Made with  in India

Buy PremiumDownload Kuku FM

Transcript

भाग - 01

ऍम पर आप सुन रहे हैं किताब दलदल जिसकी लेखिका है कुसुम गुप्ता और आवाज भी है और जे अभिनव शर्मा ने प्रकाशचंद्र सचिव का आदेश देखा मौखिक नहीं लेकिन एक नहीं दो बार पढाओ से वो विस्मित हो सोचने लगे कल जैसे काम सिखाया था आज उसी के साथ जाकर उन्हें खुद भी अध्ययन करना होगा । इस उमर में प्लान्स में विस्मय का स्थान उत्तेजना ने ले लिया । उनकी समझ में स्वयं नहीं आ रहा था कि उन्हें ये क्या होता जा रहा है । अंतर में कुछ गुदगुदाहट से होने लगी थी । कश्मीरी जलधारा उन्हें बहना शुरू कर दिया था । मधुर संगीत किसानों के स्वर, मन की सुननी घाटियों में गूंजने लगे थे । उन्होंने अपने को रोमानियत से बचाने की भरसक कोशिश की । परसा बेकार मन तो जैसे भोर बंद बार बार सीमा नाम के गुलाब पर बैठना चाहता था । सुबह के सवा ग्यारह बज रहे थे । रोज के कार्यक्रम के अनुसार थी । ग्यारह बजे कॉफी का एक प्याला उनकी मेज पर होना चाहिए था । सैनिक कार्यक्रम में ये गडबड क्यों थोडे से उठ खडे हुए है । कसमसा कर उन्होंने बजर बजाया पर उधर से कोई उत्तर नहीं मिला । दूसरी बार फिर बजाया । इस बार प्रतिक्रिया हुई । निजी सहायता तो नहीं आई पर भाई राम चपरासी था । सुबह रमाराव कहाँ है? प्रकाशचंद्र ने कर्कश स्वर में पूछा वो तो अभी तक नहीं आई है । भाई राम ने डरते हुए सूचना दी । ठीक है तो मुझे भी बैठो । कोई व्यक्ति या टेलीफोन आए तो ध्यान रखना अच्छा साहब प्रकाशचंद्र ने नसीफा रख दिया । अब उत्तेजना का स्थान क्रोध में ले लिया । उन्हें सुधार रामाराव पर गुस्सा होने लगा । यू अपने काम में एकदम दक्ष है । लम्बा छोटा कैसा भी नोट या पत्र लिखा हूँ । एकदम बढिया टाइप करेगी । एक भी गलती नहीं । फॅमिली गति भी कमाल की है । दफ्तर में रहेगी तो प्रकाशचंद्र को किसी भी बात की चिंता करने की जरूरत नहीं । समय पर चाय कॉफी किसी बैठक पर जाना है तो बिना कहीं स्टाफ कार बुक हो जाती है । कहीं दौरे पर जाना हो तो बिना निर्देश कि वह पूरे दौरे का सारा प्रबंध कर देती है । सुधा की अपने काम में कौशलता और दक्षिण की वजह से ही वो उसे अपने पास रखे हुए हैं । वरना वो उसकी एक आदत से परेशान हो गए हैं । देर से आएगी जल्दी चली जाएगी । अक्सर उसे आधे दिन की छुट्टी चाहिए । विवाहिता होकर भी वो दफ्तर की अन्य अब विवाहिताओं गैर जिम्मेदार लडकियों की तरह व्यवहार करती है । इस समय उसकी कितनी जरूरत थी? कॉफी तो चाहिए थी । ये बैंगलोर जाने का प्रबंध ही करना था । अपनी बिगडती भावनाओं को नियंत्रित का प्रकाशचंद्र ने एक बार फिर अपने मन को सीमा की तरफ मोड लिया । उसे तो बताना चाहिए सचिव के इस निर्णय के बारे में क्यों ना उसे बुलाकर व्यक्तिगत रूप से पूछा जाए । उसी के साथ कॉफी भी पी ली जाए तो क्या हर्ज है? प्रकाशचन्द्र ने सामने मेज पर मुझे शीशे के नीचे कार्यालय के अफसरों की विवरणी पर दृष्टि डाली । ऊपर से उन्होंने पढना शुरू किया । श्रीमती सीमा लाल, अवर सचिव ऍफ और उनकी दृष्टि रुक गई । कमरा नंबर बारह का फोन वो इंटरकॉम नंबर भी वहाँ था । उन्होंने इंटरकॉम पर अट्ठाईस नंबर डायल किया । घंटी बजे उधर से आवाज आई सीमा सीमा मैं बोल रहा हूँ प्रकाशचंद्र अब सचिव प्रशासन नमस्ते साहब कहीं कैसे आज क्या खुशखबरी है तुम्हारे लिए? क्या डिप्टी बना रहे हैं? सीमा ने हसते हुए पूछा घर आओ तो बताऊँ लेके काफी भी हो जाएगी हूँ । फोन बंद हो गया । प्रकाशचंद्र अपनी मेज पर नजर डाली । काफी फाइल एकत्रित थी । हालांकि इनमें से अस्सी प्रतिशत पर कोई कार्रवाई नहीं करनी थी फिर भी हर अवसर ऐसी फाइलों को सजावट के लिए अपनी मेजबा रखता है । इनसे अगर तू पर पर्याप्त प्रभाव पडता है और अनायास ई उसके मुंह से निकल जाता है । बडा काम है आपके पास ॅ क्या करे भाई काम के मारे मारे जा रहे हैं । वो कुशल अभिनता की तरह आश्चर्यजनक नाटक करते हैं । मेरे और कमरा एकदम ठीक ठाक था सीमा का स्वागत करने के लिए । पर कॉफी उन्होंने बजट दबाकर भाई राम को तत्काल दो प्याले कॉफी लाने का आदेश दे दिया । अगले पांच मिनट में कमरे का दरवाजा खोला । प्रकाशचंद्र बेहद उत्सुक हो अपनी शानदार कुर्सी से थोडा सा उठे सीमा का स्वागत करने के लिए । पर तत्काल ही वो बैठ गए । आशा निराशा में बदल गयी । कमरे चंद्र आने वाली एक युवती ही थी, पर वह सीमा नहीं सुधा रामाडा होती है । माफ कीजिएगा साहब! मैं लगाकर सुधार नजरें झुकाए, अपराधबोध से ग्रस्त पश्चाताप की आग में जलती हुई सी धीमे स्वर में बोली । प्रकाशचंद्र ने सुधाकर सिर से पांव तक गौर से देखा । एक आकर्षणहीन आकर्षक व्यक्तित्व पराजय और पीडा के बोझ से आकाने सुगठित शरीर रचना गोल चेहरा घने लंबे बाल बडी बडी आंखें गोरा रंग पर संपूर्ण रूपरंग ग्रहण लगे । चार जैसा फीका तो वही और भयावह । ऐसा क्या हुआ? प्रकाश उन्होंने कडक कर पूछा कोई उत्तर नहीं दिया उसकी गोल गोल बडी बडी आंखों में नमी उभरने लगी । तुम्हारे आने जाने का कोई समय है । बडा तंग करती हो तो वो निरुत्तर सी खडी रही बस क्योंकि हुई निगाहें और ज्यादा हो गई है आप फिर चक्कर क्या है? प्रकाशचंद्र खुलकर पूछा शायद सुबह के पास कोई स्पष्टीकरण नहीं था या फिर था पर उसे अभिव्यक्त करने के लिए उसके पास शब्दों का अकाल पड गया था । तो जो भी हो आपने अंतर की । पीडा की अभिव्यक्ति वह शब्दों से नहीं आंखों के माध्यम से कर रही थी । आंखों की झील में एक जबरदस्त तूफान उठा हुआ था । किसी भीषण जल कगारों से उतरकर बहस सकता था । जरूर इस लडकी की जिंदगी से कोई बहुत दो भरी खता जोडी है प्रकाश । उन्होंने सोचा हो और प्रकट में गुरु के स्वर में बोले अगर ना बोलने की कसम खाई है तो जाओ यहाँ पत्थर की मूरत की तरह खडे रहने से क्या फायदा साहब आप को जो असुविधा होती है उसके लिए मैं आपसे हाथ जोडकर माफी मानती हूँ । मैं बहुत मजबूर हूं । जानबूझ कर मैं सब नहीं करती । आशा है आप मुझे क्षमा कर देंगे । कॅमोडिटी और धोती के बल्लू से अपनी आंखें पोछती हुई तो आज तक बढ रही है । जैसे ही सुधारने बाहर जाने के लिए कमरे का दरवाजा खोला सीमा अंदर दाखिल हुई । उसने बाहर जाती हुई सुधार को हो उसे देखा और फिर प्रकाशचन्द्र की मेज की तरफ बढ गई । आओ सीमा प्रकाशचंद्र को लगा जैसे कमरे में साथ साथ मेनका आ गयी । बासंती बिहार का सुबंधु झुका बनकर आपकी निजी सचिव थी ना? वो कह रही थी सीमा ने कुर्सी पर बैठे हुए घोर आश्चर्य से पूछ रहा हूँ क्या बताओ सीमा लडकियों के साथ यही परेशानी है जो इनकी मर्जी में आयकर ने तो एक शब्द भी कुछ कहा नहीं, बस तेज हुए बहाने बैठ जाएंगी । प्रकाशचंद्र ने वितृष्णा भरे स्वर में कहा आप एक लडकी से बातें कर रहे हैं । सीमा ने मुस्कुराकर कहा तुम लडकी बाद में हो अवसर पहले तो मैं अपनी जिम्मेदारियों का एहसास है । आप हूँ मस्का लगा लेते हैं । खैर छोडिए इस बच्चे को ये बताइए आप क्या खुशखबरी सुनने वाले थे । सीमा ने उत्साहपूर्वक पूछा । प्रकाशचंद्र ने कोई उत्तर नहीं दिया । उन्होंने सचिव का नोट उसकी तरफ बढा दिया और उसके मुख्य भार भरने वाली प्रतिक्रिया की उत्सुकता से प्रतीक्षा करने लगे । इसमें कौन सी खुशखबरी की बात है? नोट पढकर सीमा ने तटस्थता का खोल ओढकर कहा प्रकाशचंद्र की उत्तेजना के उफान पर सीमा की टाॅप ठंडे छींटे मार दिए । बैंगलोर में सार्वजनिक प्रशासन के मानवीय पहलू पर एक सेमिनार विचारगोष्ठी हो रहा है । तीन दिन चलेगा । सचिव ने आदेश दिया है इसमें उप सचिव यानी प्रशासन तथा अवर सचिव ऍफ बार लें । सरकारी खर्चे पर बंगलौर का दौरा, वहाँ रहने ठहरने, खाने पीने का मोह प्रबंध इधर चार पांच दिन के लिए अवसर की बराबर से छोटी उनके खुद के लिए एक अतिरिक्त आकर्षण है डॉक्टर की और औपचारिक ड्यूटी को इनका साथ तुम क्या सोच में बढ गयी वो सीमा प्रकाश इन्होंने हतोत्साहित होते हुए पूजा तीन दिन बंगलौर में ठहरना है । उसके लिए चार दिन ट्रेन में बर्बाद करो । सीमा ने डूबे स्वर में कहा नहीं हम लोग हवाई जहाज से जाएंगे । आप तो जा सकते हैं पर मैं तो हवाई यात्रा की हकदार नहीं हूँ । वो मुझ पर छोड दो, मैं सचिव से विशेष स्वीकृति ले लूंगा । फिर तो तुम को जाने में कोई आपत्ति नहीं है । तो अभी भाई राम कौनसी के दो प्याले ले आया कॉफी के साथ । साथ ही संयुक्त सचिव का बोल दिया गया । प्रकाशचंद्र उनसे बातें करने में व्यस्त हो गए । उन्होंने हाथ के इशारे से सीमा को कॉफी पीने को कहा । सीमा ने कॉफी का एक घूट भरा उलझन में पड गई थी । इतनी शीघ्रता से निर्णय करना उसे संभव नहीं लगा । बैंगलोर जाने की कल्पना सुखाती वो वहाँ जाएगी तो मैसूर का वृन्दावन बाद भी देखने का प्रयत्न करेगी । फिर हवाई जहाज की यात्रा आज तक वो हवाई जहाज में नहीं बैठी थी । ये बडा आकर्षण था । यही नहीं ये सहर कितनी सुखद और सहज होगी चलने के लिए कार ठहरने के लिए पाँच सितारा होटल और सबसे बडा लाभ होगा । उस की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट में एक प्रमाणपत्र की वृद्धि । कितने कर्मचारियों को ऐसे सुनहरी अवसर मिलते हैं? बंगलौर जाने के मार्ग में कई दिक्कतें भी थी । सबसे बडी दिक्कत थी उसके पति लाल का दिल्ली से बाहर होना । वो सरकारी क्षेत्र के संस्थान के विक्रय विभाग में काम करते हैं । महीने में बीस दिन कंपनी के काम से घर से बाहर रहना पडता है और सोच वो पंजाब के दौरे पर गए हैं । दो दिन बाद आएंगे । उनसे पूछने का तो प्रश्न नहीं उठता हूँ क्योंकि उसे पर्स हो जाना है और उन के आने से पहले वो लौट आएगी । पर शायद सबसे बडी दिक्कत है क्योंकि उसकी बारह वर्षीय एकमात्र बेटियाँ सातवीं में पडती है । वो कहा रहेगी कैसे रहेगी? जब उसके पिता दिल्ली में होते तो उसे बैंगलौर साथ ले जाने का तो प्रश्न नहीं उठता हूँ । फिर क्या सोचा? सीमा प्रकाशचंद्र ने फोन पर बातें खत्म कर ठंडी होती कॉफी का एक घूट पी कर पूछा वैसा नहीं कर पा रही हूँ । सीमा ने कॉलेज कर कहा । देख लोग ऐसे मौका बार बार नहीं आते । प्रकाश किरणे उसे उकसाया । तभी एक और फोन आ गया । प्रकाशचंद्र एक लंबी बात चीत में व्यस्त हो गए । सीमा ने काफी खत्म कर ली । उसके पास बैंगलोर जाने के बारे में अंतिम निर्णय करने के कुछ निजी और उपलब्ध हो गए । मैं तो जाने के पक्ष में वो झूठ चली थी । कोई आधारभूत आपत्ति तो ही नहीं । हाँ लाल है ही नहीं तो अनुमति ऍम की समस्या थी । पर तभी उसके अवचेतन मन ने इस समस्या का समाधान भी खोज लिया हूँ । उसे अपने मेरे भाई सतीश की याद आ गई थी । वो वित्त मंत्रालय में भी अनुभाग अधिकारी है । राम कृष्णपुरम में सरकारी फ्लैट में रहता है । बिलकुल उसके बाद छोडा जा सकता है । पर इसके लिए उससे पूछा तो जाए । ये भी हो सकता है कि वह दिल्ली महीना हूँ । कहीं बाहर गया हूँ । पिछले बहुत दिनों से उससे कोई संपर्क नहीं हुआ है । प्रकाश इन्होंने फोन पर बात खत्म करके प्रश्न सूचक दृष्टि से सीमा की ओर देखा और फिर ठंडी वहाँ भरकर कुकडेश्वर में अपने आप से बोले मैंने राम प्रसाद को मोटेल किया था । अभी मोस्टली का आदेश जारी हुआ ये कि मंत्री जी के निजी सचिव का सिफारिशी फोन आ गया । चला लो प्रशासन यही लोग कहते हैं हमारे प्रशासन में अनुशासन का भाव है कि ऐसी तरह अनुशासन बनाए रखा जा सकता है क्या वही अनुभाग अधिकारी जिससे लोग ऍम सीमा ने उत्सुकतापूर्वक पूछा, वही वो तो बडा ही बदतमीज और वाहियात आदमी हैं । कहते हैं उसके अनुभाग में किसी लडकी की नियुक्ति हुई नहीं । क्यों बेचारे की मुसीबत आ जाती है उसके पास तो तुम ठीक कह रही हो । सीमा प्रकाश उन्होंने सीमा की बात बीच में काटकर का । उसके अनुभाग में कोई भी लडकी कभी सुरक्षित नहीं रहे । इसमें तो मुंबई या फिल्मों के खलनायकों वो भी माफ कर दिया है । ऐसे ऐसे जोडतोड लगता है । ऐसी ऐसी उठा पडा करता है कि बेचारी लडकी के सामने आत्मसमर्पण करने के अलावा और कोई जा रही नहीं रह जाता । बडा खतरनाक आदमी है पर इस बार फसा कैसे? एक नई लडकी की नियुक्ति हुई उसके अनुभाग मैं माफ कीजिए आप प्रशासन के इंचार्ज है । आपको पता है कि वह गन्दा नहीं फिर उसके अनुभाग में आप लडकियों को नियुक्त करते ही क्यों है? सिद्धांत रुपए तुम्हारी बात ठीक है पर व्यवहार में संभव नहीं । एक टोक लडकों में लडकों की अपेक्षा लडकियों की संख्या नहीं है । इसलिए हमेशा उस अनुभाग में लडकों की नियुक्ति संभव नहीं । दूसरे इतने निम्न स्तर की नियुक्ति अनुभाग अधिकारी जब अवर सचिव के स्तर पर हो जाती है । मेरे पास ही मामले नहीं आते हैं । ये भी ठीक है । हाँ, इस बार एक नई लडकी की नियुक्ति हुई महाशय है । उस पर डोरे डालने शुरू कर दिए । लडकी भी काफी तेज थी तो उसने बच्चों को कोई स्वतंत्रता नहीं लेने दी हूँ । बस एक दिन दफ्तर के बाद उसे जनहित में ओवर टाइम हो गया । लगभग छह बजे जब डॉक्टर सुनसान हो गया तो राम प्रसाद ने उसके साथ बलात्कार करने की कोशिश की । दफ्तर में एक अनुभाग अधिकारी का जो साहस सीमा क्रोधित होकर बोली और वो लडकी मेरे पास रोती हुई आई । मैंने उसे लेकिन शिकायत ली और प्रारंभिक जांच के बाद पाया कि लडकी के आरोप में सच्चाई है । कोई गवाह तो मिलेगा नहीं । सीमा ने शंका व्यक्त की । सहयोग से चश्मदीद गवाह मिल गया । दफ्तर में झाडू लगाने वाला जिसकी कमरों को बंद करने की ड्यूटी होती है, वो कमरा बंद करने के लिए बाहर गलियारे में बैठा था । जैसे ही कमरे में लडकी की चीज हूँ जी वो अंदर पहुंच गया । बच गए बेचारी लडकी की इज्जत आबरू । यही नहीं उसने गलत तरीके से लडकी को ओवर टाइम होगा । अब तो कोई ऐसा काम नहीं था जो दूसरे दिन के लिए नहीं डाला जा सकता था । दूसरे स्टाॅपर रोकने के लिए सक्षम अधिकारी उप सचिव होता है । उसकी अनुमति के बिना नीचे का कोई भी अधिकारी ओवर टाइम का बता नहीं दे सकता । फिर तो राम प्रसाद के खिलाफ स्पष्ट मामला बन जाता है । वही तो इसीलिए मैंने उसको मोटल करने का आदेश जारी कर दिया । इधर आदेश जारी हुआ । उधर मंत्री जी के निजी सचिव राधा चरण का फोन आ गया । राम प्रसाद की सिफारिश राधा चरण ही करेगा । सीमा नेम उनको विकृत करके कहा करने दो तो इस बार में राणा चरण की बात नहीं मानने वाला । सचिव दबाव डालेंगे । ये आदेश मैंने सचिव से अनुमति लेकर दिया है । अगर वह तू कर चाटना चाहे तो मैं क्या कर सकता हूँ । कमाल की बात ये है कि राधा चरण उस बेचारी निरापराध लडकी पर दोष लगा रहा है । कह रहा था कि वो लडकी भ्रष्ट हैं और वो राम प्रसाद को ब्लैकमेल कर रही है । क्या बकवास है वो शहर तो दोनों मोहन बैठे रहे अपने अपने स्तर पर । वो इस घटना के प्रशासनिक और मानवीय पक्ष का विश्लेषण करते रहे । पर तभी प्रकाशचंद्र को बैंगलौर यात्रा की याद आ गई । उन्होंने विषय परिवर्तन कर सीमा से कहा छोडो इस बच्चे को ये तो रोज के खिलाते हैं । ये बताओ तुमने बैंगलोर के बारे में क्या सोचा? अभी बताती हूँ जरा अपनी निजी सचिव से कहिए की वो मेरे रिश्तेदार सतीश को फोन मिलाया । सीमा बोली और उसने सतीश का फोन नंबर बता दिया । प्रकाश उन्होंने बजट दबाकर सुधा को इस विषय में आदेश दे दिया । अगले कुछ दिनों में फोन मिल गया तो हूँ

भाग - 02

फॅस सीमा अपनी कुर्सी से उसका प्रकाशचंद्र की बगल में जहाँ खडी हुई उसने रिसीवर पकडा और बोली सतीशकुमार बोल रहे हैं मैं सतीश बोल रहा हूँ उधर से आवाज आई सतीश भैया मैं सीमा बोल रही हूँ पर तुम्हारी आवाज को क्या हुआ? जुकाम हो रहा है । कहूँ कैसे हो? कैसे याद की आज ठीक हूँ तुम कैसी हो बनी जी कैसी हैं? सब ठीक ठाक है हमारे जीजा जी आजकल का है । दिल्ली में अनार होने की तरह विश्वभ्रमण पर गए हुए हैं । उनके पांव में तो चक्कर है भैया । इधर मैं भी चक्कर फस गई । वो क्या? तीन चार दिन के दौरे पर बैंगलोर जा रही हूँ तो क्या जी जी की बीमारी तो मैं भी लग गई है? नहीं, एक सेमिनार है । मैं जाना तो चाहती हूँ पर पर पिंकी की समस्या है । यही ना उस हमारे पास छोड जाना । इसमें परेशान होने की क्या बात है? शुक्रिया कब जा रही हो परसो ही जाएगा । कल शाम को मैं अगर पिंकी वो अपने साथ ले वाले जाऊंगा तो तकलीफ मत करना । मैं छोड जाऊंगी । इस बहाने भावी जी और बच्चों से भी मुलाकात हो जाएगी । ठीक है कल रात का खाना हमारे ही रहेगा । ठीक है क्या कर सीमा ने फोन बंद कर दिया । उसने चैन और राहत की सांस ली । अब तो कोई समस्या नहीं । प्रकाशचंद्र बुदबुदाए उन्होंने सीमा की ओर देखा और उनके हो टोमॅटो मुस्कान सच गई तो चलने का प्रबंध कर लीजिए । सीमा ने कहा ठीक है सीमा मेरे ख्याल से हम इस दौरे का आनंद उठा सकेंगे । सीमा ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की । वो प्रकाशचंद्र को कॉफी पिलाने के लिए धन्यवाद देकर चली गई । प्रकाश उन्होंने बजट देकर सुधार को अंदर बुलाया और उसे सचिव का नोट पकडाते हुए कहा ये लीजिए रोका विभाग से दो सीटें बुक करा दीजिए । लौटने की भी सीटें वो करवा लीजियेगा । हमलोग सोमवार शाम की फ्लाइट से लौटेंगे । और हाँ कर्नाटक सरकार के कार्मिक विभाग को फॅसा हमारे कार्यक्रम की सूचना दे दीजिएगा । हमारे लिए ठहरने, खाने पीने आदि सब का समुचित प्रबंध होना चाहिए । हवाई अड्डे पर करानी चाहिए साहब सारा प्रबंध हो जाएगा । ये सभा मेरे ऊपर छोड दीजिए । सुधा आज विश्वास में भरकर बोली ठीक है जाइए क्या का प्रकाशचंद्र एक महत्वपूर्ण फाइल खोलकर पडने लगे । अगले दस मिनट में उन्हें महसूस हुआ कि वो नई दिल्ली के अपने दफ्तर में नहीं सीमा के हाथ में हार डाले । मैसूर के वृन्दावन भाव में रंग बिरंगी रोशनियों और स्वच्छ लोग का माहौल रस्ते फुआरों के बीच घूम रहे हैं । हाँ वो ऐसी सीमा है जो उनके कार्यक्षेत्र से पडे हैं । उनके नीचे काम नहीं करती और उससे सामी पे का अवसर मिलना असंभव है । डॉक्टर से लौट का प्रकाश इन्होंने महसूस किया था कि घर में एक विचित्र सी मनहूसियत से भरी शांति व्याप्त है । उन्हें अपने दोनों बच्चों में से कोई भी नजर नहीं आया था । माला उन्नीस वर्ष की हो गई है । इंद्रप्रस्थ कॉलेज में पढाई है । बी ए ऑनर्स के अंतिम वर्ष में है । विवेक बीस वर्ष का है । चार्टर्ड अकाउंटेंसी कर रहा है । आते ही उन्होंने निर्मला से बच्चों के बारे में पूछा था । वो तो अपने दोस्त क्या वीडियो पर कोई फिल्म देखने चला गया था । माला की एक मित्र का जन्मदिन था तो वो कॉलेज से सीधी वहीं उसके घर चली गई थी । बच्चों के बिना घर कितना सोना लगता है? प्रकाशचंद्र ने टिप्पणी जल्दी सो तो है मेरे मिलने । उन से सहमती व्यक्त करते हुए आगे कहा आप कपडे बदल आदमी होकर बाहर आइए । मैं चाहे लगाती हूँ । प्रकाशचंद्र आराम से आगे पीछे होने वाली दे कुर्सी पर बैठ गए और उन्होंने अपनी टांगे फैलाकर निर्मला की कुर्सी पर टिका दी सामने उनकी प्रिया निमी देश में चाय नाश्ता आएगी । मेरी फॅमिली शाम का बेहद खुशनुमा माहौल बगल में और सिंगार के पेड से आती एक मादक महीन से सुबह नहीं सामने अनार का । फिर जिसमें लाल फूल खेल रहे थे और सडक के किनारे केले के वृक्षों का झोल । तीन वृक्षों में फल आ गए थे, पर दर परत खोलती जा रही थी । शाम की मीठी में है पूरे लॉन बस छाती जा रही थी, बल्कि हवा बह रही थी । अस्पष्ट अंधेरी छायाओं का आभास नीचे उतर चला था । प्रकाशचन्द्र ने जी भरकर इस माहौल को एक साथ में अंदर खींचा और फिर दीर्घ निश्वास छोडकर आंखे मूंद अपने दोनों पांवों को निम्मी की गोद में डाल दिया । उन्हें लगा जैसे दिनभर की दफ्तर की थकान पलभर में उतर गई है । जो लीजिए निर्मला का ये जलतरंग यसवंत सुन प्रकाश उन्होंने अपने पाओ सिकोडे और आपकी खोली । उन्होंने चाय का प्याला थान लिया, पर तभी दो परिचित व्यक्तियों को लॉन् के द्वार के बाहर खडा देख को कुछ होंगे । उनमें एक स्त्री थी और एक पुरुष साधारण किस्म के इंसान । सडक पर चलते चलते एक व्यक्ति से उन दोनों ने प्रकाशचंद्र की कोठी का नंबर पूछा था और आगे तूने उन की तरफ इशारा कर दिया था । वे दोनों लोगों के द्वार तक पहुंच गए थे । गए लोगों का फायदा खोल अंदर आने का उन्हें साहस नहीं हो रहा था । कुछ और तक में दोनों बाहर ही खडे रहे । प्रकाश इन्होंने आठ में पकडे चाय के प्याले से कुछ घूम दिए और फिर वो उसे था में हुए उठे और द्वार के पास पहुंचकर बोले किससे मिलना है । सबसे उस महिला के साथ कई पुरुष था । वो बोला था कौन से सबसे प्रकाशचंद्र जी से क्या काम है? हम अंदर आ सकते हो जाऊँ । पल भर को प्रकाशचंद्र सकपकाए फिर यंत्रवत लोहे का फायदा खोल दिया हुजूर, वो टीमें कुत्ता तो नहीं है । फिर पुरुष के अंदर आते हुए डरकर पूछा, नहीं बताओ क्या बात है मुझे और मेरा नाम गंगा शरण है और ये मेरी बहन शकुंतला है । उस व्यक्ति ने अपना परिचय दिया । कभी ना जाने की इस भावना से प्रेरित होकर शकुंतला कटे विश्व की तरह प्रकाशचन्द्र के पास पर गिर पडी । उनको इतना अवसर भी नहीं मिला । वो पीछे हट जाए । शकुंतला ने उनके दोनों को कसकर पकड लिया और रोते हुए बोली कुजुर मुझे बचा लीजिए वरना मैं अपने चारों बच्चों समेत आत्महत्या कर लूंगी । प्रकाशचंद्र इस रेस में प्रकरण के कारण काफी पहुँच गए । तब तक निर्मला भी उठकर उनके पास खडी हुई और उस महिला को कंधे से पकडकर उठाती हुई बोली ये क्या कर रही हो? सीधे तरीके से बताओ क्या बात है? अगर मैं तुम्हारी मदद करने की स्थिति में होंगे तो जरूर सहायता करेंगे । आप मई बात है । भैया ने पता किया था दफ्तर में सब कुछ आपके यहाँ तो मैं मेरी नजर को डूबने से बचा लीजिए । मेमसाहब कहते हुए शकुंतला ने निर्मला के पास को पकड लिया । प्रकाश इन्होंने होर्से शकुंतला को देखा ये नारी है अथवा पीडा दैनिक था यहाँ सहायता ही जीती जाती मूरत सूखा जर्जर शरीर पिसा हुआ चेहरा, खुरदुरी त्वचा धन से गाल, आंखों के नीचे से यहाँ लकीरें ऑस्ट्रियस बालों में चांदी के तहत साफ दिखाई दे रहे थे मुझे मुझे पनीली सी आर हैं बदन पर घर की झोली, बिना इस्तरी की हुई सूती धोती साना ब्लाउज जिसके गले और कंधे के बीच के सीवन उधर गई थी, जरूर गौरव भारी परेशान में है । उन्होंने उस महिला को देख और सोचा और फिर बोले, चलो उधर बैठ कर आराम से संबंधित बताऊँ । प्रकाशचंद और निर्मला कुर्सियों पर बैठ गए । हालांकि दो कुर्सियां और बडी थी, पर गंगा शरण और शकुंतला लोन नहीं घास पर बैठ गए । अब बोलो तो मैं क्या तकलीफ है? प्रकाशचन्द्र ने शक उनसे पूछा । गंगा शरण ने जेब से एक टाइप किया हुआ कारावास निकाला और प्रकाश चंद्र को पकडा दिया । हालांकि लॉन में अंधेरी की परछाइयां उतर आई थी । प्रकाश उन्होंने सरसरी तौर पर उसका आवाज को पापा का समस्या का अनुमान लगा लिया । वो दोनों सही व्यक्ति के पास आए थे तो ये बात है । प्रकाशन ने एक दिन विश्वास छोडकर कहा साहब, मैं तो जल्दी से ऊब गयी हूँ । जी चाहता है कि चारों बच्चों को लेकर रेल के नीचे कट मरूंगा । शकुंतला ने रोते हुए कहा ये तुम कैसी बातें कर रही हो? क्या आत्महत्या करने से तुम्हारा आदमी वापस आ जाएगा? फिर मैं क्या करूँ साहब, आप ही बताइए । शकुंतला की आंखों से आंसू बहने लगे । शकुंतला की छलछलाती आंखें उन्हें बहुत अंदर तक प्रभावित कर गई । उन्होंने विश्वास हो गया । इस महिला की पीडा वास्तविक है । उन्होंने मामले की तह तक पहुंचने के लिए उसे कुरेदा । पूरी बात बताओ ये सब कैसे हुआ तो दूर आज से दस साल पहले हमारी शादी हुई थी । इस बीच चार बच्चों को पैदा करके उन्होंने किसी और हरामजादी बोला जमीन से बात अगर गंगा शरण हो जा चार बच्चे मेरी छाती पर छोड कर खुद ना जाने कहाँ काम करते रहते हैं हफ्ते दस दिन में कभी आए ना आए ना खर्चा पानी को कुछ देते हैं इतनी महंगाई के जमाने में पांच प्राणी को गुजारा कैसे हूँ ये कमीना पढाई चालू शकुंतला गालीगलोज अच्छी बात नहीं साहब बैठे हुए इंसान के पास ही एक हथियार होता है पर इससे क्या होना है गाडियों से अपना खुद का मूवी गंदा होता है वो तो ठीक है । वो जुड पर क्या करूँ? जब कलेजा पडता है तो आप से आप उसे गाली निकल जाती है । सारी तनख्वा पढाई और तो बस खर्च कर देता है । अपने बच्चे घर पर भूखे प्यासे मारते हैं तो उससे ऐसी कोई जानता नहीं है । इधर उधर कूट पीसकर जो कमाती हूँ उसे पांच प्राणियों का पेट नहीं भरता हो जो खुद तो भूखी रह हूँ पर बच्चों का भूल से मिनट में नहीं देखा जाता है । कहते कहते वो फूट फूटकर रो पडी । उपेक्षित नारी पति द्वारा सफाई गई एक सामान्य भारतीय ग्रहणी ये सोचकर प्रकाशचंद्र का कलेजा कसम गया । उन्होंने निर्मला तो गौर से देखा उसके मुख पर तमतमाहट को भरने लगी थी । धोती के पल्लू से आंसू को बोझ हिचकियों को नियंत्रित कर शकुंतला आगे बोलिंग हाँ हुजूर, मुझे ज्यादा कुछ नहीं चाहिए । मेरे बच्चों को दो वक्त की रोटी मिल जाए । साहब पडोस में और बच्चे भी है । अच्छा खाते देते, सुंदर कपडे पहनते हैं । पब्लिक स्कूलों में पढते हैं । मेरे बच्चों ने ऐसा कौन सा गुनाह क्या है जो बात के होते अनाथों की तरह जिंदगी काट रहे हैं? शकुंतला, तुमने अपने पति को रोकने की कोशिश नहीं की । प्रकाशचंद्र ने पूछा कि और उसका नाम ये है क्या कर शकरूल्लाह बिजली किसी गति से पलटी और उसका फॅस पीछे से गर्दन तक खींच लिया । ब्राइट नंगी पीठ पर छोटों के अनेक निशान मौजूद थे । निर्मला ने लपका शकुंतला की पीठ ढक दी और उसे सांत्वना देती हुई बोली धैर्य रखूँ, ये सब ठीक कर देंगे । मेम साहब, मेरा पति मुझे लौट वह दीजिए । मैं जिन्दगी बार आपके बोल ग्राउंड छपवाना याचना भरे स्वर में कहा । प्रकाशचन्द्र के अंदर करोड का ज्वालामुखी धधक उठा । शकुंतला का पति आदमी है । जरा शास्त्र पशु पक्षी भी अपने बच्चों की देखभाल करते हैं । उन्हें उनसे लगा होता है तो ये तो इंसान है क्या इंसान पर इस तरीके मोहजाल में फस अगर हो सकता है? हाँ हुजूर, मुझे ये बताइए मुझे क्या कमी है या उन हरामजादों में ऐसी कौन सी खासियत है जिसके कारण उन्होंने मेरे पति को चुरा लिया । प्रकाशचन्द्र नजर भरकर हो और से शकुंतला हो देखा और कल्पना लोग हो गए और ये शरीर कष्टों की जोड से खंडहर हो गया है । पर शादी के समय ये महिला और श्री काफी सुंदर और आकर्षक रही होगी । सच मुझे मेरा ऐसा क्या हुआ जिसकी वजह से शकुंतला का पति अपनी पत्नी और बच्चों को छोड अन्य औरतों के पीछे भागने लगा । प्रकाशचन्द्र के मन में अनेक प्रश्न उमडने लगे और बिना दूसरे पक्ष की बात सुने किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना अन्याय होगा । यही सोचकर उन्होंने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं बडे एक प्रश्न था जिसका सीधा संबंध शकुंतला से था । इससे पहले की वह से पूछते उन्हें देख कर घोर सुखद आश्चर्य हुआ कि निमी ने वही प्रश्न शकुंतला से पूछ लिया, क्या तुम्हारे पति शुरू से ही ऐसे थे? नहीं । मेरे साथ शादी के बाद कुछ दिनों तक सब ठीक ठाक चलता रहा । फिर बाद में ना जाने क्या हुआ । जैसे जैसे अभागे बच्चे आने लगे तो वो मुझ से दूर होते चले गए । शकुंतला ने उत्तर दिया, तुमने अपने पति को कभी समझाने बुझाने कोशिश की । मैंने न जाने कितनी बार मैंने मिलने तक जी बडे पर मेमसाहब जिन्हें धूल खाने की आदत पड जाती है, वो पत्थर दिल हो जाते हैं । उन पर किसी बात का कोई असर नहीं पडता । शकुंतला ने रूआंसे स्वर में कहा प्रकाशचन्द्र! इस जटिल समस्या कि भूल भुलैया में कोई हुए थे । अपनी विवाहिता नारी को छोडकर पुरुष पराई स्त्रियों की तरफ क्यों भरता है? क्या ये पुरुष मन की विकृति है? हुआ विविधता की चाह पर क्या ऐसे एक संतुलित परिवार का विघटन नहीं हो जाता है? कुछ हो सकता है । इस मामले में निर्मला ने धीमे स्वर में पूछा और प्रश्न फॅमिली उन पर टिका दी तो क्यों नहीं सरकार ने कंडक् रूस और था । सरकारी कर्मचारियों की आचरण नियमावली के अंतर्गत आदेश जारी किया है कि समझ सरकारी कर्मचारियों से आशा की जाती है कि वे अपने परिवार के सदस्यों की समूचे देखभाल करेंगे । यदि कोई सरकारी कर्मचारी अपनी पत्नी या बच्चों की देखभाल में लापरवाही बरतना है तो उसके खिलाफ विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है । प्रकाश इन्होंने एक महत्वपूर्ण चौथे का उद्घाटन किया । ये तो बहुत ही महत्वपूर्ण मानवीय आदेश जारी किया है । सरकार ने इसी के अंतर्गत आप शकुंतला के पति को ऐसी सजा दीजिए जिससे वो ये रंगरेलियां मनाना भूल जाये । निर्मला ने उत्तेजित होकर कहा, हाँ हुजूर, मुझे इस कानून के बारे में पता था । इसीलिए अपनी बहन को आपके पास लाया था । गंगा शरण ने कहा, प्रकाशचंद्र उदास और विचारों में कोई बैठे रहे । शकुंतला ने उन्हें जो प्रतिवेदन दिया है उसमें स्पष्ट लिखा है कि उसका पति उसकी और बच्चों की उपेक्षा करता है । पत्नी की शिकायत के आधार पर आचरण नियमावली के नियम तीन के अंतर्गत उस व्यक्ति के खिलाफ विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है । उसे आरोपपत्र दिया जाएगा । उसका उत्तर यह स्पष्टीकरण आने पर मौखिक सुनवाई होगी । जांच अधिकारी नियुक्त होगा । वो पूरे मामले की और न्यायिक जांच पडताल करेगा । गवाहियां होंगी । दोनों पक्षों की तरफ से गवाह और साक्षी प्रस्तुत होंगे । जांच अधिकारी अपनी रिपोर्ट सक्षम अनुशासनात्मक अधिकारी को देगा, उस पर विचार करेगा । फिर सतर्कता आयोग तथा संघ लोकसेवा आयोग से परामर्श किया जाएगा । फिर अंत में उसको दंड दिया जाएगा ।

