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1. 2014 Ek Naya Mor

आप सुन रहे हैं खूब ऍफ का नाम हैं । किसी जीतती है भाजपा । इसमें लिखा है प्रशांत छाने आर जी आशीष चैन की आवास में कुछ हुआ है सुनी सुमन चाहे दो हजार चौदह एक नया मोड । यदि मध्य दिल्ली भारत की सत्ता का केंद्र है तो विंडसर प्लेस का गोलचक्कर इसकी गतिविधियों का मुख्य केंद्र है । पश्चिमी छोड से रायसीना रोड पर आइए तो आप शीघ्र ही भारत की संसद भवन के सामने होंगे । गोलचक्कर के जरिए एक और जाने वाला जान पर आपको राजपथ, इंडिया गेट और राष्ट्रपति भवन क्या और ले जाएगा । उसका दूसरा छोर शहर के पुराने केंद्र कनॉट प्लेस की ओर जाता है । फिर उस शहर रोड आपको अनेक राजनीतिज्ञों के आवासों से गुजरते हुए मंडी हाउस पर खत्म होता है । भारतीय रंगमंच और खाना काकड हैं । थोडी ही दूरी पर शास्त्री भवन है । इसमें कई प्रमुख मंत्रालय है । बारह मार्च दो हजार सत्रह की शाम को नरेंद्र मोदी इस गोलचक्कर पर अशोक रोड से भारतीय जनता पार्टी के मुख्यालय की ओर बढते हुए सडक के दोनों और खडी जनता का अभिवादन करते हैं । इससे पहले वाले महीने में पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए थे । अब इनमें से चार राज्य भाजपा के झूले में हैं । एक दिन पहले ही पार्टी ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में तीन चौथाई से ज्यादा सीटें जीतकर शानदार विजय हासिल की थी । भाजपा ने उत्तराखंड में भी विजय पताका फहराई और गोवा तथा मणिपुर में भी वह सरकार बनाने वाली है । सिर्फ पंजाब में लगातार दो बार सत्ता में रहने के बाद भाजपा और उसके सहयोगी अकाली दल की पराजय हुई । मोदी मोदी नारों की गूंज सडकों से होती हुई पार्टी कार्यालय तक पहुंच गई जहाँ प्रधानमंत्री चुनाव में शानदार विजय हासिल करने के अवसर पर अपने दल के नेताओं और ऑर्डर को संबोधित करने वाले थे । उन्होंने होली पर्व के अवसर पर सभी को शुभकामनाएं देते हुए अपना संबोधन शुरू किया । उन्होंने कहा कि चुनाव सरकार के लिए सिर्फ जीतने का एक साधन मात्र नहीं है बल्कि ये भारतीय लोकतंत्र में जनता के विश्वास को और अधिक मजबूत करने में मदद करता है और फिर उन्होंने चुनाव में मिली जबरदस्त सफलता पर अपना भाषण शुरू किया । मोदी ने कहा, मैं पांच राज्यों के नतीजों को विषेशकर उत्तर प्रदेश जिसमें अपने विशाल आकार के कारण भारत को नई दिशा, ताकत और प्रेरणा देने की क्षमता है, नए भारत की शुरुआत के रूप में देखता हूँ । उसके साथ ही उन्होंने इसे भाजपा का स्वर्णकाल बताया । उन्होंने इस उपलब्धि के लिए भाजपा की चार पीढियों के नेताओं हजारों कार्यकर्ता हूँ और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह तथा उनकी टीम की भूमिका की भूरी भूरी प्रशंसा की । इनके कार्यों ने आज भाजपा को इस स्थान पर पहुंचाया है । निश्चित ये भाजपा का स्वर्णकाल है । दस साल से भी कम समय पहले पार्टी को हाशिये पर रखा जा रहा था । अनेक लोगों ने घोषणा की थी की पार्टी के दिल्ली में सत्ता में लौटने की संभावना बहुत कम है । पांच साल पहले तक ऐसा सोचा भी नहीं जा सकता था कि भाजपा राष्ट्रीय चुनाव में ही स्पष्ट बहुमत से जीत हासिल कर पाएगी बल्कि देश के तेरह राज्यों में उसके मुख्यमंत्री भी होंगे । आज ये सवाल पूछा जा रहा है कि क्या भाजपा को कभी निकट भविष्य में सत्ता से बेदखल भी किया जा सकेगा । उसने भारतीय लोकतंत्र में पर की गई प्रक्रिया चुनावों के माध्यम से ये स्थान हासिल किया है और ये तो सिर्फ अभी शुरुआत है । अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा देशभर में न सिर्फ अपनी उपस्थिति दर्ज कराना चाहती है बल्कि संसद से लेकर पंचायत स्तर तक के सभी तरह के चुनाव में जीतना भी चाहती है । इस पुस्तक में ये बताया गया है कि भारतीय जनता पार्टी कैसे इन चुनावों में विजयी रही, क्यों हारी? ऐसा तब हुआ और भविष्य में क्या होगा । दो हजार चौदह के लोकसभा चुनावों ने भारतीय राजनीति को नए सिरे से परिभाषित किया है । उन्नीस सौ चौरासी के बाद से किसी भी पार्टी ने राष्ट्रीय चुनावों में पूर्ण बहुमत हासिल नहीं किया और अब आम तौर पर ये मान लिया गया था । इसके बाद गठबंधन की स्थिति ही चलेगी जिसमें दो लोगों पर दो कमजोर राष्ट्रीय पार्टियां होंगी जिनके इर्दगिर्द क्षेत्रीय दल छोटे रहेंगे और गठबंधन की सरकारें बनती रहेंगी । एक चुनाव नहीं, सब कुछ बदल दिया भारतीय जनता पार्टी ने लोकसभा चुनाव में दो सौ बयासी सीटों पर जीत हासिल की । लोकसभा की पांच सौ बयालीस सीटों में से उसने चार सौ अट्ठाईस सीटों पर चुनाव लडा और शेष सीटें राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के दलों के लिए छोड दी थी । इसका मतलब ये हुआ चुनाव में पार्टी ने हर तीन में से उन दो सीटों पर जीत हासिल की जिसमें उसकी सीधी टक्कर थी । शानदार प्रदर्शन था । राष्ट्रीय स्तर पर इसको हासिल वोट प्रतिशत दशमलव एक था । परंतु जिन सीटों पर उसने अपने उम्मीदवार खडे किए थे उनमें उसके वो चालीस प्रतिशत के पास थे । यूनिस इक्यानवे से पहला मौका था जब किसी पार्टी को तीस प्रतिशत से अधिक वोट मिले थे । उसने एक सौ सैंतीस सीटों पर पचास प्रतिशत से ज्यादा एक सौ बत्तीस सीटों पर चालीस प्रतिशत से ज्यादा मत हासिल किए और निर्वाचन क्षेत्रों में भाजपा की जीत का औसत अंतर सत्रह दशमलव नौ प्रतिशत था जो विजयी उम्मीदवार और पराजित होने वाले ने ट्रस्ट प्रत्याशी के बीच काफी ज्यादा था था । इन चुनाव में भाजपा ने न सिर्फ अधिकांश सीटें जीती बल्कि उसने जबरदस्त जनादेश के साथ ये विजय हासिल की । भौगोलिक आधार पर भाजपा ने हिंदीभाषी प्रदेश हूँ । हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ, मध्य प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली में चौवालीस प्रतिशत मत प्राप्त किये और दो सौ पच्चीस सीटों में से एक सौ नब्बे पर जीत हासिल की । राजग के घटक दलों के साथ उसने इन सीटों में से दो सौ एक पर विजय प्राप्त हैं । गैर हिंदी भाषी राज्यों में भाजपा को बाईस प्रतिशत मत मिले और उसने तीन सौ अठारह सीटों में से बाढ पर जीत हासिल की । हम तो राजग के घटक दलों के साथ वो बयालीस फीसदी सीटों पर कब्जा करने में सफल रही । उसे अपने प्रभाव वाले मूल शहरी भारतीय इलाकों के इतर अर्धशहरी और ग्रामीण भारत के इलाकों में भी जीत मिली । इस बडे पैमाने की जीत सिर्फ एक व्यक्ति नरेंद्र मोदी की वजह से ही संभव हुई । इसने गठबंधन को एक इंद्रधनुष में फिरोदिया था । वो एक हिंदू नेता थे । वो गुजरात मॉर्डल के लिए जिम्मेदार एक विकास पुरुष थे । कोई सख्त प्रशासक थे जिन्हें राहुल की तुलना में सरकार चलाने का तेरह साल का अनुभव था । राहुल गांधी को शासन चलाने का कोई व्यक्तिगत अनुभव नहीं था और उनके साथ घोटालों से भरी पंगु संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन तो यानी यूपीए दो का बोझ था । मोदी ऐसे नेता थे जो पाकिस्तान को सबक सिखाने के राष्ट्रवादी सपने को पूरा करने वाले थे । सवर्ण जातियों के लिए मोदी एक ऐसी पार्टी का प्रतिनिधित्व कर रहे थे तो मोटे तौर पर उनकी आकांक्षाओं के अनुरूप थी और जिससे वे उम्मीद करते थे ये स्थिरता व्यवस्था और प्रगति लाएगी । पिछडे वर्गों के लिए मोदी उनमें से ही एक थे जो उन्हें लगता था कि वे उनके साथ न्याय करेंगे, उच्च मध्यम वर्गों और मध्यम वर्गों के लिए जो उन का ठोस आधार था । मोदी ऐसे व्यक्ति थे जो उदार आर्थिक नीतियों के माध्यम से उन्हें गुजरात की तरह ही संपन्न बनाएंगे । सब से वंचित सबके लिए वो एक चाय वाले व्यक्ति थे । इसमें बडी सफलता प्राप्त की तो अभी भी अभी जाते वर्ग उनके पीछे पडा हुआ है । सबके लिए आशाएं लेकर आए थे । हालांकि भाजपा के साथ उच्च जातियों और मध्यम वर्ग की बेमिसाल एकजुटता थी परन्तु राष्ट्रीय स्तर पर पहली बार भाजपा को दलितों और आदिवासियों के वोट कांग्रेस से ज्यादा मिले । वास्तव में किसी भी अन्य दल की तुलना में दलितों और आदिवासियों ने भाजपा को अधिक वोट दिए और पार्टी को मिले कुल मतों में चालीस प्रतिशत अन्य पिछडे वर्गों से आए थे । ये भारतीय राजनीति का एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है । ये सब दो हजार चौदह के चुनाव में भाजपा की विजय और उसके बाद से इसकी सफलता तथा विफलता के राज के बारे में स्पष्ट इशारे करते हैं । जब उसका ये फार्मूला सही होता है, वह विजयी रहती है, क्या भी सही नहीं रहता तो सफल हो जाती है । मोदी के अनेक अवतारों ने दो हजार चौदह में तो काम क्या, हम तो दो हजार पंद्रह में ये कामयाब नहीं रहे और भाजपा दिल्ली और बिहार जैसे दो प्रमुख राज्यों में विधानसभा चुनाव हार गई । राहुल गांधी ने पिछले तीन साल में आपने सबसे तीखे राजनीतिक हमले में मोदी सरकार को सूट बूट की सरकार कहा । अचानक ही एक साल के भीतर नरेंद्र मोदी समस्त भारतीयों का नेता होने के स्थान से एक ऐसे व्यक्ति बन गए, जिन्हें रईसों के हिमायती के रूप में देखा जाने लगा और जो अपना सारा समय देश के बाहर गुजारते हैं । पर अब तो एक चतुर और कुशाग्र बुद्धि राजनेता होने के नाते मोदी ने इस छवि के जाल में फंसने के खतरों को पहचाना । खुद को नए रूप में ले आए, कुछ नीतियों और घोषणाओं के माध्यम से और फिर से कल्याणकारी शासन पर ध्यान केंद्रित करते हुए उन्होंने खुद को अब गरीबों के नेता के रूप में स्थापित कर लिया । यह पुस्तक उस कहानी को बयान करती है । एक कैसे मोदी की छवि में बदलाव आया? मोदी कैसे उच्च मध्यम वर्ग को अपने साथ रखते हुए भारत के गरीब और निम्न मध्यम वर्ग के एक तबके की पहली पसंद बन गए और कैसे इस प्रक्रिया के दौरान भारतीय जनता पार्टी के वर्गीय आधार का धीरे धीरे विस्तार हो रहा है । इस बदलाव दें भाजपा को हाल ही में उत्तर प्रदेश सहित कुछ राज्यों में संपन्न चुनावों में कैसे जबरदस्त सफलता दिलाई? दो हजार चौदह के लोकसभा चुनाव में भाजपा को कुछ सीटों का छब्बीस प्रतिशत उत्तर प्रदेश से मिला । इससे तीस सालों में किसी भी पार्टी द्वारा पहली बार अपने बूते पूर्ण बहुमत हासिल हुआ । उत्तर प्रदेश में इस वजह के पीछे मोदी के नजदीकी सहयोगी अमित शाह की बडी भूमिका थी । गुजरात में चुनाव लडने और उसके प्रबंधन का दो दशकों का अनुभव उत्तर प्रदेश में लाए थे । उन्होंने प्रदेश की राजनीति और जातीय जटिलताओं को समझने में समय लगाया । पार्टी के मौजूदा नेताओं का प्रबंधन देखने के साथ ही उत्तर प्रदेश इकाई की बागडोर अपने हाथ में ली । सहयोगियों को एक सूत्र में पिरोया और सबसे महत्वपूर्ण संगठन की नई व्यवस्था का खाका तैयार किया । दो हजार चौदह की सफलता ने शाह की पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर पदोन्नति करा दी । नई हैसियत में शाह के पास देशभर में संगठन का व्यापक तंत्र खडा करने का अवसर था । उन्होंने इस संबंध में कोई वक्त जाया नहीं किया । चाहने, पार्टी की मशीनरी का विस्तार किया नहीं । सदस्य बनाए, जनसंपर्कों पर ध्यान दिया और निचले स्तर को बूथ स्तर पर यहाँ मतदान होता है । पार्टी का दिल और आत्मा बना दिया । इस प्रक्रिया में उन्होंने एक संस्थान का गठन किया । इसे अमित शाह का चुनावी प्रबंधन स्कूल कहा जा सकता है की पुस्तक बताती है अमित शाह ने किस तरह भाजपा का कायाकल्प कर दिया । सामने से नजर नहीं आने वाले संगठन के वे लोग जिन्होंने जमीन पर इन कोशिशों को साकार किया और प्रचार तथा चुनावों के दौरान इस व्यवस्था ने कैसे कम किया? किताब इस पर नजर डालती है कि भाजपा कैसे यही तरीके अपनाकर दूसरे क्षेत्रों में आगे बढ रही है । अमित शाह के जाने के लम्बे समय के बाद भी उन का योगदान भाजपा को राष्ट्रीय दल बनाने में और चुनाव लडने की सबसे दुर्जय ही रणनीति तैयार करने और चुनाव लडने को पुर्नपरिभाषित करने में मददगार साबित होता रहेगा । जिस तरह मोदी ने अपनी छवि बदली, भाजपा ने भी वैसा ही क्या? आज अगर कोई व्यक्ति भाजपा को सिर्फ उच्च जाति के पार्टी के रूप में देखता है तो वह अतीत में ही जी रहा है । भाजपा सबसे निचले तबके जिसमें व्यापक हिंदू आधार शामिल है, सहित विभिन्न समुदायों का समर्थन हासिल करके एक समावेशी हिंदू पार्टी बन रही है । दो हजार चौदह में नरेंद्र मोदी की अपील और प्रतिनिधित्व के वायदे के कारण पार्टी इन्हीं हाशिया वाले तबकों का समर्थन हासिल करने में सफल रही थी । दो हजार चौदह के बाद पार्टी के लिए अपने चरित्र में लाए गए इस बदलाव पर अपनी नीतियों, बयानों और संगठन के ढांचे के जरिए कायम रहना चुनौती थी ताकि हिंदू समाज की विविधता की इसमें छलक मिलेंगे । वो जब ऐसा करने में विफल रही तो वह चुनाव हार गई । बिहार विधानसभा के लिए दो हजार पंद्रह में चुनाव में पार्टी को पिछ्डे वर्गों और दलितों के प्रति ऍसे पूर्ण रवैये का सामना करना पडा क्योंकि आरएसएस के प्रमुख मोहन भागवत में सुझाव दिया था कि आरक्षण की समीक्षा होनी चाहिए । हाशिये पर समुदायों ने भाजपा में अपना और नेताओं को नहीं देखा उत्तर प्रदेश में दो हजार सत्रह के विधानसभा चुनाव में भाजपा की शानदार सफलता का श्रेय खुद को पिछ्डे वर्गों और संतों की पार्टी के रूप में पेश करने की उसकी क्षमता हो जाता है । यह पुस्तक पार्टी के एक अधिक समावेशी हिंदू पार्टी के रूप में बदलाव की कहानी बयान करती है । पार्टी के भीतर अपनी जडे जमाए उच्च जातियों के हित इस बदलाव के प्रति पूरी तरह सजग नहीं थे और भाजपा में बदलाव की प्रक्रिया न तो बहुत आसान थी और नहीं सीधी सरल थी । भाजपा की परीक्षा तो पार्टी के पुराने और नए समर्थकों के बीच व्याप्त विरोधाभाषों में तालमेल कायम करने में उसकी क्षमता को लेकर होगी । अधिकांश लडे गए चुनावों में भाजपा के लिए संघ परिवार का समर्थन एक महत्वपूर्ण पहलू रहा है परन्तु वो दो हजार चौदह से पहले शायद ही कभी संघ परिवार ने अपनी समूची संगठनात्मक संरचना संसाधन कार्यकर्ताओं और संगठन को इतने बडे पैमाने पर चुनाव में लगाया हो । सत्ता हासिल करने के प्रयास में सहयोग करना एक बात है । सत्ता हासिल करने के बाद इसमें एक सीमा तक मिल जाना अलग बात है । अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली पिछली राजग सरकार में संघ नेतृत्व और प्रधानमंत्री में मतभेद साफ नजर आते थे । इसका बाहर असर भी नजर आता था । चुनाव के दौरान संध अक्सर निष्क्रिय बना रहा है या फिर उसमें इतनी ऊर्जा नहीं लगाई जितनी भाजपा को आशा थी । नरेंद्र मोदी जब सत्ता में आए तो संभावना भी थी क्योंकि उनके पास अपना बहुमत था और उनके आसपास व्यक्ति पूजा भी चल रही थी । बताते हैं कि संघ इससे और सहित महसूस करता था । इसके बाद भी व्यक्तित्व, मुद्दों और चुनाव प्रबंधन को लेकर मतभेदों के बावजूद संघ और भाजपा मोटे तौर पर एक साथ रहे । चुनावों में जाने से पहले भाजपा को संघ की अधिक जरूरत हो सकती है और भाजपा के सत्ता में आने के बाद संघ को उसकी अधिक जरूरत होती है परन्तु उन्होंने एक साथ बहुत अच्छी तरह काम किया । ये पुस्तक बताती हैं कि कैसे नरेंद्र मोदी और मोहन भागवत रहें, कैसे सरकार और संघ के बीच मधुर रिश्ते बनाए रखना सुनिश्चित किया हूँ । भाजपा की तरह ही संघ ने कैसे हिंदू जातियों के प्रति और अधिक समावेशी दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता महसूस की परन्तु हमेशा ही अपनी रूढिवादी बेचारी एकता के प्रति सतर्क पढा और उत्तर प्रदेश में चुनावों तथा प्रचार के दौरान कैसे संघ के तंत्र नहीं जिसमें उसका काडर भी शामिल है परंतु उससे भी अधिक महत्वपूर्ण उसके समर्थकों का व्यापक परिवेश है । एक समान लक्ष्य हिंदू एकता बनाए रखने के लिए भाजपा के प्रयासों में मदद की । दो हजार चौदह में मोदी ने हिंदू भावनाओं का तो आप क्या, परन्तु खुद को स्पष्ट रूप से मुस्लिम विरोधी नजर आने से बचाने के प्रति बहुत सावधान रहे । उन्होंने होशियारी भरा तरीका अपनाते हुए पहले तो पलायन करने वाले हिंदुओं और दूसरे धर्म के अनुयायियों के बीच फर्क क्या? फिर वे जिसे ऍम कहते हैं उस पर आए । इसमें गाय की हत्या और मांस के निर्यात में बढोतरी का आरोप लगाया गया । लेकिन लोकसभा चुनावों के दौरान सभाओं को कवर करने वाला कोई भी व्यक्ति इसकी पुष्टि करेगा कि मोदी के भाषण के पहले होने वाले दूसरे भाजपा नेताओं के भाषण चरम राष्ट्रवाद, एक धर्म वाले राष्ट्र और मुसलमानों के तुष्टिकरण जैसे भाजपा के पुराने संदेशों से ओतप्रोत होते थे क्योंकि राष्ट्र ने सिर्फ मोदी के भाषणों को टीवी पर देखा । उनसे पहले बनाया गया माहौल अक्सर ही जानकारी में नहीं आ पाता था । पार्टी ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुजफ्फरनगर दंगों का भी फायदा उठाया । अमित शाह ने स्पष्ट शब्दों में कहा, ये चुनाव बदला लेने के लिए ही है । इस समूचे इलाके में भाजपा का तंत्र मुसलमानों को सबक सिखाने संबंधी संदेश के साथ हिन्दू कोशिश कर जाट एकजुटता बनाए रखने में जुड गया । ये कारगर भी रहा । सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज के आंकडों के अनुसार भाजपा ने प्रतिशत से अधिक जाटों के वोट हासिल किए । दो हजार चौदह से ही भाजपा ने अलग अलग तरह से हिंदू कार्ड खेला है । हिंदू कार्ड बिहार में नहीं चला । इससे पता चलता है कि ध्रुवीकरण की राजनीति के व्यापक परिप्रेक्ष्य में ये एक मुद्दा है । परंतु सभी परिस्थितियों में ये काम नहीं कर सकता है । हम तो उत्तर प्रदेश में जी सफल रहा जहां भाजपा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक नहीं । आपने शब्दाडंबर के सहारे अपने हमले तेज करते हुए कहा कि किस प्रकार से इस सरकार ने मुसलमानों का तुष्टीकरण किया था । पुस्तक बताती है कि कैसे विशेष रूप से उत्तर प्रदेश में भाजपा ने धीरे धीरे नीचे से ऊपर तक इस कहानी का जाल बनाया कि जहाँ बहुसंख्यक कैसे पीडित हैं जबकि अल्पसंख्यकों के बारे में कहा कि उन्हें सिर पर चढा दिया गया है । ये किताब ये भी बताती है कि कैसे दबे हुए दुराग्रहों को और भी पहना बनाया और झूठ फरेब के माया जाल के जरिए नफरत की भावना को भडकाया गया । इस काम में विपक्षी दलों और उनकी नीतियों ने और मुसलमानों के बारे में उनकी भाषणबाजी ने भी भाजपा की मदद की । निश्चित कर दिया जा सकता है कि उत्तर प्रदेश के दो हजार सत्रह के चुनाव में भारतीय राजनीति के अभी तक के सुपरिभाषित शब्द धर्मनिरपेक्षता का अंत हो गया । दो हजार चौदह से नरेंद्र मोदी और अमित शाह का दृष्टिकोण साफ रहेंगे कि उन्हें अपनी सफलता वाले क्षेत्रों पर काबिज रहते हुए इससे मजबूत बनाना है और शेष भारत में इसका विस्तार करना है । भाजपा जैसे सिर्फ उच्च जातियों की पार्टी नहीं रह गई । पैसे ही यह सिर्फ उत्तर भारत की पार्टी भी नहीं है । अपने गढों के अलावा इसमें सबसे असंभावित जगहों पर जैसे जम्मू कश्मीर से लेकर मणिपुर तक इसने अपना विस्तार किया है । इन प्रयासों को एक और नेता ने आगे बढाया । इसकी जडें संघ में है और वह हैं राम माधव । दो हजार चौदह की जीत के बाद पार्टी में आने से पहले संघ के दिल्ली स्थित प्रवक्ता के रूप में माधव नहीं संघ और भाजपा के बीच में एक अहम पुल के रूप में काम किया । पार्टी के विस्तार का आधार तीन मुख्य रणनीतियां रही हैं कांग्रेस के पूर्व प्रतिद्वंदियों समेत मौजूदा राजनीतिक अभी जातों को अपने में मिला लेना, अपने विचारधारात्मक चेहरे को छुपाकर एक ऐसी पार्टी के रूप में पेश करने की कोशिश करना जो विविधता का सम्मान करती है और एक रुकता नहीं लाना चाहती है और विभिन्न क्षेत्रों की विशेषताओं के अनुकूल खुद को ढालना किताब बताती है । कैसे माधव ने पार्टी को समुचित राष्ट्रीय बनाने में मदद की और कैसे विभिन्न रणनीतियों ने श्रीनगर, कोहाटी और इंफाल में भगवा सरकारें स्थापित की । इस किताब में शुरू से आखिर तक एक ही बात मिलेगी और वो है विपक्ष की अनेक नाकामियां कोई भी नेता नरेंद्र मोदी का मुकाबला नहीं कर पाया है और राहुल गांधी के कमजोर प्रयास जनता का मामूली ध्यान ही आकर्षित कर सके हैं । कोई भी राजनीतिक दल अमित शाह की टक्कर का संगठन नहीं बना सका । कोई भी दूसरा दल अपने सामाजिक संगठन, एक या दो मुख्य जातियों के आगे विस्तृत नहीं कर सका । कोई भी अन्य दल लो पुरानी धर्मनिरपेक्ष पनाम सांप्रदायिक होने के तरफ से आगे नहीं जा पाया । इसका असल में मतलब मुस्लिम बोर्ड पर अत्यधिक निर्भर होना हो जाता है और इस तरह से ये सिर्फ भाजपा की ही मदद करता है और इनमें से अधिकांश नहीं भाजपा के खिलाफ अलग अलग चुनाव लडा और जब विपक्षी एकता कमजोर हो तो भाजपा को परास्त करना बेहद मुश्किल है । जब विपक्ष एकजुट हुआ तो कहानी अलग थी । दिल्ली में आम आदमी पार्टी के पास एक ऐसा नेता था, इसकी व्यापक अपील थी । एक दलील थी, एक संगठन था और एक सामाजिक गठबंधन था । कांग्रेस की हताशा ने भी इसमें योगदान किया था । इसके वोट आप पार्टी की और चले गए थे । असल में भाजपा ने अपने मतों का प्रतिशत बचाये रखा था और अब तो उससे मत कर रहे गई । इससे बेहतर उदाहरण तो बिहार का है जहां विपक्षी गठबंधन ने व्यापक सामाजिक आधार पर जोर दिया और उसमें सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का कोई भी मौका नहीं देने की सावधानी बरती । इन दो हथियारों के साथ विषेशकर जब नीतीश कुमार जैसे एक भरोसेमंद नेता से मुकाबला हो तो भाजपा की ये तुझे मशीनरी चरमरा सकती है । ये एक दूसरा मामला है कि जुलाई दो हजार सत्रह में बिहार की राजनीति में उलटफेर हुआ । नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद को धता बता दिया और अपनी पुरानी सहयोगी भाजपा के साथ हाथ मिला लिया और पार्टी चुनाव हारने के बावजूद सत्ता में आई । इससे नरेंद्र मोदी और अमित शाह की भूख को ही उजागर किया । लेकिन ये किताब मुख्य कहा दो हजार पंद्रह की चुनावी पराजय होता और उनसे भाजपा द्वारा सीखे गए सबको तक ही सीमित है । भाजपा की वह सफलता को समझने के लिए । इस पुस्तक में उत्तर प्रदेश में पार्टी के सूक्ष्म स्तर पर हुए कायकल्प पर ध्यान केंद्रित किया गया है । भारत के सबसे बडे राज्य में हुए राजनीतिक मंथन पर विशेष ध्यान देने की मजबूत मुझे हैं । उत्तर प्रदेश की राजनीति भारत की राजनीति की दिशा तय करती है । ये भले ही बहुत किसी पीती बात हो, परंतु इसमें बहुत कुछ सच्चाई है । दिल्ली का रास्ता लखनऊ होकर ही जाता है । उसकी वजह यह है संसद नहीं, इसका वजन ज्यादा है । ये राज्य भाजपा के एक राष्ट्रीय संगठन के रूप में उत्थान का केंद्र भी रहा है । जब कभी भी पार्टी ने उत्तर प्रदेश में सफलता हासिल की तो वो राष्ट्रीय स्तर पर भी फलीफूली है । जब भी राज्य में उसका प्रदर्शन खराब हुआ तो वह बहुत ही बुरी तरह सत्ता से बाहर हुई है । पार्टी की राजनीतिक और वैचारिक परियोजना यहाँ पर मिलती है । इसके दोनों प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी किसी राज्य से निर्वाचित हुए । इसका संरक्षक संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ उन्नीस सौ से ही उत्तर प्रदेश में ध्यान दे रहा है और इलाहाबाद विश्वविद्यालय और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों से बडे स्तर पर लोगों की भर्ती करता है । किसी राज्य में अयोध्या, काशी और मथुरा भी हैं । ये तीनों मंदिर उन्नीस सौ अस्सी और के दौरान भाजपा द्वारा चलाए गए आंदोलन से संबद्ध रहे हैं । विषेशकर रामजन्मभूमि आंदोलन ने भारतीय जनता पार्टी को उन्नीस सौ चौरासी में लोकसभा में सिर्फ दो सीटों से उन्नीस सौ में एक सौ बीस सीटों तक पहुंचाया । इनमें से इक्यावन सीटें उत्तर प्रदेश से ही थी । उस समय अविभाजित उत्तर प्रदेश लोक सभा के लिए पिचासी सांसद भेजता था । उन्नीस सौ छियानवे में जब वाजपेयी पहली बार सत्ता में आए । भाजपा ने इस राज्य में पवन सीटों पर विजय हासिल की । उन्होंने इस पर अपना प्रदर्शन बेहतर क्या और उन्नीस सौ ठाणे के चुनावों में अट्ठावन सीटें जीते । में इस राज्य से भाजपा सीधे गोता लगाते हुए सिर्फ उन सीटों पर विजयी हुई । लेकिन इस पर गौर कीजिए तब भी ये उत्तर प्रदेश में सबसे बडी पार्टी थी । एक बार फिर उसमें सरकार बनाई दो हजार चार और दो हजार में । उत्तर प्रदेश में भाजपा सर दस सीटें ही जीत सकी । वो लोकसभा में विपक्षी सीटों पर सिमट गई । दो हजार चौदह में भारतीय राजनीति में उत्तर प्रदेश की केंद्रीयता फिर से स्थापित हुई । राज्य में भाजपा की जीतने, खेल के नियमों नए सिरे से खडे और नरेंद्र मोदी को भारत का सबसे ताकतवर प्रधानमंत्री बना दिया और दो हजार सत्रह में इसके शानदार विजय के साथ ही भाजपा ने सुनिश्चित कर दिया । तीन दशकों में पहली बार एक ही दल दिल्ली और देश के सबसे बडे राज्य दोनों स्थानों पर शासन करेगा । पिछला भाजपा को दो हजार उन्नीस के आम चुनावों में पड दे दी । इसमें पार्टी की राजनीतिक और सामाजिक परियोजना में आप प्रवक्ता भी लाई है । पार्टी के सभी प्रमुख विषय मोदी की अपील शाह का संगठन भाजपा की सोशल इंजीनियरिंग, राजनीतिक ताकत बढाने के लिए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और नफरत का इस्तेमाल, विपक्ष का छिन्न भिन्न होना और उस की कमजोरियाँ उत्तर प्रदेश में दिखाई पडी हैं । उत्तर प्रदेश पर ध्यान केंद्रित करने की एक निजी वजह है । मैंने दो हजार चौदह और दो हजार सत्रह में राज्य के चुनावों को व्यापक स्तर पर कवर किया था । राज्य में विधानसभा चुनाव की तैयारियों के दौरान एक साल से अधिक समय के भीतर में राज्य में बदलते राजनीतिक समीकरणों पर निगाह रखने के इरादे से लगभग हर महीने यहाँ आया और मतदान शुरू होते ही मैंने सहारनपुर से मिर्जापुर के पश्चिमी और पूरा तराई में ट्राॅफी से लेकर उत्तर में नेपाल के सीमावर्ती क्षेत्र से बुंदेलखंड के चित्रकूट तक करीब एक महीने में राज्य में पांच हजार किलोमीटर की जाता की । लेकिन ये किताब सिर्फ उत्तर प्रदेश के बारे में नहीं है । इसमें अन्य राज्य बिहार के चुनावी समर में पार्टी की पराजय को भी रेखांकित किया गया है । इसकी मैंने पांच साल तक रिपोर्टिंग की है । इसमें इस बात का भी परीक्षण किया गया है कि उत्तरी और पश्चिमी भारत के दूसरे क्षेत्रों में किस तरह से पार्टी के विस्तार की रणनीति ने काम किया । किताब इसकी पडताल करती है कि भाजपा कैसे नई नई रणनीतियों के जरिए आज अनअपेक्षित इलाकों जैसे कि पूर्वोत्तर में भी एक प्रभुत्वशाली पार्टी बन गई है । किताब इस बात पर गौर करती है कि भाजपा चुनाव कैसे जीतती है । ये इस विषय पर गौर नहीं करती है कि चुनाव जीतने के बाद क्या करती है और इस तरह इसने भाजपा के शासन के तहत हाल में होने वाली अधिक विवादास्पद कार्यवाहियों और घटनाओं से खुद को दूर रखा है । किताब भविष्य के लिए कोई भविष्यवाणी भी नहीं करती है । जटिल समाज के बीच नियमित चुनाव और बहुदलीय प्रतिस्पर्धा में राजनीतिक प्रक्रिया के बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता है । और ये तथ्य कि आज भाजपा प्रमुख दल के रूप में है, इसका मतलब ये नहीं है, उसे हराया नहीं जा सकता । निश्चित ही पिछले तीन सालों के दौरान भाजपा हारी भी है और उसके तमाम कमजोरियां भी उजागर हुई हैं । चुनावों की लोकतंत्र प्रक्रिया के माध्यम से भाजपा का उत्थान समकालीन भारत की सबसे अधिक दिलचस्प कहानियों में से एक है । इसमें राजनीति की धारा ही बदल दी है और नई सामाजिक गठबंधन बनाए हैं । पुरानी खामियों को पीछे छोड दिया है, नए टकरावों को जन्म दिया है । कुछ को सशक्त बनाया तो अन्य को अलग अलग क्या है और आप सरकारी संस्थाओं पर उसका पूरा प्रभाव है । जब एक ताकतवर राष्ट्रीय नेता एक विकट रणनीति का एक वैचारिक एवं संगठनात्मक ढांचा, होटल, सामाजिक गठबंधन, धर्म की राजनीति और एक निर्मम महत्वाकांक्षा अध्यात्मक और लचीली संस्कृति का विलय होता है । राजनीतिक और लोकतंत्र अभूतपूर्व तरीके से बदल सकता है । शायद इस कदर बदल सकता है की उसे पालता नहीं जा सकता है ।

