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इतर भाग 01

ऍम आप सुन रहे हैं तो कोई किताब का नाम है । इधर जिसे लिखा है सुषम बेदी ने आरजे कौशल किशोर की आवाज में कोई ऍम सुने जो मन चाहे है तो बहुत स्वामी रामानंद से मिलने में कतई नहीं जाती है । अगर करने फोन पर इतना जोर देकर नहीं होता । जिनेवा से उसने फोन किया था । लॉन्ग डिस्टेंस कॉल का असर योगी को ज्यादा ही होता है । अभी भी आधी रात को कभी घंटी बज उठे तो रोंगटे खडे होने लग जाते हैं । जैसे कि हवाई हमले का सायरन बजा हो । कहता था एक बार तो मिल कर तो देखो ना । अल्पना बहुत पहुंचे हुए स्वामी है एकदम जान लेकिन मुझे क्या लेना देना स्वामियों से मुझे तो कोई सिद्धि लेनी नहीं है । ऍम ज्ञान ध्यान की बात नहीं कह रहा । दरअसल उनके पास बहुत बडी हीलिंग पावर है । हर तरह की मेरे दोस्त की नाथ में पॉलिटिक्स मिंटो में ऑपरेशन कर दिया और वह ठीक भी हो गया । मैं फिर भी चुप रही । कुछ पल इंतजार के बाद करण फिर बोला मुझे भरोसा है अभी तुम से मिलने को कह रहा हूँ । स्वामी जी पर होना हूँ पर करण पर मुझे बहुत भरोसा था । यू करन और मेरे नजरिये में बहुत फर्क था । उसमें कुछ आस्था बच्ची थी । वह वेद वेदांत को भी बडे वैज्ञानिक तरीके से समझा समझाया करता था और मैं और मेरे पति अभिषेक दिलचस्पी से सुना करते थे । उसका फल सफर उनके साथ हम एक बार एक महर्षि के घर दिल इस वक्त में पहाडी की चोटी पर बने आश्रम में भी गए थे । आसाराम किया था झील और पहाडियों से गिरा हुआ कोई हॉलिडे रिजॉर्ट था । हम गए भी छुट्टी बनाने के मकसद से थे । आसाराम के आसपास की हरियाली और ताजगी को पांचों इंद्रियों से बोलते हुए तरोताजा होकर लौट आए थे । मैं उसी से हमें मिलने की ख्वाहिश थी । नहीं उन की ओर से कोई संदेश आया बस घूम घाम कर वापस उनके चेले चपाटों नहीं देखभाल की थी हमारी रन के दो थे हम । तभी हिन्दुस्तान में तो स्वामी के पास हम कहे नहीं जहाँ की आधी से ज्यादा उम्र गुजारती अब अमेरिका में खासी बेवकूफी बात लगती है । तुम मेरे कहने से एक बार मिलो तो बडे दिलचस्प इंसान है ये स्वामी, उनकी पत्नी भी साथ है । बडे अलग किस्म के लोग हैं । नोट लाइक यू, जो स्वामी पत्नी ऍम में पडती हैं, वो फैशनेबल तेज तर्रार किस्म की स्मार्टवाॅच गप मार दिए तो में मिलकर मजा आएगा और फिर उनकी खासियत तो हिलिंग पॉवर में है । ऐसी फीलिंग पावर मैंने और पूरे दिन या शायद और ज्यादा विश्वस होने के इरादे से कहा तो अभिषेक जो मेरे आस पास ही कुछ सुनी और कुछ अनसुनी की ये मौजूद था । मेरे हाथ से छीनकर कुछ बात करने लगा तो वही मुझे बताओ ना । क्या पढाया जा रहा है मेरी बीवी को? अभिषेक के हाथ में मामला पढते ही मैं वहां से खिसक लिए और रसोई में आकर अब बच्चा काम खतम करने लगी । अभिषेक कि टेलीफोन से टकराती जोशीली आवाज मेरे कान में पढ रही थी और मैंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया और फोन रखते हैं । अभिषेक ने मुझे वहीं से सोने के कमरे में हवा देनी शुरू कर दी । पास आकर बोला अरे वही चलेंगे जरूर चलेंगे क्यूँ जाने में कोई नुकसान थोडी है । करण कहता है वे हर तरह की बीमारी ठीक कर देते हैं । अमेरिका में एड्स के बीमारों का भी इलाज कराना चाहते हैं । देखो तुम भी अपनी डायबिटीस ठीक करवा लो ना । डॉक्टर तो इसे जड से खत्म नहीं कर सकते । उनको दवा छोडने को कौन कहता है और आजमाने में क्या हर्ज है । यह क्या हो गया है तुमको अभिषेक तुम कबसे बाबाओं के चक्कर में पड गए तुम सच में सोचने होगी वह मेरी डायबिटीज ठीक कर देगा । देखो और किसी पर तो में भरोसा नहीं करता हूँ । या तो अपना यार करन कह रहा है उस पर वाला भरोसा कैसे नहीं करूँ? हो सकता है जैसे और लोग ठीक हुए हैं तो भी हो जाऊँ मैं नहीं जाउंगी । प्लीज अपना जिद नहीं करूँ । मेरे पास फालतू चीजों के लिए वक्त नहीं । इस मेरे लिए यह अभिषेक का हमेशा आखिरी हथियार होता है मेरे लिए प्लीज और फिर मुझे अपना हथियार डाल नहीं पढते हैं । थोडी देर बाद घंटी बजी । इस बार करण की गर्लफ्रेंड निकाल का फोन था । क्या मैं तुम लोगों के साथ बाबा जी के पास चल सकती हूँ? थोडी देर पहले करण ने बताया कि वे यहाँ आए हैं और मुझे उनसे मिलना चाहिए । अब तो लगता है जाए बिना चारा नहीं कि वे लोग न्यू जर्सी में कहीं ठहरे हैं करने । उनका टेलीफोन नंबर दिया है । कह रहा था फल फूल लेकर जाना ठीक है, नंबर दे दो वक्त तय करके तुम्हें बता देंगे था उन का सेक्रेटरी बात करेगा आपसे उसका नाम में । माधव हमारे फोन करने से पहले अगली सुबह माधव का ही फोन बाबा जी मिलना चाहते हैं । करण साहब ने बहुत तारीफ करके मिलने को कहा था । कब आएंगे करण में उसे शाम को मिलना पक्का कर लिया था । पहले से ही बाबा जी के यहाँ पंद्रह बीस लोगों की भीड लगी हुई थी । उसको फोन और कुछ कुर्सियों पर और बाकी के लोग कालीन पर बैठे हुए थे । गुजराती दंपत्ति का घर था । पता लगा कि जिनेवा में रहने वाली उनकी बहन के साथ ही वे न्यूयॉर्क आई । बहन ने वहीं से उनको अपना बहनोई के करते हैं, करवाने की बात की थी । हम लोगों को जहाँ कहीं भी खाली जगह मिल गई, बैठ गए, निकाल फूल ले आई थी । हमारे लिए भी एक मुख्य खरीद लाई थी । बेहद उत्साहित थी । रास्ते भर में वो है । हमें समझाती आई थी कि क्या क्या करना होगा कि बाबा जी कैसे सब कुछ जान जाते हैं । कैसे मरीज ठीक करते हैं । अमूमन जो कुछ भी करने उसे फोन पर बताया था और जिसमें से ज्यादातर रहे हैं, हमें फोन पर भी बता चुका था । वह दोहराती रही । मुझे वह कहीं बहुत नर्वस सी लगी । शायद जो सवाल उसे पूछने होंगे उनके जवाबों का अंदाज करके भी वह नर्वस हो सकती थी । खासकर अगर वे उसकी जिंदगी के अहम सवाल हुए तो इन शायद एक नए अनुभव की संभावना । उसकी उतावलापन उसे नर्वस बना रहा था । मुझे अपने में कुछ कोतूहल या उत्साह जगता नहीं दिखा । छह । इसलिए भी मैं पूरी तरह से नासिक हो चुकी है । इस बारे में मेरी जिज्ञासा तक दफन हो चुकी है और जिज्ञासा की कब्र पर जो मजार बनी है, उस पर दिया तक चलाने का होकर नहीं । अभिषेक ने कभी कभी उस दिए को जलाने की कोशिश की है और हार मानकर चुप हो गया है । पर इस बार मेरी सेहत का सवाल है । इसलिए अभिषेक ने मन में कोई दुविधा नहीं । अगर सौ चक्कर डॉक्टरों के लगाया जा सकते हैं तो एक यह भी सही चाय कुछ हो जाए । अभिषेक की आशावादिता की तो योगी कोई सीमा नहीं, आंसू में से अमृत या पत्थर में से दूध निकालना हो । ये आसमान के किसी भी नक्षत्र तक पहुंचना हूँ । मैं वही पुराना अमरीकी मुहावरा दोहराता था ऍम बस आकाश सीमा है यानी कि इंसानी उपलब्धियों की कोई सीमा है ही नहीं । मुझे हैरानी होती थी अभिषेक डॉक्टर है । इंसानी शरीर की पूरी चीरफाड करके उसकी प्रक्रियाओं को देखा समझा हुआ है, उसके लिए कुछ रहस्य नहीं है । फिर भी बाबाजी के चमत्कार में भरोसा कर सकता है । अभिषेक का तो कहना है कि चुकी वो डॉक्टर है इसलिए डॉक्टर विद्या की सीमाओं को भी समझता है । वैज्ञानिक ज्ञान के बाहर अभी बहुत कुछ है । यू कहने को कहा जा सकता है कि विज्ञान हर रहस्य को खोलता जा रहा है । फिर भी बहुत सी बातें हैं । वह अपने सिस्टम अपनी व्यवस्था से बाहर रखता है क्योंकि उनके जवाब उसके पास नहीं । लेकिन पूरी तरह खोज किए बिना उनका अस्तित्व नकार भी तो नहीं जा सकता । योगी बहुतों को शायद किसी दूसरी ताकत की जरूरत अपने मन को मजबूत बनाने के लिए होती है । अभिषेक को भी भगवान चाहिए जिससे वह अपने कमजोर शहरों में हिम्मत ले सकते हैं । मेरी सेहत का सवाल भी कुछ ऐसा ही था । अभिषेक ने कहा था तो मेरे साथ मंदिर तो जब तक चली चलती हूँ तब बाबा जी के पास जाने में क्या हर्ज है । तुम पर कोई धर्म नहीं ला देगा । कमरे में एयरकंडीशनर शायद काम नहीं कर रहा था । गर्मी बहुत ही और मुझे शायद प्यास और पसीने की वजह से ही सी हो रही थी । ड्राइव भी काफी लम्बी थी मैं बुदबुदाई इतनी आसानी से हम बेवकूफ बनने को तैयार हो जाते हैं । अभिषेक ने मेरे चेहरे पर बाल पडते देखता हूँ थोडा सब्र कर लो मैडम और वो उठकर घर के मालिक से बात करने लगा । कुछ देर बाद एक नाटक और मोटा आदमी सुस्त कदमों से दब दब करता । सीढियों से उतरा गाल इतने फुले हुये थे कि उन की वजह से आंखें अंदर को दस भी लग रही थी । सफेद कमीज और काली पतलून इस तरह से जिसमें को करते हुए थी की अतिरिक्त सांस की तैयारी कपडों के प्रस्ताव को सहने पाने के कारण जहाँ जहाँ से समतल जमीन पर पार्टियों जैसी उभरी हुई थी, घर के मालिक ने मिलवाया फॅमिली हैं । माधव माधव जी ने एक दम चपाती जैसी चलती लेकिन चौडी मुस्कान बिखेरी तो आंखें गालों के उपहार में से और भी पीछे को छुप गई । माधव ने हमें सफेद कागज की नई नकोर पर्चियां देते हुए कहा अपने अपने सवाल पर्ची पर बडे बडे शब्दों में लिख लीजिए । ज्यादा से ज्यादा दो सवाल और सवालों के बीच में जवाब के लिए खाली जगह भी छोड दीजिएगा । मैं पर्ची लेना नहीं चाहती थी । अभिषेक ने मुझे तरेरना मैंने हाथ आगे बढाकर ले ली उसने मेरे कान के पास कुछ ऐसा कर कहा अपनी डायबिटीज जरूर लिखना । कुछ देर हाथ में पर सही पकडे मैं यूँ ही बैठी रही । मैंने देखा निकोल जोकि सवाल पहले से ही सोच कर रही थी । जल्दी जल्दी पर्चे पर लिखे जा रही थी । उद्धव एक से उसके हाथ कांप रहे थे । पर्ची पर सवाल लिखकर हमारे को देने लगी तो मैं बोला नहीं, नहीं पर्ची अपने पास ही रखी है । बाबा जी के पास लेकर जाइएगा । फिर हमारी और मुखातिब होकर बोला आपको लाइन में लगने की जरूरत नहीं है । बाबा जी पूजा कर रहे हैं । जो भी फारिक होंगे आपको बुला लूंगा । तब तक आप रूपा जी उनकी पत्नी से मिलेगा । वह हमें लिविंग रूम से ही जुडे एक दूसरे कमरे में ले गया जहाँ एक सोफा ऍम रखे हुए थे । कमरे में बैठक जैसे सजावट नहीं थी । बैठक का पुराना फर्नीचर यहाँ बिछाया गया लगता था । रूपए और घर के बच्चे वहाँ बैठे टेलीविजन पर कोई सोप ओपेरा देख रहे थे । हमारे कमरे में दाखिल होने का गौर करने के बाद भी रूपा ने टेलीविजन से आखिर नीचे नहीं हटाई थी । तब माधव जोर से बोला भावी ये हो । अभिषेक और अल्पना जी आए हैं जिनके बारे में करन बात कर रहे थे, निकाल भी आई है । रूपा जी ने कुछ बेमन से हमारी ओर देखा । आंखों में बहुत था भाई जो हमें तंग कर रहे हो । आराम से टेलीविजन भी नहीं देख सकते क्या? हमारे नमस्कार ओके जवाब में उसमें हल्के से हिला दिया और बोली आइए बैठे हैं और नजर फिर से टीवी पर टिका दी हमारी आंखे भी उसके पीछे पीछे सहज टीवी पर पडने की ओर उठेंगे । वही चुपचाप बैठना । थोडा अटपटा लगा । माधव जी हमारा पर्चा कराकर कमरे से जा चुके थे । मैंने बातचीत शुरू की । कब पहुंचे आप लोग? परसों शाम को अभी जेटली होगा? नहीं मैं तो वैसे भी रात को जगह रहती है । रात ही मैं तो स्वामी जी देवी की पूजा करते हैं और क्या तभी तो इतने लोगों को देख पाते हैं । आप भी करती है क्या? मैं बार बार आंखें कभी टीवी की ओर मोड लेती थी तो कभी मेरी ओर वही जो स्वामी जी करते हैं । अरे नहीं तो अमित जी के पास देवी शक्ति है और कोई थोडे ही कर सकता हूँ । मैं तो आप ही की तरह नहीं । उनकी पत्नी इन टू पत्नी होने से देवी शक्ति नहीं मिलती । पहले रूपए का मेरा ये सवाल जचा नहीं था । फिर मुझे इस तरह समझाने लगी जैसे कोई ज्ञानी किसी अज्ञानी को समझाता है । टीवी पर अब विज्ञापन आ रहे थे अचानक जैसे उसे कुछ याद आया हूँ एकदम सोफे से लगभग उछलती वोली अभिषेक । वैसा हमको करण जी ने बतलाया था कि आप न्यूयॉर्क को बडी अच्छी तरह से जानते हैं । क्या हम को भी घुमाएंगे न्यूयॉर्क हमको अभी तक यहाँ कुछ भी अच्छा नहीं लगा । एयरपोर्ट से आते हुए जो भी नहीं और देखा बडा गंदा सा लगा । सब कुछ कहाँ तो यूरोप के इतने सुन्दर शहर पेरिस, जेनेवा और कहाँ नहीं । थोडी देर पहले मैंने करण जी को फोन पर बताया था तो कहने लगे की अभिषेक से कहूँ कि वे न्यूयॉर्क की खूबसरत चीजें दिखाएंगे तो बोलिए ले चलेंगे । तब तक चल सकते हैं । कल सुबह चाहिए । अभिषेक इस धाराप्रवाह के लिए तैयार नहीं था । डूबते डूबते सहसा उसको तीन का मिल गया । कल सुबह तो मुझे दफ्तर जाना होगा । रुपए जी वीकेंड पर जरूर घुमा देंगे । देख लीजिए जो भी ठीक रहे वरना हम तो सबसे यही कहेंगे कि हमको तो आपका न्यूयॉर्क बिल्कुल पसंद नहीं है । अपना पौर अधिकार रूपा की आवाज में इन दोनों की ही अति मुझे बहुत अरुचिकर लगी । चार । इतने बरसों से अमेरिका में रहकर इन दोनों की कमी की आदत सी हो गई थी । जैसे की खाने में कम नमक और काम मिठास की और अब मुझे हिंदुस्तानी मिठाई कुछ ज्यादा मीठी और नमकीन को ज्यादा ही तीखी लगती है । मैंने अपने आप से कहा इस भारत में काफी बचपना है जो उम्र में ज्यादा बडी भी नहीं है और तीस तीस बरस की होगी । चेहरा बना हुआ था और जिसमें भी खूब गोल मटोर लेकिन आंखों के नीचे काले कट्टे पड गए थे । चाय रातों को जागने की वजह से लंबे बाल बेपरवाही से बिना बांधे हुए खुले छोडे हुए थे । जिस पर बस एक लंबा सा कप्तान नुमा गाउन पहना हुआ था तो उसे भारी भरकम शरीर को और भी ज्यादा भारी दिखा रहा है । इस तरह से काॅफी पर पिछली हुई थी चाहत अपने आपको कोई महारानी समझती हूँ । अभिषेक ने बडे विनीत होकर उससे कहा आप बताइए आपको क्या पसंद है? उसी हिसाब से आपको घुमाएंगे सच में जरूर पसंद आएगा । आपको और विज्ञापन खत्म हो गए थे तो मेरा फिर से शुरू हो चुका था । रूपा ने आंखें फिर से वजह निकली एक दो बार हमारी और मुस्कराकर देख लेती ये देखो तुम्हारी अहवेलना नहीं कर रही पर ये नाटक कैसे नहीं देखो तुम लोग इतने महत्वपूर्ण नहीं होगी तुम्हारे लिए नाटक छोड दिया जाए । मुझे लगा की रूपा शायद ये फैसला नहीं कर पा रही है कि हमारे साथ दोस्ती का व्यवहार किया जाए या गुरुपत्नी के ऊंचे आसन से दूरी पर रखकर बात की जाए । उसे ज्यादा देर दोना में नहीं रहना पडा क्योंकि हमें स्वामी जी के पास जाने का बुलावा आ गया । माधव ने बताया कि पहले अभिषेक जाएंगे उसके बाद मैं और फिर रिकॉर्ड तो किसी को ऊपर बेडरूम में बिठाया गया जहाँ सीढियां चढकर जाना होता है । अभिषेक ऊपर चढ गए । मैं और निकल सीढियों के पास खडे हो गए । कुछ ही देर में अभिषेक अभी ऊपर ही थे कि मुझे भी बुला लिया गया । दो की गंद और दोनों से भरा है कमरा । किसी दक्षिण भारतीय मंदिर के गर्भगृह ऐसा रहस्यमय लग रहा था तो उन्होंने और लाल रंगों से कडा हुआ पलंग पोष और उसके आस पास की मेजों पर ढेर सारे फूलदानों में महकते ताजे गुलाब फॅस और कारनेशन के फूल कमरे में घुसते ही सामने वाले कोने में एक आराम कुर्सी पर कत्थई रंग का चोगा लूंगी । पहले बैठे थे स्वामी जी विशाल कराया और गहरा सांवला रंग और बहुत घने काले कंधों तक लम्बे पाल, जिनकी आगे कुछ लटें पूरी तरह से सफेद, कहीं भी अपनी उपस्थिति जताने वाला एक प्रभावशाली व्यक्तित्व, आंखों में एकदम जादू से बांध लेने वाला आकर्षण । क्या यही देवी शक्ति थी यह संसार को बेवकूफ बनाने वाली यह सायास अर्जित विद्यार्थी और जो भी कुछ हूँ, उस दृष्टि में मुझे अभिभूत कर दिया था । लेकिन मैंने अपने होश नहीं खोल । अंदर से पूरी तरह से मैं देखना चाहती थी कि अब क्या होने वाला है । मेरे दायें हाथ और मुट्ठी में पर्ची दबी हुई थी । उन्होंने बैठने का इशारा किया और मैं अभिषेक के पास की जमीन पर टिककर उनके सामने बैठ गई । सवाल नहीं है जी हाँ, वे कुछ देर आंख बंद करके ध्यान करते रहे । फिर बोले, आपको डाॅॅ जी हाँ कब से छह सात परसेंट? क्या उम्र है? छत्तीस दवा ले रही है क्या रोज ऍम टीचर हो जाएंगे आप कल सुबह आइयेगा हम शुगर चेक करेंगे । फिर उसी हिसाब से इलाज बतलाएंगे सवाल का मुट्ठी में दिखाइए । उन्होंने मुट्ठी में पडी पर्ची को खोलकर फिर दोबारा अपने ढंग से मरोडकर रख दिया । अ मोटी फिर से बंद कर लीजिए । जब हम कहें तभी खोलेगा । मुझे लगा कि वह पर्ची मेरी मुट्ठी में फडक रही थी । उन के कहने पर मैंने पर्ची खोला तो मेरे सवाल के नीचे जवाब काली स्याही में लिखा हुआ था । नियम संयम और इलाज से ठीक हो जाएंगे । उसके बाद मैं कुछ बोल नहीं सकती थी । उन्होंने हमारे लाए हुए गुलाबों में से एक गुलाब तोडने को कहा । गुलाब को उन्होंने एक सफेद पर्ची में लपेटकर मुझे मुट्ठी में रखने को कहा । कुछ देर बाद पच्चीस उनके आदेश पाने पर खोली तो उसमें सिंदूर था, जो उन्होंने मुझे अभिषेक को अपने माथे पर रोज लगाने को कहा । ऍफ कैसे होता है, क्या होता है और इस सब का क्या मतलब है? ये सवाल मुझे कुछ देर तक परेशान करते रहे । मुझे जैसे किसी ने जोड दिया था । भीतर तक सब कुछ मेरे सामने हुआ था । मैं पूरी घोषणा क्या मेरे अपने ही हाथ में सिंदूर बना? और मेरे सवाल का जवाब जब आया तो पर्ची मेरे मुट्ठी में थी । चाहे कोई ज्यादा था, ट्रिक थी या कि सच में कहीं कोई इस दर्शन जगह से एक्टर है मेरी अभी तक की सारी पढाई जानकारी ने मुझे यही सिखाया है कि जो विज्ञान द्वारा सिद्ध किया जा सके वही सच है । बाकी सब बहन है, मुगालते हैं नहीं, दूसरे कार्यों को सिद्ध करने के चोचले हैं । किसी से धर्म को भी मैं सामाजिक और मनोवैज्ञानिक जरूरत मानती रही हूँ । लेकिन अब पहली बार मन में सवाल उठ रहा था कि मेरी सारी पढाई इसी पास जाते । मानस द्वारा बनाया गया करीकुलम इसमें खुद आधुनिकता केसेस में धर्म को आस्था को नकारा । तब मैंने धर्म और आस्था को कोई मौका ही कहाँ दिया है? मेरे सामने अपने केस की पैरवी करते और तब मैं फैसला कर पाती कि सच कहाँ है या क्या है । तो क्या क्या अभी से मौका देना चाहिए? आखिर इतने बरसों से सब देता हूँ धर्म के आगोश में ही उनसे जुडे मूल्यों को जन्म दिया जिन पर आज सभ्यताओं की नींव खडी है तो फिर उन्हें मान के डर या कुछ स्वाभाविक प्रवर्तियों का परिणाम कहकर उनकी पूरी सच्चाई क्या की जा सकती है? या मनोविज्ञान मानव मन की हर गुत्था हर उडान और उपलब्धि का सही जवाब दे सकता है । विकासवाद का हर सिद्धांत सही है और उससे आगे कुछ नहीं । फिर मुझे घबराहट से हुई बाबा जी की चमत्कार का इतना असर हो गया कि मैं अपने अब तक के मूल्यों और विश्वासों को ही चैलेंज करने लगी । यही तो तरीका होता है । ऐसे ही तो इतने अमेरिकी और यूरोपियन इन गुरुओं, बाबाओं के हाथ को बनते हैं । मेरी तरह उनके मन में भी पहली बार ऐसे सवाल उठते होंगे । और फिर उनका जवाब मैं पाने पर कन्फ्यूजन की हालत में बाबा जी के पास लौट जाते होंगे । और फिर उनका हमेशा के लिए ही कल्याण, लेकिन में सिंदूर बनने जैसे मामूली चमत्कार और ईश्वर की उपस् थिति जैसे बडे सवाल को एक साथ रख रही हैं । क्या मैं यह कहना चाहती हूँ की अगर फुल्का सिंदूर बना सकते हैं तो दुनिया में भगवान मौजूद हैं और अगर सिंदूर बनना को जादू जालसाजी हैं तो फिर ईश्वर भी इसी कैटेगरी में आता है । क्या मेरा ये सोचने का ढंग सही है या उसी में कुछ बाबाजी के असर से धुंधलाहट आ चुकी है? शायद अभी से किसी निष्कर्ष पर पहुंचना सही नहीं है । ऐसे बडे सवालों के जवाब इतनी जल्दी नहीं मिलते । कुछ और सोचना होगा, कुछ और अनुभव करना होगा । अभी तो बाबा जी ने कल सुबह दोबारा बुलाया हैं, देखिए क्या होता है अगर उनकी चमत्कार से मैं तंदुरुस्त हो जाऊँ तो क्या उससे कुछ साबित होगा या नहीं होगा?

इतर भाग 02

भाग दो ऍम की ओर जाने के लिए जब हम लोग फ्री में बैठे तो सहसा मैंने नोटिस किया कि दूसरे यात्री स्वामी जी और रूपा को ही घूम रहे थे । मैंने ध्यान से दोनों को देखा । दोनों के व्यक्तित्व का कॉन्ट्रास्ट खासा दिलचस्प था तो स्वामी जी ने चटक नारंगी रंग का होगा और लोगी पहन रखी थी घना सामना । रंग धूप में और भी सामना हो गया था । बडी बडी काली आंखें लम्बी लम्बी काली बरौनियां और लम्बी धनुषाकार बोल हैं । कुल मिलाकर खासा प्रभावशाली व्यक्तित्व था । उनका कद खूब लम्बा था । छह फीट से कुछ ऊपरी भरा भरा जिसमें और भरा हुआ चेहरा ठीक ही नाक मोटे हो और कंधे तक के लंबे काले बालों कि माथे पर बिखरी लटों पर सबसे दिया चुकी थी जो स्वामी जी की जो वन की कसावट वाले चेहरे पर कुछ बनावटी सी लगती थी । रुपए तो तियां हरे रंग की किसी सेंथेटिक कपडे कि चम पीली साडी पहनी हुई थी । ब्लाउज का रंग एकदम साडी के साथ मैच नहीं कर रहा था । दरअसल आज सुबह ही सैंडलों को लेकर खासा तमाशा हुआ था । जब मैं और अभिषेक स्वामी जी और रूपा जी को घूमाने के मकसद से उनको उनके रिहाईश वाली जगह से उठाने गए तो रूपा तैयार होकर सोफे पर रूठी हुई बैठी थी । मैंने पूछा जो तैयार है तो चुप रही । मुझे लगा कि दाल में कुछ काला है । दोबारा पूछने पर बोली तैयार कहाँ से हूँ यहाँ मेरी परवाह किसको है? नहीं हैं । मेरे कपडे ठीक से प्रेस करता है और ऊपर से जो भी चीज पूछो वही गायब । मैंने दिल्ली से चलते वक्त खास इससे कहा था कि मेरे हरे सैंडल मत बोलना । मैंने साडी तो पहले कमबख् सैंडल ही नहीं ढूंढ कर देता हूँ । ऊपर रूआंसी हुआ था । तभी मैंने दरवाजे से सिर्फ नीचा की हुए माधव को प्रवेश करते देखा तो मैं समझ गई की रूपा का अपराधी कौन है? तो अपराध बहुत से दबी आवाज में कहने लगा दिल्ली फोन कर दिया है । जिनेवा भी कहीं ऊपर नहीं मिले । चार हवाई जहाज में कहीं गिर गए होंगे । रूपा के गुस्से पर पूरा ही पड गया था पागल हो गए हो क्या तोड के इसका बाकी सामान ठीक है तो जादू से कहाँ उड गए जूते मुझे मालूम है तुमने रखे ही नहीं और अब झूठ बोलते हो दिल्ली में किसी को क्या पता मेरी पैकिंग तो तुम ही ने की थी पता नहीं तुम्हारी अकल को क्या हो गया है? बावरे बने बोलते रहते हो एक जरा सा काम कहती हूँ मैं भी नहीं होता तुमसे । मैंने माहौल को थोडा नॉर्मल करने के इरादे से कह दिया रूपाजी फिक्र मत कीजिए । यहाँ अमेरिका में कुछ फर्क नहीं पडता । देखिए मैं खुद रंगीन कपडों के साथ काले जूते पहने हूँ । आपकी कालिया सबसे पहले लीजिए । सब के साथ मैच कर जाते हैं । थर्ड सहसा महसूस किया पर आए लोगों के सामने कुछ अन्यथा व्यवहार कर रहे हैं । एक दम संभल कर वो मिलता है । देखिए बाबू जी हम लोगों में से नहीं जिन्हें पहनने छोडने का सलीका नहीं वो हमारी जो हर चीज एकदम परफेक्ट मैचिंग होनी चाहिए । मैं तो मैचिंग जूते पर्स के बिना घर से बाहर कदम नहीं रखती हूँ । किसी से पूछ ले इसी पता है मैं कैसे रहती हूँ । बस यहीं आकर इसका दिमाग खराब हो गया था । खुद के अंदर से तो हंसी आ रही थी । पर अगर मैं सच में हस देती तो रूपा जी का मुझसे बडा दुश्मन और कोई न साबित होता । वक्त की मांग के अनुसार हमदर्दी जताते । मैंने कहा रहने दीजिए रूपा जी, आप तो वैसे ही बहुत खूबसूरत लग रही हूँ । जूतों की ओर किसका ध्यान जाएगा और फिर साढे के नीचे जूते देखने का है । बिखेरना दीजिए हम को तो पता है ना । शायद मेरे पहनावे की सादगी से प्रेरणा पाकर या फिर कोई और चारा नहीं देखकर अंत में वह सफेद सैंडल पहनने को मान गई थी । रुपए रूप होती थी या नहीं इस बात का तो मैं भी फैसला नहीं कर पाई थी । उसके जिस्म की लंबाई चोडाई चौबीस जी मेल की थी । यानि कि पांच फीट पांच इंच लंबा कद और भारी भरकम शरीर । वो जगह रंग स्वामी जी से तीन चार परत कम सामना और चेहरे पर पाउडर बेस और रूस की परतों की वजह से सांवलापन और भी दफन हो चुका था । मैं नक्स अलग अलग से ठीक ठीक ही थे । पर चेहरे के भाव में चतुराई और फोर्ड अपन का एक अजीब सी जी मिस्टर नहीं लगता था । आंखों में बचपना, मान नखरा, गुस्सा और रोष मासूम और बोली मुस्कान किसी फिल्म की चलती रेल की तरह बार बार जा लगते हैं और गायब होते रहते हैं । कुछ पता नहीं चलता था कब कौनसा भाव कहाँ अभी हो जाएगा । मैंने देखा कि माधव चुपके से उस भाव को पर करते वैसा ही मूड बना लेता हूँ । लेकिन जितनी तेजी से स्थितियां बदलती कई बार वहाँ उन्हें पकडा । पानी में चूक जाता हूँ और बस यहीं उसे ईद का बकरा बन जाना पडता है । लेकिन स्वामी जी को रूपा लगता है बेहद रूपवती लगती थी । रूपा का जितना रोवा माधव पर था उससे कई गुना खुद स्वामी जी पर जब तक रूपा जूतों के नखरे किए बैठी रही, स्वामी जी की उसे एक लाभ भी कहने की हिम्मत नहीं पडी हो । चुपचाप माधव और रूपा को ड्रामा करते देखते रहे और मेरे मनाने से जब रूपा मान गई तो चुपचाप गाडी में आकर बैठ गए । मैंने बाद में उन्हें अभिषेक को कहते सुना हम समझते हैं कि रूपा के साथ हमने बहुत अन्याय किया है । हमको तो इस संसार से बहुत चीजों से कुछ नहीं लेना देना लेकिन इस बिचारी का क्या कुछ हूँ? मैं तो अपनी इच्छा से जो चाहे पहले जहाँ वो मैं हम उसे मन मर्जी करने देते हैं । पहले ही बिचारे ने हमारी वजह से बहुत सफर किया है । मेरे भीतर बहुत से कोतूहल जगह तो हमी और रूपा के रिश्ते को लेकर कुछ पूछने की हिम्मत नहीं पडी तो स्त्री रही कि स्वामी ने विवाद सिद्धि मिलने से पहले क्या होगा या बाद में यह पत्नी है या कोई प्रेमिका । ॅ पहुंचे तो सैंडल की जी । तब तक आते हुए रूपा बोली इतनी सीढियाँ कौन चढेगा बस देख लिया । चलो वापस चलते हैं स्वामी जी और माधव ने हाँ में हाँ मिला दी । मुझे बहुत की जाए । जब सीढियां चढकर ऊपर नहीं जाना था तो फ्री लेकर यहाँ आने की जरूरत क्या थी? स्टेचू तो दूर से ही दिख जाता है । मुझे तीनों एक दम झड घसि आ रहे और दकियानूसी लगे । कहाँ फस गए मैं और अभिषेक इनके साथ मैं खामोश होकर उनके साथ वापसी की । फेरी जी लाइन में खडी हो गई । रूपा बोले जा रही थी मैंने कहा था ना न्यूयॉर्क में है ही नहीं । कुछ देखने को मेरा मन ओवरआॅल यहाँ आएगी तो कोई बुलाने तो गया नहीं था । मेरी से बाहर आकर अभिषेक और मैं अलग अलग चल रहे थे । तीनों साथ साथ आगे स्वामी जी बीच में रूपा और पीछे पीछे माता हूँ । ऐसा मेरा गुस्सा हवा हो गया और मैं चाहे की आप तीनों की जोडी तो ऐसे लग रही है जैसे राम सीता और लक्ष्मण हूँ । रुपए चलते चलते रुक गई और एक दम गंभीर सभाओं से बडी साडी तथा तीखी आवाज में बोली मेरे सामने उसका नाम मत लेना । भावी जी राम तो बहुत बुरा आदमी था । एक दो भी के जरा से कहने पर इसमें अपनी बीवी को त्याग दिया । उसे अब स्वामी जी की तुलना कैसे कर सकते हैं? मैं तो कहती हूँ कि लोग पागल हैं जो राम की पूजा करते हैं, हम औरतों को तो उसे दुत्कारना चाहिए । ऍम गुटके जमाने से लोग राम की कथा और चरित्रों को आधुनिक नजरिये से देखने लग गए थे । इसलिए मेरे लिए ये वाक्य बहुत नया नहीं था । तो रूपा से ऐसा सुनकर खुद रूपा मुझ से काफी दिलचस्प इसक्षेत्र वाली औरत लगी । फिर मैं सोचने लगी कि यह तर्क स्वामी जी ने रूपा को दिया होगा या रूपा ने । स्वामी जी को कुछ भी हो तो अमित जी और रूपा का साथ साथ रहना है, यह साबित करता था । दोनों इसी तरह के होते हैं, अपने साथ रहने को नहीं जस्टीफाई करते थे । वरना ज्यादातर जिन स्वामियों से मैं मिली थी प्रकट अप्रकट रूप से तरीका साहब चार एक रखते भी हूँ किन्तु पत्नी का साथ चल रहे हैं । इस तरह नहीं देखा था । पत्नी भी जो चौबीस घंटे साथ रहे तो कार में बैठती । रूपा बोली थी आपके न्यूयॉर्क में मैं होता है ना । क्या कहते हैं कि हाँ ब्रॉडवे रह दिखाइए हमको आपका मतलब थिएटर । मैंने कहा वही कैसा एक्टर पसंद करेंगे आप । म्यूजिकल या प्ले हमको वहाँ सब नहीं पता लेकिन ट्रॉफी होना चाहिए । मैं तो होगा ही । ब्रॉडवे तो सडक का नाम है जहाँ सारे थिएटर हॉल मौजूद हैं । जिन पर कई तरह के शो रहे हैं । उनमें से कौन सा देखना चाहेंगे? आप जो भी अच्छा हूँ, चौबीस चलेंगे । मैंने पूछा था तो नहीं चलेंगे । जब मैं इनके साथ हर जगह जाती हूँ तो इनको भी मेरे साथ चलना पडेगा । अब की समिति बोल पडे हम नहीं जाएंगे थेटर वेटर हमको वैसा पसंद नहीं तो ठीक है । देखिए फिर हम कैसे जाने देते हैं आपको अपने पेशेंट के पास क्या क्या मतलब हुआ कि मैं तो सारा वक्त आपके मरीजों के साथ गुजार दो और आप एक थिएटर तक नहीं देखे । मेरे साथ आपके मरीजों का ही नुकसान होगा । मुझे उन दोनों की बातचीत में अपनी उपस् थिति बडी बेढब लग रही थी । कहाँ तो मैं सोच रही थी कि उन्हें घुमा फिराकर मैं और अभिषेक उन पर एहसान कर रहे हैं और कहाँ? रूपा ने हमें स्वामी जी का मरीज कहकर हमारे किए कराये को एक डॉक्टर भी विजिट कहकर छुट्टी कर दी । मरीजों को देखना तो हमारा फर्ज है । हमारा काम है उसी के लिए तो हम यहाँ है । कोई थियेटर देखने नहीं आए हम या लेकिन मैं तो मरीज देखने नहीं आई । हाँ पूछे तो घूमना है, शॉपिंग करनी है । आपके मरीजों के साथ वक्त जाया नहीं करना । हाँ जी को हमारे सामने रूपा की बातों से तो नहीं महसूस हुई होगी । वे अपने स्वामित्व का खरापन भी साबित करना चाहते होंगे । बोले तुम ज्यादा बोलोगी तो तुम्हें छोड कर चले जाएंगे । हम सब कुछ छोड छाड करने वाले पर भी जा सकते हैं । अब की रूपा एकदम चुप कर गई । वो शायद स्वामी जी का आजमाया हुआ अचूक असर होगा । वरना रूपा चुपकर जाने वाली चीज नहीं लगती थी । अगली सुबह माधव ने फोन किया अभिषेक आप किसी डर्मेटोलॉजिस्ट ऍम ले सकते हैं । क्या हुआ ये लीजिए रूपए जी से बात कीजिए । छोटे ही रूपा ने कहना शुरू कर दिया मेरी थोडी पर एक सिस्टर है । उसका ऑपरेशन करना होगा । क्या आप किसी अच्छे डॉक्टर को जानते हैं? इस कल ही तो हम साथ थे । ऐसा तो कुछ दिखा नहीं । अरे दिखता कैसे नहीं कब से तो हमें एक तंग कर रहा था । मैं नौं कर बराबर कर देती हूँ । कैसे बनाता है हमारी शकल कितनी बुरी लगती होगी । पहले तो खैर नोटिस नहीं किया था और सच में भी तकलीफ है तो मैं डॉक्टर से बात कर लेंगे । कब की अपार्टमेंट लेंगे । जल्दी से जल्दी आज ही मिल जाए तो अच्छा है । आज तो मुश्किल होगी पता करती हूँ उन रखकर मैं सोचती रही बाबा जी सारी दुनिया की बीमारियाँ ठीक कर सकते हैं तो अपनी बीवी का सिस्टम या जो भी था नहीं, ठीक कर सकते हैं । बाबा जी के पास हर सवाल का जवाब था । यह और बात है कि उस जवाब की तरफ पद्धति से चाहे आप सहमत हूँ । दूसरा यह भी कि जवाब कई बार उन्हें खुद नहीं देना पडता था । उनके चेलों में से कोई ना कोई समस्या हल कर देता था । बाद में निकाल ने मुझे बताया उससे शायद करण ने बताया होगा कि बाबा जी के मंत्रों का असर उनके अपने परिवार पर और स्वयं पर नहीं होता, सिर्फ दूसरों पर होता है । घूम फिर कर हम उन्हें अपने घर चाय पिलाने ले आए । हमारे अपार्टमेंट पर बाल भर नजर घुमाकर रुपए बोली । यह तो बडा खूबसूरत अपार्टमेंट है । हमें भी ऐसा दिलवा दीजिए ना तब तक है आप लोग । यहाँ मैंने धीरे से पूछा । यही कोई तीन हफ्ते इतना तो रहेंगी । मैंने तो जेनेवा से चलते वक्त ही कहा था कि अपना अपार्टमेंट लेकर रहेंगे । मुझे नहीं । ऐसे औरों के घर रहना अच्छा लगता, पर मेहताजी ने जबरदस्ती अपने घर ठहरा लिया । उन को प्रॉब्लम है ना! तो मैंने कहा कि चलो यहाँ हमारे ठहरने से उनकी कष्ट दूर हो जाए तो अच्छा ही है । पर आखिर कब तक इतनी दूर न्यू जर्सी में पडे रहेंगे । वहाँ से कहीं आना जाना भी मुश्किल रहता है । दो तीन हफ्ते के लिए कोशिश तो कर सकते हैं, लेकिन शायद इतने कम नोटिस पर मिलना मुश्किल हो । फिर मैंने ट्रेन में किराया भी काफी ज्यादा है । क्या फिक्र मत कीजिए बाबू जी उसका इंतजाम हो ही जाएगा । अभिषेक कुछ ऐसा कोई ध्यान आया हो? बोला हाँ जी, आप अगर तीन हफ्ते में हिंदुस्तान लौट जाएंगे तो अल्पना के इलाज का क्या होगा? कितनी ऍम तीसरा आप फिक्र मत कीजिए । इनको हम ठीक करके ही जाएंगे । आप जल्दी जल्दी जिलिंग करवा लीजिए । अब तब रुकने की जरूरत नहीं जो हम आपको अपना दिल्ली का पता भी दे देंगे । लेकिन वहाँ आप हमें हमारे घर पर ही मिलेगा । आश्रम में तो रोज हजार हजार की लाइन लगी रहती है । आप की कभी बारिश ही नहीं आएगी । थोडी देर बाद बाबा जी ने कहा एक ख्याल अभी हमको और आया । आप चाहे तो हम आप के घर में भी आकर ही नहीं कर सकते हैं तो आप अपने कुछ दोस्तों को भी बुला लीजिए । जिस जिस को भी कोई प्रॉब्लम है हम उनको भी देख लेंगे और अल्पना की हीलिंग भी कर देंगे । बाबा जी का सुझाव हमें अच्छा लगा तो मैंने और अभिषेक ने जिस किसी से भी उन के बारे में बात की थी सभी उनसे मिलने को जग्यासी होते थे । मैंने हफ्ते बाद की तारीख निश्चित करके पूरे डिनर का इंतजाम कर लिया । बाबा जी की चमत्कार डिनर बडी खास तरह की पार्टी होगी । इस बीच अभिषेक दो बार अपना क्लीनिक का काम छोड बाबा जी के बताए वक्त पर मुझे ही ले के लिए न्यूजर्सी ले गया । बाबा जी हर बार कुछ नई तरकीब करते थे । उनको अपनी मुट्ठी में लेकर दबाते तो दो निकलने लगता । किसी में देवी का चलना मत कहकर मेरी अंजलि में भर देते हैं और मुझे भी जाने को कहते हैं । मेरी उन्ही चाटकर में मेरी शुगर चेक करते हैं । मुझे ऐसा बहुत अजीब लगता था, पर मैं चुप रहती हैं । मैं जैसे किसी दूसरे को किसी बहुत फर्क के अस्तित्व को जांच परख रही थी या उस फर्क और अतीत को अपना स्थित जाता आने का मौका दे रही थी । पार्टी के लिए मुझे खासी मेहनत करनी पडी । बाबा जी प्याज, लहसन वगैरह नहीं खाते थे । मुझे ऐसे पकवान सीखने पडे जो इनके बिना भी स्वादिष्ट बन जाती हूँ । बाबा जी के लिए खास कमरा तैयार किया गया । धूपबत्ती, आसन, ताजी गुलाब के फूल, एक पेपर पेड से काट काट कर सवाल लिखने के लिए पर्चे बनाई बाबा जी ने । उन्हें मंत्र से खोखा करीब चालीस पचास लोग इकट्ठे हो गए थे । अपार्टमेंट के बाहर गैलरी में जूतों की कतारें लग गई थी । मुझे डर हुआ कि कहीं पडोसी कोई आपत्ति न करें । जो भी कोई बाबा जी के पास से लौटकर मेरे कमरे के बाहर आता, उसका चेहरा देखने वाला होता है । कुछ पल के लिए एकदम खामोश । कैसे किसी शॉर्ट ट्रीटमेंट से गुजरा हूँ । फिर हर किसी का एक ही सवाल उनको विश्वास है ना उनमें पैसा मेरे भीतर किसी ने हो रहा है । चाइना में ठीक कर रही हूँ । जब मैं खुद ही संध्या संदेह की हालत में हूँ तो क्या यह सही है कि मैं अपने करीबी मित्रों, रिश्तेदारों को भी ऐसी दुविधा का शिकार बनने दो? अचानक में कैसा अफसोस और पश्चाताप महसूस होने लगा? क्या मैंने कोई गलती तो नहीं कर दी? कितने लोगों का दायित्व? मैंने अभिषेक को एक किनारे लाकर कहा । अमित ठीक नहीं कर रहे हैं । लोग कमजोर होते हैं । इस तरह उन्हें अभिषेक में एकदम से मुझे करती हैं । ऐसी उल्टी बात कर रही हूँ । हम तो इन लोगों को भला कर रहे हैं । उन्हें मौका दे रहे हैं । राजनाथ की कमर का हाल देखा । दो साल से तैयारी भी चल रही है । अभी तक ठीक नहीं हुई । डॉक्टर ऑपरेशन से ठीक होने की गारंटी नहीं देते । अगर बाबा जी की शक्ति से ठीक हो जाए तो बोलो दुनिया में इससे ज्यादा वाला हम किसी का कर सकते हैं । लेकिन मैं ठीक हुई तो हो सकता है मैं ठीक हूँ । लेकिन इस तरह से यह सोच तो नहीं होगा की कोशिश भी नहीं की । बाबा जी कुछ तो लेते नहीं, बस आने जाने की बात है ना तुम बिल्कुल गलत ढंग से सोचती हूँ । खेल में वाॅल रंजना लूज ऍम मिला । जवाब थी । फिर मोहित कह रहा था, मुझे तो यह सब ढकोसला लगता है । कोई ट्रिक करते हैं बाबा जी अभिषेक को मोहित की बात भली नहीं लगी । बोला तुम अपने फैसले लेने में स्वतंत्र हूँ और मुझे तो कोई ट्रिक नहीं देखती । कागज मेरे घर से लिया गया है, जिसपर जवाब अपने आप छपाए । स्कूल मैंने खुद बाजार से खरीदे हैं, जिनका सिंदूर बना या दूध निकला । बाबा जी ने उस शाम आने वाले लगभग सभी मित्रों को एक हफ्ते बाद हमारे अपार्टमेंट पर हीलिंग के लिए आने को कह दिया था । मुझे सब जब आकर कहने लगे तो ऐसा अपनी थकान याद करके मैं अभिषेक तक चीज पडी । यानी कि मुश्किल से छह दिन बाद एक और पार्टी मुझसे नहीं होगा इतना काम अभिषेक का बढिया मूड जो का क्यों बना हुआ था? इतने पकवान बनाने की जरूरत क्या है? ज्यादा खाना बनाने मैं मदद कर दूंगा । कब राव नहीं? मुझे समझ नहीं आ रहा है क्या हुआ । पहले तो कोई ऐसा संकेत नहीं दिया था बाबा जी ने । यह तो कोई सिलसिला शुरू हो गया । उसके बाद फिर फिलिंग चली तो अभी तक इस तरह हो रहा था कि बाबा जी जो कुछ कहते अभिषेक उनकी हाँ में हाँ मिला था । उनके उस दिव्य प्रभाव वाले व्यक्तित्व का प्रतिरोध अगर कोई कर सकता था तो रूपा और सभी उनसे कम से कम दस गुना छोटे होकर रहते हैं । बाबा जी योगी इतने विशालकाय थे कि सब उनके सामने होने से लगते हैं । मैंने अभिषेक से कहा इस तरह सब में सिर्फ से बने रहकर बात बनेगी नहीं । क्या हम साफ बात नहीं कर सकते? उनसे हमने तो सच में उन्हें भगवान बनाकर बिठा दिया है और ये उम्मीद करते हैं कि हम भी उनके चरण हुए । मैं तो कभी भी हुई और सच में अगर ये जादू होना है तो इससे बडी बेवकूफी की बात क्या होगी कि हम इतने समझदार हो कर भी उनके हाथ देखो बन जाए । लेकिन वो मतलब इतना हम भी उनके पास अपने स्वास्थ्य जाते हैं । तुम्हारी डायबिटीज, रियली फील, पुलिस और अपने साथ साथ अपने दोस्तों को भी बेवकूफ बनवाए जा रहे हैं । उनकी जिम्मेदारी तो नहीं होगा, ये अपने से मना कर सकते हैं । वैसे लोग हैं बच्चे तो मुझे लगा मेरी तर्कशक्ति भी कुछ कुछ पडती जा रही थी । बाबा जी हमें बार बार बुलाते हैं और हम बैठे उनकी बातें सुनते और प्रभावित होते चले जाते हैं । और जो जो बाबा जी का असर हम सबके बीच पढ रहा था । क्यों? तो रूपा का अनाचार भी यू रूपा कहीं मुझसे शायद मेरे व्यक्तित्व की अभिजात्यता से कुछ प्रभावित जरूर थी । मेरे व्यवहार, पहनावे और हर बात को खूब गौर से देखा करती । पर वहीं उसके मन में कहीं गयी थी, उसकी अपनी अभिजात्यता की थी । यानी कि वह अपने आपको सॉफिस्टिकेटेड मानती थी और सॉफिस्टिकेटेड लोगों को बीच अपने को वैसा मनवाना नहीं चाहती थी, जो पश्चिम में रहकर पश्चिमी ऍम की बातें मुझे बहुत बेमानी सी लगती थी । यहाँ बैठे भारतीयता का आकर्षण बल्कि ज्यादा था, लेकिन यहाँ रहते यहाँ के तौर तरीके अपने यहाँ भी चार डाल में खुल जाते थे । तभी ने बाॅलिंग माना जाए । किसी कॉलोनियल मनोवृत्ति के मारे तो उस पर अपना बस भी कहा है । रूपा जी का यह कॉम्प्लेक्स मैं खूब समझती थी, लेकिन उस औरत के प्रति उसके विशिष्ट रोल की वजह से मुझे चाहे कुछ जिज्ञासा हूँ, उसके व्यक्तित्व में किसी तरह का भी आकर्षण मेरे लिए नहीं था । लेकिन उसमें शायद मेरी ऊंची शिक्षा प्राप्त होने, मेरे विचार, मेरे पहनावे, सब के प्रति को तो हल्की चाहती । मैं जो भी कपडा पहना होता, मैं उसकी तारीफ करती और कहती है अपने लिए भी वैसा बनवाना चाहती है । मैं उसके भारी भरकम शरीर पर नजर डालती और कह देती आप नहीं ले लीजिए मुझे कहाँ फिट आएगा और मुझे भी ऐसा ही चाहिए । उसकी जवाब से मुझे अपनी क्रूरता पर ध्यान आया कि मुझे ऐसा नहीं कहना चाहिए था । पर मेरे मन में कुछ न कुछ खुंदक रहती थी कि उसके सामान्य व्यवहार से । तभी मैं जहाँ मौका लगता बदला निकालती । लेकिन मुझे मौके कम मिलते । ज्यादा मौके तो रूपा के पास ही थे जिसका ठाठ महारानी उसे कम नहीं था । उस दिन बाबा जी ने हमारे सारे दोस्तों की हिली के लिए चार बजे घर पर बुला लेने को कहा था । उनकी न्यूजर्सी वाले मेजबान को ही उन्हें हमारे यहाँ चार बजे तक पहुंचना था । चार । बजने में दस मिनट पर माधव का फोन आया । अभिषेक जी हैं उनसे कहिए गाडी लेकर आ जाएँ । हम लोग अपने आप नहीं आ सकते हैं । चार । बजने लगे सब लोग आने वाले होंगे । अभिषेक तो पता ही नहीं कहा है । इस वक्त ठीक है जब आप तो फोन करवा देना हम तैयार बैठे हैं । चार बजे । निश्चित वक्त पर अभिषेक घर आया तो उल्टे पांव मैंने उसे बाबा जी को लाने न्यूजर्सी भेज दिया । वक्त भी आ गया । पांच बजे छह बजे सात बजे मैं बार बार घडी देखती । लोग बार बार मुझसे पूछते हैं कि क्या हो गया? कहीं कोई एक्सीडेंट तो नहीं हो गया? इतनी देर तो नहीं लगनी चाहिए थी । कुछ लोगों ने डाॅट कर रखी थी । ज्यादा से ज्यादा छह सात बजे फारिक हो ही जाएंगे । पचास लोगों से घिरी में समझ नहीं पा रही थी कि सबको लॉर्ड जाने दो । यार रोके रखूँ होने के करीब बाबा जी रूपा और माधव ने अभिषेक के साथ प्रवेश किया तो हर एक के ऊपर एक ही सवाल था कि हुआ क्या? और उनको तो अभिषेक ने कहा तो ऐसी बहुत था । ब्रिज पर कोई एक्सीडेंट हो गया था । फिर मुझे किशन बनाकर बताने लगा तो मैं तो भागा भागा ही नहीं । लेने गया । बार उपर जी वहीं अपने नाइट ग्राउंड में बैठी थी । बाबा जी ने तैयार होने को कहा तो बोली हमारा मोड नहीं है जाने को मैंने बताया कि वहाँ पचास लोग इंतजार कर रहे हैं तो बोली हमको क्या करने दीजिए इंतजार । हम करें क्या? हमको तो इतनी थकान हो रही है । बस बैठी रही । बाबा जी ने इतनी बार कहा की रूपा जल्दी कर लो तो लोग इंतजार कर रहे होंगे तो बोली कि आप हमें छोड कर चले जाऊँ, क्या बताऊं? अल्पना बजीरू पाजी को छोडकर कहीं जाते ही नहीं । बोले तुम नहीं जाओगे तो हम भी नहीं जाएंगे । लेकिन अभिषेक बाबा जी रूपा को छोडकर कहीं जाते क्यों नहीं? मालूम नहीं मैं तो खुद हैरान हूँ क्या जुबान की वजह से बाबा जी को अंग्रेजी नहीं आती ना? रूपा जी तो सुना है कि गवर्नमेंट की पडी है ठीक ठाक वो लेती अंग्रेजी लेकिन मैं माधव भी तो बोलता है नहीं हाँ वो भी सही है । फिर मालूम नहीं जो रूपा बिना कहीं जाते नहीं है रुपए वही कमरे में हमारे बिस्तर पर पसरी रही बाबा जी के लिए कुर्सी रखी हुई थी । पालो जमीन पर बैठ के रूपा बिस्तर पर बीच बीच में जब उसकी किसी से बात करने की ख्वाहिश होती तो बाहर आ जाती । अभिषेक के दो तीन दोस्त उसे खास पसंद है । एक बिजनेसमैन, एक जर्नलिस्ट और तीसरा स्टॉक ब्रोकर । रूपा । उनसे अपनी शॉपिंग, इसके बारे में सवाल उठाती क्या कहाँ से मिलेगा सस्ता है महंगा उसे क्या क्या जरूर लेकर जाना है । क्या वो उसे शॉपिंग करा सकते हैं? क्या सही दुकानें मालूम है? मगर है मुझे काफी तरह चाहता था उन पर कि बेचारे बाबाजी के मारे रूपा को बडे इत्मीनान से उसके सवालों का हाल देते रहते थे तो बाद में मैं उन्हें छेड भी देती थी । खूब फ्लर्ट किया जा रहा है बाबा जी की पत्नी के साथ । इसके जवाब में वे तीनों मुंबई का देते हैं रुपए । कुछ देर बाद ही कमरे से बाहर आकर मुझसे बोली भावी जी, हमको तो बडी जोर से भूख लगी है । खाना तो एकदम तैयार हैं, पर पहले बाबा जी को वो रहने दीजिए, हम से नहीं होता इतना इंतजार । अभी तो उन्हें बहुत देर लगेगी । आप हमको तो खिला दीजिए मुझे तरह साडिया रूप एकदम बच्ची से लगी भूख से झुंझला थी । सच में इस बेचारे की जिंदगी में भी कहाँ आसानी होगी? मैं कुछ खाने का वक्त है न सोने का । जहां बाबा जी मरीज देखने जाते हैं, इसे साठ से जाते हैं । तब बेचारी तंग नहीं आएगी । तो क्या फॅमिली है उसमें? महिमा तो बाबा जी की जाते हैं सब या तो फालतू में किसी एक नॉर्मल जिंदगी कहा है । इसकी नसीब मैंने खाना में इस पर लगा दिया तो दूर से ही रूपा बोली दाल गर्म की है । हाँ, बिल्कुल तो वहाँ तो निकलने रहा तब गरम कैसे होगी? मेरी सारी ताजा ताजा हमदर्दी दाल से उठने वाली भाव से गायब हो गई । एक तो जल्दी जल्दी से मैंने खाना लगाया पीएम साहब की भूख का इंतजाम करने के लिए । और ये है कि मेरे काम में मीनमेख निकाल रही है । लिविंग रूम में अभी भी करीब पैंतीस लोग बैठे थे । रुपये प्लेट में खाना डालकर कमरे के बीचोंबीच पूरे ऊंचे वॉल्यूम पर टेलीविजन का कोई सोप ओपेरा लगाकर सोफे पर बैठ गई । चार बजे के इंतजार करते हुए सब थकाए बैठे थे कि किसी तरह बारी आई तो लौटे । बाबाजी के खाने से पहले किसी को खाना भी नहीं मिलना था तो सब बिना खाए जाने की जल्दी में थे । मैंने वॉल्यूम थोडा दिन में क्या रुपए एकदम बोली । वॉल्यूम ऊंचा रहने दीजिए । कितने लोगों की बातचीत में हमें ठीक से सुनाई नहीं पडता । अपने दोस्तों के सामने रूपा के इस बर्ताव पर मुझे शर्म रखी जा रही थी । थोडी देर बाद मैंने निकाल से कहा कि वह टीवी बीमा करते हैं, पर वही हुआ, वैसे ऊंचा कर दिया गया । यहाँ तक कि अंदर से बाबा जी उठ कर आए और बोले इतना शोर क्यों कर रखा है? हमारा ध्यान केंद्रित नहीं हो पा रहा है । लोग तो खामोश हो गए, पर टीवी उसी वॉल्यूम पर रहा । टीवी के सामने बैठे रूपा आराम से डेढ घंटे तक खाती रही । मैं खाना परोस का इधर उधर दूसरे मेहमानों के साथ उलझ गई थी । योगी मुझे उसके दाल वाले कमेंट पर गुस्सा चढा हुआ था तो मैं उस से कतरा रही थी । एक बार जब मैं उसके पास से गुजरी तो उसने मुझे बोला लिया भावी जी यहाँ बैठे ना । आप तो हर वक्त काम में लगी रहती है । हमारे पास भी दो बाल बैठे ना । मुझे लगा रूपा को मेरी नाराजगी का शायद ऐसा हो गया । तभी इतनी मिठास गोलकर बोल रही है । मैं वहीं बैठ गई । बोलने लगी आना । बहुत बढिया बनाया । मैं तो गुजराती खाना खाकर बुरी तरह से बोर हो गई थी । मुझे उलटबांसी शैली की प्रशंसा बाली नहीं लगी । मुझे खुद को गुजराती खाना बहुत अच्छा लगता था । मेरे कुछ गुजराती मित्र थे और जो भी मेरे गुजराती समूह से कोई दुश्मनी नहीं थी, मैं चुप रही । पैसा मेरा ऐसा योगी रुख बाप गई । बोली नर्सिंग हम दिल्ली में ही रहे है ना बहुत सालों से पिछले पंजाबी खाने की आदत हो गई है क्योंकि लगातार कई दिनों तक एक साथ खाना खाया भी तो नहीं जाता गुजराती खाना हमको अजीब मीठा मीठा सा लगता है । हम को तो आदत है खूब मिर्च मसाले वाला खाने की । मेरे खाने में तो आपको मसाला कम लगा होगा । हमें थोडी मिर्ची ऊपर से और डालनी थी और मैं आपका नियमों का चार बहुत बढिया नहीं उठा कर लेता हूँ । बोतल बेशक जरूर ले जाइए । मुझे लगा वह किसी तरह मुझसे दोस्ती करना चाहती है । मेरे साथ बहुत सहज हो जाना चाहती है । पर मैं इसके लिए तैयार नहीं थी । मुझे लगा मेरा उसके साथ सहज हो पाना संभव नहीं । बाबा जी से जुडी होने के नाते वह भी मुझे किसी और दुनिया की लगती थी । मुझे लगता उसे एक डिग्री फाइट तरीके से सब से पेश आना चाहिए या बचपना दिखाती फिरती है । सबको ऊपर से मैं खुद को दिल्ली से जताकर मेरे साथ मेरे दोस्तों के साथ एक शहर आना नाता भी जोड लेना चाहती है । जब कि वह खुद बिहार से बिहार वालों में दिल्ली वाला होने की बहुत ख्वाइश रहती होगी । मुझे अपने एक बिहारी जानने वाले का भी ध्यान आया तो मुझे मिलने के बाद कहने लगे थे । हमारी बहुत ख्वाहिश थी किसी दिल्ली वाली लडकी से शादी हो और तब मेरी शादी खुदा का शुक्र से हो चुकी थी और उनकी भी किसी बिहार से आपको हमने बहुत तकलीफ देना । भाभी जी मैं बोली अरे नहीं तकलीफ किस बात की । अच्छा अगली बार खाना मैं बनाउंगी । मैं भी बढिया खाना बनाती हूँ । पंजाबी स्टाइल का कभी मेरे हाथ की कितनी खायेगा तो खूब मजा आएगा । ऊप चीजें डालकर खिचडी बनाती हूँ । मुझे खिचडी का कोई शौक नहीं था । मैंने कहा अभी तो आप मेरी मेहमान है । मेरे हाथ का ही खाइए । जब आपकी कराएंगे तो आप अपने हाथ से बनाइएगा । अचानक रूपा की नजर मेरे बाएं हाथ की अंगूठी पर पडी । वो एकदम बोली थी ये अंगूठी तो बडी खूबसूरत है ना मेंट की है ना आप? कहाँ से ली शादी के वक्त की है । मुझे भी डायमंड खरीदने हैं । आपको कोई अच्छी दुकान मालूम है मैंने तो यहाँ कभी डायमंड खरीदे ही नहीं । पता कर सकती हूँ । ये देखिए । रूपा ने अपने बाएं हाथ की चार उंगलियों में चढी डायमंड की रोटियाँ दिखाते हुए कहा ये कैसी है ये मैंने जनेवा में खरीदी थी । कॅश हमको डायमंड बेहद पसंद है । न्यूयॉर्क में सुना है बहुत वेराइटी है । मैं जरूर कुछ लेकर जाऊंगी । मैंने अपने आप से कहा इस औरत में एक आम औरत से भी नहीं चाहता । दुनिया भी चीजों के शौक है । ये कहाँ इस भगवे वस्त्र वाले के पल्ले पड गई । कितने में अभिषेक हमारे पास से गुजरात तो रूपा उसे बुलाकर कहने लगी भाई साहब, हमने आपसे कहा था ना कि हमें एक मकान बोल दीजिए । देखिए अगर जल्दी नहीं दूंगा तो हम आपके अपार्टमेंट में धरना डालेंगे । फिर गंभीर होकर बोली, हम को नहीं अच्छा लगता । गुजरातियों के घर रहना कुछ रहने का सलीका नहीं है । मैं अब देखिए ना आपका अपार्टमेंट कितना साफ और सुंदर है । हमारा भी ऐसा ही घर होना चाहिए । दिल्ली में हमारा घर देखिए, इतना साफ और सजा हुआ है । महारानी बाग में है । हमारा एकदम सजा कर रखती हूँ उसे महारानी बात कहकर उसने मुझ पर अपने सामाजिक स्तर की उच्चता और संपन्नता बचाने की कोशिश की थी और मुझ पर उल्टा ही असर हुआ था । योगी वहाँ अपने चमकीले भडकीले गहनों से लदी लिवाज में मुझे अपने समाज की नहीं लगती थी, बल्कि जिस गुजराती समाज में उसे अपनाया हुआ था, उसी के उपयुक्त देखती थी । फिर भी अभिषेक और मैंने उन्हें घर दिखाने के लिए रियल स्टेट एजेंट से वक्त तय कर लिया । जब फोन किया तो बाबा जी की फैक्ट्री माधव बोले, हम लोग तो ट्यूशन जा रहे हैं । वहाँ किसी को कैंसर है, बाबा जी का वहाँ जाना जरूरी है । टिकट भी भेज दिए हैं उन्होंने आप हफ्ते भर बाद कि अपार्टमेंट ले लीजिए ।

