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Transcript

Ep1 - Parichay

आप सुन रहे हैं फॅमिली किताब का नाम है फैशन बाद जिंदाबाद । जिस लिखा है ज्योतिंद्रनाथ प्रसाद जी ने और मैं आपका दोस्त हरीश दर्शन शर्मा दोस्तों नए रिसोर्ट के लिए हरीदर्शन शर्मा को फॉलो करें और इस स्टोरी को अपनी लाइब्रेरी में एड करें । कुछ हुए थे सुने जो मन चाहे तो पुस्तक परिचय ज्योतिंद्रनाथ प्रसाद ने पुस्तक का परिचय देते हुए कहा यहाँ व्यंग रचना है । जिंदगी की व्याख्या लेखकों द्वारा पूर्व में की जा चुकी है । अपने दृष्टिकोण के साथ यह पुस्तक प्रस्तुत है । समाज को आइना दिखाने का प्रयास है । पेंशन, वाद जिन्दाबाद, अति आधुनिकता की दौड में हमारा स्वस्थ कहीं पीछे छूट गया है । क्या यह दुनिया इतनी पागलपन भरी है? आज से ढाई हजार साल पहले जिंदगी इस कदर जटिल नहीं थी कि गौतम मोदी को कहना पडा जिंदगी विद्रूपता विडंबना और विरोधाभासों से भरी पडी है । ज्योतिंद्र ने आगे कहा, आधुनिक युग इधर है । एक तटस्थ भाव से इन विरोधाभासों को झेलने का उपदेश दिया था बुद्ध ने । भगवान श्रीकृष्ण ने भी यही बात दोहराई । जीवन के उतार चढाव में स्थिर प्रज्ञ हो । ज्योतीन्द्र ने समझाया इस युग में द्वंद्वों को कमतर किया जा सकता है । बस हमें अपने भीतर झांकने की जरूरत है । आप पाएंगे कि आपके अंदर भी दोहरे मानदंड है यह चंद नोटों पर दूल्हे का बिकना हो या घर से बाहर निकलने पर विभिन्न स्तरों का मुखौटा लगाना पडेगा या नेताओं के पैतरे से जनता बदहाल हो अथवा जाति का नंबर हो या अपनी खैरमकदम के पीछे सामाजिकता के आवरण में दर्द छुपा हो, साहित्य में गुटबंदी हो या पोंगा पंडितों की भरमार हूँ या पत्रकारिता के व्यवसायिकरण में एक रिपोर्टर की व्यवस्था हो, इन सब में वहाँ जटिलता हम है जिसे हमने खुद जन्म दिया है और अब इसके सरलीकरण की तीव्र जरूरत महसूस की जा रही है । रोजाना हम चार तरह के अनुभवों से गुजरते हैं । सब कुछ अच्छा है, सब खराब है । मैं कुछ अच्छा है और न खराब, अच्छा अच्छा है और खराब भी । और एक वह भी स्थिति है जब हम खराब को ठीक करने में जुट जाते हैं । यही प्रयत्न चाहिए प्रयत्न की स्वयं को बदलने की । दूसरी बात जो ज्योतिंद्र में कहीं वहाँ यू है आज की भागम दौड की जिंदगी बडी एकरस और नीरज है कुछ चटपटा हो जाए ये छूट के लिए शाब्दिक वार्ड आपके अधरों पर मुस्कान लादे, दूसरों पर हसते की बजाय खुद पर फैसले । यही कदाचित व्यंगकार की सफलता है । ज्योतिंद्रनाथ प्रसाद

Ep2 - Kya Haal Hai

क्या हाल है । बेचारे लाल ने पूछा ज्योतिंद्रनाथ प्रसाद में कहना जहाँ हालत खस्ता है यार बीवी रोड कर मैं चली गई है करदार रोज सुबह अगर बांध दे रहे हैं मुन्ना स्कूल में फिर फेल हो गया है । पर ज्योतिंद्र ने कहा आप सुनाइए । बेचारे लाल ने ज्योतिंद्र के चेहरे के बिगडे नक्शे पर कोई ध्यान नहीं दिया । वे चलते बने यह कहकर ठीक है मेरा भी ज्योतीन्द्र ने सोचा यहाँ अच्छा नहीं हुआ । बेचारे लाल ने जो केंद्र की कोई नोटिस नहीं ली, ज्योतिंद्र को हकीकत बयान करती । शायद सहानुभूति के दो शब्द मिल जाते हैं, इसलिए नहीं ऐसे क्या की? इस बार कोई हाल पूछेगा तो हल्का हल्का सब गूगल दूंगा । ज्योतिंद्र ने एक किलो नमक खरीदा और घर लौटने लगे । रास्ते में टिंबकटू टकरा गए । बोले मत वो जो भैया किस मुसीबत में हूँ । मुर्गी अंडा नहीं दे रही इसलिए घटकर सहारे सत्तर किलो का हो गया हूँ जायेंगे । जो लात मारी है तो गोवा गोवा दुख रहा है । दफ्तर में साहब की चाकरी करता हूँ और घर में बीवी की । इसी तरह किस्मत क्या जुल्मोसितम जारी रहा तो वह दिन दूर नहीं जब मैं खुदागंज पहुंचाऊंगा हो । जरा मेरा भी हाल सुन लीजिए । ज्योतिंद्र रोककर कहा, कीमत तो बोले आपका हाल तो ठीक ही रहता है । जो दिन ने कहा क्या सुना है? टिंबकटू ने कहा तो मैं कह रहा था मेरी मुर्गी । वे बिना कोमा विराम के जारी हो गए । ज्योतिंद्र उन्हें सब है । बिना सुनाए सुने और फिर अपनी राहाली ज्योतिंद्र ज्यादा हो रहे हैं । अपना हाल किसी को सुनने है तो कोई हमदर्द मिल जाए । इसी बीच जरूरी लाल बगल से गुजर गए । जो तीन मिलने पुकारा हैं वो बोलते हैं । तब तक से बोले तो ये क्या हाल है? ज्योतिंद्र बोले मैं परेशान हो । जरूरी लाल ने कहा था क्यों? क्या हुआ? ज्योतिंद्र जारी हो गए । बीवी माइके पलायन कर गई है । नन्ने बहादुर टांड थोडे बैठा है लेंडर पीछा नहीं छोडते । गो वाला खाली दूध देने लगा है । बडा बुरा जमाना आ गया है और और मगर जरूरी लाल को उन्हें सुनने की फुर्सत नहीं थी । जरूरी लाल ने फर्राटे से कहा जरा सुनाई दिया हम जल्दी में है तुम्हारी तंगदस्ती का हाल फिर सुनेंगे । वे ऐसे भागे जैसे कुत्ते पीछे पड गए हूँ । ज्योतिंद्रनाथ प्रसाद परेशान हो गए । मुझे कोई सुनना ही नहीं चाहता । फिर ज्योतिंद्र सोचा लगे हो तो क्यों ना फोकट माल पर अपनी किस्मत आजमा ली जाए, उनसे ही कहकर मन की भडास उधार ली जाए । उनका घर रास्ते में ही पडता था । ज्योतिंद्र दरवाजा खटखटाया, वे झांकें कौन है? फॅमिली बोले ज्योतिंद्र ने कहा मैं हूँ हो भाई, ज्योतिंद्र क्या हाल है? फोकट माल ने कहा । ज्योतिंद्र बोले हाल नासाज है । बीवी मायके भाग गई है साहब ज्यादे फेल किए बैठे हैं । पढाई के लिए पैसे नहीं, साहू का रोज धमकाकर चला जाता है । वो वाला आजकल खाली दूध देने लगा है । वो तो चलता ही रहता है जो केंद्र और क्या हाल है । फॅमिली ने पूछा । बाकी जब भी गए, ज्योतिंद्र ने मायूसी से कहा । फॅमिली बोले की इधर का रुख हैं तो घर जा रहा हूँ । जो उन्होंने कहा होकर मलने । आगे जोडा और सुनाओ क्या हाल चाल है बाकी सब तो ठीक है, पर इधर पाॅच इसकी शिकायत है । ज्योतिंद्र ने कहा हूँ साहब की हो जाएगा यार ऍम अल बोले और हाय जाए ठीक रहना भी चाहिए । तब सब ठीक कॅाल ने कहा । ज्योतिंद्र ने जवाब में कहा हाँ, सब ठीक ही ठाक है । अच्छा ठीक है तो टहलने दरवाजा बंद कर लिया । आगे बढे हैं तो तुम दुनिया से जो तीन दो चार हो गए । ज्योतिंद्र ने पूछा । सब हालचाल ठीक हूँ । टुनटुन बोले आपने ठीक रखा है जो तीन फिल्में उबासी ली कहाँ हम ठीक रखते हैं । टुनटुन याने ठंडी साल भरी और अपनी राह ली संध्या हो गई थी, जो दिन घर की और जल्दी जल्दी डक भरने लगे । तभी मियां गुडी सामने से आते दिखे । ज्योतीन्द्र ने हाथ जोड दिए चीजे नहीं बोरी तथा हाल चाल पूछने के पहले ही कह दिया सब ठीक है, आप सुनाइए । गुडिया बोले ऍफआईआर वालिद खान का बताया है । ज्योतिंद्र ने तपाक से कहा तारे उन्हें आप पर कैसे भी हराया वे जो आपके प्रेम विवाह से खबर रिश्ता तोडे बैठे । मिया गुरूजी ने कहा खुदा मेहरबान तो गधा पहलवान यही देखो दस रुपए की लॉटरी निकली है । ज्योतिंद्र बधाई दी उन्हें और आश्चर्य प्रकट किया कि वे तो कभी लॉटरी का टिकट खरीदते भी नहीं थे । सही फरमाते हो यार मियां गुड्डी ने कहा अब इसे जुआ नहीं समझता । जबसे गोवा गया ज्योतिंद्र चीन के गोवा कब ब्रूडी बोले जमाना हुआ मेरी जहाँ है क्या आप वादियाँ है वहाँ की क्या फिर जाए हैं? क्या हो उसमें है वहाँ की जी करता है कि वहीं बस जाओ माॅक मगर मगर ज्योतिंद्र ने तो का गुड बडी चालू हो गए । मगर रुकसाना नहीं यहाँ बच्चा जन्म दिया है, मार दिया है की आवाज है ज्योतिंद्र । पिछले बेटा मुबारक हो । नियाजी बोले शुगर यहाँ शुक्रिया है जरा में कुछ दिनों के लिए अंडमान जा रहा हूँ । मेरे घर की खबर लेते रहेगा । क्यों नहीं? क्यों नहीं ज्योतिंद्र ने तत्परता से कहा आपका घर मेरा घर है । नियाजी ने कहा मेरे बेटे को पोलियो का टीका लगवा लेना । जी जरूर आपका बेटा मेरा बेटा है । ज्योतिंद्र ने कहा और सुनो जरा मेरी बीवी की भी खबर गुडी बोले जो तीन बेलो बोले आप फिक्र में करे जनाब, आपकी बीवी मेरी बीवी है । इत्तेफाक गरनिया बोले कहाँ यह वाला आपकी होती तो वैसे आपका दिल दरिया है और मान समंदर जरूरत है । मुझे गोता लगाने की बगल फॅार गया । ज्योतिंद्र ने दुबारा पनपने बोला जितना जो दिन मैंने कहा अरे फन बनी ये मिया बुड्ढी है और हजरत ये फन बनी है । कबूतर वाला मीडिया गुड बडी चकित्सा बोला आए आपका उधर वाले हैं नहीं है गुड बडी के पनपनी से मुखातिब होते ही ज्योतिंद्र वहाँ से किस लिए कोई बीस मिनट में घर पहुंचे । याद आएगी माचिस लाना तो भूल ही गए । फिर बाजार लाभ के रास्ते में देखा । पनपनी की जगह कोई दूसरा शख्स खडा है और गुड गुड मिया उसे अपना हाल सुनाया जा रहे थे ।

Ep3 - Fasionwad Zindabad

फैशन वाद जिंदाबाद ज्योतिंद्रनाथ प्रसाद ने कहा उस दिन नुक्कड पे मियां हजरत से आगे चार हो गई । वे हाथों में कपडों का बण्डल था में लग के जा रहे थे । ज्योतिन्द्र ने पुकारा मिया जरा दम बीमार लो ये अफरा तफरी क्यों? नियम अगर बोले अरे यार परेहज ये नए फैशन की पोशाक बनवाई है । डर है कि कहीं घर पहुंचते पहुंचते फैशन बदलना जाए । ज्योतिंद्र सोचे हद है गोया पॅन ना हुआ । रामलाल बनी का बाजार हो गया । कभी दाम आसमान में तो कभी जमीन पर और न हुआ तो अगर में सवाल है फॅमिली हवा बहती कहाँ है फिल्मी दुनिया से साथ माननीय यहाँ बडे बडे फैशन के ठेकेदार बसते हैं । कोई हीरो कहलाता है कोई हीरोइन । इन्हें हॉलीवुड वालों से जबरदस्त कॉन्ट्रैक्ट मिलता है । पूरी युवा पीढी को पेंशन से सरोबार कर दो । भारतीय संस्कृति के धरातल से उनके पास बुखार दो और युवा तो मानव गढने वो तैयार बैठे हैं नारा मिला है जो चाहे हम करेंगे । युवा मित्र बोले हाँ हम जो चाहे करेंगे हम नशा करेंगे । ज्योतिंद्र पूछा क्यों भाई? युवा दोस्त ने जवाब दिया हम तो अपने लोग में डेरा डंडा जमाना चाहते हैं । ज्योतिंद्र फिर पूछा क्यों इस दुनिया को क्या हुआ । युवा साथी बोले यहाँ बेरोजगारी है, भ्रष्टाचार है, उठा है, तनाव है और है चारों और फैला अंधकार हमारे पास एलएसडी, मारीजुआना, पॉर्ट्स वगैरह है जिन्हें जी पाल रखा नहीं की रंगीन संसार में जा पहुंचे । आप कहते रही है हमें पलायनवादी हम तो वही करेंगे जो चाहेंगे हूँ । हम बेलबॉटम नहीं पहनेंगे । जमाना इसका लग गया । आज की रिलीज एक फिल्म गाइरो नाइट ग्राउंड में डोनाल्ड ट्रम्प से हाथ मिला रहा है । हमारे नेता ट्रंप होता था क्योंकि इन्होंने हीरो की गुस्ताखी माफ की, फॅमिली आएंगे । कल को किसी हीरो ने गंजी बनियान के दफ्तर किया और रुक क्या? तो हम उसका नाइंटी नाइन पॉइंट नाइन परसेंट अनुसरण करेंगे । युवा रहबर बोलते गए । युग है शाहरुख खान का, न कि भीम पटक खलनायकों का तो हम जिम की तालीम छोड एंड्राइड पर आ गए हैं । जिस तरह जिम ने हमारे स्लिम शरीर को सी क्या पहलवान बना दिया, उसी तरह से हो सकता है एंड व्हाइट हमें मध्यम से बौना बना देता हूँ । हमारी साथी ने ऐसी पहुंचा के आ रही है जो छुपाती कम है । दिखाती अधिक सावधान । इन्हें देखकर वहाँ होती दलील देने की हिमाकत मत कीजिए कि जहाँ सारे की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं । अब सडक छाप मजनू निकला करते हैं । आगे आगे गर्ल्स पीछे पीछे दो महिला आते हम एक जमाना जल्द आएगा जब वे पीछे होंगी । हम आगे युवा यार बोलना जारी रखे थे । फिलहाल उनके मुकाबले हमें एक कदम आगे और दो कदम पीछे रखने हैं । अब यही देखिए हमने अपने वालों पर लगाम छोड दी है और वे सैंसर जैसी के लिए इसके पीछे पडी है । हम दोनों के बालों का पूंजीवाद और पोशाकों का सामने बाद ऐसा असर कर रहा है कि लोग बात धोखा खाए जा रहे हैं । फला जो जा रहा है वो लडका है । लडकी युवा कहते हैं अगर जा रहा है तो लडका और जा रही है तो लडकी दोनों के इस घालमेल का एक फायदा यह हुआ है कि उन की बजाय युवा लडके बाजार में अब प्रधान हुए जा रहे हैं । युवा संगीत ने आगे कहा, इस किडनेपिंग केस पर आप आंखें फाडे बैठे हैं । ज्योतिंद्र ने पूछा बरखुरदार, जिंदगी में कुछ बनने की भी सोची है । युवा ने कहा लाहौल विला कुवैत अरे साहब, हम तो बनके बने बैठे हैं, हमारी फॅमिली है और हम लक्ष्मण के कार्टून बनने को तो हम ऍम भी बनते जा रहे हैं । भले ही बालों का मेकप हमें इनकी और खींच ले गया हो । मगर वास्तविकता यह है कि फैशन की हवा मध्य कालिता से भी प्रभावित होती है । ज्योतिंद्र ने कहा, क्या घूम युवा संगीत बोले और क्या आजकल जोर है? पीत पत्रकारिता गा तो हम पी पत्रकार होने पर तुले हुए हैं । अब पत्रकारी तक किस चिडिया का नाम है? हमें क्या मालूम अरुण शौरी को मालूम होगा? इसलिए मैं पत्रकार होने से रह गए । जी से पी पत्रकार होना हो बुरा रात में पत्रकारिता वो ना जाने अपने वातानुकूलित कमरे में चरस के नशे में हम पीते पत्रकारी तक किए जा रहे हैं और कल्पित नामों से संपादक के नाम पत्र प्रकाशित कराकर वाहवाही लूटे जा रहे हैं तो यही पत्रकारिता की राजनीति है और राजनीति का दूसरा नाम ऍम ज्योतिंद्र चौके पर युवा मित्र बोले जी, यहाँ ऍम की हवा राजनीति की ओर से भी रहती है । एक समय था जब युवा कांग्रेस में होना फैशन माना जाता था । मगर यह ऍफ अलग झगडते बदल गया और अब जोर है मोदी का । इसलिए अगले आम चुनाव के मद्देनजर हमने दल बदलने का निश्चय कर रखा है । सुना नहीं पेंशन वाद जिन्दाबाद