2. Modi Hawa

हूँ । मोदी हवा उत्तर प्रदेश के चुनाव भारतीय जनता पार्टी ने नहीं, राज्य के नेताओं ने भी नहीं, उम्मीदवारों ने नहीं और न ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ बल्कि सिर्फ एक व्यक्ति ने राज्य में भाजपा को विजय दिलाई और वो व्यक्ति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी है । मुसलमानों के अलावा उत्तर प्रदेश के प्रत्येक समुदाय ने उन्हें अपना मना और दिल्ली और लखनऊ दोनों जगहों के लिए उन पर ही भरोसा क्या भरोसा दो हजार चौदह के चुनाव में भी साफ नजर आ रहा था । पश्चिम जनक हैं । तीन साल बाद भी नरेंद्र मोदी के खिलाफ कोई विरोधी लहर नहीं है । वास्तविकता तो यह है कि सत्ता ने उनकी अपील को और बढा दिया है । वो अपने पूरे करियर के दौरान इसी तरह रहे हैं । मोदी ने दो हजार एक के अंत में गुजरात विधानसभा में मुख्यमंत्री के रूप में प्रवेश किया और राज्य में एक भी चुनाव कभी नहीं हारे । उन्होंने लोकसभा में प्रधानमंत्री के रूप में प्रवेश किया और दिल्ली तथा बिहार में मिले झटके के बावजूद उनका जो रिकॉर्ड है उससे कोई भी दूसरा ईशा करेगा । सत्ता मिलने के कारण संतोष करने और अपनी संभावनाओं का चयन करने के बजाय इसने निरंतर मोदी की लोकप्रियता बढाई है । उत्तर प्रदेश के शहरों, गांवों और सडकों पर अधिकांश लोगों, जिन्होंने उनका समर्थन किया, समर्थन के लिए कोई स्पष्ट कारण नहीं बता सके या फिर नहीं बताया । ये एक अकेले व्यक्ति के प्रति अभूतपूर्व आस्था, नियत में भरोसा, मंशा और इमाम तथा निष्ठा थी । इस भरोसे को आगे लाने में बहुत ही सावधानी से बनाई गई एकदम नई छवि थी । यदि तो दो हजार से हिंदू हृदय सम्राट थे, तो मोदी ने बहुत ही सावधानी के साथ दो हजार सात से अपनी छडी को विकासपुरूष में तब्दील किया और विकास के लिए गुजरात मॉर्डल पेश किया । इन्हीं दो छवियों को मिलने का नतीजा दो हजार चौदह में उनकी विजय थी । अब तीसरा उतार लिया है, जिसकी कम सराहना हुई । नरेंद्र मोदी आपने पहले के दो अवतार बनाए रखते हुए आज गरीबों के नेता है । स्टडी के साथ उन्होंने सूट बूट वाली सरकार के आरोपों को ध्वस्त कर दिया है । आठ नवंबर दो हजार सोलह को जब रामसुधार मिर्जापुर के जमुई बाजार इस अपने घर में टेलीविजन देख रहा था तो उसने प्रधानमंत्री को यह घोषणा करते हुए सुना, पांच सौ और हजार रुपए के नोट आधी रात के बाद से वैध मुद्रा नहीं रह जाएगी । उसे इस कदम के नतीजों को समझने में कुछ चाँद लगा राम सुधार की बाजार में बिजली के सामान की छोटी सी दुकान है और उसका कारोबार सामान प्राप्त करना और से बेचने का है तो अधिकतर नकदी पर ही निर्भर करता है । अभी कैसे चलेगा दो दिन बाद वो बिजली के सामान की उसे आपूर्ति करने वाले दुकानदार से बिजली के तार केवल और बर्बादी लेने बनारस गया । उसने उसे वो न दीदी जो अब गैरकानूनी मुद्रा हो चुकी थी । उसकी आपूर्तीकर्ता पुराना संपर्क में इसी लेने से इंकार कर दिया । परंतु उसने कहा कि वह पचास हजार रुपये तक का सामान लेकर इसका भुगतान बाद में कर सकता है । लेकिन अब जब सामान की आपूर्ति का बंदोबस्त हो गया, मांग की समस्या बरकरार रही । जमुई बाजार में सिर्फ दो ही बैठे हैं । इनमें नई मुद्रा अभी नहीं पहुंची थी, एटीएम भी बंद पडे थे । सब का मतलब यही था की लोगों के पास नकदी नहीं है और इस वजह से रामसुधार की दुकान में बिक्री तेजी से कम हो गयी । रोजाना चार हजार रुपये तक का कारोबार करने वाला रामसुधार अब सिर्फ हजार रुपए तक का ही सामान बीच पा रहा था । अब परेशानी में पड गया उस पर आपने आपूर्तिकर्ता का बकाया था तुरंत उसे पर्याप्त आमदनी नहीं हो रही थी । सरकार में उसकी जिंदगी में व्यवधान पैदा कर दिया था और उसके छोटे सिर्फ देखी अर्थव्यवस्था को डामाडोल कर दिया था । पर उनकी इसके बावजूद प्रधानमंत्री ने सुधार का विश्वास कम नहीं हुआ था । उसने मुझसे कहा, या ये प्रतिबंध नहीं है । यदि ये प्रतिबंध होता तो हम बर्बाद हो गए होते । उन्होंने तो उनसे सिर्फ यही कहा है कि पुरानी मुद्रा अपने खातों में जमा कराओ और हमें ऐसा करने के लिए समय भी दिया है । समझता हूँ ये बहुत अच्छा कदम है । यही हमारे जवान चौबीस घंटे हमारी सुरक्षा के लिए अपनी जान जोखिम में डाल सकते हैं । तो क्या हम राष्ट्रहित में कुछ घंटे लाइन में खडे नहीं हो सकते? कुछ ने दलील दी, ऐसा बैंकों से वापस आएगा, जिनके पास काला धन है, वो पकडे जाएंगे । अर्थव्यवस्था स्वच्छ और साफ हो जाएगी और फिर एक मुस्कराहट के साथ रामसुधार ये भी जोडता है । मोदी ने कुछ समय मानना है कि सारी परेशानियाँ और सुविधाएं कुछ सप्ताह में खत्म हो जाएगी । हमें उन पर भरोसा है । रामसुधार अकेला बाद नहीं था । नवंबर दो हजार सोलह में समूचे पूर्वांचल, वाराणसी, मिर्जापुर, आजमगढ, जौनपुर में भारत की सबसे गरीब पट्टी में से एक सूबे में आम नागरिकों का यही कह रहा था । विमुद्रीकरण से असुविधाएं हुई हैं और अब तो वेज का समर्थन करते हैं । जौनपुर में एक बैंक की लंबी कतार में खडे एक वृद्ध महिला कहती हैं कि वह परेशानी महसूस कर रही हैं । मैंने कहा मेरे पास एक भी पैसा नहीं है, मोदी सरकार ने नहीं मुद्रा चलाई है । इसके बावजूद हो महसूस करती हैं की सरकार ने सही काम किया है । यदि बडे लोगों को परेशानी हो रही है यदि मुझे दिक्कत हो रही हो इससे क्या फर्क पडता है । मिर्जापुर के राजगढ में एक छोटा कारोबारी परिवार में विभाग की तैयारियों में व्यस्त था । वो कुछ भुगतान तो चेक से करने में सफल रहा जबकि दूसरी जरूरतों के लिए उधर पर निर्भर रहा । फिर भी वो इस नीतिगत पहल का प्रशंसक था । वो कहता है कि यह मई घटाएगी, लोगों को चेक का इस्तेमाल करने के लिए बाध्य करेगी । रियल इस्टेट के दाम भी नहीं चाहेंगे, अच्छी पहल है छोटी खेती बाडी वाले एक दलित किसान को आगामी बुवाई के सत्र के लिए बीच खरीदने के लिए नकदी की आवश्यकता थी तो वो भी शिकायत नहीं कर पा रहा था । वो कहता है, ये अस्थाई तकलीफ है । एक या दो महीने में नोट वापस आ जाएंगे । लोग कह रहे हैं कि रईसों से लिए गए धन का गरीबों में निवेश किया जाएगा । भारतीय अर्थव्यवस्था के हाल के इतिहास में कोई अन्य कदम आम नागरिकों की रोज मर्रा की जिंदगी में इतना अधिक व्यवधान डालने वाला नहीं हुआ जितना कि विमुद्रीकरण का निर्णय किसी अन्य कदम की वजह से रोजगार नहीं गए और नहीं असुविधाएं । फिर भी इस कदम के प्रति उत्साह स्पष्ट था की अपेक्षा थी कि ये कदम उन संपन्न लोगों खुशहाली देने के लिए अर्थव्यवस्था को स्वच्छ बनाएगा जो ये मानते थे सबसे अधिक पीडित है । इस उम्मीद से के अतिरिक्त संसाधनों को और अधिक क्षमता समाज की अपेक्षा करने वाले गरीबों के लिए हस्तांतरित किया जाएगा । अनेक कारणों से सरकार के इस कदम को लोगों का समर्थन मिला । इसके कुछ महीनों बाद ही ये उत्साह धीरे धीरे गायब हो गया परन्तु उसने कभी भी शत्रुता का रूप नहीं लिया । जनता के आक्रोश के कारण इतने व्यापक पैमाने पर होने वाली अव्यवस्था से उत्पन्न अपरिहार्य जनाक्रोश का बहुत ही कम लोकतांत्रिक अथवा दबंग नेता सामना करने में सक्षम होते हैं । परन्तु नरेंद्र मोदी ने न सिर्फ इस आक्रोश को शांत किया बल्कि वो और अधिक ताकतवर होकर ऐसे व्यक्ति के रूप में सामने आए जिसकी प्रतिबद्धता गरीबों के प्रति थी और जिसने भ्रष्ट और संपन्न प्रतिष्ठान के खराब ईमानदारी का संघर्ष छेड रखा था । जब जनता विमुद्रीकरण के परिणामों से रूबरू हो रही थी तो उस दौरान मोदी ने उत्तर प्रदेश में छह जनसभाएं दिसंबर की शुरुआत में मोदी ने पीटर उद्योग के लिए प्रसिद्ध मुरादाबाद, जो विमुद्रीकरण से बुरी तरह प्रभावित हुआ था, मैं ऐसे ही एक जनसभा को संबोधित किया । करीब पचास मिनट के अपने भाषण में मोदी ने दर्जनों बार गरीब और गरीबी का उल्लेख किया । ऐसा भाषण था जिसके राजनीतिक संदेश को समझने के लिए इसके वक्त विन्यास को विस्तार से अलग अलग करके समझना उपयोगी होगा । प्रधानमंत्री ने किस तरह से अपनी राजनीतिक प्रतिष्ठा का इस्तेमाल किया और किस तरह वो सवाल स्थल पर उपस्थित हजारों लोगों के साथ तालमेल बिठा सकें । मोदी ने बताया, उन्होंने कैसे उत्तर प्रदेश का चुनाव लडा क्योंकि वो गरीबी के खिलाफ युद्ध छेडना चाहते थे । भारत की गरीबी को खत्म करने के लिए पहले उत्तर प्रदेश की गरीबी दूर करनी होगी और फिर उन्होंने अपने आकर्षक अंदाज में मोदी ने भीड को इसमें शामिल कर लिया और उससे पूछा कि क्या वे अपनी मुठिया उठाकर पूरी ईमानदारी से उनके सवालों के जवाब देगी । उन्होंने सवाल किया, क्या भ्रष्टाचार ने देश को बर्बाद कर दिया है? गैस की वजह से लूट हुई है? फॅसने सबसे ज्यादा नुकसान गरीबों को पहुंचाया है क्या? इसने गरीबों के अधिकारों को छीना है? भ्रष्टाचार ही सारी समस्याओं की जड है । भीड ने जवाब दिया था । मोदी ने फिर कहा, अब आप ही मुझे बताएं कि क्या भ्रष्टाचार रहना चाहिए या इससे जाना चाहिए? जाना चाहिए कि नहीं । जनता का जवाब आया जाना चाहिए । इसे जाना ही चाहिए । तो फिर आप मुझे बताइए क्या ये अपने आप चला जाएगा? ये कहेगा कि मोदी जी आप आ गए हैं । मैं डर गया हूँ, मैं जाऊंगा । एक बार फिर जनता का स्वर उभरा नहीं तो फिर हमें भ्रष्टाचार को हराने के लिए डंडे का इस्तेमाल करना होगा या नहीं जहाँ में कानून का सहारा लेना होगा या नहीं । क्या हमें भ्रष्टाचार से निपटना होगा या नहीं था? क्या हमें ये काम करना चाहिए या नहीं था? मोदी ने आगे कहा, यदि कोई ऐसा काम करता है तो क्या वो अपराधी या दोषी है? भ्रष्टाचार के खिलाफ लडना अपराध है? नहीं । मोदी ने एक बार फिर जनता को पूरे दाग । मैं आपके लिए लडाई कर रहा हूँ । ज्यादा से ज्यादा ये लोग मेरा क्या कर सकते हैं? आप बताएंगे ये मेरा क्या कर सकते हैं । थोडी खामोशी के बाद उस जवाब देते हैं, मैं तो एक फकीर हूँ, मैं अपना थैला उठाकर चला जाऊंगा । इसके प्रत्युत्तर में जानता नहीं, जबरदस्त तालियाँ बजाई और मोदी के नारे लगाए । और यही फकीरी है जिसने मुझे गरीबों के लिए लडने की ताकत है । मोदी ने बात कही पर खत्म नहीं । उन्होंने कहा, जब उन्होंने गरीबों के लिए जनधन खाता खोलने का अभियान शुरू किया, लोगों ने उनका मजाक बनाया तो आज पैसे वाले अब गरीबों के घर आ रहे हैं, पुराने संबंधों की याद दिला रहे हैं और फिर उनसे दो तीन लाख रुपए अपने बैंक खाते में जमा करने के लिए कह रहे हैं । तो सवाल करते हैं क्या आपने पहले कभी ऐसा देखा कि पैसे वाले गरीब के दरवाजे पर आएंगे और चुकी आज भ्रष्ट लोग गरीब जनता के घरों के आगे लाइन लगाए हैं । उसके बाद उन्होंने गरीबी का सार्वजनिक रूप से आप क्या? मैं सभी जनधन खाताधारकों से कहता हूँ जिसने भी आपको अपना पैसा दिया है । इसमें से एक रूपया भी मत लीजिए । आप देखेंगे ये रोजाना आपके दरवाजे पर आएंगे । अब कुछ मत कहिए । आप उनसे कहिए कि उन्हें धमकाएं नहीं और ना मोदी को लिखकर भेजेंगे । मुझे कह दीजिए, आप सबूत दीजिए कि आपने मुझे पैसा दिया था तो फस गए हैं । आप पैसा अपने पास रखिए और इसका रास्ता मैं निकली हूँ । मैं उन उपायों पर विचार कर रहा हूँ कि जिन्होंने गैरकानूनी तरीके से पैसा जमा किया है वो जेल जाएंगे और ये पैसा गरीब के ही पांच रहेगा । अपने भाषण के अंत में शरारतपूर्ण मुस्कान के साथ ही कहते हैं कि पैसे वाले दिन भर मनी मनी मनी कहते थे । अब वो सिर्फ मोदी मोदी मोदी कहेंगे । मोदी के भाषण में एक बात साफ नजर आ रही थी वो विमुद्रीकरण से उत्पन्न परेशानियों को समझ रहे थे । मोदी कहते हैं, इस देश के लोगों को जब ये पता चलता है इसमें मंशा अच्छी है, ईमानदार प्रयास है और उन्हें भरोसा है तो ये देश कुछ भी रहने के लिए तैयार है । क्या कोई ये सोचता है सभी एक सौ पच्चीस करोड लोगों को भ्रष्टाचार के खिलाफ लडाई की जिम्मेदारी उठानी होगी । मैं आपको नमन करता हूँ । भाषण को तार तार करना आसान है । क्या विमुद्रीकरण से भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा? क्या कालेधन एक बहुत ही छोटा हिस्सा नकदी में था । क्या ये एक पेचीदगी भरे राजनीतिक निर्णय को पेश करने का गलत तरीका था? अर्थव्यवस्था का पैमाना इसके लाभों की तुलना में कहीं ज्यादा प्रभावित था । मोदी को कौन अपराधी मान रहा था? क्या लोगों को पैसा नहीं लौटाने के लिए कहकर उन्हें इस बात के लिए प्रेरित करना उचित था कि वे समझौते को तोडे तो उन्होंने दूसरों के साथ अच्छा से किया है । पर अब तो ये सब यहाँ प्रासंगिक नहीं है । इसके बजाय प्रासंगिक यह है कि वह भाषण में क्या कहते हैं । वो अपने समय के सबसे महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णय को साधारण और समझ में आने वाले शब्दों में बता रहे हैं । वो तो सही और गलत के बीच में इसे पेश करते हैं । वो खुद को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में पेश करते हैं जो बुरे लोगों के शोषण का शिकार हुई जनता की ओर से अच्छी लडाई लड रहा है । लेकिन लडाई की इच्छा जताते हुए भी खुद को एक ऐसे नेता के रूप में पेश करते हैं तो जब को छोड सकता है जिसमें उसका कोई निहित स्वार्थ नहीं है । होने के लिए कुछ नहीं है । वो पीडा को भी महसूस करता है परन्तु वो इसे न्याय परायणता, त्याग के भाव और नागरिकों को यह एहसास कराता है । वह एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मिशन में भाग ले रहे हैं । फिर वहाँ से आगे की बात करते हैं । वो इस बात से प्रसन्नता व्यक्त करते हैं कि पैसे वाले परेशान हो रहे हैं और वह उन का माहौल बनाने के लिए जनता को प्रेरित करते हैं । वो लोगों की एशिया को बना रहे हैं, उनके आक्रोश को सुना रहे हैं और वो इस तरह का संदेश पेश करते हैं कि पैसे वालों का नुकसान ही गरीबों का लाभ होगा । वो आकर्षक और समतामूलक भविष्य यहाँ चंद लोग ही संपदा को अपने पास नहीं रख सकेंगे । वायदा करके लोगों की मौजूदा परेशानियों को निष्प्रभावी कर देते हैं । मोदी ने नवंबर से जनवरी के दौरान मैं अपनी सभी जनसभाओं में यही किया । इसके दो प्रमुख लहरदार थे । पहला तो इससे जनता की भावनाओं को संभालने में मदद मिली । एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने मुझसे कहा, हर बार जब उन्होंने भाषण दिया, हम जानते थे उन्होंने कुछ और सप्ताह का समय हासिल कर लिया है । यदि उनकी विश्वसनीयता नहीं होती तो कोई ऐसा तरीका ही नहीं था जिसमें जनाक्रोश और दंगों का सामना किए ही बगैर सरकारी तंत्र उस पर अमल कर पाता । नौकरशाही इस चुनौती के पैमाने को लेकर तरफ थी । इसमें व्यवस्था को रूबरू होना था । यह दीगर बात थी कि निर्णय सही था या गलत, परन्तु उन्होंने एक निर्णय लिया । उन्होंने इसे स्वीकार किया और उसके कारण बात करने के लिए उन्होंने एक राजनीतिक माहौल बनाया । नरेंद्र मोदी की वाकपटुता इतनी प्रभावशाली थी जो उन्होंने कहा था । इस कदम को न्यायोचित ठहराने के लिए नागरिकों को उसे अक्षरशः दोहराते हुए देखा जा सकता था । लेकिन इसका दूसरा निहतार्थ अधिक गंभीर था । प्रधानमंत्री के भाषण सिर्फ अल्पकालीन असंतोष को संभालने के लिए ही नहीं थे, इस समझने के लिए कि आखिर ये कहाँ से आ रहे थे तो इसके लिए दो हजार पंद्रह में लौटना होगा । उस वर्ष अप्रैल में लोकसभा में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने सरकार पर जबरदस्त धावा बोला था । राहुल अपने भाषण में कहा, आपकी सरकार किसान की समस्याओं को नजरअंदाज कर रही है । कामगारों की नहीं सुन रही है कि सरकार दो उद्योगपतियों की है । ये तो सूट बूट की सरकार है । एक ऐसा व्यक्ति जिसने मित्रता और बहुत सुखों से दूर रहते हुए अपनी बनाई हो । मोदी ने जनवरी दो हजार पंद्रह में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के सम्मान के समय अपने नाम की लिखावट वाला सूट पहनकर अपनी छवि को बहुत ही अधिक नुकसान पहुंचा दिया था । इस व्यंग्य नहीं उन्हें व्यक्तिगत रूप से हट क्या नीति उसी तरह से चलती है जैसे कि शुरू में भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन पारित किए जाने को अमीर समर्थक किसान विरोधी बताया गया था । इस बात की संभावना थी कि मोदी सरकार को भी वैसी ही कठिनाइयों का सामना करना पडेगा क्योंकि पारंपरिक रूप से भाजपा को सिर्फ संपन्न लोगों की पार्टी के रूप में ही देखा जाता रहा है । चुनावी दृष्टि शाहिद आत्मघाती नजरिया है । ये अफसाना बिहार के गांव में नीचे तक पहुंच गया था । आप उन्हें एक ग्रामीण चिकित्सक या फिर उसे नीम हकीम भी कर सकते हैं । अमरीश कुमार बिहार के समस्तीपुर जिले के वासुदेवपुर में राजमार्ग के किनारे अपने क्लिनिक के बाहर बैठा हुआ था । जिला अस्पताल में छह दिन के प्रशिक्षण के बाद सिविल सर्जन अमरीश कुमार सरीखों को ग्रामीण इलाके में बुनियादी चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने के लिए प्रमाणपत्र देते हैं । बिहार विधानसभा चुनाव से दो महीने पहले दो हजार पंद्रह के अगस्त महीने के अंत में भावी राजनीतिक पसंद को लेकर चिंतन कर रहा था । था । मोदी जी तो है बडा घूमते हैं, बहुत यात्राएं करते हैं उन्होंने चौदह महीने में सोलह देशों की यात्रा की है । पांच साल का कार्यकाल पूरा होने तक वो इस देश को विदेशियों के हवाले कर देंगे । भारत में सारा माल विदेशी निर्मित होगा चुनावों के दौरान उत्तरी बिहार के इलाकों के दौरे में उन लोगों के लिए सबसे विस्मित करने वाली बात ये थी कि जिन्होंने इस क्षेत्र में दो हजार चौदह के लोकसभा चुनावों को देखा था । मोदी की लोकप्रियता में तेजी से गिरावट आई थी । वो अब जनता के नेता नहीं रह गए थे । वरिष्ठ पत्रकार और बिहार के मामलों में पुख्ता जानकारी रखने वाले संकर्षण ठाकुर नहीं बहुत ही सटीक तरीके से रेखांकित किया । लालू प्रसाद के गढ राघवपुर से राज्य यादव को उद्धृत करते हुए उन्होंने कहा, बेवकूफ बनाया, गरीब को वोट दे गया, महंगाई हो गया । हर हर मोदी से अरहर मोदी दाल की कीमतें निश्चित ही आसमान छू रही थी । इससे हर घर प्रभावित था और ये लोगों को भाजपा से दूर कर रहा था । इस स्थिति में सुधार की आवश्यकता थी । रिश्ते राहुल ने सूट बूट की सरकार का प्रयोग करने वाले अपने उसी भाषण उन्होंने मोदी को सलाह भी दे डाली । उन्होंने कहा, साठ प्रतिशत जनता किसान और श्रमिक है । यदि वो अपना रास्ता बदलें तो राजनीतिक रूप से इससे प्रधानमंत्री को लाभ मिलेगा । विमुद्रीकरण ने जो किया और मुरादाबाद में प्रधानमंत्री के भाषण नहीं की, साफ कर दिया कि निश्चित ही ये उनके पक्ष में बदलाव में मददगार है । भाजपा के प्रवक्ता ने मुझसे कहा, इसने हमेशा के लिए ये धारणा खत्म कर दी । ये छूट बूट की सरकार है । हालांकि राहुल ने उत्तर प्रदेश के चुनावों के दौरान इसी रणनीति को दोहराया और उनके इस दावे का कि विमुद्रीकरण गरीबों द्वारा खून पसीने से कमाए गए पैसों को रईसों के खातों में स्थानांतरित करने की बहुत बडी साजिश है और मोदी सिर्फ पचास भ्रष्ट परिवारों के लिए ही काम करते हैं । आरोपों में बहुत ही कम भरोसा किया गया । प्रधानमंत्री आगे थे । उन्होंने संभावित अंतर को भी नोटिस किया और उस पर विचार किया । वो पहले ही अपनी नई छवि बना चुके थे और समाज में हाशिए पर रहने वाले मतदाताओं के बीच अपने लिए एक स्थान बना चुके थे । आप वर्ग एशिया को अस्थाई रूप से बना सकते हैं परंतु आपको अपनी छवि को मतों में परिवर्तित करने के लिए वास्तव में आपको कुछ और पेशकश भी करनी होती है । विमुद्रीकरण से काफी पहले ही मोदी सरकार ने अपना ध्यान ग्रामीण भारत पर केंद्रित कर दिया था । लखनऊ के निकट उन्नाव जिले के ब्लॉक प्रमुख अरुण सिंह समाजवादी पार्टी के एक प्रभावशाली स्थानीय नेता थे । हालांकि वह सपा कांग्रेस गठबंधन की संभावनाओं को लेकर बहुत अधिक आशान्वित नहीं थे, के निर्वाचन क्षेत्र कांग्रेस की झोली में चला गया था । इसे लेकर स्थानीय समाजवादी कार्यकर्ताओं में इस बात को लेकर असंतोष व्याप्त था कि उन्हें अपना प्रत्याशी उतारने का मौका नहीं दिया गया । सिंगल के प्रति निष्ठा रखने वाले ग्राम प्रधानों का एक समूह राजनीतिक दिवालियापन की उनसे शिकायत कर रहा था । तभी एक मुस्लिम प्रधान ने कहा, मैं भाजपा को कभी वोट नहीं दूंगा और अंत यदि मुझे और मेरे लोगों को भाजपा को वोट देना पडा तो इसकी एक वजह गैससिलेंडर होगी । जनता के मूड के आकलन के लिए भाजपा ने दिन स्वतंत्र एजेंसियों की सेवाएं ली थी । उन्होंने एक जैसी ही अंदरूनी रिपोर्ट केंद्र सरकार के तीन फैसले सिलेंडर यानी कुछ वाला योजना, शौचालय, स्वच्छ भारत और जनधन खाते बहुत लोकप्रिय थे । खासकर महिलाओं में उज्ज्वला योजना का मई दो हजार सोलह में शुभारंभ करने के लिए उत्तर प्रदेश के बलिया जिले का चयन किया गया था की योजना सरल थी । इसके अंतर्गत गरीबी की रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले परिवारों को सोलह सौ रुपए प्रति कनेक्शन के सहयोग के साथ ही पांच करोड रसोई गैस के कनेक्शन दिए जाएंगे । कनेक्शन घर की महिलाओं के नाम से पंजीकृत होंगे । मुस्लिम प्रधान ने कहा, मैं उन्हें पसंद नहीं करता हूँ परन्तु ये सही है कि मोदी इस तरह से दस साल के भीतर ग्रामीण इलाकों का कायाकल्प कर देंगे । जिन्हें लाभों की जरूरत है उन्हें सीधे मिल रहा है । संप्रग ने हालांकि गरीबों के हित वाली अनेक योजनाओं की पहल की थी और उन्हें उन तक पहुंचाने की व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता भी महसूस की थी । बहन तो मोदी ने ढुलमुल नौकरशाही को फिर से उस तरफ बनाते हुए इनमें से कई योजनाओं पर प्राथमिकता के आधार पर अमल करने के लिए आधार द्वारा उपलब्ध कराए गए नेटवर्क का इस्तेमाल करने के साथ अपनी राजनीतिक अनुभव का सहारा लिया । सरकार की मदद के लिए सबसे अधिक सर्वदमन घरों की पहचान के लिए दो हजार बारह में संपर्क दो कार्यकाल के अनुसार शुरू की गई सामाजिक, आर्थिक और जाति जनगणना में मिले आंकडों का इन कार्यक्रमों में बडे पैमाने पर उपयोग किया गया सामाजिक, आर्थिक और जातिगत जनगणना के बारे में पर दिया जाता है । ये भारत में गरीबों के बारे में सबसे विस्तृत लेखा जोखा है । इस जनगणना ने बहुत ही सावधानी से बनाए गए अनेक मापदंडों के आधार पर घरों को वंचित या वंचित नहीं के रूप में परिभाषित किया गया है । ये जनगणना क्योंकि जनगणना कानून के दायरे से बाहर थी इसलिए इसके आंकडों में वास्तव में व्यक्ति की पहचान सिर्फ संख्या के आधार पर नहीं बल्कि उसके नाम और पते के साथ की गई है । अंतर रहा इसमें राष्ट्रीय स्तर पर करीब दस करोड घरों की पहचान वंचित के रूप में की गई । ये भारत के निर्धनतम नागरिक हैं और अब सरकार इन्हें ध्यान में रखते हुए ही इसमें हस्तक्षेप करेगी । ये बहस का मुद्दा है । क्या भाजपा की कल्याणकारी योजनाओं का वास्तव में संपर्क की योजनाओं से अधिक असर होगा? पर अब तो सवाल नहीं है कि मोदी इनके राजनीतिक महत्व को समझते हैं और इनका चतुराई से इस्तेमाल करते हैं । उन्होंने एक के बाद एक जनसभाओं में अपना ही रास्ता चुना और उज्ज्वला योजना को अपनी इच्छा बताते हुए कहा कि वो चाहते हैं उनकी माँ की तरह खाना पकाते समय असुरक्षित और अस्वास्थ्यकर परिस्थितियों से दूसरी माताओं को रूबरू नहीं होना पडे अथवा जनधन को ही ले लीजिए । चुनाव के अंतिम पडाव में मोदी की जनसभा के लिए जाते वक्त मिर्जापुर शहर में ऑटो चलाने वाले एक युवा गलत ने उससे कहा कि वह भाजपा को वोट देगा, उसका दर्द था । मोदी जी ने खाते खुलवाए हैं । उसे इससे फर्क नहीं पडता कि इन खातों में पैसा नहीं है तो कहता है ऐसा तो हमें कमाना है । वो इस बात से खुश था । उसका एक बैंक खाता है इसलिए उसे सशक्त होने का एहसास कराया और वो सरकार से ये अपेक्षा नहीं करता था कि वो आएगी और उसके स्थान पर काम करेगी । उत्तर प्रदेश में भाजपा के रणनीतिकार ने कहा, उज्ज्वला शौचालय, जन धन बहुत लोकप्रिय है क्योंकि यह गरीबों को गरिमा प्रदान करते हैं और इसके लिए मोदी जी को श्रेय रहते हैं । आप मुद्रा को ही ले लीजिए । इससे बाल काटने वाले, पान वाले आदि लघु ऋण ले रहे हैं । अभी तक किसी ने भी लोगों को निर्वाचन क्षेत्र का हिस्सा ही नहीं माना था । गरीब के हितों की परवाह को लेकर छिडी जंग में भाजपा ने बाजी मार ले । इस प्रक्रिया में भाजपा के वर्ग आधार में अभूतपूर्व विस्तार हुआ और इसमें पार्टी को उन निर्वाचन क्षेत्रों में पैठ बनाने दी । यहाँ पारंपरिक रूप से वो पहले कभी नहीं पहुंची थी । ये बदलाव हालांकि अधूरा ही रह जाता है परन्तु मोदी अच्छा से ही सही, इस वायदे के लिए तैयार हुए गरीब समर्थक इन योजनाओं की लोकप्रियता को प्रमुखता से उजागर करने वाले सर्वेक्षणों में भाजपा नेतृत्व हो । ये भी दिखाया गया कि किसानों की कर्ज माफी मतदाताओं की एक प्रमुख मांग है । इन सर्वेक्षणों में बताया गया इस विषय में मतदाताओं का रुझान तीन प्रतिशत तक झुकाने की क्षमता है । राहुल गांधी ने दो हजार सोलह में एक यात्रा के माध्यम से इस मांग के इर्द गिर्द जन्म तैयार करने में बडी भूमिका निभाई थी । लेकिन उन्होंने वास्तव में इस मामले को अधिक महत्व नहीं दिया तो नागरिकों को इस बात की एक झलक मिल गई । ये संभव है । अनेक नौकरशाहों ने इस बात का जिक्र किया कि मोदी की सोच कल्याण संबंधी सवाल पर उनके पूर्ववर्ती विषेशकर संप्रग शासन से बहन है । वो गरीबों से राहत और रहमोकरम की आवश्यकता वाले पीडितों के रूप में व्यवहार नहीं करना चाहते हैं । वो संपर्क के दृष्टिकोण को इसी तरह देखते हैं और दो उन्हें स्वतंत्र शख्सियत के रूप में देखते हैं । उन्हें सशक्त और समक्ष बनाने की आवश्यकता है ताकि मैं खुद प्रतिस्पर्धी कर सके । कर्ज माफी उनके इस नजरिये में फिट नहीं बैठती है । ये एक तरह से मुफ्ती रेवडी कि इससे भाजपा और मोदी तिरस्कारपूर्ण मानते थे परन्तु राजनीतिक दबाव बहुत ज्यादा था । प्रदेश इकाई और सर्वेक्षणों ने अमित शाह को यकीन दिलाया जिन्होंने से प्रधानमंत्री के साथ आगे बढा और ऋणमाफी तथा ब्याजरहित ऋण का वायदा हम तथा पार्टी के संकल्प पत्र के एक हिस्से के रूप में शामिल किया गया । मोदी का सिर्फ यही निर्देश था इसमें सिर्फ उन्हीं तत्वों को शामिल किया जाए जिन्हें लागू किया जा सके । इसके मसौदे को तैयार करने में शामिल राजनीतिक नेताओं से कहा, ऐसे वायदे मत करो जिन्हें हम पूरा नहीं कर सकें । वीरेंद्र सिंह मस्त ऐसे ही एक नेता थे जिन्होंने किसानों के कर्ज माफी पर जोर दिया था । ही से भाजपा के सांसद ये कद्दावर ठाकुर नेता पार्टी के किसान मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष है । उन्नीस सौ नब्बे के दशक में उस समय सुर्खियों में आए वो एक बार फूलन देवी से संसदीय चुनाव हार गए और दूसरी बार उन्होंने उन्हें पराजित कर दिया । मस्त का इसी दौरान मोदी से परिचय हुआ जब मोदी दिल्ली में पार्टी के पदाधिकारी थे । भाजपा की अंदरूनी राजनीति और एक अन्य ठाकुर नेता के उदय को देखते हुए राजनाथ सिंह ने उन्हें हाशिये पर डलवा दिया । परंतु दो हजार चौदह में अपनी सीट से विजय हासिल करने के साथ ही उनकी घर सहित वापसी हुई है । उत्तर प्रदेश के चुनावों में शाह ने उन्हें किसानों के मोर्चे की जिम्मेदारी सौंपी थी । चुनाव के तुरंत बाद मस्त मध्य दिल्ली में ली मेरिडियन होटल के ठीक सामने अपने आवास में अपने संसदीय क्षेत्र के मेहमानों की आवभगत कर रहे थे । आरएसएस के द्वितीय सरसंघचालक गुरु गोलवल्कर और संघ के श्रमिक मोर्चे के पथ प्रदर्शक दत्तोपंत थेंगडी की तस्वीरें उनके आवास की दीवार पर टंगी हुई थी । मस्त में उत्तर प्रदेश में कृषि व्यवस्था और किसानों के केंद्रीयता के बारे में बता रहे थे । उन्होंने कहा, गाजियाबाद से लेकर गाजीपुर तक समूची गंगा यमुना की पत्ती किसान क्षेत्र है । मोदी किसानों की ताकत समझते हैं । दूसरी बडी कंपनियों से किताब ये किसान अपने कर्ज की अदायगी करते हैं । उन्हें कर्ज में रहना पसंद नहीं है और अब तो ये जरूरी है जब वो गंभीर संकट में हो तो उनके लिए खडा हुआ जाए । उसके साथ ही उन्होंने सिंचाई को बढावा देने, ग्रामीण विद्युतीकरण, फसल बीमा, ग्रामीण इलाकों में सडकें और खेती के मवेशियों का उदाहरण देते हुए उन्होंने दावा किया कि किसानों के हितों के लिए सरकार द्वारा किए जा रहे अनेक प्रयासों में से ये तो सिर्फ एक है । वो कहते हैं, मैंने ऐसे नेता को कभी नहीं देखा तो मोदी के जैसा भरोसा पैदा कर रहा हूँ और जब वह कर्ज माफी का वायदा करते हैं, उत्तर प्रदेश में कृषि का चेहरा बदलने का वादा करते हैं तो किसान उन पर भरोसा करते हैं । चुनावों में गांव, गरीब, किसान पर ध्यान देने से चुनाव में बढिया नतीजे मिलेंगे । नरेंद्र मोदी की छवि को जमीन से जुडे आदमी और गरीबों के नेता के रूप में सुदृढ करने में मदद करेंगे परन्तु इसकी परिणति चंद महीनों के भीतर ही भाजपा शासक महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश की सरकारों के लिए बहुत बडी नीतिगत चुनौती पैदा करेगी क्योंकि इसी तरह से कर्ज माफी की मांग किसानों के बीच छुटेगी परन्तु उत्तर प्रदेश में विमुद्रीकरण के साथ ही केंद्र सरकार द्वारा गरीबों के लिए योजनाएं शुरू करने की अनुमति मोदी को उसी रूप में स्थापित करेगी जहाँ वो होना चाहते थे । गरीबों के मसीहा ये कैसी छवि है? इसे चार दशक पहले एक और मजबूत प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा आगे बढा गया था । आंशिक रूप से मोदी हवा की वजह बिखरे और अविश्वसनीय विपक्ष की मौजूदगी भी है । दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू कॉलेज में स्नातक की पढाई के दौरान मेरा एक घनिष्ठ मित्र लखनऊ में आज का उभरता हुआ कारोबारी है । मध्य उत्तर प्रदेश में पुराने कारोबार में दिलचस्पी रखने वाले पारंपरिक बनियां परिवार से आगे निकलकर खुद भी एक उद्यमी बनकर उभरा है । उसका परिवार पारंपरिक रूप से संघ और भाजपा का समर्थक रहा है । हम आठ नवंबर की शाम को लखनऊ के होटल में रात्रि भोज कर रहे थे । ऐसे ही हमने टेलीविजन चालू किया तो मेरे मित्र के पास संदेश और फोन आने शुरू हो गए । विमुद्रीकरण का शब्द अभी चलन में नहीं आया था । उससे कारोबार से बडा संबंध था परन्तु वो शाम था, पडा और उसके साथ भी सहज ही था । उसे लगता था ये उसके कारोबार सहित सारे कारोबार को अपनी कार्यप्रणाली ठीक करने के लिए पत्र करेगा । दीर्घकालीन स्थिति के लिए ये अच्छा है या फिर कब तक? हम भी अपने कारोबार के पहले अध्याय को लेकर चिंता करते रहेंगे । पुराने कारोबारों को भी रद्द रास्ता अपनाने और आधुनिक बनने के लिए बाध्य करेगा । सही है हम तो उसका परिवार ऐसा महसूस नहीं करता था । अगले दो महीने में जैसे जैसे वो अपनी नकदी को व्यवस्थित करने के तरीके खोज रहे थे । वैसे वैसे मुझे उनमें बढ रहा असंतोष और आक्रोश सुनाई पडने लगा तो नरेंद्र मोदी के खिलाफ । पर आपने लगता था मेरे मित्र ने हसते हुए कहा, वो सभी समझते हैं कि भाजपा उनकी अपनी पार्टी है और ये समझ नहीं सके कि मोदी ने किस तरह उनके साथ विश्वासघात किया है । चुनाव संपन्न होने के बाद मैंने उससे बात की और पूछा इसके नाराज रिश्तेदारों ने किसे वोट दिया? उसका जवाब था, हजपा नहीं जानने के लिए उत्सुक था । ऐसा क्या बदलाव हो गया था? उसने कहा । और किसको देते हैं राहुल गांधी को एक और उदाहरण देखिए अप्रैल एक स्टार्ट अप मीडिया ने युवाओं के मूड के बारे में खबर लिखी । उसने दो कॉलेजों कानपुर में आम तौर पर शहरी परवरिश वाले छात्रों और पूर्व उत्तर प्रदेश के भदोही में ग्रामीण परिवेश के छात्रों के वीडियो इंटरव्यू किए । छात्रों से ये संकेत देने के लिए कहा गया था कि वह किस नेता के सबसे अधिक प्रशंसक हैं । इसका नतीजा एक जैसा ही था । मोदी के पक्ष में अधिसंख्य हाथ थे । कुछ छात्रों ने अखिलेश यादव को पसंद किया । भदोही में एक हाथ मायावती के पक्ष में उठा । इन दोनों ही स्थानों पर किसी भी छात्र नहीं । न तो राहुल गांधी की प्रशंसा की और नहीं उनका समर्थन किया । भारत के नागरिक राहुल गांधी को भरोसेमंद नेता के रूप में स्वीकार नहीं कर रहे थे । उत्तर प्रदेश में जहाँ राहुल ने अभी तक अपने राजनीतिक जीवन का अधिकांश समय लगाया है, वहाँ मुसलमानों के अलावा कोई अन्य सामाजिक समूह कांग्रेस उपाध्यक्ष को अपने नेता के रूप में नहीं देखता था । जब कि मोदी ने अपनी बहु वर्गीय छवि का निर्माण कर लिया था । उन्होंने लखनऊ के बनियों से अपील नहीं की । उन्होंने गोरखपुर के ठाकुरों से अपील नहीं की । उन्होंने मुरादाबाद के दलितों से अपील नहीं । मिर्जापुर के कुर्मियों से उन्होंने अपील नहीं कि बुंदेलखंड के ब्राम्हणों से उन्होंने अपील नहीं की । उन्होंने इलाहाबाद के कुछ वहाँ से अपील नहीं की । उन्होंने मुजफ्फरनगर के जाटों से भी अपील नहीं की । उन्होंने सहारनपुर के सैनी से अपील नहीं की । उन्होंने संपन्न कारोबारियों से अपील नहीं की । उन्होंने मध्यम वर्ग के शिक्षकों से भी अपील नहीं की । उन्होंने दिल्ली में टैक्सी चालक के रूप में काम करने वाले युवाओं से वो टोनी के लिए लौटे थे । अपील नहीं उन्होंने गरीबी की रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाली महिलाओं से अपील नहीं । उन्होंने कॉलेज छात्र से भी अपील नहीं कि रोजगार के लिए तैयार हैं । एक राज्य के बाद दूसरे राज्य में यही सिलसिला दफनाया गया । राहुल गांधी ने किसी समूह विशेष वर्ग से अपील नहीं की । यदि इसका मतलब ये था कि वह सभी वर्गों और समुदाय तक व्यापक पहुंच वाले नेता थे जिसने जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी को एक अलग राष्ट्रीय नेता बनाया और अपने अपने क्षेत्र जाती, धर्म से संबंधित दूसरे नेताओं पर उन्हें बढत दिलाई । कुछ नहीं नतीजे दिए होते तो राहुल के मामले में इसने उन्हें कहीं का नहीं छोडा । उनके पास भरोसा करने के लिए कोई अपना मूल आधार नहीं था और वो अपने परिवार के अन्य सदस्यों के जैसा अपना व्यापक आकर्षण भी पैदा नहीं कर सकते थे । राहुल गांधी के अपना आकर्षण बनाने में सफल नहीं होने की एक वजह ये थी कि जनता की राय में उन्होंने इसके लिए कुछ भी नहीं किया था । किसी की भी दिलचस्पी संगठनात्मक सुधारों में नहीं है तो ये युवक कांग्रेस मिले होंगे जिससे ऐसा नहीं लगता कि पार्टी को कोई लाभ मिला हो । किसी भी दिलचस्पी उनके पिता या उनकी दादी या उनके परनाना में थी । अधिकांश भारतीयों के जहन में इन नेताओं कि कोई याद भी नहीं है और उनमें विरासत में मिले विशेषाधिकार को लेकर पुरस्कार की भावना ही बढ रही है । मतदाताओं की दिलचस्पी उनका रिकॉर्ड में है और उनके पास दिखाने के लिए कोई रिकॉर्ड नहीं है कि एक लचर सांसद रहे हैं । वो कभी मंत्री नहीं रहे । उनके पास दिखाने के लिए कोई प्रशासनिक क्षमता भी नहीं है । उनके पास ऐसी कोई महत्वपूर्ण पहल भी बताने के लिए नहीं है । इस परसे वो ले सकें । उनकी माँ को राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून बनाने के लिए जाना जाता है और बेरोजगारी सहित सरकार की विफलताओं के संबंध में उनकी आलोचना हो खाली लगती है । जनता भी सवाल करती है कि क्या राहुल दस साल तक सत्ता में नहीं थे? क्या उनका परिवार आजादी मिलने के बाद से अधिकांश समय सत्ता में नहीं था? इनमें से कई कमजोरियों को सशक्त संगठन के माध्यम से दूर करना संभव हो सकता था परन्तु ऐसा लगता है कि राहुल गांधी समझना तक व्यक्ति भी नहीं है । अमित शाह ने पिछले तीन साल में जिस तरह से भाजपा का कायाकल् जिसे हम अगले अध्याय में देखेंगे, राहुल गांधी का उदय पिछले एक दशक में कांग्रेस पार्टी के खोखलेपन के साथ हुआ है । कांग्रेस उपाध्यक्ष की तरह पेश कर सकते हैं कि उनके पास पूरा नियंत्रण नहीं था । हूँ पुराने लोग और कांग्रेस पार्टी के अपने हित उन्हें वो नहीं करने देंगे जो करना चाहेंगे । लेकिन एक बार फिर ये नेतृत्व की ही विफलता है । ये उन के ऊपर निर्भर करता है कि वो पार्टी में अपने वर्चस्व वाली स्वाभाविक हैसियत का इस्तेमाल करेंगे । नियंत्रण अपने हाथ में लेंगे, अपना अधिकार दिखाएँ और सभी राज्यों में प्रत्येक स्तर पर एक संगठन था । नेताओं का एक पुल बनाए । ऐसा कुछ भी नहीं हुआ यदि राहुल के पास अपना करिश्मा और वाकपटुता का कौशल होता । कठोर सामाजिक आधार और आपने किसी व्यक्तिगत रिकॉर्ड या संगठन के बगैर भी काम करना संभव होता । मंत्रीय बानगी देखी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान राहुल नहीं फरवरी दो हजार सत्रह के मध्य में बरेली में एक जनसभा की दोपहर करीब दो बजे भीड आनी शुरु हो गई परंतु कभी भी लहर की तरह नहीं बडी और जब ढाई घंटे बाद राहुल गांधी का हेलीकॉप्टर पहुंचा हूँ खाली कुर्सियों की कतारें वहाँ थी । राहुल गांधी बरेली छावनी से कांग्रेस प्रत्याशी नवाब मुजाहिद खान के लिए प्रचार करने आए थे । इस निर्वाचन क्षेत्र में एक लाख से अधिक मुस्लिम है समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन की वजह से कांग्रेस ने सोचा उसके यहाँ कहीं अधिक बेहतर अवसर हैं । मतदान दो दिन में था और निर्वाचन आयोग के दिशा निर्देशों के अनुसार चुनाव प्रचार शाम पांच बजे बंद होना था । राहुल जब पहुंचे तो नियमों को देखते हुए उनके पास अपना भाषण समाप्त करने के लिए सिर्फ आधा घंटा था । ऐसी स्थिति में जल्दबाजी ही संभव थी । राहुल गांधी ने अपना भाषण चीजे इस संदेश के साथ शुरू किया कि भारत के सामने सबसे बडी चुनौती रोजगार की है । उन्होंने कहा, मोदी ने कहा था तो दो करोड रोजगार का सृजन करेंगे । मैंने संसद में उनसे पूछा, आपने कितने रोजगारों का सृजन किया? एक मंत्री ने कहा, उन्होंने पहले साल में एक साल रोजगारों का सृजन किया । दूसरे साल में उन्होंने एक भी रोजगार का सृजन नहीं किया । उपस्थि भीडने तालियाँ बजाई लेकिन उसमें उत्साह नजारा था । अरे तो उपस्थित जनसमूह उनसे उस समय पूरी तरह सहमत हो गया जब वो एक कहानी बताने लगे । इसका पहली नजर में उनके पहले मुद्दे से कोई संबंध नहीं था । वो कहते हैं, मैं चीन गया था । यहाँ एक स्थानीय नेता से दोपहर के खाने पर मेरी मुलाकात हुई । मैं उनसे चीन के बारे में पूछता रहा । मुझसे हिमाचल प्रदेश के बारे में पूछते रहे । मैंने कहा अरे भैया, भारत इतना बडा देश है । आप सिर्फ हिमाचल प्रदेश के बारे में ही क्यों पूछ रहे हैं? तो उसने कहा हमारी प्रतिस्पर्धा हिमाचल के सेवों से है और वो दिन देखना चाहते हैं । मेड इन चाइना वस्तुएं वहाँ देखेंगे । राहुल फिर आशा लगा इस कहानी के बारे में पूरी तरह भूल गए और विमुद्रीकरण के बारे में बोलने लगे । उन्होंने भीड से पूछा आपको मालूम है कि मोदी जी ने नोटबंदी क्योंकि आपका पैसा लेकर उसे पचास रईस उद्योगपतियों को सौंपने के लिए । नोटबंदी के आर्थिक नतीजों की जानकारी देने के बाद राहुल अपनी कहानी पर लौटे । उन्होंने अपने भ्रमण करने वाले निष्कर्ष में कहा कि उन्हें उस दिन का इंतजार है जब ओबामा जी अब तो खाली है और चीन में उनके दोस्त मेड इन बरेली मेड इन उत्तर प्रदेश के चिन्ह वाले उत्पाद देखेंगे । बरेली उसके मांझी के लिए जाना जाता है । मैं वो दिन देखना चाहता हूँ कि जब मैं वापस चीन जाऊँ और उसी नेता के साथ भोजन करते हुए हम बरेली के मांझे के बारे में बात करेंगे । राहुल के भाषण के साथ को समझा जा सकता था । उन्होंने मुख्य समस्या के रूप में रोजगार के मसले की पहचान की थी । उनका मानना था स्थानीय उद्योगों को बढावा और स्थानीय स्तर पर निर्माण रोजगार संकट से निपटने का एक रास्ता है । कोई संदेश देना चाहते थे । ये स्थानीय उत्पाद वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धात्मक हो सकते हैं । अपने आप नहीं । ये न्यायोचित था तो यहाँ तीन समस्याएँ अपनी कहानी को सरल बनाए रखने की बजाय उन्होंने इसमें कई पहलुओं को जोडकर इसे उपस् थित भीड के लिए पेचीदा बना दिया । चीन, हिमाचल प्रदेश ओबामाजी से ऊपर चर्चा के बाद वो बरेली की अपनी विशेषता पर आए । ये निश्चित ही साधारण ही बात को समझाने का अधिक प्रभावी तरीका नहीं था । विमुद्रीकरण के बाद मुरादाबाद नहीं, मोदी के प्रदर्शन की तुलना में उनके भाषण में जनता की भावनाओं से जुडने वाली बात का अभाव था । दूसरी समस्या मेड इन बरेली को लेकर थी, जो मेक इन इंडिया के मोदी की अपने ब्रांड की नकल लग रही थी । कांग्रेस के एक नेता ने बाद में सफाई दी, कल्पना कीजिए कि हमारे पास वास्तविक मेड इन कर्नाटक मॉर्डल था । इसकी पहचान भी थी । राहुल के लिए इसे बेचना संभव हुआ होता । और अब तो इस समय तो ऐसा लगता है शायद हम बगैर किसी ठोस पेशकश के सिर्फ मोदी की नकल कर रहे हैं और अंत में राहुल के भाषण से नजर आता है । और देखिए ऐसी स्थिति में मोहभंग के शिकार मेरे कारोबारी मित्र के रिश्तेदार इस और आकर्षित क्यों होंगे । वो ना सिर्फ गरीब मतदाताओं में अपना पुराना जनाधार बरकरार रखने में ही विफल हो रहे थे बल्कि उनके पास मध्यम वर्ग के लिए कहने को कुछ नहीं था । हो सकता है कि इस चुनाव में अपने विकल्पों को तो बोल रहा हूँ । ध्यान रखिए उत्तर प्रदेश के शहरों और छोटे नगरों में बडी संख्या में मध्यम वर्ग रहता है । भाजपा के युवा कार्यकर्ता ने राहुल के भाषणों और संदेशों की समस्याओं पर टिक बारीक राय पेश आज का नौजवान अपनी जिंदगी में पांच चार तीन दो एक फार्मूला चाहता है । पांच अंक में चल रही चार पहिया गाडी, तीन बीएचके फ्लैट तो बच्चे और एक टीवी, जाति और वर्ग कोई भी हो उनका मकसद यही होता है । खासकर निम्न मध्यम वर्ग में जो पढा लिखा और महत्वाकांक्षी है । क्या आप राहुल के भाषणों में ऐसी कोई बात सुनते हैं? उनकी आकांक्षाओं के पूरा होने की कोई उम्मीद बनाती हो? मोदी भले उनसे नहीं मिलते हैं लेकिन मैं उन्हें उम्मीद और प्रेरणा देते हैं ये संभव है । अपनी कमजोरियों के अलावा राहुल गांधी के बरेली भाषण ने कांग्रेस पार्टी की संगठनात्मक समस्याओं को भी उजागर किया । इस जनसभा में अपेक्षाकृत कम भीड की उपस्थिति से ये भी पता चलता था की पार्टी के संगठनात्मक तंत्र और जनता को सक्रिय करने की सीमा सीमित थी । लगभग पूरी तरह से मुस्लिम भीड की उपस् थिति हो सकता है कि निर्वाचन क्षेत्र की रचना का काम रहा हूँ और अब तो दूसरे सामाजिक समूहों के बीच पार्टी की कम्पैक्ट को भी दर्शाता है । बरेली शहर में मिली जुली आबादी है । कांग्रेस बरेली छावनी सीट से चुनाव हार गई । राहुल गांधी के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश पार्टी की ये सबसे बुरी पराजय मोदी की सभी वर्गों से की गई अपील के क्या मायने थे? गोविंदाचार्य उन्नीस सौ अस्सी के दशक और नब्बे के दशक की शुरुआत में भाजपा के संगठन में बहुत प्रभावशाली नेताओं में शामिल थे । वो आप औपचारिक राजनीति से बाहर हैं परन्तु अभी भी संघ के वरिष्ठ विचारक हैं और उन्होंने दशकों के दौरान मोदी का विकास होते देखा है । तो कहते हैं मोदी की विशिष्टता राजनीतिक मार्केटिंग है । उनका मानसिक साझा साधारण है । राजनीति का मतलब है सप्ताह सत्ता चुनावों से मिलती है । चुनाव छवि का संघर्ष है और इसलिए राजनीति छवि, संदेशों और संकेतों के इर्द गिर्द घूमती है । इसके लिए गोविंदाचार्य का सुझाव है कि एक नेता में तीन तत्वों का होना बेहद जरूरी है । प्रतिकूल परिस्थिति में खुद को डटे रखने के लिए आधारभूत सुविधाएं, संसाधन और प्रौद्योगिकी । वो कहते हैं, प्रतिकूल समय में संघ के माध्यम से आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध है । उनके पास पर्याप्त संसाधन हैं । उनके पास मीडिया और सोशल मीडिया के रूप में प्रौद्योगिकी भी है जो संदेश अग्रसर करने में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है । नरेन्द्र में इसका समिश्रण करने कि नैसर्गिक प्रतिभा है । इसमें कोई संदेह नहीं कि मोदी की छवि या छवियों का निर्माण ही मोदी हवा बनाने के केंद्र में है । संघ के जनाधार के लिए वो हमेशा ही हिन्दू नेता हैं । शहरी मध्यमवर्ग के लिए वह ऐसे व्यक्ति हैं, विकास और रोजगार लाएंगे और ऐसे राष्ट्रवादी हैं तो पाकिस्तान को सबक सिखाएंगे । हाल ही में संपन्न दिल्ली नगर निगम के चुनाव ही सबूत है । उनके समर्थकों को अभी भी उन पर भरोसा है । गरीबों के लिए वैसे व्यक्ति हैं जिन्होंने धनवानों से पंगा लिया है और जो उनकी रोजमर्रा की जरूरतों के बारे में पूछते हैं । उन लाखों नागरिकों के लिए जो हर महीने उनकी मन की बात सुनने के लिए जुटते हैं जो राजनीति से हटकर है । नैतिक विज्ञान के शिक्षक है, एक गुरु हैं, शिक्षा दे रहे हैं, अन्य पिछडे वर्गों के लिए वो उनमें से ही एक है उच्च जातियों के लिए वो भारत के उनके सपने को आगे बढा रहे हैं । अक्सर ही ये पंक्तियां एक दूसरे को काटती हैं । इन सभी छवियों को बनाना भी काफी मेहनत का काम है और यही वह बिंदु है जहां मोदी के व्यक्तित्व का दूसरा पहलू ऊर्जा सामने आता है । बना रहा मोदी के अपने लोकसभा संसदीय क्षेत्र में दो हजार सत्रह के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों अंतिम चरण में मतदान होता है । प्रधानमंत्री शहर और उसके आसपास के इलाकों में तीन दिन चुनाव प्रचार करने का निर्णय लेते हैं । अनेक लोगों ने इसे प्रधानमंत्री कि अधीरता के रूप में देखा परन्तु इसमें इस तथ्य को नजरअंदाज कर दिया कि मोदी सिर्फ प्रधानमंत्री ही नहीं थे बल्कि एक जन नेता भी हैं । भारतीयों की एक पीढी को विरासत में मिले पद में इस तरह का द्वैतवाद मजाक पाना बंद हो गया था । अच्छा उन्नीस सौ के बाद के प्रधानमंत्रियों पर एक नजर डाल लीजिए पीवी नरसिंह राव हो सकता है कि अपने गृह राज्य आंध्र प्रदेश में एक जन नेता हूँ । हम तो अपने राज्य के बाहर उनका कोई जनाधार नहीं था और निश्चित ही उत्तर प्रदेश में उनका कोई आकर्षण नहीं था । एच डी देवगौडा कर्नाटक से एक अद्भुत व्यक्ति इंद्र कुमार गुजराल सिर्फ दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर सकता ही चुनाव जीत सकते थे । अटल बिहारी वाजपेयी उन्नीस सौ नब्बे के बाद के दौर में एकमात्र प्रधानमंत्री थे जिनका करिश्माई व्यक्तित्व सार्वजनिक आकर्षण तो भाई और जब नहीं जनता तक सीधे पहुंचने की इच्छा थी तो वो अपने जीवन के सातवें दशक में प्रधानमंत्री बने पूरी तरह स्वस्थ नहीं थे और इस वजह से उन्होंने खुद को प्रमुख चुनावों तक सीमित रखा था । मनमोहन सिंह ने लोकसभा का जो एकमात्र चुनाव लडा उसमें हार गए और फिर वो चुनाव की दौड से दूर ही रहे । और फिर हुआ मोदी का प्रादुर्भाव जो चुनाव जीतने को ही अपना मुख्य धर्म मानते थे । उन्होंने काफी पहले ही प्रचार शुरू कर दिया और व्यापक जनसंपर्क पर भरोसा किया । उनकी अपनी संगठनात्मक पृष्टभूमि वो पहले संघ से भाजपा में महासचिव बने तो गुजरात में संगठन का काम देख रहे थे । उन्हें पार्टी की मशीनरी में सबसे ऊपर रखती है । वो पराजय से डरते नहीं हैं और लडाई भागते नहीं हैं । उत्तर प्रदेश में चुनाव प्रचार के अंतिम दिन भाजपा अपनी जीत के प्रति आश्वस्त थी । पूर्वांचल के एक नेता ने जो प्रधानमंत्री को दो दशक से जानते थे उनसे इस बात का जिक्र किया उनके बनारस में प्रचार को पार्टी के घबराहट के रूप में देखा जा रहा है मानो वह भयभीत है और उनसे पूछा कि उन्होंने ऐसा करने का निर्णय क्यों किया । मोदी ने जवाब दिया, चुनाव जंग है और मैं सेनापति हूँ । मैं शहर का सांसद भी हूँ । मैं यहाँ अधिक समय व्यतीत नहीं कर पाया हूँ और ये मुझे लोगों से जुडने का अवसर प्रदान कर रहा है और इस प्रक्रिया में यदि पार्टी को भी लाभ होता है भी अच्छा ही है । प्रत्येक चुनाव को महत्वपूर्ण नजरिये से देखना और से जीतने के लिए उसकी जिम्मेदारी लेना तथा इसमें असाधारण ऊर्जा लगना ही मोदी को दूसरों से अलग करता है । इसमें अपने समकालीन समय में मोदी को भारत का सबसे बडा जननेता भी बना दिया । दो हजार चौदह की इश्कबाजी अब तीन साल बाद पूरी तरह रोमांस का रूप ले चुके हैं । पूरे देश में पंचायत से संसद पद के चुनाव जीतने वाली भाजपा है । भारतीय जनीति का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि क्या प्रेम प्रसंग राष्ट्र के जीवन का चरण हैं? क्या इसके बुनियादी स्वरूप को बदलने के लिए लंबे समय तक जारी रहेगा और क्या लंबे समय तक इसका टिके रहना उस दूसरे व्यक्ति और उन बुनियादी सुविधाओं पर उतना ही निर्भर करेगा जिनका उन्होंने रिश्तों को पल्लवित होने के लिए सृजन किया है? अमित शाह