इतर भाग 03

हूँ । बहुत टीम रिकॉल, इतनी खामोश, गंभीर और अपने में सिमटी हुई लडकी । पिछले पांच वर्षों से उसे जानते हुए भी मैं उसके बारे में कुछ नहीं जानती थी । तिवा इसके कि वह एक जर्नलिस्ट पर करण और वे दोनों साथ साथ एक ही अपार्टमेंट में रहते थे । प्रकरण के साथ आती और साइड की तरह उसके साथ रहती है । ज्यादा बात करन से होती निकल सिर्फ कुछ हां में हां मिलाती या कुछ छोटी मोटी टिप्पणी लगा देती है । जब मैं अपने काम की बात करती तो लगता वह एक समझदार इंटेलिजेंट लडकी है । लेकिन ज्यादातर उसे चुप रहना ही पसंद था या वही उसका संभाव था । कभी कभी मुझे लगता एक रन तो बोले, बिना एक पल नहीं रहता हूँ । मैं इसकी खामोशी से बोर नहीं होता होगा । लेकिन शायद है, हमारे साथ ही ज्यादा संप्रेषित नहीं कर पाती थी । या फिर करन के बोलने का शौक उसकी खामोशी पूरी करता होगा, जो वह भी दूसरे अमेरिकियों की तरह प्राइवेट व्यक्ति थी । जब से काॅपर पांच साल के लिए जीना आ गया था, फ्री कॉल से मिलना कभी कबार ही होता था । लेकिन अब बाबा जी की वजह से इधर हम लोग काफी मिलजुल रहे थे । अजीब बात यह थी कि जिसने कॉल को इतनी बरसों से जानते हुए भी हम नहीं की बराबर जानते थे, अब अचानक उसके अंतर्मन की बातें हमें रूपा जी के जरिए से मालूम हो रही थी । मुझे निकाल पर तरफ भी आता था । कितनी आपने में गिरी रहने वाली लडकी को ऐसे बेहाई आई से नंगा कर दिया है रूपा ने । हमारे सामने ये कैसा व्यापार है? स्वामी जी का सभी उम्मीदों पर आश्वासनों की डोर से बंधे अपने मन के भाइयों तकलीफ हो और आकांक्षाओं को उसके सामने पर्ची पर लिखकर खोल देते हैं और बाबू जी का पूरा अधिकार हो जाता है । उनके मन पर, डरों पर, आकांक्षाओं पर मेरे अपने ही तो मित्र आते हैं मेरे घर पर स्वामी जी से मिलने, लेकिन मैं किसी के बहुत अंदुरूनी जगत को कम ही जानती हूँ । कुछ ही शारीरिक तकलीफों का मुझे पता था । जिनके बारे में नहीं पता था, उन्हें भी जान गई । मैं खुद ही मुझसे बात करने लगते हैं । शायद मैं उनके और बाबा जी के बीच में एक माध्यम लगने लगी । बाबा जी के कमरे से निकलते हैं और मुझे बताने लगते हैं कि उन्होंने यहाँ का इसका मतलब क्या हुआ? क्या मैं बाबा जी से उनके लिए साफ बात कर सकती हैं, बल्कि मुझे अजीब लगता लोगों की व्यक्तिगत तकलीफ । फोन में इस तरह बॉल होने की कोई फाइल में नहीं थी, लेकिन अनचाहे अनजाने में ही बॉल होती चली जा रही थी । विजेंद्र मुझे अपने सोलन के कैंसर की पूरी संभावना खुलासे से बताता । मुझे बाबा जी से मिलवाने का धन्यवाद देता और कहता है किस तरह उसकी तकलीफ कम होती महसूस हो रही है । मेरी चित्रकार सहेली जोसना कहती पिछले तीन साल से मेरे कंधों में इतना सख्त दर्द रहता था । मैं तो डॉक्टर ठीक से कुछ डायग्नोस कर सके । नहीं कोई देसी इलाज हो सका । बाबा जी से पहली मुलाकात में ही दर्द कम हो गया । अब धीरे धीरे और काम भी हो रहा है । कहते हैं तीन और स्टेशन से एकदम खत्म हो जाएगा । तुम्हारे डायबिटीज कैसी है? अपना कुछ बेहतर महसूस होता है । मेरा तो खैर एकदम मशीन पर चेक करके पता चल जाता है कि कितनी हाई हेलो शुगर है । जब नियम संयम रखती हूँ तो कम हो जाती है । पढना ऊपर बिना ला आजकल तो नॉर्मल चल रही है । इंजेक्शन ले रही हूँ । हाँ, वह तो लेती हूँ । तब दवा के साथ तो योगी कंट्रोल में रहना ही चाहिए । वही दवा के साथ भी नियम संयम ना हो तो बढ जाती है । बाबा जी ने दावा छोडने को तो कहा भी नहीं तो मैं क्या लगता है ठीक हो जाएगी । मैं भी तुम सब की तरह एक्सपेरिमेंट ही कर रही हूँ । कुछ मालूम नहीं लेकिन तो मैं विश्वास है है शायद और नहीं अभी कुछ नहीं होंगे । शर्मिला पैंतीस बरस की हो चली मोटी होती चली जा रही है । लेकिन अभी शादी नहीं । घरवालों को यही फिक्र खाए जा रही है । हाँ, हर बार बाबा जी के लिए खास हलवा और पराठे बना कर लाती है । पापा जी ने उसे कोई मंत्र दिया है जिससे ब्राइडल जाएगा और अंततः शादी हो जाएगी । शर्मिला की स्वस्थानी भावी का भाई अफगान सीमा पर कहीं गायब हो गया है । वहाँ बाबा जी से उसका पता लगवाने के लिए अर्ज करती है । कामिनी के पति का बिजनेस मंदा पड गया है । हर तरफ घाटा हो रहा है । बाबा जी कहते हैं कि उनके घर में शायद कोई प्रेतात्मा है तो उनके हर काम में बाधा डाल रही है तो उसके घर जाकर प्रेतात्मा बता देंगे । फिर सभी कष्ट दूर हो जाएंगे और लाभ प्राप्ति होगी । मेरी और जॉन की कोई औलाद नहीं । बाबा जी के आदेश से उन्हें साल भर में संभावना हो जाएगी । मेरे घर में आने वाले ये मित्र और आगे उनके मित्र सभी सफल आवासीय हैं । अपने अपने क्षेत्र में सभी ने धन और नाम कमाया है लेकिन फिर भी वो बाबा जी के सामने कंगाल हो कर आते हैं और किसी ने किसी चीज के लिए झोली फैलाते हैं । मैं सोचती हूँ ये हमारे समेत ये बडे, बडे, यशस्वी, शक्तिशाली लोग भीतर से कितने कमजोर है । इनमें से कोई भी धार्मिक आस्था वाला नहीं किसी एक आप को छोडकर । लेकिन बाबा जी ने आशा और संभावना की लॉलिपॉप दिखा दी तो कैसे नन्ने बच्चों की तरह लग रहे हैं । इन दिनों योगी माहौल में बडी एक्साइटमेंट रहती । फोन पर फोन सभी को नए किस्म के अनुभव हुए थे । सभी एक दूसरे से बांटना सुनना चाहते हैं । काम नहीं बता रही थी पिछले शनिवार बाबा जी प्रेतात्मा निकालने आए थे हमारे यहाँ बस उन्होंने शीर्षक के ग्लास में पानी भरकर बेडरूम में बेडसाइड टेबल पर रख दिया । थोडी देर बाद अंदर गए तो क्लास के अंदर खोलते रहा था । पावर जी ने बताया कि वह खून प्रेतात्मा थी । इसे अब उन्होंने ग्लास में कैद कर लिया था । हाँ, रिकॉर्ड मुझे तो इतना डर लगा तुम व्यक्तियों, उस खून का आकार किसी सूक्ष्म मानवी शरीफ जैसा था । मैंने तो कभी कुछ ऐसा होते देखा नहीं । डिनर पार्टियों पर भी बाबाजी की ही चर्चा रहती है । सब मुझे और अभिषेक से सवाल करते । कोई मजाक बनाता । कोई उसे मिलने की जिज्ञासा जाहिर करता । कोई इतिहास जानना चाहता हूँ कि कैसे मिले? क्यों कर फंसे? अब क्या इरादा है? अभिषेक और मैं एक ही से सवालों के जवाब बार बार दोहराकर तीज नहीं लग गए थे । भविष्य से जुडी बातों का तो हमारे पास भी कोई जवाब नहीं था । निकालने, बाबा जी को लेकर अपनी कोई व्यक्तिगत बात फिर हमें नहीं बतलाई थी । बल्कि पहली बार जब हम बाबा जी से मिलकर लौटे थे और निकाल बहुत एक्साइटेड थी, तभी न उस ने हमें अपने सवाल बताए थे । हमने पूछे नहीं, इसकी हमें कोई जरूरत थी । लेकिन उस दिन मेरे घर पर रूपा जी ने कहना शुरू किया निक ऑल बडी चुप, चुप सी बडी उदास दिखती है हमको । इसमें बाबा जी से शादी के बारे में पूछा था । शायद करन को मिस कर रही है । मैंने तो कारण से कहा है कि जल्दी से कर ले शादी बिचारी । कितने उदास है उसके बिना मुझे समझ नहीं आ रहा था की रूपा को सच में निकाल से हमदर्दी है । ये यही चटकारे ले रही है तो मैं निकाल को पसंद करती थी । कॉल भी मेरे यहाँ पूरी शाम रूपा की आवभगत में बिता देती । कभी जोश पीला रही है, कभी चाहे बना रही है । कभी बैठकर रूपा की बातें सुन रही है बल्कि निकाल में रूपा को बडा धैर्यशील सुनने वाला मिला था । निकाल को हिंदी नहीं आती थी इसलिए उसे पता नहीं लगा की रूपा हमसे क्या कह रही है । बस इतना अंदाजा हुआ की बात उसी के बारे में है । उसमें जिज्ञासा की की रूपक क्या कह रही है? रूपा अंग्रेजी में ही उसे बताने लगी ऍम ऍम फॅस ऍम रिकॉल का चेहरा शर्म और छह से लाल और परेशान हो रहा है । कुछ देर बहुत चक्की सी रही । उसी जैसे अपने सपने में भी खयाल नहीं आ सकता था की कोई इस तरह से उसके बारे में बात कर सकता है । उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह इसे किस तरह लेंगे । इस तरह सवाल और जवाब देंगे मुश्किल से इतना ही मुझे निकला प्लीज प्लीज नॉट में पीस डोंट डिस्कस में । इस पर रुपए रूस होकर बोली लोग हम तो तुम्हारे ही भले की बात कर रहे हैं । कोई अच्छी बात थोडी है । यह मर्दों को इस तरह का फायदा उठाने दे । मर्दों की तो आदत होती हैं और तो कोई स्टार्ट करने की । लेकिन हम औरतों को उनके नीचे दबना थोडे ही चाहिए । मुझे और बिल्कुल पसंद नहीं । जो आदमियों को जो मर्जी चाहे करने देती हैं तभी उन्हीं की वजह से और तो मुसीबत है उठाई हैं । लेकिन अब अब तो औरतों को इस बात का पता चल गया है । अब तो उन्हें आदमी का मुकाबला करना चाहिए । कोई भी जान सकता है कि औरतों की आजादी की लडाई का टॉपिक रूपा का पसंदीदा विषय था । कमरे में और भी और तो ऐसी थी जो रूपा से सहमत होती है । लेकिन मौजूदा हालात में सबको निकाल से हमदर्दी थी और मैं चाहती थी कि रूपा किसी तरह खामोश हो जाएगा । पर रूपा कहती रही हैं मैं तो कारण से लडाई करूंगी । जरा आने दो उसे न्यूयॉर्क । मैं कहता हूँ कि अगर निकाल को इस तरह सताया और उससे शादी नहीं की तो बाबा जी के नजदीक नहीं फटक नहीं होगी । वे तो बाबा जी से सिद्धि सीखना चाहते हैं । ना देखूंगी कैसे सीखते हैं वो उन्हें पता नहीं किस से पाला पडा है, उनका रूप से कोई नहीं जी पाया । आज तक मैं अपने जिद पूरी करवा के ही छोड होंगी । मैंने अपने चेहरे का भाव कुछ इस तरह बदला । इंडिकॉम को लगे कि बात अब उसके बारे में नहीं हो रही । आखिरकार रूपा का भाषण अब हिंदी में ही चल रहा था, लेकिन निकाल के चेहरे का अस्वस्थ भाव बहुत देर तक बना रहा हूँ । यूनिकॉन और करण के आपसी रिश्ते को लेकर पोत ओवल सभी में था । दोस्त एक दूसरे से पूछ लेते, क्या ये शादी करेंगे या सीरीज मामला है? कोई कहता कारण योगी साथ रह रहा है । चाहती तो इसे हिंदुस्तानी लडकी से ही करनी है । लेकिन मैं पिछले सात साल से साथ रह रहे थे । इसलिए जिज्ञासा भी लाजमी थी, जो अमेरिकी समाज में तो आम बात है । पुरुष नारी बिना शादी किए साथ रहते हैं । किसी से कोई भी करन के सामने जबान पर कोई सवाल नहीं लाता था । लोग उन्हें एक तरह से पति पत्नी के रूप में ही मान कर चलते हैं । उसी तरह उन्हें अपनाते मैं पीठ पीछे एक दूसरे से सवाल चाहे कर डालते हैं । इसका जवाब किसी का दुख का या किसी का फोन जीता होता हूँ । निकाल का दूसरा सवाल क्या रहा होगा, इसका अंदाजा मुझे बाबा जी की बातों से हुआ । एक्साम सेशंस के बाद खाने मगर ऐसे फारिक होकर तो परी इलाइची चबाते हुए हम लिविंग रूम में बाबा जी के इर्द गिर्द बैठे हुए थे । रुपए टेलीविजन पर कोई हिंदी वीडियो फिल्म देख रही थी और बाबा जी को तब तक हमारे यहाँ ही रुकना था जब तक कि वह फिल्म खत्म हो जाती है । हमारे कुछ दोस्त बाबाजी के करीब आना चाहते थे, उन्हें नजदीकी से जानना चाहते थे । वे भी उनसे बातचीत का मौका पाने के लिए अक्सर अंत तक रुके रहते थे, क्योंकि जब कमरे में बाबा जी समाधि पर होते हैं, तब उनका कुछ ऐसा ओ और प्रभाव होता की किसी की सवाल पूछने की हिम्मत ही नहीं पडती थी । नाॅमिनी पालतू सवालों का कोई जवाब ही देते । सिर्फ जो पर्ची पर लिखकर मूल सवाल पूछे गए थे, उन्हीं से जुडे सवालों का जवाब देते हैं । मेरी चित्रकार, सहेली जोसना खास तौर से इस स्थिति से नाखुश थी । उस दिन बाबा जी को खाली बैठा देखा तो उसने पूछ लिया, आप कहाँ से है? स्वामी जी एक खूबसूरत हिंदुस्तानी औरत के इस तरह सवाल पूछने से पल भर को बाबा जी चीज के पर फिर अन्य मनोज भाव से जवाब देने लगे । बिहार से आपके माता पिता क्या वहीं हैं ये क्या करते हैं? जमींदारी जमीन है हमारी बहुत जोसना के सवाल अंग्रेजी में थे । बाबा जी भी टूटी फूटी अंग्रेजी में जवाब दिए जा रहे थे । मैंने देखा कि निकाल भी इसलिए बडे ध्यान से बातचीत सुन रही थी । उसी से पूछा बाबा जी आपने सन्यास कर लिया । यह तो लम्बी कहानी है । तभी बैठकर बताएंगे । अभी बताइए ना बाबा जी निकाल इसरार कर रही थी । सहसा बाबा जी की आंखों में एक चमक सी आई । डी कॉल की ओर से मुखातिब हो । उन्होंने अपनी टूटी फूटी अंग्रेजी में अपनी कथा सुनानी शुरू की । दरअसल हम बचपन से ही कुछ नॉर्मल रहे । जब हम पैदा हुए तो बन्दे थे हाँ हम एकदम जन्मांध थे । कोई तीन बरस के थे कि हमारे दृष्टि अपने आप वापस आनी जब चार बरस के थे तो हमारा पेट बहुत बढ गया था । डॉक्टर ने बताया कि पेट में ट्यूमर था फिर भी अपने आप ठीक हो गया । फिर हमारी माँ की मृत्यु हो गई । हम स्कूल नहीं गए, बस यूँ ही घूमते रहे । घंटों कहीं खडे रहकर एक ही दृश्य को देखते रहते थे या कुछ सोचते रहते थे । हम को पता ही नहीं रहता था । बिना कुछ शायद ये एक ही स्थान पर चौबीस घंटे पडे रहते थे । सब ने हमें पागल कहना शुरू कर दिया । वहाँ तो थी नहीं । हमारे किसी चाचा चाची ने कहा इसकी शादी कर दो तो ये ठीक हो जाएगा । बस तेरह चौदह बरस की उम्र में ही हमारी शादी कर दी गई लेकिन हमारा व्यवहार तो फिर भी नहीं बदला । हम दो दो दिन घर में नहीं आते थे । योगी देवी के ध्यान में कहीं पडे रहते थे । बाबा जी की कहानियों में किसी भी संत महात्मा के जीवन की तरह सत्य आ सकते हैं । प्राकृतिक अप्राकृतिक तत्व मिले हुए थे । मुझे शक हुआ बाबा जी ने भक्तों प्रभावित करने के लिए गढी तो नहीं है, कहाँ नहीं वरना अपने आप से जनमान्यता ठीक हो जाना या ट्यूमर ठीक हो जाना क्या माना जा सकता है या फिर यह सब कुछ हुआ ही नहीं होगा । उन्होंने यही बना लिया लेकिन फिर भी पूरी दिलचस्पी से मैं उनकी कहानी सुनाती रही । वे कहते रहे तब हमारे बडे भाई ने हमको पागल खाने में भर्ती करवा दिया । हमारी पत्नी के घरवाले आकर उनको ले गए उन्हें पढाई के लिए कॉन्वेंट में फिर से भर्ती करा दिया । रूपा जो वीडियो फिल्में पूरी मजबूती कुछ नहीं बोलती हैं । हम सब ने उनकी ओर देखा और मेरा पूछने का मन हुआ क्या? रूपा से ही शादी हुई थी आपकी फिर पागल खाने से हमको छोड दिया गया । हम घर आए । हमारी पत्नी का भी हाई स्कूल खत्म हो गया था । उन्हें भी हमारे घर पर बुलवा लिया गया था । हम दो साल रहे फिर एक दिन आधी रात में हमको देवी का आदेश हुआ और हम अपनी पत्नी और बच्चे को सोता छोडकर कामाख्या मंदिर की ओर चल रही है तो बाबा जी आपकी संतान भी है । आप एक तो कहाँ है लडका है । बारह तेरह साल का बोर्डिंग में डाला है पडता है । मैं सोच रही थी कि बाबा जी बिहार से हैं । महात्मा बुद्ध की कहानी वहाँ सभी कोई जानता होगा । आधी रात में बीबी बच्चे के त्याग वाली घटना कहीं बुद्ध करता से प्रेरित हूँ नहीं पर कुछ कह देने से तो रंग में भंग पड जाता है । बाबा जी जल्दी से मुख्य करता पर आ गए

इतर भाग 04

बहुत चार हम पता नहीं कितने दिन पैदल चलते रहे । हमको मालूम नहीं था कि हम किधर जा रहे हैं । लेकिन जब पहुंचे तो देखा कामाख्या देवी के मंदिर के आंगन में खडे हैं । बस वहीं कहीं हो गए होंगे । शॉप में हमको देवी निर दर्शन दिया और कहा कि अब से तुम हमारे हो । बस उसी दिन से हमने मांस, मछली खाना सब छोड दिया और देवी के भक्त हो गए और आपको ये विशेष शक्ति निकाल कोई से पूछ रही थी । वह देवी कहीं वरदान है, लेकिन आपको कैसे पता लगा कि आपके पास फिलिंग पावर है? उन्हें इस सवाल की मुझे उम्मीद नहीं थी । अलवर को हुए जैसे लव खोजते रहे । फिर बोले, हमको तो ऐसा कुछ पता नहीं था । लेकिन हमारे हाथ से अचानक इलाइची गिरने लगी । बस हम हाथ उठाते और इलाइची गिरने लगती । हम सब में बांध देते हैं । एक बार किसी के घुटने में दर्द था उसने कहाँ कि बाबा जी आप जरा हाथ रख दीजिए, हमारे घुटने पर चाय कुछ दर्द कम हो जाएगा । हमने हाथ क्या लगाया उसका दर्द ही गायब हो गया । बस फिर तो लोगों की भीड ही लग गई । मेरे मन में इलाइची वो वाली बात से संदेह और भी बढ गया था । तो अब ये बाबा जी साई बाबा से अपनी तुलना कर रहे हैं और उनकी सुनी सुनी कहानियों का अच्छा मिल क्या है बाबा जी ने अपनी आत्मकथा में मुझे बांग्ला लेखक टैगोर की कहानी देवी का ध्यान आया । जहाँ इसी तरह का बच्चा मुख्य नारी पात्र के हाथ लगाने से ठीक हो जाता है, सभी उसे देवी मानने लगते हैं और सारे आस पास के गांव में उसकी हीलिंग पावर की ऐसी चर्चा होती है कि लगातार भीड लगी रहती है उनके घर लेकिन अंत में उसका अपना ही चाहता । भतीजा जब बीमार पडता है तो देवी उसे बचा नहीं पाती । बाबा जी के साथ भी ऐसा ही हुआ होगा । कोई आकस्मात ठीक हो गया तो लोगों ने उसका श्रेय बाबा जी को दे दिया । देखें सच में उनकी गंभीर बीमारी ठीक होती है और उनका क्या? मेरी अपनी डाइबिटीज भी तो दांव पर लगी है । पता चल जाएगा मेरी संदिग्ध आंखों में देखने की बजाय बाबाजी निकाल के मुग्ध आंखों में देख रहे थे । हमारे इस वक्त हिंदुस्तान में एक लाख से भी ज्यादा चले हैं । एक बार योगी हमारे वक्त ने कहा कि वे हमारे जीवन का था लिखना चाहते हैं । हमने उन्हें यही अपनी सारी कहानी सुना दी । जब उन्होंने किताब का विमोचन किया तो हमें बुलाया, बस वही हाथों हाथ, एक लाख प्रतियां भी कई । वो पैसा कमाया और नाम भी हुआ और फिर बाबा जी ने अब जो बात कही तो उस से न केवल मुझे निकाल पर्ची में लिखे दूसरे सवाल का पता लगा, बल्कि यह भी समझ में आ गया कि क्यों बाबा जी इतनी उत्साह से निकाल की ओर रुख किए अपने जीवन का था, सुना रहे हैं । आपने पूछा था ना कि आप अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त लेखिका बनना चाहती हैं तो लीजिए मैं आपको अपनी कहानी देता हूँ । कम से कम एक लाख तो मेरे ही चले हैं तो आपकी किताब तो हाथों हाथ खरीद लेंगे । इस तरह आपके ऊपर मेरे आशीर्वाद की बात भी पूरी होगी और आपकी विश्वविख्यात लेखिका बनने की आकांक्षा भी पूरी हो जाएगी । मैंने खुद ही था तो बाबा जी उर्फ भगवान के घर में भी नेटवर्किंग चलती है । बाबा जी जब भक्त की कामनापूर्ति का आशीर्वाद देते हैं तो साथ ही ऐसी परिस्थितियां भी बना देते हैं या ऐसे दूसरे व्यक्तियों से मिलवा देते हैं । इस सच में कामनापूर्ति हो जाए, ताकि बाबा जी जी रेपोटेशन में चार चांद लगाते ही रहे हैं और भी सोचे की कामना तो पूरी हुई । अब चाहे उस कामना के डिटेल्स में जाने से वक्त ही खतरा जाए, ये उसकी ऐसी ब्रेन वाशिंग हो की डिटेल्स की बात सोचना ही उसे बाबा जी की इंटिग्रिटी का अपमान लगने लगे । तो बाबा जी तो सोलह आने खरेही खरे उतरे हैं । रिकॉल का चेहरा फिर से लाल हो रहा था । एक फॅमिली झा रही थी उसके मुख पर उसे फिर से जैसे सबके सामने नंगा कर दिया था मैंने निकाल को जैसे उस मैंने स्थिति से बाहर निकालने के लिए उसके बारे में अपनी थोडी बहुत जानकारी के आधार पर कहा बाबा जी निकाल तो पहले से ही ये किताब लिख रही है । वह तो है पर देखिए अब हमने बीडा उठाया है इन्हें अंतरराष्ट्रीय ख्याति दिलाने का तो यह काम हमें अब करना ही है । बाबा जी इंटरनेशनल सेम शब्द का इस्तेमाल कर रहे थे, जिससे निकाल को बात समझ में आ रही थी । मैंने मजबून बदलने के लिए सवाल पूछ डाला । जो योग मुझे परेशान तो कर ही रहा था । बाबा जी आप हमारे मन की बात कैसे जान लेते हैं? रूही आकर सब बताती है । मैं मुझे जैसे कुछ समझ में नहीं आया मैं सवाल आंखों में टिकाएं । उन्हें देखती रही । बडे सहज भाव से बोले, हमने हर तरह की रूहो आत्माओं को काबू में किया हुआ है जिनसे हम काम कराते हैं । जब आप सवाल पर्ची पर लिख रही होती है तभी रूल हमारे पास सवाल लेकर कमरे में आती है । तब रूही जवाब पर्ची पर लिख देती है । आपसे बातचीत करने के बाद जैसा देवी का आदेश होता है वही हम रूस लिखवाते हैं । मुझे याद आया जब पर्ची मेरे हाथ में थी । मुझे कुछ फडकन सी महसूस हुई थी अपनी मुट्ठी में । लेकिन बाबा जी ये रूम हैं, आती कहाँ से है? हम शमशान भूमि में जाकर पकडते हैं नहीं । इस वक्त करीब पैंतालीस हजार आत्माओं को हमने काबू में किया हुआ है । कुछ अमेरिकी डॉक्टरों की आत्माएं भी हमारे काबू में हैं । जब हम ऑपरेशन करते हैं तो अमेरिकी डॉक्टरों की आत्माओं को बुलाते हैं । आप हैरान होंगे कि जो हमें बिल्कुल अंग्रेजी नहीं आती । लेकिन जब अमेरिकी डॉक्टर के हाथ में आ जाती है तो हम फटाफट अंग्रेजी बोलने लग जाते हैं और सारी डॉक्टरी की टर्म्स अंग्रेजी में हमारे मुझसे निकलने लगती है । आत्माओं को पकडते कैसे हैं? आप उनसे काम कैसे लेते हैं? मंत्रों केबल से हम को एक लाख मंत्र याद है । आपको हैरानी हो रही है ना हम जो बिल्कुल अनपढ गवार ठहरे एक लाख मंत्र कहाँ से आ गए हमारे पास तो मैं देवी माफी कर पाते हैं । उन्हीं की कृपा से आत्मज्ञान हुआ है । अपने आप ही आ गए सारे मंत्र । अभिषेक तो इतनी देर से खामोश बैठा सुन रहा था । बोल उठा बाबाजी आत्माओं को इस तरह कैद करने से उन्हें पेडा नहीं होती । पीडा होती है । बाबा जी जैसे पूरे आश्वस्त नहीं थे । जो भी किसी को पीडा पहुंचाने का दायित्व बला क्यों कर लेते हैं? हूँ । बोले नहीं पीता नहीं होती है । जो भी दो तरह की आत्मा होती है बाली आत्माएं और दुराचार यात्रायें हम सब तरह की आत्माओं को पकडते हैं । वह तो जैसा भी कम हो, उसी हिसाब से सब तरह की आत्माओं को रखना होता है । लेकिन हमारे कब्जे में दुखी नहीं होती । हम उन्हें भेंट चढाते हैं तो प्रसन्न होते आती हैं । कैसी भेंट मैंने पूछा ऍम बस बूंद भर नवरात्रों में हम सब आत्माओं को खोल पिलाते हैं । बस साल में एक बार । उसके बाद इस साल भर हमारे कहे अनुसार चलती है ऐसा मुझे लगा कि हम अपने अपार्टमेंट लिविंग रूम में नहीं, किसी अजीबो गरीब लोग में बैठे थे । बाबा जी स्टीवन स्पीलबर्ग की फिल्म के नायक की थी । कॅाल की तरह किसी और लोग के जीव थे जो हमें अपने संसार, अपने फ्रेंड के दूसरे जीवों के बारे में बता रहे थे । हम सब पूरी तरह से बाबाजी के जादुई वर्णन में बने उनके प्लेनेट के जीवों से मिलने को बेकल हो रहे थे । लेकिन एक जादुई समाज से ऐसा रूप से जमाई लेते हुए टुकडी फिर भी तीखी आवाज ने बडी बेहरहमी से तोड दिया । क्या बात है आज यूजर्सी नहीं जाना तारीफ बात यही लेक्चर देना है क्या? तुम्हारी फिल्म खत्म हो गए? बाबा जी ने पूछा और क्या हमें तो नींद आ रही है । चलो चलो निकले वहाँ से रुपय जम्हाई लेती खडी हो गयी बाबा जी बैठे रहे पांच मिनट के लिए रूपा यही सोचता हूँ हमें अभिषेक जी से कुछ कहना है और अभिषेक की ओर से मुखातिब हो बाबा जी कहने लगे यही तो हम आपसे कह रहे थे अभिषेक जी ये हमारे पास इतना पावर है । इतनी स्पिरिट हमारी नौकरी में हैं । हम जो चाहे कर सकते हैं जो चाहेगा मतलब बुरा बुराई से नहीं मतलब की हम तो संसार की भलाई करना चाहते हैं । जिसको भी दुःख तकलीफ है हम उसकी मदद करना चाहते हैं । लेकिन हम सोचते हैं कि यहाँ भी ऐसा कुछ हो जाएगा । कोई ठिकाना बन जाए जिससे हम बिना किसी और के घर गए या उसे तकलीफ दिए सब की मदद कर सकें । अब देखिए हिन्दुस्तान में तो अपना आश्रम है । रोज हजारों बंदे आते हैं । यहाँ हजार नहीं तो सौ दो सौ तो जाएंगे ही । तो ऐसा कुछ होना चाहिए ना । यहाँ भी हम जानते हैं कि आप में भी दूसरों के लिए कुछ करने का है । इसी से हम आप ही से कह रहे हैं देखिए ना सब लोग एक से नहीं होते हैं । हमारे पास तीन तरह के लोग आते हैं । एक तो बस तमाशा देखने के लिए उनको बस जिज्ञासा रहती है कि बाबा जी क्या है, कैसे हैं तो एक बार आकर में चले जाते हैं । दूसरे किस्म के लोग हैं जो अपने स्वार्थ से आते हैं, इलाज करवाना है या कोई कामना पूरी करवानी है और जब इलाज हो जाता है ये इच्छा पूरी हो जाती है तो चले जाते हैं । लेकिन तीसरे किसी के लोग हुए हैं तो चाहे अपने स्वार्थ से ही आते हैं या हमारे प्रति जिज्ञासावश और बदले में भी वे कुछ करना चाहते हैं । हमारे प्रति या मानवता के प्रति उनमें कुछ करने की आशंका और व्यक्ति होती है । ऐसे ही लोगों की हमें जरूरत होती है । अभिषेक जी, आप और करंजी इस तीसरे किस्म के लोगों में से हैं । तभी हम आपको अपनी सारी योजनाएं बताना चाहते हैं । आप और हम मिलकर सबका कल्याण कर सकते हैं । मैंने अभिषेक की ओर नजर की और मुझे अभिषेक सिटी फिल्म के उस बाल ना एक सा लगा इसे उंगली पकडकर टीटी अपनी पृथ्वी से कहीं दूर बसे ग्रह संसार की ओर ले जा रहा था । मैं अब तक जमीन पर आ चुकी थी । मैंने पूछा बाबाजी के अमेरिका में भी कोई आश्रम खोलना चाहते हैं? बाबा जी के बहाव में भी जैसे ब्रेक लगा चौंकते हुए से बोले अभी तो मालूम नहीं यहाँ क्या हो सकता है और क्या नहीं । अब हम तो यहाँ ज्यादा रह नहीं सकते हैं । हमारा वीजा तो चार मैंने बात खत्म हो जाएगा । हमको तो योगी नवरात्रों से पहले हिंदुस्तान लौट नहीं है, लेकिन अगर कुछ बनेगा तो अभिषेक जी संभाल लेंगे । हम तो इन्हीं से कहेंगे की यही कुछ और आदमियों को चुन लिया जिनके पास साधन हूँ और रुचि भी उन सबको प्रभावित करने का काम हमारा समझे ना विषय जी आप अगर दस पांच ऐसे आदमियों को इकट्ठा कर लीजिए जिनके पास धन वगैरह हो तो एक ट्रस्ट यहाँ भी बना लेंगे आप उसको उस की देख रेख कीजिएगा और हम यहाँ पर जब लगा आते रहेंगे अभिषेक हूँ हाँ करता हुआ सिर्फ सिर्फ दिला रहा था इतनी रात गए सबको नहीं आने लगी है ऐसा रूपा के खर्रांटों ने हम सबको जगह बाबा जी उठ खडे हुए एकदम से अब चलेंगे उठो रुपए कौन छोडने जा रहा है हमको । अभिषेक जी आप मैं झट से बोल पडी ये बिजेंदर जी न्यू जर्सी में ही रहते हैं । यही आपको छोड देंगे । अभिषेक को कल सुबह सात बजे अस्पताल पहुंचना था । मैं नहीं चाहती थी कि वह छोडने जाए । दरवाजे पर बाबाजी रूपा और रूपा का पर संभाले । माधव को नमस्कार कर विदा करती मैं सोच रही थी यह सब क्या हो रहा है हमारी जिंदगी में? क्या यह सच में कोई लोगों की दुनिया है? ये सारी बचपन में सुनी कहानियां क्या हम फिर से बच्चे बनना चाहते हैं या कोई हमें बना रहा है? पर सच में मेरी और अभिषेक की जिंदगी में कोई भूचाल आ रहा था । उस रात तीसरी नींद आने के बावजूद हम सो नहीं पा रहे थे । आंख बंद करते ही कोई रूपाकार ही रूसी साढे की तरह आगे बढने लगती है । मुझे एक बार की नींद का झोका आ गया था । फिर जैसे हवा का एक बादल सास अचानक मेरे पैरों से सिर तक होकर गुजर गया । मेरी आंखें खोली और लगा कोई रो । अभी अभी मेरे ऊपर से गुजर रही है । मैंने हल्के से अभिषेक के माथे पर हाथ लगाया तो उसने आंखें खोल दी । मैंने उसे अपना अनुभव जो कत्यों सुना दिया । पहले मुझे उसकी आंखों में हल्का सा डर दिखाई दिया । फिर ऐसा एक चमक बोला । चार रूम तुम्हारा इलाज करने आई होगी । कल सुबह तुम्हारी शुगर टेस्ट करवाऊंगा, लेकिन मेरे तीस सेशन अभी खत्म कहा हुए हैं । पर बाबा जी ने तो अभी से भेजा होगा ना रूम को अपना काम शुरू करने के लिए । तो कल शाम भर में बाबा जी ने यहाँ कम से कम पचास लोगों को देखा है । यह कमरा तो स्पिरिट से भरा होगा अच्छा इसलिए नींद नहीं आ रही । धूप बत्ती की भी तीखी गंध है । गुलाबों की खुशबू में खुल मिलकर और भी तेज हो गई है । लगता है जैसे रोगों की गंद हो, लेकिन जो है कहीं खिडकी सुनो विषय तरीके खिडकियाँ तो खोल रो है, बाहर निकल जाएगी । ठंड नहीं लगेगी तो मैं उस देर के लिए खोल दो । निकल जाएगी तो बंद कर देंगे और कहते कहते मुझे लगा कितनी अजीबो गरीब से बातचीत है हमारी । यानी हम मान कर चल रहे हैं कि रूठे हैं और इस कमरे में हैं और बाबा जी की हर बात सच है । मैं बोल उठी और सिल ईवीआर तुम्हारा मतलब है कि यह सब सच में मुझे नहीं मालूम । अल्पना पर अभी मैं भी उसे जानने की कोशिश कर रहा हूँ । जानने को उसमें है क्या? मानो तो है वरना नहीं । तुम तो एबसोल्यूट बात करने लगे हैं । इसमें बीच की बात क्या हो सकती है? अभी और नहीं भी । यानी यह भी नहीं, वह भी नहीं । पर कुछ और है । जैसा कि वे आधी रात को शास्त्रार्थ करने का इरादा है तो जाओ । अभिषेक ने मुझे अपने साथ सटाकर सैलाना शुरू कर दिया । मैं उसकी छाती में चेहरा दो खाकर सोने की कोशिश करने लगी । अभिषेक ने मेरा चेहरा अलग कर एक चुम्मी भर ली और बोला यार करें कुछ बहुत अजीब सा हो रहा था । उस रात मेरे जहन से बाबा जी का चेहरा उतर ही नहीं रहा था । अभिषेक मुझे चूमता, आलिंगन में भरता और मेरे जिसमें और दिमाग पर एक विशाल का साउली देखा जाती । उसकी जामुनी भरे, भरे होट बडी बडी फॅमिली आंखें और कंधों तक झूलते बाल मुझे सरोबार किए दे रहे थे । मेरे जिस्म पर कितनी भारी भरकम बाहों का कैसा हो । मेरी नसों में बहते रक्त में वाले देने लग रहा था, करा रही थी और मेरा जिस आग में जिंदा भूने जाते परिंदे साथ आ रहा था । मैं चला रही थी वो फॅमिली अभिषेक ऍम इंद्री कराते और चिल लाटों के बीच में जिस्मानी सुख के उस शिखर पर पहुंच गई थी जहाँ से नीचे उतरते ही मैंने पूरे होशोहवास के साथ फिर से वही वाक्य दोहराया । पता नहीं मुझे क्या हो रहा है मेरे दिमाग से बाबा जी का चेहरा हटता ही नहीं । कमरे में मध्यम उजास में भी अभिषेक के चेहरे का परेशान रुख मुझे देख गया था । संजीदा भाव से ही बोला सच बताऊँ तो मुझे भी बाबाजी का ही ध्यान बन रहा था । बट ऍम ऐसा ही तो होता है । जब हो रहा होता है तो अपने आप को पता ही नहीं लगता और जब पता लगता है तो इतनी दूर जा चुके होते हैं कि पीछे का सब धोना पड जाता है । याद है उस दिन मोहित कैसे चेता रहा था हम दोनों को । अगले दिन उसने दोबारा मुझे फोन किया । कहने लगा कि तुम दोनों में दोस्तों इसी से बार बार तो बाबा जी के चक्कर में पडने के लिए आगाह कर रहा हूँ । उसका एक दोस्त ऐसे ही किसी स्वामी से मिला था । अवैध खुद तो स्वामी का अपना सेवक बना हुआ है और स्वामी उसकी बीवी को साॅफ्ट कर रहा है । दोनों की जिंदगी तबाह हो गई । मुझे तो बहुत डर लगा उसकी बात सुनकर ।