Ep4 - Dainik Yatri

दैनिक यात्री ज्योतिंद्रनाथ प्रसाद उद्घोषणा करते हैं मगर रियल आ रही है यह जनता हमारी है ऐसे थोडे ही प्रवेश मिल जाएगा, थोडी धींगामुश्ती होगी और सवार होते होते हैं तो आप सिद्दीका शुरू हुआ नजर आएंगे । इसलिए जो दिन रहते हैं थोडी वर्जिश, मालिश कर लीजिए । हाँ, रेल की छठा क्या निकली है जैसे जगन्नाथपुरी की शोभा यात्रा निकली हो इंजन पर खडे लोग डब्बो की छतों पर बैठे और पायदान पर लाॅक कौन कहता है हमारे ही है हमारे मैंने उन्हें लू, शीतलहरी और वर्ष सबका खुला बजा देती है । तभी तो हम प्रकृति के पुजारी है जो तेजेन्द्रजी आगे कहते हैं भीड देखकर हिम्मत मदारी है । आपके चढने की कोशिश और लोगों के उतरने के हर बॉलिंग में आप का किला फतह हैं क्या? कहा वाले भाइयों ने दूध के तीनों और बहनों से रास्ता जाम कर रखा है और आगे गोयठे की टोकरियों को लांघना मुश्किल है । वही देखिए ये भी दैनिक यात्री है और आप भी । जब वे आपको बर्दाश्त किए हुए हैं तब भी उन्हें कीजिए ज्योतिंद्र जारी है । डीएमयू इंजन बिजली व्यवस्था है । गाडी खुल पडती है । दिल्ली हावडा से आने वाली ट्रेन घंटों लेट है मगर मोकामा से जा रही यहाँ ट्रेन हर स्टेशन पर रुकती हुई क्षण भर के लिए विलंबित नहीं होती । यह रेल मंत्री की कृपा नहीं देनी के यात्रियों का जोर है । फॅमिली के आगे सभी मिले चलते हैं तभी तो इसे मगर मेल जनता मिल कहते हैं ज्योतिंद्रनाथ मानो आपको सूचना देते हो बंकाघाट आ गया । ट्रेन प्लेटफॉर्म को पुलिस ने सील कर दिया है । मजिस्ट्रेट चेकिंग ना सरदार जी मजिस्ट्रेट के उपर स्थिति में बेटिकट गया । टिकेट धारियों के भी पसीने छूट जाते हैं । आजकल सरदार जी जम्मू कश्मीर ड्यूटी के डर से सिख मारे हुए हैं । बनाने के बाद नहीं । आप जल्दी में टिकट नहीं ले सके । कोई बात नहीं यहाँ दैनिक यात्रियों की ट्रेन है क्या मजाल की मजिस्ट्रेटी से छुट्टी ले पाकिर मोकामा से गुलजार बात तक के यात्रियों को पटना के दफ्तरों में समय पर पहुंचना है । मजिस्ट्रेट की शामत आई है जो मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डालेंगे । आप बेफिक्र बेटिकट चलिए बहुत लोग इस बहती गंगा में हाथ होते हैं । आप क्यों चुकाएगा? ज्योतिंद्र सुनाते हैं । अभी उसी दिन की बात है । कोई नया मजिस्ट्रेट होगा करती उसने बाईपास पर जैकिंग विद्यार्थियों ने बेल्ट चलाना शुरू कर दिया । दूध वालों ने बहंगी और दफ्तर के बाबू जी ने रोडेबाजी आरंभ कर दी । ऐसे लोगों पर पटरियों के किनारे बिछे पत्थर बहुत कम आते हैं । इस मोर्चाबंदी के सामने लाठीचार्ज ठहर मैं सरकार और जब तक कोई पक्ष मैदान छोड ता दोनों तरफ से खूब रक्तदान हुए । ट्रेन के शीशे चूर हुए तो अलग उस दिन केबिनमैन का सिर्फ भी फिर हुआ था । पटना साहिब में यह गाडी हो गई । आतंकी दिल्ली एक्सप्रेस यहाँ खुली न वहाँ खुली दोनों के क्यों कार्ड दिए गए । जल्द गार्ड की हजामत बन गई । फिर पब्लिक कैबिन मेन के मतलब की और वहाँ यह जहाँ वो हजार ज्योतिंद्र ने कहा यहाँ पर इंडिया एक्सप्रेस है बेचारी आदत से मजबूर पटना दो घंटे लेट आती है । बढिया क्यूल से देने की यात्रा करने वाले लोग इस गाडी से वापस हो रहे हैं । अगर आप सुरक्षित बर्थ पर सफर कर रहे हैं तो खबरदार बाइज्जत इन खडे बाबुओं को बैठा लीजिए वरना गाडी खुलते ही ये आपको उठा कर बैठा देंगे । वैसे भी रात का सफर है और आप नहीं चाहेंगे कि आप की जीवन यात्रा यहीं पर समाप्त कर दी जाए । पटना चाहे मैं सामान की बुकिंग पार्सल भान में नहीं, आपके बर्फ पर होगी । यहाँ व्यवसायिक दैनिक यात्रियों का विशेषाधिकार है आप क्या कंडक्टर क्या रेलवे पुलिस किसी को भी हस्तक्षेप की हिम्मत नहीं । बगल वाले प्लेटफॉर्म पर भोजपुर शटल विराजमान है । यहाँ मोकामा के लिए प्रस्थान करेगी । आसपास यात्री कसरत कर रहे हैं । कभी अपर इंडिया की ओर लगते हैं तो कभी भोजपुर सटल की और कंट्रोल का क्या दिखाना । शटल को ही पहले निकले गनीमत है उसने दोनों के सिग्नल लाल नहीं की है । अब इंडिया का ही सिकंदर होगा । एक्सप्रेस को सिग्नल दिए दस मिनट हो गए । इस शटल का भी सिकंदर झुक गया मगर ना गार्ड का पता है और ड्राइवर का गाडी लावारिस पडी है । जब की उद्घोषणा हो रही है गार्ड ड्राइवर फला डाउन आपका स्टार्टर सिग्नल लोअर है । आप खुली है पडता है । मालूम होता है कि गार्ड साहब का बक्सा नहीं आया है और ड्राइवर महोदय चाय पी रहे हैं । रात्रि सवा दस हो चुके हैं । ट्रेन के खुलने का सही समय नौ बजकर चौबीस मिनट है । मगर यहाँ कब खुलेगी यह पूछताछ दफ्तर वो भी नहीं मालूम । अभी पिछले ही दिनों दैनिक यात्रियों ने पूछताछ के सीसे वगैरह चूर कर कुर्सी दारियों के साथ जमकर कबड्डी खेली थी । मगर ये बाबू लोग भी लोह पुरुष है । चाहे इधर की दुनिया उधर क्यों ना हो जाए । क्या मजाल कि वे अपनी आदत से बाज आए । अब यही देखिए उधर यात्री उबल रहे हैं और इधर पूछताछ में साहब लोग मजे से सिगरेट के धुएं उडा रहे हैं और जाना गाडी तो खुल ली है और वहाँ खुलती भी । लेकिन अब इसका क्या कीजिएगा की खुली तो बडी शान से पर धमक पडी । लोहानीपुर के पास करन जाना है तो डिब्बे से नीचे जान किए । रेल की रक्षा वाहिनी के लोग गठरी में व्यस्त हैं । आखिर सुबह चाय पानी का इंतजाम तो करना ही है । उन्हें जब मेरी गाडी अंधेरे में अंधेरी की ओर जाएगी तो क्या होगा, इसका उन्होंने कोई ठेका तो नहीं ले रखा है । क्या आप चाहते हैं की दैनिक यात्री अपना घूमना भूलकर बंदूक धारियों के सामने मर्दानगी का परिचय

Ep5 - Waah Waah

वाह वाह ज्योतिंद्रनाथ प्रसाद में फरमाया जवानी की वाहवाही बडे बडे होने की है, जो आकर चली जाए वह जवानी देखी जो जाकर न जाए । वह बुढापा देखा और मसला मशहूर है कि जाने वाले की इज्जत धूम धडाके से होती है और डेरा डंडा डालने वाला सरे आम बेज्जत हो जाता है । वो हमें यौवन मिला, चर्चा हो गई । शौहरत यूरोप में पहुंची, वहाँ के हवाले हमारा स्वागत किया और हिप्पियों का एक डेलिगेशन हमें सु संस्कृत करने । यहाँ नाम का पहला पाठ हमें विरोध का मिला । इसे हमने अपने डेट पर आजमाया । एक दिन डेड बोले, बेटे उनको लाभ में कहते हैं नॉर्ड! ज्योतिंद्र ने कहा, कार्डो में गुलाब है । यूरोपीय मित्रों ने हमारी पीठ जमकर थपथपाई । वाॅरेन युवा राॅड तो मैं अपना सबका जल्द याद कर लेता हूँ । हमें वाहवाही मिलती गई और हम अपने प्रखर बुद्धि से उन्हें परिचित करा दे गए । ज्योतिंद्र में कहा, हम पोशाक पर आए । हमारी कोशिश रहेगी कि शरीर पर वस्त्र है, मगर तन दगा न रहे, इसलिए इस काम में हमारी गलफ्रेंड हमें मात दे गई । वेदो पोशाक के विरुद्ध जेहाद छेडने पर उतार हो गई । लेकिन ऊपर से निर्देश मिला ना नहीं । अभी नहीं । शायद उन्हें अभय था कि वे यूरोपियन की बजाय सीआईएम घोषित कर दिए जाएं । धीरे धीरे रीतिवाद के प्रवर्तकों ने ज्योतिंद्र सरीके युवाओं को अपने ही रंग में जंग डाला । इसके कारण बताए चारों और भूख और झूठ का साम्राज्य हाई । इसमें हमने कुंठा और तनाव को जन्म दिया है । वी ऍम भी नहीं झेल सकता, क्योंकि तुम्हारे यहाँ भी भीषण बेरोजगारी, हाई और ज्योतिंद्र नतमस्तक थे । टिप्णियों ने हमारे विनम्रता का ढोल विदेशों में पीट दिया था । इतनी होने आगे समझाया ये हे पे बात ट्राई ऐसा वैसा आवाज नहीं आई । दुनिया मैं यहाँ एक नोया भरम लाने का धो तक है । इसमें किसी जात का बंधन नहीं किसी समाज और घर का भूटान नहीं । इसकी सबसे बडी विशेषता है कि इसकी अपनी कोई विजेता नहीं । वी आर मॉल फ्री जो दिन जैसे युवाओं ने भी घोषणा की नहीं हम बिहारी है है न भारतीय । हम पृथ्वी पुत्र हैं तो डैड ने कहा हमने प्रतिनिधि की संतान है बेटे तो जो दिन जवाब दिया और ऍम कॉल में बेटा बेटा सुना नहीं हम कोई बंधन बंधन नहीं मानते । आप भी हमारे बाद में पास रख सकते हैं । डाॅ । चकित हो गए । बोले क्या सच तुम बोलो को भी आमंत्रित करते हो जो तीन साल में कहा, हम दुविधा में थे तभी मॉम डैड के पीछे पड गई और इस तरह हमारी वसुदेव कुटुम्बकम की भावना का रसास्वादन करने से हमारे डाॅट वंचित रह गए । ज्योतिंद्र में कहा अब हम पूरे पीछे फॅस के पैंट शर्ट झुके । कंधे पर बैग, बकरा, मार्गा, दाढी सर्वर, घने बाल और जेवरिया पर हरे कृष्णा हरे राम । अब तक यौन शिक्षा एक वर्जित फल थी । हमने इसे तोडकर बाबा धन का अनुसरण किया और जब हमारे पूर्वज विद्रोही तो हम क्यों पीछे जो दिन बोल दे गए । हमें संसार को धुलना था । अस्तु नजार जरूरी था । हमने ढंग से श्री गणेश करने की बात सोची मगर स्टैंडर्ड ले आया और हम रम बोर्ड विस्की की और मुखातिब हुए । जल्द ही हम इसके आदी हो गए । अब हाल यूज था की बोतलों पर बोतलें ढाले जाओ न जाएगी । लेटलतीफी फॅार हमने अभी उन का सहारा लिया था । जय हो चीनी बात चाहूँ कि क्या चीज ढूंढ निकाली । जरा सी ली रही की रंगीन दुनिया की सैर करनी आरंभ कर दी । अब हम अफीम पिकनिक में या तो किसी गार्डन में बडे होते हैं । ये अपने गेराज में ज्योतिंद्र बोले हम सीधे कॉम्पिटिशन में थे । जब ऐसे में हमारे अमरीकी मित्र दावा करते कि पंद्रह वर्षों के भीतर अमेरिका में एक एलएसडी राष्ट्रपति होगा । तब हम भी पिनक में मेज पर घुसे । मार मारकर कहते हैं, अगर क्या दस वर्ष के अंदर भारत में अफीम जी सत्य ना? जो इस मिनी इमरजेंसी का काम बाॅस मगलरों का कोर्ट हासिल कर दिया तो अब अफीम के अभाव में हमारे हालत यू हो गई । लेकिन एक दिन इसका गजब का समाधान निकल आया । हुआ यूं कि कोबरे हमें दस लिया । काजू हम मरे नहीं मत सर, वही लोड हो गया । ज्योतिंद्र आगे बताते हैं, उसके दस में से जो नजर आया, वह मत पूछिए । अब फिल्म से भी बढकर आनंद की प्राप्ति हुई । तब से हम कोबरे पालने लगे और उनसे स्वयं को दस वाकर कई गए । घंटों तक रंग बिरंगे लोगों की सैर करने लगे । विदेशी मित्र दंग रह गए । बोले वाॅल तुमने तो हमें भी मार दे दी । ज्योतिंद्र भूलकर बैलून हो गए कहाँ? आखिर यार किसके है? वहाँ के अखबारों में हमारा नाम हो गया । यहाँ इसलिए नहीं कि सेंसर था, कहते हैं दो बोलो का नशा है वाह वाह में यह नशा सर्जन अगर बोला हम स्वयं को भूल अपनी औकात नजरंदाज कर रहे हैं, जो तीन दिन में आगे कहा, मगर जब से डेमोक्रेसी नाम की किसी दुर्लभ संस्था वो यहाँ बचाने का प्रयास किया गया है तब से हमारे यूरोपीय मित्रों की सारी वहाँ हुआ ही हमारे कुछ राजनीतिज्ञ हम उम्र ले उडे हैं और वह नशा जो सचमुच साहब के दर्ज से भी बढ चढकर था । हम से उतर कर हमारे राजनीतिज्ञों पर चढ गया है । अब हमारी हालत खस्ता है । हमारी रंगीन दुनिया छीन चुकी है भारतीय हमें भारतीय मानने को तैयार नहीं यूरोपियनों को हम स्वीकार्य नहीं पता नहीं कहाँ त्रिशंकु की भांति हम लडके बडे हैं ।

Ep6 - Bhavishyafal

ज्योतिंद्रनाथ प्रसाद ने श्रोताओं का साप्ताहिक भविष्य कुछ युवा जा जन्मतिथि अनुसार पंद्रह मई से इक्कीस मई तक मेज चौदह अप्रैल से तेरह मई मूज मिलन कर आओ । सबसे चमचागिरी नहीं चलेगी । बॉस की सेक्रेटरी को पचाने में सफल होंगे । उद्योगपति काले धन का निवेश कर सकते हैं । राजनीतिक क्यों को दलबदल से मंत्रीपद मिलेगा । पुलिस डाके जेनी के बाद घटनास्थल पर पहुंचेगी ॅ मुँह चौदह मई से तेरह जून प्रेमिका से विवाह का उत्तम योग है क्योंकि बीवी दूसरे की हो जाएगी । किशोरियों का प्रेमपत्र पिता के हाथों पहुंचाने की आशंका है । दहेज कम मिलने से मुहम्मद हुआ है । आत्महत्या में विफल लोगों को इस लगन में शादी करके भी देख लेना चाहिए । मिथुन चौदह जून से तेरह जुलाई देश बर्बाद रहेगा, नेता और बाप तबाह रहेगा बेटा से जो अभी बाबा माध्यमिक परीक्षा में अपने उम्मीदवारों से चोरी न करा पाए उनके लिए पैरवी कराना अनुकूल होगा । यात्रा शुभ फलदायी रहेगी । यदि आपने मात्र गंजी जाएंगे हमें की तो शुभ या अशुभ घटनाओं से पाला पड सकता है । हो करके चौदह जुलाई से बारह अगस्त छत्रों से कोई चिंता नहीं मगर मित्रों से सतर्क रहे है । घर में अतिथियों का आवागमन रहेगा । इससे आपके स्वास्थ्य में गिरावट आएगी । पत्नी को साडी खरीद ही दे तो वरना उसके मैं के में बैठ जाने का खतरा है । ससुराल से हो रही है खासकर साली से जल्दबाजी की तो वहाँ पोलखोल देगी शादी जूता वालों के लिए यह हफ्ता रोमांस के अनुकूल है और सेहन चौदह अगस्त से तेहरा दिसम्बर या हफ्ता आपके लिए अनुकूल है । प्रेमिका के पिता जी आप की तलाश में बंदूक लिए घूम रहे हैं । आपसे संवाद करने को उत्सुक मिलेंगे तो उन्नति आपका इंतजार कर रही है । बस बॉस को अपने घर बुलाइए और एक और डिनर लगा लेने दीजिए वरिष्ठ अधिकारियों से आना आवश्यक झगडे में मत पड ये दृढता छोडी है और गिरगिट की तरह रंग बदलिये ऍम कन्या चौदह सितंबर से तेरह अक्टूबर यहाँ सप्ताह समस्याओं से भरा है । परीक्षार्थी कडाई के चलते आपका पेपर खराब हो जाएगा । खिलाडी टीम में चयन अनिश्चित है जब तक आप के चाचा जी । रोसैया पर हैं पदाधिकारी कर्मचारी तबादला बिल्कुल शुष्क जगह पर यानी ऊपरी आम नानी से शून्य स्थल पर होने जा रहा है । राजनीतिक गया वरीय पुलिस अधीक्षक बदलेगी कोशिश में आप को समर्थन नहीं मिलेगा आगे ज्योतिंद्र जी कहीं तुलना अक्टूबर से, तेरह नवंबर यह भाग्यशाली सप्ताह होगा आपके लिए ग्राम मोर्चे पर सुख और शांति मिलेगी । बेटे आपकी आज्ञा मानेंगे । गुटबंदी नए लेखकों को संपादक से स्वीकृति पत्र दिलाएगी । अपनी कविता पर बहस शुरू कीजिए । बाहर दे पर आलोचक आपको हथवार लेंगे । बेरोजगार बेकारी भत्ता में वृद्धि है, तू आंदोलन छेडने में सफल होंगे और वृश्चिक चौदह नवंबर से तेरह दिसंबर प्रेम में धोखा खाए लोगों को सलाह है कि ठंडी आहें भरना छोडी है और मैं एडवेंचर की खोज में लगी है । राजनीतिज्ञों को मध्यावधि चुनाव की घोषणा के पूर्व ही भाजपा में शामिल हो जाना चाहिए । कवि सम्मेलन में जाने के पूर्व किराये पर श्रोताओं का इंतजाम कर ले । ऍम चौदह दिसंबर से बारह जनवरी यहाँ हफ्ता शौहरत, शराब और सेक्स लबालब है । महत्वपूर्ण निर्णय न लें । अनअपेक्षित स्रोतों से कमाई मुद्रा अनअपेक्षित ढंग से जाएगी । स्थित लग रहे हैं विभागीय जांच का जब तक आदेश हो कुछ और घोटाला कर गुजरिए सट्टा बाजार में पीकर मत जाइए हैं जीतकर लौटेंगे और मगर चौदह जनवरी से तेरह फरवरी हसीनों को अपने दीवानों के साथ भागने के लिए यह सप्ताह अनुकूल ही अनुकूल है । प्लाज्मा टीवी और सेवन लटकार की मांग पर अडे रही है । लडकी वाले हाथों हाथ देंगे । विद्यार्थी जहाँ तक हो धीरे से कम ले साहब पार्टी नहीं से लिफ्ट मिलेगी । शांति वह सुव्यवस्था आपकी चेरी है क्योंकि पत्नी घर में और प्रिया ऐसी मन में है । कुम्भ चौदह फरवरी से बारह मार्च रोग भैया पर पडी । सास की तिमारदारी में भिडने का यही वक्त है । वह वसीयत आपके नाम कर जाएगी । कुछ बहुमूल्य शत्रु आपको देंगे । उधार पर चल रही गृहस्थी किनारे लग सकती है । विक्षुब्ध गुटके राजनेता अपना सरनेम हटा दें । मुख्यमंत्री जल्द हट जाएंगे । संधान सुख की प्राप्ति होगी । अगर बेटी हुई तो अभिनेत्री निकलेगी और बेटा हुआ तो नेता बनेगा । मीन चौदह मार्च से तेरह अप्रैल विफल आईएएस प्रतियोगी क्लर्क रेट की परीक्षा में उतरे बेडापार है । संसाल त्यागने वाले के लिए यह सप्ताह शुभ है । बॉस की झाड पर नौकरी त्यागने का विचार मत कीजिए । मैंने तो लगन से टांग खिंचाई में लगे रही है । सफलता आपके चरण चूमेगी । सेहत अच्छी रहेगी, भावुकता बढेगी और मानसिक तनाव तीव्र, तीसरी रेवाखंड ए अथवा राशीफल समाप्त

