एक नवजात शिशु को गोदी में लिए हुए बैठी थी । ये तुम हो अपनी माँ के साथ, क्या मैं नाम पडा? लेकिन इसमें तो वहाँ पहचान में नहीं आ रही हैं की तस्वीर इलाहाबाद रेलवे स्टेशन की है । अखबार में छपी थी । मैंने उस अखबार को अब तक संभालकर रखा हुआ था । अभी कुछ दिन पहले ही मैंने उसे एक फोटो स्टूडियो को देखकर बडे साइज में बनवा लिया है । मैंने एक बार फिर पापा की और देखा । उनकी निगाहें एक तक उस तस्वीर पर टिकी रही । अक्सर लोग कहते हैं कि पूरे वक्त को भुला देना चाहिए । कहते हुए पापा ने मेरी और देखा तो तुम क्या कहते हो पता नहीं । मैंने प्रसिद्ध हिलाते हुए कहा मेरा मानना है कि उसे फ्रेम में मढवाकर बेडरूम में सजा लेना चाहिए । लेकिन ऐसा करने पर वो आपको जिंदगी भर चुभेगा नहीं । मैंने पूछा नहीं वो धीरे धीरे करके आपके अंदर की चुभन को काम कर देगा । आप जरा जरा सी बात पर रोने की बजाय उससे लडना शिक्षा हो गए । बाबा जो कभी मेरी नजर में सबसे बडे खलनायक थे, जिन्हें मैंने हमेशा माँ की नजरों से देखा था । जब मैं उन्हें अपनी नजरों से देख रहा हूँ तो तब हो तो कितनी । सरलता से मेरे सामने जिंदगी के एक एक पन्ने को खोलकर मुझे समझाते जा रहे थे । अब एक बात करूँ आपसे बोलो आप मेरे हीरो हो अच्छा तो बहुत बडे बहुतों को जानता हूँ । बहुत पढे लिखे हैं मगर वो अपनी जिंदगी में कभी सक्सेस नहीं हो पायेगा । आपके पास कोई डिग्री नहीं है । बावजूद इसके अपनी जिंदगी में कितने सफल है समझे उन्होंने भरपूर कहाँ से मेरी और देखा । दरअसल डिग्री करना हो ना कई बार फायदेमंद होता है । अगर आप इंजीनियर डॉक्टर है तो आप एक ही काम कर सकते हैं लेकिन अगर आप के पास कोई डिग्री नहीं तो आप कुछ भी कर सकते हैं । वो मेरा बूथ फैल गया । बहुत समय हो गया है । उन्होंने घडी की और देखते हुए कहा मुझे चलना चाहिए और तुम भारत करो । जी पवार बिस्तर की ओर बढते हुए बोला । फिर अचानक उन्हें कुछ याद आया तो जाते जाते दरवाजे के पास ठहर गए । बॉलकनी के दाहिने तरफ इशारा करते हुए बोले बातें ही बना हुआ है । चिडियों पर अंधेरा है पढा अगर उतरना ही हो तो सीढियों की स्विच फोन कर लेता हूँ । ठीक है पापा मैंने कहा और उनके वहाँ से जाते ही मैं बिस्तर पर औंधेमुंह कूद पडा ।

मेरी अर्धांगनी उसकी प्रेमिका - 45

सुबह के लगभग साढे दस बज रहे होंगे । पापा ऑफिस जा चुके थे । मैं घर पर अकेला था । रसोई और घर की सफाई का काम संभालने वाले राजू चाचा पापा के किसी काम से बाहर गए हुए थे । मैं खाली था इसलिए जाकर अपने बेडरूम में लेट गया । अपनी शादी में क्या क्या करूंगा, किस किस को बुलाऊंगा? प्रिया को सुनाकर बाबू भेजेंगे भी की नहीं कप्रिया गाना खुशबू को भाएगा और राज्य उस की शादी में तो मैं पहुंच भी नहीं पाया था । किशन वो तो मेरा यार है । शादी की सारी जिम्मेदारियां तो वही संभालने वाला है । लेकिन पापा ऐसे बहुत सारे सवाल मेरे दिमाग में उथल पुथल मचाए हुए थे की एक घर की डोरबेल पर जो ठीक हो सकता है वो सोचते हुए मैं बॉलकनी की और बडा गेट पर खाती कपडों में एक वृद्ध खडा था । उसकी निगाह मुझ पर बडी तो चिल्लाते हुए बोला क्या आपकी चिट्ठी आई है तो मैं आता हूँ कहता हुआ में नीचे की और भागा । उसने मुझे चिट्टी समझाते हुए कहा आपको इससे पहले यहाँ कभी नहीं देखा । किराये पर आए हैं नहीं अच्छा रिश्तेदार होंगे । उसने अपनी छोटी छोटी आंखों से मुझे खोलते हुए कहा मैं जवाब दिए बिना ही दरवाजा बंद कर दिया और बडे कदमों से सीढियाँ मांगता हुआ बेडरूम आ पहुंचा । चिट्ठी किसकी हो सकती है? मैंने डिफाॅल्ट कर देखने लगा । चिट्ठी तो मेरे ही नाम पर आई थी मगर उसमें देखने वाले का नाम नहीं था । उत्सुक्ता से मैंने लिफाफे को भाडा और पडने लगा । भेजने वाले ने लिखा था प्रिय संजय, हमें अच्छा लगा कि तुम अपने घर आ गए तो मैं यही होना चाहिए था । अगर ये जरूर है कि तुम अक्सर लोगों को पहचानने में या तो गलती करते हो या फिर देख हम जानते हैं कि फिलहाल तुम क्या सोच रहे हो गई कि हम कौन हैं? तो ये सब हिदायतें क्यों दे रहे हैं । जबकि ये सब जानने की तुम्हें जरूरत नहीं है अपनी मन की संतुष्टि के लिए । फिर भी हम बताए दे रहे हैं कि तुम हमें अपना दोस्त समझ सकते हो । हम मानते हैं कि तुम अपना अच्छा बुरा जानते हो लेकिन तो मैं सलाह की कोई आवश्यकता भी नहीं है । मगर हम ये भी जानते हैं कि तुम बहुत भावुक को और शायद हमारी ये भावुकता ही तुम्हारी कमजोरी है । तो हम अक्सर इंसान को पहचानने में गलती कर बैठी हूँ । शादी करने वाले हूँ और आने वाली दुल्हन सिर्फ दुल्हन नहीं होती । हमारी जिंदगी का वो एक महत्वपूर्ण हिस्सा होगी । इसलिए सिर्फ इतना कहना चाहते हैं कि नए दौर की नई गलियों में हम बी सी भागती लडकियों की हकीकत तो नहीं है । तो तुम समझते हो जरा ध्यान रखा ऊपर से खूबसूरत दिखाई देने वाले इन बहारों से फूल चुनने की कोशिश में कहीं काटे ना हाथ आ जाए । आपकी शुभ चिंता दो पत्र खत्म होते ही जो पहला नाम मेरे दिमाग में आया तो यही था लेकिन नहीं तू क्यों? मेरे पास कोई ठोस वजह नहीं थी तो प्रिया भी हो सकती है । रिया खुशबू की दोस्ती और वो उसे उतना पसंद नहीं करती थी । मुझे प्रिया को लेकर भी एक संख्या था खत्म है । जिस तरह से शब्दों का प्रयोग हुआ है वह प्रिया नहीं लिख सकती । पत्र में खुशबू का जिक्र था । इस समझने में मुझे बिल्कुल दे रही लगी । मैंने बिस्तर पर करवट बदला तो सवाल भी बदलाव खत्म । इसमें लिखा इससे महत्वपूर्ण सवाल शायद ये था कि क्यों लिखा? मैंने लगभग पर चढाने में रखी खुशबू की तस्वीर उठाई तो मुस्कराती हुई मेरी और देख रही थी । हमारी नजरें डेढ तक एक दूसरे को घूमती रही । इतनी मासूम आंखों में कोई फर्क तो नहीं हो सकता है । ये खत्म जरूर किसी की शरारत है । मैंने पत्र को उठाया तोडा मरोडा और कुछ चलकर उस पर आग लगा दी । चंद क्षणों तक उसकी डबल मेरे हाथों को महसूस होती रही । फिर जल्दी मेरी आंखों के सामने वह रात बनकर हमारे उड गई ।

मेरी अर्धांगनी उसकी प्रेमिका - 46

शादी के बाल कितनी खुबसूरत होते हैं । एक दिन के लिए ही सही मगर आप भाषा होते हैं आपके आसपास मंडराती लगभग हर नजरों के आप केंद्र बिंदु बन जाते हैं तो उन्हें राजा, धूले, राजा और शख्स की जुबान पर्व सही की शब्द होता है । जीजा जी जीजा जी कहते हुए किस तरह खूबसूरत लडकियां दूल्हेराजा के आसपास मंडराया करती हैं । कोई उसे छूने के अवसर रखती हैं तो कोई उसकी निगाहों में आने की । यदि सबकी निगाहों से जुलाकर मौका मिला तो वह नटखट लडकियाँ चिकोटी काटने से भी नहीं चूकती । मेरे का दौर चल रहा था वातावरण में मंत्रोच्चारण कि धोनी गूंज रही थी मगर उन लडकियों की बातें अब भी मेरे दिमाग में घूम रही थी । आगवानी के समय लडकियों ने मुझे खेल रखा था । उस समय मैंने शायद ही इस बात का डर रहा हो कि किसी पराई लडकी के साथ नहीं । नजदीकी पर कोई उन पर उंगली उठा सकता है । हमारी सहेली के सामने किसी बोलने लग रहे हैं । बेचारे जीजाजी देख नहीं रही हूँ । जी जैरी के सामने हमारी खुशबू ऐसे लग रही है जैसे कोई की चोच में मूर्ति का दाना तब पागल रही कि ऐसे बोलती है देख नहीं रही कैसे शर्मा गए हैं । बेचारी जीजा जी हमारी और एक बार भी निगाहें नहीं उठा पा रहे हैं । उस दौरान न जाने से और कितने स्वर्ग मुझे होंगे । उस वक्त जब मैं अपनी डायरी लिख रहा हूँ, उनमें से ज्यादातर बातें भूल चुका हूँ । इस दौरान अकस्मात मेरी निगाहें चेहरे को छुपाएंगे तो बस वहीं की वहीं ठहर गई । दरअसल वो नीतू थी मुझे थोडी ही दूर पर खडी एक तक मुझे देखे जा रही थी । उस वक्त उसकी नजरों में बेतहाशा शिकायत थी । मैं उससे नजर बनाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया । मेरी नजरें झुक गई और फिर किसी कायर की भर्ती । मैं खुद को फेरे की रस्में व्यस्त रखने का अगले करता रहा । मान पेइचिंग था टेंशन ओ बात साहस जुटा पाया तो मैंने एक बार पूछना नजरे उठाई, लेकिन वो अब वहाँ नहीं थी । मेरी निगाहें सरपट आंगन । केस कोने से लेकर उस कोने तक तेर तक उसे खोजती रही । लेकिन वो नहीं देखिए कुछ ढूंढ रहे हो तो नहीं मारते हुए खुशबू ने कहा पंडित की कुछ कह रहे हैं तुम से? हाँ हाँ क्या हडबडाहट मैंने अपनी नजरे समिति और पंडित जी की तरफ देखने लगा । शादी की सारी रस्में तो पूरी हो गए । अगर दिल और दिमाग दोनों में से कोई भी शांत नहीं था । वो यहाँ आई थी उसने बुलाया था । खुशबू नहीं, कौन लगती होगी वो खुशबू की क्या सहेली ऐसे ही अनेक सवाल मेरे मस्तिष्क पर उमडते घुमडते रहे जिनका दूर दूर तक कोई हल नजर नहीं आ रहा था । समझे जहाँ पर आवाज दी मैं मंडप छूटकर उनकी और बडा तो वो भी अपनी कुर्सी से उठकर चलती है । हम थोडी दूर तक साथ ही गए । फिर वो इधर उधर देखकर खडे हो गए तो मेरी आंखों में झांकते हुए बोले तो लडकी कौन थी? ऍम मैं चौक पडा । मुझे यकीन नहीं हो पा रहा था कि पापा मुझे अचानक ऐसा सवाल कैसे कर सकते हैं । खुद को संभालते बोला मैं नहीं जानता उस लडकी को वो उनसे प्यार करती है । शायद मैंने उसकी आंखों में देखा था । पापा ने मेरे काम में हाथ रखते हुए कहा कोई बात नहीं हो सकता है । मुझे गलत सही नहीं है । पापा ने एक बार फिर इधर उधर देखा और आगे बिना कोई सवाल किए हुए लौट पडे । मैं वहीं खडा उन्हें महसूस करता रहा

मेरी अर्धांगनी उसकी प्रेमिका - 47

सुहागरानी शादी की पहली रात खुशबू द्वारा मेरा इंतजार करना मेरा पहुंच रहा हूँ, उसे छोडा । प्यार करना उतना ही स्वाभाविक ढंग से हुआ था । किसी की अक्सर सुहागरात में हुआ करता है । लेकिन मेरे दिमाग में घुसे हुए कई सवाल मेरे हाव भाव में फिर भी चलते रहे । खुशबू मेरी जांघों में सर रखकर लेटी हुई थी । फॅसा उसके बालों को सहला रहा था । वो हमारे दांपत्य जीवन की पहली रात थी । इसलिए उस वक्त मैं उससे कोई भी अस्वाभाविक सवाल नहीं करना चाहता था । लेकिन मीटू का चेहरा मेरी आंखों के सामने ऐसे घूम रहा था कि चाहकर भी खुद को रोकना मुश्किल लग रहा था । मेरी शरारती उंगलियाँ पालों के झुरमुट से सकती हुई उसके गले को स्पर्श की तो चौक कर मेरे चेहरे की और देखी । उसके होठों पर गुलाबी मुस्कान तैर बडे बंदे में मुझे भी मुस्कुराना बडा किसी ने कुछ नहीं बोला । वो कुछ दिनों बाद मेरी खामोशी टूटी । एक बार फिर उसकी नजरें मेरे चेहरे पर बडी । हमारी शादी में मेरे कॉलेज की एक लडकी आई थी तो जानती उसे नीतू की बात कर रहे हो । वो मेरी सहेली है । वो एक का एक उठकर बैठ गई । मगर तो ये सब क्यों पूछ रहे हूँ । कब से जानती हो सही अब स्कूल के जमाने से ही साथ साथ पढे हैं । मैं चुप हो गया । शायद इसलिए कि मुझे मेरे सारे सवालों का जवाब नहीं होता था या फिर इसलिए किसके आगे और कुछ पूछना उनके नहीं था । बातों से उसका ध्यान हटाने के लिए जैसे ही मेरी शरारती उंगलियाँ उसके गले के नीचे उतरी तो एक का एक कसमसा उठी । उसने शर्मा कर मेरी और देखा और फिर बिस्तर पर नागिन सी सडक हुई । मेरी छाती पर अपने वोट रखती है । मैं सिहर उठा । तभी एकाएक पूरा कमरा अंधेरे में डूब गया । कुछ देर बाद रोशनी लौटी तो हम थक चुके थे । हमारी सांसे अनियंत्रित थी और हम दोनों एक दूसरे से नजरें नहीं मिला आ रहे थे । पता नहीं क्यों जबकि हम दोनों पति पत्नी थी । कमरे में देर तक खामोशी छाई रही । संजय काफी देर बाद वो बोली वक्त को तो देखो कभी यहाँ हम कितना डर डर कराया करते थे और आज देखो कैसे बेक खबर पडे हैं एक ही बिस्तर पर ना किसी के आने का डर है ना यहाँ से निकलने की जल्दी आज ये घर हमारा है । हम दोनों का आशियाना मैंने उसके और करवट लेते हुए उसके बदन के ऊपर अपने हाथ का घेरा बना लिया । इस बार उसकी आंखों में शर्म नहीं देखी । धीरे समझ कराई और फिर मुझे अपनी और खींचते हुए किसी बेल की तरह मुझसे लिपट गई । उसकी गर्म स्वास्थ्य मेरी छाती को जलाने लगी । संजय एक बात मुझे तुमसे डिकाॅय बोल, बडी कुछ हूँ, दिल धडक उठा ना जाने मेरे मिस्टर राज का जिक्र कर बैठे । क्या मैं जिंदगी भर तुम से ऐसे ही प्यार पाने की उम्मीद रख सकती हूँ । मेरी उंगलियों में अपनी उंगलियां फसादी हुई बोली हूँ अंतिम सांस होता तो सच कह रहे हो ना । वो बलपूर्वक मेरे बादल से निपट गई । उसकी थोडी मेरे सीने में चुके हैं । क्या कर रही हूँ? मैं जरा पीछे की कोशिश कर रहा था । लेकिन उसने कसाब काम नहीं किया । नहीं पहले बताओ । उसने बच्चों की तरह जब करते हुए कहा हाँ, मैं धीरे समझ करा दिया । वो अचानक चुप हो गई । मैंने भी कुछ नहीं कहा । हम तीर तक खामोश पडे रहे ना मुझे नींद आई, उसने सोने की कोशिश की । हमारे हाथ किसी अन्यंत्र जानवर की तरह एक दूसरे के बदन को यहाँ वहाँ छोटे रहे । वो ऍम मेरी और देखने लगे तो बताया नहीं किया है कि तुम भी हमेशा यही संजय एक आम लडकी की तरह वो भावुक हो उठे । मेरी बात बीच में ही काटते हुए बोली हम शादी कर चुके हैं तुम से अब तुम्हारे बगैर हम कुछ भी नहीं है तो तुम्हारी वजूद में ही हमारा वजूद है । संजय और जिंदगी भर रहेगा और मेरा गुजरा होता तो जानती हो ना मेरे कल के बारे में । हाँ संजय एकाएक उसके होट भेज गए । उन से अलग होकर सीधे लेट गयी । कुछ पल खामोश रहने के बाद कहने लगी हाँ संजय हम जानते थे मगर आज से सब भूल गए । हमें कुछ नहीं याद रखना और सच कहें संजय अब तुम भी भूल जाओ हमें तुम्हारी गुजरे हुए कल से कोई मतलब है ही नहीं । अब आज पर भरोसा करते हैं और आज पर ही जीना चाहते हैं । स्वच्छ ऍम मैंने आंखे बंद कर रही हो सकते हैं । तेजी से पलटते हुए उसने मेरे होने को चुन लिया । हमें पता है हर किसी का कुछ ना कुछ गुजरा हुआ कल होता है । इसका मतलब ये तो नहीं की बच्ची जिंदगी को भी उस की नींव पर टिका दी जाएगी । उस की बात सुनते ही मेरे साल से जैसे किसी ने सालों से रखे हुए बोझ उठाकर एका एक कहीं बाहर फेंक दिया हूँ । लंबी सांस भरते हुए मैंने उसकी और देखा हूँ इन करोगी कि प्रिया संजय उसने अपने उंगली मेरे वोटों से सडा भी इस वक्त नहीं प्लीज पिया का नाम तो बिल्कुल नहीं । मैं उस लडकी का नाम तुम्हारे मुझसे नहीं सुनता हूँ । उसके आखिरी शब्दों में सिर्फ और सिर्फ नफरत थी अभी चंद पहले मुझ पर प्यार लुटाने वाली औरत के अन्दर अचानक जरा सी बात पर इतनी नफरत कहाँ से आ गई? मैं भी समझने की कोशिश कर ही रहा था । अचानक मेरे मित्र राज का कहा हुआ एक वाक्य मुझे याद आ गया और तैयार करने के लिए बडी है समझने के लिए नहीं मुझे तो पूरा बडा संसार में हर किसी का कुछ न कुछ गुजरा हुआ कल होता है दिल का बोझ थोडा हल्का हुआ तो अकस्मात ही खुश्बू केशव दिमाग में कौन पडे सवाल उठा हर किसी का क्या मैं हूँ का भी ख्याल अचानक मुझे कांटो सच उठा खुशबू करवट बदल चुकी थी लेकिन मेरा पुरुष वाला दिमाग सक्रिय उठा । किस हद तक पता होगा उसको गुजरा हुआ कल क्या हो उस हद तक जैसे की मेरा प्रिया का या फिर नीतू का फिर अचानक ऐसा सुबह की सचमुच सबका तो था पूछना कुछ गुजरा हुआ कल उसका भी होगा, जरूर होगा । मैं जरा उस खुशबू की और देखा उसकी बल्कि बनती । उषा सोने की कोशिश कर रही थी या फिर हो गई थी । मैंने अपने बर्फीले हाथ उसके बाहों में रखा तो उसने बल्कि खोलती उसके चेहरे पर दबी हुई मुस्कान फिर से लौट आई । वो तो मुस्कुराने का अभिनय करते हुए बोला तो बिना करवट बदले गर्दन कुमार कर मेरी और देखने लगी । तुमने अभी कहा था ना, हर किसी का कुछ न कुछ गुजरा हुआ कल होता है । मैंने डरते लडते धीमी आवाज ना पूछा । हाँ तो उसकी आंखें एक गोल हो गई हर किसी का यानी की मेरे हूँ सूखे जा रहे थे क्या? तो तुम्हारा भी मेरी मनोदशा देखे तो खिलखिला बडी उठकर बैठेंगे । बोली संजय मैं भी तो जानी हूँ, इस दुनिया में रहती हूँ । मेरा भी तो गुजरा हुआ कल हो ना उतना ही स्वाभाविक है जितना कि तुम्हारा । फिर तो मुझे लेकर इतना परेशान हो रही हूँ । परेशान मैं इतना बडा नहीं, खुशबू और ऐसा नहीं है । मैंने जबरदस्ती हंसने की कोशिश की । चम्मच छोडो तक मेरे चेहरे के बदलते रंग को देखती रही । फिर अचानक करवट लेकर अपनी बल्कि गिरा ली है । मुझे भी लेना पडा । वैसे भी जागने की मेरे पास कोई वजह नहीं थी । संजय अचानक खुशबू उठकर बैठे और मुझे झकझोरते हुए बोली क्या तुम सच मुझे मेरे पास के बारे में जानना चाहती हूँ? नहीं, मैंने यूँ यूँ पूछ लिया था ना । उस की इस प्रतिक्रिया पर स्वच्छ मुझे डर गया था । वो थोडी देर तक एक तक मेरी और देखती रही । जब मैंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी वो उन्होंने लेट गयी ।

मेरी अर्धांगनी उसकी प्रेमिका - 48

वो नवंबर की खूबसूरत सुबह थी । अपने घर के डाइनिंग टेबल पर हम लोग नाश्ता कर रहे थे । ऍम बेटा टेबल पर कचौरी रखते हुए राजी चाचा ने पूछा नहीं चाचा जी, कुछ बूंदें मुस्कराकर राजू चाचा की और देखा और मेरी और पलटते हुए बोली संजय आप होगी । मैंने पापा की और देखा पर खामोशी के साथ कचौरियां चबाते रहे । उनके दिमाग में कुछ चल रहा था आज कल वो कुछ परेशान सराहा करते थे आप आप मैंने आवाज नहीं जिसमें कोई प्रॉब्लम चल रही है । क्या नहीं हूँ? उन्होंने हैॅ देखा नहीं बस ऐसे ही आजकल आप बातें काम करते हैं ना । इसलिए पूछ लिया वो हंस पडे । मेरी और देखते हुए बोले अब तुम सचमुच बडे हो गए हो । पापा मुस्करा पडा था । पार्टनर्स आजकल गोलबंदी करने में लगे हुए हैं । इसलिए कंपनी के फीचर को लेकर थोडी चलता है । पर कोई नहीं मैं उसे संभाल लूंगा । आपने आंखें झपकाते हुए कहा पैसे संजय उन्हें कुछ याद आया । तुम लखनऊ गए थे ना किसी इंटरव्यू के लिए । क्या उसका अभी कोई जवाब नहीं आया? अच्छा आपको कचोरी में पुनः व्यस्त हो गए । राज्य चर्चा की और देखते हुए बोले, कचोरी अच्छी बना लेते हैं । राज्य ज्यादा कुछ बोलते । उस से पहले मेरे फोन की घंटी घनघना उठी पापा की और देखने लगा कॉल लेलो । पापा ने कहा अभी मैंने फोन उठा लिया । हम आया है तुम्हारी शादी को तीन महीने होने को है । रोमांच पीरियड खत्म हो गया हो तो अपनी कोठी से कभी बाहर ही निकल लिया करूँ । फोन पर किसान था । हम तो इलाहाबाद शहर की गालियाँ भी भूल गए होंगे । शायद मुस्कुरा बडा है । नाश्ता कर रहा हूँ । थोडी देर में कॉल करूँ । अरे सुनो तो जरूरी है क्या मुझे फोन किया है? दरअसल तुम्हारे लिए खुशखबरी है क्या? अब मिठाई बनाकर रखूँ में आकर बताता हूँ । जान और सुकता से चिल्ला उठा मैं मिठाई मंगा लूँगा । लेकिन बताओ तो सही कौन सी खुशखबरी है । पापा और खुशबू के चेहरे पर एक चमक आ रहे हैं । उनको उत्सुक नजरे मुझ पर आकर ठहर गए । अब तुम लखनऊ गए देना किसी इंटरव्यू के लिए हाँ तुम्हारा जॉइनिंग लेटर आया हुआ है तो हमारे मकान मालिक के लेटर अभी देकर गए हैं । मुझे मैंने करा रहा हूँ बेहतर उसके फोन काट दिया । मैं उठकर तेजी से पापा की और बडा उससे पहले छुपकर में उनके पैर छुपाता । उन्होंने छपकर मुझे गले से लगा लिया । पी ठोकते हुए बोले उच्चतम पर पूरा यकीन था असल जिंदगी की पहली बारी में झूठ । इसी जीत के लिए तो मैं बधाई । फिर मुस्कुराते हुए उन्होंने कुछ की और देखा और बोले, फिर आप तो उसकी सिर्फ अर्धांगिनी नहीं बल्कि ताकत हो । उसके साथ हमेशा डटकर खडे रहना जीता हूँ कि आगे भराई तो दौड कर पापा के गले लगाते हैं । हम देर तक खामोश एक दूसरे की धडकनों को सुनते रहे । आंखों में पानी था और होठों पर मुस्कान ऍम आपने मेरे सर पर हाथ फेरते हुए पूछा पता नहीं आॅडीशन आ रहा है । लखनऊ में बाहर हो गए । अभी पता नहीं है बाबा कंपनी आलम भागते हैं । वहीं कहीं आसपास किराये पर कमरा ले लूंगा । ठीक है । बाबा ने कहा

मेरी अर्धांगनी उसकी प्रेमिका - 49

खुशबू लखनऊ जाने से पहले अपने पापा से मिलना चाहती थी इसलिए वह चली गई थी । तीन चार महीने में ये पहला वक्त था जब मैं अपने बेडरूम में अकेला था । कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूँ । मैं टेलीविजन ऑन किया और देखने लगा । अचानक मेरा फोन घनघना उठा उन राज का था और आज मेरे फोन उठाते हुए कहा ऐसे ऍम चुनाव मैं तो ठीक हूँ, लेकिन लगता है तुम्हारी दोस्त ठीक नहीं है तो कौन फिर से चल पडा । मैं प्रिया की बात कर रहा हूँ । राज ने कहा उससे आजकल बात होती है कि नहीं नहीं, उसकी शादी के बाद से नहीं हुई । यहाँ से आज दिल्ली के एक मार्केट में मिली थी । मुझे बीच बाजार में सुधाकर पर किसी बात को लेकर वो ऐसे चिल्ला रही थी जैसे उसे किसी की परवाह ही ना हो । नौ से कुछ कहा मेरी हिम्मत नहीं पडी उसके पास जाने की । हम घर जाते, उसका नहीं अचानक मुझे मिली थी । राज ने कहा, पैसे भी तुम जानते हो कि कॉलेज में भी उसने मुझ से कभी बात नहीं । हाँ, मैं जानता हूँ । मैंने धीरे से कहा लेकिन राज ये भी हो सकता है कि किसी हल्की फुल्की बात पर बहस हो गयी हो । दोनों में संजय राज ने पुकारा तुमने विलियम शेक्सपियर को पडा है । उन्होंने कहा था और गिर सकती हैं जब मर्द में कोई ताकत ना हो । मतलब उसकी बात मुझे समझ नहीं आई । हाँ संजय राजमा पडा, लगता है तुम सिर्फ इंजीनियरिंग ही पढते हो । कभी कभी समाज शास्त्र भी पढा करो । लोगों को समझने में आसानी होगी तो मैं पता होना चाहिए कि औरतों के बारे में समाज शास्त्री चेयर में क्या कहा था, क्या कहा था? मैंने पूछा । उन्होंने कहा था महिलाएं समाज की वास्तविक वास्तुकार होती हैं । क्या तुम उन का मतलब समझ सकते हो? इस बारे में मैंने अक्सर लोगों से सुना है और वो तुम्हें क्या सुना है? रात में हसते हुए पूछा ही की औरते अगर तुमने वही सुना है जो लोगों ने मुझे बताया है उसने गलत सुना है उसके मेरी बात बीच में ही गार्ड भी और कहने लगा । लोगों ने चेयर के संदर्भ को सही तरीके से प्रस्तुत नहीं किया और वो सही तरीका क्या है? मेरा मजाक उडा रहे हो? अरे नहीं दोस्त, मेरे हंसने का मतलब ये नहीं है कि मैं तुम्हारे कहने के अंदाज को कॉपी कर रहा था । कुछ सचमुच उनसे बहुत कुछ सीखने को मिला है । अच्छा तब भी गए, वहाँ पडा । उनमें अक्सर लोगों से सुना होगा कि हर सफल आदमी के पीछे एक औरत होती है और ये सच भी है । मगर महान ग्रुप सो मार्क्स ने इस पर एक लाइन और जोड दी थी, जिसने इस वाक्य को और भी चरितार्थ बना दिया । उन्होंने कहा, हर सफल आदमी के पीछे एक औरत है । उस औरत के पीछे उसकी पत्नी ये कुछ उसने पूछा । सत्य की समझ नहीं आया । मैंने उस कर कहा, नहीं क्या कहा तुमने सुना नहीं क्या सच में मुझे इतनी गहरी बातें समझ में नहीं आती । तो चलो तो आसान भाषा में समझाता हूँ । जोर से हंस पडा । जंपरों तक खामोश रहने के बाद कहने लगा फॅसने एक बात और कहा था कि पुरुष अपना भाग्य नियंत्रित नहीं कर सकते । उसके लिए काम उनकी जिंदगी में मौजूद बहुत करती है, जिससे हम पत्नी कहते हैं । अच्छा मैंने ऐसा कहा जैसे सब कुछ । मुझे सब कुछ समझ में आ गया हूँ । हालांकि मैं जितने अच्छे तरीके से इंजीनियरिंग को समझता था, समाज शास्त्र में उतना ही कमजोर था । मुझे समाज के तौर तरीकों से अक्सर इसीलिए खुद हुआ करती है । वो कभी भी मेरे तरीके के नहीं रहे

मेरी अर्धांगनी उसकी प्रेमिका - 50

हम शाम को गंगा गोमती से लखनऊ निकलने वाले थे । उस दिन पापा ऑफिस नहीं गए तो मैंने उसे कहा कि गाडी तो शाम छह बजे हैं और अब वैसे भी पांच बजे तक लौट आते हैं तो उन्होंने कहा नहीं आज पूरा दिन में अपने बेटे और बहू के साथ वो जानना चाहता हूँ । उस वक्त मेरी आंखें डबडबाई नहीं लेकिन तब तो आता जाता रहूंगा चल जाए । बेटियाँ भी तो ससुराल जाने के बाद अक्सर आती जाती रहती है लेकिन उसकी विदाई के बाद उसका बाप होता है जानती हूँ क्यों? क्योंकि मैंने सुना था वही पूछ लिया । चाहे बाबा जिंदगी का एक और पन्ना पलटने वाले थे तो घर छोडने के बाद सिर्फ बेटियाँ ही पढाई नहीं होती । बेटे भी होते हैं समझा नहीं हम जानते हो संजय बेटी का बाप जब बेटी के ससुराल जाता है तो वह बेटी का आलीशान घर देख कर खुश तो होता है लेकिन उस पर अधिकार नहीं लगा सकता । ठीक ऐसे ही लखनऊ के किसी घर में जब तुम अपनी दुनिया भर साल हो गई तो मैं भी शायद उसी बेटी के बाद की तरह वहाँ महसूस करूंगा हूँ । ऐसा नहीं होगा । आप कभी उस घर के मुखिया होंगे । मैं जानता हूँ । बेटा तो मुझे उस घर का भगवान बना देंगे । फिर छोडो सब हो जाना खर्च पडेंगे । आंखों में भरे पानी को पूछते हुए बोले तुम बहु को लेकर जा तो रहे हो लेकिन अभी रोकोगे कहा उसकी चिंता नहीं । पापा मेरे दोस्त नहीं आलम बाग के आस पास रहता है । अभी एक दो दिन उसी के पास रह लेंगे और उसके बाद कोई फ्रेंड खोल देंगे । अच्छा उन्होंने अजीब नजरों से मेरी और देखा । बहु का हैं गाडी का वक्त हो चला है उसे बोला हूँ जी पपालाल मैंने खुशबु का आवाज आ गई पापा मैं तैयार हो चुकी हूँ कुछ मैंने घडी देखते हुए कहा । गाडी आ गई क्या नहीं मैं खुद तुम लोगों को स्टेशन तक छोडने के लिए चलूंगा हो, हम चले जाएंगे । आप गाडी बंगला दीजिए वो सब तुम छोडो । लोग तो मेरे लिए मेरे पास एक तोहफा है । आपने जेब से चाबी का गुच्छा निकालते हुए कहा ये क्या है? पापा कुछ पूछा लखनऊ में तुम्हारे घर की चाबी फॅस की क्या जरूरत है? कुछ कुछ बोलते इससे पहले मैं बोल उठा खुशबू हैरानी से मेरी और देखने लगी । मेरी हाँ में हाँ मिलाते हुए बोली हाँ पाता । अभी इस की जरूरत नहीं है । जरूरत है । संजय पापा ने मुस्कराकर कहा कि मेरी बहू है और उसकी खुशियों का ख्याल रखना सिर्फ फर्जी नहीं । मेरा अधिकार भी है । जो कुछ भी बेटा कुछ कुछ नहीं कर पाई और मेरी और देखते हुए उसने चाबियाँ सामली । पापा ने जेब से एक पेपर निकाला और मुझे घुमाते हुए बोले लोग तुम्हारे घर का पता है, संभाल कर रख लो । खुशबू और मैं थोडी देर तक एक दूसरे की डबडबाई आंखों से देखते रहे । हमारे पास शब्द नहीं थे । कुछ कहने के लिए तुम गेट पर आ जाओ । मैं गाडी निकालता हूँ । कहते हुए पापा वहाँ से निकल गए । गाडी में बैठने से पहले एक बार फिर मैंने भरी भरी नजरों से उस घर के और देखा जल्द ही मुझ से अलग होने वाला है ।