भाग - 03

दंड भी क्या होगा सरकार की आप प्रसन्नता हुआ । वेतन में वार्षिक वृद्धि में साल दो साल के लिए रो बस इस प्रक्रिया में सालों लग जाएंगे । फिर शकुन लाके पति के दंडित होने से इस वाली महिला को क्या मिल जाएगा? इस लंबी प्रक्रिया के दौरान पति पत्नी के बीच खुली खाई और चौडी ही होगी । पटने से तो रही नहीं । ये समस्या का समाधान नहीं । इस समस्या का समाधान तो मानवीय आधार पर होना चाहिए । सांप भी मर जाए और लाठी बिना टूटे कुछ ऐसी तरकीब निकालनी चाहिए । इस दुखी नारी को वो सब कुछ मिलना चाहिए जिस पर इसका अधिकार है । क्या सोचने लगे निर्मला के प्रश्न प्रकाशचंद्र की समाधि भंग कर दी । वो सब पढवा ऐसे बोले कुछ नहीं । जरा सी समस्या के बारे में गहराई से सोचने लगा था । कोई समाधान सूझा देखो एक परित्यक्ता को उसका पति लौटा देना बडे पुण्य का काम है । निर्मला ने दार्शनिक अंदाज में कहा गंगा शरण तो मेरे पास अवसर में आना । मैं इस मामले में आगे तक की गाज करना चाहता हूँ । प्रकाश इन्होंने कहा जी हुजूर, मैं कब हाजिर हो जाऊँ? ऍम आने की जरूरत नहीं है तो मैं जा रहा हूँ । दस दिन बाद आने से पहले फोन कर लेना जी बहुत अच्छा क्या कर गंगा चरण खडा हो गया । शकुंतला भी उठ खडी हुई । वो बडी कृतज्ञता महसूस करती हुई बच्चों को आशीष देती हुई बोली साहब, आपके बच्चों को बडी उमर हो । आप दोनों खुश रहे । आपकी खूब तरक्की हूँ, ठीक है और तुम लोग जा सकते हो । प्रकाश । उन्होंने कहा । वे दोनों अभिवादन करके मुख्यद्वार की तरफ बढ गए । अचानक प्रकाशचन्द्र के अंतर्मन में बिजली सी कौन थी? उन्होंने छठ पूजा को आवाज भी शफीउल्लाह । जरा सोनू, शकुंतला छोटा कर खडी हो गई । प्रकाश चंद्र उठे और उसके पास जाकर बोले तो मैं कुछ रुपये पैसों की जरूरत है । पहले तो शकुंतला सर पटाई! फिर और सुर में बोली साहब, हम लोग तो भूखों मर रहे हैं । सवालों हो गए । मैंने बच्चों को दो वर्ष पेट भर करोड ही नहीं मिली है । प्रकाशचन्द्र ने अपनी जेब से सौ रुपए का एक नोट निकालकर उसकी तरफ बढाते हुए कहा ये रख लो । शकुंतला के मुझ पर संघर्ष की छाया है । उभर आई आत्मसम्मान तथा समझौता करने की भावना के बीच संघर्ष चार जीत स्वाभिमान की ही हुई । वो गोली साहब मैंने आज तक किसी के सामने अपनी फटी छोडी नहीं फैलाई है । मेहनत मजदूरी करके अपने बच्चों का पेट पाला है । भीख लेने से तो प्रकाशचंद्र ने शकुंतला की बात को बीच में ही काटते हुए कहा मैं तुम है नहीं । नहीं नहीं राहुल फिर ये रुपये में तुम्हारे पति की तरफ से दे रहा हूँ । इन है मैं उसे वसूल करूंगा । कहते हुए उसने एक झपट्टे में दो सौ करोड प्रकाशचन्द्र के हाथों से छीन लिया । फिर वो उन्हें और उनके परिवार को आशीर्वाद देते हुई चली गई । प्रकाशचन्द्र का अनुमान शत प्रतिशत सही निकला । इस समस्या के समाधान की दिशा में किया गया प्रयोग एकदम सफल रहा था । सौ का नोट मिलने से पूर्व नारी के व्यक्तित्व से उदासी, पीडा और अवसाद का जो कोहरा लिपटा हुआ था और वो ऐसे लोग हो गया था जैसे सूरज के निकलने पर कोहरा छंट जाता है, जैसी प्रफुल्लित लगने लगी थी । शकुंतला लॉर्ड का प्रकाशचंद्र अपनी आराम कुर्सी पर बैठे । निर्मला ने उनकी तरफ प्यार से देखते हुए कहा, एक प्याला गर्म जाए और मुंबई हूँ नहीं रहने दो । इस गरीब औरत के लिए जरूर कोशिश कीजिएगा, जरूर करूंगा । पर अपने इसके भाई को दस दिन बाद क्यों बुलाया? काम जल्दी नहीं हो सकता हो, मैं तो मैं बताना भूल गया । परसों में बैंगलोर जा रहा हूँ । कई चार पांच दिन के लिए एक सेमिनार है । मैं तो नहीं चाहता था और सचिव का आदेश बैंगलौर निर्मला ने बडी उत्सुकतापूर्वक दोहराया । फिर वो और स्पोर्ट्स और में बोली अकेली जा रहे हैं । नहीं डॉक्टर से दो व्यक्ति है एक मैं और मैं डॉक्टर की बात नहीं कर रही थी ना । और बडी खूबसूरत जगह है । फांसी मैसूर है । चंदन वृन्दावन बाद रास्ते में हैदराबाद और तिरुपति इस तरफ अभी तक नहीं गए । प्रकाशचंद्र बुरी तरह चौपडे । तुम्हें भी उन के साथ जाना चाहती है । यदि ऐसा होता है तो प्रकाशचंद्र को इस अनपेक्षित समस्या का हल ढूंढने के लिए समय चाहिए होता है । वो बोले नहीं, नहीं तो मैं ज्यादा चाय बनाने वाली थी । अभी लाई मैंने तो पहले पूछा था क्या? तो वो थी और अंदर चली गई । लोन में चारों तरफ अंधेरा बिखर गया था । प्रकाशचंद्र को मनचाहा एकांत मिल चुका था । अगले कुछ ही मिनटों में उन्हें इस योजना को क्रियान्वित करने के लिए अपनी रणनीति को अंतिम रूप देना था । ये निश्चित था । इस दौरे पर वह निर्मला को नहीं ले जाना चाहते थे । इसका मुख्य कारण था सीमा को उनके साथ जाना । निर्मला को दो जब चाहे कहीं ले जा सकते हैं और सीमा के साथ जाने का उनका ये पहला और संभव ते आखिरी मौका था । सीमा और निर्मला दोनों का साथ नहीं । एक म्यान में दो तलवारें डालने का दो सास वो नहीं करेंगे । फिर वो क्या करें? निर्मला बैंगलौर यात्रा के लिए उत्सुक है तो भी उन्हें एक उपाय सूझा । बस उन्होंने फैसला कर लिया कि वो उसी के मुझसे मना करवा देंगे । इतने कम समय में इतनी महत्वपूर्ण रणनीति बनाकर उन्होंने मन ही मन अपनी पीठ होगी । तभी निर्मला चाय का प्याला लेकर बाहर आ गई । प्रकाशचन्द्र ने बडे उत्साह से भरकर कहा लेनी हो तो तुम भी बैंगलौर चल रही हो ना । मन तो कर रहा है तो फिर कलॅर लू अ वजह से जा रहे हैं । कितना टिकट है ग्यारह होगा दोनों तरफ से बाईस सौ रुपए ना भगवान ना ऐसा नहीं हो सकता । मैं ट्रेन से चार दिन वहाँ ठहरना है । उसके लिए चार दिन ट्रेन में लश्कर होगी । फिर अलग यात्रा करने में क्या मजा आएगा? हमारे यहाँ से चले जलोना ना बाबा अपने पास फिजूलखर्जी के लिए ढाई तीन हजार रुपये नहीं है । मम्मी इस बार दिसंबर में एलडीसी लेने का राजा खाना यू ना पूरे दक्षिण भारत की यात्रा की जाए । एक ही चक्कर में हैदराबाद, मद्रास, तिरुपति, रामेश्वरम, कन्याकुमारी, त्रिवेंद्रम, मधूर, मैसूर, बैंगलोर का चक्कर लगाया जाए । यही सर्वोत्तम रहेगा । इस बार आप अकेली हुआ ये आपको थोडी बोरियत तो जरूर होगी । पर क्या किया जाए? अब जहाँ उसके किराए इतने बढा दिए क्या आम आदमी तो उसमें यात्रा कर ही नहीं सकता । निर्मला के स्वर में उसकी आन्तरिक वेदना और असंतोष की भावना स्पष्ट परिलक्षित हो रही थी । प्रकाशचन्द्र एकदम खोजते । उनकी योजना शत प्रतिशत सफल हुई थी । अपनी पत्नी की किफायत शारी की प्रवृत्ति का उन्होंने पूरा लाभ उठाया था । चाय पी कर वो अंदर आ गए । अब उनका मन शकुंतला की समस्या से हटकर आने वाले चंद दिनों में मिलने वाली उत्तेजनापूर्ण मस्ती में राम चला था । सवा बारह बजते बजते प्रकाश अंदर का मन नियंत्रित हो चला । धैर्य की सीमाएं टुकटुक होकर बिखर गई । कल दौरे पर जा रहा है । इतने डेरो कम पढे हैं और सुधा का कोई पता नहीं है । देरी से आने की कोई सूचना भी नहीं है । उन्होंने महसूस किया जैसे अपने मित्र सुधाकर का अनुरोध मानकर उन्होंने बडा गलत काम किया है । करीब चार महीने पहले उन्होंने सुधा की सिफारिश करते हुए कहा था, ये महिला बडी परेशान और दुखी है और कहीं नहीं चल सकती तो जैसे आपने बात ही लगा लो । उनके साथ जो निजी सहायक था उसकी पदोन्नति हो गई और वह एक अन्य मंत्रालय में चला गया था और ते प्रकाशचंद्र ने तत्काली सुधार को अपने पास लगा लिया था । ये निर्णय एक बडा सिरदर्द साबित हुआ । पता नहीं इस लडकी को क्या बीमारी है । दफ्तर आने जाने का कोई समय नहीं । देर से आना, जल्दी चले जाना, अक्सर छुट्टी ले लेना । कई बार उन्होंने सुधार को छिडकने डालने का फैसला किया था । एक बार उसकी अंयंत्र नियुक्ति करने के विषय में भी सोचा था और जैसे वो सामने होती थी उनके आंतरिक रोज की अपनी आपसे आप ठंडी हो जाती थी । पता नहीं उसके सरों से गठित में और खासतौर से उसकी आपको मिला जाने कैसी मूड याचना व्याप्त है कि वो चाहकर भी उस पर क्रोधित नहीं हो पाते हैं और आज वो बेहद उखड गए थे । उन्होंने फैसला कर लिया था वो जिम्मेदार लडकी को अन्यत्र भिजवा देंगे । लंच के बाद जब वो तो प्रकाशचन्द्र ने उसे तुरंत अपने पास अंदर बुलाया और बोले लेकिए श्रीमती सुधार हमारा को तत्काल इस पद से मुक्त कर आशुलिपि पूल में न्यू किया जाता है मेरी और याचक बनी हो प्रस्तर मूर्ति सी बैठी रही । आप लिखते क्यों नहीं साहब मैं आपसे हाथ जोडकर माफी मांग हूँ । श्रीमती सुधा इस तरह गाडी नहीं चल सकती है । ये सरकारी दफ्तर है ना की आपकी निजी बैठक जब मन चाहे चले आए जब दिल क्या चले गए साहब मैं लज्जित हूँ । आपको जो सुविधा होती है उसके लिए मैं पूरी जिम्मेदारी लेती हूँ । अस्पतालों, डॉक्टरों के चक्कर कहते कहते सुधार का स्वर्ण भरा गया और उसकी आंखें छल चलाई । आखिर कौन बीमार है? प्रकाश उन्होंने खुलकर पूछा । बीमारी हारे तो हर घर में चलती रहती है तो वो उसके इस बहाने से ज्यादा प्रभावित नहीं हुए । छोडिए साहब, अपनी परेशानियों को सबके सामने रोने से क्या फायदा? चुनाव उदासी की प्रतिमूर्ति बानी बैठी थी । सुधा ये जिंदगी धूपछांव का खेल है । ऐसा कौन है? इस से कोई ना कोई गम या दुख ना उतर रहा हूँ । कोई बेकार है, कोई बीमार है, कोई विधवा है जो कोई भी जोर किसी के बेटा नहीं तो किसी की लडकी को वार नहीं मिल रहा है । जितने इंसान उतनी तरह की पीढी है । पर सच्चा इंसान वही है जो धर्य, साहस और दृढता से इन कष्टों को झेल जाता है । वो सोचता है कि दो सौ तो मौसम की तरह नहीं आते रहते हैं । कभी सर्दी तो कभी बसन कभी भूल खेलते हैं । तो अगले कुछ दिनों में पाँच लडकी बिनानी छा जाती है । प्रकाश अंदर ना जाने किस भाव से प्रेरित हो, एक लंबा सा भाषण दे गए । सुबह मंत्रमुक्त से उनकी बातें सुनती रही, पर वो संतोष नहीं लग रही थी । कुछ भगदड सोचने विचारने के बाद वो धीमे स्वर में बोली साहब आप बिलकुल ठीक है, पर कुछ इंसान ऐसे होते हैं कि उनके हिस्से में आयु ही मौसम ही आते हैं । मसलन अगर शीत ऋतु का आगमन हो जाए तो फिर दूर दूर तक आजीवन पसंद की आशा तक समाप्त हो जाती है । प्रकाषन हाँ, गरम रह गए अत्यंत महत्वपूर्ण बात कह दी थी । सुधारने क्या लडकी के साथ ऐसी कोई शाश्वत पीडा जोडी है । अवश्य इसकी जिंदगी पर होस्ट भी है और अभिशाप की छाया मंडरा रही हैं । उसे भावनात्मक सहारा देने के उद्देश्य से वो बोले सुधा पीढा को बांटो या व्यक्त करो तो वह हल्की हो जाती है । वो तो ठीक है साहब और कुछ प्राणी ऐसे भी होते हैं जिनकी जिंदगी विद्यालय में लबालब विश्व भरा होता है । अमृत नाम की वस्तु का अस्तित्व तक नहीं जानते । भावुकता को छोड थोडी वास्तविकता से कम लोग बहुत लंबी कहानी है । अनावश्यक विस्तार छोड केवल संक्षिप्त रूप में ही सुना । दो सुबह भरी बदली सी बैठी थी । आप नेता और भावनात्मक आश्रय की और डरता पाकर वह बरस गई । सब कुछ खुलकर वर्णन कर दिया । उसने उत्तर प्रदेश में एक संभ्रांत ब्राह्मण परिवार की एकमात्र संतान थी । उसके पिता दिल्ली में रक्षा मंत्रालय के कार्यालय में काम करते थे । महान न्यायाधी, पुरातनपंथी और धार्मिक विचारों वाली महिला थी । बीए तथा सचिवालय प्रक्रिया का प्रशिक्षण पूरा करने के पचास हो संघ लोकसेवा आयोग द्वारा आयोजित अखिल भारतीय आशुलिपि प्रतियोगी परीक्षा में बैठी और सफल हो गयी । सफल व्यक्तियों की सूची में उसका साथ वहाँ स्थान था । इधर उसे नौकरी मिली । उधर उसके पिता सेवा निवृत हो गए । कोई विशेष अंतर नहीं पडा क्योंकि जो सरकारी आवास उसके पिता के नाम था, उसके नाम हो गया क्योंकि वह भी बारह सरकार की सेवा में ड्यूटी श्रेणी की कर्मचारी बन गई थी । पिता की पेंशन और उसका वेतन दोनों मिलकर उतना धन आज आता था, जितना पिता को सेवाकाल में मिलता था । तो भी मुसीबतों की शुरुआत हो गई । सबसे पहले पिता गए सेवानिवृत्ति के पचास उन्होंने अपने आपको एकदम निष्क्रिय और अकर्मण्य बना दिया । जो व्यक्ति जीवन में अट्ठावन वर्ष तक व्यस्त रहा हो वो एकदम बेकार हो जाए तो क्या बनेगा । यही नहीं वो और शराब और सिगरेट तो पीते ही थे, अंदर ही अंदर बोलते हुए वो अपने को नष्ट करते रहे । एक दिन वो अपनी पेंशन लेने के लिए बस से गए और फिर कभी लौटकर नहीं आए । बस की भीड नहीं । उनका निधन हो गया । रह गई माँ, वैधव्य और एक अविवाहित लडकी का बोझा । उन्होंने उसे शादी के लिए मजबूर करना शुरू कर दिया । ये समस्या भी शीघ्र ही हाल हो गई । उनके पडोस में आंध्र प्रदेश निवासी रामाराव रहते थे । वो भारत सरकार के एक मंत्रालय में अवर सचिव थे । उनका लडका केंद्रीय लोग कर विभाग में सहायक इंजीनियर था । वो अक्सर उनके घर आता जाता था । काफी अच्छा लडका था । चार एक दृष्टि से रिश् पुरुष तथा आकर्षक बातचीत में सौम्य और शालीन व्यवहार में शीर्ष उसे कोई नहीं था । होना शराब पीता नाॅट था । उसे उसके साथ कई बार के लिए बाहर घूमी थी । एक और पिक्चर भी देखी थी । कॉफी हाउस में कई बार कॉफी भी पी थी । उस लडके के साथ प्रेम नहीं बढा । मैत्रीभाव अवश्य उत्पन्न हो गया था । एक दिन उस लडकी के पिता ने सुधा की माँ से इस विषय में चर्चा की तो वो भी वहां उपस्थि थी । मैं थोडा सा कुछ ऊंचाई थी वो उत्तर प्रदेश के ब्रामण और लडका आंध्र प्रदेश का उन्होंने तत्काल कोई उत्तर नहीं दिया । सोचने के लिए समय मांग लिया था । बाद में माने उसे विचार विमर्श किया था । उसने अपनी सहमती प्रकट की थी । इसके कई कारण थे । अपनी जाती और प्रवेश के लडके के साथ चौधरी करने का मतलब था रहे जुटाना । इस अंतर प्रदेशीय विवाह है । ये सब झंझट नहीं था । दूसरा वो लडका उनका जांचा परखा हुआ था । बडा सीधा साधा सच्चा और सामान्य नहीं था । माँ भी आखिर में मान गई । दोनों का विवाह हो गया । चांदी के एक वर्ष तो सब कुछ ठीक ठाक रहा और तभी एक दिन मां चल बसी । दमाद होने था ही उसका प्रभाव हिरदय पर हो चला था । बस उसी के कारण उनका निधन हो गया । पर दुख जब आते हैं तो एक साथ कहावत है कि पानी नहीं भरता तो नहीं बरास्ता पर अक्सर जब रहता है तो मुसलाधार वही सुधर के साथ हुआ हूँ ।

भाग - 05

हूँ । माँ के जाने के लगभग चार महीने बाद उसका पति एक गंभीर दुर्घटना में बुरी तरह घायल हो गया । वो एक निर्माणाधीन सरकारी भवन का निरीक्षण कर रहा था । बात हो कि पैर पर खडा था । उसका पांव फिसला और वह नीचे आगे रहा । बेहोश हो गया । अस्पताल में भर्ती कराया । जान तो बच गई और जीवन भर के लिए अपन हो गया । उसकी कमर के नीचे का सारा हिस्सा निर्जीव हो गया । पांच महीने बाद अस्पताल से उसे छुट्टी मिल गई और वह ना जीवितों में था ना मृतकों में । पिछले चार साल से वही अपन की भारतीय जीवित है । उसे सजा एक सहारे की जरूरत है । उस की नौकरी छूट गई क्योंकि डॉक्टरों की राय में वो सेवा के लिए स्थायी रूप से अक्षम हो चुका है । क्योंकि ये शुरू की अस्थाई नौकरी थी इसलिए उसे पेंशन आदि की कोई सुविधा नहीं मिली । थोडा सा मुआवजा जरूर मिला था पर उस से क्या होता है? प्रकाश इन्होंने सुधा की कहानी संशय सोनी और उनका अंदर कैसा गया वो सिर्फ इतना ही कह पाए सच मुझे बडा भारी संकटा बडा है तुम्हारे ऊपर साहब संकट नहीं साहब, ये शब्द मेरी संपूर्ण जैसा को व्यक्त करने के लिए काफी नहीं है साहब मैं मशीन बन चुकी हूँ । दिन भर दफ्तर में काम रात भर अपन पति की सेवा । दिन में एक नौकर रखा है तो देखभाल करता है, उसका खर्चा संभाले नहीं । सवाल था फिर अस्पतालों, डॅडी और विशेषज्ञों के पास चक्कर । कई बार पूरी पूरी रात कोरी आंखों में निकल जाती है । कई कई रात में जाकर निकाल देती हूँ । निराश और पीडा की काली छाया है । मेरी आंखों के आगे नाच नहीं है तो मैं रोने लगती हूँ । सच मुझे तुम एक अग्नि परीक्षा से गुजर रही हो? सुधा हाँ, अगर सब कुछ मुझ पर निर्भर करें तो मैं अग्नि परीक्षा में खरे उतर जाओ पर ये दुनिया वाले जीने दे तब ना । अब अपने मित्र सुधाकर जी कोई देख लीजिए उनके साथ इतने दिनों से काम कर रही हूँ । जैसे तैसे उन्हें मेरी परिस्थितियों का पता चल गया तो मेरी मनोदशा तोड गए । वो अक्सर मुझे कहते थे सुधा क्यों अपनी जिंदगी इस तरह होम रही हूँ । इस तरह गलने से कोई लाभ नहीं । इस तरह अपने आप को नष् करना महान मूड होता है । तुम युवा हो, तुम्हारी उम्र ही क्या है? तो मैं विवाहिक जीवन जीने का अधिकार है । इस तरह पूर्ण ताकि चारदीवारी में कैद रहकर कुछ नहीं मिलना बाहर निकलो मैं तुम्हारी शायद अगली प्रस्तुत हूँ । और साहब एक दिन उन्होंने मुझे दफ्तर में ही चुन लिया । इससे स्पष्ट है मेरे अंदर की आदम भूख को तो भडका दिया था, पर सुधाकर जी से मुझे नफरत हो गई । मैं लंबी छुट्टी पर चली गई तो सुधाकर है तुम्हारे साहस और धैर्य के महल को दोस्त किया था । प्रकाश उन्होंने ऊपर करेगा । उस दिन के बाद साहब मुझे लगने लगा जैसा मेरा आत्मविश्वास, धैर्य, साहस, ऋण का सबको चुकने लगाए साहब राम तो वनवास के बाद अयोध्या लौट आए थे और उन्हें अपना राजपाट मिल गया था । मुझे तो लगता है जैसे मेरे लिए ये जीवन भर का वनवास है । कहते हुए सुना क्या है? छल चलाई सुधा परिस्थितियों में बडी क्रूरता की है तुम्हारे साथ । पर याद रखो सोना जितना ज्यादा आग में तब पता है, उसमें उतना ही ज्यादा दिखा रहा था । साहब क्षमा कीजिए । ये सब किताबी बातें हैं । ये तुलना अवैज्ञानिक है । सोना निर्जीव वस्तु आग में तपकर चमकता है । ठीक है पर इंसान उसकी तो चाय होती हैं । सपने होते हैं, उमंगे होती है । अगर उसे तपाते रही तो जलकर राख हो जाएगा । इंसान में लिखा रहता है खुशियों से मैं वकांक्षाओं के पूरा होने से प्रकाशचन्द्र निरुत्तर हो रहे साहब । शारीरिक अक्षमता कितनी भावना तक और बहुत दिक्कत होता तथा असंतुलन उत्पन्न कर दिए । ये कोई मुझसे पूछे । मेरे पति अपने वनस्पति असम से ऊब चुके हैं । अब वो जीवन में कभी पति धर्म नहीं निभा सकते । इसलिए वो अक्सर मुझसे कहते रहते हैं कि कहते क्या सुधार कुछ पाॅइंट की धोती के पल्लू से उसने अपनी गीली आंखों को पहुंचा और बेहद करोड स्वर में बोली साहब, मैं स्वीकार करती हूँ अपनी गलती साथ ही अपराध से और समय ग्रस्त रहती हूँ । मेरा दिल भी कच्चा हो चला है । प्रकाशचंद्र मार वहाँ से बैठे रहे गए । क्या रहे? क्या करें? सुधा की बीडा वास्तविक की नहीं ऐसी अभूतपूर्व और मर्म आत्मक है । इसे न दिखता हुआ आदर्शों की किसी भी चौखट में फिट नहीं किया जा सकता हूँ । ये सही है । इस लडकी की जिंदगी के प्याले में पीडा का विश्व भरा है । क्या ऐसे अमृत मान का कोई अधिकार नहीं? साहब स्थानांतरण के आदेश टाइप करूँ सुहाने अपने को सैयद का सहज रूप से पूछा नहीं । प्रकाशचंद्र यंत्र वक्त रह गए तभी कमरे का दरवाजा धीमे से खुला । अंदर झाकर कोई वापस लौट गया । कोई एक मिनट बाद ही इंटरकॉम की घंटी बजे प्रकाश इन्होंने रिसीवर उठाया । सचिव के निजी सचिव का फोन था । उसने प्रकाशचंद्र को लिंग स्वामी वाले मामले की फाइल को तुरंत भेजने के लिए कहा । साहब ने आदेश दिया था कि प्रकाशचंद्र को इस मामले के बारे में याद दिलाया जाए । प्रकाशचन्द्र ने निजी सचिव को कह दिया कि वो इस महत्वपूर्ण मामले की अभी जांच कर रहे हैं और बैंगलोर के दौरे से लौटकर जांच पूरी करके फाइल भेज देंगे । प्रकाश उन्होंने फोन बंद कर दिया । पल भर को किंकर्तव्यविमूढ से बैठे रहे । फिर उन्होंने सुबह को अगले दिन बैंगलोर जाने के विषय में प्रबंध करने के कुछ आवश्यक निर्देश दिए । सुधा उठी और कमरे से बाहर चली गई । प्रकाशचंद्र कमान अभी भी उसकी करोड कहानी से द्रवित हो रहा था । अभी उम्र ही क्या है इस लडकी की होगी । पच्चीस तीस के बीच में मातृत्व तक का वरदान नहीं मिला है । बेचारी को अपना सव्वा है और नावेद हुआ । जब तक मातृत्व तभी कमरे के बंद दरवाजे पर दस्तक हुई थी । वो खोला और एक नवयुवती ने अंदर झाकर सहमे हुए बीस ओवर में पूछा साहब, मैं अंदर आ सकती हूँ । आइए लडकी अंदर आई धीमी भरी चाल से वो उनकी मेज की तरह बडी पास आकर वो गर्दन लडकाें खडी हो गई । उन से बिना मिले वो बोली साहब मुझे माफ कीजिए मैं आपके पास सीधी चली आई । मेरी कई दोस्तों ने मुझसे कहा था क्या बडे, दयालु और दुख क्यों की मदद करने वाले अवसर है क्या? तकलीफ में? प्रकाश इन्होंने उत्साहपूर्वक पूछा साहब, मैंने सुनाएगी लिंगा स्वामी ने सचिव के पास तिकडम डालिए । प्रकाशचंद्र बिस्मिल से उस लडकी को ताकते रहे गए । उन्होंने उसे कुर्सी पर बैठने को कहा । वो बैठ गई तो उन्होंने बडी बेरुखी और निर्ममता भरे स्वर में कहा तो तुम्हें नीलिमा सिंह हो जी हाँ उस लडकी की पल भर कोठी गर्दन फिर लटक गई । बात कर दी तुमने तुम दूध पीती । बच्ची तो नहीं हूँ तो मैं नहीं है जो अपना बुरा भला सोच सको । फिर आज के युग में जब सब सुख सुविधाएं उपलब्ध है ऐसी गलती भाषा में अपराधी मानी जाएगी साहब इसे मैं ऍम मुझे रास्ता मत दिखाओ । ऐसे मामलों में शत प्रतिशत जिम्मेदारी सिर्फ पुरुष की नहीं होती । जब तक लडकी ना जाए । लडका कुछ नहीं कर सकता । फिर तुम लोगों को हो गया गया है । ये दफ्तर है या यौनसुख लूटने का अड्डा मैं नाराज हो तुम लोगों से नीलिमा का चेहरा पीला पड गया । वो एक दम घबरा गई । आखिर कौन है तो मैं गुमराह करता है । क्या तुम्हारे माँ बाप नहीं है? जावेद उन्हें यही शिक्षा देते हैं कि अपने काम की जा को यौन विचार का डबल आलू बताया । हमारा हिस्सा पूरे दफ्तर में बाढ के पानी की तरह फैल गया है । नीलिमा सिर झुकाए बैठी रही । आखिर ऐसी कौन सी मजबूरी थी जिसके कारण तुमने लेंगा? सोने को अपना सब को सौंप दिया । वहाँ तक भी ठीक था तो ये सब करते हुए सावधानी तो भर्ती होती और फस गए हो तो टेस्ट में बता रही हूँ और चाहती हूँ की लिंगा स्वामी को फांसी पर चढा दिया जाए । पहले नहीं सोचा था कि तुम और लिंग स्वामी समानांतर रेखाएं हो, वो भी भाई तुम्हारी वाइफ दोनों का किसी बिंदु पर मिलन संभव नहीं साहब जिंदगी में ये ऐसी ठोकर लगी है की बस पर एक बात है साहब, मैं तो नहीं थी । चार पांच महीने की नौकरी में कोई क्या सीख पाता है वो तो हमारी जानकीदेवी दादाजी ने खलीफा गिरी कर रही है । उनकी शादी भी मैं और लडकी अच्छा बुरा काम करती है । जानकी देवी वो जो पीएम सेक्शन में अनुभाग अधिकारी है प्रकाश उन्होंने आश्चर्य से पूछा जी हाँ हो वो स्कूल का यौनाकर्षण से भरपूर महिला एकदम भ्रष्ट और गलत सिद्धांतों को लागू करने वाली । मैं उसे खूब अच्छी तरह जानता हूँ । तो बडी खराब संगत में बढ गई । मैं समझ गया तेज गंगी मैं तुमको नहीं गिरी जन के लिए तो मैं किराया मैं देख लूंगा उसे अब तुम जा सकती हो । प्रकाश किरणे तमतमाकर कहा पर साहब लिंगा स्वामी सचिव और मैं । तभी इंटरकॉम की घंटी बजे प्रकाश इन्होंने रिसीवर उठाया और हेलो की । कोई सुबह नहीं । कई बार हेलो हेलो करने पर भी जब कोई नहीं बोला तो उन्होंने रिसीवर पटक दिया । कोषण बाद बजट आया । सुधा ने बताया कि उन्हें सचिव बुला रहे हैं । प्रकाशचंद्र उठ खडे हुए और बोले क्या झंझट से मुक्ति संभव नहीं है? नहीं साहब, डॉक्टर को दिखाया था । उसने उसका परामर्श नहीं दिया । नीलिमा ने खडे होकर कहा आज के युग में इस तरह की छूट कितनी अविश्वसनीय और हास्यास्पद है । कहते हुए प्रकाश अंदर कमरे से बाहर निकल गए । निलिमा पीछे पीछे मारी चाल से चल रही थी । जीने के पास पहुँच प्रकाशचंद्र तेजी से नीचे उतर गए । वो अपने सेक्शन में लौट गई । जहाज हवाई पट्टी पर किसी ओलंपिक धावा की तरह पूरी रफ्तार से दौडा और पलभर में आकाश में उड गया । कुछ ही शहरों में वे लोग आकाश की ऊंचाइयों में पहुंच गए । सीमा खिडकी के पास वाली सीट पर बैठी थी । उसने नीचे झांका सब कुछ कितना बौना तुझे और छोटा लग रहा था । सीमा के लिए पहली हवा यात्रा थी । वो बडी उत्तेजित हो रही थी । बगल में बैठे प्रकाशचंद्र ने पीटी खोलने का आदेश आते ही अपनी बेटी खोली । साथ ही उन्हें सीमा की भी सहायता करनी पडी क्योंकि उसके कोशिश करने के बावजूद वो खुल नहीं रही थी । पता नहीं उन्हें क्या सोची । पेटी खोल उन्होंने निहायत हल्के ढंग से मजाकिया लहजे में अपनी दो उंगलियाँ सीमा के पेट में घुसा दी । एक हल्की गुलबुद्दीन है सीमा को सर्वस्य सुख की सरसराहट से सराबोर कर दिया । उसने । अनुराग भरी दृष्टि से प्रकाशचंद्र को टका और उसके होठों पर एक ऐश्वर्यपूर्ण मुस्कान फैल गई । कितना सुखद संपर्क था । प्रकाशचन्द्र अंदर ही अंदर पूरे उत्तेजित हो रहे थे । सीमा के पेड को गुदगुदा कर उन्होंने उसके मुख पर दृष्टि टिका दी । वो उसके अंदर में उठती प्रतिक्रिया को ना आपने की कोशिश कर रहे थे । बनाया सुने बहुत पुराना अनुभव ज्यादा गया एक बार वो बीमार हो गए थे । तेज बुखार था । डॉक्टर उन्हें ऍम लगाना चाहता था । पर पूरा इंजेक्शन लगाने से पूर्व उसमें उनको एक परिषद डोज दी थी । वो देखना चाहता था कि उस दवा का कोई प्रतिकूल प्रभाव तो नहीं पडेगा । क्या उनका सीमा के पेट में अपनी दुनिया घुसा देना डॉक्टर के उस परिषद जैसा नहीं था । आप तो बडे उच्च कोटि के कलाकार है । सीमा ने वायुयान परिचारिका द्वारा दी गई तो फिर मैं डाल कर कहा प्रकाशचन्द्र चौके । फिर वो हस पडे बोले तुम्हारा इशारा निमी की तरफ आ गया । जी हाँ, आपने काली सारी योजना मुझे बता दी थी । ये हवाई अड्डे पर हम दोनों को साथ नहीं होना है । अलग अलग अंदर जाना है । पर एक बात मेरी समझ में नहीं आई । आपने मेरी भेड अपनी पति से क्यों नहीं कराई? सीमा बुरा ना मानो तो बात करूँ । तुम लोग बडी शक्ति होती हो ना, इसलिए मैं डाल गया । परसों ने भी साथ जाने के लिए कह रही थी । फिर खर्चे को देखकर वो टाल गई । अगर उसे पता चलता कि तो मेरे साथ जा रही हो, वो सोचती कि शायद तुम्हारी वजह से । पर मैं तो सरकारी खर्चे पर सचिव के आदेश से जा रही हूँ । इसमें ऐसा सीमा प्रकाशन रहे । सीमा की बात बीच में काट कर कहा कोई भी कुछ भी सोचने के लिए स्वतंत्र है । अब वो गलत है । सही ये हर व्यक्ति के अलग अलग दृष्टिकोण पर निर्भर करता है । ये तो आप ठीक कह रहे हैं । विमान परिचारिका शाम की जाए और नाचना बांटने लगी और ली सीटों से लगी छोटी छोटी मेजें प्रकाशचंद्र ने खोली । वैसे एक बात है साहब निर्मला जी है । बडी स्मार्ट आकर्षण शुक्रिया । बडी संतोष भी लग रही थी । जहाँ तक मैं जानता हूँ उसे मुझसे कोई शिकायत नहीं है । मैं भी यही कोशिश करता रहता हूँ कि हम दोनों के बीच कभी कोई गलत पहनी गया दरार पैदा ना हो क्योंकि दोनों बच्चे बडे हो रहे हैं । मेरे ख्याल से तो आप दोनों के बीच काफी जरा सौहार्द और समझदारी है । इसी मैं शोक है साहब । वैसे उन को देखकर मेरा मन मैं चल गया था गप्पे मारने के लिए । पर आपने तो धारा एक सौ चौवालीस लगा रखी थी फिर मत करो सीमा तुम जल्दी नहीं मिले । मिलोगी कब कहाँ, कैसे अगले महीने की पांच तारीख को हम लोग अपने विभाग की रजत जयंती मना रहे हैं । क्या सीमा अविश्वास में भरकर बोली कुछ पल सर पढाई से वो बैठी रही । वो प्रकाशचंद्र को घूम कर देखती हुई बोली थी आपकी शादी को पच्चीस साल हो गए । आप की उम्र क्या है? तो क्या दस पंद्रह साल की उम्र में ही आपकी शादी हो गई थी? प्रकाश उन्होंने बर्फी का थोडा मुंह में डाला । मिठास घुल गयी । वो गर्व से भर कर बोले देवी जी, अपनी शादी जरा जल्दी हो गई थी । एक चीज के पूरे होते हैं । पर आप छह साल की तो नहीं लगते । आपकी उम्र तीस पैतीस के आसपास लगती है । इस प्रशंसा के लिए मैं तुम्हारा आभारी हूँ । दोनों नाश्ता करते रहे । सीमा ने कॉफी ली । प्रकाशचंद्र ने चाहे दुनिया भर की बातें करते रहे, वे दोनों पता ही नहीं चला । डेढ घंटा कभी दिया जहाँ हैदराबाद रोका चालीस मिनट के बाद वहाँ से उडा और अगले पैंतीस मिनट बाद वो बैंगलौर अड्डे पर होता गया । हवाई अड्डे पर प्रकाशचन्द्र के लिए घोषणा हो रही थी । उनको लेने के लिए अमुक नंबर की कहा । बाहर प्रतीक्षा कर रही थी तो बाहर आए कारों का जंगल था । उन्होंने अपने नंबर की कार तलाश कर ली । सीमा और वह कार की पिछली सीट पर बैठ गए । उन्होंने वृन्दावन होटल में ठहराया गया । शानदार होटल संपूर्ण सुख सुविधाओं से युक्त प्रथम दल पर दोनों के कमरे साथ साथ थे । करीब आधा घंटा आराम कर कपडे बदलकर वे दोनों नीचे आ गए । एक मित्र की कार उनको उपलब्ध थी । सीमा शहर घूमना चाहती थी । पता है प्रकाशचंद्र उसे कार में घुमाने के लिए लाल बाग देखकर वह बहुत प्रभावित हुई । शहर काफी साफ सुथरा, हर कदम पर बाय चाय । इसीलिए बंगलौर को बाहों का शहर कहा जाता है । पाँच में वे बंगलौर के कैंपेगौडा क्षेत्र में आ गए । एक लंबी सडक जहाँ आधुनिकतम दुकानें और दोनों लगातार सिनेमाघर । कम से कम तीस चालीस सिनेमाघर तो वहाँ थे ही कार को एक जगह छोडकर वे पैदल ही घूमने लगे हूँ हूँ ।

