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नाज़ुक बंधन भाग - 01

हूँ, चल रहे हैं कोई ऍम किताब का नाम है ना जो बंदा इससे लिखा है पूर्णिमा के इंडिया ने आर जी आशीष चैन की आवाज में फॅस उनहीं चुम्मन चाहे सुहागरात शब्द सौभाग्य रात शब से बना है तो विभाग के बाद प्रथम मिलन की प्रथम रात सबके लिए तो सौभाग्य लेकर नहीं आती । अमिताभ के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ । रूस फॅस वाले रूम फ्रेशनर से पूरा कमरा महक रहा था । कमरे में प्रवेश करते ही ऐसा आभास हो रहा था मानो इस महत्व माहौल में कोई बेसब्री से उसका इंतजार कर रहा है । तो उसका ये सोचना तब गलत साबित हुआ जब इंतजार करते करते खडी ने रात के दो बजा दिए तो उस पैसे का यानी अनिल का कहीं पता नहीं था । इसके साथ को कल अपने पिता के घर से विदा होकर इस नई जगह में आ गई थी । वहाँ कितना हुई थी उसे विदा करते समय पिता की छाती भी कम ही पडती थी । अपनी पहली संतान को विदा करते समय अपने जिगर के टुकडे को अपने से दूर करते समय पिता की आंखें नम हो गई थी । महीनों से माँ पिताजी दोनों विभाग की तैयारियों में व्यस्त हैं । पिताजी ने तो पिछले दो वर्षों से चयन ही नहीं लिया । वर्क की खोज में आज यहाँ गए तो कल वहाँ दुर्लभ सबसे निकला हुआ तुलना शब्द सार्थक ही है तो बोला प्राप्त करना सचमुच दुर्लभ है । लेकिन पति हमेशा ही तो श्रेष्ठ नहीं होता । पति अनिल के बारे में क्या कहें? रात के लगभग दस बजे की तो वह स्त्रियों द्वारा इस कमरे में भेज दी गई थी । उस समय तक तो वो भी उसके साथ वैवाहिक रस्म विवाह संपन्न कर रहा था । आने से कुछ दिन पहले ही दोनों ने साथ साथ सांस के पहुंच हुए थे । सांस ने दोनों की पीठ पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया था । फिर वो अचानक कहाँ चला गया? लगभग ग्यारह बजे उसकी ननद रीमा मेवों के साथ दूध का गिलास लेकर आई थी और कह गई थी दूध पीकर तुम सो जाओ हूँ । अनिल को किसी जरूरी काम से बाहर जाना पडा । हो सकता है वो काफी देर से लौटे । बोलते बोलते ना जाने क्यों रीमा कमरा सी रही थी । शायद उन्हें ये बताते हुए संकोच हो रहा हो तो कोई नहीं । बारंबार सोलह पालन की और देखकर उसकी चिंता बढने लगी । उसकी एक नजर दरवाजे पर और दूसरी खडी पडती है । हर आहट पर उसे अनिल के आने का आभास होता । अगर सारी रात लाने लाया ना उसकी कोई सूचना तो बस यही सोचती रही । कैसा क्या जरूरी काम आ गया जो पहली रात को ही उसने पत्नी की उपेक्षा कर दी । क्या उस काम के लिए घर का कोई और सदस्य नहीं जा सकता था? जाना भी था तो क्या उसे बताकर नहीं जा सकता था? क्या उसके पास मोबाइल फोन नहीं था? जिस तरह से सूचित कर सके, कम से कम उसे आज तो मिल कर जाता । कैसी अजीब स्थिति है विभाग की पहली रात सब लोगों के सामने इसके साथ उसका प्रभाव हुआ । वहीं उसके लिए अभी तक अनजान सब बना हुआ है । विभाग के बाद कार में आते समय सभी नंदोई ने कोल्ड्रिंग खरीदने के बहाने जानबूझ कर ही तो रुकवाई थी । आप दोनों के लिए गोल्डन चार्ज कहकर वह ड्राइवर के साथ शॉपिंग कॉम्प्लेक्स की ओर चले गए थे । उस समय भी अनिल चुप चाप बैठा रहा था । एक बार भी उससे बात करने की कोशिश नहीं की बल्कि उसकी निगाहें जैसे किसी को ढूंढ रही थीं । वो उससे सटकर बैठने की बजाय दूर ही खिसककर बैठा था । उसी समय एक बार उसका हृदय हाहाकार कर उठा था । कैसा संकोची व्यक्ति है । ये अपने ब्याहता पत्नी से बात करने में भी जीजा हूँ । पर जी जब का भी तो कोई भाव उसके चेहरे पर नहीं था । वो अपनी दुल्हन की छुईमुई भूमिका के बीच भी नजर बचाकर उसकी और देख लेती थी । वो भी उसकी और देख लेता तो उसकी आंखों में न तो प्रेम का भाव था और नहीं मेलन की उत्सुकता । उन लोगों के लौट आने तक दोनों चुप चाप बैठे रहे तो मन ही मन कुर्ती रही और होने जाने क्या सोचता रहा । मर्यादाओं को नजरअंदाज कर वहीं उससे बात करेंगे । ऐसा भी वो नहीं कर पाए । कहीं जानबूझ कर दो उसकी उपेक्षा नहीं की जा रही है । पर ऐसा क्यों? क्या होगा? अगर अनिल सुशिक्षित और बहुराष्ट्रीय कंपनी में अफसर है तो वो खुद भी तो बीएससी पास और ग्रुप गुण संपन्न है । किसी तरह उसने अपने मन को समझाया नहीं तो जरूरी काम यहाँ पडा होगा बाहर जाने का । गाडी की सोया अपनी रफ्तार से आगे बढती जा रही थी । आंखों में चिंता के साथ नींद भी उतर आई थी । अनिल का इंतजार करते करते उन ढालसिंह वहीं जमीन पर सूट किसके सहारे बैठी रही । घडी ने फिर सुबह के चार पांच बजा दिए । उसकी आंखों में नमी सेहराई कि सौभाग्य की रात । क्या उसके दुर्भाग्य की शुरुआत हैं? जिस पुरुष के साथ उसे सारा जीवन बिताना है, उसका मूवी तो नहीं देख पाई वो ठीक से दूसरी रात में भी वो अकेली ही रहे हैं । पर कितना ही था कि कमरा पहले की तरह नहीं नहीं रहा था । ये भी अंतर था की वह जमीन पर बैठने की बजाय डबल बेड पर लेट गई थी । आधी रात तक आज भी उसे नहीं नहीं आई थी । वो अपने वर्तमान के संबंध में सोच रही थी । क्या ये वर्तमान योगी भूत बन जाएगा? दिनभर एक रहस्य का पर्दा उसके चारों और बना रहा हूँ । हर कोई उसे आश्चर्य भरी नजरों से देख रहा था । उन नजरों में कभी उससे सहानुभूति का भाव दिखाई देता तो कभी जंग का कभी लगता की नजरे उसका उपहास उडा रही हैं । तो कभी देखने वाला स्वयं अपराधी सडता । सबसे ज्यादा अपराध बहुत भरी नजर तो सांस गंगा देवी की थी । वो जब भी उसके पास आती सहमी सकुचाई और कमरा इसे लगती है रात को कमरे में छोडने भी तो आज वो ही आई थी । वो जब जमीन पर बैठने लगी तो बोली नहीं नहीं, बहुत तो बहत परसो जा दरवाजा अंदर से बंद कर ले क्या है कि वो नहीं आएंगे? उसने पूछना चाहता पर कुछ नहीं भाई मुझसे चाहे उसने प्रश्न पूछा हो और नजर नहीं शायद पूछ लिया था । इसीलिए सांस बोली बडा सिटी है । वो अब चला गया है तो शायद आज भी नहीं आएगा । कहाँ गए हैं तो पूछना चाहती थी पर पूछ नहीं पाई मुझसे । चाहे उसने प्रश्न पूछा हो, पर नजर नहीं शायद पूछ लिया था इसीलिए सांस बोली होती है । वो अब चला गया है तो शायद आज नहीं आएगा कहाँ गए हैं को पूछना चाहती थी तो सास क्या सहायता की नजर के सामने उस की नजर भी झुक गई । नहीं पूछ पाई तू चिंता ना कर बहु जो कुछ होगा, अच्छा ही होगा । कहते कहते साथ चली गई । उसने दरवाजा बंद किया और बैठ पर जा गिरी । किसकी मंगलकामना कर गई है सास उसकी क्या अनिल की? किसका क्या अनिष्ठ हुआ या होने वाला है? को समझ नहीं पाई । क्या नए जीवन का शुरुआती सफर ही कांटों से भरा है । किधर जाना है उसे? करना क्या है तो कुछ भी तो नहीं जानती । सर की सारी नसें दर्द से बोझिल हो रही थी । पिताजी तो कहते थे कि अनिल बहुत सीधा है । कहता है कि मेरे घर के लोगों ने लडकी पसंद कर ली है तो फिर मुझे भी पसंद आई जाएगी । मैं देखने नहीं जाऊंगा । पिताजी उसकी तारीफों के पुल बांधते हुए कह रहे थे आजकल कहाँ मिलते हैं इतनी सीधे? लडके दो दिनों से जो कुछ बर्दाश्त कर रही है वो भी अनिल का सीधापन है । उसका शिक्षित होना, अच्छी कंपनी में काम करना और स्मार्ट दिखना सीधेपन का प्रतीक है । घर में तो वो सब से बातें करता रहता है । दिन भर तो उसने यही देखा है । कभी वह विभाग में आई अपने रिश्ते की भविष्य मसाज करता है तो कभी बहनों से गप्पबाजी केवल उसी से बात करने का समय उसके पास नहीं है । नमिता को लगा मानव वो किसी रहस्य के जाल में पहुँच गयी है । इससे निकलने का कोई रास्ता नहीं दिखाई देता है । पिछले कई रातों से न सो पाने के कारण भयंकर सर दर्द के बावजूद आंखों में नींद उतरने लगी थी । पारंपरिक रस्मों को पूरा करने के लिए विवाह से पहले की रात तो चाहते हुए ही देती थी और विभाग के बाद की पहली रात उसके इंतजार में व्याकुल से बीत गई । अकी हारी बल्कि आखिर कब तक सब्र कर दी । बिना देरी किए उन्होंने मीन का दामन थाम लिया । विवाह में आये मेहमानों के भी धीरे धीरे कम होती जा रही थी । तीसरे दिन शाम तक घर लगभग खाली सा हो गया था । दिन के वक्त आज से पहली बार अकेली बैठने का अवसर मिला था । जाते जाते रीमा ने भी की पडी हथेलियों पर फिर से मेंहदी रचा दी थी । दाहिनी हथेली के मेहंदी पहले लगी थी इसीलिए उस पर हंगा गया था और उसे उतार भी दिया गया था । पर पानी हथेली की महंगी अभी ठीक से नहीं चुकी थी । वो बॉलकनी में बैठी अपनी मेहंदी के सुर्ख लाल रंग को देख रही थी । कहते हैं इसके हाथों में मेहंदी का रंग गहरा आता है । उसे पति का ब्रेन भी कह रही मिलता है । और क्या उसके संबंध में यह उक्ति सही उतर रही है या उतरे की मायके वापस जाने के बाद सखियाँ सुहागरात का हाल पूछेंगे तो वह क्या कहेगी? उनकी छेडछाड और जो हम लोगों का क्या जवाब होगा उसके पास खामोशी या फिर बनावटी हंसी । अभी वहाँ जाने में भी दो दिन बाकी है । कैसे कटेंगे ये दो दिन? दिनभर मूवी देखने वाली महिलाओं से घिरी रहने पर उसे मन ही मन खीझ होती थी पर समय भी तो कर जाता था । अब तो हर पल भारी हो रहा था । महिला के नाम पर एक साथ ही तो घर में बच्ची थी । वो भी काम में व्यस्त थी । बिहार शादी का काम भी तो काम नहीं होता । नमिता ने भी काम में हाथ बटाना चाहा था लेकिन सांस ने इंकार कर लिया तो अभी नहीं बहुत है । क्या काम करेगी । जहाँ बच्चा नहीं बहुत कुर्सी पर बैठे ही अच्छी लगती है और अभी तो तेरे हाथों में मेहंदी का रंग भी नहीं उतरा है । कहते कहते न जा नहीं तो वो संकुचित से हो रही थी । सांस के आदेश का पालन करते हुए नमिता बॉल करी में पडी कुर्सी पर ही बैठी रही । पर उसे लग रहा था जैसे किसी ने उसके हाथ पांव बांधकर उसे कैद में डाल दिया हो । मन में अनेक सवाल उलझन पैदा कर रहे थे । क्या वह बार्बी डॉल की तरह निजी कोरिया है या किसी शुरू में शोपीस है? बचाने कैसे ये पूरी भरा समय व्यतीत होगा हूँ । कल तो पिताजी लेने आ ही जायेंगे । साथ में छोटा भाई भी आएगा । पीयूष इतना लम्बा हो गया है वो कॉलेज में प्रवेश के बाद इतनी बातें बनाना भी सीखा है । कल उसके आने के बाद तो मन लग ही जाएगा और परसों यहाँ से चले जाना है । उसके कुछ राहत की सांस ली करेंगे कि कौन सामने से गुजरा नहीं । पीयूष कल के बदले आज ही तो नहीं आ गया । नमिता का मन उल्लास से भर गया तो दूसरे ही झंड उसकी समझ में आ गया कि कमरे की और जाने वाला व्यक्ति पीयूष नहीं, उसका पति अनिल है । उसे कपकपी हो गई । बात से गुजरते हुए पति ने एक बार भी उसकी और देखा तक नहीं सर, क्या अपराध हो गया है उससे? उसका मन रोष से भर गया । उठ खडी हुई उसके कदम कमरे की और अपने आप ही बढ गए । बाहर से ही उसने झांककर देखा । अनिल टाइम बांध रहा था तो आज भी कहीं जाने की तैयारी है? नहीं नहीं, रोज रोज ही सब नहीं होगा । आखिर कब तक अपमानित होती रहेगी । वो अगले ही पाॅल के सामने जा खडी हुई । उसकी आंखें चल रही थी क्या आज क्या बाहर जा रहे हैं वो धीरे से बोली हूँ कहाँ वो उपहासपूर्ण ढंग से ऐसा अच्छा ये भी नहीं मालूम । नमिता ने आश्चर्य भरी आंखों से उसके और देखते हुए इंकार में अपना सर हिला दिया । बोला अच्छा तो बैठ जाऊँ । मैं सब कुछ बता देता हूँ तो बैठ के कोने पर सिमट कर बैठ गई और अनिल भी बैठ के दूसरी और जा रहा था । किसी ने तो मैं कुछ नहीं बताया । उसने फिर नहीं में सिर हिलाया । मैं रोज शाम को सुविधा के घर जाया करता हूँ । मेरी जाते हैं वहीं बीती हैं । हम दोनों कॉलेज के दिनों से ही एक दूसरे को चाहते हैं । हमने जीवन भर साथ निभाने का फैसला किया है । अमिता परमाणु किसी ने पत्थरों की बौछार की हो, उसका अंतरमंत्री राहत हो गया । पत्थर की मूर्ति से भर्ती ही तक अनिल की और देखती रह गयी । उसकी आंखों में एक सवाल कर रहा था तो फिर मुझसे विवाह क्यों किया? कई और सवाल भी कह रहे थे । लेकिन अनिल ने शायद सवाल को पढ लिया तो बोला तुमसे शादी तो मुझे माँ पिता की जिसके कारण करनी पडी । उसके जीने आया कि वह कहे किसी का मन रखने के लिए । दो मिट्टी की गुडिया के साथ भी शादी की रस्म पूरी की जा सकती थी । उसके लिए जीवित व्यक्ति को दफन करने की क्या जरूरत ही तो मुस्कराया । खैर हम घबरा हूँ । मैंने तुमसे व्यवहार किया है तो मैं कभी खाने पहनने की तकलीफ नहीं होने दूंगा । उठा और जाने के लिए जूते पहनने लगा तो मन ही मन मुस्कराई था । खाने पहनने का सुखी तो सब कुछ है । एक विवाहिता के लिए अनिल चला गया । नमिता बैठ पर सेंटी बैठी रही । वो लगातार अपने मेहंदी रचे हाथों को टकटकी लगाकर देखती रही । समय नदी की धार की तरह है तो किसी के लिए नहीं रुकता । नमिता के लिए भी नहीं रोका । पिताजी और भाई पीयूष आकर उसे मायके ले गए । वहाँ बहनों और सहेलियों ने ससुराल के संबंध में तरह तरह के सवाल किए तो सभी सवालों को हूँ । मैं कह के टाइम दे रही है । उसका अन्ना पर देख कर सब उससे खींच के गए थे । शक्तियों ने कहा ये तो जीजा जी की याद में कोई हुई है । इससे तो कुछ भी पूछना बेकार है । माने निष्कर्ष निकाला फिर जल्द ही ससुराल जाना है । हम सब से दूर रहने की बात सोच सोच कर ही की उदास रहती है । उस सबको सुनती पर किसी को कुछ नहीं बताया । सच्चाई बताकर माता पिता की तकलीफ नहीं बढाना चाहती थी । और भी तो चार छोटी बहनें हैं । दो विवाह योग्य हो गई हैं । माता पिता अगर नमिता का ही झमेला लेकर बैठे रहेंगे तो अन्य बहनों का क्या होगा? पता नहीं तो बहुत दौड धूप कर उसके लिए ये घर हो जाता था तो ये सब बजाने कैसे हो गया? उसने माँ के मुंह से एक कहावत बहुत बार सुनी थी कि माँ बाप जान देते हैं, कर नहीं । माता पिता ने अपना कर्तव्य पूरा कर लिया । अपनी थी की त्रासदी उसमें ही झेलेगी । इसमें उन्हें क्यों लपेटे? दो सप्ताह बाद देवर नलिन उसे लेने आए । वहाँ पे पोस्ट हुई माँ की सुविधा हो गई । ससुराल में फिर वही पहाड जैसे दिन और सुरक्षित इरादे साफ चाहती थी कि वह सज धज कर रहे और उसी अच्छा नहीं लगता तो सास का मान रखने के लिए नववधू शेषजी रहती है । रिश्ते नाते कि महिलाएं जब भी घर आती तो उसकी सुंदरता की प्रशंसा किए बिना नहीं रहते हैं । उसका जी कोड जाता । सोचती क्या सुन्दरता ही मनुष्य का मापदंड है । अक्सर उसे अनिल के शब्द ज्यादा जाते हैं और वो उसे कभी खाने पहनने का कष्ट नहीं होने देगा । नमिता के लिए तो जीवन कार्ड खाना पहनना ही रह गया है । साथ ही बिना मूल्य की सीरीज का भी तो है । सब की सास के मना करने पर भी उस दिन भर गृहस्ती के कामों में लगी रहती है । फिर भी मन कहीं नहीं लगता था । हालांकि बहनों तथा अन्य संबंधियों से मोबाइल पर बातचीत होती रहती थी पर नमिता के लिए ठीक औपचारिकता मात्र थी । कभी कभी उसे स्वयं पर आश्चर्य होता । कितना बदल गई है वो घर में माँ के आदेशों को नजर अंदाज कर मनमानी करने वाली छोटे भाई बहनों पर हुक्म चलाने वाली सखियों पर ड्रॉप गांठने वाली वो नमिता कहाँ चली गई । उसकी जगह ये सांस की आज्ञाकारिणी बहुत कहाँ से पैदा हो गयी । उनके ज्यादा से संकेत पर ही उनकी इच्छा का हर कार्य कर डाल दी । ससुर की पसंद के अनुसार खाना पकाती, देवर की फरमाइशों के आधार पर नाश्ता बनाती, पति के कपडे आदि संभाल कर रखना, उन पर इस्त्री करना । इस अभी तो उसकी दिनचर्या था, अंग हो गया था । उससे अचानक आंधी आई, पानी बरसने लगा । तेज और तेज होता गया । घर में सब लोग चैनल कर चुके थे इसलिए वो भी जल्दी फ्री हो गई । बॉलकनी में खडी होकर बरसते पानी को निहारने लगी । अंधेरे के छोटे छोटे में गिरती हुई हमारे कितनी अच्छी लग रही थी । पर्ची बौछारों के छींटे उसके चेहरों और कपडों पर भी गिरने लगे । तभी किसी के कदमों की चाप सुनाई दी है । उसने पीछे मुडकर देखा साफ आ रही थी वह चल से सर पर आंचल रखने लगे, रहने दो बेटी उस की क्या जरूरत है । सासु के कोमल स्पर्श ने आंचल बढाते नमिता के हाथों को रोक दिया । वो पल्लू केवल कंधे पर डालकर रह गई । सांस एकदम से उसके नजदीक कहीं सांस के चेहरे पर ऐसा रहस्यमय भाव था । नमिता बस जिज्ञासा भरी नजर से उनकी और देखते रह गयी । वो धीरे से बोली हूँ आज से रोक लोग किसी को चकित होकर को छोटे हैं । अनिल को हर किसी इतने पानी में कहाँ जाएगा? उसकी समझ में कुछ नहीं आया कि वह क्या करें क्या ना करें तो मोहन खडी रही । सांसद उसका कंधा पकडकर चर्चो रहा, तेल मत करो, नहीं तो निकल जाएगा । जाओ जल्दी जाओ उनके हाथों से कमरे की ओर धकेल रहे थे लेकिन फिर भी वो खडी रही हूँ । ऐसा मौका बार बार नहीं आता । अमिता समय के अनुकूल होकर आंधी पानी को भेजा है । आज से किसी तरह ही रोक लोग फिर वो सदा के लिए तो मारा हो जाएगा तो फिर भी नहीं गई । अच्छी बेटी हो तुम तो सादा मेरा कहना मानती हो क्या आज नहीं मानोगी । कहती हुई साहब उसके वहाँ पकडकर से कमरे की ओर ले जाने लगी । उसने वहाँ छोडा ली और धीरे धीरे कमरे में चली गई । अनिल जाने के लिए लगभग तैयार हो चुका था । कपडे पहन लिए थे । अब श्रृंगार मेज के सामने खडा बालों पर कंघी दे रहा था । इस बीच कमरे में काफी फेरबदल हो गया था । दहेज का सामान अल्मारियों में सच चुका था । छुट्टी इसकी जगह पढने लिखने की मेज और कुर्सी लग गई थी तो नमिता के ससुर मनोहरलाल ने बडे दुलार से उसके लिए बनवाई थी । एक दिन जब आ जाना रिक्शे पर लगी हुई कुर्सी मेज घर पर पहुंची सास ने पूछा था ये किस लिए? मनोहर बाबू बोले थे आखिर पढी लिखी बहू आई है घर में जमीन पर बैठकर थोडे ना पडेगी लिखेगी । रूस का ताजा अखबार भी श्रम पडने के बाद नमिता के लिए भिजवा क्या करते हैं । कभी कभी अपनी व्यापार संबंधी जरूरी चिट्ठी पत्री लिखने का काम भी नमिता को सौंप देते । बहुत बराबर कुछ ना कुछ पढती लिखती रहती है । अधिक कर उन्हें अच्छा लगता था । डेवलॅप भी भाभी से मजाक करने में पीछे नहीं रहता । जब जब कुछ विशेष खाने की इच्छा होती है । आपको भाभी को सुनाते हुए माँ से कहता हमारी भावी तो दम आलू ऐसा बनाती है कि शहर के सारे हलवाई फेल हो जाए । तभी कहता, हाँ होना, कचौडियां बनाने का प्रशिक्षण देने का एक स्कूल खोलना या फिर कहता उपमा बनाने में तो भावी दक्षिण भारतीय महिलाओं को हरा सकती है । इतना सुनते ही नमिता को इस मुझे देर नहीं लगती । याद मेलन का क्या खाने का मन है और वो उसे बनाने में जुट