3. Shah Ka Sangathan

शाह का संगठन उत्तर प्रदेश में भाजपा को शानदार विजय दिलाने के एक महीने बाद अप्रैल दो हजार सत्रह में भुवनेश्वर में हुई पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में अमित शाह ने घोषणा की, ये आराम का समय नहीं है । उन्होंने पार्टी के लिए प्रत्येक राज्य विषेशकर दक्षिण और पूरा जीतने और पंचायत से लेकर संसद तक हर स्तर के चुनाव जीतने का नया लक्ष्य रखा । ये इस बात का द्योतक था कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह को अपने पूर्ववर्तियों के साथ ही उनके प्रमुख राष्ट्रीय प्रतिद्वंदी राहुल गांधी से अलग है । अपार और असीमित महत्वाकांक्षा भाजपा के एक अंदर के व्यक्ति जिसने काफी निकट से नेतृत्व के साथ काम किया था, संक्षेप में बताता है । अटल जी और आडवाणी जी उस समय बडे हुए जब कांग्रेस का आधिपत्य था । उन्हें हमेशा कि भाजपा की प्रादेशिक सीमाओं के साथ सामंजस्य स्थापित करना पडता था । मोदी और शाह दोनों ही धन है । प्रादेशिक सीमाओं और सामाजिक आधार के मामले में कठोर विस्तारवादी हैं । ये विस्तार उन पारंपरिक गढ में चुनाव जीतने के माध्यम से हासिल किया जहाँ हाल के वर्षों में उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में हो सकता है की पार्टी डगमगा गई हो । नए भौगोलिक क्षेत्रों को लक्ष्य बनाना यहाँ पार्टी के विकल्प के लिए राजनीतिक गुंजाइश है । जैसे पूर्वोत्तर और उन राज्यों में प्रमुख विपक्षी ताकत बनना जहाँ ऐतिहासिक रूप से वो कमजोर रही जैसे पश्चिम बंगाल और ओडिशा सब कैसे हुआ? यदि मोदी का व्यापक जनसंपर्क इस कहानी का एक भाग है तो भाजपा का कायाकल्प करने में पचपन वर्षीय अमित शाह का काम इस कहानी का उतना ही महत्वपूर्ण हिस्सा है । अमित शाह ने संगठन में ऊर्जा का संचार क्या इसकी सदस्यता का विस्तार किया? सावधानीपूर्वक मतदान समितियों को केंद्र और सारी गतिविधियों का केंद्र बिंदु बनाया । एक केंद्रीयकृत लेकिन फिर भी केंद्र ढांचा तैयार किया जहाँ ऊपर से लेकर नीचे था और दूसरी तरह से भी सूचनाओं का प्रभाव होता है और पैसे लेने की प्रक्रिया तेज की । संगठन द्वारा अपने हाथ में लिए जाने वाले उन बुनियादी मुद्दों की पहचान करने में मदद के लिए आंकडों पर आधारित सूचनाओं के लिए स्वतंत्र व्यवस्था स्थापित की और ये सुनिश्चित किया कि सभी स्तरों पर नेताओं की जवाबदेही होगा । इनमें से प्रत्येक के लिए अथक प्रयास की जरूरत होती है । भाजपा की अभूतपूर्व सफलता की गुत्थी सुलझाने के लिए चुनाव प्रबंधन के अमित शाह स्कूल के घटकों को सही तरीके से समझना होगा परन्तु इससे पहले इस व्यक्ति को समझना होगा । ये कहानी है कि कैसे एक व्यक्ति ने समकालीन भारत में सबसे अधिक विकेट चुनाव मशीनरी का सृजन कर दिया । अमित शाह का जन्म उन्नीस सौ चौंसठ में मुंबई में हुआ था लेकिन उनका परिवार मूलतः अहमदाबाद के निकट मनसा से था । एक दुर्लभ इंटरव्यू में जहाँ उन्होंने अपने प्रारंभिक दिनों के बारे में बताया । शाह ने हिंदुस्तान टाइम्स के लेखक पैट्रिक फ्रेंच को बताया, उनके दादा चाहते थे गांव में ही उनका लालन पालन किया जाए । उनके पडदादा व्यापार से संबंधित मामलों में मनसा के शासक के सलाहकार हुआ करते थे । परिवार संपन्न था और शाह एक हवेली में बडे हुए तो याद करते हुए बताते हैं ये उन्हें औपचारिक पढाई पसंद नहीं थी और संघ की शाखा में खेलने जाने को महत्व देते थे । अधिकांश खेलों को इस तरह से तैयार किया गया था । इससे शारीरिक शौष्ठव बडे मुझे देश भक्ति पढाई गई थी । मुझे संस्कार सिखाए गए थे तो पंद्रह साल की उम्र में अहमदाबाद आ गए, जैवरसायन का अध्ययन किया और अठारह साल की उम्र तक पहुंचते ही ब्लॅक और पीवीसी के कारोबार में शामिल हो गया । परंतु शाह संघ की गतिविधियों में काफी अधिक शामिल थे । उन्होंने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में काम किया और हम तथा भाजपा में आ गए । उनका राजनीतिक सामाजिक रन चुनावों के दस्तूर के साथ शुरू हुआ और उनकी सबसे पहला चुनावी कार्य अहमदाबाद के नारनपुरा वार्ड के चुनाव एजेंट के रूप में था । उसके बाद वो उन्नीस सौ नवासी के लोकसभा चुनाव में एल के आडवाणी के लिए चुनाव संयोजक बने । उन्नीस सौ सत्य से शाहने खुद अहमदाबाद के सरखेज विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लडना शुरू कर दिया और अपनी जीत का अंतर पच्चीस हजार से बढाकर उन्नीस सौ अट्ठानबे में एक दशमलव तीन शून्य लाख और दो हजार दो में डेढ लाख और दो हजार सात में दो दशमलव तीन लाख तक कर दिया । वो एक बार फिर दो हजार बारह में काफी छोटी नवसृजन नारायणपुरा विधानसभा सीट से साठ हजार मतों से विजयी हुए । उन्होंने सर आपने ही चुनाव में भूमिका नहीं निभाई बल्कि मुख्य रणनीतिकार और संगठन नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सभी को एक सूत्र में करो कर गुजरात में भाजपा को अधिक पडी जीत दिलाई । मोदी की छडी हिंदू दावे का मिश्रण क्षेत्रीय गौरव या गुजरात अस्मिता विकास का वायदा और सवर्ण जातियों का व्यापक सामाजिक गठजोड पटेल अन्य पिछडे वर्गों का एक बडा वर्ग और दलितों तथा आदिवासियों के वोट अनवरत सफलता का मंत्र थे लेकिन संगठन ने जोडने का काम किया । अनेक प्रयोग जिन्हें शाह को बाद में राष्ट्रीय स्तर पर अपनाना था । पार्टी की सदस्यता में विस्तार, राजधानी से बाहर पार्टी पदाधिकारियों की निरंतर यात्रा । जनसंपर्क कार्यक्रम हूँ । पार्टी की सभी इकाइयों को ऊर्जावान बनाना गुजरात में पहले ही किये जा चुके थे । नब्बे के दशक के मध्य में शाह कांग्रेस के गढ सहकारिता गुजरात में राजनीतिक ताकत का मुफ्त स्रोत था और वस्त्रकार नाम अर्जित कर चुके थे । भाजपा अचानक ही गुजरात में सहकारी बैंकों, दुख डेरी और कृषि विपणन समितियों के चुनाव जीतने लगे । एक दशक पा उन्होंने ऐसा ही कुछ गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन के साथ किया और से मोदी के लिए जीत लिया । दो हजार दस से शाह को अपने राजनीतिक जीवन के सबसे कठिन दौर से गुजरना पडा । न्यायेतर हत्या की साजिश के आरोपी शाह को अपने ही गृहराज्य जहाँ वो गृहमंत्री रह चुके थे, जेल जाना पडा अदालत में बाद में उन्हें जमानत दे दी । परंतु साथ ही दो साल के लिए गुजरात से बाहर निकाल दिया । शाह दिल्ली आ गए और फिर पूरे देश का भ्रमण किया । दिसंबर दो हजार बारह में विधानसभा चुनाव के समय अपने राज्य लौटे देश के इतिहास का एक निर्णायक मोड था । नरेंद्र मोदी लगातार तीसरे कार्यकाल के लिए विजयी हुए और उन्होंने नतीजे वाले दिन अपनी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा साहिर की भाजपा के वरिष्ठ नेताओं विषेशकर अपने पूर्व प्रणेता लालकृष्ण आडवाणी के प्रतिरोध का मुकाबला करते हुए मोदी पार्टी के मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी बनने तक पहुंच गए । दो हजार बारह के विधानसभा चुनाव की जीत नें शाह को भी नया जीवन प्रदान किया । कुछ महीनों के भीतर ही मई दो हजार में शाह को पार्टी का महासचिव बनाने के साथ ही उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया गया । जहाँ को इस राज्य के बारे में कोई जानकारी नहीं थी । अब उनके सामने सबसे चुनौती भरी जिम्मेदारी थी वो तय करती । क्या नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बनेंगे? परंतु सत्ता प्राप्त करने के एकनिष्ठ दृढनिश्चय नहीं । उन्हें इसके लिए अच्छी तरह से तैयार किया था । जनवरी दो हजार चौदह में अमित शाह को मदद की जरूरत थी और उन्होंने वही किया जो भाजपा के नेता जरूरत पडने पर मदद के लिए करते हैं । उन्होंने संघ से संपर्क किया और उत्तर प्रदेश चुनाव अभियान में मदद के लिए एक सहायक की मांग कि आरएसएस ने एक युवा परन्तु संगठन में उभरती प्रतिवाद चौवालीस वर्षीय सुनील बंसल को भेजने का निर्णय किया । मूल कहा राजस्थान के बंसल उस समय दिल्ली में अखिल भारतीय युवा परिषद के संयुक्त महासचिव है । इसमें उन्हें छात्र संगठन में तीसरा सबसे ताकत और व्यक्ति बना दिया । इसका मकसद संघ में नए युवाओं को शामिल करना और उनके वैश्विक नजरिए को साल दर साल विश्वविद्यालयों तक प्रभावित करना था । बंसल उस समय सत्रह रह गए जब भाजपा के प्रभारी संघ के संयुक्त महासचिव सुरेश सोनी ने उन्हें हैदराबाद में एक बैठक के लिए बडा और यहाँ उनसे कहा गया है कि अपना सामान समेट हो और भाजपा में शाह की टीम में शामिल होने जाओ । संघ भी जिम्मेदारी का मतलब जिम्मेदारी है । आप इससे इनकार नहीं कर सकते । पंद्रह जनवरी दो हजार चौदह को बंसल ने दिल्ली में पहली बार शाह से मुलाकात की । चाहने, उनसे उनके परिवार और संठनात्मक पृष्ठभूमि के बारे में पूछा । ये एक अनौपचारिक बातचीत थी । बंसल ने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के काम से उत्तर प्रदेश में समय व्यतीत किया था परन्तु वो इस राज्य को अच्छी तरह नहीं जानते थे । चाहने उनसे कहा जाओ राज्य के उन छह मंडलो काशी, गोरखपुर, अवध, कानपुर, बुंदेलखंड, ब्रज और पश्चिमी उत्तर प्रदेश का दौरा करो जिन्हें भाजपा ने अपने संगठानात्मक मानचित्र पर रुके रहा है और तीन सप्ताह में लखनऊ में उन से मुलाकात करूँ । अमित शाह पांच फरवरी को उत्तर प्रदेश में ढाई सौ उन प्रमुख व्यक्तियों की बैठक बुलाई । लखनऊ में पार्टी कार्यालय में भाजपा की चुनाव मशीनरी का केंद्र होंगे । इनमें भाजपा के सभी जिलाध्यक्षों, लोकसभा के सभी अस्सी निर्वाचन क्षेत्रों के प्रभारी थे और राज्य स्तर के प्रमुख लोग शामिल थे । इस बैठक में शाह ने एक निर्धारित प्रारूप में बीस सवालों पर पदाधिकारियों से रिपोर्ट । इसमें अन्य बातों के अलावा प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में सक्रिय हो चुकी बूथ समितियों की संख्या, महिलाओं, युवा वर्ग, पिछडी जातियों को लक्षित करके की गई बैठकों की संख्या और सोशल मीडिया पर पहुंच शामिल थी । दिन भर में बारह घंटे शाह ने प्रत्येक जिले की प्रगति के बारे में दी गई ताजा रिपोर्ट के बारे में सुना । उन्होंने फिर डेट दिया, संतुष्ट नहीं होने पर उनसे पूछताछ की और उन्हें निर्देश दिए । अंत में शाह ने बैठक में उपस्थित पदाधिकारियों का परिचय सुनील बंसल से कराया हूँ और कहा उपचुनावों के प्रबंधन की निगरानी करेंगे और जब वो कुछ कहीं तो ये समझे कीजिए मैं कह रहा हूँ । बंसल आधिकारिक रूप से उत्तर प्रदेश के राजनीतिक परिदृश्य पर पहुंच चुके थे । उस शाह सबसे नजदीकी सहयोगियों में से एक बनाए जाने वाले थे । उत्तरप्रदेश अमित शाह की जिम्मेवारी थी । उनके सहयोगी के रूप में बंसल को चुनावों का एक विहंगम दृश्य मिल चुका था । किसी और नहीं । पार्टी के भावी अध्यक्ष को काम करते हुए इतने नजदीक से नहीं देखा था । भारत में अब सबसे अधिक मिस्टर लोगों में शामिल और बेहद सफल चुनाव प्रबंधक माना जा रहा व्यक्ति किस तरह काम करता है? बंसल बताते हैं, चुनाव पूर्व अमित भाई पहला काम बहुत ही गहराई से वस्तुस्थिति का अध्ययन करते हैं । उन्हें दो हजार तेरह में ही उत्तर प्रदेश का प्रभार मिला था । हम तो छह महीने के भीतर ही उन्होंने राज्य के प्रत्येक होने की यात्रा कर डाली थी । वो प्रत्येक क्षेत्र के मुद्दों से अवगत थे । वो जानते थे कि कौन सा नेता कहाँ उपयोगी है । व्यापक यात्राओं और अध्ययन ने अमित शाह को चुनावों की तैयारी के लिए बुनियादी दांवपेचों से सुसज्जित कर दिया था । उनकी समझ में आ गया कि पार्टी संगठन में जंग लगा हुआ है और इसलिए उन्होंने मतदान केंद्र स्तर पर समितियां बनाने पर ध्यान केंद्रित किया । ये पार्टी संगठन की सबसे छोटी इकाइयां होती हैं तो मैदान में काम करती हैं । यहाँ किसी भी चुनाव में मत डाले जाते हैं । ये समितियां ही मतदान से पहले समुदाय के लोगों को मत देने के लिए तैयार करने में अहम भूमिका निभाती हैं और वास्तव में मतदान के दिन मतदाताओं को बाहर आने के लिए प्रेरित करने का काम करके स्थानीय स्तर पर अनुकूल माहौल तैयार करती है । उत्तर प्रदेश में बीस करोड से ज्यादा आबादी वाले इस राज्य में एक दशमलव चार लाख मतदान केंद्र थे । समितियों को सुदृढ बनाना आसान काम नहीं होगा । उन्होंने देखा, स्थानीय नेतृत्व कमजोर है और पूरी तरह से गुटबाजी में उलझा हुआ है और उन्हीं की वजह से पार्टी की लगातार पराजय हुई है । इन नेताओं को किनारे लगना ही होगा लेकिन ये बंदोबस्ती करना होगा कि उनमें कोई विद्रोही ना हो । ये भी देख सकते थे कि नरेंद्र मोदी की अपील है परंतु लोग मोदी को ठीक से नहीं जानते हैं परन्तु शाह खुद भी अपेक्षाकृत अनजान व्यक्ति ही थे । ऐसी स्थिति में चुनाव जीतने का एकमात्र रास्ता मोदी का अथक इस्तेमाल किया जाए । यही वह बिंदु था जब शाह की मशीनरी को एक्शन चुनाव रणनीतिक, क्या प्रशांत कुमार और गांधीनगर स्थित उनके दल से बहुमूल्य मदद मिलेगी? उत्तर प्रदेश चुनाव जीतने के लिए जनसभाओं, होलोग्राम, रथयात्राओं, चाय पर चर्चा, मीडिया, व्हाट्सएप संदेशों के माध्यम से मोदी घर घर पहुंच गए । बंसल बताते हैं, चुनाव में शाह का दूसरा मंत्र सामाजिक संरचना का सावधानीपूर्वक अध्ययन कर रहा था तो प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र कि जातीय गणित से परिचित थे । चाह को महसूस हुआ । पार्टी की सारी गलत गलत है । मुसलमान पार्टी को वोट नहीं देंगे । यादव समाजवादी पार्टी के प्रति ही वफादार रहेंगे । गलत समुदायों में जाटव पूरी तरह मायावती के साथ थे । इस सब मिलाकर आबादी का करीब चालीस प्रतिशत थे । भाजपा के पास अन्य पचपन से साठ प्रतिशत मतदाता ही थे और उसके बावजूद इससे पहले के दशक में पार्टी मुख्य रूप से सवर्ण जातियों बीस प्रतिशत से कम तक सीमित रही और उसने दूसरी जातियों तक पहुंचने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं किए थे । उन्होंने सवर्ण जातियों को एकजुट करने पर तो ध्यान केंद्रित किया परंतु पिछ्डे वर्गों और दलितों में भी अपनी पहुंच बनाई । बंसल बताते हैं, अमित भाई का अपना स्वतंत्र सूचनातंत्र भी है और वो जानते हैं कि प्रत्येक जिले में क्या चल रहा है । हम हर एक घंटे पर बात किया करते थे और वो अक्सर मुझसे कहते थे चेक करो, हम उस जगह क्या चल रहा है । मुझे तब वहाँ कुछ गतिविधियों का पता चलता था, ये बताते हुए उनकी आवाज में आदर स्पष्ट रख रहा था । सूचना पार्टी और वैचारिक संगठनों से आई स्वतंत्र फीट तक तंत्र से मिली ये उस पेशेवर टीम से मिली जिसकी सेवाएं वास्तविक वस्तु स्थिति की जानकारी देने के लिए ली जा रहे हैं । इसी विशेषता ने शाह को सारे विवरण पर नियंत्रन प्रदान किया और इस तरह उन्हें अपनी व्यापक रणनीति को माइक्रो तस्वीर के साथ जोडने में मदद मिलेगी । पूरे दिन बैठकर उत्तर प्रदेश के प्रत्येक जिले से वे निर्देश की जानकारी प्राप्त कर सकते थे और उसके पहलुओं पर गौर करके स्पष्ट जानकारी देना और किसी भी समय इसकी अपने स्वतंत्र सूचनातंत्र से इसकी पुष्टि कराना चुनाव प्रबंधन के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण था । शाह के दृष्टिकोण का चौथा महत्वपूर्ण पहलू गुजरात में उन के साथ व्यापक रूप से काम कर चुके लोगों से सूचना प्राप्त करके चुनाव में विपक्ष के आधार को तार तार करने पर ध्यान केंद्रित करना है । अपने आप में ये ऐसा तरीका है इसका प्रत्येक राजनीतिक दल चुनाव से पहले इस्तेमाल करता है तो भाजपा में एक ऐसी विचारधारा भी है जो बाहरी तत्वों को संदेह से देखती है और इसे वैचारिक रूप से प्रदूषित मानती है । हालांकि अमित शाह के लिए चुनावी बाध्यताएं सर्वोपरि थी । उन्हें भरोसा था इन बाहरी लोगों को स्वीकार कर लिया जाएगा और पार्टी के प्रचार एक वैश्विक दर्शन का आत्मसात कर लेंगे । भरत पंड्या भाजपा की गुजरात इकाई के प्रवक्ता हैं तो विधायक और पार्टी के कार्यालय सचिव रह चुके हैं । उन्होंने नरेंद्र मोदी और अमित शाह दोनों के साथ ही कई वर्षों तक निकटता से काम किया है । दो हजार चौदह के चुनाव में वो बडोदरा सहित मध्य गुजरात के जिलों के प्रभारी थे । वडोदरा वो दूसरी सीट थी । यहाँ से नरेंद्र मोदी ने चुनाव लडा था । बंसल ने कहा, वह विपक्ष की ताकत को छिन्न भिन्न करने में यकीन रखते हैं । अमित भाई हमेशा ही आश्चर्य करते हैं । दशकों से कडी मेहनत कर रही भाजपा को अभी तक उस तरह की सफलता क्यों नहीं मिल सके तो हमें पहले ही मिल जानी चाहिए थी । उनका जवाब है, ये सब पाँच से दस प्रतिशत मतों की कमी की वजह से हुआ और इसे प्राप्त करने के लिए वो दूसरे दलों के लोगों अपने यहाँ लाने के लिए तैयार है । ये विरोधियों को कमजोर करेगा और हमें ताकत देगा । इससे कम हो रहे मतों की भरपाई होगी । और शाह के दृष्टिकोण का अंतिम पहलू साधारण लगने वाली गुणवत्ता है । इसे हम महत्व नहीं देते । वह कठोर परिश्रम और ध्यान केंद्रित करना । प्रवेन्द्र जायसवाल नहीं जो वाराणसी उत्तर से विधायक हैं । दो हजार चौदह के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी के लोकसभा चुनाव के दौरान चाह के साथ मिलकर काम किया था । वो याद करते हैं कि पार्टी मोदी की रैली के आयोजन की अनुमति के लिए जिला प्रशासन के साथ उलझी हुई थी । तभी ये फैसला किया गया है कि वो इसके बजाय पूरे शहर में मोदी का रोडशो आयोजित करेंगे । उन्होंने कहा, रोडशो से पहले की रात अमित शाह ने इस आयोजन के प्रत्येक पहलू की बारीकी से योजना तैयार की । ये काम हमने देर रात तक किया और फिर उन्होंने मुझे साढे सात बजे रोड शो शुरू होने वाले स्थान पर मिलने के लिए कहा ताकि हम इसके रास्ते इसमें लगी होर्डिंग्स लोगों की भीड के आने की व्यवस्था पर एक बार फिर से और कर रहे हैं । मैंने कहाँ रहा और घर चला गया? जायसवाल ने सही मायने में उस भारतीय परंपरा के बारे में सोचा । सवेरे सात बजे का मतलब सुबह नौ बजे हैं और अभी भी सुन ही रहे थे । शाम का सवेरे सात बजे फोन आ गया और पूछा कि वो कहाँ है । घबराए हुए उन्होंने कहा कि रास्ते में हूँ पंद्रह मिनट बादशाह ने फिर फोन किया और तब भी वो तैयार हो रहे थे । एक बार फिर उन्होंने झूठ बोला और रहा । मैं करीब करीब पहुंच गया हूँ । जब तक वो बैठक वाले स्थल पर पहुंचे तब तक आठ बज चुके थे । उन्होंने बनारस में आपने अलीशान घर में मुझसे कहा अमित भाई अपनी कार में बैठे इंतजार कर रहे थे । वो आदर्श पेश करते हैं । बंसल ने इस से सहमती जताते हुए कहा कि उन्हें अक्सर सवेरे ढाई बजे जहाँ से पूरा जाता था फिर सवेरे सात बजे वो कहते हैं, मैंने इस बार उनसे पूछ लिया आप सोते कम है । अमित भाई ने कहा वो योगनिद्रा जहाँ सिर्फ शरीर नहीं बल्कि मस्तिष्क भी शाम होता है और आराम करता है, करता हूँ । इसके तीन चार घंटे ही शरीर की स्फूर्ति और पूरे दिन ऊर्जा बनाए रखने के लिए पर्याप्त है । उन्होंने मुझसे भी ये करने के लिए कहा और क्या उन्होंने इसका पालन किया? पहुंचते हुए बताते हैं, भाई संघ में सीखा था, हमने भी बस किया ही नहीं लेकिन इससे आगे किसी भी चुनाव के लिए बहुत ही सावधानी भरे प्रबंधन की आवश्यकता होती है और यही वजह है कि शाह ने दो हजार चौदह में मदद के लिए बंसल की और देखा । बंसल ने विभिन्न राज्यों से साठ लोगों को अपने मूल दल में शामिल किया । इनमें से अधिकांश अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के समय से उनके सहयोगी थे । उन्हें उन्नीस समूहों में विभक्त किया गया । एक समूह मीडिया पर नजर रखता तो दूसरा भाजपा की ओर से निरंतर सोशल मीडिया पर था । तीसरा समूह पार्टी के वॉर रूम को देखता था और चौथा निर्वाचन क्षेत्रों से चुनिंदा नेताओं के लिए मिल रहे अनुरोधों को देखता हूँ और उनके प्रचार का समन्वय करता हूँ । एक उड्डयन मामले आधार सभी प्रमुख प्रचार करता हूँ के लिए हेलीकॉप्टर की अनुमति लेना तो दूसरे दल के पास प्रशासन के साथ मधुर रिश्ते बनाते हुए आयोजनों की अनुमति लेने की जिम्मेदारी थी । प्रत्येक जनसभा के पीछे की नजर नहीं आने वाली एक प्रमुख गतिविधि थी । वो बताते हैं, हम पर्दे के पीछे रहकर काम करने वाले थे और नजर आ रहे प्रचार अभियान को सहयोग प्रदान करते थे । इस दौरान वो डायरी भी रखते थे और रोजाना रात में इतने वो सब लिखते थे जो उन्होंने दिनभर देखा । इसमें पार्टी की ताकत और कमजोरी तथा अमित शाह के चुनाव प्रबंधन स्कूल से मिले सबका शामिल थे मोदी हवा को इस घंटे का प्रचार बारीकी से किया गया । संठनात्मक कार्य, व्यापक सामाजिक गठबंधन और संघ के खून पसीने के प्रयासों ने उत्तर प्रदेश में दो हजार चौदह के चुनावों में भाजपा के पक्ष में सुनानी लादी । पार्टी ने उत्तर प्रदेश में अपने दम पर इकहत्तर सीटों पर जीत हासिल की और उसके एक सहयोगी दल ने भी उसे दो अतिरिक्त सीटें प्रदान की । सोलह मई दो हजार चौदह को चुनाव के नतीजों के बाद अमित शाह दिल्ली में सत्ता हस्तांतरण के प्रबंधन में मदद और नरेंद्र मोदी सरकार में शामिल होने वाले मंत्रियों के नाम चुनने में व्यस्त हो गए । बंसल भी कुछ दिन के अवकाश पर राजस्थान अपने घर चले गए । जून में शाह ने उन्हें वापस दिल्ली बुलाया और कहा कि वह संगठन महामंत्री के रूप में उत्तर प्रदेश जाए । भाजपा में ये महत्वपूर्ण पद है जिसमें इस पद पर आसीन व्यक्ति के पास पर्दे के पीछे से पार्टी के कामकाज के मामले में और सीमित अधिकार होते हैं । राष्ट्रीय स्तर पर रामलाल संगठन महासचिव थे । पार्टी के कामकाज का केंद्र थे नरेंद्र मोदी गुजरात में भाजपा के संगठन महामंत्री रह चुके थे । पद छंग के पूर्व प्रचारक के लिए सुरक्षित रहता है । सचिव आम तौर पर पार्टी मुख्यालय में ही रहता है और अक्सर वो पार्टी की राज्य इकाई के अध्यक्ष है । कहीं अधिक महत्वपूर्ण होता है । बंसल सपोर्ट कर रहे थे । उत्तर प्रदेश बहुत बडा राज्य है जहां अनेक वरिष्ठ नेता थे तो हो सकता है इतने युवा व्यक्ति के साथ सहज नहीं हूँ । ऐसी स्थिति में फैसला लेना और उन्हें लागू करना बेहद कठिन होगा । उन्होंने शाह से कहा कि बेहतर होगा कि उन्हें कुछ छोटा राज्य दे दिया जाए चाहने इसी पर जोर दिया । बंसल ने उनसे कहा, मेरी सिर्फ की शर्त है आपकी उत्तर प्रदेश के प्रभारी महासचिव मेरे प्रभारी होने चाहिए । चाहने जवाब दिया उछल, आप जाइए, मैं आपका ध्यान रखूंगा । कुछ सप्ताह के भीतर ही अमित शाह राज्य के प्रभारी महासचिव नहीं बल्कि पूरी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने वाले थे । हंसल इस बार जून दो हजार चौदह में वापस लखनऊ पहुंचे तो इस स्पष्ट आदेश के साथ दो हजार सत्रह का विधानसभा चुनाव जीतना है । अमित शाह को जुलाई दो हजार चौदह में पार्टी अध्यक्ष की बागडोर संभालने के साथ ही मैदान में उतरना था । तीन महीने के भीतर दो राज्यों महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा के चुनाव होने थे जहाँ के पास पार्टी के लिए दीर्घकालीन योजना थी परन्तु उनकी तात्कालिक प्राथमिकता इन राज्यों को जीत रही थी और इसके लिए उन्हें अपनी रणनीति का उसी तरह उपयोग करना था जिसमें लोकसभा में भाजपा के शानदार प्रदर्शन में मदद की थी । महाराष्ट्र में चुनौतियां बहुत ज्यादा थी भाजपा आपने एक महत्वपूर्ण नेता गोपीनाथ मुंडे को जून के शुरू में ही एक दुर्घटना में खो चुकी थी । हाल ही में केंद्र में ग्रामीण विकास मंत्री नियुक्त किए गए मुंडे महाराष्ट्र में सबसे अधिक गहरी पैठ वाले भाजपा नेता थे । अन्य पिछडे वर्ग की पृष्ठभूमि वाले मुंडे उस समय राज्य के उपमुख्यमंत्री थे । पार्टी शिवसेना के साथ सप्ताह पहुंच चुकी थी । मोदी और शाह ने सीटों के बंटवारे को लेकर उत्पन्न मतभेदों की वजह से तब अपनी पुरानी सहयोगी शिवसेना से संबंध विच्छेद करने का फैसला किया था । लेकिन तकनीकी नहीं एक राजनीतिक मुद्दा था । भाजपा की दो हजार चौदह के चुनावों में विजय और मोदी तथा शाह के पास पार्ट डोर होने के बाद भाजपा अब जूनियर सहयोगी की भूमिका स्वीकार नहीं करेगी । इसका संदेश सभी सहयोगी दलों के लिए स्पष्ट था । रास्ते पर आ जाओ एक ऐसा राज्य भी था जहाँ भाजपा सारी सीटों पर चुनाव लडने के लिए संगठानात्मक दृष्टि से तैयार नहीं थी । उसने दो सौ छियासी निर्वाचन क्षेत्रों में आधे से ज्यादा सीटों पर चुनाव में प्रत्याशी ही नहीं उतारे थे । भाजपा की गतिविधियों पर पैनी निगाह रखने वाले श्रेष्ट जानकार राजनीतिक पत्रकारों में से एक छिला भटकने लिखा था । एक बार जब अकेले ही चुनाव लडने का निर्णय ले लिया गया, शाह ने मुंबई के भाजपा कार्यालय में ही डेरा डाल दिया और महाराष्ट्र के छत्तीस जिलों के लिए प्रभारी नियुक्त कर दिए गए । जिला पार्टी अध्यक्षों के लिए कार्यशालाएं आयोजित की । सभी दो सौ विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों में जीपीएस सुविधा से लैस कार में एक व्यक्ति तैनात किया और उन्हें मतदान संपन्न होने तक अपने अपने क्षेत्र में ही रहने का निर्देश दिया गया । इसके बाद चाहने बहुत ही सावधानी के साथ राज्य में नरेंद्र मोदी की जनसभाओं की योजना तैयार की क्योंकि वो जानते थे ये सिर्फ मोदी हवा है तो भाजपा का बेडा पार कर सकेगी । प्रधानमंत्री ने जनसभाएं की, भाजपा अपनी ताकत बढाने के लिए दूसरे दलों के दल बदलुओं को भी अपनाने में खुश थे । चुनाव के बाद अंततः पार्टी राज्य में सबसे बडे दल के रूप में उभरी और उसने सरकार बनाई । चुनाव में मोदी हवा की तरह ही भाजपा की कौशल पोर्ट, सामाजिक गठबंधन, राजनीतिक संदेश और सरकार विरोधी लहर ने भी अहम भूमिका निभाई । लेकिन स्पष्ट लग रहा था कि शाह बहुत बडा जोखिम लेने के लिए तैयार थे क्योंकि शिवशरण से संबंध तोडने का उल्टा असर हो सकता था । लेकिन इससे उन्हें उन राज्यों में भी चुनावी सभाओं का सृजन करने का मौका मिल गया जहाँ भाजपा बहुत अधिक ताकतवर नहीं थी । हरियाणा का मामला भी कमोबेश ऐसा ही था । सिर्फ शहरी केंद्रों तक सीमित रहने और पार्टी का व्यापक समर्थन नहीं होने के बावजूद भाजपा चुनाव में सफाया करने में सफल रही, इसमें कोई संदेह नहीं । दो हजार चौदह के बाद मोदी के साथ हनीमून अभी भी सही सलामत था और जीतने ये प्रमुख पहलू था । परन्तु सफलता की एक और विशेषता थी । ये वैसा नहीं था जिससे भाजपा पारंपरिक तरीके से काम कर दी थी या उसे सफलता मिलती थी । रूढिवादी टीकाकार और अब राज्यसभा में भाजपा के नामित सदस्य फॅस कुत्ता बताते हैं, अनवरत संगठानात्मक कार्यों की वजह से चुनाव में सफलता की बजाय चुनावों में विजय के बाद संगठानात्मक आधार का सृजन किया गया । वो बताते हैं कि ये समय सारणी थी । इसमें भाजपा को दोनों राज्यों में बात है । क्या चाहने दिखा दिया था कि वह लहर पर सवार होकर और चतुर चुनाव प्रबंधन से नतीजे ला सकते हैं परन्तु उनकी महत्वाकांक्षा भाजपा संगठन के विस्तार और उसमें बदलाव से कहीं अधिक बडी थी । एक नवंबर दो हजार चौदह को अमित शाह ने सर्वाधिक महत्वाकांक्षी सदस्यता अभियान शुरू किया । दुनिया में कहीं भी किसी दल द्वारा किया गया सबसे बडा था । इसमें सभी राज्यों के संगठन के प्रमुख व्यक्तियों का आह्वान करते हुए उनके लिए सदस्यता का लक्ष्य निर्धारित किया था । सशक्त भाजपा सशक्त भारत अभियान में पार्टी के प्रत्येक पदाधिकारी प्रधानमंत्री से लेकर मतदान समिति कार्यकर्ताओं था और शामिल किया गया । उसका एकमात्र लक्ष्य भाजपा में नागरिकों को लाना था । बाहर के अधिकांश लोग भाजपा के सदस्यता अभियान को लेकर सशंकित थे और उन्होंने सोचा कि जनसंपर्क कवायद है । विपक्षी नेताओं ने उपहासपूर्ण तरीके से इसे भाजपा को मिस कॉल कहने का अवसर प्रदान किया । इसमें सिर्फ एक मोबाइल नंबर पर फोन करके ही पार्टी के सदस्य के रूप में पंजीकरण कराया जा सकता था । लेकिन यही पार्टी के अनुसार में एक निर्णायक मोड था । इस संबंध में उत्तर प्रदेश को ही ले लीजिए । दिल्ली से बैठक के लिए लखनऊ आये सुनील बंसल से शाह ने पूछा, इस बार उत्तर प्रदेश कितनी सदस्य बनाएगा? उत्तर प्रदेश में करीब चौदह लाख सदस्य थे जिन्हें पुरानी ऑफलाइन प्रणाली के जरिए फॉर्म भरने की प्रक्रिया और इसकी औपचारिक रसीद देने के प्रावधान से बनाये गए हैं । बंसल हिचके जाए और जो उन्होंने अपने भरोसे के आधार पर कहा, ऍम जहाँ पे अपना सिर हिलाया और कहा नहीं, एक करोड का लक्ष्य बंसल नहीं । तभी जवान में कहा ये काफी मुश्किल लगता है । शाह ने जवाब दिया, करना है, यही करना है । लखनऊ में पार्टी ने चार आयामी योजना शुरू की । इस रणनीति का पहला हिस्सा मतदान केंद्र स्तरों पर काम करने की रणनीति थी । दो हजार चौदह के चुनावों के एक लाख इकतालीस हजार मतदान केंद्रों में से भाजपा को तेरह हजार मतदान केंद्रों पर एक भी मत नहीं मिला । पार्टी का आकलन था इनमें से अधिकांश मतदान केंद्र मुख्यतय मुस्लिमबहुल होंगे । पार्टी ने ऐसे निर्वाचन क्षेत्रों को सहज भी अपने चुनावी रण से बाहर रखा था । इन पर समय गंवाने की बजाय पार्टी ने अपनी ऊर्जा शेष मतदान केंद्रों पर लगाने का फैसला किया । पार्टी ने एक लाख बीस हजार मतदान केंद्रों की पहचान की और मतदान केंद्र समिति के अध्यक्षों से कहा कि उन्हें प्रत्येक मतदान केंद्र से कम से कम एक सौ सदस्य बनाने होंगे । ये प्रक्रिया रामक रूप सरल थी । हर घर जाएँ और इसमें दिलचस्पी दिखाने वाले व्यक्तियों के फोन नंबर से मिस कॉल भिजवायें । उसके बाद उन्हें एसएमएस के माध्यम से सदस्यता नंबर मिलेगा और वे पार्टी के प्राथमिक सदस्य बनेंगे । बंसल ने मुझे बताया कि एक महीने के भीतर ही उत्तर प्रदेश भी एक लाख मतदान केंद्रों पर ये सदस्यता अभियान सफल रहा था । वे शाह द्वारा निर्धारित लक्ष्य के काफी करीब अस्सी लाख सदस्य बनाने में सफल हो गए थे । उत्तर प्रदेश की सीमा से लगे बिहार के पश्चिम चंपारण जिले में वरिष्ठ पत्रकार अब है मोहन छाने इस पर सवाल उठाया, क्या हमें इस संख्या पर भरोसा करना चाहिए? मैंने लिखा कि उन्हें किस तरह से पार्टी में स्वागत करते हुए फोन कॉल और एसएमएस मिला । जब उन्होंने जवाब दिया कि वह सदस्य बनने के छुट नहीं है तो उन्हें दूसरा लिखित संदेश मिला । इसमें कहा गया था कि वह अपने परिवार के सदस्यों को भी इसमें शामिल होने के लिए प्रेरित करें । पत्रकार होने के नाते झांसें बिहार में भाजपा नेता सुशील मोदी से बात की । इन्होंने संकोच के साथ उनसे कहा तक नहीं होंगी । और बाहरी होती है वो इसमें सुधार कराएंगे । झा का नाम सदस्यता सूची से निकाल दिया गया लेकिन इस तरह की घटनाओं पर भाजपा ने जोर देकर कहा, ये अफवाह है । इस कवायद का असली उपयोग तो कहीं और होना था । बंसल ने मुझे बताया सोचिए इसका भारत नहीं । क्या क्या पिछले मतदान केन्द्र के स्तर पर समितियों को सक्रिय किया जो आम तौर पर चुनावों के बीच की अवधि में निष्क्रिय रहती हैं । पिछले हमारे कार्यकर्ताओं को बाहर निकालकर क्षेत्र के लोगों से परिचय बढाने और उनसे संपर्क स्थापित करने के लिए बात किया और इसी वजह से भाजपा हर जगह नजर आने लगी । लेकिन लक्ष्य अभी भी पूरा नहीं था । इसका दूसरा हिस्सा व्यक्तिगत रूप से लोगों को लक्षित करके उन्हें पार्टी का सदस्य बनाना था । मतदान केंद्र स्तर के अभियान नहीं । कार्यकर्ताओं को एक क्षेत्र विशेष तक सीमित कर दिया । अब भाजपा कार्यकर्ताओं से कहा गया, किसी परिवार के सदस्यों, पडोसियों किसी को भी सदस्य बना सकते हैं । सभी को एक बार फिर नए सदस्य जोडने के लिए तौर लगानी पडी । इस रणनीति का तीसरा ब्लॉक स्तर पर शिविर लगाने से संबंधित था । उत्तर प्रदेश में बहुत अधिक अंतरराज्यीय विस्थापित है । महिलाओं की शादी उनके गांव से बाहर होती है और वे अपना घर बदलती हैं । आदमी रोजगार के लिए जाते हैं । छात्र कॉलेज की शिक्षा के लिए बडे शहरों में चले जाते हैं । भाजपा के बैनर के साथ एक शिविर का उद्देश्य इस वर्ग को आकर्षित करना था । मतदान केंद्र, व्यक्तिगत और शिविर केंद्रित प्रयासों के अलावा पार्टी ने हिंदू समाज के प्रत्येक वर्ग को छूने के मकसद से सोच स्पर्शी अभियान चलाया । अन्य पिछडे वर्गों और दलित समुदाय से सात सौ अस्सी कार्यकर्ताओं की पहचान की गई और उन्हें राज्य में उन जगहों पर भेजा गया जहां उनकी अपनी जातियों के सदस्य बडी संख्या में थे । इसका उद्देश्य पार्टी का उन वर्गों की आबादी तक था जो अभी तक भाजपा के स्वाभाविक मतदाता नहीं थे । मार्च दो हजार पंद्रह तक राज्य में भाजपा के नए सदस्यों की संख्या एक दशमलव आठ करोड थी । शाह द्वारा निर्धारित लक्ष्य का लगभग दोगुना था । पार्टी ने इसे उत्तर प्रदेश मॉर्डल के नाम से जाना गया । इसमें बंसल के अपने अंदाज में ही एक संगठक के रूप में पहुंचने की शुरुआत थी कि इस अवधि में उन्होंने प्रदेश के प्रत्येक जिले का दौरा कर लिया था । उन्होंने सभी चार अभियानों की योजना तैयार की थी और उन पर अमल भी किया था । उत्तर प्रदेश के अनुभव नहीं ये अहसास कराया कि मैदान में किस तरह से सदस्यता अभियान पर अमल किया जा सकता है । यद्यपि उत्तर प्रदेश में पार्टी की झोली में सबसे अधिक नहीं सदस्य दिए थे । फिर भी अभियान उत्तर प्रदेश केंद्र सही था । ये अभियान के दूसरे राज्यों में भी चलाया गया और ऐसे अलग अलग सफलता मिली । मसला झारखंड को ही लें । यहाँ सदस्यता अभियान शुरू होने के तुरंत बाद दो हजार चौदह के अंत में चुनाव हुए । अमित शाह ने अपनी रैलियों में टोल फ्री नंबर पढकर सुनाए और लोगों से इस पर फोन करने का आह्वान किया । बिहार में पार्टी ने पचास लाख नए सदस्य बनाने का लक्ष्य रखा । महाराष्ट्र में नेताओं ने दावा किया कि उन्होंने दो हजार पंद्रह के मध्य तक एक करोड से अधिक नए सदस्य बनाए । तीस मार्च तक एक समाचार में कहा गया कि भाजपा नौ करोड नए सदस्य बनाने भी सफल रही है । पार्टी ने दस करोड सदस्यों का लक्ष्य पूरा करने के लिए इस अभियान को एक महीने के लिए और बढा दिया था । पत्रकार संजय सिंह ने इस संदर्भ में लिखा, पूरी कवायद दूसरे मायने में भी भाजपा के लिए बहुमूल्य रही है । पार्टी ने अपनी मिस कॉल सदस्यता अभियान पर अमल के लिए जो तकनीक अपनाई उसने भाजपा को विशाल डाटाबैंक थी उपलब्ध कराया । इसका उपयोग नरेंद्र मोदी के भविष्य के कार्यक्रमों में जनता तक पहुंचने के लिए हो सकता है । ये भाजपा को उन राज्यों में भी पहुंचाने में मदद करेगा जहाँ उसकी संस्थानात्मक ताकत सीमित है । ये अभियान समाप्त होने तक भाजपा ने अपना लक्ष्य हासिल कर लिया था । कुछ रिपोर्ट में कहा गया था कि पार्टी का ये दावा बढा चढाकर किया गया है । स्वतंत्र रूप से पार्टी के इस दावे की पुष्टि करना मुश्किल था । या तो दुनिया का एक सबसे बडा राजनीतिक दल है । परन्तु भले ही इसमें कुछ संदेह हो फिर भी यदि उसके दावे से कुछ लाख संख्या कम भी हो तो भी संगठन का व्यापक विस्तार हुआ था । इस अभियान के असली हीरो थे अमित शाह । उन्होंने सदस्यता अभियान शुरू किया था जिसे अधिकांश लोगों ने नाटक बताते हुए नकार दिया परन्तु ये कम से कम कागजों पर ही दस करोड सदस्य बनाने के साथ संपन्न हुआ । पार्टी को लोकसभा चुनाव में करीब सत्रह करोड मत मिले थे इसलिए चढाने वाला आंकडा था जहाँ पार्टी में ऊपर से लेकर नीचे नई ऊर्जा का संचार किया और एक सामान मिशन दिया था । चुनाव में अभूतपूर्व विजय के तुरंत बाद पार्टी के मशीनरी आत्ममुग्धता की अवस्था में आकर आसानी से थोडा शिथिल हो सकती थी । परंतु पार्टी की सदस्यता अभियान ने ऐसा करने से रोक दिया । लेकिन यही नहीं रुका । मई दो हजार पंद्रह में भाजपा ने फैसला किया । सदस्यता अभियान के बाद अब महासंपर्क अभियान चलाया जाएगा । कार्यकर्ताओं का वापस जाकर उन लोगों से संपर्क करना था जिन्हें उन्होंने सदस्य बनाया था और उनसे विस्तृत फॉर्म भरवाने थे । इसमें आयु, आर्थिक स्थिति, पेशा, परिवार में सदस्य और लेंगे जैसी अनेक जानकारियां मांगी गई थी । ये प्रकार से पुष्टिकरण और ये पता करने की प्रक्रिया थी कि कहीं इसमें बडे पैमाने पर विसंगतियां तो नहीं है । उत्तर प्रदेश वापस आने पर बंसल ने खुद भी लखनऊ स्लम में एक मतदान केंद्र की जिम्मेवारी ली । जहाँ उन्होंने एक सौ सदस्य बनाए थे । वो लोगों से फॉर्म भरवाने के लिए वापस मतदान केंद्र गए । उन्होंने महसूस किया ये काफी समय लेने वाली पेचीदा प्रक्रिया है और प्रत्येक फॉर्म भरने में चालीस मिनट या इससे अधिक समय लगा । इससे स्पष्ट था ये पुष्टि कर नहीं और सदस्यों से संपर्क करने का अभियान उन्हें सदस्य बनाने जैसा सफल नहीं होगा । फिर भी भाजपा चालीस लाख फॉर्म भरवाने में सफल रही जिनमें आवेदक की विस्तृत जानकारी थी । यहाँ के चुनावों के लिए अब एक नया हथियार था और ये कवायद बहुत ही उपयोगी थी । सदस्यता अभियान और संपर्क अभियान एक साथ शुरू करने से राज्यों में भाजपा का संगठन पुनर्जीवित हो गया । गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ जैसे राज्यों को छोडकर जहाँ भाजपा काफी लंबे समय से सत्ता में है, अन्य राज्यों में पार्टी का ढांचा खस्ता हाल था । लोकसभा के दो हजार चार के चुनाव में पराजय और दो हजार में हुए सफाई के बाद किसी ने भी संगठन में इतने बडे पैमाने पर समय नहीं दिया था । पार्टी बमुश्किल नए सदस्य बना पाई थी । मैदान में तो ये कहीं नजर ही नहीं आ रहे थे । अधिकांश राज्यों में उसका वोट प्रतिशत कम हो गया था । ये मुश्किल से ही एक पार्टी थी बल्कि इसके इतर ये प्रत्येक जिले में विभिन्न गुटके नेताओं के प्रति वफादार लोगों का सबूत बन कर रह गई थी । इसलिए दो हजार चौदह की जीत पार्टी संगठन की उतनी बडी विजय नहीं थी जितने की व्यक्तिगत रूप से नरेंद्र मोदी की उनके स्वतंत्र अभियान की व्यवस्था और संघ से मिल रहे समर्थन की थी । अमित शाह उनके दल ने संठनात्मक विस्तार करके भाजपा का आधार बढा, पार्टी संगठन को पुनर्जीवित किया । पुराने नेताओं को किनारे लगाया, बेशुमार आंकडे एकत्र किए और ये सुनिश्चित किया दो हजार चौदह का चुनाव सिर्फ अचानक मिली सफलता भर नहीं रहेगी । दो हजार पंद्रह की शेष अवधि के लिए पार्टी ने अंदरूनी स्थिति पर गौर करने का निर्णय लिया । सदस्यता के विस्तार और संपर्क अभियान के बाद अमित शाह का ध्यान अब पार्टी में प्रशिक्षण भरथा । यदि सदस्यता अभियान का उद्देश्य राज्यभर में भाजपा की उपस्थिति दर्ज कराना और सत्ता के लिए खुद को मजबूत दावेदार के रूप में पेश करना था तो उसका दूसरा चरण पार्टी की आंतरिक व्यवस्था को चाकचौबंद करना, कौशल का विकास करना और नए सदस्यों में पार्टी के सिद्धांतों को समझाना था । पार्टी के प्रशिक्षण शिविर आयोजित किए गए कार्यकर्ताओं और सदस्यों को पार्टी के सिद्धांतों से रूबरू कराया गया । पार्टी में पहले मतदान केंद्र से लेकर ब्लॉक स्तर तक और फिर जिले तथा राज्य स्तर पर संठनात्मक चुनाव कराए गए । उत्तर प्रदेश में समझना तक ढांचे को दुरुस्त करते समय भाजपा ने ब्लॅक भूत के बीच एक और स्तर सुदृढ किया । सेक्टर स्तर समितियां होंगी । प्रत्येक सेक्टर करीब एक दर्जन मतदान केंद्रों का प्रभारी होगा । इस प्रक्रिया से पार्टी ने तेरह हजार पांच सौ सेक्टर इकाइयों को सक्रिय किया । इस तरह नेताओं का एक पुल तैयार किया गया जो प्रचार में जाने के लिए तैयार थे । संगठनात्मक चुनावों के माध्यम से सबसे अधिक महत्वपूर्ण बदलाव भाजपा के पदाधिकारियों के जातीय समीकरण था । मुख्य रूप से सवर्ण जाति की पार्टी से उत्तर प्रदेश इकाई कहीं अधिक सर्वहारा इकाई में तब्दील हो चुकी थी । लेकिन ऍन आत्मक चुनाव उस व्याप्त की धारणा के लिए महज दिखावा थे । ऐसे लगता था कि भाजपा एक केंद्रीय पार्टी है । इसके सारे फैसले सबसे ऊपर अमित शाह द्वारा ही लिए जाते हैं । सुनील बंसल इस तरह की दलीलों को पूरी दृढता से खारिज करते हैं और मुझसे कहा कि संगठनात्मक ढांचा ही खुद को विकेंद्रीकृत फैसले वाला बनाता है । बंसल कहते हैं, कोई भी तो बीस करोड लोगों वाले उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में अपने आप एक पार्टी नहीं चल सकता । देखो मैं एक संगठनात्मक सिद्धांत का पालन करता हूँ तो काफी समय पहले मैंने एक किताब में पढा था । निर्णय लेने वाले अपने में से एक स्तर नीचे के लोगों को शामिल करो और अपने से एक स्तर ऊपर के प्राधिकारी को रिपोर्ट करूँ । भाजपा में भी निर्णय लेने का ढांचा व्यापक रूप से यही है जहाँ नहीं एक बार कहा था वो एक घंटे के अंदर उत्तर प्रदेश में ग्रामीण स्तर से लेकर लाखों लोगों पर अपना संदेश भेज सकते हैं और इस बारे में विस्तार से बताते हैं । यदि कोई संदेश है अमित भाई हम से कह सकते हैं, मैं ये जोनल प्रमुखों से बात कर सकता हूँ कि वह सेक्टर और मतदान केंद्र स्तर पर बात कर सकते हैं । अमित भाई जोनल प्रभारी से बात नहीं करेंगे । मैं जिला अथवा मतदान केंद्रों के लोगों से बात में शामिल नहीं होंगा । उत्तर देते हैं ये सहज लगता होगा और हम तो इससे पार्टी में कुछ सामंजस्य प्रदान की है । इस नहीं निचले स्तर को स्वायत्तता दी है और जवाबदेही के स्तर बनाए हैं जहाँ और बंसल के बीच बेहतरीन कामकाजी रिश्तों के कारण हो सकता है । ये उत्तर प्रदेश में सफल हो गया हो परन्तु निर्णय लेने की प्रक्रिया पार्टी में अधिक जटिल है । पार्टी संगठन में निश्चित ही एक नई संस्कृति आई है और इसमें जनता को चल दिया है जहाँ पार्टी के मुखिया थे । केंद्रीय पदाधिकारियों, अपनी अपनी राज्यों के प्रभारियों की अपने क्षेत्र में चलने वाले अभियान के प्रबन्धन के मामले में प्रमुख भूमिका थी । राष्ट्रीय स्तर पर संगठन के प्रभारी महासचिव जो आरएसएस से होते हैं, सभी राज्यों को आदेश दे सकते थे । संगठन के सभी अवयवों का कामकाज प्रत्येक राज्य में राष्ट्रीय स्तर के नेता, राज्य इकाई के अध्यक्ष और संगठन महासचिव से संवाद करते हैं और यदि पार्टी सत्ता में है तो मुख्यमंत्री से संवाद करते हैं । राज्य के ये वरिष्ठ पदाधिकारी फिर उन के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों, जिलों और मतदान केंद्रों का प्रबंधन देखते हैं । लेकिन व्यवहार में ये व्यवस्था असंतुलित तरीके से काम करती है । इसमें केंद्रीय और राज्य स्तर के पदाधिकारियों के बीच व्यक्तिगत तालमेल मायने रखता था । अमित शाह ने ये भरोसा किया कि राज्य अध्यक्ष अपने आप नतीजे दे सकते हैं । क्या राज्य स्तर के संगठन मुखिया के पास वही कौशल है? बंसल में है क्या राज्य का नेता? आपने आपने ताकतवर था या मोदी और शाह के संरक्षण की वजह से उसे ऐसी स्थिति प्रदान की गई थी कि सब तय करेंगे केंद्र का नियंत्रन और राज्य को कितनी स्वायत्तता दी जा सकती है? मोदी के समर्थन और शाह के ट्रैक रिकॉर्ड से एक बात साफ है कि पार्टी में शाह की ताकत बडी है और सत्ता के कई केंद्रों और अलग अलग प्राधिकार का दौर हो गया है इसमें संदेह नहीं । इससे अहम को आघात लगता है, मौजूदा वरिष्ठता बाधित होती है और असंतोष पैदा होता है । भाजपा में अनेक नेता उनसे कई साल जूनियर जहाँ के अधीन दूसरे दर्जे की भूमिका को लेकर नाराज है, अफवाह है । कई वरिष्ठ कैबिनेट मंत्रियों को पार्टी अध्यक्ष और उनके विश्वासपात्रों से आदेश लेने पडे । शाह का मुंहफट अवसर अहंकारी अंदाज है जिससे और सस्ता बडी है । उनके प्रमुख हैं सहायक नेता । इनका अपना कोई जनाधार नहीं है और ये उन लोगों में आक्रोश पैदा करता है तो समझते हैं कि राजनीतिक दृष्टि से अधिक अनुभवी हैं भाजपा बीट के एक संवाददाता इसमें सालों में पार्टी में हो रहे बदलाव को देखा है । कहता है इसमें कोई संदेह नहीं कि लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर सरीखे वयोवृद्ध नेताओं से लेकर पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राजनाथ सिंह जैसे और सुषमा स्वराज सरीखे वरिष्ठ नेता और वसुंधरा राजे जैसी मुख्यमंत्री भी अमित शाह के साथ सहज नहीं है । हम तो उनके पास कोई विकल्प नहीं है । उन्हें सिर्फ मोदी का ही समर्थन हासिल नहीं है बल्कि अपनी तरह से परिणाम भी दे रहे हैं और जब तक वो नतीजे दे रही हैं तो कुछ नहीं कर सकते हैं । लेकिन एक ऐसा भी साल था जब वह नई संठनात्मक संस्कृति की स्थापना कर रहे थे । अमित शाह नतीजे नहीं दे पा रहे थे । पार्टी अध्यक्ष के लिए दो हजार पंद्रह एक गंभीर झटका देने वाला साल बन गया । जब सदस्यता अभियान जोर पड रहा था उसी दौरान दो हजार पंद्रह के शुरू में भाजपा ने दिल्ली का चुनाव लडा । भाजपा संगठन के कार्यक्रम के अनुरूप जब सदस्यता अभियान, संपर्क अभियान और प्रशिक्षण का कार्यक्रम समाप्त होने वाला था तो उसने दो हजार पंद्रह के अंत में बिहार का चुनाव लडा । इस तरह की मशीनरी के स्वजन और इतने बडे पैमाने पर व्यवस्था के बगैर ही महाराष्ट्र, हरियाणा पता यहाँ तक कि झारखंड के चुनाव जीतने के बावजूद भाजपा दिल्ली और बिहार जैसे राज्यों में विफल क्यों हो गई? इसका जवाब आसान है । संगठन तो चुनावी गठित का एक अंग है । ये मूल नहीं बल्कि पूरक है । अन्य पहलुओं के साथ ही मूल मुद्दा, नेतृत्व का आकर्षण, सामाजिक गठबंधन और विपक्ष की स्थिति होता है । उदाहरण के लिए, दिल्ली में पार्टी के मुख्यमंत्री पद के लिए किरण बेदी के चयन का संगठन पर नकारात्मक असर हुआ । मुख्यमंत्री पद के लिए पुराने कार्यकर्ता उनके प्रति इतने वफादारी नहीं जुटा सकें, उनके लिए काम नहीं कर सकें । अधिकांश बाहर निकले ही नहीं है । बिहार में सर्वाधिक सौ संगठन और अप्रत्याशित रूप से उसकी तैनाती पड रहा है परन्तु व्यापक सामाजिक आधार और सशक्त स्थानीय नेतृत्व का अभाव मुख्य कारण रहे । शाह के लिए ऐसा सोचना सरल होगा । इससे पहले के साल में संगठन को सुदृढ बनाने के लिए उनके प्रयास व्यस्त हो गए । क्या वो कुछ गलत कर रहे थे? ये सत्ता प्राप्त करने का रास्ता नहीं था । इसके बाद थी । यदि संगठन अपने आप में पर्याप्त हथियार नहीं था तो भी आवश्यक हथियार है तथा अमित शाह ने दिल्ली अथवा बिहार के नतीजे को उन्हें हताश नहीं करने दिया । वो जानते थे कि अपनी प्रतिष्ठा बचाने और ये साबित करने के लिए दो हजार चौदह के चुनाव के नतीजे सिर्फ हुक्का नहीं थे । उनके पास एक ही रास्ता था उत्तर प्रदेश में काम में जुट चाहूँ दो हजार सोलह के शुरू में ही शाह अपने चालीस सूत्रीय कार्यक्रम के साथ लखनऊ पहुंचे । इन पर पार्टी को ध्यान देना था । इसमें अन्य बातों के साथ ही नए मतदाताओं को लक्ष्य करना कि सुनिश्चित करना कि मतदान केंद्र स्तर की समितियां काम कर रही हैं । दलितों और अन्य पिछडे वर्गों सहित दूसरे हिस्सों पर ध्यान देना केंद्र सरकार के कामों को प्रचारित करने के तरीके खोजना, पार्टी के सांसदों को अपने संसदीय क्षेत्र के विधानसभा हिस्सों में काम करने के लिए लाना और मूल मुद्दों की पहचान करना जो पार्टी का केंद्रीय मंच बनेंगे । इस पर अमल की जिम्मेवारी राज्य की टीम पर छोड दी गई थी और अमित शाह पर पैनी नजर रखे थे और वो एक एक करके इस काम में जुट गए और मुद्दों की पहचान करने के लिए जो मतदाताओं और उनकी मुख्य चिंताओं को प्रतिध्वनित करते हो तो भाजपा ने भी चुनावी राजनीति में अधिकांश दलों की तरह ही स्वतंत्र एजेंसियों से सर्वेक्षण कराने का तरीका अपनाया । कुछ मुद्दों के साथ वापस आए कि जनता के दिलो दिमाग पर छाए हुए हैं । इनमें कानून व्यवस्था, महिलाओं की सुरक्षा, भ्रष्टाचार, रोजगार, पलायन और पुष्टिकरण शामिल थे । सपा सरकार कार्यकाल के अंत में ये आश्चर्यजनक नहीं था । ये मुद्दे जनता के दिमाग में छाए रहते थे । इलाहाबाद के एक स्थानीय समाचारपत्र प्रयागराज एक्सप्रेस के संपादक और राज्य की राजनीति के अंदरूनी विश्लेषण करने वालों में शामिल अनुपम मिश्रा इस बारे में स्थिति स्पष्ट करते हैं । वो कहते हैं, सपा के शासन में प्रत्येक जिले का नेता खुद को मुख्यमंत्री समझता है । वो अपनी ताकत का इस्तेमाल करता है और जिला प्रशासन को प्रभावित करता है । वो उन पर दबाव बनाने के लिए लखनऊ फोन करता है और स्थानीय कारोबारियों से किराया और संसाधन की वसूली करता है । और इसी वजह से बसपा के उलट जहाँ अधिकार और भ्रष्टाचार दोनों ही पूरी तरह केंद्रीकृत है । सपा के शासन में यहाँ भ्रष्टाचार और गुंडागर्दी का लोकतंत्रीकरण हो गया । इसका मतलब ये हुआ कि उत्तर प्रदेश का प्रत्येक निवासी किसी न किसी तरह से सपा के कुशासन से प्रभावित हैं । अगर निष्पक्ष होकर देखें तो दो हजार सोलह में उत्तर प्रदेश की यात्रा करने वाले हम सभी को ऐसा लगा कि मुलायम सिंह का कार्यकाल समाप्त होने पर जो सरकार विरोधी भावना होती थी उससे कहीं काम अखिलेश यादव के खिलाफ नजर आ रही थी । परन्तु एक व्यक्ति जिसे सकारात्मक नजरिये से देखते हैं और शीर्ष पार्टी जिससे अराजकता को बढावा देने वाले रूप में लिया जाता है, अंतर होता है । भाजपा के लिए अपना प्रचार इसी के इर्दगिर्द केंद्रित करने के लिए इतना ही पर्याप्त था भाजपा का चुनाव अभियान । व्यापक रूप से भ्रष्टाचार और गुंडागर्दी इन दो मुद्दों के इर्द गिर्द रहेगा । बंसल ने कहा, इस अवसर पर हम ने नारा दिया न गुंडाराज न भ्रष्टाचार इस बार भाजपा सरकार भाजपा ने मतदाताओं के पंजीकरण का अभियान चलाया । इसका गणित साधारण था । पहली बार मतदान करने वाले अधिकांश मतदाता मोदी को पसंद करेंगे परन्तु ये काम पार्टी के तत्वावधान में नहीं किया गया । इसकी बजाय एक तटस्थ ही नजर आने वाले गैरराजनीतिक संस्था के तत्वावधान में ये किया गया । इसे नाम दिया गया ऍम एटी । इस अभियान के अंतर्गत नए मतदाताओं का मतदाता सूची में पंजीकरण कराने के लिए उनसे फॉर्म सिक्स भरवाने के लिए छह सौ कार्यकर्ताओं को लगाया गया था । बंसल बताते हैं, इस प्रायोगिक प्रक्रिया के जरिए हमें सबसे अच्छी कार्यप्रणाली और जो युवा मतदाताओं को पंजीकरण के लिए प्रेरित करें, उसका चयन किया और फिर पार्टी के प्रावधान में मतदाता पंजीकरण अभियान शुरू किया । प्रत्येक ब्लॉक में शिविर लगाए गए और हमने करीब दस लाख नए मतदाताओं का पंजीकरण किया । उत्तर प्रदेश के आकार के राज्य में दस लाख मतदाताओं के पंजीकरण के बहुत अधिक मायने नहीं है, लेकिन नए मतदाताओं को अपनी और करने पर ध्यान केंद्रित करना और इस काम नहीं संगठानात्मक ऊर्जा लगाना उल्लेखनीय था । इसके बाद सबसे अधिक चुनौती वाली हिस्सा आया और चुनाव प्रबंधन के बारे में अमित शाह स्कूल का मूल सिद्धांत मतदान केंद्र स्तर की समितियों को क्रियाशील और सक्रिय बनाए रखने का काम आया । ध्यान रखना चाहिए कि सदस्यता अभियान और संठनात्मक चुनावों के माध्यम से पार्टी ने मतदान समितियों की मूल इकाइयों को सक्रिय कर रखा था । पार्टी ने लखनऊ में अपने कार्यालय की पहली मंजिल से चुनाव के दौरान अठारह सदस्यीय कॉल सेंटर बनाया । यहाँ से युवा लडके, लडकियों को एक लाख अट्ठाईस हजार मतदान केंद्र स्तर के पार्टी अध्यक्षों को टेलीफोन करके संपर्क करने और उनकी पहचान, उनके संपर्क के विवरण और पार्टी से उनकी संबद्धता की पुष्टि करने के लिए तैनात किया गया था । पहले दौर में उन्हें पता चला कि सिर्फ छिहत्तर हजार मतदान केंद्र स्तर के प्रमुखों का विवरण सही है । चेंज किया तो नाम या अन्य विवरण सही नहीं है । इसका मतलब ये हुआ की पचास हजार से अधिक के नाम सही नहीं थे कि संगठन नेतृत्व के लिए खतरे का सूचक था । क्या पिछले साल किया गया काम था? क्या ये पचास हजार इकाइयां सिर्फ कागजों पर ही थी? इसमें तत्काल सुधार की जरूरत थी । ये नाम पार्टी की जिला और ब्लॉक इकाइयों के पास स्पष्ट निर्देश के साथ भेजे गए नामों को और उन के विवरण तक पडता से दुरुस्त किए जाए । ये वापस लखनऊ भेजा गया जहाँ पार्टी ने मतदान केन्द्र के अध्यक्षों के विवरण के साथ उससे कम प्रकाशत की । पार्टी जब अपनी इस कवायद को बंद करने की तैयारी कर रही थी तभी निर्वाचन आयोग ने मतदान केंद्रों की संख्या एक लाख इकतालीस हजार से बढाकर एक लाख सैंतालीस हजार कर दी है । जनता पार्टी को फिर से नई मतदान केंद्र इकाइयों का सृजन करके अतिरिक्त नामों के साथ नई पुस्तिका प्रकाशित करनी पडेगी की प्रक्रिया लगाने वाली थी परंतु उसने पार्टी को निचले स्तर तक अपने लोगों के आंकडे उपलब्ध कराए जिनसे दो हजार सोलह के मध्य तक सिर्फ टेलीफोन से संपर्क किया जा सकता था । अगला कदम इन मतदान केंद्र स्तर की इकाइयों से सीधे रूबरू होना था । अमित शाह ने एक बार फिर इसकी कवायद अपने हाथ में ली । उन्होंने उत्तर प्रदेश में बनाए गए भाजपा के सभी छह मंडलों का दौरा किया । इनमें पश्चिमी उत्तर प्रदेश का मुख्यालय, गाजियाबाद ब्रिज का मुख्यालय, आगरा, कानपुर और बुंदेलखंड का कानपुर, अवध का लखनऊ, गोरखपुर और राशि शामिल थे । प्रत्येक मंडल में राष्ट्रीयध्यक्ष नहीं बीस हजार से अधिक मतदान केंद्र समिति के अध्यक्षों के साथ मंत्रणा की । बंसल स्पष्ट करते हैं ये मतदान केंद्र इकाइयों के नेताओं को बेहद सशक्त बनाने वाला था । उन्होंने कभी ये सोचा नहीं था कि वे अध्यक्ष से मिलेंगे । उन सभी को भेज दिए गए थे । उनके पद को मान्यता दी गई थी और इसमें उन्हें प्रेरित किया । इसी तरह की एक बैठक में पहली बार मुख्यमंत्री पद के संभावित प्रत्याशी के रूप में योगी आदित्यनाथ का नाम आया । शाह और उनकी टीम को ये आभास हुआ कि राज्य में पार्टी के बॉर्डर में योगी लोकप्रिय हैं और गोरखपुर में ऐसे ही मतदान केंद्र स्तर के समागम में ऐसा समझा जाता है । शाह ने उत्तर प्रदेश को दयनीय स्थिति से उभारने की भूमिका के लिए योगी को अपनी तैयारी शुरू करने का संकेत दे दिया था परन्तु बडी सभाएं और इसमें हजारों लोगों की उपस् थिति संदेश देने के लिए एक बडी तस्वीर का मकसद पूरा कर सकती है । चुनावों के नजदीक समय इसी तरह की बैठकें निर्वाचन क्षेत्र स्तर पर और फिर सेक्टर और मंडल स्तरों पर आयोजित की गई थी तथा मतदान केंद्र समिति के अध्यक्षों की अपनी पार्टी अध्यक्ष के साथ चार बार मुलाकात हुई और उनसे निर्देश लेना और अपने इलाके की गतिविधियों के बारे में विस्तार से जानकारी भी दी । मतदान केंद्र समितियों को अपने इलाकों में जातीय समीकरण की सूची तैयार और ए, बी या सी श्रेणी के तहत घरों की पहचान करने की जिम्मेवारी सौंपी गई थी । एक मतलब ऐसा परिवार जो भाजपा का मतदाता था, बी श्रेणी में किसी भी तरह जा सकने वाले और अस्थाई मतदाता थे जबकि चीज श्रेणी के अंतर्गत आने वाले मतदाता किसी भी स्थिति में भाजपा को मत नहीं देंगे । इसमें भाजपा को पूरे राज्य के बारे में बहुत ही उपयोगी आंकडे उपलब्ध कराए थे । दो हजार चौदह में रणनीतिकार प्रशांत किशोर की टीम ने भी कुछ इसी तरह करने का प्रयास किया था और उसने मतदान केंद्रों के हिसाब से एक पुस्तिका में प्रत्येक प्रत्याशी के मजबूत और कमजोर क्षेत्रों का विवरण दिया था । भाजपा का एक नारा था, उसके पास मैदान में काडर की उपस्थिति है । उसके पास मतदाताओं के बारे में उपयोगी आंकडे हैं और उसके पास मतदान केंद्र इकाइयां और ऐसी सभी इकाइयों का विवरण है । क्या प्रचार अभियान शुरू करने का सही समय है? भाजपा ने पांच नवंबर को अपनी परिवर्तन यात्रा को हरी झंडी दिखाई । इस राज्य के चार छोडो पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सहारनपुर, बुन्देलखंड में झांसी, पूर्वांचल में बलिया और सोनभद्र से इसे साधारण लक्ष्य के साथ रवाना किया गया । बंसल बताते हैं, भाजपा को छा जाना था बस भाजपा ही भाजपा दिखाना चाहिए था । लगभग इसके साथ ही यह भी निर्णय किया गया की अन्य पिछडे वर्गों, युवाओं और महिलाओं को ध्यान में रखते हुए बैठके शुरू की जाए । इन तीनों को भाजपा चुनाव में एक स्वतंत्र वर्क की तरह अपना लक्ष्य बना रही थी । बंसल ने इसके समय के बारे में स्पष्टीकरण देते हुए कहा हमारा मकसद प्रत्येक जिले में प्रत्येक पखवाडे में एक बडी गतिविधि का आयोजन होना चाहिए । इसके अंतर्गत या तो जिले से एक यात्रा निकलनी चाहिए या फिर महिलाओं, युवाओं या अन्य पिछडे वर्गों के साथ इस तरह की एक बैठक होनी चाहिए । इसका ताक पर ये हुआ की मुख्य आयोजन से पहले के दिनों और आयोजन के बाद के कुछ दिनों तक लोग अपने जिले में सिर्फ भाजपा के बारे में ही बात करते रहे । लालकृष्ण आडवाणी की सर्वाधिक प्रसिद्ध रथयात्रा के साथ ही भाजपा का रथयात्राएं आयोजित करने का इतिहास रहा है । नरेंद्र मोदी स्वयं भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष डॉक्टर मुरली मनोहर जोशी कि कन्याकुमारी से कश्मीर की यात्रा में उनके साथ थे । लेकिन परिवर्तन यात्राएं भिन्न थी क्योंकि ये किसी नेता के इर्द गिर्द नहीं घूमती थी । बंसल गर्व के साथ बताते हैं, इस संगठन की यात्रा थी और ये प्रदेश के चार सौ तीन निर्वाचन क्षेत्रों में से प्रत्येक में पहुंची । बिस्तर समय राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण था । यात्रा पांच नवंबर को शुरू हुई और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का पांच सौ और एक हजार के नोट बंद करने के कठोर निर्णय की घोषणा आठ नवंबर को हुई थी । इसका मतलब ये हुआ की जबरदस्त सामाजिक और आर्थिक अव्यवस्था जिसमें प्रत्येक भारतीय नागरिक एक सीमा तक और सुविधा में था, जब राजनीतिक माहौल प्रधानमंत्री के खिलाफ हो सकता था, के दौर में भाजपा की सारी मशीन रही मैदान में सक्रिय थी । इस यात्रा के माध्यम से प्रत्येक जिले में प्रत्येक छोटी जनसभाओं में भी छोटे बडे नेताओं को ये समझाने के लिए उतारा गया । राष्ट्र के लिए अर्थव्यवस्था के लिए, समाज के लिए आखिर नोटबंदी क्यों अच्छी है और मोदी ने पडे कालेधन वालों के खिलाफ कैसे मोर्चा खोला है और किस तरह से उन्होंने अपना मुख्य वायदा पूरा किया है । यात्रा में लगाए गए अनेक नेताओं और केंद्रीय मंत्रियों को शायद खुद भी इस पर भरोसा नहीं था और कुछ नहीं तो निजी मुलाकातों में अपनी आशंका को छिपाया भी नहीं परन्तु जनता को समझाने के लिए बाहर निकले थे । मोदी ने खुद भी परिवर्तन यात्रा के हिस्से के रूप में छह जनसभाओं को संबोधित किया और प्रत्येक पडाव पर उन्होंने नोटबंदी के पक्ष में दृढता से अपनी बात रखें । कहा ये त्याग परिहार्य था, परमप्रिय राष्ट्र के लिए हितकारी होगा, नोटबंदी के राजनीतिक प्रभाव पर नहीं और चर्चा हुई थी परन्तु यहाँ सवाल भाजपा की मशीन देखा था । इसमें यात्रा की व्यवस्था की थी और पडे राजनीतिक क्षेत्र की जनता था । सीधे पहुंचने के लिए प्रधानमंत्री को मंच उपलब्ध कराया था । इसमें उनका राजनीतिक संदेश पहुंचाने में मदद की और राजनीतिक संदेश देने की कवायद नहीं । उन्हें उस स्थिति पर काबू पाने में मदद की जो दुनिया के किसी भी लोकतंत्र या अधिनायकवादी व्यवस्था में किसी राजनीतिक नेता के लिए आत्मघाती कदम हो सकता था । ये यात्रा दो जनवरी को लखनऊ में उत्तर प्रदेश के चुनावी माहौल की सबसे बडी जनसभा के साथ संपन्न हुई जिसमें उपस्तिथ हजारों लोगों को नरेंद्र मोदी ने संबोधित किया । रैली आपने आपने भाजपा की संतित ताकत का प्रतीक थी । अब अंतिम चरण के लिए आगे बढने का समय था । तीन दशक तक चुनाव प्रबंधन से जुडे रहने वाले अमित शाह जानते थे आप सुदूर राजधानी ने अपने और रूम में एक बेहतरी नक्शा तैयार कर सकते हैं । आधे एक संरचना का दर्शाने वाला खुबसूरत चार्ट तैयार कर सकते हैं । आप टेलीफोन करके नम्बरों की पुष्टि कर सकते हैं और अब तो संगठन की असली परीक्षा तो नजदीक आ रहे चुनाव के दौरान मैदान में ही होती है । मैंने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अमरोहा की यात्रा ये समझने के लिए कि कि मैदान में भाजपा संगठन किस तरह काम कर रहा है । चंद्रमोहन लखनऊ में भाजपा के राज्य प्रवक्ता हैं और उन्हें भी जिले का प्रभार सौंपा गया था । पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर के मूल का निवासी चंद्रमोहन पाल स्वयं सेवक थे और वो उन्नीस सौ में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद नहीं शामिल हो गए थे । चार साल के भीतर ही वो इसके पूर्णकालिक हो गए और परिषद के संगठन सचिव के रूप में काम करने लगे । इसे एटा कासगंज क्षेत्र में आरएसएस के छात्र प्रकोष्ठ को इसी नाम से बुलाया जाता है । अंततः स्वदेशी जागरण मंच में चले गए और वहां उसकी राष्ट्रीय कार्यसमिति के सदस्य बने । दो हजार तेरह में आरएसएस ने उन्हें भाजपा में भेज दिया, जहाँ वो पार्टी के लिए मीडिया प्रभारी बनाए गए । पार्टी ने प्रत्येक सीट के लिए मध्यम स्तर के कार्यकर्ता को प्रभारी के रूप में लगाया था और नवंबर से सारा ध्यान जैसा के नेतृत्व ने सोचा था । संगठन की जनसभाओं और जनसंपर्क बढाने पर था । चंद्रमोहन याद करते हैं, हमने अन्य पिछडे वर्गों की एक सभा के लिए दो निर्वाचन क्षेत्रों को मिला दिया । इसका संदेश आसान था की सरकार पिछडे वर्ग के प्रति अन्यायपूर्ण है । हम निष्पक्ष हैं और मोदी जी सबका साथ में विश्वास करते हैं । प्रत्येक जिले में आयोजित महिलाओं के केंद्र उनको रखकर आयोजित बैठकों का मुख्य मुद्दा, कानून व्यवस्था, लडकियों का अपहरण और उन्हें परेशान किया जाना था और युगों के साथ भी राज्य के प्रत्येक जिले दे बैठके आयोजित की गई है । इस परिवर्तन यात्रा के दौरान प्रभारी को यह भी सुनिश्चित करना था कि उसके अंतर्गत आने वाले जिले में मोदी की जनसभाओं के लिए पर्याप्त संख्या में लोग पहुंचे । विमुद्रीकरण के बाद मोदी की पहली रैली अमरोहा के निकट मुरादाबाद में हुई । हमारे कार्यकर्ताओं को लक्ष्य दिया गया था । इसी जनसभा में मोदी ने गरीबों का आह्वान किया था कि उनका धन वापस नहीं लौटाए जिन्होंने विमुद्रीकरण के दौरान अपनी संपदा को ठिकाने लगाने के लिए उनके जनधन खातों का इस्तेमाल किया है । आमतौर पर ये माना जाता है कि इन रैलियों में शामिल होने के लिए लोगों को भाजपा पैसे देती है परन्तु चंद्रमोहन ऐसे तर्कों को पूरी तरह अस्वीकार करते हैं । वो कहते हैं, बिल्कुल नहीं । हम परसों की व्यवस्था करते हैं और जिला स्तर के पार्टी के नेताओं से कहते हैं अस्सी निजी गाडियों की व्यवस्था में वे खुद करें । हम सामूहिक भोजन और चाय की व्यवस्था करते हैं । ये भी इस बात पर निर्भर करता है कि उन्हें अपने घर से रैली स्थल तक पहुंचने में इतना समय लगा । मोदी जी की सभाओं के लिए लोग अपने आप आना चाहते थे । हमारा लक्ष्य अमरोहा से तीस हजार लोगों का था परंतु पहुंचे अस्सी से नब्बे हजार और इनमें से अधिकांश अपने आप आए थे । चुनाव की तैयारियों के दौरान प्रभारियों के पास दूसरा काम स्थानीय कार्यकर्ताओं और जिले के नेताओं से परामर्श करना और प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र से ऐसे प्रत्याशियों की छोटी सूची तैयार करना हो जिन्हें चुनाव में टिकट किया जा सकता है । इसके मुख्य आधार में प्रत्याशी के जीतने की संभावना, सामाजिक समीकरण और जाती प्रत्याशी का नाम लोग जानते हो और उसकी आर्थिक स्थिति जैसे बिंदु शामिल थे । उदाहरण के लिए पूर्व क्रिकेटर और भाजपा के पूर्व सांसद चेतन चौहान का नाम अमरोहा के एक निर्वाचन क्षेत्र के लिए भेजा गया । उन्हें लोग अच्छी तरह जानते थे । आर्थिक स्थिति ठीक थी और निर्वाचन क्षेत्र के सामाजिक समीकरण के लिए पूरी तरह सही थे । चंद्र बताते हैं, हमने उन प्रमुख नेताओं की सूची भी तैयार की जिनके साथ संभावित प्रत्याशी की नजदीकी थी ताकि यदि उसे टिकट नहीं मिले तो हम जानते थे इसके लिए किस से संपर्क करें । असंतुष्ट को साधना महत्वपूर्ण है परन्तु अवसर चुनावी काला में कमतर आते हैं । इन सामर्थ्यवान प्रत्याशियों की सूची फिर राज्य स्तर के नेतृत्व तक भेजी जाती हैं और उसके बाद बंसल से शाह तक ले जाएंगे । बंसल सिर्फ जिला इकाई पर ही नहीं बल्कि टिकटों के लिए नामों की सिफारिश करने से पहले पांच अन्य स्रोतो स्थानीय सांसद, क्षेत्रीय नेताओं, संघ की मशीन रही हूँ । सर्वेक्षण करने वाली एजेंसियों और जिलों में तैनात किए गए श्रम सेवकों से मिलने वाली जानकारी पर भी निर्भर कर रहे थे । चुनावों में बहुत ही विवाद वाले मुद्दों में एक बनता जा रहा टिकट वितरण का काम संपन्न हुआ और एक अवसर तो ऐसा लगा ये भाजपा कोई सारी संभावनाओं को ही खतरे में डाल देगा । लखनऊ और वाराणसी में प्रचार के दौरान जब हम पाँच साल से मिले तो उन्होंने इस विवाद को पूरी तरह दरकिनार कर दिया । उनका कहना था, आपको पार्टी के प्रति आकर्षण को बताता है कि प्रत्येक निर्वाचन सीट के लिए पंद्रह पंद्रह लोग टिकट चाहते थे कि स्वभाव देखी है । जिन्हें टिकट नहीं मिला वो आक्रोशित और राहत महसूस करेंगे । पर अब तो ये पर्याप्त तरीके से उस नाराजगी के पैमाने को नहीं बता सकें जो हमने टिकटों को लेकर जिलों में देखी थी । आवश्यकता पडने पर विपक्ष को तोडने की कम हुए मतों के लिए छतिपूर्ति की अमित शाह की रणनीति से बंधी भाजपा नहीं बेहिचक कांग्रेस रीता बहुगुणा और बसपा से स्वामीप्रसाद मौर्य तथा प्रजेश पाठक जैसे जाने माने नामों सहित दूसरे नेताओं को थोडा बंसल समझाते हैं । साठ से अधिक ऐसी सीटें थी जहाँ हम कभी नहीं जीते थे और बीस अन्य सीटों पर हमारी स्थिति कमजोर थी । इन सीटों के लिए हमने सपा और बसपा के उन नेताओं को लिया । दिन का वहाँ पर अपना जनाधार था । इसका अभिप्राय यह था कि मत उन मतों को लाएंगे और हम संगठन सहयोग उपलब्ध कराएंगे । उन सीटों पर लंबे समय से पार्टी के लिए काम कर रहे भाजपा कार्यकर्ता नाराज थे । परिवार के जो लोग टिकट की उम्मीद लगाए थे उन्हें लगा कि यदि नया प्रत्याशी जीत गया तो अगले कुछ चुनावों के लिए उन की संभावना तो खत्म हो जाएगी । इसीलिए ये नाराजगी थी । आखिरकार ऐसे सीटों में से भाजपा बयालीस ही जीत चुकी । ऐसे तेरह जिलों में जहाँ भाजपा पहले कभी नहीं जीती थी, उन पर दूसरे दलों से आया था । नेताओं की बदौलत वो चुनावी सफलता दर्ज कराने वाले थे । क्या यह वैचारिक शुद्धता की कीमत पर था? पाँच साल तक देते हुए कहते हैं, भाजपा इतनी विशाल है । इसमें शामिल होने वाले नए लोग सहजता से पार्टी की संस्कृति और वैचारिक दायरे को आत्म साफ कर लेते हैं । वो कहते हैं, मैंने इस बात को नोटिस किया है । इनमें से अधिकांश नेता पहले ही हमें भाईसाहब कहने लगे हैं । लोगों का स्वागत करने के हमारे तरीके को भी आत्मसात करने लगे हैं आपने हमारी संस्कृति में हमने लगे हैं भाजपा भी उत्तर प्रदेश चुनाव का इस्तेमाल नेताओं कि नई पीढी के सृजन के लिए कर रही थी । इसके लिए पुराने नेताओं की पीढी को अब सेवानिवृत्त होने की कगार पर है । पार्टी अब प्रत्येक जिले में उन लोगों को एक दो टिकट देने की तैयारी कर रही है तो चालीस और पचास साल के प्रारंभिक तौर की उम्र के हैं । बंसल स्पष्टीकरण देते हुए कहते हैं, एक समुदाय विशेष के उस आयु वर्ग के व्यक्ति के बारे में सोची तो पार्टी में है और से टिकट नहीं मिला है । वहाँ संतुष्ट ही होगा । ऐसा ही कुछ एक सबसे अधिक निगाहों में रहे । निर्वाचन क्षेत्रों में सही एक वाराणसी दक्षिण में हुआ । इस सीट का प्रतिनिधित्व श्यामदेव रायचौधरी करते आ रहे थे । वो असाधारण रूप से बंगाली भ्रामरों में लोकप्रिय है और ज्यादा के नाम से जाने जाते थे । पूरी तरह से अपने क्षेत्र में रचे बसे थे और एक एक व्यक्ति को जानते थे और रोजाना अपने क्षेत्र के लोगों की समस्याओं पर विचार करते थे । दादा को इस बार टिकट नहीं दिया गया बल्कि उनके स्थान पर एक युवा नीलकंठ तिवारी हो पार्टी का उम्मीदवार बनाया गया । एकदम क्या दर्शाता है? क्या इसकी वजह उम्र थी? भाजपा के एक नेता ने कहा हूँ । उम्र एक पहलू था परन्तु हूँ । भविष्य के लिए निवेश भी था । देखिए हम एक स्थानीय भ्रमण की आवश्यकता थी । अपने समुदाय के लिए एक नेता के रूप में बढेगा और जिसे उत्तर प्रदेश के पंडित राज्य में जोड सके । मुरली मनोहर जोशी अब अप्रासंगिक हो चुके हैं । कलराज मिश्र पचहत्तर साल पार कर चुके हैं । हमें दादा के बारे में तकलीफ हुई परन्तु हमें भविष्य की और देखना है इस से एक बार फिर बढता और जोखिम की कहानी ही सामने आती है । प्रत्याशियों के चयन में व्यापक स्तर पर की गई करवाया और विभिन्न स्रोतों से जानकारी प्राप्त करने की व्यवस्था का तृण प्रभाव नजर आता था । यदि किसी प्रत्याशी के नाम की सिफारिश जिला इकाई द्वारा संबंधित पटरी के नेताओं द्वारा संघ द्वारा स्थानीय सांसद द्वारा सर्वेक्षण एजेंसी द्वारा स्वतंत्र स्वयंसेवकों द्वारा की गई हो तो वह स्वाभाविक पसंद करेगा अथवा यदि इसके नाम को इन सभी में से अधिकांश ने आगे बढाया आपको उसका चयन किया जाएगा । हालांकि अंतिम निर्णय लेने का अधिकार अमित शाह, प्रभारी महासचिव ओम माथुर, प्रदेशाध्यक्ष केशव प्रसाद और बंसल के पास ही था तो किसी भी सिफारिश को स्वीकार या अस्वीकार कर सकते थे । परन्तु इसमें भी जोखिम था क्योंकि जो पार्टी की संरचनाओं से बाहर थे उन्हें भरोसेमंद कार्यकर्ताओं को नाराज करने की कीमत पर लाया गया था । दूसरे समुदायों से आए नई पीढी के नेताओं के लिए जगह बनाने के लिए पुरानी और सफल उम्मीदवारों के नाम हटाए गए थे । क्रिकेट मिलने की आशा में पिछले कुछ सालों में अपनी ऊर्जा और धन लगाने वाले अधिकांश लोगों ने अचानक ही खुद को दौड से बाहर पाया । उनके पास कहीं और जाने का रास्ता नहीं था । ये सब एक साथ होकर भाजपा के लिए परेशानी का सबब बन सकते थे । ये पार्टी के लिए बेचारी का दौर था परन्तु उसने स्थिति का सामना करने का फैसला किया । वापस अमरोहा में पार्टी संगठन अंतिम चरण की तैयारी कर रहा था । प्रारंभिक बैठकों का दौर शुरू हो चुका था । व्यापक जनसंपर्क स्नातक किया जा रहा था । मोदी इस इलाके में रैलियों को संबोधित कर रहे थे और टिकटों को अंतिम रूप दिया जा चुका था । चंद्रमोहन ने अमरोहा के मुख्य राजमार्ग पर गजरौला में उडूपी कैसे मैं दूसरा खाते हुए मुझे बताया । पार्टी ने प्रत्येक उम्मीदवार को डायरी और एक एंड्राइड दी थी । इसमें मतदान केंद्र स्तर के आंकडे थे जिन्हें दो सालों में बहुत ही सावधानी के साथ तैयार किया गया था । इसमें प्रत्येक मतदान केंद्र पर सदस्य बनाए गए लोगों के नाम, समिति के सदस्यों की सूची और प्रत्येक केंद्र की कमियों और ताकतों का विश्लेषण था । चंद्र बताते हैं, जैसे जैसे चुनाव नजदीक आया पार्टी ने निर्वाचन क्षेत्र के स्तर पर एक और व्यवस्था का सृजन किया । पार्टी ने विनिर्दिष्ट जिम्मेदारी के साथ बारह से पंद्रह सदस्यों की चुनाव संचालन समिति का गठन किया । इसमें एक व्यक्ति उम्मीदवार के दैनिक कार्यक्रम और क्षेत्र में उसके दौरे का प्रभारी होगा । दूसरा जनसभाओं के लिए तालमेल में मदद करेगा । तीसरा व्यक्ति राष्ट्रीय और राज्य स्तर के प्रचारकों के लिए मंडल मुख्यालय के पास अनुरोध भेजेगा और प्रचारक के कार्यक्रम के साथ तालमेल करेगा । एक उम्मीदवार के सोशल मीडिया कोशिश कर फेसबुक पेज और वाट्सऐप समूहों पर प्रचार में सहयोग करेगा । एक अन्य वित्तीय मामलों का प्रभारी होगा । एक पर्मिट के लिए जिला प्रशासन के साथ सामंजस्य बनाएगा और एक व्यक्ति प्रचार सामग्री का प्रभारी होगा । रोजाना शाम को समिति की बैठक होगी जिसमें दिनभर की गतिविधियों का आकलन किया जाएगा । इसमें चुनाव सहायक थे जो मतदान केंद्र समितियों की निगरानी कर रहे थे । प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में करीब साढे तीन सौ मतदान केंद्र थे । निर्वाचन क्षेत्र में प्रत्येक पंद्रह से बीस मतदान केंद्रों के लिए बैठी हुई जिसमें मतदान केन्द्र के कार्यकर्ताओं को आने जाने वाले मतदाताओं की पहचान करने और उनके लिए काम करने का निर्देश दिया गया । चंद्रमोहन बताते हैं, हमारे पर जिला स्तर पर थोडे वरिष्ठ नेता भी थे जिन्हें विरोधियों पर नजर रखने और उन्हें अपनी और आकर्षित करने और यदि आवश्यक हो तो उन्हें कुछ महत्व देने तथा अपने पाले में लाने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी । सपा और बसपा दोनों में नेता ही चुनाव लडते हैं । उम्मीदवार अपने पैसे से भी लडते हैं । सीट की जिम्मेदारी उसी व्यक्ति विशेष को दे दी जाती है । भाजपा में संगठन चुनाव लडता है और हमने यही अंतर जिले में पाया । वो निश्चित ही उम्मीदवार को कडी मेहनत करनी होती है परंतु यहाँ उसका साथ देने के लिए पूरी मशीनरी है । निश्चित ही भाजपा में संगठन लडा और चुनाव जीता । सदस्यता का दायरा बढा नहीं । सदस्यों के साथ संपर्क को नए सिरे से स्थापित करने, प्रशिक्षण शिविरों के आयोजन, संठनात्मक चुनाव कराने, मुद्दों की पहचान के लिए स्वतंत्र एजेंसियों की सेवाएं लेने, मतदान केंद्र स्तर के कार्यकर्ताओं के साथ कई दौर की बैठकें करने और सेंटर चला नहीं और निर्वाचन क्षेत्रों का माइक्रो स्तर पर डाटा तैयार करने, राज्यव्यापी यात्राओं और जनसभाओं का आयोजन करने, उम्मीदवारों और निर्वाचन क्षेत्र स्तर की चुनाव समितियों का समर्थन करने, विरोधियों को प्रलोभन और दूसरे तरी कों से पार्टी में शामिल करने, प्रधानमंत्री से लेकर स्थानीय प्रभावशाली नेताओं की तरह सभाओं का आयोजन करने, गाडियों का बंदोबस्त करने, स्टार प्रचारकों के लिए हेलीकॉप्टर, जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं के लिए कारों और मोटरसाइकिलों के लिए ईंधन से लेकर जनसभाओं तक लोगों को लाने के लिए बसों और कारों का बंदोबस्त करने, प्रचार सामग्री का प्रकाशन और फिर प्रचार सामग्री । विज्ञापन पट से लेकर ऍम प्रत्येक गांव, कस्बे और नगर में पहुंचाने और समाचार पत्रों और टेलीविजन चैनलों में विज्ञापन देने आदि के लिए धन की आवश्यकता होती है । राजनीति में वित्तपोषण के बारे में खोज करना सबसे अधिक दुर्गु कामों में से एक है । दलों और नेताओं ने अपनी सबसे अंदरूनी राजनीतिक रणनीति का खुलासा किया परंतु संसाधन जुटाने के बारे में सवाल आने पर चुप्पी साध लेते हैं क्योंकि रिश्तों को बचाए रखना जरूरी होता है और अनुचित और गैरकानूनी कारोबारों को छुपाना होता है । ये भारत में अनोखा नहीं है । राजनीतिक वैज्ञानिक देवेश कपूर और मिलन वैष्णो राजनीतिक वित्तपोषण के बारे में आने वाले नए खंड में अपने परिचय में लिखते हैं, कम विकसित देशों, कम जवाबदेही, कमजोर अथवा आंशिक पारदर्शिता और सार्वजनिक घोषणा करने वाले मानदंडो और कानूनों को लागू करने की प्रक्रिया का अभाव ऐसा मार्क उपलब्ध कराते हैं । इसके जरिए बगैर हिसाब वाले धन का प्रभाव हो सकता है । फिर भी कालेधन के प्रवाह के बारे में अस्पष्ट पर भाषा के कारण हम इसके आकार और तरीके के बारे में बहुत ही कम जानते हैं । वो इस तथ्य को इंगित करते हुए कहते हैं, अकेले भारत में उन्नीस सौ से ही अर्थव्यवस्था और मतदाताओं के आकार में प्रति हुई है । जीत का अंतर घटने के कारण अब चुनाव बहुत अधिक प्रतिस्पर्धी हो गए और स्थानीय शासन के स्तर पर निर्वाचित पदों की संख्या बढकर तीस लाख तक हो गई है । इन सपने खर्च में इजाफा किया है मैंने भाजपा के दर्जनों नेताओं, राष्ट्रीय पदाधिकारियों से लेकर राज्य स्तर के मुख्य पदाधिकारियों और हायक उम्मीदवारों से लेकर मैदानी स्तर के कार्यकर्ताओं तक हैं । चुनावी खर्च के बारे में पूछा इनमें से अधिकांश स्पष्ट रूप से कुछ भी बताने के प्रति अनिच्छुक थे । अधिकांश के पास पूरी बहुत जानकारी जी परबातचीत कल्पना और अक्सर अनुमान के इर्द गिर्द ही घूमती रही था । मैं जो कुछ जानकारी जुटा सका वो अधूरी तस्वीर भारतीय राजनीति का सबसे अधिक अंधकार में और कडी सुरक्षा वाला गोपनीय पहलू हैं । उत्तर प्रदेश के दो हजार सत्रह के चुनावों पर भाजपा द्वारा खर्च की गई राशि के बारे में मुझे कम से कम सोलह करोड रुपये से लेकर ज्यादा से ज्यादा बारह सौ से पंद्रह सौ करोड रुपये का आंकडा दिया गया । यहाँ पर ये बताना भी महत्वपूर्ण है । स्वतंत्र रूप से इन आंकडों की पुष्टि करने का कोई तरीका नहीं है । पार्टी ने इस तरह से धन जुटाया इसके लिए पहला तो नीचे से ऊपर तक संसाधन जुटाना था । इसका मतलब ये हुआ कि निर्वाचन क्षेत्र के स्तर पर ही प्रत्याशियों के आर्थिक रूप से मजबूत होने की अपेक्षा की गई ताकि वे अपने संसाधनों का इस्तेमाल कर सकें । ये उनकी अपनी निजी संपदा के रूप में हो सकता है या फिर उन्हें वित्तीय मदद के लिए तैयार स्थानीय व्यापारियों का नेटवर्क हो या फिर स्थानीय उद्यमियों के साथ बेहतर रिश्ते हो । जो गाडियां जब कारों के ईंधन का खर्च दे सकें, संचालन की व्यवस्था कर सकें और अंतिम क्षणों में चुनावों में जरूरत पडने पर नकदी मुहैया करा सकें । जिला स्तर के भाजपा के एक नेता ने बताया, यदि किसी उम्मीदवार के पास अपने ही चुनाव के लिए धन एकत्र करने के संसाधन नहीं है तो वो निर्वाचित होने के लायक नहीं है । परंतु ध्यान रहे तीस सपा और बसपा में उम्मीदवारों को अपने आप ही चुनाव लडना होता है । लेकिन हमारे मामले में उम्मीदवार के खर्च किंचित सीमित रहते हैं क्योंकि संगठन तमाम खर्चों को वहन कर लेता है । उसे हमारे ऑर्डर को पैसा नहीं देना होता हूँ । उसे संघ परिवार के प्रचार हूँ और सहानुभूति रखने वालों को कुछ नहीं देना होता है । उसके प्रचार के लिए हेलीकॉप्टर से आने वाले स्टार प्रचारकों का खर्च वहन करने की पार्टी उससे अपेक्षा नहीं करती । पार्टी मुख्यालय से तमाम प्रचार सामग्री भी आती है लेकिन हाँ उसे भी चुनाव में अपना धन खर्च करना होता है । वो वित्तपोषण का दूसरा सौ राज्यस्तर के बडे कारोबारी हैं और वे कई तरह से योगदान करते हैं, नकदी देते हैं । ऐसा ठेकेदारों, बिल्डरों, सरकारी रेवडियों और भविष्य में लाइसेंस के लिए निर्भर रहने वालों के मामले में ही सही है । भविष्य में संभावित सहयोग को ध्यान में रखते हुए सेवा भी करते हैं । भाजपा के एक नेता ने लखनऊ में पार्टी कार्यालय में कहा, अक्सर लोग सिर्फ जुडना चाहते हैं और किसी प्रकार के धन की मांग भी नहीं करते । वो जानते हैं, दिल्ली में हम सत्ता में है । वो जानते हैं कि हमारे पास सांसद है और एक बार की सुगबुगाहट हो कि हम राज्य के चुनाव जीत सकते हैं तो किसी ना किसी तरह पार्टी से जुडना चाहते हैं । पहले ही हम उनसे ये कहे कि हम उन्हें कोई पैसा नहीं देंगे । पता हो सकता है कि कोई पेट्रोल पंप का मालिक हूँ जो हमारे ईंधन की आवश्यकता का ध्यान रखेगा । ऐसे ट्रांसपोर्टर हैं जो उन्होंने कार्य मुहैया करा देंगे और ऐसे कारोबारी भी हो सकते हैं । ये नहीं कि वह किराए पर हेलीकॉप्टर की व्यवस्था कर देंगे । लखनऊ के कारोबारी जो पारंपरिक भाजपा परिवार से है नहीं इस तरह के कारोबार के चरण की पुष्टि की । वो कहते हैं, उन्हें मुझसे कहने की जरूरत नहीं है । चुनाव नजदीक आते ही मैं उनके पास पांच कार्य भेज देता हूँ और राज्य स्तर के शीर्ष पदाधिकारियों को कुछ नकदी भी भिजवा देता हूँ । मेरे जैसे इस स्तर के सैकडों होंगे अगर निर्वाचन क्षेत्र और राज्य स्तर पर जुटाए गए संसाधन पार्टी के खाते में जुडते हैं । हम तो उत्तर प्रदेश के चुनावों के लिए अधिकांश संसाधन जुटाने का काम केंद्रीय स्तर पर ही हुआ था । चुनाव को मोदी और शाह दोनों के द्वारा अत्यधिक महत्व दिए जाने के कारण पार्टी के व्यापक नेटवर्क से धन जुटाने के लिए कहा गया था । केंद्र में भाजपा के मंत्रालय है वो प्रमुख राज्यों में सत्ता में है और उसके पास सांसद विधायक हैं । भारतीय राजनीति की अर्थव्यवस्था से दूर से नहीं परिचित कोई भी व्यक्ति ये मान सकता है । पार्टी ने इन सभी स्तरों पर संसाधन जुटाने के लिए अपनी सत्ता का इस्तेमाल किया होगा । परम तो इस मामले में वो सावधान और काफी हद तक कांग्रेस के कार्यकलापों से भिन्न थी । भाजपा की कार्यशैली से परिचित एक रणनीतिकार ने मुझे बताया कांग्रेस में यदि पार्टी नेतृत्व उदाहरण के लिए पचास करोड रुपए चाहे तो वो अपने प्रमुख सहायक को इस बारे में संदेश देगा । वो सहायक मंत्रियों क्या राज्यों में तीन चार मुख्यमंत्रियों से सौ सौ करोड रुपये के लिए कहेगा । इसके बाद मुख्यमंत्री स्थानीय कार्यवाहियों, ठेकेदारों, नौकरशाहों हूँ, मंत्रियों से कहेंगे और प्रतिदान की पेश करेंगे और तत्काल ही धन की व्यवस्था करेंगे । अच्छा पचास करोड रुपये प्राप्त करने के लिए पार्टी द्वारा तीन सौ करोड रुपए लिए जाएंगे । इस प्रक्रिया के दौरान नीचे स्तर तक जुडे लोग बहुत धन अर्जित कर लेंगे । भ्रष्टाचार स्पष्ट नजर आएगा और अक्सर सौदेबाजी काफी जगजाहिर हो जाएगी । भाजपा में बताते हैं और इसे वह देखते हैं तो शीर्ष पर आसीन होते हैं । वो जानते हैं क्या सरकार देने वाला वही है? तो फिर इतनी कडियों से गुजरकर क्यों जाएँ पता? पार्टी नेतृत्व ये जानता है कि किस राज्य में कौन सा मंत्रालय अवसर प्रदान करेगा और वो सीधे संबंधित कारोबारी अथवा व्यक्ति से बात करेगा । उधर जुटाते हैं, जरूरी है वो बीच से बिचौलियों को हटा देते हैं की सौदेबाजी इतनी अधिक साहिल नहीं होती है, उधर पर नियंत्रण रखते हैं और फिर सावधानी से उसका वितरण करते हैं । उत्तर प्रदेश में मोटे तौर पर यही तरीका था । उत्तर प्रदेश में एक और पेंच था नोटबंदी । इससे राजनीतिक खर्चों पर असर पडने की संभावना थी परन्तु ऐसा नहीं हुआ । राजनीतिक वित्तपोषण कर आपने खंड के अंतिम अध्याय नहीं । कपूर, वैष्णो और श्रीधरन इस बात का जिक्र करते हैं इस कदम नहीं । चुनाव के दौरान नकदी अथवा प्रलोभन देने की दूसरी सामग्री पर आश्रित रहने में बहुत अधिक कमी नजर नहीं आई । अकेले उत्तर प्रदेश में ही आदर्श आचार संहिता लागू होने के दिन से एक सौ पंद्रह करोड रुपए जब्त किए गए । ये दो हजार बारह के विधानसभा चुनाव में बरामद राशि से घूमी थी । इससे पता चलता है कि नोटबंदी के बाद जैसी अपेक्षा की जा रही थी उस तरह का नकदी का बहुत अधिक संकट नहीं था । भाजपा हो या सपा दोनों पर इसका असर कम था । सत्तारूढ दलों ने कारोबारियों से सीधे नकदी नहीं मांगी । भारत के चुनावों में नकदी केंद्र में होती है । कोई भी दल आर्थिक ताकत के बगैर चुनाव नहीं जीत सकता है । फिर भी ध्यान रखना जरूरी है कि ये सिर्फ अकेला फैसला लेने वाला एकमात्र मुख्य पहलू नहीं है । यदि ये संसाधनों का संघर्ष होता है, भाजपा दिल्ली या बिहार का चुनाव या फिर दो हजार चार के चुनाव में नहीं, हर थी । लेकिन यह संसाधन मददगार होते हैं और प्रत्येक दल को चुनाव में गंभीर दावेदार बनने के लिए एक न्यूनतम मात्रा में संसाधनों की जरूरत होती है । संगठन की तरह ही यह भी आवश्यक है । परंतु ये तत्व पर्याप्त नहीं है । अब जैसा कि उत्तर प्रदेश में स्वागत हुआ, भाजपा ने सभी स्तरों पर संसाधन जुटाने और प्रभावी तरीके से उसके इस्तेमाल की क्षमता दिखा दी है । संगठन जो भी है, अमित शाह की बदौलत है । उन्होंने सदस्यता अभियान की परिकल्पना की और तमाम उपहास के बीच इसे अंतिम नतीजे तक पहुंचाया । उन्होंने संपर्क अभियान के माध्यम से उन लोगों से संपर्क स्थापित करने के लिए कार्यकर्ताओं को तैनात किया तो सदस्य बने थे । उन्होंने कार्यकर्ताओं के लिए प्रशिक्षण, संगठानात्मक चुनाव और संगठन में सामाजिक विविधता सुनिश्चित करने की आवश्यकता को आगे बढाया । इस बारे में अगले अध्याय में और अधिक शाह ने मतदान केंद्र स्तर की समितियों को सक्रिय क्या उन्हें कार्यशील बनाया, इसकी सदस्यता की सावधानीपूर्वक निगरानी सुनिश्चित की और इसे पार्टी के तंत्र का अभिन्न हिस्सा बनाया । उन्होंने मतदाताओं से संबंधित मामलों पर स्वतंत्र रूप से जानकारी हासिल की और उसके इर्द गिर्द प्रचार और जनसंपर्क को मूर्तरूप दिया । उन्होंने उम्मीदवारों के चयन के लिए बहुत ही सावधानी भरा तरीका तैयार किया और उन्हें अपने चुनाव लडने के लिए संगठन के ठोस समर्थन और आंकडों से सुसज्जित किया और इन सब के लिए धन का पंद्रह वर्ष किया और सब दिल्ली के अशोका रोड पर स्थित पार्टी के वातानुकूलित कार्यालय में बैठने से नहीं हुआ । अगस्त दो हजार चौदह से मार्च दो हजार सत्रह के दरमियां शाह ने विधानसभा चुनावों और दो हजार उन्नीस के संघर्ष को ध्यान में रखते हुए वस्तुस्थिति को समझने, उसका प्रबंधन देखने और पार्टी इकाइयों को निर्देश देने के लिए दो बार देश में प्रत्येक राज्य का दौरा किया । उन्होंने दो सौ छियासी दिन दिल्ली से बाहर रहते हुए पांच लाख किलोमीटर की यात्रा की और इस दौरान चौंसठ दिन उत्तर प्रदेश में रहकर व्यक्तिगत रूप से राज्य में और साधारण काम किया और ऊर्जा लगाई । उत्तर प्रदेश की जीत के बाद शाह देश की पिक्चर दिन की यात्रा पर निकल गए । नरेंद्र मोदी का जनता के बीच करिश्मा और अमित शाह के अथक संठनात्मक कौशल । दोनों ने मिलकर सामाजिक समरसता के आपने अतिमहत्वाकांक्षी प्रयोग के बीच में ही नई भाजपा की आधारशिला रखी है ।

