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Transcript

गुजरा हूँ जिधर से - Part 1

आप सुन रहे हैं क्योंकि वो एफ एम पर तेजपालसिंह तेज के लिखे किताब गुजरा हूँ जिधर से गजलें और मैं हूँ आपके साथ आर्जेन ऍम सुने जो मनचाहे आदमी उडान में रहे तो खूब है बात जो मैं यान में रहे तो खूब है मारने मरने के या मौके तो काम नहीं तीर पर कमान में रहे तो खूब है आज की महफिल का हर बंदा नवाब है जो खामोशी बयान में रहे तो खूब है जिंदगी थकान के सेवा तो कुछ नहीं जो ताजगी थकान में रहे तो खूब है नमाज मंदिरों में हो मस्जिदों में कीर्तन राम जो कुरान में रहे तो खूब है यू ही मत बवाल कल की कुछ नए सवाल कर चांदनी के वास्ते उठ जरा धमाल कर था के धक्के दिमाग है कि ताजगी बहाल कर मिलने तो मिलिये रोज पर दामन जरा संभालकर कि आदमी की जात का तेज कुछ खयाल कर अंधेरा शहर है कुछ बत्तियां रखते फूल ही काफी नहीं कुछ पत्तियां रखते हैं कुछ हस्तियों ने या बिहार बाकी ये शहर आपकी तो कब्रगाह में कुछ हस्तियां रखते धार के विपरीत यू जलना नहीं आता मुक्तसर सी बात है कुछ मछलियां रखते है शब्द भी भाषा भी है तुझ को नसी फट अनपढों के सामने कुछ तख्तियां रखते गमगीन रहना तेज देशक हर घडी अच्छा नहीं की जूडे में या रहे यार के कुछ तितलियां रखते हैं अपना अपना मिजाज है साहेब किसको किसका लेहाज है ऐसा है वो तो कहता है नास्तिक खुद को रोज पडता नमाज है साहेब अपने हिस्से में चंद साहब से हैं उम्र उनकी दराज है साहेब मैं तो मर मर के भी की लूंगा मुझको इसका रियाज है साहेब चिंता का फन की तेज को क्यों हो कि दोस्त उसका बजाज है साहेब नहीं बेटियाँ सोच रही है खडी टूट के नीचे कोई तो निश्छल हाथों से वन उपवन को सीटें प्रदूषण इस तौर बढा है बस्ती क्या जंगल तक में खुली हवा की मांग कर रहे हैं खुश्बूदार बगीचे धुआ धुआ घर आंगन कैसे घर जाऊँ ऍम गली गली है कि चढ गारा संसद बीच गलीचे चित्र एक भी हुआ ना पूरा राजनीति के रंगों से नारो में यू खुशहाली के चित्र बहुत है खींचे गंगा यमुना तेज उदासी सागर हुआ विनाशक अच्छा हो मानव से मानव मिलजुल प्रेम लीजिए कल आज और कल बंद आंखें खुल गई तेरी जफा के बाद की जिंदगी रोशन हुई तेरी जफा के बाद कल तलक खुशबू मेरी उल्फत में कैद थी बस की हवाओं में घुल गयी तेरी रफाल के बाद की बातों पे अपनी था मुझे बेहद जरूर पर बात मेरी सिर्फ हुई तेरी जफा के बाद सादगी कोड लू की छोड दू में क्या करूँ खुद ही खुद से ठंड गई तेरी जफा के बाद कल भी थी आज भी अपनी हवाएं तेज उल्फत मगर रूसवा हुई तेरी जफा के बाद गो शहरभर आवारगी बरपा हुई संसद में लेकिन शून्य भर चर्चा हुई लोग कहते हैं कि कल जिंदा थी पर आज कल इंसानियत मुर्दा हुई शायरी के मायने को छोडना हूँ शायरी पर हर समय फतवा हुई मैं ही मानी का असर कुछ यू बढा ईमानदारी खुद ही वापदा हुई मौत देशक मूल भी है ब्याज भी जिंदगी पर तेज बस चर्चा हुई मुद्दत बाद मिली है यहाँ की सर से भूल खेली है पांखें अपना कोई आस पास है फिर काहे को बदले झांकी बाजार गर्म है अनुबंधों का मत कर संबंधों की बातें जीवन भर रोज होके गुजरा दिन सब लेना समझी रातें कुर्सी पाने के लालच में तेज लगी हैं लम्बी बातें रेट का सागर सही सागर तो है घर मेरा खस्ता सही पर घर तो है दो आएँ या की न आएं पर मुझको उनके आने का तसव्वुर तो हैं हैं खाक सारी को मौज मस्ती का ख्वाब ही सही मैं सर तो हैं होने को तो हैं वो आदमी बेघर बात में उसकी मगर असर तो है तेज समझे कि न समझे खुद को उसमें जीने का कुछ हुनर तो है आंखों आंखों में जो उनसे गुफ्तगू होने लगी रफ्तार रफ्तार बात दिल की सुर्खरू होने लगी ना तो दिन ही मिले मेरे ना रात ही रोशन हुई बात लेकिन नागहानी चार सौ होने लगी जिंदगी को मौत की मेहमान है लेकिन मौत ने जो दी सादा तो रूबरू होने लगी वक्त ने आवारगी को कुछ दिया ऐसा सबक की आवारगी आवारगी से दूर दूर होने लगी कि उनसे मिलने के बहाने तेज को खुद से मिलने की बराबर जस्ट जू होने लगें । मजदूरी सही मगर आदमी सा है चेहरे का रंग देखिए कुछ चंद नहीं है हमको तो हर एक गाम पे आती हैं क्या पर जीने का हुनर उसका कुछ राग नहीं है हम है कि हम पनपा की पतझड की झाओ में उसका हर एक मौसम मगर कुछ फाल्गुनी सा है बात में दम है ना उसकी ना हाथ में दम है तेवर मगर हम रह का कुछ दामिनी सहाय बाद में बात मिलाना कैसा आंख से आंख मिलाना कैसा हर पल रंग बदलते हैं जो उनसे हाथ मिलाना कैसा जब माली ही गंद चुराए फिर फिर भूल हो गाना कैसा जब मन आंगन हो अंधियारा चौमुख दीप जलाना के साथ तेज हिमालय की चोटी पर हरियल दूब उगाना कैसा बहते हुए पानी को नाशकों से तो लिए जब जब भी रुके बाकी तो चलने को बोली है जिंदगी जीना है तो जीने के वास्ते दोस्त कैसा भी हो पाते ना खोलिए सोने कीगो फितरत नहीं है फिर भी हम चलते चलते रह में सोचो में सो लिए जब जब मिले उलझन नहीं यू कीजिए यार अब हुआई ने रूबरू हर गार्ड खोलिए तेज अब वर्ष में नहीं सदियों को झेलना है वक्त अभी वक्त की बढते नहीं खोलिए सपने कब हुए अपने सपने बस हुए सपने हिंसा भी कहाँ बाकी इंसान भी हुए कितनी जीना है ढेरों में खाई कसम सबने पाउंड का सफर छीना दी कैसी सजा आपने गैरों से गिला कैसा आपने भी कहाँ अपनी सामने दुनिया के हंसाए गए हैं हम घर पर लाके खूब बुलाए गए हैं हम न जान ही थोडी न मरने का हौसला यूबा रहा हर तौर सताए गए हैं हम अपनापन है ये की दीवानगी उनकी की गालियां