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Transcript

Introduction

तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा । ये नाराज इस इंसान ने दिया । जिस व्यक्तित्व नहीं दिया उस महापुरुष के नाम से हम सब वाकिफ है । लेकिन उनका जीवन, उनकी जीवनी, उनका संघर्ष ये शायद हम नहीं जाएगा । लेकिन अब चंद्र सुल्तानपुरी की इस किताब में इसका नाम है क्रांतिकारी सुभाष । हम जानेंगे सुभाष चंद्र बोस के जीवन के बारे में । एक क्रांतिकारी के रूप में, एक बेटे के रूप में और एक देशभक् के रूप में । ओलिया उनको कॅामन चाहे राजकीय बनी ।

1. Khoon KI Roli

खूल किरोली एक सशस्त्र गोरी ने आगे बढकर पिंजरे का लो हरिद्वार खोलिए जैसे ही बंदी शेर सीट से बाहर आया हाँ खोज पूर्ण कोलाहल धरती और आकाश को गुंजरित करो था ऍम जिन्दाबाद वीर सुबह जिन्दाबाद आजादी अधिकार हमारा कुछ छडों में इतनी ही पुष्पमालाओं से उसका गला भर गया उस मानव यू पी । सी हाँ की दुर्बल किंतु दीप्तिमान मुखाकृति पर गंभीर मुस्कुराहटें मिलती वो हाथ हिला हिलाकर लोग स्वागत सम्मान के प्रति आभार प्रकट कर रहा था प्रणाम मेरे आराध्य प्रणाव वहाँ अपने आपसे बताए विस्फारित नेत्रों से कुछ अड उस अभूतपूर्व जान कोलाहल को देखती रही फिर पूजन का था लिए आराध्या तेल की ओर पडने लगी सी है बडी निर्भरता और गौरव के साथ आगे आगे चल रहा था और हर्षोल् लेता पार्जन समूह गगनभेदी नारों के साथ उसका अनुसरण कर रहा ब्रिटिश सरकार की सशस्त्र टुकडी ने पुलिस को चारों ओर से घेर रखा था । गुड सवार बडी सतर्कता के साथ जुलूस का फेरा लगा रहे थे और पुलिस का एक उच्च पदाधिकारी जी द्वारा जुलूस की गतिविधियों का निरीक्षण कर रहा था । जुलूस पूरे जोश खरोश के साथ आगे बढता रहा नारोल ब्रिटिश विरोधात्मक आवाजों की गति बढती रही । लोगों में अदम्य साहस और अटूट उत्साह हिलोरे ले रहा था । एक विस्तृत पार्क में जुलूस ठहर गया । पार्क में पूर्व से ही स्वाधीनता सेनानी सुभाष जी के स्वागत आह्वान के लिए भव्य मंच घोषित था । हजारों की संख्या में दर्शक अपने लाडले नेता के दर्शन के लिए उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रहे थे । इंकलाब जिंदाबाद, वीर सुभाष अमर रहे आजादी अधिकार हमारा जैसे ही सुभाष मंच पर उपस्थित हुए, उपस्थित जनता तो मूल हर्ष और उल्लास के साथ गगनभेदी नारा लगाया जय सुभाष जय हिंद । माइक पर ओजपूर्ण स्वरलहरी वहाँ के वातावरण में गूंजी और इसके साथ ही वहाँ पर शांति हो गई । बंदी सुभाषा बंदे मधुर और श्रद्धा ऍम सात्विक शांति को आकस्मिक रूप से भंग किया और हजारों दृष्टियां अपलक मंच पर टिक गई । मृदला जशवीर परिधान में सुशोभित हाथों में पूजा की थाली लिए क्रांतिदूत के अभिनंदन के लिए मंच पर पस्थित हुई । मृदुला क्रांतिदूत कि तेजस्वी मुखमण्डल पर आह्लाद एवं गौरवान्व भक्ति की पवित्र मुस्कान तरह थी । मृ दिलाने गुलाब के सुगंधित पुष्पों की एक माला क्रांतिदूत को अर्पितकी एक चढ के लिए उन मत बाद लोगों की तरह तालियों की गडगडाहट ये क्रांति जीता की क्रांति प्रयाण का अभिनंदन था मेरे दिलाने आराध्या के उन्नत ललाट पर रोली अंकित करने के लिए हाथ बढाया फिर ओली स्वतंत्रता की सिपाही के मस्तक पर ये रोली क्रांतिदूत के स्वर में कौन सा था तो बाल भर को मृत लाल अरेंज कर रहे गई । मेरे विचार से आजादी के दीवाने का स्वागत रख की रोली से होना चाहिए मेरे द्वारा पोषण कब आएगा जब तुम रख की रोली से मेरे क्रांति प्रयाण का अभिनंदन करोगी मृत लाने पल भर को श्रद्धा वेरावल दृष्टि से क्रांति देवता के प्रखर मुखडे पर देखा सहसा हीरो लिया अंकित करने के लिए उसका बडा हुआ हाथ स्वतः पीछे लौट आया अभी इसी ठंडे वहाँ बुदबुदाई उसने उसी शरण रेजर मंगाकर अपना छोटा चीज लिया रख की गाडी धारा छलक पडे तुम धन्य हो देगी मैं तुम्हारी इस रक्त होली को व्यर्थ नहीं जाने दूंगा । कहते हुए क्रांति देवता ने उसके समक्ष मस्तक न कर दिया रखी जोलन ट्रोली क्रांति देवता के मस्तक पर अंकित हो गयी वातावरण पुनः और जसवीर हर्षनाथ से झंकृत हो था सहस्त्रों कंटेश्वर एक साथ ललकार थे आजादी अधिकार हमारा मार्टि के कण कण का ना आओ प्यारो वीरो आओ भारत मान्य तुम्हें पुकारा ज्यादा सारा हिन्दुस्तान हिंदू मुस्लिम एक समान बता रहा इतिहास हमारा व्यर्थ नहीं जाता । बलिदान केवल एक यही अभियान जय हिंद, जय हिंद, जय हिंद । सुभाष ने अपने संबोधन में कहा मैं आप लोगों को अपनी आत्म की संपूर्ण निष्ठा के साथ अपने स्वागत अभिनंदन के लिए धन्यवाद देता हूँ । आप जानते हैं कि सन उन्नीस से इक्कीस में विश्वविद्यालय के प्रांगण से निकल कर मैं सक्रिय रूप से स्वतंत्रता संग्राम में कूद पडा हूँ । नतीजा ये हुआ कि कई बार मुझे आजादी की लडाइयों से संबंधित होने के कारण बिना किसी निश्चित आरोप के बंदी बनाया गया । मुझे इसकी कोई शिकायत नहीं क्योंकि अपनी स्वतंत्रता का अधिकार मांगना हमारा अधिकार है और हमारे इस प्रयास को आघात को बचाना उनका शासकीय दायित्व है । मैं बिना किसी अभिमान के इस बात का दावा करता हूँ कि प्रत्येक भारतीय ने मेरी तरह विभिन्न प्रकार की राष्ट्रीय समस्याओं का अनुभव किया है । अपने ऐसे ही अनुभवों के आधार पर मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ के बिना सशस्त्र क्रांति के भारत की स्वतंत्रता संभव नहीं । आप सब जानते हैं कि जब विदेशियों ने सर्वप्रथम हमारी धरती पर अपने कदम रखें, उस समय भारत में दूध घी की नदियाँ बहती थी । लोग अमन चैन से रहते थे । भारत में सुख समृद्धि अपनी चरम सीमा पर थी और विदेशी इसे सोने की चिडिया के हैकर्स चिडिया को अपनी स्वार्थ की धारा में बंदी करने को लगाए रहते थे । वो भारत की समृद्धि ही थी जिसमें कुटील अंग्रेजों को भी हमारे देश की ओर आकर्षित किया था और बडे ही नाटकीय ढंग से व्यापार के बहाने हमारे देश में आकर उन्होंने एकछत्र अधिकार कायम कर लिया । आज हम देखते हैं कि भारतीय जनता राजनैतिक दासता और आर्थिक विपन्नता के कारण भूख और गरीबी से मार रही है जबकि अंग्रेजो कभी दीनता और दरिद्रता में जीते थे । भारत की समृद्धि और साधनों के बल पर मोटे और समृद्ध हो गए केंद्र तमाम दुख और कष्ट सहकर दासता और उपेक्षा की चरमसीमा पर पहुंचाने के बाद अब भारतीय ये समझ गए हैं कि इन सभी स्थिति और समस्याओं को सुलझाने का एक ही रास्ता है अपनी खोई हुई स्वतंत्रता को पुनः प्राप्त करना । भारतीय इतिहास के घटनाक्रम से हमें तो समझ मिले हैं । पहली बार यदि हम विश्वासघातियों का बहिष्कार नहीं करते और उन्हें आवश्यक दंड नहीं देते तो हम स्वतंत्रता प्राप्त करने की कल्पना भी नहीं कर सकते । और दूसरी बात जब तक हम भारतीय एकता के सूत्र में बंद कर सामूहिक रूप से ब्रिटिश सत्ता से मोर्चा नहीं लेते तब तक हमारी आजादी का प्रयाण पूरा नहीं हो सकता । वस्तु कहा जब सितंबर ऍम चालीस में लडाई प्रारंभ हो गई, उस समय हमारा कर्तव्य था कि हमारे देश की संपूर्ण शक्तियां एकत्रित होकर सरकार पर इस बात का दबाव डाले कि वह हमारी मांगों पर विचार करेंगे । यदि वो इन मांगों को पूरा करने से इनकार करे तो लडाई के लिए सामने किंतु अफसोस है कि सहयोगी नेतागणों ने मेरे इस विचार की उपेक्षा क्योंकि वो दूसरे ही ढंग से सोचते थे, उन की ढुलमुल नीति के कारण हमें असफलता ही हाथ लगी । ये वक्त ज्यादा तर्क वितर्क का नहीं है और हमें अपने संकल्प को दोहराते हुए अपनी आजादी की लडाई आखिरी सांस तक जारी रखनी है । नतीजा कुछ भी नहीं दोस्तों मैं एक बार फिर अपने विश्वास को दोहरा देना चाहता हूँ कि देश हर कीमत पर आजाद होगा । हमारा त्याग और बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा । हमें हमारे खून की हर पूर्ण का मुआवजा मिलेगा । हम अपने इस कठिन इम्तिहान में जरूर पास होंगे । आइए एक बार फिर हम अपने संकल्प को दोहराया लेगी । हम सब कंधे से कंधा मिलाकर अपनी आजादी की लडाई के लिए आखिरी सांस तक लडते रहेंगे और हम में से कोई भी अपने लिए नहीं वन देश के लिए जीता मरता रहेगा । इस वक्त इतना ही काफी है । इन्कलाब सिंदबाद चाहिए । जनसमूह ने गगनभेदी नारा लगाया नेताजी जिंदाबाद नेता जी अमर रहे । कभी ब्रिटिश कोर्सवार सभा को भंग करने के लिए दौड पडे । उत्तेजित जनता उनसे भिडने को आमादा हो तभी लोगों ने नेता की ओजस्वी शब्द सुने । हमें ऐसी छोटी मोटी बेकार की बातों में अपनी शक्तियों का विनाश नहीं करना है बल्कि अपने को भविष्य के बडे मोर्चों के लिए तैयार करना है । जनता उनकी आवाज के जादू से शांत हो गई । आप के लिए सार्वजनिक सभा में भाषण करने की पाबंदी है । पुलिस अधिकारी ने आगे बढकर सुभाष को पुनः हिरासत में लेते हुए कहा आप को घर में नजरबंद रहेगी । फरवरी शर्त पर छोडा गया है । ठीक है गंभीर मुस्कुराहट के साथ सुभाष इतना ही कहकर गाडी में बैठ गए और पुलिस की जीप उन्हें हिरासत मिलेगा । फंकी एल्गिन रोड वाले मकान की ओर भागती रही देशभक्ति युवा हृदय सम्राट सुभाष का ये क्रांति अभिनंदन था

2. Kranti Ki Chingariya

शहर ऍम गोरे मारक ने किसी बात पर भारतीय बालक का कॉलर थामकर जोड दिया । सारी कक्षा में सन्नाटा छा । भारतीय बालक से हम गया और कातर दृष्टि से गोरे पालक की ओर निहारता मगर उसके बगल की सीट पर बैठे एक दूसरे विद्यार्थी के बाजू पढने लगे । ऍम किसी को बीच बचाव न करते देखकर गोरा बालक और शेर हो गया । भारतीय बालक की आंखों में शमा चायना का भाव था । पि्रंट उसका सहपाठी क्रोध और प्रतिशोध में कहाँ रहा था? उसके विशाल तेजस्वी नेत्रों में चिंगारियां अटक रही थी और वह गोरे बालक से बदला चुकाने के लिए आतूर हो रहा था । क्षण प्रतिक्षण उसकी इच्छा होती थी कि उछल कर उस पर मार्च को रे पालक का गिरवाना मामले और मारे घुसों के उसकी ना तोड दे । ऐसा कक्षा में अध्यापक ने प्रवेश और क्रोधासुर बालक की इच्छा घटकर रहेगी, लेकिन भीतर ही भीतर सुलग तरह इंटरवल हुआ तो उसके अपने भारतीय सहपाठी को अलग बुलाकर कहा तुम मुश्किल हो । अगर इस बदमाश ने मेरा इतना अपमान किया होता तो मारते मारते कचूमर निकाल लेता । उसका मैं अकेला क्या करता? वह बालक गिलानी से रो पडा । साहस हो तो अकेला आदमी बहुत कुछ कर सकता है । उसने दिलासा दी खबरा हो नहीं मैं उसे अंग्रेज के बच्चे से तुम्हारे अपमान का बदला छुट्टी होने किसी बडे ऑफिसर का लडका है । बालक ने सहमत स्वर में कहा वो कुछ भी हो उग्र साथ ही ने निर्मतता से कहा मनुष्यता! न्याय की दृष्टि से हर इंसान बराबर होता है । मैं जानता हूँ कि उसने बडप्पन और अंग्रेजियत के नशे में अकारण ही तुम्हारा अपमान किया है । इसलिए उसे माफ नहीं किया जा सकता । आप धन्य है सुभाष भाई श्रद्धा और आभार से गदगद होकर सहपाठी ने कुछ साहस क्या आप ही कहते हैं । हमें उसे अपमान का बदला ली नहीं चाहिए परन्तु इसका परिणाम भयंकर हो सकता है । उसकी चिंता मत करो । साहसी सुभाष ने दृढता के साथ उत्साहित किया । अन्याय का विरोध करना प्रत्येक वंशिका का टफ है । उसका परिणाम कुछ भी निकले । हमारी अन्याय, सैनिक कमजोरी ने ही हमें अंग्रेजों का गुलाम बना रखा है । आपके विचार कितने महान है? सहपाठी अचानक से अपने साथ ही की ओजपूर्ण शहर को देख कर रहा तुम सिटी में मेरे साथ रहना । सुभाष ने कहा इंटरवल समाप्त हुआ । दोनों ने कोई मंत्रणा की और वहाँ कक्षा में बैठे हैं । अध्यापक विषय पढा रहे थे, मगर बारह सुभाष का ध्यान सोना था । शरीर से कक्षा में बैठा था परन्तु हृदय और मस्तिष्क से नहीं था । नाना प्रकार के ज्वलंत प्रश्न उसके हृदय पटेल पर उभर रही । वो अपने आप में डूबा हुआ था । ये गोरी चमडी वाले अपने आप को क्या समझते हैं? हमारी ही धरती पर ही हमारे शासक और भाग्य विधाता बनकर हम पर तमाम अत्याचार कर रहे हैं । गुलामी करते करते हम अन्याय और अत्याचार सहने के आदी हो गए । जब तक हम निर्भिकता के साथ ऐसी कुटिल नीतियों का विरोध नहीं करेंगे, हमें दासता से मुक्ति नहीं मिल सकती । जब एक अंग्रेज लडका हमारे साथ ऐसा दुर्व्यवहार करने का साहस कर सकता है तो इतनी बडी ब्रिटिश सकता । हम भारतीयों पर जाने कैसे कैसे जुल्म खाती हूँ । ऍम दृढनिश्चय के साथ वो अपने स्थान से उठा और सहपाठी को अपने पीछे पीछे आने का संकेत क्या दोनों द्रुतगति से स्कूल के मही द्वार की ओर चल पडेंगे । आगे वो कांग्रेस पार्टी चला जा रहा था । कुछ दिनों में दोनों उसके निकट पहुंच गए । सुभाष ने पीछे से उसकी टांग में लगी मारी । असावधान होने के कारण वह चारो कोने छुट गया बदमाश करेगा गरजते हुए सुभाष नेस्ट गिरेबान खामकर उठाया आहट अंग्रेज बालक हक्का बक्का सा सुभाष की ओर देखता रह गया तो उन्हें इसका अपमान क्यों किया था? सुभाष ने कठोर स्वर में पूछा एक भारतीय वाला द्वारा एक अंग्रेज बालक को पीटना एक असाधारण घटना थी । तमाम विध्यार्थी वहां एकत्रित हो गया और इस अभूतपूर्व रोमान्चकारी दृश्य को अच्छे से देखते रहेंगे । आइन्दा जो किसी भारतीय विद्यार्थी के साथ उन्हें ऐसा दुर्व्यवहार किया तो याद रखना हड्डी पसली तोड कर दूंगा । झटका देकर सुभाष ने से छोड दिया । उस दिन से सुभाष के दुस्साहस को लेकर सारे स्कूल में सनसनी फैल गई ।

3. Surjoday

सूर्योदय प्रवा कैसी है? रायबहादुर जानकीनाथ ने विभाग स्वर्ग में पूछा और उनकी व्याकुल दृष्टि कमरे के द्वार पर झूलते पर्दे कोबेद नहीं लगी । घबराएगी सरकार कमरे से निकलकर आती हुई । सेविका ने मंद मंद मुस्कराकर कहा कुछ ही पलों की देर है । इस समय तो बीवीजी प्रसव पीडा से करा रही है । करा होने का करना सेट स्वर सुप्रसिद्ध वकील रायबहादुर जानकीनाथ की कानून तक आया । क्षण भर को मैं रोमांचित हो उठे और शंका आशंका से उनका हृदय कांप उठा । माँ दुर्गे उन्होंने दीर्घ निश्वास लियो रात दुर्दशा । मैं इधर से उधर टहलते रहे । कटक ओडिसा की कोटलिया ग्राम में स्थित उनकी विशाल टेलिकाॅम चहल पहल और उत्साह उमंग से गूंज रही थी । वातावरण अत्यंत सुहावना हो रहा । वायु में हूँ और नवीनता का संचार प्रतीत होता था । ऐसा आभास होता था कि भारत को कोई महान उपलब्धि होने की घडियां पहुंची है । रायबहादुर जानकीनाथ स्वयं उल्लास की अनुभूति कर रही थी । ऐसे शिक्षक हो रहे थे जो प्रसव की दिव्यता का पूर्वाभास देते थे । एक विचित्र सानंद उन्हें छूट हो जाता था । बधाई हो, सरकार सूर्योदय हो गया । एक का एक कक्ष से निकल करती हुई परिचारिका ने हर्षोल् सिर्फ स्वर में पुत्ररत्न प्राप्ति का शुभ समाचार सुनाया और रायबहादुर कुछ उनको आनंद में बोर होते हैं । विशाल भवन का कोना कोना मंगलगीत लहरियो से गुंजायमान होता । बधाई और शुभकामनाएं व्यक्त करने वालों का तांता लग गया । सेवक सेविकाएं न्योछावर पाने के लिए मालिक और परिवारजनों को घेरने लगे । कोई ऐसा नहीं था जो इस नवोदित सूर्यउदय पर तन मन से अलादीन हो । शहर आई की सुमधुर स्वरलहरी दूर दूर तक गूंज रही थी । पूर्व जी बुलाए गए जयम कुंडली बनाएंगे । शिशु के ग्रहों को देखकर पंडित जी आश्चर्यचकित रहे गए और हर्षोल्लास से बोले ये बालक विद्या में सदा अग्रणी रहेगा । महापराक्रमी होगा दुश्मन सदाय से मैं भी तो नहीं । अपने माँ से अधिक जननी जन्मभूमि का मुफ्त होगा और इतिहास में अमर स्थान प्राप्त करेगा । इस भविष्य घोषणा नहीं, परिवार की प्रसन्नता में दुगुनी वृद्धि करती रायबहादुर जानकीनाथ के हर्ष का पारावार ना रहा । शिशु का पालन पोषण बहुत सावधानी के साथ होने लगा । उसका नामकरण सुभाष चन्द्र किया गया । वास्तव में ये संख्या उसकी रूपाकृति के सर्वथा अनुकूल थी । जो देखता मंत्रमुग्ध साहब अप्रतीम शिशु को ही देखकर है जाता । उसके उदित होने के दिन से ही रायबहादुर की यश और प्रतिष्ठा में वृद्धि होने लगी । एक रात रायबहादुर जानकीनाथ ने एक विचित्र तो आपने देखा शिशु शुभाष पालने में निद्रामग्न हैं । सहसा पालने के समीप दिव्यप्रकाश फैलता है और माँ दुर्गा जैसी भव्य आकृति प्रकट होती है । उस आकृति के हाथों में एक पुष्कर मालिका है । बहुत तेजस्वी नेत्र से अपलक श्रीश्री सुभाष को निहारती रहती है । रायबहादुर सांसे संभाले अचानक से या कुछ स्वप्न अदृश्य देखते रहते हैं । फिर भी आकृति आगे बढकर कुछ कोमालिका शिशु के गले में पहना दी है वो देख पत्र तो अवतारी है । फॅमिली भूमि को बंधन मुक्त कराने के लिए जन्म आया गया है । मेरा शीर्ष है तो अपने महान देश में सफल हो और वहाँ पुष्पमाला शिशु के गले में जाना पडेगा । मांग साक्षात महादुर्गा भावविभोर होकर रायबहादुर देवी के चरण स्पर्श करने को झपट्टे हैं । अचानक उन्हें पलंग के पाएगी, छोडकर लगती है और स्वप्न भंग हो जाता है । रायबहादुर रखा था व्रत से आंखें मिलते हैं नहीं कुछ भी नहीं था । स्वच्छ केवल स्वस्थ्य मगर अध्यक्ष वक्त ऐसा सपना उन्होंने पहले कभी नहीं देखा था । अच्छा पढते हुए पत्नी के कक्ष में देखा तो प्रभावती गहरी निद्रा में लीन थी और समीर की पालनी में सुभाष सोया था । वास्तव में ऐसी गले में एक ताजी पुष्पमाला पडी थी हूँ । स्वप्न केवल सपना नहीं था । पत्नी के निकट आकर उसे सारी घटना कह सुनाई और शिशु के गले में पडी हुई माला की ओर संकेत क्या सच ये कैसी लेना है? प्रभावती चकित होती ईश्वर जाने रायबहादुर हर्षातिरेक में अधिक कुछ ना कह सके ।

4. Proura Bachpan

रोड बचपन बहुत सारे बच्चे सामने हरेभरे मैदान में उछल कूद रहे थे, मगर वो गुमसुम सा एक और बैठे जाने क्या सोच रहा था उसकी मुखाकृति से ऐसा लगता था हमारा किसी गंभीर चिंतन में डूबा हुआ सात आठ वर्ष के नादान बच्चे को कौन सी गंभीर चिंता हो सकती है? मैंने तो ये उसका नीति का स्वभाव था और उसके बाद मित्र उसके ऐसे रूखे स्वभाव पर हैरान गौरवर्ण बडी बडी चमकीली यहाँ के चौडा मात्र रिश्ते, पृष्ठ, शरीर और गंभीर मुखाकृति उसके असाधारण व्यक्तित्व का भाषा देती थी । इस समय वो बालयोगी सा दिखता था हरी सुभाषा दुनिया अकेले बैठे क्या कह रहे हो ऐसा? एक ओर से प्यारी सी बच्ची दौडती हुई उसके समीप आएगी । बच्ची के स्वर और मृदुलता ने उसकी ध्यानावस्था भांग की और इसकी गंभीर चेहरे पर अनायास मुस्कान के फूल खिलाया । बच्ची ने अपार स्नेह ऐसे उसके दोनों कंधी धाम लिए और जो छोटी हुई बोली पढना चल सब के साथ खेल तू जा खेल मृदला मुझे खेला नहीं भाता । उसने साहस प्रेम से बच्ची को समझाया ना सुभाष ता तुम चलोगी तभी जाऊंगी मृदला जिसपर पडती थी कहाँ तो मुझे उनके खेलों में कुछ आनंद नहीं आता । फिर तुम कैसा खेल वजन करते हो । सुभाषा मृदुल ने पूछा वीरता उसने घर से कहा वो खेल कैसा होता है? तुझे दिखाऊंगा कहकर? सुभाष इसके साथ उठ पडे । दोनों हाथों में हाथ डायरेक्ट खिलाडी बच्चों के बीच आ गए । उस्तोली में पास पडोस के धनी और उच्चवर्गीय लोगों के बच्चे शामिल थे । दो तीन अंग्रेज बच्चे भी थे और सब मिलकर कोई अंग्रेजी गीत गाते हुए थे, रख रहे थे । बंद करो ये बेकार का गाना सुभाषनी ऊंचे स्वर में कहा, आवाज में कुछ ऐसा जादू था कि सब के सब मौन हो गए और सुभाष की ओर देखने लगे । अंग्रेज बालकों को सुभाष का इस तरह का ड्रॉप जमाना अच्छा नहीं लगा । उनमें से किसी जज और दूसरा किसी उच्च पदाधिकारी का पुत्र था । क्या इस गाने में क्या खडा भी है? हम लोग आएंगे । अंग्रेज जज की लडकी ने प्रतिवाद किया और पुराना गाने को तत्पर हुआ । इस गाने में अंग्रेजियत की बू आती है । सुभाष नहीं । लडकी आवाज में कहा, इसमें हिन्दुस्तानियों कि बुराई की गई है और अंग्रेजों को महान कहा गया है । ऍम तभी तो हिंदुस्तान पर हमारी हुकूमत इस बार दूसरा अंग्रेज वाले खोला । महान लोग स्वार्थी और विश्वासघाती नहीं हुआ करते । धोखा देकर किसी का राज नहीं हडप लेते वॅार हूँ । अंग्रेज बाला तडफ की और ऍम हारे वरना तुम्हारा मुंह तोड दूंगा । सुभाष सी की तरह हारते हुए उस की ओर ना भाई का ना इतना सुभाई कहती हुई मृदला बीच में आपको और उन्हें कसकर थाम गया । मैं इसलिए लोगों के बीच खेलना पसंद नहीं करता । सुभाष ने क्रोध में कहा जहाँ देखो तहां या अंग्रेज लोग हिंदुस्तान की बुराई करते हैं । ये बात मुझे सहन नहीं होती । इसलिए मैं ऐसे खेल कूद से दूर रहता हूँ । सुभाष कि रोज से बच्चे सहम गए और अपने अपने घर की रखवाली मगर मृदला ने उसका साथ नहीं छोडा । दोनों मित्र घर लौट तुम्हारी तो मुझे भी अंग्रेज लोग अच्छे नहीं लगते । सुभाष मृदला हुई अब मैं इनके साथ नहीं खेल होंगी । बाल सुभाष ने अचरज से अपनी बालिका मित्र की ओर देखा और मधुर मधुर मुस्कुराते हुए उसका सिर्फ तब आकर बोले तो मेरी दोस्त बनने के काबिल है । मैं तुझे अपनी फौज में रखूंगा । फौज कैसी फौज बालिका अचकचाकर रहेगी । मैं साहसी देशभक्तों की एक फौज बनाऊँ । सुभाष बोल वो फौजिया करेगी, फिर दिलाने पूछा अंग्रेजों से लडकर भारत माँ को स्वतंत्र करें । हम मृदला आँखे फाड रहेगी तो यहाँ बैठा है । बेटे चल आज दुर्गा नवमी पूजन करेंगे । एक का एक मां प्रभावती ने आकर बुलाया मैं भी देवी जी का पूजन करूंगा ना कर सुभाष तुरंत पडे सिना मौसी आज रात से बोली मृदुला सुभाष क्या कहते हैं की एक फौज बनाऊंगा जो अंग्रेजों से लडकर भारत माता को स्वतंत्रता दिलाई । हाँ, बेटी के सिर पर स्नेहन से हाथ करती हुई मांगकर कंट्री से बोली मेरे बचपन में ये फ्रॉड विचार कैसे कैसे सोच आती हैं तुम्हारी आशीर्वाद सीमा सुभाष का गर्वपूर्ण उत्तर था ।

5. Udarta Aur Seba Ki Ankur

उदारता और सेवा के अनुकूल सुबह सुबह क्या कह रहा है बेटा भर्ती हुई मां प्रभावती सुभाष के अध्ययन कक्ष में आ गई कमरा खाली महान चकित हुई अभी थोडी देर पहले जब सुभाष के लिए दूध लेकर आई थी अपनी में इस पर इशू का अध्ययन में तल्लीन था । आखिर सुभाष देखा ही चला । कहाँ गया मैंने अपने आपसे सुचार धीरे धीरे सुभाष की मैच के निकट उसने देखा कि चीटियों की लंबी कालीन हजार सुभाष कि मेरे से होती हुई उस की पुस्तकों की अलमारी की ओर जा रही है । यहाँ छुट्टियाँ क्यों? महान एक अमरीकी फर्श मेज और अलमारी के चारों तरफ ध्यान से देखा । वहाँ पर चीटियों का आना जाना वास्तव में आश्चर्यजनक था । इस साफ सुथरे व्यवस्थित स्थान पर चीटियों का क्या काम? मैंने सोचा हो सकता है सुभाष की अलमारी में कोई कीडा मकोडा मर गया हूँ । इस अनुमान से उसने अलमारी खोली और किताबें उलट पलट कर देखने लगे । शीघ्र ही उनके अनुमान की पुष्टि हो गई । मगर उनके अचरज का ठिकाना आया । कुछ तो अपने आप से सोचती रही । अगर प्रकृति का लडका है, पता नहीं उसका मन और मस्तिष्क कहाँ चलता रहता है । आखिरी रोटियाँ किस लिए अलमारी में पुस्तकों की कतार के पीछे दो सूखी रोटियां पडी थी । चीटियों की कतार रोडियों के कण तोड तोड कर ले जा रही थी । मांग को समझाते दिए नहीं लगी कि अवश्य ही रोटियाँ उसके बेटे की किसी विशेष प्रकृति से संबंध रखती है । माने रोटियों को हटाकर अलमारी की लेकिन उसे बीडी कैसे? विचित्र काम पर अब आशंका हो रही थी यहाँ क्या कर रही हो? मा कमरे में प्रवेश करते हुए सुभाष ने उदास स्वर में पूछा लगता है तेरा दिमाग खराब हो गया है । महान ईरोज में सुभाष के चेहरे की ओर देखते हुए कहा हरिपद ली उन्नीस अलमारी में रोटिया क्यों डाल रखी थी? ऍम कि क्या सुभाष ने भी एक घंटे से कहा और अनायास ही उसकी आखिर चल चलाई ये तुझे क्या हो गया? मैं रोटियों की बात कुछ समझ नहीं पाए । माने पर इसमें ऐसे सुभाषा कांदा सकता पाया । बात ये है कि मैं नित्य अपने खाने में से दो रोटियां बचाकर एक बूढी भी कारन को दिया करता था । वो मेरे स्कूल के रास्ते में खडी होती थी । कल जब मैं रोटियाँ देने गया तो अपनी जगह पर नहीं थी इसलिए उसकी इसी की रोटिया में यहाँ नजदीकी फिर किसी वक्त जा कर दिया होगा । मैं भी वहाँ गया था तो पता चला कि बेचारे का स्वर्गवास हो गया । अपनी बात समाप्त कर सुभाष इस प्रकार से क्या भरने लगा? मानव अधिकारों उनकी कोई आदमी हूँ, बेटे की सहर देता और उदारता पर मां प्रभावती का रूम रूम भगत हो था और वह हर्षातिरेक से उसके माथे को चूमती हुई प्रेम विभोर घंटे से बोली तो मनीष नहीं अवतारी है बेटे मेरी को धन्य हो गई । हमें गरीबों की सहायता करनी चाहिए ना माँ ये हमारा कोई अहसान नहीं । कर्तव्य सुभाष ने सहजभाव से उतार दिया । समाज की फाॅर्स समाचार पत्र पर टिकी थी । ऊपर ही मोटे मोटे अक्षरों में अंकित था । जहाजपुर में है जे का भीषण प्रकोप और उसके नीचे जाजपुर में पहले हुए हैं जैसे होने वाली जीवन शक्तियों का वर्णन अत्यंत मार्मिक शब्दों में किया गया था । बालक सुभाष पर इस दुखद समाचार की बडी गहरी प्रतिक्रिया हुई । उसके अंतरात्मा हाहकार कर उठे और हृदय का विक्षोभ अधरों पर भराया । वो आज महामारी के प्रकोप से अनगिनत रानियाँ समय ही कालकवलित हो रहे हैं । कोई भीषण काल से उनकी रक्षा करने वाला नहीं । बेचारे ग्रामीण असहाय अवस्था में मृत्यु के हाथों अपने जीवन का सौदा कर रहे होंगे । हाँ, मुझे अट्टालिका में रह रहे हैं । स्वादिष्ट भोजन कर रहे हैं और सुख चैन की बंसी बजा रहे हैं । पर विचारों पर क्या विपत्ति गुजर रही होगी? क्या हमें इस दुखद घटना को सुनकर भी खामोश बैठे रहना चाहिए? यहाँ तो हम मनुष्य होकर भी पशु से भी बदतर है । सुभाष ज्ञान बडे स्नेहा से पुकारती । विम दिलाने कमरे में प्रवेश किया । सुभाष का ध्यान हो गया आम रिजिला सुभाष ने पीके मुस्कान के साथ कहा और समाचार पत्र समेटकर एक और रख दिया तुम्हारा नहीं चलते मेरी समझ में आता ही नहीं है । भाई था बालिका एकदम निकट आकर उनके गले में बाहें पहनाकर बोलिए । हर घडी गंभीर ही रहते हो कभी मिनट में हस्ते मुस्कराते नहीं देखा जरूर हमारे दिल में कोई दर्ज पर राय समाज था, है ना अपनी बात समाप्त कर बालिका सुभाष के गंभीर गहरे नेत्रों में झांकने लगी तो ठीक कैसे हम बदला सचमुच मेरे दिल में एक भयानक दर्ज पड रहा है और मैं हमेशा उस दर्द की छटपटाहट से बेचैन रहता हूँ । ईश्वर तुम्हारे दिल में इतना दर्द होता है, सुभाष था और तुम नहीं देने बाहर अगर उसको छुपा रखा है कोई बढिया तो बदलाव व्यग्रता से बोली हूँ तू तो मेरी बच्ची है । सुभाष ने उस वगंधा जब पाते हुए कहा गरीब बदली मेरे दिल का दर्द मेरा कोई शारीरिक रोग नहीं है । ये तो समूचे देश का दर्द है, समूची मानवजाति की पीडा है और संपूर्ण भारत की वेदना है । मैं चिंतित और दुखी इसलिए रहता हूँ कि अपने देश में हमको नाम क्यों है? गोरी सरकार ने हमारे अधिकारों को क्यों छीन रखा है? हम दरिद्रता, गरीबी, पराधीनता और संताप का जीवन चौधरी रहे हैं । हमने भारत से उखाड देखने के लिए कटिबद्ध क्यों नहीं होते? और बताओ मेरे दिल में डर किस लिए हैं? समाज में अपने मन का संताप इतने वेक से प्रवाहित किया कि वह आप उठा और आगे बोलने में असमर्थ हो गया । बारह वर्षीय अबोध बालिका मृदला अचरज से अपलक बाल विद्रोही सुभाष के तमतमाए चेहरे को देखती रही । तुझे अचरज हो सकता है । मृदुला की जरा से सुभाष कैसी कैसी बातें करता है । लेकिन सच मान मैं जो भी कह रहा हूँ, मेरे दिल की सच्ची झनकार है जो मेरे मस्तिष्क को घडी भर चैन नहीं लेने देती । आज मेरे दुख और चिंता का कारण जाजपुर में पहला भयंकर है । चाहे जो अंग्रेज प्राणियों को मृत्यु का ग्रास बना रहा है । सच तुम्हारे विचार बहुत ऊंचे और उदार है । सुभाष मृदुला सीम श्रद्धाभाव से बोली, लेकिन ऐसी उसी भावनाएं रखी भी हम क्या कर सकते हैं? बहुत कुछ कर सकते हैं । मृदला सुभाष ने तुरंत ही प्रतिवाद किया । यदि मनुष्य में साहस, लगन और दृढ संकल्प हो तो वह क्या नहीं कर सकता? मैं मानता हूँ कि मनुष्य मनुष्य की शारीरिक व्याधि को अपने ऊपर नहीं हो सकता, किंतु बहुत ज्यादी को समाप्त या कम करने में सहायक हो सकता है । जानती हूँ मैंने क्या निश्चय किया है क्या? मृदुला ने अधीरता से पूछा ये है कि मैं जांच पर आकर रोगियों की सेवा करूँ । अकेले ही जो भी समझता, महिला चिकित्सा बोली, क्या अंकल राय बात हो तो मैं वहाँ जाने देंगे । नहीं । मेरे पिताजी हृदय तथा विचारों से महान होते हुए भी अपने जीवन स्तर के संबंध में अत्यंत सजग है । मैं कभी नहीं चाहिए कि उनका बेटा रोगियों के बीच जाकर सहायता करेंगे । तो फिर मृदुला ने पूछा तो भी जाऊंगा । सुभाष ने गिरफ्तार में कहा, उनके विचारों की अवहेलना करोगे हैं । इस समय करनी ही पडेगी पर वो कारण सेवा के मार्ग में अनेक बाधाएं आती है । मनुष्य को साहस के साथ उन का सामना करना चाहिए । अच्छा अब तो जाम रिजिला मजाजपुर के लिए अभी ही निकल जाता हूँ कहकर सुभाष उठे और बाहर की ओर जल्दी सुनो । सुभाष मैं दिलाने पुकारकर कहा मासी सीटों में लोग तुमने खाया भी तो नहीं खाया होगा चिंता नगर मृदला इस समय मुझे भूख प्यास कुछ भी नहीं है । कहते हुए सुभाष आंखों से ओझल हो गए और मॅहगी सी खडी रह गई । बालक सुभाष महीनों जांच पर गांव में रोगियों की सेवा सुश्रुषा करता रहा । उसके साथ ही विनम्रता और सेवा तत्पर्ता देखकर किसी को अनुमान भी न हो सका कि वह कटक के सो सम्मान सरकारी वकील रायबहादुर जानकीनाथ का पुत्र होगा । जब लोगों कोइ सच्चाई का ज्ञान हुआ तो इसमें हुए । वहाँ से लौटकर सुभाष ने सर्वप्रथम पिता के चरणों में प्रणाम किया और अत्यंत विनय भाव से कहा पिताजी शमा खींचेगा । मैं बिना आपकी सहमती लिए जाजपुर चला गया था । अच्छा हाँ, दीर्घ निश्वास के साथ रायबहादुर ने बेटे को ऊपर से नीचे तक पूरा फिर गंभीर वाणी में बोले, अब तक जमा का प्रश्न ही नहीं उठता । वैसे तुमने जो किया है, वह सर्वदा मेरी प्रतिष्ठा के विपरीत है । मैं ज्ञान होना चाहिए कि तुम एक प्रतिष्ठित सरकारी वकील के बेटे हो और तुम्हें उनके स्तर के अनुकूल ही रहना चाहिए । जी अपनी जानकारी में मैंने आपकी प्रतिष्ठा के प्रतिकूल कार्य नहीं किया । विनम्र, आदरणीय भाव से कहने लगे सुभाष क्या करता है? जब मैंने जहाजपुर में भयंकर हैजा फैलने का समाचार पढा तो मेरा मन विचलित हो था और ये भाग जागी कि मुझे मुझे वहाँ जाकर रोगियों की सेवा करनी चाहिए । सफाई देने की कोई आवश्यकता नहीं । बीच में गुड पडे रहे बातें एक तुम्हारी ही सेवा की जरूरत थी वहाँ पर अगर तुम्हारा यही रंग ढंग रहा था, निश्चित है की तुम्हारा भविष्य निकाल में होगा । पिताजी सेवा कार्य निंदनीय तो नहीं होता? सुभाष ने आगे भी कहना चाहिए ये रायबहादुर परिवार के लिए अपमानजनक है । रायबहादुर ने टाॅस की बात करती हूँ तो आगे मेरे लैंड व्यापारी व्यतीत । मां प्रभावती झपट्टी हुई । उसके निकट आई और इससे हृदय से लगाकर हर्षातिरेक मैं छलकाने लगी । सुभाष ने शुक्कर तक्षण ही मां के चरण स्पर्श किए । तुम्हारी यही ममता इसकी उलजलूल कृतियों को प्रोत्साहन देती है । कहकर रायबहादुर उस कक्ष से चले गए । बधाई से भाजपा विधायक मृदला बाहर से जब पट्टी हुई सुभाष के पास है क्या वहाँ से मृदला सुभाष ने इस नहीं से मुस्कराते हुए उस की ओर देखा । महिला के हाथों में समाचार पत्र के पृष्ठ थे । उसने उसे सुभाष के आगे फैलाते हुए एक स्थान पर अंगुली रखकर कहा ये ऍम ये मेट्रिकुलेशन का परीक्षाफल था । उत्तीर्ण विद्यार्थियों में सुभाष को द्वितीय श्रेणी प्राप्त हुई थी । धन्यवाद मंजिला शिव समाचार लेकर रहे सुभाष इस इसने ही तब की लगाकर बोले परीक्षा काल में मैं इतना व्यस्त था की मुझे उत्तीर्ण होने की आशा ही नहीं थी । केंद्र मुझे तुम्हारे तीन होने में कोई संदेह था । मृदुला सहज गर्व से कह पडी जब बिना ठीक से पढे लिखे तो इतनी अच्छी श्रेणी में उत्तीर्ण होते हुए सुभाष था । तब तो दैनिक परिश्रम करने पर तुम्हारी प्रथम श्रेणी आ सकती है । मैं तो जैसे ही ये परीक्षाफल देखा उस चल पडी अब जल्दी से मेरा मुंह मीठा कराओ तो मिठाई कब सिखाने लगी? सुभाष आज प्रथम बार विनोद के भाव में आकर बोलेगी । विजित नमकीन ही अधिक पसंद है । देखो मुझे डालने की कोशिश मत करो । वहाँ के न जाती हुई कहाँ पर तुम अपनी पढाई से कल मेरी प्रार्थना से अधिक सफल हुए हो । क्या मतलब देखो जब तुम्हारी परीक्षा चल रही थी तब मैं नित्य माँ दुर्गा से प्रार्थना करती थी कि मेरी सुभाष को अवश्य तीन कर देना । ये उसी का प्रतिफल है । महादुर्गा गिरी प्रार्थना सादा मान लेती है । जो भी श्रद्धा भक्ति से उन्हें ऍम करें उसी की प्रार्थना सुन लेती है । अच्छा हुआ उस अंग्रेजी स्कूल से छुट्टी में अब मैं किसी भारतीय स्कूल में पढूंगा । सुभाष ने मनोकामना व्यक्त की । प्रभावती ने अखबार पति को दिखाया । सुभाष देर हो गया । यद्यपि मुझे तनिक भी आशा नहीं थी तो गंभीर स्वर में कहने लगे मुझे इस बात का अनुमान है की वो मैं जहाँ भी विद्यार्थी है नदी वो अपना समय कुछ बेकार के कामों में ना खराब करे तो उसकी प्रथम श्रेणी आ सकती है । मैंने उसका वातावरण बदलने का निश्चय किया । वातावरण बदलने का निश्चय मैं कुछ समझी नहीं जी । प्रभावती ने आशंका से पूछा हम अब लडको को कलकत्ता वाली नहीं कोठी में भेज दूंगा । वहाँ ये लोग प्रेसिडेंसी कॉलेज में पडेंगे । ये प्रशन चल ही रहा था कि वहाँ पर सुभाष और मृदला भी यहां पहुंचे । सुभाष ने आगे बढकर पिता के चरण स्पर्श किए । चिरंजीवी हो बिदानी गंभीर स्वर में आशीर्वाद दिया । फिर अच्छा नहीं अपना निर्णय सुना दिया । आगामी जुलाई से तो मैं प्रेसिडेंसी कॉलेज कलकत्ता में प्रवेश करना है । जैसी आप क्या क्या सुभाष में इतना ही कहा