4. Samajik Samarsatta

सामाजिक समरसता उत्तर प्रदेश में मतदान से तीन दिन पहले फरवरी हो भाजपा की प्रदेश इकाई के अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य सहारनपुर जिले के गंगो निर्वाचन क्षेत्र के छोटी से मैदान में हेलीकॉप्टर से पहुंचे । केशव प्रसाद मौर्य एक पिछले समुदाय के हैं । वो संघ की पैदावार हैं और उत्तर प्रदेश विधानसभा का दो हजार बारह का चुनाव लडने से पहले और विश्व हिंदू परिषद के पदाधिकारी थे । दो हजार चौदह के लोकसभा चुनाव में मोदी हवा पर सवार थे और फूलपुर संसदीय क्षेत्र से सांसद चुने गए जो कभी पंडित जवाहरलाल नेहरू का निर्वाचन क्षेत्र हुआ करता था । भाजपा ने दो हजार सोलह के प्रारंभ में उन्हें पार्टी की उत्तर प्रदेश इकाई का अध्यक्ष बनाया । निश्चित ही ऐसा अन्य पिछडी जातियों को लुभाने के इरादे से ही किया गया था । जैसे ही हेलीकॉप्टर से बाहर निकले भीड का एक समूह उनका स्वागत करने के लिए मैदान की और लडका मौर्य एक एसयूवी उत्तर भारत के सभी राजनीतिकों का एक ट्रेडमार्क में सवार होकर जनसभा स्थल की और रवाना हो गए । उनकी गाडी के पीछे चल रही कार में करीब एक दर्जन लोग सवार थे । ओम पाल सिंह सैनी ने अपना परिचय अखिल भारतीय सैनी समाज के अब तक के रूप में दिया । उन्होंने बडे गर्व के साथ कहा, ये सैनी बहुल इलाका है । उत्तर प्रदेश में सैनी अन्य पिछडे वर्गों की श्रेणी में आते हैं और मैं खुद को । एक बडे सैनी, कश्यप, कुशवाहा, मौर्य इससे भाजपा नेता आते हैं, समाज के हिस्से के रूप में देखते हैं । उन्होंने कहा, इस बार भाजपा ने हमें सम्मान दिया है । पूरा समाजपार्टी के साथ है क्योंकि मौर्या जी मुख्यमंत्री बनेंगे । वो कहते हैं, हमारा समाज पहले भी कई दलों के बीच झूलता रहा है परन्तु दो हजार चौदह में चुनावों में पूरी तरह नरेंद्र मोदी के साथ चला गया । मौर्या जी को दो हजार सोलह में पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने के बाद से ही समाज नहीं कमाल के साथ ही रहने का फैसला किया है । चैनी कहते हैं, भाजपा हमारी पार्टी है । प्रधानमंत्री हमारे हैं । प्रदेश अध्यक्ष हमारे हैं । जिलाध्यक्ष हमारे हैं, अंतर रहा । अब हमारी भी राजनीतिक आवास है । हालांकि ये अन कहाँ छोड दिया गया तो हमारे का तात्पर्य था कि प्रधानमंत्री भी पिछडे समुदाय के ही हैं । मौर्य अपने व्यापक जातीय समुदाय से थे जबकि जिलाध्यक्ष कश्यप था । तीन छोटे किसान भी इस जनसभा में पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष को सुनने आए थे । इनमें से एक राम सिंह कोचर था । वो बताता है कि हमारे परिवार की राजनीतिक संबद्धता हूँ । पूर्व प्रधानमंत्री और उत्तर भारत के बहुत ही सम्मानित नेता चौधरी चरण सिंह इन्होंने पिछडी जातियों और मुसलमानों का उनके किसान होने के आधार पर गठबंधन तैयार किया था के साथ रही है को बताता है । मेरे पिता जी चरण सिंह के साथ में थे । मैं रामजन्मभूमि आंदोलन की और आकर्षित हुआ और भारतीय जनता पार्टी ने आ गया । कल्याण सिंह ने जब भाजपा छोडी तो मैंने दूसरे दलों को वोट दिया परंतु दो हजार चौदह में पार्टी में पुणे लौटा । कल्याण सिंह उन्नीस सौ नब्बे के दशक नहीं प्रदेश के भारतीय जनता पार्टी के मुख्यमंत्री थे । लोड समाज के कल्याण से अन्य पिछडे वर्गों को पार्टी के साथ लाने में कामयाब रहे थे लेकिन बहुत ही तेजी से उन्हें पार्टी में हाशिये पर डाल दिया गया और अंततः दो हजार नौ में उन्होंने पार्टी छोड देते हैं । हालांकि बाद में वो पार्टी में लौट आए और दो हजार चौदह में उन्होंने मोदी के लिए प्रचार भी किया । रामसिंह कहते हैं, कांग्रेस और समाजवादी पार्टी दोनों ही सिर्फ एक समुदाय की राजनीति करते हैं, सांप्रदायिक हैं । कांग्रेस सिर्फ एक ही समुदाय को देख सकती है । बसपा भी सिर्फ एक ही समुदाय को देखती है । देखिए ना मायावती हमेशा यही कहती रहती है कि मैंने सबके मन में टिकट दिए हैं तो हम सभी सपा के बारे में जानते ही हैं । उसने अखलाक के परिवार यानी गोमांस के सेवन के आरोप में दादरी में मारे गए व्यक्ति को एक करोड रुपये दिए । मुस्लिम शब्द का इस्तेमाल किए बगैर ही उसने स्पष्ट कर दिया उसका आप पर रहे क्या है सिंगल कहते हैं भाजपा एक राष्ट्रवादी पार्टी है परन्तु क्या कांग्रेस की राष्ट्रवादी पार्टी थी? जो भी हो, यही वो पार्टी है जिसने भारत को आजादी दिलाई । कांग्रेस एक राष्ट्रीय पार्टी है पर उनकी उसकी सोच राष्ट्रवादी नहीं है । ओम प्रकाश सैनी अपने समुदाय को भाजपा द्वारा दिए गए प्रतिनिधित्व और सम्मान से रोमांचित रामसिंह सांप्रदायिकता की बजाय राष्ट्रवादी नजरिए को लेकर आकर्षित हुआ । इन दोनों को एक साथ मिला दिया जाए तो ये भावनाएं उत्तर प्रदेश के चुनावों का नक्शा बदलने वाली होंगी । पार्टी के शीर्ष रणनीतिकारों द्वारा तैयार की गई योजना जमीन से आ रही आवाजों के साथ एकदम सटीक बैठती थी जिनके तीन घटक थे । पहला, पार्टी के संगठनात्मक ढांचे में बदलाव करके इसे और अधिक समावेशी बनाना । दूसरा इसके प्रचार और इसके संदेश ऑपरेशन के तरीके को नया कलेवर देना ताकि पिछडी जातियों को उत्पीडन और मुक्ति दोनों का भाव महसूस हो । दूसरा था भाजपा के जबरदस्त प्रभुत्व के बावजूद इन समुदायों के बीच आधार वाले दलों के साथ गठबंधन करना । नरेंद्र मोदी ने संपन्न वर्ग का समर्थन बनाए रखते हुए स्वयं को गरीबों का नेता बना लिया था । पर्दे के पीछे अमित शाह संपन्न वर्ग का समर्थन बरकरार रखते हुए धीरे धीरे भाजपा को वंचित जातियों की पार्टी के रूप में बदलने के काम में जुटे थे । इस प्रक्रिया में भाजपा अपेक्षाकृत अलग हिंदू पार्टी बने रहने की जगह समय के हिंदू पार्टी बनने की और बढ रही थी । एक विशेष समायोजन में सबसे अधिक राजनीतिक प्रभुत्व वाली के जाती क्योंकि जरूरी नहीं कि सबसे अधिक प्रभुत्व वाली सामाजिक जाती का पर्याय हूँ की पहचान करके काम प्रभुत्व वाली जाती को उनके खिलाफ सक्रिय करके जहाँ एक पे जोर सामाजिक गठबंधन को खडा करने का ताना बाना पुल रहे हैं । सामाजिक समरसता में इस उल्लेखनीय प्रयोग में भाजपा की राजनीतिक सफलता का रहस्य छिपा है और जब की व्यापक स्तर पर सामाजिक गठबंधन बनाने में विफल हो गया । जब से सिर्फ संपन्न लोगों की पार्टी के रूप में देखा जाने लगा तब चरमरा गया । पार्टी अध्यक्ष का पद ग्रहण करने के बाद अमित शाह को महाराष्ट्र और हरियाणा में विधानसभा चुनावों की चुनौती का सामना करना पडा । मजबूत संगठन के अभाव में उन्हें अपना गलत सही करना था । उन्होंने सम्पन्न जातियों के मुकाबले के लिए राजनीतिक रणनीति तैयार करने पर ध्यान केंद्रित किया । पहली नजर में ये पहल प्रतिकूल नजर आती होगी क्योंकि ये पार्टी उन जातियों से ही जुडी रही है, सामाजिक ढांचे से लाभान्वित हुए और हमेशा ही शिष्टता के मामले में ऊपर रहे । परंतु यहाँ पार्टी ने बहुत ही चतुराई से सामाजिक वरिष्ठता के मामले में पारंपरिक रूप से प्रभुत्व वाली चाहती हूँ और राजनीतिक रूप से विशेषाधिकार प्राप्त जातियों के बीच विभेद किया था । उसका गणित बहुत साधारण है । सभी भारतीय राज्य अपनी संरचना में बहुलतावादी है । मंडल राजनीति के उदय, अन्य पिछडे वर्गों की दावेदारी और उनकी गोलबंदी, खेतिहर पृष्ठभूमि से आने वाली इन जातियों की आबादी बडी होने और सामाजिक रूप से प्रभुत्वशाली होने की वजह से वो राजनीतिक रूप से भी प्रभुत्वशाली हो गई । परंतु इसकी वजह से पारंपरिक रूप से ताकतवार है और ज्यादा हाशिया वाली । दोनों ही तरह की जातियां अलग थलग महसूस कर रही थी तथा इसकी तरकीब इन जातियों को सक्रिय करना और उन वर्चस्व वाली जातियों के विरुद्ध गठजोड तैयार करना है जो मंडल के बाद के युग में अधिकतर बडी आबादी वाली मध्यम जातियां है । महाराष्ट्र में जहाँ राजनीतिक दृष्टि से प्रभुत्वशाली जाती मराठा है, भाजपा ने उन्नीस सौ नब्बे ऐसे ही अन्य पिछडा वर्ग समर्थक रणनीति अपना रखी थी । इसमें पिछडी जातियों के नेताओं को ही आगे बढाया था । इसके साथ ही शिवसेना से गठबंधन और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण तेज होने की वजह से वो में सत्ता में आई थी लेकिन पंद्रह साल तक वह सत्ता से बाहर विपक्ष में रही थी । दो हजार चौदह के लोकसभा चुनाव में मोदी की अपील की वजह से पार्टी अडतालीस सीटों में से बयालीस पर विजय हासिल करके बडी सफलता के साथ लाते हैं परन्तु विधानसभा चुनावों में और अधिक सावधानीपूर्वक सामाजिक समरसता की जरूरत थी । भाजपा ने सवाल जातियों, अन्य पिछडे वर्गों और कुछ हद तक दलितों के साथ मिलकर गठबंधन तैयार किया । भाजपा को मराठों के मतों का भी एक हिस्सा मिला चुकी है । राज्य की आबादी में वे तीस प्रतिशत से अधिक हैं इसलिए पूरी तरह उन्हें बेदखल करना आसान नहीं है । हम तो इसे असली ताकत गैर मराठा जातियों से मिली क्योंकि राज्य में दो सौ से अधिक अन्य पिछडे वर्गों के समूह है और इनमें से सबसे बडे समूह में पांच प्रतिशत से कम आबादी है इसलिए जमीनी स्तर पर प्रबंधन की आवश्यकता थी । जनादेश के स्वरूप को भाजपा ने मुख्यमंत्री के लिए चयन से ही व्यक्त कर दिया था । पार्टी ने इसके लिए भ्रमण देवेंद्र फडणवीस की नियुक्ति की । उन्हें स्थित राजनीतिक वैज्ञानिक सुहास पलसीकर कहते हैं कि भाजपा ने पैंतीस प्रतिशत मतों की हिस्सेदारी के साथ शहरों की सौ सीटों में से तिरेपन पर विजय प्राप्त की थी । चुनाव बाद के सर्वे के अनुसार उसे सवर्ण जातियों के प्रतिशत और अन्य पिछडी जातियों के अडतीस प्रतिशत मत भी मिले थे । दो हजार चौदह के चुनाव के नतीजों ने मराठा अभिजात्य वर्ग को पूरी दृढता के साथ राज्य की सत्ता से बाहर कर दिया । हरियाणा विधानसभा चुनाव में भी भाजपा ने ऐसा ही कुछ किया इसके बारे में सोचा भी नहीं जा सकता था । जाट समुदाय के प्रभुत्व वाले इस राज्य में भाजपा ने गैर जाट समुदायों का गठबंधन बनाया । इसका मतलब ये हुआ कि भाजपा नहीं समझ जातियों यादव, गुज्जर और सैनी जैसे अन्य पिछडे वर्गों और दलितों को एकजुट किया । इसने पूरी तरह से जाटों को छोडा नहीं था और राज्य में इस समुदाय के वरिष्ठ नेता चौधरी वीरेंद्र सिंह को केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किया परंतु उसका ध्यान कम प्रभुत्व वाली जातियों पर था । उत्तरी, पूर्वी और दक्षिणी हरियाणा में भाजपा का प्रदर्शन अच्छा था लेकिन राज्य के जाट बहुल पश्चिमी क्षेत्र में तो दूसरे स्थान पर रही थी । सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज के चुनाव बाद सर्वेक्षण से पता चलता है कि भाजपा को राज्य में भ्रामरों के प्रतिशत सवर्ण जातियों में से पचपन प्रतिशत और अन्य पिछडी जातियों के चालीस प्रतिशत मत मिले । में नब्बे सदस्यीय विधानसभा चुनावों में महज चार सीट जीतने वाली पार्टी ने इस बार सैंतालीस सीटों पर कब्जा कर लिया और अपने दम पर राज्य में पहली बार सरकार का गठन किया । यहाँ भी उसने गैर जांच मनोहरलाल खट्टर को मुख्यमंत्री बनाया । अमित शाह अपने सामाजिक गणित को हाल कर रहे थे लेकिन अगले साल बिहार में उन्हें एक जटिल सामाजिक जमीन पर उतरना था जो उनके लिए सबसे बडी चुनौती थी और जिसमें वे नाकाम होने वाले थे । राजनीतिक दृष्टि से संपन्न वर्ग से मुकाबला करने के लिए राजनीतिक गठबंधन तैयार करने की रणनीति कम आबादी की वजह से राजनीतिक रूप से कमजोर लेकिन सामाजिक दृष्टि से प्रभुत्वशाली जैसे सवर्ण जातियां और सामाजिक दृष्टि से कमजोर और राजनीतिक रूप से अलग थलग हो परन्तु पर्याप्त संख्या जैसे पिछडा वर्ग और दलित वालों के बीच एक गठबंधन पर टिकी हुई थी । लालू प्रसाद ऐसे नेता हैं जिनकी राजनीतिक दृष्टि एकदम स्पष्ट है । उन्नीस सौ नब्बे से ही जाति का कार्ड बहुत ही निर्ममता के साथ खेल रहे हैं और उन्होंने लंबे समय तक राज्य सत्ता की तमाम सुविधाओं पर एकाधिकार कायम रखने वाली सवर्ण जातियों के खिलाफ राजनीतिक वातावरण् बनाया, पिछडों को सशक्त बनाया और उन्हें राजनीति में आवास प्रदान की । उनका खेल उस समय खत्म हो गया जब पिछडी जातियों के उनके द्वारा बनाए गठबंधन में दरार आ गई । यादव प्रभुत्व से नाराज नीतीश कुमार ने अति पिछडे समुदायों का नेतृत्व किया और उन्होंने सवर्ण जातियों के जनाधार वाली भाजपा के साथ गठबंधन कर लिया । दो हजार पंद्रह में नीतीश और लालू प्रसाद एक बार फिर से साथ थे । लालू को भी यह अहसास हो गया था । सत्ता तक पहुंचने का रास्ता पिछडों के गठबंधन का वही मूल फार्मूला है जिसने में उन्हें सत्ता तक पहुंचाया था । यदि ये अगडे पिछडे के बीच चुनाव हुआ भाजपा के जीतने का कोई सवाल ही नहीं है क्योंकि उसी समय जातियों के बीच अपने जनाधार तक ही सीमित रहना पडेगा नहीं । हम को जाति कार्ड का इस्तेमाल करते हुए लालू प्रसाद ने अकेले ही दम पर बिहार के चुनावों को अगडी जातियों बनाम अन्य पिछडी जातियों के बीच चुनाव की शक्ल दे दी थी । इसमें उनके सामने सबसे बडे सहयोगी आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत थे । ऑर्गेनाइजर के संपादक प्रफुल्ल केतकर को दिए एक साक्षात्कार में भागवत ने आरक्षण के राजनीतिकरण की आलोचना करते हुए इसकी समीक्षा के लिए एक समिति गठित करने की वकालत की थी । इस इंटरव्यू के बारे में अगले अध्याय में विस्तार से बात की गई है । उन्होंने सुझाव दिया था, ये एक स्वायत्तता प्राप्त आयोग इस पर अमल कर सकता है । लालू प्रसाद यादव को इसमें राजनीतिक लाभ की गंध मिल गई और तत्काल उन्होंने घोषणा की यदि भाजपा सत्ता में आई तो आरक्षण खत्म कर देगी । स्वास्थ्य ठीक नहीं होने के बावजूद लालू ने रोजाना छह से सात जनसभाएं गी । उसमें नौ बजे पटना में अपने घर से निकलते और तेर शाम लौटते तो उनके हाथ में आरएसएस के द्वितीय सरसंचालक एम एस गोलवल्कर की बंच ऑफ थॉट्स की प्रति होती है । उन्होंने इस किताब से अंश उद्धृत करते हुए कहा, जिससे पता चलता है कि आरएसएस हमेशा से ही आरक्षण विरोधी रहा है, राघवपुर के धबौली गांव में लालू प्रसाद के दूसरे पुत्र और संभावित उत्तराधिकारी तेजस्वी यादव आपने पहले चुनाव में प्रचार कर रहे थे । उन्होंने तेजी से चलते हुए महिलाओं से आशीर्वाद मांगा और आदमियों से हाथ मिलाया । उन्होंने आत्मविश्वास के साथ कहा, ये चुनाव उनके पक्ष में आ चुका है । यहाँ बदला था । उन्होंने कहा, आरएसएस प्रमुख की टिप्पणियों ने वास्तव में खेल ही बदल दिया है । अन्य पिछडी जातियां एकजुट हो गई हैं । भाजपा शहरों में रहने वालों के बीच अंतिम प्रयास कर रही है परन्तु मैं समझता हूँ यह वहाँ भी जीतेंगे । भाजपा सोचती है कि दो हजार चौदह के चुनावों की तरह ही विभिन्न जातियों के लोग मोदी के लिए वोट देंगे और अब तो अब ये नहीं होगा । आधुनिक शिक्षा के रूबरू हो चुका और बीस साल से अधिक आयु का ये युवा नेता सभी पक्षों द्वारा राजनीति के लिए जातियों के इस्तेमाल के बारे में क्या सोचता है ये तो हर जगह है । अमेरिका में क्या ये श्वेतों और कानों को लेकर रही हैं? जातियां तो हमारे समाज का वही तरीका है, सदियों से बनाया गया है और ये लंबे समय तक मुद्दा रहेगा । ये मायने रखता है । राष्ट्रीय जनता दल पहले से ही सामाजिक आर्थिक जाति जनगणना के जाती संबंधित आंकडों की मांग करके जातियों के इर्द गिर्द अपना प्रचार केंद्र कर रहा था । सामाजिक ऍम जाति जनगणना का काम कांग्रेस के कार्यकाल में शुरू किया गया था । इसका भाजपा के सरकार के अंतर्गत जारी किया गया परंतु जातियों से संबंधित विवरण रोक लिया गया था । लालू प्रसाद का तर्क है कि ये पिछडों और दलितों की स्थिति, उनकी संपत्ति, उनकी आमदनी और शिक्षा का स्तर और उनके रोजगार की स्थिति को सही जानकारी देगा । मैं कर्जे आरएसएस आरक्षण खत्म करने की बात कर रहा है और हम आबादी के आधार पर इसे बढाने की बात कर रहे हैं कि संदेश एकदम सही ठिकाने पर पहुंचा । भाजपा जानती थी कि हालांकि सवर्ण जातियां व्यापक रूप से पार्टी के साथ रहेंगे । उसे पिछडी जातियों में अपनी पैठ बनानी थी परंतु आरक्षण खत्म होने की आशंका नीचे तक पहुंच गई थी । भाजपा पशोपेश में फंस गई तो भागवत की निंदा नहीं कर सकती थी पर अब तो उसने आरएसएस प्रमुख की टिप्पणियों से पूरी बना ली । उसने संघ से स्पष्टीकरण भी जारी कराया और प्रधानमंत्री ने भी आरक्षण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई लेकिन कुछ भी काम नहीं आया । डेढ साल बाद भाजपा के एक प्रमुख नेता नहीं तो बिहार चुनाव प्रचार में काफी सक्रिय थे । स्वीकार किया भागवत जी के बयान ने जितना हमने सोचा था उससे कहीं हमें अधिक नुकसान पहुंचाया । लालू प्रसाद के अलावा प्रशांत किशोर की टीम ने भी इस संदेश को नीचे तक पहुंचाया । उन्होंने पर्चे छापे और इसमें हमें बचाव की स्थिति में पहुंचा दिया । पिछडों में अपनी पैठ गहरी करने के लिए हमने जितना भी काम किया था सारा चौपट हो गया । इस चुनाव में नीतीश लालू गठबंधन के लिए किशोर मुख्य चुनाव रणनीतिकार थे । उन्होंने दो हजार बारह के गुजरात चुनाव और दो हजार चौदह के लोकसभा चुनाव में मोदी के साथ काम किया था । हालांकि पार्टी के भीतर एक अलग विचार मंच था । इसका मानना था कि मतों की भागीदारी से संकेत मिलता है कि पार्टी को पिछडों का वोट भी मिला था और सिर्फ महागठबन्धन का गण था जिसने उसे सत्ता में पहुंचा दिया । लेकिन ये सिर्फ संघ ही नहीं था । किसी नेता ने ये भी स्वीकार किया कि भाजपा ने भी जातीय समीकरणों विषेशकर टिकटों के वितरण के मामले में सही तरीके से प्रबंधन नहीं किया । पहली सूची में हमने सवर्ण जातियों को बहुत अधिक टिकट दे दिए थे । इसमें हमें अगडों की पार्टी के रूप में पेश करने का लालू का काम और अधिक आसान बना दिया था । इसके बाद हमने करीब तीस मिनट यादव को ये सोच कर दिए उनके यादव वोट पडेंगे, ये मूर्खतापूर्ण था । ये बातें नहीं और हमने वो टिकट बेकार कर दिए और दूसरे समुदायों को भी नाराज कर लिया । भाजपा के विद्रोही उम्मीदवार भी सत्तर से अधिक सीटों पर चुनाव मैदान में थे । भाजपा पिछडों और दलितों के बीच अपने समर्थन के अभाव को देखते हुए गठबंधन बनाने के प्रति बहुत सावधानी पड रही थी । उसने अपने राजग सहयोगी रामविलास पासवान और उपेंद्र कुशवाहा ये सोचकर कि वह समुचित कोई भी वोट दिलाएंगे और कुर्मी कोई भी गठबंधन को तोडेंगे जिसमें नीतीश को सत्ता तक पहुंचाया था, के साथ रिश्ता जोडा । उन्होंने मुख्यमंत्री पद से हटाए गए जीतन राम मांझी से भी तालमेल किया और उम्मीद की कि वह नीतीश कुमार के महादलित वोट बैंक में सेंध लगाएंगे तथा राजू पर तो ये गन्ना ठीक लगती थी तो इन गठबंधनों ने बहुत बडी कीमत परसोली एक और भाजपा नेता नहीं तो पासवान, कुशवाहा और मांझी के सहयोगी होने की वजह से अपना नाम जाहिर नहीं करना चाहते हैं हूँ । हमारा गठबंधन पूरी तरह असफल रहा । हम ने इन दलों को अस्सी सीटें दी । उनका इतना सीमित जनाधार था । यह बरबादी थी । इनमें से अधिकांश ने टिकट देश दिए और अपनी जाति पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया । किस उसके एकदम विपरीत था जो नीतीश लालू कांग्रेस को मिलाकर बने महागठबन्धन ने किया था । अपेक्षाओं के विपरीत टिकट वितरण बहुत ही सहजता से हुआ था । एक बार फिर प्रशांत किशोर नहीं जमीनी हकीकत का आकलन ये पता लगाने में अहम भूमिका निभाई किस निर्वाचन क्षेत्र में कौन सा दल और उम्मीदवार सबसे अच्छी स्थिति में होगा और वो अनौपचारिक रूप से नीतीश और लालू प्रसाद के बीच सहज साझेदारी सुनिश्चित करने के लिए मध्यस्थता की भूमिका निभा रहे थे । भाजपा नेता बताते हैं लालू प्रसाद यादव प्रभुत्व वाली सीट मिली । कांग्रेस को सवर्ण जातियों वाली सीटें दी गई जबकि नीतीश ने अति पिछडी जाति की सीटे ली और उनके मत एक दूसरे के लिए हस्तांतरित हो गए । महागठबन्धन ने करीब पचपन प्रतिशत टिकट अन्य पिछडी जातियों और पंद्रह प्रतिशत दलितों को दिए थे । नरेंद्र मोदी के पिछडी जाति का होने की वजह से दो हजार चौदह के लोकसभा चुनावों में पिछले समुदायों का भाजपा को समर्थन मिल गया था । यद्यपि एक साल के भीतर ही मोदी के पिछडा होने की छवि और शाह का प्रबंधन और गठबंधन कोई काम नहीं आया । भाजपा एक बार फिर सामाजिक रूप से संपन्न सवर्ण जातियों की पार्टी के रूप में देखे जाने लगी । ऐसी पार्टी तो आरक्षण के जरिए तरक्की करने के वंचितों और हाशिये के लोगों के दावों और अपेक्षाओं को कबूल करने को तैयार नहीं थी । आपने संपर्क बिहार में शासन करने की भाजपा की लाल था, अधूरी ही रहेगी क्योंकि वो बिहार की सृजनता को और लक्षित करने में असमर्थ थी । इसकी सामाजिक इंजीनियरिंग औंधेमुंह गिर गई । बिहार के ताजा नतीजों से मिले सबका के बाद भाजपा अब उत्तर प्रदेश के चुनावों की तैयारियों में जुट गई । इसके पास गठबंधन के लिए नमूना पहले से ही था । दो हजार चौदह में अमित शाह ने साठ प्रतिशत का फार्मूला तैयार किया था । फॉरमूला हाँ, क्या राज्यसभा के सदस्य भूपेंद्र यादव पार्टी के महासचिव और अमित शाह के भरोसेमंद सहयोगी हैं? बोलता हूँ राजस्थान के रहने वाले भूपेंद्र यादव उत्तर भारत की जातीय समीकरणों से परिचित थे और वो बिहार के प्रभारी थे । पेशे से वकील यादव को उत्तर प्रदेश में प्रचार के दौरान परिवर्तन यात्रा और जनता तक पहुंचने के काम में संगठन की मदद करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी । चुनाव के बाद उन्हें पिछडे वर्गों के नए आयोग के गठन संबंधी संसदीय समिति की अध्यक्षता करनी थी । उन्हें दो हजार सत्रह के अंत में गुजरात में होने वाले चुनाव के मद्देनजर राज्य का प्रभारी बनाए जाने वाला था की उनके प्रति मोदी और शाह के भरोसे को दर्शाता है । मार्च महीने की एक शाम यादव चुनाव प्रचार से लौट रहे अमित शाह को लेने पार्टी के लखनऊ कार्यालय से हवाई अड्डे जा रहे थे । हवाई अड्डे तक की पैंतालीस मिनट से अधिक की यात्रा के दौरान उन्होंने साठ प्रतिशत के फॉर्मूले की रूपरेखा को दोहराया जो चुनाव प्रबंधन के मामले में अमित शाह स्कूल का ट्रेडमार्क था । यादव बताते हैं, देखिए इस चुनाव में मुसलमान तो बीस प्रतिशत है । वो हमें वोट नहीं देंगे । यादव जो करीब दस प्रतिशत है, मोटे तौर पर समाजवादी पार्टी के प्रति ही निष्ठावान रहेंगे, जाता हूँ तो दस प्रतिशत से थोडा अधिक हैं । बसपा के प्रति वफादार बने रहेंगे । लुभाने के लिए हमारे पास बचपन से साठ प्रतिशत मतदाता ही बचते हैं । हम इन्हें ही अपना लक्ष्य बना रहे हैं । इसका मतलब पारंपरिक सवर्ण जातियों का जनाधार है । इसका मतलब है कि पिछले समुदाय जिनमें सैकडों छोटी और बडी जातियां हैं जो अन्य पिछडे वर्गों के दायरे में आती हैं परंतु उन्हें सत्ता में उस तरह की भागीदारी नहीं मिली जो यादव को मिली । इसका मतलब है उत्तर प्रदेश में साठ दलित उपजातियों में से पचास जरूरी नहीं कि जाटों की तरह सशक्त हुई हूँ परन्तु ऐसे क्षेत्रों की पहचान करना आसान काम था लेकिन उन्हें अपने साथ लाना असल चुनौती दो हजार चौदह में इसका रास्ता बनाया । अन्य पिछडा वर्ग बडी संख्या में भाजपा के पास लौट आया परंतु पार्टी नेतृत्व जानता था इस सफलता को बनाये रखने के लिए संगठन की संरचना में नीचे तक बदलाव करना होगा । यही वो मुकाम था जिसमें अमित शाह और उनकी टीम द्वारा संगठन में किए गए कार्यों को अपनी भूमिका निभानी थी । सुनील बंसल को जब संगठन का महासचिव बनाकर उत्तर प्रदेश भेजा गया तो उन्होंने प्रदेश में पार्टी के भीतर के जातीय समीकरणों और संरचना का फटाफट सर्वे कराया और वो जानकार हतप्रद रह गए । दो हजार चौदह में राज्य में लखनऊ से लेकर जिला स्तर तक पार्टी में सिर्फ सात प्रतिशत अन्य पिछडे वर्ग और तीन प्रतिशत दलित समुदाय के पदाधिकारी थे । इसका मतलब सास था । राज्य की आबादी में करीब सत्तर प्रतिशत इन समूहों से थे । लेकिन भाजपा के संगठन में उन्हें सिर्फ दस प्रतिशत ही स्थान मिला हुआ था । संगठन में ग्रामीणों, ठाकुर और बनियों का वर्चस्व था । ये दर्शाता था लखनऊ में भाजपा में किस्टो प्रभुत्व है । इसमें कलराज मिश्र, राजनाथ सिंह, लक्ष्मीकांत वाजपेयी और सूर्य प्रताप शाही थे जिनके पास पिछले दस साल से पार्टी की बागडोर थी । ये नेता संगठन में विभिन्न स्तरों पर नियुक्तियों के लिए अपनी जाती की और मुखातिब हुए और उन्हें ही आगे बढाया । भाजपा के नए नेतृत्व के पास ऐसी टीम थी । एक ऐसी टीम दो बार बार नतीजे देने में विफल रही । ऐसी टीम जिसमें राज्य की सामाजिक विविधता नहीं लगती थी, वो जानती थी की पार्टी की विफलता की यही वजह है । फिर भी हमेशा ही पार्टी के प्रति निष्ठावान रहे । इन लोगों को पूरी तरह अलग अलग किए बगैर ही उसे इसमें बदलाव करना था । इसे ठीक करने का उचित समय दो हजार चौदह के अंत और दो हजार पंद्रह के शुरू में चलाया गया सदस्यता अभियान के दौरान ही था । अन्य पिछडे वर्गों और दलित समुदाय के सात सौ अस्सी कार्यकर्ताओं को नए सदस्य बनाने के लिए उन गांवों और कस्बों में भेजा गया जहां उनकी अपनी जाति का प्रभुत्व था । इसका परिणाम यह हुआ तीन समुदायों के पंद्रह लाख नए सदस्यों का पार्टी में पंजीकरण हुआ तो पार्टी में असली बदलाव दो हजार पंद्रह में संगठन में हुए फेरबदल से आया । बंसल ने शाह से पूछा कि क्या वह पार्टी में अन्य पिछडे वर्गों और दलितों का प्रतिनिधित्व को बढा सकते हैं । चाहने जवाब दिया, बात ठीक है पर लोग नाराज होंगे । उन्होंने अभी एक रास्ता निकाला, मौजूदा व्यवस्था में हिस्सेदारी देने की बजाय पार्टी पदाधिकारियों की संख्या बढा सकती है । चाहने से हरी झंडी दे दी । इसमें पार्टी में हर स्तर पर विशेष कर अन्य पिछडे वर्गों और दलितों के लिए पद बढाने का लाइसेंस दे दिया । प्रत्येक जिले में बारह नए पदाधिकारी जोडे गए । राज्य की कार्य समिति में एक सौ नई सदस्य शामिल किए गए तो पहले से ही पदाधिकारी थे । उन्हें नहीं हटाया गया जिसने पार्टी में असंतोष काम करने में मदद थी । दो हजार पंद्रह के अंत पार्टी में नए अन्य पिछडे वर्गों और दलितों के एक हजार नेताओं का फूल था । अब ये लोग भी खुद को पार्टी संगठन का हिस्सा महसूस करने लगे । पार्टी में जगह मिली और उनकी वर्ष को मान्यता मिली । पार्टी की संरचना में औपचारिक रूप से इस के नजर आने की भी जरूरत थी । संगठनात्मक चुनावों के दौरान भाजपा ने धीरे धीरे उन्हें नेतृत्व करने की बागडोर सौंपी और पार्टी में समाहित करने तथा समुचित प्रतिनिधित्व की उनकी अपेक्षाओं को संतुष्ट किया । अब पचहत्तर जिला अध्यक्षों में से चौंतीस अन्य पिछडी जातियों और तीन अनुसूचित जाति के थे । यदि दो हजार चौदह में इन समूहों का संगठन में दस प्रतिशत प्रतिनिधित्व था, दो साल के भीतर ही उनकी हिस्सेदारी तीस फीसदी हो गई थी । भाजपा ने बेहद खामोशी के साथ लगभग अदृश्य तरीके से बदलाव किया और इसकी विशेषता का अनुमान इस तथ्य से ही लगाया जा सकता है कि मौजूदा नेतृत्व के खिलाफ सीधे सीधे विद्रोह किए बगैर ही ये हुआ था । क्या इससे सवर्ण जातियां परेशान हुई? बंसल जवाब देते हैं, देखिए, अगर अन्य पिछडे वर्ग और दलितों के नेताओं को कहीं और से लाकर बिठाया होता और जिला नेतृत्व से कहा गया होता, यह स्वीकार करो । उसका प्रतिरोध हो सकता था । परंतु याद रखिए, हमने इन्हें दो हजार पंद्रह नहीं संगठन ढांचे में शामिल कर लिया था । इस तरह अब एक साल तक वर्तमान सिला नेतृत्व के साथ काम कर चुके थे और जिला प्रमुखों के चयन की प्रक्रिया, परामर्श और आम सहमती थी । इसमें अधिक परेशानी नहीं थी । इस कवायद के अंत नहीं केशव प्रसाद मौर्य को राज्य इकाई का प्रदेश अध्यक्ष ने किया गया था । मौर्य पिछडे वर्ग के थे और हिंदुत्व के बारे में उनकी सोच सर्वविदित थी । निश्चित ही मौर्य एक प्रतिकात्मक पसंद थे । उत्तर प्रदेश में हर फैसले को जाती के दशमी की नजर से देखा जाता है । हम तो इस बार भाजपा उनकी संकेतिक पसंद से भी आगे बढ गई । उनकी नियुक्ति संगठन के भीतर अधिक बदलाव होने की ओर इशारा कर रही थी । केशव प्रसाद मौर्य ने सहारनपुर की जनसभा में अपना भाषण खत्म किया और हम अमरोहा में उनकी अगली जनसभा के लिए वापस हेलीकॉप्टर में सवार हुए । मैंने थोडे शरारतपूर्ण अंदाज में केशव प्रसाद मौर्य से पूछा, ये सब लोग यहां आए थे क्योंकि आपको मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं । क्या पार्टी को इस पद के लिए आप उम्मीदवार के रूप में पेश नहीं करना चाहिए था? बहुत होशियार थे और हमारे ध्यान में फंसने वाले नहीं थे । मौर्य ने मुस्कराते हुए कंधे उसका और कहा, भाजपा ने प्रत्येक कार्यकर्ता संभावित मुख्यमंत्री है । भाजपा ने दो हजार सोलह में ही तीन मुख्य कारणों से किसी को भी मुख्यमंत्री के रूप में पेश नहीं करने का फैसला किया । आप भी जानते थे उनके पास राज्यस्तर का ऐसा कोई चेहरा नहीं है । प्रदेश में अखिलेश यादव और मायावती सरीखे पहले से स्थापित क्षेत्रीय छत्रपों का मुकाबला कर सके । इस जाति के व्यक्ति को मुख्यमंत्री के रूप में पेश करना दूसरी जातियों को दूर कर देगा और इस तरह से बहुजातीय गठबंधन के निर्माण का काम प्रभावित होगा और वैसे भी मोदी का नाम और आकर्षण किसी को मुख्यमंत्री के रूप में पेश नहीं करने की कमी को पूरा करने के लिए पर्याप्त होगा । पार्टी नेताओं का तर्क था, इसके लिए कोई निश्चित फार्मूला नहीं था । बिहार में भाजपा के पास मुख्यमंत्री पद के लिए कोई चेहरा नहीं था । वहाँ उसका प्रदर्शन काफी खराब रहा था जबकि महाराष्ट्र में उसने काफी अच्छा किया था । आसाम में उसके पास मुख्यमंत्री पद का चेहरा था और वह जीती, परंतु दिल्ली में मुख्यमंत्री पद के लिए चेहरा पेश किया और वह बुरी तरह पराजित हो गई । लेकिन इसमें थोडा ही संदेह है के मौर्य में मुख्यमंत्री बनने की महत्वकांक्षा थी और कोई वायदा किए बगैर पिछडी जातियों के लिए चालाकी भरा संदेश था । उनका अपना आदमी इस पद पर आसीन हो सकता है । इस वंश है मददगार हुआ मोरिया के सहायक विवेक सिंह ने खाने का डिब्बा निकाला और उसमें से घर में बनी रोटी में लिपटी सब्जी अपने नेता को दिया । हमने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मैदानों को ऊपर से देखा और हेलीकॉप्टर के शोर के बीच ही मैंने उनसे पूछा कि उन्हें लगता है या अन्य पिछडा वर्ग पार्टी के लिए वोट करेगा । मौर्य ने जवाब दिया, इस बार हमने टिकट वितरण में न्याय किया है । भाजपा ने उत्तर प्रदेश के अपने चुनावी इतिहास में पहली बार सबसे अधिक टिकट अन्य पिछडा वर्गों को दिए हैं । ये हमारे समाज को हमारी और आकर्षित करेगा । वो इससे सवर्ण जातियों के परेशान होने को लेकर चिंतित नहीं थे । नहीं, उन्हें भी डेढ सौ से अधिक टिकट दिए गए हैं । हम सभी हो एक साथ लेकर चलने में विश्वास करते हैं और फिर विडंबना को समझे बगैर ही मुस्कुराते हुए उन्होंने कहा, दूसरे दलों ने इतने सारे टिकट मुस्लिमों को दिए हैं । उन्होंने दूसरों के साथ अन्याय किया है । ये सिर्फ प्रतिनिधित्व नहीं था बल्कि संदेश था जिसने इन समुदायों से अपील करने में भारतीय जनता पार्टी की मदद की और यही संदेश इस बात के इर्दगिर्द केंद्रित रहा । इस सपा और बसपा ने किस तरह उनके साथ गलत व्यवहार किया तो कहते हैं, इन सभी लोगों ने किसी न किसी समय समाजवादी पार्टी को वोट दिया परंतु सिर्फ एक समुदाय ही लाभान्वित हुआ । वो अब विकल्प की तलाश कर रहे हैं । वो जानते हैं कि भाजपा किसी के साथ भेदभाव नहीं करती है कि सब की पार्टी है । ये भी जोड सकते थे । वे सभी जो हिंदू है । मौर्य उस विरोधाभास को उजागर कर रहे थे तो मौजूद था और अन्य पिछडा वर्ग परिवार के भीतर और अधिक तेज हो गया था और इसका एक पुराना इतिहास रहा है । उत्तर प्रदेश में कांग्रेस सवर्ण जाती हूँ तो और मुस्लिमों के मिले जुले गठबंधन के आधार पर परंपरागत तरीके से चुनाव जीतती रही थी । परंतु मझोले कामगारों और पिछडों ने महसूस किया । सत्ता के इस गणित में उन्हें शामिल नहीं किया गया है और वे उन्नीस सौ साठ के दशक से ही समाजवादी संगठनों की और आकर्षित होने लगे जैसा कि राजनीतिक वैज्ञानिक कॅालेजों ने दर्ज किया है । ये राम मनोहर लोहिया की राजनीति के दायरे में हुआ जिसमें जाति के आधार पर प्रतिनिधित्व और मुख्य रूप से सकारात्मक कार्यवाही यानी आरक्षण की मांग की गई थी और चरण सिंह की राजनीति इसमें किसानों की व्यापक पहचान का मुद्दा उठाया गया और किसान की पहचान के इर्द गिर्द की मांगों पर जोर दिया गया परन्तु अंत में लोहिया की राजनीतिक विचारधारा का प्रभुत्व कायम हुआ । विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व वाली जनता दल सरकार ने मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू की । इसमें अन्य पिछडे वर्गों के लिए केंद्र सरकार की नौकरियों में तो प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान था । ये एक निर्णायक बोर्ड था । अन्य पिछडे वर्गों की राजनीतिक चेतना गहरी होती जा रही थी जिसने मुस्लिमों के साथ गठबंधन करके लालू प्रसाद यादव को बिहार और मुलायम सिंह को उत्तर प्रदेश में अपना नेता चुन लिया । लेकिन ये राज्य सरकारें व्यापक अन्य पिछडा वर्ग परिवार को लाभ पहुंचाने की बजाय जाती की जागीर बन कर रह गई । सरकारी नौकरियों से लेकर राजनीतिक पदों तक लालू और मुलायम दोनों के राज को यादव राज के नाम से जाना जाने लगा । जैसा कि जब फ्लो लिखते हैं ये धारणा बना दी । इस जाति ने शुरू से ही अपने लाभ के लिए अन्य पिछडे वर्गों का इस्तेमाल किया है । इस वजह से पिछडे वर्गों के भीतर भी विरोधाभास शुरू हो गया । बिहार में उदाहरण के लिए लालू प्रसाद और नीतीश कुमार दोनों ही व्यापक जनता परिवार के कमरे थे और पिछडों के सशक्तिकरण के लिए प्रतिबद्ध थे । लेकिन नीतीश कुमार तो कुर्मी थे और पूर्वी कम ताकतवर होने और यादवों की तुलना में संख्या में कम होने के बावजूद अन्य पिछडा वर्ग किए महत्वपूर्ण जाती है । उन्हें पार्टी में किनारे लगाए जाने से उनमें असंतोष था । नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद से रिश्ता जोडा और उसे तैयार किया । उन्होंने अंततः समूची अति पिछडी जातियों को ही तैयार किया और अन्य पिछडा वर्ग को खंडित कर दिया । जैसा की हमने ऊपर देखा, पिछडों ने सिर्फ दो हजार पंद्रह नहीं एक साथ वोट दिया । नीतीश और लालू दशकों के बाद एक साथ आई थी । उत्तर प्रदेश में भी अंतर्विरोध तेज हो गया । हो सकता है कि अन्य पिछडा वर्ग आरक्षण पाने की लालसा पूरी करने और कांग्रेस की दादागिरी खत्म करने के अपने लक्ष्य के लिए एकजुट हो गया हो परन्तु अब यादव और गैर यादव की दरार पैदा हो गई थी । अधिकांश पिछडे समूह और में कुशवाहा लूज और अन्य समाजवादी पार्टी के दायरे दूर हो चुके थे । कुछ नहीं बस पा से उम्मीद लगा रखी थी परंतु यहां भी उन्हें निराशा ही हाथ लगी । दूसरे दलों द्वारा मुसलमानों को जरूरत से ज्यादा महत्व दिए जाने और इस तरह से दूसरों के साथ न्याय नहीं करने संबंधी केशव मौर्य के भर आज से भाजपा के वैचारिक पूर्वाग्रहों का ही पता चलता है । प्रंतीय सही था । सपा और बसपा ने गैर यादव अन्य पिछडे वर्गों को लुभाने में अधिक समय नहीं लगाया और उसने भाजपा को पूरा खुला अवसर प्रदान कर दिया । बिहार में नीतीश कुमार ने इन समुदायों की नाराजगी जाहिर की थी और उनकी अपेक्षाओं पर तवज्जो दी थी । उत्तर प्रदेश में ऐसा कोई नेता नहीं था । चुनावी गन्ना से तीस प्रतिशत को अलग कर देना उत्तर प्रदेश में किसी भी क्षेत्रीय दल के लिए आत्मघाती हो सकता है । अखिल यादव विभिन्न जातियों के बीच सपा की एक यादव पार्टी होने की छवि से बाहर निकलते हुए अपने विकास के नाम पर शब्दाडंबर के भरोसे थे । लेकिन भाजपा का मानना था की ये काम नहीं करेगा । उसने खुद को ऐसी ताकत के रूप में पेश किया तो जाती के खिलाफ खडी है जिसमें सिर्फ अपना अपना क्या और बाकी सभी की अपेक्षा की । और इसीलिए जब हम अमरोहा में हेलीकॉप्टर से उतरे तो मोर्चा ने कहा कुछ जातियां तो विशेषाधिकार वाली जातियां हो गई हैं । चुनाव उसके खिलाफ जनादेश है । भाजपा को सफलता मिली । राज्य के प्रत्येक कोने में पिछडे वर्ग के लोगों ने अपनी स्थिति मजबूत की । बुंदेलखंड को ही लें । निलंजन सरकार भानु जोशी और आशीष रंजन राजनीतिक वैज्ञानिक हैं और सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के साथ हैं । उन्होंने उत्तर प्रदेश से हिंदू अखबार के लिए लिखा, झांसी के बबीना निर्वाचन क्षेत्र में उनकी मुलाकात राजभर समुदाय के एक परिवार से हुई । इनमें सभी ने दो हजार बारह के चुनाव में समाजवादी पार्टी को वोट दिया था । इस बार तो भाजपा को वोट देंगे । परिवार ने महसूस किया कि उन्हें उतनी आर्थिक मदद नहीं मिली जितनी सरकार ने सूखे से प्रभावित लोगों को देने का वायदा किया था परन्तु यादव को उनके हिस्से से भी कहीं अधिक पाला । मध्यम आयु के एक व्यक्ति ने उनसे कहा कि सिर्फ काम करने के बारे में नहीं है । हम कोई ऐसा चाहते हैं जो हम सभी के साथ एक समान व्यवहार करें । छटता जोशी और रंजन ने निष्कर्ष निकाला, उचित हूँ या नहीं तो पूरे उत्तर प्रदेश में उनकी यानी अखिलेश यादव की पार्टी का संगठन अभी भी स्थानीय नौकरशाही, पुलिस और सामाजिक ढांचे में बडे पैमाने पर यादव प्रभुत्व से जुडा हुआ है और फिर पता हिंसा के माध्यम से शासन चला रहा है । जब ही संसाधनों को अपनी जाती की और बोल रहा है या फिर मध्यपश्चिम उत्तर प्रदेश में जायेंगे पत्रकार शिवम विज ने एक सप्ताह राजगंज में बिता एक ऐसी सीट है उन्नीस सौ चौहत्तर से ही उत्तर प्रदेश का चुनाव जीतने वाले दल को वोट देने में आगे रही है । ये भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह का क्षेत्र था । दो हजार बारह में सपा के साथ कुछ समय बिताने के बाद पार्टी का कद्दावर लोध नेता की घर वापसी हो गई थी । हालांकि इस समय वो राजस्थान के राज्यपाल थे लेकिन उनके समुदाय के लिए इस संदेश में कोई तकलीफ नहीं थी । भाजपा उन्हें महत्व और सम्मान दे रही थी । उनका पौत्र एक अन्य सीट से चुनाव मैदान में प्रत्याशी था और भाजपा नेतृत्व ने अपनी प्रत्येक जनसभा में कानून व्यवस्था की दृष्टि से कल्याण सिंह के शासन को प्रदेश का स्टाॅल बताया । इस विडंबना को मत भूलिए कि कल्याण सिंह के शासनकाल में ही बाबरी मस्जिद गिराई गई थी । रिज ने लिखा, इस निर्वाचन क्षेत्र में तीन लाख के आस पास मतदाताओं में से पैंसठ हजार से अधिक लोग थे और भाजपा अकेली पार्टी थी । उसने लोग को अपना उम्मीदवार बनाया था । भाजपा के पारंपरिक सवर्ण जातियों के वो और अन्य पिछडे वर्ग के समूह हो लो । वोट के साथ जुडने से भाजपा यहाँ करीब करें अच्छी लग रही थी । विज बाद में याद करते हुए बताते हैं, कल्याण सिंह के प्रति निष्ठा और उनकी जाति का उम्मीदवार होने के अलावा यादव विरोधी भावनाएं जगजाहिर थी । वो कहते हैं, एक गांव में मुझे याद है कि मैं गैर यादव पिछडे वर्गों के एक समूह से बात कर रहा था जिसमें लोग पश्चिमी और अन्य शामिल थे । एक यादव आया और हमारी बातचीत में व्यवधान डालते हुए बहुत ही आक्रमक ऍम बोला अखिलेश, अखिलेश फिर वहाँ से चला गया । लूट समुदाय का एक व्यक्ति घूमा और अफगान बोला, किसी तरह का आचरण है कि उनकी हार का कारण बनेगा । यहाँ पूर्वांचल की और जाये जैसा टेलीग्राफ अखबार के रॉलिंग एडिटर और वरिष्ठ पत्रकार संकर्षण ठाकुर ने मार्च के शुरू में किया था । वाराणसी में प्रधानमंत्री द्वारा अपनाए गए गांव जयपुर में उनकी मुलाकात ग्राम प्रधान नारायण पटेल से हुई तो कुर्मी थे पटेल भाजपा की सहयोगी और अनुप्रिया पटेल के नेतृत्व वाली छोटी पार्टी अपना दल के समर्थक थे । अनुप्रिया पटेल । मिर्जापुर से सांसद और आप केंद्र सरकार नहीं मंत्री हैं । ये गठबंधन दो हजार चौदह के चुनाव में कुछ भी मतों को प्राप्त करने की अमित शाह की रणनीति का हिस्सा है । चाहने दो हजार सत्रह के चुनाव में भी ये गठबंधन बनाए रखा था । आपके विचार आम तौर पर चुनावों के प्रति उनके दृष्टिकोण से सही है । मतों को बढाएं । पांच से दस प्रतिशत के उस अंतर को दूर करें । इसमें भाजपा को जीत से दूर रखा था । इसके लिए दूसरे दलों के नेताओं को तोडने ऐसे सहयोगी को साथ लेने की रणनीति थी जो भले ही छोटे हूँ और हम तो एक समुदाय पर उसका प्रभाव हो । उत्तर प्रदेश में ये गठबंधन स्वतंत्र अन्य पिछडे समूहों के प्रति भाजपा की संवेदनशीलता को दर्शाने की रणनीति में सही बैठता था । इसी तरह का गठबंधन राजभर समुदाय की एक छोटी सी पार्टी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के साथ भी किया गया था । पूरे फॅमिली अपनी मोटरसाइकिल पर चुनाव प्रचार कर रहे नारायण पटेल ने ठाकुर से कहा, मेरा सरोकार मोदी है और सिर्फ उन से है । देश को अभी तक ऐसा नेता नहीं मिला था और उत्तर प्रदेश को भी मोदी की जरूरत है या आप राज्य के दूसरे छोर पर करीब करीब दिल्ली की सीमा से लगे हुए पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जांच इलाके को ही ले लीजिए । देश स्पष्ट था परन्तु क्षेत्रों की विशिष्टता ने इसे अनुकूल बनाया था । दो हजार चौदह के चुनाव में भाजपा ने मुख्य रूप से जाट वोटों के सहारे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सफाया कर दिया था । इस बार पूर्व केंद्रीय मंत्री अजीत सिंह की पार्टी राष्ट्रीय लोकदल को उम्मीद थे जाट समुदाय पार्टी में लौट आएगा । ऐसा लगता था हरियाणा में गैर जाट को मुख्यमंत्री बनाए जाने, अन्य पिछडे वर्ग की केंद्रीय सूची में जाटों को शामिल करने के लिए अधिक प्रयास नहीं करना और उनके कद्दावर नेता चौधरी चरण सिंह के प्रति अनादर रखने की वजह से ये समुदाय नाराज था । उसके बावजूद भाजपा ने इस इलाके में सफाई कर दिया । राष्ट्रीय लोकदल के एक नेता ने बाद में सफाई देते हुए कहा, आप जानते हैं चार्ट हमारे पास लौटे हैं । दो हजार चौदह में हमें सिर्फ सात लाख गैस के आसपास मत मिले थे । सिर्फ जीरो दशमलव आठ प्रतिशत ही था । लेकिन इस बार हमें पंद्रह लाख से भी ज्यादा वोट मिले तो एक दशमलव आठ प्रतिशत है । समस्या ये हुई कि प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में सभी अन्य पिछडा वर्ग भाजपा के लिए एकजुट हो गए । उनके पीछे पिछडों के एकजुट होने की सीमा जो खाने वाली है इसलिए हुआ क्योंकि भाजपा को प्रभावशाली वर्ग से निपटने में सक्षम होने वाले दल के रूप में देखा गया था । हमारे इलाके में सैनी और गुज्जर में महसूस किया कि भाजपा जाटों को काबू में रखेगी । जाटों ने जितना अधिक कहा कि वह इस बार आरएलडी को वोट देंगे, दूसरे उतना ही अधिक प्रतिबद्ध होकर भाजपा को वोट देंगे । अंततः भाजपा को जाटों के साथ ही सभी पिछडों के भी मत मिले । उत्तर प्रदेश के सभी बडे क्षेत्रों में भारतीय जनता पार्टी खुद को वंचित तबकों के मसीहा के रूप में पेश करने में कामयाब रही और अंततः एक ऐसी प्रभावशाली पार्टी बनकर उभरी सभी के लिए थे और जिसने विभिन्न जातियों से बनी राज्य की अकेली सबसे बडी आबादी को जीता जिसमें गैर यादव ओबीसी शामिल थे । मेरठ में सतीश प्रकाश एक दल प्रोफेसर हैं । प्रकाश कि बसपा से सहानुभूति है परंतु वो स्वतंत्र हैं । पार्टी की राजनीति के आलोचक हैं । दलित समाज में अच्छी तरह पैठ रखने वाले प्रकाश पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपने समुदाय के एक महत्वपूर्ण बुद्धिजीवी के रूप में भर रहे हैं । चुनाव प्रचार के दौरान हम दोनों ने एक साथ ही हस्तिनापुर, सुरक्षित क्षेत्र है की यात्रा और बसपा प्रत्याशी योगेश वर्मा के प्रचार अभियान को देखा । प्रकाश उनकी जीत के प्रति उसी तरह आश्वस्त जैसा कि वह मायावती के लखनऊ में मुख्यमंत्री के रूप में सत्ता में लौटने के प्रति थे । चुनावों के बाद हमने उनसे बात करके जानना चाहा । गडबडी कहाँ हुई है? प्रकाश ने कहा, दलितों और जाटवों के एक वर्ग ने विशेष रूप से ब्राह्मणवाद के खिलाफ लगातार आवाज उठाई और अपने लिए जगह मांगी । जब आर्थिक और शैक्षणिक रूप से सशक्त हो गए तो इस जगह पर अपना एकाधिकार जमाना चाहते थे । क्या उनकी अपने समुदाय के भीतर ही कमजोर वर्गों के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं थी? बसपा ने इसे नहीं समझा । हज पाने से समझा उत्तर प्रदेश में सभी सामाजिक समूहों में दलित सबसे अधिक कमजोर है और दलितों में भी छोटी और इधर उधर फैली जातियां सबसे कमजोर हैं । इनके पास संख्या शिक्षा, मध्यम वर्ग और राजनीतिक नेता नहीं है । उनकी समस्याओं को सही तरीके से पेश कर सके वो गलत हैं । जिन्होंने आगे बढने की प्रक्रिया में किसी हिस्से के बगैर ही चार दशकों तक पूरी निष्ठा के साथ कांग्रेस को वोट दिया । वो गलत है जिन्होंने मायावती को वोट दिया । परंतु वे पार्टी की मशीनरी पर जाटवों के एकाधिकार के कारण पीछे ही रह गए । वो गलत है । उन्होंने समाजवादी पार्टी के यादव को अपने शोषकों के रूप में देखा है । प्रकाश उन दलितों के संदर्भ में कह रहे थे जिनके प्रति अब अधिक ताकतवर हो चुके दलितों की जिम्मेवारी थी । दलितों को पार्टी में पीछे छोड दिया गया था । अदालत हैं इस बार भारतीय जनता पार्टी की और चले गए । बद्रीनारायण उत्तर प्रदेश के दलितों की राजनीति के एक जाने माने विचार विद्वान और फॅमिली के लेखक हैं । अप्रैल की शुरुआत में बिहार के प्रमुख बुद्धिजीवी सैबल गुप्ता द्वारा पटना में आयोजित एक सम्मेलन में नारायण ने व्याख्यान दिया । उत्तर प्रदेश में मिली विजय की गहमागहमी शहर में भी थी । अब सारी बातचीत पडोसी राज्य में जो कुछ हुआ उसी के इर्द गिर्द केंद्र है । नारायण खुद भी इस विजय के पैमाने से हत्या थे और उन्होंने उसी बात को आगे बढा कि प्रकाश नहीं मुझसे कही थी । उन्होंने बताया, उत्तर प्रदेश में दलितों में साठ से अधिक उपजातियां हैं । इनमें से कुछ का सशक्तीकरण हो गया है और इनमें जाटों भी हैं जिन्होंने राजनीतिक सप्ताह में एक बडा हिस्सा हासिल कर लिया और सरकारी नौकरियों और योजनाओं का भी लाभ प्राप्त कर लिया । शिक्षा मूलभूत बुद्धिजीवी हूँ और समुदाय के नेताओं के सृजन अपनी जाति के माध्यम से, सांस्कृतिक रूप से अपनी पहचान का दावा करके और हीरो तथा अन्य जातीय प्रति को जैसे कई कारणों से आगे निकल गए । कमजोर तब का अभी भी व्यापक रूप से प्रशिक्षित था । उनके पास अपने समुदाय को उनके समकक्ष कोई नेता नहीं थे जो उन्हें संगठित करते और अपनी पहचान को लेकर दावा करते हैं । आप जानते हैं काशीराम इन सभी समुदायों में आत्मनिर्भर होने का एहसास दिलाने के लिए उनमें से सभी के अलग से नाम लिया करते थे । मायावती ने सभी को एक साथ इकट्ठा कर दिया और उन्हें बहुत कम जगह दी । काशी राम ने ये भी कहा था जिनकी जितनी संख्या है उनकी उतनी हिस्सेदारी परन्तु क्या दलितों में भी ये नियम लागू हुआ जाटव थे जिन्होंने दलितों की सीटों का बडा हिस्सा हथिया लिया था । मेरठ में प्रकाश से सहमत थे । दूसरी सबसे बडी दल जाती वाल्मिकियों को ही ले लीजिए । जिला स्तर पर उनमें से कितने पार्टी सचिव है, एक भी नहीं । वही घटना के बारे में बताते हैं । इसके बारे में वो दावा करते हैं कि बसपा के बारे में वाल्मीकियों का कथन महत्वपूर्ण है । मायावती जब मुख्यमंत्री थी एक दलित महिला रेखा वाल्मीकि पूर्वांचल में कहीं पर एक स्कूल में दोपहर भोजन की रसोइयां थे । कुछ छात्रों ने इस पर आपत्ति की । आपको पता है कि मायावती ने क्या किया? उन्होंने वाल्मिकी को हटा दिया । इसका दूसरे स्कूलों पर भी दूरगामी असर पडा था । जरा सोचिए इससे पूरे समाज के लिए क्या संदेश गया होगा । बिहार में नीतीश कुमार ने दलितों में व्याप्त विरोधाभाष का ही सहारा लिया । इनमें पासवान को प्रबल माना जाता था । उन्हें प्रतिद्वंद्वी रामविलास पासवान के प्रति निष्ठावान माना जाता था । नीतीश कुमार ने महादलितों की एक नई श्रेणी को जान दे दिया । ये सबसे अधिक हाशिये वाले दलित थे तो दो हजार दस और दो हजार पंद्रह के चुनावों में बडी संख्या में उनके साथ जुड गए थे । और भाजपा ने इस समझ लिया था उत्तर प्रदेश में भी यही विरोधावासी मौजूद है । अमित शाह ने एक बार फिर ये दिखा दिया । वो उत्तर भारत में राज्य में पहले से ही गहरी जडें जमाए नेताओं से कहीं अच्छे समाजशास्त्री क्यों हैं? उन्होंने इन विरोधाभासों को पहचान दी और इसे तेज किया और वर्ग में सबसे अधिक प्रभुत्ववाले समूह के खडा सभी को संगठित किया । नारायण पर पेश करते हैं राशि राम में जो जाटों के लिए क्या आरएसएस और भाजपा ने वही शेष दलितों के लिए क्या वे समुदाय को अपने नेता तैयार करने में मदद कर रहे हैं? वो अपनी जाति के इतिहास को संकलित करने में मदद कर रहे हैं तो उनके समुदाय के हीरो का पता लगा रहे हैं । वो उनके उत्सवों को जांच करके उन्हें मना रहे हैं, दलित बस्तियों के निकट चाचाओं का आयोजन कर रहे हैं और गैर यादव पिछडों की तरह ही इसमें भी उत्पीडन किए जाने का संदेश है । तुलनात्मक दृष्टि से वंचित किए जाने के एहसास को पढाया गया । देखो जाटों को क्या मिला? देखो तुम लोगों को क्या मिला? क्यों बसपा से चिपके हुए हो? नारायण को लगता है ये तो सिर्फ शुरुआत है और भाजपा ने अभी ऊपरी सतह को ही लेना है और दस के आस पास दलित जातियों में ही पैठ बनाई है । कल्पना कीजिए यदि धीरे धीरे वे दूसरों के साथ भी ऐसा ही करेंगे तो क्या होगा? वहाँ पूरी तरह से खालीपन है पर बीस के आंकडे निर्वाचन आयोग द्वारा उपलब्ध कराए जाने वाले मतदान केंद्र का विवरण के अभाव में जनसांख्यिकी का विवरण प्राप्त कर रहा हूँ । और ये पता लगाना संभव ही नहीं है कि किस जाति और समुदाय ने किसे वोट दिया है और गैर यादव पिछडों से इतर गैरजाटव दलित उत्तर प्रदेश में सभी समुदायों में सबसे अधिक चुप्पी साधने वाले हैं तो उनसे किसी भी तरह का साक्ष्य निकलवाना भी कठिन है । भाजपा दलितों के लिए सुरक्षित अधिकांश सीटों पर विजयी रही और अब तो ये भी सुरक्षित सीटों के लिए कोई पैमाना नहीं था क्योंकि सारे उम्मीदवार गलत है और ऐसी स्थिति में गैर गलत मत महत्वपूर्ण हो जाते हैं । लेकिन हम जो जानते हैं वो ये है भाजपा का दिल्ली में नीतिगत स्तर और चुनावों में जमीनी स्तर पर दलितों के बारे में ध्यान केंद्रित कर रही है । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बाबा साहेब आंबेडकर की विरासत, परसो अम्बेडकर के जीवन से जुडे दिनों पर केंद्र सरकार के समारोह, उनके जीवन से जुडे पांच स्थानों को बढावा देने पर उसका जो सरकार के डिजिटल भुगतान ऐप का नाम भीम रखकर प्रधानमंत्री का अंबेडकर को समकालीन जीवंतता प्रदान करने का प्रयास और गलत उद्यमियों को प्रोत्साहन देना किसी राजनीतिक उपक्रम का हिस्सा है । विपक्ष को उम्मीद थी रोहित वेमुला की आत्महत्या और उन की घटना भाजपा को नुकसान पहुंचाएगी । उसने अनेक अंबेडकरी कार्य करता हूँ, विषेशकर छात्रों को उत्तेजित नहीं किया परन्तु ये वे लोग थे जो किसी भी स्थिति में बढ सपा को ही वोट देते । ये सब अपेक्षाकृत वंचित दलितों को उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी का सहयोग करने से रोक नहीं सके । इसका तत्पर ये नहीं है कि वे पूरी तरह दूसरी और चले जाएंगे । नहीं, इसका मतलब ये है कि भाजपा का प्रतिरोध खत्म हो जाएगा । निश्चित ही भाजपा के सत्ता में आने के बाद सहारनपुर में ठाकुरों और दलितों के बीच हुई झडप और इस वजह से कई हफ्ते तक तनाव व्याप्त रहने की घटना ने पार्टी के खिलाफ दलितों विषेशकर चाट क्यों कि संगठित होने की क्षमता को दर्शाया । परन्तु भाजपा की इतने बडे पैमाने पर जीतने ये संकेत तो दिया है देश के निर्धनतम राज्य के सबसे अधिक वंचित समुदायों और भारत के सर्वाधिक वंचितों में से एक वर्ग नहीं, उस पार्टी को वोट दिया, प्रभावशाली जातियों से जुडी हुई पार्टी रही है, इस समर्थन के प्रति आभार व्यक्त कर नहीं और इसके और अधिक बडे पैमाने पर एकजुट होने की उम्मीद में भाजपा ने देश के अगले राष्ट्रपति पद के लिए उत्तर प्रदेश के ही गैरजाट आ उतर रामनाथ कोविंद को नामक करने का फैसला किया । ये समझने के लिए की क्या नई भाजपा सबको एक साथ रखेगी और क्या उसका बहुजातीय प्रयोग सफल होगा? जरूरी है अतीत पर नजर डाली जाए । दो हजार सत्रह या दो हजार चौदह ऐसे पहले मौके नहीं थे । भाजपा ने इन जातियों को लिखाया था वन डर बिल विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के तारीख हासिल नहीं भाजपा के सामाजिक आधार का दायरा बढाने के प्रयास पर एक बहुत ही शानदार पूछता हूँ डिलीट पार्टी ओवर वोटर्स हाउ सोशल सर्विसेज ॅ इंडिया लिखी है । उन्होंने सबसे का आकलन करने के लिए तीन बिंदुओं को रेखांकित किया । क्या अब जाते वक्त पार्टी के समर्थन का मुख्य आधार है? आपने हैं उस की आंतरिक संरचना, मतदाताओं के समर्थन का तरीका और नीतिगत रूपरेखा हिमाचल तरफ देते हैं । इन तीनों ही बिंदुओं पर भाजपा ने हमेशा अब जब से राजनीति के इन सभी बिंदुओं को प्रदर्शित किया है, लेकिन भाजपा ने उन्नीस सौ अस्सी के दशक के हम और उन्नीस सौ नब्बे के दशक के प्रारंभ में धीरे धीरे ये महसूस करना शुरू कर दिया था तो उसे दूसरे समुदायों का दिल जीतने के लिए और काम करना होगा । इस प्रयास को गति प्रदान करने वाले व्यक्ति एक समय सबसे अधिक ताकतवर पार्टी के महासचिव गोविंदाचार्य थे, जिन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी के साथ मतभेद की वजह से सितंबर दो हजार में पार्टी से बाहर होने के साथ ही सक्रिय राजनीति से सन्यास ले लिया । बातचीत के दौरान ही गोविंदाचार्य पार्टी में आए बदलाव पर चर्चा करते हैं । हम ने उम्मीद सौ अस्सी के दशक के मध्य में महसूस किया कि यहाँ कुछ कुछ जाए है । उस समय दो बातें हुई थी मीनाक्षीपुरम धर्मांतरण की घटना हुई थी । इसमें सैकडों दलितों ने इस्लाम धर्म कबूल किया था और फिर शाहबानों का फैसला आया । हिंदुओं की भावना आहत हुई । उन्होंने तर्क दिया कि उस समय अल्पसंख्यकवाद राजनीति का केंद्र बन गया । बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी सक्रिय हुई । उन्होंने इस पॅाल में नमाज पढने की अनुमति मांगना शुरू कर दिया । सबने हिंदू की भावनाओं को आहत करने में योगदान दिया । ध्यान रखना भी जरूरी है कि हिन्दू भावना आहत होने के बाद स्वतः ही नहीं थी बल्कि भाजपा और विश्व हिंदू परिषद द्वारा सदियों से किए गए अन्याय की बात लोगों के दिमाग में बिठाने के लिए सदत किए गए प्रचार और संगठनात्मक कार्यों से हुआ । यही नहीं, ऐतिहासिक न्याय की आवश्यकता पर जोर देते हुए इसके प्रतीक स्वरूप अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण की मांग की गई और फिर कुछ ही सालों के भीतर रामजन्मभूमि आंदोलन तेज हो गया । अब एक व्यापक हिंदुत्व की छाया थी और फिर इस और पिछडे समुदाय के लोग भी आकर्षित होने लगे । उन्होंने वापस लौटना शुरू कर दिया । कुर्मी और कोई भी जैसे समूह उम्मीद सौ साठ के दशक में भाजपा के पुराने अवतार भारतीय जनसंघ की और मुड गए थे । हम तो पार्टी उनका समर्थन बरकरार नहीं रख सकी । गोविंदाचार्य तर्क देते हैं, ये हिंदुत्व ही था जिसने सभी जातियों में हिन्दू एकता की रूपरेखा पेश की । ध्यान दीजिए । मोदी शाह करीब तीन दशक बाद यही करने का प्रयास कर रहे थे । बी पी सिंह की सरकार में उन्नीस सौ उन्यासी में समाजवादियों, मार्क्सवादियों के साथ भाजपा के गठबंधन ने इसमें मदद की । गोविंदाचार्य स्वीकार करते हैं । इसमें पिछडे समुदायों की नजर में हमारी स्वीकार्यता को बढा दिया था । पार्टी की एक महत्वपूर्ण रणनीति रही है में समाजवादियों के साथ गठबंधन ने पार्टी को पहली बार सत्ता तक पहुंचाया । उन्नीस सौ सत्तर के दशक के मध्य में जय प्रकाश नारायण के आंदोलन में हिस्सा लेने और जनता पार्टी में विलय ने पार्टी को सबसे पहली व्यापक स्वीकार्यता दिलाएंगे और उन्नीस सौ अस्सी के दशक के आखिर में उन समूहों के साथ राष्ट्रीय मोर्चा का हिस्सा बनी जिनका मध्यम जाती के कामगारों और पिछडी जातियों में जनाधार था । इसने इन समुदायों के बीच भाजपा का द्वार खोल दिया था परंतु एक समस्या नहीं है । विश्वनाथ प्रताप सिंह ने जब अन्य पिछडे वर्गों के लिए आरक्षण का प्रावधान करने वाली मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू करने का फैसला किया, भाजपा पशोपेश में पड गई । भाजपा इसका विरोध करते हुए नजर नहीं आ सकती थी । नहीं उसने इसे अंगीकार किया क्योंकि आशा करके उसे सवर्ण जातियों का समर्थन करवाना पडता है । वो मंडल को बेअसर करने के लिए एक बार फिर हिंदुत्व कार्ड मंदिर मुद्दे पर वापस गई और ऐसा करने के लिए उसने पिछले चेहरों का इस्तेमाल किया । एल के आडवाणी की रथयात्रा पूरे चरम पर थी परंतु क्षेत्रीय स्तर पर मैदान में इसके प्रमुख चेहरे कल्याण सिंह, उमा भारती, विनय कटियार काम पर थे । ये मैं सहयोग नहीं था । तीनों ही पिछले समुदायों चाहते थे । सिंह और भारतीय लोग और कटियार कुर्मी थे कि भाजपा के विस्तार का स्वर्णकाल था । इस दौर के बारे में बिहार से भाजपा के एक वरिष्ठ नेता हूँ और अब एक प्रभावशाली केन्द्रीय मंत्री ने दो हजार चौदह के चुनावों की तैयारी के दौरान मुझे कहा था । हिंदुत्व सबसे अधिक सफल उस समय होता है जब उसका चेहरा अन्य पिछले वर्ष होता है । उन्नीस सौ नब्बे के दशक पर गौर कीजिए । गोविंदाचार्य ने इस बदलाव को प्रोत्साहन देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी । इसे सोशल इंजीनियरिंग के नाम से जाना गया परंतु वो जोर देते हुए कहते हैं, ये इस अनुमान के लिए उपयुक्त शब्द नहीं है । इस समुदायों को प्रक्रम तरीके से संख्यक किया जा सकता है परन्तु शब्दावली से इतर सही मायने में जनाधार के अनुसार का प्रस्ताव था और इस प्रक्रिया नहीं । गोविंदाचार्य ने भाजपा के लिए अपने चर्चित सलाह के अंदाज में कहा, आवश्यकता चार चरित्र और चेहरा बदलने की है । इसका तात्पर्य क्या है? जब मैंने चान के बारे में कहा तो मेरा साथ कर रहे हैं । हमारी शैली बदलने की आवश्यकता से पहले हम अपनी सारी सभाएं शाम को करते थे । बनिया समाज के लोग उस समय तक स्थानीय बाजार में अपना काम खत्म कर लेते थे और वहाँ आने के लिए उनके पास पर्याप्त समय था । मैंने तर्क दिया, यदि हम चाहते हैं कि हमारी सभाओं में ग्रामीण इलाकों के भी लोग आए तो हमें ये जनसभाएं दिन में आयोजित करनी होंगी और जब विभिन्न जातियों के लोग ग्रामीण इलाकों से इन सभाओं में आए तो उनके लिए महत्वपूर्ण था की उन्होंने एक चेहरा ऐसा देखा । इसे वो पहचान सकते थे और जो उनके अपने समुदाय से आए लोगों में था । महत्वपूर्ण ये था की विभिन्न जातियों के लोगों ने मंच पर अपने परिचित चेहरों को देखा । उन्हें भाषण देते हुए देखा । उन्होंने देखा कि उन्हें सम्मान दिया जा रहा है । यही वो कदम था । लोग महसूस कर सकें कि वे इसका हिस्सा है । यादवों के मामलों में शहरों के महत्व को देखा जा सकता है । हिंदुत्व कार्यक्रम के साथ उन्हें पहचाना जा सकता है । निश्चित यादव बिहार के भागलपुर दंगों सहित अनेक मौकों पर मुस्लिम समुदाय से टकराव होने पर अवसर ही सबसे आगे थे । दो चार याद करते हैं कि समुदाय के लोग उनके पास आए थे । उन्होंने कहा कि गौरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है । जब हमने मथुरा को मंदिर आंदोलन में छोडा था तो उन्हें आभास हुआ कि हम अपने एजेंडे में भगवान कृष्ण जिन्होंने अपने वंश का मानते हैं वो भी इसमें स्थान दे रहे हैं । शुद्ध शाकाहारी थे लेकिन उनके पास उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव और बिहार में लालू प्रसाद सरीके नेता थे और इसीलिए इस मुद्दे पर उनका भावनात्मक लगा । पार्टी के प्रति उनके राजनीतिक समर्थन में परिवर्तित नहीं हुआ । भारतीय जनता पार्टी समुदाय में अपनी जगह बनाने में असफल थी क्योंकि पूछ पद के चेहरे पेश नहीं कर सके लेकिन असर किया था । हिन्दू जाति व्यवस्था का शिकार होने के बावजूद पिछडे समुदाय हिंदू राजनीतिक वाले की और आकर्षित हुए हैं । गोविंदाचार्य ने दो बातों का उल्लेख किया अल्पसंख्यकवादी जिसने हिन्दुओं को एकजुट किया और प्रतिनिधित्व लौटकर हम फिर चेहरे की उपस्थिति पर आ गई । मैं हमेशा सजग थे । उनका सहयोग मुख्य रूप से प्रतिनिधित्व पर आधारित है । पार्टी के चरित्र में बदलाव लाना आसान नहीं था और बहुजातीय गठबंधन तैयार करना भी आसान नहीं था । मंडल ने बहुत तेजी से समाज और संगठनों का जातीय आधार पर ध्रुवीकरण कर दिया था । सवर्ण जातियों में अपेक्षाकृत अपने अवसरों को गंवाने को लेकर असंतोष ऍम पिछडी जातियों का सशक्तिकरण हुआ था और से लेकर सवर्ण जातियों में व्याप्त असंतोष को उन्होंने अपने अधिकारों से उन्हें वंचित करने की चाल के रूप में लिया । संघ और भाजपा हूँ दोनों में ही ये विरोधाभास उभर कर सामने आया । हाँ, चल लिखते हैं भाजपा ने विशुद्ध चुनावी बाध्यताओं की वजह से काफी लंबे समय के संशय के बाद बहुत ही अनिच्छा के साथ अन्य पिछडे वर्गों को आरक्षण का लाभ देना स्वीकार किया । जाति आधारित आरक्षण का मुद्दा इसलिए भी पार्टी को लेकर परेशान था क्योंकि ये उसे दूसरे तमाम दलों से अलग कर रहा था । और उसके विरोधी इसे आसानी से आपने अभिजात्य आधार हो वो प्राथमिकता देने वाले हिंदू राष्ट्रवाद के एक और उदाहरण के रूप में पेश कर रहे थे । अंततः भाजपा ने जब अन्य पिछडे वर्गों के लिए आरक्षण को सशर्त समर्थन देने का फैसला किया तो ये उसके लिए अपनी भ्रमण बनिया की छवि से निकलने के लिए बहुत ही कम और बहुत देर से लिया गया निर्णय था । यहाँ तक कि हिंदू कार्ड भी पर्याप्त नहीं था । अयोध्या में बाबरी मस्जिद विध्वंस के तुरंत बाद उन्नीस सौ तिरानवे में हुए चुनावों में भी भाजपा उत्तर प्रदेश में अकेले बहुमत हासिल करने में असमर्थ रही । उस की बजाय पिछडे और दलितों का प्रतिनिधित्व कर रही सपा और बसपा ने हाथ मिलाकर गठबंधन बना लिया । आपने संधि भाजपा ने सवर्ण जातियों का समर्थन हासिल कर लिया था परन्तु ये निचली जातियों को आकर्षित करने के लिए पर्याप्त नहीं था जो अपने नेताओं और दलों के साथ सशक्तिकरण का एहसास महसूस कर रहे थे । गोविंदाचार्य को भी विवादों की वजह से उन्नीस सौ तिरानवे में तमिलनाडु भेज दिया गया था । वो जब दिल्ली से जा रहे थे तो पार्टी के अन्य पिछडे वर्ग और दल समाज के कई सदस्य उनके पास आए और कहा आप जा रहे हैं माना क्या होगा गहरे सामने रंग के गोविंदाचार्य लगभग पच्चीस साल बाद कहते हैं उन्होंने महसूस किया कि मैं उनके अपने समुदाय का है शायद मेरे रंग रूप को देखकर । लेकिन भाजपा भी ये जानती थी कि यदि उसने विस्तार नहीं किया तो उसका विकास नहीं होगा क्रिस्टो फॅालो इसे भाजपा की अनिच्छा और अप्रत्यक्ष मंडलीकरण का दौर कहते हैं इसने गठबंधन का रास्ता चुनाव उदाहरण के लिए बिहार में समता पार्टी उन्नीस सौ नवासी से उम्मीद सौ अठारह के दौरान हिंदी क्षेत्र से अन्य पिछडे वर्ग के सांसदों में पार्टी की भागीदारी सोलह से बढकर बीस प्रतिशत हो गई थी जबकि सवर्ण जाति के सांसदों का अनुपात दशमलव तीन प्रतिशत से घटकर बयालीस दशमलव चार प्रतिशत रह गया था । अकेले उत्तर प्रदेश में ही अन्य पिछडे वर्ग के विधायको में उसकी हिस्सेदारी विश्व कराने में उन्नीस सौ छियानवे में अठारह प्रतिशत से बढकर बाईस प्रतिशत हो गई । नहीं हासिल भाजपा के सामाजिक आधार के विस्तार में सहयोग करने वाले एक और तरीके की और इशारा करते हैं । पार्टी के अपने मूल आधार के हितों को नुकसान पहुंचाए बगैर ही चुनावी सफलता के लिए जरूरी थी । मेरा मुख्य तर्क ये है कि राजनीति से प्रेरित भाजपा से संबद्ध संगठनों द्वारा निजी स्तर पर जनता की भलाई के लिए किए गए कार्य गरीब जनता के बीच अप्रत्याशित रूप से सफल साबित हुए हैं । दूसरे शब्दों में संघ के संगठनों के शिक्षा और स्वास्थ्य उपलब्ध कराने जैसे कल्याणकारी कार्यों ने भाजपा को चुनावी लाभ प्राप्त करने में मदद की । हासिल का शोध मुख्य रूप से दलितों और आदिवासियों के इर्द गिर्द केंद्रित था । महम तो सामाजिक विस्तार के लिए पार्टी द्वारा अपनाई गई रणनीति के बारे में एक महत्वपूर्ण जानकारी है । हालांकि राजनीतिक विरोधाभास अभी भी बरकरार थे हैं । उत्तर प्रदेश में सवर्ण जाति और गैर यादव पिछडों के गठबंधन में उन्नीस सौ नब्बे के दौरान ही दरार चौडी हो गई थी । भाजपा के वरिष्ठतम नेताओं में से एक डॉक्टर मुरली मनोहर जोशी नहीं गोविंदाचार्य पर सीधा हमला बोलते हुए कहा था, मेरी पार्टी को अपना चरित्र विचार बदलने हैं । इसका मतलब है पार्टी इस लायक नहीं है । उन्होंने ये भी कहा, सामाजिक समरसता के नाम पर कौन सा सामाजिक न्याय लाया गया है कि शायद महज एक सहयोग नहीं था कि वह भ्रमण थे । अटल बिहारी वाजपेयी भी कल्याण सिंह के साथ सहित नहीं थे । इसमें कोई संदेह नहीं कि वाजपेयी अखिल भारतीय स्तर के नेता थे जिन्होंने समुदायों और क्षेत्रों को आगे बढाया । परमप्रिय ध्यान रखना जरूरी है कि वे रावण थे और उत्तर प्रदेश की स्थानीय राजनीति में उनका दखल था । उत्तर प्रदेश भाजपा में उनके समर्थकों राजनाथ सिंह, फूलराज मिश्र और लाल जी टंडन ने कल्याण सिंह, जिन्होंने विवादों के उनके इस मामले में मदद नहीं की, के खिलाफ राजनीतिक माहौल तैयार करने में अहम भूमिका निभाई थी । परमप्रिय सिर्फ व्यक्तित्वों का मामला नहीं था । एक साधारण बात ये थी कि भाजपा का सवर्ण जाति का आधार एक पिछडे नेता के नेतृत्व की और झुकने को पूरी तरह तैयार नहीं था । गोविंदाचार्य बताते हैं तो फिर से एकजुट होने लगी थी । पहला उपयुक्त अवसर मिलते ही किसी ने भी कल्याण सिंह को हटाने में संकोच नहीं किया । सिंह को उनके उत्तराधिकारी चुनने की जिम्मेदारी सौंपी गई और उन्होंने राम प्रकाश गुप्ता जैसे एक गैर राजनीतिक व्यक्ति को चुनाव । लेकिन ये भी गुप्ता को किनारे लगाए जाने से पहले सिर्फ कुछ समय की ही बात थी और फिर राजनाथ सिंह ने मुख्यमंत्री पद ग्रहण कर दिया । इस तरह भाजपा के पास एक बार फिर समन जाति का वर्चस्व हो गया । पार्टी अध्यक्ष के पद पर कलराज मिश्रा एक भ्रमण और राजनाथ सिंह ठाकुर थे । अन्य पिछडे वर्गों ने अपमानित महसूस किया और वो पार्टी से दूर चले गए । सपा और बसपा के बीच इस मुद्दे पर सात झूलते रहे । उन में से कौन सी पार्टी उन्हें प्रतिनिधित्व देने की पेशकश करती है । भाजपा ने दो हजार में ये राज्य गवा दिया और दो हजार चार के लोकसभा चुनाव में भी उसका बहुत खराब प्रदर्शन रहा और एक बार जब उन्होंने ये पाया कि वह जीतने वाला घोडा नहीं है तो उन्होंने भी विकल्प तलाशना शुरू कर दिया । हार का ये सिलसिला दो हजार, सात, दो हजार नौ और दो हजार बारह में भी जारी रहा । भाजपा का सामाजिक गठबंधन चरमरा गया था और सभी नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने उत्तर प्रदेश के बाद और अपने हाथ में लेंगे । उन्होंने सामाजिक विस्तार के लिए जोरदार प्रयास किए । उन्होंने सवर्ण जाति के नेताओं को किनारे किया और उनके साथ ऐसा व्यवहार किया जिससे वे विद्रोह नहीं करेंगे । उन्होंने संगठन की संरचना में बदलाव शुरू कर दिया । उन्होंने कम प्रभाव वाले समुदायों को प्रतिनिधित्व और सम्मान दिया । उन्होंने अधिक प्रभाव वाले अन्य पिछडे वर्ग और दलित समूहों के खिलाफ उन लोगों के बीच पनप रहे असंतोष पर काबू पाया तो सोच रहे थे कि उन्हें दरकिनार कर दिया गया है । उन्होंने बडी संख्या में अन्य पिछडे वर्ग के लोगों को पार्टी का टिकट दिया और भाजपा को हिंदू एकता को लेकर सभी जातियों में पहले से कहीं अधिक सफलता प्राप्त करने में मदद की । क्या वे अपने पुराने और नए समर्थकों को साथ लेकर चलने में सफल होंगे? निश्चित ही संतुलन बनाये रखना कठिन होगा । फिलहाल असली सत्ता और पदों के मामले में भाजपा ये सावधानी बरत रही है । अपने पुराने समर्थक पैरी नहीं बने । उत्तर प्रदेश के मंत्रिमंडल में सवर्ण जातियों के प्रतिनिधित्व की अधिक संख्या यही दर्शाती है । पार्टी के मूल आधार को हराया नहीं गया है । योगी आदित्यनाथ स्वयं ठाकुर है, उपमुख्यमंत्री दिनेश शर्मा रावण है प्रदेश अध्यक्ष जो खुद मुख्यमंत्री बनने की उम्मीद लगाए थे वो भी उपमुख्यमंत्री बनाकर पिछडों को संकेत देने के साथ उनकी भूमिका का सम्मान किया गया है । योगी आदित्यनाथ के पद ग्रहण करने के कुछ महीनों के भीतर ही लखनऊ में ये चर्चा थी कि भाजपा की इस जीत ने किसी तरह से प्रदेश में ठाकुर राजा गया है । वे विरोधाभास, शासन और प्रशासन में नजर आएंगे । भाजपा का भविष्य सी होगा कि वह इससे किस तरह निपटती है । लेकिन अभी तो उत्तर प्रदेश ने अमित शाह की समाज को समझने, विरोधाभाषों की पहचान करने और इनका दोहन करने की उल्लेखनीय क्षमता दिखाई है । इसने भाजपा को अपने ही गढ में सिर्फ प्रभुत्वशाली सामाजिक समूहों के पार्टी से काम ताकतवार और अधिक प्रभावशाली राजनीतिक जातियों के खिलाफ संघर्षरत पार्टी में परिवर्तित होने के प्रयासों को भी रेखांकित किया है । भाजपा आज चुनाव जीती है तो नई भाजपा की वजह से क्योंकि एक समावेशी हिंदू पार्टी है, नई भाजपा कितनी दूर तक चलेगी, ये इसके पित्र संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के साथ उसके रिश्तों पर निर्भर करेगा ।