दे दे के बुलाए गए हम मुद्दा रोटी का जहां का तहां रहा हूँ तब क्या दे दे के सुनाए गए हम उल्फत से कोसों दूर है वह खुद ले के गमलों में दोस्ती के सजाए गए हैं सफर जारी है सफर होने तक बदमजा है जिस गुजर होने तक यू बाद मुदद के नींद आई है सोने दो अबकी शहर होने तक मेरी मैयत को आग मत देना मेरे दुश्मन को खबर होने तक मुझको जल्दी है गुजर जाने की जिंदा रहे वह की कुफल होने तक तो जायज है रूठना रोना उन का पहले उल्फत का होने तक जीना भी नहीं आता मारना भी नहीं आता हम है कि हुए वाहन गलना भी नहीं आता चलने की हिदायत है रुकना भी नहीं आता शोला है बदन अपना जलना भी नहीं आता हो तेज से मुखातिब लेकिन अभी नहीं ऐसा हूँ और पीने का ये असर हुआ है जिंदा अपना हुआ है आंखों को चपल चांदनी पाओ पाउंड सफल हुआ है बस्ती बस्ती सन्नाटा है बेशक कोई ऊपर हुआ है मंजर संबंधों के चलते अनुबंधों का गुजर हुआ है खुद अपनी हस्ती पहचान हूँ तेज मेरा काम नजर हुआ है जो फूल थे वो खार हो गए जो शेर थे तैयार हो गए वक्त ने ढगा तो इस कदर कि हौंसले फरार हो गए वोट की कमर पे मेम नहीं सहज ही सवार हो गए काम अंजल बढे तो यू बढे एक से हजार हो गए कितना बडा असर रहते जो कि हम भी बंदा अखबार हो गए यूँ ही न धमाल कीजिए कुछ बोली सवाल कीजिए आ रहे जो दिल के दिल गरीब ऐसा कुछ कमाल कीजिए जो कल तलक हुआ तो हो गया कल का खयाल कीजिए लूट के गुलों की रंगो बू खुद को ननिहाल कीजिए मौत की बिसात जिंदगी ना काम कुम मलाल कीजिए मौत को तकिया बनाकर जिंदगानी सोच ली छोड करवा दे बहारी पुर बाहर रहो चली वहां मूढ है अनुपम घने रफ्तार क्या बनी छोडकर गश्ती की वो दे किनारा हो चली देखकर सूरत शकल जब फूल मुरझा नहीं लगी क्या कर रही हूँ सी रख कोई ये सोच बारी हो चली है इंसान के हाथों गया इंसानियत का नू बस खयाली यू बढी की खानदानी हो चली आंखों हूँ उसकी या उसकी तेज अब झुकती नहीं कि आंख का पानी मारा तहजीब पानी हो चलिए ऐसा एक दिन मुझे नसीब तो है कोई अपना मेरे करीब दो है पेट की खाई थी उन सेनान अपील उनके हाथों में गो जरीब तो है सभी यूशू तो नहीं है मानो भी सब के कंधे पे गुल सलीब तो है मेरे संग संग जो जीता मारता है कुछ होना हूँ वो बाकी तो है गजल में वक्त की खामी क्या है काफी हो ना हूँ रदीप तो हैं वो की कुछ खींचा की चासा रहता है खुद से खुद जुदा जुदा सा रहता है है वो भी इतना कि शिकस्ता दिल है वो की कुछ ठगा ठगा सा रहता है आस्मा हूँ के भी आज सुबह कुत्ता के है वो की कुछ खफा खफा रहता है मैं से क्या कटे की अब भी साथ ही सुनील की कुछ नशा नशा सर रहता है मोहब्बत का नशा जो उतरा है की थी दिल की कुछ डाॅ रहता है दे रहे हैं जिनमें ऐसे गुजरी जब भी गुजरी दिल पे गुजरी आंख में उसकी जाने क्या है जब बिल्डिंग जी उधर से गुजरी आशिक नजर है इतनी काफी हर एक और मदन से गुजरी बन जा रहा हूँ मैं बन जाता सारी उम्र सफर में गुजरी तू मुझे मत मेरी तबीयत सारी उम्र कुफल नहीं कुछ नहीं बहुत पीटीएम मिलाकर आंसू सबको आंखों से जुडा करार जो तू चाहे है गजल में मानी मिसरे मिसरे में लिखा कर आंसू कैसे गुजरी है उम्र मत पूछो बहुत बेचे हैं सूखा कर आंसू कोई अपना यूमर से गुजरात चश्में कातिल में सजाकर आसु बिल कभी पड जाए जरूरत शायद बस की रखना बचाकर आसु बात बनी पर जरा जरा सी शमा जाली पर जरा जरा सी सन्नाटों की राजधानी में हवा चली पर जरा जरा सी स्वप्न सुंदरी के सपनों में आकर लडी पर जरा जरा सी मजलूमों के चाक जी घर में आग पली पर जरा जरा सी तेज कलम गारों के दरमियां साख बनी पर जरा जरा सी पता नहीं कब दिन निकला कब रात गई बात बात में लेकिन अपनी बात गई रात चांदनी का आना क्या खूब रहा दिल्ली में उत्तरी और जे वह पर गात गई दिल क्या गुजरा जोर गया तारीख की का घाटा गए अम्बर निखरा बरसात गई सतनामी तो चलते दम ही रूट गई बदनामी पर कोसो अपने साथ गई । तेज उम्र जब जब भी गुजरी यू गुजरी पतझड में जून शब्द शजर से पाक गई गोयल है पिंजरे में बंद कौवे हुए घने स्वच्छ संबंधों के पेड पे आ कर बैठ गए कोरियन बन लगा ली लेने पावस खुद ही आह वादित फूलों की गन शब्दों की सीढी पर चढकर उन्हें गिरे विचारे झंड नंगी हुई व्यवस्था बेशक फिर कैसे सुधरे पर बंद हूँ आंसू पीकर जीने का यू काम किया हमने जैसे अपना काम तमाम क्या जानू था की मैं एक ला रहे जाऊंगा फिर भी उसके जाने का एहतराम किया मैं खाने का आना जाना छूट गया घर बैठे ही मैं खाना सर नाम क्या तेज ने जिसको जितना ज्यादा प्यार किया उसने उसको उतना ही बदनाम किया हूँ बढ गई इतनी थकन है यार अब की फूल भी लगने लगे हैं खार जीत को इतना करीबी सही दिया जीत से अच्छी लगी है हार अब किश्तियां तो है मगर नाविक नहीं किस तरह जाए नदी के पार अब अगर शख्स है यू वक्त का मारा हुआ लगने लगी है जिंदगी भी भार अब जनतंत्र के चलते भला ये क्या हुआ नन्ने हाथों में भी है हथियार न जिंदगी न बंदगी नवाह चाहिए काटने को उम्र यानी वह चाहिए दिल्लगी की बात कुछ और है पर जानने को दिल मगर निगाह चाहिए न्याय को ना झूठ सही न सच से वास्ता एक अदद वकील और गवाह चाहिए । जिंदगी और मौत का रिश्ता भी खूब है की जिंदगी को मौत की पनाह चाहिए ये कैसा लोकतंत्र है ये कैसा लोकतंत्र यहाँ शाह को भी हर नजर सिपाह चाहिए बैठा हूँ घर जुटाकर साकी से दिल लगाकर बीता हूँ रोज फिर भी आंसू मिला मिलाकर कभी होश में मिलेंगे तुझे आईना दिखाकर साकिन इलाज रख ली सरेशाम ही सुलाकर जीना है तेज