6. Presidency College Kolkata

प्रेसिडेंसी कॉलेज कल करता हूँ । पांच जाती से बिता में रहना हुआ । अंग्रेजी शिक्षा संस्थान जब भारत की शिक्षा संस्थानों में प्रमुख स्थान रखते हुए अंग्रेजियत और विदेशी संस्कृति का प्रमुख केंद्र था । इस कॉलेज साधारण स्तर के भारतीय विद्यार्थियों के लिए प्रवेश पाना कठिन था । यहाँ अधिकांश कहा भारत में निवास करने वाले उच्च अंग्रेज अधिकारियों के पुत्र एवं समृद्ध तथा प्रभावशाली भारतीयों के बच्चे ही प्रवेश पा सकते थे । सुभाष ने यहाँ एफ ए इंटर प्रथम वर्ष में तो प्रवेश ले लिया पर हिंदू यहाँ के रंग ढंग देख कर उन का मन खिन्न हो उठा । थोडे ही समय में उन्हें इस बात का अनुभव हो गया कि ये कॉलेज उनकी मनोभावना के अनुकूल नहीं है । इस विदेशी स्कूल में प्रवेश लेकर भी सुभाष अपने को वहाँ के सांसे में न डाल सके । वहाँ अपने सहपाठियों से अलग अलग रहे । उनका ध्यान केवल अपने अध्ययन की ओर रहता था । वैसे है पार्टियों से अधिक बातें ना करते समय पार्टियों का दौर, तरीका और व्यवहार उन्हें तनिक भी पसंद था । वे देखते कि भारतीय विद्यार्थियों के साथ कॉलेज के अंग्रेज प्रोफेसरों और छात्रों का व्यवहार अत्यंत उपेक्षा का है । सुभाष देखते कि प्राध्यापकगण भारतीय विद्यार्थियों के प्रति ऐसा व्यवहार करते हैं । मारो भारतीय विद्यार्थी उपेक्षा और घृणा के पात्र को कक्षा में भारतीय विद्यार्थियों को पीछे बैठाया जाता है । उनके शिक्षण में विशेष रुचि नाली जाती और जब भी किसी अंग्रेज सहपाठी के दुर्व्यवहार के संबंध में कोई प्रार्थना पत्र देते तो उस पर कोई विचार नहीं किया जाता है । इन अ नीतियों ने सुभाष के हृदय में क्रांति की चिंगारी उत्पन्न करना आरंभ कर दिया । उन्हें ये दुर्व्यवहार असहाय हो उठा और वे इसका विरोध करने के लिए आतुर होते । उन्होंने कॉलेज में भारतीय विद्यार्थियों का एक संगठन बनाया और स्वयं उसके नेता बने । उनके नेतृत्व में वह संगठन कॅरियर और दुर्व्यवहार का विरोध करने लगा । सुभाष विशुद्ध भारतीय परिधान धोती कुर्ता पहनकर कॉलेज जाते थे, जबकि उनके सहपाठी रंग बिरंगे सूट पहनते, यूरोपियन होटलों में जाते । वहाँ विभिन्न प्रकार के अच्छे बुरे आमोद प्रमोद करते हैं । सुभाष, उनका आचरण, उनके अशिष्टता और उनके व्यवहार को देखकर मनी मंत्री हो जा रहे हैं । उनके हृदय में घृणा के सोलह है कुत्ते उनके रूम रूम में विरोध की चिंगारियां सुलग उठी और ये अपने आप में क्या होते हैं? क्या यही विद्यार्थी जीवन है? वैभव विलास में डूबे रहना शिक्षा के महान उद्देश्य को खुल कर व्यर्थ की कार्यकलाप में अपने मूल्यवान समय को नष्ट करना । क्या यही है अपना भारत? क्या यही है हमारी सभ्यता? संस्कृति? क्या यही है गुरु शिष्य की परंपरा नहीं? कदापी नहीं हम विदेशियों का अंधानुकरण करते हुए पूर्ण जहाँ उनकी हाथों की कठपुतली बन चुके हैं । आज जो कुछ भी बन गए हैं वह उन्हीं की देर अन्य ताज बुद्ध, अशोक और चंद्रगुप्त मोहरी का भारत इतना पति इतना होता है अपने पतन का कारण हम स्वयं हमें अपनी मुक्ति और स्वतंत्रता के लिए स्वयं आगे बढकर विदेशियों की दुर्नीतियों से संघर्ष करना होगा । अन्यथा वो दिन दूर नहीं जब अपने ही देश में हमारी कीमत अधिकारियों से भी होगी । सुभाष के सहपाठी उन्हें स्थान की समझते हैं क्योंकि भावनाओं का मजाक उडाते यद्यपि किसी में ये साहस नहीं था जो उसके समक्ष उनके विचारों की आलोचना और अवहेलना कर चुके । पीठ पीछे कुछ लोग कीचड उछालने से बात नहीं आते थे । सुभाष अपने सहपाठियों की ऐसी मनोभावना से अनभिज्ञ नहीं थी, परंतु उस पर ध्यान देने के लिए उनके पास वक्त नहीं था । बहुत अपने आपसे कहता, छिछला, भौतिकवादी दृष्टिकोण रखने वाले लोग जीवन और मानवता का मूल्य कब समझेंगे? निजी स्वार्थ में लिप्त होने के कारण ये इतना भी नहीं समझते कि एक जिंदा लाश की तरह अपने आप को हो रहे हैं । अपनी लाश कुछ होते हुए इनका मूल्य समय नष्ट हो जाएगा । सुभाष दिन रात इसी चिंता में डूबे रहते की किस प्रकार ब्रिटिश सरकार के अत्याचारों से भारत को मुक्ति मिले और भारतवासी अपने देश में स्वतंत्रता तथा निर्भिकता के साथ जीवन यापन कर सके । संयोग से उन्ही दिनों मजदूरों के सुप्रसिद्ध नेता डॉक्टर सुरेशचंद्र बनर्जी ने एक संस्था स्थापित की । इस संस्था का एकमात्र उद्देश्य तीन दलितों की सेवा सहायता करना और इसमें वे लोग शामिल हो सकते थे जो आजीवन अविवाहित रहकर मातृभूमि तथा दीन दुखियों की सेवा करने का व्रत धारण कर सकें । सुभाष ही संस्था के सिद्धांत इवन कार्यक्रमों से अत्यधिक प्रभावित हुए और स्वयं को इसका सदस्य बना लिया । डॉक्टर सुरेशचंद्र बनर्जी इस प्रतिभाशाली नवयुवक की विलक्षणता और कर्मठता से अत्यंत प्रभावित हुए । इस संस्था में प्रवेश करते ही सुभाष ने अपनी कार्यक्षमता का अद्भुत परिचय दिया । देखते ही देखते उनके अनेक सहपाठी तथा अन्य भारतीय नवयुवक संस्था के सदस्य बन गए । थोडी दिनों में संस्था की लोकप्रियता वर्कर में प्रयाण ता की चर्चा सर्वत्र होने लगी । डॉक्टर प्रफुल्लचन्द्र घोष भी संस्था में सम्मिलित हुए । संस्था के निकट संपर्क में आकर जब सुभाष ने देश और देशवासियों की स्थिति का सूक्ष्म अध्ययन किया तो उन्हें आमोद प्रमोद के विदेशी ढंग से घटना हो गई और उन्होंने निर्भयतापूर्वक मातृभूमि की सेवा करने के लिए जीवन भर ब्रह्मचारी रहने का व्रत धारण किया हूँ । कलकत्ता में रामकृष्ण मिशन का वार्षिक उत्सव संपन्न हो रहा था । ये चर्चा सुभाष के कानों में भी पहुंची । चिंता नहीं हम आध्यात्म प्रिया सुभाष के हृदय में इसके प्रति उत्सुकता जागृत हुई और बडे उत्साह के साथ में इस उत्सव में शामिल हुए । यहीं पर प्रथम बार ही स्वामी विवेकानंद के साक्षात दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ । सुभाष अपलक उस महान तपस्वी के तेजस्वी मुखमण्डल की ओर निहारते रहे । स्वामी जी की अलौकिक मुखाकृति पर विद्वता, ब्रह्मचर्य एवं पवित्रता का इतना प्रबल तीज पूंछ प्रवाहित हो रहा था कि नवयुवक भाषा रूम रूम से कृतकृत्य होते थे । स्वामी विवेकानंद का सारगर्भित भाषण आरंभ हुआ । वह अत्यंत ओजस्वी स्वर में कहने लगे, भारत के दरिद्र भारत के पतंजलि तो की सहायता करने वालों का कोई मित्र नहीं है । राक्षसों की तरह निर्णय समाज इन पर जो आघात करता चला रहा है, उसकी वेदना अगर हम भलीभांति कर रहे हैं, लोग ये भी भूल गए हैं कि वे भी मनीष है, इसका परिणाम है ऍम आज आवश्यकता इस बात की है कि नर नारी पवित्रता के अग्नि मंतर में दीक्षित होकर भगवान में दृढविश्वास रूपी कवच को धारण करके दरिद्र पर दलितों के प्रति सहानुभूति के साथ कमर कसकर समस्त भारत का भ्रमण करेंगे । मुक्ति सेवा तथा समाज की उन्नति तथा क्षमता के मंगलमय संदेश का घर घर प्रचार करेंगे । सभी धर्मसत्तू हैं और ईश्वर की उपलब्धि के विभिन्न साधन मात्र है । इसलिए मेरे विचार से सर्वप्रथम मनुष्य को सत्य की खोज करनी चाहिए । सत्य की खोज ही वह पवित्र पद है जो सच्ची मानवता और सेवा की दिशा का वोट कराता है । स्वामी जी के इस ज्वलंत भाषण से नवयुवक से भाजपा जादू सा प्रभाव क्या ज्ञान और जीतना की तीव्र लहर ने उनके शरीर को झकझोरकर क्या वास्तव में स्वामी विवेकानंद के विचारों से अत्यधिक प्रभावित हुए और स्वामी जी के आध्यात्मिक विचारों पर उनकी अटूट श्रद्धा हो गई । परिणामस्वरूप उनका मन वैराग्य पद पर जाने के लिए आतुर होता था । सत्य की होंगे? हाँ मैं सत्य की खोज करो ना, क्योंकि सबके ही मानवता और सीमा का मूलमंत्र है । इस आध्यात्मिक अनुभूति ने नवयुवक सुभाष को इतना प्रेरित किया कि एक दिन में पढाई लिखाई से मुख मोड कर सकती की खोज में निर्जन स्थल की ओर चल पडे । वह कैसा रोमांच? एक समय था जब अंधकारपूर्ण रात्रि में नवयुवक सुभाष सत्य की खोज करने के लिए निर्जन वन पथ पर द्रुतगति से बढता जा रहा था । उसने ऐसा सुन रखा था कि बडे बडे सिद्ध महात्माओं ने निर्जन वनों की एकांत साधना में परम सत्य की खोज की है और इसी आधार पर वह एकांत साधना में लीन हो गया । कई घंटे बीत कर उसने अनुभव किया कि एकांत साधना केवल शरीर को कष्ट बिना मात्र है । सत्य की खोज के लिए उसे कर्म क्षेत्र का अनुभव संग्रहित करना होगा । तब वो जंगल से निकलकर नगर पद की ओर चल पडा । इसी बच परे प्रख्यात धार्मिक संस्थान था । सुभाष की दृष्टि उस पर पडी और विषय की खोज में वहाँ प्रविष्ट हो गए । एक ऐसे संत के द्वारा स्थापित संस्थान था जो सन्यासी कम गृहस्थी अधिक था । सुभाष ने यहाँ भारी भीड भाड और चहल पहल देखी जो सामान्य सामाजिक जीवन में देखते रहते थे । उनका मन यहाँ से भी उन चढ गया । फिर सत्य की खोज के लिए आगे की यात्रा आरंभ कि एक स्थान से दूसरे स्थान का भ्रमण करते रहे । सिद्ध महात्माओं से मिलते रहे परंतु कहीं पर भी उन्हें उस सत्य की उपलब्धि न हो सकी, जिसकी उन्हें तलाश थी । एक धार्मिक स्थान पर उन्होंने साधुता के पीछे ऐसे बात की दृश्य देखे कि उनकी आत्मा बिलबिला उठी । उन्होंने देखा कि मठाधीश सन्यासी वासना और आमोद प्रमोद में लिखते हैं, सुभाष बोस वातावरण में मत और संन्यास के पाखंड ने ग्लानि से भर दिया । उनकी सत्य की खोज मिनट की आत्मा विद्रोह से भर उठे और उनकी बुद्धि सिरा पर चेतना के बिजली कौन थी? अपने आप से क्या उठे? सुभाष ये सब ढोंग है, व्यर्थ है । सबके इन मठों में नहीं, संसार के कोलाहल में है । उसकी खोज के लिए संसार में रहकर ही सफलता पाई जा सकती है और वे थे वैराग्य के उस पद से महानगर पद की ओर लौट आए । तभी उन्होंने अपने एक मित्र के पत्र के उत्तर में लिखा था, ऍफ कर रहा हूँ कि जीवन में मेरा कोई विशेष उद्देश्य हैं और उसी के लिए मुझे ये शरीर मिला है अनुभव प्राप्त करने के लिए । मैं भले ही कुछ समय तक कोई पद अपना केंद्र सच्चा ये है कि मैं लोकमन के प्रवाह में बहने वाला नहीं, सुभाष को इस मेरा यात्रा नहीं होगी और शीन बना दिया । उनका शरीर इतना दुर्बल हो गया की आसानी से पहचान पाना भी मुश्किल था । जैसे ही वे घर गए, उदास भवन में अकस्मात ही खुशहाली और चहल पहल व्याप्त हो गई । मान युग का खोया हुआ मूल्य रतनपुरा मिल गया, परिवारजन सुभाष आ गए, सुभाष आ गए । कहते हुए उनकी स्वागत के लिए आज सदेव गंभीर देखने वाले रायबहादुर जानकीनाथ के चेहरे पर भी प्रसन्नता और उल्लास के लक्षण साफ दिखाई पडने लगे और मां प्रभावती हर्षातिरेक में विभोर होती है । सुभाष ने सर्वप्रथम पिता के चरणों प्रणाम किया । रायबहादुर को छडों तक जडवत खडे अपलक दृष्टि से पुत्र के छीन शरीर की और निहारते रहेंगे, पर अनायास ही उनके विशाल नेत्रों में आंसू की नमी, तरुण स्वस्थ रहो । उन्होंने भर बनाए घंटे से कहा । सच कहा गया है कि संसार में कुछ सुल्तान केवल माँ बाप के जीवन को देख मैं बनाने के लिए उत्पन्न होती है । कहते कहते रायबहादुर बीच में गला फंस जाने के कारण तेजी से खांसी थे और फिर कहना शुरू कर दिया । फिर मैंने कभी कल्पना भी ना की थी कि मेरे जीवन में ऐसा भी समय आएगा जब भी ही संतान मिल इच्छाओ की अवहेलना करेगी । अपनी बात समाप्त कर रायबहादुर जानकीनाथ ने अपना चेहरा दूसरी ओर को कमा लिया । मानव आपने भी गए मुखडे को अपने बेटे से छुपाना चाहते हो । सुभाष नहीं किया कि उनके आकस्मिक वैराग्य से पिता के हृदय को गहरा आघात लगा है । वह अत्यधिक दुखी और छोड देते हैं । पिताजी अपने स्वर को साधते हुए सुभाष ने कहना क्या मैं जॉब कर रहा हूँ कि मेरे कृत्य से आप अत्यंत दुखी है, परंतु मैंने जो कुछ किया उसमें मेरी आत्मा की प्रेरणा का हाथ रहा है । स्वामी रामकृष्ण परमहंस के सुन पवन आदर्श उपदेश होने अचानक ही मुझे भावविभोर कर दिया और स्वामी स्वामी विवेकानंद के ज्वलंत उपदेशों ने मुझे सत्य की खोज के लिए प्रेरित किया । मैं भावविभोर होकर अचानक की सत्य की खोज में निकल पडा । क्या सत्य तुम्हें मिल गया? हाँ, क्या सत्य तुम्हें मिल गया? रायबहादुर ने प्रश्न किया तो मैं पर्याप्त विविधता, मेरे प्रश्न का उत्तर दो तीन सुभाष विद्यार्थी के लिए पहले क्या विषय है? शिक्षा अथवा सांसारिक अनुभव शिक्षा हूँ, किन्तु मात्र स्कूली शिक्षा मनुष्य की संपूर्णता और सफलता के लिए यथेष्ठ नहीं । उसके साथ सांसारिक अनुभवों की उपलब्धि भी आवश्यक है । मेरे विचार से पूरी स्कूली शिक्षा के आधार पर समाज और देश सेवा का व्रत धारण करने वाला व्यक्ति कभी अपनी कर्तव्यपथ पर सफल नहीं हो सकता । क्या महीनों महीनों निर्जन वन प्रदेशों में घूम कर तुमने इसी सत्य की खोज की? पिता ने दूसरा प्रश्न किया नहीं, वास्तव में मैं सत्य की खोज करने के लिए दूर दूर भटका । वो सत्यावन, कंदराओं, गुफाओं और धर्म स्थानों में नहीं है । वो सत्य तो समाज, मनुष्य और कण कण में विद्यमान है और उसे हमें उन्हीं के बीच खोजना है । मैंने तुम्हारी मनोभावना को अच्छी तरह समझ लिया है । सुभाष मैं जानता हूँ कि तुम क्या करना चाहते हो, किन्तु किसी भी उद्देश्य की सफलता के लिए अपने को उसके योग के बनाना नितांत आवश्यक है । कहने को मेरा आशा ये है कि पहले पूर्ण निष्ठा के साथ अपनी शिक्षा पूरी करनी चाहिए और उसके बाद किसी दूसरे उद्देश्य पाँच पर बढना चाहिए । मैं ऐसा ही प्रयास करूँगा । पिताजी सुभाष नहीं नतमस्तक होकर कहा, ऐसी ही आशा करूँगा । संभव है हमारे अशुभ नक्षत्र का राहुल थक चुका हूँ । रायबहादुर ने दुर्गुणी विश्वास के साथ कहा और हाथ से हाथ बांधकर चहलकदमी करने लगे । सुभाष जैसे ही उनके कमरे से बाहर निकले, सामने से आती हुई माने उन्हें छप्पड कर अपनी बाहों में भर लिया तो आगे मेरे लाल माने भीगे कंठ से कहा और कुछ ही क्षणों में सुभाष का कंधा उसके आंसुओं से भी क्या तुम इतना रोती क्यों हो? मान सुभाष ने छुप स्वर में कहा मैं ठीक हूँ! हाँ कुछ दिनों के लिए भ्रमण करने के लिए चला गया था और फिर तुम्हारे आजकल चले आ गया हूँ तो अभी से इस तरह होगी तो भविष्य में क्या होगा? अभी तो तुम्हारा सुभाष जाने कितनी बार जाने कितने दुस्साहसिक कार्य करेगा और इसमें हमें तो विश्वास रखते । तेरह । सुभाष कभी कोई ऐसा दुष्कृत्य नहीं कर सकता जो उसकी कुल प्रतिष्ठा पर किसी प्रकार आक्षेप आक्षेपित करें । माँ तो मेरी अच्छी मा सुभाष ने देनी पवित्र कूक से जन्म लिया है । ऍम अमृत दुग्धपान किया है और फिर पवित्रा ऍम की झपकी ली है । फिर भला वैसी ममता नहीं कि हृदय को कैसे आघात पहुंचा सकता है । सच में होकर भी सुभाष सारे भारत की माताओं के उधर से जन्मा है, संपूर्ण भारत की माता है । पेरिस भाष की माँ है । संपूर्ण भारत के पुरुष सिर्फ आज के पिता और भाई है तथा संपूर्ण भारत की नारिया तेरे सुभाष की बहने हैं आपको तेरह होकर भी सारे देश का । इसलिए सारे भारत का सब लोग उसका अपना सुख दुख है । तेरह । सुभाष मेरा पुत्र होते हुए भी भारत माता का प्रतीक पुत्र बन गया है । मेरी पाॅड तेरी जरा से बेटे पर बहुत सारी जिम्मेदारियां है इसलिए तो यदा कदा संतुलित और विचलित हो जाता है । देखो ना हो अपना भारत परतंत्र हैं । अपने ही आंगन में हम विदेशी है और अपनी ही धरती पर हम क्रूरता, निर्ममता और अत्याचार सह रहे हैं । हम इतने शोषित हो चुके हैं कि हमारा खून ठंडा हो चुका है । हम अपने उत्थान और प्रगति के प्रति उदासीन है और निरंतर गोरी सरकार द्वारा धूलधूसरित किए जा रहे हैं । सच में इन्हीं चिंता और अनुभूतियों ने तेरे बेटे को भी आप खुल कर रखा है और वो अपने देश और देशवासियों को इन व्याधियों से मुक्ति दिलाने का संकल्प करना चाहता है । मुझे आशीर्वाद डोमा कि मैं अपने इस महान देश में सफल हो अपना सारगर्भित वक्तव्य समाप्त कर अपने नेत्र माँ की ममता में मुखाकृति पर टिक आती है । उस क्षण अपना प्रभावती का मुखिया देख नहीं होता था । अभी कुछ दिन पूर्व जिस मुखडे पर वात्सल्य की व्याकुलता, मातृत्व की भावुकता, अपनत्व की व्यग्रता और निजत्व की वेदना थी, अब उसी मुखडे पर गर्व और त्याग का लॉजिक प्रकाश चमत्कृत हो रहा नहीं जो आंखे अभियोग के पश्चात बेटे के मिलन से शुरू बात कर रही थी अब उन आंखों में उत्साह की लहर याल हैरा नहीं क्यूँ कीर्तिमान हो मेरे लाल माँ का गद्गद कंठ स्वर प्रस्फूटित हुआ तेरी उचित भावाभिव्यक्ति ने मेरी ममता के अधिकार को विनष्ट कर दिया और अचानक ही बुद्धि पटेल स्वच्छंद हो गया है । वास्तव में उस माँ की कोख सहस्त्र बार घंटे है जिसका बेटा मान मात्र की व्यथा को दूर करने के लिए जमा तो अफतारी है । बेटे मैं अटूट विश्वास कर चुकी हूँ तेरा जन्म अपने लिए नहीं दूसरों की पीडा मुक्ति की ये हुआ है ही कोटि कोटि शुभकामनाएं और आशीष मेरे साथ सुभाष ईश्वर तेरे महानुष्ठान को किर्ति और सफलता प्रदान करें । तेरी कोक में जन्म लेकर में स्वयं धन्य होमा कहते हुए सुभाष माँ के चरणों में झुक गए । अरे धर धर की भटकने तो कितना निर्मल और छीन बना दिया है माने सुभाष को एक बार फिर हृदय से लगा लिया और उस दिन लोग आश्चर्यचकित रह गए जब फेका परीक्षाफल निकला । स्कूली शिक्षा पर ध्यान न देने वाले सुभाष ने ऐसे की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्णता प्राप्त की थी ।

7. Ek Shola aur Bharka

एक शोला और बढ का विद्यार्थी सुभाष मेधावी छात्र था । साथ ही उसमें देशभक्ति की भावना भी खोल छोडकर भरी थी । इसके अतिरिक्त हुआ नहीं । गुणों का सकर प्रतीक भी था । उसका चरित्र उस हीरे की भांति था जो किसी भी अग्नि परीक्षा धूमिल नहीं पडता । उसके आचरण में ऐसी गंभीरता और संतुलन था जिससे कोई प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता था तथा उसकी प्रकृति में ऐसा ओ जरुरत थी जो लोगों को पलभर में आकर्षित कर लेती थी । स्वामी विवेकानंद के उपदेशों और सिद्धांतों से प्रभावित होने के बाद उसके विचारों में ऐसी ओज और प्रौढता आ गई थी कि समकालीन विद्यार्थी दो आश्चर्यचकित रह जाते थे । बहुत कम लोग सुभाष की भावनाओं को समझ पाते थे । सही पार्टियों में केवल एक छात्र ऐसा था सुभाष ने जिसे अपनी संगत क्योंकि समझा व्यक्ति उन्हीं की तरह मेधावी छात्र और तीसरा बुद्धि का था । उस व्यक्ति का नाम था दिलीप कुमार । दिलीप सुभाष की विद्वता और प्रतिभा से परिचित होने के कारण उन के प्रति अत्यधिक आकर्षित हुए और सुभाष से मैत्री संबंध स्थापित करने का प्रयास करने लगे । एक दिन देवयोग से वो अवसर आ ही गया । सुभाष नाम नौ कॉलेजों में डिपेंट वाद विवाद क्लब स्थापित किया था और विशेष कर अपने प्रतिभाशाली भारतीय सहपाठियों को उन का सदस्य बना रहे थे । एक दिन होने दिलीप को बुलाकर कहा, मेरे विचार से डिबेट हम लोगों की प्रतिभा विकास में सहायक सिद्ध होंगे । देश को कुछ बेटर की आवश्यकता है । डाॅटर्स दिलीप जैसे आकाश, सिगरेट और अच्छे से कहा । रामकृष्ण परमहंस के अनुसार डिबेट समय सत्य से विमुख करते हैं, इसकी चिंता नहीं । सुभाष ने दृढता से कहा, हर क्षेत्र में हमें किसी कवि और संत की कहावते ही नहीं लागू कर देनी चाहिए । कहावत की इसी परंपरा ने हमारे हिन्दू सविता को संकुचित कर रखा है । अपने भविष्य के निर्माण के लिए हमें पुरातन की रेड पर नवीनतम दीवार खडी करनी है । हमारा जन्म अपने देश की सीमा के लिए हुआ है । हमें पुरानी बातें छोडकर नहीं, बातों को अपना रहा है । मैं रामकृष्ण परमहंस की आलोचना नहीं करता किन्तु उनकी अपेक्षा स्वामी विवेकानंद के सिद्धांत अधिक ग्रहणीय । दिल्ली सुभाष की वजह से व्यक्तव्य से अत्यधिक प्रभावित हुए और बोले, किन्तु में कुछ अलवत्ता नहीं हूँ । मंच पर आते ही मुझे लग जा घेर लेती है है । ये एक मेधावी छात्र और भारतीय नवयुवक के शब्द है । सुभाष जोर से हंसने लगे और बोले, आरंभ में हर व्यक्ति को ऐसा सब कुछ होता है । हिन्दू अभ्यास से सभी कुछ सहज हो जाता है और उन्होंने सहपाठी दिलीप कुमार राय को आपने डिबेट संस्था का सदस्य बना लिया । उनके प्रभाव में आकर अनेक सहपाठी संस्था में सम्मिलित हो गए । शिक्षा के साथ साथ देश के राजनीतिक भविष्य के लिए उनके ऐसी प्रेरक कार्यक्रम भी चलते रहे । उन्ही दिनों विद्रोह का एक सोलह फिर भडका । एक दिन अंग्रेज पैसा मिस्र ओटन कक्षा में पढा रहे थे । उन्होंने किसी भारतीय विद्यार्थी से कोई प्रश्न पूछा जिसका उत्तर वो तुरंत ही नहीं दे सका । ऍम खत्म पडता है । हुआ विद्यार्थी सहन गया । कंट्रोल ऍम अपनी जबान संभाल के श्रीमान जी सुभाष विद्युत गति से उठे और शोले की तरफ भडक उठी । ऍम आपने इसे ब्लैक मनी क्यों कहा? सुभाष ने तेजस्वर में पूछा हम बीच में क्यों बोलता ऍम बोला होगा यूज ॅ यूमा की ईडियट्स, सुभाष टाॅपर एक भरपूर चांटा जड दिया । सारी कक्षा में सन्नाटा छा गया और मिस्टर ओटन अपना चोट खाया हुआ गाल सहलाते रहे गए । सुभाष ने उन्हें पीटा भी और सारी कॉलेज में हडताल भी करा दिया । इस प्रसिद्ध यूरोपियन स्कूल में घटित होने वाली ये प्रथम दुस्साहसिक घटना नहीं इसमें समस्त गोरी चमडी वालों में आतंक फैला दिया । इसके परिणामस्वरूप स्कूल अधिकारियों ने सुभाष को स्कूल से निलंबित कर दिया । कॉलेज से निलंबित कर दिए जाने के बाद सुभाष अपने गृहनगर कटक चले । पिता को सुभाष के कॉलेज से निलंबित कर दिए जाने की घटना पहले से ही ज्ञात थी । सुभाष से अत्यधिक असंतुष्ट थे । बीच अध्ययनकाल में कॉलेज से निकाल दिया जाना चिंता और चोट का विषय था । सुभाष घर आए तो पता नहीं रोशनी पूछता हूँ । बीच में ही कैसे आ गए । वो इस तरह पूछने लगे मानव को जानते ही नहीं हूँ । इधर तो छुट्टियाँ भी नहीं है । मैंने अपमान का विरोध किया । फलस्वरूप मुझे कॉलेज से दो वर्ष के लिए निलंबित कर दिया गया है । सुभाष ने सत्य बता दिया की आप मान हुआ तुम्हारा? पिता ने ऍम में पूछा फॅसने मुझे बेवकूफ मुर्क । बदमाश कहा मैं ऍम नहीं कर सका और तुम ने उन्हें थप्पड मार ऍम पिता बीच में ही खडपडे । ईंट का जवाब पत्थर ही होता है । सुभाष ने दृढ स्वर में कहा क्या यह उचित था की मैं अपने और अपने देश वासियों के लिए अपमानजनक शब्द सुनता और खामोश रहता । मुझे नहीं सहन हो सका पिताजी । तुम अपने हाथों से अपना भविष्य चौपट कर रहे हो रायबहादुर छुब्ध होकर बोल बडे मैं तुमसे बहुत बडी बडी आशा करता हूँ मैं आपकी आशाएँ धूमिल नहीं होने दूंगा । पिताजी गंभीर स्वर में सुभाष नहीं मैं मानता हूँ कि कॉलेज से निलंबित कर दिया जाना मेरे शैक्षिक विकास के लिए अच्छा नहीं हुआ तो ये भी तो उचित नहीं था कि मैं अपमान का कडवा घूंट पीकर गोरी चमडी वाले प्रोफेसर की दृष्टा को प्रोत्साहित करता हूँ तो भरी बातों में एक नवयुवक की भावुकता के अतिरिक्त और कुछ नहीं है । पिता गंभीरतापूर्वक किस देकर ही देखो । सुभाष ऐसी बचकानी उग्रता से तुम अपना ही कर रहे हो । किसी भी उद्देश्यपूर्ति का सीधा रास्ता विद्रोह नहीं । कुछ बनने और कुछ करने के लिए तुम स्वयं उस योग्य बनना होगा । मैं जानता हूँ । मैं चाहता हूँ कि मेरे प्रयास में कुछ कमी है । पिताजी सुभाष ने पहली जैसी दृढता के साथ कहना क्या? तो मैं अपने प्रति विश्वस्त हूँ क्योंकि मुझे इस बात का आभास हो चुका है कि मेरा चंद्र किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए हुआ है । अचानक ही पल भर को रायबहादुर की आंखों में वह सपना कौन गया जो उन्होंने सुभाष के उत्पन्न होने के तुरंत बाद देखा था । फिर भी वह संतुष्टि के भाव से ही बोले कुछ भी हो, तुम्हारा रास्ता न्यायसंगत नहीं है । जब तक तुम जीवन में वास्तविक कर्तव्य कपूर नहीं कर लेते हैं, किसी भी क्षेत्र में सफलता नहीं प्राप्त कर सकते । सुबह मैं कर्तव्य से मुक्त नहीं पिताजी सुभाष ने दृढनिश्चय के साथ इस कर्तव्य के साथ ये भी हमारा कर्तव्य है कि उस विदेशी नीति और सत्ता का दामन करे जो हमारी शोषण और दासत्व का प्रतीक है । ये सब बकवास पाते हैं । ऊबकर रायबहादुर कमरे में टहलने लगे । सुभाष अपने कक्ष में चले गए । रायबहादुर के मन और मस्तिष्क में तूफान आ रहा था । सुभाष को अपने विचारों और सिद्धांतों की सीमाओं में बांध करन के अनुसार चलने के लिए विवश नहीं किया जा सकता हूँ । अब उसका विचार पक्ष अत्यंत विकसित और प्रॉफिट हो चुका है । उस पर कोई दूसरा रन चढा पाना सर्वथा संभव है । किंतु यह कितनी विचित्र बात है कि मेरे जैसे स्थिर और गंभीर व्यक्ति के यहाँ उस जैसा उग्र और क्रांतिकारी विचार तो पालक उत्पन्न हुआ । सुभाष की ये उग्रता कभी भी मेरी प्रतिष्ठा पर कोई विस्फोट कर सकती है । अपने कक्ष में आने के साथ इस भाषा की दृष्टि वहाँ पर पडी जो अत्यंत शूट दशा में उनकी प्रतीक्षा कर रही थी तो हम अच्छा संतुष्ट नहीं हूं । अनायास ही गंभीर होकर सुभाष ने पूछा इन्होंने कैसे सोच लिया माँ पुत्र पर स्नेहल दृष्टि टिकाकर कहा तो जो भी करता है, जैसा भी करता है, उसे मैं तेरह कृत्य नहीं बल्कि अब तरीका कृति समझती हूँ । ऐसी दशा में असंतोष का प्रश्न ही नहीं उठता तो कितनी महान है । इसमें हमें वृद्धि, करंट से सुभाष इतना ही कह सके । दो वर्ष पश्चात सेर आशुतोष के प्रयत्न से सुभाष को कलकत्ता विश्वविद्यालय में पुनर्प्रवेश मिल गया । इस बार भी उन्होंने अपनी प्रतिभा का चमत्कार दिखाया । दर्शनशास्त्र में बीए की परीक्षा प्रथम श्रेणी में तीन की

8. Udyeshya Par Aghat

उद्देश्य पर आघात चिंता नहीं, कोई चिंता नहीं । इसरो की शब्द ध्वनि के साथ रायबहादुर जानकीनाथ की चिंता, प्रावित मुखमण्डल पर गंभीर मुस्कान तैर थी । उनके चेहरे पर व्याप्त चिंता की रेखाएं उनकी मानसिक अशांति का स्पष्टीकरण दे रही थी । अपनी बात समाप्त कर उन्होंने अपनी पत्नी की ओर से दृष्टि फेमली अनावश्यक रूप से कानून की कोई पुस्तक पलटने लगे । मैं पिछले एक साल से ऐसा आभास कर रही हूँ कि आप मानसिक रूप से अशांत रहते हैं । इसका प्रभाव आपके स्वास्थ्य व्यवहार पर पड रहा है । प्रभावती ने अत्यंत सहज भाव से कहा और उनकी श्रद्धा दृष्टि पति के चेहरे पर टिकी रह गई । मेरे विचार से अनुभूति आशंका की जनानी होती है । दीर्घ निश्वास के साथ रायबहादुर ने कहना आरंभ किया क्या में पहले की अपेक्षा दुर्बल हो गया हूँ । मेरे व्यवहार में कटुता आ गई है । हाँ मैं ऐसा ही आभास पाती हूँ । हो सकता है मुझे कुछ भ्रम हूँ किन्तु अब पहले की अपेक्षा । हाँ मैं स्वयं अपने आप में बहुत बडा परिवर्तन पा रहा हूँ । रायबहादुर ने बीच में ही पत्नी की वार्ता खंडित क्या तुमने कभी इसके मूल कारणों पर विचार क्या है? मेरे विचार से भी कारण विचारनीय नहीं है । अब सुभाष के लिए चिंतित रहते हैं ना उसमें लक्षण अफ्तारी के लिए जो जन्म के साथ ही अद्भुत प्रतिभा लेकर आया है । कितनी ही बार कह चुका होगी तुम्हारी ये अतिभावुकता पूर्ण धारणा ही उसकी उद्दंडता को प्रचारित करती है । कहा ना कि हर मां हर मां के लिए उसका बेटा अवधारित होता है । मेरे समझ में नहीं आता कि सुभाष में कौनसी असाधारणता है सिवा इसके कि वहाँ टी और दुस्साहसी साथ ही महत्वकांशी भी । युवास्था में प्रायः हर व्यक्ति इन विशेषताओं से ओतप्रोत होता है । अनुभव की बात कहता हूँ प्रभाव युवावस्था स्वयं ही एक क्रांतिकारी स्थिति है जो तेज ना और संवेदनशील प्रवृत्ति को चैन में देती हैं और मनुष्य को उस प्रवाह में कहीं से कहीं पहुंचा देती है । अतः अवस्था में अंकुश और अनुशाशन नितांत आवश्यक होते हैं । प्रभात अन्यथा युवाओं तेजरा कुछ नहीं किया जा सकता है । मैं इन सभी विचार से सहमती रखती हूँ । किन्तु क्या आप इस स्थिति से इंकार कर सकते हैं कि आपका सुभाष, अपना सुभाष, अपने परिवार के सदस्यों से आचार, विचार, व्यवहार सभी बातों में सर्वथा अलग थलग है । यदि परंपरा और संस्कारी व्यक्ति के जीवन को प्रभावित करते है और परिवार का वातावरण् परिस्थिति ही उसके व्यक्तित्व का निर्माण करती है तो फिर सुभाष उस परंपरा और संस्कार से अछूता क्यों रह गया? ऐसा बेकार की भावनात्मक बातें हैं । मेरे विचार से सामयिक परिस्थितियों से वह बहुत प्रभावित है और उसी प्रवाह में बह रहा है । लेकिन अब मैं उसे इस परिवेश से अलग करने का उपाय हो चुका हूँ । क्या वो क्या क्या उपाय प्रभावती ने आतुरता से पूछा । रायबहादुर दृढता के साथ कहना है कि मैंने सोचा है कि उसे आईसीएस की कंपटीशन के लिए लंदन भेज दूँ । उसकी प्रतिभा का इससे बडा कोई और उपयोग नहीं हो सकता । एम ए की पढाई उसके लिए कोई महत्व नहीं रखती । सेवा इसके की कॉलेज लाइफ का उत्तेजनात्मक वातावरण से और तेजित करें । पति के विचारों ने प्रभावती को छत भर में संतप्त कर दिया । उनके मुखडे पर विभाग लता के लक्षण साफ भर ये आपने कैसा क्रूर नहीं किया है । सुभाष को इतनी दूर विलायत भेजेंगे नहीं नहीं उससे यही है । मैं करने दीजिए । भगवान ने उसे जिस महानिदेश कुलोत्पन्न क्या है, हमें उसमें बाधा नहीं डालनी चाहिए । तुम्हारी ये धर्मवीर होता और अंधी ममता कहीं उसके जीवन के लिए विनाशकारी ना सिद्ध हो । आप रायबहादुर के स्वर में गिरफ्तार कठोरता थी जहाँ प्रश्न जीवन निर्माण का है वहाँ मैं ममता के साथ कोई समझौता नहीं कर सकता है । क्या तुम चाहती हूँ की वो एक विद्रोही नवयुवक बन कर रह जाए? उद्देश्य कितना ही महान हो प्रभास तो जब तक मनुष्य अपने चाहती और परंपरागत कर्तव्य पूर्ण नहीं करता तब तक तब तक वो किसी उद्देश्य में सफल नहीं हो सकता । मैं सुभाष को पत्र दलितों का नेता नहीं, उन का अवसर बनाना चाहता हूँ । क्या अफसर बन कर देश की सेवा नहीं की जा सकती है? तुम क्या समझती हूँ कि एक सुभाष की आवाज दो सौ वर्षों से कुछ ली हुई आत्माओं में चेतना ला सकती है? हो सकता है कि उसका उद्देश्य पवित्र हो और इसमें सफलता भी प्राप्त करें । लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हम ब्रिटिश सरकार के प्रति उत्तरदायित्व, वफादारी की प्रतिज्ञा के साथ बंधे हुए हैं । एक सरकारी वकील परिवार का कोई सदस्य सरकार के प्रति विद्रोह करने की कल्पना भी नहीं कर सकता । प्रभाव मैंने इस बात का अंतिम रूप से निर्णय कर लिया है कि सुभाष को हाई सीएसके परीक्षा में बैठने के लिए लंदन जाना है । शीघ्र ही उसके जाने की व्यवस्था कर रहा हूँ । मुझे विश्वास है कि तुम्हारी ममता मेरे इस कार्य में कोई बाधा नहीं डालेगी । बाधा या सहयोग हृदय में उमडते घुमडते ममता वीक को संतुलित करते हुए प्रभावती ने कहा, आप के किसी भी निर्णय से कभी असहमती हुई है । मातृत्व बंधा हो सकता है, ऍफ नहीं । फिर पितृत्व कि कर्तव्य में मैं माँ की ममता बाधा नहीं बनेगी । में हर झन आपके विचारों के साथ अब बच्चे के भविष्य निर्माण के लिए मत से कहीं अच्छा सोच सकते हैं । भेज दीजिए से मैं मना नहीं करती । अंतिम बाकी कहते हुए प्रभावति का कांदा अवरद्ध हो गया । आंखों में नमी कॅरियर है । गाय की वेदना कहीं छलकना पडेगी, इसलिए उठकर वो अंदर चली गई ।