भाग - 06

हूँ । घूमते घूमते सीमा के पाव बंगलौर सिर्फ एम्पोरियम के सामने छोटा गए दुकान की विशाल शो विंडो में अनेक आदमकद महिला पुतलियां एक से एक आकर्षक बैंगलोर ई सिर्फ साडी में सजी खडी थी बाहर से क्या अंदर आकर देखिए हाँ एक से जब ज्यादा साडी मिलेगा दुकान के बाहर खडे छोड रहे सीमा कोर्स आया उसके पांव यंत्रवत दुकान के अंदर चल पडे । वातानुकूलित दुकान में काफी भीड भाव थी । एक काउंटर खाली था वहीं जाकर सीमा खडी हो गई । सेल्स मैंने उसके सामने साढे हूँ काम बार लगा दिया एक से खूबसूरत साढे पचास रुपए से पांच सौ रुपये तक की सीमा ने पौने दो सौ की साडी खरीद ली । वो बेहद होश नजर आ रही थी । उसके बाद से दोनों होटल लौट आए पर हूँ रात का खाना खाकर वे अपने अपने कमरे में जाकर हो गए । प्रकाशचंद्र कोई विचित्र सी अनुभूति हो रही थी । उन्हें बार बार लग रहा था जैसे उनके साथ सीमा नहीं निमी आई हुई है । कई बार कार में उनका मन किया कि वो अपने दोनों हाथों में सीमा का हाथ थाम ले या उसकी बगल में अपनी वहाँ को सटाने पर वो अपने को संयत कर गए । अगले दो दिन वो दोनों सेमिनार में व्यस्त रहे । दूसरे लंच के पश्चात सेमिनार समाप्त हो गया । व्यवस्थापकों ने बाहर से आए प्रतिनिधियों को महसूस घुमाने का प्रबंध किया था । उन लोगों ने कर्नाटक ऍम की एक लग्जरी बस की व्यवस्था कर ली थी । करीब ढाई बजे ये बहुत लगभग पच्चीस प्रतिनिधियों को लेकर मैसूर के लिए रवाना हो गई और वहाँ सात बजे पहुंच गई । वैसे तो करीब तीन घंटे की यात्रा थी किंतु मार में कुछ महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थलों को दिखाने के लिए बस तीन जगहों की थी । टीपू सुल्तान का मकबरा, श्रीरंगम पटल का मंदिर, कृष्णा कावेरी का संगम स्थान मैसूर पहुंचकर प्रतिनिधियों को सीधे वृन्दावन बाप ले जाया गया । क्या शानदार आकर्षण और मस्कर देने वाली जगह थी कांगरी पर बांध बांध के नीचे फुहारे, सुंदर लॉन फूल और रंग बिरंगे प्रकाश की व्यवस्था में पूरा बाव एकदम परी लोग लग रहा था कितना सुन्दर लग रहा है । ऊपर से नीचे देखते हुए सीमा ने बेहद रोमांटिक स्वर में कहा और उत्तेजित हो । उस ने अपने दोनों हाथों से प्रकाशचन्द्र के दायरे हाथ फोकस का पका लिया । कितना और आकर्षक दृश्य है कहते हुए हाथ में हार डाले हुए । दोनों ऊपर से नीचे तक पूरे बाप के दो चक्कर लगाए । बाप के अंतिम सिरे के बाद विशाल लंबी गहरी झील थी । उसे देख सीमा अनायास बोल पडी । कितना रोमेंटिक माहौल है जी करता है । सारी जाती ही काट दी जाए । प्रकाश चंद्र हस पडे और आठ बजे रोज नया बंद कर दी गई । पूरा बास अंधेरी की चादर से ढक गया । सारे प्रतिनिधियों को पहले होटल ले जाया गया जहां उनके ठहरने खाने की व्यवस्था की गई थी । रात का खाना खिलाने के बाद बस में उन्हें चामुंडा मंदिर की पहाडी पर ले जाया गया । वहाँ से खडे होकर उन्होंने पूरे मैसूर को देखा । रोशनी से जगमगाता खूबसूरत शहर एकदम ऐसा लग रहा था जैसे हवाई जहाज से नीचे देख रहे हो । करीब दस मिनट वहाँ ठहरकर वे होटल लौट आए । तब साढे नौ बज रहे थे । होटल मुख्य बाजार में था और दुकानें खुली हुई थी । वो दोनों बाजार में चहलकदमी करने लगे । अगले दिन तो था ही दुकानें बंद रही थी । इसलिए उन्होंने उसी रात मैसूर कि मशहूर चीजें खरीदनी, चन्दन की विभिन्न वस्तुएं, धूप और अगर बत्तियां, हाथी दांत के खिलौने, लकडी के ऊपर दो खूबसूरत क्षेत्र बाजार में घूमते घूमते उन दोनों की नजर एक साथ एक दुकान पर बडी मजदूर मंगल प्रकाशचंद्र ने मुस्कुराकर कहा मैसूर की ये चीज तो विश्वविख्यात है क्या? ये नहीं खरीदों की सीमा महसूस सिल्की साडिया उनका प्रदर्शन देख सीमा के मुंह में पानी आ रहा था पर ना जाने क्यूं उसके कदम ठिठक रहे थे और वो दुकान के अंदर जा रहे थे । हिचकी चाह रही थी चलो ना क्या कर वो सीमा को धमकी आते हुए अंदर ले गए । कैसी सुंदर साडिया थी । क्या शानदार डिजाइन थे और सिर्फ दो इतना मुलायम था जैसे मक्खन हो । पाँच रन की पृष्ठभूमि पर विभिन्न गहरे चटक रंगों में आधुनिकतम डिजाइन की एक साडी दोनों को बहुत पसंद आई । दाम पूछे सवा तीन सौ रुपए बाब रे क्या कर सीमा ने वो साढे काउंटर पर अभी हूँ पर प्रकाशचंद्र ने उस साडी को अलग रखवा दिया । फिर उन्होंने एक और हरे रंग की साडी पसंद की दम सवा दो सौ रुपए दोनों सवारियों को पैर करागर । उनका दाम चुकाकर प्रकाशचंद्र दुकान से बाहर आ गए या शहर की बात ही की । पौने ग्यारह बजने को आए थे और अभी भी काफी दुकानें खुली हुई थी । होटल में पहुंचकर दोनों को एक और सुखद था । सुविधा का सामना करना पडा क्योंकि पर्यटन सीजन चल रहा था । होटल में समिति संख्या में कमरे उपलब्ध थे । दो दो प्रतिनिधियों को एक एक कमरे में ठहराया गया था । सीमा और प्रकाशचन्द्र के लिए ठहरने की व्यवस्था एक ही कमरे में थी । ये कैसे होगा प्रकाशन? खबर आएगी वो दोनों ने पार्टी के साथ आए व्यवस्थापक तथा होटल के प्रबंधक से भेंट करके दो कमरों की मांग की परन्तु ये संभव नहीं हो पाया । एक कमरा भी खाली नहीं था । बडे ही विचित्र सुविधाजनक स्थिति थी । रात के ग्यारह बज रहे थे । किसी अन्य होटल में भी उस समय प्रबंध करना संभव नहीं था । साहब इस पार्टी के साथ कोई अन्य महिला सदस्य भी नहीं है जिनके साथ मेमसाब को ठहराया जा सके । क्योंकि आप दोनों दिल्ली से एक ही दफ्तर से आ रहे हैं । इसलिए मैं सोचा दोनों का में कमरे से चल जाएगा । व्यवस्थापक में स्पष्टीकरण दिया था । दिन भर के सैर सपाटे कारण दोनों थके हुए थे । वे मजबूर और सर पटा ऐसे कमरे में आएगा उसके अंदर से बंद कर वही दूसरे को तानते खडी रह गई । सामने था डबल बैड एक दंपति के सोने के लिए लाख की दो अजनबियों के एक साथ लेने के लिए । कभी प्रकाशचंद्र फालसाई रंग की साडी सीमा की तरफ बढाते हुए कहा ये लो अपनी साडी दूसरी मैंने निमी के लिए खरीदी है । कैसी लगी बहुत सुन्दर मेरे लिए मेरे पास इतने पैसे नहीं थे, सच में चाहती थी पर मैं दिल्ली से कितने रुपये नहीं लाई थी? सीमा ने नहीं संकोच होगा । एक बात करुँ सीमा पर बुरा मत मानना नहीं ये तुझे मेरी मेरी तरफ से नहीं, मैं दिल्ली चलकर आपको इसका मूल्य दे दूंगी । तुम्हारी मर्जी प्रकाश उन्होंने घोर निराशा से कहा । फिर दो पल के मौन के बाद वो बोले वैसे तो, मगर ऐसे मेरी भेड समझ होगी तो मुझे बेहद खुशी होगी । पर एक शर्त है तो मैं सुविधा या सकुचाहट नहीं होनी चाहिए । सीमा ने पल भर प्रस्ताव के पक्ष विपक्ष में सोचा और बिजली किसी गति से तो फिर बोली आपकी खुशी खादिर मुझे भेंट स्वीकार है आपका बहुत बहुत धन्यवाद । चलो एक समस्या तो हाल हुई । अब रही दूसरी समस्या एक पलंग और हम दो कहो तो मैं निचे कारपेट पर । सीमा ने प्रकाशचंद्र की बात बीच में ही काटकर कहा खत्म कर दिया आपने आप फर्श पर । मैं तो मैं किसी भी समय पर वर्ष पर सोने नहीं दूंगा । हम दोनों में से कोई फर्श पर क्यों हुए? ये पलंग इतना तो छोडा है । कहते हुए सीमा अपने कपडे बदलने सालगिरह में चली गयी । उसकी बात सुनकर प्रकाशचंद्र बेसमेंट मंत्र विद से खडे रहे । जब वो स्नानगृह से अपनी रात्रि पोशाक पहनकर बाहर निकली तो प्रकाशचंद्र स्तब्ध रह गए । पारदर्शक नाइटी के आरपार सीमा का चम्पई रंग का शरीर स्पष्ट परिलक्षित हो रहा था । ये क्या स्पष्ट सीधा निमंत्रण था या अप रोष? आत्मसमर्पण की घोषणा मुझे बडे जोर की नींद आ रही है । इस तरह का खडे क्या देख रहे हैं? सीमा ने बडे रोमानी अंदाज में कहा । और वह बडी निश्चिंतता से पलंग के आधे से पर पसर गई । उसने बत्ती बुझा दी । प्रकाशन अपनी रात की पोशाक पहनी और पलंग पर लेट गए । उन्हें लग रहा था जैसे उनके शरीर में रक्त का संचार बडा तेज हो गया है । चुनाव और उपचुनाव में आपसी लग गई है । सारा शरीर जलने ऐसा लगता है उनको ये क्या होता जा रहा था । संपूर्ण व्यक्तित्व एक अनाम किंतु मजबूत आकांशा से आंदोलित हुआ जा रहा था । वो सीधे पीठ के बल लेटे हुए थे । वो महसूस कर रहे थे कि आज उनके धैर्य, संयम और विवेक की बडी जबरदस्त अग्नि परीक्षा होने वाली है । साथ उन्होंने ये भी लग रहा था कि वह पत्नी व्रतधारी नहीं बन सकते । आपने बहुत होने का उन है । पूरा विश्वास था प्रकृति ये साधारण नियम के हाथ में वो खिलौना बन चुके थे । और भी जब मिलेंगे तो और भडकेगी । संपूर्ण शरीर थका और प्लान था और उन्हें नींद नहीं आ रही थी । ऐसे माहौल में कौन हो सकता था? रासरंग के इंद्रधनुषी रंग की तमाम खुशियाँ उनकी बगल में देख रही थी । खुशियाँ नहीं । उत्तेजना, कामना और वासना का संगम । अगले कुछ ही शहरों में प्रकाशचंद्र पर एक आलू किसी मानवता छाने लगी । कहीं दूर घंटियां बज रही थी । मधुर सा संगीत स्वर चारों तरफ बिखर नहीं लगा था ये उन्हें क्या होता जा रहा है? एक बांधा संयम का वो कैसे ध्वस्त हो गया? मेरा बरसात बाढ का पानी कहाँ से हर हर आता हुआ चला रहा है । उनके अंतर में ये कैसे उल्कापात हो रहे हैं । गांव के बाद पानी में बडे जा रहे थे । सब कुछ जलमग्न हो चला था । सीमा भी सोई नहीं थी । जागी हुई मैं की सांसों और सोते हुए उत्पन्न होने वाले इस पंद्रह का अंतर प्रकाशचंद्र बखूबी जानते थे । फिर एक निर्णय आ चुका था । आकर वो गुजर भी गया । प्रकाशचंद्र नहीं पाया जो उसके और उनके बीच की दूरी समाप्त हो चुकी थी । कैसे थे ये पाल एक अनुपम सुख की रचना कर गए । बाढ का पानी और गलती हो या दोनों एक साथ बाहर रहे थे, जला रहे थे । घंटों इसी तरह बीत गए जब सुबह का भूमिका फैलने को हुआ तो दोनों जैसे नींद की गोद में होता खा रहे हैं । सुबह हुई संशोधनों के बाद ये दोनों उठे तो एक अद्भुत सूट से आप्लावित एक यूनिवर्सिटी है सुख संतोष से परिपूर्ण और एक नवीन मादक अनुभूति से मधुमास सीमा ने मुस्कुराकर लगाई नजरों से प्रकाशचंद्र को देखा और बोली निंदाई अफसोस है किए चंद घंटे व्यर्थ गए । बडे रोमानी हो रहे हैं । सीमा आज में महसूस कर रहा हूँ कि इसको परमानंद क्यों कहा गया है? सच तो भूतपूर्व एकदम विशेष । मैंने सपने में ही इस महासुख की कल्पना नहीं की थी । आज मैं इतना अमीर हूँ, जितना पहले कभी नहीं था । बडा मस्का लगा रहे हैं । मस्का नहीं लगा रहा । मैं उस सुख संतोष को जी रहा हूँ जो रात को तुम्हारे माध्यम से मिला था । आप समझते हैं इसमें सिर्फ आप ये मेरे रूम में है । मैं सिर्फ नहीं इशारा काफी था । दरवाजे पर दस्तक हुई व्यवस्था था वो कह रहा था चार जल्दी तैयार हो जाइए । पहले देखने जाना है । बस ठीक सात बजे उन्हें होटल वृंदावन छोड दिया । दिनभर खूब घुमाया गया । पहले तो मैसूर में चामुंडा देवी के दर्शन, फिर राज महल की सर । एक पाँच सितारा होटल में लंच चिडियाघर की सैर और अंत में तीन घंटे की अनवरत यात्रा के बाद बंगलौर उम्मीदवार की शांति और बाजार बंद था । करने को कुछ नहीं था । देखने को कहीं नहीं जा रहा था । तीन दिन भर की थकान दोनों ने मोहन संकेतों में फैसला कर लिया जब ऊपर चल कर आराम किया जाए । जैसे ही वे स्वागत अधिकारीके काउंटर के पास से गुजरे, प्रकाशचंद्र एक्शन को वहाँ रुके और उन्होंने डेट पर बैठी सामान्य सी देखने वाली उस महिला को अपना परिचय देकर और कमरा नंबर बताकर पूछा । कोई संदेशा हमारे जी कहते हुए महिला पलटी । छोटे छोटे खाने वाले एक राय वैसे उसमें कुछ निकाला । एक काफी उसका पूर्जा उसे पढा और बोली साहब, आपकी कल शाम की फ्लाइट की बुकिंग हुई है । धन्यवाद जय का प्रकाशन जीने की तरफ बढ गए । उनके कमरे प्रथम तल पर थे । सीमा उनके साथ । साथ ही उन्होंने कनखियों से उसकी ओर देखा और पाया जैसे वह काफी उदास है । ऊपर पहुंचकर प्रकाशचंद्र ने अपना कमरा खोला । वे दोनों अंदर पहुंचे । सीमा ने दरवाजा अंदर से बंद कर लिया । प्रकाशचन्द्र तक सीमा को देखे जा रहे थे । अचानक वो पूछ बैठे सीमा क्या बात है? तुम कुछ उदास लग रही हो? नहीं तो कहते हुए वह भावावेश में आगे बढी और प्रकाश अंदर से निपट गई । उनकी छाती में मूंगडा कर वो बोली कि हम लोग कुछ दिन और नहीं ठहर सकते हैं । प्रकाशचन्द्र क्या उत्तर देते? ये प्रश्न ही अंतर की सच्चाई को उजागर करने वाला था । इस प्रश्न का उत्तर भी प्रकाशचंद्र ने बडे अनोखे ढंग से दिया । शब्दों से नहीं, अपनी बलेश बाहों की जकडन बढाकर और सीमा के होटल और बालों पर चुंबनों की वर्ष का के सीमा को लग रहा था । उत्तेजना के कारण वो विशिष्ट हो जाएगी । वो देख ली जा रही थी । उसका सर्वस्व वहाँ जा रहा था और मुंदी आंखों से उसने प्रकाशचन्द्र के सीने पर होंगे । काले बालों के घने जंगल को देखा और उसने अपने दोनों हो उनमें डुबो दिए । ये एक ऐसा मादक मिला था जिसने दोनों को लगभग निश्चित कर दिया । संयम और अनुशासन के समझ बंधनों को ध्वस्त करके जब उठे तो उन्हें विशेष संतुष्टि और परिपूर्णता का आभास हुआ । तब आठ बज रहे थे । उन लोगों ने नीचे जाकर आपका खाना खाने का फैसला कर लिया । नीचे जाकर एक एक डोसा उठाकर फिर ऊपर आ गए । इस बार सीमा ने उत्साह में भरकर कहा बराबर वाला कमरा छोड देते नहीं तो सामान उठवाकर इस कमरे में रखवालों मैसूर में मजबूरी थी । पर यहाँ ऐसी क्या परेशानी है? फॅसने हस्कर कहा तो इसका मतलब है कि नहीं, इसका वो मतलब नहीं है जो तुम समझ रही हो । तुम रात को मेरे ही कमरे में सोना पर इसके लिए कमरा छोडने या सामान उठवाकर लाने की क्या जरूरत है? हर्ज भी किया है । सीमा ने बडे भोलेपन से कहा हर्ज है कि यहाँ सबको पता है कि हम बदली बदली नहीं है और शुरू से ही अलग अलग कमरे में ठहरे हैं । अब एक कमरे में शिव करना उनके मन में शंका पैदा करेगा । सीमा इन मामलों में दैनिक सावधानी और चतुराई की जरूरत होती है । इस तरह के संबंधों को बनाए रखने के लिए उस मुहावरे को हमेशा याद रखना चाहिए । साहब भी मर जाए और लाठी भी ना टूटे । ठीक है अभी तुम यही रहो या फिर अपनी रात्रि की पोशाक ले आओ । काफी सामान वहीं रहने दो । वो कमरा बंद रहेगा, उसका डाला बाहर नहीं अंदर है । इसलिए कमरा बंद होने की स्थिति में किसी को ये पता नहीं चलेगा कि तुम कमरे में हो या नहीं । बडी दूर तक जाकर सोचते हैं । हाँ हाँ, सीमा सोचना पडता है । जो नहीं सोचते थे बाद में बच जाते हैं । ठीक है क्या कर सीमा उठी । वो अपने कमरे में गए और वहां से अपनी प्रसाधन सामग्री की अटैची, रात्रि की पोशाक और एक दो अन्य आवश्यक वस्तुओं लेकर प्रकाशचन्द्र के कमरे में आ रही हैं हूँ ।

भाग - 07

प्रकाशचन्द्र रेडियो से संघर्ष कर रहे थे । नौ बजने लगे थे । वो रात्रि के अंग्रेजी के समाचार सुनना चाहते थे पर स्टेशन मिल नहीं रहा था । सीमा को कमरे में आया देख उन्होंने रेडियो बंद कर दिया । सोने का इरादा है प्रकाश इन्होंने एक ऐसे लहजे में पूछा जैसे वो उसका इम्तिहान ले रहे हूँ । नहीं आज तुरान घर जाने का कार्यक्रम है, जिसको शी में खुशी नहीं जम में कैसा हूँ । यही कि कल रात को हम दिल्ली में होंगे और शायद ये दिन और ये रातें जिंदगी में दोबारा नसीब ना हूँ । क्या तो मैं ऐसा सोचती हो? प्रकाश इन्होंने दोबारा सीमा का अंतर हाल लिया । मेरे अकेले की सोचने से क्या होता है? शायद जी तो आप भी महसूस करेंगे कि दिल्ली और बंगलौर में जमीन और आसमान का अंतर है । जो दृढ निश्चय और संकल्पी होते हैं, जिनमें थोडी व्यवहारकुशलता और विवेक होता है, वे जमीन और आसमान के अंदर को नष् कर देते हैं । सीमा मंत्रमुग् सी प्रकाशचंद्र को बस देखती रह गई । क्या ये उन संबंधों की शाश्वतता की शुरुआत नहीं थी । तभी अचानक बत्ती चली गई । पूरा होटल गहन अंधकार की चादर में लिपट गया । इस अंधेरे का फायदा उठाकर मैं कपडे बदल लेती हूँ । सीमा उसको साइड क्या टॉर्चर अमुमति है? प्रकाश उन्होंने पूछा और अंधेरे का एक दूसरी तरह से फायदा उठाने के लिए वो टटोलते हुए भी वैसे उस दिशा में बढे सीमा खडी थी उस की क्या जरूरत है सीमा के स्टोर से पता चला की वो वहाँ नहीं है जहाँ पहले खडी थी । लगभग दस कदम आगे बढने पर भी प्रकाश चंद्र को कुछ हाथ नहीं लगा । उन्हें सीमा की हल्की धीमी जान तरंगी हंसी जरूर सुनाई पडे । क्यों? क्या बात है? प्रकाश इन्होंने अंधेरे में सीमा को टटोलते हुए पूछा क्या बात है कपडे तो बाहर दिए है पर पता नहीं नाइंटी कहाँ चली गई मेरी नहीं रही है । सीमा ने हल्के स्वर में कहा तो मैं लाइट ही नहीं मिल रही है और मुझे तो कहते हुए प्रकाशचंद्र एकदम सीमा के पास से निकल गए । तभी बिजली आ गयी । कमरा दूसरा प्रकाश से नहीं आ गया । पर प्रकाशचंद्र को लगा जैसे उन पर बिजली गिरी है । ऐसा दृश्य कितनी बार अंग्रेजी फिल्मों में उन्होंने देखा था । एक अभी सारे का अपने प्रेमी के कमरे में नितांत कहाँ की संपूर्ण रूप से वस्त्रहीन अपनी पूरी रूप राशि के प्रशांत महासागर को उद्वेलित कर दी हुई सिनेमा के निर्जीव पर्दे पर देखा । वो दृश्य आज उनके खुद के शयन कक्ष में जीवंत हो गया था । सीमा एकदम उनके सामने खडी थी । बिजनस की मूर्ति की तरह अपने रूट के वैभव को बिखेरती हुई प्रकाशचंद्र ने बत्ती बंद कर दी । कमरे में घुप अंधेरा नहीं छाया, क्योंकि अगल बगल के कमरों और गलियारे में जलती पत्तियों का अस्पष्ट और मैं ना साधु मिल प्रकाश कमरे में देखा गया था । उत्तेज नगाई पर्वतीय निर्झर उनको सर्वस्व कोई दे रहा था सुख केस महासागर में गोते खाते हुए अचानक प्रकाशचंद्र सजग हो गए । उनका विवेक जागृत हो गया । अंतर्मन में छिपा जो जो कल से सक्रिय था, आज पकडने आ गया था । संतोष सबसे क्लान । सीमा उनके सीने पर सिर रखे लेती थी । प्रकाशचंद्र कांतर उद्वेलित हो चुका था । अचानक उनके अंतर्मन ने उनसे कुछ पूछा अरे भाई, ये तुम ने क्या किया? अपने से लगभग बीस वर्ष छोटी लडकी के साथ तुमने ये वे विचार क्यों? क्या क्या ये दिल्ली के प्रति विश्वासघात नहीं? क्या तुमने एक विवाहिता महिला को अपने पति के साथ विश्वासघात करने के लिए नहीं उकसाया? क्या ये अति व्यवसाई संबंध दो परिवारों के विघटन का माध्यम तो नहीं मान जाएंगे? पर तभी सीमा की महत्ती सांसों और वर्ष साल से आते स्पंदनों की सरसराहट ने उन्हें मस कर दिया । उन्होंने इन प्रश्नों की गला घोंटकर हत्या कर दी तो ये था कि प्रकाशचंद्र के पास अब सिर्फ एक ही एहसास बाकी था । ऐसा पूर्ण सूट जो उन्होंने वर्षों के बाद होगा था । उन्हें इस बात के लिए तब भी खेल नहीं था और सीमा तभी प्रकाशचंद्र थोडे भयभीत से हो गए । सीमा विवाहित है उन्हें उसके पति परिवार के बारे में कुछ नहीं पता लगता तो यही है किसी में अपने पति से संतुष्ट है यहां सडक आवेश में या कृतज्ञता ज्ञापन के उद्देश्य उसने आत्मसमर्पण तो कर दिया है और यदि दिल्ली जाकर वो अपने पति से सब कुछ कह दे दो प्रकाशचंद्र थोडा घबराए उन्हें हल्का सा पसीना आ गया । फिल्मों, किताबों और वास्तविक जीवन में ऍसे देखें और पढे थे जिनमें पतियों ने विश्वासघात के लिए अपनी पत्नियों और उनके प्रेमियों की हत्या कर डाली थी । आश्वस् होने के उद्देश्य प्रकाश इन्होंने सीमा को कसकर आपने वर्ष से भेजा और बोले सीमा एक बात बोलूँ सही बताना पूछे तो अपने पति के साथ सुखी तो बहुत पडे । फिर बोली ये क्या सवाल बुझाया आपने बताओ लाल के साथ में पूरी तरह संतुष्ट हूँ । हमारे संबंध बडे मधुर है, फॅमिली किस्म का इंसान है फिर हमारे तुम्हारे संबंध कैसे जुड गए? विश्वास मानिये जब दिल्ली से चले हैं तब सपने में भी सब की कल्पना नहीं की थी । मैं खुद नहीं सोच पा रही हूँ की आखिरी सब कैसे हो गया तो मैं सब के लिए खेल तो नहीं हूँ । मुझे लगता है अगर जी बार बार जान लेता है तो पूर्वजन्म में हम तुम जरूर पति पत्नी आ रहे होंगे । सीमा मैं पूर्वजन्म की नहीं किसी जान के आगे आने वाले कुछ दिनों की चर्चा कर रहा हूँ । तुम कहना क्या चाहते हो? यही के अनायास हम दोनों एक ऐसे रास्ते पर चल पडे हैं । इस पर कृष्णा ही फैसला है तनिक सी असावधानी हुई पाओ फैसला और दो परिवार अगल खाई में गिरकर नष्ट हो जाएंगे । असावधानी होगी तब ना सीमा इस तरह के संबंध में बडे संतुलन, सावधानी और सतर्कता की आवश्यकता होती है । आप इस तरह अपराधों से ग्रस्त हो रहे हैं । सीमा ने महत्वपूर्ण प्रश्न पूछ लिया इसीलिए की हम दोनों ही विवाहित है । प्रकाशन निर्णय तपाक से उत्तर दिया सीमा धीमे से हसी फिर वो बोली विवाह के माध्यम से व्यक्ति का निजी विकास होना चाहिए ना कि इसकी वजह से रूकावटे और दिक्कत नहीं आनी चाहिए । शादी में आजकल मिल्कित की समस्या पैदा हो गयी हैं । भारत में खासतौर से पति पत्नी दोनों ही अपने अपने साथ ही पर पूर्ण स्वामित्व का दावा रखना चाहते हैं । जहाँ दवाई पाँच तरीख सभी विश्वासघात किया मैं वहाँ पर ऐसा बकवास है । पति पत्नी का प्राथमिक संबंध है, पर दोनों पक्षों को अन्य व्यक्तियों के साथ यौनसुख लूट नहीं स्वतंत्रता होनी चाहिए । इस व्यवस्था में ना किसी को झूठ बोलने की जरूरत होगी, ना व्यक्ति अपराधबोध से क्रिस्ट होंगे । इससे वैवाहिक संबंधों में ईमानदारी और स्वतंत्रता के साथ साथ स्वामित्व दिया जाएगा । सीमा की लंबी स्पष्ट छुट्टी प्रकाशचंद्र को उद्वेलित कर कही तो इसका अर्थ है कि ये लडकी आधुनिक पाश्चात्य साहित्य पडती है । पहले था वो इतना खुलकर इस प्रकार के आॅन संबंधों की पैरवी इतना करती है । इसी भय से ग्रस्त हो उन्होंने पूछा हूँ हूँ तो क्या तुम अपने पति से इन संबंधों के बारे में सब कुछ बता दो गई? सीमा थोडी जोर से उसने प्रकाशचन्द्र के प्रश्न का सीधा उत्तर नहीं दिया तो तो बस सिर्फ इतना ही बोली थी । उसका पति लालू ईष्यालु किस्म का पति नहीं है । प्रकाशचंद्र आश्वस् नहीं हुए, कुछ देर बाद सीमा के स्वीकारने पर भी क्यों? उसे इन दो रातों में जो सुख मिला है, भूतपूर्व पूरन है । सीमा ने ये भी स्वीकारा की कोई भी ये नहीं मान सकता के बिना दूसरे के पास जाए । पत्नी को एकमात्र कभी से इतना सुख मिल सकता है । यही भावना प्रकाशचन्द्र के मन में उमर घुमड रही थी पर वो से अभिव्यक्त नहीं करना चाहते थे । पर एक बात निश्चित ही बोल के अंदर में शीर्ष किंतु अव्यक्त सब है घर घर गया । सीमा ऐसी लडकी है जो आज के भारतीय परिवेश समय से कुछ आगे है । अपनी विचारधारा में यदि इसमें स्वतंत्रता की झोंक में कोई जोखिम भरा काम कर डाला तो ही विचारों और सीमा के रूप राशि के जालों में उलझे पडे रहे । प्रकाशचंद्र सुबह हुई सीमा को उठाकर उन्होंने अपने कमरे में भेज दिया । नहा धोकर कपडे पहन नाश्ता खत्म करते करते दस बज गए । साढे दस बजे से साॅस प्रारम्भ होने वाला था । शाम को छह बजे के विमान से उन्हें दिल्ली लौट जाना था । लाश ना करके सीमा प्रकाशचंद्र को लेकर ऊपर कमरे में गई । उनके गले में दोनों बाहर डालकर वो झूल गई । देवीजी सेमिनार में जाने का समय हो रहा है । रोमांटिक मूड में बताइए । प्रकाशचंद्र बोले, गोली मारो सेमिनार को हम नहीं जानते । कहते हुए सीमा ने अपना पर्स पलंग पर फेंक दिया । प्रकाशचंद्र पूरा शरीर से सीमा की ओर देखा और बोले किसी काम के लिए तो सरकारी दौरे पर आए हम लोग नाना भेजो । इस दौरे पर अरे भाई, ऐसा एक और घर से इतनी दूरी बार बार नहीं मिलती । वो तो ठीक है । फॅसा पर क्या सोचेंगे? कुछ नहीं । मैं यहाँ हूँ । आप जाइए और आधा घंटे में का पैसा चाहिए । उन लोगों से कह कर के श्रीमती लाल की तबियत अचानक खराब हो गई और आपको उनके लिए चिकित्सा सुविधाएं जुटानी है । मांग साजी प्रकाश उन्होंने प्रशंसा भरी दृष्टि से आमंत्रित करती सीमा को देखा । प्रकाश किरणे वहीं किया । वो सेमिनार में गए और सीमा द्वारा बताई गई तब की का सहारा लेगा । आधे घंटे में ही वापस आ गए । अंतर्मन में उन्हें कोई गुरेज रहा था प्रकाश ये तुम क्या कर रहे हो? ये सरासर बेईमानी है । यहाँ तुम सरकारी खर्चे पर इस सेमिनार में भाग लेने आए हो ना की सीमा के साथ हनीमून बनाने पर । तभी उन्होंने अपने स्टार्टिंग मान के मुंबई एक कसकर तमाचा जड दिया और बोले, यहाँ पर अगर उन्होंने सेमिनार में भाग नहीं लिया तो कौन सा हो गया ये सारे सेमिनार, मीटिंग और कॉन्फ्रेंस सिर्फ नाटक बाजी है । जनता के पैसे, होर अपमान । इनका आयोजन सरकारी कर्मचारियों द्वारा अपने शौक मौज सरसवाल के लिए ही किया जाता है । लंच, डिनर, चाय, पानी और घूमने भरने पर पैसा पानी की तरह बहाया जाता है । स्तर के सामने उनका विवेकी नमक हलाल अंतर्मन चुप हो गया । आगे क्या कहता और लंच तक एक बार फिर में दोनों रासरंग पारदर्शक मीठे पानी की झील में गोते खाने लगे । दोपहर होने को आई तो प्रकाशचन्द्र के सामने दो बात एकदम साफ हो गई थी । पहले तो ये फॅमिली की अपेक्षा सीमा यौनसुख प्रदान करने और लेने में माहिर है । दूसरी उन्होंने अपनी खुद की खोज कर ली थी । उनमें भूत क्षमता थी, किंतु निमी के साथ वो एक अत्यंत शालीन और संयमित जीवन बिता रहे थे । ये क्या विवेक और माला की वजह से था । प्रकाशचन्द्र ने सीमा को सरकारी लंच में शामिल होने के लिए राजी कर लिया । दोनों ने लंच लिया । फिर वे कैंपेगौडा की ओर चले गए । शॉपिंग करने के लिए शाम चार बजे लौटे और फिर वापस चलने की तैयारी । शाम को दिल्ली की फ्लाइट करीब डेढ घंटे लेट थी । कोई तकनीकी खराबी आ गई थी जहाँ में काफी प्रतीक्षा के बाद जहाँ होगा । जब रात एक बजे पालम हवाईअड्डे पर उतरा तो प्रकाशचंद्र और सीमा को एक साथ महसूस हुआ । जैसे दोनों कल्पना लोग के रंगीन माहौल से लग गया था कि ठोस भूमि पर होता रहा है, साफ कर आई हुई थी । उसमें बैठते ही सीमा ने ड्राइवर ना समझ सके इसलिए अंग्रेजी में कहा एक अविस्मरणीय यात्रा रही इसे मैं जीवन भर भूल नहीं सकती । प्रकाश उन्होंने भी अंग्रेजी नहीं उत्तर दिया । मैं भी ऐसा ही महसूस करता हूँ । आशा है या नहीं प्रारंभ है । मुझे स्वीकार है । सीमा को उसके घर छोडकर प्रकाशन अपने घर पहुंचे । उन्हें देकर पूरा शहर हुआ की घर में उनके शयन का श्रीमती जल रही थी । निम्मी को पता तो था कि वो आ रहे हैं । उसने पालम पर फोन करके जहाँ के आगमन के समय का पता कर लिया था । घर में घुसते ही और निधि को आलिंगनबद्ध करते ही प्रकाशचंद्र को बडी सुरक्षा आत्मीयता और आश्वस्त ना का आभास हुआ । अगले दिन सुबह नाश्ते कि मेजबान प्रकाशचंद्र ने जो कुछ पाया उसकी रसा अनुभूति के सामने बैंगलोर में बीता समय एकदम ऐसा था जैसे वो तीनों दिन लगातार चोरी और सेंधमारी करते रहेंगे । बच्चों के आने से पूर्व खाने की मेज पर आज हमें थे । निमी नाश्ता लगा रही थी और वो उसकी कभी कमर में तो कभी बाहर में चुटकी काट लेते थे । एक बार मम्मी ने उन्हें प्यार में जुडा का कहाँ भी था कि तीन दिनों में ही ऐसे नतीजे से क्यों हो गए हो । इस उम्र में क्या ऐसी चोंचलेबाजी अच्छी लगती है? उन्होंने दिल्ली की इस बात का जोरदार प्रतिवाद करते हुए कहा कि मोहम्मद के मामलों में उम्र नहीं दिल की जवानी देखी जाती है । बातें करते करते ही बार तीन दिन की खराब हुई आदत अपना कमाल दिखा गई । एक बार उनके मुझसे लिखने की जगह सीमा निकल गया तो उन्होंने अपने जी दातों के बीच भेजनी । निमी ने इस पर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की या फिर से सुना सुना कर दिया । वो गरम गरम बिल्लियों को प्लेटों में लगाने में जुटी रही । तब तक विवेक और वाला भी आ गए । दोनों को देखा प्रकाशचंद्र का माथा गर्व से ऊंचा हो गया तो वो कितने स्मार्ट और आकर्षक लगते हैं । पढाई में होशियार दोनों उनकी कितनी इज्जत करते हैं । यही नहीं इतने बडे होने पर भी वे दोनों अपने पिता से डरते हैं । अनुशासनबद्ध कितने कि कहीं भी जाना हो तो बिना माता पिता से जाती है, नहीं जाएंगे । पिछले साल गर्मियों की छुट्टियों में माला के कॉलेज का दूर राजस्थान सैर करने को गया था । प्रकाश उन्होंने इजाजत नहीं दी । माला को सिर्फ इसलिए ये राजस्थान में बेहद गर्मी होगी और माला को परेशानी होगी । माला ने पिता का फैसला खुशी खुशी स्वीकार कर लिया था । उसके चेहरे पर शिकन तक नहीं आई थी प्रकाश उन्होंने उन दोनों से पढाई लिखाई के बारे में दो चार औपचारिक प्रश्न पूछे । फिर वो नाश्ता करने लगे । विवेक और माला ने भी पिता से बैंगलोर और मैसूर के बारे में ढेर सारे प्रश्न पूछे और उन्होंने बडे विस्तार और उच्च ढंग से कुछ जगहों के बारे में उन दोनों को बताया । प्रकाशचंद्र निमी और अपने दोनों बच्चों के लिए ढेर सारे उपहार लाए थे । बैंगलोर और मसूर की रेशम की साडिया, सच्चे हाथ, दावत की सजावटी वस्तुएं, असली चंदन का विभिन्न सामान जैसे पंखा, बॉल पहन तथा सिंधु रखने की डिबिया, लकडी पर बने सुंदर सुंदर क्षेत्र । तीनों ने इन उपहारों को बेहद पसंद किया था । विवेक ने तो साफ शब्दों में पिता के चुनाव की जमकर प्रशंसा कर दी । नाश्ता खत्म हुआ । बच्चे तैयार होकर कॉलेज और कंपनी चले गए और प्रकाशचंद्र दफ्तर आ गए ।

भाग - 08

तब तीन चार दिन के अंतराल में ही उनकी मेज पर फाइलों का अंबार लग गया था । इतनी फाइलें वहाँ जमा थी की मेज की सतह दिखाई नहीं दे रही थी । प्रकाशचन्द्र अपनी सीट पर बैठ हो गए, पर मेज पर सामने फाइलों की छोटी छोटी को तो मिला रहे, देख कर उन का दिल घबराने लगा । उनकी हमेशा से आदत रही थी की जिस दिन फाइल आए, उसे उसी दिन निपटा दिया जाए । निपटाने का मतलब फाइल को धक्का देना नहीं, उसमें नहीं समस्या को हल कर देना था । प्रकाशचंद्र की इसी तत्पर्ता से काम निपटाने की क्षमता और सुरुचिपूर्ण सहायता करने की मनोवृत्ति का परिणाम था उनकी अभूतपूर्व लोकप्रियता । क्योंकि वो प्रशासन रद्द कर्मचारियों की समस्याओं से संबंध थे । उन्हें दूर्वा पास के सारे लोग जानते थे और गति यही कहता था कि प्रकाश साहब कुछ कोठी के अवसर है । अपने काम में दक्ष लोगों की राय थी । यदि कोई रोता हुआ व्यक्ति उनके पास अंदर कमरे में जाता है तो कुछ देर बाद हस्ता हुआ ही बाहर निकलता है । अरे भाई, जो भी सहयोग से तो मैं प्रशासनिक शक्ति मिली है तो उसका सदुपयोग करो । जनहित में उसका इस्तेमाल करो । ये क्या इस शक्ति के माध्यम से विध्वंस करना, लोगों को कष्ट पहुंचाना या निषेधात्मक रवैया अपनाकर जनसेवकों को हतोत्साहित करना या फिर शक्ति की बन्दूक की नोट से भ्रष्ट धन की खुलेआम लोड करना नहीं ये सब गलत है । शक्ति द्वारा सेवा करो, देखो मेवा मिलता है । नहीं ये थी प्रकाशचंद्र की विचारधारा जैसे वो अक्सर दोहराया करते थे । प्रकाशचंद्र को मिला मिला था । इसमें कोई संदेह की गुंजाइश नहीं थी । उनकी दक्षता, कार्यकुशलता और निष्ठा का उन्हें भरपूर पुरस्कार मिला था । वो अखिल भारतीय प्रतियोगी परीक्षा के माध्यम से राजपत्रित कर्मचारी लगे थे । उनके साथ चालीस नवयुवक और थे । आज वो जिस पद पर पिछले दो साल से हैं, उस पर उनके चालीस सहयोगियों में से अभी एक भी नहीं पहुंचा था । दो वर्ष पूर जपान सचिवों की विभागीय पदोन्नति कमेटी ने एक सौ दस व्यक्तियों की सूची पर विचार किया तो उन्हें सर्वोत्कृष्ट कर्मचारी पाया । बीस अफसरों की पदोन्नति होनी थी । उन का नंबर एक सौ पांच था । वो अपने ऊपर वाले लगभग सौ व्यक्तियों के सिर के ऊपर से छलांग लगाकर पदोन्नत होने वाले अधिकारियों की सूची में दूसरे नंबर पर थे । काम का इनाम मिलता है प्रकाशचंद्र का दृढविश्वास यही नहीं तो ये भी सोचते थे कि सुचारू और समन्वय ढंग से काम करने से ही प्रतिष्ठा बनती है । संसद सत्र के दिनों में किए जाने वाले प्रश्नों के उत्तर या फिर ध्यानाकर्षण प्रस्तावों पर वो टिप्पणी बनाते । तीन तीन चार चार प्रश्नों की मजाल है कि संयुक्त सचिव या सचिव या मंत्री महोदय उन टिप्पणियों मसौदों में कहीं भी गलती निकाल रहे प्रकाशचंद्र फाइलों को भूलकर देखते रहे । फिर उन्होंने सोचा क्यों ना सुबह से पता किया जाए कि इन तीन दिनों में कोई विशेष बात तो नहीं हुई है या फिर कोई खास टेलीफोन तो नहीं आए । उन्होंने बजट दिया, जिस बात की आशंका थी वही हुई । टेलीफोन पर सुधा नहीं, भाई राम था और वह कह रहा था साहब, मेम साहब तो भी नहीं आई है । कल कुछ कह गई थी । प्रकाशन ने पूछा वो तो पिछले तीन दिन से आई नहीं । भाई राम ने जो सूचना दी उसे प्रकाशचंद्र गमन शुभ हो गया । अगर अवसर ना हो तो उसके निजी सचिव का होना बहुत जरूरी है पर नहीं ये सुबह पर शीघ्र उन्होंने अपने को संयुक्त कर लिया । बेचारी मजबूर है की है, चलने दो, वो उसे बदलेंगे नहीं । क्यों ना वो एक अतिरिक्त जूनियर स्टेनो को अपने पास लगा लें । वो स्वयं प्रशासन को देखते हैं । एक अतिरिक्त व्यक्ति को अपने पास लगाने में ऐसी कोई अनियमितता नहीं है । उन्होंने अपने अवर सचिव को इंटरकॉम पर संपर्क किया और उसे अच्छा जूनियर स्टेनो तलाश करने के उनके पास न्यू करने का आदेश दे दिया । उसे बातें करने के दौरान अनायास उन्हें शकुंतला और गंगा चरण की यहाँ आ गयी होते हैं । उन्होंने कहा, वही एक और जरूरी बात है । आप एक मिनट के लिए मेरे पास तशरीफ लाएंगे । बहुत अच्छा साहब उधर से उधर आया प्रकाश । उन्होंने इंटरकॉम रखा तो भी दूसरा फोन बजने लगा । वो इन फोनों में ही व्यस्त हो गए । सुबह से आये आधा घंटे से ऊपर हो चला था और एक फाइल नहीं निपटी थी । अगर सुधा होती तो टेलीफोन कौन से? तो उन्हें नहीं जूना पडता । इस बीच इंटरकॉम पर भी कई फोन आ चुके थे । कोई अपने प्रोविडेंट फंड से निकाले जाने वाले धन के बारे में पूछ रहा था । किसी को भी पदोन्नति के आदेश मिलने में विलंब हो रहा था । कोई कार खरीदने के लिए एडवांस स्वीकृति की प्रतीक्षा कर रहा था । एक अवसर दो उन पर झल्ला पडा । पिताजी मुझे कल शाम की फ्लाइट से रूम जाना है पर आपकी क्लियरेंस अभी तक नहीं मिली है । जी, मैं आज चार दिन के दौरे के बाद डॉक्टर लौटा हूँ । उससे क्या होता है? ये कोई संतोषजनक उत्तर नहीं है । अगर आप दफ्तर में नहीं रहोगे तो क्या काम रुक जाएगा? या ये सारा दफ्तर आपके कंधों पर दिखाए? क्या अब इस अवसर के लिए अपरिहार्य हो गए हो? प्रकाशचंद्र को बडा क्रोध आया इन तर्कों और आरोपों को सुनकर पर चुकी उधर एक कुछ अधिकारी था इसलिए वह अप्रियता को नहीं बढाना चाहते थे । वो खून का वो भी कर बोले अभी हो जाएगा अपना काम । अगर आधे घंटे में कॅश नहीं मिला तो मैं इस मामले की रिपोर्ट सचिव वो कर दूंगा । इस चेतावनी के साथ देशपांडे ने फोन बंद कर दिया । प्रकाशचंद्र इस धमकी को सुनकर विचलित तो नहीं हुए । हाँ, वर्तमान ऐसा अवश्य महसूस कर रहे थे तो अभी कमरे का दरवाजा खुला । आशा के विपरीत सीमा के रूप में एक सुखद आश्चर्य भाव फसते था । उसे देखते ही प्रकाशचंद्र खडे हो गए । एकदम खुशी से उत्तेजित होगा । सीमा उनकी मेज की तरफ बढ रही थी और प्रकाशचंद्र अपने में इसके इस पार से निकल उस पार पहुंच गए । सीमा की आगवानी करने के लिए प्लान्स को आमना सामना होने पर प्रकाशचंद्र का मन किया कि वो उसे बॉलिंग अनुबंध करले । उनके दोनों हाथ ऊपर की तरफ उठे भी । सीमा को उन्होंने मुस्कुराते देखा भी पर तत्काल उन्हें होश आ गया । ये बैंगलोर के वृन्दावन होटल का कमरा नंबर एक सौ दस नहीं उनके दफ्तर का कमरा था । अगर उसी समय कोई अकस्मात अंदर आ गया और उसने उन दोनों को अलग अलग की मुद्रा में देख लिया तो समाचार पूरे दफ्तर में जंगल क्या की तरह फैल जाएगा । आओ बैठो लेवल हाथ मिलाकर प्रकाशचंद्र को संतोष कर लेना पडा । कहीं कैसा रहा? लिमिट जी कैसी है? सीमा ने बैठे हुए पूछा चाहती है लिमिट खूब खुश है । रात को बडा जोरदार स्वागत किया । उसने जश्न दिवाली मना डाली । अब तुम अपनी का हूँ । लालसाहब को तो कुछ पता नहीं चला । लालसाहब को क्या पता चल रहा है । वो तो अभी अपने दौरे से ही वापस नहीं लौटे । अच्छा फिर तो बेकार में हमें कल रात अपने घर जाने दिया । क्या ऐसा महसूस करते हैं सीमा की आंखों में अनुराग के लालडोरे उभर आए । प्रकाशचन्द्र एक विकसित हो मानी लोट में हो गए । उन्हें मैसूर बैंगलोर की वे रातें याद आने लगी । बडी फाइल जमा करनी सीमा ने पूछा थे कि का काम है छोटी लो या दौरे पर जाओ ये फाइलें जो आपने कोई निपटानी होंगी मारो दस्तखत और फेंको आउट रे में अपने से ये नहीं होता दस में से नौ सौ तो यही करते हैं । ये वो लोग हैं तो निर्जीव और लश्कर सरकारी कांग्रेस के पीछे आपके निर्णय की बात होते मेरी प्राणी को नहीं देख पाते । आप तो बात करते करते भाषण के मूड में आ जाते हैं । क्या इन्हीं से पेट भरने का रहता है? या कुछ फॅमिली बनानी है वो वहाँ क्या का प्रकाशन उन्हें बदल दबाया और भाई राम को तुरंत कॉफी हाउस से दो प्याले और मगर हम कॉफी लाने का आदेश दे दिया । आज तीन बजे अशोक होटल में बडा जबरदस्त कार्यक्रम हो रहा है । लंच के बाद एक रशियन पार्टी का मनोरंजन सांस्कृतिक कार्यक्रम है । खासतौर पर इसी के बारे में बात करने की आई थी टिकट मिल जाएंगे । मैंने दो टिकट लाने के लिए पहले अपनी निजी सहायक को भेज दिया है । पर दफ्तर के समय में और पिछले चार दिन का रुका हुआ काम प्रकाशचंद्र थोडा अच्छा जाए । नहीं बुरा ना मानो तो एक बात करूँ तो मैं अवसर वाला इस बिगड नहीं है । तुम तो एकदम फाइलों के कीडे हो और यही अंतर है । विभागीय पदोन्नत हुए अवसर में और इस सीधी भर्ती से अवसर में वो जब मर्जी होती है तब दफ्तर आता जाता है । नीचे वालों पर खूब रॉब झाडता पाय लोगों का भी नहीं पडता । आंखे मूंदकर समझ करता है । कभी नोट नहीं लगता आप । मैं इसमें से एक भी नहीं है । प्रकाश अंदर कुछ नहीं बोले । बैठे बैठे सिर्फ मुस्कुराते रहे । फिर कुछ निर्णय सा करते हुए बोले भाई जैसा तुम का हो तुम्हारे कहने पर दो मुर्गा भी बन जाएंगे । प्रकाशचंद्र की ये बात सुनकर सीमा की आंखों में नहीं भी रोशनी की चमक तैयार गई । इससे पहले कि वह कुछ कहती फाइव राम कॉफी के दो प्यारे ले आया । कॉफी पीते हुए विभिन्न विषयों पर बातें करते करते । दोनों ने टिकट मिलने की स्थिति में तीन बजे होटल जाने का निश्चय कर लिया । लगभग बारह बजे करीब सीमा गई । इस बीच अनेक व्यक्ति उनके कमरे के दरवाजे को होने से खोल थोडा संदर्भ झाड वापस लौट गए थे । ये इसलिए हुआ कि भाई हमें समय उनकी कमरे के बाद चपरासी कुर्सी पर नहीं, निजी सचिव की सीट पर बैठा पूर्ण सुन रहा था । सीमा के जाते प्रकाशचंद्र को अपनी अंडरसेक्रेटरी याद आई । उन्होंने मुझे एक घंटे पहले बुलाया था और वो अभी तक नहीं आई है । वो थोडा पडे ये महिला अपने को समझती क्या है? बडी सिरखडी नकचढी है क्या? आज उनके दो सौ कहना कि ये लडकी और उनका बाद सहयोग सचिव पक्के दोस्त हैं, अच्छा खासा लंच करते हैं और एक ही कार में दफ्तर आते जाते हैं । क्या इसका एक कारण ये हो सकता है कि वे दोनों भारतीय प्रशासनिक सेवा से आए हैं जबकि वह उस सेवा से नहीं आए हैं । जो भी हो डॉक्टर में तो अनुशासन रखना ही होगा । उन्होंने श्रीमती काशीनाथ से इंटरकॉम पर संपर्क किया और उन्हें तत्काली अपने कमरे में आने का आदेश दिया । उसके आने में पांच मिनट तो लग ही जायेंगे । यही सोचकर जैसी उन्होंने फाइलों के सबसे नजदीक ढेड से एक पति तत्काल फाइल उठाई और खोलकर पढना शुरू ही किया था की बजह गुनगुनाया । बडे टुकडे और ऍम से उन्होंने रिसीवर उठाया और रुपए स्वर में बोले कौन दुखी कर रहा है भाई राम चाह भर से होने एक नहीं दो आश्चर्य सुधा देवी कश्मीर ले आई थी । मम्मी का फोन क्यों आया है? वैसी कोई विशेष बात है । मिला ये क्या? क्या प्रकाशचंद्र सतर को निमी की लाइन पढाने की प्रतीक शासन में लगे । जैसे ही नहीं मैंने हैलो कहा प्रकाश । उन्होंने उसको पूछा कि उनकी आवाज है, सब तो है वहाँ । पर आप इतने घबराए, उनकी वो है नहीं तो मैं तो सिर्फ प्रकाशन होना भी बात पूरी नहीं । क्योंकि दरवाजा बुला और श्रीमती काशीनाथ एकदम आधुनिकतम वेशभूषा में कटे बालों को बार बार पीछे धकियाते । मटकती चढती उनकी मेज की तरफ चली आ रही थी । जैसे ही वहां पहुंची प्रकाश इन्होंने फोन के माउथपीस को हथेली से बंद करके कहा बैठे श्रीमती नाथ चलो क्या हुआ क्या कोई आ गया है? जमीन पूछा आप बताओ कैसे फोन किया? आज दोपहर तीन बजे अशोक होटल में बहुत बढिया शुरू हो रहा है । प्रदर्शन पार्टी आई हुई है । आज तो मैं बहुत व्यस्त हूं । तीन बजे जरूरी मीटिंग है प्रकाश । उन्होंने बहाना बनाया ये जो मैं कर समस्या बन गई थी पर मैंने तो दो टिकट भी मंगा लिया । अब इनका क्या होगा? तो तुम अपनी किसी दोस्त के साथ क्यों नहीं चली जाती? पडोस की कमला जी से पूछ लो । कमला पुरानी चीज गई हुई है । प्रकाशचंद्र को लिमिट जी कोई बात सुनाई नहीं दे रही थी । उन्हें अपनी मूर्खता का आभास हुआ । उनके द्वारा बताये गए प्रस्ताव में कितनी जोखिम थी । इधर वो सीमा के साथ वहाँ जाएंगे और उधर निमी आपने किसी सहेली को लेकर वहाँ पहुंचेगी । मेरा निश्चित है तब उन की क्या स्थिति होगी? तो हो गए । सुन रहे हो मैं क्या हूँ? उधर से निन्नी की आवाज आई । प्रकाशचंद्र की चेतना लौटी और वह घबराकर बडे हाँ नहीं ठीक है मैं चलूंगा । हम दोनों साथ चलेंगे । मैं तो मैं घर से ले लूंगा तो थी ढाई बजे तैयार रहना तो क्या लंच में घर आकर फिर आधे घंटे के लिए दोबारा तब सर जाओगे । कार क्या पानी से चल दिए । ठीक है लंच के बाद में और प्रकाश इन्होंने श्रीमती काशीनाथ की उपस्थिति कारण अपनी बात अधूरी छोड गई । ये तो बडी गडबड हो गई । इधर सीमा के साथ उन्होंने पहले ही फैसला कर लिया था । अब काफी देर तक प्रकाशचंद्र कूल है । वो खडे और आवश्यक से बैठे रहेंगे । अपने याद किया था श्रीमती काशीनाथ में । हल्के स्वर में प्रकाशचंद्र को सजा क्या प्रकाशचंद्र को फिर एक बार इस बात का एहसास हुआ कि लडकी कभी उन्हें साहब के अगर संबोधित नहीं कर दी तो थोडे से हर बढाए । अपनी निजी समस्या नेमी और सीमा के बीच संतुलन बनाए रखने के प्रयास में मुझे भूल ही गए थे । उन्होंने अपनी अवर सचिव को क्यों बुलाया था था? उन्होंने उसे सुबह बुलाया था और अब दोपहर हो रही है । पता है वो अपने स्वर्ण बोले देखिए मैंने तो आपको करीब ग्यारह बजे बुलाया था और आप मैं तीन बार चक्कर लगा गई थी । आप किसी खूबसूरत लडकी के साथ व्यस्त थे । मैंने गलत डाला, उचित नहीं समझा । श्रीमती काशीनाथ ने मुस्कुराते हुए कहा प्रकाश चंद्र को लगा जैसे लडकी ने उनके ऊपर कसकर तमाश हमारा हूँ । अंदर ही अंदर तिलमिलाए इससे पूर्व की वो अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते । इंटरकॉम बजाओ उन्होंने रिसीवर उठाकर कांस्य लाकर हेलो कहा तो उधर से सीमा की उमसभरी आवाज आई मिल गई हूँ पर बडा चक्कर हो गया क्या? सीमा ने आशंका सोर में पूछा अभी थोडी देर मैं फोन करूँगा । कोई बैठाया गया ठीक है क्या? क्या सीमा ने फोन बंद कर दिया? प्रकाश उन्होंने भी फोन बंद किया और श्रीमती काशिनाथ की ओर देकर बोले हाँ तो मैं कह रहा था कि क्या कह रहा था । मैं बाद में आ जाउंगी नहीं एक मिनट जयप्रकाश उन्होंने अपने दिमाग पर जोर डाला और उन्हें दोनों बातें याद आ गई । एक तो आपने मेरे पास एक जूनियर सहन हूँ । श्रीमती काशीनाथ उनकी बात बीच में ही काटकर कहा! या अपने सुबह कहा था मैंने अंजुम को आप के पास यू कर दिया है । शायद आदेश निकल गए होंगे और ये प्रतिवेदन है । जरा देखिए से मैं सौरभ के पति से मिलना चाहता हूँ । पता कीजिए कहाँ किसके पास काम करता है जैसे मेरे पास दोपहर बाद चार बजे के करीब मेरी जीतेगा । प्रकाश । इन्होंने शकुंतला का प्रतिवेदन श्रीमती काशीनाथ को पकडते हुए कहा मैं पता कर लेंगे पर क्या लंच के बाद आप चार बजे दफ्तर में होंगे? श्रीमती काशीनाथ हैं । शरारती लहजे में मुस्कुराते हुए पूछा तो क्या शादी लडकी ने उनकी चोरी पकडी है? प्रकाश उन्होंने सोचा और वह थोडे से परेशान भी हुए पर तभी तो संभलकर बोले इंटरकॉम पर पता कर लीजियेगा अगर मैं दफ्तर में हुआ तो उसे भेज दीजिएगा । बहुत अच्छा क्या का श्रीमती काशीनाथ उठी और कमरे से बाहर चली गई । विकृत भूल करके वह बढाए कल की छोकरी हमें लक्ष्य दिखाती है बढ । तभी उन्हें दोपहर बाद होने वाले और संतुलन की याद आई और उन्होंने सीमा को फोन किया और उससे अपनी समस्या से अवगत करा दिया हूँ ।