Ep7 - Jaati hi puchho sadhu ki

जाती ही पूछो । साधु की ज्योतिंद्र जी सोचते हैं, लोग धर्म बदल लेते हैं, राष्ट्रीयता बदल लेते हैं, यहाँ तक कि वे असार संसार बदल लेते हैं, मगर कभी अपनी जाती नहीं बदलते । कभी किसी को यह कहते नहीं सुना कि मैं जाती बदल रहा हूँ तो क्या सम्मोहन होता है जाती है कि लोग जिसे छोड दे ही नहीं । ज्योतिंद्र जी तो बाबा अंबेडकर के प्रशंसक हैं, जिन्होंने अनुसूचित जाति के ठप्पे से निजात पाने है । तू बौद्ध धर्म अपना लिया । वे तंग आ चुके थे । हरिजन कहलाने से कभी गांधी जी के आज पक्षियों के लिए प्रयुक्त हरिजन शब्द में गजब का आकर्षण हुआ करता था । स्वर्ण अछूतों से ईर्ष्या करते होते हैं कि वे भगवान के जान नहीं है । लेकिन अब तो दलित ज्ञानी जी को गालियां बकते हैं और बाबा अंबेडकर इस शब्द से इस कदर घबराये की उन्हें बुद्धम् शरणम् गच्छामि होना पडा । जोगिंद्र कहते हैं, मैं सराहता हूं, दक्षिण भारतीय निम्न वर्गों को भी जो कभी गरीबी से तंग आकर धडल्ले से ईसाई और इस्लाम धर्म अपना रहे थे, जो तीन दिन में भी जाती बदलने का फैसला कर लिया है, होता हूँ । यहाँ मत समझिए कि ज्योतिंद्र दलित शब्द से तवा है और घोर दरिद्रता से पीडित हैं । वस्तुतः है ज्योतिंद्र आपने बेरोजगारी से परेशान है क्योंकि इस युग में एक अदद नौकरी ही एकमात्र योग्यता है । अतः अपनी पीएचडी की उपाधि के साथ विभिन्न रोजगार दफ्तर का सडक छाप मजनू बने जो तिन दलितों के लिए सरकारी नौकरी में आरक्षण के प्रति चालू है । तो जिस रफ्तार से सरकार नौकरियों में उनके आरक्षण की अवधि बढाए जा रही है और जिस दृढता से उन्हें राष्ट्र की मुख्यधारा के साथ जोडने का उपक्रम कर रही है उससे भरे है कि कहीं ज्योतिंद्र का ही इस राष्ट्र से पत्ता साफ हो जाए । ज्योतिंद्र जी कहते हैं, हमारे वर्चस्व को यह चुनौती है कि देश समाज को चलाने का ठेका हमारे दिमाग को प्राप्त है । बला जो नाली के कीडे की तरह जन्म लेते हैं और उसी में बिलबिलाकर मर जाते हैं, उन्हें कहाँ से वह क्षमता प्राप्त हुई कि समाज में अगुवा बने पर नहीं । हमारी सरकार जिसका दिमाग इन जूतों के सानिध्य से दिवालिया हुआ जा रहा है तो है इन्हें ऊपर उठाकर देश को दिवालिया बनाने के लिए और दो और मंडल आयोग हम पर तलवार की तरह लटक रहा है । जो कुछ स्थान हमारी मेरा के लिए बचता है वह पिछडी जाति हर अपने को तैयार बैठे हैं और उनके आरक्षण से दो हम बिहार में नौकरी से हाथ धो बैठे ही थे । अब केंद्र से भी पत्ता साफ ही समझ है । अब हम आंदोलन छेडने पर बात ये है कि हमें भी आरक्षण जो हमारा अस्तित्व खतरे में है । जब एक साला दिमाग कॉम खतरे में हो तो संपूर्ण राष्ट्र खतरे में पड जाता है लेकिन खतरे की घंटी जबतक सरकार को सुनाई देगी हो सकता है जो केंद्र नौकरी पाने की उम्र सीमा लांघ जाए । अपने इस फैसले पर ज्योतिंद्र पडी है कि इस बार प्रतियोगिता परीक्षा में है, अनुसूचित जाति के उम्मीदवार के रूप में ही उतरेंगे । ज्योतिंद्र बोले अब पछतावा है कि क्यों झूठ से स्वर्ण की और रुख किया तब शायद सोचा था की जिंदगी में हीन भावना से ग्रस्त हूँ और समाज में जो गरिमा स्वर्ण को प्राप्त है वह मुझे मिले इसलिए अपने मूल जाती छिपा ली और स्वयं को कायस्त कहना शुरू किया होता हूँ । पूछ सकते हैं कि कायस्थ बनने में क्या तो मिया राजकोट बोलों और अपनी सफाई चढ मुझ पर ताऊ देकर तथा आप इतनी सी बुलाये भडकाकर झूठी आन बान चंद लगा लो अथवा गर्दन में जान लटकाकर दूसरों से पाय लागू सुनने का सुख प्राप्त करुँ । आज नहीं जनाब कायस्थ जाति में जानेंगे । जो फायदे हैं वे और कहा यहाँ चमचागिरी करके सबको खुश रख सकते हैं राजपूत को तथा ब्राह्मण और भूमिहार को भी एक साथ इन दिक्कत जातियों की दम मिलने वाली है और कोई कौन ज्योतिंद्र नहीं देखी है । पहले की बात और है तो तब कायस्थों की बौद्धिक वर्ग में सानी नहीं थी । पढाई ही उनका पेशा थी । अब तो पढाई की पूछ भी नहीं रही है । जिसकी लाठी उसकी भैंस और जिसका उल्लू उसकी लक्ष्मी वाला जमाना आ गया और कायस्थ जैसी फटीचर बिरादरी के पास ये दोनों कभी नहीं भटकी । इसलिए ये इसकी कमी ब्रह्मणों कि शास् टन दंडवत करके और राजपूत भूमिहार भाइयों के तलुए सहलाकर पूरी कर लेते हैं । शेयर का झूठ भी मिल जाता है और भूमि मुझको का । प्रसाद जी यू, राजपूत और भूमिहार कभी एक दूसरे को फूटी आंख भी नहीं हुआ है और हम है जो इन दोनों को लडाकर सिर्फ फुटबॉल का मजा लेते हैं । लडते वक्त राजपूतों को महाराणा प्रताप याद आती है तो भूमि आरोपों अपनी छीनी जमीदारी राजपूत हुआ है जिसके सामने अपनी मूझे एंड दीजिए फिर वहाँ छज्जे पर भी खडा रहे तो कूद पडे । ज्योतिंद्र बताते हैं, यो जाती बदलने के अभियान से जो दिन अपने क्षेत्र में शक की नजरों से देखे जाते हैं, उनकी वास्तविक जाती क्या है? यह खुद ज्योतिंद्र को नहीं पता तो अन्य लोगों को कहाँ से होगी? वैसे यह निश्चित है कि ज्योतिंद्र मानव जाति है, भले ही उनमें मानवोचित गुण न हो । यह अभी निश्चित है कि वह पूर्व से जाति से संबंधित हैं । हालांकि ज्योतिंद्र को रविंद्र जी की तरह पुरुष होने का दुख नहीं है । ज्योतिंद्र को तकलीफ इस बात की है कि लोग उनकी जडे खोदने को हर वक्त कमर कैसे रहते हैं । जो दिन याद करते हैं, अभी उसी दिन की बात है । सिंह जी से नया नया परिचय हुआ था । वे आयकर निरीक्षक है । बार बार अपने घर आये वालों का छापा पडने से तंग आकर ज्योतिंद्र में उनसे दोस्ती की थी, जो तीन दिन उनकी मित्र मंडली में एक जवाहरात थे क्योंकि मंडली में उन्हें छोड उनका और कोई भूमिहार जात भाई नहीं था । लेकिन अचानक जब उन्हें पता चला कि जो केंद्र जातिविहीन है तब उन्हें जमीनों होना पडा । अब वे ज्योतिंद्र की तलाश में बंदूक लिए फिर रहे हैं । अक्सर जाती का बता टाइटल से हो जाता है जैसे सिन्हा, सिंह, फंदे, राम यादव इत्यादि । पर ज्योतिंद्र पर यह फार्मूला लागू नहीं होता होता हूँ । वे अपना नाम बस ज्योति बताते हैं । और जब टाइटल बताने को कहा जाता है तब जवाब होता है आगे नाच न पीछे पंगा । दरअसल अपनी जाति के बारे में अटकलें लगाने के लिए नौ परिचितों को ज्योतिंद्र स्वतंत्र छोड देते हैं । सुविधा अनुसार ज्योति प्रसाद, ज्योति सिन्हा, ज्योति राम जाती में वे उन्हें पीट करने लगते हैं । यहाँ तक तो ठीक है, पर जब ज्योतिंद्र भी अपनी सुविधाओं पर उतर जाते हैं तो कभी कभी विचित्र स्थिति पेश हो जाती है । रमादान बाबू को ज्योतिंद्र यदुवंशी समझा था और उन्होंने ज्योतिंद्र को राणा प्रताप का वंशज इस खुशफहमी के साथ साथ खाना बैठना और सरजूबाई के छज्जे पर पांच गिलोरी लेना तब तक होता रहा जब तक ज्योतिंद्र रमाकांत आपने भ्रमजाल से बाहर जाकर एक दूसरे की चंद गंजी करने दो जूते पानी में भिगोने ना लगे ।

Ep8 - Chal Khusro Ghar aapne

चल खुसरो घर आपने ज्योतिंद्र सुनाया । संवाददाता सम्मेलन में नेता जी से किसी धमाके की उम्मीद थी पर हुआ टाइट आए फिर मैं द्वार से आमरन मौन अंचन करने जा रहा हूँ । नेता जी के श्रीमुख से इस योजना के निकलते ही दो हजार संवाददाता खिसक लिया । ज्योतिंद्र दे रहे हैं । उनकी निगाह निमंत्रण देते मिठाई व नमकीन की तश्तरियों पर खडी थी । यहाँ तो देश का अहोभाग्य है कि आप जैसे नेता आमरण अनशन कर रहे हैं । राजनीति पर आबादी का कुछ अधिक भारत योजना ज्योतिंद्र कहा वैसे यहाँ खुराफात आपको क्यों कर सूजी नेताजी ने कहा देखिए मेरा आमरण अनशन इस बात को लेकर है कि देश का अनाज कहाँ जा रहा है, वह तो आपके पेट में जा रहा है । किसी ने छूटते ही कहा बहुत सही थी नेता जी की तो उन का घेरा दो मीटर व्यास लिया था जो मुश्किल से सोफे में धंसा पडा था । मेरी मान है नेता जी हाँ के सरकार इसपर एक उच्चस्तरीय जांच आयोग बैठाये । आखिर इतना अन्य उत्पादन यहाँ होता है ऊपर से इसका निर्यात होता है । फिर हमारी प्यारी जनता हूँ की क्यों मार दी है? मेरे दादा जी मायूस हो गए किसी संवाददाता ने छेडा उन्हें आपको किसी पर शक है मुझे आईएसआई पर साथ है । हम सभी नेता जी का बयान कलम मध्य करने को चुके । मेरा ख्याल था एक पत्रकार कलम बद्ध करने को झुका । मेरे ख्याल था एक पत्रकार कहीं से चीखा आप आत्मप्रचार है तू कोई और सबूतों जोडते । नेताजी हत्थे से उखड गए । आप अपने को क्या समझते हैं देश का हम सवाल है यहाँ इस पर आज तक आमरण अनशन नहीं हुआ प्रचार तो इसमें भी मुझे मिल शांतम पाप अम् शांतम पार्टम नेता जी म्यान से बाहर नहीं मैंने टोका वे चुप हो गए । अनशन के तीन दिनों बाद जो देवेंद्र उनके दल के मुख्यालय में थे, बडे बडे पोस्टर लगे थे जैसे नेता दे रहा कुर्बानी पहुंचाओ, उसको राशन बनी आईएसआई तुम बाजाओ नेता की इज्जत बचाओ आदि हूँ । आज भी के नाम पर वहाँ कुत्ता हो रहा था । वे गांव तकिया लगाए लेते हुए थे और करा रहे थे । मेरे आगमन से उनमें बिजली भर गई । बाद में मालूम हुआ उनके अनशन कालका जो दिन रही पहले आगंतुक थे, हम प्रेस से बात कर रहे हैं । नेताजी फुसफुसाए अपना हम लोगों का दुर्भाग्य है । जो तीन फिल्में खेद व्यक्त किया उन्होंने सिरहाने पडे अखबारों की और इंगित करके कहा, सभी में मेरे अनशन का फ्लैट है तो तुम्हारे अखबार में जिक्र ही नहीं क्या कीजिएगा । ज्योतिंद्र ने कहा मेरा अखबार देशभक्त नेताओं कि कर रही नहीं करता । आपको किसी अन्य गोदाम में अनशन करना था । देशभर ज्यादा जोर पडता भी कहते हो । यहाँ मेरे हेल्थ पर जोर पड रहा है । नेताजी ने कहा तो ज्योतिंद्र में जोडा वजन घटाने का यह चल उसका है । नेताजी बोले डॉक्टर कहता है हम नौ किलो घट गए हैं । शुरुआत अच्छी है यह कहकर थोडी देर ज्योतीन्द्र चुप रहे । नेताजी सुनने में ताक रहे थे जो दिन नहीं निस्तब्धता तोडी । जवाब राज्य बाजार समिति के अध्यक्ष थे । आप पर अनाज के भारी घोटाले की एक जांच समिति बिठाई गई थी । उसका रिपोर्ट प्रकाशित होने वाला है । छोडो यार सब मुझे जाने की चाल है । नेताजी ने कल के बंद कर ली । वे निदाल हो गए और धीरे धीरे कराने लगे । अनशन का सातवां देना ज्योतिंद्र पूछा मेदा जी आप अभी जिंदा हमने समझा शहीद हो गए । नेताजी वास्तव में मौन धारण कर चुके थे । बोलने की शक्ति छूट गई थी । आपके कामरेड लोग है जो केंद्र ने इधर उधर देखकर हैरानी से कहा था । नेताजी ने पास बुलाया और कान में अस्फुट स्वर में बोले फॅस साले होते हैं जो केंद्र चकित हुए क्यों क्या हुआ हूँ? नेताजी फिर कराये । मैं नहीं नहीं दल से निकाल दिया है हैं । ज्योतिंद्र का मुख्य खुला का खुला रह गया जहाँ समिति के रिपोर्ट में मुझ पर देंगी का मामला है । नेताजी ने कहा ठीक है तो कहते थे ज्योतिंद्र बोले बात कहते थे मैं दम निकल रहा उन्हें रिपोर्ट सूझती जो दिन उनके मुख से ट्रांसट्राय स्थिर रहे । सोनो नेताजी ने कहा जी जो दिन बोले तो दस पांच आदमी पब्लिक से किराये पर ले लो । उनकी तरफ से मुझे नारंगी काॅस्ट देकर मुझ से अनशन तोडने का अनुरोध करो । यह कहते हुए की आप की मांग ऍम अब जनता की मांग है बहन के लिए मुझे मार देने से बचा लो नेताजी बुरी तरह हाँ आपने लगे ज्योतिंद्र ने कहा यहाँ सब कसद करने की क्या जरूरत है? नेताजी आप उठिए खाइये दीजिए मैं अखबार में लिख दूंगा की जनता जनार्दन और गणमान्य नागरिकों के अनुरोध पर आपने आमरन मौन अनशन तोड दिया । आप शीघ्र ही सरकार में अपनी मांग मनवाने के लिए गुजरात स्तर पर एक शांतिपूर्ण आंदोलन छेडेंगे । ठीक है और जो नेताजी कूद कर खडे हो गए