मेरी अर्धांगनी उसकी प्रेमिका - 51

लगभग रात के दस बजे हम लखनऊ पहुंच गए । ऑटो वाले को पेपर में लिखे पते को दिखाया तो वह चमचमाती आंखों से हमारी तरफ देखने लगा । बढिया जी इस पते पर तो कोई रहता ही नहीं । तुम जानती हूँ इस पाते हो मुझे बडा ऑटो में हमारे समान रखते हुए बोला अरे इसी कोठी के पीछे तो मेरा मकान है । अच्छा तो तुम्हें पता हैं, किस की है? मेरा मतलब किसकी थी । हम ऑटो में बैठ गए भी किए तो नहीं पता । हाँ, इसमें जो लोग रह रहे थे, अभी पांच छह दिन पहले ही खाली करके वहां से जा चुके हैं । तो पडोसियों ने उनसे पूछा कि क्यों खाली कर रहे हो तो कहने लगे उनके मकान मालिक ने उसी इलाहाबाद के किसी आदमी को भेज दिया है । आप लोग इलाहाबाद जा रहे हैं क्या? हाँ तो अब समझा । उसने ऑटो में लगे हुए कांच में मेरी और देखते हुए बोला साहब आप नहीं खरीद लिया है । नौ से बहुत अच्छा किया । आपने बहुत लकी कोटियां साहब देखेगा, बरकत ही बरकत होगी । आपकी बातों ही बातों में हम वहाँ कब पहुंच गए, पता ही नहीं चला । ऑटो से उतरकर मैंने भरपूर निगाहों से देखा । इमारत की और बिना रोशनी के पहाड की तरह लग रही थी । हम दरवाजा खोलकर अंदर चले गए । दरवाजे के आसपास स्विच खोजना लगे । नहीं मिली तो मैं तेजी से बाहर निकला । खुशबू दरवाजे पर खडी रही । ऐसा आपके पास कोई टॉर्च है क्या? मैंने पूछा फॅमिली नहीं है । घर चले आता हूँ । नहीं नहीं, उस की जरूरत नहीं है । पांच हो तो दे दीजिए, उसी से कम हो जाएगा । हाँ चीज है । एक मिनट उसने अपनी जेब टटोलते हुए कहा, लेकिन इसका करेंगे क्या? बिजली का कटआउट नहीं पता, कहाँ लगा है उसे खोजना है । अरे वो तो वहीं दरवाजे के बगल में ही लगा है क्योंकि हम आते हैं । वह अंधेरे को चीरते हुए सीधे कटआउट के पास पहुंचा और उसका हैंडल पकडकर नीचे की ओर खींच दिया । एक का एक पूरी इमारत रोशनी सिन्हा उठी । मैं हैरानी से उसकी ओर देखने लगा तो मैं कैसे पता कि ये स्विच किधर है? साथ में पॅन हूँ । उसने अपने हाथों को मिलते हुए कहा, यहाँ कुछ भी खराब होने पर अक्सर नहीं आकर ठीक करता था हो तो अच्छी बात है । बीच में खुशबू बोल पडी तब तो हम भी आपको ही बुला लिया करेंगे जी भावी जी किसी भी समय अपनी छत पर चढकर आवाज दे दीजिएगा । हम हाजिर हो जाएंगे । कहता हुआ वो ऑटो की तरफ मुड गया । मैं बाहर आकर ऑटोवाले को पैसे दिए और मुड कर कोठी की और देखने लगा उस सचमुच बहुत खूबसूरत थी । इलाहाबाद की कोठी से भी खूबसूरत संजय मुझे लौटा हुआ देख खुशबू मुस्कुरा बडे पापा जी को फोन करके कहीं आएगा की उनका गिफ्ट सचमुच बहुत खूबसूरत है । हमें पसंद आया जरूर मैं मुस्कुरा बडा ऊपर चलकर देखिए कि कैसे क्या है देख कर उसका हम देर तक सफाई और सामान को व्यवस्थित करने में लगे रहे । काम से फुर्सत मिली तो एक दूसरे पर नजर गई । हम उठाके मारकर हस पडे । हम दोनों के शरीर धूल से ढक चुके थे । चेहरा ऐसे लग रहा था कि अभी अभी ईट के भट्टे से निकल कर आया हूँ । हम बिना शर्म संकोच के साथ ही बाथरूम में घुस गए । आज उस घर में हमारी पहली रात थी । सुहागरात

मेरी अर्धांगनी उसकी प्रेमिका - 52

हमारा दांपत्य जीवन एक एक दिन करके तेजी से कटता जा रहा था । इसी दौरान हमारे घर में एक नन्ही सी बेटी भी आगे पंखुडी । जी हाँ, हम उसे इसी नाम से पुकारते थे । वो हम दोनों के बीच पडे लाड प्यार से पढ रही थी । उसके नाना उसके जन्मदिन पर हमें तौर पे में एक कार भी दे गए । बस यही कमी थी और वो भी पूरी हो गई । शादी के तीन साल पूरे होते होते हमारे लगभग सारी घरेलू जरूरतें पूरी हो गई । कितना नसीब वाला हूँ कभी कवार खुद ही सोचा करता है । इतने कम समय में इतना कुछ खास लोग ही पा पाते हैं । इसी साल खुशबू को भी एक्ट्रेस पर नौकरी मिल गई । दस हजार वेतन कम नहीं होता । मेरे वेतन से सिर्फ दो हजार कम खुशबू को नौकरी करते हुए तीन चार महीने गुजर गए थे । इस दौरान उसमें कुछ खास तब्दीली नहीं आई । वहीं चुलबुलापन वहीं हंसने की बेवजह आदर और बिस्तर पर हर रात में सुहागरात जिंदा रखने की तमन्ना । अप्रैल की वह सुबह उस खुशबू बिस्तर से जल्दी उठाई । बेडरूम के बाहर गलियारे में कुछ उठपटक की आवाज आई तो मेरी भी नींद खुल गई । मैं आखिर मिलता हुआ बाहर निकला तो एक उस पर बरस पडे तो मैं जरा भी शर्म, ये संजय सब कुछ जानते हुए भी तुम से दूर आती भी नहीं रहा गया । बिहार सिक्स के चलो मानती हूँ मेरे ससूर थे, मैं भूल गई मगर तुम्हारी अपने पापा देना तो कैसे भूल गए । इतनी बडी बात तो मैं तो याद दिलाना चाहिए था । खुशबू ने पिछले तीन सालों में कभी मुझसे ऐसे बात नहीं की । मैं थोडी देर तक करानी उसे देखता रहा । मैं समझ नहीं पा रहा था कि वह इस बारे में बात कर रही है । लोग अब देखा हूँ वहाँ पर फिर पलटी मेरी और जाओ जल्दी बाकियों नहा धोकर बाहर आओ । ठीक है जाता हूँ । अगर हो तो सही आखिर हुआ क्या? कोई गलती हो गई मुझे रात में किस बात पर? सुबह सुबह मैं चला रही होगी । मतलब तो मैं अब भी कुछ याद नहीं आ रहा है । पूजा की थाली को सजाते हुए उसने पूछा खुशबू बताओगी तभी तो याद आएगा और थाली किसी सजा रही हूँ । संघीय मैं सचमुच पागल हो जाऊंगी । वो खींचते हुए बोली बाईस अप्रैल है ऍम मैं अपना नाखून चबाते हुए उस की ओर देखा । मेरे होठों पर शरारती मुस्कान झलक रही थी । आज बाईस अप्रैल है तो आज पापा जी की पुण्यतिथि है । संजय और भगवान के लिए मुझे ये पूछना कि कौन से पापा की इस बार उसका गुस्सा वाकई सातवे आसमान पर था । पिछले साल आज ही के दिन ऍसे उनकी मौत हुई थी । याद आया उसके चंद शब्द मेरे कानों से टकराएगा तो एक का एक मेरा शरीर छूने पड गया जब मुझे पहले मेरे वोटों परछाई हुई । शरारत भरी मुस्कान को एक का एक मेरे आंसुओं ने निकाल लिया । मैं आराम से घुटनों के बल बैठ गया । कुछ हुआ जिससे पापा ने अपनी बेटी का हाथ घर के रूप में छोटा सा पहुँचा दिया तो बेटी होने के फर्स्ट और उन के एहसानों के कतरे कतरे का कर्ज अदा कर रही है और मैं मैं तो बेटा उन का मुझे किस नरक में जगह मिलेगी । खुशबू भरी भरी आंखों से देर तक कुछ कहती रही लेकिन मैं सुन नहीं पा रहा था । मेरी पथराई आंखे देर तक बेतहाशा पानी को झेलती रही । संजय तो सुन रही हूँ कि मैं क्या कह रही हूँ । कहते हुए खुशबू जैसे ही मेरी और बडी उसके हाथ से पूजा की थाली छूट गई । हाली के गिरने का वह शोर जैसे मेरे कानों के पर्दे को चीज का हुआ निकल गया होगा । लगाया मेरी संवेदना वापस लौटी और जोर से चीख पडा । संजय तुम ठीक हूँ कुछ भी तेजी से मेरी और भागे । फिर वो जैसे ही मेरे इतने गरीब आई की मैं छुपाता पूरी ताकत से झटकर मैं उससे लिपट गया । हम दोनों की आखिर देर तक बस्ती रहे हैं । पापा सभी अचानक पंखुडी हमारे पास आकर खडी हो गई और हमें अपने आंसू पूछना पडेगा हूँ ।

मेरी अर्धांगनी उसकी प्रेमिका - 53

मेरा दोस्त राज अक्सर कहा करता था कि और तो और मौसम में कुछ खास फर्क नहीं होता । इन्हें समझने की कोशिश में वक्त बर्बाद मत करूँ । मौसम अच्छा है, उसका मजा लो, प्रतिकूल है, जीने में तकलीफ हो रही है तो ये नए शहर चले जाइए क्योंकि आप उसे बदल नहीं सकते । शादी के कुछ दिनों बाद से लेकर उसे नौकरी मिलने से पहले तक कुछ होगा । दिन बदिन खुद पर ध्यान देना कम कर दी जा रही थी । पांच । सब रहे हैं या नहीं चेहरे पर मैं कब है कि नहीं कपडे कैसे पहन रखे हैं । इन सब बातों की वो परवाह नहीं क्या करती है? आपको पंखुडी की देखभाल में खुद को इतना व्यस्त कर लेती है कि अगर शोर मचाकर में खुद का अहसास न कराता तो कब का? मैं किसी बंद पडे कमरे के किसी कोने की रखी एक ऐसी ब्रैंड बन जाता । इसका इस्तेमाल तो हो रहा है लेकिन उसकी परवाह किसी को नहीं है । मगर नौकरी मिलने के कुछ दिन के बाद से ही अचानक उसके सुभाव में आया परिवर्तन हैरान कर देने वाला था । अब खुद के सौंदर्य को लेकर कुछ ज्यादा ही संवेदनशील हो गयी । सजने संवरने के बाद दर्पण के सामने खडे होकर देर तक खुद को निहारना, हंसना, मुस्कुराना खुद में ही रीत जाना और सुबह ऑफिस जाने से पहले उसका ये सब करना जैसे उसकी आदत में शामिल हो गया हूँ । हालांकि मुझे उसका खूबसूरत दिखना पसंद था मगर न जाने क्यों कुछ वक्त से उलझन होने लगी थी । खासकर राज की बात याद करके एक बार रात में किसी घटना का जिक्र करते हुए कहा था, घर से निकलते वक्त और तों का सजना संवरना अप्रत्याशित नहीं है क्योंकि दुनिया की हर औरत सुन्दर दिखाना चाहती है । मगर सजने संवरने के बाद देर तक खुद को एक तक देखते रहना, आईने के सामने हंसना, मुस्कुराना जरूर अप्रत्याशित है जो बताता है कि वो प्यार बाहर तलाश रही है या तलाश चुकी है । मेरा दिल धडक उठा लेकिन मैंने मन को संभाल लिया । हो सकता है राजकीय समाज शास्त्र की बातें किसी दूसरी औरतों के लिए सच हो मगर खुश हूँ । उस पर मेरा अच्छा विश्वास था । वो ऐसा कुछ नहीं कर सकती है । उसको ऑफिस मेरे ऑफिस की तुलना में थोडा दूर था । वो मुझ से लगभग पंद्रह बीस मिनट पहले ही घर से निकल जाया करती । इस दौरान उसकी सबसे खास बात ये थी कि वो हर सुबह घर से निकलते वक्त मुझे किस करना नहीं भूलती । आप वक्त के साथ एक बदलाव जरूर आया । पिछले कुछ दिनों से मैं भी महसूस कर रहा था । खाना बनाने के प्रति उसका व्यवहार काफी हद तक बदल चुका था । अब वह खाना बनाने से काफी हिचकिचाया करती । कभी कभी तो हंसी हंसी में कह भी दिया करते हैं कि संजय अच्छा खाना तुम पका हो गई क्या? क्यों नहीं मुस्कराकर कहता और मैं पक्का भी लिया करता चाहे तो अक्सर नहीं बनाया करता । इन सबके बीच हम खुद एक भरोसेमंद आया के सहारे बडे लाड प्यार से पढ रही थी । अब तक वो तीन सामन देख चुकी थी । उसकी तोतली आवाज घर के गलियारों में गुजरा शुरू हो चुकी थी । एक खुशबू ऑफिस से काफी देर से आई और आते ही मेरे गालों को चूम लिया । हालांकि कोई पहला मौका नहीं था जब उसने ऑफिस से लौटने के बाद मुझे चूमा हो । अगर राहत जाने क्यों मुझे उसके किसमें प्यार कम और रिझाने वाली अदा ज्यादा लगी । धीरे धीरे डेढ से आने पर अक्सर वही करने लगे । कई बार तो रात के दस ग्यारह बज जाते हो जाने में मैं उससे देरी के बारे में पूछताछ उससे पहले ही वह बिफरते हुए कहने लगी संजय नहीं नौकरी नहीं करूंगी क्यों? मेहरान होकर पूछता तो मुझसे लिपटकर कहने लगते हैं । मुझे देर से आना अच्छा नहीं लगता और वह पटेल ऍम के बाद भी कुछ ना कुछ काम मुझे दे ही देते हैं । उस दिन उनकी बात सुनी तो मुझे हसी आगे मजबूत दूसरों की नौकरी ऐसी होती है हमें खुद को एडजस्ट करना पडता है । तुम परेशान मत हो जिनमें पंखुडी को संभालने के लिए आया रहती है और शाम होते होते तो मैं दिया जाता हूँ तुम्हें कुछ देर सी सही फिर ऐसा कभी कवार ही तो होना है । थोडा बहुत ऍफ कर लोगी तो तरक्की के लिए और रास्ते खुल जाएंगे । ऍम वो खिलखिलाकर एक बार पुनः मेरे गालों को चूम रही थी । मुझे लगता तो बुरा मान होंगे तो सचमुच बहुत अच्छे हो रहे इसमें बुरा मानने की कौन सी बात है? खुशबू मैंने मुस्कुराकर कहा हम जो कुछ भी कर रहे है पंखुडी के भविष्य के लिए कर रहे हैं । पैसे भी पापा की कंपनी पर उनके पार्टनरों ने कब्जा कर लिया है । अब अगर हम लोग छोटी छोटी बातों को लेकर घर में बैठ जाएंगे तो हमारे अपने भविष्य का क्या होगा? खान संजय मगर तीस तुम कभी मुझ पर शक मत करना । कहते हुए वो मेरे बाहों में सिमट आई मत करना । मतलब मैंने अपना असर हो जाए । बिना वजह ही इस बात को बात में शामिल करना मुझे हैरान तो कर गया । मुझे कुछ समझ नहीं आया । वैसे भी सब जानते हैं । मुझे समाज शास्त्र में कुछ खास दिलचस्पी नहीं है । रात से बात करता वो जरूर इसके भी कुछ ना कुछ मायने निकाल ही देता है ।

मेरी अर्धांगनी उसकी प्रेमिका - 54

अगली शाम मैं जैसे ही घर पहुंचा, दरवाजे पर लगे पत्र बॉक्स में पढाई खत्म मेरे हाथ लगा लिफाफे पर भेजने वाले का नाम नहीं था । मैं उसे खोलता हुआ अंदर आ गया । उसमें लिखा था उन कौन है ये सब क्यों कर रहे हैं? ये सब पता करने से ज्यादा ये जानना जरूरी है कि तुम्हारे आस पास क्या हो रहा है इसके बारे में तुम्हें पता नहीं है । हम जानते हैं संजय की तुम अपना अच्छा बुरा समझ सकते हो लेकिन जो कुछ तुम्हारी जिंदगी में घटित हो रहा है वो तो हारे लिए ठीक नहीं है तो भाई बहुत हो और कई बार तुम्हारी ये भावुकता ही तुम्हारी कमजोरी बन जाती है । इसका लोग अक्सर फायदा उठाना शुरू कर देते हैं । इसलिए अपना और अपनी लाडली बेटी पंखुडी का ख्याल हो । पंखुडी बहुत प्यारी है । वैसे हमेशा बताने के लिए खत्म नहीं लिख रहे । हम तो मैं सिर्फ इतना बताना चाहते हैं कि पिछले दो तीन दिनों से खुश्बू ऑफिस नहीं गई । पत्र पढने के बाद में अंदर ही अंदर तरफ उठा क्यों मैं खुद नहीं जानता हूँ । शायद इस बात पर की खुशबू मुझे कुछ छुपा रही है या फिर इस बात करके कौन है वो शख्स जो इस तरह के पत्र लिखकर हमारी जिंदगी में जहर खोलने की कोशिश कर रहा है ना उस पत्र को उलट पलट कर देखने लगा तो एहसास हुआ कि वह खत सीधे मेरे पत्र बॉक्स में फेंका गया है । क्योंकि उस पर न तो कोई टिकट था और नहीं किसी डाकघर की कोई मुहार । संजय एक कमरे में आवाज को जी मैंने पलट कर देखा । सामने खुशबू खडी थी अच्छा तुम ठीक है उसे अपने सामने पाकर बच्चों पडा आज जल्दी आ गई । पूछते हुए मैंने वो पत्र मरोडकर अपनी जेब में डाल लिया । घबराहट मेरी नजर छूट गई । क्या बात है संजय को झुककर मेरे सर को चलाते हुए पूछे बडे परेशान नजर आ रही हूँ । सब ठीक ठाक है ना और पंखुरी करते हैं । पंखुडी नीचे आया के पास है । नौ से लेने जाने वाला था कोई नहीं । मैं जाकर लेकर आती हूँ वो तेजी से पीछे क्या पडे हूँ । मैंने पुकारा तो वो ठहर गई तो बताया नहीं आज इतनी जल्दी कैसे आ गई? मैंने दोबारा उसी सवाल को पूछने पर वो खुलकर ऐसे देखिए मेरी और जैसे किसी ने उसकी चोरी पकडी हो । खुद को संभालते हुए अचानक खासकर वो कहने लगी आज पटेल सर को कहीं निकलना था तो साथ में उन्होंने अपने साथ काम करने वाले स्टाफ को भी जल्दी ही जोड दिया । मैंने फिर कोई सवाल नहीं किया । मेरी निगाहें उसके चेहरे पर कुछ पडने का प्रयास करती रही ।

मेरी अर्धांगनी उसकी प्रेमिका - 55

पत्र मिले हुए तीन चार दिन हो गए । इस बीच मैंने अपने दिमाग को कई बार समझाने की कोशिश की मगर वो नहीं माना । ऑफिस की कुर्सी पर बैठे बैठे अचानक ही मेरा हाथ जेब में कुछ टटोलने लगा । वो लेटर एक बार फिर मेरे हात आ गया । उस वक्त मैंने उस खत को लगातार दो तीन बार बडा मन तिलमिला उठा । खुद को इस तरह परेशान करने से अच्छा था की मुझे खुशबू से ही इस बारे में चर्चा कर लेनी चाहिए थी । लेकिन कहता क्या अचानक मन भ्रमित हो गया ये कि ये सब कुछ मुझे किसी ने खत भेजकर बताया है । मैं अपनी कुर्सी से उठा और ऑफिस से बाहर आ गया । गेट के बगल में सिगरेट की दुकान थी । उस एसिडिटी और चलाने ही वाला था कि किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए बोला ऍम अकेले ही अकेले धोनी का मजा ले रहे हो । ऍर देखा अरे कोई तुम यहाँ आया पहुंचते हुए बोला, यही तो ऑफिस के बगल में जो बीपीओ है वहीं आया था । तभी अचानक तुम दिख गए तो सोचा चलो संजय के साथ एक सिगरेट पी लेते हैं । हम बिल्कुल ऍम आते हुए बोला कुछ काम था यहाँ हर एक काम किया था । उसने गंदा समूह बनाया । बिना वजह का लफडा पाल लेते हैं । शर्मा जी शर्माजी अरे बीपीओ के मैनेजर शर्मा जी सिगरेट का जोरदार कश खींचते हुए बोला, ऍम, वो हमारे अच्छे दोस्त हैं । इनके बीबी का कुछ लफडा था । घर में तनाव बडा तो हमें बुला लिया और क्या लफडा था? मैंने पूछा जान जब भाई है, तुमसे क्या था? हमने शर्मा जी से एक बार कहा था कि शर्मा जी अगर भाभी जी का लोगों से घुलना मिलना आपको अच्छा नहीं लगता तो उन्हें घर पर ही रहने दीजिए । मगर तब नहीं सुनी और पैसे के लालच में एक प्राइवेट बैंक में मार्केटिंग के लिए लगवा दिए । फिर फिर क्या फॅार के साथ और देखो अपने पीछे चार साल का बेटा है । उसे शर्मा जी के पास छोड गई । अब शर्मा जी अपने बेटे को सम्भाले ऑफिस को कहते कहते उसके होट भी । इसलिए उस दिन खामोश रहने के बाद बोला मुझे एक बात बोलेंगे हाँ, ऐसे ही इंसान तब तक ईमानदार रह सकता है जब तक उसे बेमानी करने का मौका नहीं मिलता । तोफा के मामले में और भी कुछ ऐसी होती हैं । उसमें सिगरेट का आखिरी खर्च की जा और तो साला कुत्ता है कुत्ता कसम से साला ऐसे ही बदनाम है ही है । मैंने उसके कंधे में हाथ मारते हुए बोला ऐसे किसी के बारे में कुछ भी कहना ठीक नहीं है । ऐसे ही नहीं बोल रहा हूँ मेरे दोस्त खुद भुगतभोगी हूँ हूँ यहाँ औरतों के बारे में लक्षण दिन नहीं आया तो रहो चबाते हुए मेरी और देखने लगा । उसकी आंखों में एक का एक नमी आगे ना छोडते हुए बोला, बस ऍम शर्मा जी से मिलकर बिल फट गया या इतने कम समय में बेशुमार दौलत कमाई है उन्होंने इसके लिए और उसका ये सिला मिला नहीं । अभी जी को समय नहीं दे पा रहे थे । क्या कह नहीं सकता । गुजरते काम के चक्कर में उन्हें तैयार नहीं दे पाए । वो धीरे से बोला क्या? मैं चौंक गया तो उनकी बीवी थी । उनके बीच शादी का पवित्र बंधन था । इतने बडे फैसले के बीच प्यार अडे कैसे आ सकता है? संजय सिगरेट की रात झाडते हुए वो मेरी और देखा बोला एक बात याद रखना मित्र और पार्टनर के प्रति नहीं बिहार के प्रति वफादार होती हैं । अगर आपको औरतों को खरीदना है तो जेब में पैसे नहीं यार रखिए । सिर्फ प्यार के लिए कोई और और अपने बेटे को कैसे छोड सकती है क्योंकि औरतें प्यार की भूख ही होती हैं और भूख कई बार इतनी ज्यादा होती है कि उसके लिए अक्सर उससे भी बडी कीमत चुका जाती हैं । कहते हो दुकानदार की और बडा एक सिगरेट और मिल सकती है । इन तुमने अभी तो भी है । मैंने कहा हाँ मगर जब मैं बातें करता हूँ तो मुझे सिगरेट की ज्यादा जरूरत पडती है । उसने नहीं सिगरेट पर आग लगाते हुए कहा प्रशोतम अखबार पढते हो हाँ! तो हम अक्सर देखते हो गई की लडकियाँ कई बार प्यार के चक्कर में अपने रास्ते पर आने वाले अपने भाई माँ बाप को नहीं छोडती है जबकि लडकों के बारे में इस हद तक की दिवानगी कम ही देखने को मिलती है । ऐसा नहीं है मुझे मैंने उसकी बात का विरोध करते हुए कहा मैं ऐसे बहुत से लडकों को जानता हूँ जिन्होंने किसी लडकी के लिए कब तक पर डाले हैं । लेकिन यकीनन उसने अपने माँ बाप या भाई का खत्म नहीं किया होगा । अचानक वो तेज हो था । मैं जानता हूँ ना मर्ज की आपका । वो पैसे के लिए तो ऐसा कर सकता है लेकिन प्यार के लिए नहीं । अगर तुम्हारे पास कोई उदाहरण हो तो मुझे जरूर दिखाना । मैं सोचने लगा तो वह हस पडा । बोला हमारी छुट्टी बता रही है कि मैं सही हूँ । नहीं ऐसा नहीं है । मर्दों के उदाहरण भी तमाम है । लेकिन मुझे खोजना पडेगा बिल्कुल । वो जो बहुत बडा मिल जाए तो मुझे जरूर बताना । मोहित काफी देर हो गयी है । मुझे जाना पडेगा । मैंने घडी की और देखते हुए कहा फिर कभी मिलता हूँ । मैं वहाँ से अगर एक बार फिर अपनी कुर्सी पर बैठ गया । मोहित से बात होने के बाद दिमाग और भी अशांत हो गया । समझ नहीं पा रहा था कि क्या करूँ । मेरे सामने फोन रखा हुआ था । मैंने रिसीवर उठाया और खुशबू के ऑफिस का नंबर डायल कर दिया । फोन पर अमित पटेल ही था यार खुशबु का पहुँच सर क्या कुछ हुई जानकारी दे पाएंगे । बोलिए अभी चार पाँच दिन पहले कुछ ऑफिस में मौजूद थी । जी आप बिलकुल रहे हैं । रुककर उसने पूछा खुशबु का पति संजय मैंने अपना परिचय दिया । मैंने परिचय दिया तो वहाँ के आसपास ही होकर के हंस पडे । जी जी बिल्कुल बिल्कुल व्यवस्थित थी । वहाँ उपस्थित थी उसकी हसी में अचानक अतराहट आ गया जी टैंक्स मैंने कहा और फोन रख दिया

मेरी अर्धांगनी उसकी प्रेमिका - 56

उस दिन जब घर पहुंचा पंखुडी अकेली ही बाहर के बरांडे में चाबी से चलने वाली कार के खिलाने का पीछा कर रहे थे । पापा मुझे देती के खिलाफ पडेगी । उसकी नहीं स्वीकार एक दीवार से टकराकर रुक गई । आंटी के पास नहीं खेल रही हो । मैंने से गोदी में उठाकर दुलार करते हुए पूछा ऍम को मम्मी नहीं जात कर भगा दिया है इसलिए वो चली गई हैं । अमीनी! मैं चाहती हूँ उसे कुछ खारा मम्मी आ गई क्या? तो कमरे में लेटी हुई हैं । बडी मासूमियत के साथ उस ने कहा मम्मी ने हमें भी डाटा और हम से बात ही नहीं कर रही है । तो आप ॅ उसके नाजुक गानों को छोटे से मैंने कहा चलो हम भी मम्मी को डाटते हैं । गलियारे को पार करते हुए मैं सीधा बेडरूम पहुंचा । खुश गुस्सा मुझे खामोश लेटी हुई थी । मेरी आहट पर से कोई असर नहीं हुआ तो मैंने पुकारा तो वो उठकर बैठ गई । संजय उसके होठों पर एक भी की हंसी दौड पडेंगे । कब आई तो मम्मी से कम पडी की शिकायत है । मैं उसकी बात पर बिना ध्यान देते हुए कहा क्या वो पंखुडी की और देखी और फिर खुद पूछ पडी क्या ये पंखुडी पंखुडी चुप रहे । उसके नन्ने गुलाबी होठों पर हल्की सी हंसी बिखर पडी । आंकडे की शिकायत है कि मम्मा ने उसे डाटा पंखुडी आपने वापस से ऐसा का वो पंखुडी की ओर देखते हुए पूछी फॅार है ना दिया आपकी मुझे ॅ आप आप आपको दे देंगे । फॅमिली गई की एक का एक उठकर खुशबू ने उसे मेरी गोदी से छीन लिया । लाट करते हुए बोली हमने तो कब डाटा बताओ चाय मिल सकती है । अकस्मात थी बीच में मैं पहुंच पडा सर, दर्द हो रहा है था, जा रही हूँ । खुशबू पंखुडी को वहीं छोडकर अंदर रसोई की और चली गई । मैं कपडे बदलकर बैठ के और बडा ही था की खुशबू चाय का कप लेकर आ गई । एक चौक पडा हाँ मेरा मन नहीं है जो करन बताना जरूरी है, कुछ न कुछ अलाउड है । इस तरह जाना गुस्सा करते हुए मैंने आज से पहली बार देखा था । मैंने अपना सर खुजलाते हुए कमरे में इधर उधर देखा । मुझे उसके गुस्से का कारण समझ नहीं आया । इच्छुक जहाँ चाय पीने लगा पंखुडी टहलते टहलते कमरे से बाहर निकल गई । संजय खुशबू ने आवाज दी तो मैं उसकी ओर देखने लगा । उसकी आंखों में एक पानी कराया । वो पलके झपकाते हुए बोली, तुमने आज ऑफिस में फोन किया था, उसके सवाल सुनते ही चाहेगा । वोट मेरे गले में अटक गया । मैं खाते पूछा तो बीएसएफ क्यों हो? मैं ऐसी तो बताओ तुम्हें फोन किया था या नहीं? उसके स्वर्ग कम्पन कुछ पड गया हम क्या था मुझे स्वीकार करना पडा की हूँ ऐसी तुम्हारा हलचल जानने के लिए मैंने बात को वहीं थाम लेना चाहा । खुश हो गई है । थोडी देर तक तक मेरी और देखती रही । फिर कौनसी आवाज में कहने लगे संजय इस तरह तो मेरे बॉस को फोन करके मेरा हाल चल दे रहे थे । सुप्रीम सारी बनाते हुए वो बोली तो भारी सौरी बोलने पर तो माफ तो कर दूंगी । मगर मेरी जो बदनामी हुई है उसे लौटा सकते हो तो मैं खुश नहीं है । जानते हो संजय कहते कहते उसकी आंखों से आंसू की पूंजी टपक पडेंगे । रुकी नहीं । अपनी बात को जारी रखते हुए बोली जिस समय तुम्हारा फोन आया था, पटेल सर के कैबिन पर मैं अकेली नहीं थी । साथ में काम करने वाले कई लोग थे । जल सोचू । तुम्हारे इस तरह के सवाल सुनकर सबको कैसा लगा होगा? बहुत मुझे ऐसा लगा होगा मैं मैं समझ सकता हूँ । मैं द्रवित हो गया तो नहीं समझ सकते । संजय लेकर वो खींच पडी जानती हूँ क्यूँ! क्योंकि तो एक मर्द हो तो ही बताओ कि तुम्हारी कितनी सी बात पर लोग मेरे साथ कैसा व्यवहार करेंगे । मेरे बारे में कैसी कैसी बातें होंगी । कुछ दस के तहत के पास फर्श पर घुटनों के बल बैठ गया । बाकी मेरी आंखें आंसुओं से भर दी थी । उस वक्त में समझ नहीं पा रहा था की उससे क्या करूँ । उसकी हथेली को अपने हाथों में भरते हुए मैं बोला मैं मैं सच में अपनी सरकार के लिए बहुत शर्मिंदा हूं । संजय फफककर रो पडे तुम्हारी अंदर अगर कुछ था तो घर पर मुझसे बात कर लेते हैं या ऑफिस के नंबर पर कॉल करने की बजाय मेरे मोबाइल पर कर लेते हैं । मैं ये सब किसी की आप कब मैं मैं कुछ समझ नहीं पा रहा हूँ । कहते हुए मैंने अपना सर उसकी चांगों में टिका लिया । फिर हम देर तक खामोश रहे तो मेरे वालों को किसी बच्चे की तरह तीर तक सहलाती रही

मेरी अर्धांगनी उसकी प्रेमिका - 57

बुधवार की सुबह थी । हम दोनों छुट्टी पर थे । मुझे लगा सारे गिले शिकवे दूर करने के लिए सबसे बेहतर मौका है । हमें कहीं उन्होंने निकलना चाहिए । कुछ दूसरे जब मैंने अपनी इच्छा जाहिर की तो वह चौंक पडी । उसका चौकन् शायद अस्वाभाविक नहीं था, क्योंकि जब से हम लखनऊ आए थे कि शायद पहला मौका था जब मैंने अपनी तरफ से घूमने की इच्छा जाहिर की । खुशबू जब तक रुकने की हद तक नहीं आ जाया करती, तब तक कहीं बाहर निकलने की योजना नहीं बन पाते हैं । कुछ भी जल्दी जल्दी नहाकर अपने गिरे वालों को झटकती हुई आई और बेडरूम में रखी हुई मेकप टेबल के सामने खडी हो गई । मैं और पंखुडी पहले ही तैयार हो चुके थे, इसलिए मैं हॉस्टल में लगे सोफे में बैठकर अखबार पडता हूँ । उसके तैयार होने का इंतजार करने लगा । बंगडी मेरे पास ही अपने खिलौनों के साथ खेलने में व्यस्त हो गई । काफी देर तक कुछ भी नहीं आई तो मैंने पंखुडी से कहा । मीटर जाकर देखो तो मम्मी क्या कर रही हैं? उन्हें बुला लाओ नहीं, हम नहीं जाएंगे । मम्मी अच्छी नहीं है । मुझे प्यार नहीं करती । रुकने का आग्रह करते हुई पंखुडी ने मेरी और देखा । मेरे पास आकर कहने लगे तो आपका आप हमें बहुत प्यार करते हैं फॅार उसे अपनी गोद में उठा लिया और से गानों को चूमते हुए बोला आप आप को बहुत प्यार करते हैं । मेरे सीने से चिपक थोडी देर तक दुलार करती रही और मैं उसे वहीं छोडकर तेज कदमों से बैडरूम पहुंचा तो दंग रह गया । खुशबू बिलकुल तैयार थी । मगर उलझाने क्या? आईने के सामने खडे होकर खून घूमकर हर कोने से खुद को देख देख कर मुस्करा रही थी । इससे पहले की मैं उसकी हरकतों का कुछ तथाकथित समाज शास्त्रियों की नजरों से मतलब निकालना शुरू करता । उसके कंधों को मैंने अपने दोनों हाथों से थाम लिया । मुझे ईकाई आईने में अपने पीछे देखकर वह शर्मा गई । मुस्कुराकर बोली तो जानते हो ना की इस तरह चोरी से किसी लडकी के कमरे में घुसना पूरी बात है । जानती हूँ मैं मुस्कुरा बडा मगर साढे बात अब आपको लडकी नहीं रही हैं । पत्नी है हमारी और हमें इस तरह की हरकतों का पूरा अधिकार है सब्जियाँ चीन नहीं तो बिजली गिरफ्तार से मेरी और भूमि फिर हफ्ते में बोली ऐसा कोई अधिकार नहीं है तो के जी से अपनी बाहों में भर लिया । उसके आंखों में देखते हुए बोला जानती हूँ इस तरह देर तक आइना को देखने का मतलब क्या होता हैं? क्या होता है वो बच्चों से खिलखिला उठे उसे किसी से बिहार मैं अपनी बात जानबूझकर बीच में ही छोड दिया और उसके चेहरे पर बनती बिगडती भावभंगिमाओं को गौर से देखने लगा । क्या देख रहे हो? अचानक उसके होम छूट गए तो तुम कहना क्या चाहते हो? वो उपपरियोजना भरी निगाहों से मेरी और देखने लगी । पल भर पहले उसके होठों पर तैरती मुस्कान यहाँ यहाँ गायब हो गई ही की तो भी हम से प्यार हो गया । हाॅट तुमसे बिहार हो गया है । वो हकला पडी थी फिर खुद को संभाल पाई तो कहने लगी हम तो तुमसे हमेशा से प्यार करते हैं । अगले कुछ घंटों में हम चिडिया घर पहुंच गए । शीर हाथ, भालू और अनेक प्रकार के पक्षियों और जंतुओं को देखते हुए हम आगे बढते गए । पंखुडी मेरी गोद में थी । हम देर तक इधर उधर घूमते रहे । संजय इधर देखो सफेद बंदर । खुशबू हैरान होते हुए बोली आप करीब से देखते हैं । हम करीब पहुंचे तो बंदरों का एक झुंड बडी तेजी से हमारी और दौडा थोडी का चेहरा खेल उठा । संजय भी शायद कुछ खाना चाहते हैं । खुशबू गोली क्या खाएंगे हमारे पास तो फॅमिली के अलावा ऐसा कुछ नहीं है जो इन्हें खिलाया जा सके । फॅमिली खिलाते हैं खुशबू मेरे हाथ से मूंगफली का कुछ हिस्सा अपने हाथ में लेकर जैसे ही जाल के करीब पहुंची जगह सारे बन्दर उसकी और टूट पडे । संजय तुम भी खिलाओ ना । उजाल के अंदर मूंगफली फेंकते हुए बोली मैंने मूंगफली से भरी हथेली जाल के अंदर बढाई तो फिर जो नजारा देखा उस पर कुछ देर मुझे यकीन नहीं हुआ । मेरी और एक भी बंदर नहीं आया । मैंने कुछ हूँ की और देखा मेरा आशय समझ को हंस पडी । बहुत मैंने हसते हुए कहा । लगता है इंसानों की तरह बंदर भी खुबसूरत लडकियों पर बहुत जल्दी फिदा हो जाते हैं । तो ऐसा था खुशबू ढाका मार्कस पडे तो शर्माते हुए बोली ये भी तो इंसान के पूर्वज भी हैं । कुछ मूंगफली व्यक्ति हुई मुझ से कुछ दूर निकल गई थी । पंखुडी अब भी मेरी ही घूमती थी बेटा । मैंने कहा अब कुछ देर के लिए पैदल चलिए देखो पापा के हाथ दर्द करने लग गए । उनको भी एक अच्छी बच्चे की तरह मेरी गोदी से उतरकर जमीन पर खडे हो गई । मुझे कुछ राहत सी महसूस हुई । मैं अपने हाथों को झगडते हुए इधर उधर चहलकदमी करने लगा । अभी कश्मार मेरी निगाहें व्यक्ति पर जाकर ठहर गई । लगभग तीस पैंतीस साल का युवक बडी तल्लीनता से खुश्बू की और देखे जा रहा था । पिछले अचानक कैसे ऐसा हुआ कि उसको मैं देख रहा हूँ । कोई का एक मुस्करा पडा और बोला आप समझे समझे मुझे अजीब सा लगा और वह चलता हूँ, मेरे पास आ गया । अब चिडियाघर देखने आए हैं हम कर तुम कौन हो? अपनी चलते मुझे दशक की बेटी बहुत प्यारी है क्या ना मिस्टर थोडी मगर तुम कौन हो? कैसे हो? पंखुडी बेटा पूछते हुए उसमें पंखुडी को अपनी गोद में उठा लिया । मैं हैरान नजरों से उसकी और देखता रह गया तो थोडी देर तक कंपनी कुल लाड करता रहा । फिर एकाएक उसे मेरी गोद में थमाकर वहाँ से चला गया । संजय चलो यहाँ से अभी खुशबू ने आवाज भी पीछे मुडकर देखा । खुशबू मेरे पीछे खडी बडी घनत् में गांवों से लौटते हुए उस युवक को खुल रही हैं । पता नहीं वो कौन था । उन की उस घटना के बाद मुझे खुशबू के इस बारे में कुछ भी पूछने की मत नहीं पडेगी ।

मेरी अर्धांगनी उसकी प्रेमिका - 58

अगले दिन सुबह मुझे घर से जरा जल्दी निकलना पडा । ऑफिस में एक मीटिंग थी । उस वक्त तक पंखुडी के लिए दूध नहीं आ पाया तो मैं निकलते वक्त खुशबू को कहता गया कि वह ऑफिस निकलने से पहले हर हाल में दूध मंगा कर रखते हैं, ताकि हमारी अनुपस् थिति में पंखुडी को कोई तकलीफ हो । ऑफिस पहुंच गया, मगर खुशबू ने दूध मांगा ही लिया होगा इस बात की मुझे तसल्ली नहीं हो पा रही थी । खुशबू इधर कुछ दिनों से इन सब मामले में कुछ आप्रवासी हो गई थी । बेटिंग खत्म होते ही मैंने खुशबू के मोबाइल पर फोन किया तो कॉल नहीं लगी । मैंने उसके ऑफिस फोन किया तो देर तक घंटी बजती रही । वो नहीं उठा । मैंने फिर से ट्राई किया । उन किसी कर्मचारी ने उठाया । उससे मैंने खुशबू को लाइन पर बुलाने के लिए कहा तो वह कहने लगा सर मजबूत ऑफिस में नहीं है । पटेल सर के साथ कहीं निकली हुई हैं कहाँ? अब पता नहीं है, बता कर नहीं गए । ऑफिशियल काम था, कह नहीं सकता । लेकिन आपको बोल रहे हैं कि मैं बाद में फोन करता हूँ । अगर मैंने फोन रख दिया उसमें जब शाम को घर पहुंचा तो पता चला कि दूर आज आया ही नहीं । मैंने जब आया से पूछा की खाने में पंखडी को क्या दिया था? इस सवाल पर वो बनाते हुए बोली क्या करती साहब? बिस्कुट के अलावा और कुछ नहीं था । पिच में कुछ से रखे हुए थे । उसी को काट कर दिया तो उसे खाया भी नहीं । वो अब भी वहाँ कटा हुआ रखा है । उसने सामने अलमारी की ओर इशारा करते हुए बोला मैंने घूम कर देखा । लगभग पूरा का पूरा से सुरक्षित था तो कितना ही होगी । मैं अंदाजा नहीं लगा पा रहा था । मैंने दौड कर पंखुडी को गले से लगा लिया और कुछ करते हुए पूछा ट्विटर रोक लगी हैं उससे से लाया । मैंने बगैर कपडे बदले सीधे उसे गोद में ले जाकर बाजार की तरफ निकल गया । लौट कराया तो खुश हुआ । चुकी जी मुझे देख कर मुस्कुराई लेकिन मैंने कोई प्रतिक्रिया नहीं क्योंकि मेरे अंदर पीडा थी, पंखुडी के लिए था । पेडा आॅफिस पर नहीं थी । कहाँ गए थे आप लोग? मैंने सवाल किया आज मुझे इस बात की कतई फिक्र नहीं थी कि वह पूरा मान जाएगी । तुमने आज फिर ऑफिस फोन किया और संजय आप लोग का क्या मतलब था? पहले तो वह भडकी मेरे चेहरे पर किसी क्रोध की रेखाओं का उसे जल्द ही अनुमान लग गया । उसके होठों की मुस्कान अचानक गायब हो गई । आप लोग का मतलब है ना पटेल के साथ पहुँच गयी तो वहाँ उसमें एक एक हफ्ते की कोशिश की, मगर हो तो उसका साथ नहीं दिया । खिलाते हुए बोली वो क्या है ना? संजय एक जरूरी काम वंश हमें असरगंज हम जानते हैं अजय देवगन पैसे तो नहीं जाना पडा । मैं अचानक चलना बडा हो ये बात हम बहुत बार तुम्हारे मुझे सुन चुके हैं । नहीं संजय हम वो नहीं कहना चाह रहे थे । दरअसल आजम दूसरे प्रेस में गए थे । अच्छा किस प्रेस में उसके दिमाग में कोई दम आया तो बोल गई । वहाँ का फोन नंबर है तुम्हारे पास नहीं । उसके होट सूखा लगे । अच्छा चलो पटेल का तो कोई पहुंॅच नंबर होगा है । नंबर ऍम मेरे पास भी रखा हुआ था । मैंने रिसीवर उठाते हुए उस की और देखा, लेकिन फोन करके उनसे पूछेंगे क्या? ऍफ का फोन नंबर मैंने कहा उन्हें भी नहीं मालूम होगा । उन कैसे जानती हूँ कि उन्हें नहीं मालूम होगा । फॅमिली नंबर बोलो । जोर देते हुए कहा साहब, मैं जा रही हूँ, अभी ये का एक आया की आवाज आई जाओ मैंने वही बैठे बैठे कह दिया । अब आॅड कहती हूँ वो तेजी से आया की और भागे दूध आया था । मुझे दूर से खुशबु का स्वर सुनाई दिया । शायद मेरे गुस्से के कारण को समझ गई थी । उस दिन खुशबू मेरे पास नहीं हुई है । खाना खाने के बाद वो नीचे वाले बेडरूम में चली गई । पंखुडी मेरे पास ही थी । अगली सुबह घर से निकलते वक्त उसने मुझे बात नहीं किए । ऑफिस पहुंचा तो पता चला की वो उस दिन फिर ऑफिस नहीं गई । शाम को जब मैंने पूछा ऑफिस क्यों नहीं गई? झल्लाकर बोली मेरी मासी और इसके बाद तो मैं कुछ कहना है । उसमें लाल लाल आंखों से मेरी और देखा । मैं चुप हो गया । इन गुजरे सालों का वह पहला मौका था जब मेरी मर्जी जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया था । प्राथमिक फिर हम अलग अलग कमरे में ही सोए थे ।

मेरी अर्धांगनी उसकी प्रेमिका - 59

सुबह मैंने जैसे ही नाश्ता करके अखबार उठाया और नजर मुखपृष्ठ पर गई तो एक का एक मेरा पूरा बदन थर थरा उठा । अखबार में प्रिया का चित्र छपा हुआ था मगर खून से लगभग इसमें अब सांसे नहीं थी । पूरी खबर पडी तो लगा कि अब मैं नहीं कहूंगा बाकी मेरी बहुत थरथरा रहे थे । अज्ञात हालातों पर दिल्ली में एक और कत्ल खबर की मुख्य लाइन थी । मैंने खुद को संभाला, बेडरूम पहुंचा, कपडे पहने और अपना पहुंच देखा और सीढियों से उतरते हुए नीचे आ गया । सामने खुशबू खडी खानी देख रही थी । ठंड भर के लिए हमारी नजरें टकराई लेकिन नहीं उसे कुछ नहीं पूछा मैं मैं कल तक आऊंगा । मैंने कहा और घर से इलाहाबाद के लिए निकल गया । अखबार की खबर के मुताबिक प्रिया की लाश शाम तक इलाहाबाद पहुंच जाएगी । मैं जब इलाहाबाद उसके घर पहुंचा । प्रिया की लाश वहाँ पहुंच चुकी थी । राज के आस पास कितने लोगों का घेरा था मुझे ठीक से याद नहीं लेकिन इतना जरूर है कि बडी मुश्किल से भीड को पार करके मेरी निगाहें उसकी लास्ट तक पहुंच पाई । उसके चेहरे को छोडकर पूरा शरीर सफेद चादर से ढका हुआ था । चेहरे पर नजर पड रही मेरी आंखें रो पडी जी क्या की सब को चीरते हुए उसके पास तक पहुँच जाऊं और से अपनी बाहों में समेटकर चिंघाड का रोल । लेकिन ऐसा संभव नहीं हो सकता था । कुछ बंदिशें है इनकी वजह से खुद को संभालना पडा । धीरे धीरे रेंगता हुआ कुछ बता रहा हूँ । शाम की ढलान के साथ भीड धीरे धीरे वहाँ से निकलती जा रही थी । रात का पहला पहर लगभग आखिरी पडाव पडता था घर के सामने छोटे से लॉन पर रखी लाश के इर्द गिर्द । अब इक्के दुक्के लोग ही बच्चे थे जो इधर अगर अंधेरा का सहारा लिए दूर दूर तक लॉन में छितराए हुए थे । चारों तरफ पूरी तरह से सन्नाटा था । रोते रोते हर किसी का गला रुंध चुका था । सबकी आंखें सूज गई थी । उस वक्त प्रिया की लाश के सबसे करीब नहीं था जिससे उसकी नाम बूंदे धीरे धीरे भी कोई जा रही थी । मैंने भरी भरी आंखों से आसमान की और देखा । चंद की धुंधली रोशनी में मैंने एक बार फिर प्रिया के चेहरे को देखा था । उसकी आंखें अब भी खुली थी । पल भर के लिए लगा जैसे वो मुझे देख रही है । उस वक्त मुझे उसका सबसे पसंदीदा शेयर याद आ गया जिससे वो अक्सर मुझे सुनाया करती थी हम गए ये सांसे तेरी जुलाई में ये मेरे प्यार की हद थी छोड दिया तुझे तेरे कहने पर ऐतबार की हद थी पता था तो नहीं आएगा मेरी जिंदगी में लौटकर मगर मर गए हम खडी रही आप हैं जितने इंतजार की हत्थी परेशान हो उठा की संसार का एक खूबसूरत गुलदस्ते को किसी ने कितनी बेरहमी से कुचल दिया गया है या फिर ये चंद क्यों अपना सफर बंद नहीं कर रहा है कि शबनम की भूमि सूख क्यों नहीं जाती तो नहीं । सारा जहाँ धीरे से भर गया तभी न जाने मुझे लगा कि दूर अंधेरे में बैठे किसी इंसान क्या की काफी देर से मुझे खूब रही हैं । हो सकता है और कुछ सवाल किया नहीं तो नीतू हो गई वो यहाँ कैसे नहीं नहीं और होगा । मैं अपने सवालों, सभी निकलने की कोशिश कर ही रहा था कि वहाँ से उठकर लडखडाते कदमों से चलती हुई मेरे पास आकर खडी हो गई । उसने मेरे कंधे पर रखने के लिए अपना हाथ बढाया और फिर कुछ सोचकर अपने हाथों को समझ लिया । ऍम आँखों में देखा नहीं हुई थी ठंड लग जाएगी छाया में बैठी हूँ मेरे कानों तक चुभते हुए धीरे से बोल मैंने कोई जवाब नहीं दिया । थोडी देर तक मेरी प्रतिक्रिया का इंतजार करती रही । मैं नहीं उठा तो उसने अपने कंधे पर पडे दुपट्टे को निकाला और मेरे कंधे में डालकर वहीं मेरे पकडते बैठ गई । रात भर हम साथ रहे एक फुट की दूरी बार मगर ना फिर उसने कुछ कहा । मैंने कुछ बोला सर्द हवाओं के बीच रात गुजर गए । सुबह मुखाग्नि के वक्त जब प्रिया की लाश से आखिरी बार चादर उठाया गया तो मैं खुद को संभाल नहीं पाया और चिल्लाकर रो पडा । कितनी बेदर्दी से चाकुओं द्वारा उत्पदन को भेजा गया था । स्तनों को काट दिया गया । उस स्थान को मैं किस नाम से लिखो । वहाँ पर कितनी चाहूँ लुभाए गए थे । उसके जिस्म के ऊपर पडे कपडे पर एक के चाकू का निशान अंकित था । पिशाचों ने उसके बदन में सैकडों छेद कर दिए थे । पता नहीं कब करने वाला कौन था इंसान या शाॅ कौन था वो । एक अखबार की कुछ पंक्तियां याद आ गई क्या मारने में सचमुच सुधाकर का हत्था चिता धू धू करके चल रही थी । हड्डियां चटक रही थी । प्रकृति की इस प्रलय को देखने वाला उस समय वहाँ पर कोई नहीं था । सवाल मेरे और प्रिया के भाई के

मेरी अर्धांगनी उसकी प्रेमिका - 60

मुझे शाम को वापस लखनऊ लौटना था । ट्रेन के निकलने में काफी वक्त था हूँ । मैंने खुद से सवाल किया आपने जॉन्सटाउन के घर पर जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था । आप आगे जाने के बाद से उस घर में में कभी नहीं गया । उसके निचले वाले हिस्से में मैंने अपने दोस्त किशन को कोचिंग चलाने की अनुमति दे दी थी । ऊपर का हिस्सा घर के सामान से भरा हुआ था । प्रिया के घर में मैं नीतू से चार सालों बाद पहली बार मिला था । अगर हालात अच्छे थे कि हम दोनों में कोई बातचीत नहीं हुई । मैंने टैक्सी पकडी और सीधे उसके घर उतर गया । दरवाजे पर बैठने वाला इंसान बदल चुका था । मुझे दरवाजे की ओर आते देख को खडा हो गया तो उससे मिलना है । आप को उसने पूछा नहीं तो देखने पर मैंने पूछा तो थोडी देर तक मेरी और खुद जा रहा है । फिर बोला आपका नाम संजय पाठक हूँ । आशा तो घर पर ही कोई काम था । आपको बहुत सवाल जवाब करते हो तो मैं डाक्टर कहा आप कर दीजिए साहब । पुस्तक बताते हुए बोला नौकरी ही ऐसी है, अभी रुकिए मैं अंदर जाकर पूछ कर आता हूँ । एक तो अंदर की अलग का । फिर अचानक ठहरकर मेरी और देखने लगा । ऑस्कर बोला तो नहीं साहब मुझे आप पर भरोसा है । आप इधर जाइए । ऍम दरवाजा पार करके जैसे ही मैंने गलियारे पर कदम रखा, अकस्मात आवाज आई, मैंने पलट कर देखा । एक पचास पचपन साल के अधेड औरत मेरे सामने खडी थी । कॅश मैं था पांच छह साल बाद मैं फॅमिली में घुसा था और जहाँ तक मुझे याद है कि इससे पहले उस अधेड स्त्री से मैं कभी नहीं मिला । नीतू ऊपर अपने कमरे में हैं । इधर सीढियों से चले जाओ । उसने कहा अचानक मेरी निगाहें ऊपर बॉल करने की और गई तो मैं सहन गया । नीति सामने बॉलकनी पर होने के बाल चुकी हुई मेरी और देख रही थी । हमारी नजरें मिली तो कुछ करा बडी मगर उसकी वो सीखी से मुस्कान देर तक नहीं तेरी नजरों से ऊपर आने का संकेत करते हुए धीरे से बोली आजाओ संजय हाँ बेटा, ऊपर जरूर मैं नाश्ता वहीं भी जाती हूँ । अभी तो स्त्री ने कहा उसकी आवाज में मेरे लिए मातृत्व ठूस ठूस कर भरा हुआ था जी । मैं उसकी प्यार से लगभग आंखों कि और देखता हुआ अभी धीरे धीरे सीढियाँ चढ ही रहा था कि अचानक एहसास हुआ कि वहाँ पर सिर्फ हम तीन लोग नहीं थे । कुछ और भी थे जो मेरी और बडी उत्सुकता से देख रहे थे । सब की नजरों से बचने की कोशिश करता हुआ सीधे नीतु के पास पहुंच गया । नहीं तो मुझे अपने सामने पाकर पूरी देर तक पथराई आंखों से तक देखती रही । उसका चेहरा भावना था जिसमें ना उत्सुकता थी ना आप रात मैंने जब हाथ मिलाने के लिए अपना हाथ बढाया, वो चौक पडी जिसे अभी भी होश में आई हो, उसका प्रख्यात नहीं बढाया । आपने सूखे हुए हो तो में रुकी । हंसी भरते हुए बोली कैसे हो? संजय ठीक हूँ मैंने अपने हाथ समय के लिए तुम जी रही हूँ । उसके नीचे खडे लोगों पर निगाह दौडाते हुए कहा ये सब मुझे ऐसी को देख रहे हैं । मेरी निगाह अभी नीचे खडे लोगों पर चली गई । मेरे घर भगवान जो आएँ हैं । मैचों पडा भगवानी तो हो तो क्या यहाँ वहाँ फिर थी । मेरी निगाहें लौट कर नहीं तो की आंखों में ठहर गई । ऍम कहती हुई वो पलटकर कमरे की और बढ गई । उससे वक्त उसने दरवाजा खुला छोड दिया । उसके रूखे व्यवहार पर हैरान था । पीछे पीछे मैं भी अंदर चलाया । उजाकर धर्म से सोफे पर बैठे उसकी नजरे सामने खाली पडे, सोफे की और दौड लगाते हुए आई और मेरे चेहरे बडा थक गई । मैं कुछ देर तक नीतू की और देखता रहा कि शायद वो कहेगी की पहचान मगर वो चुप नहीं बैठने के लिए नहीं होगी । आखिर में मुझे उसे शिष्टाचार की याद दिलानी पडी । संजय मुझे अब ये भी कहना होगा जरूर मेहमान हूँ ऍम उसमें भरपूर निगाहों से मुझे देखा । कुछ पल खामोश रहने के बाद बोली भगवान को कौन कहता है, क्या हो और बैठो हमारी आत्मा में एक उसमें अपनी पलकें झुका ली । उसकी आंखों से पानी की चंद बूंदे उभरकर भी फर्श पर टपकी । वो उठकर एक कमरे के पीछे वाले दरवाजे की और भाग है । मैं भी कुछ समझ पाता उससे पहले एक का एक जोरदार तो दवा हुआ । वजन का स्वर्ण कानों को चीज का हुआ । उस हवेली की दीवारों के बीच कहीं दफन सा हो गया । मैं हर बडा और उसकी और लगता वो एक कमरे का सहारा लिए हुए खडी हो रही थी । मैं समझ नहीं पा रहा था कि वह ऐसे अचानक किस बात पर रो पडी क्या पागल पन है? नहीं तो मैं भी कंधों को पकडकर खींचने का प्रयास कर रहा था और वो और भी मजबूती से खम्बे से निपट गई । रोते हुए बोली संजय आज हमें मतलब को जी भर के रो लेने दो । हमें शायद तुम्हारे सामने रोकर हमें थोडी तसल्ली मिल जाए तो हम भी खडे रहे हैं नहीं, आंखे भी नम हो गई । कितने दिनों बाद तुमसे मिले हैं । कुछ बात नहीं करूंगी । हमसे करेंगे । संजय खुद को संभालते हुए वो एक मेरी और पार्टी उसके आखिर लाल हो चुकी थी । दोबारा कर सोफे पे बैठी मैं खडा ही रहा । अब बॅाय नीतू कुछ हंसने की कोशिश कर रही थी । यहाँ फिर आरती जला हूँ । नहीं नहीं उस की जरूरत नहीं है । मैं उसके सामने पढे सोफे पर बैठ गया । हम देर तक खामोश बैठे रहे । बात कहाँ से शुरू करें शायद अभी इस बात का फैसला नहीं हो पा रहा था । संजय एक खामोशी टूटी छोडी नहीं होता था । हम समझ नहीं पा रहे हैं कि तुम्हें इतने करीब देखकर हम क्या करें । तुम यहाँ आए इसलिए हसी या फिर इस बात पर हुए की तो अभी चले जाओगे । कहते हुए वह फिर से हंसने की कोशिश कर रही थी मगर आंसू नहीं संभाल पाए । तपाक से एक रूम फर्श पर गिर गई । उसने झटके से उस पर पैर रखा है । अपनी बात जारी रखते हुए बोली है तो वो सब छोडो बताओ तुम कैसे हो? आज कर दुबले होते जा रही हूँ । खाते पीते नहीं हो क्या? पहले तो तुम बहुत मोटे थे, कितना भगवत किया करते थे । अब तो तुम बिल्कुल खामोश रहने लगे हूँ । पहले दो हफ्ते भी बहुत वो पे रुके हुए बोले जा रही थी । संजय तुम भी तो कुछ कहूँ कुछ बताओ । अपने बारे में कुछ पूछो हमारे बारे में मौका मिले बोलने का । तब तो मैं पूरी मासूमियत के साथ मुस्कराकर बोला मेरी बात का अर्थ समझ पाई तो मुझे नहीं तो पत्ते से चेहरा छुपाते हुए बोली तो अब भी नहीं सुधरी । संजय सुधरेंगे भी नहीं क्यों सुधारने वाला कोई है ही नहीं । कुछ चुप हो गई । शायद उसका अपना स्थित उसके सामने आ गया था । उसी वक्त एक छोटी सी लडकी कमरे में दाखिल हुई । उसके हाथों में नाश्ते की प्लेट और पानी का क्लास था । यहाँ एक्टर मेस की और संकेत करते हुए नहीं तो बोली वो नाश्ता रख कर लौट गई । लोग नाश्ता करो । उसने कहा और फिर खुद ही सेब की भागों को उठाकर छिलने लगी । इस घर में सब निकम्मे होते जा रहे हैं । अब देखो ना बिना छिले हुए सेव रखती, तुम्हारे सामने रहने दो, नहीं तो ऐसे कुछ के साथ ही खाता हूँ । उसका छिलका हेल्दी होता है । अच्छा तो मेरी और ऐसे देखिए जैसे मैंने भौतिक विज्ञान का नया सूत्रों से बता दिया होगा । तुम भी खाओ ना ऍम को नीतू की और बढाते हुए कहा मैं बाद में खाने की तुम खाओ अरे मेरी फिक्र ना करो । संजय आज इस घर में दिवाली मनाई जाने वाली है । क्यों बच्चों पडा घर में काम जो हैं । कुंभ पागलों की तरह बातें क्यों कर रही हूँ? मैंने पूछा नीचे तुम्हें जो औरत मिली थी जानते हो कौन है? कभी मिले हो से नहीं मेरी माँ अच्छा ना एक और फिर उसकी आगे चल चलाए । जानते हो संजय तो कई बार मुझे भी नहीं । पहचान पार्टी एक बार तो पापा को पर मेरे कमरे में आने से रोक दिया मगर अभी तुम्हें तो तुम्हारे लिए उनका ये व्यहवार देखकर मैं हैरान थी तो ऐसे पहचान लिया जैसे तुम वर्षों से जानती हूँ । इन मैं तो उनसे कभी मिला ही नहीं । वही तो उन्होंने तो मैं हमेशा तस्वीर में ही देखा है । फिर भी हो गया है क्या हुआ है, कैसे बताओ संजय उन्हें क्या हुआ है? कहते हुए कोई बात फिर संभावित हो गयी । लम्बी लम्बी सबसे खींचते हुए बोली द रेसर वो पापा की तरह मजबूत नहीं है । इसीलिए टूट के मतलब अपनी एकलौती बेटी को कभी विदा नहीं कर पाई ना । इसीलिए सब अपनी शादी नहीं की । बीस साल से मेरे गले पर अटक करेंगे । कुछ कोई जवाब नहीं दिया । बस खाली खाली नजरों में मेरी और देखते रहेंगे । मैंने तो कह रहा हूँ मैं कुछ पूछ रहा हूँ । हाँ तो क्या जवाब दो । संजय उसने अपनी नजरे झुका ले । मैं थोडी देर तक उसके खामोश छोटों की और देखता रहा तो नहीं बोली मुझे जब नहीं रहा गया तो सोफे से उठा उसके कदमों के पास वर्ष पर घुटनों के बल बैठ गया । उसने मुझे रोकने की कोशिश भी नहीं की । पता नहीं कहाँ हो गई थी तो फॅमिली वो चौक कर मेरी और देखते हैं क्या सोच रही हूँ? मैंने पूछा नहीं तुम? मैंने कहा तो मुस्कुराने लगी ऍम थोडी देर बाद उसने कहा मैं तो जितना निष्ठुर समझती थी तो उतना हो नहीं । अच्छा ऍम मैं सोचा करती थी कि ये जानते हुए भी कि मैंने शादी नहीं की, तुमने कोई असर नहीं हुआ । इतने निष्ठुर होता हूँ लेकिन तुम्हे तो कहते कहते हुआ अचानक होगी । थोडी देर तक एक तक मेरी और देखती रही । फिर बोली संजय तुम्हें कभी जानने की कोशिश नहीं की कि मैं कहा हूँ किस हाल में हूँ? नहीं क्यों? संजय इतना बडा अपराध तो हम ने नहीं किया था । राहत की कोई बात नहीं थी । नहीं तो अचानक में भावुक हो उठा और बोला अच्छा इसलिए मैं अपने खुशहाल जिंदगी में व्यस्त था । इसलिए कि अपनी बदहाल जिंदगी को समेटने में इतना वक्त लग गया की मुझे फुर्सत नहीं मिली । धीरे सूट कर सोफे पर बैठ गया । इससे पहले की वह मेरी जिंदगी के तार छेडती । मैंने कहा इस बातें अब जरूरी नहीं है तो बताओ तुमने तक शादी क्यों नहीं तो नहीं मिले ना, इसीलिए मत करो । मुझे शादी ना करने का कारण जानना है । शादी बहुत बडी बोली सब की तरह तुम भी अगर शादी पर यूरज कर समझे शादी के सच में जीवन के लिए कितना जरूरी है हूँ लेकिन मुझे तो ऐसा नहीं लगता । उसने कहा मैं अक्सर सोचा करती हूँ राधा के बारे में, मीरा के बारे में और संजय राधामीरा ही क्या हमारे किताबें ऐसी बहुत से नामों से भरी पडी हैं । जीवन जीवन में कभी शादी नहीं की । फिर भी उन्होंने जीवन क्या है? बेहतर तरीके से किया । ऐसे ही हम भी ले लेंगे । तो इस सब बातें किताबों के पन्नों में बहुत अच्छी लगती है । असल जिंदगी में ऐसा संभव नहीं है । हाँ, अगर तुम राधा की बात करती हूँ तो राधा से इंसान नहीं थी । वो ईश्वर का रूप थे और तुम उनका इंसान होनी थी हूँ । फॅमिली झल्लाहट थी चल हम तुम्हारी बात मान लेते हैं । उसको सर भारी था । हम राधा बनकर नहीं जी सकते तो ना लेकिन मेरा वो तो इंसान थी ना । संजय उसे तो ईश्वर करूँ । नहीं कहोगे तो मेरे स्वर का कंपनी अब कुछ और मुखर था । इस तरह भावनाओं में बह जाने से प्राकृतिक आवश्यकताएँ नहीं बढ जाती हैं और नहीं ईश्वर के नियम बदल जाते हैं । ईश्वर द्वारा बनाई गई हर छोटी बडी चीज का अपना एक फर्ज होता है और तुम उस पर से मूड नहीं कर सकती । जिंदगी बहुत बडी होती है ना चाहकर भी एक दिन तो में उन्हीं राहों में फिर से लौटना पडेगा । पूरा करना पडेगा उन फर्जों को और तब से क्या करोगी? तुम जानती हूँ समाज में जीना मुश्किल हो जाता है । संजय मैं जानती हूँ तुम क्या कहना चाहते हूँ? मगर एक बात याद रखना तुम्हारे सामने बैठी हुई ये लडकी इतनी कमजोर नहीं है कि वह शारीरिक भूख के सामने घुटने टेकते और न ही विदेशियों की जिंदगी के पीछे दौड लगाने वाली आधुनिक अंधी बंदा है । जिसको लगता है कि जिसमें दिखाना आधुनिकता की पहचान है । मैं भारतीय नारी हूँ । एक ऐसी नारी जो खुद तो चल सकती है मगर दामन में एक चिंगारी भी नहीं छिटक नहीं देगी । प्रेम में पागल ये बदन अगर एक बार तुम्हारे सामने बेपर्दा हो चुका है तो अब जिंदगी के किसी भी मोड पर किसी के सामने बेपर्दा नहीं होगा । नहीं तो मैं जानता हुई आदर्शवादी बातें कहने में बहुत अच्छी लगती है । सुनने वाले को भी बेहद प्रभावित कर देती है । लेकिन इन का कोई भविष्य नहीं होता पाते हैं । इंदौर के साथ बदलना ही होगा । फिलहाल दो हजार तीन में जी रहे हैं । हम नारी समाज बहुत आगे निकल चुका है । उसके बीच सोच के साथ नहीं किया जा सकता । बेशक संजय मैं इनकार नहीं कर रही हूँ । नारी समाज आगे निकल चुका है । उसने अपनी बात पर जोर देते हुए कहा मगर जरा करीब से झांक कर तो देखो उस समाज को वो अंदर से कितना खोखला है । किसी की जिंदगी में स्थायित्व नजर आता है तो मैं पति पत्नी पुराने कपडों की तरह बदल रहे हैं । एक दूसरे को और उनके बच्चे संजय पति पत्नी के अलग होने पर पशु के बच्चों की तरह बंटवारा किया जाता है । उनका कल शादी, आज तलाक, ये किसका परिणाम है । अगर तुम फिर भी इसे समाज कहते हो तो मैं खुश हूँ कि मैं इस समाज का हिस्सा नहीं हूँ । उसका चेहरा मुद्दे जित होता था । अपनी बात जारी रखते हुए वह फिर से बोली संजय मैं भी उसे ही हूँ या नहीं । क्या मैं बच्चे को जन्म नहीं दे सकती या खूबसूरत नहीं हूँ मगर भी इस समाज में मुझे ठुकराया क्यों? संजय भी तो मैं उसे वहीं रोक लेना चाहता था । इसीलिए ना कि क्षण भर के लिए झटके । फिर आंखों में आंसू भरते हुए बोली मैं छोटे कपडे नहीं पहन सकती । बहन सी टाइप देखती हूँ । नीतु तो संजय इसमें मेरा क्या कसूर अगर मेरी परवरिश ही ऐसी हुई है । क्या बोल रही हो तुम? संजय मैं जानती हूँ की तुमने प्रिया या खुशबू को क्यों चुना? बोलो सच है या नहीं? अच्छा ठीक है । मैं चलता हूँ तो ना उसे और नहीं उकसाना चाहता था । आउट कर खडा हुआ क्योंकि मुझे उसकी बातें बिल्कुल अच्छी नहीं लगी तो बुरा मान गए । मेरी बातों का मुझे खडा होते हुए देखा तो एक है । उसकी उत्तेजना गायब हो गई । चेहरा पीला पड गया तो फिर से उठते ही रोहांसी आवाज में बोली हम से कुछ नहीं पूछेंगे कि हम किस तरह जी रहे हैं । आजकल क्या कर रहे हैं? कहाँ रहते हैं वो? ट्रेन का वक्त होने वाला है । मैंने घडी की ओर देखते हुए कहा जानती हो मुझे आज ही लौटना है । मुझे भी तो लौटना है । संजय लेकिन मैं कल निकलेंगे यहाँ से अगर तुम्हें दिक्कत ना हो तो रात यही रुक जाओ । कल साथ चलेंगे कहाँ? लखनऊ मैं चुप पडा । तुम लखनऊ होगी । हाँ कोई काम था वहाँ नहीं । संजय में वही रहती हूँ । एक छोटी सी नौकरी मिल गई है । तुम लखनऊ में जॉब करती हूँ । मेरा वो खुला का खुला रह गया । कब से आप किस जगह पर तो भारी आसपास ही उसने कहा मन की तसल्ली के लिए उसी में लगी रहती हूँ । तुम मेरे घर में जानती थी । हाँ, खुशबू और पंखुडी के बारे में भी अपने आखिरी और फौजों को गुजरा । धीरे से बोली मैं एक तक उसकी और देखता रह गया । घबराहट थी या खुशी कहना बहुत मुश्किल था ।