इतर भाग 05

भाग पांच इतना डर गई थी तुम मुझे तो बताया होता, बजे से मिलना ही बंद कर देंगे । कोई जबरदस्ती तो कर नहीं आराम से मैं कह दूंगा मैंने खुद ही बात करनी है । नहीं, ऐसी बात नहीं है । अभी चलने दो, कितने बच्चे तो नहीं हम किसी की बातों में आ जाए । पढे लिखे समझदार एडल्ट हैं । अभी उन्हें इलाज का पूरा मौका तो देना ठीक है । मैं भी यही सोचता हूँ इलाज तो करवाले पढना पछतावा होगा और हमारा कौनसा दम लग रहा है । जो श्रद्धा होगी दे देंगे । बाबा जी पैसे तो लेते नहीं, किसी और तरीके से देने होंगे, पूछूंगा कुछ भेज दे सकते हैं । मेनका ट्रस्ट बनाने में भी मदद करूंगा तो तुम्हारा मुफ्त इलाज कर रहा है । उसके लिए मुझे भी तो कुछ करना चाहिए । पर अभी तो इलाज भी हो रहा है । ठीक तो नहीं हुई तो तो हो ही होगी । बस वक्त की बात है तुम्हें सच में ऐसा लगता है । मुझे लगता है जो आदमी इतने विश्वास के साथ कहे कि मैं तो मैं ठीक कर देगा, उसमें जरूर कुछ ताकत होगी । वरना वह ऐसा कहे गए क्योंकि उनकी आप विश्वास की तो मैं डाल देती हूँ । किसी और को होना हूँ । उन्हें तो सच में भरोसा है कि उनकी पूजा का असर होता है । कल हीलिंग सेशन के वक्त मुझसे कह रहे थे मुझे इतना ठीक कर देंगे की ग्लास में चीनी गोल गोल करती होंगी तब भी शुगर नहीं बढेगी । मुझे लगता है कि वे अच्छे इंसान है, अच्छी सकती है । उनमें कल शाम को देखा था । वहाँ पानी का क्लास उससे कहा की एक लाख पानी भर लूँ और तुम्हारा घर पवित्र करूंगा । मैं ले आया । उन्होंने कुछ एक सीटें सब कमरों में छिडक । बाकी पानी मुझे वापस दे दिया । मैंने देखा थोडी देर बाद वह दूध बन गया । जैसी बता रहा था कि उस की दुकान पर घाटा पड रहा था तो बाबा जी ने कहा कि कोई प्रेतात्मा परेशान कर रही है उस की दुकान पर ऐसे ही पानी का एक ग्लास एक कोने में कुछ देर के लिए रख बाहर के इससे मैं आ गए । थोडी देर बाद देखा तो पानी में इंसानी आकार का खून जमा हुआ था । बाबा जी ने बताया कि उस प्रेतात्मा को उन्होंने पकड लिया है । उस क्लास में अब जैसी को कोई समस्या नहीं होगी । ऍम मुझे सब नहीं मालूम था । तुम्हें कब बताया जैसी नहीं तो कल ही तो मालूम है क्या हो रहा है? तुम तो मजे कर होगी और मुझे धंधे पर जाना है । हाँ, लिखने का काम तो मजा करना ही होता है ना? ऍफ हो जाओ । मुझे भी नींद आ जाएगी तो मैं आप खुली तो अभिषेक का चेहरा बहुत अच्छा लगा । कह रहा था । मुझे रात भर ठीक से नींद नहीं आई । सपने से आते रहे । मुझे भी सपना आया था । मुझे तो बहुत डरावना सपना आया था । मुझे लगा कि मैंने बस तुम को खो दिया । बडा अजीब सा माहौल था । वो पहले खंडर थे जिनमें से दोस्ती हुई । आवाज सुनाई दे रही हैं । टेलीविजन के स्क्रीन जैसे साॅफ्ट की चमकने वाले पर्दे पर मैं तुम्हारा चेहरा देखता हूँ । फिर तो उसे ऐसा गायब हो जाती हूँ । मैं तो मैं सोचता हूँ लेकिन तुम मुझे नहीं मिलती । फिर में हारकर हुआ हूँ हूँ । मुझे लगता है कि तुम हमेशा के लिए कहीं हो गई हो । या तो बिल्कुल किसी हिंदी फिल्म का सीन तोहरा रहे हो तो महल या मधुमती या वह कौन थी? किस्म की फिल्में और उनके खण्डरों में बोलते हुए लता मंगेशकर की आवाज के गाने माई गॉड मेरी तो ऐसी चोट आई थी । लेकिन अभिषेक सच कहे तो हमारा रूम हो या मृतात्माओं का अनुभव हिंदी फिल्मों तक ही तो सीमित है । तभी तुम्हारे मन के डर उसी फाॅर तुम्हारे मुकाबले में यू मेरा सपना तो बहुत सीधा साधा है और उसकी व्याख्या भी प्राइज वगैरह पहले कर चुके हैं । मैंने तो देखा कि मेरे चारों ओर बाढ का पानी चढाया है सडक पर लॉन में दूर दूर जहाँ तक भी ने कहा जाती है बस पानी ही पानी यानी कि यू फोर सी ट्यूबल हो सकता है । कितना तो घबराए रहे कल रात मेरे ख्याल से ये अच्छा नहीं होगा । हमारे लिए काट दो । बाबा जी का पता रात को जब मैंने कहा तो तुमने जवाब दिया कि उन्हें इलाज का मौका देते हैं । चलो ठीक है । मैंने महसूस किया कि जब से ये सिलसिला शुरू हुआ, हम दोनों में एक बाबा जी से दूर जाना चाहता है तो दूसरा उसे रोक लेता है । कहानी चलती रहती है । मैं कभी भी धार्मिक प्रवृत्ति कि नहीं रही अभी भी नहीं है । जबकि अपने माँ बाप को मैंने हर दिन कोटरी में बने मंदिर में पाठ करके ही नास्ता खाते देखा है । कभी कभी मैं भी मंदिर वाली कोर्ट्नी में उनके साथ बैठ जाया करती थी । वहाँ के भजन सुनती, पिता की प्रार्थना और खुद उनके साथ आरती गाती थी । पर बडे होने पर मैंने धर्म को, खासकर धार्मिक कर्मकांड को फालतू मानकर अपनी जिंदगी से एकदम काट दिया था । पर शादी के वक्त वेदी पर बैठ के ही बरसों बात मंत्रोच्चारण किया था । अभिषेक के घर में तो पूजा पाठ का सिलसिला था ही नहीं । पिता, मार्क्सवादी, कम्युनिस्ट और माँ को भी उसी तरह डाला हुआ था । मैंने उनकी उम्र कि पंजाब में पहली औरत देखी थी, जो करवा चौथ का व्रत तक नहीं रखती थी, क्योंकि पति ने ऐसे कर्मकांडों की मना ही कर रखती थी । तब अपने से ज्यादा अभिषेक के धार्मिक भाव पर मुझे हैरानी होती थी । मैं कैसे बाबा जी की आध्यात्मिक शक्तियों पर विश्वास कर सकता है । इसे बचपन से मार्क्सवाद जैसे धर्मविरोधी मत का दूध पिलाया जा रहा था और अभिषेक में जहनी तौर पर वामपंथ में अमेरिका में रहते हुए भी पूरा भरोसा था, लेकिन अभिषेक में सच में मुझसे ज्यादा कहीं भक्ति बहुत था । उसे जब कभी ज्यादा परेशानियां, घबराहट होती तो मंदिर जाना चाहता था । वहाँ जाकर उसे सुकून मिलता है । मंदिर में रुपये भी डॉलर नोट जरूर चढाता । तिलक भी लगवाता और प्रसाद भी जरूर खाता हूँ, वरना उसे भगवान के अप्रसन्न होने का या अनुष्ठान के अधूरे रहने का वहम बना रहा था । मैं उसके व्यक्तित्व के इस विरोधाभास को समझ नहीं पाती थी और धीरे धीरे मैंने इस संबंध में अपनी ही एक स्टोरी रच डाली थी । खासकर अभिषेक की माँ को कुछ जानने के बाद मैंने देखा तो पडोसियों के कीर्तन हवन में बडे उत्साह से जाती और पूजा गीत वगैरह गाती जबकि घर के अंदर भी ऐसा कुछ भी नहीं करती थी । यहाँ तक कि घर के अंदर किसी देवी देवताओं की तस्वीर तक नहीं थी । मैंने उनसे एक बार इस बारे में सवाल किया तो झिडककर बोली तू रहने दे ये नहीं मानते हैं तो क्या भगवान तो है उस लोग में पहुंचेंगी तो जवाब तो मुझको ही देना होगा । अब तो ये नहीं आएंगे बचाने अपना तर्क वितर्क तो कर लेंगे और वैसे मेरी समझ के बारह यहाँ तक की सासु जी ने मुझे करवा चौथ का व्रत रखने के लिए भी कहा था । ये और बात थी कि मैं खुद इन संस्थानों में विश्वास नहीं रखती थी तो मैं जोर नहीं दे सकें । अभिषेक में माँ और आपका विश्वास विश्वास यानि माँ की धर्म भी रोता और पिता का वैज्ञानिक समाजवाद फॅमिली मिल गया था और भीतर कहीं जाकर अलग अलग सांसों में समा गया था । जब उसे भी और चिंता सताती तो वह सहमा हुआ, जमी हुई धर्म भीरूता और ईश्वरीय विश्वास के गलकर ऊपर तैराते । जबकि आम हालत में उसका वैज्ञानिक, डॉक्टर, मन और दिमाग पिछले सोने सा निथरा रहा था । एकदम खाली इंसानियत में विश्वास । तब भगवान की बात करने वाले उससे बेहद बोरिंग किस्म के लगते हैं । किसी हवन कीर्तन का आमंत्रण बिना सोचे अस्वीकार कर दिया जाता है तो मैं कहता हूँ कि धर्म ने फायदे की बजाय समाज का नुकसान ज्यादा किया है । लेकिन अब अब क्या हो गया अभिषेक के भीतर और अभिषेक ही क्यों? मैं खुद भी तो समझ नहीं पा रही थी कि हम पूरा विश्वास नहीं होते हुए भी इस सबको अपने आपसे कार्ड क्यों नहीं पा रहे थे? हमारी जिंदगी का नॉर्मल ढर्रा बेहद उलट पुलट हो रहा था । दिन रात बाबा जी की ही बातें घर पर दोस्तों से जो कोई मिलता, उन्हीं की बात पूछता हूँ । टाइम मकसद सबका अलग अलग होता है । कुछ उनसे मिलना चाहते कुछ मेरा और अभिषेक का मजाक उडाते हैं । मुझे बुरा लगता है और मैं बाबाजी के खरेपन को जस्टिफाई करने लगती हैं । मैं इन दिनों अपने खाने पीने, व्यायाम और दवाई का पूरा ध्यान रख रही थी जिससे मेरी शुगर पूरे नियंत्रन में थी । लेकिन लोगों की आंख में उपहास का एहसास होते ही मैं डालती हूँ कुछ भी हो मेरी शुगर तो एकदम नॉर्मल है । कुछ तो असर होगा ही । बाबा जी का पढना आज तक तो एक सौ आठ आई नहीं थी । यह बात किसी के घर पर पार्टी में हो रही थी । कुछ ही देर में पूरे कमरे में खबर पहल गई कि बाबा जी तो बडे पहुंचे हुए ये अचानक पूरी पार्टी का केंद्र बन गई थी । सवालों के प्रचार होती रही । कौन है? कहाँ से आए हैं, क्या करते हैं या न्यूयॉर्क में कैसे मैं और अभिषेक कैसे मिले? क्या फीस लेते हैं? अगर बीमार नहीं हो तो भी मिलेंगे क्या? भविष्य बताते हैं कहाँ रहते हैं? कहाँ है आश्रम? कुछ देर बाद एक डॉक्टर मेरे पास आया और पूरी छानबीन करता हुआ सवाल पूछने लगा । वो लोग तुम्हारी शुगर एकदम नॉर्मल लेवल पर आ गई । हाँ आज सुबह एक सौ आठ थी दवाई ले रही हूँ । हाँ ऍफ का तब क्या क्या मतलब इसका तब तो इन्सुलिन से कंट्रोल में आई है ना । बाबा जी के प्रताप से और पहले तो इन्सुलिन के साथ ही बडी रहती थी । मैं तो खाने पीने के हिसाब से ऊपर नीचे हो सकती है । तभी मैं हैरान रह गया । ऐसे बीमारी ठीक होने लगी तो डॉक्टरी का पेशा ही खत्म हो जाएगा । मैंने उत्साह से कहा यह बात तो बाबा जी भी कहते हैं । कहते हैं कि वे बिना हजार के इस्तेमाल किए मंत्र के बल पर बडे बडे ऑपरेशन कर सकते हैं । डॉक्टर अपने पेशे के खतरे की वजह से उन्हें करने नहीं देंगे । वे तो यहाँ के डॉक्टर को अपना तरीका सिखाना भी चाहते हैं । दूसरी उनकी बंद किया भी है कि इलाज मुफ्त होना चाहिए । जबकि यहाँ के डॉक्टर तो कोई भी विद्या पैसा कमाने या कमाई बढाने के लिए ही सीखेंगे । अभिषेक क्यों नहीं सीख लेता । उसका सर्जरी में इंटरेस्ट नहीं है । सर्जरी नहीं तो दूसरा इलाज सीख ले । मैं भी रुका है । मेरी डायबिटीज के पूर्व ठीक होने का इंतजार कर रहा है । उसके बाद सीट भी सकता है । तब तक तो ठीक करने का वादा किया है । पंद्रह सेशन हो चुके हैं, पंद्रह और बाकी है करते क्या? ऍम कुछ ज्यादा नहीं फलों से चरणामृत बनाकर पिला देते हैं । तिलक लगाना होता है तो उसे कुछ झाडू भी करते हैं । अगली बार देसी घी लाने को बोला है । देखो क्या करते हैं उसका? और तुम सोचती हूँ इस जादू टोने से तो ठीक हो जाओगे । शायद कोशिश करने में हर्ज नहीं । मैं मिल सकता हूँ जरूर अगले बुद्ध को घर पर आ जाना । छह बजे अभिषेक कमरे के दूसरे सिरे पर अपने इर्द गिर्द समूह इकट्ठा किए बैठा था । उसे भी इस तरह के सवालों का जवाब देना था । वह तो मुझ से भी ज्यादा जोश के साथ बाबा जी की हिमायत कर रहा था । घर लौटते हुए गाडी में मुझसे कहने लगा ऍफ मनी, मैं तो ऐसा कुछ करूंगा नहीं, पर उस साले टंडन के मूड में तो पानी आ रहा था । मैं कुछ समझी नहीं । अब देखो कमरे में जितने भी लोग थे, सभी बाबा जी में दिलचस्पी ले रहे थे । उनसे मिलना भी चाहते थे । जानती हो ये लोग वैसे चाहे धर्म और गुरु या धार्मिक संस्थाओं पर कितना भी कीचड उछालें पीकर से जिंदगी का डर, समस्याएँ, चिंताएं उनको भी उतना ही सताती और कमजोर कर देती है, जितना कि मुझे तो में प्रॉब्लम किस के घर में नहीं होता हूँ । प्रॉब्लम होती है, लेकिन बाबा जी का विश्वास की बात पहले तुम मेरी पूरी बात सुन लोग मैं यह नहीं कह रहा कि बाबा जी किसी को तंदुरुस्त कर सकते हैं या नहीं । पर पक्के तौर पर बाबा जी इन लोगों को बडी ही नायाब चीज देते हैं और वह उम्मीद उम्मीद की तो कोई कीमत नहीं आंकी जा सकती है, जो चाहे कीमत लगा लीजिए । बाबाजी लोगों को ये उम्मीद देते हैं कि वे उनकी कम बना देंगे और बदले में वे उस आदमी से कुछ भी करा सकते हैं । इतनी पक्की उस की उम्मीद होगी, उतना ही ज्यादा बाबा जी का काम करेगा और आम आदमी के बस में होता भी चाहे तो सेवा करेगा या धन देगा । बोलो मत, ये इतने बडे बडे मंदिर गुरूद्वारे तब उम्मीद के व्यापार पर ही तो चलते हैं । तो हमें उम्मीद चाहे कैसी भी हो, चाहे धनवान बनने की, बच्चा पाने की, दुश्मन को हराने की, प्रेमी से मिलने की, क्लास में फर्स्ट आने की या कस्य छुटकारा की बाबा जी चाहे कहने को कहते रहे कि उन्हें पैसा नहीं चाहिए । पर आखिर उन का ये है जो रोज मर्रा का खर्चा है । यह भी तो कहीं से आता है । अगर लोग नहीं देंगे तो कहाँ से आएगा । बस बाबा जी कह देंगे आप मुझे नहीं तो उसको दीजिए पैसा । उन्होंने तो तुमको ट्रस्ट संभालने को कहा है कहाँ तो है पर यह काम आसान नहीं होगा । किसी वकील से बात करनी पडेगी, टैक्स का बखेडा पड सकता है और अभी तो मुझे साफ ही नहीं है कि उनकी प्लान्स क्या है । कहते थे तीन चार हफ्ते में लौट जाएंगे । अब तो तीन महीने से ऊपर हो गए । कोई जाने की बात तो की ही नहीं । चार ही है देखने का हो । कहते हैं अपने भक्तों का इलाज पूरा करके ही जाएंगे । एक इंसान के रूप में ये आदमी खराब और भरोसे वाला लगता है । दूसरों के दुख से हमदर्दी है । मैं अभी से कुछ नहीं कह सकते हैं पर उनसे मिलने में हमारा नुकसान भी किया है । बल्कि आज की पार्टी में मुझे ध्यान आया कि दरअसल सोशल पावर पानी में भी बाबाजी काफी मददगार हो सकते हैं । हर कोई तो उनसे मिलना चाहता है तो नहीं कुछ खास का लोगों को बुलाकर अपने कॉन्टेक्ट्स बढाया जाए । बाबा जी खुद भी सलाह दे रहे थे कि कुछ खास खास आदमियों को भी उनसे मिलवाओ जिससे ट्रस्ट भी कुछ बात बने और मेरा अपना कॉन्टेक्ट भी इस तरह बढेगा मुझे हंसी आ जाती है तुम्हारा मतलब कि तुम्हारा अपना पेशे समाज में जो इतना नाम है बाबा जी की बोते और बढ सकता है उसके लिए उल्टा कहो तो मान ले लूँ होगी । उलटा ही रहा कर दी ना तुम्हें पति परमेश्वर वाली बात है ज्यादा देखती चलो जिस स्पीड से इनके चेले बन रहे हैं कुछ दिनों में इनका महासम् बनने वाला है पर तुम तो ज्यादा इन मामलों में पडो नहीं । आजकल तुम्हारी प्रैक्टिस का भी नुकसान हो रहा है । जब तक बाबा जी बुला लेते हैं दवाई का तो काम चलता ही रहता है । ऐसे इंसान और मौके जिंदगी में कमी आती हैं । अभिषेक के जवाब पर मैं अचानक बढ गई । हिंदुस्तान की गली गली में घूमते ऐसे बाबा कोई बडे ज्ञानी ध्यानी तो है नहीं जो अपनी खुशकिस्मती का बखान करने लगी हूँ । मैं तो एक ही को मिला हूँ और उसने मुझे बहुत प्रभावित किया है और तुम अपने आप को डॉक्टर के लाते हो इसीलिए तो प्रभावित हूँ । इन चीजों का इलाज मैं नहीं कर सकता । उसे देख कर सकते हैं तो कोई प्रूफ है हो ही जाएगा । जो लोग कहते तो रहते हैं । उस दिन यूरोप से बच्चा नहीं आया था जिसकी जन्मजात मूडी टांगो को सीधा कर दिया । उन्होंने सुना है देखा तो नहीं और वह शैला नहीं कह रही थी । उसका इंसोमेनिया ठीक हो गया है । साइकलॉजिकल प्रॉब्लम होगी । उसकी मानसिक लोगों की बात और है । उनकी दवा दारू साधु लो बेहतर कर सकते हैं क्योंकि वहाँ रोगी की जरूरत ही आस्था, विश्वास, घर और उम्मीद जैसी चीजों की होती है । यहाँ भी तो फॅमिली होती है । कहते हैं कि विश्वास हो तो आदमी ठीक भी हो जाता है । पर मुझे उल्टी बात सही लगती है । यानी कि आप मान लेते हैं कि आप ठीक हो रहे हैं । तब आप चाहे कितना भी बीमार हो जाए, अपने आप को ठीक ही पाते हैं । विश्वास अपने आप में बडी ठोस चीज है । बुरी से बुरी हालत में टिकाए रखता है । मुझे लगता है मैं कभी भी ठीक नहीं होंगे क्योंकि मेरा तो विश्वास ही नहीं जमता । अगर बाबाजी लोगों की बीमारियाँ ठीक कर सकने का दावा करते हैं तो बताऊँ उन्हें इसमें क्या फायदा है । आखिर ऊपर ऊपर से देखो तो तुम्हारी बात ही सही लगती है । पर वे तो रोका ही बनना चाहते हैं । लेकिन हमारा यह जो हिंदुस्तानी सिस्टर है ना पैसे नहीं लेने का, यह देने वाले के ही फायदे के लिए बना है क्योंकि इससे देने वाला पैसे से कहीं बडी चीज अपनी सेवाओं की कीमत के रूप में मांग सकता है । देखते हैं इसी नियम से ही तो ग्राउंड में एक लाख का उठा मांग लिया था तुम जो उन्हें पचास पचास मील लेने के लिए छोडने जाते हो, घर पर पचास लोगों को बुलाकर उनसे मिलवाते हो । यह भी तो कीमत ही है । उधर जाने इस ट्रस्ट के लिए तो क्या क्या करना होगा? इधर एक बात और नोटिस लगा है । बाबा जी अपनी सेवाओं के लिए कुछ नहीं लेते हैं । लेकिन अगर आप उन्हें अवश्य देना चाहते हैं तो देवी को मिनट चढाइये उसमें क्या किसी का बन सकता है? पता नहीं और उस दिन रूपाजी हीरे का सेट और तीन बडी बडी हीरे की अंगूठियां खरीद कर लाई थी । कहाँ से आया इतना सारा पैसा? उसे आदमी कहता रहे हैं, कुछ नहीं चाहिए, कुछ नहीं चाहिए और बीवी जाकर हजार डॉलर की शॉपिंग कर डाले । उनका अपना पैसा होगा । सुना है रूपा का हिंदुस्तान में बिजनेस है तुम्हारा मतलब हिन्दुस्तान से इतने डॉलर लाए हैं । बाबा जी के बारे में ऐसा बहुत कुछ होगा जिसे हम नहीं जानते हैं । जानकर करना भी क्या है । हमें तो तुम्हारे ठीक होने से मतलब है कोई और रोकने लग जाए । आजकल हम बाबा जी से ऑफिस से रहते हैं । मुझे डर लगने लगा है जैसे की जिंदगी का ढंग ही नहीं बदल जाए । किसी और का रास्ता हमारा रास्ता ना बन जाए । अल्पना तुम तो इतनी घबराई सी लगती हो । तुम रुक जाना चाहती हो तो बेशक यही रोक लगा तो मैं जबरदस्ती नहीं करूंगा । मैं तब तक संभाल चुकी थी । बोली कोई नहीं अब चल पडी हूँ तो लक्ष्य तक तो जाउंगी । कबीर ने कहा है कि जिन खोजा तिन पाइयां, मैं भी शायद कुछ पानी जाऊँ । इसलिए खोज अभी जारी रखनी है ।

इतर भाग 06

ऍम भाग छह माताओं का रिश्ता रोपा और बाबा जी से किया था । यह भी मेरे लिए पहली बना हुआ था । तरण ने माधव का हम से परिचय बाबा जी का सेक्रेटरी कहकर करवाया था । हमने भी उसे सेक्रेटरी माना क्योंकि बाबा जी तक सीधी पहुंच उसी की थी और सब उस की उतनी ही इज्जत करते हैं जितनी की बाबा जी की । मैंने बल्कि बहुत बार यह नजर आया था की उसे अपने ऍम होने का पूरा अहसास था और मैं इस स्थिति का पूरा पूरा फायदा उठाता । जब उसका अपना मन किसी भक्त के लिए फोन पर बाबा जी को बुलाने के नए होता तो मैं आराम से कह रहा था बाबा जी पूजा में है, बाबा जी से हो रहे हैं । इसी तरह जिस किसी को ऑफलाइन करना होता था तो कह रहे था आपकी जब कहीं बाबा जी से बात करवा दूंगा, लाइन में खडे होने की जरूरत नहीं । आप जाइए मिली उनसे लोग बाबा जी के लिए उपहार लाते तो माधव के लिए भी पहले अलग से कुछ पकडा दिया जाता है । सब की आंखों में मैं खटकता भी खूब था । पास कर जब वह बाबा जी और मिलने वालों के बीच अडंगा बन जाता एक बार अभिषेक को भी उसको बहुत गुस्सा आया था । बोला, इस की ताकत तो ऐसी है जैसे इंदिरा गांधी के सेक्रेटरी धवन की वैसे ही प्रॉब्लम आता है जैसे खुद ही सब कुछ हो और बाबा जी भी लगता है । इसे या तो कुछ कहते नहीं या उन्हें पता नहीं चलता कि इसमें क्या धांधली मचा रखी है । पहले तो सोच लिया है कि इसे बीच से काटकर सीधे बाबा जी से रिश्ता रखना । ये होता कोने टटपूंजिये ऐसा आज कोई तीन चार बार फोन किया, हर बार कुछ न कुछ कहकर बाबा जी से बात नहीं करवाई । फोन तो करवा सकता था तुम्हारे साथ ऐसा करता तो नहीं । कुछ बात होगी । बात किया तो लगता है उसे खुद नींद आ रही थी । उठाई नहीं होगा तो फिर से चौथी बार रूपा ने उठाया था । फोन बोली बाबा जी तो यहीं है । उन्हें किसी ने बताया ही नहीं । आपके फोन का बडाई सुस्त और अडियल किस्म का है । जरूर किसी करेगी । हालत होगा । बाबा जी को कोई और सेक्रेटरी नहीं मिला था । क्या उस से मैंने ये सब जोड दिया था । लेकिन जिस तरह रूपा माधव से व्यवहार करती थी, मुझे माधव पर तरफ भी ज्यादा आने लगा था । सैंडल वालों का किस्सा तो एक नमूना था ही । आए दिन दोनों में नोकझोंक होती रहती । दोनों किसी ने किसी बात को लेकर बाबा जी से एक दूसरे की शिकायत लगाते रहते हैं । कोई भी काम गलत होता और बाबा जी पूछते तो रूपा कर देती हूँ । मैंने तो माधव से कह दिया था और मानव कहता हूँ मुझे तो किसी ने कुछ कहा ही नहीं । रूपा को जब कोई अपना काम जरूर करवाना ही होता तो वह कह देती मैं नहीं कह रही । बाबा जी ने कहा है दोनों एक दूसरे पर बाबा जी का हथियार चलाते हैं और बाबा जी के सामने जब कचहरी लगती तो दोनों को ही एक बात कह देते थे । देखो लडो मत कुछ समस्या हूँ तो मुझे सीधी बात कर लिया करो । बाबा जी ने तो पत्नी को नाराज करने की हिम्मत सकते थे । मैं सेक्रेटरी को बहुत संजीदा मसला हो जाता तो बीवी का पलडा भारी रहता है जो की सभी को जायेगी लगता क्योंकि पत्नी का होता सेक्रेटरी से तो ऊंचा होता ही है लेकिन धीरे धीरे कई जनों को महसूस होने लगा था की रूपा ही अन्याय करती है माधव के साथ खासकर जब रूपा उस पर जीती चिल्लाती है । तो हमदर्दी माधव के साथ ही हो जाती है । हम सबके सामने ही माधव को डांट पड जाया करती थी । मुझे याद है कि एक दिन रूपा हमारे यहाँ पर अपना पर्स भूल गई थी । घर जाकर उसमें माधव से मांगा तो पता लगा कि पर्स नहीं है । आधी रात हमारा फोन बजा । जब हमने बताया कि पर्स यही है तो बस फोन हाथ में पकडे ही वह माधव पर बरसने लगी होता । किसी भरोसे का नहीं है । मेरी सारे ज्वेलरी स्पर्स में नहीं हो जाता तो पर तो उस दिन मुझे यह भी पता लगा की रूपा का पर्स उठाने की ड्यूटी भी माधव की ही है । ऊंची एडी पहनकर गहनों से लगा पर उसके लिए बहुत भारी पडता है । लेकिन एक दिन तो कमाल ही हो गया । मैं और अभिषेक दोपहर में उनके पास पहुंचे तो तीनों बैठक में ही बैठे थे । या तो कोई मशवरा कर रहे थे या बहस । माधव ने दरवाजा खोला और अभिवादन का जवाब दिए । बिना मुंह फुलाकर कोने वाली कुर्सी पर बैठ गया । बाबा जी कहने लगे एक जरूरी काम आप पडा है । माधव को हिंदुस्तान जाना होगा । आज ही ऐसा क्या हो गया? मैंने पूछा पर इस सवाल का जवाब नहीं देकर बाबा जी बोले टिकट बुक करा लिया है पर मैनहटन से लेना है । अभिषेक बोला माधव को मेरे साथ दे दीजिए । टिकट लेकर मैं उसे एयरपोर्ट छोड देगा । रूपा बीच में बोल पडी नहीं वह कैसे माधव को ऐसे बिना विदा किए थोडी भेजेंगे । हम हम को भी ये रिपोर्ट साथ जाना है । ऐसे ही नहीं छोडूंगा । रुपए जी माधव को खुद प्लेन में बैठा कराऊंगा । आप की बात और है । हम खुद उसे हवाईजहाज पर चढाना चाहते हैं । लेकिन माधव तो थोडे दिन के लिए जा रहे हैं ना, लेकिन अब क्या लौटेंगे? महीने भर बाद तो हमें भी लौट जाना है । तब यहाँ कर क्या करेंगे । नवरात्र से पहले तो हर हालत में हमें भारत में होना है । ठीक है हम टिकट लेकर वापस आते हैं । आप तैयार हो जाइए । तब तक अभिषेक को काम पर जाना था । उसने मुझे कहा कि मैन मैनहटन में उसके ऑफिस में उसे ड्रॉप करके टिकिट लेकर वापस सवा घंटे की ड्राइव कर उनकी बात हूँ । उन्होंने लेकर एयरपोर्ट ले जाऊँ टाइम की ड्राइविंग से मैं वैसे भी घबराती थी । अब तो अगले छह घंटे से ड्राइविंग का सिलसिला ही दिख रहा था क्योंकि एयरपोर्ट से वापस होने न्यू जर्सी में छोडकर ही घर आ सकती थी । मुझे लगा कितनी ड्राइविंग में मैं जरूर थक जाऊंगी और किसी की टक्कर लगा बैठी हूँ । फिर टिकट लेकर मैं वापस न्यूजर्सी पहुंची तो पाया कि तीनों के तीनों पिछले ढाई घंटों से ठीक उसी पोज में बैठे थे जिसमें मैं और अभिषेक उन्हें छोड गए थे । मेनका भीतर से कहने लगी, रूपा बेन थोडा तो कुछ खाली देना देखिए आपकी मारे मैंने भी सुबह से कुछ मौकों नहीं लगाया । मेरा मन बहुत खराब होता है । मैं आपके लिए पाव भाजी बनाई, थोडी सी लाऊं एयरपोर्ट जाना है ना । मैं टिकिट ले आई हूँ । दो घंटे में प्रेम का वक्त हो जाएगा । हमें जल्दी जाना चाहिए । कम से कम डेढ घंटा तो रास्ते में ही लगेगा । सामान तो बन रही है, बस निकलते हैं । रूपा ने कहा । तब बाबा जी एकदम से उठे और बोले ऍम होकर भी आ गई तो वहीं की वहीं बैठे हो । अगर चलना है तो निकल चलो ना । बाबा जी आगे मेरे पास बैठे थे । ग्रुप और माधव पीछे कुछ खुसर पुसर कान में पडती रही अगले कुछ गिले शिकवे जैसी आवाजे पर मेरा पूरा ध्यान ड्राइविंग पर था । प्लेन की चलने में भी वक्त था । हमने जल्दी से माधव को सामान के साथ लाइन में खडा किया और फिर मैं पार्किंग लॉट में गाडी ले गई । पार्किंग लॉट में गाडी खडी करके मैं उनके पास आ गई तो देखा सामान चेकिंग नहीं किया गया था । रूपा की आंखें रोने से लाल हुई थी और माधव भी अपने आंसू पहुंच रहा था । बाबा जी उसका कंधा थपथपाकर कह रहे थे, मत जाओ ना मैंने तुमसे जाने को तो नहीं कहा तो अपनी मर्जी से ही जा रहे थे । माधव आंसुओं के बहाव में हिचकी भरता बोला मैं तो नहीं जाना चाहता हूँ पर मुझे किसी ने रोकने को कहा भी तो नहीं । तो मैंने कहा तो था बाबा जी बोले रुपए भावी अगर एक बार भी कहे तो मैं रुक जाऊँ और रूपा सूप मुँह बोली । मैं तो नहीं चाहती कि तुम जाओ और मेरे लिए रुकने की जरूरत भी नहीं । मैं तो कभी चाहती भी नहीं थी कि तुम जाओ और मैं कभी नहीं करूंगी तू को और आखिरी वाक्य कहकर फूट फूटकर रोने लगी मेरे लिए । एक ओर तो यह ड्रामा किसी भी हिंदी फिल्म के विदाई सीन से कहीं ज्यादा हृदयविदारक था । दूसरी ओर मुझे समझ नहीं आ रहा था कि अब जाने वाला जाना नहीं चाहता, दूसरे उसे जाने नहीं देना चाहते हैं । तब ये जाने और रोने धोने का नाटक ही क्यों खेला जा रहा है और था मैं सच में नाटक की क्योंकि बाबा जी बोले जीत नहीं करूँगा तो तुम दोनों में बहुत अहम है । रूपा मुझसे कहेगी नहीं पर तो मालूम तो है ही है । तुम्हारे जाने से कितने कष्ट में हैं और तुम भी जाना नहीं चाहते हो । चलो अपने टिकट वापस लेता हूँ । पता लगा काउंटर पर टिकट देने के बाद एक तरह के चरम क्षण पर रोने धोने का ये ड्रामा शुरू हुआ था । माधव ने कहा तो मैं जा ही रहा हूँ । मुझे किसी ने रोका तक नहीं और वह सफल पडा । फिर पता लगा की रूपा और माधव का जबरदस्त झगडा हुआ था और रूपा ने माधव से कहा था कि वह हिंदुस्तान वापस चला जाए । मैं उसे कत्तई बर्दाश्त नहीं कर सकती और मानव ने भी प्रण कर लिया था कि वह भी अब और नहीं सह सकता और लौट जाएगा । इसी झगडे की वजह से दिनभर मेनका मैंने भी खाना नहीं खाया था क्योंकि रूपा को खिलाए बिना वे कैसे खा सकती थी । मेनका बहन देवी की बडी व्यक्ति और देवी को नाराज नहीं कर सकती थी । रात साढे दस बजे जब मैंने इन्हें रुक जाने की खुशी में भूख भूख का इतना शोर मचाया की मुझे रास्ते में गाडी रोककर उन्हें पिज्जा खिलाना पडा । रात बारह बजे जब थकी हारी मैं घर पहुंची तो अभिषेक मुझे लेकर फिक्रमंद था । अंदर दीपाकर मेरा गुस्सा और भी बढ गया था । पता नहीं किन बेवकूफ से पाला पडा है । इनका तो बडा बहुत ड्रामा हो गया और हम फालतू में पिस गए । आॅवर सीन सच प्रीचर्स और कहते कहते मैं खुद ही समझ नहीं पाई कि मुझे गुस्सा आ रहा है या हंसी । माधव को बाबा जी और रूपा से इसने जरूर मिलता होगा । लेकिन जिस तरह से मैं ज्यादातर रूपा का उसके प्रति व्यवहार देखती थी, मुझे वह उन का सेक्रेटरी नहीं बल्कि पालतू कुत्ता लगता था । कभी वह कुछ करा जाता, कभी दुत्कारा फिर भी अपने दम हिलाता रहता था और किसी वफादार कुत्ते की तरह पहचाने लोगों पर भी बहुत तभी पूरे जोर से था । एक बार मुझ पर भी उसने बहुत नहीं की कोशिश की थी । मेरे घर पर हीलिंग सेशन के बाद सबके लिए खाना लगने वाला था । माधव ने किचन में मुझसे आकर अचानक कहा कि उसे बहुत भूख लगी है, जल्दी खाना लगा देंगे । मैंने मेज पर खास अतिथियों यानी कि बाबा जी रूपा और माधव के लिए प्लेट लगा दी और खाना गर्म करने लगी । लेकिन दो मिनट में ही वापस आकर उसने खाली प्लेट को मेज पर पटकते हुए कहा, ये खाना लगता है । मुझे गुस्सा इतना आया कि सारा खाना नाली में पटक दूंगा । पर मेरा शिष्टाचार मुझे हरा गया । बडी सीधी सधी आवाजे मैंने कहा सब्र कीजिये अभी लग जाता है । पर उस दिन मैंने माधव को लेकर अपनी डिक्शनरी में से अंग्रेजी का लव मी, लाॅक वाला मुहावरा एकदम उलट दिया और बल्कि यहाँ तक कि उसमें दुगुनी नकारात्मकता भी दी । यानी कि डोंट की जगह नाॅक कर दिया । लेकिन माधव क्यों? पूरा आदमी नहीं था । कुछ मजबूरियाँ थी उसकी वरना मनसे भला और बाबू किसान था । बाद में मुझे पता लगा कि वह अच्छे काफी संपन्न परिवार का लडका था । स्कूल पास करके वह भी बाप के बिजनेस में लग गया था, जम के काम करता था । नाम की कमाई होती थी । फिर उसे सब सिर दर्द की शिकायत होने लगी । किसी ने ब्रेन ट्यूमर का अंदेशा बताया, माधव घबराया तभी किसी ने उसे बाबा जी के बारे में बताया । बाबा जी ने ही कहा कि वह दुरुस्त हो जाएगा की उम्र था या नहीं यह तो किसी को पता नहीं चला क्योंकि माधव ने डॉक्टर से चेक तो कराया नहीं था और उसका सिर दर्द सही सलामत होने पर माधव ने बाबा जी से कहा था आप मुझे ठीक कर दीजिए, सारी उम्र में आपकी सेवा करूंगा । आप जो चाहे वो मैं करूंगा । हिंदुस्तान में बाबा जी के आश्रम का कार्य शुरू ही हुआ था । बाबा जी को भी मांगा मिल गया । सैकेट्री किसी के आदमी की जरूरत थी । माधव असम में बैठा रहता था । लोगों की बात भी उन तक पहुंचाता था और छोटे मोटे संदेश भिजवाता था । टेलीफोन वही अटेंड करता था । बिना किसी तरह की औपचारिकता के उनके सैकेट्री बन गया । अपनी दुकानों पर जाना उसने छोड दिया । एक दिन बाप आकर बाबा जी के पैर पकडकर बोला तो बाबा जी ने कहा तुम्हारे बेटे में बहुत बडा आदमी बनने की लक्षण है । उसे दुकानदारी में जीवन व्यर्थ करने को बाध्य क्यों करते हो पाकिस्तान अब उसे मार्ग दर्शक मिल गया है तो उसके रास्ते का रोडा नहीं बना । माधव से बाबा जी बोले तो मुक्त हो । पिता के साथ जाना चाहते हो तो चाहूँ मैं रोकूंगा नहीं क्योंकि परिवार के प्रति भी तुम्हारा कर्तव्य । माधव बोला मेरा अब उस काम में मन नहीं लगता । मुझे अपनी सेवा में ही रहने दीजिए । बाबा जी के मन में भी था यह सेवकों की कमी उन्हें थी नहीं । बहुतों को जाने पर भी उनकी सेवा का सौभाग्य नहीं मिलता था, लेकिन माधव रूपा को भी भाग गया था । बडा ही विनीत बोला और नरम स्वभाव का । दोनों का ही भरोसा माधव पर हो गया था । जब यूरोप अमेरिका घूमने की बात होती है और मानव ने उनके साथ जाने में दिलचस्पी दिखाई तो दोनों ही आसानी से मान गए । माधव ने खुद ही कहा था बाबा जी वहाँ पर दी तो आपको एक बंदे की जरूरत होगी । मुझे साथ ले चलिए । टिकट तो बाबा के भक्तों कोई भेजना था । दो की जगह तीन आ गए । माधव बेहद खुश था विदेश घूमने के । आप तो पहले भी देखा करता था । जहां जहां बाबा जी के भक्तों ने बुलाया या जहाँ जहाँ भी रूपा घूमना चाहती थी, वहीं वहीं पैदा हो गए और वह भी उनके साथ लंदन, पैरिस, रोम, एम्बर और जिनेवा सब जगह घूमा । लोग उसको भी इज्जत करते हैं । रुपए के उतार चढाव पर्व बाबा जी किसने और विदेश यात्रा के उत्साह के बूते किसी तरह से आ जाता हूँ । दरअसल हिंदुस्तान में रूपा के इर्द गिर्द उसकी अपनी सेविकाएं थी । आदत थी साडी उतारकर पटक देने की । तेरी का चाहती है उसके कपडे प्रेस करके नहाने के वक्त मैचिंग कि जूते और पर्स निकालकर साडी के पास रख दिए जाते हैं । यहाँ तक कि पैर के सैंडल वह खुद खोलती तकनीति । लेकिन प्रदेश की बात और थी । यहाँ कोई नौकर आया तो था नहीं । लोग बुलाते भी थे तो खाना मगर खिलाकर रहने की जगह वापस छोडा थे । रूपा के सारे व्यक्तिगत कम माधव के जिम में आना पडेगा । बाबा जी के व्यक्तिगत काम तो वह चाहो से करता था । उनका लूंगी । चौगान होता, प्रेस करता, नहाने के वक्त पहनने के लिए तैयार करके रखता । उनकी पूजा के वक्त पूजा का सारा सामान तैयार करता है । इस काम में उसे आनंद मिलता और लगता के जीवन सुधर रहा है । बाबा जी गलती होने पर भी कभी गुस्सा नहीं करते और हस्कर कुछ ऐसा कहते हैं कि गलती का एहसास उसे खुद खुद हो जाता था या बेच चुकी रहते अनदेखा करते थे । उनके पास माधव की गलतियां देखने का वक्त भी कहा रहता है । ज्यादा वक्त या तो वो लोगों से घिरे होते हैं या फिर एकांत में पूजा पर होते हैं । लेकिन रूपा काम में तनिक सी गलती होने पर चिल्ला पडती, कभी बिस्तर की चादर पर एक भी सिलवट रह जाती तो चिंघाड थी, क्या है इस ठीक करना नहीं आता । ठीक से कोई काम होता है तुमसे रूपा के रवैये पर माधव के मन में बहुत रोड था, उसका उल्टे काम करने का मन मर जाता है । तब रूपा और भी की थी और बात बाबा जी तक पहुंचाती लेकिन बाबा जी उसे गुस्सा तब भी नहीं करते हैं । प्यार से कहते हैं माधव कर दिया करो ना जो मैं कहती है माधव बाबा जी के कहने से रूपा की सेवा भी मन से करने लग जाता है । बाबा जी के लिए उसके मन में प्यार और इज्जत बढती । मैं सोचता कि बाबा जी जैसा महान, आॅईल, सहनशील और स्थिति प्रज्ञा व्यक्ति ही रुपए जैसी पत्नी के साथ निबाह कर सकता है । पर कभी कभी उसका मन होता कहीं कि बाबा जी आप ऐसी औरत के साथ क्यों रहते हैं? छोड क्यों नहीं देते हैं? पर मैं जानता था कि ऐसा वह कभी नहीं कर पाएगा । उसने बाबा जी का पत्नी के प्रति इसमें और कर्तव्य भाव भी देखा है । पत्नी अगर विदेश घूमना चाहती है तो बाबा जी भी किसी तरह अपने आप को मना लेंगे कि वे भी जाना चाहते हैं । वरना स्वयं में उन्हें घुमाने के स्थान देखने का कत्तई शौक नहीं था । बस जहाँ जहाँ रुपए तय करती है, वहाँ सब चल पडते हैं । बाबा जी में कहीं पति पुरुष का यह अहंभाव जरूर था कि वे पत्नी की सारी आवश्यकताओं की पूर्ति करने में पूरे समर्थक हैं । वे वैसे बैरागी योगी नहीं जो कि परिवार के प्रति अपने कर्तव्य से, चूककर दुनिया का या अपना भला करने की सोचते हैं । बाबा जी तो परिवार का भला करते हुए दुनिया का भला करना चाहते हैं । वक्त के लिए योगी बहुत परीक्षाएं होती है । हनुमान जी को कैसी कैसी परीक्षा पास करनी पडी, मेरुपर्वत उठाना पडा, रूपा जी का करो तो उसके सामने कुछ भी नहीं । जब तक बाबाजी कसने उस पर है, वह डाटा रहेगा भूल कैसे सकता है वहाँ उनका एहसान उस की उमर ने उसकी जान ही ले ली होती । ये जीवन तो बाबा की कृपा से है । तब उन्हीं को समर्पित रुपए उसे भी देती थी । जब बाहर जाते माधव को अपने साथ खाना खिलाती, बाहर के लोगों के साथ मैं माधव का ओहदा और इज्जत पूरी बनाए रखती थी । तभी तो मैं बाहर वालों की नजर में इतना खास कर बाबा जी से मिलने के लिए सब उसकी ही तो कुछ कुछ करते थे ।