जाती हैं । ऍम वो ही कि आडवाणी श्रृंगार, मेज आदि सामान तो उसे मायके से ही मिले थे । कमरे की दीवार में एक शिक्षा लगी आलमारी भी थी, जिससे उसे सामान रखने में सहूलियत हो गई थी । आपने पढने लिखने का सामान, पुस्तकें वो इसी अलमारी में रखती थी । पेंटिंग का सामान भी इसी अलमारी में था । कूची और कनवासी उसके खाली झडों के साथ ही थे । प्रकृति और मानव के विभिन्न रूपों की उस अलमारी के शीशों के पीछे से झांका करते थे । उन्हें देख कर एक दिन मिलने भी मुस्कराकर कहा था, पेंटिंग तो तुम अच्छी बना लेती हो । उस दबी से मुस्कान से नहीं तर समझ नहीं पाई कि उसमें तस्वीरों का खास था । क्या फिर उनकी प्रशंसा नमिता की उपस्थिति में जब कभी अनिल कमरे में अपना कुछ सामान लेने आता उसी तरह के वाक्य कहाँ जाता? वो पढती रहती तो कहता हुआ पडने का कुछ शौक है तो मैं सिलाई बुनाई कशीदाकारी करते देखता तो कहता बढिया कडाई कर लेती हूँ । चलते चलते कहीं गए इन बातों का नमिता सामान्यतः कोई उत्तर नहीं देते हैं । कभी कह देती हैं था कर लेती हूँ थोडा बहुत इससे अधिक अनिल से उसकी कोई बातचीत नहीं थी । सांस का आदेश था । किसी भी तरह आज अनिल को रोक ले तो कुर्सी पर जाकर बैठ गई । कंघी रखकर वो जाने लगा तो बोली सुनी क्या मैंने कहा है कि इस आंधी पानी में वहाँ मत चाहिए । मैंने कहा है या तुम कह रही हूँ एक भरी मुस्कुराहट उसके होठों पर बनाई । हाँ मैं कह रही हूँ वो कुर्सी पर से उठ खडी हुई ऐसे तूफान में जाना जरूरी तो नहीं है । एक रात पर नहीं रोक सकते । क्या वो काम रही थी । ओपन भर के लिए रुका फिर बोला हो मुझे अपने रूप पांच में बांधी की कोशिश करता हूँ । मैं सुविधा का हूँ और उसी का रहूंगा । कहने के बाद वो चला गया । उसी तरह खडी खुले दरवाजे की और देखते रहेंगे । हाँ, किस अधिकार से रोकने आई थी वहाँ हो । उसने तो पहली बार हुई बातचीत के समय ही अपनी ईमानदारी प्रदर्शित करते हुए कह दिया था कि वह सुमिता का है और उसी का रहेगा । फिर वो क्यों आई थी उसे रोकने नहीं । अब वो कभी नहीं रोकेगी । उसे जाए । जहाँ जाना है उसे नमिता के जीवन की धारा जैसे बढ रही है, वैसे ही बहेगी । कुछ नहीं चाहिए । उसे कुछ नहीं । उसने दरवाजा अंदर से बंद कर दिया । बैठ पर पडे दो तकिये उसे अपना उपवास करते महसूस हुआ । उसने एक प्रक्रिया को उठाकर अलमारी में बंद कर दिया । सुबह जब वह जागी तो खिडकी से आती तेज धूप कह रही थी कि आज वह बहुत देर से उठी है । रात नींद भी तो देर से आई थी । रात में आंखों के पानी से गीला हुआ था । क्या उसने धूप की और सरकार दिया? मेज पर रखी घडी की और उसने नजर डाली तो देखा कि साढे सात बज चुके हैं । मांझी अकेली नाश्ता बनाने में लगी होंगी । उसने जल्दी से दरवाजा खोला । देखा अनिल बाहर अपराधी भाव दिखता है हूँ । ये भी तो सात बजे के लगभग आ जाते हैं तो आधे घंटे से बाहर का नहीं दरवाजा खोलने का इंतजार कर रहे हैं । उनके कपडे तो इसी कमरे में रहते हैं । बोले बिना दफ्तर के लिए तैयार भी कैसे होते हैं । उससे जल्दी से अलमारी से कपडे निकालकर बेस पर रख दिए । अंदर अंदर आया तेजी से बाहर जाने लगी कि अनिल ने टोका तो बहन के लिए रात को डर तो नहीं लगता । क्यों उसकी आंखों ऍम लग रहा था । हीटर लगता हो तो नौकरानी को यहाँ से ला लिया करो । नमिता ने आप भरी नजर से पति की और देखा और पहाड चली गयी । उसका सारा दिन कैसे बीता उसे खुद नहीं मालूम । वहाँ के रूप में मिली । उससे बार बार पूछती रही क्या तुम्हारी तबियत खराब है? उसके नहीं कहने पर भी आराम करने के लिए कहती रही और वो जबरदस्ती रसोई के कामों में उलझती रही । कभी अपना भूत उसके आंखों के सामने आता तो कभी वर्तमान । भविष्य के सपने तो देखते ही नहीं थी । तो रात में जी का स्वप्न रह रहकर आंखों से टकराता था । कैसा जीत सपना था वो । उसे भयानक तेज बुखार है । मगर घर में न तो कोई दवा देने वाला है और न खाने को । नमिता कहाँ होती है, कैसा था फिर अचानक दिमाग में आया । कहीं स्वप्न उसके जीवन का प्रतीक तो नहीं खर्च पडी थी । हाँ, खुशी का जीवंत झलक रहा है । सपने में अपने माता पिता को प्रसन्न करने के लिए अनिल उससे व्यवहार तो कर लिया । अगर अपने दायित्वों से घूमो रहा है उससे विभाग का स्वांग भरके सपने को याद कर कभी वहाँ तो कभी उसके अंतर कार उधर की । ऐसी बनकर उसके होठों पर भी लगता रहता है । उसके होठों पर मुस्कान देखकर सांस भी निश्चिंत होकर बाजार से रसोई कर कुछ सामान लाने पहाड चली गयी । दोपहर के भोजन का कार्य समाप्त हो गया पर उसका कमरे में जाने का मन ही नहीं कर रहा था था । उसने शाम का रास्ता बनाने में अपने आपको व्यस्त कर दिया । नाश्ते के लिए खीर बनकर तैयार हो गई । उसने गैस बंद करके खीर में इलायची डालने के लिए ऍम रेखा के सब ऍम समाप्त उसे याद आया कि अपने कमरे में भी उसने कुछ अलाॅट छोडी हैं । असमय मूमेंट डालने के लिए ही ढककर वाॅल लाने अपने कमरे में गई तो देखती क्या है कि अनिल दफ्तर से आकर कहीं जाने के लिए तैयार हो रहा है । आज इतनी जल्दी दफ्तर से आके से गए और आते ही जान कर रहे हैं । उसके मन के सवालों का जवाब स्वयं मान ही देने लगा । सुविधा के पास ही जा रहे होंगे और कहाँ जायेंगे? शनिवार की शाम है ना उसे कहीं घुमाना फिराना होगा । जी को उडने लगा । इलायची निकालते हाथ हम गए और वहाँ से अनिल के पास ले गए । मैं भी आज शाम तक से मिलना चाहती हूँ । तुम सुमित्रा होगी और आज ही काम सुदृढता से बोलिए । वो मोहन को छोडने लगा बोला पर आज तो हम दोनों खरीदारी के लिए जा रहे हैं । ठीक है मैं भी चलूंगी तुमको खरीदारी करना । मैं बाहर में बैठे रहेंगे । उन लोगों के बीच किसी प्रकार का दखल नहीं होंगे । ऊंचे पद पर कार्य करने के कारण अनिल को दफ्तर से गाडी मिली हुई थी । आगे जाने का काम हमेशा वो इस कार से ही क्या करता था । थोडी देर सोचने के बाद उन्होंने कहा अच्छा चलो तैयार हो जाओ । कोर्ट पहनते हुए वो बाहर चला गया । कपडे बदलने के बाद नमिता को याद आया कि वह इलायची लेने कमरे में आएगी या जाना कुछ क्या हो गया । कैसे वो सुमिता से मिलने का प्रस्ताव कर बैठी । सांस जैसे ही बाजार से आई नमिता हकलाती हुई से बोली मैं इनके साथ घूमने जा रही हूँ हूँ हूँ कहती सांस खुशी से फूली नहीं समाई बेटे को ऐसी सद्बुद्धि कहाँ से आ गई तो मन ही मन प्रार्थना करने लगी । पुत्र की सुमति बनी रहे । कार एक अनशन मकान के सामने जाकर होगी । दो मंजिला बने इस मकान में ही सुविधा और उसका परिवार रहता है । ये नमिता जान गई क्योंकि अनिल कार से उतरते ही सीढियाँ चढने की बजाय सीधा अंदर बने कमरे की और चला गया । कार रुकने की आवाज से ही दरवाजा भी खुल गया । लगा जैसे पहले से ही उसकी प्रतीक्षा की जा रही थी । खिडकी से कोई अधेड महिला छन छन कर कार की पिछली सीट पर बैठी नमिता की और देख रही थी । अमिता समझ गयी वो सुमिता की माँ होगी । उसने अनेक बार सांस को बडबडा पेश होना था । बढिया अपनी बेटी को मना भी नहीं करती । दोनों बेटियों ने मिलकर अनिल पढना जाने कैसा जादू कर दिया है । शाम को अनिल के जाने के बाद अक्सर सांस कोई टिप्पणी करती, कभी सुमिता के बारे में तो कभी उसकी माँ के बारे में सुमिता का छिछोरापन और उसकी माँ की फैशन परस्ती तो वो ही उनके लिए आलोचना के विषय थे । उनके शब्दों में तो आपने कुमारी बेटी को परपुरुष के साठ दिन रात रहने की छूट देती है । वो वहाँ नहीं उसकी दुश्मन है । नमिता देख रही थी कि सच सुमिता के माँ अपने आधे सफेद बालों के परवाह किए बिना भडकीले वस्त्रों और भारी जेवरों से सजी थी । हम आपका ये हाल है तो बेटी कैसी होगी? नमिता सोच ही रही थी कि अनिल के पीछे पीछे आंचल लहराती हुई सुमिता निकले । अन्य लाकर ड्राइवर की सीट पर बैठ गया और सुमित्रा उसके बगल वाली सीट पर । उसके कानों में लंबे झुमकों को नमिता पीछे की सीट से भलीभांति देख रही थी । चेहरे का गहरा में कभी कुछ कुछ दिखाई पड रहा था । अनिल का स्टार्ट कर रहा था । सुमिता ने एक बार पीछे मुडकर भरपूर नजर से नमिता की और देखा । सुमिता मुस्कुरा रही थी । नमिता सौ पचासी गई कार चल पडी । सुमिता ने अनिल की और झुकता धीरे से कहा टीवी तुम्हारी पूरी नहीं । दोनों धीरे धीरे अच्छे लगे हैं । इस तरह बातों में हो गए मानव नमिता तो वहाँ है ही नहीं । दोनों मिलकर दफ्तर में काम करने वाले किसी कर्मचारी का मजाक उडा रहे थे । उसके सीधेपन और बेवकूफी का उसे लगा जैसे उसी का मजाक उडाया । जा रहा हूँ । मुझे भी समझ गई कि सुमिता अनिल के दफ्तर में ही अफसर है । तारेक राष्ट्रों के सामने जाकर रुपये उन्होंने उतरकर राष्ट्रों के अंदर चले गए । नमिता बैठी रही । अचानक ऍम हुआ । चाय पीने की इच्छा जाग उठी । उसने देखा की राष्ट्र के करीब चाय की दुकान है । आज के इशारे से दुकान में खडे लडकी को बुलाया और एक कप चाय लाने का आदेश दे दिया । अनन्य शायद ये सब देख लिया था । लडका चाहे लेकर आया तो वो भी पीछे पीछे चला आया वो मैं तो मैं भूल ही गया था । चाय के साथ कुछ खाना भी है तो मम्मा दू नमिता ने अस्वीकृति भी सर हिला दिया । फिर वो लडके की और देखकर बोला चाहे पैसे मैं दे दूंगा तो नमिता ने कुछ अच्छे पंच खोलकर चाहे पैसे लडके को दे दिए । अनन्या इस तरह से नाम ताकि और देखा । मानव कह रहा हूँ की मेरा अपमान कर रही हो । पर नविता ने उस नजर की जरा भी परवाह नहीं की । तरफ से भरी हुई एक हल्की सी मुस्कान उसके चेहरे पर फिर आई । अनिल फिरसे राष्ट्रों की और चला गया । चाय पीती भी सोचती रही जब उसके मान अपमान की कोई परवाह नहीं करता तो वो किसी की परवाह क्यों करें । तरह से अपमान बहुत के भाव से अनिल का चेहरा बच गया और नमिता के जीवन का हर कदम अपमान में डूब रहा है । उस की किसी को परवाह नहीं । घर समाहार आज पहली बार सुना आपने पैसे खर्च किए हैं मायके चलाए हुए बिल्कुल अपने पैसे । अनिल ने आज तक उसे तो पैसे नहीं दिए ना कभी कोई चीज लाकर दी । आपको तो जब मायके जाती तो सांस अवश्य से पूछती की रूपये चाहिए उन्हें हूँ । सास अक्सर से पांच सौ का नोट देना चाहती हैं और उस ने कभी नहीं लिया । वो जब भी जाती छोटे भाई बहनों के लिए फल, मिठाई और कपडे मंगा दे दी । मायके में उसका खर्च तो कुछ नहीं होता था । अभी तो जब वहाँ से आती तो विदाई में कपडे और रुपये पैसे मिलते हैं । दो लाख मना करती परमां भला का मानने वाली थी । उन्हें रुपयों में से वो सास को तीज त्यौहारों पर उपहार दे देते हैं । ससुराल में भी और कोई खर्चा उठा नहीं था । उसके पास में रुपए हमेशा पडे रहते थे । तो क्या ये पैसे भी उसके अपने हैं? अनिल और सुनीता राष्ट्रों से बाहर आते दिखाई दिए । गहरी लाल लिपस्टिक से लगे सुनता के होठों पर उपहास की ऐसी थी और अनिल केंद्रों पर उदासी छुपाती से मुस्कराहट कार कुछ दूर जाकर रुक गई । अनिल नाम मकान की और इशारा कर के कहा पर जानती हो ना अपने घर को चली जाओगी । यहाँ मैं पहुंचा दूँ । हमें खरीददारी करने शॉपिंग मॉल जाना है । वो निरुत्तर कार से उतर गई । मन घायल हो चुका था । हो चुकी थी मकान की और जाती हूँ वो पृष्ठों से गिर गई । कौन सा घर इसका है? क्या बुखर उसका अपना है? घर के सब सदस्य जल्द ही खाना पीना खाकर हो गए थे । नमिता ने अभी अभी अपनी दैनिक डायरी में आज का पन्ना लिखकर खत्म किया था । डायरी में इस पर खुली पडी थी । आपने अक्षरों को नहीं आ रही थी । सच मांगी उसके लिए बहुत सुंदर है । स्कूल कॉलेज के शिक्षक शिक्षिकाओं से उसने सकते हम अपनी लिखावट के लिए प्रशंसा प्राप्त की थी । कक्षा में वह सादा प्रथम स्थान प्राप्त करती थी । इसका एक कारण लिखावट भी होगी । ऍफ के बल पर ही उसे उच्च अंक मिलता रहे । जी नहीं । इसके साथ साथ विषय को समझने बूझने और अभिव्यक्त करने की क्षमता भी तो रही होगी । इसमें क्या वह क्षमता नहीं है उसमें अभी भी तो होगी और अब वो उसका उपयोग मात्र खाना बनाने और डायरी लिखने में ही तो करती है या फिर साथ ससुर और देवर को उनका मनपसन्द खाना खिलाकर प्रसन्न करने में या फिर पति की उपेक्षा रहने में बस पडी हो तो क्या और नहीं पढ सकती हूँ । क्यों नहीं पढ सकती इस घर की चारदीवारी के बीच रहकर घर के ढेरों काम करके भी तो उसके पास काफी समय बच जाता है । इस खाली समय में पढकर क्या वो स्वतंत्र रूप से एमएससी की परीक्षा नहीं दे सकती । ऐसा उसके पास ड्राइंग रूम में रखे फोन किया और बढ गए उन के निकट रखी आराम कुर्सी पर बैठकर उसने फोन की मेज पर रखी टेलीफोन बुक उठा ली । शहर के महाविद्यालय की प्राचार्या तापसी दीदी के फोन नंबर उसने ढूंढी निकले आप से उसके गांव की शायद पहली ऐसी लडकी है । उन्होंने नारी की परंपरागत छवि को तोडकर नए रास्ते की और कदम बढाए थे । वैसे उनके बारे में ये कहा जाता है कि प्रेम भी असफल हो जाने पर ही उन्होंने ऐसा किया था । कहते हैं जब उनके बालमित्र प्रसून ने जिन्हें वो मनी मंत्री है समर्पित कर बैठी थी । अपने परिवार वालों के दबाव में कहीं और विवाह रचा लिया तो वो आजीवन कुमारी का रहने का व्रत में बैठे हैं कि बहुत पुरानी बात रही होगी । नमिता नहीं तो जब से उन्हें जाना अपने शहर के कॉलेज में लेक्चरर के पद पर ही देखा वो उन की छात्रा भी रह चुकी है । वो उससे हमेशा छोटी बहन की तरह ही नहीं करती है । परीक्षा के दिनों में जब से कुछ नहीं समझ में आता तो उनके घर जाकर भी पूछा करती । अपने माता पिता, भाई भाइयों और भतीजे भतीजियों के भर पूरे परिवार में प्रेस तापसी अपनी छात्राओं को अपने छोटे से ही कमरे में बैठाकर उनकी समस्याओं का समाधान करते हैं । लौटने से पहले उन्हें कुछ खिलाती पिलाती भी जरूर उनके शहर में प्राचार्य बन जाने की खबर उसने बहुत पहले समाचार पत्र में पडी थी । छोटी बहन से हुई बातचीत में भी उसने समाचार की पुष्टि की थी । ये वही तापसी दीदी हैं । एमएससी के अलावा पीएचडी की डिग्री भी उन्होंने पाली थी । नमिता ने दीवार पर तनी खडी की और नजर डाली । साढे नौ बजे थे । ख्यालात के समय फोन करना ठीक रहेगा पर सभी तो इतनी जल्दी नहीं हो जाते हैं और तापसी दीदी जैसी अध्यवसायी महिला वाला इतनी जल्दी सो ही कैसे सकती है । फोन पर तापसी दी तुरंत मिल गई चलो नहीं नमिता बोल रही हूँ ओ नेता तुम कैसी हो चुना था तुम्हारी ससुराल शहर में पर तुम से मिल नहीं पायेगी । आप से कम है दीदी क्या मैं एमएससी की परीक्षा में स्वतंत्र रूप से बैठना चाहती हूँ लेकिन परीक्षा में तो केवल छह महीने रह गए हैं । इतनी जल्दी तैयारी कैसे कर पाओगी तुम एक काम करो, अगली बार दे देना । लगभग डेढ साल मिल जाएगा । तुमको पडने के लिए नहीं देती । मैं इसी वर्ष देना चाहती हूँ । ठीक है परिश्रम करोगी तो कम हो जाएगा । उन को शुरू से ही मेहनती हो और बताओ घर में सब कैसे हैं? समझे हैं तो मैं क्या करूँ? कल कॉलेज में आकर परीक्षा के लिए आवेदन पत्र भर दो । अपने सब सर्टिफिकेट मांक्षी और उन की मूल कॉपी भी लेती आना । विषय कौनसा ले रही हूँ फॅमिली आती का विषय है दीदी । ठीक है मेरे पास समय किताबी मिल जाएगी । कल दस बजे कॉलेज पहुंचाना । नमिता कमरे में आकर आखिरी में रखी । आपने सर्टिफिकेट की फाइल करने लगी । रात का एक बच चुका था पर वो अपनी सारे जरूरी का एक साथ तैयार करके ही सोई । सुबह सास नहीं खुशी से उसे कॉलेज जाने की अनुमति दे दी । शाम को जब पुस्तकों के पैकेट लेकर टैक्सी से उतरी तो ससुर जी ने भी उसकी पुस्तकें उलट पुलट कर देखी है । फिर आया से कमरे में रखवा दी । अब उसे पढाई के सिवाय और कुछ नहीं सोचता था । सुबह नाश्ते के काम से निपटकर उसकी लेकर बैठ जाती तो बाहर का खाना सांस आया की मदद से स्वयं बना लेती हैं । आपको बनाना चाहती तो कहती तुम पढो तो हरी परीक्षा नहीं छोडे । दिन ही बाकी रह गए हैं । दो चार बार उसने पूछा पूछना छोड दिया था । शाम के समय वह फॅमिली में नहीं आने देती है । फिर भी ऊपर का काम तो सास करती ही थी । खाने का काम समाप्त करते ही तो उन्हें पढने बैठ जाती है और जब तक बैठे बैठे नींद के छोड के नहीं आने लगते हैं तो बिस्तर पर नहीं जाती है । जो समझ में नहीं आता हूँ से फोन पर तापसी दीदी से पूछती अपने द्वारा लिखित प्रश्नोत्तरों को दिखलाने । कभी कभी वो तापसी दीदी के पास भी पहुंच जाती हैं । अध्ययन के इस दौर नहीं उसे एक नई दुनिया में पहुंचा दिया हूँ । वर्तमान और भविष्य सब कुछ भूल गयी । वो अध्ययन का एक नशा समझाया रहता । उस पर गृहकार्य करते समय फिजिकल कैमिस्ट्री की गुत्थियां उसका दिमाग में तैरती रहती । देखते देखते छह महीना बीत गए । आठ प्रश्न पत्र अच्छे हुए थे । तीन महा प्रतीक्षा के उपरांत जब परीक्षाफल निकला तो उसे अपनी प्रथम श्रेणी देखकर विशेष अश्चर्य नहीं हुआ । ससुर ने पहले अखबार में परिणाम देखा फिर उसे भिजवा दिया । सास ने मिठाई मंगवाई । रात को जब अनिल खाना खाने बैठा तो माने प्लेट में चार रसगुल्ले खाने की थाली के साथ उसके आगे रखती है । ये किस खुशी में? अनिल ने पूछा । बहू ने प्रथम श्रेणी में एमएससी पास की है । उसने रसगुल्ले तो खाली है लेकिन उसका चेहरा उतर गया था । दूसरे दिन सावन की हरियाली तीज थी । उस दिन सिंजारा था । दिन में सांस नहीं मिश्राणी जी को बुलवाकर उसकी इच्छा न होने पर भी उसके दोनों हाथों में मेहंदी रचवा दी । मेहंदी का रंग चलने के लिए आज से पानी नहीं छोडा था । ओ बालकनी में बैठी एक पत्रिका के पृष्ठ पलट रही थी । इसी समय देवर नारायण ने आकर सूचना दी की उसकी सबसे छोटी बहन और पिता जी आए हैं । मैं किसी सिंजारा लेकर अनिल कब खाकर हाथ हो रहा था । खबर सुनते ही पिछले दरवाजे से सुनता कहाँ चला गया । शायद ससुर और साली का सामना नहीं करना चाहता था । इसीलिए आज बिना तंगी किए बिना डर पन्ने मूल्य हरे ही चला गया । दो दिनों तक खूब गहमागहमी रही । सांसद उसके मायके शायद लड्डू पूरे मोहल्ले में बनवाए । बीच के दिन मायके से आई । नई साडी पहनने के लिए उसे विवश किया और अपनी और से भी एक नई साडी मंगवा कर दी । परीक्षा परिणाम का हर्षो तो नमिता को अच्छा लगा था पर ये सब जाने क्यों मन को नहीं आ रहा था । फिर भी सांस की प्रसन्नता के लिए वो सब कुछ स्वीकार थी । चली गई । सुबह होते ही पिताजी