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परिचय

हूँ नमस्कार दो सौ मैं हूँ आशीष क्या आप मुझे सुन रहे हैं? फॅार सोनी जो मन चाहे जहाँ पर मैं लाया हूँ । साहित्यकार गुरुदत्, प्रतिनिधि रचनाएं इन रचनाओं का पहला भाग है प्रभात वेला उपन्यासों का संक्षिप्त परिचय । पौराणिक उपन्यास श्रृंखला के इस खंड में तीन उपन्यास समाहित हैं प्रभात मिला कुमारसंभव और उमडती घटाएं । प्रभात वेला सृष्टि के आदिकाल पर आधारित है तो कुमारसंभव उसके कई सहस्त्र बाद के भारत के पौराणिक वातावरण पर आधारित उपन्यास है । आप उम्र घटाने तो उसके लाखों वर्ष बाद के आर्यावर्त भी हम वार्ता आदि के पौराणिक वातावरण् स्थिति पर आधारित है । यहाँ संक्षेप में उनके कथानक पर प्रकाश डाला जा रहा है । प्रभात वेला यह उपन्यास मानव जीवन की प्रभात रेला पथार सृष्टि उत्पत्ति वे लगा है । आज से कई लाख वर्ष पूर्व की यह गाथा है । उस समय तक पृथ्वी पर वनस्पतियां प्रचुर मात्रा में हो चुकी थी और इधर जीव जंतु भी अत्यधिक संख्या में उत्पन्न हो चुके थे । उस अवसर पर सोम और रोहिणी ने मिलकर सूर्य की रश्मियों से कलोल करना आरंभ कर दिया तो इस भूतल पर अनेक स्थानों पर पंचमहाभूतों में मंथन प्रारंभ हो गया । आदित्य ने रोहिणी से सहयोग किया और सोम ने इस सहयोग में सहायता की पृथ्वी पर अंडों के रूप में गर्व स्थित हो गया । ऐसे ही एक अंडे से इस उपन्यास की नायिका जिसे कालांतर में महर्षि मरीचि ने प्रस्तुति नाम से अभिहित किया, उत्पन्न हुई थी, उस समय उस स्थान पर दिन का उषाकाल था । शनः एक्शन है, अंडा परिपक्क होता गया और यथा समय फूटा । बोस में से हमारी नई का रूप प्राणी बंद हुआ हूँ । ये प्रथम नारी पूर्ण युवती के रूप में उत्पन्न हुई थी । बहुत होने के उपरांत मैं कुछ देर तक तो भूमि पर ही पडी रही हूँ, किन्तु जब उसको स्वच्छ वायु और प्रकाश का आस पास मिला तो कुछ ही क्षणों में सांस लेने लगे और उष्णता के सहयोग से उसमें स्फूर्ति का संचार होने लगा । कुछ कुछ दिनों में भूमि पर से उठकर बैठ गई और फिर खडी हो गई । उसने अपने चार और की हरी भरी श्रृष्टि को निहारा और असमंजस में बडी निहारती नहीं । धीरे धीरे उसने वनस्पतियों तथा अन्यान्य जीव जंतुओं से संपर्क स्थापित किया हो । उस वातावरण में वो सहज होने लगी । तभी सहसा एक दिन उसको नदी में स्नान करते समय अपने ही जैसा दोपहर दो दो आंख, दो कान, नाक आदि वाला एक अन्य प्राणी नदी तट पर खडा दिखाई दिया । ये दक्ष प्रजापति था । दोनों को एक दूसरे को देखकर प्रसन्नता हुई हूँ । सांकेतिक भाषा में परिचय हुआ और फिर पक्ष उसको अपने साथ अपने स्थान तथा पे काम है कि आश्रम में ले गया । पृथ्वी के अन्यत्र भागों पर भी इसी प्रकार की सृष्टि हो चुकी थी । आप वहाँ कुटुंब बन गए थे । एक बार ऐसे ही एक वनचर कुटुंब अपने पिता में है कि आसाराम किए सुख संपन्नता को देख कारण उस पर आक्रमण कर दिया तो पिता महीने अपनी दिव्या अथवा योगिक विद्या के प्रभाव से उन के आक्रमण को निरस्त कर दिया । किन्तु उनमें से कुछ वनचर पिता है की आज्ञा से आश्रम के बाहर अपने लिए स्थान बनाकर रहने लगे और कुछ अपने स्थान को लौट गए । यहाँ से मानव का मानव से परस्पर संघर्ष प्रारम्भ हुआ । कालांतर ने दक्ष और प्रस्तुति का विभाग हो गया । दक्षिण तो जब प्रथम अवसर पर प्रस्तुति को देखा था तभी विचार कर लिया था । वो उससे संतानोत्पत्ति करेगा तो इसके लिए पिता में है की आज्ञा अनिवार्य थी । प्रसूति ने भी पति के रूप में दक्षिण को ही चुनाव इस प्रकार उनका परस्पर प्रभाव हो गया । सुरश की बढती गई मानव मानव ने सोच विचार और आचरण की विभिन्नता भी बातें होने लगीं । इसके साथ ही निर्वाह के लिए उत्पादन व्यवस्था के लिए वर्णाश्रम का गठन, अनुशासन और प्रशासन का प्रबंध आदि किए गए । मानव स्वभावानुसार कुछ वो ये व्यवस्था रुचिकर भी तो कुछ को ये अरुचिकर लगी विचारों में विभिन्न था । इसका मुख्य कारण था बृहस्पति । इस मतभिन्नता के जनक और प्रोत्साहक बनें । वनचर बन गए और पिता का स्थान तथा पद प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए उन्होंने आश्रम पर उन हाँ वन चरों की सहायता से आक्रमण किया जो इस बार भी निष्फल सिद्ध हुआ । श्रृष्टि का विस्तार होता चला गया । अनंग और आदित्यों का जन्म हुआ । कालांतर में राज्य व्यवस्था लागू करने की बात आई तो बेन को राजा बनाया गया । मैंने शासन तो अच्छा किया तो इससे वो उच्छृंखल हो गया । उसका वध करके प्रश्न को राजा बनाया गया । नथाना प्रगति करता गया और किरण कश्यप और उसके पुत्र प्रहलाद का काल आया । प्रहलाद ने अपने पिता की आसुरी वृत्ति का विरोध किया । आप अनंतनाम में विद्रोह भी कर दिया । उस समय नरसिंह को अवतार धारण कर हिरण्यकश्यपु पा वध करना पडा । पहला के राज्यभिषेक पर उपन्यास की पारी समाप्ति होती है हूँ ।

प्राक्कथन

ऍम हमारा वैदिक तथा पौराणिक साहित्य हमें अपने अतीत से परिचित कराता है तो जो जो हम दासता की जंजीर में जब करते गए, अपने अतीत से कटते गए और अब जब हम स्वतंत्र हैं, तब कदाचित इस सब की आवश्यकता ही नहीं समझी जाती कि हम ये जाने की हम क्या थे, क्योंकि यह प्रगति का युग है । हमने प्रगति तो की है किंतु केवल बहुत क्षेत्र में नैतिकता और आध्यात्मिकता में हमारा राहत हुआ है । उचित अनुचित कर्तव्य अकर्तव्य की पहचान को हम हो बैठे हैं । ये राज भारतीयों का युवा हो, ऐसी बात नहीं है । यहां तो मानव का का हुआ है किसी कभी कि यह चिंता समीचीन ही है । हम क्या थे, क्या हो गए और क्या होंगे अभी प्रस्तुत उपन्यास प्रभाती वेला का कथानक हम क्या आधे से संबंधित है आदि प्राणी सृष्टि का ये है और पन्या से वर्णन है । ज्ञान और विज्ञान हमें बताता है कि आरंभ में यह पृथ्वी कैसी थी और उसमें कौन निवास करता था । हमारे ग्रंथ हमें बताते हैं कि मानव से पूर्व वन्य पशु और पक्षियों की रचना हुई । कालांतर में मानव की श्रृष्टि हो जाने के उपरांत अधिकांश वन्यप्राणियों का लोग होता गया हूँ किन्तु सर्वथा लोग होना तो प्रलय में ही संभव है । हमारा साहित्य बताता है कि आरंभिक सृष्टि मैं तो नहीं थी । इसका कारण और प्रमाण भी हमारे साहित्य में विस्तार से प्राप्त है । उसके आधार पर कहा जाता है आधी मनुष्य अंडर था । उस अंडे का निर्माण किस प्रकार हुआ और फिर उसमें किस प्रकार मनुष्य प्राणी का बीजारोपण हुआ तथा आरंभिक मनुष्य किस आकार प्रकार का उत्पन्न हुआ, यह भी सम प्राण हमारे शास्त्रों में वर्णित है । पौराणिक सहित वेदों का ही विस्तृत और सहज हम रूप है । किन्तु वेद क्या है? उनकी रचना किस प्रकार हुई? उनके रचियता कौन थे? लेकिन भाषा और लिपि में रचे गए क्या वैदिक भाषा जनसामान्य की भाषा रही थी । भाषा और लिपि का अविष्कार कब, कैसे और कहां हुआ तथा किसने यह अविष्कार किया, ये सब इन पुराणों में पृथक से उल्लिखित नहीं है । तब आती, इसके संकेत उनमें प्राप्त हैं । ये और इसी प्रकार के अन्य अनेक प्रश्न है, जो चिंतनपरक तथा अध्ययनशील मनुष्य के मस्तिष्क को पूरे देखते रहते हैं । ऐसे जिज्ञासु पाठकों को पुराणों का गहन अध्ययन करना चाहिए । वेदों का भी कर सके तो अधिक उत्तम होगा । आत्मा और परमात्मा क्या है? उन का परस्पर क्या संबंध है, वे सजीव हैं । या निर्जीव उनका निवास कहाँ है? ये भी उसी प्रकार के प्रश्न हैं, जिनका समाधान आज का मनीषी चाहता है । हमारे विद्वानों ने इन विषयों पर गंभीरता से विचार किया, मंथन किया, मन किया, शोध क्या प्रयोग किए? तब कहीं जाकर उन्होंने कुछ सिद्धांत सुनिश्चित किए और फिर उस ज्ञान को सर्वत्र प्रकाशित करने का सुख आ रही क्या मंत्रदृष्टा ऋषियों ने वेद सहायता हूँ की रचना की । कालांतर में व्यासपीठ के अधीक्षक व्यासों ने उन के आधार पर पुराणों कोरा चाहूँ व्यासपीठ की यह परंपरा महाभारत, जो समय जय काफी माना जाता था, तक ही प्रचलित मिलती है । प्रभात वेला यद्यपि उपन्यास है, किन्तु इसमें निहित ज्ञान उपन्यास से कहीं अधिक अतुलनीय है, जो समझना चाहिए कि उपन्यास के माध्यम से विद्वान लेखक ने सृष्टि के आरंभ कि सारी प्रक्रिया इस उपन्यास में वर्णित कर दी है । उपन्यासकार स्वर्गीय श्री गुरुदत् मात्र उपन्यासकार नहीं थे । वे चिंतक, शोधकर्ता, अध्ययनशील अध्यापक एवं मनीष ए थे । उन जैसा शुद्ध बुद्ध पंडित ही ऐसे जटिल और दुरूह विषय को उपन्यास एक रूप में प्रस्तुत कर सकता था, कोई अन्य नहीं । हिंदी के पाठकों का यह सौभाग्य है कि स्वर्गीय गुरूदत्त की लेखनी का चमत्का उनके लिए पुस्तक रूप में सुना है हूँ । हूँ । अध्ययनशील अध्यापक एवं मनीष थे उन जैसा शुद्ध बुद्ध पंडित ही ऐसे जटिल और दुरूह विषय हो और पन्यास इक रूप में प्रस्तुत कर सकता था कोई अन्य नहीं । हिंदी के पाठकों का यह सौभाग्य है स्वर्गीय गुरूदत्त की लेखनी का चमक का उनके लिए उस तक रूप में सुना है ।

प्रथम परिच्छेद

प्रथम परिचय बिहड वन में एक विशाल वट रक्ष की छाया में एक पाँच कुट्टी बनी थी । लकडी के खंभों के साथ रक्षियों की सूखी डाले बांध कर उन पर किसी वक्ष के बडे बडे पत्तों को रखकर ये कुट्टी बनाई गई थी । कुटि के तीन और वृक्ष की शाखाओं से बनी तिवारी थी और एक और द्वारा चार मोटे मोटे वृक्षों के तने । हम बोल के रूप में चार फोन पर गडे थे । हरी लताओं से रक्षा की सूखी डालियां इनके साथ बंदी हुई थी । इसी प्रकार छत बनी थी । चारों खम्बे चार शाखाओं से बंधे थे और उन पर छोटी छोटी शाखाओं का जाल था । इस जान पर पत्ते रखे हुए थे । पत्तों पर भी लताओं से बंधी वृक्षों की शाखाएं रखी थी । कुटिया का द्वार शाखाओं की जाली कैसा बना था? दीवारों के समान ही ये द्वार भी बनाया गया था तो दीवारों और द्वार की और से हवा भीतर आती जाती थी । छत पर पत्तों के कारण और ऊपर घने वृक्ष की इच्छा होने के कारण धूम तथा वर्षा का जल भीतर नहीं जा पाता था । कुटि की पीठ रख के मोटे तो नहीं के साथ लगती थी और द्वार ब्रिक्स के नीचे एक साफ सपाट स्थान की और था । द्वार की जाली उठाकर एक और की जा सकती थी । खंबों के साथ टिका देने से द्वार बंद हो जाता था । कुटिया वन्य जंतुओं को भीतर आने से रोकने के लिए बनी थी । उस स्थान का जलवायु ऐसा प्रतीत होता था । वहाँ तो शीट और नहीं गर्मी असहाय होती थी तथा कुटिया में रहने वाले को कुटिया में खुली हवा के आने जाने से कष्ट नहीं होता था । रखिया जिसके नीचे ये कुटिया बनी थी, बहुत बडा था । उसके नीचे की भूमि समतल थी । इस समतल भूमि पर दस बारह अन्य ऐसी ही कुटिया बन सकती थी । प्रातःकाल का समय था । रक्षा पर बने घोसलों में रहने वाले सैकडों पक्षी पूछा, कालका प्रकाश देखकर फडफडाते तथा चीन चीन करने लगे थे । कुटी के भीतर भी सूखे पत्तों की सरसराहट एडवंचर चढा । हट का शब्द होने लगा था । हाँ, घटने ही वाली थी । कुटि के द्वार को भीतर से कोई धकेलकर एक और करने लगा । द्वार की जाली एक और हुई तो भीतर से एक सर्वथा नगर युवती निकल आई और कुटी के बाहर खुले स्थान पर खडी हो सुस्ती मिटाने के लिए अंगडाइयां लेने लगी । शरीर से सर्वथा लगने, सिर के बाद जटाओं से कंधों पर लटकते हुए वह भी वृक्ष के नीचे ही खडी थी । इसका ध्यान बहुत स्लो में चाहते, पक्षियों के कोलाहल की और चला गया । इधर ध्यान जाते ही उसकी आंखों में चमक दौड गई और उसने मुख गोल कर सीटी बजा नहीं आरंभ कर दी । बहुत स्लो में से पहले एक फिर कई पक्षी गर्दन निकाल कर सीटी बजाने वाली ही और देखने लगे । तदंतर एक एक कर कई पक्षी उसकी और लपके और कंधों और हाथों पर आप बैठे और लगे की जीकर अपने मन का अल्लाह प्रकट करने ऐसा प्रतीत होता था इस युवती का इन पक्षियों से चिरकाल का परिचय है पे आने जाने वाले पक्षियों को देख देख कर हसती थी और उसकी हसी की आवाज सुन पक्षी चीज चीज करते हुए उसके चारों और उडने लगे थे जो उसके सिर गंधों पर बैठे थे की प्रसन्नता से नाश्ते प्रतीत होते थे और अन्य उसके सिर पर तथा उसके चारों और मंडे रहते फिरते थे । वह जब भली भांति सचेत हो गई तो जंगल के बाहर की और चल पडी । वट रख के नीचे की खुली भूमि पार कर छोटे मोटे रक्षियों के बीच से निकलती हुई वह चली जा रही थी । भूमि ढलान पर आ गई थी । वो समाप्त हो गए थे और सामने एक स्वच्छ जल वाली नदी कल कल शब्द करती हुई बह रही थी । युवती नदी के तट पर खडी हुई हाथ हिला । उसने सिर पर मंडराते पक्षियों को उडा दिया । पक्षी कुछ देर तक उसके सिर पर हवा में मंडराते रहे और फिर एक एक दो दो कर उड गए । इस प्रकार अपने सखा साथियों से अवकाश पाकर वह युवती नदी तट पर बैठ गई । कुछ देर तक बहते जल पर उठने वाली तरंगों को देखती रही । अंतर उसके पांव पसार नदी के जल में डाल दिए । शीतल जल के पापा को लगने से उसके पूर्ण शरीर में कपकपी हुई और उनकी हसी निकली तो मुक्ता सामान श्वेत दम दिखाई देने लगे । इस समय नदी के पार प्रकाश बढने लगा था । पूर्व दिशा का आकाश रक्तवर्ण हो गया था । नदी के पार दूर तक एक रेतीला मैदान था और छितिज स्पष्ट दिखाई दे रहा था । छितिज पार आकाश में लालिमा फैलती दिखाई दी तो वह प्रसन्नता से हाथ उठाकर जोर से है का शब्द कर उठी । मैं खडी हो गई और पढ रही लाली की और देखने लगी । उसकी आंखों में उत्सुकता थी, मुख पर आश्चर्य के लक्षण थे और विश्व में खुले अधर कुछ बोलने को उद्यत प्रतीत होते थे । छितिज पार प्रकाशपुंज गोलाकार भास्कर उगता दिखाई देने लगा । प्रथम एक प्रकाश बिंदु प्रकट हुआ और छनछन में वह बढने लगा । भूमि के पीछे से एक हाली सामान प्रकाशपुंज आकाश में उठने लगा । जब भास्कर पूर्ण निकल आया तो नदी के तट पर खडी युवती ने एक हाथ से भरा हो क्या? वाह वो करती हुई नदी में कूद पडी, डुबकी ली और जल में से शर्ट निकालकर तैरने लगी । कुछ देर तक तैरने के उपराम बह जल में खडी हो गई और शरीर के प्रत्येक अंग को मल मल कर साफ करने लगी । दिनभर घूमने और रात पत्तों पर सोने से शरीर पर चढी मैल दूर होकर उतारने लगी । शरीर के अंग अंग को मलमल कर जल सिद्ध होती थी और उसको उजला एवं सुंदर देख प्रसन्नता अनुभव करती प्रतीत होती थी । उसे अपना शरीर रक्षा के साथ ही पक्षियों से अधिक भला लग रहा था । जल से शरीर खुल गया और वह नंबर की भर्ती निर्मल प्रभात की भांति उज्वल और कमाल की भर्ती प्रफुल्ल दिखाई देने लगी । शरीर को रुचिपूर्वक साफ कर रह मुक्त होने लगी । मुक्त होती हुई वह उसका प्रतिबिंब जल में देखती जाती थी और इसे आकाश में उठ रहे भगवान सूर्य का प्रतिबिम्ब जल में देखते प्रसन्नता अनुभव करती थी । क्या प्रसन्नता उसकी आंखों में बढ रही चमक और मुख पर बन रही रेखाओं से प्रकट हो रही थी । अब सिर के बालों की बारी आई । वो जल में डुबकी लगाते समय भी गए थे । फिर की लपटों से जल्द टपक रहा था । उसने हाथ से दबा दबाकर लटों में समय चल छोड दिया । तदनंतर जटाओं को मुक्त पर से हटा पीठ की और कर सीधी हो । एक घंटे तक सूर्य की और देखकर घूमें । इस सब समय में उसका मुख नदी के तट किया था, जिधर से सूर्य निकल रहा था और उसकी पीठ उस और थी जिधर जंगल था और जिधर से वह नदी पर आई थी । जो भी वह नदी से बाहर निकलने के लिए भूमि उसकी दृष्टि उसी तट पर खडे एक प्राणी पर चली गई । मैं उसे देख डर गई थी । उस करानी के सिर पर, मुख पर और होटों से ऊपर घने बाल उग रहे थे । डरकर उसने जल में डुबकी लगा दी और जलमग्न हो गई । जब उसने सिर्फ उन्हें जल्द से बाहर किया और तक की और देखा तो उसी प्राणी अभी भी खडा दिखाई दिया वह एक लंबी दाडी मुझे और जटाओ वाला पुरुष था । उसी कमर पर मृगचर्म लपेटा हुआ था और हाथ में बृक्ष की डाल का ठंड था । ऐसा जीव उसने अभी तक नहीं देखा था । वह वन पशु तो नहीं था । सब वन पशु हाथ पाओं के बाल खडे होते और चलते थे हूँ पर खडे नहीं हो सकते थे । साथ ही प्रायस सब जन तो उससे डर कर भाग जाया करते थे । यह तो मुग्ध होकर उसकी और देखकर मुस्कुरा रहा था । वह उन्हें डुबकी लगा । उसे अपनी आंखों से ओझल करने वाली थी कि तट पर खडा पुरुष खिलखिलाकर हंस पडा । वह डुबकी लगती लगती ठहर गई । तट पर खडे पुरुष तेरे हाथ खडाकर आश्वासन के भाव में कहा हैं निर्भय हो निर्भय हो । पुरुष को उसी की भर्ती कुछ बोलते तथा हस्ते सुन मैं समझी व्यक्ति उसी की भर्ती का है । पुरुष ने उन्हें हाथ से संकेत किया और कहा भाई मत करो, आओ बाहर निकल जाओ । युवती ने उसके और ध्यान से देखा तो आश्वस्त अनुभव करने लगी । अब एक एक पक्का जल से निकलने लगी । जल से निकलकर वह पुरुष के सामने आ खडी हुई पुरुष के बाहों, टांगों, पेट और पीठ पर बाल नहीं थे । शरीर के स्थानों पर उसका गौरवर्ण बहुत स्पष्ट दिखाई देता था । पुरुष ने पुलिस पूछा तुम कौन हो? युवती ने आप वो के शब्द उच्चारण किए और आज से अपनी कुटिया की और संकेत क्या? तदंतर उसने कुटिया की और चलने का हाथ से संकेत भी कर दिया । इस समय युवती समझ गई थी कि सामने खडा व्यक्ति उससे विलक्षण है । फिर भी ना मुख, कान, टांगों, बाहों और खडे होने के ढंग से मैं उस जैसा ही दिखाई देता है और उसने भी इस तरी को पहली बार ही देखा था । ये इस तरह से दुबली पतली थी, कोमल और सर्वथा लोम रही थी सिर पर बाल से परन्तु बारिश और जटाओ उसमें लटकते हुए उसके सिर दाडी और मुझे ऊके बाद मोटे मोटे और घने थे भी भी उलझे हुए नहीं थी । है । उसके सिर और मुख पर फैले हुए थे । वह देख रहा था कि सामने खडे अपने से कद में छोटे जीव कि कमर पतली है और नीतम बडे बडे हैं । एक अन्य विशेषता वक्ष स्थल पर दिखाई दी । उसकी छाती दो गोल पिंडो में उभरी हुई थी । पुरुष ने अपनी मांसल परन्तु तरी छाती की और देखा और फिर उसकी और वह विचार ही कर रहा था । यह क्या है? क्या कुछ भी रहती हैं? एकाएक उसके मुख से निकल गया तो उन को उन श्रेष्ठ अतिश्रेष्ठ युवती कुछ नहीं समझे । फिर भी उसके मुख पर हर्ष और उल्लास देख उसने अनुमान लगाया कि वह उसे पसंद कर रहा है । इस समय उसे एक बिहार की बात स्मरण आ गई । वाह यार, अपने सामने पडे त्रसित तथा चीज ही करते एक पक्षी को देख संतोष और प्रसन्नता प्रकट कर रही थी । युवती विचार करने लगी कि कहीं इस सामने खडे व्यक्ति की प्रसन्नता भी वैसी ही ना हो परन्तु उसके मुख पर भिन्न भाव था और वह शांति अनुभव करने लगी थी । सामने खडा व्यक्ति देख रहा था कि उसके कथन से अधिक उसके मुस्कराने और हाथ के थपथपाने से अधिक विश्वास दे रहा है । मैं समझ गया कि वह वन पशुओं की भर्ती उसकी वाणी को ही नहीं समझते हैं तथा उसने अब संकेतों से समझाने का यत्न किया कि वे है हिंसक जान तो नहीं है । उसने उन्हें मुक्त आंखों से उसकी और देखते हुए कहा तो उन अतिश युवती ने उसे कसन की नकल उतारते हुए कहा । वरिष्ठ पुरुष ने कहा था यह प्रथम बात दोनों में हुई । इससे दोनों में विश्वास बडा और दोनों खस पडे । अब युवती ने पूछा ये एक और उसमें समझा कि वह उसके निवास के विषय में पूछ रही है । पता हूँ अब उसने वानी के साथ साथ हाथ उठा संकेत से बताने का यत्न किया । जीवन से बार दूर से वह आया है युवती जिसमें में उसकी और देखती रह गई । मैं उसके संकेतों और शब्दों का अर्थ लगाने का यत्न करने लगी । पुरुष इस नवीन सुंदर प्राणी को अपने निवास स्थान पर ले जाने की कल्पना करने लगा था । उसके अनुप्रीत युवती एक लगभग अपने जैसे प्राणी को सामने खडा देख विचार करने लगी थी । कैसे इसे अपने पास रख ले युवती ने अपने मन की बात को कार्य में लाने का यत्न पहले क्या उसने पुरुष की, वहाँ पकड अपनी कुटिया की और ले चलने का यह क्या पुरुष के आशय को समझकर चल पडा । युवती को अपनी कुटी पर गर्व था । उसने कई दिन तक कई पक्षियों के हौसले को देख छुट्टी की योजना बनाई थी और फिर कई मांस के विचार और प्रयत्न के उपरांत से बनाया था । बन जाने के उपरांत उसे उसमें सुख अनुभव हुआ था । मैं उस नवीन साथी को लेकर अपनी कुटी के सामने जा खडी हुई एक्शन पर कुट्टी के सामने खडे हो प्रशन्नता और विजय के भाव में शासी पुरुष मुख पर देख वह उसे भी चली गई । वहाँ से पत्तों के बिच होने पर बैठा और उसे बैठे रहने का संकेत कर छुट्टी से निकलकर भर्ती हुई । एक वृक्ष की और गई वह रक्षित फलों से लगा था है । उनमें से विफल जो अभी किसी पक्षी ने चोंच मार गंदे नहीं किए थे । तोडने लगी । उसने इतने तोड दिए जितने की वह अपनी दोनों भुजाओं और छाती के बीच उठा सकती थी । पुरुष छुट्टी के बाहर निकल आया । वह उस स्थलों के वृक्ष के पास जा फल बीनते देखकर समझ गया कि वह है उसका आथित्य करना चाहती है । इससे उसकी समझ में आ गया कि वह बुद्धि और भावना रखती है । जब युवती फलों से लदी फदी लौटे तो वह उन्हें कुट्टी में आ गया । दोनों पत्तों पर बैठ गए । युवती ने फल बीच में रखकर उसे खाने का संकेत क्या? अब पुरुष ने संकेत से बताया कि वह नदी पर जाकर स्नान करेगा । जब यह समझाने में सफल हो गया तो उसे वहीं छोड बहन नदी तट पर चला गया । युवती तब आश्वस्त हो चुकी थी उसे वह पुरुष अब भयकारी प्रतीत नहीं हो रहा था । वो स्नान करके लौटा । मृत चर्म अभी भी सूखा था । युवती समझ गई है । उसके शरीर का अंग नहीं है । नुकसान करते समय अवश्य उसने उतार दिया होगा । अब दोनों आमने सामने बैठकर फल खाने लगे । पेट भर खा चुके तो छिलके और गुठलियाँ उठा युवती ने कुटिया के बाहर फेंक दिए । इकाई पुरुष को अपनी कल्पना स्मरण आई कि वह है उसे अपने आश्रम में ले चलें । अच्छा उसने संकेतों से उसे बताने का यत्न किया कि उसकी भी एक छुट्टी है । वह इससे जिसमें वे बैठे हैं, अधिक स्वच्छ और सुंदर है । युवती कुछ कुछ ही समझ पाई । अनायास ही उसके मुख से निकल गया क्या? और उसने उन्हें हाथों केसंकेत और शब्दों से प्रेमभरी दृष्टि से उसे समझाने का यत्न किया कि उसे उसके साथ चलना चाहिए । युवती समझी तो और उसने सिर्फ हिला इंकार कर दिया और उसने उसके कपोलों पर प्रेम से दोनों हाथ रखकर उसे समझाया । इस समय तक मैं समझ गया था जैसे पशुओं में नर और नारी होते हैं, वैसे ही वह मनुष्य नारी है है । उसे अपने स्थान पर ले जाकर संतानोत्पत्ति करेगा । परन्तु युवती को इंकार करते देख परेशानी अनुभव करने लगा । वह संतानोत्पत्ति के लिए कभी करें । नर पशुओं को बल प्रयोग करते भी देख चुका था । तभी एक नारी के लिए एक से अधिक नरों को परस्पर युद्ध करते भी देख चुका था हूँ । उसके मन में आया कि वह भी बल प्रयोग करें । तुरंत उसकी कोमलता, मृदुलता और दुर्बलता देख रहे । ऐसा करने के लिए मन को तैयार नहीं कर सका । फिर भी वह उसकी वहाँ पकडा । उसे हाथ के संकेत से अपने साथ चलने के लिए उत्साहित करने लगा । युवती समझी बलवान व्यक्ति उसे बलपूर्वक सांस ले चलने का यत्न करने वाला है । अच्छा उसने पीछे और क्रुद्ध स्वर में कहा ना ना और वह लीड गई । मैं समझती थी की लेते हुए उसे उठाकर ले जाने में उस पुरुष को कठिनाई होगी । इस पर पुरुष ने उसकी वहाँ को छोड दिया । स्वयं उठकर उसने यह संकेत क्या कि वह जा रहा है और फिर आएगा तदंतर एक ठंड तक उसके मुख पर दयनीय दृष्टि से देख वह कुटिया से निकल घने जंगल की और चल दिया । युवती ने उसे जाते हुए लालसा भरी दृष्टि से देखा और से पुकारा परन्तु पुरुष केवल एक दृष्टि पीछे को डाल हो रहा अपने मार्ग पर चलता गया । यूपी उसे कुछ देर तक जाते देखती रही अब है उठ कर बैठ कुटिया के द्वार पर आकर खडी हुई थी । एकाएक उसके मन में कुछ आया और वह उसकी और हाथ उठा ऊंची ऊंची आवाज देते हुए भाग खडी हुई । मेरे हाथ उठाकर कह रही ही बी ए ए ए ए यह घटना मानव जीवन की प्रभात भी इलाका है । आज से कई लाख वर्ष पूर्व की बात है । पृथ्वी पर वनस्पतियां प्रचुर मात्रा में हो चुकी थी । इधर जीव जंतु भी भारी संख्या में बन चुके थे । ऐसे अवसर पर सोम और रोहिणी दोनों ने मिलकर सूर्य की रश्मियों से टटोल करनी आरंभ कि और ऊपर कई स्थानों पर पंचमहाभूतों से मंथन आरंभ कर दिया । सोम तो अंतरिक्ष में भ्रमण करता रहता था । रोहिणी नक्षत्र अंतरिक्ष का भ्रमण करता हुआ पृथ्वी के समीप आया था । आदित्य नहीं रोहिणी से सहयोग किया । सोम ने सहयोग में सहायता की और पृथ्वी पर अंडों के रूप में गर्व स्थित हो गया । ऐसे ही एक अंडे में से युवती निकली थी । उस समय उस स्थान पर दिन का उषाकाल था । तब तक प्रकाश भी बहुत ही धीमा हुआ था और रक्षा के झुरमुट में जहाँ अंडा बना और बडा हो रहा था । प्रकाश और भी काम था । अंडा भीतर के प्राणी की हलचल से फूट पडा और वह अठारह उन्नीस वर्ष किसी युवती अंडे ने से बाहर लुढक पडी । कुछ देर तो वह भूमि पर पडी रही परंतु जब स्वच्छ वायु में श्वास लेने लगी उसके शरीर में ऊष्णता और स्फूर्ति प्रकट होने लगी । वह भूमि पर से उठी और लुढक की पडती इधर उधर टटोल टटोलकर चलने लगी । धीरे धीरे प्रकाश बढने लगा और वह उस वन को देख देख कर अपने पर हम अपने चारों और की वस्तुओं पर विचार करने लगी । एक सम्वत्सर से अधिक काल व्यतीत हो जाने पर युवती ने पेड पौधों, पक्षियों और वन पशुओं को देख देख कर बहुत कुछ सीख लिया था । दुःख की निवृत्ति, सोने के लिए स्थान, दूसरों से भय से बचाव और जल्द से शरीर को साफ करना, यह सब मैं करने लगी थी । समीर ही एक स्वच्छ जल वाली नदी थी । उसमें वन के पशु जल पीते एम जलविहार करते थे । वह भी उन्हें देखकर नाम था तैरने लगती थी । पक्षियों के हौसलों को देख देख उसने अपने लिए एक कुटी बना ली थी और उसमें पत्ते बिछाकर कोमल बिछोना बना लिया था । इस प्रकार जीवन की मूल आवश्यकताएँ भोजन, निवास और सर्दी गर्मी से बचने का उपाय आवश्यकता पडने पर विचार कर प्राप्त करने लगी थी । स्वच्छंद घूमती खेलती कूदती खाती पीती वह दिन व्यतीत करती चली जा रही थी । प्राय घोसलों में दो दो पक्षियों को रहते देखती थी और अपनी छुट्टी में भी मैं अपने किसी साथी की लालसाहब करती थी परंतु अपने सामान किसी को ना पाकर वह व्यवस्था थी । इस समय एक का एक उसे दो टांगों पर खडा होकर चलने वाला तथा अपने ही सामान, आंखे, नाक, कान तथा मुख वाला प्राणी दिखाई दिया और उसके मन में अपनी कुटिया में साथी के साथ रहने की आशा बन गई । परंतु जब प्राणी उसके महीनों के घोर परिश्रम से मनी कुटिया को छोडकर चल पडा वह अदृश्य आकर्षण से खींची हुई हैं । उसकी और कूकती हुई भाग खडी हुई और उसने आवाज सुनी तो खडा हो घूमकर पीछे की और देखने लगा । युवती आकर उसके सामने खडी हुई । पुरुष समझ रहा था कि वह पुनः उसे वहीं रह जाने का आग्रह करने आई हैं अतः रहे हैं । प्रश्न भरी दृष्टि में उसकी और देखने लगा युवती ने अपनी वहाँ उसकी बाहर में डालते हुए उसके साथ चलने का संकेत क्या तो पूरा नहीं प्रसन्नता से हसने लग था तो चल पडे कुछ पल ही हुए थे कि युवती उसे एक और घसीटकर ले जाने का यत्न करने लगी । इसका कारण जानने के लिए उस और चलता रहा । कुछ ही पता चलने पर एक वृहत अंडे के समीप जा पहुंचे । ये अंडे का छिलका मात्र था । छिलका एक और सिर्फ बैठा हुआ था और भीतर से खाली था । वह इतना बडा था ये युवा मनुष्य टांगे समेटकर उसमें बैठ सकता था । यूपी उसे समझाने के लिए कि वह उसने से निकली है, अंडे के छिलके में घुस गई और उसमें टॅबलेट बैठ गई । अब फिर मस्ती हुई । बाहर निकल गर्व भरी दृष्टि में उसकी और देखने लगी और सब समझ रहा था । उसके लिए यह कोई नई बात नहीं थी । अतः मुस्कराते हुए उन्हें उसकी वहाँ को अपनी वहाँ पे डाल अपने मार्ग पर चल पडा । मार्ग चलते हुए उसने अपने भी वैसे ही उत्पन्न होने के बाद संकेतों से बताने का यह क्या, जो जो भी पश्चिम की ओर चलते गए । वन अधिक और अधिक घना होता गया । लक्ष्य अति समीप समीर और कई स्थानों पर तो गिरे हुए भी थे । पुरुष कुछ पेडों पर चिंता देखता हुआ मार्ग पा रहा था । ऐसा प्रतीत होता था कि वे चिन्ह उसने किसी पत्थर इत्यादि कडे वस्तु से पेडों पर इस और आते हुए बनाए थे । कई स्थानों पर गिरे वृक्षों से मार्ग अवरुद्ध होता था, तब तक उस युवती को अपनी भुजाओं में उठाकर पेड के तने पर बैठा देता और स्वयं कूदकर पार कर उसे बुलाओ में पकडकर नीचे उतार नेता ऐसा करने में युवती गिरने के भय से भयभीत उसकी पुष्ट गर्दन में महान डाल उससे लिपट जाती थी । पुरुष को उसका कोमल स्पर्श कौन बना लगता था । इस प्रकार के स्पर्श को युवती भी ना पसंद नहीं करती थी और अब पूरा उसको अपनी छाती से लगाए रखने का यत्न करता तो वह इससे सुख अनुभव करती हुई जिसमें में उसकी आंखों में देखने लगती थी । इस प्रकार पश्चिम की और चले जा रहे थे । लगभग आधा दिन चलने पर घने वन से बाहर निकल आए । कुछ दूर उनको वृक्षों के एक लिमिट में से वहाँ उठता दिखाई दिया । युवती इसे देख ठिठककर खडी रह गई । पुरुष ने उसे बताने का यह क्या कि वह वहाँ रहता है तथा कुछ समझौता हम उत्साहित करता हुआ और वहाँ से खींचता हुआ प्रयुक्ति को बच्चों के झूठ की और लिए जा रहा था । झूठ के चार और सुरक्षों की सूखी डालियों को पेडों से बांध बांध कर बाढ बनाई हुई थी । भीतर जाने का केवल एक था । मैं झुरमुट के उत्तर किया था । इनको घूम कर उधर जाना पडा । द्वार पुष्पित लताओं से बना था इस द्वार से वे बाढ के घिरे स्थानों में जहाँ पहुंचे मेरे के बीचोंबीच एक ऊंचा मिट्टी का चबूतरा बना था । उस पर एक गहरे गड्ढे में से तू उठ रहा था । युवती ने देखा उस स्थान पर कितने ही अन्य व्यक्ति हैं । प्राय सबके साथ उस जैसे ही थे जैसे उस कर । साथ ही तो उसे अपने साथ वहाँ लाया था । उस स्थान पर कई खुटिया बनी थी । कोटिया उसकी कुट्टी से अधिक सुंदर, साफ और चारों ओर से किसी प्रकार के थोडे चौडे पत्तों से ढकी थी । प्रत्येक कुटिया का द्वार था । उस समय कुछ छुट्टियों का द्वार खुला था और कुछ का बंद था । जिनके द्वार बंद थे वो बंद होने पर एक छुट्टी की दीवार के से ही दिखाई देते थे । देखो टीमें द्वार के अतिरिक्त एक में एक लडकी भी थी । वह भूमि से एक पुरुष की ऊंचाई ये बराबर ऊंची थी । युवती ने देखा कि जितने लोग वहाँ दिखाई दिए हैं, सब कमर पर नज चर्म लपेटे हुए हैं । उनके शेष शरीर नग्न थे हूँ युवती को वह पुरुष अपने साथ लेकर एक कुटीर के सामने खडा हुआ । बुटीक का द्वार बंद था । पुरुष ने द्वार के समीप खडे हो धीरे से आवाज दी भवन मैं दक्षिण हीटर से उत्तर मिला आ जाओ । उसी पुरुष ने कहा साथ एक अच्छी है लेता हूँ दक्षिणी द्वार खोला और दोनों भीतर जा पहुंचे । दक्षिणे झुककर चरण स्पर्श क्या सामने बैठे एक बडी आयु के व्यक्ति ने आज के संकेत से बैठने को कहा । बैठने से पूर्व दक्षिण कहा किसान हैं यहाँ से दोपहर धवन के अंतर पर यह मिली है । मैं से प्रेरणा देकर यहाँ पे आया हूँ । उस बडी आयु के व्यक्ति ने इस तरीके और देख कर कहा यह मानव कन्या है । ये संतान उत्पन्न करने में समर्थ होगी । उच्च विचार कर उसने उन्हें कहा यह भगवान विश्वस्त मनो कि संतान प्रस्तुति हैं । उसकी माँ प्रकृति भगवती स्वयं है, है, शतरूपा है, पता है यहाँ रहेगी इसे मरीची के पास ले जाओ । वहाँ इसके गुरु होंगे दक्षिणी उन्हें पितान है कि चरणस्पर्श किए और युवती को उसको टी से बाहर चलने के लिए कहने लगा । पहले युवती वहाँ खडी उसको टी को भीतर से देख रही थी । छोटी पर्याप्त खुली और ऊंची थी । उसकी अपनी कुटी में तो उसका साथी पर सीधा खडा नहीं हो सकता था । वह स्वयं भी कुछ झुककर ही खडी हो सकती थी । स्कूटियां में छत इतनी ऊंची थी कि सीधा खडे होने पर भी हाथ उठाकर छत को छुआ नहीं जा सकता था । कुटि की दीवारों के साथ कई प्रकार के वन पशुओं के चरमर लगे हुए थे । पांच स्थान पर पक्षियों के सुंदर पंख लटके हुए थे । एक और एक पशु कर चर्म लटका हुआ था । इसने खिडकी का प्रकाश एवं हवा रोकी जा सकती थी । दक्षिणी समीप खडी प्रस्तुति को चलने का संकेत किया तो वह प्रश्न भरी दृष्टि में उसकी और देखने लगेंगे । बच्चों ने कहा गुरुओं के पास युवती समझी नहीं । तब दक्षिणी हाथ के संकेत से कहा तो उसके साथ चल पडी । दोनों एक अन्य कुट्टी के द्वार पर जा खडे हुए । द्वार खुला था और छुट्टी में द्वार सिंह एक और हटकर एक मिनट चरम पर एक पुरुष बैठा था । मरीची दक्ष का भी कुरूद अथॅरिटी में पहुंच दक्षिणी चरणस्पर्श किए और पे काम है का आदेश सुना दिया । उसने कहा, पिता महीने इसे आपके पास शिक्षा ग्रहण करने के निमित्त दिया है । ये कौन है? पिता मैंने इसका नाम प्रस्तुति बताया है । यह यहाँ से आधा दिवस यात्रा के अंतर पर अकेली रहती हुई मिली है तो तुम को मिली है, ये कन्या है । अब सृष्टि चलेगी तो क्या आप इससे संतान करेंगे? प्रदान है कि यह अच्छा नहीं है । इसी कारण उन्होंने मेरे साथ शिक्षा के रूप में भेजा है । यह मेरी पुत्री के समान होगी । साथ ही मेरी पत्नी का चयन तो हो चुका है । छत्तीस आपने बताया नहीं, कौन है? है कहाँ मिली नहीं आपको उसे अंजीरा लाए थे । यह भारत के जन्मस्थान के सनी थी मिली थी । आजकल अंगीरा ही उसे शिक्षा दे रहे हैं तो मैं हूँ दक्षिणी मन में आश्वस्त हो कर रहा हूँ । बहमन में प्रस्तुति को अपनी पत्नी बनाने की इच्छा करने लगा था । मर्जी ने कहा इसे नदी दिखा देंगे । ऍम करेगी तदंतर इसे भंडारी से तो चर्म ले दो, एक रक्षियों को ढाकने के लिए और दूसरा कमर पर लपेटने के लिए । तब ही मैं इसको शिक्षा दूंगा । भाषी रक्षको ढांपने की आवश्यकता है । ऐसा ही वेद का आदेश है । घुटनों से कटे तकता भाड और गर्दन से वक्ष तक का भार कामनाओं को उभारने वाला होता है । इनका स्पर्श तो काम ना । मैं ही साथ ही इनका दर्शन भी कामनाओं को उत्पन्न करने वाला होता है, जहाँ भंडारी से कह दो दक्ष युवती को लिए हुए चला गया । एक घडी में युवती लौटी परन्तु तब तक उसका कायाकल्प हो चुका था । नदी तक पर अंगीरा के शिष्या रोहिणी बैठी पांच स्मरण कर रही थी । ऊंचे एवं मीठे स्वर में मंत्रोच्चारण कर रही थी और ऊपर ऊपर मधवा बहुत बीती माया हा । प्रश्न ऍम और इस वह स्त्रियाॅ वहाँ पर मुहूरत माँगा था स्वा मंत्री रन तू पार दावा रोहिणी वो गाती गाती रुक गई और इसमें में इस नए प्राणी की और देखने लगी । दक्षिण रोहिणी को प्रथम बार ही देखा था तो यह देख यदि है मर्जी के लिए निर्वाचित पत्नी है तो उसकी निर्वाचित प्रस्तुति इससे अधिक श्रेष्ठ है । दक्षिणी हाथ जोड नमस्कार कर कहा तेरी मैं दक्षिण हूँ आपको मैंने पहले कभी नहीं देखा भगवान उस स्त्री ने कहा मुझे इस आश्रम में आए एक पखवाडा व्यतीत हो चुका है । मैं अभी वाणी सीख रही हूँ । आप महर्षि अंगीरस शिक्षा प्राप्त कर रही हैं । हाँ, वही मेरे गुरुवर हैं । उन की आज्ञा थी कि जब तक मेरा उपचारण शुद्ध नहीं हो जाता, तब तक मुझे वेदी पर नहीं बैठना चाहिए । आधा मैं आपके दर्शन नहीं कर सकें । दक्षिणी अपने आने का प्रयोजन बता दिया । उसने कहा देवी यह प्रस्तुति है । पिता मैंने इनको महर्षि मरीचि के पास शिक्षा के लिए भेजा है और महर्षि ने मुझे आज्ञा दी है कि मैं से स्नान करा । हम उत्तर यह पहनाकर उनके पास ले जाऊँ । आप चाहें मैं से स्नानादि कराकर महर्षि के पास ले जाउंगी परन्तु ये वहाँ से सर्वथा अनभिज्ञ है । तो मैं भी थी और मन की बात कहने लगे हैं । उसकी बात मैं समझ सकूंगी और इसे समझा सकूंगी । दक्ष प्रसूति को रोहिणी के पास छोड अपने काम पर चल दिया । उसके लिए आश्रम में गौसंरक्षण का कार्य । मैं आश्रम से जब भी कहीं भ्रमण के लिए एक से अधिक दिन के लिए जाता था, एक अन्य आश्रमवासी को अपना कार्य सौंप जाया करता था । अहा! उस साथ ही की छुट्टी की और वह चल दिया रोहिनी ने । प्रस्तुति को आपने समीर बैठा उससे पूछने का यत्न किया कि वह कहाँ से आई है । प्रस्तुति ने अपनी फॅमिली उच्चारणों हाथ के संकेतों से आपने दूर से यहाँ आने का प्रताप बताया । रोहिणी उसकी बात को कुछ कुछ ही समझ सकें । जो कुछ है समझी पहले ही था । वह भी उसकी भर्ती एक अंडे में से निकली है और नदी के तट पर कुटी बनाकर रहती थी, जहाँ से दक्षिण उसे यहाँ पे आया है । रोहिणी ने उसे जाल में नदी के तट के समीप ही स्नान करने के लिए कहा । कुछ बताया कि बीच में नदी बहुत गहरी है । वेग से बह रही है, प्रस्तुति नहीं । जब रोहिणी कि बात समझे तो हस पडी । फिर उसके कुछ कहे बिना नदी में छलांग तथा बहत्तर करने लगी । रोहिणी ने उसके उलझे हुए बालों और जटाओं को सुलझाने का यह क्या पर कुछ कुछ ही सुलझा सकें । इसके उपरांत रोहिणी उसे लेकर भंडारी के पास जा पहुंची और वहाँ से उसे कमर्ठ आपने तथा वक्षों उसको समेटने के लिए उत्तरीय ले दिया तो जनता उनको पहनने का ठंग सिखा दिया । प्रस्तुति को उत्तरी है । मैं बहुत गर्मी लगी परंतु रोहिणी ने बताया कि उत्तर यह तो यहाँ पहनना ही पडेगा । इस प्रकार प्रस्तुति को तैयार कर हम हरषि मर्जी के पास में आई । मर्सियों ने देख पूछने लगा उनसे कहाँ से ले आई हो और इसका संरक्षक दक्ष कहाँ गया? मैं समझी थी कि इसके संरक्षक आप हैं नहीं । मैं इसका गुरु हैं । दोनों में क्या अंतर है? गुरु का संबंध मन और बुद्धि से होता है और संरक्षक का संबंध शरीर से होता है । मन एवं बुद्धि का क्या अंतर है? शरीर से उस दिन पिता है, बता रहे थे शरीर, इंद्रियाँ, मन और बुद्धि सब जड प्रकृति का अंश है । आप दोनों में भेद बता रहे हैं । हाँ, रोहिणी दोनों प्रकृति का ही अंश होते हुए भी भिन्न भिन्न है । केंद्रीय सूक्ष्म एवं बलवान है । ये शरीर से पर रह कही जाती हैं । इंद्रियों से मन सूक्ष्म और बलवान है । मन से बुड्ढी प्रबल है और बुद्धि से भी प्रबल तथा विलक्षणता कि वह आत्मा है । मन बुद्धि का सीधा संपर्क करे । आत्म से होता है । उसके प्री इंद्रियों का आत्मा से सीधा संबंध नहीं है । संबंध मान के द्वारा ही होता है । इसका दोनों में अंतर है । गुरु मन और बुद्धि का पाँच प्रदर्शन करता है । संरक्षक केवल शरीर का संरक्षण ही करता है और संरक्षता को क्या कहते हैं? वो सिंह पत्नी कहते हैं । पति की पत्नी होती है और गुरु की शिष्या अथवा शिष्य तो दक्षिण इसका संरक्षक है । ऐसा पिता है का आदेश है । अभी ये वाप सीखेगी । जब ये अपने मन की बात शब्दों में व्यक्त करने योग्य हो जाएगी, तभी से किसी का संरक्षण प्राप्त होगा । पितान है का कहना है कि दक्षिण इसका संरक्षक होगा । मेरा संरक्षक कौन होगा यह पिता में से पता करना आप शिक्षा प्राप्त कर चुके हैं । आपकी संरक्षता कौन है? अभी ये निश्चय नहीं हुआ है । इसका मैं संरक्षक होंगा । वही मेरी संरक्षता होगी तो अभी आप संरक्षता रहित है था । जब मैं किसी का संरक्षक नहीं होंगा तब बहस होता है । मेरी संरक्षता नियुक्त हो जाएगी । यह परस्पर निर्भरता का प्रबंध है । मैं पिता मेरे से बात करूँ । मेरा संरक्षक कौन होगा? अभी इसकी इतनी शीघ्रता क्यों हैं? सब कुछ यथा समय हो जाएगा । मैं भी किसी की संरक्षता बनना चाहती हूँ । चलते हैं बडा किसकी जहाँ पे काम हैं कोई बताउंगी । मरीची ने उसी समय से प्रस्तुति को वाणी का दान देना आरंभ कर दिया । स्वयं नहीं बन गए । इनके बनाने वाला कोई है । वह कोई महान ज्ञानवान और अपारशक्ति का स्वामी होना चाहिए था । उसी हम परमात्मा कहते हैं । आत्मा चेतन का नाम है । वैसे तो एक आत्मा प्राणियों में भी है, परंतु मैं महान नहीं है । वे अल्पज्ञान और अल्प शक्ति वाली है । उसे जीवात्मा कहा जाता है । इन दो क्षेत्रों के अतिरिक्त एक अन्य है । मैं चेतन नहीं है, उसे प्रकृति कहते हैं । यह जगत जिसे हम देखते हैं । उसने ये तीनों मिले जुडे रहते हैं । इसी कारण जगत में तीनों के गुण माने जाते हैं । प्रसूति को यज्ञशाला के मन्त्र गान में और मध्याना पर पिता है । के प्रवचनों में सम्मिलित होते हुए बहुत कम दिन हुए थे । जब से वह पितान है कि प्रवचन सुनने और समझने लगी थी । कई प्रकार के संशय उसके मन में उठने लगे थे । परन्तु मैं संकोच वर्ष पूछती नहीं थी, आज उस से नहीं रहा गया । वह अन्य आश्रमवासियों द्वारा प्रश्न पूछे जाते सुनती थी । परन्तु उसके मन में प्रश्न उनसे भिन्न प्रकार के होते थे । आज उसने पूछ लिया भगवान ये कैसे विदित हो इस जगत के रचने वाला हुई है । मैं सादा से है और सादा रहेगा । हमारी गौशाला में इस वर्ष पांच बछडे बने हैं और दो बूढी कोई मृत्यु को प्राप्त हुई हैं । जब बनना और बिगडना होता है तो फिर बनाने और बिगाडने वाला भी हुई है । ये है मानना पडेगा गांव तो हमारी गौशाला में बनी है । हमने उन्हें किसी को बनाते नहीं देखा । पिता महीने प्रश्न पूछ लिया । यदि किसी वस्तु के बनाने वाला दिखाई न दें तो क्या नहीं बनी? मानना चाहिए यदि बनी है किसने बनाई है यह प्रस्तुति की बुद्धि की सीमा रोहिणी ने पूछ लिया । सृष्टि पति पत्नी मिलकर बनाते हैं, परमात्मा कहाँ से आ गया आदि पति पत्नी किसने बनाए थे? अभी तो इस आश्रम में सबके सामने सब मानव ऐसे हैं जो बिना माता पिता के बने हैं । इनके साथ ही माता पिता में भी तो निर्माण शक्ति ईश्वर की ही है, सादा और सर्वत्र निर्माण नहीं कर सकते हैं । परन्तु मेरे पति महर्षि मरीचि कहते थे कि वे चाहें तो संतान नहीं भी उत्पन्न कर सकते । इश्वर की शक्ति होती तो हम विवश हो जाते हैं । संतान उत्पन्न करने में यह व्यवस्था भी होती है । फिर भी मर्जी जी का कथन सब ही है । ईश्वर की शक्ति पति पत्नी ने रहती है और उसका प्रयोग कर भी सकते हैं, नहीं भी कर सकते हैं तथा प्रयोग करने का समय एवं स्थान भी हम निश्चय करते हैं । ये इस कारण कि हम ने भी एक चेतन आत्मा है । इसी कारण शक्ति के प्रयोग का फलाफल हमें मिलता है । परन्तु प्रस्तुति के प्रश्न समाप्त नहीं हुए । उसमें पूछ लिया आपको यह बात किसने बताई है? परमात्मा नहीं, मुझे क्यों नहीं बताई? इस कारण तुमने मेरे जैसी योग्यता प्राप्त नहीं की । वह अयोग्यता योगा अभ्यास से प्राप्त होती है । अभी हमारे आश्रम के छह व्यक्तियों को वह अयोग्यता मिली है । वे हैं मरीचि, अत्रि, अंगीरा पुल तस्य हो रहा और ऋतु ये सब परमात्मा की बात को सुन और समझ सकते हैं । इसी कारण इनको महर्षि की उपाधि प्राप्त है । ये कब और किस प्रकार की परमात्मा की बातें सुनते हैं । जमीन के मन में कोई संशय अथवा प्रश्न उपस् थित होता है तो ये समाधि अवस्था में चले जाते हैं और इनका वह संशय निवारण हो जाता है । इनको अपने प्रश्नों का उत्तर मिल जाता है । बहुत विचित्र है नाम जो कुछ परमात्मा की वाणी में सुनते हैं वह स्मरण रखते हैं और मंत्रों में उच्चारण कर देते हैं और मंत्राी पूर्ण ज्ञान का स्रोत होते हैं । इन मंत्रों को हम वेद इसी कारण कहते हैं क्योंकि विज्ञान है । वेद शब्द ज्ञान का पर्याय वाचक है और महात्मा अपनी बात को बनाने का दुष्ट क्यू करता है । परमात्मा का ज्ञान तो सबके लिए छत पे प्रसारित हो रहा है और महात्मा देवों के द्वारा वेज उद्घोषित कर रहे हैं । ये महर्षि उस ज्ञान को सुनने और समझने की सामर्थ्य प्राप्त किये हुए हैं । अब तो लोग सुनते हैं और परमात्मा के आदेश से ही सबको सुनाते हैं । यदि इनके पास यह सामर्थ होती अथवा परमात्मा वेदज्ञान न देते तो फिर क्या होता हूँ मैं समझती हूँ तब भी हम सब कुछ जान पाते । मैंने अपने स्थानों पर रहते हुए भी कई बातें चीखली थी । बंद वही बातें जो वन पशु जान गए थे कदाचन । उनको इन बातों के जानने में उतना कष्ट भी नहीं करना पडा जितना कि तुम्हें करना पडा होगा । ये बातें प्रकृति के गुण है । इनके जानने और समझने में कुछ भी यत्न करना नहीं पडता । ये प्रकृति के धर्म है । स्वरों प्रस्तुति आहार अर्थात भूख लगने पर खाना, भय, किसी अनदेखी वस्तु अथवा घटना को देखने से डरना, निंद्रा ठग जाने पर सो जाना और संतानोत्पत्ति करना । चार कार्य प्रकृति की देन है । यह बिना परमात्मा के बताए भी सीखे जा सकते हैं । ये कार्य तो पशु भी जो परमात्मा की वाणी को न तो सुन सकते हैं और न ही समझ सकते हैं, जान जाते हैं । परन्तु इनके अतिरिक्त जो कुछ हमने सीखा है वह परमात्मा की कृपा से था, उसके बताने से ही सीखा है । उदाहरण के रूप में वाणी हमने वेदों से सीखी है । अग्नि प्रदीप्त करना हमने परमात्मा से शिखा है, अपनी कामनाओं पर संयम रखना परमात्मा ने बताया है । यदि हम किसी मनुष्य को ये बातें न बताएं तो वही इनको कभी सीख नहीं सकेगा । वह पशुवत ही बना रह जाएगा । वेद मनुष्य मात्र को मिला है । मैं कल्याण, मई, वाणी, सोच प्राणियों के लिए है । ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, क्षुद्र अपने और परायों के लिए हम उनकी वाणी को सुन और समझ सकते हैं । था । ये है हमारा कर्तव्य है कि हमें से यहाँ इस लोग में सबका प्रिया करने के लिए सबको सुनाएँ, जिससे सब लोग हमारे अनुकूल हो तथा अधीन हूँ । प्रस्तुति को अभी भी संतोष नहीं हुआ । उसने पूछ लिया अधीन से आपका क्या अभिप्राय है? वेद के जानने वालों आधारित ज्ञानवान ओं के अधीन सब होने चाहिए । जो ज्ञानी नहीं उनको ज्ञानवान ज्ञान देते हैं । पिता मेरे को भी पता चल गया । यह स्त्री अपनी बुद्धि का प्रयोग करने लगी है तथा वे उससे ज्ञानवान सृष्टि की आशा करने लगे थे । प्रस्तुति रोहिणी से विलक्षण स्वभाव की थी । वह रोहिणी के पति महर्षि मरीचि की शिक्षा थी इसलिए उनकी कुटी में नित्य शिक्षण और प्रशिक्षण के लिए जाती थी । ट्राय प्राप्त हैं कि जग्य क्यों मारा? वह पति पत्नी दोनों के साथ उनकी कुटी में चली जाती और प्रातः का अल्पहार फल उसी स्थान पर ग्रहण करती । आश्रम में कोई सेवक नहीं था । अच्छा अपनी सेवाएं सब स्वयं ही करते थे । आसाराम के घेरे के भीतर फल उद्यान था । सब आश्रम निवासी जंग वेदी से उतरकर फल उद्यान में चले जाते थे और वहाँ से रूचि और आवश्यकतानुसार फल उतारकर अपनी कुटिया में ले जाते थे और खाते थे । जब से मरीचिका विभाग हुआ था रोहिणी अपने पति के लिए भी फल तोड लेती हैं । प्रस्तुति रोहिणी के साथ जाती थी और वह भी आपने तथा गुरु जी के लिए फल ले आती थी । रोहिणी ने उद्यान को जाते हुए मार्ग में पिछली बार पिछली साईं पिता नहीं के प्रमोशन की चर्चा कर दी । उसने कहा ऍम कल हमने बहुत प्रश्न पूछे थे । मैं समझती हूँ पिता में है । तुम्हारे पशुओं से खुश हो रहे थे । सब उनको ये किसने बताया । मुझे स्वयं समझ में आ गया है जो यूनतम प्रश्न पर प्रश्न कर दी जाती थी । उत्तर देते हुए उत्तेजित हो रहे प्रतीत होते थे । मैं तो इसका अर्थ यह समझती हूँ कि वह मेरे प्रश्न पर प्रसन्नता अनुभव करते थे, समझता हूँ क्यों? इसलिए कि आश्रम में अन्य कोई भी इतना कुछ जानने की इच्छा नहीं करता हूँ । मेरे मन में ये सब बातें तब भी रहती थी । मैं अपने जन्म स्थान पर भवन क्या करती थी? मेरे मन में यह प्रश्न खडा उठता रहता है कि मैं क्या हूँ जो हूँ और इसलिए हो । मुझे स्मरण था एक श्वेत रन की छुट्टी थी । मैं उसमें से निकली थी । बहुत मेरे लिए किसने बनाई थी और फिर मैं उसके भीतर मैं जा नहीं किसने काल तक सोच रही थी । उस समय मुझे कौन खिलाता पिलाता रहा था उसको टीवी को? आप लोग अंडा कहते हैं । मैं उससे निकल जब जाऊँगी तो मैं उठ कर खडी होने लगी परंतु फिर पडी मैं उन्हें उठी । समीर एक वर्ष का आश्रय लेकर उठ खडी हुई और बच्चों को पकड पकडकर अपनी चारों और वन पशु पक्षी इत्यादि देखने लगी । मैंने एक जंतु को देखा तो डर गई कि वह क्या है । इस सब समय भी मैं यह मन में विचार कर दी थी कि वह क्या है परंतु इस से पूछती हूँ मैं तो मैं अपने मन की बात किसी को बता सकती थी और न ही वहाँ कोई था । मेरी बात को समझ सकता हूँ । तब तक वे बच्चों से फल तोडने लगी थी । अन्य आश्रमवासी भी वहाँ अपनी अपनी रुचि अनुसार खाने योग्य फल कंद मूल चुन रहे थे । प्रस्तुति और रोहिणी अपने तीनों के खाने के लिए भोजन एकत्रित कर चुकी थी । उस समय दक्ष उनके पास आ गया और रोहित ऍसे लगा मरीची जी नहीं आई । मैं जो आई हूँ तो तुम उनका काम कर देती हो । उनकी अर्धांगिनी जो शरीर का एक अंग दूसरे अंग का काम करता ही है और प्रसूति किसलिए साथ है? उत्तर प्रस्तुति नहीं दिया । मैं अपने लिए भोजन एकत्रित करने आई हूँ । मैं समझा था तो किसी के लिए ले जा रही हूँ । मेरा विचार है कि तुम्हारे पास भी एक व्यक्ति की आवश्यकता से अधिक है । हाँ वो मैं अपने सांयकाल के प्रयोग के लिए ले जा रही हूँ । उन्हें सांयकाल आना नहीं पडेगा तो साढे कान उद्यान में आने से कुछ पानी होती है । एक काम के लिए दोगुना समय क्या करना बुद्धिमता नहीं है परन्तु कुटिया में बेलनार भी तो झपट कर ले जा सकती है । प्रशस्ति मुस्कराई और कहने लगी मेरे साथ एक दिन ऐसा हो चुका है । मैं अपनी कुटिया के होने में फल रखता हूँ । गुरूजी से कुछ जानने चली गई थी । वहाँ से लौटी तो फल वहाँ नहीं थे । विचार कर रही थी कि कहाँ गए होंगे । मेरी दृष्टि सरीखी पडे छिलकों पर चली गई । कदली के छिलके पडे थे मैं समझ गई कोई खा गया है अवश्य कोई वन पशु होगा । अब मैंने विचार कर एक लटकन निर्माण किया है । उसे कुट्टी की छत से कुटी के बीजू बीच लडका रखा है । अब बच्चे फल उस पर रखते थी हूँ । वहाँ से वन पशु नहीं उतार सकते हैं । दक्ष प्रसूति का मुख्य देखता रह गया । इस समय तक वे उद्यान से निकल गुरूजी की कुटियां की और चल पडे थे । दक्षिणी अपनी मन की बात कह दी थी । उसने कहा रोहिणीदेवी आप प्रसूति को कहें कि मत से विवाह कर नहीं की आवश्यकता है तो क्या आप अभी नहीं समझती हूँ । आपका तो विभाग हो चुका है । आपको ज्ञात होना चाहिए कि विवाह करने से एक प्रकार का आनंद प्राप्त होता है । रोहिणी का मुख् आनंद की बात सुन रक्तवर्ण हो गया परन्तु तुरंत ही अपने को नियंत्रण में कर उसने कहा मैं समझी थी पी है आनंद केवल स्त्रियों को ही अनुभव होता है । आप कैसे जानते हैं कि यह पुरुषों को भी प्राप्त होता है । दक्षिण हस पडा और बोला आपको अपने महार्षि इसे पता करना चाहिए पता करूँगी । उन्होंने कभी ऐसी बात नहीं बताई उनका किसी प्रकार का आग्रह भी नहीं रहता । इसी से अनुभव होता है कि वह संतानोत्पत्ति को मात्र एक कर्तव्य समझ इसमें संलग्न है । इस कारण मैं यही समझ रही हूँ कि वह मुझ पर अत्यंत कृपा कर रहे हैं । दक्षिण फॅसा इस समय तीनों महर्षि की कुटिया के द्वार पर ना पहुंचे । दक्षिणी रोहिणी और प्रस्तुति के साथ महर्षि की कुटिया में चला आया हूँ । महर्षि के चरण स्पर्श कर बोला, गुरुजी, मैं रोहिणीदेवी से कह रहा था यह प्रस्तुति को मेरी अर्धांगिनी बनने के लिए प्रेरित करें परन्तु है बात तो तो मैं पिता ने से करनी चाहिए । बिना उनकी स्वीकृति के विभाग नहीं होगा । देखो मैं उनके जीवन की एक प्राचीन कथा बनाता हूँ । कई वर्ष व्यतीत हो चुके हैं । यहाँ एक प्रकार की पुष्टि हुई थी । आर्मी में हमारे सामान ही है । मैं तो नहीं थी परन्तु रूप से विक्रम और शरीर ओज वहीं तथा बुद्धि से मंदिर थी । पिता मैंने उनको देखा तो सबको विनिष्ट कर दिया । पिता मैं का विचार था कि उस सृष्टि के रहते यहाँ रहने से पृथ्वी पर भार ही बढेगा तथा यदि तुमने उनकी स्वीकृति के बिना कहीं संतान उत्पन्न की वाह तुम्हारी संतान सहित उन को भी नष्ट कर रहेंगे । सुबह हमारे अधिपति बन रहे हैं आप हम उन्हें उनके ज्ञान के कारण अपना अधिपति स्वीकार करते हैं । विद्वानों का आधिपत्य शुक्कर होता है । दक्षिण भी महर्षि मर्जी से ही वानी और अन्य ज्ञान की बातें सीखा था तो उन को अपना गुरु है । अपने से अधिक ज्ञानवान मानता था । इस कारण चुप रहा हूँ और पुनः चरणस्पर्श कर वहाँ से चला गया । जब तक चला गया तो मरीची ने दोनों स्त्रियों को बैठने को कहा । जब बैठ गई तो उसने प्रस्तुति से पूछा क्या तुम इस महापुरुष थे? विवाह करना चाहोगी । जब अपने जन्मस्थान से मैं इसके साथ यहाँ आई थी तो मैं इसके साथ एक ही नीड में रहने की इच्छा करने लगी थी । परंतु जब मैंने आपको देखा और आपकी विद्वता का पता चला हूँ, आपसे विभाग की इच्छा करने लगी । पर अब तो आपने कह दिया विशेष या पुत्री के समान होती है और पिता का पत्री से दे रहा नहीं होता । इस कारण मैंने अब अपना ध्यान उन्हें दक्ष की और केंद्र कर रखा है । मैं पे काम है से बात करूँ और मैं आपसे बात जानना चाहती हूँ । रोहिणीदेवी कह रही हैं कि कल मेरे प्रश्न पूछे जाने पर पिता मैं मुझसे रुष्ट हो गए प्रतीत होते हैं । रोहिणी का ये है हम है साठ साल में पिता में है के पास बैठा था महर्षि वहाँ और ऋतु भी वहाँ पे हम सबके समक्ष पता मैंने कहा था कि वह प्रस्तुति के प्रश्नों से बहुत प्रभावित हुए हैं । मैं बहुत ही बुद्ध शी जीत है । प्रस्तुति ने मुस्कराते हुए रोहिणी के मुख पर देखा तो वह आपकी बाद स्पष्ट करने नहीं । उसने कहा, मेरा अनुमान था कि वह इस प्रकार पूछे जाने पर अब प्रसन्न है । प्रसूति के प्रश्नों से यह होता था । इससे पिता में है कि प्रखंड पर विश्वास नहीं है । नहीं रोहिणी । मैं बुद्ध युक्त प्रश्न किए जाने पर प्रश्न ही रहे थे । उन्होंने मुझे कहा था प्रस्तुति को शीघ्रातिशीघ्र वेदों के ज्ञान जागत करा देना चाहिए । वह शीघ्र ही विभाग का आश्रम से चली जाएगी, चली जाएगी । रोहिणी ने विश्व में प्रकट करते हुए पूछा, आप दो कन्याओं का पहले भी विभाग हो चुका है तो तीसरी हो । पहली दोनों आश्रम छोड अपने अपने पति को साथ लेकर चली गई हैं । उन्होंने अपनी नए आश्रम बनाए हैं । पिता महंगा विचार है की प्रस्तुति भी अपना नया आश्रम बनाकर अपना कोई चलाएगी । मैं तो आश्रम छोड कर नहीं जा रही है । तीनों पत्तों पर भर रखा खाने लगे थे । रोहिणी के इस कथन पर महर्षि मरीचि ने कहा, पिता मैं का विचार है । तुम आश्रम को नहीं छोड हो गई और मुझे तुम यहाँ से किसी अन्य स्थान पर नहीं ले जा सकते होगी । हाँ, मैं को ले जाना चाहूंगी ही नहीं । मुझे यहाँ बहुत बडा प्रतीत हो रहा है । यह बडे बुरे का प्रश्न नहीं है । यह महत्वाकांक्षी का प्रश्न है तो अपनी वर्तमान व्यवस्था पर संतुष्ट हो । प्रस्तुति इतने में ही संपुष्ट नहीं है । यह क्या चाहती है? पिता मैं कह रहे थे कि वह इतने बडे परिवार की माता होने की इच्छा रखती हैं जो पूर्ण नहीं तो आधे बहुमंडल परछा जाए । इसकी संतान इस पृथ्वी पर मान सम्मान का पद ग्रहण करेगी । उससे इसको क्या मिलेगा? रोहिणी ने पूछ लिया, यह उसके स्वभाव में है और जब किसी की स्वाभाविक बात सिद्ध होती है तो उसके मन में एक प्रकार के नैसर्गिक आनंद की अनुभूति होती है । पैदावार का कहना है कि तुम्हारा सुधाव मैं सामने जैसा है और प्रसूति का छतरी आता है । क्या होता है कि शब्द रोहिणी और प्रस्तुति दोनों के लिए नवीन थे? इसका चारण कभी पिता मैंने भी अपने प्रवचनों में नहीं किया था । महर्षि मरीचि ने बताया कुछ दिन से मेरे मन में एक बार बार बार प्रस्फुटित हो रही थी उसे कल सांयकाल ही मैंने पितान है । सब कुछ एक मंत्र है रामा उससे मुख्य मासी बाहुल् राजन प्रथा और दस से ये ऍम बंदे आश जो आ जाया तो ये कोमलांगी प्रसूति वहाँ भी समाजों में बाहों का काम करेंगे । नहीं अभिप्राय यह नहीं है ऐसी संतान की स्पष्टी करेगी जो मानव समाज की रक्षा का भार अपनी पर लेगी । रोहिणी ने विस्मय प्रशस्ति किया और देखा मैं इन व्यक्तियों से गौरान्वित अनुभव करने लगी थी । मैं प्रसन्न और संतुष्ट प्रतीत होती थी । मरीची ने भी प्रस्तुति की और देखा और कहा मैं समझता हूँ शीघ्र ही प्रस्तुति का व्यवहार अच्छा जाएगा । इसके कुछ दिन उपराम एक साइकल पिता में है । अपने प्रोफेशन में बता रहे थे परमात्मा की इच्छा से इस पृथ्वी पर सस्ती अच्छी है । पिता में है नहीं बताया आज से चार सम्वत्सर पूर्व की बात है कि अपने आश्रम निवासी दक्षिणी मुख्य पोछा मैं कहाँ से आया हूँ इस पर इनके पर मैंने कहा तुम क्या हो पहले यह जान हूँ । दक्ष कहने लगा मैं नहीं जानता हूँ । मैंने उसे कहा कल मध्यान के समय मेरे साथ चलना हूँ । यहाँ से कुछ दूर चल रहा होगा । वहाँ तो मैं कोई ऍम । अगले दिन मैं उसे यहाँ से एक प्रहर की यात्रा के अंतर पर ले गया । वहाँ एक अश्वस्त के वृक्ष के नीचे एक घंटे में बहुत तीव्र किरणें । विपक्ष के भक्तों और सेक्शन कारण भूमि बार पड रही है । उन किरणों से गड्ढे में उथल पुथल मच रही थी । मानव किसी बर्तन में मट्ठा मथनी से मथा जा रहा हूँ । वहाँ की भूमि उस मथन से बुलबुले छोड रही थी । दक्षिण जिसमें से देखता रह गया । मैंने उससे पूछा तीव्र किरणें कहाँ से आ रही हैं? उसने वृक्ष की और देखा । दक्षिण अति मनोहर दिखाई दे रहा था । उन के पत्ते सुनहरी आभा लिए हुए थे । पूर्ण रख विशेष मुँह से प्रज्वलित था । दक्षिण पूछा गिरने इस वृक्ष के पत्तों में सेक्शन करा रहे हैं परन्तु है वृक्षों को क्या हो रहा है तो रक्षित फस रहा प्रतीत होता है । मैंने कहा रक्ष पर सोम छाया हुआ है । सोम से इसकी शोभा कई सौ गुना बढ रही थी, परंतु है चिरकाल तक नहीं रहेगी । इस वक्त की शोभा दें । रोहिणी ने अपनी किरण यहाँ डालकर भूमि पर विक्षोभ उत्पन्न कर रखा है । इससे क्या होगा? दक्षिण कश्मीर था मेरा था बीस पे जाओ । आगे घडी भर वह दो शो चलता रहा हूँ । उसके उपरांत भूमिका उबाल बंद हो गया और उस गड्डे में कुछ बन गया । मैंने दक्ष को बताया ये कलम है, उससे क्या होगा? मैंने कहा ये है कल आकर देखेंगे । अगले दिन हम दोनों पुणे उसी स्थान पर गए । मैं कलम सिकुडकर एक हो गया था । उसके ऊपर एक श्वेत रंग की त्वपूर्ण की भर्ती की वस्तु जम रही थी । इसके उपरांत उसे हम नित्य देखने जाते रहे हैं । लगभग दस माह के उभरा । हम वहाँ गए तो वह अंडा जो तब तक एक सुदृढ श्वेत छिलके का बन चुका था और जिसका एक मटके के बराबर हो चुका था तो गया था और देखते देखते हुए हैं । फूट गया और उसमें से मानव बाहर निकाला है । हमने उसे आश्रय दे उठाया और धीरे धीरे चला है । कुछ ही देर उपरांत फॅस चलने लडा । तब हम उसे नदी के किनारे ले गए । वहाँ हम ने उसे स्नान कराया और फिर उसे साथ लेकर इस आश्रम में आ गए । वह नाराज था । इसी प्रकार हम सब बने हैं ना भारत के उपरांत ऍम हमारे आश्रम के समीप नहीं हुई । महर्षि अत्रि ने बताया है कि रोहिणी नक्षत्र अब पृथ्वी से तो पिछले अन्य लोग में चला गया है था । अब इस प्रकार से सृष्टि होनी संभव नहीं रही । इस पृथ्वी पर अब भगवान वैवस्वत मनु कन्याओं की सस्ती कर रहे हैं । उन्होंने मेरे ज्ञान में अभी चार कन्यायें रखी हैं । उन चारों का पालन और शिक्षा दी । क्या हमारे आश्रम में हुई है? भगवान व्यवस्थता ये हैं । आदेश है इन कन्याओं में मैथुनी सृष्टि करें । उसी प्रकार जैसे वन पशु करते हैं । मैंने सनक सनन्दन से कहा कि वही सृष्टि करें । उन्होंने यह कहकर इंकार कर दिया यह पशु करम है । मैंने अपने आश्रम के छह ऋषियों से कहा कि वे दिन कन्याओं से स्पष्ट करें । उन में से केवल महर्षि मरीचि नहीं है । कार्य स्वीकार किया है, परन्तु उसके अभी तक कोई संतान नहीं हुई तो कन्यायें हमने पहले विभाग है । एक प्रजापति रुचि से और दूसरी प्रजापति कदम से । वे दोनों कन्यायें कुछ अधिक संतान उत्पन्न करने में असमर्थ रही हैं । प्रजापति रूचि और देवा होती नहीं । एक ही प्रसव क्या है? उसने पुत्र और एक कन्या का जन्म हुआ है । प्रजापति गर्दन के अभी तक कोई संतान नहीं हुई । रुचि के विभाग को चौबीस बच्ची संबंध सर व्यतीत हो चुके हैं जब आश्रम में प्रस्तुति आई है । ये सब प्रकार से इस योग्य है कि सृष्टि उत्पन्न करें । मैं इसके लिए कोई योग्य वर भी घूम रहा हूँ । काम है । अंगीरा ने कहा इस बार आप स्वयं अपना करेंगे बस्ती आपके सर्वथा योग्य है । बहन मेरी पुत्री सामान है । साथ ही मैं इस समय तो मन्वंतर कि वयस्क का हो चुका हूँ । मैं वृद्ध हो रहा हूँ । कोई अन्य योग्य वर मिलते ही इसका विभाग कर दूंगा पिता में ऐसे यह सब सुनकर प्रस्तुति ने आज उन्हें प्रश्न पूछ नहीं आरंभ कर दिए । उसने पूछा भगवान वृद्ध क्या होता है? प्रत्येक मनुष्य जो इस स्थान पर हुआ है एक न एक दिन मृत्यु को प्राप्त होगा । आप सबने देखा कि एक दिन बहल गौशाला में लेट गया था और विश्वास लेना बंद कर दिया था सब हमने उसकी खाल उतरवा ली थी और उसे नदी में बहा दिया था । ये है मृत्यु है, पर ऐसा क्यों होता है? शरीर कार्यकर्ता करता छीन हो जाता है और फिर काम करने योग्य नहीं रहता है । तब इसमें उपस् थित चेतनपुरा ही इसे छोडकर कहीं अन्यत्र चला जाता है और शरीर प्राण रहित हो जाता है । उसको शीघ्रातिशीघ्र विनष्ट करने के लिए हमने उसे नदी में बहा दिया था और शरीर को जल जंतु खा गए थे और वह दुर्गंध फैलाने से बच गया । देखो होती हैं जब प्राणी उत्पन्न होता है और जब उसकी मृत्यु होती है । इन दोनों के बीच के काल को आयु कहते हैं । इस आयु के चार भाग किए गए प्रश्नकाल के निर्माण का होता है । दूसरा साल यौवन का होता है, तीसरा मनन का और चौथा लोक कल्याण करने का । आयु के दूसरे साल में संतान उत्पन्न करनी चाहिए । मैं इस काल को व्यतीत कर चुका हूँ । आपको भूतल पर आए कितने संबद्ध हुए हैं? इस मन्वंतर का नाम व्यवस् वक्त मन्वंतर है । इससे पहला मनमोहन डर चाहता था । मैं उस के आरंभ में इस पृथ्वी पर उत्पन्न हुआ था । उस समय यह पृथ्वी जलमग्न थी । बढाने जल का हरण किया तो भूमि जल से बाहर नहीं । भूमि कमल सामान चल से निकली थी, ऐसा प्रतीत होता है । उस समय भी रोहिणी नक्षत्र ततवीर के समीप था और इस पर अपनी गिरने भेज रहा था । उस पृथ्वी रूपी कमाल की नाभि में विक्षोभ उत्पन्न हुआ और एक अंडा बन गया जिससे जिससे समय पागल हो मैं उत्पन्न हुआ । मेरा जन्म भी आप सब की बातें ही हुआ है । उस समय कमल पर सोम की छाया भी और रोहिणी ने कमलनाथ को मत डाला और मेरा है शरीर बन गया । मेरा शरीर बना और मैं अपने इधर उधर देखने लगा । मुझे ऐसा प्रतीत हुआ हूँ । उस कमाल के चार और भूमि पर वनस्पतियां बन रही थी । मैं कमाल से निकल भूमि पर पिक्चर नहीं लगा और वनस्पतियों एवं फलों को खाता हुआ जीवन चलाने लगा । मैंने तपस्या की और समस्या से मैं समाज हो गया । उस समाधि की अवस्था में एक मन्वंतर निकल गया और वर्तमान व्यवस्था मन्वंतर आ गया । अब मैं समाधि से उठा तो पृथ्वी पर घर नहीं बन बन चुके थे । इन वनों में जीव जंतु करने लगे थे । मैंने अपनी जैसी मानव सृष्टि इच्छा की, तब उन हर रोहिणी नक्षत्र गेहूँ लोग में भ्रमण करता हुआ इस पृथ्वी के समीप आया और फिर यहाँ मानव सृष्टि होने लगी । ऐसा प्रतीत होता है कि हमारे आकार विस्तार के परन्तु भिन्न स्वभाव वाले लोग भी उत्पन्न हुए । वे वन पशुओं को मार मार कर खाते थे । जब इस आश्रम में भी कुछ श्रेष्ठ मानव बन गए तो वे तुम्हें खाने के लिए आए । मैंने उनसे इस आश्रम की रक्षा ऐसा विजिट हुआ कि वे लोग परस्पर लड लड कर मर चुके हैं । विरुद्ध थे इस प्रवचन की अगले दक्षिण गौशाला का प्रबंध देखने के उपरांत अपनी कुटिया हो जा रहा था की प्रस्तुति नदी तट की ओर से आती हुई मिल गई । प्रस्तुति प्रायर रोहिणी के साथ रहती थी । आज रोहिणी साथ नहीं थी । वहाँ अकेली थी । दक्षिण साथ साथ चलते हुए पूछ लिया तुम्हारी सखी कहाँ है? मान सके रोहिणी महार्षि मर्जी के भारतीय मैं रूम है । आसनार्थे नदी तक पर नहीं आई । क्या कष्ट है बोलो टेस्ट का मुझे ज्ञान नहीं । महर्षि गुरूवर रोहिणीदेवी को लेकर पिता नहीं के पास गए हैं । उनको जाते । मैंने देखा और पूछा था ये किस कारण वहाँ जा रही हैं? गुरूजी ने बताया है कि वह रोबिन हैं और पिता नहीं से इसका उपचार पूछती जा रहे हैं । कल पिता महीने तक है । विषय में कुछ कहा है । हाँ, मैंने भी सुना और समझा है तो संतानोत्पत्ति करोगी करूंगी तो सही परंतु करूंगी । मैं जानती नहीं मैं जानता हूँ कल्पिता मैंने कहा था की सडक शानदान ने इसे पशु क्रम बताया था और इसी कारण उन्होंने यह नहीं किया । इस पर मुझे पशुओं के एक धर्म का स्मरण हुआ है । ऐसा प्रतीत होता है कि उस धर्म से संतानोत्पत्ति होती है । बछडे बछडियां उत्त्पन्न होती हैं परंतु एक गाय को तो चाहते मैंने भी देखा है । बहुत कष्ट हमें प्रतीत हुई थी की आवश्यक नहीं । कुछ बिना कष्ट भी जाती हैं । ऐसा किस प्रकार हो सकता है, पिता में ही बता सकेंगे । मुझे इसमें होता है कि वे इस विषय में कैसे जानते हैं । बहुत कुछ चलते हैं । उनकी तपस्या, साधना और सामाजिक द्वारा बहुत बातों का पता चल जाता है तो मैं उनसे पूछेंगे । हाँ, उस दिन प्राथमिक यज्ञ के उपरांत प्रसूति ने रोहिणी से पूछा, यहाँ भ्रष्ट था, बहन हूँ, कुछ नहीं था, नाम है । मैं अपने भीतर किसी प्रकार की सादा से भिन्न अवस्था अनुभव कर रही थी । ऍम महार्षि चीज क्या? तो बोले कि पिता मैं से बात करनी चाहिए । अगर हम दोनों वहाँ पहुंच गए । मैं अपनी समाधि से उठे ही थे । मैंने नमस्कार किया तो उन्होंने बिना मेरे किसी प्रकार की बात किए स्वयं प्रसन्नता प्रकट करते हुए कह दिया, मेरे संतान होगी । तब मैं आश्चर्य में पढकर पूछा । बोले दस मास उपराम तो अभी बहुत दूर है । पिता महीने मुझे महर्षि अत्रि से सम्मति करने के लिए कहा है । क्या वह बताएंगे? प्रस्तुति ने पूछा यह मैं क्या जानूँ आज किसी समय उन से बात करूंगी । प्रसूति के मन में स्पष्ट इसी उत्सुकता, आशा और भय उत्पन्न हो रहा था । वह सब को समझ नहीं रही थी । आज वह फल उद्यान से फल लेकर अपनी कुटिया में चली गई । उसने अपने पूर्व स्थान पर रक्ष पर घोसलों में दो दो पक्षियों को इकट्ठे रहते देखा था और संस्मरण कर मैं अपनी कुटिया में भी किसी साथी की इच्छा करने लगी थी । उसे गुरु मरीची और रोहिणी को एक ही छुट्टी में इकट्ठे देख ये अनुभव होता था कि वे बहुत पसंद नहीं और अब रोहिणी कह रही थी कि उसके संतान होगी । वह अपने विषय में भी विचार करती थी । क्या उसकी भी कुटिया में कोई साथ ही आकर रहेगा? इस पर उसे दक्ष की बात हो गई थी । पहले ही दिन उसने जब देखा तो वह उसे रूचिकर प्रतीत हुआ था । इस आश्रम को आते हुए कई बार उसे दक्षिण के शरीर का स्पर्श हुआ था और उस पर से उसको कुछ अत्यंत रोचक अनुभव हुआ था । इससे रहे विचार कर दी थी । इस किसी साथी के एक ही कुटी में रहने से मैं रस प्राप्त होगा क्या और उससे कुछ लाभ होगा अथवा हनी होगी? आज मैं साईं की उपासना और रोशन सुनने गई तो वह मन में चिंतन कर रही थी कि वह क्यों और क्या है? मैं इस विषय में पिता में से जानना चाहती थी । उस दिन यज्ञशाला पर एक विलक्षण हलचल थी, जो ही प्रस्तुति नहीं । यज्ञशाला में प्रवेश क्या सामने दक्षिण खडा दिखाई दिया? प्रस्तुति ने पूछा यहाँ क्या है? सब लोग किस लिए खडे हैं? बैच क्यों नहीं रहे तो तुम कहाँ थी? यहाँ तो अभी अभी एक बहन का घटना घटी हैं । क्या हुआ? कुछ मंश बाहर कहीं से आकर आश्रम में घुस गए । हमारी फुलवारी और पशु मना को नष्ट भ्रष्ट करने लगे । महर्षि अच्छे भागे । भागे पिता नहीं के पास आए और उन्होंने सब बात बताई तो फिर काम है अपनी कुटिया से बाहर आ गई और देहात के संकेत से उन्हें विनाशकारी कार्य करने से मना करने लगे । नहीं मैंने तो पिता मैंने केवल संकेत मात्र से उनको तक एल धकेलकर आश्रम से बाहर निकाल दिया । केवल संकेत से हाँ वैसे पीछे हटते गए आश्रम से बाहर हो गए, जैसे कि धकेले जा रही हूँ । तब अब ये आश्रम के बाहर एकत्र वो अपनी स्थिति पर विचार कर रहे हैं । ऐसा प्रतीत होता है कि वे इस आश्रम में पश्चिमी और स्थलों की दुनिया को देखने आए हैं । चाहती हमारी कोरियाओं को देख चुके हैं । वे हम सबको मार कर ऐसे ही खा जाने का विचार कर रहे हैं । जैसे भी वन पशुओं को खा जाते हैं मैं स्त्री पुरुष बता बालक भी हैं । ये सब आश्रम से बाहर द खेले जाने पर बिसनेस है और उन्हें आक्रमण की योजना बना रहे प्रतीत होते हैं । कोई सब कितने हैं? कई सौ है । इस समय पिता मैं कोटिया से निकल कार्यशाला में आ गयी । पितान है की आज्ञा से सब बैठ गए और हवन आरंभ हुआ । अग्नि में अभी डाली जाने लगी दोगुनी प्रदीप स्पोर्ट ही और ऊंची ऊंची लपटें उठने लगी । साथ ही रह आश्रमवासियों के मन्त्र चारण के ध्वनि उसने लगी । इस समय आश्रम के बाहर खडे व्यक्तियों में से एक व्यक्ति आश्रम का द्वारा लांघकर भीतर आ गया । मैं अकेला था और हष्ट पुष्ट ऍम बलशाली प्रतीत होता था । उसे अकेला देख जगदीश शाला में बैठे लोग कुछ कुछ बेचैनी अनुभव करने लगे थे परन्तु पिता मेरे को मंत्र चरण करते देख सब स्वर रहे विज्ञान कर दे रहे हैं और उन करनी वो जरा नाम ऍम तरह सामान प्रशंसित हूँ हूँ और सब डोमेंद्र गिर रहा प्रति तो हम उस हार सकता ऍम वाॅटर यज्ञवेदी कि समीप आकर खडा हो गया । उसने दोनों हाथ उठाए हुए थे । आश्रमवासी इसका अर्थ नहीं समझ पा रहे थे । पिता महीने भी उसे देखा और अपने हाथ के संकेत से उसे भीतर चले आने का संकेत क्या में आया तो पता नहीं उसे बैठे बैठे ही आपने समीर पानी का संकेत क्या मैं भी प्रतीत होता था । पग पग पर्व है, आगे बढने लगा बैठी हूँ के पीछे से होता होगा । पिता नहीं कि सुमित और खडा हुआ मन्त्रोच्चारण अब भी चल रहा था और भी एम अन्य द्रव्यों की आहुतियां दी जा रही थी । सब लोग एक स्वर से मंत्र गान कर रहे थे और सुनीत हूँ घास है मार तू मर तू धर्म सभा मित्रा स्पॅाट द्रोह । इस प्रकार मंत्र पर मंत्र बोले जा रहे थे । आक्रमणकारियों का दूत सर्वथा अ वस्त्र पितान है के पीछे खडा हुआ था । भवन समाप्त हुआ और पिता मैंने अंगुली के संकेत से उस दूध को अपने समक्ष आने को पढा । मैं व्यक्ति सामने आकर हवन कुंड के समीप खडा हो गया । पिता महीने उसे बैठने का संकेत कर कहा निशि! मैं बैठ गया पता मैंने अग्नि की और संकेत कर और स्वयं हाथ जोडकर कहा प्रणाम करो । दूध ने प्रणाम कर दिया । अब पता मैंने संकेत से पूछा क्या चाहते हो? इस पर उस दूध ने कुछ शब्दों का उच्चारण किया जिससे कोई नहीं समझ सका । परंतु पिता मैं समझ गए बे मुस्कराकर यज्ञवेदी पर बैठे आसाराम निवासियों से बोले ये कह रहा है इसके लोग हमसे शुद्ध करने आए हैं तथा एक से एक का युद्ध हो जायेंगे और जो विजयी हो उसके पक्ष के लोग दूसरे के ही हो जायेगा । वो ये भी कहता है कि आपने हरिहि व्यक्तियों को ये मार कर खा जाते हैं । आश्रमवासी समझ नहीं सके कि पिता में है उस व्यक्ति के कुछ ही शब्दों से इतनी बडी बात कैसे समझ सके हैं । सब इसमें से किताब है का मुख देखते रह गए तो कोई नहीं बोला तो दक्षिण उठकर पिता से पूछने लगा भगवान आप कैसे कहते हैं कि यह युद्ध का आह्वान कर रहा है? ये है एक अति सरल सी बात है । इसके साथ ही वन वन में घूमते हुए पशु पक्षियों को मार मार कर उनका मांस खाकर जीवन चलाते हैं । कुछ वन पशु बहुत बलशाली होते हैं । इनमें से एक उसको परास्कर उसकी हत्या नहीं कर सकता था । ये सब एक ही परिवार के लोग हैं और वे इकट्ठे होकर पशु को मार खाते हैं । अपने भोजन की खोज में वे यहाँ आए हैं और हमको भी वन पश्चिम समझ हम पर आक्रमण कर बैठे हैं । यहाँ जब तक इनके फल खाने तक बात थी, मैंने सहन की । पर जो भी वे आश्रम के पशुओं पर लपके, मैंने इनको धकेलकर आश्रम से बाहर कर दिया । उन्होंने आश्रम के बाहर विचार क्या है और उन्होंने एक का एक युद्ध का आह्वान किया है । यही कह रहा है । अध्यक्ष ने हाथ खडाकर कहा मैं इनमें से किसी के साथ भी लडने के लिए उद्यत से ठीक है । हम इस योग्य भी होगा । इस पर भी देख लो हुई तुम्हारी हत्या भी कर सकते हैं । वाह क्या होती है कभी तुमने दो वन पशुओं को लडते देखा है या नहीं? फॅस कहाँ एक दिन में भ्रमण करता हूँ । आश्रम से दूर चला गया था और वहाँ दो लोगों को एक लगी का भोक करने के प्रयास में लडते देखा गया है । क्या हुआ था एक महकने लडते हुए दूसरे के पेट में आपने सिंह चुभोकर उसे भार डाला था घायल भूमि पर बडबडा रहा था विजयी मृग लगी का भोक करने लगा था । हाँ, वैसा ही ये करना चाहते हैं । एक बार और चाहता है कि तुम में से एक के पराजित होने, अपना विजयी होने से हमारा पूर्ण आश्रम अपने को पराजय कछवाह, विजयी समझे । पराजित होने पर पूर्ण आश्रम इनके अधीन हो जाएगा । हम सब इनके दास बन जाएंगे ही प्रकार । यदि ये पराजित हुए तो ये हमारे दास बन जाएंगे । मैं अपने लिए लडने को उद्यत है । पूर्ण आश्रम के बाद आप क्या नहीं? पिता मेहनत दूध को समझाने का यह क्या एक से एक लड सकता है । मैं एक ही पराजित अपना विजयी होगा उन परिवार अथवा आश्रम नहीं । इस पर उसने तो संकेत क्या जिसका अर्थ है समझा गया कि वह अपने साथियों से सम्मति करके ही बताएगा । पिता महीने उसे जाने दिया । वन चरों के दूध के चले जाने पर पिता नहीं ने आश्रमवासियों को अपना सांयकाल का प्रमोशन देना आरंभ कर दिया । पिता नहीं ने कहा वर्तमान जैसे संकट की तो मैं सुना आशंका करता रहा हूँ । जीवन पशुओं के युद्ध का आक्रमण मुझ पर अथवा आश्रम पर्सन हो रहा है । ये लोग वन पशुओं से कुछ सीमा तक ही श्रेष्ठ है । इस प्रकार का प्रस्ताव जो लेकर आए हैं । वन पश्चिम से नहीं हो सकता । वह बुद्धिमता से विचारित बात है । फिर भी यह ठीक बात नहीं, यह सर्वथा पशुधन तो नहीं । पश्चिम किसी बात तो है ही । यह युद्ध से बात निश्चय करने आया था परन्तु में हैं अभी तक या नहीं समझा जिसमें इस सबको धकेलकर बाहर क्या है? मैं अब भी और कभी भी इसको विनष्ट भी कर सकता है । अच्छा ये लोग अति सीमित बुद्धि रखते हैं । यदि कक्ष इनमें से किसी से भी युद्ध करेगा, निश्चय ही विजयी होगा । कक्ष में बाल भी है और बुड्ढी भी है । बाल तथा बुद्धि दोनों के सहयोग से तो उस तरह से दुस्तर कठिनाई को पार किया जा सकता है । ये भी मैं एक बात कहता हूँ । यदि ये प्रभात होने तक यहाँ से चले नहीं गए तो प्रातः था । ये सब आश्रम में बंदी बना लिए जाएंगे और फिर बंदी जीवन में इनको सभ्य और सुसंस्कृत करने का यह न करूंगा । परम तो इनको कुछ अधिक देर तक प्रतीक्षा नहीं करनी पडी । वहीं वरिष्ठ वन चरों का दूध आया और यज्ञशाला के समीप खडे होगा । हाथ उठा उठाकर युद्धघोष करता दिखाई देने लगा पे काम है । उठकर यज्ञशाला के नीचे खुले क्षेत्र में आ गए । उनके साथ पक्ष और अन्य आश्रमवासी खडे थे । रोहिणी और प्रस्तुति भी खडी थी पिता मैंने आगे आकर उस व्यक्ति को शांत कर संकेत से कहा कि वह अपने साथियों को भी बडा ले तो वे भी युद्ध देख लें । बाल चरों के दूत ने इसे श्रृष्टि योजना समझी और रहे आश्रम के बाहर आकर अपने को साथियों को जिनमें कुछ स्तरीय और बालक भी थे साफ ले भीतर आ गया । अन्य लोग बाहर ही खडे थे । पंचर आश्रमवासियों के सामने युद्ध क्षेत्र के एक और खडा हो गया और आश्रमवासी जगदीश शाला की और पीठ किए खडे थे । वन चरों का योद्धा दोनों दलों के बीच में खडा था, दक्षिण मैदान में निकाला और उसने ऊंचे स्वर में कहा आओ वन चरों का योगदान सिर आगे का मानो वह अपने सिर से प्रहार करेगा दक्षिण की और लगता है उसके सिर का निशाना दक्षिण आप एक बच्चे उसके टक्कर मारने से आदर्श में पहले दो पार्टी एक और हट गया आक्रमण करने वाला अपने ही वेग में निशाना मार्ग से हट जाने पर लुढकता हुआ चार पांच पद आगे आकर भूमि पर गिर पडा । दक्षिण एक बार एक जंगली बढा के आक्रमण से इसी प्रकार बच्चा था । इसके आक्रमण से भी वह बच गया । इस बार उसका एक बात और जो भी वह वन युद्धभूमि पर लडका के दक्षिणी पीछे बहुत उसके उठने से पूर्व उसके सूत्रों पर एक लाख जमाई । मैं उसका उत्तर फिर गिरा । बच्चों ने एक लाख और लगाई फिर गिर पडा इस बार में पराजय तो भूमि पर पीठ के बल लेट गया । बट टांगे और हाथ प्रसार कर आंखें मूंदे लेता रहा । यह देख पिता मैंने आगे बढकर हाथ उठा युद्ध बंद करने की घोषणा कर दी । वन चरों ने मिलकर आश्रमवासियों पर आक्रमण करना चाहा परंतु उन्हें पता मैंने अपने योग बल से उनको ऐसे रोक दिया जैसे कि सामने दीवार खडी कर दी गई हो । पता मैंने भूमि परचित लेते एक व्यक्ति के समीप उसे उठने के लिए कहा । भूमि पर लेटे व्यक्ति ने आके फोल्ड हाथों के संकेत से कहा कि वह मर गया है । मुख से भी उसमें कुछ कहा दक्षिण कुछ अंतर पर खडा था और भयभीत वनचर सामने पंक्ति में खडे थे । आगे बढना चाहते थे परंतु बढ नहीं सकते थे । पिता मैंने हाथ के संकेत से भूमि परचित से बडे व्यक्ति को कहा उठाओ । वनचर पहले उठ कर भूमि पर बैठ गया । तब उन पर भूमि पर लेटकर सास टन प्रणाम करने लगा । प्रणाम कर रहे उठा और हाथ छोड सामने खडा हो गया । इस समय वन चारों में से किस तरी अपने साथ दो बच्चे लिए हुए उस योद्धा के समीप खडी हुई युद्ध संकेत से कहा कि वह पराजित हो गया है । अतः है इनका हो गया है । उसके साथ ही खडी स्तरीय और बच्चों के ऊपर हाथ कर कहा ये उसके अपने हैं और वे भी दास हो गए हैं । पता मैंने कहा तो मेरी है जाना चाहूँ जा सकते हैं और हमारे साथ ही भी जा सकते हैं । योद्धा ने अपने साथ खडी स्तरीय की और पलभर दृष्टि में देखा । स्त्री ने कुछ अपनी ही बोली मैं कहा और योद्धा ने हाथ से संकेत से पता नहीं किस चरणों में रहने के बाद पिता महीने एक्शन पर विचार किया और कहा तथा तो इस पर वन चरों का अधिकांश स्त्रीवर्ग वन चरों को छोड पिता मैं के सामने खडा हो गया । तब वे सब भूमि पर लेट सास टन प्रणाम करने लगी । पिता मैंने उनको उठने का संकेत क्या? और ये सब खडी हो गए और वैसा ही संकेत करने लगी जैसे दास बनने का वनचर जो कर रहा था पता मैंने उनके पुरुषों की और संकेत कर कहा, वे उनके पास चली है । एक युवती जो संभव कहा, अभी अविवाहित थी अपने लोगों की और देखकर ठोकने लगी पैसा महीने समीर खडे वनचर योद्धा को समझाने का यह क्या वह उन स्त्रियों को आपने पुरूषों के पास जाने के लिए कहते हैं? पुरुष नहीं उसी युवती की और देख कर कहा । उस युवती ने भी कुछ बात कही । अब योगदान सिर हिलाते हुए पिता नाम है को समझाने का जब क्या वेस्ट रियां नहीं जाएंगे ये सब आप लोगों के पास रहना चाहेंगे । पिता महीने कुछ दिए मौन रहकर विचार किया । और तो अंतर प्रभास को कह दिया आक्रमण करने वाले वन चरों की संख्या दो सौ से अधिक । उनमें से कुछ ही लोग आश्रम के भीतर आए थे । भीतर आई स्त्रियों की संख्या बीस के लगभग थी । उनके साथ दस के लगभग बच्चे थे तो माताओं की गोदी में थे अथवा अल्पायु के थे और माताओं के साथ खडे हुए थे । सब बीस बीस स्त्रियाँ भिन्न भिन्न बहस की थी इन सब में से वे तो पिता में है कि आश्रम में रहने के लिए पितामह हैं के सामने भूमि पर ले और बैठ गए थे । ग्यारह स्त्रियाँ और उनकी गोद में पांच बच्चे थे । कुछ कुमारी लडकियाँ थी । उनकी गोद में कोई बच्चा नहीं था । केवल एक कुमार था । शेष पुरुष और बच्चे था आठ नौ फॅस परियां दूसरी और खडी थी । जब पितामह हैं दूसरी और खडे वन चरों को कहा आश्रम से निकल जाता है तो लालसा भरी दृष्टि से अपनी स्क्रीन की और देखते रहे । उनमें से एक पुरुष ने कुछ रहा और सब पुरुष तथा कुमार लगभग कर अपनी स्त्रियों की और बडे और उनको बाहों से पकडकर आश्रम के द्वार की और घसीटने लगे । वे स्त्रियां ठीक ही मारने लगी । शोर आर्तनाद मच गया । पहले तो आश्रमवासी और पे काम है । चुप चाहती है कि जापानी देखते रहे एक का एक पैदा मैंने ऊंचे स्वर में कहा ठहर हो । साथ ही उसने अपना दाहिना हाथ ऊंचाकर उनको खींचा, खांची करने से रोकने का संकेत दिया । पहुंॅची पुकार में और क्रोधावेश में वन चरों नहीं न तो पे काम है कि स्वर्ग को सुना समझा और उन्होंने स्त्रियों को घसीटना जारी रखा । दक्षिण उन स्त्रियों को बचाने के लिए आगे को बडा परन्तु पिता नहीं नहीं उसे रोका तो बक्ष बीच में ही ठहर गया । इस पर पिता मैंने हाथ को हिलाते हुए वन चरों को निकल जाने का संकेत करना आरंभ किया । प्रत्येक हाथ के संकेत से एक पुरुष उस पर पकडी स्त्री से कथक हो जाता था और फिर आसाराम के बाहर ऐसे फैंक दिया जाता था जैसे कि हवा के झोंके में कोई सूखा पत्ता उड जाए । इस प्रकार सब के सब वंचन स्त्रियों पर बल प्रयोग कर उन को घसीटते हुए लिए जा रहे थे । आश्रम से बाहर फेंक दिए गए पे काम है उनके पीछे पीछे आश्रम के द्वार पर पहुंचे । पिता को देख सब वंचन और उनके साथ स्त्रियां तथा कुमार सिर पर हाँ रख, भिन्न भिन्न दिशाओं को भाग गए । रोहिणी और प्रसिद्धि को पिता मैंने कहा इंडस्ट्रियों को डाली तटपर ले जाओ । सान कराऊँ और भंडार से लेकर उनको उत्तरीय पहना तो गोद के बच्चों को साथ लेकर स्त्रियां नदी को जल्दी उनमें कुछ कुमार थे । उनको महर्षि यात्री के साथ स्नानादि के लिए भेज दिया गया । पक्ष को कहा गया । इनको पेट भरने के लिए दूध, नवनीत, फल और कंदमूल इत्यादि तैयार कर दिए जाएं । आश्रमवासियों में सबसे अधिक चिंतित महर्षि मरीचि थे । जब सब आश्रमवासी आपने अपनी कार्य में लग गए तो वहाँ पिता नहीं की कुटिया में आए और अपने मन का संचय वर्णन करने लगे । उन्होंने कहा, भगवन या आपने क्या क्या है? कल की गति देख रही यही उचित प्रतीत हुआ है । हम आश्रमवासी हैं क्या? उन आश्रमवासियों में केवल दो स्त्रियां हैं । मैं देख रहा था तीन वन चरों में कम से कम पांच छह स्त्रियाँ ऐसी हैं जो पत्नी बनने के योग्य हैं । उनसे आप लोग संतान करेंगे परन्तु पितान हैं । हमारे लोग यह कार्य पसंद नहीं करते हैं । वैसे पशु कर्म ही समझते हैं । पिता महीने मुस्कराते हुए पूछ लिया और तुम तुम क्या समझते हो? मैं तो ऐसे स्वर्गीय आनंद मानता हूँ । रोहिणी भी यही कहती है । परंतु मरिचि ये आनंद भारी उत्तरदायित्व का सूचक भी है । तो नए जीव इस लोग में आएंगे तो तुम सब की भर्ती एक दो दिन में ही अपनी शारीरिक आवश्यकताओं को पूर्ण करना नहीं सीख सकेंगे । उनको इस योग्य होने में कई संभव सर लगेंगे । तब तक संतान के माता पिता को उनकी देख रेख करनी होगी । हमारी चीज मुख देखता रह गया । फिर कुछ विचार कर बोला तो मेरा प्रश्न तो बना ही है । कौन पुरुष स्त्रियों के संतान उत्पन्न करेंगे? तो ये सब इस काम में अरुचि रखते हैं । उनमें ये रुचि स्थिति उत्पन्न कर देंगी । जलती अग्नि ईट पतंग की भारतीय लोग इस अग्नि में फस होते चले जाएंगे । मरीची चकित रह गया उसे मोहन देख पता मैंने कहा एक ऋचा है अश्विन ना पुनरसंसाधन मेरा शरीर छे हम ने आवन कम दे रहा पता हूँ इस वेदवाणी को कैसे असत्य सिद्ध कर होगी । देखो मरीची यही होना ही है अन्यथा श्रेष्ठ लोग संसार ने दास बना लिए जाएंगे अथवा मार डाले जाएंगे । देखा है ना वो जो आए थे हम से अधिक संख्या में थे । हम ने अपनी बुद्धि तथा ज्ञान बाल से उन को पराजित कर लौटा दिया पहनती है । बुद्धि और ज्ञान भी बहुत संख्या के सम्मुख ठहर नहीं सकेगा । इस कारण संख्या में वृद्धि भी एक धर्म है । अन्यथा तुष्ट संध्या ने बढ जाएंगे । पिसान सारे ज्ञान भी प्राप्त कर लेंगे तब विद्वानों को और देवताओं को वन पशुओं की भर्ती मार मार कर खा जाएंगे अथवा गौशाला के पशुओं की भांति अपनी शालाओं में बांध उनका तू दो दो होकर पान करेंगे । मवेशी निरुत्तर हो गया । फिर भी उस ने आशंका प्रस्तुत कर नहीं उसने कहा इससे वर्णसंकर और भेज वाणी की स्पष्टी होगी हूँ । परमप्रिय तभी होगा जब हमारे शिक्षा प्रसाद ऍम आलस्य के कारण अपना कर्तव्य पालन करना छोड देंगे । यह तो हुई विद्या की बात परन्तु वर्ड संकर की बात मैं नहीं समझा । हम सर्वथा शेजवान के हैं । ये लोग कुछ महीने हुआ लगे हैं । इनसे हमारी संतान भी इन्ही के वर्ल्ड की होगी । हाँ, शरीर से परंतु जीवात्मा तो वन रहित है । उसका कोई वर्ड नहीं । बुद्धि और मन मानस पिताओं की करनी से बिगडेंगे अथवा बनेंगे । उसमें इनकी चमडी का रंग हस्तक्षेप नहीं करेगा । मरीचिका समाधान हो गया और वह नमस्कार कर कोटिया से बाहर निकल आया । जब अपनी कुटिया में पहुंचा रोहिणी और प्रस्तुति वहाँ पहुंच चुकी थी । रोहिणी छूटते ही कहा स्त्रियाँ हमसे विलक्षण हैं । क्या विलक्षण का देखी है तुमने? इनमें? वाशी का प्रश्न था । ये स्त्रियां आसान करती हुई भी परस्पर ऐसे कलोल करने लगी थी जैसे कि वे परस्पर स्त्रीपुरुष हैं । वहाँ शेमस कराया और चुप रहा । प्रस्तुति के समूह किस विषय पर बात करना नहीं चाहता था? इस समय प्रस्तुति ने कहा, गुरुवार मैं कई दिन से दस से विवाह की इच्छा कर रही हूँ । अभी नई आई स्त्रियों को देखना समझती हूँ । मुझे अभी पिता नहीं, ऐसे जाकर अपने मन की बात करनी चाहिए । पाँच तुम्हारी बात से इन स्त्रियों का क्या संबंध हैं? मेरा मन कहता है कि ये दक्ष को झपट ले जाएंगी और मैं मुख् देखती रह जाउंगी । तुम क्यों मुझे देखती रह जाओगी मैं बता नहीं सकती । मेरे मन में कुछ है जिसको मैं शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकता थी । मेरा मन कहता है कि मैं दक्ष से व्यवहार करूँ और उनको कहीं दूर ले जाऊं जहाँ मिस्त्रियों के दर्शन भी ना हो सकें । इसे अपनी भाषा में ईद शाह कहते हैं । किसी दूसरे को वह प्राप्त करते देख जो हम प्राप्त नहीं कर सकते हैं उस दूसरे के प्रति घृणाभाव एशिया कहना आती है परंतु दक्षिण के विषय में तुम्हारी धारणा मिथ्या है । फिर भी मैं शीघ्र विभाग करना चाहती हूँ । अभी तुम जाओ और अपने एशिया की भावना को चित्र से निकाल उसे शुद्ध करने का यह करो । मैं अभी दक्ष को बुलाकर बात करता हूँ हमारी जो स्वयं उठा और दक्ष को ढूंढने चल पडा वाह गौशाला में आश्रम में आए प्राणियों को फल कंदमूल और दुग्ध वितरण कर रहा था मैं ऋषि वहाँ गया तो दक्षिण अपना कार्य लगभग समाप्त कर चुका था । एक दो बालक और थे उनको फल इत्यादि दिए जा रहे थे । सब खाने की सामग्री ले लेकर गौशाला से बढा जा रहे थे पे स्त्रियाँ बालक तथा युवतियां आश्रम के प्रांगण में एक बड के वृक्ष के नीचे बैठे खा रहे थे और वहीं सोने का विचार कर रहे थे । परंतु एक स्त्री दक्ष के पास ही बैठी थी, वही थी जिसने वनचर योद्धा के कहने पर वे आपने पुरुषों के साथ जाएँ अपने पुरुषों की और देख कर उन का था । जब पक्ष अपने काम से अवकाश पर आ गया तो मवेशी उस समय वहाँ आने का कारण जानने के लिए उसके मुख पर देखने लगा । मरीची नहीं, उस स्त्री की और संकेत कर जो दक्षिण के सम्मुख बैठी थी, पूछ लिया या किस लिए बैठी है, मैं नहीं जानता हूँ । जाती ही नहीं । कुछ कहती है जो उसमें नहीं सकता हूँ हूँ मशीने प्रश्न भरी दृष्टि में उच्चस्तरीय और देखा तो स्त्री महर्षि का आशय समझ सोने का संकेत कर तक्ष की और देखने लगी । पांच ही समझ गए स्त्री दक्ष के साथ होना चाहती है अथवा है उसकी कुटिया में जाकर रहना चाहती है । इस पर उसे प्रस्तुति के कथन में सत्ता दिखाई दी । साथ ही उसे प्रस्तुति में जिस तरी के प्रति एशिया पर विश्व में भी हुआ महर्षि विपक्ष को कहा तुम मेरे साथ आऊं, पिता नहीं के पास चलेंगे, क्या कार्य हैं चलो वही चल कर बात करेंगे । पहले मैं से अपनी कुटिया में छोडा हूँ । मेरे को क्या नहीं होना चाहती है । ये तो मैं प्रदान है की सम्मति के बिना नहीं करना चाहिए । क्या नहीं करना चाहिए अपनी कुटिया नहीं किसी को स्थान देना मुझे स्त्री बहुत पहली प्रतीत हो रही है । इसमें विशेष आकर्षण है । प्रसूति से भी अधिक प्रस्तुति का नाम सुनकर दक्ष गंभीर विचार में निमग्न हो गया । एक साइड में उठा मरिचि से बोला आशीष चलिए मैं आज ही प्रस्तुति से व्यवहार करूंगा हूँ और इस स्त्री से नहीं नहीं इससे विवाह नहीं करूंगा । इस समय दोनों पितान है की कुटिया की और चल पडेंगे । मैं यूपी भी इनके साथ साथ चल पडी । जब दक्षिणी उसके साथ साथ आती लेखा हाथ से संकेत से एक रक्षा के समीप ठहरने के लिए कहा । स्वयं लौटकर वहाँ आने की बात समझानी । फॅमिली वही ठहर गई । दोनों पिता नहीं की कुटिया में जा पहुंचे । पितान है अभी भी अपने आसन पर बैठे चिंतन कर रहे थे । कुटिया में अंधेरा हो रहा था । भीमा सा प्रकाश रह गया था । उस प्रकाश में ही पिता मैंने इन को पहचाना पूछ लिया और श्री आप किस कारण ऍम बता रहे हैं? दक्ष कहता है कि वह प्रस्तुति से इसी समय व्यवहार करना चाहता है और वो क्या चाहती है वो बीस से व्यवहार करना चाहती है ही समय वह तो दक्षिण चाहता है । हो सकता है प्रस्तुति को बुला लाओ । दक्षिण को वहीं छोड मरीची प्रसूति को ढूंढने चला गया । दक्षिण पिता में ऐसे पूछा क्या बिना विभाग की कोई पुरुष किसी स्त्री से संतान पर नहीं कर सकता? कर सकता है परंतु मैं कार्य पशु जीवन की और दूसरा होगा । प्रथम पढ है पुरुष स्त्री में संतान उत्पन्न ये उससे अधिकतर सोपन होगा । यह क्षमताओं तकती में मिलने वाले रस के कारण ही हैं । यह घोरदंश ओपन है । बहुत निपट ओपन किया है । दक्षिणी मुस्कुराते हुए पूछ लिया वो है इस्त्री । संघर्ष तो करना परंतु संतान उत्पन्न करना । पशु तो ऐसा नहीं करते, पैसा अभी तुम भी नहीं कर सकेंगे । करन है कितना पशु और न तुम संतान उत्पन्न करने के उपाय जानते हो । पशु भी है संसर्ग संतान का चिंतन करते हुए नहीं करते । वे िसकर्म के रस से प्रेरित होकर ही है, कार्य करते हैं । यही बात तुम कह रहे हो पर मैं तो जानता नहीं कि इसमें कोई रस है अथवा नहीं । फिर बीस रस की और तुम्हारा शरीर तुम्हें प्रयोग कर रहा हूँ । मैं नहीं मानता हूँ फिर भी प्रेरणा था । आकर्षण तो है । मैं विवाह अभी करना चाहूँगा हूँ । यदि प्रस्तुति चाहेगी तो हो जाएगा । प्रस्तुति आई तो उसी समय आश्रम के छह ऋषियों को बुलाकर उनके सम्मुख विभाग की दी थी । तीन कर दी गई । विवाह के उपरांत अच्छे प्रस्तुति को अपनी कुटिया मिले गया । प्रातः अकार, दक्ष और प्रस्तुति साथ साथ जारी और प्राथमिकी शीट समीर का आनंद लेने नदी की और चल पडेंगे । मार्ग में वह रक्ष पडता था जिसके नीचे दक्षिण उस वंचित स्त्री को बैठने के लिए कह गया था । मैं अभी भी उसी वृक्ष के नीचे सो रही थी । दक्षिण उसे सोई देख वहाँ खडा हो गया । स्थिति ने पूछा क्या देख रहे हैं जैसी अति सुंदर प्रतीत हो रही है । कल रात यहां मुझसे सहवास की इच्छा कर रही थी । मैं इसकी इच्छापूर्ण करने के लिए से अपनी कुटिया में ले जाने वाला था कि महर्षि गुरुवार आ गए और फिर काम है के पास ले गए । जाते समय मैंने इसे इस वृक्ष के नीचे प्रतीक्षा करने को कहा था । ऐसा प्रतीत होता है यह मेरी प्रतीक्षा करती करती हो गई हैं । प्रस्तुति को उस पर दया अनुभव हुई । उसने उसे हाथ से हिलाकर जगाया वैसी जांच पडी दोनों को इस तरह खडे देखकर कुछ बोली जो ये नहीं समझे ऍम मस्तक पर क्योरी चढा पक्ष की और देखती रह गई होती है उसके बहाने वहाँ डाल अपने साथ चलने का संकेत क्या वही इसका नहीं समझ पाई फॅस की और अति प्रेमभरी दृष्टि से देखा और कहा आप भारी इच्छापूर्ण होगी । तेरी दक्षिण विस्मय में प्रस्तुति की और देखकर पूछ लिया क्या कह रही हूँ मैं आपसे प्राप्त हुआ सुख बांटने लगी हूँ परन्तु बिना मुझसे पूछे आप तो इसको वह देने का वजन पहले ही दे चुके हैं । पिता नहीं से अनिश्चित मारेंगे तो उन की व्यवस्था के विपरीत होना, उनकी व्यवस्था मेरी और आप तक है और यह बात इसके और मेरे भीतर है । उसमें प्रदान है की व्यवस्था प्रभावी नहीं । यह मैं अपने भाग की वस्तु बांट रही हूँ । इस पर तीनों नदी तक पर जा पहुंचे । तदंतर शौच स्नानादि से तीन व्रत हुए । तत्पश्चात जग्य में समय होने यज्ञशाला में जा पहुंचे । वनचर स्त्रियों और बच्चों की देखभाल और उनको आश्रम की गतिविधियां सिखाने के लिए विश्वपति नियुक्त हुआ था । प्रार्थना के हवन के समय विश्वपति उन्हें भी यज्ञशाला में ले आया । इस प्रकार हवन में सम्मिलित होने के लिए । अब इक्यावन व्यक्तियों के हाँ सत्तर से उन पर व्यक्ति हो गए थे । नित्य की भांति हवन हुआ । तदंतर पिता बहने प्रार्थना की पिता मैंने तीन ऋषियों और रोहिणी को आश्रम में नए आए प्राणियों के लिए शिक्षक नियुक्त किया और व्यवस्था दी । इन्हें वाणी प्रदान की जाए जिससे यह आश्रम का अंग बन सकें । साथ ही उनको आश्रम में कुछ कार्य सौंपा जाए । कार्य के लिए विश्वपति ही नियुक्त रहा । विश्वपति ने उन स्त्रियों को सबसे पहले अपने लिए कुटिया निर्माण करने के काम पर लगा दिया । उसी दिन वन से लकडियां एवं हरी कोमल लगाएँ लहराकर कुटियों करता हूँ आरंभ हो गया । ऍम प्रार्थना के उपरांत मरीची हत्यादि महर्षिगण नए नए मंत्रियों को पिताजी को सुनाते थे और उनके अर्थों के विषय में विचार करते थे । यमंत्रित्व है । प्रातःकाल के चिंतन के समय उनके मन में प्रस्फुटित हुआ करते थे । आज तू महर्षि वहाँ पहुंचे । दक्षिण प्रस्तुति और उनके साथ वनचर युक्ति वहाँ पहुंच गए । पिता महीने पूछ लिया, अच्छा किसको ले आए हो? उत्तर प्रस्ताव नहीं दिया । हम एक पृथक आश्रम बनाना चाहते हैं । कहाँ? यहाँ से कहीं दूर तो यहाँ के तेज और आपकी प्रतिष्ठा के कारण हम बंधन में अनुभव करते हैं । हम अपना जीवन स्वतंत्रतापूर्वक चलाना चाहते हैं, तब भी प्रजापति रूचि और कदम की भांति एकाकी जीवन व्यतीत करना चाहते हो । हाँ पता मैं हम इसमें अपना कल्याण समझते हैं । जैसे बरगद के वृक्ष के नीचे घास नहीं जमता, वैसे ही आपकी छत्रछाया में हम पाँच नहीं सकेंगे । पिता मैंने एक क्षण के लिए आंखें मूंदकर विचार क्या कह दिया? ठीक है फिर भी अपने आश्रम की रक्षा के लिए सतर्क और सजग रहना और आश्रम से संपर्क है । हम वेदवाणी को स्थायी और चल रूप दे रहे हैं । समय समय पर इस आश्रम में होगी तो यहाँ महर्षियों से प्राप्त की शरवानी का लाभ हो गई । सरस्वती ने आगे कहा, युवती को अपने साथ ले जाना चाहते हैं इसलिए मैं से अपनी सहचरी के रूप में रखना चाहती हूँ हूँ । हम क्या चाहते हो भगवान, मैं तो एक ही रात में जान गया हूँ की प्रस्तुति मत से अधिक सूझबूझ रखती है । इसने भावी आश्रम का ऐसा चित्र खींचा है कि मैं उसके मुँह में फस गया हूँ । देवी मेरी रंगेश्वरी बन गई है हूँ । कब जा रहे हो ऍम अभी सूर्यास्त होने से पूर्व हम अपने स्थान पर रात के बसेरे के लिए स्थान बना लेंगे । हमने स्थान का निर्वाचन कर लिया है । ऍम ये वही स्थान है जहां प्रस्तुति का जन्म हुआ था । गृहस्थान यहाँ से अधिक सुरक्षित प्रतीत हुआ है । साथ ही वहाँ प्रस्तुति की कुट्टी है । एक संवत्सर से उसकी देखभाल न होने के कारण उसको ठीक भी करना होगा । अच्छी बात है हम भी यहाँ से किसी को भेज हमारी तो लेते रहेंगे । भवन इस वनचर युवती का नामकरण कर दीजिए । मंगला पिता महीने बिना विचार किए कह दिया । उसके उपरांत तीनों ने पिता हैं कि चरणस्पर्श किए और कुटिया से निकला है । दक्ष चला गया तो मरीची ने कहा काम है दक्षिण इस वन चली को अपनी दूसरी पत्नी बनाने का विचार रखता है । ऐसे कहते हो कल स्वयं बस मैं ऐसे आपके पास लाने के लिए गौशाला नहीं गया तो मैं इस वनचारी को अपनी कुटिया में ले जा रहा था । उसने कहा था कि वह वन चली उसके साथ रहने की इच्छा कर रही है । अब इसमें प्रस्तुति को इसे अपनी सहचरी बनाने के लिए उद्यत कर लिया है । यह स्वाभाविक है । यहाँ स्त्रियों की संख्या पुरुषों से अधिक हो रही है । इनके बच्चों में भी कुछ करने आए हैं । समय पाकर वे भी किसी की भारतीय बनना चाहिए । यदि इनका विवाह नहीं किया जाएगा । वो पशुओं की भर्ती अनियमित संतान उत्पन्न करती थी, रहेंगे और ये हमारे आश्रम में रहने वालों के लिए भी प्रलोभन बन जाएगी । पता नहीं व्यवस्था है कि पुरुष एक से अधिक पत्नियां रख सकता है । परन्तु बताने यह भी व्यवस्था हो सकती है कि महिला एक से अधिक पति रखने हाँ, यदि पुरुषों की संख्या इस तरह से अधिक हो जाएगी तो वह व्यवस्था भी दी जा सकती है । तो मैं समझता हूँ कि है स्थिति उत्पन्न नहीं होगी । क्या काम है इस से तो बहुत झगडे और हत्याएं हो जाएगी । ऐसी स्थिति होगी तो पुरुष अधिक और इस तरह काम पुरुष अपने को इस प्रथा के अनुकूल कर लेंगे । फिर भी मैं समझता हूँ कि अब सुष्टि का विस्तार होने लगा है । कितने पुरुषों में भूमि संपत्ति ऍम वर्ग के लिए युद्ध होंगे जिनमें पुरुष स्वर्गारोहण करते रहेंगे । परिणाम ये होगा कि स्त्रियां सादा संख्या में पुरुषों से अधिक रहेंगी । इस कारण मेरी व्यवस्था ठीक ही है । मरीज चीज का उत्तर नहीं दे सका । वो देख रहा था की बीस स्त्रियाँ आकाश तब पडी हैं और आश्रम में पीस पुरुष इनसे विवाह करने वाले नहीं है इस कारण ये ठीक ही है । एक पुरुष एक से अधिक स्त्रियों से विभाग करें । पिता मैंने वेद विषय पर विचार आरंभ कर दिया । वह कहने लगे, ऋचाओं की संख्या बढती जाती है । अच्छा इन को स्थायी रूप देने के लिए इन कुछ चिंतित करने का उपाय ढूंढना होगा । मैंने इसके लिए एक ढंग विचार क्या है? हम जो कुछ बोलते हैं वह यदि यहाँ चित्रित कर दें तो कोई दूसरा कभी भी उसको देखकर वैसा ही बोल सकेगा । यह मैंने विचार क्या है? देखो महर्षिगण हमारी वाणी में वाक के होते हैं । वाक्यों में शब्द होते हैं और शब्दों में अक्सर होते हैं । अक्षर के उच्चारण था, उस वर्ग होती है तो मैं उदाहरण देता हूँ । एक बंद है दोनों ही विश्व तो मुखा रिश्ता भू रस्सी इस पद में शब्द है ही । विश्व तो क्या दी? इनमें अक्सर हैं तो वो तथा मैंने कई दिन के विचार के उपरांत नक्षत्रों और स्वरों की गणना की है । अनंत शब्दों में कुछ थोडे से ही स्वर्ग तथा अक्सर हैं जिनके सहयोग से हम उन शब्दों का उच्चारण करते हैं । मैंने उच्चारणों की संख्या गिनी है, ये हैं । इनमें से सुगम उच्चारण बयालीस हैं । मैंने इन उच्चारणों के दो भेद किए हैं । एक को स्वर कहता हूँ जैसे और ई ऍम लू ये दस हैं । फिर दूसरी प्रकार के उच्चारण भी हैं जिसमे इन स्वरों को रूप मिला है । जैसे ॅ ना चर्च छह मुझे इत्यादि ये कुल छब्बीस हैं । अब हमारे पास उपचारण हो गए हैं । इन की हम चिंता नहीं करते हैं और उन चिन्हों में हम अपनी वाणी को स्थिर, चिरायु और सर्वग्राही बना सकेंगे । महर्षि उन्होंने लेखन सामग्री का आविष्कार किया है । उन्होंने एक प्रकार की मासी और होली का निर्माण की है और भुज वृक्ष की छाल पर चित्र बनाने का आयोजन किया है । मैंने उन सब का लाभ उठाया है और उच्चारण लिखने का विचार क्या है? इस लिखने की पद्धति को मैंने लिपि का नाम दिया है । आज मैं आपको उस लिट्टी का ज्ञान देता हूँ । आप सीखें और फिर अपने चिंतन द्वारा प्राप्त वेदवाणी को लिपिबद्ध कर सकेंगे । इतना कह पिता मैंने एक भोज पत्र लिखा और ऋतु अपनी कुटिया से बनाई मासी और तू निकले आया । पिता नहीं ने भोजपत्र पर स्वर और व्यंजन लिखती है । छह वो ऋषियों ने उस लिपि की प्रतिलिपि बनाई और फिर काम हैं को दिखा स्वीकार करवा अपनी अपनी कुटी को जाने के लिए तैयार हुए । वे अपने अपने स्थान पर एकांत में बैठ लिपिका अभ्यास करना और तदंतर उस लिपि में वेदज्ञान को लिखना चाहते थे । महर्षि ऋतु ने बहुत सी तो लिखा बना रखी थी और सभी पात्रों में डाल एक एक तो लिखा सबको देकर लिखने का ढंग बता दिया । ये ऋषि ऋण पितान है कि इस अविष्कार पर अभ्यास करने के लिए उत्सुक थे । परंतु हुए जाने के लिए उठे ही थे कि विश्वपति कुटी के द्वार पर खडा हुआ और कहने लगा पता है प्रजापति रुचि के पत्र यज्ञ रूप दर्शनाथ आए हैं, आने दो एक अति तेजस्वी और सुंदर संतुलित शरीर वाला युवक भी तरह और भी काम है कि चरणस्पर्श कर हाथ जोड खडा हो गया । पिता मैंने देखा कि यह युवक अति तेजस्वी और बुद्ध शील है । उसे पिता है के सामने आसन पर बैठने को कहा और उसके पिता का समाचार पूछा । शिवक ने पूछा इन पिताओं का समाचार पूछ रहे हैं । मेरे जन्म दाता तो प्रजापति रूचि हैं परन्तु मेरे पालन करता भगवान व्यवस् वक्त हैं । मैं व्यवस्था जी के विषय में ही पूछता हूँ । जब मैं बालक था । एक दिन वे आए और पिताजी से कुछ निश्चय कर मुझे प्रयास हम ले आया । यहाँ उन्होंने मुझे वेदवाणी दी, उसका फल भी बहुत कराया । मेरा अभिप्राय है कि उन्होंने वेदवाणी का वास्तविक और आशा बताया । इस प्रकार में उनके पास बीस संभव सर्तक रहा । इस समय मेरी रूचि अपने जन्मदाता पिता के दर्शन करने की हुई । मैं भगवान व्यवस्थागत से स्वीकृति से प्रजापति जी के आश्रम पर पहुँच गया । वो वहाँ नहीं वहाँ अति सुन्दर युवती ने मेरा आथित्य किया और बताया प्रजापति वन पशुओं को मानवता का पांच पढाने जाया करते हैं । वह कहते हैं कि उनकी प्रजा वही है और वह अपनी प्रजा को मानवों का शाह बना देंगे । पहले वह उनको वेदवाणी सिखाते रहे । कई सम्वत्सर के उपग्रहण भी जब पशु वेदवाणी नहीं सीख सकें, वे अपनी ही चीज ही करते रहे । तो पिता ने उन पशुओं को भी वाणी सीखने का यह क्या? इस समय उनको विजिट हुआ कि भिन्न भिन्न जाति के जंतुओं की भिन्न भिन्न वाणी है । अच्छा उन्होंने लंगूरों की वाणी सीखने का यत्न किया । मैं कुछ कुछ सीख गए हैं और सब लंगूरों की एक कक्षा को वेदवाणी उनकी अपनी वाणी द्वारा सिखाने लगे हैं । भवन मैं उनकी इस योजना को सुनकर मुस्कराता रहा । अब इसमें हसी की क्या बात थी? पिता मैंने मुस्कुराते हुए पूछ लिया । मैंने व्यवस्थागत जी से सीखा था कि पशुओं की बुद्धि और उनका स्मृति क्षेत्र बहुत दुर्बल होता है और उनके इन दोनों यंत्रों में विकास नहीं हो सकता । युवती और मैं प्रजापति के लौटने की प्रतीक्षा करते रहे । बहुत मधुर भरी और ट्रकर बुद्धि की थी । उसने अग्नि पर अन्य धुनकर मुझे खिलाया, एक रक्षा के फल का रस पिलाया और स्वयं भी दिया । जब तक प्रजापति लौटे मैं और वह पति पत्नी बनकर इकट्ठे रहने योजना बना चुके थे । प्रस्ताव यूपी की ओर से ही था । उसने मुझसे पूछा आप कहाँ से आए हैं? मैंने बताया व्यवस्था लोग सिंह वहाँ कितने प्राणी रहते हैं । उसने पूछा हूँ । मैंने कहा मैं था और मेरे माता पिता थे परन्तु यहाँ का वन तो प्राणियों से भरा पडा है । महज पडते हैं । बस कर मैंने बताया ये सजती है नहीं है । वन पशु तो वहाँ भी बहुत थे । हमारी संख्या बढ नहीं रही हैं और वे वन पशु तीव्र गति से बढ रहे हैं । मैंने उसे समझाया कि पशुओं में नर और नारी के सहयोग से वृद्धि होती है । यह हमारी जाति में भी उत्पन्न हो सकती है । मैं किसी नारी की खोज में होगा । मिल जाने पर मैं भी संस्थान पकती कर सकूंगा ते आपको कहाँ मिल सकेगी? तुम मिल गई हो परंतु तुम्हारे माता पिता से पूछना होगा तो क्या मैं संतान उत्पन्न कर सकूँ? सत्य तो मैं आपसे संतान उत्पन्न करूँ । पिताजी आले उनसे पूछ लूँ, विश्व कार कर लेंगे । प्रजापति आए । माता जी भी उनके साथ थी । मैंने उनको बताया कि मैं वैवस्वत लोग से आया हूँ । भगवान व्यवस्था आपने मुझे बताया है कि मेरे जन्म दाता यहाँ रहते हैं । अगर हम हैं आपके दर्शन करने चला आया हम जग्य रूप हो आप तो कुछ दिन यहां को ये तुम्हारी माता होती हैं । मैंने समीर बैठी लडकी की और संकेत कर पूछा यह कौन है तो तुमने से पहचाना नहीं । जी नहीं पैसे है, अति सुंदर है । हम प्रिय प्रतीत होती है । यह तुम्हारी बहन है । महम । मैं तो इसके साथ रहने और सुष्टि निर्माण का विचार कर रहा था । इसपर प्रजापति बोलेंगे ये कैसे हो सकता है? भाई और बहन संतान पर नहीं रह सकते हैं । क्यों ऐसा विधान है? इसने बनाया है विधान मैं बता नहीं सकती । कुछ विचार कर बोले यह बात मैं और इसकी माता पसंद नहीं करेंगी । इस पर लडकी ने आग्रहपूर्वक कहा मैं इनके साथ जाऊंगी । दक्षिण मेरा अभिप्राय है उस युवती से उसकी माता ने कह दिया । इस विषय में पिता में से व्यवस्था ले सकते हैं । हमारे कोई संतान नहीं । इनके द्वारा ही हमारा परिवार चलेगा । मैं उनके पास एक पक्ष भर रहा हूँ । दक्षिण अपनी माँ से आग्रह करती रही है । विमर्श पिताजी तथा माताजी ने मुझे आपके पास भेजा है । आपने इस विषय में व्यवस्था लूँ । पिताजी कहते थे कि पांच संभव सर पूर्व माता जी के साथ यहाँ आए थे और आप स्वस्थ है तथा सबल थे और भी समझते हैं कि आप अभी भी वैसे ही स्वस्थ तथा सफल होंगे । पिता में है कि समूह की एक नई समस्या थी । उसने यज्ञ रूप को कहा तो अभी यहाँ हो । मैं तुम्हारी समस्या पर विचार करके ही निर्णय ले सकता हूँ । इसमें कुछ दिन लग सकते हैं । जंग रूप का उत्तरी है । पिता में है कि आसाराम वालों के उत्तरी से भिन्न प्रकार का था । मैं किसी जंतु का चरम नहीं था । फौरन किसी वृक्ष की छाल से बना था । मैं उत्तर यह है दोनों और से खुले एक पहले की भांति था और सिर की ओर से पहना जाता था और जब बाहों के नीचे बंगलो तक आ जाता तो बांध दिया जाता था । एक उसी पदार्थ की दूरी थी जिसका वह उत्तरीय बना हुआ था । मैं उत्तरीय के ऊपर के भाग से किसी वस्तु से जुडी हुई थी । नीचे रहे जैसा घुटनों तक आ जाता था । जब पता नहीं ऐसे बात समाप्त हो गई तो पिता रहने विश्वपति को कहा । जज रूप को दक्ष जी की कुटी में ठहरा दो विश्वपति जग्य रूप को अपने साथ लेकर बाहर निकल गया । उसके जाने के उपरांत ऋषिगण प्रताम है का मुख देखने लगे । वो भी समस्या को समझ रहे थे । सबसे पहले अंगीरा ने कहा बहन भाई के संबंध से संतान की बुद्धि विकृत होगी । शरीर दुर्बल होगा और मानव जाति इतिहास को प्राप्त होगी । वो तो होगा ही । तुम बताओ हमारी चीज हम संयुक्त फॅमिली हूँ । मैं विवाह को और उसके व्यवहार को मुख्य धर्मों में नहीं मानता हूँ । क्या अभिप्राय है सैनिक विस्तार से हो? धर्म करणीय कर्म को कहते हैं । मुख्य धर्म हुए हैं तो प्रत्येक अवस्था नहीं तथा सबसे पालन करने के योग्य होगा । कुछ करनी करवा ऐसे भी हैं जिनका पालन करना अनिवार्य नहीं । यदि परिस्थितियां प्रतिकूल हूँ तो उनका पालन छोडा भी जा सकता है । वहाँ रुचि के आश्रम में अन्य कोई युवक न होने की अवस्था नहीं, बहन भाई का विवाह वर्जित नहीं होना चाहिए । मार्शिया से बोले इस युक्ति में दोष है । पिता में यह व्यवस्था दे चुके हैं । एक पुरुष एक से अधिक पत्नियां रख सकता है अच्छा हमारे आश्रम में कई पुरुष अविवाहित है । उनमें से किसी के साथ दक्षिण का हो सकता है अथवा दक्षप्रजापति के साथ उसका विभाग किया जा सकता है । मैं समझता हूँ कि वह मान जाएगा । इसी प्रकार यज्ञ रूप के लिए अब इन मनचलों में से कोई पत्नी दी जा सकती है । महर्षि मरीचि की धर्म के विषय में युक्ति मान भी ली जाए । अभी विभाग धर्म के उल्लंघन की आवश्यकता नहीं है । यहाँ तक समाज निर्माण का संबंध है । केवल जलवृष्टि आवश्यक नहीं, वन स्वस्थ, सबल युक्त और दीर्घायु जान उत्पन्न करना अधिक आवश्यक है । पिता महीने व्यवस्था देते हुए कहा बहन भाई का व्यवहार उचित नहीं । मैं समाज के लिए हितकर भी नहीं । केवल एक ही अवस्था में ये है शाम में है जबकि जीवन साथ ही बहन भाई की अतिरिक्त मिलता हो । परिवार की परंपरा चलाने के लिए इसकी अनिवार्यता हो सकती है परन्तु अन्य किसी कारण से नहीं । महर्षि पुराने इस व्यवस्था के विषय में ही प्रश्न कर दिया । पूछा अन्य किसी कारण से क्या अगर पढाया है उसकी व्याख्या होनी चाहिए? भाषे पिता मैंने कह दिया अन्य किसी में कोई एक आद बात हो तो उसका वर्णन हो सकता है । मेरा अभिप्राय है कि संसार में वर्तमान तथा भविष्य में कोई भी कारण हो सकता है । केवल मात्र परिवार की परंपरा चलाने के लिए ही इस नियम को भंग किया जा सकता है । अन्य कारणों में एक अति प्रबल कारण जो इस नई परिस्थितियों में बन रहा प्रतीत होता है नहीं वहाँ से और शारीरिक आकर्षण । ये वही बात है जो दक्षिण और मंगला के संबंध में हुई है । मंगला वासना, विभूत अथवा चार एक संदर्भ के आकर्षण से प्रभावित अपने संगी साथियों को छोडकर पक्ष के साथ चलती है । मैं कल ही बात समझ गया था जब दक्षिणी चतुराई से वनचर योद्धा को पराजित किया था और मंगला ने अपने साथियों की और देखता था । समझ गया था कि दक्ष की चतुराई ने इस लडकी के मस्तिष्क में दक्षिण के लिए आकर्षण उत्पन्न कर दिया है । यह भी बहन भाई के परस्पर विवाह का कारण नहीं हो सकता । मैं समझता हूँ कि वर्तमान परिस्थिति में इस समय कई अविवाहित कन्यायें वहाँ हैं जो यज्ञ रूप के लिए उपयुक्त पत्नी हो सकती हैं । इसी प्रकार दक्षिण यदि इस आश्रम में आ जाये तो उसका भी विवाह किया जा सकता है । प्रजापति रूचि का परिवार दोनों पक्षों में चल सकेगा । विश्वपति ने अगले दिन यज्ञ रूप को वन चरों की कई लडकियाँ दिखाई परन्तु से कोई पसंद नहीं आई । सबसे बडी बात थी वन चरों कि वाणिज्य, अनभिज्ञता और स्मृति ऍम बुद्धि में निम्नस्तर का होना । उसे कोई भी वनचर कन्या दक्षिण की तुलना में ऊंची नहीं । न तो रंग रूप ने और न ही मानसिक विकास में । कई दिन के आश्रम में आथित्य के उपरांत पिता मैंने यज्ञ रूप को बैठाकर अपनी व्यवस्था बता दी । जब ग्रुप ऐसी आशा नहीं करता था उसने इतिहास संबंधित मुक्ति दे दी थी । उसने कहा पे काम है सब अमैथुनी य प्राणी क्या बहन भाई नहीं है आपने? आदित्य के तेज द्वारा शत्रुपा प्रकृति के गर्भ से उत्पन्न युवक युवतियों का विभाग क्या है? एक ही माता पिता से उत्पन्न मेरे माता पिता भी हैं । अभी अभी आपके आश्रम में दक्ष और प्रस्तुति का विवाह हुआ है । मेरे विषय में ही ये बाधा क्यों है? मैंने कहा अमैथुनी सृष्टि में माता प्रकृति शतरूपा है । मैं एक होते हुए भी अनेक रूपों में कार्य करती है परंतु मैथुनी सृष्टि में तो पत्नी की तुलना प्रकृति से नहीं की जा सकती है । स्त्री एक प्रयोजन के लिए निर्माण की गई है और ये है उस कार्य को केवल एक की पत्नी बनकर ही पूर्ण कर सकती है । रही बात दक्षिण की उसका मंगला के साथ सहयोग से पहले प्रस्तुति का जहाँ हो चुका था । मंगला विपरीत यौन आकर्षण में दक्षिण के साथ चली गई है और हमने उसको मना नहीं किया । कारण ये कि वह बहन भाई नहीं चाहती । वर्तमान परिस्थिति ने अधिक ज्ञानवान, बुद्धिमान और बलवान संतान उत्पन्न करने के लिए बहुपत्नी विवाहों की स्वीकृति देनी पडी है अन्यथा संसार निर्मितियों और हीन प्राणियों से भर जाएगा । यहीन प्राणी केवल संख्या के बल पर श्रेष्ठ विद्वान और उन्नत मनुष्यों को अपना दास बना लेंगे । पिता में है मेरा भावी संतान और उसमें होने वाले संघर्ष से कोई संबंध नहीं । मैं अपने को संसार के कल्याण के लिए नियुक्त या प्राणी नहीं मानता । मेरा तो केवल मात्र है । आग्रह हैं कि मैं दक्षिण से मैं वहाँ करना चाहता हूँ । मैं उसे व्यवहार करने का वचन दिया है । इसको मैं पर्याप्त कारण मानता हूँ । तुम उसे अपनी भार्या बना सकते हो परन्तु मैं इसकी अनुमति देकर समाज में अव्यवस्था का बीजारोपण नहीं कर सकता हूँ । नहीं कोई गंगेरू । मैं आने वाले मनुष्य समाज में कठिनाई का स्पष्ट दर्शन कर रहा हूँ । दो प्रकार की सुस्ती का बीजारोपण हो रहा है । एक देवी सुभाव युक्त और दूसरी मसूरी सुधार युक्त । देवी स्वभाव के लोग समाज के हित को अपनी शारीरिक सुख सुविधा से ऊपर समझेंगे, यज्ञमय होंगे, दूसरी सृष्टि होगी जिसको आपने शारीरिक सुख और लोगों से परे कुछ दिखाई ही नहीं देता । वे आंसू सुभाव वाले माने जाएंगे । वे लोग अपनी अपार सुष्टि करेंगे और अपनी जनसंख्या के बल पर परिश्रमी मृत्यु हुई और शांतिप्रिय मानवों को रास्ता में बांध कर अपना सर्वार्थ सिद्ध करेंगे । मैं ऐसी व्यवस्था देना चाहता हूँ जिससे मनुष्य समाज में देवी स्वभाव वालों का सिर ऊंचा रह सके । अजय जहाँ यह आवश्यक है कि भले लोगों की संतान संख्या में काम ना हो, वहाँ भी आवश्यक है उसमें दीन हीन बालक उत्पन्न ना हो । इन सब बातों का विचार कर मैं किसी परिणाम पर पहुंचा हूँ की बहन भाई से संबंध वर्जित कर दूँ । यद्यपि शारीरिक सुखों की प्रेरणा प्रबल होगी और यज्ञ में होने में किसी प्रकार का रस दिखाई नहीं देगा परन्तु अंतिम ऍम स्थाई कल्याण यज्ञमय जीवन व्यतीत करने से ही होगा । पिता में मैंने वन पशु उत्पन्न होते देखे हैं । शरीर से ही शरीर बनता है । उम्र से लग उत्पन्न होते हैं दस से शश ब्लूमर से लू मार और बिहार से बिला कैसे सिद्ध नहीं होता कि शरीर ही मुख्य और इसी की चिंता करनी युक्तियुक्त है । शरीर अपना अपना है । अतः स्वार्थ इस संसार का केंद्र बिंदु है । स्वार्थ की सिद्धि के अर्थी यदि किसी दूसरे का कल्याण हो जाए तो ठीक है यह फिर भी मनुष्य के लिए लक्ष्य स्वहित ही होगा और होना भी चाहिए । संपूर्ण जगत को सिर के बल खडे होकर देख रहे हो । यही कारण है कि जिसको मैं एक ढंग से देखता हूँ तो मुझे सर्वथा विपरीत दिशा में देखते हो । मैं वो देखता हूँ कि मनुष्य का लक्ष्य परहित होना चाहिए और इस पर हित में यदि कुछ अपना भी कल्याण हो जाए तो ठीक है, परंतु किसी दूसरे के अधिकार को छीनने से तुम अपने को इधर जीव जंतुओं के समान बना लोगे तब उनकी ही बढाती तुम बंधनों में बंद कर दुख और कलेश के भागी बन जा हो गई । परन्तु पितान हैं ये वन पशु क्या दुख और कलेश का जीवन व्यतीत कर रहे हैं? मैं समझता हूँ कि वे हमसे अधिक सुखी है । यह गिरोह क्या तुम ये पसंद करोगे कि श्वान की भांति जब शर्दी लगे तो अपने को सर्दी से बचाने का उपाय भी ढूंढ सको । अपनी रक्षा का उपाय भी ना कर सको । क्या तुम उसका मूत्र की भांति बनना चाहोगे, जो भाय समूह का आने पर आंखें मूंद ये समझ लेता है कि बेला है ही नहीं, यह इधर जीव जंतुओं की असमर्थता है । मनुष्य की सृष्टि हुए इस पृथ्वी पर चालीस पचास वर्ष से अधिक नहीं हुए और इन पशुओं को यहाँ प्रकट हुए आधे मन्वंतर से अधिक काल व्यतीत हो चुका है । इस लम्बे काल में भी ये वन पशु है, सीख नहीं सके । सर्दी, गर्मी तथा धूपछांव से बचने के लिए आवास कैसे बनाएं? प्रलय काल तक भी पशु पशु ही रहेंगे और मनुष्य मनुष्य यज्ञ रूप हस पडा बोला दक्षिण के प्रताप प्रजापति रूचि पिछले दस वर्ष से वन पशुओं को मनुष्य बनाने का ये अपना कर रहे हैं । मैं तो एक बार समझा हूँ कि पशु तो मनुष्य बनेंगे नहीं, हम तो पिताजी एक सीमा तक पशु बन गए हैं । इसी कारण मैं कहता हूँ आपके परमात्मा ने हमें मनुष्य बनाया है और हमें अपना मनुष्यत्व स्थिर रखने के लिए अपनी बुद्धि को उन्नत रखना चाहिए । यह ही विशेष वस्तु है जो मनुष्य को पशुओं से अधिक मिली है परन्तु पे काम है । मैं बुड्ढी से ही विचार करके यह कर रहा हूँ कि मैं दक्षिण से विवाह करूंगा । दक्षिण की माताजी ने कहा है कि वह वेद को इतना जान नहीं सकी जितना कि आप जानते हैं । इस कारण उन्होंने मुझे आपसे व्यवस्था लेने के लिए भेजा है । यदि संसार में अन्य लडकियाँ उपस् थित न होती तो मैं इस विभाग के पक्ष में व्यवस्था न देता । इसी प्रकार यदि दक्षिण से विवाह करने के लिए कोई अन्य पुरुष ना होता तो मैं उन दोनों को सृष्टि रखने की भी स्वीकृति दे देता हूँ । आहुती और प्रजापति रुचि में भी विवाद चल रहा था । जब से आहुति ने यज्ञ रूप को पिता मै के पास भेजा था, सब से ही मतभेद प्रकट हुआ था कि उसके दोनों बच्चे परस्पर विभाग करें अथवा न करें । प्रजापति इस विभाग के पक्ष में था । रहे जीवन से उचाट हो चुका था । उसने अपनी पूर्ण सूझबूझ और योग्यता वन में रहने वाले पशुओं को मानवीय आचार विचार सिखाने में लगा दी थी । पिछले ग्यारह वर्ष से वैसी कार्य में लगा हुआ था और इतने लम्बे प्रयास के उपरांत भी वह सर्वथा असफल हुआ था । इससे हुए हैं । जीवन से ही निराश हो गया था । इस कारण दक्षिण का व्यवहार कर और उसकी माता आहुति को उसके पास छोड भगवत भजन में लग जाना चाहता था । मैं समझने लगा था कि संसार को ज्ञान देना निरर्थक कार्य है । जो जितनी बुद्धि लेकर संसार में आता है, मरन पर्यंत उतरी बुद्धि का स्वामी रहता है । उसकी बुद्धि में वृद्धि नहीं हो सकती । ये अनुमान प्रजापति का पशुओं को मनुष्य बनाने के प्रयत्न से बना था । आहुती बहन भाई के विवाह को पसंद नहीं करती थी । इसी कारण उसने जग्य रूप को सम्मति के निमित्त पिता नहीं के पास भेज दिया था । मैं समझती थी कि पिता में है समस्या पर किसी प्रकार का सुझाव उपस् थित कर सकेंगे । जहाँ तक दक्षिण के रिहा का संबंध था, उस विषय में भी वह पिता में से सहायता लेना चाहती थी । उसको स्मरण था की वह मानव सृष्टि में वृद्धि के लिए बहुत उत्सुक थे । उसके विवाह के समय भी पिता महीने प्रजापति रूचि को धूम निकाला था । यज्ञ रूप के पिता नहीं के आश्रम को प्रस्थान करने के उपरांत प्रजापति अपने कार्य से वन को जाने लगा तो नित्य की भांति आहुति भी उसके साथ चल पडी । पिछले एक वर्ष से वह अपने पति के साथ जा रही थी । वन में एक स्थान पर पहुंच प्रजापति ने अपने वहाँ पहुंचने का घोष क्या वह उच्च स्वर में वो हाँ ऐसा घोष तीन बार क्या करता था? एक प्रकार की विद्यालय खुलने की घंटी थी । इस घोष को सुन वन के चालीस पचास लंगूर पेडों से लड सकते हैं । उन पर छलांगे लगाते हुए आए और उनके चारों और एक चित्त हो गए । प्रजापति उनके एकत्रित हो जाने पर रक्षा कि नीचे की ओर झुकी डाल पर बैठ गया । उसके उपरांत लंगूर एक एक कर प्रजापति के पास आते हैं और उनके चरणस्पर्श करते तो प्रजापति अपने झोले में से एक एक फल जो अमरूद की प्रकार का था, निकाल उनको खाने को देता था । इस प्रकार सब के चरण स्पर्श कर प्रसाद पर जाने के उपरांत सब भूमि पर बैठ जाते हैं और प्रजापति गान करने लगे । गान केवल तीन स्वर्ण और एक व्यंजन का होता था । उस दिन भी प्रजापति ने उच्चारण आरंभ किया । आप सब लंगूर उसके उपरांत बोले, आप अब उसने दूसरा स्वरूप चारण क्या? यह भी सबने एक स्वर से गाया । तत्पश्चात इन दोनों स्वरों का सहयोग कराया । वो क्या उच्चारण भी लंगूरों ने गाया । प्रजापति का स्वर्ण अति मधुर और प्रभावित उसके विपरीत पचास लंगूरों का स्वर्ण उसके अकेले से धीमा और असरहीन था । परंतु जो ही प्रजापति ने व्यंजन माँ माँ का उच्चारण किया तो सब मुख देखते रह गए और चारण नहीं कर सके । माँ का उच्चारण पिछले एक वर्ष से उनको सिखा रहा था परंतु वे बेचारे इसका उच्चारण कर ही नहीं सकते थे । अब कई बार कहलाने का यत्न कर एक एक को बुलाकर अपने पास खडा कर उसने पुनः माँ का उच्चारण सिखाने का यत्न किया पचास में से दो ही यह उच्चारण कर सके । उनको प्रजापति ने पुनः फल खाने को दिया और उनकी पीठ पर बिहार दिया । तत्पश्चात है उनको खेलकूद कराने लडा एक घंटा भर खेलकूद कराकर उन्हें वाणी का पाठ पढाया और फिर एक बार फल बांटकर वह अपने आश्रम को लौट पडे होती ने कहा अब आप इस खेल को बंद करेंगे । एक वर्ष के लगभग मुझे आपके साथ आते हो चुका है । एक रीजन तू कुछ भी नई बात नहीं सीख सका था । अपनी बगिया के स्वादिष्ट फल पाने के लोग में ये आते हैं और कुछ खेल कूद कर चले जाते हैं या खेलना को ना उनके स्वभाव में है । बृहस्पति चुप रहा होती ने उनक आ रहे हैं । एक बात और है । इन सीखने वालों की संतान में भी कई एक वर्ष के हो गए हैं और वे अपने सुशिक्षित माँ के पेट से कुछ भी अधिक सीखकर नहीं आएँ । प्रजापति बोला यह तो मैं भी देख रहा हूँ । जब तो भारी संतान पैदा हुई थी तब है । इनके बच्चों से भी कम जानती थी जब ग्रुप और दक्षिण को चलने फिरने के लिए भी परिश्रम से सीखना पडा था । पर एक वर्ष के हो जाने के उपरांत दोनों बच्चे द्रुत गति से उन्नति करने लगे थे । जब ग्रुप अपने नाना के घर जाने से पूर्व वेदमंत्र कंठस्थ कर स्वर्ण रहित उच्चारण करता था और दक्षिण अब मुझसे और तुम से भी विचार युक्त बातें करती है । मैं वही तो कह रही हूँ कि वे वनचर कुछ नहीं सीखेंगे । मेरा पिछले दस साल का प्रयास विफल रहा है परन्तु देवी मैं दिन भर क्या क्या करूँ यही समझ में नहीं आ रहा हूँ । मैंने समझाया कि जैसे मेरी संतान वन पशुओं से हीन होने पर भी बहुत कुछ सीख गई है । इसी प्रकार वे भी कुछ सीख जाएंगे, परंतु नहीं है ना? परन्तु तुमने कोई अन्य संतान भी तो नहीं की मैं कई बार कह चुकी हूँ पिता नहीं कि आश्रम को लौट चलें । पांच । संभव सर पूर्व हम गए थे परन्तु वहाँ के एकरस जीवन को देख मैं ऊब गया था और यहां चला आया था और यहाँ क्या रस आ रहा है जीवन में उस समय तो मैं आशा से भरा हुआ था और इस कार्य में रस भी अनुभव कर रहा था । मैं आशा विफल गई है और रसयुक्त होने की अपेक्षा अब व्यर्थ का बोझा प्रतीत होने लगा है । मैं से पहले से ही जानती थी और तो आप मानते नहीं थे । यदि तुमने कुछ समताना और पंद्रह की होती है, मेरा तो लगा रहता रहे तो हुई नहीं । जब तो आपने बहुत क्या है, मैं भी सब विफल गया है । इसी कारण मैं कहता हूँ कि दक्षिण और यज्ञ रूप का विवाह कर दें तो हमारे लिए भी काम बन जाएगा । बंद तो पिता है की व्यवस्था है की बहन भाई का व्यवहार नहीं हो सकता हूँ । मैं समझता हूँ कि वह यह ग्रुप का विवाह दक्षिण से स्वीकार कर लेगा तो हारे विभाग के पूर्व उसने मुझसे पूछा था कि क्या मैं तुमसे संतान उत्पन्न करूंगा? मेरे पूछने पर उन्होंने मुझे गौशाला में पशुओं को संतान उत्पन्न करते देखने के लिए कहा था । मेरी इसमें इच्छा हो गई तो मेरा तुमसे यहाँ कर दिया गया । पिता मैंने मुझे सृष्टि रचने की महिमा का ज्ञान करा दिया और कहा कि मानव सृष्टि रचना उन्नीस करम है । फिर भी वह स्वयं तुमसे संतान उत्पन्न नहीं कर सका । उन का मेरे प्रति पुत्री का स्वभाव था । जैसे आपका दक्षिण में है व्ययभाव सब व्यस्त है । होती मौन हो गई । मैं समझ रही थी कि उसके पति का स्वभाव अपने जीवन कार्य में असफलता के कारण चिडचिडा हो गया है । चुप देख प्रजापति ने कहा तुमने व्यर्थ नहीं यज्ञ रूप को इतनी दूर वनों में भटकने के लिए भेज दिया है । मैं आशा कर रही हूँ कि यज्ञ रूप यहाँ से किसी सुंदर प्रशिक्षक लडकी से विवाह करके लौटेगा । इस प्रकार पति पत्नी में विवाद चलता रहता था । दक्षिण अभी माँ से खुश थी । मैं समझती थी कि उसको एक साथ ही मिला था परन्तु माने उसे व्यस्त में दूर भेज दिया है । भला जब ये यज्ञ रूप के साथ रहना चाहती है तो उसे क्यों पसंद नहीं । वे दोनों यही स्कूटी में रह सकते थे । एक दिन आहुति और प्रजापति वन भ्रमण सिलवटे दक्षिण कोटे में नहीं थी । दोनों चिंतित हो गए । आहुति दक्षिण को ढूंढने चल पडी । उसने देखा कि वह नदी तट के समीप एक्सपार्ट पत्थर पर बैठे हो रही थी । बस यहाँ उसके समीप जा खडी हुई और दक्षिण ने मुख् दूसरी और मोड नदी से जल लेकर धोना आरंभ कर दिया । क्या कर रही हो माने पूछता हूँ पीडा हो रही है वहाँ दक्षिण ने बिना बोले सिर को हाथ लगा दिया । चलो जन्मकुंडली में मैं तुम्हारा सिर दबा होंगी । ऍसे नहीं मिलेगी तो कैसे मिलेगी? यह के रूप से विवाह करके बहुत ही मुख् देखती रह गई । फिर कुछ विचार कर बोली पिता में उसका विभाग तुमसे पसंद नहीं करेंगे तो ना करें । मैं उनसे पूछे बिना चढा कर लूंगी । मैं तो तुमसे भी पूछने की आवश्यकता नहीं समझती है परन्तु यज्ञ रूप माने नहीं और बोले हमें अपने बडों का आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए । उससे अच्छी शिक्षा मिली है । मैं उससे प्रसन्न हूँ । बात हमें विभाग करने पर आशीर्वाद देंगी । माँ ने लडकी को रोते देखा और उसके मन में उसके प्रति दया उमर पडी । दोनों उठा अपनी खुटी की और चल पडीं । माँ ने लडकी के कंधे पर हाथ रखा तो लडकी ने दयनीय दृष्टि से हम माह की और देखा । माने खडे हो उस की अभी भी हडबडाई आंखों में देखते हुए और उसके गालों को तब तब आते हुए हैं दक्षिण भारी पीडा मिट जायेगी । लौटने दो लडकी हर्षोल्लास इत हो माँ के गले में दोनों बहेडा उनसे लिपट गई । माने उसे पीठ पर बिहार देते हुए कहा अब मतलब वो अब उसके लौटने की प्रतीक्षा करनी चाहिए । फिर भी माँ मन ही मन या अच्छा कर रही थी कि यज्ञ रूप किसी लडकी को विभाग कर साथ ही लौटे । इस प्रकार प्रतीक्षा होने लगी । अगले दिन प्रजापति लंगूरों को शिक्षा देने नहीं गया । उसे अधिक इसमें हुआ कि कोई भी उसे ढूंढता हुआ उसकी खुटी पर नहीं आया । दिन पर दिन व्यतीत होने लगे और उसके वन शिष्य उसे ऐसे भूल गए मानो उनका उन से कोई संबंध ही नहीं । लगभग एक मार्च व्यतीत हो चुका था और यह ग्रुप लौटा नहीं था । तीनो प्राणियों को चिंता होने लगी थी । कहीं कोई दुर्घटना हो गई हो, यही तीनों के मन में था । एक दिन प्रजापति ने अपनी पत्नी से कहा मैं देखना चाहता हूँ मेरे शिष्य कैसे हैं और उनको मेरा पढाया पार्ट्स करन है अथवा नहीं? क्या लाभ होगा? दैनिक देखना चाहता हूँ, बहुत ही समझी की उसके पति को उन जंतु से कुछ हो गया है । मैं बोली चलिए मैं भी साथ चलती हूँ । उन्होंने अपनी बढिया में से फल तोडे और आपने छोले में डाले और उसी स्थान को चल पडे जहाँ उसकी लंगूरों की पाठशाला लगा करती थी । आज वहाँ पहुंच प्रजापति ने अपने वहाँ पहुंचने का घोष पूर्व वक्त किया । उसने ओ हाँ का खोश कई बार क्या तुरंत उसके विस्मय का ठिकाना नहीं रहा, जब वहाँ कोई नहीं आया । वहाँ लंगूर थे, सुरक्षों पर कुछ भी कर रहे थे, परंतु वे उसके शब्द को सर्वथा विस्मरण कर चुके प्रतीत होते थे । एक लंगूर प्रजापति को बार बार घोष करते सुन एक वृक्ष की डाल से लटकता हुआ उनकी और विश्व में से देखने लगा । ऐसा प्रतीत होता था कि वह किसी बहुत दूर अथवा देर की घटी बात को स्वर्ण कर रहा है । वह डाली से खुद कूद भूमि पर आ गया और धीरे धीरे भयभीत साहब प्रजापति की और जाने लगा । प्रजापति ने पुनः ओ हाँ का घोष क्या तो वह प्रजापति के सामने आकर बैठ गया और विस्मय में इन दोनों की और देखने लगा । इसपर प्रजापति ने अपने झोले में से एक फल निकाल कर उसको दिखाया । मैं कुछ और आगे बढा और जब मैं दो पक्के अंतर पर रह गया तो एक है एक लाख का और फल को प्रजापति के हाथ से छीन कर भाग गया और उन्हें लपक कर रक्ष पर जा बैठा । वो फल को खाता रहा और इन पति पत्नी की और देखता रहा । प्रजापति विचार करने लगा । फल खाने से उसे कुछ स्मरण हो जाएगा । एक बार उसकी आंखों में एक चमक सी दिखाई दी । प्रजापति ने समझा कि उसे स्मरण आ रहा है परन्तु अगले ही क्षण में है । लगभग कर दूसरी और फिर तीसरी डाल से होता हुआ दूर चला गया । प्रजापति अपने पूर्ण प्रयास को विफल होता देख शोक ग्रस्त अपनी कुटिया की और लौट बढा होती उसके साथ थी । अब क्या करियेगा? बहुत ही ने पूछ लिया कुछ समझ में नहीं आ रहा है मेरा का हवानी अमाजी पिता है कि आसाराम कुचल देते हैं परंतु जब केरूप तो वहाँ से लौटा नहीं पर वहाँ किसी लडकी से विवाह का रह गया है । हम उसे वहाँ मिलेंगे । अच्छा सुंदर, ओजस्वी युवक है । नहीं बात मानी । कल प्रातःकाल यहाँ से चल देते हैं और दो दिन में हम वहाँ पहुंच जाएंगे और यदि जगगुरु वहाँ से इधर की और चल पडा तो वो तो मार्ग में मिल जाएगा । हम उसी मार्ग से चलेंगे । कुमार हमने उसको बताया था परन्तु यहाँ कुटीर में हमने कई सुख सुविधा के साधन बना लिए हैं । यहाँ उससे बनाने का भी तो प्रबंध किया है । हाँ, परन्तु क्या जाने पितान है कि आश्रम में इससे कहीं अधिक वस्तुओं का अविष्कार हो चुका हूँ । नहीं हुआ हो तो हम उनको इन सब वस्तुओं के बनाने का ठंड बताएंगे । मैं समझती हूँ कि वहाँ के वासी इन वन जंतुओं से अधिक सरलता से सीख सकेंगे । निराश और उदासीन प्रजापति पत्नी की बात को मान गया । उसने कहा अच्छा चल चल देंगे । इस प्रकार की योजनाओं को बनाते हुए वे अपनी कुटिया में पहुंचे । कुटिया का द्वार खुला था । वह सैदेव के विपरीत था । आहुती ने कोटिया में झांककर देखा तो वहाँ का सामान अस्त व्यस्त हो रहा था । एक श्वान भीतर खडा खाने के पदार्थों को चाह रहा था । बहुत ही निस्वान को हराया और विचार करने लगी । दक्षिण ऐसे खुला क्यों छोड गई है? गुडिया के दो बात थे दोनों भागों के बीच पर दावा था, बहुत ही ने उस भाग में झांक कर देखा तो भी खाली था । एक बात उसे और पता चली है । दक्षिण ने अपने पहनने के लिए एक नवीन उत्तरीय बनाया था । वह कुटिया की दीवार पर खून पी से लटका रहता था । वहाँ नहीं था चिन्ताग्रस्त आहुति भागी हुई नदी तट पर गई । दक्षिण अपना बहुत सारे समय वहाँ व्यतीत किया करती थी । आज मैं वहाँ भी नहीं मिली । ताऊ जी ने लौटकर पति को बताया नहीं मिली । मैं समझता हूँ कि जब ग्रुप आया है और उसको अपने साथ अपने पालक के आश्रम में ले गया है, ऐसे कहते हैं ये देखो उसने भूमि के और संकेत क्या? आहुती ने ध्यान से भूमि की और देखा । उसे किसी स्त्री के पदचिन्हों के साथ साथ बडे बडे पुरुष के पश्चिम न दिखाई दिए । पुरूष यहाँ आया प्रतीत होता है नहीं, आपके पश्चिम तो नहीं । पति ने पुनः उन चिन्हों की और देखा । उसने अपने भावों को भी देखा तो अंतर कहा मेरी पगचिह्नों से ये बडे प्रतीत होते हैं । मैं उठा और उन पदचिन्हों के समीप भूमि पर अपने पांव का चिन्ह बना । पत्नी को बताने लगा ये पश्चिम ना मेरे पच्चीस से बडे हैं । यह तो स्पष्ट है कि कोई पुरूष यहाँ आया है, नंबर है, यज्ञ रूप ही हूँ परन्तु चले किधर गए हैं । मैंने तो उसका उस से विभाग कर देने की बात स्वीकार कर ली थी । ऐसा प्रतीत होता है कि उसे तुम्हारे कथन का विश्वास नहीं हुआ और वह यह ग्रुप के साथ भाग गई है । संभावना को सुनकर भी आहुति की चिंता नहीं मिलते । प्राप्ति के संभव भूमि पर ही बैठ गई । प्रजापति ने कुछ विचार करता था । इसमें भी वही कुछ किया है जो मेरे शिष्य वन जंतुओं ने किया है । दोनों में क्या समानता देखी है आपने यही की अवसर मिलते ही इतने वर्ष के सहयोग को विस्मरण कर नई बात के पीछे चलती है । बहुत ही को ये तुलना ठीक प्रतीत नहीं हुई । उसने कहा, वहाँ हम को विस्मृत कर गई है अथवा उसे अभी भी हम स्मरण है । हम कह नहीं सकते वन जंतुओं का । आपको आपके शब्द को और आपके फलों के स्वाद को भी विस्मरण कर देना तो सिद्ध हो ही चुका है । उसे हमें बताकर तो जाना चाहिए था । आहुती समझ रही थी कि उसका पति युक्तियुक्त बात नहीं कर रहा । इस कारण उसने बात बदलकर कहा, क्या करेगा, समझ में नहीं आ रहा । हमें पता है कि आश्रम को लौट चलना चाहिए । निराश चित्र कहाँ जाने को नहीं करता । वहाँ का जीवन सर्वथा नीरस है । अभी तो वहीं चलना चाहिए । वहाँ की नी रस्ता अखरने लगेगी तो वहाँ से चल देंगे । आखिर वहाँ किसी को बंदी बनाकर नहीं रखा जाता तो दल चलेंगे उस दिन जब दक्षिण के माता पिता को नहीं वन जंतुओं से मिलने गए । दक्षिण के मन में विचार पिता के मन में तुम हर शिक्षक होने का मोजाक पडा है । इससे वह अपने को उन्हें अकेला अकेला अनुभव करने लगी थी । वह भी उठ अपने मनोरंजन के स्थान नदी तक जा पहुंची । वहाँ है । वन जंतुओं को जलपान करते देख चित्र को बहलाया करती थी । उसे वहाँ बैठे अभी एक घडी भी नहीं हुई थी । किसी ने पीछे से आकर अपने हाथों से उसकी आंखें बंद कर दी । कौन होता हूं दक्षिण में उसका हाथ पकड आंखों से हटाने का? यत्न किया । परंतु एक वरिष्ठ पुरुष के हाथों को वह हटाना गई । एक का एक उसको विचार आया । इस वन में उसके माता पिता की अतिरिक्त अन्य कोई मानव नहीं रहता और उसके पिता उससे इस प्रकार का कलोल नहीं करेंगे तभी है । अवश्य जग्य रूप होगा । इतना विचार कर उसने कहा आप यज्ञ हैं, आंखों पर से हाथ हट गया और ये ग्रुप में उसके समीप बैठ कर रहा । मैं लौट आया हूँ । क्या कहा है पिता मैंने उन्होंने मुझे वहाँ कई कुमारियां दिखाई हैं और उनसे विवाह करने को कहा है और मुझे तुम्हारे लिए वह व्यवस्था है कि तुम वहाँ चली जाओ और तुम्हारे लिए वार वहाँ नहीं जाएगा तो तो हराम उससे विवाह नहीं हो सकता । हो सकता है कैसे वहाँ से अपने माता पिता को बताए बिना रिश्ता चल दो । शमी थी एक अन्य आश्रम है । वहाँ का प्रजापति दो पत्नियों के साथ रहता है । एक घटना वर्ष । वह मुझे मार्क में मिल गया । में नदी के किनारे किनारे इस आश्रम को लौट रहा था । मुझे नदी में एक पुरुष दो स्त्रियों के साथ जलविहार करता दिखाई दिया । वे भारती भारती के परस्पर कलोल कर रहे थे । मुझे उनका विहार बहुत ही मनोरंजक और लो भाई मान प्रतीत हुआ । मैं तक पर खडा उनको खेलते हस्ते देखता रह गया जब उन्होंने मुझे देखा । दोनों स्त्रियाँ कमर तक चल में बैठ गई और पुरुष नदी से निकलकर मेरी और आने लगा । मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि वहाँ से लडने के लिए आ रहा है । स्त्रियाँ भी सर्वथा नग्न थी और पुरुष थी । मैं अपना उत्तरीय पहले था । मैं जल्द से निकल मेरे सम्मुख खडा हुआ । मैं सतर्क और लडने को तैयार खडा हो गया । फिर दोनों हाथों की मुठ्ठी बन गई । उसने पूछा यहाँ क्यों खडे हो? मैंने कहा आपको खेलते देखने निश्चित नहीं भी खेलने की इच्छा उत्पन्न हो । ठीक है हूँ । अभी अपनी पत्नी को यहाँ गया हूँ । अब काम भी हमारी भारतीय मनोरंजन कर सकते हो परन्तु मेरी पत्नी नहीं है । उसने हाथ के संकेत से पिता नहीं के आश्रम का मार्ग बता कर कहा उधर एक आश्रम है वहाँ कई अविवाहित स्त्रियां हैं । एक से अथवा दो तीन से व्यवहार कर के आ जाओ और हम भी हमारे खेल में सम्मिलित हो सकते हो । मैं बस पडा फसकर मैंने कहा मैं वहीं से आ रहा हूँ । पिता मैंने कहा है कि मैं इन युवतियों में से एक से विवाह का लोग तुरंत मुझे उनमें से कोई पसंद नहीं आई । कुछ तो उनमें बहुत सुंदर है परंतु मैं उन सबसे अधिक एक सुंदरी को जानता हूँ । मैं उससे विवाह करना चाहता हूँ । पिता मैंने व्यवस्था दे दी है कि मैं उस लडकी से व्यवहार नहीं कर सकता तो इसलिए उसकी माँ कहती है कि वह मेरी बहन है ये तो हम सब हैं । इन दोनों में से मेरी एक बहन है छत्तीस कौन उसने गौरवर्ण हिस्ट्री के और संकेत कर रहा हूँ । हम दोनों के पिता व्यवस् वक्त है और हम एक माता पिता की संतान है परन्तु मैं पहली पारी में उत्पन्न नहीं हूँ । तब क्या हुआ? सब हाँ प्रकृति की संतान है । सब बहन भाई है । कभी कभी पिता होते हैं नहीं के पिता मन्वंतर के मनो भगवान है परंतु माँ सब की पाँच बहुत एक प्रकृति है परन्तु लडकी की मां पसंद नहीं करेंगे । वह पिता में है कि आश्रम में पडे हुए हैं तुम किसके पत्र हो? माता आहुति के मेरे पिता प्रजापति रूचि कहे जाते हैं परन्तु मैं बाल्यकाल से पिता व्यवस्थागत के आश्रम में रहा हूँ । कुछ दिन हुए मैं अपने जन्मदाता माता पिता से मिलने आया तो वह लडकी जिसका नाम दक्षिण है मिल गई । नौ से प्रेम करने लगा हूँ । पहुंचने की बारी उस पुरुष की थी । उसने कहा मैं दक्षिण और तुम्हारी खता जानता हूँ । तुम लडकी को माता पिता के घर से बडा लाओ और यहाँ आ जाओ । मैं एक ही बात वर्जित मानता हूँ । है किसी दूसरे की विवाहिता को अपनी पत्नी बनाना । किसी भी अविवाहित से विवाह करने में पानी नहीं है । मैं यहाँ अपनी पत्नी को लेता हूँ । हाँ और हमारे सामान कुटी बनाकर रहो । दक्षिण मैं यहाँ आ गया हूँ, चलो चलते हैं । दक्षिण ने कहा अब मेरी माता जी भी कहती थी मेरा विवाह आपसे कर देंगे । परन्तु जब भी सुनेंगी कि पिता नहीं की व्यवस्था हमारे विभाग के विपरीत है और वह बदल भी सकती है तो बिना बताए कोटियां को बहुत चलें नहीं नहीं है । वह पिताजी के साथ वन जंतुओं को पढाने गई है । जब ग्रुप फस पडा हसते हुए उसने कहा एन जडबुद्धि जंतुओं को पढाते पढाते ना उनकी बुद्धि भी हो गई है । इस कारण मैं समझता हूँ कि उनसे हमें विवाह करने की स्वीकृति नहीं मिलेगी हूँ । अच्छा ने उत्सुकता से पूछा । उनके लौटने से पूर्व चल दो, शीघ्रता करूँ । लौट आए तो कठिन हो जाएगा । दक्षिण उठी और बोली मैं छोटी से अपनी एक दो वस्तुएं लेना चाहती हूँ । उन लोग दोनों को टीम में पहुंचे । वहाँ दक्षिण ने अपना नवीन उत्तरीय ले लिया और एक लंबी सी बनी वस्तु उठा ली और बोली चलिए ये क्या है? बच्चा मुस्कराई और गर्वपूर्वक उसे मुख्य लगा । उसमें फूंक मारने लगी । इस पर उसमें जिसपर निकला तीन विश्व में लग के रूप में कहा ये तो बोलता है । हाँ, दक्षिण ने अब उसके चंद्र पर उंगली लगा दिया और बदल गया । उसने दूसरे चंद्र पर आपने उंगली रखी तो दूसरा स्वर हो गया । अब दक्षिण ने तीसरे चंद्र पर तीसरी उंगली रखी तो स्वर्ण और अच्छा हो गया । दक्षिण अंगुलियां बदल बदलकर भिन्न भिन्न स्वरों के सहयोग पैदा करने लगी । जब ग्रुप को बहुत भला प्रतीत हुआ, पूछ लिया कि कैसे बनाया है । अब चलो अब नए आश्रम में चलकर बताउंगी । वो दोनों चलती है । जाते समय वेत्री जल्दी में थे । द्वार बंद करना भूल गए हो क्या को तो द्वार खुला होने के कारण एक कुत्ते ने अस्त व्यस्त कर दिया था । कुटिया में कुछ कंदमूल अग्नि पर पटाने का प्रबंध था । उन पके हुए कंधे की सुगंध से आकर्षित वैश्वानर वहाँ आया और मन भर कर खाकर और वस्तुओं को उथलपुथल करता रहा था । अब प्रजापति रूचि और आहुति अपनी कुटिया में आए । उन्होंने कुछ ठीक व्यवस्था देख अनुमान लगाया । यज्ञ रूप दक्षिण को लेकर अपने पालन करने वाले पिता के पास चला गया है । इससे भी बहुत ही खेलते थे । उस रात कुट्टी में रहे और कराता हूँ अपनी एक दो प्रिय वस्तुओं को लेकर पितान है । क्या आश्रम को चल रही है? वहाँ जाने के दो मार्ग थे । एक वन में होता हुआ वो हमारे दुस्तर परन्तु समीर का था । दूसरा मार नदी के तट के साथ साथ होते हुए नदी का बहाव के आ नहीं रहा था । इस कारण यह मार्ग लम्बा था । यद्यपि सुगम था । वे शीघ्रातिशीघ्र पिता में है कि आश्रम में पहुंचना चाहते थे । इस कारण वे वन के मार्ग से ही गए हो हूँ हूँ आपने सुना साहित्यकार गुरुदत् प्रतिनिधि रचना प्रभात बेला का प्रथम पर हूँ ।

द्वितीय परिच्छेद

द्वितीय परिचय उक्त घटना के पच्चीस वर्ष उपरांत की बात है । पिता मैं आश्रम एक नगर में परिवर्तित हो चुका था । आसाराम के चार और का वन काटकर नगर के लिए स्थान बनाया गया था । नगर की जनसंख्या कई सहस्त्र हो चुकी थी । इसमें अधिकांश युवक युवतियां और बाल बच्चे ही थे । प्रौढावस्था के लोग उंगलियों पर भी नहीं जा सकते हैं । पितान है की कुटिया के स्थान पर एक पक्का भवन बना था । भवन की डैडी पर सेवक खडा रहता था । अब बिना सूचना के भवन के भीतर कोई नहीं जा सकता था । भवन के बाहर चालीस पचास पकड के अंदर एक विशाल चबूतरा था । उस पर यज्ञशाला थी । निशाना पर छत बनी थी । वैसे वह चारों ओर से खुली थी । छत सुदृड विंडो के संभव पर टिकी थी । यज्ञशाला के चारों और एक विस्तृत खुला मैदान था जिसपर कोमल खास लगी थी । इस मैदान के उस और जिधर पितान है का आवाज किया था । महर्षियों के लिए बने हुए थे । अब इन महर्षियों के साथ बीस के लगभग ऋषि पदवी के व्यक्ति भी थी और उनके भवन आश्रम के बाहर बने नगर में थे । यह बुद्धि और विकास दो कारणों से हुआ । महर्षि अंगिरा ने अग्नि की सहायता से नए नए पदार्थ निर्माण करने आरंभ कर दिए थे । महर्षि जी अग्नि का प्रभाव भिन्न भिन्न पदार्थों पर देखते थे । इन परीक्षणों में उन्नति का एक दूसरा साधन मिल गया परन्तु एक ऐसा पत्थर मिला था तीव्र अग्नि में तपाने पर चलकर अति कट हो परंतु रात वध्य पदार्थ में परिवर्तित हो जाता था । यह लोगो धातु थीं । इस पर और अधिक परीक्षण किए गए है । देखा गया इस को और कठोर किया जा सकता है । इसके लिए अग्नि के तीव्रता आप की आवश्यकता नहीं तो अग्नि को हवा देने का प्रबंध किया गया । इस प्रकार लोग और बनाने और इसे सुधार कर इसे अति कठोर बनाने का ढंग पता चल गया । इन दो अविष्कारों ने आश्रम की कायापलट दी और आश्रम के चारों और नगर बन गया । जिस दिन आश्रम पर प्रथम मानव आक्रमण हुआ था । पिता मैंने ऋषियों को अपनी कुटिया में एक गोष्ठी बुलाई थी और उनको दो बातें कही थी । एक थी वेद ज्ञान को लिपिबद्ध करने की और दूसरी थी वन पशुओं और वन में रहने वाले असब प्राणियों से आश्रम की रक्षा का प्रबंध करना । इन दो प्रकार के चिंतन की दिशा से प्रगति चल पडी थी । इसमें वे स्त्रियां सहायक हो गई जो वन चरों के गोल को छोडकर आश्रम में रहने की लालसा करने लगी थी, उनमें प्रायोग तियां थी और वे आश्रमवासियों की भार्या बन गई । आश्रम में महर्षियों के अतिरिक्त कुछ लोग भी थे तो वानी तो सीख गए परंतु बुद्धि के प्रयोग से अधिक हाथों का प्रयोग करने में प्रसन्नता अनुभव करते थे । वे लोग आश्रम की सेवाओं में संलग्न रहते थे और जब आश्रम में स्त्रियों का बाहुल्य हुआ तो वही लोगों ने सर्वप्रथम गृहस्थजीवन चलाने का यत्न किया । उन स्त्रियों को आश्रम में आये कुछ दिन ही हुए थे कि विश्वपति उनकी देखरेख के लिए नियुक्त हुआ था । पिताजी के पास एक युवती को लेकर आया और उससे विवाह करने की स्वीकृति मांगने लगा । सहयोगी पहले भी एक बच्चे की माँ और अपने बच्चे के पिता को छोड आश्रम में रहने रही थी । पिता मैंने उस स्थिति से पूछा, पैसे भी कुछ कुछ वानी के शब्द सीख गई थी, स्त्री नहीं, पिता है की प्रश्न का उत्तर खाने दिया तो वहाँ हो गया और फिर अन्य स्त्रियां भी धीरे धीरे अपने पति पा रहीं । इसके साथ ही वनचारी जिन्होंने आश्रम पर आक्रमण किया था और आश्रम पक्ष की विजय के उपरांत पिता मेरे द्वारा आश्रम के बाहर फेंक दिए गए थे । उस समय तो भयभीत हूँ । चारों और वन में भाग गए थे तो कुछ दिन पपरा उन्हें एकत्रित हो रात के समय आश्रम की बाढ ध्यान कर रहे हैं । भीतर उस स्थान पर जा पहुंचे जहां उनका स्त्री वार्ड सोया करता था । जब भी अपनी स्त्रियों को पकड पकडकर भागने लगे, स्त्रियों ने चीखपुकार करनी आरंभ कर दी । इसपर पितान है और आश्रम के अन्य प्राणी जहाँ पडेगी अग्नि प्रदीप्त कर दी गई और वन चरों के हाथ से स्त्रियों को छुडाया गया वन चरों को बंदी बना लिया गया । अगले दिन प्रातः कार की जगह तो प्राण उन बन्दियों को पिता में है कि समूह प्रस्तुत किया गया । पुरुष संकेतों से बताते थे कि वे अपनी स्त्रियों को लेने आए हैं । पिता है का प्रश्न था कि वेस्ट प्रिया उनकी किस प्रकार अधिकार से हैं । वनचर पिता है कि वानी और नियुक्ति को समझ नहीं सके वे किस तरी को वेदवाणी अपनी साठ दिनों से अधिक समझने लगी थी । बुलाया गया और उसको पता मैंने अपनी बात बताने का यत्न किया । जब इस्त्री समझ गई तो उसने बंदियों में से एक को पिता नहीं की बात समझाई । वन चरों का उत्तर था कि वे स्त्रियां उनके पास थी, कुछ उन की लडकियाँ हैं । अतः उनके स्वामी है वे उनको मिल जानी चाहिए । पिता मैंने वो सब द्विभाषीय स्त्री से कहा कि वह उन को समझाएँ । ये पत्थर के टुकडे और एक स्त्री में अंतर है । एक इच्छा नहीं तो दूसरे में इच्छा है अच्छा वे स्त्रियां जब तक उनके साथ रहे की इच्छा नहीं करती, उनकी नहीं हो सकती । वन चरों के नेता ने कहा हमारे सामने उन स्त्रियों से पूछा जाए, ये उनके पास रहना चाहती हैं नहीं अगर सब स्त्रियाँ और बच्चे बुलाए गए । उनसे पूछा गया कि वे इन लोगों के साथ रहना चाहते हैं अथवा आश्रम में? उन्होंने आश्रम में रहने की इच्छा व्यक्त की । पिता मैंने द्विभाषियों इस तरी से पूछा ये सब की सब इनके साथ जाना क्यों नहीं चाहती हूँ? बच्चे भी तो आपने कभी ले में जाना नहीं चाहते । उस स्त्री ने बताया कि लोग अतिक्रूर हैं । ये भोजन का अभाव होने पर अपने ही गोल के दुर्बल घटकों को मारकर खा जाते हैं । पैसे स्त्रियाँ कबीले की सांझी संपत्ति हैं और सब उन का प्रयोग करते हैं । मिस्त्री के पेट में बच्चा होता है । अभी उसे पुरुष योगी सेवा से मुक्ति मिलती है । पिता महीने व्यवस्था दे दी । जो स्त्री स्वेच्छा से उन के साथ जाना चाहे जा सकती है अथवा जो स्त्रियाँ अपने पुरुष को अपने पास रखना चाहेंगे यहाँ आश्रम में रख सकती हैं परन्तु यहाँ रहने वाले को आश्रम की व्यवस्था का मान करना पडेगा । स्त्री तो कोई भी उनके साथ जाने को तैयार नहीं हुई । हाँ, दो पुरुष अपनी स्त्रियों के पास रहने के लिए तैयार हुए और उनकी पत्नियों ने उनको अपने साथ आश्रम में रखना स्वीकार कर लिया । इसके उपरांत भी समय समय पर वनचर आश्रम पर छात्र डालते रहे । एक बार एक स्त्री का अपहरण भी किया गया और दो दिनोपरांत उसका आधा खाया मृत शव वन में पडा मिला । इस बात से आश्रमवासियों को अपनी रक्षा के लिए साधन निर्माण करने का विचार करना पडा । संसाधनों के निर्माण ने लाठियों कदम पर बहनों और अन्य अस्त्र शस्त्रों का अविष्कार हुआ । काम है कि भवन के बाहर यज्ञशाला में नित्यप्रति दो बार यज्ञ होता था और नित्य सांयकाल के समय जग्गी के उपरांत प्रवचन होता था । ऍम को श्रवण करने वालों की संख्या पडने लगी थी । कभी कभी कोई मनुष्य कहीं बाहर से भी आ जाता था । इस से ये अनुमान लगाया जा रहा था की कुछ अन्य भूभागों पर भी मैथुनी मानवीय सृष्टि हुई है । जो भी मनुष्य हाँ आता था वाणिज्यिककर वहीं रहने लगता था । इस प्रकार जनसंख्या बढ रही थी और धीरे धीरे आश्रम नगर का रूप ले रहा था । इस बडी हुई जनसंख्या के लिए खाने पीने का प्रबंध भी होने लगा था । बहुत से फलों के उद्यान बना लिए गए थे । साथ ही अन्य भी उत्पन्न होने लगा था हूँ । ठीक था श्रीनगर में सुविधाएँ उपलब्ध थी और वन के हिंसक पशुओं से तथा वनचर मानवों से रक्षा भी सुगम थी । पिता में है कि प्रवचनों से लोग परस्पर सहयोग और सहकारिता का आचरण स्वीकार कर रहे थे । फिर भी दिन प्रतिदिन जीवन संघर्ष कठोर होता जाता था । दिन प्रतिदिन अधिकाधिक परिश्रम करना पड रहा था । ये स्थिति थी जब का ये है ब्रितानी लिखा जा रहा है । महर्षि मरीचि के साथ छह अन्य ऋषि कार्य कर रहे थे तो नगर के रहने वालों की व्यवस्था चलाते थे । ये सब के साथ मरीची के शिष्य भी थे । मिलने से एक था जो वाणी की शिक्षा नगर के बालक बालिकाओं को देता था । अब वाणी शिक्षा के अंतर्गत ही लिपि की शिक्षा भी दी जाती थी और सब वाणी जानने वाले वाणी लिखते भी थे । एक ऋषि भोजन की व्यवस्था पर विचार करता था । वह नए फलोद्यान लगता था और अधिक तथा स्वादिष्ट फलों की उपज का प्रबंध कर रहा था । अन्य की उपज भी की जा रही थी और अन्य की अग्नि में भुनकर नागरिकों को उपलब्ध कराया जा रहा था । महर्षि मरीचि के अधीन कृषि वस्तुओं का प्रबंध कर रहा था । अब खालों के स्थान पर बच्चों की छालों से तंतु निर्माण होने लगे थे और इन तंतुओं को बोलने का ठंग आवश्यक रित हो चुका था । एक दिन महर्षि मरीचि एक नागरिक को लेकर पिता नहीं के पास उपस् थित हुए कितान है की उसे वहाँ लाने का कारण पूछने पर महर्षि ने बताया इस व्यक्ति के घर में तीन प्राणी है ये है उसकी पत्नी और स्टेट बच्चा है । ये सात आठ साल का प्रतीत होता है परंतु उसके घर में कंदमूल, सुखा, सुखा कारण ढेरों के ढेर लगे पडे हैं उसका क्या किया जाए । पिता महीने उस व्यक्ति से पूछा क्या नाम है उपदेश जितना महर्षि बता रहे हैं क्या इतना तुम्हारे घर में है तो भवन है कहाँ से आया है? मैं और मेरी पत्नी नियम से नित्य उद्यान में जाते हैं और वहाँ से कंदमूल जितने हम उठा सकते हैं, ले आते हैं । हम सब खा नहीं सकते । कंदमूल को सुखाकर सुरक्षित करने का ढंग मैंने सीख लिया है । यह महर्षि अंगीरा ने मुझे सिखाया है । मैंने सुखाने का चूडा घर पर तैयार किया है । उसमें अगली जला दी जाती है और उसके चारों और भट्टी की गुफा बनी है । उसमें हम सुखाने वाली वस्तु रख देते हैं । वह सामान्य ऊष्मा होने के कारण चलती नहीं परंतु हुए हैं, सूख जाती है । जब मैं सर्वथा सूख जाती है तो उस को ऐसे स्थान पर रखता हूँ जहाँ नेतृत्व पाती है । हम नीति ऐसा करते हैं । हमारे खाने से या बहुत अधिक होती है है । हम एकत्र कर रहे हैं इसलिए एकत्र कर रहे हो । वर्षा ऋतू में कंदमूल नीरस हो जाते हैं और हम उस समय इसका प्रयोग करेंगे । महर्षि मरीचि ने कहा परंतु तुम्हारे पास इतना है कि तुम्हारा पूर्ण परिवार वर्ष भर में उसे समाप्त नहीं कर सकेगा । पिता मैंने पूछा होता हूँ उसका क्या करोगे? पिता मैं मुस्कुरा रहे थे । इससे उत्साहित उप देव ने कहा भगवान जिस किसी को भी आवश्यकता होगी उसे दे दूंगा । बिना प्रतिकार में कुछ लिए नहीं । भगवान मैं और मेरी पत्नी ने परिश्रम किया है । इस कारण इस परिश्रम का प्रतिकार ले लूंगा । हो गई इस समय नहीं बता सकता । उस समय अपने सुख के लिए कुछ भी ले सकता हूँ । उदाहरण के रूप में महर्षि के सुपुत्र कश्यप हैं पे बने हुए बंद खाने में बहुत रुचि रखते हैं । जब खाने के लिए मांगेंगे तो मैं उनसे अपने पुत्र के लिए सुंदर अक्षरों में मंत्रों की प्रतिलिपि मांगा । इस प्रकार महार्षि कुलहा को यदि वे रस्में कंधे खाने होंगे तो मेरी पत्नी के लिए सुंदर उत्तरीय देंगे । पिता में है । उस देव की बात सुनकर गंभीर विचार में मग्न हो गए । कुछ विचार कर खिलखिलाकर हंस पडे और बोले महर्षि मरीचि, अब बताओ तुम क्या चाहते हो? कितना इसमें कौन सपात किया है जिसे बंदी बना कर लाए हो? प्रताम है मशीने समझाने का यह क्या ये फल सबकी सांझी संपत्ति है । इसमें उन को अपने अधिकार में लेकर चोरी की है । ऐसे ही पिता मैंने समझाया जैसे नदी का जल अथवा भूमि सबकी सांझी संपत्ति है । जब तक किसी दूसरे को जल भरने अथवा भूमि का प्रयोग करने में कोई बाधा नहीं डाल सकता, तब तक ये अपने परिश्रम से जितना भी ले ले, ये चोरी किस प्रकार हो गई? मारी चीज युक्ति को समझने के लिए पितान है का मुख देखता रह गया । पिता मैंने देखा कि महर्षि समझी नहीं । इस कारण बात को स्पष्ट करने के लिए उन्होंने कहा मान लो की नदी सूख जाए और उसमें जल इतना कम रह जाए कि सबके पीने योग्य ना रहे हैं । जल भरने को नियंत्रण में करना पडेगा परन्तु जब तक जल का प्रवाह था है अब नियंत्रन होगा और अनाधिकार भी यहां की भूमि उर्वरा है । एक वृक्ष से बीस बीस परिवारों का भोजन उत्पन्न होता है । जब तक ये आवश्यकता से अधिक उपज रहा है तब तक नियंत्रन व्यस्त है और उसका यहाँ से उठा लाना चोरी नहीं । इसमें और उसकी पत्नी ने परिश्रम किया है और फलों को तथा कंदमूल को बीनकर और उठाकर घर लाए हैं । वहाँ उन्होंने और अधिक परिश्रम किया । उन्होंने उनको भुनकर सुरक्षित क्या है यदि अब किसी प्रकार से उस परिश्रम का प्रतिकार चाहते हैं । पि ऍफ अपराध है । वाणिज्य समझ गए ये उपदेवता थलों का मूल्य नहीं ले रहा है परन्तु अपने परिश्रम का प्रतिकार लेना चाहता है । महर्षि ने समस्या का एक अन्य पक्ष बताया । इसके भुने कंधे अति स्वादिष्ट होते हैं और लोग इसको कुछ भी देने को तत्पर हैं । यदि इसकी भुने काम नहीं आती स्वादिष्ट हैं तो क्या वह इसका दोष है और कोई अन्य भी तो महर्षि अंगीरस से सीखकर वैसे ही कंधे एकत्र कर सकता है । मवेशी निरुत्तर हो गए । इस कारण अब उसने व्यवस्था की बात की कहाँ भगवन इससे नगर में अव्यवस्था उत्पन्न हो जाएगी । इस वर्षा ऋतू में यह अपने कंदमूल लोगों को किसी उपयोगी वस्तु के नहीं देगा । अगले वर्ष पूर्ण नगर ही यह व्यवसाय करने लगेगा और तब बहुत से फल व्यस्त हो जाएंगे । जब बहुत से लोग यह कार्य करने लगेंगे तो इनकी कंदमूल की मांग कम हो जाएगी । तब अगले बारिश वह काम संचय करेगा अन्यथा इसका परिश्रम व्यर्थ जाएगा । देखो महार्षि समस्या ये नहीं कि जो तुम प्रकट कर रहे हो । समस्या यह है कि वह भुने गंद खाने में हानिकर तो नहीं । मैं समझता हूँ कि अतरजी से वे कहो कि इसके कंदमूल की परीक्षा की जांच हो, पर निश्चित किया जाए ये स्वास्थ्य की दृष्टि से हानिकर तो नहीं उपदेवता तो महर्षि अच्छी के पास चले जाओ और आपने भुने पदार्थों की परीक्षा करवा हो । यदि वे स्वास्थ्य के लिए हानि करना हुए तो तुम यह व्यवसाय करने में स्वतंत्र हो । देखने पितान हैं को प्रणाम किया और अत्रिजी के द्वार पर जब बच्चा जब उप देव चला गया तो मशीने पिता नहीं ऐसे कहा आपकी व्यवस्था को मैं हानिकर सिद्ध नहीं कर सकता परन्तु मुझे इस व्यवहार के गर्व में लोग मुझ हत्यादि दुर्गुण छुपे हुए दिखाई देते हैं । महर्षि तो में लोग मुकाम और क्रोध इस व्यवहार के कारण नहीं दिखाई देते है परन्तु आलस्य, प्रमाद और निष्क्रियता में छिपे प्रतीत होते हैं । परिश्रम करके उसका प्रतिकार पाना पाप नहीं परन्तु आप ये है होगा । कुछ लोग बिना प्रतिकार दिए इसके परिश्रम का फल भोगने की इच्छा करेंगे । वे स्वादिष्ट पदार्थों को खाने की कामना करेंगे । उस कामना की पूर्ति में उनको कुछ प्रतिकार में देना होगा । सबके पास प्रतिकार में देने को होगा । नहीं । वो लोग कामना से पीडित । इसका परिश्रम इससे लूट लेना चाहेंगे । इसको परिश्रम करने से मना करने की आवश्यकता तब होगी । महर्षि यात्री इनका खाना हानिकर बताएंगे अन्यथा इसे परिश्रम करने से रोकना पाप हो जाएगा । रोकने की आवश्यकता उनकी होगी जो इसके परिश्रम का मूल्य तो दे नहीं सकेंगे । फिर भी इसके परिश्रम के फल को प्राप्त करना चाहेंगे तथा मैं समझता हूँ कि समस्या ये है कि काम आ बिभूति को धर्म पर आरूढ रखा जाए । भगवन मैं इस लोग को ही रोकने की आवश्यकता समझता हूँ । यह लोग नहीं है की जान उपकारी परिश्रम करने की प्रवृत्ति है । इसे प्रोत्साहन मिलना चाहिए । महर्षि को देव की सूचना उनके एकमात्र पुत्र महाशीर कश्यप ने दी थी । उसे इसके बने हुए कंधे अति स्वादिष्ट लगे थे परन्तु जब उसने कुछ खाने को मांगे तो देव ने कह दिया कि वेदमंत्रों के प्रति लिखित पृष्ठ के लिए मैं एक मुट्ठी भर काम देगा । कश्यप समझता था कि जैसे बच्चे कंदमूल बिना कुछ लिए दिए मिल जाते हैं वैसे ही ये भी मिल जाना चाहिए था । उसने अपने पिता महर्षि मरीचि से उप देव की बात बता दी । प्रश्य भाषा कर रहा था । सुखदेव के सब संकुचित कंधे छीन कारण लोगों में बांट दिए जाएंगे और वह पिता के पिता नाम है कि पांच से लौटने की प्रतीक्षा कर रहा था । मरीची देव को महर्षि अत्रि के पास पे स्वयं अपने आवास पर पहुंचा तो कश्यप ने उत्सुकताओं से पूछा देव का क्या हुआ है? यह व्यवस्था हुई है कि महर्षि अत्रि यह बताएं कि उनके भूने कंदमूल स्वास्थ्य के विचार से कैसे हैं । यदि वे स्वास्थ्य के लिए हानिकर हुए तो ये सब के सब नदी में बहा दिए जाएं अन्यथा उसके कार्य में किसी प्रकार का दोष नहीं है । ऍम रह गया, बनाया उसके मुख से निकल गया था । जी, आपने पितान हैं को भलीभांति समझाया नहीं । जो तुमने मुझे बताया था, वह सब मैंने पिता नहीं ऐसे कहा और स्वयं ही एक आपकी नियुक्ति की । परन्तु मेरा समाधान हो गया है कि