Ep9 - Kavi Sammelan

असली कवियों से क्षमा याचना के साथ ज्योतिंद्र प्रसाद कहते हैं कविता लिखता हूँ और क्या लिखता हूँ यहाँ मेरी समझ से बाहर है । लोग मुझे समझ लेते हैं । मुझे उनकी फिक्र नहीं लेकर अपनी है कि मैं अपने ही नहीं दूसरों की कविता भी समझ नहीं पाता । इजहार यही करता हूँ की खूब समझता हूँ । एक दिन मेरा दोस्त जिसे कविता से कोई सरोकार नहीं, कुछ कविताएं लेकर मेरे पास आया है । वो बोला यार न तुम्हारी कविता मेरे पालने पडी और नाइन साहबों की भी समझा दो । ज्योतिंद्र ने कहा जिंदगी में अब तक कौन सी कविता तुम्हारे पालने पडी है? प्यारे दोस्त बोला मसखरी छोडो यार, आजकल कविता का बाजार गर्म है । अपनी इज्जत बचाने के लिए कविता का सामान्य ज्ञान होना जरूरी है तो मैं समझा तो ज्योतिंद्र ने समझाया, हम लोगों की कविता समझने के लिए तुम्हारा बौद्धिक धरातल वैसा होना चाहिए । ऐसा मित्र ने मोहबा दिया । तुम्हें कविता न समझने की समझ होनी चाहिए । ज्योतिंद्र ने कहा मित्र बोला समझा नहीं, जैसे तुम जिन्हें कविता समझ रहे हो, वह कविता नहीं । ज्योतिंद्र ने कहा कविता नहीं, संगीत अचकचा गया नहीं । ज्योतिंद्र बोले । फिर क्या है? मित्र ने पूछा । ज्योतिंद्र ने जवाब दिया, पता नहीं वैसे कहते इसे कविता ही है दोस्त हक्का बक्का रह गया वह कभी मुझे देखता हूँ कभी मेरी कविताओं को उसने कविता को भद्दी गाली दी और चलता बना ज्योतिंद्र को अफसोस है वह कभी नहीं बना ज्योतीन्द्र मुशायरे की और चल पडे अखबार रेडियो टीवी में इस विज्ञापन के बावजूद कि कवियों को भाडे पर श्रोता चाहिए । सारा पंडाल खाली पढा था मंच पर जनवादी, कभी प्रयोगवादी, कभी छायावादी, कभी लम्बे, कभी नाते कवि, कवि और गैर कभी सभी थे । ज्योतिंद्र ने अपना अलग आसन जमाया । लोग कहते हैं जो तीन रजीत सब कभी है अर्थात उनकी कविता में सब बात है धन्य है वे धन्य है जो दिन रही कविता पार्ट शुरू हुआ था वहाँ हुआ के शोर के बीच बैठ जाओ का स्वर भी उभर जाता था जनवादी कभी उठा और बोला था तेरे रूप जाल्को चाहिए तेरे रूप जाल्को चाहिए मेरे नारे हवा में उठी मेरी मुट्ठियां वगैरह वगैरा वहां बैठा तो छायावादी ने माइंड पकडी तीन रसीले होटों पर लगूँ कैसे आया इनका खाती लाखों में सुरमई कैसे छाया चंद्र मुख पर यहाँ आक्रोश क्यों? मैं हिंदी रचे हाथों में तो क्यों इसके पहले की मैं भाग जाऊं सुंदरी बता दो तुम कौन हो? धर्य ठहरिये जनवादी कभी बोला आप मेरी कविता क्यों पढ रहे हैं वो ना पडो छायावादी कवि ने हाथ ना चाहे अपने मेरी कविता चुराकर जो पढ रही है तुम चोर हो तुम चोर हो मैं चोर हूं के आरोप प्रत्यारोप में छायावादी और जनवादी कभी उलझ गए । आगे यह तकरार चली की इन दोनों ने एक दूसरे की कविता का सत्याराज कर दिया है । छायावाद में जनवाद और जनवाद में छायावाद के अतिक्रमण हो गया । जनवादी कभी उलझ गए । दोनों की आस्तीनें चढ गई । इस बीच प्रयोगवादी कभी बोला यह समाजवादी कविता है । जनवादी और छायावादी कवियों ने प्रयोगवादी को उठाकर पटक दिया कभी और लम्बा कभी उनकी तरफ लपके । पर गैर कमीने जो डील डॉल में सबसे भारी था उन्हें बीच में ही उल्टा डांडिया मंच पर प्रति विश्व युद्ध का विकेट दर्ज देखकर संयोजक दुम दबाकर बहुत खडा हुआ । बहुत मुश्किल माइक ज्योतिंद्र के हाथ में आई है वेज लाए कविता तुम कहाँ हो यहाँ नहीं वहाँ नहीं जहाँ नहीं वहाँ नहीं कविता तुम कहाँ हो तो मैं नहीं तुम नहीं तुम सिंह नहीं दूर नहीं कविता तुम कहाँ हूँ हम यहाँ है एक आवाज आई ज्योतिंद्र तथा उठा पटक में लीन कवियों की नजरे उधर गई एक आदमी घुटनों तक धोती बांधे और मैली कमीज पहने पांडाल के बीचोंबीच खडा था । नहीं तुम दोनों । ज्योतिंद्र ने पूछा हम पांडाल और लाउडस्पीकर गिराएंगे । उस इंसान ने कहा । जब जो दिन घर लौटे तो कभी मित्र को इंतजार की घडियां गिनते पाया । उनकी बातें खेली थी । किसी पत्रिका में उनकी कविता छपी थी । उन्होंने प्रति ज्योतिंद्र जी को धमाकर आग्रह किया कि ज्योतिंद्र उसे खरीद ले पर यह तो मुफ्त में बढती है । एरोड्रम पर ज्योतिंद्र सकुचाए पर वो पीछे पड गए ज्योतिंद्र रूपये निकाल कर देने बडे मेरी कविता पर अपनी प्रतिक्रिया पत्रिका को भेज दीजिएगा । यार ने आगे कहा, पर जो एनर्जी ने सुझाया भी प्रतिक्रिया सुन लीजिए नहीं आप संपादक को लिख दीजिएगा । इससे मुझे आगे चांस मिलेगा । मित्र ने कहा मगर यह तो गुटवादी कविता हुई । ज्योतिंद्र में कहा रहबर बढ गए आप कौनसे गुटनिरपेक्ष हैं हम नहीं जानते क्या आप जो पत्रिका संपादित करते हैं उसमें सिर्फ अपने लोगों को छापते हैं? छदम नाम से प्रशंसा पत्र प्रकाशित करते हैं । रह रहे आपको जाने से बाहर होने लगे लीजिए, पान खाइए और गुजरात होगी है । ज्योतिंद्र ने उन्हें पुचकारा और कहा काम जरूर आपकी प्रशंसा लिखेंगे । भला हम एक दूसरे को न उठाएंगे तो किसी उठाएंगे । हमें वो टवादी नहीं बल्कि सहयोगवादी कविता का है तो ज्यादा बेहतर होगा । आपका क्या ख्याल रहे हैं तो मित्रवर्ग कोई ख्याल व्यक्त नहीं किया । चाय बात हजम कर रास्ता नापते नजर आएगा । अगले दिन रास्ते में गुरुघंटाल मिल गए । उन्हें सर्वोच्च साहित्यिक पुरस्कार से सम्मानित किया गया था । ज्योतिंद्र ने उन्हें बधाई दी कि वे भूखे मरने से बच गए । दोस्त बोले, मिया! न पूछो कविता में हमने क्या क्या पापड न पहले बूढे से गूल कविता लिखते लिखते मेरी टांगे कवर में पहुंच गयी । पुरस्कार का श्रेय तो मेरे चार साल के बच्चे हो जाना चाहिए क्या? ज्योतिंद्र चौके हाँ, उसकी कविताएं मैंने अपने नाम से पुस्तकाकार छपवा दी थी और दो लाख का पुरस्कार बालिया कविता की बानगी देखो कविता सुबह उठती है दोपहर झडती है, शाम में खुशहाल रात में सो जाती है ।

Ep10 - Bade BeAabru Hokar

बडे बेआबरू होकर राजधानी में सुखमय जीवन व्यतीत करने वाले के बारे में ज्योतिंद्र के एक मित्र ने क्या खूब कहा जिसकी नौकरी पक्की और घर अंगना है उसकी पांचों उंगलियाँ घी में और सर कडाई में है । था तो भाग्य वैसे ज्योतिंद्र जी को भी एक अदद पक्की नौकरी प्राप्त है पर दुर्भाग्य वर्ष अपना मकान नहीं हूँ । अगर बहन अपने पैरों पर खडे होने की जिद नहीं करती तो हम दो नौकरी, पैसा भाई, कभी किराये के मकान के लिए दर दर की खाक नहीं जानते हैं । हमारा दफ्तर चुकी फ्रेजर रोड के पास है अस्तु ज्योतिंद्र वहीं कहीं दे रे की खोज में थे देहरादून नहीं मिला पर मिल गए होटल में कार्यरत एक बंदूक लगाए ज्योतिंद्र चांदमारी रोड गाये चक्कर । बंधू बोले वो मौका पलासा आपको भाई जी ने ढूंढ कर दिया था । ये मौका भी बंद हुई, दिलाए थे कुछ मकानों को इंगित करते गली कूचे से निकलते हुए बताते जा रहे थे और जो देवेंद्र गोद में भांजे को लिए मुड मुडकर अपनी बहन को लस्त पस्त आते देखता उनका अनुसरणकर्ता जा रहा था । बहन से जब रहना गया तो पूछ लिया उनसे भाई साहब क्या बात है मकान के लिए लोग आपको ही पकडते हैं । बहन जी आप नहीं जानती ढूंढने से भगवान मिल जाते हैं पर यहाँ मकान नहीं बंद बोले जिस ढंग से ये मियां कुछ डेरों में प्रवेश कर जाते हैं और किरायदार अथवा मकान मालिक से बातें कर ब्लॅक हमारे पास आते उससे मुझे लगा कि अगर ये होटल की नौकरी छोड दिल्ली में किराये के मकान की दलाली करने में लग जाते तो अच्छा बिजनेस करते हैं । दिल्ली में मकान मिलना आसान है, आप दलाल के पास जाए और जिस क्षेत्र में जिस किराये पर आप देना लेना चाहे मिल जाएगा । मगर पटना में लाहौल मिला हुआ चांदमारी रोड में हमारी कई दिनों से दौड धूप जारी थी कि कंकडबाग में एक प्लेट के खाली होने की खबर मिली । ज्योतिंद्र मकान मालिक के दरपेश थे अच्छा दो आपका एक ही बच्चा है । मकान मालिक ने भांजे को पूछ करा आपकी शादी कब हुई हूँ आप लोग कहाँ के रहने वाले हैं । जोगेंद्र में बडी शांति से कहा देखिए ये मेरी बहन हैं । मकान मालिक ने हाथ जोड दिए और दाद निंबोरकर कहा माफ कीजिये बहन मैं शादी शुदा किरायेदार चाहता हूँ । जब ज्योतिंद्र और उनकी बहन लौट रहे थे तो ज्योतिंद्र ने कहा सुनो जामा है । फिर श्यामा ने हुंकार भरी थोडी देर के लिए मेरी बीवी बन जाओ । जो भी निर्णय कहा और फिर एक झटके में ही चांदमारी रोड में किराए का मकान मिल गया । यहाँ दे रहा है या सर्च वाने की जगह कमरा बक्से को भी मात कर रहा है । न धूप ना हवा और खिडकी कहीं आडी तिरछी सलाह हैं तो पल्ला गायब, कहीं पालना है तो सलाह है नजारा छत इतनी नीची की जो तीन रोज शाम के सर कंडील ओ से टकरा टकराकर खुद सख्त कंडील बने गए । इस कबूतर खाने का किराया मुश्किल से एक हजार पचास साठ रूपये होगा जबकि मकानमालकिन उनसे दो हजार एक सौ दस रुपये लेती है । श्यामा झल्लाई और दूर ना यहाँ कि बिजनेस शुल्क अलग से अगर उस दिन दहाडे नहीं होते तो कब की लाइन कार्ड देती । दिन नहीं तारे दिख गए होते हैं । देखो जामा ज्योतिंद्र ने समझाया । इस जैसे दडबे में अठारह लोग बचते हैं । जिन्हें शहर में डेरा खोजना है, वे ही सर छुपाने आते हैं । हमें भी सब्र का परिचय देना चाहिए । मगर पहले ही हफ्ते में धैर्य छूट गया । ज्योतिंद्र और शाम को क्या पता था कि चांदमारी रोड में बंधु लोग चंद भी गन्दी कर जाते हैं । बेचारा पत्रकार भी जी वही होता है आधी रात होने को है । खरामा खरामा चले आ रहे हैं । जो केंद्र चाॅद पुल से अचानक दो यमदूत प्रकट होते हैं । ज्योतिंद्र उसे घडी उतार कर देते हैं । मोबाइल कमाते हैं सूट उदार कर देते हैं उन्हें क्या गंजी जाएंगे से भी हाँ दोनों जो केंद्र स्वयं से सवाल करते हैं फिर जवाब देते हैं भाई लोग कद्रदान है जाडे का मौसम जो है लुटेरे बंद होगा क्या? पुलिस तो उनसे खुद डरती है, कहीं उनकी बख्शी से बंद हो जाए । चांदमारी रोड में चादर गंजी नहीं करानी कुमारा आदमी है भावी बीवी बेवा हो जाएगी मगर इस बीवी का क्या करेंगे जिसके चलते यहाँ मकान मिला है और जो वस्तु है ज्योतिंद्र जी की बहन है भैया मकान मालिक के मुख से दुल्हन सुनते सुनते कान पक गए शाम कहती है और सुनो नहीं या वह पडोस में जो मुझे वाला मनोज रहता है वहाँ हमारे शहर का है । आज उसने मकान मालिक से हमारे सात पुश्तों की बखिया उधेड दी कि ये बंगालन है और तुम बिहारी हूँ हैं । बातें यहाँ तक पहुंच गयी ज्योतिंद्र चाहते हैं तुम मेरा दो नंबर का माल लो । अगले रोज पुलिस का छापा पडता है । बगल वाले कमरे में कोई मुसलमान औरत रहती थी, उसके तथा कथित शहर नहीं जिसकी वस्तुतः वह रखेल थी । रबड लिखा है कि उसकी बीवी लापता है जबकि माजरा यह है कि हजरत नहीं छोड दिया था और किराया न चुकाने के कारण मकानमालकिन ने महिला को निकाल दिया । बहरहाल मकान मालकिन को अंदर होना ही था तो वो हो गई तो भाग्य से वहाँ बूढी है और ऐसे घोटालों में हवालात की हवा खाने का अच्छा खासा अनुभव है । ज्योतिंद्र सोचते हैं भगवान तुम्हारा भला हो तुमने मुसलमान नहीं का चक्कर चलाया । अगर मामला हिंदू औरत का होता तो जो दिन दिन अंदर होते और बढिया बाहर बहरहाल किरायेदार इन चटकारे लेते नहीं सकती है । रियो लाडो इस बार के छापे में तू भी बरामद हो जाएगी । झबरा सामान ठेले पर लगा रहे हैं जो दिन और शाम यहाँ मकान गली कूचे छोडे जा रहे हैं । कहाँ जायेंगे साथ में आंटी है जो केन्द्र के एक सहयोगी ने इन से परिचय कराया था । अपने किराये के घर के बगल वाले मकान में इन्होंने ज्योतिंद्र और शाम का इंतजाम किया है । मकान मालिक को सूचित कर दिया है कि वेन के रिश्तेदार हैं । अभी अभी कानपुर से यहाँ तबादला हुआ है । मकान मालिक राजी नहीं था नया किरादार रखने के लिए । इसलिए पुराना किरायेदार अगले दरवाजे से घर खाली कर रहा है और ज्योतिंद्र जी का सामान पिछले दरवाजे से प्रवेश कर रहा है । याद आ रहा है चचा गालिब का एक शेर बडे बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले ।