भाग - 09

हूँ । ये तो सच कुछ बडे बजट की बात हो गयी या अपने निजी को किसी भी तरह से मिला नहीं सकते । नहीं प्रकाश उन्होंने दृढता से कहा तो उनसे बहुत डरते हैं । नहीं, मैं तुमसे यानी मम्मी से नहीं सिर्फ एक बार से डरता हूं । दफ्तर हो या घर नहीं किसी प्रकार की कटुता आप बता ना जान रहे हैं । मैं चाहता हूँ हर जगह हर चीज अपनी जगह जोडी रहे गए । कुछ ना थोडे इसके लिए तुम्हारे और दिल्ली के बीच एक संतुलन बनाये रखना निहायत जरूरी है तो मैं दोनों छोटों को फाड देती हूँ । दोनों नहीं सिर्फ एक अपना के लिए नहीं होंगी तो मैं अकेली नहीं मैं भी साथ होगा । एक टिकट में दो व्यक्ति तुम इसकी चिंता मत करो । पहले की मुझे आ रहे हैं सब सब बताइए । मैं तुम्हारी मुलाकात मम्मी से कराने वाला हूँ नहीं, मुझे डर लग रहा है जब राहुल मत निम्मी, शिक्षित, सुसंस्कृत, समझदार और भावनात्मक रूप से परिपक्क है । आज नहीं तो कल तो मैं उस से मिलना ही होगा । बिना मिले आगे गुजारा कैसे होगा? ठीक है मुझे क्या करना होगा? तुम ठीक तीन बजे अशोक होटल पहुंच जा रहा । हम दोनों भी वहाँ उसी समय पहुंच जाएंगे तो वहाँ नहीं जाना । फिर अचानक भेड करने का नाडा खेलेंगे । मैं तुम्हारा दिल्ली से पर जगह दूंगा । बस हम तीनों साथ सा शो देख लेंगे । सीटों पर नंबर तो होंगे नहीं जो अलग अलग बैठना पडेगा । आपने भी खूब तिगडम सोची पर कहीं तुम चिंता मत करो । मैं सब संभाल लूंगा । बस भी करो । पार्टनर या घंटे बाद से आ रहे प्रकाशचंद्र बुरी तरह चौपडे । उन्होंने देखा उनका मित्रा साधूराम उनके सामने बैठा हुआ है । वो कब अंदर आकर बैठ गया उन्हें पता ही नहीं चला । सीमा से बातें करने में वो इतना मन में हो गए थे तो आपने माहौल तक के एहसास को खो चुके थे का ये श्रीमानजी ऐसे लगा रहे थे । साधूराम ने पूछा तुम्हारी बीवी से प्रकाश उन्होंने बर्गर बना टिक रोज से कहा ये चीज गए इसी कैसा रह गए है । बच्चों बताया ऍम कोर्ट में जा कहते हैं धारा चार सौ तीस पढना तो पता चलेगा । एडल्ट्री विचार की सजा क्या है? सात साल के लिए तिहाड के अंदर समझे गुरु चौधरी नाम की बात सुन प्रकाश अंदर का अंतर कम कम गया तो क्या वो गैरकानूनी काम कर रहे हैं? अपने विचलित मन को तसल्ली देने के उद्देश्य उन्होंने पूछा अगर विवाह इंडस्ट्री की सहमती हो तो भी क्या? तो वो क्या सच में कोई चक्कर चला रखा है? सदर में सावधान हो पूछा प्रकाशचन्द्र सतर्क हो गए । उन्हें पता था कि साथ पूरा बडा चालाक अवसर है । दोस्त है तो क्या हुआ? पूर्ति चिडिया को पहचानता है और अगर अपना स्वार्थ सिद्ध होता है तो पट्ठा उसका शिकार करने से भी नहीं चूकता । यही सोच का प्रकाश निर्णय अपने को सहज कर लिया । वो विभागीय पुस्तकालय से आईपीसी की एक प्रति मंगाकर धारा चार सौ तीस का अध्ययन कर लेंगे । हाँ तो उन्होंने प्रसंग बदलकर कहा तो गुरु कैसे तकलीफ की बैंगलोर का दौरा कैसा रहा? बहुत बढिया लौंडिया जो साथ में थी मतलब प्रकाशचंद्र का मुफ्त पीला बढ गया । मतलब अपना कुछ नहीं । कोई सुंदर लडकिया रंगीन साहब हो, समय अच्छा, कडी आता है । वो तो है बडी फॅमिली यार बहुत कम है । भ्रष्टाचार के मामले, कर्तव्यपालन में चूक, दफ्तर के सामान की चोरी, किसी की नियुक्ति, किसी की बदली, किसी को एडवांस तो किसी की वार्षिक वेतन वृद्धि, किसी की छुट्टी तो बस इन्हीं मामलों में सारा समय निकल जाता है । मैं भी ऐसे मामले में सिफारिश करने आया हूँ । कौन सा मामला है लिंगा स्वामी नीलिमा सिंह वाला दो किसकी सिफारिश करने आया है रहगी गया लगेगी । लडकी ही ठीक है । मैं देख लूंगा । प्रकाशचंद्र ने तथा स्वर में कहा लडकी को नहीं मामले को देखना । साधूराम ने हंसते हुए कहा । तीस साल की सरकारी नौकरी के बाद ही मेरी जिंदादिली और खुशमिजाजी कायम है । यह बडे आश्चर्य की बात है । साधु प्रकाशचंद्र ने उसकी प्रशंसा की । प्रशंसा के लिए धन्यवाद वालों के सागर से ज्यादा वो केस निकाल लेता हूँ । क्या कर साधुराम चला गया । सवा बजे तक दो आगंतुक और तीन चार फोन और आए । जब लंच पर घर जाने के लिए उठे तो उन्हें इस बात का अंदर ही अंदर अफसोस हो रहा था की लाइन से पूर्व के तीन घंटों में उन्होंने एक फाइल भी नहीं देखी है । सारा समय हुई निरर्थक नष्ट हो गया । एक बात निश्चित थी अगर दोपहर बातें कार्यक्रम से सीमा ना जुडी होती तो पता भी नहीं जाते । निमी को अवश्य मना लेते हैं । अब वो लंच के बाद दफ्तर नहीं आएंगे तो क्या वो आधे दिन की छुट्टी ले ले? नहीं सीमाओं ने छेडेगी आपको एकदम बाबू हैं । आपकी बाबू मनोवृत्ति गए नहीं । अरे ये छुट्टी बुट्टी का चक्कर तो लडकों के लिए है । अवसर दो भाषा होते हैं जो मर्जी हुआ है । जब मर्जी हो जाए अवसर का असर प्रकाश अंदर का अंदर मान मिस्टर क्या सिद्धां को स्वीकार नहीं करवाता था । सरकार उन्हें वेतन देती है । उन का समय सरकार का है । इसका दुरुपयोग करना नमक हरामी है पर वो क्या करते हैं उन्हें भी जमाने के साथ चलने की आदत डाल नहीं पढ रहे थे । उन्होंने अपनी डॉक्टर से लंच बात यूनिवर्सिटी वो सरकारी बनाने के लिए एक काल्पनिक मीटिंग की । रचना कर रही तारीख वाले कैलेंडर में उन्होंने तीन बजे विधि मंत्रालय में मीटिंग है लिख दिया । फिर उन्होंने अपनी निजी सचिव को दोपहर बाद अपनी सीट पर बैठने का आदेश देकर का वो लंच पर जा रहे हैं और उसके बाद वो घर से सीधे विधि मंत्रालय चले जाएंगे । एक मीटिंग में हिस्सा लेने जाॅब खत्म हो गए तो दफ्तर आएंगे था । वहीं से सीधे घर चले जाएंगे । निजी सचिव ने इन आदेशों को पूर्ण गम्भीरता से ग्रहण कर लिया । ऍम साहब मैंने अंडरसेक्रेटरी को कहा था । प्रकाशचंद्र ने डरते डरते कहा वो बहुत छक्के रह गए थे । अंदर ही अंदर वह श्रीमती काशीनाथपुर उबल रहे थे । कहने के बावजूद वो इस बैठक में नहीं गई और किसी अनुभाग अधिकारी को भेज दिया । उसका बच्चा बीमार था । मुझे छुट्टी लेकर चार बजे चली गई थी । पर आपको क्या तकलीफ थी? साहब मैं मैं एक और बैठक में व्यवस्था प्रकाशचंद्र ने बडी कठिनाई से करते हुए झूठ बोल दिया । श्रीमती काशीनाथ तो कह रही थी क्या अब शायद किसी दोस्त के साथ प्लेस कॉफी पीने गए थे? हद कर दी । इस बीच महिला ने एक तो उनके आदेश का उल्लंघन फिर उनके विरोध विश्व मान क्यों ना करें? दोनों एक ही सर्विस के जो है । इस दौरा काम नहीं चलेगा । प्रकाशचंद्र जी मेरे ख्याल से तो आप जैसे वरिष्ठ अधिकारी को इशारा ही काफी है । संयुक्त सचिव ने भी त्रुशा भरे स्वर में कहा । तभी बजट बजाऊं संयुक्त सचिव रिसीवर उठाया उनके पीएम है । उन्हें कोई सूचना दी है । वो बोले प्रकाशचंद्र जी चाहिए आपको सक्रेटरी साहब याद कर रहे हैं । अभी प्रकाशचंद्र जी संयुक्त सचिव की झाड के कुप्रभाव से उभर भी नहीं पाए थे कि सचिव के बुला मिले तो उन्हें काफी घबराहट में डाल दिया । जरूर कोई नई मुसीबत खडी हुई होगी । पाँच छह साल क्या क्या प्रकाशचंद्र बाहर आए । अपमानिक और चिंता से वो सचिव के कमरे में पहुंचे तो वहाँ पर भी उन पर जबरदस्त भयानक आक्रमण हुआ ये क्या है? पाॅइंट तो भारी शिकायतें आ रही है । आप फिर फाइलें आगे क्यों नहीं भेजी जाती? सचिव बिगडकर पूछा हूँ साहब इसके इसके बारे में हमारे स्टाॅक्स दो महीने से पढा है । उसकी लडकी की शादी है । पाँच से पैसा निकालना चाहता है कहाँ साहब वो कल मेरे पास आया था और तुमने काली आदेश जारी करने का आश्वासन दिया था । पर वो आदेश आज भी जारी नहीं हुआ है । कल शाम को उससे तुम्हारे कमरे के कई चक्कर लगाए ना तुम देना तुम्हारा साहब कल शाम तुम कहाँ थे साथ एक बैठक में फंसा हुआ था । बैठक के साथ साथ आवश्यक फाइनल निपटाना भी तो जरूरी है । अगर प्रशासन की फाइलें रोकने लगी तो लोग इसका गलत और निकाल सकते हैं । समझे प्रकाशचन्द्र तिलमिला गए । कितना जोरदार तमाचा मारा था सचिव अपरोक्ष रूप से वो भ्रष् करार दे दिए गए थे । जाइए और निपटा ये जरूरी फाइलों को मैं नहीं चाहूंगा कि भविष्य में मेरे पास कोई शिकायत आए । माफी चाहता हूँ साहब, आगे से पूरा ध्यान होगा । प्रकाशचंद्र अपने कमरे में आकर बैठ गए । बेहद ढीले से अपमानित और चिंतित । अभी कुछ दिन पहले तक उनके बहुत उनसे कितने प्रसन्न है और समय उनकी प्रशंसा उन पर पूर्ण निर्भरता । अपने पूरे सेवाकाल में उन्होंने कभी इस तरह झाड नहीं खाई थी । मैं इसपर फाइलों के ढेर थे । पर उनका मन दुखी था । मूड नहीं बन रहा था । वह छूने का उनका चेहरा उतरा हुआ था । वो अपनी अपमानजनक स्थिति का विश्लेषण कर रहे थे । क्या ये सब सीमा की वजह से हो रहा है? शायद नहीं । इसका कारण है नकारा सुबह और नखरेवाली श्रीमती काशी ना इन दोनों महिलाओं ने उनका जीवन दुख मैं बना दिया है । यदि कल सुधारने उस अनुभाग अधिकारी की फाइल पर दस्तखत करा दिए होते हैं और ये श्रीमती काशीनाथ बैठक में चली गई होती तो इन दो उच्च स्तरों पर आज ये अप्रियता क्यों? पश्चिम ठीक है वो नहीं छोडेंगे, दोनों को मौका आने पर देख लेंगे । सीमा का इसमें कोई दोष नहीं है । सीमा की याद आते ही वो थोडा हमले उन्होंने इंटरकॉम पर फिर उसे संपर्क स्थापित करने की कोशिश की । पर बेकार वो वहाँ नहीं थी । वो काफी चिंतित हो गए । तो क्या हुआ सीमा को? आप फिर क्यों नहीं आई? नहीं उसकी तबियत तो नहीं खराब हो गयी । वो दफ्तर पति के साथ न जाने कैसे कैसे गलत है और गंदी बात नहीं उसके लिए वो सोच में पड गए । तभी मंत्री जी के व्यक्ति का सचिव का फोन आ गया । वो भी थोडा सुखा हुआ था । कहने लगा प्रकाश जी के आवास है । देखो हफ्ते से ज्यादा हो गए । आप से छोटे से काम के लिए कहा था अभी तक नहीं हुआ । कौन सा काम मनाया? प्रकाशचंद्र पूछ बैठे तो आपको कम तक याद नहीं । तभी प्रकाशचन्द्र के स्मृति पटल पर कुछ कौन था था? उन्होंने राम प्रसाद को बहाल करने की सिफारिश की थी । वो तत्काल बोले आपका शाम राम प्रसाद के केस की तरफ है क्या? चलो आपको या तो आया मैंने कई दिन पहले आदेश दे दिए थे । पर क्या करें पीछे वाले ऐसे कूडा करकट है कि कुछ काम करके देते ही नहीं है । अब आप ही बताइए अकेला इंसान देखिए । प्रकाश नीचे वालों पर निर्भर करेंगे तो कहीं के नहीं आएंगे । महत्वपूर्ण मामलों को तो खुद ही करना होगा का ये कब तक आदेश जारी कर देंगे । चौबीस घंटे के अंदर ठीक है । आदेश जारी हो जाए तो उनके प्रति मुझे भेजवा दीजियेगा । जी बहुत अच्छा फोन बंद हो गया । ऑसिलेशन एक और महत्वपूर्ण फोन आया । घर से था । निमी थी पूछ रही थी कि अस्पताल में मामाजी को दिखाने के लिए डॉक्टर से समय निश्चित किया या नहीं । मैं खराब बोर्ड में थे, प्रकाशचंद्र होता है । वह रूखे स्वर में बोले, सुबह से दफ्तर की बर्बर में एक मिनट की फुर्सत नहीं मिली । अब करता हूँ बोल समय और दिन पता चल जाए तो फोन कर दीजिएगा । अच्छा और प्रकाशचंद्र ने रिसीवर फोन पर लगभग पटक दिया । पर तभी जैसे ऍम पसंद आ गया । जहन, अंधेरे बादलों को चीर सूर्य अपनी समस्या के लिए आभार के साथ बाहर निकल आया हूँ । दरवाजा खुला और सीमा अंदर आ गई । प्रकाशचन्द्र ने खडे होकर उसका अभिवादन किया और फिर शिकायती लहजे में बोले सुबह से आप कहाँ थी? आपने तो मेरी जान ही निकाल कर गई क्यूँकि आबाद है क्या? मेरी चिंता से आपका चेहरा पीला बढा हुआ है । सीमा खुशी से जैसे झूम गई । खुशफहमी से प्रकाशचंद्र को संतोष हुआ । उन्होंने इस बात का कोई उत्तर नहीं दिया । वो बोले ये बताओ बात क्या थी? कुछ भी नहीं । सीधी घर से चली आ रही हूँ । दफ्तर में आ गई । सबसे पहले आपके पास हाजिर हुई हूँ । आखिर देर से क्यों पहुंची हो? कुछ खास बात नहीं थी । लालसाहब रात को ग्यारह बजे दसवी फ्लाइट फिर उसके बाद जन्मदिन का जश्न मनाया गया । रात के दो तीन बजे तक जश्न जन्म दिन चलता रहा । सुबह नहीं डेढ से खुली । बस बराब इतना घबरा क्यों गए थे? प्रकाशचंद्र को अपनी मूर्खता का आभास हुआ । सच मुझे उन है, इतनी घबराहट दिखाने की क्या जरूरत है? फिर अनायास उन्हें कल रात की अप्रियता याद आई । वो बोले कल तो हो गया सीमा क्यों क्या हुआ? सीमा ने उत्सुकतापूर्वक पूछा । कल हम लोग कॉफीहाउस गए थे ना? वहाँ उन दोनों को हमारे बेटे विवेक ने देख लिया था तो क्या हुआ? सीमा ने बेहद सीधे बन से कहा कुछ हुआ ही नहीं । इसमें होने की क्या बात है? अरे दफ्तर के दो सहयोग यदि काॅफी पीने चले जाते हैं तो उसमें कौन सा पहाड टूट पडा? उसने कल ये बात लिख के सामने कह दी तो कुछ बोली बोली तो नहीं पर दिल में कुछ महसूस किया हो तो क्या नहीं सकता । ऐसा फिर आगे से काॅन् चला करेंगे । वहाँ भी अच्छे खासे रह रहा है । ये ठीक है, ठीक ठाक ही करते रहेंगे या कुछ चाय कॉफी भी पिलाएंगे प्रकाश । उन्होंने बजट दबाया और अर्जुन से दो गरम कॉफी मंगाने के लिए कह दिया । वैसे दफ्तर में आजकल अपने इसके चर्चा शुरू हो गए । सीमा ने बेहद सरलता तथा सादगी से यह रहस्योद्घाटन कर दिया । अच्छा तो मैं कैसे बता प्रकाशचंद्र ने अचकचाकर पूछा । ये सुनकर वो थोडे चिंतित और भाव से हो गए । पता चल जाता है एक दो दोस्त हैं । वो पूछ रही थी कि कहो भाई प्रकाशचंद्र से कैसी पड रही है । यही नहीं कल शाम को मैं चार बजे चली गई थी । बहुत को बिना बताये । आज वो कह रहा था प्रकाशी के साथ कहीं गयी थी । ये सब बताते हुए सीमा बडी खुश नजर आ रही थी । पर प्रकाश चंद्र के मुख पर उदासी के सारे ठहराये । वो काफी परेशान और जैसे बैठे रहे बोले कुछ नहीं । आपको क्या हुआ? सीमा ने बजकर पूछा सीमा में नहीं चाहता की हमारे संबंध सार्वजनिक चर्चा का विषय बन जाए । सीमाएं तत्काली अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर दी । देखिए कहावत है इसको और मुश्किल खुशबू छिपाए नहीं छिप सी कहावत अपनी जगह ऐसी बात मैं नहीं जाता । ये सार्वजनिक चर्चा हमारे जीवन में परेशानियां पैदा कर देगा । वही परेशानियाँ तो तब पैदा होती है जब दो अभी भाई या फिर एक विवाहित और दूसरा अभी वाइट प्रेम करें । हम दोनों शादीशुदा है । हर तरह से लाइसेंसशुदा सुरक्षित और समझदार नहीं । सीमा तुम गलती पर हो । हम विवाहित है । दोनों का अपना परिवार है, बच्चे हैं । यदि ये सार्वजनिक चर्चा हमारे घर तक पहुँच जाती है तो दो घरों के बिगडने का खतरा पैदा हो जाएगा । ये करा भी नहीं होना चाहिए । प्रकाशचंद्र ने गंभीर फॉरेन स्वर में कहा, भाई राम! दो प्याले कॉफी आया है । कॉफी पीने लगे । मोहन के आवरण में लिपटे एक अदृश्य आशंका से आतंकियों से ये सब शुरू कैसे हो गया? सीमा ने दार्शनिक अंदाज में पूछा, मैं खुद हैरान ही समझ में नहीं आता । ये सब कैसे शुरू हो गया? इसके लिए कोई खेल तो नहीं है? बिल्कुल नहीं । ये तो जिंदगी की अमूल्य निधि बन गया है । पर सीमा मेरा विश्वास करो का मैं हर समय डरा, डरा सहमा सहमा सा रहता हूँ । क्यों भला? मैं चाहता हूँ कि मेरे और तुम्हारे परिवारों में कहीं कोई कटुता और असंतुलन उत्पन्न हो । हमारा उद्देश्य मौज मस्ती मनाना है ना कि अपने अपने साथ ही को कष्ट और दुख हो जाना । एक बार पूछ लूँ क्या वही जो कुछ दिन पहले पूछने वाली थी । शायद मैं अक्सर सोचती हूँ कि हम दोनों की भावना से प्रेरित हो । इस मार्ग पर अग्रसर हो गए । सच हुई है कि मैं अपने पति से और आप अपनी पत्नी से पूर्ण रूप से संतुष्ट है । फिर हम दोनों नहीं उनके साथ ही विश्वास है क्यों? क्या मैं भी अक्सर यही सोचता हूँ कई बार मेरा अंतकरण मुझे कचोटता है कि ये सब गलत है पर फिर भी आंखे खोल वो गलती करने को मन करता रहता है । हो सकता है ये इंसान की आदम भूख हो । एक शाश्वत विविधता की चाह एक ऐसी दायिक भू जो हर समय अग्नि की तरह लगती रहती है । संभव है धन की चाहना से भी अधिक तीव्र और परेशान करने वाली है । ये चाहे आप ठीक कह रहे हैं पर मेरे ख्याल से इन संबंधों की चीज फॉर करना उचित नहीं चलने दीजिए । ऐसी भागती पर सीमा, थोडी सावधानी और सतर्कता तो बर्फ नहीं पडेगी । ठीक है पर एक बात है अनायास मन में एक विचित्र खयाल आया है । क्या माँ लोग इन संबंधों का रहस्य उद्घाटन हो जाता है? नहीं बिजी तूफान खडा कर देती है । अब आपको हम दोनों में से एक का चुनाव करना है । बोलिये, आप किसको चुनेंगे? मुझे यहाँ लिमिट जी को हूँ ।

भाग - 10

सीमा मेरा ऍम मत लोग ये तो एक काल्पनिक स्थिति है । इसके बारे में कुछ नहीं कहूंगा । हाँ, इस समय तो मैं बस यही महसूस करता हूँ कि मेरे दो हाथ है । मेरे हाथ में है कमल और दूसरे में गुलाब । मैं दोनों फूलों में से किसी को भी छोडने को तैयार नहीं हुई । किसी भी कीमत पर सीमा अभिभूत हो गई । ये सुनकर फिर तत्काल ही उसने एक प्रश्न पूछ कर माहौल को हल्का बना लिया । मैं गुलाब हूँ या कमल चोपडा हूँ प्रेम को कोई नाम ना तो एक भावना है, एहसास है इसे नाम ही रहने दो । चलिए मान गए अब बोलिए क्या इरादा है जब तक तुम्हारे नियाजी शहर में इरादों को कोल्ड स्टोरेज मिनट दीजिए । अरे इसमें डरने की क्या बात है तो उनके विश्वास पर डाका डाल रही हो । हम डरते हैं पर आपकी तरह नहीं देखिए डरने से कुछ नहीं बनेगा । थोडी हिम्मत जुटाइए और कुछ साहसिक कारनामें करके दिखाइए करना ये किसी की हत्या कर नहीं या फिर कहीं तो पृथ्वीराज चौहान बंदो में संयोगिता की तरह थोडा ले जाए । ये बात हुई ना । सीमा हसते हुए बोली फिर कॉफी का एक घूट पी कर वह कहने लगी देखिए प्रेम बडी विचित्र चीज है । ये कभी इंसान को मजबूत बनाती है तो कभी तुलसीदास कभी जोड दिया तो कभी सबकुछ तोड कर देती है । छोडिये इसकी चर्चा हमें तो बस मौज मस्ती करना है । ठीक है प्रेस इतवार को आ रही हो ना । उसके बाद कोई पिकनिक का कार्यक्रम बना लेंगे । सिर्फ अपने दो परिवारों का । ये लोग जितने समीप आएंगे आपस में बोलेंगे मिलेंगे उस ने हमारे लिए सुविधा रहेगी । संडे और संशय की उतनी संभावनाएं कम हो जाएगी । ठीक है देखने के बाद एक दिन में आप लोगों को रात के खाने पर बुला लेंगे । वो बढिया कार्यक्रम रहेगा, मजा करेंगे । सबके होते हुए मजा प्रकाशचंद्र ने जिस तरह ये प्रश्न पूछा उसे सुनकर सीमा मुस्कुरा ली । काफी डेढ का प्रकाशन और सीमा पे माला अपने व्यस्त रहे । दोपहर के भोजन का समय हो चुका था फिर भी वो बैठे गप्पे मारते रहे । आखिर में सीमा ने पूछा खाना नहीं खाना तो उनसे बात करके मेरा पेट भर गया है और तुम्हारा क्या रहता है । घर से काफी देर से चली थी । डटकर राष्ट्र कर लिया था । अब तो बिलकुल भी नहीं । तो तो कॅरियर दोसा या फिर नहीं मेरा कुछ नहीं है । मैं चलूंगी । आप खाना खा लीजिए कहकर सीमा कोर्ट खडी हुई । प्रकाशचंद्र भी उठे और उसे दरवाजे तक छोड आए । लौटकर वो अपनी सीट पर बैठे । कभी सुनने बजट दिया और बोली हूँ आप कुछ खाने का ऑर्डर देना? नहीं वो कल वाला अनुभाग अधिकारी फिर आया था । उसकी फाइल कहाँ है? मैंने कल भी तुमसे कहा था पर तुम एकदम लापरवाह होती जा रही हो । फाइल अंदर है । आकर निकली । सुधा नराई फाइलों के ढेरों से उस फाइल को तलाश करने लगी । उधर प्रकाशचंद्र उस पर बुरी तरह बरस रहे थे । ऍर में कह दिया साहब कल शाम चार बजे चले गए थे । ऍम घंटे से सीमा जी बैठी थी । मैंने गलत डालना उचित नहीं समझा । प्रकाशचंद्र तिलमिला गए । उनका गाल सार्वजनिक वस्तु बन गया था । जिसे देखो वही टमाटर जोड रहा है । पर समाज में तथ्यों में कहीं कोई गलती नहीं होता है । तो विरोधी कैसे करते हैं । मन ही मन वो अपने गाल को सहलाते हुए चुप्पी लगा रहे । सुनने संबंधित फाइल निकली । आदेश पर हस्ताक्षर करवाकर फाइल बाहर ले गई । प्रकाशचंद्र निष्क्रिय से बैठे रहे । सीमा की सुगंधित याद की वादी कि भूल भुलैया में खोए हुए से पार्टी सात बजे शुरू हुई और करीब ग्यारह बजे तक चलती रही । सारे मेहमान एक स्वर में खाने की प्रशंसा कर रहे थे । निर्मला इस प्रशंसा कोसोन आत्मविभोर हो गई थी । पर प्रकाशचंद्र रहा उन का मजा मिट्टी हो गया था । इसका कारण था विवेक और पिंकी द्वारा किए गए रहस्योद्घाटन । जिस समय सीमा अपने पति लाल और बेटी पिंकी को लेकर पहुंची, सपने एक साथ उनका स्वागत किया । वो पहला परिवार था जो समय पर पहुंच गया । प्रकाशचन्द्र के परिवार के सदस्यों और सीमा के पति और पुत्री के पारस्परिक परिचय के मध्य काफी बडी हो गई । किसी और से महसूस किया हूँ या ना किया हो प्रकाशचंद्र का चोर मन उस वार्तालाप को सुन का काम गया । सीमा के पति लाल से अभिवादन का आदान प्रदान होने के बाद जब सीमा ने पिंकी का परिचय कराया तो प्रकाशचंद्र की ओर संकेत करके फटाक से बोली थी, चाचा जी से तो हमारी मुलाकात हो चुकी है । कम मुलाकात हुई थी । बेटे निर्मला ने सहजभाव से पूछ लिया तो लिमिट जासूसी । बहुत डर आई है । प्रकाशन ने सोचा चाचा जी हमारे घर आए थे । अच्छा मम्मी की अच्छा उनके अंतर में धमाका कर गई । इसी प्रकार जब प्रकाश चंद्र ने सीमा का परिचायक निर्मला, विवेक और माला से कराया तो भी गडबड हो गई । विवेक ने सीमा का हाथ जोडकर अभिवादन किया और मुस्कुराकर बोला पिताजी अगर मैं गलती नहीं कर रहा हूँ तो उस दिन शाम को काॅस्ट में यही आपके साथ ही ना प्रकाश अंदर का मुफ्त पीला पड गया । निम्मी की सर्चलाइट जैसी निगाहें उनके मुख पर टिकी हुई थी । सीमा भी थोडी असुविधा सी महसूस कर रही थी । उसके मुख पर तो बारी बारी से लाल और निन्नी की खोजी शंकालु दृष्टि आकर देख रही थी । अच्छा विवेक पिंकी को अपने साथ ले जाओ तो तुम तीनों बैठ कर गप्पे मारो । प्रकाश इन्होंने उस अप्रिय प्रसंग को टाल दिया । उसके पश्चात और मेहमान आए और ऍम पार्टी में गरम नहीं पाया । विवेक और पिंकी द्वारा कही हुई बातें नागदंश जैसे उनके अंदर को छटपटा रही थी । इसका अर्थ है लाल और दिल्ली के मन में शंका और संदेह के बीजों की उत्पत्ति । पार्टी चलती रही । हंसी मजाक होता रहा । खाना पीना और गप्पों का दौर चलता रहा क्योंकि सारे मेहमान कर्मचारी वर्ग के थे । वो सारे समय सरकार की आलोचना करते रहे । हर दृष्टि से वो सफल पार्टी थी । ग्यारह बजे तक सीमा जाने लगी तो उसने निमी द्वारा किए गए स्वागत सत्कार की भूरी भूरी प्रशंसा की और बोली अब आप लोग हमारे कमा रहे हैं । जब कहीं आ जाएंगे । निर्मला ने सहृदयतापूर्वक कुत्ता दिया अभी दस तारीख को सही अभी तो कई दिन है । फोन पर बात करके तय कर लेंगे । फोन पर मैं आपको याद दिला दूंगी । वैसे तारीख के बारे में कोई परिवर्तन नहीं होगा । कोई खास दिन है । ये था । सीमा ने मुस्कुराकर कहा कोई विशेष अवसर सीमा ने कोई उत्तर नहीं दिया । कभी पिंकी बीच में तब तक पडी चाची जी उसे मेरा जन्मदिन है । फिर तो हम अपनी बेटी की पार्टी में जरूर आएंगे । मम्मी ने पिंकी के उनको अपने दोनों हाथों में भर दुलारते हुए कहा वो लोग चले गए । अगले दस मिनट में शेष मेहमान भी लौट गए । घर में एक विशेष महा शांति से छा गई । एक थकान, अवसाद और छटपटा बसा प्लाॅन पार्टी का शीर्ष काम निपटाते निपटाते बारह बज गए । चौबे दोनों पलंग पर लेते तो उन्हें महसूस हुआ । जैसे ये बहुत थक गए हैं । चार मिमी के मन में कोई गलत भाव शेष है । उस को दूर करने के लिए निमी के प्रति थोडे पत्र प्रेम की आवश्यकता होगी । पता प्रकाशचंद्र ने निमी को अपनी बाहों में समय क्या फिर बाएं हाथ से उसे अपने मैं सभाएं दवा यहाँ से वो उसके कंधे और बाहों को दबाते हुए नहीं भरे । स्वर में बोले बहुत थक गयी होगी । कोई प्रत्युत्तर नहीं । उन्हें महसूस हुआ जैसे उनके अंक में उनकी पत्नी निमी नहीं हिमखंड ऍम अल और स्थिर । तो क्या दिल्ली के मन में बातें घर कर गई हैं? ये सोच करोड घबराए । उन्होंने एक बार फिर अपना प्रश्न दोहराया । फिर भी उत्तर नहीं मिला क्या बात है नहीं मैं क्या सोच रही हो? निर्मला ने अपने को उनके आलिंगन से मुखिया और बोली हूँ । एक बात पूछूं पूछूं, मुझे गलत मत समझना । नहीं । आप सीमा को लेकर ऍम में गए थे । पल भर के लिए प्रकाशचंद्र बेहद घबरा गए । एकदम सीधा रहा । इसके लिए वो कतई तैयार नहीं थे । लेकिन उन्हें एक अजीब धर्मसंकट में डाल दिया था । बोलिए गए थे आपने आज तक मुझे कभी झूठ नहीं बोला है । हाँ मैं गया था प्रकाश इन्होंने मात्र प्राय स्वर में कहा हूँ या आपने क्या क्या निरॅतर में कहा इसमें ऐसा क्या हो गया? कार्यालय के एक सहयोगी के साथ रेस्तरां में जाकर एक प्याला कॉफी पीना क्या कोई बात है जी, वही तो मैं कह रही थी कि कोई पाप नहीं पर पांच तो आपने वो झूठ बोल कर कर दिया । आपको पता है विवेक को अपने झूठ बोलकर कितना धक्का पहुंचाया है । उसके अंदर भावनाएं पैदा हो गई है । ना एकदम व्यथित हो उठा है । वह फैसला नहीं कर पा रहा है कि सही वो है या उसके पिता हूँ । क्या वो तुमसे इस बारे में बात नहीं करता रहा था? हर दिन और आज शाम को उसने सीमा को पहचान भी लिया । दो घंटे पहले उनसे कह रहा था कि आखिर पिताजी ने उसे झूठ बोला । प्रकाशचंद्र अपने को बहुत बुरा महसूस करने लगे । चार । अपने एकमात्र बेटे की नहीं, गांव में वो गिर चुके थे । वह माला से जरूर बातें करेगा, अपने बच्चों की नहीं । गांव में उनकी प्रतिष्ठा नष्ट हो चुकी थी । मैं ठंडा माहौल था । बाहर भीतर, हर जगह ठण्ड, प्रकाश अंदर काम रहे थे । फिर वो भरे स्वर में बोले, मुझसे बडी गलती हो गई । नहीं । बेकार में झूठ बोलकर आपने अपने मन के चोर और अपराध भावनाओं को उजागर कर दिया । ऐसा तो कुछ नहीं, मैं कुछ नहीं कह रही हूँ । पर बच्चों को ये सब सोचने से कैसे रोका जा सकता है । अब बडे बहुत समझदार होते जा रहे हैं । दुनियादारी की बातें समझने लगे हैं । प्रकाश अंदर समझ गए बच्चों के कंधों पर बंदूक रखने में उन्होंने गोलियों से भून रही थी । वो बोल रहे थे क्या करते हैं और कोई उपाय भी तो नहीं था । उस अप्रियता और अपमानजनक स्थिति से उन्हें नींद ने बचा लिया । कुछ देर बाद ही था की हुई नहीं हो गई पर वो खुद पश्चताप और नानी जी आर में चलते हुए जाते रहे तो सुबह उनकी आंखें डेढ से खुली । वो बाहर लॉन में घूमने गए । नौकर वही उन्हें गिलास चाहे पकडा गया । खास में घूम घूमकर वो चाय पी रहे थे और पिछली राजी विभिषिका को याद कर करके दुखी हो रहे थे और तभी उनके अंतर्मन ने उन्हें साथ ना दे दी । उनके पास नहीं आता था । मम्मी को उनके सीमा के साथ रेस्तरा जाने पर आपत्ति नहीं थी । उसे तो उनके विवेक से झूठ बोलने पर घोर आपत्ति थी । ठीक है, आगे से वो सच बोलेंगे और सच के अलावा और कुछ नहीं बोलेंगे । इस विश्लेषण आत्मनिर्णय से प्रकाशचंद्र को सुख और संतोष हो गया और वो स्वस्थ और सहज हो गए । तभी निर्मला भी बाहर आ गई और बोली मामाजी जाने को कह रहे थे, कल के टिकट करवा दीजिएगा, ठीक है । इतना कहकर निर्मला वापस जाने को मुडी हुई थी कि प्रकाश इन्होंने उस किसी भी वहाँ पकडी और बोले मुझे सच मुझे बेहद दुख है । अब कभी ऐसा नहीं होगा । निर्मला थोडी सामान्य हो गई । ठीक है क्या? अगर वो फिर से अंदर जाने को हुई तो लोन का मुख्यद्वार खुला । उसने देखा गंगा शरण और शकुंतला अंदर आ रहे हैं । वो ठिठककर खडी हो गई । छठ पूजा बहुत खुश नजर आ रही थी । उसने नई साडी और ब्लाउज पहना हुआ था । आते ही वो निर्मला के पास पर गिर पडी और सौ सौ आशीष देते हुए बोली मेमसाहब आपका सुहाग अमर रहे । आपके बच्चों की लंबी उमर हो । साहब ने मेरी और मेरे बच्चों की जिंदगी बचा ली । तुम्हारा काम हो गया । निर्मला ने योगी निर्थकता प्रश्न पूछ लिया । हम इंसान रुपया है तो अभी आने लगा । तभी गंगा शरण आगे आया । उसके हाथ नहीं डब्बा था उसे । आगे बढाते हुए वो बोला इंसाफ ये ये क्या है? मीठा कीजिए मेम साहब, मेरी बहन और बच्चों को नई जिंदगी मिली है । नहीं इस की क्या जरूरत थी । निराश मत कीजिए । मेमसाहब रख लीजिए । निर्मला ने मिठाई का डब्बा पकडा दिया । उसे वही खोलकर उसके अंदर से बर्फी गए । टोका निकाल डब्बा गंगा शरण को वापस कर वो बोली ये लोग हमारी तरफ से बच्चों को खिला देना नहीं मेम साहब जैसा हम गए वैसा करो । हमने तुम्हारे मिठाई स्वीकार कर ली थी । अब हम ये तुम्हारे बच्चों को दे रहे हैं क्या कर निर्मला ने वो डब्बा शकुंतला के हाथ में पकडा दिया । मिलो प्रशंसा और आशीषों की अजस्त्र वर्ष करके चले गए । प्रकाशचंद्र सुखद नाटक के दर्शक मात्र बने खडे थे । वे दोनों फाटक के बाहर चले गए तो नहीं मिलने उन पर एक और स्कूल दृष्टि डाली और फिर अंदर चली गई । सुबह की नियमित दिनचर्या के बाद प्रकाशन और दफ्तर पहुंचे तो करीब आधे घंटे लेते थे । कोई विशेष घटना नहीं घटी । सुबह के समय उन्हें पहले देखने का समय भी मिल गया । कमरे को अंदर से बंद कर उन्होंने काफी सारी फाइलों को निपटा दिया । जैसे ही डेढ बजा और वो लंच में घर जाने के लिए उठे, उनके कमरे में एक सुखद आश्चर्य उपस् थित हो गया सीमा पहुंची थी । उसे देखते ही प्रकाशचंद्र कमल के फूल की तरह खेल गए । सीमा अंदर आई और वह बाहर जाने के लिए दरवाजे तक पहुंच गए थे । दरवाजा बंद हो चुका था और मैं आमने सामने खडे थे । अनायास एक बिजली के झटके सी सीमा उनसे लेफ्ट और तत्काल अलग हो गई । उन मानौ रंगीन, सुखी तेजधारा में उनका संपूर्ण अवसाद रह गया । वो पूर्ण रूप से एक दिन प्रकाशन बन गए थे । आज कॉफी पीने क्यों नहीं आई इसलिए कि खाना आपके साथ खाना था । मेरे साथ कोई खास बात करे नहीं । भाई खास बात क्या होनी है? कहाँ चल रहे हैं घर घर? प्रकाशचंद्र ने घोर आश्चर्य से पूछा था इसमें चौंकने की क्या बात है? घर क्यों? किसी रचना में क्यों नहीं घर घर है और ऍम पर पिछली बार विवेक ने देख लिया था क्या इस बार माला ने देख लिया तो क्या कर सीमा हंस पडी हमारे ख्याल से घर में पकडे जाने के कम अवसर हैं । काम क्या बिल्कुल नहीं है । मेरे पति चंडीगढ गए तो स्कूल में होगी और नौकरानी छुट्टी पर है तो यूँ क्यूँकि मैदान पूरी तरह साफ है । यही समझ लीजिए । चलिए अब देर करने से क्या फायदा? दो बातें एक जो घर पर सूचना देनी होगी तो दे दीजिए प्रकाशचन्द्र पलट कर फोन के पास गए । बजा दिया । दोनों ऍम थे । उन्होंने स्वयं भी घर फोन मिलाया और सुबह किए हुए अपने सच बोलने के फैसले को ताक पर रात उन्होंने लिमि । से झूठ बोल दिया । ये वो घर पर भोजन करने नहीं आ सकेंगे क्योंकि उन्हें मंत्री जी ने अपनी कोठी पर किसी जरूरी काम से बुलाया है । निर्मला क्या कहते हैं क्यों कर गई? दूसरी बात क्या थी? सीमा ने पूछा अपनी कार से जाना सुरक्षित नहीं रहेगा और तुम्हारे घर के बाहर खडी रहेगी तो पडोसियों को शक हो जाएगा । फिर कैसे चलेंगे स्टाॅल? खर्च कर दिया आपने स्टाफ का ड्राइवर पूरे दफ्तर में ये खबर फैला देगा । नहीं वो बडा विश्वसनीय है । मैंने उसकी भर्ती अपने हाथों से की है । फिर भी टैक्सी से क्यों ना चलेंगे? बेकार में दस बीस रुपए फूटने से क्या फायदा ठीक है चालू हूँ ।