उसने कोई अपराध नहीं किया । पिता मैंने कहा है किसी को जनोपयोगी परिश्रम करने से रोका नहीं जा सकता । यदि महर्षि अपनी नहीं ये व्यवस्था दी कि वे अपनी भुने कंदमूल हानिकर नहीं और भोजन का स्थानापन्न हो सकते हैं, तब देव को यह कार्य करने से रोक नाम होगा । साथ ही जो परिश्रम करता है भी है, उसका प्रतिकार पाने का अधिकारी है । परंतु पिताजी अर्थव्यवस्था नहीं । यह एक दूषित कार्य होगा । इसका परिणाम यह होगा उसके स्वादिष्ट कंदमूल की माँग नगर में बढेगी । लोग इन को प्राप्त करने के लिए उप देव को उसकी मांग के अनुसार प्रतिकार देंगे । इस वर्ष उनके पास अमूल्य वस्तुओं का विस्तृत भंडार हो जाएगा, तब है । इन वस्तुओं के प्रतिकार में अन्य मूल्यवान वस्तुएं मांगेगा । उसमें उत्तरोत्तर लोग बढेगा और लोगों में हीन भावना आएगी तथा नगर की शांति भी भंग हो सकती है । देखो कश्यप तुम्हारी नियुक्ति में एक बहुत बडा चित्र है । पिता मैंने कहा कि उसे परिश्रम करने से मना नहीं किया जा सकता है । उसे अपने लिए परिश्रम का प्रतिकार पानी से मना नहीं किया जा सकता । रही बात उसके समृद्ध हो जाने की और लोगों के उस द्वारा निर्मित कंदमूल की मांग बढ जाने की इसका हुवा ये नहीं है । उस पर प्रतिबंध लगाए जाएं पर लोगों में काम को शांत किया जाए । कुछ अन्य लोग उसको फलता फूलता देख स्वयं ऐसा व्यवसाय करने लगेंगे । ये भी संभव है कि घर घर में उस जैसे पकाने वाले चूल्हे बन जाएंगे और लोग घर पर ही वैसे कंदमूल तैयार करने लगेंगे । तब उसकी समृद्धि पर स्वाभाविक सीमा लग जाएगी । परन्तु पिताजी इससे जनसंसाधन के स्वभाव में परिवर्तन होगा और इस प्राप्ति की इच्छा में वृद्धि होगी । इससे कामनाएँ बढेगी और लोग आपका मार ग्रहण करने लगेंगे । उत्तर कि सब कुछ संभव है, परंतु क्यों कि जनसाधारण में ऐसे मूर्ख हैं जो अपनी कामनाओं पर नियंत्रण नहीं रख सकते हैं । इस कारण किसी को अस्वीकार करने तथा अविष्कृत पदार्थ का निर्माण करने से मना नहीं किया जा सकता है । था । यदि उस द्वारा निर्मित पदार् स्वास्थ्य के लिए हानिकारक सिद्ध हुआ तो उसे रोक दिया जाएगा । पिताजी तो ऐसे होगा । जैसे किसी स्त्री को आपने गोवा अंगों का तथा शरीर पर लोग हाय मान स्थलों के सार्वजनिक स्थलों पर प्रदर्शन करने से मना किया जाए । इस कारण की उसके पास सुंदर मनोहर अंग हैं और उनका प्रदर्शन करने से मना करना उनकी स्वतंत्रता पर बाधा होगी । मुझे स्मरण है कुछ वर्ष हुए किस तरी आपने वक्त शोज नग्ना रखकर नगर में घूमा करती थी और पिता महीने उसको मना कर दिया था । मैं समझता हूँ कि उप देव भी आपने भुने कंद मूलों के स्वाद का प्रदर्शन कर जनसाधारण की मनोवृत्ति को बिगाड रहा है । मैं समझता हूँ तुम्हारे उदाहरण में और उस देव की बात में अंतर है तुम बताओ उसके भरे हुए कंदमूल खाने से शरीर में किसी प्रकार का विकास हुआ है । इस पर कश्यप ने मुस्कुराते हुए कहा स्वास्थ्य के विचार से ये भुने कंधे, बच्चे, कंधों से अधिक सुख करण हितकर प्रतीत हुए हैं । मैं कई दिन से उस से लेकर खाता रहा हूँ । ये अधिक पुष्टिकारक हैं, सुगमता से पश्चिमी और शौचादि को नियमित करते हैं हूँ । कल इस ने मुझे कहा भविष्य में ये मुझे कंधे तब तक देगा जब तक नौ से नित्य एक प्रश्न वेदमंत्र सुरेश में लिख कर दिया करूँ तुम इसमें दो समझते हूँ । मैं वेदमंत्र के एक पृष्ठ का मूल्य उसके एकाद कंधे से अधिक मानता हूँ तो मैं चाहिए था । उससे एक पृष्ठ के लिए दो दिन के लिए काम की मांग करते हैं । कश्यप मुख देखता रह गया । मर्जी ने कहा देखो पुत्र! मैं तो उसकी सब इच्छा जान कहता हूँ । ऍम मेरे निवास स्थान पर जाकर वेदमंत्र निशुल्क ले जाया करो । परिणाम ये होता है कि मैं अपना कर्तव्य पालन करता हूँ । इसके प्रतिकार में उसके बंद नहीं मानता हूँ उसका प्रतिकार । यदि वह सब कुछ समझता है तो स्वयं देता दंद खिलाता अथवा कुछ अन्य प्रकार से मेरी सेवा करता हूँ । प्रश् अपमान हो गया । पिता ने कहा तो मैं भी और स्वाध्याय करूँ । पिता में है कि प्रवचनों को सुना करूँ, हमारा ज्ञान अधूरा प्रतीत होता है । इसका परिणाम यह हुआ कि कुछ अन्य उद्यमशील लोग अंगीरा से फल बोलने की भट्टी बनाने का ढंग और उसके प्रयोग का ठंग सीखने जा पहुंचे और वर्षा ऋतु के उपरांत नगर में पांच छह अन्य कंधों का व्यवसाय करने वाले इस क्षेत्र में आ गए । सामान्य लोगों में कच्चे कंदमूल खाने के स्थान पर भुने कंदमूल खाने का स्वभाव पडने लगा । उसके साथ कश्यप नहीं देखा । पिता मैंने मुद्रा का अविष्कार किया है । इस समय तक स्वर्ण और रजत धातु शुद्ध व्यवस्थान ने प्राप्त की जा चुकी थी । लोहा तो इसके उपरांत खनिज पदार्थों से निकाला गया था । व्यवस्थानुसार स्वर्ण अखबार रजत के एक ही बार शुरू टुकडे बना । उन पर महर्षि अंगीरा का मुद्रांकन किया जाने लगा । ये स्वर्ण और रजत मुद्रा के नाम से प्रचलित हुई और पदार्थों के प्रतिकार में पदार्थ देने के स्थान पर इन मुद्राओं का चालान किया गया । लोग स्वर्ण और रजत के भूषण भरवाने लगे थे । अगर अभूषणों को डलवाकर उनको मुद्राओं में परिवर्तित करवाने लगे । इससे पदार्थों का विनिमय सुगमता से हो सके । दशक की पिता नहीं से इस विषय पर भी बातचीत हुई । एक दिन सा निकाल के प्रमोशन के उपरांत कश्यप ने पता नहीं ऐसे पूछा बता रहे हैं आपने स्वर्ण और रजत मुद्राओं के चलन की व्यवस्था की है । इस जनसाधारण में लोग और मोहो बढने लगा है । पिता महीने उत्तर देने के स्थान पर प्रश्न पूछ लिया । इन मुद्राओं ने लोग बढाया है अथवा लोग और मूं इससे प्रत्येक विषय है । कोई कंदमूल हम अन्य का संचय नहीं कर सकता । अभी कच्चे फल इत्यादि संचय किए जाएं तो वे दो तीन दिन में लडने लगते हैं परन्तु उनके प्रतिकार में होने हुए कंदमूल एक दो वर्ष तक रखे जा सकते हैं और अब स्वर्ण रजत मुद्राएं मनुष्य के जीवन भर रखे जा सकेंगे । बेलो और मौका कारण हो जाएंगे । कश्यप काम रोज लो हम हूँ अंधकार मन के विकार हैं की मुद्रा के अधिकार नहीं अच्छा इनका संबंध दूषित मन से है न कि अन्य तथा तृणमूल इत्यादि से मुद्रा भी स्वयं इसमें कारण नहीं हो सकती । मैं लोग उसे मानता हूँ जब किसी दूसरे के अर्जित धन को हथियाने की इच्छा हो । इसमें भी परिश्रम का अनुदान करके मुद्रा उपार्जन करना लोग नहीं, ये है परिश्रम है । मैं परिश्रम पर भी प्रतिबंध नहीं लगा सकता । अतः उस परिश्रम का प्रतिकार प्राप्त करने पर भी प्रतिबंध नहीं लगा सकता । मुद्रा उस परिश्रम को संचित रखने का उपाय है, जब परिश्रम करना पास नहीं, परिश्रम का फल प्राप्त करना । आप नहीं तो उस फल को संचित रखना भी किसी प्रकार से अपराध नहीं हो सकता हूँ तो दो शुक्ला बात किया है । कश्यप का प्रश्न था, कामनाएँ स्वाभाविक है । स्वाभाविक वस्तु का लोग भी सौहार्द ही होगा, परन्तु भरो को प्राप्त करने का उपाय उच्चत अथवा अनुचित हो सकता है । वो प्राप्ति का उपाय जब अनुचित होता है तब दोष उत्पन्न हो जाता है । साथ ही भो प्राप्ति का उपाय जब अन्य के उचित भो प्राप्ति के उपाय में बाधक हो तब भी दो शुरू हो जाता है । इन उपायों का कामनाओं के निर्माण से कोई संबंध नहीं । कामनाओं की वृद्धि अथवा इनका उचित अनुचित होना एक पृथक बाद है । इस प्रकार कामनाओं की पूर्ति का साधन एक पृथक विषय है । उपाय साधनों का निर्माण का नाम ही है । उचित साधनों पर प्रतिबंध नहीं लग सकता । इसी प्रकार उचित कामनाओं पर प्रतिबंध नहीं लग सकता है । उचित कामनाएँ क्या है जिनसे व्यक्ति के जीवन लक्ष्य में हानि ना हो और जिनसे दूसरों की उचित कामनाओं की पूर्ति में उचित उपायों के मार्ग में बाधा ना हूँ, वह सब इतना झंझट है कि समाज ने व्यवस्था रखना कठिन अवश्य हो जाएगा । था जान बुद्धि के साथ ये व्यवस्था रहना कठिन हो रहा है और हम तो किसी कार्य की कठिनाई को देखकर उस कार्य के करने पर प्रतिबंध नहीं लग सकता हूँ । परन्तु ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिससे किसी भी उचित कामनाओं की पूर्ति में और कामनाओं की पूर्ति के उचित उपायों में बाधा ना पडे । इस व्यवस्था के लिए एक व्यवस्था शास्त्र बनाना पडेगा जैसे ये मैं बना रहा हूँ । इसमें तीन खंड होंगे एक धर्म दूसरा और तीसरा काम । काम का अभिप्राय है कामनाएँ । इन की व्यवस्था होनी चाहिए । अर्थ है उन कामनाओं की पूर्ति में साधन । इस विषय में भी उचित अनुचित की व्यवस्था होनी चाहिए । इन दोनों कामनाओं और उनकी पूर्ति के साक्ष्यों पर नियंत्रण के लिए नियम उपनियमों का नाम है धर । यह धर्मशास्त्र बनाना आवश्यक हो गया है । कश्यप के वक्तव्य में सत्यता थी । यदि स्वर्ण और रजत मुद्रा का विस्तार हुआ तो व्यवस्था रखने में कठिनाई होगी । पिता ने भी इस कठिनाई को अनुभव कर रहे थे । परंतु कठिनाई से पार पाने के लिए दोनों के उपाय भिन्न ही नहीं थे वरन परस्पर विरोधी भी थे । कश्यप चाहता था कि पितान है कि जनपद में निजी संचय और संचित का विनिमय करने के लिए अवसर ही न रहने दिया जाए । पिता में है । इसके विपरीत व्यवस्था दे रहे थे । वो ये कि परिश्रम करने की सबको स्वतंत्रता दी जाए । केवल वह स्वतंत्रता धर्मयुक्त हूँ । उस परिश्रम की, किसी दूसरे के परिश्रम से विनय की स्वतंत्रता हो, यह मैंने भी धर्मयुक्त हो । विनिमय से प्राप्त फल के भोग की भी सपने करता हूँ । उसमें भी नियंत्रन धर्म का ही हूँ । कश्यप समझता था इससे ऐसी छीनाझपटी होगी । इस सब वन पशुओं की भारतीय लड पडेंगे उप देवकी कंदमूल भुनने की कुशलता अन्य किसी में नहीं थी । यद्यपि उसका व्यवसाय अन्य भी कई लोग करते हैं, परंतु वे उसकी कुशलता को प्राप्त नहीं कर सकते थे । था । नगर के सब लोग जिनके पास रजत स्वर्ण मुद्रा होती थी, बहुत देर से अपनी भोजन सामग्री उपलब्ध करते थे । परिणाम ये हुआ की एक दो वर्षों में ही उप देव स्वयं और उसकी पत्नी अपने अकेले परिश्रम से जनपद की मांग को पूर्ण नहीं कर सकते थे । उसने कई लोगों को अपने कार्य में सहायता रख लिया था । मैं उनको रजत मुद्रा के रूप में वेतन देता था । नगर भर में उसकी भट्टी से भुने कंधे सब धनियों के घरों में जाते थे और वहाँ से वह इच्छानुसार दम प्राप्त करता था । धनी लोग हुए थे जो स्वर्ण अथवा रजत एकत्रित करते थे । एक दिन महर्षि मूल है । मैंने नदी के बालू में स्वर्ण को मिला देखा तो उसने अंगीरा की सहायता से उनको गलाकर छर्रे बनवा लीजिए । पहले तो उसने इस धातु के भूषण बनवाकर अपनी पत्नी को पहना दिए और बाद में जब पिता नहीं नहीं मुद्रा चलाने की व्यवस्था दी तो स्वर्ण की मांग बढ गई । जनपद के बहुत से लोग स्वर्ण निकालने का कार्य करने लगे । इस समय के लगभग रजत का पता लगा । लोग तो पहले ही खनिज पदार्थ निकाला जा चुका था । लोगों से खोदने, लकडी, पत्थर काटने, छीलने तथा चीज ने के उपकरण बनने लगे थे । वो सब व्यवसाय जनपद के लोग करते थे । वे अपने परिश्रम का फल उनके पास बेचते थे । जिनके पास स्वर्ण तथा रजत मुद्रा होती थी । सबसे बडा व्यवसायी उप देव था । उसके पास स्वर्ण तथा रजत मुद्रा बहुत अधिक मात्रा में एकत्र होने लगी थी । जनसंख्या बढने के साथ साथ कार्यकर्ताओं की संख्या बढने लगी थी और कच्चा माल, धातु वर्ग, वस्त्रों के लिए तंतु निकालने की, वृक्षों की छार तथा फलों में कमी होने लगी थी और इसको उपलब्ध करने में अधिकारिक परिश्रम भी करना पड रहा था । जिन लोगों को उप देव के व्यवसाय के प्रारंभिक दिनों का स्मरण था वे वर्तमान की कठिनाइयों का अनुभव देख मन में असंतोष अनुभव करते थे । कश्यप मुनि ने स्थिति को एक विस्फोट की स्थिति समझा था । एक अन्य ऋषि उत्पन्न हो गए थे । मैं अंगीरा के पुत्र बृहस्पति थे । अंगीरा की पत्नी उन मनचलों में से थी जो एक बार पिता है कि आश्रम में खुश आए थे और जिनके योद्धा के साथ दक्षिण का युद्ध हुआ था । युद्ध के उपरांत बहुत सी स्त्रियां पिता में है कि आसाराम की संपन्नता तथा सभ्यता दें वहीं रह गई थी । उनमें से एक लडकी के साथ अंगीरा का विवाह हो गया था और उसकी संतान बृहस्पति हुए । संतान होने के उपरांत रहे स्तरीय आपने वन के साथियों के पास चली गई थी और अपने पुत्र को भी साथ ले गई थी । जहां बृहस्पति के माता ने वन चरों को सभ्यता का पाठ पढाया वहाँ उनको सुसंगठित हो अपने अस्तित्व को स्थिर रखने का ढंग सिखाया । यह है वह पिता है कि आश्रम में रहती हुई सीख गई थी । राष्ट्रपति की माता ने वन चरों को आश्रम बनाकर एक स्थान पर रहने तथा अपने फलों के उद्यान ऍम अन्य के क्षेत्र बनाने का ढंग सिखाया । साथ ही उनको वाणी का भी लाभ समझाया परंतु वन चरों में रहने से वे स्वयं कुछ उसके व्यवहार को भी सीख गए थे । पुरवासियों का जीवन ही आधार था और वह इसके लिए ही जीवन के सब प्रयासों को उपाधि मानते थे । बृहस्पति ये माता सुनी थी जब अपने पति महर्षि अंगिरा के आश्रम में लौटी तो बृहस्पति दस वर्ष का हो चुका था । महर्षि अंगीरा उसे रखने को तैयार नहीं हो रहे थे परन्तु बृहस्पति ओजस्वी और मैं धारीवाला प्रतीत होता था । उसे देख तथा पितान है के अनुरोध पर वह मान गया । बृहस्पति बडा ही वेद का ज्ञाता युवक हो गया । वो और कश्यप लगभग सब व्यस्त होने से साथ ही थे और दोनों जनपद में अव्यवस्था के बीज बोये चाहते देख रहे थे । वास्तव में दोनों इस पक्ष में थे । इस अव्यवस्था को बढने से रोकने के लिए मुद्रा संचय पर नियंत्रण करना चाहिए । वे जनपद के सैकडों लोगों को दिन राहत स्वर्ण करूँ की खोज में नदी की रेत में उथल पुथल मचाते देखते थे तो चिंतित होते थे । देख रहे थे की कोई खोज करने वाला तो दिन भर ही खोज में खाली हाथ घर लौट ता है और कोई एक डुबकी में दो सौ रजत मूल्य का स्वर्ण पाया जाता है । वो ये भी देख रहे थे की जिनको स्वर्ण नहीं मिलता वह निराश हो निर्जनता का जीवन व्यतीत करता था । तभी वह किसी धनी मानी के घर सेवा कार्य करने पर विवश हो जाता है । धन के एक दो हाथ में एकत्र होने से वे दूर वनों में बहुत सी भूमि पर अधिकार का कर्मचारी रख अन्य की उपज करने लगे थे । उन दिनों व्यवस्थापक पिता नहीं थे । बृहस्पति अपने मन के भावों को लेकर पिता ने से मिलने उनके निवास स्थान पर जाया करता था । एक दिन रह गया तो पता नहीं कि समूह उप देव उपस्थ था और अपने साथ हुई एक दुर्घटना था । वर्णन कर रहा था । उसने बताया था काम है रात में आपके जनपद में सर्वोत्कृष्ट धनी धा नी व्यक्ति था, आज प्रात हूँ । मैं जनपद ने सबसे निर्धन और दुखी हूँ । मैं रात अपनी दोनों पत्नियों से बातें करते करते हो गया । मध्यरात्रि के उपरांत किसी ने मेरे छह हजार का द्वार खोला । पांच सात व्यक्ति भीतर खुश आए । उनमें से एक नहीं प्रकाश सलाखाें जला रखी थी । अन्य ने मुझे तथा मेरी पत्नियों को मार मारकर हमारे मुंह में कपडा ठूंस बांदिया मैं और मेरी पहली पत्नी चुपचाप पडे रहे और अपने हाथ पाँव तथा मूँग बांधे जाने दिए गए । परन्तु मेरी दूसरी पत्नी ने विरोध करना प्रारंभ कर दिया । वो छटपटाने लगी और ऊंचे ऊंचे स्वर में चीखने लगी । इस पर एक ने उसका गला दबाकर उसकी हत्या कर दी । संता मेरे घर में रखा सब स्वर्ण रजत ऍम वस्त्रादि उठा बैलगाडियों पर लाभ ले गए । उन्होंने घर में एक ताना भी नहीं छोडा । मेरे व्यवसाय को नष्ट भ्रष्ट करने के लिए कंदमूल भूलने की भट्टियां भी तो डाली । कपडा बुनने के यंत्रों को एकत्रित कर अग्नि की भेंट कर दिया । मेरे तथा मेरी पत्नी के पास इतना कुछ भी नहीं रहा कि हम दूसरी पत्नी के शव का दाह कर सकें । मुझे आज यह भी विदित हुआ है कि जनपद के अधिकांश लोग मेरी दुखद कथा सुनते हैं और मन में संतोष अनुभव करते हुए चले जाते हैं । कोई यह भी नहीं पूछता मुझे किसी वस्तु की आवश्यकता है अथवा नहीं । भगवान मायावती दयनीय अवस्था में हूँ और आप से सहायता की आशा लेकर आया हूँ । अच्छा मैंने मुस्कुराते हुए पूछ लिया कितनी हानि हुई होगी । उप देव ने कुछ विचार कर बताया । कम से कम दस सहस्त्र स्वर्णमुद्राएं प्रतिवर्ष कितनी आय हो जाती है तो मैं भगवान ये सब चार वर्ष में एकत्रित हुआ था । इस समय घर में एक पत्नी का शव पडा है । दूसरी पत्नी भयभीत अपने आवास में छिपकर बैठी है । मेरे पांच बच्चे उसके पास भूख से व्याकुल हो रहे हैं । वर्ष में कितना दान करते थे जितने भी दान के लिए आते थे सब धूत प्रतीत हुए । उनको कुछ भी देने को जितने नहीं करता । मैं भी ऐसा हो गया । इस प्रश्न पर उम देव पहुंचकर रह गया । परंतु शीघ्र ही अपने को सचेत कर बोला । पर तो भगवान क्या आप भी किसी शिदान की आशा करते हैं? नहीं ये मेरे आशा करने की बात नहीं, तुम्हारे देने की बात है । हमने किसी को एक ऑडी दान के रूप में नहीं दिया । तुमने खोर पास क्या है? धनोपार्जन किया है और उससे जग्य नहीं किया । हमारी पत्नी के शव के दाह का प्रबंध इस आश्रम की ओर से किया जाएगा । तुम्हारे एक मांस भर के लिए खाने पहनने का विजय आश्रम से दिया जाएगा । एक मास में तुम अपनी जीविका का प्रबंध कर लेना । हाँ, मैं महर्षि ऋतु को कहता हूँ की चोरी करने वालों का पता करें । भगवान उन में से एक को मैं पहचान गया था । मेरे वस्तुओं के कार्य का व्यवस्थापक था । उसका नाम है वर्चस् । जब आपने अपनी करूँ ऐसा कह रहा था तो बृहस्पति और कश्यप भी वहां मौजूद थे । पूर्ण खता सुन चिंता अनुभव कर रहे थे । जब देव सामाजिक सहायता का आश्वासन देकर चला गया तब राष्ट्रपति ने बात आरंभ कि उसने कहा पे काम है मैं पहले भी कई बार कह चुका हूँ । आप का अर्थ संविधान ठीक नहीं है । काम मैंने तुम्हारी सम्मति को धर्मयुक्त नहीं समझा । इस कारण मैं अपने मुख से उसके अनुकूल व्यवस्था नहीं दे सका और इसका परिणाम आपने सुन लिया है । कुछ सुना है परन्तु मैं मेरी व्यवस्था का परिणाम नहीं है है । उसके विपरीत आचरण करने वालों का परिणाम है । उस आचरण में एक विचारधारा कार्य कर रही है और उस विचारधारा के प्रचार तुम्हें तो फिर मुझे दंड दिया जा सकता है । बृहस्पति मेरी व्यवस्था दंड देने की नहीं है । मैं तो प्रेरणाओं से कार्य करवाता हूँ परन्तु जब तुम दंड की बात करते हो तो मैं बताता हूँ उसके लिए मैंने एक त्रिवर्ग नाम का व्यवस्था ग्रंथ लिखा है और उसको मैं आप सबके विचार के लिए शीघ्र ही उपस् थित करने वाला हूँ । उसमें धर्म की व्याख्या ही होगी और धर्म का उल्लंघन करने वालों के लिए दंड भी । मैं उसमें ये भी व्यवस्था दे रहा हूँ कि अधर्म को धर्म कहने वालों के साथ कैसा व्यवहार किया जाए । परन्तु धर्म क्या है, वह किस प्रकार निश्चय होगा और उसका निश्चय कौन करेगा, यह भी उस करंट में लिखा है । इस समय संकेत मात्र ही मैं बता सकता हूँ सनातन धर्म विख्यात है और उन का निश्चय इस बात से होता है जो एक व्यक्ति अपने साथ क्या जाना पसंद नहीं करता । मैं किसी दूसरे के साथ करने लगे तो वह है और हम है उदाहरण के रूप में किसी में उप देव के घर तो इसी है । मैं पूछूंगा क्या चोरी करने वाला अथवा क्या उस चोरी को न्यायोचित बताने वाला? स्वयं धनवान होने पर ऐसी चोरी अपने घर पर की जाना पसंद करेगा? नहीं, नहीं तो वह उप देव के घर चोरी को कैसे न्यायोचित समझ सकता है? पिता मैं मैं तो कहता हूँ कि इतना धन एकत्रित करना ही न्याय आवश्यक नहीं है । उसने धन एकत्रित करने में किसी सनातन धर्म का उल्लंघन किया है । बताओ तो उसके लिए भी दंड का विधान होगा । सनातन धर्मों के विषय में मैं नहीं जानता । मैं तो इतना कह सकता हूँ कि इतना धन एक व्यक्ति के पास एकत्रित हो जाने से ही आप कार्य बढेगा । बृहस्पति हम क्या कार्य करते हो? आप कार्यकार समझाएँ तो मैं बता सकता हूँ । जब किसी का कोई प्रिय कार्य किया जाए तो उसमें व्यय किए गए परिश्रम को ही मैं कार्य कहता हूँ । यही अपना प्रिय किया जाए । तब क्या कार्य नहीं होगा? मैं कार्य तो होता है परंतु उसका प्रतिकार कोई दूसरा नहीं देता । जब तुम प्राथमिक उठ स्नानादि से शरीर शुद्धि करते हो अथवा संध्योपासना से आत्मा की शुद्धि करते हो तो तुम काम तो करते हो परन्तु वह कर्म तुम्हारे लिए ही होने से कोई दूसरा उसके लिए कुछ प्रतिकार नहीं देगा । और जब मैं लोगों को ऐसा कोई उपदेश दूँ, इस पर आचरण करने से उनको लाभ हो तो फिर फिर वे प्रतिकार नहीं देंगे । देंगे वे लोग जिनका लाभ होगा । यदि तुम एक का छीन कर किसी दूसरे को देने की बात हो गयी, इसका छीना गया है । मैं तुमको किस बात का प्रतिकार देगा और मैं समझता हूँ कि जो छीन कर ले गया है वो भी कुछ नहीं देगा । कारण ये की वो समझेगा । उसके पांच एकत्र होने पर तुम उसका भी छीन लेने की बात करने लग हो गए । जब कोई परिश्रम करेगा तो वह परिश्रम उद्यान में हो, स्वर्ण निकालने में हो अथवा किसी अन्य क्षेत्र में हो, उस परिश्रम का जो भी फल होगा, उसका व्यय से बचा शेष एकत्रित करता है तो वह पापी नहीं हो सकता । मैं फल एकत्रित होकर संपत्ति बन जाएगी । तब भी पास नहीं होगा । इससे दूसरों को खानी पहुंचती है । कैसे? यदि वह अपनी संपत्ति से वस्तुएं क्रय करेगा, वस्तुओं के दाम बढेंगे और कोई अन्य वस्तु बनाने वाला भूखा मरने लगेगा । परन्तु ऐसी वस्तु बनाए ही क्यों इससे कोई क्रय नहीं करना चाहता तो वो क्या करें? वहीं करें जिससे उप देव के पास धन एकत्रित हो गया था । यह वह करना नहीं जानता । तब तो उसे जो कुछ दूसरों से मिले उस पर संतोष करना चाहिए । बृहस्पति निरुत्तर हो गया । तदंतर वहाँ उठकर चला गया । पश्चिम भी आया तो बृहस्पति के साथ था परन्तु है उसके साथ गया नहीं । पिता में है कि समूह बैठा रहा । जब बृहस्पति गया तो पिता मैंने कहा मैं समझा था कि अंगीरा का पुत्र, उसके सामान ही प्रतिभाशाली होगा । वेदों का ज्ञाता होगा और लोक कल्याण कार्य में लगेगा । फलती है । अपनी माँ की प्रवृत्ति को स्वीकार कर रहा है । अच्छा हम तो उसके साथ आए थे । इसके साथ गए क्यों नहीं सितावा हैं । मैं इसके साथ नहीं आया था । सात तो साथ ही आते हैं । मैं इसका साथ ही नहीं हूँ । आपने मार्क कर रही हूँ । मैं अपने कार्य से आपकी सेवा में उपस्थित होने आ रहा था । ये मार्ग में मिल गया और पूछने लगा मैं किधर जा रहा हूँ तो मैंने यहाँ आने की बात बताई तो बोला आओ तो मैं वहाँ एक नई बात पता चलेगी । इस प्रकार हम दोनों साथ साथ आए थे । इसका अभिप्राय यह हुआ कि इसे क्या था? युग देव मेरे पास याचना लेकर आ रहा है और ये जानना चाहता था कि वह किस किस के विपरीत याचिका करता है, हो सकता है परन्तु देव ने अपने एक सेवक के अतिरिक्त है अन्य किसी का नाम नहीं बताया । हाँ मैं अनुमान से यह जान गया हूँ कि बृहस्पति उनका नेता है जिन्होंने यह कांड किया है । किताब है, विश्वास नहीं आता । कारण ये कि महर्षि अंगिरा सब प्रकार से संपन्न है और वह ऐसी विद्या के जानने वाले हैं जिसमें सहस्त्रों देव किए जा सकते हैं । ये मैं जानता हूँ । फिर भी मैं तो मैं तो की बात बताता हूँ । पापी पाप की प्रवर्ति रखता है परन्तु पाप कर्म करने का साहस सभी कर पाता है । जब कोई बुद्धिमान, अदूरदर्शी, उसको पाप का मार्ग दिखाने वाला नेतृत्व के लिए आ जाए । मनुष्य में एक नैसर्गिक भय की भावना रहती है । वो जो किसी दूसरी की बुराई करने लगता है तो उसका वहन नैसर्गिक स्वभाव उसे रोकता है । पर अभी जब कोई अपने को तरफ से उसके पाप को पुण्य सिद्ध करने लगे तब बहन निशंक हो पाप करता है । बृहस्पति यही कर रहा है । बुद्धिमान तो है परंतु ज्ञानवान नहीं है । बुद्धि के कार्य का आधा ज्ञान होता है । जितना ज्ञान अधिक होता है उतना ही बुद्धि सन्मार्ग सिखाती है । था । बुद्धिमान अज्ञानी अपनी बुद्धि से उतर करने लगता है और सादा मध्यमार्ग दिखाने लगता है । कश्यप अपने ही मन की बात में उलझा हुआ था । इस कारण वह प्रतीक्षा कर रहा था की कब पिता में है । अपनी बात समाप्त करते हैं तो वह अपनी समस्या उनके सम्मुख रखें था । प्रथम अवसर मिलते ही उसने कहा भगवान, मैं आपसे एक स्वीकृति लेने आया हूँ । वह रह के विषय में है था बताऊँ । मैं कुछ दिन पहले दक्षिण की नगरी में गया था । कुछ दिन वहाँ दक्ष जी के आवास में रहा था । महाराज उनकी पचास कन्यायें हैं । वैसे उनके कई पुत्र भी हुए थे परंतु सब के सब समय पूर्व ही शरीर छोड के चले गए । उन्होंने अपनी दस कन्याओं का विभाग धर्म से कर दिया है । सत्ताइस कन्याएं उन्होंने चंद्रमा को दे दी हैं और तेरह कन्यायें अभी बाकी हैं । रियाज व्यवस्था दे तो मैं शीर्ष सबके साथ वहाँ कर लूँ । एक साल तेरह से बाराज चंद्र ने सत्ताईस एक साथ व्यवहार किया है । देखो बहुत अधिक हैं इससे जीवन तू भर हो जाएगा । पिता मैं बात इस प्रकार हुई है कि दक्षिण के ग्रह पर प्रवास में मैंने उनकी किसी एक लडकी से विवाह की इच्छा प्रकट की तो वो मुझे सभी लडकियों के सम्मुख ले गए और पूछने लगे कि मैं किससे व्यवहार करना चाहता हूँ । इससे पूर्व मैं सब लडकियों से नहीं चुका था और जब भी किसी से मिलता था तो उसी से विभाग की इच्छा करने लगता था । एक से एक सुंदर, सभ्य खुशी प्रशिक्षक और सो संस्कृत है । अच्छा । मैं किसी एक का अपने लिए निर्वाचन नहीं कर सका । पक्ष ने पूछा तो मैंने कह दिया ये सब परम सुंदरियां हैं । वैसे भी उनकी सब ग्रहणी बनने के योग्य हैं । प्रजापति कहने लगे ये तेरह हैं, सब की सब आपके साथ कर सकता हूँ परन्तु ये क्या चाहेंगी? मैंने उनसे पूछा है सब की सब आपको एक समान पसंद करती प्रतीत होती हैं । इस अवस्था में पिता ने ही से स्वीकृति लेनी पडेगी । ये कहकर मैं आपसे इस विषय में सहमती लेने चलाया हूँ । देखो कश्यप मैं वहाँ के विषय में किसी प्रकार का कठोर नियम नहीं बना सकता हूँ । यह पुरुष के स्वास्थ्य सामर्थ्य और संपन्नता पर निर्भर करता है । कितने विवाह करें कश्यप ने कुछ चिंता व्यक्त करते हुए कहा, क्या यही व्यवस्था लडकियों के विषय में भी हैं नहीं और उसमें बीजों की सृष्टि स्त्रियों में भूमि के अनुपात से बहुत अधिक होती है । इस कारण एक पुरुष कई स्त्रियों से बीजारोपण कर सकता है और हम तो इस तरी के पास एक पुरुष के अनेक बीजों के लिए स्थान नहीं होता है । पुरुषों के लिए कहाँ स्थान होगा तथा एक स्त्री का एक से अधिक पुरुषों से व्यवहार युक्तियुक्त प्रति नहीं होता । कश्यप संतानोत्पत्ति और वासना तृप्ति दो प्रथक प्रथक बातें हैं । जहाँ तक संतानोत्पत्ति का प्रश्न है, एक पुरुष अनेक स्त्रियों में बीजारोपण कर सकता है और वासना प्रगति के लिए तो एक स्त्री एक पुरुष के लिए पर्याप्त है, वो तब ही हो सकता है जबकि इस तरी का प्रयोग संतानोत्पत्ति के लिए न हो । मैं केवल स्वाद की वस्तु मान ली जाए और एक पुरुष और एक स्त्री का संपर्क हो सकता है । तो मनुष्य का एक ही प्रकार का भोजन करते करते चित्र ऊब जाता है तो मैं किसी दूसरी प्रकार के भोजन की इच्छा करने रखता है । वहाँ सम्मान के लिए अधिक पत्नियाँ करने से कहीं अधिक दूषित बात है था । मेरी ये व्यवस्था है कि तुम दक्ष की तरह कन्याओं से विवाह कर सकती हूँ और उन सब से संतान उत्पन्न कर सकती हूँ और तुम स्वयं अपनी सामर्थ्य और समृद्धता का विचार कर लो । तेरह पत्तियों से वर्ष में तेरह मालक हो सकते हैं । उनका पालन पोषण कर सक हो गई तो व्यवहार करो । जहाँ तक शरीर के सामर्थ्य का संबंध है तो महर्षि अत्रि जिसे सम्मति ले लोग इस प्रकार प्रदान है की स्वीकृति लेकर कश्यप अपने पिता मरिचि के पास चला गया । स्टॉप प्रांत दक्ष के नगर में जाकर प्रजापति की तेरह कन्याओं से विभाग का एक विशाल भवन बसा पुर में रहने लगा । बृहस्पति उन दिनों पुर में नहीं था और महर्षि अंगिरा से पता करने पर कश्यप को ज्ञात हुआ कि वह पिता है की खूब से भी कहीं घने वनों में जाकर रहने लगा है । कश्यप को ये समाचार सुन जिसमें हुआ और महर्षि अंगिरा से पूछा क्या अपराध किया था बृहस्पति ने अपराध तो उसमें बहुत बडा किया था । उसने नगर के कुछ पेंशनों को बहुत प्रेरणा दी थी कि वे उप देव के ग्रह में संचित संपत्ति लूक सकते हैं । वह पुण्यकार्य होगा । सकती महर्षि आप जैसे विद्वान अपने पुत्र को समझा नहीं सके है कि वह अपनी वाक शक्ति का दुरुपयोग न करें । मैं और उसकी माँ मेरी कहीं में नहीं है । अभी उसकी माँ उसके साथ है जब वह अवश्य उसे अपने लोगों में ले गई होगी । वहाँ जाकर पता क्या है कि माँ पुत्र वहाँ नहीं है । मैं समझता हूँ कि ये उसको पता नहीं ऐसे छमा दिलवाकर उसे वापस ले आना चाहिए । अन्यथा ज्ञान केसरो से असंबद्ध होने पर वह असर संतान उत्पन्न करने लगेगा तो हम उसे ढूंढ निकालो । जहाँ तक काम है का संबंध है मैं उसे कुछ नहीं है । फिर भी रहन हत्या बात करता था और उसकी बात का पिता काम है । अपने प्रवचनों में नित्य खानदान करने लगे तो जिन्होंने उप देव के घर चोरी हुई थी । पिता नहीं के पास जाकर छमा प्रार्थना करने लगे । उन्होंने ही बताया है कि बृहस्पति इसपुर में एक विप्लब उत्पन्न करने वाला है । मैं स्वीकारो आती सार्वजनिक रूप से कराई गई और उनसे क्षमा याचना की गई । तब पिता रहने उन्हें छमा कर दिया । बृहस्पति ने छमा मांगनी उचित नहीं समझे और उसे भय लग गया कि पिता में है कि प्रवचनों से उद्विग्न हो । पूर्व के लोग ही कहीं उसकी हत्या ना कर दें । वो वन में जाकर छिप गया है । कश्यप ने एक दिन पिता में से भी बृहस्पति के विषय में बात चला दी थी । इस समय तक कश्यप की तीन पत्नियां गर्भवती हो चुकी थी । कश्यप अपनी पत्नियों के साथ पुर के बाहर के विशाल भवन में रहता था । उस भवन की देखभाल के लिए कुछ सेवक नियुक्त थे । भवन के साथ एक विशाल उद्यान और अन्य क्षेत्र था । एक पशुशाला भी थी । कश्यप अपना व्यवहार मुद्राओं के द्वारा नहीं चलता था । वह लेन देन पदार्थों के विनिमय से करता था । सेवाओं को उनकी सेवा का प्रतिकार भी अन्य फूल, कंदमूल और दूध घटा दी के रूप में देखा था । उस दिन वह पिता में है कि सम्मुख उपस् थित हुआ तो पिता मैंने मुस्कराते हुए पूछ लिया कश्यप, गृहकार्य कैसा चल रहा है? बहुत रस्में चल रहा है । भगवान सब बहने मिलकर जीवन नीरस तो नहीं कर रही? मैं समझता हूँ कि वे सब मिलकर मेरे जीवन को अधिक रस्में बनाने का प्रयत्न कर रही हैं । उदाहरण के रूप में पहले ही दिन मैंने उन सब को बुलाकर पूछा सबसे पहले माँ कौन बनना चाहती है? भगवान मेरे विश्व का ठिकाना नहीं रहा जब तेरह में से कोई भी तैयार नहीं हुई । मैंने कह दिया तब तो मुझे तो मैं से अपने पुत्र निर्माण के लिए एक का निर्वाचन करना पडेगा । सब भयभीत होकर मेरा मुख देखने लगी । वो सब समझती थी कि मैं उनमें से उसी का निर्वाचन करूंगा । ये भय सत्य था । करन की मैं सबको एक से एक अधिक सुंदर समझता हूँ परन्तु जब मैंने उनको ही परस्पर निर्णय करने का एक ढंग बताया तो सभी आशा करने लगी की इस काम के लिए वही निर्वाचित नहीं होगी । मैंने एक बर्तन लिया और उसमें तेरह गुठलियाँ डाल दी । एक गुट ली पर मासी से चिन्ह बना दिया था और उनको कह दिया कि तुम सब एक एक गुट ली । इसमें से आंखें मूंद करने का लो जो मासी से अंकित गुठली निकलेगी है । सबसे पहले पुत्रवती होगी महाराज इससे सब अपने अपने भाग्य पर विश्वास करती हुई कुछ लिया निकालने लगी और अंकित गुठली मेरी पत्नी अदिति के हाथ में आई और वह मेरे प्रथम पुत्र को जन्म देगी । विश्वास से जानती हूँ कि वह पुत्र होगा हमारा महाशिवरात्रि ने मुझे बताया है किस प्रकार पुत्र को जन्म दिया जा सकता है और मैं समझता हूँ कि अदिति मेरे प्रथम पुत्र की माँ होगी । यदि यह विद्या तुम अपने ससुर को बता देते हैं, उसका कल्याण हो जाता है । वो अपने दो हितों को पुत्र बनाने की इच्छा अनुभव न करता हूँ । मैंने महर्ष यात्री से कहा है कि वह यह कृपा मेरे ससुर पर करते हैं । वो कहते थे कि दस को हमारी विद्या पर विश्वास नहीं और जो विद्या पर विश्वास नहीं करता हूँ विद्या उसे छोड जाती है । वो ये भी कहते थे कि बृहस्पति भी वेद विद्या पर विश्वास नहीं रखता हूँ और उसका परिणाम भी ठीक नहीं हो सकता । एक परिणाम तो हो रहा है कि उसे वनों में रहना पड रहा है । पिता में है कि बृहस्पति के वनों में रहने की बात पर कश्यप को उसके विषय में बात करने का अवसर मिल गया । उसने पूछ लिया मैं कम है, आप उसे किसी प्रकार का भारी दंड देने वाले हैं । नहीं मैं कौन हूँ दंड देने वाला । मैं तो प्रेरणा ही देता हूँ । यह तो उसके अपने मन का भय है जो है इस पुर में आने से भयभीत है । इसमें संदेह नहीं कि उसने समाज धर्म का उल्लंघन किया है और वह समाज से ही भयभीत होकर वहां से भागा है । जब तुम विवाह के लिए दक्षिण अग्री से गए थे तब मैंने नित्य अपने प्रवचनों में उसके विचार में दोस्त प्रकट करने आरंभ किए । इसका एक परिणाम यह हुआ उसके शिष्य एक एक कर अपने अपराध के लिए छमा मांगने लगे । उन्होंने ये भी बताया कि बृहस्पति ने उनको वह समझा दिया था कि वह किसी प्रकार का पाप करना करें, उप देव भी हैं और पार्टी को दंड देना समाज के छत्रिय वर्ग का काम है । मुनि उन्हें छतरी वर्ग में मानते थे और इस प्रकार उनके मानने पर विश्वास कर वे उप देव को दंड देने चल पडे थे । मैंने सबके मन पर ये अंकित कर दिया । वाक प्रग लगता भी मनुष्य की संपत्ति है और जैसे एक मंश धन के बल पर दुराचार और अत्याचार कर सकता है । इस प्रकार वाक संपत्ति केबल पडता हूँ, इससे भी अधिक पाप किए तथा कराई जा सकते हैं । यदि एक धनी धन के बल पर दुराचार कर सकता है अथवा करवा सकता है वैसे ही एक वाणी का धनी भी ऐसा कुछ कर सकता है । दोनों पापी हैं । मैंने ये भी श्रोतागणों को समझाया कि उप देव ने अपनी संपत्ति को आपने भंडारों में सोंचा कर रखा था । ये आप तो नहीं था फिर भी है श्रेयस्कर कार्य भी नहीं है परन्तु वाणी के बल पर सरल चित लोगों को पथभ्रष्ट करना और उनसे हत्या डाका दूर ईत्यादि कर्म कराने की प्रेरणा देना पाप है और इसका फल मिलता है । मेरी इसी प्रेरणा का फल ये हुआ उसके दल में फूट पड गई और जो लोग उसके कहने पर उप देव की हत्या करने अथवा उसे लूटने के लिए उद्यत हो गए थे, वही उसकी हत्या तथा उसको तथा उसके पिता को लूटने के लिए उद्यत हो गए । बृहस्पति के पिता स्वर्ण और रजत मुद्रा को ना तोलकर मोहर से अंतिम करने का पारिश्रमिक लेते हैं और मैं समझता हूँ कि उनके पास भी गन्ना योग्य धनराशि एकत्रित हो गई है । लोग उसको भी लूटने के लिए तैयार हो गए । परिणाम ये हुआ कि महर्षि अंगिरा ने पुत्र को मेरे सम्मुख उपस् थित हो पश्चताप करने के लिए कहा तो वह तथा उसकी माता घर छोड कर कहीं चले गए हैं, किताबें नहीं । मुझे स्वीकृति दे तो मैं उसे ढूंढ कर लेता हूँ । मेरी स्वीकृति की आवश्यकता क्यों है? मैंने इस नगर में आकर शांतिपूर्वक रहने से किसी को मना नहीं किया वो भी आ जाए और समाज के नियमानुसार रहे । वो यहाँ सुखपूर्वक रहे सकता है । अच्छा तुम भी ये समझ लो कि धर्मात्मा व्यक्ति के लिए यहाँ के सभ्य समाज में रहने में कोई बाधा नहीं है । परन्तु पितान है सब की बुद्धि में आ सकने योग्य धर्मकर्म की व्याख्या भी तो होनी चाहिए । जनसाधारण भूल भी कर सकते हैं । हाँ, इस बात का विचार किए छह माह से अधिक हो चुके हैं । मैंने एक स्मृति का निर्माण किया है । छत्तीस अध्याय हैं धर्म और और काम । इन अध्यायों में इन तीनों का प्रथम, प्रथम और फिर उपसंहार में तीनों के समन्वय का वर्णन किया है । उस को महर्षि मंडल ने स्वीकार कर लिया है । इसमें विलंब इस कारण हुआ है । इस क्रिकेट का आकार कुछ बडा हो गया था । इसमें एक लक्ष्य पद है तदंतर इसकी छह प्रतिलिपियां दिखाई गई और एक एक पद पर विचार किया गया है । अब वह तुरंत जनसाधारण का मार्गदर्शन करेगा ये तो ठीक है परंतु भगवान ये एक लक्ष्य पदों का गर्म सब कैसे पढ समझ और स्मरण कर सकेंगे । गन तो भावन वर्ग के ज्ञान के लिए लिखा गया है और वे लोगों को उसका भावार्थ बताते रहा करेंगे । लोग भी जब किसी विषय पर जानकारी चाहेंगे तो वे अपने किसी समीप के भ्रमण के पास जाकर जानकारी प्राप्त कर सकेंगे । और ऍम कौन होगा तो पढा लिखा विद्वान होगा और हम दम । तब शौच छह आभाव और आस्तिक बुद्धि रखता होगा । साथ ही स्वभाव से विद्यादान का काम करता हूँ और उनको इस विद्यादान का प्रतिकार क्या मिलेगा? भगवान आपकी अर्थव्यवस्था में तो बिना मूल्य के किसी को कुछ नहीं देता । हाँ, उसको क्या मिलेगा, उसकी व्यवस्था भी उसी ग्रंथ में की है तो इस ग्रंथ की व्यवस्था कब से लागू होगी? आगामी श्रावणी से मैं इस ग्रंथ की घोषणा करूंगा और तुम्हारे पिता महर्षि मरीचि इस ग्रंथ का परायण आरंभ करेंगे । उस दिन आरंभ होने वाले चातुर्मास में उस जाॅन समाप्त होगा और तदंतर लागू हो जाएगा और यदि में बृहस्पति को इसपुर में लेता हूँ तो वह किस प्रकार रह सकेगा । उसके पिता धनवान हैं । वहाँ रहकर गृहस्थाश्रम में प्रवेश करें और एक नागरिक के रूप में रहता हुआ नागरिक के अधिकारों का सेवन करें । कश्यप को कुछ वनवासियों से यह पता चला कि पश्चिम की और एक घने जंगल में एक माँ पुत्र दो प्राणी कुटियां बना रहते थे । पुत्र पति ओजस्वी शौर्य वान और बुद्धिमान प्राणी है और वह वन में रहने वालों का एक संगठन तैयार कर रहा है । इस प्रकार शक्ति संचय कर ब्रह्मपुरी को लूट लेगा, क्योंकि ब्रह्मपुरी में बहुत सवर्ण एकत्रित हो रहा है । सूचना पर ही कश्यप को चिंता लग रही थी तो हम पुरी के सब लोग जानते थे कि वे अकेले पितान है कि बाल पर वे लक्ष्य लक्ष्य शत्रुओं का दमन कर सकते हैं । कश्यप को उसके पिता ने भी एक युद्ध की कथा सुनाई थी, जिसमें दक्षिणी किंचित बुद्धि के प्रयोग से अपने प्रतिद्वंद्वी को पराजित किया था और पिता मैंने अपने योग बल से क्षत्रों को आश्रम से ऐसे बाहर निकाल दिया था जैसे कि आंगन में से पूरा क्रिकेट बुहारकर बाहर कर दिया जाता है । कश्यपी समझ रहा था कि बृहस्पति वनवासियों के बल पर ही तो पिता मैं को पराजित नहीं कर सकता । पिता मैंने तो एक बार गंगा के बहाव को ऐसे रोक दिया था जैसे कि किसी ने उसे बहुत बडा और ऊंचा बांध लगा दिया हो । उस वर्ष हर्षाना होने से एक हम उद्यान सूख रहे थे । गंगा के बहाव को रोक देने से बाढ आ गयी थी और किनारों के सब खेतों की सिंचाई हो गई थी । इस संवाद को संभव समझाते हुए बृहस्पति का कल्याण इसी बात में मानता था कि बृहस्पति को पुरनपुर में लाया जाए और पिता में है कि सहयोग से वनवासियों की दशा सुधारने का यत्न किया जाए । अब पता है की स्वीकृति से एक दिन वह बृहस्पति की खोज में चल पडा । अच्छा कई वर्ष तक मन मंथन करने के उपरांत वे बृहस्पति के आश्रम को पा गए । इस काल में बृहस्पति ने कई सहस्त्र वनवासी एकत्रित कर लिए थे । ये सब लोग अपने परिवारों सहित मुठिया बना एक वन नगर सा बनाने में लीन थे । कश्यप बृहस्पति को मिलने गया तो वहां पहुंचा । उसमें एक बात देखी । प्रत्येक संज्ञान व्यक्ति ने हाथ में एक प्रकार का अस्त्र पकडा था । एक बांस के फल को ले उसे छील पूछ कर साफ किया गया था और उस फल के दोनों किनारे एक डोर से बांध कर बंधे हुए थे । ये सब के पास एक ही प्रकार का था परंतु छोटे बडे आकार के देख कश्यप समझ गया था ये किसी प्रकार का अस्त्र है । कश्यप आपने एक वनवासी साथी के साथ जब वहां पहुंचा उसके साथ ही ने बताया कि आपने लक्ष्य स्थान पर पहुंच गए हैं परन्तु वनवासी ने अभी है । सूचना दी थी कि बीस के लगभग अर्धनग्न पुरुष स्त्रियों ने उनको घेर लिया । सब अपने कंधों से अस्तर उतार । उनमें एक प्रकार की छडी जिसके अगले किनारे पर एक लकडी का तीव्र पूर्ण दार्शिनिक लगा हुआ था, तानकर खडे हो गए । कश्यप के साथ ही ने उसको समझाया । इसके मुखिया के हम मित्र हैं । इस पर दोस्तों को पकडकर बृहस्पति के सम्मुख ले गए । राष्ट्रपति कश्यप को वहाँ देख प्रसन्न नहीं हुआ तो समझ रहा था कि वह पिता में का गुप्चर लिए यहाँ आ गया है । अच्छा उसने माथे पर त्यौरी चढाकर पूछ लिया, हम यहाँ किस लिए आये हो, तुम्हारे कल्याण का चिंतन करता करता यहाँ पहुंचा हूँ परन्तु वो तुम यहाँ का पता कैसे पा गए? मित्र की गंध को सुनता सुनता यहाँ पहुंचा हूँ । कश्यप ने उसको कर कहा मैं तो ये समझा हूँ कि बूढे पिता मैंने तो मैं यहाँ का भेद जानने के लिए भेजा है । पिता महीने नहीं भेजा हो । मैं उनकी स्वीकृति से अवश्य आया हूँ । मैं मित्र से मिलकर पिता में से उसकी मित्रता कराना चाहता था । इसी विचार से आया हूँ । परन्तु यहाँ का नियम ये है कि बिना मेरी स्वीकृति के यहाँ आने वाला मार दिया जाता है । अपना नियम का पालन करूँ, नियम भंग नहीं होना चाहिए परंतु यदि तुम सत्य सत्य बात बता दो तो तुम को जीवन दान मिल सकता है । सत्य से तुम्हारा क्या अभिप्राय है? तुम अपने भेदिए के कार्य को स्वीकार करूँ और उसके लिए छमा मांगी तो तुमको दंड युक्त किया जा सकेगा । फिर भी तो उन्हें इस वन को छोडकर तुरंत चला जाने के लिए कह दिया जाएगा । तुम्हारा अभिप्राय है कि मैं तुम्हारी असब के बाद वो सत्य मान लो और फिर शपथ लोगों की यहाँ की बात किसी को नहीं बताऊंगा । साथ ही जो कार्य मैं यहाँ करने आया हूँ वो न करूँ । बृहस्पति मैंने सत्य बताया है । मैं अपनी इच्छा से अपने मित्र से मिलने आया हूँ । मेरे आने का प्रयोजन तुमने और प्रथम है नहीं मित्र का कराना है । यदि इस पर विश्वास नहीं तुम अपने नगर के नियम का पालन करो । हाँ तो मैं मृत्युदंड दे दूँ । मैं मारता नहीं हूँ । मैं अनादि आनंद अजर अमर हूँ । काम उसकी हत्या नहीं कर सकते परन्तु तुम्हारे तेरह पत्नियों को तुम्हारे शरीर का भोग भी तो प्राप्त नहीं हो सकेगा । पत्नियों की बात पत्नियाँ जाने, वहाँ नगरी में कई नर नृत्य मरकर पर लोग को चले जाते हैं । समझेंगी मैं भी पाँच फिसल जाने से गंगा जी की लपेट में आ गया हूँ । यही तो कठिन बात है । क्या आप लोग एकदम में फंसे हुए किसी से डरते नहीं है परन्तु बृहस्पति मैं तो तुम्हारे है की बात बताने आया हूँ । मुझे विश्वास है कि वास्तविक कश्यप मारेगा नहीं हम तो हम तो मानते हो मरने के उपरांत तुम्हारा कुछ नहीं रहेगा । इस कारण मरने का है उनको करना चाहिए हो ये जो तुमने यहाँ निर्माण क्या है इसमें किसी प्रकार का दोष नहीं । भूखंड बहुत लंबा चौडा है ट्राय सबका सब निर्जन पडा है । हम कहाँ रहते हो और बहुत क्या करते हूँ इसकी कोई दूसरा चिंता नहीं करता । साथ ही ये जो तुमने इन वनवासियों को यहाँ एकत्र कर रखा है और इनको दूसरों की हत्या करने में निपुणता करा रहे हो । इसका ज्ञान पे काम है तो नहीं है । समझता हूँ कि इसकी भी वो चिंता नहीं करेंगे । इसका प्रतिकार भी वो उसी ढंग से करेंगे जिससे वह तुम्हारी चिंता करते थे । तुम वहाँ से भाग आए हो वैसे ही ये यहाँ से भाग जाएंगे । ऍम जीवन के अंत में सब भोग सुविधाओं का अंत मानते हो वैसे ही ये बेचारे मानते हैं और जब ये मारे जाने लगेंगे तो भाग खडे होंगे । इनके विचार से इनका जीवन भ्रम शरीर इनसे चलने लगेगा तब तुम्हारे लिए भय का अवसर उत्पन्न हो जाएगा । मैं भयभीत नहीं हूँ । मैं तब था जब मैं हम पूरी छोडकर यहाँ चलाया था और ना अब हूँ । मैं समझता हूँ कि तुम लोग लोगों में एक मिथ्या भावना उत्पन्न कर रहे हो और मुझे उससे जनमानस को बचाना चाहिए तो ये यहाँ रहते हुए क्यों नहीं किया? यहाँ अशिक्षित और सरल चित्र वनवासियों को बरगलाने क्यों चले आए हो? मैं शक्ति संचय करना चाहता था परंतु वहाँ तो शक्ति का काम नहीं । जब देर के घर घर पर डाका पडा तो किसी को पकडा नहीं गया । कोई पकडने के लिए नियुक्त भी नहीं था । बन्दुक देव का आधे से अधिक धन उसे दिया गया है । उसकी मूल पत्नी तो उसे मिली नहीं । हाँ एक नवीन पत्नी मिल गई है । वो अब उन्हें अपना वही व्यवसाय करने लगा है जो पहले करता था । वही तो मैं कह रहा हूँ कि पता नहीं की बात करने में चतुराई की तुलना नहीं कर सका और यहाँ से पलायन कराये । ये भाई के लक्षण है । बृहस्पति मैं तुमको निर्भय करने आया हूँ कैसे हमारे मन में ये विश्वास बैठाकर वहाँ तुम्हारे लिए भय का कोई वातावरण नहीं है । जो कुछ तुम यहाँ कर रहे हो, यदि है किसी मानव के विपरीत नहीं है तो मैं इसके लिए भी भय करने की आवश्यकता नहीं । वहाँ विचार से बात की जाती है । हम भी विचार युक्त बात कर सकते हो । अपने विचार को स्वीकार कराने के लिए वहाँ का कोई भी व्यक्ति बल प्रयोग नहीं करेगा और तुम को भी आश्वासन देना होगा । तुम भी अपने विचारों का प्रयोग बाल से नहीं करोगे और यदि करूँ क्या होगा तो दूसरे भी बल प्रयोग करेंगे, इस प्रकार करेंगे । वे तो उधर जवान नहीं बना सकते हैं । उन लोगों ने पृथ्वी को प्राप्त कर भोगविलास का जीवन चलाना आरंभ कर दिया है । तो अपनी ही बात देख लो ना । तेरह तेरह पत्नियाँ क्या विलासिता का लक्षण नहीं तो हमारे पास कितनी है । हमारी माने तो तुम्हारा भी व्यवहार नहीं किया है और तुम स्त्रियों से निर्लिप्त तो हो नहीं । मेरा व्यवहार यहाँ की विधि से हुआ है, परंतु तुम्हारी भांति नहीं । एक ही रात में तेरह दे रहे उपस् थित हूँ । यहाँ से वहाँ की क्या विधि है? यहाँ विवाह तथा पत्नी नाम की कोई वस्तु रही युवती और युवक परस्पर मिलते हैं और जब किसी के घर पे ठहर जाता है तो उसको युवकों से मिलने नहीं दिया जाता हूँ । संतान होने के उपरांत उन्हें स्वतंत्रतापूर्वक अपनी इच्छानुसार युवकों से मिलती है, ऐसा प्रतीत होता है । यह बात तुमने वन पश्मीन सचिन की है परन्तु हमारा ढंग उनसे उन्नत है । इस अवस्था में कौन किस पिता की संतान हैं पता नहीं चलता हूँ । साथ ही है विधि अव्यवस्था उत्पन्न कर देगी । यहाँ पूर्ण समाज ही सब बच्चों के माता पिता है । बच्चे किसी की निजी संपत्ति नहीं होते था । कश्यप ने हसते हुए कहा, एक क्षेत्र में उत्पन्न अन्य की भर्ती क्षेत्र के स्वामी की संपत्ति होते हैं । यह पशुओं से भी निकृष्ट स्थिति है । हम में से सर्वश्रेष्ठ पद्धति मानते हैं । हम बच्चों का कोई सोनी स्वीकार नहीं करते और तुम क्या हो? मैं स्वामी नहीं हैं तो फिर मुझे उन को समझाने दो कि तुम एक अच्छी सम्मत दी नहीं दे रहे हैं । कैसे समझा हो गई? मैं इनके सामने ये सब कर दूंगा कि तुम इन सब को मरने के लिए तैयार कर रहे हो । पता यदि तुम किसी पर अनावश्यक आक्रमण के लिए कम हो गई तो तुम्हारा साथ छोड देंगे । और मैं आक्रमण करूंगा ही क्यों? तो फिर तुम्हारा ये झुकाओ लुक आओ तथा इनके प्रक्षेपण शस्त्रों का निर्माण किस प्रयोजन से है? ये तो वन पशु ने अपनी रक्षा के लिए क्या है? किसी मानव समुदाय से युद्ध करने के लिए नहीं । ऐसा कोई विचार नहीं । ठीक है, कल मैं हम पूरी की और लौट जाऊंगा । हम भी मेरे साथ । वहाँ चलो तो हमारा दक्ष कर्दम इत्यादि से अधिक मानने होगा । इसलिए तुमने अपने में कुशलता जो प्रकट की है तो मैं एक योग्य संगठन करता हूँ । तो तुम यदि वहाँ चलो तो तुम्हारी इस योग्यता के लिए तुम पुरस्कृत किए जा हो गए । इस प्रस्ताव पर बृहस्पति मुख देखता रह गया । उसे गंभीर भाव में विचार कर कहा, विश्वास नहीं होता । इस पर भी विचार करके बताऊंगा । अविश्वास की बात बताने के संबंध में नहीं थी । यह बृहस्पति के अपने साथियों के विषय में थी । उसने अपने माता पिता के कबीले वालों से पिता ने कि इतनी निंदा की थी । वे अत्यंत भडके हुए थे और उनको शाम तरफ सकना संभव प्रति नहीं होता था । राष्ट्रपति ने योजना बनाकर अपने साथियों को बता रही थी कि ब्रह्मपुरी पर आक्रमण कर न केवल अपने पुरखों की हानि का बदला लेंगे वरन यहाँ के अपार स्वर्ण भंडार को भी लूट लेंगे । एक सहस्त्र से अधिक धनुष मान से सुसज्जित योद्धा इस वन में एकत्रित थे । मैं सब तेज व्यवस्था में थे । इस विषय में परम तेजना का शो भ्रष्ट पति की माता सुनीति थी । माँ पुत्र को भी भडकाती रहती थी । सुनीति का तथा उनके माता पिता का भडकाना प्रभावहीन ही रहता । यदि बृहस्पति वेदवाणी पर श्रद्धा रख सकता हूँ । उसे जो कुछ इंद्रियों से अनुभव होता था, उसके अतिरिक्त वह किसी भी बात मानने के लिए तैयार नहीं था था । पिता में है कि जीवन निवान सा उसे अशुद्ध प्रतीत होती थी और वह समझने लगा था कि उस जीवन मिमांसा से मानव अंत में पशु बनने वाला है । इसी कारण मैं उस जीवन मिमांसा का विरोध करना मानव कार्य समझता था । इस उद्देश्य की पूर्ति में उसे अपनी माँ के पिता के परिवार के लोग सहायक मिल गए । सुनी थी कि माता पिता के कबीले वाले जीवन मिमांसा के विषय में कुछ नहीं जानते थे । उनको इसमें किसी प्रकार का विरोध अनुभव नहीं होता था । उनको तो बीस वर्ष पूर्व अपने कबीले वालों की पराजय की स्मृति कष्ट दे रही थी । इस कष्ट का प्रतिकार लेने में बृहस्पति उनका सहायक था । जब बृहस्पति ने अपनी योजना बनाई और उनको ब्रह्मपुरी आने का धन वैभव लूटने की आशा दिखाई तो सब तैयार हो गए । धनुषबाण बृहस्पति का अविष्कार था और इससे पशु हत्या में सुगमता देख सकते पसंद थे और ब्रहमपुरी पर आक्रमण की तैयारी होने लगी । एक बात बृहस्पति की चिंता का विषय ही वो थी । पता है कि योगविद्या यद्यपि उसमें इसका चमत्कार कभी नहीं देखा था, परंतु है उस के विषय में किंवदंतियां सोंचता रहा । ये अज्ञात भय था और उसका पार पाने के लिए उसकी योजनाएं थी कि पिता मैं को किसी प्रकार बंदी बना लिया जाए और तदंतर पूरी पर आक्रमण करें । कश्यप आया उसके मन में ये विचार हुआ । यदि पिता मै संपत्ति का सबसे सामान्य रूप में वितरण मान लें तो उसके ननिहाल के लोग अनायास ई धनसंपदा से युक्त हो जाएंगे और यदि वह यह नहीं मानेंगे तो अपने साथियों को लेकर पुरी में रहना आरंभ कर देगा । जब अपने लोग पुरी में रहते हुए परिश्रम करने लगेंगे तो वहाँ पूरी के भीतर ही विप्लब उत्पन्न करना सुगम होगा । इसी कारण उसने कश्यप को कहा था कि वह विचार करके बताएगा । कश्यप उसके साथ ही सहित कुटिया में ठहरा दिया गया और वह अपनी माता से विचार करने जा पहुंचा हूँ । उसने माता को बताया कि मरीची का पुत्र कश्यम उसे ढूंढता हुआ यहाँ पहुंचा है । वो यहाँ के योद्धाओं को धनुष मान लिए युद्ध के लिए तैयार देख चुका है । माँ अब क्या किया जाए? राष्ट्रपति ने पूछा हमने क्या विचार क्या है? वो कहता है कि वह पिता में से हमारी संधि करा देगा । संधि कैसे होगी? मैं उस पुरी में चलकर रह सकता हूँ । वहाँ हम में से कोई अथवा सब चल सकते हैं और वहाँ रह सकते हैं । वहाँ पडती भूमि पर अधिकार कर फल, फूल, कंदमूल तथा अन्य उत्पन्न कर सकते हैं । वहाँ के धनी मानी नागरिकों के घरों, उद्यानों अथवा क्षेत्रों में सेवा कार्य भी प्राप्त कर सकेंगे । मुझे इसमें किसी प्रकार की धोखाधडी प्रतीत होती है । पिता में है, अति बुद्धिमान हैं । इस कारण उनसे सबकुछ की आशा की जा सकती है । अच्छा उसकी बुद्धि का मानना बताओ उसकी बुद्धि का सामना बुद्धि से ही किया जा सकता है । बेटा हम पराजित हो जाओगे माँ अभी तो कहा करती हूँ कि वह योगशक्ति से गंगा नदी का बहना बंद कर सकता है । युद्ध में वो क्या करेगा, ये भी तो विचार नहीं है । मैं समझती हूँ या वो हो गया है उसमें वो शक्ति नहीं रही होगी जिससे गंगा का बहाव रोक सके । फिर