मुश्किल यह मौत को भुलाकर ऍम चलते चलते पांव था के सच्चे झूठे जैसे भी थे हुआ था के सूरज की इतनी सी मंशा है शायद झेल झेलकर धूत कसैली पाओ सकें नए दौर में यौवन यू उन्मुक्त हुआ तो एक एक करके कामसूत्र के दाव था कि आखिर को आंखें सूखी दिल बैठ गया रिश्ते जुडते अंतर्मन के घाव सकें ताकि मल्हार रहे थकी रुदाली तेज धक्का नए रूप में ढलते ढलते पाऊँ था की पत्थर उठाए हाथ जो जिनके सिता नहीं है घर उन्ही के खासकर शीशे से बनी है भीड तो है हर कदम पर भीड में साहिब आदमी की जून में दो चार जने हैं कल अलग था आज सुबह मेरे घर से बावस्ता था आजकल धरती भी घनशाम घर नहीं है इंसान ने इंसानियत को आप ही अगुवा क्या माने वरना बारहा इंसान नहीं है हाथ में जिनके खिलोने चाहिए थे खून में अपने ही उनके हाथ सा नहीं है दिल गुजरा है और रात गई फिर भी ना प्रभात हुई सूखा सूखा अपना आंगन ये कैसी बरसात हुई रीत गए रिश्तों की गागर कि मानवता बदला हुई बाहर बाहर जीत मुकम्मिल भीतर भी डर माप हुई तेज बुझाता क्यों रहता है ऐसी भी क्या बात हुई यू रात बेनकाब हो गयी खान माँ खराब हो गयी आज ही पीढी हिसाब से फिर क्यों सिर्फ शराब हो गयी आवारगी के धुर बाजार में ऐसा दूँगी अजाब हो गई तो उन्हें की या मैंने की पहल बात पर खराब हो गई जिसने मुझ को तेज था पढा किसू और की किताब हो गई लेकिन नहीं लगी कहानियाँ बिटिया रानी लगता है बिटिया हुई सयानी रहे सावन माँ से मेरे से बत्ती आ गए हैं पायल की झमझम संघ भर से पानी नहीं अल्को मैंने चंद्र सितारे गोथे हैं पूछे हैदर फंसे तन के मानी रही आके उसकी अब मधु की मोहताज कहा कल की चिंता मेरे कल है नानी नहीं तो होता तो पल दो पल बतिया लेती दुख अपने सब कहाँ से करूँ बयानी रहे

गुजरा हूँ जिधर से - Part 2

हर पल नया सवाल हुआ है इतना फकत कमाल हुआ है नए दौर की चकाचौंध में जीना बहुत मोहाल हुआ है लोकतंत्र की छाती पर चढ हरसू खूब धमाल हुआ है हिंसा के हाथों से बेशक इंसा आज हलाल हुआ है प्रशासन अब राजनीति का सबसे बडा दलाल हुआ है तो हम को क्या देना लेना है दुनिया से हम को तो बस आस स्वागत है धनियाँ से रूखी सूखी जैसी भी है खा लेंगे चटनी से, कुछ सब्जी से, कुछ पन्नियां से कब तक आंख चुनाव होगे कुछ सोचो तो राजनीति की आंख बदलती दुनिया से फूल चुराने का सपना पालो भी खेतों से खलिहानों से, कुछ बढिया से तेज वक्त है बचने का, सम्मोहन से, नेता से, अभिनेता से की ठगी या से हूँ दिलों की बात क्या कीजे दीवाने खास में गुजारे हैं बादशाह का हर पल कयास में जिंदगी को एक है कीमत जुदा जुदा किसी की लाख में उठी किसी की पचास में बहुत कोमल धवल अनमोल है लेकिन धंदे की बात है सो है कि ले का पास में मैं ही बंद की मार हूँ मस्जिद नहीं जाता वाइज मगर मिलता है नित नौ ल्लेबाज में घूमता फिरता हूँ मैं भी तेज की तैयारियाँ एस की न उसकी बस वक्त अपनी तलाश में हंसने का घुमा और है रोने का घुमा और उल्फत की जुबान और है नफरत के जुबान और जानते सब है मगर समझे तो बात है झूले का धूम और है मरघट का धूम और पर्चियां डर पर्चियां जब मौत की आने लगी कहने लगे जहाँ बाज भी जीना है और नाहक की खुशगवार है दुनिया की शहर का घर से बडी दुनिया भला पाएंगे कहाँ और होश में रहने का कुछ हासिल नहीं है तेज बहकने की चाह है दे पी रही मोगा ऍम जब जब मौसम दैनिक सुहाना लगता है अपना कोई लाख सयाना लगता है चौखट पर हर सांस मौत का पहला है जीवन ने ले लिया बयाना लगता है हमने दो ता उम्र फकीरी झेली है साथ ही को मिल गया खजाना लगता है गए सांझ ही उसने नाता तोडा है गुजरा लेकिन एक समाना लगता है कहाँ जवा हैं गजलें नाथ नहीं तू जा रहे सब छत और साथ ही नहीं साल को कर आई ना बेपर्दा हुई शहरी रातें हैं याद आएगी आइंदा भी गए वर्ष की गुजरी बातें कल की दरियां कल भी आ रहा काम करेंगी खुलकर खाते हैं रोजी रोटी की चाहत में कल भी होंगी लम्बी बातें जीवन भर जीवन ना पाया उलझी लेट सुलझाना पाया सारी उम्र बनाया घर पर घर अपना होना पाया दुनिया से टकराने वाला खुद से ही तक रहना पाया गैरों को तो समझाया पर खुद को वह समझाना पाया जिसने दुनिया को अपनाया वो दुनिया को राष्ट्र आया भारतीय बदली है यू और एक फसाद में की मिट गया अंतर सफेद ओसियां नहीं जिसके किए बुझने लगे दिल के चिराग रखा है क्या तुम्ही कहो ऐसे गुना हमें लाजिम है बहुत कोर्ट में माना की गवाही गैरत मगर बाकी कहाँ आपके गवाह में डीजे न यार आजकल मांगे बिना सलाह थोडा बहुत रखो वजन अपनी सलाह में यूँ ही नहीं है तेज को साहब बहुत नसीब कुछ न कुछ तो बात है उसके निबाह में मन है मेरा की सब तक मेरा सलाम पहुंचे हर खासोआम की रुख मेरा कलाम पहुंचे दीनो मजहब का रोडा बाकी रहे ना रह में मस्जिद में हो पुजारी मंदिर इमाम पहुंचे छोटा बडा ना कोई बंदे हैं सब खुदा के यानि कि मोहम्मद का घर घर पाया हम पहुंचे पर जा को चाहिए कि राजा का हाल जाने पर जा का हाल लेने घर घर निजाम पहुंचे पीरी मिले जिगर की लूंगा तेज मैं खुद कातिल मेरा सलामत अपने मकाम पहुंचे तो भी एक कहानी लिखना विस्तर को राजधानी लिखना अंतर अंतर राग रागनी आंखों आंखों पानी लिखना गए दौर की तरिया तो भी एक राजा एक रानी लिखना शब्द अकेले ना काफी हैं कुछ दाना कुछ पानी लिखना चेहरा जेहरा चांद सरीखा क्यू जन का रंग धानी लिखना कोहरा कोहरा सारा जंगल नई हवा का मारा जंगल चिडियों ने आवाज उठाएगी इंसानों से हाला जंगल कल तक जंगल में मंगल था आज हुआ आवारा जंगल कल देखता था चांद सरीखा आज देखे है तारा जंगल जीवन सत्ता का रखवाला तेज हुआ अब नारा जंगल लडते लडते पायल हारी आज हुआ साडियों पर भारी हवा हवा में जहर घुला है देशक नदी नदी है खाली हैं जैसे जैसे हुआ सवेरा अंधियारे ने पलटी मारी मानवता को मार अडंगी मानवता ने बाजी मारी तेज जलाने होंगे दिल अब हरसू है अंधियारा तारीख चंद जब जब भी भला लगता है देश सांसों में पाला लगता है रोज मिलना भी खूब है लेकिन थोडा अंतर भी भला लगता है आग खाने का हुनर है जिसमें जंगी हाथों में पाला लगता है वो जो गिनता है पाओ के छाले बात मुद्दत के चला लगता है हरसू खोजे हैं हवा में खुशबू तेज गुरबत का सिला लगता है बेटिया जब ससुराल चली बचपन का सच भूल चल नहीं आने वाले कल की खाते कल पे पानी डाल चली अपने ही हाथों से अपने घर का आंगन कील चली युद्ध क्षेत्र कि जाने के लिए गहर श्रृंगारी ढल चली तेज अकेला रहा सुबह ता बिटिया जब ससुराल चली कोई अपना पास तो दिल में दैनिक उजास तो हूँ अपनी भाग का मस्ती का भी काम ज्यादा इतिहास हूँ रोटियां भी हस लिख लेंगे इतना भर परिहास तो हो हा गुनमा से मेघा बरसे पत्र जड में मधुमास तो तेज का क्या वो तो पागल है इसका पर एहसास हो शहरा में बदला क्या गरजे थकी प्यास उठ बैठी फिर से वर्षों बाद खुदा की पकडनी कान खुजाती निकली घर से महक उठी धनियाँ किशन सिंह मोईज चुनरिया किसकी सेट से सत्ता की यहाँ के खुजलाई हाथ मिला बैठी मुख बेड से लगी झांकने बगल झोपडी तेज हवा पानी के डर से सागर सागर पानी पानी तब रही! पर मछली रानी अपने ही घर में बेघर है । दादा दादी नाना नानी क्या बरखा क्या ऋतु वसंती भूल गए बच्चे गुडधानी गए दौर की दौड धूप में बदल गए शब्दों के मानी तेज महल में राजनीति के कैद हुई बेशक जलवानी सावन में बदली ना बरसी मधु ऋतु में बलियाणा सरसी जाने कैसी हवा चली है आंचल को धनिया हैं तरसी सत्ता की मारामारी में संसद हुई राम के घर सी भूख प्याज को लोकतंत्र ने नारों की थाली है पर्सी ठंडा हुआ तेजी वो सूरज निकला पहन जेठ में जैसी हूँ गांव बडे भोले भाले हैं संबंधों के रख वाले हैं गोद में अपनी बेशक इसने छोटे बडे शहर पाले हैं चलते चलते धक्के नहीं को वाओ में इनके भी छाले हैं मगर खेद विज्ञानी युग में गांव मेरे बैठे डाले हैं तेज ये कैसी फाकामस्ती हाथों हाथों में प्याले हैं खट्टे मीठे कडवे देश सबके अपने अपने देश आजादी के उजियारे में पाल रहा अंधियारे देश सत्ता की मारामारी में दूर हुआ आंखो से देश गैरों की चर्चा क्या करना जूझ रहा अपनों से देश सोने की चिडिया तुम जानो हम जाने भिखमंगे देश लेकिन इंसानीयत तियो आजकल फैरी चुकी चुकी है एकांत में हस्ती है पर अब भी कभी कभी तो ही तो मेरा अपना दुनिया में दिल नशी है तो रहती है तेरे सामने आंखें झुकी झुकी यू मंजिले बाकी है अभी और भी बेशक राहे मगर लगती हैं कुछ काफी ढकी था की नए दौर में पेशे नजर यू बोझ बस्तों का बढा की उम्र बचपन की भी है लगती पक्की पक्की कल बादलों को छोड कर ली तेज नहीं अंगडाइयां है चांदनी भी आज कल बेशक ठगी ठगी वो लौटकर घर आए तो अच्छा हुआ हो रूबरू बत्ती आए तो अच्छा हुआ सुंडियों के आईने से कल आंखे लडा वह दो घडी मुस्कुराए तो अच्छा हुआ धूल कर गुजरे दिनों की दास था कुछ टूटकर शर्माएं तो अच्छा हुआ पथरा गई थी हाँ सच तेरे बिना मैं ना दैनिक सरसाइज तो अच्छा हुआ बात मुद्दत आज के बिस्तर मेरे थोडा बहुत करना है तो अच्छा हुआ हूँ मैं तो पागल ठहरा जी गांव घना है गहरा जी मैं क्या जानू अपनी हस्ती मैं तो फक्कड ठहरा जी तुम खुद देखो आईने में अपना असली चेहरा जी आंगन आंगन खून सेना है पर्वत पर्वत बेहरा जी तेज मेरी चौखट पर बैठा अंधियारों का पहरा जी घर के कूल्हे पे गगरिया सहित घर से निकली है गुजरिया साहेब तुम तो समझी ना हवा की साजिश सेंसेक् किसकी है चुनरिया साहेब जो भी देखे है नाटक जाए हैं ऐसे लचके कमरिया साहिब पाओ धरती से नहीं बाबस्ता ऐसे बहकी है उमरिया चाहे बाहर निकला है बदन कपडों से ऐसे निकली है उमरिया सहित हूँ सेट पर बेशक नीलगगन है धरती धरती मगर तपन है अर्थ हुए शब्दों से पृथक शब्दों का संसार सघन है संबंध हुए विकलांग धरा पर अनुबंधों की धारा सफल है लोकतंत्र की मर्यादा का संसद संसद खुला हनन है सत्ता की मारामारी में मानवता का हुआ पतन आंख चुनाव होगे तुम कब तक प्यार छुप आओगे तो मैं कब तक छोडो की अब आंख मिचौनी ख्वाब दिखाओगे तुम कब तक कोई नहीं फंसने वाला यहाँ जाल बिछा हो गए तुम कब तक अपनी फितरत में चलना है आज सुझाव होगे तुम कब तक तेज हिमालय की चोटी पर गांव बताओगे तुम कब तक दादी माँ जो कहती थी अब लगता है सच कहती थी बचपन की नहीं दुनिया में अंबर पर नदियां बहती थी धरती पर थे चोर उचक्के अम्बर पर पर यार रहती थी घर की छत पर भूत भूत ली आंगन में चिडिया रहती थीं आज हुआ गुलशन आवारा कल बुजदार हवा बहती देश मरने कु्त्ता सब वो तो नहीं जख्म कह रहे हैं समंदर हमने जाना कि लोग दुनिया के बहुत जालिम है, सिकंदर तो नहीं उन के आने का इंतजार तो है उनकी राहुल ने मगर सिर्फ तो नहीं वो जो बैठा है मेरी चौखट पे मना अपना मुंतजिर तो नहीं कैसे छेड हूँ में तार वीणा के मुझको रोना भी मैं असर तो नहीं देश की बारी में खास होने का रंज बेशक है तहस सुर तो नहीं बातों बातों में सिमट जाएगा तेज इतना विमुक्त सर तो नहीं गुजरा हूँ इधर से मैं सारा धुंधला धुंधला प्रकाश मिला कि चांद सितारों से बोझिल कुछ झुका