चले गए थे । शायद इसलिए भी मन उदास हो । रात को छोटी बहन मृदुला उसके साथ ही हुई थी । लगभग पूरी रात दोनों कब तय करती रही । झूठी मृदुला में लगता था अब बहुत अगला आ गई है । उसने मायके के सारे समाचार बडे अच्छे ढंग से नमिता को सुना दिए और अंत पूछा तो यहाँ खुश होना दे दी । मैंने पूछा है उसको नहीं हूँ, देखती नहीं मेरी सास कितनी अच्छी है मुझे एमएससीपी करवा दिया है । उन्होंने तो तो देख ही रही हूँ, पर जिया जी नहीं दिखाई दिए । वो जरूरी काम से बाहर गए हैं तो इतनी जल्दी लौट रही है । दो चार दिन रूकती तो मिलती है । मैं बोला हूँ कहकर चुप रही । पिताजी जब नमिता से मिले तो उन्होंने अनिल के बाबत उससे कुछ नहीं पूछा । खाना खिलाते समय ससुर जी ने उनके कान में बात डाल ही दी थी । चैनल जरूरी काम से कहीं बाहर गया है । मृदुला और पिताजी का आत्मीयतापूर्ण व्यवहार देखकर साथ समझ गए कि नमिता ने उन्हें अपने अभिशप्त जीवन का कोई संकेत नहीं दिया है । उनके जाने के बाद वो नमिता से बोली । समझदार बहू बेटियां ऐसी ही होती हैं । वो माइटी की बात ससुराल में नहीं कहती और ससुराल की मायके में नहीं । वो मुस्कुराकर रह गई और मन में सोचती रही । व्यवस्था ने उसे विश्वास ही नीलकंठ बना दिया है । अपना विश्व वो उबले तो कहाँ मिले बस अपनी कविताओं में अपनी ढाई में एक दिन उसने सांस को चरण छूकर प्रणाम किया । उन्होंने आशीष का हाथ पीठ पर रखते हुए कहा, तू जो नहाओ पूतो फलो । हमेशा तो वह सदासुखी रहूँ कहकर आशीर्वाद क्या करती हैं? आज ही उनके मुझसे क्या निकल गया । वो तो कहते कहते उनका भी गला भर आया था । उसका जी भी न जाने कैसा हो गया तो चुपचाप रसोई में जाकर काम में लग गई । पर जाने क्यों आज आंखे भर भर आ रही थी । पता नहीं पिता और बहन के चले जाने से किसानों के आशीर्वाद की निस्सारता से और जोरों से सिर दुखने लगा । फिर भी वो किसी तरह काम में लगे रही । सात चौके में आई उसका चेहरा देखकर बोली हमारी तब ठीक नहीं लग रही समझाऊँ आराम करो । मैं खाना बना लेती हूँ । अपने बिस्तर पर जाकर बच्ची भरके रोई । मन को झूलता हुआ तो नहीं जाने लगी । दोपहर के खाने के समय शासन से जगाया तो उसकी आंखें खुली । मुझे भूख नहीं है । थोडा सा ही घायलों वहाँ के बोलती हुई सांस के पीछे पीछे चली आई और सोचती रही एक साथ ही तो है यहाँ से ममता के निश्चल पड मिलते हैं । ससुर खाना खाकर मौन बैठे थे, ने कहा मैंने तो सोचा था विवाह के बाद ये लडका सुधर जाएगा । लेकिन ये तो एक दिन भी घर पर नहीं रहता तो ठंडी कहाँ भरकर बोले तो भी बहु को थोडा घुमा फिरा लाया करो । कभी शर्म दिखा जाया करो । कहती तो उससे पर ही जाती ही नहीं जमता बोली तापसी दीदी के पास जाउंगी ना उनके निर्देशन में पीएचडी करना चाहती हूँ, जरूर करो । ससुर बोले उसके चेहरे पर भी प्रसन्नता झलक रही थी । खाना खाते ही तापसी दीदी के पास जाने के लिए टैक्सी आ गई थी । पुस्तकों की दुनिया में अपने आपको व्यस्त कर देने के लिए उसने बोल रहा हूँ । एक बार यात्रा फिर से आरंभ कि ससुर अचानक बीमार हो गए । न जाने के सब बुखार था, जो करने का नाम नहीं लेता था । शायद मलेरिया था । डॉक्टरों को आंत्र ज्वर का भी संदेह था । जांच चल रही थी । पूरा निर्णय न हो पाने के कारण दोनों बीमारियों की दवाएं दी जा रही थी । उस दिन शाम को उनकी बेचैनी बहुत बढ गई । साथ सुने दवा पिला रही थी । वह व्याकुल होकर बोले, इच्छा थी अगली पीढी का मूवी देखने तक सुंदर हूँ तो लगता है सब भाग्य में नहीं लिखा है । सांस के नेत्रों से मोटी टपक पडेंगे । नमिता रसोई के दरवाजे से सब कुछ देख सुन रही थी । पिता के सिरहाने बैठा अनिल भी सब कुछ सुन रहा था । फिर चुप चाप समाचारपत्र पडने लगा । रात का खाना खाने के बाद अनिल घर पर ही रुका रहा था की बीमारी के कारण चाय दूसरा रात को घर पर ही रहने का निर्णय ले लिया । कुछ देर बाद उसने फोन पर सुविधा को सूचित किया कि पिता जब तक ठीक नहीं हो जाते हैं, नहीं आ सकेगा । नमिता सुन रही थी अनिल किस तरह? हाँ संस्कार सुमिता से बातें कर रहा था । उसका मन चढ गया उससे तो हमेशा रुखाई से बोलता है मैं कपडे निकाल लो, मेरा खाना लगा दो बस ऐसे ही शुष्क और वो कमरे में जाकर हो गई । पर आज से नहीं नहीं आ रही थी । पता नहीं ससुर की बीमारी की जनता के कारण या किसी और कारण से । माँ बेटे ने बारी बारी से जब कर ससुर के पास बैठे रहने की योजना बनाई थी । फिलहाल सांस हो रही थी । आधी रात के बाद जब वो सोकर उठी तो उन्होंने बेटे को हो जाने का आदेश दिया और स्वयं पति के पास बैठ गए । अनिल कमरे में चला गया । नमिता हडबडाकर बैठे । उसने ये तो नहीं सोचा था कि अंदर कमरे में ही सोने चला जाएगा । तेजी से बाहर जोड जाने लगी । अनिल उसके कहाँ पकडेंगे हम थोडा रुक जाऊँ माँ पिताजी की इच्छा पूरी होनी चाहिए । इस घर में नन्हे मुन्ने आनी चाहिए । समझा को अभी माँ बनना नहीं चाहती । उसकी संतान को ये लोग पोता पोती मानेंगे भी नहीं । फॅमिली मैं केवल दूसरों की इच्छापूर्ति का साधन नहीं हूँ । एक झटके से हाथ छुडाकर बाहर चली गई और बगल के कमरे में जाकर हो गयी । वो कमरा एक तरह से अतिथियों के लिए सुरक्षित था । बीमा जब ससुराल चाहती तो उसी कमरे में रहती नमिता के पिताजी क्या अन्य कोई अतिथि आता तो भी यही टिकता । यूज कमरे की नियमित सफाई होती थी । उसने कमरा अंदर से बंद करना चाहा पर देखा चिटकनी टूटी हुई है । उसने दरवाजा केवल हटाकर बंद कर दिया । उसी समय उसकी नजर ससुर के सरहाने बेटी सांस पडी देखा अपने आप से पूछ रही थी ससुर तो ठीक ठाक हो रहे हैं । फिर आंसू का क्या कारण? शायद कमरे में नमिता का भाग आना ही सांस की आंखों का स्राव बन गया है । उसकी आंखे भी हो गई । ऍसे छुट्टी ली । उस दिन रात पिता की सेवा में जुटा रहता था । साथ साथ मैलन और माँ भी लगे रहते । नमिता को घर के काम अकेले ही करने पडते हैं तथा दिन में शोध अध्ययन के लिए कम ही समय मिल पाता । रात को रसोई से निकलती तो वह सीधे अध्ययन में जुड जाती हैं । देर रात तक उसका अध्यन चलता रहता है । उस रात की घटना के बाद से अनिल अतिथि कक्ष में सोया करता हूँ और नमिता अपने कमरे में रात के लगभग ग्यारह बजे थे । वो पढ रही थी । दरवाजा बना हुआ था । सोच रही थी कि अब अध्ययन समाप्त करके दरवाजा बंद करके सो जाए । इसी समय दरवाजा खोला । उसने देखा कि नहीं लाया है । शायद कमरे से अपनी कोई वस्तु लेने आया हूँ । पर ये क्या उसके अंदर से बंद कर लिया वो कांप उठी । जल्दी से कुर्सी पर से उठकर दरवाजे की गडबडी तो दरवाजे के पास दीवार बनकर खडा रहा । इसी समय बाहर से भी किसी ने दरवाजे की कुंडी लगा दी । चूडियों की खनक सुनकर नमिता समझ गई । ये सास का काम है । सांस के प्रति उसकी श्रद्धा टूटने लगी । अनिल की आंखों में एक अजीब सा वहशीपन था । वो उससे बलात् बिछावन की और खींचने लगा । पता नहीं प्रेमिका से दूरी के कारण नमिता के आकर्षण से जब संतान कामना से शासन भाव के इस पर प्रयोग ने नमिता को भी सिंगर ही बना दिया । उसने अपने शरीर की संपूर्ण शक्ति लगाकर अनिल को परे धकेल लिया । वो बिछावन पर जा गिरा हूँ । कुर्सी बडा बैठी बाहर जाने का कोई उपाय नहीं था । बाहर से कुंडी जो लग गई है । उसने टेबल नेम चलाकर कुछ पडने का प्रयास किया पर ध्यान नहीं लगा । पुस्तक बंद कर उस सारी राहत सोचती रही । अनिल करवटें बदलता रहा । सुबह बाहर से कुंडी खुली तो नमिता को मुक्ति का अनुभव हुआ । धीरे धीरे ससुर का स्वास्थ्य सुधारने लगा । अनिल के दिन फिर से दफ्तर में और रातें बाहर बीतने लगे । नमिता का जीवन भी पहले जैसा चलने लगा हूँ ।

नाज़ुक बंधन भाग - 02

अगले दिन सुबह नाश्ते के बाद सास ने नमिता का उतरा हुआ चेहरा देखा । उसका माता छूकर बोली नहीं तो मैं तो तेज बुखार है । चाहूँ तो सोचा हूँ मैं डॉक्टर को बनवाती हूँ । वहाँ के कहने पर अनिल डॉक्टर को लेकर आया । डॉक्टर ने कहा को विशेष बात नहीं है । मौसम के परिवर्तन से ठंड लग गई है । उसने कुछ दवाई लिखी, अंग्रेजी दवा लेकर आया । उसने ही नमिता को दवा खाने के लिए दी । साफ पानी रखकर जानबूझ कर बाहर चली गई थी । शायद रसोई में जाकर व्यस्त हो गई । दवा खाकर नमिता पूरा लेट गयी । अनिल कुर्सी खींचकर बैठ के समीप ले आया और उस पर बैठ गया । उसने दफ्तर से छुट्टी ले ली थी । नविता को अच्छा लगा । उसने आंखे बंद कर ली और लेटी रही । अचानक अनीस बोला क्यों अपने आप को मार रही हो तो दूसरा विवाह क्यों नहीं कर लेती? उस ने सुना पर सोचा हूँ दूसरा व्यवहार आप इस विषय पर तो उसने पहले कभी सोचा ही नहीं । मनी मनी फंसी एक विवाह करके तो बहुत छुपा लिया । अब दूसरा यहाँ और कौन सा सुख पाना बाकी रह गया है । पर मुझे कुछ नहीं । हाँ हमारी तो रही है । वो अपने आप को और क्या कर रही है या नहीं । काम उसे बहुत बडा सच निकला है । अनिल कस्टमर फिर उसके कानों में भूल जा रहे हो । पढी लिखी हूँ देखने में भी अच्छी हो हमारा दूसरा विभाग होना ज्यादा काटे नहीं है । नमिता के वोटों पर एक व्यंग भरी हंसी उभर आए । आंखों में कुछ नहीं भी ठहराई । उसने पैरों पर बडा कम्बल गले तक खींच लिया और मुंह फेरकर लेट गए । मन में अनिल के प्रश्नों के कई कई उत्तर करते रहे हैं । बडी चिंता हो रही है । मेरी अरे नहीं समझ जाते तो मुझे बिहानी हो गए थे । जाओ जाओ अपनी सुमिता की जनता करो । मेरी चिंता की कोई जरूरत नहीं है । मैं स्वयं खेल होंगे अपने आप को । पर सारे जवाब मन में ही घुमड दे रहे हैं वो उसे बाहर आने का प्रयास किसी ने नहीं किया । न जाने कब उसे दिन लग गए । अब कब अनिरुद्ध कर चला गया । जागी तो जी उसे हल्का लगा । इसी समय सांस में आकर से शुभ सूचना दी । देवर के विवाह का दिन तय हो जाने की तो हर्षित होते हैं । कोई तो हम उम्र ही मिलेगी । उसे अपना खाली समय बांटने के लिए । विवाह की बातचीत कई दिनों से चल रही थी । लडका लडकी देखने दिखाने का काम भी पहले ही हो चुका था । बस विवाह का दिन तय होना बाकी था । नलिन के विभाग में नमिता फलीफूली थे । दौड दौड कर विभाग के कार्य निपटाए । उस रात को रात समझा नहीं इनको दिन उसका यह साहब एक कार्ड न केवल साल बल्कि विभाग में आए मेहमान भी चकित रह जाते हैं । उसके ऊपर तो सब उसकी प्रशंसा करते हैं तो उसके जाते ही सब कानाफूसी करने लगते है । पति एक रहती घर पर नहीं रुकता हूँ पर एक का सब की लडकी है और कभी सवाल तक बात नहीं लाती है । पहले घर की लडकी है कोई दूसरी होती तो अभी तक छोड छाड कर भाग गयी होती है । वो आठ वोट से सब कुछ सुनती मनी मान हस्ती कहाँ जाएगी वो भागकर कहाँ जाएगी? भारतीय नारी के लिए अपनी व्यवस्था के पास से निकल भागने की सामर्थ्य शक्ति है । आखिर कहाँ है मायके में तो वह जन्म से ही निर्माण रहती है । बात बात पर यही तो कहा जाता है लडकियाँ पढाई होती हैं उन्हें पढाई घर जाना है इस पर आए घर को अपना मानकर रहना ही तो लडकी की हवाई है अधिकांश भारतीय नारियां आज भी ससुराल अपने कर्तव्य की राह पर चलकर वो अपने प्रतिकुल और पत्र को दोनों को जगल क्या रखना चाहती है । सहसराव से महादेवी की पंक्तियां हुआ मैं नीर भरी दुख की बदली परिचय इतना इतिहास है उमडी कल थी मिट आज चलें नारी नीर भरी दुख की बदली ही तो है उसका जन्म लेना और विवाह होना यही तो उसका इतिहास है । नमिता का भी यही इतिहास है । माइटी के उस घर में वो बदली की तरह बडी थी और ससुराल के घर में फॅमिली जाएगी । यही उसकी नियति है और नियति की अक्सर किसने बांचे हैं? कौन पड सकता है उसकी आदर्श लिपि को? देवरानी के आते ही उस घर के मुख्य भाषा भी मुखर होने लगी । पाओ में घुस वाली पायजेब पहनें । मौके पर बडा सा टीका लगाए जब घर में इधर उधर डोलती तो घुंगरू छमछम बचते सास नहीं बहु के चारों और डोलती नमिता को रसोई घर अब और अधिक प्रिय हो गया । बच्चा हुआ समय वो अपने शोध प्रबंध को समर्पित कर दी । अभी कभी उसे अच्छा लगता साथ सब उसके आगे पीछे नहीं मान जाती है । उसे पढने लिखने में अधिक स्वतंत्रता महसूस होती है । अच्छा ही है कि वह देवरानी में रवि रहती है । लेकिन कभी कभी नमिता अपने आपको बहुत एकाकी अनुभव कर दी । तब वो रसोई में चार चीजें अधिक बनाती । कमरे में आकर चार पृष्ठ अधिक लिखती । कभी कभी देवरानी, अचला आकर छेडती वहाँ पर आप दीदी अब कितना पढती लिखती है, कितनी कॉपियां करेंगी? कितना मोटा पोथा तैयार कीजिएगा । फॅमिली डिग्रियां लेकर क्या करेंगी? उस सब कुछ सुनती और मुस्कुराती रहेगी अचला को अपने कमरे में बैठाती, सॉफ्ट इलाइची खिलाती उसके मायके की बातें पूछती लिखते पढते! जब वो भी उपजाति तो अच्छा के कमरे में जा पहुंचती तो पीहर से लाये काजू, किशमिश, अखरोट मेरे उसे जेठानी का स्वागत करती पर छेडने से वहाँ भी बात नहीं आती । पैसे दीदी भैया के बिना आपका मन कैसे लगता है? आप राहत कैसे बताती हैं? नमिता का जी छोड जाता की लडकी है कि आप सांस के सामने भी वह जो ना सो बोल पाती, उसकी चटपटी चुलबुली बातें नमिता को छू नहीं । पास तो हस्ती तो बस मंत्री मंत्री उसकी सरस पाते हैं । जब नमिता में नीरज सृजन करने लगती है तो कोई न कोई बहाना बनाकर वहाँ से उठ जाते हैं तो उसे भी वो अक्सर अकेले ही जूझती अच्छा वो अक्सर ये कहकर भगा देती की नई पहुँचे । ज्यादा काम नहीं करवाना चाहिए । लेकिन जब तापसी दिनों से बार बार चेताया, शोध प्रबंध उसे नियत अवधि में ही पूरा कर लेना चाहिए । अब उसने रसोई की और कम और शोध कार्य कि और अधिक ध्यान देना प्रारंभ किया । अच्छा भी धीरे धीरे चौका चुना संभालने लग गई । तापसी दीदी के यहाँ उसका आना जाना बढ चुका था । प्रबंध नियम से बहुत कम समय में पूर्ण हो गया । तापसी निधि के एक परिचित व्यक्ति ने उसे कंप्यूटर टाइप करके स्पाइरल बाइडिंग करवाकर किताब का सुंदर रूप दे दिया । यही नहीं, उस सीडी में भी सुरक्षित कर दिया, जिस दिन उस शोध प्रबंध विश्वविद्यालय में जमा करके आई । मंदिर बहुत भारी भारी हो गया । लगा जैसे अपनी कोई प्रिय वस्तु किसी को दे डाली हो । उसी के दो वर्षों का संघर्ष है । उसकी अनगिनत रातों का जागरण उस शोध प्रबंध में समझाया था । तापसी दीदी ने बताया था, अभी काफी समय लगेगा । शोधप्रबंध परीक्षकों के पास भेजा जाएगा । वो उसका अध्ययन करके अपनी रिपोर्ट भेजेंगे । तब कहीं मौके की परीक्षा का आयोजन होगा । उन्होंने आश्वासन दिया था कि सब ठीक ठाक हो जाएगा । फिर भी नमिता का दिल धडक रहा था कि उसे सफलता मिलेगी या नहीं । एक खाली पाॅप कचोटता था । चोट प्रबंध के साथ मान उसकी व्यस्तता भी विदा हो गई थी । फिर वो खाली खाली सी हो गई । फिर उसे तापसी दीदी के पास जाना पडा । उन के पुस्तकालय से उठी सारे उपन्यास ले आई । उन्हें पडने में उसने अपने आप को फिर से व्यस्त कर लिया । इस खूब से छुटकारा पाने का उसे एक और सहारा मिल गया । उसकी छोटी बहन संचिता का व्यवहार था । मायके से फोन आया था । बहुत दिनों से वहाँ नहीं गई थी । उन तो वहाँ से अक्सर आते थे, लेकिन वह स्वयं ही मना कर देती है । पता नहीं पढाई में अपनी व्यस्तता के कारण या फिर किसी और कारण से । पर इस बार तो अपने को रोक नहीं सकी । मन जाने के लिए उछलने खडा यू तो अनिल भी साली के विभाग में निमंत्रित था तो उसने जाने से साफ इंकार कर दिया । माँ बाप के लाख समझाने पर भी यही कहता रहा । उसे दफ्तर से छुट्टी नहीं मिलेगी । आज कल बहुत बहुत कम है । आप है । नमिता के लिए ही बहन के विभाग में सम्मिलित हुई । सब बार बार उससे अनिल के संबंध में पूछ रहे थे । वो उत्तर देते देते थक गई परिवार, पडोस, रिश्तेदारों और विभाग में सम्मिलित होने वाले करीब करीब हर व्यक्ति के यही तो सवाल थे क्यों नहीं आए भी ऐसा के जरूरी काम था साली के विवाह में तो नहीं चाहिए । नमिता ने तंग आकर अंत में प्रश्नों का उत्तर ही देना बंद कर दिया तो जवाब उसकी बहनों को देना पडा । अमिता को लगा जैसे सब उसकी जडें खोदने पर चले हैं । विभाग की धूम धाम में भी उसे कोई रस नहीं आ रहा था । विवाह लगाया जाने वाला एक ही बार बार उसके मांस को चल छोड देता था ये दे वो जब हम चली जाये बेटी बाबुल की थी उडाओ जगह उड जाए चिडिया वन वन कि बांधों जट्टू बन जाए गैया खूंटे की आम बाबुल की बेटी वन वन की चिडिया ही तो है जिससे जहाँ उडा दिया जाए वहीं उठना पडेगा । जिस खूंटे से वो उसे बांदे उसी पति रूपये छोटे से उसे बंद कर रहना होगा । उसे लगा वो भी घायल है । खूंटे से बंधी हुई उनकी से उसे कुछ लेना देना नहीं फिर भी उसे जिंदगी भर डोलना है । खूंटे के इर्द गिर्द गायिकी और भारतीय नारी की नियति एक ही तो है । विभाग के समय गीत ये गाया जाता है या कोई अन्य किंतु नमिता के कानों में तो यही गीत गूंजता रहा । यहाँ संपन्न हो गया । समझता विदा हुई और मेहमान भी एक दिन माने । एक अंत मुझसे पूछे लिया । हमने सुना है कि दामाद जी का कहीं और आना जाना है । कहीं सचिन, अमिता, नमिता मोहन रह गई । यहाँ तक भी बात पहुंच गई । मैंने आगे पूछा क्या घर पर कभी नहीं रुकते हूँ? उसने सपने मुस्कराते, अपने झूठ को छुपाने का प्रयास किया । कर रखते हैं तो अभी तक भी बच्चा क्यों नहीं हुआ? फॅमिली तो उसका जो पकडने आ रहा है । अचानक उसे उपाय सुझाव बोली । डॉक्टर ने कहा है मुझे कुछ एक ही बच्चा नहीं हो सकता । क्यों? क्या कमी है तो मैं तो डॉक्टर ही जाने । अच्छा हम यहाँ भी तुम्हारी जांच करवाएंगे । अब नमिता दोबारा चौकी बचाव का उपाय सोचने लगी पर कुछ नहीं सूझा । दूसरे दिन मैं उसे अस्पताल लेकर जाने की तैयारी करने लगी तो उसे सच उगलना बडा उससे कहा नहीं जा रहा था । पर उस ने कहा मुझे अच्छा नहीं हो सकता क्योंकि मेरी उनसे कुछ संबंध नहीं । ये सुनकर मांस तब रह गई उनकी आंखों से आंसू बहने लगे । थोडी देर आंसू बहा लेने के बाद शांत हो गई और आंचल से अपनी आंखें पहुंच की भी बोली । भरत ससुराल भी मन कैसे लगता है तो हंस पडी मन लगाने के लिए क्या एक वही हैं? फॅस है, देवरानी है । उनके साथ मतलब जाता है हाँ, लेकिन इन सब लोगों को सब कैसे मालूम हुआ? छुट्टी नहीं मिलती है । वहाँ के पहले भी तुम लोगों को सब पता था । हाँ, फिर होने लगी सकती हुई बोली नहीं मिट्टी, अच्छे घर और कमाओ वर्ग के