भाग - 11

वो दोनों साफ तौर से सीमा के घर पहुंच गए । प्रकाशचंद्र ने एक और बुद्धिमानी का काम क्या साफ कार को वापस दफ्तर भेज दिया । वहाँ रोके रखने से कोई फायदा नहीं था । ना जाने खाने पीने, मौज मस्ती में कितनी देर लग जाए । घर के अंदर हो सही प्रकाश इन्होंने काफी देर से अंतर्मन में कुलबुलाते एक प्रश्न को बाहर निकाल लिया । वो बोले सीमा तुम्हारे में अक्सर चंडीगढ क्यों जाते हैं? कहीं कोई राहुल तो नहीं बोल रही है? हाँ ये तो नहीं पता पर हाँ चंडीगढ में उनकी कंपनी का क्षेत्रीय कार्यालय है । अच्छा है उनकी कंपनी के क्षेत्रीय कार्यालय का । वहाँ होना हमारे अनुकूल बैठता है । प्रकाश उन्होंने कहा, और शरारत से मुस्कुरा दिए । खाने का तो बहाना मात्र था । सीमा रसोई घर में जाने लगी तो प्रकाशन में रोक लिया और बोले, घर आए रसोई घर में समय खराब करने के लिए सीमा इशारा समझ गई । उसने जल्दी जल्दी सैंडविच बनाई, घर में रखा नाम की निकाला और दो प्याले चाहे बना ली खाने के बीच फॅसने सीमा से एक महत्वपूर्ण सवाल पूछ लिया पार्टी से घर लौट कर लाल है तुमसे मेरे बारे में तो कुछ नहीं पूछा नहीं पर क्यों? विवेक और पिंकी की बातें हमने नोट की थी । हाँ पर लाल इन मामलों में काफी उदार है । यही नहीं वो छोटी मोटी बातों को गंभीरता से नहीं लेते । फिर ठीक है फायदा उठाओ । लालकुॅआ का उठा तो रहे हैं क्या कर सीमा हंस पडी । खाना खत्म हुआ । बहुत मस्ती शुरू हो गई । करीब तीन बज गए । मस्ती मारते हुए दो प्रकाश अगर वो दफ्तर की याद आई थी, बनाया उनके ऍम फाइल उभर आई । जिस पर सचिव ने आदेश दिए थे कि उसे आज तीन बजे तक उनके पास जरूर भेज देना चाहिए । प्रकाशन उठने की कोशिश करते तो सीमाओं से लिपट जाती । जब पौने चार बजे तो थोडा परेशान हो गए । पलंग के नीचे उतरे कपडे पहले बाल गाढकर । वो बोले डॉक्टर की कोई चिंता नहीं क्या नहीं चल रहा है नहीं क्योंकि मैं दो दिन की छुट्टी ले आई थी । पर मैं मेरी मेज पर कई जरूरी फाइलें पडी है । मैं चलूंगा । सीमा मुझे अकेला छोडकर क्या करूँ जाना होगा । दो तीन फाइल हैं जिन्हें आज ही सचिव के पास महीना बेमन से सीमा ने प्रकाशचंद्र को विदा किया । वह तीन पहिया स्कूटर से दफ्तर के लिए रवाना हो गए । रास्ते भर वो एक मिश्र भावना को जीते रहे । सुख की प्राप्ति कि मानवता उतर चुकी थी और एक और खेल भावना उत्पन्न हो चुकी थी । बिल्कुल सागर की उत्ताल तरंगों के साथ आई लडकी, गंदगी जैसी वो दफ्तर पहुंचे । कमरे में आकर अपनी सीट पर बैठ उन्होंने बजट देख अपने पीए से पूछा कोई फोन जी हां घर से आया था । सचिव और संयुक्त सचिव भी कई बार याद कर चुके हैं । मारे गए प्रकाशचन्द्र के मुंह से अनायास निकाल लिया । वो फैसला नहीं कर पा रहे थे कि पहले किससे संपर्क करे । जिस से भी संपर्क करेंगे, वही बम दर्शाकर उनको नष् कर देगा । ये दफ्तर के समय में देश बाजी किसी भी जरूर ले डूबेगी । यही सोचते बैठे रहे प्रकाशचंद्र अपराध भावना से ग्रस्त, आतंकित और घबराए से सीमा ने तो यही मजाक में वो प्रश्न पूछा था । पर प्रकाशचन्द्र के मन में जैसे हलचल मचा गया था । कई दिन से वो उसी के बारे में सोचते रहे थे । निर्मला और सीमा में से एक का चुनाव नहीं । वो चुनाव नहीं कर सकते । निर्मला के साथ पूरे पच्चीस वर्ष बिताए हैं । इतने लम्बे समाचार एक अपना महत्व होता है । दो । जस्ट इतने लम्बे अरसे तक एक ही छत के नीचे रहे सुख दुख की भागीदारी करें तो कुछ अटूट सा जरूर जोड जाता है । ऍम मानसिक तथा भावनात्मक और साथ संपूर्ण असद उसे वो एकाकार हो जाते हैं । फिर क्या सीमा जैसा तीसरा प्राणी इस रूट को तोडने में सक्षम हो सकता है? वो विचार मन से फाइल खोले बैठे हुए थे कि जलतरंग स्वर्ण है, उनकी समाधि भंग कर दी हूँ । कहाँ हो गए? प्रकाशचंद्र ने सामने बैठी सीमा को देखा और अनायास ही उनके मुंह से निकल गया । तुम्हारे बारे में सोच रहा था क्या चुनाव कर रहे थे? नहीं समझने के बारे में सोच रहा था । आप सोचते बहुत है पर लगता है आज तुम को सोच रही हो । मैं सीमा सरपट आ गयी । वो ऐसा महसूस कर रही थी जैसे चोरी करते पकडी गई हो । क्या बात है, कुछ उदास लग रही हूँ । साथ में परेशान और चिंतित से भी क्या लालसा नहीं वैसा कुछ नहीं थे । कुछ हद तक सीमा ऊहापोह में पडी रही । क्या वह प्रकाशचंद्र को बता दे या नहीं? फिर जैसे उस ने निर्णय कर लिया और बोली मैं तुमसे कभी कुछ नहीं छुपा होंगी । फिर बता डालो साधुराम को जानते हैं । मेरा बडा अच्छा दोस्त है और तुम्हारा बॉस उसने मेरे साथ ही जाती की है । क्यूँ क्या पिछले साल की गोपी रिपोर्ट खराब करदी हो आप सरकारी कर्मचारी तो डीएफए और सीआर से आगे सोच नहीं सकते । फिर क्या? क्या साथ उन्हें परसों शाम श्रीमान जी मुझे अपने घर ले गए यह बहाना बनाकर कि उस दिन उनकी शादी की वर्षगांठ है । मैं चली गई । घर पहुंचकर देखा तो पाया वहाँ पार्टीवादी कुछ नहीं थी । सच हो गया था कि घर में कोई भी नहीं था । ना साधु की बीवी, न बच्चे, सब कहाँ चले गए थे । मैं क्या जानूँ? घर के कान और साधु की हवाओं को देख कर मैं तो बुरी तरह घबरा गई । उससे मुझे शराब सिगरेट पिलाना चाहिए । मैंने साफ मना कर दिया । जब उसके घर पार्टी नहीं थी तो तुम है ले ही क्यों गया था । उसके दोपहर पीने के बाद ही यह भी स्पष्ट हो गया । पहले तो मेरे साथ हल्का फुल्का मजाक करता रहा हूँ । मैं उसे सहती रही । पर बाद में कई तरह चढाने के बाद वो एकदम पशु बन गया और मेरे साथ बलात्कार करने को उतारू हो गया । उसकी ये हिम्मत ब्लाउज का खून कर दूंगा । वो समझता गया है प्रयास प्रकाशचंद्र उबल पडे । मैंने उसकी समझ योजना पर पानी फेर दिया । जहाँ कसकर दो चांटे रसीद किए । उसका सारा नशा हिरन हो गया और उसकी अवसर लौट आई । वो कहने लगा कि तुम मुझे चांटा मारा है, मैं तुम्हारी गोपी रिपोर्ट खराब कर दूंगा । मैंने भी कह दिया कि जो मर्जी में आये करना तुम जैसे दर्जनों अवसर गली गली मारे, मारे फिरते, बडा नीच और कमीना है । साजों का बच्चा पर उसकी हिम्मत पडी कैसे? क्या वो ये नहीं जानता कि तो मेरी हूँ प्रकाश । इन्होंने डूबे स्वर में कहा ये वो जानता है । शायद इसी कारण उसकी ये बदतमीजी करने की हिम्मत पड गयी । वो कहने लगा था कि प्रकाशचंद्र में ऐसा क्या है जो मुझे नहीं है और प्रकाश अंदर तो मैं क्या देगा । मैं तो मैं कुछ देने की स्थिति में भी हूँ । तुम ने क्या कहा? मैंने उसके ऊपर ठोकर कह दिया । ये प्रेम की बात है ना कि व्यापार का लेनदेन । बहरहाल, साधु ने बहुत कोशिश की पर मैंने उसकी सारी योजना विफल कर दी । ये तो तुमने अच्छा किया गौर से बोला हूँ और सारी बातें साफ साफ कर लूँ । नहीं कोई फायदा नहीं है । इससे अप्रियता ही बढेगी । कोई लाभ होने से रहा । शायद तुम ठीक कह रहे हो सीमा क्या का प्रकाशचंद्र विचारमग्न हो गए । वो सोचने लगे कि उनके और सीमा के संबंध अब गोपनीय नहीं रह गए हैं । वे सार्वजनिक बन चुके हैं । क्या ये तथ्य सीमा को एक सार्वजनिक भोग की वस्तु बना देगा? एक ऐसी विषम समस्या थी, जिसका उनके पास कोई समाधान नहीं था और साधु के साथ काम करना नामुमकिन है । मुझे कहीं और किसी अवसर के साथ लगा दीजिए । इससे समस्या सोना जाएगी । प्रकाश उन्होंने पूछा, अगला प्रश्न वो पूछने का साहस नहीं जुटा पाए । प्रश्न उनके गले तक पाकर उमडने घुमडने लगा था । मान लोग नए अवसर ने भी तुम्हारी स्थिति का अनुचित लाभ उठाना चाहा तो तुम क्या अगर होगी कब तक अपना स्थानांतरण करती रहोगी? फिलहाल तो सुना जी जाएगी, बाद में देखा जाएगा । सीमा ना शांतिपूर्वक कहा । प्रकाशचंद्र सोच में डूब गए । अवर सचिव के स्तर के अवसरों का स्थानांतरण इतनी सरलता से नहीं हो पाता । इसके लिए बडे आप कारण होना चाहिए । फिर वर्तमान अवसर तथा भावी बहुत की स्वीकृति भी आवश्यक है । अंत में सचिव की भी अनुमति लेनी होती है । क्या सोचने लगे? सीमा ने पूछा तुम्हें दूसरी जगह भेजने की तरह की सोच रहा हूँ । कहो तो साधुराम की लिखित शिकायत कर दूर चीमा ने फडकर पूछा था । इससे तुम्हारे सामान दौड का आधार तो बन जाएगा पर इससे हमारे हमारे संबंधों पर भी काफी की चलो चलने की संभावना है । नहीं । पहले दो प्रकाशचंद्र ने निर्णय स्वर में कहा कॉफी आई सीमा ने बेमन से कॉफी पी और फिर परेशान से वो चली गई । उसके जाने के बाद प्रकाशचंद्र काफी परेशान और चिंतित से बैठे रहे । उनका निजी जीवन सार्वजनिक बनता जा रहा था । उनकी वजह से सीमा की प्रतिष्ठा को भी खतरा उत्पन्न हो गया था । जब इस प्रेम प्रसंग ने तूल पकड लिया तो तो कुछ भी हो सकता है । शाम को घर पहुंचे तो उन्हें महसूस हुआ । जैसे आज का दिन से समस्याओं का दिन है । घर में घुसते ही उन्हें लगा या जरूर कुछ अप्रत्याशित घटने वाला है । वह अंदर पहुंचे लेना पलंग पर लेटी थी मौन उदास एक्टर छक्को सुनी निगाहों से ताकि हुई उन्हें देख कर भी वह वैसी लेटी रही । बडी विचित्र बात ही प्रकाश अंदर का अंतर धक से रह गया । तो क्या निर्मला को उन पर पूरा संदेह हो गया है? अपराधी चोर मान धंधुका रहा था । वो पलंग थक गए और धीमे स्वर में बहुत बुलाये । मैं निर्मला ने उनको तटस् और छटपटाती सी दृष्टि से देखा । तब तो ठीक है क्या तो ये प्रकाशचंद्र पलंग पर बैठ गए फिर फैसिलिटी हो । प्रकाश उन्होंने पूछा और ठंडी से रन उनकी रीढ की हड्डी में तैयार गई । लगता है मम्मी को सब कुछ पता चल गया हूँ क्या कर निर्मला निश्चेष्ट जैसी बडी रही । प्रकाशचंद्र ने निर्मला की दोनों भाँपकर उसे उठाया । ऍम वो बोले हम से कोई गलती हुई है । वो जानते थे जैसे व्यक्ति को अपनी पत्नी का विश्वास जीतने के लिए नहीं । भावेश और पत्नी के प्रति थोडे अतिरिक्त नहीं की जरूरत होती है । विभाजन के खतरे की सूचना या आभास पत्नी को ना मिले इसके लिए ऐसा करना अत्यंत आवश्यक है । नहीं, आपसे क्या गलती होनी है? दिल्ली की बात सुन प्रकाशचंद्र की जान में जाना गयी । वो सहज तनावमुक्त होकर बोले फिर क्यों परेशान हो? हर बात चीत सीमा होती है । निर्मला के मुख्य सीमा शब्द सुनकर प्रकाशन बुरी तरह तक पढा गए । पर थोडा संभलकर बोले आखिर बात क्या है? मैं कुछ समझा नहीं । अंदर से सिर्फ होने लगे थे वो मैं माला के बारे में कह रही थी । प्रकाशचन्द्र की जान में जान आ गई तो समस्या सीमा नहीं माला ने पैदा की है । वो सहज होकर बोले क्या क्या वाला नहीं करना क्या है? कोई नाटक संस्था है उसी में सम्मिलित हो गई है । पढाई लिखाई, सब बोल, हर समय स्टेज, नाटक, अरुण और अभिनय घर में किसी को पूछा उसने नहीं उसे मेरा भी डर नहीं रहा । नहीं वो किसी की परवाह नहीं करती । ये सब की ओर कैसे हुआ? क्या नहीं सकती? परमाणु और विवेक में उसी दिन से बहुत जबरदस्त परिवर्तन आ गया है जिसमें उन्होंने आपके झूठ को पकड लिया था । शायद उसके बाद उन दोनों को आपके और सीमा के बारे में माला है । कहाँ घबरा का प्रकाशन? मैंने निर्मला की बात बीच में ही कार्ड भी और प्रसन्न को बदल दिया । उसी और उनके साथ नहीं मार रही होगी । नहीं नहीं तुम ने उसे समझाने की कोशिश नहीं की थी । पर वो तो छोड खाई छोडने की तरह बिफर गई । कहने लगी कि किसी को अपनी रुचि को मेरे ऊपर लाने का क्या अधिकार है । यही नहीं वो तो बदतमीजी पर भी उतर आई थी । कहने लगी जब पिताजी पढाई विवाहिता औरतों के साथ घूमते हैं और तुम और मंगल को मंदिर चाहती हो । जब विवेक हर शाम आशा के साथ घूमता फिरता है तो मैं कुछ कहती हूँ प्रकाशचंद्र का अंदर कैसा गया उदास डूबे स्वर में बोले उसने ऐसा बोला आने दो ना उसकी तबियत साफ कर दो । तभी फोन की घंटी बजे ये प्रकाशचंद्र थे । उनके पास पहुंचे । रिसीवर उठाकर बोले लोग प्रकाशन बोल रहे हैं । मैं सीमा बोल रही हूँ, तुम कहाँ से प्रकाशचन्द्र? बुरी तरह चौकर बोले सीमा का फोन आने का मतलब था कोई खराब खबर । वरना उसे घर पर फोन करने की सख्त मनाही थी । दफ्तर से बोल रही हूँ । इस समय दफ्तर में क्या कोई जरूरी काम आ गया? कोई जरूरी काम नहीं है । साधु आपने कमीनेपन पर आ गया है । एक फाइल दे दी है । क्या था इस पर आज टिप्पणी चाहिए । मामला पेचीदा है । मैं उसे पडा । टिप्पणी लिखा दी है । ये टाइप कर रहा है । सालों ने तो हस कर दी तो जरूर बात करूंगा उसे । यही नहीं उसने मेरे संयुक्त सचिव से शिकायत भी कर दिया । उन्होंने मुझे बुलाकर झाडा था । कहने लगे कि दफ्तर में काम करने वाले अफसरों के साथ घूमने फिरने, मॉल, मस्ती करने साथ साथ कुछ काम भी किया कीजिए । श्रीमती लाल उनका इशारा मेरी तरफ था और नहीं तो क्या और साधु को संयुक्त सचिव से तुम्हारी शिकायत करने की क्या जरूरत थी? शायद आत्मरक्षा के लिए उसने ऐसा किया है । वो सोचता होगा कि उसकी कल की बदतमीजी के लिए कहीं में पहले शिकायत ना कर दूँ । ठीक है कल दफ्तर में ना उसकी तबियत साफ कर दूंगा नहीं तो बाद में कोई कदम उठाना ठीक नहीं होगा । सोचने कल बात कर लेंगे । ठीक है । सीमा ने फोन बंद कर दिया । प्रकाशचन्द्र उलझे हुए से कमरे में चहलकदमी करने लगे और समस्या गंभीर और जटिल होती जा रही थी । कटुता और आप यहाँ से वह कतराना चाहते थे पर ये संभव नहीं लग रहा था । घर और बाहर बिखराव तथा अप्रियता की संभावनाएं बहुत दी जा रही थी । कैसे रोकें वो इस विनाश को तभी अनायास माला अंदर आई थी । वो काफी जल्दी में लग रही थी । उसने अपनी किताबें पलंग पर फेंकी । हाथ मुंह धोकर कपडे बदले और फिर बालों में कंघी करती हुई बाहर जाने लगी । माला प्रकाश, अंगने और गंभीर सोच में उसे आवाज दी । माला छिडककर खडी हो गई । दरवाजे पर उसके पास थे । वो पलटी और पिता की ओर प्रश्न सूचक दृष्टि से देखने लगी । वो बोली नहीं प्रकाशचन्द्र को माला का व्यवहार बडा अपमानजनक लगा था । वो शांत रहने का प्रयास करते हुए बोलेंगे । अभी आई और ऍम दी कहाँ जा रही हो? क्या मुझे बताना होगा । हाँ, प्रकाशचंद्र का स्वर कठोर हो गया क्योंकि माला पलट कर उनके सामने किसी पुलिस वाले की तरह तनकर खडी हुई । क्या मुझे बताने की जरूरत है? क्या मुझे बताने की जरूरत है कि मैं तुम्हारा पिता हूँ? तो ये बात है । आप अपने पिता होने का अधिकार प्रयोग में ला रहे हैं वाला प्रकाशचंद्र चीज पडे की कीमत तो मुझे मजबूर कर रही हो । मैं उनके साथ जा रही हूँ । कहा शंकर मार्केट इसलिए मेरा खयाल था आप समझ गए होंगे नहीं मेरी अपील काफी मोटी है आपने अगले नाटक की रिहर्सल करने के लिए तो मैं इस नाटक चर्चा में इस से पूछ कर शामिल हुई । क्या इसके लिए भी लाइसेंस परमिट की जरूरत है? मालूम है उपहास उडाते हुए कहा वाला तुम नाटकों आपको भाग नहीं होगी । क्यों बोला हमारी चाहे प्रकाश । उन्होंने अंदर से भुन बनाते हुए कहा मैं आधारहीन आपत्ति की परवाह नहीं करती क्या तो माला तेजी से बाहर चली गई । मैं कहता हूँ मना के बाहर निकलते । प्रकाशचंद्र ने अपना अधूरा वह के पूरा नहीं किया । वो बेहद अपमान ऐसा महसूस कर रहे थे । माला इतना आशीष और उत्तर वादी पूर्ण व्यवहार करेगी । इसकी उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी । तभी निर्मला पास आकर खडी हो गई । उसकी आंखें छलछल आई थी । वो दोनों एक दूसरे के आमने सामने खडे थे । एक दूसरे को बस देख भर रहे थे और सोच रहे थे इस खुले विद्रोह को कैसे दबाया जाए । कई दिन तक सोच विचार करने के बाद प्रकाशचंद्र ने लिंगा स्वामी और नीलिमा सिंह वाली फाइल सचिव को भेज दी । समस्या का समाधान नहीं हो पाया था, वो भी कैसे सकता था । प्रशासनिक स्तर पर उन्होंने नियम उपनियमों की खाना पूरी कर दी थी । उन्होंने लिंग सोनी के विरोध गहराई से जांच की थी और वो ये सिद्ध करने में सफल हो गए थे कि नीलिमा सिंह और लिंग सोनी का प्रेम व्यापार चलता रहा था । महिला के अंदर जो जीवन पड रहा था वो लिंग सोनी की देन है या किसी और की ये सिद्ध करना का सामना था । फिर भी प्रेम के आधार पर यही निष्कर्ष निकाला जा सकता था कि इसके लिए लिंगा स्वामी ही दोषी है । जब दोष सिद्ध हो गया तो उन्होंने लिंग सोनी को दर्द देने के विषय में विवेचनात्मक टिप्पणी लिखी जिसमें उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा था हूँ हूँ

भाग - 12

हमारे डॉक्टर यौन विचार के अड्डे बनते जा रहे हैं । अभी कुछ वर्ष पूर्व ता की समस्या इतनी जटिल नहीं थी किंतु अधिक संख्या में महिलाएं दफ्तरों में आ रही हैं । उधर पांच शांति देशों के यौन उदारता का प्रभाव भी काम पर पडा है । इसी कारण से हमारे कार्यालयों में उनको कुछ शंकर यौनसंबंध स्थापित होते जा रहे हैं । नीलिमा सोनी कांड एक दुखद घटना है । दुकान इसलिए कि निलीमा विवाहित है और लिंग स्वामी विवाहित । यह तो सिद्ध हो चुका है कि दोनों एक दूसरे से प्यार करते थे और स्वतंत्र रूप से मिलते थे । पता है ये निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि नीलिमा की दुर्दशा के लिए लिंगा स्वामी ही दोषी है । इस आधार पर लिंगा स्वामी को कडे से कडा दंड दिया जाना चाहिए । प्रशासन को स्वच्छ तथा अनुशासन को कडा करने के लिए तो धारण तैयार मैं लिंग सोनी को नौकरी से निकालने की सिफारिश करता हूँ परन्तु इस मामले का एक अन्य मानवीय पहलू है । इस अप्रिय कांड के लिए केवल लिंगा स्वामी ही दोषी नहीं ले ली । मानसिंग पूर्ण रूप से सहभागी है । अतः मेरे विचार से यदि पांच वर्ष तक लिंगा स्वामी की पदोन्नति पर रोक लगा दी जाए तो ये न्यायोचित होगा । प्रकाश इन्होंने फाइल ऊपर भेज दी । परंतु वो उस दिन थे जब वो टिप्पणी लिखा रहे थे तो बार बार सुधा के हो । टोपर एशियन ऐसी वेदर भरी मुस्कान उभरती थी । जन का उपहास उडाती थी । कैसे खोखले शब्द थे उन्हें खुद महसूस होता रहा था तो हुई है कि लिंगा स्वामी को दंड की सिफारिश करते समय उन्हें महसूस हुआ था । स्वयं कहाँ घर में बैठकर वह व्यर्थ मिलेंगा । स्वामी पर पत्थर फेंक रहे हैं । यही नहीं, उनकी खुद गिनता का एक और कारण था । प्रशासनिक स्तर पर उन्होंने अनुशासनात्मक कार्रवाई पूरी कर ली थी । परंतु मानवीय दृष्टिकोण से नीलिमा की समस्या अनसुलझी रह गई थी । जैसे समाधान करें इस विकट समस्या का । यदि लिंगा स्वामी भी अविवाहित होता तो शायद वो से नीलिमा सिंह से विवाह करने के लिए मजबूर कर देते । उन्होंने सीमा से इस बारे में विचार विमर्श किया था । उसे सारा पैसा भी सुना दिया । उसे सुन सीमा बोली थी, ये तो सरासर मूर्खता और पागलपन है किसका दोनों का? अरे भाई बिहार के लिए बराबर स्तर चाहिए । दोनों को अविवाहित या फिर हमारी तरह विवाहित होना चाहिए । एक विवाहित, दूसरा विवाह ये तो एक दम ऐसा हुआ कि जैसे किसी सवारी में एक भैया साइकिल का हूँ और दूसरा ट्रैक्टर का । वो तो ठीक है पर अब लेनी बात सिंह का क्या होगा? उससे कहूँ कि वह संकट से मुक्ति वाले डॉक्टरों की राय से अब वो स्थिति नहीं रही है तो ठीक है । होते हैं वो अपनी मूर्खता का फल । हमारे ख्याल से समस्या का कोई समाधान नहीं । सिर्फ एक ही है वो किसी ऐसे उदार समाजसुधारक और स्वतंत्र विचार वाले आप विवाहित लडकी की तलाश करेंगे जो नीलिमा को इसको बाहर सहित स्वीकार कर ले । विचार तो तुम है पर मैं कहाँ से लाऊंगा? ऐसा लडका मेरे बस का नहीं ऐसे लडके को तलाशना फिर काहे को दुखी हो रहे हो । मारो गोली नीलिमा को वो जाने और उसके अभिभावक जा रहे हैं । सीमा ने व्यापारी ढंग से निर्णायक स्वर में कह दिया । इसराइल को ऊपर भेजकर प्रकाशचंद्र निश्चिंत हो गए परन्तु अंतर्मन की किसी कोने में लिलिमा की समस्या फांस बन गढी जा रही थी । अचानक उन्हें एक दिन इसका हल मिल गया । सुबह का व्यवस्था करीब ग्यारह बजे थे । उनको एक ग्रुप लिफाफा प्राप्त हुआ । प्रकाशचंद्र ने उसे खोला, अंदर से निकाला, पत्र पढा और उनकी भृकुटि चौदह रही तो उनका स्वयं का पीछे भी उन्होंने बजार दबाया और अर्जुन को अंदर बुलाया । उसे सामने बैठाकर वो बोले जो तुम ग्रेड चीज हो, जी साहब कब से नौकरी में हो? आप करीब छह साल हो गए नहीं अभी बच्चे हैं नहीं साहब, अभी तो हम खुद बच्चे हैं । आप अगर इजाजत हो तो एक शेयर्स करूँ । बकवास बंद करो छेड चीजें की बात ही मत करो । ये बच्चे नहीं है । अभी तो नौकरी फिक्र नहीं है । तो आप नौकरी पर कैसे सत्रह आ गया? प्रकाश इन्होंने उल्टे हाथ में पकडे कांग्रेस को दिखाकर का गिरा तुम्हारी मौत का परवाना बस मेरी कलम का एक तेज बार से तुम्हारी नौकरी खत्म । अंजुम गंभीर हो गया । वो समझ गया कि मामला गंभीर है । उसके मुख पर कविता की जगह निबंध ने ले ली । वो भयभीत और आतंकित साथ खून कर बोला हूँ । अब लगता है मामला कुछ टेडा है । ब्यूरो की रिपोर्ट मिली है कि तुम हमारे कुछ दुश्मनों के दूतावास सों में जाकर इधर की गुप्त सूचनाएं उधर देते रहते हो । इसके लिए तो मैं बिना जांच पडताल के संविधान की धारा तीन सौ ग्यारह के अंतर्गत दोनों नौकरी से निकाला जा सकता है । तब मैं एक बार गया जरूर, पर मैंने कोई गुप्चर ही नहीं किए होंगे । देवा प्रकाश उन्होंने कहा कर पूछा था इसी सांस्कृतिक भास्कर भी मौके पर वहाँ के दे जाने का निमंत्रण पत्र मिल जाए । सिर्फ इसीलिए या तो मैं नहीं मालूम । इस तरह का तुम्हारा वहाँ जाना सरकारी आदेशों का खुल्लम खुल्ला उल्लंघन है । वहाँ मैंने आदेशों के बारे में अनभिज्ञ था । कानूनों के बारे में ना जानकारी बचाव की कोई बढिया दलील नहीं है । अंजुम को पसीने आ गए । बडी कठिनाई से मेरी नौकरी उसे जाती नजर आएंगे । जब जब उसे नौकरी से निकाल दिया गया तो वो तो जिंदगी भर के लिए नाकाम हो जाएगा और कहीं सरकारी नौकरी के लिए अब उसकी उम्र नहीं गई है । वो दोनों हाथ जोडे । विनम्र और दैनिक स्वर में बोला साहब, इस बार बचा लीजिए । अब ऐसी गलती कभी नहीं करूंगा । प्रकाशचंद्र प्रचार मालूम हो गए । फिर अनायास जैसे उनके अंतर्मन में बिजली सी कौन गई? वो थोडे सहज बोलेगा । अभी कुछ देर पहले तुमने कहा था कि तुम अविवाहित हूँ जी साहब, इसमें भी मेरा कोई कसूर नहीं चाहते तो ये है कि कोई ढंग की लडकी मिली ही नहीं । अब अगर मिल जाए तो तो शादी करके उसे खिलाऊंगा कैसा? नौकरी तो जाने वाली है तो मान लोग मैं तुम्हारी नौकरी बचा लूँ और तुम से किसी लडकी से शादी करने के लिए कहूँ तो क्या? तो साहब मुझे सौदा मंजूर है । लडकी कैसी भी हो, लडकी कैसी भी हो, किसी भी ओसा चलेगी पर मेरी नौकरी वो नहीं जाएगी । पर अंजुम तुम लिलिमा से दिल्ली से अंजुम तिलमिलाकर बोला था । वो तो किसी का पास अन्जुम, उसे बात क्या कहते हो? कई बार पुरूष किसी विश्वास जी से विवाह करता है । मैं वहाँ के बच्चे होते हैं । क्या वे बच्चे उसके अपने नहीं हो जाते हैं या हूँ? बच्चा अभी अजन्मा है । सिर्फ इतना ही फर्क है । चाहता हूँ मुझे सोचने का समय मिलेगा जरूर । पर अंजुम मैं सिर्फ इतना ही कहूंगा कि ये बोलने का काम है । ठीक ऐसा । अब इन बातों में हम आपको कोई नहीं लाए तो ही अच्छा है । मैं कल तक आपको बता दूंगा । ठीक है । अंजुम चला गया तो प्रकाशचंद्र को खयाल आया । इस विषय में निलीमा से भी तो पूछना चाहिए । उन्होंने उसे भी बोला भेजा । उसे अंजुम के बारे में पूछा । उसने सहर्ष ये प्रस्ताव स्वीकार कर लिया । अगले दिन अंजुमने भी इस विवाह के लिए सहमती दे दी । प्रकाशचंद्र बेहद खुश थे । उन्होंने ऍम की समस्या का मानवीय आधार पर समाधान कर दिया था । पर उनकी खुशी अल्पजीवी थी । अभी वह इस विषय में सीमा को बदलाने के लिए इंटरकॉम का प्रयोग करने ही वाले थे कि उनके कमरे का दरवाजा खुला । उन्हें देख कर थोडा विस्मय हुआ कि बिना किसी पूर्व सूचना के श्रीमती काशीनाथ उनकी कमरे में आ गई है । वाई और कुर्सी पर बैठकर बोली थी राम प्रसाद वाली फाइल कहाँ है कौन नाम? प्रचार वही जो निलंबित पडा है । क्या करना है उस मोबाइल का? प्रकाशन में रिश्तों से पूछा जिसने अभी भी मुझे बुलाया था उनके पास शायद मंत्री के निजी सचिव का फोन आया था । वो तो आपसे कह कह कर थक गए हैं । हारकर उन्होंने संयुक्त सचिव को फोन किया । जी एस चाहते है कि मैं फाइल आपसे लेकर सीधे उन्हें भेज दूँ । संयुक्त सचिव मुझसे सीधे बात कर सकते थे या उनके आदेश मुझे आपके माध्यम से पहुंचेंगे । प्रकाश इन्होंने उखडकर कहा ये उनसे पूछे इस बारे में मैं कुछ नहीं कह सकती । मैं उनसे बात करूंगा अवश्य । आप पिछले दो दिनों से शायद दफ्तर नहीं आई थी । नहीं बिना किसी सूचना के ना छुट्टी की अर्जी, ना कोई फोन । मैंने अर्जी भेज दी थी । सीधे संयुक्त सचिव को आप मेरे नीचे काम करती है ना कि संयुक्त सचिव के । देखिए बेकार में बोर तो कीजिए नहीं । अगर फाइल देनी है तो दे दीजिए वरना वरना क्या मुझे तो थोडा देंगी । प्रकाशचंद्र बौखला गए । वो इस महिला से बेहद परेशान हो चुके थे । जरा जरा सी बात संयुक्त सचिव के पास पहुंचा देती है । श्रीमती काशीनाथ ने कोई उत्तर नहीं दिया । वो तमतमाकर खडी हो गई और घूरकर उन्हें देख वो तेजी से कमरे के बाहर निकल गयी । वो जानते थे अभी थोडी देर में उनके पास संयुक्त सचिव का संदेश आएगा । उसने सीधे वहाँ जाकर उनके विरोध खूब विश्व अमन क्या होगा? ठीक है करेंगे । इस बार वह भी उसकी संयुक्त सचिव के सामने कलई खोलकर रख देंगे । वो दफ्तर में कभी समय पर नहीं आती थी । बिना सूचना या अर्जी दिए वो हफ्ते में दो तीन दिन दफ्तर से गैर हाजिर रहती है तो वहाँ काम सुबह फाइलों पर दस्तखत के सिवा उसने कभी कुछ किया ही नहीं । जान तक संयुक्त सचिव ने उन्हें नहीं बुलाया । वो थोडा सकपकाए ये क्या हुआ अगला दिन । फिर उसके बाद एक और दिन कई दिन बीत गए, पर संयुक्त सचिव ने उन्हें नहीं बुलाया । इतना कुछ कहा ना । इस बीच श्रीमती काशीनाथ उनके पास आई यही नहीं उस महिला ने उनको फाइलें भेजना भी बंद कर दिया था । उन्होंने अनुभाग अधिकारी को बुलाकर पूछा तो पता चला कि श्रीमती काशीनाथ सारी फाइलें सीधे संयुक्त सचिव को भेज रही है । उनके स्तर को लांघकर वो तिलमिला गए और वह अवस्थी क्या करते हैं? अवश्य संयुक्त सचिव के निर्देश पर ही हो रहा है । ठीक है वहाँ करेंगे । उन्हें क्या काम फाइल आ रही है तो और भी अच्छा है । उन्हें फुर्सत ही फोर थी । सीमा के साथ और ज्यादा समय बिताने का अवसर मिल रहा था । जल्दी प्रकाशचंद्र कोई दफ्तर य, संकटपूर्ण मॉन्स, खनने लडा । एक सप्ताह तक ऊपर का कोई अवसर ना बुलाये । इतना संयुक्त सचिव ना सचिव एकदम ऐसा महसूस होता है जैसे उन्हें देश निकाला दे दिया गया है । बहुत हुआ शक्ति की मुख्यधारा से कट कर वो एक नाम शक्तिहीन अस्तित्व जी रहे हैं । ये सब पता ज्यादा दिन नहीं चली । एक दिन वो सुबह दफ्तर पहुंचे तो पाया उनकी कुर्सी पर श्रीमती काशीनाथ विराजमान है । उनका खून खौल गया । वो अपनी कुर्सी के पास पहुंचे तो अभी वो बैठी रही । वो तमतमाए तो श्रीमती काशीराज मुस्कुराई । आज के इशारे सोने सामने पडी कुर्सी पर बैठने को कहा और बोली शायद कल दोपहर बाद आप श्रीमती लाल के साथ फिल्म देखने चले गए थे । यह क्या बदतमीजी? श्री मति काशीनाथ बत्तमीजी आपको एक महीना से बात करने की भी तमिल नहीं । आप मेरे कमरे से जा सकते हैं । श्रीमती काशीनाथ फॅार कहा ये काम राहत का है । आपको दफ्तर में बनाने से फुर्सत नहीं । फिर कैसे पता चलेगी दफ्तर में क्या हो रहा हैं? प्रकाशचंद्र को महसूस हुआ जैसे कुछ घटेगा घट गया है । पता है वो थोडे नरम होकर बोले की आपकी पदोन्नति हो गई है । संयुक्त सचिव से जाकर पूछे पैसे कल शाम को ये आदेश जारी हो गए थे । श्रीमती काशी नाते एक परिपत्र उनकी तरफ फेकते हुए कहूँ उन्होंने कहाँ से हाथों से वो आदेश पकड लिया धोते हिरदय से उसे पढा था उनका अनुमान सही था । श्रीमती काशीनाथ की पदोन्नति कर उप सचिव प्रशासन नियुक्त किया गया था । उन्हें उप सचिव सामान्य प्रशासन लगाया गया था । उनका ये संयंत्र निश्चित रूप से एक दम था । उनको एक महत्वपूर्ण पद से हटाकर एकदम व्यर्थ और महत्वहीन पद पर लगा दिया गया था । अपने वर्तमान पद पर वह दफ्तर के एक शक्तिशाली व्यक्ति माने जाते थे । डॉक्टर के समझ कर्मचारियों की समस् कार्मिक समस्याएँ उनके पास ही है । अवसर और कर्मचारी उनके कमरे के बाहर पंक्ति लागर खडे रहते थे । हर कोई सिफारिश लेकर आता हूँ । वो जो चाहते वही होता । लोगों ने मानते थे । चपरासी से लेकर मंत्री के साफ तक सब में उनकी प्रतिष्ठा थी । अब एकदम ऐसा ही हो गया था जैसे किसी मंत्री को मंत्रिमंडल से निकाल दिया गया हूँ । कुर्सी थी पर असली कुर्सी छीन चुकी थी । प्रकाशचंद्र खडे हो गए । उदास दुखी, निराश शिंदे और अपनाने थे । श्रीमती काशीनाथ को पदोन्नति की बधाई दें । वो मारी छल से आपने पर आए हुए कमरे से बाहर आ गए । पिटे हुए से वो सीधे यंत्रवत संयुक्त सचिव के कमरे में पहुंच गए । संयोग वर्ष उस समय उनके कमरे के बाहर हरी बत्ती चल रही थी । अंदर पहुंचकर उन्होंने कुर्सी पर बैठ एकदम सीधे सीधे पूछ लिया हूँ । मुझे किस बात के लिए सजा दी गई है? सजा कैसी सजा? क्या एक सीट से दूसरी सीट पर बदलना सजा है? क्या तुम्हारा वेतन या पर कम हो गया है? संयुक्त सचिव ने रोष से पूछा जहाँ मुझे पलभर में महत्वहीन बना दिया गया है । आखिर क्यों? ये ठीक है कि श्रीमती काशीनाथ ने आईएस में आठ वर्ष पूरे कर लिए थे और वह पदोन्नति पाने की अधिकारिणी थी परंतु मुझे क्यों हटा दिया गया? उत्तेजित हो प्रकाशचंद्र ने पूछा सचिव बेहद नाराज है तो मैं भी तमीज भी नहीं की । आपने अधीनस् काम करने वाली महिलाओं से कैसा व्यवहार किया जाता है? तब वो अनुशासनहीनता पर प्रकाशचंद्र हो । तुम अनुशासनहीनता की बात करते हो । संयुक्त सचिव ने बिगाड कर रहा हूँ । फिर वो तेजी से बोले नीचे वालों को अनुशासित करने के लिए पहले स्वयं को अनुशासन के बंधन में बांधना होता है । जब मर्जी आया दफ्तर से चले गए, बैठा का झूठ भरा बना दिया । पहले है कि बस पडी हुई है । सचिव कहेगा मंत्री का विशेष आया, कोई असर नहीं कहीं इस तरह उप सचिव के स्तर पर काम चलता है । फिर पूछते हैं कि मुझे किस को दूर की सजा दी जा रही है । प्रकाशचंद्र निरुत्तर हो गए । वो पिटे और पराजित से बैठे रहे । मैं नहीं समझता इस साल सचिव तुम्हारे कोई खास अच्छी रिपोर्ट देंगे । संयुक्त सचिव ने एक और है उद्घाटन कर दिया हूँ ।