9. Pratibha KI Chunauti

प्रतिभा को चुनौती प्रभावती का हृदय शांत था । विफलता कि वह सीमा बाहर कक्ष में संतुलित थी । अंतररा कक्ष में आते ही टूट गई और उनका संता पांच सौ में बदल गया । भोजन कक्ष में दुर्गा की भव्य मूर्ति के समाज इसने माथा टेक दिया । हाँ तू ही बता इस झंड मेरा क्या करता था? महत्व को प्रमुखता दिए थे तो पत्नी पर आघात होता है । ऍम क्यूपेक शक्ति तो पति फिर घर में लांछित होता । मैंने अपनी क्षमता भर तो उन्होंने संतुलन बनाये रखने का प्रयास किया है । पति मेरे प्राण पर पुत्र मीरांशाह है । ग्रहण की अभी ला कर के अंश के प्रति निष्ठावान नहीं रहा जा सकता । यदि मच्छी भूल हुई हो तो इतना प्रदान करना माता की मैं उस सुधार मेरा सुभाष गया । प्रेम आदर्श करते हुए का पुतला है । इसके उद्देश्य से ही महान है । कोई भी अवरोध उसके उद्देश्य कुछ ही नहीं कर सकता । मेरी विनती है कि उसके उद्देश्य कुतुब बल प्रदान करें और उसे पत्र मुख ना होने दे । एक का एक कक्ष के द्वार तक आ गए । सुभाष ठगे से रह गए । माँ का देवी के समक्ष इस प्रकार का विनय मिला । उन्हें विस्मित कर उठा । माँ संताप की स्थिति में ही देवी की शरण में आती है ये नहीं किया था इसलिए उन्हें ये समझते देर न लगी कि आज भी कोई असाधारण घटना घटित हुई है जिसमें माँ को व्यतीत कर दिया है । क्या बात है? हाँ तुम स्वास्थ्य नहीं लगती कहते हुए सुभाष माँ के निकट चले आए और बडी बहन दृष्टि से उसके व्यथा व्यवहार मुखडे पर देखने लगे । नहीं नहीं कुछ भी नहीं । कुछ नहीं ऍम खाना । प्रभावती ने रूंधे हुए स्वर में कहा बेटे से अपनी मनोव्यथा छिपाने के लिए झट से शुरू करो को आंचल से समेट लिया और स्वाभाविक मुस्कान के निष्फल चेष्टा के साथ बोली देवी की आराधना में कोई निश्चित समय नहीं होता वरन् मनुष्य को जब भी अवकाश मिले, देवी देवताओं का स्मरण करना चाहिए । हाँ तुम अभिनय भी कर लेती हो । मृदल मुस्कान के साथ सुभाष ने माँ को दोनों बाहों में भर लिया और उनकी डबडबाई आंखों में छापते हुए वो बोले धैर्य और साहस की साक्षात मूर्ति जब स्वयं भी अपना संतुलन खो बैठे वर्षी ही किसी गंभीर प्रतिक्रिया का आभास होता है । मैं जानता हूँ हेमा तुम कभी भी अकारण नहीं हो सकती । तुम्हारी आंखों में कभी भी साधारण आघात से आंसू नहीं आ सकते है । ना विशेष बात हंगामा पुत्र की इस अंतर परिवेशी अभिव्यक्ति ने माँ के संतुलन के हे शांशी को भी तोड मरोड दिया था कि वो गागर जो अब तक छू रही थी अब पाँच से छलक पडी जैसे सुभाष ने उसमें एक भारी काम कर डाल दिया हो । प्रभावती ना चाहते हुए भी सुब क्या भरने लगी? अरे इस तरह बच्चों जैसा रोना बताओ ना! क्या कारण है माँ सुभाष की माँ इस तरह नहीं हो सकती । कैसी विचित्र बात है कि जो लाखों करोडों के आंसू पूछने का संकल्प रखता हूँ, स्वयम उसी की मारो । ये हर्ष और गौरव के आंसू है । बेटे मानित अच्छे ही आंसुओं को समेटकर कहा ये आज मेरे दुर्बलता नहीं, मेरी सहनशक्ति के परिचायक हैं । मैं हूँ बेटे के दुःख सुख में रोना मेरी प्राकृतिक व्यवस्था है साथ ही मैं पत्नी भी हूँ इसलिए पत ित्व के प्रति निष्ठावान रहना मेरा कर्तव्य है, कोई विशेष बात नहीं । आज मेरी समस्या का समाधान हो गया की समस्या का समाधान सुभाष ने छूटते ही पूछा था आज तेरे पता नहीं तेरी कर्मपथ का निर्णय कर लिया और मैं प्रसन्न हूँ कि वर्षों की चिंता समाप्त हुई । मैं कुछ समझ नहीं पा रहा हूँ । स्पष्ट का होना मा स्पष्ट है । उन्होंने दिल्ली एम । ए । की पढाई स्थगित कराकर तुझे आईसीएस की प्रतियोगिता में बैठने के लिए विलायत भेजने का निर्णय लिया है । इस निर्णय सेमरताल की प्रताप ही पूर्ण था, सहमत हैं । शीघ्र ही तेरे विदेश जाने की व्यवस्था की जा रही है । ये घोषणा शुभाष के लिए बिच्छू के डंक मारने के समान थी, जिसमें उनके तलवे से आरंभ होकर रोम रोम में जलन पैदा कर दिया । गंभीरता और संतुलन का वो पुतला उद्वेग से अस्थिर दिखने लगा । पिताजी चाहते हैं कि मैं ब्रिटिश सरकार के अधीन उच्च पदाधिकारी बनकर अपने वास्तविक उद्देश्य से विमुख हो जाऊँ । मैं जानता हूँ नौकरशाही के दबाव ने पिताजी को इस असंगत निश्चय के लिए विवश किया है । मेरा जन्म एक विशेष देश को पूरा करने के लिए हुआ है, जो ब्रिटिश साम्राज्यवाद की जी हुजूरी करने में आडे आएगा । पिताजी ने मेरे प्रति ऐसा प्रतिकूल निर्णय क्यों कर लिया? ठीक है तो क्या कहता है? बेटे, पिता और प्रतिकूल निर्णय युवा उत्तेजना में उनके साथ विचारों को लांछित कर रहा है । अपने बेटे से में ऐसी असर नहीं करती? नहीं नहीं, मैं उनकी पितृत्व को तो लांछित नहीं करता हूँ । मेरे प्रति उनके जो कर्तव्य अच्छा, उनके प्रति मेरी जो कर्तव्य है मैं उनकी अवहेलना करने की कल्पना भी नहीं करता । किंतु एक नवयुवक को अपनी आकांक्षा और उद्देश्यों पर विचार करने का स्वतंत्र अधिकार भी तो होना चाहिए । आईसीएस बनना मेरी जीवन का उद्देश्य नहीं है और इस दृष्टि से पिताजी को अपना ये निर्णय बदल देना चाहिए । मैं भी उनसे बात करता हूँ । सुभाष अपना संपूर्ण विरोध एक ही साथ में समाप्त कर द्रुतगति से पिता के कक्ष की ओर चले गए । पिता पुत्र के बीच की मर्यादा ना तोड बैठना । बेटे माँ का विनीत कैंट स्वर्ण के कान में पडा । सुभाष जिस समय पिता के कक्ष में पहुंचे, रायबहादुर जानकीनाथ मेज पर झुके कोई पत्र लिखने में तल्लीन थे । सुभाष के पदचापों ने उनका ध्यान आकर्षित किया । उन्होंने कलम मेज पर रख दी और गंभीरता से बोल तुम बडे मौके से आ गए । आप बैठो, कुछ आवश्यक बात करनी है तुम से । सुभाष ने श्रद्धा से अभिवादन किया और तथा के सामने पडी कुर्सी के सहारे खडे हो गए । क्षण भर को उन्होंने बडी सूक्ष्म दृष्टि से पिता की मुखमुद्रा का अध्ययन किया और फिर अपनी स्वाभाविक स्थिति में आ गए । एमएस करना कोई विशेष मैच में नहीं रखता । समय नष्ट करने से कोई लाभ नहीं मैं चाहूंगा कि आइसीएस कंपटीशन में बैठने के लिए तुम लंदन चले जाओ । मैंने लगभग सारी व्यवस्था कर दी है । संक्षेप में रायबहादुर ने सुभाष को अपना निर्णय सुना दिया और प्रतिक्रिया देखने के लिए उनके चेहरे पर अपनी आंखें टिका दी । सुभाष दो झंड मूर्ति व्रत रहे । फिर हल्की निश्वास के साथ बोले, पिताजी, यदि विलायत जाकर आईसीएस बनना ही एकमात्र उद्देश्य हो तो आप क्या गया? शिरोधार्य हैं तो ये मेरे संकल्प के वृद्ध एक कुछ समझौता होगा । आईसीएस बनकर में स्वतंत्रता के साथ अपनी आत्म और अपने देश के प्रति न्याय ना कर सकूंगा । किसी भी संपन्न पिता का प्रतिभावान बेटा इसलिस बन सकता है । ये उसके लिए कोई असाधारण बात नहीं होंगे । यदि संपन्नता और प्रतिभा का सदुपयोग जन सेवा के लिए किया जाए तो गौरव का विषय होगा तुम्हारा मतलब रायबहादुर का स्वर्ग कठोर था । वास्तव में मैंने आईसीस बनने की आकांक्षा कभी नहीं और न कभी करता हूँ । मैं चाहता हूँ कि मुझमें जितनी भी शक्ति और क्षमता है, उसका उपयोग देश सेवा करे । तुम्हारी इस भावना को मैं कोरी, किताबी, आदर्शवादिता और युवा समय भी समझता हूँ । रायबहादुर गंभीर और भारी स्वर में कहने रहेंगे, तुमने देश सेवा, जन सेवा, दया, त्याग वगैरा वगैरह तमाम तमाम सारे भावनात्मक शब्द याद कर लिए हैं और हर समय उन्हें कल्पना में बहते रहते हो देश सेवा से आ जाती है । इस तरह की फिजूल बातें बेकार नौजवानों के विकृत मस्तिष्क की बहुत है, जिनके पास अपने जीवन में कोई नियम, कानून और स्तर नहीं है । मैं ऐसे एक टूर समझता हूँ । एक ऐसा फितूर जो नौजवान दिमाग में बडी तेजी के साथ पैदा होता है और यथार्थ की एक ही ठोकर से चकनाचूर हो जाता है । हम जानते हो मैंने बहुत कानून पडा है । आए दिन मेरी आंखों के सामने तमाम ऐसी बातें गुजरती है । इसलिए तो मैं समझ लेना चाहिए कि तुम्हारा सही रास्ता क्या है? सुबह पिता के इसका टू व्यक्तव्य ने सुभाष को झकझोर कर रख दिया । फिर भी मैं संयत स्वर में बोले नौजवान को मस्तिष्क की विकृति और बहकने संसार को कभी कभी महान उपलब्धियां दी है । यदि इतिहास की कथाएं सकते है तो ईसा गौतम अशोक ये सभी नौजवानी में बैठते थे और बात कोई युगप्रवर्तक कह गए । आपके कई बेटे हैं, आईसीएस कोई भी बन जाएगा, किन्तु मुझे मेरी आकांक्षा उद्देश्य के लिए स्वतंत्र छोड दीजिए । साफ क्यों नहीं कहते कि तुमने आईसीएस बनने की क्षमता ही नहीं है । रायबहादुर ने सुभाष के स्वाभिमान पर तीव्र प्रहार किया और अपनी क्षमता कुछ पाने के लिए तुमने सेवा और त्याग का मुलम्मा चढा रखा है । ठीक है आइसीएस का कंपटीशन । लोहे के चने चबाने के समान मैं विश्वास नहीं करता कि तुम सफल ही हो जाओगे, लेकिन असफलता के भाई से तुम्हें कतराना नहीं चाहिए । सुभाष का स्वाभिमान कल मिला था । उनके लिए सर्वाधिक कष्टदायक स्थिति वो होती थी, जब कोई उनके आत्म सम्मान को आघात पहुंचाया और वे प्रतिवाद न कर सकें । क्षमता क्षमता का निर्णय परीक्षक के निष्कर्ष का विषय है । पिता जी यदि आप मुझे आईसीएस बनाने के लिए कटिबद्ध ही है तो मैं आपको विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि मैं आपके अभिलाषा को निष्फल नहीं होने दूंगा । सुभाष में विवाद को बढने नहीं दिया । उनका विरोधाभास पिता के संताप का कारण नहीं बन सका । आंतरिक रूप से किसी अन्य निर्णय पर पहुंचकर उन्होंने बनाया जाने की स्वीकृति दे दी । ठीक है, एक हफ्ते के भीतर ही तुम्हारे जाने की व्यवस्था हो जाएगी । समय कम है, तुम है, परीक्षा भी काफी करना है । मेरे ख्याल से तुम्हें कॉलेज छोडकर कंपटीशन की तैयारी में जुट जाना चाहिए । अपनी बात समाप्त कर रायबहादुर पनाह अपने कार्य में तल्लीन हो गए । सुभाष गहरे मानसिक द्वंद्व के साथ अपने कक्ष में लौटे । ये कैसी स्थिति थी, जिसमें उन्हें अपने साथ समझौता करने के लिए नैतिक रूप से विवश कर दिया । इस समय दो ज्वलंत प्रश्न उनके सामने थे । एक और पिता की चुनौती स्वीकार कर आईसीएस में सफलता प्राप्त करना । दूसरी ओर आत्मनिष्ठ के विरुद्ध अपने देश से विचलित ना होगा । वो दोनों स्थितियों में संतुलन स्थापित करने का प्रयास कर रहे थे । यद्यपि दोनों की धारा पृथक थी और उन में से किसी एक को स्वीकार कर लेना दूसरे के प्रति व्यवस्था का सोचा था । गहरी चिंता धारा में हाथ से हाथ बांध ही विपक्ष में एक ओर से दूसरी और टहल रहे थे । उनके हृदय तथा मस्तिष्क में भीषण द्वंद चल रहा था और इस घटना के एक सप्ताह पर शायद आईसीएस की प्रतियोगिता में सम्मिलित होने के लिए सुभाष ने वायुयान द्वारा लंदन के लिए प्रस्थान किया । उनका हृदय और मस्तिष्क भारत और भारत के शोषितों के पास था । उनकी भावनाएं उनके चरम उद्देश्य के साथ थी । केवल उनका शरीर व बौद्धिक पक्ष तथा प्रतिभा लंदन जा रही थी, जिससे पिता की चुनौती ने उद्वेलित कर दिया था ।

10. I.C.S Ko ek Thokar

आईसीपीएस इंडियन सिविल सर्विस को एक ठोकर लंदन की एक शाम प्रेसिडेंसी कॉलेज, कलकत्ता की सहपाठी मिस्टर दिलीप कुमार राय केम्ब्रिज विश्वविद्यालय छात्रावास के कक्ष में अध्ययन व्यस्त थे । ये विश्वविद्यालय में कानून के छात्र थे और साथ ही आइसीएस की प्रतियोगिता में बैठने की तैयारी भी कर रहे थे । ऍम कहते हुए आगंतुक ने निश्चिंतता पूर्वक राय की कमरे में प्रवेश किया और राई की तरह पैदा हो गयी । राय ने आश्चर्यचकित दृष्टि से आगंतुक को देखा और छान भर बाद ही उसकी ओर बडे आत्मीय बाहर से झपट्टे हुए बोले, अरे मिस्र! सुभाष चन्द्र हर्षातिरेक के कारण उनकी कंटक असवर फसकर रह गया और उन्होंने सुभाष को अपनी बाहों में जकड स्मृतियों झांझा बाद में दोनों को बडी देर तक एक दूसरे के हृदय के निकट समझौते रखा और जब तूफान कुछ कम हुआ तो मैं से राय ने आज श्री शिक्षित भाव से कहा आपके बारे मित्र, आप और लैंडिंग ये दृश्य मेरे लिए महान आश्चर्य का विषय है । लेकिन साथ ही साथ आपको यहाँ अगर मैं कितना प्रसन्न हूँ, उनका कंट्री फिर फस गया । सुभाष को छडों तक चुपचाप अपने मित्र क्या हालत दिवम भावभंगिमा का अध्ययन करते रहे और राई की दृष्टि पटल पर कुछ ही क्षणों में सुभाष के क्रांतिकारी स्वरूप की सारी स्मृतियां कौंध गई । सुभाष वह सुभाष कॉलेज में प्रवेश करेंगे । साथ ही विद्यार्थियों के आकर्षण और श्रद्धा का केंद्र बन गया । वह सुभाष जो एक ही रात में मेरे मानस का नायक बन गया । वो सुभाष जो आपने इस दुस्साहस और निर्भिकता के लिए प्रसिद्ध रहा है । आर्य वही सुभाष जिसने ट्राॅफी गाल पर भरी कक्षा में थप्पड मारकर भारतीय विद्यार्थियों के स्वाभिमान की रक्षा की थी । सुभाष खेल विचारों हो गए । राय सहज मुस्कान के साथ सुभाष ने राय की कंधे को झकझोरा और स्मृतियों की दृश्यावली हो गई । आपको देखते ही अतीत की स्मृतियां संजीव होती । आपके यहाँ आना मेरे लिए वास्तव में आॅरेंज का विषय है । क्यों? क्या मेरे लिए यहाँ ना वजह था? एक कुर्सी पर आसन जमाते हुए सुभाष ने सरल मुस्कान के साथ कहा निर्णय नहीं वर्जित नहीं, लेकिन मुझे अच्छी तरह से याद है कि आप कहा करते थे कि अध्ययन समाप्त करने के बाद मेरा प्रमुख देश भारत की स्वतंत्रता है । आप तो ब्रिटिश शासन के घोर विरोधी थे, बस इसलिए था इसलिए मेरा यहाँ अचरज का विषय है । केंद्र मेरा ध्यान अभी समाप्त करूँ । अध्ययन के साथ अनुभव की भी आवश्यकता होती है और जब तक किसी शासन की नीतियों का निकट से अनुभव ना किया जाए, उसके प्रति विद्रोह का प्रयास सफल नहीं हो सकता । क्या तुम फॅमिली ही आए हो? राय ने प्रश्न किया, केवल वहीं नहीं सोचा एक पंथ दो काज हो जाएगा । बारह लाख के साथ ही आइसीएस की तैयारी कर रहा हूँ । आईसीएस में बैठने के लिए मारे ऍसे राय की आंखे कपाल पर चढ गई और उन्हें अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ । आप आईसीएस में बैठ रहे हैं । राय का स्वर अत्यधिक उसमें सूचक था । उत्तर में सुभाष ने सहज मुस्कान बिखेरती राई की मानस पटल पर एक वर्ष पूर्व की वह स्मृतियां सच्ची होती । जब भी लोग केम्ब्रिज में पढने के लिए भारत से प्रस्थान करने वाले थे, तब सुभाष ने डेढ शब्दों में इसका विरोध किया था और कहा था कि वह केंद्र इसमें जाना कभी पसंद नहीं करेंगे और आज वही सुभाष केम्ब्रिज में एक सीट पाने के लिए उत्सुक थे । राई के अथक प्रयास से सुभाष को उन्हीं के साथ फिट्जविलियम हॉल में प्रवेश मिल गया । उनके इस कार्य के प्रति सुभाष ने अपनी कृतज्ञता प्रकट की । सुभाष ने अपने आकर्षक और गंभीर व्यक्तित्व से राय को ही नहीं समझते हैं पार्टियों को अभिभूत कर दिया । उनके प्रतिभा के आकर्षण ने सभी को उनका अनुगामियों अरुणेश्वर बना दिया । आयदिन वहाँ की मित्र मंडली में विभिन्न विषयों पर चर्चा होती थी । उन गोष्ठियों में सुभाष समय पार्टियों के केंद्र बिंदु होते थे । वार्ता का विषय मुख्यतः यूरोपियन डिप्लोमेसी और राजनीति हुआ करता था । एक दिन बाद की बातों में राय ने पूछा, अचानक क्या आपके विचारों में परिवर्तन के से हो गया परिवर्तन? कैसा परिवर्तन? सुभाष ने सहजभाव से कहा यही कि देश सेवा का संकल्प छोडकर आईपीएस बनने का विचार कैसे आ गया? राय ने अपना प्रश्न स्पष्ट किया । मेरा ये संकल्प अपने स्थान पर अडिग है । दृढता के साथ कहने लगे, सुबह देख रहे हैं आइसीएस बन जाना । किसी भी मूल्य पर मेरी चिर संचित आकांक्षाओं पर कोई विनाशकारी प्रभाव नहीं डाल सकता । मेरे लिए अपनी इच्छाओं, आकांक्षाओं को सदेव के लिए दबाकर इंडियन सिविल सर्विस की अवसरी करना सर्वथा असंभव है । तो फिर कंपटीशन में बैठने का तात्पर्य राई की विस परिदृष्टि सुभाष के ओजस्वी मुखमंडल पर टिकी रह गई । आई । सी । उसमें बैठना मेरी अपनी आकांक्षा नहीं, माता पिता के आदेश की पूर्ति है । मैं कर्तव्य का निर्वाह कर रहा हूँ, नहीं था आई सी इसका मेरी व्यक्तिगत आकांक्षाओं में कोई स्थान नहीं । मैं भारत का स्वतंत्र पूत हूँ, स्वतंत्रता का स्वस्थ है । मेरा अपना स्वप्न हैं और मैं इसी आत्मविश्वास के साथ अपने पद पर चलूंगा । चाहे मेरे स्वप्न छिन्न भिन्न हो जाए और फूलों से भरा रास्ता शूट और कष्टों से भर जाएगा । अपने पिता की हठवादिता और उनके अनुचित दबाव को मैं कभी छमा नहीं कर सकता, जिसके कारण मुझे आईसीएस में बैठने के लिए विवस होना पडा । तो हो सकता है कि मैंने ये शपथ ले रखी है कि यदि में आईसीएस हो भी गया तो मैं इस पद को त्याग दूंगा । सुभाष केस अंतिम बाकी को सुनकर उपस् थित छात्र स्तंभित रहे गए । वास्तव में उन दिनों किसी भारतीय लिया इस इस पद प्राप्त करना एवरेस्ट विजय के समान था । फिर से प्राप्त करके त्याग देने की घोषणा करना एक अभूतपूर्व असाधारण घोषणा थी । उस चाँद से ही सुभाष के प्रति साथियों की श्रद्धा, जिज्ञासा और उत्सुकता अपनी चरम सीमा पर पहुंच गयी । सुभाष केवल वाद विवाद में ही प्रखर, व्यवस्थित और आदर्शवादी नाथ हैं । वरण उनकी इन समस्त अभिव्यक्तियों का साक्षात दिग्दर्शन उनके दैनिक जीवन में भी दृष्टिगोचर होता था । स्वयं भगवान थे, साथ ही दूसरों के गुणों की भी प्रशंसा करते थे । वे अंग्रेजों की स्फूर्ति और अनुशासनप्रियता से बहुत प्रभावित थे और स्वयं तीन गुणों का पालन करते थे । उनमें वाक शक्ति की अद्भुत क्षमता थी । उनके अंदर संघर्ष की दृढता थी और भी प्रतिद्वंदी को पराजित करने में संपूर्ण शक्ति लगा देते थे । उनका जीवन अत्यंत अव्यवस्थित था और व्यवस्था के प्रति उनकी जागरूकता । वह सावधानी दैनिक जीवन में कदम कदम पर दिखती थी । उनका कक्ष अत्यंत साफ सुथरा और व्यवस्थित रहता था । उसमें वैभव इलाज की किसी वस्तु के लिए स्थान नहीं था । कोई भी वस्तु ऐसी नहीं थी जिसे रईस या विलासता तब छुट्टी हो, किताबें, कपडे आदि सब अपने कुछ स्थान पर दिखलाई पडते थे । यद्यपि उनकी कपडे भडकीले नहीं होते थे तो भी वे स्वच्छ रहते थे । किसी ने उनके पंजाब को थोडा मोडा नहीं देखा और कभी भी उनकी कोर्ट पर कोई शिकन नहीं दिखाई पडी । उनके कार्य और कथन में एकरूपता थी और ये उनके व्यक्तित्व की सबसे बडी विशेषता । उनके आई सी इसमें सफल असफल होने की आशंका जिज्ञासा रखने वाले लोग बडी व्यग्रता से उस दिन की प्रतीक्षा कर रहे थे जब सुभाष सफलता प्राप्त करके आई सी उसको ठोकर मारेंगे । सीख रही वो रोमांचक अवसर आ गया । केवल आज महीने की छोटी अवधि में सुभाषनी आईसीएस की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की और तीन प्रतियोगियों में उनका चतुर्थ स्थान रहा । इतना ही नहीं निबंध लेखन में उन्होंने रिकॉर्ड स्थापित किया । पिता की चुनौती की प्रतिक्रिया में इंचौली परिणाम देने वाले सुभाष की प्रतिभा और क्षमता का लोहा कांग्रेस प्रोफेसरों को भी मानना पडा और चाय वायुमंडल स्तब्ध रह गया जब सुभाष की घोषणा प्रकाशित हुई जिसके अंतर्गत उन्होंने भारत के तत्कालीन ब्रिटिश राज्य सचिव लॉर्ड लंडन को संबोधित करते हुए लिखा था, मैं एक विदेशी सत्ता के अधीन कार्य नहीं कर सकता । इस घोषणा से ब्रिटिश अधिकारियों में खलबली मच गई और उन्हें पद चुराने की कारणों पर प्रकाश डाल नहीं तू साक्षात्कर के लिए बुलाया गया । साक्षात्कार में सुभाष ने दृढ और स्पष्ट शब्दों में कहा, मेरे विचार से जो व्यक्ति देश सेवा का संकल्प रखता हूँ वो विदेशी राज्य के प्रति वफादार नहीं रह सकता । मैंने अपने हृदय और आत्मा की संपूर्ण निष्ठा के साथ भारत की सेवा करने का संकल्प लिया है । अदाह मुझसे ब्रिटिश सरकार के अधीन अफसरशाही का निर्वाह नहीं हो सकेगा । यह अभूतपूर्व घटना थी जिसने इंग्लैंड और बंगाल में तहलका मचा दिया ।

11. Swadesh Wapas

स्वदेश वापस रायबहादुर जानकीनाथ पुत्र के आईसीएस में सफलता प्राप्त करने का गौरव अधिक दिनों तक नासन हो सके । सुभाष की पदत्याग नी की अविश्वसनीय विज्ञप्ति ने उनकी सारी आशाओं पर दशहरा बात कर दिया । उन्होंने तार द्वारा सुभाष से पद रुपया का कारण पूछा । जिसके उत्तर में सुभाष में स्थिति स्पष्ट की, इंग्लैंड सम्राट के प्रति निष्ठावान होने की शपथ ग्रहण करना मेरे लिए असंभव था । वो प्रतिज्ञा ऐसे मत दे ढंग से प्रारंभ हो रही थी जैसे मेरे देने स्वीकार नहीं किया । इसके पश्चात कि सुभाष अपने भाई का पत्र प्राप्त को जिसमें उन्होंने लिखा था भारी आई सी इसके पदत्याग से पिताजी पर बडी बुरी प्रतिक्रिया हुई है । उन की रातों की नींद हराम हो गई हैं और वे हर्षण तुम्हारे संबंध में चिंतित रहते हैं । क्या तुम उनका मेन रखने के लिए एक बार उनसे पूछ भी नहीं सकते थे? हो सकता है तो मैंने अपनी दृष्टि में उचित ही किया किंतु तुम्हारा ऐसा करना हम लोगों के लिए कष्ट है । भाई के इस पत्र ने सुभाष के ओजर दुस्साहस को स्वाभाविक रूप से आंदोलन कर दिया, पर वो अपने आप से कह उठे मनुष्य के जीवन में वो कितनी विडंबनात्मक स्थिति आती होगी, जब उसे सामाजिक मान्यताओं की पूर्ति करते हुए भी अपने संरक्षक की हठवादिता के समक्ष झुकने के लिए विवस होना पडेगा । केंद्र परिवार के प्रति उत्तरदायित्व होने की अपेक्षा देश के प्रति उत्तरदायी होना कहीं अधिक महत्वपूर्ण है । सच्चे अर्थों में अभी तक परिवार के प्रति में अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह कर रहा हूँ तो देश के प्रति मेरे उत्तरदायित्व और कर्तव्य भी शेष है । इस अनुभूति ने सुभाष के अंतर्द्वंद को शांत कर दिया और अपने मुख्य उद्देश्य के प्रति उनकी दृढता का आभास सभी को हो गया । भाई था तो एक बात का क्या? पिताजी असंतोष की स्थिति में आर्थिक सहायता नहीं भेजेंगे । इस समस्या को लेकर भी अत्यधिक चिंतित थी । उन्हें परेशान देखकर दिलीप राय से नहीं रहा गया और वे पूछ बैठे क्या बात हैं? बहुत परेशान नजर आ रहे हैं । समस्या बहुत साधारण सी है तो इस समय मेरे लिए असाधारण बंदी है । सुभाष ने चिंतित भाव से कहा, अब पिताजी मुझे कोई आर्थिक सहायता नहीं भेजेंगे । मुझे चिंता इस बात की है कि मैं स्वदेश वापस कैसे जाऊंगा । बस मैं अभी जीवित हूँ । रायनी सहजभाव से हसते हुए कहा, भारत के इतिहास में एक अभूतपूर्व अध्याय जोडने वाला व्यक्ति ऐसी साधारण समस्या के लिए चिंतित हो बडी हास्यास्पद बात है । आपको कितने की आवश्यकता है? मैं तुम्हारा ऍम, तुमने सादा, मेरी भावनाओं को महत्व दिया है । आभार आतिर एक के कारण सुभाष अभी कुछ कहना चाहिए किंतु राय ने इसे अपना अहोभाग्य समझा कि वे भविष्य के एक महापुरुष की कुछ सहायता कर सके । राय के आर्थिक सहायता से सुभाष स्वदेश को वापस हैं, महान या पास नहीं । ऐसे बेटे को हृदय से लगा लिया, किंतु बितानी, हर्ष अथवा विश्वास का कोई भी दृश्य उपस्थित नहीं किया । सुभाष को इस अनुभूति से मार्मिक पीडा हुई कि उनका पदत्याग पिता की मान प्रतिष्ठा का एकमात्र प्रश्न बनकर रहे गया है ।

12. Rajniti Ke Rangmanch Par

राजनीति के रंगमंच पर विदेश में रहते हुए भी सुभाष स्वदेश की तत्कालीन राजनीतिक उथल पुथल से अनभिज्ञ थे । उनका मन और मस्तिष्क हर छह देश के विभिन्न समस्याओं के प्रति उत्सुक और जागरूक रहता । उन्हीं दिनों देशबंधु चितरंजनदास की एक मार्मिक अपील ने उनके रूम रूम को प्रभावित किया । अपील का सारांश किए था नवयुवक की तो देश के प्राण है । स्वतंत्रता संग्राम का पवन प्रयाण के योगदान पर निर्भर है । नवयुवकों कि संगठित शक्ति ही इस महायज्ञ को पूर्णता प्रदान कर सकती है । सुभाष ने अनुभव किया कि ये समय राष्ट्रीय चेतना जागरण का प्रारंभिक काल है । देश की स्थितियां परिस्थितियां भयानक जान जावाद से गुजर रही है । अंग्रेजों के क्रूर अत्याचार से भारतीय शुद्ध होते हैं । नवयुवकों के हृदय में क्रांति की चिंगारियां लगने लगी है । जालिया माना बाप के विभाग से हत्याकांड ने उदार हृदय भारतीयों को बाल पडने के लिए आंदोलित कर दिया है । इतना ही नहीं, सुभाष ने पंजाब को अपने ताजे घावों से बेचैन देखा । वहाँ की स्थिति अत्यंत चिंतनीय और रोमांचक थी । फॅार की क्रूर पैशाचिक वृत्तियों की छटपटाहट अभी पूर्व तथा विद्यमान कि भारतीयों की पीडित आत्माएं अपमान और संताप से झुलस रही थी । अभी राष्ट्रीय ब्रिटिश साम्राज्यवाद की निर्दयता मक्कारी को देख कर किंकर्तव्यविमूढ ही था कि सहसा एक दूसरा आघात लगा ऍफ का महात्मा गांधी देश के कोने कोने में घूमकर लोगों में आत्मबल जगाने लगे । नागपुर में हुए कांग्रेस के अधिवेशन में असहयोग आंदोलन का प्रस्ताव पारित हुआ । लोगों ने अपने सरकारी किताब लौटा दिए । वकील, मुक्तान, अधिवक्ता आदि ने कोर्ट कचहरियों को मरघट बना दिया और देश के नवयुवकों ने स्कूल कॉलेज जाने छोडती है । ऐसी स्थिति में बंगाल के बेताज बादशाह, स्वतंत्रता संग्राम के अग्रगामी योद्धा, महान राजनीतिज्ञ एवं कलकत्ता हाईकोर्ट सर्वश्रेष्ठ ॅ देशबंधु चितरंजनदास ने अपनी तिजोरी का मुंह खोल दिया । वो बंगाल का हरिश्चंद्र बनकर स्वयं कंगाल हो गया । देशबंधु ने अपना सब कुछ देश को अर्पितकर अनेक संस्थाओं के संचालन के साथ ही अंग्रेजों की हिंसात्मक कार्यवाहियों का विरोध किया । जिस किसी ने भी उन का प्रतिरोध किया, उसे उन्होंने आंधी की तरह अस्तव्यस्त कर दिया । वो शक्ति का साक्षात भंडार थी, जिसने देश के नवयुवकों के हृदय में विद्रोह और क्रांति की आग भडकाती । सुभाष देशबंधु के अतुलनीय व्यक्तित्व, महान चरित्र नायकत् और सेनापतित्व के आकर्षण में खींचते चले गए । उन्हें लगा कि देशबंधु हुई वह प्रकाशपुंज है, जो उनके पद का सही प्रदर्शन कर सकता है । सुभाष जैसे प्रवृत्ति को देशबंधु के प्रथम साक्षात्कार नहीं अभिभूत कर लिया । देशबंधु ने भी उनकी प्रतिभा को छत भर में पहचान लिया । देशबन्धु ने अनुभव किया की स्वतंत्रता संग्राम को चलाने के लिए जिस नवयुवक की आवश्यकता थी, वह सुभाष ही है । जो दशा रामकृष्ण परमहंस से मिलकर विवेकानंद की हुई थी, वही दर्शन सुभाष की चितरंजनदास से मिलकर हुई और सुभाष चितरंजनदास के नेतृत्व में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की समर भूमि में उतर पडे । देशबंधु ने उन्हें राष्ट्रीय विद्यालय बंगाल का प्रधानाचार्य नियुक्त किया । सुभाष इस महान उतरदायित्व को निष्ठापूर्वक निभाने के लिए जी जान से जुट गए । बेजवाडा में भारतीय कांग्रेस कमेटी द्वारा पारित प्रस्ताव के अंतर्गत जब देशबंधु ने सहस्रों राष्ट्रीय स्वयं सेवक तैयार किए तो उनके नेतृत्व किए है । जिस साहस, चरित्रबल और अनुशासन की आवश्यकता थी, वह केवल सुभाष में ही दृष्टिगत हुई और देशबंधु ने सुभाष बोस राष्ट्रीय स्वयं सेवक टोली का सेनापति बनाया । सुभाष ने डोली के नेतृत्व में अतुलनीय शौर्य एवं संगठन शक्ति का परिचय दिया । बंगाल सरकार उनके इस विशाल संगठन से घबराकर और सचिन विभिन्न करने के लिए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संगठन गैरकानूनी करार दे दिया, क्योंकि सरकार ये जान गई थी कि ये संगठन प्रिंस ऑफ वेल्स के स्वागत का बहिष्कार करेगा । इस आगया को भंग करने के आरोप में सहस्त्रों नवयुवक जेल में दोस्ती स्वयं सुभाष को बंदी बनाकर अलीपुर जेल में रखा गया । राजनीति के रंगमंच पर प्रथम बार सुभाष गिरफ्तार हुए और उन्हें छह माह की सजा हुई ।

13. Jail Ek Pathshala

जेल, एक पाठशाला वो प्रथम जेलयात्रा सुभाष के लिए एक प्रकार से वरदान सिद्ध हुई । छह माह के उस बंदी जीवन में सुभाष ने सेवा और त्याग के अनेक नए सबका सीखें । उस समय उनके हालात का अंत ना रहा जब उनके महान पथप्रदर्शक देशबंधु को भी बंदी बनाकर उसी कक्ष में रखा गया जिसमें सुभाष बंदी थे । अहमदाबाद कांग्रेस अधिवेशन के सभापति चुने जाने की कुछ ही दिनों बाद कॅश के अनुसार देशबंधु को गिरफ्तार कर लिया गया था । इसे मैं अपना अहोभाग्य ही समझता हूँ कि जेल में भी आपको अपने साथ पा रहा हूँ । सुभाष नहीं । स्वतंत्रता की अमर सेनानी देशबंधु का स्वागत करते हुए कहा ये मेरा सौभाग्य, देशबन्धु, गंभीर मुस्कान के साथ अगर सफर में वो वास्तव में स्वतंत्रता की इस महायज्ञ को जारी रखने का उत्तरदायित्व हम सभी पर एक समान है । सेवा और त्याग के लिए छोटे बडे में कोई अंतर नहीं । उस कसौटी पर हम सबको एक साथ खरा उतरना है । सुभाष ये जेलयात्रा तो कठोर जीवन रख का पडा मात्र है, जिस पडाव में हमें आगे की योजना के लिए और मजबूती तथा स्पूर्ति के साथ तैयार हो लेना है । यातनाएं उद्देश्य को स्थिर आई और मजबूत बनाती है । क्रांति देवता कि अभिव्यक्तियों में जो प्रेरणा और गाय था, उसने सुभाष को उत्साह से सराबोर कर दिया । सरकारी तौर पर भले ही देशबंधु बंदी थी, केंद्र प्रथम श्रेणी के जेलयात्री की सभी सुविधाएं प्राप्त थी । अपने मित्रों और सार्वजनिक कार्यकर्ताओं को वो जेल में बुलाकर उनसे राष्ट्रीय प्रश्न पर विचार विमर्श करते । जेल का वातावरण एक प्रकार से राजनीतिक कार्यालय बन गया था । सुभाष मुझे विश्वास है कि तुम मेरी छह संचित अभिलाषा पूर्ण करोगे । देशबंधु ने एक दिन बडे भावविभोर सफर में कहा, मैं जानता हूँ कि तुमने वेदांत और नीति शास्त्र का अध्ययन किया था । मैं उन की शिक्षा लेना चाहता हूँ । बाद कुछ वैसे ही थी, जैसे एक शिक्षक अपने विद्यार्थियों के ज्ञान को भी सम्मान दे और उनके अनुभवों को स्वयं जाने की अभिलाषा प्रकट करेंगे । कुछ विचित्र सी विस्मय में मुग्धता के साथ सुभाष देशबंधु के उस पूर्ण मुखमण्डल पर देख रहे हैं । फिर सेहत संकोच से बोले पथ प्रदर्शक को पति क्या बता सकते हैं? भले ही आप ईरान और नीति के सैद्धांतिक दृष्टिकोणों से अनभिज्ञ हो, परन्तु क्रियात्मक रूप से तो सर्वथा भी यही है । किसी विषय का सैद्धांतिक अध्ययन ही क्रियात्मकता को सफलता प्रदान करता है । गंभीर मुस्कान के साथ देशबंधु ने अपने आशय को दोहराएं पास तब मैं तुम्हारे गहन अध्ययन का लाभ उठाना चाहता हूँ, संकोच की बात नहीं । सुभाष तो इस दिशा में मेरा मार्गदर्शन करेंगे । सुभाष ने विनी भाव से देशबंधु का ये आग्रह स्वीकार कर लिया और विराट और नीतिशास्त्र का जो कुछ भी ज्ञान उन्होंने अध्ययन से अर्जित किया था, उसका सारतत्व समझा दिया । कर्वे मीठे अनुभवों के अद्भुत दिन थे । देशबंधु अपने अनुयायियों की जितने महान पथप्रदर्शक थे, उतने ही बडे मित्र भी । बडे खुले । जैसे वे नवयुवकों से बात करते और मित्रवत विचारों का आदान प्रदान होता । घर और शुभचिंतकों के यहाँ से उनके सेवन के लिए फलों के तो करो का अंबार लग जाता । वे स्वयं स्वाद मात्र लेते, किन्तु आपने बंदी साथियों को भरपेट खिलाते जेलयात्रा । देशबंधु के लिए एक मनोरंजक अर्द्धविराम थी, तो सुभाष के लिए ज्ञान लेने और देने वाली पाठशाला थी ।

14. Bar aur Seba Abhijan

बाढ और सेवा अभियान अपनी प्रथम झील याग्रस् मापकर जैसे ही सुभाष घर पहुंचे सर्वप्रथम स्नेहभरे भाला माने दौड करन है गले से लगा लिया और इसमें हवाई की आंखों में हर्ष मिश्रित अश्रु अच्छे लगने लगे । स्वस्थ है तो माँ माँ के चरणों में अभिवादन करते हुए सुभाष ने अपनी सुपरिचित गंभीर मुस्कान के साथ पूछा और पिताजी कैसे हैं? जिस माँ बाप का बेटा सारी देश की स्वास्थ्य रक्षा के लिए कटिबद्ध हो, भला उसके माँ बाप भी अस्वस्थ रह सकते हैं । उसमें हवस चला के मुख्य मंडल पर्यूषण ओजपूर्ण मुस्कान की रेखा की चाहिए और वह बीटी के मुखमण्डल को अपनी हथेलियों में भर्ती हुई या था हा गौरव से मंडित हो । अरे सुभाष अब हमें अपने स्वास्थ्य से अधिक तेरी स्वास्थ्य की चिंता बनी रहती है क्योंकि अब तो हमारा ही सुभाष थोडी ही है । शरद, सुनील और बहनें यहाँ तक कि तेरे पिता जी सबके सबके स्वास्थ्य के प्रति चिंतित रहते हैं । ठहर जा मैं उन्हें सूचना दे दूँ । कैदी हुई मठापति की कक्ष की ओर चली गयी माँ मेरा मेरे लिए आज का समाचार पत्र भिजवा देना और मृदुला को भी मेरे आने का समाचार कहना देना । सुभाष ने उच्च स्वर में कहा और मेसी कुर्सी सता आवश्यक पत्रों को देखने लगे । माने पिता को सुभाष के आने का संदेश दिया, बोली सुभाषा गया देखिए बात कर लीजिए क्या देख क्या बात करूँ । जब कोई वस्तु अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर हो जाए तो उसके प्रति अनाधिकार चेष्टा कोई प्रश्न ही नहीं उठा । मैं जब सुभाष के विगत पर विचार करता हूँ तो लगता है कि मैंने उसकी जन्मजात प्रवृत्तियों के प्रति अन्याय किए हैं । जब मैं उसकी वर्तमान गतिविधियों प्रदेश की डालता हूँ तो मेरे सामने ब्रिटिश सरकार के प्रति अपने उत्तरदायित्व और कर्तव्य की सीमा रेखा खींच जाती है और मुझे उनके उपकार लंघन का कोई कारण समझ में नहीं आता । मैं स्वराज्य आंदोलन को आज के नवयुवकों की स्वाभाविक मांग मानता हूँ । लेकिन साथ ही यह भी जानता हूँ की ये मांग एक बडे किले में कैद कुछ ऐसे विद्रोहियों की आवाज है जिसे तो आपका एक ही निशाना कुछ ही क्षणों में शांत कर सकता है । और इस विचार से मुझे सुभाष का भविष्य घने अंधकार में डूबा हुआ दृष्टिगत होता है । प्रभात तुम जानती होगी अपने जीवन में मैं राजनीति और अन्य सामुदायिक संस्थाओं से सादा लग रहा है । मैंने कभी इनमें कोई रूचि नहीं ली और ना मेरे पास इन सबके लिए वक्त ही रहा है । लेकिन जहाँ तक मैंने नहीं किया है प्रभाव आजादी की इस लडाई में अंतर होगा तो हम हिन्दुस्तानियों का अपना सब कुछ होने के बाद शोषण और दासत्व की चरम उपलब्धि ही होगी । व्यक्ति से व्यक्ति का संघर्ष संभव है किंतु सत्ता से व्यक्ति का संघर्ष असंभव । मैं अपने को सुभाष की आलोचना करने की स्थिति में नहीं समझता हूँ । वो जो कुछ कर रहा है उसके लिए उस वक्त मतलब आई है रायबहादुर । जानकीनाथ ने इस धाराप्रवाह और गंभीर वक्तव्य के बाद सुभाष के आगमन के संबंध में कोई विशेष रूचि नहीं । निरंतर सी प्रभावती अंतर कक्ष में जाकर पुत्र कि खानपान की व्यवस्था करने लगी । नौकर अमेजॅन एक पत्र पत्रिकाएं और पत्रों का ढेर रख दिया था । सुभाष ने सर्वप्रथम समाचार पत्र का मुखपृष्ठ देखा । मुख पृष्ठ पर ही मोटे मोटे अक्षरों में अंकित था । उत्तर बंगाल में भीषण बाढ । हजारों लोग बेघर और लहलहाती फसल जलमग्न । ये कैसे? हृदयविदारक घटना थी जिसमें सुभाष को चिंतित और अशांत कर दिया । बडी चिंतित मुद्रा में समाचार पंथियों परदर्शी टिकाएंगे । इस आकस्मिक विपत्ति से मानव जीवन की रक्षा का उपाय सोचने लगे । ये बाढ कैसी भयानक बार थी जो धन और कृषि की छठी ही नहीं वरन हजारों मनुष्य की अकाल मृत्यु का कारण बन रही थी । चिंतित और व्यस्त घर घडी, चिंता और व्यस्तता इंटरनल बाकियों के साथ मुझे लाने, कक्ष में प्रवेश यार सुभाष की गंभीर दृष्टि उस पर जाती की कोटिश बधाई सुभाषा मृदुला निकट आकर मेज पर हाथ टिकाकर उनके चेहरे के निकट झुकती शक्ति बोली आपने त्याग सेवार कर्तव्य का जो उदाहरण प्रस्तुत किया है, उसे कभी ना बुलाया जा सकेगा । जिस झंड मुझे आपकी आईसीयू त्याग का समाचार मिला था, उस समय में प्रसन्नता से पागल होती थी । यदि आप यहाँ होते तो निश्चय ही मैंने आप की आरती उतारी होती है । जब आप बंदी बनाए गए उससे मैं मैंने पिताजी से कहा था कि जेलयात्रा सुभाष ता के उद्देश्य में व्यवधान नहीं, प्रेरक है । सच मुझे तो आपसे ईर्ष्या होती है, मृदुला नहीं । अपने ह्रदय के उद्गार एक ही साथ में व्यक्त करना किंतु शहरों चकित सी रह गई, जब उसने सुभाष के भावों में कोई परिवर्तन नहीं देखा । क्या बात है? भाजपा अभी ही तो जेल से छूटकर आए हो और अभी ये बोलना चिंताग्रस्त हो गए । चिंता का विषय व्यक्तिगत नहीं सामुदायिक है । सुभाष गंभीर स्वर में कहने लगे तो सादा ही मेरे उद्देश्य की सफलता में प्रेरणा का कार्य करती है । मतलब समझता हूँ कि तो कभी मुझे अपनी प्रेरणा से वंचित नहीं करेगी । बोले से भाजपा बोलो मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकती हूँ? भावविभोर मृदला नहीं बडी अधीरता से कहा यदि मेरा श्रम और मेरे खून की एक बूंद भी देश सेवा के लिए काम आ सके तो मुझ से बडी सौभाग्यशालिनी कौन? युवती होगी? संभावना है तो मैं एक यात्रा होगा सब भाजपा की तुम्हारी ही प्रेरणा से मैंने भी आजीवन त्याग और सेवा का व्रत अपना लिया है । सच वह मृदला । इस समय तो मुझे महारानी लक्ष्मीबाई नजर आ रही है । हर्षातिरेक में सुभाष कहीं पडे मैं तेरा आह्वान करता हूँ । देश की आजादी के लिए नवयुवतियों की भी उतनी ही आवश्यकता है जितनी कि नवयुवकों । तूने आज का समाचार पत्र देखा होगा । उत्तरी बंगाल में भीषण बाढ आई हैं और इस क्रूर प्राकृतिक प्रकोप से जनधन की अपार छती हो रही है । हमें आज ही बाढग्रस्त क्षेत्रों की ओर प्रस्थान करना है और बेघर बार लोगों को इस भीषण प्रकोप से बचाना हैं मैं आपके साथ सुभाषा सेवा की इस अवसर को मैं किसी भी कीमत पर गवा नहीं सकती । कहती हुई मृदुला कक्ष से बाहर की ओर भागती चली गई । बाढपीडित क्षेत्र को संरक्षण और सहायता पहुंचाने के लिए तुरंत ही बाढ कमेटी का गठन हुआ । सुभाष इस कमेटी के मंत्री बनाए गए । अनेक स्वयंसेवको, सहायको, परिचारिकाओं और प्राथमिक चिकित्सकों की टोलिया बाढग्रस्त लोगों की रक्षा सहायता करने के लिए निकल पडे । जैसे ही माँ का आशीष लेकर सुभाष बाढ क्षेत्र में जाने के लिए घर के बाहरी द्वार पर आए । सामने से मृदुल को आते देख वो हाथ में एक सौ के इसलिए द्रुतगति से सुभाष की ओर आती हुई उच्च स्वर में कह रही थी मैं इस भाषा चलो । सुभाष स्वागत भाव से मुश्किल है । मृदुला सहित उनकी टोली बाढग्रस्त क्षेत्र की ओर प्रस्थान करेगी । कितना अव्यवस्थित दृश्य था चारों ओर जल्द ही जल्द दृष्टिगत होता था । झोंपडे जलराशि में विलीन हो गए थे । ऊंचे मकानों की सिर्फ कंगूरे दिखाई पड रहे थे । कितने ही पशु पानी की सतह पर आश्रय की तलाश में डूब उतरा रहे और कितनों की राशि पाने पर बह रही थी । बडे बडे पेड अपनी फुनगी तक चल में समय हुए थे । असहाय, निराश्रित भूख और शुद्ध आ पीडित जनसमाज की दयनीयता देखकर बडे बडे साहसी ओके शहीद बंगाल में से पूर्व इतनी भयानक बाढ कभी नहीं थी । संपूर्ण उत्तर बंगाल जलमग्न था । सहायता जूलियान नावों द्वारा मनुष्य और पशुओं की प्राण रक्षा का भागीरथ प्रयत्न कर रही थी । बाढ पीडितों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने, उनके रहने और भोजन की व्यवस्था करने तथा उन्हें प्राथमिक चिकित्सा देने का अभियान द्रुतगति से चल रहा था । उस समय सुभाष की अदभुत कार्य क्षमता और संगठन शक्ति देखते ही बनती थी । एक विशाल का नाम और अपनी टोली के साथ बाढग्रस्त क्षेत्रों का तूफानी दौरा कर रहे थे । स्वयं अपने हाथों से बाढ पीडितों की जीवन रक्षा और भरण पोषण का दायित्व निभा रहे थे । संचालक थे और कार्यकर्ता भी । मृदला बडी लगन और तत्पर्ता के साथ बाढ पीडितों की सेवा सुश्रुषा में लगी थी । इस समय कोई उसे देखकर यह अनुमान भी नहीं कर सकता था कि वह एक उच्च पुलिस अधिकारी की लाडली बेटी है जिसने स्वयं उठाकर एक गिलास पानी भी नहीं दिया होगा । लगातार कई दिनों तक रात दिन सुखचैन त्यागकर सुभाष और उनका बाढ सहायक दल बाढ पीडितों को जीवन दान देता रहा । उसमें शिथिलता, थकान और उदासीनता का नामोनिशान दिया था ।