भी यह शक्ति तो है उसका सामना करने के लिए भी वो कुछ करता होगा । इस पर तुम क्या विचार कर रहे हो? यही कि उससे संधि का लोग संधि में ये स्वीकार करवा लूँ कि हमारे लोग भी वहाँ रहते हुए जीवन निर्वाह कर सकें । जब हम सहस्त्रों की संख्या में वहाँ रहने लगे और साथ ही अपना संगठन रख सकें तो फिर एक दिन अवसर मिलते ही मैं पिता नहीं के स्थान पर जाकर रह जाऊंगा और पिता मैं सहित सब को रास्ता की श्रृंखला में बांध लूंगा । देख लो इसमें भी है । अभय की चिंता ना करो मा मैं कश्यप के साथ जाऊंगा और अपने साथ एक सौ के लगभग यहाँ के लोग ले चलूंगा । जब मैं वहाँ रहने लगूंगी तो तुम दो दो चार कर यहाँ के वनवासियों को वहाँ भेज देना । इस बार में पिताजी के घर पर नहीं रहूंगा । मैं अपना पृथक आवास बनाऊंगा और हमारे लोग मेरे आवास के चारों और अपने निवास स्थान बनाकर रहेंगे । इस प्रकार मैं वहाँ अपना एक पृथक नगर बनाऊंगा । तब एक दिन अवसर पाते ही सुनीति समझ गई और बोली ठीक है यदि किसी प्रकार की छलना हुई तो समाचार भेज देना और मैं अपने योद्धाओं के साथ हमारी सहायता के लिए पहुंच जाऊंगी । इस प्रकार अगले दिन कश्यप उसका साथ ही वनवासी तथा बृहस्पति और उसके साथ एक सौ से कुछ अधिक स्त्रीपुरुष चल पडे । सब ने अपने कंधों पर धनुष बाण लटकाए हुए थे । ये लोग वनस्थली से चले तो पांच दिन की यात्रा पर हम पुरी में जा पहुंचे । बृहस्पति ने अपने साथ ही पुरी के एक खुले स्थान पर बैठा दिए और कश्यप बृहस्पति को लेकर पिता में है कि निवास गृह पर जा पहुंचा पे काम है की स्वीकृति से वे उनके सामने उपस् थित हुए तो कश्यप ने पिता में है कि चरण स्पर्श किए और जब तक पिता मैंने बैठने को नहीं कहा बैठा नहीं मैं सम्मुख खडा रहा । बृहस्पति ने केवल नमस्कार की और पिता है कि संभव बैठ गया । पिता मैंने मुस्कुराते हुए कहा बैठो कश्यप कहाँ रहे इतने दिन भगवान दक्षिण के वन में बृहस्पति के रहने का पता चला था था वहाँ इसको ढूंढता रहा । कई मांस की खोज के उपरांत इसे पा सका और इस से यह आश्वासन देकर यहाँ से आया हूँ । आप इसके पूर्व के अनियमित व्यवहार के कारण इसे दंड नहीं देंगे । दशक देख रहा था बृहस्पति ने अपना व्यवहार ऐसा बना रखा है कि मानव है, पिता में है कि सामान है । इस कारण पितान है कि रुष्ट होने की रोकने के लिए उसने अपने इस आश्वासन की बात सुना दी । पिता मैंने कहा इसके जितने साथ ही थे, उनको हमने कभी कष्ट नहीं दिया । नहीं उन्हें किसी प्रकार का दंड देने का कभी विचार किया था । बृहस्पति हमने हमारा किसी भी प्रकार से अब कार नहीं किया । इस कारण हमारे मन में तुम्हारे विरुद्ध किसी प्रकार का भी विचार नहीं था । इस कारण हम तुमको दंड नहीं दे सकते थे । फिर भी तो मैं एक बात समझ लेनी चाहिए । जब तुम किसी का आप कार करोगे तो निस्संदेह वह उस अब कार का प्रतिकार लेगा । तुमने समाज का अपमान किया था तो तुमने समाज में रहने के ढंग को अस्वीकार कर दिया था । यदि अब भी तुमने समाज का किसी प्रकार से अनिष्ठ क्या समाज तुम पर रूष्ट होकर प्रतिकार लेगा? परन्तु पिता में जब समाज के नियम नियम हो जाए तो उनका भंग करना क्यों होगा? अनियमित व्यवहार भूल है और भूल का विरोध होना चाहिए । उपराष्ट्रपति सब ठीक रहते हो परन्तु इस बात का निर्णय कौन करेगा? समाज का नियम खाने कर है अथवा अन्य आयुक्त है, यह समाज ही निर्णय कर सकता है । समाज को चेतावनी दी जानी चाहिए । फिर काम है एक अत्यंत अहानिकर नियम । आपने प्रतिपादित किया मैंने उसके संबंध में जिनको हानि हो रही थी उन को चेतावनी दे रही है । उन्होंने उप देव को लूटा, बताओ उसमें क्या हुआ? ये बात तो मुझे किस लिए पूछते हो । जिस समाज को तुम ने चेतावनी दी थी उसी से जाकर पता करो कि उन्होंने तुम्हारा कहा मना क्यों नहीं? आपने पुल है, उनको पथभ्रष्ट कर दिया है । ये भी तुम उनसे ही पूछो । मैंने उनको क्या कहा है? जल्दी वे बहकाए गए हैं तो क्यों? भगवन अब आया हूँ तो उनसे पूछूंगा ही और उनको पुनः सीधे मार्ग पर ले जाने का यत्न करूंगा । ठीक है, मैंने इससे मना नहीं किया और एक बात तो मैं समझ लेनी चाहिए कि तुम्हारी और कश्यप की अनुपस्थिति में एक यह नियम स्थापित हो चुका है । यदि कोई बलपूर्वक मनमानी चलाए तो उसको बाल से रोका भी जा सकता है । परिणाम यह हुआ युव देव ने अपनी रक्षा के लिए कुछ संरक्षक नियुक्त कर रहे हैं और वे शस्त्रास्त्र सचित हैं । ऐसे शस्त्रों से सुसज्जित हैं ये उसको विदित हो जाएगा, जो अब उसके घर पर डाका डालने आएगा । अभी बातचीत चल ही रही थी कि पिता में है कि सेवक ने भीतर आकर कहा पिता में पता नहीं मुझे उठाकर पूछा हैं क्या कहते हो महाराष्ट्र पूरी पर कुछ वनवासियों ने आक्रमण कर दिया है । ट्रंप फिर हमने तो ये नियम बना रखा है । जो किसी पर अत्याचार करेगा, वो पाई है और प्रताडित व्यक्ति ताई को दंड देने का अधिकार रखता है । धम्मा ने सूचना लाने वाले को कहा, पर भगवन बहुत अधिक संख्या में हैं । समाचार लाने वाले ने कहा नगरवासियों की संख्या से भी ज्यादा वो तो नहीं, परन्तु वो एक प्रकार के अस्त्रों से सुसज्जित हैं । उन अस्त्रों से पूरी वासियों की हत्या कर रहे हैं । अच्छा हूँ और देखो कि वे भाग गए हैं तो नहीं । आपने शास्त्र छोडकर अधीनता स्वीकार करें । उन्हें यहाँ आश्रम में बंदी बना कर लेता हूँ । सेवक तो ये देख कराया था कि ब्रह्मपुरी के नागरिक वनवासियों के बाणों से घायल हो । भावविभोर होकर घरों में छिप रहे थे । यहाँ पिता में कह रहे थे कि वनवासी भाग रहे हैं, फिर भी पिता मैं के आदेश के अनुसार वह भागा हुआ आश्रम से वनवासियों के आक्रमण स्थल की और चला गया । जब सेवक चला गया तो पिता मैंने बृहस्पति से पूछ लिया, ये वनवासी तुम्हारे साथ आए प्रतीत होते हैं था । एक सौ से ऊपर आए हैं तो उनको यहाँ क्यों नहीं ले आए? मैं आप से जानना चाहता था कि उनको कहाँ रह रहा हूँ । कुछ अन्य कबीलों के लोग भी नगर की सुविधाओं से लाभ उठाने के लिए यहाँ आ रहे हैं और वो भी बिना मुझसे पूछे नगर के बाहर अपनी इच्छानुसार अपनी कुटिया बनाकर रहते हैं । देवर मुख्यमार्गों के अतिरिक्त कहीं भी स्थान लेने की स्वीकृति है । परंतु मैंने उनसे कहा था वे शांति से रहे । मैं उन्हें वृक्षों के एक झुरमुट के नीचे बैठा कराया था । वो सूचना सूचना दे । बृहस्पति उठते हुए बोला मैं उनकी अवस्था देखने जा रहा हूँ । प्राय सभी यहाँ लाए जा रहे हैं तो मैं जाने का कष्ट करने की आवश्यकता नहीं है । राष्ट्रपति अभी विचार ही कर रहा था, जाएँ अथवा नहीं या फिर वही ठहरे । बाहर बहुत से लोगों का हल्ला सुनाई देने लगा । किताब है आश्रम की जल्दी शाला में आकर खडे हो गए । यज्ञशाला के सम्मुख मैदान में सत्तर अस्सी के लगभग वनवासी स्त्रीपुरुष ब्रहमपुरी के नागरिकों से घिरे हुए वहाँ खडे थे बृहस्पति और कश्यप दोनों पिता नहीं से कुछ पीछे हटकर खडे थे । नगर का एक मुखिया पिता उन्हें को देख आगे बढाऊं और हाथ जोड प्रणाम कर बोला भगवान! ये लोग सोमनाथ के उद्यान में एकत्रित हो गए थे । नागरिक उनको देखने वहाँ जा पहुंचे थे । नागरिक इनसे कुछ अंतर पर खडे थे । एक किसी के आदेश पर इन लोगों ने अपने कंधों पर रखे अस्त्र तारें और तीव्र नोकदार शहर रख नागरिकों पर छोडने लगे । नागरिक घायल हो भागने लगे तो उन्होंने पीछा करते हुए नगर में घुसकर लूट मचा दी । कुछ ही काल में नागरिकों ने अपने को संगठित कर लाठियों से इन पर आक्रमण किया । वे अपने अस्त्र उतारकर छमा मांगने लगेगे भगवन इनके छरों से चालीस के लगभग नागरिक घायल हुए हैं और नागरिकों की लाठियों से दस बनवासी तो मारे गए हैं और बीस के लगभग घायल महर्षि अत्रि के निवास स्थान पर नहीं किए गए हैं । पिता मैंने मुखिया के कथन पर किसी प्रकार की अपने मन की प्रतिक्रिया बताएँ बिना बृहस्पति से पूछा, बताओ तुम क्या कहते हो? मैं अपने व्यक्तियों से पूछना चाहता हूँ कि ये दुर्घटना कैसे हुई है? यद्यपि मुझे विश्वास है कि मुखिया अमृत भाषण नहीं करता हूँ । फिर भी मैं जानना चाहता हूँ कि ये लोग क्या कहते हैं । बृहस्पति ने आगे बढकर एक वनवासी को अपने सामने बुला पूछ लिया । ये घटना किस प्रकार हुई है? वनवासी ने अपनी भाषा में कुछ बताया तो बृहस्पति पिता है की और मैं घूमकर बताने लगा कि बनवासी क्या कह रहा है । परन्तु पूर्व इससे बृहस्पति पिता मैं को बनवासी की बात बताए । वनवासियों में से स्त्री लगभग कर जब द्विवेदी के समीप परन्तु नीचे आकर खडी हो गई और बृहस्पति से कुछ कहने रही राष्ट्रपति उससे वहाँ विवाद करने लगा । पिता में है उस तरीके मुख पर क्रोध का भाव देख रहा था । साथ ही वह प्रवक्ता वनवासी के मुख पर भय और लग जा के लक्षण देख रहा था । पिता में है उनके मुख पर अंतर भावों से हम अपने अनुमान से सब समझ गया । उसने बृहस्पति को डांट के भाव में कहा । राष्ट्रपति मैं समझ गया हूँ स्त्री क्या कह रही है और तुम उसे सत्य कहने से घुमा रहे हो । थोडा इस विवाद हो । बताओ ये पुरुष और स्त्री क्या कहते हैं हम स्वयं अनुमान लगाएंगे । अकाउंट सत्य कहता है पर पिता में बृहस्पति को चढकर कहा आप समझ रहे हैं तो फिर मेरे बताने की आवश्यकता नहीं । आप बताइए कि अब वे क्या करें? बृहस्पति पुरुष ने दोष नागरिकों का बताया है । उसका इनकी और से किसी बात के पहल किए जाने की बात कही है । परंतु उस स्त्री ने इसे मिच्छा कहाँ है? जब भी इस पुरुष का नागरिकों के विपरीत आरोप में समझ नहीं सका परमप्रिय है, निर्विवाद है । उसने झूठ बोला है । स्त्री ही उसके झूठ बोलने की बात कही है । वो सब होने पर भी मैं कहता हूँ यदि तुम्हारे लोग वन को लौट जाना चाहे । मैं इन को स्वीकृति दे सकता हूँ, ये जाने के लिए स्वतंत्र हैं । यदि यह नगर में रहना चाहे तो रह सकते हैं । इनके लिए स्थान की व्यवस्था नगर का मुखिया कर देगा । परंत ये वहाँ पर धनुष बाणों के बिना रहेंगे । साथ ही इन को किसी के फल उद्यान में से बिना मूल्य दिए फल तोडने की स्वीकृति नहीं है । मूल्य परिश्रम करने से इन को मिल जाएगा । परिश्रम महर्षि अंगे्रजी बताएंगे । पारिश्रमिक रज्यों में मिलेगा और उससे ही अपनी आवश्यकताओं को क्रय कर सकेंगे । इसके अतिरिक्त वन के फल कंदमूल वे स्वेच्छा से प्रयोग कर सकते हैं । नगर में रहने के लिए सब्जियों के से वस्त्र पहनने होंगे । प्रथम बार के लिए हम नगर के मुखिया को आज्ञा देते हैं । इस वर्ग को उचित वस्त्र दे दें और जो इनके पुरुष मर गए हैं । राष्ट्रपति ने पूछा युद्ध में मरने के कारण स्वर्ग प्राप्त करेंगे और जो नागरिक मारे गए हैं, मुखिया की सूचना है कि कोई मरा नहीं घायल हुए हैं । उनके घावों पर औषधि लगा दी गई होगी । बृहस्पति इतने से संतुष्ट था । इसका अर्थ वह समझा था, पिता में है । उन वनवासियों को लूटमार करने के लिए दंड नहीं दे रहे और नहीं उनको इन उच्च ठंड वनवासियों को साथ लाने के कारण अपराधी मानते हैं । इसी प्रसन्नता में उसमें पूछा मुझे क्या गया है? आ जाओ कुछ नहीं । यहाँ सब स्वतंत्रतापूर्वक धर्म का पालन करते हैं तो उनको भी करना चाहिए भगवान जो बात आज तक मेरी समझ में नहीं आई, वो ये धर्म ही है । बिना जाने इसका पालन कैसे कर सकूंगा, वो मैं बता दूंगा । बृहस्पति ने उसी वनवासी को झगडे का वृतांत बता रहा था । कह दिया कि वह अपने सब साथियों के साथ नगर के मुखिया द्वारा बताये स्थान पर रहे । उसने यह भी कहा, मैं पिता में ऐसे अन्य बातें जन का नहीं आता हूँ जहाँ आपको ठहराया जाएगा । इतना कहकर पितान है की साथ आवाज के भीतर चला आया । इस समय कश्यप ने भी कम है से कहा था मैं मुझे अपनी पत्नियों को छोडे । तीन मांस के लगभग होने जा रहे हैं । मुझे स्वीकृति दी जाए तो मैं उनसे मिलने के लिए जाऊँ । बृहस्पति हस पडा फसकर उसने कहा था मैं इसे स्वीकृति दी जाए ये देखें इसके क्षेत्र में कोई अन्य तो नहीं प्रविष्ट हो गया कश्यप गया तो पिता मैंने पूछा हूँ राष्ट्रपति मैं जानता हूँ कि कश्यप की पत्नियां प्रसन्न और सुरक्षित हैं । यहाँ कोई ऐसा व्यक्ति नहीं रह सकता । चोर हो, अमृत भाषी हो अथवा कामनाओं से पीडित हो उस की तेरह पत्नियां इसने काल तक काम से उत्पीडित नहीं । नहीं नहीं काम वासनाओं का बडा पुत्र है । जब कामनाएँ ही नहीं तो पुत्र कहाँ से आ गया । कामनाओं की शांति सत्संग से होती है, कामनाओं के भोग से नहीं हो प्रज्वलित कामनाओं पर जी का कार्य करता है । इन की शांति का उपाय विवेक और संयम है । कश्यप की पत्नियां नृत्य साईं वहाँ वेद का प्रवचन सुनने आती हैं और उनकी कामनाएँ शांत रहती हैं । मैं जानता हूँ मैं एंड तेरह जलती हुई लकडियों से मेरा अभिप्राय है कि सुंदर युवतियों को एक जिले से बांध कर रखना क्या पाप नहीं है । मैंने इनको किसी भी जिले से नहीं बांधा । इनमें से प्रत्येक स्वतंत्र है वो जहाँ चाहे जा सकती है । हम वहाँ साईं प्रवचनों में उनकी कामनाओं को शांत करने का यत्न करते रहे हैं । पिता महीने बाद बदल दी । बृहस्पति से पूछने लगे हमने विभाग क्या है या नहीं उस ढंग से नहीं की जिस ढंग से यहाँ विवाह होते हैं । फॅस तरीको आपने कभी लेके पुरुष के वक्तव्य को गलत बताने के लिए यज्ञशाला के समीप खडी हुई थी । आज तक मेरी पत्नी के रूप में मेरे साथ रहती है तो पहले किसी अन्य के साथ रहती थी । इसका वृतांत ज्ञात नहीं है । मुझे अति सुंदर प्रतीत हुई थी । इस कारण जिस पुरुष के साथ भी उसको मारकर मैंने इसे वार लिया है, अब रहते दिनभर वन में घूमती है और रात को मेरे शयनागार में होती है । पिता नहीं ने विचार करके पूछा इसके अतिरिक्त भी तुम्हारे शरीर नासार का भोग कोई करती है, बहुत रह चुकी हैं । मुझे उनकी गणना स्मरण नहीं परंतु जब से वो आई है तब से किसी अन्य का साहस नहीं हुआ । इसको वहाँ आने से रोकें और स्वयं आ रहे हैं । पिता में हंस पडे और बोले तब तो प्रशासन सबसे अच्छी स्थिति में है । उसकी कोई भी पत्नी किसी दूसरे को न तो कश्यप के शयनागार में जाने से रोकती है और न ही एक के वहाँ होते । दूसरी वहाँ घुसने की इच्छा रखती है । अधिकार कश्यप का है । किसको आपने शयनागार में स्वीकार करता है तो एक पृथक बात है कि वो अपनी पत्नियों की इच्छाओं का मान करता है । ये बात मुझे कश्यप ने बताई है परन्तु मुझे इस पर विश्वास नहीं आया । शरीर की मांग की पूर्ति करनी ही पडती है । वास्तविक बात ये है कि विषयों का चिंतन करने से कामनाएँ उभरती हैं । कामनाओं की पूर्ति के अभाव में क्रोध उत्पन्न होता है । अब विवाद होते हैं और विनाश होता है । पता इस दूषित श्रृंखला के उद्गम स्थान अर्थात विषयों के चिंतन को ही रोकना चाहिए । बीच में वह श्रृंखला नहीं टूट सकती और विषयों का चिंतन चिंतन से ही रोका जा सकता है । उसके लिए सब संग है । साधु महात्माओं की संगती से वह संभव है । बृहस्पति की रुचि इस विषय में नहीं थी । वो समझता था की अर्थव्यवस्था में सुधार हूँ । ब्रहमपुरी की अर्थव्यवस्था, गुण, कर्म, स्वभाव और परिश्रम से संबंधित थी । राष्ट्रपति चाहता था कि अर्थ जिस किस प्रकार से भी उपलब्ध क्यों ना हो, मानव समाज की साझी संपत्ति है और कोई ऐसा ढांचा होना चाहिए जिससे अर्थ का वितरण सामान्य भाव में हो सके । राष्ट्रपति ने कह दिया, मैं आपकी अर्थव्यवस्था को पसंद नहीं करता । इससे धन एक स्थान पर एकत्रित हो जाता है और हो रहा है । पिता महीने मुस्कराते हुए पूछ लिया धन क्या है? यह परिश्रम का एक रूप है । ठीक है, परंपरिक व्यक्ति थलों की ऋतु में अधिक परिश्रम कर फल संचय कर लेता है और जब फल उपलब्ध नहीं होते तो वहाँ उनको निकालकर प्रयोग करता है । इसमें क्या हानि है तो सब करते हैं । कुछ लोग ये करते हैं कि फलों का संचय नहीं करते हैं । विफल को रजत ओके विनिमय में दूसरों को दे देते हैं और फिर रजत ओं से अपनी अन्य वस्तुएं जब उन की आवश्यकता होती है, कराये कर लेते हैं तो तुम इस बात का विरोध करते हो? नहीं, यह स्वाभाविक ही है । तो तुम क्या इस बात का विरोध करते हो? एक व्यक्ति अपनी युवावस्था में जब वह अधिक परिश्रम कर सकता है, करता है और भूख के उपरांत शेष परिश्रम के विनिमय में रजत बटोर रखता है और अपने वृद्ध अवस्था में प्रयोग करता है । नहीं वह भी नहीं । तो क्या तुम इस बात का विरोध करते हूँ । एक पिता विशेष बुद्धि रखने के कारण अधिक परिश्रम से धन को संचित कर अपनी संतान को दे देता है । हाँ, यह घोर अन्याय होगा । इससे धन के बल से धन उपार्जन में सहायता मिलती है । तुम ये चाहते हो कि किसी पिता के देहावसान के समय वह अपने पुत्र को कुछ नहीं देगी । अपना परिश्रम तो वह दे नहीं सकता हूँ । इस कारण वह परिश्रम का प्रतिरूप धन दे सकता है । भला हो क्यों ना देखें इस कारण की जिसमें परिश्रम नहीं किया, उसको किसी अन्य के परिश्रम का फल मिल जाता है तो उस दिन का क्या किया जाए? क्या वो गंगा नदी में वहाँ दिया जाए? नहीं, उसका समाज में वितरण कर दिया जाए । आधार वह धन उनको मिल जाए जिन्होंने उसके अर्जन के लिए परिश्रम नहीं किया । तब हमने मना क्या किया है? उन कहते हो कि उसके पुत्र थोडा मिले तो किसने? परिश्रम नहीं किया तो दूसरों को दे दिया जाए । परिश्रम तो उन्होंने भी नहीं किया । मेरी मुख्य आपत्ति धन का एक स्थान पर एकत्रित होना है तो इस अतिरिक्त धन का वितरण होना चाहिए । यही कह रहे हो ना उसका एक उपाय । मैंने विचार क्या है, वह दान है । इसका गुण यह है कि परिश्रम करने वाला ही स्वेच्छा से अपने अतिरिक्त परिश्रम के फल का वितरण करता है और वहाँ करता है जहाँ है पसंद करता है । मैं चाहता हूँ कि उस वितरण में दूसरे भी सहमती दे सकें, परंतु मैं बल प्रयोग से ऐसा करना ठीक नहीं मानता हूँ । जिसने धनोपार्जन किया है, उसी को प्रेरणा देकर लोक कल्याण के कार्यों के लिए दान दिलवाना ही ठीक मानता हूँ । मैं प्रेरणा देकर उसे अपने ढंग से वितरण करवाना चाहता हूँ । ठीक है, बिना बल प्रयोग करो । प्रभारी वनवासी जो करने लगे थे, उसकी स्वीकृति नहीं दी जा सकती । बृहस्पति मैं बात नहीं मानते । इसी से तुम मेरी बात को समझ नहीं सकते हैं । वो है मनुष्यों में एक आत्म तत्व की विद्यमानता । आत्मतत्व का लक्षण चेतना है । चेतना अर्थ है किसी कार्य को आरंभ करने, उसे चालू रखने और उसका अंत करने की इच्छा । कोई काम कब, कैसे और किस दिशा में आरंभ किया जाए, चारु रखा जाए अथवा समाप्त किया जाए, वह मनुष्य में आत्मा करती है । यदि उसके इस उपकरण को तुम छीन लोगे तो निश्चय जानो । तुम उसकी चेतना को छीन रहे हो था तो हूँ उसकी हत्या कर रहे हो । यदि किसी की विशेष प्रतिभा, सामर्थ्य और परिश्रम से उपलब्धि को तुम किसी पात्र कुपात्र में वितरण कराना चाहते हो तो प्रेरणा से कराओ । किसी का नाम मैंने ध्यान रखा है । बृहस्पति कुछ ऐसा समझने लगा था कि वे एक वृताकार में घूमते हुए किसी परिणाम पर नहीं पहुंच रहे था । वह पिता मैं से अवकाश लेकर चल दिया । पिता में है या समझ रहा था कि वह निरुत्तर होकर जा रहा है । यथार्थ बाद ये थी कि वह आत्मा परमात्मा के विषय में विचार ही नहीं कर सकता था । बृहस्पति के वनवासी साथियों के लिए नगर के बाहर एक वन में रहने का प्रबंध कर दिया गया । वह एक दिन अपने पिता महर्षि अंगीरा से मिलने गया है । उसके लौटने के पंद्रह दिन उपरांत की बात थी । महर्षि अंगीरा को अपने पुत्र के साथ आए वनवासियों के दुष्कर्म का ज्ञान हो चुका था । वह पुत्र से मिलकर उसे समझाने का यत्न करना चाहता था परन्तु इस भाषा में वह स्वयं अपने पिता से मिलने आएगा । अपने निवास स्थान पर ही उसकी प्रतीक्षा कर रहा था । महर्षि अंगीरा अग्नि का उपासक था । वह अग्नि के गुणों को जान उससे भारती भारती के लाभ उठाने का यत्न कर रहा था । अपने निवास स्थान के समीप थी । उसने अग्नि संबंधी परीक्षणों के लिए अपनी प्रयोगशाला बनाई हुई थी । वहाँ अपना संपूर्ण समय उसमें व्यय करता और अपना लाभकारी ज्ञान दूसरों को सिखाता था । सीखने वाले शिष्य उसके प्रतिकार में धान देते थे । इससे अंगीरा सब महर्षियों से अधिक धनवान हो रहा था । उसने अपने भव्य निवास स्थान को प्रत्येक प्रकार की सुख सुविधा से युक्त बना रखा था । इसने उसे कभी विश्वास ही नहीं होता था कि उसकी पत्नी कुरीति क्यों इस सुख सुविधा से संपन्न घर को छोडकर वनों में जाकर रहती है । अपुत्र को भी उसके सामान ही बुद्धि वाला देखकर वह पुत्र से इसका कारण जानने के लिए उत्सुक था । बृहस्पति पिता के घर पर जाने के स्थान पर वनवासियों के साथ एक कुटी बनाकर रहता था । उसके त्याग और तपस्या का प्रभाव तो नगरवासियों पर भी हो रहा था और वह उसकी बात सुनने भी जाने लगे थे । किस प्रकार बृहस्पति को भ्रम पुरी में आए हुए एक पखवाडा व्यतीत हो चुका था । एक दिन उसकी समझ में आया या वो स्थिर हो गया है तथा उसे अपने पिता से मिलने जाना चाहिए वह । उस दिन भी वह उस दिन प्रातः सूर्योदय के समय पिता के घर पर जा पहुंचा । महर्षि अंगिरा यज्ञवेदी पर बैठे हुए हवन कर रहे थे । उसके दक्षिण अंग की और महात्मा श्रमिक बैठे थे और वाम कक्ष में बृहस्पति की विमाता सावित्री महार्षि अंगीरा मंत्र उच्चारण कर रहे थे और सावित्री यज्ञकुंड में आहुति डाल रही थी । शौमिक मुनि मंत्रोच्चारण की मधुर ध्वनि पर मुक्त महर्षि और उनकी पत्नी को देखते हो रहे थे । महर्षि के सामने जब कुंड के दूसरी और कुछ शिष्यगण थे भी जग्य में मंत्र चैनल से सहयोग दे रहे थे । इस समय बृहस्पति यज्ञशाला में यहाँ वसत हुआ । महर्षि अंगिरा ने आप के संकेत से उसे शिष्यगण में बैठ जाने को कहा और मंत्र पाठ में संलग्न रहा वो चारण कर रहा था वे दस से वह मित्र शुरू, प्रतिष्ठा ग्यातो, मौका बहूऍ । पदमपुरी निपुर । ओये भरण मैं मिष्ठान शर्मा प्रतिमा भी अज्ञात सम विषम वह रहा स्वान हाँ सोनम तनवंत प्रतिबंद आयु हूँ ये धम शक एम हत शाह नक्ष मना योग जीवन था शर्मा पुरुष इस प्रकार मंद के उपरांत मंत्र उच्चारण करते हुए यज्ञ चल रहा था । मैं राष्ट्रपति समझ नहीं सका । इस प्रकार भावों वाले मंत्रों का उच्चारण करने से लोग क्या सिद्ध करना चाहते हैं और इनका प्रभाव समाज पर क्या होगा? इतना तो वह समझ रहा था । ये मंत्र दूर से आए परिश्रम न करने वाले लोगों के विषय में है । आधार उसके साथियों के विपरीत अगली को आह्वान है परंतु अग्नि उनको किस प्रकार संतप्त करेगी रे तो इस अग्नि की बहुत से बहुत दूर है । अतः मंत्रालयों को समझता हुआ वो गंभीर विचार में पडा हुआ बैठा था । यह समाप्त हुआ और पूर्ण होती के उपरांत महर्षि अंगिरा ने आसन से उठते हुए बृहस्पति को संबोधन कर पूछा, राष्ट्रपति यहाँ नहीं का अवकाश मिल गया है । वहाँ पिताजी मेरा भी परिवार बन गया है और उसका प्रबंध करने में इतने दिन लग गए हैं और तुम्हारी मानता कहाँ है? वह वनस्थली में हैं । शेष परिवार के लोग वहाँ हैं और वह उन का प्रबंध करती है । कितने लोग हैं? यहाँ हमारे साथ एक सौ लोग आए थे । इनमें से दस पहले ही दिन मारे गए थे और दो उसके बाद मारे हैं । ये बताया गया है कि उनमें से कम से कम एक को तो तुम नहीं भरवाया है और दूसरे के विषय में कहा जाता है कि उसके किसी साथी ने अपने निजी बेहर के कारण उसे मार डाला है । बृहस्पति सबके सामने कुछ भी कहना नहीं चाहता था । इस कारण मौत था । फिर भी उसे जिसमें हो रहा था कि जहाँ पिता में पर बैठे सब सूचनाएं रखते हैं वहाँ उनका पिता भी उन के विषय में सूचना रख रहा है । उसे मॉम देख पिता ने अपनी पत्नी सावित्री को कहा, राष्ट्रपति भी प्राप्त है का आहार यहीं करेगा । राष्ट्रपति ने मना नहीं किया । मैं जिसमें कर रहा था की उसके पिता को ये ज्ञान है कि उसने अपनी पत्नी कमला को इस कारण मरवा डाला है कि उसने वनवासियों के विपरीत पिता में है कि सम्मुख हल्ला किया था उसे जिसमें इस बात का था कि पिता ही जानता था । पिता ये जानता था कि उसे अपने भोजनालय ने भोजन देने की वो बात कर रहा है । वो अभी भी मौत था । कारण ये कि कुछ बाहरी लोग वहां मौजूद थे । ग्यारह शिष्य थे और शौमिक मुनि थे । अंगीरा नहीं छोडने का परिचय दिया और कहा ये एक दूर आश्रम से अथर्व विद्या सीखने यहाँ आए हैं । वैसे ये बहुत संपन्न ऋषि हैं । इनका आश्रम यहाँ से अधिक समृद्ध है । शिष्यगण प्रयोगशाला में चले गए थे और महर्षि अतिथि यौनिक और पुत्र बृहस्पति के साथ भीतर आए तथा कुछ काल तक बैठक घर में बैठ बहुजन तैयार होने के समाचार की प्रतीक्षा करने लगे छोडने के बाद आरंभ कर दी । उस ने कहा आचार्यवर मैं अशुद्ध धातु को शुद्ध करने में अग्नि का प्रयोग सीखने आया हूँ । वहाँ से अंगिरा ने कहा ऋषिवर! केवल इतना ही पर्याप्त नहीं कि शुद्ध धातु निकली जाए और ये भी जानना चाहिए युज धातु को संस्कारित करने की भी आवश्यकता रहती है । बिना उसका संस्कार किये है उतनी लाभदायक नहीं होगी जितनी की होनी चाहिए । हमने यहाँ प्रयोगशाला में शुद्ध लोहे को संस्कारित करने के लिए परीक्षण किए हैं । संस्कारित लोहा भर बुरा नहीं रह जाता । इसे गर्म कर बारीक तारों में खींचा जा सकता है । इतने तीसरे शस्त्रास्त्र बनाए जा सकते हैं । मैंने ऐसे खडक बनाए हैं जिनकी सहायता से एक ही बार में किसी का भी सिर काटकर रखा जा सकता है । ये सुनकर की लौ से अतीत तीक्षण अस्त्रशस्त्र बन सकते हैं । बृहस्पति पिता की बातों में रूचि लेने लगा । वह दत्तचित्त होकर सुनने लगा । अंगीरा ने आगे कहा, मेरे इस सापुतारा बृहस्पति में भी पिता की प्रतिभा तो है परंतु विनय और शिष्टाचार नहीं । इसने वनों में रहते हुए एक ऐसा अस्त्र तैयार किया है जिससे सौ पकड दूर खडे शत्रु को घायल किया जा सकता है । हमने उस अस्त्र का नाम धनुष बाण रखा है परन्तु हमने एक ऐसे धनुष का आविष्कार किया है जो आकाश में उडते पक्षी का पीछा कर उसको मारकर भूमि पर ले आता है । इनका बांध तो धनुष के डोरे केबल से दूर फेंका जा सकता है पर तो हमने अपने बाढ को फेंकने के लिए अगली की शक्ति का प्रयोग किया है । बृहस्पति से मौन नहीं रहा गया । उसने आंशिक रूप से उत्सुकता और आंशिक रूप से व्यंग के भाव में कहा, परन्तु पिताजी आपके इस स्तर को हमने वनवासियों पर प्रयुक्त होते नहीं देखा । इस प्रश्न का आशय समझने के लिए पिता पुत्र का मुख देखने लगे । पिता को मोहन देख पुत्र ने एक बात और कह दी हमारे धनुषबाण तो एक व्यक्ति एक दिन में बीस तक बना सकता है । वनवासियों के सब धनुष नागरिकों ने पहले ही दिन तोड दिए थे । हमारे लोगों ने एक ही दिन में उससे दुगने धनुषबाण निर्माण कर लिए हैं । अंगीरा ने मुस्कुराते हुए कहा हम नहीं चाहते थे व्यर्थ में नरहत्या की जाए । यदि वैसे अस्त्र जनता के हाथ में होते तो तुम्हारे परिवार का अब तक एक भी व्यक्ति तुम्हारी सेवा के लिए उपस्थ इतना होता हूँ । पिताजी ये तो आपकी बहुत कृपा हुई है । एक प्रभाव और कर दीजिए । हम को भी उन आगने वस्त्रों का निर्माण बता दीजिए । आप की कृपा कि आश्रय हम नहीं रहेंगे । हम सोनम उनसे निपटा लेंगे तो हमें मारने के लिए उद्यत होंगे । एक है मैं सिखा सकता हूँ परन्तु उनको सीखने के लिए विवेक बुद्धि की आवश्यकता रहती है । हम अपनी खोज के परिणाम केवल विवेक वालों को ही देते हैं । पिताजी हमने रेट है । हम सांसारिक वैभव को मिथ्या और व्यर्थ का झंझट मानकर छोड चुके हैं । इस से बढकर त्याग और तपस्या और क्या हो सकती है कि हम सर्वथा सरल और व्यावहारिकता से शांतिपूर्वक यहाँ रहते हैं । हम देख रहे हैं की तुम लोग इस नगर के अन्य रहने वालों को देखकर अपना व्यवहार युक्तियुक्त तथा अनुकूल बना रहे हो । जब हम देखेंगे कि आप लोग सर्वथा शांति में हो गए हैं तब हम तुम्हारे परिवार के लोगों को अपने समाज में सम्मिलित कर उन को भी उन्नति के पथ पर डाल देंगे । इस समय सूचना मिली कि भोजन तैयार है । तीनों पुरुष भीतर भोजनालय में जा पहुंचे, आसन लगे थे और तीनों आसनों के समूह पतले भी अच्छी थी । उन पर मिट्टी के कुल्हडों में जल रखा था । तीनों हाथ होकर आशन पर बैठ गए । भाषी की पत्नी सावित्री भी उनके सामने एक आसन पर बैठ गई । वहाँ पत्तल नहीं लगी थी । सावित्री ने अपने आसन पर बैठने पर पुकारा । कमला हम ना एक लकडी चेक उठाने में, दूध में उबला हुआ एक प्रकार का अन्य ले आई । एक लकडी की कलछी से वह अन्य को पत्रों पर टालने लगी । बृहस्पति अवाक उस लकडी को देखता रह गया । ये वही कमला थी जिसने वनवासियों के विचारों का आदर करते हुए मृत्युदंड देकर मरवा डाला था । मर जाने के उपरांत कमला का शव जंगल में ठुकवा दिया गया था । जब वह लडकी उनके सामने बिची पत्थल पर अन्य डाल रही थी तो उसने पूछ लिया, तुम हमला हो । कमला ने बृहस्पति की और देखा और मुस्कुराकर शेष बचा अन लिए हुए भीतर रसोई घर में चली गई । ट्रोनिक मुनि! तो बृहस्पति के उस प्रश्न का अर्थ समझा नहीं, अंगीरा समझ रहा था, फिर भी वो मौन था । पिता को चुप देख बृहस्पति ने पूछा वो कौन थी जो ये भरोसा रही थी, मैं तुम्हारी प्रेमिका है । उच्चतम ने मरवाकर वन में भिजवा दिया था । हमारे एक नागरिक ने इसको जीवित परन्तु अचेत पडे देखा उठाकर महर्ष यात्री के पास ले गया । उन्होंने इसे औषधि देखा । ठीक किया तो इसमें इस घर में सेवा कार्य करने की इच्छा प्रकट की । पांच यात्री ने इसे वहाँ भेज दिया । उसने बताया, ये तुम से प्रेम करती थी तो तुमने उसके पिता नहीं के समूह सत्य बात कहने पर अपने सेवक से उसका गला घोट मरवाने का यत्न किया था । वो मच गई और अपने पे भी ये माता पिता के घर में रहने की इच्छा करती है । बृहस्पति विषय में पिता का मुख देखता रह गया । पिता ने खाना आरंभ करते हुए कहा इसे हम चीर कहते हैं । धान की गुठली निकाल उसे भूसे से साफ कर दूध नहीं उबाल कर बनती है से और भी स्वादिष्ट करने के लिए इसमें दूध डाल दिया जाता है । बृहस्पति इस चीज बनाने के ढंग को नहीं सुन रहा था । उसका ध्यान कमला की बात विचारने में लगा हुआ था । ने कहा, हमला मुझे प्रिया थी परन्तु हमारे परिवार में सब कार्य सबकी सम्मति से होते हैं । इसके जाती भाइयों ने इनके पिता नहीं कि समूह कथन को परिवार के साथ रहो मान इसे दंड दिया था । मैं व्यवस्था और रहे हैं । हत्या हो गई तो हत्या नहीं हुई । ना देखो ईश्वर की इच्छा से तथा कर्मफल के अधिक जीवन मरण होता है । परमात्मा तुम्हारी इस बात को पसंद नहीं करते थे इसी कारण ये मारी नहीं । मैं उससे बात करना चाहूंगा । अंगीरा नशीर खाते हुए कहा ये उसकी इच्छा के अधीन ही है । सावित्री उसे बता देगी । तीनों भोजन कर रहे थे । चीन के उपरांत पूरी साठ भाजी आई । बृहस्पति ने अब मौन रहना ही ठीक समझा । भोजनोपरांत अंगीरा शौर्य कृषि को लेकर अपनी प्रयोगशाला में चला गया । बृहस्पति भी वहाँ जाकर देखना चाहता था परन्तु पिता ने कह दिया मैंने तुम्हारी माता से कह दिया है तुम कमला से बात करना चाहते हो । कमला से कहा गया है कि वह तुम्हारी माता के सम्मुख तुमसे बात करेंगी । मैं उससे प्रथक से मिलना चाहता हूँ । मैं भी उस की इच्छा पर है । हम स्वयं उससे पूछ लेना । इस कारण बृहस्पति अपने पिता के साथ प्रयोगशाला में नहीं जा सका जो तो उसने प्रयोगशाला पहले देखी थी परन्तु उस समय वह प्रयोगशाला को मात्र मन बहलाने की बात समझता था । अब पिता के मुख से सुना यागने की शक्ति से बाण चलाए जाते हैं तो उस की रुचि हो गई की प्रयोगशाला में जाकर इन अस्त्रों को देखें । अब कमला आकर्षण का केंद्र थी इस कारण वो घर में ही रह गया । वाशी के जाने के उपरांत सावित्री कमला के साथ बैठक घर में आ गयी । बृहस्पति चटाई पर बैठा था । दोनों स्त्रियाँ बृहस्पति के सामने आकर खडी हो गई । बात कमला ने आरंभ कि मैं भी बहुत ही कम वेदवाणी सीख सकती थी । इस कारण टूटी फूटी वेदवाणी में तथा कुछ अपनी वन भाषा में बोली बताइए आप क्या कहते हैं? मैं तुमसे क्षमा याचना करना चाहता हूँ । मुझे परिवार के लोगों ने विवश कर दिया था । जमा की आवश्यकता नहीं । मैं तो आपसे संतान प्राप्ति की इच्छा से आई थी और फंस गई आपके मुँह में । मैं तो अभी भी छोटा नहीं । इसी कारण स्वस्थ होने पर जब महर्षि अत्रि जी ने पूछा की मैं कहाँ जाउंगी तो मैंने आपके पिता का घर बता दिया । मैंने अपने मन की भावना इनको बताई । उन्होंने घर पर रख लिया ऍम के हूँ अच्छी बात तो मैं यहाँ हूँ । मैं कभी कभी यहाँ सोने के लिए आया करूँ, अभ्यर्थ है क्योंकि मेरी संगती व्यक्त किसलिए प्रतीत हुई है? पिछले दस दिन में मैंने जो कुछ देखा है उससे मुझे यहाँ का रहन सहन पसंद आया है और मैं माता जी की सेवा में रहना चाहती हूँ । उनका कहना है, तीसरी को संतानोत्पत्ति के अतिरिक्त पति से सहवास नहीं करना चाहिए और ये आप से हो नहीं सका । क्या हो नहीं सकता । संतानोत्पत्ति यदि आप कहीं होगी गई तो आपके सामान और बुद्धिहीन और अस्थिर मन होगी । मैं आप के पिता सामान शुद्ध आश्रम वाली संतान चाहती हूँ । ये तो हो सकती है परन्तु इससे तुमको के अलावा होगा । आपकी माताजी ने बताया है श्रेष्ठ संतान से मन प्रसन्न होता है । इनके पांच बच्चे हैं । एक लडकी है चंद्रकला और वे सब के सब जब यहाँ होते हैं तो बहुत ही प्रिय प्रतीत होते हैं और वे इस समय कहाँ है? नगर के उत्तर कक्ष में गुरुकुल है । पांच वहाँ शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं । राष्ट्रपति ने अपने विमाता से पूछा उनको घर पर शिक्षा क्यों नहीं दी जाती है? वहाँ की आचार्य मुझसे अधिक योग्य है । चाहती वहाँ अन्य विद्यार्थी भी हैं । विवाह खेलकूद में प्रसन्न रहते हैं । मांस में दो बार पूर्णिमा और अमावस के दिन आते हैं । रात को भी आचार्यकुल में वापस चले जाते हैं और माँ आज कर देती है । आज एकादशी है आज से चार दिन उपरांत अमावस को आएंगे माता जी मैं उस दिन आऊंगा और कमला के पास रहूंगा । योग कमला क्या कहती हो? मंत्री ने पूछ लिया माता जी चित नहीं करता हूँ, उनका चाहती हूँ । सावित्री का प्रश्न था मैं चाहती हूँ कि ये उन वनवासियों के साथ रहना छोड दें अन्यथा वो अब अब भी उनको प्रसन्न करने के लिए मेरी हत्या कर देंगे । मुझे अपनी जाती वालों की बुद्धि पर अब बिलकुल भी विश्वास नहीं रहा । उपराष्ट्रपति ठीक रहती है । वो लोग अशिक्षित और हीन संस्कारयुक्त हैं । उनमें रहते हुए तुम भी हीन संस्कार और हीन बुद्धि रखने वाले बन गए हो । माता जी ये बहुत कठिन है । मैंने कई साल के कठोर परिश्रम से वहाँ की सृष्टि का निर्माण किया है । मैं आपके पिता हैं कि सवाल प्रतिष्ठित और सम्मानित बनना चाहता हूँ । मैं समझता हूँ कि मैं वह स्थिति प्राप्त कर रहा हूँ । मैं भी सा निकाल अपने शिविर में प्रवचन देता हूँ । आपने वनवासी तो उसे सुनते ही हैं परंतु उत्कृष्ट नगर के कुछ लोग भी आने लगे हैं । मेरे जीवन में मनसा और समाज की कल्पना उनको भी स्वीकार हो रही है । क्या जीवन में मनसा है तुम्हारी ये जीवन घटना वर्ष निर्माण हो गया है । इसका प्रयोग कुछ भी नहीं है । फिर भी यह अति रस्में है । इस कारण प्रकृति की सडक का लाभ यही है कि अधिक से अधिक रस प्राप्त किया जाए । मैं उनको प्राप्त करने का यत्न कर रहा हूँ । यहाँ आपके समाज में आकर वो सब कुछ सुख भोग प्राप्त नहीं हो सकेगा । हमने एक अंडे मस्तू का निर्माण किया है । उसे हम मध्य कहते हैं । मधु को जाल में मेरा ऍम मिट्टी के घरों में रख दिया जाता है । कुछ दिनोपरांत उनमें एक विशेष प्रकार की कंधे आने लगती है । जब हम उसका पान करते हैं तो संसार के रस ड्रैगन हो जाते हैं । यहाँ लोग उसे बनाना नहीं जानते । माताजी, मैं समाज की कल्पना भी इसी आधार पर बनाता हूँ । जिस समाज में आबाद सुख भोग की स्वीकृति हूँ, मैं समाज मेरा है । अभी देवता लोग इस जीवन में मनसा को नहीं समझते हैं । तब ठीक है तुम वहाँ का सुख हो करो । हम यहाँ के ढंग पर सुख भोगना चाहते हैं । कमला यदि वहाँ जाना चाहती है तो जा सकती है । यहाँ भी यदि इस की इच्छा हो तो इसको तुम्हारे संग रहते देख हमें हर्ष शोक कुछ नहीं होगा । अब बताओ । कमला राष्ट्रपति ने पूछ लिया, मैं कुछ निश्चित नहीं कर सकें । मैं कुछ दिन विचार करने के लिए चाहती हूँ । बृहस्पति तो उसको तैयार कर लूँ । हमने इसे पृथक आगार रहने के लिए दे रखा है कि चाहे तो तुमको वहाँ आमंत्रित कर सकती है । इस आश्वासन पर बृहस्पति ने प्रेमभरी दृष्टि से हमला किया और देखा परन्तु कमला ने सर हिलाते हुए कहा, नहीं आज नहीं अभी आपके शरीर से वनवासी लडकियों की कंधा आती है । पहले इस गंदे से स्वच्छ हो कराइए । ये कहकर कमला उठी और आपने आगार की और भाग गई । भीतर जाकर उसमें आगार कद्वार भीतर से बंद कर लिया । सावित्री ने निराशा भाव दिखाते हुए बृहस्पति से कहा एक हो बृहस्पति । अन्य वनवासी लडकियों से यह भिन्न प्रतीत होती है । भगवान जाने क्यों उसके मस्तिष्क में के बाद बैठ गई है कि पुरुष के सहवास का प्रयोजन संतानोत्पत्ति है, एशवर्थ है । इस कारण ये तुमसे संधि तो करना चाहती है और अंतिम तुम्हारी उन लडकियों से संगती तो इसके विपरीत विचार रखती हैं । इस सहन नहीं कर सकती । इसके पूर्व जान के संस्कारों के कारण ही प्रतीत होता है । बृहस्पति पूर्ण घटना से पहुंचता वनवासियों के शिविर में लौट गया । मैं कमला के आकर्षण को अनुभव कर रहा था । परंतु जो जो है वनवासियों के शिविर की ओर जा रहा था, उसके मस्तिष्क से कमला के आकर्षण का प्रभाव कम होता जा रहा था । उसके मन की महत्वाकांक्षा थी । पिता मैं की सामान, मान प्रतिष्ठा और समाज पर प्रभावी निर्माण करें । उम्र होने लगी थी । जब है शिविर में पहुंचा और शिविर के लोगों की अनेकानेक समस्याएँ होनी वहाँ कमला को भूल शिविर की समस्याओं में लीन हो गया । शिविर की सबसे प्रमुख समस्या भोजन की थी । अभी तक वनवासी वन में स्वतः बजने वाले कंदमूल खाकर निर्वाह कर लेते थे परन्तु नगर के लोगों को भारतीय भर्ती के खाद्य पदार्थ बनाते हैं । हम देश से देख लालसा करने लगे थे, उनको वैसे ही पदार्थ मिले । स्वादिष्ट भोजन के अतिरिक्त वे नगर में रहने वालों को भिन्न भिन्न रंगरूप के वस्त्र पहने देख वैसे ही वस्त्रों की लालसा करने लगे थे । धनवासी स्तरीय ऐसी लालसा करने वालों में अधिक संख्या में थी । आवाज की तीसरी समस्या थी । नगर में बहुत कम लोग थे, जिनको झोपडों में रहना पडता था । प्राय नागरिक मिट्टी, चूना अथवा सीटों के भवनों में रहते थे । नगर में भवन बनाने वाले लोग थे, परन्तु मेरे पिता में है की मुहर लगी मुद्राओं में अपने परिश्रम का प्रतिकार चाहते थे । स्वस्थ बनाने वाले भी मुद्राओं में मूल्य मांगते थे और भोजन सामग्री भी मुद्राओं पर ही प्राप्त हो सकती थी । वनवासियों में सबसे अधिक असंतुष्ट स्त्रियाँ थी । नागरिकों को स्त्रियों की भांति भांति के शनिनार किए रंग बिरंगे वस्त्र पहने घूमते हुए देखती थी और वैसे ही सामग्री की लालसा करती थी । राष्ट्रपति समझ गया वास्तविक समस्या रजत एवं स्वर्ण मुद्राओं की है । मुद्राओं को प्राप्त करने के लिए जनो कारी परिश्रम की आवश्यकता थी या वनवासी नहीं जानते थे । समस्या का एक सुझाव यह था इन वनकर्मियों को पूर्ण छूट दे दी जाए कि वे अपने परिश्रम को मुद्राएं प्राप्त करने में लगा दें । परिश्रम से मुद्राएं प्राप्त करने का ढंग जानते नहीं थे तथा लूट, चोरी और डाका डालने से मुद्राएं प्राप्त कर सकते थे । परन्तु प्रथम झडप में वनवासियों को बहुत पानी हुई थी । इस समय पुल है, जगह लेने में लाभ नहीं समझता था । मुद्रा प्राप्त करने का एक दूसरा उपाय था तो ये की कुछ बालक बालिकाओं को नगर के गुरुकुल में शिक्षा दी जाए । भारत बालिकाएं शिक्षित होकर अपने समुदाय के लिए मुद्रा अर्जन करने का ढंग सीख जाएंगे परन्तु इसमें समय लगेगा और असंतोष तो निरंतर बढ रहा था । साथ ही वनस्थली से समाचार आया । एक सौ अन्य वनवासी स्त्रीपुरुष बालक बालिकाएं आ रही हैं । माता सुनी थी । उन को भेज रही थी । बृहस्पति इन समस्याओं का सुझाव विचार करने में लीन बैठा था । एक वनवासी आया और बृहस्पति के सामने उपस्थित हो बोला भगवान मुझे चाहिए क्या हुआ? नदी के किनारे कुछ धीवर झोपडी में रहते हैं । उनका धंधा मछली पकडकर नगर में बेचना है । उन की स्त्रियों के पास भी रजत और स्वर्ण के भूषण है । एक ही वार लडकी के गले में स्वर्ण माला थी । मेरे मन में विचार आया कि वह माला मेरी लडकी के गले में हो तो बहुत सुंदर लगेगी । इस विचार के आते ही मैंने उस लडकी के गले से माना, निकालने में उसका गला घोंट दिया हो । या तो मर गई या फिर अच्छी हो गई है । मालूम है ले आया हूँ परन्तु कुछ दीवर लाठियां मेरा पीछा करते हुए यहाँ हमारे शिविर में आ गए हैं । मुझे मांग रहे हैं आपने संधीर मेरी हत्या कर देंगे । राष्ट्रपति ने पूछ लिया वो कितने हैं? सात आठ होंगे और तुम कितने हो? इस प्रश्न पर सम्मुख खडा वनवासी मुक्ति पा रह गया । कुछ देर तक विचार कर रहे बोला हमारे शिविर के प्रहरियों ने उसे रोक रखा है परन्तु मैं कह रहे हैं या तो मैं उनका अधिकार में कर दिया जाओ । अन्य सारे पूर्ण शिविर को अग्नि के पेट में झोंक देंगे । एक बार तो बृहस्पति के मन में आया कि कहते इन दीवरों को मारपीट कर भगा दो । महत्वपूर्ण शिविर को अग्नि की भेंट किए जाने की बात सुनकर मैं गंभीर विचार में पड गया । उसमें कुछ विचार कर अपने सेवक को बुलाया और शिविर के प्रहरियों को ये कहलवा दिया । विधिवित को भीतर मेरे सम्मुख खाने दो और उनको कहो कि वे अपनी बात मुझे बताएँ । अच्छे लग गया तो बृहस्पति ने सामने खडे वनवासी को कहा, जहाँ भी जाओ मैं सब वनवासियों को उन दीवरों के समय उपस्तिथ करूंगा और कहूँगा कि वहाँ जाने किसने लडकी का गला दवा है । हम सब के साथ इस देखा देखी में मत आना । मैं वनवासी शिविर के पिछवाडे से जंगल में घुस गया । दीवरों के सम्मुख स्त्रीपुरुष बाल वृद्ध सब वनवासी एकत्रित कर दिए गए और उन्होंने कहा हत्यारे वनवासी को पहचाने, हम उसको उचित दंड के लिए तुम्हारे साथ कर देंगे । उन्होंने कई बार वनवासियों को देखा और हत्यारे को वहाँ न देख कह दिया । तेहरा इनमें नहीं है ऐसा प्रतीत होता है । बृहस्पति ने कहा मैं भागकर वनस्थली में चला गया है । हम पता करेंगे और हम उसे यहाँ पकडकर मंगवाएंगे । हीरो ऍम तोश पर नहीं हुआ था परन्तु वो ये नहीं कह सकते हैं कि एक के अपराध कर दंड किसी दूसरों को दिया जाए । पता नही निराश लौट गए हत्यारे को वापस वनस्थली में भेज दिया गया । उसके बाल परिवार को भी उनके साथ लौटा दिया गया परन्तु ये समस्या का सुझाव नहीं था पर पिता नहीं के पास गया और अपने शिविर के कुछ बालक बालिकाओं को गुरुकुल में प्रवेश की स्वीकृति ले आया । उसी दिन साकार अपने प्रवचन में उसने कहा हमें भी धनोपार्जन के ढंग सीखना चाहिए । इस कारण मैंने यह निश्चय किया है कि हमारे शिविर के दस बालक बालिकाएं नगर में स्थित गुरुकुल में पडने जाएंगे । जब वे वहां से शिक्षा प्राप्त कर यहाँ आएंगे तो वे नगर से मुद्रा अर्जन करेंगे । इससे हमारा शिविर भी धनधान्य से संपन्न हो जाएगा । अगले दिन दस बालक बालिकाओं को गुरुकुल में आशा जी के पास भेज दिया गया परंतु वनवासियों में असंतोष बढता ही गया और ये दो दिशाओं में कार्य करने लगा । एक तो वनवासी चोरी का धंधा करने लगे और दूसरे कुछ नागरिकों के यहाँ सेवा कार्य करने लगे । एक दिन पता नहीं कि प्रवचन के उपरान्त एक नागरिक ने कहा था मैं मेरी पत्नी के भूषण चोरी हो गए हैं, कौन ले गया है, ले जाते, किसी ने देखा तो नहीं । फिर भी संदेह हैं की हमारे पडोसी विश्ववाणी चोरी की है तो क्या कार्य करता है, वस्त्र बनता था परन्तु कुछ दिन से उसने कार्य बंद कर रखा है तो भगवन ये तो वही बता सकता है परंतु आजकल वस्त्र बनने से उसके कल चलते नहीं । पिता मैंने पूछ लिया उस पर संदेह करने का कुछ आधार है । एक आधार पर है उसके कल निश्चल पडे हैं । परन्तु उसके घर में नृत्य उत्सव होते हैं है वनवासियों से मध्य क्रयकर स्वयं भी पीता है और अपने बच्चों को भी दिलाता है । क्या उत्सव करता है वो अपने घर में वनवासी स्त्रियों का उसके घर में आना जाना होता है और नगर के लोग भी वहाँ जाते हैं । तुम्हें नगर के मुखिया को सब की सूचना दी है अथवा नहीं । अपने घर की चोरी की सूचना तो दे दी है परंतु विश्व के घर की बात मैंने नहीं बताई क्यों उसकी अपने जीवन से संबंध रखती है । भगवन आपकी आ गया है कि सब अपने निजी कार्यों में स्वतंत्र है । चोरी के संबंध में मुखिया ने क्या कहा है? चोरी की गई वस्तुओं की खोज करने के उनके पास न तो साधन है और न ही उसकी सामर्थ्य है । किसी चोर को दंड दे सके । उनका कहना है की अभी तक समाज में अधर्माचरण करने वालों को प्रेरणा से ही पश्चाताप करने के लिए कहा जाता है । इसी कारण उसने आपकी सभा में उपस्थित हो सब बात बताने के लिए कहा है । ठीक है हम यत्न करेंगे की चोरी किया गया माल फिर से मिल जाए । पिता मैंने ये कह तो दिया परन्तु वो यह भी समझ गया कि अब केवल प्रेरणा से काम नहीं चलेगा । प्रेरणा के लिए तो दो माध्यम होते हैं वही है समाज अथवा परिवार के प्रमुख के प्रति मान प्रतिष्ठा और न्याय मुद्द्े । अब जीवन का आधार नास्तिकवाद हो, अपना कर्मफल की अनिवार्यता स्वीकार हूँ । वहाँ प्रेरणा सफल होती है परंतु जब किसी जगत नियंता के अस्तित्व पर विश्वास न हो और काम फल की अनिवार्यता मानने ना हूँ, वहाँ स्वतः धर्म का पालन संभव है । ऐसे समाज में जहां दोनों प्रकार के लोग रहते हैं । प्रेरणा से धर्माचरण करने वाले और पशु की भर्ती लाठी से सीधे मार्ग पर हाथ जाने वाले वहाँ धर्म की व्यवस्था होनी चाहिए और अधर्माचरण करने वालों के लिए दंड का विधान होना चाहिए था, पिता नहीं । मैंने अपने त्रिवर्ग स्मृति को चालना देने के लिए शीघ्रता करने का निर्णय कर लिया । नृत्य दो दो प्रहर तक महर्षियों की विचार गोष्ठियां चलने लगी । अभी ये घोषणा चल ही रही थी । एक अन्य किताब उपस्तिथ हो गई । वनवासियों के शिविर में जनसंख्या बढने लगी । वनस्थली के बहुत से वनवासी ब्रह्मपुरी के समीप के शिविर में आ गए । उनके साथ बृहस्पति की माता सुनीति भी थी कि शिविर वालों को काट काटकर विस्तार पाने लगा रहे । वनवासी वन में आखिरकर जीवन चलाते थे । वन पशुओं के चर्म से शरीर उठाते थे । शिविर में तो प्राइम नग्न रहते थे । नगर में जाते समय उत्तर यह पहनते थे । अधिकांश वनवासी नगर के रहने वालों का लाभ का कोई काम नहीं कर सकते थे । ये कुछ सीखने में रुचि भी नहीं रखते थे । अच्छा वन पशुओं के चर्म सी अथवा पक्षियों के पंख भेजकर और नगर की वस्तुएं क्रय कर सकते थे । सुनी थी । जब हम पुरी में आई तो वह बृहस्पति के पिता से मिलने जा पहुंची । कमला तब भी वही रहती थी, कमला और बृहस्पति में संबंध नहीं हो सका । कमला एकाकी जीवन से प्रसन्न और संतुष्ट प्रतीत होती थी । बृहस्पति के अनेक बार यत्न करने पर भी वो उससे संबंध बनाने के लिए उद्यत नहीं हुई तो एक ही बात चाहती थी वनवासियों की संगती का त्यागकर अपने पिता के घर में आकर रहे और बृहस्पति ये नहीं कर सका । सुनी थी आई तो अपनी सह पत्नी सावित्री । सावित्री के बच्चों और कमला से मिली भाषी अंगीरा ने पत्नी को कहा जीवन में रहते रहते पेट भर गया हो तो मैं सुन्दर, स्वच्छ है और सुखद निवास स्थान पर आकर रह सकती हो । इतने दिन खुले वायुमंडल और स्वच्छ संसार में रहते हुए ऐसा सुभाव बन गया है । इस घर के आगारों में रहते हुए दम घुटता, अनुभव होगा तब ठीक है तो तुम लोगों के स्वच्छंद जीवन की सीमा निश्चय हो गई है और जीवन को अब हम सीमा के बाहर नहीं चला सकेंगे । बृहस्पति को यहाँ सरकार हो गया है । यदि वहाँ आ जाता तो उस को भी सचेत कर देता हूँ । मैं कहता है कि कमला के प्रति उसके मन में प्रबल हो है और वैसे देख अपने पर नियंत्रण रखने में कठिनाई अनुभव करता है । यह उसकी पत्नी के रूप में रहना पसंद नहीं करती है । वो यहाँ आकर दुख अनुभव करता है परन्तु मैं दूसरी बात कह रहा हूँ । वो अब अपने को राजा के रूप में प्रकट कर रहा है । इसलिए उसकी प्रचार द्वारा किए गए को कर्मों का फल उसे भोगना पडेगा । यही चेतावनी में देना चाहता था तो वहाँ राजमाता के रूप में रहती तो इस कारण तुम भी अपने राज्य की प्रजा के गर्म फलों से मुक्त नहीं मानी जाओगी या दंड होगा । हमारे लिए यहाँ एक मानव स्मृति का निर्माण हो चुका है । उस स्मृति को चालू करने के लिए राजा की आवश्यकता अनुभव हुई है । राजा के कार्य के लिए महर्षि विरजा को आमंत्रित किया गया था । विरजा ने राज्य करने से इंकार कर दिया है तो फिर जा के पुत्र कीर्तिमान को ये पद स्वीकार करने का आग्रह किया गया । उसने भी से स्वीकार नहीं किया । कीर्तिमान के पुत्र कर जब ने भी राजा वरना स्वीकार नहीं किया । अब दर्जन के उत्तर आनंद से प्रार्थना की जा रही है कि वह राज्य भार वहन करें । सुनीति हंस पडी, हसते हुए बोली हमारी मीमांसा और आपकी विमान सा में यही अंतर है । पिता मैं ऐसे कह दीजिए । इतनी दूर जाने की की आवश्यकता है हूँ पर में ही एक राजा है बृहस्पति को राज्य पर दे रहें तब वह सब प्रबंध मुक्ति पूर्वक कर देगा । अब हसने की बारी अंगीरा की थी उसमें हसते हुए कहा वहाँ पे काम है को ज्ञात है कि बृहस्पति में संगठन करने की शक्ति उच्च कोटि की है परंतु संगठन करना एक काम है, ठीक है, किसी शुभ उद्देश्य से भी हो सकता है और किसी अशोक उद्देश्य के लिए भी धर्म का फल उस उद्देश्य के अनुसार ही मिलता है । देखो सुनीति कारण और उसमें सफलता बहुत बडी बात होते हुए भी जब निकृष्ट उददेश्यों के लिए होती है तो घोर पतन का कारण बन जाती है परंतु महार्षि वो अपनी अपनी बुद्धि ही तो है तो किसी कर्म कोशिश उद्देश्य वाला मानती है अथवा निकृष्ट उद्देश्य वाला । हम समझते हैं कि फल तो कामना के आधार पर मिलते हैं । जिस कामना से जो कार्य किया जाए, भले ही काम कैसा हो, उसी प्रकार का फल होना चाहिए । कामना से ही उद्देश्य का पता चलता है । कभी कामना के मूल्यांकन में भूल हो सकती है परंतु उस कामना के लिए किए गए कर्म का फल उस भूल को सुधारने में समर्थ होना चाहिए । जो मनुष्य अशुद्ध परिणामों को देखकर भी अपनी कामना के अशुभ होने को स्वीकार नहीं करता, वो यहाँ तो निपट मूर्ख माना जाना चाहिए । भगवान धूर हूँ, पिता हूँ और मुझे भी बृहस्पति के उद्देश्य पर कोई संदेह नहीं । उसकी इच्छा यह है कि वह अपने संगठन शक्ति का प्रयोग करें । अपने विचार से उतने लोक कल्याण के विचार से संगठन आरंभ किया है । परंतु उसकी जो परिणाम निकल रहे हैं उनको देखते हुए उसका संगठन कल्याण के स्थान पर कल्याणकारी सिद्ध हो रहा है । वह स्वयं भी परिणामों को देख रहा है । हम तो अपनी संगठन शक्ति का दूषित हो । वो छोड नहीं रहा था । उसको या तो मूर्ख मानना पडेगा अथवा धूर्त बिता नहीं तो बृहस्पति को मूर्त मानते हैं परन्तु मेरी दृष्टि में महादूत है । पिता में कहते हैं कि उसकी धूर्तता के कारण है । वो ये नहीं जानता कि उसकी व्यवस्था से जो अनाचार और अत्याचार व्याप्त हो रहा है वो उसको भी भारी कष्ट देने वाला है । मेरा मानना ये