झुका आकाश मिला पतझड तो हर सांस जिंदगी अरु पावस को सन्यास मिला या रोटी के बदले में अक्सर एक अदद उपवास मिला आका मस्ती का कुछ कुछ तो मुझको है इतिहास मिला नए दौर की राजधानी में है जनता को उपवास मिला अनुबंधों की तंग गली में बिखरा बिखरा विश्वास मिला शहर हुआ विश्वास समूचा डोल गया खिडकी दरवाजे मान के सब खोल गया करवट करवट सोचों की थी चुभन बहुत यादव का अंधियारा सिर चढकर बोल गया उसके हंसने में था दुख सुख का दर्शन भेद अचानक मन का एक एक खोल गया भूल गए सब प्रेम प्रीत की परिभाषा कोई अनगढ उल्फत में विश्व खोल गया तेज सावनी हवा चली तो सहसा हो जाते जाते मन की सांकल खोल गया तेरे पीछे छुप के रहना सीख गया अस मानों से बातें करना सीख गया तेरे संग होने भर से थी गजल जवाब तुम बिछडे तो आगे बढना सीख गया पल पल इतना टूटा बिखरा मैं आखिर रेत की दीवार ओसा डाॅॅ सीख गया वादे तो वादे हैं सच्चे झूठे क्या वादों की धारा में बहना सीख गया बहुत लोग मार मार के जिंदा रहते हैं तेज बीमार के जिन्दा रहना सीख गया हूँ उम्र चढी तो रफ्तार रफ्तार अर्थ खेल के बदल गए सांझ सकारे भी अब दन्नू मिलने से कतरावल हैं धूम हुई आवारा दिनभर इत उत आंख लडा वे हैं शहर हुए निकले हैं घर से सांझ हुए घर आ गए हैं पाओ में पाजी पडे जब मांग के लिए सिन्दूरी है पीपल की तब छांव घने दी ना धन लोगों की भावना है जीवन दो तेज पहली सुलझाए ना सुलझे हैं जब चाहे तब बहन निकले है जब चाहे धर्म जावे है हूँ तुम क्या जानो मुर्दा दिल हो बहुत मजा है जीने में बहन निकले हैं दिल का दरिया पनघट के ढंग पीने में देश का मजा है इश्क करता है इसके सजा है क्या कहने सारी उम्र गुजर जाती है चाक जिगर को सीने में पेश करना हो तो सब भेजा है सूरज चांद सितारे क्या इश्क के होते ढल जाते हैं राजकरण सहज नगीने में हाय नाजुकी फूलबदन की हाय बदन का पैनापन आए बदन का रंग गीलापन रंग हमारे पश्मीने में मीर साहब ने हाई तेज से क्या तरकीब बनाई है रंग बदन का जब देखो तब भी के गाने फस रहने में हूँ थोडा सा जो असर हुआ है जिंदा अपना हुनर हुआ है हाँ गोवा को चपल चांदनी पाओ पाओ सफर हुआ है मानव मानव गूंगा बहरा दानव दानव मुखर हुआ है बेसिक संबंधों के चलते अनुबंधों का गुजर हुआ है बस्ती बस्ती सन्नाटा है जाने कोई कुफर हुआ है हूँ नया वर्ष कुछ ऐसे आए सात सात सब कदम उठाएं मानव मानव को पहचानने रेम के प्याले उछालू थी हवा मुकम्मिल दुनिया की घर बदले तो यू बदले बस्ती बस्ती खुशहाली हो गांव बगीचे महक उठे सूरज धरती पर उतरे आंगन आंगन धूप केले सुबह सवेरे बैठे मुंडेरी चीज चीज चिडिया चहक उठे हरिया को रोटी मिल जाए और धनिया को पैजनियां झालों भले हाथ को चूडी घायल पायल छनक उठे हिंदू हो या मुस्लिम, कोई कोई ईसाई से क्या बहुत आपस में यूँ तेज मिले सब सबके चेहरे चमक उठे आप अपनी जो सादा होने के लिए सारी दुनिया ही खफा होने के लिए उनके होने से जवाब महफिल में बात मुठ्ठी की हवा होने के लिए ऐसा बदला है जमाने का चलन खुल के मिलना भी खता होने के लिए, जड के सीने पर गुजरना उनका उनके जिले की ज्यादा होने के लिए तेज बानूर जिंदगी अपनी अपने खाते में जमा होने के लिए कुछ ही दिन की बात है चुप चाप है मिलने को निजात है चुप चाप रहे आंख काली बढ गई चेहरे पर झुर्रियां अब तू भी न तेरे हाथ है चुप चाप रहे जरा जरा जमीन है जरा जरा है और की जाने लगा तो मान है जो चाह रहे बादे बहारी कब गए पत्र जन का दौर है कुछ बागवान कम जात है चुप चाप बातों में तेरी अबकी वो दमखम नहीं ऊपर से भीतर घात हैं जो आप रहे आग जब लगी गयी बचने का यतन कर बाकी कहाँ बरसात है चुपचाप रहे शहर अब आने को है कि तेज सुनी जाने को खुद का रात है जबकि आप रहे ऍम पग पग जो निर्बाध बढा है धनवानों के हाथ चढा है बांच न पाया इस दुनिया को पडने को यूँ बहुत पढा है मानवता को दिखा आईना दान अवतार का क्षेत्र बढा है सबकुछ कडवा कडवा सा है कोई करेला नीम चढा है लोकतंत्र के गलियारे में भ्रष्ट जनों का भाव बढा है अंदर अंदर शूल गढे हैं आंचल आंचल फूल कडा है बडी देर से मजलूमों पर इनका लाभ का भूत चढा है काट सके तो हीरा काट नजरों से अंधियारा काट जिस घर में चंदा बंदी है उस घर का दरवाजा गार्ड जिसमें मेरा सूखी लकडी है जितना चाहे उतना काट खासी बहुत पुरानी होली मुश्किल है अब इसका कार्ड छोड तेज अब कालाधंधा कुछ तो जिला उजला कार्ड आंखों का उतरा पानी है अर्थ हुआ या बेमानी है चौपट है कानून कायदा सबकी अपनी मनमानी है वो बोले तो बात बडी है हम बोले तो बचकानी अपने घर आंगन की छोडो घायल अपनी राजधानी है प्यार महोब्बत बदरंगी है जुल्मों की जूनियर धानी है हूँ लील गई जडती नदी पका पकाया धान भूख प्याज की मार से टेडा किसान धनिया को नहीं बात है अब पीतल की इच्छाओ पाओ में पाजेब सिर पे तीरकमान धीरे धीरे बिक गया घर का सारा माल होरी खाक उडाता है खाली बडी दुकान जोरो कि पंचायत है गीदड है सरपंच थाम हाथ उल्टी कलम लिखते चोर विधान तेज उजाला थक गया सूरज गया विदेश सारे मिलकर कर रहे चंदा का अपमान गली गली नेता घने गली गली हडताल संसद जैसे बन गई तुगलकी घुडसाल नेता ही डाकू यहाँ नेता ही सरपंच प्रभु की करने की कहूँ कौन करें पडता कॉलेज कॉलेज बाज है आंगन आंगन का कोयलिया बोझल हुई बिगड गया सोरता आंगन आंगन बुक है हाथोंहाथ खाज सत्ता की चौपाल पर लगी हुई टक सा राजा बहरा हो गया जनता हो गयी मौन तेज निरर्थक भीड में बजा रहा हडताल फागुन भागवन