15. Swarajya Party ka Janma

स्वराज्य पार्टी का जन्म अपने आगामी कार्यक्रमों पर प्रकाश डालते हुए देशबंधु चितरंजनदास ने कहा, मेरे विचार से ब्रिटिश सरकार पर आक्रमण करने का एक सशक्त तरीका ये होगा कि हम उनके गढ में घुसकर सहयोग करें । मैं इस निर्णय पर पहुंचा हूँ कि हमें कौंसिलों में प्रवेश करके ब्रिटिश शाही को उसी के इस तरह से समाप्त करना चाहिए । मैं आपके इन विचारों का पूरी तरह समर्थन करता हूँ । सुभाष ने दृढता के साथ कहा, शत्रु से सफलतापूर्वक मोर्चा लेने के लिए यह आवश्यक है कि हम नियोजित कार्यक्रम को जल्द से जल्द कार्यरूप में परिणित करें । देशबन्धु और सुभाष तथा उनके अनुयायियों की इस कौंसिल वादी विचारधारा नहीं, कांग्रेस में दो डर पैदा कर दी है । कांग्रेस पार्टी परिवर्तनवादी क्यों? और अब परिवर्तन वादियों में विभक्त हो गई । यद्यपि बहुमत परिवर्तन वादियों का ही रहा । केंद्र देशबंधु हताश ना हुए । गया में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ, जिसका सभापतित्व देशबंधु ने किया । इस सभा में सुभाष भी सम्मिलित हुए और उन्होंने स्वराज्य पार्टी का जोरदार समर्थन किया । उनके वक्तव्य नहीं परिवर्तन वादियों से मतभेद को और गहरा कर दिया । केंद्र सुभाष के विचारों में कोई लचक नहीं आई । उन्हीं दिनों स्वराज पार्टी की ओर से फॉरवर्ड नाम का एक अंग्रेजी दैनिक पत्र देशबन्धु के संचालन में प्रारंभ हुआ । इस पत्र में तत्कालीन राजनीतिक स्थितियों, समस्याओं और कार्यक्रमों पर लिख संभावनाएं और सूचनाएं प्रकाशित होती थी । देशबंधु ने सुभाष को उस पत्र का संपादन कार्य सौंपा । सुभाष ने बडी निर्भिकता और कुशलता के साथ इस ज्वलंत दैनिक पत्र का संपादन कार्य संभाला । यह वह समय था जब कांग्रेस में आपसी फूट पैदा हो चुकी थी और विचार भिन्नता के कारण वायुमंडल दूसरी हो रहा था । कौन चल प्रवेश के विरुद्ध प्रचार को रोकने के लिए बम्बई में अखिल भारतीय कांग्रेस का अधिवेशन हुआ जिसमें सुभाष ने पुनः स्वराज पार्टी के कार्यक्रमों का दृढता के साथ समर्थन किया । अपने ओजपूर्ण वक्तव्य में गांधी जी के यहाँ इंडिया का उदाहरण देते हुए सुभाष ने कहना आरंभ किया, गांधी जी ने स्पष्ट कहा लिख दिया है कि अल्पसंख्यक दल को जिसका मन कांग्रेस में नहीं मिला है, सच्चाई ईमानदारी से उसे किसी कार्यक्रम को अपने हाथ में लेने का पूरा अधिकार है । बंगाल की वर्तमान राजनीतिक स्थिति को देखते हुए टाॅल तथा एजुकेशन बिल के खिलाफ आवाज उठाने की सख्त जरूरत है । टेनिस टेबल काश्तकारों के अधिकार पर वज्र प्रहार करता है और एजुकेशन बिल से शिक्षा के क्षेत्र में घोर निराशा का जन्म हो रहा है हो । बंगाल प्रांत की काश्तकार तथा मध्य श्रेणी के लोग ये चाहते हैं कि कांग्रेस वाले आपसी मान मान लेने को भूलकर काउंसिल में जाकर उनके अधिकारों की रक्षा करें । मैं इस बात को फिर से दोहरा देना चाहता हूँ कि कांग्रेस काउंसिल में केवल इसीलिए प्रवेश करना चाहती है कि नौकरशाही के मार्ग में रोडे अटका केंद्र सुभाष की इस न्यायसंगत वक्तव्य से भी कांग्रेस की आपसी मनोमालिन्य की खाई नहीं पड सकी । सुभाष ने अनुभव किया कि उन की सदभावना को हंसी में उडा दिया गया है और कांग्रेस में मतभेद के अंकुर तेजी के साथ पढते जा रहे हैं जिससे समस्त राजनैतिक वातावरण विषाक्त हो रहा है । कांग्रेस का ये मनोमालिन्य अभी बना भी रहा था की कलकत्ता महानगरी कॉर्पोरेशन का चुनाव आ पहुंचा । देशबन्धु ने सोचा कि कॉरपोरेशन को हत्या लेना चाहिए । इसमें एक पंथ दो काज हो सकेंगे । प्रथम तो स्वराज पार्टी को सहायता मिलेगी और दूसरे महानगरी की सेवा भी हो सकेगी और इसी आशय से उन्होंने कॉर्पोरेशन चुनाव में स्वराज पार्टी के उम्मीदवार खडे किए । यद्यपि या परिवर्तनवादी कांग्रेसियों ने इसका विरोध किया । घोरा परिवर्तनवादी उस समय ये देख कर दंग रह गए कि उनकी भीषण विरोध और सहयोग के उपरांत भी कॉर्पोरेशन के निर्वाचित सदस्यों में पचपन सदस्य स्वराज पार्टी के थे । ये स्वाभाविक ही था कि बहुमत प्राप्त सुराज दल देशबंधु चितरंजनदास को अपना मेयर निर्वाचित करें । मेयर निर्वाचित होते ही देशबंधु ने सबसे पहला काम जो क्या वो था सुभाष चंद्र बोस को कॉर्पोरेशन का एक्जिक्यूटिव ऑफिसर शासनकर्ता नहीं करना । आपने अल्पकालीन सेवाकाल में कलकत्ता को एक आदर्श महानगरी बनाने के लिए सुभाष में जो क्रांतिकारी कदम उठाएगी, वे अविस्मरणीय और अभूतपूर्व थे ।

16. Lord Liton Ki Damanchakra

लॉर्ड लेन देन का दमन चक्र । सुभाष अभी कलकत्ता महानगरी को आदर्श नगरी बनाने की कार्यक्रमों में व्यस्त थे कि सहसा लॉर्ड लिंटन की सरकार ने बंगाल में अपना दमन चक्र चलाना आरंभ कर दी । सरकार तो कलकत्ता कॉर्परेशन में स्वराज्य पार्टी के आधिपत्य से यूपी जली भुनी बैठी थी । दूसरी और एक और तेजनाथ मत घटना नहीं, इस आज में घी का काम किया । किसी किशोर नवयुवक ने एक अंग्रेज पदाधिकारी की हत्या कर दी और सार्वजनिक सभा में सरकार के विरुद्ध विद्रोही भाषण देकर जनजीवन में भी क्रांति की चिंगारियां चिपका दिया । इन चिंगारियों ने जल्द ही विस्फोटक का रूप धारण किया । फलस्वरूप लिंडन सरकार का दमनचक्र तेजी से नाचने लगा । तत्कालीन बंगाल में ऑर्डिनेंस के अनुसार अस्सी क्रांतिकारी युवकों को कैदी बनाया गया । मूल रूप में ये ऑर्डिनेंस स्वराज्य पार्टी की शक्ति को चकनाचूर करने के लिए निकाला गया था । फलता स्वराज्य पार्टी के मुख्य काम सुभाष चंद्र बोस की अकारण ही बंदी बना लिए गए । सुभाष के अकारण ही बंदी बनाए जाने की इस घटना से समग्र देश में हलचल मच गई और चारों ओर से भाज के बंदी बनाए जाने की विरोधी आवाजे ब्रिटिश शासन का तख्ता हिलाने नहीं । सुभाष के बंदी बनाए जाने का सर्वाधिक क्षोभ देशबंधु हुआ । उन्हें ये समझते देर नहीं लगी कि स्वराज्य पार्टी का विध्वंस करने के लिए ही लंडन सरकार का दमन चक्र आरंभ हुआ है । एक और देशबंधु ने अपराध सुभाष की गिरफ्तारी पर छुप थे तो दूसरी ओर सरकार की स्कूटी खेलनीति के प्रति उनमें तीव्र आक्रोश था । कलकत्ता कॉर्पोरेशन की एक बैठक में सुभाष की गिरफ्तारी के विरोध में एक प्रस्ताव पारित हुआ और देशबंधु के हृदय का झंझावात शब्दों में फूट पडा । वो उस समय आ गया है जब हमें जनता के हिंसात्मक कार्यों के साथ साथ सरकार के हिंसात्मक नीति की भी निंदा करनी है । सरकार ने ऐसा कानून बनाया है जो गैरमानवीय इस कानून का हम इसलिए विरोध करते हैं कि इससे हमारे नागरिक अधिकारों की हत्या होती है । अपराधी को बिना बताया की उसका क्या अपराध है? जब तक सरकार चाहे उसे कैद रख ले, मानवाधिकारों पर कुठाराघात करना नहीं है तो और क्या है? मुझे खेद है इस देश की सरकार बिना हिंसात्मक नीति के शासन नहीं कर सकती । यदि देश प्रेम अपराध है तो हाँ मैं भी अपराधी हूँ । कलकाता क्रॅशर जितना दोषी है, उसका मेयर भी उतना ही दोषी है । सुभाष सर्वप्रथम अलीपुर सेंट्रल जेल में रखे गए उसके बाद उन्हें वरपुर जेल में भेज दिया गया और जहाँ से उनका तबादला इतिहास प्रसिद्ध मांडले जेल को कर दिया गया वहाँ जेल एक और अपने सीन बच्चों में लोकमान्य तिलक तथा लाला लाजपत राय जैसे मूर्धन्य नेताओं को बंदी रखने के लिए प्रसिद्ध थी तो दूसरी ओर घोर अपराधियों की नयनक्कारा भी थी । इसका वातावरण स्वास्थ्य के लिए अत्यधिक विश्वास और हानिकारक । इस नक्कारा में आने के साथ ही सुभाष अस्वस्थ हो गए तथा दिन प्रतिदिन उनका स्वास्थ्य गिरता गए तो उनकी आत्मज्योति समुज्ज्वल होती जा रही थी । उनकी आलोकित आत्मा ने और जेल के अंधकार को छीनकर उसमें प्रकाश विकिरण कर दिया । सुभाष निर्जीव सिंह बच्चों में अपने मन में सोचते बाहर आंदोलन की क्या स्थिति होगी? मेरे मित्र मुझे याद भी करते होंगे या नहीं । इस समय चारदीवारियों में बैठकर कीम कर्तव्य विमूढ रहने का नहीं है या मूल्य समय तो स्वतंत्रता के महायज्ञ में आहुति देने का है । सुभाष का स्वास्थ्य दिन प्रतिदिन शीन से छिहत्तर होता जा रहा था और इस कारण स्थिति में भी वह तन्हाई की तपती प्राचीरों के अंदर सुदूर भविष्य की क्रांतिकारी योजनाएं बनाने में तल्लीन थी । भीषण गर्मी और प्रदूषित जलवायु ने अजय सिंह को छीन का आयकर दिया । उन में टीवी के लक्षण स्पष्ट दृष्टिगत होने लगे । उनका वजन चालीस पौंड घट गया । जब समाचार पत्रों द्वारा ये सूचना जनसाधारण पहुंची, तब बंगाल ही नहीं, संपूर्ण भारत में तूफान साउथ खडा हुआ । प्रेस वालों ने इस विज्ञप्ति को समक्ष रखकर ब्रिटिश सरकार की निर्दयता और अन्याय की जोर जोर से तीव्र निन्दा आरंभ कर दी, किंतु निर्दयी सरकार ने इस कान से सुना और उस कान से उडा दिया । इसी मत भी बंगाल का सर्वाधिक महत्वपूर्ण दुर्गा एवं सरस्वती पर का समय निकट आ गया । स्वाधीनता सेनानी एवं शक्ति का उपासक इस अवसर पर जेल के सींखचों से मुक्ति पाकर महाशक्ति दुर्गा की आराधना के लिए तत्पर हो गया । सुभाष ने इस महान पर्व को सामूहिक रूप से मनाने के लिए कुछ रुपयों की स्वीकृति चाहिए, किंतु संबंधित अधिकारियों ने उनकी सात्विक अभिलाषा को भी राजनीतिक चाल कहकर ठुकरा सुभाष के जो और संताप का अंतर आ रहा

17. Swarajya Debata Ka Mahaprayan

स्वराज वीरता का महाप्रयाण भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का कितना भागा और कलुषित दिन था, जब समाचार पत्रों द्वारा या शिव विज्ञप्ति प्रसारित हुई, स्वतंत्रता संग्राम के महान था । स्वराज की परंपरा और भारत के लाडले सपूत देशबंधु चितरंजनदास का देहावसान हो गया । स्वराज देवता कि महाप्रयाण के इस हृदयविदारक समाचार नहीं, समस्त भारत को शोकग्रस्त कर दिया । मुर्झाने राष्ट्रनायकों ने अनुभव किया कि अचानक बीच खबर में वह मस्तूल टूट गया, जिस राज्य की नौका का सशक्त आधार उस दिन भले ही ब्रिटिश अधिकारियों और चाटुकारों के मन में बदमाशी फूटे हो, हिन्दू स्वतंत्रता सेनानी और अन्य देशवासी शोक विफल, देशबन्धु, स्वनामधन्य, उनका बंधुत्व समग्र भारत का प्रतिनिधित्व करता था । जान जान के प्रति उनकी बंधुत्व की भावना एकाकार होकर बंगबंधु से देशबंधु का प्रति बन गई थी । उनके महाप्रयाण पर देश के विभिन्न स्थानों पर शोकसभाएं हूँ और राष्ट्रनायकों ने दर्द करने से अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके महान व्यक्तित्व एवं राष्ट्र सेवाओं पर अपने उद्गार व्यक्त किए । पुरुषोत्तमदास ठाकुरदास ने भावविह्वल स्वर में कहा, वास्तव में पिछले दो वर्षों से नौकरशाही के लिए देशबंधु हवा और भयंकर दुःस्वप्न । वे बंगाल के बिना मुकुट के राजा थे । इंग्लिशमैन नेटिव नहीं दी थी । भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में देशबंधु का नाम अगर कम योद्धा के रूप में लिया जाएगा, देशबन्धु के त्याग, कर्मठता, पौरुष, दुस्साहस एवं चरित्र बल्कि ज्वलंत गाथाएं तब तक ना विस्फोटक की जा सकेगी, जब तक भारत में भारतीय तक का एक भी अगर जीवित रहेगा । स्वतंत्रता संग्राम में वीर सैनिक की भांति जीवन पर्यंत लडते रहे इस महान पुरुष के महाप्रयाण की जो ताकत नहीं है, प्रतिक्रिया सुभाष पर भी उसे सुभाष के अतिरिक्त और कोई अनुभव नहीं कर सकता था । उछाने सुभाष को लगा कि जैसे उनके कंधवे पद का प्रकाश नाम किसी ने तोड दिया हो, जैसे वह ऋषि धराशाही हो गया हो । स्वयं जिसकी शाखा रहे हो जैसे वो इमारत की लडखडाकर गिर गई हो, जिनके स्वयं स्तंभ रहे हो और जैसे वो सूर्य ही व्यस्त हो गया हो, वो स्वयं जिसकी किरण रहे हो उन्हें किसी कीमत पर ये विश्वास नहीं हो पा रहा था कि उन्हें कर्तव्य की दिशा दिखाकर स्वयं उनका पथप्रदर्शक गंतव्य प्राप्ति के पूर्व ही सदा सदा के लिए हो गया है । किन्तु उस कठोर सकते को भावात्मक संवेदना असत्यता सिद्ध कर सका । सुभाष की मार में कभी की फूट कौन कल्पना कर सकता है कि आज मेरे दिल पर कितना बडा बजराह खास हुआ है । समाचार पत्र के शब्दों को पढकर मुझे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ किंतु वो समाचार हृदयविदारक कठोर सकते हैं । हम उसे झुठला नहीं सकते हैं ।

18. Nirdosh Aparadhi

निर्दोष अपराधी महाशक्ति का महापर्व संपन्न हो गया । स्वराज देवता निर्माण को प्राप्त हो गया किंतु सुभाष, मांडली, जीएलके, लाहौर सीन बच्चों में बंदी रहे लिंटन सरकार के दमन चक्र की परिक्रमा अब भी यथावत थी । धैर्य और संतुलन की एक सीमा होती है किंतु क्रूरता और अमानुषिकता जब निरंतर सीमा पर वजह घाट ही करती चली जाती है तब स्वाभाविक रूप से उस सीमा को अतिक्रमित हो जाना पडता है । निर्दोष अपराधी सुभाष जब इस आशा से पूर्णतः हताश हो गए कि उनकी निर्दोषिता का भास्कर सरकार उन्हें यात्रा मुक्त कर देगी, तब उनकी जो गलत आत्मा विद्रोह के लिए छटपटा थी । फरदर सुभाष ने अपने बीस साथियों सहित बंदीग्रह में आमरण अनशन आरंभ कर दिया । एक तो योगी भारतीय जनता अपने प्राणप्रिय नेता के अकारण बंदी बनाए जाने के कारण संतृप्त और विश्व थी । दूसरे सुभाष के आमरण अनशन की सूचना समग्र भारत को विद्रोह विफल कर दिया । उनके अनशन से सारा देश चिंतित था और सरकार की तीव्र आलोचना होने लगी । विभिन्न स्तरों पर हडताल ब्रिटिश सरकार के खिलाफ नारेबाजी और सुभाष को मुक्त करने के लिए सभाओं का आयोजन होने लगा । केंद्रीय फॅमिली में श्री गोस्वामी ने बडी उत्तेजना में कहा अनशन का कारण यही नहीं है कि बंदियों को दुर्गा पूजा की सुविधाएं नहीं दी गई बल्कि इस मांग के साथ उनकी दूसरी न्यायोजित मांग भी ठुकराई गई । श्री सुभाष चंद्र बोस तथा उनके साथियों का जीवन खतरे में है । यदि सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु हो जाए तो सरकार भले ही संतोष की ठंडी सांस लेते हैं लेकिन बंगाल तथा संपूर्ण भारत की जो छती होगी उसे कौन पूरा करेगा । लाला लाजपत राय ने अत्यंत भावविह्वल स्वर में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा यदि श्री सुभाष चंद्र बोस जैसे चरित्रवान प्रतिभाशाली व्यक्ति को अनशन करने के लिए विवस होना पडा तो स्थिति कितनी भयंकर है, इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है । इस प्रस्ताव के तुरंत बाद ही श्री गोस्वामी और लाला लाजपत राय ने सुभाष को तार भेजकर अनशन समाप्त करने का आग्रह किया । इसी विषय स्थिति में श्रीनिवास शास्त्री का वक्तव्य भी प्रकाशित हुआ । सुभाष बाबू की दिया की प्रशंसा करना सूरज को दीपक दिखाना है । मुझे उनकी त्याग की गाथा साहसपूर्ण तथा कल्याणकारी काफी की तरह मालूम पडती है । चाहे हम विभिन्न राजनीतिक विचार रखते हो लेकिन जहाँ नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा का प्रश्न उठता है, वहां हम सब की एक ही आवाज है । अपने अनशन की ये क्रांतिकारी प्रतिक्रिया देखते हुए सुभाष तथा उनके साथियों ने अपना अनशन भंग कर दिया । जनता के अतिरिक्त विभिन्न समाचारपत्रों ने सुभाष की निरापराध गिरफ्तारी के संबंध में अपना विरोध प्रकट किया । स्टाॅल तथा ऍफ इंडिया इन्होंने इस परिस्थिति का लाभ उठाते हुए ये घोषणा की । सुभाष चंद्र बोस तमाम आतंकवादियां दोनों के संचालक रहे हैं किन्तु साथ ही स्टेज मैंने ये भी स्वीकार किया सुभाष चंद्र बोस को कभी न्यायालय के सामने खडा नहीं किया गया और न उनके अपराध ही बताए गए इंग्लिश मानता था क्या ऍफ इंडिया में न जाने किस विरोधी ने ये टिप्पणी कर डाली । स्वयं सुभाष बाबू के पिता ने अपने पुत्र को आतंकवादी स्वीकार किया है । इस विज्ञप्ति पर सुभाष की अंतरात्मा तिलमिला उठे और उन्होंने पिता के प्रति निराधार वक्तव्य का जोरदार खंडन किया । इतने कोहराम और उठा पटक के बाद भी सुभाष को जेल से रिहाई नहीं मिल सकी । उनकी शारीरिक स्थिति अत्यंत दयनीय थी । उनके लिए उठना तक मुश्किल था । अंत में उनके भाई डॉक्टर सुनील चंद्र बोस एवं अन्य सरकारी मेडिकल ऑफिसरों ने जांच की और उनकी दशा सोचनीय बताई । परिणाम कहाँ मुस्लिमो बरली ने बंगाल सरकार की तरफ से ये प्रस्ताव पेश किया कि सुभाष को स्वास्थ्य लाभ करने के लिए स्विट्जरलैंड ले जाना चाहिए । ये प्रस्ताव न्यायसंगत था किंतु जब सुभाष का ध्यान इसके साथ जुडी हुई निर्मम शर्तों की ओर गया तो अस्वस्थता की स्थिति में भी उनकी बाहर पडी थी । इस प्रस्ताव के अंतर्गत कहा गया था सुभाष बाबू जी जहाँ यात्रा करें वो सीधा यूरोप हो जाए और वे कलकत्ता भगवान ने किसी बंदरगाह पर नहीं उतर सकेंगे । ये शहर किसी प्रकार थी जिस प्रकार की पिंजरे का द्वार खोल दिया जाए और उडते हुए पक्षी के चारों गिद्धों का पहला लगा दिया जाएगा । इस विज्ञप्ति की प्रतिक्रिया स्वरूप सुभाष ने शुष्क मुस्कान के साथ कहा, ब्रिटिश सरकार का सदस्य रवैया रहा है कि वह एक हाथ से किस चीज को देने के लिए लुभाती है तो दूसरे हाथ से ले लेती है । क्रिमनल ऑॅल सरकार का एक ऐसा सुदर्शनचक्र था जब चाहा उसे छोड दिया और जब जहाँ अंगूठी की तरह अंगुली में पहन लिया । इसके मूल में सरकार की कुटील नीति काम कर रही थी । सुभाष यूरोप चले जाए ऍफ को मार कैंडी ऋषि की भारतीय चिरंजीवी बना दिया जाए । जनता भले ही इस को टीम नीति के अंदर नहीं दुर्भावों को न समझती रही हो किंतु क्रांतिवीर सुभाष भली भांति समझते थे । जब मुक्ति आंदोलन के सारे प्रयास विफल हो गए । तब सुभाष ने अपने बडे भाई सर चंद्र बोस के नाम एक मार्मिक एवं सारगर्भित पत्र लिखकर संपूर्ण स्थिति स्पष्ट की । फॅमिली चार अप्रैल उन्नीस सौ सत्ताइस प्रिया भाई साहब आप ये जानने को उत्सुक होंगे कि मैं माननीय मिस्टर मोबली की उदारता के विषय में क्या सोचता हूँ । आज वो समय आ गया जब मैं आपके समूह अपने हो गए खोल सकूँ मेहमान भी गृहसचिव के वक्तव्य को कई बार पढा जो निसंदेह है बडी चतुराई से निर्मित किया गया है । छोटे ज्यादा डॉक्टर सुनील चंद्र बोस इन्होंने मेरे बारे में जो रिपोर्ट दी है और जो सिफारिशें की है वे मुझसे पूछ कर नहीं कि अन्यथा में इस तरह की सिफारिश का कभी समर्थन नहीं करता । उन्हें ये भी ख्याल नहीं था की सरकार इन सिफारिशों को अपनी राजनीतिक पूंजी में परिणीत करेगी । इसके लिए ना तो मैं और न कोई और उन्हें दोस्ती सकता है । मुझे ऐसा जान पडता है कि सरकार छोटे ज्यादा की रोक विश्लेषण को स्वीकार नहीं करती क्योंकि माननीय मेंबर ने कहा था इस समय मिस्टर सुभाष चंद्र बोस बहुत सख्त बीमार नहीं है । ये जानने लायक बात होगी कि सरकार किस दिशा में मुझे सकते । बीमार समझेगी क्या जब मेरी व्यवस्था लाइलाज हो जाएगी अथवा मेरी मृत्यु की कुछ ही दिन शेष रह जाएंगे । छोटे ज्यादा की सिफारिश ये नहीं कहती कि मुझे घर ना जाने दिया जाए । सिफारिश में ये भी नहीं कहा गया है कि बंगाल क्राॅस की समाप्ति के लिए मुझे अपने देश को नहीं लौटना चाहिए । इन सब बातों से मुझे सरकार की नियत में विश्वास नहीं होता । बंगाल सरकार ये चाहती है कि मैं बंगाल क्रिमनल ऑॅफ के अंत तक विदेश में ही रहो । ये कानून जनवरी उन्नीस सौ तीस में होगा । लेकिन इस बात की क्या गारंटी है कि उसके बाद उसकी आयु नहीं बढाई जाएगी । ऍम, डीआईजी, आईजी सीआईडी के साथ मेरी जो अंतिम बातचीत हुई थी, उससे मेरे कथन की पुष्टि होती है । मुझे इसमें कोई आश्चर्य नहीं होगा कि यदि उन्नीस सौ पच्चीस का बंगाल क्राॅस उनतीस में सदा के लिए कानूनी किताब में शुमार कर लिया जाए । इस दशा में मैं जीवन भर के लिए अपने देश से निर्वासित हो जाऊंगा । ऐसा करना तो स्वयं अपने लिए ही एक ऑर्डिनेंस बनाना होगा । यदि सरकार की मंशा बिल्कुल सच्ची होती तो वह मुझे सूचित कर देती की किस तारीख तक मुझे विदेशों में रहना चाहिए । मुझे भली भांति विदित है कि स्विट्जरलैंड में ब्रिटिश जासूसों के अतिरिक्त इटालियन, फ्रेंच, जर्मन था । हिंदुस्तानी जासूस अंग्रेज सरकार की नौकरी में नियुक्त रहते हैं जो विरोधियों और राजनीतिक संदिग्ध व्यक्तियों का छाया की तरह पीछा करते हैं । मुझे अपनी जन्मभूमि से स्वेच्छापूर्वक निर्वासित होने की चाह नहीं है । अतएव मेरी इच्छा है कि सरकार इस दृष्टिकोण से विचार करें । जब मैंने ये पढा की मुझे ये शर्त देनी है कि मैं हिंदुस्तान वर्मा और लंका को नहीं लौटूंगा । तब बार बार मैंने अपनी आंखें, मालिक और मन में कहा क्या में ब्रिटिश सरकार के अस्तित्व के लिए इतना खतरनाक हूँ कि केवल बंगाल प्रांत से मेरा निर्वाचन काफी नहीं है । यदि ऐसा नहीं है तो क्या ब्रिटिश सरकार ने एक भानुमति का पिटारा खडा किया है? मैं नहीं समझता कि बंगाल सरकार के सिवा अन्य प्रांतीय सरकारों अथवा भारतीय सरकार को मेरे खिलाफ कोई शिकायत है । सरकार को यह भली प्रकार विदित है कि मैं लगभग ढाई वर्ष से घर से दूर रहा हूँ और इस बीच में अपने माता पिता तथा कई रिश्तेदार उसे ना मिल सका । अब यदि में यूरोप को जाओ तो कम से कम ढाई तीन साल लगेंगे, जिस बीच मुझे भेंट करने का कोई अवसर नहीं मिल सकता । ये मेरे लिए कठोर है ही, लेकिन मुझे प्यार करते हैं । उनके लिए तो ये और भी कठोर है । एक पांच चाहती व्यक्ति के लिए यह समझना मुश्किल है कि पूर्व के लोग अपने सगे संबंधियों से कितना मोह रखते हैं । सरकार ये बिल्कुल भूल गई है कि उसने मुझे ढाई वर्षों तक कितनी तकलीफ हो में डाला है । देखी मैं हूँ ना कि वो इतने समय से अकारण ही उसने मुझे बंद कर रखा है । मुझे केवल ये कहा गया है कि मैं अस्त्र शस्त्रों को संगठित करने, विस्फोटों को बनाने तथा पुलिस अफसरों को मारने का दोषी हूँ । भला ऐसी दशा में अगर ऐसे ही निराधार दोष सर एडवर्ड मार्शल हालिया सर जॉन साइमन के ऊपर मंडे जाते तो वे भी स्वयं को नर अपराधी कहने के अतिरिक्त और क्या सबूत दे सकते थे? यदि सरकार और किसी नैतिक उत्तरदायित्व को अपने स्तर पर लेने के लिए तैयार नहीं है तो उसे कम से कम मुझे उसी शारीरिक अवस्था में मुक्त करना चाहिए जैसी अवस्था मेरी उन्नीस सौ चौबीस थी । यदि जेल में मेरा स्वास्थ्य खराब हुआ है तो सरकार को मुझे मुआवजा देना चाहिए । मेरा खर्च तब तक उसे बर्दाश्त करना चाहिए जब तक मेरा स्वास्थ्य पूर्ववत ना हो जाए यदि सरकार ने मुझे एक बार घर जाने दिया होता, मेरे यूरोपियन जीवन का खर्च अपने ऊपर ले लिया होता था । चंगे होने पर मुझे निष्कंटक रूप से घर लौटने के आगया दी होती तो इस उदारता में कुछ मानवीय होता । मुझे श्री देशबंधु की याद आ रही है । मुझे नवयुवक मुठा कहते थे क्योंकि मुझे उनको एक निराशा से दिखाई देती थी । एक दृष्टि से मैं निराशावादी हूँ क्योंकि मैं बुरे बुरे परिणाम की कल्पना करता हूँ । सरकार की सुधारता को अस्वीकार करने का भीषण से भीषण परिणाम सोचने का मैंने प्रयत्न किया है । लेकिन मैं ये विश्वास नहीं करता कि स्वदेश में आजीवन निर्वासन जीवन पर्यन्त जेल जीवन से श्रेयस्कर है । स्वतंत्रता का मूल्य खजाना प्राप्त करने से पहले हमें व्यक्तिगत रूप से या सामूहिक रूप से अभी कितनी कुर्बानियां देनी है? ईश्वर को मैं धन्यवाद देता हूँ कि मुझे बडी शांति है और मैं प्रसन्नतापूर्वक किसी भी अग्नि परीक्षा का जिससे वो मुझे जाना चाहिए, सामना करने के लिए उद्यत होगा । मैं तो ये सोचता हूँ कि मैं भारत के विगत पापों का एक छोटे से रूप में प्रायश्चित कर रहा हूँ और इसी प्रायश्चित से मुझे आनंद मिल रहा है । यह सकती है कि हमारे विचार मार नहीं सकते । हमारे आदर्श राष्ट्र की स्मृति पटल सीमित नहीं सकते और भावी संतान उन चीज संचित स्वप्नों के अधिकारी होगी । बस यही विश्वास मुझे अग्नि परीक्षा में सदा विजयी बनाएगा । रुपया पत्रों, तार शीघ्र दीजिए आपका परम सनी सुभाष । इसके कुछ ही दिन बाद सुभाष की रिहाई के संबंध में एक सरकारी विज्ञप्ति प्रसारित हुई । श्री सुभाष चंद्र बोस की चिंताजनक व्यवस्था का समाचार पाकर ये उचित समझा गया था कि उन्हें अल्मोडा जेल भेज दिया जाएगा । केंद्र उनकी दूसरी डॉक्टरी परीक्षा से क्या हुआ की उनकी दशा अत्यंत गंभीर है । अच्छा अब बंगाल सरकार ने यह निर्णय किया है कि उन्हें रिहा कर दिया जाएगा, ताकि वे बिना किसी प्रतिबंध के जहाँ चाहे अपना इलाज करा सके । सुभाष के भाई श्री शरद चंद्र बोस को सुभाष की रिहाई से संबंधित जब ये तार मिला, वे तुरंत ही सुभाष को लेने के लिए मांडली जिला पहुंचे । सुभाष नहीं, हमें बोर हो कर कई छडों तक भाई की गले से चिपके रहे । शरद चंद्र संतप्त हृदय और शुभ दृष्टि से भाई के छह निकाय शरीर और कांतिहीन मुखाकृति को निहारते रहे गए । जेल से बाहर आते ही सुभाष ने देशवासियों के नाम संदेश प्रसारित करते हुए कहा क्योंकि अब मैं फिर अपने घर पहुंच गया हूँ । मैं समझता हूँ कि मेरा पहला कर्तव्य ये है कि मैं अपना कार्य फिर से आरंभ करने के लिए अपना स्वास्थ्य सुधार जेल में इतने दिनों रहने के कारण मुझे अपने सह बंदियों की आज रात दिन सताएगी । मैं आशा करता हूँ की मेरे देशवासी यही कामना करेंगे कि मैं शीघ्र स्वस्थ हो जाऊँ ताकि हम सब मिलकर दिलोजान से उस दिए की प्राप्ति के लिए लग जाए जो हमारे है ना मैं छुपा है उनके मुक्ति समाचार से संपूर्ण भारत में हर्ष और उत्साह की लहर दौड गई । स्थान स्थान पर मुक्ति सभाओं का आयोजन हुआ और लोकप्रिय नेता की स्वास्थ्य के लिए मंगलकामनाएं की गई । उन के दर्शनार्थ घर के समक्ष दर्शनार्थियों का मेला लग गया । केंद्र डॉक्टरों की विज्ञप्ति के अनुसार उस समय उनके विश्राम में किसी प्रकार का व्यवधान उनके स्वास्थ्य के लिए उचित था । इस सूचना पर दर्शन में फल जनता केवल गगनभेदी नारों से आपने हेडन आय का स्वागत अभिनंदन करती रही । दूर बहुत दूर तक जैसे कहा की प्रतिध्वनि गूंजती रही । नेताजी जिंदाबाद, नेताजी अमर रहे, नेताजी चिरंजीवी हो, इन्कलाब जिंदाबाद

19. Bideshi Bastra Bahiskar

विदेशी वस्त्र बहिष्कार अभी सुभाष के स्वास्थ्य में थोडा ही सुधार हो पाया था कि वे पुनः अपने तूफानी कार्यक्रम में जुड गए । उनके असाधारण कार्यशक्ति और जोश को देखकर सभी चकित थे । उनके स्वास्थ्य लाभ के मूल में उनकी आत्मशक्ति का ही हाथ था । इस संबंध में दैनिक पत्र ने बडी उत्साह वर्धन विज्ञप्ति प्रकाशित की । गरम दल वालों के नौजवान नेता श्री सुभाष चंद्र बोस जो पिछले वर्ष बीमारी के कारण मुक्त कर दिए गए थे, अपनी अदम्य मन शक्ति से पुनः स्वस्थ होकर कर्म क्षेत्र में उतर आए हैं । उनकी प्रभाव और कार्यक्षमता से ऐसा लगता है कि कहीं में महात्मा गांधी की जगह ना ले ले । पटना की एक विराट सभा में बोलते हुए सुभाष में देश की वर्तमान राजनीति गतिविधियों पर व्यापक प्रकाश डाला और बडी दृढता के साथ कहा देश की वर्तमान स्थिति में हमें बीमार होने का समय नहीं है । जैसे ही सुभाष पटना से लौटे विदेशी वस्त्र बहिष्कार के आयोजना पर विचार विमर्श के लिए मृदुला उन्हें अपनी प्रतीक्षा करते हुए मिले । वे घडी भर विश्राम भी ना कर पाए और इस आयोजन पर विचार विनिमय करने बैठ गए तो अपने आंदोलन को तुम लोगों ने किस प्रकार क्रियान्वित करने का निश्चय किया है । सुभाष नहीं मृदुल से पूछा ये देखे हैं बिजलानी एक लंबी कार्यसूची उनके समक्ष प्रस्तुत करते हुए कहना, क्या हमने अपना संगठन कार्य प्रायः अपूर्ण कर लिया है? हजारों की संख्या में महिलाएं हमारे अभियान में सम्मिलित हो गई है । विदेशी वस्त्र बहिष्कार के लगभग पचास हजार पर्चे नगर की कोने कोने में बांट दिए गए हैं । महिलाओं की टोलियां विभिन्न स्थलों का दौरा करती हुई लोगों को विदेशी वस्त्र बहिष्कार के लिए प्रेरित प्रोत्साहित कर रही है । लोगों पर हमारे संगठन के कार्य की बडी सकारात्मक प्रतिक्रिया हुई है । सुभाषा हमारा ये अभियान शीघ्र ही विराट प्रदर्शन करने वाला है । हम लोग आपकी प्रतीक्षा कर रहे थे । ये बताइए कि इस अभियान को अंतिम रूप किस प्रकार दिया । जैसे भाजपा कुछ दिनों तक सुभाष मृदला द्वारा प्रस्तुत की गई कार्यसूची का निरक्षण करते रहेंगे । फिर से एक और रखकर बोले मेरे विचार से महिलाओं को बहुत सामूहिक जुलूस नगर के मुख्य मुख्य सडकों से होता हुआ किसी विशाल पार्क में एकत्रित होना चाहिए । वही पर विदेशी वस्त्र बहिष्कार करने और स्वदेशी वस्त्र धारण करने की नीति तथा उन के उपयोग पर सामूहिक विचार प्रदर्शन होना चाहिए । तत्पश्चात ब्रिटिश सरकार पर अपना विरोध प्रकट करने के लिए विदेशी वस्त्रों की होली चलानी चाहिए तो तम अति उत्तम से भाजपा मृदुला प्रसन्नता से उछल पडी । सुभाष के सुझाव के अनुसार विदेशी वस्त्र बहिष्कार संगठन द्वारा जुलूस का आयोजन करने चली गई । वो कितनी लोमहर्षक घडी थी जब दस हजार महिलाओं का मीलो लंबा जुलूस पूर्ण जोश के साथ नगर के प्रमुख सडकों से गुजरता हुआ श्रद्धानंद पार्क की ओर बढ रहा था । इस विशाल जुलूस का नेतृत्व मृदला कर रही थी । उस समय नारी का मधुर कंठ माधुर्य, ओज और गर्जन का सम्मिलित उद्घोष बन गया । इस जुलूस के प्रदर्शन और नारू से प्रभावित हो गए हजारों लोगों ने अपने विदेशी वस्त्र चलाने के लिए सौंप दिए । कलकत्ता में महिलाओं का इतना विशाल और भव्य प्रदर्शन पहले कभी नहीं हुआ था । लोग अचंभित और संबित से इस विराट प्रदर्शन को देख रहे थे । श्रद्धानंद पार्क में आकर जुलूस ठहरा गया । सवानी थ्री मृदुल बनर्जी ने मंच पर आकर अत्यंत ओजपूर्ण स्वर में अपना वक्तव्य आरंभ किया । माताओं और बहनों आज का यह दिन और विशेष रूप से ये घडी भारत की स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास की वह अभूतपूर्व घडी है जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी । क्योंकि आदिकाल से घर की चारदीवारी में कैद रहने की परंपरा की कारण आज तक महिलाओं का इतना बडा संगठन समूह कभी भी खुले मैदान में एकत्रित नहीं हो सका । आज हम जिस उद्देश्य से यहाँ एकत्रित हुए हैं उसकी मूल में केवल विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार ही नहीं है बल्कि संपूर्ण ब्रिटिश साम्राज्य का ही बहिष्कार नहीं है । जैसा की आपको पहले से ज्ञात है कि हमने विदेशी वस्त्रों की होली जलाने का और उसका सदेव के लिए उपयोग न करने का संकल्प लिया है । ये संकल्प इसलिए किन वस्त्रों की ग्रहण करने की मोह में हम अपना बहुत सा धन विदेशों को सौंपते जा रहे हैं और स्वयं धनहीन होते जा रहे हैं । ये अंग्रेज हमें केवल शासन सत्ता का ही गुलाम नहीं बना रहे हैं वरन हमें अपनी सभ्यता, संस्कृति और अपने विचारों की पराधीनता में भी जकड रहे हैं । हमें केवल इनकी नीतियों राजनैतिक चालू का ही विरोध नहीं करना है बल्कि इनके द्वारा ला दी जा रही पांच शाती संस्कृति और सब पिता का भी पूर्णरूपेण बहिष्कार करना है । मेरा आप सभी से विनम्र अनुरोध है कि विदेशी वस्त्र का उपयोग करना से देवकी लेते आते हैं और अपने देश में बने खादी के वस्त्र का उपयोग में लाएं । आई हम सभी इसी बात का संकल्प करेगी । आज से हम विदेशी वस्त्र का उपयोग नहीं करेंगे और दस हजार महिलाओं ने एक स्वर में इस महान संकल्प को दोहराया तथा हर्षनाथ तथा करतल ध्वनि के साथ अपनी दृढता और विश्वास को प्रकट किया । कुछ दिनों बाद विदेशी वस्त्रों के पहाड में आपकी भीषण लपटें जमा थी । स्वाहा, विदेशी वस्त्र स्वाहा जहन । इसके महाप्रसाद ही सुभाष के नेतृत्व में महिलाओं ने स्वयं सूत कातकर खद्दर भेजा । सुभाष की अदम्य कार्यशीलता और पूर्व क्षमता ने बहुत जल्द राष्ट्रीय शक्ति को जगह दिया ।

20. Congress Ke 46be Adhibeshan Tak

कांग्रेस की छियालीस अधिवेशन तक सुभाष छठी महाराष्ट्र प्रांतीय कॉन्फ्रेंस के सभापति निर्वाचित किए गए । अध्यक्ष पद से इस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने जो वक्तव्य दिया वो उनकी गहन अध्ययन, अतुलनीय देश, प्रेम तथा कदम में उत्साह का अविस्मरणीय परिचायक है । सुभाष ने कहा, स्वतंत्रता ही मेरे जीवन का लक्ष्य है और मेरी दृष्टि में वो एक अमूल्य वस्तु हैं, जैसे ऑक्सिजन फेफडों के लिए आवश्यक है, उसी प्रकार स्वतंत्रता भी मानव जीवन के लिए आवश्यक है । तभी तो स्वामी विवेकानंद ने कहा था स्वतंत्रता आत्मा का संगीत है । आज दादी ही सच्चा अमृत है । हमारी सब दुर्बलताओं की अच्छी औषधि स्वराज हैं और स्वास्थ्य के लिए हमारी योग्यताओं की कसौटी हमारी आजादी की प्रबल आकांक्षा ही है । इस सारगर्भित वक्तव्य के दो सप्ताह बाद ही सुभाष ने बम्बई के ऑपरा हाउस में भारत की राजनीतिक परिस्थिति, सभ्यता, संस्कृति एवं युवकों की चरित्र आदर्श पर प्रकाश डालते हुए कहा, नवयुवकों की जीवन का ये आदर्श होना चाहिए कि मानव समाज तथा अपने लिए एक नए संसार का निर्माण करें । नौजवानों द्वारा संचालित प्रत्येक आंदोलन को मैं नौजवान आंदोलन नहीं कह सकता । नौजवान आंदोलन वो आंदोलन है जिसका जन्म आंतरिक जागृति से हुआ हूँ और जिसकी रूपरेखा में समाज का भावी चित्रांकित हो । नवयुवकों का जीवन भी ये होना चाहिए कि पहले में अपनी आंतरिक स्वयं की अनुमति प्राप्त कर ले । उसके बाद में अपने अनुभव को सामाजिक तथा राष्ट्रीय जीवन में रूपांतरित करें । युवकों का कर्तव्य है कि वे अपनी चारों ओर की स्थिति देखकर राष्ट्र निर्माण का कार्य अपने हाथों में ले । आज भारत के सामने दो महत्वपूर्ण प्रश्न है पहला राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक स्वाधीनता प्राप्त करना और दूसरा सभ्यता के निर्माण में सहयोग प्रदान करना । पर नवनिर्माण के इस कार्य में भारत तभी सहयोग दे सकता है, जब वह पूर्ण रूप से स्वतंत्र हो । भारतीय सभ्यता में हिन्दू मुस्लिम संस्कृतियाँ घुल मिल गई है । मैं तो ये कहता हूँ कि मुगल शासक यदि केवल ताज हमारे लिए छोड गए होते तो भी हम उनकी कृतज्ञ ही रहते और ब्रिटिश सरकार को देखिए, हमारे लिए क्या छोड जाएगी? सिर्फ जेल की तन्हाइयां तथा भीषण कोठरियों के सिवा कुछ भी नहीं । कलकत्ता आने के साथ ही सुभाष कांग्रेस के प्रियाली अधिवेशन की तैयारी में जुट गए । स्वराज पार्टी के प्रधान होने के नाते इस अधिवेशन को भव्य और अभूतपूर्व बनाने का संपूर्ण उत्तरदायित्व सुभाष के कंधों पर था । जब कलकत्ता कांग्रेस के सभापति का जुलूस निकला तो दो हजार स्वयंसेवक एक ढंग की सैनिक वर्दी पहने पचास घुडसवारों और दो सौ साइकिल सवार आगे आगे थे । सभापति पंडित मोतीलाल नेहरू छत्तीस सफेद घोडो की शानदार बग्गी में विराजमान थे । दो हजार स्वराज्य सैनिकों के साथ चार पांच लाख की भीड थी । शायद ही हिंदुस्तान भर में कहीं हूँ और कभी किसी राजा महाराजा या गवर्नर का ऐसा जुलूस निकला हुआ सर्वप्रथम सभापति को स्टेशन पर ही एक सौ एक बंदूकों की सलामी दी गई । जुलूस की सबसे आगे जो सैंक्च्यूरी चल रही थी उसका नेतृत्व सेनापति सुभाष कर रही थी । खद्दर की फौजी वर्दी में उनका व्यक्तित्व अत्यंत आकर्षक और प्रभावशाली देख रहा था । उनके मुख प्रतिदिन आत्मविश्वास और विजयी सूरमाओं का आत्मसंतोष लग रहा था । पंडित मोतीलाल नेहरू द्वारा कांग्रेस का ध्वजारोहण अत्यंत लोमहर्षक ढंग से हुआ । झंडा स्थान पर गडा हुआ था । वहाँ टिकट द्वारा ही लोगों को जाने किया गया थी किंतु अपार भीड ने सुरक्षा घेरे को तोड डाला । सभापति झंडी के रंग की तिरंगी सुसज्जित गाडी में आए और उनका स्वागत करते हुए सुभाष उनको झंडे के पास ले गए । पंडित मोतीलाल नेहरू ने झंडे का वंदे मातरम जयघोष से अभिवादन किया । इसके पश्चात सेनापति की आज्ञा पर स्वयंसेवक झंडी के नीचे सभापति की ओर मार्च करते हुए आए । बारी बारी से सेनापति ने सभापति को सेनानायकों का परिचय दिया । तत्पश्चात बिगुल बजाकर स्वयंसेवकों को संदेश देने की प्रार्थना । अपनी छोटी से वक्तव्य में पंडित मोतीलाल नेहरू ने कहा स्वराज सेना के सैनिकों में ही भारत की भावी सेना बनना है । अपनी नस नस में, पर उसका संचार करो । वृद्ध होते हुए भी मैं कर्तव्य पद से डिगने वाला नहीं । मुझे आशा है कि तुम भी कर्तव्यपथ पर डटे होगी । उसके बाद सुभाष की कार्यनिष्ठा नायकत्व, देश प्रेम, दृडता, लगन, उच्च चरित्र की प्रशंसा करते हुए पंडित मोतीलाल नेहरू ने गद्गद कंठ से कहा सुभाष चंद्र बोस मुझे अपने बेटे की तरह प्रिय हैं ।