मेरी अर्धांगनी उसकी प्रेमिका - 61

मैं रात ग्यारह बजे तक लखनऊ पहुंच गया । डोरबैल मेरी अंगुली के नीचे थी । उस पर जरा सा दबाव पढते ही घर के अंदर एक तरकश आवास हो जी कुछ ही देर गुजरे थे । घर के अंदर रोशनी बिखर गई । कुछ भी जा चुकी थी । मुझे उम्मीद थी कि वह दरवाजा खोलने आएगी तो कुछ बोलेगी । कुछ पूछेगी या फिर अपनी सहेली की मौत पर दुख प्रकट करेगी । मेरी आशाएँ टूटकर तब बिखर गई जब उसने तेजी से आकर दरवाजा खोला और फिर उसी रफ्तार से बगैर कुछ भी बोले वापस लौट गई । मिलना चाहता हूँ । उसके लौटते कदमों को देखता रह गया । कितनी कठोर हो गई है । अब तो बढते रशीदिया लांघता । वह सीधे अपने बेडरूम पहुंचा । अंकुरित हो रही नहीं । जी में आया है कि उसे जगह पर उसके खामोश छोटों को चुन लो । कुछ सोच कर अपना इरादा बदल दिया । जल्दी जल्दी मैंने अपने कपडे बदले और नहाने के लिए बाथरूम की और चला गया । उस रात में ठीक से सो नहीं पाया । सुबह समय से दो घंटे पहले ही मैं ऑफिस के लिए निकल गया । मैंने घर पर चाय नहीं थी, इसीलिए उसने बाजार होते हुए गया । लंच के समय भी टिफिन मैंने बाजार से ही बनवाया । दोपहर का लगभग एक बज रहा था । ऍम करने के लिए तो हो ही रहा था कि एक है पंखुडी की याद आ गई क्या हुआ होगा । उसका टोटल होंगे तो उसको ख्याल रखती रही होगी या फिर मुझे नाराजगी की भडास उससे निकालती रही होगी । मन किया कि फोन करके खुशबू से पर पोस्ट हो लेकिन मत ही नहीं बडी मैं टिफन भी बंद कर दिया । मैं नहीं होगा । बॅास करने की कोशिश की । फॅमिली को कैसा महसूस हुआ होगा । ऍम फोन की घंटी बजती । रिसीवर उठाते हुए मैंने बोला खुशबू बोल रही हूँ । उधर से आवाज आई । दल धडाक उठा । पता नहीं कौन सा हंगामा होने वाला है । वो लोग फॅस में कहा आज में दूध के लिए नहीं बोली हूँ । पंखुडी के लिए पर्याप्त दूध मंगा लिया है । ऑफिस से लौटकर नाराज मत होना । मैं जवाब में कुछ कहता उससे पहले ही फोन इसका हो गया ।

मेरी अर्धांगनी उसकी प्रेमिका - 62

उस दिन मुझे इस बात की तसल्ली हो गई थी । शाम को पहुंचूंगा तो खुशबू जरूर मेरी यात्रा का हालचाल लेगी । ब्रिया के बारे में भी बात करेंगे । हो सकता है उसे उम्मीद होगी । मैं उसके मम्मी पापा स्थिति मिलकर आया होंगा । शाम आई तो मगर निराशा भरी कुछ । वो ऑफिस से देर में लौटी और फिर कपडे बदल का सीधा रसोई में घुस गई । इस दौरान हमारी नजरें कई बार मिली लेकिन उसमें कुछ नहीं पूछा । खाने की थाली रखकर उच्च चलने लगी तो मजबूरन मुझे ही बोलना पडा । वो वो ठहर कर देगी और देखिए मैं मालूम है पिया का खत्म हो गया है । कब और सुशांत को अखबार में बडा भी होगा तुमने तस्वीर भी तो सभी जी प्रिया की । मैंने एक बार नहीं देखा । बडी बेरुखी सोचने कहा लौट पडी । सुनो तो अंदर ही अंदर मैं क्रोध और पीडा से तडप पडा उठा हूँ । फिर भी जवान को संतुलित रखते हुए बोला तो नहीं । उन का जरा भी दुख नहीं हुआ । वो तुम्हारी सहेली थी और तुम्हारी कौन थी? अचानक वो पलट कर खडी हो गए । उसके आंखों में गुस्सा साफ दिख रहा था । मेरी और झुकते हुए बोली बोसॅन तुम्हारी दोस्त प्रेमिका या रखे कुछ वो पच्चीस पडा ठीक ही तो कह रही हूँ चिल्लाते की हो तो बताओ कौन थी वो तुम्हारी उसके श्रोत्र रूप को देखकर कुछ पलों के लिए मेरा दिमाग शून्य पड गया । मेरे एक साधारण से सवाल पर वह इस तरह की प्रतिक्रिया देगी । मुझे बिल्कुल उम्मीद नहीं थी बोलो अब चुकी हूँ खींचते हुए बोली शादी से पहले तो खुद ना जाने कितनी लडकियों के बदन को रोने हो और मैं मैं एक बार किसी के साथ यु ही चली गई तो इतनी दूर तक सोचने लगे मेरे ऑफिस में फोन कर करके पूछताछ शुरू कर दी वो बिना मेरी और देखिए कुछ देर तक पडती रही मुझ पर मैं मानती हूँ हर किसी का तीस होता है शायद मेरा भी लेकिन तो भारी जैसे किसी का नहीं होता । एक नहीं तीन तीन लडकियों को भी होगा है तुमने और उनमें से एक मैं भी हूँ वो बस करूँ पंखुडी है यहाँ पर तो उसे भी तो पता चले कि वह कैसे बाप की बेटी है । दिनभर पापा की पूछ बनी रहती है कैसा बाबू में निर्यातकों में ही का एक सूची चला जो तुम रिश्तों को ऐसे उसको बहुत कह लिया तुमने बीस जब नहीं गलत हो ना उसकी निगाह मेरे आंसुओं पर बडी तो अचानक को सहन गई । अपने शब्दों के पीछे बन में लगाम लगाते हुए बोली अब रोती हूँ । मुझे बुलाने का इरादा है क्या? कहते हुए वो सचमुच रो पडी । इससे पहले मैं कुछ कहता हूँ तेजी से लगाते हुए मेरे सर को अपने वक्ष से चिपका ली थी का एक उसका सारा गुस्सा हुए की तरह हवा में फिर हो गया । अपने दुपट्टे से मेरे आंसू को पूछते हुए बोली संजय आजकल तो मुझे बहुत बुलाने लगे हो । मैं तुमसे तंग आ चुकी हुआ । अचानक उसकी समृद्धि पर मेरी आंखों में और भी उबाल आने लगा । उसने मुझे किसी बच्चे की तरफ बाहों में समय क्या बहुत देर तक मेरे बालों को सहलाती रही । महीनों बार हमारे बीच प्यार का बीच पुनः अंकुरित हुआ था तो इधर कुछ दिनों से शायद सूखता जा रहा था । उस रात एक बार फिर हम एक ही कमरे की एक ही बिस्तर पर पति पत्नी बनकर आंखों में बिना नींद के बोझ के तेरह तक चाहते रहे । मुझे नहीं पता जोश रात बहारों की कितनी गलियाँ टूटे होंगे । कुछ तो पूरे समर्पण के साथ मेरी बाहों में अपना असर रखे हुए लेती रही । इतनी थकान के बावजूद उसकी आंखों से नींद भारत साॅस सो गए क्या मैं मैंने आपको खोलते हैं उसकी और देखा मुझे कुछ आप लगते थे । प्रिया को किसी का रहा होगा । मैं नंगे सीधे हो सहलाते हुए वो बोली पता नहीं अभी कुछ कह नहीं सकते । अखबार में सुधाकर सहित दो नाम और दिए गए थे । पुलिस को उन्हें तीनों पर शक है । कहाँ है सब जल्द से जल्द पकडे जाएंगे । कहते हुए वो मेरे सीने से सडक कर बिस्तर पर सीधे लेट गयी । नजरे छत पर घूम रही बंक को घूमती रही ।

मेरी अर्धांगनी उसकी प्रेमिका - 63

रात का दूसरा तहर दबी पहुँच गुजर रहा था । एक डोरबैल चिल्ला उठी मैं चौंक कर जग मेरी निगाहें दीवाल पर टंगी घडी पर गई । रात के दो बज रही थी पहुँच सकता इतनी रात को मैंने बिजली का सोच क्या कमरे में रोशनी बिखेरते ही पंखुडी कि आखिर हो गयी खुशबू अब भी सो रही थी । पापा को बोली और उसका पडी मैं झुककर अपने हो तो उसके गाल छोडिए । बेटा तुम सोचा मैंने कहा तो पंखुडी पुणे से लेट गयी जिससे वो मुझ से इतना प्यार पाने की चाहत में जगह थी । अपने कमरे से निकलकर सीढियां उतरते हुए तटवासी की और बडा दरवाजे के पीछे लगी । बाहर लाइट की सोच थी मेरे स्विच दबाते ही दरवाजे के बाहर एक का एक रोशनी बिखर गई । मेरा शरीर उसी समय कहाँ उठा जब दरवाजे पर खडा व्यक्ति रोशनी बिखेरते ही झटके से पीछे अंधेरे की और हट गया । हो सकता है रात को क्यों है? कुछ दिनों तक मैं सोचता रहता हूँ हिम्मत जुटाकर मैंने पूछा कौन है बाहर मैं संजय बाहर शाॅल मैंने आपको पहचाना नहीं । इधर इधर रोशनी में आइए । मेरी आवाज सुनी तो चौदह दिनों के लिए रोशनी में आया और फिर उसी झटके से लौटते हुए अंधेरे का सहारा लेकर खडा हो गया । मैं उसे पहचान नहीं पाया । बिखरे बाल उल जलूल कपडे आंखों पर बडा सा चश्मा पता नहीं कौन है मैं तो मैं नहीं जानता । हाँ तो जहाँ से कहते हुए मैं पडा रुपये निश्चित । संजय एक बार फिर वो इंसान रोशनी की और थोडा हम सुधाकर हैं । डॉक्टर सुधाकर प्रिया के पति सुधाकर उसके और गौर से देखा तो सुधाकर ही था । अरे सुधाकर बाबू, आप मैं चौंकते हुए बोला इतनी रात को यहाँ लखनऊ में हाँ मिस्टर संजय अपनी पहले दरवाजा को लिए पुलिस मेरे पीछे पडी हुई है और पीछे रौशनी भुजा दीजिए । मैंने बढकर दरवाजा खोल लिया । दरवाजा खुलते ही सुधाकर तीव्रता से भीतर घुसा ना । उसे लेकर सीधा गस्टो पहुंच गया । ऍम मैंने पूछा ऍम नहीं नहीं मिस्टर संजय परेशान मत हुई है । इस वक्त खाने पीने की कोई जरूरत नहीं है । आपने पनाह दे दी । मिली इतना ही काफी है । कैसे हो सकता है आप मेरे घर में हो फिर भी मैं कुछ लेकर आता हूँ । मैं अंदर चला गया । जब लौटा तो अलमारी सब बिस्कुट के पैकेट और पानी के बॉर्डर लेकर गेस्ट रूम में पहुंच गया । पैसा संजय भी वजह को देख कर दी । उसके सूखे होठों के बीच से रोक ही हंसी फूट पडी रहे । इसमें दिक्कत की क्या बात सुनाकर? बाबू आप मेरे मेहमान है । मेरी और खाली खाली नजरों से देखने लगा । ॅ उसकी तरफ बढा दी । उसने बिना कहे प्लेट से बिस्कुट उठाकर अपने भूमि डाली । उसका दिमाग भी कोई तूफान था जिसकी खामोश आंखों में दिख रहा था । इस कैसे हो गया सुधाकर बाबा? मैंने पूछा मेरे सवाल उसके कानों में टकराया तो मेरी और भरी भरी नजरों से देखने लगा । मैंने जो पडा है वह सचमुच दुर्भाग्यपूर्ण है । किसने किया ही सब? मुझे उम्मीद थी कि वह प्रतिक्रिया में कुछ कहेगा, अपनी सफाई देगा या गुनाह कबूल करेगा, लेकिन उसने ऐसा कुछ नहीं किया । उदवीर तक खामोश बैठा मूल्य पडे दस कोट ऐसे चलता रहा जैसे उसे निकलना भूल गया हो और लीजिए ना? मैंने कहा तो वो अच्छा मैं भावुक हो था । उसने अपने आँखों से चश्मा उतारते हुए मेरी और देखा । उसकी आंखें नम हो गई थी । खुद को संभालने के लिए पानी का क्लास उठाया और एक ही स्वास्थ्य में कट गया । संजय खाली गिलास रखते हैं । उसने कहा, पीएम वास्तव में जितनी गलत थी, इतना गलत मैंने उसे कभी नहीं समझा । मैंने कुछ नहीं कहा हाँ बताइए । मिस्टर संजय उस ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा ऍम जीवन में संतान की इतनी जरूरत होती है कि अगर पति सक्षम न हो तो पत्नी किसी गैर मर्द के सामने अपना दामन अपनी जब सिर्फ इसलिए समर्पित कर दे कि उसे संतान चाहिए । हाँ चौपड अब अभी क्या कह रहे हैं? सुधाकर बाबू ऍम प्रिया के खत्म का मुख्य कारण यही था । वो बच्चा चाहती थी और वो असक्षम पति नहीं था । मेरी मेडिकल रिपोर्ट कहती हैं कि मैं आप नहीं बन सकता था और मेरी कमजोरी का उसने ऐसा हल निकाला । उसने बच्चे के लिए मेरे पडोसी का सहारा लेने की कोशिश की । इसमें वो सफल भी रही । उसके पेट में गर्भ आ गया तो झूठ नहीं कहूंगा विश्व संजय इस मामले में प्रिया ने ईमानदारी भी दिखाई । उसने मुझे इस पूरे मामले को बताया तो मैंने उससे कोई शिकायत नहीं की । मैं इस तरीके मातृत्व की उत्कंठा को भलीभांति समझता हूँ । उसकी खुशी के लिए मैंने जिंदगी का ये जहर मैं सिर्फ दिया बल्कि उस का साथ देने का वायदा भी किया और मैं देता भी तो उस वक्त मैंने पूछा उन लोगों ने मारती अब से क्यों मेरे पूरे बदन में झुनझुनी कर गई । मेरे अलावा प्रिया के और दो लोगों के साथ संबंध थे । अचानक उसकी आंखों से पानी की चंद बूंदे उछल कर फर्श पर टपक पडेंगे । उसने बल्कि झुक काली । थोडी देर खामोश रहने के बाद उसने खुद को संभाला और कौनसी आवाज में बोला जी शुक्रिया । मेरी प्रिया उन्हीं के बीच मिस कर रहे हैं । आप जानते हैं अगर मर्द एक बार औरत के शरीर को पाले तो वो उसे अपनी संपत्ति समझने लगता है । प्रिया के शरीर पर अपने हक की इसी खींचातानी में उन्होंने उन्होंने से मार डाला । कर बाबू मेरी निगाहें तक उसके चेहरे पर अटक कर रह गई । उसमें रोमांस अपनी आंखें पहुंची पर लंबी लंबी सबसे खींचते हुए मेरी और देखा और बोला अगर आप प्रिया की लाश देखते तो समझ चाहते कि इतनी पे रहने से उसे मारा गया । मेरे ही घर में घुसकर आपने बचाने की कोशिश नहीं की । उस वक्त मैं ऑफिस में था नहीं किया गया था । मैंने हैरान होते हुए उस की और देखा । दोपहर में महिलाबाद शाजी लौटाऊं इलाज देखी है मैंने । मैंने बोला तब तो आप उनकी जवानी से रूबरू हुए । हो गए जी मेरी आंखों के सामने एक बार फिर प्रियंका वह जख्मी बदन खुलने लगा । इतनी खूबसूरत गुलदस्ते का इतना पूरा मेरी आंखों में पानी की बूंदे उत्तराई सुबह के लगभग पाँच बजने वाले थे । सुधाकर सोफे पर बैठे बैठे हो गया, लेकिन मुझे नहीं नहीं आएगा । मैंने उसके हाथ को हिलाते हुए बोला । आकर बाबू नींद की दरिया में डूब इंसान भरी एक की आवाज में उठकर बैठ गया और फटी पडी निगाहों से मेरी और देखने लगा । इससे पहले वो कोई सवाल करता । मैंने कहा पांच बच गए हैं । इस लाकर बाबू जल्दी उजाला होने वाला है । मेरी आशा को समझा तो उस पर खडा हो गया । धीरे से बोला अगर आपको तकलीफ हो तो क्या मैं आज यहां ठहर सकता हूँ । आपको पता है कि मेरे सगे संबंधियों के यहाँ किसी पागल कुत्ते की तरह पुलिस मुझे खोज रही होगी । यही जगह जहाँ उनके पहुंचने की संभावनाएं नहीं है, उसके स्वरूप में तेज भाषा ला जारी थी । मैं कुछ देर तक सोचता रहा । उस वक्त पुलिस का लफडा मेरी आंखों के सामने घूम रहा था और ऐसे मामलों में मैं जान बूझ कर नहीं फंसना चाहता था । मैंने उसे पनाह देने से इंकार कर दिया । मेरी खामोशी देखी तो बिना छत भर भी देरी किए हुए वहाँ से निकल गया । अगले ही दिन अखबारों में उसकी तस्वीर छप गई । पुलिस नहीं उसे हिरासत में ले लिया था ।

मेरी अर्धांगनी उसकी प्रेमिका - 64

खुशबू की नौकरी को लगभग एक साल पूरा होने को था । इस दौरान खुशबू में बहुत बदलाव आ गया था । कभी कभी बात बात पर असली चिंघाडने वाली खुश को दिन बदिन खामोश होती जा रही थी । वासना की प्रतिमूर्ति बनी रहने वाली खुश हो तो बिस्तर के नाम पर बडी से बडी पीडा, बडा से बडा झगडा भूल जाने के लिए तो पर रहती थी । आज उसने बिस्तर को लेकर बिलकुल दिलचस्पी नहीं बच्चे पता नहीं उसे क्या होता जा रहा है उसको भी वजह का चिडचिडापन बात बात में कम कम आ जाना ऐसे था जैसे मेरे जीवन के हर रोज का हिस्सा बन गया होगा । राज् अक्सर कहा करता था कि और आपके अनुसार कभी नहीं चल सकती है इसलिए बेहतर है कि आप उसके अनुसार ढल जाए । मैं हर हाल में अपनी वैवाहिक जिंदगी की टूटती कडियों को जोडे रखना चाहता था और उसके लिए मैं उसकी उपेक्षा, पीडा और बेरुखी को जिंदगी का एक हादसा समझकर सहता जा रहा था । मैं समझ नहीं पा रहा था की उसमें लगातार आ रहे इस बदलाव का आखिर कारण क्या है जो वो गृहस्ती को बोत्सा महसूस करने लगी है । एक दिन तो वह महज इस बात के लिए नाराज हो गई कि हर रोज सुबह चाहे उसी को क्यूँ बनानी पडती है वो भी उस घर के लिए उतना ही कम आती है जितना कि मैं उसको कहना था । या तो शाम सुबह दोनों पहर चाहे और खाना बनाने के लिए कोई नौकरानी घर पर रखने या फिर एक पहर वो बनाए और एक पहले मैं ठीक है उसकी जब पर में हंस पडा, दोपहर का खाना हम ही बना लिया करेंगे । नौकरानी की कोई जरूरत नहीं है । उसके हाथ का खाना मुझे पसंद नहीं है । मिल बात सुनी तो वह खुश हो गई । हसते हुए बोली नहीं एक पहले मैं बना लूंगी । एक शाम मैं जैसे ही घर पहुंचा की एक फोन घनघना उठा उन पर पटेल था फेसबुक अब आप आप कौन? उसने पागलो से सवाल किया आपने फोन किया है हो हो तो आप संजय जी हैं । जी हां सही पहचाना आपने बताई उन पर कुछ को बुलाना है । मैंने उससे कहा मुझे घर पर उसका फोन करना बिल्कुल पसंद नहीं था । जी कोई जरूरी नहीं है । बात आप से भी हो सकती है । जी बोलिए कुछ की तरह तो ठीक है ना, क्यों आप उसके हो रही है? उस दिन मैंने भी जैसे ठान लिया था कि सीधा तो कुछ बोलना ही नहीं है । जी ऐसी कोई बात नहीं है । तो मैंने पूछा । दरअसल पिछले दो दिनों से वो ऑफिस नहीं आई और नहीं फोन का जवाब दे रही है । तो मुझे लगा कि क्योंकि रुकिए लेकर जैसे किसी ने मेरे सर पर जोर से हथौडा मार दिया हूँ । मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई । चलो छोडो तक मैं रिसीवर की तरफ देखता रहा । फिर खुद को संभालते हुए पूछा एक क्या क्या कहाँ अपने तरफ से कही जी मैंने कहा है कि कुछ तो दो दिन से ऑफिस नहीं है । क्या वो बीमार है? दो दिनों से ऑफिस नहीं गई । निरस्तर चकरा गया । वो तो हर रोज ऑफिस के लिए घर से निकलती थी । मैंने हडबडाहट में पूछा आप पूरी तरह से आश्वस्त है ना? जी हाँ । उसने कहा लेकिन संजय जी मेरी बात को बीच में ही काटते हुए बोला आप जरा फोन पर खुशबू को बुला देंगे क्या? तो घर पर नहीं है क्या कर मैंने फोन डिस्कनेक्ट कर दिया । उस दिन खुश को घर काफी देर में आए । रसोई घर में खाना बना रहा था । पंखुडी मेरे पास ही खेल रही थी । ऐसी हो गई । उन्होंने पंखुडी के गानों को छूते हुए बोला, बहुत दिन बाद पहली बार उस दिन वो इतने प्यार से पंखुडी से पेश आ रही थी । तब कभी हंसकर उसकी और देखने लगे । मैं चुप चाप खाना बनाने में बीजी था । संजय दिखाई, उससे आवाज भी ऍम उसकी और देखा । उसके होट सूखे हुए थे किसी चोर की तरह वो मेरे सामने खडी एक तक मेरी और देखे जा रही थी । कुछ कुछ होगी नहीं कि मैं कहाँ थी । जब मुझे बाद उसने कहा इसका मुझे अधिकार है । मैंने बिना उसके और देखे हुए पूछा, जिंदगी तुम्हारी है जो चाहे कर सकती हूँ । मैं जानता था आज भी उसके पास कोई न कोई बहाना मौजूद होगा । संजय तो मुझे कितना पढा है । समझने लगी हो । अचानक उसकी आखिरी डबडबाई मैं चुप चाप खाना बताता रहा तो देर तक वहीं खडी खडी मेरी और देखती रही हूँ । पटेल ने फोन किया था । मैंने धीरे से कहा क्या? क्या कहा उन्होंने अकस्मात थी, वह गडबडा पडी तुमसे बात करने के लिए कहा था । इतना ही कहा था उन्होंने उसके चेहरे के भाव कुछ बदल गए और कुछ कहा उन्होंने नहीं ये सर भी उसने लंबी सांस कीजिए । उसके होठों पर हल्की मुस्कान पर पडी किसी बात पर इन्हें जरा भी सब्र नहीं होता । अब आज ही देखो मेरी और बढते हुए बोले । उन्होंने कहा था की खुशबू जाकर प्रेस की हजरतगंज शाखा से उसके कार्य करने के पन्नों की रिपोर्ट लेकर आ जाऊँ । वो अचानक अपने पर उसमें कुछ टटोलने लगे । फिर वहाँ के स्टाफ के आलसीपन के कारण जरा देर हो गयी तो घर पर फोन कर दिया । मैंने कहीं पढा था कि आंख में आंख डालकर जितने भरोसे के साथ और झूठ बोल सकती है वो हिम्मत मर्द कभी नहीं कर पाता । मैंने गौर से देखा उसकी और खुशबू के चेहरे पर अपार संतुष्टि थी । अपनी बात जारी रखते हुए बोली पटेल शायद उसी के बारे में मुझसे बात करना चाहते थे । अच्छा वो संजय तुमने बता दिया मैं भी जाकर फोन करती हूँ कहकर तेजी से बाॅंटी कुछ वो मैंने पुकारा को खडी हो गई और यही हैं रसोई के पास आपको निहार रखा हैं उसके चेहरे । करण अचानक गायब हो गए । हाँ, दरअसल अभी लगातार दो तीन फोन आए थे । मुझे बार बार वहाँ तक जाना पड रहा था तो उसे लाकर मैंने अपने पास ही रख लिया । कोई बात नहीं मैं अपने मोबाइल से बात करी होंगी । उसने मुस्कराते हुए कहा, मोबाइल ऍम फ्री है, हाँ वो तो है । वो थोडी देर खडी कुछ सोचते रहे हैं । देखती रही मेरी और पटेल सर ने कहा था कुछ जरूरी काम है इसलिए जरा जल्दी कॉल बैक करें । मैंने कहा जल्दी क्या वो अचानक अस्वाभाविक हो गयी? भराई आवाज में बोली पागल है वहाँ मैं अभी फोन कैसे कर सकती हूँ? अरे अभी तो आ रही है कम से कम कपडे बदल लूँ । कुछ स्टालों नहीं तो लगता है हर वक्त काम में पिसी रहो । दूसरे की जरा भी परवाह ही नहीं । मैं नहीं करती हूँ फोन कमीने, बॉस को दूसरों की परवाह कहाँ हुआ करती है । मैंने उसके समर्थन का अभी नहीं किया । हाँ, संजय तो सही कह रहे हो । ये सचमुच बहुत कमी नहीं होते हैं । इन्हें किसी की परवाह ही नहीं हुआ करती है । उसके चेहरे के उडे हुए रंग दोबारा आ गए । संजय तुम्हारी कुछ सहायता करूँ वो अचानक मेरी और बडी नहीं । तुम जाकर कपडे बदलो । खाना लगभग बन चुका है । मैं टेबल पर से जाता हूँ । ऍम कहते हुए वो पलटी । फिर अचानक उसे कुछ याद आया तो ठहर गई । पंखुडी की ओर बढते हुए बोली पंखडी तुम आओ हमारे साथ तुम्हारे लिए हम कुछ लाए हैं कहते हुए उसने पंखुडी को अपनी गोद में उठा लिया । देखना चाहूँ कि पंखुडी आश्चर्यपूर्ण निगाहों से उसे देखती रही ।

मेरी अर्धांगनी उसकी प्रेमिका - 65

जब पैदा बाय उस हालत को अपने घटिया चुटकुलों से हटाने की कोशिश कर रहा होता है तो उस वक्त वो खुद अंदर ही अंदर रो रहा होता है । मैंने आखिरी दिनों में ऐसा करते हुए अक्सर अपने पापा को देखा था । मुश्किल का वक्त मेरी पीठ पर हाथ फेरते हुए अक्सर कहा करते थे चिंता मत करो मैं होना और उनके इस भरोसे पर मैं सचमुच चिंता मुक्त हो जाता । मगर वही चिंता और उन्हें चलाने लगती महीने बचपन से उन्हें देखने के लिए मुझे अपनी नजर दे दी थी और मैंने सालों तक उसी नजर से देखता रहा । सोचता हूँ की खुशबू अगर यही पंखुडी के साथ करें तो मैंने उचककर पंखुडी के चेहरे की और देखा तो खुशबू और मेरे बीच में लेटी हुई चयन से हो रही थी । उस दौरान मेरी नजरिये निद्रा में डूबे हुए खुशबू के चेहरे पर भी गई । मैं परेशान हो उठा । पता नहीं क्यों शायद इसलिए कि मुझे नहीं नहीं आ रही है या फिर इसलिए हो रही है । राहत का पहला पहर पीटने वाला था । मगर मेरी आंखों में नींद का खतरा भी नहीं था । कमरे में फैली धीमी रोशनी के बीच मैं छत पर लगातार घूम रहे पंखे को देखता रहा । मन में था, कुंठा थी । इनका इतना उठकर बैठ गया । गर्दन घुमाकर खुशबू की ओर देखा तो मन एक घंटा से भर गया । पूरी था कुछ करके भी चैन से हो रही है और मैं मैं क्या कर रहा हूँ? मेरा चैन कहाँ गया? उस वक्त अचानक मेरा खून खौल उठा । एक बार तो लगा कि अभी उसका कडा खोल दो या फिर उसके जिसमें इतने चाकू भोग दो, किसका बदन खंड खंड हो जाए? मैं कभी हाँ बिस्तर से उतरा और पांच रखी अलमारियों में कुछ खोजने लगा । मगर क्या याद नहीं आ रहा था । कुछ देर तक पूछता रहा मुझे वहाँ कुछ नहीं मिला तो पहनता हुआ मैं रसोई की तरफ बढ गया । सब्जी की टोकरी मेरे सामने थी । चाकू मेरी आंखों में अचानक चमकाई । हाँ यही तो खोज रहा था । मैंने टोकरी चाकू उठाया और सीधे बैडरूम पहुंच गया । खुशबू गहरी नींद में थी । मैं थोडी देर खडा उसे देखता रहा । फिर अकस्मात ही मेरा आपका और खर्च पहला चाकॅलेट क्या उत्तर अब कर मेरी और देखी और मैंने अपने हाथ से उसका मूड हवा लिया । फिर खर्च न जाने कितनी आवाजे हुई । उसका बदन लहूलुहान हो गया । बिस्तर पर पूरी तरह खून ही खून बिखर गया । मगर मेरे मन की पीडा अब भी शांत नहीं हुई । मैंने बडी बेरहमी से चाकू उस के स्तरों में घुसेड दिया । थोडी देर तक मैं अपनी लाल आंखों से उसके तहस नहस हो चुके बदन को देखता रहा । उसकी सांसे थम चुकी थी । उसके बदन का कौन सा सबसे ज्यादा पैसा? इसकी प्यास ने मेरे घर को छोड दिया । कुछ अचानक याद आया तो एक बार फिर मैंने झटके में बीस हो चाकू चला दिए । पापा अचानक पंखुडी उठकर बैठ गई । मैं हडबडाकर उसकी और देखा । उन रहता हूँ । उसके नीचे तक चला गया था । वो अपने खून से भी चुके हाथों को उठाये हुए मेरी और एक तक देख रही थी । फिर अचानक उसकी निगाह खुशबू पर बडी तो जोर से चीख पडी । मम्मी को क्या हुआ? उन को खुद ही रहा है । कुछ नहीं पीता । कुछ नहीं । मैं लगभग कर खून से सने हुए, अपने हाथों की बिना परवाह किए हुए उसे गोदी में उठाकर बाहर की और भागा । तभी अचानक रूम सडक पर एक जान पहचान आवाज गूंजी तो पुलिस पुलिस फिर मुझे चीख निकल गई । क्या हुआ संजय करवा लेते हुए खुशबू तो मेरी और देखी तब सपना था । कुछ सपना था अचानक उठ कर बैठ गया । मिस्टर को थोडी देर तो देखता रहा । मेरा पदन कहाँ रहा था? संजय खुशबू भी उठकर बैठ गई । लाइनलाॅस मैंने हफ्ते में कहा अगले पल पूरी कमरे में रोशनी बिखर गई । मैंने पंखुडी की और गौर से देखा । वह हो रही थी । खुशबू मेरे घबराहट देखकर डर गई । उसे कुछ नहीं सूझा और उसने मुझे अपनी बाहों में भरकर अपने दुपट्टे से मेरे माथे का पसीना पहुंचने लगी । कुछ बुक नहीं कौन सा था । मैं भी तो उसके चेहरे की और देखता रहा ।