Ep11 - Baazar Bhav

बाजार भाव ज्योतिंद्रनाथ प्रसाद याद दिलाते हैं आपने सुना होगा लोगों को कहते हुए जो मियां बडे कटे कटे से नजर आते हो, भाव बढ गया लगता है तुम्हारा फिर भी उनका भाव बढा हुआ है । जी हां दहेज के बाजार में अभी उसी दिन कुछ लोग रिश्ते के लिए आए हुए थे । बात लेन देन की चल रही थी । पिताजी से आता ज्योतिंदर जी का लगाए सुन रहे थे । पिताजी दस लाख रुपयों पडे थे । अरे भाई लडका अंग्रेजी में स्नातक है और पत्रकार भी है । देखने में बुरा नहीं तो जो मर्जी की कीमत दस लाख रुपए हैं, वे फूल कर कुप्पा हुए जा रहे थे तो चलो कुछ तो ऐसा हुआ अपने अस्तित्व का । मगर जिस बात पर वे आश्चर्य से मोबाइल था, वहाँ ही दहेज के बाजार में पत्रकार का भी मूल्यांकन होना । अब तक तो इंजीनियर, डॉक्टर और आईएएस अफसर ही मैदान में थे । भला पत्रकार कब से बहुत बडा जो दिनकरजी अपनी जवानी की याद में खोए हुए हैं । आईएएस अफसर की कीमत पचास लाख रुपए हैं । यहाँ तो वे उन्हें दिनों जान गए थे । जिन दिनों आईएस उम्मीदवार थे, डॉक्टर इंजीनियर तीस लाख रुपए ऊपर चल रहे थे । बहरहाल वो भी क्या दिन थे जब ज्योतिंद्र जी आईएएस उम्मीदवार थे । रिश्तों का तांता लगा था । पच्चीस लाख रुपये तो अग्रिम ही मिल गए थे । पूरा हो संघीय लोकसेवा आयोग का, जिसने प्रिलिमनरी टेस्ट लागू किया और वे पहले ही इस तेज में प्रतियोगिता से बाहर हो गए । मार्केट में ज्योतीन्द्र जी की साथ गिर रही थी संभाला पत्रकारिता ने दिल्ली के एक समाचार पत्र में वे नौकर हो गए और यहाँ पिताजी गिरे थे लडकी वालों से । उस वक्त न तो उन्हें शादी में रूचि थी और मैं पिताजी को बेचारी लडकी वाले फतुआ से दिल्ली और दिल्ली से फतवा स्टर्लिंग करते । पिताजी कहते बेटे से पूछिए । यहाँ उसका मामला है और ज्योतिंद्र कहते पिताजी से स्वीकृति लीजिए । आखिर उनका आज्ञाकारी पुत्र जो है ज्योतिंद्र कहते हैं एक बार तब फिर उनका मान नीचे गिर गया जब उनकी मति मारी गई और दिल्ली छोडकर घरघुस्सु बंद पडने के एक दैनिक में आ गए । बस उनका रेट घटकर पच्चीस से बीस लाख रुपयों पर आ गया हूँ । लेकिन यह तो उनके पिताजी की व्यवसाय निपुणता का ये की ज्योतिंद्र को भेजकर नगर दस लाख रुपये बल्ले आए हूँ । अपनी तरफ से भी अपना भाव बढाने में जो तीन कोई कसर नहीं छोडी । दिल्ली के कई समाचारपत्रों में जो साक्षात्कर दिए थे उनका खासा प्रभाव कुटुम्बजनों पर छोड कर रहा । फिर अपनी आईएस उम्मीदवारी की जो जिन्होंने जो उन्हें घोषणा की उससे भी बिरादरी में सनसनी पैदा हो गयी । आखिर पिछली असफलताओं का यहाँ तो मतलब नहीं कि वे अगली बार फिर विफल होंगे । आईएस में बैठने के लिए अभी एक आद जांच बाकी है और इन्हें दहेज के बाजार में अच्छी तरह कॅश करने का इरादा है । जो तीन दिन आपने राम कहानी बयान करते हुए कहते हैं कि उनकी लेखकीय प्रतिभा ने भी बाजार मूल्य पर खासा प्रभाव डाला है । सम्पादकों पर दबाव डलवाकर महीने में दो चार रचनाएं पत्र पत्र गांव में प्रकाशित करवाने का उनका भागीरथ प्रयास रंग ला रहा है और बिरादरी वाले इससे प्रभावित होते पाए गए हैं । बहरहाल उनके बाजार भाव के उतार चढाव से जितने बिरादरी वाले परेशान नहीं है उतना तो वह खुद हैं । मुंगेर बढिया की तरफ बंदूक की नोक पर शादी होने की खबर से वे खासे परेशान हुए सोचते उनके दहेज की प्रतिबद्धता से अवश्य कुछ लोग कुंठित हुए होंगे । फिर आपने अब राहत होने और बंदूक की नोक पर बिना दहेज के विवाह रचने की कल्पना मात्र से उन्हें जरूरी हो जाती है, ऐसा भी तो नहीं । बाद में गले में ढोल पडी बीवी को छोड दें या उनकी साज नेनाद उसका जीना मुहाल कर दे । जैसा कि आए दिन अखबारों में होता पाया गया है, जो दिन के परिवार में सभी सज्जन लोग हैं, जिससे दुल्हन को जला देने की कल्पना भी नहीं की जा सकती । मतलब गले में पडे ढोल को डमडम आते फिरने के सिवा कोई चारा भी नहीं । सत्यानाश हो इस दहेज प्रथा का, जिसने बंदूक की नोक पर शादी कराने की प्रथा को जन्म दिया हूँ । अब हर वक्त यहाँ भर उन्हें सताता रहता है कि कहीं किडनैप कर लिया जाए । अब तक तो ज्योतिंद्र अपने बाजार भाव के बल पर हीरो बने घूमते रहते थे । अब सिर्फ घर से दफ्तर और दफ्तर से घर के इर्दगिर्द नाचते हैं । विचार है कुछ अंगरक्षक रखने का और विवाह का लगन फिलहाल दूर है । इसलिए तब तक विचार को मिलता भी रखा है । ज्योतिंद्र कहते हैं, उन्हें चिढ है उन समाज सुधारकों से, जो दहेज की बुराई करते अघाते नहीं । जिनका मार्केट वैल्यू जीरो रहा, वही तो ऐसा व्यक्ति हैं । वे पोर्टमैन इसके खिलाफ हैं । यह तो सरासर पहुँचाते तौर तहजीब की नकल है । हमारी हिंदू परंपरा कितनी सुंदर है तिलक दहेज से बैंक बैलेंस बढाओ गाजेबाजे के साथ आओ और अग्नि के साथ तेरे लगाओ । सोशल मेरिज में जो आन बान शान है वह सिविल मैरिज में कहा बजाप्ता रजिस्ट्री कराओ, गवाही दिलवाओ, शपथग्रहण करो । और जब मजिस्ट्रेट कहे कि आप दोनों शादी के बंधन में बंध गए तो हो गई शादी वहाँ भगवान भला शादी नहीं हुई जैसे मुकदमा लडा गया । जो दिन बोले यह जानते हुए कि शादी वहाँ पेडा है, जिसे जो खाए वह बचता है और जो न खाए वह भी बताए । वे अपना मार्किट रेट बढाने की फिक्र में हैं । बनी रहे शादी ब्याह और भला हो दहेज प्रथा का

Ep12 - Abala Jeevan Hay Hay

अपना जीवन हाय हाय ज्योतिंद्रनाथ प्रसाद शर्म आती हैं । जहाँ नारी की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं । यहाँ कहावत उन्होंने सुनी तो है मगर कभी विश्वास नहीं किया । वरदो नारे धरती पर कभी पूंजी नहीं जाती हैं और अगर पूंजी भी गए तो डंडे और बलात्कार से दो मुझे जहाँ तक नारी वह देवता के सामने की बात है तो जब बेचारी नारी समता की बात कर नहीं सकती तो भला वह देवी देवता कि प्रतिष्ठत कहाँ से प्राप्त करेगी, जो इंद्रजीत गोसाई जी महाराज को दाद देते नहीं सकते? उन्होंने क्या खूब कहा ढोल, गवार, शुद्र पशु नारी ये सब ताडन के अधिकारी सीता को पूजनीय स्थान देकर इस तरी को ढोल गवार शुद्र पशु की पंक्ति में लाख खडा करने वाले तुलसीदास जी की जय हो बेचारे तुलसी ने दो वैसा ही कहा जैसा लोग करते आ रहे हैं अर्थात एक और तो नारी जाति को माँ बहन से लेकर चांदी वार सरस्वती के रूप में उन्होंने आकाश में पहुंचा दिया । दूसरी और बीवी के रूप में पाऊँ की जूती का दर्जा देकर न तो में धकेल दिया वाह! अरे लोग और उनकी खोपडी जिसने कभी भी औरत को कंधे से कंधा मिलाकर चलने का मौका नहीं दिया । मार्क्सवादी इसमें नारी का शोषण साहब देख सकते हैं और अमरीकी मानव अधिकार का खुल्लम खुल्ला उल्लंघन ज्योतिंद्र का मानना है पुरुष प्रभावी इस समाज में इस तरी को स्वावलंबी होने के खतरे से हमेशा बचाया गया है । बचपन में उसे पिता का संरक्षण चाहिए । जवानी में पति का तो बुढापे में पुत्र का सहारा अनिवार्य है । जब वे लोग हैं ही तो आपको फिर करने की क्या जरूरत है क्या जो दिन को यह नहीं मालूम कि अगर आपको अपनी हालत पर छोड दिया गया तो मर जाती का ही अस्तित्व खतरे में पड जाएगा । आप अगला ही बने रही है । सुनते जाइए मर्द का तर्क और फिर देखिए ना दे जी आपको प्रकृति ने ही कितना दुर्बल कोमल बनाया है । उस कवि का भी क्या कहना जिसने कहा अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी आंचल में है दूध और आंखों में पानी ज्योतिंद्र सोचते हैं और मिला तडफती रही चौदह वर्ष लक्ष्मण जी के वियोग में जिन्हे भारत है बच्चों से ज्यादा भारतीय विडियो कष्टकर प्रतीत हुआ । उधर सीता जी को जवाब नहीं कुछ अंश अशोकवाटिका में काटना पडा था और जब पिया मिलन का दौर आया भी तो बेचारे को श्रीराम के आदर्शों की बलिवेदी पर चढा । तपोवन में आपने युवावस्था होम करनी पडी । जोगेंद्र ने आगे कहा नारी तो माया है जब से उन्होंने हो संभाला । यही विचार उनके मन में कूट कूटकर भरा गया और किस लेन का एक रास्ता है दूर रहो इससे स्कूल कॉलेज में तो लडकियों की छाया से भी वे पडे रहे यार दो से चुटकी लेते हैं मिया साधु हो या नपुंसक । प्राचीन ऋषि मुनियों को ज्योतिंद्र साधुवाद देते हैं जिन्होंने प्राणी मात्र आपको इस तरी से दूर रहने का उपदेश दिया । बुद्ध का महाविनाश करमान अकारा नहीं यशोधरा को सोते में छोडकर हुआ । उन्हें डर था कि उसे जगाया । कीमो पांच में बने । इस अर्थ में तो बुद्ध ज्योतिंद्र से भी ज्यादा कायर है । इस तरी को कभी बुद्धम् शरणम् गच्छामि होने ही नहीं दिया । यहाँ तो आम्रपाली थी जो यशोधरा से ज्यादा तेज तर्रार निकली और वही हुआ जिसका बुद्ध को डर था । माया आई नहीं कि सारा बौद्ध संगठन छिन्न भिन्न हो गया । ज्योतिंद्र बोले और तेरह दूसरा नाम भेज गया है भला तो मानव कहा तो वो आपकी जाने वाली एक वस्तु है तो कहा नहीं दिखती कोठे पर चंद्र सीखो में और होटल में चंद नोटों पर तो पुरुषों की अमित भूख है । अतिरिक्त प्यास है विज्ञापनों में, फिल्मों में तेरह सौंदर्य नहीं, शरीर बिकता है । यूरोप में तो वस्त्रहीन मॉडलों के रूप में मिल जाएगी तेरी दूरदर्शन का जो तीन दिन से देखी नहीं जाती जो दिन आगे हाल बयां करते हैं और नारी स्वतंत्रता आन्दोलन भी क्या बला है? पेरिस में एक साहब अपने बीवी के शयन कक्ष में मैं जूते प्रवेश कर गए । वह श्रीमती जी की शान के खिलाफ था । उन्होंने श्रीमानजी पर मुकदमा ठोक दिया । तलाक का और तलाक मिल भी गया । विमेन स्लिप जिन्दाबाद जो दिन सुनाते हैं । कहावत है मर्द से उसका वेतन ना पूछे और इस तरह से उसकी आयु मुझे बचपन को दो सुविधा आपके पर लगे होते हैं और बुढापे को आते देर नहीं लगती । जवानी के इन चंद लम्हों में हसीना एक समा होती है जिस पर न जाने कितने परवाने मर मिटने को लालायित रहते हैं । इस उम्र की लगाम कैसे रहने के लिए हसीना क्या नहीं करती मेरे पडोस की एक महिला का तो ख्याल ये अनूठा है । वे तेरह सालों से अपना जन्मदिवस सत्रह मोमबत्ती अलग अगर बनाती आ रही है ज्योतिंद्र सुनाते हैं आप मिस बुलबुल को नहीं जानते होंगे । रात्रि में उनकी बंद खिडकी और दरवाजों से अगर उठा पटक की आवाज आये या ऐसा लगे कि कपडे की पिटाई हो रही है तो फौरन समझ लीजिए कि उनके श्रीमानजी पर सामान आ गई है । प्रेम करने से पूर्व अपने पति की वह नहीं करती है कि भूत भी भाग जाए । मनोविज्ञान में इसे परपीडक कहते हैं । डॉक्टर का अब सराना तेवर इतने से ही संतोष नहीं प्राप्त करता । बाजार करने जाएगी तो पति इस कदर पालतू कुत्ते की तरह दो मिलाते उनके पीछे पीछे होंगे कि पूछिए मत । उनके मिस्टर का बेरंग लिखा है कि भारतीय हो लिया देख ज्योतिंद्र वात्सायन के कामसूत्र में दी इस हिदायत पर चलने का निश्चय किया है की शादी करो तो समान स्तर की नारी से ।

Ep13 - Saiya NHaye Patrkar

संया भाई पत्रकार ज्योतिंद्रनाथ प्रसाद चकित होकर कहते हैं और सरकार भी क्या जीव है देखने में तो है वैसे आदमी की शकल सूरत का और उठता बैठता पशुओं के बीच हूँ । इस लोमडी के लिए अंगूर खट्टे हैं, कौन भी मीडिया आया चिल्ला रहा है बाद कहाँ घट मैं आदि आदि की खबर इसे रखनी पडती है । इस तरह से शहर जहाँ उसका अखबार है की वहाँ जबरदस्त कडी है । जाहिर है कि जब शहर में लोग लिख लो, हाँ और बडे पत्थर है तो उसका अखबार जंगल में बिकता होगा तो उसे बहुत कुछ करना पडता है । तोड मरोडकर पेश करना होता है और कभी कभी समाचार में नमक, मिर्च बेल लगना लाजमी हो जाता है क्योंकि विचरना है उसे जनरल में ही है । और जैसा कि जंगल का कानून है सर्वशक्तिमान और योग्यतम का अस्तित्व उसे भी अपनी नौकरी और प्लानों की रक्षा करनी होती है । ऐसी जगह अगर मानव रूप लेकर भी वह उल्लू की आंखों से देख रहा है, कौवे के कान से सुन रहा है, चमगादड के पैरों से योग दिखा रहा है तो गलती उसकी नहीं उसके रचियता ईश्वर की है । जिस बिरादरी के पक्ष में यह स्थिति हो रही है यहाँ वार्ताकार भी उसी में आता है । संवाददाता सम्मेलन पाँच सितारा होटल में भी होता है और गुरजीत दी हड्डी ढाबा में भी मुद्दा जोलन है दोनों में मगर मजाल है जो दिन उनके सहयोगी ढाबे की रिपोर्टिंग कर दें । सितारा होटल में उनका स्वागत मुगलई बिरयानी, मलाई कोफ्ता, टूटी फूटी जाम और हसी शाम से होती है और हम अपना स्वागत कराने जाते हैं । वहाँ समाचार लेने नहीं । अखबार दो वैसे भी छपेगा । ज्योतिंद्र जी का यह अनुभव है कि एक रात के ही किसी प्रेस में अखबार में थोडी सी जगह खाली रह गयी । उपसंपादक में संपादक को खबर क्या संपादक ने कुछ सोच समझकर कहा समाचार बनाते हो कि एक साहब ने एक बार में चार मच्छर मार दिए । उन्हें पुरस्कार मिले । उपसंपादक ने कहा महाशय जगह फिर भी बढ जाती है । जवाब आया लिख दो कि यह समाचार गलत था । एक दिन शीर्षस्थ समाचार के लिए कोई सनसनी समाचार नहीं मिला तो यह छप गया । जो है बिल्ली को खाया । किसी ने कहा मगर यह तो झूठी खबर है । कैसे झूठी खबर है । संपादक में घुसा मेज पर मारा था । कहीं ना कहीं या घटना जरूर हुई होगी । यहाँ तो वही खबर के अंदर की बात है । अब ये बाहर देखें । लूटमार की रिपोर्टिंग करते एक बार हम खुद पहुँच गए । पुलिस ने पूछा वारदात से पहले आप घटनास्थल पर मैं कैमरा घूम रहे थे, घूम रहे होंगे । हमने लापरवाही से कहा हमारा आपका काम तो यही है कि घटना से पहले घूमें । घटना के बाद में आरक्षी ने पूछा मगर क्यों धरते रहेगी? ज्योतिंद्र हैरान हैं । यह तो गले बढ गया वो क्या जाने की उनके घूमने के बाद वारदात हो जाएगी । पर मारा गया पत्रकार क्योंकि जहाँ अंधेर नगरी है और राजा है चौपट! क्योंकि लुटेरे छोडने जा पा रहे और छह दिन छोटा करने वाले गिरोह के बताया जाते हैं तो इसलिए मामूजान को उनकी उम्र पर ऐतराज था । मगर ज्योतिंद्र जैसे पैसे वैसे निकल भी आए ना तो वह चारों मजूमदार के तेले साबित हुए और उनकी गर्दन मोटी निकली । इसलिए वे अपनी पीठ खुद ठोकते हैं । पिताजी की गर्दन मोटी करो की हिदायत की । कभी उन्होंने अवहेलना की थी । कवींद्र रवींद्र तरीके केशराशि में उन्हें ज्योतिंद्र का गला पतला नजर आता था । पहलवान सा कटोरा कट बाल रखने पर ज्योतिंद्र जैसे फॅमिली को की गर्दन मोटी देखेगी । ऐसा उन्हें विश्वास था, ज्योतिंद्र सुनाते हैं । बहरहाल, अपनी गर्दन पतली रखी और अंधेरनगरी और चौपट राज्य के चन्दन से निकल आए । श्रोता इस बात पर गौर फरमाएं कि उनकी गर्दन तकलीफ क्यों है? धुँधला बदली न हो तो क्या होगा? क्या खाकर पत्रकार गला मोटा करेगा? सब तो खाने में व्यस्त हैं और एक बेचारा । वह दिन रात उनके खाने की रिपोर्टिंग में व्यस्त है । अब वहाँ दिन लग गए जब संसद में धमाका हुआ करता था कि हिंदुस्तान के बत्तीस अदद पत्रकार सीआईए के वेतनमान पर हैं भाई । अपवाद तो हर जगह है, पर यह सत्य सर्वव्यापी है कि पत्रकार को कोई घास भी नहीं डालता । घुसकी कौन मुझे बेचारा जीता है, मर्ज में मरता है कर्ज में जो दिन रहते हैं । इसलिए संवाददाता सम्मेलन में यदि सभी बैठे हो और रिपोर्टर्स वी । आई । पी । के सम्मान में खडे हो जाए तो समझ लीजिए वे भी कुछ कृपा चाहते हैं । उनसे ।