21. Ek Path Onek Kaj

एक पंथ अनेक काज कलकत्ता कांग्रेस के अधिवेशन में महात्मा गांधी ने औपनिवेशिक स्वराज्य का प्रस्ताव पेश किया । इस प्रसाद के साथ करती थी कि यदि सरकार ने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया तो कांग्रेस अहिंसात्मक असहयोग आंदोलन प्रारंभ कर देगी । स्वतंत्रता संघ वाले इस प्रस्ताव से सहमत नहीं थे । फरीदाबाद पंडित जवाहरलाल नेहरू एवं सुभाष चंद्र बोस ने इसमें संशोधन करने का सुझाव रखा । अंत में काफी वाद विवाद के बाद स्वतंत्रता संघ के सदस्यों एवं विषय समिति के सदस्यों में समझौता हो गया । इस संशोधन पर सुभाष ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी मुझे दुख है कि मैं महात्मा गांधी के प्रस्ताव के विरुद्ध बोल रहा हूँ । लेकिन ये संशोधन इस बात का परिचायक है कि कांग्रेस की पुराने व नए विचारों में कुछ सैद्धांतिक अंतर है । कांग्रेस ने जो मूल प्रस्ताव रखा है उसके द्वारा तो हम आगे नहीं बढते बल्कि पीछे हटते हैं । हम अपने झंडे को एक दिन के लिए भी चुकाने को तैयार नहीं हैं । हम यहाँ जीते अथवा हारे इसकी देश के नवयुवकों को चिंता नहीं है । उन्होंने तो हिंदुस्तान को आजाद कराने का बीडा उठा लिया है । यदि कांग्रेस ने इस समय देश का साहसपूर्ण नेतृत्व नहीं किया तो नए संगठन शीघ्रता से इस कार्य को अपने हाथ में ले लेंगे । इन संगठनों में देश के सभी उत्साही तथा शक्तिशाली कार्यकर्ता चले जाएंगे और इस दशा में कांग्रेस की वही स्थिति हो जाएगी जो लिबरल पार्टी की ग्रेट ब्रिटेन में हुई । इस संशोधन के लिए मेरे पास एक जबर्दस्त प्रमाण है और वह प्रमाण है अंतरराष्ट्रीय परिस्थिति का । मुझे डर है कि यदि मूल प्रस्ताव पास हो गया तो हमने विदेशों में जो आत्म सम्मान प्राप्त किया है, उसे खोलेंगे । आपको मालूम ही है कि इन चंद महीनों में सरकार का क्या रवैया रहा है । लाला लाजपत राय की चिता को मुझे अभी अधिकतर नहीं हुए । कानपुर तथा लखनऊ में क्या घटनाएं हुई वो हमारी आंखों के सामने हैं । वाइसरॉय का भाषण में हम लोगों को मालूम ही हैं । यदि अब भी हम ने कदम नहीं बढाया तो कब बढाएंगे? अब सरकार को एक साल का समय देना चाहते हैं । क्या आप अपने सीने पर हाथ रखकर कह सकते हैं? एक वर्ष के अंदर औपनिवेशिक स्वराज्य मिल जाएगा? हमारे माननीय सभापति पंडित मोतीलाल नेहरू ने कहा है कि उनको सरकार की बात पर विश्वास नहीं है । मेरी समझ में नहीं आता कि एक साल के लिए हम अपने झंडे को क्यों चुका । एक आप क्या कहते हैं? आप ये कहते हैं कि हमें इस पूर्ण स्वतंत्रता के प्रस्ताव को पास कर कर क्या मिलता है? लेकिन मैं कहूंगा की बहुत मिलता है । हम एक नई मानसिक प्रवृत्ति को ग्रहण करते हैं और हमें चाहिए ही क्या? हमारी पराधीनता का कारण तो हमारी गुलामी मनोवृत्ति ही है । यदि इस प्रवृत्ति को हटाना है तो अपने देशवासियों में हमें गुलाम मनोवृत्ति के स्थान पर पूर्ण स्वतंत्रता की प्रेरणा उत्पन्न करनी होगी । इस प्रस्ताव को पास कर हम हाथ जोड नहीं बढ जाएंगे । अपना ही कार्यक्रम बनाकर जहाँ तक हमसे बनेगा, इसको कार्यान्वित करने का प्रयत्न करेंगे । एक दूसरा कारण मेरी आंखों के सामने हैं । विश्व की राजनीति में एक महान उथल पुथल हो रही है और दुनिया एक दूसरे महायुद्ध की ओर बढती जा रही है । यदि हिंदुस्तान को इस महायुद्ध के पहले ही हमें जग रहा है तो बिना किसी देर देशवासियों में पूर्ण स्वतंत्रता की भावना पैदा करनी होगी । ये तभी हो सकता है जब हम अपने उद्देश्य को स्पष्ट शब्दों में घोषित कर दे । अंत में वहाँ से यही अपील करूंगा कि संशोधन को स्वीकार कर लिया जाए । इसका ये अर्थ कदापि नहीं है कि इससे पुराने नेताओं के सम्मान में कुछ कमी आएगी । श्रद्धा, आदर और प्रेम एक चीज है और सिद्धांत दूसरी । कितनी बार हमारे नेताओं ने स्वयं कहा है कि वे नवयुवकों को सारा भार सौंपने को तैयार है । इसलिए मैं समझता हूँ कि संशोधन को स्वीकार करने से उनकी भावनाओं को किसी भी प्रकार की इस नहीं पहुंचती । इन सब के साथ सुभाष ने अपना व्यक्तव्य समाप्त किया । श्री सत्यमूर्ति ने संशोधन का समर्थन किया । अंत में जब मत लिए गए तो सुभाष के संशोधन के पक्ष में नौ सौ तिहत्तर और महात्मा जी के प्रस्ताव के पक्ष में तेरह सौ पचास बताया । इसे यहाँ व्यतीत होता है की यदि मूल प्रस्ताव के समर्थन के पीछे महात्मा गांधी के व्यक्तित्व का प्रभाव ना होता तो सुभाष बाबू का प्रस्ताव पास हो गया होता । अथक परिश्रम, शीलता, अद्भुत कार्यशक्ति और निरंतर कर्मण्यता सुभाष के व्यक्तित्व के सर्वोपरि कौन थे? शायद ही उनके जीवन में ऐसा समय आया हो जब विचार भावनाओं और कार्यक्रमों से रख रहे हो । स्वराजजी तो उनका चरम लक्ष्य था ही, साथ ही देश और समाज की विभिन्न समस्याओं, संस्थाओं और उनके कार्यकर्ताओं में भी गहरी दिलचस्पी रखते थे । बंगाल के युवक आंदोलन के संगठनकर्ता के रूप में उनकी ख्याति बढ रही थी । भारत भर के विद्यार्थियों और नवयुवकों की हृदय सम्राट थे । बंगाल में जब विद्यार्थी कॉन्फ्रेंस हुई, तब सुभाष ने विद्यार्थियों को किसान मजदूरों में राष्ट्रीय चेतना भरने के लिए प्रेरित किया । अखिल भारतीय नौजवान सभा का तृतीय अधिवेशन कलकत्ता में संपन्न हुआ तो सुभाष स्वागत कार्याणि समिति के अध्यक्ष निर्वाचित किए गए । उन्होंने इस अधिवेशन को कांग्रेस अधिवेशन की भर्ती ही प्रभावशाली बनाने में अथक परिश्रम किया । इसके पश्चात जब कराची में अखिल भारतीय नौजवान सभा का शानदार अधिवेशन संपन्न हुआ तो सुभाष इसके सभापति निर्वाचित हुए । जैसे ही सुभाष ने सभापति के आसन को घोषित किया, पंडाल में उपस्थित विशाल जनसमूह के गगनभेदी स्वर में नारे लगाए क्रांतिवीर चिरंजीवी हो, नेता जी अमर रहे । इस अधिवेशन में देश के गणमान्य राष्ट्रनायक बसते थे । सभापति पद से सुभाष ने ओजस्वी भाषण दिया मेरे नौजवान दोस्तो, आपने इस महान अवसर मुझे आमंत्रित कर उत्तरदायित्वपूर्ण पद और सम्मान प्रदान किया है । उसके लिए मैं आप लोगों का है जैसे आभारी हूँ । मैं चाहूंगा कि इस अवसर पर मैं आपके समक्ष आपके पवन देशों और उनकी सफलता के संबंध में कुछ करूँ । मेरे विचार से हम लोगों को सामाजिक तथा आर्थिक ढांचे की ओर जिस पर दुनिया की शांति तथा समृद्धि अवलंबित है एवं चरित्र को बढाने के साथ साथ मानव की एकता की भी रक्षा करती है । ध्यान देना चाहिए हमें ये सोचने की आवश्यकता है कि किन उपायों के द्वारा हम इस पवित्र लक्ष्य की प्राप्ति शीघ्र कर सकते हैं । मैं तो इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ । यह संसाधन न्याय, समानता, स्वतंत्रता, अनुशासन तथा प्रेम हैं । इसलिए समानता की रक्षा करने के लिए सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक सभी बंदरों को तोड डाला होगा । जब तक हम उग्रवादी अथवा क्रांतिकारी तत्वों को जगह नहीं देते तब तक ना तो देश में जागृति हो सकती है और न ही स्वतंत्रता मिल सकती है । हम इन तत्वों को तभी जागृत कर सकते हैं जब हम उन्हें ये संदेश दे जो हृदय से निकलता है और ठीक हृदय में ही प्रवेश करता है । कांग्रेस के कार्यक्रम में प्रधान तृतीये हैं कि नेताओं के दिमाग में एक प्रकार की अस्पष्टता है और ये आपने कुछ विचारों को छिपाए रखते हैं । उनके कार्यक्रम का आधार अगर गाना मिता नहीं बल्कि समझौता है । वे जमींदार तथा किसान में मील मालिक तथा मजदूर में पुरुषों तथा स्त्रियों में समझौता करना चाहते हैं । मैं विश्वास नहीं करता कि कांग्रेस के वर्तमान कार्यक्रम से देश को आजादी मिल जाएगी । भगत सिंह उस भावना का प्रतिरूप था जो देश के एक छोर से दूसरे छोर तक फैल चुकी है । ये भावना अच्छे है और इसमें जो ज्योति चलाई है वो कभी नहीं बुझेगी । आजादी हासिल करने के लिए अभी भारत माता को न जाने कितने लाल खोने पडेंगे । इन फांसियों से ये साफ जाहिर है कि सरकार का हृदय परिवर्तन नहीं हुआ है और इसलिए सुबह का वक्त अभी नहीं आया है । गांधी इरविन समझौते में सुबह की जो शर्तें तय हुई है उन के विषय में मैं कह सकता हूँ कि वे बहुत ही असंतोष पर तथा निराशाजनक है । सबसे बडा दुख तो इस बात का है कि जिस समय यह संधि हुई उस समय समझौते में नहीं । शक्ति के मुकाबले हम लोगों में अधिक ताकत थी । प्रश्न इस बात का है कि हम देश की मांग को किस प्रकार शक्तिशाली बनाए । इसके लिए मैंने एक कार्यक्रम आप लोगों के समक्ष प्रस्तुत किया है जिसको अग्रगामी दल वाले अपना सकते हैं । इस कार्यक्रम को अपनाकर आप कांग्रेस के नेताओं के साथ संभावित झगडों को मिटा सकते हैं । याद रखी है कि विश्व की समस्याओं के हल्का केंद्र भारत है और हिंदुस्तान की आजादी का अर्थ है संसार व्यापी, साम्राज्यवादी सत्ता की माँ । इसलिए आज सबसे बडी आवश्यकता है कि हम उठें और हिंदुस्तान को आजाद कर मानवता को बंधनमुक्त करें ।

22. Lahore Congress

लाहौर कांग्रेस लाहौर कांग्रेस के अधिवेशन में पंडित जवाहरलाल नेहरू को सभापति निर्वाचित किया गया । इस अधिवेशन में महात्मा गांधी की पूर्ण स्वाधीनता काउंसिल का बायकॉट किया गया । सत्याग्रह वाले प्रस्ताव पर सुभाष ने एक संशोधन पेश किया । कलकत्ता में कांग्रेस का जो पिछला अधिवेशन हुआ था, उसमें पास किए गए प्रस्ताव के अनुसार ये कांग्रेस अघोषित करती है कि कांग्रेस के धेर्य में स्वराज्य का अर्थपूर्ण स्वाधीनता है, जिसमें ब्रिटिश सरकार का पूर्ण विच्छेद सम्मिलित है । हिंदुस्तान में ब्रिटिश साम्राज्यवाद और उसके सहायकों का तख्ता पलटने और पूर्ण स्वाधीनता प्राप्त करने के लिए कांग्रेस तय करती है कि एक तरफ तो वर्तमान सरकार के मुकाबले में अपनी सरकार कायम करने के लिए जबरदस्त आंदोलन किया जाए और दूसरी ओर जब संभव हो वहाँ सत्याग्रह संग्राम, जिसमें कर यानी कि टैक्स ना देना शामिल है तथा आम हडतालों का सिलसिला शुरू किया जाए, अपने नए थे, के अनुसार कांग्रेस कार्यकर्ताओं को हिदायत करती है कि वे केंद्रीय प्रांतीय व्यवस्थापक सभाओं का सरकार द्वारा नियुक्त की गई कमेटियों का, लोकल बोर्ड का, पोर्ट ट्रस्ट का तथा अदालतों का बायकॉट करें । कौन लोग कमीटियों और बोर्डों के वर्तमान कांग्रेस सदस्य त्यागपत्र दीदी वह आगामी चुनाव में भागना लेंगे? कांग्रेस अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी को अधिकार देती है की ये ऊपर के कार्यक्रमों को पूरा करते हुए जो सीधी सामने आए उसका सामना करें । अंत में पंडित जवाहरलाल नेहरू के सभापतित्व में पूर्ण स्वाधीनता का प्रस्ताव पास हो गया । इस दृष्टि से पूर्ण स्वाधीनता आंदोलन की जाग्रति और दृढता प्रदान करने में सुभाष अग्रनी रहेगा । बंगाल के नवयुवकों में वे पूर्व से ही पूर्ण स्वाधीनता की सुदृढ भावना का विकास कर रहे थे ।

23. Rajdroha Ka Arop

राजद्रोह का आरोप सुभाष की तूफानी कार्यक्रमों ने सरकार का तख्ता हिला रखा था । ब्रिटिश सरकार की शीर्षस्थ शक्तियां उनसे बुरी तरह आतंकी थी । सरकार उनको खतरे की घंटी समझने लगी थी । सुभाष को खतरनाक व्यक्ति सिद्ध करने का प्रयास कर रही थी किंतु न्यायिक रूप से सुभाष को अपराधी करार कर बंदी बना लेने का उनके पास कोई कारण नहीं रहा । सुभाष की बढती हुई लोकप्रियता और सफलता की ओर अग्रसित उनकी ग्रान्धी चरण इस बात के दिनों तक थे कि वह समय दूर नहीं है जब सुभाष देश की क्रांति का एक छत्र अधिनायक तो ग्रहण कर लेंगे । इस आतंक से ब्रिटिश सरकार प्रकंपित थी । परिणामस्वरूप उसने देश के क्रांतिकारियों का दमन करने के लिए कुटील नीति, अपना सुभाष और उनके साथियों पर राजद्रोह का झूठा लांछन न्यायालय द्वारा सिद्ध कर उन्हें नौ महीने का कुछ ओर कारावास दंड सुना दिया गया । हाईकोर्ट ने इस संबंध में नाक की भूमिका निभाई । उसने शर्त के साथ सुभाष को रिहा करने की सहानुभूति दिखाई कि सुभाष और उनके साथ जमानत पर छोड दिए जाएंगे । परिंटन नौ महा तक में किसी भी राजनैतिक कार्यकलाप में भाग नहीं ले सकेंगे । इस निर्णय पर सुभाष ने कहा, मेरे लिए ये शर्त वैसे ही है । जैसे किसी व्यक्ति को जीने की छूट दी जाए, लेकिन सांस लेने की नहीं । मैं किसी भी राजनीतिक कार्यक्रम में भाग नहीं लूंगा । शर्त को मैं भी दस साल की सजा भी होती तो भी ठुकरा देता । सुभाष ने बडी निर्मिता से ऐसी ऊंची शर्त को छोडकर मार दी । कितना लोमहर्षक दृश्य था जब वे और उनके साथ ही जेल यात्रा के लिए प्रस्ताव कर रहे थे । इन्कलाब जिंदाबाद, क्रांतिवीर चिरंजीवी हो तथा नेता जी अमर रहेगा आदि के गगनभेदी जोशीले नारों से धरती आकाश पूछ रहा था । हजारों लोग अपने प्रिय नेता की जलयात्रा पर शुभकामनाएं और हर्षनाथ के रहे । नेताजी को वकीलों की ओर से पुष्प मालाएं पहनाई गई । इस संदर्भ में सभापति पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा बंगाल ने रास्ता दिखा दिया है । हमें बराबर आगे बढते जाना चाहिए । श्री सेनगुप्ता ने गद्गद कंठ से अपने हिंदी रोजगार व्यक्त की । सरकार हमारे शरीर को कैद कर सकती है, आत्मा को नहीं । जेल में सुभाष तथा उनके साथियों के साथ जो दुर्व्यवहार किए गए उसे जेल की दीवार भी कम होती । उन्होंने अलीपुर जेल में मछुआ बाजार के इसके कैदी भी गिरफ्तार थे । पुलिस अधिकारियों ने अकारण ही उन कैदियों को पीटना शुरू कर दिया । सुभाष ये निर्दयता देखी नहीं गई और उन्होंने इसका विरोध किया । पुलिस अधिकारियों ने फिर भी अपना अत्याचार बंद नहीं किया । सुभाष और उनके मित्रों का मूड बन करने के लिए उन्होंने उन्हीं पर प्रहार करना हम कर दिया । सुभाष को इस बेरहमी के साथ भेजा गया की जब तक बेहोश ना हो गए तब तक उन पर प्रहार होता रहा । वे तीन घंटे में हो रहे जीवन में पहला अवसर था जब सुभाष चंद्र बोस जैसे महान लोकनायक को इतनी क्रूर यातना दी गई । इस पैशाचिक दृश्य को देखकर कितने दुर्बल हृदय कैदी बेहोश हो गए जब नेताजी की चेतना लौटी, उन्होंने अपने सारे शरीर में घावर पीडा की गहरी अनुभूति कि वे कई दिनों तक जोर ग्रस्त रहे और उनका जो हर काम होने की बचाये पडता क्या जेल में उनके साथ वैसा ही साधारण कैदी सा व्यवहार होता रहा जैसा कि दुर्दांत अपराधी वर्ग कि कैदियों के साथ किया जाता है । सुभाष के लिए ये स्थिति अत्याधिक असंतोषजनक कष्टदायक थी और संतोष को उन्होंने अपने साथियों सहित आमरण अनशन के रूप में प्रकट किया । इस बर्बरतापूर्ण घटना की सूचना जेल की चारदीवारियों से बाहर जब जनसाधारण में पहुंची तो समग्र देश में विद्रोह के शोले भडक उठी । बंगाल काउंसिल में संबंध में प्रश्न पूछे गए और कहा गया कि एक सार्वजनिक जांच कमेटी बनाकर इस घटना की अघोषित जांच करानी जानी चाहिए । केंद्र इस प्रस्ताव को ये कहकर डाल दिया गया की जेल में सुभाष तथा उनके साथियों ने अनुशासन भंग किया था । अतः जांच की कोई आवश्यकता नहीं । सुभाष की अवस्था दिनोंदिन बिगड रही थी और उनका शरीर जीर्णशीर्ण हो रहा था । अत्यधिक दयनीय स्थिति में और है । कुछ दिनों पश्चात जेल से बिना किसी शर्त के मुक्त कर दिया गया । शुभचिंतको द्वारा सुभाष धर लाए गए जेल से छूटने के पूर्व ही सुभाष कलकत्ता कॉर्पोरेशन के मेयर निर्वाचित कर लिए । घर आने पर अवस्था की स्थिति होते हुए भी उन्होंने कलकत्ता कॉर्पोरेशन की बागडोर संभाली । मेयर के रूप में सुभाष निकल कर तक ऑपरेशन में जो महत्वपूर्ण भूमिका अदा की अविस्मरणीय जिसे राष्ट्रीय झंडे के संबंध में सत्याग्रह के दिनों अनेक योद्धाओं ने प्राणों की आहुति दे डाली । उस राष्ट्रीय झंडे को सर्वप्रथम सुभाष बाबू ने कलकत्ता कॉर्पोरेशन के भवन परपंरा प्लाइट्स पुलिस भाजपा के इस साहस पर चौक पर केंद्र वह कर भी क्या सकती थी, कॉरपोरेशन पर जो स्वराज पार्टी का राज था

24. Rashtriya Mahadibas

राष्ट्रीय महाधिवक्ता चार हो भीड भी कोयला उत्साह और हर चना किस पर है आजादी अधिकार हमारा क्रांति चिरंजीवी हो नेता जी अमर रहे इन्कलाब जिंदाबाद, फॅमिली नारों से धरती आकाश प्रकंपित जुलूस के सबसे आगे राष्ट्रीय महिला संघ की लगभग पांच सदस्य की टोली चल रही हैं । प्रत्येक के हाथ में राष्ट्रीय बच हैं । स्टोरी का नेतृत्व मृदुला कर रही है । वो कितनी ओजपूर्ण स्वर में ललकार भरी राष्ट्रीय गीत की पंक्तियां गा रही है और डोली के अन्य सदस्याें उन पंक्तियों को दोहरा रही है कदम कदम बढाए जा खुशी के गीत है ये जिंदगी है क्योंकि तू कॉम पे लुटाए जहाँ कदम कदम बढाए महिलाओं की स्टोरी के पीछे ही राष्ट्रीय स्वयं सेवकों का जुलूस हैं आगे बढते हुए उनके स्वर में भी ऐसा ही प्रेरणादायक, एक अन्य की देश हमारा धरती अपनी हम धरती के लाल मैं संसार बनाएंगे, नया इंसान बनाए, बडा ही अद्भुत दृश्य । तब मीलों सडक पर सिर ही सिर दिखाई दे रहे हैं । दूर दूर तक सिर्फ आजादी के दीवानों की भी थी । कुछ पुलिस अधिकारी और सशस्त्र सिपाही इस जुलूस के साथ चल रहे थे किन्तु उनका दिए इस जुलूस की रक्षा करना नहीं बल्कि मौका मिलते ही दमन का पहले ऍम भवन के सामने प्रदर्शन किया । जैसे ही सुभाष भवन के बाहर आए उन्हें कुछ तो महिलाओं ने सिर्फ तक सब दिया । सैकडों शंखों के तमिलनाडु के बीच बन्दे मातरम के गगनभेदी जयघोष के साथ जुलूस आगे बढेगा । पुलिस अधिकारियों को आशंका थी की आजादी के दीवानों का ये विशाल आयोजन उनके लिए कडी चुनौती है । उन्होंने अपनी लाख या संभाली और ऐसा अवसर ढूँढने लगे जो इस विराट आयोजन को छिन्न भिन्न कर सके । जुलूस आगे बढता रहा और सर्वप्रथम महिलाओं की टोली डाक्टर लोनी मान मेन पर पहुंच के राष्ट्रीय ध्वज फहराने को तक पर तो तभी सिपाहियों ने जो न्यूज पर लाठी वर्षारंभ कर और पुलिस तथा प्रदर्शनकारियों के बीच तनातनी और मारपीट का वातावरण ऊपर हो गया । कुछ पुलिस अधिकारी लाॅकर सुभाष की और बढिया महिलाओं की टोली ने इस रोमांच भरे दृश्य को देखा तो तुरंत ही सुभाष की रक्षा के लिए पीछे की ओर इसके पूर्व की पुलिस भाजपा अपनी लाठियों से आहत कर सके । महिलाओं की टोली ने उन्हें घेरकर रक्षित करने का प्रयास किया । फॅस अपनी रक्षा कर सुभाष का उच्च कांदा स्वर्ग पंजाब पुलिस की लाठियां उन निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर बरसने लगी । जुलूस छिन्न भिन्न होने लगा । मिलने से भाजपा अपने शरीर से रखना चाहते ऍम एक मजिस्ट्रेट करोड से चलना है मैं दिलाने बढकर आठ नहीं है दृष्टि से उसकी ओर देखा लाठिया बस्ती रही इंटर मृदुल और उसकी सहयोगी महिलाओं ने सुभाष की सुरक्षा का घेरा नहीं थोडा फिर भी सुभाष के शरीर पर जहाँ तहाँ प्रहार होते रहे एक निर्दलीय से पार्टी ने सुभाष के सिर का निशाना साधकर लाख चला महिला उसके बार को तार गई और सुभाष को बचाने के लिए लाठी का भरपूर वार अपने सर पर एक दर्दनाक चीज के साथ वो गिर पडी । उनका फव्वारा फूट पडा श्वेत परिधान ताजी लोगों से रंग गया और जैसे ही सुभाष ने उसे बाहों में उठाया उसकी गर्दन मृतक की फांसी छूट गया मैं दिलाने दर्दीली करा किसान ताकि खोली तो अपने समक्ष पथ प्रदर्शक को पस्थित देखकर उसके रक्तरंजित मुखडे पर गर्व कि मुस्कान देर की स्थान आप सिर्फ भाई था । हर्षातिरेक में वो इतना ही कैसे की और उसकी आंखों में प्रसन्नता की ऐसा कुछ अलग आए फॅमिली से अपने आराध्य को निहारती रही । हाँ वे सुभाष ही थे जिनके शहर बाहों पर पटिया बंदी हुई थी जो पुलिस की निगरानी के बीच अस्पताल में मृदला को देखने आए थे । बडी कोशिशों के बाद उन्हें पुलिस के निरीक्षण में मृदुल को देखने की छूट दी गई थी । हम रिजिला मुझे खेद है कि तुम्हें मेरी प्राणरक्षा के लिए अपने ही जीवन को दांव पर लगा दिया । सुभाष ने आभार पूर्णेश्वर में कहा मैंने यदि आप के लिए इस देश की हजारों महिलाएं भी अपने प्राणों को दांव पर लगा दी तो कम है । सुभाष का काश में अपना बलिदान करके भी आपको पुलिस के पैशाचिक व्यवहार से बचा सकती होती हैं । सुभाष ही नहीं, अनेक क्रांतिकारी इस महान राष्ट्रीय पर्व पर आहत हुए और उन्हें जेल की कोठरियों में ठूस दिया गया । इस निर्मम व्यवहार से जानता और काउंसिल में गहरा असंतोष और विद्रोह बना था । बंगाल काउंसिल में मौलवी जलालुद्दीन हाशमी ने इस विषय पर थी की आलोचना करते हुए कहा, राष्ट्रीय महोत्सव के दिन राष्ट्रीय स्वयं सेवक और सुभाष बाबू के प्रति जो दुर्व्यवहार किया गया है, शर्मनाक घटना को कभी बुलाया नहीं जा सकता है । मैं किसी भी उच्च अधिकारी को इसका तरदायी कैसे कहूं? सरकार तो खत्म हो चुकी है और जो सरकार इस समय काम कर रही है वह सर्च आॅर्ट की सरकार है । अब पुलिस राज और लाठी राज है । मैं तो यही कहूंगा की लॉन ऍम जैसे निर अपराधियों की घृणित हत्याओं का कारण प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप में सर्च ऍफ ही है । उस दिन क्या हुआ? हाँ पागल कुत्ते की तरह कितना ही पुलिस वाले सुभाष बहुत के ऊपर टूट पडे । ये सरकारी कार्यवाही पहले से ही खूब सोच समझकर स्वेच्छापूर्वक की गई थी । मैं जानना चाहता हूँ कि जब सारे हिंदुस्तान स्वतंत्रता दिवस शांति से मनाया गया तो चालीस टैगार्ट ये नीति क्यों अपनाई? इसका तो एक ही मतलब समझ में आता है कि सरकार बंगाल का आपने पशुबल से जीतना चाहती है किन्तु काउंसिल के प्रतिरोधों का ब्रिटिश सरकार पर कोई प्रभाव ना बढा और सुभाष बाबू को छह माह का कारावास सुना दिया गया । उनके शरीर में इतनी छोटी थी कि जेल में रखना उनकी जीवन के लिए घातक था, आता था । एक ही सप्ताह के बाद किसी शर्त के बिना उन्हें रिहा कर दिया गया । जेल से छूटने के बाद सुभाष ने प्रधानमंत्री में डॉलर की घोषणा के संबंध में महत्वपूर्ण वक्तव्य दिया । इस घोषणा में सच्ची स्वाधीनता देने की झलक नहीं पूर्ण स्वाधीनता केवल भारत के लिए ही नहीं, विश्व शांति के लिए भी आवश्यक है । अंग्रेजों को जो अधिकार इंग्लैंड में प्राप्त है वही अधिकार भारतीयों को भारत में प्राप्त हो जाने पर भारत और इंग्लैंड एक हो सकते हैं । संधि प्रारंभ होने के साथ ही हिंसात्मक तथा अहिंसात्मक सभी कैदियों की रिहाई की जानी चाहिए ।

25. Tufani Karjakram

तूफानी कार्यक्रम राजनीतिक बंदी सम्मेलन के अवसर पर राजनैतिक बंदियों के प्रति सरकार के दुर्व्यवहार की तीव्र आलोचना करते हुए सुभाष ने अध्यक्ष पद से ज्वलंत भाषण दिया । मैं अपने देश भक्त, भाई बहनों के साहस की प्रशंसा किए बगैर नहीं रह सकता जिन्होंने अनेक संकट झेलते हुए झील यात्रा आएंगे है । मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि हमें जेल में किस तरह रखा जाता है । आज भी हमारे सैकडों बंदी भाई हवालातों में कीडे मकोडों की तरह रहे हैं । समय ही बिलबिलाकर मरने से उन को बचाना है । हमें इस व्यवस्था का सामना करने के लिए एक मजबूत संगठन बनाना होगा और उस संगठन के लिए हमें अपने सक्रिय सहयोगियों की जरूरत है । नेताजी के आह्वान पर सभास्थल पर सहस्त्रों लोगों ने सहयोग का वचन दिया । हिजली और चटगांव में नौकरशाही का नंगा नाच हो रहा था । बिजली कांड के विरोध में कलकत्ता आयोजित एक विशाल सभा में सुभाष ने कहा, जो साम्राज् एक दिन में बना है वो एक रात में नष्ट भी होगा । संयुक्त प्रांतीय भारतीय नौजवान सभा का अधिवेशन जब मथुरा में हुआ तो सुभाष अधिवेशन के सभापति बनाये गए । अध्यक्ष पद से भाषण करते हुए सुभाष कहते हैं, देश की वर्तमान अवस्था ने युवकों के हृदय को आंदोलित कर दिया है । विदेश और समाज की बुराई दूर करना चाहते हैं । मैं उनके इन विचारों का हृदय से स्वागत करता हूँ । युवकों की हृदय में कांग्रेस से मिलकर कार्य करने की भावना होनी चाहिए और कांग्रेस को भी युवकों के प्रति सहानुभूति रखनी चाहिए । प्रत्येक युवक को इस बात का अनुभव करना चाहिए कि कांग्रेस राष्ट्र के लिए हैं इसलिए उसे ऐसा कोई कार्य नहीं करना चाहिए जिससे कांग्रेस की प्रतिष्ठा को बता लगे । अनेक महापुरुषों के बलिदान से आज कांग्रेस की नींव पक्की हुई है और मैं आपसे पूछता हूँ की इस धरातल पर आप महात्मा गांधी के समान नेता कहाँ आ सकते हैं । लेकिन कांग्रेस को यह नहीं भूलना चाहिए कि नौजवान ही भारत के भावी कर्णधार है । वह दिन दूर नहीं जब उन के हाथ में सत्ता होगी । न्याय, समानता, स्वाधीनता और विनयशीलता का प्रेम से घना संबंध है । यदि मानव जाति के प्रति हमारे हृदय में प्रेम नहीं है तो हम किसी के साथ न्याय और समानता का व्यवहार नहीं कर सकते । ऐसी दशा में हम नाथ स्वतंत्रता के लिए लडकी सकते हैं और ना ही आत्मबलिदान कर सकते हैं । मैं कह सकता हूँ कि यही सिद्धांत साम्यवाद के साथ है और इसी साम्यवाद को मैं भारत में देखना चाहता हूँ । हमें बिना सोचे समझे दूसरों का अनुकरण नहीं करना चाहिए । एक कहावत सकती है कि जो वस्तु के लिए खाद्य पदार्थ हो सकती है, दूसरों के लिए विश हो सकती है । इसके कुछ दिन पश्चात ही कलकता के अल्बर्ट हॉल में सुभाष के सभापतित्व में एक प्रस्ताव पास हुआ कि आतंकवादियों को अपनी हिंसात्मक कार्य छोड देने चाहिए और क्रांतिकारी नवयुवकों को कांग्रेस के झंडे के नीचे आकर कांग्रेस का कार्यक्रम अपने हाथों में ले लेना चाहिए । जिस समय सुभाष नौकरशाही के विवाद से रूप का निरीक्षण करने चटगांव की ओर जा रहे थे, उन्हें बीच में ही गिरफ्तार कर लिया गया । जेल जाते जाते उन्होंने बंगाल की राजनीतिक कार्यकर्ताओं को संबोधित किया । चटगांव हिजली की याद रखो, इन घटनाओं की छतिपूर्ति किए बिना हम शांत नहीं बैठ सकते हैं । मैं अपने देशवासियों से अपील करता हूँ कि इस अत्याचार के विरुद्ध देश में आप भी आंदोलन करें । अगर सरकार नाम आने तो प्रत्येक ब्रिटिश वस्तु का बायकॉट हो जाना चाहिए । इस घटना के सप्ताह भर बाद ही देशबंधु पार्क में सुभाष ने चटगांव हिजली घटना के संदर्भ में सार्वजनिक सभा को संबोधित किया । चटगांव घटना के संबंध में जिन अपराधियों पर सरकारी आरोप लगाए गए हैं । उनके बारे में सरकार ने कोई प्रमाण नहीं दिया । अब सरकार का करते हुए है कि छती पूर्ति करेंगे और कानून के महत्व की रक्षा करके लोगों के हृदय में ये विश्वास पैदा करें कि कोई भी नागरिकों के प्राथमिक अधिकारों के साथ मनमाना बर्ताव नहीं कर सकता । सुभाष ने सादा कांग्रेस के हिंसात्मक नीति का प्रचार किया । कभी उसके अनुशासन सीमा का अतिक्रमण नहीं किया, फिर भी सरकार की दृष्टि में वे भयंकर आतंकवादी रहे । कलकत्ता की श्रद्धानंद पार्क में हिजली और चडगांव दिवस मनाने के लिए एक विराट सभा हुई जिसे सुभाष ने बडी निर्मिता के साथ संबोधित किया । हम लोग ऑर्डिनेंस के युग में वास कर रहे हैं । फिर भी मैं इतना कह सकता हूँ कि नवयुवक अपने हिंसात्मक कार्यों से देश की बडी हानि कर रहे हैं । हिजली गोली कांड के संबंध में सरकार द्वारा नियत कमेटी का निर्णय बिल्कुल स्पष्ट था की गोली सिराणा अंधाधुंध तथा अनुचित था । केंद्र सरकार ने इस संबंध में क्या कार्यवाही की था? उसने जनता के आक्रोश को शांत करने के लिए कोई भी ऐसा नहीं कि सरकार ने खुद ही अपने कार्यों तथा अदूरदर्शिता की नीति से अहिंसा वादियों को ऐसा बना दिया है कि वे बिल्कुल अकर्मण्य जान पडते हैं । महाराष्ट्र नौजवान सभा के शानदार अधिवेशन का सभापतित्व सुभाष ने किया । इस अधिवेशन में सुभाष ने सरकार की दमन नीति की आलोचना करते हुए नौजवानों के कर्तव्य और जागृति पर बडा महत्वपूर्ण भाषण दिया । उन्होंने कहा, यद्यपि सरकार की दृष्टि से मैं खतरनाक व्यक्ति हूँ लेकिन वास्तव में मुझे शांति प्रिय है । इसमें कोई संदेह नहीं कि हम स्वतंत्रता की भूख से छटपटा रहे है । जहाँ एक बार हम इस भूख से तडप उठे तब बिना पूरी खुराक लिए हमें छह नहीं मिल सकता है । दिल्ली के समझौते में नौजवानों की नहीं सुनी गई । सरकार दमन ही करती चली गई और इस मनमाने धवन ने युवकों की दिल में आग लगाई और तभी उन्होंने आतंकवाद का सहारा लिया । जबकि सरकार ने समझौते को भंग कर दिया तो मैं नहीं समझता कि कांग्रेस संधि की छाया से क्या छुट्टी पडी है । जब सरकार ऑर्डिनेंस शासन करने लगी है तो इससे स्पष्ट हो गया है कि उनके साथ जनता की सहानुभूति नहीं । ट्रेड यूनियन कांग्रेस कलकत्ता के अधिवेशन में इस वर्ष भी सुभाष को सभापति निर्वाचित किया गया । इस अधिवेशन के प्रति कई विदेशी ट्रेड यूनियनों ने भी अपने सब संदेश भी है । इस अवसर पर सुभाष ने अध्यक्ष पद से अत्यंत महत्वपूर्ण भाषण दिया । उन्होंने कहा, मुझे इसमें संदेह है कि गत दस महीनों से ट्रेड यूनियन अंदर उन्होंने शक्ति तथा विस्तार में कुछ नजदीकी है । आपस की फूट से आंदोलनों को भारी धक्का पहुंचा है और सत्याग्रह के कारण सबका ध्यान ट्रेड यूनियन आंदोलन से हट गया । ट्रेड यूनियन कांग्रेस कोई खोखली संस्था बना देना था । उसे सर्वदल सम्मेलन का रूप देना ट्रेड यूनियन आंदोलन के लिए घातक होगा । ट्रेड यूनियन कांग्रेस एक सार्वजनिक संपत्ति है । भले ही कुछ समय के लिए ट्रेड यूनियन आंदोलन पिछड जाए, लेकिन अंत में वह आवश्यक नहीं करेगा । किसी भी सिद्धांत को कार्यरूप में परिणत करते समय आप इतिहास और भूगोल को नहीं भूल सकते । हमें अपने अतीत के घटनाक्रम से प्रेरणा लेकर और भौगोलिक स्थिति परिस्थितियों को ध्यान में रखकर भविष्य की योजनाएं निर्धारित करनी चाहिए । भारत को अपना विशेष समाजवाद बनाना चाहिए । बहुत संभव है कि भारतीय समाजवाद में कुछ मौलिकता हो और उससे संसार कुछ लाभ उठा सकें । इस प्रकार सुभाष की तूफानी कार्यक्रम अनवरत रूप से चलते रहे और सरकार उनके भाषणों कार्यक्रमों से संशकित होती रही, झुलाती रही और उनका दमन करने के लिए उनकी गुप्तचर शक्तियां सुभाष के आस पास मंडराती रही ।

26. Europe Yatra

यूरोप यात्रा सुभाष की राजनीतिक गतिविधियों के फलस्वरूप उनके प्रति ब्रिटिश सरकार का आक्रोश अपनी चरम सीमा को पहुंच रहा था, लेकिन सुभाष की तूफानी कार्यक्रम आने वाले रूप से चल रहे थे । सरकार उनके निर्भिक सक्रियता से इतनी आतंकी थी कि घबराकर उन्हें तीसरे रेगुलेशन के अंदर निर्दोष बंदी कर लिया । कहने के लिए में प्रथम श्रेणी के राजनीतिक बंदी थे किंतु जेल में उन्हें जिस सामान्य वातावरण में रखा गया, उसमें वे शीघ्र ही अस्वस्थ हो गए । उन का स्वास्थ्य बार बार जेल की यात्रा से यु ही छीन हो चुका था और इस बार की जेलयात्रा ने राहत साहब शरीर भी जीर्णशीर्ण बना दिया । स्वास्थ्य की चिंताजनक स्थिति ने सहयोगी नेताओं का ध्यान उनकी ओर आकर्षित किया और सर्वप्रथम डॉक्टर श्याम प्रसाद मुखर्जी ने काउंसिल में व्यक्तव्य दिया । उन्होंने कहा, बंगाल के इस वीर पुत्र की चिंताजनक अवस्था से नेता चिंतित है । ये एक राष्ट्रीय आघात है । उनके विचार से सहमती प्रकट करते हुए फजलुल हक ने कहा, सुभाष को तुरंत रिहा किया जाना चाहिए और अगर सरकार इतना भी करने को तैयार नहीं तो अपनी देख रेख । मैं उसे सुभाष को ऐसी जगह जाने देना चाहिए जहाँ ठीक से इलाज करा सकें । मगर सरकार ने इन समर्थनों की उपेक्षा की । सुभाष की अस्वस्थता बढती रही । उन के पेट में बराबर दर्द बना रहे था । स्वास्थ्य सुधार के लिए उन्हें भवाली भेजा गया । केंद्र वहाँ भी उनके स्वास्थ्य में कोई परिवर्तन हो । फिर वे लखनऊ भेजे गए । अब उनके सीने में दाहिनी और भी दर्द होने लगा था और उनका वजन पांच पांच घट चुका था । चिकित्सक जांच से पता चला उनके फेफडे में झेली पैदा हो गयी है, जहाँ चिकित्सकों ने उन्हें चिकित्सा के लिए यूरोप जाने का सुझाव दिया । उधर परिवार में माता पिता की स्थिति भी चिंताजनक थी । दोनों ही बीमार चल रहे थे । जब उनको बीमार पुत्र सुभाष के यूरोप भेजे जाने का समाचार मिला तो उनकी व्याकुलता और भी बढ गई । अपने लाडले को देखने के लिए विफल हो थी । उन्होंने सरकार को इस आशय का प्रार्थना पत्र दिया कि उन्हें उनके पुत्र को कटक लाकर दिखाया जाए किन्तु निर्दयी ब्रिटिश सरकार ने उनके समय को बहाना बनाकर टाल दिया । क्रूर अधिकारियों ने चरमसीमा की निर्दयता अख्तियार कर ली । किसी भी कीमत पर सुभाष को स्नेहा विफल माता पिता के दर्शन का अवसर ना मिल सका । यूरोप जाने के अंतिम दिनों में भी जेल अधिकारियों ने उनके प्रति मानवता का व्यवहार नहीं किया । सरकार की निर्दयता और अमानुषिकता ने अस्वस्थ सुभाष को छोडो और संताप से विदीर्ण कर दिया । बंबई बंदरगाह पर यूरोप जाने वाला जहाज लगा था । उच्च पुलिस अधिकारियों के निरीक्षण में सुभाष अत्यधिक दयनीय अवस्था में जहाज पर सवार हुए जहाँ छूटने में अभी कुछ समय का विलन था । सुभाष के अनेक सब चिंतक आपने रुकने नेता को विदाई देने के लिए वहाँ पर स्थित थे । केंद्र सरकारी पहरेदारी के कारण सुभाष और उनके बीच में लंबी दूरी थी और इस व्यवस्था के कारण में हाथ हिला हिलाकर सुभाष के स्वास्थ्य के प्रति शुभकामनाएं प्रकट कर रहे थे और उन्हें मौन विदाई दे रहे थे । विधा के समय उनकी तीन भाईयों श्री सुशील बोस, श्री अमियां तथा डॉक्टर सुनील बोस ने आकर सुभाष जी से भेंट की । सुभाष ने उनसे नपे तुले शब्दों में बडे धैर्य और संयम के साथ बातें की । डॉक्टर से लेंसेज ने सुभाष की डॉक्टरी परीक्षा की और उन्हें विश्वास दिलाया कि वे शीघ्र ही स्वास्थ्य हो जाएंगे । ज्योंहि जहाज के चलने की सूचना दी गई । एक पुलिस अधिकारी ने आकर सुभाष को बताया कि उनके ऊपर से तीसरे रेगुलेशन की पाबंदी हटा ली गई है । सुभाष ने इसके ऊपर कोई प्रत्युत्तर नहीं दिया । केवल गंभीर और विमान उसका आनंद के चेहरे पर इलाज थी । उन्होंने स्वदेश से विदाई लेते हुए अपना संदेश प्रसारित किया । ये रोक जाने से पूर्व में अपने उन सभी मित्रों और शुभचिंतकों को हार्दिक धन्यवाद देता हूँ, जिन्होंने मेरे संबंध में फॅमिली बजे भयानक बीमारी के होते हुए भी सरकार ने मुझे हिंदुस्तान में रहने तक मुक्त नहीं किया और ना किसी प्रकार की स्वतंत्रता ही थी । अनेक प्रार्थनाएं अनेक प्रार्थनाएं करने पर भी सरकार ने मुझे अपने वृत्त माता पिता से मिलने तक नहीं थी । जनता कोई अच्छी तरह मालूम है कि मेरी वर्तमान व्यवस्था का उत्तरदायित्व सरकार पर ही है । किन्तु ना तो सरकार ने ये रूप में मेरी चिकित्सा का आर्थिक भार अपने ऊपर लिया और ना मेरे मित्रों तथा संबंधियों को ही भारत ने मेरी चिकित्सा करने की आज्ञा प्रदान की । मेरे भाई शरत चंद्र बोस की जेल में रहने से हमारे घर की आर्थिक अवस्था अच्छी नहीं है और इस प्रशासन है । शायद मैं यूरोप को भी नहीं जा सकता और भाग्य से मेरे कुछ मित्रों ने यूरोप प्रवास था । चिकित्सा प्रबंधन अपने ऊपर ले लिया । मैं नहीं कह सकता कि मैं अपनी पुरानी तंदुरस्ती पुनः प्राप्त कर लूंगा परन्तु मैं उन सब लोगों को है । ऐसे धन्यवाद देता हूं जिनकी कृपा से मैं यूरोप जाने में समर्थ हो सकता हूँ । मैं अपने सब देशवासियों को विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि दवाओं की अपेक्षा मुझे उनकी शुभकामनाओं से अधिक आराम पहुंचेगा और जहाँ चल पडा हजारों लोगों ने हाथ हिलाते हुए गगनभेदी नारों के साथ अपने लाडले नेता को भावभीनी विदाई दी । आपने हिरदय में कसम साथ ही व्यथा को उन्होंने अपने मित्र दिलीप कुमार राय को अत्यंत मार्मिक शब्दों में लिख भेजा । मुझे इस बात का जरा भी विश्वास नहीं था कि मैं अपना इलाज कराने के लिए रुक जा सकूंगा । सरकार की कुटिल नीति के कारण अपने माता पिता से मिलना संभव नहीं था । केवल कुछ सगे संबंधियों को ही मुझसे जबलपुर जेल में मिलने दिया गया । मेरे मित्र जो दूरस्थ स्थानों से मिलने के लिए बम्बई आए थे, निराश लौट गए । वास्तव में जब तक जहाँ छूट नहीं गया, पुलिस अफसर शिकारी कुत्तों के झुंड की तरह जहाँ को चारों ओर से घेरे हुए थे । स्थिति में मुझे घोर आत्मिक पीडा हुई