लालच में तुम्हारे पिताजी ने बहुत जल्दबाजी में तुम्हारा विभाग कर दिया तो बहुत पछता रहे हैं । लेकिन हो सकता है अब तो बंद गए सो ही मोटी छोटी के लिए । तो इसीलिए सब कुछ देख सुनकर क्या है? पर तुम तो कुमारी की कुमारी ही रह गई । किसी तरह तुम्हारी गोद भर जाती तो चीनी का सहारा हो जाता है । उसका भी मन कर रहा था की माँ की गोद में भूल छुपाकर फूटकर रोए और उसने अपने आप को संयत कर लिया । मायके से विदा हुई तो फिर वहीं ससुराल का घर वही दीवारें अचला की गोद भरने वाली थी । उसकी इच्छानुसार उसे नित नई चीजें बनाकर खिलाई जाती हैं । नमिता ने भी शुभ काम में अपने सहयोग दिया, वो भी अच्छा की मनपसंद वस्तुएं बना बनाकर से परोसती । साथ ससुर, देवर सभी अचला की खातिर करने लगे । अमिता के मन में एशिया की भावना जाते हैं तो वो स्पीच को अंकुर आने से पहले ही कुछ डालती है । उस दिन वो चला के लिए मूंग की दाल के चीजें बनाने के लिए रसोई में रखी मिक्सी से मूंग की दाल पी रही थी । मनोहर बाबू ने कुछ पके आम लाकर में इस पर रख दिए तो मिक्सी बनकर आश्चर्य बोल पडी है इस मौसम में पकौडे यहाँ तो सब मुस्कुराकर बोले चला का मन था इसलिए खोज खासकर बडी मुश्किल समझ पाए हैं । समीर बेटी साथ पुरानी गाडियों से भावी शिशु के लिए कंधे सी रही थी । उन्हें शायद नमिता के चेहरे पर इंशा दिखाई थी तो बोल पडी तुमको सकती हूँ चाहती हूँ । अभी तक अपने पति को वश में कर लेती और एक दो बेटे बेटियों की मां बन जाती । ससुर चुपचाप चले गए । नमिता का सर हमने लगा वाॅकर सोचा है तो उसने अपना वो धन को भी उस काम बना लिया था और मोहन मिक्सी चलाती रही । सोचती रही पता नहीं सांस उसे गलत समझ रही है या फिर उनकी बडी बहुत से पोते पोती प्राप्त करने की इच्छा ही व्यंग्यबाण बनकर फट रही है । सांस के शब्द चाहती तो अभी तक अपने पति को वर्ष में कर लेती । उसके कानों में मिक्सी के स्वर्ग के साथ साथ पूछते रहे । फिर मन में प्रश्न को बडा क्या मिल कोई गाय है जिससे वो वर्ष में कर लेंगे । लगा गाय तो वो स्वाद ही है । इसे अनजाने में ही कुछ नियमों ने अनिल जबान दिया । फिर उसके कानों में पहन के विभाग में सुना । लोग की पूजा लगा । यहाँ घूमते ही की रसोई में जाकर उसने चले भी बनाए और अपनी भरी हुई आंखों का पानी बहाकर जी भी कुछ हल्का कर लिया । जब चला को चीजे खिला रही थी तो हमेशा की तरह मजाक का माहौल था । रात को तापसी दीदी का फोन आया । दो सप्ताह बाद उसकी मौके परीक्षा होगी । इस बीच में अपना शोध प्रबंध पडती रहे क्योंकि परीक्षितगढ उसी से संबंधित प्रश्न पूछेंगे मन में कर रही थी और ऊपर से आश्वस्त सी वो अपना शुभ प्रबंध पडती रही । देखते देखते दो सप्ताह बीत गए । मौके की हुई और वो उत्तरी घोषित कर दी गई । उसकी पसंद का अस्सी बोल रहे हैं परीक्षाफल की कॉपी, मिठाई का डब्बा और एक साल फोन लेकर जब घर पहुंची तो सबसे बहुत प्रसन्न हुए । सांस भी हरशद होठी अनिल तो घर में था ही नहीं । मैंने कहा कितनी से मिठाई से क्या होगा? भाभी आपको तो ढेर सारी मिठाई लानी चाहिए । नमिता हस्ती पर जब अपने कमरे में गए तो अच्छा भी उसके पीछे पीछे गई । मैं इस पर से उस पर शोध प्रबंध उठाकर कुर्सी पर बैठी नमिता के गोद में डालती हुई बोली सही बात की संतान है और संतान का पास क्या करेंगे? हस्ती हुई अच्छा चली गई । नमिता सोचती रही कितना बडा सच उगल दिया है चलाने । उसका विचार भूल ही तो उसकी संतान है । एक अद्भुत आनंद उमर आया । उसके चारों चलाने पुत्र को जन्म दिया । नमिता तो नहीं ना । शिशु बहुत प्रिय लगा । उसने उसका नाम नील रख दिया । घर में सभी को नमिता का दिया इनाम बहुत पसंद आया । पूरे परिवार का वो मानो खिलाना था । उसके दादा दादी और माता पिता तो उस पर जान छिडकते ही । घर पर कभी न रुकने वाला अनिल भी घंटों रोककर उसके साथ खिला कर पा । अमिता को पता नहीं क्यों एक व्यर्थता का बोर्ड होता लगता है जिससे वो कोई मेरा ठीक है । इसमें न कोई फल फूल है, न कोई ऊपर, कभी कभी मन की शांति बहुत बढ जाती तो खुद को कमरे में बंद कर लेती । खुद से सवाल जवाब करती रहती । मन शांत हो जाता है । तब बाहर निकल थी । घर के काम काज में भी अब उसका उतना मान नहीं रहा था । पत्र पत्र कहाँ पडने में ही आजकल उसका अधिक समय बीतता । दैनिक समाचारपत्र तो ससुर उसके लिए भिजवा नहीं करते । अब कोई नई बात देख रही थी कि अनिल भी कई तरह की पत्रिकाएं लाकर कमरे में रख जाता । शायद इस प्रकार उसके प्रति मूंग संवेदना व्यक्त करता । पठन सामग्री नमिता की कमजोरी थी । अनिल कहे उपकार उसने भी मूड भाव से ग्रहण कर लिया । पत्रिकाएं तो वह दिनभर पडती ही । अखबारों में नौकरी के कॉलम भी हाँ आजकल गौर से देखा कर दी । समय धीरे धीरे आगे बढ रहा था, उसकी हूँ निरंतर बढती जा रही थी तो सामाजिक सा नहीं रहता । प्रकृति परिवर्तनशील है तो मैं सवा एक जैसी नहीं रहती है । इसमें से लोग में ग्रीष्म के बाद पावस के बादल बढते या नंबर से । लेकिन पतझड के उपरांत वसंत के स्वागत के लिए विपक्ष नवीन पल्लवों के वक्त तो पहन ही लेते हैं । रात को जिस आंगन में कडाके की सर्दी पडती है, घर से निकल जाने पर वहाँ जाने में लोग घबराते हैं । सुबह उसी आने में गुनगुनी धूप मुस्कराकर उनकी प्रार्थना करती है । आखिर नमिता केश उसको होठों पर भी एक दिन हर्ष के मुस्कान खेलो भी लंबी प्रतीक्षा के बाद मनोनुकूल विज्ञापन उसने अखबार में देख लिया । उसी शहर के एक महाविद्यालय में फिजिकल कैमिस्ट्री के एक लेक्चरार की आवश्यकता थी तो आपके हाथों से उसने आवेदन पत्र लिखा और अपनी मार्कशीट और सर्टिफिकेट की प्रतिनिधियों के साथ भेज दिया । तापसी दीदी को भी फोन करके सब कुछ बदला दिया, पर हो रहा था । कई कई अनुभवी लोग भी आवेदन कर सकते हैं । तो फिर भला उसे कौन पूछेगा? उसका तो शायद सक्षात्कार के लिए भी बुला बनाए । नौकरी मिले या ना मिले, केवल सक्षात्कार के लिए ही बुलावा आ जाए तो कितना बढता रहेगा । कम से कम साक्षात्कार का तो अनुभव होगा । जिस निष्कर्ष की जटिलता के संबंध में वो सुनती आई है, जाने भी तो आखिर वह है क्या? घर में संबंध उसने किसी को कुछ नहीं बताया था । अच्छा किसी को पता भी कैसे चलता? तापसी दीदी को फोन भी उसने एकांत पाकर ही किया था । लोगों ने पता नहीं कैसी कैसी पैर भी लगा रखी होगी । उसका सहारा तो एक तापसी दीदी ही थी । उसने सोचा साक्षात्कार के लिए बुलावा आ दी जाए तो वो घर में किसी को बताएगी नहीं, क्योंकि उसने उन्हें अपना सेल नंबर ही दिया है । कहीं असफल रही तो उपहास का पात्र बन जाएगी और साक्षात्कार का फोन आएगा । सबको पता चल ही जाएगा क्योंकि घर में बिना बताए तो साक्षात्कार नहीं दिया जा सकता । यू तो नमिता के मायके से कभी कबार फोन आते रहते थे । कुछ दिन पहले जब मृदुल ने फोन पर बताया कि संचिता दीदी खुशखबरी सुनने वाली हैं । अब हम जल्दी मौसी का पद पाने वाली हैं । सुनकर नमिता को खुशी तो जरूर हुई थी, पर मैं जाने क्यों मन भारी भारी भी हुआ । आया था । अच्छा मैं उस दिन बार बार पूछा था क्योंकि आज आप दास दास क्यों हैं? हरिओमदास कहाँ हूँ? कहकर हसने की चेष्टा करते हुए उसने बात डाल दी । कुछ भी नहीं बताया कि कहीं चला उसे ईशान उन्हें समझ ले । बस उसके नील से खेलती रही । आजकल नहीं नहीं, उसके तनावभरे क्षणों का साथ ही था । उसके उत्साह बडी किलकारियों में अपनी चिंताओं को डुबोई रखती अचला नहीं । उसे नील को सौंप कर स्वयं निश्चिंत होकर सहकारियों में डूबी रहती हूँ तो सभी नील से खेलते थे । पर नमिता की समिति में ही उसके दिन का अधिकांश सा बीतता । दोनों बहुओं पर गृहस्ती का भार डालकर सांस भी अब अपने शरीर को आराम देती । कई दिन बीतने पर जब उसको फोन नहीं आया तो झुंझला उठे । मगर फिर भी प्रतीक्षा जारी रहे हैं और एक दिन आकर उसके पास फोन आया तो कुछ संतोष हुआ । ट्यूशन खुशखबरी भी कि अब मामा बन गया है । अच्छा समझता नहीं । पुत्री को जन्म दिया है । नमिता को बेहद प्रसन्नता हुई । शायद पीयूष को मामा बनने का बहुत शौक था । चलो उस की इच्छा तो पूरी हुई । उसने तभी अपने मोबाइल से स्वच्छता को बधाई दी । इसी तरह दिन बीतते गए तो जिस फोन का उसे इंतजार था, वो नहीं आया । नंदिता को लगा कि अब साक्षात्कार हेतु निमंत्रण नहीं मिलेगा । फिर भी रजय के किसी कोने में आशा का एक नन्द सितारा तब तक आ रहा था । इसके प्रकाश में उस सपनों के रंग बिरंगे चित्र भी बनाती । अगर साक्षात्कार के लिए फोन आ ही जाए तो उसे उसमें सफलता भी मिल जाए । तो क्या उसे नौकरी के लिए घर से अनुमति मिलेगी? सात सौ और कहीं नौकरी के नाम से ही बदल गए तो नौकरी तो नहीं कर पाएगी । ऊपर से गुस्से की हमारे उनका प्रेम भरा व्यवहार भी बदल जाएगा । अब वो क्या करेंगी तो घर में रहना और मुश्किल हो जाएगा क्योंकि उन्हीं का यही प्रेम तो उसे इस घर में रहने के लिए बाध्य कर रहा है । नाना फोन नौकरी का नाम भी नहीं लेगी पर चुपके से सक शताब्दी आएगी पर बुलावा तब ना वो भी शेख चिल्ली की तरह कल्पना के घरोंदे बना बनाकर कहाँ से कहाँ तक पहुंच जाती है । उसे खुद पर हंसी आने लगती है । बहुत दिनों के बाद देवर ने कचौरियों कि फरमाइश की पहले वो मांग को माध्यम बनाकर फरमाइश करता था तो अब अचला को माध्यम बनाकर वो दिन का खाना खा रहा था । अच्छा परोस रही थी नमिता समीर भी नील को लिए बैठी थी । वो चला से बोला खाना तो तुम अच्छा बनाती हो लेकिन धाबी जैसी कचौरियां तो मैं नहीं बनानी आती । अचला हस्ती हुई बोली अरे सीधे क्यों नहीं कहते कि आज शाम को भाभी के हाथ की कचौरियां खाने का मन है । वो हंसने लगा और नमिता भी । हसमुख की अचला तो हमेशा हस्ती रहती है । खाने का काम समाप्त होते ही अचला कचौरियों की तैयारियों में जुट गई । नलिन के आने से पहले ही उसकी कचौडियां तैयार खूब स्वाद लेकर उन्हें खाने लगा । उसकी सराहना का भी अपना ही ढंग था । अच्छा को संबोधित करते हुए बोला तो भी तो ऐसी कचौरियां बनानी सात जन्मों में भी नहीं आ सकती । अरे भाई, कोशिश करो कुछ सीखने की । बीवी जैसी बनने के लिए तो सात जन भी थोडे हैं । लेकिन दीदी अभी सिखाया तो कचौरी बनाने तो इसी जन्म में सीख जाउंगी । अपने स्वाभाव अनुसार बोलती बोलती वहाँ उसी की फुलझडी भी छोड दी जा रही थी । नमिता भी हंस पडी । नील को बोर्ड में लेकर बैठे । दादी माँ भी हम छुट्टी कितने में मनोहर बाबू आते दिखाई दिए । नमिता ने सोचा कि उन्हें भी कचौरी के लिए पूछेगी । एक है कि याद आया पिछली बार जांच के बाद डॉक्टर नहीं । उन्हें तली हुई चीजें खाने के लिए एकदम मना कर दिया है । तो मन मसोसकर रह गई । काम से निपटकर वो जैसे ही अपने कमरे में पहुंची तो उसका सेल बज उठा । सक्षात्कार का निमंत्रण मिलेगा की आशा तो मन में थी ही मगर अब समस्या घरवालों को बताने की थी । उसने हिम्मत जुटाई और ससुर जी के पास जाकर बोली । शहर के महाविद्यालय में एक लेक्चरर की जगह खाली है । पिछले दिनों मैंने वहीं आवेदन पत्र दे दिया था । आज वहाँ से सक्षात्कार के लिए कौन आई है? साक्षात्कार कब है जी परसों इतना सुनते ही सांस बीच में बोल पडी क्या? बहुत नौकरी करने जाएगी नमिता का जैसे पूरा शरीर का बुड्ढा दिन तो आशा के विपरीत ससुर जी ने कहा मिल जाएगी तो कर लेगी । इसमें हर्ज क्या है? बहु का मन भी लगा रहेगा और उसकी पढाई लिखाई भी कम आ जाएगी । नमिता का मन हुआ जाकर ससुर जी के चरण झूले उसके रोते हुए मन को एक नए ही प्रकार की शक्ति प्राप्त हो गई । नौकरी मिले या ना मिले ससुर जी की अनुमति तो मिल गई । मनोहर बाबू ने नलिन की ओर मुड कर कहा छुट्टी ले लो । आप भी को साक्षात्कार के लिए ले जा रहा नहीं । मैं स्वयं चली जाऊंगी । नमिता नहीं बढता से कहा अपने आत्मविश्वास पर उसे स्वयं आश्चर्य हो रहा था । अच्छा ठीक है कहकर ससुरजी चले गए । उसके मन में नया ही उत्साह भर गया । अचला ने उसके सामने कचौरियों की प्लेट लाकर रखती दोबारा खो दीदी अब तो आप प्रोफेसर बन जाएंगे । नमिता हस्ती भी कहा देखो क्या होता है उसका जी खबर आने लगा । पता नहीं साक्षात्कार भी क्या क्या पूछा जाएगा । एक से काबिल आएंगे शायद उसे नौकरी ना मिले । अचला ने सास के सामने पहले ही कचौरियों की प्लेट लाकर रखती थी कचौरियां खाती हुई सांस न जाने किस चिंतन मिली थी नौकरी की बात पर शायद भीतर से खुश नहीं थी किंतु ससुर जी की बातों का विरोध करने की भी उनकी आदत नहीं थी । देवर सहजभाव से हसते हुए अपनी कचोरियाँ समाप्त करके जा चुके थे । नमिता सोचने लगी मैं सब की प्रतिक्रियाओं की क्यों परवाह करूँ? जो होगा देखा जाएगा । अरे पहले साक्षात्कार तो देखा रहा हूँ शिक्षक कर के लिए जब वो महाविद्यालय पहुंची तो उसका सिर चकराने लगा । इतनी भीड मात्र कुछ पदों के लिए पता नहीं किन योग्य व्यक्तियों को एक साथ मिलेंगे । नमिता तो नहीं ही प्राप्त कर सकेंगी । फिसिकल केमिस्ट्री में तो एक ही था और उम्मीदवार थे पचासों महिला और पुरुष । उनमें से कुछ चेहरे जाने पहचाने से लग रहे थे । कुछ तो फॅमिली के साथ थे । कुछ से उसका परिचय शोध कार करते वक्त विश्वविद्यालय में ही हो गया था । कई लोग पीएचडी भी कर चुके थे तो अधिकांश लोग एनएसी ही थे । जो लोग साक्षत्कार जा रहे थे उसने उनसे पूछा कैसे प्रश्न पूछे जा रहे हैं । पता चला कि जो लोग पीएचडी कर चुके हैं, उनसे अधिकांश प्रश्न उनके शोध विषय से संबंधित ही पूछे जाते हैं । नमिता आश्वस्त हुई छोड विषय से संबंधित प्रश्नों के उत्तर तो दे ही देगी । एमएससी के विशेष प्रश्न पत्र से संबंधित प्रश्न भी पूछे जा रहे थे । देखें तो कितने प्रश्नों का उत्तर दे पाएगी और कितनों के नहीं । तापसी दीदी ने उसे समझाया था कि किसी प्रश्न का उत्तर नहीं मालूम हो तो उस उत्तर के संबंध नहीं । अपनी अनभिज्ञता स्वीकार करते हुए छमा मांग लेनी चाहिए । बिना जानकारी के उल्टा सीधा उत्तर देने से यही बेहतर है । सोचते ही सोचते, उसका भी बुलावा पहुंचा । घर पैदल से वो अंदर पहुंची । विशेषज्ञों की अनुमति लेकर वो उनके समक्ष बैठी । अभिवादन तो पहले ही कर चुकी थी । उसके सामने पांच पुरुष और दो महिलाएं थे । वो सब बारी बारी से उससे प्रश्न पूछते जा रहे थे और वो उत्तर देती जा रही थी । एक बार तापसी दीदी का बदला हुआ सूत्र भी काम में लाना पडा । कितने ही प्रश्न पूछे गए से न केवल शोर संबंधी एवं विशेष प्रश्न पत्र संबंधी । अब तो फिजिकल कैमिस्ट्री के अन्य आयामों से भी पता नहीं कैसे उसे सब याद आता रहा और वो बोलती रही । बाहर निकली तो पसीना बह रहा था । तीन चार दिनों के बाद शाम को वो रसोई में अपना मन रमा रही थी कि अचानक साल बजा तापसी दीदी का फोन था । चकला बेलन छोडकर फोन सुनने लगे जो कुछ सुना आश्चर्यचकित कर देने वाला था । नियुक्ति के लिए जो तालिका बनी उसमें पहला ना उसका था । पहला नाम, उसका उसका नाम सबसे ऊपर ये कैसे हो गया । आश्चर्य और खुशी के दामन ने उसकी रात आधी सोते हुए और आधी चाहते में भी थी । सुबह महाविद्यालय का चपरासी नियुक्ति पत्र लेकर आया तो सारे घर में समाचार खुल गया । ससुरजी रसगुल्ले का डब्बा लेकर आए । अच्छा नहीं सबसे पहले उसी के मुॅह हो जाएगा और उससे ये हो । आवास नहीं था तो सोच रही थी कल से उसे महाविद्यालय में अपना कार्यभार संभालना है । कौनसे कपडे पहनकर जाएगी । वो कपडों की अलमारी खोलकर बैठ गए । बहुत भरी साडी तो अच्छी नहीं रहेगी और बहुत हल्की भी नहीं । आखिरकार एक सूची कडाई की हुई साडी उसने निकली ख्याल आया इतने दिन चुन चुनकर पहनेगी अब रोज तो महाविद्यालय जाना है ही जाना है छूटकर एक सहमंत्री उठी बदन में नहीं जाने कैसा होगा? वहाँ का माहौल कैसे होंगे? सब लोग उसने जाने की सुरक्षा को पढाना है । क्या पढाना है ऐसे होंगे उसके छात्र का बडा पाएगी उन्हें नहीं । कक्षा में जाकर कुछ नहीं बोल पाई तो तब क्या होगा उसका हृदय का आपने लगा दर्शन अमन को सांत्वना दी । सक्षात्कार में जब इतने लोगों के सामने बोल सकें तो कक्षा में क्यों नहीं बोल पाएगी? दूसरे जब टैक्सी से उतरकर महाविद्यालय की और जा रही थी उसके पांव आगे नहीं बढ रहे थे । कहीं साथ ही प्राध्यापकगण उसका उपहास तो नहीं करेंगे तो और भास्कर ने योग्य तो उसमें कोई बात नहीं डरते । डरते उसमें स्टाफ रूम में प्रवेश किया । वहाँ लम्बी में इसके चारों और कुर्सियों पर शिक्षक शिक्षिकाएं विराजमान थे । कोई लिखने पढने में लगा था तो कोई बातचीत में उसको किसी ने कुछ कहने पूछने का साहस नहीं हुआ । वो चुप जहाँ पे एक कोने में खडे रहे हैं । अचानक एक शिक्षक ने पूछा आपको किस से मिलना है? उसने समीप जाकर अपनी नियुक्ति की बात बता दी । शिक्षक ने मुस्कराकर कहा मैं भी आप ही का विषय पढाता हूँ । मेरा नाम राजीवलोचन है चले अन्य लोगों से भी आपका परिचय करवा लूँ । फिर राजीव जी ने खडे होकर उच्च स्वर में कहा ये है हमारे कॉलेज परिवार की नई सदस्या डॉक्टर नमिता बजाज । नमिता ने हाथ जोडकर सबसे नमस्ते कहा । उत्तर में अन्य लोगों ने भी हाथ छोडे । राजीव और एक महिला प्राध्यापिका के बीच में एक खाली कुर्सी बडी थी । महिला प्राध्यापिका ने हाथ से संकेत किया कि वह कुर्सी पर जा बैठीं । राजीव ने बताया ये है हमारी विभागध्यक्ष । डॉक्टर श्रावणी भट्टाचार्य । नमिता ने उन्हें उन्हें नमस्कार । क्या बोली मैं समय सारिणी आपको बात दें दूंगी । आप पहले अपनी ज्वाइनिंग रिपोर्ट लिख कर प्राचार्य साहब को दिखाइए । तापसी दीदी के निर्देश पर वह जॉइनिंग रिपोर्ट घर से ही तैयार करके लाई थी । जॉइनिंग रिपोर्ट लेकर वह प्राचार्य के कमरे में पहुंची । वही कमरा था जिसमें उसने साक्षात्कार दिया था । प्राचार्य अपनी कुर्सी पर बैठे उन पर किसी से बात कर रहे थे । उसे देखकर पहने का संकेत क्या । फोन रखते ही नमिता ने अपना ज्वाइनिंग रिपोर्ट उनके सामने रख दी । उन्होंने ज्वाइनिंग रिपोर्ट पर सरसरी निगाह डालकर ओके कर दिया है । अपना चश्मा ठीक करते हुए बोले ऐसा लग रहा है यहाँ नमिता खबर आई क्या बोलेंगे तो बोली ठीक लग रहा है । यहाँ बहुत राजनीति चलती है । प्रसाधन रहेगा हूँ ही चलती है । कहाँ हो सकता हूँ आपके स्टाफ रूम में और कहाँ ऍफ रूम में? खान मैं मैं भी तो स्टाफ रूम का