Ep14 - Chunav Kshetre

चुनाव क्षेत्र ज्योतिंद्रनाथ प्रसाद ने कहा, जब घरवाली ने जो तीन दिन से पूछा कि क्या वे मास्टर जी की उम्मीदवारी का समर्थन करेंगे तो उन्होंने स्पष्ट कहा कि पहले सुबह वे या तो उन्हें दरवाजे का रास्ता दिखा देंगे या उनकी अच्छी खबर लेंगे । यहाँ आदमी रात बार उनसे जब याता बतियाता रहा है कहाँ की क्षेत्र में सभी राजपूतों को पृथ्वीराज चौहान की सौगंध दिलाकर एक करना है । नहीं तो उनकी बीवियों से कहा जाएगा कि आप सभी मैं चली जाये । मगर आपके जहन में चुनाव लडने का ख्याल कैसे आया? जो तीन दिन में पूछा भाई, पिछले बैसाख में हम चौंसठ के हो गए । कहते हैं साठा सौ पाठा सारी जिंदगी मास्टरी करते करते हुई थी और एमएलए तक नहीं बना । इसलिए इस विधानसभा चुनाव में अंतर प्रेरणा कह रही है कि अब न चुप चौहान आपको विश्वास है अब जी जाएंगे ज्योतिंद्र पूछा मैं जीतने के लिए नहीं खडा हो रहा । मास्टर जी ने स्पष्ट किया बैठने के लिए खडा हो रहा हूँ बास आप नामांकन में मेरा प्रस्ताव करते हैं क्यों कि आपको कोई प्रस्तावक नहीं मिल रहा है । ऐसी बात नहीं है । आप के समर्थन से मेरी स्थिति मजबूत हो जाएगी । मास्टर जी ने दयनीय स्वर में कहा मगर जिस तरह का आपका स्वास्थ्य है उससे तो आप चुनाव रुकवा दीजिए गा । ज्योतिंद्र में कहा इसपर मास्टर जी ने खींसे निपोरते आप किसी पार्टी से क्यों नहीं खडे हो रहे हो? ज्योतिंद्र ने प्रश्न किया ऑन मुझे टिकट देगा । आप जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट की तरफ से खडे हो जाए । यहाँ पार्टी क्रांतिकारी है । जम्मू कश्मीर में प्रतिबंधित है । नामांकन भरने के लिए उसके समर्थन की जरूरत नहीं । ज्योतिंद्र सुझाव दिया मास्टरजी हो कहकर उत्साह में खडे हो गए । ज्योतीन्द्र वृतान्त दिया । अगले दिन मजिस्ट्रेट के दफ्तर में सनसनी मच गई । कहाँ जेकेएलएफ और कहाँ मास्टर जी कहाँ उथल पुथल मचाने वाली पार्टी और कहाँ मरियल मास्टर जी कोई तालमेल नहीं था । बहुत समझाने बुझाने के बाद मास्टर जी निर्दलीय हो गए । चालीस पचास आदमी जुड गए थे उनके पक्ष में नारे लगाने के लिए । मास्टर जी ने सबको राम भरोसे हिंदू होटल में चाय बनी कराई । बिल के भुगतान के बाद जेब में हाथ डालकर उन्होंने घोषणा की कि उनके पास महज पांच रुपए पचास पैसे बचे हैं । वे चुनाव कैसे लडेंगे? जिन लोगों ने उनके चाहे समूह से डकारे थे, वे चंदा करने का वायदा करके खिसक गए । एक हफ्ते बाद उनसे नुक्कड भेंट हो गई । ज्योतिंद्र में पूछा क्या प्रोग्रेस है? मास्टर जी ने बडी मायूसी से कहा नेता जी अब तक मुझसे मिलने नहीं आए क्यो मुझसे यहाँ अनुरोध करने ये मैं बैठ जाऊँ । ज्योतीन्द्र में कहा वो तो आपको ढूंढ रहे हैं कि आप कुछ ले देकर खडे रही है ।

Ep15 - Samajwad aa Gaya

समाजवाद आ गया । ज्योतिंद्रनाथ प्रसाद ने श्रोताओं से कहा आपको यकी हो या न हो, उन्हें तो पूरा विश्वास हो गया है कि संसार में समाजवाद आ गया है । बडे बडे चिंतको महात्मा गांधी, राममनोहर लोहिया, जॉर्ज फर्नांडिस, मधु लिमये और मार्क ट्वेन ने समाजवाद की व्यर्थ परिकल्पना की थी । वस्तुतः पूरे भारत और विश्व में समाजवाद बरकरार है । अब यही देखें । पटना की यातायात व्यवस्था अनूठी है । सडक पर पूरा समाजवाद है । पब्लिक से लेकर प्राइवेट सेक्टर तक के वाहन रहते हैं । कहाँ रहे, गिर सकती हैं, बस और ऍम रखते हैं । रिक्शा और ठेला भी रेस में शामिल हैं । भला हो वीआईपी का उन की इज्जत, आबरू की खाते ट्राफिक पुलिस रोड की नाकाबंदी कर देती है और उनके अद्रश्य होने पर सडकों पर आतंकवाद विराजमान हो जाता है । सब जाम में पड जाते हैं । यहाँ तक कि पटपटिया वाले भी महाजाम में बाइक की सवारी का प्रशिक्षण पूरा कर लेते हैं । और साइकल सवारों का अगला पहियां यदि किसी पैदलयात्री की दो टांगों के बीच में प्रकट हो जाता है तो तो इसमें कसूर किसी का नहीं, सब रोड समाजवाद है । अब घरों से नजदीक का सफर भी नीलो नजर आए तो यह सब समाजवाद है । उस पर तुर्रा यह कि दूध हुआ तो वाहनों के संगीत और कोहरे में सबकुछ सरोबार हो जाता है । लोगों को संगीत से भले ही प्रेम ना हो पर यहां सडकों पर बला की संगीत सुनने को मिलती है । उनके फेफडों को ऑक्सीजन मिले या ना मिले पर पटना की सडकों पर काॅप खजूर इंतजाम हैं । एक बार सडकों पर आइए तो ज्योतिंद्र आगे किस्सा यू सुनाते हैं यह नजारा हमने भारत की टेक्नोलॉजी राजधानी बेंगलुरु में भी देखिए । वहाँ तो दफ्तर में समय पर पहुंचने के लिए लोग अपना सुबह का पार्कों में पहला छोडकर भोर से ही सडकों पर उतरना शुरू कर देते हैं । इस भागम भागी में सभी दौडते नजर आते हैं । कुछ विचारक का भला हो जिसमें कहा कि आप दौडे दौडे नहीं तो रहेंगे पर चलते रही है । एक स्थान पर ये नहीं जाना कहाँ है । मालूम नहीं अपनी बगल की पतली गली में भी रेलम पेल हैं और हम समाजवाद की चर्चा कर रहे हैं । यातायात का यहाँ नजारा देख बडे बडे बाबाओं का जन्म जन्मांतर का आवागमन का उपदेश ज्यादा जाता है । बाबा लोग जीवन मरण के ट्रैफिक से मुक्ति का उपदेश देते हैं । यहाँ तो यातायात से मुक्ति मिले तब ना बेंगलुरु में उपयोग के सब सामान घर में बैठे मिल सकते हैं तो पटना में क्यों नहीं? बस थोडा सा ग्रह लक्ष्मियों को खटाल तक जाना होता है । इसमें उनके मर्दों को भले ही सुबह शाम कटहल आओ ना मिले और उन्हें तो मिलता है । इसमें राजधानी की आधी आबादी को भी समाजवाद का रस मिलता है । पटना में वैसे भी बहुत सी बीमारियाँ हैं । यदि वे कुछ बीमारियाँ दूध में लेकर आती है तो डॉक्टरों को भी समाजवाद में डुबकी लगाने का मौका मिल जाता है । खुदा खैर करे घटाल वालों का वे आपने बहसों के पीछे बीन बजाने के पहले अधिक दूध किसने की मंशा में उन्हें इंजेक्शन बहुत देते हैं । पटना नगर निगम को मेयर आयुक्त के विवाद से फुर्सत नहीं, वहाँ खटालों की फिक्र क्यों करें? आगे जो केंद्र कहते हैं रहा । सवाल खाकीवर्दी वालों का तो उन्होंने कुछ माह पूर्व न्यायालय में यहाँ शपथपत्र दायर किया कि उनके थाना के अंतर्गत कोई घाटा नहीं है । भरी होने क्या पटना पढाया न्यायालय को चाय बाल गोवा लोग उन्हें निशुल्क दूध देते होंगे, लेकिन न्यायाधीश भी कहाँ चुकते? उन का निर्देश आया और पुलिस लाडिया भर्ती नजर आई है । शहर में सबको रहने का अवसर प्रदत्त है । जय हो समाजवाद की होता हूँ । ज्योतिंद्र से यह सुनिए । रायपुर, बेंगलुरु और दिल्ली के पहाडगंज में बहुमंजली मारते हैं । इमारतों के बीच गरीबों की झोपडियां है । पटना में भी इससे महान चिंतकों के साथ अस्तित्व का सपना साकार नजर आता है । गरीबी रहे हैं और उनके ऊपर अमीर भी रहे हैं । अच्छा समाजवाद है अब सरकार ऐसा समाजवाद लाने पर हम ज्यादा है तो लाए । सरकार ने हाल ही में अपने ऑस्ट्रेलिया दौरे में कहा की सरकार देश का नेतृत्व नहीं करती, जनता करती है अब जनता वो ऐसा समाजवाद पसंद है तो इस वक्त वो अपनी गर्दन बचाने की क्या जरूरत है । सरकार कल्याणकारी होती होगी । अब सरकार से कौन पूछे कि जब देश का नेतृत्व उनकी सरकार नहीं करती तो कल्याण कौन करेगा? जनता तो आत्मकल्याण करने से रही । अच्छा है जनता ने अपना पत्ता साफ कर लिया । सरकार चुनकर सरकार ने पल्ला झाड लिया । पिछली सरकारों के मध्य बढकर मार्क ट्वेन कह गए हैं कि पूरा पूरब है और पश्चिम पश्चिम दोनों का मिलन संभव नहीं । पर कांग्रेस और भाजपा ही सरकारों का कुछ ऐसा दौर रहा कि देश में ट्विन की उक्ति अब चरितार्थ नहीं होती है । अब पूर्व और पश्चिम काम मिला हो चुका है । अमेरिका और यूरोप के पूंजीनिवेश के लिए सरकारों ने इस कदर भारत का फाटक खोला की हम चौधरी आए बैठे हैं कि हम भारत में है कि अमेरिका में विश्व में समाजवाद आ गया है । आपको यकीन न हो तो हम क्या करें?

Ep16 - Babao ki karamat

बाबाओं की करामात ज्योतिंद्रनाथ प्रसाद के बयान और उससे जुडा है बाबा लोगों की करामात के वे कायल हैं । एक बाबा है टीवी पर बादल वाले बाबा । ये बादलों की उमर घुमाएंगे दर्शकों को भविष्यवाणियां सुनाते हैं । इनकी वेज बुझा देखकर वेदों के रचियता ऋषिमुनि भी शर्मा जायेगा । घने सफेद केस तलाशी को गार्ड देवघर बकरी मार्का दाडी लगाकर वे बच्चों बच्चों कहकर ज्योतिंद्र सरीके मीन राशि वालों को भी ऐसी सुखद बातें बताते हैं जैसे आज की बिन ब्याही मां भी लेविन रिलेशनशिप में अपने बच्चों को लोरी न सुनाती होगी । एक और है एस्ट्रो बाबा । वे कोर्ट टाइपेंड में सफेद बालों का वैसा वेब सर्वर लगाते हैं जैसे तमिल फिल्मों में चंडीगढ रजनीकांत लगाते हैं । ये लोग भविष्यवाणी कम प्रव्रजन ज्यादा करते हैं । अगर आपको भविष्यवाणी के साथ प्रवचन का मजा लेना हो तो इन को जरूरत थी उन कीजिएगा इन्हें अपना भविष्य बताते जो तीन दिन ने कभी नहीं देखा है । एक और बाबा है योग बाबा । ये पेड पीडी यूज करते हैं । ऐसे भिक्षुक कविता में सूर्यकांत त्रिपाठी निराला दर्शाया था । ऐसा प्रतीत होता है मानो योग बाबा को किसी भरी सभा में लोगों ने तो नियल कह दिया हूँ । आजकल योग बाबा व्यापार जगत में बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भी मात देने लगे हैं । इनके सहयोगी फोन ड्रेस पत्रिका के देश के अमीरों की सूची में अव्वल नंबर पर है । जबकि कुछ साल पहले एक दो बॉल भी नजर नजर ही नहीं और योग बाबा को बैंक में खाता खुलवाने की क्या जरूरत है तो देशी उद्योग इनके नाम से वैसे ही फल फूल रहा है । एक बाबा और हो गए हैं । आजकल अंदर है । पत्नी, दो, पत्नी, बच्चे तक भी जेल में मिलने नहीं आती । बापू से बाबू ने कुछ खास नहीं किया था । बस रैलियों से मु काला किया था । किस्सा वो जोगेंद्र कहते हैं । वो बाबा नहीं रहे जो नदी में भक्तों के बीच प्रकट होते थे । बहुत मानते थे कि वे चार सौ वर्षों से धरती के भर बने हुए थे । देवराहा बाबा जैसे नामुराद प्रकट हुए । वैसे अन्दर ध्यान भी हो गए । अब उन बाबा के भक्त किसकी पार्टी में गए यह कयास लगाना मुश्किल है । बाबाओं का संगत कुछ ऐसा है जैसे राजनीतिज्ञों की पार्टी दलबदल होते रहता है । देवघर के बाबा समाधि लिए तो उनका राजपाट उनके सुपुत्रों ने लगाया था । बेचारे भक्त जनों का संगत बदलना पसंद नहीं आया तो उनके बडोदा राज दरबार लगाने लगे । एक निर्मल बाबा भी हुए जो सिंहासन पर विराजमान हो । भक्तों के कष्ट निवारण के लिए फूल फल बताया करते थे । टीवी वालों ने यह तो नहीं दिखाया कि कष्ट निवारण हुआ या नहीं, किसे परवाह है । इनका टीआरपी वैसे ही बढता है । आजकल ज्योतिंद्र के मोहल्ले में बाबा लोगों का आना जाना लगा रहता है । अब उसी दिन की बात है । किसी ने दाना पानी के लिए गुहार लगाई । गले से यू आवाज निकली । मानव कई दिनों से आते क्या खाली पडी हो खाकसार बहुत दया आई । तब जब सब दरवाजे बंद थे, ज्योतिन्द्र उन्हें आवाज लगाई और एक पैकेट चावल दिखाया । ज्योतीन्द्र इस मुगालते में थे कि इससे उनकी दानशीलता का पता लगेगा और उन्हें ढेरों आशीर्वाद मिलेंगे । आगे की दासता यूँ है । बाबा दर पर आए । हटते करते पूरे परिधान में उन्होंने दुआओं की ढेर लगा दी । ज्योतिंद्र बहुत खुश हुए । आजकल वैसे भी बाबाओं से दुआएं मिलती है और उसी तो मारे जलन के कुछ कहते ही नहीं । बाबा ने एक गिनती उनकी हथेली पर रखा । कहाँ मुट्ठी बंद कर लो, मुट्ठी बंद कर ली । कितने बच्चे थे रे बाबा ने इसके अंदर पूछा कि जैसे घर में आया मेहमान में नहीं पूछता मुट्ठी खोल । उन्होंने कहा है ज्योतिंद्र ने मुझे होली गिट्टी एक ट्रॉफी में बदल गयी थी । उन्होंने चमत्कार को नमस्कार क्या हैरान थे कि इस मनोवैज्ञानिक युग में ऐसे कैसे हो गया जब खाने के लिए रोटी ल बंदा बोले । जो तीन ने कहा रोटी तो अभी नहीं है । बाबा था उन्हें एक पैकेट जुडा दे दिया है । बाबा ने हर लगाई नमक मिर्ची भी साथ दे देते हैं । जो तीन उन्होंने अपने परिवार को हाथ लगाई, बाबा को कुछ दे दो । डर बर बाबा और सामने ज्योतिंद्र खडे रहे । ज्योतिंद्र सोच रहे थे कि अब तो बाबा करवा करेंगे और दरवाजे सेंटर करेंगे पर वहाँ दरवाजे पर अडा रहा हूँ । बाबा ने निर्देश दिया जाता इस ट्रॉफी को सबसे बडे रुपये में लपेटकर ला ज्योतिंद्र परिवार को ऐसा करने के लिए कहा लेकिन उनकी पत्नी का माथा ठनका । उसे बाबा की मंशा से ज्यादा जो केन्द्र के इरादे पर शंका हुई । यहाँ मदद तो घर पर रहा सहा कैसी साफ करा देगा । दरवाजा बंद कीजिए । पत्नी ने ज्योतिंद्र से कहा । ज्योतिंद्र ने दरवाजा बंद किया । बाबा ने चूडा फेंक दिया और बद्दुआ देता हूँ । चला गया । ज्योतिंद्र में पड गए कहाँ तो दुआ की ढेर लग रही थी । अब उल्टी गन्ना बढ रही है । वो सोच रहे थे कि बाबा वो अगर पैसे की जरूरत होती है तो वह जितनी को नोट में बदल लेता । अगले दिन नामुराद फिर आज फिर एक बार ज्योतीन्द्र में दरवाजा खोला ही नहीं । बाबा चिल्लाया क्या है? बच्चा अहंकार में हो? जो देवेंद्र सर परिवार खामोश थे । कुछ देर बाद बाबा नुकसान हो गए । आज फिर कुछ बाबा लोग हाजिर थे । दरवाजे पर एक बोला वो गड को कुछ दे दो । बच्चा और दूसरे दरवाजे पर जब उन्हें अनाज दिया गया तो बाबाओं ने कहा ऐसा तो हमारे गांव में हमारे खेतों में पैदा होता है । हम तो कैसे चाहते हैं? मित्र ने उन्हें पांच रुपये दिए । क्या हम भिखमंगे बाबाओं ने कहा । दोस्त ने ग्यारह रुपये देकर अपना पीछा छुडवाया और ज्योतिंद्र अभी सोच रहे हैं कि वह गिट्टी ट्रॉफी में कैसे बदल गई । कुछ वैसे जैसे बडे बालों वाले साईं बाबा ने जादूगर पीसी सरकार से किया था । साई बाबा ने वेश बदलकर आए पीसी सरकार को भक्तजनों के बीच हवा में खाली मुट्ठी लहराकर रात सौंप दिया था । जादूगर पीसी सरकार ने भी हवा में हाथ फैलाए और साई बाबा के हाथ में एक रसगुल्ला थमा दिया ।