मेरी अर्धांगनी उसकी प्रेमिका - 66

अगली सुबह मेरे मस्तिष्क में भयंकर उलझन थे । मैं सोच नहीं पा रहा था कि मैं उलझन से कैसे निकलूँ । मैं समझ नहीं पा रहा था की खुशबू एक साथ दो चरित्र जी रही थी या फिर मुझे ही कोई गलत सैनी जी कल जिस ममता के साथ उसने अपने दुपट्टे से मेरे माथे का पसीना पहुंचने के वक्त गले से लगा लिया था । मेरी इस माहौल से हैरान कर देने वाला था । लेकिन दिन दिन भर बाहर रहना और मुझे सब छुपाना हूँ । मैं उसका कौनसा ऍम पुरुषों की आलोचना करते हुए कहा था, संसार का हर पुरुष हमेशा महिलाओं का पहला प्यार बनना चाहता है । जबकि दुनिया की हर महिला पुरुषों का आखिरी रोमांस मेरे साथ ऐसा क्यों हो रहा है? अपने ही सवालों में चलते हुए मैं टहलने के लिए छत चला गया । मेरे हाथ में मोबाइल था । मैंने एक नंबर डायल कर दिया । फिर वो कहाँ उधर से आवाज आई । संजय बोल रहा हूँ । मैंने उत्तर दिया । मेरा नाम सुनते ही मोबाइल पर कुछ दिनों के लिए खामोशी छा गई । मैंने काम से हटाकर मोबाइल की स्क्रीन पर देखा । कॉल चल रही थी । अगर वो दोबारा कहा खाओ बोसॅन रही हूँ । जब झंडा बात मुझे सहमत चहुँओर सुनाई दिया तो ऍम मेरी आवाज के कानों से टकराई तो वह गडबडा गई । बोले तो परेशान हो नहीं, मैंने खुद को संभाला । फिर मुझे ऐसा क्यों लग रहा है? संजय की मेरी सांसे रुकने वाली है । कहते कहते उसके आवाज करेंगे । फसकर रह गई नहीं तो मैंने पुकारा हाँ छह रो पडी थी । अच्छ सकते हुए बोली मैं मैं तो मैं थोडी देर में फोन करुँ, उसके फोन काट दिया । किसी ने कहा था कि पुरुष जब किसी महिला से प्यार करता है तो वह अपनी जिंदगी का बहुत छोटा हिस्सा ही महिला को देता है । मगर महिला किसी पुरुष को प्यार करती है तो अपना सब कुछ दे देती है और जीतु इसका जीता जागता उदाहरण थी । अपनी दृष्टि मुलाकात में मैंने महसूस किया था । उसने सच मुझे अपनी जिंदगी सौंपी । जब की मैंने सवाई दर्द के उसे कभी कुछ नहीं दिया । ऍन बचता है, वायदे की पक्की थी, बोलो संजय उसने कुछ खास कर कहा । हालांकि मैं जानता था कि वो अपनी हंसी के पीछे कोई दर्द था, इससे छुपा रही थी मगर मैंने उसे छोडा नहीं । मैंने कहा आज मैंने कुछ कहने के लिए फोन नहीं किया, नहीं तो फिर सुनना चाहता हूँ । तो अभी कुछ करूँ । कुछ सलाह तो मुझे ऐसा क्यों? ॅ क्योंकि मैं जानता हूँ कि मेरी शादी से पहले और शादी के बाद दोनों खत तुम्हे ना लिखे थे । संजय को एक खामोश हो गई । थोडी देर बाद बोली ऍम मैंने नहीं नहीं तो मैं उसके बाद बीच में ही कार्ड भी गंभीर होते हुए बोला इस बारे में तो कोई सफाई देने की जरूरत नहीं है । ये मेरा दुर्भाग्य था के मैंने तुम्हारी सलाह पर कभी ध्यान नहीं दिया तो फिर से चुप हो गई । थोडी देर तक उसका इंतजार करता रहा तो नहीं बोली थी तो मैंने आवासी चौक पडी । धीरे से बोल मुझे नहीं पता संजय की ऊंची एडी के जूतों का अविष्कार किसने किया है । मगर यकीन मानो उन जूतों को पहनने वाली दुनिया की सारी महिलाएं उसका कर्ज कभी नहीं उतार पाएगी हूँ । मैं ऍसे पुकार रहा था । मुझे उसकी बात समझ नहीं आई तो मैंने पूछा अच्छा मतलब कुछ बातों का मतलब नहीं होता है । संजय वो अचानक हंस पडी । इतने जानते हो ना? कहने को तो मैंने कह दिया मगर समझ नहीं पा रहा था कि वह क्या कहने की कोशिश कर रही थी । मैंने संदेहात्मक भरे स्वर में पूछा तुम और उनकी बात कर रही हूँ । एक दार्शनिक थे आपको कुछ हैं उसने मेरी बात पर बिना ध्यान दिए हुए अपनी बात जारी रखते हुए बोली को कुछ चैनल ने कहा था कि वे और तो जो इस तरह नहीं लगती उनका कोई भविष्य नहीं है और मैं शायद उन्हें से हूँ । उससे अपने आखिरी शब्दों को बहुत धीरे से कहा । नहीं तो इन सब बातों का क्या लेना देना है? मैंने पूछा नहीं संजय दरअसल ये जिंदगी का सार है और इन चंद शब्दों में जिंदगी की पूरी समस्याएँ और सारे सुख निहित होते हैं । जानती हूँ कैसे वो थोडी देर चुप रहने के बाद बोली जैसे मैंने पूछा संजय ऊंची एडी के जूते पहने हुए और इत्र की खुशबू से महकती गोरी औरते कभी अकेले नहीं होती । छुट्टी पुरुष उन्हें प्यार करते हैं और अश्वेत उन्हें पानी की इच्छा रखते हैं और तुम जानते हो ना कि जिस चीज की मांग बढ जाती है, शाश्वत नियम है कि उसकी कीमत भी बढ जाती है और जिन्हें फिर देर तक बाजार से दूर नहीं रखा जा सकता क्योंकि आज के समाज में ऐसे बहुत लोग हैं जो महंगी चीजों के शौकीन होते हैं । उसकी बात एक बार फिर मेरे सर के ऊपर से निकल गई । मैंने चंद क्षणों तक मोबाइल को काम से हटाकर उसे तक देखता रहा । समझने की कोशिश कर रहा था की फोन पर नहीं तो है क्या राज दोनों की बातें मुझे समझ नहीं आया करती हैं । पता नहीं कौन सी किताब पढते हैं । दोनों सही है । मुझे खामोश देख करनी तूने पुकारा मैंने धीरे से कहा तो जानते हो कि अब मैं कैसे निकलूँ हालत से मैंने उसके बाद बीच में ही काट दिया उसे और जर्जर की बातें करने का । बिना मौका दिए हुए मैंने अपनी बात जारी रखते हुए कहा मैं बाहर चुका हूँ । मैं सब कुछ समझ नहीं पा रहा हूँ की अपने दांपत्य जीवन को बिखेरने से कैसे रोक सिंह के उस ने कुछ कहना चाहा तो नहीं तो मैंने एक बार फिर उसके बाद बीच में ही काटते हैं । मैं इंजीनियरिंग का छात्र रहा हूँ । टिपिकल बातें मुझे सिर्फ काम समझ आती है क्या तो मेरी समस्याओं का हल आसान भाषा में मुझे समझा सकती हूँ । आसान भाषा को हंस पडे ऍम यू तुम्हारी और सच कहूँ तो मेरे पास तुम्हारी समस्याओं का कोई हल है भी नहीं । मगर मुझे इतना पता है कि आसान भाषा समझ में तो जल्दी आ जाती है, मगर उसका प्रभाव इतना नहीं होता कि लोग उसका अनुसरण करें । यही मानव का स्वभाव है । क्या तुम जानती हो कि पिछले तीन चार दिनों से खुश्बू कहाँ जाती है? नहीं मतलब ये सब मुझे पूछ रहे हो क्योंकि वो तुम्हारी अच्छे दोस्त है? नहीं । संजय तुम्हारी शादी के बाद से ही उसने मुझसे बात नहीं की । पता नहीं वो किस बात पर मुझे नाराज है । शायद वो जान गई है कि तुम मुझसे मैंने कहा मुझे भी यही लगता है । अचानक उसके स्वर में उदासी छा गई । नहीं तो तुमने बताया नहीं क्या खुश को कहाँ जाती है मुझे सच कुछ नहीं पता । संजय तो फिर तुमने जो खत्म लिखा था वो सब कैसे? संजय वो हंस पडी । खुशबू के ऑफिस में मेरी दोस्त भी काम करती हैं । उसी ने बताया था तो क्या मुझसे बात कर सकती हूँ क्या दूसरा कुछ पता हूँ? ठीक है मैं बात करी होगी । मगर एक बात कहूँ तुमसे तो वासाय किसी गैर मर्द के प्यार के लिए दौडती ऐसी औरतों का भटकाव ज्यादा दिनों तक नहीं ठहरता । उन्हें जल्दी ही एहसास हो जाता है कि जो प्यार जो अपराधबोध रही चरमसुख उन्हें अपने पति से मिल सकता है, वो कहीं अन्यत्र संभव नहीं । इसलिए मुझे लगता है कि तुम अगर रख सको तो थोडा धैर्य रखो । जल्दी ही उसे अपनी गलती का अहसास हो जाएगा और तब उस शायद हमेशा के लिए तुम्हारे पास पूर्व मन और समर्पण के साथ वापस लौट कर आ जाएगी । तो मैं जानती हूँ संजय तुम क्या कहना चाहते हो? उससे मेरी बात काटते हुए बोले । मगर एक बात सोचो कि तुमने उसकी गुनाह को इतनी बार बर्दाश्त किया है तो प्लीज थोडा और करलो । हालांकि मैं जानती हूँ कि पुरुषों में ऐसी सहनशीलता नहीं होती जो तुम में है । इतना बडा तेज मैंने हमेशा औरतों में ही देखा है । इच्छुक हो गया संजय तुम सुन रहे हो ना मुझे? हाँ मुझे देखकर वह बोली चुन रहा हूँ । ऍम अचानक उसके स्वर में कुछ अलग से आ गए । बोली तुम हर रोज हुई छत पर पहले आ जाया करो । ठीक है । मैंने भारी मन से कहा और फोन काट दिया । फोन करने के बाद मैं सोचने लगा कि मैं नीतू से बात करने से पहले कुछ ज्यादा परेशान था या फिर बात करने के बाद कुछ समझ नहीं आया तो लडखडाते कदमों से मैं स्टेडियम करने लगा । अभी मैं आखिरी सीढी को लांघकर फर्श पर कदम रखने ही वाला था कि अचानक मेरा दिल ठहर गया । उसने आखिरी में क्या कहा था? हाँ तो मैं याद करने की कोशिश करने लगा । हाँ यही तो कहा था कि तुम हर रोज हूँ, छत पर पहले आ जाया करो । एक रूसी कैसे पता? सौ टन का सवाल एक का एक मेरे ऊपर आ गिरा । मैं खुद को संभालते हुए उनके बहुत छत की और भागा पहुंचकर धर धर देखा तो मुझे वहाँ कोई नहीं दिखा । मैंने एक बार फिर नीतू को फोन लगा दिया । उन खाते ही कुछ जोर से हंस पडी । पुलिस तो हमें मालूम था । संजय तो वो लगाओगे नहीं तो एक बात पता होगी । मैं बिना वक्त गवाएं असली मुद्दे पर आ गया । पूछा तो मैं कैसे मालूम कि मैं छत था । हमें तो ये भी मालूम है कि तुम ऍफ में हो तो फिर खिलखिला पडी और जानते हो संजय हम ये भी जानते हैं तो अपने आस पास हमें खोजने की कोशिश कर रहे हो । बोलो हैना ये तुम किसी जानती हूँ । क्यों बताए वो किसी बच्चे की तरह मुझे छेडते हुए बोली बस इतना जान लो हमें तुम्हारे पल पल की खबर रहती है कि न हो तो आज मालूम अच्छा था । बोलो तो बताएं हम की इस समय तुम क्या कर रहे हो । तुम अपना दायां हाथ सर पर रखकर पूर्व की और बनी ऊंची इमारतों पर हमें ढूंढने की कोशिश कर रहे हो है ना? शायद में लग रहा है कि हम इन्हें खिडकियों में कहीं दिख जाएंगे लेकिन नहीं है हम ऐसे भी लोग उनको रुको । मैं एक दिन चलना पडा फिर से कहूँ किया । उसने पूछा तो मैं अभी कहा अपनी आखिरी लाइन में क्या कहा था? संजय हमें नहीं याद तो नहीं बता दो कि क्या कहा है हमने यही कि लेकिन नहीं कॉलेज के दिनों में यही वह नीतू थी जो बात बात में यार कहने की आदि थी और आज इतने सालों बाद बडी मुश्किल से उसके मुंह से वो छोटा सा शब्द सुनने को मिला था । दिल कह रहा था कि वह शब्द को बार बार हर बार दोहराती रहे । सुन तो लिए हो तो फिर हम दुबारा क्यों कहीं वो बच्चों से मुझे शायद उसे भी याद आ गए थे । वहीं कॉलेज कर देंगे । अच्छा फोन रखो । पंखुडी आवाज दे रही है । हमें उनसे बाद में बात करते हैं । मैंने कहा हम क्यों रखें तो रखो अचानक किसी नहीं गुडिया की तरह जल्दी लहजे में बोली, तुम रखो । मैंने उसी लहजे में जवाब दिया संजय फोन तुमने गया था तो तुम रखो, हम नहीं रखेंगे सर । मैं चाहता भी था कि वहाँ से खिलखिला इज्जत करें और इन रोनित होने के दिनों को छोडकर लौट जाए । अपने पुराने की फैलाते दिनों में अच्छा हम रखें । त्यौहार मानते हुए बोला तो उनको रख होगी । सहसा उसने पैंतरा बदल लिया तो उन्होंने हमें कहा है तो हम रखेंगे हस्कर । उसने कहा फोन डिस्कनेक्ट हो गया । मैंने एक बार फिर अपनी छत के चारों तरफ देखा तो नहीं देखी तो अपना सर मारते हुए मैं छत से नीचे उतर आया । पंखुडी मेरा इंतजार कर रही थी ।

मेरी अर्धांगनी उसकी प्रेमिका - 67

रात को लगभग बारह बजने वाले थे । खुशबू तब तक घर नहीं पहुंची । उसे देर हुआ करती थी । मगर ये उसकी हत्थी जहाँ तक मुझे याद है वह नौ दस बजे तक अक्सर आ जाया करती थी । उस दिन मैंने सोच लिया था कि आज वो हर कुछ कर जाऊंगा तो मुझे बहुत पहले करना चाहिए था । अब और बर्दाश्त नहीं हो रहा है । मेरे छह बजे के आस पास उसके ऑफिस में फोन करके पता किया की वह वहाँ से निकल चुकी है । लगभग छह घंटे से वो कहाँ है उसके साथ है । मैंने बंगडी को खाना खिलाने के बाद स्तर पर सुनने के लिए ले गया लेकिन वो नहीं हुई । दरअसल उसे मम्मी और पापा के बीच में सोने की आदत थी । मैं उसे लेकर बरांडे में आ गया । लगभग सवा बारह बज रहे थे । एक किसी के पैरों की आहट सुनाई दी । मैं आंखे फैलाकर दरवाजे की और देखा । अंधेरा और रोशनी की जरूरत को पार करती खुशबू चली आ रही थी । उसके हाथ में कुछ कागज का टुकडा था जिससे वो लहरा रही थी । कुछ पल गुजरे तो वो ही का एक बरामदे की रोशनी में दाखिल हुई । ना उससे कुछ दूर कुर्सी पर बैठा हुआ हमारे नजरिए मिली तो वहीं ठहर गई और हाथ में लहरा रहे कागज को पडने लगी । प्रेमपत्र होगा अपना अंदर ही अंदर मैंने सोचा मेरे दिल की धडकन नहीं का एक रफ्तार पकड रही थी । वो पत्र पड चुकी तो तेजी से मेरी और बडी मैं उसके चेहरे से अपनी नजरें हटा ली । पंखुडी उसने पुकारा । पंखुडी मेरे पास ही एक खिलोने में व्यस्त थी । मम्मी पंखुडी एका एक खिलौना छोड कर उसके और भागे खुशबू से गोद में उठा लिया । उस दौरान उसकी नजरें पर फिर मेरी नजरों से टकराई । उसके चेहरे पर दरिया संकोच का तीस दिन का भी नहीं था । मैं इस से पहले कुछ पूछता । उसने पंखुडी के नन्हें हाथों में उस कागज को थमाते हुए बोली, लोग अपने पापा को उनका प्रेमपत्र दे दो । बोलना दिल्ली से आया है । दिल्ली से तेजी से कुर्सी से उठा और लगभग कर पंखुडी के हाथ से चपट लिया । सब्र नहीं हो रहा है । जरा भी मेरी और टूटकर ऐसे देखिए जैसे गुना उसने नहीं मैंने कर दिया हूँ । मैंने कुछ नहीं कहा । चंद क्षण होता तो उम्मीद थी और देखती रही । फिर अपने बॉस को वहीं खडे खडे दरवाजे के सामने ही रखे बैड पर फेंक कर पात्रों की और चली गई । पत्र प्रियंका था जिससे अपनी मौत के दो दिन पहले ही लिखा था तो इतने समय बाद मुझ तक पहुंच पाया । प्रिया को मरे हुए एक महीने से भी ज्यादा हो चुका था । फिर इतने दिन कहाँ था? ये पत्र शायद खुशबू के पास हो सकता है कि मुझे पहुंचने में देरी हो गई हूँ । भारतीय डाक है, कुछ भी हो सकता है । मैं पत्र को लेकर बैडरूम चला गया । संजय कैसे हो तुम? उम्मीद है ठीक हो गए आज इतनी इतनी बात खत्म कर रही हूँ । बुरा मत मानना बहुत से कारण हैं जिनकी वजह से खत्म नहीं लिख पाई । वैसे तुमने भी तो नहीं लिखा । मुझे शिकायत कर रही हूँ । बुरा मत मानना । हम जानते हो ये मेरी आदत है । संजय तुम सच कहते थे । सुधाकर बहुत अच्छे इंसान है । शायद उससे भी ज्यादा जितना तुम ने मुझे बताया था । मैं सचमुच उनकी बहुत जॉब करती हूँ और वो भी मुझे जान से जाना चाहते हैं । लेकिन पता नहीं क्यों मैं आज भी नहीं समझ पा रही हूँ कि तुम मेरे क्या होगा । दोस्त जो भी हो उसी रिश्ते से तो मैं बता रही हूँ । अपने जीवन के बारे में आपने आज के बारे में संजय मैं अतीत को बनाने की कोशिश में अपने वर्तमान में फंस गई हूँ । इससे निकलने का मुझे कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है । आपने स्वच्छ के साथ अकेली पड गई हूँ और अब उससे निकलने के लिए अकेले ही लड रही हूँ । जानते हो क्यूँ? क्योंकि स्वच्छ के बारे में मैं सुधाकर को भी बताने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही हूँ । मैं नहीं जानती कि जो कुछ मैं बताने जा रही हूँ उसे जानकर तो मेरे बारे में क्या सोच हो गई । मगर फिर भी बता रही हूँ शादी के तीन साल बाद भी जब हमारे कोई बच्चा नहीं हुआ तो मुझे बहुत दुख हुआ । हम दोनों नहीं अपना अच्छा कब करवाया तो पता चला कि सुधाकर कभी बात नहीं बन सकते । इस खबर ने मुझे अंदर तक तोड कर रख दिया । संजय मैं तो मैं हर हाल में बोलना चाहती थी और उसके लिए मुझे ढेर सारे बच्चे चाहिए थे । तुम्हें याद है? मैंने तुमसे कहा भी था ताकि मैं उन में व्यस्त हूँ । मैं काफी दिन तक खुद में घूमती रही और कर भी क्या सकती थी । जब ऊपर वाला ही बारिश के पानी में आग लगा दे तो मैं बंजर ही बन होंगी । पता नहीं । भगवान कभी कभी इतना बेरहम क्यों हो जाया करता है? खासकर मुझे लेकर मैंने तुम्हें पाना चाहते तो नहीं मिले तो मैं बोलने के लिए बच्चे चाहिए थे । बच्चे नहीं मिले तो कब तक ऊपर वाले की कठपुतली बनकर नाश्ते रहती हैं । मैंने उस को चुनौती देने का फैसला किया । मुझे ये बात लिखने में संकोच हो रहा है पर सच्चाई से कब तक नहीं बोलती फिर होंगे । मैंने बच्चे की ख्वाइश में अपने पडोसी युवक का सहारा लिया और उसमें सफल भी हुई । अब इस वक्त जब मैं तो खत्म देख रही हूँ, उसका कर मेरे पेट में हुआ है । हालांकि मैं कुछ दिनों तक इस बात को सुधाकर से छुपाती नहीं मगर ये कैसा सब था । इसको एक ना एक दिन सामने आना ही था । मैंने सुधाकर को ये बात बता दी । सुधाकर बहुत अच्छा इंसान है । वो मेरे मातृत्व के सामने छुट गया और बच्चे को अपना नाम देने के लिए तैयार हो गया । मगर मेरी बदनसीबी देखो । संजय अभी दूसरा व्यक्ति मेरे पीछे पड गया तो मेरे पडोसी का दोस्त है । वो चाहता है कि मैं उसके साथ थे । वही सब करूँ तो मैंने अपने पडोसी के साथ करती रही हूँ । उसने मुझे धमकी दी कि अगर मैंने उसकी बात नहीं मानी तो दुनिया के सामने मेरे सच को उजागर कर देगा । हालत में मैं क्या करती है? मैं एक औरत हूं और तुम जानते हो कि औरत होना क्या होता है । मुझे जिंदगी का वह जहर भी पीना पडा तो दोनों दोस्त वापस में दुश्मन बन गए हैं और मैं दो गैरमर्दों के बीच लगातार फस रही हूँ किसकी सुनी हूँ और किसकी नहीं कुछ कुछ समझ नहीं आ रहा है । मैं अपने इस मजबूरी को सुधाकर से भी नहीं कर पा रही हूँ । संजय तो वैसे मेरी कमजोरी भी कह सकते हो फिर भी पूछ रही हूँ बताऊँ अभी क्या करूँ कौन सा रस्ता पकडो और किसी छोड दुनिया के डर से अब मैं अघोषित वैश्या बन कर रह गई हूँ । बहुत घबरा रही हूँ कर रही हूँ कि एक बच्चे की बारिश में फस्ट और आखिर कब तक क्यों घसीटती रहेगी मेरी ये जिंदगी क्या होगा इसका हूँ छोडो संजय मेरी बातों को मेरी जिंदगी ऐसी है कि मैं चाहकर भी इन सबसे बडा तो नहीं सकती । तो बताओ तुम कैसे हो? कैसे कट रही है हमारी अच्छा तो बहुत खुश हो गए खुशबू लडकी ही ऐसी है दोस्त जो है हमारी एक बात बताओ संजय की अब भी वो लडकी लगती होगी और बन गई होगी ना अब तक कभी से मिलवा होगी मुझे मुझे अब तक माफ कर पाई अभी नाराज है वहाँ एक बात पूछनी को बोल रही हूँ जब तक तुम बच्चों की तीन तैयार कर पाये कि नहीं क्या देना है तुमने क्रिकेट टीम तैयार करना चाहते थे । मुझे हमारी बहुत याद आती है । मैंने गुस्से में तुम्हारा फोन नंबर भी अपने मोबाइल से हटा दिया था ताकि तुम्हें फोन भी ना कर पाऊँ खत के नीचे में अपना नंबर लिख रही हूँ कभी कभी फोन कर लिया कर ना खत समाप्त होते ही मैं चिंघाड करो । पडा जो भगवान कभी कभी सब बहुत किसी के लिए इतना कठोर हो जाया करता है बस करो अब इतना भी मत रहो एक एक दरवाजे पर खडी फॅसा देखा पंखुडी अपने पापा को कितना दुख हो रहा है उन्हें दूसरे के दर्ज में कभी कभी हमारे लिए भी रो लिया करो, खुश हो मैंने अपनी लाल आंखों से उसकी और देखा चिल्ला क्यों रहे हो? क्या गलत कहा है मैंने कहती हुई वह पंखुडी को वहीं दरवाजे पर छोडकर बरामदे की और पलट पडी पंखुडी दौडती हुई मेरी खोदी में आ गई ना धीर तक बिस्तर में पौधे बुलेट आ रहा तो उस तरह प्रिया की जिंदगी के बारे में पंखुडी मेरे बगल में चुप चाप लेटी रही । संजय एक बार फिर खुशबू का कर्कश स्वर भेद गया । मेरे कानों को अब पढे ही रहोगे क्या? मुझे भूख लगी है? चल कर खाना निकालो कहती हुई वो कमरे में घुस आई । मैंने कोई जवाब नहीं दिया । रात गुजर गई । मैंने सुबह सुबह उस पत्र को न्यायालय को पोस्ट कर दिया था । जी यकीन था प्रिया का ये पत्र सुधाकर की रिहाई का सबसे ठोस सबूत साबित हो सकता है ।

मेरी अर्धांगनी उसकी प्रेमिका - 68

रविवार का दिन था । हम दोनों घर पर ही थे । एक दोपहर को पंखडी को दस शुरू हो गया ना उसे लेकर पांच ऍम गया । दवा कराने के बाद फुर्सत नहीं जब डॉक्टर दस होने का कारण बताया है तो मेरे पैरों तले से सभी नहीं सकते हैं । उसने कहा असल अस्वभाविक तनाव के कारण ये दस हुआ है । आपका बच्चा न समय से हो पाता है और नहीं पूरी नींद माता है । बना हूँ मैं चौक पडा । चार साल की बच्ची को क्या हो सकता है । इंसान की यही तो उम्र होती है जिसमें वो पूरा जीवन जी लेते हैं । इस उम्र में ना तो से रोटी की फिक्र होती है जबकि होते पूछा तो साहब अभी तो बच्ची हैं । पीस को कौन सा हो सकता है आपके घर में उसके अलावा और बच्चा है । इस इस का अक्सर झगडा होता रहता हो या आप लोगों से ज्यादा प्यार करते हो जिससे से जलन होती हूँ । छगन इतनी कम उम्र में? यहाँ यही वो स्वभाव है जो व्यक्ति जन्म के समय ही साथ लेकर पैदा होता है । ऍम डॉक्टर सब ये एकलौती है इकलौती ऍफ करने का अच्छा आपने का रिश्ता कैसा है? मतलब आप पति पति के बीच में कभी झगडा होता है क्या? क्या मतलब? मैंने आॅफ देखा आपका मतलब है कि हम दोनों के झगडे से कितना हुआ है? जी उसने अपनी फोटो भेज रहे हैं मगर उसकी आंखों में दिख रहा था कि वो अपने इस बात से पूरी तरह संतुष्ट नहीं था । असमंजस भरे स्वर में बोला हो सकता है तो नहीं हो सकता हूँ । मैं चुप था । देखिए आप ये मैं समझी की छोटी है । हालांकि छोटी बच्ची ही है । इस बार उसकी आंखें आत्मविश्वास से चौंक उठे । वो अपनी बात जारी रखते हुए बोला आपको लगता होगा कि उसे आप लोगों के झगडों से क्या लेना देना वैसा नहीं है । आजकल के बच्चे बहुत सेंसिटिव है । ऍम आप को चाहिए कि अपनी बेटी को इस वक्त खुला और खुशहाल माहौल दें । उसके साथ थोडा वक्त गुजार रहे चीज मैं तो ख्याल रखूंगा क्लिनिक्स लौटकर में जैसे ही सीढियां चढकर बरामदे में घुसा बैडरूम की खिडकी सामने आ गई । आज उस पर पडता नहीं था । मैं वहीं ठहर गया । विश्व बिस्तर में पेट के बल लेटी हुई हाथ झटक झटक कर फोन पर किसी से बात कर रही थी । ना उसकी बात सुनने की कोशिश करता, उससे पहले वहाँ की शांति को भंग करते हुए पंखुडी बोली, पापा, अब यहाँ फॅमिली है । अंदर चली ना । मैं राम था की खुशबू भी चौकन्नी थी । पंखुडी की आवाज सुनते ही वह तेजी से बिस्तर पर पार्टी और इस दौरान फोन उसके हाथ से गिर गया । मैं उसके चेहरे को गौर से देखा । उसके चेहरे की रंगत एक गायब हो गई । चम्मच दिनों तक मूर्ति बनी । फटी फटी आंखों से मेरी और देखती रही । होश आया तो बिजली की गति से उसने फोन उठाया । अच्छा रखती हूँ । कहा और फोन काट दिया । मैंने कुछ नहीं कहा । चलता हूँ । बिस्तर के पास पहुंचा और पंखुडी को उसमें लगा दिया । पंखुडी कैसी हो? मैं कोई सवाल करने की कोशिश करता । उससे पहले उसने पंखुडी को अपना मुद्दा बना लिया । पंखुडी को दस होने के बावजूद कौनसी होगी जैसे मटक मटक कर किसी से बातें करेगी । पंखुडी मुस्कराकर उसकी और देखी तो बिना वक्त गवाएं तीव्रता से पंखुडी की और आपकी और उसे अपने गोदी में उठा लिया । हालांकि ये कोई पहला मौका नहीं था । खुशबू हर ऐसे मौके पर पंखडी पर प्यार लुटाना शुरू कर देती थी । शायद वो जानती थी की पंखुडी मेरी सबसे बडी कमजोरी थी । दोपहर ढलान पर थी । घडी का कांटा लगभग चार बजा रहा था । वो बिस्तर से उठी और अचानक आईने के सामने खडी होकर सजने संवरने लगी नहीं जा रही हूँ । मैंने पूछा हाँ थोडा ऑफिस का काम था इसलिए जाना पड रहा है । लेकिन आज हरिद्वार है, जानती हूँ उसे घूरकर मेरी और देखा आज काम नहीं हो सकता क्या इससे पहले तो तुम बुधवार को कभी नहीं गई । ठीक है, पहले नहीं गई तो कहाँ लिखा है कि इतवार को कभी काम नहीं हो सकता । वो लेकर एक्वीफर पडेगा । उधर पटेल सर को इधर तो तुम दोनों ने मेरा जीना हराम कर दिया है । पटेल ने ना तो इस बार देखते हैं ना सोमवार । जब भी इच्छा हुई मुझे ही काम पर लगा देते हैं । और तो तो होगी अपनी टीका । टिप्पणी में कभी बात नहीं आती । मैं चुप हो गया । वो सस्ती समझती रही । मैं पंखुडी का लेकर वहाँ से निकल गया । जब लौटा तो मैं और पंखुडी दोनों भी बाहर जाने के लिए तैयार थे । तुम दोनों भी कहीं जा रहे हो गया । हमें सजधजकर खडे देखा तो चौंक पडेगी । हाँ, आखिर ये कार कब काम आएगी? हमेशा खडी रहती है । आज हम सब लोग साथ चलेंगे तो हमारे ऑफिस छोडेंगे । फिर हम दोनों वहीं से कहीं घूमने निकल जाएंगे तो पागल तो नहीं हो गई हूँ । मुझे एक चीज पडी तुम जानती होगी पंखुडी की तबियत ठीक नहीं है और तुम उसे घुमाने का प्लान बना रहे हो । वो ठीक हो गई है । मैंने उसके बाद बीच में ही कर दी । यकीन हो तो तुम मुझे कुछ मेरी और देखने लगी और मैं खडी क्या? संजय एक है उसका स्वरूप सहज हो गया । मुस्कराकर बोली मानती हूँ सही है की पंखुडी स्वस्थ है मगर सोचो क्या इसे लेकर ऑफिस जाना ठीक होगा क्योंकि इसके वहाँ जाने से क्या बिगड जाएगा? और सो उसने अपना माथा पकड लिया । संजीव तुम भी कभी कभी जाने क्या क्या सोचने लगते हो । मैंने ऐसा कब कहा । फिर कहूंगी भी क्यों? थोडी हमारी बेटी हैं हमारी अपनी बेटी । उसे तो हमारी इज्जत बढती है मगर वो पंखुडी की और तेज नहीं लगेगा । मगर क्या कुछ हो में चलना है तो चलना है । ऍम कहा आज हम सब साथ जाएंगे और वो भी इसी कारण है । थोडी देर तक खामोश नजरों से मुझे देखती रही । शायद कुछ सोच रही थी पंखुडी तुम अपना गुड डाले लोग मैं पंखुडी की उंगली पकडकर पलटते हुए अलमारी की और बडा फॅमिली के सारे खिलोने वहीं रहा करते थे । संजय कुछ वो अचानक चलना पडेगा । जरा समझा करूँ क्योंकि वजह तो मुझे परेशान कर रहे हो । फिर किसी दिन सब लोग साथ चल लेंगे । कुछ वो हमारी से खिलौना उठाकर में उसकी और पालता और हस्कर वाला एक बात बताओ तुम्हें हमारे साथ चलने में प्रॉब्लम क्या है? हम बाहर गाडी पर हीरो के रहेंगे तो ऑफिस चली जाना । फिर जब लौटेंगे तो सब लोग बाजार होते हुए चले आएंगे । इसी बहाने कुछ खरीदारी भी हो जाएगी । मैं ऑफिस नहीं जा रही हूँ । संजय को चलना पडेगा सब । दरअसल मुझे अपनी एक सहेली के यहाँ जाना था । हम लोग ऑफिस में साथ ही काम करते हैं । अभी तो तुम ने कहा था कि और ऍम कहाँ कहाँ था मगर मुझे ऑफिस नहीं जाना था । बोला क्यों मतलब? हमने हम से छूट बोला । नहीं संजय ऐसी बात नहीं है जिसके होठों से फिर से मुस्कान बिखर गई । बोले ऍम में बताना नहीं चाहती थी । क्यों फॅमिली के यहाँ जाने में आपत्ति करोगे? मैं क्या आपत्ति करूंगा? मेरी आपसे फैल गया । मैंने कभी भी तो मैं कहीं जाने से रोका है जो आज रोकता । हाँ, वो तो है । वैसे कहा जिससे आभार जता रही हो । फिर मुस्कुराकर बोली अच्छा मैं हूँ जाओ बॅाय वो खिलखिला पडी । उसने अपना मैंने बैग उठाया, कंधे पर डाला और एक बार फिर मेरी और मुस्कुराकर देखा बदले में मैंने भी उसका दिया । चलो कोई नहीं हम भी चलते हैं । मैंने गोदी में उठा लिया तुम कहाँ जा रहे हो? कोई ठहर गई तो मैं छोडने संजय वो हस पडे तुम्हें बहुत जिद्दी हो पहले कभी तो मेरी मान लिया करो तो एक एक में गंभीर हो गया पंखुडी को वहीं फर्श पर तार कट उसके सामने खडा हो गया । उसकी आंखों में झांकते बोला कुछ वो सच बताऊँ तुम हकीकत बताने में कतरा क्यों रही हो? अगर तुम अपने दोस्त के यहाँ जा रही हो तो तो मेरे साथ चलने में क्या दिक्कत है? मेरी वाक्य उसके कानों को छोडे तो जैसे एक उसके अंदर तूफान आ गया । उसने अपने पास को जमीन पर फेंका और चिंघाडते आवाज में बोली संजय मुझे दिक्कत है । हाँ है मुझे दिक्कत तुम्हारे साथ चलने में ये जिंदगी मेरी है और इसे अपने तरीके से जीने का मुझे हक है तो उसमें कोई दखलंदाजी नहीं कर सकते । समझे तो मैं अकेली जाना चाहती हूँ तो बस चाहती हूँ तो मुझे रोकने वाले हो । थोडा थोडा हम पत्नियों मेरी और इस रिश्ते से मुझे तुम्हारी जिंदगी में दखलंदाजी करने का हक है । हाँ जानती हूँ कि मैं तुम्हारी पत्नी हूँ, वो चल रहा है इसलिए तो मैं बता रही हूँ । मैं पत्नी गुलाम नहीं की जो तुम का होगी । मैं वहीं करूंगी । यदि तुम्हें मेरा यू घूमना फिरना, स्वतंत्र जिंदगी जीना अच्छा नहीं लगता तो मुझे छोड नहीं देते । कुछ वो एक एक मेरे पैरों के नीचे से समिति सकते भाई आवाज में बोला क्या तुमने मुझे इसलिए शादी की थी? हाँ चल पडी संजय अब और तो की तरह आंसू मत बहो । मैं सचमुच तंग आ गई हूँ तो उनसे और तुम्हारी ऍसे को झपट कर वर्ष पर पडे अपने पर्स उठाया और खोलने लगेंगे । बोली जितना तो बर्दाश्त कर्नाटक कर दिया अब और नहीं कर सकती । मैंने फैसला कर लिया है कि मुझे तुम्हारे साथ नहीं रहा । उससे पहुँच से कागज के उस पन्ने निकले और मेरी और रहते हुए बोली इसमें हस्ताक्षर करूँ ज्ञान मैंने उसके लाल हो चुके चेहरे की ओर देखा । झुककर कागजों को उठाते हुए पूछा ये ये क्या तलाक के पेपर्स, तलाक के पेपर पद आवास में थोडी देर तक उसे एक तक देखता रहा? संजय साइन करो, इनमें मुझे खामोश थे । उसमें लगभग डपटते हुए से कहा लेकिन ऍम बडी मुश्किल से मेरे फॅमिली तो उसकी फिक्र मत करो । को तेजी से पंखुडी की और बडी उसका फैसला अदालत करेगी । मैं हैरान था उसके पास में तलाक के पेपर । इसका मतलब था ऐसा मतलब ये नहीं किए । ये वो फैसला बहुत पहले ही कर चुकी थी ।