भाग - 13

प्रकाशचन्द्र खडे हो गए । अब कहने सुनने को शेष ही किया था । जाने से पहले वो सिर्फ इतना ही कह पाए साहब, यदि मुझे कोई गलती हुई हो तो मैं क्षमा मानता हूँ । पर मैं इतना जरूर कहूंगा । मेरी मामूली बातों को बहुत बढा चढाकर पेश किया गया है तो हमारी नियत पर शक है । हमारे विवेक पर संदेह है । प्रकाश इन्होंने इन प्रश्नों को निरुत्तर छोड दिया । वो संयुक्त सचिव के कमरे से बाहर आए तो अचानक गलियारे में सीमा से भेंट हो गई । उसे देखते ही वो कमाल की तरह खेल गए । पल भर कोने लगा था कि जो कुछ संयुक्त सचिव ने कहा उसमें दम था । गैर जिम्मेदार नीचे के कर्मचारियों की तरह तो व्यवहार करने लगे थे । पायलों के निपटाने के साथ मौज मस्ती ये सब था और पता नहीं बीमारी उन पर ऐसा क्या जादू कर दिया था । सीमा का सामना होते ही वो बस इस अपराध भावना, कुल गिनता, अंतर्मन में होने वाली हूँ । आपका गला घोट देते हैं । चुना है तुम को बदल दिया है । सीमा ने बेहद फॅार में कहा तो मैं ठीक सोना है । प्रकाश इन्होंने कहा होने लगा नहीं । उनके महत्वहीन होते ही सीमा के व्यवहार में बदलाव ना आ जाए । चलो अच्छा हुआ, इसमें अच्छा क्या हुआ? एकदम व्यर्थ, निरर्थक और महत्वहीन सीट है प्रकाश । इन्होंने मारे स्वर में कहा तो क्या हुआ? ये क्यों नहीं सोचते हैं कि लाइक सीट पर दिन भर में कुल दो घंटे ज्यादा काम नहीं है । इतनी हल्की सीट मिली है और आप जनाब शोक मना रहे । प्रकाशचंद्र विचारमग्न हो गए । इस दृष्टि से अभी तक उन्होंने सोचा ही नहीं था क्या सीमा ठीक कह रही थी इस नई सीट पर तो फुर्सत फुर्सत होगी । बीमा के साथ मौज मस्ती मारने का खूब मौका मिलेगा । इस विचार से उन्हें थोडी शांति मिली । वे दोनों गलियारे से होते हुए सीढियां उतर नीचे आ गए । सीमा ने पूछा एक कप कॉफी चलेगी, अभी नहीं । नए सहयोग सचिव से मिलूँ । नया चार देकर मैं अपने नए कमरे में बोला होगा । ठीक है सीमा चली गई । प्रकाशचंद्र अपना एक कमरे में आ गए । पूरे दफ्तर में उनके साथ अंदर की खबर फैल चुकी थी । उनको अपने महत्वहीन होने का तत्काल आवाज भी हो गया था । जब वो प्रशासन को देखते थे तो उन के गलियारे से गुजरते समय कमरे के बाहर कुर्सियों पर बैठे चपरासी और गलियारों में गुजरते कर्मचारी उन्हें सलाम ठोकते थे । पर अब अंजान और अजनबी से पूरी इमारत का चक्कर लगाते थे । पर कोई भी उनका िवादन नहीं करता था । यू बात मामूली थी पर ये उनके स्वाभिमान को आहत कर देती थी । पिंकी के जन्मदिन की पार्टी में प्रकाशचंद्र को बडी असुविधा महसूस हो रही थी । सीमा ने सिर्फ पडोस के बच्चों को भी निमंत्रित किया था । बडो में तो बस केवल वो और नहीं थे । थोडी गर्व और हो गई । दोनों बच्चे नहीं आए थे । पता नहीं विवेक को क्या हुआ था । वो छह बजे तक अपनी कंपनी से नहीं लौटा था । प्रकाश उन्होंने माला से पिंकी की जन्मदिन की पार्टी में चलने को कहा तो उसे साफ मना कर दिया । प्रकाशन उन्हें माला से चलने की जिद की तो इस पर भी उस से साफ इंकार कर दिया । उन्होंने कारण पूछा तो उसने कह दिया कि पिंकी उसे आयु में छोटी है और वहाँ पार्टी में उसकी आयु समूह का कोई बच्चा नहीं होगा । इसलिए वहाँ जाकर ये उसमें बोर होने से क्या फायदा । स्लिमिंग विशेष आग्रह नहीं किया किन्तु जब प्रकाश और निमी सीमा के यहाँ पहुंचे तो पहली शिकायत यही हुई कि बच्चों को क्यों नहीं लाए । स्पष्टीकरण देने के बावजूद सीमा संतोष नहीं हुई हैं । पार्टी हुई जी माने निधि को गर्वपूर्ण सम्मान दिया । उसी के माध्यम से थिंकिंग आॅफ पहला टुकडा भी उसी के मुंह में डाला गया । बच्चे खा भी घर चले गए । जब वे लोग अकेले रह गए तो दुनिया जहाँ की बातों के बीच एक अप्रिय प्रसंग छह गया । खिलाडियों का उसी दिन सुबह बार में एक समाचार छपा था की एक सम्मान महिला कनॉट प्लेस ही दुकान से साढे छोडी करती पकडी गई । समाचार की शल्यक्रिया के बीच प्रकाशचंद्र की चोरी भी पकडने आ गई । यह विचित्र संयोग ही था कि उस दिन निर्मला ने वही रेशमी साडी पहनी थी जो प्रकाशचंद्र उसके लिए मैसूर से लाए थे और सीमा भी वही साडी पहने हुए थी जो प्रकाश इन्होंने बंगलौर के दौरे में उसे उपहार स्वरूप दी थी और ये खूबसूरत साडी है । निर्मला ने सीमा की साडी को गौर से देखते हुए कहा । फिर उन्होंने पूछा कहाँ से खरीदी सीमा अचकचा आई । उसकी समझ में नहीं आया कि वह क्या उत्तर देंगे तो अभी लालसा देश में टपक पडे । मैसूर से खरीदी थी । उन्होंने चार सौ का चूना लग गया । आप लोग एलटीसी पर मसूर गए थे । निर्मला ने यूँ ही निरर्थक सा प्रश्न पूछ लिया । आज ही नहीं हमारी मेम साहब एक कोर्स करने बेंगलोर गयी थी । वो अच्छा छह दूसरी कोर्स में गई होंगी जिसमें मेरे पति गए थे । निर्मला के मुझसे अचानक निकल गया । अच्छा तो प्रकाश भी इस उम्र में ट्रेनिंग लेने गए थे । लाल सामने घोर आश्चर्य से टिप्पणी जल्दी तीनों प्रकाशचंद्र का मूंग पीला पड गया । दोनों की चोर निगाहें टकराई और फिर से सहज होने का प्रयास करने लगे । प्रकाशचन्द्र के मन में तो सिर्फ एक ही विचार था कितने ही जतन कर लोग इस तरह की चोरी और छिपकर किया गया काम कभी ना कभी उजागर हो ही जाता है । उधर निर्मला और लाल भी अपने अपने स्तर पर न जा रहे, क्या सोच रहे थे? घोषणा होता दोनों उदास रहे । अंदर धन जावा चलता रहा, परंतु शीघ्र ही वे सामान्य और सहज होने का नाटक करने लगे । रात्रि भोज खत्म हुआ । प्रकाश इन्होंने सीमा और लाल की भूरी भूरी प्रशंसा की । उनकी मेहमानदारी की । फिर मैं उनसे विदा ले चल दिए । कार में कई मिंटों पर बडा तनावपूर्ण माहौल रहा । एक विचित्र सी स्तब्धता, चुप्पी कसम साथ ऐसा माहौल फिर अनायास निर्मला ने छुट्टी का तिलस्म तो डाला और बोली क्या आपको क्या होता जा रहा है? मुझे क्या हो रहा है? प्रकाशन बुरी तरह छोड पडे । क्या मुझे ये भी बताना होगा अपना देश टटोलकर देखिए प्रकाशचंद्र सबको समझ गए थे । परंतु इस अप्रिय प्रसंग को हाथ वहाँ समाप्त करने और मामले को तूल न देने की खातिर उन्होंने हास परिहास के असर का प्रयोग शुरू कर दिया । एक हाथ से स्टीयरिंग थाने और दूसरे से अपने सीने पर बाई तरफ कुछ टटोलकर बोले भाई इधर तो कुछ नहीं है । सिर्फ तो मैं छोड कर मुझे जो उतने अच्छे नहीं लगते । निर्मला ने उन्हें छोड दिया । प्रकाश इन्होंने एक और प्रयास किया । उन्होंने अपने बाएं हाथ को निर्मला की गर्दन में डाल उसे अपनी तरफ घसीट आलिंगनबद्ध करना चाहता हूँ तू निर्मला छिडककर परे खिसक गई और उन्हें डांटते हुए बोली ये क्या स्कूल के छोड दो की तरह हरकतें करने लगे । सडक पर हो या अपनी बैठक में प्रकाशचन्द्र सबको समझ गए । आज काफी गहराई तक निर्मला हाथ हुई थी । वो मैसूर वाली सूचना से उत्पन्न धक्के को बर्दाश्त नहीं कर पाई है । वो माल ये पहलू से सोचने पर मजबूर हो गए । खास परिहास से नहीं, गंभीरतापूर्वक निधि को आश्वस्त करना पडेगा अन्यथा नहीं का ये बारूद उनके सुखी पारिवारिक जीवन को ध्वस्त कर के रख देगा । क्या बात है नहीं तो तुम कुछ परेशान नजर आ रही हो था । मैं परेशान हासिल बात क्या है? मैं पूछती हूँ आपको होता क्या जा रहा है? मैंने क्या किया है? मुझे लगता है हमारे तुम्हारे बीच कुछ पराया बनाया गया है । ऐसी बात नहीं करती हो । मैं ठीक कह रही हूँ आपने । वो पहली जैसी बात नहीं रही ना, वो स्पष्ट न सच्चाई नहीं । ईमानदारी खुलापन मुझे तो ये लगने लगा है जैसे आप बढ गए हो, विभाजित होते जा रहे हो । नहीं नहीं ये तुम क्या कह रहे हो? देखिए आप देखा की बहसों कीजिए मत । जैसे मैंने पहले कहा आप से हम अपने आप से पूछे क्या आप जो कुछ कर रहें हो? ठीक है मैं कुछ भी तो नहीं कर रहा हूँ । फिर ठीक है बात खत्म । कार के अंदर मोहन छा गया लेकिन तब तक घर भी पहुंच गए । पहले निर्मला उतरी और उदासी अंदर घर में चली गई । प्रकाशचन्द्र कार को गैराज में रखकर अंदर गए तो देखा माला बुरी तरह तो खडी खडी है और नियमित चिट्ठी पडने में खोई हुई है । मैंने कहा है प्रकाश । उन्होंने माला से पूछा अभी तक नहीं आया । कोई सूचना नहीं प्रकाशचन्द्र । थोडे चिंतित हुए । फिर उन्होंने पूछा कोई फोन नहीं । तब तक निर्मला ने वो चिट्ठी पर डाली । उसका मूड तमतमा गया । आंखों में क्रोध की ज्वाला धधक उठी । किसकी चिट्ठी है हवाई प्रकाश? उन्होंने पूछा अब ये घंटा पहले एक गुमनाम इंसान दे दिया था । माला ने ठंडे स्वर में कहा क्या लिखा है प्रकाश? उन्होंने उत्सुकतापूर्वक पूछा । आप के काले कारनामों का पर्दाफाश किया किसी ने? निर्मला ने उबलते हुए कहा । ये तो क्या कह रही होने में प्रकाश इन्होंने उलझकर पूछा । लोग हूॅं दादे सफेद कागज पर एक संक्षिप्त सा पत्र लिखने वाला था । कोई आपका शुभचिंतक संबोधित था? प्रिया निर्मला जी लिखा था, मैं आपकी सूचना के निवेदन करना चाहता हूँ । यहाँ अपने पति पर अंकुश रखिए वरना इनसे हाथ धो बैठेंगे । आजकल ये दफ्तर में जमकर राज लिया । बचाए हुए हैं । एक भी ऐसी छोड ही नहीं है जो उनकी लोलुपता और वासना का शिकार न हो चुकी होगी । अच्छा एक खास है जो इनके दिल की रानी बन चुकी है । उसे लेकर तो बैंगलोर मैसूर की शहर भी कर आए हैं । यहाँ दिल्ली में अक्सर आए दिन उसे लेकर दफ्तर से गोल हो जाते है । न जाने कहाँ कहाँ जाते और क्या करते हैं । इनकी नहीं । हरकतों की वजह से इनका तबादला हो गया है । मैं आपको इनकी गतिविधियों के बारे में बताता रहूँगा । प्रकाश उन्होंने पत्र बडा और उनके माथे पर पसीने की बूंदें उभर आई । टांगे काम नहीं लगी । देर थोडा उतने लगा ये कमीनापन किसने किया है । कोई भी हो सकता है । राम प्रसाद लेंगा । स्वामी जान जून या फिर कोई और वो पत्र पढ चुके थे । दिन तो उनकी आंखें अभी भी उसी से चिपकी हुई थी । पर लिया निर्मला ने थोडे ऊंचे स्वर में पूछा और लिया जय का । प्रकाशचंद्र ने अंदर के बिखराव को समेटा और थोडी शक्ति जुटा दृढतापूर्वक कहा ये डॉक्टर में किसी आदमी की शरारत है । ये सब आधार ही है । पिताजी बिना हुआ नहीं उठता हूँ । माला न जाने किस रूप में आकर कह गई माला तो मेरे को मत बोलो जाओ । अपने कमरे में निर्माण से आदेश दिया मना चली गई । ये साफ था कि वो काफी बिगडी हुई थी । हमारे ख्याल से इस गुमनाम खत में जो कुछ लिखा है वो सब आधार ही है । निर्मला ने पूछा हाँ ये मुझे तंग और परेशान करने के लिए लिखा गया है । मैं जानता हूँ । जवाब दफ्तर में पांच सौ व्यक्तियों की सेवा शर्तों की देखभाल करते हैं । कोई ना कोई कहीं ना कहीं अवश्य नाराज हो जाता है और इसका ये मतलब नहीं कि इस तरह निष्ठा की निकृष्टतम सीमा तक उधर कर क्या आपका तबादला नहीं हुआ है? निर्मला ने पूछा हूँ वो तो हुआ है और उसका कारण था करन की बात छोडिये ये बताइए ये तथ्य सचिन छोड प्रकाश उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया जाए । तब भी गलत है कि आप और सीमा एक साथ बैंगलोर, मैसूर कैसे प्रकाशचंद्र इस पर भी मौन रहे । क्या ये भी गलत सूचना है कि आप सीमा दफ्तर के समय में बाहर घूमते फिरते हैं । ये सरासर गलत और शरण भरा प्रचार है सिर्फ मेरे सुखी पारिवारिक जीवन को भस्म करने के लिए । पर विवेक ने आप दोनों को ऍम उसमें देखा था । सिर्फ एक बार देखिए, पूरी देखी को छोडने की जरूरत नहीं, चावल पडते हैं । नहीं, इसे जांचने अगले सिर्फ एक या दो चावल । काफी मम्मी तुम कहना क्या जाती हो? मैं क्या कहूं तो खुद बोल रहे हैं तो तुम्हारे ख्याल से मैं नहीं सोचती थी । इस उम्र में इतने बडे बच्चों के सामने आप ऐसा करेंगे । कल तक विदेश से मैं नहीं मिला पाती थी । आज माला भी और निर्मला की आंखों में आंसू आ गए । वो तेजी से अपने कमरे में गए और कटे हुए वरिष्ठ के सवाल पलंग पर गिर पडी । लिख और निष्क्रिय से प्रकाशन अपने कमरे में पहुंचे । निर्मला पालन पर पडी सुबह खाई थी । एक तो सीमा के घर की चोट । फिर इस गुमनाम पत्र की माँ इस समय वो कुछ नहीं कर सकते हैं । जिस बात का उन्हें डर था वो हो चुकी थी । जिन पति व्यवसाई संबंधों को वो गुपचुप रखना चाहते थे वो उजागर हो चुके थे । उनके संबंधों में दरार उत्पन्न कर चुके थे । नहीं ये सब गलत हुआ है । उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था । किस भावना से प्रेरित हो वो इस अंधेरे में जा गिरे । उन्हें किस बात का भाव था । पद, प्रतिष्ठा, पैसा । पत्नी सब कुछ तो था उनके पास । मम्मी ने उन्हें किस चीज का भाव होने दिया । फिर उन्होंने उसके साथ ही विश्वास था क्यों किया उन के अंदर में पश्चताप की तेज आज झुलसी उनका सब कुछ जलकर फंस होने लगा । अग्नि की ज्वाला को बुझाने के लिए कि नहीं पानी शीतल जल चाहिए । वो पलंग की पार्टी पर बैठ गए ही पडी । निर्मला की पीठ पर उन्होंने हाथ रखा तो वैसे चौकी जैसे किसी गर्म लोहे का स्पर्श कर दिया हो । उन्होंने बिहार का दबाव बढा दिया तो लगभग चीज बडी मुझे मच हुई है । नहीं मुझे जमा कर दो । निर्मला ने कोई उत्तर नहीं दिया । देखो मेरा दिल खबर आ रहा है । वो एक अभी तक नहीं लौटा है । दस से ऊपर हो रहे हैं । घबराने की क्या बात है? जैसे बात पैसे बेटे वो भी किसी छोड के साथ मुझे उडा रहा होगा । ये तुम क्या कह रही है? नहीं क्या सचमुच? अरे जब थोडा बात थोडी थोडी लाला गांधी का आवाज चौरीधार कर रहा है तो लडका तो अभी जवान हुआ है । निर्मला का आक्रमण जारी था । प्रतिवाद या प्रतिकर आग में घी का काम करता निर्मला के तानों ने उनका कलेजा छलनी कर दिया था । फिर भी वो साहसपूर्वक सबकुछ सहते चले गए । पर वो की तरफ से सच मुझे चिंतित होने लगे थे । सुबह दस बज रहे थे । ये पहला मौका था जब भी वो बिना पूर्व सूचना कितनी देर तक घर से बाहर आया था । प्रकाश इन्होंने माला से पूछने का फैसला किया ही था की घंटी बजी वो लपक कर दरवाजे बढ गए । उसे खोला सामने सकुशल विवेक को खडा देखकर उनकी जान में जान आ गई । वो खुशी और रोज की मिलीजुली अनुभूति से प्रेरित हो चुकी है । कहाँ चले गए थे ये वक्त घर पर लौटने का तुम्हें तुम्हारी जानी निकाल दी । ऍम घर के अंदर आया । दरवाजा बंद कर के वहाँ के कमरे की चौखट पर पहुंचकर छोटा गया । उसने पिता के प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं दिया । हाँ, विवेक नेमा को पलंग पर लेटे सुबह से देख घोर आश्चर्य से आवाज भी । फिर वो उनके पास जाकर उनसे लिपट कर बोला ना मुझे माफ कर दो क्या तो मेरी वजह से नहीं बेटा, तुम जाओ कपडे बदलकर माला से खाना ले लो । थॉट किसमें रखा है? मालूम हो तो मैं इस समय अपने कमरे में जाऊं । वहाँ का आदेश सोना विवेक तानकर खडा हो गया । उसने घूरकर पिता को देखा । फिर उसने पूछा था

भाग - 14

कि आप से झगडा हुआ था । प्रकाश उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया । कोशर तक मौन खडे रहने के बाद उन्होंने तन तना कर पूछा कितनी देर कहाँ गए थे अपने दोस्त के साथ पिक्चर देखने चला गया था । घोषणा तो दे सकते थे । फोन किया था तो घर पर घंटी बजती रही । किसी अन्य उठाया क्या करता? फिर क्यों झूठ बोलते हो? प्रयास प्रकाशचन्द्र के मुंह से निकल गया पिताजी मैं आपकी तरह बेकार झूठ बोलने विश्वास नहीं करता क्या कर विवेक तेजी से कमरे के बाहर चला गया । प्रकाशन अपना गांव चलाते रह गए । बेटी ने कितना कसकर तमाचा मारा था उनके गाल पर उनकी संपूर्ण सत्ता को भी उखाड फेंका था । उनके अपने अंश नहीं छटपटाया और फिल्म वाला इसे प्रकाश इन्होंने कपडे उतारे और रात्रि की पोशाक पहनकर बत्ती बंद कर वो भी पलंग पर पड गए । एक घोर नीरवता छा गई थी उन के अंदर और बाहर । अगले दस बारह मिनट में घर की सारी बत्तियां हो गई तो इसका मतलब था कि विवेक ने खाना नहीं खाया था । उन का अंतर कैसा गया? इधर उनका पालन युद्धक्षेत्र बन गया था । उनके सीधे हाथ में पूरे पलंग की यात्रा कर डाली थी । पर निर्मला का कहीं बताना था तो इसका मतलब था कि वह भी शत्रुपक्ष की तरह छोडे । क्यों विराम कर दूसरे सिरे पर पहुंच गई थी ये सब क्या हो गया? प्रकाश उन्होंने एकदम तटस् और निर्विकार भाव से पूरे तीस पर एक विहंगम दृष्टि डाली और पाया की उन्होंने अपने पूर्ण जीवन को स्वयं ही ध्वस्त कर डाला है । सीमा के आगमन के साथ ही उनके पद प्रतिष्ठा की गरिमा समाप्त हो गई है । पत्नी का रोना माला का आरोप, विवेका प्रत्याक्रमण दफ्तर में अफसरों की डांट और कर्मचारियों की असंतुष्टि पर क्षेत्र में ही वह मात खा रहे थे । ये सब किस लिए सीमा का सामने पे सुख आखिर किस कीमत पर नहीं ये सब गलत है । वो दो देंगे काम और वासना का ये मोहजाल और जमकर पुनर्निर्माण में जुड जाएंगे । इस तरह मलेशिया के साथ ही प्रकाशचंद्र को महसूस हुआ जैसे उनमें नई शक्ति और साहस का संचार हो गया है । वो निर्मला की तरफ इसके पालन के अंतिम छोडकर उन्हें ये देख कर बेहद आश्चर्य हुआ कि पलंग पर वह अकेले हैं । अंधकार में निर्मला कहाँ हो गई मूल है परेशान से पडे रहे उठकर उसे तलाशने का वह साहस नहीं जुटा पाए । समय बीतता गया । तीव्रगति से एकदम पर्वर्तीय निर्झर की भांति घर और बाहर दोनों स्थानों पर प्रकाशचंद्र निर्वासित हो चुके थे । घर में झगडे वाली रात को निमी उनके पलंग से उतर कर बच्चों के कमरे में पहुंच गई थी । तब से वो अलगाव और अकेलेपन का अभिशाप भोग रहे थे । उन्होंने महसूस किया था जैसे वे तीनों आपने एकदम पराये हो चुके हैं । पहले वाले घर और अब के घर में कितना भयंकर परिवर्तन आ चुका था । पहले प्रेम, सुख, शांति, सौमिता और एक जाती और अब घृणा अलगाववा । शांति और संदेह से विषाक्त माहौल था और बाहर विशेष रूप से दफ्तर में वो मैं महीनता की विभीषिका को जी रहे थे । नई सीट में ना कोई काम था, ना कोई प्रतिष्ठा । कोई कुछ नहीं पूछता था । इतना कोई सिफारिश लेकर आता, ना कोई कुछ अधिकारी बुलाता । इस उपेक्षा के साथ ही साथ उन्हें ऐसा डर नहीं मिला था जिसकी उन्होंने कभी कल्पना तक नहीं की थी । वो ऐसी अपमानजनक स्थिति थी जिसके लिए वह स्वयं ही जिम्मेदार थे । संपूर्ण सरकारी कार्यालयों में केंद्रीय आधार पर जो वार्षिक उप सचिव से निर्देशक तक की पदोन्नति की सूची बनती है, उसमें से उनके सभास् मित्र थे, परंतु उनका नाम आया था जो व्यक्ति अवर सचिव से उप सचिव विशेष श्रेणी में आया हो । वही उप सचिव से निदेशक पद के आयोग्य सिद्ध हो चुका था । प्रकाशचन्द्र की आंखों में पास हुआ गए थे । उन का अंतर कैसा गया था । जो सजा उन्हें लिमि से घर में मिली थी । ये उससे कहीं ज्यादा गंभीर और याद आया था । कई दिनों और रात होता वो सोना सके ना ठीक से खा पी सके । एक दिन सुबह के समय उन्होंने गौर से वो बेसन के ऊपर लगे शीशे में अपने चेहरे को देखा । घेरो बाल सफेद हो गए थे । आंखों के नीचे काले धब्बे उभर आए थे, गर्दन और गले में छोड दिया उत्पन्न हो गई थी और आंखों में पीडा, मिश्रत, गहन उदासी डेरा डाल चुकी थी । ये गजब कैसे हुआ तो कौन जिम्मेदार उनकी इस दुर्दशा के लिए चार सीमा या वो खुद संयुक्त सचिव तथा सचिव ने उनकी छोटी मोटी भूल चुके के लिए जमा नहीं किया । पिछले वर्ष की गोद में रिपोर्ट में अवश्य कोई ऐसी बात लिख दी होगी जिसकी वजह से विभागीय पदोन्नति समिति ने उन्हें पदोन्नति के लिए अयोग्य और अक्षम करार दे दिया । यदि दफ्तर में उन्हें जमा नहीं किया गया तो घर में किसने कर दिया था । वो बेहद उदास चिंतित और परेशान रहे । ना खाना पीना, न सोना । किसी ने घोषणा पूछा उन्हें तो नहीं पर आश्चर्य होता था । जिस महिला के लिए उन्होंने अपनी जान को होम कर दिया, अपना सर्वस्व उस पर न्योछावर कर दिया था । वही ऐसा बोला कर बैठी थी । एक बार भी उसने उनसे कभी नहीं पूछा हूँ कि आज तो दास की हूँ या फिर आज आपने ठीक से खाना क्यों नहीं खाया । पहले किसी दिन यदि वो रोज के मुकाबले में अगर आदि चपाती कम खाते थे तो नाम भी सारा घर से पर उठा लेती थी । क्या बात है तब तो ठीक है, पूरा खाना क्यों नहीं खाया हूँ । ठीक है उन से गलती हुई । इस गलती के लिए वह प्रायश्चित कर रहे हैं । इसीलिए काफी दिनों से उन्होंने सीमा से अपने आप को दूर रखा । उन्होंने उसे यह आभास नहीं होने दिया कि वह से कतरा रहे हैं । हाँ, व्यस्तता या फिर कोई और बहाना बनाकर वो सीमा से दफ्तर के बाहर नहीं मिले लाये । उसके घर गए । दो चार बार उसके साथ दफ्तर में काफी जरूर बस ऊपर होता और बनाने की प्रक्रिया से गुजरते रहे । उन्हें निर्माण की ओर अग्रसर हो रहे थे । इस व्यवस्था में उन्हें निर्मला के भावनात्मक और मानसिक सहारे की आवश्यकता थी । उन्हें उसे सहजतापूर्वक व्यवहार की आशा थी और घर पर उन्हें एक ठंडी उपेक्षा और एक आमानवीय अवमानना का सामना करना पडता था । उनके समझ में नहीं आ रहा था कि उस जरूर चौराहे पर खडे वो किस दिशा में चले जाए । क्या सीमा तक उनकी अपमानजनक स्थिति की सूचना पहुंच गई थी । उनके पास आई थी एक ठंडी बासंती बिहार का झुमका बनकर उनके सर्वस को शांति, सहानुभूति और आप नेता से सराबोर करने के लिए आते ही उसने पूछा जो कुछ मैंने सुना है कि अब ठीक है? प्रकाश इन्होंने बेहद उदास और अपने स्वर में कहा ये सब कैसे हुआ? जो व्यक्ति अतिकुशल माना जाता था वो अचानक सहयोगी कैसे हो गया? यही नाटक होते हैं हमारी व्यवस्था में हम लोग बंधुआ मजदूरों से कौन से काम है? जरा मालिक लोग नाराज हुए नहीं के बस तुम्हारा बंटाता या आप की अयोग्यता तथा दक्षिण परवाह नहीं । इस व्यवस्था और उच्च अधिकारियों के एकांगी दृष्टिकोण का परिचायक है आप चिंता मत कीजिए । सीमा तुम चिंता की बात करती हूँ । मैं कहता हूँ ऐसी अपमानजनक स्थिति है जिससे उबर पाना संभव है । सारे दफ्तरों में मेरी योगिता और आप कुशलता की चर्चा हो रही है । कुछ लोग मेरी इस सफलता के साथ तुम्हारा नाम भी जोड रहे हैं । प्रकाश उन्होंने साहस जुटाकर कह दिया हूँ, मुझे इसकी चिंता नहीं हूँ । जब आप ऐसा सोचते हैं, दो बार दूसरी है । नहीं । मेरा जो भी हो मेरे साथ अन्याय हुआ है । आप इसके विरुद्ध प्रतिवेदन क्यों नहीं देते? क्या लाभ प्रकाशचन्द्र के होठों पर एक थी । किसी मुस्कान उम्र ही लाभ क्यों नहीं होगा? जो अन्याय कर रहे हैं वही मेरे प्रतिवेदन पर विचार करेंगे । ऐसी स्थिति में न्याय की आशा की जा सकती है । आप मंत्री को ले किए वो भी तो उस निर्णय प्रक्रिया में शामिल है । सीमा ने गंभीरतापूर्वक पूछा फिर क्या इस वर्ष बॉस को थोडा अतिरिक्त मक्खन लगाना पडेगा तब जाकर अच्छी रिपोर्ट मिलेगी । का मतलब है अब अगले साल ही नंबर आएगा । उन्हें विचार की कोई संभावना नहीं । तब को संभव है बशर्ते कि किसी प्रभावशाली व्यक्ति का आपको संरक्षण मिल जाए । पर अपने दो सब शत्रु हैं । आजकल मंत्री के विशेष सहायक से लेकर संयुक्त सचिव तक ठीक है । जो बोया वही काटेंगे । प्रकाशचन्द्र के स्वर में गहन पीडा थी । छोडिये नौकरी में तो ऐसी घटनाएं दुर्घटनाएं चलती रहती है । सब ठीक हो जाएगा । क्या इस हमने कॉफी भी गोल कर जाएंगे, वहाँ नहीं जमा करना । मुझे खयाल ही नहीं रहा । तयकर प्रकाशचंद्र घंटी बजाई । एक बार दो बार तीन बार पर चपरासी नहीं आया । उन्होंने बजट दिया उधर से कोई उत्तर नहीं । थोडे थोडे अंतराल से वो घंटी और बजट बजाते रहे । ना चपरासी था ना आप । ये निराश होकर वो बोले ये हालत है सीमा हम सब की हालत है न चपरासी का पता रहता है मैं पीछे का पहले तो ऐसा नहीं था । वो इसलिए था कि तबाह प्रशासन के मालिक थे । इस पद पर तो कोई भी नहीं पूछता । कुछ दिनों तक गुमनामी भी अच्छी लगती है । प्रकाश इन्होंने सामने में इस पर शीशे के नीचे लगे मंत्रालय के फोन चार्ज को पढा कॉफीहाउस का नंबर देखा और फिर इंटरकॉम पर मैनेजर को दो कॉफी भेजने का आदेश दे दिया । वो लोग कॉफी की प्रतीक्षा करते रहे । इस बीच सीमा ने घर के बारे में पूछा तो प्रकाशचंद्र अंदर चल रही आप यह और कटुता की सूचना को टाल गए । उन्होंने बिलाल साहब और पिंकी के बारे में पूछा तो उसी माने बस ठीक ठाक कहकर उन्हें डाल दिया । उन्हें इस बात का आभास हुआ । दिशा सीमा और लाल में भी कुछ खटपट चल रही है । ठीक है जल्दी सीमा नहीं बताना चाहती ना सही । उन्हें ही उसके निजी जीवन के अंतरंग बच्चों की गहरी खाइयों में झांकने की क्या जरूरत है? कॉफी आ गई । सीमा ने दो प्याले बनाए एक खुद ले लिया और दूसरा प्रकाशचन्द्र के सामने रख दिया । कॉफी का एक घूट लेकर वो बोली मई शुरू होने में अभी एक हफ्ता है । अभी से कितनी गर्मी पडने लगी है । वो तो है ही । मैं तो एक महीने की छुट्टी लेने की सोच रहा हूँ । कई साल हो गए । छुट्टी लिए हुए हैं । दिल्ली में ही रहूँ या कहीं बाहर जाने का इरादा है । सोच रही हूँ मैं सूर्य चली जाऊँ मंजूरी वहाँ क्या रखा है मॉल पर शाम को हम लोग हो गए सर बाडी की ठंड तो मिलेगी कहाँ जाने में एक विशेष सुविधा है वहाँ मेरे मौसी निभाई उत्तर प्रदेश सरकार के जैसा उसके मैंने जा है चार पांच रुपये रोज में दस पंद्रह दिन के लिए कमरा आरक्षित हो जाएगा । किसी और हिलस्टेशन बचाइए तो साठ सत्तर रुपए । रोज तो कमरे गई दीजिए । हाँ ये तो ठीक है, रहने का किराया या करता है । बाकी तो खाने पर खर्च होता है । वहीं बाहर निकलकर होता है । आप भी चली है ना बढिया रहेगा सीमा का प्रस्ताव कितनी आकाश स्मिता से आया कि प्रकाशचंद्र पल भर को चौंक गए । फिर वो विश्वास पूरा बोले ये कैसे संभव है? आपने भी तो शायद कई सालों से छुट्टी नहीं ली है तो ले लीजिए ना । एक महीने की छुट्टी साल दो साल में घर से बाहर निकल जाओ तो एकदम ताज गया जाती है । इस बार गर्मी भी जल्दी बढने लगी है । वर्षों तक लगता है काम करने के बाद कुछ दिन के लिए आराम और मनोरंजन आपका अधिकार है । वो तो है पर परवर किया है चलिए हूँ मजा आएगा वो तो है पर ये संभव कैसे होगा इसमें संभव संभव का क्या है? हम दोनों अकेले नहीं सब परिवार जाएंगे नहीं तो मैं भैया को लिख दूँ । दो कमरे रिजर्व करने के लिए प्रकाशचंद्र विचार मन हो गए । लिमि । से अनबोला चल रहा है । पता नहीं वो राजी हो गया नहीं बिना पूछे वो कैसे हाँ करने पर साथ ही उन्हें सीमा का प्रस्ताव काफी पसंद आया हूँ । दिल्ली की गर्मी, दफ्तर में बड बड और घर बाहर की उमस दमघोटू जिंदगी में कुछ बदलाव आएगा । कुछ तो मूर्ति मिलेगी इन सब से क्या सोच रहे हैं । कोशिश नहीं । मम्मी से पूछना पडेगा । पूछ लीजिए मेरे खयाल से तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए । ठीक है मैं एक दिन में बात हुआ । सीमा चली गई ऍम में । उन के अंदर मैं एक नया नाटक जान ले चुका था । पहले तो इस कार्यक्रम के विषय में कुछ विशेष उत्साही नहीं थे किंतु धीरे धीरे उनके मन में एक नई योजना ने जान ले लिया था । वो एक महीने की छुट्टी लेंगे । सीमा के साथ मसूरिया जहाँ वो कहेगी चाहेंगे लिमि । और बच्चे चलने को राजी होते हैं तो ठीक है अन्यथा वो अकेले ही जाएंगे । इस निर्णय की तरह में थी जो दागी जो उन्हें सीमा से मिलकर महसूस हो रही थी । पिछले कई दिनों से वो दासी, चिंता, अपमान और पीडा के कोई ने गिरे करा रहे थे हूँ । किसी ने इसलिए कि रस्सी नीचे डाल उन्हें बाहर निकालने का प्रयास नहीं किया । उल्टे जो भी आया उन पर हस कर चला गया । कितने दिनों बाद सीमा मिली थी, आई तो लगा जैसे वो को संदेह हुए से बाहर आ गए । प्रेम की धूप में सहानुभूति के चमकीले प्रकाश से आवृत्त माहौल में सीमा प्रेम, सहानुभूति इसने तथा अपने ताकि प्रतिमूर्ति है । कुछ दिनों पूर्व उन्होंने उससे कतराने का जो फैसला किया था, पूरे के ढूंढ जैसा खिसकने लगा । काम कुछ था नहीं आती । उन्होंने अर्जित अवकाश की अर्जी देने का फैसला कर लिया । मगर दिया ये अभी तक आया था । उन्होंने प्रशासन अनुभाग के अधिकारी को फोन किया और उसे अर्जी का फॉर्म भेजने के लिए कह दिया । अगले पांच मिनट में उन्हें मर्जी का फार्म मिल गया । उन्होंने उसे भर दिया । उस देश वाले फॅमिली दिया । आराम और मनोरंजन के लिए अर्जी पर हस्ताक्षर कर के उन्होंने उसे अपने नए संयुक्त सचिव के बाद भेज दिया । उन्होंने चैन की सांस ली । ठीक है, घर जाकर वह फाॅर्मूले, अलगाव और अकेलेपन की दीवार को दे देंगे । अगले कुछ दिनों में सीमा के साथ मंजूरी के ठंडे माहौल में आराम और मनोरंजन करने की कल्पना मात्र से उन्हें बडा सुकून मिला तो कभी उनके दरवाजे पर दस लाख कोई आ जाइए । उन्होंने कहा, अंदर आने वाला व्यक्ति था । डॉक्टर का स्टाफ का ड्राइवर अप्रत्याशित रूप से उसका आगमन हुआ था । अभिवादन करके वो खडा हो गया कहोगे दार कैसे आना हुआ? प्रकाशचंद्र ने उत्सुकतापूर्वक पूछा, साहब, मजबूरी में आना पडा । शर्मिंदगी महसूस हो रही है । बोलो भी मुझे सौरभ क्योंकि सब जरूरत है । केदारनाथ बोलने से कह दिया प्रकाशचंद्र, क्योंकि बडी, अप्रत्याशित और विचित्र बात ही ये स्टाॅपर उनसे रुपये मांगे । वो स्पष्ट रूप से बोले, देखो केदार! मैं उधार लेन देन में विश्वास नहीं करता हूँ । तब मैं उधर नहीं मांग रहा हूँ । फिर मैं बख्शीश मांग रहा हूँ कैसी वकील प्रकाशचंद्र केदार के दो सास को देख विस्मित रह गए हैं ।