इतर भाग 07

वो भाग साथ रूपा के प्रकोप का पात्र माधव ही नहीं वे सब मेजबान बन जाते हैं जिनके हाँ बाबा जी डेरा डालते हैं । जिस गुजराती परिवार के यहाँ पहले पहले अमेरिका में आके रुके थे, उनके बारे में रूपा ने कहना शुरू कर दिया । इसका आदमी तो बिलकुल काम नहीं करता । एकदम निकम्मा है और इसी की वजह बाद में है । पता लगा कि उस आदमी ने अपने कामों की वजह से रूपा जी को वाशिंगटन घुमाने में कुछ आनाकानी कर दी थी । मुझे उस गुजराती महिला पर बहुत तरह से आ रहा था । मैं हर वक्त नर्वस ही रहती की फल सब्जी बाबा जी को पसंद आएगी या नहीं, चाहे रूपा की पसंद की बनी की नहीं । यहाँ तक कि उसने अपनी बडी बहन को काम में मदद करने के लिए अपने पास बुला लिया । यू पहले से ही साईं बाबा की भक्ति और उसके घर में कीर्तन मगर होता रहता था । शायद उसकी घबराहट की एक वजह यह भी थी । मैं साईं बाबा के प्रति मन से वफादार बने रहना चाहती थी, पर बाबा जी को भी प्रसन्न रखना चाहती थी । बाबा जी नए सिर्फ उसके घर पर ठहरने को राजी हो उसे धन्य कर रहे थे । उनके चमत्कार भी साईं बाबा से कम नहीं थे । लेकिन फिर भी मैं पहले से निश्चित की गई साईं बाबा के कीर्तन की तिथि को किसी भी हालत में बदलना नहीं चाहती थी । जबकि उन्हीं तारीखों पर रूपा कि वाशिंगटन जाने की जिद थी । महिला ने बाबा जी से रोकने की बहुत प्रार्थना की और बाबा जी से ज्यादा रोपा को इसमें बाबा जी का अपमान महसूस हुआ । कीर्तन से ठीक एक दिन पहले वे एक और परिवार के साथ वाशिंगटन चल दिए और लौटकर उसी परिवार के यहाँ कर आसन जमाया । यह दूसरा घर पहले की बजाय कुछ बडा ही था । घर की महिला मेनका बिन देवी की बडी व्यक्ति रूपा को उन के हाथ का खाना भी दूसरे गुजराती खानों से बेहतर लगा था । और जब रूपा का मन होता वह उन्हें बम्बई की चौपाटी वाली पावभाजी बनाने को कहती जो बडे शौक से बनाती और खिलाती । लेकिन पाउ बाजी का मजा आखिर कितने दिन टिक सकता था । रूपा ने फिर अभिषेक से कहा अभिषेक भाई, हमको तो भगवान बच्चों से बचाया इतनी बोर है ये लोग मेरा तो इनसे बात तक करने को मन नहीं करता । हमको कोई घर ढूंढ दीजिए ना घर तो हमने पहले भी ढूंढ लिया था । पर तब आप कुशन भाग गई । उसमें क्या है? कल ही किसी रियल स्टेट एजेंट से वक्त तय कर लेता हूँ । ऐसा घर चाहिए । आपको बडी सी बैठक हो । इसमें कम से कम सौ लोग एक साथ बैठ सकें । इतने लोग जो आते हैं, उनके बैठने की जगह तो चाहिए लेकिन घर को मेन्टेन कौन करेगा? उसकी सफाई वगैरह । उसकी फिक्र मत कीजिए । हमको बस अपना घर चाहिए । अब तंग आ गए हैं । दूसरों के घर में रह रहे हैं । मैं अपने आप अपनी मर्जी का खाना पका आऊंगी जाऊंगी । यूरोपा के अपने घर की जरूरत को तो मैं समझ सकती थी । पर मेनका बहन की खातिर वजों में तनिक भी कमी नहीं थी । यहाँ तक कि बाबा जी और रूपा की सेवा टहल में रहने के लिए उन्होंने अपनी नौकरी की छुट्टी कर दी थी । वे अपने पति के कपडे साडी की दुकान में मदद किया करती थी । रूपा के मुझसे बात निकलते ही उसे पूरा करने के इंतजाम शुरू हो जाते हैं । इधर रूपा ने कहना शुरू कर दिया था, मुझे क्या पता था कि इतने दिन रहना है । मेरे तो कपडे भी खत्म हो गए । बार बार वही कपडे दो पहनो । मैं तो उनमें से थी जिनको सालों में जाकर सेम साडी की बारी आती है । रूपा की हाय तोबा ज्यादा बढ ने से पहले ही साडी और सूट ओके कपडों के चढावे चडने लग गए थे । मेनका बहन तो उन्हें अपनी दुकान पर ले गई और कहा कि जो पसंद हूँ उठा लेंगे । मैं मेनका बहन के घर पर ही बैठी थी । जब तक पति पत्नी बाबा जी के चरण छूकर नये खडे हो गए और मेनका बहन बोली रूपा बहन ये दोनों खाली वक्त में दर्जी का काम करते हैं । आप जो साडी के साथ ब्लाउज सिलवाना चाहती थी इन्हें ना आप दे दीजिए रूपाणी अजीब हिकारत भरी नजर से दोनों को तरह और बोली कुछ आता हूँ, आता भी है कहीं खराब मत कर देना । इतने महंगे हैं ये पीस दिल्ली में तो सारे ब्लाउज प्रॉमिनेंट से सिलवा आती हूँ ऐसा करती हूँ पहले एक ब्लाउज मेरे ब्लाउज की ही नकल करके बना कर दिखाऊँगा फिर दूंगी । और हाँ साडी के फॉल तो तुम लगा ही सकती हो ना उससे पहले कुछ पेटीकोट सेल्लो महिला हाथ जोडी जोडी रूपा के कपडे ना आपने लगी और मैं अकाउंटेंट कम दर्जी बाबा जी का नाम लेने लगा । उनके लूंगी कुर्ते के लिए अभी ये सब चल ही रहा था की रूपा एकदम से लाये । मेनका वहन कुछ खाने को हैं । बहुत जोर से भूख लगी है । शाम को पांच बजे होंगे । मेनका बहन घबराकर बोली मैंने अभी अभी शाम का खाना बनाना शुरू किया है, उसका इंतजार नहीं कर सकती । हमको तो बस जल्दी से सब्जियां मिलाकर खिचडी बना दीजिए । बहुत दिनों से खिचडी खाई भी नहीं । बस उसमें खूब सारा देसी जी और लाल मिर्च का छोड दे दीजिएगा और रूपा मूड के अंदर जी घुमाती हुई चटकारे से लेने लगे । मैंने सोचा रूपा जो है और जो होना यह दिखाना चाहती है उसमें कितना फर्क है रुपए उस दर्जी नुमा सब महिला या कहूँ सब महिला अनुमान डर जिनको अपना ब्लाउज दिखाते समझाने लगे हमको सिंपल ब्लाउज बिल्कुल पसंद नहीं । गला और चोली कट ब्लाउज जानता होगा, बटन पीछे होंगे और बटनों की जगह तनिया लगेगी जैसे ब्लाउज का डिजाइन रूपा बता रही थी वैसे ब्लाउस या तो मैंने किसी हिंदी फिल्म की हिरोइन को पहले देखे होंगे या देसी कैलेंडरों और पोस्टरों में छपी पौराणिक महिलाओं की तस्वीरों की, जिनके वस्त्राभूषणों की परिकल्पना का मुख्य श्री रवि वर्मा के क्षेत्रों को जाता है । वी शांताराम की फिल्मों में हीरोइनों के वस्त्राभूषणों में पौराणिक रोमांस की बात तो मेरे समझ में आती थी और उन वस्तुओं में कभी सडकों पर घूमती भारतीय महिलाएं । फिलहाल मैंने नहीं देखी तो मेनका बहन ने सच कुछ ऐसी फुर्सत से रूपा के आदेश का पालन किया कि पंद्रह मिनट में लाल लाल ही में तैरती खिचडी की दसवी रूपा के हाथ में रखी थी । मेनका बहन के साथ एक दंपत्ति भी कमरे में आया । मेनका बहन ने बाबा जी के पास जाकर फुसफुसाकर कहा हूँ हमारे एक मित्र मिलना चाहते हैं । आप से भी हीरे के बहुत बडे व्यवसायी है और उन्होंने अभी अभी मैनहटन में एक रस्सा खरीदा बडे मालदार लोग हैं, जरा बात कर लीजिए ना । बाबा जी बोले हम नीचे मंदिर में जाने वाले हैं हमारे जाने के दस मिनट बाद वहीं भेज दीजिएगा उन्हें मैं हीरे का व्यापारी कोई सीटियाँ पहलवान सा लगता था और उसकी बीवी भारी जरी की साडी और गहनों से लदी कठपुतली सीट परिचय पाकर बडी रूचि भरी आंखें रूपा ने उन पर फेरी और आवाज में अतिरिक्त मिठास करके बोली कहाँ से आए हैं आप लोग? यहाँ से कोई बत्तीस मील दूर आपकी धीरे की दुकान है या होलसेल का बिजनस ऍम में शुरू है और ऐसा का है मैनहटन में टाउन में बाबा जी अगली बार जब मैंने टन जाएँ तो हमें इनके रस वाले चलिएगा । हम को मैनहटन जाना पसंद है । बाबा जी ने रूपा की बात की अवहेलना करते हुए मुझसे कहा हम मंदिर में पूजा करने जा रहे हैं । दस मिनट बाद अब नीचे चले आइयेगा बाबा जी चले गए तो रूपा ने उस कठपुतली सी बेजान, सुखी सुकडी महिला के तीरे का हार्पर रखना शुरू कर दिया । ये हार क्या आपकी दुकान में बना है? बडा सुंदर है क्या काम होगा? मैंने अपना ध्यान कमरे में बाकी जिससे कि क्रियाकलाप की ओर घुमाया । कमरा भर चुका था लोग दस्तर दुकानों को बंद करके बाबा जी से मिलने को हाजिर हो रहे थे । पेन का बहन का पति सबको हिदायत दे रहा था । देखिए सब लोग जूते बाहर ही उतारे । अंदर और जगह नहीं है । या तो में चले जाइए या बाहर लॉन में ही लाइन लगा दीजिए । करीब साढे सात के करीब मुझे पुलिस गाडियों के वोटों की आवाज सुनाई दी । गब्बर आकर मैं बाहर आई तो देखा करीब दो ढाई सौ लोग चौधरी पचौरी लाइनें लगाए खडे थे । खूब शोर मचा रहा था और सडक पर लाल बाल धमकाती नीले रंग की पुलिस की गाडियां खडी थी । जो बाहर भरपूर रोशनी थी । जुलाई का अंत था । सूरज नौ से पहले तो कभी डूबता नहीं । इन दिनों वर्दीधारी पुलिस के आदमी गाडी से बाहर निकलकर पूछ ताछ कर रहे थे । इतने में शायद किसी के बुलाने पर । मेनका बहन का पति कैलाश खेर आज की ओर से बाहर लॉन में आया और पुलिस वालों की पूछताछ का जवाब देने लगा । मैंने अंदर आकर रूपा को बतलाया । इतने में कैलाश भी अंदर आ गया । रूपा के पूछने पर बोला लगता है किसी पडोसी ने शिकायत लगाई होगी । मुझसे कह रहे थे कि कितने आदमी क्यों जवान मैंने कह दिया की होली मैन आए है इंडिया से । बस फिर पुलिस वाले वापस चले गए । फॅस घबराया हुआ था फिर भी रूपा को या अपने आपको दिलासा देता बोलता रहा हूँ । कुछ भी हो रिलीजियस फ्रीडम तो है इस कंट्री में पता नहीं क्या समझते हैं लोग अपने आप हो उठाकर पुलिस बुला ली तो सोचा होगा कोई बिजनेस कर रहा होगा । बिना लाइसेंस लिए अपने धर्म के लिए तो चाहे जो भी करें । दुनिया भर को मिशनरी भेजे । यहां चार लोग इकट्ठे हो गए तो जैसे क्राइम हो गया रुपए कम नर्वस नहीं थी तो बिना आगा पीछे देखे चिल्लाने लगे । ऐसा ही होता है हाँ मैं तभी तो कहती हूँ मुझे अपना घर चाहिए । यहाँ किसी दूसरे घर में बैठे नहीं तो हम कुछ बोल सकते हैं । नवास था अपना घर होगा अपना असम बनाएंगे तो देखूंगी कैसे आती है पुलिस बडे बडे पुलिस वाले भी खेले हैं बाबा जी के और कुछ हूँ या न हो बात अभिषेक पर आप पडी घर ढूंढने का काम । अभिषेक के जिम में जो था । एयर अभिषेक ने अपना पूरा काम तैयार कर रखा था । दो तीन शहर में रियल स्टेट एजेंटों से अपार्टमेंट कर रखी थी । अभिषेक ने थोडा बहुत इन्हें समझाया भी कि उनके पास विजिटर बहुत आएंगे । इसलिए कुछ अकेला सा घर हो । घर के आस पास बोली जगह पर मैनहैटन से बहुत दूर भी नहीं । अगले दिन सुबह सुबह शाम हम रूपा बाबा जी और माधव को लगातार गाडी में बैठाकर एक से दूसरी जगह घर दिखाते रहे । रूपा को आखिरकार एक घर पसंद भी आया तो बडा था अगर चार बैडरूम बडी सी बैठक पीछे बडी सी बेसमेंट एजेंट ने कहा कि दो महीने का किराया पेशगी देना होगा । रूपा बोली ये सोच कर फैसला लेंगे । बात यहीं पर रुकी रही । हफ्ते बर्बाद मैंने ही जब घर की बात उठाई तो रूपा बोली एक पंजाबी है । कोई उनकी पांच छह हिंदुस्तानी खाने के राॅक में बडे अमीर लगते हैं । कह रहे हैं कि हमें अपनी पूरी बेसमेंट बाबा जी के लिए तैयार कर देते हैं । कोई चार पांच सौ आदमी उस बेसमेंट में आ सकते हैं, सौ लोगों को बाबा जी से मिलने के लिए बाहर नहीं रुकना पडेगा और मेरे और माधव के लिए भी अलग अलग कमरे । यह तो बडी अच्छी बात है । तब तो आपको वहाँ शिफ्ट कर जाना चाहिए । किराये पर मकान लेने की क्या जरूरत है? किराये भी तो कितना है । ऊपर से घर का काम भी और हमको तो किसी दूसरे के घर में रहना पसंद ही नहीं । हमको तो अपना घर चाहिए । जो भी हो हम तो वहाँ नहीं जाएंगे । आप घर कब शिफ्ट करना चाहेंगी? होटल भर वाले रियल स्टेट एजेंट का फोन आया था कि इस शुक्रवार तक नहीं पहुंचे तो वह घर किसी और को दे रहेगा । अरे नहीं वही रोगों से घर हाथ से नहीं जाने देना और कल तो हम लोगों को यूस्टन जाना है । उस बेचारी की तबीयत बिगड गई लौटकर अपने घर में जाएंगे । शुक्रवार को अभिषेक ने मुझे बताया कि बाबा जी चले गए और लौटकर वे उस पंजाबी परिवार के साथ रहेंगे । उनकी बेसमेंट सुना है, बहुत खूबसूरत है, पूरी तरह फाॅगिंग है, पार्टी वगैरह रहता होगा । वहीं बाबा जी ने उससे कहा अगर मैं बेसमेंट में बने उस बार को हटा दे तो चले आएंगे । वह बार हटाने को ही नहीं माना बल्कि कभी शराब मैच होने का भी प्रण किया है । तो मैं सब किसने बताया खुद बाबा जी ने और रूपा तो कहती थी कि अब किसी दूसरे के घर में रूपा की कौन चलती है तो और इतना पैसा भी तो चाहिए । दो हजार डॉलर तो उस घर का किराया ही है और रूपए कहती थी पैसे उनके पास है, कहाँ से आएगा? चढावा होगा और क्या अपनी बर्बाद माधव का फोन आया है? बाबा जी ने बुलाया है आपको हम लोग शिफ्ट कर गए हैं । नया पता लिख लीजिए । हम वहाँ पहुंचे तो उसने घर के आस पास की हरयाली देखकर मैं हैरान रह गई है । बडी पहुँच लोकेलिटी में घर था घर की बनावट भी बहुत खूबसूरत की बडा सा कॉलोनियल डिजाइन का घर बाहर बडे बडे लॉन जिनकी कहाँ समतल थी, गर्मियां थी इसलिए फूलों की क्यारियों में खेले रहे धूप में दुली उस घर कि सफेद पॉलिस को और भी कुछ नहीं दिखा रहे थे । मैं बोल उठी खासी प्रोग्रेस कर गए बाबा जी इतनी थोडी सी देर में कहाँ? वो पहला वाला घर और कहाँ है? अंदर गए तो बाबा जी और रूपा बेहद खुश देखें । रूपा हमें खुशी से लगभग चूमती हुई अपना माधव और बाबा जी का कमरा दिखाने लगी । रूपा का कमरा सच में बडे ही खूबसूरत ढंग से सजा था । बीचोबीच मखमल का बेडकवर बिछा डबल साइज का पलंग । पलंग के एक तरफ की मेज पर खूबसूरत सब महंगे क्रिस्टल का बना एक सारस था । दूसरी तरफ की मेज पर ऍम कोने में श्रंगार मेज । इस पर कई तरह के परफ्यूम, ओके, दिलचस् आकारों वाली बोतले सब्जी थी । माधव के कमरे में बडा सा टेस्ट था जो मूलतः है । घर के मालिक ऑफिस कमरा रहा होगा । बाबा जी का शहर स्थल बेसमेंट में ही मंदिर के पास था । मंदिर की दीवारों पर लाल चमकीले रंग का वॉलपेपर चिपकाया हुआ था । देवी की तस्वीर के दोनों और गमले लगे हुए थे । कितने में घर की महिला रूपा के पास आकर कहने लगी पौधों की डिलीवरी आ गई है । जरा बता देंगी कहाँ? कहाँ रखवाने हैं । यहीं मंदिर और बेसमेंट में ही लगेंगे । पहुँचे यही नीचे मंगवा दीजिए और सच में बडे खूबसूरत है । रूपा ने बडे शौक से उन्हें लगवाया । मैं बोल पडी बेसमेंट में तो इतनी रोशनी नहीं यहाँ तो मर जाएंगे इन्हें ऊपर क्यों नहीं रखवाती? रुपए एकदम काट दिया मुझे ऊपर तो इनके पास बहुत पौधे हैं । ये तो मेरे कहने से मंगवाए गए मंदिर के लिए बाबा जी को पौधे बहुत पसंद है ना । मैं समझ गई कि घरवाले रूपा को हर तरह से खुश रखना चाहते हैं और रूपा उनके सेवाभाव में किसी तरह की कमी नहीं करना चाहती हूँ । थोडी देर में छह सात बरस का एक लडका रूपा के आसपास मंडराने लगा । रूपा ने उसे चूमकर सिर पर हाथ फेरा और उससे उसी की उम्र की आवाज में बतियाने लगी । लडका बडा खुश हुआ । उसकी हाथ में छोटी सी गाडी थी । उसने उसे रूपा की ओर सरकाया । रूपा ने वापस उसकी ओर भी दोनों खेलने लगे । रूपा ने मुझसे कहा ये बडा इंटेलिजेंट लडका है । नाम भी बढिया है । चुनमुन मैंने गौर से उस लडकी को देखा । लडका मुझे कुछ नॉर्मल सा लगा । ऐसा सारी बात मुझे समझ में आ गई । क्यों इस घर में बाबा जी और रूपा का इतना सम्मान किया जा रहा है । मैंने रूपा से पूछा क्या यहीन पंजाबी दंपत्ति का लडका है? किसी का तो इलाज कर रहे हैं? बाबा जी देखना एकदम ठीक हो जाएगा । ये बडा इंटेलिजेंट है फॅालो रूपा कुश्ती तो वह बच्चा भी खुश था और उसके माँ बाप भी । थोडी देर बाद हम जाने को हुए तो रूपा बोली ऐसे नहीं आज तो खाना खाकर ही जाना होगा । काम नहीं, बहुत अच्छा खाना बनाती है । अब तो मुझे भी बहुत मजा आ रहा है । दिन रात बढिया पंजाबी खाना मिलता है । लेकिन रूपा जी हमें तो जाने दीजिए । इन को तकलीफ होगी । काम नहीं जो पास ही खडी थी रूपा का मेरे प्रति स्नेहभाव देख बोली नहीं नहीं खाना खाए बिना नहीं जाएंगे आप दोनों की तो जो भी बाबाजी इतनी चर्चा करते रहते हैं मैं तो यह भी मिलने के लिए बडी हो सकती । कामिनी और राजेंद्र मुझे ठीक ठाक लोग लगे । चतुर बिजनेस वाले लोग लेकिन बोलने में मीठे मिलन साहब कुछ काम हम खाना खाने के लिए रुक गए । कामिनी ने अपनी मदद के लिए हिंदुस्तानी लडकी भी रखी हुई थी । खाना उसी लडकी ने बनाया था । मैंने रूपा को बधाई दी आखिर आपको मनपसंद रहने की जगह मिल ही गई । इनके तो नौकरानी भी है, काम नहीं पर सारा बोझ भी नहीं पडेगा । रूपा बोली सच में बहुत अच्छे लोग हैं वरना मैं तो गुजरातियों से तंग आ गई थी । ये तो आपने जैसे लोग हैं क्योंकि घर दिलाने का मसला हल हो चुका था । इसलिए लगातार कई दिनों तक अभिषेक और मैं बाबा जी से मिलने ही नहीं गए । दूसरे कामों में डूबी फिलिंग स्टेशन के लिए नहीं जा पाई । फिर एक दिन जब हम गए तो बहुत भीड थी । बाहर कारों का हुजूम देखकर मैंने बेसमेंट में बैठे लोगों की तादाद का अंदाजा लगा लिया था । बहुत से नए चेहरे थे । माधव बारी बारी से लोगों को अंदर बाबा जी के पास मंदिर भेज रहा था । हमारी भी बारी लगा दी गई । जब की पहले हमें खास मेहमान की तरह लगभग अंदर आते ही भेज दिया जाता था । अभिषेक और मैं बेसमेंट की दीवारों के साथ सटे घुंगरू घंटियां वाले हिंदुस्तानी पीढी नुमा सोचने पर बैठ गए । इतने में रूपा भी बाबा जी के मंदिर से बाहर आई और हमें देखकर हमारे पास ही आकर बैठ गई । लोगों से खचाखच भरी उस बेसमेंट में रुपए आपने नाइट गांव में ही घूम रही थी । चेहरा देखकर लगता था जैसे तीन दिन से ना ही नहीं हूँ । गांव भी दूसरे महिला सा दिख रहा था । पालों की जटाए बने झूल रही थी क्या बात है तब तो ठीक है । रुपए जी बस ऐसे ही बहुत दर्द कर रहा है । चार लाख प्रेशर कुछ आई है । आप लोग तो बडे दिन बाद आए । मैंने तो वहाँ से भी कहा था कि आपको फोन करें पर उसे फुर्सत ही नहीं । इतने ज्यादा लोग आने लगे हैं । मैं तो फोन सुन सुन कर पागल हो जाती हूँ । कुछ नॉर्मल दिखने वाले बच्चे आपस में खेल रहे थे । उनके माँ बाप बातों में लगे हुए थे । इतने में घर का मालिक राजेंदर । हाफ पैसा रूपा के पास आया और कहने लगा देखिए रुपए जी पता नहीं कैसे कैसे लोगों को बुला लेते हैं । बाबा जी इन को ऐसी जगहों का कुछ पता ही नहीं । किसी ने अभी मेरे पडोसी के लोन पर कार चढा दी है । मैं चला रहा है उसका लॉन खराब कर दिया है उन्होंने । मेरा तो इस लोकेलिटी में रहना हराम हो जाएगा । आप जरा अनाउंस कर दीजिए । जिसकी भी ॅ आठ सात कार है प्लीज वहाँ से हटाई । रूपा भी एकदम भडक गयी बैठे बैठे चिल्लाना शुरू कर दिया । अरे इन लोगों की यह मत बाबा जी का नाम खराब करते हैं । अरे वही किसका है नंबर चलो निकालो अपनी गाडी जब एक आदमी उठा तो रूपा उस पर बर्फ पडी चरण नहीं आती आपको । आप तो बरसों से इस देश में रहते हैं । तब क्या आपको यहाँ के कानून का नहीं पता? किसी के लॉन पर गाडी चढा दी आपका यहाँ आना जाना एकदम बंद करवा दूंगी और सब सुन लो । अगर किसी ने आइंदा ऐसी हरकत की तो बाबा जी कभी उससे नहीं मिलेंगे । बदनाम करते हैं आप लोग बाबा जी को भी आपका भला करें और आप इस तरह फिर हमारी तरफ मुकाबले होकर बोली मेरा तो दिन रात लोगों से निपटते निपटते सिर्फ पड जाता है तो थोडी देर अपने कमरे में जाकर आराम करती हूँ । ऊपर नीचे जाकर भी थक जाती हूँ । मुझे तो ऐसा घर चाहिए जहाँ सोने का कमरा भी पूजा घर के पास हूँ । पर हाँ उसमें शोर बहुत होता है । सच में कहीं निजात नहीं । अभी रूप जाने को हुई थी एक सरदार और एक मौका आदमी राजेंद्र के साठ रुपए की और बढेगा । सरदार रूपा को देखते ही कहने लगा रूपा बाॅलिंग इस आदमी ने मेरी बेचती है । कहता है मैं घर के अंदर नहीं आ सकता । मैंने कहा कि मैं तेरे नाल मिलने थोडी आया हूँ । मैं तो बाबा जी से मिलने आया हूँ । राजेंदर हादसा हफ्ता कहे जा रहा था । रूपा जी देखिए ये लोग अच्छे नहीं है । इनसे नहीं मिलना चाहिए आपको ये सारे चोर हो चुके हैं । मेरे से दस साल पहले इन दोनों ने पचास हजार रुपए उधार लिया था । आज तक वापस नहीं दिया । मोना आदमी कहने लगा यह बिल्कुल झूठ कहता है । बहन जी इसमें हमारे साथ बिजनेस किया । अब सारा पैसा डूब गया तो किसका उदार यह भी तो पार्टनर था । इसका पैसा गया तो क्या हमारा नहीं गया । तब यह हमसे क्यों मांगता है? मांगना है तो अपनी किस्मत से मांगे । सरदार बोला इसे कौन से पैसे की कमी है । बस का बिजनेस चल रहा है । पर सारी उम्र ये है अपने पचास कोई होता रहेगा । राजेन्द्र और भी बढकर बोला कमीने तेरी रहमत ज्यादा बकवास की तो जोडी से घसीटकर घर से बाहर कर दूंगा । तरफ से जाने को कह रहा हूँ तो भेजे में घुसी नहीं देने बाद अब रूपा का पारा भी एकदम चढा

इतर भाग 08

विभाग आठ वारदार जो मेरे सामने लडाई की तुम लोगों ने कोई लिहाज नहीं चलो चलो बाबा जी के पास ही करेंगे फैसला मंदिर का दरवाजा बंद था बाबा जी किसी भक्त के साथ थे रुपए मैं झटके से दरवाजा खोला और बोली ये लोग तो आप को बदनाम करने पर तुले हैं बाबा जी अब आप ही चीजे इन का फैसला रुपए तीनों को बाबा जी के पास छोडकर बाहर आ गई । मुझसे कहने लगी ये लोग अच्छे नहीं है, बडे घमंडी किस्म के हैं । ये कौन होते हैं हमें बताने वाले की हम किस से मिले और किस से ना मिले । भगवान की कृपा तो सभी पर होती है । चाहे मैं अमीर हो या गरीब । जोर हूँ या सिपाई । हमारे पास तो जो भी आएगा उस की मदद करेंगे । इन लोगों का अपनी नौकरानी से व्यवहार भी ठीक नहीं । इतना कम लेते हैं उससे और ऊपर से मारते हैं उसे । मैं तो ऐसी जगह नहीं रह सकती । फैसला बाबा जी का भी वही था जो हम रूपा के मुझ से पहले ही सुन चुके थे । भगवान के दर पर सभी एक है । बाबा जी के पास हर जगह का व्यक्ति मिलने आ सकता है । राजेंद्र और काम नी को यह बात पसंद नहीं तो बाबा जी उनके यहाँ से चले जाएंगे । पर राजेंद्र तो बाबा जी के पैरों पर गिर पडा था । बाबा जी माफ कर दीजिए, आइंदा से ऐसी गलती कभी नहीं होगी । आप प्लीज नहीं रही है, कहीं चाहिए नहीं, लेकिन रूपा पर जो नहीं रहेगी । मैं कहती रही हमें यहाँ नहीं रहना । अब इस घर में यह काम नहीं बडी चालाक औरत है । जो अमीर अमीर लोग आते हैं उनसे तो प्यार से बात करती है, खाना भी पूछती है और जो बेचारे आम और गरीब किस्म के लोग आते हैं, उन्हें अपने फ्रिज का पानी तक पीने से रोक देती है । हमें यहाँ बिलकुल पसंद नहीं है । हमारे लिए तो सब बराबर है । ठीक है, हम को अच्छा खाना खिलाती है और बाबा जी से मिलने वालों से ऐसा विवाद मैं तो सहन नहीं कर सकती । अभिषेक ने इस बारे में सोच लिया था कि जब तक बाबा जी खुद नहीं करेंगे, वैसे रूपा के कहने पर मकान नहीं खोजेगा । बाबा जी का इस बारे में नया कोई फोन आया । मैं संदेश कुछ दिनों बाद अचानक माधव का फोन आया । हम लोगों ने अपना घर ले लिया है । बाबा जी आपको दिखाना चाहते हैं कब लिया कहाँ पर मैं और अभिषेक दोनों ही हैरान थे । कुछ दूर आ गए हैं । लीजिए पता लिख लीजिए । पहले से डेढ गुना ड्राइव थी । घर खासा बडा था । चार बैडरूम ऊपर थे । नीचे बडी सी बैठक खाने का कमरा और उसमें भी नीचे बेसमेंट में बडे बडे कमरे बने थे । बाबा जी खुद सारा घर हमें दिखा रहे थे । अभी फर्नीचर नहीं खरीदा गया था । खाली खाली घर और भी बडा लगा । रूपा ने अपनी योजना बतानी शुरू की । यह कमरा मेरा होगा यह पूजा कर और इसमें मैं मना कर रहेंगे जो मेहमान ज्यादा होने पर कुछ नीचे भी रहेंगे । पूजा घर में मंदिर सबसे पहले तैयार किया जाएगा । मेनका बहन से कह दिया है की दीवारों पर कागज की जगह लाल कपडा चिपकाएंगे । वे कई स्थान लेकर पहुंचने वाली हैं । मेरे मन में कुछ और सवाल थे । मैंने पूछा यह अगर आपको मिला कैसे? इसमें दिलवाना, गर्मी और भी बहुत से पहचाने अनपहचाने चेहरे घूम रहे थे । कुछ हिंदुस्तानी बच्चे घर से बाहर और कुछ अंदर घर के खाली स्पेस में उछल कूद मचा रहे थे । दिलवाया तो इन्हीं गुजरातियों नहीं है । किसी हिंदुस्तानी का ही घर है । मैं खुद कहीं मूंग कर गया है । आखिर में तो इससे बेच नहीं है । उसे तो जब तक बेचता नहीं, हम किराये पर ही रह लेंगे । कितना किराया हम से पंद्रह सौ डॉलर ही लेगा भी ज्यादा है । बाबा जी बोले पैसा तो कोई बात नहीं, मंदिर बनेगा तो चढावे पैसा आएगा ही । उसी से किराया देते रहेंगे । पंद्रह सौ से ज्यादा ही आएगा । हम तो यहीं असम बनाने की सोच रहे हैं । इस एरिया में दस करें । उसमें से नौ में गुजराती परिवार रहते हैं । वे सभी हमारे वक्त है तो आश्रम तो बन ही जाएगा । सभी रूपा ने वहीं पास में खडे गुजराती आदमी से कहा, दिनेश देखो कल से हमें खुद खाना बनाना है । इसलिए आज रसोई में सारा राशन भर देना । मुझे हर तरह की दाल चाहिए । माओवादी दाल बहुत शौक से खाते हैं । चावल की बोरी, देशी घी के डब्बे, हर तरह के मसाले और अचार आज ही लाना है और मैं पंडया का उससे कहूँ आलू, प्याज और सब्जियां लिया । दूध, मक्खन और डबल रोटी वगैरह भी फ्रिज में मार दे । बाबा जी ने रूपा की बात पता नहीं सुनी या नहीं, यह अभिषेक से बात करते रहे तो आदमी रूपा से कह रहा था आप बिल्कुल फिक्र मत कीजिए । अभी घंटे बाद में सारा सामान आ जाएगा । कुछ मिठाइयाँ वगैरह भी लेता हूँ । ठीक है अभी के लिए तो मिठाई ठीक रहेगी । बाद में खीर हलवा बनाया हूँ । रूपा बेहद शौक से उस घर को बना रही थी । मुझे बोली कामनी के घर से में पौधे मैं ला सकती थी । बाबा जी के लिए ही खरीदे गए थे, पर फिर मन नहीं माना । ऐसे घमंडी लोगों के घर से कुछ नहीं लेना मुझे मुझे लगा बेहतर कहीं बहुत सारी और बोली लडकी है मेरा मन हुआ हम भी इस नए घर में कुछ योगदान दें मैं । अभिषेक उस वक्त बाबा जी और रूपा को गाडी में बैठाकर नर्सरी ले गए । वहाँ रूपा ने जी भर पौधे उठाएंगे । सात सौ डॉलर के पौधे और गमले वगैरह थे । अभिषेक ने अपने अमेरिकन एक्सप्रेस के कार्ड पर चार्ज किए । रूपा एकदम खेल गई थी । बाबा जी भी खुश थे । बस एक बात से मैं उन्हें बार बार रोकती रही । उन्होंने कुछ ताजा पौधे उठाए । बाकी वो प्लास्टिक के बनावटी पौधे लेना चाहते थे । रूपा भी बार बार बनावटी फूलों के रंग और बनावट पर न्योछावर होती । मैं आगाह कर देती है । रूपा जी थोडे दिनों में आप इन बनावटी फूलों से बोर हो जाएगी । ताजे पहुँचे तो मौसम के साथ बदलते हैं । हरियाली और ताजगी भी बनी रहती है कि बनावटी पौधे देवी माँ को कहाँ अच्छे लगेंगे । पर जब हम पैसे चुका रहे थे तो बाबा जी गुलाबी फूलों वाला प्लास्टिक का पौधा लेगी । आए बोले यह पौधा सच में बहुत खूबसूरत है । इस बार मेरा रोकने का साहस नहीं हुआ । घर पहुंचे तो देखा रसोई के बीचोंबीच राशन के बक्से भरे रखे थे । पांच पांच किलो के दालों के पैकेट, मसालों के किलो किलो भर के पैकेट, अचार वगैरह सभी कुछ काउंटर पर खाली मर्तबान भी रखे थे । सामान भरने के लिए ऊपर पूजा के कमरे में तीन आदमी मिलकर दीवारों पर लाल रेशमी कपडा लगाने में अपनी सिद्धहस्तता दिखा रहे थे । एक भी साॅल्वर दीवार पर नहीं दिखे । बाबा जी ने उन आदमियों से कहा आज सारी रात चाहे काम करना पडे, मंदिर की स्थापना हो जानी चाहिए । उन के बिना हम कुछ नहीं कर सकते थे । माधव कभी एक कमरे में जाता, कभी दूसरे में हर जगह काम हो रहा था । पर माधव ने अपने हाथ में कॉर्डलेस फोन पकड रखा था और जो ही कहीं उसके हाथ बटाने का आसान होता वह या नंबर मिलने लग जाता है या दूसरे कमरे में खिसक जाता । यहाँ तक कि पौधों को कमरे में सही जगह रखने में जब बाबा जी और अभिषेक लगे थे तभी माधव इधर उधर खिसक गया । जब भी कोई बाहर का व्यक्ति होता, माधव यही अपेक्षा करता हूँ कि बाहर वाला काम करें । जैसे कि माधव उन पर सबसे सुपीरियर था । पर जहां बाबा जी कुछ करने को होते तो मैं मदद को आगे आ जाता हूँ । अगले दिन सुबह फिर जाना था । बाबा जी के यहाँ देखा कि किचन में राशन जो कत्यों पडा है जो दूसरी पडोसन की औरते सफाई वगैरह के कामों में लगी थी । खाना भी अपने घर से बनाकर लाई हुई थी पर शायद पढाई खरीददारी को छूना उन्हें ठीक नहीं लगा होगा । इस बीच बैठक में एक नया सोफा और सेंटर टेबल लग चुके थे । रूपा के शयन कक्ष में नया पलंग सजा हुआ था । होने में ड्रेसिंग टेबल भी थी । मंदिर रातोंरात सच गया था । लाल और सुनहरी रंग वाला मंदिर, देवी की मूर्ति और तस्वीरें रखने के लिए दीवार से तख्तियां लगाकर बडा सा आला भी बनाया गया था । उस पर गुलाब, सजे फूलदान और आस पास गमलों में पौधे भी रख दिए गए थे । पडोस के हिंदुस्तानी बच्चे रूपा के पलंग पर कूद रहे थे । रुपए उन्हें प्यार से जुड की दे रही थी । देखो बैठे बाहर के लोग पलंग पर मत को तो पलंग तो बाबा जी का फिर नाराज हो जाएंगे । मैंने योगी पूछ लिया क्या आप और बाबा जी सात होते हैं क्या? रूपा ने बडे सहज भाव से जवाब दिया, यही तो मुसीबत है । यही तो मेरी सारी बीमारियों की जड है । बाबा जी ने पिछले तीन साल से ब्रह्मचर्य का व्रत ले लिया है । उससे पहले तो सब ठीक था और उनका क्या पता? इसलिए तो मुझे इतना गुस्सा आता है । ज्यादा गुस्सा करने से ही मेरे ब्लड प्रेशर हो गया है । इसी वजह से इतनी मोटी भी हो गई हूँ । मैं पहले ऐसे थोडी ना थी । मुझे कुछ हसी सी आई पता नहीं । रूपा के बोले बनते या की उसके अध्यापक के मनोविज्ञान के ज्ञान को लेकर मुझे लगा अट्ठाईस तीस बरस की ये लडकी महिला मुझे हर बार हैरान सक्कर जाती है । आगे कुछ पूछने का मेरा साहस नहीं हुआ । नीचे आकर हम नहीं सोफे पर बैठे ही थे की रूपा बोली डालिये मिलकर राशन में डालते हैं । कल से ही पडा है तो एक बार सच जाए तो फिर खाना बनाने में मजा आएगा । मैंने और रूपा नहीं है । काम शुरू ही किया था कि मानव भी रसोई में आ गया । चाय रूपा की नाराजगी ताड गया था । बोला यहाँ हम कर देंगे । भावी जी आप बैठे हैं रूपा ने जो अब तक आपने माधव के प्रति गुस्से को काबू किया हुआ था । एकदम से शैंपेन की बोतल की तरफ । फोर्ड पडी तुम्हारे तो काम करते हार टूटते हैं कब से? मैं देख नहीं नहीं सब लोग काम कर रहे हैं । एक तो टेलीफोन का चौका लटका इधर उधर निकम्मे घूम रही हूँ । शर्म नहीं आती । नहीं घर आए मेहमान तो काम करें और तुम आराम से डटकर बैठे रहो । देखा है तुमने बाबा जी तक काम कर रहे हैं । मुझे तो कल रोना ही आ गया । सारा कूडा कल बाबा जी ने उठाया ऐसी क्या जरूरत पडी है हमें यहाँ रहने की बाबा जी थोडा उठाएगा । देखो ये हाल हो गया है कि बाबा जी जिनके सारी दुनिया चरण होती है घर का कूडा उठाएगा तो उनको तो चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए जिसके रहते बाबा जी थोडा उठाएंगे । रूपा धारा प्रभाव गालियां दिए चली जा रही थी और माधव को वहां से खिसकने का कोई सुराग नहीं मिल रहा था । किसी न पोरसा सब बोला मैं भी क्या करूं? भावी जी यह फोन ही नहीं छोडती हूँ, वो नहीं छोडना या तुम फोन को नहीं छोड दे । कह नहीं सकते कि अभी काम करना है बाद में फोन कर ले । ये सब बहाने हैं जैसे मैं जानती नहीं हूँ । अब तक तो लोगों के घरों में रोटियाँ तोडना रहा । अब जब काम की बारी आई है तो फोन का रोना ले बैठा तो छोड फोन को मैं देखूंगी । सारे फोन कर तो घर का काम । रूपा ने सच में फोन उसके हाथ से छीन लिया । पांडव ने चुपचाप डब्बों पर लेबल चिपकाने शुरू कर दिया । यह कोई पहली बार मेरे सामने नहीं हुआ था । फिर भी मुझे लगा की रूपा और मानव के बीच का तनाव बढता जा रहा है और अब और भी बढेगा क्योंकि घर के काम तो बेयंत है । कोई ना कोई झगडे का कारण बनता ही रहेगा । फिर माधव भी कुछ बेशर्म सा होता जा रहा था । वह रूपा की परवाह काम करता हूँ । बाबा जी के पीछे अभी भी हरदम पूरी दुम हिलाता हूँ । लेकिन रूपा और मानव के झगडे में फटकार तो माधव ही सुनता हूँ । रूपा का जवाब देने की हिम्मत अभी भी उसमें नहीं थी । फिर भी गुरु पूर्णिमा वाले दिन इन दोनों के तनावों का जो हाल हुआ, उसका मुझे कभी ख्याल तक नहीं आ सकता था । यू पूजा की थाली सजाने क्या मंदिर की सजावट का काम रूपा काफी प्यार से कर देती थी, लेकिन इसके अलावा सेवा बाबाजी के इर्द गिर्द रहने के कोई दूसरा काम नहीं करती थी । एक बार जब उसके हाथ से रोमल छूटकर नीचे गिर गया तो वह इंतजार ही करती रही । जब तक मैंने उठाकर वापस उसके हाथ में नहीं दे दिया, क्या उसमें होड थी कोई बाबा जी के साथ या वह अपनी नजरों में ही कुछ खास थी और अपनी खासियत को हम सबसे बनवाना चाहती थी । जो आदर और सम्मान बाबा जी को सहज मिल जाता था, उसे अपने लिए पानी की हर तरह की कोशिश करती थी और इन्हीं कोशिशों के दौरान रहे लोकप्रिय हो जाती थी । यह बात नहीं की सबके कस हर लिए थे बाबा जी ने । पर उम्मीद बहुतों को लगी थी और जिनमें धैर्य और विश्वास की कमी थी, वे अपने आप अलग हट गए थे । लेकिन उससे बाबा जी को कोई फर्क नहीं पडता था क्योंकि आने वालों की संख्या हर दिन के साथ इस कदर बढ रही थी एक दो का निकल जाना पता ही नहीं लगता था । जो लगता था कि बाबा जी भी कहीं मन ही मन जांच परख करते रहे थे आने वालों की आने वाला जो भी उनके सामने अपना पूरा अंतरंग बोल देता था । इसीलिए बाबा जी को दूसरों को आसानी से जान जाने की खास सुविधा थी जबकि दूसरे उन्हें जान पाने का विरल मौका ही पा सकते थे । बाबा जी को जो लोग अच्छे लगते हैं उन्हें में खास खास और दुर्लभ चमत्कार दिखाते हैं । दूसरों को बस योगी सवालों का जवाब दे वापस कर देते हैं । अच्छे उन्हें कौन लगते थे? इस फोन को परिभाषित करना मुश्किल था पर इतना मैं जान गई थी । ये सभी अच्छे लगने वाले, संपन्न, आस्थावान भरोसे वाले और काम करने वाले लोग थे । कम से कम दिखते तो ऐसे ही थे और बाबा जी ने तो उन्हें अपनी बुद्धि और खास शक्ति से जरूर परख होगा । और ये कुछ खास लोग उनके काफी करीब थे । एक तरह से कह सकती हूँ कि ये उनके अंतरंग कैबिनेट के सदस्य हैं । दूसरे दर्जे पर्दे थे जिन्हें आप मिनिस्टर ऑफ स्टेट कह सकते हैं जो सौंपा जाने वाला काम तो करते थे, पर उन्हें आदेश सीधे बाबा जी से नहीं, उनके कैबिनेट मिनिस्टर भी दे सकते थे । अल्टीमेट पावर तो खुद बाबा जी जी थे । रूप और माधव की स्थिति वैसी ही थी, जैसे कि इंदिरा गांधी के प्रशासन में संजय गांधी और धवन की थी । दोनों का अपना अलग ही क्लाउड था । जो इनकी क्लाउट में रहते थे, उन पर बाबा जी की कर पा इनकी सिफारिश होने पर ही होती है । लेकिन इन दोनों को खुश रखना या इनके करीब आना ज्यादा आसान था । इसलिए बहुत से लोग इन्हीं से रखी रखा ही करते हैं । खासकर महिलाएं तो योगी रूपा को खुश करने में लगी रहती थी । जब से रूपा सिस्टम से आई थी, उस परिवार पर उसकी खास कृपादृष्टि हो गई थी । इसलिए मैं जीत करके बार बार जब यूस्टन से बुलावा आता बाबा जी को वहीं ले जाती है । अभिषेक बाबाजी के अंतरंग परिसर में था या नहीं, इसे लेकर मेरा मत बदलता रहा । तभी तो लगता बाबा जी उसकी इज्जत और भरोसा करते हैं, उसे पास रखना चाहते हैं । पर जब हम एक लंबे समय के बाद उनसे मिलने जाते हैं, तो लगता कुछ और लोग उस अंतरंग परिसर में प्रमुख हो गए हैं । और वे अपनी वजहों से अभिषेक को दूर रखना चाहते हैं । अभिषेक मुझसे कहता देखो हम थोडे दिन इनसे नहीं मिलते हैं तो और लोग कैसे आगे आने की कोशिश करते हैं । मैं कह देती लेकिन अभिषेक बाबाजी के इतने करीब आकर हमें करना भी क्या है? अच्छा है और लोगों को सेवा कर रहे तो तुम्हारे पास इतना वक्त का आगे भी तुम्हारी प्रैक्टिस का नुकसान हो रहा है । बाबा जी के प्रति यह कैसा खर्चा होता हूँ कि बार बार उनसे खुद को काट कर दी । हम वापस उनके पास पहुंच जाते हैं । मेरी डायबिटीज तो ठीक नहीं हुई थी । इधर खाने पीने में कुछ बदनियती कर ली तो फिर से ब्लड शुगर का लेवल खूब अच्छा चढ गया था । बाबा जी ने मेरा इलाज पक्का कर दिया था । फिलिंग स्टेशन खत्म होते ही मैं ठीक हो जाउंगी, ऐसा मैंने और अभिषेक में सोचा था । पर उल्टे जब खून में चीनी बडी हुई निकली तो अभिषेक ने बाबा जी से कहा बाबा जी बोले हाँ अपना जी आदेश आ गया है देवी माँ से अगली बार आप करीब चालीस पचास ग्राम देसी जी एक बोतल में ले आइयेगा फिर इलाज बताएंगे । तीन दिन बाद हम जी तैयार करके ले गए थे । उन्होंने बोतल खोलकर फूककर गीको मन्त्रपूत किया । फिर मुझसे बोले