हिस्सा हूँ । उसने अपने आप से कहा । प्राचार्य महोदय को जी धन्यवाद कहकर वापस स्टाफ रूम में चली आई । सोचती रही कि कौन करता है यहाँ राजनीति कैसी राजनीति स्टाफ रूम में चार और नए लोगों से उसका परिचय करवाया गया । वो भी उसी दिन । विद्यार्थियों को पढाने का नया कार्यभार अपने कंधों पर वहन कर रहे थे । उन के विषय भिन्न थे आपने विभाग में राजीवलोचन उसे भला आदमी लगा वही उसने पुस्तकालय ले गया । वहाँ पुस्तकालयाध्यक्ष से उसका परिचय करवाकर उसे पुस्तकें दिलवाई । श्रामणी दीदी ने उसे समय सारणी दे दी । दूसरे दिन सबसे कक्षाएं लेनी थी । घर जाकर होता लक्षण तैयार करने में जुट गई । फिर भी मंदिर भाषण के था । पता नहीं आ पाएंगी या नहीं । नमिता कक्षा के समय से काफी पहले ही महाविद्यालय पहुंच गई । अपने वक्तव्य को उसने कई संक्षिप्त सूत्रों में एक कागज पर नोट कर लिया था । उन सूत्रों को बार बार देखकर वह नहीं याद कर लेना चाहती थी ताकि कागज बिना देखे ही पढा सके । घंटे लगने पर विभागध्यक्ष राजीव से कहा कि वह नमिता को क्लासरूम दिखा दे । राजीव के प्रश्नों का अनुमान से उत्तर देती हुई वो क्लासरूम की और जा रही थी । रजय का कम्पन पडता जा रहा था । हो रही थी यदि छात्र छात्राओं के बीच जाकर कुछ बोल ही नहीं पाई तो नहीं, ऐसा नहीं हो सकता हूँ । उसने अपने आप को संभाला । तू कब जा रही है? टूटने पर विश्वास हो रही है । नहीं नहीं उसे हौसला रखना ही होगा । हिम्मत बंधते ही उसका ध्यान राजीव की बातों की और गया अभी तक जो अर्थ पर ध्यान दिए बिना ही वहाँ कर रही थी । राजीव कह रहा था विद्यार्थियों का ध्यान बांधे रखने के लिए आवश्यक है कि आप भी हस्ती हंसाती रहें । गलियारे में आगे आगे कुछ छात्र भी जा रहे थे था । राजीव धीमी आवाज में बोल रहा था । नमिता ध्यान लगाकर सुन रही थी । पहली कक्षा बहुत महत्वपूर्ण होती है । आप इस कक्षा में जम गयी तो समझ लीजिए जिंदगी भर के लिए जम गयी । देखिए क्या होता है, होना क्या है जो होगा अच्छा ही होगा । बस आप नर्वस मत हुई है । हाँ, यदि छात्र शोर मचाया तो आप खूब तेज आवाज में बोलिए । इतनी तेज आवाज में डाटकर बोलिए । उनका शोर तब कर रहे जाएंगे । काटना भी पडेगा । छात्रों को यह एहसास हो जाने दे की पढाई के समय कब पकडना आपको बिल्कुल बर्दाश्त नहीं मैं जरा भी चूचा करे तो अब तुरंत रोक दें । आज ही नहीं हर साल जब नहीं छात्र छात्राएं आए तो आपको यही सूत्र अपनाना पडेगा तो आपके ही सूत्र अपनाते हैं फॅस पडेगी हाँ ये सब को करना ही पडता है । एक बार डांटने में शक्ति तो अवश्य रखती है और फिर पूरे घंटे आराम से पढाया जा सकता है । जी धन्यवाद फिर प्रसून तक लोग चुप चाप ही चले ऍम मंच पर चढकर उसने अपना पाॅल पुस्तक गरीबी से मेज पर रख दिए । सामने लगभग चालीस छात्र छात्राओं की भीड उसकी और उत्सुकता से देख रही थी । मंच पर उसके निकट खडे राजीवलोचन ने खास अंदाज में उसके और विद्यार्थियों के बीच की दूरी होता है । क्या आज आप लोगों के लिए बहुत खुशी का दिन है । आपके समक्ष आपकी नई प्राध्यापिका डॉक्टर नमिता बच्चा इनकी विद्वता और नम्रता का परिचय तो इनके लेक्चर से मिल जाएगा । अच्छा मैं चलता हूँ । अब आप लोग अपने परिचय का क्षेत्र विस्तृत कीजिए । राजीव के जाते ही सामने की बेंच पर बैठे कुछ विद्यार्थियों ने पूछा कि वह क्या पढाएंगे और किस किस दिन उनकी कक्षा लेंगे । नमिता ने बता दिया और फिर उपस् थिति लेकर अपना लेक्चर प्रारंभ कर दिया । बिना रुके वो बोलती ही गई, बोलती ही गई । छात्र छात्राएं भी बीच में बिना कुछ बोले सुन रहे थे । जब ठंडी लगी उसका ध्यान टूटा । क्लासरूम से जब बाहर निकली उसके पांव धरती पर नहीं पढ रहे थे । उसे लग रहा था वो कोई नई ही नमिता है । मुट्ठी में दबे लेक्चर के सूत्र लिखे कागज के टुकडे को उसने कैलरी के कोने में रखे कूडेदान में फेंक दिया । एक नया आत्मविश्वास उसमें जहाँ पडा था, स्टाफ रूम में जाकर उसमें रोमांस अपना पसीना पहुंचा । चेहरे पर प्रसन्नता के भाव लिए उसने में इस पर रखे अखबारों में से एक उठा लिया और पडने लगी । कैसा लगा इसी समय विभागध्यक्ष ने आकर धीरे से पूछा बहुत अच्छा तो पूरे आत्मविश्वास से बोली चाहूँगी कि बैठ कर कुछ पडने लगी और लोग भी बैठ कर पढ लिख रहे थे । कुछ बातें भी कर रहे थे । नमिता की एक क्लास खाली थी । उसके बाद उसे अगली क्लास में प्रति वर्ष के विद्यार्थियों को पढाना था । अभी तो वह द्वितीय वर्ष के विद्यार्थियों को पढा कराई थी । अब उसे किसी प्रकार का भय नहीं लग रहा था । घंटे लगने पर राजीव जी आपका हुआ आया ऍम हाथ में था । शायद वो कक्षा लेकर आया था । यहाँ को फाइनल ईयर की कक्षा तक छोडा हूँ । उसने रजिस्टर मेज पर रखते हुए पूछा नहीं नहीं मैं स्वयं चली जाऊँ । वो उठ खडी हुई हैं । इस बार वो स्वयं विद्यार्थियों को अपना परिचय दे सकेंगे । इतनी हिम्मत आ गई थी उसमें क्लास रूम में जाकर विद्यार्थियों को अपना नाम बताते हुए उसने अपना लेक्चर शुरू कर दिया । विद्यार्थी मंत्रमुग्ध होकर से सुन रहे थे । अंत में उपस्थिति लेने लगी तो उसे लगाकर फिर से छोटी सी बच्ची बन गई हैं और अपने स्कूल की कक्षा में गिनती का अभ्यास कर रही हैं । स्कूल की छोटी कक्षा के अंतिम घंटे में सबको पंक्तिबद्ध खडे होकर गिनती का अभ्यास करना पडता था । पहले शिक्षक बोलते हैं और फिर वो सब वो सामूहिक गिनती थी । कितना आनंद आता था यहाँ वो अकेली ही गिनती पड रही थी । छात्र छात्राएं जी हाँ जी हाँ उपस् थित क्या यस मैडम की हुंकार लगाते जा रहे थे और रजिस्टर के रिक्त खाने भर्ती जा रही थी । कहाँ वह बचपन का सरस सजीव गिनती और कहाँ यांत्रिक करना? और पढाने में तो कितना आनंद आया । लगा जैसे उसके भीतर भरा हुआ कोई कुमार बाहर निकल रहा हूँ । हलकी महसूस कर रही थी । अगले दिन उसने तृतीय वर्ष और प्रथम वर्ष की कक्षाएं आपको लगभग सभी विद्यार्थियों को अपने लक्ष्य से प्रभावित कर चुकी थी । उसे अपनी नस नस में खुशी का बहुत हो रहा था । बता रही थी उसकी वाणी की मधुरिमा का परिणाम था या भावों की गरिमा का । उसे किसी भी कक्षा में किसी प्रकार की परेशानी नहीं उठानी पडी । सुबह आठ बजे घर से निकलती है और शाम को चार बजे घर लौट आते हैं । पहले दिन घर लौटने पर उसने अपने आप को काफी थका थका महसूस किया था और दूसरे दिन ऐसी थकावट भी नहीं लगी । आते ही फैसला ने पूछा तेजी आपने चाय बना दूँ? नहीं नहीं अभी कोई जल्दी नहीं । जब बाबू जी देवर जी और सबके लिए चाय बना होगी तभी मैं अपील होंगे । कहकर वो भी अच्छा के साथ नाचना बनाने के काम में जुट गई । अच्छा तो बार बार मना कर दी रही कि अभी आप थक कराई हैं, आराम कीजिए लेकिन वो नहीं माने । राष्ट्रीय का काम समाप्त करके वो अपने कमरे में जाकर दूसरे दिन के लिए लेक्चर तैयार करने लगी । अनिल कमरे में आकर शिंगार मेज के दर्पण के सामने अपने बाद समाज में लगा प्रेमिका के घर जाने की तैयारी ये तो रोज ही कर कार्यक्रम है नहीं बात किया है उसी प्रकार अलग थलग भाव से मेज पड चुकी लिखती रहेगी बचाना पति उसके समीप आ खडा हुआ देश पर रखी उसकी पुस्तकों में एक के पृष्ठ प्रस्तावा बोला सुना है तुम नौकरी करने लगी हो हाँ नमिता निकल अब लोग कर रहा हूँ मैं नौकरी करने की क्या जरूरत है? किस बात की कमी है तो मैं घर से बाहर नौकरी करने जाओगे । समीर यह कर वो हल्के से मुस्करा नहीं । अनिल थोडी देर खडा रहा हूँ । शायद उसे प्रतीक्षा थी कि नमिता कुछ और बोलेगी । पर नमिता भरी मुस्कान लिए आपने लिखने के काम में टूट गयी । वो निराश डॉक्टर लौट गया । अनिल कर चले जाने के बाद नमिता ने सहजभाव से अपना लेखन कार्य पूरा किया और फिर काम में जुट गई है ।

नाज़ुक बंधन भाग - 03

परिश्रम जीवन पुष्य का पराग है तो पारिश्रमिक है उसकी सुगंध । परिश्रम से तन मन खिल जाता है तो पारिश्रमिक से वो मैं उठता है । अगले महीने जब नमिता को वेतन मिला उसकी खुशी का ठिकाना ना रहा हूँ । अपनी पूरी योजना के अनुसार अपनी सहकर्मिणी मधुमिता को लेकर वो बाजार गई । वहाँ स्माॅल की एक साडी ससुर के लिए सफारी सूट का कपडा, सील के लिए खिलौने, अच्छा के लिए दादर पर्स और अन्य सबके लिए मिठाई का डब्बा लिया । जबसे उसने अध्ययन कार्य प्रारम्भ किया था सांस कुछ गंभीर ही रहती थी तो आज साडी देखते ही उनकी गंभीरता का आवरण टूट पडा । वो पहले की तरह हस हस कर नमिता से बातें करने लगी । चलाने पास देखा उसकी खुशी का ठिकाना ना रहा नहीं के साथ किलकारियां भर रहा था । शाम को ससुर जी जब घर आए तो नमिता ने सूट के कपडे के साथ साथ हूँ । बचे हुए पांच सौ के नोटों में से कुछ तो उनके सामने रखती है । यह देखकर मुस्कराए । सूट का कपडा तो बहुत अच्छा है । मैं जरूर ऍम रुपयों का मैं क्या करूँ । इन्हें तो बैंक में जमा करती हूँ । भविष्य में तुम्हारे ही काम आएंगे । नवैतानि चुपचाप पैसे उठाकर पास में रखें और दूसरे दिन बैंक में अपना खाता खोलकर जमा कर दिए । दूसरे दिन कॉलेज में लंच ब्रेक के वक्त जब अपना टेंशन खोल रही थी तो उस पर बस अचला का स्मरण हुआ हूँ । कितनी नहीं भाव से उसके लिए खाना बनाकर टिफन में रखती थी । सप्ताह की किस दिन नमिता कितने बजे महाविद्यालय जाएगी आएगी योजना को अच्छी तरह हो गया था । नमिता के तैयार होने से पहले ही उसका टिफिन उसके मैच पढना कर रख लेती हूँ । आज तो मंगल है अब जल्दी घर लौट आएंगे इसलिए थोडा सा खाना रखा है । क्या कहती है शुक्रवार देर से घर आएंगी । इससे ज्यादा पराठे रख दिए हैं । उसका दिया हुआ थोडा खाना भी नमिता के लिए अधिक हो जाता था । फिर अधिक का तो कहना ही क्या । वो और मधुमिता साथ बैठकर खाना खाया कर दी । मधुमिता कंप्यूटर साइंस की प्राध्यापिका थी । उसकी नियुक्ति भी नमिता के साथ ही हुई थी । सुभाव था तो में मित्रता स्थापित हो गई थी । दोनों मिल बांटकर अपना ऍम खाती हूँ । राजीवलोचन भी अक्सर साथ आकर बैठता । कभी ऍम साथ रहता हूँ कभी नहीं कहता । आज तो कैसी हो गई तभी कहता । आज तो मेरा आता ही गिला हो गया । गुस्से से मैंने खाना ही नहीं बनाना आता । उठाकर फेंक दिया और गैस के ऊपर पानी डाल दिया । उसकी ना समझी बडी बातों पर दोनों को हंसी आ जाती है । दोनों ही अपने अपने टिफिन उसके आगे बढाती । वो नाना करता भी थोडा बहुत खा ही लेता हूँ । उसके अपने टिफिन में अक्सर ही की वस्तु रहती है । जहन लगी पावरोटी अमिता कहती मुझे जहाँ लगी पावरोटी बहुत अच्छी लगती है और वह एक दो टुकडे ले लेती है । मधुमिता को शायद पावरोटी उतनी पसंद है । धीरे धीरे राजीव रोजी उनके साथ बैठने लगा । आपने दे फिर निकाल कर मेज पर रखता । नाम था उसका डब्बा खोलकर एक दो टुकडे पावरोटी आपने डब्बे में रखते हैं और आपने कब देगा? फिर खाना उसके डब्बे में डाल देती है । मधुमिता को अदला बदली शायद उतनी पसंद नहीं थी । उसका टिफिन में खुल के और आलू की सब्जी रहती है । ममता के आग्रह पर कभी कभी वह लिमिटेड से थोडा आचार या फिर कभी कोई और चीज पहले उसके अनुरोध पर नमिता देश की सब्जी चकली थी । मधुमिता की एक आदत थी वो ये कि अपने से संबंधित बातें तो हूँ कह के टाल जाना होगा । पर दूसरों के जीवन रहस्य खुद खोदकर पूछना नमिता के बारे में तो पूछती ही थी, राजीव की जिंदगी के बारे में भी उसके मुंह से उगलवा लेती थी । धीरे धीरे नमिता जान गई । राजीव भी कम तूफान से नहीं गुजरा है । जहाँ बचाने के बाद ही वो अविवाहित था और पत्नी के होते हुए भी मधुर सच जीवन जी रहा था । उससे उन दोनों के सामने वहाँ की गठरी खोली बैठा । शिक्षा प्रेमी राजीव चाहता था शिक्षिका पत्नी उसने अपने मन की बात अपने माता पिता को बता दी दी थी तो पिता चाहते थे दहेज भी मोटी रकम हूँ जबकि राजीव को बिना दहेज विभाग करने की चाहते है । माँ को मध्यस्थ बनाकर उसने पिता को समझाने का प्रयास किया । पता अपनी बात पर अडे रहे । उनका कहना था कि जब उन्होंने अपनी बेटियों के विवाह में दहेज दिया है तो खिला बेटे के बिहार में क्यों न लें । पिता की इच्छा के विपरीत नजीब कुछ नहीं करवाया । अच्छी पढी लिखी लडकियों के रिश्ते चलते रहे । अंत में शादी तय हो गई । एक ऊंचे घराने में माता पिता ने लडकी देखी थी । उससे लडकी देखने को कहा गया तो उसने ये प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया । क्योंकि आपने लडकी क्यों नहीं देखिए । नमिता पूछ बैठे हैं राजीव फंसा । जब माँ बाप की मर्जी से ही विवाह होना था तो मैं बीच में क्यों पडता है? तो वहाँ तो आपका होना था । मधुमिता बोली उसके चेहरे पर पीडा उभर आई । बोला आप लोग नहीं जानती हमारे समाज में माता पिता पुत्र के लिए जीवन संगिनी नहीं घूमते । वो तो खोजते हैं अपने घर के लिए । लक्ष्मी लक्ष्मी के दोनों अर्थ समझ कर नमिता को मन ही मन ही आ गई है । उस पर कुछ नहीं बोली । राजीव इतना दुखी लग रहा था कि नमिता या मधुमिता उससे और कुछ नहीं पूछ पाएंगे । लंच ब्रेक भी समाप्त हो रहा था । घंटे लगने ही वाली थी । अभी मेरी क्लास है क्या कर राजीव चला गया वो दोनों भी उठ खडी हुई । राजीव के भीतर जीवन की खिडकी खुली ही रह गई । कॉलेज भी परीक्षाएं चल रही थी । छात्र छात्राएं तो लिखने में डूबे रहते हैं तो शिक्षक शिक्षिकाएं उनका पहला देते थे थे परेशान हो जाते हैं । पढने वाले तो तेजी से कदम चलाते तो चोरी की ताक में रहने वाले अपने दांवपेच बडा नहीं । नमिता लाख प्रयत्न करके भी किसी की चोरी नहीं पड पाई । पर मधुमिता जाने किस विद्या के प्रभाव के परीक्षार्थियों के चेहरे पढ लेती थी । वो जिसे उठाकर तलाशी देती उसी के पास दो चार चिट पुर्जे मिलेगी जाते । नमिता तो एक दिन और भी बेवकूफी कर बैठी । एक लडकी ने उससे कहा कि वह बीमार है, बैठ कर नहीं लिख पाएगी । उसके लिए लेटकर लिखने का प्रबंध कर दिया जाए तो अच्छा हो । सात के निरीक्षक शिक्षक शिक्षिकाएं मना कर रहे थे, लेकिन अमिता के आग्रह पर उसके लिए दरिये तक की की व्यवस्था की गई । नंदिता नहीं एक और उसके लिए दरी तकिया लगवा दिया । उस पर निभा रखने की जिम्मेदारी भी नमिता पर यहाँ पडी । परीक्षा के उस कमरे का चक्कर लगाती हुई बीच बीच में उस पर नजर डाल देते हैं । शुरू के दो घंटे तो कुछ पता नहीं चला । तीसरे घंटे में उसे कुछ संदेह हुआ । उसने देखा लडकी कभी कोई दवा तकिये के नीचे रखती है तो कभी कोई दवा निकालती हैं । कभी कोई दवाब वेरोवाल में रखती हैं । अमिताभ को निर्णय लेने में देर नहीं लगी । उस लडकी से रुमाल मांगा । वो देने में आनाकानी करने लगी । इसमें दवा है दीदी और कुछ नहीं तो मुझे वो माल दोना नाॅट कर कहा और रुमाल उसके हाथ से ले लिया । पूरे रोमान में छोटे छोटे अक्षरों में संभावित प्रश्नों के उत्तर सूत्ररूप में लिखे हुए थे । फिर उसमें क्या उठाया । उसके नीचे भी दवाओं के साथ कुछ पर्चियां पडी हुई थी । नमिता ने उससे कॉपी ले ली । लिखे हुए उत्तरों से पडसियों को मिलाया गया । बहुत कुछ मिल रहा था । नमिता कॉपी, पर्चियां और रोमान लेकर पर ये शिक्षकों के पास जा पहुंची । शिक्षकों ने लडकी को परीक्षा से निष्कासित करने का निर्णय लिया होने लगी । उसके रोने के इस हथियार से नमिता और अन्य कुछ शिक्षक शिक्षिकाएं पहुँच गए । लडकी द्वारा छमा मांग ले जाने पर उसे एक नई कॉपी दे दी गई । परीक्षा समाप्त होने में अब केवल आधा पौन घंटा ही शेष रह गया था । इतने कम समय में वो एक खास प्रश्न का उत्तर ही लिख पाई । चोरी करके उसने अपने ही पांव पर कुल्हाडी मार ली थी । प्रारम्भ से ही यदि उसने अपने मन से प्रश्नों का उत्तर लिखे होते तो कुछ भी पहले पडा होता है । उस आधार पर शायद उत्तर इन्होने लायक अंक ले आती है तो अब वो भी संभव नहीं था । दूरी वाली कॉफी नमिता के पास उसे पढकर नमिता ने अंदाजा लगा लिया था छात्रा उतनी बुरी नहीं है । उस की लिखावट सुंदर थी और भाषा शैली भी बहुत प्रसिद्ध नहीं । यदि उस लडकी ने दूरी पर भरोसा न करके थोडी सी मेहनत की होती तो बहुत अच्छा आंकडा सकती थी । लेकिन जिनके मुझे एक बार चोरी का खून लग जाता है वो पढाई में ध्यान ना लगाकर चोरी करने के नए नए तरीके खोजने में अपनी बुद्धि खर्च करते हैं । बाद के पत्रों में वो लडकी घबराई, घबराई रहती, निगरानी भी उस पर कडी रखी जाती है । परीक्षा की समाप्ति पर नमिता उसकी कॉपी जरूरत कर देखती है और पार्टी किसने सभी प्रश्नों के उत्तर लिखे हैं और वो अधिकांश कहा सही भी है । अन्य छात्र छात्राएं तो पहले चोरी करते पकडे गए पर आप जिन्हें चोरी करने की छूट नहीं मिल पा रही थी उनकी कॉपियां भी नमिता बीच बीच में देखती है और पार्टी उन्होंने बिना चोरी किए भी कोई उत्तर बहुत बुरे नहीं देखे हैं । हाँ जिन्होंने एकदम भी पढाई नहीं की है उन्होंने या तो अधिकांश प्रश्नों के उत्तर गलत लिखे हैं या फिर लिखे ही नहीं है । नमिता ने एक निष्कर्ष निकाला, कुछ विद्यार्थियों को चोरी की लत लग जाती है । पढने लिखने में वो सभी मंदबुद्धि नहीं होते । चोरी का आसरा छोडकर वो थोडा सा परिश्रम करें तो अच्छे विद्यार्थियों की श्रेणी में आ सकते हैं । नमिता और मधुमिता दोनों ही राजीव की कहानी आगे जानने के लिए उत्सुक थे तो परीक्षा के बाद सब अपने अपने घर जाकर खाना खाते हैं ना साथ बैठकर खा पाते और नहीं कहानी सुन पाते हैं । कुछ दिनों बाद नमिता और मधुमिता को मनचाहा अवसर मिल ही गया । पहले दिन में एक ही प्रश्नपत्र की परीक्षा हुआ करती फिर दो दो प्रश्नपत्रों की परीक्षा होने लगी । प्रथम पत्र सुबह नौ बजे से बारह बजे तक होता तो दूसरा दिन में दो से पांच बजे तक । पहले प्रश्नपत्र कि कॉपियाँ जमा करते करते समय बारह बज जाते हैं । दूसरे प्रश्नपत्र के लिए उन्हें पौने दो बजे परीक्षा विभाग में उपर सपना पडता है । बीच के डेढ घंटों में वे तीनों पूर्व साथ बैठकर खाने लगे । मौका देखकर एक दिन मत बता ने पूछा आपकी पत्नी कहाँ रहती है अपने मायके में क्यों? अमिता ने पूछा हूँ उस सब एक लंबी कहानी है । राजीव हस्तिया फिर बोला, सुनना चाहती हैं तो सुनिए दोनों सुनती रही राजीव सुनाता रहा मेरी पत्नी का नाम है । शोभना नाम के अनुरूप सुंदर तो नहीं है पर असुंदर भी नहीं है । तो ऐसी सुंदरता होती है मन की तो शायद उसमें नहीं है । पढाई लिखाई