भाग - 15

तो अब दस बार में आपको और सीमा मेम साहब को बाहर ले गया था और मैंने आपकी प्राइवेट यात्राओं को सरकारी कर दिया । तो क्या हुआ साहब मैंने देखा फॅमिली थी करीब तीन सवा तीन सौ रुपए बनते हैं तो मुझे रात धमकाकर पैसे अपने आये । ऊं प्रकाश उन्होंने तनिक रोज से कहा । तब ऐसा करना होता तो हम आपकी इस कहानी को सारे दफ्तर में फैला देते हैं । पर नहीं हम नाम खराब नहीं है । जब भी किसी ने आप दोनों के बारे में गलत बयानी की हमने उसका मुंहतोड जवाब दिया । वो तो इस समय थोडी मजबूरी आ गई । वह हम आपको परेशान करते, बडा बनना है । ठेकेदार हो इतना घूमना निकलेगा ये तो उन्होंने कभी सोचा नहीं था । प्रकाशचंद्र का दिल डूब गया । गलत काम करके उन्होंने अपने आपको इस पटना से कर्मचारियों के हाथों देश दिया था । वो पराजित सा महसूस करते हुए बोले ठीक है इस समय मेरे पास नहीं है । कल ले जाना हूँ थी के साथ जरा याद कर के लिए आइयेगा क्या कर केदार चला गया । प्रकाशचंद्र बेहद उदास हो गए । ये सौ रुपयों की बात नहीं थी ये सिद्धांत की बात ही । यदि आज उप सचिव प्रशासन होते हैं तो क्या केदार की उनके पास आकर इस प्रकार रुपये मांगने की हिम्मत पडती? ठीक है समय समय की बात है । मौसम आया तो इसके दार के बच्चे को देख लेंगे तभी उन्हें याद आया हूँ । यहाँ शाम को अशोक होटल में एक प्रीतिभोज का आयोजन है । उनके एक सहकर्मी के पुत्र का निर्वाह हुआ था उसके उपलक्ष्य में । पता नहीं मेरे माना जाना पसंद करेगी या नहीं । जो भी हो उन्हें तो जाना ही होगा । चाहे हो जाए या नहीं । शाम को घर पहुंचे । घर पर कोई नहीं था । नानी मीना विवेक नाम आला सिर्फ नौकरानी थी । उसने बताया की माला कॉलेज से आकर किसी लडके के साथ चली गई है । विवेक अभी अपने दफ्तर से नहीं लौटाए और मेमसाहब वो तो दोपहर से दो बजे की निकली हुई है । छह बजे से पहले नहीं आएगी । नौकरानी द्वारा किए गए एक और है । उद्घाटन ने प्रकाशचंद्र को बुरी तरह चौंका दिया । मेमसाहब अक्सर दो दिन में करीब चली जाती और पांच बजे के बीच लौटा दी है । वो कहाँ जाती है? उन्होंने नौकरानी से पूछा पता नहीं चाहते क्या अकेली जाती है? हाँ साहब जाती तो के लिया पर पर क्या पर लौटी कार में है कार में कौन होता है । एक साहब तो उन्होंने जानती हूँ नहीं कार का रंग किया है । हल्का नीला ठीक है । प्रकाशचन्द्र के मन में संदेह कावेश खुल गया । उन का संपूर्ण अस्तित्व कपकपाने लगा । वो जैसे जैसे कमरे में चहलकदमी करते रहे, उन्हें लगा जैसे उनके पांव के नीचे की जमीन दलदली हो गई है । किसी भीषण वो उसमें समाज सकते हैं । कौन है नीली कार वाला क्या निर्मला भी उसी रास्ते पर निकल गई है जिस पर वो चल रहे हैं । क्या वो भी विविधता की जहाँ से अवश्य हो गई है? क्या सचमुच ऐसा हुआ? पूरे दिन घर पर अकेली रहती है माला कॉलेज और वह पूरे अपने अपने दफ्तर चले जाते हैं । सुबह दस से छह बजे तक वो एकदम अकेली है । घर बाहर, सब स्थान पर पूर्ण सुबह होता । बंधन हिंगा एक कान शांति लोग तो बंधन और परतंत्रता के बावजूद असंख्य व्यक्तियों की भीड में जिंदगी की पूर्णता पा लेते हैं । फिर निर्मला के मार मैं कौन सी वाला है? अपने सिर को दोनों हाथों से पकडा । प्रकाशचंद्र सोचने पर बैठ गए । नौकरानी चाय ठन्डे के लिए पूछने आई थी । उन्होंने मना कर दिया था । न जाने कितनी देर तक वो संज्ञाशून्य से बैठे रहे । बस एकीभाव श्रेष्ठा उनके मन में ये घर कैसा था? अब कैसा हो गया है । करीब सवा छह बजे विवेक लौटा । वो सीधा अपने कमरे में चला गया । उसके पांच मिनट बाद ही निर्मला गई । गर्मी के कारण मूत हम जमाया था । पसीने से शरीर लतपत हो रहा था । उन्हें देखा देखा कर वो भी अंदर चली गई । प्रकाशन उत्तेजित होकर खडे हो गए । फिर वो अंदर जाकर तेज स्वर में बोले कहाँ गई थी? निर्मला ने कोई उत्तर नहीं दिया । बोलती क्यों नहीं? ऐसे मैंने तुम्हारा कौन सा माल मार लिया है जो हर समय मुझे बुलाए रहती हो? प्रकाश उन्होंने बेहद अवार्ड से का । मैं बेकार की बहस में नहीं पडना चाहती हूँ । फिर मेरे सवाल का जवाब दो । क्या मुझे स्पष्टीकरण देना होगा? ऐसा ही समझ लो अगर मैं ना दूर तो नहीं प्रकाशचन्द्र चीज पडे की कीमत जहाँ पे अंतर में झांकर देखिए फिर चीखेगा हो ये घर है । असाॅल्ट किसने बनाया? ऍम प्रकाशचन्द्र बुरी तरह चौपडे ये चुभता हुआ प्रश्न निर्मला ने नहीं देखने पूछा था वो चौक पर आकर खडा हो गया था तो वो मतलब को अपने कमरे में जाओ प्रकाश उन्होंने आदेश दिया वहाँ पर सीखने का आपको कोई अधिकार नहीं है । अगर अपने माँ से दुर्व्यवहार किया तो तो तुम की अगर हो गए । प्रकाशचन्द्र इस विचित्र स्थिति के लिए कतई तैयार नहीं है तो मुझे हस्तशिप कर नहीं होगा । वे तो अपने कमरे में जाओ । अभी मुझे अपनी सुरक्षा और बचाव करने की शक्ति है । निर्मला ने कहा और वो तौलिया लेकर स्नान घर की तरफ बडने लगे । प्रकाशचन्द्र ने उसका रास्ता रोक लिया । फिर वो उन्माद और भी तृषा मिले । सुर में बोले बाद में नाना पहले मेरे प्रश्न का उत्तर दो तो मुझे धमका रहे हो । क्या मैं तुमसे बोलती हूँ कि तुम कहाँ जाते हो? जिसके पास जाते हो इसके साथ जाते हो । जब मैं नहीं पूछती हूँ तो मैं यहाँ हम उसे पूछने का प्रकाशन में हथियार डाल दिए । क्या लाभ था कटुता को बढाने से उन्होंने निर्मला का रास्ता छोड दिया । ठीक है तुम अपने रास्ते पर चलो । मैं अपनी राह पर चलूंगा । जय का प्रकाश इन्होंने हाथ हुए और कपडे बदलकर तैयार हो गए । अशोक होटल जाना था जहाँ संबंधों में सीमा तक तनाव और कटुता आ जाए । वहाँ कुछ भी कहना या करना मेरा था । कहने से कोई लाभ नहीं था । निर्मला नहीं जाएगी । तैयार हो प्रकाश । उन्होंने गाडी निकाली और प्रीतिभोज में चले गए । करीब दो घंटे तक काफी गहमागहमी रही । अशोक होटल की तीसरी मंजिल पर दावा हॉल में मित्रों और सहकर्मियों की भीड में घिरे हुए वो घर में उत्पन्न पडता को जी रहे थे । एक एकांत कोने में अकेले वो खाना खाते रहे । एक मित्र ने पूछा भी था क्यों भाई क्या बात है? उदास नजर आ रहा हूँ । कुछ नहीं क्या करूँ होता? टाल गए थे । प्रीतिभोज समाप्त होने से पूर्वी माहौल से बाहर निकल भागे । गाडी में बैठे वो चले तो उन्हें ऐसा लगा जैसे वो घर नहीं कारावास की तरफ जा रहे हैं । राष्ट्रीय में सीमा का घर बडा अपना जाने की भावना से प्रेरित हो । उन्होंने उसके घर के सामने कहा रोक दी । वहाँ एक घंटे रोककर जब घर पहुंचे तो किसी ने उनसे कुछ नहीं पूछा कि आखिर तुम कहाँ गए थे? गए थे तो ठीक आ गए तो टी पूरे पच्चीस साल का । प्रकाशचंद्र कम से कम एक विदेश यात्रा का सपना देखते रहे थे । पूरे दफ्तर में एक भी अवसर ऐसा नहीं था जो एक दो बार के चक्कर न लगाया हूँ । इस बार उन्हें अवसर मिला था । लंदन में राष्ट्रमंडल के सदस्य देशों के प्रशासनिक अधिकारियों के लिए दस सप्ताह का एक प्रशिक्षण सत्र आयोजित किया जा रहा था । उन्होंने उस के लिए अर्जी दी थी । उन्हें पूरा विश्वास था इस बार उन्हें इस विदेश यात्रा की अनुमति अवश्य मिल जाएगी । कई दिन से फाइल सचिव के पास पडी थी । वैसे उन्हें अपनी सफलता का विश्वास तो था, पर चूंकि श्रीमती काशीनाथ स्वाइल पर टिप्पणी लिख दी थी, उन का मन बार बार आशंकित हो जाता था । तीन चार दिन की दम वोट प्रतीक्षा के बाद सरकार के निर्णय की घोषणा हो गई । जिस बात की आशंका थी, वही हुई । सचिव ने उनके नाम का अनुमोदन नहीं किया था । वे बेहद उदास, निराश और परेशान थे । उनको अपनी इस सफलता का कारण पता था उन का पहला संयुक्त सचिव और सीमा का । वर्तमान संयुक्त सचिव घनिष्ट मित्र हैं और वे सचिव के अग्रणी चमचे हैं । फिर जिस अवसर का चुनाव हुआ, उसके सामने वो टिक भी कैसे सकते थे? श्रीमती काशीनाथ लंदन जा रही थी । वो एक बार पहले भी कनाडा हुआ ही नहीं । ठीक है, जब श्रीमती काॅफी लिखनी थी, तो उनकी सफलता का तो प्रश्न नहीं उठता था । कमरे में मन नहीं लग रहा था । अंतर मन की पीडा को बांटने की खाते वो सीमा के पास चले गए । उसके कमरे में बैठने वाला अन्य अवर सचिव शायद आपने उप सचिव के पास गया हुआ था । इससे उन्हें सीमा से बातें करने के लिए एकांत मिल गया । उन्होंने हो और सीमा हो देखा वो भी थोडी, चिंतित, परेशान और उदास तो क्या उसे भी उनकी इस सफलता के बारे में पता चल गया । ऐसे समाचार कितनी तीव्रता और शीघ्रता से दफ्तर में प्रचारित हो जाते हैं? सीमा आज कौन सी के लिए क्यों नहीं आई? प्रकाश उन्होंने पूछा यही मन नहीं किया । इसमें परेशान होने की क्या बात है । जब तक श्रीमती काशीनाथ प्रशासन को देखती रहेंगी, हमें कुछ नहीं मिलेगा । सीमा ने उसी दृष्टि से प्रकाशचंद्र को देखा । वो कुछ नहीं समझ पाई । ऐसे क्या देख रही हो? मैं समझी नहीं तो क्या? तो मैं पता नहीं कि मैं लंदन नहीं जा रहा हूँ । नहीं तो फिर तुम उदास क्यूँ प्रकाश निरॅतर पूछा होश और पर सीमा उदास चिंता ऐसी बैठी रही हैं । चार अंदर से साहस नहीं जुटा पा रही थी या फिर फैसला नहीं कर पा रही थी कि वो उनसे भागीदारी करें या नहीं । क्या लाल से झगडा हो गया है? प्रकाशचंद्र ने यही मजाक में पूछ लिया । सीमा क्या है? छलछल आई अरे तो रो रही हो प्रकाशचंद्र बुरी तरह से बता रहीं हूँ । कल रात को लाल से झगडा हो गया और नहीं तो क्या करूँ? किस बात पर झगडा हुआ तुम को लेकर मेरी वजह से प्रकाशचंद्र बोले और अंदर बहुत गहराई में जाकर वो भयभीत हो गए । इन विवाहेतर संबंधों के दुखद परिणामों से वो भलीभांति परिचित थे । फिल्मों तथा अन्य किस्से कहानियों के माध्यम से वो इन संबंधों के दुष्परिणामों को देख चुके थे । हाँ, पता नहीं किस कमीने व्यक्ति लाल को एक गुमनाम पत्र लिख दिया । उसमें हमारे हमारे संबंधों की पूरी जानकारी उसे दे दी । पत्र घर पर मिला था । नहीं, वो लाल के दफ्तर के पते पर भेजा गया था । तो कल शाम को दफ्तर से घर लौटा और पूरा घर से पर उठा लिया । ऐसे बिगडा की बस पूछो मत, ये तो बहुत बुरा हुआ । प्रकाश उन्होंने काम पे स्वर में कहाँ? उन्हें लगा कि ये संबंध खतरनाक मोड पर पहुंच गए । एक विश्वासघाती महिला कारूष पति पत्नी के प्रेमी की हत्या करने में भी नहीं इसके जाता हूँ । इस विचार के साथ ही प्रकाशचंद्र का पूरा शरीर पसीने से नहीं आ गया । मैं लाल की परवाह नहीं करते हैं । मेरा जो मन करेगा, मैं वही करूंगी । खुद का घर में बैठेंगे पर दूसरों पर पत्थर फेंकने से बाज नहीं आएंगे । प्रकाशचन्द्र की समझ में कुछ नहीं आ रहा था । एक अगर भय से वो कहाँ रहे थे । वो सोचते हैं कि मैं उनकी गीदडभभकियों के आगे झुक होंगी । मुझे तो सिर्फ एक ही बात है क्योंकि है अगर पिंकी और खयाल ना होता तो मैं कल रात लाल को छोडकर हमारे पास आ जाती हूँ । हूँ । फिर क्या होता यदि सचमुच सीमा किसी दिन उनके घर आ जाए तो क्या करेंगे? क्या निर्मला और उसको एक साथ हो एक ही घर में रह सकते हैं और वो भी खास तौर पर । विवेक और माला के होते हुए नहीं या संभव है । मुझे तो लगता है इस गुमनाम चिट्ठी को भेजने वाला साथ हुई है । वो कुछ भी कर सकता है । सीमा बेहद को तेजित हो गई । सीमा तो थोडे विवेक से काम लेना चाहिए । इस तरह पति से झगडा करना उचित नहीं । प्रकाश इन्होंने उसे समझाया तो तुम क्या चाहते हो ना उसका अन्याय को चुपचाप सहन हूँ । वो चाहे कुछ करें पर मैं कुछ नहीं कर सकती । ये क्या बात हुई मैं तुम्हारी व्यथा समझता हूँ सीमा पर जिस तरह की व्यवस्था में हम जी रहे हैं उसमें हमें अपने अपने जीवन साथी को सन्तोष रखना ही होगा । अन्यथा अच्छा क्या होगा? सीमा ने ऊपर कर पूछा कुछ भी हो सकता है । प्रकाश इन्होंने और पूर्ण स्वर में कहा कुछ भी हो जाए पर मैं लाल का न्याय, अत्याचार और अनाचार नहीं होंगी । प्रकाशचन्द्र मौन हो गए । सीमा से आगे बहस करना व्यवस्था वो खडी और उत्तेजित थी । ऐसी स्थिति में वो इस विवाद के दुष्परिणामों की कल्पना करने में पूर्ण रूप से असमर्थ थी । प्रकाशचंद्र ने फैसला कर लिया कि वो सीमा को समझाएंगे, अभी नहीं । जब वो शांत और सहज होगी, वो सीमा के पास से चले आए । बडे उस दिन परेशान और उदास से क्या करें? कहाँ जाएँ और बाहर डॉक्टर सब जगह सफलता है । मैं बोलता है और प्रतिकूल पर से दिया उनका मुंह चिढा रही थी । आज सीमा से मिलकर उनके मन में एक भाई घर कर गया । यदि लाल को इन संबंधों के बारे में पता चल गया है तो उनका कुछ भी अहितकर सकता है, यहाँ तक की हत्या भी । इस भयावह कल्पना ने उन्हें झकझोर कर रख दिया । वो हमले उनका विवेक जागृत हुआ, एक व्यक्ति की भावनाओं भी नहीं । अब वो इस संबंध को समाप्त कर देंगे और संबंध टूटने के लिए जोडता है । क्या लाभ जिंदगी में ऐसा खतरा मोल लेने से ठीक है । वो सीमा और लाल से मिलेंगे । शांतिपूर्वक ठंडे दिल से वो लाल को समझा देंगे । ये गुमनाम पत्र साधु ने या दफ्तर की किसी अन्य व्यक्ति ने एशिया वर्ष लिखा है और उसे गंभीरतापूर्वक लेने की आवश्यकता नहीं है । पर तभी वो अपने आप को अवश्य महसूस करने लगे । कई बार ऐसा निर्णय कर चुके हैं । पर हर बार सीमा का सामना होते ही उनका निश्चय सूखे पत्ते जैसा हो जाता है । ऐसा क्यों होता है? प्रकाशचंद्र की एक महीने की छुट्टी स्वीकृत हो गई थी । इसकी सूचना प्रशासन अनुभाग के अधिकारी ने दे दी थी । उन्होंने तुरंत सीमा से संपर्क स्थापित करने का प्रयास किया, पर वो नहीं मिली । कई दिन तक यही सिलसिला चलता रहा । तीन दिन तक सीमा दफ्तर नहीं आएगी । नहीं, उसमें कोई सूचना भेजी नहीं । छुट्टी की अर्जी जरूर वो बीमार हो गई होगी । प्रकाश इन्होंने सोचा और उन्होंने शाम को दफ्तर से सीधे उसके घर जाने का फैसला कर लिया । इधर निर्मला के रेस में व्यवहार ने उन्हें बहुत परेशान कर रखा है । वो बराबर दो और पांच बजे के बीच घर पर फोन करते रहे थे । एक बार भी निर्मला नहीं मिली थी । हो उनकी घंटी बजती रहती थी । एक दो बार इसी पर उठाया गया था । वो भी नौकरानी द्वारा । वो आवाज पहचान गए थे । उन्होंने बिना बोले फोन बंद कर दिया था । पर एक दिन उन्होंने बात की थी । पूछा था मेमसाहब है वो नहीं ऐसा नौकरानी उनकी आवाज पहचान गई थी । कहाँ गई पता नहीं चाहते क्या वहीं गई हैं जहाँ हो जाती हैं? हाँ साहब, अब तो कार वाला साहब हम सबको दोपहर को लेने भी आता है । अच्छा जी साहब आज तो देर से आने की भी बोल रही है । ऐसा और उत्तेजित हो उन्होंने फोन बंद कर दिया । उनकी आंखों के आगे अंधेरा सा छा गया । क्या वो निर्मला को गवा बैठे हैं पर तभी भी अपने मन को आश्वस्त करने लगे । क्या मूर्खतापूर्ण बातें हो जाते है हूँ अवश्य निमी ने मेरा उनसे पूछे बहुत काटने के लिए कहीं नौकरी कर ली है । वही समझदार महिला है पढी लिखी सौं, सुसंस्कृत ग्रहणी दो युवा हुए बच्चों की मां भावनात्मक तथा मानसिक रूप से परिपक्व । उसे जीवन की समस्त सुविधाएं उपलब्ध है तो उनके साथ क्यों विश्वासघात करेगी? पर प्रकाशित बहुत देर घर अपने मन को नहीं पहला सके छलावा ऍम हूँ

भाग - 16

आजकल क्या नौकरी भी आसानी से मिल जाती है? फिर जो कुछ उन्होंने उसके साथ क्या है? क्या उसका बदला नहीं ले रही है? कुछ दिन पहले उन्हें टीवी पर देखिए अंग्रेजी फिल्म याद आ गयी । बिलकुल निमी की उम्र की एक विवाहिता महिला बीस वर्ष से ऊपर के युवक की माँ एक टेनिस खिलाडी के प्रेम में फंस जाती है क्योंकि उस महिला का पति भी अपनी इमारत में रहने वाली एक अन्य महिला के प्रेम पांच में फंस चुका है । नहीं प्रेम बंधा होता है । वासना का दलदल ऊपर से मोहक पर अंदर से मारा होता है । एक बार गलती से किसी का पाओ उस पर पडा नहीं कि वह दलदल उसे अपने मैं आत्मसात कर लेता है । आयु, उत्तरदायित्व, सुख सुविधाएं, संतोष, प्रतिष्ठा, परिपक्वता सब के सब महत्वहीन हो जाते हैं । इस दलदल में भाषा नहीं तो क्या निर्मला हो सकता है इस विचार के उनके अंदर की समझ व्यक्ति को सोच लिया । वो निष्प्राण और निर्जीव से कुर्सी पर बैठे रहे । नहीं, ये भयावह स्थिति वो सही नहीं पाएंगे । इसका फैसला होकर ही रहेगा । वो निर्मला की जासूसी करेंगे । उसे रंगे हाथों पकडना ही होगा । फिर क्या होगा तलाक? क्या हत्या हिन्दू भयावह शब्दों का उच्चारण करते उनका अंतर कहाँ गया? पति दवाई संबंधों की परिनीति यही तो है नहीं ना बोल गाल चाहते हैं ना हिंसा । वो तो ऐसा तारतम् में सामान जैसे और संतुलन चाहते थे । जहां हर व्यक्ति अपने स्थान पर प्रतिशत रहेगा । कहीं कोई संबंध चटके न टूटे पर ये सब संभव नहीं हो पाया । वो अनायास बिना इसके भयावह परिणामों की कल्पना किए दलदल में धंस गए थे । अब इस से निकलना कितना कठिन हो गया है । जितना वो हाथों मारते हैं, उतने ही उसमें और ज्यादा पूछते चले जाते हैं । ठीक सवा पांच बजे वो दफ्तर से उड गए । कार में बैठकर वो सीधे सीमा के घर करते । दरवाजा बंद था । घर के अंदर बाहर शमशान का सा मोहन गया था । उन्होंने घंटी बजाएगी, कोई प्रत्युत्तर नहीं । अंदर कोई हलचल होने के संकेत नहीं मिले । कुछ बाद उन्होंने फिर घंटी बजाएंगे । कई मिनट तक प्रतीक्षा करने के बाद दरवाजा खुला । उन्हें यह देखकर आश्चर्य हुआ कि खुले दरवाजे के बीच पिंकी खडी है और उनसे कह रही है, आइए चाचा जी, वो अंदर चले गए । उन्होंने आश्चर्यपूर्वक पूछा, वहाँ नहीं है क्या? आॅक्सी मैंने दरवाजा क्यों नहीं खोला तो उसका प्रकाशचंद्र पूरे विस्मित हो गए । वहाँ अंदर की कमरे की ओर बढते हुए बोले कि मैं तीन दिन से नव सर क्यों नहीं जा रही है? पिताजी से उनका झगडा हो गया था । अच्छा किस बात पर ये तो पता नहीं पर बीच बीच में वो लोग आपका नाम भी लेते जाते थे । पिंकी ने बडे बोले बन से कहा प्रकाशचन्द्र बुरी तरह चौंक गए तो क्या उनके स्वयं के घर में घटित होने वाला नाटक इस घर में भी अभिनीत हो रहा है । उन के कारण सीमा और लाल के मंजूर दवाई संबंध चढ गए । डूबे उदास मन से वह सीमा के कमरे में पहुंचे । उसे पलंग पर पडा देखकर वह चकित रह गए । तीला मुखपृष् स्टेज, आंखें, निष्प्राण शरीर एकदम शाम के समय मुरझाई, सूरजमुखी फूल जैसी वो पलंग पर पडी थी । उन्हें देखकर वो धीरे से मुस्कुरा हूँ । एकदम ऐसे ही जैसे बुझते दिए मैं थोडा तेल डाल दिया गया हूँ । ये क्या हाल बना रखा है? सीमा प्रकाश इन्होंने भरवा इस्वर में पूछा । चलो आपको फुर्सत तो मिल गई । मेरा हाल मालूम करने की तीन दिन से दफ्तर नहीं आ रही थी । फिर भी चिंता नहीं हुई । नहीं जानता हूँ मुझ पर क्या बीत रही थी । पर ये तो बताओ हुआ क्या ये क्या हाल बना रखा है । अभी तक जिंदा हूँ मारी नहीं । बस साफ साफ बताओ क्या हुआ की कह रही थी कि तुम्हारा लाल से झगडा हो गया । मेरा झगडा हो गया । उसने मेरे साथ जानवरों से भी बदतर व्यवहार किया । किस लिए तुम को लेकर जाना उसके लक्षण नहीं जानती । वो खुद कौन सा दूध का धुला? मैं खूब जानती हूँ । वो क्यों महीने में चार बार चंडीगढ जाता है । आदमी खुद कुछ भी कर लेगा पर बीवी को दो जब खरीद गुलाम बना करना चाहता है, क्या उसे सब कुछ पता चल गया? सब कुछ क्या पता चलेगा? सिर्फ शक है और क्या मैं किसी कीमत पर उसके साथ नहीं रहूंगी? इसलिए मैंने उस दिन नींद की कई गोलियां खाली पर फिर भी मारी नहीं हो ये तुमने क्या क्या सीमा ये तो तुमने सरासर कायरता और पागल बन की बात कर डाली । जिस तरह उसने मुझे जलील किया, अपमानित किया उसे तो मेरा मर जाना ही बेहतर था । पर एक बात तय है कि मैं डाल के साथ नहीं रह पाउंगी । देर क्या अगर होगी कुछ भी करूँ, कहीं भी जाओ पर थोडा शांति से कम लोग सीमा कैसे अलग होता होगी? क्या तलाक होगी तलाक किस आधार पर मिलेगा ये सब मैं नहीं जानती । मैं तो लाल को छोड अब स्थायी रूप से तुम्हारे साथ रहूंगी । मेरे साथ स्थायी रूप से हाँ अगर कोई जगपति आपत्ति हो तो अभी से बता दो और निर्मला वो तुम्हारी समस्या है । तुम जानो उन्हें तलाक दे दो तो ठीक रहेगा वरना मिला तलाक के भी हम दोनों पति पर नहीं चला रह सकते हैं । सात फेरों याॅर्क की मोहर की को विश्वास है । मैं नहीं है । मेरे लिए प्रकाशचन्द्र के सामने एक बेहद जटिल समस्या उत्पन्न हो गई थी । जिन संबंधों को वह सिर्फ मनोरंजन और मनबहलाव का साधन समझे हुए थे, वो खतरनाक मोड पर पहुंच चुके थे । एक तो उनको निर्मला से तलाक लेना होगा, फिर सीमा और लाल का तलाक हो, तब कहीं जाकर उनका और सीमा का स्थायी मिलन संभव है । दोनों के लिए तलाक के कोई पर्याप्त कारण नहीं है । फिर भारत में तलाक की प्रक्रिया इतनी जटिल है कि ये सब सरलता से नहीं हो सकता । वर्षों लग जाते हैं । इस प्रक्रिया को पूरा होने में क्या सोचने लगे । यदि तुम्हारे लिए ये संभव नहीं तो मुझे बता दो, मैं समस्या का कोई और समाधान खोज होंगी । सीमा ने वो कृष्णा से कहा, सीमा बाद संभव और असंभव की नहीं है । हम दोनों को इतनी आसानी से तलाक मिलना संभव नहीं । मैं चला के लिए कब कह रही हूँ? क्या हेमा मालिनी और धर्मेंद्र की शादी नहीं हुई? क्या वे लोग पहले से विवाहित नहीं थे? इंसान चाहे तो असंभव को भी संभव कर सकता है । सीमा मैं नहीं जानता । इन फिल्मी कलाकारों ने ये सब कैसे किया? शायद उनके पास पैसा था । हमारे पास भी दो पद है । सीमा थोडी समझदारी से कम लोग । हम दोनों ही जिम्मेदार सरकारी अवसर है । आश्रणीय मौली के अनुसार एक पति या पत्नी के होते दूसरी पत्नी पति से विवाद नहीं कर सकते । विवाह की बात कौन कर रहा है तो साथ रहने के लिए क्या रहेगा? सीमा ये भारत है पश्चिम नहीं । यहाँ बिना विवाह केसरी पुरुष का साथ साथ रहना ठीक है । फिर ये कहानी खत्म । कल से हम दोनों के रास्ते अलग अलग । अब कभी मिलने की कोशिश मत करना । अब आप जा सकते हैं रोज और उत्तेजना में भरकर । सीमा ने निर्णायक स्वर में कहा, इतने अपमानजनक आक्रमण के बावजूद प्रकाशचंद्र बैठे रहे । मोटे नहीं । इतनी दूर तक दलदल में फंसकर क्या उस से निकलना संभव था? क्या एक ही कार्यालय में साथ साथ काम करते हुए इतने घनिष्ठ संबंधों के बावजूद वे दोनों एक बार फिर से परिचित बन पाएंगे और संभव जनमी को छोड देना संभव होगा । सच तो ये है कि पिछले दिनों से उसने उनकी जिंदगी नरक बना दी है । यही नहीं आजकल तो उसने एक नया गुल्ली खिलाया हुआ है । यदि नीली कार वाले के साथ उसके पति व्यवसाई संबंधों के प्रमाण मिल जाते हैं और उसका विश्वासघात तथा चरित्रहीनता सिद्ध हो जाए तो तलाक के लिए एक मजबूत आधार बन जाएगा । अब बैठे हुए क्या सोच रहे हैं? सीमा ने उखडकर का सीमा जल्दबाजी से कम देना ठीक नहीं । मुझे सोचने के लिए कुछ समय तो ठीक है । तो लोग अब मैं और नहीं होंगे । ये निर्णय तथा अनिश्चितता की स्थिति बस दो चार दिन नहीं अंतिम फैसला करना होगा । सीमा आश्वस्ति हो गई । फिर थोडी देर तक विचारमग्न रह कर वो बोली क्या करूँ? मेरी हिम्मत नहीं होती उठने की वो चाय कॉफी उसकी चिंता मत करो । मैं दफ्तर से पी कर आया था । अब मैं चल होगा मेरा ये लाल कहाँ चला गया? काॅलेज गया है अकेला नहीं । चंडीगढ से उसकी प्रेमिका और उसका पति आए हुए हैं । उन्होंने शहर कराने उठाना खिला रहे हैं प्रकाश । इन्होंने सीमा के इस वक्तव्य को गंभीरतापूर्वक नहीं लिया । वो सोचने लगे तीन और लाल में झगडा हुआ है । इसी के कारण चंडीगढ से आए मैं तो उसकी पत्नी को शायद सीमा ने गलत समझ लिया है । ऐसी आंखें मटका मटकाकर लाल से बातें कर रही थी और बीवी के गुलाम नरेंद्र को देखो । बीवी पराए मर्द को रिझा रही थी और आपकी से निंबोरकर चीज ही कर रहा था । अच्छा सीमा अब मैं चलूंगा क्यों? क्या जल्दी में हो? क्या निर्मला की याद आ रही है प्रकाश चंद्र को सीमा की ये सस्ती इस तरह बातें जम नहीं । नहीं नहीं । फिर भी वह कोई प्रतिवाद नहीं करना चाहते थे । अब है कलाई पर बंधी खडी में देखकर वो बोले सवाल बज रहे तीन घंटे बीत गए, पता ही नहीं चला । देखो मुझे हमेशा के लिए अपना लोग फिर देखना समय का पता भी नहीं चलेगा । प्रकाशचन्द्र उठे और बाहर आ गए । बेहद उमस और धूल भरा सा माहौल था । बाहर भी डर एक साथ वहां से रवाना हो । वो सीधे घर आ गए हैं हूँ । उन्हें देख कर बहुत आश्चर्य हुआ कि निमी अभी तक नहीं लौटी थी । चार । विवेक भी नहीं आया था । सिर्फ माला घर में अकेली थी । संभव है । नौकरानी भी छुट्टी करके जा चुकी थी । उन्होंने कपडे बदले, उससे पहले स्नान घर में जाकर न आए । फिर इससे ठंडी बोतल निकली, उसे पूरी पी डाली । तब कहीं जाकर उन्हें को शांति मिली । पर ये शांति शारिक स्तर पर ही थी । मानसिक और भावना को डिस्टर्ब हो । बेहद अशांत थे निर्मला की ये हिम्मत सरयाम वो पराए मर्द के साथ आवारागर्दी करती पढिए । उसके दिल से ये भी डर निकल गया है कि अब रात के नौ बज रहे वो करा चुके होंगे और उसे अब घर लौटना चाहिए । अंदर ही अंदर वो बोलते हुए माला के कमरे के बाहर पहुंचे और उसे आवाज नहीं माला किताब पकडे बाहर आकर खडी हो गई तो बोली कुछ नहीं वहाँ का प्रकाशन लाॅकर पूछा । मुझे नहीं मालूम घर में रहती हो या नहीं । प्रकाशचंद्र बिगडे रहती हूँ पर एक उपेक्षित लडकी की तरह चौकीदारी करना नहीं आती तो ये घर आया सराय, आखिरी से सलाह किसने बनाया है? माला का मुफ्त तमतमा गया । उन से टक्कर लेने के लिए कटिबद्ध नजर आ रही थी । माला तुम प्रकाश इन्होंने क्रोध में भर कर रहा हूँ वहाँ पिताजी मैं बच्ची नहीं नहीं, कमोबेश सबको समझती हूँ । आखिर हमारे घर को क्या हुआ है ये विघटन शुरू करने के लिए आप की जो जिम्मेदार रहे वाला तो मुझे दबा लडाई हो । ठीक है अगर आपको इसका सच को सुनने में तकलीफ होती है तो मैं अंदर चले जाते । रहते हुए माला अंदर कमरे में चली गई और पडने लगी प्रकाशचन्द्र वहीँ खडे रह गए । अपमानित पिटे हुए और परेशान से क्या करें हो? अब एक ऐसी स्थिति आ गई है जब कल तक उनका सम्मान करने वाले बच्चे उनका सामना कर अपमान करने से नहीं चूक रहे हैं । वहाँ से चले गए । बाहर लॉन के किनारे जाकर वह खडे हो गए । चांदनी रात ही पूरा चान सिर के ऊपर आ गया था । इसी की वजह से उमस कम हो गई थी । निरुद्देश्य से वह लॉन में चहलकदमी करने लगे । दस बजने लगे थे पर निर्मला का कहीं कोई पता नहीं था । कहाँ गए वो वो चिंतित और आप तोड से बार बार समझ की ओर देख रहे थे । तभी मुख्य समय पर एक नीले रंग का आधार होगी । बोल पा कर आगे बडे तब तक निर्मला आगे की सीट से बाहर निकली, दरवाजा बंद किया और जो करियर की चार पांच सीधा हाथ हिलाकर ड्राइवर को बाय बाय करके वो लोन की तरफ आ गई । प्रकाशचन्द्र का खून खौल रहा था उनका जी । क्या वो अभी तत्काल इस विश्वासघाती चरित्रहीन महिला का खून कर नहीं किस शान इतनी और शालीनता से चली आ रही है । यार के साथ गुलछर्रे उडाकर निर्मला लॉन के पास पहुंची तो प्रकाशचंद्र ने तो आपका पूछा, नहीं नहीं दी । निर्मला ने उनकी ओर उपेक्षाओं से देखा और फिर उन्हें देखा । अनदेखा कर वो अंदर चली गई । प्रकाशचन्द्र के क्रोध में उबाल आ गया । वो तेजी से अंदर गए । निर्मला के पीछे पीछे बैठक नहीं । उन्होंने उसकी दोनों बाहों को कसकर पडा और आवेश में भरकर कहा मैंने कोई बुझाता चुना था जब आप क्यों नहीं दिया? जरूरी नहीं समझा जरूरी था मेरे खयाल से नहीं था प्रकाशचन्द्र के हाथों का दबाव । निर्मला की बाहों पर बढा तो वो तो कर बोली हाँ! छोडिए! प्रकाश! इन्होंने हाथ नहीं छोडे । चीखकर बोले जवाब दो ऐसे स्तर पर उतर आए हो तो मेरे सर की बात करते हो । अपना स्तर तो देखो । एक बार आई मार के साथ इतनी रात गए चोरी और सीनाजोरी । तकलीफ हुई ना बदलाव पता चला विश्वास हाथ कैसे कचोटता है । माला बाहर आ गई थी । मूवी और चिंतित दर्शन बनी वो घर में होने वाले महाभारत को देख रही थी । निर्मला ने एक झटका दे अपनी बातें मुख करा ली । फिर वो अंदर चली गई । अपने कमरे में नहीं माला के कमरे में प्रकाशचंद्र में अकेले खडे रह गए । कोई संपत्ति कक्ष में पडे गोलमाल की तरह हूँ ।

भाग - 17

सुबह के साथ बच्चे थे । चमकीली धूप ने वातावरण को खूब गर्म कर दिया था । प्रकाशचंद्र नहा धोकर तैयार और बार पडा है । गर्मियों की सुबह इतनी लंबी होती है कि काटे नहीं करती फास्ट और जब कि घर में शीत युद्ध का वातावरण भी हो । उधर निर्मला माला और विवेक एकजुट हो उनके खिलाफ ना जाने कैसा षडयंत्र रच रहे थे । उन्हें सुबह की चाय भी नहीं मिली । उन्होंने खुदी बनानी पडेगी । वो अखबार पढते जा रहे थे और मन ही मन घर की समस्या का समाधान खोजने में जुटे हुए थे । तो अभी घंटी बजे वो नहीं उठे । नौकरानी अभी आई नहीं थी । बराबर के कमरे से भी कोई बाहर नहीं आया तो शर्ट बाद दोबारा घंटी बजती है तो फिर भी नहीं थे । इस बार माला बाहर आई और मुख्य द्वार खोलकर बाॅंटी और बोली पुलिस वाले आपको बुला रहे हैं पुलिस प्रकाशचन्द्र चौकी पुलिस कि वाई है उनके आप पुलिस का क्या काम और कहीं कुछ गलती हुई है? मूड है । बाहर आए एक पुलिस इंस्पेक्टर तथा उसका सहयोगी द्वार पर खडे थे । उन्होंने एक इंस्पेक्टर बोला क्या भी प्रकाशन रहे? क्या मैं अंदर हो सकता हूँ? आइए वो दोनों आकर बैठ गए । तब तक निर्मला विवेक और माला भी वहाँ पर खडे हो गए । उनके चेहरों पर चिंता की एक आई थी आप बैठी प्रकाशचंद्र जी, हम आपसे कुछ पूछताछ करनी है । इंस्पेक्टर बोला पर बात ऍम प्रकाश उन्होंने उलझकर पूछा जब श्रीमती सीमा लाल को जानते हैं, मेरे कार्यालय ने काम करती हैं, उनके साथ आपके कैसे संबंध है? अच्छे हैं । मेरा मतलब अच्छे खराब से नहीं फेस । आप उनसे प्यार करते थे । इंस्पेक्टर ने डालने से पूछ लिया । प्रकाशचन्द्र को लगा जैसे इंस्पेक्टर ने उन्हें भरे बाजार नंगा कर दिया है । पता है वो बिल्डर बोले इस सबसे तुम्हारा क्या मतलब मतलब है? तभी तो पूछ रहा हूँ । अगर मैं लागू हो तो दो बयानी होगी । हम कल रात से तहकीकात कर रहे हैं । आप के दफ्तर के कई अवसरों से पूछताछ करने और सीमा के पडोसियों से बात करने के बाद हम किसी नतीजे पर पहुंचे या और श्रीमती सीमा लाल ठीक है पर अगर ये सच भी हो तो तो ये जबरदस्त कारण बन सकता है । हत्या का फॅमिली या मत बुझाओ । साफ साफ बताओ बात क्या है? कल रात सीमा के पति लाल की हत्या कर दी गई है । प्रकाशचंद्र जी इंस्पेक्टर ने तठस्थ भाव से सूचना नहीं प्रकाशचन्द्र, भौचक्के रह गए । उनका मूड पीला पड गया । वो संज्ञाशून्य से इंस्पेक्टर की तरफ देखते हुए रह गए । पांच जोडियाँ हैं । उन्होंने भूल रही थी सब के सब जैसे उन्हें अपराधी सिद्ध करने में जुटे हुए थे । उन्हें इंस्पेक्टर द्वारा की जा रही पूछताछ का उद्देश्य समझ में आ गया । वो सीमा के प्रेमी है । प्रेमिका को प्राप्त करने के लिए प्रेमी द्वारा प्रेमिका के पति की हत्या स्पष्ट को देश है । ये सोच रही उनका सारा शरीर पसीने से नहा गया । उन क्या होगी? आगे फांसी का फंदा झूल गया । कल रात आप सीमा के घर गए थे । इंस्पेक्टर ने पूछा हूँ कब तक बना रहे हैं । चार बजे तक सीमा और पिंकी के बयान के मुताबिक आप साढे आठ तक वहाँ थे । हो सकता है पर मैं सीमा के बंदे की हत्या क्यूँ करने लगा? ऐसा खून कह रहा है । फिर आप लोग मेरे पास की है इस हत्या की गुत्थी सुलझाने के लिए । पर मैंने कहा ना कि मैं इस कांड के बारे में कुछ नहीं जानता । कल रात में सीमा के घर जरूर गया था पर लाल से मेरी मुलाकात नहीं हुई थी । प्रकाशचंद्र ने घबराकर कहाँ इंस्पेक्टर मुस्कुराया । उसने घूरकर प्रकाशचंद्र को देखा और फिर दृढ स्वर में बोला आप उस घर में रात साढे चार बजे तक थे या अपने स्वीकार किया है । पोस्टमार्टम की रिपोर्ट के अनुसार उन्हें विश रात साढे सात और आठ के बीच में दिया गया था । पर मैंने कहा ना लाल से तो मेरी मुलाकात ही नहीं हुई है या आप कह रहे हैं पर सारी परिस्थितियां आपके खिलाफ जा रही है । आपने सीमा से पूछताछ की, उनका बयान लिया वो भी बयान देने की स्थिति में नहीं है क्योंकि वो कल रात से ही बेहोश है । उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया है । को ये सब क्या हो गया? बच्चा अब मैं चलूंगा, दिल्ली से बाहर आ जाए ना आपसे दोबारा मिल होगा । ऍम अपने सहयोगी के साथ चला गया । पुलिस चली गयी थी । रह गया एक विचित्र सामान और चंदे । गिलानी वशता और अपमान से भरा प्रकाश उन्होंने दोनों हाथों से अपना सिर कसकर पडा हुआ था । पहली बार उन्हें सीमा से स्थापित किए गए संपर्कों की निस्सारता निरर्थकता और अपनी महान मोटा का आभास हुआ । तभी से देखो सुख और भावनात्मक संतुष्टि की खाते उन्होंने किस तरह अपने जीवन की सुख शांति की बाली चौहान दी थी । आज वो पुलिस और परिवार के सामने एक हत्यारे बने बैठे थे । गिलानी पश्चताप और खेती मिली जुली भावना से तो रेस्ट । वो सोच रहे थे काशी भूमि फट जाती और इसमें समाज आते हैं और तभी उन्हें याद आया पुलिस को उन पर लाल की हत्या करने का संदेह है । पहले तो उन्हें अपने को निर्दोष सिद्ध करना है । बाद में और कुछ देखा जाएगा । वो खडे हो गए । सीमा ही एकमात्र आशा की किरण नहीं । उसी के बयान पर उनकी जिंदगी और मौत निर्भर करती थी । ठीक है अस्पताल जाकर देखना चाहिए की सीमा को होश आया या नहीं । जैसे उनका निर्मला से सामना हुआ । वो खबर आ गए । जिम नहीं की निगाहें उन पट्टी की थी । उनका हूँ की भीषणता को सहन नहीं पा रहे थे । लिमि । का चेहरा पीला पडा हुआ था । हो गया तो भी नजर आ रही थी । वे वरमाला चिंतित और परेशान थे । तब चुकी थी एक अमानवीय स्तब्धता के घर में शायद एक घटित घट जाने के धक्के से आका किसी को बोलने की हिम्मत नहीं पढा रही थी । वो आगे बढना चाहते थे, पर उनके पास जैसे एक ही जगह पर जम गए थे । हारकर वही बोले निर्मला मेरा विश्वास करूँ, मैंने एक काम नहीं किया है । निर्मला की आंखों में आंसू उछल चला है । क्या तुम सोचती होगी मैं ऐसा कर सकता हूँ । ये सब आपने किया या नहीं इस बात का पता तो पुलिस लगाएगी । पर्सनल सोचिए इस घर में इतने बडे बच्चे हैं, उन पर क्या असर पडेगा आपके लक्ष्यों का? अपराधी की भारतीय सिर झुकाए प्रकाशचंद्र खडे रहेंगे । उनके पास अपने बचाओ या सफाई के लिए कहने को कुछ भी तो नहीं था । आपने इस उम्र में तो झूठ में आकर अपने को इतना नीचे गिरा दिया । ज्यादा तो सोचा होता अपने पद के बारे में थोडा सा भी खयाल क्या होता? मेरा और बच्चों का मुझे अफसोस है । निर्मला तो ये है कि मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि मैं बुरी तरह से पार्टी वैवाहिक संबंधों के दलदल में फंस चाहूंगा । अगर मुझे पता होता कि इसमें इतने खतरे हैं तो तो मैं सीमा के पास कभी नहीं आता और दूध पीते बच्चे से ना अनायास प्रकाशचंद्र बिगड गए होते । स्वर में बोले इस दशा के लिए क्या सारी जिम्मेदारी मेरी है? ठीक है बिजनेस भरे रास्ते पर मेरा पांव फैसला मैं दलदल में जा गिरा । तुमने कौन सा प्रयास किया मुझे उसमें से बाहर निकाल लेगा । वो बुलाकर घर में कलह मचा अलगाव का नाटक कर मुझे दो लाते मारी ताकि मैं उस जंगल में पूरा का पूरा समाकर नष्ट हो जाऊँ । यही नहीं प्रतिशोध की आग में जलकर तुम भी उसी रास्ते पर चल पडी, जिसपर मैं बता गया था । पिताजी विवेक चीज कर बोला, मैं वहाँ पर ऐसा जिन्होंने आरोप मत लगाइए तो तुम्हारे ख्याल से निर्मला की आंखों में आंसू आ गए । उसका स्वर्ग भरा गया । वो अपनी बात पूरी नहीं कर पाई । हाँ, मेरे ख्याल से मुझे और तुम्हें कोई खास नहीं है । फॅमिली तो तो मैं मेरे घर से बाहर जाने और शंकर जी कार में बैठने पर संदेह हुआ । ठीक है जो स्वयं अपराध भावना से ग्रस्त हो । जो स्वयं ऐसे गंदे और हमारा काम करता हूँ, उसका अंतर्मन और सोच भी क्या सकता है? निर्मला ने हताशा से कहा पिताजी शंकर साहब मेरे बॉस है । माहौल ही कार में आदि जाती है । मान तीन चार घंटे के लिए अगर नैतिक समाजसेवा का काम शुरू कर दिया है, ताकि इस विषय ले दमघोटू घर के माहौल से कुछ तो मुक्ति मिलेगा, नहीं तो चौबीस घंटे । इसी में रहकर तेंदुलकर के घुटने मारते रहो हो । उस दिन रात को दस बजे भी क्या समाज सेवा कर के आ रही थी । समाज सेवा नहीं था, परिवार के उत्तरदायित्व का निर्माण अवश्य कर रही थी । अकेले ही क्या करती साथी को तो इस उम्र में भी जो बन से फुर्सत नहीं थी । प्रकाशचंद्र की समझ में कुछ नहीं आया । मूल जैसे खडे रहे पिताजी आपको तो ये भी नहीं बताऊँ की संकर साहब ने उस रात को माँ और वे को अपने घर खाने पर बुलाया था । आशा को दिखाने के लिए माँ और भैया को लडकी पसंद आ गई है । मालूम नहीं सुखद अप्रत्याशित सूचना दी प्रकाशचंद्र के संपूर्ण शरीर में सरसराहट फिर गई । बच्चे इतना बडा हो गया था शादी लायक और एक वो है कॉलेज के छोकरों की तरह एक सहकर्मी के प्यार में दीवाने हो गए थे । छीछी उनका अपराधबोध और खेल भावना के आ गई । पता नहीं अब ये संबंध होगा या नहीं । जब शंकर साहब को पता चलेगा की लडकी का पिता एक अपराधी हत्यारा है तो निर्मला की बात पूरी नहीं हो पाई । प्रकाशचंद्र बीच में ही चीज पडेगा नहीं करवा रहा हूँ मैं कसम खाता हूँ मेरा विश्वास करो ना मैं अपराधी हूं ना हथियार आऊंगा । मैंने एक अपराध अवश्य किया था । इस पति वैवाहिक संपर्को साबित करके मुझे इसकी भरपूर हजार मिल चुकी है । मैं तुम सबसे माफी मानता हूँ । मुझे माफ कर तो मुझे इस दलदल से निकलने में मेरी मदद करो । प्रकाशचंद्र का आर ना सबको पहला गया । खून के रिश्तों में खिंचाव भले या जाए और संकट की घडी आ गयी । वो खिंचाव और तनाव तुरंत समाप्त हो जाता है । लडकी बडी सुंदर है । अंकल जी का परिवार बडा अमीर है । अच्छी शादी करेंगे वे लोग फिर उसके बाद फॅमिली में भागीदार बन जाएगा । इससे बढिया संबंध और कहाँ मिलेगा? मैं तो सोचती हूँ इस कांड की उनको भारत बिना लगे वरना लडके का भविष्य नष्ट हो जाएगा । निर्मला शांत स्वर में कहा पिताजी अगर आपने ये सब नहीं किया है तो आप अपने को निर्दोष करने के लिए कुछ कीजिए ना देखने का ठीक है । मैं अस्पताल जाकर सीमा से मिलता हूँ । केवल भाई है जो मुझे फांसी के फंदे से बचा सकती है । कहते हुए प्रकाशचंद्र घर से बाहर आ रहे हैं । कार्लेकर वो सीधे अस्पताल पहुंचे । आपातकालीन वार्ड आदि में एक डेढ घंटे तक पूछताछ करके भी वो सीमा लाल का कुछ भी पता नहीं लगा सके । इस नाम की कोई मरीज अस्पताल में नहीं थी । वो उदास और निराश लौट गए । अपने घर ना जाकर वो सीधे सीमा के घर गए । हो सकता है उसे छुट्टी मिल गई हो और वह घर में हूँ । वो सीमा के घर पहुंचे तो पाया वहाँ ताला लगा है । किंकर्तव्यविमूढ से वहाँ खडे इधर उधर नीचे ऊपर देख रहे थे । क्या करें? किस से पूछे? अभी वो सब पढाई से खडे हुए थे । ऊपर वाले फ्लैट से एक महिला नीचे उतरी । उन्होंने वहाँ खडा देख वो बोली क्या मांगता है ये लोग कहाँ चले गए? प्रकाश इन्होंने सीमा के घर की तरफ इशारा कर के पूछा । बेचारा पूरा घर बर्बाद हो गया हूँ । चुनाव है लाल की कल रात हत्या हो गई थी । उनकी पत्नी जो कल रात अस्पताल में भर्ती हुई थी, वो कहाँ है? उसका अभी डेट मृत्यु हो गया । क्या कर वह दक्षिण भारतीय महिला चली गई तो क्या सीमा भी नहीं रही है? नहीं ये नहीं हो सकता । प्रकाशचन्द्र का पूरा शरीर कम गया, वो पसीने से नहा गए । अगर ये सच है तो उनका क्या होगा? उनकी निर्दोषता को सिद्ध करने वाला प्रत्यक्षदर्शी साक्षी समय के लिए जा चुका था । प्रकाशचंद्र संज्ञाशून्य से खडे रह गए । उनकी आंखें छलछलाता आई । वो सोच रहे थे उन्होंने लाल की हत्या नहीं की । पर क्या वो सीमा की मृत्यु के लिए जिम्मेदार नहीं है । नहीं वो सीमा के हत्यारे हैं । उन्होंने उसकी हत्या की है । पर इस अपराध के लिए उन्हें कोई न्यायालय सजा नहीं दे सकता । वो अपराधी हैं, उन्हें सजा मिलनी चाहिए । दौर में बैठे वो बडा गए तब तक मालूम हुए जा चुके थे । केवल निर्मला घर पर थी । महीनो बाद उन्होंने अपनी पत्नी को अनुवाद भरी दृष्टि से देखा था । महीनो बाद ही निर्मला के अंदर मैं इस विश्वासघाती पुरुष के प्रति करोड पहुँची थी हूँ । निर्मला ने बडी उत्सुकता से पूछा होना क्या था? क्या क्या प्रकाश उन्होंने अपना हूँ एक शिशु की भारतीय निर्मला के वर्ष में दिखा दिया और फोड फोड कर होने लगे । भेज क्यों? और लडकियों के बीच टुकडो टुकडों में उन्होंने वो दुखा समाचार निर्मला को सुना दिया भी तो हो गया । निर्मला भी कंपनी और में बॉल पडे भी थी परन्तु सीमा की मृत्यु का समाचार उसके अंतर के कई आशान कोनों में महा शांति का सृजन कर गया हूँ । समझ झंझट का मूल रोज नष्ट हो चुका था । थाना की भावना चोर की भर्ती दबे पांव अंतर में घुसी थी पर वो पति के ऊपर मंडराने वाली अशुभ छाया से आकाश थी । घर में पुनर्मिलन, थोडी आंतरिक शक्ति का संचार किया परन्तु प्रकाशचंद्र दफ्तर जाने का साहस नहीं जुटा पाए । उन्होंने संयुक्त सचिव को फोन कर दो दिन का आकस्मिक आॅस्ट्रेलिया घर और निर्मला के आंचल में आश्रय पापा वो कुछ आश्वस्त हो चुके थे परंतु लगभग चार बजे जब माला लौटी तो उसका मुड सफेद पडा हुआ था । वो कहाँ रही थी । वो संपूर्ण विनाश का समाचार लेकर आ रही थी । उसके हाथ में शाम का अखबार था । उसके मुख्य प्रश्न प्रकाशचंद्र का फोटो छपा था । साथ ही शीर्षक था सरकार के कुछ अधिकारी पर प्रेमिका के पति की हत्या का संदेह और फिर पूरी की पूरी कहानी मुख्य पृष्ठ पर छपी थी । उनके और सीमा के प्रेम प्रकरण का समाचार सब था । पर कल रात की घटना का विवरण एकदम झूठा था । अखबार में छपा था इस प्रेम ने कुछ दिनों से बडा खतरनाक मोड ले लिया था और उसके पति लाल में अक्सर जोडा होता था । हत्या से कोई एक सप्ताह पूर्व लाल अपनी पत्नी को पीटा था और जो सीमा न नींद की गोलियां खाकर आत्महत्या करने की कोशिश की पर वो बच गई । फिर सीमा प्रकाश इन्होंने मिलकर लाल को पैरासेल चलाने का फैसला कर लिया । लेकिन होना षड्यंत्र बच्चा गया । कल रात प्रकाशचंद्र सीमा के घर गए । रात को कॉफी में देखते इस विश्व मिला दिया गया । इसके परिणामस्वरूप कॉफी पीते ही लाल की दशा खराब हो गई । उसे अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया । बहुत ही पुलिस के आगे जांच करने और प्रमाण जुटाने का समाचार भी छपा था । अगर मैंने लाल की हत्या की होती तो सीमा की उम्र थी । उसे तो जीवित रहना था । चंद्रा साहब जी हो रहे हम लोग तो कहीं के नहीं रहे । अखबार वालों को आपका ये फोटो कहाँ से मिल गया? निर्मला मैं चिंतित होकर पूछा, बोले से लिया होगा पुलिस के पास कहाँ से आया? दफ्तर से लिया होगा वहाँ सुरक्षा अनुभाग में और अवसर और कर्मचारी का फोटो उपलब्ध होता है । पर इस तरह मेरा फोटो अखबार में छापकर उन्होंने मेरी मानहानि की है । मैं पुलिस पर मानहानि का दावा करूंगा । प्रकाशचंद्र असंगत बातें करने लगे । तभी टेलीफोन की घंटी बजी । निर्मला गए और फोन पर बात करने लगी । कुछ बाद वो आकर बोली इंस्पेक्टर का फोन है तो आपको थाने बुला रहे हैं । उसके लिए मजाक हाँ हूँ ।