है कि वो सब कुछ जानता है परन्तु वो अपने विषयों से तथा महत्वाकांक्षा से प्रेरित होकर अपनी कार्यविधि पर आरोप है, समझता हूँ उसे अपनी सुख सुविधा को लोग कल्याण नहीं मानना चाहिए । वो समझता तो है परंतु स्वमुख के लोग में मिथ्या मार्ग कर रही बना हुआ है । इसका भयंकर फल उसको मिलने वाला है । भाषी सुनीति ने गंभीर भाव से कहा, आपको ये विचार करना चाहिए कि वह आपका पुत्र है, आपके शरीर का अंग है । आपको उस पर संधि नहीं करना चाहिए । अठारह अपने पुत्र के विषय में विचार करते हुए मैं धर्म व्यवस्था को भूल जाऊँ । अपने ज्ञान और बुद्धि का त्याग कर दूँ, ये नहीं होगा सुनी थी । यदि उसके कर्मों का परिणाम उसके अपने तक सीमित रहता तो मैं मौन रह सकता था । हम तो उसके कर्मों का परिणाम उसके अतिरिक्त ऊर मानव समाज के लिए दुख और कष्ट का साधन बनता जाता है । इस कारण अब पुत्र और पिता के संबंध की बात नहीं रही । एक आचार्य और शिष्य की बात हो गई है । जाओ देगी उसे कह दो की अविलंब पिता नहीं के चरणों की शरण ले ले और अपने भूत कर्मों के लिए छमा याचना कर भविष्य में ठीक रहने तथा पिता नाम है कि आदेशानुसार आश्रण करने का आश्वासन दें । इसी में उसका कल्याण है । चिन्ताग्रस्त सुनीति वनवासी शिविर को लौट गई । शिविर में पहुंच उसने बृहस्पति को अपनी कुटी में बुलवाया । बृहस्पति को विजिट था । उसकी माता अपने पिता से मिलने गयी हुई है तथा माता का सन्देश आया तो वह किसी प्रकार की विशेष बात की जानकारी होने के बाद समझ तुरंत माता के सामने जा पहुंचा । सुनीति ने उसे अपने सम्मुख बैठाया और अपनी दासियों को बाहर निकालकर उसने महत्वपूर्ण वातावरण उन वार्तालाप सुना गई तो उसके पिता के साथ हुई थी । जब सुनीति सब बात कह चुकी बृहस्पति ने कह दिया माँ तो रद्द हो रही प्रतीत होती हूँ । मैंने वहाँ पर दो कार्य करने के लिए कहा था और कार्य तो एक रात वहाँ रहकर ही कर सकती थी कहीं और लॉट भी हाई और कुछ भी कार्य नहीं करवाई । उत्तर के लांछन सुनी सुनी थी मुस्कराई और कहने लगी ऍम मैं वहाँ गई तो इसी प्रयोजन से थी कि महर्षि जी की सेवा में कुछ देर रहेंगी । आखिर मैं बी आर चाम की बनी हुई हैं । मुझे भी कामनाओं और वासनाओं का जो आ रहा है बंद मैं इस तरी से कुछ अधिक मैं माता दी हूँ । मेरे अकेले पुत्र हो और मुझे यही ठीक समझ में आया था कि अपने पुत्र के कल्याण के लिए तुरंत लौट जाना चाहिए । मैं मेरी वेयर्स में जनता करती हो । पता नहीं हो गए हैं । मानव समाज देख बहुत उन्नति कर ली है और पिता में अभी भी यह समझ रहे हैं कि अमैथुनी मूल्क सृष्टि चल रही है । मैंने मानव समाज की इच्छाओं और अभिलाषाओं को जान उनकी पूर्ति के सुगम उपाय विचार किए हैं । इस कारण कुछ ही वर्षों में मैं कार्य कर सकता हूँ । जो पिता है सहस्त्रों वर्षों भी नहीं कर सके हैं । शीघ्र ही उसके नगर से बडा शिविर हमारा हो जाएगा । तब की और संख्या के बल पर हम इन मूर्खों को इनके कल पे स्वर्ग में भेज देंगे अन्यथा जल भरने तथा सीमा के लिए रख लेंगे देख लेता हूँ । मैंने प्रदान है की शक्ति को देखा है । उस अकेले ने एक बार सौ से अधिक वनवासियों को आश्रम से ऐसे बाहर निकाल दिया था जैसे ही कोई बुहारी से पूरा करकट बुहारकर आंगन से बाहर भेज दे । मैंने सुना है ये तो उसकी शक्ति का अतिसामान्य प्रदर्शन था की शक्ति का विशिष्ट प्रदर्शन बहुत ज्यादा है । इसके अतिरिक्त सुना है कि अनंग वहाँ का राजा बनने वाला है और वह बहुत ही तृण संकल्प व्यक्ति है । उसका न्याय क्रूड का की सीमा को छू जाता है तो आनंद ने स्वीकार कर लिया है अभी उस को आमंत्रित किया गया है । मैं समझती हूँ कि वो मान जाएगा तब कठिनाई उपस् थित हो जाएगी । पिता मेहमी एक गुण है, प्रेरणा में विश्वास रखते हैं और अनंग बल के प्रयोग को अवैध नहीं मानता हूँ । मुझे स्मरण है कि जब वह पितान है कि आश्रम में महर्षि मरीची से शिक्षा ग्रहण किया करता था तब भी रहे दृढनिश्चय और स्थिरबुद्धि रखता था । ऐसे व्यक्ति को जब तुम्हारे पिता अंगीरा का सहयोग प्राप्त हुआ, वह भूमंडल को अपने अधीन कर लेगा । माँ चिंता मत करूँ, कुछ नहीं होगा । आनंद को हमारे साथ संधि करनी पडेगी । वो अपने राज्य का विस्तार उत्तर की और करेगा और हम दक्षिण की और करेंगे । वह अपूर्व की और उस पार कर सकता है और हम पश्चिम की और उन्नति करेंगे । इस प्रकार हम दोनों एक दूसरे का बार काटे बिना उन्नति कर सकेंगे । ठीक है चार करूँ । मैं वहाँ सावित्री से एक अन्य सूचना लाई हूँ । क्या हमारा मित्र कश्यप इस समय दक्ष पत्रों का पिता हो चुका है? उसके बडी पत्नी आदित्य से चार बच्चे हैं और पांचवी बार गर्भधारण कर चुकी है । एक विशेष बात यह है कि उसकी कुछ पत्नियां हैं जो संतान की इच्छुक नहीं, उनमें से एक देती है । सुना है कश्यप से कई बार संतानों भक्ति के लिए आह्वान कर चुका है परन्तु मैं अपनी खेल कूद में ही रुचि रखती है । ठीक है उस बैल बुद्धि से और कुछ आशा भी तो नहीं की जा सकती है परंतु सुना है कि पता है कि प्रकरण स्मृति शास्त्र में उसका बहुत भारी योगदान है । पिता में उसकी विद्वता को बहुत मानते हैं । बृहस्पति हस पडा बोला प्रत्यक्ष में तो उसकी विद्वता बच्चे पैदा करने में दिखाई दी है । ये तो महान नील जैसे अनपढ मूर्ति भी उत्पन्न कर रहे हैं । सुनीती को पुत्र की बातों से संतोष नहीं हुआ परन्तु वो उसकी अपनी ही जिज्ञासा थी जो फलीभूत हो रही थी । उसने अपने लडके को अपने माता पिता तथा कमीने वालों की सहायता के लिए अपने पिता और पितान है के विरुद्ध किया था । अब वो उसे उनके अनुकूल करना चाहती थी । उसे अब इसमें ही उसका कल्याण दिखाई देने लगा था । परन्तु वो जिस पद पर चल पडा था उसमें लौटने की उसमें सामर्थ्य नहीं थी । उसके पूर्वग्रह उसे प्रमित कर रहे थे । इस वार्तालाप के उपरांत सुनीती को यही ठीक प्रतीत हुआ कि वह स्वयं पिता में है कि आसाराम वालों से बनाकर रखें तो दोनों में सेतु का काम करना चाहती थी । किसी कठिनाई के समय वह पुत्र अथवा अपने पति के लिए नौका का काम करना चाहती थी । अगले ही दिन वो उन्हें अपने पति के निवास स्थान पर जा पहुंची । बच्चे गुरुकुल गए हुए थे । महर्षि अपनी प्रयोगशाला में थे । घर पर सावित्री और कमला ही थी । सावित्री ने सुनीती को उन्हें देखा, उसका स्वागत किया । सुनीति ने कहा, मैं कल एक प्रयोजन विशेष आई थी, परंतु महर्षि की बातें सुन पुत्र की चिंता ने भूल गई थी । किस कार्य से यहाँ आई थी पुत्र को अपनी चिंता का कारण बता । जब चित्त स्थिर हुआ तो उन्हें अपना प्रयोजन स्मरण हुआ है और यहाँ नहीं हूँ । क्या प्रयोजन है तुम्हारा । यहाँ पर मुझे घर से गए छह वर्ष से अधिक हो गए हैं और इतने दिन से पति की संगती से वंचित हो । आपने नहीं कुछ अभाव महसूस करती हूँ । इसलिए मैं पति की संगती की इच्छा रखती हुई वहाँ कुछ दिन रहने के विचार से आई थी । अब उस विचार को पूर्ण करने आई हूँ । सावित्री ने आंखे मून सुनीति के बाद पर विचार किया और तब कहा इस बात का मुझे कोई संबंध नहीं भाषी सहायता डाल के समय आएंगे तब उनसे पूछ लेना मैं यही रहूंगी और वो घर लौटेंगे तो उनसे पूछ होंगी देखो सावित्री, मैं उनकी पत्नी हूं । यदि वह मेरी इच्छा पूर्ण नहीं करेंगे तब भी मैं वहाँ रहने का कार्यकार रखती हूँ । मैं ये जानती हूँ परन्तु यहाँ रहने का एक नियम है । उसका पालन तो करना ही होगा । वैसे तो इस घर की दिनचर्या से मैं परिचित हूँ और उसका पालन करूंगी तो नहीं । बात चल रही हो तो वो बता दो नहीं, कुछ नहीं बात नहीं है । पर घर पर तो वही स्थिति है । परंतु आपने जब अपनी एक नई स्थिति बना ली है । आपको कुछ लोग असरों की राजमाता के रूप में मानते हैं । इसमें राजमाता कैसे एक महर्षि के घर में पत्नी के रूप में रह सकेंगे? यह विचारणीय है । सावित्री हम जनता वक्त करूँ । मैं राजमाता का पद बाहर वनवासी शिविर में ही रखा हूँ । यहाँ एक महर्षि की पत्नी के रूप में ही रहने का विचार रखती हूँ । ठीक है उनको आने दो । जैसा वो चाहेंगे वैसा ही करना चाहिए । चुनाव कामयाब तो निधि ने अब लडकी की बात किया और ध्यान दिया कल तो तुम से भी बात नहीं हो सकी । यहाँ प्रसन्न हो माता जी यहाँ किसी प्रकार का कष्ट नहीं है । यदि ये कहूँ कि शिविर से वहाँ अधिक सुख, संतोष और सुरक्षा अनुभव होती है तो अधिक ठीक होगा । बृहस्पति से मिलने की इच्छा नहीं करती करती है परन्तु जिस कारण से करती है वो उससे उपलब्ध नहीं इस कारण से पति से मिलना चाहती हो । उस दिन आदित्य अपने पांच बच्चों के साथ यहाँ आई थी और उन बच्चों को देख मेरे मन में भी वैसे ही एक दो बच्चों के लिए उत्कट इच्छा उत्पन्न हो रही है । वैसे बच्चे वहाँ रहते हुए वह दे नहीं सकेंगे और नहीं उसके पालन पोषण का प्रबंध वहाँ हो सकेगा जैसा यहाँ हो सकता है । ये कैसे कहती हूँ कि ऐसा मान नहीं हो सकेगा । मैंने उन दोनों स्थानों को देखा है इसलिए यही समझ रही हूँ । उसके लिए अपनी प्रजा को छोड यहाँ आकर रहना संभव नहीं है तो वह वहीं पर ऐसा वातावरण निर्माण कर सकते हैं जैसा यहाँ है । इसके लिए यहाँ के ऋषियों महर्षियों के सहयोग की आवश्यकता होगी परन्तु वहाँ का सहयोग न तो वो चाहते हैं और न ही वहाँ के लोग इसके अधिकारी हैं । इतना समीप रहते हुए भी बहुत कम पिता मेरे से मिलने जाते हैं । कभी जाते भी हैं तो प्राइम झगडा ही करते रहते हैं । एक बात और है । बिना योग्यता प्राप्त किए वह पिता नहीं को प्रतिस्पर्धा करना चाहते हैं । पिता में है जी स्वयं बता रहे थे उन्होंने दो मध्यांतर भर होर तपस्या की है । योग निश्चिंत हैं । अब भी वह जब चाहते हैं तो बाहर से अंतर्ध्यान हो । सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान परमात्मा से योगस्थ हो जाते हैं । उस समय यहाँ की जटिल समस्या को सुलझाने का मार्ग पा जाते हैं । इस योग्यता के अतिरिक्त वह आयु और अनुभव में हम सबसे बडे हैं । उन्हें उन का बान करना चाहिए, परंतु आपके पुत्र उनको मूर्ख और मिथ्या परसाई मानकर उनकी अवहेलना करते हैं । सुनीति सब बात को जानती थी, पर अब जो अनुभव कर रही थी कि अपने पुत्र में ये सब गुण उसने ही उत्पन्न किए हैं । मैं उस दिन की घटना को बोल नहीं सकती थी, जिस दिन उसके वनवासी पुरुषों को पिता मैंने अपनी किसी बजाय शक्ति से पराजित किया था । इस बात को तीस वर्ष के लगभग व्यतीत हो चुके थे । जब उसे अपने घर वालों की दुर्दशा देख हाथ दुख हुआ था । वह अयोद्धा जो दक्ष से पराजित हुआ, उसका बडा भाई था । वहाँ पे काम है कि शिविर में तो अपनी माँ के कारण आकर रहने लगी थी । उसकी माँ दक्ष की चतुराई से और पे काम है की सामर्थ्य से अति प्रभावित हुई थी और अपनी लडकी तथा एक लडकी के साथ अपने कबीले को छोड पिता में है कि आश्रम में रहने के लिए तैयार हो गई थी । इस घटना से पूर्व सुनी थी कि माँ ये भी देख चुकी थी कि जब दो कबीलों में युद्ध होता था, विजयी कबीले वाले पराजित कबीले के स्त्रीवर्ग को आपने कभी ले में सम्मिलित कर लेते थे । पूरी स्त्रियों को मार डाला जाता था और युवा स्त्रियों का पत्नी के रूप में प्रयोग किया जाता था । अच्छा सुनी थी कि माँ और कबीर की अन्य स्त्रियां यही आशा करती थी । इसी कारण वे दया की भीख मांगती हुई इस आश्रम में आ गई थी । यहाँ पे आश्रम में किसी की हत्या नहीं हुई । हाँ, स्त्रियों को अपने कबीले में लौट जाने की स्वीकृति दे दी गई । तब स्त्रियां यहाँ की सुख सुविधाओं को देख रहने को तैयार हो गई । तब भी उनमें से विवाह के योग्य कहा उनकी इच्छा से ही क्या व्यवहार किया गया? सुनीती को स्मरण था कैसे अंगीरा ने उस से आग्रह किया था कि वह उसकी पत्नी बनना स्वीकार करें । इन सब सुविधाओं के होते हुए भी उनको अपने पिता और भाई की दुर्दशा स्मरण थी । इसलिए वह अपना पूर्ण दोष और असंतोष अपने पुत्र को पिता में है के विरुद्ध करके निकालने लगी थी । अब मैं अनुभव करती थी कि उसने अपने पुत्र के मन में सीमा से अधिक पिता में है कि प्रति विश्व भर रखा है और अब वह उसे मिटा नहीं सकती थी । जब उसे अनंग के भी हम पुरी में राजा बनने का समाचार मिला तो वह भी हो गई और अपने पुत्र के पास गई । अनंग कठोर प्रवृत्ति का व्यक्ति था और उसके राजा बनने की बात सुनकर बहुत ही कठोर समय की आशा कर रही थी । अतिथि के पांचवां पुत्र उत्पन्न हुआ और उसके नामकरण संस्कार पर हम पुरी के प्राइस सब प्रतिष्ठित विद्वानों को आमंत्रित किया गया जिसमें वे मानक को आशीर्वाद दे सकें । पिता मैं भी आमंत्रित थे, पिता में है, अपने साथ एक अन्य व्यक्ति को भी लेते आए थे । इस नवीन व्यक्ति को भ्रम आश्रम के कुछ प्राचीन निवासी ही जानते थे । नवीन संतति इस ओजस्वी और बलशाली व्यक्ति के विषय से अनभिज्ञ थी था जब पे काम है पधारे और उनके साथ वो व्यक्ति आए तो प्राचीन महर्षियों ने उठकर जहाँ पे काम है का सत्कार क्या वहाँ इस नवीन व्यक्ति को भी हाथ जोडकर प्रणाम किया । अन्य जान तो पिता में है कि सम्मान में उठे थे । फिर भी वेश नवीन व्यक्ति के मुख की दृढ मुद्रा देख उत्सुकता से उसकी और देख रहे थे और हम तो उन अनभिज्ञ व्यक्तियों में से किसी का साहस नहीं हुआ । वो इस के विषय में कुछ पूछे । ऐसी आशा की जा रही थी कि पिता मैं स्वयं इसका परिचय कराएंगे । पिता महीने बाद में ऐसा ही किया । जब यज्ञ, हवन नामकरण हो चुका तो पिता नहीं नहीं आशीर्वाद रूप दिए गए । प्रवचन में जहाँ बालक के विषय में दो शब्द कहीं वहाँ इस नवीन व्यक्ति का भी परिचय दिया । मैंने कहा हम देखते हैं कि मानव सृष्टि का प्रभातकाल कहाँ पहुंचा है । अन्य ऋषियों ने भी इसको लाने के लिए प्रयत्न किया है, परंतु कश्यप द्वारा ऐसी सृष्टि की जा रही है जो इस भूल लोग के अंत तक अपना संतान सूत्र आगे ले जाएंगी । ये अदिति के आदित्य और दीप्ति के व्यक्ति ही इस जगह में संघर्ष को जीवित रखेंगे । इससे मानव उत्तरोत्तर उन्नति करेगा । वह हालत जिसको महर्षि मरीचि ने इंद्र के नाम से संबोधित किया है । आदित्यों की संतान का रखवाला होगा । जैसे भूलोक में केंद्र राज्य करता है और अंतरिक्ष की विभिन्न शक्तियों का संचालन करता है, वैसे ही उसी का नामधारी वह बाला इस भूमंडल पर राज्य करेगा । वह आदित्यों का राजा बनेगा और अपने यौवनकाल में आदित्यों के यश और कीर्ति का पालक बनेगा । सब बैठे हुए होने एवमस्तु एवमस्तु के वाक्य से पिता में है कि वजन का समर्थन किया । उसके उपरांत पिता मैंने अपने समीर बैठी भव्य मूर्ति का परिचय दिया था । मैंने कहा इस बात को जानकर सबको खर्च होना चाहिए कि इस जनपद को अब एक शासक मिल गया है । महात्मा अनंग ने इस जनपद का शासन चलाने की स्वीकृति दे दी है । सबके साथ न्यायायुक्त व्यवहार चलाकर स्थान पर और भूमंडल में शांति व्यवस्था स्थापित करेंगे । महात्मा अनंग कीर्तिमान के पुत्र और कदम के पौत्र हैं । कदम मैं सुनी सृष्टि के जी थे और विराट स्वभावी थी । अंगने हमारे त्रिवर्ग स्मृति शास्त्र का अध्ययन किया है और उसके अनुसार ही वह राज्यकार्य चलाएंगे की ग्रही अनंग का राज्याभिषेक किया जाएगा और वह जनपद के शासक हो गई । इस आशीर्वाद के उपरांत कश्यप में एक वृहत बोझ दिया । पिता में है भी उसमें सम्मिलित थे । महर्षि पिता में है आनंद और उनके साथ कुछ कश्यप के मित्र एक प्रसव कक्ष में बैठे पूजन कर रहे थे । उस समय विभिन्न विषयों पर चर्चा का आरंभ कश्यप नहीं किया । कश्यप ने प्रदान है से पूछा पितामह हैं? आप ने कहा है कि मेरी पत्नी दिति की संस्था टेस्ट इस भूमंडल को मानव सृष्टि से भरने में अतिथि की संतान आदित्यों को सहयोग करेगी । परंतु भगवान ये तो संतान से गिर्णा करती हैं और मेरे अनेक बार प्रयास करने पर भी वह इंकार कर चुकी है । खाता पिता मैंने मुस्कान भरकर कहा जब हम देख रहे हैं कि जहाँ अन्य दक्षिण अन्याय सृष्टि रचना ने संलग्न हो रही हैं, वहाँ देती अभी बाल्यकाल में ही पिक्चर रही है परंतु इस भविष्यवाणी ने भी सार है यह अन्यथा नहीं होगी । वार्तालाप चलने लगा तो बृहस्पति को कश्यप के मित्र के नाते आमंत्रित किया गया था और बोल उठा पे काम है महात्मा अनंग का जनपद कितना बडा होगा, जितने पर नियंत्रण रखने की इसकी सामर्थ्य होगी । अंदर भी अपनी सामर्थ्य तो हमारे एक सुबह तो सुनने से भी कम है । शब्द जैसे हमारे शिविरों में बीसियों है । देखो बृहस्पति तुमसरा अपनी विलक्षणता का ही परिचय देते हो । साथ ही तुम्हारे लक्षण का सादा विघटन की और ही जाती है । संगठन तुमको सुहाता नहीं देखो समाज एक मानव शरीर के समान है, शरीर में सामर्थ्य की सूचक बाहे हैं परन्तु शरीर बही मात्र नहीं । इसके दूसरे अंग भी हैं । इनमें सबसे मुख्य सिर्फ अच्छा मस्तिष्क पूर्ण शरीर का संचालन करता है । वहाँ भी मस्तिष्क से अपनी सामर्थ्य का प्रश्न पाती हैं । इसी प्रकार समाज रुपये शरीर में अनंग अपनी सैन्यशक्ति के साथ बहु का काम करेगा परन्तु समाज का मस्तिष्क महर्षि और अन्य विद्वान आनंद की सहायता करेंगे । इस कारण तुम्हारे सुंदर इत्यादि सुन्नतों की शक्ति अनंग की शक्ति से ही सिद्ध होगी । उनको भी अपने समाज में ग्रामीणों का निर्माण करना पडेगा अन्यथा अनंग का ही प्रभाव रहेगा, अन्य किसी का नहीं । अपने समाज का मस्तिष्क मैं और यदि दोनों समाजों के मस्तिष्क न्याय एवं शांति के पक्ष पर न चल सकें तो संघर्ष होगा और विजय उसकी होगी । जिस समाज में मस्तिष्क और हूँ तथा शरीर के अन्य अंगों में समन्वय और सहकारिता होगी, कश्यप हैं । इस समय एक नवीन आयोजन किया । उसकी एक पत्नी मुनिष वो भी दक्षकन्या थी । भोजन हो रहा था । सबके समक्ष मुनि की दो कन्यायें एक उच्च मंच पर आकर खडी हुई एक अन्याय पांच बरस की थी । यात्री सुंदर देवीभूषण और वस्तुओं को पहले थी और शंघाई आयुक्त थी । जब ये आई तो कश्यप ने पिता में का ध्यान उस और आकर्षित कर रहा हूँ । ऍम एक अन्यायी मेरी पत्नी मुनि की जुडवा संतान है । जन्म से नृत्य और कला का प्रदर्शन कर दी रही हैं कि आपने नृत्य और संगीत का आपके सम्मुख प्रदर्शन करना चाहती हैं । इनमें से एक स्पष्ट है और दूसरी स्वच्छता है पिता नहीं । मुस्कराकर इसकी अनुमति दी तो गाने लगी । सर्वप्रथम ओंकार ऍम उपासी का उद्घोष गान हुआ तत्पश्चात उन्होंने अनेकानेक भक्तिभाव की मुद्राएं नृत्य में संपन्न की । पिता महीने परेशान होने आशीर्वाद क्या इनकी संतान गणधर नाम से विख्यात होंगी और मानव को मोक्ष का मार्ग दिखाने में सहायक होंगी? रसोत्सव और बोझ में महर्षि अंगीरा की प्रथम पत्नी बृहस्पति की मात्रा भी उपस्थि थी । उसने भी वहाँ बृहस्पति और पिता नहीं में हुए वार्तालाप को सुना था । उत्सव से लौटते समय सुनीति बृहस्पति को अपने पिता महर्षि अंगीरा के निवास स्थान पर ले आई । वहाँ पुत्र को उनके पिता के सामने बैठाकर बोली राष्ट्रपति अब अनंग राजा बनेगा, इस कारण अपनी स्थिति पर विचार कर लो । परमाणु राष्ट्रपति ने कहा अंको कौन राजा मानेगा । किसी ने भी उसे राजा बनने के लिए नहीं बुलाया और नहीं उसे राजा बनने के लिए कहा है । महर्षि अंगिरा ने कहा यहाँ के सब ऋषि महर्षियों की अनुमति से अंग को राजा निर्वाचित किया गया है । अंदर की राज्य करने में योग्यता की परीक्षा कर ली गई है । मैं समझता हूँ कि वह ठीक व्यक्ति है परन्तु बृहस्पति ने पूछा उन ऋषियों एम महर्षियों की संख्या कितनी थी, जिन्होंने अनंग भी परीक्षा कर इसे राजा निर्वाचित किया है । ग्यारह थी । इनमें छहों महर्षि थे और पांच अन्य ऋषि थे । परन्तु पिताजी मैं तो था ही नहीं । नहीं सहस्त्रों अन्य लोग थे जो इस जनपद में रहते हैं । इस कारण खाने और से अपना राजा मानने पर बाध्य नहीं किया जा सकता । बाध्य करने का तो प्रश्न ही उपस्थित नहीं होता । वास्तविक स्थिति यह है कि अधिकांश लोग इसके अधीन रहने के लिए स्वतः तैयार हो जाएंगे । कुछ लोग तो विद्वता मंडल के लिए मंगलकामना की बात जानकर और अन्य इसकी कार्य पटता को देखकर तथा इसके राज्य दंड को देख कर आधार दंड से राज्य करेगा । क्यों नहीं जब आवश्यक होगा तो राज्य दण्ड भी प्रयोग में लाया जाएगा । राष्ट्रपति मौन हो गया । सुनीति ने कहा, बृहस्पति क्या तुम अपराधियों को दंड नहीं देते? तुम तो नर अपराधियों को भी दंड दे देते हो? नहीं, मैंने ऐसा नहीं किया तो हमला का गला किसलिए घोडा गया था? इसमें आपने कभी ले वाले को रुष्ट कर दिया था । मैं समझता हूँ कि वह अकारण नहीं हुआ था । सामूहिक युद्ध ही सबके और न्याय है । अंगीरा ने पुत्र को समझने का यह क्या? बृहस्पति तुम भूल कर रहे हो? सत्य और न्याय का निर्णय जनमत से नहीं, वन ईश्वरीय विधान से होता है । उसको कहाँ ढूंढा जाए? वेद और वेदों के या था तथा सदाचारी जम नियमों का पालन करने वालों के कथन ही धर्म का निर्णय करने में समर्थ हैं और अंत उसका निर्णय कौन करेगा? विज्ञान वान, सदाचारी और यम नियमों का पालन करने वाला कौन है? ये लोग अपनी विद्वता से अपने अधिकारी होने को सिद्ध कर देंगे । तो क्या अस्त्र शस्त्रों का निर्माण तथा उन का प्रयोग विद्वता के लक्षण नहीं है? ये विद्वता को सिद्ध करने का एक साधन है । इसके अतिरिक्त अन्य भी साधन है । साधन समूह ही निर्णय करते हैं । कौन सत्य और न्याय का पक्ष ले रहा है? पिताजी कैश का यह अर्थ नहीं, जो विजयी होगा । वहीं सत्य का पक्ष ले रहा है अंगीरा हस पडा उसने कहा हाँ! परन्तु स्मरन् रखो की मृत्यु और अन्यायमुक्त पक्ष लेने वाले सदा पराजय होंगे । जब भी उन को पराजित करने के लिए न्याय स्त्रियों को भी क्या तपस्या और बलिदान करना पडेगा था । इस मानव सृष्टि में संघर्ष सादा रहेगा । संघर्ष में दोनों पक्षों की हानि हुआ करेगी । साथ ही विजय सब विपक्ष की ही होगी । बृहस्पति अपने मन में विचार करता रहा की विजय शक्ति की होगी । इस कारण शक्ति संचय ही धर्म है हैं । आपने सुना साहित्यकार गुरुदत् प्रतिनिधि रचना प्रभात वेला का दूसरा परिच्छेद

तृतीय परिच्छेद

तीसरा परिचय महाराज अनंग ने राज्य को बहुत विस्तार दिया । उस राज्य के पालन पोषण में महर्षि अंगिरा, महर्षि अत्रि और महर्षि पुल है का बहुत सहयोग मिला । इन महर्षियों ने अपने अपने कार्य को विस्तार देने के लिए शिष्य परंपरा चला रखी थी । उन शिष्यों में भी अनेक ऋषि पद प्राप्त कर चुके थे । अस्त्रशस्त्र तथा कृषि कार्य के लिए जंतर अधिक सब अंगीरा के कार्यालय में आयोजित तथा निर्माण किये जाते थे । राज्य के विस्तार से कार्य इतना अधिक बढ गया था कि महर्षि को अपनी पत्नियों की सुध लेने का अवकाश की नहीं मिलता था । सावित्री दो पुत्रों और तीन कन्याओं की मां बन चुकी थी । अन्याय तो ऋषियों की पत्नियाँ बन सृष्टि रचना ने लग गई थी और पुत्र थे उतथ्य तथा सम्बद्ध । वे भी पिता के समान प्रकृति के जटिल रहस्यों को जानने में लीन थे । विदेशी पद प्राप्त कर चुके थे महर्षि अंगीरा की सुनीति से एक लडकी भी हो चुकी थी । इस कारण वो समय पंद्रह वर्ष की युवती थी और अति मृदुल स्वर से वेदज्ञान करती थी । उसका उसे ब्रह्मवादिनी की उपाधि प्राप्त थी । सुनीति पुत्र बृहस्पति की हत्या मार्ग का अवलंबन करने पर बहुत निराश की तथा महर्षि अंगीरा नहीं उसे सांत्वना देने के लिए एक और संतान धारण करने का सुझाव दिया । इस पर सुनी थी । महर्षि अत्रि से परामर्श करने जा पहुंची । खुशी ने कहा क्या चाहती हो उत्तर अथवा पुत्री जो मेरी आज्ञा का पालन करें, बनाया उसी सुनीति के मुख से निकल गया । महर्षि ने एक औषधि सेवन करने के लिए कहा । इसे गौदुग्ध से बात करो और पति की सेवा में चले जाओ । दस माह उपरांत एक अति सुन्दर मेधावी पुत्री का चल होगा तो तुम आ ही आज्ञाकारिणी होगी । भ्रम वादनी गर्व नहीं थी कि बृहस्पति और अनंग में विवाद उत्पन्न हो गया । राष्ट्रपति के शिविर को अनंग ने अपने राज्य में सम्मिलित कर बृहस्पति को कहा कि उसे त्रिवर्ग स्मृति का पालन करना होगा । राष्ट्रपति का कहना था उनकी अपनी एक स्मृति है और उसका ही पालन करेंगे । अंग्रेजी घोषणा कर दी । यदि बृहस्पति और उसकी प्रजा त्रिवर्ग स्मृति का पालन नहीं कर सकते तो ब्रह्मपुरी से दो सौ योजन की दूरी पर चले जाएं अन्यथा उन्हें बलपूर्वक यहाँ से हटाया जाएगा । राष्ट्रपति ने यह चुनौती स्वीकार कर ली और दोनों और से युद्ध की तैयारी होने लगी । ब्रह्मवादिनी एक वर्ष की भी नहीं हुई थी कि ब्रह्मपुरी के बाहर घोर युद्ध हुआ । बृहस्पति युद्ध में बंदी बना लिया गया । भारी नरहत्या के उपरांत वनवासी शिविर टूट गया और बच्चे कुछ वनवासियों में से अधिकांश भाग गए और कुछ अनंग की नगरी में श्रमिक जीवन व्यतीत करने के लिए उद्यत हो गए । ऍम होगी बहुत बडी संख्या थी । बहुत ऐसी थी जिनके पति युद्ध में मारे गए थे और कुछ अविवाहित युवतियां भी थी । इस विजय के उपरांत पिता मैंने अपने को राजनीति से तटस्थ रखने के लिए अपना आश्रम उत्तर की और लगभग दो सौ योजन दूर बना लिया । ट्राय सब महार्षि अनंग की नगरी ब्रहमपुरी में ही रह गए । ब्रह्मपुरी वैदिक संस्कृति हम समझता का केंद्र बन गया । बृहस्पति को मृत्युदंड दिया गया था परंतु सुनीति और अंगीरा की याचना पर पिता मैंने उसे शर्त पर जीवन दान देने का वचन दिया कि वह नगरी से दूर कहीं जाकर अपना आश्रम बना कर रहे हैं । अब बृहस्पति इन शर्तों के साथ मुक्त हुआ और अपना नवीन आश्रम बनाने के लिए भ्रम पुरी से उत्तर पूर्व की और जाने लगा तो कमला उनके साथ जाने के लिए तैयार हो गई । घटना को पंद्रह वर्ष व्यतीत हो चुके थे और हमला के भी एक पुत्र का जन्म हो चुका था । वो इस समय तीन वर्ष का कुमार था । उसका नाम था का जी दशक की अगर बहुत संतान हो चुकी थी । अतिथि के बारह पुत्र हो चुके थे और सब आदित्य कहना देते । बारह पुत्र अब दो वर्ष का था । उसका नाम विष्णु था । बाल्यकाल से ही यह बालक सब आदित्यों से अधिक बलवान, ओजस्वी और प्रतिभावान दिखाई दिया था । दक्षकन्या अदिति के भी दो पुत्र थे किरण कश्यप और निर्णय ये दोनों अभी उत्तर अविजीत थे । पहले तो दीदी ने संतान हरण करने से इंकार कर दिया तो फिर एक का एक वो एक साइकल अपने पति कश्यप के पास पहुंची और संतान की याचना करने लगी । उस समय कश्यप जगे पूजा उपासना में बैठने के लिए वस्त्र बदलते चयन घर में जा रहा था थी । उसके साथ वहाँ जा पहुंची और सहवास के लिए आग्रह करने लगी । प्रजापति ने कहा दही! अभी संध्या समय इस समय में पूजा पाठ इत्यादि के लिए जब बिशाला जा रहा हूँ आज रात को मना तुम्हारी इच्छा होगी । भगवान नहीं है । मैं तो अब इस कार्य में शिक्षण की देर भी सहन नहीं कर सकती । प्रश्न आपने गंभीर हूँ, देती के मुख पर देखा तो वासना से आच्छादित था । प्रजापति को चिंता लग गई की देर करने पर वो कहीं अन्यत्र सुल्तान लेने ना चलते है । मैं तैयार हो गए । दस माह उपरांत देती के दो पुत्र हुए ऋण कश्यप और फिर ना जब अतिथि के बारह पुत्र विष्णु का जन्म हुआ । विरण कश्यप हो दस वर्ष का था और सब भाइयों को मारने पीटने के लिए विख्यात था । उसके इस व्यवहार पर वे हिरण्यकश्यपु के पिता बालक से तथा उसकी माता से नाराज रहते थे । विश्व में एक वर्ष का था कि किसी कारण है रन कश्यप उत्कृष्ट हो विष्णु का गला खूब हत्या कर देने पर उद्यत हो गया । घटना वर्ष अतिथि वहाँ गई और उसने हिरणकश्यप को वहाँ से भगा दिया । जब प्रजापति कश्यप से कहा गया तो उसने हिरण्यकश्यपु और माँ को बुलवाया । जब आए तो कश्यप ने देती के सामने आरोप का वर्णन कर दिया । उसने कहा अतिथि कह रही हैं के हिरण ने विष्णु का गला घोंट रहा था हाँ पिताजी हिरण मैंने बताया मैं समझ रहा था की इतना सुन्दर बालक के होते हुए आप अपनी अन्य सब संथानों की अवहेलना कर अपना सब प्रेम और विद्यालय किसी को दे देंगे । इससे मेरे मन में कई दिन से ईर्ष्या हो रही थी । आज मेरे मन में आया कि मैं इस की हत्या कर दूँ । रंग जानते हो ये बात है । पिताजी इससे अच्छा आप उनमें क्या हो सकता था की एक क्षेत्र से बाहर कर बीसियों को प्रसन्न किया जाएगा । मैंने यही करने का ये किया था । कश्यप हिरण्यकश्यपु की मनोवृत्ति देख उसकी माँ से बोला देखो देवी ये असुर इस घर में नहीं रह सकता । या तो राज्य की और से मृत्युदंड हो जाएगा अन्यथा मुझसे शापित हो । यहाँ से निकाल दिया जाएगा भगवान और उनके तो बारह बारह संतान है उनकी एक चली भी गई तो हानि नहीं होगी परंतु मेरे तो दो ही हैं हमको रिश्ता नहीं कर सकती हूँ । कश्यप ने कह दिया ऐसा करो कि से लेकर कहीं अन्यत्र आश्रम बना लो । मेरे निर्वाह के लिए क्या देंगे? कश्यप ने पूछ लिया मांगों क्या चाहती हो? ब्रह्मपुरी वाला है उद्यान, अन्य क्षेत्र और सब भूमि ठीक है, अब तुम को मिल जाएगा । इस प्रकार कश्यप ने अपना पृथक आश्रम बनाया गया या श्रम हम पूरी से पूर्व की और एक सौ योजन के अंतर पर था । पहाडी क्षेत्र से नीचे था ब्रह्मपुरी पहाडी क्षेत्र में थी धर्म का आश्रम हिमाच्छादित पहाडों को पार कर उत्तर की और था । महाराज अनंग भी पहाडों में रहते हुए अपने राज्य का विस्तार नहीं कर सकते थे । पता उन्होंने धरमपुरी से निकलने वाली सरस्वती के तट पर अपनी राजधानी ऐसे स्थान पर बनाई जहाँ सरस्वती पहाडों को छोड समतल भूमि में प्रवेश करती थी । इसका परिणाम यह हुआ हिरणकश्यप भ्रम पुरी में निरंकुश हो वृद्धि पानी लगा । आदिकाल में पृथ्वी कमल रूपी जल से बाहर हिमालय के शिखर पर ही दिखाई थी थी । वहीं पिता मैंने तपस्या की और उसी स्थान से सृष्टि की रचना का आरंभ हुआ है । उस समय मानव सृष्टि हो रही थी । भूमी का एक विस्तृत खंड जल से बाहर निकल चुका था । जल का शोषण बढा रूपी बादलों ने किया था और सागर का जल घट रहा था । जल्द से बाहर नए नए भूखंड बनने योग्य हो चुके थे । मानव सृष्टि का व्यवस्था हिमालय के पठारों से चलकर उत्तर, पूर्व, पश्चिम और दक्षिण को हो रहा था । पता कश्यप ने अपना नवीन निवास था । हिमालय के एक और धरमपुरी के पूर्व की और बना था हम्म का नवीन निवास स्थान भी मुश्किल से उत्तर किया था । धर्म सर के समीर भीमपुरी में निरंकुश रहते हुए हिरण्यकश्यपु ने अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिया । इस राज्य के स्थापित हो जाने पर जितनी को चिंता लगने लगी । राज्य तो बन गया परंतु आनंद से मित्रता में रखी गई तो उसके पुत्र का भी वही परिणाम होगा । सुनीति के पुत्र बृहस्पति का हुआ है था । उसने एक दिन पुत्र को बुलाकर कहा बेटा क्या तुम ने अपने को राजा घोषित कर दिया है? हूँ । यह स्थान तब से राजा रहीन पडा था । जब से अनंग ने अपनी राजधानी सरस्वती के तट के समक्ष एक समतल स्थान पर बनाई है मैंने ये विचार क्या है? जब कोई राजा नहीं तो मैं ही राजा क्यों ना बन जाऊँ । ये विचार कर मैंने अपने को वहां का राजा घोषित किया है । देखो बेटा किसी निवास ग्रह का रिक्त होना इस बात का सूचक नहीं होता । कोई चाहे उसमें आकर रहने लग जाए । उस पर अधिकार तभी हो सकता है जब उसके पहले स्वामी से इसकी स्वीकृति ले ली जाए । देखो तुम महाराज अनंग के साथ । ये सूचना तो हमने यहाँ अव्यवस्था देख यहाँ व्यवस्था स्थापित करनी आरंभ कर दी है । ऋण कश्यप का छोटा भाई है ना की सूचना भेजना नहीं चाहता था तो समझ रहा था की सूचना भेजने से तो कार्य में उसे सचेत करना होगा । तब वो उसे पसंद करेगा अथवा नहीं ये कहना कठिन है मैं चुप चाप राज्य का भोग करते हुए यहाँ शक्ति संचय कराना चाहता था । माता ने बृहस्पति के विद्रोह का परिणाम बताया तो वह विचार करने लगा । उसने इसका एक उपाय विचार कर लिया । अनंग से अनुमति लेने के स्थान पर वो पे काम है कि निवास स्थान को चल पडा । पिता में है दुर्लभ हिमालय पार कर रहे हैं । बिहड मरुस्थल को भी पार कर उत्तर में अति शीतल स्थान पर अपना आश्रम पसाई हुए थे । अरुणाक्ष उसी स्थान को जला बंदो को अपने लक्ष्य स्थान पर नहीं पहुंचेगा । दुर्गम मार्ग पर आकाश मेघों से मुझे गया और मूसलाधार बारिश होने लगी । नदी नाले जल से भर गए और आगे जाना उस पार हो गया । नाक शेक स्थान पर जल से खेल गया और वो ना आगे बढ सका और नहीं लौट सका । कई दिन तक उसने अपने मार खुलने की प्रतीक्षा की हुआ हूँ । नहीं खुला है एक राहत वो गुफा में हो रहा था कि वो गुफा भी जलमग्न हो गई और वह जल में बह गया । ऍम को भी हम पूरी से गए । दो माँ से अधिक हो चुके थे कि गंगा नदी में मछली पकडने वाले उसका गला सडा शव जल में बहता हुआ पकडना आएंगी । उसे पहने हुए भूषण से पहचाना गया तो उसे राज्य रहने पहुंचा दिया गया । उसके शव को देख हिरण का शव उसकी माता दी थी तथा सारा परिवार बहुत शोक रेस्ट हो गया । राज्य ग्रह में हाहाकार बच गया और मृत्यु का कारण जानने का यह होने लगा । स्थिति ने अपने पति को सूचना भेज दी । उसके दो पुत्रों में से एक मृत्यु को प्राप्त हो गया है । प्रजापति कश्यप समाचार पाते ही आए और मीनाक्षी के पिता में से राज्य प्राप्ति की बातचीत करने की बात सही बोल रहे हैं । ये पिता मेरे को भयभीत कर कुछ प्राप्त करने की लालसा से चाहता हुआ परमात्मा के कोप का भाजन बन प्रतीत होता है । उसको रजत नहीं था कि पिता है, इस प्रकार से पसंद नहीं होते । वो सेवा और उपासना से प्रसन्न होते हैं । राज्य तो एक साधारण सी बात है । वो तो उससे बहुत अधिक दे सकते हैं । क्या दे सकते हैं लेकिन कष्टपूर्ण पूछ लिया जिससे चाहो अभिदान पा सकते हो परन्तु वो प्रसन्न होते हैं । शुद्धभाव से सेवा करने से ही इस सुझाव पर हिरणकश्यप अतिप्रसन्न हुआ । वो मन में अपने विषय में विचार करता हुआ अपने पिता का मुख देखता रह गया । उसे इस प्रकार मुख देखते हुए पास कश्यप ने कहा देखो बेटा छलकपट को छोड शुद्ध अमन से परमात्मा में विश्वास रखते हुए तपस्या करोगे तो उनके अधीन अथवा उनके भक्त जितने भी हैं, सब तो हमारे मित्र और भक्त हो जाएंगे, तब तो निष्कण्टक राज्य करने का अवसर मिल जाएगा । हमारे भाई ने विचार किया था कि पिता मेरे को अपने आश्रम में अकेले घेरकर उनसे अपने लिए ब्रह्मपुरी का राज्य प्राप्त कर लेना । इस विचार की सूचना उनको मिल गई होगी । उन्होंने ईश्वर से अपनी रक्षा की याचना की और ईश्वर ने किंचित मत्र उपाय से अरुणाक्ष को पहले तो जाने से रोका होगा और जब वो नहीं रुका तो उस पर मुझे पास क्या प्रतीत होता है? परंतु भगवान को सूचना कैसे पा गए होंगे, ये तो केवल नहीं जानता था । एर्नाक का विचार किया था वाला यहाँ से दो तीन सौ योजन के अंतर पर बैठे पिता में कैसे उनके मन की बात जान पाए होंगे? अवश्य तुमने बताई होगी नहीं पिताजी, मैं इतना नीचे नहीं हूँ कि अपने भाई की हत्या का कारण बनाओ । कश्यप पडा कहने लगा मन का मन साक्षी होता है । देखो तो मैंने तो तुम्हारे मन की बात जान ली है तो हमारा बन बिना तुमको बताए मुझे बता रहा था कि है ना? पिता में वो भयभीत कर्स नगरी का राज्य लेने गया था । मुझे विश्वास नहीं आ रहा था कि तुम्हारा भाई इतना दुष्ट हो सकता है और अब तुमने अपने मुख से भी और सूचना का समर्थन कर दिया है । पिता में है । मुझसे भी अधिक योगस्थ व्यक्ति हैं । इस बात का मुझे संदेह हुआ था । वह निश्चय से जान गए होंगे । रन कश्यप के मन में एक बात अंकुरित हो रही थी परंतु वो से अपने पिता को बताना नहीं चाहता था । अच्छा उसमें बात बदल दी । उस ने कहा, पिताजी आधि दृष्टि के एक जीव कदम होनी है । उनका विवाह वैवस्वत मनु की कल्याणदेव होती से हुआ है । उन्होंने घोर तपस्या के उपरांत एक पुत्र को जन्म दिया था । उनका पुत्र उस दिन नाना जी के घर पर आया हुआ था और माँ को बहुत बातें बताया गया है । वो अपना नाम कपिल बताता था । सत्य वो तो योगेश्वर कहलाता है । क्या कहता था देवी विधि सामने बैठी पिता पुत्र के वार्तालाप को सुन रही थी । स्थिति ने कहा, कदम और प्रजापति रुचि की पत्नियाँ परस्पर बहने थी । दोनों ने अपने माता पिता की अनुमति के बिना विवाह किया था और उनके घर से भागकर पिताजी के आश्रम में आकर रहने लगे थे । दोनों के कई संतानें हुई । एक बार प्रजापति कर्दम अपनी पत्नी देवहूति के साथ पिताजी के आश्रम में वजह रूम और उसकी पत्नी दक्षिण को मिलने गए । उनके पुत्र कपिल भी उनके साथ थे । तब मुझे बहन सामान समझाते थे । हम सब सब व्यस्त थे । पिछले साल कपिल अपने भाई के पुत्र अनंग के राज्य में भ्रमण करते हुए इधर आए । फिर नाक से उसे घर पर लेगा । आया यहाँ मुझे वो पहचान गया । मेरे कहने पर वो हमारे घर पर कई दिन रहा और उससे बहुत बातें हुई थी । अब वो संख्य विद्या के पारंगत विद्वान हो गए प्रतीत होते थे । उसी के बाद हिरणकश्यप कह रहा है क्या कहता था वो? उन कश्यप ने बताया । वो कहता था ये चराचर जगत प्रकृति की देन है । एक अनादि पदार्थ है । इससे प्रकृति कहते हैं और जगत की असंख्य वस्तुएं उससे ही बनी है । प्रकृति का ज्ञान प्राप्त हो जाए तो फिर कुछ भी जानने को नहीं रहता हूँ और मनुष्य को परम सुख की प्राप्ति हो सकती है । हाँ, ये तो है ही है । कश्यप ने बता दिया पिताजी महीने परमात्मा के विषय में पूछा था वो कहने लगे उसकी चिंता नहीं करनी चाहिए । प्रकृति के नियमों का पालन करने जाएँ तो परमात्मा प्रसन्न रहते हैं । मैंने मुनिजी से प्रकृति के विषय में बहुत बातें पूछी थी और उन्हें बहुत ही अद्भुत बातें बताई थी । सूर्य, चंद्र नारायण और फिर से कुछ रक्षा वनस्पतियों की सृष्टि तथा पशु पक्षी और मनुष्य में अंतर की बातें बताई गई थी । मैं कपिलमुनि के कसम से एक बात समझी की प्रकृति के नियमों का पालन करने पर हमें किसी भय की आवश्यकता नहीं । मैं समझी हूँ कि भैया ने प्रकृति के नियमों का पालन नहीं किया, इसी कारण वो जल प्लावन में डूब गए । कश्यप को स्मरण हुआ या नीति ने प्रकृति की आवेग नहीं इन बालों को जन्म दिया था और उस आर एग्ने बहते हुए इसका बडा भाई यमलोक सुधर गया है और ये भी उसी प्रकृति की आवेग में इस योनि से उधार पाएगा । इस कारण वो चुप रहा । दशक मुनि के वार्तालाप थल ये हुआ गृहऋण कश्यप पे काम है से अभिदान प्राप्त करने की योजनाएं बनाने लगा । कश्यप तो देती को सांत्वना देकर चला गया और हिरण कश्यप पिता नहीं ऐसे अवैध धान प्राप्त करने का यत्न करने लगा । उस समय तक अनंग का देहांत हो गया था और उसका पुत्र अतिबल राजा बन गया था । अंग के देहांत पर जब अतिबल का राज्याभिषेक हुआ तो हिरण कश्यप भी उत्सव देखने अनंगपुर चला गया था । अनंगपुर सरस्वती के तट पर समतल भूमि ने बसान नगर था और उस नगर की शोभा देखकर हिरणकश्यप मोहित हो गया । उनके साथ ही उनकी पत्नी भी थी । इस उत्सव में आकर्षण का केंद्र ऋषि नाराज थे । वो सामदेव का अति मधुर स्वर में गान करते थे । उन्होंने एक यंत्र बनाया हुआ था जिसे वीना कहते थे और यंत्र पर ऐसी मधुर ध्वनि निकालते थे । सुनने वाले मोहित होकर नाचने लगते थे । नारद परमात्मा के भक्त थे और स्वयं भी जब परमात्मा की महिमा के गीत गाते तो मस्त हो नाचने लगते थे । हिरण्यकश्यपु तो अनंग के पुत्र अतिबल की मैत्री प्राप्त करने में लीन था और उसकी पत्नी जो सुने गर्भवती थी । नारद मुनि के कीर्तनों और प्रवचनों को सुनने में लगी हुई थी है । उसके संगीत, नृत्य और प्रेम भक्ति के गीतों में रस पा रही थी । तीन सप्ताह तक उत्सव चलता रहा । पिता मै भी इस अवसर पर उपस्थित थे । हिरणकश्यप अतिबल एवं पिता हैं को प्रसन्न करने में लगा रहा और उसकी पत्नी नाराज जी के शिविर में रहती रही । हम उत्सव समाप्त हुआ । हिरण्यकश्यपु ने अपनी पत्नी से कहा नहीं नहीं मैं हम लोग नहीं पिता के साथ जा रहा हूँ । सुना है कि वहाँ जाने का मार्ग अतिदुर्गम है । जा नहीं होगी । इस कारण तुम माताजी के पास ब्रहमपुरी को लौट जाओ । वहाँ से वरदान पाने के उपरांत ही आऊंगा । ऋण कश्यप ओके पत्नी नाराज जी के मनमोहक गीतों पर इतनी आसक्त हुई थी । वो अपने प्रसव काल में नारद जी के आश्रम में ही रहना चाहती थी । पता उसने कह दिया मैं अपने इस प्रसवकाल में नारद मुनि जी के आश्रम में रहना चाहती हूँ । वहाँ क्या है भारत जी का मधुर संगीत, उनका वीणावादन तथा उनका साम रेत । क्या नाराज जी का आश्रम कहाँ है इसी सरस्वती के तट पर परंतु पर्वतों में है । ठीक है आपने दास दासियों को साथ ले जाओ । इस प्रकार एक महान नास्तिक की पत्नी उधर चल पडी जहाँ भावी संघर्ष का बीजारोपण हो रहा था । प्रशस्त्र अपनी पत्नियों सहित ब्रह्मसर से निकलने वाली तीसरी महान हम नदी के तट पर एक विशाल नगरी अमरावती निर्माण करने रहता था । यहाँ केंद्र ने राज्य स्थापित कर लिया था और देवा लोग के जनपद को संगठित किया था । देव लोग नाम का जनपद अंग के पुत्र अतिबल के जनपद से अधिक सुंदर सुखप्रद और सास टिक वातावरण से परिपूर्ण था । यहाँ सब लोग सुखपूर्वक स्पष्टी के उत्पादक परमात्मा का चिंतन करते हुए पिता में है कि त्रिवन शास्त्र का पालन करते थे । स्थान फल कंदमूल एम से भरपूर था । इंद्रा अपने आदित्य भाइयों सहित एक सहस्र घरों के वाले प्रसाद में रहता हुआ आपने प्रजाक्ता हित चिंतन क्या करता था इस चिंतन में कश्यप मुनि अपने पुत्रों की सहायता करते थे । अनंग की मृत्यु के उपरांत अतिबल के राज्याभिषेक उत्सव ऊपर उपस् थित होने का निमंत्रण इंद्रादि आदित्यों को भी मिला था । इस पर भी वे उत्सव पर नहीं गए । उन्होंने अपने पिता के द्वारा अतिबल के प्रति सद्भावना और सहकारिता का सन्देश भेज दिया था । काम है कि पूछने पर केंद्र इंद्रादि इत्यादि नहीं आए । कश्यप ने कहा उन्होंने अपनी शुभकामना का संदेश भेजा है । उनको स्वयम आना चाहिए था । मैं भी ऐसा ही समझता था । परन्तु इंद्र का कहना है कि शीघ्र ही अतिबल को राज्य चुप होना पडेगा इस कारण उन्होंने अपने चित्र की अतिबल से प्रति प्रकट की है पिताराम है कि मुख से निकल गया ठीक है परंतु कर्म के पहले ही उसके फल की कल्पना तो ठीक नहीं है । कश्यप ने अभी विनीत भाव से कहा, भगवान बुद्धिमान लक्षण देखकर वस्तुस्थिति का ज्ञान प्राप्त करते हैं और उसका प्रतिकार भी विचार कर लेते हैं । अभिप्राय यह है कि कश्यप मुनि केंद्र को मुझसे अधिक बुद्धिमान मानते हैं । देखो मनोहर मेरा सिद्धांत यह है कि कर्म करने की स्वतंत्रता सबको देता हूँ । शुभ शिक्षा भी सबको देता हूँ परन्तु किसी को भी काम करने से पूर्व फल का भागी मैं नहीं मानता । मेरा अनंग का निर्वाचन ठीक था और उसने पच्चीस वर्ष से अधिक साल तक धर्मयुक्त राज्य बनाया है । अंग के पुत्र अतिबल को भी मैं ऐसा ही मानता हूँ । मैं कोच्चि उस श्रृंखला अवश्य है परन्तु छत्रिय स्वभाव वाले सब लोग ऐसे ही होते हैं । मेरा विचार है कि जब उसके कंधों पर उत्तरदायित्व बढेगा, सब है, अपना व्यवहार शस्त्रनुसार कर लेगा । केंद्र और उसके भाई उसके विपरीत मानते हैं । विश्व बीज को ही जलाकर भस्म कर देने में विश्वास रखते हैं । नवीश बीज होगा, न विश्व रक्ष बनेगा । फिर विश्व फल भी उत्पन्न नहीं होंगे । इससे आत्मा की स्वतंत्रता का हनन होता है । भगवान स्वतंत्रता सबको प्राप्त है परन्तु किसी अनाधिकारी को अधिकार तो नहीं दिए जा सकते । हैं । स्वतंत्रता मानवीय कार्यों में है परंतु राज्यकार्य एक विशाल शक्ति है । शक्ति देने वाले को पात्र कुपात्र का विचार करना ही पडता है । पर हम क्या कर सकते हैं और महात्मा की कृपा से वह अनंग का जीएसटी पत्र है और नियम से उसे पिता की परंपरा का पालन करना चाहिए । उसे अवसर तो मिलना ही चाहिए । कश्यप पिता मैं से सहमत नहीं था तो भी वह चुप रहा है परन्तु पिता नहीं की इस अनिच्छित व्यवहार की संभावना का संकेत मिला । उसने अपने विचार में इसका उपाय कर दिया । उसने अतिबल को ये सम्मति थी कि वह अपने राज्य कार्य में विषयों से सहायता ले । पिता मैंने अतिबल के साथ राज्य परिषद के नाम की एक समिति बना दी । इसमें सात ऋषि नियुक्त कर दिए । कश्यप उनमें से एक था । कश्यप का देव लोग के अनुभव का लाभ उठा रहा था । राज्य विषय के उपरांत कश्यप अमरावती लौट गया । इस पर भी वह अतिबल को वचन दे आया कि वो अपनी पत्नियों सहित आकर उसके राज्य में रहेगा । अमरावती में पहुंचकर जब उसने राज्य परिषद ने कार्य करने के लिए अनंतपुरी में आना चाहा तो दीदी ने पति के साथ जाने से इंकार कर दिया । उसका कहना था वो अपनी सृष्टि का सुख भोगने के लिए अमरावती में ही रहेगी । पता कश्यप मनो हत्यारे तीन अन्य पत्नियों को लेकर अनंगपुर में आकर रहने लगा । उसने राज्य में पहुंचते ही उसकी वृद्धि के उपाय करने आरंभ कर दिए । राज्यकार्य सब ऋषियों ने आपने मैं पांच लिया और राजा अतिबल को एक विशाल सेना का निर्माण करने तथा उससे जनपद की रक्षा के लिए लगा दिया । अतिबल का राज्य दस वर्ष तक चला । उसने एक सिद्धांत स्वीकार कर लिया था । राज्यकार्य में तो ऋषियों की सम्मति चलती थी और अधिक निजी कार्यों में वह स्वतंत्रता का जीवन व्यतीत करता था । यद्यपि अतिबल अति सुखी जी था फिर भी वह राज्यकार्य में विषयों को स्वतंत्रता से कार्य करने की स्वीकृति देने से उनके सुप्रबंधन का यश प्राप्त करता था परन्तु अतिव्यस्त नहीं और विषय वासना में सीमा से अधिक रत रहने के कारण वो रुकने रहने लगा और अल्पायु में ही रूम हो मृत्यु का ग्रास बन गया । राजा था और ऋषिगण ये समझ रहे थे कि वो किसी भी समय देख छोड देगा । अच्छा परिषद भवन में बैठे प्रतीक्षा कर रहे थे । मृत्यु का समाचार आते ही वे नवीन राजा के विषय में घोषणा करेंगे । अतिबल के कनिष्ठ पुत्र तथा तीन के छोटे भाई सुदेव को उपयुक्त राज्याधिकारी मानते थे । जब राज्य परिषद में यह विचार हो ही रहा था ये किस प्रकार पेन को सुबह के लिए राज्य छोडकर कहीं अन्यत्र जाने पर उद्यत करें । सब देख सेना के शिविर में आपने राजा बनने की घोषणा कर रहा था । उसने है प्रबंध कर रखा था कि अतिबल की मृत्यु का समाचार उसके द्वारा ही परिषद हो जाए । जो भी उसे विधित हुआ कि उसके पिता का देहांत हो गया है तो उसमें राज्य परिषद भवन, राज्यभवन और अपनी माताओं तथा भाइयों के भवनों पर सेना बैठा दी और राज्यभार अपने हाथ में ले लिया । बहन में अपने राज्य विषय के दिन का भी निश्चय करके उस की घोषणा कर दी । इतना करने के उपरांत वह अपने निष्ठावान सुबह बच्चों को लेकर राज्य परिषद में पहुंच गया । जो ही ऋषिगण को विद्युत हुआ राजा का देहांत हो गया है । तभी उनको विदित हो गया की सेना ने उनके भवन को घेर लिया है । इस पर कश्यप वयोवृद्ध होने के कारण भवन के द्वार पर आकर खडा हो सेनापति को समीप बुलाकर पूछने लगा हम लोग यहाँ खडे क्या कर रहे हो? हमें आ गया है कि राज्य परिषद से कोई भी सदस्य कहीं न जाए । राजकुमार स्वयं यहाँ आने वाले हैं परन्तु वरना तो सेनाध्यक्ष है और न ही राजा । उसके आज्ञा का पालन तुम्हारे करने योग्य नहीं है । हम महाराज बैन को राजा मानते हैं । वह राजा होने के नाते हमारा नेता शासन और सर्वेसर्वा है परन्तु उसका राज्यभिषेक नहीं हुआ है । वो अभी राजा नहीं है उसका राज्यभिषेक हो चुका है । सेनापतियों ने मिलकर उसका राज्यभिषेक किया है । बिना वेदमंत्र पडे पढ दिए गए थे तो वो हम से क्या चाहता है । महाराज अभी परिषद में पढा रहे हैं और स्वयं आपको बताएंगे कि वे क्या चाहते हैं । कश्यप सैनिकों से विवाद करने की क्षमता नहीं रखता था । वहा पे भीतर आकर सब ऋषियों को एकत्रित कर वस्तुस्थिति का वर्णन करने लगा । उसने बताया आप सब लोग बंदी बना लिए गए हैं । क्यों तथा कब तक के लिए वह महाराजा बैन आपको अभी आकर बताएंगे । ऋषिगण सब समझ गए । किसी को भी कुछ और अधिक कहने सुनने की आवश्यकता अनुभव नहीं हुई । कश्यप ने ही बात आगे चलाई । उसमें कहा राज्य की शक्ति सेना है । वो इस समय किसी न किसी प्रकार बैंड ने अपने पक्ष में कर ली है । दूसरी शक्ति जनबल है परंतु जनरल एक जडवत पदार्थ है । उस को सक्रिय करने के लिए किसी शक्तिशाली चेतना की आवश्यकता है । साथ ही उस जनवरी को शक रिय करने के लिए उसके सभी पहुंचने की आवश्यकता है । पिछले दस वर्ष से हमने राज्यकार्य में लीन होने के कारण अपने को इस जडवत शक्ति से दूर रखा है । हम नहीं जानते कि वह शास्त्र भी हमारी सहायता करेगा अथवा नहीं था । मेरी सम्मति यह है कि जब बहन यहाँ आए तो उसको मनमानी करने की स्वीकृति दें । हम यहाँ से चल दें । महर्षि प्रमुख सब ऋषिगणों में युवा थे । पता उनको चुपचाप चल देने के बाद पसंद नहीं आई । उन्होंने कहा, हमें बेन को कह देना चाहिए कि उसका अभिषेक नहीं हुआ है । मैं अभी राजा नहीं है और राज्य अभिषेक बिना ब्राह्मण वर्ण तथा प्रजा वर्ग की अनुमति के संपन्न नहीं हो सकता । कश्यप ने कहा, तब तक हमें अपनी सैनिक शक्ति से कारागार में डाल देगा और हमारे विषय में प्रजा में मनमानी मित्तियां बातें फैलाकर हमें निंदित घोषित कर देगा । परिणाम ही होगा कि राज्य में दूसरी शक्ति भी हमारे संपर्क और प्रभाव में नहीं रहेगी तो हम शक्तिहीन कुछ नहीं कर सकेंगे । प्रसूति चुप रहे । कश्यप ने अपनी योजना बता दी । उस ने कहा हमें इस समय बिना बैन के कृत्य को स्वीकार अथवा अस्वीकार किए अपने को राज्य से पृथक कर लेना चाहिए । जहाँ से अवसर, बातें ही बिताना है, के पास पहुंचना चाहिए और उसकी सम्मति तथा आशीर्वाद से इस दिशा में कुछ करना चाहिए । वो निश्चित हो गया की पूर्ण परिषद के वक्ता कश्यप नहीं हूँ और अन्य सब मौन रहे । उन्हें कुछ अधिक काल तक प्रतीक्षा करनी पडी । पेन स्वयं उसको नहीं पेश करने के लिए उनसे बात करना चाहता था । वो आया तो परिषद की सभा आरंभ हो गई । सभा में बैठते ही बैन नहीं घोषणा कर दी कि मैं अभी अभी सैनिक शिविर में आया हूँ और उन्होंने सर्वसम्मति से मुझे यहाँ का राजा स्वीकार कर लिया है तथा राजा के अधिकार से मैं अपनी परामर्शदाता समिति का निर्माण करना चाहता हूँ । बताइए आप में से कौन कौन उस समिति ने समृद्ध होना चाहेंगे । कश्यप मनी ने कहा, ये हम तब बताएंगे जब आप हमें व्यक्तिगत रूप से अथवा सम दृष्टिगत रूप से उस समिति ने सम्मिलित होने का निमंत्रण देंगे । पहले आप बताइए क्या आप हम सब को अथवा हम में से किसी को उसका सदस्य बनने का निमंत्रण देते हैं? मैं समझता हूँ कि साथ ही परामर्शदाता समिति बहुत बडी है । पांच से अधिक सदस्य नहीं होने चाहिए । साथ ही समिति में एक सैनिक और एक वित्ताधिकारी होना चाहिए । इसके अतिरिक्त व्यापार भी उत्तरोत्तर उन्नति कर रहा है तथा एक सदस्य व्यापार के विषय का ज्ञाता भी होना चाहिए । चेंज दो सदस्य आप में से लेना चाहता हूँ इस कारण क्या पर राज्य संबंधी विषयों में अनुभव है? कश्यप ने कहा राजा देन वो हमारी परामर्शदाता समिति नहीं थी । वो तो राज्य परिषद थी । इसके अधीन सेना, व्यापार इत्यादि विषयों के सचिव थे । तुम सचिवों को राज्य परिषद में सम्मिलित करना चाहते हो, यह है विधान नहीं है । फिर भी हम इस विषय में त्रिवर्ग शास्त्र के अनुसार कार्य करना चाहते हैं । मेरी इच्छा हूँ तो इसी रूप में इस परिषद को रखा जाए अन्यथा इस परिषद को भंग कर दिया जाए और उसके स्थान पर राजा की परामर्शदाता समिति का निर्माण किया जाए । मैं नामों को महत्व नहीं देता । नाम कुछ हो सकता है । हाँ, इस