रंग है आंखन आंखन नहीं वाले हो ले पड रहा भी डर भी डर में है धरती और आसमान ने आखिर थोडा मोहन कब तक झेले आज को कंचन कंचन देते हैं कागज के गुलदान है रूप स्वरूप निगन बस्ती बस्ती आग है जंगल जंगल रहे हैं दानवता ने पहुंच दी मानवता की मांग अंडा अंडा बांध है जब मर्जी तब से मन मंदिर को छोडकर गया कबूतर दूर तेज टिका है आजकल अनुबंधों पर नहीं है यू आदमी से आदमी डर नहीं लगा बात दीवारों से हैं करने लगा लीक से हटकर समय का देवता रिश्ते नए हैं खून के बोलने लगा कान का कच्चा हुआ इतना या की जरा जरा सी बात पर उठने लगा देखकर नए दौर का चिकना बदन धरती हिली की आसमा झुकने लगा नित नई तहजीब के पेशे नजर तेज अपने आप से लड नहीं लगा खून सपनों के मेरे काम ना हुए हाथ कातिल के मदर नाम ना हुए हस्तियां डर हस्तियां महफिल में थी उनकी महफिल में मगर हम ना हुए बढ सा की ये है नैन यू तो उम्र भर पर वर्क जीवन के कभी नम ना हुए लोग धरती के गगन तक पहुंचे एक हम है कि हम मुझे मौसम ना हुए तेज तो है जान से अपनी गुजर गया न करें मगर दिलशाद के बेहरम ना हुए तो चंदासी उज्वल घनी धवन है तो गंगा सी गति में सहज सरल है तू मेरे को पवन की केसर के आ रही है तो मेरी आंखों का नीलकमल है तो मेरी आंगन की चपल चांदनी तू मेरे अधरों का गीत नवल है तू मेरे अंतर कि अमृत धारा ने युक्त तू निर्मल सहज सरल है तो मेरे हिंदी की कोमल आभास तो मेरे जीवन की सहज गजल है

गुजरा हूँ जिधर से - Part 3

हैं आज मना मत कर तू साकी दे दे आज शराब बूंद बूंद कर क्या देता है दे दे बिना हिसाब बरसों बाद खोली है आंखें इश्क ने ऐसा वर क्या बरसों बाद मेरे कातिल के रुख से उठा न का जन्नत मिले मे लेना जन्नत जन्नत की है पीर किसे जिसको आना था नहीं आया दिल पर गुजरे लाख अजाब मेरे मरने पर ही शायद आएगा आने वाला फिर मरने का इंतजार किया जी ने सेना रहा लगा आज पूछ मत कितनी गुजरी कितनी से बाकी हैं आज मैं चुकता कर जाऊंगा साकी तेरह हिसाब भर सों बाद मेरे आंगन में सजधज उतरा चार की बरसों बाद मेरी जानम के रूप से उठा नकाब आज होश की बात न कर की तेज तेरे दीवाने का धुआ धुआ विश्वास गया की माटी हुआ सुनेहरा मैंने भी एक गांव खरीदा । मौका पाकर नाम खरीदा । धन दौलत की चकाचौंध में झोंपड का हर दाव खरीदा । संबंधों को अनुबंधित कर सम्बन्धों का मर्म खरीदा । खुशी की खींचातानी में जनता का राम खरीदा चलने की चाहत के चलते लकडी का एक पांव खरीदार तेज निरा पागल है उसमें बस औरों का घाव खरीदा कहा है इतना समझ रही हूँ फूलों जैसी निकल रही हूँ बस्ती बस्ती आंगन अगर धूप सरीखी बिखर रही होगी खुशबू बन सासों के जरिए सबके दिल में उतर रही हो देख आइना सहमी सहमी कहे आचल उतर रही हूँ शायर के मन की पीडा तो गीत गजल की बहन रही हूँ नजरों को पहचाना कर तब जाके दिल हराकर कभी कभी अपने को भी लेकर नाम तो करा कर जीवन तो आना जाना है जीवन सेना हराकर मसलों को तू जुल्फें तरीके आए रोज सवार आकर जैसे भी हो वैसे तेज जीवन भला गुजारा कर तो मैं हूँ कि बर्बाद न पूछो गए दिनों की बात न पूछो झुलसा है मेरा घर आंगन कहाँ हुई बरसात ना पूछो दिन ढलते ही टूट गया दिल कैसे गुजरी रात न बूझो फरमानों में चैन अमन है वैसे है उत्पाद पूछो कुछ तो मेरा भी रहने दो मेरी और एक बात न पूछो आँख में आकाश लेकर जलघरों से प्याज लेकर मैं भटकता ही रहा हूँ जीत का विश्वास लेकर खास कुछ आगे बढा है गोद में उपहास लेकर पेट पर पट्टी बंधी है आज लेकर लोग सडकों पर खडे हैं एक अदद वनवास लेकर बाद बरसों वो हरकत में आने को है जाल वादों के हरसू बिछाने को है दिल के कोने में चलके सेवा कुछ नहीं घर के कोने में मंदिर बनाने को है वो आंखों में नफरत की आंधी लिए दीप उल्फत के भरसक जलाने को है चंद दिन को है वो आदमी हो गया की बात सारी पुरानी बुलाने को है तेज अब भी समय है समझ जाए ये सारी खुशियां वाह खासकर चुराने को है हूँ बेफिक्री है चयन अमन है सपनों का संसार सघन है जाने किसका हाथ है सिर पर पतझर में आबाद चमन है बिन बादल बरसात का आलम आज महरबान नीलगगन है चेहरा जैसे सुर्ख गुलाबी सांसों सात सौ मगर तपन है टंगडी मार गिराना जैसे दुनिया का एकमात्र चलाना है सीख सके तो चलना सीख गिरना और समझना सिंह सोना तब कुंदन बनता है प्रेम अगन में चलना सीख जीने की चाहत है घर तो बर्फ तरीके गलना से राजनीति में आना है तो खुद अपने को झेलना सीख ढाका मस्ती एक बात है पर भागों में पालना सीख मैं भी अब सो जाने को हूँ अब तू खुद ही जगना सी तेज अकेला क्या कर लेगा हाथ मिलाकर चलना सीख न दे रे न रैनबसेरे सूरज रूठा सुबह सवेरे फुटपाथी घर पटरी बिस्तर कोरा है धरती को घेरे बात बात पर राजनीति हैं मूल्य कहाँ तेरे मेरे भुजबल की पहचान है हरसू ज्ञानी को भुजबल हैं घेरे किस्से करें वफाकी मिन्नत अपने ही हैं आंखें भेज रही धनिया जहाँ भरे भी पानी हरियाणा वह पनघट दे रहे हैं तेज हुआ कुछ ढीला लेकिन वक्त है फिर भी आंख करे रहे वो पटरी बिस्तर ईट करता क्या टापर्स इधर सोवे हरियाणा टूटी जूती हटा घाघरा कब तक सी वो भूखी धनियाँ आंखों में ही डूब जाऊं मुझसे आंख बंद कर बदिया छाती पर चढकर बैठा है नए दौर का छह बाहरिया तेज क्या जाने नए दौर में जिंदादिल है केवल गठिया गांव जब जब भी शहर आवे हैं रात आंखों में गुजर जावे हैं रंग धरती का रहत का मंजर सहज आंखों में उतर रह रहे हैं मार अम्मा की प्यार भाभी का आगे चौखट पे ठहर जावे हैं मैं सरसों की गंद गोबर