भाग - 18

उसकी आवाज से ऐसा लग रहा था जैसे वो किसी निष्कर्ष पर पहुंच गया है । मैं भी और आक्रोश में भरे प्रकाशचंद्र खडे हो गए । प्रकाशचन्द्र कार में खाने जा रहे थे और उनके अंतर में हाहाकार मचा हुआ था । मैं कर उथल पुथल हो रही थी । अखबार में छपे समाचार ने उनकी प्रतिष्ठा को धूल में मिला दिया था । यही नहीं उन्होंने थाने बनाने का था, ऍम है अपराधी मान लिया है । इसी उथल पुथल और आस व्यस्तता के बीच प्रकाशचन्द्र के अंदर मन में जैसे बिजली सी चमकी, उन्हें सीमा द्वारा कहे गए को शब्द याद आ गए । लाल कौन से दूध के धुले हैं? मैं जानती हूँ वो चंडीगढ क्यों जाते हैं? नरेंद्र की पत्नी से जिस प्रकार उन पर हत्या का संदेह किया जा रहा है या उसी प्रकार नरेंद्र पर नहीं किया जा सकता है । यदि आपने मार के कांटे लाल को रास्ते से हटाने के लिए उसकी हत्या कर सकते हैं, उसी भांति नरेंद्र इच्छा वर्ष अपनी पत्नी के प्रेमी की हत्या कर सकता है । इस विचार के साथ ही उनके अंदर साहस और आत्मविश्वास का संचार हो गया । वो पुलिस थाने पहुंचे । इंस्पेक्टर उनकी प्रतीक्षा कर रहा था । उन्हें देखते हैं वो उठा और सख्त स्वर में बोला मुझे अफसोस के साथ कहना पडता है कि सब इंस्पेक्टर यह हत्याकांड है । इसमें जल्दबाजी में किसी निर्णय पर पहुंचना तुम्हारे लिए परेशानी का कारण बन सकता है । प्रकाश उन्होंने दृढतापूर्वक का इसमें जल्बाजी कुछ नहीं । अब तक जितनी जांच पडताल हुई है, लोगों की गवाहियां हुई है, उनमें से ही की बात होती है या आप सीमा से प्यार करते थे और आप दोनों ने मिलकर कल रात लाल को कॉफी में विश लेकर उसे मार डाला । इंस्पेक्टर ने कहा फिर तो शुरू कर वह हिचकिचाता हुआ बोला मैं मजबूर मुझे ऊपर से आदेश मिलेंगे । आप को हिरासत में ले लूँगा । ये क्या होता है? किसने आदेश दिया है मुझे उसका नाम बताओ ना उससे बात करना चाहूंगा । इंस्पेक्टर कुछ पल ठंड का फिर वो बोला अपनी सफाई में आप कुछ कहना चाहते हैं । मैं कुछ कहना ही नहीं बल्कि कुछ करना भी चाहता हूँ । मैं तुम से कुछ पूछना चाहता हूँ । प्रकाशचन्द्र कुर्सी पर बैठ गए । इंस्पेक्टर हुई अपनी कुर्सी पर जम गया । तीन साल की मृत्यु कैसे हुई प्रकाश? उन्होंने पूछा । डॉक्टरों की राय थी जो पति की मृत्यु का सम्मान सह नहीं पाई तो इसका मतलब है कि वो लाल की हत्या के षड्यंत्र में शामिल नहीं थी । ये कैसे सिद्ध होता है? इतनी साधवानी बात ही तो मैं समझा नहीं होगी । अगर सीमा चाहती थी कि उसका पति उसके रास्ते से हट जाए तो उसे सदमा क्यों होता है? इंस्पेक्टर निरुत्तर हो गया । एक बात और इंस्पेक्टर लाल को जहर कहाँ दिया गया हूँ घर में या बाहर मतलब? जब मैं सीमा के पास तो फिलहाल घर पर नहीं था । वो चंडीगढ से आए अपने मेहमान और उसकी पत्नी को लेकर कनॉट प्लेस गया हुआ था । ये समय मैं सीमा के घर से लौटा तब तक ये लोग बाहर से नहीं लौटे थे । इंस्पेक्टर के मुख पर अविश्वास की रेखाएं थी । आपको इस कारण की इस समय सूचना मिली थी पर दस बजे अस्पताल से फोन आया था । लाल को अस्पताल कहाँ से पहुंचाया गया? गर्जिया किसी होटल से ये तो पता नहीं मेरा अपना क्या जांच पडताल की ऍम बॅाडी सीमा जीवित होती तो सारी सच्चाई सामने आ जाती पर वो तो मुझे इस मुसीबत में फंसा कर चली गई पर लाल को अस्पताल होटल से अगर से लाया गया इससे क्या फर्क पडता है या बच्चों जैसी बातें करते ॅ अगर लाल को किसी होटल से सीधे अस्पताल लाया गया तो इस कार्ड में मैं कहाँ से आता हूँ । मैं तो सीमा के बाद घर पर डाल आगे होटल में परिस्तिथि का अब कैसे पता चल सकता है । हद कर दी तुमने । इंस्पेक्टर तुमने सीमा लाल की बच्ची बिंकी से कुछ पूछा क्या तुम नरेंद्र फॅार से जो लाल को अस्पताल ले गया था? पूछताछ नहीं कर सकते हैं? इंस्पेक्टर विचार मन सा बैठा रहा तो फॅालो मेरे साथ चलो कुछ बताया । सीमा की बच्ची पिंकी का होगी । हाँ वो अपने घर बडी है । उन लोगों के कुछ रिश्तेदार आ गए तो चलो प्रकाशचन्द्र इंस्पेक्टर को लेकर सीमा के घर पहुंच गए । पिंकी ने उन्हें देखा तो उनसे लिपट लिपटकर फूट फूटकर रोने लगी । उसकी आंखें सूजी हुई नहीं लाल लाल अंगार जैसी वो रोते हुए बोली चाचा जी और पिताजी कहाँ चले गए । अब मैं अकेले कैसे रहूंगी? मैं जिंदा नहीं रहूंगी । मैं भी मर जाउंगी । प्रकाशचंद्र द्रवित हो गए । उन का अंतर कैसा गया? एक अबूझ बालिका का करोड बंधन सुन देकर बस एक ही विचार उनके मन में था । मामा तो छुट्टी बाग गए रह गई बेचारी यानाथ अकेली पालिका इस संसार के संकटों से जूझ ने के लिए या विभाजित और संबंधों की विभीषिका का ये पहलू भी महत्वपूर्ण नहीं माँ बाप वासना की आग में अंधे हूँ । अपने बच्चों के भविष्य के बारे में भी भूल जाते हैं । सच हुई है कि पिंकी की दो वर्ष के लिए आंशिक रूप से वो स्वयं भी जिम्मेदार थे । अपराध भावना से ग्रस्त उन्होंने पिंकी को अपने से चिपटा लिया । उसके बालों और पीठ पर इसने कहा, फेरते हुए वो आपने स्वर में बोले पिंकी बेटे, तुम चिंता मत करो, हम है । हमारे होते हुए तो मैं कोई परेशानी नहीं होगी । इतना सहारा काफी था । पिंकी थोडी आश्वस्ति हो गई तो प्रकाशचंद्र बोले दिन की बेटे इंस्पेक्टर साहब तुम से कुछ पूछना चाहते हैं क्या? मेरे बारे में पूछिए । इंस्पेक्टर ने प्रकाशचंद्र को देखा और बोला आप भी पूछे जिनकी बैठे कल रात हम तुम्हारे पास घर आए थे । अच्छा चलिए हम कब तक ठहरे थे? ठीक टाइम तो नहीं पता जब हम तुम्हारे पास से तो क्या तुम्हारे पिताजी भी घर में थे नहीं, वो कहाँ थे? चंडीगढ से उनके दोस्त नरेंद्र चाचा जी और उनकी पत्नी आए थे । पिताजी उन्हें बाहर ले गए थे । जब वे लोग लौटे तो क्या घर पर था नहीं क्या पिताजी ने घर लौटकर कॉफी पी थी? कहाँ चाचा जी आप के जाने । करीब एक घंटे बाद नरेंद्र चाचा जी पिताजी को अपनी कार में डालकर लाए थे । अंदर आकर वो वहाँ से बोले कि लाल की तबियत अचानक खराब हो गई है । मैं बहुत घबरा गई । उनके साथ नहीं । कार में बैठकर अस्पताल चली गई और फिर दोनों कहते हुए अचानक पिंकी फिरसे रोली हिम्मत रखो । बेटे प्रकाशचंद्र ने पिंकी को साथ ना दें । चंडीगढ वाले चाचा जी और चाचीजी कहा । इस बार इंस्पेक्टर ने पिंकी से पूछा पता नहीं कल के बाद हमने उन्हें नहीं देखा । प्रकाश इन्होंने इंस्पेक्टर पर प्रश्न सूचना दृष्टि दिखा दी । फिर उन्होंने कहा कुछ और बोलना है नहीं अच्छा पिंकी बेटे तो मंदिर जाओ । अब हम तुम्हारे पास कल आएंगे । प्रकाश । उन्होंने कहा और वो इंस्पेक्टर के साथ कार में आप बैठे हैं । इस कार्ड तो एक विचित्र मोड ले लिया । मेरे ख्याल से हमें चंडीगढ जाकर नरेंद्र से पूछताछ करनी होगी । इंस्पेक्टर स्वीकार किया । प्रकाशन अपने को सुरक्षित महसूस करने लगे थे । उन्हें इस बात का संतोष था कि जो बयान पिंकी ने दिया था उसे इंस्पेक्टर ने लिख लिया था । उसी के आधार पर वो इस हत्या के आरोप से साफ बडी हो जाते थे । तुम अकेले जल्दी और जाना पसंद हो गया । मैं भी चलो प्रकाश उन्होंने पूछा इसके लिए ऊपर से आदेश लेने पडेंगे साहब । इंस्पेक्टर का आरोप मुलायम पड चुका था । ठीक है तुम आदेश ले लो । मेरे साल से इस काम में देरी करने की जरूरत नहीं । आज रात की गाडी से चंडीगढ रवाना हो जाना चाहिए । ठीक है साहब प्रकाशचन्द्र इंस्पेक्टर को पुलिसवाले छोडकर लौट आएगा । उनके मुख पर विजय की चमक तो थी पर साथ ही इस दोहरे हत्या अमृत्युः कार्ड ने नदी दृष्टि से उन्हें तोड कर दिया था । जैसे वो घर में उसे निर्मला ने उतावलेपन से पूछा क्या हुआ? कुछ नहीं ताकि कहा जारी है इंस्पेक्टर ने क्यों बुलाया था गिरफ्तार करने के लिए गिरफ्तार करने के लिए? तो क्या पता नहीं कहाँ कहाँ के नाकारा आयोग और भ्रष्ट लोगों को ऐसे संवेदनशील विभाग में भर्ती कर लिया गया है । बिना पूरी जांच पडताल की गिरफ्तार करने चले थे । दफ्तर से आपके संयुक्त सचिव का फोन आया था । निर्मला ने एक आतंकित करने वाली सूचना दी । क्या कह रहे थे पूछ रहे थे । आप गिरफ्तार हो गए । मैंने मना किया तो कहने लगे कि जब हुआ है तो उनसे कहिए तो मुझे सचिव से बात कर ले ते का प्रकाशन में कुछ सोचा । फिर वो बोले फोन पर क्या बात करूंगा । कल दफ्तर जाकर उन लोगों को सारी वस्तुस्थिति से अवगत करा दूंगा । ठीक है, घर में एक मन हो, उसी शांति व्याप्त हो गई हूँ । और लेकिन सुबह प्रकाशचंद्र दफ्तर पहुंचे । उन्हें बडा विचित्र अनुभव था । हर व्यक्ति उन है, ऐसे हो रहा था मानो विचित्र जानता हूँ, जिसे उन्होंने अपने जीवन में पहली बार देखा हूँ । वो अपने कमरे में जाकर बैठे थे कि मित्रों के फोन का तांता लग गया । व्यक्तिगत रूप से आने वालों की भी भीड जमा हो गई । हर कोई पूछ रहा था क्या यह सच है? पिछली शाम के समाचार पत्र नहीं । ये सारा नाटक शुरू किया था क्योंकि पूरे दफ्तर को उनके और सीमा के प्रेम पटाका पता था । उन लोगों को सत्य कांड के संदिग्ध अपराध के तथा करते । जो हम पर विश्वास हो चला था, वो किसी से क्या कहते हैं? अरे कोई विश्वास दिला रहे थे । ये झूठ है, गलत है और उनकी प्रतिष्ठा और पद की गरिमा का सर्वनाश हो चुका था । इतना घोर अपमान लोगों के सामने नजर उठाने का साहस नहीं हो रहा था । पूरे दफ्तर में उनके कथित हत्यारे होने का समाचार जंगल में आग की तरह फैल गया था । लोग चर्चाएँ कर रहे थे । उनकी आलोचनाएं हो रही थी तो अभी संयुक्त सचिव का फोन आया । उन्हें तत्काल आने का आदेश दिया गया । वो भयभीत, आतंकित, घबराए हुए से संयुक्त सचिव के कमरे में घुसे । उनके प्रवेश करते ही संयुक्त सचिव ने उन पर व्यंग्य वर्ष और हम कर दीजिए ये सब क्या है? फॅमिली है तुमने कितने जिम्मेदार अवसर होगा । ये सब गलत है । ऐसा तब बहुत नाराज है । तुमसे उन्होंने तो मैं तत्काल मोर्कल करने के आदेश दिए हैं । मैं तुम्हारे आने का इंतजार कर रहा था । मोटेल प्रकाश उन्होंने दोहराया अपमानिक और लज्जित होने की सीमा फिर भी उन्होंने साहस जुटाया और बोले साहब ये मेरा दुर्भाग्य है कि मैं निर्मूल झंझट में फस गया हूँ । पर ये भी सच है कि मैं निर्दोष हूं तो क्या पुलिस है? तुम्हें गिरफ्तार नहीं किया नहीं साहब, पुलिस आगे जांच पडताल कर रही है । मुझे होटल करने का पर्याप्त आधार नहीं है । मैं प्रार्थना करता हूँ की आप दो चार दिन ठहर जाइए । आपको शीघ्र ही पता चल जाएगा कि मैं निर्दोष हूं । इस हत्या के लिए कोई और जिम्मेदार है ठीक है पर इसके लिए तो मैं सचिव से मिलना होगा । मिलूँगा साहब ठीक है । तुम जा सकते हो, लज्जित और अपमानित हो । वो संयुक्त सचिव के कमरे से बाहर आए । शाम तक कई बार प्रयास करने के बाद लगभग चार बजे उन्होंने सचिव के कमरे में जाने की आज्ञा मिली । कुछ दिनों पूर्व सचिव कितनी शालीनता से उनसे व्यवहार करते थे । वही सचिव उन्हें उप सचिव नहीं, एक लट समझ बुरी तरह छोड रहे थे । प्रकाशचन्द्र के पास अपनी सुरक्षा के लिए कोई कवर नहीं था । वो आप मान के बाद से मिले, बहुत लहूलुहान बैठे रहे । उनके कम लाल गाल, तमतमाए और आंखें जलने लगी थी । प्रकाशचन्द्र उमर है तुम्हारी इस तरह के प्रेम नाटक करने की । चार्ली लाइक हमारे बच्चे हैं या एक उच्च पद पर? तुम हसीन हो, समाज में तुम्हारी प्रतिष्ठा है । फिर भी तुम लोग छे छे बात कर दी है । अगर जिम्मेदारी निर्लज ना और चरित्रहीनता की जी मैं तो आता है कि आज नियमों के अनुसार तो नौकरी से निकाल दो । सचिव बेहद पकडे हुए बढाए चले जा रहे थे । प्रकाशचन्द्र गर्दन झुकाए सबकुछ सुन रहे थे । जो कुछ सचिव ने कहा वो शरद है, सत्य था । उसको सुनकर उन्हें क्रोध नहीं आया । उल्टे पश्चताप और लाने की ऐसी ज्वाला धक्की जो उनका सर्वस्य भस्म किये जा रही थी । इंसान की जिंदगी में एक ऐसी स्थिति तो आनी चाहिए । वो किसी अन्य नारी को देखे तो उसके मन में वासना के स्थान पर श्रद्धालुओं मुझे समझ में नहीं आता तो हम जैसे समझदार, परिपक्व और संतुलित व्यक्ति नए भयंकर भूल कैसे की साहब मैं अपनी सफाई मैं कुछ नहीं कहूंगा । केवल मुझे इतना ही कहने की अनुमति दीजिए । ये मेरे जीवन की महान, भयंकर मूर्खतापूर्ण होती थी । इसके लिए मैं जिंदगी भर अपने को शमा नहीं कर पाऊंगा । मैं आपको विश्वास दिलाता हो जाता है । इस कारण में जो विनाश हुआ है उसके लिए संपूर्ण रूप से नहीं दोषी नहीं होगी । कृपया कुछ दिन प्रतीक्षा करके देख लीजिएगा । प्रकाश इन्होंने उन्होंने विनय भरे स्वर में कहा, सचिव कुछ नहीं बोलेंगे । हाँ, वो थोडे संतुष्ट लग रहे थे । इसमें जो कुछ इलाज हुआ है मैं उसके पुनर्निर्माण की कोशिश में जोड रहा हूँ साहब, इस समय मैं आपसे क्षमा प्रार्थना करने की स्थिति में भी नहीं । पर मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ । मैं शीघ्र ही वहाँ चुरा और व्यवहार करूंगा जो सामान्य और सहज व्यक्ति को करना चाहिए । ठीक है अब तुम जा सकते हो । दक्षिण ने आदेश दिया, प्रकाश अंदर उठे और निष्प्राण से कमरे के बाहर आ गए । सीमा की दुखद मृत्यु के पांचवे दिन की शाम खुशखबरी और दो भरी खबरें तो नहीं साथ लेकर आई । पिछले पांच दिनों में प्रकाशचंद्र जीवित होते हुए भी मृत्यु कभी शाम हो रहे थे । इधर हत्याकांड में फंसने कम है । उधर सीमा की मृत्यु की नैतिक जिम्मेदारी इन दोनों बात उन्हें उन्हें बुरी तरह तोड कर रख दिया था । किसी के साथ मिली थी एक और कटु अनुभूति विवेक शाम को जल्दी लौट आया । घर में घुसा किसी से कोई बोल चाल नहीं । वो सीधा अपने कमरे में गया । अंदर से उसे बंद कर वो पालन पर पड गया हूँ ।

भाग - 19

प्रकाश और निर्मला की निगाहें आपस में टकराई । अवश्य कोई खास बात है तो वहाँ क्या कर गया था कि आज देर से लौटेगा? निर्मला ने धीमे स्वर में कहा फिर इतनी जल्दी कैसे लौट आया? जरूर आशा से जुडा हुआ होगा । आशा हाँ, शंकर जी की लडकी उसी के साथ हुए घूमता फिरता रहता था । मुझ से निर्मला विवेक की कमरे में गई । देखा वो पलंग पर होना पडा है । जूते पहने हुए में कोई उत्तर नहीं विवेक क्या हाँ क्या हुआ वही जिसका डर था आशा से जुडा हुआ नहीं । आशा कह रही थी कि पिताजी ने इस संबंध के बारे में साफ इंकार कर दिया । ठीक है अगर ऐसा है तो मैं उसे लेकर क्यों बेकार में घूम फिर हूँ । पर शंकर जी ने मना कर दिया क्या यह भी बताना होगा? तो क्या हम ये सब गडबड पिताजी की वजह से हुई है? आशा की माँ बाप को कैसे दोष दिया जा सकता है? अगर आप उनकी जगह होती तो क्या अपनी इकलौती बेटी का हाथ एक हत्याकांड में फंसे व्यक्ति के बेटे के हाथ में दे दी? अनायास विवेक तमतमाकर खडा हो तेजेश्वर में बोला निर्मला का अंतर कैसा गया? पिता के को कर्मों की सजा बेटा बहुत रहा था, पर वह क्या कर सकती थी? पिताजी ने मैं कहीं का नहीं रखा । सुषमा दोस्तों के सामने शर्म के मारे सिर्फ नहीं उठता । आशा भी कुछ को लेकर सवाल पूछ रही थी । हम लोगों की तो मिट्टी खराब करदी । पिताजी के इसका ना मिले हमें तो उन्हें पिता कहने में भी शर्म आती है । मेरे उखडकर बोला दरवाजे के बाहर खडे प्रकाश उन्होंने ये सुना तो लगा किसी ने उनके कलेजे पर हथौडा मार दिया है । ठीक ही है । वो गलत थोडी कह रहा था । उनके द्वारा की गई ये भूल या कोकम एक साधारण घटना नहीं थी । वो तो एक ऐसा तूफान था जिसने भयंकर विनाश किया था । चारों तरफ तबाही तबाही मचा दी थी । वृक्ष उखड गए थे । हर ढाए गए थे । रास्ते टूट गए थे । पशु बह गए थे । उनका बातों से जिंदगी की नहीं तक हिल गई थी । इस संपूर्ण बिना शिला की जिम्मेदारी उन्होंने अपने ऊपर ले ली थी और चारा भी किया था । हाँ, उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर पुनर्निर्माण कहाँ से शुरू होगा । जितनी शीघ्रता से विनाश हुआ था, उतनी ही देरी और धीमी गति से उन अवस्थान होगा । माँ बेटे को अकेला छोड वहाँ से हटाए । वो सीमा के पति के हत्यारे नहीं थे किंतु उन्होंने अपने बेटे की खुशियों की हत्या आवश्यक ई थी । पश्चाताप की अग्नि में चलते हुए वो फोन के पास पहुंचे । चार दिन से पुलिस पैटर्न ने उनसे संपर्क नहीं किया था । फिर वो चंडीगढ गया या नहीं । अगर गया तो क्या नरेंद्र से पूछताछ करने पर कोई महत्वपूर्ण सुराग हाथ लगा? उन्होंने इंस्पेक्टर को फोन किया । संयोग वर्ष को मिल गया । उन्होंने पूछा था इंस्पेक्टर चंडीगढ गए थे । जी हां आज शाम लौटाऊं कोई सूत्र मिला जी हमने नरेंद्र को गिरफ्तार कर लिया है । उससे पूछताछ जारी है । उधर होटल भी जाना है । चार । कल सुबह मैं आपके पास आऊंगा । इंस्पेक्टर बोला नरेन्द्र ने कुछ बोला अभी तो कुछ नहीं । मामला बडा पेचीदा हो गया । मेरा मैं कॅण्टकी सहायता ले रहा हूँ । आशा है कल तो ये गुत्थी सोलह जाएगी फॅार कल मुझे जरूर बताइएगा जी प्रकाश उन्होंने फोन बंद कर दिया । वो गलियारे में निरुद्देश्य भडक पे रहे । उधर विवेक और निर्मला अभी भी कमरे में खेले थे । अवश्य उनकी चमडी उधेड रहे होंगे । माला का कहीं कोई पता नहीं था । रात के दस बज गए थे । वो अभी तक नहीं लौटी थी । घर में सारा खाना बना, पर खाया, किसी ने भी नहीं । खादी कैसे सकते थे विवेक निराशा बेहद हतोत्साहित माला के ना आने से निर्मला बेहद चिंतित और परेशान थी और प्रकाशचंद्र पिछले पांच दिनों से उन्हें नहीं आ रही थी और ना ही भूख लग रही थी । खाना में इस पर लगा रखा रह गया । यह प्रकाशचंद्र लॉन में घूम कर अंदर घर में आए तो देखा ग्यारह बज रहे हैं । विवेक की कमरे की बत्ती हो चुकी है । हाँ, उनके अपने कमरे में हल्की रोशनी अवश्य बिजली हुई थी । वो कमरे में गए । आशंका, भय और चिंता से ग्राॅस से खडे रह गए । वो एक्टर अपनी फॅमिली को ले आ रहे थे । उनका मन वितृष्णा से भर गया था । उन्होंने अपने ऊपर लानी हो रही थी । उन्होंने अपनी संपूर्ण बोलता हूँ । कोई झटके से मकडी के जाले की तरह परेज हटा दिया । उन्होंने एक नया जीवन शुरू करने का दृढ निश्चय कर लिया । एक ऐसा जीवन जिसमें पति पत्नी के बीच कभी कोई तीसरा प्राणी ना सके । प्रकाश चंद्र खडे हुए थे । उनके माथे पर पसीना को हराया था । वहाँ अपने से लगे थे । उन्हें लग रहा था जैसे भारतीय मारते वो काफी दूर निकल आए थे । उसी बिंदु पर उन्हें लौटना था । उन्होंने वापस दौडना शुरू कर दिया । इस दौड में वो अपनी जिंदगी का काफी कुछ मूल्यवान और महत्वपूर्ण दांव पर लगाकर हो चुके थे । वो सब कोन है लौटाकर लाना था । वो बत्ती बुझाकर पलंग पर लेट गए लिंडी के बगल में । हालांकि निर्मला की पीठ उनकी तरफ थी । वो अंधेरे में उसके निर्दोष निष्पाप कोई नाटक देख रहे थे तो महसूस कर रहे थे जैसे निमी होने सुबह रही है । वो हो रही थी अंदर ही अंदर बाहर कुछ नहीं था । आसु तक नहीं प्रकाशचन्द्र का आप नियंत्रण ढीला पडा गया । वो भी में से बोले ले नहीं । उनका संबोधन निर्धारित रह गया । ऍम रो रही हो नहीं फिर सोच रही हूँ क्या अब क्या होगा? जबकि हो जाएगा चिंता मत करो फिर महा शांति फिर वही मौन शांत रोधन काफी देर हो गयी, ठीक कर लूंगा । अनायास निर्मला ने करवट पलटी और पलंग पर उठकर बैठ गई । फिर अपने दोनों हाथों से प्रकाशचन्द्र के सिर को पता झकझोरती हुई बोली ये तुमने क्या कर डाला? जिंदगी ने मेरे साथ बडा करवा मजा किया था । नहीं आखिर तो मैं हूँ किया गया था ना एक विकृति का शिकार हो गया था । जैसा विध्वंस किया उसने जो नष्ट हुआ है उसे फिर से बना लेंगे । बहुत मुश्किल है । कोशिश करना फर्ज है । तभी फोन की घंटी बजे ग्यारह बजे हैं । इस समय किसका फोन हो सकता है? निर्मला बोलिए पुलिस का ना हो कहते हुए प्रकाश इन्होंने पलंग की पार्टी के पास जहाँ आगे जो का रिसीवर उठा लिया और बोले चलो कौन पिताजी बोल रहा हूँ पर तुम कहाँ से बोल रही हूँ? माला घर क्यों नहीं आई? नई और नहाने का विचार है । मतलब प्रकाश उन्होंने चौकर पूछा, फोन पर माँ को बुला सकते हैं, वो यही है जय का प्रकाशन में रिसीवर निर्मला को बताते हुए कहा माला का है निर्मला की लाइन पर आते ही माला नहीं एक ही साथ अपना संदेश दे दिया । बहुत चिंता मत करना । मैं उनके साथ कल सुबह की गाडी से मुंबई आ रहा हूँ । मुंबई क्यों और उनके मामा फिल्म लाइन में है? कोई फिल्म बना रहे हैं जिसमें हम दोनों को रोल मिलने की पूरी उम्मीद है । माला की बेवकूफी मत करो । क्यों बेकार में जिंदगी बर्बाद करने पर तुली हो । आपके घर मेरे घर भी करुँगी बनने की उम्मीद है । हाँ तो बोल कहाँ से रही हूँ और उनके घर से मैं बाहर हूँ । ऍम हम लोग मुंबई जा रहे हैं । हमें कोई नहीं रोक सकता । क्या कर माला ने फोन बंद कर दिया । अंदर करो जान इस बार बाहर आ गया । रिसीवर हाथ नहीं रह गया । निर्मला फूट फूटकर हो रही थी । कुछ बात बोली मेरी इकलौती बच्ची को लौटा लाइए । अगर वह बंबई गई तो हम उसे हमेशा हमेशा के लिए खोलेंगे । प्रकाशचंद्र सबको समझ गए । पल भर को उनके मुख पर सास के सहायता कर गए । वो निराश बोले मम्मी, मेरे खयाल से अंबाला को लौटा पाना संभव है । शायद वो खुद ही लौट आए । असंभव मैं जानती हूँ इन पिछले दिनों उसके अंदर कैसी कैसी भावनाएं पैदा हुई है । अभी नहीं, पर ठोकने खाकर वाशी लौटाएगी । आज नहीं तो कल उसे मुंबई से लौट नहीं होगा । पर तब तक क्या बहुत देर नहीं हुई होगी? हो सकता है पर इस समय और क्या किया जा सकता है । पुलिस को सूचना दे दीजिए । उस से क्या बनेगा? माला बनी है और अपनी मर्जी से अरुण के साथ मुंबई जा रही है । इसमें पुलिस क्या करेगी? निर्मला कुछ दिनों के लिए समृद्धि रह गई । फिर वो अनायास फूट पडी । माला किस दूर्दशा के लिए भी आप ही जिम्मेदार है । आने में मैं स्वयं को अपराधी स्वीकार करता हूँ । रात गहरा गई थी । बाहर कुत्तों के बहुत नहीं । चौकीदार की सीडी की आवाज और जनशून्य से उत्पन्न साॅल्वर स्पष्ट सुनाई दे रहे थे । प्रकाश चंद्र को महसूस हुआ जैसे निर्मला बार बार वही चली जा रही है । उन्होंने उसे अपने बाहुपाश में मान लिया और इस ने भी एक स्वर में बोले सो जाओ । जिस तरह समय के साथ समस्याएं पैदा होती है, उसी तरह समय के प्रवाह के साथ उन का समाधान भी हो जाता है । निर्मला कुछ नहीं बोली । वो सोने की कोशिश करने लगी । सुबह प्रकाशचंद्र की नींद खुली तो देखा लेना पालन पर नहीं है । वो करोड बैठे, कुछ हो बात होने पाया । लिमिट दो प्याले चाय बनाकर ला रही है । ले मिले चाहे स्टूल पर अभी प्रकाशचंद्र बोले तो मेरे को बुला लेना था । बहुत दिनों बाद उन्हें मिला हुआ है । तीनों साथ ही चाय पी लेते । विवेक बाहर गया है । कहाँ माला को लौटाने उसे और उनके हर का पता है । प्रकाशचन्द्र आश्वास वोट है ब्रज करके उन्होंने चाहे भी तभी विवेक और माला गए । उनके अंतर्मन के का नाम कोने में संदेह का कीडा कुलबुला रहा था । उन्हें विश्वास नहीं था कि विवेक माला को लौटा पाने में सफल हो जाएगा । उन्होंने बच्चों से कुछ नहीं पूछा । पूछने की जरूरत भी क्या थी? हिमाला क्यों और क्या से लौटे । उन्हें तो इस बात का संतोष था । जिस काम को नहीं कर सकते थे उसे उनके बेटे ने संपन्न कर दिया था । उनकी बेटी लौट आई थी । यही उनके लिए बहुत बडा पुरस्कार था । निर्मला के मुख पर भी चल थी । सुख शांति और संतोष से लबालब और फिर अगले कुछ मिनटों में इंस्पेक्टर दिया गया पुनर्मिलन था । पुनर्निर्माण किस प्रक्रिया की? वास्तव शुरुआत करने । इंस्पेक्टर के आते ही सब के सब उदास और चिंतित हो गए । बैठक में उसे बिठाया गया । वहीं पूरा परिवार बैठ गया । इस हत्याकांड के ऐसे उद्घाटन को सुनने के लिए कहूँ इंस्पेक्टर जांच पडताल पूरी हुई । प्रकाश उन्होंने पूछा हूँ हाँ, लगभग पूरी हो चुकी है । लाल की हत्या का षड्यंत्र नरेंद्र नहीं रहा था और वहाँ क्या खुसी नहीं की है । उसके पर या प्रमाण प्राप्त हो गए । पूरा पैसा तो सुनाइए । इस बार विवेक ने उत्सुकतापूर्वक पूछा इंस्पेक्टर में संशय में पूरी कथा सुना देंगे । सीमा के पति लाल जब सार्वजनिक स्थान में कार्य करते थे, उसका एक क्षेत्रीय कार्यालय चंडीगढ में है । लाल कंपनियाँ काम से वहाँ जाते और साडी और कार्यालय के क्षेत्रीय प्रबंधक नरेंद्र के घर बडी ठहरते थे क्योंकि लाल हर बार वही करते थे । उनका नरेंदर की पत्नी से प्रेम हो गया । ये बात नरेंद्र को पता चल गयी । वो इस अवसर की तलाश में रहता हूँ । ये कब उन दोनों को यहाँ तो पकडा जाए और कब उनको इसको करनी की सजा दी जाएगी । पिछले सप्ताह कंपनियाँ काम से लंदन उसकी पत्नी दिल्ली आए । वो लाल के घर ठहरे दिन उन्होंने कंपनी का काम किया । शाम को लाल उन दोनों को काॅल में खाना खिलाने ले गया क्योंकि सीमा बेहद बीमार और कमजोर थी । वो इस रात्रिभोज में नहीं गई । वहीं पर खाना खाने के बाद लाल की कॉफी में नरेंद्र ने विश्व मिला दिया । नरेंद्र की पत्नी ने बडी कठिनाई के बाद इस बात की पुष्टि कर दी है कि ये रिश्ता मिलाया गया जब लाल पेशाबघर गया था । कॉफी पीने के कोई पंद्रह मिनट बाद ही लाल की तबियत खराब होनी शुरू हो गई । नरेंदर अपनी कार से दिल्ली आया था उसी का और मैं वो सीमा और लाल को अस्पताल छोड उसी रात चंडीगढ लौट गया था । तो क्या नरेंद्र ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया है? प्रकाश उन्होंने पूछा वो तो पूछताछ के बाद गुमसुम हो गया । कुछ भी नहीं बोलता । इंस्पेक्टर तुमने तो अधूरी जांच पडताल करके मुझे निर्दोष को इस हत्याकांड फंसाई दिया था । मुझे खुशी है कि मैं जंगल से निकल गया हूँ । प्रकाश उन्होंने खुश होकर कहा हम आपके बहुमूल्य सहयोग के लिए आभारी है । साहब, हमें आपके सहयोग की बराबर रोल बनी रहेगी । आप इस हत्याकांड के एक महत्वपूर्ण गवाह होंगे । इंस्पेक्टर बोला, क्या तुम इस दलदल से मुझे मुक्ति नहीं? ॅ चाहते । असली मुक्ति तो आपको मिली गई है । होने को सजा मिलनी चाहिए । ये तो आपका नैतिक दायित्व है । ठीक है । प्रकाश अंदर बोले, आभार प्रदर्शन कर इंस्पेक्टर चला गया वो प्रकाश । इन्होंने गर्दन उठाकर बारी बारी से निर्मला, विवेक और माला को देखा के लानी और पश्चाताप की भावना से अभिभूत हूं । वो देर तक बैठे महसूस कर दे रहे हैं कि दलदल से वो बाहर दो आ गए हैं । पर उनका संपूर्ण व्यक्तित्व कलुषित और गन्दा हो गया है । वो इसे धोकर पवित्र कर लेंगे । ईमानदारी, सच्चरित्रता और एकनिष्ठा कॅाल से फॅसा की गंदी को धो लेंगे । उन्होंने गर्दन झुका ली और एक दर्जन जैसे गंभीर स्वर में बोले, मैं तुम तीनों से शमा मानता हूँ । मैं मानता हूँ मैं बता गया था । मेरे पापा ऑफिस ले और मैं एक गन्दी दलदल में जाता था । पर अब देर सवेर सही मैं उस दलदल से निकल आया हूँ तो लोग मेरी मदद करो । मेरे पुनर्निर्माण में मेरी सहायता करेंगे ना । जहाँ सब कुछ खत्म हुआ था वहीं से नई शुरुआत हो चुकी थी । हो हूँ ।

share-icon

00:00
00:00