सभा का कार्य राजा को राज्य के विषय में परामर्श देना है और रहेगा । परंतु महाराज हम नाम और गुड में संबंध बनाए रखना चाहते हैं । इस कारण हमारी सम्मति होगी । यदि वह राज्य परिषद होगी तो इसके अधिकार और इसका निर्माण रिवन शस्त्रनुसार होगा और उसके कार्य भी उस शास्त्र के अनुसार होंगे और यदि किसी अन्य गोल्ड और रूप वाली समिति बनानी है तो उसका नाम ही दूसरा होगा । हमारा यही मत है । हमारा से क्या अभिप्राय है? इस परिषद का सामूहिक मत यही है । हम तो क्या आप ने पहले ही इस विषय पर विचार कर लिया था? हाँ, इस विषय में हम सब एक मत हैं । ठीक है । आज से राज्य परिषद भंग की जाती है और उसके स्थान पर राजकीय परामर्शदाता समिति का निर्माण किया जाता है । कौन कर रहा है जहाँ का राजा ऍफआईआर राजा परिषद को भंग नहीं कर सकता हूँ । अरशद राजा को राजा छूट कर सकती है था । परिषद अपने को स्वतः हम कर सकती है । वह कब करती है? जब अपने को शासन चलाने के अयोग्य पाती है तो अपने को धन कर देती है और उसके स्थान पर नवीन परिषद का निर्माण प्रजा का विद्वान पर करता है । ठीक है आप सभा को भंग कर दीजिए । अभी मैं एक परामर्शदाता समिति का निर्माण करता हूँ । बाद में उचित समय पर विद्वानों की सभा बुलाकर नवीन परिषद का निर्वाचन करा लिया जाएगा । महर्षि प्रसूति ने कहा, राजा बैंड हमें से भंग करने का निर्णय आपसे प्रथक में बैठ कर करना चाहते हैं । ये नहीं हो सकता । राजा को अधिकार है कि वह परिषद की सभाओं में बैठकर सम्मति थे और सम्मति स्वीकार करें । दश अपने विवाद को शांत करने के लिए कह दिया । महाराष्ट्र कहते हैं आप बैठे मैं राज्य परिषद की सभा में ये प्रस्ताव करता हूँ । यह परिषद भंग कर दी जाए जिससे कि शास्त्रानुसार नई परिषद का गठन हो सकें । यह प्रस्ताव सबने स्वीकार कर लिया । इस पर राजा दैन ने कहा, मैं अपनी परामर्शदाता समिति में आप में से दो सदस्य लेना चाहता हूँ और इन दो स्थानों के लिए मैं महर्षि, प्रमुख जी और महर्षि नाम ऊंची को निमंत्रण देता हूँ । अब सब इन दोनों नामांकित ऋषियों के मुख पर देखने लगे । महर्षि नमुचि ने उत्तर दिया, मैं इस पद को स्वीकार करने से पूर्व पिता मैं से परामर्श करना चाहता हूँ । कैसे उनसे पूछेंगे इसमें कई मांस लग सकते हैं । नहीं मेरे पास दिव्यदृष्टि है और मैं रात्रि में उस दृष्टि से पिता में ऐसे सम्मति करके कल प्रातः अकार बता दूंगा और आप प्रमुख चीज जी, मैं भी आपको कल प्रातःकाल तक बता दूंगा । ठीक है दोनों महर्षि यहां रहेंगे और शेष यहाँ से एक घडी के भीतर चलते हैं । आप व्रत जीत हैं आपको इस प्रसाद में से कुछ भी अपने साथ नहीं ले जाना चाहिए । परिषद की सभा समाप्त हुई और ऋषिगण उस भवन से जाने के लिए तत्पर हो गए । ऋषिगण अपने परिवारों के साथ वहाँ रहते थे । मैं सब बिना एक दिन का भी अपने साथ लिए अपने परिवारों के साथ परिषद भवन से निकल गए । महर्षि प्रमुख चीज और नमुचि भी उनके साथ ही चलती है । किसी ने उनको जाने से नहीं रोका । जब बेन को ये पता चला इस सब के सब ऋषिगण अपने परिवार सहित परिषद भवन को छोड हम लोग की और चल दिए हैं तो उसने विस्मय में पूछ लिया । सब के सब चले गए हैं अथवा कोई नहीं भी गया । सूचना देने वाला परिषद भवन का मुख्य प्रबंधक था । उसने बताया, महाराज, सातों के सातों सदस्य और उनके साथ उनके परिवार के पचपन सदस्य ऍम सेवक भी गए हैं और वे नगर में किसी के घर पर नहीं ठहरे । नहीं महाराज सीधे सरस्वती के तट के साथ साथ बने पद पर जाते देखे गए हैं । नगर के लोगों ने उनको रोका नहीं । सब अपने अपने घरों से निकलकर राजपथ पर आप खडे हुए थे और चुपचाप उनको जाते हैं । देखते रहे नगर के द्वार तक सैनिक उनके साथ गए थे । जब वे नगर द्वार से निकलकर नदी तट वाले पद पर चले तो सैनिक वापस आ गए थे । ठीक ही हुआ है । प्रमोद जी और नमुचि भी तो पिता है कि भक्त हैं । वो भी उनसे ही सम्मति करने की बात कहते थे । अगले दिन से राज्यकार्य चलने लगा । सबसे प्रथम राज्याभिषेक उत्सव मनाया गया । यह उत्सव एक पखवाडा तक चलने की घोषणा की गई और प्रत्येक दिन का कार्यक्रम बनाया गया । इसमें नाच रंग, खाना पीना और भोगविलास सब प्रकार के केंद्रीय सुख सम्मिलित किए गए । पूर्ण पखवाडे में लोग गाने बजाने, नाश, रंग और खाने तथा भोगविलास में इतने लीन हुए कि किसी को भक्ष्य, अभक्ष्य कम गंभीर कर्तव्य, अकर्तव्य वाक्य, वाच्य तथा दोषा दोष का भी ज्ञान नहीं रहा । इस उत्सव में आने का निमंत्रण किसी अन्य राजा को नहीं भेजा गया । फिर भी ब्रहमपुरी में रहने वाले कश्यप पुत्र हिरण्यकश्यपु स्वयं ही आ गए थे । हिरणकश्यप के आने पर बेन को विस्मय तो हुआ परंतु प्रसन्नता नहीं । विश्व में का कारण यह था कि उसने किसी भी राजा को निमंत्रण नहीं भेजा था और यह विख्यात हो रहा था । हिरण कश्यप पिता होने की सेवा में कई वर्ष व्यतीत कर चुका है । वहाँ हैं हम विद्या का ज्ञान प्राप्त करता रहा था और हिरण कश्यप के कथानुसार उनके आशीर्वाद से ही ब्रहम्पुरी का शासक बन गया है । हम पुरी किसी काल में बेन के बाबा अनंग के अधीन थी, पर हम तो उसके पिता के काल में जलवायु तथा अधिक अन उत्पन्न करने में एक अच्छा क्षेत्र न समझ उसे छोड दिया गया था था । जब बहन के पिता कोई समाचार मिला था कि ब्रह्मपुरी कश्यप के पुत्र धारण का शिक्षकों को दे दी गई है तो उस स्थान को एक व्यर्थ राजस्थान समझ और ऋण कश्यप के पिता हो । राज्य परिषद का एक प्रतिष्ठित सदस्य मान कंपनी में किसी अन्य राज्य की चिंता नहीं की गई । अब पेन द्वारा हिरणकश्यप के पिता को मना कर अनंगपुर से निकाल देने पर ऋण कश्यप का देन के राज्यभिषेक में समृद्ध होने वाला जिसमें का विषय था, नगर के बाहर हिरणकश्यप को रोका गया और से पूछा गया उसके वहाँ आने का क्या प्रयोजन है? ऋण कश्यप का उत्तर था कि वह उत्सव में सम्मिलित होने आया है । बैंक ने अपने सभा भवन में उसका अति आदर और सम्मान से स्वागत कर उसे बिठाया और पूछा भगवान किस प्रयोजन से आपका यहाँ आना हुआ है? मैं आपके पूछे पिता के स्वर्गवास होने के बाद सुन यहाँ शोक प्रकट करने के लिए आ रहा था । क्या आप की राज्य परिषद के सदस्य हम लोग को जाते हुए मिले? उनमें मेरे पिता भी थे । उनसे विगत हुआ कि आपको अपने पिता के देहांत का शोक नहीं वरन प्रसन्नता है । समाचार से मेरी सब सुषुप्त प्रवृत्तियां जान पडी और मैं आपकी प्रसन्नता में समृद्ध होने चलाया हूँ । चोकसे हर्षोल्लास मुझे अधिक रुचिकर है । आप की कौन कौन सी सुषुप्त प्रवृतियां मेरी बात से जाग्रत होती हैं । मुझे भी सुख भोग की प्रवर्ति है । मैं भी मानता हूँ की भूख के लिए जीवन का एक अल्पकाल नियत है और उस अल्पकाल में संसार के अनेक अनेक भोगों का रसास्वादन नहीं हो सकता । इस कारण किसी के मरने का शोक मनाने में समय व्यर्थ गवाना ठीक नहीं पता है । जब मुझे अभी हुआ या अपने अपने पिता के देहांत पर चोक बनाने के स्थान पर उत्सव रचा दिया है तो मेरे हर्ष की सीमा नहीं रही, परंतु भगवान मैंने सुना था कि आप किताब है कि लोग में तपस्या करने और ज्ञान प्राप्ति के लिए गए थे । हाँ, तपस्या मैंने की है । परंतु मुख्य बात उस तपस्या का उद्देश्य था न कि तपस्या । क्या उद्देश्य आपकी उस घोर तपस्या का? मैं अपने अजी होने का वर प्राप्त करता चाहता था तो क्या पर प्राप्त हुआ है? पिता मैंने ये वार दिया है कि कोई भी उसकी सृष्टि का व्यक्ति मुझसे शत्रुता अथवा द्वेषभाव नहीं रखेगा । यदि रखेगा तो मैं अजय ही रहूंगा । पेन ने कहा भगवान आपस बहुमंडल में एक महान शक्ति बन गए । फिर भी मैंने पिता है कि वेद मत हो स्वीकार नहीं किया । मैं मानता हूँ कि वेद मत में धर्म के नाम पर जीवन में अनेक अनेक प्रतिबंध उपस्तिथ है । वे सब दुर्बलों की रक्षा के लिए अविष्कृत किए गए हैं, जबकि दुर्बलों के लिए प्रकृति रहे हैं । कोई स्थान नियत नहीं किया । संसार के सब भोग बलशालियों के लिए हैं । कितनी समानता है आपके और मेरे विचारों में ट्रेन का कथन था । इस कारण अपने पिता के यहाँ से निकाले जाने पर भी इस राज्यभिषेक की बधाई देने मैं यहाँ चला आया हूँ । बैन हिरण कश्यप की बातों से अति प्रभावित हुआ था । वो मन में विचार करता था कि ये नर व्यक्ति है । ऐसे के साथ मित्रता रखने से उसका और उसके राज्य का कल्याण होगा तथा अभिषेक उत्सव में हिरणकश्यप को भी सम्मिलित होने का निमंत्रण दे दिया गया । दोनों राजाओं की परस्पर मैत्री हो गई । दोनों ने अपने राज्य में पिता कम है कि त्रिवर्ग स्मृति से विलक्षण स्मृतियां स्वीकार कर ली । धर्म बलशालियों की आज्ञा का नाम हो गया तो बलवानों की आज्ञा पालन करता था । वो धर्म का पालन करने वाला माना जाता था जो बलशालियों की आज्ञा का उल्लंघन करता था । वह अधर्मी समझा जाता था । दोनों राज्यों में राजा और सेना बलवान थी तथा वहाँ सेना की आज्ञा धर्म था । बेन की अनंतपुरी और इस जनपद में निर्धन एवं दुबलों की भूमि, संपत्ति और स्त्रीवर्ग सुरक्षित नहीं रहे । उसका परिणाम ये हुआ राज्यभर में डाकुओं और चोरों के गुट बन गए । जो प्रत्येक वस्तु जिसे भी बातें थे, आत्मसात कर लेते थे । राजा और इन गुटों में भी परस्पर संघर्ष होने लगा था । जीवन के लिए आवश्यक उपलब्धियों को निर्माण करने वालों की संख्या अब कम होने लगी थी । लोग अपने काम धंधे छोड छोड कर भागने लगे । राज्य को धन मिलना कम हो गया और तब राज्य ने भ्रामरों, विद्वानों, ऋषियों और कृषकों पर डर लगना आरंभ कर दिया । प्रत्येक जग्य हवन में डाले जाने वाली भवि में से राजकीय भाग लिया जाने लगा तो दुर्बल और निर्धन तो इसलिए राज्य छोडने लगे कि उनका धन संपर्क ॅ बलशालियों से सुरक्षित नहीं था और ब्राह्मण विधवा हो त्रि रितिक और यजमान इसलिए राज्य छोडने लगे । उनको धर्म कर्म पर भी कर देने के लिए बाध्य किया जाने लगा था । राज्य को अथवा लुटेरे गुटों के लिए जब कर अथवा लूट्स मार के लिए भी मिलना कठिन होने लगा तो वे आपस में एक दूसरे को लूटने लगे । इससे हिरण कश्यप को अपने राज्य में भी एक समस्या उपस्तिथ हो गई । लुटेरा वर्ग जब अनंतपुर जनपद ने अपनी लूट के लिए पर्याप्त सामग्री नहीं जा सके, वे धन धान्य से पूर्ण ब्रहमपुरी जनपद में लूट मचाने के लिए आने लगे हैं । हिरणकश्यप अपने अपने राज्य में महामंत्री के पद पर महर्षि भृगु के पौत्र एवं कभी के पुत्र शुक्राचार्य को नहीं किया हुआ था । शुक्राचार्य नास्टिक विद्वान था इसी कारण ऍम उसे भारी प्रलोभन दे अपने राज्य में बुलाया था और उसे अपना मंत्री ऍम अन्य पुत्रों का गुरु नियुक्त कर दिया था । अब अनंगपुर के लोग ब्रहमपुरी में लूटमार करने लगे तो हिरण का शव होने आचार्य को बुलाकर पूछा । भगवान इन लोगों से किस प्रकार का व्यवहार किया जाए । प्राचार्य ने समस्या का सुझाव दिया । वास्तव में इस राज्य की आधारशिला में बल प्रयोग की प्रथा है परंतु जो दो राज्य इसी नीति के मानने वाले पडोस पडोस में आ जाए तो उन दोनों का परस्पर भेज रहा ठीक नहीं । इससे दोनों की हानि होती है और लाभ किसी को नहीं हो सकता था । इन लुटेरों के इस राज्य में घुस आने पर इन लुटेरों का दामन करना चाहिए । परंतु हमें ये नहीं मानना चाहिए कि इन लुटेरों का अनंतपुर राज्य से किसी प्रकार का संबंध है और नहीं अपने मन में ये बात आनी चाहिए । इनके दमन से हम पडोसी राज्य को हानि पहुंचाने की नियत से ऐसा कर रहे हैं । अनंतपुर राज्य में वहाँ की राजनीति का भी घोर विनाशकारी परिणाम उत्पन्न होने लगा । उस राज्य के लडाकू और योद्धा हम पूरी राज्य में आने से भय खाने लगे । बैंको परिश्रम करने वाली प्रजा पर और अधिक कर बढाने पडे । जो कुछ पडोसी राज्य से लूट खसूट कर आ रहा था वो बंद हो गया । इससे अनंतपुर राज्य के भले लोग भाग भाग कर हम लोग में पहुंचने लगे । इस व्यवस्था को देख पिता महीने ऋषियों की एक सभा बुलाई और उसमें निश्चित हुआ क्या? नागपुर में विप्लव खडाकर पैन को गड्डी से हटाया जाए । इसके लिए कश्यप उन्होंने नमुचि नियुक्त किए गए । ये ऋषिगण जब अनंदपुर में पहुंचे तो वहां की भाई भी प्रजा उनसे मिलने के लिए आने लगी । पूर्व इसके की इनके यहाँ पहुंचने का समाचार बैन को मिले । उन्होंने सेना के नायकों से मिलकर विचार विनिमय आरंभ कर दिया और सैनिकों में भले लोग इन दृश्यों की रक्षा के लिए एकत्रित हो गए । परिणाम ही हुआ कि जब बैन के सुबह इनको राज्य प्रसाद ने ले चलने के लिए आए, वहाँ सैनिकों का जमघट देख विश्वमय करने लगे । एक सेनानायक ने एक सौ से पूछा यहाँ कैसे आए हूँ? कश्यप मुनि को महाराज के पास ले चलने के लिए ऍम कश्यप मुनि के सम्मुख प्रस्तुत किया गया तो कश्यप ने उसके आने का कारण जान कह दिया । बहन से जाकर के है तो क्या वो इस जनपद का राजा नहीं है? इस कारण उस की आज्ञा के पालन की मैं आवश्यकता नहीं समझता हूँ । यदि उसे हम से कुछ काम है तो वह स्वयं आ सकता है । सुलटने पूछ लिया अभी बहन राजा नहीं तो क्या आप राजा हैं? मैं हम दंड हूँ । अभी कुछ समय में यहाँ न्यायपाल लगाएंगे और तब बेन के अपराधों की जांच पडताल पर दंड निर्धारित करेंगे । उदंड मैं दूंगा ऍफ गए और जब उन्होंने ऋषि आश्रम की अवस्था वर्णन की । वैन ने कह दिया ये सोलह पत्नियों का पति और सैकडों पुत्र पौत्रों का जन्म दाता मुझ बलिष्ठ राज्य अधिकारी का मान करके बच नहीं सकता हूँ । इतना कह बहन उसी समय शस्त्रास्त्र से सुसज्जित बीस सुबह लेकर ऋषियों के निवास स्थान पर जा पहुंचा । उस स्थान पर सहस्त्रों नागरिक और सैकडों सैनिक एकत्रित हो चुके थे । मैंने वहाँ से कुछ सुबह सैनिक शिविर में सैनिक सहायता लाने के लिए भेज दिए और स्वयं भीड को संबोधन कर कहने लगा आप लोग अपने अपने घरों को चले जाएँ, सेना आने ही वाली है । उसके आते ही यहाँ एकत्रित विद्रोहियों का संहार आरंभ हो जाएगा । इस समय कश्यप आश्रम से बाहर निकला और बहन के सम्मुख उपस्थित हो उससे बोला न्यायाधीश तो मैं भीतर बुला रहे हैं । चलो मैं उसे न्यायाधीश नहीं मानता । कश्यप यहाँ खडे लोगों से कहा पकड लो और भीतर ले चलो । इस बात के कहते ही सहस्त्रों हाथ बैन को पकडने के लिए उसकी और लग के मैंने अपना खडक निकाला और अपनी रक्षा करने के लिए उठाया । इसी समय कश्यप ने हाथ संकेत से उसे कहा यह खडक निष्काम है । उसके वह कहते ही खडा उसके हाथ से नीचे गिर पडा । सडक के गिरते ही लोग उत्साहित हो । उसको पकडने के लिए आगे बढे । मैंने वहाँ से भागना चाहा परंतु वहां एकत्रित विशाल जनसमूह ने उसे भेज लिया । इसके उपरांत लोग उसको मुक्कों और लातों से पीटने लगे । ऍम को भूमि पर गिरते देखा तो उसने लोगों को शाम करने का बल दिया और बेन को जीवित पकडने का आग्रह किया परन्तु बहन गिरा और उसके चिथडे उधर गए । जब लोगों को हटाया गया तो उसका शरीफ टू टू हो चुका था । प्रज्ञा नहीं जब बैंक के शरीर पर अपना रोज निकाल लिया तो अपने ही कृति के और चित्रा पर अनिश्चित मन एक दूसरे का मुख देखती रह गई । कश्यप आगे बडा तो उसके लिए मार्ग छोड लोग एक और हट गए परंतु बहन का तो कहीं पता ही नहीं था । नहीं एक बात और कहीं एकता तथा कुछ दूर पर कुछ ना हुआ । सिर्फ और समीप में एक वहाँ का अग्रभाग लुडका पडा था । कश्यप ने लोगों को कहा इसके सबंग एकत्रित करो और उसको अग्निदेव की भेंट करना चाहिए । तदंतर प्रजा और सैनिकों को संबोधित कर उसने कहा, अनंगपुर निवासियों अनंगपुर के भूतपूर्व अधिपति बैन के विरुद्ध है । पिता में है कि समक्ष आरोप लगाए गए थे । उन आरोपों पर उसे मृत्युदंड मिलना चाहिए था । हम तो पिता मैंने यह उचित समझा था की बहन को सब आरोप पता कर उन पर उसका उत्तर सुना जाए और तदंतर उसे उचित दंड दिया जाए । परंतु जो उसके अत्याचार से पीडित थे, उन्होंने उसे दंड दे दिया है । यह दंड अन्यायपूर्ण तो नहीं है । फिर भी यदि जीवित बैंको उसके अपराधों का अनुभव कराया जाता है तो वह अनुभूति उसके लिए अगले जन्म में कल्याणकारी हो सकती थी । जो व्यक्ति प्रायश्चित करता हुआ अपने अपराधों का दंड भोक्ता है, वह शीघ्र ही दोष हो । उन्हें इस लोग में अपनी उन्नति के लिए आ सकता है । अब यह कार्य आगामी जन्म में वह स्वयं करेगा । हमें परमात्मा से प्रार्थना करनी चाहिए । जो लोग हम छुद्र जीव यहाँ नहीं कर सके वो उसे परलोक में करने का अवसर प्रदान करें । अब हम विद्वान ऋषि महर्षियों का एक सम्मेलन बुलाएंगे और इस जनपद के लिए नवीन राज्य अधिकारी का निर्वाचन करेंगे । तब तक के लिए भगवान नमुचि यहाँ प्रबंध करेंगे । प्रजा को चाहिए कि वह अपने अपने कार्य में संलग्न हो जाए । इस समय देश की धनसंपदा राय विनष्ट हो चुकी है, परन्तु धनसंपदा कास्ट्रो मानव परिश्रम आए हैं । यदि आप मन से परिश्रम करेंगे, शीघ्र ही वह राज्य उन्हें धन धान्य से भरपूर हो जाएगा । आइए अपने लिए और अपने जनपद के परिश्रम में लीन हो जाइए । प्रभु आपकी सहायता करेंगे । कश्यप मुनि किस प्रकार की रचनाओं से लोग शांत हो अपने घरों को लौट गए । मानव समाज की ये प्रथम जनक्रांति बहुमंडल के अन्य राज्यों के लिए विचार का विषय बन गई । ऍम कश्यप को भी जरिए समाचार मिला तो शुक्राचार्य के पास पहुंचकर पहुंचने लगा आचार्यवर अपने बहन के विषय में सुना है । हाँ राजन! वहाँ यही होना था तो मैंने वहाँ के लुटेरों के इस राज्य में घुस जाने और वहाँ लूटमार मचाने पर जब ये कहा था कि उनको पकडकर बिना उस राज्य को बीच में लाए उन्हें दंड देना चाहिए तो मैं कुछ ऐसी की आशा कर रहा था । आचार्यवर मुझे यह है कि जहाँ पर भी प्रजाति नहीं कुछ करना नहीं, यही तो मैं है तो इसका उपाय अभी से करूँ, क्या उपाय करूँ? देश में विद्वानों की मान प्रतिष्ठा में वृद्धि करूँ और उन को दान दक्षिणा आपसे प्रसन्न हो वो तो मैं कर रहा हूँ । आप विद्वत शिरोमणि यहाँ के सर्वेसर्वा हैं परन्तु तुम मध्य का सेवन बहुत करते हूँ और मध्य के मदद क्या में कभी कभी मेरी भी निंदा कर देते हो । महाराज भविष्य में ऐसा नहीं करना । प्रजा को डरा धमका कर रखना चाहिए । विशेष रूप से जो प्रजा का उच्च अंकल है, उसको बंदी बनाकर रखूँ परिप्लव उत्पन्न कर सकता है । परिणाम ये हुआ कि ब्रह्मपुरी के जनपद ने किंचित मात्र भी अच्छा चरण करने वालों को उच्चकमान मृत्यु अथवा कारावास का दंड दिया जाने लगा । इसी समय अनंगपुर में ऋषियों का सम्मेलन होने लगा । पिता है का आदेश था यथा सम्भव बैंक की संतान में से किसी को भी नरेश पद पर नियुक्त किया जाए । मैन के उत्तराधिकारियों को ऋषि मंडल के सम्मुख उपस्थित होने को कहा गया । ये देखा गया की बहन के वंश में सैकडों युवा कुमार और बालक उपस् थित हैं । वे सब एक दूसरे के उपरांत ऋषि मंडल के सम्मुख उपस् थित हुए । ऋषिगण किसी को अल्पायु के विचार से और किसी को अल्पबुद्धि के विचार से अस्वीकार करते गए । अंत में दो पुत्रों में तुलना हुई । दोनों युवा थे, बुद्धिमान थे और सबल थे । इन दोनों को ऋषि मंडल के सामने बारी बारी से उपस् थित होने के लिए कहा गया । पहले एक नील नाम का लडका उपस् थित हुआ और से ऋषियों के नेता नमुचि ने प्रश्न करने प्रारंभ कर दिए । कृषि ने पूछा क्या नाम है नहीं इसके पुत्र हो महाराज बेन के माता का क्या नाम है? सीमा उसके पिता का क्या नाम है और वह कहाँ रहती है? माँ को ज्ञात नहीं मैं वनवासी जाती की थी जिसमें विवाह की प्रथा नहीं थी तो मेरी मौत हुई । उसकी माँ कई पुरुषों की इस तरी थी और तुम्हारी महाकाव्य वहाँ मैन से विधिवत हुआ था । नहीं महाराज वन में मृगया के लिए गए हुए थे तब उन्हें माँ मिल गई और वे उसे पकडकर राजधानी में ले आए और आपने प्रसाद ने रख लिया कुछ बडे हो मलयुद्ध करना सीखा है और कुछ इतने से जीवन निर्वाह होता रहता है अच्छा हूँ । इसके उपरांत एक अन्य युवक व्यवस्थित किया गया । उसे भी प्रश्न पूछा गया क्या नाम है भगवान हो वहाँ का नाम वायु वायु के पिता का नाम महर्षि मस्त वायु का विवाह बैन से विधिवत हुआ था अथवा पानी में वहाँ विधिवत हुआ था तो महर्षि कश्यप ने कराया था कहाँ पडे हूँ वेद वेदांग और स्मृति शास्त्र पहुँच शास्त्र स्वयंभू का तेवर शास्त्र हम पालन कर हो गई और शमा राज धर्म क्या होता है जिससे सबका कल्याण हो सके । तोर का भी आप तो का कल्याण उसे कारावास में रखने से होता है । इसके लिए उसे कारावास में रखना धर्म है । इस पर सर्वसम्मति से पृथ्वी को राजा स्वीकार किया गया । राज्य अभिषेक के समय उससे वचन दिया गया । एक एक वह के रही बोलता था और पृथु उसको स्वीकार करता जाता था । जिस कार्य से धर्म की सिद्धि होती है वहीं करोगे प्रिय अप्रिय का विचार, छोडकर काम, क्रोध, लोग मोहो और मान को दूर हटाकर सब प्राणियों के प्रति संभाग देखोगी । लोग में जो कोई भी मनुष्य धर्म से विचलित हो उसे संतान धर्म पर दृष्टि रखते हुए अपने बाहुबल से परास्त करके दंडित हो गई । प्रतिज्ञा करूँ तो मन, वाणी और कर्म द्वारा हूँ । वेद वचन का नित्य पालन कर हो गई । वेद में दंडनीति से संबंध रखने वाला जो नित्य धर्म बताया गया है उसका निशंक होकर पालन कर हो गई । जब पृथ्वी में ऋषि आदेश के पालन का वचन दे दिया उसका राज्यभिषेक कर दिया गया । इस बार राज्यभिषेक के समय जब याद और दान दक्षिणा प्रचुर मात्रा में किये गए । वहाँ जनपद में शांति स्थापित हुई, पिता में है तथा ऋषियों के आदेशानुसार धर्माचरण और आचरन का स्तर ऊंचा होने लगा । भूमि समझ चलकर उस पर कृषि की जाने लगी । अनेक प्रकार के अन्य बंद किए जाने लगे और जनपद का कार्य सुख सुविधा और संपत्ति से युक्त हो गया । इस समृद्धि की गूंज बहरमपुर जनपद के शासक विरण कश्यप के कान में भी पहुंची । वैसे तो उसके अपने क्षेत्र में भी संपन्नता विराजमान थी । इसका मुख्य कारण वहाँ के मंत्री स्मृति का शुक्राचार्य का सुप्रबंधन था तो वहाँ एक अन्य भी विशेष बात थी । वहाँ का राजा साक्षा परमात्मा का अवतार माना जाता था । इसका परिणाम ये हो रहा था के राजा ऍम राज्य के मंत्री क्या आज्ञा ईश्वर के विधान की भांति मानी जाती है? इसमें एक दोष भी उत्पन्न हो रहा था । मुझे राजा को ईश्वर की भारतीय स्वतंत्रता भी प्राप्त थी । इसका परिणाम ये हो रहा था हिरण का सपोर्ट उच्च अंक हो रहा था । अन्य प्रजाजन उसके लिए उपभोग की वस्तु समझे जाते थे । उनको निर्जीव भूमि के भर्ती नियम का पालन करना पडता था । राजा इन सब नियमों के बंधनों से ऊपर था । ठीक था, उनको परस्पर धर्म और न्याय का व्यवहार रखने पर बाध्य किया जाता था परंतु हूँ जब बात राजा और प्रजा के भीतर होती थी तो न्याय और धर्म सब राजा के पक्ष में हो जाते थे । राजा की इच्छा और सुख हो जाता हूँ, सर्वोपरि थी । लोग व्यापार करते थे और सहस्त्रों तथा लाखों रूपये का लेनदेन होने लगा था परन्तु हूँ राजा को प्रत्येक वस्तु बिना मूल्य के प्राप्त थी । कोई भी उससे मूल्य मांगने का अहसास नहीं कर सकता था । वो सबका इश्वर था, स्वामी था । एक दिन मंत्री महोदय राजा से मिलने आए तो महाराज को शुरू के विषय में बात चल पडी । मंत्री ने बताया की पुष्टि तूने राज्यकोष धन व्यय कर बहुत भूमि समतल करा दी है । वहाँ अन्य इतनी मात्रा में उत्पन्न होने लगा है कि वहाँ के रहने वालों के खाने में बढिया बच जाता है और वहाँ से अगर हमारे राज्य में बहुत ही कम मूल्य पर बिकने लगा है । ऍम कहा तब तो ठीक है । ये भूमि पर्वतीय है और यहाँ कृषि का कार्य अधिक नहीं हो सकता है । लोगों को अन्य सस्ते मूल्य पर मिल जाएगा परन्तु महाराज वहाँ की कश्यक अन्य उत्पादन का काम बंद कर रहे हैं । वो इतने कम मूल्य पर अन्य नहीं दे सकते हैं । साथ ही आनंदपुर से आने वाले अन्य का मूल्य देने के लिए यहाँ के रहने वालों के पास धन नहीं है । ऐसा करिए किए वहाँ का अन्य यहाँ आना रोक दीजिए । इससे तो प्रिया में वित्र होती हो जाएगा । लोग ये जान यहाँ से वहाँ अन्य सस्ता है । इसमें राजा को दोष देने लगेंगे । मेरा मेरा इसमें क्या दोष है? यहाँ के राजा ने भूमि को समतल कराकर कृषकों की सहायता की है, वैसी सहायता आपको भी करनी चाहिए । हम कैसे सहायता कर सकते हैं? यहाँ की पर्वतीय भूमि समतल नहीं हो सकती, परन्तु यहाँ कि पर्वतीय भूमि पर कुछ ऐसी वस्तुएं उत्पन्न की जा सकती हैं, जो हम अनंगपुर में बेचकर वहाँ से धन वापस ले सकते हैं । आचार्यजी ऐसा कराइए, उसके लिए अंगीरा जैसे विद्वान बाहर से बुलाने पडेंगे । उन विद्वानों के साथ वेदज्ञान भी आएगा और तब इतना कहकर शुक्राचार्य चुप रहा । कुछ समय तक आचार्यजी के कहने की प्रतीक्षा कर ऋण कश्यप पूछ लिया । हाँ तो महाराज वेद ज्ञान के यहाँ आने से क्या होगा? होगा, ये की आपके अधिकार कम होने लगेंगे । जान जान ये जानने लगेगा कि आप ईश्वर नहीं है, आप ईश्वर हो ही नहीं सकते तो हम नहीं चाहते हैं । मेरा ये कहना है कि आपको अपने अधिकारों में कमी करनी पडेगी । बिना इस प्रकार की व्यवस्था उत्पन्न की ये कुछ करना चाहिए । महाराज अपनी करता हूँ इसके लिए मुझे भी अपने अधिकारों में कुछ वृद्धि करनी पडेगी । आम जो मन में आये करें । मैं अपने बल और बुद्धि से ईश्वर बना हूँ और इस पद को मैं छोड नहीं सकता । शुक्राचार्य मुस्कराकर बोला महाराज, ये अपना करूंगा । शुक्राचार्य ने पर्वतीय भूमि पर फलों की उपज करानी आरंभ कर दी । परंतु धन का ये स्रोत न तो पर्याप्त था और नहीं उस गति से चल सका । इससे अनंगपुर में अन्य की उपज पड रही थी । परिणाम शुरू राज्य में असंतोष पडने लगा । ब्रम्हपुर में एक वस्तु विशेष होती थी वो था स्वर्ण । अनंगपुर से व्यापार में ब्रह्मपुर का स्वर्ण कम होने लगा और प्रजा के पास स्वर्ण बहुत कम था । इसके पास ये कुछ अधिक होता था । राजा उनसे छीन लेता था । जब लोगों का असंतोष सीमा को छूने लगा तो हिरण कश्यप को चिंता बढ गई । अब शुक्राचार्य ने सम्मति राज मैं समझता हूँ कि आप अनंदपुर जाएँ और वहाँ की उन्नति का रहस्य जाने तब तक अपने राज्य में भी कुछ कर सकेंगे । अनंगपुर जाकर वहाँ की स्थिति का अपनी आंखों अध्ययन करने का बच्चा हिरण कश्यप को पसंद आया परन्तु कठिनाई उपस् थित हुई । चुप चाप उस राज्य नहीं जाया जाए अथवा वहाँ के राजा को सूचना देकर शुक्राचार्य चाहता था कि हिरणकश्यप महाराज पृथु को पत्र लिखें और उसके साथ मैत्री स्थापित करने के विचार से वहाँ जाने की इच्छा प्रकट करें है । समझता था कि पृथु इस प्रस्ताव का स्वागत करेगा और हिरण कश्यप को अपने राज्य में आने का निमंत्रण दे देगा । ऋण कश्यप ऐसा नहीं समझता था । उसका विचार था कि वहाँ एक का एक बिना सूचना के और यदि संभव हो तो बिना प्रकट हुए चाहे और सब बात देख आएँ की किस प्रकार वह अपने राज्य में इतनी उन्नति कर रहा है । अच्छा एक दिन वह अपने कुछ सेवकों को साथ लेकर अनंतपुरी में जा पहुंचा । हिरणकश्यप का विचार गुप्त रूप से अनंतपुर जनपद में पहुंच वहाँ का वृतांत जानने का था परन्तु ऐसा नहीं हो सका । अनंतपुर का राज्य पर्वतों उसे मैदान में उतरते ही आरंभ होता था और प्रत्येक ऐसे मार्ग पर जो पर्वत से मैदान में आता था, अनंतपुर राज्य के संरक्षक बैठे थे और आने जाने वालों से पूछताछ करते रहे थे । रन कश्यप के राज्य में ऐसा प्रबंध नहीं था । अच्छा जब से और उसके साथियों को रोककर पूछा गया तो इनको बताना पडा कौन है और अपने आने का प्रयोजन ये बताना पडा था कि वे महाराज पृथु से मिलने आए हैं । संरक्षकों ने ये उचित समझा । एक दूसरे राज्य के नरेश में आने की सूचना अपने राजा को भेजनी चाहिए । पता उन्होंने ऋण कश्यप को वहीं ठहरा लिया और नगर में महाराज पृथु के पास सूचना भेज दी । नगर के बहार से जबरन कश्यप ओं का बढ जाएगा राज्य प्रसाद ने पहुंचा प्रति स्वयं रात हाथ ले उसके स्वागत के लिए आ गया प्रतुल हम पुरी के लोगों का बहुत आदर सत्कार से नगर में ले गया और उनको सुंदर, सुसज्जित और सुदृढ भवनों में ठहरा दिया गया । ऋण कश्यप को अनंदपुर में पढ रखते ही पहले से आपने अंतर दिखाई पडने लगा । बेन के राज्यभिषेक के समय यहाँ आया था परन्तु उस समय प्रजा के मुखों पर मुर्दनी छाई प्रतीत होती थी है । लोग भयभीत और कुछ ऐसे भूमि की और देखते थे मानो कि वे सब किसी महान पाप कर्म में लीन हो । अब सब लोग प्रकाशित प्रफुल्ल बदन प्रसन्न और संतुष्ट प्रतीत होते थे । दो दिन तो हिरणकश्यप तथा उसके साथ आए हुए इस की सेवा देख बडे रहने से की गई । उसको खाने पीने, रहने और सेवा तहल तथा मनोरंजन से सन्तुष्ट कर दिया गया । तीसरे दिन पृथुः आपने ऋषिगणों को लेकर हिरणकश्यप उसे मिलने गया । ऋषिगणों के नेता कश्यप मनी थे । कश्यप हिरणकश्यप ओं का पिता था और उसने पिता का अगर सबका उठकर चरण स्पष्ट किया जब औपचारिक व्यवहार और वार्तालाप हो चुका हूँ । मैं कहा महाराज हिरणकश्यप आपके दर्शन देने का कष्ट किया । हमारा नगर और हम आपके आभारी हैं । अच्छा कोई विशेष सेवा हमारे योग्य हो तो बताने की कृपा करें ऋण कश्यप ने कहा, यहाँ से हमारे जनपद को जाने वाले लोग वहाँ की बहुत प्रशंसा करते हैं । इससे यहाँ इस राज्य की समृद्धि प्रयासों से देखना चाहता हूँ तो अभी तक कुछ देखा है, अपना नहीं । अभी तक तो एक वस्तु ही देखी है और दो रात से रहे हमारा मनोरंजन कर रही है । हमारा अभिप्राय है वी रूचि देवी प्रतिभा पडा उसका महाराज आपने कुछ नहीं देखा । उससे अधिक सुंदर, सभ्य, सुशील और सुशिक्षित तो मेरी महारानी सुनती है और उससे भी सब गुणों में अधिक एक ग्रामीण की पत्नी सुभद्रा है । कुमार आज उनके दर्शन करा दे तो मैं गलत हो जाऊंगा, उन के दर्शन हो सकते थे । परन्तु जब आप अपनी महारानी को साथ लेकर आते तो इससे मुझे क्या होता है? प्रदर्शन तो महारानी जी को होते हैं । जैसे नौका में बैठा यात्री नदीपार चला जाता है । आप भी वह सौभाग्य प्राप्त कर लेते तो महारानी को मिलता है । तो हमारे लिए कठिनाई यह है कि महारानियां अनेक हैं । एक नहीं इसको लाएँ और किसको नहीं लायें । निर्णय करना अति कठिन था । आप अपनी जेस्ट राजकुमार की माता को ले आते हैं तो ठीक रहता । वहाँ राजकुमार भी अनेक हैं तो इस अवस्था के हैं कि अपने को राज्य अधिकारी माने । परंतु मैंने सुना है क्या आप का सबसे बडा पुत्र प्रहलाद हैं । वही ईश्वर भक्ति और सद्बुद्धि रखने वाला है । पर हम तो उससे बडा एक और है । उसकी माँ ने उसका नाम विक्रम रखा है । ये हमारे लिए एक ऐसा समाचार है जो हमने पहले कभी नहीं सुना था । स्वाभाविक है हमारे यहाँ के समाचार जानने में न तो आपको रुचि होनी चाहिए और न ही जानना संभव है । प्रत्योप उन्हें हसा हसते समय महाराज पृथु के मुख की शोभा इतनी बढ जाती थी ये हिरण कश्यप उसे मंत्रमुक्त देखता रह जाता था । प्रभु ने कहा, आपके आचार या तो आपको बताते नहीं अथवा स्वयं जानते नहीं । वस्तुस्थिति यह है कि इस राज्य में मेरे मंत्रिगणों को आपके राज्य की प्रत्येक जानने योग्य बात का ध्यान रहता है । हम सब जानते हैं ये विक्रम के विषय में हमें ज्ञात नहीं था । कदाचित को जानने योग्य कोई नहीं है परन्तु हम तो उसको अपना युवराज घोषित करने वाले हैं । इस पर प्रतियों ने कश्यप मुनि जी की और देखकर पूछ दिया विश्व आपका समझते हैं । मैं समझता हूँ कि ब्रहमपुरी जनपद का राजा एक चक्रवर्ती महाराज पहला होंगे, पर ये विक्रम कौन है? प्रश्न पूछ लिया । कश्यप ने कहा तब हिरण्यकश्यपु अविवाहित था तो ये वन में विचरता हुआ एक वन जान स्त्री से संबंध बना रहा था । वो इस्त्री पिछले वर्ष हम पुरी में आई है और अपने पुत्र को हिरणकश्यप ओं का सबसे बडा पुत्र घोषित कर रही है । महामात्य शुक्राचार्य भी उस पुत्र को राज्य कर दी पाने में सहायक हो रहे हैं । शुक्राचार्य जी की इसमें क्या रुचि है? वो उसे राज्य के लिए उपयुक्त व्यक्ति मानते हैं । वो क्यों शुक्राचार्य जी राजा के दो गुण मानते हैं । एक तो ये किधर सुंदर, बलवान और शाम स्वभाव का हो तो राज्य की रक्षा के लिए सदा तत्पर हो । दूसरे व्यक्ति शोभनीय हो, इसको देख उसकी प्रजा मंत्रमुग्ध, उसका सुख देखा करें और इन गुणों के प्रतिकार में राज्य में राजा को सुरक्षा ईश्वर माना जाएगा, उधर और न्याय से ऊपर हूँ और ईश्वर की वहाँ थी । वह स्वतंत्र हूँ और परमात्मा शुक्राचार्य का ये कहना है यदि कोई इस विश्व में ईश्वर है, उसका अवतार ही किसी देश का राजा होता है । परंतु महाराज पृथु नहीं । पुनर्भरण का शकों से बात की । इससे तो आती भयंकर स्थिति उत्पन्न हो जाएगी । आपके राज्य में तो ईश्वर हो जाएंगे और दोनों के भक्त आपस में ही लड मारेंगे । अब हिरणकश्यप ऑस्कर बोला महाराष्ट्र हूँ हमारे राज्य में एक ही ईश्वर है और वो मैं दूसरे ईश्वर को जिसकी आप कल्पना कर रहे हैं । हमने धक्के देकर वहाँ से निष्कासित कर दिया । उस प्रांत हो चुका है और अंतेष्टि संस्कार हो चुका है । उसी शहर की चिंता का धुआ तभी कभी दिखाई देता है परंतु एक ना एक दिन तो मैं चिता जल कर राख होगी, तब धुआ भी समाप्त हो जाएगा । हम समझते हैं । कश्यप ने उत्तर दिया हुआ उठ रहा है और वह दिन प्रतिदिन अधिकाधिक हो रहा है । इससे यही प्रकट होता है कि आग प्रतिदिन तीव्र हो रही है और संभव है कि वो एक दिन पूर्ण नगर को ही घेर लें । ये नहीं हो सकता हूँ । ब्रहम्पुरी जनपद का ईश्वरशरण कश्यप है और वहाँ सजग सतर्क और सुना सक्रिय है । उसके यहाँ रहने पर अग्नि जलती नहीं रह सकती । मैं आपका संकेत समझ रहा हूँ । आपका अभिप्राय है की प्रहलाद का प्रभाव दिन प्रतिदिन पड रहा है और वह पिछले दिन पूर्ण नगर में अच्छा जाएगा । परंतु पिताजी हमारे जनपद में गंगा का शीतल जल है । वो उस अगली को एक ठंड में बुझा देगा । बेटा ऐसा करके देखता हूँ । इस प्रकार बाद समाप्त हो गई और ऋण कश्यप को अनंतपुर जनपद में दर्शनीय वस्तुएं ऍम स्थान दिखाए जाने लगे । एक सप्ताह तक हिरण्यकश्यपु का प्रवास अनंगपुर मैं रहा हूँ । इन दिनों में एक दिन महाराज हिरणकश्यप पोको महाराज पशु कें प्रसादों में बोझ दिया गया । उस समय राज्य के प्रमुख लोगों को भी एक पडोसी राज्य के नरेश का अभिनंदन करने के लिए आमंत्रित किया गया । बहुत के पूर्व महाराज पृथु नहीं स्वयं अपने राज्य के प्रमुख व्यक्तियों का हिरणकश्यप से परिचय करवाया । सबसे प्रथम हिरणकश्यप के महारानी से अपनी पत्नी की भेंट कराई । ॅ अपने हाथ जोड प्रणाम करते हुए कहा मेरा सौभाग्य है क्या आप के दर्शन हो गए । महाराष्ट्र प्रथम है तो कहा था कि जब तक मैं अपने देश की महारानी को लेकर नहीं आता हूँ, दर्शन नहीं होंगे था । ये था आपका महारानी जी को साथ मिलने का भी यही अर्थ समझा गया । यहाँ मुझे अपने से परिचय के जो कि नहीं मानते हैं ये तो मैंने ही आग्रहपूर्वक आपके दर्शनों का हट क्या है? मेरे मन में उत्कट इच्छा थी कि विश्व के स्वामी भगवान परमात्मा के भक्त है । पहला की माता तो नहीं पिता के ही दर्शन कर लूँ । ऍफ का मुख से अनायास ही निकल गया । वो कुछ विचार कर पूछने लगा । महारानीजी पहला तो माता से युक्त है उसका मुझे कुछ अधिक संबंध नहीं । प्रत्येक व्यक्ति में अग्नि पिता से ही आती है । माता तो उन्हें मात्र है, शरीर निर्माण कर सकती है वो भी बालक के पिता द्वारा दी गई अगली के बल पर । महारानी के साथ ही अन्य युवती अति सोम्य स्वरुप परंतु शंका युक्त खडी थी । महारानी ने कहा महाराज ये है हमारे पूर्वज सादा शुभ की पत्नी सुभद्रा इस नगर से हिरण का शपूर जिसमें में समीर खडी रोहित जी की पत्नी को देखने लगा अबराम महाराज पृथु से पूछने लगा यही वह चमत्कार है । इसका वर्णन आपने एक दिन किया था । यही वह सुभद्रा है जिसको मैं अपने राज्य की जिबूती मानता हूँ । क्या विशेषता है, इनकी निगरानी तक हैं और लाखों करोडों उनको हमारी राशियों के गुण तथा बाहर एक क्षण नहीं कर देती हैं और ये इन का सौंदर्य हैं था । इसका पार आज तक कोई स्तर यात्रा पुरुष नहीं पा सका । हिरणकश्यप हंस पडा और बोला इसके अलावा क्या है ये निश्चित भविष्य की जाता है तो कुछ लाभ उठाया जा सकता है । इस सब समय तो मुद्रा महारानी के समीप मुस्कुराती हुई खडी थी । हाँ महाराष्ट्र तो कह दिया हम ये समय भविष्यवाणी सुनने का नहीं । इस समय नगर के प्रमुख स्त्रीपुरुष आपके दर्शन है । हम परीक्षा के लिए प्रतीक्षा कर रहे हैं । विमर्श हिरण का शव हूँ । आगे बढा होने कहा आई मैं आपकी अपने राज्य की अन्य विभूतियों से भेंट कराना चाहता हूँ । प्रथम उसे एक अन्य प्रौढावस्था कि व्यक्ति के सामने ले गया । उसने बताया, ये हमारे नगर सीट हैं, अपने देश का अन्य विदेशों में भेजते हैं । इस प्रकार अपने देश के लिए धनार्जन करते हैं । देश के लिए प्रदेश के लिए कैसे जो भी धन बाहर से आता है । वह देश के कारण ही आता है और धन के मुख्य रूप से तीन भाग हो जाते हैं । एक भारत उन कृषकों अथवा उन श्रमिकों के पास जाता है जो अन् उत्पन्न करने, अन्य ढोने और ले जाने का काम करते हैं । दूसरा भाग ये धर्म कार्यों पर व्यय कर देते हैं कि सैकडों आचार्यों को अन्न, वस्त्र इत्यादि देते हैं और वही इन का प्रयोग करते हुए सहस्त्रों शिक्षार्थियों को निशुल्क शिक्षा देते हैं । इस धनराशि में से सभा भवन और पूजागृह बनाए जा रहे हैं । इनकी आय का तीसरा भाग स्वयं अपने और अपने परिवार के पालन पोषण पर व्यय करते हैं । हमारे यहाँ तथा इनसे भिन्न है । कश्यप ने कह दिया सब लाभ राजकोष में आ जाता है और उसका वितरण राज्य करता है । इस प्रकार हमारे राज्य के राजकोष में आने वाली धनराशि लगभग दस लक्ष्य स्वर्ण है और उनमें से आठ लक्ष्य स्वर्ण मैं आचार्यों में बांटता हूं, भेज दो । लक्ष्य राज्य प्रसाद पर होता है । ये व्यर्थ का झंझट आप क्यों करते हैं? व्यर्थ का झंझट नहीं । ये जान मन को अपने राज्य के अनुकूल बनाने का वृहत आयोजन है । सब विद्यालयों और गुरुकुलों में हिरणकश्यप भी ईश्वर है की गूंज उठती है । नगर से धानों प्रसाद कहने लगा महाराष्ट्रीय कह रहे हैं इतनी बुद्धिमता की बात वहाँ किसी को भी याद नहीं । पृथु उसे आगे अन्य आमंत्रित नागरिकों के पास ले गया । अनंगपुर से विदा होने के पूर्व हिरणकश्यप अपने पिता कश्यप मुनि से उनके आवास पर मिलने गया । मोदी जी ने पूछ लिया पता हूँ ऐसे आये हो जब नगर में आता हूँ । यहाँ पे एक मुख्यमंत्री हैं, आपसे मेरे बिना लौट नहीं सका । वही पूछ रहा हूँ कि इस नगर में आने का क्या प्रयोजन है जो राज्यकार्य को छोड यहाँ घूम रहे हो? राज्य कारित शुक्राचार्य करते हैं हम हम क्या करते हो? आपके पिता पुत्र का अध्यक्ष है । उसके श्रेयश एम कल्याण का आयोजन दिन रह चलता रहता है और मेरे प्रिय पुत्र को श्री और कल्याण किस बात में प्रतीत होता है? स्वादिष्ट मध्य वास, मिष्ठान का भोजन, पति को मार वस्त्र, अतिश्रेष्ठ, सुंदरियों से भ्रमण, अलौकिक संगीत का श्रवण और मनोहर नृत्य के दर्शन और ये सब क्यों? इसलिए कि मुझे इनमें रस मिलता है और इन सबके भोग की मुझे सामर्थ है रस्ते मिलता होगा । वो अपनी अपनी रुचि की बात है । जिस बात में किसी की रुचि नहीं, उस की प्राप्ति में रस प्राप्त नहीं होता । रुचि स्वभाव और संस्कारों से बनती है कि दोनों पूर्वजन्म के कर्मों का फल है । मैं वही पूछ रहा था कि कौन से पुण्यकर्म तुमने किए थे जिसके कारण उन्हें ये सब अनायास ही प्राप्त हो रहा है । परन्तु भगवन इसके जानने की आवश्यकता क्या है? यदि ये कहीं उन कर्मों का फल है तो होने दे दूँ । ठीक है उन पुण्यकर्मों को जानने की आवश्यकता नहीं है । फिर भी इतना तो जान लेना चाहिए कि जो जो फल का भोग किया जाता है उसके स्रोत पुण्यफल छीन होने लगते हैं । जो वस्तु संचय होती है वो समाप्त भी होती है । बुद्धिमान लोग कोष को रिक्त होने नहीं देते, उसमें व्यय के साथ साथ आए भी करते रहते हैं । वहीं आश्रय हमें पूछने का उस पुण्यकर्मों के कोष को कैसे भर रहे हो? स्वादिष्ट भोजन, सुंदर सुखद वस्त्र, सुंदर रमणिया, मनोहर संघीय अंडरटेक तो उसको कर्मों के कोष को व्यय करने के साधन है, उनमें वृद्धि के नहीं । मैं पूछ रहा हूँ कि संचय भी कुछ करते हो या नहीं । वो आचार्यजी कर रहे हैं । वहाँ दोपहर कार्य में संलग्न में रहते हैं और राज्य का हित चिंतन करते रहते हैं । इसका फल उनको मिलेगा । उनको क्यों और कहाँ से मिलेगा? मैं उनको इसका प्रतिकार देता हूँ । उस प्रतिकार के उपलक्ष्य में ही वो कार्य कर सकते हैं । वो प्रतिकार एका धन भी वहीं से आता है और जहाँ से नर्तकियों और वेश्याओं को देने के लिए आता है । बात नहीं रही कि तुम्हारा पुण्यकर्मों का पोर्ट शीन हो रहा है । पिताजी एक दिन देव लोग से एक व्यक्ति आया था और कह रहा था की मौसी अदिति का सबसे छोटा लडका हूँ । परमात्मा का अवतार है वो हम तुम सब है । उसी की शक्ति हमें अवतरित हो रही है । अभी तो हम प्रत्येक प्रकार की कामनापूर्ति के लिए प्रयत्न करते हैं और मैं तो अपने को विष्णु से बडा अवतार मानता हूँ । मैं उससे आयोग ज्ञान और विद्या में बडा हूँ । मैंने पिता में है कि हम लोग में रहते हुए तपस्या भी की है । उसने कदाचित हमलोग के दर्शन भी नहीं किए । हाँ परंतु मैंने देखा है देव लोग हम लोग से अधिक सुंदर, सुखद और स्वास्थ्यप्रद है । आप वहाँ किस कार्य से गए थे? राज्यकार्य से गया था । इस राज्य को देवलोक से क्या कार्य हो सकता है वो यहाँ से दूर है और मार्ग अतिदुर्गम तथा पैसे भरा है । इसी कारण तो मुझे भेजा गया था । महाराष्ट्र तो का कहना था कि यदि मैं चाहूंगा तो वहाँ सुगमता से पहुंच सकूंगा था । मैं गया था और विष्णु से भी मिला हूँ । बहुत ही होनहार युवक प्रतीत होता है पिताजी आपको क्या प्रतीत होता है? यदि मैं देवलोक पर आक्रमण कर दूँ तो विजय किसकी होगी । आक्रमण अकेले करो गया था सेना के साथ सेना के साथ तो एक घडी भर में पूर्ण सेना जलकर राख कर दी जाएगी । ऐसे उसके पास एक दिव्य अस्त्र है तो नगर के नगर एक्शन में अग्नि का मुख में डाल देते हैं । आपने देखा है सर किया जाता हुआ मेरे देखते देखते पर्वत परिस्थित, पूर्ण वन और उसके साथ ही पर्वत का सत्रह ही विलुप्त हो गया वो सस्त्र के चलने पर इतना प्रकाश हुआ कि आखिर बंद हो गई और जवान खुली तो वहाँ पर सपाट जिला की भांति एक विशाल मैदान था । पर्वत रहा नवान और यदि अकेला युद्ध करूंगा तो हमको दिवेश शास्त्र नहीं चलाएगा । विष्णु तुमसे तुम्हें युद्ध करेगा और विजय उसकी होगी क्योंकि इसलिए वो अभी तक कर्मचारी है । उसने अभी तक किसी स्त्री के साथ रमण नहीं किया । वीर और तेज का पुंज हम जैसे व्यसनी व्यक्ति हो । पलभर में परास्त कर देगा । पर मुझे पिता महीने वर्ड दे रखा है कि उसको कोई मनुष्य अथवा देवता नहीं मार सकता हूँ । तो पिता मैंने ये बढ दे रखा है कि तुम दुराचार और व्यभिचार करूँ । ये मैं पिता नहीं की कहने से नहीं करता हूँ । ये तो मैं अपने ईश्वर के होने से करता हूँ । ये तो मैं हम हो रहा है कि तुम ईश्वर हो तो प्रचार जी भी यही कहते हैं । वो तो मैं मूर्ति बना रहे हैं । नहीं पिताजी ऍम करते हैं कि संभव है परन्तु मैं समझता हूँ कि वह कदाचित सही समझ रहे हैं । हमारी हत्या हो जाए तो तुम होगा । इसी कारण तुम को शीघ्र मृत्यु के पद पर ले जा रहे हैं । ऋण कश्यप को अपने पिता से भेंट का सुख अनुभव नहीं हुआ हूँ । वैसे तो पिता उससे कभी भी इस नहीं नहीं करता था परंतु जिस दिन की बात तो बहुत ही रुक्ष और कटु प्रतीत हुई थी । ऋण का शपूर राज्य अतिथिगृह से जाने की तैयारी ही कर रहा था की नगर रक्षक एक व्यक्ति के हाथ पांव बांधे हुए राज्य न्यायालय ने ले जा रहा था । न्यायकर्ता ऋषि नमुचि थे । नमुचि नगर रक्षकों से पूछा किसलिए पकडा है और इस प्रकार बांध रखा है भगवान श्री नगर की किस तरी को पकडकर अपने रस्ते पर बांधे हुए नगर से बाहर लिये जा रहा था । जब इसे रोकने का यह क्या तो ये सैनिकों को रज के नीचे कुचलकर भाग जाना चाहता था परन्तु से पकडा दिया गया है और इस कारण नहीं भागना जाए । उसके हाथ पांव रस्सी से बांध दिए गए हैं । उस तरी कौन है? ये राजपुरोहित जी की पत्नी सुभद्रा है । उन्हें महारानी जी के प्रसाद में भेज दिया गया है तो और कैसे पकडा है उसे? इस नहीं वो कहती है कि वह पूजा ग्रह से लौट रही थी । ये मंदिर के बाहर रख लिए खडा था उसे बलपूर्वक पड रस्सी बांध नगर के बाहर को भाग खडा हुआ हूँ तो वो नहीं जानती क्या नाम है तुम्हारा । न्यायाधीश ने गलती से पूछ लिया भगदत्त कहाँ के रहने वाले हो? पुरी के यहाँ क्यों आए थे? महाराज हिरणकश्यप के साथ आया हूँ उस स्त्री को किस लिए जा रहे थे आपने? महाराज हिरणकश्यप हों की आज्ञा थी इस इस तरी को अपने नगर में ले चलें । वहाँ उनका ही राज्य है और रुका छुपाओ की आवश्यकता ना होगी परंतु यहाँ राज्य उनका नहीं है । इस कारण मुझे आज्ञा हुई थी कि मैं जिस तरी को चुपचाप और बहुत प्रातःकाल पूजा ग्रह से निकलते ही पड कर ले जाऊँ । किसी नगर के बाहर संरक्षक ना होते । मैं अपने महाराजके आज्ञापालन कर पुरस्कार पाता हूँ । मार शिवम जीने एक्शन पर विचार किया । नवआरक्षकों कह दिया तुरंत महाराज के पास ले जाओ । उसका स्वामी हिरण कष्टपूर्ण नगर को छोडकर जाने ही वाला है । नगर रक्षा को उस बंदी को लेकर राज्य प्रसाद में जा पहुंचा हूँ । वहाँ महर्षि नमुचि का संदेश देकर महाराज पृथु के सामने बंदी सहित व्यवस्थित हो गया । उनको स्थिति का ज्ञान कराया गया तो उन्होंने उस बंदी को कश्यप होने के पास भेज दिया । वो समझ गए थे कि दोषी हिरणकश्यप है और वह कश्यप मुनि का पुत्र है । कश्यप ने पूर्ण का था सुनी तो आज्ञा दे दी इस व्यक्ति को नगर द्वार के बाहर एक ऐसे स्थान पर फांसी पर लटका दिया जाए । यहाँ पर महाराज हिरण्यकश्यपु जाते हुए आपने आज्ञाकारी सेवक केशव को लटका दें उसके जहाँ कर्म के लिए उसे अपने साथ हम पूरी की और ले जा सकें । ऐसा ही किया गया मध्यान् का भोजन का । रहन कश्यप अपने सेवकों के साथ राज्य प्रसाद से विदा हुआ । सेवकों में से एक में पूछ लिया महाराज भगवत अच्छा नहीं है । वो अपनी पुरी में हमारे पहुंचने की सूचना लेकर हमारे आगे आगे गया है । अंक ये बात चिरकाल तक छुपी नहीं रह सकती । अनंतपुरी के प्राचीर द्वार के बाहर ही पद के तक पर एक रक्ष से भगदत्त का शरीर लटकता देखा गया । ॅ सेवक में लटक रहे भगदत्त के शरीर हो पहचान लिया महाराष्ट्र कह दिया महाराज शव भगदत्त का है । हिरण्यकश्यपु और सेवक दोनों ने आपने रस खडे कर लिए । उस पक्ष के नीचे एक पटपर ये लिखा था ये चोर इस नगर से एक स्त्री को उठा कर ले जाता पकडा गया है । उसके अपराध स्वीकार करने पर उसे मृत्युदंड दिया गया है । पत्ते पर लिखे गए इस वाक्य को पर सब मुख देखते रह गए । एक सेवक ने कहा ये एक विदेशी को यहाँ के धर्म के अनुसार दंड दिया गया है । महाराज सहन नहीं किया जाना चाहिए । हिरण्यकश्यपु एक्शन तक रक्ष के नीचे बडा विचार बनता रहा और फिर सेवकों को कहने लगा इसके शाम को उतार और एक रस्में डाल करते चलो इसका संस्कार आपने नगर में चलकर करेंगे महाराज एक सेवक ने कहा इस अपराध का दंड नहीं दिया जाएगा । यहाँ नहीं इस समय दंड दिया जाना संभव ही नहीं पर अब तो हम इस अपमान को छमा भी नहीं कर सकते । हम इसका प्रतिकार लिए बिना नहीं रहेंगे । शव रख से उतारा गया और एक रथ पर डाल कर ले जाया गया । हिरणकश्यप को अपने एक सेवक का फांसी चढाकर एक फॅमिली अटकाया जाना एक घोर अपमान की बात ही समझ में आएगा । और अपनी राजधानी में पहुंचते ही उसने राज्य के मुख्यमंत्री शुक्राचार्य को बुला रहे जा चुका चाहे अपने साथ महाराज के जेष्ठ पुत्र प्रहलाद को लेकर वहां पहुंच गया । ऍम कश्यप पुणे आचार्य जी को आदर्श बैठाया और आपने अनंगपुर का वृतांत सुना दिया । शुक्राचार्य ने पूछा तो ये आज्ञा भगदड जी को महाराज जी ही इस मुद्रा देवी को पकडकर यहाँ ले आए? हाँ, परन्तु ये आज्ञा आपने क्यों दी? हम चाहते थे कि वो इस तरी हमारे राज्य की शोभा को बढाती परन्तु महाराज आप किसी दूसरे के राज्य की विभूति को कैसे अपना अधिकार में ले सकते हैं । इस कारण की हम शक्तिशाली हैं । हम ईश्वर हैं । संसार की सब श्रेष्ठ वस्तुओं पर हमारा अधिकार होना चाहिए । महाराज आपके राज्य के ईश्वर है, अनंतपुर के नहीं था । मैं विश्व का इश्वर नहीं हूँ । ये अधिकार अभी आपने प्राप्त नहीं किया तो वो पैसे प्राप्त कर सकता हूँ । पहले आप हम पूरी केश्वर बने रहने की चिंता करिये । आपके वहाँ से जाने के उपरांत आपके स्पुत्र ने नगर में आपके विपरीत विद्रोह खडा कर दिया है । पहला क्या कहते हो राजी? आप जनपद के राजा हैं परन्तु ईश्वर नहीं है हूँ । ईश्वर पूर्ण भगवान में व्यापक एक व्यक्त शक्ति का नाम है सूर्य, चंद्र और तारामंडल इत्यादि को बराती चलाती और उसका प्रणय करती है आपने वो सामर्थ्य नहीं है हम से कम इस राज्य में हमारी ये सामर्थ्य हैं नहीं, इस राज्य में भी नहीं है । आपको यहाँ रहने वाले मानकों पर शासन मात्र करते हैं । आप उनके निर्माण, पालन और विनाश करने में समर्थ नहीं है । हम समझते हैं कि हम समर्थक हैं । आप किसी भविष्य का निर्माण करके दिखाइए । तभी माना जा सकता है कि आप मानव निर्माता हैं । ईश्वर बनने के लिए उससे भी कहीं अधिक सामर्थ्य की आवश्यकता होती है । किरण कश्यप हस पडा और बोला प्रहलाद अपनी माँ से जाकर पता करो कि तुम्हारा निर्माण इसमें क्या है? मैंने ही किया है । मेरी ही अनुमति से इस जनपद ने सब काम उत्पन्न होते हैं । यदि मैं क्या करूँ तो मनुष्य सृष्टि ही रुक सकती है । पिताजी अब भूल कर रहे हैं । बिना सर्वव्यापक, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान परमात्मा की स्वीकृति के एक दिन का भी नहीं मिल सकता । हिरणकश्यप पूने आचार्जी को संबोधित कर कहा आप से समझाइए कि मनुष्य कैसे उत्पन्न होते हैं और कैसे मेरी आज्ञा के मारे जा सकते हैं । अभी आप पिछले आइए । मैं इस बहुमंडल का ईश्वर बनने का उपाय करना चाहता हूँ । शुक्राचार्य उठ खडा हुआ । आचार्य जी के जाने से पूर्व हिरण्यकश्यपु ने उनको कह दिया आचार्यवर मैं सबसे पहले इस पृथ्वी को सन्मार्ग दिखाना चाहता हूँ । उसने मेरे सेवक की हत्या कर मेरा घोर अपमान किया है । शुक्राचार्य ने दाहिना हाथ उठा आशीर्वाद दे दिया । तदंतर मैं रात को साथ लिए हुए प्रसाद से बाहर निकल गया । शुक्राचार्य ने दाहिना हाथ उठा आशीर्वाद दे दिया । अंतर पहला को साथ लिए हुए तो प्रसाद से बाहर निकल गए । जब शुक्राचार्य प्रहलाद को साथ लेकर राज्य प्रसाद में गया था तो देखने वालों को ये भय लग रहा था कि पहला उसको फांसी चला देने का दल हो जाएगा । कई माँ से पहला अपनी पाठशाला में अपने ही पिता के विरुद्ध की प्रचार कर रहा था । राजा के लिए ईश्वर शब्द का प्रयोग अनुचित है । धर्म का शको राजा है ईश्वर नहीं । आरंभ में सुनने वाली बात सुनकर सभास् पडते हैं । परंतु धीरे धीरे बात को बार बार और स्पष्टता है । बताने पर लोग समझने लगे थे । विद्यालय के विद्यार्थियों से बात नगर में फैल रही थी । नगर में बहुत लोग ऐसे थे जो हिरण कश्यप के ईश्वर माने जाने के कारण भारी हानि उठा चुके थे । सबसे बडा आधार स्त्रीवर्ग पर हो रहा था । जनपद कोई सुंदर स्तरीय अथवा कुमारी होती तो जनपद का