Ep17 - Salam Fatuha

सलाम पदों हा प्रिय श्रोताओं प्रधानमंत्री अपने दिल्ली को भले ही तीसरी सदी में ले जाएँ । ज्योतिंद्रनाथ प्रसाद क्या फतुहा अठारह शताब्दी नहीं हो जाएगा? यहाँ के लोग नरेंद्र मोदी के नहीं बल्कि महात्मा गांधी के भक्त हैं । कई वर्षों बाद प्रशासन ने यहां की सडकों की मरम्मत क्या यहाँ के इंजीनियर, ठेकेदार और नेता कई टन काॅरीडोर रोडा ईद पर धर खा गए? श्रोताओ हाफ मानेंगे की अब खाने के अन्य नहीं तो लोगों का नए सर्किट पदार्थो भी और रोक करना खाद्य समाधान के हाल में शुभसंकेत है । वैसे कहते तो यही है कि इंजीनियर, ठेकेदार और नेताओं की जाती ही ऐसी है कि इन है यही सब कुछ खाकर जीवन निर्वाह करना पडता है । जातिवादी बिहार में इस जाती को साधु महात्माओं की जाती जो कंदमूल, फल, फूल और ग्रस्त जो अनाज खाते हैं, से कहीं ज्यादा श्रद्धा की दृष्टि से देखा जाता है । खाने भी नहीं । बात से तो लगता है कि हम रोबोटों से भी आगे बढ गए हैं । इस मसले की पैदावार से देश के भविष्य के प्रति आशा बदलती है । यह सोचकर कि शताब्दी पुराना पुल इतना जर्जर हो चुका है कि वह किसी भी क्षण ट्रैफिक को लिए दिए नदारद हो सकता है । सरकार ने वर्षों पूर्व बने पुल का निर्माण कार्य ठप कर दिया । लाखों रुपयों की लागत पर एक डायवर्जन बनाने का हुक्म दिया । काम के बदले अनाज की योजना इंजीनियर, ठेकेदारों और नेताओं के भूख प्याज को नजर में रखकर बनाई जाती है । डायवर्जन एक दिन में ही बैठ गया । ज्यादा ही कम थी सरकार को इंजीनियरों की भूख प्याज का जरा भी अनुमान में था । नया पुल निर्माण और डाइवर्जन लाने के बाद भाई लोग पुराने पुल पर नजर गडाए हुए हैं । फुल बनता रहा है, टूटता रहा है । भूख को खाना मिल रहा है, बहुत दूर है । अस्पताल के डॉक्टर दवा खा रहे हैं । अस्पताल में इनके लिए आपको और कोई भी मारी नहीं मिलेगा । स्वस्थ आदमी यहाँ नहीं की जरूरत नहीं करता । उसे मालूम है कि एक बार यहाँ आया नहीं कि संक्रामक रोग घर पकडा । जोशी जी चाहे आपको मालूम नहीं कि भदोरा प्रखंड एक ऐसा प्रखंड है जहाँ अधिकारियों का तबादला पुरस्कार समझा जाता है । यहाँ के ग्रामीण बाढ में नहीं डूबते बल्कि अधिकारी गोदा खाते हैं और रिलीज प्राप्त करते हैं । यह अलग बात है कि बीडीओ साहेब निलंबित हो जाते हैं । भदुआ एक औद्योगिक क्षेत्र है । यहाँ के कल कारखानों में कच्ची शराब का भी अपना महत्व है । स्कूल और ट्रैक्टर जैसे सार्वजनिक उद्योगों को रोड कर दारू जैसे कुटीर उद्योग को फलने फूलने से महात्मा गांधी के भारत का सपना पूरा हुआ दिखता है । नरेंद्र मोदी के भारत में स्कूटर, ट्रैक्टर कारखाने के कर्मचारी अन्यत्र कर रहे हैं । भला ऐसे करमवीर और कर्मनिष्ठ नौकर दुनिया में और कहा मिलेंगे । यह सरासर गलत आरोप है कि वे कारखानों के पार्ट पुर्जे बेचकर अपने बीवी बच्चों की परवरिश करते रहे हैं । तो होता हूँ ज्योतिंद्र की इस बात पर गौर फरमाएं अगर लोग सार्वजनिक उद्योगों की ईद उखाडकर देशी शराब के उद्योग धंधों में लगा रहे हैं तो इसे मोहन दास कर्मचंद गांधी की आत्मतुष्टि ही होगी । नरेंद्र मोदी जी इक्कीसवीं सदी के आदमी है । महात्मा गांधी बीस शताब्दी के इंसान थे । दोहरा इस से भी आगे शताब्दी में जाए यह काम गौरव की बात नहीं है, छोटा हूँ । आपको कई ऐसे लोग मिले होंगे जो भारत की प्राचीन गाथा कहते नहीं थकते और कई तो उसकी प्राचीनता लौटाने के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने पर तुले हैं । हाँ, तो ऐसे महापुरुषों से खाली नहीं जो कई सभा समितियों के पदों पर विराजमान होकर काॅस्ट आ बहुत ध्यानम् की योगमुद्रा में इस कस्बे को जनरल एसके सिन्हा प्रस्तावित पाटलीपुत्र में पिरो देना चाहते हैं । इनकी कार्यपद्धति और जीवन शैली से तो यही लगता है कि इन्हें नौकरी और अब सरीफ दोनों से वितृष्णा है । जाहिर है कि ऐसे समाजसेवियों का खर्च वर्ष भी समाज ही वहन करता होगा । समाज नहीं नहीं, खेत खलियान, मार मकान और धन धान्य से पूर्ण कर अपने को धन्य मान लिया है । धन्य है वसुंधरा । ऐसे सबूत पाकर कपूर भी धन्य है । ऐसी वसुंधरा पाकर चौदह हूँ । नरेंद्र मोदी विदेशी निवेश पर ज्यादा जोर देते रहे हैं । उनका यह देशी विदेशी चक्कर समझ में नहीं आता । यहाँ समझ में आता है कि कई विदेशी चीजें हमारे यहाँ बनकर देशी का खिताब पा रही है और कई स्वदेशी वस्तुएं तस्करों के फजल से विदेशी कहलाकर धडल्ले से बिक रही है । यहाँ देशी देशी नहीं हो सकीं । प्रदेश ही रही, लाना है हम पर की इतनी तरक्की करने के बावजूद भी कायदे की अपनी शराब ने बना सके । रूस ने दुनिया को वोट कर दिया । फ्रांस नाॅलेज और इसी तरह कई नामीगिरामी देशों ने कुछ मैं कुछ अपना एक राष्ट्रीय पे दिया । पर हमने क्या दिया अगर फतुहा राष्ट्रीय जरूरत की तरह ठहरा में ही कुछ आजाद करने के चक्कर में है तो समस्त भारत को इसका शुक्रगुजार होना चाहिए । आशा है श्रोताओं की यह वार्ता आपकी सेहत बनाए रखेगी ।

Ep18 - Ram Ram Japna Paraya Mall Apna

राम राम जपना, पराया माल अपना ज्योतिंद्र जी की आदत है, शुरू होते हैं तो खता खत्म कर कर ही दम लेते हैं । अब इसका क्या कीजिए कि उनसे धनि व्यक्तियों का दुख देखा नहीं जाता । मोटर हमारी के बावजूद वे पैदल चलते हैं ताकि मोटापा उनसे निजात है और बेचारी मालपूए भी उडा नहीं सकते कि कहीं दिल का दौरा ना बढ जाए । कुछ दिन प्यारेलाल जी से भेंट हो गई जो तीन दिन में कहा सिट जी, अपना बीमा मुझसे करा लीजिए । सेठ जी बोले, क्या आप एजेंट हैं? नहीं? जो दिन दिन में कहा जो दिन तो आपके सुबह जो है मगर डर है कहीं आप की दौलत ज्योतिंद्र को आपसे दूर नगर दें, क्या मतलब? सेठ जी ने पूछा मतलब यह सेठ जी की आपने जो रुपये तिजोरी में रखे हुए हैं उसके चलते आपकी सेहत खराब होती जा रही है । आप बैंक में रख नहीं सकते हैं क्योंकि वहाँ को आयकर का भुगतान करना पडेगा । इसलिए आप मेरे सपूर्द कर देते हैं और जब जरूरत हो तो वापस लेले तथा चैन की नींद सो । सेठ जी ने आशंका जताई कि कहीं जो दिन पैसे खर्च नहीं कर दें, ज्योतिंद्र ने कहा था बेफिक्र रही है । प्यारेलाल जी ऍसे ज्योतिंद्र की कमाई पर्याप्त है । उन्हें ज्योतिंद्र की सलाह पसंद आई और कुछ लाख रुपये जो केंद्र की झोली में आॅल एक दिन प्यारेलाल जी पूछने आए की जो रुपये मेरे पास रखने को दिया था, वे सही सलामत है नहीं । जो भी निर्णय मायूस चेहरा बनाकर कहा हूँ । सेठ जी आपको मालूम नहीं की आपकी रखी धरोहर पूंजी कुछ लुटेरे जो तीन दिन से छीन कर ले गए, जबकि असलियत यह थी कि ज्योतिंद्र पैसों से हज करने का कार्यक्रम बना रखा था । बेचारे सेठ जी अपना का मूल लेकर लौट गए । इस पूंजीवादी समाज में समाजवाद लाने का एकमात्र ठेका किसी ने ले रखा है तो वहाँ है जो तीन अजय भाई उनके मित्र है, वहाँ शेक्सपियर की नीति पर नहीं चलते हैं । विलियम शेक्सपियर ने कहा था कि न तो उधर लोग और न उधर दो । ज्योतिंद्र के मित्र कहते हैं कि एक तो उधर मत दो और दो तो वापस लेने की आशंका न करो । इस सिद्धांत के चलते अब तक हम दोनों की मैत्री प्रधान काम चल रही है । ज्योतिंद्र ने उनके सिद्धां के पहले पहले ऊपर नहीं नहीं दिया । अरे भाई, यहाँ व्यवहारिक जीवन है, लेना देना तो चलता ही रहता है हरियो हरियो इस संसार में ऐसा कौन है जो द्रविड के आगे झगडा नहीं? ज्योतिंद्र लाहौल मिला हुआ था और बताओ आप भी कहेंगे कि ज्योतिंद्र आपसे कभी किसी प्यारी चीज के लिए आग्रह नहीं करते, बस ज्यादा नहीं । यही कोई हजार पांच हजार की जरूरत है । बस इसके बाद तो आपको ब्याज समेत लौटा देना है और जानते हैं कि उनके दोस्त भले ही उधर मद्दों का सिद्धांत तोड देंगे मगर वापस मतलब का संयम से पालन करेंगे । वे जानते हैं कि कर्ज वापस लिया और यही दोस्ती हादसे भाई ब्लैकमेलर का खिताब ज्योतीन्द्र को मान लीजिए । समाजवादी व्यवस्था में वो भी खाया और ज्योतिंद्र बिठाया । कुछ पूंजी वे रखे और कुछ ज्योतिंद्र । बाढ बंटवारे से समाज चलता है । अब इसका तो कोई मतलब नहीं कि किसी के पास ज्यादा हो और कोई थोडी का भी स्वामी न हो । आप जानते है कि हमारा भारत धार्मिक विश्वासों का देश है । ऐसे लोगों की कमी नहीं जो विश्वास के आधार पर एक, तीन और तीन का पांच करते हैं । देवदा की पूजा हो या दशहरा दीवाली ये जो केन्द्र के पास आध रहते हैं और कहेंगे कि जनाब इस बार देवता आपको तरक्की दे देंगे । यदि आप हमें कुछ चंदा दें जो केंद्र अपनी तरक्की तो नहीं पर देवी देवताओं की तरह की है तो कुछ रुपयों से हार दो बैठते हैं । ज्योतिंद्र अपना माता ठोक लिया जब उन्होंने देखा कि उनकी कठिन अर्जित पूंजी का हिस्सा चंदा हुआ । आने वालों की तरह की मैं चला गया । प्रसाद ने तो पूजा आयोजकों के घर को सुशोभित किया जबकि आयोजकों ने सारी दौड धूप का बदन दर्द, पिकनिक और सोमरस पान से निकाला । जब भगवानी बेगू बन जाते हो तो जो तीन दिन तो निदा आदमी है । आपने कुछ भी पूंजी न लगाकर आपकी सारी पूंजी राम राम जबकि हडपने वालों के प्रति हुए श्रद्धानत है । उस दिन ज्योतीन्द्र स्नान करने गए । गंगा तट पर बैठे पंडित जी को अपने कपडे और बंटवार रखवाली के लिए सौंपकर वो बाल निकले तो देखा कि उनके हाथ की मैं निकल चुकी थी । पंडित जी नदारद थे । एक दिन पंडित जी मिल ही गए । ज्योतिंद्र ने कहा पूज्यवर ज्योतिंद्र की धरोहर आधी के पास है । पडने जी ने जवाब दिया बच्चा वो तो गुरूदक्षिणा है । ऐसे ही दक्षिण से घर चलता है । मित्रों सबको शुद्ध दूध पीने का क्रेज है और वालों को हाँ कुछ और हैं । ऐसे में अगर वो पानी में दूध मिलाकर आप शुद्ध दूध के पैसे वसूलते हैं तो समझ लीजिए कि उन्होंने आपकी सेवा करने का संकल्प नहीं लिया है बल्कि गौ माता की सेवा करने का व्रत लिया है ।

Ep19 -Ye Bihar Hai

ये बिहार है । ज्योतिंद्रनाथ प्रसाद का कहना है उनके साहब को चार संभालते जुमा जुमा चार रोज हुए हैं । पर पैतरे इस कदर बदले हैं कि लगता है हमारी और उनकी मोहब्बत सदियों पुरानी है । वो आए, दरबार लगाए और मातहतों ने सर झुकाए जोर हम यही काम करते हैं । इस तरह लोगों को उन्होंने पहचाना । लोगों ने उन्हें बचाना पर हमारी पहचान कुछ और ढंग से हुई । उस दिन हम पांच मिनट लेट थे । ये हमारा अब तक का रिकॉर्ड है कि हम बस पांच मिनट लेट थे । पेशी हुई हमारे नाइन चार हुए और जैसे किसी नवयोवना ने पहली मुलाकात में शर्मा कर पलके झुका ली हो । हम मेज पर ध्यान डराये खडे थे तो आपका नाम अपना धुन है । साहब ने वृहस् कर कहा यहाँ तो आपकी जगह नवाजी है ओ, वरना हमारा नाम कुछ भी हो सकता था जैसे ज्यादा पाजी । ज्योतिंद्र ने कहा हूँ बहुमत या तो मैं मालूम नहीं कि मैं क्षणमात्र भी विलंब माफ नहीं करता था । साहब गुड के जो तीन नंदे सफाई दी माईबाप गुस्ताखी माफ हो । पिछले साहब की हुकूमत में दो घंटे लेट की मुआफी थी । उनसे पहले के हकीम के समय ड्यूटी पर मैं आने तक की मुआफी थी और पिछले पिछले शासन में सर यह दस तरी नहीं था । साहब बिफरे मिस्टर अफलातून हम अंग्रेजों के जमाने के अवसर हैं । हमारे राज्य में गाडी बिफोर टाइम चलेगी । आप घर लौट जाइए । आइंदा समय से आने पर ही आपको ड्यूटी पर रखा जाएगा । शाम को यूनियन के कुछ नेताओं ने साहब को समझाया सरकार यहाँ क्या कर रहे हैं? आप लेट लतीफ को इस कदर लौटाना शुरू करेंगे तो काम कैसे चलेगा? हम जानते हैं कि आप जहाँ पहले कार्यरत थे वहाँ के दफ्तर का भट्टा बैठा कर आए हैं । जोरिस दफ्तर बहुपक्षीय कुत्ते की दुम बारह बरस जमीन होने के बाद भले ही सीधी हो जाये मादर हम हो । जोर आदमी है । हमारे दम कभी सीधी नहीं होगी । हमारे राज्य में बगावत की बू आती है । सरकार घर जाते हैं, हम देखेंगे । तुम यूनियनिस्ट को देखेंगे, सबको देखेंगे । अगले रोज हम फिर साहब के दरपेश थे । एक अजीब पास करानी थी मिस्टर बेकसूर सर मुझे अफलातून कहते हैं । ज्योतीन्द्र ने उनकी भूल सुधारी । साहब ने चंद फैलाई । आप जो कुछ हो, आप जो यह बताइए आपकी शैक्षणिक योग्यता किया है सर, मैं मैट्रिकुलेट हूँ जो तीन दिन उन्हें हाथ जोड दिया देखा । अपने बॉस अपने डिप्टी से मुखातिब थे । सारा का सारा स्टाफ अयोग्य है । कोई मैट्रिक पास है तो कोई इंदर फेल । जब की किसी भी पद की न्यूनतम योग्यता यहाँ स्नातक है वो चोरी से पास किया । कलर क्या खाक हिसाब किताब संभालेगा । बहराल आप राजपूत या भूमियां तो नहीं । बॉस में पूछा हूजूर ऐसा दुस्साहस मैं कैसे कर सकता हूँ । मैं तो दूर की कृपा से बस मोची हूँ । मेरा सारा खानदान फटे जूतों की सिलाई करते रहा है । जो तिन दिन मैंने कहा । साहब ने पूछा ये आपका उपनाम ऐसा है सर की जब से मुख्यमंत्री जी ने अपना उपनाम हटा दिया, हमने भी उनके नक्शे कदम पर चलते हुए अपने दम हटा ली । ज्योतिंद्र कहा चाहे बोले तो वहाँ गयी, देखो तो आप की अर्जी आवेदन देखकर ही उन्हें यकीन आया । उस पर स्वीकृति दे दी । साहब की जाती निरपेक्षता से दो जातियों के कान तो जरूर खडे हो गए । अब तक इन्हीं के परस्पर टकराव की बदौलत हमारी यूनियन लय ताल से हडताल बता रही थी । अब दोनों बंदूक गले मिलने लगे, संयुक्त घोषणा पत्र निकालने लगे, मगर अपने उपनाम हटाकर सब तल बजट है । सिर्फ हडताल छोडकर दूसरे दिन हमारे और बगल वाले विभाग के दरवाजे गायब थे । कुछ इस कदर नजारा जैसे करेंगे । सिर्फ सिंह ये ये दरवाजे किसने उखाड लिए? ज्योतिंद्र लाएगा तो साहब ने उखडवा दिए सहयोगी बोला क्यों? ज्योतिंद्र में पूछा हम दरवाजे भेड कर मेज पर पैर फैलाकर होते हैं । साथ ही ने कारण बताया होते हैं यहाँ सोना तो हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है । इस अधिकार के हनन के खिलाफ हम सर्वोच्च न्यायालय में अपील करेंगे । यहाँ से ही बजा देंगे । जो केंद्र में कहा देखिए भाई उत्तेजित होने की जरूरत नहीं । विभागीय चीफ ने कहा मैं हकीम है, नए प्रयोग कर रहे हैं जनाब ये हमारी इज्जत का सवाल है । इस कुर्की जब्ती से हम सरे आम नंगे कर दिए गए हैं तो दूसरा सहयोगी आगे बढा था । तीसरे में जोडा है । जरा सोचिए इस से हमारी कार्यक्षमता पर कितना असर पडेगा । तूफान, बारिश, शीतलहरी, लू सब मौसम का मजा इस कमरे में बैठे बैठे मिल जाएगा । मगर ही नहीं दो विभागों पर यह कटप्पा दृष्टि क्यों? और ऊपर क्यों नहीं? बगल वाले विभाग के लोग बोले तो एक ही गुजरा भाई जो जो अक्ल खुलेगी और रास्ते भी खुलते जाएंगे । एक आपातकालीन सभा बुलाई गई । आत्मसम्मान के रक्षा जो प्रस्ताव रखे गए उनमें से निम्नांकित उल्लेखनीय है पहला पुलिस बुलाओ दूसरा साहब को एक बडा विरोधपत्र दिया जाए । पर बिल्ली के गले में घंटी बांधने से हमारे चीफ इसलिए पांव खींच ले गए कि वे साहब के द्वारा प्रतिबंधित दो जातियों में से एक हैं और दूसरे अपनी छवि साहब की नजर में बिगाडने नहीं चाहते थे । बिंदु नंबर तीन आपस में चंदा करके नए दरवाजे लगवा दिए जाए । हालांकि इस प्रस्ताव की धज्जियाँ उड गई की साहब इसे भी उखडवा ना दें । बिंदु नंबर चाह रहा था हडताल की जाए और नारे ये हूँ हर दिल करता ये गुहार दरवाजे वापस करो सरकार कपडे लगाते लोदार दरवाजे हरगिज मत बुखार बिंदु नंबर पांच हाँ गेम डिप्टी की पिटाई की जाए । एक समुदाय के इन दो सिरफिरों को मालूम होना चाहिए कि ये बिहार है । किसी भी प्रस्ताव पर एकमत न हुआ जा सका । सभा शोरशराबे में खत्म हो गई । स्वाभिमान की रक्षा का मुद्दा बदस्तूर है । आपके पास कोई सुझाव हो तो हमें लिख भेजिए ।