मेरी अर्धांगनी उसकी प्रेमिका - 69

खुशबू के वकील इकबाल अंसारी ने मुकदमे को जिस तरीके से तोड मरोड कर अदालत में पेश किया, उसे समझने के बाद पंखुडी को पाने की मेरी उम्मीद टूट कर बिखर चुकी थी । कितनी आसानी से उसने साबित कर दिया कि मैंने कभी पंखुडी को प्यार नहीं किया । भगवान जानता है कि मेरी बेटी पंखुडी मेरे लिए क्या था? मेरा तो भारत से सवाल था कि क्या कोई मुझे बता सकता है कि इन चार सालों में खुश भी में पंखुडी के लिए क्या किया था? मेरी सिर्फ इतनी गलती है कि मैं उसका पिता हूँ । मान नहीं, मैं समझ नहीं पा रहा था की अदालत निर्णय पर कैसे पहुंच गई की बेटी पालन पोषण सिर्फ माँ ही बेहतर कर सकती है, पिता नहीं । अदालत के सामने कटघरे में घुटनों पर बैठकर फिर गन्दा रोया अगर मेरी आवाज किसी के कानों तक नहीं पहुंच पाई । अदालत मुझे पुरुष होने की सजा सुना रही थी और न्याय की देवी आस में पट्टी बांधे हुए भरी अदालत में अन्याय होते हुए देखती रही । मैं बता नहीं सकता कि उस दिन पहली बार मुझे अपने पापा की कमी कितनी महसूस हुई । अगर वहाँ होते तो मैं यकीन से कहता था कि वह पूरी अदालत मेरे सामने समर्पित हो जाती है । मेरे आंसू की कीमत मेरे रुलाने वाले को चुकानी पडती । मेरा बहुत मन रोने लगा । मैं हाथ जोडकर जज के सामने चिंघाड । बडा मान्यवर ये सरासर मुझ पर गलत आरोप लगाया जा रहा है । मेरा भगवान जानता है की पंखुडी को मुझ से ज्यादा प्यार और सुरक्षा दुनिया में कोई नहीं दे सकता । मैं पंखुडी को पाने के लिए, अपने घर को अपनी सारी दौलत को छोडने के लिए तैयार हूँ । पहले कुछ अपनी पंखुडी दे दीजिए । लॉर्ड मिस्टर संजय कौनसे घर की बात कर रहे हैं एक बार बीच में ही बोल बडा इनके पास लखनऊ शहर में कोई अपना घर नहीं है । उसने अपनी इमेज से उस पेपर उठाए और जब साहब को थमा दिए । ये जिस घर की बात कर रहे हैं, दरअसल वो मेरी क्लाइंट खुशबू के नाम पर है और उसकी मालकिन भी वही है और ये पेपर उसके सबूत हैं । वर्जन था वो घर मेरे पापा ने हमें शादी के उपहार के रूप में दिया था । दिया होगा मिस्टर संजय मगर वो मेरी क्लाइंट खुशबू के नाम पर है । इसीलिए उस घर पर कानूनी तौर पर अब उनका अधिकार है इकबाल नहीं । अदालत को संबोधित करते हुए कहा मैं चुप हो गया । चंद घंटों के भीतर देखते ही देखते मेरी पूरी दुनिया उजड गई । मेरी पत्नी किसी और की क्लाइंट बन गई । मेरी अपनी बेटी मुझ से छीन कर उसकी माँ को दे दी गई और वह घर आपको घर जिसे मेरे पापा ने बडे प्यार से हमारी जिंदगी की शुरुआत के लिए हमें गिफ्ट किया था, वो मेरा नहीं रहा । इस वक्त जब नहीं किराये के कमरे में चटाई डाले हुए लेता हूँ, सोच रहा हूँ स्त्रियों के बारे में सोच रहा हूँ क्या वाकई पीडित हैं अपन थोडी उसने अदालत के सामने क्यों नहीं कहा कि मैं पापा के साथ जाना चाहती हूँ । मैं पापा के साथ रहोगी । वो मुझे बहुत प्यार करती है । खटखटाओ जी का एक मेरे दरवाजे पर दस्तक हुई तो मैं उठ कर बैठ गया । दरवाजा खुला हुआ है । कटाई बैठे बैठे ही मैंने कहा अगले पल दरवाजे के पट खोले तो मैं चौंक गया । एक लम्बा चौडा इंसान मेरे सामने खडा था ये वही काला कोठारी इंसान था तो अदालत में उछल उछल कर खुशबू की तरफ से दलीलें पेश कर रहा था । क्या किसी आई हूँ? बहुत कर खडा हो गया उसने मेरी बात सुन तो मुस्कुरा पडा और फिर रहते हुए बोला ऍम चल कर अपनी फॅमिली को ले आओ । मुझे वो लडकी बिल्कुल पसंद नहीं है, जो बडी जल्दी ऍसे । दस बारह दिनों में ही अदालत में तो उछल उछल कर दलीलें पेश कर रहे तो उसकी संजय बंगडी को पाना खुशबू की चाहत थी मेरी नहीं । मेरा तो सिर्फ एक इम्तिहान था । मैंने पास कर लिया । मुझे खुशबू चाहिए थी और वो मुझे मिल गई । उसने अपने आखिरी वक्त को धीरे से कहा और वहाँ से निकल गया को पाने के लिए । अंदर ही अंदर मेरे दिल पर चारों शूल चुप सोचने लगा खुशबू के और कितनों से रिश्ते हैं ।

मेरी अर्धांगनी उसकी प्रेमिका - 70

मैं आज कई दिनों बाद अपने घर घुसा था । लोन पर करने के बाद मैं पल भर के लिए ठहरा । उस वक्त पूरा घर मेरी निगाहों के सामने था । मेरी आंखें डबडबाई कभी किसी घर को देखकर में कितना खुश होता था । घर के अंदर मेरी पूरी दुनिया थी लेकिन आज वही हर इतना पढाई लग रहा था । ऐसा जैसे कि मैं वहाँ पहली बार आया हूँ । उस वक्त मेरी ने कहा उस छज्जे पर भी गई जहां बैठकर कभी कबार हम चाहे दिया करते थे । मैंने लॉन में लगे फूलों को नहीं आ रहा । कितना मुझ से गए थे क्या देख रहे मिस्टर संजय एक किसी ने आवाज नहीं मेरे कानों को छोडा । मैंने उधर देखा । सामने इकबाल खडा मुस्कुरा रहा था । अपने सर पर हाथ घुमाते हुए बोला दूसरों के घर में घुसने से पहले दूर बाल दवाई जाती है । पता है ना आपको? हाँ मैंने कहा कोई बात नहीं, पहली दफा है । गलती हो जाती है । आई बैठी है । कहते हुए वो गेस्ट रूम के दरवाजे पर जोर से लात मारी वो हो गया । सामने वाले सोशल में बैठे हुए बोला अरे आप अपनी खडे बैठे बैठे हो गया । बंगडी कहा मैंने वही खडे खडे पूछा । वो ऊपर खेल रही है । लेकिन इतनी जल्दी भी किया है सिस्टर है । उसने छुपी निगाहों से घडी की और देखा । उसके चेहरे पर लगातार एक बहुत हँसी चाय रहे । उससे कहा मिस्टर संजय । एक बात बताइए गया जी मैंने धीरे से कहा आपको ये सब करके क्या मिला? मतलब मेरा मतलब ये है कि अगर आपने खुशबू को मुझसे मिलने के लिए बार बार न रोका होता । खुशबू ना सही कम से कम आपके घर और थोडी तो आपके पास होते हैं । अगर आप तो हीरो बनने निकल पडे । जैसे कि आपको पता है कि दो प्यार करने वालों के बीच में दीवार खडी करना कानूनी तौर पर भी जुर्म है और अगर प्रेमी वकील हो तब तो ये भयानक अपराध है । जानते हैं ना आप? उसने कभी बताया नहीं । आप के बारे में अच्छा ऐसे अगर बता देती तो हम से मौत देता हूँ से और जेल चले जाते हैं तो जोर से हंस पडा छोडिए उसने एक बार फिर घडी की और देखा और मुस्कुराकर वाला वो तमन्ना भी आपकी जल्द ही पूरी हो जाएगी । बुलाना अब ऊपर जाइए पंखुडी आपको इंतजार कर रही होगी । मैं आखिरी बार उसकी और देख और पर लांगते कदमों से सीढियों को पार करता हुआ बरामदे की और बढ गया पंखुडी मैंने आवाज भी अगर किसी ने कोई जवाब नहीं दिया । सीधे बैडरूम पहुंचा । वहाँ भी कोई नहीं था कुछ वो अभी शायद ऑफिस से नहीं लौटेंगे । उस दौरान मैंने कई कमरे झांके थे पर जब वो कहीं नहीं मिली तो दोबारा लौटकर बेडरूम में बिस्तर के पास खडा हो गया । नहीं आंखे देर तक इधर उधर कुछ खोजती रही कि तभी अच्छा ना । हमारी के पास बडे कपडों के गट्ठर में मुझे पंखुडी का हाथ दिखाई दिया । मेरे हाथ पहुँचाना शून्य पड गए । मैं लडखडाते कदमों से उधर भागा मगर कदमों ने साथ नहीं दिया । आराम से मैं फर्श पर गिर गया । मेरी आंखों के सामने अच्छा ही अच्छा गया । अपने काम के हाथों से मैंने पंखुडी के हाथों को छुआ उठते पड चुके थे । उच्चतम खडी कंपनी मर चुकी थी । मैं उसे गले से लगाकर चिंघाडता । उससे पहले एक तीन चार गाडियां आवाज करते हुए घर में दाखिल हुई । मैंने खुद को समेटा, उचककर खड कीजिए । देखा तो मैं फोटो से चीख निकल गई तो पुलिस मैं एक बार अंसारी की साजिश समझ गया । एक तरफ मिल बेटी की लाश थी, वहीं दूसरी और मेरे झेल जाने का रास्ता है । नहीं दोनों में से किसी को भी चुनने की हालत में नहीं था और मुझे वहाँ से भागना पडा था ।

मेरी अर्धांगनी उसकी प्रेमिका - 71

संजय को अपनी बेटी की लाश छोडकर भागना पडा । एक बात के लिए इससे ज्यादा बुरा वक्त और क्या हो सकता है । संजय की डायरी तो खत्म हो गए मगर डायरी की आखिरी पंक्ति एक बार फिर मेरी आंखों में आंसू को सलाह छोड गई । राज्य मेरी आंखों में पानी की एक बूंद शिवी के हाथ में गिरी तो वह एक का एक होकर बैठ गई । मेरी भरी भरी आंखों कि और देखकर बोली आप फिर हो रहे हैं क्या करूँ? संजय की जिंदगी सिर्फ जिंदगी नहीं है । वो धरती में बसा हुआ जीता चलता एक नर्स है । इससे सालों से वो होता है पंखुडी को किसने मारा था? शिविर पूछा पता नहीं मगर जब संजय उसकी लाश मिली उस वक्त वहाँ पर सिर्फ एक बार अंसारी मौजूद था । मुझे लगता है कि संजय सही ही कह रहा था क्योंकि जिस तरह के हालात से उसे देख कर मुझे भी यही लगता है कि हो ना हो पंखुडी को उसी ने मारा होगा । अच्छा कहते हुए वो अचानक उठकर खडी हो गई, कहाँ जा रही हूँ? मैंने पूछा चाहे बनाने देंगे ना । मगर अभी कुछ देर ऍम सुबह होने वाली है । हाँ अरे आप कमरे का पर्दा तो हटाइए । सुबह हो चुकी है । क्या मैंने चौंककर उसकी और देखा जी दस लाख संजय भाई साहब की डायरी पढने में इतना व्यस्त थे कि कब सुबह हो गई आपको पता ही नहीं चला । और आप मैंने कमरे की खिडकी में पडे पडे को हटाया । पहुँच निकल आया था तो बिस्तर से छलांग लगता वो संजय की कमरे की और बडा संजय की नींद खुल चुकी थी । उससे नजरे मिलाते ही उसके वोटों में एक रूकी से मुस्कान तैर पडी गुड मॉर्निंग । मैंने कहा ऍम राज्य वोट कर बैठ गया । मैं कुछ कहना चाहा मगर तभी ऍम नजरों से संजय की और देखा सुबह के सात बज रहे थे । उस वक्त हो सकता है इस मेरे बदन में हल्की झंझरी दौड पडी । भारी कदमों से दरवाजे की और बडा दरवाजे पर लगभग मेरी उम्र की एक लडकी खडी थी मुझे देखती उसकी आंखों में चमक आ गयी । कैसे है आप? उसने पूछा मैं ठीक हूँ और आप की जी मैंने आपको शायद पहचाना नहीं आप अपराध है ना अच्छी मैं नहीं तू संजय की दोस्त लखनऊ से आई हूँ । वो मैंने दरवाजा खोल दिया मगर मेरी नजर उसके चेहरे पर जाकर अटक गई । मोहम्मद और वफाकी देवी एका एक सामने आ जाए तो कोई भी अभिभूत हो जाएगा । संजय की डायरी पढने के बाद मैं पूरी तरह सहमत था की उसमें नीतू को जितनी जगह मिलनी चाहिए भी शायद नहीं मिली । किसी के लिए अपनी जिंदगी को बेरंग बना देने वाले कितने लोग मिलेंगे । इस दुनिया में नीतू में से एक थी । उसने गली के दोनों और करीब मेरी निगाहों से देखा फिर भी जरा गई । धीरे से बोली थी संजय कैसे हैं? वो ठीक है । सामने वाले कमरे में ही है । जगह मिल नहीं नहीं । राज को झटके में कदम पीछे हट गई । उसकी आंखों में पानी उतार आया । बोली इस हाल में उससे मिलने की हिम्मत नहीं है । मुझे उसे इस मुश्किल से निकलने दीजिए । फिर नहीं होगी । उससे हंसने की कोशिश की मगर फोटो ने साथ नहीं दिया । मेरी और एक लिफाफा बढाते हुए बोली उसकी जमानत के कागजात उसे कहीं आएगा की अब उसे पुलिस से डरने की जरूरत नहीं है । मैंने कांपते हाथों से लिफाफा थाम लिया । मेरी नजर उसके चेहरे से हटी नहीं, मैं चलती हूँ । उसने कहा और पलट पडी नीतु मैंने अवस्थी वो ठहर गई । मैंने संजय की डायरी पडी है । आपसे सदोष नसीब वालों को ही मिलते हैं । नसीब वाली उसने पलटकर मेरी और देखा । उसके आंखों में दर्द ही दर्द था । ना उससे कुछ कह पाता, उससे पहले वहाँ से निकल गई । अब यू यहाँ खडे क्यों है? ऐसा जाना पहचाना स्वर मेरे कानों को छोडा । मैंने पालक पर पीछे देखा मेरे सामने शिवी खडी थी जो अभी अभी बाथरूम से नहाकर निकली थी । हमारी निगाहें टकराई तो मुस्कुरा बडी कौन आया था? उसने पूछा हैं मैं उसे क्या बताता हूँ? मैंने लिफाफे को हवा में लहराते हुए कहा । कोई संजय की जमानत के काम साथ लेकर आया था ।

मेरी अर्धांगनी उसकी प्रेमिका - 72

संजय यहाँ नहीं तू आई थी । सुबह का नाश्ता करने के बाद मैंने से बताया । उसने मेरी बात सुनी तो उसकी आंखों में आकाशवाणी चमक आ गई । जी, उसका यकीन ही था तो उसे शायद उससे किसी अच्छे समाचार की उम्मीद थी । कहाँ है वो? उसने पूछा चली गई चली गई । उसने हाॅट देखा । बिना मुझसे मिले मैंने से रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन वो कि नहीं । वही किस लिए थे । तुम्हारी जमानत के कागजात के कराई थी क्या कुछ पडा है? लेकिन मैंने तो इस घटना के बारे में बताया भी नहीं । संजय मैं उसके हाथों को थामते हुए कहा । सहायता मांगने पर सहायता देने वाले इस दुनिया में तमाम मिल जाते हैं । मगर नहीं तू जैसे लोग करोडों में एक्का दुक्का ही मिलते हैं । काम सही कह रहे हो और आज उसने मेरी हथेली पर दबाव देते हुए कहा काश काश में नहीं तो को पहले ही उससे अपने होते ही चाहिए, कोई नहीं । किस्मत में शायद यही था । फीफा खोलते हुए मैंने कहा ऍम फोन की घंटी बजती है । ऍम करते हुए मैंने कहा राज्य में नहीं तो बोल रही हूँ । उधर से आवाज आई क्या संजय से बात करा सकते हैं बिल्कुल । मैंने संजय को फोन थमा दिया । अलोक कहता हुआ संजय बॉल करने की और चला गया ऍम उसके आंखों में चौथी उसका मुझे बताया कि तू कह रही थी अभी उसके पास उसके वकील का फोन आया था । उस ने कहा है कि मुझे आज ही लखनऊ लौटना होगा । वोट नहीं, सशर्त जमानत दी है । उस ने कहा है कि जब तक मामले पर कोई फैसला नहीं आता तब तक आरोपी को लखनऊ के बाहर नहीं होना चाहिए । तू कहाँ है वही? मैंने पूछा पता नहीं । उसने कहा है कि मैं चिंता ना करो, वो जल्द ही मामले को निपटा लेंगे । इस समय वो कुछ जरूरी सबूतों को जुटाने में लगी हुई है । तो अच्छी बात है समझे अगर की आज तुम सच में जाना चाहती हूँ नहीं मगर चाहे तो पडेगा समझे मैं थोडी देर तक उसके और देखता रहा । फिर गंभीर होते हुए कहा मामला शायद इतना आसान नहीं है जितना कि हम समझ रहे हैं । क्या तुम शाम तक रुक सकते हो तो मैं भी तुम्हारे साथ लखनऊ चलना चाहता हूँ । अगर इस वक्त मुझे कंपनी जाना होगा, कुछ जरूरी काम है तो मेरी और देखने लगा । थोडी देर चुप रहने के बाद बोला । नीतू ने कहा है कि जल्दी से जल्दी मुझे लखनऊ पहुंच जाना चाहिए । वरना इकबाल अंसारी शातिर दिमाग का इंसान है । वो मेरी अनुपस्थिति का फायदा उठा सकता है । कोई बात नहीं । फिर तो अभी निकला है, बाद में आ जाऊंगा । ठीक है । उसने कहा और झुककर बिस्तर पर रखे हुए अपने बैग को टटोलने लगा । तभी अचानक उसे कुछ याद आया । उम्मीद और बडा राज्य । क्या तुम खुशबू के पास एक रात ठहर सकते हो? क्यों ऍफ गई पता नहीं होगी क्या कहने वाला है ऍम नीतू ने कहा है कि अगर राज एक रात वहाँ ठहर ले तो काफी ऐसे सबूत इकट्ठा कर सकते हैं जिससे कोर्ट में हमें मदद मिल सकती है । वो मेरी अटकी सांसे चलना फिर से शुरू कर दी । हालांकि पूर्व में खुशबू के घर में गुजारी गई रात और फिर घटी उस घटना को छुपाने का मेरा कोई इरादा नहीं था । दरअसल मुझे ऐसे मौके की तरह थी जब मैं शिविर और संजय से उस घटना का जिक्र कर पाता । मैंने खुशबू के पास दोबारा जाने से इंकार कर दिया । संजय ने हालांकि कारण जानने की कोशिश नहीं की मगर मैंने खुद ही उस रात की पूरी घटना को उसके सामने रख दिया । उस वक्त भी नहीं थी जिसे मैंने पानी लाने के बहाने बुला लिया था । ऐसा नहीं है कि मुझे उसके अंजाम की भी खबर नहीं थी । मगर मैं उस बोझ के साथ और नहीं जीना चाहता था । उस घटना को बयान करने के दौरान मेरी निगाहें कई बार शिवी के चेहरे को छोटी रही । पल पल उसके चेहरे के बदलते भाव मुझे बता रहे थे कि वो उस घटना को निकल नहीं पा रही है । उस दौरान संजय के चेहरे में कोई हलचल नहीं थी । वो खामोश सुनता रहा । अच्छा मैं चलता हूँ । संजय का एक उपकर खडा हो गया । उसके स्वर में पहले की तुलना में अधिक रूखापन था । क्या हुआ मैंने चौंककर देखा उसकी आप । तुम कुछ देर बाद जाने वाले थे महाराज, लेकिन मुझे लगता है कि अब चलना चाहिए । मैं उठाते हुए उसने कहा मैं उसे रोक नहीं सका । मैंने शिविर और देखकर बोला भी कभी कुछ कहो संजय से मुझे भी लगता है उन्हें जाना चाहिए । शिवजी ने कहा और तेजी से कमरे से निकल गई । मैं किसी और से कुछ नहीं किया । पहुंॅच के की अपना मोबाइल ऑन रखना । लखनऊ के लिए मैं शाम की गाडी पकड लूंगा । ठीक है चलो मैंने कहा और घर से निकल गया । उसने मुझे पहली बार ऐसा हुआ कि रिश्ते इतने आसान नहीं होते । ये तो अक्सर हम समझ बैठते हैं । वहाँ और ईमानदारी का महल बढाने के लिए की । जरूरी नहीं है कि जानबूझ कर ही गलती की जाए । अनचाहे में हुआ हादसा भी रिश्तों को तार तार कर सकता है ।

मेरी अर्धांगनी उसकी प्रेमिका - 73

शाम को जब ऑफिस से लौटकर शिवी के होटों को छुआ तो उसमें कोई शहर नहीं हुई । अक्सर ऐसे मौकों पर कुछ शर्म से लाल हो जाया करती थी । चाय का कप थमाते हुए उसने पूछा उसके शोर में रूखापन छाया रहा था । मैंने कहा हाँ कर दो तो अंदर जाने के लिए पलटी । मैंने पुकारा । इससे पहले मैंने उसे कभी ऐसे नहीं देखा । उसके आंखों में पानी की बूंदे उतर आएगी । वो ठहर गई । रोहांसी आवाज में मैंने कहा वो एक अच्छा था । मैंने अपनी तरफ से कुछ नहीं किया । सुबह लगभग पांच बजे में लखनऊ पहुंच गया । स्टेशन से मैं जैसे ही निकला लगभग आठ नौ साल का एक लडका जो मैली कुछ ही वेशभूषा में खडा था उसने मुझे आवाज नहीं था अखबार खरीद लीजिए । नहीं मैंने मना कर दिया और ले लीजिए साहब नहीं भाई, मुझे नहीं चाहिए बस दो रुपये का है समझा । वहाँ से मुझे परेशान मत करो । मैनेजर डाट कर रहा हूँ । वो सहन गया । चंद दिनों तक वो इधर उधर देखता रहा । घर लौटने के लिए पढता । उससे पहले मैंने प्यार से कहा अच्छा हूँ अखबार खरीदी गया । अचानक उसके रूखे चेहरे में चमक आ गई । मुसकराकर हमें सरेला साहब उससे भी ले लीजिए । एक है कि दूसरा लडका आकर मेरे सामने खडा हो गया । मुझे हंसी आ गई । दोनों के हाथ मेरी और खर्चे जा रहे थे । आशा निराशा के दोनों में जूझते उनके चेहरों को मैंने गौर से देखा । रोटी की भूख में हजारों किताबों की प्रेरणा, पूरे सामान्य का दुख और सारे संसार का सुख नहित होता है । मैंने दोनों अखबारों को थाम लिया था । जेब से निकालकर मैंने जैसे ही दोनों के सिक्के उनकी हथेलियों में रखे तो उनके चेहरों में जमाने भर की मुस्कराहट बिखर गई । मैं उन्हें दूर तक साथ जाते हुए देखता रहा । मुझे लगा अगर ऊपर वाले ने बेटी का बाहर न दिया होता । इंसान का जीवन कितना नीरस हो गया होता । थोडी दूर पर ही भैया की कार्य मेरा इंतजार कर रही थी । कुछ घंटों में मैं ही भैया के घर पहुंच गया ।

मेरी अर्धांगनी उसकी प्रेमिका - 74

अखबार को सोफे के सामने लगी मेज पर फेंक कर मैं बातों में घुस गया । जब राहत होकर बाहर निकला सोफे के सामने रखी मेज पर चाहे मेरा इंतजार कर रही थी, क्या बात है राज्य बिना किसी फोन या सूचना की एक का एक यहाँ आना पडा सब कुछ ठीक ठाक है ना? भावी कमरे में दाखिल होते हुए बोली अभी कुछ जरूरी काम था इसलिए चलाया भी हो रहा है क्या? दरअसल बॉबी मेरा दो साल का भतीजा था । नटखट मैं जब जब भी वहाँ जाया करता, उसके साथ रूम क्रिकेट खेलना नहीं बोलता हूँ । बोलता भी कैसे अपनी दूसरी शताब्दियों से जैसे ही फिर सपने होता, किसी कोने में पडे अपने बल्ले को लेकर आ जाता और गेंद थमाते हुए अपनी तो आपकी आवाज से संकेत करदाम तो मैं उसके लिए गेंद हैं को सीवी कैसी है? भाभी ने पूछा ठीक है मैं चाहकर अपने चेहरे का रूखापन नहीं छुडावाया भरे मुख्यमंत्री बोल रहे हूँ अभी हंस पडी सब ठीक ठाक तो है ना या फिर कोई तकरार हो गयी क्या भागेंगे आप भी हकीकत को छुपाने की कोशिश में मुझे जबर्दस्ती हटना पडा । अच्छा तुम चाहती हूँ तब तक मैं बना लेती हूँ । आॅल्टर किचन की ओर चली गई थी । अचानक मेरी निगाह अखबार पर बडी तो मैंने उसे उठा लिया । पहले ही पृष्ठ की पंक्ति पर नजर पडी तुम्हारी सौ से जहां की तहां थम गयी । संजय की जमानत खारिज हो चुकी थी और पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया था । नीचे ठूठी धुंधली सी संजय की तस्वीर भी छपी हुई थी । हो सकता है मैं परेशान हो गया हूँ । मैं तेजी से उठकर अपने मोबाइल की और बडा तभी अचानक दूर ही चलना बडी राज थोडा देखोगे क्या कौन है दरवाजे पर? किचन से तेज स्वर में भावी ने कहा जी भावी मैं सीढियों उतरता हूँ दरवाजे की और बडा दरवाजा खोला तो सामने नहीं तू खडी थी । अरे आप मैंने चौंकते हुए कहा अभी मैं आपको फोन करने वाला था । संजय की जमानत खारिज हो गई हैं । उसकी आंखों में कोई तूफान था जिससे वो सामने की कोशिश करते हुए बोली मैंने अभी भी अखबार में बडा जांच संजय ठीक नहीं है । उसे बचा लीजिए उसकी आंखें एका एक झड जाना पडेगा । मुझे लगता है कि आपको अपने भैया से मदद मांगी चाहिए । पुलिस उनकी बात सुनी जी महीने तो वहीं इस मुद्दे पर हमारी कोई मदद नहीं कर सकते क्यूँ क्योंकि केस अदालत के पास है और हमें फिलहाल किसी अच्छे वकील की जरूरत है । एक बाल अंसारी के कहने पर खुशबू ने पुलिस को पैसे दे दिए हैं ताकि वो लोग संजय के साथ बुरा सलूक करें । पुलिस को हार आज पुलिस संजय को बडी बर्बरता से बीट रही है । मुझे डर है कि उनकी मार्को संजीव बहुत देर तक बर्दाश्त नहीं कर पाएगा । वो मैं पल भर के लिए जैसे सोचना ही भूल गया हूँ । मेरे नजरिए नीतु के चेहरे पर अटक कर रह गई तो कुछ देर तक कहीं जा रही थी लेकिन मैं कुछ सुन नहीं पा रहा था । जांच अब सुन रहे है ना उसने मुझे झकझोरा । मुझे होश आया तो मैं बगैर कुछ बोले तीव्रतर से सीढियों की और भागा भागी । किसी से फोन पर बातें कर रही थी तो मुझ पर निगाह पडी तो बोली आज शिव जी का फोन है, तुम से बात करना चाहती है । मैं बाद में बात करूंगा । भागेंगे अभी मुझे किसी जरूरी काम से बाहर जाना है । कहाँ घबराकर उन्होंने मेरी और देखा मुझे पता नहीं है लेकिन जाना पडेगा फोन पर मैं अपनी खबर देता रहूंगा । शर्ट पहनते हुए मैंने कहा राज्य कहाँ जा रही हूँ । एक और भैया बात हमसे निकल पडे बाल भर के लिए मैं सहन गया । फिर खुद को संभालते हुए कहा भैया, दोस्त क्या जा रहा हूँ? बाहर आया तो नहीं तो अपनी कार की ड्राइविंग सीट पर बैठी मेरा इंतजार कर रही थी । बगल की सीट पर बैठ गया । कार सडक पर दौड बढेंगे । कई मोड और सडकों को पार करते हुए अच्छा ना मुझे जोर का झटका लगा । कार खडी हो गई । नहीं तूने मेरी और देखा हूँ । पुलिस स्टेशन उसके होट लहराएंगे, यहाँ यहाँ क्या करेंगे? हम ऍफ सवाल किया । संजय यहीं है । बाहर से उतरते हुए वो बोली वो मैंने नहीं होगी और देखा और फिर पुलिस स्टेशन की सीढियाँ चढते हुए उस लॉकप रूम के सामने खडे हो गए । इसकी मोटी दीवारों से घिरी चित्तौडी फर्श पर बेसुध और लहूलुहान संजय पडा था । एकबारगी उसपर निभा पढते ही मेरा मन था । एक इंसान के साथ किसी जानवर से बदतर सलूक किया गया था । मैंने छिपे निगाहों से नीतू की और देखा उस संजय को उस हालत को देख नहीं पाई और खून कर खडी हो गई । उसके वोटों से तभी हुई उसकी निकल पडी । इसमें मेरी पीडा को और भी बढा दिया । मैं खुशबू के बारे में सोच रहा था कि इस तरह बेरहमी से संजय को मरवाने के लिए पैसे देने वाली क्या खुद इस हालत में संजय को देख पाएगी? क्या फिर उसका पत्थरदिल तब भी नहीं निकलेगा? संजय मैंने आवाज भी मगर उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी । संजय मैंने पूछा आवाज भी तब भी उसमें कोई दिक्कत नहीं थी । संजय एक का एक में चिल्हाड पडा । इस बार संजय की शरीर में कुछ हरकत हुई । उसके आपने फर्स्ट से जब के चेहरे को उठाकर हमारी और देखा उस की सूजी हुई आंखें ठीक से खुल भी नहीं पा रही थी । नीतू की निगाहें जैसे ही उसके घायल चेहरे पर पडी तीव्रता से पलटते हुए दीवाल से छुट गई । अपने होठों पर उसमें रोमांस ढूंढ लिया था की उस की सुर्खियां मु के भीतर ही दफन हो जाए । संजय मैं तो उस क्या हो गया? संजय क्यूँ चले आए थे तो दिल्ली से मैं सलाखों की छडों को हिलाने की कोशिश करते हुए बोला काश काश मैं तो वही रोक लेता हूँ । आपको मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए किसी ने पूछा पीछे पलट कर देखा मेरे पीछे बडी बडी मूंछों वाला एक वर्दीधारी इंसान फटी फटी ने गांवों से मुझे देख रहा था मेरा नाम राज है । मैंने पूरा दब के साथ जवाब दिया और मैं दिल्ली से आया हूँ । ये ऍम इंसान तुम्हारा कौन लगता है तो उसका मिला । मैंने बिना डरे हुए से जवाब दिया तुम पर लानत है इतना गिरा हुआ इंसान तो भारत दोस्त है तो ऍम तो मैं इसका गुना भी नहीं मालूम । वो जोर से हंस पडा । जानते हो । अचानक गंभीर होते हुए बोला इसमें अपनी चार साल की मासूम लडकी को अपने ही हाथों से गला दबाकर मार दिया । वो भी सिर्फ इसलिए तलाक के बाद । अदालत ने उसे उसकी माँ को सौंप दिया था । वो लोग यकीन करोगे तुम बढिया को कैसे पता? इसका खून इसी ने किया है । इसने खुद कबूल किया है । उसकी रिकॉर्डिंग है । हमारे पास कबूलनामे की रिकॉर्डिंग पीठ कर भी तो करवाई जा सकती है । मैंने उसकी आंखों में आंखें डालते हुए कहा जैसे आपको पता है कि कोर्ट में आपके इस तथाकथित कबूलनामे को सबूत के तौर पर नहीं पेश किया जा सकता है । आप गलत आरोप लगा रहे हैं । पुलिस बार पुलिस किसी को ऐसे ही क्यों पडेगी । हो सकता है उसके लिए किसी ने पैसे लिए हूँ की क्या क्या सकते हैं । आप आप देना वजह मुझ पर इल्जाम लगा रहे हैं । समझे मैंने संजय की और एक बार फिर देखा ये मानने के लिए की पंखुडी का कभी संजय नहीं किया है । आप के पास कोई ठोस वजह है? आपको पता है ना कि आप एक पुलिस ऑफिसर से बे वजह बहस कर रहे हैं । जानता हूँ मेरी पीडा कुंठा का रूप ले चुकी थी । लेकिन आपने बताया नहीं । इसके लिए आपको कितने रुपए दिए गए थे? दस तीस हजार पचास लाख लाख वो इस तक मेरी और देखने लगा । मैं जानता था के अंदर ही अंदर उबल रहा होगा । मैंने उसकी कोई परवाह नहीं करूंगा । साहब एक एक मेरा स्वर भारी हो गया । रियात पैसे लेकर किसी को सजा देते हैं । मैं काम करिए जिसमें आपको संजय को टॉर्चर करने के लिए पैसे दिए थे । उसे टॉर्चर करने के लिए मैं आपको उसका पांच गुना पैसे दूंगा । बोलिए, आप संजय की जगह से टॉर्चर कर सकते हैं । आप आप आप मुझे खरीदने की कोशिश कर रहे हैं, वो वो हटना पडा । देखा हुआ इंसान और कितना दिखेगा? आप बस इतना बताइए कि सौदा मंजूर है । आपको उम्मीद और एक तक देखने लगा । मैंने जेब से अपना विजिटिंग कार्ड निकाला और उसे हम आते हुए बोला मैं फोन का इंतजार करूंगा । पुलिस स्टेशन से लौटते वक्त नीतू बिल्कुल खामोश कार के हैंडल घुमाती हुई भरी भरी आंखों से बस सडको देखती रही । मैं उसके दिमाग में चल रहे दोनों से अच्छी तरह वाकिफ था । वासु को रोकने की कोशिश में बार बार अपने होठों को दांतो तले दबा लेती । भैया के घर के सामने कार रोकी तो मेरी और देखने लगी । क्या आज आपको क्या लगता है? उसमें पूछा आपके पास दरोगा का फोन आएगा? पता नहीं । मैंने वोट भेजते हुए कहा अगर आपको लगता है कि संजय के लिए मेरी कहीं जरूरत पड सकती हैं तो जरूर बताइएगा । उसके लिए मैं कुछ भी कर सकती हूँ । जी ठीक है कहते हुए नकार से उतर गया । घर पहुंचा तो शिविर फोन मेरा इंतजार कर रहा था । मेरी राज कुमार गए भी नहीं रहा । लोग शिव जी से बात करूँ कह रही है । उसने तो मैं कई बार फोन लगाया तो मैं उठाया ही नहीं । अभी कुछ बात ही ऐसी थी । वक्त नहीं मिला । मैंने फोन थाम लिया । टीवी मेरी आवाज सुनते ही एक एक रो पडी । शिविर मैंने पुकारा । फिर वो कुछ देर तक कुछ कहती रही और मैं सुनता रहा