27.. Bidesho Mein Sakriya

विदेशों में सक्रिय सुभाष की समुद्री यात्रा सकुशल समाप्त हुई । विवेन इसमें कुछ दिन रहने के बाद वियना के लिए रवाना हुए जहाँ पर वे मैसेज मूलर की मेहमान रहे । मैसेज मूला प्रसिद्ध ऑस्ट्रियन लेखक मिस्टर आरएफ मूल्य की धर्मपत्नी थी । इस परिवार में सुभाष कई महीनों तक रहे और उनकी परेशानियां बडी आत्मीयता के साथ होती रही । यहीं पर सुभाष ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक इंडियन स्ट्रगल का लेखन कार्यारंभ क्या व्यवस्तता के कारण में स्वयं लिख पाने में असमर्थ थे इसलिए मैसेज मूलर ने स्थिति को समझते हुए एक महिला तीनों की व्यवस्था कर दी । उसका नाम कुमारी ऍम था । सुभाष उसकी कार्यकुशलता और विद्वता से बहुत प्रभावित हुए और एम । एल । के प्रयास से उनकी पुस्तक का लेखन, अत्यधिक सुंदरता और सफलता के साथ संबंध हुआ । वियना से सुभाष ने पूर्ण स्वास्थ्य लाभ के लिए स्विट्जरलैंड को प्रस्तान क्या अस्वस्थता की स्थिति में भी वे शांत नहीं बैठे । उन्होंने यूरोप के विभिन्न देशों में अनेक महत्वपूर्ण कार्य किए । रूम में पूर्वी विद्यार्थी कॉन्फ्रेंस संपन्न हुई जिसमें प्रायः सभी एशियाई देशों के छात्र सम्मलित हुए । सुभाष इस सम्मेलन में सर्वसम्मति से सभापति चुने गए और महत्वपूर्ण भाषण दिए । विद्यार्थी आंदोलन पर बोलते हुए उन्होंने कहा, भारतीय विद्यार्थी आंदोलन का संबंध राष्ट्रीय आंदोलन से हैं । इटली तथा जर्मनी के विद्यार्थी आंदोलन को देखकर भारतीय विद्यार्थियों को भी अपना संगठन सदृढ करना चाहिए । रूम के बाद सुभाष ने पॉलैंड को प्रस्थान क्या जहाँ पर उनकी भेंट अनेक प्रसिद्ध व्यक्तियों से हुई । स्वतंत्र पॉलैंड निवासियों ने भारत के आंदोलन के प्रति अपनी सहानुभूति प्रकट की । उसके बाद उन्होंने वहाँ की कई ग्रामीण स्कूल देखे जहाँ वैज्ञानिक प्रणाली से शिक्षा दी जाती थी । वार्ता में सुभाष ने देखा कि वहां के निवासी भारतीय सभ्यता और संस्कृति के बडे प्रेमी हैं । उन्होंने ओरियंटल सोसाइटी के समक्ष अपना वक्तव्य भी दिया । वहीं पर उनकी भीड प्रसिद्ध संस्कृत विद्वान स्टानिस्लास से हुई । जनवासे उन्होंने दक्षिण फ्रांस की और प्रस्थान किया जहां की जलवायु से उनके स्वास्थ्य में काफी संतोषजनक सुधार हुआ । वहाँ से वे पुनः मिलन और रूम की ओर चले गए जहाँ पर उन्होंने एक विराट सभा में भारत और इटली के संबंधों पर भाषण दिया । लौटकर जने वहाँ आने तक उनकी पेट का दर्द काफी कम हो गया । चेकोस्लोवाकिया में कल सुबह अधिक प्रसिद्ध स्थान है । यह स्थान अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है । इसकी सुरंग में पहाडियों और झरनों को देखकर उदास से उदास चेहरे पर आनंद की लहर दौड जाती है । कहा जाता है । तीन झरनों के तब तक और रोगनाशक जल में स्नान करने से मनुष्य को व्याधि मुक्ति मिल जाती है । सुभाष भी जल चिकित्सा के लिए यहाँ इन्हीं चरणों की स्मृति स्वरूप उन्होंने एक बार कहा मैं बडी आशा स्वराज्य के सुनहरे दिन को देख रहा हूँ, जब विदेशी स्वास्थ्यप्रद जलप्रपातों की शरण लेने के लिए हमें यूरोप जाने की आवश्यकता नहीं होगी और भारत के जलप्रपातों को हम अपना लेंगे । जिनेवा में भारतीय विशेष तृतीय अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस हुई, जिसमें विश्व के प्रायः सभी प्रमुख देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया । इस कॉन्फ्रेंस में सुभाष का वक्तव्य अत्यंत प्रभावशाली रहा । सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, भारत की वर्तमान दशा को समझने के पूर्व ये जानना आवश्यक है कि भारत में कैसा कठोर दमन हुआ है । जो जेल से छूटे गए हैं, वे भी बंदी ही है । लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि हम पराजित होकर बैठे हैं । जब तक जनता मालिक और मानवीय अधिकारों से वंचित रहेगी और वह दूसरों के शोषण का साधन बनी रहेगी, तब तक अशांति दूर नहीं हो सकती । हिंदुस्तान की समस्या केवल राष्ट्रीय समस्या नहीं है, वो सारी दुनिया की समस्या है । भारत में ब्रिटिश राज ब्रिटिश साम्राज्यवाद का आधार है, और बडे साम्राज्यवाद की नींव पर विश्व साम्राज्यवाद स्थित है । इसलिए हिंदुस्तान की मुक्ति के लिए प्रयत्न करना संसार की स्वतंत्रता के लिए प्रयुक्त करना है । ऑस्ट्रिया में रहते हुए सुभाष ने वहाँ की राजनीतिक एवं आर्थिक स्थिति का गंभीर अध्ययन किया था । उन्होंने वहाँ से संबंधित अनेक समस्याओं पर भारतीय पत्रों में प्रकाश डाला । वे जब वियना में थे, वहाँ के अनेक गणमान्य व्यक्ति उनकी कार्यक्षमता और व्यक्तित्व से प्रभावित हुए हैं । वियना के प्रसिद्ध पत्र ने उनके संबंध में कूज पूर्ण और प्रशंसात्मक विज्ञप्ति प्रकाशित की । कलकत्ता के भूतपूर्व मेयर वियना में आजकल एक प्रतिष्ठित भारतीय थी । वियना के एक मकान के कमरे में ठहरा हुआ है । रहन सहन में वह यूरोपियन दिखता है, लेकिन विचार, धर्म और संस्कृति से वह हिंदू है । ये अपने देश के स्वाधीनता संग्राम का महान योद्धा है । व्यक्तित्व और विद्या में वहाँ प्रतीम हैं । विद्वता और ज्ञान में उस किसानी ही नहीं । वो सुभाष चंद्र बोस के नाम से प्रख्यात है । आपने यूरोप प्रवास में अस्वस्थ रहते हुए भी सुभाष कभी शांत नहीं बैठे । उनके तूफानी कार्यक्रम वहाँ भी चलते रहे । वे जहाँ भी गए, वहीं महत्व और सम्मान प्राप्त हुआ । जनता और जननायकों ने उन्हें हाथों हाथ लिया । अभी वे कुछ दिनों तक और भारतीय स्वतंत्रता की स्थिति को दृढ बनाने के लिए यूरोप के विभिन्न देशों का भ्रमण करते हैं । किन्तु तभी अचानक उन्हें पिता की गंभीर बीमारी का तार मिला । सूचना पार्टी ही सुभाष को छडों तक सब रहे गए, फिर तत्काल ही स्वदेश वापस आने का निश्चय किया । कराची एयरपोर्ट पर सुभाष के सामान की जबरदस्त तलाशी ली गई और उनकी महत्वपूर्ण पुस्तक इंडियन स्ट्रगल की प्रतिलिपि छीन ली गई । सौभाग्य से इस पुस्तक की एक प्रतिलिपि इंग्लैंड की विशाल कंपनी के पास थी जब बाद में मुद्रित हुई और जिसे अनेक देशी विदेशी विद्वानों ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ कहाँ जो भी हवाई जहाज बम्बई दमदम हवाईअड्डे पर उतरा, नेताजी चिरंजीवी हो, नेता जी अमर रहे आदि की तमिलनाडु से हजार ऊॅट स्वर स्वागत आह्वान के लिए मुझे भारी संख्या में जनता नेता जी के स्वागत अभिनंदन के लिए हवाई अड्डे पर उपस् थित थी । पुलिस वहाँ से दो पुलिस अधिकारी उतरे और सुभाष को गाडी में बैठाकर घर की ओर ले भागे । आदर उत्सव जनता अपने लाडले नेता को भरा हो भी ना देख सकें । घर पहुंचते ही पुलिस अधिकारियों ने सुभाष के आगे एक सरकारी परवाना पेश कर दिया जिसमें लिखा गया था कि सुभाष आपने एल्गिन रोड के मकान के बाहर नहीं जाएंगे । परिवार वालों के अतिरिक्त किसी अन्य से बात नहीं करेंगे तथा कोई पत्रव्यवहार नहीं करेंगे और बाहर से आने वाली डाक को जांच कराने के बाद ही पढ सकेंगे । यदि उन्होंने इस में से किसी भी शर्त का उल्लंघन किया तो उन्हें सात साल की सजा और साथ में जुर्माना भी देना होगा । एक ओर पिता मृत्युशय्या पर अंतिम सांसे ले रहे थे, दूसरी और सुभाष के सिर पर सरकारी ऑर्डिनेंस की तलवार लटक रही थी । सरकार को इतने पर भी संतोष नहीं हुआ और उसने ये भी आदेश जारी किया कि एक हफ्ते के भीतर पुनः यूरोप चले जाएं अन्यथा सरकार दूसरा रुख अपनाएंगी । सुभाष काहिर ऐसी अमानुषिक नीति पर शुद्ध हो उठा फिर भी बडी संतुलन से उन्होंने सरकार से एक माह की मोहलत मांगी । मृत्युशय्या पर अंतिम सांसे गिन रहे पिताश्री जानकीनाथ बोस शायद आपने इसी लाडले के दर्शनार्थ भी जीवित थे लेकिन जैसे ही सुभाष उनके निकट आए उसके कुछ दिनों बाद रायबहादुर जानकीनाथ के प्राण पखेरू उड गए । संपूर्ण भवन करोड रोधन से आप्लावित हो उठा और संभलते समझते भी सुभाष की आंखों से आंसू लग ही पडेगा ।

28. Phir Europe Mein

फिर यूरोप में पिता के श्राद्ध तक सुभाष स्वदेश में हैं । उनका स्वास्थ्य अभी संतोषजनक नहीं था । प्रबल जीवन शक्ति कारण भले ही वे स्वस्थ देखते थे, परंतु आंतरिक रूप से अब भी अस्वस्थ थे । रात के अवसर पर अनेक सगे संबंधी घर पर आए सुभाष इतने दुर्बल और अशक्त हो गए थे कि उन्हें बोलने तक मैं कष्ट हो रहा था । सगे संबंधियों ने उनसे अनेक राजनीतिक विषयों पर वार्तालाप करना चाहा, किंतु केवल नमस्कार कहकर उन्होंने अपनी असमर्थता प्रकट की । उनकी ये गंभीर रूप बढता सुब चिंतकों की चिंता का विषय बन गई और स्वास्थ्य लाभ के लिए उन का पन्ना यूरोप जाना नितांत आवश्यक हो गया । अभी स्वदेश के वातावरण में सुभाष एक महीने भी सांस ना ले पाए थे कि विक्टोरिया नामक जहाज द्वारा वे पूरा विदेश के लिए रवाना हो गए । अपनी यूरोप यात्रा के इस दूसरे दौर में सुभाष ने देश की स्वतंत्रता के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर असाधारण कार्य के बर्लिन पहुंचने ही वहाँ के मेयर ने उनका भव्य स्वागत किया । अपने स्वागत भाषण में बर्लिन के मेयर ने कहा, कलकत्ता की भूतपूर्व मैं श्री सुभाष चंद्र बोस का स्वागत करते हुए हम आपार हर्ष का अनुभव करते हैं । सुभाष की इस बार की यूरोप यात्रा में स्वास्थ्य लाभ के अतिरिक्त एक अन्य महानिदेश नहीं था । वो यहाँ की स्थितियों, परिस्थितियों का अध्ययन कर उनकी भविष्य की योजनाओं की जानकारी प्राप्त करना चाहते थे । बर्लिन में उन्होंने हर हिटलर तथा अन्य उच्चधिकारियों से भेंट की और अपना मंतव्य प्रकट ना करते हुए पूछा, आप लोग ब्रिटेन के विरुद्ध हथियार उठाने के संबंध में क्या सोच रहे हैं? नहीं, हम ब्रिटेन के विरुद्ध हथियार उठाने का इरादा नहीं रखते क्योंकि हमें आशा है कि शीघ्र ही ब्रिटेन हमारी मांगों को पूरी करेगा । इस तरह से सुभाष को ये आभास हुआ कि ये लोग ब्रिटेन से शांति समझौता करने के पक्ष नाम है । परंतु भारतीय स्वतंत्रता के पक्ष में सुभाष कौन से पर्याप्त सहानुभूति और सहयोग का आश्वासन मिला? पेरिस होते हुए सुभाष डबलिन पहुंचे । आयरलैंड में उनका हार्दिक स्वागत हुआ । आयरिश प्रजातंत्र के प्रधान श्री डी वैगराह तथा आयुष भारत स्वाधीनता संघ की प्रधान मैडम मैकब्राइड द्वारा उनका भव्य स्वागत हुआ । आयरलैंड के प्रमुख पत्र में सुभाष के संबंध में अनेक प्रशंसात्मक वक्तव्य प्रकाशित हुए । आयरिश ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन ने उन्हें भारत के संबंध में भाषण देने के लिए आमंत्रित किया । सुभाष ने आयरलैंड कि व्यापारियों कि अनेक सार्वजनिक सभाओं में महत्वपूर्ण भाषण भी डी वेल रात सुभाष से अत्यधिक प्रभावित हुए । उन्होंने सुभाष के साथ गवर्मेंट हाउस में प्राइवेट मीटिंग की । डी वेला ने भारत के आंदोलन के प्रति सहानुभूति प्रकट की और सुभाष ने स्वीकार किया कि भारतीयों को आदेश आंदोलन से बडी प्रेरणा मिली है । उसी दौर में सुभाष ने मुसोलनी से भेंट की और फ्रांस तथा लंदन भी रहे । यूरोप के इस तूफानी दौरे के बाद सुभाष ने स्वदेश लौटने का निश्चय किया । इंडो ब्रिटिश सरकार की कुट्टीन तापूर्ण घोषणा नहीं उन्हें कुछ समय के लिए असमंजस में डाल दिया और शर्त के अनुसार यादव सुभाष विदेश में रहे या स्वदेश आने पर बंदी जीवन व्यतीत करें । इन दोनों में से सुभाष को एक निर्णय लेना था । उन्होंने अपने मन में सोचा विदेश में रहने की अल्पकालिक स्वतंत्रता की अपेक्षा स्वदेश में बंदी जीवन व्यतीत करना कहीं अच्छा होगा । इस निष्कर्ष पर पहुंचते ही उन्होंने भारत के लिए प्रस्थान कर दिया । जो भी उनका जहाज बम्बई एयरपोर्ट पहुंचा, दर्शनार्थियों की अपार भीड ने जयघोष के साथ उनका स्वागत किया । लेकिन जहाज से नीचे पैर रखते ही वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने गिरफ्तारी का वारंट दिखाकर उन्हें हिरासत में ले लिया और सुभाष अपने सहयोगियों तथा जनसमूह के मध्य को छह बिना रह सकते हैं । जाते जाते केवल उनका एक संदेश स्वर्ग हो जाते हैं । स्वतंत्रता की पताका ऊंची रखो । स्वतंत्रता की लडाई में अंततोगत्वा हमारी विजय निश्चित है । पुलिस बयान ऑर्थर रोड जेल की ओर भागती रही और क्रांतिवीर सुभाष का ओजस्वी संदेश मायु मंडल में दूर दूर तक गुंजरित होता रहा । वास्तव में सुभाष बाबू की छाल लखनऊ कांग्रेस में जाने की थी किंतु बंदी बनाए जाने के कारण उनकी इच्छा अधूरी रह गयी । कांग्रेस कार्यसमिति ने उनकी गिरफ्तारी का विरोध करते हुए अपने प्रस्ताव में कहा, ये घटना इस बात का प्रबल प्रमाण है कि ब्रिटिश साम्राज्यवाद में शांतिपूर्ण, राजनैतिक तथा व्यक्ति के जीवन को नष्ट करने के लिए दमन के हथियारों का प्रयोग बंद नहीं किया । सुभाष की इस अनैतिक गिरफ्तारी पर देशभर में छोड और हलचल हो गई और प्रमुख शहरों में हडताल की गई ।

29. Pnha Jail Ki Sikhcho Mein

पुनः जेल के सींखचों में सुभाष के चिकित्सक डॉक्टर डॉक्टर ने कहा बैंडी जीवन के प्रभाव बहुत के स्वास्थ्य पर अवश्य पडेगा और उनके स्वास्थ्य में जो कुछ सुधार हुआ है और नष्ट हो जाएगा । सरकार ने उनके इस वक्तव्य की उपेक्षा की और सुभाष को जेल से मुक्त नहीं किया । पहले ऑर्थर रोड जेल में रखे गए फिर उन्हें यरवाडा जेल भेज दिया गया । इस जेल ने उनके स्वास्थ्य पर भीषण आघात किया । यहाँ का वातावरण अत्यधिक हानिकारक और विषाक्त था । खुली वायु और प्राकृतिक वातावरण का सर्वथा अभाव था । सुभाष एक संकुचित कोठारी की तपन झुलसन में जीवन के अत्यंत कष्टकारी दिन व्यतीत कर रहे थे । बॅाय शूल और अपन से पीडित है । सरकार ने औपचारिक सहानुभूति दिखाते हुए उन्हें उनके भाई की कुर्सियांग स्थित मकान में एक कमरे में बंद कर दिया । केंद्र सुभाष की बीमारी बढती गई । इसी बीच फॅमिली में उनके स्वास्थ्य के लिए सरकार की बर्बरतापूर्ण नीति की निंदा की गई । इंग्लैंड की सुप्रसिद्ध पत्र मैनचेस्टर गार्जियन इसमें भी संदर्भ में एक भारत से नात् मक टिप्पणी प्रकाशित की जबकि हम भाषण और विचार की स्वतंत्रता के विषय में अपने उदार नीति का बखान करते करते हैं । तब हमारे साम्राज्य की कुछ भाग सेंसर के भारी बोझ से दबकर करा रहे हैं । मिस्र सुभाष बोस के साथ जो बर्ताव हो रहा है वो ब्रिटिश न्याय के अनुकूल है । अच्छा ये वही चीज है जिसके लिए अंग्रेज लोग विदेशियों की सभ्यता पर उनकी उठाते हैं । बाद में मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर एक्सरे परीक्षा के लिए उन्हें कलकत्ता मेडिकल कॉलेज लाया गया । अखिल भारतीय कांग्रेस के तत्कालीन सभापति पंडित जवाहरलाल नेहरू की आज्ञानुसार संपूर्ण भारत में सुभाष दिवस मनाए जाने की घोषणा हुई । इस अवसर पर देश के विभिन्न भागों में सभाएं आयोजित हुई और उनमें सरकार के दमन था । बिना मुकदमा चलाए सुभाष चंद्र बोस तथा अन्य राजनीतिक बंदियों को कैद में डाले रखने की कुटील तापूर्ण नीति की भर्त्सना की गई । इस अवसर पर आयोजित एक सभा में भाषण करते हुए पंडित नेहरू ने कहा, श्री सुभाष चंद्र बोस की गिरफ्तारी नहीं सिद्धां का रूप धारण कर लिया है और इस संबंध में विशेष काम करने की जरूरत है । उस समय संपूर्ण विश्व सुभाष की रिहाई की मांग रहा था और चारों ओर से उन्हें मुक्त करने के लिए आवाज उठाई जा रही थी । इस विश्वव्यापी आंदोलन ने ब्रिटिश सरकार को झकझोर कर रख दिया । अकारण ही अधिक दिनों तक सुभाष को बंदी बनाए रखना कठिन हो गया । परिणामतः सत्रह माह की कठोर नजरबंदी के बाद सुभाष को बिना शर्त रिहा कर दिया गया ।

30. Matribhumi Ke Liye Sarbaswa Samarpan

मातृभूमि के लिए सर्वस्व समर्पण सुभाष जिस समय मुक्त किए गए संपूर्ण भारत में हर्ष की लहर दौड गई । अपार जनसमूह ने लोकनायक सुभाष चंद्र बोस का भव्य स्वागत किया । उस समय सुभाष अत्यधिक जीर्णशीर्ण हो गए थे । फिर भी बंगाल की ओर से श्रद्धानंद पार्क में आयोजित सभा में उन्होंने अपने सार्वजनिक अभिनंदन के अवसर पर बोलते हुए कहा, आप लोगों ने मेरे प्रति अपने हार्दिक स्नेहा का परिचय दिया है । उसके प्रतिदान में आपको देने के लिए मेरे पास कुछ नहीं । इस घटना की स्मृति सदैव मेरे मानस पटल पर अंकित रहेगी और भावी संगठनों और कठिनाइयों के समक्ष ईश्वरीय प्रेरणा का काम करेगी । मैं पुनः अपने अटल संकल्प को दोहराता हूं कि मातृभूमि की सेवा में और उसकी राजनीति के वहाँ आर्थिक उन्नति के लिए मेरे पास जो कुछ है, सब समर्पित है । सुभाष के इस वक्तव्य पर लगातार करते बनी होती रही । उन्होंने अपना वक्तव्य जारी रखते हुए कहा, मैं थोडी शब्दों में एक बार पुनः हम लोगों के समक्ष प्रधान देश को दोहराना चाहता हूँ । हमें संसार की गतिविधियों के साथ अपने देश की गतिविधियों का तुलनात्मक अध्ययन करते हुए अपने देश में आंदोलन का संचालन करना चाहिए । साम्राज्यवाद हर स्थिति में स्वतंत्रता और शांति के लिए घातक है । अच्छा दृढनिश्चय के साथ हमें उसका विरोध करना चाहिए । संपूर्ण भारत वर्ष को एक शक्तिशाली राष्ट्र बनाने के लिए हमें सामूहिक रूप से राष्ट्रीय झंडे के नीचे खडा होना होगा । हमें अपने आंदोलनों में मजदूर, किसानों और मध्यम श्रेणी के साम्राज्य विरोधी मोर्चों को प्रमुखता देनी होंगी । सबसे बडी आवश्यकता तो इस बात की है कि आपने भूखे और गुलाम देशवासियों की आर्थिक एवं राजनीतिक मुक्ति के लिए साम्राज्य विरोधी शक्तियों का सम्मिलित मोर्चा बनाया जाए, परंतु हमारे संघर्ष का तरीका अहिंसात्मक हो । सुभाष के इस तरफ रोजगार के पश्चात अभिनंदन सभा विसर्जित हुई और वे सीधे अपने एल्गिन रोड वाले मकान की ओर चले गए ।

31. Congress Sabhapati Ke Rup Mein

कांग्रेस सभापति के रूप में अभिनंदन समारोह से वापस आते ही सुभाष पारिवारिक वह सार्वजनिक कार्यक्रम में व्यस्त हो गए । अनेक शुभचिंतकों और मित्रों ने उन्हें घेर लिया और उनके स्वास्थ्य के प्रति विविध प्रश्न करने लगे । सुभाष उन लोगों के बीच अत्यंत आत्मीयता के साथ बातें कर रहे थे कि अचानक कक्ष में एक व्यक्ति ने प्रवेश किया और उन पर दृष्टि पडती ही सुबह शिशु की भारतीय बाहर प्रसार कर उसकी और हफ्ते दिलीप हर्षातिरेक में भी इतना ही कह सके । फिर उनका कंठ अवरुद्ध होकर रह गया । दिलीप सिस्टम है और चकित से अपने परम मित्र को निहार रहे थे । अधिक कुछ कहने की अपेक्षा सुभाष अन के निकट आए और दिलीप को बाहों में भरकर नादान बच्चे की भांति रो पडे । इस मित्र मिलाप में वैसी की आत्मीयता और सद्भावना का भाव था, जो कदाचित राम और भारत के मिलाप में रहा होगा । दिलीप काम करते हुए विमूढ से अपने अभिन्न मित्र के जीवन शरीर को देख रहे थे । वह शरीर शारीरिक सौन्दर्य का अप्रतिम प्रतीक था । वो शरीर जब पुरुषोचित संतरे का अनूठा आदर्श था, दिलीप अपने आप में सोचते रहे । क्या ये वही सुभाष है जो की इमेज में अपने व्यक्तित्व और शारीरिक सान देने के लिए प्रख्यात रहा है । कई चरणों तकवे संज्ञाशून्य रहे और जब सुभाष ने उन्हें झकझोरा तो स्वाभाविक मुस्कान के साथ बोले मुझे सिर्फ है कि आज वह सुभाष टूट रहा है जो अपनी टूटता और दृढता के लिए प्रसिद्ध रहा है । मैं शरीर से भले ही टूट गया हूँ । हिन्दू आदमी और विचारों से मैं आज भी अपने उद्देश्य के प्रति दृढ और सशक्त हूँ । जीवन में स्थिती यह भी आती है जब मनीष समाज और परिवार से कितना भी तटस्थ क्यों ना हो किन्तु मोहन के तंतु से परिवार और समाज से जोडे रखते हैं । सुभाष लोकनायक हो सकता था लेकिन वो किसी माँ का भी था, किसी भाई का भाई और किसी आदमी का मित्र भी था । जहां प्रश्न मानवीय धरातल का होता है, वहाँ मनुष्य भले ही पहले असाधारण मनीष हो किंतु उसके बाद स्वाभाविक रूप से उसे सामाजिक और पारिवारिक मान्यता वरिष्ठ को स्थान देना पडता है । यदि ऐसा नहीं होता तो ऑस्ट्रेलिया के लिए राम, यशोदा के लिए कृष्णा, यशोधरा के लिए गौतम और प्रभावती के लिए सुभाष साधारण मानव ना होते । परिवार और समाज स्वतंत्र का आ रहा है जिसमें विशिष्ट व्यक्ति फीस नहीं, उत्तरदायित्व, मर्यादा और कर्तव्यबोध के इलाकों में बंदी रहता है । सुभाष का स्वास्थ्य भी संतोषजनक नहीं था । सुप्रसिद्ध चिकित्सक डॉक्टर धर्मवीर ने उनका स्वास्थ्य परीक्षण किया और उन्हीं की देखरेख में वे अपने स्वास्थ्य सुधार के लिए डलहौजी पंजाब चले गए । किंतु वहाँ पर उनके स्वास्थ्य में संतोषजनक सुधार नहीं हुआ और डॉक्टरों ने उन्हें चिकित्सा के लिए पुनः यूरोप जाने की सलाह दी या अचरज और सुभाष के महान व्यक्तित्व का ही प्रभाव था कि जैसे ही सुभाष लंदन के विक्टोरिया स्टेशन पर पहुंचे, मेरी साम्राज्य की राजधानी सुबह जिंदाबाद, इंकलाब जिंदाबाद के नारों से गूंज उठी । सर्वप्रथम भारतीय विद्यार्थी संघ ने उनका स्वागत अभिनंदन किया । कौन में हॉल की एक विराट सभा को संबोधित करते हुए सुभाष ने इंग्लैंड को चेतावनी दी विधान निर्मात्री समिति ही भारत का शासन विधान तैयार कर सकती है । फेडरेशन को तो हिंदुस्तान में कांग्रेस क्योंकि आज छोटी से छोटी राजनीतिक पार्टी में नहीं चाहती । इंग्लैंड प्रवास में उन्होंने मेजर, इटली, लाॅरी, लॉर्ड्स, नील आदि से भारतीय परिस्थितियों पर विचार विमर्श किया । कांग्रेस का अधिवेशन सूरत जिले के हरिपुरा नामक ग्राम में होने वाला था । अभी सुबह यूरोप नहीं थे और यहाँ भारत में कांग्रेस के सभापति का निर्वाचन होने वाला था । कांग्रेसी कार्यकर्ता धूमधाम से प्रचार कार्य में व्यस्त थे । कांग्रेस की गणमान्य नेता सुभाष के सभापति चुने जाने के पक्ष में नहीं थे क्योंकि आपने प्रथम यूरोप प्रवास काल में जब सुभाष विट्ठलभाई पटेल के साथ भारत की स्वतंत्रता संग्राम की दृढता के लिए प्रचार प्रसार कर रहे थे और उन्हें गांधीजी के सत्याग्रह आन्दोलन समाप्त करने का समाचार मिला था, तब उन्होंने ये वक्तव्य दिया था । सत्याग्रह बंद करने की ताजी कार्यवाही गांधी जी की असफलता की स्वीकारोक्ति है । हमारे ये स्पष्ट समिति है कि गांधीजी राजनीतिक नेता के रूप में असफल रहे हैं । इसलिए अब समय आ गया है कि हमने सिद्धां नए उपायों को लेकर कांग्रेस का कायाकल्प करें और इसके लिए एक नेता की आवश्यकता है क्योंकि गांधीजी से या आशा करना व्यर्थ है कि वे ऐसे कार्यक्रम हाथ में लेंगे जो उनके जीवन भर के सिद्धांतों में मिला खाता हूँ । यदि कांग्रेस में इस प्रकार का परिवर्तन हो सके तो अच्छा है, नहीं तो कांग्रेस के भीतर ही उग्र मत के लोगों को एक नई पार्टी बनानी पडेगी । इस पृष्ठभूमि को आधार बनाकर सुभाष को बागी, गद्दा, राष्ट्रदोही आदि जाने क्या क्या कहा गया । उक्त वक्तव्य से अपने विचारों और नीतियों की अवहेलना होते देखकर गणमान्य कहे जाने वाले कांग्रेसी नेताओं ने सुभाष का जमकर विरोध करना शुरू किया ताकि वे सभापति निर्वाचित हो सके । किन्तु इन तमाम विरोधों के पश्चात भी सुभाष भारी मतों से सभापति निर्वाचित किए गए । आपने सभापति निर्वाचित होने की सूचना पाकर सुभाष वहाँ चुपचाप बैठे ना रह सके । हरिपुरा अधिवेशन में अपने इस पद गुरुता के निर्वाह के लिए स्वदेश लौट सुभाष ने आते ही सभापति का पदभार संभाल लिया, किंतु उनके विरोधियों ने उनके कार्यपत्र में बाधाएं उत्पन्न करना आरंभ कर दिया । यहाँ तक कि उन्होंने सुभाष के द्वारा बनाई गई कार्य समिति में रहना भी स्वीकारना क्या? सुभाष ने देश और गांधी जी के प्रति कौन सा अपराध किया था, जो उनकी पवन देशों पर इस प्रकार कुठाराघात किया गया । यदि उनका कुछ अपराध था तो इतना ही कि वह ना तो दयनीयता से भीख मांग कर स्वतंत्रता प्राप्त करने में विश्वास रखते थे और ना ही साध्य बस साधन के विवाद में पढना चाहते थे । उनकी दृष्टि में उनका एकमात्र साथ ही मात्र भूमि की स्वतंत्रता थी, जिसके लिए भी कोई भी पद अपनाने में संकोच और हिचक का अनुभव नहीं करते थे । सभापति पद में सुभाष ने जो वक्तव्य दिया वो उनकी हिरदय, विशालता और व्यापक दृष्टिकोण का परिचायक है । वर्तमान परिस्थिति को समक्ष रखा । उन्होंने अपने भाषण में कहा, मित्रों, आज हमारी व्यवस्था अत्यंत चिंताजनक है । ब्रिटिश साम्राज्यवाद हमें चुनौती दे रहा है । हमें दृढता के साथ खडे होकर इस तूफान का सामना करना चाहिए और निर्दलीय शासकों की दुर नीति को असफल करते रहना चाहिए । स्वतंत्रता युद्ध के लिए आज कांग्रेस की उत्तरदायी साधन है । इसमें उग्रपंथी हो सकते हैं और अहिंसावादी भी । परंतु दोनों को कांग्रेस की छत्रछाया में खडे होकर साम्राज्यवाद विरोधी शक्तियों का एकीकरण करना चाहिए । अंत में ये कहकर आप सबको आंतरिक भाव प्रकट करूंगा कि महात्मा गांधी दीर्घजीवी हो और हमारा देश उनके नेतृत्व में अपने स्वतंत्रता प्राप्ति के धीरे की ओर आगे पडता रहे और उसे शीघ्र प्राप्त करें । यही समस्त भारत की हार्दिक कामना है । भारत महात्मा गांधी को खोना नहीं चाहता, विषेशकर ऐसे समय में जबकि लोगों में एकता स्थापित करने के लिए उन की आवश्यकता है । क्या केवल युद्ध की कटुता और घृणा से बचाए रखने के लिए हम नहीं चाहते हैं? नहीं नहीं मनुष्यमात्र के हित के लिए हम नहीं चाहते हैं । हमारा युद्ध केवल ब्रिटिश साम्राज्यवाद से नहीं तो संसार भर के साम्राज्यवाद से हैं । अदाह हम केवल भारत के लिए नहीं वरन मनुष्यमात्र के हित के लिए लड रहे हैं । भारत की स्वाधीनता का अर्थ है समस्त मानव जाति का भय मुक्त हो जाना । अपने सहयोगियों के साथ जब सुभाष तीसरा जिले का दौरा करने गए तब मुस्लिम कांग्रेसियों ने उनका भव्य स्वागत किया किंतु मुस्लिम लीग वाले से चढ गए और उन्होंने स्वागत समारोह को छिन्न भिन्न करने के लिए ईंट पत्थर चलाए । इस उपद्रव में अनेक व्यक्ति घायल हुए और सुभाष को भी छोटे हैं । इस घटना के संदर्भ में सुभाष ने अपने वक्तव्य में कहा, मैं इस प्रकार के कार्यों से संबंध रखने वाले व्यक्तियों को ये साफ साफ बता देना चाहता हूँ कि ये ईट पत्थर हम लोगों को अपने पवित्र पद से विचलित ना कर सकेंगे । मेरा अनुमान है कि जो जो जनता की शक्ति नित्यप्रति बढ रही है क्योंकि वो मुस्लिम लीग वाले हताश होते जा रहे हैं और वे प्रकार से पागल होते हैं तो हम लोग उनके रोज का सामना शांति से, अपनी सहनशीलता से और उनकी घृणा का सामना अपने प्रेम से करने का संकल्प लेना चाहिए । इस बीच यूरोप की गतिविधियों का अध्ययन करने के लिए सुभाष ने प्रस्थान किया । इस बार उन्होंने वहाँ की राजनीतिक परिस्थितियों में परिवर्तन देखा । पहले तो ब्रिटेन ने जर्मनी की मांगों को स्वीकार नहीं किया । परंतु जब ब्रिटिश प्रधानमंत्री मिस्टर चेंबरलेन हिटलर से वार्ता करने के लिए जर्मनी गए और वहाँ जाकर जर्मनी की मांगों को मान्यता दी तो सुभाष इसके रहस्य को समझ गए कि ब्रिटेन जर्मनी की अपेक्षा कमजोर होता जा रहा है । भारत आने के साथ ही सुभाष ब्रिटिश जर्मनी समझौते कि उक्त घटना को समझ रखकर अंग्रेजों के विरुद्ध देशभर में घूम घूमकर प्रचार करने लगे । उन्होंने एक सभा में भाषण देते हुए कहा, यदि कांग्रेस सरकार हमें छह महीने के भीतर पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान नहीं करती तो उनके विरुद्ध हम सभी शक्तियों का एकत्रीकरण करके भयानक स्वतंत्रता संग्राम की घोषणा करेंगे और हमारा नारा होगा अंग्रेजों भारत छोडो ।

32. Forward Block Ki Sthapana

ऍम की स्थापना संघ शासन के प्रश्न पर कांग्रेस में तीव्र मतभेद की जडे पहले लगी । सुभाष किसी भी दृष्टि से संघ शासन के पक्ष में नहीं थे । अतएव मतभेद की जडों ने प्रकाश का रूप धारण करना शुरू कर दिया । सुभाष के विरोधियों ने उन्हें नीचा दिखाने का प्रयत्न आरंभ कर दिया । स्वयं गांधी जी ने सभापति के चुनाव को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया । कांग्रेस के सभापति पद के लिए गांधी जी की ओर से डॉक्टरी पट्टाभि सीतारमैया उम्मीदवार हुए और उग्र दिलवालों की ओर से सुभाष का नाम प्रस्तावित हुआ । इस चुनाव में सुभाष के दृष्टिकोण को मान्यता देने वाली पंडित जवाहरलाल नेहरू भी गांधीजी के प्रस्ताव से डगमगा गए और एन मौके पर उन्होंने भी सुभाष का साथ छोड दिया । गांधी और उनकी समर्थक समझता दिग्गत शक्तियां सुभाष को परास्त करने के लिए जुट गई । किंतु उस समय समस्त भारत आश्चर्यचकित रह गया जब राष्ट्र नहीं त्रिपुरा में नेताजी सुभाषचंद्र बोस को दोबारा कांग्रेस अध्यक्ष चुनकर उनका भव्य स्वागत किया । वास्तव में ये पराजय डॉक्टर सीतारमैया की नहीं, स्वयं महात्मा गांधी ही थी और उन्होंने खुले शब्दों में इसे अपनी पराजय स्वीकार किया । सभापति चुने जाने के बाद भी मतभेद की खाई नहीं पटी और इस असहयोग ने सुभाष को मानसिक तथा शारीरिक दोनों रूप में अस्वस्थ कर दिया । कांग्रेस अधिवेशन का समय आते आते हुए अधिका स्वस्थ हो गए । अधिवेशन में सम्मिलित होना उनके लिए असंभव हो गया किंतु उनकी प्रबल इच्छा से बातें होकर सहयोगियों ने उन्हें ले जाने की व्यवस्था की । त्रिपुरा पहुंचने पर उनकी स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि वे जुलूस में सम्मिलित होने के योग्य ना रहे किन्तु शानदार जुलूस निकाला गया । जुलूस ने हाथियों की पंक्ति थी और प्रत्येक पर सुभाष का भव्य क्षेत्र घोषित था । एक सुसज्जित रथ पर उनका एक बडा असर चित्र रख दिया गया था । हजारों की संख्या में लोग इस जुलूस में सम्मिलित थे । अपनी गंभीर बीमारी के कारण सुबह स्वयं कोई वक्तव्य ना दे सके एवं के वक्तव्य को बडे भाई शरत चन्द्र बोस ने अंग्रेजी में तथा आचार्य नरेन्द्रदेव नहीं हिंदी में पढ कर सुनाया । वक्तव्य इस प्रकार था अब हमें संघ योजना की और आपके लगाए चुपचाप नहीं बैठे रहना है वरन अपने स्वराज्य की मांग ब्रिटिश साम्राज्य के समक्ष प्रस्तुत कर ये चेतावनी देनी है कि यदि उन्होंने निश्चित अवधि के भीतर हमें पूर्ण स्वराज नहीं दिया तो हम सारे भारत में सत्याग्रह आराम कर देंगे । सभापति निर्वाचित हो जाने के पश्चात भी विरोधी सदस्यों ने सुभाष का तीव्र विरोध जारी रखा, जिससे सुभाष को मर्मांतक आघात पहुंचा । ये विरोध उनका और प्रजातंत्र पद्धति का बहुत बडा अपमान था । ऐसी स्थिति में सभापति बने रहना उनको अपनी प्रतिष्ठा और स्वाभिमान की वृद्धि लगा । इस अपमान स्थिति को सुभाष अधिक दिन सहना सके । फलता उन्होंने अध्यक्षता से त्यागपत्र देकर फॉरवर्ड ब्लॉक कर संगठन किया, परंतु प्रचारतंत्र और हिंसा के तथाकथित पास को को इतने से भी शांति नहीं मिली । तानाशाही पर उतर कर अपनी प्रतिक्रिया का परिचय देते हुए उन्होंने सुभाष को कांग्रेस ने निकाल बाहर कर दिया और देशभर की कांग्रेस कमेटियों को ये हिदायत कर दी कि सुभाष बोस की कहीं जाने पर कांग्रेस की उनकी सभा में सम्मिलित ना हो और ना ही उन्हें सहयोग दे । कांग्रेस दल से निकलकर सुभाष पूर्ण रूप से फॉरवर्ड ब्लॉक को सुदृढ और संगठित करने में लग गए । उनका तूफानी दौर समग्र भारत में होने लगा । सारे देश में घूम घूमकर क्रांति की ज्योति जगाने लगे और अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध निश्चित कार्यक्रम के अनुसार पूर्ण स्वराज्य के लिए एक साथ सत्याग्रह आन्दोलन करने की घोषणा की । कलकत्ते की सार्वजनिक सभा में सार्वजनिक स्थानों पर से पराधीनता के प्रतीक अंग्रेजों के पुतले हटाने की नियमित एक प्रत्येक सत्याग्रह करने की घोषणा की । सुभाष के भीषण सत्याग्रह प्रदर्शनों और फॉरवर्ड ब्लॉक की तीव्र प्रगति को देखकर ब्रिटिश सरकार आतंकित होती थी । उसने ये समझ दिया कि यदि स्वाद ही जनता के सचिव विद्रोही उन्नायक सुभाष को गिरफ्तार नहीं करती तो ब्रिटिश शासन सत्ता का तख्ता पलटने में देर नहीं । उसने सुभाष को बंदी बनाने में ही अपनी भलाई समझी और सुभाष बंदी बनकर अलीपुर जेल में बंद कर दिए गए । यह वह समय था जब द्वितीय महायुद्ध छिड गया था और ब्रिटिश साम्राज्य की नींव डामाडोल हो रही थी । सुभाष जानते थे कि इस समय ब्रिटिश साम्राज्य अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए महायुद्ध में व्यस्त है और यदि स्वर्ण अवसर पर समग्र देश में संगठित होकर ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध सत्याग्रह शुरू कर दिया जाए तो भारत से अंग्रेजों के पास उखड जाएंगे और भारत पूर्ण स्वाधीन हो जाएगा । तो ये देश का दुर्भाग्य ही था कि युगचेतना की दूरदृष्टि को आपसी फूट में उलझे हुए अदूरदर्शी पतले लोग स्वार्थी कांग्रेसियों ने नहीं समझा और देश ने आजादी शीघ्र प्राप्त करने का सुनहरा अवसर पुराना खो दिया ।