Ep20 - Mahar Jaa Gayo - Unke Ada thar lo

मार जान गए उनके अदात है लोग गए यकबयक हवा जो पलट नहीं दिल को सबरे करार है । ज्योतिंद्रनाथ प्रसाद को कुछ ऐसा ही भाग हुआ जब देश की राजनीति नरेंद्र मोदी के उदय के बाद मोड खा गई । एक आम आदमी की प्रतिक्रिया जानने के लिए ज्योतिंद्र मंगरु राम को पकडा । वे अपनी झोपडी के बाहर उकडू बैठे इत्मिनान जे बी डी पी रहे थे । मुझे देखा तो इत्मीनान से पीने लगे । मंगरू भैया राम राम ज्योतिंद्र ने अभिवादन किया । ऍम राम मुझे घुलकर देखा उन्होंने तू कौन है जी जी मैं देखा हूँ ज्योतिंद्र में खेल से नहीं हो रही है । अच्छा तो लेखक हूँ । अखबार किताब वाला झोपडी की ओर रूख कर मंगरू ने हाथ लगाई अरे यहाँ चमरोग की मई जलाई । पीढी भेजा फिर जो केंद्र की और गर्दन घुमाई हो हम समझ लिया भैया जीते पार्टी पॉलिटिक्स के आदमी हो लो । बीडीपीओ ज्योतिंद्र ने स धन्यवाद लौटा दी । आप राजनीतिज्ञों से घृणा करते हैं जो केंद्र में पूछा नानाजी हमें गिरना करेगा । अधिकार ना हवा हमार सबका अधिकार करता सरकार लेले थी । वैसे सुन ली है कि विरोधी पार्टी सब कुछ लौटा देते ही मगर कौन विरोधी हमें तो घेरना हो वोट मांगने वाला से मंगरू बीडी फोकर बोले थे जी ज्योतिंद्र में कहा था जी आखिर वोट बोर्ड कहे ला तो हमारा वाला कुछ खेले हैं । हमारे गांव में बिजली न पहुंच लाये ट्यूब नहीं लग नहीं स्कूल खुल नहीं कल्लू के जो रूके दवा ना मिल नहीं है । मंगतूराम फर्राटेदार मगर ही बोले जा रहे थे मानव सारे जाऊंगा ठेका उन्होंने ले रखा हूँ हैं कुछ केला उतना और चल दिया वॅार के मंगलभाई ने हाथ चमकाएं बु बिच कराया गांव का भी कार भी माने देश का राजनीतिक बोर्ड हूँ शायद मजबूर आम कि यह आदत है कोई उन्हें बाॅन्ड करने वे तेज रिकॉर्डर की भांति चालू हो जाते हैं । आज ही हम कहते हैं ससुर को फुर्सत कहा कि वह हमारे गांव में पोर ग्रेस दिलाई । वो तो अपने में ही सिंह इमारत है । कभी वो ऍम की जो कभी ओके मिट्टी पलीद कर दो और समय पर तो आपके हमसे कहत भैया बोर्ड दे दो धर तेरी वाला जैसे बोर्ड हो लाइक अमर लोग गए के नब्बे सर हो गयी । अरे वो धनिया जरा बाबू को ले । शर्मा ने जो तीन रहे उनकी पहली हाथ पर ध्यान नहीं दिया । वे उनकी राजनीति पदक बरदंग थे । पूछा मंगलभाई आप कौन सा अखबार पढते हैं ये भी खूब रहो आ रहे है बाबू अगर हम अखबार पडेंगे, काबिल होते तो हमारे ईद असर हाल हम तो सरकार की ऐसा पार्ट पढाते की नानी याद आ जाती । भला हूँ वहां हम का अनपढ बनाकर बुलाने में । रखाई मंगरू फतुहा इस्लामपुर रेलवे की तरह बीडी धुलाने लगे । ज्योतिंद्र में कहा मंगरू बाबू विरोधी पार्टी की सरकार आपको शिक्षित बनाएगी और आपकी गरीबी मिटाएगी । मंगलभाई बोले आरॅन कहत है और गरीबी में डाय को गरीबी है कहाँ? गरीब तो पहले ही मार दे गए । कोच्चि महंगाई मार दे गई और कुछ के कमरे में फेंक बेल गई । इन महत्तर सालों में गरीबी हटाने के बदले गरीब का सफाया कर दिया जो बाकी रहा कहीं तो विरोधी पार्टी को बाद के वर्षों में ठिकाने लगा देने को बाबू हम तो फॅालो लोगन कहते कि ई राजनीत हैं, वहाँ भाई खूब मार जान गए । उनके अॅान

Ep21 - Aao kursi kursi khele

आओ कुर्सी कुर्सी खेले । ज्योतिंद्रनाथ प्रसाद भी जाते हैं । मुझे चुनाव का बुखार चढ गया है । मैं कोई नेता नेता नहीं महज मतदाता हूँ । हम मुद्दा यह है कि मैं किसको वोट देना ज्योतीन्द्र ने सोच लिया है । उनका वोट अवसरवादी पार्टी हो जाएगा । यह पार्टी गिरगिट की तरह रंग बदल दी है । हर चुनाव में अपने नाम को सार्थक करती है । अवसर देख सत्तारूढ दल की तरह अपने हाथ मजबूत करने पर तो जाती है और कभी विपक्ष की तरह मोदी हटाओ पर मारामारी करने लगती है ना । इसका नारा है अवसरवाद जिंदाबाद इसका चुनाव चिन्ह है । कुर्सी आपके कायल है । जो तीन रहे पार्टी को साधुवाद देते हैं कि उसे चुनाव आयोग की तरफ से कुर्सी चुनाव दिन में मिला है । मगर कुर्सी के साथ कुछ और घपले हैं । एक नेता कुर्सी पर बैठना चाहता है तो दूसरा उसकी टान तोडने में व्यस्त हैं । तान तोडने वाले की भी टाइम की दी जा रही है । इस तरह कुर्सी के इर्द गिर्द अफरा तफरी मची है । ज्योतिंद्र जी कहते हैं, अवसरवादी पार्टी ने लोकसभा के सभी स्थानों के लिए अपने उम्मीदवार खडे किए हैं । कुछ को छोडकर बाकी सभी उम्मीदवार निहायत शरीफ और पाकसाफ हैं । इस हद तक शरीफ और पाक साहब की पुलिस को उन पर विश्वास नहीं होता । उन्हें तंग करने के लिए पुलिस ने झूठमूठ के उनके खिलाफ गुंडागर्दी के मामले दर्ज कर दिए हैं । एक साक्षात्कार में उम्मीदवारों ने वार्ताकार ज्योतिंद्र को बताया की हिंदुस्तान की पुलिस को हम भाई मानते हैं । आखिर चोर चोर मौसेरे भाई वाली कहावत वो चरितार्थ करना था । इसके लिए प्रत्याशी जब तब पुलिस की धौंस रहने के लिए तैयार रहते हैं जो दिन अजीब बयान करते हैं । कुछ उम्मीदवारों को पार्टी ने तमाशा के रूप में खडा गया है । यह प्रजातंत्र नहीं भीडतंत्र है । जितना ज्यादा भीड इकट्ठी कर सको उतना ही फायदा भले ही भीड वोट में तब्दील ना हो । अब तो भाजपा ने भी इस पार्टी की नकल की है । भीड खडी करने के लिए अमिताभ बच्चन को गुजरात के मोर्चे पर खडा कर दिया है । अमिताभ एक चुनाव प्रचार में अपने प्रतिद्वन्दी से कह रहे हैं मेरे हमने नहीं मैं तुम्हारा क्या चाहता है और राहुल जी कह रहे हैं कि आखिर अमित जी की मंशा क्या है? कहीं इन्कलाब तो नहीं चलने वाले । उधर मद्रास में भरत नाट्यम करके वोटरों को लुभा रही है । मालूम नहीं था कल की फिल्मों की छम्मकछल्लो के विरुद्ध विपक्षी चिल्ला रहा है । डेवलॅप अवसरवादी पार्टी ने अपने घोषणा पत्र में कहा है कि वहाँ यदि सत्ता में आई तो भ्रष्टाचार को बढावा देगी और दलबदल को तरजीह है ताकि विपक्ष के अस्तित्व बना रहे हैं । बिना विपक्ष के कहीं जनतंत्र होता है । ज्योतिंद्र बताते हैं, अवसरवादी पार्टी में प्रधानमंत्री पद की होड हैं । वैसे यहाँ पार्टी मानती भी है कि प्रधानमंत्री बनने का चांस से सबको मिलना चाहिए । यहाँ तक कि हेमा मालिनी को भी शायद अगले चुनाव में वे अपना भाग्य आजमाएंगी । फिलहाल अवसरवादी पार्टी की इस चुनाव में तीव्र लहर है । बहती गन्ना में आप भी हाथ बोले ज्योतीन्द्र तो अवसरवादी पार्टी को ही वोट देंगे । बोगस जी सही है ।

Ep22 - Chale Na Aawe Angan theda

चले मैं आवे आनंद टेढा ज्योतिंद्रनाथ प्रसाद अपनी आत्म कथा इसका बांचते हैं । जिस तरह दुर्योधन को महल के आंगन में पानी होने पर भ्रम होने पर द्रोपदी नई एसपी तो महाभारत नहीं होता उसी तरह स्नानाघर में ज्योतिंद्र का पैर नहीं पिघलता तो घर में कोहराम नहीं बचता था । अब कलाई टूटनी थी तो टूटनी थी पर लोग उनके प्लास्टर चढे हाथ को गर्दन के पीते से झूलता देख ही बैठते । भाईसाहब सारा दोष संगमर्मर के टाइम में है जहाँ अच्छे अच्छे सूरमा के हाथों भूल जाते हैं । इस नाना ग्रह इतना चिकना बनता ही क्यों है कि पाँच बढ जाए और तो बता के वे चप्पल बनने बंद हो गए जिसमें फर्ज को पकडने के लिए खांचे बने होते थे । ज्योतिन्द्र जी के पडोसी का कहना है कि वे बगलगीर हैं इसलिए गिरना तय था । अब गिरने में एक लुक तो है । देखने वाले खैर मनाएगी । हादसा तो बाहर होता है यहाँ घर में ना हो जाए सब जगह से डरा सहमा आदमी घर आता है सुरक्षा का ऐसा लेने के लिए । पर कम्बख्त घर भी मजबूत नहीं । बीवी ने बडे शौक से दूसरों के घर देखकर स्नान घर में टाइल्स लगवाए थे और साहब ज्यादा ने कहा था कि पापा तो मोड पर बैठकर आराम से अखबार पढेगा और अब आना नहीं टेडा नजर आए तो क्या ये ऍम ज्योतिंद्र ने हड्डी के विशेषज्ञ चिकित्सक को फोन किया? उन्होंने कहा था हमारे नर्सिंग होम में चौबीस घंटे आपातकाल सेवा चलती है । आप कल सुबह ग्यारह बजे आ जाइए । अगले दिन हाथ को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के नमस्कार की मुद्रा में गर्दन से फीते से लडका है । जब ज्योतिंद्र नर्सिंग होम पहुंचे तो तय समय से एक घंटा विलंब हो चुका था । चिकित्सक चला है । आपको तो ग्यारह बजे आने को कहा था । उनसे कैसे गए थे कि जिस हडबडी में बातों में कलाई तोड बैठे, उसी हडबडी में अब और कुछ तुडवाने का उनका इरादा था? क्या नर्सिंग होम में हर जगह टाइल्स का फर्स्ट था और वो इतना चिकना था कि अगर सही डॅाल ज्योतिंद्र ने नहीं पहने होते तो ऐसे ही फर्ज को ढलते देख उन्होंने एक सरकारी दफ्तर के बाबू से कहा यहाँ तो काया काल हो रहा है । हाँ हम इसे कार्पेट लुक दे रहे हैं । बाबू ने सीना चौडा कर कहा नर्सिंग होम में जिंदगी की रफ्तार के और शिकारे भी मौजूद थे । ज्योतिन्द्र जब घर लौटे तो कुछ रिश्तेदार उपस्तिथ थे । हम आपको देखने आए हैं । साली में कहा जरूर देखिए, अब तो डेढ महीने की पूर्व मिल गई है । आराम से देखिए । ज्योतिंद्र बोले जो आराम मुझे असर नहीं था, उसे यह हुआ स्नानघर में दिला दिया । कलाई घडी का बॉल टूटा पडा था । बीवी ने उसे बनवा दिया । पर कलाई पर तो प्लास्टर चढा था । मानते कहा एक आम भारतीय की तरह कोई काम समय पर नहीं किया तो घडी के ऊपर वाले हैं और समय पर कुछ हुआ है तो यह पलस्तर राजमिस्त्री संतोष अपनी मजदूरी लेने आया । उसने घर के प्लास्टर का सारा काम पूरा कर लिया था । उसकी आंखें विस्फारित हो ज्योतिंद्र को देख रही थी । तुम मालिक यह क्या दल दिनों बाद ज्योतिंद्र फिर नर्सिंग होम में थे । अपने हाथ दिखाने चिकित्सक ने कहा हम आपके हाथ का फिर से अक्सर करेंगे जो दिन की जेब हल्की थी । इसलिए उन्होंने विरोध किया था । दो बार तो एक्स रे हो चुका है । यहाँ हमारा प्रोटोकॉल है । आपको मानना होगा जो इंद्रकुंड बनाकर बिना एक्सरे कराए लौट आया । एक महीना बाद में नर्सिंग होम मैं तैयारी के गए । चिकित्सक ने कहा प्लास्टर बदलना होगा आपको दस दिनों बाद बुलाया था । आप एक महीना बाद आए हैं ज्योतिंद्र के तो होश फाख्ता कहाँ फस गए और फिर से मानो ईसा को क्रॉस पर चढाया गया एक्सरे और ऑपरेशन थिएटर की दवाइयाँ । गनीमत थी की प्लास्टर बदलाव का पैसा नहीं लगा । क्या उन्हें भी अपनी गलती का एहसास हुआ? बगल से शारदा सिन्हा के गीत की ध्वनि आई बेनिया डुलते मोरा मुड गलई कलैया और आम मूड गलई कलैया मोरे बलमा हो शुक्र है । घर में जितने कमरे हैं उतने ही स्नानघर भी । इसलिए पसंद अपनी है कि किसका मोड पर बैठकर कौन सा अखबार बढे और प्लास्टर उतना ही झकाझक सफेद रहे जितनी ज्योतिंद्र की कमी । इसलिए उस पर गमझा रखकर जब बाहर निकलते हैं तो यह प्रतीत होता है कि यह जो जा रहा है, हाथ में असला तो नहीं था । मैं हुए लेकिन साडू भाई उनका हाथ देखकर चाहोगे हूँ । ऐसा लगता है जैसे किसी ने डंडा बरसा दिया हो । बहरहाल आप पीट कर आए हैं या पिटकर

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