इतर भाग 09

भाग नौ रोज रात को सोने से पहले चरण ऐसा कि अंगूठे में लगाकर नाम भी में लगाइये गा । कुछ महीने में आप एकदम ठीक हो जाएगी । तब पानी में गोल गोल कर चीनी जाएगी तो भी शुगर में कुछ फर्क नहीं पडेगा । एकदम नॉर्मल हो जाएगी । यह मैं पहले भी कह चुके थे । मेरी टूटती उम्मीद फिर से जुडने लग गई थी । लेकिन अपनी उम्मीद पर मुझे खुद भी भरोसा नहीं होता था । पाए गए वक्त वक्त दिमाग से सवाल करता ही रहता था । तभी मैंने अभिषेक से कहा बाबा जी से हमें लेना देना भी चाहिए । मिलकर तुम्हें अच्छा लगता है । बस यही ना बाकी ज्यादा करीब जाकर भी क्या मिल जाना है । डायबिटीज ठीक होने से नहीं । मैं सोचता हूँ बाबा जी से सिर्फ दिल होगा । दूसरों को इलाज करने की पावर फिर देखूंगा डॉक्टर के इलाज बाबाजी के इलाज में कहाँ? समानता फर्क है । अभिषेक के जवाब में मुझे काट कर दिया । क्या सच में गंभीर है मैं भीतर से कहीं डर गई थी मैं यह तो बडी बेतूकी बात है । बाबा जी को इलाज थोडे ही करते हैं । वे तक ठीक होने की प्रार्थना करते हैं । प्रार्थना का बाल और इलाज दो अलग अलग चीजें प्रार्थना में कितना बाल होता तो क्या मैं ठीक नहीं हो जाती? तुम्हें भरोसा भी तो नहीं कहते हैं । जिन्हें विश्वास होता है वही ठीक होते हैं तो बताओ कौन ठीक हुआ है । उन्होंने कई ऑपरेशन भी किए हैं । कुछ लोग ठीक हुए हैं, सुना है या देखा भी है, देखा तो नहीं । और बाबा जी उस दिन बता रही रहे थे कि जिनेवा में एक बच्चा आया था । उसकी टांगे टेडी थी । देवी माने सीधी कर दी । मैं बच्चे के माँ बाप से मिला था । ये कह रहे थे बच्चा बेहतर है । हाँ मैंने भी देखा था और पूरा ठीक तो नहीं हुआ । मैं तो टाइम देना होगा ना । एक रात थोडी ठीक हो जाता है । कोई नमस्कार तो एक रात में भी ठीक कर सकता है । यह कहते कहते मेरी आवाज गरम हो गई थी । अभिषेक भी तेज आवाजें बोला । डाॅ चमत्कार नहीं करते । उनकी भी इलाज करने की अपनी एक विधि है । अगर तुम और मैं उस विधि को नहीं समझते तो बाबा जी का मजाक बनाने का भी हमें कोई हक नहीं । जो बात खेल खेल में शुरू हुई थी वह गंभीर होने लगी । बात आगे बढाना नहीं चाहकर मैं चुप रही । लगता है लोग अभिषेक को अंतरंग कैबिनेट का मानते ही होंगे । तभी हमें भी गुरु पूर्णिमा का न्योता दिया गया था । फिर बाबा जी ने ही उन्हें हमें बुलाने को कहा होगा, क्योंकि मानने वाले न्यूजर्सी के ही गुजराती परिवारों को लोग थे । तब उन के लिए बाहर के थे । शहर से भी बाहर और कम्युनिटी से भी बार । ये लोग अभिषेक को पंजाबी साहब कहकर बुलाते थे । किसी के नाम से पुकारने की जरूरत नहीं समझी । जैसे कि किसी भौगोलिक हिस्से द्वारा दी गई आइडेंटिटी नाम से ज्यादा अहम हो । अजीब बात थी । हम सब ने अमेरिका में आकर एक पूरा भारतीय संघ बना दिया था । गुजराती समाज, बंगाली समाज, केरल समाज, पंजाबी एसोसिएशन इस तरह सभी अलग अलग अपने समूह में रहते थे । उस समूह के संदर्भ में ही वे भारतीय थे, क्योंकि सहयोग से वह समूह भारत से आया था या वह भौगोलिक हिस्सा भारत की सीमा में पडता था । वरना हर अर्थ में वह समूह सिर्फ गुजराती थे, सिर्फ पंजाबी या सिर्फ बंगाली । भारत के संपूर्ण नक्शे से उनका कोई वास्ता नहीं था । इसलिए भारत की एक भाषा हिंदी को प्रमोट करने की बजाय सब अपनी अपनी भाषा आगे करने की कोशिश करते थे । इनका बेन नहीं हमें बुलाया था कहने लगी, बाबा जी के लिए पार्टी वार दे रहे हैं । अठारह अगस्त को क्या बाबा जी का जन्मदिन है? उस दिन नहीं गुरु पूर्णिमा है । पार्टी उसी हीरे के व्यापारी के घर थी जिसे हम पहले मेनका बहन के घर पर मिल चुके थे । मेनका बहन नहीं । उनका नाम पता भी दिया जयंत पटेल और विभूति बुरी । पूर्णिमा के दिन का कभी मेरे लिए कोई मतलब नहीं रहा था । मेरे लिए वहाँ कोई त्यौहार नहीं था । पर अब न्योता आ ही गया तो सोचा कि हम भी पार्टी में जाएंगे । बाबा जी ने भी खास कहा की जरूर आएंगे । हम नियत वक्त से कुछ देर से पहुंचे । अंदर गए तो देखा कि बाबा जी जरी की सॉल से ढकी एक बडी सी आराम कुर्सी पर विराजमान है । उनके पैरों के पास एक थाली में फूल पत्र, एक नारियल और पूजा का दूसरा सामान तथा एक में प्रसाद के लिए कटे हुए फल रखे हैं । दो दिन पहले एक पंडित मंत्र बात कर रहा था और बाबा जी के पैरों के पास बैठे जयंत और विभूति पंडित के आदेशानुसार पूजा की रस्में अदा किए जा रहे थे । बाबा जी की आंखे बंद थी और हिलते वोटों से लग रहा था कि वे स्वयं भी कोई जॉब कर रहे थे । बाबा जी ने आठ खोलकर पंडित से देवी सूती के एक सौ आठ नाम बोलने को कहा और फिर आगे बंद कर ली । देवी के बाद गुरु स्थिति के मन्त्र गाए गए । गुरु पूजा करते हुए जयंत विभूति ने बाबा जी के चरण पर रात में पानी से धो फिर उन चरणों पर शीर्ष रखकर नमन किया । ये रस्में बहुत देर तक चलती रही है । मैं लगातार बाबा जी का तेजस मारा मुखमण्डल देखती रही तो यह व्यक्ति आज इतना उठ गया है । इन लोगों के बीच में उसकी पूजा कर रहे हैं । करीब दो सौ आदमी उस बडी सी बैठक में बैठे पूजा में भाग ले रहे थे । पूजन के बाद भजन गाए गए । मेनका बहन ने गुरु की स्थिति में भजन गाया । फिर सबको फूल बांटे गए और सब एक एक करके बाबा जी के चरण छूकर फूल चढाते हैं और बाबा जी अब मुंडी आंखों से जैसे किसी दिव्यलोक में पहुंचे हो । हल्के से झुके सिरों पर आप रख देते हैं । लोग इस हिंदुस्तान के लिए लाइन में लग गए थे । कुछ देर मैं भी लाइन में खडी रही । मेरी बारी आने को हुई तो ऐसा मुझे होश आया कि मुझे भी यह सब करना होगा और मैं फूल अभिषेक की हथेली में डालकर वहां से खिसकने लगी । अभिषेक ने हैरानी से पूछा कहाँ जा रही हूँ? रूपा का ही नहीं देखी । उससे मिलने जा रही है । किचन में कुछ और थे । पकवान बनाने में लगी थी । मैंने पूछा की रूपा का है तो किसी से सही जवाब नहीं मिला । मैं बाहर आ गई । पूर्णिमा के चांद की रोशनी बिखरी हुई थी । पार्टी का इंतजाम बाहर ही पोर्टिको में था । लेटे क्लास सजे रखे थे । होने में जोला भी लगा था । मैं झूले पर बैठकर चार निहारने लगी । मुझे ध्यान आया कैसे अगस्त के महीने में ही बारिश पडती है । बचपन में मैं चीज के मेले में जाया करती थी । घर पर भी झोला लगा रहता था । मैं और मेरी सहेली खूब जो ले पर बैठकर महल फिल्म का वह गाना गाया करते थे । आएगा आएगा आने वाला मुझे कोई लोग जीत याद नहीं हमारा बचपन फिल्मी धुनों को गाते ही बीत गया संस्कृति का ऐसा एक एक रन क्या सराहनीय हरमुख पर वही जीत बहुत बाद में जाकर में ठुमरी और दादरा की खूबसूरती से वाकिफ हो सकती हैं । चांदी से लाए गए अंधेरे में मुझे किसी की सिसकियों की आवाज सुनाई भी । मैं चौकी है इस सचमुच की ही सिर्फ क्या थी मैंने नजरे घुमाई । पोर्टिको के झूले के पीछे कोने में कुर्सी पर रूपा बैठी सिसक रही थी । मैं हैरान उसके पास पहुंची । उसने आंखें मलते हुए एक बार मुझे उठाकर मुझे देखा और फिर दोबारा आंखों पर बाहर रखे और भी जोर से सिसकी बढने लगी आप यहाँ अकेली क्यों बैठे? रूपाजी इस तरह से क्यों रो रही है? क्या हो गया? पूजा में भी नहीं आई । सब लोग तो अंदर पूजा कर रहे हैं । आप देखती तो कैसे? सब लोग बाबा जी की अर्चना कर रहे थे । ऐसे देखती ऐसे आती या कोई इन गंदे कपडों के साथ पूजा में बैठ सकता है । यह कहकर रूपा और जोर से रोने लगी । मेरी समझ में अभी ठीक से कुछ नहीं आया था । मैंने कहा लेकिन क्या बात हुई? होनी चाहती इस माधव के बच्चे को तीन दिन से कह रखा था मेरा नया वाला साडी ब्लाउज प्राइस करके रखते हैं दिन भर तो आज बाबा जी तो मैं नहीं इसमें ही काम था । शाम को घर लौटकर तैयार होने लगी तो देखा साढे ब्लाॅस्ट नहीं । वह एक क्या भरने लगी? मैंने कहा मानव से तभी प्रेस करवा लेने थे । ॅ वक्त कहाँ था? आगे ही थोडी देर से पहुंचे कर मैंने खुद पहले कपडो में से यह सूट निकाल का प्रयास किया और वहीं पहन कर आई हूँ । मुझे रूपा की बात भी अजीब लगी थी । कितने तो कपडे हैं इसके पास अगर नहीं साडी प्रेस नहीं थी तो क्या कोई और भी साडी ॅ नहीं था । तेरे से कहा और कोई साडी पहन लेती कहाँ? दूसरी वाली का ब्लाउज भी प्रेस नहीं था । पर जब मैंने इस से तीन दिन पहले ही से ही कह रखा था तो इसमें क्या? क्यों नहीं आज के दिन के लिए आज इतना बडा त्यौहार है और देखो में कैसे कपडों में हूँ । सब लोग इतना सच दर्ज कराए आज का दिन तो होता ही समझने के लिए इस कमीनी को तो मैंने नया सूट ले कर दिया था । देखो तो नया सूट पहने हैं और मैं असु रागनी फिर छूट गई । इतने में एक औरत ने आकर पोर्टिको की बत्ती जला दी । कुछ और रोड से खाना लेकर रखने लगी । रोशनी में हम पर नजर पडते ही एक महिला बोली रुपए हाँ अंदर जाइए आपकी और बाबा जी के लिए अंदर ही मेज पर खाना लगा है तो रूपा रूपा बहन से रूपा माँ बन गई है । आज से गुरुपत्नी के रूप में रूपा का और और भी ऊंचा चढ गया है । लेकिन रूपा उठी नहीं सकती रही । कुछ और सोने आकर उसे घेर लिया और मनाने लगी । मुझे हटना पडा । मैं अंदर आ गई । पूजन खत्म हो चुका था । किचन में ही मेज पर खास खास पकवान छोटे डांगो में बाबा और रूपा के लिए रखे जा रहे थे । विभूति ने उस मैच का जिम्मा खुदपर लिया हुआ था । मदद करने वाली औरते बाहर पोर्टिको में बडे बडे बर्तनों में गुजराती कडी अंदर यू पूरी और चावल रख रही थी । थोडी देर में और रूपा को मनाकर अंदर ले आई । मेज पर तीन प्लेटें लगी थी बाबा जी रुपए और माधव के लिए बाबा जी और माधव बैठ गए थे । रूपा आते ही चिल्लाई अगर यहाँ उल्लू इसमें इस पर बैठकर हमारे साथ खाना खायेगा तो मैं बिल्कुल नहीं होंगी । बाबा जी ने रूपा को शांत करने के लिए कहा । चलो ज्यादा बोलो नहीं, शांति से बैठ कर खाना खा हूँ । बाबा जी के कहने से रूपा बैठ हो गई पर उसका रोना फिर से चालू हो गया । रूपा कहने लगी, बोलो मैंने किसी का कुछ बिगाडा है फिर यह मुझे क्यों तंग करता है । इतना बडा त्यौहार और मैं इन कपडों में मुझे वहाँ अपना खडा रहना ठीक नहीं लगा । रसोई में पहले से ही काफी सारी और काम में लगी थी । जयंत भी बाहर था । अभिषेक और मैं उससे बातें करने लगे । वहाँ हमें अपने डायमंड बिजनेस के बारे में बताता रहा । फिर बोला अब तो बाबा जी का आशीर्वाद है तो खूब मुनाफा होगा । मुझे उसकी बात को इस तरह कहना कुछ अजीब लगा पर मैंने खुद को समझाया या उसके विश्वास की बात है । मुझे सिंह निकल नहीं होना चाहिए किसी विश्वास के बूते पर उसने इतनी बडी पूजा कराइए । कितने लोगों को बोझ क्या है? खाना खत्म करके हम बैठक में लौटे तो एक रूम में रूपा की ऊंची चिल्लाती आवाज सुनाई भी पहले दूर से देखा । कमरे में बाबा जी माधव रुपए और विभूति थे । रूपा कह रही थी बाबा जी अब आप इसका फैसला कीजिए । जब मैंने तीन दिन पहले इसे साडी प्रेस करने को कहा था तो उसने क्यों नहीं की? बाबा जी की आवाज सुनाई दी, देखो रूपा हम तुम दोनों के झगडे में नहीं पडना चाहते हैं । लेकिन मैं देख रहा हूँ । आज कल हर वक्त उन दोनों में तनाव रहता है तो हमें इस बारे में कुछ करना ही होगा । बोलो माधव रूपा ने तो मैं कहा था साडी प्रेस करने को माधव चुप था, बोलो कहा था या नहीं? जी कहा था तो फिर क्यों नहीं थी ध्यान मेरा अब की रूपा बीच में बोल पडी पूछो इससे क्या काम करता है जो ध्यान नहीं रहा । सारा काम तो मैं खुद करती हूँ या बाबा जी के वक्त मदद कर देते हैं । एक भाई का काम नहीं करता । मजाल है कि अपने खाने के बर्तन तक उठा दे । इसको मालूम था कि गुरु पूर्णिमा का त्यौहार है । मैंने इसे नए कपडे ले दिए । कुछ पहले कपडों से निकालकर ये सूट प्रेस करके पहना । योग महिला सूट प्रेस करके पहनने वाला वाकया रूपा ने कम से कम दस बार दोहराया होगा और हर बार जम्मू से निकला तो सिसकियों के स्वर भी तार सप्तक में पहुंच जाते हैं । बाबा जी का दिल जरूर दहल गया होगा । फिर भी शांत आवाज बोले माधव, हम कभी अपनी पत्नी का साइड नहीं लेते हैं । हमको लडाई झगडा पसंद नहीं पर तुम तो मानो या गलती तुम्हारी है जैसे जमीन में करते हुए मानव ने हल्का सा यहाँ कहाँ? तब तुम रूप आपसे माफी मांग । लोग माधव चुप रहा । उसे लगा रूपा के सामने बाबा जी उसे छोटा कर रहे हैं । बडी बेचारगी से उसने बाबा जी को देखा । लेकिन बाबा जी उसकी नजर की परवाह नहीं करके बोलेगा । देखो जब गलती करते हैं तो माफी मांग लेते हैं । क्या है? हम से गलती होती है तो हम माफी नहीं मांगते । माधव की लाचारी अभी भी चुप्पी से रखी थी । मैं बाबा जी को ऐसे देख रहा था कि जैसे वे वहीं बाबा जी हैं जिन्होंने जानता है या कोई और है । चंद कमरे की छुट्टी तोडने की खातिर विभूति बोली रहने दीजिए ना आरोपों गलती सबसे होती है । हमें सेवा का मौका दीजिए ना इससे घर भेज दीजिए । मुझे अपने पास रख लीजिए । मैं आपका सारा काम करते होंगे । मुझे सेवा का मौका देंगे । मेरे तो बाहर ही खुल जाएंगे । कितनी देर में माधव को खुद को तैयार कर लिया । धीरे से बोला ठीक है माफी मांगता हूं । रूपा को जैसे आग लग गयी ऐसे मानते हैं । काफी तरह समूह हिला दिया मानता हूँ । ऐसे नहीं होती माफी । जब तक मन में अफसोस में हो, दिल से माफी मांगी तो ऐसी माफी का मतलब ही क्या देखो । बाबा जी ऐसे मांगना है माफी इसके मन में दुखी नहीं है । इसमें मुझे कितना दुख दिया है मुझे नहीं चाहिए । ऊपर की माफी इससे कहूँ कि मेरी आंखों से दूर चला जायेगा । यहाँ से हट जाए । मैं इसे एक पल के लिए भी नहीं कह सकती । माधव उठकर कमरे से बाहर आ गया । मैं और अभिषेक बाबा जी और रूपा को नमस्कार कर घर लौटना चाहते थे । मैं अंदर गई विभूति वहीं सेवा का मौका देने वाली बात दोहरा रही थी । मैंने रूपा को छोटा सा परिवार धन किया और बाहर आ गई । कुछ दिन बाद रूपा का फोन आया अमेजॅन चाहिए मैं मानव उसको तो हमने अगले दिन ही हवाई जहाज पर चढा दिया । मैं तो बहुत निकम्मा था । कोई अमेरिकी सेक्रेटरी मिलेगा । मैंने मन में कहा ऐसा अमेरिकी सेक्रेटरी आपको कहाँ से मिलेगा जो आपके कपडे भी प्रयास करें और आपकी लाॅ दूसरे । मुझे यह अंदाजा नहीं था कि वह कुछ तन्खा वगैरह भी देंगे या नहीं । भक्ति बहु के जाल में यदि कोई खुद में खुद आकर फंस जाए तो और बात है वरना नौकरी की तन्खा और दूसरे पक्ष की एवज में यह तो कह नहीं सकते कि सारी सेवाओं के वेतन के रूप में आपको बाबा जी की कृपा मिलेगी । चलिए बाबा जी की कृपा के नाम से शायद कोई धार्मिक किस्म का आदमी फंस भी जाए । पर साथ में अगर उसे पता लग जाए की रूपा कपडे को भी पारिश्रमिक के रूप में स्वीकारना होगा तो भला कौन बेवकूफ फटकेगा इनके पास और ये क्यों किसी के ऐसे दुर्भाग्य की जिम्मेदार बनूँ ऊपर से मैंने कहा पता कर दूंगी यो मिलना मुश्किल होगा लेकिन क्या कोई अमेरिकी ही चाहिए या की हिंदुस्तानी चलेगा आजकल बाबा जी के पास बडे अधिकारी भी आने लगे हैं । बेहतर होगा अमेरिकी हो क्योंकि उसे बातचीत का सलीका तो होगा । पढना मुझे खुद सारे फोन सुनने पडते हैं । मैं तो तंग आ गई हूँ । फोन सुन सुनकर सारा दिन बोल बोल कर मेरा सर फट जाता है हूँ । तो अब रूपा को अंदाजा हुआ माधव के कामों का । वह भी तो सारा दिन फोन पर लगा रहता था । पर तब रूपा जी को फोन सुनना करना कोई काम ही नहीं लगता था । किसी हिंदुस्तानी का मिलना ज्यादा आसान होगा । कहते हुए मेरे दिमाग में भी हिंदुस्तानी थे जो भारत से अपनी किस्मत आजमाने के चक्कर में यहाँ धक्के खा रहे होते हैं । ऐसे किसी से अक्सर टक्कर भी हो जाती है उसके लिए यह सौदा इतना बुरा नहीं होगा । रहने का आश्रय, नए नए लोगों से मिलना, जुलना बेहतर भविष्य की संभावना और ना यहाँ टीका हुआ आदमी अपने काम धंधे छोडकर बाबा जी की नौकरी में भला क्या पाएगा? पर फिर पता लगा कि बाबा जी ऐसे किसी गैरकानूनी प्रवासी को अपने इर्द गिर्द नहीं फटकने देना चाहते हैं । बाबा जी और रूपा के लिए सेक्रेटरी तो मैं ढूंढ नहीं पाई । तो अगली बार जब मैं और अभिषेक उनसे मिलने गए तो मुझे वहाँ सब कुछ एक बहुत संगठित संस्था की तरह लगा था । हर काम का एक ढर्रा बन चुका था । सब बडे सुचारु रूप से काम पर लगे हुए थे । किचन में ही प्रेस करने की मेज लगी थी । विभूति रूपा के ब्लाउज प्रेस कर रही थी । दो हफ्ते खाना गर्म कर रही थी । एक औरत बर्तन हो रही थी । रूपा किचन के बीचोंबीच कुर्सी पर बैठी बालों में तेल वाली करवाती सबसे गप्पे लडा रही थी । किचन की अलमारियों में दालों, मसालों के मार तमान जो कहते थे, किसी ने उनका इस्तेमाल किया नहीं लगता था । रूपा से पूछा तो आपने खाना बनाया

इतर भाग 10

बहुत दस बहुत बार मुझे लगा करता था की रूपा की सबसे बडी जरूरत ही है । जरूरत नहीं कडक है एक नॉर्मल जिंदगी जीने की । जिस तरह से मैं बीमारों और जरूरतमंदों से दिन रात की रहती है, वह किसी को पागल नहीं कर देगा । आखिर रूपा को खुद इन लोगों में क्या दिलचस्पी हो सकती है? नहीं, ये लोग रूपा में कोई दिलचस्पी लेते हैं । वे अपने किसी मकसद से बाबा जी के पास आते हैं । लेकिन हालात की अनिवार्यता कुछ ऐसी है कि बाबा जी से पहले रूपा का सामना होता है क्या करना पडता है? कुछ लोग तो रूपा को बाबा जी का ही एक रूप मानकर पूरी इज्जत सम्मान दे डालते हैं । फिर भी उन्हें यह तो ऐसा रहता है कि वह बाबाजी होकर भी बाबाजी नहीं है और दूसरे कुछ ऐसे हैं जो बाबा जी को खास या भगवान रूपमान कर दी रूपा को अपने जैसे आदमी के रूप में देखते हैं । इस दूसरी कैटेगिरी के लोगों का तो रूपा कुछ बिगाड नहीं सकती, बस उनसे कुछ जली कटी रहती है, पर पहली कैटेगरी के लोगों से ही शायद अपनी नॉर्मल जिंदगी खो देने का बदला लेती रहती हैं या नरम लफ्जों में कहा जा सकता है कि उन्हीं की तरह नॉर्मल या खास जीवन जीने की कोशिश में रूपा उन्हीं की जिंदगी का कुछ हिस्सा कुछ टुकडा ले लेना चाहती है और यह हिस्सा देने वाले के लिए प्राप्त के तोल में कितना महंगा पडेगा, रुपए उसे हक मान कर ही लेती है । आखिर लोग नहीं देखते की उसके सुहाग की सारी अनमोल घडियां बीमारों की तिमारदारी में लग जाती है । तब बीमारों की जिंदगी पर उसका हक क्यों न हो? आखिर उनके अपने घर तो सही सलामत है उनके घरों में, उनके सुहागों में तो किसी की दखलंदाजी नहीं । पर फर्क सिर्फ इतना था कि रूपा को जो नॉर्मल इटली या जिंदगी चाहिए थी, उस की परिभाषा मेरी या किसी भी सामान्य जिंदगी की परिधि से बाहर आप पडती क्योंकि सामान्य जिंदगी की मांगे चाहे बहुत कम या कुछ और ही हैं पर हर आदमी की सामान्य जिंदगी अपने ढंग से सामान्य होती है । तो मैं कौन होती हूं? रूपा की जरूरतों का फैसला करने वाली चाय? मुझे इस बारे में कुछ और कहना सोचना नहीं चाहिए तो चीज बिना में रह भी नहीं पाती है । रूपा का व्यवहार मुझे बेहद हैरान कर जाता है । कभी मुझे लगता है यहाँ आने वाले ये ढेर सारे लोग जैसे रूपा के खेलने के लिए ढेर सारे खिलोने हैं । वहाँ उन्हें मन मर्जी से उठाती पटकती उछालते गिराती है । उस दिन में आश्रम पता नहीं असम कहना चाहिए या घर यूज हूँ इस घर का इस्तेमाल आश्रम या कहूँ क्लिनिक एक धार्मिक लेने एक मुफ्त मगर खाल उतार स्वास्थ्य संस्थान के रूप में हो रहा था । पर अभी आश्रम का बोर्ड भारत नहीं लगा था । गई तो मंदिर जाने से पहले सोचा की रूपा से राम राम कर लूँ । रुपए का दरवाजा आधा भेजा था । बिस्तर पर दीवार के सहारे बैठी जोर जोर से फोन पर किसी को डांट रही थी । मैं भीतर जाने की हिम्मत नहीं रख दरवाजे के बाहर ही खडी रही । रुपए की आवाज साफ सुनाई दे रही थी । आप की ये हिम्मत कैसे हुई? आपको भी मालूम नहीं कि हम क्या है । आप जैसे लोगों से मैं कभी बात तक नहीं करती है । आप हिंदुस्तान में आइए तो आपको पता चलेगा आप जैसे हजार हजार लोगों की लाइन लगी रहती है । मैं उनसे मिलने तक नहीं ठीक है । हम यहाँ नहीं हैं । इससे इतने ज्यादा लोग हमें जानते नहीं पर आप जैसे लोगों को तो मैं मुंह तक नहीं लगती । नहीं गुस्सा मुझे इस बात का है आपने स्त्री का अपमान किया । आपने मेरे सामने अपनी पत्नी को डांटा । मिस्त्री का अपमान बिल्कुल नहीं बर्दाश्त कर सकती हैं । ठीक है इस बार माफ कर देती हूँ । अंदर कभी ऐसा किया तो बाबा जी के नजदीक नहीं फटक । नहीं होंगी मुझे इस तरह रूपा की बातें सुनते । अपने आप पर शर्म भी आ रही थी । सब लोग नीचे थे इसलिए बिना किसी दिन के खडी थी । पर अब मैंने दरवाजा खटखटाने का फैसला किया । रूपा कुछ आगे को उठकर बैठती मुझे अधखुले दरवाजे से देख बोली अरे भावी जी आप बाहर क्यों खडी हो गई? अंदर चले आइए और फोन रख कर रुपए मुझे बताने लगी पता नहीं कैसे लीटर लोगों से वास्ता पडता है । यहाँ इनको पता लगे ना कौन हूँ मैं इसकी बेटी हूँ । इतने छोटे लोग है ना । पता नहीं कैसे अपने को पढा लिखा कहते हैं ये सोचते हैं कि मैं भी नहीं की तरह सोचते हैं । बाबा जी की पत्नी है जो जरूर सीधी साधी अनपढ गवार होगी इनको पता नहीं मेरा बाप ऐसा वैसा गवार नहीं । बहुत बडा कॉन्ट्रैक्टर है और मैंने तो उस की भी परवाह नहीं की । तारीख के बाद आखिर पति का घर और अब का अपना घर होता है । जहां मेरे पति का अपमान हूँ, वहाँ मैं क्यों रहूँ? क्यों जाऊं? छती के पति का अपमान हुआ था तो आग में कूदकर उसने अपने पिता के यज्ञ को ही भ्रष्ट कर दिया था । मैं बोला कैसे सह सकती हूँ पति का पान इतनी बडी बडी साडी की मिसाल सुनकर मेरा अपना दिमाग चकराने लगा था । फिर भी अपने भीतर कोतवाल को उडते हुए तूफान को पूरी तरह मसोसकर बडी सहजता आवाज में मैंने कहा किस चीज के कॉन्ट्रैक्टर है आपके पिता यू । मुझे मालूम था कि चाहे कितना भी सादा सवाल पूछूँ, अपमान वाली बात कर रहे ऐसे रूपा बताए बिना नहीं रहेगी, वही हुआ । रूपा बोली बिल्डिंग के कॉन्ट्रैक्टर है और क्या कितना पैसा मेरे बाप के पास है ना सारे गुजरातियों को खरीद डाले । समझते क्या है ये लोग अपने आप को एकदम पाई पाई के कंजूस है । ये तो एक डॉलर खर्चने में भी सोचते हैं । मैं तो हैरान होती हूँ । बताइए, डॉलर भी कोई चीज होती है, लेकिन मेरा बाप तो पानी की तरह पैसा लौटाता है और वही हमारी आदत है । पैसा आखिर होता भी किस लिए हैं । पापा ने तो बाबा जी को भी बिजनेस जॉइन करने के लिए कहा था पर ये क्यों मानते हैं और पापा ने जब इस पर इन को बुरा भला कहा तो फिर मुझ से नहीं रहा गया । मैंने कह दिया पापा कुछ भी हूँ, ये मेरे पति हैं, इनका अपमान करेंगे तो मैं भी इस घर में कदम नहीं रख हुई । हाँ रूपाजी बाबा जी से आपकी शादी कब हुई? अरे अब तो पंद्रह सोलह बरस हो गए । अब तो मुश्किल से चौदह बरस की होंगी में स्कूल में पढती थी आठवीं क्लास में मेरे पापा तो बहुत खिलाफ थे शादी के पर माँ के ही जित्ती । माँ को कैंसर था । यही उनकी आखिरी ख्वाहिश थी । रूपा कुछ पल चुप रहकर फिर बोली बाबा जी भी कौन से बडे थे । मुश्किल से सत्रह के रहे होंगे । ऐसे ही घूमते थे । देवी के मंदिर पर ही मना नहीं नहीं देखा था । कहने लगी मुझे देवी ने दर्शन दिया है कि इस युवक से मेरी बेटी का हो । पापा भी क्या करते हैं यह बाबा जी का घर परिवार तो अच्छा ही था । बहुत ही बडी जमींदारी है इनकी । अब तो सब कुछ अपने भाइयों को दे डाला है उन्होंने । लेकिन पैसे की कमी तो इन को भी नहीं थी । मामाजी को तो किसी बात की परवाह ही नहीं थी । बस पागलों की तरह घूमा करते थे । हफ्ता हफ्ता नहीं आते थे । इनके घर वालों ने भी शादी तो इसलिए कि पैर में जंजीर पडने से लडका घर में तो रहेगा पर इनके तो कोई फर्क ही नहीं आया । तब इनके बडे भाइयों ने इन्हें पागल खाने भिजवा दिया । मेरी माँ जब तक चल बसी थी पापा मुझे आकर ले गए और फिर स्कूल में भर्ती करा दिया । कलकत्ता में कॅश कुछ कुछ ऐसा बाबा जी से सुन चुकी थी । फिर भी बडी अजीबो गरीब से लग रही थी । मुझे रूपा की कहानी और रूपा कहती रही और मैं सुनती रही । बाबा जी बताते हैं इन्हें वहाँ बिजली के इतने शौक लगाए गए कि पागल नहीं हो तो भी पागल हो जाएंगे । भाइयों से कहा कि बिजनेस करेंगे । मेरा स्कूल भी खत्म हो चुका था । पापा तो मुझे भेजना नहीं चाहते थे और बाबा जी उनसे बोले कि वे मुझे बम्बई ले जाएंगे । वहीं कोई बिजनेस करेंगे या फिल्म बनाएंगे? मैंने पापा से कहा कि आखिर में मेरे पति हैं । मेरा जीवन तो उन्हीं के साथ हैं । मैं भी बम्बई जाकर उनके साथ बिजनेस में हाथ बताऊंगी । मैं जैसे सांस रोके । रूपा के को से सुन रही थी । मुंबई में बिजनेस अभी जमा नहीं था की एक रात ये मुझे सोता छोडकर चल दिए । मेरा वन हुआ कि आत्महत्या ही कर डालो जो हमारे घर से भी बहुत दूर नहीं था । पर मैं प्रेग्नेंट थी । पास में पैसे भी नहीं थे । टिकट खरीदकर बिहार वापस चली जाऊँ । पापा से ही तार भेजकर पैसे मंगाए । पापा खुद ही मुझे लिवाने आ गए । भावी जी क्या बताऊँ इस आदमी के लिए जो कुछ मैंने सहा है ना? पर शायद भगवान ने मुझे इन्ही के लिए बनाया होगा और बताइए कोई और औरत रह सकती है इस आदमी के साथ मैं चुप थी बाबा जी के लिए आदमी का संबोधन मुझे अजीब सा लगा । पल भर बाद मैंने ही पूछ डाला क्या आप की कोई औलाद हैं? हाँ, वही एक छोटा बेटा है । राहुल उसे बोर्डिंग में ही डाल रखा है । हमारे साथ कहाँ कहाँ घूमता रहेगा? लेकिन छुट्टियों में अरे नाना और मामा के साथ रहता है छुट्टियों में वहीं देख रेख करते हैं । उसकी पडने की ही तो उम्र है उसकी । मुझे तो बाबा जी के साथ ही रहना होता है । मेरे पास कहाँ वक्त है उसकी देखभाल करने का । दिल्ली में होते हैं तो हफ्ते दो हफ्ते बाद मिलने चले जाते हैं । बाबा जी लौटे का तीन साल तक इनका कोई पता नहीं लगा । फिर किसी ने इनको कामाख्या देवी के मंदिर के पास देखा तो हमें आकर बताया । फिर मेरा और इनके भाई इन्हें लिवाने गए । आप का मतलब है गुवाहाटी वाला काम आपकी देवी मंदिर और क्या बाबा जी बताते हैं मुझे कि उन्हें स्वप्न में ही देवी का आदेश हुआ तो चल पडेंगे । उन्हें पता ही नहीं लगा कि कब कैसे वे देवी के मंदिर में पहुंच गए । लेकिन भावी जी मैंने इस आदमी को साल भर माफ नहीं किया । जब इनके मिल जाने की खबर लगी तो मुझे ससुराल बुलवा लिया गया । पर जिस वक्त ये घर में घुसे मुझे इतना गुस्सा चढा । इतना गुस्सा चढा कि मैंने अपने कमरे की हर चीज तोड डाली थी । बिस्तर को चाकू से फाड दिया । जो चीज सामने देखी तहस नहस कर दी । बाबा जी ने कुछ कहा नहीं कहते कैसे उन को मालूम था । उन्होंने अपराध किया है । माँ बनने वाली पत्नी को इस तरह छोड जाने से बडा और क्या अपराध हो सकता है इनके लिए तो मुझे सबसे सुनना पडता था । मेरे पापा भी इनको निखट्टू बोलते थे । मैं अपना दुखडा इनको नहीं सुनाती तो भला किसको सुना । लेकिन फिर भी क्या बाबा जी इतने साल इस तरह रहकर कुछ अलग किस्म के इंसान नहीं हो गए थे । इन की स्पेशल पावर को तो मैं मानती हूँ क्योंकि तब भी ये दूसरों के भीतर की बात सही सही बता दिया करते थे । गांव के दूसरे लोग इन्हें देखने आते तो बडा प्रभावित होकर जाते । सबका भूत और भविष्य एकदम सही बता देते थे । लेकिन मुझसे तो इन्होंने इतनी बार माफी मांगी की मुझे तरह दिया गया । कहने लगे कि देवी माँ का आदेश हुआ कि अपनी पत्नी को प्रसन्न रखूँ तभी देवी भी उन पर कृपा करेंगे । पटना देवी रुष्ट हो सकती हैं । बोले तभी तो मैं घर वापस आया हूँ । हाँ जी मैं मन में तो बेहद खुश थी, लौट आए हैं पर खुशी जाहिर करने में भी डरती थी कि मुझे खुश जानकर ये फिर से कहीं गायब हो जाए । अभी तक मेरा ये डर गया नहीं । यू जब से ये कामाख्या देवी के मंदिर से लौटे हैं इनका नाम बढा ही है । लगातार लोगों की संख्या बढती चली जा रही है । अब तो इनकी जिम्मेदारी कहीं और ज्यादा हो गई है । फिर भी मुझे डर लग जाता है कि कहीं किसी रात कहते कहते रुपए हुआ । ऐसा हुआ । मैंने गौर से उसका चारा देखा । उस पर डर से सहमे बच्चे की मासूमियत छुपी हुई थी । मैंने सहलाती सी आवाज में कह दिया अरे रूपा जी आप यही रबर आती हैं बाबा जी आप को छोडकर किसी भक्त के घर तक तो जाते नहीं, कहीं दूर क्या जाएंगे? आप नहीं जानती भावी जी ऊपर से इतना प्यार जाता आते हैं बाबा जी और इन को मेरा ध्यान है भी । पर अंदर से मैं जानती हूँ उन्हें कुछ भी लगाव नहीं । तभी देवी का आदेश हुआ तो सब छोड छाडकर चल उठेंगे । तभी तो मैं कहती हूँ किसी तरह से यहाँ मेरा एक घर बन जाए । हिंदुस्तान में घर है । हाँ तो पर यहाँ भी तो होना चाहिए ना । तभी टेलीफोन की घंटी बजती । बातचीत से लगा कि उसी अमेरिकी सौदागर पिनौनी का फोन था जिसकी बीवी को कैंसर था । रूपा उस से कह रही थी आप डॉक्टर की रिपोर्ट और एक से लेकर अभी हवाई जहाज से आ जाइए । बाबा जी देख लेंगे । घबराए नहीं, मैं खुद एयरपोर्ट पर आपको लेने आ जाउंगी । जरूरत हुई तो हम आपके साथ ही लौट चलेंगे । बोल रखकर रूपा मेरी ओर मुखातिब वो बोली हमें शाम को एयरपोर्ट ले चलेंगे । बहुत बुरा हाल है । रोहणी के बीवी का बस मारना ही वाली है । समझो दो छोटे छोटे बच्चे हैं । मुझे तो बहुत तरह चाहता है । मेरी उम्र की ही होगी उसकी भी पर बाबा जी कहते हैं कि बच्चे ही नहीं फिर भी तसल्ली तो देने ही होती है । आप मरने वाले को यह थोडी कह सकते हो कि तू मरने वाला है इसलिए इलाज की जरूरत नहीं । मुझे नहीं मालूम था कि मुझे हुकुम दिया जा रहा है या अर्ज की जा रही है और मुझे मालूम था कि मैं नहीं नहीं करता हूँ । जबकि एयरपोर्ट जाने का मतलब था दिनभर वही कुमार करना क्योंकि लंबी ड्राइव करके पहले घर लौट थी तो उसमें भी तो दिन निकल जाता है । मैंने सोचा इस बीच घर के लिए जो कुछ ग्रोसरी वैगरह खरीदनी थी ये सब काम इसी लोकेलिटी में कर लेती हूँ । शाम को एयरपोर्ट के लिए वापस आ जाउंगी । मैंने कहा ठीक है रूपा जी मैं कुछ अरेंज करके लौटी हूँ, आप तैयार रहेगा । एयरपोर्ट चलने के लिए मैं नीचे उतरी तो बैठक और खाने वाला कमरा खचाखच भरा हुआ था । कुछ एक पहचाने मित्रों के चेहरे देखे दो तीन एयर इंडिया में काम करने वाली एक सी लडकियाँ थी जिन्हें में अरसे से जानती थी । यहाँ देख मुझे कुछ हैरानी सी हुई । फिर मैंने अपने को गौर किया, मैं यहाँ आ सकती हूँ तो ये क्यों नहीं बडे बडे तपाक से मिली और मेरा लंबी बात का मूड नहीं था । क्यों लगता है उन्होंने वहाँ मेरे होने को एक आम बात की तरह लिया था । लेकिन उनकी उपस् थिति में वहाँ होना मुझे खुद को एक सवाल बनकर तंग कर रहा था । जयंत बडे उत्साह से नंबर बार लोगों को ऊपर बाबा जी के पास भेज रहा था । मुझसे बोला बाबा जी से नहीं मिलेंगी नहीं, मुझे लौट कराना है तभी मिल होंगी वो भी अभी इतनी भीड है आपके लिए । क्या भीड है आपको लाइन में थोडे ही लगना नहीं नहीं रहने दीजिए । मैं लौटकर आ रही कहते कहते मुझे ध्यान आया कि अभिषेक तो रात भर से बाबा जी के पास ही मंदिर में बैठा रहा था । उसे तो बता दूँ कि कुछ घंटों में लौटूंगी पर फिर भी बेमानी लगा । अभिषेक को कौन सी परवाह है कि इस वक्त मैं कहा हूँ मैं तो अपनी माला जप पडा होगा । शाम को लौटी तो रूपा जी का रूप और ढंग यानी की स्टाइल बस देखने वाला था । ये मुझे कुछ दिन पहले ही बता रही थी । मुझे कुछ फॅस खरीदनी है कौन सी जगह से खरीदी जाए और मैंने शहर के बडे बडे फैशनेबल स्टोरों के नाम सुझा दिए थे । लेकिन जो ना मैंने सो जाए थे वहाँ शायद इस तरह के कपडे रखे ही नहीं जाते हैं । जैसे कि इस वक्त वे पहनी हुई थी या हो सकता है ऐसे कपडे वहाँ मिलते हूँ । पर मैंने गौर नहीं किया हूँ । इन दिनों मिनीस्कर्ट फिर से फैशन में आ गई थी पर ज्यादातर स्कूल कॉलेज की लडकियाँ ही नहीं पहनती थी । बाकी औरतें अभी लंबी घेरदार स्कर्ट पहने घूमती थी जो मिलने को तो कई तरह के फैशन के कपडे एक साथ मिल जाते हूँ पर रूपा जी को यही फैशन भाया होगा । उन्होंने काले रंग की मिनीस्कर्ट, काला ब्लाउज और मैजेंटा रंग की चमकीली सीक्वेंस के काम वाली जैकेट पहन रखी थी । स्कर्ट इतनी कैसी थी कि पेट और गोले दोनों ही आगे पीछे बाहर को निकले दिखाई पड रहे थे । मोटी मासपेशियों से गठित टांगे जालीदार जीनी टाइट्स की खूबसूरती को चोट लाकर अपने मोटापे का है । डिंडोरा पीट रही थी पैर में चार इंच वाले ही कालेपन शूज पहने । वे इस तरह इतना एक लाकर चल रही थी जैसे कि कोई उन्नीस बरस की नवेली अपने नए नए प्रियतम को अपने रूप की आवाज से चमत्कृत कर देना चाहती हूँ । मैंने सोचा यह सारी रूपसज्जा, यह पश्चिमी ढंग क्या फिर धोनी को चौकाने बहलाने के लिए, लेकिन यह रूप उसे बहला आएगा या कि पहला देगा? रूपा इठलाते बोली, देखो मेरी नई ड्रेस अच्छी लगती है ना? इसका जवाब सिर्फ हाल ही में हो सकता था । मेरी सभ्यता के हिसाब से मैंने सिर्फ हिला दिया और इस तरह से बार बार हिलाती रही और इस तरह से बार बार हिलाती रही कि पता ही नहीं लगे की प्रशंसा की जा रही है । क्या की यही हिलाया जा रहा है । लेकिन रूपा के सजने सजाने पर तिरूतनी का ध्यान तक नहीं गया । एयरपोर्ट पर उसे लेने अभिषेक भी हमारे साथ गया था । तिरुतनी का चेहरा पकड गवर आ और निराशा से इस तरह काला पडा हुआ था । ऐसा लगता था मानो उसकी खुद की मौत ही उसके सिर पर झूल रही हो । रूपा अपने उत्साह में काफी कुछ बोलती रही थी, पर तिरूतनी मुस्कुरा तक नहीं सका । रूपा की बातें शायद वह सुन ही नहीं रहा था । तुम भी होगी तो बडी बीमारी लगी होगी । वह कहे जा रही थी सारे दिन इतनी भीड लगी रहती है घर में । मेरा तो मन करता है कि कहीं भाग जाऊंगा बाबा जी के पास । मुझे घुमाने का तो टाइम होता ही नहीं । हर वक्त लोग उनका पीछा ही नहीं छोड देते हैं । यह सब करना था तो हिंदुस्तानी क्या बोला था । इतनी दूर कोई घर में ही बैठने थोडी आए हैं । घर पहुंचने के दो घंटे बाद ही पिस्टल से फोन आया था । फिर धोनी की पत्नी संसार छोडकर चल दी थी । बाबा जी ने कहा था कि वे और रूपा पिरोने के साथ यूस्टन लौटेंगे । दस दिन बाद क्रियाक्रम करके पावभाजी लौटे तो फिर और उसके छह और आठ साल के दोनों बच्चे भी उसके साथ थे । रूपा उन बच्चों को चूमती । कुछ कार्ति उनके साथ खेलती, कभी उन्हें तैयार करती और कभी अपने चार इंच की हील पहने पहने छोटी वाली बच्ची को गोद में उठा लेती है । मैं हैरान थी रूपा के इस रूप को देखकर । इतना मातृत्व है रूपा में । तभी अपने बेटे के बिना कैसे रहती होगी बाबा जी तो फिर से अपने दिनचर्या में जुट गए । ढेरों लोग उनके लौटने के इंतजार में थे इसलिए उनकी आने की खबर पाते ही ताता लग गया था । घर असम में पर रूपा बिलोनी और उन दो बच्चों की अपनी एक पारिवारिक इकाई बन गई थी । विचारों दिनभर गाडी में घूमते । रोज सुबह ही उनका कोई प्रोग्राम बन जाता है और वे चारों घर से निकल पडते हैं और रात को देर से घर लौटते लौटकर रूपा बच्चों को सुनने में मजबूर हो जाती । बाबा जी से बहुत कम बात करते देखा मैंने । इन दिनों बाबा जी को जो लोगों की कमी नहीं थी एयर इंडिया की वो तीनों लडकियां उनके आसपास रह रही थी । जैन की बीवी विभूति तो बाबा जी के साथ ही रही थी । मुझे आश्रम अब कतई अच्छा नहीं लग रहा था और वहाँ होना बडा फिजूल लग रहा है । उसने कहा हम लोग यहाँ क्यों अपना वक्त जाया कर रहे हैं? क्या वहाँ लोगों को हमारी जरूरत नहीं?