5. Sangh Stot Paripurak Parchai

संघ तो परिपूरक परछाई भारतीय जनता पार्टी की जबरदस्त सफलता और सर डालने में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ हमेशा ही उसका स्रोत परिपूरक और परछाई रहा है और इस प्रक्रिया में उसका भी स्वरूप चल रहा है । संघ भाजपा का वैचारिक संरक्षक है तो भाजपा के लगभग समूचे नेतृत्व और उसके बॉर्डर की मात्र संस्था है । घर है जहाँ वो हमेशा ही सहायता के लिए आ सकते हैं । फिर भी ये एकतरफा मार्ग नहीं है । नरेंद्र मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता भाजपा की एक समावेशी हिंदू पार्टी बनने की प्रक्रिया और राष्ट्रीय स्तर पर उसकी सफलता नहीं । पहले ही मूल संगठन और उससे उपजे संगठन के बीच समीकरण बदल दिए हैं । हमेशा ही संगठन पर अधिक जोर देने वाला सब किसी भी प्रकार की व्यक्ति उपासना का स्वाभाविक तैयारी है और इसीलिए मोदी जैसे अकेले ताकतवर नेता से भी जाती के प्रति उसका रवैया पार्टी से भी कहीं अधिक सावधानी वाला है । बहुत पुरानी बात नहीं है । जब आरएसएस की व्यापक राष्ट्रीय स्तर वाला संगठन था और भाजपा उससे निकला संगठन था तो निर्दिष्ट क्षेत्रों पडेगी, सीमित था । भारतीय जनता पार्टी आसन की पहुंच और उसके अनुसार को पीछे छोडते हुए एक अखिल भारतीय संगठन बनने की राह पर है । इसका मतलब ये हुआ । चुनावी संघर्ष में संघ एक परिपूरक की भूमिका निभाता है । आरएसएस और भाजपा के बीच नेतृत्व, मुद्दे और चुनाव प्रबंधन को लेकर लगातार विरोधाभास बना रहा । तीन मुख्य वजहों से आज से बाहर नहीं निकले नरेंद्र मोदी की मोहन भागवत के साथ व्यक्तिगत रिश्ते, वैचारिक समागम और नियमित समन्वय नरेंद्र मोदी ही संघ है । टीकाकार अशोक मलिक ने एक बार कहा है कि वह संघ के सबसे अधिक प्रतिभाशाली पूर्व छात्र हैं । संघ ही उन्नीस सौ अस्सी के दशक के अंत में मोदी को गुजरात में भाजपा के संगठन सचिव के रूप में भेजा था । मोदी अपने वैश्विक नजरिये आपने नेटवर्क, अपने राजनीतिक जीवन और आपने सदाचारी सिद्धांतों के लिए संघ के ऋणी हैं । यदि कोई व्यक्ति मोदी को पूरी तरह संघ से अलग मानता है तो वो तो मोदी और न ही संघ के साथ न्याय करता है । फिर भी मोदी सिर्फ पसंद नहीं है । उस से भी काफी आगे निकल गए हैं और महत्वपूर्ण अवसरों पर उन्होंने अपने मूल संगठन का मुकाबला किया है । उसे चुनौती दी है और उसे पीछे है । ये उस समझ लगता था की मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे । गुजरात के दो हजार दो के दंगों के बाद जहाँ मोदी या तो अनिच्छा या फिर अक्षमता की वजह से ही सभी से जुडे संगठनों के अल्पसंख्यकों पर हमले रोकने के लिए बहुत कम प्रयास किए । एक ऐसा भी दौर था जब मोदी और संघ के रिश्ते बिगड गए थे । संघ नेतृत्व के ही एक वर्ग ने तो छुटपुट समूहों और नेताओं को चुनाव में मोदी पर हमला बोलने के लिए प्रोत्साहित भी क्या हिंदुत्व के नेताओं में सबसे कट्टर और विश्व हिंदू परिषद के प्रवीण तोगडिया की तो सर ये मोदी से ठनी हुई थी कि टकराव व्यक्तिगत और अहम को लेकर और नियंत्रण तथा प्रत्यक्ष शासन में संघ के दखल को लेकर रहा । मोदी की लोकप्रियता और तक जैसे जैसे बडा मीडिया में ये अटकलें तेज होने लगी है, क्या संघ दो हजार चौदह के लोकसभा चुनाव में उन्हें भाजपा के चेहरे के रूप में स्वीकार करेगा? असंतोष की आवाज भी उठ रही थी परंतु उनकी बॉर्डर के बीच प्रचारकों और स्वयंसेवकों के बीच जबरदस्त अपील फॅार और सहानुभूति रखने वाले और नागपुर की व्यापक परिस्थितिकी प्रणाली का तब पता था कि संघ को नीचे से उठ रही आवाजों को ध्यान में रखना होगा । मोहन भागवत और दूसरे वरिष्ठतम नेता भैयाजी जोशी ने मोदी का समर्थन किया और यहाँ तक असंतुष्ट लालकृष्ण आडवाणी को भी रास्ते पर आने के लिए तैयार किया । लेकिन इसके बाद भी ये अटकलें जारी नहीं । यदि मोदी जबरदस्त बहुमत से जीत गए तो संघ मोदी के बीच रिश्ते कैसे होंगे हूँ । आरएसएस इस बात से असहज है जिससे वो व्यक्ति पूजा कहती है । हालांकि उसने अपने व्यापक संगठनों की व्यवस्था को अनुमति प्रदान कर दी थी परंतु पूरी तरह से अपना नियंत्रण गंवाने को लेकर और साहस थी । वो चीज थी । इसने अनेक मुद्दों पर संघ नेतृत्व और वाजपेयी सरकार के बीच रिश्तों को तनावपूर्ण बना दिया था । परन्तु मोदी ने प्रधानमंत्री के रूप में संघ के साथ उल्लेखनीय तरीके से सहज कामकाजी रिश्ते बना लिया थे और स्पष्ट है मोहन भागवत के साथ उनके व्यक्तिगत समीकरणों को जाता है । आरएसएस के पदाधिकारी सफाई देते हैं, अटल जी के समकालीन रज्जू भैया पूर्व सरसंघचालक राजेंद्र सिंह नहीं थे परंतु जब वह प्रधानमंत्री बने तो सरसंघचालक सुदर्शन जी थे, उनसे जूनियर्स है । इसमें समस्या पैदा की क्योंकि प्रधानमंत्री उनसे निर्देश लेने के मामले ने और सहस्त्र सरसंघचालक भी उन मुद्दों को लेकर थोडा आक्रमक थे जिनके लिए प्रधानमंत्री को थोडा मौका दिया जाना चाहिए था । अब स्थिति अलग है । मोदी और मोहन भागवत समकालीन है और दोनों ने जीवन में लगभग साथ साथ ही प्रगति की है और एक ही चरण में दोनों ने उच्च मुकाम हासिल किए हैं । दोनों का ही जन्म उन्नीस सौ पचास के दशक में हुआ । उन्नीस सौ सत्तर के दशक में पूर्णकालिक प्रचारक बने । अगस्त उन्नीस सौ निन्यानवे में संघ के महामंत्री बढें और मोदी तो हजार एक हम तो नहीं गुजरात के मुख्यमंत्री है । भागवत ने दो हजार में सर संघचालक का पद ग्रहण किया और मोदी का इसके तुरंत बाद राष्ट्रीय सडक पर उदय हुआ । दो हजार चौदह में विजय दिलाई । इनके ऊपर संघ में मोदी के गुरु भागवत के पिता थे । सब ने दो हजार में उनकी उम्मीदवारी के लिए संघ का समर्थन प्राप्त करने में मदद की । इस पदाधिकारी का कहना था, मित्र हैं, सरसंघचालक भी काफी व्यवहारिक और खुले दिमाग वाले हैं । आप उनके समाजसुधार और एक मंदिर, एक शमशान और एक जलाशय अभियान के प्रति उनके ध्यान को देखिए या आरएसएस का जाति आधारित भेदभाव समाप्त करने और ऐसी व्यवस्था के सृजन का अभियान है जहाँ दलितों सहित सभी की बहुत सके और मोदी का ध्यान पार्टी के आधार का विस्तार पर केंद्रित है । इसमें समन्वय है । इसका मतलब ये नहीं है कि संघ जो कुछ भी कहता है उसे सरकार सुनती है और इसका मतलब ये भी नहीं कि संघ हर मामले में हस्तक्षेप करता है परन्तु अटल जी के शासन से रिश्ते बहुत धन है । यहाँ वैचारिक झुकाव का एक और पहलू है । विश्व हिंदू परिषद के सुप्रीमो और संघ के वरिष्ठ नेता अशोक सिंघल । वाजपेयी के समय में राजग सरकार के कटु आलोचक थे । जून दो हजार तेरह में मोदी को औपचारिक रूप से भाजपा का चेहरा बनाए जाने से पहले सिंगल गुजरात के मुख्यमंत्री को एक राष्ट्रीय नेता के रूप में लेकर बेहद उत्साहित थे । संघ के एकदम स्पष्ट अपेक्षाओं और एजेंडा का संकेत देते हुए सिंघल ने कहा था कि वो चाहते हैं मोदी देश में चल रहे हिंदुओं के धर्म परिवर्तन की प्रक्रिया रोकें । वो चाहते थे कि मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त करने के लिए संसद अयोध्या मुद्दे पर एक प्रस्ताव पारित करें । चंद परिवार चाहता था सरकार गंगा की सफाई पर ध्यान दे । राम की तरह ही गंगा भी हमें जोडती है और गंगा को नष्ट करने की सुनियोजित साजिश हो रही है तो वहाँ पर प्रतिबंध उनका अगला एजेंडा था । इसका सर धार्मिक ही नहीं बल्कि उन्नतिशील और पोषण संबंधी उद्देश्य भी है । दो हजार सत्रह में स्थिति का आकलन कीजिए और अपेक्षाओं से इसकी तुलना कीजिए । अयोध्या के अलावा जहाँ एकतरफा कार्रवाई की संभावना सीमित है, सरकार ने दोनों अन्य विषयों को आगे बढाने के लिए काफी जोर लगाया है । गंगा हो सकता है साफ नहीं हुई हो परन्तु किसी अन्य सरकार ने इसे कितनी प्राथमिकता और संसाधन नहीं दिए थे, कितने नरेंद्र मोदी सरकार ने दिए नहीं । गौसंरक्षण के इर्द गिर्द राष्ट्रीय स्तर पर इतनी प्रवचन हुए । राजनीतिक संकेत एकदम साफ है । बहुत पर एक नई अधिसूचना लाई जा चुकी है । उत्तर प्रदेश में गैरकानूनी का प्रतिष्ठानों के खिलाफ अभियान छेडा जा चुका है और खाने की बात तो छोडिए, गौमांस रखने का संदेह भर स्वयंभू गौरक्षकों के प्राणघातक हमलों को निमंत्रण दे सकता है । उत्तर प्रदेश के दादरी में दो हजार पंद्रह में मोहम्मद अखलाक की हत्या के साथ शुरू हुआ हम तो दो हजार सत्रह की गर्मी में गोमांस को लेकर भीड द्वारा पीटपीटकर हत्या करना भाजपा शासित चंदा राज्यों में एक नई सामान्य बात हो गई थी । हो सकता है इसके लिए स्पष्ट रूप से ऊपर से राजनीतिक मंजूरी नहीं हो । पर अब तो इस तरह की भीड की हिंसा के खिलाफ कठोर कार्रवाई के लिए सख्त राजनीतिक संदेश के आभाव और ऐसा करने वालों को दंड के भय से मुक्ति ने इन स्वयंभू गौरक्षकों के हौसले ही बढाए हैं । एक चीज इन सभी घटनाओं में एक जैसी थी और वो थी मुसलमान इनके प्रमुख निशाना थे और इसमें इन समुदाय में असुरक्षा की भावना पैदा कर दी थी । इस तरह की हिंसा इतनी अधिक हो गई कि मोदी को जून दो हजार सत्रह के अंत में हस्तक्षेप करना पडा और अनेक लोगों ने महसूस किया । ये काफी देर से उठाया गया और उसके साथ कठोर कार्रवाई की आवश्यकता थी । कुछ सप्ताह बाद ही दो हजार सत्रह के मध्य जुलाई में उन्होंने एक बार फिर राज्य सरकारों से कहा, ऐसी किसी भी घटना से सख्ती से निपटा जाए । मोदी की खुलकर अपनी धार्मिक पहचान के लिए तवे में भी उनका वैचारिक चुका पर लक्षित होता है । संघ से आने वाले भाजपा के प्रमुख नेता बताते हैं, जब महत्वपूर्ण अवसरों पर संघ गौरान्वित महसूस करता है वो कहते हैं, मोदी जब काठमांडू में पशुपतिनाथ मंदिर, क्या केदारनाथ या फिर बनारस जाते हैं तो वहाँ पूजा अर्चना करके माथे पर टीका लगाकर बाहर निकलते हैं तो कह रहे होते हैं वो हिन्दू है और उन्हें इस पर गर्व है । इससे पहले सार्वजनिक रूप से मंदिरों में जाने वाली आखिरी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी थी, जो आपने अंतिम कार्यकाल के दौरान जाती थी । मोदी तो अपना धर्म का खुलकर आवरण करते हैं । वो अपनी संस्कृति के प्रदर्शन को लेकर किसी प्रकार की शर्मिंदगी महसूस नहीं करते । संघ इससे बहुत खुश है । उसका एकदम यही एजेंडा है । हमने अपने सारे प्रचार के दौरान गर्व से कहो हम हिंदू हैं नारे का ही तो इस्तेमाल किया है जमीन पर । संघ कार्यकर्ताओं को यही सब आकर्षित करता है और मोदी ने उनका भरोसा बरकरार रखता है । दिल्ली से आरएसएस के एक युवा कार्यकर्ता था । कहना था, अटल जी की सरकार पहली गैर कांग्रेसी सरकार थी । इसमें अपना कार्यकाल पूरा किया था और अब तो संघ में अधिकांश लोग संदेह करते थे । क्या सही में पूरी तरह भाजपा की सरकार है । इससे प्रदेश मिश्र चलाते थे जिनमें कांग्रेसी खून था । ये गठबंधन में भी थी । ये पूरी भाजपा सरकार है । छोटे छोटे मतभेद होने के बावजूद इस की वैचारिक प्रतिबद्धता और मोदी जी की मंशा को लेकर किसी प्रकार का संदेह नहीं है । और अंत था संघ और भाजपा के नेतृत्व के बीच अधिकतर निजी । लेकिन कई बार सार्वजनिक रूप से भी नियमित प्रचार का आदान प्रदान होता है । संघ से जुडे हुए भाजपा के एक नेता कहते हैं, प्रधानमंत्री सदैव ही विस्तार से जानने के लिए उत्सुक रहते हैं कि संघ ऐसा महसूस कर रहा है । वो हम से उन बैठकों की रिपोर्ट भी लेते हैं तो हमने संघ के पदाधिकारियों के साथ ही होती हैं । वो अपने प्रचार अभियान का समर्थन करने के लिए संघ को प्रोत्साहित करते हैं, उनके सरोकार को भी ध्यान में रखते हैं । पार्टी स्तर पर संघ संयुक्त महामंत्री कृष्णगोपाल के साथ संस्थागत समन्वय है और वो अमित शाह और संगठन के व्यक्ति रामलाल दोनों के साथ निकटता से काम कर रहे हैं । प्रत्येक मंत्रालय के दरवाजे संघ से संबद्ध हर उस संगठन के लिए खुले हैं जो उस क्षेत्र में काम कर रहा है । उनकी बात सुनी जाती है, भले ही हमेशा उस पर कार्यवाही नहीं होती हो और दो हजार पंद्रह में मोदी और उनके प्रमुख कैबिनेटमंत्री दिल्ली में आरएसएस के साथ एक मुलाकात के लिए गए थे जहां उन्होंने शासन की प्राथमिकताओं और विचार विमर्श किया और फीडबैक प्राप्त किया । एकदम स्पष्ट और सार्वजनिक रूप से पार्टी का संघ के प्रति आभार व्यक्त करना और शासनकला में संघ की भूमिका की स्वीकारोक्ति थी । शीर्ष स्तर पर भाजपा के साथ बेहतर व्यक्तिक रिश्ते, वैचारिक एजेंडे पर व्यापक झुकाव, सुचारू तालमेल की व्यवस्था और परस्पर सामंजस्य संघ की पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों को महत्वपूर्ण संस्थाओं में जगह दिला रहा है और अपने प्रिय विषयों को आगे बढाया जा रहा है तथा इसके बदले में संघ द्वारा शासन से संबंधित दूसरे मुद्दों पर भाजपा को ढील देने से दोनों को साथ साथ काम करने में मदद मिली है । इसलिए संघ के लिए सामंजस्य स्थापित करने और भाजपा के अधीन लोगों को भी अपनाने का अवसर प्रदान किया है । सितंबर दो हजार पंद्रह में प्रफुल्ल केतकर चेन्नई में थे जब उनके पास एक फोन आया । उन्हें बताया गया कि भाजपा आपके इंटरव्यू पर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रही है । जरा देख लो ऍम ग्रेजी पत्रिका ऑर्गनाइजर के संपादक करने सरसंघचालक मोहन भागवत का इंटरव्यू दिया था । इसी इंटरव्यू में भागवत ने आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा का सुझाव दिया था । बिहार में चुनाव होने वाले थे और एक कुशाग्र बुद्धि वाले राजनीतिक की तरह लालू प्रसाद ने सुन लिया । इसे चुनावों में अगडे बनाम पिछ्डे में बदलने का यही मौका है । इसी अगडे पिछडे की लडाई को लेकर उम्मीद में सप्ताह में पहुंचे थे भाजपा जिसे चुनाव जीतने के लिए पिछडे वर्गों के मतों की दरकार थी । वो बचाव की मुद्रा में थी । शुरू में उसने सरसंचालक के इस बयान से दूरी बनाई जो एक व्यर्थ की कवायद थी क्योंकि कोई भी विश्वास नहीं करेगा कि संघ सुप्रीमों के बाद सिर्फ उनकी निजी राय है, व्यापक परिवार की नहीं । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं आरक्षण व्यवस्था जारी रखने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई परंतु इसके बावजूद आशंकाएं हम ही नहीं रही थी । इस वक्तव्य का इस्तेमाल ये सुद्ध करने के लिए किया गया । संघ अभी एक ब्राह्मणवादी संगठन है तो पिछडी जातियों का स्थान से और सहज है और उसे जगह देने के लिए तैयार नहीं है । करीब डेढ साल बाद दो हजार सत्रह के मध्य नहीं, बात कर दिल्ली के पहाडगंज में ऑर्गनाइजर के कार्यालय में बैठे अभी भी इसी में उलझे थे । किस तरह से इंटरव्यू की गलत व्याख्या की गई है । खेत करने मुझसे कहा, इंटरव्यू फिर से देखो । हम दीनदयाल उपाध्याय पर चर्चा कर रहे थे और हम ने ये पूछा था क्या आज की नीति मानवतावाद के अनुरूप है? और इस संदर्भ में उन्होंने आरक्षण का जिक्र किया था कि आरक्षण विरोधी नहीं बल्कि आरक्षण के समर्थन में रखता था । कर को दिए गए भागवत के जवाब में सामाजिक रूप से पिछडे वर्गों को आरक्षण के हमारे की थी क्योंकि यही इस तरह की नीतिगत पहल सही मिसाल थी । लेकिन इसके बाद उन्होंने ये भी सुझाव दिया यदि हमने इस पर राजनीतिक करने की बजाय संविधान निर्माताओं द्वारा परिकल्पित इस नीति पर अमल किया होता हूँ, मौजूदा स्थिति उत्पन्न नहीं होती । शुरू से ही इसका राजनीतिकरण हो गया । हमारा मानना है इस सारे राष्ट्र के हितों के लिए वास्तव में चिंतित और सामाजिक एकता के लिए प्रतिबद्ध समाज के कुछ प्रतिनिधियों सहित प्रबुद्ध लोगों की समिति बनाई जाएगी । इस से ये निर्णय करना चाहिए इस समुदाय को और कितने समय के लिए आरक्षण की जरूरत है । एक स्वायत्तता प्राप्त आयोग सरीखी गैरराजनीतिक समिति इस पर अमल की प्राधिकारी होनी चाहिए और राजनीतिक प्राधिकारियों को इनकी ईमानदारी और निष्ठा के लिए इन पर निगाह रखनी चाहिए । इस पर बहुत तेज और उग्र प्रतिक्रिया हुई । निश्चित ही भागवत ने इसकी व्याख्या के लिए यहाँ गुंजाइश छोड दी थी जब उन्होंने कहा कि संविधान निर्माताओं द्वारा परिकल्पित नीति लागू की जानी चाहिए थी । लोगों ने तत्काल याद किया के मूल प्रावधान सिर्फ दलितों और आदिवासियों के लिए ही थे । तो क्या उनका ये सुझाव था कि उस समय अन्य पिछडे वर्गों को आरक्षण का लाभ दिया जाना अलग था, के सारी व्यवस्था की समीक्षा के लिए समिति बनाने के लिए सुझाव नहीं संकल्पित । समूची सकारात्मक कार्रवाई को ही हल्का बना दिया और सिर्फ चुनिंदा जातियों को निशाने पर लेने तक ही सीमित रह गया की आशंकाएं अब अविश्वास का रूप ले चुकी थी । फॅसने सवर्ण जातियों के लिए ही ये कहा है और हिंदू एकता की उसकी प्यास सवर्ण जातियों के प्रभुत्व का कुछ शब्द है यह यह दृष्टिकोण सही है । फिर सामाजिक विस्तार के भाजपा के प्रयासों को झटका लगेगा क्योंकि सीमांत वर्ग दूसरे वर्ग का दर्जा स्वीकार नहीं करेगा । यदि ऐसा नहीं है तो क्या ये संघ के अनुकूलन में कोई मूलभूत परिवर्तन आया है? राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का लिखित वक्तव्य कुछ सुराग देता है, में तत्कालीन सरसंघचालक पाला सहित देवरस ने पुणे में एक व्याख्यान दिया था कि जातियों के बारे में संघ का निश्चित रुख बन गया । उन्होंने हिंदुओं के एकजुट होने के बारे में बोला और स्वीकार किया कि सामाजिक असमानता इस एकता में बहुत बडी बाधा है । उन्होंने घोषणा की, यदि अस्पृश्यता गलत नहीं है, दुनिया में कुछ भी गलत नहीं है । उन्होंने अपमान किया कि पिछले और स्पष्ट भाइयों ने इतनी साडियां, बहुत अधिक कष्ट, अपमान और अन्याय रहा है परन्तु साथ ही उन्होंने उन्हें भी आगाह किया कि वे अतीत के झगडे वर्तमान में नहीं लाए और कटु भाषा का प्रयोग और विश्व मन करना बंद करें । आरक्षण के बारे में देवरस ने कहा था कि पिछडों की अवसरों के लिए मांग न्यायोचित है परन्तु दीर्घकाल में उन्हें भी दूसरों के अनुसार प्रतिस्पर्धा करनी होगी और योग्यता के आधार पर समान दर्जा प्राप्त करना होगा कि भाषण जाति के प्रति संघ का रवैया दर्शाता है और समानता के प्रति सजग है । भेदभाव भी स्वीकार कर रहा है लेकिन उस के प्रति भी सजग है कि क्या करना है । धीरे धीरे सामाजिक बदलाव चाहता है, वो व्यक्तिगत आचरण पर जोर देता है और वह पिछडों तथा दलितों की उग्र राजनीति को लेकर सहज नहीं है । इस तरह संघ के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने हैदराबाद विश्वविद्यालय में रोहित वेमुला के जुझारूपन पर जिस तरह प्रतिक्रिया व्यक्त वो आश्चर्यजनक नहीं था । मोहन भागवत ने मार्च दो हजार सत्रह में केतकर को एक और इंटरव्यू दिया । भागवत नहीं उन्नीस सौ चौहत्तर के व्याख्यान को श्रम सेवकों के लिए वैचारिक भवन बताया और रख दिया । किस अंधेरे इन समूहों पर पहुंचने का प्रयास किया था । इनके साथ भेदभाव हुआ था । उन्होंने व्यक्तिगत परिवार, पेशे, गा और सामाजिक व्यवहार में सुधार पर जोर दिया और अंतरजातीय विवाह का समर्थन किया । उन्होंने इस आक्रोश भर समझ पैदा करने पर भी जोर दिया । लेकिन देवरस की तरह ही उन्होंने पीडितों से अनुरोध किया कि वे अपनी भाषा का स्वर बदलेंगे । भारत में हाशिया पर रहने वाले हालांकि किसी तरह का प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व नहीं चाहते बल्कि असली ताकत चाहते हैं, प्रतिनिधित्व और गरिमा चाहते हैं । जैसा कि आरएसएस के पुराने प्रचारक ने मुझसे कहा, आपको संघ भी तनाव नजर आएगा क्योंकि वह सामाजिक एकता और सामाजिक न्याय चाहता है । वो चाहता है गरिमा परन्तु साथ ही असमानता वाले समाज में सद्भाव चाहता है । यह उतना रूढिवादी नहीं है जितना लोग सोचते हैं परन्तु वो विघटनकारी नहीं है । केतकर दावा करते हैं कि प्रतिनिधित्व के सवाल पर ध्यान देते समय वर्तमान संघ के दृष्टिकोण में गांधीवादी सोच का मिश्रण है । सवर्ण जातियों की सोच और आंबेडकरवादियों का नजरिया बदलना ये अनवरत है क्योंकि इसे संगठनात्मक ताकत का समर्थन हासिल है । हम तो ये दावा सवालिया है । संघ में कभी भी गैर सवर्ण जाति के किसी भी व्यक्ति का सरसंचालक नहीं बनना संभव तहर सबसे बडा उदाहरण है । पैसे भी राजू भैया के अतिरिक्त शेष सभी सरसंघचालक ब्राह्मण ही हुए हैं । हालांकि केतकर अब इनमें भी मंथन का दौर देखते हैं । आप संगठन को नीचे से देखते हैं । आपने बदलाव हुआ है प्रचारकों में राज्य के पदाधिकारियों में अन्य लोग भी हैं । आपको परिवर्तन नजर आएगा भाजपा की हाशिए के समुदायों के प्रति अनुकूल होने के प्रति । संघ के विकसित हो रहे दृष्टिकोण को समझने के लिए संघ के ऊपर दिए गए दृष्टिकोण को समझना जरूरी है । वो जब पिछडों को आकर्षित करने के भाजपा के प्रयासों के विपरीत एक राय जाहिर करता है तो पार्टी चुनाव हट जाती है । जैसा कि बिहार में हुआ । जब समर्थन करती है तो चुनाव जीत लिए जाते हैं जैसा कि दो हजार चौदह के लोकसभा चुनावों में हुआ । दो हजार चौदह के चुनावों में दो तरह का प्रचार अभियान था जिसने नरेंद्र मोदी को जीत दिलाई । पहला आधुनिक और उच्च प्रौद्योगिकी वाला चुनाव प्रचार था । इसका संचालन गांधीनगर से मोदी की टीम कर रही थी । नागरिकों ने छह महीने तक मोदी के चकाचौंध वाले प्रचार से रूबरू हुए क्योंकि भाजपा ने पूरे देश में अपना संदेश पहुंचाने के लिए सभी तरह कल्पनाशील प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल किया । भाजपा की सुविधाओं का इसके लिए इस्तेमाल किया गया था । ये तो वो है जो हम सभी ने देखा । सभाएं, विज्ञापन, होलोग्राम, चाय पे चर्चा और ये संदेश सिर्फ मोदी ही अच्छे दिन ला सकते हैं । दूसरा बहुत ही चुप चाप समानांतर चुनाव प्रचार था । आरएसएस बहुत ही कम इतनी गहराई से किसी चुनाव में शामिल होता है जितना वो दो हजार चौदह में था । देखा उसने जनसंघ को बनाया और उसका समर्थन किया । उसने में जनता पार्टी के समर्थन में भरपूर काम किया और उसने पिछले तीन दशकों में भाजपा को सफलता दिलाने के लिए उसकी मदद की परन्तु हूँ उसने हमेशा ही एक सीमा तक और स्पष्टता बना कर रखी और इस तारे को भी बनाए रखा है कि वो एक सांस्कृतिक संगठन है । दो हजार चौदह में इसमें बदलाव किया और ये सोच समझकर नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने की चाह में समूचे परिवार का इस्तेमाल करने का फैसला किया । संघ की सार्वजनिक अपील लोगों को वोट देने और अधिक से अधिक मतदाताओं को मतदान तक पहुंचाने के लिए प्रेरित करने तक ही सीमित थी । एक मिशन था इसे मोहन भागवत नागपुर में दो हजार तेरह में विजयदशमी के अवसर पर अपने वार्षिक संबोधन के दौरान रेखांकित किया था या दृश्य प्रचार अभियान था तो हमने देखा नहीं । ये दो प्रचार कई बार एक दूसरे को परस्पर मिलते भी थे । सर्वोच्च स्तर पर मोदी खुद भी सरसंचालक और उनके सह सरसंचालक भैया जी के संपर्क में थे । पार्टी स्तर पर भाजपा के प्रभारी संघ के संयुक्त महामंत्री के साथ सामंजस्य भी था । प्रत्येक राज्य के भाजपा नेता भी संपर्क में थे, जिसे वह वैचारिक परिवार कहते थे । विशेष का जनाधार वाले संगठन जैसे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, विश्व हिंदू परिषद, भारतीय मजदूर संघ, बजरंग दल और वनवासी कल्याण आश्रम । स्थानीय स्तर पर भी एक सीमा संघ से संबद्ध जिला इकाइयों और पार्टी की जिला इकाइयों के बीच तालमेल था । परंतु दिल्ली में इन दोनों अभियानों के बीच एक सेतु की आवश्यकता थी । ये कोई ऐसा व्यक्ति होना चाहिए था, जो आधुनिक चुनाव प्रचार की भाषा समझता हूँ और उसके बावजूद संघ की जडों से जुडा हो । ऐसा व्यक्ति होना चाहिए था जो प्रौद्योगिकी से अभ्यस्त होने के बाद भी जानता हूँ । नब्बे साल पुराने संगठन को इसे अपनाने में किस तरह मदद की जाए, इसके लिए कोई व्यक्ति ऐसा नहीं था, जो राममाधव से अधिक इसके लिए उपयुक्त हो । मूलतः आंध्र प्रदेश के निवासी माधव लंबे समय से प्रचारक रहे हैं । हालांकि इससे पहले के दशक में नई दिल्ली में संघ के चेहरे के रूप में उभरेगी । दिल्ली में राष्ट्रीय मीडिया के लिए उनका संपर्क राजनयिक मिशन के साथ वार्ताकार भी थे और क्योंकि उनका स्थान दिल्ली था इसलिए वह भाजपा के साथ एक महत्वपूर्ण अनौपचारिक संपर्क बन गए थे और उनका प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी के साथ बेहतर समीकरण थे । इंडिया फाउंडेशन एक वैचारिक मंच इसे बहुत ही सावधानी से उन्होंने आकार दिया था और जब दिल्ली में एक अत्यधिक प्रभावशाली संस्था के रूप में उभरा था, कार्यालय में बैठे माधव दो हजार चौदह के अनुभवों को याद करते हैं और स्वीकार करते हैं, मैंने चुनाव प्रचार के संघ के हिस्से को संभाला था । एक अपवाद वाला चुनाव था और हम इसमें पूरी तरह से शामिल थे । वो जानते थे कि संघ के तंत्र में सबसे महत्वपूर्ण प्रान्तीय प्रचारक थे क्योंकि ये पदाधिकारी अपने अपने राज्य में संघ की समस्त गतिविधियों के लिए जिम्मेदार होते हैं । बिलासपुर में नेतृत्व और जमीनी स्तर पर स्वयंसेवको प्रचारकों और शाखाओं के बीच संपर्क का काम करते हैं और जब भाजपा को चुनावों के दौरान इनकी मदद की जरूरत होती है तो ये प्रांत प्रचारक ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं परन्तु इन्हें प्रचार के पारंपरिक तरीके से आगे जाने के लिए जानकारी स्रोत उपलब्ध कराने की आवश्यकता होती है था । माधव ने सभी प्रांत प्रचारकों के लिए लेनोवा टैबलेट लेने का आदेश दिया और इसके इस्तेमाल के बारे में जानकारी देने के इरादे से सब के लिए प्रशिक्षण का आयोजन किया । उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, ऐसा कुछ था जिसके सभी अभ्यस्त नहीं थे और इस प्रशिक्षण के दौरान ही उन्होंने उन्हें चुनाव के दूसरे अहम उस तरह डॉक्टर से अवगत कराया । माधव ने दो स्रोतों से ये आंकडे प्राप्त किए । पहला तो गांधीनगर में चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर की टीम से जिसने निर्वाचन क्षेत्रों के आधार पर प्रत्येक प्रत्याशी के लिए विस्तृत पुस्तिका तैयार की थी और निर्वाचन क्षेत्रों के बारे में राजेश जैन से आंकडे प्राप्त किए । जैन एक समर्पित संघ समर्थक और उद्यमी थे जिन्होंने नीति सेंटर स्थापित किया था । जैसे मैं दिल्ली की मीडिया के वैकल्पिक परिप्रेक्ष् की पेशकश कहते थे । माधव बताते हैं, मैंने प्रांत प्रचारकों कि मतदान केंद्र तक के आंकडों के महत्व को समझने में मदद की । उसके बाद संघ ने इन आंकडों का उपयोग चुप चाप, घर घर प्रचार करने और मतदाताओं को जुटाने के लिए क्या जो मतदान के दिन उन्हें मतदान केंद्रों तक लाने के लिए बेहद महत्वपूर्ण था । माधव पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह के साथ भी एक महत्वपूर्ण कडी बन गए थे और वो उन्हें प्रत्याशियों तथा टिकट वितरण के बारे में संघ के नेटवर्क से मिलने वाली जानकारी उन्हें उपलब्ध कराते थे । पहले से ही राजनीतिक गतिविधियों में संलिप्त उनका दो हजार चौदह के चुनाव में जीत के बाद भाजपा में जाना स्वाभाविक था और वो पार्टी में सबसे ताकतवर महामंत्रियों में से एक बनकर उभरे । लोकसभा चुनाव के अनुभव ने इस बात की एक झलक भी । यदि संघ किसी चुनाव में अपना पूरा संगठनात्मक तंत्र लगा दे तो क्या संभव है? इसका काम बहुत ही सहज काम था कि मतदाताओं को मतदान केंद्रों तक निकाल कर लाया जाए । परंतु इस सरल का जो राजनीतिक नतीजों की शक्ल बदल सकता है, ये संभावित मतदाताओं की पहचान करना, व्यक्तिगत रूप से उन तक पहुंच रहा उन्हें राजी करना, अनुकूल राजनीतिक माहौल बनाना, संगठानात्मक सहयोग उपलब्ध कराना, विषेशकर उन क्षेत्रों में जहाँ पार्टी खुद ही कमजोर है और छात्रों, कामगारों तथा आदिवासियों के बीच काम कर रहे संगठनों का इस्तेमाल करके अपने नेटवर्क को सक्रिय करना एक और अप्रत्यक्ष भूमिका है । संघ की पारिस्थितिकी व्यवस्था इसमें भी लोग हैं जो पूर्णकालिक प्रचारक है । परंतु संघ के प्रति सहानुभूति रखने वाले स्वतंत्र पेशेवर हैं । वो अपने अपने क्षेत्रों में प्रभावशाली हैं और राई का रुझान बदल सकते हैं । संसाधन भी लगा सकते हैं । संघ की मशीनरी और संघ की अपनी व्यवस्था अकेले ही पार्टी को चुनाव नहीं जिता सकती है, परंतु इसके बगैर अक्सर पार्टी चरमराने लगती है । यह विशुद्ध रूप एकदम अलग तरह का समर्थन देती है । ये पार्टी का मनोबल बढाती है और एक परिपूरक की तरह ये अनमोल है । यही भूमिका इसने उत्तर प्रदेश में निभाई हैं । ये समझने के लिए जमीनी स्तर पर संघ परिवार किस तरह काम करता है? मैंने उत्तर प्रदेश चुनाव के अंतिम चरण के लिए । वाराणसी की यात्रा बनारस हिंदू विश्वविद्यालय संघ के सबसे पुराने भर्ती स्थलों में से एक है । मोदी सरकार ने ये निश्चय कर लिया था । अपने कार्यकाल के पहले ही वर्ष में विश्वविद्यालय के संस्थापक पंडित मदन मोहन मालवीय को भारत रत्न प्रदान किया जाए । ऐसे कुलपति के साथ स्वयं के संघ की उपज होने पर कर महसूस करते हैं । विश्वविद्यालय ने दो हजार चौदह के बाद दूसरी अधिकांश भारतीय उच्च शिक्षण संस्थाओं की तरह ही अनेक ऐसी शिक्षाविदों को देखा । सार्वजनिक रूप से संगठन के व्यापक नजरिए के प्रति अपनी वफादारी जाहिर कर रहे थे । ऐसे ही एक प्रोफेसर नहीं जो स्वयं सेवक भी हैं । बता एक सौ एक प्रतिशत संघ इस चुनाव प्रचार में शामिल था तो भाजपा के टिकट वितरण से पूरी तरह सहमत नहीं थे । अब महसूस करते थे कि पार्टी के लिए ये सही नहीं था । लंबे समय तक टिकटार्थियों को जानबूझकर लटकाए रखा जाए तो ये भी महसूस करते थे कि भाजपा ने चुनाव जीतने की खाते दूसरे सभी तत्वों की बलि चढा दी थी । वो कहते हैं, पहले उन्होंने संघ से जानकारी प्राप्त की थी । इस बार भी उन्होंने यही किया । हम तो पिछली बार की तुलना में काम उन्होंने दूसरे दलों से दल बदलने वालों को वैचारिक प्रतिबद्धता की कीमत पर लिया । वो जोड देते हैं लेकिन जिसने पार्टी का समर्थन करने के व्यापक लक्ष्य से प्रमुख नहीं किया । आखिरकार भाजपा को ही चुनाव लडना है । नहीं । शिक्षाविद ने उस भूमिका को रेखांकित किया तो संघ निभा रहा था । उन असंतुष्टों को देख रहा था । इनमें टिकट नहीं मिलने के कारण असंतोष था । हम उन से कह रहे थे कि उन्हें अगली बार जगह दी जाएगी और उन्हें समाजवादी पार्टी की सरकार को सत्ता से हटाने के बारे में ही सोचना चाहिए । उनकी तरह के अनेक स्वयंसेवा अपने मित्रों और परिवार सहयोगियों और छात्रों तथा विश्वविद्यालय के कर्मचारियों से बात करके उन्हें ये बता रहे थे उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार लाने से किस तरह के लाभ होंगे और हमारे प्रचारक वही कर रहे हैं तो उन्होंने दो हजार चौदह में किया था और वे मतदाताओं को बाहर ले आने के लिए मतदान केंद्र स्तर पर काम कर रहे थे । समर्थकों के दूसरे क्षेत्र को ही ले लीजिए । संघ को आर्थिक ताकत पुराने उद्यमियों और कारोबारियों से मिलती है । विक्रम मेहरा का प्रश्वास में घाट के निकट गोदौलिया में होटल स्वास्थ्य के नहीं है । होटल सकरीगली के अंदर एक इमारत की दूसरी मंजिल पर है । ये उन सैकडों होटलों में से एक है जिसने वाराणसी को शहरी भूल भुलैया बना दिया है । मेरा एक पुलिस अधिकारी के साथ बैठे थे जिन्होंने अपने परीक्षा ने बताया कि वो विश्वनाथ मंदिर और आसपास की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार हैं । वो आरएसएस से सहानुभूति भी रखते थे । मेरा तर्क देते हैं ये महत्वपूर्ण चुनाव था क्योंकि इसने उन्हें दिल्ली और लखनऊ में एक ही सरकार होने का अवसर प्रदान किया है । शिक्षक लोगों और व्यापारी समुदाय के बीच आम भावना है । इस बार विकास के लिए उत्तर प्रदेश में भाजपा को ही जीतना चाहिए । यही संदेह हम अपने दोस्तों और अपने सर्किल में प्रसारित कर रहे हैं । सबको मौका मिला है तो इस बार भाजपा को क्यों नहीं? ये दलील बहुत से लोगों को जज रही है । मेहता संघ समर्थक परिवार से आते हैं और वो स्थानीय संघ व्यवस्था के साथ घनिष्ठता से जुडे हुए हैं । मेहरा हसते हुए कहते हैं, मेरा इसी में जन्म हुआ है । हम ही संघ है । वो बताते हैं कि संगठन और उसके समर्थक किस तरह काम करते हैं । वो कहते हैं, संघ चुपचाप काम करता है । हमारे में से कोई भी प्रचार नहीं चाहता हूँ । मैं आपको एक उदाहरण देता हूँ । काशी क्षेत्र के एक प्रचारक नहीं । कल भाजपा के एक सांसद को व्यापारियों से मिलाया । हमारी उनके साथ बातचीत हुई और फिर हम लोगों ने फोटो चाहिए । जैसे ही लोगों ने सेल्फी लेना शुरू किया तो प्रचारक चुप चाप एक और खिसक गया । आप उन्हें देखेंगे नहीं और इसीलिए ऐसी अनुभूति होती है कि वे उपर स्थित नहीं है । संघ के लिए मेहरा सरीखे व्यक्तियों की महत्ता उनके पुरानी निष्ठा, स्थानीय बाजार और समुदाय में उन का महत्व और उनकी आर्थिक स्थिति चाहती है । मेरा और उनके व्यापक परिवार के लिए संघ और उससे संबद्ध राजनीतिक घटकों से यही अपेक्षा है वे कारोबार के लिए और बेहतर माहौल तैयार करेंगे । हालांकि प्रदर्शन जैसी बाधा डालने वाली गतिविधि अभी भी हुई है और इसने उनके कारोबार पर प्रतिकूल असर डाला है । फिर भी मेहरा की निष्ठा नहीं लगी है । मेरा कहते हैं सिर्फ बेमानी कारोबारी ही नाराज होगा । इसमें कुछ समय के लिए हमारे कारोबार को प्रभावित किया होगा । प्रंतीय संकट अब खत्म हो गया है । आप मुंबई नगर पालिका के चुनावों को ही देखी । वो तो भारत के कारोबार का केंद्र है और भाजपा ने नोटबंदी के बावजूद वहाँ चुनाव में इतना शानदार प्रदर्शन किया है । मेरा उसी शाम व्यापारियों की एक बडी सभा में जाने की तैयारी कर रहे थे । सभा को वित्त मंत्री अरुण जेटली संबोधित करने वाले थे और इसके लिए वो अपनी उत्सुकता छुपा नहीं पा रहे थे । वो कहते हैं, आप भी आइए, आप खुद देखिए कि व्यापारी समाज किस तरह से मोदी जी के साथ है । बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के शिक्षा और मेहरा संघ के स्वयंसेवकों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे । इनकी गणना इसमें नहीं होगी । क्या बहुत ही सीमित दृष्टिकोण नहीं । कैसे आरएसएस ने भाजपा का समर्थन किया या दृष्ट समर्थक हैं जिनकी प्रभावशाली होने के साथ ही अपने समुदाय में बैठ है और जो चुनाव में हवा बना सकते हैं । लोगों को संगठित करने का अधिक प्रत्यक्ष का संघ की मशीनरी करती है । वाराणसी में मेरा के होटल के ठीक सामने ऍफ का पुराना कार्यालय है । प्रचारक संगठन के हिंदू समाज की एकता के उद्देश्य के खाते इसे बनाए रखने और इसके विस्तार के लिए अपनी जिंदगी लगा देते हैं । ये वे लोग हैं तो चुनाव जैसे महत्वपूर्ण अवसरों पर पार्टी को कार्यकर्ता उपलब्ध कराते हैं । तीन बुजुर्ग एक शांत कमरे में रखी एक बडी सी में इसके इर्दगिर्द बैठकर अखबार पढ रहे हैं । एक प्रचारक अपना परिचय देता है कि वो संघ के साथ उन्नीस सौ पचपन से जुडा हुआ है । वो मेरा की हाँ में हाँ मिलाता है । इस तरह की भावना है कि केंद्र और राज्य स्तर पर एक ही पार्टी की सरकार होनी चाहिए । अमीर और गरीब दोनों ही मोदी जी को चाहते हैं । सेना का मनोबल ऊंचा है, विकास का काम आगे बढ रहा है । उन्होंने चुनावों के बारे में संघ और भाजपा के विचारों में महत्वपूर्ण अंतर को चिन्हित किया । संघ एक ऐसा स्कूल है जहां हम लोगों को उनकी योग्यता, कठोर परिश्रम और उसके नतीजे के आधार पर अंक देते हैं परन्तु राजनीति अलग है । एक राजनीतिक दल को जाती आर्थिक मजबूती, चुनाव जीतने की संभावना आधी को देखना होता है । आखिरकार उन्हें तो चुनाव लडना है और हम यहां उनका समर्थन करने के लिए हैं । वाराणसी में मतदान से छह दिन पहले की बात है । भाजपा के साथ तालमेल करने वाले प्रमुख व्यक्ति आरएसएस के संयुक्त महामंत्री कृष्णगोपाल वाराणसी पहुंच गए थे और वो विभिन्न जिलों के कार्यकर्ताओं की बैठकें बुला रहे थे । पूर्व उत्तर प्रदेश के प्रत्यक्ष प्रभारी होने की वजह से भोपाल पूरे राजनीतिक परिदृश्य से परिचित थे । बुजुर्ग प्रचारक ने बताया, इन बैठकों में क्या हुआ? वो सभी कार्यकर्ताओं से राजनीतिक माहौल, मतदान केंद्र स्तर के समीकरण और मतदाताओं के रुझान के बारे में जानकारी प्राप्त करते हैं । तो ये भी स्पष्ट निर्देश देते हैं उन्हें मतदान के लिए क्या करना है और बडी संख्या में मतदाताओं के मत डालने पहुंचने पर जोर देते हैं । यही जीत सुनिश्चित करेगी । लेकिन ये काम चुपचाप किया जाता है और यही वजह है कि संघ की भूमिका अक्सर ही ये पहली ही बनी रहती है । प्रचारक में अपनी बात जारी रखी मैं एक और तरह से आपको बताता हूँ पिता अपने बच्चे उसकी शिक्षा का ध्यान रखता है । उसे जीवन में बसने में मदद करता है, उसे घर मुहैया कराता है । परंतु वो चारों लागाकर लोगों को नहीं बताता है । संघ के कार्यकर्ता पोस्टर नहीं बांटते हैं । जनसभाओं में कुर्सिया नहीं लगाते हैं और नहीं खुद भीड जुटाते हैं । ये हमारा काम नहीं है और इसीलिए मीडिया को अक्सर गलतफहमी हो जाती है । गलत स्थानों पर देखते हैं । हम तो चुप चाप घर घर जाकर संपर्क करते हैं । लोगों को एक नेता और पार्टी को वोट देने के लिए लोगों को प्रोत्साहित करते हैं । राष्ट्र के बारे में सोचते हैं । दुनिया भर में भारत की प्रतिष्ठा बढाते हैं, सेना का मनोबल ऊंचा करते हैं । अब सबके विकास में विश्वास करते हैं । संघ की परिकल्पना और संदेशों में सिर्फ एक ही नेता और एक पार्टी इस कसौटी पर खरी उतरती है । नेता नरेंद्र मोदी हैं । वो पार्टी भाजपा है । संघ का नया कार्यालय गोदौलिया चौक से महज कुछ किलोमीटर की दूरी पर सिगरा में स्थित है । लेकिन शहर के पुरानी दरें यातायात का मतलब हमें अपने लिए रेंट पे हुए रास्ता बनाना है । इसी कार्यालय से काशी प्रांत के अठारह जिलों में संघ के कामकाज का प्रबंधन किया जाता है । भीतर एक छोटे से कमरे में एक व्यक्ति लगन के साथ अकाउंट का काम कर रहा है । उसने मुझे कहा, आप भी बाहर जाइए और आप आपने जिन मित्रों और लोगों को जानते हैं, उन्हें मोदी जी को वोट देने के लिए तैयार कीजिए । हमारा सांस्कृतिक संगठन है, परंतु विकास के लिए हम राज्य में भाजपा की सरकार चाहते हैं । उसने फिर इस तथ्य को रेखांकित किया कि संघ किस तरह से इस लक्ष्य को प्राप्त करने में मदद कर रहा था । हम मतदाता जागरूकता मंच नाम के प्लेटफॉर्म के माध्यम से काम करते हैं । हम अधिक से अधिक मतदान पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं । आरएसएस का मानना है कि प्रत्येक भारतीय नागरिक का ये कर्तव्य है लोकतंत्र में शामिल हो और मतदान करें । इसका निष्कर्ष यह था कि ये प्रोत्साहन उन मतदाताओं के लिए सुरक्षित था । इन की बहुत अधिक संभावना संघ से संबद्ध राजनीतिक दल को वोट देने की थी, लेकिन संघ नहीं । किस तरह से पार्टी की मदद की, इस बारे में सबसे अधिक विश्वसनीय जानकारी प्रमुख राजनीतिक वार्ताकारों ने स्वयं नहीं । भाजपा का एक प्रमुख नेता जो रोजाना संघ के साथ विचार विमर्श करते थे, घटनाक्रम का पुनर्निर्माण करते हैं । चुनावों के बारे में संघ के साथ हमारी पहली बैठक नवंबर दो हजार सोलह में हुई थी । और उस बैठक में ही निर्णय हो गया था कि वे जमीनी स्तर पर संपर्क पर ध्यान देंगे । चुनावों से पहले संघ के वरिष्ठ नेता मतदान वाले क्षेत्रों में पहुंचे और स्वतंत्र रूप से बैठकें आयोजित की और मदद की । उन्होंने बताया कि हालांकि दो हजार चौदह और दो हजार सत्रह में राज्य में चुनाव में संघ की भूमिका को लेकर तो बडे अंतर थे । पहला तो ये उत्तर प्रदेश में भाजपा खुद भी कमजोर थी और उसे इस तरह की मदद की जरूरत ही दो हजार सत्रह तक अमित शाह, सुशील बंसल और उनकी टीम द्वारा किए गए कामों से भाजपा संगठन काफी ताकतवर हो गया था और बाहर से मदद की जरूरत हो गई थी । ये निश्चित ही परंपरिक महत्वपूर्ण बिंदु था राष्ट्रीय स्तर पर लागू होता है जहाँ भाजपा अपने आप ही ताकतवर थी और उसकी गहरी पैठ थी । वहाँ पर चुनाव प्रक्रिया में संघ की आवश्यकता कम लेकिन जहाँ भाजपा कमजोर थी परंतु संघ की जडें काफी मजबूत थी, वहाँ ये अधिक महत्वपूर्ण हो गया था । इसका नतीजा दूसरे अंतर में आया । दो हजार चौदह में आरएसएस के अनेक कार्यकर्ताओं को उत्तर प्रदेश के बाहर से राज्य में सभी गतिविधियों में सहयोग के लिए लाया गया था । चाहे वह सूचना प्रौद्योगिकी हो, फीडबैक और निगरानी हो, घर घर संगठित करने का काम हो या प्रचार प्रबंधन हो, नजरिया कभी कभी उल्टा पड जाता है । बिहार के चुनाव में राज्य के शीर्ष नेता ने मुझे संकेत दिया । इसमें स्थानीय कार्यकर्ताओं में असंतोष पैदा कर दिया था । उत्तर प्रदेश में दो हजार सत्रह में भाजपा को बाहर से बडी संख्या में कार्यकर्ताओं की आवश्यकता नहीं थी । वास्तव में स्थानीय नेता जो पहले ही मतदान कर चुके थे, उन्हें उन क्षेत्रों में भेजा गया जहां मतदान होना था । अरे सबसे पुराना रिश्ता रखने वाले एक नेता ने कहा, बाहर के आरएसएस के कार्यकर्ता इतना अधिक संलिप्त नहीं थे । परन्तु ऐसा इसलिए था क्योंकि इस की जरूरत नहीं वही कर रहे थे तो जरूरी है । आखिरकार कृपा करके इसे समझे कि संघ जहाँ भी हो, हम उसी से आते हैं । वो तो मेरा माईबाप भी है । ये विभेद बनाओ टी है । निश्चित ही आरएसएस की भूमिका की तलाश में इस पत्ते का छूट जाना सहज कि समूचा नेतृत्व ही संघ से आया हुआ है । नरेंद्र मोदी संघ में ही प्रचारक थे । अमित शाह भी समय से ही हैं । सुनील बंसल तो सिर्फ तीन साल पहले ही संघ से आए थे । केशव प्रसाद मौर्य अभी कुछ समय पहले तक वीएचपी के कार्यकर्ता और पदाधिकारी थे । वरिष्ठता के क्रम में अगर नीचे आए चंद्रमोहन भी भाजपा में आने से पहले अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और स्वदेशी जागरण मंच में राज्य स्तर के अनेक नेताओं का आधार संघ परिवार के एक या दूसरे संगठन से रहा है । अमित शाह से लेकर नीचे तक भाजपा नेताओं को सहयोग करने वाले सभी कर्मचारी संघ की पृष्ठभूमि से आते हैं । निश्चित ही भाजपा ही सब है । उपचुनावों में आरएसएस की शेष मशीनरी अधिक सक्रिय हो सकती है और कुछ में पीछे रह सकते हैं । ये खोज बाहरी व्यक्तियों का पता लगाने की भी थी, क्योंकि हम कुछ ऐसे रहस्यमय उपसेना की तलाश में थे । इस चुनाव के दौरान प्रचार के लिए अचानक ही अवतरित होती थी और फिर नवभारत हो जाती है पेशा ये इस तरह तो काम नहीं करती है । बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के शिक्षाविद संघ थे, वरुण मेहरा संघ थे । हमने सर प्रचारकों और हमने सुनिश्चित करने के काम में उनकी भूमिका पर ही ध्यान केंद्रित किया जो अपर्याप्त संघ में दूसरे सबसे अधिक ताकतवर व्यक्ति भैया जी जोशी ने ऑर्गनाइजर को दिए इंटरव्यू में कहा था, हमारा सारा प्रयास रहस्त कार्यकर्ताओं को अपने काम का मुख्य स्तंभ बनाने का है । आज हजारों परिवार इस काम को आगे बढा रहे हैं । व्यस्त कार्य करता हूँ की तुलना में प्रचारकों की संख्या बहुत कम है की व्यापक व्यवस्था थी और प्रत्येक व्यक्ति ने अक्सर चुपचाप भी अपनी तरह से वो काम किए कि चुनाव के दौरान उसे करने थे । अपनी स्थापना के नब्बे साल बाद संघ अपने अनुयायी नरेंद्र मोदी के माध्यम से खुद को और समावेशी बनाने के लिए उपलब्ध करने, आंशिक और धीरे धीरे और खामोशी से संगठनात्मक कार्यों के माध्यम से चुनावी सफलताओं के जरिए भारत में मैत्रीपूर्ण सरकार स्थापित करने में मदद कर रहा है । इस प्रक्रिया में इसका राजनीतिक संगठन पहले से कहीं अधिक ताकतवर हो रहा है । हिंदू एकता और हिंदू राष्ट्र हासिल करने के अपने लक्ष्य के लिए दोनों अविभाज्य हैं हैं ।