33. Palayan

पलायन, जेल के सींखचों में बंदी सुभाष का मन और मस्तिष्क स्थिर नहीं था । अनेक मानसिक बंधु और वैचारिक उथल पुथल उन्हें चैनल लेनी देती थी और उन्हें क्या करना है, ये गंभीर और उलझा हुआ प्रश्न था, जिसका निदान किसी निश्चित पृष्ठभूमि पर नहीं कर पा रहे थे । द्वितीय महायुद्ध के जो समाचार उन्हें जेल में मिल रहे थे, वे ब्रिटेन की अफवाह पूर्ण प्रचार के कारण इतने उलझे हुए थे की सही स्थिति का अनुमान कर पाना कठिन हो रहा था । उसकी देश पर क्या प्रतिक्रिया हो रही है, ये स्पष्ट नहीं हो पा रहा था । सुभाष ये जानने को उत्सुक थे के संबंध में भारतीयों की क्या विचार है? स्वतंत्रता संग्राम के विषय में कैसे सोचते हैं? भारतीय स्वतंत्रता के लिए विदेशों से क्या सहायता प्राप्त की जा सकती है या ब्रिटेन की शत्रु इस समय उन्हें कहाँ तक सहयोग दे सकते हैं? इन विचारों ने उन्हें पे चयन कर रखा था । इसका निदान पाने के लिए उन्होंने सोचा कि इस समय किसी व्यक्ति को भारत से बाहर भेजना नितांत आवश्यक है । वो व्यक्ति ऐसा होना चाहिए ये ब्रिटिशर उसकी निगाह में महत्वपूर्ण तो हो ही, साथ ही जिस पर भारतीय पूर्ण रुपये निष्ठा रखते हो, लेकिन जब सुभाष ने कार्य की कठिनाई का विचार किया तो उन्हें लगा कि ये काम उन के अतिरिक्त और कोई नहीं कर सकता । अटेक उन्होंने स्वयं बाहर जाने का निश्चय किया परंतु कडा प्रतिबंध था लेकिन ये निश्चित साधारण था । यदि वे जेल से निकल भी आए तो ब्रिटिश सीआईडी उन्हें कितने की तरह नहीं डालेगी । बडी तर्क वितर्क के बाद सुभाष ने भूख हडताल करने का निश्चय किया । उन्होंने अपने आपसे सोचा या तो मैं मर ही जाऊंगा या जेल के सींखचों के बाहर आऊंगा । इस दृढनिश्चय के साथ उन्होंने भूख हडताल आरंभ कर दी । जब सुभाष केस अनशन का पता सरकार को चला तो अधिकारियों में खलबली मच गई । जेल अधिकारियों ने सुभाष से अनशन तोडने को कहा और उन्हें चेतावनी दी । यदि आप जेल के अंदर मर गए थे इसके लिए आप स्वयं जिम्मेदार होंगे । लेकिन सुभाष ने अपना अनशन जारी रखा और उन्होंने मन में निश्चय कर रखा था कि कुछ भी हो जाए या तो मैं जेल के सींखचों से बाहर आऊंगा नहीं तो यतीन्द्रनाथ दास की तरह अपने प्राणों की आहुति दे दूंगा । सात दिन बीत गए केंद्र सुभाष ने अपना अनशन नहीं तोडा । उनकी स्थिरता से घबराकर ब्रिटिश अधिकारियों ने राजकीय भवन में एक गुप्त मीटिंग । डॉक्टरी जांच में उनकी दशा गंभीर बताई गई और विवश होकर उन्हें शर्त के साथ जेल मुक्त कर दिया गया कि एक माह के बाद पुनः बंदी बना लिया जाएगा और ये वही समय था जब विस्तृत पार्क में उनकी मुक्ति का स्वागत अभिनंदन करते हुई कुमारी मृदुल बनर्जी ने उनके मस्तक पर रक्त की रोली अंकित की थी । खून की रोली और राष्ट्रीय लोरी की ओजपूर्ण गुंजरित होती थी । आजादी अधिकार हमारा दिया तिलक ने हमको नाराज वीर सपूतों बाली बाली जाओ, भारत माने तुम्हें पुकारा एक यही अपना अभियान चाहिए, इन चाहिए चाहिए । इसके बाद सुभाष ने अपार जनसमूह को संबोधित करते हुए उन्हें उनके पवन देश और कर्तव्यों की याद दिलाई थी कि पुलिस अधिकारियों ने झपट कर उन्हें भाषण देने से रोक दिया पर उनके समक्ष नजरबंदी का परवाना पेश करते हुए अपनी हिरासत में लेकर उन्हें उनके एल्गिन रोड वाले मकान में नजरबन्द कर दिया । मकान के चारों ओर सशस्त्र पुलिस का पहरा था । क्या मजाल कि कोई चिडिया भी पर मार सके । परिवार के अतिरिक्त ना तो वहाँ कोई आ सकता था और ना कोई वहाँ से जा सकता था । सुबह शेक एकांत कमरे में नजरबंद थे । केवल पारिवारिक सदस्य ही मिल सकते थे । कितनी विडंबनात्मक स्थिति थी कि जो क्रांतिवीर विश्व में क्रांति का सक्रिय प्रयाण आनंद करने के लिए जेल से मुक्त हुआ था, वह पुनः घर की जेल में बंद था । अपने कक्ष में सुभाष विचारमग्न थे । उन्हें लगता था उनकी अंतरात्मा उनका आह्वान कर रही है । सुभाष तुम्हारे लिए अपने उद्देश्य को मूर्तरूप देने का स्वर्ण अवसर आ गया । तुम्हारे जैसे लोक नायक के लिए ये समय घर की चार दीवारियों में बंदी रहकर खामोश बैठे रहने का नहीं उठो सुभाष कुछ हो समग्र भारत आशा और विश्वास से तुम्हारी और निहार रहा है । जननी जन्मभूमि परतंत्रता का बोझ सहते सहती मुक्ति के लिए आप स्कूल भी अकूल है । तुम पर देश की स्वतंत्रता का उत्तरदायित्व है, क्योंकि तुम बराबर लोगों को स्वराज्य का आश्वासन देते हो । ये ना बोलो कि महाराज्य में एक विशेष उद्देश्य के लिए हुआ है और ये उद्देश्य है मात्र भूमि को बंधनमुक्त कराया । यदि तुम स्वयं ही बंदी बने रहोगे तो माँ भारती को कैसे बंधन मुक्त करा सकोगे? अंतर्रात्मा किस प्रबल स्नेहा भर चलाने सुभाष को इस तरह से झकझोर कर रख दिया । मानव सुनसान मैदान में खडे हुए एक दृढ और विशाल वृक्ष को अकस्मिक झंझावात ने भयानक रूप से झगडा छोड दिया हूँ । उनके अंग उपांग एक विचित्र सी झनझनाहट से झनझना उठे अपने विशाल नेत्र को और फैलाकर उन्होंने एकांत कक्ष के चारों ओर इस प्रकार देखा मानो आत्मलीन ता की स्थिति में किसी बिच्छू ने तलवे में टक मार कर उन्हें जगह दिया हो । उन्होंने दीर्घ निश्वास ली । द्वंद्वों की भीड मस्तिष्क पटल पर बढती जा रही थी । छत भर को माथे से हाथ टिकाकर उन्होंने नेत्र बंद कर लिए और मन तथा मस्तिष्क को एक बिंदु पर केंद्रित करने का प्रयास करने लगे । नेत्रपटल पर प्रकाश कि दिव्या रेखा प्रस्फुटित हो रही थी और प्रकाशपुंज से वो आकृति उभरती गई, उभर दी गई और छह प्रतिक्षण प्रकाश रश्मि एक भव्य आकृति में परिवर्तित हो गई । उसने साकार रूप धारण कर लिया । माथुर के सुभाष के आधार पर बताएँ । उन्होंने देखा कि साक्षात् माँ दुर्गा उनके समक्ष खडी है । उनके शरीर से दिव्यज्योति प्रस्फुटित हो रही है । उनके भव्य मुखमण्डल पर अद्वितीय तेज चमक रहा है । उनके विशाल नेत्रों से चिंगारियां निकल रही है । उन की आठ पहुंचाओ में उनकी अच्छी शक्तियां आयुध के रूप में विद्यमान हैं किन्तु उनकी रेश रंजित अधरों पर वात्सल्यपूर्ण मुस्कान थिरक रही है और अगर शब्द प्रस्फुटन करते जा रहे हैं । सुभाष ने उन शब्दों को स्पष्ट सुना, बेटे तो इतना विचलित किया है तो इस चिंता में मग्न है । िवल की है तो मेरा पुत्र हैं, कौन सी बात है जो तुझे आगे बढने से रोक रही है । तेरे मार्ग में कौन रुकावट डाल सकता है । भारत माँ के बंधन मुक्ति संग्राम के लिए तो जान में लिया है क्योंकि इस भ्रम से भ्रमित हो रहा है । मैं तो तेरे साथ हूँ । फुटबॉल अपना कर्तव्य पूर्ण करने के लिए निकल पडो तेरे मार्ग में कोई बाधा नहीं पहुंचा सकता । माँ भारती तुझे पुकार रही । सुभाष ने देखा माँ दुर्गा ने अपना वरदहस्त उसके स्तर पर रख दिया है । उन्हें लगा कि उनके शरीर में दिव्य तेज का संचार हो रहा है । सुभाष अद्वितीय आनंद से रोमांचित हो उठे और सहसा माँ दुर्गा अंतर्ध्यान हो गई । सुभाष की समाधि भंग हो गई और हर्षातिरेक में तीव्र अट्टहास कर उठे । उसी क्षण में उठे और एकांत कोने में बैठ कर माँ दुर्गा की आराधना में लीन हो गए और सी लीनता में उन्होंने भारत से पाला चल करने की योजना निर्धारित कर के योजनानुसार किसी को भी उनके कक्ष में प्रवेश करने की अनुमति नहीं । भोजन के समय वह दैनिक सब द्वार खोल देते हैं । थाली अंदर लेकर पुरा द्वार बंद कर लेते हैं । वे कब खाते हैं, कब सोते हैं, कब क्या करते हैं इसकी किसी को जानकारी नहीं है । कई सप्ताह बीत गए, घर के प्राणियों ने भी सुभाष को नहीं देखा । लोक समाचार पत्र में प्रकाशित इस सूचना से संशकित और आश्चर्यचकित हैं । सुभाषा स्वस्थ है और अपने घर के एकांत कमरे में शक्ति साधना में रत रहते हैं । उनके घर वाले भी उनसे नहीं मिल पाते और उनका खाना भी दरवाजे की सेंस से अंदर रख दिया जाता है । आधी रात बीत रही थी । चारों ओर सन्नाटा व्याप्त था । पुलिस के सशस्त्र पहले के कारण एल्गिन रोड पर तू दूर तक कोई नजर नहीं आया । पुलिस बडी निश्चिंतता के साथ उस भवन की पहरेदारी कर रही थी । तीन और पुलिस के सिपाही कंधे पर बंदूक रखे भवन के बहर प्रांगण में चहलकदमी कर रहे थे और दो तीन सिपाही धवन की पिछली और चारदीवारी के सहारे बैठे हुए उन रहे थे । एक का एक भवन के एक ऊपरी कक्ष का द्वार धीरे से खुला और एक साया बाहर निकलकर सतर्कतापूर्वक चारों तरफ देखने लगे । हर ऊर, पूर्ण नेट स्तब्धता व्याप्त थी । साया नहीं आश्वस्त सांस ली और आहिस्ता आहिस्ता सीढियों से नीचे उतरने लगा । नीचे दालान में आकर उसने फिर आ हटनी पहरेदारों के पदचाप रह रहे कर सुनाई पड रही थी जिसने उसे ये अनुमान लगाने में कठिनाई नहीं हुई कि पहरेदार आशंका रहित मुख्य रूप से बाहर की ओर सक्रिय है । साया धीरे धीरे मकान के पिछले हिस्से की ओर पडा और गलियारे से होता हुआ भवन के पिछले तुम्हार पर पहुंच गया । उसने टटोलकर द्वार की चिटकनी खोली और गृह उद्यान में प्रविष्ट हो गया । उद्यान चारों ओर चारदीवारी से घिरा था और इसमें फूलों तथा फॅमिली लगे थे । साया छत भर छिटका आ हा की और हॉल इसे आम के वृक्षों की ओर बढ कर विद्युत गति से एक वृक्ष पर चढ गया और चारदीवारी पर उतर कर बाहर की ओर कूद गया । एक आवाज हुई फिर सन्नाटा छा गया । पहरेदार सिपाही चौक पडे और चारों ओर घूर घूरकर देखने लगे । सहसा उन है दो चलती हुई आंखे दिखाई पडी और उन्होंने एक बिल्ली अपने सामने से भागती हुई देखी । पहरेदार ने बहुत बिसी गाली दी और होने लगा । साय ने अपना मार्ग दूर दूर तक भयरहित देखा और दबे पाप तेजी से चलते हुए सडक के अंधेरी पटरी पर पडता रहा । अभी वह कुछ ही दूर पहुंचा था की का एक सामने से एक मोटरसाइकिल के आने की आवाज सुनाई पडी और तीव्र प्रकाश में वो ठंड का आस पास कोई ऐसा स्थान ना था जहाँ अच्छे हो सकता है । विवश होकर स्वाभाविकता का स्वांग भरते हुए आगे की ओर पडता क्या ऍम एक का एक मोटरसाइकल उसके सामने आकर रुक गई । एक कडकडाती हुई आवाज में उसे संबोधित किया । वही कांग्रेस पुलिस इंस्पेक्टर था । उसकी वर्दी पर कसाव और आवाज की कडकडाहट इस बात का सबूत दे रही थी कि वह गश्त पर निकला है तो मैं कैसे घूमता है? पुलिस इंस्पेक्टर ने घटकर पूछा और सारे कुछ सिर से पैर तक घूमने लगा । उसने देखा की एक लंबा तगडा और हष्ट पुष्ट अधेड पठान है । पठान पंजाबी जूते, पंजाबी सलवार, लंबा कुर्ता और चौडा साफा बांधे हुए हैं । उसके ऊपर भरी भरी लंबी दाडी मुझे हैं और चेहरे से पठानी रो आप टपक रहा है खुदा के वास्ते तो हमको क्यों परेशान करता है । हम अपने डेरे पर जाता है पठान ने झुंझलाकर जवाब दिया तो नहीं जानता इधर को बगैरा लगता रात में इधर से जाने का हुकुम नहीं है पुलिस इंस्पेक्टर ने ताकि थी हमको नहीं मालूम था बाबा अपनी अनभिज्ञता प्रकट करते हुए पठान ने कहा, आप वेदर कभी नहीं आएगा दही एक किसी गाली देकर पुलिस इंस्पेक्टर आगे बढ गया । पठान ने छह पीछे की ओर मुडकर देखा फिर बडी तेजी के साथ आगे बढ चला और ये साया नेताजी सुभाषचंद्र बोस थे । ब्रिटिश पुलिस की आंखों में धूल झोककर में कभी मोटर, कभी लारी और कभी रेल द्वारा यात्रा करते हुए पेशावर पहुंच गए । पेशावर से काफी ले के साथ उसी भेज में सीमापार की और काबुल पहुंचे । इसी बीच उन्होंने कुछ भरोसेमंद साथी बना लिए । सीमापार करते समय उन्होंने गले में पट्टी बांध ली जिससे उन्हें बोलना पडेगा । उनके साथ ही लोगों से कहते कि यात्री के गले में तकलीफ है । यह बोल नहीं पाता और इसकी दवा कराने के लिए ही वे लोग काबुल जा रहे हैं । उनके काफिले में दो तीन सौ हथियारबंद पठान भी थे जो इस बात के लिए तैयार थे कि यदि आवश्यकता पडी तो वे अपनी जान देकर भी सुभाष की रक्षा करेंगे । सुभाष को सीमा पार कराकर वे पठान वापस चले गए । अपराध अकाल जब सुभाष का नाश्ता ले जाने वाले नौकर के साथ एक पुलिस का सिपाही निगरानी के लिए उनके कक्ष में गया तो कक्ष के दोनों द्वार खुले और कक्ष को बिलकुल खाली । पास तब रह गया उसे काटो खुला था । कई बार आके मलमल कर उसने चारों ओर देखा लेकिन सुभाष का कहीं बताना था । दूसरे ही शायद वो पागल की तरह चलता हुआ, बाहर की ओर भागा भागा फिर सुबह कुंवारी आपको हूँ जो भाग्य कुछ दिनों में बिजली के करंट की तरह सर्वत्र प्रसारित हो गया की पुलिस को चकमा देकर सुभाष अपने भवन से पलायन कर गए । पुलिस अधिकारी और सरकार का दिल दहल गया । वायरलेस द्वारा चारों और ये सूचना प्रसारित कर दी गई कि भारतीय क्रांतिकारी सीमापार करने के प्रयत्न में है । वह जहाँ भी मिले तुरंत गिरफ्तार कर लिया जाए । सरकार की सीआईडी सुभाष को गिरफ्तार करने के लिए देश के कोने कोने में दौड पडी । काबुल पहुंचकर सुभाष एक सराय में ठहरे । उनके साथ उनके सहयोगी मित्र भगत राम तलवार भी थे । उनके काबुल में रहते हुए एक भारतीय सीआईडी को उन पर शक हो गया । उसने उनके प्रति संदेह प्रकट किया और उन्हें गिरफ्तार करना चाहा । सुभाष ने उसे कुछ राशि घूस में देकर शांत की किंतु इतना ही पाकर शांतना हुआ और दूसरे दिन फिर आ पहुंचा । उसकी गिद्धदृष्टि सुभाष की घडी पर थी । जो उन्हें अपने पिता से उपहार में मिली थी, बहुत कीमती और सुंदर थी । साथ ही भगत राम तलवार ने सुभाष को उसका आशय बताया और सुभाष से उसे घडी देने के लिए कहा । घडी पाकर वो प्रसन्न होता हुआ चला गया किंतु उन्हें आशंका बनी रही कि अगले दिन वो फिर आ सकता है । भगत राम तलवार ने भारतीय व्यापारी उत्तमचंद के घर और दुकान का पता लगाने की कोशिश की किन्तु उस दिन में सफल नहीं हुआ । अतः सीआईडी से बचने के लिए दोनों व्यक्ति दूसरी सराय में चले गए । अगले दिन भगत राम तलवार को उत्तमचंद की दुकान का पता मिल गया जो नदी के तट पर थी । उत्तमचन्द चीनी के बर्तनों का व्यापारी था । उत्तमचंद संदेशवाहक के रूप में जर्मन दूतावास में गए और टॉमस से मिले हिंदू है । सिर्फ यही बताया कि जर्मन मंत्री ने फिलहाल उन की देखभाल करने के लिए कहा है । प्रत्यक्ष में कोई खतरा ना देखकर दोनों व्यक्ति उत्तमचंद के घर पर अतिथि के रूप में रहने लगे । यहाँ सुभाष ने थॉमस के जरिए जर्मन मंत्री के नाम एक व्यक्तिगत पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने अपने अकेले ही आगे बढने के फैसले से सूचित किया । भगत राम थॉमस से पुनः मिले । उन्होंने सलाह दी कि उन्हें इटली के मंत्री से मिलना चाहिए । इटली का दूतवास न्यू काबुल की एक बंद गली में था । मंत्री से मिलने पर उन्होंने बताया कि थॉमस ने उन्हें भेजा है । मंत्री ने फोन द्वारा टॉमस से विवरण प्राप्त किया और दरवाजा बंद कर के भगत राम से बातें करने लगा । इटली के मंत्री ने बताया कि खतरा सिर्फ अफगानिस्तान में ही नहीं वरन रूस में भी है । साथ ही साथ उन्होंने ये भी बताया कि तीनों धूरी शक्तियों ने सोवियत सरकार से प्रार्थना की है कि वह सुभाष चंद्र बोस को अपने देश होकर जाने दे । आशा दिलाते हुए उन्होंने कहा कि रूस से उनके अच्छे संबंध है और रूस से होकर जाने की व्यवस्था हो जाएगी । अगर ऐसा न हो सका तो सीरिया और ईरान में होकर नेताजी के जाने की व्यवस्था की जाएगी और उन देशों से होकर रूम या बर्लिन जाना आसान होगा । भगत राम ने लौटकर सुभाष को बताया कि इटली के मंत्री मिलना चाहते हैं । पहले तो सुभाष को झुंझलाए केंद्र परिस्थिति की गंभीरता को समझाते हुए उन्होंने मिलना स्वीकार कर लिया । सुभाष ने अपना चेहरा बदला और उत्तम चंद का एक सूट पहन लिया । करा खुली टोपी लगाकर भगतराम के साथ डेढ मील का रास्ता पैदल तय करके इटली के दूतावास में पहुंचे । दूतवास के द्वार पर पहुंचकर भगत राम ने द्वार पर दस्तक दी । एक अफगान ने आकर द्वार खोला । उसके द्वार खोलते ही पीछे से गिटार लेना गया और अफगान को सामने से हटने का आदेश दिया । भगत राम सुभाष को लेकर मंत्री के कक्ष में प्रविष्ट हुए परिचय कराते हुए भगत राम ने कहा, अब है हमारे क्रांतिकारी नेता सुभाष चंद्र बोस और आप है इटालियन मंत्री । दोनों वरिष्ठ व्यक्तियों ने आगे बढकर तब आप से हाथ मिलाया । मैं आपको इस अभियान की सफलता के लिए हार्दिक शुभकामनाएं देता हूँ । इटालियन मंत्री ने अपनी शुभकामनाएं और प्रसन्नता व्यक्त की । धन्यवाद गंभीर मुस्कान के साथ सुभाष ने अपना आशा प्रकट किया । का बुला जाने से ही मेरा उद्देश्य पूरा नहीं हो जाता । मुझे अभी बहुत कुछ हासिल करना बाकी है । इसके लिए मुझे हर व्यक्ति की मदद की आवश्यकता है जो हमें गुलाम बनाने वालों से लड रहे हैं । मेरे विचार से अब आप ही हमारे पास ठहरे ताकि हम लोग आगामी योजना पर विचार विमर्श कर सके । इटालियन मंत्री ने सुझाव रखा, सुभाष नहीं । सुझाव पसंद किया और दूतवास नहीं ठहर गए । भगत राम तलवार वापस लौट गए । इधर सुबह इटली के द्वितीय सेक्रेटरी श्री रजनी के साथ दारू नमन गए । यहाँ पासपोर्ट के लिए उन्होंने अपना चित्र के छाया और एक दिन जर्मन पासपोर्ट द्वारा एक जर्मन को रोककर सुभाष को जर्मनी भेज देने की व्यवस्था की गई और बर्लिन पहुंचते ही उन्होंने रेडियो द्वारा अपना वक्तव्य प्रसारित किया । हमें जर्मनी, जापान और इटली की भीतरी राजनीति से कोई मतलब नहीं । दुश्मन का दुश्मन दोस्त और दोस्त का दुश्मन दुश्मन राजनीति का ये साधारण और प्रथम पाठ है । हमें धूरी राष्ट्र से सहायता लेनी चाहिए क्योंकि वे हमारे दुश्मन अंग्रेजों के दुश्मन है । दुश्मन को टन करने के विचार से भी किसी अन्य राष्ट्र की सहायता लेनी चाहिए ।

34. Duri Rashtron Se Sampark

धूरी राष्ट्रों से संपर्क बोलिन पहुंचकर सुभाष ने अडॉल्फ हिटलर से भेंट की । एडॉल्फ हिटलर ने बडी गर्मजोशी के साथ हाथ मिलाते हुए कहा, हमें बडी खुशी है कि आप सकुशल यहाँ आ गए । उनका धन्यवाद अदा करते हुए सुभाष ने अपनी योजना उनके सामने रखी । वास्तव में में इस समय ये जानना चाहता हूँ कि मुझे भारत की स्वतंत्रता पाने के लिए कौन सा रास्ता चलना चाहिए । मैं अजीब सी उलझन में हूँ । मेरे देश के नेताओं का रवैया इस मामले में मुझे बिल्कुल अलग है । वे अहिंसा हिंसा चलाते हैं । मेरी समझ में नहीं आता कि क्या ब्रिटिश सरकार उनकी मांगों को पूरा करेगी? क्या वह भारत को पूर्ण प्याज स्वाधीन करेगी? मेरे विचार से जैसा विश्वासघात, धोखेबाजी, व्यवहार आप लोगों के साथ ब्रिटिश साम्राज्य में क्या है? लगभग वैसा ही बर्ताव वह भारतीयों के साथ कर रहे हैं । आपका इस संबंध में क्या विचार है? सुभाष के इस वक्तव्य पर हिटलर कुछ देर तक आपने आपने विचारमंथन करते रहे । फिर बोले, मैं आपके विचारों से पूरी तरह सहमत हूँ कि बडी सरकार धोखेबाजी और विश्वासघात की नीति को नहीं छोडेगी । जैसा कि अपने पिछले मुलाकात में अंग्रेजों के चरित्र और स्वभाव के बारे में चर्चा करते हुए इंगित किया था, वास्तव में आज उसी को घटित होते देख रहा हूँ और इसी आधार पर इस निर्णय पर पहुंचा होगी । बिना हथियार उठाए उनसे स्वतंत्रता की आशा करना व्यर्थ है । मैं तो यह समझता हूँ कि एक सशस्त्र सेना, कुछ हजार टुकडी हजारों लाखों अस्तित्वहीन क्रांतिकारियों को काबू में कर सकती हैं । मेरे विचार से तब तक हम अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सकते जब तक विदेशी शक्तियों की सहायता लेकर बाहर की ओर से सीमा पर धावा नहीं बोलते हैं । इन्हीं विचारों से सहमती रखते हुए मैं आपसे सहयोग की अपेक्षा करता हूँ । सुभाष ने स्वीकारात्मक भाव से कहा, मेरा हर प्रकार का सहयोग आपके साथ है । इन्द्रचंद होगी । भारतीय सेना का दसवां ब्रिगेट लिबिया में हमारे वृद्ध युद्ध कर रहा है । हिटलर ने चिंता व्यक्त की । मैं शीघ्र ही भारतीय सेना के नाम अपना संदेश प्रसारित करूंगा । मैं उनके समक्ष स्थिति की वास्तविकता रखते हुए जर्मन के वृद्ध युद्ध न करने की अपील करूंगा । आप विश्वास रखी है कि वे मेरी बात अवश्य मान जाएंगे । सुभाष ने हिटलर को आश्वस्त किया कुछ देर तक दोनों वरिष्ठ राजनीतिज्ञ विभिन्न राजनीतिक स्थितियों पर बात करते रहे और फिर सुभाष इटली के लिए प्रस्थान कर गए । ये उनका एक तूफानी दौरा था जिसमें मैं उन सभी धूरी राष्ट्र के सर्वोच्च अधिकारियों से मिले जो ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध थे । वह भारतीय स्वतंत्रता के प्रति सहयोग, सहानुभूति और सहायता की भावना रखते थे । उन्होंने रोम में मुसोलिनी से भेंट की । कियानी और इवेंट रब से मुलाकात की । भ्रमण करने के पश्चात विपिन अहा जर्मनी पहुंचे और उन्होंने जर्मन के विरुद्ध लड रही भारतीय सेना के नाम एक संदेश जर्मन वायुयानों के द्वारा ब्रिगेट पर गिराया । संदेश इस प्रकार था मैं तो मिनी पहुंच गया हूँ । आप से मुझे एक लंबी कथा कहनी । आपको विधि होना चाहिए कि ये युद्ध हमारा युद्ध नहीं है । ब्रिटेन और जर्मनी की आपसे युद्ध से हमारा कोई संबंध नहीं है । मैं चाहता हूँ कि आप युद्ध बंद करते हैं ।

35. Azad Hind Sena Ki Sthapana

आजाद हिंद सेना की स्थापना सुभाष ने जर्मन के विरुद्ध युद्ध बंद करने के लिए भारतीय सैनिकों के बीच ये संदेश पत्र गिराए थे । सैनिकों पर उनकी तीव्र प्रतिक्रिया हुई । सैनिकों ने नेताजी के संदेश के शब्द शब्द को समझा और अंग्रेजों की कमान से निकलकर अदम्य उत्साह और साहस से आगे बढे । उन्होंने सुभाष के आदेशानुसार जर्मन फौज से संधि करने का निश्चय किया और कर्नल हसन अली के नेतृत्व में संधि का झंडा उठाकर के जर्मन फौज की ओर पढे । जर्मन फौज के कमांडर ने देखा कि ब्रिटिश वाज का भारतीय दस्ता आत्मसमर्पण करने के लिए आ रहा है तो उसने विचार किया कि शायद दुश्मन की नीति नजदीक आकर एका एक हमला करने की हो । अच्छा उसने अपनी फौज को अलर्ट रहने का हुक्म दिया और भारतीय टुकडी के पास आने की प्रतीक्षा करने लगा । जर्मन फौज के निकट पहुंचकर भारतीय टुकडी रुक गई और उनका एक संदेश वाहक तीव्रगति से जर्मन कमांडर के पास किया । उसने स्थिति प्रकट करते हुए बताया कि कर्नल हसन उनसे मिलना चाहते हैं । स्वीकारोक्ति पाकर संदेशवाहक लौट गया । जर्मन कमांडर ने कर्नल हसन अली का स्वागत की और ब्रिटिश सेना से अलग हो जाने के लिए बधाई दी । इस संधि की सूचना वायरलेस द्वारा सुभाष चंद्र बोस को प्रेषित की गई और उन्होंने युद्धस्थल पर पहुंचकर भारतीय सैनिकों को उनकी सद्भावना के लिए धन्यवाद देते हुए उनके नायकत्व को संभाल लिया । लाडले नेता को अपने बीच पाकर भारतीय सैनिकों ने जय हिंद का जयघोष किया और उन्हें विश्वास दिलाया कि हर क्षण में उनके साथ है । सुभाष के प्रभाव में आकर पैंतालीस हजार भारतीय सैनिकों ने आत्मसमर्पण कर दिया और उनके आदेश की प्रतीक्षा करने लगे । ये वही प्रथम अवसर था जब सुभाष ने आजाद हिंद सेना की स्थापना कि उन्होंने ड्रेस जिनको अपना प्रधान कार्यालय बनाया और सेना के निरीक्षण का संपूर्ण दायित्व स्वयं संभाला । सेना को संबोधित करते हुए उन्होंने अपने प्रधान लक्ष्य को दोहराते हुए कहा, साथियों याद रहे हो, ब्रिटेन हमारा तथा जर्मनी दोनों का क्षेत्र है और हमें जर्मनी की सहायता से अपने स्वतंत्रता संग्राम की तैयारी करनी है । वक्तव्य के पश्चात सुभाष ने आजाद हिंद सेना के सम्मुख राष्ट्रीय ध्वज लहराते हुए कहा, हमें प्रतिज्ञा लेनी चाहिए कि हमने इस राष्ट्रीय झंडे को महत्व दिया है । उसे कभी मिटनी नहीं देंगे । सैनिकों ने दृढतापूर्वक ये संकल्प दोहराया हिटलर सुभाष के व्यक्तित्व और संगठन शक्ति से इतना ज्यादा प्रभावित हुए कि उन्होंने आजाद हिंद सेना को हर प्रकार की सुविधाएं दी । उन्होंने आजाद हिंद सेना के निवास की व्यवस्था तो की ही साथ ही उसे अपना स्वतंत्र रेडियो स्टेशन स्थापित करने की भी छूट दे दी । संपूर्ण जर्मनी नेताजी से प्रभावित था । बडे बडे अधिकारी उनका सम्मान करते थे और स्वयं फ्यूचर हिटलर ने उन्हें भारतीय क्यूरा और एक्सिलेंसी की उपाधि प्रदान की । एक विशेष अवसर पर सुभाष ने डाल फिर टेलर को सैनिक परेड के समय आमंत्रित क्या हिटलर ने आजाद हिंद सेना की सलामी ली और अपने भाषण में गद्गद कंठ से कहा, महान भारत के निवासियों आप धन्य है और आप के नेता भी धन्य हैं । आपने नेताजी का दर्जा मुझसे कहीं ऊंचा है । मैं केवल आठ करोड जर्मनों का नेता प्रंतीय, चालीस करोड भारतीयों के नेता । वह प्रत्येक बाद में मुझसे बडे राष्ट्रनायक हैं । मैं और मेरी जर्मन सैनिक उन्हें प्रणाम करते हैं । मुझे पूर्ण विश्वास है कि नेताजी के नेतृत्व में महान भारत एक दिन अवश्य स्वतंत्र होगा । बहुत लेन रेडियो पर समस्त विश्व के भारतीयों के लिए एक संदेश प्रसारित करते हुए सुभाष ने दृढ सारगर्भित शब्दों में कहा, हमको अपने विजय का पूर्ण विश्वास है । हमारे भारत भूमि पर हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है । हम अपने भाग्य विधाता स्वयं बनेंगे और जब तक भारत भूमि पर एक भी जिंदा भारतीय बाकी होगा, तब तक हमारे अधिकार अच्छा रहेगा । इस अधिकार के साथ हम अपने आत्मविश्वास के बल पर यह घोषणा करते हैं कि हम पूर्ण गया, स्वतंत्र हैं और अपनी जान पर खेलकर भारत की स्वाधीनता कायम करेंगे और दुनिया में उसके नाम पर डब्बा नहीं लगने देंगे । जब तक हम हथियारों के बल पर हम पर शासन करने वाले एक एक विदेशी को चुनकर अपने देश के बाहर ना निकालेंगे तबतक चैन नहीं लेंगे । सुभाष के इस रेडियो प्रसारण ने मनाया । जापान, सिंगापुर, वर्मा और भारत आदि के भारतीयों के रोम रोम में क्रांति की चिंगारियां लगा दी ।

36. Samayik Paristhitiya

सामयिक परिस्थितियां सर उन्नीस सौ चालीस में महायुद्ध की जो आज यूरोप और मध्यपूर्व में लगी थी । उसकी लपेट दक्षिणपूर्व एशिया की तरफ भी आने लगी थी । उन्नीस सौ इकतालीस के समाप्त होते होते जापान में मनाया और पच्चीस इंडीज पर आक्रमण कर दिया और उसे अपने अधिकार में कर लिया । सन उन्नीस सौ बयालीस में ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा शासित सिंगापुर बडे नाटकीय ढंग से जापानियों के अधिकार में आ गया । इतना ही नहीं, जापानी आक्रमण को रोकने में ब्रिटिश इतने दुर्बल सिद्ध हुए कि जापानी वर्मा आधी पार कर भारतीय सीमा पर आ पहुंचे । उधर टोक्यो में भारतीय क्रांतिकारी राजबिहारी बोस के प्रयत्न से भारतीयों की कॉन्फ्रेंस होने जा रही थी, जिस से मनाया वर्मा, सियाम, इंडोचीन एवं जापान आदि के भारतीय प्रतिनिधि सम्मेलन थे । एक कॉन्फ्रेंस स्वामी सत्यानंद पूरी की । विमान दुर्घटना में मृत्यु के कारण शोकपूर्ण वातावरण में हुई । कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष श्री राजबिहारी पोस्ट है । तीन दिन के विचार विमर्श के बाद स्वाधीनता संघ की स्थापना करने का निश्चय किया गया । पूर्व निश्चय के अनुसार सियाम देश की राजधानी बैंकॉक में भारतीयों के प्रतिनिधियों की एक सभा हुई । इसमें मनाया, जावा, सुमात्रा, इंडोनेशिया, इंडोचीन, बोर्नियो, हांगकांग आदि के एक सौ भारतीय प्रतिनिधि उपस्थित थे । इसके भी सभापति श्रीराज बिहारीबोस थे । प्रतिनिधि सभा ने भारतीय स्वाधीनता संघ की स्थापना के संघ के उद्देश्य भारत के लिए पूर्ण स्वाधीनता प्राप्त करना और इस उद्देश्य की सिद्धि के लिए भारतीय सेना का संगठन करने तथा अन्य आवश्यक कार्यवाही को करने की घोषणा की गई । संघ की कार्यकारिणी का चुनाव हुआ जिसमें श्री राजबिहारी बहुत सभापति और श्री ए राघवन के पी । के । मैंने कैप्टन मोहन सिंह, कर्नल जी के । गिलानी सदस्य चुने गए । संघ ने कांग्रेस के झंडे को ही अपना राष्ट्रीय झंडा स्वीकार किया । भारतीयों की सेना के संगठन का भार कैप्टन मोहन सिंह पर था और संघ के विस्तार गठन आदि के लिए प्रधान श्री राजबिहारी और सिंगापुर के सुप्रसिद्ध बारिश श्री एंड राजभवन जिम्मेदार थे । दक्षिणपूर्व एशिया के सभी देशों के भारतीय खुले दिल से भारतीय स्वाधीनता संघ के सदस्य बन गए । सिर्फ मलाया में ही लगभग दो लाख मेंबर बनी । मनाया मिश्री, राघवन और मैंने उन का काफी प्रभाव था । इसलिए बहुत शीघ्र ही संघ एक शक्तिशाली प्रतिनिधि सभा के रूप में परिणीत हो गया । दूसरी ओर भारतीय सेना का कार्य भी कैप्टन मोहन सिंह के नेतृत्व में आगे बढ रहा था । ब्रिटिश सहनशक्ति पराजय के कारण लगभग सात हजार भारतीय युद्धबंदी प्रिजनर्स अफॉर्ड जापान के कब्जे में आ गए थे । जापानियों के कब्जे में भारतीय बंदियों का असंतोष बढ गया क्योंकि जापान उनके भोजन आदि की व्यवस्था समुचित रूप में नहीं कर सका । अतः जापानी अधिकारियों ने भारतीय युद्धबंदियों को कैप्टन मोहन सिंह के सुपूर्द कर दिया । इससे कैप्टन मोहन सिंह को अपने उद्देश्य में सफलता मिली । भारतीय युद्धबंदियों के रूप में सैनिक ही नहीं वरन अधिकारी भी भारतीय सेना में सम्मलित हो गए जिनमें के । शाहनवाज खान, सहगल, भौसले और डेलन आदि के नाम उल्लेखनीय हैं । किंतु अधिकारी किचन के अधिकारी भारतीय सेना को जापान के आधीन रखना चाहते थे । इसके लिए भारतीय स्वाधीनता संघ तैयार नहीं था क्योंकि भारतीय जापानियों से बराबरी का दावा रखते थे । श्री राजबिहारी बहुत ने टोक्यो जाकर इस समस्या को सुलझाने की कोशिश की । इंदु जापानियों ने अपनी नीति स्पष्ट नहीं की और उनकी उदासीनता के कारण जापानी अधिकारियों ने कैप्टन मोहन सिंह तथा कर्नल गिलानी को गिरफ्तार कर लिया । मोहन सिंह की गिरफ्तारी से भारतीयों में असंतोष फैल गया । इसी बीच फॅमिली के अंदर और के प्रारंभ में एक घटना और हो गई जिससे भारतीय और जापानियों का मतभेद पड गया । घटना ये थी कि जापानियों ने बिना संघ के कार्यकर्ताओं की अनुमति के एक जहाज सिंगापुर से भारतीय सेना को लाने के लिए भेजा । हिंदू सेना के उच्च अधिकारियों ने जहाज को ये कहकर लौटा दिया इसे वापस भेजा जा रहा है क्योंकि ये सेना जापानी स्वार्थ और आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए नहीं । इस कांड से जापानी सैनिक अधिकारियों का रोष बढ गया और जापानियों तथा भारतीयों में विरोध की गहरी खाई तैयार हो गयी । श्रीराज बिहारीबोस, श्री एन राघवन आदि को जापानी अधिकारियों के इस प्रकार के बर्ताव से बहुत शोक हुआ । श्रीराज बिहारीबोस जापान सरकार को समझाने के लिए जनरल तो जो से मिले परंतु जापान सरकार ने कोई निश्चित घोषणा नहीं थी । भारतीय अपने देश की स्वाधीनता के लिए प्राणोत्सर्ग करने के लिए कटिबद्ध थे और जापानी अधिकारी अपनी अदूरदर्शितापूर्ण नीति के कारण उसमें बाधक बन रहे थे ।

37. Tokyo Mein

टोक्यो में बर्लिन में सुभाष को श्रीराज बिहारीबोस का टोकियो से प्रेषित किया गया पत्र मिला, जिसमें श्रीराज बिहारीबोस ने भारतीय स्वाधीनता संघ का संदर्भ देते हुए अपनी स्थिति स्पष्ट की थी और सुभाष को टोक्यो आने के लिए आमंत्रित किया था, जिसके उत्तर में सुभाष ने उन्हें दो माह के अन्दर आपने टोक्यो पहुंचने का आश्वासन दिया था । सुभाष उस समय अपनी आजाद हिंद सेना का संगठन करने और राष्ट्र से सहयोग प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील थे । दो महापंचायत टोक्यो प्रस्थान करने से पूर्व उन्होंने अपनी सेना को संबोधित करते हुए कहा, साथ ही हो हमारा केवल एक उद्देश्य है और वह भारत के लिए पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करना । अपनी सीधे की पूर्ति के लिए मैं आज तुम लोगों से अलग हो रहा हूँ । केंद्र में विश्वास दिलाता हूं कि यदि यातायात की सुविधाएं प्राप्त हो गई तो मैं बहुत शीघ्र तुम सबको अपने पास बुला लूंगा । जय हिंद के गगनभेदी नारों से सैनिकों ने अपने हृदय नायक को सलामी दी । अपने सैनिकों को संबोधित करने के पश्चात सुभाष अडॉल्फ हिटलर से मिले और उन्हें अपने टोक्यो जाने के विषय में बताया । फिर सुभाष कर्नल हसन के साथ एक वायुयान में बैठकर क्यों क्यों के लिए रवाना हो गए । जिस समय सुभाष जापान की राजधानी टोक्यो में पहुंचे श्रीराज बिहारीबोस तथा अन्य भारतीय प्रतिनिधियों ने बडे हर्ष के साथ स्वागत किया । भारतीयों ने सुभाष को पुष्पमालाएं पहले सुभाष ने अपने स्वागत समारोह के लिए धन्यवाद किया । कई सप्ताह टोक्यो में रहकर सुभाष ने जनरल तो जो सिंघम इट्स टू आदि से जोरदार शब्दों में स्पष्ट रूप से बातें कहती उनके व्यक्तित्व, जीवन, ओजस्वी वाणी से प्रभावित होकर जनरल तो उन्होंने उनकी सब शर्त स्वीकार कर ली । तो क्या मैं सुभाष ने प्रेस प्रतिनिधि को वक्तव्य देते हुए कहा पिछले महायुद्ध में अंग्रेजों ने भारतीयों के साथ जैसा छल किया, ऐसा मौका फिर अंग्रेजों को नहीं दिया जाएगा । ये भारतीयों ने निश्चय कर लिया है । हमारा देश स्वर्ण अवसर की प्रतीक्षा कर रहा था, वो आ गया है । अब अगले सौ वर्षो में ऐसा मौका फिर नहीं आएगा । हमें अपना सर्वस्व देकर आजादी प्राप्त करनी है । हम तलवार का जवाब तलवार से ही देंगे । ब्रिटिश साम्राज्य का धन से होने तक हमारे जारी रहेगा । साम्राज्यवाद की चिता पर ही स्वतंत्र भारत का जन्म होगा और हमें तब तक आगे बढते रहना है जब तक विजय प्राप्त हो जाएगा । जापानी अधिकारियों ने सुभाष को पूरा सहयोग देने का आश्वासन दिया इसके पश्चात सुभाष ने अपने देश वासियों को रेडियो द्वारा संदेश दिया । मैं जानता हूँ कि मेरे कुछ देशवासी जो अंग्रेजी संस्थाओ और अंग्रेजों की अफवाहों से प्रभावित है, हमारी शक्ति के प्रति संदेह करते हैं । मैं चाहूंगा कि भारतवासी मुझ पर अपना पूर्ण विश्वास रखते हैं । क्रूर शक्तिशाली ब्रिटिश सरकार, जो मुझे जिंदगी भर अकारण दंड देती रही है और ग्यारह बार मुझे जेल के सींखचों में कैद किया, परंतु मुझे मेरे धीरे यह पद से विचलित करने में कामयाब नहीं हुई है । उन सभी भारतीयों ने, जो देश के बाहर है, जो देश के अंदर शत्रुओं के अधीन नहीं रह रहे हैं, अब एक होकर एक सदृढ संस्था का निर्माण कर लिया है । दोस्तों मैंने एक बार अतीत में हमको विश्वास दिला चुका हूँ कि यदि अवसर आता है तो मैं और मेरे जैसे अनेक सेनानी कष्टों और युद्ध के गौरव में आपके साथ साथ होंगे और सब विजय की खुशी में हिस्सा बताएंगे । भारत आजाद होगा । बहुत शीघ्र स्वतंत्र भारत जेल के किवाडों को खोल देगा, ताकि उसके होनहार बेटे जेल के अंधेरी कोठरी से निकल कर स्वतंत्रता की रोशनी में कदम रख सके और अपने मन की मुराद और खुशी हासिल कर सके । इन्कलाब जिंदाबाद, आजाद हिंद जिंदाबाद रेडियो से अपना भाषण प्रसारित करने के पश्चात सुभाष ने श्रीराज बिहारीबोस से भेंट की और उनसे सिंगापुर में मिलने का वादा कर बर्लिन के लिए रवाना हो गए ।