की जैसे आंगन में पसर जावे हैं तेज जानो तो गांव में हरसू सांस हस्ती है सहर गांव हैं गांव में नए दौर की रफ्तार ले चलो जोड के दस बीस दल सरकार ले चलो बातों में हैं या बात बनाने की नहीं छोडकर इंसानियत तलवार ले चलो जिंदगी जीना है तो जीने के वास्ते हाथों में आपने वक्त का अखबार ने चलो गर्मियों का दौर है माना कि दोस्तो, गर्मियों को छोडिये है बाहर ले चलो जिंदगी माना कि एक नाव के जैसी तो हाथ में आपने फकत पतवार नहीं चलो मौसम में कुछ बदलाव है पैगाम लिख भेजो पार्टी कोई हम कम जगहों के नाम लिख नहीं जो मदद हुई है राष्ट्र से सिर्फ दा किए हुए तकदीर में मेरी भी कोई रात लिख भेज हुआ है उठ गया यू तो जमाने से सुकून कुछ तो होगा आदमी का नाम लिख भेजो या रास्ता रास्ता मंजिल परस्त है कि मेरे रहे तबीब का अंजाम लिख भेजो जबसे गए हो पुर असर तबियत नहीं खेली अब की हवा के रास्ते मुस्कान लिखने जो गांव में नए दौर का प्रभाव देखिए हर नजर हर नवी में बदलाव देखिए इंसानियत यु ही तो ना चुकता हुई निर्धन का है धनवान से टकराव देखिए बदलियां बरसी तो बरसी शहर से हटकर बस्ती में धूपछांव का छिडकाव देखिए कल तलक घर बार था आबाद था आंगन नए दौर में नए तौर का बदलाव देखिए वो जो मुझको हर घडी सूली चढाई है चाल में उसकी हुआ है । राव देखिए जब जब भी वो मिले हैं रोते रोते हस्ते हैं फिर फिर भाग का मस्ती का बाहर मेरे फिर धरते हैं चलते चलते रुक जाना रुक रुक कर के चलते हैं आंखों से करते हैं बातें हाथ नब्ज पर रखते हैं गुजरात एज सफर से ऐसे नाक पकडना भरते हैं बोल सके तो खुलकर बोल वजन तरफ दारों का तो अपना और बनाया छोड सबको एक नजर से तो मैंने अपने पत्ते खोले तो भी अपने पत्ते खोल पर डे तो पर्दे हैं बेशक मुमकिन है पर दोनों में झोल अपना घर तो अपना घर है किसी और की कुंडी खोल तो तुम अपनी कीमत पहचान हूँ मैं तो हूँ कौडी के मोल तेज का क्या वो तो पागल है तो अपने बारे में हूँ कंगला मालामाल बरस शांतिदूत महाकाल बरस आता जाता सालाना मानवता को साल बरस राजनीति के गलियारों में करता खूब धमाल बरस जी ने देना मरने दे हैं, करता अजब कमाल बरस उत्तर की परवाह किए बिन गडता नए सवाल बरस कथनी करनी पढना हक करता नहीं मलाल बरस तेज मानवीय संबंधों का करता नहीं खयाल बस बात पर कुछ बात कहना प्यार को जज बात कहना बारहा गमगीन मत रहे खास कुछ उत्पाद कहना टूटती इंसानियत को कल योगी प्रपात कहना रक्त में ना हाई धारा को बे सबब अपवाद कहना आग का घर है जमाना टूटकर हिमपात कहना दो सावन कि करवट बदलती रही कि समंदर की चढती उतरती रही चंद सोता रहा अर्श पर नई खबर चांदनी दरबदर भटक ही रही धनिया की नाजुक जवानी मगर दुष्ट आंखों में रह रहे उतरती रही जान तारों से लेकर कोई ताजगी बीटीआरसी बनती समवर्ती रही तेज तपता रहा जेट की धूप साहब वो सावन के जैसे ही बस्ती रही विदा हुई जब घर आंगन से बेटी आ रहे बस पडी बूढे बाबुल की अखियां आ रही हूँ भाभी की आंखों के आंसू सूख गए हवा हुई छोटे भैया की निधियां रहे बाहर बाहर बिटिया भी थी दुखी बहुत अंदर अंदर चमक रही थी बिंदिया रही दूल्हा दुल्हन पल भर में ही एक हुए हाथ लगी जी हूँ निज मंजिल की बत्ती आ रही तेज अकेला नाहक थक थक रोवे हैं जीवन जीवन है बहती नदियां रहे बेटे वालों की सरदारी क्या कहने ढोल वाले गोलाबारी क्या कहने सब दुल्हे के आगे पीछे घूम रहे बेटी वालों की ला जारी क्या कहने लेना देना खाना पीना सब कुछ है ऊपर से है तहबाजारी क्या कहने मित्र जनों ने मिलकर सारा काम किया रिश्तेदारों की मेहमानी क्या कहने तेज पडोसी आए आकर चले गए नए दौर की आपस दारी क्या कहना है कब फर्स्ट टूटे गगनी वे चुरू तो कुछ कुछ हो आम लापा बजे घुंगरू तो कुछ कुछ हो अमावस्या की रातों में जो जुगनू बन कभी दो को कभी निकलूँ तो कुछ कुछ हो पतझड के बियाबान मे में सरसों सारा कॅश लूँ बनु सवरूप तो कुछ कुछ हो वैशाखी दोपहरी में मैं बन बादल कभी घर जाऊँ कभी बरसू तो कुछ कुछ हो तेज का क्या मेरी सोचो मैं बन मजनू डिश करके नाम हो गुजरा हूँ कुछ कुछ वो आई भी सकुचाई भी कुछ मिलने से कतराई भी लगता है सस्ती है अब उसे भीड भरी तन्हाई भी नए दौर में छीन ली वैसे तरुणाई भी अंगडाई भी आप चुराई के होले होले वो शरमाई भी खिलाई भी कुछ भी गांव जिंदगी आ रहा है रुतवा भी जो दवाई भी इतना भरना प्रयाद क्या क्या दिल से दिल को याद किया कौन है अपना कौन पराया जितना हो इमदाद क्या कर यूट्यूब जीना भी क्या जीना कुछ कुछ कुछ संवाद क्या कर कोई नहीं यहाँ सुनने वाला नाहक न फरयाद क्या कर शायद फिर हाजत हो निकले आंसू ना बर्बाद किया कर हूँ गए रोज मैं देखा क्या यूज चांद सा चेहरा रोशनी कम कम थी कुछ दाग था कह रहा गो चंद की फितरत नहीं मेरा नसीब है या की है मेरे देश पर एक लाख का पहला नामुमकिन हुआ मिलना मेरा उससे कभी बुंदी रही था उम्र जो मेरे नाम का सहरा वो आदमी जो न्याय की नजरों में चोर था नजरों में खास हु आम कि वो आदमी ठहरा उन्हें जाना जिंदगी दरिया है हर नजर के तेज नहीं जाना क्या जिंदगी का सहवा जब मैं पारी हार खडा था सुधियों से हर सांस लडा था चंदा अंधियारों में गुम था सूरज का प्रभाव पडा था मेरा भी अस्तित्व था कोई लेकर इतनी बात अडा था आज की तरह मियां कल भी आरा माना आंगन कुछ गला सडा था तेज अकेला क्या कर लेता है लडने को यू जो लडा था फिर फिर कोई अपना मुझे शीर्षा दिखाए हैं खुद तो हस्ता है मगर मुझको रुलाए हैं मेरे घर में देख कर