6. H M Chunab

एच एम चुनाव तेईस फरवरी दो हजार सत्रह को इलाहाबाद में होटल का प्रबंधन कर उसे अपनी उंगली पर लगी शाही दिखाता है । मैंने मत दिया है और साइकिल जीतेगी । साइकिल समाजवादी पार्टी का चुनाव चिन्ह है । उसने तब मतदान केंद्र की एक कहानी सुनाई । लाइन में लगा एक व्यक्ति से देख नहीं पा रहा था और उसने मदद मांगी । वो पवन का बटन दबाना चाहता था । मैंने कहा कि मैं मदद नहीं कर सकता । लेकिन वहां मौजूद पुलिस ने कहा कि उन्हें दिखा दो थोडा रुका । फिर शरारती मुस्कान के साथ बोला मैंने कमाल के बजाय उसे साइकिल दिखाई और उसमें वह बटन दबा दिया । हमारे लिए एक और वोट आ गया । होटल के स्वागत कक्ष पर उसके आस पास मौजूद दूसरे लोग होने होने मुस्कराये जब वो चला गया तो उसके सहयोगी ने कहा आपने देखा उसमें क्या क्या क्या गलत नहीं है । वो मुसलमान है, ये सब लोग ऐसे ही है । ये पूरी कॉम ही इसी तरह की है । प्रदेश को बर्बाद कर दिया है । होटल का ये दूसरा कर्मचारी ब्राह्मण था और उसने कहा कि वो बाद में भाजपा के लिए वोट करेगा, भाजपा ही जीतेगी लेकिन ये लोग भी बडी संख्या में है । थोक में वोट देते हैं । वे तो ब्रश से अपने दान साफ किए बगैर ही वोट देने पहुंच जाते हैं और इसलिए ये चुनौती होगी पर इनको हराना है । सपा कांग्रेस गठबंधन मुस्लिम मतदाता की ऊर्जा और उत्साह देखकर बहुत ही खुश होते हैं और अंतर इसकी प्रतिक्रिया भी भाजपा के लिए बेहद कर्णप्रिय होती क्योंकि इस से पता चला कि चुनाव को धार्मिक पहचान के चश्मे के जरिए देखने की प्रवृत्ति बढती जा रही है । भाजपा अपने वर्तमान वैचारिक रूप रेखा के सहारे उत्तर और पूर्वी भारत ने दिल्ली की सीमा से उत्तर प्रदेश और बिहार होते हुए पश्चिम बंगाल के रास्ते असम जबरदस्त सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के बगैर चुनाव जीत नहीं सकती थी । इसकी वजह साफ थी । इन सभी राज्यों में मुस्लिम आबादी बीस प्रतिशत या इससे अधिक है और पार्टी बीस प्रतिशत के नुकसान के साथ शुरू करती है क्योंकि मुस्लिम न तो पार्टी के लिए वोट करते हैं और नहीं पार्टी की उनके वोटों में कोई दिलचस्पी है । शीर्ष मतदाताओं के बीच अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए उसे अंदरूनी तरीके से हिंदू जातियों की सरकार होगी जिसके लिए कोशिश कर रही है तो इसके लिए उसे मुस्लिमों को अन्य बनाकर पेश करना होगा क्योंकि अगर दूसरे जीत गए तो ये समुदाय अकूत ताकत का इस्तेमाल करेगा और उसे एक सबक सिखाने की जरूरत है । उसे मौजूदा पूर्वाग्रहों का दोहन करना होगा, उसे असंतोष पढाना होगा, उसे हिंदुओं में भय और आक्रोश पैदा करना होगा और इसके लिए संवेदनाओं से खेलने की जरूरत है । अक्सर हकीकत में दूसरों का ध्यान मुस्लिम मतदाताओं को जीतने में लगा होता है । इसे हासिल करने के लिए भाजपा और उसके वैचारिक संगठनों ने अत्यधिक प्रगतिशील फिर भी सर्वाधिक बहुत प्रचार को आधार बनाया । प्रगतिशील क्योंकि ये नवाचार और प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल का था और थोडा क्योंकि इसके संदेश के लिए सीधे झूठ का सहारा लिया गया था, मुस्लिम विरोधी दंगों और हिंसा में सक्रिय रूप से भागीदार रहे हैं और ऐसे क्षणों, सोपन, क्रोध और उत्तेजना से लाभान्वित हुए हैं । उन्होंने कम तीव्रता वाले परन्तु सतत तनाव को बढावा दिया और धार्मिक आधार पर दोस्तों, पडोसियों, गांव और श्रमिकों के बीच विश्वास की कमी को और बडा विभिन्न जातियों से एक साथ मतदान कराने के लक्ष्य को हासिल करने और हिंदू समाज को एकजुट करने के व्यापक वैचारिक लक्ष्य को प्राप्त करने में मददगार था और जब पार्टी चुनाव को एच एम ग्यारह हिंदू मुस्लिम चुनाव की शक्ल देने में सफल हुई तो हिंदू बहुल्य परिदृश्य में उसकी विजय निश्चित हो गई । एक बाकी पहचान संगीत सोम हिंदू पहचान संगीत सोम चुनाव प्रचार की गाडी पर लगा । इस नारे ने घोषणा की उत्तर प्रदेश के दो हजार सत्रह के चुनाव में संगीत सोम मेरठ की सरधना सीट से भाजपा के उम्मीदवार हैं । हाल ही में भंग हुई विधानसभा के विधायक सोम को दो हजार तेरह के मुजफ्फरनगर दंगों में आरोपी बनाया गया था । इन दंगों में करीब पचास व्यक्ति मारे गए थे और चालीस हजार से ज्यादा लोग प्रस्थापित हो गए थे । हिंसा के दौरान ही जाट समुदाय ने एक महापंचायत आयोजित की । इसमें सोम नहीं कथित रूप से भडकाने वाले भाषण दिए और फर्जी वीडियो आप लोग किए । इसी तरह के एक वीडियो में जाहिर तौर पर ये दिखाया गया था कि मुजफ्फरनगर के चावल गांव में मुसलमानों ने किस तरह दो जातियों को सचिन और गौरव की हत्या की । इसमें बताया गया की वो एक मुस्लिम व्यक्ति से अपनी बहनों के सम्मान की रक्षा कर रहे थे और इसके लिए उन्हें अपनी जान गंवानी पडी । दंगा भडकने के बारे में अलग अलग बातें सामने आ रही थी और सचिन और गौरव के साथ झगडे में शामिल मुस्लिम व्यक्ति की मौत कैसे हुई परन्तु बाद में पता चला कि उन मान और आक्रोश पैदा करने के इरादे से अपलोड किया गया ये वीडियो दो हजार बारह पाकिस्तान के प्रांत का था । इन दंगों की घटनाओं की जांच के लिए गठित न्यायमूर्ति विष्णु सहाय आयोग का निष्कर्ष था । जब तक उन्हें यानी वीडियो क्लिप हटाया गया, उस समय तक मुजफ्फरनगर और आसपास के जिलों में इसकी वजह से हिंदू और मुसलमानों के बीच तनाव बहुत अधिक बढ चुका था । इसके लिए जिम्मेदार ठहराए गए व्यक्तियों में सोम भी शामिल थे । उनके खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत मामला दर्ज किया गया । फर्जी वीडियो कब बात नहीं था? संघ से संबद्ध संगठनों ने अपनी कहानी गढने के लिए किस तरह से मुस्लिम हिंदू लडकियों को अपने जाल में फंसा रहे हैं और रंगों में हिन्दू लडकों की हत्या कर रहे हैं । इस तरह की सामग्री बहुत सपने संदेह और ऑडियो वीडियो के जरिए प्रसारित । इनमें अधिकांश फर्जी थे । गौरक्षा सहित हिंदू संतों के चरमपंथी संगठनों से संबंध होने की वजह से तो उनका व्यक्तिगत रिकॉर्ड भी कम साफ था । मेरठ से हिंदुस्तान टाइम्स ने रिपोर्ट किया था । सोम मांस के प्रसंस्करण और उसका निर्यात करने वाली एक कंपनी के डायरेक्टर थे । इसके बारे में जब पूछा गया तो उनका जवाब था, मैं कट्टरपंथी हिंदू हूँ और इसलिए ऐसी किसी गतिविधि में शामिल होने का सवाल ही नहीं उठता है जो मेरे धर्म के खिलाफ है । हालांकि ये पाखंड उन्हें कट्टरपंथी पृष्ठभूमि से अलग करने में बहुत अधिक मददगार नहीं हुआ और सोम निरंतर हिंदू कार्ड का इस्तेमाल करते रहे । दो हजार सत्रह के चुनावों में स्थानीय पर्यवेक्षक में इस बात की और इशारा भी किया कि उनके लिए कडी चुनौती है और सो एक बार फिर मुजफ्फरनगर को बुरी तरह प्रभावित करने वाले दंगों को बनाने में लग गए । इसमें लोकसभा चुनाव में इस क्षेत्र में पार्टी को मदद पहुंचाई थी । चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने दंगों की भडकाने वाली सीडी वितरित नहीं थी और एक बार फिर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने का प्रयास किया । उनके खिलाफ चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन करने के आरोप में मामला भी दर्ज हुआ । जिदंगी चार साल बाद भी भाजपा की मदद कर रहे थे । ये बोर का बहन था जो प्रत्याशियों के अपने क्षेत्र के ग्रामीण इलाकों में चुनाव अभियान पर निकलने से पहले मिलने का सबसे उचित समय था । श्रद्धालुओं में संगीत सोम के घर के बाहर मेरी बडो का पार्टी के समर्थक राजकुमार सैनी से हुई इस राज्य में हिंदुओं पर अत्याचार और उनका शोषण होता है । मुजफ्फरनगर दंगों के सिलसिले में हिन्दू लडके अभी भी जेल में हैं परंतु सभी मुस्लिम मौज कर रहे हैं । उत्तर प्रदेश में हिन्दू लडकियों से बलात्कार किया गया लेकिन मुस्लिम लडकियों को सर पर बिठाया गया । अब जरूरत ये है हिंदू वोट एक साथ पढे दंगों के दौरान जो कुछ भी हुआ उसके अनुभूति और प्रचार हकीकत से बहुत दूर था । दंगों में मुसलमान ज्यादा मारे गए थे । मुसलमानों को बहुत ही तकलीफ परिस्थितियों में शिविरों में रहना पडा था । मुस्लिम महिलाओं के साथ बलात्कार के बारे में भरोसेमंद रिपोर्ट आई थी । फिर भी हिंदू में उनका उत्पीडन होने का भाव बहुत ज्यादा था । अनिल सैनी की बातचीत से अच्छा लगता था कि सरकार उनकी है । उन्होंने ही दंगा शुरू किया । उसके बाद भी आजम खान अपने लडकों को रिहा करा लिया और फिर मुआवजा भी लिया है । उन्हें बहुत सारा धन मिला । हिन्दू क्या मिला? समाजवादी पार्टी में मुसलमानों के सुप्रीम नेता आजम खान को लेकर यही कहा जाता रहा है । सचिन और गौरव की हत्या में शामिल मुस्लिम लडकों को संरक्षण प्रदान करने में उन्होंने अहम भूमिका निभाई । उनकी सांप्रदायिक रूप से भडकाने वाली टिप्पणियों ने भाजपा को अपने समर्थकों को एकजुट करने में मदद की । लेकिन ये विश्वास करना मुजफ्फरनगर में आजम खान की वजह से मुसलमानों को विशेष अधिकार प्राप्त हैं । सरासर पसंद था परन्तु तथ्यों से किसी को कुछ लेना देना नहीं था । हिन्दुओं को एकजुट करने के प्रयास में जून लगातार ये बता रहे थे इस सभा के शासन नहीं किस तरह से हिंदुओं का उत्पीडन किया गया । सैनी से बात करने के बाद में दरवाजे के बाहर हुए तैनात सुरक्षाकर्मियों के पास से गुजरता हुआ सीढियों के रास्ते छह से होता हुआ एक बडे से कक्ष में पहुंचा । यहाँ तीन बडी बडी भेजे लगी हुई थी । लोग दोनों और बैठकर इलाकेके ताकत और व्यक्ति के साथ बातचीत के लिए अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे तो मैं घायल हो गए थे । उनके बाद हाथ में प्लास्टर लगा हुआ था । इसके बावजूद ठाकुर नेता की गतिविधियां धीमी नहीं हुई थी । उन्होंने फोन से खिलवाड करते हुए अपने सहायक को निर्देश दिया उसके कार्यक्रम में कुछ और गांवों को शामिल किया जाए । साम्प्रदायिकतावाद के बारे में मेरे सवाल के जवाब में जो उनको कोई ग्लानि नहीं थी और पूरे विश्वास से भरे हुए थे तो हम करते हैं । सपा ने कब्रिस्तान के लिए चारदीवारियों का निर्माण क्यों कराया? शमशान भूमि और रामलीला मैदान के लिए नहीं । उन्होंने गाजियाबाद में हज हाउस के निर्माण पर हजारों करोड रुपये क्यों खर्च किए लेकिन कांवडियों के लिए जो उसी रास्ते से यात्रा करते हैं, विश्रामगृह बनाने पर एक पैसा खर्च नहीं किया । सरकार ने सिर्फ मुस्लिम लडकियों के लिए छात्रवृत्ति दी और हमारी लडकियों को नहीं । मुलायम सिंह ये क्यों कहते हैं कि सिर्फ सपा ही मुसलमानों का ध्यान रख सकती है कि अखिलेश यादव ने सिर्फ मुस्लिम वोटों के लिए ही नहीं कांग्रेस के साथ तालमेल किया है । क्या हिंदू इस राज्य में नहीं रहते हैं? वो जो भी चाहे मुसलमानों को दे सकते हैं, मैं उसके खिलाफ नहीं हूँ परन्तु नहीं वही सब हिन्दुओं को भी देना चाहिए । सोम उसी मुद्दे पर लौट रहे थे जो भाजपा की राजनीतिक कथन का केंद्र रहा है । ये है तुष्टिकरण । ये इस दावे पर आधारित है कि भारत में धर्मनिरपेक्षता की राजनीति का तात्पर्य मुस्लिम समर्थक राजनीति है । धर्मनिरपेक्ष दल मुस्लिम समर्थक हैं और इस प्रक्रिया में हिन्दू कहीं पीछे छूट चुके हैं और यही वो मुद्दा है जिसे हम उत्तर प्रदेश में चुनाव प्रचार के दौरान बाहर बाढ सुन रहे थे और इसीलिए देश की राजधानी से करीब सौ किलोमीटर की दूरी पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के क्षेत्र में भाजपा का प्रचार अभियान हिंसा के महिमामंडन, उत्पीडन और पूर्वाग्रहों की कहानियों पर आधारित था । उत्तर प्रदेश में सपा की सरकार को एक समान रूप से कानून लागू करने के बजाय अल्पसंख्यकों के पक्ष में भेदभाव करने वाली सरकार के रूप में देखा जाता था और भाजपा ने इसे भी शामिल कर लिया । इसमें काम भी किया । ग्यारह मार्च को संगीत सिंह सोम सरधाना सीट से विधायक निर्वाचित हुए । उन्हें सत्यानी हजार नौ सौ इक्कीस मत मिले जबकि उनके सबसे नजदीकी प्रतिद्वंदी तीस हजार से भी अधिक मतों से पीछे रहे । संगीत सोम इसी बात का नहीं बल्कि उन्हीं मापदंडों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे । अमरोहा से पूर्व टेस्ट क्रिकेटर खिलाडी चेतन चौहान विधान सभा चुनाव लड रहे थे । उनके निर्वाचन क्षेत्र में उनके साथ चाय की चुस्कियों के दौरान चौहान ने कहा, इस क्षेत्र का बहुमत वाला समुदाय महसूस करता है । उनके साथ न्याय नहीं किया गया है । सिर्फ मुस्लिम लोगों का ही काम हुआ है । उनका आरोप था कि सपा विधायक में उन लोगों को संरक्षण दिया । उन्होंने जमीन छीनी और लूटपाट की । इनमें से अधिकांश अपराध मुस्लिम समुदाय नहीं किए थे । उनके गुंडागर्दी के खिलाफ ही प्रतिक्रिया हुई थी और उन्होंने स्वीकार किया कि भाजपा इस गुस्से को बनाएगी । पांच साल तक हिन्दुओं को तोडा गया है, वो एकजुट होंगे । यह उल्लेखनीय प्रचार मंच था । किसी प्रत्याशी के लिए इतना खुलकर बोलना । अपराध के लिए एक समुदाय विशेष जिम्मेदार था । दूसरे समुदाय में यानी ज्यादा प्रभुत्वशाली हूँ, असंतुष्ट पैदा करता है और उम्मीदवार का उम्मीद करना किससे उसे फायदा होगा, ये भाजपा द्वारा धर्म की राजनीति के से निकल उपयोग को उजागर करता है । मुजफ्फरनगर के आसपास घटनाओं के बारे में बताई जा रही बातों के समर्थन में कोई तथ्य और साक्ष्य नहीं थे । व्हाट्सएप्प का और व्यापक संगठनात्मक नेटवर्क का इस्तेमाल करके तस्वीरों और लेकिन संदेशों के आधार पर इस निष्कर्ष तक पहुंचना असम था । ये मुसलमान ही अपराधी और हिंदू पीडित है और दूसरे सभी राजनीतिक दल सिर्फ मुस्लिम समुदाय के लिए ही काम कर रहे हैं और भाजपा हिंदुओं के हितों की रक्षा करने वाली एकमात्र पार्टी है । चुनाव में इसमें काम किया चेतन चौहान नौगांव की जनता का प्रतिनिधित्व करने वाले विधायक के रूप में आराम से चुनाव जीत गए । उन्हें सत्य में हजार तीस मत मिले । उनकी जीत का अंतर भी संगीत सोम की तरह ही बीस हजार मतों से अधिक था । वो आज देश के सबसे बडे राज्य के खेलमंत्री हैं और उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त है । अनेक लोगों ने भाजपा द्वारा विकास कार्ड, ऍम व्यवस्था कार्ड और हिंदू कार्ड इस्तेमाल किए जाने की खांचों में रखा और उसे एकदम अलग प्लेटफॉर्म के रूप में लिया । इसे नजरअंदाज कर दिया कि भाजपा कितनी चतुराई से अक्सर ही तीनों का एक ही कहानी में इस्तेमाल करती है और इस प्रक्रिया में वो चीज का इस्तेमाल करके खुश है जिसे झूट करते हैं । दूसरे मुद्दों को ही लीजिए जो उसने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उठाए । पार्टी ने दावा किया कि मुस्लिम गैंगस्टरों की वजह से हिंदू कैराना में असुरक्षित है । उन्हें इस भय के कारण वहाँ से भागना पड रहा है और कैराना नया कश्मीर बन गया है । वस्तुस्थिति का पता लगाने वाले सभी स्वतंत्र दलों ने इस दावे को असत्य पाया । पलायन बेहतर अवसरों की तलाश के लिए हुआ था । एक बार फिर जैसे मुजफ्फरनगर भी मुसलमानों को किस्मतवाला या अमरोहा में मुस्लिमों को अपराधी बताने । जैसे ही कथानक की पुनरावृत्ति कैराना में हुई जहां मुस्लिमों को गैंगस्टर और हिंदुओं को जबरन विस्थापित बताया गया । हालांकि ये झूठ था । बहुत सब समूहों और भाजपा का लखनऊ कार्यालय खुद ही आठ सौ से ऐसे अधिक समूह और सोशल मीडिया विषेशकर फेसबुक पर चला रहा था । इसमें हिंदुओं में और सुरक्षा की कहानी कडी गई थी । पार्टी के एक नेता से जान पत्तियों के साथ कहा गया कि ये सच नहीं है तो उसने मुझे स्वीकार किया सही साहब इससे कोई फर्क नहीं पडता । सवाल ये है हम दिखाना चाहते हैं कि हम उत्पीडित हैं । इससे हिंदू नाराज होंगे । उन्हें तभी ऐसा होगा कि उन्हें मुसलमानों के खिलाफ एकजुट होना है । इसी तरह की एक और कहानी गैरकानूनी बूचडखानों के बारे में गढी गई । बताया गया कि किस तरह से मुस्लिम समर्थक सपा सरकार में से बढावा दिया गया । आधिकारिक रूप से से कानून और व्यवस्था, पर्यावरण और सफाई और स्थानीय निकायों के नियमों के पालन करने से जोड दिया गया था । परन्तु वही नेता साफ तौर पर आपने गलत पर भी जोर देता है । जब आपन बूचडखानों के बारे में सोचते हैं । आपके दिमाग में कैसी तस्वीर बनती है? मैं एक मुस्लिम कसाई, गोवर और सडकों पर पहले फोन के बारे में सोचता हूँ । मैं सोचता हूँ कि किस तरह से मुसलमानों ने हमारे सार्वजनिक जीवन पर कब्जा कर लिया है । मैं कैसे हमारी संस्कृति और जीवन शैली को बर्बाद कर रहे हैं । किस तरह से आज चिकन और मांस की दुकानें हर जगह हैं और किस तरह से ऐसा करके हो रही बन गए, इस सवाल उठाकर हम हिन्दुओं को जागृत करना चाहते हैं, उन्हें गुस्सा दिलाना चाहते हैं परन्तु भाजपा और उससे संबद्ध संगठनों ने उत्तर प्रदेश और यहाँ तक कि देश के दूसरे हिस्सों में सबसे अधिक संदिग्ध कहानी गढी होती । लव जेहाद के बारे में शब्द मुजफ्फरनगर दंगों के दौरान उस समय प्रचलित हुआ जब संघ कार्यकर्ताओं ने इस कहानी को आगे बढाया । मुस्लिम लडके हिन्दू लडकियों को अपने जाल में फंसाने के लिए उनसे झूठ बोलकर संबंध स्थापित करते हैं और उन का धर्म परिवर्तन कराते हैं । वो दलील देते हैं कि ये जनसांख्यिकी आप प्रमुख थी । ये मुस्लिम जनसंख्या बढाने और हिंदुओं को अल्पसंख्यक बनाने की एक सुनियोजित साजिश तो तीन साल में लव जेहाद की कहानी पश्चिमी उत्तर प्रदेश के प्रत्येक समाज और बातचीत का हिस्सा बन चुकी थी । सच्चाई इस दावे से अलग थी । पहली बात तो अंतर धार्मिक और ऐसी शादियों की संख्या बढाने का कोई सबूत नहीं था । दूसरी बात यह यदि ऐसी संख्याओं में वृद्धि हुई थी तो भी ऐसा कोई सबूत नहीं था । ये किसी सुनियोजित मुस्लिम साजिश का हिस्सा था । ये हो सकता है कि ये मिली जुली आबादी वाले क्षेत्र में विश्वविद्यालयों और बाजारों जैसे धर्मनिरपेक्ष स्थानों पर विभिन्न धर्मों के व्यस्कों के बीच बढते मिलजुल के कारण हुआ हो । और तीसरी बात यह क्या नहीं दर्ज मामलों और आरोपों से पता चलता है कि महिलाओं को ऐसे संबंधों से रोकने के लिए पित्र सत्तात्मक प्रयास थे । लेकिन भाजपा ने मुसलमानों के प्रति असंतोष और संदेह उत्पन्न करने के लिए सफलतापूर्वक इसका इस्तेमाल किया था । उसने सफलतापूर्वक हिंदू माता पिता और हिंदू लडकियों में भर बता दिया था । पार्टी ने से अपने चुनाव अभियान से जोड दिया था । भाजपा के राज्य प्रवक्ता चंद्रमोहन ने स्पष्ट रूप से कहा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चुनाव प्रचार में हमारा ये एक बडा मुद्दा एंटीरोमियो दस्ता है । ये कानून और व्यवस्था का मसला है । महिलाओं को सुरक्षा वास्तव में एक बडा मुद्दा है । परंतु यह लव जिहाद के बारे में भी है । लेकिन दो हजार सत्रह में साफ तौर पर इसका इस्तेमाल करने के बजाय भाजपा ने एंटी रोमियो दस्ते गठित करने का वायदा किया तो मुस्कुराते हुए कहते हैं, एंटीरोमियो ट्रस्ट वास्तव में एंटी सलमान सस्ते हैं । एंटी नौशाद सस्ता है । उत्तर प्रदेश में सत्ता संभालने के बाद भाजपा सरकार ने अपनी पहली नीतिगत कार्यवाही में एंटी रोमियो दस्ते तैनात किए और गैरकानूनी बूचडखानों के खिलाफ कार्रवाई की । ये तरीका साथ था । भाजपा ने प्रचार के ही मुद्दे को उठाया था तो हिंदू के बीच उत्सुकता और क्रोध को जान देगा और मुसलमानों के प्रति समझे और नफरत पैदा करेगा । उसके संदेशों में रत्ती भर भी सच्चाई नहीं थी और निश्चित ही उसने मुजफ्फरनगर में मुसलमानों को लाभवाला समुदाय इंगित करके अमरोहा में सारे अपराधों के लिए मुस्लिम को जिम्मेदार ठहराकर कैराना में सारे हिन्दुओं को बाहर जाने पर मजबूर करने का आरोप, मुस्लिम गिरोहों पर लगाकर मुस्लिम कसाइयों पर सांस्कृतिक मूल्यों को नष्ट करने और राज्य में मुस्लिम युवकों द्वारा हिंदू महिलाओं को अपने जाल में फंसाने के बारे में सरासर झूठ बोला था । इन सभी में यही कहानी दोहराई गई की विपक्षीदल मुस्लिम का साथ दे रहे हैं । भाजपा हिंदुओं के है तो अधिकारों, मूल्यों और संस्कृति की रक्षा करेगी और इसके लिए उसे उनके वोट चाहिए । ये बहुत ही सोचा समझा वोट बांट नहीं या फिर राजनीतिक भाषा में कहें तो रविकरन करने का प्रयास स्वार्थ भरा और खतरनाक प्रयास था । मुसलमानों के तुष्टिकरण का मुद्दा उच्च स्तर पर पार्टी नेतृत्व नहीं चुना था । पीलीभीत में डूमंड कॉलेज के मैदान नहीं जब अमित शाह का हेलीकॉप्टर उतरा हूँ । उनका सम्मान शहर के सिख समुदाय नहीं किया था । उन्होंने जहाँ को पगडी बांधे प्रधानमंत्री और शाह ने इस तरह की रियायत मुस्लिम टोपी पहनने के लिए नहीं दी थी । अपने भाषण के दौरान केंद्र सरकार के रिकॉर्ड का बचाव और सपा के रिकॉर्ड की आलोचना के बादशाह ने हमले की दिशा बदली । उन्होंने सवाल किया, क्या आपको अखिलेश के वायदे के अनुसार लेपटॉप मिले? उन्होंने ही जवाब दे दिया, आपको नहीं मिलेगा क्योंकि आपकी जाती सही नहीं थी । आपको नहीं मिला क्योंकि आपका धर्म सही नहीं था कि आप की लडकियों को अखिलेश के वायदे के अनुसार छात्रवृत्ति मिली । साथ ही शाह ने जोडा नहीं आपको नहीं मिला क्योंकि आपका धर्म सही नहीं है । इसके समर्थन में जोरदार आवाज केसरी आधारत युवकों के एक छोटे से समूह से आई जिन्होंने जय श्री राम का उद्घोष किया । शाह उन अंतर्निहित भावनाओं को बनाने को उभार रहे थे जिन्हें सोम और चौहान ने तैयार और पल्लवित किया था । वो था सपा के शासनकाल में भेदभाव परन्तु सोम और चौहान के दावों की तरह ये पूरी तरह तथ्यों पर आधारित नहीं थे । कुल मिलाकर लेपटॉप वितरण निष्पक्ष और भेदभाव नहीं था । चुनाव प्रचार के अंतिम क्षणों में अखिलेश यादव ने उन छात्रों के नाम लेने शुरू किए ऍफ मिले थे और इसमें सभी जातियों और समुदायों के बच्चे और युवा वेस चावल थे । परन्तु शाह की बात लोगों के मन भी बैठ गई और अनेक लोगों को ये विश्वास हो गया । इस सपा सरकार मुसलमानों की हितैषी है । इसके लिए कोई और नहीं बल्कि सपा खुद ही दोषी है क्योंकि पार्टी ने अल्पसंख्यकों के वोटों को आकर्षित करने के लिए मुलायम सिंह के समय से ही बहुत ही गर्व के साथ ये छडी बनाई थी जो अब ऐसे वक्त में उस पर भारी पडने लगी जब एक राजनीतिक ताकत सुनियोजित तरीके से बहुमत के मतों को अपनी और करने में जुटी हुई थी । चाहने दूसरी जगह भी जनसमूह में यही संदेश गहराई तक पहुंचाया । पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा ने दो हजार चौदह के चुनाव में सफाया कर दिया था । दंगों के बाद समाज का ध्रुवीकरण हो गया था । हिंदू मुस्लिम के बीच दूरी बढ गई थी और विशेष कर जाटों ने बढ चढकर भाजपा को वोट दिया था । और अंतर इस बार ऐसा लग रहा था कि कई कारणों से चाट पार्टी से नाराज है । भाजपा को लेकर ये मानना जाट समुदाय को केंद्रीय अन्य पिछडे वर्गों की सूची में शामिल कराने के प्रति अनिच्छा या असमर्थता, हरियाणा में जाटों के प्रति उसका रवैया और एक गैरजाट को राज्य का मुख्यमंत्री बनाना । दंगों में आरोपी बने चार युवकों को जेलों से रिहा कराने में उसकी असमर्थता । चौधरी चरण सिंह के प्रति उसका अनादर जिनकी जयंती पर प्रधानमंत्री ने ट्वीट नहीं किया था और जिनके परिवार को दिल्ली में लुटियन क्षेत्र के बंगलों से बेदखल कर दिया गया था । इसके साथ ही मुस्लिम समुदाय के साथ करार अभी भी बनी हुई थी । जो कुछ भी हुआ उसके लिए दोनों समुदाय एक दूसरे पर दोषारोपण कर रहे थे । मुस्लिम समुदाय चार्टों को हमलावर हिंसा के लिए जिम्मेदार और हजारों लोगों के विस्थापित होने की वजह से उनके शिविर में रहने के लिए बाध्य करने वालों के रूप में देखते थे । जाटों का कहना था कि मुस्लिम समुदाय नहीं लडाई शुरू की और बजकर भी निकल गए क्योंकि लखनऊ में उनकी ही सरकार थी जिसने उन्हें राहत प्रदान कर के सिर पर बैठा और उन्हें ही अपने समुदाय के युवकों की गिरफ्तारी के लिए जिम्मेदार ठहराया । उत्तर प्रदेश में पहले चरण का मतदान होने से एक दिन पहले अमित शाह का एक वीडियो टेप लीक हुआ । उन्हें दिल्ली में जाट नेता और केंद्रीय मंत्री चौधरी वीरेंद्र सिंह के आवास पर जांच समुदाय के नेताओं से बात करते सुना गया । जाट समुदाय से पुरजोर अपील कर रहे थे तो वही भाजपा के साथ ही डटे रहे हैं और वायदे कर रहे थे । उन्होंने उन सभी से एक साधारण सवाल पूछा यदि हम हार गए तो कौन जीतेगा? लोगों के फुसफुसाहट सुनाई पडी ये गठबंधन शाहने जवाब दिया सपा गठबंधन कौन बनेगा मुख्यमंत्री और आपको क्या मिलेगा? इस बार किसी को जोर से जवाब देते सुना गया मुजफ्फरनगर के दंगे । इस रिकॉर्डिंग में शाह ने कुछ समय बाद फिर सवाल दोहराया, इतिहास होने वोट नहीं देंगे तो क्या होगा? भाजपा हार जाएगी इस पट्टी पर हम आप पर ही निर्भर है । हम आपका बगैर जीतने की बात सोच भी नहीं सकते । लेकिन बिरादरी बिहार जाएगा । उनके बारे में सोचिए तो सत्तासीन होंगे उन सब के बारे में सोच ये जो उन्होंने बिरादरी के लिए क्या सोचिए की वह बिरादरी का क्या करेंगे, ये कहाँ छोड दिया गया? परंतु शाह ये संकेत जरूर दे दिया । सत्ता में कौन आ रहा है और ऐसा नहीं था कि शाह सिर्फ एक पार्टी और एक नेता का जिक्र कर रहे थे । जाट समुदाय को फैसला करना था कि वे किसी अधिक ना पसंद करते हैं मुस्लिमों और उन दलों को जिन्होंने उनकी हिमायत की या फिर भाजपा को एक अन्य चुनावी सभा में वो और अधिक मुखर थे और उत्तर प्रदेश को कसाब, कांग्रेस, समाजवादी पार्टी साफ और बहुजन समाजवादी पार्टी बहुत के खिलाफ चेतावनी दे रहे थे । ये न सिर्फ प्रतिद्वंद्वी दलों को मुसलमानों के साथ जोडता है बल्कि उस पाकिस्तानी से भी जोडता है जो मुंबई हमले में अपनी भूमिका की वजह से भारत में आधुनिक आतंकवाद की परिभाषा बन गया । अच्छा ठीक वही कर रहे थे जो पार्टी की मशीन रही चुनावी मैदान में कर रही थी । हिन्दू को उद्वेलित करना और मुसलमानों को संधि का प्रतीक बनाना और सभी दूसरे दलों को सिर्फ मुस्लिमों और संभावित आतंकवादियों के विदेशी के रूप में दिखाना । संदेश स्पष्ट था । उत्तर प्रदेश को मुसलमानों से बचा नहीं और इस तरह उत्तर प्रदेश को आतंकवादियों से बचाने के लिए हिन्दुओं को जागरूक होना पडेगा और भारतीय जनता पार्टी को वोट देना होगा । यदि प्रतिद्वंदियों को मुसलमानों के मददगार के रूप में पेश करना था । भाजपा के लिए भी शुद्धता बनाए रखना महत्वपूर्ण है, जहाँ के नेतृत्व में भाजपा ने एक भी मुसलमान को पार्टी का टिकट नहीं दिया । उधर आलोचकों के लिए ये पार्टी की कमजोरी थी । इससे वह सब पर लक्षित हो रहा था । पार्टी ने क्या गडबडी है और इसलिए ये भाजपा को कटघरे में खडा करने की एक वजह भी थी । पार्टी के निष्ठावान और उसकी वैचारिकता से संबंध लोगों का मानना था । ये पार्टी की शक्ति का प्रतीक है । पार्टी का आधिकारिक स्पष्टीकरण साधारण सा था । प्रत्याशियों के जीतने की क्षमता के आधार पर फैसला करते हैं । मुस्लिम में कोई भी जीतने योग्य उम्मीदवार नहीं था । मुसलमानों ने पार्टी को वोट नहीं दिया था और ये अपेक्षा करना ही गलत और भोलापन होगा की पार्टी उन्हें टिकट देंगे । दो हजार चौदह के चुनाव के तुरंत बाद में अशोक सिंघल के यहाँ गया था । छियासी वर्षीय सिंगल भाजपा से संबंध रखने वाले एक मीडिया उद्यमी के साथ बातचीत कर रहे थे । मेरी उपस् थिति में उनसे कहा, आपके संबंधों मुसलमानों से भी है । उनसे कह दीजिए, दो हजार चौदह में दिखा दिया है कि मुस्लिम समर्थन के बगैर भी चुनाव जीते जा सकते हैं । यही समय है कि वे इससे समझे और हिंदू भावनाओं का सम्मान करें । सिंघल ने विस्तार से कहा, बहुत लंबे समय तक मुस्लिम ये समझते रहे कि राष्ट्र पर उनका वीटो है परंतु इसमें भी हिन्दुओं को संगठित कर दिया है । आज हिंदू एकजुट हो गए । सात सौ साल बाद एक स्वाभिमानी हिंदू दिल्ली पर राज कर रहा है और मुस्लिम अब अप्रासंगिक हो गए हैं । ये उनके लिए झटका है । अवस्थिति बदल गई है । सिंगल का दो हजार सोलह में देहांत हो गया, लेकिन उनका नजरिया फल फूल रहा है । दो हजार सत्रह के चुनाव के बीच में भाजपा के एक नेता ने लखनऊ में सिंगल के विचारों को दोहराया । हम मुस्लिम विरोधी द्रवीकरण चाहते हैं । दूसरी तरह का नाटक क्यों? हम मुस्लिम को एक टिकट देकर दिल्ली वालों को खुश करने में यकीन नहीं करते हैं । जहाँ तक मुसलमानों की बात है वो भी जानते हैं कि वे किसे वोट नहीं कर रहे हैं । लखनऊ के अहमद नगर पार्क में एक युवा मुस्लिम कहता है कि वह नरेन्द्र मोदी को दो हजार दो के लिए कभी माफ नहीं करेगा । देवबंद में एक मुस्लिम छात्र ने कहा तो वो सोचता था ये मोदी ने सुधार हुआ है । लेकिन योगी और साक्षी महाराज के बयानों पर वो नाराज हो जाता है । बरेली में सबसे प्रभावशाली मकसदों में एक दरगाह है । हालत हजरत के मौलानाओं का कहना था कि समान नागरिक संहिता और हाल ही में तीन तलाक के मसले पर भाजपा के रुख ने उन्हें बहुत आहत किया है । झांसी में एक मुस्लिम कारोबारी ने कहा कि मोदी के सत्ता में आने से वह परेशान नहीं है क्योंकि इस भय के बावजूद की बहुत खून खराबा होगा लेकिन उनके प्रधानमंत्रित्वकाल नहीं । कोई दंगा नहीं हुआ है । लेकिन परेशानी ये है कि जब भाजपा सत्ता में होती है तो मुसलमानों की सरकार तक कोई पहुंच नहीं होती । कोई सुनवाई नहीं, कोई आवाज नहीं कानपुर देहात के अकबरपुर बाजार में एक मुस्लिम मैकेनिक में इस पर विस्तार से कहा, भाजपा हम सभी को मार नहीं सकती तो हमें पाकिस्तान भी नहीं भेज सकते । वो सिर्फ सत्ता से बाहर रखना चाहते हैं । उन्होंने अलग रखना चाहते हैं । वो हमें गुलाम बनाना चाहते हैं । विश्व भर में प्रभावशाली एक और इस्लामी मगर से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के देवबंद में एक मुस्लिम धर्मगुरु का एक अलग ही नजरिया था । उनका कहना था कि भाजपा को खुद ही मुसलमानों के वोट नहीं चाहिए क्योंकि वे हमें एक समस्या के रूप में दिखाकर सभी को एकजुट करना चाहते हैं । ऐसी स्थिति में किसी प्रकार की वार्ता कैसे हो सकती है । लेकिन जब मुस्लिम जानते हैं कि वे भाजपा को वोट नहीं देंगे इसलिए इसका ये तात्पर्य जरूरी नहीं है कि उन सभी ने एक साथ वोट देने या भाजपा को हराने की योजना तैयार की है । वैसे अनेक साक्ष्य उपलब्ध हैं । मुस्लिम समुदाय में भी शहरी ग्रामीण जाति वर्ग और दलीय समीकरण के आधार पर विखंडन होता है और कांग्रेस और सपा दोनों के गठबंधन तथा बसपा द्वारा मुस्लिम मतदाताओं को लुभाने की कोशिश के कारण मुस्लिम मत बढ गए । मुस्लिम समुदाय का मानना था कि भाजपा को ध्रुवीकरण का अवसर प्रदान करने का खतरनाक और गहरा असर होगा । हिंदू भी संगठित होंगे । भाजपा के रणनीतिकार ने स्वीकार किया हाँ ऑपरेशन हमने इसका इस्तेमाल किया । हर कोई मुस्लिम मतदाताओं को लुभा रहा था । हमने हिंदुओं से कहा एकजुट हो जाएंगे तो हम हमेशा ही बढते हुए रहेंगे । अमेरिकी चुनाव में ट्रंप ने दिखा दिया निकले इस पहले और मुस्लिम निर्णय नहीं करेंगे । अमेरिका का राष्ट्रपति कौन होगा? श्वेत लोग ये करेंगे । यहाँ भी मुसलमान ये निर्णय नहीं करेंगे । उत्तर प्रदेश में शासन कौन करेगा? ये काम हिंदू करेंगे । उन्होंने हराना चाहते हैं । हम उन्हें और उनके दलों को पराजित करना चाहते हैं । ये संघर्ष है इस लडाई में उनका पक्ष जीता । नई विधानसभा में मुस्लिम विधायकों की संख्या में जबरदस्त गिरावट आई और उनकी संख्या किसी रह गई जबकि दो हजार बारह के चुनाव में मुस्लिम विधायक निर्वाचित हुए थे । देश के सबसे बडे राज्य में सत्ता पक्ष की सीट पर एक भी मुस्लिम नहीं था जबकि उत्तर प्रदेश में इनकी आबादी चार करोड से भी अधिक है । प्रधानमंत्री मोदी के चुनाव प्रचार में उतरने से पहले उनके कार्यालय को पार्टी से एक ईमेल मिला । इसमें उनकी जनसभाओं से संबंधित क्षेत्र का राजनीतिक महत्व मुख्य मुद्दे हैं । क्षेत्र की प्रमुख हस्तियों के संक्षिप्त इतिहास के साथ ही भाजपा द्वारा उठाए जा रहे राजनीतिक मुद्दे भी शामिल थे । प्रधानमंत्री ने स्टाॅपर एक नजर डाली और जनसभा में उठाए जाने वाले प्रमुख मुद्दों को आत्मसात कर लिया । लेकिन इस बात की कोई अपेक्षा नहीं की जा सकती । प्रधानमंत्री अपने भाषण में किसी पटकथा तक सीमित रहेंगे । प्रधानमंत्री के साथ निकटता से काम करने वाले एक अधिकारी ने उनकी वाकपटुता और विभिन्न मुद्दों को जनता के सामने रखने में उनकी दक्षता की प्रशंसा करते हुए कहा कि वो जनसमुदाय का मूड और उसकी प्रतिक्रिया को देखते हुए बहुत ही सरल शब्दों में अपनी बात रखते हैं तो चंदा बातों की जानकारी प्राप्त कर लेते हैं परन्तु अक्सर उनका भाषण मूल ही होता है । वो बिना किसी तैयारी की ही भाषण देते हैं । अफसर जनसभा में लिए जाने वाले नामों और स्थानों के अलावा नोट से किसी तरह की मदद नहीं लेते हैं । इस सबका मतलब ये हुआ कि किसी को नहीं मालूम होता कि मोदी अपने भाषण में क्या बोलने वाले हैं । शायद ये वजह है कि अमित शाह के अलावा किसी को देश के प्रधानमंत्री द्वारा ये कहे जाने की अपेक्षा नहीं थी तो उन्होंने अवध इलाके में तीसरे चरण के मतदान के दौरान नहीं फरवरी को फतेहपुर में कहा था । मोदी ने हमेशा की तरह ही भारत माता की जय के उद्घोष के साथ अपना भाषण शुरू किया । जनता ने भी हमेशा की तरह ही पूरे जोश के साथ इसका प्रस्तुत कर दिया । इसके बाद उन्होंने मंच पर उपस्थित सभी पदाधिकारियों के नाम लिए । ये मंच पर उपस्थित नेताओं के महत्व को दर्शाने का सामान्य तरीका है और जनसमूह को ये आभास चलाना के मंच पर विभिन्न समुदायों के नेतागणों का प्रतिनिधित्व है । उसके बाद जिले से चुनाव लड रहे प्रत्याशियों का परिचय कराया । प्रत्येक उम्मीदवार आगे आया और उसके बगल में खडा हुआ जहाँ पार्टी का चुनाव चिन्ह कमल लहरा रहा था । प्रधानमंत्री विकास की गंगा वायदा करते हैं । वो सपा कांग्रेस गठबंधन का मजाक भी बनाते हुए उनकी अवश्यंभावी पराजय के बारे में बोलते हैं और सपा पर पुलिसथानों को पार्टी कार्यालय में तब्दील कर रहे हैं तथा अपराधियों को संरक्षण देने का आरोप डालते हैं । किसानों का कर्ज माफ करने की प्रतिबद्धता करने और केंद्र सरकार द्वारा शुरू किए गए दूसरे विकासकार्य के बारे में बोलते हैं । परन्तु मोदी ने अपने पैंतीस मिनट के भाषण नहीं तुष्टीकरण की राजनीति का एक बार भी जिक्र किया । बगैर ही अपने ही अंदाज बहुत ही विस्तार से सब कुछ कह डाला । प्रधानमंत्री ने कहा, हम सबका साथ, सबका विकास में विश्वास करते हैं । सभी के साथ न्याय होना चाहिए । उज्ज्वला योजना के अंतर्गत हमने रसोई गैस के सिलेंडर वितरित किए । हमने ये नहीं कहा कि मोदी चुकी बनारस से सांसद हैं इसलिए सिर्फ बनारस के निवासियों को ये मिलेगा नहीं । उत्तर प्रदेश के प्रत्येक कोने कोने में रहने वाले व्यक्ति को ये मिलेगा । हमने ये नहीं कहा कि सिर्फ हिन्दुओं को ही मिलेगा, मुस्लिम लोगों को नहीं मिलेगा । सभी को ये मिलेगा लाइन में लगे प्रत्येक व्यक्ति को मिलेगा । हम ने ये नहीं कहा कि इस जाती को मिलेगा और इस जाती को नहीं मिलेगा । नहीं । गांव की सूची के अनुसार नंबर आने पर प्रत्येक व्यक्ति को ये मिलेगा और प्रत्येक व्यक्ति के अधिकारों को आने वाले दिनों में पूरा किया जाएगा । मेरा पराया नहीं चलता । सरकार को ऐसा करने का कोई अधिकार नहीं है । और इसी वजह से मोदी ने कहा कि उत्तर प्रदेश में भेदभाव, पक्षपात उसकी सबसे बडी समस्या है । अन्याय की जड यही पक्षपात है । आप मुझे बताएं यहाँ पक्षपात है या नहीं । जनता ने जोर से कहा हाँ, मोदी ने अपना भाषण जारी रखा । मैं हैरान हूँ । उत्तर प्रदेश में आप एक दलित से पूछे और वह कहता है, मुझे मेरा हिस्सा नहीं मिलता । अन्य पिछडे वर्ग से ले जाते हैं । ओबीसी कहते हैं कि हमें हमारा हिस्सा नहीं मिलता, ज्यादा उसे ले जाते हैं । यादवों से पूछे वो कहते हैं, जो परिवार से जुडे हैं सिर्फ उन्हें ये मिलता है और बाकी मुस्लिमों में चला जाता है और यहाँ तक कि हमें भी नहीं मिलता । हर व्यक्ति शिकायत कर रहा है कि पक्षपात काम नहीं कर सकता । हर एक को उसके अधिकारों के अनुसार मिलना चाहिए । यही है सबका साथ सबका विकास और भाजपा इसके लिए प्रतिबद्ध है और फिर अपनी बात के संदर्भ और दर्शन की भूमिका बांधने के बाद मोदी ने नॉकआउट पाँच हमारा इसके बारे में निश्चित ही वो जानते थे । ये दो हजार सत्रह के चुनाव का संघर्ष का नारा बन जाएगा । इसीलिए किसी गांव में कब्रिस्तान बनता है तो एक शमशान घाट का निर्माण भी होना चाहिए । यदि रमजान के अवसर पर बिजली आपूर्ति की जाती है, दिवाली पर भी उपलब्ध कराई जानी चाहिए । होली के अवसर पर बिजली की आपूर्ति की जाती है तो ईद के मौके पर भी की जानी चाहिए । इसमें किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए कि सरकार का कर्तव्य है कि वह पक्षपातरहित प्रशासन उपलब्ध कराए, न धर्म के आधार पर, न कभी जाति के आधार पर और नहीं । कभी ऊच नीच के आधार पर किसी प्रकार का न्याय नहीं होना चाहिए । यही है सबका साथ सबका विकास । ये एक असाधारण मैं तो वाला भाषण था । इसे पूरा पढिए । संदर्भ से हटकर इसका एक भी शब्द नहीं था । मोदी ने सही धर्म पर बहस के लिए तैयार नहीं किया था । जाती परहेज के लिए नहीं । भाजपा के अतिप्रिय शब्द पुष्टिकरण के लिए तैयार किया था बल्कि इससे सरकार के संवैधानिक कर्तव्य को ध्यान में रखकर तैयार किया था कि सभी नागरिकों से एक समान व्यवहार हो । कई लोग ये तर्क दे सकते हैं कि मोदी खुद मुख्यमंत्री के रूप में दो हजार दो गुजरात में ऐसा करने में विफल रहे परन्तु फतेहपुर में उनकी अपील ऐसी भाषा में कडी हुई थी जो आपत्तिजनक थी । लेकिन जब से उस राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में रखते हैं इसमें ये कहा जा रहा था तो मोदी का इशारा एकदम स्पष्ट था । मोदी ने जो कहा था और सरधाना नहीं, संगीत मोम नहीं । अमरोहा में चेतन चौहान ने जो कहा था और जो पार्टी के मुखिया अमित शाह पीलीभीत ने कहेंगे उन में कोई विशेष अंतर नहीं था । इसका मकसद ही हिंदुओं में उसके लिए कडवाहट पैदा करनी थी जो उन्हें नहीं मिल रहा था । उसमें असंतोष का ये भाव पैदा शर्मा था कि मुस्लिमों को सिर पर चढाया जा रहा है । उसका मकसद बाकी सभी राजनीतिक दलों, धर्म आधारित हितों की हमारे करने वाले दलों के रूप में पेश करना था । आम नागरिकों और भेदभावरहित शासन के नाम पर इसका मकसद समुदायों को बांटना था । और जैसा कि दूसरों ने दावा किया, मोदी के तरफ भी पूरी तरह साक्ष्यों पर आधारित नहीं थे । मतलब ऐसा कोई संकेत नहीं था की सरकार ने जानबूझकर निर्बाध रूप से बिजली की आपूर्ति सुनिश्चित करके ईद को होने दिया और दूसरे त्यौहार में ऐसा नहीं करके बाधा डाली । जैसे ही ये संदेश नीचे तक पहुंचा उनकी कब्रिस्तान, शमशान, रमजान, देवाली और किस तरह से सरकार दूसरे की कीमत पर पहले की हिमायत कर रही है, जैसी तुलना की शब्द रचना सबसे अधिक लोकप्रिय हो गई । इस की इस तरह व्याख्या की गई इस सरकार इस तरह से हिंदुओं की तुलना में मुसलमानों का पक्ष दे रही है और इसी वजह से इस ने सरकार के खिलाफ ही नहीं बल्कि दूसरे समुदाय इस मामले में मुस्लिम के खिलाफ भी लोगों में गुस्सा पैदा कर दिया । मिर्जापुर बाजार में एक कुर्मी कारोबारी राम पटेल ने मुझसे कहा, मोदी सही कह रहे हैं, सब मुसलमानों के लिए कम हो रहा है । मोदी जैसी कुशाद राजनीतिक बुद्धि वाला व्यक्ति ही जनता था की संदेश को किस तरह सुना जाएगा । उसने काम किया । मोदी का संदेश और भाजपा का बहुत संदेह, विशेष रूप से । इस विषय पर दो हजार चौदह और दो हजार सत्रह में दोनों में क्यों देख पूजा मैंने दिन से अधिक समय उत्तर प्रदेश में बताया । इसमें पूरा एक महीना चुनाव के दौरान, दो हजार सोलह के अंदर और दो हजार सत्रह के शुरू का समय शामिल था । मैंने राज्य के प्रत्येक क्षेत्र का और अक्सर कई बार दौरा किया और मेरी मुलाकात प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में सैकडों व्यक्तियों से हुई । परन्तु अपने इस पूरी यात्रा के दौरान मैंने एक भी हिंदू से इतने लंबे समय तक राष्ट्रीय राजनीति को परिभाषित करने वाला धर्मनिरपेक्षता शब्द बोलते नहीं सुना है । मुस्लिम हूँ लगातार शब्द का इस्तेमाल करते थे । वे ललक के साथ धर्मनिरपेक्ष दलों की और देखते थे और उसमें कांग्रेस, सपा और यहाँ तक कि कुछ हद तक बसपा को भी इसमें शामिल करते थे । राजनीतिक दल भी कभी करी अल्पसंख्यकों से वोट की अपील करते समय शब्द का इस्तेमाल करते थे परन्तु यहाँ तक कि वे हिंदू जो भाजपा को वोट नहीं देते थे, सपा परिवार के थे जो पारंपरिक रूप से बसपा के साथ थे तो कांग्रेस के साथ उसके पास अपने दलों का समर्थन करने के लिए अपने अपने कारण थे । इन कारणों में उन्होंने कभी भी धर्मनिरपेक्षता को नहीं गिराया । रोज मर्रा की राजनीतिक परिचर्चा हूँ, धर्म निरपेक्षता के खत्म होने की वजह जानने के लिए और गहराई में जाकर जांच पडताल की आवश्यकता है । एक अच्छा विषय बन सकता है । किस प्रकार संघ का दशकों से चल रहा अनवरत सांप्रदायिकता का प्रचार अंततः अब इसके परिणाम दे रहा है । इसके संकेतों का पैमाना और कई बार सीधे धूर्तता, संदेशों के प्रसार के लिए प्रौद्योगिकी और संगठानात्मक नेटवर्क का इस्तेमाल । ये संदेश आंशिक रूप से ही सही और कई बार एकदम हालत होते थे और उस व्यवस्था तरीके नहीं जिसमें पार्टी प्रधानमंत्री से लेकर मतदान केन्द्र के कार्यकर्ता काम करते हैं । बातचीत के तरीके को ही पूरी तरह बदल कर रख दिया है । एक नजर ये ये भी हो सकता है ये दलों की प्रशासनिक और शासन की विफलता है । इसमें सार्वजनिक रूप से खुद को धर्मनिरपेक्षता के विचार से संबद्ध करके धर्मनिरपेक्षता को ही कलंकित कर दिया हूँ । ये भी दृष्टिकोण हो सकता है कि शब्द का प्रयोग खत्म होने का काम कर रहे हैं । ये नहीं है कि लोगों को सद्भाव, सहिष्णुता के श्रद्धान और धर्म के मामले में सरकार की तटस्थता प्रिया नहीं है । क्या वे प्रतिगामी हो गए? लेकिन एक सबसे प्रभावशाली तर्क ये भी हैं कि उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में धर्मनिरपेक्ष दलों ने खुद ही अल्पसंख्यकों से वोट की अपील करके धर्मनिरपेक्षता के विचार को ही कमतर कर दिया । जितना अधिक उन्होंने ये किया, उतना ही अधिक इसने हिन्दुओं को एकजुट करने के लिए भाजपा को अवसर प्रदान किया । निश्चित ही बिहार के दो हजार पंद्रह के चुनाव के नतीजे दर्शाते हैं । यदि विपक्ष सही तरीके से अपनी राजनीति करें, पैसा नहीं है । हिन्दू कार्ड के आधार पर चुनावी जीत हो, टाला नहीं जा सकता हूँ । लालू प्रसाद यादव जैसे बिहार चुनाव को अगडे बनाम पिछ्डे की शक्ल देने की उम्मीद करते हैं, वैसे ही भाजपा चुनाव को हिंदू बना मुस्लिम बनाना चाहती है । यदि हिंदू एकजुट होते हैं तो खेल खत्म हुआ । ईमानदारी से कहा जाए तो धर्म का इस्तेमाल करना उनके लिए कोई नई बात नहीं । नहीं नीतीश लालू कांग्रेस गठबंधन मुस्लिम मतों की एकजुटता सुनिश्चित करने न कि दो हजार चौदह की तरह ठंडी कर रहे हैं, के इरादे से ही बनाया गया था । ऐसा करने के लिए पार्टी यानी भारतीय जनता पार्टी ने ध्रुवीकरण की भाषा का इस्तेमाल किया । अमित शाह ने घोषणा की, यदि भाजपा चुनाव हार गई, पाकिस्तान में दिवाली मनाई जाएगी, एक पर्यवेक्षक के लिए चुनाव के दौरान कहीं जाने वाली सामान्य बात हो सकती है । मंत्री इस बयान के कहीं मायने थे । इसमें पहले तो इस तरह से पेश किया कि भाजपा एक पार्टी के रूप में भारत की रक्षा कर रही है । इसमें ये तथ्य भी छिपा था । चुनाव मैदान में उतरे दूसरे दल राष्ट्रविरोधी थे तो इसमें अपने जनाधार को भेजा गया । दूसरा छुपा हुआ मतलब और ज्यादा स्पष्ट था । यह कोई छुपी हुई बात नहीं है । राज्य में पर्याप्त संख्या वाली अल्पसंख्यक आबादी चाहती थी कि भाजपा चुनाव आ रहे हैं और इसलिए बिहार के मुसलमान भाजपा की हार का जश्न मनाएंगे । कट्टरपंथी हिंदुओं की परिकल्पना में भारतीय, मुसलमान और पाकिस्तानी एक जैसे थे और इसलिए भाजपा की पराजय का जश्न पाकिस्तान में मनाया जाएगा । शाह ने संघ कि उस तकनीकी व्यवस्था को अपनाया था जिसमें राष्ट्रवाद और धर्म को मिलाकर तथा अकेले खुद को राष्ट्र के एकमात्र रक्षक के रूप में पेश किया जाता है । उन्होंने उत्तर प्रदेश के चुनाव में कसाब का जिक्र करके एकदम यही किया था । भाजपा ने बीस कार्ड भी खेला है । उत्तर प्रदेश के दादरी में सितंबर दो हजार पंद्रह में मोहम्मद अखलाक को कथित रूप से गौमांस का सेवन कर रहे हैं और इसे घर में रखने के कारण उग्र भीड ने बीट बीट कर मार डाला था । भाजपा ने दावा किया, ये कानून और व्यवस्था का मामला था । पड चुकी कानून व्यवस्था राज्य का विषय था । इसलिए इसमें वह बहुत अधिक कुछ नहीं कर सकती थी परन्तु उससे संबद्ध संगठन कथित हत्यारों के बचाव में कूद पडे और उन्होंने सारा ध्यान हत्या की बजाय गोमांस के मुद्दे पर ही केंद्रित किया । इस हत्या के तुरंत बाद लालू प्रसाद यादव ने अपने भाषण नहीं कहा था । हिन्दू भी गोमांस खाते हैं और उन्होंने संघ और भाजपा को चेतावनी दी थी इस मुद्दे का सांप्रदायीकरण नहीं करें । भाजपा को इतना मौके की गंधा । पार्टी ने तत्काल आकलन किया कि महागठबंधन को कोवर और उसके मांस के सेवन का बचाव करने वालों के रूप में पेश करने से हिंदुओं और यादवों को भी लालू से दूर कर सकता है । मोदी ने स्वयं भी कहा, इस टिप्पणी ने यदुवंशियों का अपमान किया है । लालू भी तत्काल इस कथन से पीछे हट गए । फिर भी इन प्रयासों के बावजूद और जिसे लालू प्रसाद के कैंप में भी अधिकांश लो बहुत बडी भूल के रूप में देख रहे थे । हिंदू कार्ड बिहार में नहीं चला हूँ । क्यों हो भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने इसका स्पष्टीकरण दिया । पहले तो आपको समझना होगा कि बिहार उत्तर प्रदेश नहीं है । उत्तर प्रदेश में ध्रुवीकरण का इतिहास रहा है । अयोध्या, काशी, मथुरा सभी वहाँ है । भागलपुर के उम्मीद तो नौ उसी के दंगों के बाद बिहार में कोई बडा दंगा नहीं हुआ । विभिन्न समुदायों के बीच संबंध बहुत अधिक कटुतापूर्ण नहीं है । हमें इस सब के बारे में ध्यान देना चाहिए था परन्तु ये सिर्फ अंतर समुदाय समीकरण नहीं था । ये राजनीति थी नीतीश कुमार हमेशा से ही चौकस नहीं की । वो स्वयं को मुसलमानों के नेता के रूप में पेश नहीं करें तो किसी भी कीमत पर उनके हितों की खाते हैं, किसी भी सीमा तक जा सकता है । उन्होंने मोदी से संबंध तोडकर उनका विश्वास जीत लिया था तो उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह की जा रहे उन्हें कभी नहीं सिर्फ समुदायके नजदीकी के रूप में नहीं जाना गया था । इसने पुष्टिकरण की भाषा के प्रयोग और सरकार द्वारा हिंदुओं की तुलना में मुसलमानों का अधिक पक्ष लेने जैसे मुद्दे के इस्तेमाल को भाजपा के लिए बहुत ही मुश्किल बना दिया था । लालू प्रसाद का मामला अलग था । उनकी राजनीति ही मुस्लिम यादव गठबंधन पत्ते की थी और वो मुस्लिम मुद्दों पर काफी प्रखर भी रहे हैं । परन्तु दो हजार पंद्रह में उनकी आलंकारिक भाषा में नरमी आ गई थी और चुनाव के अधिकांश समय वो धर्मनिरपेक्ष सांप्रदायिक की बहस में पडने से दूर ही रहे । राजद के एक प्रमुख नेता ने इस बारे में सफाई दी । मुस्लिम नेता हमारे पास आए थे और उन्होंने हमसे साफ शब्दों में कहा, वे गठबंधन के साथ रहेंगे । हमें उन के बारे में चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है और फिर उन्होंने कहा कि हमारे बारे में बात मत कीजिए । इससे उन्हें हिन्दुओं को एकजुट करने में मदद मिलेगी । दूसरे विषयों के बारे में बात कीजिए । हम चुप रहेंगे, आएंगे और आपको वोट करेंगे । भाजपा भी चुनावी मैदान में ये देख रही थी । यही नहीं पर्याप्त संख्या में मुस्लिम माओवादी वाले कटिहार और अररिया जैसे निर्वाचन क्षेत्रों में गठबंधन ने भाजपा को इस चुनाव को हिंदू बनाम मुस्लिम का रंग देने से रोकने के इरादे से हिंदू प्रत्याशी खडे किए । इसमें सफलता मिली । मुसलमानों ने गठबंधन के हिंदू प्रत्याशी को वोट दिए । भाजपा के एक नेता ने इस की प्रशंसा करते हुए स्वीकार किया वो इस तरह की चतुराई से मतों के ध्रुवीकरण को रोकने में कामयाब रहे । इस सब का नतीजा ये हुआ कि भाजपा की पाकिस्तान और गोमांस की रणनीति उल्टी पड गई । उन्होंने सिर्फ हिंदुओं को एकजुट करने में विफल हो गई बल्कि इसमें मुस्लिमों को एकजुट होने और अधिक आक्रमक तरीके से वोट करने में मदद की । किसी भाजपा नेता ने कहा, वैसे भी वो गठबंधन के साथ ही होते हैं परंतु हमारी आप प्रवक्ता ने उन्हें असुरक्षित बना दिया । बडी संख्या में मतदान करने आए और बडी चतुराई से खामोश भी रहे । ऐसी कोई निश्चित फार्मूला नहीं है । भाजपा के हिंदू कार्ड नहीं सुनंदा परिस्थितियों में पार्टी के लिए जबर्दस्त काम किया था । मगर बिहार में ऐसा नहीं हुआ । बिहार के राजनीतिक परिदृश्य की विलक्षण कहाँ के अलावा इस संकेत भी देता है? सिर्फ हिंदू कार्ड ही पर्याप्त नहीं है और ये बेहद जटिल समस्या का एक अंश हो सकता है । हालांकि बिहार का अनुभव ये भी बता रहा है किस तरह से समाज और राजनीति बदल रही है । बिहार में धर्मनिरपेक्ष दल अपनी धर्मनिरपेक्षता का ढोल पीट कर नहीं बल्कि इससे कम महत्व देकर चुनाव जीते । सार्वजनिक रूप से अल्पसंख्यकों की अपेक्षाओं की चर्चा करके नहीं बल्कि खामोशी के साथ । इस पर फैसला करके जीते । महागठबन्धन को मुस्लिम मतों के बारे में भरोसा दिलाया जा चुका था और उन्हें इसके लिए प्रतिस्पर्धा नहीं करनी पडी और इसे इसी तरह से चलने दिया । उत्तर प्रदेश में धर्मनिरपेक्ष दलों ने अपने धर्मनिरपेक्षता के मुद्दे को बखूबी उछाला । दो धर्मनिरपेक्ष वोटों पर सपा और सपा कांग्रेस उन्ही मुस्लिम मतों के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं जिनके लिए उनकी आक्रमक अपेक्षाएँ थी । इसने भाजपा को इसका जवाब करने का अवसर प्रदान किया । एक सिद्धांत के रूप में धर्मनिरपेक्षता का अंत होने का अपने आप में एक गंभीर चुनावी नेता है और यदि भाजपा की असाधारण से निकल बहुसंख्यक परस्त राजनीतिक परियोजना इसकी एक वजह है तो धर्मनिरपेक्षता को महज अल्पसंख्यक मतों तक सीमित कर देने की धर्मनिरपेक्ष दलों की भूमिका इसकी दूसरी वजह है । उत्तर प्रदेश के नतीजों से मजबूत हुए आरएसएस और भाजपा का विश्वास है । उनकी वैचारिक योजना सही रास्ते पर है । अंदरूनी गतिविधियों से जुडे भाजपा के एक प्रमुख नेता ने कहा, राष्ट्र का निर्माण बहुसंख्यकों की पहचान पर होता है । भारत एक अपवाद था क्योंकि उदार अभी आपके वर्ग के पास अकूत ताकत हिंदू संगठन नहीं थे । सच्चाई तो यह है कि यह हिंदू राष्ट्र है । हम जो कुछ देख रहे थे वो मतपेटियों पर यही दावा है । इस प्रारूप में सही नहीं बैठेंगे जो बहुमत के सिद्धांतों को स्वीकार नहीं करेंगे, हाशिया पर चले जाएंगे । यही संघ की पुरानी सोच रही है । हमें से चुनावी प्रक्रिया के माध्यम से ऐसा होते देख रहे हैं । वह जोर देकर कहते हैं, चुनावों के माध्यम से एक हिन्दू राष्ट्र बनने की प्रक्रिया में है । अनेक लोगों ने भी इस लडाई को इसी नजरिए से देखा । दो हजार सत्रह के विधानसभा चुनाव के बाद नई दिल्ली में खान मार्केट के एक कॉफी शॉप नहीं पश्चिमी उत्तर प्रदेश से नवनिर्वाचित एक युवा भाजपा विधायक अपनी चीज के बारे में बताता है । बडी प्रसन्नतापूर्वक कहता है, ये भारत पाकिस्तान का चुनाव था । भारत जीता हिन्दू दो हजार चौदह में जीते थे । उसके बाद अनेक राज्यों में चुनाव जीते और दो हजार सत्रह में सबसे बडे राज्य उत्तर प्रदेश पर कब्जा कर लिया ।