मेरी अर्धांगनी उसकी प्रेमिका - 75

लगभग शाम ढलते ढलते मैं कपडे पहनकर जैसे ही सीढियों से उतरने लगा, बॉबी की नजर मुझ पर पड गई और होने लगा । मैं जल्दी में था, रुका नहीं । मेरी कार सीधे खुशबू के खूबसूरत मकान के सामने जाकर खडी हो गई । मैंने अपने शर्ट पर छिपे हुए कैमरे को एक बार फिर से चेक किया और डोर बेल की बटन दबा दिया । संजय की लहुलुहान तस्वीर मेरी आंखों में अब भी घूम रही थी, जिसे मैंने अपने मोबाइल में क्लिक कर लिया था । मुझे यकीन था उस तस्वीर को देखने के बाद खुशबू अपना इरादा बदल देंगे । उस की बीवी है जो इतनी भी क्रूर नहीं हो सकते हैं । जी आप दुबली पतली सी लडकी देखा एक दरवाजे पर आकर खडी हो गई । घर पर मैडम है आपकी मुझे मिलना है हम से । मैंने पूछा जी मुझे बडी उनके साथ उनकी एक सही नहीं है तो अभी मैं लौट जाऊँ । नहीं नहीं मेरा वो मतलब नहीं था । आप अंदर आइए । मैं उसके पीछे पीछे गैस रूम तक पहुंच गया । उसने पलट कर देगी और देखा और लगाकर बोली अब यही बैठी है मैडम को बुलाकर लाती हूँ । ठीक है । मैंने कहा और वहीं सोफे पर बैठ गया । पिछले चार पांच दिनों में वहाँ कुछ नहीं बदला था । वहीं पेंटिंग्स वहीं खूबसूरत सजावट बस उस घर का मालिक बदल चुका था । मैं देर तक दीवारों को तख्ता रहा मैं आपको ऊपर बेडरूम में बुलाया है । उस लडकी ने मुस्कुराकर कहा लेकिन इस बार में दारा नहीं मैं उठकर खडा हुआ और तेजी से सीढियों की अलग का । अभी मैं दूसरी सीढी पर पाव रहा ही डाल एका एक नीतू मेरे सामने आ गयी । पल भर ठहर कर भरी भरी आंखों से उसने मेरी और देखा और फिर तेजी से वहाँ से निकल गई । यहां किस लिए आई थी ठहरकर मैंने सोचा । मगर धीरे तक इस बेवजह सवाल पर मैंने खुद को भटकने नहीं दिया । आइए आज दरवाजे पर मेरी आहत होते ही अंदर से आवाज आई । वो खनकदार आवाज खुशबू की थी जैसे वो मेरा ही इंतजार कर रही थी । मैं भीतर चला गया बैठे । उसने मुस्कुराकर भी और देखा और बोली मुझे लगा दोबारा कभी आपके दर्शन नहीं होंगे आपको सही लगाना अगर क्या करेंगे दोस्त की जिंदगी का सवाल है इसलिए आना पडा मेरे शब्दों में कुछ गुस्सा और कुछ लाचारी मैं जानती हो रहा है कि आप अपने दोस्त की वकालत करने यहाँ आए हैं लेकिन हमें देखिए ये सब जानकर भी हमने आपके साथ कोई बदसलूकी नहीं की । खुशबू जी अगर इरादा है तो दिल पर मत रखिए, वो भी कर लीजिए । मेरे गुस्से भरी लाचारी को समझना मुश्किल नहीं था । खुशबू ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी । हस कर बोली आप तो बुरा मान गए मिस्टर राज । फिर बताइए मैं आप की किसतरह सहायता कर सकती हूँ । मैंने जवाब में कुछ नहीं कहा । जेब से अपना मोबाइल निकाला और संजय की पुलिस स्टेशन के अंदर की लहूलुहान तस्वीर निकालकर उसके सामने रखनी । खुशबू की नजर देर तक उस तस्वीर पर नहीं ठहरी । उसने सरसरी निघासन से देखा और फिर नजर उठाकर देरी और घुटने लगी । उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं पढते हैं और हस्कर बोली ये सब आप मुझे क्यों दिखा रहे हैं । इसलिए कि शायद आपके अंदर बच्ची थोडी बहुत इंसानियत चार जाए इंसान है एक का एक उसका चेहरा सुख पड गया । इन्सानियत की बात आप मुझसे कर रहे मिस्टर आज मुझे नहीं पता हूँ की आपके बच्चे हैं कि नहीं । मगर इतना यकीन है की अगर आप भी अपनी बच्ची की लाश उस हालत में देखते हैं तो वहीं करते जो आज मैं कर रही हूँ, जी जरूर यही करता है । मगर कातिल के साथ किसी निर्दोष के साथ नहीं और आपको ये कैसे बताऊँ कि वह कातिल नहीं है वैसे ही जैसे आपको यकीन है कि वही कातिल है । मिस्टर जांच वो अलमारी देख रही हूँ । बैठ से थोडी दूर पर रखी अलमारी की ओर इशारा करते हुए वो बोली मुझे जब इस हादसे की खबर में ही और ऑफिस छोडकर में यहाँ आई तो मेरी बेटी की लाश मुझे ठीक इस अलमारी के पास पडी मिली थी और उस समय ये पूरा घर लोगों से खचाखच भरा हुआ था । अचानक उसकी आंखें भर आई । रोहांसी आवास में बोले अब यकीन नहीं करेंगे । हर किसी के ऊपर एक ही नाम था और वो नाम था संजय पाठक । देखिए, मैं आपकी बात से सहमत हो सकता हूँ । मैंने अपना मोबाइल जेब में डालते हुए कहा, यकीन मानिए की जनता हमेशा वही देखती है जो हम उसे दिखाना चाहते हैं । इसलिए लोगों पर आंख बंद करके भरोसा करना बिल्कुल उचित नहीं है । तो किस पर भरोसा करो? मिस्टर आज आप उसमें मेरी और घूरकर देखा जबकि मैं जानती हूँ अब संजय की दोस्त है जिसे मेरे दर्द से कोई लेना देना नहीं है । ऐसा नहीं है । खुशबू जी अगर आप गलत समझ रही हैं । मैं आपके दर्द को समझता हूँ । पक रहा अभी तो संजय के दर्द को समझे । अरे उसने तो बेटी को होता है तो आप हम दोनों के दर्द की तुलना कर रहे हैं । उसकी आंखों में अचानक पानी की कुछ बूंदे बिस्तर पर टपक पडेंगे । अपनी आंखों को मलते हुए बोले, या आज मेरे दर्द को समझना है तो समुद्र से कूद चाहिए और अपने दोनों हाथों से ठंडे पानी को समिति है । जितना आप समेत पाएगा वो दर्द आपके दोस्त का बाकी सब मेरा है । देखिए आप मेरी बातों का गलत मतलब निकाल रही है । मैं गलत मतलब नहीं निकाल रही हूँ । राज बल्कि आप लोग मेरा कहते कहते इकाई को रुक गई । अपने होठों को उंगलियों से दबाते हुए बोली अभी जब आप नीचे बैठे थे ठीक उसी वक्त एक लडकी भी यहाँ आई थी और यही सब कुछ कह रही थी जो आप अब कह रहे हैं । मैं समझ नहीं पा रही हूँ कि पूरी दुनिया को सिर्फ संजय का दर्द दिखता है और मेरा वॅाक पडी मेरा अमित राज कौन थी वो लडकी आप नहीं चाहिए उसे वो हैरान होते हुए मेरी और देखी । मुझे लगा आपको पता होगा पंजाब का इतना अच्छा दोस्त जो है । उसे अपनी दूसरी बीवी के बारे में आपको जरूर बताना चाहिए था वो भी नहीं । मेरा मतलब खेल खेल का मतलब तो समझते होंगे ना । उस से उसका चेहरा लाल पड गया जानता हूँ मैंने नफरत उसकी और देखा रुककर खडा हो गया । अच्छा मैं चलता हूँ क्या इतनी जल्दी भी उठकर खडी हो गयी । उसका गुस्सा अचानक कहीं गायब हो गया । वहाँ से आवाज में बोली जानते हैं राज मैं आपकी बहुत इज्जत करती हूँ और आप की बात ना मानकर मुझे सच में अच्छा नहीं लग रहा है । मगर मैं क्या करूँ? उसने अपनी दोनों हथेलियों से अपना सर पका लिया । बोली संजना कभी अच्छा पति बन पाया न जब पिता इसलिए मुझे लगता है आज वो जहाँ भी है उसके लिए वही जगह सही है मुझे मैं चलते चलते ठहर गया । उसकी आंखों में देखते हुए मैंने कहा अगर मैं पिछले बार की घटना को भूल जाऊँ तो मुझे ये सुनकर सचमुच अच्छा लगा कि आप मेरी इज्जत करती हैं । मगर एक बात और समझे आप इस बात पर जरूर बहस कर सकती हैं कि वो अच्छा पति था या नहीं । मगर इस बात में कोई दो मत नहीं है कि वो एक अच्छा पिता है । और ये आप कैसे कह सकते हैं । जब की मैं जानती हूँ वह कई बार पंखुडी के साथ कठोरता से पेश आ चुका है । अब आपके सवाल का जवाब में आपको कैसे दो? बस एक बात जान लीजिए कि पिता की कठोरता को समझना उत्तर अनुसार नहीं है । जितनी आसानी से अक्सर लोग माँ की ममता को समझ लेते हैं । लेकिन उस ने कुछ कहना चाहा मगर मैंने उसे बीच में रोकते हुए कहा, मैं और इस मुद्दे पर कोई बहस नहीं करना चाहता हूँ । मेहमान नवाजी के लिए आपका शुक्रिया । मुझे लगता है कि अब मुझे यहाँ से निकलना चाहिए और आपके हिसाब से वो कत्ल किसने किया है? दरवाजे की और पलट पाता उससे पहले उसने रैपिड फायर क्या आपके होने वाले शौहर इकबाल अंसारी मैंने ठहरकर कहा क्या चौक पडी मेरी और बढते हुए बोली जांच होश में तो जी क्या कह रहे हो? आप इस बात को साबित कर सकते हैं, अभी तो नहीं । मगर हाँ यकीन मानिए इस बात को साबित करने के लिए किसी भी हद तक जाऊंगा तो मैं जानता हूँ मेरा दोस्त हाँ बिल्कुल नहीं है । मैंने कहा और फिर वहाँ से तेजी से निकल गया

मेरी अर्धांगनी उसकी प्रेमिका - 76

लगभग बारह तेरह दिन बाद में लखनऊ से दिल्ली के लिए लौटा । मेरी कार सडक का चक्कर काटती हुई, एकाएक एक सक्रिय गाली की और मोडी और चंद मीटर की दूरी पार करते ही मेरे घर के पार्किंग में जाकर खडी हो गई । मुझे यकीन था शिविर दरवाजे पर मेरे इंतजार कर रही हो गई लेकिन मेरे सर पर कोई बोझ था । मेरी कदम इतने भारी हो गए थे उसकी मैं आगे नहीं बढ पा रहा था । दरवाजे पर पहुंचने से पहले मैंने अपनी आंखों की नमी को साफ किया, लंबी सांसे खींची और फिर डगमगाते कदमों से दरवाजे की और बढ गया । दरवाजे के करीब पहुंचा तो मैं चौंक पडा । दरवाजा खुला हुआ था । अगर शिवजी वहाँ नहीं थी । मैंने अपनी निगाहें इधर उधर दौडाई । सांसें अटक कर रह गई भी । वहाँ से थोडी दूर बरामदे में खडी एक तक मेरी और देखे जा रही थी । उसकी आंखों में न तो मेरे आने की कुछ चमक थी और नई होठों पर मुस्कुराहट । मैं लखनऊ से हारकर लौटा था इसलिए उस वक्त मुझे उसका वो व्यवहार अच्छा नहीं लगा । मैं उसे अनदेखा करते हुए जैसी उसे पार करना चाहा ईकाई जोर से रो पडी । ऍम वहीं के वहीं ठहर गए । मुझे लगा कि शायद किसी ने उसे लखनऊ की सारी कहानी के बारे में पहले ही बता दिया है । मैंने उसकी और पलटते हुए घबराकर बोला भी क्या हुआ, कुछ नहीं । उसने कहा और एक एक दौड कर किसी बच्चे की तरह मुझसे निपट गई । मैं मच्छरों तक माजरे को समझने की कोशिश करता रहा । मगर जब दिमाग में साथ नहीं दिया तो हैरान होते हुए पूछा भी तो रुक रही हूँ । मुझसे कोई गलती हो गई है क्या नहीं । उसने अपनी लाल लाल आंखों से मेरी और देखा । उसके गाल आंसूओं से भी गए तो मैं अगर यहाँ मर जाती तो भी मैं हैरान उठा तो क्या कह रही हूँ कितने दिन हो गए । आपने मुझे एक फोन भी नहीं किया तो उसने मुझे कसकर पकड लिया । सौ रही । अब जाकर मुझे मसला कुछ समझ में आया । मैं उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए कहा भी मैं करता भी क्या, हालत ही को जैसे बन गए थे कि मौका ही नहीं मिला । कुछ और सोचने का प्लीज माफ कर दूँ । यहाँ कोई का एक कुछ अलग हो गई । उसकी भरी भरी आंखों में चमक लौट आई । मुस्कुराकर बोली अब बच्चे माफी मांग रहे हैं । क्यों अब जानते हैं ना मैं आपको कितना प्यार करती हूँ । हाँ जानते हैं मगर मैंने भी मुस्कुरा दिया । हमने इतनी बडी गलती की है तो माफी तो मांगनी पडेगी । अब इतनी भी बडी गलती नहीं है । मेरे हाथ से अटैची थामते हुए उसने कहा हम थोडा आगे बढे की इकाई को ठहर गई । मेरी और देखते हुए बोली हाँ आपने बताया नहीं कि संजय भाईसाब कैसे हैं । उनकी जमानत हो गई ना । तुमने पूछा ही का आप वहाँ वो लगा गई । मैंने ही नहीं पूछा । वो जेल से आजाद हो गए था तो हमेशा के लिए आजाद हो गया । मेरे स्वर अचानक रुक गया । मेरे आंसू अनियंत्रित होते हैं । उससे पहले मैं तेज कदमों के साथ अपने कमरे की ओर बढ गया । यहाँ भी समझ गई कि कुछ ऐसा हो चुका है जिसके बारे में वो नहीं जानती । मेरे पीछे पीछे शिविर भी उसी रफ्तार से कमरे में घुस आई और मुझे पकडकर झकझोरते हुए बोली यहाँ क्या हो रही है? संजय भाई सब ठीक नहीं है । क्या आप मुझे क्या छुपा रही हूँ? मैंने कोई जवाब नहीं दिया । मेरी आंखें अनियंत्रित हो गई । मैं ऍम बिस्तर पर लेट रहा । आज मेरा दिल बैठा जा रहा है फिर भी एक बार फिर रो पडी बताइए ना क्या हुआ है? संजय भाई साहब को कुछ हो गया गया । उस पानी को क्या होगा? ऍसे अपना सर निकालते हुए अपनी भेजी हुई आंखों से शिविर की और देखा । उसके चेहरे का रंग उड चुका था । मैंने अपनी बात जारी रखते हुए कहा उसे किसी की फिक्र होती है क्या? वो पहले भी तो सब को छोडना ही आया है । पहले अपने पापा को उधर नीतू को प्रक्रिया को खुशबू को और अब अब मेरे ऊपर खुद को चादर की तरह बिछा दिया । फिर सर को अपनी और खींचते हुए बोली । वही नाराज अब उन्होंने किसी छोड दिया । शिविर मैं जोर से चिल्हाड बडा जहाँ राज्य क्यों? आपको अब ठीक है ना । मेरे बालों को सहलाने लगे । अच्छा सुनिए मुझे आप से भी कुछ नहीं जाना । आप फॅमिली लीजिए, मैं चाहे लेकर आती हूँ । फिर बाद में बात करते हैं । वोट कर खडी हो गई । कभी से निकलते हुए बोली मैं जा रही हूँ ऊंचाई बनाने । वो चली गई और मैं नहीं पत्थर खुद को समेटा । बिस्तर से उठा और बातों में घुस गया । उस दिन मैं धीर तक नहीं बता रहा । शिवजी ने मुझे एक बार भी आवाज नहीं दी । शाम को हमने खामोशी के साथ डिनर किया और बैडरूम चले गए । इस बीच भी शिवी ने इस बात का एक बार भी जिक्र नहीं किया । स्तर पर हम दोनों तीर तक एक दूसरे से चिपके हुये लेते रहे । दोनों की आंखों से नहीं कहीं गायब थीं भी । काफी देर बाद मैंने आवाज मेरी और देखने लगे । लोग सच्ची कहते हैं क्या पैसे और अब तो खोज सकते हैं जिस का कभी कोई अफेयर न रहा हूँ और ऐसी औरत खोजना बेहद मुश्किल है जिसका बस एक अफेयर रहा हूँ और खुश हूँ । उसका अच्छी तरह चाहता उदाहरण है उस दिन जब मैं दोबारा उसके घर गया । उसने जिस तरीके से संजय और नीतू के चरित्र पर छोटा कही कि उसने मुझे बहुत परेशान कर दिया । मैं राम तस्वीर की कोई औरत इतने भरोसे के साथ झूठ कैसे बोल सकती है? खुशबू के घर से लौटकर तो आ गया मगर मान इतना अशांत था की मैं अपने परिवार के साथ होकर भी उनके बीच नहीं था । मुझे याद है भैया मुझे देर तक देखते रहे मगर उन्होंने मुझे कुछ नहीं पूछा । जानती हूँ तो शायद उन्हें उम्मीद थी कि मैं खुद ही उन्हें सबकुछ बताऊंगा लेकिन मैंने कुछ नहीं बताया । मैं उन्हें परेशान नहीं करना चाहता था । खुशबू इकबाल ने जितनी चालाकी से उस अपराध में संजय को अपराधी बना दिया था । मुझे उम्मीद कम थी कि हम संजय को कोर्ट से छोडा पाएंगे । इसलिए इसलिए उसी शाम को मैंने इलाहाबाद जाने का फैसला किया । इलाहाबाद क्यों? धीरे धीरे से अच्छा मुझे लगा कि मैं खुशबू के परिवार से मिलूँ । शायद शायद उन्हें मेरी बात समझ में आ जाएगा और वो खुशबु का अपना केस वापस लेने के लिए मना नहीं । इसलिए मैं लखनऊ से उसी दिन शाम को इलाहाबाद के लिए निकल गया ।

मेरी अर्धांगनी उसकी प्रेमिका - 77

रात लगभग ग्यारह बजे तक मैं इलाहाबाद पहुंच गया । स्टेशन के बाहर एक होटल की गाडी मेरा इंतजार कर रही थी तो मुझे लेकर सीधा होटल पहुंच गई । मैंने कमरे पर पहुंच करना आया और फिर डिनर के लिए लॉबिंग आ गया । उसने मुझे पहली बार एहसास हुआ जीवन के कुछ रातें कितनी हम भी होती हैं । तब बिस्तर पर लेटे हुए सुबह होने का इंतजार कर रहा था । तभी एक मेरे होटल के फोन की घंटी बजती थी । मैंने सामने दीवार पर लगी घडी की और देखा । सुबह के सात बज रहे थे । मैंने फोन उठाकर हेलो कहा । आप राज बोल रहे हैं । उधर से आवाज आई जी बोल रहा हूँ । मैं बोल रहा हूँ समझे का दोस्त मैं कल शाम से आपको फोन लगा रहा हूँ लेकिन अब मोबाइल शायद अच्छा है हूँ । मैंने लगभग कर अपना मोबाइल उठाया । उॅची जताते हुए कहा सौरी मैंने ध्यान नहीं दिया । कोई काम था आपको मुझसे फॅमिली तूने कल शाम मुझे फोन किया था कि आप खुशबू के मम्मी पापा से मिलने वाले हैं । जहाँ दरअसल वो लोग इलाहाबाद में नहीं है क्या बच्चों पडा कहाँ है वो लोग? इस समय के बाबा की छुट्टियाँ चल रही है इसलिए वो गांव गए हुए हैं तो अब मैं क्या करूँ? आप तैयार हो जाइए । मैं आ रहा हूँ आपको होटल से पिक कर लेता हूँ और उसके बाद हम दोनों उनके गांव के लिए निकलेंगे । उनका काम यही कोई दो ढाई घंटे की दूरी पर है । सारी आपने अपना क्या नाम बताया था । मैंने उस वक्त ध्यान नहीं दिया । फॅमिली सारे मुश्किल हाल कर दी और मैं ये खबर सुनकर तो मेरे पैर के नीचे से जमीन ही खिसक गई थी । नहीं राज, आपको थैंक्यू बोलने की जरूरत नहीं है । आप शायद मेरा नाम पहली बार सुन रहे हैं । मगर मैं आपको अच्छे से जानता हूँ । संजय आपकी अक्सर बात किया करता था । अच्छा जी दरअसल वो मेरा पडोसी था और दोस्त नहीं हम दोनों । यही अल्लापुर में पास पासी रहते थे । आप के बारे में जानकर अच्छा लगा । किशन अपने लिए वहाँ से मैं तैयार होता हूँ । मैंने फोन रख दिया । सुबह के लगभग साढे दस बज रहा होगा । हम किसन की मोटर साइकिल से उस गांव तक पहुंच गए । गांव से लगे हुए एक छोटे से बागीचे में खेल रहे बच्चों से मैंने पूछा और गिरीशचन्द्र जी का घर कहाँ है? गिरीशचन्द्र खुशबू के पिता जी का नाम था । हम उनके बताए रास्ते से जल्दी ही उस घर के सामने पहुंच गए । मिट्टी से बने उस घर के सामने काफी जगह थी । दाहिनी और एक नीम का बडा सा पेड था जिसके नीचे तीन चार बच्चे खेल रहे थे । अमरजीत बच्चा चिल्ला उठा अल्लू देश और धर्मा गांव से कौनो मनाई आवा है । मुझे उसके अंदाज पडोसी आ गई । कहते वक्त तो बच्चा जोर सोचना । हालांकि मुझे पता नहीं चल पाया की उन बच्चों में से कल्लू कौन है । फिर भी मैं उसके नाम से पुकारा । मेरे संबोधन पर एक तीन चार साल का नाटा सा बच्चा अपना सिर खुजलाते हुए मेरी और देखने लगा ऍम घर पर मैंने पूछा मेरी और अर्थपूर्ण नजरों से देखने लगा बोला कुछ नहीं बाबू घर में है तो हारे डिसन में हस्कर दोबारा पूछा जीत रहे हैं । अपने घर के दरवाजे की ओर इशारा करते हुए उसने कहा जाके बुला लूँ हाँ बुला लो । वो अंदर की ओर तेजी से भागा । मुश्किल से पंद्रह सेकंड बिना गुजरे होंगे कि वह उसी तीव्र गति से लौट भी बडा क्या हुआ मेरा बुलाया हूँ । मैंने पूछा मगर उसने मेरे बात पर बिना ध्यान दिए ही हसते खिलखिलाते हुए सीधे अपने दोस्तों के बीच फैसला हुआ ताली बजाते हुए कहने लगा ही हम माँ हमरे बाबू को भारत है हमरी अम्मा । हमरे बाबू को भारत है । मुझे उसकी नागवानी पर हंसी आ गई । मैं थोडी देर तक उसके और देख पा रहा हूँ । किसन की और देखते हुए मैंने कहा बच्चे भी कितने मासूम होते है ना दुनिया दारी की अच्छाई बुराई से कोई लेना देना नहीं होता । अब देखो ना अपने पापा की जब को सरेआम उछालते हुए भी उसे एहसास नहीं हो रहा कि वह घर क्या रहा है । नहीं कह रहे हैं आप । किसान ने कहा बॅाल इन्हें अपनी खुशियों से ही फुर्सत नहीं मिलती है । सब सोचने के पास अपने छोटे से संसार में मस्त रहते हैं । कुछ देर तक जब उधर से कोई नहीं निकला तो मैं खुद ही दरवाजे को खटखटाने के लिए आगे बढा । हालांकि आगे बढते हुए मैं सोच रहा था कि शायद मैं हालत दरवाजे को खटखटाने जा रहा हूँ क्योंकि मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि वो मासूम सा लडका कुछ का भाई हो सकता है । मगर मैं विकल्पहीन था । आगे बडा दरवाजे के पास पहुंचा तो और उसकी आवाज आ रही थी । शायद किसी पर चीख रही थी । मैंने दरवाजा खटखटाकर खुलने के इंतजार में खडा हो गया । लगभग दो तीन मिनट बाद एक दुबला पतला सा इंसान इस उम्र पचास से पचपन साल की रही होगी । बाहर निकला मुझ पर नजर पडते ही वह तीव्रता से आपने ऊलजलूल हो चुके शर्ट को ठीक करके अपने बिखरे वालों को चिपकाने की कोशिश करने लगा । उसके चेहरे के जुडे हुए रंग को देखकर मुझे हंसी आ गई जिसे मुश्किल से मैं पाया । मैंने खुद को गंभीर दिखाते हुए कहा काफी देर से मैं आपका इंतजार कर रहा हूँ । कुछ दिनों तक को एक तो मुझे ऐसे देखता रहा जैसे मैंने उसे रंगे हाथों चोरी करते हुए पकडा लिया हूँ । हो समझे तो हंसने की जबरदस्ती कोशिश करते हुए बोला हूँ कहा है कि खाना खाये लागे हवा दोनों काम था हम से ये क्वेश्चन रात ठिकाना में हम हमारे नाम है लेकिन हम आपको पहचान नहीं पावा । कुछ तो जानते हैं उसको कुछ देर तक वो सोचता रहा फिर कुछ याद आया तो खास पडा हो तो आपको शायद खुशबू बिटिया के घर जाए । चाहत हो उनके पापा भी हमारे नाम राशि है । चलिए चलिए मैं आपको वहाँ तक छोड आता हूँ । आजकल तो ये हैं छुट्टी में आया है नया मैं और किसान उसके पीछे पीछे चल पडेंगे साहब, आप बताएंगे अचानक पीछे मुडकर उसने मेरी और देखा था क्या है? खुशबु का तलाक हुई है आप लोगों का कुछ पता है? था नहीं, मैंने तो नहीं सुना । मैंने धीरे से कहा आप बात कर रहे हो । यहाँ तो पुरे गांव में चर्चा है । कहते कहते वो टीका खडा हो गया । सामने घर की ओर इशारा करते हुए बोला हो रहा गिरीश बाबू का घर मैं गौर से देखा था । उस घर के आस पास की खरोंच अगर तुलना की जाए तो वहाँ पर सबसे अच्छा घर वही था । पूरी तरह से बना हुआ और उसके आगे छोटा समाधान जिसके कोने पर चितकबरी गाय बनी हुई थी । मैंने किशन की और देखते हुए खुश कर बोला चलिए ये लडाई भी लड कर देखते हैं । कुल हम अभी घर के चबूतरे की सीढियां ही चल रहे थे कि एक डॅडी बडी मुझे शरीर पर बनियान और कमर पर तौलिया लपेटे हुए हमें देखा तो एक का एक अटक गया । लोग काउंट हैं । उसने पूछा जी जी से मिलना है होली क्या काम है अभी अंग्रेजी जी नहीं हूँ । उसने कहा तो मैं मारा गया । उसके बाद करने के अंदाज से लग रहा था कि वह सुनने में काम और बोलने में ज्यादा यकीन करता है । किसान की ओर इशारा करते हुए बोला, मुझे लग रहा है कि मैंने कहीं आपको देखा है । उसके बाद सुनी तो किसन मेरी और देखने लगा । उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो उस की बात का जवाब क्या गई । जबकि संजय की शादी में वो किसान ही था । इस पर शादी की सारी व्यवस्था की जिम्मेदारी थी । एक किसान है समझेगा तो आपने मुझे उस की शादी में ही देखा होगा । फॅस कोई का एक ऐसे चौक पडे जैसे उनके सामने अचानक किसी ने बम रख दिया हूँ । थोडी देर तक अजीब सी नजरों से हमारी और देखते रहे । फिर एक का एक उनके होठों पर हल्की मुस्कान छोड पडी । हाथ हिलाते हुए बोले, अरे आप लोग वहाँ क्यों खडे हैं? आइए बैठे उन्होंने दरवाजे के पास रखी चारपाई की और इशारा किया । हम लोग बैठे थोडी देर तक हम सब एक दूसरे की और देखते रहे । शायद समझ नहीं पा रहे थे की बात कैसे शुरू की जाए । चाहे लेंगे आप लोग? अचानक उन्होंने पूछा अच्छी नहीं शुक्रिया । मैंने मुस्कराकर कहा हमें कुछ आपसे बात करनी थी इसीलिए यहाँ तक आए हैं आपका परिचय मेरा नाम राज है । मैं भी समझता दोस्त हो तो आप संजीव की तरफ से बात करने वाले हैं या मेरी बेटी खुशबू की तरफ से । हालांकि हम उनके सवाल को जीत कह सकते हैं मगर वो गलत नहीं था । मैंने मुद्दे को बदलते हुए कहा, दरअसल हम चाहते हैं कि वो दोनों तो दोनों नहीं उन्होंने मेरी बात बीच में ही कर दी । आप उस लडकी के आप से बात कर रहे हैं जिसने अपनी बेटी हुई है और दुर्भाग्य सही । खत्म का आरोप उसके पति पर है । इसलिए फैसला करिए की आप एक कत्ल के आरोपी के लिए मेरी सहानुभूति लेने आए हैं । जहाँ पंखुडी की माँ के लिए इंसान अब मैंने कहा तो थोडी देर तक गौर से मेरी और देखता रहा । शायद उसे अपने कानों पर यकीन नहीं हो पा रहा था । तब तक क्या क्या वह अपने अपने कानों पर हाथ लगाते हुए मेरी और झुका ये मैंने कहा इंसाफ मगर सिर्फ माँ के लिए नहीं, पिता के लिए भी भी आखिल का एक नाम हो गई । बेटी तो उसमें भी हुई है । ये कैसे कह सकते हैं? इस सवाल का जवाब अपने आप से पूछे । मैंने सुना है कि आप भी अपनी पत्नी से अलग रहते हैं । जबकि आपकी बेटी अपनी माँ के साथ आप मुझसे क्या चाहते हैं? एक का एक उनके स्वर बदल गए । बचाता हूँ कि आप कुछ मुझे से कहे कि वह नामजद रिपोर्ट वापस लेकर सिर्फ बेटी के कपडे की रिपोर्ट करवाए ताकि पुलिस इसकी नए सिरे से जांच करें और पंखुडी के वास्तविक कातिल तक पहुंचा जा सके । और सच कहूँ तो यही वो रास्ता भी है जिससे सही मायने में पंखुडी को न्याय मिल सकेगा । तो मेरी और देखने लगा नजर नहीं गई । वैसे आप को क्या लगता है? मैंने उनकी ओर झुकते हुए पूछा । हालांकि उनकी आंखों में सवालों का संबंध था मगर मैं भी समंदर को सुखाने के इरादे से धनुष लेकर उनके सामने खडा हो गया । अब या तो मुझे मार्ग पे या फिर से तू बनाने का रास्ता बताए, मेरी बात नहीं सुनेंगे । थोडी देर बाद उन्होंने कहा क्या कहा आपने? मैंने उनकी बात सुनी तो पडा चलो छोडो तक मुझे अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ । मैंने जोर देते हुए कहा मैंने ठीक से सुना नहीं यहाँ राज्य । आपने अभी जो भी कहा, ऐसा नहीं है कि मैं वो सब जानता नहीं । उन्होंने अपने सर झुका लिया । मैंने उनकी आंखों को गौर से देखा । उनमें एकाएक नमी आ गई थी । अपनी बात जारी रखते हुए बोले मुझे पता है संजय ने अपनी शादी निभाने की भरपूर कोशिश की है । मगर कोई था जो खुशबू के दिमाग पर इतना हावी हो गया कि वह सही और गलत के बीच फर्क करना भूल गई और पंखुडी के कत्ल के मामले में भी उसने यही किया । जबकि व्यक्ति का तौर पर मुझे लगता है कि संजय निर्दोष है । फिर आपको क्या लगता है कि खत्म कृष्ण क्या ये मतलब किसी और ने नहीं बल्कि इकबाल नहीं किया है और यकीन माननीय की या बाद मैंने खुशबू को कई बार समझाने की कोशिश की है । पर क्या आप जानते हैं कि लडकियों की सबसे बडी त्रासदी क्या है? क्या वो हमेशा अपने माँ की तरह बन जाती है और खुशबू भी उसी में शामिल हो गई है? मेरी बात सुनने की बजाय अपनी माँ की सुन रही है । उनकी बात सुनी तुम उठकर खडा हो गया । उनके पैरों तक छुपकर उनको चरणस्पर्श किया और अपना हेलमेट उठाते हुए कहा अच्छा मुझे चलने की इजाजत दीजिए । उन्होंने कुछ नहीं कहा । उनकी भरी हुई आंखें सब कुछ बयां कर गई ।