के धुप अंधेरा बारहा घर में वो किसी और के दीपक जलाए हैं मांगू पता अगर तो वो रास्ता बताये हैं आने को तो आता है मुझे जोड घटाओ हूँ वह करते करते जोड कर कुछ कुछ घटाई है बात बढने से ही पहले हम गए अच्छा हुआ अब मैं बतलाऊं से ना वो बुलाई हैं जाने कब कब क्या क्या खोया सोच सोच के मन में रोया के मजदूर इनका भूका बच्चा माँ का थप्पड खाकर सोया जब जब नींद ना आए मुझको आंसू पीपी करके सोया चंदा क्या खुजलाई सूरज घोडे बेच के सोया तेज पहनकर काला चश्मा छत पे चादर तान के सोया ये कैसी हिमाकत है रिश्तों में बगावत है कहने को तो असली है सचमुच में मिलावट है चलने का हुनर तो है रस्तों में रुकावट है भूखों के पांव छूकर उभरी ज्ञान सियासत है उसने नहीं मेरे हाथों की लिखावट है उससे ही नहीं मेरी खुद से भी अदावत है करता है कौन मेरी धरती पर हिमायत है मतलब की बात करना दुनिया की रिवायत है है चादर में झोल खासे ये कैसी बुनावट है तेज सभी अपनी फिर कैसी शिकायत है अपनी एक मजबूरी है खुद से खुद की दूरी है मोर हुआ बूढा मना पर मस्त मलंग मयूरी है काम तो है पूरा का पूरा अभी मगर मजूरी है रोटी के मुद्दे पर चर्चा साडियों गए अधूरी है जीना तो है एक चुनौती मारना एक मजबूरी है बहुत हुआ जीतेजी मारना जुलमत के घर पानी भरना मुद्दत बाद समझ आया है खुलकर जीना खुलकर मारना जिसको आना है आएगा देशक द्वार गुलाम मत रखना खट्टा मीठा जैसा भी है मैं फिल बीच सजा कर रखना तेज आंधियां बाबस्ता है दीपक जरा बचाकर रखना बे जाना सिर्फ अपने तू सबके मुन्ना हले लेनी ही पडे घर तो खुदा की पनाह लें हो ही गया ना बेडा तमाम अगर ले और लेना हक सबकी सलाह ले सुनता है कब कानून मुद्दा ही कि सादा साथ में कुछ एक तू अपने गवाह ले बनता था जो इश्क का तीमारदार हो गया वो इश्क में यू ही तबाह ले कुछ जामनगर जो हो गया तो हो गया छोड सिटवे तेज अब मंजिल की रह लेगी सरे राह में गुजरात तो पर कुछ कुछ यूं काम तेरह कुछ ने बडा तो पर कुछ कुछ यूं ना घर का रहा घाट का क्या कही ना मेरा सच उछला तो पर कुछ कुछ यूं कब रात हुई कब दिन निकला मैं क्या जानूँ गिर गिर के मैं मिला तो पर कुछ कुछ यूं न बाहर कभी न पत्थर बनाराम क्या मैं बर्फ सरीखा पिघला तो पर कुछ कुछ यूं उठ उठ गिरना गिर गिर उठना लगा रहा है तेज सफल में निकला तो पर कुछ कुछ हूँ मैं हूँ कि बर्बाद मैं पूछूँ गए दिनों की बात ना पहुंच हूँ झुलसा है मिला घर आंगन कहाँ हुई बरसात न पूछो दिन डालते ही टूट गया दिल और गुजरी रात ना पूछो फरमानों में चैन अमन है वैसे है उत्पाद न पूछो कुछ तो मेरा भी रहने दो मेरी हर एक बात ना हो आंखों आंखों प्रीत लिखा कर अधरों आदमी गीत लिखा कर सर्दी सर्दी धूप का नगमा गर्मी गर्मी शीत लिखा कर अपने हिस्से हार भली है उनके हिस्से जीत लिखाकर आपने तो आपने है माना गैरों को भी मीट लिखा कर तेज के नगर में नाकाफी हैं । सांसों में संगीत लिखाकर बहुत मुश्किल से दिया जाता है । अंक मिलता नहीं लिया जाता है । जहर पीने की बात किया कीजिये जहर मुश्किल से पिया जाता है । कर्ज लेना तो सहज है लेकिन कर्ज क्रिश तों में दिया जाता है । हम तो हम है कि जवाब दिल छह रहे पर दिल मुश्किल से दिया जाता है । बात करने में कुछ नहीं जाता । जख्म मुश्किल से सिया जाता है पल पल यु ही गुजरा जीवन कदम कदम पर हारा जीवन हमने जाना एक चुनौती उसने जाना नारा जीवन मौत को आना है आएगी फिर फिर लाख सवारा जीवन समझे थे हम चांद सरीखा लेकिन निकला तारा जीवन मौत की चिट्ठी साथ लिए हैं मानो कि हल्का राजीवन कहने को एक साल गया है वैसे जिंदा काल गया है लेकर खाली प्याला प्याली घर अपने कंगाल गया है सत्ता की आपाधापी में पाक कभी बंगाल गया है मानवता के सीने पर चढ मजहब का भूचाल गया है बेपर्दा हुई राजनीति की इंसानी सुल्ताल गया है सोनी मस्तानों की होली हाथ छोडा महिवाल गया है तेज पुराने संबंधों को अनुबंधों में ढल गया है एक दिन मुझे तू आंख भर के देखता हूँ सीने पे तेरे हाथ घर के देख तो कुछ सुनाई दे अगर तो चुप रहना दिल्लगी का हौसला एक बार करके देख तो जो कुछ हुआ तो हो गया अब छोड भी जीतने पर भी कभी तोहार करके देख तो हर घडी ॅ आऊंगा नजर सुधियों की खिडकी खोलकर के देखता हूँ तेज है कि उल्फत में तेरी जब है दिल तू उस परिवार करके देखता हूँ खिराम आखिर लामा चला कीजिए बियाबाँ अभियान बाजिया कीजिए जिंदगानी असल जिंदगानी नहीं मौत से रूबरू हो दिया कीजिए रिंदों की सहमत है अच्छी नहीं अकेले अकेले पिया कीजिए कब तक किसी का एहसान लोगे चाक दामन स्वयं ही सिया कीजिए तेज । खुद ही उजालों से महरूम है ना उसका सहारा लिया कीजिए भागा कशी में ही दम लिया है आज तक । मैंने देखा नहीं है शहर क्या बाजार तक मैंने कहने को हम आजाद है, आबाद है लेकिन देखी नहीं दिल्ली कभी राजपथ मैं नहीं खून का इल्जाम यूज के सिर्फ था खुद ही खुद को है क्या पर नामजद मैंने एक खत्तक भी मेरा अक्सर बना हुआ लिखने को यू लिखे हैं लाख खत्म मैंने दिल्लगी भी खूब है दिल्लगी में तेज पूछा न यार ए यार का कभी नाम तक मैंने हम को छह से उदार होने के लिए जैसे पूर्वा बयार होने के लिए कितना अच्छा हो कि घर ही में दर्द दिल का गुबार होने के लिए बहुत शब्दों को छला था हमने । शब्द आखिर सवाल होने के लिए शिकारी शौक फरमाते खुद ही खुद का शिकार हो निकले । घर के बाहर जो शेर बनती थी तेज घर में सीआर होने के लिए

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