इश्वर उसे बुलाकर अपने प्रयोग में लाता था । यदि किसी के पास को सुंदर वस्तु होती तो उससे जनपद का वो इश्वर वस्तु छीन लेता था । ईश्वर की छह सौ वो पडी थी और नगर की सेना तथा सुबह द्वारा सादा ईश्वर इच्छापूर्ण करने में लीन रहते थे । सैनिक और सुबह सादा भारी वेतन पाते थे और सुंदर स्वादिष्ट हम दुर्लभ वस्तुओं की जूठन उनको भी प्राप्त होती रहती थी । इससे राजा के ईश्वर माने जाने में अपना लाभ मानते थे । अतएव सेवक सब राजा के पक्ष में थे । सैनिक संगठन बाल के सम्मुख सामान्य नागरिक अपने को असहाय पाता था और अत्याचार सहन करने के अतिरिक्त कुछ भी उपाय नहीं कर सकता था । अब जनपद की ईश्वर का जेष्ठ पुत्र ही कह रहा था राजा ईश्वर नहीं है । इस कारण उसकी अनियमित बातों का विरोध होना चाहिए । राजा के पुत्र और राज्य के युवराज को उनके मन की बात कहते देख प्रजा में साहस उत्पन्न हो रहा था । पूर्ण जनपद में आशा और उत्साह की तरंग उठने लगी थी और सामान्य लोग भी अब कानू कान बात कर रहे थे । ऐसे वातावरण में नगर के लोगों ने देखा कि आचार्य प्रहलाद को साथ लिए हुए ऋण कश्यप के प्रसाद ने गया है । इससे पूर्व प्रहलाद को राज्य प्रसाद ने जाते कभी नहीं देखा गया था । आठ वर्ष की आयु का था तो नारद मुनि के आश्रम से अपनी माँ के साथ लौटा था । हालात का जन्म उसी आश्रम में हुआ था । उस समय हिरण का सपोर्ट हम लोग में तपस्या कर रहा था । वहाँ वो युद्ध करने के ढंग ऍम शस्त्रास्त्रों के प्रयोग की प्रक्रिया सीख रहा था । आठ वर्ष तक वहाँ रहा और जब पूर्ण दक्ष होकर लौटने लगा तो पिता मैंने उसे ये है प्रमाणपत्र दिया था । वो अजीब है । ऍम कश्यप के लौटने पर प्रहलाद की माँ अपने पुत्र को लेकर आश्रम से लौट आई थी परंतु फिल्म कश्यप की अब उसमें रूचि नहीं थी था । उसके लिए राज्य प्रसाद से प्रथा के एक आवास बनाकर उसे वहाँ रख दिया गया था । हेलन कश्यप को अपनी शक्ति ऍम पिता में से प्राप्त वान पत्र से उन्मुक्त नृत्य अपनी पत्नी की खोज करने लगा था । नगर के लोग जानते थे कि पहला की माँ और पहला कभी राज्य प्रसाद ने नहीं बुलाया जाते हैं । प्रहलाद को शुक्रचार्य पढाता था परन्तु नारद मुनि के आश्रम की शिक्षा उसके मन पर इतनी दृढ छाप छोड चुकी थी कि आचार्य जी की शिक्षा व्यस्त हो रही थी । पहलाद उस समय अठारह वर्ष का युवक हो चुका था । वो अब वीर्यवान परन्तु सात्विक विचारों का युवक था और मन में दृढ संकल्प कर चुका था कि पिता के अनाधिकार पूर्ण ग्रहण किये गए अधिकारों को निशेष कर देगा । जब प्रहलाद ने खुलकर प्रजा ने ये कहना आरंभ क्या राजा के लिए भी धर्म के नियम होते हैं और सनातन धर्म सबके लिए एक समान है । तब शुक्राचार्य को चिंता लगने लगी जिन दिनों हिरण्यकश्यपु अनंदपुर गया हुआ था । विद्रोह की भावना प्रबल होने लगी थी । इस यात्रा में दो सप्ताह के लगभग लगे और ऋण कश्यप की अनुपस् थिति ने सैनिकों और सुबह को भी प्रहलाद की जीवन मिमांसा भली प्रकार समझ में आने लगी थी । इस कारण महामंत्री शुक्राचार्य हिरण कश्यप के लौटने की प्रतीक्षा करने लगा । जब उसे सूचना मिली कि महाराज यात्रा से लौट आए हैं तो वहाँ पर हालत को लेकर राज्य प्रसाद ने जा पहुंचा हूँ । हिरणकश्यप तो आपने आनंदपुर में हुए अपमान की बात बताने के लिए महामंत्री से भेंट करना चाहता था परन्तु जब सवेरे हुआ उसके अपने राज्य में और उसका अपना पुत्र ही उसकी प्रतिष्ठा को छीन करने में लगा है तो उसे चिंता लग गई । शुक्राचार्य ने प्रहलाद को समझाना आरंभ कर दिया । उस राज्य पाने पर स्वेच्छा से विचार में और मानवाने भोगेश्वर की उपलब्धि का आश्वासन देकर कहा हम स्वयं ही अपने पांव पर उल्हाना चला रहे हो, राज्य में राजा की महिमा को काम कर रहे हो, परन्तु आचार्यवर प्रहलाद ने दृढता से अपने पक्ष को पस्थित करने के लिए कह दिया । ये मानव जीवन तो एक बंदी जीवन है । इसमें किसी को भी स्वेच्छा से अंबाराम तक जाने की शुक्र भी नहीं है । ठीक है परंतु राजा तो मानवों से ऊपर होता है । उस सर्वे ऐश्वर्या संपन्न हैं । इसी कारण उसे ईश्वर कहा है । उसको विशेषता प्राप्त है और उस सब बंधनों से मुक्त होता है । आचार्य जी, मैं इसे एक आयुक्त कथन समझता हूँ । राजा भी बंधनों से झगडा हुआ है । वही शरीर के रहते हुए पृथ्वी से बना हुआ है और चंद रोक अथवा सूर्यलोक में नहीं जा सकता । वह वायु के बिना जीवित नहीं रह सकता । उसे भी अन्य जल की आवश्यकता रहती है । ये सब बंधन उसके लिए वैसे ही है जैसे किसी भी मनुष्य के लिए हैं । अच्छा मनुष्य होने के नाते वह जनसाधारण से श्रेष्ठ नहीं है । फिर भी आचार्य ने उसे समझाया वो राजा है । जब वो नगर में घुस जाता है तो सहस्त्रों लोग उसके दर्शन के लिए पद के तट पर आकर खडे हो जाते हैं । यहां मुझ जैसे पढे लिखे विद्वान को अपनी जीविका के लिए राजा के सामने हाथ पसारने पडते हैं । वहाँ उनके लिए लोग अपना सर्वस्व निछावर करने के लिए तैयार रहते हैं । देखो पहला यदि राजा कहे तो सैनिक पूरन नगर को आर लगा भूख सकते हैं और किसी में साहस नहीं की आज्ञा का उल्लंघन कर सकें । इस कारण तुम को यह स्वीकार करना ही पडेगा । राजाओं ने सर्वसाधारण से कुछ विशेषता होती है । भगवान मैं मानता हूँ परन्तु ये विशेषता इसी कारण है । राजा कुछ विशेष कर्तव्यों का पालन करता है । यदि बहन कर्तव्यों का पालन न करें । यह विशेषता उनमें नहीं रहती और उस विशेषता का यार कैसे हो गया? राजा प्राकृत धर्मों का भी उल्लंघन कर सकता है । यदि वो उसका उल्लंघन करेगा, उस मनुष्य की भांति तो प्रसाद की छत पर चढकर चंद को पकडने के लिए छलांग लगा देता है । अपनी स्वयं हत्या कर लेगा । परंतु क्या तुम्हारा पिता किसी प्रकार के प्राकृतिक नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं? पहला गंभीर भाव बनाए हुए कहा तो क्या वो आप नहीं जानते हैं? मैं क्या नहीं जानता हूँ । यही की पिताजी प्राकृतिक नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं । किसी अन्य के परिश्रम से उत्पन्न संपदा को स्वयं आत्मसात कर लेते हैं । मेरा एक्सपार्टी को था, आप भी जानते हैं उसकी माँ का सैनिकों ने अपहरण कर लिया था और महाराज ने उसे कुछ मार्च तक आपने प्रसाद के रखा तदंतर निकाल दिया । बहुत की माँ ने आत्मग्लानि से पीडित हो अपने को जल्दी अग्नि में छोड दिया था । बताइए, ये महाराज की अनाधिकार चेष्टा थी अथवा नहीं परंतु वहां का राजा है पूर्ण जनपद की रक्षा का भार अपने हाथ में लिए हुए हैं । इस कारण उसके विशेषाधिकार भी हैं । विशेष कर्तव्यों पर विशेषाधिकार तो होते ही हैं परन्तु प्रत्येक कर्तव्य की सीमा होती है और प्रत्येक अधिकार की भी कोई एक किसी दूसरे के धर्मयुक्त अधिकारों का अपहरण नहीं कर सकता । आचार्यजी नगर में जिस किसी के पास कुछ अधिक धन एकत्रित होने लगता है, राजा उससे छीन लेता है । जब किसी की संपत्ति धर्मयुक्त उपायों में से एकत्रित की गई हो तो फिर उससे छीन लेने में क्या युक्ति है? युक्त यही है कि तुम्हारा पिता राज्य वहन करने लगा है । उसे धन चाहिए और जिसके पास हो उससे नहीं लिया जाए तो अभावग्रस्त से छीनने में तो ध्यान ही नहीं होता । राज्य जैसे दुस्तर कार्य के लिए सब धन संपदा रखने वालों को स्वतः राज्य को दे देना चाहिए और जी ऐसे नहीं प्रत्येक बात के लिए कोई नियम होना चाहिए । अनियमित छीनाझपटी से तो छठा असंतोष और रोज होगा । साथ ही उच्च से उच्च राज्याधिकारी के लिए भी उसके भोग की सीमा होनी चाहिए । गुरुजीत जब मैं ये कहता हूँ कि राजा ईश्वर नहीं, राजा मात्र है तो मेरा अभिप्राय यही है कि वह धर्म से बना हुआ है । ईश्वर असीम है, उसकी सामर्थ्य और अधिकार भी असीम हैं । मैं बुद्धिहीन और अशिक्षित प्रजा के लिए कहा जाता है कि राजा ईश्वर है । इसका अर्थ है कि वह ऐश्वर्यवान है । इस प्रकार राजा के व्यक्तित्व और नाम की सजधज से अलंकृत करने के लिए उसे ईश्वर कहा जाता है । गुरुवार आती इसलिए करते हैं । यह विवादास्पद नहीं विवाद की बात ये है कि ये सब नाम और सजधज किस प्रयोग में लाई जा रही है । चली ईश्वर होने का अर्थ यह है कि कुमुद की माँ का अपहरण करने वाला दंड से मुक्त हो सकता है भी है, अत्यंत दूषित कार्य है । यदि किसी मनुष्य को ईश्वर मान लेने से वो किसी की भी संपत्ति लूट सकता है तो उससे ईश्वर का प्रत्यय छीन लेना चाहिए । परन्तु राजा को ईश्वर मान लेने से लाभ तो तुम को भी होगा । कैसे महाराज जब अपने पिता के उपरांत तुम राज्य कर दी पर बैठोगे और तुम को भी ये सुविधाएं प्राप्त होंगी तो इस समय तुम्हारे पिता जनपद के इश्वर को प्राप्त है । मुझे इन सुविधाओं की आवश्यकता नहीं । अगर हम तो कभी मेरे लिए कल्याण का सूचक नहीं हो सकता है । मैं तो राजा से लेकर जनपद में एक निर्धन और दुर्बल व्यक्ति के लिए एक समान धर्म के नियमों का प्रचलन चाहता हूँ । यदि राजा को कुछ अधिक सुख सुविधा प्राप्त होती है तो इस कारण नहीं कि वह ईश्वर है । पर इस कारण वो राजा है और राज्य प्रबंध चलता है । तुम तो अपना हित भी विचार नहीं कर रहे हैं । मेरा ही धर्म की स्थापना में है न कि ईश्वर बनने में भरी बात तुम्हारा पिता नहीं मानेगा । वो क्या नहीं मानेंगे । अपने को ईश्वर मानना छोडेंगे नहीं । मैं उनको छोडने को नहीं कह रहा । मैं तो प्रजा को कह रहा हूँ उनको ईश्वर मत मानो पेशवर नहीं है, केवल राजा मात्र हैं और राजा ऋषियों से पक्ष किया जा सकता है । लोगों के ऐसा मानने से क्या होगा? संसार में सब प्राणी और वस्तु धर्म से बंधे हुए कार्य करते हैं । धर्मपथ के छोडने का अर्थ है भयंकर वन में भटक जाना । और ऐसे व्यक्ति को उसके परिणामों को सहन करने के लिए तैयार रहना चाहिए तो तुम अपने पिता को धमकी दे रहे हो । मैं उनको शुभ सम्मति दे रहा हूँ । ठीक है अभी तक मैं तुमको गुरु के नाते समझा रहा था । बडा यहाँ के मंत्री के नाते आज्ञा देता हूँ कि तुम अपने ही घर में स्वयं को बंदी मान कर रहा हूँ । तुम घर से बाहर निकलते देखे गए तो प्राणदंड के भागी बन जा हो गई । मैंने क्या अपराध किया है । हमने राज्य के विपरीत विद्रोह की ध्वजा उठाई है । राज्य के विपरीत विद्रोह का दंड मृत्यु है और मैं मंत्री होते हुए इस दंड के देने का अधिकार रखता हूँ । अधिकार तो आपको मृत्युदंड देने का है । हम तो मंत्री वर्ष मुझे मृत्युदंड देना अन्य आयुक्त है आपका मुझे निरापराध को बंदी बनाना भी अन्य आयुक्त है और उस न्यायायुक्त आज्ञा का पालन न करने पर मुझे मृत्युदंड देना तो बहुत अन्याय होगा तो तुम नहीं मानोगे जी नहीं मैं भी नगर के चौराहे पर खडे होकर कहने जा रहा हूँ । राजा ईश्वर नहीं होता । राजा राज्य करने के कारण कुछ विशेष सुविधाओं का भागीदार है परन्तु उसके अधिकार धर्म की सीमा में सीमित हैं और धर्म का एक लक्षण है कि जो भी कुछ व्यक्ति अपने साथ किया जाए, पसंद नहीं करता हूँ । व्यवहार उसे किसी दूसरे के साथ भी नहीं करना चाहिए । इतना कहकर प्रहलाद ने गुरुवार के चरण स्पर्श किए, उनके आवास से बाहर निकल आया । छोटा आचार्य प्रहलाद की नियुक्ति और साहस से प्रभावित हुआ था । परंतु वो समझता था कि राज्यकार्य बच्चों का खेल नहीं है । ये सब राजकुमार को समझ लेना चाहिए । वो मन में ये संकल्प कर बैठा इस राज कुमार को सलमान दिखाना चाहिए । अब ये नहीं किया गया तो जनपद में घोर उपग्रह होने लगेंगे और फिर सहस्त्रों प्रदर्शित लाखों की क्या होगी? संभावना पर आचार्य अत्यंत विक्षुब्ध होते थे । हिरणकश्यप को अनंगपुर से लौटे हुए दो सप्ताह बीत चुके थे, जब शुक्रचार्य प्रहलाद के विषय में दंड का निश्चय करने महाराज से मिलने गए । उनको राज्य प्रसाद के मार नहीं, बडी संख्या में सैनिक अस्त्रशस्त्र दिए हुए राज्य प्रसाद की और चाहते दिखाई दिए । अचारण ने एक सैनिक से पूछ लिया क्या बात है तो आप लोग इतनी संख्या में राज्य प्रसाद की और जा रहे हैं । महाराज ने पूर्ण सेना को वहां एकत्रित होने के लिए कहा है । क्यों नहीं तो पूछ रहा हूँ । चुना है कि महाराष्ट्र सेना के सम्मुख एक वक्तव्य देने वाले हैं । छत्तीस आचार्य को इसमें हुआ । अभी तक प्रजा कह रही थी कि महाराज के सब कार्य महामंत्री की सहमति से होते थे । परंतु इस समय उस से पूछे मिला सैनिकों को आह्वान किया गया है । आचार्य जी रख पर जा रहे थे और सैनिक पैदल थे । नगर चौराहे पर एक विशाल जनसमूह एकत्र था और मार्ग अवरुद्ध हो रहा था । आचार्य जी को रख रोकना पडा । राज प्रसाद को जाते हुए सैनिक भी उस भीड में समृद्ध होते जा रहे थे । मार्ग लिखना होने के कारण रख रुका तो महामंत्री ने समीप खडे एक नागरिक से पूछा यहाँ क्या हो रहा है? एक सभा हो रही है । आचार्य जी को विश्व में हुआ और बोले क्या ही सभा है । सभा तो वह होती है जहां विद्वान सभ्य जान विचार विनिमय कर रहे हो । विचार दिन में तो हो चुका है और विचार का परिणाम बताने के लिए ही लोगों को एकत्र किया जा रहा है । कौन एकत्रित कर रहा है ये? मैं नहीं जानता । सभा कहाँ हुई थी । उनमें कौन कौन थे, क्या विचार हुआ है ये जानने के लिए ही तो हम यहाँ खडे हैं । भीड में लोग कानोकान रथ की चर्चा करने लगे थे । एक निरस्त पहचाना और कह लिया महामंत्री कारत प्रतीत होता है था । दूसरे ने कह दिया मालूम तो यही होता है । यहाँ किसके आए हैं सभा भंग कराने क्यों देखते नहीं की इस भीड में कितने सैनिक खडे हैं । इससे क्या होता है? दैनिक बिता नागरिक हैं । उनकी रूचि भी इस कार्य में होनी स्वाभाविक है । किस कार्य में नागरिकों की सभा ने तो महामंत्री भी उसी सभा में आए प्रतीत होते हैं । क्या नहीं सकते हैं । एकत्रित भीड में इस प्रकार की चर्चा होने लगी थी । आचार्यजी विचार कर रहे थे कि वो अभी लौट जाएं अथवा किसी दूसरे मार्ग से राज्य प्रसाद को चल रहे हैं । वो अभी विचार ही कर रहे थे कि राजकुमार पहला एक प्रसाद से एक अति सुन्दर और ओजस्वी योग के साथ बाहर निकला । पहला देख क्षण पर गुरूजी को रात में वहाँ खडा देख जिसका परंतु शीघ्र ही संभाल और परिणाम कर बोला गुरुदेव आज हमारी सार्वजनिक सभा के अध्यक्ष पद को सुशोभित कर लिए । अब सभा का प्रयोजन जानने का अवसर जान शुक्राचार्य ने पहला से पूछ लिया ये इसकी सवा है और क्योंकि जा रही है सभा नागरिकों की है और जनपद के संबंध में एक अत्यावश्यक विषय पर विचार के लिए बुलाई गई है । परन्तु तुम कोई निश्चित होना चाहिए की सभा में सभासद केवल सभ्य प्रशिक्षक और सदाचारी ही हो सकते हैं । आप भगवान आप की कृपा से ये जानता हूँ । सभा तो हो चुकी है और उसमें सब पस्थित गण सभ्य, सुशिक्षित और सदाचारी ही थे परन्तु मैं उसमें आमंत्रित नहीं था तो इसलिए कि अब राजा के वेतनधारी सेवक है । सेवक स्वयं कुछ नहीं होता उसका कोई भी कर्म उसका अपना नहीं होता । वो अपने स्वामी का एक अंग मात्र होता है । हाँ वो तो है और गुरु जी आपके स्वामी महाराज हिरण्यकश्यपु जी नहीं सकते हैं और ना सुशिक्षित वो सदाचारी तो है ही नहीं । इस कारण आपको सभा में आमंत्रित नहीं किया गया । आप अपने स्वामी का एक अंग मात्र हैं । पहला हम विद्रोह कर रहे हो? नहीं भगवान ये विद्रोह नहीं कहना था । धर्मानुसार आचरण करने वाला व्यक्ति विद्रोही नहीं हो सकता । विद्रोह अधर्माचरण का सूचक है । धर्म क्या है? छोडना चाहते अपनी बात समाप्त नहीं कर सका कि समीप खडे ओजस्वी योग में कह दिया राजकुमार चलो सभा आरंभ करने का समय हो गया है तो वही गुणवत् मैं अपने स्वामी को मिलने जा रहा था और तुम्हारे लोगों ने मार ग्रो करता है । अब तो पीछे लौटने को भी मार्क नहीं रहा हूँ । ये तो ठीक है अब आपके लिए ना राज्य प्रसाद को जाने के लिए मार्केट है और न घर लौटने का । और तुम गुरुवर एक मार्ग अभी भी खुला है । आइए उस पर चलने का ही निमंत्रण दे रहा हूँ और वहाँ कौन सा मार्ग है धर्म का? शुक्राचार्य हस पडा और बोला हूँ विचार कर रहा हूँ । क्या सबसे ही धर्म का मार्ग है । हाँ, विचार करिए और परीक्षा करिए तो तुम सभा करो । मैं यहाँ बैठा हुआ देख सुन और विचार करुंगा । सभा में वही ओजस्वी युवा तो मैं रात के साथ प्रसाद से बाहर निकला था और उस को साथ लेकर सभा के मंच पर आया था । वक्तव्य देने लगा । उसने मानव समाज का विश्लेषण करके बताया ये इतर प्राणियों से सर्वथा विलक्षण समाज है । इसमें प्रत्येक को परमात्मा ने विकासयुक्त बुद्धि दी है । इसमें प्रत्येक को अपने अपने भाई बंधु, आपने स्टीवार्ड, पडोसी और नगर के साथियों के कल्याण की कामना करनी चाहिए और उस कल्याण के निमित्त तक प्रत्येक को यही करना चाहिए । सबके कल्याण की बात होती है । वो करने वाले का भी कल्याण करती है । श्रद्धान का विचार करके ही हमने यह निर्णय किया है । इस जनपद में हो रहे कल्याण को मिटा दिया जाए । इसके मिटाने में व्यक्तिगत हानि को वहन करके भी सबको सदुपयोग देना चाहिए । समस्या यह है कि ब्रह्मपुरी के महाराज मात्र एक मानव है । उसके अधिकार राजा होने से राज्य के संबंध में कुछ अधिक हैं, परन्तु मानव धर्म से वो भी ऐसा ही बना है जैसे कि हम सब बंधे हुए हैं । यदि वह कुछ अमानवीय व्यवहार कर रहा है तो इस कारण से हम उसे सहन कर रहे हैं । हम जनपद के विद्वान और बुद्धिमान जनों ने एकत्रित होकर ये निश्चय किया है । याद से महाराज की किसी भी अमानवीय आज्ञा का पालन नहीं किया जाएगा । मैं पूछता हूँ आप में से कितने ऐसे हैं जो किसी भी मनुष्य को अमानवीय अधिकार देना चाहते हैं । एक मंच पर से ही उच्च स्वर में कहा कोई नहीं सभा में से सहस्त्रों घंटों ने शब्द निकल गया । कोई नहीं कोई नहीं, कोई नहीं कोई नहीं । घोष का तुमुल नाथ शांत हुआ तो उसी ओजस्वी मुनि ने कहा और कुछ नहीं चाहते । एक अमानवीय कृत्य हाँ हो रहा है और महाराज के पुत्र को राज्य प्रसाद में घुसने नहीं दिया जाता । उसकी माता को अपना उचित पटरानी पद प्राप्त नहीं है कि सब अकारण हैं । ये अन्याय मिट जाना चाहिए । उसके साथ ही राज्य के कार्यभार में युवराज को उचित कार्य मिलना चाहिए । ये हमने विद्वत सभा की ओर से मांग की है । इसके पूर्ण होने पर शेष बात पर विचार किया जाएगा । इस प्रवक्ता ने कदम समाप्त किया और सभा विसर्जित कर दी । इस पर प्रजा भगवान नरसिंह की जय हो । भगवान नरसिंह की जय हूँ कि घोष करती हुई उठ खडी हुई और सब इधर उधर अपने अपने मार्ग पर चल पडेंगे । आचार्य जी के रज के लिए मार्ग अभी अवरुद्ध था । आचार्य इस भाषणकर्ता से मिलना चाहते थे परंतु मार्क साफ होने से पूर्व ही प्रहलाद आचार्य जी के पास आया और नमस्कार करके पूछने लगा पुरवासी सुना नहीं हाँ रन तू कौन था? तो वैसे नरसिंह कहते हैं क्या अभिप्राय है इसका नरों में? सिंह हम तो सिंह होगा, खेती किया जाता है हूँ परन्तु आचार्यजी नरसिंह का ठीक नहीं होता । नरसिंह राज्य करते हैं वो तुम्हारा पिता हैं । मैं विद्वत सभा के आदेश से आज राज्य प्रसाद ने उचित कार्यभार संभालने के लिए जा रहा हूँ तो तुम्हारा नर्सिंग कहाँ है? कुछ चला गया है । कहाँ कहाँ से आया? कहाँ से आया था अब आएगा तो पूछ कर बताऊंगा । क्या वो अपने राज्य में रहता है? अवश्य रहता होगा तो अब आप चली मैं भी वहीं आ रहा हूँ । अकेले ही अथवा विद्वत सभा के सदस्यों सहित अभी तो अकेला ही जा रहा हूँ । तो मेरठ पर बैठ जाओ । मैं तुमको लिए चलता हूँ । पहला गुरु जी के पीछे बैठ गया । मार्ग साफ होते ही रख चल पडा प्रजा नहीं । युवराज को मंत्री के साथ राज्य प्रसाद की ओर जाते देखा । उनमें से कुछ ये समझे कि आचार्य विद्वत सभा के निर्णय का पालन कराने के लिए युवराज को अपने साथ राज्य प्रसाद ने ले जा रहे हैं । कुछ को ये इस नहीं भी हुआ था । गृहमंत्री तो युवराज को बंदी बनाने के लिए राज्यभवन में लिए जा रहे थे । इस प्रकार भिन्न भिन्न प्रकार की बातों में लोग उत्सुकता से प्रतीक्षा करने लगी । इस सभा और युवराज के राज्य प्रसाद को प्रस्थान का क्या परिणाम होता है । राज्यभवन में रानी सुषुम्ना महाराज को नगर में हो रही इस सभा के विषय में कह रही थी रानी की दासियों ने ये समाचार दिया था । नगर के मैदान में नागरिकों की एक भरी सभा हो रही है । इस पर दानी ने महाराज को अपने आधार में बुला लिया । हिरण्यकश्यपु जब रानी के सामने आया उसने अपनी दासियों से प्राप्त सूचना महाराज के समक्ष रखती और पूछा आप क्या कर रहे हैं? मुझे इस प्रकार की सभा की कोई सूचना नहीं हैं तो मुझे इसकी सूचना होनी ही चाहिए । ऍम की आवश्यकता है तो इसको होनी चाहिए । राज्य के मंत्री को मुझे भार है क्या? मुख्यमंत्री आपसे छलना देख रहे हैं परन्तु इसका प्रमाण क्या है? ये महारानी का केवल मात्र ही तो हो सकता है परन्तु आज सभा को होने देना और उसके सहस्त्रों लोगों का एकत्रित हो जाना है । उसका प्रमाण नहीं है कि आपके हाथ से राज्य छीन कर आचार्यजी अपने शिष्य को देना चाहते हैं । मुझे दोनों में कुछ संबंध प्रतीत नहीं होता फिर भी मैं मंत्री जी को बुलाता हूँ और इस विषय में ज्ञान प्राप्त करता हूँ । ये सभा इस प्रयोजन से बनाई गई थी । यहाँ पता करिए और देरी संबंधी मानी पचास सशस्त्र सैनिकों को उन पर छोड दीजिए । कोई सभा को कुछ डालेंगे । हिरण का शव महाने के आधार से बाहर मुख्य भवन में पहुंचा । वहाँ शुक्राचार्य प्रहलाद के साथ खडे उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे । महाराज ने आचार्य को प्रणाम कर रहा हूँ । आपका कल्याण हो इस समय में आपको ही बुलाने के लिए दूध भेजने वाला था । महाराज आगे करिए सुना है कि आप नगर में किसी प्रकार की सवा हो रही है । ये क्या है? फाॅर हूँ सभा आपके राज्य की व्यवस्था के विपरी मनोज गार प्रकट करने के लिए की गई है या व्यवस्था क्या क्या है इसे सभा दूर करना चाहती है । उस के विषय में विस्तार से बताने के लिए मैं राजकुमार यहाँ आया है तो यह सभा किसी ने बुलाई थी । शुक्राचार्य ने राज कुमार की और देखकर कह दिया वहाँ अब बताओ ऍम कश्यप ने कहा हम उसके बाद नहीं सुनना चाहते हैं । ये वही ईश्वर का झगडा आरंभ कर देगा । महाराज आपको बताएगा कि सभा में क्या हुआ है । बात ये है कि सार्वजनिक सभा तो केवल वास्तविक सभा में हुए निश्चय को बताने के लिए हुई थी । वास्तविक सभा एक भवन में गुप्त रूप से हुई है और सभा ने क्या हुआ? वहाँ राजकुमार ही बता सकेगा । पर मैं तो यह विद्रोह है । जो कुछ भी है उसको जानना तो चाहिए । इन कश्यप होने पर रात के और देखकर पूछ लिया अच्छा बताओ वाला वो सभा कहाँ गई हुई थी । यह नगर मंदिर में हुई थी । उसमें कौन कौन था? मैं सभा में आमंत्रित नहीं था । इस कारण न वहाँ द्वार पर ही खडा रहा था । जब सवा हो रही थी तो मैं आचार्य जी के प्रसाद में था । वहाँ से नगर में से होता हुआ मैं अपने घर को जा रहा था । मैदान में बहुत से लोगों को एकत्र देखा हूँ । पता चला कि पिता है का एक दूत आया है और सभा कर रहा है । मैं सभास्थल पर जाने लगता । मुझे भीतर नहीं जाने दिया गया । सभा स्थान से केवल एक व्यक्ति निकला था । वो पिता मैं का दूध ही था । पहचानने लोग भी थे परंतु सुना है कि मेरे वहाँ पहुंचने से पहले ही चल दिए थे । पिता है के दूत ने मुझे पहचाना तो पूछ लिया । मैं कहा गया था उसने मेरे घर पर मुझे बुलाने के लिए संदेश भेजा था । तो मैंने बताया तो मैं आचार्य जीव के निवास स्थान पर था । इसके उपरांत उस दूध ने मुझे कहा की मैं आप से मिलकर उनकी सभा का निश्चय बता दूँ । मैंने उस महापुरुष से कहा था कि वह स्वयं आपसे मिलने परन्तु उसने कहा कि वह आपसे एक अन्य दिन मिलेगा । मिलने से पूर्व वो आपको समय देना चाहता है कि आप उसके द्वारा कही बातों पर विचार कर रहे हैं । मैं आपसे हाँ भगवान ना का उत्तर लेने आएगा तो वह मुझे पिता मैं का दास समझता है और मेरा उत्तर सुनकर मुझे ऐसा करने से मुक्त करें अथवा न करें । ये निश्चय करने आएगा जो उसने नहीं कहा हूँ । यह नगर पिता है का वैसा है और वह पिता मैं कहा दूध है इसका जो भी अर्थ आप समझे हिरणकश्यप पूछ सभा के विषय में और अधिक जानने को उत्सुक था । इस कारण उसने पूछा था उसने मुझे क्या कहना दिया है? उस ने कहा है कि आप तुरंत राज्य का उत्तराधिकारी नियुक्त कर रहे हैं । अच्छा आप अपने उत्तराधिकारी को ऋषियों से स्वीकार करवाएँ । स्वीकृति उत्तराधिकारी को आप राज्य का कार्यभार सौंप नहीं हूँ और मैं क्या करूँ? आप अपनी प्रेमिकाओं से बहुत गिलास करिए अथवा वन में आखेट और इच्छा हो वन में जाकर तपस्या करिए और मैं यदि ऐसा न करो तो तब मेरे कहने के लिए कुछ नहीं है और उसको बताओगे रही मैं उसका नाम तो पिता मैं का दूध मानता हूँ और नहीं उसके आदेश को प्रदान है । करता था नहीं । मैं समझता हूँ कि उसके पास आपके मन की बात जानने का मुझ से अतिरिक्त भी कुछ अन्य साधन है । तो एक बात नाम भी सुन लो, हम तुमको युवराज नहीं मानेंगे । युवराज वो होगा ये मानेगा की मैं ईश्वर का अवतार हूँ । विक्रम इस बात को मानता है परंतु पहला राज्य प्रसाद नहीं एक अन्य आसानी हो गर्भ धारण किए हुए हैं और उसके बाद होने तक हम युवराज की घोषणा नहीं कर सकते । हम उसको भी देखने तभी युवराज की घोषणा करेंगे । दूसरी बात है युवराज को ऋषियों से स्वीकार कराने की । हम उनका ये अधिकार नहीं मानते हैं कि वे मेरे निर्णय को रद्द करें अथवा उस पर विचार भी करेंगे । श्री बात भी सुन लो अभी मैं वृद्ध नहीं हुआ हूँ । इस कारण में अभी राज्यकार्य नहीं छोडूंगा । परन्तु पिताजी प्रहलाद ने कहा जनपद की प्रजा ने इस निर्णय को स्वीकार किया है । सब इस प्रस्ताव पर प्रसन्न और संतुष्ट प्रतीत होते थे । प्रजा मिट्टी के दे ले के समान होती है । इस पर जैसे संस्कार डाल नहीं वैसा ही इसका रूप बन जाता है । इस अवस्था नहीं मुझे कुछ नहीं तो मैं अभी चलूँगा । देखो वाला हम तुम्हारी सब चतुराई को भाग गए । ये आयोजन हमने प्रजा को मेरे विरुद्ध करने के लिए क्या है? तो उन्होंने जो अपनी अनभिज्ञता बताई है उस पर हमें विश्वास नहीं । क्या आपका अधिकार है कि आप इस बात पर विश्वास करें अथवा न करें परंतु पिताजी पिता है कि दूध की बात को स्वीकार न करने से बहुत कठनाई हो जाएगी । तुम मूर्ख हो मैंने जब हम लोग ने अपनी सामर्थ्य का प्रदर्शन किया तो कम है, मुझ पर प्रसन्न हो गए । मेरे कौशल और पराक्रम को देखकर प्रसन्न हुए थे । अब उनका विश्वास नहीं रहा । उनको चाहिए कि वे अपनी प्रसन्नता वापस ले लें । भला मुझे इससे क्या फर्क पडता है? हाँ, हम तुम से पूछते हैं तो उन्होंने ईश्वर मानते हुआ हुआ नहीं । पिता जी, मैं आपको अपना पिता मानता हूँ और तुम ईश्वर के पुत्र हो, ये भी ठीक है परंतु मेरे एक अन्य पता है । अच्छा कौन है? वो ये आचार्यजी हैं । इनसे पूर्व नारद मुनि थे और कदाचित कोई अन्य भी हो सकते हैं । वे मेरे मानस पता है और हम क्या है? आप इस मानवीय शरीर के निर्माता मानवीय पिता है । ऐसा प्रतीत होता है कि तुम को कोई अन्य गुरु मिला है जिसने तुम्हें या धूर्तता भर दी है कि तुम हमें धोखा देने लगे हो । देखो पहला तो तुम्हें आज मेरे सामने और फिर हमारी राज्यसभा तथा पूर्ण प्रजा के सामने स्वीकार करना पडेगा तो मैं साक्षात ईश्वर हूँ । पिताजी मैं असत्य भाषण नहीं करता । इस कारण जिस बात को मैं नहीं मानता उसको कहूंगा नहीं । नहीं यहाँ जा रही है क्या को गुरु मानता है । फिर भी ये कहता है कि मैं ईश्वर नहीं हूँ । महाराष्ट्र ये विवाद पिता पुत्र के मध्य है, इसमें मैं कुछ भी नहीं करूंगा । देखिए आचार्यश्री मैंने आपको विश्वास दिलवा दिया था कि हम महान शक्ति केसवानी है । हमारा आप प्रमाण दिया था कि ब्रह्मपुर में आप ही सबसे बाली है परन्तु दूसरे जनपदों में आपकी सामर्थ्य का प्रमाण नहीं दे सके प्रतियूनिट आपके प्रिय सेवा भगदत्त की हत्या करवा दी और आप वहाँ कुछ नहीं कर सके । तब तो हम समझते हैं कि महारानी सुषुम्ना का गठन सकते हैं । क्या कथन है महारानी जी का? उनका कहना है कि आप हमसे झलना खेल रहे हैं । आप हमारे मुख पर कुछ कहते हैं और पीछे बालक को दूसरी बात की शिक्षा देते हैं । शुक्राचार्य का मुख्य छह साल हो गया फिर भी वो कुछ बोला नहीं । उसे मोहन देख हिरणकश्यप ने कहा है कि आचार्यजी लक्षणों से वस्तु का ज्ञान होता है और आपके शिष्य के विचारों से आपके विचारों का ज्ञान होता है । अगर हम आज ही आपको यहाँ से चले जाने क्या क्या देते हैं और हम इस बालक को इसी प्रसादी में बंदी बना लेने की आज्ञा देते हैं । इसे हम एक माह की अवधि विचार करने के लिए देंगे । तदंतर हमसे कहीं या तो ये हमें ईश्वर माने अन्यथा ये अपने ईश्वर को बुला लेंगे और हम इसको जीवित भस्म कर देंगे । शुक्रचार्य का मुख पीला पड गया वो मौन बैठा रहा हूँ आप हिरणकश्यप ताली बजाई तो दो सुबह आ गए । उसने कहा इनको भवन के भूमि अंतर्गत आगर में बंद कर दो । वहाँ इनके भोजनादि का प्रबंध रहे । सुबह उन्होंने प्रहलाद को वहाँ से पकडना चाहा । परंपरात ने खुलकर उनकी और देखते हुए कहा इस की आवश्यकता नहीं ड्रॉप मैं स्वेच्छा से चलता हूँ । पहला तो बच्चों के साथ महाराज के आगार से बाहर निकला हूँ । शुक्राचार्य ने कहा महाराज मैं हूँ हमने आपको अपनी आज्ञा सुना दी है । शुक्राचार्य उठ खडा हुआ और महाराज आपका कल्याण हो । आशीर्वाद दे बाहर निकल गया । शुक्राचार्य राज्यभवन से बाहर निकला तो उसने देखा राज्यभवन के बाहर लोगों की भीड एकत्रित हो रही थी । लोग आचार्य जी को बाहर निकलता देख उनके रज के चारों और खडे होने लगे । शुक्राचार्य ने उनकी और प्रश्न भरी दृष्टि से देखा । भीड में से एक व्यक्ति ने पूछ लिया आचार्य वर्ष युवराज कहाँ है? वो राजभवन में है । वहाँ के साथ क्यों नहीं आया? वो बंदी बना लिया गया है तो वो अपने पिता को ईश्वर नहीं मानता हूँ । आपसी ईश्वर समझते हैं । वो इस जनपद के ईश्वर है । भगवन जनपद में बडे व्यक्ति को राजा कहते हैं था । ये बात तो महाराज मानते हैं तो वो अपने को जनपद के राजा से बडा मानते हैं । वैसे नहीं है । एक अन्य ने कह दिया उनके सेवक भगदत्त को उनकी आंखों के सामने फांसी पर लटका दिया गया और वो वो जगदीश्वर अनंदपुर में कुछ नहीं कर सके । ये बात मैंने महाराज को कही थी परन्तु वो कह रहे थे कि इसका प्रबंध हो कर रहे हैं और शीघ्र ही ब्रहमपुरी और अनंगपुर एक राज्य हो जाएंगे । लोग मुख देखते रह गए । अब आचार्यजी ने कहा राजकुमार को एक मास्क अवसर दिया गया है यदि उसने पिता कटा है ना मना जलाकर भस्म कर दिया जाएगा । आचार्जी यही अनर्थ होगा । महारानी जी को बहुत दुःख होगा तो महारानीजी को का होगी । कोई उपाय करें मैं इस विषय में कुछ नहीं कर सकता हूँ । इतना कह शुक्राचार्य ने हाथ के संकेत से लोगों को एक और हटाया और चला दिया । नगर में धूम मच गई की प्रहलाद बंदी बना लिया गया है और उसको जीवित जला देने की आज्ञा हो गई है । रहना आपकी माता को भी समाचार मिला । उसी समय पे निवास ग्रह से चलकर शुक्राचार्य के आवास पर जा पहुंची परंतु उसके यहां पहुंचने समय आचार्यजी अपने परिवार सहित यहाँ से विदा होने का विचार कर रहे थे । उनका पूर्ण परिवार रच पर बैठ चुका था और आचार्यजी गरज के अशोक समीर खडे थे । जब महारानी वहां पहुंची तो आचार्य ने आगे बढकर नमस्कार क्या पूछा हूँ क्या हो महारानीजी मैं आप के पास न्याय की मांग करने आई थी । माता जी मैं न्यायकर्ता नहीं रहा हूँ । फिर भी एक बात आपको स्मरण रखनी चाहिए इस जनपद में बलवान कि बात ही धर्म है और उस की आज्ञा का चलन ही न्याय होता है । इस कारण मैं कुछ नहीं कर सकता हूँ । अब छमा प्रार्थी मारी नहीं कर सकता हूँ । करन की मैं मंत्री पद से हटा दिया गया हूँ । साथी मैं जनपद छोड कर जा रहा हूँ । शुक्राचार्य की पत्नी और लडकी रस्में बैठी थी । आचार्य जी की एक ही लडकी थी वो भी पांच छह वर्ष की थी । हाँ और लडकी देख रही थी की महारानी जी की आंखों में आंसू बह रहे थे । उसे इस प्रकार आंसू बहाते देख माँ बेटी क्या की तरह हो गयी । आचार्यजी तृणा मुद्राएं बनाए हुए थे । महारानी को मोहन देखकर आचार्यजी ने कहा माता जी परमात्मा से प्रार्थना करिए वहीं सहायक हो सकता है । एक बार मुझे दिखाई देती है कि कहीं भगवान ने सहायता करने में देर कर दी तो आप विधवा तो होंगे ही साथ ही पुत्रहीन भी हो जाएंगे था । उस आंखों के अंधे और कानों से बहरे भगवन को कहना चाहिए शीघ्र ही सहायता भेजेंगे इतना के हैं । शुक्राचार्य सारथी के स्थान पर बैठ गया और रात को दौडाता हुआ चल दिया । महारानी ने अपने को ने सहाय पास विधवा और पुत्रहीन होने की दोनों स्थितियों से बचने के लिए आत्महत्या करने का निश्चय कर लिया । वो अपने निवास स्थान पर जा आशन लगा । बैठ कहीं और भोजन करना छोड दिया । उस समय समय पर थोडा थोडा जल लेने लगी । पहला आपके बंदी बना लिए जाने और उसके माता के अनशन का समाचार पूर्ण जनपद में और तदंतर जनपद के बाहर अन्य जनपदों में भी फैलने लगा । एक सप्ताह व्यतीत होते होते हैं ये बात हिरण्यकश्यपु के प्रासाद ने भी चर्चा का विषय बन गई । हिरणकश्यप का विचार था शुक्राचार्य उसके कह देने पर भी उसे मंत्रीपद छोड देना चाहिए छोडकर नहीं जाएगा । कम से कम जाने से पहले वो उसे एक बार उन्होंने अपने आदेश पर विचार करने के लिए रहेगा तो ऐसा नहीं हुआ । मोहम्मपुर के शासक को इस पर विश्व में था । दुश्मनों को जभी विजिट हुआ कि आचार्य नगर छोड चला गया है तो वह बहुत प्रसन्न हुई । उसने इस समाचार के विख्यात होते ही महाराज से प्रस्ताव करना आरंभ कर दिया कि मंत्री पद पर उसका भाई चंद्र नियुक्त किया जाए । चंद्र एक सेनानायक था और शूरवीर था और राजा का भक्त था । इस कारण उस पर भरोसा किया जा सकता था परन्तु प्रहलाद के बंदी बनाए जाने और उसकी माता के अन्य छोड प्राण त्यागने के प्रयास ने नगर भर में भारी असंतोष रुक मना कर दिया था । ऐसे समान्य सुषुम्ना नहीं भाई को मंत्री बनाने के प्रस्ताव पर बल देना प्रांत कर दिया ऍम था हूँ मैं अभी भी आगया कर रहा हूँ कि आचार्यजी वापस आ जाएंगे । उनको मेरे जैसा उदार नरेश तो नहीं मिलेगा परन्तु वो नहीं लौटेगा । मुझे विश्वस्त सूत्रों से ज्ञात हुआ है कि वह कामभोज क्षेत्र में असर राज्य का मंत्री बनने चला गया है । वह इतना योग्य व्यक्ति था की संसार में वैसा दूसरा मिलना कठिन है । सुषमा ने कह दिया, मैं समझती हूँ कि आप चंद्र को इस पद पर नियुक्त कर लेंगे । उसमें सब प्रकार के कई ऐसे गुण हैं जिससे वह इस पद की सर्व था क्योंकि है मशहूर है और निर्णयात्मक बुद्धि रखता है । मुझे यह है कि यदि प्रहलाद की महत्व कुछ हो गया तो मेरा जीवित रहना कठिन हो जाएगा क्योंकि उसके जीवन और आपके जीवन में परस्पर क्या संबंध है? मैं जीवन की बात नहीं कह रहा हूँ । मेरा अभिप्राय प्रजा के रोष से है । इसी कारण मैं चंद्र की नियुक्ति की बात कह रही हूँ । वो जिस प्रकार लाठी से भेडे हाँ की जाती है, प्रजा को सीधा मार्ग दिखाता होगा । आखिरकार हिरणकश्यप मान गया और उसने अगले दिन राज्यसभा में घोषणा कर दी है । आचार्य शुक्र मंत्री का कार्य छोडकर कहीं वनों में चले गए हैं था । यह आवश्यक हो गया है कि उनके स्थान पर किसी क्योंकि व्यक्ति को मंत्री पद पर नियुक्त किया जाए । हम सेना चंद्र को इस पद पर नियुक्त करते हैं । हम चाहते हैं कि वे प्रजाति के साथ वैसा ही न्याय का व्यवहार करें, जैसा आचार्य जी क्या करते थे और प्रचार गण भी इसको वैसा ही मान करें जैसा कि आचार्यजी का करते थे । चंद्र एक अभिज्ञात व्यक्ति था । केवल उसके अधीन सैनिक ही उसे जानते थे और उनकी दृष्टि में भी वह अति क्रूर और मूर्ख व्यक्ति था । परिणाम ये हुआ कि जो सैनिक प्रहलाद की माता के कारण असंतुष्ट थे । वह विचार करने लगे कि इस मूर्ख व्यक्ति के अन्याय और अत्याचार से कैसे मुक्ति पाई जा सकती है । प्रहलाद की माता के अनशन की गूंज जनपद से बाहर भी पहुंची थी और ब्रह्मपुरी के लोगों को कुछ ऐसा अनुभव होने लगा था । जनपद के देहातों के अथवा बाहर के जनपदों के लोग ब्रह्मपुरी में घूमते फिरते दिखाई देने लगे हैं । चंद्र को भी इस बात की सूचना मिली तो उसने नगर में चलते फिरते लोगों से पूछताछ आरंभ कर दी । नगर मार्गों पर सैनिक खडे कर दिए गए और वे किसी भी मार्ग पर चलते व्यक्ति को रोककर पूछ लेते हैं उसका नाम क्या है, उसका धाम कहा है । इसका पत्र है और किस काम से घूम रहा है । इससे असंतोष और भी अधिक बढने लगा । कभी कभी किसी स्त्री पर भी सम देकर उसे रोक दिया जाता हूँ तो वहीं सैनिकों से लड पडती है नगर में नित्य झगडे होने लगे । सैनिक किस प्रकार के कार्य से ऊबकर कार्य छोड विद्रोह की बातें विचार करने लगे थे । चंद्र को भी सूचना मिल रही थी उसकी वह पूछताछ की नीति असफल हो रही है । एक दिन एक अपरचित व्यक्ति ने एक सैनिक से पूछ लिया भत्र कहाँ के रहने वाले हो अनंगपुर के यहाँ किस लिए आए हो? नहीं बताऊंगा ये तो बताना पडेगा । जनपद के लोग अनंतपुर जनपद में आते हैं तो उनसे इस प्रकार की बातें पूछी नहीं जाती है परंतु यहाँ विशेष परिस्थिति उत्पन्न हो चुकी है या परिस्थिति उत्पन्न हो गई है । ये की एक महारानी ने अनशन किया हुआ है तो राजा ने उसके पुत्र को बंदी बनाया हुआ है । उसमें क्या प्राप्त किया है वो मैं जानता नहीं तो मैं तुमको नहीं बताऊंगा कि मैं यहाँ किस अर्थ आया हूँ । मैं तुम्हें पकडकर मंत्री के पास ले चलूँगा । पकडने की आवश्यकता नहीं मैं स्वयं चलने को तैयार हूँ । जब वह विवाद हो रहा था तो मार्ग पर चलते फिरते लोग एकत्र होने लगे । इस एकत्रित होने वालों में अधिकांश भ्रमों पर के नागरिक थे तो कुछ प्रदेशी भी थी । इन परदेशियों में से एक ने कहा महाराज ने नवीन मंत्री की नियुक्ति के समय ये कहा था पूर्व मंत्री की शुक्राचार्य जैसा ही व्यवहार होगा । उनके काल में पूछताछ नहीं होती थी, हाँ नहीं होती थी । सब लोग एकत्र बोल पडे । इस पर सैनिक बिगड गया और बोला ये बात आपको मंत्री अथवा महाराज से करनी चाहिए । मैं अपने स्वामी की आज्ञा का पालन ही कर रहा हूँ । इस पर एक बोल उठा तो चलो अपने मंत्री अथवा राजा के पास । इस प्रकार सैनिक उस व्यक्ति को वहाँ से पकडा राज्य प्रसाद की और चल पडा । सैनिक भी प्रजा द्वारा दी गई इस अवज्ञा से असंतुष्ट थे था । एक बार निर्णय हो जाए की पूछताछ होगी अथवा नहीं होगी इस कारण उसने इस व्यक्ति को राज्य प्रसाद में ही ले जाना उचित समझा । इन दिनों चंद्र भी अपना कार्य राज्य प्रसाद नहीं किया करता था । घटना वश चंद्र और हिरणकश्यप हो उस समय विचार विमर्श कर रहे थे जब प्रजा की एक भीड उस सैनिक के पास राज्य प्रसाद के बाहर आ पहुंची । नगर में किसी ने सूचना दे दी की पहली बात की हत्या होने वाली है । इस से पूरन नगर ही राज्य प्रसाद की और उन्होंने पडा । सैनिक ने भीतर सूचना भेज दी की वो एक विशेष व्यक्ति को पकडकर लाया है जो अपने विषय में जानकारी महाराज को ही देना चाहता है और उसके साथ बहुत से लोग वहां एकत्रित हो गए हैं । लोग महाराज के दर्शन करना चाहते हैं । राज्यभवन का प्रांगण भीड से खचाखच भर गया था और अभी अन्य लोग भी आ रहे थे । चंद्र ने आज्ञा दी सब लोग तो भीतर नहीं आ सकते हैं । इस कारण कुछ प्रमुख व्यक्ति ही भीतर आकर बता सकते हैं कि वे क्यों आए हैं सैनिक उस व्यक्ति को जिसे वह बंदी बना कर लाया था, साथ लेकर भीतर जाने लगा । उसके साथ एक अन्य व्यक्ति भी चल पडा । फॅसने पूछा हम इसलिए चल रहे हूँ मैं प्रजा के प्रतिनिधि के रूप में चल रहा हूँ । नाम ये भी डर चलकर बताऊंगा सैनिक कोई व्यवस्था की मंत्री ने कुछ प्रमुख व्यक्तियों को भी भीतर आने की स्वीकृति दी है । अतः है उस व्यक्ति को भी मना नहीं कर सकता । राज्य प्रसाद के एक विशाल आगार ने हिरण कश्यप बैठा मंत्री से परामर्श कर रहा था । सैनिक दोनों नागरिकों को लेकर भीतर जा पहुंचा हूँ । मंत्री ने प्रश्न पूछा तो इस प्रयोजन से आए हो पकडकर लाए व्यक्ति ने कहा कि सैनिक मुझे यहाँ अकारण प्रकट कर रहा है इसलिए पता लाए हो मंत्री ने सैनिक से पूछा, परन्तु तीसरे व्यक्ति ने सैनिक के कुछ कहने से पूर्व ही कह दिया व्यक्ति अपने यहाँ आने के कारण को बताना नहीं चाहता हूँ । इस पर हिरण्यकश्यपु पूछ लिया तो हम कौन हूँ? मैं प्रजा का नेता हूँ । उनको पिछले नेता बनाया है । नेता बनाए नहीं जाते हैं । नेता स्वयं बना करते हैं । बाहर खडी भीड को देख लें । मैं उनकी बात कहने आया हूँ । इस कारण मैं उनका नेता हूँ । राज्य भवन के प्रांगण में एकत्रित भीड का हो हल्ला भीतर भी सुनाई दे रहा था । इस कारण प्रमाण की आवश्यकता अनुभव नहीं हुई है । काम तो हमारी प्रजा क्या चाहती है? महाराज ने कुछ नम्रता से पूछ लिया । उसने स्वनियुक्त नेता के आने से पूर्व सब बात पर विचार किया गया और वह उस बात को पूर्ण करने से पहले किसी प्रकार का प्रजा के साथ झगडा नहीं करना चाहता था । नेता बने व्यक्ति ने कहा नगर में चलते फिरते नागरिकों से पूछताछ की जाती है । अरे कौन है, कहाँ से आए हैं और उनका क्या कार्य है? विशनगर में ये पहले इस नगर में कभी नहीं हुआ था । इस कारण असंतुष्ट भीड बाहर इस आज्ञा को वापस लेने के लिए कहने आई है । पर हम तो ये आज्ञा एक विशेष प्रयोजन से की गई है तो वह प्रयोजन ही बता दिया जाए । राजा को विवश नहीं किया जा सकता है कि वह सब कुछ प्रजा आपको बता दें । देखिए ऍम आपका पुत्र प्रहलाद कहता था कि सब नागरिक एक समान है । सबके साथ न्याय होगा । इस कारण हम इस नियम का पालन चाहते हैं परन्तु में अभी राजा नहीं बना । इस कारण उसको नगर में व्यवस्था देने का अधिकार नहीं । प्रजा ने उसको राजा बनाया है । कब? आज एक सप्ताह से ऊपर की बात है । आचार्य शुक्ला जी अभी यहीं पर थे । तब विद्वानों की एक सभा ने राज कुमार को यहाँ का युवराज नियुक्त किया गया था और महाराज को राज्य के कार्यभार से निवृत करने का निर्णय लिया गया था । परंतु हमने विद्वत सभा की बात कभी नहीं मानी । विद्वानों की बात न मानने का परिणाम अच्छा नहीं हो सकता । हमने निश्चय किया है की प्रहलाद को बुलाकर उसे हम अपने अधीन रहने की प्रेरणा दें । यदि वो मान जाए तो उसे मुक्त किया जा सकता है अन्यथा उसे मैं युदंड दिया जा सकता है । तो महाराज उसे पूछे की वो क्या चाहता है । प्रजा भी इस बात को जानने के लिए बेहद उत्सुक है । हिरणकश्यप अपने विचार किया और ताली बजाई । दो सुभट भीतर आ गए । उनको आज्ञा दे दी गई की तरह रात को यहाँ लाया जाए । सुबह तक है और पहला रात को चलाते हुए ले आए । पहला जननेता को देख मुस्कराया । ऋण कष्टपूर्ण उसका मुस्कराता देख पूछ लिया इसलिए मुस्कराये वो बालक पिताजी आपने मुझे इन के कहने पर बुलाया है । जानते हो जी तुरंत ये अपना परिचय सुन लेंगे । ये तो कहता है कि ये जननेता है । हाँ जी कहते हैं छोडो इस बालक को पता हूँ हमारा प्रस्ताव स्वीकार है अथवा नहीं? जननेता ने कहा क्या तो नहीं जानते हैं जो कुछ आपकी बात जानता हूँ, उसे अस्वीकार कर चुका हूँ । कोई अन्य और बात हूँ तो बताइए देखो मैंने एक बात विचार की है मैं इस जनपद का ईश्वर मेरे इस जनपद में अधिकार नहीं है तो तुम लोग ईश्वर को देते हूँ । रही बात अन्य जनपदों की वो यदि तुम इतना मान जाऊं कि हम पूर्ण पृथ्वी को विजय कर उसके ईश्वर बनने का यत्न करेंगे । पृथ्वी की बात पिताजी पृथ्वी वाले जाने मुझे उससे कोई प्रयोजन नहीं । मैं ब्रह्मपुर में रहता हूँ और वहाँ रहता हुआ भी मैं आप को ये अधिकार नहीं दे सकता हूँ जो ईश्वर को देता हूँ । मैं सर्वशक्तिमान है, सर्वज्ञ है, सर्वव्यापक है और सबके कर्मफल को देने वाला है । बस बस कुछ विचार करो । तुम क्या कह रहे हो तुम्हारे कर्मों का फल देने वाला मैं हूँ वो नहीं है और पिताजी आप तो उसकी इच्छा के बिना एक दिन का भी नहीं तोड सकते । देने का अरे मूर्ख बालक हमने तुम को मृत्युदंड दिया है और तो मैं बुलाया है । यदि तुम दृष्टता के लिए छमा मांगों तो हम दंड वापस ले सकते हैं । अन्यथा प्रहलाद ने पिता को चुप होते देखकर पूछा हाँ हाँ, अन्यथा जी बताइए तो तुमको मृत्यु से भय नहीं लगता । पिता जी आप मुझे मार नहीं सकते । आप अपने पुत्र की हत्या कर सकते हैं परन्तु आप नहीं जानते की आपके पुत्र के शरीर में एक दिन जीवात्मा है । मैं वो हूँ और जीवात्मा मरता नहीं उसे कोई मार नहीं सकता हूँ । इस कारण आप मेरी हत्या नहीं कर सकते हैं । बहुत दिन हो गए हो क्या आरोप ठीक नहीं । पिता जी मैं वास्तविक ज्ञान को जान उसे हृदयंगम कर चुका हूँ । वो दिखता नहीं है वो तो ज्ञानवान होना है तो तुम नहीं मानोगी । आपकी मानने योग्य बात मान रहा हूँ । मानने योग्य और न मानने योग्य का निर्णय तुम कर रहे हो ये धर्मशास्त्र कहता है पिता में है कि स्मृति शास्त्र में है । लिखा है सनातन धर्मों का पाल सबके लिए आवश्यक है । राजा रंक वाला, वृद्ध स्त्री पुरुष सभ्य धर्म का पालन करें और धर्मों में से बहुत से हैं जिनका उल्लंघन कर रहे हैं । इसी कारण जनपद के विद्वानों ने यह निश्चय किया है क्या आप राज्य कार्यभार के अयोग्य हैं? आपने इस जनपद की एक समय तक सेवा की है । इस कारण आपको सुख ऍम शांति से जीवन व्यतीत करने की स्वीकृति दी है । रात के राज्य कार को अब मैं चलाऊंगा । अरे दुष्ट हम अपने पिता राजा और ईश्वर के विरुद्ध मित्र हो करते हो जाओ । नाटक में हमारी आशा है कि तुम्हें भस्म कर दिया जाए । हिरण का शपूर सुबह को आज्ञा देने के लिए रोड में हाथ उठा कहने ही लगा था । जननेता ने हिरण का शब्दों का हाथ पकड लिया और घसीटकर सिंहासन से नीचे खींच लिया । ऋण कश्यप के मुख से निकला पकडो पकडो परन्तु वो आगे कुछ नहीं कह सका । जननेता का एक मुक्का उसके मुख पर लगा । मुक्खा वज्र के समान कठोर था और उसके मुख से बात नहीं निकल सकती है । उसके सिर को चक्कर आने लगे और वह मुख्य के वेग से भूमि पर लुढक गया । चंद्र जननेता की और आपका परन्तु जननेता की एक बात के प्रहार से ही वह दस पन्द्रह दूर लुढक गया । सामने खडा सुबह भयभीत राज्यभवन से बाहर की और चिल्लाता हुआ आया बाहर प्रांगण में खडी प्रज्ञा की भीड को पुकार पुकारकर कहने लगा बचाओ बचाओ महाराजकुमार डाला को नियंत्रण में रखने के लिए राज्यभवन के सुबह वहाँ खडे थे भीड का विचार छोड राज्य प्रसाद के भीतर भागे और भीड उनके भीतर को भागते थे स्वयं भी राज्यभवन के भीतर की और लडकी परन्तु सुबह और भीड के भीतर जाने से पूर्व हिरण्यकश्यपु भूमि पर मृत पडा था । उसका पेट भाडा जा चुका था और भूमि रक्त से लगभग हो चुकी थी । सुबह भैया भयंकर दर्शक देख सब रह गए । वो जननेता हिरण कश्यप के शव के समीप खडा हाथ के संकेत से सुबह तो और भीड को दूर रहने को कहते हुए बोला हम सब बाहर चलो । इस समय भीड में से किसी ने खोज कर दिया नरसिंह हरी की और भीतर सुबह बाहर की प्रजा ने घोष कर दिया जय हो सबका इस घोषणा निस्तेज हो अपनी जान बचाने के लिए अपने आगारों की और भाडी वहाँ उनके स्टीवर्ड रहते थे । उनके मन में भय समझ आ गया कि वह नागरिकों की सुंदर लडकियों, बहूं और स्त्रियों को हरकर महाराज के लिए लाया करते थे और इस समय भीड अपने साथ अत्याचार का प्रतिकार लेने का जब भी कर सकती है । इस भय से प्रतिशत भवन के पिछवाडे में आपने आगारों की और अपने बाल बच्चों की रक्षा के लिए भागे वो जननेता जिसका नर्सिंग हरी के नाम से जयघोष किया था । भीड को राज्यभवन से बाहर चलने के लिए कहने लगा था । भीड हर्षोल्लास ऍम ऋण कश्यप के शव को चीर फाड कर अपने मन का रोष निकालना चाहती थी परन्तु उस जननेता के संकेत और वाणी में बाल और प्रभाव था । उसके संकेत पर लोग प्रसाद से बाहर निकल जाने लगे । चंद्र जब आपने मारे जाने की बारी समझकर जननेता के पांव पर अपना सिर रखे पडा था । जननेता ने पांव की ठोकर से उसे दूर धकेलते हुए कहा उठाओ और राजमुकुट लाओ नवीन राजा का राज्याभिषेक होगा । चंद इससे साम तो ना पाकर उठा और भवन के रत्नाकार में चला गया । हिरणकश्यप की मृत्यु का समाचार भवन के भीतर और बाहर सर्वत्र फैल रहा था । बाहर प्रांगण में लोग नर्सिंग हरी की जय जयकार कर रहे थे और भवन के भीतर स्त्रियों के रोने दे होने से हाहाकार मचा था । भीतर के वो लोग जो राज्य परिवर्तन में लाभ समझ रहे थे, भवन से निकल प्रांगण में नागरिकों में जा खडे हुए थे । सुबह अपने गनवेश उतारकर सामान्य नागरिकों के पहनावे में अपने बाल बच्चों को ले भवन के पिछवाडे के द्वार से भाग रहे थे । चंद्र राजमुकुट लेकर आया तो नर्सिंग हरी ने उसे पकड लिया और बाहर प्रांगण आ गया । वहाँ ऊंचे स्थान पर वो खडा हो गया । उसने अपने समीप पहला रात को खडा कर लिया और प्रजा को शांत रहने का संकेत करने लगा । जब लोग शांत हुए तो नर्सिंग हरी ने कहा इस जनपद के सर्वजन को विदित हो । मैं प्रजापति कश्यप का कनिष्ठ पुत्र विष्णु हूँ । हिरण्यकश्यपु मेरा भाई था । मेरी विमाता का पुत्र था । काम हिरणकश्यप ओके प्रजा पर अत्याचार का समाचार पिता है के पास पहुंचा तो उन का आदेश हुआ कि मैं हिरणकश्यप को सन्मार्ग दिखाऊँ मैं आया । यहाँ आकर मैंने भाई के व्यवहार का ज्ञान प्राप्त किया । जनपद के प्रमुख विद्वानों की सभा बुलाई और फिर भाई के पुत्र प्रहलाद कुमार के विचार सुनाई । विद्वानों की सभा ने यह निश्चय किया किरण कश्यप को कहा जाए वो राजगद्दी छोड रहे और स्वेच्छा से आपने योग्य पुत्र प्रहलाद को राज्य सौ वन को चला जाए । ये संदेश प्रहलाद के द्वारा हिरण्यकश्यप को भेज दिया गया । संदेश के प्रतिकार ने उसने पहला को बंदी बना लिया और से जीवित भस्म कर देने की आज्ञा दी । मेरे पास कोई भी उपाय नहीं रह सकता था की मैं हिरण कश्यप को मार्ग से पृथक कर दूँ । सलवार ये देख नहीं सका । इस कारण उसको मार्ग से हटा देना ही उचित प्रतीत हुआ है । मैं जानता हूँ कि वह मुझसे युद्ध नहीं कर सकता । व्यसनों में डूबा हुआ व्यक्ति किसी भी चरित्रवान के सामने खडा नहीं हो सकता है । परंतु मैं उसको अवसर देना चाहता था कि वह सन्मार्ग स्वीकार कर ले । अब हिरण कश्यप का देहांत हो गया है तो अपने पापों का फल भोगने यम धाम को जा चुका है । इस कारण जनपद के सुप्रबंधन के लिए यहाँ के विद्वानों ने प्रहलाद को यहाँ का शासक नहीं करने का निश्चय किया है । अतः मैं प्रहलादका राज्यभिषेक करता हूँ और इस बालक को वो सम्मति देता हूँ कि वे धर्म के अनुसार वहाँ का राज्य चलाये । धर्म और न्याय के मार्ग में अपना पराया सब सामान होना चाहिए । यहाँ विद्वानों का आदेश पालन होगा और सब चरित्र तथा परिश्रम ियों का मान होगा । मैं रात को इस जनपद का शासक घोषित करता हूँ । इतना कहकर विष्णु ने प्रहलाद के सिर पर राजमुकुट रख कर काम काम से उसको तिलक लगा दिया । इसके उपरांत विष्णु ने अपने सफल प्रभारी और गंभीर स्वर में घोषणा महाराज पहला की जय हो सहस्त्रों उपस्तिथ जनों ने एक स्वर में इसके समर्थन में ऊंचे स्वर में कहा महाराज प्रहलाद की जय हो तो तो आपने सुना । साहित्यकार गुरुदत् प्रतिनिधि रचना प्रभात इलाका तीसरा परिच्छेद कुकू ऍम पर सोने जो मनचाहे

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