इतर भाग 11

क्या भाग जा रहे हैं । बाबा जी के पास हम जितना ज्यादा जाते हैं उतना ही और ज्यादा जाने की इच्छा बनी रहती है । धीरे धीरे मैंने गौर किया कि हमारा सोशल सर्किल ही बदलने लगा था । हम उनको लोगों से ही मिलते हैं जिन्हें हम या तो बाबा जी के आश्रम में मिलते हैं या जिनको बाबा जी के बारे में बात करने में दिलचस्पी होती । कई बार बाबा जी ही लोगों से मिलने या खाने पर जाते हैं तो हमें अपने साथ चलने को कह देते हैं । इस तरह हम कई नए लोगों से मिलते हैं और उनके और हमारे बीच संबंध या बातचीत का सूत्र बाबा जी ही होते हैं । बाबा जी का नाम तो बढता ही जा रहा था आई जिन्होंने न्यूयॉर्क के बाहर के शहरों में बसे हिंदुस्तानियों के समूह आमंत्रित करते । न्यूजर्सी के एक शहर के हिन्दुस्तानियों ने उन्हें अपने शहर के मेयर से विशेष सम्मानपत्र भी दिलवाया । अभिषेक मुझसे कहता हूँ, इस आदमी में जरूर कुछ खास बात है वरना इतने लोग बेवकूफ थोडे ही हो सकते हैं । जब हम बाबाजी के चमत्कारों से इतने प्रभावित हो गए तो और लोग भी हो सकते हैं । तुम कहना क्या चाहती हूँ । अभिषेक के इससे ऐसा तने हुए सवाल ने मुझे चौंका दिया । शायद अभिषेक ने मेरे जवाब में हमारे अपने बेवकूफ होने के अर्थ को ही लिया था जो उसे चूका था । क्योंकि इसके थोडी देर बाद अभिषेक ने कई दिनों से भीतर बोलती अपनी ख्वाइश को मुझ पर जाहिर किया । मैं बाबा जी से सिद्धि लेने की सोच रहा हूँ क्यों नहीं? इसलिए मैंने जबरदस्ती उससे मजाक नहीं लिया । बाबा जी ने खुद मुझसे कहा कि वे मुझे सिखाना चाहते हैं । उन्होंने अपने आप ही मुझे इस काम के लिए चुना है । उनका कहना है कि मैं एक सुयोग्य पात्र हूँ वरना मैं और किसी को अपनी विद्या नहीं देते हैं । तुम्हें उन्हें क्या जवाब दिया था? उन्होंने खुद ही कहा कि जब भी में मानसिक रूप से तैयार हूँ, शुरू किया जा सकता है, क्या करना होगा? कह रहे थे कि मांस, मदिरा और औरत का त्याग करना होगा? नहीं नहीं, तुम्हारा नहीं रहे तो मैं कभी करूंगा नहीं और मैंने बाबा जी से क्या दिया था? पर वे बोले की उनका मतलब पत्नी से नहीं, परिस्थिति से हैं । वरना आखिर में खुद भी तो रूपा के साथ ही हैं । तुम तो खासे संजीदा लग रहे हो तो मजाक ही समझे जा रही हूँ, लेकिन अभी मैं थोडा सीट कर देखना चाहता हूँ । ये हैं कोई नहीं, बात तो नहीं । अभी हम जानते नहीं यह सारी विश्वास की बात है । यह तो सिर्फ मार कर ही जाना जा सकता है । अगर जीते जी जान लिया जाए तो यह संभव नहीं । अभी अपने आप को धोखा मत दो, लेकिन तुम भी तो उतने डाउट में हूँ, जितना कि मैं । तुम जितना अविश्वास करती हूँ, मैं उतना ही विश्वास । तब हम दोनों में से कौन गलत या सही है? वह बात नहीं और अभिषेक तो ऑलरेडी एक्सपेरिमेंट कर रहे थे तो लगभग फेल हो चुका है । फिर भी तुम कैसा एक्स्पेरिमेंट? तो हमने कहा नहीं था । मेरी डायबिटीज हो गई तो बाबा जी को मान जाओ गए वरना ऐसा फिजूल ऍम कुछ पल चुप रहे । अभिषेक फिर बोला एक बात करूँ बाबा जी कहते हैं कि विश्वास और धैर्य से सब काम हो जाते हैं तो मैं तो बाबा जी पर इतना संदेह तब तुम्हारी डायबिटीज कैसे हो सकती है? सिर्फ एक व्यक्ति के नहीं ठीक होने से तो उनको गलत तो साबित नहीं कर सकती । ठीक हुआ है तो कितने लोग हुए हैं, वही होंगे वरना उनके पास जाने वालों का नंबर दिन पर दिन बढता कैसे जा रहा है तो लोगों की संख्या से बाबा जी की सच्चाई होती है और क्या तरीका है उनकी सच्चाई साबित करने का? मैं लाजवाब थी । कहने के तो मैं कह सकती थी कि लोग को भेड चाल होते हैं । पर इन में कहीं अभिषेक का भी तो होता है । यहाँ तो तरफ बढाये जाने का मन नहीं था यह बहुमत । यह संख्या की शक्ति जिस बात को सही साबित कर दे, उसे गलत साबित करने के साधन भी मेरे पास कहाँ थे? फिर मैं तो खुद मात्र संदेह की स्थिति में हूँ । मैं सोचने लगी कि मुझे तो अभिषेक की सुपात्र ता पर गर्व होना चाहिए । मान लो मुझे बाबा जी ऐसा कुछ कहते तो मैं क्या भागी? भागी सीखने नहीं जाती । तब अभिषेक ऐसा सुनाना, मौका क्यों छोडे हैं? लेकिन अभिषेक की डॉक्टरी प्रैक्टिस का क्या होगा? मैंने पूछा तो अभी से बोला दुनिया के काम तो चलते ही रहते हैं । सभी पैसे कमाते हैं । मैंने अभी तक यही किया । उस दिन नहीं भी कमाऊंगा तो क्या चलेगा? नहीं तो मैं फिक्र तो नहीं । अभी तो हमारी खासी सेविंग भी है । एक दो महीने नहीं करवाया तो क्या भी करने वाला है । जिंदगी में कुछ और अनुभव भी तो लेने चाहिए । कैसा भी आकर किस लिए होता है? अभिषेक सभाओं से कुछ बाबू और आदर्शवादी भी था । उसके मार्क्सवाद का अर्थ अपनों से कमजोर के लिए कुछ करना भर ही था । अगर मैं मंत्रशक्ति से निरोग करने का रहे से जान गया तो जानती हूँ कितने लोगों का कल्याण हो सकता है । बाबा जी अकेले तो हर जगह पहुंच नहीं सकते । कुछ और लोग सीख सकें तो उतने ही ज्यादा लोगों का भला भी तो कर पाएंगे है । मैं तो अभी अपने ही हो तो हाल की वजह से सीखना चाहता हूँ । अगर सिद्धि नहीं मिली तो सोचूंगा । थोडा सा वक्त जाया हो गया । योगी तो सालाना छुट्टी लेकर कहीं ना कहीं घूमने जाते ही हैं । इस साल यही सर सा पडा रहा तो बेसिकली तुमने फैसला कर ही लिया है, लेकिन तुम्हारी रजामंदी भी चाहिए । बाबा जी कहते हैं कि अल्पना की इजाजत के बिना में दीक्षा का काम ही शुरू नहीं करेंगे । पत्नी की रजामंदी जरूरी होनी चाहिए तो मेरा भी कुछ रोल है । इसमें अगर मैं ना कर दो तो तो मैं सीख नहीं पाऊंगा । लेकिन क्या तुम ना करोगी कर भी सकती हूँ । लेकिन अल्पना मैंने तुम्हें हमेशा तुम्हारे अपने ढंग से जीने दिया । अगर मैं जिंदगी में कुछ करना चाहूँ कुछ अपने मन से चाहूँ तो क्या तुम रोक दोगी तुम्हारे घर के प्रति दायित्व उसमें तो कोई फर्क नहीं आएगा क्योंकि तुम मुझे बेवकूफ समझती हूँ । सारी जिंदगी मैं घर का ही बना रहा हूँ क्या? दो तीन महीने और मैं कौन सा घर छोड कर जा रहा हूँ तुम भी मेरे साथ चलना । मैंने फैसला किया कि मैं अभिषेक को उसका मनचाहा काम करने दूंगी । अपने मन के डर और शंकाओं से खुद ही लडने पढ लुंगी यूपी अपने स्वार्थ के मारे उसे रोकना कहाँ तक ठीक है? मैंने अपने आप को बडे बडे संतों की पत्नियों प्रेमिकाओं में स्थान दे दिया जिन्होंने अपने स्वार्थों को तजकर पतियों प्रेमियों को सही रास्ते पर भेजा या जाने दिया था । शायद अभिषेक भी कोई मानस या सूरसागर रचने । अगली शाम जब हम बाबा जी के यहाँ गए थे तो उन्होंने अभिषेक के सामने ही मुझसे पूछा क्यों? अल्पना तो मैं कोई आपत्ति तो नहीं है ना तुम्हारे पति को सिद्धि सिखा सकते हैं ना । अगर आपत्ति हो तो आप बता दीजिए क्योंकि पत्नी की आज्ञा के बिना हम कुछ नहीं सिखा सकते । मैंने धीरे से कहा जी नहीं भला मुझे क्या आपत्ति हो सकती है । तुम चाहूँ तो कभी कभी तुम भी साथ आ सकती हूँ । ठीक है तो हम जल्दी ही तिथि निकालकर फोन करेंगे कि कब शुरू करना है । ठीक है । अभिषेक रात ग्यारह बजे बाबा जी के पास जाता है और सुबह छह सात बजे वापस आता है । कराकर दिनभर होता हूँ । शाम को उठकर कुछ एक धंदे निपटाता और फिर बाबा जी के पास जाने का समय हो जाता हूँ । हफ्ते में एक दो बार मैं भी उसके साथ जाती । बाबा जी शाम की आरती के वक्त फिलिंग स्टेशन करते हैं । डिनर लेते डिनर की । एक दो घंटे बाद सब गपशप और प्रवचन करते हैं और रात के बारह बजे मंदिर का दरवाजा बंद कर पूजा करते हैं । रात बारह बजे से सुबह पांच बजे तक अभिषेक भी उनके साथ मंदिर में पूजा करता है । एक रात मुझे भी उन्होंने अंदर बुला लिया था । मुझे भी मंत्र देकर सफेद मोतियों की माला दी और जब करने को कहा बाबा जी योगासन में बैठकर लगातार पांच घंटे ध्यान मनन करते हैं । अभिषेक भी उसी पोज में मंत्र पाठ करता । शुरू शुरू में उसकी तांगर घुटने बहुत दुखते थे । बाद में उस तरह बैठने की उसकी आदत पड गई है । मुझसे भी बहुत ज्यादा देर चौकडी मारकर बैठा नहीं गया और बाबा जी के अनुसार मेरे लिए वैसा कुछ भी करना अनिवार्य नहीं था क्योंकि मैं सिद्धि पाने के लिए तो कुछ कर ही नहीं रही थी । दो तीन हफ्ते बाद मैंने अभिषेक से पूछ डाला तो मैं अपने में कुछ फर्क लगा ऐसा पर वैसे ही कोई खास ताकत जैसे बाबा जी में है बीमारी ठीक करने की । हाँ अरे अभी से कहा अभी तो मुझे पूजा की विधि सिखा रहे हैं । अभी तो मुझे ठीक से यह भी नहीं पता कि मंत्र कैसे पढा जाता है या पूजा की पूरी प्रक्रिया क्या होती है । पहले वैसी खाऊंगा तभी कोई पावर आएगी । यू पूजा का आनंद तो मुझे भी मिलता था बाबा जी की वो छोटे से मंदिर में धूप, अगरबत्ती और गुलाबों की खुशबू ऐसी रच बस गई थी कि वहाँ बैठे मुझे मैं कुछ वही जीवन लगने लगती है जैसे उस खुशबू से ही सब के दुःख दर्द छोड जाते हो । जैसे बाबा जी खुद भी सिर्फ खुशबू थे और अपने भक्तों में भी वह फूक देते थे । लेकिन कमरे के बाहर निकलते ही जैसे अपने आप ही आ जाती है । बाद में इसी खुशबू से मुझे डर लगने लगा था । जितना हम बाबाजी के करीब आते जा रहे थे उतना ही वे हमारी जिंदगी का एक अनिवार्य अंग बनते जा रहे थे । बाकी लोगों की नजर में भी हमारी इज्जत इससे बढती जा रही थी । अबे हमें बाबा जी का करीबी समझते मेनका बहन तो अभिषेक को छोटे बाबा जी बुलाने लग गई थी । उनकी देखा देख कुछ और लोग भी अभिषेक को इसी नाम से पुकारने लगे । मुझे बडा अजीब लगता मेरे लिए अभिषेक अब भी वह अभिषेक ही था जो सर्जरी की जगह एक दूसरी नौकरी में व्यस्त हो गया था । वहाँ हमारी दिनचर्य बहुत उलट पुलट हो गई थी । जैसे रात भर अपार्टमेंट में अकेला रहना । बडा अजीब सा लगता था मुझे । लेकिन पहले भी अभिषेक का सर्जन का काम अक्सर उसे इमरजेंसी में रातों को भी व्यस्त रखता था तो इसमें भी कोई वैसी नई या अनोहनी बात नहीं थी । पर धीरे धीरे अभिषेक ने दिन का भी बडा हिस्सा वहीं बाबा जी के पास ही बिताना शुरू कर दिया । मैं पूछती तो कहता कि बाबा जी ने रोक लिया था, एक दिन में है । शाम छह बजे वापस आया । नहा धो कर खाना खाया तो घंटे पर आराम करने के बाद फिर लौटने को तैयार हो गया । मैं एकदम खबर आ गई । अपनी हालत देखी है तुमने अभी आखिर कैसे लाल हुई पडी है । रात भर तुम सोते ही नहीं । अब दिन में भी नहीं ड्राइव कैसे करोगे । इतनी दूर तक ऐसी कोई बात नहीं है । वहाँ जाकर बैठ नहीं है । बाबा जी भी तो जाते हैं उससे कहीं ज्यादा जाते हैं । उनका कहना है कि आदमी को दो घंटे से ज्यादा नहीं इन की जरूरत नहीं होती और तुम्हारा डॉक्टर मन उनकी बात सही मानता है । एक बार तो मैं भी जानता हूँ । आदमी जिस तरह से भी खुद को आदि कर लेंगे वही उसके लिए सही तरीका हो जाता है । यह बात तो सब डॉक्टर मानते हैं की भूख और नींद बढाने से बढते हैं और घटाने से कम होते हैं । अभिषेक के डॉक्टरी तरह के सामने मुझे फिर हार माननी पडी थी । लेकिन मन की गवर्नमेंट और फिक्र का क्या करती हैं? चलो मैं चलती हूँ तुम्हारे साथ बाबा जी के आदेश के बिना कैसे चल होगी । मैं ऐसा तैश में आई तो अपने पति के साथ भी मुझे बाबा जी के आदेश से मिलेगा । मैं बात नहीं लेकिन रात को वे सबसे मिलते नहीं पूजा में बैठना होता है और जिस तरह से जगी राते काट का तुम सूजी आंखों से गाडी चला होगे तो एक्सीडेंट होने पर बाबा जी जिम्मेदारी लेंगे । तुम्हारी जब उनकी मेहरबानी हो तो एक्सिडेंट होता ही नहीं । यादव करन का कितना बुरा एक्सीडेंट हुआ था, स्विट्जरलैंड में एकदम बच गया । अभी हमारे विश्वास से मैं टक्कर नहीं ले सकती है, लेकिन बहुत सिर्फ बाबाजी के रोक लेने की नहीं थी, क्योंकि अभिषेक अब वहाँ मौजूद होता था । इसलिए रूपा जी को उस पर हक जमाने का जैसे मौका मिल गया था । यूपी अभिषेक बाबा जी से सिद्धि सीख रहा था इसलिए गुरु शिष्य परंपरा में गुरु माता का उस पर परंपरागत स्वयंसिद्ध अधिकार था । इन दिनों उस पर एक नया फितूर चढा हुआ था और वह यह कि उसने न्यूयॉर्क की नाइटलाइफ अभी तक नहीं देगी तो आप जरूर देखनी है । बाबा जी हमेशा की तरह बोले हमारे पास इन बातों के लिए वक्त नहीं है तो मैं जाना है तो जाओ । रूपा को पहले भी हमेशा इसी तरह का जवाब मिला करता था और वह कुछ प्रतिरोध करके भी अंततः चुप हो जाती थी । और इस तरह के मामलों में बाबा जी की बात अंतिम रहती है, पर इस बार में हैरान रह गई । जब रूपा बोली ठीक है हम अकेले ही चले जायेंगे तो अभिषेक जी हमको न्यूयॉर्क की नाइटलाइफ दिखाएंगे । अभिषेक बाबाजी की और देखने लगा था । बोले अभिषेक के साथ तो हम तो मैं भेज भी देंगे । ले जाओ अभी से इसको दिखाओ जो कहती है वरना मैं मेरी जान खा जाएगी । अभिषेक विचारा न हाँ करने के काबिल था ना के रूपा के साथ नाइटलाइफ देखने का मतलब था अपनी माँ के साथ देखना । अभिषेक मानसिक रूप से इस बात को लेकर बडा अटपटा सा महसूस कर रहा था । कहाँ अल्पना से पूछना पडेगा अगर वह साथ चले तो रुपए एकदम से बोल पडी तो मेरे साथ अकेले जाने में आपको घबराहट होती है । ठीक है मैं ही कौनसा के लिए आप के साथ जाना चाहती हूँ तो भाभी जी आपको जाने में कुछ आपत्ति है । मुझे कुछ कहना ही था मुझे नाइटलाइफ देखने का शौक नहीं । पर चलिए यह भी एक अनुभव होगा खासकर आपके साथ देखने का । तो क्या आपने भी नहीं देखी । उसको देखा है पर बहुत कुछ भी नहीं देखा । रूपा ने किसी से छिप अंडे के बारे में सुन रखा था जो न्यूयॉर्क में सिर्फ औरतों के लिए बना स्पोर्ट हुआ । लडकियों की बजाय लडके सिर्फ तीस करते हैं । उसे सिर्फ लडकियों को ही देखने की इजाजत होती है । उसकी जित्ती वहाँ जरूर जाएगी । अभिषेक को अंदर जाने की इजाजत सिर्फ तीस के दौरान नहीं थी इसलिए मैं ही रूपा कोच्चि फॅस लेकर गई । जैसे कबड्डी बॉक्सिंग का काम होता है उसी तरह तीन तरफ दर्शकों के बैठने की बेंचों से गिरा डिस्को डांस के फ्लोर घुमा फॅार स्टेज बना था जिसके पीछे लकडी की खपच्चियों को खडा कर मैन है की रूपरेखा का बेडरॉक बना था । छत पर से डिस्को की लाइटें लटक रही थी । सारे डिस्को या नाइट क्लब का माहौल बडा ही सजावट और ऍम विरोध या कहूँ बडी वोह इंडियन किस्म की कॅाल किस्म की सजावट थी । जवान खूबसूरत शकल और बदन वाले लडके डेरो चहकती मेहनती लडकियों के बीच सिर्फ वोट आई और कैसी पतलून पहने ड्रिंक सर्व कर रहे थे । कई लडकियाँ उनके साथ तस्वीरें खिचवा रही थी । पूरे माहौल में बेहद एक्साइटमेंट हूँ और शोर शराबा मचा था । लोग लगता है शो के वक्त से पहले ही पहुंच गए थे क्योंकि सारी बैंचे भर चुकी थी । बडी मुश्किल से सबसे पीछे वाली लाइन में हमें जगह मिली कोई रैफल भी हो रहा था । कुछ लडकियों ने रैफल टिकट बेचने वाले लडकों को स्टेज पर घेरा हुआ था । धडाके के संगीत के साथ प्रोग्राम शुरू हुआ । मंच पर पांच लडके एक साथ उतरे और जिस्म की सारी मांसपेशियां को थिरकाते हुए बडा ही उत्तेजना और पूर्ति भरा नृत्य पेश करने लगे । मैं अंधेरे में बडे गौर से रूपा का चेहरा देख रही थी जिसकी एक तक उस दुकान के मंच पर व्यक्ति गठी इन टू लचीली गोरी पुरुष देर जस्ट क्यों पर टिकी थी । मुझे अपनी ओर घूमते देख ऐसा जैसे गाकर शर्मीली मुस्कान लाकर बोली कैसे बेशरम है ये लोग? मैं सिर्फ मुस्करा दी । प्रोग्राम खत्म होने पर सारी लडकियाँ मंच पर डिस्को डांस करने उत्तराई रूपा किसी नई जगह जाना चाहती थी । अभिषेक हमें लेने आ गया । हम उसे एक अमरीकी देश कंट्री संगीत के क्लब ले गए । यहाँ बडा ही मस्त कर देने वाला कंट्री म्यूजिक था ।

इतर भाग 12

भाग बारह हो दो । अभी वेस्टन फिल्मों वाली टोपियां और जींस पहने गिटार बजा रहे थे । एक दम पर था । एक गायक था कि नहीं किसी के कपडों में डांस फ्लोर बडा छोटा था । लोग लगभग एक दूसरे से सटे सटे नाच रहे थे । पर गानों की धुनें कितनी मैं नहीं थी कि जो ही संगीत शुरू होता है सब अपने हाथ से क्लास छोडकर फ्लोर पर नाचने पहुंचाते दो जोडे जिन्हें मृत्य की गतियों का ज्ञान भी था बडी मस्ती से नाच रहे थे । लोगों की निगाहें उन्हें दोनों जोडों की नृत्य गतियों पर टेक जाती थी । यू रूपा ने भी आज काफी उत्तेजक किस्म के कपडे पहन रखे थे जिसमें को कस्ती हुई काली मिनीस्कर्ट और लाल नीले पीले नकली पत्रों से जडा रेशमी जम पर आपने सीधे लंबे काले घने बाल उसने खुले छोड रखे थे । एक दिन पहले ही उसने अपने बाल बाबा जी के पास नियमित रूप से आने वाली एक हिंदुस्तानी लडकी से सेट करवाए थे । यह लडकी मैनहटन के ही एक हेयर कटिंग सैलून में काम करती थी । वहीं बाबाजी के बाल काटा और सेट किया करती थी । रूपा का मेकप बहुत गहरा था । आंखों पर मस्कारा और आईशेडो लगाकर उन्हें खूब हाईलाइट एड किया गया था । मैं कब लगता है उसी लडकी ने किया होगा क्योंकि पहली बार यह मैं कब रूपा के चेहरे को आकर्षक बना रहा था । टांगों पर मकडी के जाले के डिजाइन की स्टॉकिंग और चार इंच झील वाले काले सैंडल जिस दिन के निचले हिस्से को भी दिलचस्पी दिखा रहे थे, ड्रिंक करता हुआ एक गाडी वाला स्पेनिस लडका बार बार रूपा को हो रहा था । रूपा भी कभी कभी उस की ओर देख लेती । उसपे ड्रिंक लेकर हम नाचने के लिए उठे तो चूंकि हम तीन और किसी तरह से उसने अंदाजा भी लगा लिया था की अभिषेक के साथ मैं ही हूँ । मैं लडका रूपा के करीब आ गया और नाचने लगा । अब मैं अभिषेक के साथ नाच रही थी और रूपा उस लडके के साथ । उस लडके ने कुछ पाल बात रूपा को अपने साथ हटा लिया और वेट लोस डांस करने लगे । मुझे रूपा का उस अंजान लडके के साथ इतनी आसानी से लिपट जाना कुछ अजीब लगा लेकिन कुछ देर बाद फिर से अलग अलग होकर नाचने लगे । रूपा पूरे जोशो खरोश के साथ लगभग उछलती हुई बडे ही मुक्त भाव से नाच रही थी । पता नहीं उस लडके के स्पर्स ने इतनी ऊर्जा भर दी थी कि अपने स्वाभाविक ऊर्जा को संभाल नहीं पा रही थी । अचानक मैंने गौर किया, बार पर खडे और दूसरे नाचने वाले उन दो नर्तक जोडों को नहीं बल्कि रूपा को देख रहे थे । रूपा के हाथ पैर संगीत की धुन लय के साथ नवाकोट खेलते हुए बडी बेहतर बीवी से पढ रहे थे । लेकिन उन बेतरतीब अनपढ गतियों का अपना ही आकर्षण था । चाहे बे दस का आकर्षण सब लोगों की आंखें उधर ही लगी थी । सहसा रूपा संगीत रुकने से पहले ही डांस फ्लोर छोडकर साफ हुई । जिस मेज पर हम बैठे थे, उसी बेंच पर लेट गई । लडका भी पीछे पीछे उसके पास चला गया । उसे शायद लगा की रूपा की तबीयत खराब थी या वह कुछ ज्यादा ही उत्तेजित हो गई थी । कुछ पल में रूपा उठकर बैठ गई । लडका भी उसके साथ सटकर बैठ गया । लडके के होट रूपा के गानों की ओर बढने लगे । इतने में मैं और अभिषेक भी संगीत बंद हो जाने से मेज की दूसरी ओर के बेंच पर आकर बैठते हैं । हमें देखते ही रूपा बोली यह तो मेरे पीछे ही पड गया है । अभिषेक ने सहसा रूपा का पूरा दायित्व आपने पर लेते हुए उस लडके से कहा ऍम लडके ने नये समझाते हुए कहा वो आॅनलाइट अभिषेक ने और भी जोर और अधिकार जताती आवाज में अपना कहाँ दोहराया हो तो लडका एकदम वहाँ से उठ गया और उसने मुडकर रूपा की ओर देखा भी नहीं । और बार पर बैठे एक और लडकी के करीब जाकर गुडी मिल बात करने लगा । लडके के उठ कर चले जाने के बाद हम उसी की बातें करते रहे हैं । रूपा बोली देखो तो कैसा आदमी था चढी जा रहा था हम पर मुझको तो ऐसे आदमी पसंद नहीं डांस कर लो और बात यह है कि मैं एक हद तक ही जा सकती हूँ । हमारे साथ की मेज पर बैठे दो आदमियों ने हमारी हिंदी अंग्रेजी मिली बातें सुनी थी और उन में से एक की खासतौर में खोपा की दिलचस्पी थी । दोबारा हम ना आज के लिए उठे तो उसने बडी सभ्यता से रूपा से नाचने के लिए कहा । रूपा जी से पहले वाले लडके के चले जाने का बेहद अफसोस हो रहा था । छूटते ही तैयार हो गयी । लडका उसे स्टोर पर ले जाने लगा तो रूपा ने अपने सैंडल उतार दिए और स्टॉकिंग्स के साथ ही नाचने लगी । संगीत वैसा ही खुशनुमा और मस्त करने वाला था । रूपा खोले मटका मटकाकर टाइपिस्ट करने लगी । रूपा के जिस्म की रग रग में उन्मुक्त उछाह टपक रहा था । बिना शराब ये मस्ती में झूले जा रही थी । कुछ देर बाद उस लडके ने भी उसे बाहों में गिरा और वे सात सटकर नाचने लगे । यू यह लडका पहले वाले से कुछ बेहतर लगता हैं । कम से कम पहले वाले की तरह इनकी आंखें रूपा को कच्चा चबाने पर उतारू नहीं थी । जब संगीतकारों ने ब्रेक लिया तो रूपा उसी लडके से बात करने लगे । इतने में एक और लडका जो दूसरे वाले लडके का दोस्त था । रूपा से कहने लगा मेरा नाम जॉनी है । युवा ब्यूटीफुल ॅ हाँ, ऍम रूपा हमारी और देखकर मुस्कराई । उसकी आंखें मानव कह रही थी । इस बार की रानी तो मैं ही हूँ । रात तीन बजे तक यही सब चलता रहा । चलने से पहले रूपा ने दूसरे वाले लडके के साथ टेलीफोन नंबर पदों की अदला बदली कर ली । चलते वक्त में है । आदमी बोला था शूटआॅफ मुझे उस आदमी के संजीदा वाक्य पर हंसी आ गई । अभिषेक मेरे भाव को समझता हुआ बोल उठा रूपाजी इस आदमी ने सच में अगर आप को फोन किया आपके घर पहुंच गया और वहां भक्तों की भीड देखी तो सोचेगा कि आपके लिए ही लगी होगी सारी लाइन को । रूपा ने इसे और ही तरह से लिया और बोली तो हमारे नहीं नहीं लग सकती । लाइन क्या हम किसी बाबा से कम है? रूपा का ऐसा बर्ताव कम से कम मेरे लिए तो कुछ नया ही था । अब तक बाबा जी को लेकर ज्यादातर उद्गार उनकी प्रोटेक्शन या उनके प्रति रूपा के प्रोटेक्टिव गांव में जुडे होते थे । पर अब रूपा के जुबान में बाबा जी को ही चैलेंज कर देने के तेवर थे । यू बाबा जी का प्रतिरोध तो वह करती रहती थी और के सामने भी करती थी । लेकिन उसके बोल में बाबाजी के प्रति इज्जत का भाव निश्चित रूप से बना रहता था । आज के बोलने में सिर्फ एक दूसरा मोर्चा संभालने का चैलेंज करता हूँ । यू तो बाबा जी और रूपा का किसी ने किसी बात पर खटपट या बहस या ऊंची आवाजों में तकरार उनके घर में आने जाने वालों से छिपा नहीं था । आए दिन कुछ न कुछ प्रकट में सबके सामने ही होता है और उस जगहों का मुद्दा इतना मामूली होता कि उस पर हंसी और तरफ तो एक साथ ही आते हैं । बाबा जी के मानव पन पर उसने भी कईयों के अंतर अंगों में भर जाता हूँ । उन्हें उसमें कृष्ण और राधा की शिकवे शिकायतों से भरी नटखट लडे फोकस मरन आता । कुछ लोग तो यह भी कह डालते की रूपा भी शायद अनबिया ही है या किसी दूसरे की पत्नी बाबा जी उसे बंगाल आए हैं लेकिन अपने कहीं पर उन्हें खुद भी पूरा विश्वास नहीं था । बस वे उनके आपसी जगहों के चस्के लेते । बाबा जी को जिस के घर जाना होता, रूपा भांजी मार कर बैठ जाती है । कभी तबियत खराब होने का बहाना होता, कभी किसी दूसरे का काम जब रूपा को मनाने से उसका भाव तो खास बढ गया होता और वह सबके आकर्षण का एकदम केंद्र बंदी बन चुकी होती है । तब है अपनी सार्वभौमिकता । यह कहकर जताती ठीक है हम चलेंगे लेकिन हम ऐसे ही चलेंगे । किसी के घर जाने को तैयार होने के लिए मेरे पास वक्त नहीं और मैं अपने दिनभर के पहले लंबे चोडे में ही चल पडती है । एक बार तो करीब डेढ सौ लोगों की एक शानदार पार्टी में किसी पंजाबी में बाबा जी को लोंग आइलैंड पर बुलाया था । वहां सबको एकदम बढिया चमक दमक के साथ सजा देखा । रूपा सहसा आपने चौदह के प्रति आत्म सजग हो उठे । बस घोषणा कर दी की तबियत खराब है और पार्टी का पूरा वक्त मेजबान के बैडरूम में लेटकर बिता दिया । जयंत और विभूति को भी हमारी पार्टी के दौरान रूपा की सेवा टहल में ही रहना पडा । वे भी उसके पैर सहलाते बेडरूम में ही बन रहे और वहीं से आदेश देते रहे की रूपा यह नहीं खाएगी । वह नहीं खाएंगे । उनके लिए अभी बाजार से सलाह लाया जाए और वहीं पकाया जाये । डेढ सौ लोगों की पार्टी के काम के बराबर की मांग करने वाली इस बैडरूम पार्टी ने मेजबान की खासी भूतनी उमा दी थी । जयंतो कुछ देर बाद बाहर आ गया था और पार्टी में घुलने मिलने लगा । विभूति पल भर को भी बैड रूम से बाहर नहीं निकली । कुछ नया जानने वाले लोगों ने तो विभूति को रूपा की तनख्वा सुधार आया ही मान लिया था । मुझे माधव का ध्यान आया और मैंने छोड दिया । आया काम ऍम आया युवक रूपा बीमार भी रहने लगी थी । भारी भरकम शरीरों को रोक योगी जल्दी लग जाते हैं । बैठे बिठाए खाना, कारों में घूमना रूपा को हाई ब्लड प्रेशर की शिकायत होने लग गई थी । शायद उसका गुस्सा भी अब इसलिए तीखा होने लग गया था या खुदा जाने गुस्से की वजह से हाई ब्लडप्रेशर हो गया हूँ । फिर यह कार्यकारण संबंध तो डॉक्टर ही जाने । मैंने तो उसका असर ही बार बार देखा और हर बार वह पहले से ज्यादा बैंकर होता हूँ । बाबा जी और उनकी सारी प्रचार रूपा से डरती थी । कभी भी कोई भी उसके गुस्से का निशाना बन सकता था क्योंकि इस नए असम या घर की मालकिन मैं खुद थी । इसलिए पहले की तरह घर की मालकिन तो अब उनके गुस्से की आग में सामग्री बनने के लिए मौजूद थी नहीं । इसलिए बाबा जी जो भी भक्त करीब आता उसे उस क्रोधाग्नि में अपनी परीक्षा देनी पडती थी । वहीं रूपा के सबसे ज्यादा करीबी थे । उनके व्यक्तिगत काम भी वही संभालती थी । कपडे प्रेस करना या अलमारियों में तय कर कर रखना, बाल बनाना क्या रूपा के दुखते कंधो के मालिस करना या उसका हमेशा का दुखने वाला सिर्फ रवाना इस सारे काम विभूति ही करती है । इधर विभूति को अपने घर और नए खुले रस्सों की देखभाल भी करनी होती है, पर वह किसी तरह घर और बंदे के बीच काम निपटाकर रूपा के टहल में पहुंची जाती हूँ । एक दिन मैंने देखा । बाबा जी के पास उनके मंदिर में बैठी थी । दरवाजा बंद था । बाबा जी और विभूति दो ढाई घंटे वहीं मंदिर में रहे । हम बाहर बैठे दरवाजा खोलने का इंतजार करते रहे थे । विभूति बाहर निकली तो मैंने गौर किया कि उसकी आंखें सूजी हुई थी । बाद में पता लगा की रूपा ने उसे बहुत सारी कडवी बातें कही थी । इसके बाद कई बार ऐसा हुआ कि विभूति रूपा की बजाय बाबा जी की जगत में घंटों बैठी रहती । अक्सर बाबा जी के साथ अकेले में और कभी दूसरों की उपस् थिति में देर रात तक निष्पन्न से बाबा जी के पास बैठे ही रहती है । उसका घर लौटने का मन ही नहीं करता हूँ । अक्सर जयंती उससे घर चलने का इसरार करता रहता है और वह उससे जब तक डाल सकती डालती रहती । कहीं मुझे लगता की रूपा की बढती हुई चीज और घुसों की जडों में कई कई तरह के पानी खाद पढ रहे थे । बाबा जी को लेकर उसके मन में स्वीकृति अस्वीकृति का द्वंद एक तरफ था । उनके भक्तों के प्रति सहनशीलता और असहनशीलता की कशमकश । एक दूसरा पहलू और इन सबसे बढकर कुछ और चीजें भी रूपा की जिंदगी में घट रही थी तो शायद उस खाद पानी में कितने नए किस्म का रसायन था कि बिना एहसास रूपा के भीतर एक तरह का रासायनिक असंतुलन पैदा कर रहा था । मुझे इस असंतुलन का करीब से ऐसा उस रात हुआ जब की एक रात बाबा जी के पास पूजा के लिए जाते हुए अभिषेक मुझे भी साथ ले गया और क्योंकि उस रात काफी लोग वहाँ रुके हुए थे । बाबा जी ने मुझे रूपा के कमरे में ही सो जाने का आदेश दिया । रूपा ने घर भर के फोन डिस्कनेक्ट करके अपने ही कमरे में रख लिए थे । रात भर या तो विरोधियों से फोन करता रहा, क्या मैं उसे नंबर डायल कर देती? घंटों फोन पर उससे बात करती हैं, उन पर से सकती । बस यही कहती रहती मेरा कत्तई मन नहीं लगता, यहाँ तो मैं आ जाओ ना । अब तो नवरात्र भी आने वाले हैं । बहुत बडी पूजा होगी । तुम आ जाओ ना, वरना बिल्कुल अच्छा नहीं लगेगा । मुझे बच्चे भी बहुत याद आती हैं । उन्हें लेकर आ जाऊँ या मुझे वो लालू पता नहीं कैसे कैसे लोग हैं । बाबा जी को तो लोगों से गिरा रहना पसंद है । मेरा मन करता है बस सब कुछ छोड छाड के निकल जाऊँ । बच्चों से बात करो ना मेरी सच में बेहद मिस करती हूँ । तुम्हारी पत्नी को मैंने वचन दिया था तो हमारे बच्चों का मैं खुद ध्यान रखूंगी । बच्चे भी फोन पर रूपा से बातें करते रहते हैं । बच्चे भी फोन पर रो रुपए कमा आप आ जाइये ना । मैं जो सोने की कोशिश कर रही थी, बार बार रूपा के असूम भेजे । उद्गारों द्वारा जगह जाती रही । यू रूपा तो मुझे सोया ही समझ रही होगी । मैं नींद में भी सुनने से होकर उसके उद्गार पहचानती रही । रुपए सच में बच्चों को मिस कर रही थी या खुद हिरोनी को दे उसके अपने भीतर यह बात मानने का कभी अहसास होगा या की मैं ही फालतू के दुखने लगा रही हूँ । मन में कहीं घबराहट से हुई कि क्या बाबा जी को अंदाजा होगा? उसकी पत्नी की जिंदगी में क्या घट रहा है पर उससे ज्यादा घबराहट मुझे अपने आप को लेकर होने लगी । क्या मुझे खुद पता है की मेरी जिंदगी में क्या घट रहा है या की? अभिषेक को अंदाजा है कि उसके जीवन में क्या घट रहा है । एक व्यक्ति हम सबकी जिंदगी को इस तरह चलाया जा रहा है और हम इस तरह से लाचार और पर बस हो गए हैं कि कुछ नहीं कर पाते और मुझे खुद में कुछ होश बच्चा है तो अभिषेक को तो मैं इस दलदल से नहीं निकाल पाती । मैं आखिर मुझे क्या हुआ है? मैं तो पूरे होश में हूँ । मुझे अच्छी तरह मालूम है कि यह व्यक्ति मेरी डायबिटीज कत्तई ठीक नहीं कर सका, लेकिन फिर भी उसके द्वारा दिया गया तथाकथित मन्त्रपूत जी बिला नागा मैं हर रात ना बी में लगाकर सोती हूँ तो इसका मतलब क्या है? क्या मैं खुद विश्वास विश्वास की रस्सी पर नहीं बोल रहे हैं? पर मैं ऐसा क्यों कर रही हूँ? तो मैं उस मन्त्रपूत भी की बोतल को उडे में नहीं फेंक । पति तो मेरे लिए एक पवित्र और मानने वस्तु बनी हुई है । मुझे याद है बचपन में मुझे एक बार बिच्छू ने काट खाया था । मेरी टांग में जहर ऊपर तक चढाया था । ऐसा तीखा जहरीला दर्द उस नंदनी से उम्र में मेरी बर्दाश्त के बाहर था । रात ही रात में कोई झाडफूंक वाला बुलाया गया था । पता नहीं कैसे सच में जैसे जादू से दर्द फिसलकर बाहर उत्तर आया था । किसी खंबे पर पानी उन तो तो एकदम बाॅम्बे पर से फिसलता हुआ नीचे आ जाता है । वैसे ही मंत्र भी दर्द को फैसला था । हुआ एक दम पैर के बाहर लाकर जमीन में गाड गया तो मैं उठी तो उस प्रक्रिया की हल्की हल्की सुखद याददाश्त भी थी । अब जैसे किसी याददास्त क्या किसी बडे विश्वास का आधार भी बन सकती है । लेकिन मैं झाड फूंक जैसी सामान्य शल्य चिकित्साओं को किसी बडे रहस्यात्मक अस्तित्व से जोडकर क्या गलती नहीं कर रही है? और उस बडे रहस्य की मैंने स्टेशन यही छोटी छोटी प्रक्रियाएं ही तो हो सकती है । वही तो उस बडे तक पहुंचने का रास्ता है । तब मैं क्या करूँ या अभिषेक को उसकी खोज करने दो । और अगर वह असफल होता है तो उसे उस और जाने देने का दायित्व बीवी रही होगा । और अगर मैं नहीं जाने देती तो वंचित करने का दायित्व भी तो मेरा ही है । लेकिन सफलता की बात में सोच रही हूँ । खोज तो कुछ पाने के लिए ही थोडी की जाती है । कुछ नये पाना भी तो खोज का परिणाम हो सकता है । बात तो परिणाम तक पहुंचने की प्रक्रिया है, पोज की प्रक्रिया से गुजरने की है लेकिन उस प्रक्रिया से गुजरना ही शायद महंगा पड सकता है । व्यक्ति पर जो कुछ घटता है, मैं उस प्रक्रिया के दौरान ही तो घटेगा । तब क्या उस खतरे को उठाना सही फैसला हो सकता है? यदि इस प्रक्रिया के दौरान ही कुछ अन् चाह कट जाए तो मन इतना घबराता क्योंकि सदियों से इंसान धर्म का आश्रय लेकर जिंदगी गुजारता रहा है । मुझे क्यों लगता है कि वह मुझे असली जिन्दगी से वंचित कर देगा? क्या मेरा यह घर मेरी आधुनिकता का आग्रह हैं या की मेरी इंसानियत का यानी कि इंसान का इंसान की तरह जी पाना लेकिन कब जी पाया है? इंसान सिर्फ इंसान रहेगा । धर्म, समाज, सभ्यता की इन तोपों को आखिर उसने अपनी खुशी से ही अपनाया है । वरना पांचों तत्वों के बने जिस्म पर धर्म की छाप तो कहीं लगी नहीं । तभी तो समाज को व्यक्ति को दूसरा जान देना पडता है । धार्मिक जन्म यानी कि ब्लॅक जैसे उदाहरण । अभिषेक मुझे कुछ समझ नहीं आता तो मेरो को या जाने दो मेरे रोकने से भी तुम कौन सा रुक होगी । फिर भी मुझे तो मालूम होना चाहिए ना कि मुझे क्या करना है, कौन बतलाएगा मुझे क्या करना है? क्या बाबा जी या रूपा बताएंगे? क्या वे भी दो भटके हुए इंसान नहीं है? अगर मैं बाबा जी का विश्वास कर भी लूँ कि उनमें सद्भावना हैं और वे जो कुछ करते हैं, दूसरों के भले के लिए । तब क्या वे खुद अपने आप को धोखा नहीं दे रहे हैं? क्या यह सच में यह मान सकते हैं कि उनमें कोई देवी शक्ति है तो दूसरों में नहीं? जितने आत्मविश्वास से वे दूसरों को आशीर्वाद देते हैं, उससे तो कहीं लगता है की अपनी देवी शक्ति में उन्हें अटूट विश्वास है । और अगर नहीं है तो फिर यह बहुत बडी जालसाजी है और जो जालसाज होगा आत्मविश्वास । कम से कम कार्यात्मक ऑप्रेशनल आत्मविश्वास तो उसमें भी होगा, वरना मैं सफल जालसाज कैसे बनेगा? लेकिन जालसाजी के बूते पर इतनी बडी प्रजा कैसे अनुयायी बन जाती हैं? कई लोग फंसे बाबाजी के प्रति स्नेहशील थे । अपने बारे में चाहे नए कह सकूं, पर अभिषेक के मन में भी उनके लिए स्नेहभाव है । बाबा जी सबको अपनी अपनी जगह जय महसूस करा देते हैं । उनके लिए वे विशिष्ट है । अभिषेक को बाबा जी कहते हैं । आप के प्रति मेरे मन में विशेष हैं । आप हमें शिष्य रूप में भी सुपात्र लगते हैं और मैंने उन्हें और उसे भी इस तरह की बातें कहते हो ना । जैसे कि जयंत को उस दिन कह रहे थे जब तक आप नहीं पहुंचेंगे, हम तो आरती भी नहीं शुरू करेंगे । आपके बिना आरती कैसे हो सकती है या विभूति से? यह कहना तुम तो अन्नपूर्णा हो तुम्हारे जैसे बढिया खाना और कोई नहीं बना सकता है या खुद मुझसे ही एक बार उन्होंने कहा तुम्हारी जी वहाँ पर तो सरस्वती बैठी है ना, बहुत सुन्दर बात कर लेती हूँ । जब की मैंने बाबा जी से कभी कोई खास बात नहीं की, पर जिसकी जो भी विशेषता उन्हें देख के आती है, उससे पहचान कर व्यक्ति के साथ एक अंतरंग नाता जोड लेते हैं । अभी उनका चाहते हैं उनकी तीखी इंसानी व्यवहार की समझ या उनकी डिप्लोमैसी कहलाया जाना चाहिए या उनकी दिव्यदृष्टि । यह दर्शक श्रोता के अपने विश्वास विश्वास पर ही मुनासिब था । एक और अंतरंग नाता वे अवचेतन के स्तर पर हर भक्त के साथ जोड लेते थे । बोलते तो जो भी भी बहुत कम थे, किंतु उतना कि जिसके बिना काम ही नहीं चल सके । लेकिन अपने अंतर को भेज जाने वाली गहरी काली दृष्टि से सबके अंतर्मन की सबसे निचली तहों तक पहुंच जाते हैं । हर व्यक्ति पर अपना सारा विश्वास नहीं । अच्छा वर्कर मान के सारे डर, डर, हम इच्छा, अनिच्छा, आकांक्षा, महत्वाकांक्षा उन पर लाख देता हूँ । जब कि यह नाता एकतरफा ही था क्योंकि अपने सारे भेद खोल देने पर भी तो बाबा जी तो उनके लिए रहस्यमय ही बने रहते हैं जबकि वे खुद भेद खोलकर कहीं कमजोर और नंगे हो जाते हैं जिससे बाबा जी पर उनकी निर्भरता भी बढ जाती है । बाबा जी इस प्रक्रिया से पूरे वाकिफ थे और मुझे लगता है कि वे इसका फायदा भी उठाते थे । आदमी उन्हें जितना भी ज्यादा कमजोर देखता हूँ, वे उतना ही इसमें और सहारा देकर अपने कब्जे में करने की कोशिश करते हैं । इसी दौरान रूपा उनके सामने अपनी आर्थिक जरूरतों को पेश करती और स्वयं उनकी आर्थिक मांगों को बाबा जी की कृपा के सामने बेहद छोटा और कुछ मान कर अपना सर्वस्व लुटाने को तैयार हो जाते हैं ।

इतर भाग 13

बहुत तेरह । कुछ अरसे बाद ये लुटाने वाले बाबा जी की ओर से कुछ ठोस आधार पाकर अपना हाथ कुछ पीछे हटा लेते और इससे अब बाबा जी को इतना फर्क नहीं पडता क्योंकि एक तो मैं पहले ही अपने सामर्थ्य से बाहर जाकर दे चुके होते और दूसरे अब तक कोई और नए पंछी दाना चुग रहे होते हैं । बाबा जी की आत्म लाभ का चक्र तो स्थाई रूप से घूमता रहा तो यह भी मुमकिन है कि कुछ लोग जिंदगी भर उस स्थायी रूप से घूमने वाले चक्र की स्थायी दूरी में बने रहे । आखिर बाबा जी अगर इतने सालों से कारोबार चला रहे हैं तो कम से कम स्थायी तारीख तो होंगे ही । उसके चक्र में क्या यह भी कहना मुमकिन है कि तार टूटने लगती हो तो बाबा जी खुद ही उसकी मरम्मत कर दें या किसी दूसरी तरफ से जोडकर उसे दुरुस्त कर दें । क्या मैं खुद वैसा तार नहीं हूँ? सन्देहों से टूट टूट कर भी जो उस चक्र की गति में अपना पूरा योगदान दिए जा रहा है । लेकिन मैं मैं खुद तो कहीं अभिषेक की वजह से ही नहीं जाती । अभिषेक का यह ना संसार कहीं उससे मुझ से दूर नहीं लिए जा रहा है उसे पकडे रहने के लिए, उसे अपना बनाए रखने के लिए । क्या उसके संसार से मेरा परिचय अनिवार्य नहीं हो जाता है । लेकिन क्या पता इसी तरह से खुद मुझ पर भी कोई धुंध छा जाए और अपने आप को मैं खुद भी पहचानना सकूँ क्या या खतरा मुझे अपने लिए लेना चाहिए पर किसी की कोई अमूल्य वस्तु खाई में गिर जाए तो उसे पाने के लिए खाई में तो उतरना ही पडता है । बस नहीं तैयार ना मैं भूल जाऊँ या कहीं कोई खतरनाक जीव मुझे भी लील नहीं ले । क्या मैं अभी से कोई दलदल से कभी बाहर नहीं निकाल पाउंगी? कहीं से किताब मेरे हाथ लगी है । दरअसल मेरी एक सहेली नहीं मुझे भेजी है । शायद हम दोनों की आंखें खोलने के लिए किताब का शीर्षक है । फिल्म फिल्म किताब में ऐसे ही जादू मंतर से इलाज करने वाले साधुओं का चिट्ठा खोला गया है । लिखने वाला फिलिपीन और दूसरे एशियाई देशों में घूम चुका है और इस विषय पर उसने अपनी तरह की ही खासी खोजबीन की है । उसका कहना है कि यह सब एक हाथ की सफाई है । उसने बताया कि किस तरह झूट वूट का खून दिखाया जाता है और कैसे चालाकी से पास खडे लोगों की आंखों में धूल झोंक दी जाती है । बाबा जी के ऑपरेशनों के बारे में भी मैंने खासा सुन रखा था । एक बार मैंने भी उन्हें गुलाब की पत्ती से मास्को चीरकर खूल निकालते देखा था और मुझे चीजें का कुछ पता नहीं लगा था । उन जरूर देखा था । मरीज को भी कुछ महसूस नहीं हुआ था । यही बाबा जी का कथन था कि बिना दर्द के ऑपरेशन होगा । बाबा जी से मैं सवाल पूछ लेती थी । उनका जवाब होता था, हम तो लोगों को बुलाते हैं । वे ही सब कुछ कर डालती हैं । तुम तो मुझे ऑपरेशन करते देखती हूँ पर वहाँ मेरा शरीर होता है रूको शरीर का माध्यम चाहिए । मैं काम करने के लिए मैं माध्यम बन जाता हूँ वरना मैं तो पढा लिखा भी नहीं । मुझे कहाँ कोई डॉक्टर ही आती है । यह सब तो देवी की कृपा से होता है । जिस के घर पर कोई मुसीबत होती है, बिजनेस में घाटा पड रहा होता या कोई विपदा होती बाबा जी कहते उस व्यक्ति के घर में शायद कोई हानि कारण हीरो है । इस तरह बाबा जी इस व्यक्ति के घर पर जाते । शीशे के गिलास में पानी भरकर कमरों में घूमते और जिस कमरे में उन्हें पीडित होने का महसूस होता वहीं रुक जाते हैं । कुछ पल में उनके हाथ की इलाज के पानी में उनका क्लॉट्स झलकने लगता है । फिर भी गिलास को उसी कमरे में एक मेज पर टिकाकर बाहर इंतजार करते हैं । घंटे आधे घंटे में पडे पडे खून का कॉर्ड कुछ और बडा हो जाता । बाबा जी कहते कि यही तक का रूप है । बडी सावधानी से वे उसे आश्रम में ले जाते हैं और कभी कभी ये ग्लास मंदिर में रख देते । मंदिर में रखने का मतलब होता है की ये उसे स्टडी करना चाहते हैं यानि की किसकी रूप है । जीवन में क्या ऐसी थी अभिषेक की बाबू जी में इस पूरी इन्वॉल्वमेंट को लेकर अपना दोहरा मैं अपनी एक पूरी तरह से नासिक फोन जमीन पर खडी बडी दुनियादारी और बुद्धिमान सहेली के सामने रोया करती थी । तभी उसने किताब खोजकर अभिषेक को पढाने के लिए मुझे दीप पर जब मैंने अभिषेक को दी तो किताब के स्लैब को पढ और किताब को कुछ उलट पुलट कर बोला यह क्या बकवास है । इसमें लिखा है कि फीलिंग वगैरह सब मैजिक है और उसमें किताब में प्रमाणों के साथ इस बात को साबित करने की कोशिश की है । पर किताब मुझे खुद कन्विन्सिंग नहीं लगी थी । अभिषेक को क्या समझती है? मुझे पहले से पता है इस किताब का । पर ये है उन झूठ चोर उचक्कों किस्म के साधुओं के बारे में हैं । जैन लोगों तक वहाँ पहुंच ही नहीं पाया । फॅस तुम्हारे पास क्या सबूत है कि बाबा जी जनून है । मेरा दिल कहता है कि इसके कहने पर मैं ज्यादा विश्वास करूँ । दिल से ज्यादा कोई और सच कह सकता है । उस आदमी से मेरा दिन रात वास्ता पडता है । अगर तब भी उसको विशेष शक्तियों पर मेरा विश्वास बना हुआ है तो और किसी से पूछने की मुझे क्या जरूरत है? पूछो तो तब ना अगर मुझे कोई शक हूँ लेकिन अभी मुझे मालूम है तुम क्या करोगी? तो फिर से यही दौरा होगी कि मैं अपना वक्त जाया कर रहा हूँ । घर में कमाई नहीं आ रही । मैं पूछता हूँ कि मैं सारी उम्र आखिर कमाता ही रहा हूँ और जिंदगी में मैंने क्या ही क्या है । अगर अब जाकर जिंदगी में कुछ सच सामने आया है । ऐसा व्यक्ति किस्मत से मुझे मिला है जिससे मैं शरीर की जरूरत से ऊपर उठकर कुछ सीख जान सकता हूँ तो तो मैं इससे आपत्ति क्यों होती है तो मैं भूखा तो नहीं मारा । मैं तुम्हारे प्रति अपने कर्तव्यों को भी निभाया ही है । मैंने अगर मैं अपनी आत्मा की उन्नति के लिए कुछ करना चाहता हूँ तो क्यों इसे तुम वक्त जाया करना कहती हूँ जिससे तुम आत्मन् होती कह रहे हो । मुझे डर है कि वह शायद अपने आप को धोखा देना है । सच को नए समझकर उस पर पहुंचा मारना है यह तुम्हारी जुबान नहीं । अल्पना यह तुम्हारी उस सहेली तुम्हारा मतलब क्या है? जो मैं कुछ महसूस करती हूँ, वही तो कह रही हूँ और उस ने ऐसा कहा भी हो तो गलत क्या है? मैं वन नंबर की स्वार्थी और कठोर लडकी है, पर साधना के सिवाय उसने क्या ही क्या है? तो आत्मोन्नति को तुम स्वार्थ साधना कहती हूँ । तब तुम्हारा अपने बारे में जिस आत्मोन्नति की तुम बात कर रही हो ना करियर अचीवमेन्ट ये सब स्वार्थ साधना नहीं तो और क्या है? तो अब तक और क्या अब तक मैं सौर सर ना ही तो करता हूँ । अगर मैं अपने से ऊपर उठकर कुछ लोगों के लिए कुछ करना चाहता हूँ तो तुम उसे आत्म प्रवंचना, लेकिन परोपकार किसका हो रहा है? हाँ, हम सोचते हो वृद्धि को लेकर तुम लोगों का मंत्र बाल से इलाज कर लोगे, उनके दुख दूर कर दो । हो गए । इतना कुछ भला बाबा जी ने खुद किया है । मेरे तुम्हारे दरवाजे पर क्यों नहीं होते हैं? क्योंकि यह है ना, वरना क्यों सौ सौ लोग उनके दरवाजे पर खडे रहते हैं । अभिषेक के जिद्दी तर्कों का जवाब देना मेरे लिए मुश्किल हो जाता था । मुझे गुस्सा आ गया । फिक्र मत करो, शिक्षा चल रही है ना तुम्हारी तुम्हारे दरवाजे पर भी ढेरों लोग खडे होंगे । अब हकीम का पेशा करना तो क्या बोला है? पहले भी तो हाँ की नहीं करता था । सॉफिस्टिकेटेड नाम देने से पेश थोडी बदल जाता है तो तुम सच में हकीमी की ही सोच रहे हो । अल्पना मुझे पुश मत करो । आखिर में वही कर रहा हूँ जो मेरा अंतर कहता है । इतनी उम्र हो गयी । पहली बार तो मैंने अंतर की आवाज सुनी । अब जब सुन ली है किसी ने कृपा करके मुझे सुनवा दी है तो अब मैं उसे अनसुना कैसे कर दूँ? मुझे समझ नहीं आता कि आज मैंने अपनी जिंदगी का रास्ता बदल दिया है तो तुम्हें उसमें क्यों आपत्ति होती है? तो मैं तो बस एक ही फिक्र है ना कि है जमा पैसा खत्म हो जाएगा तो तुम खाना कहाँ से होगी? क्योंकि मैं अब तुम्हारे लिए दिनभर खट नहीं रहा और सोचो बाबा जी भी तो अच्छा खासा रह रहे हैं । खा पी रहे हैं तो हम क्यों कर भूखे मरेंगे । जब ईश्वर की कृपा रहेगी तो सब काम ठीक ठाक होंगे । यह घर नहीं भी होगा तो किसी छोटी जगह शिफ्ट कर लेंगे । जिसने पैदा किया है तो पालना भी तो उसे ही है । अ विषय की ये सारी बातें मेरे खून को जला जला कर रात बना रही थी । उसने मुझे कितना स्वार्थी समझ दिया है जैसे कि मुझे सिर्फ अपने खाने रहने की ही फिक्र, वो मेरी बाकी किसी बात को तो मैं समझना ही नहीं चाहता हूँ और जवाब देता है किसी और के तक इयान उसी तर्कों से ये तर्क जो हिंदुस्तान में हर आदमी सदियों से देता है जिनका कोई तार्किक आधार ही नहीं । फिर भी उनमें कनविक्शन का ऐसा जो रहता है कि मेरे सुलझे सोचे समझे तरफ भी कुल हथियारों की तरह बेकार हो जाते हैं । पैसा मुझे लगा की तरफ से शायद अभिषेक को समझाया नहीं जा सकता क्योंकि वह खुद तर्कशक्ति से काम नहीं ले रहा क्या लेने में लाया की नहीं रहा । उसके भीतर बसा बाबा जी का भक्त अब तक कैसे सुन सकता है? तरक्की बात होती तो क्या रोगों से काम करने की वे सारी बातें उसे अजीबो गरीब नहीं लगती? मैंने सहसा पूछ डाला, तुम तो रोज होते हो पूजा में क्या तुमने भी देखा है? लोगों को रोगों को तो देखा ही नहीं जा सकता । महसूस किया है । मैंने खुद महसूस नहीं किया । लेकिन बाबा जी बता देते हैं कि वह कमरे में आई थी । क्योंकि पूजा में जब ये सवाल लगते हैं तो मैं जवाब लेकर आती हैं, लेकिन तुमने खुद कभी महसूस नहीं किया । शायद नहीं तो क्या? तो मैं सिखाया नहीं । बाबा जी ने रोगों से काम लेना सिद्धि कैसे मिलेगी? लोगों को बस में लाना बडा मुश्किल काम है । उन्हें ठीक से हैंडल करना नहीं आता हूँ तो वे अटैक करके तुम्हें ही खत्म कर देगी । बाबा जी अभी मेरे साथ ऐसा खतरा नहीं लेना चाहते हैं तो पहले मुझे सामान्य किस्म के दर्द ठीक करना सिखाएंगे । अभी तो मैं मंत्रों का ही सही उच्चारण मैंने बात काट दी थी । तब से बस तो मन त्रिपाठी किए जा रहे हो फॅस । जिस विद्या को इस व्यक्ति ने अपना पूरा जीवन देकर पाया है तो तुम समझती हूँ कि वह छह महीने में मैं पूरी तरह से जाऊंगा । आखिर मुझे भी तो वक्त लगेगा तो कितना वक्त लगाना है । जितना भी यानि कि नहीं । अभी कुछ और देर तो देखूंगा जब तक बाबा जी कहेंगे । फिर अगर अपनी बदकिस्मती से मैं कुछ भी नहीं सीख पाया तो देख लूंगा । तब अपनी डॉक्टरी प्रैक्टिस पर वापस आ जाओ गए । हाँ, मैं तो सारी उम्र लगाकर मैंने सीखा ही है, उसे तो कभी भी दोबारा शुरू कर सकता हूँ । उस रात अभिषेक जब पूजा के लिए चला गया तो मैं सारी रात जगे, उसी के बारे में सोचती रही । मन में ढेर सारी गुंजने पडी हुई थी । यह सब क्या हो रहा है? मेरी जिंदगी में जैसे छोटे से कौतूहल की तृप्ति के लिए ही अपना लिया था । आज वही मेरा गला दबोच रहा है । क्या अभिषेक कभी लौटेगा? क्या ये जिंदगी उसके बिना ही बितानी होगी या की मैं भी उसके साथ ही हूँ । पर जिस विश्वास के साथ मैं नहीं रह सकती, जिसे उठाते ही हाथ में ढेरों कीडे भी साथ चढाते हैं, उनका अपनी हस्ती पर रेंगना पाला कैसे सहता होंगी? लेकिन अभिषेक में ऐसा बदलाव क्यों कराया है । क्या पहले से ही उसके भीतर कुछ काट रहा था, जैसे मैं देख नहीं पाई । क्या अभिषेक भी इस तेज गति से बहने वाली जिंदगी से ढकने लग गया था, जिसे मैं अपने रोजाना के छोटे छोटे सुखों में डोभी मैं महसूस नहीं कर पाई । शायद उसे भी कुछ आराम चाहिए था । जिंदगी की मंथर गति से बहने वाली धारा, जिसमें वह नहाकर अपनी खींची हुई मांसपेशियों को कुछ सहला देता । आखिर जब से वह इस देश में आया है, लगातार काम ही तो कर रहा है पहले रेजिडेंसी के दौरान रातो रात का खाना, फिर प्रैक्टिस दिन रात काम ही काम पैसा शॉपिंग डिनर सोशल लाइजेशन बस इन्ही दूरियों पर घूमती जिंदगी आखिर है क्या? जिंदगी में जिसके साथ में चिपका रहे । फिर बाबा जी में शायद उसे एक अंतरंग मित्र मिल गया है । एक बाबा जी ही तो उसे हरदम बुलाते रहते हैं और किसके पास फुर्सत है यहाँ डिनर या लंच सात खा लिया । बस कितनी दोस्ती की परिभाषा रह गई है हमारे समाज में बाबू जी और रूपा के व्यवहार में जो एक सहजता है, स्पोर्ट यूनिटी है, क्या वह कहीं भी किसी भी व्यक्ति में मिल सकती है? इस देश में यहाँ आने वाले हिंदुस्तानी भी तो अपनी स्पाॅट देते हैं । तब बाबा जी को लेकर अभिषेक का रेस्पॉन्स नहीं, उसके भीतर के अकेलेपन को भरना ही तो नहीं । एक बडी सहज स्नेह मई जिंदगी जहाँ किसी को जल्दी नहीं, किसी को कोई हडबडी नहीं । बस आश्रम का मंदिर का शांत माहौल । अगले दिन अभिषेक मेरे लिए किताब ले आया । ये अमेरिका में प्रैक्टिस करने वाले एक हिंदुस्तानी डॉक्टर की अमेरिका में ही छपी किताब थी । इसमें उस डॉक्टर ने झाडफूँक, बेड, हीलिंग और कैंसर जैसे रोगों के मंत्रों द्वारा इलाज को वैज्ञानिक आयाम और आधार देने की कोशिश की थी और इन्हें विश्वसनीय बताया था । मैंने भी किताब को उसी तरह उल्टा पुल्टा जैसे अभिषेक ने फिलम सलाम को और एक किनारे रख दिया । मन में सहसा चोट लगी । हमारा आपसी कम्युनिकेशन कहीं खत्म हो रहा था । हम आमने सामने नए होकर दूसरे प्रतीकों का सहारा ले रहे थे ।