कुछ खास नहीं किए । स्कूल तक की बडी है कॉलेज नहीं गई । पैसे लक्ष्मी की कृपा हो और सरस्वती की कृपा न हो तो भी चल जाता है । तो लक्ष्मी का अगर अपने को भी नष्ट करता है और दूसरों को भी क्यों क्या हुआ? मधुमिता ने प्रश्न किया । नमिता चुपचाप सुन रही थी, राजी बोलता गया । उसे बहुत धवन था । वो मायके सिर्फ टीवी ए सी सबकुछ लाये क्या बहुत अमीर है । शोभना जी के मायके वाले बहुत अमीर तो नहीं है । अपना मकान है, कोयले का बिजनेस करते हैं, कमाते खाते हैं मेरे पिता जी की फरमाइश पर उन्हें नगद रुपयों के साथ ही सामान भी देना पडा । छोडना बात बात पर ये दिखाती रहती है । घर में जो कुछ भी सुख सुविधा आई है उसी के साथ आई है और हम लोग क्या थे? उनका ऐसा व्यवहार आपके साथ था । ये आपके माता पिता के विचार मेरे ही साथ था । उन से तो कुछ नहीं कहती थी । क्या आप उन्हें एक बार भी अपने साथ यहाँ नहीं लाए? इस बार प्रश्न अमिता ने किया । लाने की बात पर ही तो सब कुछ हुआ क्या हुआ? मैं चाहता था कि वो अपने दहेज का सामान यहाँ ना लाए । मैं अपने परिश्रम की कमाई पर विश्वास करता हूँ । धीरे धीरे मैं भी फ्रेश टीवी आदि खरीदी लेता और वह सब कुछ वहीं से ले आने पर पडी हुई थी । वहाँ से ले आने में शायद आपके माता पिता को भी खतरा होता हो सकता था क्योंकि वो उन वस्तुओं को बहुत शौक और गर्व से प्रयोग में लेते थे । जबकि मुझे उन वस्तुओं को हाथ लगाने में भी अपराध का बोर्ड होता था । आप बहुत सिद्धांतवादी है । मधुमिता बोली और धारू थी । नमिता ने जोडा हो सकता है वो हजार फिर बोला मुझे बहुत अफसोस होता है कि मैं दहेज के बाजार नहीं विकास हूँ । मैंने अपने पिता का विरोध क्यों नहीं किया? नमिता बोली पर अपने अपने विचारों और भावनाओं का सौदा नहीं क्या काम है आपकी पत्नी आपके साथ नहीं आए हैं? मधुमिता ने प्रश्न चला ना? उसका कहना था की फ्रिज के पानी के बिना उसकी प्यास नहीं । मुझे टीवी और विश्व के बिना भी उसका मन नहीं लगता हूँ । फिर की सब चीजें मैं तुरंत नहीं खरीद सकता था । अगर वो नहीं आई मैं भी वहाँ नहीं गया हूँ । चार वर्ष बीत का इन सब बातों को सुना है वो अपने मायके में रहने लगी है । बुलाने पर भी सुना नहीं आती हूँ । आप फिर मिले नहीं, उनसे ना अपने माता पिता के पास जाते होंगे । नमिता ने पूछा कहीं नहीं जाता हूँ, मैं तो वैसे ही रहता हूँ । फिर हस दिया आगे बोला हूँ और कुछ मत पूछेगा । मैं वाकई बहुत थक गया हूँ । उसके बाद कुछ दिनों तक इस विषय पर और कोई चर्चा नहीं हो पाई । जब दो विपरीत लिंग के व्यक्ति अक्सर मिलने लगते हैं । लोग समझे कि आप में चलने लगते हैं । ऐसी संदेह से बचने के लिए नमिता मधुमिता को अपने साथ लगती थी । राजीव के साथ बैठकर रंच खाना हो या कैंटीन में चाय पीनी हो वो मधुमिता को अपने साथ लगाये रखते हैं । फिर भी लोग बातें बनाने से बाज नहीं आए । पहले महाविद्यालय में कानाफूसी होती रही, फिर बाहर भी चर्चा चलने लगी । लोग मधुमिता से कुर्वीत पुलिस कर पूछते नहीं नमिता और राजीव का कुछ चक्कर तो नहीं चल रहा है । मधुमिता कहती नहीं, ऐसी तो कोई बात नहीं है । फिर भी लोगों को विश्वास नहीं होता । वो सब कुछ नमिता को बता देती है । जिसमें पूछा तो कल उसने पहले ममता को क्रोध आता था । फिर हसी आने लगी । उसमें कोशिश की । राजीव के साथ अधिक मिले । चले नहीं । पर ऐसा हो नहीं पाया । वो और मधुमिता अकेले ही खाने बैठ जाते हैं तो राजीव मानना मान मैं तेरा मेहमान की तरफ । बीच में आप बैठता, कैंटीन में चाय पीने बैठती तब यही हाल होता ना समझ और सीधे साधे राजू वो समझाए भी तो क्या समझाए अंतिम उसमें कैंटीन में चाय पीना बहुत कम कर दिया । चाय पीने के लिए वो ऐसे मौके तलाशती जब वो और मधुमिता खाडी रहती और राजीव अपनी कक्षाएं लेता रहता हूँ । ऐसा मौका किसी किसी दिन ही मिल पाता हूँ । घर जाकर वो अक्सर अचला के हाथ की चाय देंगे तो वो हमेशा ही नमिता के कॉलेज जाने पर चाय के लिए पूछती थी । पर पहले तो नमिता प्राय नहीं कह दिया करती थी लेकिन अब वो अक्सर खाकर रचना को मानो बेहद खुशी मिल जाती । मना करने पर भी वो चाय के साथ कुछ नाश्ता भी ले आती है । दिन बीत रहे हैं पर नमिता को डर था कि कहीं वो चर्चा कर सकता पहुंच जाएगा । उसके साथ ससुर सुनेंगे तो क्या कहेंगे? देवर देवरानी क्या कहेंगे? तब क्या चला उसका उतना सम्मान कर पाएगी । अब तो आते ही अच्छा उसकी गोद में नील को बिठा देती रहती हैं । आप आती है तो मेरा सर हल्का होता है, नहीं तो ये मुझे किए रहना है । नमिता को नील की सबसे पानी अच्छी लगती । उन्होंने ना शिशु उसके जीवन में नया उत्साह भर देता । रक्षा में तो विज्ञान पढाती, सुब पढाती, राजीव भी विज्ञान पर बहस कर उसका माथा काम नहीं खाता । उसके हर विषय पर अपने ही सिद्धांत और विचार थे । लेकिन नील से खेलते समय कोई सब कुछ भूल जाती । नहीं । नील कभी उसके सर के बाल खींचता तो कभी कान की बाली । खिलाडियों में उसे कोई रूचि नहीं थी । उसे तो खेलने के लिए चाहिए । लोहा लगता झाडू जब पाला दी नीचे उतरते ही वो अपने मनोरंजन की कुछ न कुछ वस्तु ढूंढ रहा था । वस्तु चाहे गंदी गंदी हो या अच्छी से अच्छी उसके मुंबई जाने रखती है । उस दिन नमिता अपने कमरे में कुर्सी पर नील को गोद में लिया बैठी थी । मेज पर बडी उसकी कलम को उठाकर अपना आहार बना रहा था । उसी समय अनिल ने कमरे में प्रवेश किया । नमिता ने सोचा और उसकी तरह श्रंगार में इसके सामने आकर बाद हमारे गा जूते पहने जाने पर चलेगा । अपनी महबूबा के हर बहुत होगा तो नील को उसकी गोल से लेकर थोडी देर खेल देगा । इस कर्मियां कुछ लिखती पडती रहेगी या फिर पढने लिखने का दिखावा करती रहे हैं । कभी अनिल अधिक देर तक मिल से खेलता रह जाता तो वो उठकर रसोई की और चल रही थी । उसके उपर स्थिति में तो वहाँ अधिक देर नहीं बैठ पाते हैं । लेकिन आज अनिल न तो शानदार मैच के सामने गया नहीं नील को लिया । पर उसके सामने खराब क्रोध भरी नजर सोचे देखता रहा । उस समझ नहीं पाई कि वह से इस तरह से क्यों देख रहा है । यहाँ तो दोनों में बातें भी होती थी शब्दों के माध्यम से कम नजर के माध्यम से ही थोडी बहुत तो ये क्रोध भरी नजर पहली बार उस पर पडी थी तथा इसका तब पर वो नहीं समझ पाई । उस से तो वो कुछ पूछ नहीं पाई लेकिन नजर शायद पूछ रही थी । अनिल नाम उत्तर बोला इसके साथ राष्ट्रीयता चलती है । फॅमिली के साथ रहती हो सब सुना है मैंने हो बदनामी करो मेरी नमिता का खून खौल उठा वो लगभग ठीक से बडी । पति सारी रात बाहर रहे तो बदनामी नहीं होती और पत्नी किसी से बात भी कर ले तो राष्ट्रीय कहलाती है । उसकी आंखों से भी आठ बसने लगे तो फिर बोली मुझे भी तो अपनी जिंदगी अपने ढंग से जीने का हक है । आखिर घुट घुटकर कब तक रहूंगी? नहीं चलाया । यही करना है तो चली जाओ मेरे घर चले जाओ, उसी के साथ रहूँ । उस क्षण भर तो हत्प्रभ सी हो गई । फिर हंसी इस घर से मेरा रिश्ता हब के कारण जुडा हुआ है । ये गलत नहीं । मन से निकाल दीजिए । घर के कुछ अन्य लोगों के सामने संबंध में बनी हुई । मैं इसीलिए वर्षों से इस घर में रह रही हूँ तो ये लोग चाहेंगे क्या? मैं चाहूंगी? इस तरह से चलता हूँ आपके आदेश या निर्देश नहीं । इस शोर को सुनकर नील घबरा गया और उन्हें लगा नमिता खडी होकर से हिलाकर चुप कराने लगे और वो चुप नहीं हुआ । वो उसे लेकर बाहर चली आई । अनिल अंगारों भरी नजर सौ से थोडा सा ही रह गया तो बालकनी में डील को टहलाती रही । थोडी देर में अनिल को कमरे से निकलते देखा । फिर वो कमरे में चली आई । बिस्तर पर बैठकर कंधे से जब के नील को गोद में लेटाया तो देखा कि वह हो चुका है । उसने उसे धीरे धीरे स्तर पर चला लिया और चादर उडाकर किनारे अपना अकेला तकिया रख दिया ताकि वह गिरे नहीं । एक और वो लेट गयी सोचती रही तू रह रही है वो इस घर में कौन है उसका प्रयास तो आपने है सास और देवर देवरानी नींद सभी तो ये सारे संबंधों पति के कारण होते हैं । जब पति ही अपना नहीं तो ये सब उसके आपने कैसे हुए तब तक वो इस घर में रह पाएगी । आखिर कपडा आज अनिल ने उंगली उठाई कर उसके माँ बाप उठाएंगे । परसों कोई और क्या करें? कहाँ जाए? वो सारे के सारे प्रश्न से हो रहे थे । उत्तर की एक चंदारी तक कहीं दिखाई नहीं दे रही थी । नींद से आने लगी । क्या चला पहुंचे । अरे दीदी ऍम ना कर दे रही, घर देगा तो कर देगा तो मुस्कुराकर बैठे हैं । खाना कब खायेंगे? सब ने खा लिया । केवल आप और आपके लाडले देवर बाकी हैं । अच्छा नील को भूत मिली थी । बोली मैं नहीं खाऊंगा चला मैं खाना मत रखना, क्यों छेड कराया गया? दवा दूँ नहीं रहने दो तीन आ जाएगी तो अपने आप ठीक हो जाएगा । अच्छा नील को लेकर चली गई । वो दरवाजा बंद करके हो गई । उस दिन के बाद से अपना घर कराने वाला ये घर नमिता को बेगाना सा लगने लगा । अब उसका जी कहीं लगता नहीं घर में ना हमारा विद्यालय में अजीब सी बेचैनी छाई हुई थी । मन मस्तिष्क में मुझे बता से उसने कह दिया था उसके लिए कोई किराये का घर मुझे एक दिन तापसी दीदी से भी जा कर के आई । अपने घर के आस पास कोई घर उसके लिए भी तलाश राजीवलोचन से भी कहना चाहता लेकिन कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाई तो ढूंढ देगा । कितने उल्टी सीधी प्रश्न पूछेगा और सब को पता चल जाएगा कि वह अलग रहना चाहती है तो फिर न जाने ऐसी किसी बातें बनाएंगे । इस उठते मन को लगाने के लिए पुस्तकालय से ढेरों पन्यास ले आई । पुस्तकों जब हुई रहती है तो भाई तू बातें छोटे से दिमाग को छुट्टी मिल जाती है । उससे आपको वहाँ विद्यालय से आकर एक उपन्यास पडने में हुई थी जिसका सेल बज उठा । बहुत दिन के बाद पिताजी का फोन सुनकर मन खुशी से भर गया । उन्होंने कहा था की शुचिता की सगाई हो गई है । विभाग नवंबर में हैं । वो आने के लिए छुट्टी ले ले तो उसकी नौकरी के संबंध में भी सबको पता चल गया है । कुछ बातें बिना बताए भी पंख लगाकर उडा करती है और न जाने कितनी कितनी दूर पहुंच जाती है । ऍम अब इस वातावरण से कुछ दिनों के लिए बाहर जा सकेगी । इसी बात से उसका मन खुश हो गया । पिताजी ने कहा था उनकी बेटी अपने पैरों पर खडी हो गई है । उन सब के लिए प्रसन्नता गौरव की बात है । साथ ही ये भी कहा था यदि वह बिहार से कुछ दिन पहले आ सके तो तैयारियों में हाथ बंटाकर माँ का बोझ भी हल्का कर सकेंगे । नमिता ने निर्णय ले लिया । वो कुछ दिन पहले ही जाएगी । सास ससुर भी उसके जाने के प्रस्ताव को सहज स्वीकार कर लिया । बस आपत्ति थी तो केवल अचला हो कि अब मील को कौन रखेगा । इस बीच कॉलेज में दशहरे की छुट्टियाँ हो गई । नमिता ने बैंक से पैसे निकालकर महा पिताजी और भाई बहनों के लिए कपडे खरीदे थे । मधुमिता भी उसके साथ खरीदारी का लुत्फ उठाती रही । जब मायके पहुंची उसे कुछ नवीनता का एहसास हुआ । प्राध्यापिका बन जाने से सब की नजर में उसका मूल्य बढ गया था । मैंने कहा बेटी तूने अपनी जिंदगी संभाल नहीं । पिताजी ने कहा विद्या ध्यान से बढकर और कोई दम नहीं । बेटी विद्या को बांधते रहना ही उसकी सबसे बडी उपयोगिता है । विश वाला मैं आजकल अपने कॉलेज के साथ ही पर खूब प्रॉब्लम आता हूँ । मेरी दीदी भी कॉलेज में लग रहा है । नमिता ने उसकी पीठ पर धौल जमाते वहाँ पे पगले, ये भी कोई जॉब काटने की बात है । जिस दिन तो इंजीनियर बनेगा उस दिन रॉक जमाना बहनों के मन में आवश्यक उठाती संख्यता तो कुछ दिनों पूर्व भी अपनी ससुराल से आ गई थी । बोली हम लोगों की जिंदगी तो बस घर गृहस्ती चलाते और बाल बच्चे पालते ही बीत जाएगी । नमिता ने मुस्कराकर उसके बच्चे को गोद में ले लिया । अरे मैं भी तब शादी के पिंजरे में कैद होने जा रही हूँ । शुचिता बोली छवि पिंजरा हैं क्या? कोशिश करो तो शादी के बाद भी अपना विकास कर सकती हूँ । सबको तुम्हारे जैसे सास ससुर तो नहीं मिल सकते । दे दी तीसरी बहन अभिनेता बोली छोटी मृदुला भी अपनी राय प्रकट करने में पीछे नहीं । नहीं नहीं मैं तो अपनी पढाई लिखाई पूरी करके अपने पांवों पर खडे होने के बाद ही शादी करूंगी । ले नहीं । शुचिता बोली विजेता की शादी होते ही पिताजी तेरे लिए लडका खोजेंगे, देख लेना । मृदुला हस्ती अभी तो तुम्हारी शादी होगी । फिर विंता देवी के लिए खोजबीन होगी फिर उस की शादी फिर मेरे लिए खोजबीन तब तक मैं पढ कर निकल जाउंगी । नौकरी तो मुझे बडी दीदी दिलवा ही देंगे । हाँ दीदी नमिता मुस्कराकर रहेंगे । आज पडोस की महिलाएं भी अब उसके जीवन से अधिक उसकी नौकरी में रूचि ले रही थी । नमिता ने आश्वस्त था की सांस ली चलो उनकी तैयार करो ना से तो बच गई । फिर भी कुछ महिलाएं सीधे या फिर कानाफूसी के रूप में उसके जीवन की बखिया उधेड थी और उसकी नौकरी को भी उसके जीवन की विडंबना मानती । नमिता सबकुछ सुनती सहती और आपने मुस्कान के आवरण चलेंगे । उनकी सहानुभूति के बाद खेलते रही नहीं । छुट्टियों में जब बढ की वो अपने बेटे रमेश के बेहद का बहुत में अपने आई तो वो कर रही थी । उन से भी कुछ वैसी ही सहानुभूति मिलेगी तो बुआ ने तो आते ही उसकी तारीफों के पुल भागने शुरू कर दिए । फूफा जी बीस की प्रशंसा कर रहे थे बुआ फूफा जी दोनों का आग्रह था कि वो रमेश के विधा में उनकी शहर जरूर आये । तीन दिन हुआ वहाँ रही । एक दिन उन्होंने पूछा क्या तू अपने कॉलेज के राजीवलोचन को जानती है? नमिता चौखूटी क्या उन तक भी किस्सा पहुंच गया क्यों? उसने पूछा उनसे हमारे पडोस की लडकी का क्या हुआ था पर बिचारी को छोड रखा है । नमिता को भरोसा हुआ कि चलो राजीव नमिता का नाम अभी उतना नहीं जुडा है पर वो राजीव की पत्नी के बारे में अधिक जानने के लिए उत्साह कोर्ट हैं । होली बहुत जानती हूँ । राजीव को उसकी पत्नी कैसी है? अच्छी है । सभी तरह से ठीक है बचार्इ रूपरंग में चरित्र स्वभाव में पढना जाने बेचारी को क्यों छोड रखा है? कहीं और तो ध्यान नहीं है । राजीव का नहीं तो कहते कहते हो न जाने क्यों आप उठी । अब तो बिचारे ने संतोष कर लिया है । फिर भी मन में आज बाकी है कि कब से बुलाएगा या नहीं भी बुलाया । कौन जाने वो भी तेरी तरह पढ लिखकर अपने पांव पर खडी हो जाती तो यू गोल गुल कर तो नहीं करती । नमिता तो हम दुखी हो गया । न जाने क्यों चौकडियों की व्यथा कथा से क्या घूम फिर कर बातें उसके जीवन से जुड जाती थी । इसलिए उसने बुआ को आश्वासन दिया कि वह रमेश के विभाग में जरूर आएगी । तो आश्वासन देकर भी क्या वो रमेश के में सम्मिलित हो पाई । छुट्टियाँ दीपावली और छठ तक चली । मायके में दीपावली मनाते । समय से बार बार अपना बचपन याद आने लगा । कैसे वो सब पहन भाई पटाखे फुलझडियों के लिए आपस में झगडा करते हैं । इस बार उसने अपने पैसों से ढेड जी आतिशबाजियां मंगवाकर भाई बहनों में बांटे । छुट्टी भी जाने पर कॉलेज में फिर अपना कार्यभार संभालना पडा । वहाँ जब भी राजीव से मिलती छोडना के संबंध में सब कुछ बता देने को जी चाहता हूँ, लेकिन तो चाहकर भी तो कुछ कह नहीं पाई था । मधुमिता को उसने सब कुछ बता दिया था । मधुमिता ना बार बार कहा था कि वह बुआ के यहाँ जरूर जाए और शोभना को निकट सिलते कराए तो रमेश की शादी में उसे छुट्टी नहीं मिल पाई क्योंकि उस समय विभागाध्यक्ष भी छुट्टी लेकर पिछले विवाह में सम्मिलित होने के लिए गई थी । शूचिता के विभाग में जाने के लिए उसको छुट्टी मिल गई । यही उसके लिए पर्याप्त था । इस विभाग बुआ से उसकी फिर भेंट हुई । उसने बुआ को आश्वासन दिया कि रमेश के विवाह में वो नहीं आ पाई तो क्या हुआ । कभी ना कभी बुआ के यहाँ अवश्य आएगी । फिर वही कॉलेज वही नमिता, पढाई परीक्षा परीक्षाफल सिलसिला चलता रहा हर कॉॅलेज ये काम भी चलता रहा किंतु घर भी उसे अपना घर सा नहीं लगता । किराये का घर ढूंढ रही थी तो ये भी इतना आसान नहीं था । मधुमिता के साथ जाकर चुप चाप उसने कई घर देखे भी तो कहीं भी मकान अनुकूल नहीं लगा । कहीं किराया ज्यादा था तो कहीं मकानमालिकों का व्यवहार ही मन को नहीं भाया । आपसी दीदी भी इस दिशा में कुछ विशेष नहीं कर पाए । नमिता को लगा कि दिल्ली जैसे बडे शहर में तो आवाज की समस्या बडी जटिल है । आर कर उसका घर देखने का काम धीमा पड गया हूँ । उसे लगने लगा कि अनिल के ना चाहते हुए भी उसी के घर में रहना ही शायद नमिता की नियति है । दिन सप्ताह महीने इन आयामों में रूपायित होता हुआ समय बीतता जा रहा था । किन्तु दिल्ली विश्वविद्यालय की परीक्षाएं समाप्त होने का नाम ही नहीं ले रही थी । सारी गर्मी की छुट्टियां इन परीक्षाओं में करते करते ही बीत गई । छुट्टी के बाद अध्यापन और निरीक्षण कार्य साफ साथ चलते रहे । चाहती तो निरीक्षण कार्य के लिए अपनी कक्षाएं किसी और को भी दे सकती थी । सभी तो ऐसा कर रहे थे । ऐसा ही निर्देश भी था वो आपने विभाग के अन्य लोगों के निरीक्षण कार्य के दिन उन की कक्षाएं ले लेती हूँ तो अपनी कक्षाएं यथा सम्भव किसी को नहीं देती । मधुमिता कभी कभी चढकर कहती मर जाओगी । तीन मेहनत करके राजीव भी कई बार कहता कि वह नमिता की कक्षाएं ले लेगा तो वो नहीं मानती । लेकिन मधुमिता ने उसको एक दिन पकडे लिया तो बोर नहीं होती । एक जगह रहते रहते धूमल आती हूँ चलेगी मेरे साथ । मैं एक सेमिनार के लिए बाहर जा रही हूँ । कहाँ दिन बाद वहाँ तो मेरी बुआ रहती हैं तो चल वहाँ से मिलाना हुआ नहीं ठहरेंगे । अच्छा हो गया । अरे हाँ, राजीव की पत्नी भी नहीं रहती है । उस से भी मिल लेंगे । देखा जाएगा तो उसी से मिलने के लोग में मुझे अपने साथ ही जा रही है । हाँ और क्या दोनों हंसने लगी? नमिता को प्रसन्न थी कि वह गोवा से किया गया अपना आने का वायदा भी पूरा कर पाएगी । साथ ही कॉलेज और घर की एक तरह की जिंदगी से कुछ दिन छुट्टी पाने की भी खुशी थी । उसकी छुट्टियाँ बाकी थी । चार दिनों का अवकाश से आसानी से मिल गया हुआ उसे देखकर बहुत खुश हुई । बातों ही बातों में सारा बंद कैसे गुजर गया, पता ही नहीं चला । तब तक मतलब दादी अपनी प्रायोगिक परीक्षाओं से नहीं पटाई । शाम को वो चाय पीने बैठी तो मधुमिता पूछ बैठी हूँ जी पूरा जीव की पत्नी शोभना जी आप के पडोस में रहती है ना हूँ । मैं तो भूल ही गई थी । तुम दोनों मिलोगे ना उससे तो कल चलेंगे । ठीक