38. Delhi Chalo Delhi Chalo

दिल्ली चलो दिल्ली चलो बाॅन पहुंचे । यहां पर उन्होंने सिंगापुर जाने के लिए एक बोर्ड ते की, जिसके चालक फर्नांडिस टीचर ने बडी कुशलता के साथ सुभाष को सिंगापुर तट पर पहुंचा दिया । उसने यात्रा के दौरान सुभाष के अनजाने में उनका एक चित्र खींच लिया । जिस समय सुभाष के सिंगापुर पहुंचने की सूचना भारतीय स्वाधीनता संघ को मिली, समग्र सिंगापुर में उमंग और उत्साह की लहर हो गई । वहाँ पर सुभाष का जब भूतपूर्व स्वागत हुआ, वह सिंगापुर के इतिहास में बी जोड हैं । भारतीय स्वाधीनता संघ की जो जटिल समस्या उलझी हुई थी और जिसे सुलझाने में जापानियों और भारतीयों के बीच रस्सा कशी चल रही थी, उसे सुभाष ने पूर्ण गया सुलझा दिया । यहाँ आकर उन्होंने देखा कि भारतीय स्वाधीनता संघ और आजाद हिंद फौज के बीच मतभेद की शाखाएं पनप रही है । सुभाष ने इस मतभेद को बडी कुशलता के साथ समाप्त कर दिया । उन्होंने भारतीय स्वाधीनता संघ और आजाद हिंद फौज दोनों को एक पेड की दो शाखाओं के रूप में अपने अपने विकास के लिए परस्पर निर्भर बताया और अब ये स्वीकार कर लिया गया कि संघ अभिभावक कमेटी है, किंतु उसका पद पूछा नहीं माना जाएगा । सिंगापुर के प्रथम ऐतिहासिक सम्मेलन के अवसर पर सुभाष के नेतृत्व में दक्षिणपूर्व एशिया की भारतीयों ने भारत के स्वाधीनता आंदोलन का उपयुक्त ढंग से शुभारंभ किया । इस अवसर पर सुभाष ने अध्यक्ष पद से भाषण देते हुए कहा पूर्व एशिया में भारत स्वाधीनता आंदोलन का नेता चुनकर आपने मुझे जो सम्मान और प्रतिष्ठा प्रदान की है उसके लिए मैं आप लोगों को अपनी अंतरात्मा से धन्यवाद देता हूँ । मैं ये उत्तरदायित्व स्वीकार करता हूँ किन्तु ऐसा में परम सेवा ही दिया था की भावना से कह रहा हूँ और मैं प्रार्थना करता हूँ कि ईश्वर मुझे अपने कर्तव्य को पूर्ण करने की शक्ति दे जिससे अपने देशवासियों और प्रवासी भारतीयों को पूर्ण सन्तुष्ट कर सकू । किसी दिन आजाद हिंद फौज ने टाउन हॉल के समक्ष शानदार परेड की । इस अवसर पर सुभाष ने फौज को अत्यंत ओजपूर्ण स्वर में संबोधित किया । भारत की स्वाधीन सेना के सिपाहियों आज करेंगे मेरे जीवन का सर्वाधिक गौरवशाली दिन है । आज मुझे समस्त भारत को यह सूचित करते हुए अपार गौरव और अद्भुत आनंद का अनुभव हो रहा है कि भारत की स्वाधीन सेना का निर्माण हो गया है । ये फौज भारत को स्वतंत्र ही नहीं करेगी । वन स्वतंत्र भारत की भावी सेना का निर्माण भी इसी के द्वारा होगा । मेरे साथियों और सैनिकों हमारा नारा होगा दिल्ली चलो दिल्ली चलो सैनिक होने के नाते आपको सजा तीन आदर्श अपने सामने रखने हैं विश्वास, पात्रता, ऍम और बलिदान । मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि सदैव आपके साथ रहूंगा । अधिकार और प्रकाश में, दुख सुख में तथा जय पराजय में भी । ये बात महत्वहीन है कि भारत की आजादी देखने के लिए हम में से कौन जिंदा रहेगा । हमारे लिए इतना ही काफी है कि भारत आजाद होगा और इसे आजाद कराने के लिए हम सब अपना सर्वस्व समर्पित कर देंगे । इस समय में आपको भूख, प्याज और संघर्ष के अतिरिक्त कुछ नहीं दे सकता हूँ । भगवान हमारी सेना को आशीर्वाद दे और भावी युद्ध में विजय प्रदान करें । इन्कलाब जिंदाबाद, आजाद हिंद जिंदाबाद, उपस् थित जनसमूहों और सेना के सिपाहियों ने अनुभव किया कि आज उन्हें वास्तविक नेता मिला है जो वास्तव में स्वतंत्रता प्राप्त करा सकता है । आजाद हिंद फौज ने नेताजी को सलामी दी । उस समय जनरल तो जी भी उपस्थित थे । उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा, निश्चय ही सुभाष चंद्र बोस स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति होंगे । जापान को भारत पर किसी राष्ट्रपति को लादने का अधिकार नहीं है । सुभाष ने दक्षिण ही जनरल तो जो के वक्तव्य का खंडन करते हुए अपनी सद्भावना प्रकट की । स्वतंत्र भारतीय जनता जिसे चाहेगी उसे अपना प्रथम राष्ट्रपति चुनेगी । मैं तो स्वतंत्रता का सेवक मात्र हूँ । सुभाष के सारगर्भित वक्तव्य पर उपस्तिथ जनसमूह मंत्र मुग्ध हो था । उत्साह से सराबोर होकर गगनभेदी कर कल ध्वनि की ।

39. Jandhan Ki Mang

जन धन की मांग आजाद हिंद फौज का संगठन करने के साथ ही उसकी व्यवस्था और संबंधित आवश्यकताओं पर सुभाष ने गंभीरतापूर्वक विचार किया । वो इस निष्कर्ष पर पहुंचे । सैनिक संगठन के लिए उन्हें जनता से आर्थिक सहयोग और उसकी सहानुभूति प्राप्त करना आवश्यक है । इस विचार को दृष्टिपत्र में रखते हुए सिंगापुर की एक विराट सभा में उन्होंने अपना आशय स्पष्ट किया । बहनों और भाइयों, सबसे पहले ही सपा, जो उसके साथ आप ने मेरा स्वागत किया, उसके लिए मैं आपको हृदय से धन्यवाद देता हूँ । विशेष रूप से हमारी बहनें धन्यवाद की पात्र है, विशाल संख्या में उपस्थित हुई है । हमारे देश वासियों को अपने देश में जिस मदद की आवश्यकता है, वह दो तरह की है नैतिक और भौतिक । प्रथम तो हमें विश्वास होना चाहिए कि अंततोगत्वा विजय हमारी होगी । मेरी योजनानुसार यह कदापि आवश्यक नहीं है कि हम दूरी शक्तियों के झुकाव के बारे में परेशान हो । यदि भारत के अंदर और बाहर रहने वाले भारतीय ही सिर्फ अपने कर्तव्य का पालन करे तो यह सर्वथा संभव है कि हम लोग अंग्रेजों को भारत से निकाल दे और अपनी अडतीस करोड देशवासियों को स्वतंत्रता प्रदान करें । अपस्थित संपूर्ण जनसमूह से मैं तीन लाख सैनिक और तीन करोड अर्थात तीस लाख डॉलर देने की आशा करता हूँ । मैं बहादुर भारतीय नारियों की एक यूनिट बनाना चाहता हूँ जब मृत्यु से जूझने वाली रजिमेंट होगी और वह तलवार उठाएगी और वहाँ वो तलवार उठाएगी । जॉॅब के स्वतंत्रता संग्राम वीरांगना झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने उठाई थी दोस्तों हम लोग बहुत दिनों से यूरोप में दूसरे मोर्चे की बात सुन रही है कि दो हमारे देशवासी अपने देश में बुरी तरह से दबे हुए है और भी दूसरे मोर्चे की मांग कर रहे हैं । आप पूर्वी एशिया में अपना पूर्ण सहयोग दीजिए और मैं आपको दूसरा मोर्चा भारतीय संग्राम का वास्तविक दूसरा मोर्चा देने का वायदा करता हूँ । सुभाष का ये ओजस्वी भाषण सुनकर समस्त भारतीयों के रग रग में जीतना जाती थी और वे अपना सर्वस्व समर्पण करने के लिए आतुर होते थे । बडे बडे व्यापारियों ने लाखों रूपये सुभाष के चरणों में चढा दिए । इसके दो तीन दिन पश्चात ही एक अन्य सार्वजनिक सभा आयोजित हुई । इस सभा में उपस्थित होने के लिए और अपने प्रिय नेता जी का दर्शन करने के लिए लाखों की संख्या में पुरुष ही नहीं ऑस्ट्रिया भी दूर दूर से आकर सम्मिलित हुई । सभा स्थल ठसाठस भरा हुआ था । जिस समय नेताजी ने मंच पर पदार्पण किया । इन्कलाब जिंदाबाद के नारों और करते ध्वनि से जनसमूह ने उनका भव्य स्वागत किया । जय हिंद । अपार भीड को संबोधित करते हुए नेताजी ने अपने सारगर्भित भाषण में कहा, मैं कह सकता हूँ कि ईश्वर की असीम अनुकंपा से इकाई के अवसर आ गया है । यदि इस अवसर पर उठ खडे होते हैं और हर तरह का त्याग और बलिदान करने के लिए तैयार हो जाते हैं तो हमेशा के लिए राष्ट्रीय गौरव प्राप्त कर लेंगे । हमें स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए मूल्य चुकाना हैं । स्वतंत्रता का मूल्य हैं त्याग और संघर्ष । यहाँ पूर्वी एशिया में हमारे तीन लाख भारतीय है और मुझे जरा भी संदेह नहीं है कि यदि हम अपने संपूर्ण साधनों को एकत्रित कर सके, मानवशक्ति, आर्थिक तथा अन्य साधना भी तो हम सब अपने देश से ब्रिटिश साम्राज्य को उखाड देखिए । नेताजी के ओजस्वी भाषण ने सभा में उपस्थित पुरुषों के साथ साथ महिलाओं को भी झकझोर कर रख दिया और उनमें भी त्याग और बलिदान का उत्साह हिलोरे मारने लगा । उन्होंने अपने गहने उतारकर नेता जी को अर्पित कर दिया । जनता ने उनकी धन जन की मांग को अपनी संपूर्ण शक्ति और क्षमता से पूरा किया । लोगों में नेताजी को पहनाई मालाओं को नीलामी में खरीदने की होड लग गई और देखते ही देखते करोडों रुपये और लाखों व्यक्ति नेताजी के संगठन में सहयोगी हो गए ।

40. Juddhabhumi Par

युद्ध भूमि पर सेना बडी सुभाष आजाद हिंद फौज का सेनापतित्व ग्रहण करते हुए सुभाष ने अपनी फौज के सिपाहियों के नाम संदेश दिया । आजाद हिंद फौज और भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के हित में आज मैंने अपनी सेना का पूर्ण अधिनायक ग्रहण कर लिया है । मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि प्रत्येक परिस्थिति में मुझे भारत के प्रति करते हुए पालन के लिए आवश्यक शक्ति प्रदान करेंगे । साथियों, अधिकारियों तथा सैनिकों अपनी कर्तव्यनिष्ठा, देशभक्ति और मदद से आजाद हिंद फौज भारत की क्रांति का उपकरण होगा । अन्ततोगत्वा मैं विश्वास दिलाता हूं कि निश्चय ही हमारी विजय होगी । सुभाष चंद्र बोस, प्रधान सेनापति ऍफआईआर आजाद हिंद फौज पच्चीस अगस्त उन्नीस सौ रंगून में बहादुरशाह के मकबरे पर स्वतंत्र भारत के अंतिम बादशाह की स्मृति में नेताजी ने श्रद्धांजलि अर्पित की । हम भारतीय धार्मिक विश्वासों को अलग रख बहादुरशाह का स्मरण करते हैं । इसलिए नहीं कि वे वह पुरुष थे जिन्होंने शत्रुओं से लडने के लिए भारतीयों का आह्वान किया था बल्कि इसलिए कि उनके झंडे के नीचे सभी प्रांतों, सभी धर्मों के मानने वालों ने युद्ध किया था । वह पुरुष जिसके पवन झंडे के नीचे स्वतंत्रता के इच्छुक मुसलमान हिंदू और सिखों ने साथ साथ लडाई लडी । स्वयं बादशाह ने कहा था हिन्दू में बु रहेगी जब तलक ईमान की दखते था उस तक चलेगी तेज हिंदुस्तान की जब तक भारतीय स्वतंत्रता के लिए लडने वालों की आत्माओं में विश्वास का अंतिम का बाकी है, भारत की तलवार था उसके लिए लडकी रहेगी अर्थात लंदन की छाती को लगातार छेडती रहेगा । आजाद हिंद फौज का सेनापतित्व ग्रहण करने के पश्चात सुभाष का उत्तरदायित्व बहुत बढ गया । घूम घूमकर जन संपर्क स्थापित करते और अपनी फौज का कार्य सुचारु रूप से चलाने के लिए जन धन की मांग करते । सुभाष ने जब देखा की आजाद हिंद संघ और आजाद हिंद फौज का कार्य बहुत विस्तार पा गया है तो उसे यथावत संचालित करने और धूरी राष्ट्र से बराबरी का संबंध बनाए रखने के लिए अस्थि आई हिंद सरकार स्थापित करने का निश्चय किया । आज आधीन सरकार जिस दिन आजाद हिंद संघ का विराट समारोह हुआ उस समय सिंगापुर में विशाल जनसमूह उमड पडा अस्थि आई आजाद हिंद सरकार की घोषणा करते हुए सुभाष ने कहा पूर्वी एशिया में भारतीय स्वाधीनता संघ द्वारा अस्थि आई आजाद हिंद सरकार की स्थापना करते हुए जो प्रगति हमने की है उसके लिए पूर्ण उत्तरदायित्व के साथ अपने कर्तव्य को पूरा करने के लिए आगे बढते हैं आजाद इनकी अस्थाई सरकार घोषित की जाती है । प्रत्येक भारतीय इसपर निष्ठा के साथ दावा कर सकता है । ये सरकार अपने प्रत्येक नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता और साथ ही समान अधिकार तथा समान सुविधाएं देने का वादा करती है । ये सरकार राष्ट्र के प्रत्येक व्यक्ति के लिए सुख समृद्धि की समान रूप से रक्षा करने की घोषणा करती है । विदेशी सरकार द्वारा अतीत में भेदभाव और चालाकी से जिस कटु परिस्थिति को जन्म दिया है, उसे दूर कर शांतिपूर्ण स्थिति बनाने की भी घोषणा की जाती है । इसके बाद नेताजी ने आजाद हिंद सरकार के पदाधिकारियों की घोषणा की । पद घोषणा के पश्चात प्रत्येक सदस्य ने अस्थि आई आजाद हिंद सरकार के प्रति निष्ठा की शपथ ली और अपने हस्ताक्षर किए । नेताजी की इस घोषणा को लाखों भारतीयों ने स्वीकार किया । फिर आजाद हिंद फौज की शानदार परेड हुई तथा नेताजी ने सलामी ली और हजारों काट एक साथ का पडेगा जय हो, जय हो शुभ सुख चैन की वर्ष बरसे, भारत भाग है, जाएगा पंजाब, सिंध, गुजरात मराठा द्राविड, उत्कल बंगा चंचल सागर, विंध्य हिमाचल नीला जमुना गंगा तेरे नितिन गुड का भी तो जिसे जीवन भी सब टाॅय तू राज्य बनने कर जगह परचम के भारत नाम सुभागा, जय हो, जय हो जय हो जाया जाया जाया जाए हो आजाद इन सरकार की घोषणा की । कुछ दिनों पश्चात ही विभिन्न राष्ट्र ने नेता जी को बधाई भेजी और सरकार को मान्यता दी जिसमें जापान, इटली जर्मन थाईलैंड वर्मा जो कि ये वर्तमान में अनुमान आदि मुख्य झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के जन्म दिवस पर रानी झांसी रेजिमेंट का उद्घाटन करते हुए प्रधान सेनापति श्री सुभाष चंद्र बोस ने अपने ओजस्वी भाषण के अंतर्गत कहा यदि झांसी की स्वतंत्रता की लडाई में भारत ने एक लक्ष्मीबाई पैदा की थी तो आज भारत की स्वाधीनता की लडाई में अडतीस करोड भारतीयों को मुक्त कराने के लिए भारत में हजारों झांसी की रानी का उत्पन्न किया है और करेगा नेताजी की ओजस्वी वक्तव्य । शंकर विरांगनाओं की नस नस में बिजली का संचार हुआ, रग रग से क्रांति की चिंगारियां निकलने लगी । सभी ने महसूस किया भारत आजाद होगा और आवश्यक होगा इस उत्सव की दूसरे ही दिन आजाद हिंद सरकार ने अपने रेडियो स्टेशन से ब्रिटिश और अमेरिका के विरुद्ध युद्ध की घोषणा करती हैं । सारी दुनिया ने आश्चर्य के साथ स्वतंत्र भारत की इस घोषणा कुछ ना इस घोषणा के साथ ही सुभाष अपनी सेना को खोज करने के लिए तैयार करने लगे । इस बीच टोकियों में बृहत्तर एशिया के देशों के प्रतिनिधियों की कॉन्फ्रेंस हुई जिसमें वर्मा के प्रधान डॉक्टर बामाने भारत के स्वाधीनता संग्राम में हर तरह का सहयोग देने का प्रस्ताव किया जो सर्वसम्मिति से पास हो गया । इसी अवसर पर जनरल तो उन्होंने जापान सरकार की ओर से अस्सी आई हिंद सरकार को अंडमान और निकोबार नामक टापू सौंपने की घोषणा की । सुभाष ने अंडमान और निकोबार टापू का नाम बदलकर क्रमशः शहीद और स्वराज टापू रखने की घोषणा की और इन द्वीपों के शासन के लिए लेफ्टिनेंट कर्नल चैट जी को अपने स्टाफ के साथ भेज दिया । पोर्ट ब्लेयर पर राष्ट्रीय झंडा फहरा दिया गया । जब सुभाष ने अपनी तैयारी पर्याप्त कर ली तो उन्होंने अपनी फौज का प्रधान कार्यालय सिंगापुर से हटा रंगून ले जाने का निर्णय किया । सारी सेना सिंगापुर से चैंपियन तक ट्रेन पर फिर वहाँ से मेरे गो तक स्टीमर में और मेरे घूसे मोल मीन तक पैदल सफर कर रंगून पहुंची । सेना में अपूर्व उत्साह था । आजाद हिंद फौज में सभी जातियों, धर्म और विचारों के लोग थे । चाहे हिन्दू मुसलमान से क्या एंग्लो इंडियन अर्थात किसी भी समुदाय के रहे हो । ये सभी देश भक्त थे । सुभाष की आश्चर्यजनक संगठन शक्ति को देखकर समस्त संसार तंग था । उन्होंने सेना को चार ब्रिकेट ओ सुभाष गांधी नहीं हूँ और आजाद ब्रिगेड में बता, जिनका नेतृत्व अलग अलग सेनापतियों के हाथ में था और जिनकी कार्यप्रणाली में अंतर रखा गया था । युद्ध प्रारम्भ करने के पूर्व सुभाष ने लेफ्टिनेंट गवर्नर ए । सी चाट जी को शाहिद टापू से वापस बुलाकर एक ब्रिगेड उनके कमान में दी और उनके स्थान पर एडी लोकनाथ को शहीद बसवराज टापू का चीफ कमिश्नर बनाकर भेज दिया । नेताजी ने अपने बहादुर सिपाहियों का दृढसंकल्प और पूर्वा देश भक्ति देखकर उन्हें अराकान के मोर्चे पर भेज दिया और चार जनवरी उन्नीस को आजाद हिंद फौज ने अराकान क्षेत्र पर सशस्त्र आक्रमण कर दिया । आजाद हिंद फौज के हेडक्वॉर्टर्स की ओर से मेजर पी । के । सहगल ने आदेश जारी किया, जिसमें सब यूनिट कमांडरों से अपनी फौजी टुकडियों की परेड का इंतजाम करने के लिए और अराकान मोर्चे संबंधी बातें बनाने के लिए कहा गया था । प्रधान सेनापति सुभाष का आदेश इस प्रकार था संसार की टकटकी अराकान के मोर्चे पर लगी हुई है । मुझे विश्वास है कि अराकान के मोर्चे पर हमारे साथियों के वीरतापूर्ण कार्य, आजाद हिंद फौज के बाकी अब सरोवर सिपाहियों का उत्साह बढाएंगे । मध्यम से जिसका इंतजार था वह दिल्ली की कुछ शुरू हो गई और पक्के इरादे से कूद जारी रखेंगे । साथ ही हूँ भारत की मुक्तिवाहिनी के अफसरों और सैनिकों । आपके दिल में एक ही निश्चय होना चाहिए आजादी क्या मौत और आपकी जुबान पर एक ही नारा हूँ दिल्ली चले दिल्ली का रास्ता आजादी का मार्ग है । विजय निश्चय ही हमारी होगी । इन्कलाब जिंदाबाद, आजाद हिंद जिंदाबाद । नेता जी का ये संदेश हर एक सैनिक को सुना दिया गया । इस प्रकार में हर सिपाही में अटूट विश्वास भरते रहते थे । आजाद हिंद फौज के साथ जापानी भी लडते थे किंतु दोनों फौजों का प्रबंध स्वतंत्र था । आजाद हिंद फौज बिना लारी टू के पैदल ही आगे बढती रही । झांसी रानी रेजिमेंट कैप्टन डॉक्टर लक्ष्मीबाई सहगल के नेतृत्व में घायलों की तीमारदारी का काम कर रही थी किंतु उन सबके दिल युद्ध में भाग लेने के लिए लग रहे थे । नंबर दो और तीन बटालियन काले वाममोर्चे के लिए पूछ करके इसी समय आराकान विजय का समाचार मिला । नेताजी ने इस संबंध में अपनी प्रसन्नता प्रकट की और आगे बढते रहने का संदेश भेजना । तीसरी बटालियन की दो कंपनियां फॅमिली सीफ्लोर को रवाना कर दी गई । राम सेवन पांच सौ सिपाही को लेकर फ्लोर के लिए रवाना हो गया । मेजर फुलवाडा नहीं स्टेडियम को घेर लिया । उनके सैनिक बडी वीरता से लडे और अंग्रेजों के छक्के छूट गए । डंपर अधिकार हो गया । कर्नल शाहनवाज नंबर तीन बटालियन की सहायता करने के लिए टेडिम भेजे जाने वाले थे । हिन्दू शुभ समाचार पाकर योजना स्थगित कर दी गई । इसी बीच दो सौ सिपाही भाग गए जिन्हें पकडने के लिए राम सिंह और सिकंदर को आदेश दिया था करना शाहनवाज खान अपनी फौज के साथ कोहिमा में घुस गए । भीषण गोलाबारी के बीच उनकी सेना दुश्मन से लडकी हुई आगे बढती गई लडाई भयंकर रूप से हो रही थी और तीव्र गति से आजाद हिंद फौज प्रगति करती बढती जा रही रणबांकुरे अपनी जान की बाजी लगाकर भारत की ओर बढते जा रहे थे । वे अपना खून बहाकर भी देश को आजाद कराना चाहते थे । कर्नल शाहनवाज के नेतृत्व में फौज ने कोहिमा पर अधिकार कर लिया । नेताजी समाचार पाक ऋण भूमि का निरीक्षण करने के लिए गए और कर्नल शाहनवाज को बधाई दी । इसी समय जापानियों के अभद्र व्यवहार का समाचार मेजर ठाकुर सिंह से पाकर शाहनवाज पालन से हट आ गया । पानी बरसने के कारण रात भर ताओ नदी के किनारे रुके रहे । क्लब क्लब की पोस्ट का निरीक्षण कर उन्होंने किम बारी से साफ साफ बातचीत की । दीपक, जंगजू और आवल की कॉन्फ्रेंस बुलाकर सबको विभिन्न आदेश दिया । अलग अलग पर दुश्मन ने गोलीबारी शुरू कर दी थी तो लेफ्टिनेंट ले हम सिंह की फौज से दुश्मन को मुंह की खानी पर उसने नहीं गर्म तक दुश्मन का पीछा किया जिसमें तीन चीनी मारे गए और तीन पकड लिए गए । नंबर वन डिवीजन के कमांडर मेजर एमजेड की आनी थी और आजाद क्षेत्रों का शासन भी उनके अधीन था । इसी समय जब गांधी ब्रिगेड काली वह युद्ध कर रही थी तो नेहरू, ब्रिगेट और आजाद ब्रिगेड उनकी सहायता के लिए चल पडी । गांधी ब्रिगेड की नंबर दो गुरिल्ला रेजिमेंट पाल एल और तामू इलाके में युद्ध करने के लिए भेज दी गई और इसी समय सुभाष ब्रिगेट की एक बटालियन को कलादान सत्यकाम युद्ध करने के लिए भेज दिया गया । इस बटालियन के साथ जापानी सैनिकों के भी कई दस्ते थे जो पश्चिम में अफ्रीका नो की वृद्धि लड चुके थे । इस युद्ध में काफी छती हुई । झांसी रानी रेजिमेंट की वीरांगनाएं युद्ध करने के लिए लाइट थी अच्छा उन्होंने अपनी इच्छा पत्र के द्वारा नेता जी के पास पहुंचाई नेताजी ने रानी झांसी रेजिमेंट की दो कंपनियों को युद्ध क्षेत्र में जाने का हुक्म दे दिया । साथ ही उन्हें ये भी आगाह कर दिया कि युद्धक्षेत्र व्यवस्था संगीन हैं । जंगली युद्धक्षेत्र पहाडी और पतले दर्रों से भरपूर था । वो जान, कपडे और अस्त्रशस्त्र की कमी थी । इंदूर विरांगनाओं ने इस बात की जरा भी चिंता ना की और दुश्मन पर धावा बोलने के लिए तीन बजे रात को रवाना हो गई । उन लोगों को चुपचाप आगे बढने का बना मीलो चलने के बाद एक पहाडी पर उन्होंने अपनी पोजिशन । उनसे ब्रिटिश फौज की दूरी एक नहीं थी । दुश्मन को इस बात की जरा भी आशंका ना थी । वो तेजी के साथ बडी जा रही थी । जब थोडी दूरी रह गई तो उन्हें फायर करने का आदेश मिला । अद्भुत जोश था, विरांगनाओं का फुर्ती से फायर कर रही थी । जैसे नारे के साथ टूट पडी दुश्मनों पर कौन घायल हो रहा है, कौन मार रहा है? इन बातों की चिंता किए बिना आगे बढती गई और अंत में अपनी बहादुरी से उन्होंने दुश्मन पर विजय प्राप्त अंग्रेजों ने जहाँ लिया कि भारत की पुरुष ही नहीं ललनाएं भी अपना जौहर दिखाने में सारे संसार में आगे है । उधर करना शाहनवाज की डिवीजन को इंफाल के मोर्चे पर भेज दिया गया । अन्य कमांडरों को कालांतर पर हमला करने का आदेश मिला । तीन नंबर बटालियन को उधर जाने का मामला इस समय तक मोरे से पालेम तक का पंद्रह सौ वर्ग मील का भूभाग आजाद हिंद के कब्जे में आ चुका था । पाल एल पर अधिकार करने के पश्चात जापानी फौज इंफाल तक पहुंच गई थी । गांधी ब्रिगेड की पांच कंपनियां एस । एस । वह इमा के नेतृत्व में आगे मौजे पर लड रही थी । तीन कंपनियाँ रसद आदि पहुंचा दी थी । एक कंपनी महत्वपूर्ण घाटियों पर पहरा दे रही । कोहिमा और मणिपुर पर घमासान युद्ध के पश्चात विजय मिल चुकी काल अंदर एक दिन पाल एल और कोहिमा से फौजी आगे बढी और दूसरे दिन इंफाल पर अपना राष्ट्रीय झंडा कार दिया । स्वतंत्रता के वीर सैनिक खास खास खाकर खूब कोई रहकर अंग्रेजी सेनाओं का जीतोड मुकाबला कर रहे थे । कई बार उन्होंने अंग्रेजी सेना को पीछे खदेड दिया था । हिंदू साधनों और वायुसेना के अभाव में आजाद हिंद फौज को पीछे हटने को विवश होना पडा । आजाद हिंद बैंक बराबर अधिकार हो जाने के पश्चात सुभाष ने आजाद हिंद बैंक की स्थापना कि रंगून के एक मुस्लिम सज्जन ने अकेले तीस लाख रुपये दिए । सुभाष ने वर्मा रजिस्ट्रेशन कानून के अनुसार बैंक की रजिस्ट्री कराई । बैंक के चेकों का मान चालू सरकारी नोटों के बराबर था । व्यवसायी उन्हें खुशी से स्वीकार करते थे और जापानी नोटों से अधिक पसंद करते थे । जनता का समर्थन प्राप्त होने से बैंक की साख जम गई और कुछ ही दिनों में इस की तीन शाखाएं खुल गई । आजाद हिंद के सारे खजाने बैंक में जमा रहते थे । अस्थि आई हिंद सरकार ने भारतीयों पर कर लगाया कर वसूल करने का ढंग था कि पहले प्रमुख व्यापारियों की एक समिति गठित हुई । ये सभी व्यक्तियों की पूंजी निर्धारित कर उसका दसवां हिस्सा कर के रूप में वसूल करती थी । समिति यह निश्चय कर दी थी कि कितनी किस्तों में रकम चुकाई जाएगी । ये कर केवल भारतीयों से ही वसूल किया जाता था । उस समय तक वर्मा से आठ करोड रुपये मिल चुके थे जिनमें से साढे तीन करोड का सामान फौज के लिए भेज दिया गया और बाकी धनराशि बैंक में जमा कर दी गई थी । सुभाष ने सिंगापुर में अपना स्वतंत्र प्रेस खरीद लिया जिसका मुख्यपत्र आजाद था । प्रतिदिन इसके दो संस्करण निकलते थे । एक अंग्रेजी और दूसरा हिंदी जो रोमन लिपि में सरल हिंदी में छपता था । कभी कभी मद्रास और आंध्र प्रदेश के लिए तमिल संस्करण भी निकलता था । नेताजी ने सरल हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित कर दिया था । यद्यपि उसके लिए भी रोमन थी । अखबार में मोटे अक्षरों में आजाद हिंद और उसके ऊपर तीन शब्द रहते थे एकता, यूनिटी, विश्वास, फिट, बलिदान, सैक्रिफाइस और नीचे लिखा रहता था । भारतीय स्वतंत्रता संघ का मुखपत्र और दिन ऑफ इंडियन इंडिपेंडेंस लीग हैड क्वाटर्स अपने संपादकीय आज और कल के कालम में एक बार संपादक ने लिखा था जय हिंद, कैसी शानदार सलामी है, हमारे रोंगटे खडे हो जाते हैं हमारा दिल धडकने लगता है जय हिंद, हिंदुस्तान की जय हो, चालीस करोड भूखी और लगी आत्माओं की जय हो सभ्यता की मशाल जलाने वाले उस महान राष्ट्र की जय हो, उस भारत की जय हो जिसके संतों ने सादा शांति का उपदेश दिया है । करोडो पददलित ओके उस राष्ट्र की जय हो जिस पर मुठ्ठी भर विदेशी शासन कर रही हैं । वे विदेशी जो तब गुफाओं में रहते थे जब हम अपनी उन्नति के शिखर पर थे । प्रयाण गीत अहा! अराकान के आह्वान पर सुभाष ने अपने सिपाहियों को संबोधित कर कहा था दूर बहुत दूर है । इस नदी वन जंगलों के हरे भूभाग के शैल शिखर और नदी झरनों के उस पार हमारा देश है । उसी में हम जन्मे थे और उसी में फिर जा रहे हैं । सुनो भारत हमें पुकार रहा है भारत की राजधानी दिल्ली हमें पुकार रही है । अडतीस करोड नब्बे लाख देशवासी हमें पुकार रही है, हमारी माता है और स्वजन हमें पुकार रही है । कुछ तो समय नष्ट नहीं करना है । हथियार उठालो पूरे हो तुम्हारे सामने पद खुला पडा है, हम उसी पद से आगे बढेंगे । शत्रुसेना को चीरकर हम अपना रास्ता बना लेंगे । भगवान की इच्छा होगी तो हम रण क्षेत्र में शहीद हो जाएंगे । किंतु जिस पद से हमारी सेना दिल्ली की ओर बढेगी, मृत्युशैया ग्रहण करने से पूर्व एक बार उस पद को छू मिलेंगे । दिल्ली का पद स्वाधीनता का पद हैं दिल्ली चलो और आजाद हिंद फौज का प्रयाण गीत गूंज था कदम कदम बढाए जा खुशी के गीत है या ये जिंदगी है तो माँ की दुकान पे लुटाए जा तू शेर हिंदी आगे बढ मरने से तू कभी ॅ तलक उठा के सर जोशे वतन बढाए जा हिम्मत तेरी बढती रहे खुदा तेरी सुनता रहे जो हमने तेरे अडे तू का काम नहीं मिला चलो दिल्ली पुकार की कमी हमेशा संभाल के लाल किले ॅ जहाँ पहरा आए जा

41. Sahid Smarak

शहीद स्मारक उस दिन सिंगापुर में बहुत बडा आयोजन किया गया । आज आजाद हिंद फौज के शहीदों के स्मारक की नींव डाली जाने वाली है । हमारे के लिए समुद्र तट पर कनाट ड्राइव का स्थल चुना गया है । इसी कम ऑन ड्राइव पर सबसे पहले एक सभा में नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने आजाद हिंद फौज के संगठन का प्रस्ताव रखा था । सिंगापुर में ही सबसे पहले आजाद हिंद सरकार की योजना का प्रयोग हुआ था । इसी स्थान पर हिन्दू मुसलमान और सिखों ने कंधे से कंधा मिलाकर आजादी के स्वर्ण देश की ओर चलने की कसम खाई थी । सिंगापुर ही आजाद हिंद फौज के लिए बहुत से जवान दिए थे और इसीलिए सिंगापुर को इस पुनीत आयोजन के लिए चुना गया है । कनान ड्राइव को जाने वाले तीन मुख्य राजमार्गों के दोनों और आजाद हिंद फौज के बहादुर सैनिक अपनी पोशाक पहने खडे हुए हैं । झांसी की रानी रेजिमेंट की स्वयं सेविकाएं कई फलांग आगे तक प्रतिष्ठित अतिथियों के स्वागत के लिए खडी है । सुबह से ही भारतीय नेशनल स्कूल की छुट्टी है । बच्चों की बाल सेना खूबसूरत खाकीवर्दी पर एक रेशमी तिरंगा स्कार्फ लगाकर छोटे छोटे झंडे लेकर जन गण मन गाते हुए कनाट राय की ओर पढी जा रही है । उनकी छोटी छोटी बहनें तिरंगी साडियो पहने घूम घूमकर तिरंगे फूलों की कुछ बेच रही है । लोग शहीदों की स्मृति में चढाने के लिए मुंहमांगे दामों में वे कुछ खरीद रहे हैं । मुख्यमंच को झांसी की रानी रेजिमेंट ने तीन ओर से घेर रखा है । उसके सामने सुंदर सा फाटक है, जिसके सामने बैंड बज रहा है । फाटक के सामने बाल सेना ने आकर दो कदारी बना रखी है । ठीक ग्यारह का समय है । नेता जी आ गए हैं । आज उन्होंने फौजी वर्दी नहीं पहनी है । एक महीन सफेद कुर्ता हूँ, सफेद होती है और टोपी पहन रखी है और बाहों पर एक काला रेशमी टुकडा बंदा है । नेताजी बहुत गंभीर है । जापानी अब सरन है, सलामी देते हैं । प्रत्युत्तर देने के पश्चात नेताजी झंडे की ओर पडते हैं । कर्नल डॉक्टर लक्ष्मीबाई अस्वस्थ है उनके स्थान पर कैप्टिन मैसेज तिवारी कमांडेंट फॅसने आगे बढकर झंडे की डोर । नेताजी के हाथ में समाधि । नेताजी ने झंडा फहराया । रिजर्व बैंक पर जय हो की ध्वनि गूंज उठी । बाल सेना मार्च करती आ रही है । वे कौमी नशा लहराए जा का गीत गा रही है । झंडे के पास अगर उनकी सेना रुक गई, उनका सरदार जो भी चौदह वर्ष का ही है, आगे बढता है और सुभाष कोई तिरंगा गुलदस्ता लेता है । सुभाष से हाथ मिलाकर मंच की ओर बढ गए हैं और माइक पर उनकी गंभीर आवाज गूंज उठती है । हम आज यहाँ शहीदों को श्रद्धांजलि देने आए हैं जिन्होंने भारत माता की आजादी के लिए अपने प्राणों की भेंट चढाई । चार फरवरी उन्नीस सौ चवालीस को हमने पहला सशस्त्र आक्रमण किया था । तब से आज तक सेना का हर कदम खून की पगडंडियों पर उठा है । हमने अपने खून के कतरों से माँ की आरती का थाल सजाया है । राज वो दिन है जब हम अपने खून के कतरों की आवाज को पत्थर के स्मारक पर लक्ष्य करने जा रही है । अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करने के बाद उन्होंने एक संगमर्मर का टुकडा नीट में रखा और लाउड स्पीकर पर अटेंशन की तेज पुकार हुई है और दो मिनट के लिए सारे मैदान में सन्नाटा छा गया । इस समय झंडा आधा झुका दिया गया है । नारों के साथ सभा समाप्त होती है । यु्द्धविराम भारत का दुर्भाग्य आजाद हिंद फौज का एक अधिकारी दुश्मन से मिल गया । उसने फौज की शक्ति, कमजोरी और स्थान आदि का पता बतला दिया है । फॅस को भयानक हवाईहमले का सामना करना पड रहा है । कमांडर बहुत जल्दी जल्दी अपने स्थान बदल रहे हैं । किंतु दुर्भाग्य वर्ष प्रकृति भी प्रतिकूल हो गई है । फौज के सामने विकट समस्या है । वे वर्षों की पूर्व इंफाल ले लेना चाहते थे तो इसी समय अमरीका ने मैं नीला पर आक्रमण कर दिया जिससे जापानी हवाई ताकत उधर चली है । साथ ही साथ जापानियों ने ठीक से साथ नहीं दिया । मित्रराष्ट्र की सेना नहीं पहुँच और हवाई ताकतों से अंग्रेजों ने कोहिमा और इंफाल पर पुनः अधिकार कर लिया । दूसरी और रसद की कमी के कारण आजाद हिंद फौज को अनेक दिक्कतों का सामना करना पडा । जापानी एकदम से पीछे हट गए । प्रशांत महासागर में अमेरिकनों का जोर पड गया । उन्नीस सौ चवालीस की समाप्ति बता रही थी की हवा का रुख बदल गया है । वर्मा की रक्षा करने के लिए आजाद हिंद फौज प्राण प्रेम से जुडी हुई हैं । इंडो जापानी साथ नहीं दे रहे हैं । नेताजी स्वयं रन क्षेत्र पर पहुंचे । शाहनवाज ने पोपा की परिस्थिति बतलाई । नेताजी स्वयं वहाँ जाना चाहते थे किंतु शाहनवाज ने सख्त विरोध किया । अंग्रेजों ने पिन बेन पर अधिकार कर लिया है और ऍम का था की तरफ बडे आ रहे हैं । मैं चला पुल पर बमबारी हो रही अंग्रेजों का मचाने का ब्रिगेट भी पहुंच गया है । शाहनवाज एक मार्च को नेताजी से फिर मिले और भावी योजना पर विचार विमर्श किया । प्रशांत महासागर में मैकऑर्थर एक के बाद दूसरा अंतरीप लेता जा रहा है । शाहनवाज खान यहाँ से रंगून गए और नंबर एक डिविजन का फिर से संगठन कर्नल सहगल ने बताया बैंकिंग से दुश्मन भाग रहे हैं और अपना अधिकार हो गया है । आजाद ब्रिगेड देखो बहादुरी दिखलाई दुश्मन कि कम से कम दो सौ सैनिक हताहत हुए जबकि आजाद हिंद फौज का एक सैनिक माॅक घायल हुए । पांच मार्च को मस्त इलाका पतन हो गया । ब्रिटिश हवाईजहाजों ने पोपा पर भारी गोलाबारी दुश्मन बढ रहे हैं । उनकी ताकत भी बढ गई है । बरमी फौजों ने जापानियों के खिलाफ बलवा कर दिया । अभी फिर गए किंतु कर्नल सेहगल की फौज और बागले निकला है । सिर्फ कर्नल सिंह की कंपनी भरी हुई है । मगर ऊपर ब्रिटिश बैंकों ने घुसकर अधिकार कर लिया । जापानी चले गए, केवल भारतीय रह गए । रंगून का रास्ता गिर गया है । कर्नल डॉक्टर लक्ष्मी सहगल, झेलन शाहनवाज और मेजर महिदास दुश्मन के पंजाब में फस गए । मान ले का पतन हो गया । रानी झांसी रेजिमेंट तथा अन्य रंगून से हट गए तो नेताजी बैंकॉक चले गए । जाते जाते अपना संदेश वर्मा के भारतीयों के नाम दिया । मैं बहुत भारी हिरदय से वर्मा छोड रहा हूँ । हम आजादी के संग्राम में पहले चक्कर में हार गए पर अभी और बहुत से चक्कर आएंगे । पहले चक्कर में हार जाने पर भी मैं कोई कारण नहीं देखता कि हम अपनी हिम्मत छोड दे । भारत आजाद होगा, आजाद होगी, रहेगा इन्कलाब जिंदाबाद, आजाद हिंद जिंदाबाद, जयहिन्द, आजादी के सिपाही और अफसरों के नाम नेताजी का हो । मैं जन्मजात आशावादी हूँ और किसी भी परिस्थिति में हार मानने वाला नहीं । मैं आपके हाथ हो अपना राष्ट्रीय झंडा, अपना सम्मान और भारतीय वीरों की परंपरा छोडे जा रहा हूँ । मैं आपसे कहता हूँ मेरी ही तरह आशावादी बनी और मेरी ही तरह विश्वास कीजिए । घोर अंधकार उषा की पूर्व सूचना है । भारत स्वाधीन होगा और बहुत शीघ्र ही भगवान आपका मंगल करें । इंकलाब जिंदाबाद, आजाद हिंद जिंदाबाद जयहिन्द सुभाष चंद्र बोस प्रधान सेनापति

42. Tathakathit Dardnak Biman Durghatana

तथाकथित दर्दनाक विमान दुर्घटना बैंकॉक पहुंचने पर नेताजी ने एक प्याली चाय पी और काम में ऐसे जुड गए जैसे कुछ हुआ ही ना हो । परिस्थितियों पर विचार करने के पश्चात भविष्य की योजना बनाई । नेताजी अभी भविष्य की योजना बना ही रहे थे कि उन्हें समाचार मिला । लॉर्ड वॉवेल, गांधी मिस्टर जिन्ना आदि नेताओं शिमला में अपने नए प्रस्ताव के लिए हाँ या ना जवाब देने के लिए बुलाया है । कांग्रेस के लिए लॉवेल का ऑफर स्वीकार करना आत्मघाती होगा । ऐसा सोचकर नेताजी सिंगापुर पहुंचे और स्वाधीनता के प्रश्न पर समझौता न करने के लिए रोज संदेश प्रसारित ब्रॉडकास् करने लगे । अंत में ये कॉन्फ्रेंस फेल हो गई और उन्होंने संतोष की सांस ली । फिर भी उन्होंने कांग्रेस कार्यसमिति को सावधान किया कि अगर लेबर पार्टी चुनाव जीत गई तो फिर वो चावल की तरफ से ऑफर आएगा । कांग्रेस को सावधान रहना चाहिए । वर्मा में आजाद हिंद फौज के सिपाही होता था । अफसरों के साथ अंग्रेजों ने ठगबाजी की उनके हथियार लेकर सबको रंगून जेल में बंद कर दिया । नेताजी ने जापान के सम्राट हिरोहितो से मिलने का निश्चय किया जिससे वर्तमान घटना और परिस्थिति पर विचार विमर्श करके किसी निश्चय पर पहुंचे । अतः कर्नल हबीबुर्रहमान के साथ एक हवाई जहाज पर विद्यार्थियों के लिए रवाना हुए । हिंदू भारतीयों का दुर्भाग्य देश का दुर्भाग्य तेईस अगस्त उन्नीस सौ पैंतालीस को क्योंकि वो रेडियो के निर्णय समाचार ने भारतवासियों पर वजह बात कर दिया और सारा संसार स्तब्ध और अचंभित रह गया । आजाद हिंद की अस्थाई सरकार की सर्वोच्च अधिकारी श्री सुभाष चंद्र बोस कर्नल हबीबुर्रहमान के साथ बैंकॉक से टोक्यो आ रहे थे । फारमोसा के निकट ताही होक नामक स्थान पर उनका विमान दुर्घटनाग्रस्त । उसमें आग लग जाने के कारण मृत्यु को प्राप्त हुआ समाचार कहाँ तक सत्य और प्रमाणित है? इस दुर्घटना को लगभग सत्तर वर्ष बीत गए । भारतीय जनमानस में ये प्रश्न दिन ब दिन गहराता जा रहा है । खून से लग गए जो यहाँ गीता मान के लिए, वो तलबगार भी तो नहीं एक टुकडा कफन के लिए । जय सुभाष जय हिंद । अब भारतीय इतिहास में और संसार की क्रांति के पन्नों में सदैव अमर रहेंगे । सलाम है आजाद हिंद फौज को सलाम है भारतीय क्रांति की उम्मीद को और सलाम है । उस महापुरुष को सलाम है नेताजी सुभाषचंद्र बोस को ऍम का मैं राज राज की सुबानी आपका तहेदिल से आभार व्यक्त करता हूँ कि मुझे ये मौका मिला । इनकी जीवनी पडने का सुनी अपनी वीरता था जो रज गए थे वो इंसान जो हमेशा मार रहेंगे सुभाष चंद्र बोस सुना आपने कुकू एफएम पर सुने जब मन चाहे

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