इतर भाग 14

बहुत चौदह है । उस दिन जब दोपहर में अभिषेक बाबा जी के पास से लौटा तो छूटते ही बाबा जी का फोन आ गया । एक घंटा सो लीजिए । उसके बाद आप फौरन यहीं आ जाइए । असम के लिए जमीन देखनी है । आपसे ज्यादा रियल स्टेट के बारे में और कौन बेहतर सलाह दे सकता है । इसलिए हमने इन लोगों को बोल दिया है कि हम अभिषेक जी को साथ ले आएंगे । मुझे सुनते ही आग लग गई । रात भर जाकर अब मुश्किल से घर लौटा है तो बाबा जी को उसके आराम का सैनिक भी ध्यान नहीं । मैंने कह दिया मैं क्यों नहीं कर देते इनके लिए अब जान भी दे देनी है क्या? इतना तो ख्याल बाबा जी को खुद होना चाहिए । बाबा जी खुद कहाँ होते हैं जो नींद कम करना उन्हें कोई बडी बात लगे । उनका तो कहना है जितना कम नींद करें उतना ही नींद भर कंट्रोल बढता है । इस तरह व्यक्ति की कार्यक्षमता बढ जाती है । जब अभिषेक हो गया तो मैंने उसे कुछ देर से ही उठाया और मैं खुद भी तैयार होकर उसके साथ चल पडी तो बाबा जी हमारा इंतजार कर रहे थे । कुछ और गाडियाँ भी चलने के लिए तैयार खडी थी, जहाँ हम गए । मैं जगह पहले से ही कोई उजडा हुआ रिजॉर्ट एरिया था । कोई एक गुरु वहाँ रहते थे, जिन्हें मैं जगह दान में मिली थी और अब वे उसका कुछ हिस्सा बाबाजी के आश्रम के लिए किराये पर देने को तैयार थे । कुछ गुरु के पास अपने साधन अब कम थे कि वो खुद जगह को मेन्टेन कर सकते हैं । उन्हें फायदा था कि बाबा जी की लोकप्रियता से खींचे लोग यहाँ इलाज कराने आएंगे तो इस तरह पूछना हुआ दूर तक फैला ऍम फिर से बच जाएगा । पूर्व जी के अपने शिष्य भी शायद कुछ बढ जाए । मुझे सारा बंदोबस्त बडा अजीब सा लगा । बात पट्टी भी नहीं । यहाँ जगह खूब बडी और हरी भरी थी । एकदम जंगलों के बीच शांत और साफ बाबा जी और उस गुरु कि अकेले में बातचीत हुई थी । हम सब बाहर बैठक में बैठे रहे थे । गुरूजी ने रूपा को भी अंदर आने से मना कर दिया था । बातचीत तो हिंदी में ही होनी थी इसलिए रूपा दुभाषिए की भूमिका अदा करने के बहाने भी नहीं जा सकती थी । प्रॉपर्टी पर एक छोटी सी झील हुई थी जो रूपा को बेहद पसंद आई और बाद में मछुआरा करके फैसला यही हुआ कि इस जगह को लेने में शायद बाबा जी उन गोलियों से गौड में हो जाए क्योंकि पहले से आज हम उन्हीं के नाम पर था । नाम बदलने को वो तैयार भी नहीं थे । इसमें तो बाबा जी की बेटी थी ना । बाबा जी बोले अभी नवरात्रों के लिए हिंदुस्तान जाना है, उसके बाद लौटकर देख लेंगे । जयंत बोला हिंदुस्तान नहीं जाने देंगे हम आपको । इस तरह सब को बीच मझधार में छोडकर कैसे चले जाएंगे आप? अभिषेक ने कहा क्या नवरात्र यहाँ नहीं बनाया जा सकते हैं? पंड्या बोला तो नहीं, किसी जगह पर नवरात्र भी बनाकर देख लेते हैं । कहीं है तो गुरूजी से पूछे अगर नवरात्र भर के लिए वे जगह दे दें । बाबा जी ने कहा हाँ, यह विचार तो अच्छा है । ऐसी कोई हमारे जाने की जरूरत भी नहीं । वीजा का इंतजाम भी हो ही गया है । चार महीने का और मिल गया है । जितने बडे पैमाने पर नवरात्र मनाने की तैयारियां शुरू हुई, उसने मुझे हैरान ही कर दिया । दुनिया भर में जहाँ जहाँ भी बाबाजी के प्रिय भक्त थे, उन्हें आमंत्रित किया गया । असम में करीब पांच छह सौ लोगों के रहने का इंतजाम भी आसानी से हो सकता था । रूपा ने पंड्या की पत्नी जीता से कहा, नौ दिन लगातार हवन होगा । उसके लिए नौ मन शुद्ध घी चाहिए । उसका इंतजाम आप कीजिएगा । पाँच इकट्ठे करने का काम रूपा ने खुद अपने ऊपर लिया था । मीटिंग बुलाकर बोली अभिषेक जी, आप और जयंत तो कम से कम अभी दस दस हजार डॉलर दही डालिये, जिससे काम शुरू किया जा सके । बाकी लोगों से इकट्ठा करने का काम मैं विजेंदर को सौंप होंगी । एक कुशल मैनेजर की तरह रूपा ने सबको अलग अलग काम सौंपना शुरू कर दिए । पिरोने को उसने फोन किया । बच्चों को लेकर यहीं आ जाइए और अगर उनके स्कूल का खर्चा होता हो तो उन्हें नानी के पास छोडकर आप अकेले ही आ जाइए । विष्णु से उसने कहा हर दिन कम से कम पांच सौ लोगों के लिए खाना बनेगा । खुद ही में बिना प्याज लहसुन के इसकी जिम्मेदारी आपकी है । चाहे कैटरिंग करवाइए या घर की औरतों से खाना बनवाई । सब लोग रूपा के हुकुम को बाबा जी का हो को मानकर उसके कहे अनुसार कामों में लग भी गए थे । एयर इंडिया में काम करने वाले बाबा जी के भक्तों को हिन्दुस्तान से मंगाए जाने वाले सामान की लिस्ट दी गई । वोटे किनारे दिल की साडिया कलस दीप देवी की वृद्ध आकार मूर्ति और पता नहीं सैकडों किस्म के खाद्य पदार्थ और दूसरी चीजें । नवरात्रों के लिए रूपा ने अपने लिए नौ ही नए परिधान बनवाए थे । गोटे किनारे और जरिये बॉर्डर लगाकर फ्रेंड्स से फोन की अलग अलग रंगों की नौ साडिया कुछ महिलाएं तैयार करने लग गई थी । देवी का परिधान अलग बनना था । आश्रम के लिए ऑडिटोरियम में स्टेज पर देवी का मंदिर बनाया गया । सारे ऑडिटोरिम को चमकीली झालरों के बन्दर वालों से सजा दिया गया । दीवारों, छत, सभी जगह लाल, हरे, सुनहरे और पहले रंग स्टेज के तीनों तरह की दीवारों को लाल सिल के कपडे से मार दिया गया । बीचोंबीच गोटे और सिल्क तथा गहनों से लदी देवी की मूर्ति स्थापित की गई । इसके आगे लाल कपडों से ढके नौ कलश सजा दिए गए । हाल ही में मेवा, इलाइची और ताजे फल तथा नारियल बेशुमार पडे थे । प्रसाद के तौर पर मुझे नवरात्र के नाम पर इतना बडा आयोजन बहुत ही फालतू बात लग रही थी । आखिर इसलिए खास तौर से दस हजार डॉलर देना भी बेहद सुबह क्योंकि हमारे पास पैसे खत्म हुए जा रहे थे । खुल दस बीस हजार ही बचे थे । अब रूपा ने उन का भी सफाया कर दिया । पता नहीं अभिषेक कब अपनी प्रेक्टिस शुरू करेगा । मैं पैसा कहाँ से लाऊंगी । लेकिन अभिषेक ने एक बार भी इस बात का ध्यान नहीं दे । उसी वक्त चेक काटकर दे दिया था । पता लगा नौ दिन बाबा जी का तो बहुत ही रहेगा । देवी के आदेश के बिना जल भी ग्रहण नहीं करेंगे । उन्होंने अभिषेक से कहा कि वह चाहे तो वह भी व्रत कर सकता है । माता की कृपा उस पर भी होगी । देखते ही देखते कितने ही और लोग व्रत के लिए तैयार हो गए । खासकर व्रतधारियों को नवरात्र के दिनों में । वहीं आश्रम में ठहरना था । वहीं काफी छोटी छोटी कॉटेज बनी थी । मैं और अभिषेक भी एक कॉलेज में ठहरे । धीरे के व्यापारी जयंत को देवी माँ को रूपा की सजा के लिए अपनी ओर से धीरे की हार भेंट करने थे । उसने और बेटी ने भी व्रत रखा था । यू बाबा जी ने कह रखा था कि जो लोग निर्जल निराहार नहीं रह सकते, ये फलाहार कर सकते हैं । मैंने भी औरों की देखा देखी पलाहच व्रत का फैसला किया था । यह भी अनुभव रहेगा । स्विट्जरलैंड, जर्मनी और इंग्लैंड से भी बाबाजी के कुछ वक्त आए थे । अपने बीमार बेटे को एक दंपत्ति साथ लाया था । पूजा के लिए तीन पंडित स्थानीय मंदिरों से बुलाए गए थे । ऑडिटोरियम के बीचोंबीच बडा सा हवन कुंड रखा गया था । इसके इर्दगिर्द और सामग्री थी । बाबा जी भी हवन पर बैठते हैं । कभी अपनी कॉटेज में लौट जाते हैं । पर हवन दिनभर चलता रहता है । पुजारी बारी बारी से मंत्र पार्ट की जिम्मेदारी लेते । हवन खत्म होते ही भजन शुरू हो जाता । फिर कीर्तन है । मानस बजरी गुरु शरणम् केशव माधव गुरु शरणम् बाबा जी रात भर अपनी कॉटेज में पडे रहते हैं । उनके अनुसार उन्होंने सारे लोगों को मुक्ति दे रखी थी और इन दिनों इसलिए वे हीलिंग का काम नहीं करते । ऑडिटोरियम में रात भर डांस चलता । गुजराती गरबा, डांडिया रास और धीरे धीरे संगीत बदलकर डिस्को संगीत हो जाता और सब डांडिया डिस्को या साधारण डिस्को डांस करते हैं । पेन का बहन बडे उत्साह से डांस करती, खासतौर से डांडिया । एक दिन तो वे नास्ते, नास्ते बेहाल हो गई । फिर भी लोग उन्हें और न चाहते रहे । संगीत दुख कर होता रहा और मेनका वहन भी उतनी ही तेजी से डंडे बजाती घूम घूमकर फेरे लेती हूँ । चाहेगा । हमने देखा कि उनकी आंखें चढ सी आई थी । मैं डर गई । मेनका बहन की उम्र पैंतालीस के ऊपर ही रही होगी । मुझे लगा कि उन्हें हार्ट अटैक नहीं होने वाला हूँ । मैंने उन्हें रोकना चाहा पर उन्हें घेरे कैलाश और पंड्या ने मुझे उन के करीब नहीं जाने दिया । ये लोग कहने लगे कि मेनका बहन पर देवी आई है । सबने चिल्लाना भी शुरू कर दिया । मेनका बहन में देवी है, देवी है नास्ते । नास्ते में इनका बैन स्टेज की ओर बढ गई और स्टेज की तीन चार सीढियां तेजी से चढ अचानक मंच पर देवी के चरणों में गिर गई । लोग मंच पर आकर उनके पैर छोटे और से आपने नन्ने बच्चों के लेकर चढाई और बेहोश मेनका बहन के हाथ से अपने बच्चे के सिर छुआने लगती है । मुझे डर लगा कि ये कहीं खत्म नहीं हो जायेगा । जबकि उन नाचने वालों में कुछ डॉक्टर भी मौजूद थे । स्टेज पर बी डी सी हो गई थी । मैंने मुश्किल से सबको अलग करते हुए पानी के छींटे मेनका बैंक के चेहरे पर मारे । कुछ पल में उन को होश आया । दो आदमियों की मदद से हमने उन्हें सोफे पर बैठा दिया । इतने में रूपा पिरोने के साथ हॉल में आ गई ना फिर से रंग पर आ गया । इन दिनों रूपा खास एहतियात के साथ सस्ती थी । मंच पर देवी के पहनावे और रूपा के पहनावे में बहुत फर्क नहीं था । वैसे ही चौडे गोल्ड बॉर्डर वाली चटक लाल रंग की साडी गले, कान और हाथों में ब्यूरो के चमकते गहने, माथे पर हरे और लाल रंग कि बिंदी चटक लाल लिपिस्टिक और उतनी ही चटक रूस गालों पर लम्बे ऊंचे भारी भरकम जिस्म पर दबा पाता । पहनावा पहनकर वह जालिम किसी की कोई रॉकाबिली महारानी लगने लगती है जहां बाबा जी और रूपा एक दूसरे के साथ हफ्ते थे क्योंकि बाबा जी भी खूब ऊंचे लम्बे व्यक्तित्व वाले थे । वहीं पे रोनी रूपा के साथ खडा चूहा सा दिखता दुबला पतला और फिर हरी वाला गोरापन लगता जैसे चुहिया का वाहन साथ लिए रूपा चल रही है या वह वाहन रूपा के बाहर तले चूहा बने जा रहा है । पिरोने के साथ रूपा को नाचते हुए देख बहुत मजा आ रहा था । रूपा ने अपनी साडी नादी के काफी नीचे बांध रखी थी । गढेगा गडा पेट यु ही बाहर को उल्टा पडा था । ऊपर से मास्की ता हूँ की कितनी मोटी मोटी सलवटें कमर के दोनों ओर से उखडी पडी थी तो ऐसा नाचते नाचते उसकी साडी का पल्ला नीचे गिर जाता है मांस का एक सैलाब साउथ बढाता है रूपा बे खबर नाचती रहती है उस की जिसमें ऐसा उद्दाम आवेग है पेड से लटकता मांस का हर पॉकेट उत्तेजना से थरथरा रहा है रूपा बेहोसी संगीत की ताल पर झूमे जा रही है सब की आंखों में संघार से लेकर तिब्बत सरस तक पता नहीं कितने भाव आते जाते हैं फिल्मी और डिस्को गाने की दुनिया पूरे शोर के साथ बज रही है रुपए एक एक करके तमाशबीन खडे मर्दों को नाचने के लिए बीचोबीच घसीट ले जाती है अभिषेक को भी घसीट ले गई एक ली कर रही है रूपा अभिषेक के साथ दाढी बढा अभिषेक भारत में भूका अभिषेक बहुत कमजोर लग रहा है मुझे फिर भी रूपा के साथ जो उसमें वह भी एक ली करता गोल गोल घूम रहा है एकदम उन्मुक्त है रूपा एकदम आॅड अभिषेक को छोड वह विष्णु को घेरे में ले आती है अब कि मुझे भी कसी लिया है नाचने के लिए अचानक हीरे के व्यापारी जैन को मिर्गी का दौरा पडता है । उसके जिस्म का दायां हिस्सा पूरी तरह से का आपने लगता है पास खडे लोग उसे शांत करते हैं । उसकी पत्नी विभूति वहाँ पास में नहीं है वह दिन रात बाबा जी की कॉलेज में उनके चरणों में बैठी रहती है । जब हॉल में आते हैं तभी मैं उनके साथ आती है । अगले दिन बाबा जी का जन्मदिन है । नवरात्र के दौरान ही उनका जन्मदिन भी पडता है । दिनभर पार्टी ही होती रही । ढेरों बच्चे मौजूद थे । उस दिन हॉल में करीब तीन बार तो अलग अलग लोगों द्वारा भेंट किया गया । एक काटा गया बच्चों में चॉकलेट, कैंडी और खिलोने बांटे गए । बाबा जी बस के काटने आते हैं और अपनी कॉटेज में लौट चाहते हो । उस दिन शाम वाले हवन पर भी मौजूद रहे और ही अग्नि में उन्होंने ही अपने हाथ से डाला । उस दिन हर कोई उस हवन पर बैठा और दूर दूर से सब हाथ बढाकर मंत्रा होती । ये वक्त आज में सामग्री डालते रहे । कुछ शाम भोजन भी खास बना था और खूब सारी मिठाइयाँ बनी थी । भवन के बाद बाबाजी स्टेज के पीछे के कमरे में विराजमान हुए हैं । लोग बाहर लाइन में खडे एक एक करके उन्हें उपहार भेंट करके मन से नीचे आते हैं । मैं भी अभिषेक के साथ गई थी । अभिषेक ने मुझसे कहा आजकल सहम देवी ही बाबा जी में विद्यमान है । इसलिए आज इनके पैर जरूर होना । उनके शरीर को छोडने का मतलब है देवी का स्पर्श मेरा मन नहीं माना । बाबा जी ने इस बारे में जैसे कुछ गौर ही नहीं । क्या बोले तुम्हारे लिए देवी का एक आदेश हुआ है और वह काम तो ही को करना है । मुझे एक सहज एजेंसी हुई जी मैं तो मैं तो प्रसन्न होना चाहिए इस काम के लिए । देवी नीतु मैं चुना है जी काम क्या है? मैंने कहा था ना तो में सरस्वती का वरदान है तो मैं पुस्तक लिखो । देवी के अनुसार उस लेखन से तो मैं ख्याति भी मिलेगी और तुम बहुत लेकिन किस बारे में? बस यही देवी का सेवक हूँ । उत्तर हूँ लेकिन जरूरी नहीं कि मेरे बारे में हो । बस हम तो यही चाहते हैं कि कुछ ऐसा लिखो जिससे देवी में लोगों का विश्वास बडे । मैं समझ गई और सोचूंगी कहकर चुप हो गई । यानी कि मुझे देवी महात् में या बाबा जी महात्मे लिखना है या इसे बाबा चालीसा कहूँ, बस उनके प्रति प्रशंसात्मक उद्गार लिखने हैं । मैं सोचने लगी ये जो इतने वैदिक मंत्र या पुराण रखे गए हैं ये भी ऐसे ही किसी ने लिखवाए होंगे । अपनी एम तृप्ति के लिए या की लोगों के भीतर से उठे हुए सहज उद्गार थे । सहज मेरी गोदी में आकर एक माला गिरी । दरवाजे पर खडे लोग लगे । बाबा जी ने चमत्कार दिखाया, चमत्कार हुआ । देवी ने प्रसन्न होकर अल्पना जी को सच्ची मोती की माला भेंट की है । मैं डिवोर्सी बैठी रही । आज बाबा जी मुझ पर खास कर पा क्यों कर रहे हैं? मेरे मन को जीतना । शायद बाबा जी के लिए भी एक चैलेंज होगा । मैंने माला को हाथ में ले उसके मोतियों को उंगलियों से महसूस किया । वह इतनी सच थी कि जैसे अभी अभी जौहरी की दुकान से खरीद कर लाई गई होगी । इस समय कार की धूम मची । बार बार लोग मेरे इर्दगिर्द आकर खडे हो जाते । पूछते कि यही मानना है उसे छूते परख थी और कहते कि सच्चे मोटी की है । आप बडी खुशी किस्मत है । रूपा भी देखने आई और बोली मुझे तो आपसे इच्छा हो रही है । बाबा जी मुझे तो कुछ देते नहीं, दूसरों को देते हैं । मुझे अपने दस हजार डॉलर की फिर से चूक हुई । मन हुआ कि कह दूँ, पीएम वाला आप ही रखिए, मेरे दस हजार वापस कर दीजिए । मुझे यह भी मालूम था कि जितना सामान आया है, उसमें से एक कभी बिल रूपा ने नहीं चुकाया । हमेशा कोई न कोई और पकड में ही आ गया आपने हजारों डॉलर उसने अपने ही पास कहीं दवा लिए थे, जो उसका बैग हमेशा नोटों की गड्डियों से बाहर आ रहा था । कुछ निकालने के लिए जब बैक बोलती तो गड्डियाँ बाहर जाती दिख जाती है । दिनभर हवन पूजन के अनुष्ठानों के दौरान रुपए कम ही नजर आती है । किसी ने किसी काम इंतजाम के बहाने वह फिर ओमी के साथ घूमती रहती । कारलेकर दोनों आश्रम के बाहर भी चले जाते हैं । कोई खरीद फरोख्त होती या कुछ नया भी होता है । रात को भी नाच के दौरान आती फिर चली जाती । पूजा में कुछ देर के लिए बाबा जी के साथ ही आती थी और छह इंच की सैंडल उतारे बिना हवन कुंड के आसपास घूमती रहती । कुछ बूढी औरतों को उसका ये चाल चलन बहुत बुरा लग रहा था । पंड्या की माँ उस पर खूब छींटाकशी करती रहती थी । देखो तो बाबा जी की पत्नी होकर कैसे हवन के पवित्र स्थान का अपमान करती है । हमको तो विश्वास नहीं होता कि है बाबा जी की पत्नी है जरूर कोई रखेल होगी । वरना जैसे सारा बदन उगाने नाचती हैं, बिल्कुल शर्म ही नहीं है । इसको तो बडा बदनाम कर रही है बाबा जी को धीरे के व्यापारी जयंत को अगले दिन फिर हवन में पूर्णाहुति डालते समय ऐसा बुरी तरह से दौरा पडा । इस सब लोग गबरा ही गए और उसे अस्पताल भेज दिया गया । उसने भी निराहर व्रत किया हुआ था । चाहे कमजोरी की वजह से दौरे ज्यादा पढ रहे थे । दो दिन उस पर ग्लूकोज ही चढा रहा हूँ । उसके बाद में वापस इस कार्निवाल में पहुंच गया । हाँ कार्निवाल ही कहना चाहिए इस सारे आयोजन को लोग जिस तरह से अपने हर काम फिक्र को बोले मस्ती में दिनभर वहाँ पडे रहते हैं । रात को भी कभी नाचते नाचते वहीं हॉल में सो जाते । फिर वहीं हवन मंत्रों की गूंज से आंखे खोलते किसी को दूसरे का होश नहीं । लोग पूजा करते, गप्पे मारते, प्रसाद और भोजन खाते हैं । यहाँ तक कि उन्हें यह भी नहीं पता रहता है कि बाबा जी कहाँ हैं । जिन्होंने ये जिनकी वजह से ये वहाँ इकट्ठे हुए हैं । बच्चे भी वहीं दिनभर खेलते रहते हैं । सारा हॉल देसी घी के चिकनी हुए चढावे के गुलाब के फूलों की खुशबू हूँ और अगरबत्ती के धुएं से मिस मिस आता रहता । पूजा के मंत्र कीर्तन के बोल और लोगों की आपसी कपडों का शोर उस गंद और स्वर को कोई मौलिक आपसी रिश्ता घोषित करता था । दिनों दिन एक ही गन्दा एक से ही स्वर्ग । मुझे लगता हम सबकी आंखों में अजीब सा पागलपन सा अच्छा लगता होगा । रात रात नींद धुएं से कच्छ का चाहती आते हैं । रोशनियां और रंगों गोटे किनारियों के चमक में चुंधिया की आंखें मुझे वहाँ मौजूद सब लोग किसी और लोग के कुछ पागल से दिखने लग गए थे । चढी हुई यह चुंधिया थी आंखों से मैं भी तो वैसे ही देखती थी और उनको हम कॉटेज में बस नहाने धोने के लिए ही जाते थे । ज्यादा वक्त ऑडिटोरियम में ही पडे रहते हैं । किनारों पर कुछ सोफे पडे थे । कुछ करदे भी नींद आती तो वहीं लेट जाते । अभिषेक ने निर्जल निराहार व्रत बाबा जी की तरह ही रखा था । लेकिन जयंत के हादसे के बाद चौथे दिन बाबा जी ने उसे फलाहार का आदेश दे दिया । अभिषेक बस वो जूस लग रही लेता । असमी वाले दिन देवी का विशेष पूजन था । उस दिन सारे अनुष्ठानों में बाबा जी और रूपा दोनों मौजूद थे । मंतर और संगीत के दूत और तीव्र स्वरों के बीच बाबा जी ने शीर्ष के प्रतीक एक बडे से गोल कद्दू को बडे से छोटे से एक ही बार में काट कर उस पर सिंदूर का रखता लगा । देवी को प्रतीकात्मक मानव बलि दी नारियल फोडकर उस जलसे शीर्ष को दो या गया फिर नारियल प्रसाद रूप में बातें रूपा ने कन्याओं के पैर धोकर उन्हें चुनिया और पैसे देकर कंचक मनाई । स्टेज पर कन्याओं को खडा कर जब यह रसम अदा हुई तो पता नहीं कितनी वीडियो बना रहे थे और तस्वीर खींची जा रही थी । जिनकी बेटियों को यह सुअवसर मिला था वो अपने को धन्य मान रहे थे जो एक वीडियो तो पूरे कार्यक्रम का बनाया ही जा रहा था । दो लोगों की ड्यूटी स्टिल तस्वीरें खींचने की भी थी । हवन और बाली के बाद बाबा जी ने स्वयं अपने हाथ से दूर में केले मत पथकर प्रसाद बनाया और अपने हाथ से ही सबको बता । प्रसाद बनाने के बाद जब उन्होंने पर रात में हाथ दो तो उनके साथ लगी लगी बैठी स्विस महिला जिसमें कि अपना हिंदुस्तानी नाम रख लिया था, बोली क्या मैं पानी पी सकती हूँ? मुझे इस महिला के व्यवहार पर अक्सर हंसी आ जाती थी । बाबा जी के लिए उसके मन में बेहद सकती थी पर उसे चुकी हिंदुस्तानी संस्कृति से पूरी वाकफियत नहीं थी । इसलिए वह अपने बडे ही मौलिक नियम बना डालती थी । जैसे कि बाबा जी के जन्मदिन पर कटने वाला केक । हम व्रत करने वालों में से किसी ने भी नहीं खाया लेकिन इसमें व्रत रखे हुए भी यह कहकर खा लिया ये है तो बाबा जी का प्रसाद है इसे तो खाना ही चाहिए और वह मजे मजे से बार बार एक का टुकडा काट लाती और खाती रहती । असमी की रात को सबको व्रत तोडना था । खासकर एक बाबा जी । अब तक नौ दिनों से निर्जल निराहार थे जबकि बाकी हम सब ने इस दौरान फलाहार तो क्या ही था । कुछ लोगों ने पहले दो दिन खाकर फिर तोड भी दिया था । पूजा का आखिरी दिन ता भजन कीर्तन का स्वर्ण और भी सदन हो गया था । जयपुर के शरणम् है जय अम्बे शरणम् है और फिर गोविंद माधव हरी हरी बोल, श्रीकृष्ण केशव, हरी हरी बोल वातावरण में जोश बढता जा रहा था । लोग कीर्तन के सर बोलते हैं उठकर नाचने लगते हैं । पूरे वातावरण में सम्मलित पर पहुंचते गोविंद माधव, हरी हरी बोल, श्रीकृष्ण केशव, हरी हरी बोल बाबा जी को साक्षा देवी रूप मानकर सब उनके चरणों पर शीर्ष रख आशीर्वाद ले रहे हैं । रूपा भी बाबा जी के चरणों पर सिर रखकर आशीर्वाद लेती है । ऐसा मुझे रूपा का चेहरा बहुत बोला बडा निर्दोषता लगता है किसी बच्चे का साथ मासूम क्या है? इस लडकी में? बोल आपन या भोंडापन मैं उसके गोटे का चौडा बॉर्डर लगी शिफॉन की पीली साडी से उभरते उसकी कमर देखती हूँ । क्या ये गांव के बॉन्ड अपन पर चढी? शहर की आधी अधूरी मैली रंगत है । लोग मस्ती में गाते हुए वक्त टूटने की वेला की प्रतीक्षा कर रहे हैं । प्रतीक्षा है जी भर खाने की, लेकिन वहीं उनके मन में उत्सव की अंतिम दिन होने की उदासी भी गिरने लगी है । कैसा होगा कल का दिन? नौ दिन से जो जलसा मनाया जाता रहा, अब किस की इच्छा या शक्ति रही है? धंधों पर लौटने की लोग भूल गए हैं कि वे हिन्दुस्तान से बहुत दूर प्रदेश के एक मुझे आश्रम में मंगल बना रहे हैं । कल से सब कुछ यहाँ भी वैसा हो जाएगा । सोना सुनसान

इतर भाग 15

भाग पंद्रह अचानक एक बेहद घबराया हुआ आदमी बाबा जी के पास आया और उनके कान के बहुत करीब हो कर उसको साया बाबा जी ने क्या कहाँ पर उनके चेहरे की चमक एकदम गायब हो गई । मैं आदमी बाबा जी को बाहर दरवाजे की ओर ले जाने लगा । बाबा जी की चाल पहली बार मुझे बेहद थकी हुई लगी । सब लोग उनके पीछे पीछे बाहर की ओर बढने लगे । बाहर पुलिस की गाडियां खडी थी । तीन चार पुलिस वाले गाडी के बाहर खडे थे । दो आदमी बढकर बाबाजी के करीब आएगा । उनसे कुछ कहा और हथकडी लगाने लगे । सब के सब एकदम सुन्न हो गए थे । क्यों? क्या हुआ? इसलिए यह उभरते स्वरों का एक ही जवाब उन पुलिस के आदमी के पास था । इनकी गिरफ्तारी का हो कम हुआ है । आपको सवालों के जवाब थाने पर आने से मिल जाएंगे । बाबा जी बिना किसी प्रतिरोध के पुलिस की गाडी में बैठकर अपने चेहरे के भावों पर उन्होंने काबू कर लिया था । एकदम शांत प्रकट दस्त भाव से वे भक्तों की ओर मुड कर बोले आप लोग हमारी फिक्र मत कीजिए । हम को पहले से ही पता था ऐसा होने वाला है । लोग चलना पडेगा । तब आप ने किसी से कहा क्यों नहीं, जो होना है उसे कोई नहीं रोक सकता है । गाडी चल रही है । अभिषेक पंडया, जयंत और पटेल उनके पीछे पीछे गाडियाँ लेकर स्थानीय पुलिस स्टेशन की ओर चल रही है । कुछ लोग हॉल में ही थे जिन्हें अपनी मस्ती में बाहर होने वाली इस घटना का पता ही नहीं लगा । लेकिन बाहर अंदर खलबली मच गई । लोग समझाना जानना चाहते थे कि ऐसा क्यों कर हुआ । किसी के पास जवाब नहीं था । जिस आदमी ने अंदर आकर सोचना दी थी मैं उसी के करीब पहुंचकर उसके इर्द गिर्द सवाल पूछते लोगों की भीड में शामिल हो गई । मैं कह रहा था की पता नहीं इस बीच और अपने बाबा जी पर झूठा इल्जाम लगाया है कि बाबा जी ने उन्हें छेडा है । यह कैसे हो सकता है । बाबा जी तो कभी अकेले ही नहीं होते हैं । छेडेंगे कैसे? जरूर किसी ने जलन के मारे ये अमेरिकी बडे नस्लवादी हैं जरूर किसी ने झूठमूठ की शिकायत लगा दी होगी । आचार्य रजनीश के साथ भी तो ऐसा ही हुआ था । स्थानीय लोगों को वो एकदम खट रखते थे । हो सकता है कहीं इस आश्रम के गुरु जी नहीं तो सुना है बाबा जी को अपने साथ शामिल होने को कह रहे थे । बाबा जी के मना करने से कहीं बदला तो नहीं निकाल रहे हूँ । अरे शासन में तो चिडिया तक नहीं बोलती थी । अब हजारों लोगों को देखकर जल गए होंगे लेकिन यही कोई झूठा इल्जाम थोडी लगा सकता है । कुछ ना कुछ तो हुआ ही होगा वाला किसने लगाया होगा? मुझे तो विश्वास नहीं आता कि बाबा जी ने ऐसा कुछ किया होगा । मैं लोगों की बातें सुन रही थी और खुद उन के जरिए से सच को पकडने की कोशिश में थी । लेकिन सच क्या है? क्या मैं भी जान पाउंगी? क्या यहाँ भी वह अपने व्यक्तिगत विश्वास पर आधारित नहीं है? जो बाबा जी को निर्दोष मानना चाहेंगे । वे कानून द्वारा अपराधी साबित होने पर भी उन्हें निर्दोष मानते रहेंगे और जो लेकिन मैं अभी कुछ भी नहीं जानती की कुछ कह सकता हूँ । इतने में रूपए फिर उन्हीं के साथ हर बडा तीसरी घुसी और सवालों की बौछार कर दी । फिर चिल्लाई मैं उस नीच कमीनी औरत की टांगे तोड होंगी जिसमें है शरारत की है । उस की ऐसी हिम्मत कैसे हुई आकर बाबा जी को घेरे बैठी रहती है । उस पर यह जरूर बाबा जी को किसी ने फंसाने की कोशिश की है । पहले भी हो चुका है । लोग हमारी तरक्की देख नहीं सकते । जलकर राख हो जाते हैं । लोगों को समझ नहीं आ रहा था कि खेल खत्म हो चुका है या की रूके रहना चाहिए । कुछ लोग तो चुपके से किसी भी गए थे । कुछ बाबाजी के भविष्य के बारे में कुछ जान कर जाना चाहते थे । मदद लोग वापस आए तो पंद्रह से ज्यादा हॉल में नहीं बच्चे थे । मर्दों के चेहरों की हवाइयां उड चुकी थी । अभिषेक ने सब मौजूदा लोगों को संबोधित कर कहा, बाबा जी पर जो ये है विपत्ति आई है वहां हम सब पर आई पी पति है क्योंकि बाबा जी हम सबके हैं । वे हमारे ही कल्याण में लगे हैं । इसलिए उनकी विपदा का भी सीधा असर हमी पर है । हमने उन्हें बच्चा भी सकते हैं । इस वक्त पुलिस ने एक बडी रकम जमानत के तौर पर मांगी है । आप लोग उनको छुडाने के लिए जितना भी धनदान दे सकें खुले दिल से कीजिये क्योंकि उन्हें बचाना ही है । लोगों ने सौ पचास जो जेबों में थे निकाल कर दे दिए । पर वह बहुत कम रकम थी । बाबा जी की जमानत सौ हजार डॉलर की थी । लोगों ने रकम सुनकर रूपा की ओर नजर घुमाई । रूपा ने अपने दमकते हीरे के हार को साडी में कंधों के पीछे से लपेटकर छुपा लिया और हाथ के पर उसको कस्टर बगल के नीचे दवा लिया । गुजराती जिसका नाम मैं नहीं जानती थी, बोला इतने पैसे हम कहाँ से लाएंगे मेरे साथ खडी सुमन धीरे से काम में बोली रुपए क्यों नहीं निकालती? पिछले नौ दिन में हजारों रुपये तो आरती पर ही चलता रहा है । सब किसी के पास बंद बक्सों में पहुंचता है और सब लोग चुके थे । अभिषेक नहीं कहा अगर आप बाबा जी के लिए कुछ देते हैं तो इन का उन पर कोई ऐसा नहीं आपकी अपनी ही भलाई है । बाबा जी आखिरकार अपने लिए नहीं, आपके लिए ही जीते हैं । अपना सारा जीवन उन्होंने दूसरों की भलाई में ही लगाया हुआ है । आपने अपनी आंखों से ही देखा है । मुश्किल से एक वक्त का खाना खाते हैं और दिन रात देवी पूजा या भक्तों के कष्ट निवारण में लगे रहते हैं । उनकी अपनी तो कोई जरूरत है ही नहीं । आप ही के लिए तो जी रहे हैं । तब आपको उनके लिए कुछ करने में आनाकानी हूँ । आप अपना ही तो भला करेंगे । अभिषेक की बात शायद किसी को भी गलत नहीं लगी । पर लोगों को बाबा जी का भविष्य इतना अंधकार में लग रहा था कि वे समझ नहीं पा रहे थे की डूबती नैया पार वे भी सवार रहे कि तैरकर किनारे हो जाए । आखिरकार वे भी अपने किसी स्वार्थ के मारे ही उनसे जुडे थे । दूसरे नवरात्रों के चक्कर में जो भी बहुत सी जेब खाली कराई जा चुकी थी, वो बिलकुल ही अंधी चालबाजी में नहीं खेलना चाहते थे । कुछ और नोट थाली में गिरे अभिषेक ने देखा वे भी बहुत कम थे । अचानक मैंने देखा कि एक अजीब सा तेज अभिषेक के माथे पर चमका । उसका चेहरा बेहद उत्तेजित था । चेहरे की मांसपेशियां काम रही थी और गाल और कान बेहद लाल हो रहे थे । उसके गौरव वन और चेहरे की कोमल त्वचा पर लाल दिख भी झट से जाती थी । लेकिन इस वक्त उसका चेहरा आवेग और उत्तेजना से कम कम आ रहा था । माथे पर पसीने की बूंद था, लगाई थी मुझे मैं चेहरा दोपहर के सूरज की तरह लग रहा था । इस की ओर देखते ही आंखें मिर्च मिर्च आ जाए । अभिषेक कह रहा था ठीक है अगर आपको अपना धन बाबा जी से ज्यादा प्यार है तो उसे अपने ही पास रखिए । बाबा जी तो खुद किसी से मांगते नहीं, पर मुझे मालूम है कि इस वक्त क्या सही है? क्या हमें करना है? अगर मैं अपना घर गिरवी रखवा देता हूँ तो जमानत का पैसा उसी से निकल आएगा । आप लोग अपना पैसा वापस उठा लीजिए । मुझे पहले इस बात का ध्यान आ जाता तो आपसे कहता ही नहीं । किसी योगदान के लिए मैं सकते की हालत में थी । यह क्या कह डाला अभिषेक ने तो मेरा राहत साहब अपार्टमेंट भी क्या यह क्या हो गया? विषय को त्याग और बलिदान की बातें सोच रहा है, पर किसके लिए इन बाबा जी के लिए मेरा रहने का नीड चला जाएगा और कल को बाबा जी की महबूबा मेरा मकान बेच हीरे का हार खरीदकर अपने को आईने में निहारते हुए यह ख्याल भी नहीं ला पाएगी । किसी ने क्या कुछ खो दिया है उसके इतने से शौक पूरा करने के लिए इतने लोगों के बीच मेरी कुछ कहने की हिम्मत नहीं पडी । अभिषेक की सराहना किसी ने नहीं की, लेकिन अपने बच जाने की राहत बहुतों ने महसूस की । जयंत मुझसे बोला यह तो सरासर बेवकूफी है । आप मना कीजिए ना इनको मैं अभिषेक से अकेले में बात करने के शरण की पकड में थी । मुझे विश्वास था कि मेरी सम्मति नहीं होने पर अभिषेक कभी भी ऐसा बडा कदम नहीं उठा सकता । जो भी घर मेरा भी उतना ही था । उसके बारे में अभिषेक अकेला फैसला कर भी कैसे सकता था । पहले चाहे उस घर को खरीदा नहीं था, पर बनाया तो मैं नहीं था । अभिषेक लोगों से गिरा गिरा । बाहर भी चला गया और इससे पहले की उसका बाहर निकलना मैं नोटिस करती । वो गाडी स्टार्ट करके निकल भी गया । वहाँ से मुझे हैरानी हुई । अभिषेक मुझ से कुछ कहे बिना ही चला गया । पर शायद है अभी कहीं और गया होगा । घर गिरवी रखने का निर्णय मुझ से बात किए बिना नहीं कर सकता । शायद लोगों में प्रेरणा और उत्साह भरने के लिए ही उसने यह पत्ता खेला होगा । लोगों पर तो असर हुआ नहीं । अब क्या करेगा? वह क्या अपनी बात पर टिके रहने को मजबूर हो जाएगा? मैं मुझे लगा । सच में मेरे पैरों तले फर्स्ट नहीं था । डर, शक और घबराहट की कितनी ही खाइयां वहाँ खुदी पडी थी । कुछ देर बाद जयंत दोबारा मुझे देखा । मैंने पूछा क्या तुम लोग जमानत में कुछ हिस्सा बताओगे? सच बताऊँ, भावी जी मेरी तो श्रद्धा को बडी तेज लगी है । अब देखिए ना, ऐसे तो कोई दोस्त लगता नहीं और बाबा जी अगर ऐसे किसी लडकी को छेड छाड सकते हैं तो दूर लाना मैं तो यहाँ पैर भी ना रखूं । छोटा इल्जाम भी तो हो सकता है ना । कुछ लोग कहते हैं ना कि इन्हें असम के गुरु ने एशिया बस पिसवाया । अरे जाइए यह झूठ मूठ का पर्दा डालना है । उनकी करतूतों पर देखिए बाबा जी को नया तो आप ठीक से जानती हैं मैं मुझे तो उन पर बहुत भरोसा और सरदार थी । पर कौन जाने कितना सच है उनमें? मेरा तो बिजनेस भी कुछ बढा नहीं । रस्सा में भी घाटा ही पड रहा है । मैंने तो उनके लिए पानी की तरह पैसा बहाया । नवरात्रों पर मेरे कम से कम ग्यारह बारह हजार जरूर गए होंगे । जब अब तक कुछ नहीं हुआ तो जेल में पडे पडे क्या कर लेंगे? अब तो एक नहीं खर्चने का मैं मैं तो विभूति की जीत है वरना मैं तो आना भी बंद कर देना चाहता हूँ । पता नहीं क्यो यह बात कहते हुए जयंत मुझे घटिया किस्म का स्वार्थी और अवसरवादी बिजनेसमैन लगा । मुझे अभिषेक का फैसला सही नहीं लग रहा था तो जयंत की सर्वार्थ आंध्र का भी नहीं । खासतौर से जिस तरह मैंने जयंत को बाबा जी के इर्द गिर्द उनकी सेवा टहल में ही ज्यादातर देखा था । विभूति की प्रतिक्रिया जैंसे एकदम उलट थी । उसकी बाबाजी के प्रति भक्ति में एक कतरा भी फर्क नहीं आया था । उसका कहना था कि बाबा जी ने तो इस जन्म में तो भले काम ही किए हैं । यह जरूर पिछले जन्म का कुछ दुष्कर्म होगा, जिसका फल अभी भुगत रहे हैं, उसका वर्ष चले तो वह अपना तन मन धन बाबा जी पर न्योछावर कर दें । पर जयंत उसे रोकता है । सारी संपत्ति उसी के नाम पर है । वह अपनी मर्जी से कुछ नहीं कर सकता है । युवती योगी मुझे बडी दुबली पतली कमजोर से लडकी लगा करती थी । भारी बारिश, गाडियों और जेवरों के भीतर उसका व्यक्तित्व और भी ज्यादा दबा हुआ दिखता था । जयंत के खिलाफ कभी उसने एक सब भी नहीं था । पर मुझे लगता था कि यह लडकी अंदर से कहीं जरूर असंतुष्ट और अपने हालत से नाखुश है और ना रूपा और बाबा जी से इतना लगाओ । इतनी सेवा नहीं, उसके अपने घर से दूर रहने के बाद तो नहीं थे । अभिषेक लौटा तो बहुत देर बाद मेरे सामने उसने कुछ कागज फैला दिए और कहा कि हस्ताक्षर कर दूँ साथ ही जोड दिया लेकिन मत करना कहीं नहीं जाता । पार्टमेंट एक बार बाबा जी जेल से बाहर आ गए तो पैर धो धोकर चढाएंगे लोग पैसा तब मैं घर भी छोड डालूंगा । अभिषेक की आवाज में पिक कान का इतना दम था कि प्रतिरोध का साहस मुझे नहीं हुआ । मैं अपनी नजरों में जयंत भी नहीं बन सकती थी । बिना कुछ देखे पडे मैंने साइन कर दिए । मैं सोच रही थी कि त्याग और बलिदान जैसी चीजें भी तो धर्म और आस्था के साथ जुडी हैं । क्या आस्था से रिक्त होकर कोई त्याग बलिदान कर सकता है? पर उसकी तार की मांग थी? क्या यही है? क्या मांगता है? इधर मेरी चेतना, मेरी जिज्ञासा, मेरी अब तक खोज जो इधर की मांग है, वह तो बाबा जी की नहीं । तब मेरे इधर और इन बाबा जी में कोई रिश्ता है क्या? चाहे कोई कहेगा कि वे माध्यम है उस स्तर तक पहुंचने के? क्या मैं खुद समर्थ नहीं हूँ? अपनी खोज में क्या माध्यम खोजूं मेरी सारी शक्तियां माध्यम द्वारा बिक राई या वितरित होने के बजाय सीधे प्राप्ते पर ही केंद्रित क्यों नहीं हूँ? क्या मेरा चेतन उतना जगह नहीं है, जितना कि माध्यम का चाय । बहुतों को अपनी जागृति का आपने चेतन की प्रबुद्धता का विश्वास नहीं होता, उन्हें माध्यम चाहिए ही, पर जिन्हें चाहिए वे लें । मैं भी उस रास्ते पर चलूं जिस पर दूसरे चल रहे हैं । मैं क्यों मान लो कि जो सच और किसी ने पाया है, वही मेरा भी हो । लेकिन मकान गिरवी रखने वाली बात को त्याग बलिदान कहकर जितनी अहमियत मैं दे रही हूँ, उतना अहम ये है नहीं । अभिषेक का जोश किसी मित्र को मुसीबत से बचाने का है, लेकिन मुझे यह भी समझ में नहीं आता कि या तो बाबा जी कुछ खास है या नहीं है । अगर खास है तो वहीं क्यों नहीं बने रहते । पर सच में वे खास होते तो जो बहुत कुछ हुआ है, शायद नहीं होता है । और अगर वे एक आम किस्म के दोस्त हैं तो उनसे हमारा रिश्ता दोस्ती का तो कभी नहीं रहा । हम हमेशा उनके सामने छोटे और अपना इंसान माने जाते हैं । तब यह दोनों तरफ से फायदे वाला रिश्ता मेरी समझ में तो आता नहीं । जब सेवा करवानी हो तो प्रभु हैं और जब मुसीबत में पडे हूँ तो भी हम ही बचाएं । तब ये कैसे प्रभु हैं? यू मैंने चाहे उनकी प्रभुता कभी माननी भी न हो और उन्होंने तो कोई कसर नहीं छोडी और मेरी जिंदगी में जो इतने बाढ तूफान खडे हो गए हैं उनकी जिम्मेदारी क्या उनकी जिम्मेदार बाबा जी नहीं, यह कैसा कर्म कहाँ जाएगा उनका उन्हें या पाप? यह पुण्य और पाप तो बाबा जी की ही शब्दावली है । जिसकी तार की खोज मुझे हैं, वह इसके बाहर भी है । ऊपर है कोई कितनी दूर जा सकता है अपनी खोज में जो है ही तार उसकी सीमा कहाँ है एक मेरी तरह का आम लेकिन सोचने वाला इंसान कहा इतनी दूर तक जा सकता है । बहुत दूर तक जा पाना ही क्या पागलपन हो जाता है । इधर भी क्या कोई डायबिटीज की बीमारी है? खान पान या विचार का संतुलन ही जिसे सही कर पाता है वरना बहुत हाई या बहुत लोग और दोनों हालत में शरीफ इधर के संदर्भ में मस्त िक्ष या चेतन की प्रतिक्रियाएं कितना गडबडा जाती है की तरह तरह के विकार पैदा होने लगते हैं । क्या यही है इन तथाकथित मार्गदर्शी गुरुओं की परिभाषा?