7. Mukhya Bhumi Se Age

मुख्यभूमि से आगे भारतीय जनता पार्टी आज भारत की प्रभुत्वशाली राष्ट्रीय पार्टी है ठीक उसी तरह जैसे ये अब सवर्ण जाति की पार्टी नहीं रह गई है । उसी तरह यह उत्तर भारतीय पार्टी भी नहीं रह गई है । हिंदी के केंद्रीय स्थल में भाजपा का मौलिक पर और जातीय स्वरूप बदल रहा है जो उसे चुनावी सफलता दिला रहा है । मूल कर्म क्षेत्र से आगे ऐसे अनेक स्थानों पर उसका विस्तार तीन मिली जुली रणनीति पर टिका है । ये हैं मौजूदा राजनीतिक अब जाते वर्ग से सहयोग, वैचारिक आधार में नरमी लाना और विशिष्ट वास्तविकताओं की व्यावहारिकता को अपनाना । भाजपा की पारंपरिक ताकत वाले क्षेत्रों से बाहर पार्टी का विस्तार करना नरेंद्र मोदी और शाह की सावधानीपूर्वक तैयार की गई योजना का हिस्सा है और प्रमुख क्षेत्रों में इस पर आरएसएस के पुराने अनुभवी और आज भाजपा के नेतृत्व में सबसे अधिक प्रभावशाली नेताओं में से एक राम माधव काम कर रहे हैं तो इस समय घरेलू राजनीति की दुनिया राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति के मामले में मुखिया बने हुए हैं । राम माधव का जब लोकसभा चुनावों के बाद पार्टी में पदार्पण हुआ तो उन्हें पूर्वोत्तर को जीतने का आदेश आप परन्तु से पहले ही एक अनअपेक्षित कम उनके सामने आ गया । राजनाथ सिंह ने जब गृहमंत्री के रूप में पदभार ग्रहण किया, पार्टी को एक व्यक्ति एक पद की अपनी परंपरा बनाए रखने के लिए अध्यक्ष पद के लिए नहीं नेता को चुनना था । इसके लिए पसंदीदा उम्मीदवारों में थे अमित शाह, जिन्होंने दो हजार चौदह में उत्तर प्रदेश में पार्टी को शानदार सफलता दिलाकर नाम अर्जित किया था और जेपी नड्डा संगठन की एक प्रमुख हस्ती थे । संघ के बडे वर्ग ने नड्डा का समर्थन किया परंतु मोदी के समर्थन से शाह अध्यक्ष चुने गए । नड्डा को तब ये चुनने का विकल्प दिया गया वो पार्टी के संगठन में ही बने रहना चाहेंगे या फिर सरकार में काम करना चाहिए । नड्डा ने दूसरा विकल्प चुना और भारत सरकार में स्वास्थ्य मंत्री बन गए । इसमें हालांकि पार्टी में रिक्त स्थान उत्पन्न कर दिया क्योंकि नड्डा जम्मू कश्मीर के पार्टी में प्रभारी थे । भाजपा को ये प्रभार संभालने के लिए एक नई व्यक्ति की तलाश थी और चाहने माधव से कहा, आज जरा देख लीजिए इस बार फिर इस पसंद की वजह से और ये माधव में संघ में बताए गए अपने वर्षों के दौरान इस राज्य का दौरा किया था और वह गुप्तचर सुरक्षा प्रतिष्ठान के बारे में अच्छी तरह जानते थे तो राज्य की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है । समस्या थी उनके पास । राज्य में चुनाव से पहले सर दो महीने का वक्त था । माधव ने दोहरी रणनीति तैयार ही जम्मू में स्थिति मजबूत करके पूरा सफाया करो और कश्मीर घाटी में अपनी उपस्थिति दर्ज करा हूँ तो बहुत ही बडा प्रतीक होगा । भारत के इकलौते मुस्लिम बहुमत वाले प्रांत में सरकार बनाने की महत्वाकांक्षा पूरी करो । घाटी में लंबे समय तक अलगाववादी आंदोलन रहा है । जो कभी अलगाववादियों का बढ रहा है, वो अलग थलग पड रहा है । वहाँ भी कुछ सीटें जीतने की उम्मीद करना । इसके लिए ऊर्जा और विस्तार की ललक जरूरी है । तो दो हजार चौदह से ही मोदी और शाह के अंतर्गत भाजपा में पर्याप्त था । घाटी में सीटों की चाह के सिलसिले में माधव एक निर्णायक मोड के बारे में स्वर्ण करते हैं और वो था पूर्व अलगाववादी नेता सज्जाद लोन का साथ आना । माधव ने कई हफ्ते इसपर काम किया और अंततः लोन के लिए प्रधानमंत्री मोदी की बैठक की व्यवस्था की । ये पूर्व अलगाववादी साफ आ गया । वो बताते हैं, हमने घाटी में मोदी जी की अपील पर भी भरोसा किया । हम चाहते थे कि वहाँ एक रैली करें । सुरक्षा एजेंसियों सहित अनेक लोग इसे लेकर काफी असहज परन्तु मैं वहाँ एक सप्ताह रोका । सज्जाद की भूमिका भी काफी महत्वपूर्ण थी और श्रीनगर में प्रधानमंत्री की रैली आयोजित कराने में सफल रहे और हाल गांव आदियों की अपील के बावजूद लोगों को नहीं सुनने आए तो याद करते हैं । यहाँ तक कि मोदी जी को भी इसकी अपेक्षा नहीं थी । जम्मू में रैली खत्म होने और श्रीनगर के लिए रवाना होने से पहले प्रधानमंत्री ने माधव को फोन किया हिट है, आना है क्या पार्टी भी से अपनी ताकत में बदलना चाहती थी? भारतीय लोकतंत्र की दुखती हुए रख रहा था जैसा की संकर शन । ठाकुर ने टेलीग्राम अखबार में लिखा था, मतदाताओं के आने की अपेक्षा मतदाताओं की अनुपस्थिति ने कश्मीर घाटी की सीट के लिए भाजपा को जोर देने पर प्रेरित किया । भाजपा के पीछे के रणनीतिकारों ने कुछ सीटों पर ध्यान केंद्रित करना शुरू कर दिया जिनके बारे में उन्हें भरोसा था कि विस्थापित मतदाताओं की अनुपस्थिति की मदद से कोई ऐसी जीत सकती है । इन सीटों में पुराने श्रीनगर की हब्बा कादल और अमीरा कदल, उत्तर कश्मीर में सोपोर शहर की सीट शामिल थे । वो ये जगह थी जहां कभी कश्मीरी पंडित बडी संख्या में रहते थे । उसके बाद भी मानव स्वीकार करते हैं कि वे अपने मिशन में सफल हुए । आपको बताते हैं मैंने कठोर परिश्रम किया था । कम से कम एक सीट तो हम घाटी में जीत चाहे हम ऐसा करने में विफल रहे । दूसरों ने ये प्रचार किया कि मोदी मत को एकजुट करते आ रहे हैं परन्तु यदि कश्मीर हमारे लिए बडा झटका था, जम्मू में भाजपा ने सफाया कर दिया और उसे विधानसभा के इतिहास में सबसे अधिक सीटें मिले । जम्मू का निवासियों के लिए अभी भी मोदी की लहर का जबरदस्त प्रभाव था जब उन्हें लंबे समय तक घाटी के प्रभुत्व को बर्दाश्त किया था और भाजपा ने इस असंतोष का लाभ उठाया और इस क्षेत्र को सत्ता में उसकी भागीदारी दिलाने का वायदा किया । हालांकि माधव इंकार करते हैं परंतु स्वतंत्र पर्यवेक्षकों का मानना था, जम्मू में राष्ट्रवाद से भरपूर जबरदस्त हिंदू असर था । चुनाव के नतीजे आए और राज्य में त्रिशंकु विधानसभा बने जिसमें पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी बहुत ही मामूली अंतर से भाजपा से आगे थी । माधव ने पहले नेशनल कॉन्फ्रेंस के साथ तालमेल स्थापित करने का प्रयास किया । भाजपा के सूत्रों ने मुझे बताया कि दिल्ली के दिल्ली रोड स्थित एक अपार्टमेंट इसी परिसर में इंडिया फाउंडेशन का कार्यालय भी है । अमित शाह और माधव ने उमर अब्दुल्ला से मुलाकात की और उन्हें मुख्यमंत्री पद की पेशकश की । भाजपा ने उमर अब्दुल्ला को तैयार करने के लिए उनके पिता फारुकअब्दुल्ला से भी संपर्क साधा परन्तु उमर, जिन्होंने भाजपा नेताओं के अनुसार बैठक में उनके साथ प्रस्ताव पर विचार किया, घाटी लौट गए और उस प्रस्ताव को ठुकरा दिया । उमर अब्दुल्ला ने हमेशा इस तरह की किसी भी बैठक के आयोजन से इनकार किया है । मानव ने इसके बाद रही पीडीपी के साथ बातचीत शुरू की । इसका मुख्य चुनावी मुद्दा भाजपा को बाहर रखना था । यह विडंबना थी कि संघ के वैश्विक परिदृश्य के इस प्रस्तुति को अब उस पार्टी के साथ एक समझौते के लिए बातचीत करनी थी जिसे अक्सर ही अलगाववाद के प्रति नरम रुख अपनाने के लिए जाना जाता रहा है । लेकिन कई महीनों बाद माधव पीडीपी के वार्ताकार हसीब द्राबू के साथ समझौता करने में सफल रहे क्योंकि दो हजार सोलह की गर्मियों और दो हजार सत्रह में घाटी में स्थिति बिगडी थी । इसलिए गठबंधन इसे लेकर पढते हुए दबाव में था । पीडीपी और भाजपा के बीच विरोधाभास तथा भाजपा की अपनी व्यापक राजनीतिक योजना और कश्मीरी अपेक्षाओं की वजह से सरकार की विश्वसनीयता खत्म होने लगी थी । अनेक लोग माधव की रणनीति पर सवाल उठाते हैं परन्तु पार्टी का तर्क था कि जनादेश में कोई और विकल्प ही नहीं बचा था । हमारी कहानी के लिए इस से अधिक महत्वपूर्ण ये था चुनाव भाजपा की आकांक्षाओं का सबूत था । इसमें मोदी लहर पर सवार होने की पार्टी की क्षमता का भी प्रदर्शन कर दिया था । राष्ट्रवाद और हिंदू जिससे भाजपा के मुख्य पहलुओं ने जम्मू के हिन्दू मतदाताओं के बीच बेहतरीन काम किया । इसमें सज्जाद लोन जैसे चरमपंथी नेता को लुभाने और उनके साथ काम करने की पार्टी की व्यवहारिकता का भी प्रदर्शन किया । लेकिन चुनाव नहीं भाजपा के विस्तार की सीमाओं को भी दिखाया । घाटी ने पूरी तरह से पार्टी को अस्वीकार कर दिया था । शेष भारत ने संघ से संबद्ध संगठनों के झगडालू पन्ने पार्टी की संभावनाओं को ठेस पहुंचा दी थी । परंतु राम माधव के लिए ये दुखद अनुभव था । ये पहला मौका था जब वो एक राजनीतिक नेता के रूप में पूरी चुनाव का बंदोबस्त दे रहे थे । माधव बताते हैं, इससे एक बडा सबक मेरे लिए ये था चुनावों का प्रबंधन भी राजनीति के प्रबंधन जैसा ही होता है । आपको प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र को अच्छी तरह समझना होगा । आपको अपने संसाधनों का प्रबंधन करना होगा । आपको ये भी जानना होगा कि कहाँ पर क्या इस्तेमाल किया जाए । आप कुछ सावधानीपूर्वक रणनीति, योजना तैयार करने और उन पर अमल करने की जरूरत है । जी सब माधव के लिए अच्छा अवसर होने वाला था, जब वे पूर्वोत्तर में भाजपा को प्रवेश चलाने के लिए अग्रदूत बनने वाले थे । दो हजार चौदह के लोकसभा चुनाव असम में नजदीक थे । नरेंद्र मोदी पूर्वोत्तर सहित पूरे देश में लगातार प्रचार कर रहे थे । भाजपा ने महसूस किया, विशेष रूप से असम चुनावी लाभ के लिए पूरी तरह तैयार है । राम माधव अभी संघ में ही थे, परंतु अक्सर इस राज्य का दौरा करते थे । चुनाव से ठीक पहले ही ऐसे ही एक दौरे में एक अधिकारी के घर पर उनकी मुलाकात कांग्रेस के नेता और कैबिनेट मंत्री मंत्री विश्वास शर्मा से हुई । गुवाहाटी भी सत्ता के गलियारे में ये किसी से छिपा नहीं था । इस शर्मा अपने बॉस मुख्यमंत्री तरुण गोगोई और दिल्ली के नेतृत्व से खुश नहीं थे । गोगोई का ये तीसरा कार्यकाल था और शर्मा खुद को राज्य में पार्टी के अगले स्वाभाविक नेता के रूप में देख रहे थे । लेकिन कांग्रेस इसका वायदा करने की इच्छुक नहीं थी । उसके बजाय गोगोई के पुत्र गौरव को आगे बढाया गया और वो लोकसभा का चुनाव लड रहे थे । माधव में इसे एक अवसर के रूप में भाग लिया और वह शर्मा के संपर्क में बने रहे । इस बैठक में माधव ने फोन पर शर्मा की बात कराई । शर्मा ने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार से कहा, मोदी साहब चिंता मत कीजिए । आप को अपनी अपेक्षा से तीन या चार सीटें ज्यादा ही यहाँ से मिलेंगे । भाजपा को राज्य में सात लोकसभा सीटें जीतनी थी और इनमें से कुछ सरमा के खामोश सहयोग से हैं । पार्टी ने दो हजार में राज्य में बारह प्रतिशत मत हासिल किए थे परंतु दो हजार चौदह के चुनाव में उसे तैंतीस प्रतिशत वोट मिले । अब भाजपा जानती थी कि वह विधानसभा चुनाव को लक्ष्य बना सकती हैं । डेढ साल बाद अगस्त दो हजार पंद्रह में पच्चीस किलोमीटर लंबे ग्रैंट रोड शो जिसमें हजारों लोग शामिल हुए । शर्मा भाजपा में शामिल हो गए तो अपने साथ कांग्रेस विधायकों को भी लाए थे । भाजपा के भीतर और संघ की स्थानीय इकाई ने इसका प्रतिरोध किया था । हम तो अमित शाह से हरी झंडी मिलने के साथ ही माधव सौं आगे बडे राज्य में एक साल बाद मई में हुए विधानसभा चुनावों में शर्मा पार्टी के लिए सबसे ताकतवर शक्ति के रूप में उभरकर आए । बहुत कम लोगों को ही इसकी जानकारी थी । दो हजार चौदह के चुनावों में शर्मा भाजपा के लिए अदृश्य शक्ति की भूमिका निभा चुके थे । माधव ने इस सत्य को स्वीकार किया कि आसान के लिए उनकी योजनाओं का ये निर्णायक मोड था । वो सिद्धांत पर काम कर रहे थे, जिस पर उनकी पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह ने हमेशा विश्वास किया और वो था जब आप अकेले नहीं जीत सकें तो उस व्यक्ति को साथ लाये तो आपको चिता सकते हैं । आपको अपने लिए आवश्यक अतिरिक्त वोट जुटाने चाहिए । विपक्ष को छिन्न भिन्न कर दीजिए और लोगों को विश्वास में लीजिए जो आपके लिए काम कर सकते हैं । माधव जिस व्यवस्था में विश्वास कर रहे थे उसमें ये श्रद्धान एकदम सही बैठ रहा था । केंद्रीय मंत्री सर्वानंद सोनोवाल पार्टी ने मुख्यमंत्री पद के चेहरे के तौर पर चुना था । पार्टी के मशीनरी और बॉर्डर से अपील करते और शर्मा जनता से अपील करते थे, ये पूर्वोत्तर की बाधा को पार करने का सही समय था । असम में भाजपा के लिए एक विचित्र विरोधाभास पेश कर रखा था । एक ऐसा राज्य था जहां संघ और पार्टी द्वारा लंबे समय से प्रमुखता से उठाया जा रहा राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा राजनीतिक महत्व का था क्योंकि इस सीमा पार से आए बांग्लादेशी विस्थापितों से जुडा था फिर भी पार्टी कभी भी इसका लाभ नहीं उठा सकी थी । ये तो असम गण परिषद थी जिसमें तीन सौ अस्सी के दशक में इसे प्रमुखता से उठाया और उसके युवा नेता प्रफुल्ल कुमार महंत को मुख्यमंत्री बना दिया और पहले के पंद्रह साल तक कांग्रेस राज्य में अपना प्रभुत्व बनाए रखने में सफल रही थी । इस राज्य में उत्तर भारत की पार्टी के लिए संगठानात्मक स्तर पर प्रतिकूल परिस्थिति रही है क्योंकि लंबे समय से विशेष रूप से उपराष्ट्रवाद की परंपरा हमेशा ही पार्टी का पीछा करती रही थी । भाजपा वैसे भी संगठनात्मक दृष्टि से कमजोर थे । गोगोई सरकार विरोधी हवा का सामना कर रहे थे परंतु वो जमीन से जुडे नेता थे जिन्होंने मुख्य कल्याणकारी योजनाओं से जनता को लाभ पहुंचाया था । कांग्रेस का यहाँ पर मतदान केंद्रों की प्रबंधन व्यवस्था भी बेहतरीन रही है । चुनाव का समय विशेष रूप से अनुकूल नहीं था । भाजपा नवंबर दो हजार पंद्रह में दिल्ली का चुनाव हार चुकी थी । प्रधानमंत्री के जोरदार प्रचार अभियान के बावजूद पार्टी बिहार चुनाव भी हार गई थी की भावना बढती जा रही थी कि मोदी अपनी राह से भटक गए थे । उनके विदेश यात्राएं मजाक का विषय बन गई थी, महंगाई बढ गयी थी, दाल की कीमतें आसमान छू रही थी और दो हजार चौदह के हर हर मोदी के नारे का स्थान अरहर मोदी ने ले लिया था । इस दौरान चुनावी दृष्टि से संवेदनशील एक जिले के मजिस्ट्रेट के पद पर सारे रहे है । एक सरकारी अधिकारी ने टिप्पणी की, कांग्रेस की जडें काफी गहरी हैं । इस बार दो हजार चौदह की हवा भी नहीं है । इस बार भाजपा के लिए मुश्किल होगी । इस पृष्ठभूमि में राम माधव और शर्मा भविष्य की रणनीति बनाने के लिए एक साथ जुडे । उनका पहला कदम सुनिश्चित करना था कि कांग्रेस पूरी तरह अलग थलग हो जाए और अकेले ही चुनाव लडे । बिहार में महागठबंधन की सफलता के बाद बिहार का मुख्यमंत्री सहित अनेक ताकतें कांग्रेस को असम में भी इसी तरह के भाजपा विरोधी गठबंधन के लिए प्रोत्साहित करने के इरादे से दबाव बना रही थी । ऐसे हर कीमत पर रोकना था और इसमें ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के नेता और धुबरी से लोकसभा सांसद बदरुद्दीन अजमल एक प्रमुख चेहरा थे । अजमल का सशक्त मुस्लिम जनाधार था और कांग्रेस तथा अजबुल के बीच गठबंधन स्पष्ट रूप से मुस्लिम मतदाताओं को एकजुट करेगा । भाजपा हरकत में आ गई और उसने ये सुनिश्चित करने के लिए कांग्रेस और अजमल के बीच इस तरह का कोई तालमेल नहीं हो । सभी संभव तरीके अपनाए । पार्टी को इसमें सफलता हाथ लगी । अजमल ने स्वतंत्र रूप से चुनाव ही नहीं लडा बल्कि लगातार कांग्रेस की आलोचना की । मुस्लिम मतदाताओं को और अधिक भ्रमित करने के लिए भाजपा ने उन्हें ही प्रमुख प्रतिद्वंद्वी के रूप में पेश कर दिया । चुनाव में सफलता के लिए मुस्लिम मतों का विभाजन जरूरी था लेकिन यदि उसकी रणनीति का एक हिस्सा कांग्रेस को अलग थलग करना रहा था, दूसरा पहलू यथा सम्भव पार्टी से महागठबन्धन को विस्तारित करना भी रहा था और इस अभियान में माधव नहीं बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट के साथ बातचीत शुरू की । इसके मौजूदा सदन में बारह विधायक थे और ये गोगोई मंत्रिमंडल का हिस्सा भी था । ये गठबंधन असम गण परिषद के बगैर अधूरा होता और सीटों के बंटवारे को लेकर कडी सौदेबाजी के बावजूद असम गण परिषद नहीं भाजपा के नेतृत्व वाले राजग से हाथ मिला लिया । मानव की रणनीति के तीनों पहले अपनी अपनी जगह थे । शर्मा को पार्टी में शामिल कर लिया गया था । कांग्रेस को अलग थलग कर दिया गया था और भाजपा गठबंधन का नेतृत्व कर रही थी । एक आम इतना आसान नहीं था और गुवाहाटी में चर्चा थी कि पार्टी और संघ की स्थानीय इकाई के बीच इस गठबंधन और चुनाव प्रबंधन के मुद्दों को लेकर तनाव स्पष्ट था परन्तु चुनाव प्रचार के लिए नींव रखी जा चुकी थी । चुनावी एजेंडे के संदर्भ में भाजपा ने मुख्यमंत्री के खिलाफ आक्रमक होने का निर्णय किया । एक समय कांग्रेस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह पर बेहद निजी हमले कर रही थी तो माधव के स्पष्ट निर्देश थे ये हमले कितने ही भडकाने वाले क्यों ना हो लेकिन पार्टी को इनका जवाब नहीं देना । कुल मिलाकर गोगोई पर हमले जारी रखना और उनका रिकॉर्ड को केंद्र बनाना ही लक्ष्य था । भाजपा ने गोगोई के निर्वाचन क्षेत्र में उनके खिलाफ एकतरफा प्रत्याशी खडा किया ताकि मुख्यमंत्री को अपने स्थानीय प्रतिद्वंद्वी से निपटने में ही अधिक से अधिक समय लगाना पडेगा । आपकी सुनिश्चित करने के लिए सारा ध्यान स्थानीय मुद्दों पर केंद्र रहे । माधव ने ये भी फैसला किया इसमें केंद्रीय नेतृत्व की सीमित भूमिका रहे । मोदी ने उन्होंने बिहार में ताबडतोड अपनी रैलियां की थी । सिर्फ तीन बडी रैलियां की अमित शाह ने दो जनसभाओं को संबोधित किया । इसका नेतृत्व राज्य स्तर के स्थानीय चेहरों को दिया गया था । स्वतंत्र पर्यवेक्षकों का मानना था इस चुनाव में प्रगति और बदलाव का वायदा ही भाजपा की मुख्य अपील थी । सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च यानी सीपीआरके निलंजन सरकार । भानु जोशी और आशीष रंजन ने चुनावों के दौरान राज्य का व्यापक दौरा किया था । सीपीआरके दस्तावेज में वे लिखते हैं की असम को लेकर प्रमुख संचार माध्यमों में भाषा, विशिष्ट संस्कृति और धार्मिक झगडों को अत्यधिक प्रमुखता देकर परिभाषित किया गया । अधिकांश मतदाताओं ने, जिसने उन्होंने पास की चुनाव में सामाजिक टकराव को नहीं बल्कि विकास और आर्थिक विकास को ही मुख्य मुद्दे बताया । कांग्रेस ने इस क्षेत्र में शांति और स्थिरता, आस्था तक कि परन्तु ऐसा लगता है की असम आर्थिक विकास के मामले में शेष भारत से काफी पीछे हैं । यही सबसे बडा मुद्दा है जिसके लिए मतदाता इस चुनाव में बदलाव चाहते हैं । इसी विषय को आगे बढाते हुए सरकार और रंजन ने हिंदू समाचार पत्र में लिखा, भाजपा विकास और परिवर्तन के उसी मंत्र की और लौट आई है तो दो हजार चौदह के चुनावों में बहुत ही उपयोगी साबित हुआ था । शर्मा को कांग्रेस के लिए एक प्रभावी स्वास्थ्य एवं शिक्षा कैबिनेटमंत्री माना जाता था । मोदी के लोकप्रिय छवि ने असम के विकास के लिए पार्टी के दावे को लेकर भाजपा की स्थिति मजबूत कर दी तो विकास के साथ ही पहचान भी एक प्रमुख मुद्दा था । पार्टी के मुख्यमंत्री पद का चेहरा असम गण परिषद के पूर्व नेता सर्बानंद सोनोवाल का था तो विस्थापितों के खिलाफ संघर्ष में सक्रिय थे । शर्मा ने भी असमी पहचान और उसके खतरे का मुद्दा जोर शोर से उठाया था । एक के बाद एक रैलियों में उनका इस बात पर जोर रहा । ये अपनी पहचान बनाने का हमसे मौका है । उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस के पत्रकार शीला भट्ट से कहा, हम नहीं चाहते कि बांग्लादेशी हमारी जमीन पर ही नहीं बल्कि हमारी राजनीति में अतिक्रमण करें । इस चुनाव में बांग्लादेशी विस्थापन अपना मुख्यमंत्री चाहते हैं । भाजपा ने औपचारिक रूप से भारतीय मुसलमानों और बांग्लादेशी मूल के मुसलमानों के बीच विधेयक क्या परन्तु इस कदम ने हिन्दुओं को संदेश देने में मदद शेखर गुप्ता ने उन्नीस सौ अस्सी के दशक के प्रारंभ से असम की राजनीति को दर्ज किया है जब वहाँ एक संवाददाता के रूप में कार्यरत थे । इस चुनाव के दौरान बिजनेस स्टैंडर्ड समाचार पत्र में अपने लेख में उन्होंने विस्तार से बताया कि आरएसएस ने किस तरह से भाजपा के लिए अनुकूल राजनीतिक माहौल तैयार किया ताकि उसे इसका लाभ मिल सके । वो लिखते हैं, असम का आंदोलन जातीय समुदाय की भावना से प्रेरित था । ये बाहरियों के खिलाफ आंदोलन के रूप में शुरू हुआ था । इसका निशान मुख्य रूप से मुस्लिम और बंगाली, हिंदू और मारवाडी थे । आरएसएस को इसमें आशा की किरण नजर आई परंतु से जातिया था और धर्म के बीच टकराव से भी निपटना था । गुप्ता ने इस बात का भी उल्लेख किया कि आरएसएस ने इस आंदोलन को स्थापित विरोधी आंदोलन से विस्थापित, मुस्लिम विरोधी की और मोडने के लिए गहरे पूर्व काम किया । श्वैचारिक बदलाव हैं बंगाली को लेकर व्याप्त नफरत और भय अब मुस्लिम विस्थापित विरोध या मियां मानुष बन गया था । शराब ने भाजपा के लिए चुनाव रणनीतिकारों के एक नए समूह को भी चल दिया । रजत सेठी और शुभ्रस् अपने आप ही चुनाव में आए थे । दिल्ली की मेरा ऍम शुभ्रस्था मोदी के प्रचार अभियान और नीतीश कुमार लालू प्रसाद के प्रचार में प्रशांत किशोर के सिटिजंस फॉर अकाउंटेबल गवर्नेंस का हिस्सा थी । यहीं पर उन्होंने छोड मीडिया प्रचार आंकडों पर आधारित फैसले कर रहे हैं और स्थानीय स्तर की वास्तविकताओं को अपनाते हुए केंद्रीयकृत प्रचार की आवश्यकता को समझा । उन्होंने यहाँ प्रचार के दौरान उस समय अधिक और सहित महसूस करना शुरू कर दिया जब चुनाव प्रचार के दौरान एक पार्टी द्वारा सालों से संकलित किए गए आंकडों को बाहरी लोग मांगने लगे, उन्हें बदलने लगे और पार्टी की मशीनरी को इस तरह से हटाने की ही मांग करने लगे और फिर आगे बढ जाएगी । उन्होंने बाद में कहा, मेरा तो वास्तव में यही मानना है कि आपको कार्यकर्ताओं की राजनीतिक पूंजी नहीं, हत्या नी चाहिए । पार्टी की भूमिका के प्रति आभार प्रकट करने की बजाय इसका श्रेय लेने की प्रवृत्ति है । आप एक छोटे समूह में काम कर सकते हैं, पार्टी कार्यकर्ताओं पर भरोसा कर सकते हैं । उस समय तक वो वैचारिक रूप से भाजपा के अधिक नजदीक आ गई थी । अब यहाँ से आगे बढने का समय आ गया था । रजत सीटी अपनी साझेदार और भावी पत्नी के उलट हमेशा ही भाजपा की राजनीति का हिस्सा रहे । भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान में पढाई के दौरान ही उनकी मुलाकात राममाधव से हुई थी और उन्होंने उन्हें होवर्ड में भाषण देने के लिए उस समय आमंत्रित किया था जब वहाँ छात्र थे । ऑकवर्ड और मैसेच्यूसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से डिग्री लेकर सेठी दो हजार पंद्रह में सुदेश लौटे थे । माधव से सिटी से जानना चाहा क्या वह गुवाहाटी चलकर असम चुनाव प्रचार में मदद करना चाहेंगे? ठीक थी, इसके लिए राजी हो गए बिहार चुनाव खत्म होते ही शुभ्रस्था भी असम में उनके साथ मिली तो उन्होंने प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र के आधार पर ताकत और कमजोरियों का विश्लेषण तैयार करना शुरू कर दिया । उनका बुनियादी काम जमीनी हकीकत से जुडी जानकारियां उपलब्ध कराना और नेताओं के ट्विटर और फेसबुक खातों, व्हाट्सप्प समूह सहित सोशल मीडिया और विज्ञापन पट तथा होडिंग्स और समाचार पत्रों में संदेशों के प्रबंधन तथा चुनाव प्रचार चलाना शामिल था । उन्होंने एबीवीपी और पार्टी काडर के साथ काम किया । राम माधव बताते हैं, उन्होंने बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और समय के अनुरूप जानकारियाँ उपलब्ध कराई । हमें प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र के विवरण की जानकारी मिल रही थी । मसलन आज दोपहर इलाके में मतदाताओं का ये रुझान है । अगले दिन ताजा स्थिति के बारे में जानकारी उपलब्ध हो गई । जमीनी हकीकत की जानकारी देने के लिए हमारे आदमी थे और इसे अंतिम रूप देने के लिए हमारे पास ऍम ये बहुत ही संवेदनशील था की सारी चीजें भाजपा को एक साथ मिलेंगे और उसने अपने सहयोगियों के साथ असम चुनाव में विजय हासिल कर ली । इस चुनाव नहीं एक बार फिर भाजपा की महत्वाकांक्षा को उजागर कर दिया । पिछले दिखाया चुनाव जीतने और अपनी निर्मम व्यवहारिकता के लिए पार्टी तरह तरह की रणनीति और हथकंडे अपनाने के लिए तैयार है । वो सूरमा जैसे बाहरी लोगों को अपनाने के लिए तैयार है, जिन्होंने अपना पूरा राजनीतिक जीवन ही भाजपा की आलोचना करने में लगा दिया था । इसने खुद के एक राष्ट्रीय दल होने और शीर्ष पर मोदी जैसा नेतृत्व होने के बावजूद अपनी कमजोरियों को महसूस किया और पूरी विनम्रता के साथ घटक दलों के साथ वार्ता की । वो ये भी जानती थी कि कुछ चुनावों में जहाँ केंद्रीय नेतृत्व बहुत ही अहम है, वहीं दूसरे चुनावों में स्थानीय नेतृत्व अति महत्वपूर्ण है और दो हजार सोलह का असम चुनाव इसमें पूरी तरह सटीक कैसा है । उसने तरह तरह के हथकंडे अपनाकर विपक्ष को सर्व कर करके ये भी दिखा दिया कि वह तीस फीसदी मुस्लिम आबादी वाले राज्य में भी चुनाव जीत सकती है । पार्टी ने नेताओं के बीच संतुलन बनाया, सोनोवाल को नेतृत्व की कमान सौंपी तो शर्मा को भी पर्याप्त महत्व दिया । ऐसा गुण है जो अवसर नजर नहीं आता है और इस वजह से दलों में अंदरूनी गुटबाजी चंद देती है । चुनावी संभावनाएं बर्बाद होती हैं । भाजपा विकास और पहचान के मुद्दे को साथ ले आई असम चुनाव में भाजपा की जीत के नतीजे असम से भी आगे निकल गए । ऐसी पार्टी जिसने दो हजार पंद्रह में बिहार और दिल्ली में जबरदस्त आघात झेला था, पूरे जोश के साथ वापस आई । इसने नेतृत्व और बॉर्डर में नया भरोसा और जोश बढा । इसने पूर्वोत्तर राज्यों में भाजपा के प्रवेश को भी इंगित करके इसे सही मायने में राष्ट्रीय दल बना दिया और इसने राममाधव की स्थिति को भी मजबूत बना दिया क्योंकि इससे चुनावी रणनीतिकार और राजनीतिक सोच वाले व्यक्ति के रूप में उनकी प्रतिष्ठा बढाई । लेकिन ये समय आराम करने का नहीं था क्योंकि अगला पडाव मणिपुर का था । सितंबर दो हजार पंद्रह में एन बिरेन सिंह एक असंतुष्ट व्यक्ति थे । कांग्रेस नेता और पूर्व मंत्री सिंह इम्फाल में अपने घर के लॉन में बैठे थे । मादी सरकार ने हाल ही में नेशनलिस्ट सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड इसाक मुइवा ऍम के साथ एक फ्रेमवर्क समझौते पर हस्ताक्षर किए थे । मणिपुर की दुखती हुई रग घाटी और पहाडों के बीच के अंतर्विरोध है । घाटी में मैं ही समुदाय मुख्य रूप से हिंदू है का प्रभुत्व है और पहाडों में आदिवासी खासकर नागा और कुकी हैं, जो ईसाई है । नागा विद्रोही समूहों की पुरानी मांग है कि मणिपुर के नागा भाषी इलाकों को मिलाकर ग्रेटर नगालैंड का सृजन किया जाए । ये घाटी के मैं ही समुदाय को स्वीकार नहीं है । उनका सत्ता के ढांचे पर प्रभुत्व है और इसी वजह से जब फ्रेमवर्क समझौते के विस्तृत विवरण की जानकारी दिए बगैर ही जब इस पर हस्ताक्षर हुए तो इम्फाल की राजनीतिक सत्ता और सिविल सोसाइटी भाजपा की मंशा को लेकर सशंकित थी, केंद्र नहीं । मणिपुर को पुरा ये भरोसा दिलाने का प्रयास किया, इसका बंटवारा नहीं होगा, लेकिन इसके बावजूद संदेह बना रहा । क्या अखिल नागर सांस्कृतिक परिषद राज्य की सीमा को प्रभावित नहीं करती है? स्वीकार्य होगी । सिंह ने फोरी तौर पर इसे अस्वीकार कर दिया । वो सवाल करते हैं, ये सांस्कृतिक परिषद क्या है? पंजाबी तो भारत और पाकिस्तान दोनों ही नहीं हैं । क्या दिल्ली उन्हें सांस्कृतिक परिषद बनाने की अनुमति देगी? दिल्ली पाकिस्तानी झंडे की कश्मीर में इजाजत देगी । हम नागाको क्यों बर्दाश्त करें जिनकी निष्ठावान मिलीजुली है और अपनी सीमाओं में नागा ध्वज की अनुमति दें । फॅमिली देते रहे कि दिल्ली इसका मतलब केंद्र में भाजपा सरकार से है । ईसाई आदिवासियों का समर्थन कर रही है जो अलग राज्य का एजेंडा आगे बढा रहे हैं । डेढ वर्ष बाद मार्च दो हजार सत्रह में एन बीरेन सिंह उस पार्टी में शामिल हो गए जिसकी वह आलोचना कर रहे थे । उन्हें मणिपुर में भाजपा के प्रथम मुख्यमंत्री के रूप में शपथ दिलाई गई । इस अब कैसे हुआ राम माधव जानते थे कि मणिपुर उन्हें सौंपा गया अब तक का सबसे कठिन काम हो सकता है । जम्मू कश्मीर में काम शुरू करने के लिए पार्टी का आधार था जम्मू राजनीतिक दृष्टि से स्वागत करता हुआ इलाका था । असम में भाजपा ने लोकसभा चुनावों में काफी अच्छा प्रदर्शन किया था और वहाँ भी काम आगे बढाने के लिए कुछ बुनियादी थी परन्तु मणिपुर में तो पार्टी के पास कुछ भी नहीं था । विधानसभा में इसका कोई प्रतिनिधि नहीं था । राज्य से उसका कोई सांसद नहीं था । पिछले चुनाव में उसे दो प्रतिशत मत मिले थे । पार्टी का कोई संगठन नहीं था, उसका कोई नेता नहीं था । उसके पास कोई ताकतवर उम्मीदवार भी नहीं था । वो एकदम शून्य से शुरू कर रहे थे लेकिन उनके पास केंद्र में सत्ता और उसने मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक बढत प्रदान किए हैं । मणिपुर के समाचारपत्र फ्री इम्फाल प्रेस के संपादक और राज्य के एक प्रभावशाली व्यक्ति प्रदीप पंजो बामने बताया, पूर्वोत्तर के सभी छोटे और कमजोर राज्यों में ये माना जाता है । राज्यों को अधिक आसानी होगी यदि वे केंद्र में सत्तारूढ दल के साथ गठबंधन करके चलेंगे । राज्य के राजनीतिकों और मतदाताओं दोनों का ही यही दृष्टिकोण है । पहले जब केंद्र और राज्य में अलग अलग सत्तारूढ दल थे तो राज्य को जबरदस्त आर्थिक संकट का सामना करना पडा था और ये संभव कहा आंशिक रूप से सहयोगात्मक हो परन्तु मुझे यकीन है इसकी वजह ढांचागत भी है । वन जुबान बताते हैं, निश्चित ही जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे । भाजपा ने पहली बार मणिपुर विधानसभा में चार विधायकों के साथ अपना खाता खोला था । जब एनएससीएन यानी आई एम के साथ युद्धविराम का समझौता दो हजार एक में बनाया गया तो मणिपुर में इसी तरह की आशंकाओं को जन्म दिया था जिनके बारे में हमने पहले एन बीरेन सिंह सुना था । इसके बाद भाजपा लगातार चुनाव हारी । फंड्ज ओबाम कहते हैं, इंसानों में केंद्र में कांग्रेस के सत्तारूढ होने नहीं यहाँ पहुंचने में मदद की लेकिन जहाँ भाजपा को ये बढत हासिल थे वहीं चुनाव को जमीन पर ही लगना होता है । ऐसा कोई स्वचालित आसान रास्ता नहीं था और केंद्र में सत्ता होना मददगार तो था, पर अंतर जीतने की कोई गारंटी नहीं थी । और इसी वजह से माधव को वही हथकंडे अपनाने पडे तो उन्होंने दूसरी जगह बनाए थे । एक बात के बारे में पार्टी भलीभांति जानती थी । उसे यहाँ नेताओं का पूल तैयार करना होगा । माधव ने स्वीकार किया, हम जानते थे कि सशक्त संगठन के अभाव में हम मोदी जी की छवि और स्थानीय उम्मीदवार की ताकत पर ही निर्भर थे और इसीलिए इसे हासिल करना महत्वपूर्ण था । कश्मीर में सज्जाद लोन को तैयार करने और असम में हेमंत विश्वास शर्मा को अपनाने की तरह ही माधव किसी बाहरी व्यक्ति की तलाश में थे । फुटबॉल खिलाडी से राजनीतिक बने एन बिरेन सिंह ऐसे ही एक नेता थे । उन्हें कांग्रेस के दूसरे लोगों के साथ पार्टी में शामिल किया गया था । दूसरी बडी चुनौती एक सुसंगत और सुस्पष्ट पार्टी का मंच और एजेंडा तैयार करने की थी और उस काम में भाजपा ने चीजों को अंगीकार करने में उल्लेखनीय क्षमता का प्रदर्शन किया । सबसे पहले तो उसे मैतेई नागा मतभेदों के बीच रास्ता बनाना था । मैं ही के प्रभुत्व वाली घाटी में विधानसभा की चालीस सीटें हैं, जबकि आदिवासी बहुल पर्वतीय क्षेत्र में बीस सीटें हैं । भाजपा फ्रेमवर्क समझौते से पल्ला नहीं झाड सकती थी । इस पर केंद्र में उसकी ही सरकार ने हस्ताक्षर किए थे और जिसने सिंघम को दो हजार पंद्रह में इतना अधिक उद्वेलित कर दिया था । फिर भी उसे सफलता के लिए घाटी में मैं ही समुदाय की राय को जीतना था । नागा प्रभुत्ववाले इलाकों में केंद्र में रजत के घटा छोटे नागर संगठन अलग अलग चुनाव लड रहे थे क्योंकि किसी भाजपा को उनके सहयोगी के रूप में देख लिया गया तो वो मैं ही समुदाय से हाथ हो गई थी । माधव ने अपनी गन्ना में अनुमान लगाया यदि आवश्यक हुआ तो ये समूह इम्फाल में चुनावों के बाद भी भाजपा का समर्थन करेंगे । सारा ध्यान मैं ही समुदाय पर केंद्रित करना था और चालीस सीटों में पर्याप्त संख्या प्राप्त करनी थी । कांग्रेस प्रचार के एक प्रमुख स्तंभ ने आरोप लगाया था कि भाजपा राज्य का बटवारा कर देगी । भाजपा ने फैसला किया कि अधिकांश समय वो इस जाल में फंसने से बचेगी और यही कहेगी कि वो मणिपुर की एकता के लिए प्रतिबद्ध है और क्या प्रधानमंत्री ने इंफाल में एक जनसभा को संबोधित किया तो पार्टी ने उनसे कहा कि वह भी मन से इस स्थिति के लिए प्रतिबद्धता दोहरा देंगे । मोदी ने जब मणिपुर की सीमा की अखंडता बनाए रखने के प्रति बहुत अपनी प्रतिबद्धता दोहराई तो मैं ही समुदाय के बीच पार्टी का हौसला बढ गया । वन जो हम पुष्टि करते हैं, स्वयं प्रधानमंत्री सहित भाजपा के केंद्रीय नेताओं के आश्वासन नहीं इस आशंका को काफी हद तक दूर कर दिया था । भाजपा को अभी एक और मुश्किल मुद्दे का सामना करना था जहां आप स्पा के नाम से चर्चित सशस्त्र बल विशेष अधिकार कानून के मामले में उसका परंपरागत रुख मणिपुर में व्यापक स्तर पर लोकप्रिय समझी जा रही राय के ही वृद्ध चला गया था । रोम शर्मिला ने हाल ही में अपना उपवास खत्म किया था और उन्होंने चुनाव लडने की अपनी इच्छा की घोषणा की थी । भाजपा हालांकि शर्मिला के चुनाव लडने से चिंतित नहीं थी परंतु जानती थी आस पास को हल्का करना, यहाँ से निरस्त करने के खिलाफ उसका दृष्टिकोण उसके विरुद्ध जा सकता है । माधव जानते थे कि ये मुद्दा कितना संवेदनशील है क्योंकि उन्होंने कश्मीर में इसी मुद्दे पर पीडीपी के साथ भी वार्ता की थी । भाजपा अपनी स्थिति पर अडी रही थी और उसने आफ्स्पा पर पीडीपी की मांग नहीं मानी थी । परंतु सौभाग्य वाही जब पार्टी ने एक सर्वे कराया तो पता चला कि मणिपुर के चुनाव के प्रमुख मुद्दों में आप सपा काफी नीचे है । ये चुनाव में शर्मिला के अपने प्रदर्शन से भी परिलक्षित हुआ । मानवाधिकार के लिए संघर्ष करने वाली शर्मिला को चुनाव में एक सौ से भी कम मत मिले । भाजपा भी इस मुद्दे पर बहस करने से दूर ही रही है । भाजपा कोई सर्वे से पता चला कि जनता के लिए विकास और मुख्यमंत्री ओकराम इबोबी सिंह के तहत भ्रष्टाचार सबसे बडे मुद्दे हैं और इसीलिए भाजपा ने असम की तरह ही सरकार विरोधी और स्थानीय मुद्दों पर ही चुनाव में ज्यादा ध्यान केंद्रित किया । उसने मुख्यमंत्री को लक्ष्य करके जबरदस्त विज्ञापन अभियान चलाया जिसमें उन्हें मिस्टर दस प्रतिशत मुख्यमंत्री बुलाया गया । इससे हताश मुख्यमंत्रीने संपादकों को बुलाकर उन्हें चेतावनी दी । भाजपा को इस सर्वे के माध्यम से ये भी पता चला कि मुठभेड में होने वाली मौतों का मसला भी यहाँ के लोगों की चिंता के विषयों में काफी प्रमुख है । राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा को नागरिक स्वतंत्रता के स्थान पर सुरक्षा को प्राथमिकता देने वाले दल के रूप में देखा जाता है और उसे कुछ उल्लंघनों की कीमत पर भी इसमें कटौती करने की छुट पार्टी माना जाता है । खाना कि मणिपुर में इसे लेकर उठ रही आवाजों को देखते हुए भाजपा ने इसे प्रमुख मुद्दा बनाया और कांग्रेस को बचाव की मुद्रा में लाख ना क्या पार्टी ने बार बार इस बात को प्रमुखता से उठाया । राज्य में थाल के समय नहीं हुई मुठभेडों या न्यायेत्तर हत्याओं में पंद्रह सौ अट्ठाईस व्यक्ति मारे गए हैं । पार्टी ने पूर्व पुलिस अधिकारी को टिकट देने से इंकार कर दिया क्योंकि इन मुठभेडों में शामिल अधिकारियों के रूप में उसकी पहचान हुई थी और पार्टी ने ऐसे मामलों की सीबीआई जांच कराने का वायदा किया था । उसने स्थानीय मानवाधिकार समूहों के साथ मिलकर खुद को नागरिक स्वतंत्रता की चैंपियन पार्टी के रूप में पेश किया । एक और उदाहरण में पार्टी की आत्मसात करने की क्षमता नजर आती है । इसाई आदिवासी उम्मीदवार पर्वतीय क्षेत्रों में जाकर जनता से मजाक मजाक में कह रहे थे कि भारतीय जनता पार्टी वास्तव में भारतीय जीसस पार्टी है ताकि भाजपा के हिंदू स्वरूप को लेकर उनकी चिंताओं को शांत किया जा सके । निश्चित ही पूर्वोत्तर में भाजपा ने कब किया और अपने गौरक्षा और वो माँ सेवन विरोधी जैसे मुद्दों को आगे नहीं बढाया । माधव ने एकदम साफ शब्दों में कहा, हम इस क्षेत्र की सांस्कृतिक विविधता का सम्मान करते हैं । यहाँ वैचारिक आस्थाओं और चुनावी जरूरतों के बीच उसका तनाव स्पष्ट है और पार्टी ने दूसरे विकल्प को चुना । पंजो बम इससे सहमत होते हुए कहते हैं कि भाजपा ने इस क्षेत्र में उत्तर भारतीय सांस्कृतिक प्रभुत्व को यहाँ आगे नहीं बढाया । वो बताते हैं, पीस आज भी यहाँ खुलेआम दिखता है । बॉलीवुड फिल्में प्रतिबंधित है । पूजा के तरीके में कोई बदलाव नहीं आया है परन्तु अभी भी कोई स्पष्ट फैसला सुनाना जल्दबाजी होगा । माधव के साथ एक बार फिर रजत सेठी और शुभ्रस् ताकि टीम काम कर रही थी, उन्होंने दो हजार सोलह खत्म होने के करीब ही इंफाल में अपना ठिकाना बनाया और करीब छह महीने यहाँ व्यतीत किए । उन्होंने चुनावी मुद्दों की पहचान करने के लिए विस्तार से लोगों के इंटरव्यू करें, यात्राएं की और सर्वे किए और रणनीति में मदद की । उन्होंने संवाद की रणनीति को भी आकार दिया जिसे अंततः माधव ने मंजूरी दी थी । परन्तु मणिपुर के चुनाव सिर्फ मुद्दों और संवाद के बारे में ही नहीं थे । राज्य में दर्जनों भूमिगत संगठनों की मौजूदगी दिन का प्रदेश के महत्वपूर्ण हिस्सों पर प्रभाव था और वह यह निर्धारित कर सकते थे कि कौन और कैसे वोट करेगा । भाजपा ने ऐसे ही कुछ भूमिगत संगठनों यानी यू जी के साथ वार्ता का रास्ता खोला । राज्य में इन्हें इसी नाम से जाना जाता है । उन्हें कई तरीके से मनाया गया और आसानी से ये माना जा सकता है इसमें धन का प्रलोभन, भविष्य में पुनर्वास का वायदा और राजनीतिक समाधान तथा और भी बहुत कुछ शामिल था । चुनाव में हर जगह धन का बोल वाला होता है परंपरा इम्फाल में राजनीतिक सूत्रों ने मुझे बताया कि जिस तरह की सौदेबाजी की राजनीति यहाँ हुई तो चौंकाने वाली थी । यहाँ पर एक हजार रुपए से लेकर पांच हजार रुपए तक में वो सीधे खरीदे जाते हैं । इसका मतलब ये हुआ भाजपा को भी बहुत अधिक संसाधनों का इस्तेमाल करना पडा जो कुछ हद तक दिल्ली से और कुछ पूर्वोत्तर के उन राज्यों से आए जहाँ वो शासन कर रही थी । ये सवाल करने पर की क्या लोगों के लिए पैसा लेकर और फिर अपनी इच्छा के मुताबिक वोट देना संभव था? मणिपुर के एक नेता कहते हैं, यहाँ ऐसा नहीं है । हमारे यहाँ छोटे छोटे निर्वाचन क्षेत्र और मतदान केंद्र है । ये अनुमान लगाना आसान है । लेकिन परिवार ने किस तरह से मतदान किया है । एक और अंदरूनी चुनौती भाजपा में कई सत्ता केंद्र थे जो मणिपुर के चुनावों में अपना दखल रखने का प्रयास कर रहे थे । इस वजह से टिकट वितरण और रणनीति को लेकर टकराव भी हुआ और भाजपा में कई लोगों का मानना था यदि असम की तरह ही स्पष्ट रूप से अधिकारियों का विभाजन हुआ होता और राम माधव को पूरा अधिकार मिला होता तो हो सकता है की पार्टी और अधिक सीटें जीती होती है । जब चुनाव के नतीजे आए तो भाजपा को सबसे अधिक मत मिले लेकिन उसे कांग्रेस की अट्ठाईस सीटों की तुलना में काफी कम आधार इक्कीस सीटें ही मिली । फिर भी मैदानी हकीकत में जनादेश नहीं कांग्रेस को ठुकरा दिया था । भाजपा ने तत्काल ही गठबंधन तैयार किया । राजग के घटक दलों जिन्होंने अलग अलग चुनाव लडा था और कांग्रेस से पाला बदल कर आए कुछ लोगों के समर्थन से पार्टी ने बहुमत हासिल कर लिया था । भाजपा सही मायने में एकता सरकार बनाने में कामयाब हो गई थी । इसमें नागा पार्टी नागा पीपुल्स फ्रंट गठबंधन में शामिल थे । माधव कर देते हैं जिस तरह से पीडीपी और भाजपा को साथ लाना ऐतिहासिक घटना की मेरा मानना है कि हमने मणिपुर में जो हासिल किया है वो भी समान रूप से ऐतिहासिक है । दो प्रमुख ताकतें मैं ही और नागा, जो अलग अलग राजनीतिक दलों का प्रतिनिधित्व करते हैं, एक साथ आ गए । दो समुदायों के बीच राज्य में चल रही राजनीति कुलजमा शून्य का खेल हो गई और राजद इसे तोडने में सफल रहा । शपथ ग्रहण समारोह में राममाधव एक और विजय के शहरे के साथ पहली पंक्ति में बैठे थे । यदि असम के नतीजों के बाद वो और हेमंत शर्मा व्यक्तिगत रूप से तरुण गोगोई को शपथग्रहण समारोह के लिए आमंत्रित करने गए थे तो इस बार इम्फाल में वो कांग्रेस के निवर्तमान मुख्यमंत्री इबोबी सिंह के बगल में बैठे थे । दो हजार पंद्रह के एंग्रीमैन एन बिरेन सिंह ने नए मुख्यमंत्री के पद की शपथ ली । रजत सेठी उन का सलाहकार नियुक्त किया गया था । मणिपुर चुनावों ने भाजपा की निरंतर व्यवहारिकता और दूसरे संगठनों से नेताओं को जिनका समुचित प्रभाव था, अपनाने के प्रति अपनी इच्छा मंशा जाहिर कर दी थी । अधिकांश लोगों का मत था, ये वास्तव में भाजपा के कांग्रेसीकरण का प्रतीक हो सकता है । सिंग भाजपा के एक मात्र मुख्यमंत्री हैं, पुराने कांग्रेसी हैं परन्तु पार्टी को पूरा भरोसा है कि ये उसके वैचारिक मूल्यों को हल्का किए बगैर ही उसकी ताकत बढाएंगे । वास्तव में चुनाव में ये दिखाया चुनावी सफलता की तलाश में भाजपा में वैचारिक रुख के मामले में लचीलापन है । उसने इतिहास में एक दूसरे से टकराव में उलझे दो पक्षों मैं थे और नागा को एक साथ क्या? और दोनों से ही समर्थन प्राप्त क्या खुद को नागरिक अधिकारों और अल्पसंख्यक अधिकारों की चैंपियन की तरह पेश किया और इस से ये भी नजर आता है । इंफाल की जबरदस्त रैली के साथ मोदी की अपील प्रांतों में नीचे तक पहुंची और ये चुनाव का एक निर्णायक बिन्दु था । परन्तु इस चीज का प्रतीकवाद काफी नीचे तक गया । एक राज्य, जिसने देखा की विभिन्न आंदोलनों के जरिए भारत में उलझा सबसे ताकतवर अलगाववादी संगठन स्वयंभू राष्ट्रवादी की प्रतिज्ञा करने वाले संगठन के लिए वोट कर रहा था । वैचारिकता में लचीलेपन, अनुकूलन और सहयोग का ये मिश्रण भाजपा को सबसे ऐसे क्षेत्रों में अपना विस्तार करने में मदद कर रहा था तो एकदम संभव नहीं था ।