है । नमिता ने भी मौन स्वीकृति जल्दी दूसरे दिन जब शोबरा के घर पहुंची तो पता चला कि वह घर के पीछे बने गार्डन में है । उसकी माँ के साथ तीनों गार्डन में पहुंची । कई सौ मीटर जमीन में अच्छा खासा बगीचा था । एक और थोडे बडे पेड थे तो दूसरी और साग सब्जी लगी हुई थी । किनारे कुछ फूलों के पौधे भी थे । नीम के पेड के विशाल डाल पर छोडना पडा हुआ था जिसपर दो स्त्रियां बैठी थी और उन दो लडकियाँ उनके पीछे खडी झूले ले रही थी । नमिता को लगा कि उनमें से ही कोई शोभना होगी लेकिन नहीं पास पडी चौकी पर लडकियों का एक झुंड बैठा हुआ था । सब सामूहिक रूप से सावन के गीत गा रही थी । वही नहीं इशारा किया तो नमिता ने देखा कि शोभना सबसे दूर चौकी के कोने पर चुप चाप बैठी है । एक हल्के रंग की साडी पहने हैं । माथे पर कुमकुम केटीके के ऊपर चंदन का टीका है । गले पर भी थोडा चंदन लगा है । मांग में सिंदूर की लंबी सी देखा है । उसकी माँ बोली देख उससे मिलने को बनाया है । उसने सिर उठाकर देखा और उसी तरह चुप चाप बैठी रही । उसके निकट जा बैठी । चौकी पर बैठी अन्य लडकियाँ उठकर झूले की और बडी उन सबके मुंह में श्रावणी तीज की जीत के बोलते और चेहरे पर सामने मस्ती पर शोभना इस तरह खामोश बैठी थी कि कहीं कुछ हो ही नहीं रहा । चल रहा था साडी पार्टी माँ मेरे पीहर की मायड मकई हो वीर ना भेज की हाँ मेरे पीहर की साडी फट गई है ले सके वहाँ से जाकर कहना कि भाई को मुझे लिवाने भेजेगी । गाने वाली उन्हें जिन्होंने से ढक रखा था वो निसंदेह बहुत ही होंगी । उनके स्वर में कुछ दर्द खुला था । लडकियों के स्वर में संगीत का उल्लास पूंछ रहा था पर वो ससुराल में एक आधी सावन बिता पाई जिससे हर समय मायके में ही रहना है । मायके के ही वस्त्र पहनते हैं वो मायके के वस्त्र फट जाने का दुखभरा गीत गाती भी तो कैसे उसके मन में न जाने कैसे गीत गूंज रहे थे । वही बोली ये मेरी भतीजी है और ये है उसकी सहेली । दोनों उसी कॉलेज में पढाती हैं । दिल्ली में छोड उन्होंने हाथ जोडे बोली कुछ नहीं बस प्रश्नवाचक नजर से उनकी और देखा । उसकी माँ ने पूछा आप हमारे दामाजी को जानती हैं? मधुमिता बोली कैसी हूँ कुछ कहा है उन्होंने अच्छी हैं कहाँ तो कुछ नहीं । दरअसल हमने उन्हें यहाँ आने के बारे में नहीं बताया तो फिर चुप्पी छा गई । झूले पर महिलाओं का झूलना जारी था कि पूछता रहा तू दाल भाटी यहाँ मेरे पीहर की मायड ना कहीं हुए वीर ना भेजेगी । झूला रुका पहले वाली महिलाएं उत्तराई फिर कुछ लडकियाँ झूले पर जा बैठी । छोडना जी आप भी झोलियां ना । मधुमिता बोली नहीं कहता शोभना उठ बैठी बोली हाँ मैन के लिए चाय ला रही हूँ । वो चली गई । उसके माँ बोली पता नहीं क्यों टूट गए हैं । दामाद जी ये बेचारी तो अनब्याही रही न कुमारी कितना कहती हो तुम बीजू लो हंसो खेलो परिषद तो चुप रहने का रोक लग गया है । हमने पूछा दूसरा वहाँ कर दी और उसके लिए भी राजी नहीं । लडकी का दूसरा क्या करना तो आसान नहीं जमता । मनी मनाना चाहिए । ये समाज में लडकी का एक बार वहाँ करना ही का मुश्किल नहीं है । वहाँ दूसरे की कौन कहे एक और उसकी ठुकराई हुए इस तरी तो भारतीय समाज में झूठी पत्तल की तरह हो जाती है । उसका दूसरा यहाँ शोभना चाहे बना कर ले आई । साथ में नमकीन और गुजिया भी थी । खाते समय नमिता ने पूछा तो पता चला कि झूला झूलने वालियों में से कुछ छोडना कि भाजियाँ थे और कुछ उसकी पहने शेष बहनों की सखियाँ हो जाने लगी । शोभना की माँ बोली अभी तो होगी ना जाने से पहले फिर एक बार आना हो जा रही थी और जीत पूछ रहा था । आॅल टूटी एम मेरे पीहर की छोडना के मन में कौन सा ही पूंछ रहा होगा । उसकी तो मायके नहीं, ससुराल की पायल टूट गयी थी । गीत की नायिका मायर को संदेश भेजने के लिए आकुल पर क्या? शोभना अपने जीवन से जुडकर टूटे हुए और टूटकर भी जुडे हुए साजन को कोई संदेश नहीं भेजना चाहती । जाने के पहले दिन शाम को बुआ बोली राखी के पांच दिन रह गए हैं । यहाँ के बाजार काफी धूमधाम से सकें, चलो घूम आएँ । नमिता की कोई विशेष इच्छा नहीं थी जाने की किंतु मधुमिता की खातिर उसे भी जाना पडा । बाजार से लौट रही थी तो घर के सभी पहुंचते पहुंचते बुआ जी वाली छोडना से मिलने चलोगी । इस बार मधुमिता से पहले नमिता नहीं हाँ कर दी । अपने घर के बगीचे में छोडना ने झूला आकर्षक अंदाज में सजाया था । ऊपर रंगीन कागजों की कलात्मक झालरे लगी हुई थी । नीचे विभिन्न रंगों की रंगोली सजी थी । कहीं खिलोनों के हाथ सजे हुए थे तो कहीं गुड्डे गुड्डियां तो कहीं बातों के तीन बन्दर । आज शोभना उतनी प्रसन्न थी जितनी उस दिन छोले पर झूलने वाली लडकियाँ सावन के गीत उस दिन वो नहीं जा पाई थी और आज बहनों के साथ मिलकर गीत को बुला रही थी । उन्हें देख कर थोडा मुस्कराई । नमिता को लगा उसकी जीवन डोर भी शायद अभी जोर से गुड गई है । उसकी जिंदगी में अब राजीव के लिए कोई स्थान है या नहीं । यहाँ आया भूत ने बताया था कि राजीव की उन्हें प्राप्ति के लिए उस ने क्या क्या नहीं किया । कहाँ राजीव द्वारा बतलाई हुई वह घमंड नहीं विलासिनी, जिद्दी, नारी और कहाँ? ये सादगी संपन्न छोडना चलते हुए शोभना की माँ बुआ जी से कहा कल ये लोग जा रही हैं अच्छा तुम लोग राजीव जी से मिलोगी उसी मिलते हैं । मधुमिता बोली तो बातों से पूछ होगी बताइए लडकी का अपराध क्या है? कुछ बताया तो हमने हम से कोई गलती हो गई है । छोडना के पिता और उसके भाई कई बार उनके पास गए और उन्होंने इन की किसी भी बात का कोई जवाब नहीं दिया । घंटों उनके पास बैठकर निराश लौट आए । बस इतना कहा इधर उसके साथ निभाव नहीं हो सकता । सुना है कि अपने माँ बाप से भी नहीं मिलते । वो भी रोते रहते हैं । पहले तो शोभना अपनी ससुराल जाती थी पर अब वहाँ भी नहीं जाती है । इसे लगता है की सास ससुर के दुख का कारण भी यही है । आखिर कोई इतना तो बताएं लडकी का कसूर क्या है? बाहर से कुछ और महिलाओं ने ढूंढने के लिए घर में प्रवेश किया । अशोक ना की माँ चुप हो गई । बुआ जी नमिता और मधुमिता भी जाने के लिए उठ खडे हुए । देखा छोडना की आंखों में उसके चेहरे पर एक तरह से हराया था । शायद माँ के वाक्य स्टिक कानों में नहीं पड गए थे ।

नाज़ुक बंधन भाग - 04

यात्रा कि थकावट अभी दूर ही नहीं हुई थी कि साल बजा तापसी दीदी का फोन था । उसने सोचा था कि आज दिन भर आराम करेंगे तो आकर खाना खा रही थी की घंटी बज उठी । असली फोन उठाया और दीदी आपका फोन उसे खाते खाते । बीच में ही उठकर फोन पकडना पडा हूँ तुम्हारे लिए फ्रेंड दिखा यहाँ कहाँ मेरे घर के पास ही है, अभी खाली हुआ है । मैंने बात कर रखी हैं तो वहाँ पर देख लो । काला जाऊँ दीदी नहीं नहीं आज ही आना होगा अभी मैं भी खाली हो तो मैं दिखा देती हूँ और बात भी करवा देती हूँ । आपकी है दीदी । अरे बात बात कुछ नहीं तेर करोगी तो फ्लैट हाथ से चला जाएगा । बहुत लोग उसके पीछे लगे हैं हो तो मकान मालिक पहले आदमी है तो मेरे कहने से अभी किसी दूसरे से बात नहीं कर रहे । परसों की मेहनत में फोन लगाया था लेकिन तो भारत साल सोचो था, अच्छा हूँ आ रही हूँ । नमिता नहीं जल्दी जल्दी खाना समाप्त किया और भागते अच्छा पूछती नहीं क्या बात है दीदी ऐसी क्या हडबडाहट ठीक से खाना तो खा लीजिए नहीं वो एक जरूरी काम है क्या कर जमता तेजी से चली गयी । थोडी दूर पैदल चलने के बाद ही ऑटोरिक्शा मिला । ऑटो में बैठकर उसने सिर से आंचल उतारा और सोचा ऍफ मिल गया तो इस से ढकने के झंझट से छुट्टी मिलेगी । फॅस पर कोई बंधन नहीं था सर नाटक के तो भी घर में कोई कुछ बोलेगा नहीं । फिर भी घर की जिस मर्यादा को वो इतने दिनों से पालन करती आई, उसे योगसार फेंकना उससे उस घर में रहते हो नहीं सकेगा । घर से निकलती है इसे लगा रहता । फिर रास्ते में कब और कहां आंचल उतर जाता उसे पता नहीं चलता । पहुंची तो तापसी दीदी तैयार मिले । उनके घर से कुछ ही दूरी पर अपार्टमेंट था । छोटा था तो ढंग से बना हुआ था तो कमरे रसोई बातों वगैरह तो थे । एक छोटी सी बॉलकनी भी थे बाहर का नजारा देखने के लिए । घर में पर्याप्त । फिर क्या था ये नमिता के लिए संतोष की बात थी । फ्लाइट ऊपर था । नीचे मकान मालिक कहते थे । अगर क्रिकेट में एक और किरायेदार रहता था । उसने बताया कि पानी ऊपर सिर्फ एक घंटे के लिए आता है । ये पडोसन इस बात पर खुश थी । शिक्षिका बगल में आ जाए, उसकी बेटियों को पडने में सुविधा होगी । मकान मालिक भी खुश मिजाज लगी रहा है । कुछ अधिक लगा पर काम में मन पसंद घर मिल भी तो नहीं रहा था । उसने एक वहाँ का किराया एडवांस दे दिया । आपसी बोली कि दूसरे दिन आ जाएगा । उसने भी सोचा जब जाना ही है तो देर क्यों करें? लेकिन सामान वगैरह बांधने के लिए भी तो कम से कम एक दिन चाहिए । उसकी किताबें क्या काम है? पर वो कैसे कहेगी? सबसे वो जा रही है उस घर से जिस घर में वो एक दिन यहाँ कराई थी क्या? क्या वो क्या था या अपने आप से ही सवाल जवाब करती है । जब उस कमरे में पहुंची इससे वहाँ तक अपना कहती आई थी । उन्होंने जाने क्यों रुलाई फूट नहीं लगी । इस कमरे में बताया हुआ हर छह से याद आने लगा लगती बारे बोल रही हैं । इसी कमरे में उसने जीवन के सारे अभिशाप खेले थे । पर अभिशाप क्या केवल अब शायद ही मिले उसे या आँसू के सिवाय कुछ नहीं पाया उसने । इस घर में लेटे लेटे ही उसकी नजर अलमारी में सब्जी पुस्तकों पर पडी इन पुस्तकों का अध्ययन भी उसने इसी कमरे में बैठ कर क्या है कितनी रातें जांच जाकर उसने पढाई लिखाई की है । उसका साक्षी भी तो यही काम रहा है । फिर आंखों में आंसुओं का सैलाब उमडा । इसी समय पति नामक उस चीज यानी अनिल ने कमरे में प्रवेश किया तो फिर कर लेट गयी । वो सुमिता के घर जाने की तैयारी कर रहा था । नमिता को याद आया । उस दिन किसी ने कहा था चली जाऊ मेरे घर चाहिए । हाँ, सच है ये घर किसी का है । फिर वो झूठमूठ अपनेपन के मुँह में क्यों बन रही है । उसके आंसू थम गए । उसे नींद आने लगी । अनिल कब चला गया उसे वाकई पता नहीं चला । सुबह उठते योजना पर सामान बनना शुरू कर दिया । अलमारी से कपडे निकालकर सूटकेस में भर लिए । किताबें कागज में लपेटकर रस्सी से बांधकर उनकी कई गठ्ठर बना लिए । छोटी मोटी वस्तुएं बैंक में भरने लगे । कृष्णा ने प्रवेश किया हैं । मैं घर छोड कर जा रही हूँ । अच्छा संडे रह गई । थोडी देर चुप चाप सामान को देखती रही है । पर नमिता के चेहरे की और देखती हूँ । बोली क्या हो गया दे दिया आपको यहाँ कह रही हैं कहाँ जा रही है । मैंने किराये का घर लिया है । आज से वही रहेंगे । मजाक कर रहे हैं ना साथ नहीं चला है । मैं सच कह रही हूँ । अच्छा कहाँ? छुट्टी हो चुका था । बाहर चली गई । उसके साथ से कहा ऍसे थोडी देर में सांसद ससुर पूर्व कमरे में आए । पीछे पीछे चला भी नहीं लग रहा था की हो रही थी और नीचे उसकी कूद में था । सास बोली हूँ अभी क्या सुन रही हूँ अब ठीक सुना नाम जान उत्तर दिया । अब सास चुप होकर ससुर की और देखने लगी । मनोहर बाबू बोले लेकिन हूँ यहाँ कष्ट किया है तो मैं कष्ट तो कुछ नहीं । साथ होली फिर तू तू जा रही हूँ यहाँ से मेरी हाँ! रहने से आपके बेटे की बदनामी होती है । हाँ जी, आज न जाने नमिता में ये सब कहने का साहस आखिर कहाँ से आ गया । उसके चेहरे पर कुछ न समझ पाने की व्यवस्था सी छा गई । ससुर बोलेंगे क्या उसने तुमसे कुछ कहा है? नमिता के कंट्री रुलाई का ब्रेक खूब पडा और उसने अपने आप को नियंत्रित करने का प्रयास करते हुए कहा आम वो नहीं चाहते कि मैं घर में रहूँ, कॉलेज चाहती हूँ । वहाँ दस लोगों से मिलती जुलती हूँ । इससे शायद उन की बदनामी होती है । मनोहर बाबू क्रौं ग्रुप है । बोले वो कौन होता है तो मैं घर से निकालने वाला ये घर मेरा है तो इस घर की बहू हो और इस तरह तो मैं घर से नहीं जा सकती । नहीं पिताजी अब जाने दीजिए । सब मौन रह गए । अब पीछे खडी अचला सामने आ गई थी अब तक जो आप इस घर में बहू बनकर रह रही थी, क्या वो सब नाटक था? नहीं हूँ नाटक समझकर तो मैंने ये जीवन नहीं दिया । मैंने तो ये सब कुछ कर ही जीवन क्या है? पर पर अब लगने लगा है कि ये जीवन नाटक ही तो है क्योंकि जी जहाँ सात फेरों के बंधन का अर्थ पुरुष के लिए कुछ और हो और नारी के लिए कुछ और वहाँ जीवन और हो भी कर सकता है । नाटक के सिवाय अग्नि को साक्षी पुरुष और स्त्री दोनों ही बताते हैं और पुरुष किसी दूसरी स्त्री से संबंध बनाए रखें । रात भर घर से बाहर रहे तो भी पत्नी की जब नहीं जाती और वही इस तरी यदि किसी से बात भी कर ले तो उस पुरुष की नाक कटने लगती है कि दोहरे मापदंड जीवन को जीवन कहाँ रहने देते हैं । नाटक ही हो गई है जिंदगी कम से कम मेरा जीवन तब मुझे नाटक लगने लगा है । घर की बहुत गोनी रहने की भूमिका मैंने बहुत दिनों तक निभा दी । अब ये मुझे नहीं हो सकेगा । कहते कहते वो मानो भक्सी गई । अपनी और लगते नील को उसने अचला की गोद से ले लिया और कुर्सी पर बैठ गई । सास ससुर को उसने बैठ पर बैठ जाने के लिए कहा । पांच पढे स्कूल पर चला भी बैठ गई कमीशन हस्ती रहने वाली अचला को नमिता ने पहली बार इतना मायूस देखा । सास ससुर खामोश बैठे नमिता की और देख रहे थे । अच्छा रह रहकर अपनी आंखे पहुंच रही थी । इसी समय बाहर का द्वार बजने की आवाज आई । अच्छा जी जी आ गए कहकर फैसला द्वार खोलने चली गई । कुछ ही क्षणों में अनिल ने कमरे में प्रवेश किया । अच्छा नहीं । वो शायद रसोई में ही व्यस्त हो गई थी कि कौन जाने पहुंच चक्कर हो रही हो । अनिल ने बंधे हुए सामान पर नजर डाली । फिर माता पिता की और देखा उसे । उनका इस कमरे में जो बैठना आश्चर्य में डाल रहा था उसने बने हुए सामान की और संकेत करते हैं अपनी माँ से पूछा क्या बहुत जा रही है? मैंने धीरे से कहा हूँ । अपने मायके उस केश्वर में यंग था तो नहीं । उसने किराये का घर लिया है, वही रहेगी । वो मानो आसमान से गिरा है । चक्का सा कभी नमिता की और देखता तो कभी अपने । पिता क्या फोन पर बैठकर कुछ सोचता रहा । अचानक उत्तेजित होकर बोला क्या हमारी इज्जत उछालने में कुछ कमी रह गई है, जब उसमें और चार साल लगाए जा रही हैं? चली व्यंग्यपूर्ण ही थी । नमिता जल उठी और बोली कुछ नहीं बोले । मनोहर बाबू वो रोज से भरे हुए थे, जो कैरामिल बहुत हो चुका है । आदमी के रहने की एक सीमा होती है । अरे आखिर कब तक सहती रहेगी? है तुम्हारा अनिल का व्यंग्य सौरभ सहज हो गया । बोला मैंने तो किसी पर कोई अत्याचार नहीं किया । पिताजी भी शादी तो आप ही लोगों के मर्जी से हुई थी और आज भी शादी टूट रही है । रोक सकते हो तो रोक । लोगों को कहकर मनोहर बाबू उठ खडे हुए धीमी चाल से चलते हुए बाहर चले गए । उनकी पत्नी गंगा देवी भी उनके पीछे पीछे चली गई । एक दिन बरसात की शाम को सांस नहीं जमता से कहा था कि वो अपने पति को प्रेमिका के घर जाने से रोक ले । सांस के कहने से उसने प्रयास किया था पर रूप नहीं पाई थी । आज पिता नहीं उसी के पति अनिल से कहा था कि वो अपनी पत्नी को रोक ले । अलग घर में न जाने दें पर क्या ये संभव हो पाया? माता पिता के जाते ही अनिल ने नमिता से पूछा क्या तुम सब जा रही हूँ हूँ हूँ बहुत दिनों से तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ अब मुझे कुछ नहीं सुना है । कहकर नमिता आपने नहाने के कपडे जो मेज पर रखे थे उठाकर बाथरूम की चलती है । अनिल ने अलमारी, सपने, वस्त्र निकले साधारण है । वो अपने वस्त्र निकालकर बाहर चला जाता था । स्नानगृह खाली नहीं होता तो बरामदे के सोफे बैठकर अखबार पढता रहता और कमरे में नहीं आता था । लेकिन आज वो कमरे में बैठ कर ही नमिता का इंतजार करता रहा । पता नहीं वो उससे क्या कहना चाह रहा हूँ । नमिता बाथरूम चाहे तो रोज की तरह के स मारने के लिए कमरे की और बडी दरवाजे पर अनिल के जूते देखकर समझ गयी । वो अभी तक कमरे में है उल्टे पांव लौट आई । खाने की मेज पर बैठकर डब्बे में रखे अचला के बनाए पराठे निकालकर खाने लगे । अचला नील के साथ शायद अपने कमरे में थी । देवर को उसने थोडी देर पहले दफ्तर जाते देखा था । क्या अन्य आज दफ्तर नहीं जाएगा । वहाँ फिर उससे क्या कहना चाहता था । ससुर भी अपने कार्यालय जा चुके थे । सांस सम्भवता बाजार गई थी । उसने शीशी से निकालकर थोडा आचार लिया । फिर भी ग्रास कर ले के नीचे नहीं उतर रहा था । रह रहकर आंखे भर आती थी । क्या करने जा रही है वो? इस तरह ये घर छोडकर अकेले रहना क्या उचित होगा? उसके अपने माता पिता सुनेंगे तो क्या कहेंगे और लोग क्या कहेंगे? अचानक दीदी का चेहरा उसकी आंखों के सामने तहर गया । तापसी दीदी कैसे रहती है के लिए वैसे भी वो भी रहेगी । कोई कुछ भी कहता रहे, उसे जाना है और वो जाए । माता पिता ने विभाग के इस खेल से अपना कर्तव्य पूरा कर दिया । इन खोखले रिश्तों के धागे में बंदी वो कब तक चल सकती रहेगी । उसे भी खुली हवा में सांस लेने का हक है । आधा परांठा खाते ही वह खडे हुई । उसके पास अपने आप कमरे की और बढ गए । उसे देखकर पलंग पर लेटा अनिल उठ बैठना बोला कुछ बात करनी चाहिए । कुर्सी पर बैठ गई । शुरू समिता मुझे नहीं चाहते हैं । पता नहीं वो क्या चाहती है । उसका व्यवहार मेरे प्रति बदल गया है । हो सकता है वो मुझ से छुटकारा चाहती हूँ । क्या तुम यहाँ रहोगी? मैं मैं सुविधा के यहाँ जाना छोड दूंगा । नमिता कुर्सी से उठ खडी हुई अपनी शेष वस्त्र अलमारी से निकालकर बैंक में डालने लगेंगे । अनिल भी अलमारी के पास खडा हुआ बोला तो होगी नहीं । उसने गुस्से चैनल के और देखा । फिर बोली क्या उसका भी जीवन बर्बाद करना चाहते हो? नहीं ये नहीं हो सकता हूँ तो मैं उसके साथ विभाग करके गृहस्थी बसाकर रहना होगा । वो भी विभाग करके सामाजिक सम्मान के साथ जीवन बिताना चाहती होगी । शायद इसीलिए तुम नाराज हो । अब उसे यहाँ गया हूँ और या फिर तो भी उसके घर में जाकर रहो । आज पता नहीं कैसे वो आपकी जगह तो बोल गयी बांग्लादेश में अंदर से क्या यहाँ किसी भाव से सोच कर वो कांप उठी । अपने को संयत करने के लिए । जल्दी जल्दी सामान निकालने लगे । एक बैग भर गया तो दूसरा उठाया । इसी समय मनोहर बाबू गंगादेवी ने उन्हें कमरे में प्रवेश किया । उपलब्ध पर बैठ गए । नमिता