मेरी अर्धांगनी उसकी प्रेमिका - 78

मैं एक बार फिर लखनऊ लौट आया । सबूत के नाम पर अभी तक हमारे पास कुछ खास जमा नहीं हो पाया । मेरे पास सिर्फ मेरे हिडन कैमरे से रिकॉर्ड की हुई बातचीत थी । वो एक जो मैंने खुशबू के घर जाकर बात की थी और दूसरी वह जो उसके पापा के साथ गांव जाकर किया था । आज उसके पापा के साथ हुई बातचीत इतना तो इशारा करती है । इस संजय को राहत नहीं मिल सकी अगर उसकी पूरी तरह रिहाई कराने के लिए वह पर्याप्त नहीं थी । अगली सुबह मैं जब उठा मेरा मन काफी होता था । पता नहीं क्यों मुझे ऐसा लग रहा था कि कुछ अच्छा होने वाला है । मैं तो फिर में बैठो । चाय पी रहा था कि अचानक मेरा भतीजा बॉबी बिस्तर पर उठ बैठा । उसके और देखा तो वह हॉल से मुस्करा पडा । ऍम चाय पिएगा । मुस्कराकर उससे पूछा नहीं । उसने कहा और बिस्तर से उतरकर मुस्कुराता हुआ सामने रखी अलमारी की और बढ गया । मैं समझ गया कि वह पहले ही अलमारी के पास रखे हुए बल्ले वो देख चुका है । उसके पास पहुंचकर बल्ला उठाया और फिर मुस्कराता हूँ मेरी तरफ लौट बडा अपनी उंगलियों को बुराइयों में मरोडते हुए कुछ संकेत क्या मैं समझ गया कि वह मुझ से गेम के बारे में पूछ रहा था । मैंने छूटकर सोफे के नीचे देखा तो वो भी छूट गया । इंसान नहीं पडी थी । मैंने निकालकर उसके हाथों में थमाने की कोशिश की, मगर उसने लिया ही नहीं । पूजा अपनी और खींचते हुए गेंद फेंकने का संकेत किया ताकि वो बैटिंग कर सकते हैं । मैं उसके लिए गेम देखने लगा । तभी एक मेरे फोन की घंटी बजती । उन नीतू का था । जांच अभी घर आ सकती है । उसकी आवाज में खबर थी, कोई जरूरी काम है । हाँ, कुछ सबूत इकट्ठा किए हैं, उसे आपको दिखाना चाहती थी । क्या मैं कहीं कुछ पडा? किस तरह का सबूत है? मुझे लगता है कि आपको यहीं आकर देखना चाहिए । आप कहे तो मैं आपको लेने आ जाऊँ । नहीं, उस की कोई जरूरत नहीं है । तो मैं खुद आ रहा हूँ । वही है कि कारलेकर । आप मुझे अपना पता मैसेज कर दीजिए । एक घंटे बाद मुझे घर पहुंचा । उधर वाजे पर ही मेरा इंतजार कर रही थी । आइए राज मुझे देखते ही वह फॅस पडी । मैंने भी हंस करके जवाब दिया । उस वक्त उसकी आंखों में अभूतपूर्व चमक थी । उसके उस छोटे से घर में मात्र दो कमरे और एक किचन था जिसके एक कमरे पर बैडरूम था और दूसरे ड्राइंग रूम के रूप में वह इस्तेमाल कर रही थी । दीवार पर लगी कई अच्छी पेंटिंग के बीच वहाँ एक बडी सी तस्वीर संजय की भी लगी थी या आज क्या लेंगे? आप ठंडा या फिर चाय या कॉफी? बस चाहे वो मुस्कुराकर मेरी और देखिए और किचन की और बढ गई । फिर जब लॉटरी तो उसके हाथ में चाय के दो कप और नमकीन की एक प्लेट थी । मेरी निगाह एक बार फिर संजय की तस्वीर पर जाते हैं । मैंने उसको पूछा, ये स्वीट था तो गांव से मिली भर से ऐसे ही कई से चुरा ली थी । हसते हुए उसने तस्वीर की और देखा । उसके आंखों में सपनों का समंदर हिलौरे खा रहा था । अभी अचानक उसे कुछ याद आया । मेरी और मुखातिब होते हुए वो बोली, वैसे जांच आप एक रिकॉर्डिंग सुनना चाहेंगे । उसके और देखने लगा । रिकॉर्डिंग जी मुस्कुराते हुए उठी और लगभग दौडते हुए दूसरे कमरे में घुस गई । लॉटरी तो उसके हाथ में छूट सर टेपरिकॉर्डर था । इसमें क्या है? मैंने पूछा तो कुछ बताने की बजाय उसने उसे ऑन कर दिया । उसमें इकबाल अंसारी और नीतू की बातचीत रिकॉर्ड थी । इसमें एक बार अंसारी हस हस कर बता रहा था । उसने किस तरह खुशबु का इस्तेमाल किया । एक बार लेनी तो यकीन दिलाते हुए कहा कि दरअसल वो असली प्यार सिर्फ नहीं तू से ही करता है । खुशबू से तो इसलिए निकाह करना चाहता है क्योंकि उसे खुशबु का वह खूबसूरत घर चाहिए जिससे वो निकाह के वक्त में हर में मांगने वाला है । उसने ये भी बताया था कि वह कंपनी को मारना नहीं चाहता था । उपर से हादसा था जिसमें उसने खुद को बचाने के लिए संजय को फसा दिया । उसने तो संजय को अपने निकाह के बीच में न आने और से डराने के लिए बिस्तर में एक स्टूल रखकर पंखुडी को उसमें खडा कर दिया और पंखे से बंधे हुए फंदे को उसके खुले में डाल दिया ताकि वह संजय को दिखा सकें कि अगर उसमें उसकी बात नहीं मानी तो पंखुडी के साथ क्या क्या हो सकता है । फिर वो पंखुडी को उसी हाल में छोड कर जैसे ही बॉल करने की और ये देखने के लिए आया है । क्या वहाँ आस पास संजय आ चुका है? अचानक पता नहीं कैसे और कम स्कूल गिरा और दम घुटने से पंखुडी की मौत हो गई । इस समय तो पंखुडी की लाश को कपडे में लपेट रहा था । ठीक उसी समय संजय लॉन में खडा होकर वहाँ के मुरझाए हुए फूलों को देख रहा था । अपनी बातचीत के दौरान इकबाल नहीं कई बार नीतू को डार्लिंग सबसे भी संबोधन किया था । बातों से ऐसा लग रहा था जैसे खुद उन्हें दूसरे को सालों से जानते हो । वही तो आपने संजय के लिए खुद को ही गांव में लगा दिया । ऍफ करके मैंने नीतू की और देखते हुए पूछा, ऍम, मेरी और थोडी देर तक तक देखती रही । फिर धीरे से हस्कर बोली हाँ लगाना पडा । मगर आज आपको घबराने की जरूरत नहीं है । मुझे अभी हद बता दी । मैंने उतना ही किया था जितना आपने रिकॉर्डर पसंद है । वैसे एक बात बताऊँ आपको मैं संजय के लिए इससे भी ज्यादा जोखिम उठा सकती हूँ । मैं जानता हूँ । लेकिन इस स्कूल बहादुरी की बात है कि इस काम को अंजाम देने के लिए आपको इकबाल अंसारी के घर तक जाना पडा नहीं । मैं इतनी पागल नहीं । वो राज दरअसल में उसके ऑफिस गई थी क्योंकि वहाँ एक बात की गारंटी थी की तमाम साफ होने की वजह से उसे बात कर सकता था वो भी बिना बताए ताकि वह कोई प्लानिंग भी ना कर पाए । लेकिन आपसे पहली बार मिली है हमारी जान । पहचान इतनी नई नहीं है । राज्य उसी में तीन चार महीने से जानती हूँ । तीन चार महीने से फॅस की ओर देखा था । वो हंस पडी । मुझे ठीक से याद नहीं है मगर तीन चार महीने तो पूरे होंगे । जब पहली बार मैंने खुशबू को इकबाल के साथ उसके ऑफिस के पांच देखा था । लेकिन आप तो आलम बाकी तरफ काम करती हैं । ऍम तो खुशबू ऑफिस की तरफ किसी काम से गई थी । हाँ दरअसल खुशबू के ही ऑफिस में मेरी एक दोस्त काम करती है । मैं उसी से मिलने वहाँ गई थी । तभी अचानक मेरी नजर खुशबू पर पडी । मैंने उसके बारे में अपने दोस्त को बताया तो उसने कहा की खुशबू तो उसी के साथ काम करती है और उसके साथ जो आदमी खडा है वो कौन है? मेरे इस सवाल पर उसने बताया कि वो उसे नहीं जानती मदरहा वह अक्सर खुशबू से मिलने वहाँ आता जाता रहता है । फिर आप उसे कैसे मिली? मैं तो जोर से हंस पडी । आप शायद जानते नहीं कि मैं बाहर से शांत स्वभाव की हूँ । अंदर मेरा दिमाग बहुत तेज चलता है । खुश हो के वहाँ जाने के बाद मैंने उसे लिफ्ट मांगी और उसने मुझे कॉमन लडकी समझकर लिख टीवी दी । फिर रास्ते में मैंने उससे उसका परिचय पूछा । उसने बता दिया उतरते हुए उसने अपना कार्ड थमाते हुए फसकर कहा कि कभी आइए हमारी गरीब खाने में । जवाब में मैंने ये कह दिया कि ठीक है आएंगे कभी अब मुझे कहाँ पता था कि ऐसा वक्त आ ही जाएगा कि सचमुच जाना पडेगा और फिर देखिए । संजय के साथ हुए इस हादसे के बाद जब मुझे सारे रास्ते बंद देखे तो उसका दिया हुआ वह कार्ड कम आया । मुझे उसके गरीब खानी जाना पडा । बुरा ना माने तो एक बात तो हूँ जी कहीं मुझे समझ में नहीं आ रहा है । मैं नहीं चलते हुए कहा की खुशबू को छोड कर आप के साथ जाना चाहता था । किसकी मत राज को खिलखिला पडे । मैं ऐसी बातों का बुरा नहीं मानती क्योंकि मैं जानती हूँ की मैं खुशबू की तरह खूबसूरत नहीं हूँ और ये बात स्वीकार करने में मुझे कोई हिचक नहीं होती है । दरअसल बात ये हैं की खुशबू जैसी खूबसूरत लडकी को छोडकर मुझे चुनने की आदत अकेले इकबाल में ही नहीं है । अभी तो सृष्टि के सारे मर्दों में है मार चाहे अपनी पांचवी शादी कर रहा हूँ फिर भी उसे लडकी वर्जिन ही चाहिए और आप इतना तो जानते ही हैं की खुशबू तो वो है नहीं सही कह रही है मैंने नजरे झुका नहीं इससे कुछ मर्दों की सबसे बडी त्रासदी है सारी राज्य । मुझे लगता है कि शायद में कुछ ज्यादा ही नहीं गई । आपने कुछ ज्यादा नहीं कहा । आपने जो भी कहा वो सच है । मैंने कहा । और दीवार पर लगी संजय की तस्वीर की और देखने लगा । उस वक्त नीतू की नजरे मेरे चेहरे के इर्द गिर्द घूमती रही । थोडी देर तक वहाँ खामोशी छाई रही । क्या सोचना लग गए राज अचानक भी तूने आवाज थी यही कि काश संजय की जिंदगी में खुशबू की जगह आप होती तो कितना खुश होता है । मतलब कोई बात नहीं । मैंने मुस्कुराकर उसकी और देखा तब नहीं तो अब सही हमने इतने साक्ष्य जुटा लेंगे हैं कि संजय को बाहर आने में और इकबाल और खुशबू को अंदर जाने में देर नहीं लगेगी । और इस बार तो अब दोनों की शादी मैं नहीं छोडने वाला । यहाँ कुछ और बात कीजिए ना नहीं तू अचानक भावुक हो गई छलेडी गया कुछ और बात करता हूँ । मैंने धीरे संस्कार कहा । आपको पता है । संजय डायरी लिखता है, हाँ जानती हूँ उसने पलकें झुका ली । उसकी डायरी पडी है उसमें आप का भी जिक्र है क्या? उसकी पाल के मेरी और दौड लगाई । उसके चेहरे की असहजता को मैंने महसूस किया जानती हूँ । मैंने कहा उस डायरी को पढते वक्त मुझे लगा कि संजय ने जिस तरीके से आप का जिक्र किया है वह व्यवहार में संभव नहीं है । मगर अब जबकि मैं आपके सामने हूँ, आपसे बात कर रहा हूँ । सोचता हूँ कि मैं कितना गलत था । मुझे ऐसा भी लगता है कि उसने शायद आपको उस डायरी में पर्याप्त जगह नहीं दी । उसमें आपके व्यक्तित्व की बहुत छोटी सी अभिव्यक्ति है तो शायद पर्याप्त नहीं है । अब चाहत के लिए, आपके समर्पण के लिए, आपके प्रेम के लिए राज । मुझे जानकर सचमुच खुशी हुई कि संजय ने अभी जिंदगी में ना सही, कम से कम अपनी डायरी में तो मुझे थोडी सी जगह दे दी है । नीतू के चेहरे की चमक एकाएक गायब हो गई । शायद एक बार फिर वो भावुक हो गई थी ।

मेरी अर्धांगनी उसकी प्रेमिका - 79

उस दिन कोर्ट लोगों से खचाखच भरा हुआ था । मेरे मन में तथा प्रसन्नता थी । मुझे विश्वास था कि संजय बहुत समय तक जेल में नहीं रहेगा । अगर वक्त के हर पल के साथ साथ मेरा काम करता जा रहा था । भरोसा भूमा बनकर हवा में उड के जा रहा था । कोर्ट की सुनवाई शुरू होने वाली थी मगर अब तक नीतू कोर्ट नहीं पहुंची । इस बीच हमारा वकील कई बार मुझसे पूछ हुआ था कि नहीं, तू सबूत के साथ कोर्ट का पहुंचेगी । मैं एक दो बार को टूट के बाहर निकला । इधर उधर देखा । जब नहीं देखी तो उन्हें जाकर अपने वकील के पास पहुंच गया । उस वक्त हम से कुछ ही दूरी पर बैठी खुशबू एक तक मेरी और देखे जा रही थी । उसके चेहरे की रौनक बता रही थी की वो अपनी जीत को लेकर पूरी तरह से आश्वस्त उसने मुझे चढाने के लिए इकवाल का हाथ पकडकर उसकी और देखा । दोनों की नजरें मिली । उनके होठों पर मुस्कुराहट छा गई । इस दौरान इकबाल की नजरे मुझ से टकराई मगर हमारे चेहरों पर शून्यता बनी रही । स्वराज अचानक मेरी वकील नवाज नहीं एक बार नहीं तू फोन रही । कुछ कहाँ पर है वो तो मैं कई बार प्रयास कर चुका हूँ । वकील साहब लेकिन उसका फोन नहीं लग रहा है । वो नहीं लग रहा है तो चौक पडा । अब जानती आप क्या कह रहे हैं आप के दोस्त की जमानत और सजा दोनों उन्हीं पर निर्भर है । अगर वो नहीं आई तो आप मुझे दोष मत दीजिएगा क्योंकि बिना पर्याप्त सबूत के मैं कुछ नहीं कर पाऊंगा । जानता हूँ वकील साहब लेकिन करूँगी तो क्या तब अभी कुछ नहीं कर सकता । उसने फटी फटी नजरों से मेरी और देखा ये जो आपने वीडियो सीडी मुझे दी है । इससे ज्यादा से ज्यादा ये हो सकता है कि आपके दोस्त पुलिस रिमांड में जाने से बच्चा है और अगर किस्मत बहुत अच्छी रही, उनकी जमानत हो सकती है । मगर एक बार एक बार अगर अंदर नहीं गया तो याद रखेगा तो मिस्टर संजय को बहुत देर तक बाहर नहीं रहने देगा । क्योंकि एक बार अंसारी सिर्फ वकील नहीं है, कोई ब्रांड है तो किसी भी केस को अपने तरीके से घुमा सकता है । लेकिन नतीजा मैंने कुछ कहना चाहता कभी जब साहब कोर्टरूम में दाखिल हो गए, मुझे अपनी बात को वहीं पर छोडना पडा । मेरे वकील ने बहस के लिए आगे बढने से पहले आखिरी बार खुलती नजरों से मेरी और देखा मैंने नजरे चुका नहीं संजय अचानक मेरी और पालता और धीरे से बोला जैसे आपकी दोस्त नहीं तो भरोसे के लायक तो है ना । ऐसा क्यों कर रहे हैं? क्योंकि मुझे ऐसा नहीं लगता । उसने कहा और दोबारा जज की और लौट गया । मैं हैरान नजरों से देखता रह गया । सच कहूँ तो कुछ देर के लिए मुझे यही लगा । मगर उधर बहस शुरू ही हुई थी कि एक का एक मेरे कंधे पर किसी ने हाथ रखा । मैंने पलट कर देखा के मेरे पीछे नीतू खडी थी आपको इतनी धीर कैसे हो गई? उसके आने पर खुश होने के बजाय मैंने सख्त लहजे में उसकी और अपना सवाल दागा । वो सब बाद में बताउंगी । अब ये बताओ की सुनवाई कब शुरू हुई हैं । अभी तुम पहले क्या कहती हुई वो मेरे बगल में बैठ गई । उसके चेहरे की चमक और फोटो की मुस्कराहट ने जैसे फैसले को पहले ही भांप लिया हो । सुनवाई जारी रही मगर नीतु के आने के बाद पता नहीं क्यों खुशबु का चेहरा एक है । उतर गया उससे नफरत भरी नजरों से नीतू की और ऐसे देखा जैसे कोई अपनी सौतन को देखता है । कुछ को उसकी खुशी निकली नहीं जा रही थी तभी एकाएक इकबाल किसी कागज उठाने के लिए अपनी देश की और बडा उसकी निगरानी तु बढ गई तो वह चंद क्षणों तक मूर्ति बना नहीं तू की और देखता रहा तो वहाँ पर नीतू की उपस् थिति पर हैरान था । शायद से नीतू का संजय के साथ किसी तरह के संबंध का कोई अंदाजा नहीं था । उसके चेहरे के हावभाव देखकर मैं समझ गया कि नीतू सुनवाई शुरू होने से पहले कोर्ट रूम में तो नहीं आई । हर मिनट के गुजरने के साथ ही हमारा वकील घनश्याम तिवाडी लगातार इकबाल अंसारी पर हावी होता जा रहा था खासकर तब से जब उसकी नजर नहीं तूने चेहरे पर पडी । उसने कोर्ट से पूछा आप की अदालत मुझे बताएगी की पंखुडी को मारने की वजह किसके पास ज्यादा थी? मेरे क्लाइंट मिस्टर संजय के पास क्या पर मेरे काबिल दोस्त इकबाल अंसारी के पास? और अगर अदालत के पास इसका जवाब नहीं है तो उसने पुलिस रिमांड से पहले मेरे क्लाइंट के खिलाफ पुलिस ने याचिकाकर्ता से सबूत क्यों नहीं मांगा? सब संधि के नाम पर अदालत द्वारा किसी भी इंसान को क्योंकि पंखुडी का पता भी है उसे किसी बडे वकील कीचन दलीलों के नाम पर पुलिस रिमांड में दे देना कहाँ का नया है? हालांकि जब मिस्टर तिवाडी अदालत से सवाल कर रहे थे, उस समय जज ने घूमकर तिवाडी की और देखा । मैं घबराया हुआ था की अदालत तेवाडी केस व्यवहार पर हमारे मुकदमे को एकपक्षीय न बना दे । मगर स्पोर्ट की अनुमति के बाद जब मेरी और खुशबू के पापा के बीच हुई बातचीत के वीडियो को अदालत के अंदर चला गया तो मैंने जिसकी आंखों को गौर से देखा, उनकी नजरों के सवाल बदल चुके थे । उन्होंने इकबाल की ओर देखते हुए पूछा, क्या यह सच नहीं की? पंखुडी के तहत उसे आपको मिलने वाला फायदा संजय से कहीं ज्यादा है? और दूसरे बाद आपने कोर्ट को ये क्यों नहीं बताया कि आप अपने क्लाइंट्स मैंने कहा करने वाले थे । अच्छा मेरे निकाल ऍफ का कोई लेना देना नहीं है । ऍम अचानक और सहज हो गया । इसलिए मैं अदालत का समय बर्बाद नहीं करना चाहता था और रही बात मेरी क्लाइंट के पापा से हुई बातचीत का मामला तो मैं बता दूँ कि मिस्टर हरीशचंद्र क्योंकि मेरी क्लाइंट के पापा है नहीं, हमारे निकाह से खुश नहीं थे । इसलिए उनका ये सब कहना अनापेक्षित नहीं है और मेरी इस अदालत से गुजारिश है कि हमें समझे की जमानत पर बहस करनी चाहिए न कि मुझे मिला वजह अपराधी बनाने की कोशिश की जाए । नहीं अच्छा कल शाम से बडी एकाएक उठकर खडे हो गए और बोले मैं अपने काबिल दोस्त को अपराधी बनाने के सिर्फ कोशिश नहीं बल्कि कर रहा हूँ और आना क्योंकि सच यही है की पंखुडी की हत्या का गुनाहगार मेरे क्लाइंट्स मिस्टर संजय पाठक नहीं बल्कि खुद इकबाल अंसारी हैं और उसका मेरे पास पुख्ता सबूत है । इससे सुनने के बाद अदालत आज और अभी इस केस पर फैसला सुनने के लिए बाध्य हो जाएगी । तो फिर वो सबूत को अदालत के सामने पेश करिए ना । कहते हुए इकबाल अंसारी पत्थर नीतू की और देख रहे थे । उसकी आंखों में डर साफ झलक रहा था । अभी तूने उनसे नजरें नहीं मिलाई । मेरे वकील तिवारी ने तुरंत टेपरिकॉर्डर उठाकर जज की कुर्सी पर घुमा दिया । उधर टेंट पर इकबाल के रिकॉर्ड की हुई आवास पंखुडी मर्डर केस को कुछ और ही रास्ते पर ले जा रही थी । और इधर एक बार अंसारी नीतू को ऐसे हो रहा था जैसे कि वो अभी उसे कहाँ जाएगा । उस दौरान मैंने खुशबू के चेहरे को भी पडने की कोशिश की । उसमें हैरान कर देने वाली जैसी कोई भावनाएं नहीं थी, सिवाय उस लाइन के जब इकबाल ने नीतु के साथ हुई बातचीत के दौरान कहा था कि वह खुशबू से प्यार नहीं करता और वो ये सब कुछ इसलिए कर रहा है ताकि वह ने कहा कि वक्त मेहर में उसका घर मांग सके । खुशबू के व्यवहार पर हराम था की रिकॉर्ड की गई बातों में इतना सब को सुनने के बाद भी उसने इकबाल से सवाल नहीं किया । उसकी पथराई नजरेें मेरे और नीतू के चेहरे के बीच भ्रमण कर रही थी जिनमें आंखों को पढने का हुनर रखने वाला कोई भी व्यक्ति जेल जाने की घबराहट को महसूस कर सकता था । टीवी बंद होते हैं, कुछ देर के लिए अदालत में खामोशी छा गई । जज भारी बारिश दोनों वकीलों की और देखता रहा । तब तक एक बार अचानक उठकर खडा हो गया और अदालत से आग्रह करते हुए बोला, अच्छा, मेरे खिलाफ झूठे सबूत इकट्ठा करके मुझे फंसाने की कोशिश की जा रही है । इसलिए मेरी अदालत से अपील है कि मुझे अपना मुकदमा पेश करने के लिए अगली तारीख दे दी जाए । नहीं होना कल शाम थोडी अचानक आक्रमक हो गया । अपने हाथों में लिए पेपर को लहराते हुए बोला मेरे क्लाइंट संजय पाठक निर्दोष होते हुए पहले ही पुलिस रिमांड बहुत यातनाएं रह चुके हैं । इसलिए अब सारी सच्चाई अदालत के सामने आ गई है और उस रिकॉर्ड की गई आवाज की लैब रिपोर्ट भी आपके सामने है । इस की अदालत से मेरी गुजारिश है कि वो अपना फैसला सुनाया और मेरे क्लाइंट को सभी आरोपों से पांच रिहा करें । तो एक बार अंसारी साहब ने कहा कोई और मौका होता तो जरूर में आपको अपना पक्ष रखने के लिए मौका दे देता हूँ । मगर इतने मजबूत सबूत होने के बावजूद अगर मैं आपको मौका दे दूँ तो यह शख्स के साथ अन्याय होगा । आप लोगों की दलीलें सुनकर मैंने ही पुलिस रिमांड में भेज दिया था । इसलिए सभी सबूतों को मद्देनजर रखते हुए अदालत नतीजे रुपये जैसा अचानक एक बार फिर खडा हो गया । आप मुझे अपना पक्ष रखने का मौका न देकर मेरे साथ अन्याय कर रहे हैं । मैं एक बार साहब मैं अपनी गलती सुधार रहा हूँ और आप चुप चाप अपनी सीट पर बैठ चाहिए । लेकिन जब साहब मैंने कहा चुप हो जाइए आप जब साहब अचानक अलाउड है मुझे मेरा काम मत सिखाइए । मैं आपको आपका काम आप अदालत की मर्यादा हो चुके हैं । बस साहब अचानक उठ कर खडे हो गए और सामने खडे पुलिसवालों को संबोधित करते हुए कहा आपने अभी आरएसपीसीए जज का आदेश मिलते ही पुलिस के जवान तुरंत आगे बढकर एक बार अंसारी को आरेस्ट कर लिया फॅस खुशबू पस्थित हैं क्या? सामने बैठे लोगों की तरफ देखते हुए जब साहब ने पूछा था एक सौ तीन सौ मुझे मेरा नीतू का खुद खुशबु का जब हाथ उठाकर आवाज जब साहब की और देख रही थी साजिश में मुस्लिम का साथ देने के जुर्म में उन्हें भी गिरफ्तार कर लीजिए जैसे कुर्सी पर बैठे हुए कहा पुलिस जब उन्हें गिरफ्तार करके अदालत से बाहर लेकर जा रही थी, उस समय मेरी और नीतू की नजरें एक दूसरे से टकराई । दोनों की आंखों में आंसू थे । पता नहीं क्यूँ मैं कुर्सी से उठकर खडा हो गया । नीतू की और देखते हुए बोला चलें नहीं तूने ऐसे कहा जैसे वो अब भी किसी सपने में खोई हुई है या फिर उसे अदालत के फैसले पर यकीन ही नहीं हो रहा है । घर हमारी शादी की तैयारी करते हैं । मैं सारे समंदर का पानी अपनी पलकों के नीचे दवाई हुए, ढाके मारकर हस पडा

मेरी अर्धांगनी उसकी प्रेमिका - 80

अगले दिन शाम को संजय को पुलिस हिरासत से छोटा था । हमारे वकील घनशाम दिवाली कागजी कार्रवाई के लिए वहीं थे । नी तूने मुझे सुबह से ही अपने घर बुला लिया था । संजय पुलिस हिरासत से लौटने वाला था इसलिए डी तो उसकी अगवानी के लिए घर को सजा रही थी । उसके हावभाव को बडे करीब से गौर कर रहा था । ढलती दोपहर के साथ नीतु के दिल की धडकन अचानक पडने लगी । उसके व्यवहार में उतावलापन और आंखों में चमक थी । आपने अक्सर कहाँ करता था कि जब आदमी इस तरी से प्यार करता है तो वो अपनी जिंदगी का बहुत छोटा सा हिस्सा उसे देता है । लेकिन जब स्त्री प्यार करती है तो अपना सब कुछ दे देती है । नीतू ऐसी ही स्त्रियों में से एक थी । संजय ने तिरस्कार, नफरत और अनदेखी के अलावा उसे कभी कुछ नहीं दिया था । मगर नीतु के लिए संजय उसकी दुनिया थी जिसकी अगवानी में वह सुबह से बिना रुके अपने छोटे से घर पर इधर से उधर भागे जा रही थी । बस करो नहीं तो मुस्कराकर कहा घर अच्छा लग रहा है । इसे और कितना चमका होगी तो शर्मा कर मेरी और देखने लगे और खासकर बोलिए मैं घर नहीं जा रही हैं । राज देख रही हूँ कि पूरा घर कैसे बिखरा पडा है । सूचना यू से थोडा व्यवस्थित कर दो । संजय को ऐसा घर देखकर शायद अच्छा ना लगे । लेकिन हम सुबह से इसी में लगी हूँ । पता है ना । हाँ हाँ पता है राज को मेरी और देखने लगी । फिर उसे शायद याद आया कि हम दोनों ने सुबह से कुछ नहीं खाया । तेजी से मेरी और बडी और हस्कर बोली जांच आपके अभी तक कुछ नहीं खाया । ना हो मैं भी कितनी वो लग कर हूँ । तो मेरे सामने पडी कुर्सी पर बैठ गई । मेरी हथेलियों पर अपनी हथेलियां रखते हुए बोली सौरी आज मुझे याद ही नहीं रहा । अब इस पांच मिनट रुकी । मैं आपके लिए कुछ बनाए दे रही हूँ । वो अचानक उठकर कुर्सी से खडी हो गई । आपको नूडल्स तो पसंद है ना आपके लिए । वहीं बना दूँ जी ऍम उसका बडा लेकिन की आपको याद है कि सुबह से आपने भी कुछ नहीं खाया । हाँ हाँ, याद है वो हंस पडी मगर मुझे भी भूख नहीं है । नहीं मैं हैरान नजर उसकी ओर देखा । शाम के पांच बजने वाले हैं । ही देखिये आपने वो उसने घडी की और देखा तो शर्मा समय का तो पता ही नहीं चला । चलिए उसी में थोडा अपने लिए भी बना लेंगे साथ ही खा लेंगे । वो पलट कर किचन की और बडी किचन में घुस नहीं उसके शरीर पर जैसे पंख लग गई हूँ । मुश्किल से पांच सात मिनट गुजारे होंगे । उसने गर्म नूडल्स के दो प्लेट सजा करने इस पर रखती है और कुर्सी पर बैठे हुए बोली था ये राहत जी मैंने प्लेट को अपनी और खींचते हुए कहा । फिर हम दोनों बिना एक दूसरे से कुछ कहे देर तक खाते रहे । पता नहीं हमारे पेट पर नौं कितने थे या फिर खाने की स्पीड भी दी थी । जहाँ जाना उसमें आवासीय उसकी और देखने लगा । मुझे समझ नहीं आ रहा है कि संजय मेरे सामने आएगा तो मैं खुद को कैसे संभाल पाऊंगी । पता नहीं उसे नजर मिलने की हिम्मत जुटा भी पाऊंगी या नहीं तो संजय होता है । जैसे ही आप उस की शादी के बाद भी उसे अपने घर पर मिल चुकी हैं । हार आज मिल तो चुकी हूँ मगर तब वो मेरा नहीं था । उससे क्या फर्क पडता है । नहीं तो वो किसी का भी रहा हो तो संजय ही हाँ हाँ तो मगर कुछ कहते कहते होगी । फिर बात को घुमाते हुए धीरे से बोले छोडी ना आज नहीं समझेंगे । हमने खाना खत्म कर लिया । वो दोनों बेटों को समेट रही थी और किचन की ओर चल पडी । उसकी और तक देखता रहा । उसके हावभाव को बारीकी से समझने की कोशिश कर रहा था । यहाँ पहुंचाना ठहर गई । मेरी और घूमते हुए बोली मैंने कल शाम कुछ खरीदारी की थी कि आपसी देखना चाहेंगे कि बिलकुल आउट कर खडा हो गया । ठीक है अब हाथ धो लीजिए फिर आपको दिखाती हूँ उसमें किचन के सिंक में दोनों गंदी प्रेट्र की हुआ और दीवार पर टंगी तोलिये से हाथ पहुंचती हुई मेरी और देखा आ जाएंगे । अपने बेडरूम में घुस गई । उसके पीछे पीछे मैं भी चला गया । वो अलमारी के पास खडी होकर एक बार फिर मेरी और देख रही थी । उसके होठों पर मुस्कान ऐसे बिखर गई थी जैसे मध्यम रोशनी में कोई कमल खिल उठा हो । आज उसने कहा मुझे नहीं पता कि मैं क्या कर रही हो मगर एक बात करूँ आपसे मैं उसकी और प्रश्न पूर्ण निगाहों से देखने लगा । वो अपनी बात जारी रखते हुए बोले जब संजय को पाने की उम्मीद नहीं थी तो ना तो मुझे ऐसे उत्सुकता थी और ना ही ऐसा उतावलापन । मैंने उसे अपनी किस्मत समझकर उससे अलग रहकर जीना सीख रही थी । मगर अब देखो जब उसे पाने की उम्मीद जगी है तो इंतजार नहीं हो रहा है । कहते हुए उसने अलमारी खोली और एक बडा सा बॉक्स निकालकर स्तर पर रख दिया । ये क्या है? मैंने पूछा तो वहाँ पडी खुद ही खोल कर देख लीजिए, लेकिन है क्या? कहते हुए मैं छुट गया मेरी और एक तक देखे जा रही थी । मैंने बॉक्स ढककर उठाया तो हैरान रह गया । बॉक्स श्रंगार के सामान से भरा हुआ था तो चूडियां, महंगी लिपस्टिक बंदी संदूर और मैं जाने क्या क्या नहीं तू की और देखने लगा । आपको भी इन चीजों का शौक है । मैंने पूछा क्यों? मैं भी तो और ऍम नहीं रहा है उससे मेरी बात बीच में कार्ड होली बचपन में जब मैं अपनी माँ के हाथों में बारह पंद्रह चूडियां होटों पर ढेर सारी लिप्सिंग और मांग के इस छोर से लेकर उस छोड तक सिंदूर भर्ती देखती थी तो गुस्से से लाल पीली हो जाया करती बनाते हुए कहती की क्या माँ आप भी ये क्या करती हूँ? इतनी चूडियों के बोर्ड से आपका हाथ नहीं दुखता और ये सिंधु जी इतना लम्बा भरना जरूरी है क्या इसी थोडा सा भी तो लगाया जा सकता है । इस पर जानते हो क्या कहती थी वो खास कर कहती हैं कि तुम अभी बहुत छोटी हो तो नहीं समझता हूँ ये सब ये चूडियां ये सिंदूर सुहाग की निशानी है जो किस्मत वालों को ही मिलती है । और जब मैं रूट कर कहती की माँ में दसवीं में पढ रही हूँ अब इतनी छोटी नहीं हो तो हस कर कहती जानती हूँ । तभी कहती हूँ कि जल्दी ही तो ये सब कर होगी । माँ की इस बात पर मैं टूटकर कहती कि नहीं मैं ये सब कभी नहीं करूंगी । मैं किसी के लिए अपनी मांग में इतना सिंधु लपेटकर नहीं रह सकती । और फिर आज देखी राज्य इसी सिंदूर चूडियों के लिए में कितनी उतावली हूँ । सच कहूँ सुहागन होने का सिर्फ अहसास मेरे अंदर धरती से आकाश तक का गुरूर भर दिया है । समझ सकता हूँ मैंने कहा तभी अचानक मेरे फोन की घंटी टनटन आउट उन मेरे वकील का था । मैंने फोन उठा लिया हूँ । मैं नीतू जी के घर के नीचे खडा हूँ आप जरा नीचे आ जाइए । उस ने कहा की आवाज में कुछ भारीपन था अरे अपनी चेकिंग बडे ऊपर चाहिए । मैंने हसते हुए कहा और सब्जी कहा है । आप नीचे आ जाइए । उस ने दोहराया फोन कर दिया । उसकी इस अप्रत्याशित व्यवहार पर भी सनसेट देखा । मैं अभी नीचे करा रहा हूँ । मैंने नीतू से जैसे तैसे कहा और लगभग ढाकने कदमों से बाहर के अलग का । लगभग पंद्रह मिनट बाद जब वापस लौटा तो मेरी आंखें भरी हुई थी । मैं थके हुए कदमों से सीरिया चलता हुआ जाकर भी तू के सामने खडा हो गया । उसने मेरी और नहीं देखा । मैंने रुंधे हुए गले से पुकारा लेकिन फॅमिली और ध्यान नहीं दिया । तो बे खबर अपने होठों पर जमाने भर की मुस्कान सजाए हुए हाथों में चूडियां डालती रही नहीं, तू दोबारा पुकारा । उसने अपनी नजरे उठाई । उसकी नजर जैसे ही मेरी आंखों में उबल रहे, समंदर पर पडी, उसके हाथ से चूडियाँ छूटी और कई टुकडों में पटकर फर्श पर बिखर गई । थोडी देर तक हवा वो मेरी और देखती रही । फिर बडी मुश्किल से उसके होट खुले । मेरी और बढते हुए बोली यहाँ क्या हुआ? संजीव ही तो है ना । मैं कुछ कह नहीं पाया तो वह मेरे कंधे को झकझोरने लगी । बोलो नाराज संजय ठीक है ना, अब आप कुछ बोलते क्यों नहीं? पुलिस के द्वारा किए गए सकता और इलाज में भी लापरवाही नहीं फॅस । जोर से चिन्हट पडा अब वो इस दुनिया में नहीं रहा । मेरी बात सुनते ही जैसे एक किसी ने उसके शरीर से उसके प्राण निकले हो । वो बेजान उसी की तरह मेरे कपडों पर लटक गई । उसके मुंह से कोई आवाज नहीं निकली होने की भी नहीं । मैंने फिर उसे कोई सांत्वना नहीं दी । पट रही नजरों से मैं तेल पक फर्श पर बिखरी टी चूडियों की और एक तक देखता रहा । मेरे सामने पूरी दुनियाँ एक पूरा युग समाप्त हो चुका था ।

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