8. Adhipatya Ka Bhabisya

आधिपत्य का भविष्य समकालीन भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में भारतीय जनता पार्टी की अच्छी बढत में इजाफा होता ही देख रहा है । अधिकांश टीकाकार और यहाँ तक कि कुछ विपक्षी नेता भी ये मानते हैं ये अवश्यंभावी है । दो हजार उन्नीस में नरेंद्र मोदी फिर सत्ता में लौटेंगे । जुलाई के अंत में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने, जिन्हें मोदी को चुनौती देने के लिए राष्ट्रीय नेता के रूप में पेश किया गया था, पाला बदल लिया और भाजपा के साथ हो गए और सार्वजनिक रूप से की घोषणा का डाली कि अगले चुनाव में प्रधान मंत्री को हराना असंभव है । निश्चित ही मौजूदा परिदृश्य में फिलहाल तो ऐसा ही होने की संभावना लगती है परन्तु भारतीय राजनीति के बारे में कोई भी भविष्यवाणी नहीं की जा सकती है और राजनीति के भीतर ही लोकतंत्र के पास चीजों को संतुलित करने रहने का अपना ही तरीका होता है । कोई भविष्यवाणी किए बगैर ही रिकॉर्ड के आधार पर विभिन्न पहलुओं पर गौर करना उपयोगी होगा, जो भाजपा के भविष्य का निर्धारण करेंगे । चार । ऐसे व्यापक पहलू फैसला करेंगे क्या भारत में भाजपा का व्यापक विस्तार और आधिपत्य जारी रहेगा? क्या क्या भाजपा का विजय अभियान रोक लिया जाएगा? यदि भाजपा की सफल का एक बार और मुख्य रूप से नरेंद्र मोदी की व्यापक अपील वजह से हुई तो मोदी ब्रांड का भविष्य ही व्यापक रूप में भाजपा के भविष्य का निर्धारण करेगा । मोदी की सबसे बडी सफलता सभी वर्गों में उनकी अपील थी । हालांकि आंद्री के स्तर में गिरावट होने की वजह से इस समर्थन में भी कमी आई । राजनीतिक वैज्ञानिक ई श्रीधरन के अनुसार दो हजार चौदह के चुनावों में प्रतिशत उच्च मध्यम वर्ग, बत्तीस प्रतिशत मध्यमवर्ग, तीस प्रतिशत निम्न मध्यम वर्ग और चौबीस प्रतिशत गरीबों में भाजपा को वोट दिए थे । एक बार सत्ता में आने के बाद मोदी धनवानों और कॉरपोरेट हितों के काफी नजदीक आ गए थे, लेकिन उन्होंने शीघ्र ही स्वयं के लिए नई छवि तैयार की और आज उनके प्रति मध्यम वर्ग का समर्थन बरकरार है । लेकिन गरीबों के समर्थन के मामले में उन्हें ऐसा नजर नहीं आ रहा है । निश्चित ये मोदी इस बात को समझते हैं । ये सही तरीके से संतुलन रखना जरूरी है । उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद बारह मार्च को दिल्ली में पार्टी मुख्यालय में अपने भाषण में प्रधानमंत्री ने नए भारत के दृष्टिकोण की घोषणा करते हुए गरीबों के कल्याण की बातें की । उन्होंने कहा, मैं गरीबों की क्षमता देख सकता हूँ । मैं उन की ताकत देख सकता हूँ । यदि गरीब शिक्षक हो जाए तो वो हम समाज को ही नतीजे देगा । यदि उसे काम मिलता है तो देश के लिए और अधिक सेवा करेगा । गरीब देश की सबसे बडी ताकत है । लेकिन इसके तुरंत बाद उन्होंने भाषण का प्रभाव बदला । ऐसा लगता है कि वह अपने मूल जनाधार को फिर से भरोसा दिलाने के प्रति जागरूक थे और इस बात का उल्लेख किया कि मध्यम वर्ग ही अवसर भारी जिम्मेदारी वहन करता है । उन्हें ही कर देना पडता है । उन्हें नियमों का पालन करना पडता है । उन्हें ही समाज के मानदंडों का पालन करना होता है । उन्हें ही मात्रा के लिहाज से सबसे अधिक आर्थिक बोझ वहन करना पडता है । मध्यम वर्ग के इस बोझ को काम करना होगा । मध्यम वर्ग में क्षमता है और वो सिर्फ यही चाहता है । इसमें कोई अडचन नहीं आए और इससे वह पल्लवित होगा । पार्टी मुख्यालय में भाजपा के अधिक प्रखर समर्थक हूँ और संगठनात्मक ढांचे का हिस्सा रहे लोगों ने उस बयान का मोदी मोदी के नारे लगाकर स्वागत किया । मोदी ने इसके बाद दोनों को एक साथ जोडते हुए कहा, एक बार जब इस देश के गरीब के पास अपना भार उठाने की क्षमता आ जाएगी तो मध्यवर्ग का बोझ स्वतः ही पूरी तरह खत्म हो जाएगा । यदि हम गरीबों की ताकत और मध्यम वर्ग के सपनों को जोड सकें तो कोई भी भारत को नई बुलंदियों पर पहुंचने से रोक नहीं सकता । इस भाषण में निहित संदेश स्पष्ट है । मोदी इस बात को मानते हैं की वो मध्यम वर्ग की अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर पाए परन्तु वो कोई अतिरिक्त फायदा भी नहीं करते हैं तो ये भी स्वीकार करते हैं गरीबों के लिए बहुत कुछ करना है परंतु उनकी उम्मीदों को ये कहते हुए डॅालर्स बनाते हैं प्रगति उन्हें ही वाली है । क्या मोदी सबका साथ सबका विकास के नारे के साथ बहुवर्षीय सघनता को बनाए रख पाएंगे और क्या वह धनवानों, मध्यमवर्ग और गरीब तबके के नेता बने रहेंगे? अथवा की विभिन्न समुदायों के बीच शून्य जमा खेल बनकर रहे जाएगा? क्या संतोष का स्वर्ण सबसे पहले उस वर्ग से उभरेगा तो पहले उन्हें सत्ता में लाया और वो है मध्यम पर भारत का व्यवसाय, समाज और युवा अच्छा, वो किसानों जैसे तुलनात्मक रूप से वंचित वर्ग से उभरेगा । दो हजार सत्रह के मध्य में हुआ किसानों का आंदोलन इसी और कुछ संकेत कर रहा है । भाजपा के प्रमुख नेता तो संगठन और सरकार दोनों को ही देखते हैं । संभावित गडबडी वाले क्षेत्र के बाद स्वीकार करते हैं । हम जो देख रहे हैं वो ये है कि प्रधानमंत्री नए आधार की और आगे बढ गए हैं और ये पार्टी के लिए बहुत अधिक लाभ ला रहा है । लेकिन पार्टी के संगठन ने अभी तक खुद को नहीं बदला है । इस समय सभी एकजुट हैं लेकिन पार्टी का स्वरूप और प्रधानमंत्री का मूल आधार धीरे धीरे छितरा सकता है और इसीलिए पार्टी को अपने मौजूदा स्वरूप को बदलना होगा । आपका लक्ष्य गरीब मतदाता हैं तो एसयूवी गाडी चलाने वाले संपन्न ठेकेदार को आप अपना जिला अध्यक्ष नहीं बना सकते । उन्होंने आगाह किया अन्यथा दो नावों के बीच गिरने और एक अस्थायी आश्चर्य बनकर रहे जाने का पूरा खतरा है क्योंकि गरीब हो सकता है शायद ना आए और धनवान और मध्यम वर्ग तथा व्यवसायी समाज कोई विकल्प हो जाएगा । इस समय हमें जो मदद कर रहा है वो है राष्ट्रीय स्तर पर कोई चुनौती उपलब्ध नहीं होना । यदि गरीबों, निम्न मध्यमवर्ग और काम प्रभुत्व वालों पर ध्यान केंद्रित करने का सिलसिला जारी रहा तो क्या उच्च मध्यम वर्ग और मध्यमवर्ग का भाजपा का पारंपरिक आधार मोदी को पीछे धकेलेगा । सेवानिवृत्त नौकरशाह शक्ति सिन्हा राजनीति की पर और शैक्षणिक दिलचस्पी वाले व्यक्ति हैं । सिन्हा ने उन्नीस सौ नब्बे के दशक की हम समय प्रधानमंत्री कार्यालय में अटल बिहारी वाजपेयी के साथ काम किया है और उन्हें संस्थान के भीतर और नेता की कार्यशैली की बेहतर जानकारी है । वो अब नेहरू स्मारक संग्रहालय और पुस्तकालय के मुखिया है तो बताते हैं आज क्या हो रहा है कि भले ही पारंपरिक समर्थक पहले की तरह उपलब्ध नहीं है लेकिन उनके विचार आज भी प्रचलित है । भारत राष्ट्र का विचार, अखिल भारतीय पहचान एक सशक्त राष्ट्र विरोधियों के सामने खडे होने की इच्छा, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत का उदय, आर्थिक विकास, आधुनिकता और बुनियादी संरचना आदि जैसे सारे विचार उनके विवेक का हिस्सा है और ये दर्शाता है कि उन्होंने कैसे भारत की कल्पना की और मोदी का व्यापक संदेश और एजेंडा इजी विषयों के इर्द गिर्द घूमता है । चुनाव कहते हैं मोदी की समाज के विभिन्न वर्गों से की गई अपील नहीं, उन्हें इतना ताकत और बना दिया जैसा जनसंख्या भाजपा ने अपने अभ्यास में पहले कभी नहीं देखा था । मूल रूप से ये सवाल क्या मोदी अपनी अपील को कायम रख सकेंगे? उनकी नीतियां, उनके निष्पादन और शासन पर निर्भर करता है । दो हजार सत्रह के मध्य में देश की अर्थव्यवस्था नहीं, गंभीर चुनौती पैदा की विकास दर कम हो गयी । माल एवं सेवाकर जीएसटी व्यवस्था लागू होने से भी देशभर में व्यावसायिक गतिविधियां अव्यवस्थित हुई हैं । रोजगारों का सृजन नहीं हो रहा है । निजी निवेश भी कम हो गया है । सूचना प्रौद्योगिकी, आईटी जैसे प्रमुख क्षेत्र में नौकरियों में कटौतियां हो रही है । नोटबंदी के बाद के असर नजर आने लगे हैं । अच्छे कृषि सत्र के बावजूद मुख्य राज्यों में किसान आंदोलनरत है । प्रमुख नीति निर्धारक स्वीकार करते हैं । बेरोजगारी में हो रही वृद्धि राजनीतिक और आर्थिक दोनों ही तरह की परेशानियों का प्रतिनिधित्व कर रही हैं, क्योंकि हर महीने करीब दस लाख युवा श्रमशक्ति में जुड रहे हैं । दो हजार उन्नीस के चुनाव नजदीक आ रहे हैं और अच्छे दिन का वायदा पूरा करने के दावे की संभावना चीज हो रही है । सरकार को जल्द ही जनता में पनप रहे असंतोष को शांत करना होगा । मध्यम वर्ग के सपनों को साकार करना होगा । सिर्फ रोजगार के अवसर प्रदान करने के साथ ही गरीबों के उत्थान पर ध्यान केंद्रित देना होगा ताकि मोदी की अपील बरकरार रहे । राजनीति विरोधाभाषों के प्रबंधन की कला है और यदि मोदी की अपने समर्थकों के विभिन्न वर्गों के बीच में आप अस्थिर विरोधाभासों के साथ सामंजस्य स्थापित करने का कौशल एक अहम कारक है तो भाजपा की विभिन्न जातियों के बीच जो अक्सर ही सीधे एक दूसरे के साथ टकराव की स्थिति में होती हैं । विरोधाभास से समझौता करने का कौशल एक दूसरा कारण होगा । चुनावी सफलता को तय करेगा । उम्र को ही ले लीजिए जैसा कि इस पुस्तक में दर्ज किया गया है । भाजपा की असली सफलता उसका अपने सामाजिक आधार का विस्तार करने में सफल रहने में था । ये उसके पुराने जनाधार की कीमत पर नहीं हुआ था । रावण और ठाकुर सरीखी सवर्ण जातियां दो हजार चौदह और दो हजार सत्रह के चुनावों में पार्टी के साथ एकजुट होकर खडी थी परन्तु वो इन से आगे निकलकर पिछ्डे वर्गों खासकर यादवों के प्रभुत्व से असंतुष्ट समूह हूँ और दलितों भास्कर जाटवों के प्रमुख से आहत नजर नहीं आने वाली जातियों तक पहुंचने में कामयाब रही थी । क्या ये व्यापक गठबंधन टिकाऊ होगा? सरकार के संरक्षण संसाधनों, सत्ता तक पहुंच के लिए ये जाती समूह एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा करते रहते हैं क्योंकि सीमित अवसर ही उपलब्ध है । इसलिए कुछ जातियों के समूह और जाति समूह के अंदर के कुछ व्यक्ति अपने हिस्से ज्यादा स्थान हथियाने में कामयाब हो जाते हैं । विभागीय नीतियां नहीं । जिस तरह से इन पर अमल होता है, अक्सर इसी तरह के खेल का शिकार हो जाती हैं । यानी एक सडक का निर्माण या फिर योजनाओं पर कारगर तरीके से अमर इस बात पर निर्भर करता है क्या उस गांव के लोग सत्तारूढ दल के समर्थक हैं? संस्थागत कमजोरियों की वजह से राजनीतिक सत्ता तक पहुंच ही अवसर ये भी तय करती है क्या एक जाति विशेष के व्यक्ति की स्थानीय थाने में पहुंच गए और क्या था ना उस की शिकायतों को महत्व देता है । इसी दोषपूर्ण राजनीतिक शासन के मॉर्डल नहीं, वास्तव में भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में आने का रास्ता तैयार किया । सपा और बसपा के शासनकाल के दौरान सत्ता के दायरे से बेदखल महसूस करने वाली जातियां सबका साथ सबका विकास के मोदी के नारों की वजह से उनके पीछे एकजुट हो गई । पर मैं तो वायदों को पूरा करने के लिए भाजपा के सामने शासन के समूचे मॉर्डल को ही नया रूप देने की जरूरत है । उसे ऐसी संरचनाएं का सृजन करना है । इसमें शिकायतकर्ता की जाती पर ध्यान दिए बगैर ही स्थानीय पुलिस अधिकारी उस पर ध्यान दें और सत्ता के समीकरण में उस जाती की क्या स्थिति है । उसे सक्षमता के आधार पर व्यक्तियों की प्रमुख पदों पर नियुक्ति करनी होगी न कि इसलिए कि अमुक व्यक्ति उस जातीय समूह का है जिसमें चुनावों के दौरान भाजपा का समर्थन किया था । उसे विकासकार्यों वाली संस्थाओं को इस तरह से रास्ते पर लाना होगा, उससे पक्षपातपूर्ण संबद्धता के आधार पर नहीं बल्कि सभी को लाभ मिले हूँ । बडा काम है और यही वजह थी कि विरोधाभास अवश्यंभावी हो जाते हैं । उत्तर प्रदेश में अनेक लोगों का मानना है कि योगी सरकार के पहले सौ दिन की मुख्य बात ठाकुरवाद है । ठाकुरों की सत्ता की राजनीतिक और प्रशासन में अपनी स्थिति मजबूत करने के संदर्भ में है । योगी की अपनी जाति का समूह है । आंकडों से पता चलता है ये पूरी तरह सही नहीं है । हालांकि सच्चाई ये है कि सवर्ण जातियों की सत्ता में सबसे अधिक हिस्सेदारी हो गई है । योगी सरकार के सत्ता में सौ दिन के बाद जून दो हजार सत्रह तक पुलिस में नियुक्तियों के बारे में कराए गए एक सर्वेक्षण से पता चला कि पुलिस के जिला अधीक्षकों में बयालीस सवर्ण जातियों के थे । इनमें बीस भ्रमण और तेरह ठाकुर थे । योगी सरकार के छियालीस मंत्रियों में से पच्चीस सवर्ण जातियों के थे । सहारनपुर में ठाकुरों और दलितों के बीच झडप हुई और दलितों के बीच पडे शब्दों में यही कहा जा रहा है पुलिस ने अब अपना ही आदमी मुख्यमंत्री होने की वजह से ठाकुरों का साथ दिया । पिछडे समुदायों में अधिकांश अब ये महसूस करने लगे हैं । हालांकि उनके मतों से ही भाजपा सत्ता में आई परंतु उन्हें अभी तक लाभ नहीं अपना हिस्सा नहीं मिला है । व्यापक गठबंधन के आधार पर चुनाव जीतने भी अपनी राजनीतिक चुनौतियां होती हैं । उत्तर प्रदेश में भाजपा की पहली प्राथमिकता साठ प्रतिशत सवर्ण जातियों, गैर यादव पिछडे और गैर जाटव दलितों को एकजुट रखना होगी । उसे उन शेष चालीस फीसदी मुस्लिम यादवों और जाटवों को भी संभालना होगा जो भाजपा के नेतृत्व में जीतने वाले गठबंधन से बाहर थे । परन्तु व्यवधान पैदा करके सरकार के समक्ष चुनौतियां खडी करने वाला ताकत और सामाजिक समूह है । लेकिन ये सिर्फ सभी सामाजिक समूहों को खुश रखने के बारे में नहीं है । आज हाँ और उसके असली वैचारिक करो । आरएसएस की असली परीक्षा तो ये है कि क्या वह भरोसे और सोच में बदलाव लाने के साथ ही अपने सवर्ण जाति के मूल आधार का सामंजस्य अधिनस्त लोगों की दावेदारियों के साथ स्थापित कर सकेगा । संघ बदल रहा है । वो जानता है कि हिंदू एकता की उसकी तलाश उस समय तक अधूरी रहेगी जब तक वो ये स्वीकार नहीं कर रहे हैं । हिंदू समाज में भेदभाव, असमानता और वर्गीकरण रहा है । वो इस सिद्धांत को स्वीकार करने में सहज है । परंतु वो इसके अंतिम परिणाम के प्रति सचिव है और वो है सामाजिक रिश्तों को दर्ज करने की आवश्यकता । अच्छा जाती के सवाल पर संघ का नजरिया न्याय के लिए स्वीकार करने की आवश्यकता और किसी भी तरह की उथल पुथल से बचने की आवश्यकता के बीच झूल रहा है । कांग्रेस पार्टी की तरह ही उसका अपना सवर्ण जाति का चरित्र विषेशकर नेतृत्व के स्तर पर स्वयं की पैतृक स्थिति ऊपर से नीचे सुधार की धारणा प्रदान करता है तो अब सशक्त पिछडे समुदायों के लिए अरुचिकर है । यही वो चिंता है तो बिहार चुनाव के दौरान मोहन भागवत के बयान में झलक रही थी । यही वो रवैया है जो भाजपा में अधिकांश लोगों में व्याप्त है और यही पिछडे समुदायों और दलितों, खासकर आंबेडकरवादियों में पार्टी की इस मंशा के प्रति गहरा संदेश पैदा करता है । इसे वे सवर्ण जातियों की अपना वर्चस्व बनाए रखने की साजिश के रूप में देखते हैं । बिहार से भाजपा के प्रमुख नेता स्वीकार करते हैं, हम अभी भी पिछडों और दलितों की स्वाभाविक पार्टी नहीं है । अभी सिर्फ यही बदला है कि हम उनके लिए अछूत नहीं है । अभी ये कमजोर है, वो भी देख रहे हैं और जब तक सबका साथ सबका विकास जमीनी हकीकत में नहीं बदलता और जब तक वो अपने नेताओं के लिए पार्टी में सभी स्तरों पर महत्वपूर्ण स्थान नहीं देखते हैं जब तक वो हमें सवर्ण जातियों के खिलाफ संघर्ष में अपनी और नहीं देखते हैं, हम पर पूरी तरह विश्वास नहीं करेंगे । यही हमारे लिए असली परीक्षा है । ये परीक्षा ही निर्धारित करेगी । भाजपा एक समय के हिंदू पार्टी बनेगी या फिर सिकुडेगी? यही ये भी निर्धारित करेगा कि क्या भाजपा लगातार चुनाव जीतेगी? क्या वापस विपक्षी सीटों पर आ जाएगी? यहाँ उसने अपना अधिकांश राजनीतिक जीवन को जा रहा है, चुकी हूँ मैं आपने हिंदू पृष्ठभूमि पर जोर देने और साथ ही मुसलमानों और धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दलों, जो मुसलमानों की हिमायत करते हैं कि प्रति असंतोष पैदा करने की प्रक्रिया ने भी भाजपा की मदद की । इसी तलाश में पार्टी जानबूझकर छल प्रपंच के हथकंडों का इस्तेमाल करने की इच्छुक रहती हैं । वो सांप्रदायिक सद्भाव को भंग करने की भी इच्छुक है । यही नहीं तो छोटे स्तर पर टकराव और यहाँ तक कि दंगा भडकाने के लिए भी तैयार है । अधिकांश लोग भाजपा को हिस्सों में देखते हैं । ऐसी पार्टी तो विकास और संपन्नता में विश्वास करने वाला एक आधुनिकतावादी संगठन है और एक एक हिन्दू पुनर्जागरण पार्टी है जो नफरत की राजनीति में भरोसा करती है और वे पहले वाली दृष्टि की सराहना करते हुए आशा करते हैं के दूसरा रूप हो जाएगा । क्या दलील देते हैं? इसी वजह से भाजपा पीछे रह जाती है । एक नकली और गलत बटवारा है । भाजपा दोनों ही है वो एक हिंदू पार्टी है । इसके नेताओं और समर्थकों में मुसलमानों के प्रति बहुत गहराई तक असंतोष व्याप्त है और राजनीतिक सत्ता की चाहत में हिन्दू मुस्लिम में दूरी बढाने के लिए अपना हमला तेज करने में भी संकोच नहीं करते हैं तो इसमें भी विश्वास करती है । भारत को विश्व मंच पर महत्वपूर्ण स्थान दिलाने के लिए बुनियादी संरचना, निवेश और आधुनिक अर्थव्यवस्था भी जरूरी है । ऍम उसके लिए बढिया काम किया है । दो हजार चौदह के चुनावों में दोनों ही पहलू थे । उत्तर प्रदेश चुनाव में भी जैसा किस पुस्तक में दर्ज किया गया है । हिंदुत्व के प्रखर तत्व के साथ ही भाजपा ने सभी के लिए विकास का वायदा किया था । वास्तव में अक्सर ही ये दोनों पहलू एक दूसरे से जुडे थे । पार्टी दावा करती थी इस सपा के शासन ने मुस्लिम समुदाय को आवश्यकता से अधिक लाभ पहुंचाया गया । अब वो समानता बहाल करेगी हूँ । सिर्फ मुस्लिम विरोधी राजनीति अपने आप में अकेले ही भाजपा को चुनाव जिताने के लिए पर्याप्त नहीं है और इसीलिए पार्टी का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि वो किस तरह से हिंदुत्व कार्ड का उपयोग करती है । उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद पर योगी आदित्यनाथ की नियुक्ति कुछ खत्ता, जनादेश के हिंदू स्वरूप और हिंदू एकता उसका हिस्सा है के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करती है । गैरकानूनी बूचडखानों के खिलाफ कार्रवाई हो सकता है कि कानून और पर्यावरण विनियमनों के दायरे में की गई हो । परंतु यह मुस्लिम समुदाय के लिए एक संख्या था और गौरक्षा के नाम पर दो हजार पंद्रह में मोहम्मद अखलाक को भीड द्वारा पीट पीट कर की गई हत्या से लेकर दो हजार सत्रह में पहलू खान की हत्या था । हमने हिंदुत्व के नाम पर सबसे अधिक हिंसक रूप देखा है । भाजपा और संघ की अपनी व्यवस्था भले ही इस से दूरी बना ले और उसके लिए हाशिया के तबकों को जिम्मेदार ठहराए और अंत इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता । राजनीतिक नेतृत्व इससे पूरी गंभीरता से नहीं निपटा । इससे निष्कर्ष निकाला जा रहा है तो उसकी इसी मौन स्वीकृति है । गौरक्षा की राजनीति वास्तव में भाजपा के लिए हिंदुत्व की राजनीति में संलिप्तता की और इशारा करती है । पार्टी में अधिकांश हो ना तो इस तरह की हत्याओं को लेकर चिंतित हैं और न ही इसकी आलोचना कर रहे हैं । आमतौर पर ऐसी घटनाओं के बाद होती है । उनका मानना है ये हिन्दुओं को संगठित करने में पार्टी के लिए मदद कर रहा है । पार्टी के नेता कहते हैं हिंसा गलत है, परंतु मूल प्रश्न यह है क्या हमें गाय का सम्मान करना चाहिए या नहीं? क्या हमें इस देश के हिंदुओं की भावनाओं का सम्मान करना चाहिए? क्या सिर्फ अल्संख्यकों की भावनाओं और अधिकारों का सम्मान होना चाहिए? क्या हिंदुओं की भावनाओं को आहत करते हुए पीस के सेवन की अनुमति दी जानी चाहिए? इस विचार घर वाले वर्ग का तर्क है । ये घटनाएं इस मुद्दे पर अभिप्राय का ध्रुवीकरण करती हैं और जब ध्रुवीकरण होता है तो यह भी इसकी समीक्षा हो सकती है । फिर भी समाज का एक वर्ग ऐसा है जो इस मुद्दे पर संगठित हो जाता है और रक्षा हमारा पुराना एजेंडा है परन्तु आज देश इस बारे में बात कर रहा है । आपको हो सकता है कि ये पसंद नहीं हो परंतु सडकों पर हिंदुओं के लिए ये हिंसा नहीं बल्कि गौरक्षक मुद्दा है तो महत्वपूर्ण है लेकिन ये कोई सीधी सोच स्पष्ट पटकता नहीं है और यहाँ तक कि संघ भाजपा की व्यवस्था के भीतर भी इस बात को स्वीकार किया जा रहा है । किसी तरह की लडाई की राजनीति ही उसे महंगी पडी है । पहली बार भाजपा की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा है । भाजपा की दो हजार की रणनीति पूर्वोत्तर और दक्षिण के राज्यों में अपनी उपस्थिति के विस्तार पर टिकी हुई है । वास्तव में पूर्वोत्तर एक ऐसा क्षेत्र है जहां भाजपा ने बहुत संरक्षण और बीस के सेवन के बारे में कुछ भी नहीं बोला है । वो जानती है इस तरह के उस के किसी भी कदम को इस क्षेत्र में उत्तर भारतीय हिंदू आचार विचार रोकने के रूप में देखा जाएगा जहां उपराष्ट्रवाद की भावना बहुत ही बलवती है और चुनावी दृष्टि से आत्मघाती हो सकती है । परन्तु क्या इस क्षेत्र को देश के शेष से मैं जो कुछ भी हो रहा है उस से अलग रखा जा सकता है । उत्तर प्रदेश में भाजपा से जुडे तब को जो कुछ भी कर रहे हैं उसको केरल में भाजपा के विस्तार की योजनाओं से यहाँ बीस महोत्सव का आयोजन होता है । कैसे अलग किया जा सकता है इस मुद्दे पर मेघालय जैसे राज्यों में भाजपा नेताओं द्वारा पार्टी छोडने की घटनाएं हो चुकी हैं । दूसरी बार उसके अपनी ताकत वाले मुख्य इलाकों में सब प्रदीप नहीं होता । इस तरह की को राजनीति वास्तव में हिन्दुओं को संगठित कर रहे हैं । वास्तव में ये दो हजार चौदह में भाजपा के साथ जाने वाले शहरी मध्यम वर्गीय हिंदू मतदाताओं के एक वर्ग को उससे दूर कर रही होगी । मुंबई बैंकरों से लेकर गुरुग्राम के उद्यमी तक सभी मोदी के प्रबल समर्थक हैं । लोगों ने गौरक्षा के तरीके को स्वीकार किया है और इसे रोकने के लिए भाजपा द्वारा पर्याप्त कदम नहीं उठाने पर निराशा व्यक्त की है । दो हजार चौदह के चुनावों के दौरान पार्टी का समर्थन करने वाले दक्षिणी पक्ष के टीकाकारों ने भी पार्टी के रुख की निरंतर आलोचना ही है । क्या इस तरह की राजनीति से असहज महसूस कर रहे थे? क्या उन्हें इतना पीछे धकेल दिया गया था कि भाजपा के खिलाफ हो गए स्पष्ट नहीं है परन्तु पार्टी को दो हजार चौदह के चुनाव में उसे मिले अधिक मतों पर इस तरह की अतिवादी राजनीति के परिणामों पर पैनी निगाह रखनी होगी और तीसरी बार ये भाजपा के व्यवस्था और शासन बहाल करने दावों को खोखला बना रही है । भीड की हिंसा बाल पर राज्य के एकाधिकार के बुनियाद पर चोट कर रही है या सुरक्षा को जन्म देती है, बडे पैमाने पर अराजकता फैला सकती है और बडी हिंसा को जन्म दे सकती है । निश्चित ही प्रधानमंत्री मोदी इनकी महत्वाकांक्षा एक वैश्विक नेता के रूप में पहचाने जाने की है । ऐसा लगता है इस तरह कि गौरक्षा के नाम पर हिंसा और हिंसा के खतरों को समझते हैं । जून महीने के अंत में अहमदाबाद स्थित साबरमती आश्रम में मोदी ने गौभक्ति के नाम पर इस तरह की हिंसा की सार्वजनिक रूप से निंदा की और कहा, समाज में हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं है और उन्होंने महात्मा गांधी को गौरक्षा में विश्वास करते थे, यह कहते हुए उद्धृत किया कि वह कभी भी इसे स्वीकृति नहीं देते । भाजपा वैचारिक और क्या कारणों से हिंदू कार्ड लगातार खेलती रहेगी? इसके नेता अक्सर दावे करते हैं कि हिन्दुओं को संगठित करना जहाँ उसका चुनावी हथकंडा भरे हैं, उसकी सरकार की रणनीति सबका साथ सबका विकास की ही है । ये बहस का विषय है । परंतु एक बात स्पष्ट है कि भाजपा की भावी राजनीति इस पर टिकी हुई है कि वह कैसे हिंदुत्व की राजनीति को बढाती है । क्या ये राजनीतिक पार्टी को ही डुबो देगी या फिर पार्टी परिस्थितियों, समय और संदर्भ के अनुसार इसका इस्तेमाल करेगी? और क्या ये भाजपा के सही मायने में राष्ट्रीय पार्टी बनने की उसकी योजना में सहयोगी होगी अथवा उसे कमजोर बना देगी? अंतिम कारण जो भाजपा के भविष्य का फैसला करेगा, उसका उस से कोई संबंध नहीं है कि उसने क्या किया और क्या नहीं किया । आप हमेशा ही सिर्फ अपने दम पर चुनाव नहीं जीते हैं, दूसरा चुनाव हारता है और दो हजार चौदह से ही । इसमें कोई संदेह नहीं है कि भाजपा के उदय ने विपक्ष की स्थिति का भी योगदान रहा है । क्या कांग्रेस एकजुट होकर काम करने, क्या क्षेत्रीय धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी न्याय वाले दल अपनी जमीन उन्हें हासिल करने और क्या गैर भाजपा दल एकजुट होकर के निर्णय करने में बडी भूमिका निभाने में सफल होंगे कि मोदी कितने समय तक प्रधानमंत्री आवास में रहेंगे जिनका हाल ही में नया नामकरण लोक कल्याण मार्ग, नई दिल्ली कर दिया गया है । कांग्रेस में परिवार और पार्टी के बीच पुराना करार सरल था कि परिवार वोट लाएगा और पार्टी उसके प्रति वफादार बनी रहेगी । परिवार अब मतदाताओं को आकर्षित करने में सक्षम नहीं है परंतु कांग्रेस अभी भी टिकी हुई है । परिवार के एक सदस्य के शीर्ष पर काबिज रहे बगैर एकीकृत पार्टी नहीं रह सकती क्योंकि दूसरे नंबर के किसी भी नेता को अन्य कोई नेता पार्टी के बॉस के रूप में स्वीकार्य नहीं होगा और इसीलिए उसे इंतजार है की एक ना एक दिन राहुल गांधी इसकी कमान लेकर परिणाम दिलाएंगे । ऐसा कुछ होने के कोई संकेत नहीं है । क्षेत्रीय दल जिन्होंने धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय के नाम पर चुनाव लडा था, लगातार भाजपा के दबाव में है और इसी वजह से पार्टी ये कहानी गढने में सफल रही है कि धर्मनिरपेक्षता का मतलब ही अल्पसंख्यकों को बढावा देने और सामाजिक न्याय का तात्पर्य एक या दो पिछडी जातियों को दूसरी जातियों की कीमत पर सत्ता सौंपना है । भले ही यह उचित या प्रासंगिक नहीं हो परंतु निश्चित रूप से ये इन गठबंधनों पर खुद पर नए सिरे से आत्मनिरीक्षण करने के लिए दबाव तो बनाती है । जब तक ऐसा करने में सफल नहीं होंगे, से भाजपा के निशाने पर रहेंगे और अंततः भाजपा को हटाने और उसके भविष्य का निर्धारण विपक्षी एकता के इंडेक्स पर निर्भर करेगा । बिहार में नीतीश कुमार, लालू प्रसाद कांग्रेस के महागठबंधन ने काम किया और भाजपा मतों में सम्मानजनक हिस्सा प्राप्त करने के बावजूद ॅ को मात नहीं दे सके । जब चतुष्कोणीय चुनाव में तीन अन्य दलों ने मिलकर चुनाव लडा । उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव और राहुल गांधी का गठबंधन था परन्तु ये महागठबन्धन नहीं था । मायावती जिनके पास बीस प्रतिशत वोट थे, गठबंधन से बाहर ही थी । भाजपा विरोधी मत बढ गए और मोदी सहजता से विजय की और बढ गए । पहला एक बार फिर सभी दलों को एकजुट करने के प्रयास किए जा रहे हैं । नीतीश कुमार के पाला बदलकर राजग में जाने से इन योजनाओं को करारा झटका लगा है परन्तु अन्य के लिए राजनीति में बने रहने की लालसा उन्हें एकजुट किए हुए हैं कि राजनीतिक दल जानते हैं की अलग अलग रहकर वह मोदी के विजय रथ को नहीं रोक पाएंगे । इसलिए सामूहिक कार्रवाई ही उनकी उम्मीद का सहारा है । निश्चित ही या भाजपा के लिए एक कडी चुनौती पेश करेगा । हालांकि एकजुट विपक्ष को भी चार चुनौतियों से रूबरू होना पडेगा । पहले तो ये नेतृत्व को लेकर इनमें कोई आम सहमती नहीं है । राहुल गांधी किसी क्षेत्रीय नेता का नेतृत्व स्वीकार करेंगे । ममता बनर्जी जैसी ताकतवर क्षेत्रीय नेता राहुल गांधी को स्वीकार करेंगी । राष्ट्रपति पद जैसे चुनाव की तरह भास्कर मोदी के खिलाफ पहले ही एक सर्वमान्य चेहरा खोजना बेहद जरूरी है । परन्तु इस मुद्दे पर किसी भी तरह की एक राय बनाना ऐसे किसी भी गठबंधन के लिए सबसे बडी चुनौती है । वहाँ ये इसके अस्तित्व में आने से पहले ही रहने का संकेत भी हो सकता है । दूसरा, इस विपक्षी गठबंधन के पास एक भरोसेमंद मकसद का होना जरूरी है । यदि मोदी हटा हुई एकमात्र संदेश हो और वे एक साथ बने रहे हैं तो उनके सामने चुनौती है मोदी से ठीक उसी तरह पेश करेंगे जैसे इंदिरा गांधी ने किया था । कोई से भारत से गरीबी हटाने और विकास के लिए प्रतिबद्ध व्यक्ति और छोटे इधर उधर बिखरी और हताश दलों के गठबंधन के बीच संघर्ष के रूप में पेश करेंगे, जो सिर्फ उन के खिलाफ नफरत फैलाने के लिए एकजुट हुए हैं । तीसरा एक महागठबन्धन अपने आप में सफलता की गारंटी नहीं है । सभी नागरिकों के पास साधन होते हैं प्रत्येक व्यक्ति स्वतंत्र रूप से आपने मस के बारे में निर्णय लेता है और यहाँ तक कि पूरा समुदाय ही नहीं बल्कि परिवार के सदस्य भी एक साथ मत नहीं देते हैं । इसका तात्पर्य ये हुआ कि मतों का मिलना अब आसान नहीं है । कोई भी गठबंधन उन्हीं परिस्थितियों में जीतेगा यदि उसके विश्वसनीय संदेश जमीनी स्तर पर संगठनात्मक सामंजस्य और स्वाभाविक हित मिलते हो । शीर्ष स्तर से फरमान काम नहीं करता है और अंत में ये समस्या को हल नहीं करता कि द्विपक्षीय स्थिति में जहाँ भाजपा की सीधे कांग्रेस से प्रतिस्पर्धा है और उसने बहुत ही शानदार प्रदर्शन किया है । कांग्रेस राजस्थान, गुजरात और मध्यप्रदेश राज्यों में पिछले लोकसभा चुनावों में पूरी तरह पराजित हो गई । विपक्षी एकता इन राज्यों में कांग्रेस को पुनर्जीवित नहीं कर सकती है और इसलिए विपक्ष एक बार फिर किस तरह अच्छा करता है, ये इस बात पर निर्भर करता है कि कांग्रेस प्रदर्शन कैसा करती है और यही भाजपा के भविष्य का निर्धारण करेगी । भारतीय लोकतंत्र में भारतीय जनता पार्टी का उत्थान परिवर्तनकारी की तरह हुआ है । ये ताकतवर बनी रह सकती है । ये वर्चस्वशाली भी हो सकती है या फिर ये उतनी ही तेजी से नीचे आ सकती है जिस तरह से उसका खान हुआ परन्तु मिलीजुली रणनीतियों के माध्यम से पार्टी ने भारत में राजनीतिक मुकाबले के स्वरूप को ही बदल दिया है और वो ये पुनर्भाषित करने की राह पर है कि भारतीयता का मतलब क्या होता है । अभी ये स्पष्ट हो गया है भाजपा ने सत्ता कैसे प्राप्ति परन्तु चुनाव जीतना शासन करने से आसान है । भारतीय जनता पार्टी द्वारा इतनी मेहनत से हासिल की गई राजनीतिक ताकत के इस्तेमाल का तरीका ही यह निर्धारित करेगा । क्या नरेंद्र का नए भारत का सपना पूरा हुआ हूँ?

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