दी ऍम पर जा रही है उसी खाली थी पर अनिल बैठा नहीं खडे खडे ही बडा हो मैं रोक नहीं सकता पिताजी उसका स्वर्ण फिर फल हुआ आया था । नमिता सिर चुकाए थोडी देर बैठे रही । बोली अपनी गलती सुधार लीजिए । माताजी पिताजी सुविधा को इस घर में ले आएंगे । गंगादेवी मनोहर बाबू दोनों चुके थे । अनिल कुर्सी पर बैठ गया नमिता की और छुपके बोला कि तुम उस राजीवलोचन से विभाग करोगी । थोडी देर चुप रहने के बाद वो मनोहर बाबू बोली मेरे लिए टैक्सी लगवा दीजिए । पिता जी बहुत किताबे हैं, ऑटो रिक्शा में तो नहीं जा पाएंगे? और बाबू बोले डबल बैड कुर्सी नहीं भी ले जाओ तो भी नहीं होगी तो तुम्हारी चीजों का क्या होगा? और ये पलंग तो है तो मेरे मायके का नंदा देवी बोली इसे रहने दीजिए । बाजी कुर्सी दे दीजिए । ऍन लाए गए कुर्सी में इसके पुराने उपहार के प्रति उसे हो आया था । मनोहर बाबू ने दफ्तर का कर्मचारी भेजकर टैक्सी बुलवा दिए । देखते ही देखते सामान लग गया । कुर्सी टैक्सी के ऊपर बन गई । जाते समय सांस के पांच हुए तो रोड है । बोली तो भारी बिना तो ये आनंद सूना हो जाएगा बेटी लेकिन मैं भी चाहती हूँ कि तुम भी अपना घर बसाकर सुखी रहूँ । तब तक अपने आपको होम करती रहोगी । और बाबू बोले, जी चाहता है कि अपनी बेटी की तरह तुम्हारा बिहार अच्छा हूँ, पर पर हिम्मत नहीं होती सामाजिक बंधनों के कारण । लेकिन मैं शुभ कामना करता हूँ कि तुम सदासुखी रहो । फूलो फलो इतनी देर से न जाने कहां छिपी । अचला नहीं को लेकर आई । मीन को नमिता की गोद में देकर उसे गले मिलकर फूट फूटकर रोने लगा । होली का ये नील भी आपका कुछ नहीं लगता । दीदी आप के बिना कैसे रहेगा? नमिता की जी में आया कि वह भी फूट फूटकर रोए । बडी कठिनाई से उसने अपने आप पर नियंत्रण क्या केवल नेत्रों का छलकना न रोक सकी । होली मैं भी नहीं के बिना कहाँ रहता हूँ या चला हूँ उसे । देखने में तो बीच बीच में आउंगी ही । उसकी इस वाक्य से सबके चेहरे पर डॉक्टर्स की रेखाएं उभर आए । लेकिन जब घर की देहरी पान करने लगी तो स्वयं कर दे ही हाहाकार कर उठा । उसने एक नजर बहुत बने अनिल प्रणाली और जाकर टैक्सी में बैठ गई । घर की एक नौकरानी और एक कर्मचारी मनोहर बाबू ने साथ भेज दिया । सामान उतरवाकर नए घर में लगा देने के लिए सामान नहीं घर में लग गया था । तापसी दीदी ने एक बैठ भी भेज दिया था । एक नौकरानी की व्यवस्था दी कर दी थी । और तो और चूल्हे वाली गैस का भी इंतजाम कर दिया था । मायके चलाए हुए सारे नए बर्तन इस नई गृहस्ती की सेवा में जुट गए थे । नहीं घर को सजाने में नमिता को एक प्रकार का आनंद आ रहा था । फिर भी वो पुराना घर जिसमें उसने अपनी उम्र के साथ साल गुजारे थे, उसके दिमाग से उतर नहीं रहा था । कभी उसे नील की नहीं से किलकारी सुनाई देती तो कभी अच्छा कर उन्हें ज्यादा जाता । तब गंगा देवी का बहुत शब्द कानों में गूंज उठा तो कभी मनोहर बाबू की खांसने की आवाज सुनाई पडती है । रह रहकर वो होती है । गंगा देवी ने मना करने पर भी थोडे मसाले और आठ टैक्सी में रखवा दिए थे । किंतु से उस दिन खाना बनाने की जरूरत नहीं पडी । दोपहर को कॉलेज कैंटीन में डोसा खा लिया था और रात को तापसी दीदी के घर खाने का निमंत्रण था । सुबह के नाश्ते के लिए मक्खन पावरोटी खरीद लाई थी । अन्य आवश्यक वस्तुओं भी उसने मधुमिता के साथ मिलकर खरीद ली थी । दूसरे दिन महाविद्यालय में भी ये खबर पहुंच गई थी कि वो अलग घर में आ गई हैं । स्टाफ रूम में सब तरह तरह के प्रश्न पूछ रहे थे । कोई पूछ रहा था आप उस घर से चली । क्यों? किसी का सवाल था क्या आप कुछ करने का नहीं जाएंगे? नमिता के मन में भी तो ऐसे ही प्रश्न उठ रहे थे । फिर वो दूसरे को क्या आप कर देती? उसे मौत देखकर ऐसे प्रश्न उछालने वाले स्वयं ही चुप हो गए तो घर को राजीव और मधुमिता के साथ खाने बैठी तो उसकी लंच बॉक्स में भी पावरोटी देखकर राजीव फंस उठा । चलो मैं और आप अब लंच की नजर से सामान हो गए । नमिता भी हस्ती लंच बना कर देने वाली बहन को छोड जो आई हूँ अकेली हम रहेंगे कैसे रहना ही होगा । कहते कहते उसकी आवाज में दर्द दोहराया । तुरंत ही उसने अपने आप को संयुक्त कर लिया और साहस और में बोली कल आप मेरे यहाँ आयेंगे । एक बार क्यों रक्षा बंधन है ना कल? हाँ उसी की तो कल छुट्टी है तो आइयेगा मधुमिता दीदी आप भी आना तो दोपहर का खाना । हम तीनों नए घर में साथ खाएंगे । दोनों ने सहमति सूचक सिर हिला दिया । राखी के दिन उसने पहली बार घर में भोजन बताया । राजीव और मधुमिता नहीं । रुचि और प्रशंसा के साथ भोजन ग्रहण किया तो नमिता को अच्छा लगा । खाने के बाद भी काफी देर कपडे चलती रही । भोजन पडने वाली मेज पर ही लगा था । इकलौती कुर्सी पर राजीवलोचन को बैठा दिया था और वे दोनों बैंड को मेज के निकट खींच कर उसी पर बैठ गए । खाने के बाद मेज पहुंचकर कोई पेट में राखियां सीधा कर लिया । ठीक इसलिए मधुमिता ने पूछा राजीव भैया को बांध होगी? मुस्कराएंगे राजीवलोचन भी ठंडा कराया गया । उसने रखी हाथ में ली । राजीव ने भी मुस्कराकर कलाई आगे कर अपना पर्स निकाला तो बोली रुपए रहने दीजिए, मुझे तो कुछ और ही चाहिए । क्या भाभी कैसी बातें कर रही हूँ इस उम्र में मैं दूसरी शादी थोडी करूंगा और करना चाहूँगी तो किससे करूं । अपने तो राखी बांधी वहाँ पडा दूसरी शादी के बाद मैं नहीं कर रही हूँ । उन्हें ही ले आने के लिए कह रही हूँ । शोक ना जी को ये उपहार तो मैं आपको नहीं दे पाऊंगा । नमिता जी अच्छा मैं छत पर थोडा घूमा हूँ । बहुत खा लिया है क्या कर वो छत की सीढियाँ चढ गया । नमिता देखती रह रहे हैं । थोडी देर बाद मधुमिता बोली तो ये क्या? क्या उसे लाके क्यों बांदी पगली तो समझ नहीं भाई, वो तो चाहता था और तेरह भी तो उधर खिंचाव था । मैंने तो सोचा था तो उसी के लिए वो घर छोडकर आई है । नमिता खुद झंड छुपा रही । फिर बोली सभी तो यही समझ रहे हैं । मधुमिता दी और किसी से मित्रता हो जाने का यह तो नहीं है । इसके साथ गृहस्ती बताई जाएगी । मित्रता भी जो नहीं और अपनापन होता है उसे भाई बहन के रूप में भी निभाया जा सकता है । लेकिन गृहस्ती भी बचा लेते । उसके साथ तो क्या अनुचित होता तो दोनों की जिंदगी समझ जाती है और उसे भूल रही हूँ । मुझे बता दीजिए इससे झूले की छांव में देखा था । उसकी जिंदगी के हमें नहीं सामान भी चाहिए लेकिन अपने बारे में भी सोचना चाहिए । मधुमिता मेरे जीवन में कोई राहु बन जाए तो मैं भी किसी के जीवन का केतु बन जाऊँ । उचित है क्या? उचित तो शायद नहीं होता । सुमिता मेरे जीवन की बादक थी या मैं उसके जीवन में बाधक थी । पता नहीं पर सुविधा का बदला में शोभना से क्यों लूँ? मैं क्यों उसके जीवन में कांटे बिछा हूँ । उसी समय सीढियों पर पचास सुनाई नहीं । राजीव शायद नीचे उतर रहा था । नमिता धीमी से बोली तो से आग्रह करो ना मदद बता दी की वह शोभना जी को ले आए अभी जो कुछ देखा हैदराबाद में बताओ ना उसे । राजीव के आते ही नमिता चाय बनाने चली गई । मधुमिता बोली जानते हैं जी जी, उसका जगह धनबाद गई तो छोडना जी से मुलाकात हुई थी । अच्छा जिस स्थिति में देखा शोभा जी को पता नहीं सकती क्या? मधुमिता धीरे धीरे सब कुछ बताने लगी । नमिता चाहे बनाकर रोटी तो दोनों मौन बैठे थे । तीनों ने चुपचाप चाय समाप्त की । आखिर मधुमिता ने ही चुकी थोडी तो बहन को राखी बन रही मिल रही है कि नहीं । राजीवलोचन ने नमिता की और देखा फिर बोला उसे मैं तो आऊंगा किन्तु क्या निभाव हो सकेगा । अब किसकी बात कर रहे हैं राजीव भैया चोपडा जी के । अब वही शोभना रह गई हैं । आपकी बात मैं नहीं जानते । हिंदू शोबरा जी ने अपना वो अहम धो पहुंचकर फेंक दिया । नमिता ने कहा राजीव पर थोडी देर के लिए मौन छा गया । कुछ सोचता रहा है फिर बोला लेकिन इतने दिनों बाद फिर से नया जीवन आरंभ करना ठीक होगा । हम दोनों ने ही तो अपने जीवन को एक अलग दिशा दे दी है । वो तपस्या के मार्ग पर है तो मैं शिक्षा के मंदिर में हूँ । क्या यही हम दोनों के लिए ठीक नहीं है । शोभना जी की तपस्या आप ही को पाने के लिए है । मधुमिता बोली हो तो मुझे लगता है कि मैं उसके साथ नहीं रहता होगा । कुछ ठंड चुप्पी छा गई । फिर अमिता बोली बुरा मत मानिएगा । मुझे लगता है आप ही का अहम आपके संबंधों में आडे आता रहा है । ये भी हो सकता है । क्या आप अपने को कुछ बदल नहीं सकते? ऐसी संभावना हो पाएगा । प्रयास कर के तो देखिए देखिए जब भी दो व्यक्ति आपस में मिलते हैं चाहे मिस्त्री हूँ जब पूर्व उन्हें कदम से कदम मिलाकर चलने के लिए कुछ समझौते तो करने ही पडते हैं । अपनी गति सीमा पर थोडा अंकुश तो लगना ही पडता है और किसी समझौते का नाम जीवन है, समझा नहीं । किसी भी दो व्यक्तियों के चेहरे नहीं मिलते हैं । उसी प्रकार उनके भाव में भी भिन्नता होती है । उनके विचार भी एक जैसे नहीं होते । दो के एक जोडे को धुंध कहते हैं और धुंध शब्द का अर्थ संघर्ष भी है । यानी जहाँ दो की सत्ता होगी वहाँ संघर्ष की भी संभावना होगी । किन्तु जब दो की सत्ता एक करनी हो यानी द्वैत में अद्वैत की स्थापना करनी हो तो इस संघर्ष मूलक अहम का सिर तो काटना ही होगा । लेकिन क्या मैं सत्तर पाऊंगा? कोशिश करके देखने में क्या हर्ज है । राजीव के आग्रह पर नमिता और मधुमिता को भी उसके साथ बात जाना पडा । नमिता को भी इस बात की खुशी थी कि वह इतनी जल्दी फिर बुआ से मिलेगी और मन में ये डर भी था । शोभना कहीं आने से इंकार कर दें । राजीवलोचन के आने की बात सुनकर शोभना घबराकर बेहोश हो गयी । बडी कठिनाईयों से होश में लाया गया । नमिता ने कहा आपको घबराना नहीं । अभी हम दो ननद जो आपके साथ है वो अपलक तीनों को निहारती रही नहीं और प्रसन्नता के अशुभ प्रभाव के बीच विदाई समारोह संपन्न हुआ । शोक ना की मांग भाजियाँ और बहनें सभी रो रही थी । पिता, भाई आदि की आंखे भी सजल थी । एक नहीं रोहित तो सिर्फ शोभना ही उसके चेहरे पर ना हर्ष का कुछ चंद्रराणा विषाद का कोई कोई सी नजर से सबको नहीं आ रही थी । एक शून्यता सी व्याप्त थी चेहरे पर टैक्सी में बैठे इधर महिलाएं गीत का रही थी । बही रे जवाहरी, बोलू आवाजो डोला बेटी और दामाद कि ज्यादा रही है । देखते ही देखते राजीवलोचन की गृहस्ती जम गयी । धीरे धीरे शोभना भी सामान्य हो चली । नमिता और मधुमिता जब भी जाती उन्हें विविध पकवान खाने को मिलते हैं । कभी कभी राजीव के प्रति मीठे बुलाने भी सुनने को मिलते हैं । घर के लिए सामान लाना भूल जाते हैं या कुछ काम को छोटा लाते हैं । मधुमिता कहती आखिर ऐसी गलतियां तो करेंगे हैं । नई नई गृहस्ती जो ठहरी नमिता उसे समझाती कि वह भी बीच बीच में बाजार जाया करे जिससे उसका समय भी कट जाएगा और मनपसंद सामान भी ला सकेंगे । नमिता को भी तो प्राय रोजी बाजार जाना पडता था । आपने नई गृहस्ती के लिए सामान लाने अभी कुछ दस दिन हुए थे । इस घर में आए प्राय रोजी को छोटी बडी वस्तुओं की सूची तैयार हो जाती । उस दिन बाजार में सब्जी खरीदते समय अचानक नलिन मिल गया था । सामने पढते ही बोला घर नहीं चलिए रंभादि नील आपको सारे घर में खोजता रहता है और रोता रहता है । ममता की आंखें भर आई । अपने आंसुओं को छुपाने का प्रयास करते हुए उसने मुस्कराकर कहा ऍम अभी तो बहुत व्यस्त हुआ नहीं । पाओंगे नील को नौकरानी के साथ थोडी देर के लिए मेरे पास भेज दीजिएगा । अच्छा कहकर नलिन चला गया । नाम का सोचने लगी । सात सालों से बंधे इन बंदरों को काटना इतना आसान नहीं है । शाम को नौकरानी सपूत मील को लेकर आ गई । सविता से ऐसा चपटा की गोद से उतरने का काम नहीं ले रहा था । नविता ने नौकरानी सोमवारी से पूछा घर में सब अच्छे हैं ना? क्या अच्छे होंगे? बहुत जी जब से आप चली आई कोई किसी से कुछ नहीं बोलता । सब चुप चाप अपने काम में लगे रहते हैं । जिसे घर पर रोना की आप के साथ चली गई । नमिता चुप रह गई । फिर बोली और बच्ची भी कुछ कहा है आपको बुलाया है । बडी बहू आपको जाकर देखना चाहिए । बडे भैया का तो हाल से बेहाल हो गया है । दिन रात उसी कमरे में पडे रहते हैं । ना कहीं आना ना कहीं जाना है । तो उसी कमरे में तो सुनीता की यहाँ भी नहीं जाते । किस स्तर नहीं जाते हैं । कल बाबू जी ने बहुत डांटा फटकारा तब गए फिर आकर । उसी कमरे में नमिता ने सोमवार को चाय लगाए । नील को बिस्कुट दिए । बडी मुश्किल से नील नमिता की वो चौतरा और सोमवारी के साथ गया । जाते जाते नमिता ने से कहा नहीं आस पास की सब नौकरानियों को शाम को चार से छह बजे तक पढाती हूँ । तुम दिया जाया करो थोडा पहले होगी तो काम आएगा, क्या फीस लगेगी? अरे कुछ नहीं । कॉपी किताब सब मेरे पास है तो मैं तो जाने की जरूरत नहीं । सोमवारी खुश होकर चली गई । नमिता किस पाठशाला में अब सोमवारी भी नियमित रूप से आने लगी । इन अनपढ कामकाजी स्त्रियों और लडकियों को पढाने में नमिता को बहुत आनंद आता था । वो भी अक्षय ज्ञान करके खुशी से भर जाती थी । नमिता के लिए देश से बता रहा था अपना तारे ईमानदारी से करना और बचे हुए समय में दूसरों का भला करना और उपकार के लिए निशुल्क पाठशाला खोलने से अच्छा कार्य और उसे कुछ नहीं सोचा था । उससे उतनी पांचला समाप्त करके खिडकी के पास खडी थी जो से नीचे सडक पर एक परिचित चेहरा दिखाई दिया । नहीं ऐसा लग रहा है पर ध्याडी बडी हुई है । हो गया । घंटी बजी तो खोला तो अनिल सामने खडा था । वो चुपचाप खडी रही क्या ऊपर आने के लिए भी नहीं होगी? आइए अनिल पैड पर बैठ गया । उसने पूछा चाहता हूँ नहीं कुर्सी पर बैठ गई । मन में सवाल उठ रहे थे कि ये क्यों आया है? गाडी क्यों नहीं बनाता? चेहरा ऐसा बना रखा है, कुछ खाओगे नहीं, फिर भी वो थी और एक प्लेट पर कुछ मठरियां पानी ले आई । वो खाने लगा, अच्छी बनी है । नमिता की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या पूछे । क्या बोले फिरने जाने कैसे मुंह से निकल गया । क्या हाल बना रखा है तो ऐसा फिर बोला घर नहीं होगी तो चुप रही । वो भी कुछ नहीं बोला । सुनाये आजकल कहीं नहीं जाते हैं । मन ही नहीं करता । क्षमता के यहाँ भी नहीं चाहते हैं । नहीं क्यों पता नहीं । थोडी देर चुप रही । फिर तेजित होकर बोली तो मुझे भी धोखा दे रहे हो । मेरे तो कुछ समझ में नहीं आ रहा कि मैं क्या कर रहा हूँ, क्या हो रहा है? सबसे सेवा कर लो । शायद इसके लिए मुझे तलाक लेने की जरूरत पडे । उन कागजात तैयार करवा दूँ । मैं फॅार कर दूंगी या कुछ हो गया । जब घर नहीं चलो नहीं उधर ता से बोली क्यों? इसके ऊपर उसके पास कोई नहीं था । स्पोर्ट कर जाने लगा । लौटाये खडा खडा ही बोला एक बार चलो ना फिर कुछ दिनों में लौटाना ना चाहते हुए भी जाने के उसके आगे भराई बोली कुछ नहीं मन में सोचती रही । जिस गहरी को एक बार लांग कराना ही मुश्किल हुआ, दोबारा वहाँ जाकर फिर क्या वो लौट पाई कि सात वर्ष साथ रहकर भी जिसे पाना सकी दो सप्ताह अलग रहकर उसे पा लिया है । बराबर शायद बहुत देर हो चुकी है और सुमिता नहीं अब ऐसा कुछ भी नहीं होने देगी । बोलिए एक बार तुमने कहा था ना कि सुमिता के हो और उसी के रहोगे । शायद अब तुम पंद्रह दिनों से वहाँ नहीं गए । इस की क्या हालत हो रही होगी हूँ उसके पास जाओ पढाई अपनी दाढी बनवा लेना । कुछ चुपचाप खडा रहा । तरीक जाओ, देर मत करो । देखो मैंने तुमसे कभी कुछ नहीं मांगा है । आज मांगती हूँ इंकार मत करना तुम सुमिता से यहाँ कर लो मेरी खुशी के लिए तो मैं ये करना ही होगा । चाहती हो तो वही होगा क्या कर वो धीरे धीरे नीचे उतरने लगा तो पीछे पीछे थी । नीचे के दौर से बाहर निकलकर भी वह फिर खडा हो गया । पूरा कभी कभी आना तो भी नहीं । यहाँ मैं फिर आऊंगा नहीं । अब तुम यहाँ फिर कभी बताना कागज भिजवा देना हस्ताक्षर कर दूंगी । यहाँ पर उसने जोर से दरवाजा बंद कर दिया । ऊपर आई तो बैठ पर गिरकर जीभरकर हुई बोलिंजेर में फिर घंटी बजी । स्थिति से झांक कर देखा तो मधुमिता थी आते ही नवी तरफ चेहरा पढ लिया । फिर कडाई छूकर बोली तुझे तो बुखार है, सिर दर्द कर रहा है । मेरे सामने ही दवा की दुकान है, पहले करती हूँ लेकिन हाथ में तुम अकेली रहोगी कैसे? सही बुखार चढ गया तो मैं साक्षी दीदी के यहाँ चले जाते हैं । चल रास्ते में ही दवा भी ले लेंगे । घर पर ताला लगाकर थोडी देर में दोनों दवा समेत तापसी दीदी के घर पडती । तब सीधी संभालिये ऐसे बुखार है । रात को यही रहेगी । मैं चलती हूँ । नमिता सोफे पर बैठकर बोली पीडि पानी मंगा दीजिये दवा खानी है । साक्षी देने आया से पानी लाने के लिए कहा पर नमिता से बोली मैं तो कहती हूँ कि तुम जहाँ हो वो घर छोड दो । दोनों साथ साथ रहेगी जिससे तुम्हारा भी अकेलापन दूर होगा और मेरा भी नहीं थी । अब तो लग रहा है कि मुझे दिल्ली छोड देनी पडेगी । इस शहर में रहकर और अलग घर में रहकर भी शायद मैं पुराने घर की माया से मुक्त नहीं होता हूँ और हमारे पाठशाला कैसी चल रही है । तापसी दीदी ने उसे उत्तेजित देखकर पांच बदलने की कोशिश की । अच्छा तो ठीक ही चल रही है और अब मैं यहाँ होंगे नहीं तो आप मेरा तबादला करवा दीजिए ना । आपकी तो कुलपति से जान पहचान है । अच्छा कोशिश करेंगे पर जाओगी कहाँ कहीं बस यहाँ नहीं रहूंगी । आया पानी का गिलास से आएगी । नमिता पर से दवा निकालने लगी । अब तक कडवी से कडवी दवा से चबाकर खानी पडती थी क्योंकि वो निकल नहीं पाती थी और आज उसने निर्णय लिया कि वह चबा चबाकर अपना मूंग कडवा नहीं करेगी । जैसे भी हो दवा निकल जाएगी । उस ने जीत के अंतिम छोर पर दवा रखी और पानी का भूल भरा नहीं । एक ही बार में दवा गले के नीचे उतर की । इससे पहले तो वह जब भी प्रयास करती विफल ही रहती । अंत में कडवी दवा चबा चबाकर खाने के सिवाय कोई चारा नहीं रहता और आज वो बाजी जीत गई । दूसरे दिन ही तब समझ गई और वो अपने घर लौट रही आपसे दीदी उसके तबादले का सफल प्रयास करती रही । उधर तलाक की कार्यवाही भी पूरी हो गई । आखिर समाजवादी हो ही गया । ये भी रजीत सहयोग रहा । जिस दिन वो दिल्ली छोड रही थी उसी दिन उसे अपने पूर्व पति के साथ सुविधा के विवाह का निमंत्रण पत्र मिला तो मुस्कुरा का टैक्सी में बैठे और चली गई तो बहुत दूर

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