इतर भाग 16

बांध सोलह बाबा जी की गिरफ्तारी के अगले दिन योगी नवरात्र का पूजन समाप्त था और सबको अपने अपने घरों को लौटना ही था । कुछ लोग तो फट ही गए थे और कुछ इस हादसे से डी मोर लाइट होकर समझ ही नहीं पा रहे थे कि क्या करें और किसी के आदेश के इंतजार में थे जो कुछ लोगों के लिए अभिषेक बिना किसी औपचारिक निर्वाचन के भी नेता बन चुका था । पर अभिषेक कुछ पैसों के इंतजाम में दृश्य स्थल से गायब था । रूपा भी खूब चीख चिल्लाकर की । मैं देखती हूँ कौन बाबा जी का बाल भी बांका कर सकता है । कौन से बाहर हो गयी थी । शायद वह पिरोने के साथ सलाह करना चाहती थी क्योंकि हॉल से निकलते हुए वह उसी के साथ बातचीत भी कर रही थी । रूपा को खुद भी वापस पुराने वाले आसाराम लौटना था । यह चल तो नवरात्र पूजन भर तक था । तभी लोगों ने अपने अपने ढंग से इस धक्के को सहा था । बाबा जी तो सभी से जुडे थे । जितने ज्यादा जिससे जुडे थे उसकी प्रतिक्रिया उतनी ही तीखी थी फिर चाहे दुःख हो करोड हो, संदेह हो या ग्लानि । शाम के धुंधलके में विभूति हॉल के कोने में बैठे आंसू बहाती रही थी । जयंत उसे डांट रहा था और घर लौटने का इसरार कर रहा था । सूरत के कारण विभूति और भी दुबली और कांति विहीन हो गई थी । जयंत को तो सियर्स के कारण अस्पताल में ही दाखिल होना पडा था । इसलिए उसने तो वक्त तभी तोड दिया था पर कमजोर वह भी बहुत लगता था । चेहरे पर दाढी बडी हुई थी जिससे चेहरा और छोटा लग रहा था । पंड्या और दिनेश यंत्र वक्त कॉल की सफाई और संभाला सवाली में लगे थे । कुछ एक बच्चे भी उन्हें मदद कर रहे थे । पंडितों का काम खत्म हो चुका था । सुबह सुबह ही चले गए थे । कल रात तक संगीत, अवन, मंत्रों, भजनों और डिस्को डांडिया गीतों से गूंजता हॉल अब गुजरा और मातम मनाता । ऐसा लगता था लोगों के दो तीन छोटे छोटे जुड जुगाली कर रहे थे । उनके लिए उत्सव अभी समाप्त नहीं हुआ था । उनकी बहस का मुद्दा यही था कि यह खेल त्रासदी होगा या कम दी हिंदुस्तानी नामावली सुइस महिला मुझसे पूछ रही थी, क्या मैं जाऊँ परसों से मुझे स्कूल में पढाना है । मेरी फ्लाइट कल सुबह की है जरूर चाहिए लेकिन बाबा जी उनसे मिले बिना मुझे तो खुद कुछ मालूम नहीं अभिषेक लौट आएंगे तो पूछ लुंगी और तभी अपना पश्चिमी परिधान पहने रूपा ने बिरयानी के साथ प्रवेश किया और मुझे बोली मैं रात नौ बजे की फ्लाइट से ट्यूशन जा रही हूँ । फिर धोनी जी के साथ आज ही पैसों का इंतजाम करना है ना! पैसों का इंतजाम करने तो अभिषेक भी गया था लेकिन वह तो रूपा को भी पता था । उस ने भरी सभा में ही मकान गिरवी रख पैसे उगाने की घोषणा की थी । क्या यही वजह थी रूपा के जाने की या कि बाबा जी की? वहाँ नहीं होने से रूपा को अपना होना बेतूका लगने लगा था क्या जिस तरह से फिर धोनी के साथ उसका लगाओ बढ रहा था या उसकी सहज निष्पत्ति थी, मेरे मुझे इतना ही निकला लेकिन पिरो नहीं मदद करना चाहते हैं और पैसा वहीं बैंक में है । मैं साथ जाकर जल्दी ले होंगी वरना इतना पैसा डाक में आने में देर भी तो लगेगी । रूपा बाहर चली गई तो लोगों में बडी गर्मागर्मी खुसपुस शुरू हो गयी । अरे इसे ऐसा नहीं करना चाहिए था । बाबा जी जेल क्या गए यह तो पराए मर्द की होली हमने तो खाई था, बाबा जी की पत्ती हो ही नहीं सकती । कोई रखेल होगी तभी मौका लगते ही भाग ली हो । बुरे वक्त में ही पत्नी और रखेल का फर्क पता लगता है । पता नहीं कैसा जिगरा इसका ऐसी हालत में पति को छोडकर कैसे जा रही है । पैसों का तो बहाना है जी और तो भरा पडा है । निकले क्यों नहीं हो पाती के लिए भी निकालने में कंजूसी आखिर उसी की कमाई है । पता नहीं कौन सा बुरा कर्म किया था बाबा जी ने जो ऐसी धर्म पत्नी मिली । शक नहीं करना चाहिए, रकम के लिए ही जा रही होगी । निकाल देते ना आप लोग भी अपने पैसे फिर देखते जाती की नहीं जाती । अभिषेक रात देर से लौटा था इसलिए हम फॅमिली कॉटेज में ही रुके । मकान गिरवी रखने के कागजों पर हस्ताक्षर करने के घंटे बर्बाद । जब मन स्वस्थ हुआ तो मैंने अभिषेक से पूरा मामला समझने की कोशिश की थी । तुमने पुलिस में रिपोर्ट देखी थी । पूरी रिपोर्ट तो वकील के द्वारा ही मिलेगी । पर खास बातें तो बडी थी । शिकायत की इस लडकी ने की थी तो मैं विश्वास नहीं होगा । कौन निकाल मैं कैसे? मैं तो बाबा जी पर किताब लिख रही है । वही तो इसी सिलसिले में उसे बाबा जी से शायद अकेले में मिलना पडता होगा । क्या लिखा है रिपोर्ट में वो अभी कुछ स्पष्ट है जैसे कि उसे समझ में आया हूँ कि वह बाबा जी थे या उनकी रोई थी या कोई बुरी रु । बाबा जी का वेदर कराई थी । बाबा जी ने उससे कहा कि नवरात्रों के दौरान वे सभी रोगियों को छोड देते हैं और इस तरह उन की सारी ताकत चली जाती है अपनी शक्तियों को वापस लाने के लिए । उन्हें पांच बार एक स्त्री से मैं तुमको यानी कि सेक्स करना पडता है । ऐसा कहते उन्होंने अपने होटल उनके होल्ड पर रख दिए और हाथ पैंट के अंदर यह सब रिपोर्ट में है । हाँ, फिर क्या हुआ फिर से ऐसा उसका सम्मोहन टूटा और उसे समझ में आएगा की क्या हो रहा है तो वहाँ से निकल कर भागी कब हुआ है सब नवरात्रों से एक दिन पहले जब बाबा जी ने यहाँ शिफ्ट किया था तब खास लोग नहीं थे वहाँ । तभी नवरात्रों भर निकाल कहीं नहीं दिखी । उसी वक्त में आश्रम के गुरु के पास गई । उन्हें सारी कथा सुनाई और गुरु ने उसे शहर भिजवाने का इंतजाम किया । पूर्व की भी गवाही है इसमें । तभी लोग कह रहे थे कि शायद उस गुरु नहीं । एशिया वर्ष शैतानी की है । उधर जाने शायद यही सच हो, लेकिन निकाल बिना बताये ऐसा क्यों करेगी? मुझे भी कुछ समझ में नहीं आ रहा और बाबा जी ऐसा कर सकते हैं । विश्वास नहीं होता तो तुमने निकाल से बात की । वही तो बात ही नहीं करती हूँ । मैंने फोन किया था । एकदम अंगारे सी गरम होकर बोली तुम सब हिन्दुस्तानी एक से हो, बाबा जी भी, करण भी तो वह करन से भी गुस्सा है । करण ने भी तो इतने साल रोमांस किया, फिर शादी नहीं की । क्या जाने सारे हिंदुस्तानी आदमी बस ऍम । यह शब्द उसी ने इस्तेमाल किया था फोन पर बाबा जी ने चाहता हूँ । वे तो इंकार करते हैं । उनका कहना है कि उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया । निकाल ही कुछ मायूसी अपनी जिंदगी से करियर से । बाबाजी के अनुसार तो यह किसी पूर्व जन्म के कारण की सजा है । वे कह रहे थे कि उन को तो पता ही नहीं था कि यह होना है । बिना अपराध उन्हें सजा मिलेगी । लेकिन मैं इसका निवारण नहीं कर सकते थे क्योंकि पूर्वजन्म का लिखा था आॅल उन्होंने तुम्हें बताया क्यों नहीं । पहले से पता था तो हम कुछ एहतियात बरत सकते थे । कहाँ ना कोई कुछ नहीं कर सकता था । किसी ने किसी तरह यह होना ही था । अब क्या होगा? कल जमाना देकर जेल से तो छुडवा लाएंगे । फिर देखो केस चलेगा असली भाग दौड तो तब शुरू होगी । कोई ढंग का वकील खोजना होगा । ये है जगह सिर्फ गोरे निवासियों की है । इसलिए एशियाई पर लगे इल्जाम को जूरी शायद मान भी नहीं करेंगे । बाबा जी जो भी जिस तरह ऊंचे लम्बे और सामने रखे हैं, लोग आसानी से इन्हें अपराधी मान बैठेंगे । जो भी इस देश का कानून हैं कि जब इस तरह एक औरत किसी आदमी का आरोप लगती है, तब जब तक आदमी अपने आप को बेकसूर प्रमाणित नहीं कर देता हूँ, सजा उसे होती ही है । बाबा जी अपने आप को बेकसूर कैसे प्रमाणित करेंगे? पता नहीं पर हम लोगों की गवाही भी नहीं मानी जाएगी । क्योंकि पुलिस के अनुसार हम सब तो पहले से ही उनके अनुयायी है तो उनके खिलाफ कुछ कहेंगे ही नहीं । फिर तो मामला हर तरफ से बडा पेचीदा है । अल्पना अब सो भी जाओ ना, बहुत थका हुआ हूँ । सच में बोला कि नींद आ रही है तो मेरी तो नींद उड गई पर तुम सो जाओ । बाबा जी को जेल से वापस लाया गया तो चेहरे से कमजोर और निस्तेज बहुत लग रहे थे । पर कहीं भी किसी तरह की फॅमिली को शहरे पर नहीं था । बडे शांत होकर स्थिर और विनम रूप से उन्होंने अगवानी करने वाले भक्तों को जय माता की कहकर नमस्कार । क्या सब कुछ बडा जल्दी ही वैसे का वैसे नॉर्मल हो गया तो ऐसे ही उनसे बतियाने लगे जैसे कि इस बीच ऐसा कुछ हुआ ही नहीं हो । सभी इस हादसे को भूल जाना चाहते थे और बोलना भी संभव नहीं था । अभी कुछ देर तक पहले रहने वाले असर बाकी थे तो भी लडा जाना ही था । लेकिन सबसे बडी एबॅट जो मौजूदा लोगों को हो रही थी, रहती । रूपा की अनुपस् थिति रूपा की योजनाओं का भी किसी को कोई ज्ञान नहीं था । उसने किसी को यूस्टन से फोन भी नहीं किया था । ब्यूटी नहीं हिम्मत करके बाबा जी से कहा रूपा जी होस्टल गई हैं । बाबा जी ने बडे सहज भाव से कहा हम को मालूम है आपको कैसे मालूम हुआ तो हम को सब पता रहता है । तो मुस्कुराते हुए बाबा जी बोले विभूति ज्यादा वक्त बाबा जी के पास ही रहने लगी थी । शायद उसे लगा की रूपा की अनुपस्थिति में किसी ने किसी का बाबा जी के करीब रहना लाजमी था या बाबा जी कहीं उसकी परिहार जरूरत बनते जा रहे थे । लोगों का तांता लगना फिर से शुरू हो गया था । कुछ पुराने लोगों ने आना कम कर दिया था, पर कहीं नहीं । चेहरे वहाँ देखने लगे थे, जिन्हें बाबाजी के निकट भूत के बारे में कोई भनक भी नहीं थी । फिर से रूटीन तौर पर हीलिंग सेशन शुरू हुए । फिर से वही भूत भगाने लोगों के घर जाना । ऑपरेशन वैसे ही शुरू । अभिषेक की रात रात भर बैठ देवी की पूजा भी शुरू हो चुकी थी । जयंत बहुत कम दिखता था, फिर भी कभी कभी हिलिंग के लिए आ जाता था । उसके चेहरे पर मुझे हमेशा शिकायत और असंतोष दिखता है । एक शाम जब भक्तों को इर्दगिर्द बैठाए बाबाजी प्रवचन कर रहे थे तो सहसा जयंत बोल उठा बाबा जी, आपका काम भक्तों के कष्ट करना है ना? भक्तों को कष्ट देना तो नहीं । सवाल सच में अटपटा था । सब की चौकी हुई । निगाहें जयंत की ओर सडक गई । बाबा जी ने अपने बहुत छक्के पन पर पूरा काबू पाते कहा कहना क्या चाहते हो? जयंत आप पहले हाँ या ना? मैं मेरी बात का जवाब दीजिए । क्या आप अपने भक्तों का भला चाहते हैं या कि उन्हें दुख देना चाहते हैं । जयंत की ऊंची और आक्रामक होती हुई आवाज में उसके अंदर की उत्तेजना और छटपटाहट छलकने लगी थी । बाबा जी ने फिर से बिना किसी उत्तेजना के सहजभाव से कहा हमारा उद्देश्य तो कभी भी किसी को दुख पहुंचाना नहीं हो सकता है । तो फिर मेरे साथ ऐसा क्यों हो रहा है? हमारी जिंदगी क्यों तबाह हो रही है आप की वजह से? मेरा घर मेरा बिजनेस । सभी कुछ चौपट हो रहा है । मेरी बीवी और कुछ नहीं करती । दिनभर आप ही के पास बैठी रहती है । मेरी बात तो वो सुनती ही नहीं । बच्चों की देखभाल होती है मेरी उसे हर पल आप ही के पास आने की लगी रहती है । बताइए यह क्यों कर रहे हैं आप ऐसा अधिकार किसने दिया है आपको? आप बोलते क्यों नहीं? जवाब क्यों नहीं देते हैं? मैं अपना घर संवारने के लिए आपके पास आया था बर्बादी के लिए नहीं । जयंत के भीतर जैसे आज बता रही थी मैं जोर जोर से जमीन पर मुक्ति मारता वो बोल रहा था । आपको मालूम है की ये और कितना काम करती थी । घर संभालने के बावजूद आठ घंटे रेस्ट्रां चलाती थी और हीरे के बिजनेस में भी मेरी मदद करा करती थी । अब मैं ऐसा नहीं घर को देखती है । मेरे गाँव में घाटा पड रहा है । मेरा बिजनेस और सहसा जयंत को फिर से दौरा पडा हूँ । उसका जिस्म किसी बवंडर की लपेट में आए । पौधे की तरह जोर जोर से कांपने लगा । दो आदमी उठाकर उसे संभालने लगे पर वहाँ उनकी बाहों में बेहोश हो गया । झट से उन्होंने उसे फस पर ही लेटा दिया । एक आदमी गिलास में पानी भरकर लाया । ऊपर पानी के छोटे थे । उसे होश में लाया जाने लगा । इस दौरान विभूति चुप पत्थर बनी बाबाजी के निकट जो कि क्यों बैठी रही, लोग कभी बेहोश जयंत को देखते हैं । कभी बाबा जी को बाबा जी का कुछ कहना या लोगों का बाबा जी से कुछ सुनना बहुत जरूरी हो गया था । बाबा जी ने विभूति की ओर मुखातिब होकर कहा, मुझ पर जो सरासर झूठा इल्जाम लगाया गया है, आपको इस बारे में कुछ कहना है । विभूति उसी तरह निस्पंद बैठी बोली मेरा ना इस आदमी से लगाव है । मैं इसके घर से फिर कुछ रुककर दोबारा शुरू किया । इससे खुद तो कुछ होता नहीं, मुझ पर हूँ काम चलता है अपने से देखे ना रस हाँ, तब मैं घर का काम देख होगी । पहले तो खाली बिजनेस था, अब दस दस घंटे रस्सा में ही लग जाते हैं क्या? क्या करूँ मैं घर का भी करूँ और बाहर का भी । बस थक गई हूँ मैं बेहोशी से अब जगह जयंत पूरा बच्चा कुछ दम लगाकर कह रहा था मेरी बीवी को छोड दो । बाबा जी मेरी बीवी को छोड दीजिए । बेहोश होने से जयंत उपस् थित लोगों की दया और सहानुभूति का पात्र बना हुआ था । इस बात को बाबा जी भी महसूस कर रहे थे और गहराई से हल खोजने की सोच में पड गए थे । कुछ बल्कि सहमी चुप्पी तोडते हुए बाबा जी बोले विभूति जयंत चाहे गलत भी हो है तो तुम्हारा पति यह सही है कि पति की रजामंदी के बिना तो मैं यहाँ नहीं आना चाहिए । अब से तुम जयंत की इच्छा के बिना यहाँ नहीं हूँ । विभूति किसी बाबा जी को देखती रही । ऐसी निर्दयी कैसे हो सकते हैं? ये विभूति किसने की? ऐसी अवहेलना सिर्फ समाज के डर से या उसके पति के पति समाज में बदनामी कर सकता है । बाबा जी पर पहले से ही इल्जाम है इसलिए शायद इस बार छाछ को खूब कर लेना चाहते हैं । विभूति क्या रोटी इस आदमी ने मुझे बहुत दुख दिया है? बाबा जी बहुत दुख आपको बता नहीं सकती । इसमें क्या क्या अत्याचार किये हैं? मुझ पर नौकरानी की तरह हो काम चलता है मुझ पर और नया करूँ तो पिटाई करता है । अब आप की वजह से मैं उसके चंगुल से बाहर आ गई हूँ । तो इस से यह सब बर्दाश्त नहीं होता । मुझे फिर से मत भेजिये । उसने रखने बाबा जी और विभूति तब तब आंसू बहने लगी । मुझे ड्रामा बेहद दिलचस्प लग रहा था और इसके आगे के प्रसंग में और अंत के प्रति भी बेहद जिज्ञासा जग गई थी । बाबा जी बोले हमें इस बात पर कुछ विचार करना होगा । बाबा जी उठकर अपने पूजा घर की ओर चल दिए । लोग कानाफूसी करते हुए जयंत को पूरे होश में लाने के टोटके करते रहे । कभी कोई चेहरे पर थप्पड जमाता, कभी पानी का छींटा जयंत होश में आ गया तो वो उसे अस्पताल ले गए । फोन की घंटी काफी देर तक बचती रही । ज्यादा लोग आसपास थे नहीं तो मैं नहीं उठा लिया । उधर से तडाक की आवाज आई अरे भाभी जी कैसी है आप? तो रूपा जी कहाँ चली गई हैं । आप इतने दिन से कोई खोज खबर नहीं खबर किसको देती? बाबा जी तो जेल में थे नहीं नहीं । अभिषेक उन्हें दूसरे दिन ही छुडवा लाए थे तो जमानत के पैसे दे दिए थे । अभिषेक नहीं वह तो उन्होंने कहा था आपको कहीं जाने की जरूरत तो नहीं थी ।

इतर भाग 17

भाग सत्रह मैं तो यहाँ पर बहुत पछताई । मुझे नहीं मालूम था कि फिर धोनी इतना घटिया इतना अन्य बाइबल आदमी हैं । इन बच्चों के नाना नानी मुझे ऐसे घूमते थे जैसे मैं उनकी बेटी की जगह लेने आई हूँ । मुझे तो फिर होनी की बीबी ने ही मरने से पहले कहा था कि मेरे बच्चों का ध्यान रखना पर अब मुझे ऐसे देखते हैं जैसे मैं उनकी सौतेली माँ हूँ । मुझे ऐसा बच्चा नहीं लगता पर मैंने किसी तरह चेक तो ले ही लिया है । मैं आज की फ्लाइट से लौटना चाहती हूँ । बाबा जी कहा है उन्हें बोला दीजिए । मैं रिसीवर रखकर बाबा जी के पास गई तो वो बोले हमको रूपा से बात नहीं करनी है । आवाज में नाराजगी थी मेरी रूपा से यह बात सीधे कहने की हिम्मत नहीं पडी । मैंने कहा वे अभी मसरूफ हैं, उन पर नहीं आ सकते । आप पक्का आ रही हैं तो मैं और अभिषेक आपको एयरपोर्ट पर लेने आ जाएंगे । एयरपोर्ट से लौटते हुए रूपा सुनाती जा रही थी इस गोरी चमडी पर तो आदमी कत्तई भरोसा ना करें । इतने घटिया, इतने स्वार्थी इतने पैसे की तीन होते हैं कि आदमी जितनी दूर रहे उतना ही अच्छा देखा था ना यहाँ कैसे मेरी चिरौरी करता था । पिनौनी अपने साथ ससुर के सामने उसकी सिट्टी पिट्टी गुम हो गई । मुझसे बात करना बंद कर दिया । मैंने भी कह दिया कि मेरे साथ से अगर तुम्हें कोई हीन भावना आती है तो हम भी नहीं रहेंगे । साथ हम क्या इतने कई गुजरे हैं, हमारी भी इज्जत है । पैसे देने में भी आनाकानी कर रहा था । फिर चेक तो में ले आई । मैं सोच रही थी रूपा क्या सच में पैसे ले नहीं गई थी वहाँ? या फिर धोनी का आकर्षण कहीं भी उसकी मन की ता हूँ में नहीं था । क्या उसने ऐसा नहीं सोचा होगा कि अब बाबा जी तो एक तरह से स्थगित होगी गए हैं । तब वह भी क्यों सती बनी रहने का दावा करती रहे? या फिर भी उसे किसी स्वार्थवश रिश्ते के तहत साथ ले गया था? क्या रूपा ने उससे किसी स्थायी रिश्ते की अपेक्षा या कामना की होगी? क्या इसलिए रूपा के मन में इतनी कडवाहट बढ गई है कि अगर उसने किसी तरह के लंबे समय तक चलने वाले रिश्ते की कल्पना भी की होगी तो मैं इतनी जल्दी हो गई । हिरोनी के मन में बाबा जी का डर भी तो होगा । उन की पत्नी के साथ रिश्ता स्थापित करके क्या वह बाबाजी के प्रकोप का पानी नहीं हो जाता है? तब क्या इतने दिन में है बाबा जी की पत्नी के साथ सिर्फ रोहानी रिश्ता ही बनाए रहा होगा । रूपा जिसमें जिस्मानी सुख का चाव इतना कूट कूट बडा नजर आता है क्या इतने दिन पुरुष केसा मित्र में भी उस सुख से वंचित रही होगी? बाबा जी की मनस्थिति क्या होगी? उसमें कहीं कुछ नाराजगी तो है । फोन पर रूपा से बात करने से इंकार कर रहे थे । शायद रुकने का नाटक कर रहे थे रूपा । उन्हें बिना बताए जो चली गई थी लेकिन बाबा जी के लिए बहुत बडी बात होगी या की मामूली? क्या रुपए इस तरह पहली बार गई थी । आज हम पहुंचे तो रूपा के स्वागत के लिए कोई भी बाहर नहीं निकला । पता नहीं रूपा ने इस ओर ध्यान दिया या नहीं तो सीढियां चढकर सीधे अपने कमरे की ओर चल दी । कुछ नहीं । लोग तो रूपा को पहचानते भी नहीं थे पर जो सिर्फ कोतुहल भरी आंखों से उसका पीछा कर रहे थे, इधर उधर देखकर रूपा ने पूछा बाबा जी कहाँ है और कहते कहते पूजा कर के अधखुले द्वार को सपाट खोलते बोली अरे सब लोग यहाँ बैठे हैं । कैसे हैं सब सबकी निगाह रूपा की ओ रोटी लेकिन बोला कोई कुछ नहीं । उनमें गांव में कुछ ऐसा भाव था जैसे कि सौ हुए । खाने के बाद दिल्ली उनसे पूछ रहे हो कि अब हज हो जाए । रूपा ने किसी ने कहा की परवाह नहीं की । लगता है बडा सीरीज डिस्कशन चल रहा है । सब लोग इतने और रूपा ने अपने पर्स में से चेक निकालकर बाबा जी को दिखा । यह देखिए उस बेईमान से मैं । यह तो धरवाला ई बाबा जी की आंखें चैक की जगह खुद रूपा को ही तरह रही थी । जैसे उन आंखों से वह उसके पूरे शरीर को चीरकर बीदर का सब कुछ देख लेना चाहते थे । रूपा के चेहरे पर वही लापरवाही का उद्दंड होता । मैं जैसे बाबाजी के मन की बात समझ रही थी और जानबूझ कर उसकी अवहेलना कर रही थी । बाबा जी उसको बदन चीरती निगाहों से देखते हुए बोले हमें नहीं चाहिए आपके पैसे अपने पास ही रखी है, चाहे हम अपना इंतजाम खुद कर सकते हैं, आपके भरोसे होते तो अब तक जेल में पडे होते हैं । रूपा कुछ गुस्सा सी गई । वह तो हमको मालूम था कि आप बाहर हैं वरना हम जल्दी ही आ जाते हैं । वहाँ भी तो बच्चे मत । चुनाव मुझे बहुत आनी । अपने बच्चे को एक बार भी याद किया है । एक बार भी फोन किया है । इतना ही बच्चों से प्यार इतने लोगों के सामने । पहली बार बाबा जी ने रूपा को अपमानित किया था । अब तक उन्होंने रूपा से अपमान ही लिया था । रुपए टप टप आंसू बहाती अपने कमरे में आ गई । मैंने इसे सहलाने को कहा । दरअसल बाबा जी आपको बहुत मिस कर रहे थे, रहने दो ये है आदमी मुझे कहीं जाने देता ही नहीं । चौबीसों घंटे बस इसी के साथ बन्दे बैठे रहो । मैं खुद कहीं जाएगा ने मुझे जाने देगा । मेरी अपनी भी तो कोई जिंदगी है, इच्छाएं हैं और ऐसा कहते कहते हैं और जोर से हिचकियां बांध बांध कर होने लगी । बकने तो जो लगता है मैं तो कैलिफोरनिया भी जाऊंगी । फॅमिली जाऊंगी देखो कैसे कोई रोकता है मुझे इतने में टेलीफोन की घंटी ट्रिन ट्रिन बाजी तो रूपा झट से आंसू पहुंचती भी बोली । अगर फिर धोनी का हूँ तो कह देना घर पर नहीं हूँ । नहीं बात करनी उस वक्त अमीर से डरपोक कुछ दिल काम का मुझे बदनाम करवाया फोन सबकुछ हिरोनी का था, उसे शायद मालूम था कि रूपा फोन पर नहीं आएगी । उसने बस ठीक ठाक पहुंचने की बात पूछी और बाबा जी से बात करने की इच्छा जाहिर की । मैं फोन की लम्बी तार सुन जाती, खुल जाती बाबा जी के पास ले गई । मेरे बताने पर की । फिर धोनी का फोन है वो झट से आप सोचा करके मानव से रोक बोले, उसे बोलो यहाँ कर माफी मांगे । तभी हो सकती है बात मैं फोन पर नहीं आऊंगा । मैंने फिर धोनी से कहा कि बाबा जी अभी मौजूद नहीं है । यह बेहतर है । मैं उनसे आकर ही मिलेगा । रात को अपनी गिरवी रखे अपार्टमेंट में लौट रहे थे तो अभिषेक ने बताया कि बाबा जी के केस की पैरवी के लिए वकील तो राजी हो गया है पर वह चालीस हजार डॉलर पेश की मांग रहा है । इतने पैसे का इंतजाम अपार्टमेंट को बेचकर ही हो सकता है । मैं फिर से सकते की हालत में थी । मुझे लगा कि मैं किसी चलती गाडी में नहीं बल्कि किसी बवंडर के बीच में फंसी गोल गोल घूमे जा रही थी । मुझे चक्कर आ रहा था, पर मैं गिर नहीं पा रही थी और गिरने के डर से मैं बीत सिर्फ चक्कर खाए जा रही थी । तुम को करना है इंतजाम और कोई नहीं । बाबा जी कह रहे हैं कि अभी इंतजाम कर दूँ, वे हिन्दुस्तान से मंगवा कर वापस कर देंगे । वापस मिलेंगे क्यों नहीं? मैं भी मिले तो और अपार्टमेंट बेचकर जाएंगे । कहा किराये पर ले लेंगे, देख लेंगे । जब पैसा हो जाएगा तब दोबारा भी खरीद लेंगे । लेकिन क्यों ये सब किस लिए? बाबा जी को बचाना इतना जरूरी है कि उसके लिए चाहे हम को तबाह हो जाए, कितना छोटा नजरिया है तुम्हारा अल्पना अपार्टमेंट बेचने से तबाह होंगे हम अपार्टमेंट कम से कम दो लाख का तो लगेगा ही । मेरा मन नहीं मानता हूँ । फिर अभी कुछ दिन रुका जा सकता है । तुम्हारा मन तब तक एडजस्ट हो जाएगा अगले दिन में तन मन से ताकि बस बिस्तर पर लेटी नहीं । अभी शोक को कैसे रास्ते पे हूँ । मैं जितना दिए जा रही थी उतना ही मुझसे और खींचा जा रहा था । और जब मैं अभिषेक को रोकने की कोशिश करती हूँ तब भी हार जाती हूँ । उस की ताकत हर तरह से मुझसे ज्यादा है । मुझे हर बार हार मिल रही है । मैं क्यों ने सीधे बाबा जी से ही बात करूँ । उनको अंदाजा भी है उनके लिए अभिषेक अपने आप को कैसी मुसीबतों में जो करना है? अभिषेक बाबाजी के ही किसी काम से बाहर गया हुआ था । मैंने पाॅच अडाया और गाडी लेकर निकल पडी बाबा जी की ओर मैं पहुंची तो शाम का हीलिंग सेशन शुरू हो चुका था । करीब साठ सत्तर लोग नीचे वाले कमरों और बेसमेंट में क्षेत्रीय चित्र बैठे थे । ज्यादातर चेहरे मेरे लिए नए थे । बाबा जी के अंतरंग समूह का कोई नहीं था । यूपी पहले वाले अंतरंग समूह के ज्यादा लोग बच्चे नहीं थे । जयंत और विभूति का आना बंद हो चुका था । पंड्या और दिनेश भी नहीं देखते थे । कुछ नए चेहरे उस अंतरंग समूह में शामिल हो चुके थे । खासकर सुनना और उसका पति जो अपने बच्चों समेत उनकी तीमारदारी में लगे हुए थे । सुनना के पति का बिजनेस फेल हो गया था । बाबा जी ने उसे विभूति जयंत के रस्सा में नौकरी दिलवा दी थी, पर उसकी पटी नहीं सुनना । बाबाजी के आश्वासनों के एवज में सारे घर की सफाई, खाना वगैरह देखती थी । उसका पति और बडी लडकी ड्राइविंग और छिटपुट सौदे के काम करते थे । तीन बच्चे स्कूल जाते थे । लडकी स्कूल पास कर चुकी थी और कोई नौकरी खोजना चाहती थी । सब इसी द्वंद में थे कि वह कॉलेज जाए या नौकरी करें । बाबा जी ने कहा कि उसकी कॉलेज का खर्च वह देंगे । नौकरी करने की जरूरत नहीं । मैं भी नीचे ही बैठ गई । सुनना का पति सबको बारी बारी से ऊपर बाबा जी के पास भेज रहा था । मुझे अकेला देखकर बाबा जी कुछ हैरान हुए । क्या बात है, अकेली आई हैं । अभिषेक मुझे आपसे कुछ पूछना है । बाबा जी एकदम चौकन्ना से हुए । पूछे आप अभिषेक की उपस् थिति में भी पूछ सकती थी । बताइए क्या बात है । दरअसल मैं कोई सवाल फॉर रिलेट कर के नहीं चली थी । कुछ उत्तेजित थी इसलिए ठीक से वाकी गढ नहीं पा रही थी । ऐसा मैंने कहा आप कौन हैं? मेरे चेहरे की ओर बोलते रहे जैसे मेरे भीतर का सब कुछ पढ डालना चाहते हूँ । बडे निर्दलीय स्वभाव में जवाब मिला इंसान हूँ इंसान तो मैं भी हूँ, देवी का भक्त हूँ । बस तो और भी हैं । वो आपकी तरह चमत्कार तो नहीं कर पाते हैं । देवी की मुझ पर विशेष कर पाया । क्यों? आप ही क्यों कर पाए मैं देवी तक आपकी बात पहुंचाने का माध्यम । लेकिन क्यों देवी ने आपको ही इस काम के लिए क्यों चुना? मेरे पिछले कर्मों का फल है । यानी कि हम सब ने बोले कर्म की हैं एक आप ही मैं यह तो नहीं कह रहा हूँ, पर मेरे माध्यम चुनने में कुछ तो उद्देश्य होगा ही और उसे मैं अपने कर्म का फल ही कह सकता हूँ । आप भी अपने आपको जीजस क्राइस्ट की तरह भगवान का पुत्र मानते हैं । देवी पुत्र मैं तो देवी का ही पुत्र हूँ । मैंने भी कुछ बुरे कर्म तो नहीं किए मुझे देवी पुत्री क्यों नहीं मानते हैं तुम्हारा ये जीवन पिछले कर्मों का परिणाम है । जो काम अब कर रही हूँ उसका फल तो आगे जाकर मैं कितना भी सर फोड हूँ । मुझे वही किसी छोटे कर्मवाद के जवाब ही मिलने थे । यही अभिषेक कहता यही बाबा जी, यही शायद किसी भी हिंदुस्तानी गांव का अनपढ किसान कहता क्या मुझे यहाँ और सिर्फ छोडना चाहिए? दुनिया भर के झूठ, मक्कार और खुदगर्ज कर्मकांडियों ने ऐसी भाषा की ढल से उसको ढक लिया है कि जितने वार करो, वे परंपरा और पुरातन धर्म से ठोकी । पीटी ढल को इतना मजबूत बनाए हैं कि हर ढल वापस ही खुद को आकर चोट करता है । मेरा और कुछ भी कहने का मन नहीं हुआ । आपके सवाल का जवाब मिल गया । मेरी छुट्टी तोडने के लिए कहा गया था । जी हां जरा नीचे चलती हूँ । रूपा से भी मिलूँगी बाबा जी ने गर्वित विजयी की नजर से मुझे देखते हुए पूछा आपकी किताब का क्या हुआ? कौन सी देता हूँ? अभी लिखने में शुरू की कब करेंगे? बस जल्द ही कुछ सिर दर्द कर रहा था । मैं चाय पीने की इच्छा से सीधे रसोई की ओर गई । तुम ना साबूदाना और आलू की खिचडी बना रही थी । बाकी खाना स्टोर पर ही पतीलों में ताजा बना पडा था । अरे वाह! आज तो खूब पकवान पकडे हैं । मैं तो खाने का काम खत्म कर चुकी थी और रूपा बोली कि साबूदाना की खिचडी खानी है, उसका व्रत है ना अनाज नहीं खा सकती । आज के इस बात का व्रत अरे आप को मालूम नहीं । रूपा जी ने तीन महीने का निरंतर व्रत रखा है । कहती है बाबा जी के कस्ट हो से मुक्ति दिलाने के लिए कहने को तो बाबा जी के बल्ले की बात कर दी है और मुझे लगता है कि अपनी शुद्धि के लिए ही रख रही हूँ । बिना मर्जी के रावण के यहाँ रहने पर सीता को तो अग्नि परीक्षा देनी पडी थी । ये है तो अपनी मर्जी से ही गई थी । फिर धोनी को कम से कम इतना तो करना ही पडेगा । तो रूपा को भी सजा दी जा रही है । बाबा जी की नजर क्या फिरी हर कोई अपने आपको रूपा का फैसला सुनने लायक समझ रहा है । मुझे तरफ आया रूपा पर और साथ ही सुनना पर भी । जैसे व्रत के बहाने से दिन रात नई नई चीजें पकाने के लिए दौडाया जाएगा । फिलिंग स्टेशन खत्म करके बाबा जी भी नीचे आ गए । मैं चाय खत्म करके जाना ही वाली थी । नमस्ते करते हुए मैंने योगी कह दिया रूपा जी ने तो बडा भारी व्रत रखा है आपके लिए? हमारे लिए क्या अपना वजन घटाने के लिए रखा है? इतनी चर्बी जो चढ गई है । अब अमेरिकी लोगों को प्रभावित करने के लिए बॉडी को तो ठीक रखना ही होगा ना । रूपा पास ही खडी सुन रही थी । मैं बेहद पछताई । रूपा भी चुप रही । मैं खिसक गई । अगली सुबह विभूति का फोन आया । उसकी आवाज रुआंसी थी । व्यवस्था का कुछ महीने से किराया नहीं गया था । उन्होंने उठाकर ताला लगवा दिया है । यहाँ तो मुसीबतें बढती ही जा रही है । मैंने जैंसे कहा कि तुमने बाबा जी को नाराज किया है । उसी का फल मिल रहा है तो माफी मांगने को भी तैयार नहीं । आप प्लीज मेरी ओर से माफी मांग लीजिएगा । मेरा आना तो दोनों तरफ से मनाया । अगर बाबा जी आने देते तो मैं चाहे जैंसे चोरी छिपे आ जाती, पर भी कहते हैं कि पति की अनुमति के बिना मेरा आना उन्हें स्वीकार नहीं होगा । रूप को तो मेरा बाबा जी से मिलना पसंद नहीं है । जयंत उन का नाम सुनकर ही मेरी जान लेने पर उतारू हो जाता है । मैं तो आए दिन बाबाजी के सपने देखती हूँ । बहुत तकलीफ से बहुत मालूम पडता है उन के दर्शन को और विभूति फोन पर सिसकियां मरती रहती है । मैं उसे क्या समझाऊं कहूँ कि जयंत गलत है, जबकि मैं खुद यह नहीं मानती नहीं कह सकती हूँ कि वह ठीक कर रहा है । रो मत विभूति सब ठीक हो जाएगा और खुद नहीं जानती क्या हो जाएगा बाबा जी ने कैसा तूफान उस बोली वाली महिला की जिंदगी में खडा कर दिया है । दुबली पतली कमजोर से विभूति क्या इस तूफान को संभाल पाएगी? हफ्ते भर बाद फिर फोन आया था विभूति का इस बार और भी ज्यादा घबराई आवाज की उसकी लगता है कोई हमारे पीछे पडा हुआ है । कल रात चोरी हो गई है । इस तरह में ताला तोडकर सब कुछ ले गए । यह जयंत मेरी मानता नहीं । जरूर बाबाजी के अपमान का फल । आप प्लीज उनसे पूछ लीजिए, मैं उनसे मिलने आ सकती हूँ या आप ही किसी तरह मिलवा दीजिए । पता आपको फोन कर लीजिए ना । यू मुझे फोन करने में कोई हर्ज नहीं । पर मुझे लगा कि मैं क्यों फालतू में इन बॉल हूँ । इन दोनों के बीच मैंने किया था । वे फोन पर आते नहीं और मिलने की बात पर कहते हैं जयंत के साथ हूँ । आप की बात तो मानते हैं । आप कह दीजिए ना, प्लीज विभूति की आवाज फिर से सिस्टरों में बदलने लग गई थी । मैंने बाबा जी को फोन किया । वही जवाब था जो व्यक्ति को मिल चुका था । लेकिन मुझे शायद इसरार करके बाबा जी को मना लेना चाहिए था । क्योंकि अगले दिन मुझे खबर मिली । उसने मेरी रोहतक को दहला दिया । विभूति से कोई मेरा लगाव नहीं था, फिर भी बार बार मिलते रहने से अच्छी जान पहचान तो थी मुझे और अभिषेक को इसी पहचान की वजह से कुछ और बाबा जी का करीबी जानकर ही फौरन कर लिया करती थी । दरअसल बाबा जी की वजह से मैं अनजाने अनचाहे ही बहुत लोगों से जुड गई थी और उस जोडने में कुछ वैसी ही आत्मीयता और बेगानापन था जैसे कि अस्पताल से एक ही वार्ड में दो मरीजों का मिलना जो की दोस्ती में भी फल फूल सकता था और वहीं का वहीं खत्म हो सकता था । क्योंकि किसी कस्ट कर अनुभव का साझापन जहाँ दो इंसानों को करीब लाता है, वहीं अनुभव की कडवाहट की स्मृति को दूर रखने के लिए वह उस इंसान से भी दूर हो जाता है । मैं ज्यादातर बाबाजी के गिर मिलने वाले लोगों को अपने घर की परिधि से बाहर ही रखना पसंद करती थी । वो भी मुझे लगता है कि उन में मुझे सेवा बाबाजी के संप्रेक्षण का कोई और आधार नहीं है । और ऐसी एक आयामी मित्रता मुझे नागवार थी, क्योंकि जिस तरह जिंदगी बाबा जी से ही आज साबित हो रही थी, मित्रता में मैं उनसे छुटकारा ढूंढती थी । जयंत जमीन पर पेट के बल लेटा हुआ था । अपना चेहरा बाबाजी के पैरों पर गडाए हुए हाथों से उन की दोनों टांगों को था । मैं छटपटा सा चिल्लाया जा रहा था । मेरी बीवी को बचा लीजिए । बाबा जी मेरी बीवी को बचा लीजिए, मैं जिंदगी भर आपका दास रहूंगा । बस एक बार उसे बचा लीजिए । बाबा जी के आश्रम में घुसी ही थी तो सामने ये नजारा दिखा । पता लगा कि विभूति ने नींद की गोलियां खाकर आत्महत्या करने की कोशिश की थी ।

इतर भाग 18

मैं वो भाग अठारह है । जयंत उसे अस्पताल ले गया था । इमरजेंसी में हैं पता नहीं बचेगी या नहीं । बाबा जी ने झुककर जयंत के सिर पर हाथ फेरा और उसे उठाने की कोशिश की । चलो हम चलते हैं तुम्हारे साथ । अस्पताल में ज्यादातर धीरे शांत रहने वाला बाबा जी का चेहरा भी अब लटक आया था । होती उनकी विशेष चली रही थी । जयंत ने जब तक हाहाकार नहीं मचाया था, विभूति उन्हीं के दो चरणों में पडी रहती थी । बाबा जी का भी उससे विशेष प्रकट था । मैंने तो एकाद बार ये है । आप वहाँ तक सुनी थी कि वे चोरी चोरी आश्रम के बाहर भी विभूति से मिलते हैं । हो सकता है पहले मिलते रहे हूँ । पर जब से जयंत ने निवृत्ति को रोका था मिलने से उसके बाद शायद नहीं मिले हूँ । वरना यहाँ आत्मकथा की नौबत क्यों करती है? जयंत गाडी चलाने की हालत में नहीं था । मैं और अभिषेक की उन्हें अस्पताल ले गए । अस्पताल न्यूजर्सी के ही एक छोटे शहर में था । बाहर से अस्पताल नहीं कोई होटल सा लगता था । लॉन में समतल हरी घास और फूलों की छोटी छोटी क्यारियां आंखों को बडी लुभावनी लगी । अस्पताल के भीतर एकदम चुप्पी थी । घनघोर चुप की मौत की याद दिलाने वाली चुकी है । मुझे दिल्ली के अस्पतालों का ध्यान आया, जहाँ आती जाती भीड केरे ले ही अस्पताल की जिंदगी होते हैं । जिंदगी का इतना सामना मौत की अहमियत ही काम कर देता है । लेकिन यहाँ जिंदगी का कहीं नामोनिशान भी नहीं था । दरवाजे पर खडा गार्ड या रिसेप्शन क्लर्क एकदम मौत को साकार की ये जड मुस्कान रही चेहरे बाबा जी और जयंत को ही अंदर जाने दिया गया । मैं और अभिषेक बाहर ही खडे रहे हैं । मुझे बार बार एक अनाम सा अपराधबोध जकड लेता था । मैं इस वारदात को बचा सकती थी, लेकिन क्या मैं ही बचा सकती थी । बाबा जी भी तो बचा सकते थे । मुझ से बडा जिम्मा तो बाबा जी का है या उन्हें कोई अपराधबोध होगा । क्या वे ही इस सारे हादसे की जिम्मेदार नहीं । लेकिन क्या बाबा जी को खुद अपनी जिम्मेदारी का एहसास है या कि इसे भी वे कर्मफल बताकर बच जाएंगे? किसी का बोला विश्वास लेकर उसे पूरी तरह ठग लेना । फिर कहना कि यह तुम्हारे कर्मों का परिणाम है । उस मौत के सन्नाटे से गिरे अस्पताल से विभूति को जीवन दान नहीं मिल पाया । नहीं बाबा जी उसे कुछ दे पाए, सिवा इसके कि उसके क्रियाक्रम के हवन में उन्होंने कुछ मंत्रोच्चारण कर आओ तियां डाल दी थी । जयंत को हवन के दौरान फिर से मिर्गी के दौरे पडे और वह बेहोश हो गया था । जब जब होश में आया फूट फूटकर रोता रहा । पता नहीं क्या चाहता विभूति में बाबा जी से क्यों कर इतना लगाव हो गया था उन से मुझे याद है जब एक दिन उसने बाबा जी से कहा था मुझे कतई लगाव नहीं रहा इस आदमी से बात बात पर मेरी तौहीन करता है, मारता है मुझे मैं और इसके दबाव में नहीं रह सकती थी या बाबा जी ने विभूति को अपनी मुक्ति का एहसास दिलाया था अपनी अस्मिता का कि वह अपनी आवाज उठा सके और पति के पैरों तले दबती नहीं रहे हैं । लेकिन ये आत्महत्या का पसंद है या ऐसे हालात में घट सकता था । अपनी अस्मिता की पहचान तो और अपने अंदरूनी ताकत लाती है । ब्यूटी तो शुरू से आखिर तक कमजोर ही कमजोर बनी रही । बाबा जी ने उसकी कमजोरी का फायदा उठाया । उसे अपने भय पर भावात्मक रूप से निर्भर बना लिया और जब बात बिगडने लगी तो साफ सुथरे बाहर निकल आने की खातिर उन्होंने विविधि को दुत्कार दिया । क्या यह है अपने को गुरु और भगवान कहलाने वाला इंसान कभी मानेगा है? आत्महत्या नहीं थी बल्कि उसी के हाथों की गई हत्या है एक क्रूर और बेशर्म हत्या । इसकी खुले आम सजा भी नहीं सुनाई जा सकती है, क्योंकि कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं । कोई उनके कर्मों का भी लेखा जोखा कर रहा है ऐसा मुझे निकाल का ध्यान आया बाबा जी पर लगे इल्जाम का और अपनी एकमात्र ऐसी जगह बिकाऊ होने का । पता नहीं किस किस के कर्मों केरे शेयर आपस में उलझकर गुन जनों का पुलिंदा बन गए हैं । इंसान के पास इंसान को ठगने की हर विद्या का एक सम्मानित सा नाम है । शब्द होते तो हम सब कुमारी और बांध रह जाते हैं । शब्दों को जोड तोडकर पता नहीं कितना कुछ पैदा कर लेते हैं हम । रूपा दिनबदिन दुबली हो रही थी जो जो शरीर का वजन घटा हुआ दिखता तो तो रूपा का रूप मिलता जाता । एकदम घटते हुए चांद के प्रसन्न मुखडे की तरह । बाबा जी ने शायद थी की कहा था कि व्रत उनके शुभ के लिए नहीं, अपने वजन घटाने के चक्कर में क्या जा रहा था । एक दिन सबके बीच रूपा ने घोषणा भी कर दी थी कि अब उसे फ्लोरिडा जाना है । मियामी बीच पर जाएगी और स्विमिंग कॉस्टयूम पहनेगी । अब तक तो उसके ना आपको स्विमिंग फट मिलता ही नहीं था और उसके व्रत के अंतिम दिनों में तो जरूर मोटापा कई इंच घट चुके होंगे । बाबा जी के एक नए चले ने रूपा के फ्लोरिडा में रहने घुमाने का भी पूरा जिम्मा उठा लिया । उसने बाबा जी को चलने पर भी खूब जोर दिया परंतु बाबा जी का एक शिष्य । उन्हें वाशिंगटन बहुत दिनों से बुलाया जा रहा था । उन्हें हीलिंग करने वहाँ जाना था । रूपा वाशिंगटन अब तक कई बार घूम चुकी थी, इसलिए वहाँ जाने में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं थी । वाशिंगटन से कोई देवेंद्र दवी नाम के सज्जन बाबा जी को लेने भी आए हुए थे । बाबा जी और रूपा में सबके सामने इधर या उधर जाने की बात को लेकर खुले आम कई लडाइयाँ हुई । रूपा बोली, कोई मजाक है, जहाँ आपकी मर्जी होती है, वहीं मैं जाऊँ । कोई मेरी भी तो मर्जी है । नहीं जाउंगी मैं आपके साथ और रूपा बाबाजी के नए चले अनिल कुमार जी के साथ फ्लोरिडा चल दी और बाबा जी वाशिंगटन । अभिषेक को बाबा जी की नामौजूदगी में आश्रम संभालना था । सुबह शाम का आरती भजन बाबा जी का कहना था की अभिषेक ने अब इतना सीख लिया है कि लोगों के छोटे मोटे दर्द मंत्र पाठ करके ठीक कर सके । अभिषेक को खुद ऐसा महसूस नहीं होता था कि उसमें कोई विशेष शक्ति आ गई है । पर बाबा जी ऐसा कहते थे तो मैं मानता था कि शायद ऐसा कुछ होगा । एक दिन उसने अपने हाथ मेरे हाथ के ठीक ऊपर कुछ इंच दूरी पर रखा और मिंट पर रखने के बाद बोला क्या कुछ महसूस होता है? मैंने कहा कि हाँ गर्मी से आती है पर ये तो कुछ वैज्ञानिक सीधी बात है जिसमें की गर्मी तो लेकिन सुनना की पीठ का सब डर बाबाजी के पीछे से अभिषेक नहीं । इसी तरह ठीक कर दिया तो सब लोग अभिषेक की और दी जब करने लगे बाबा जी के हाथ में भी कुछ छपा तो थी ही । उनके पास आने वाले अपन बच्चों के कई माँ बाप यह महसूस करते थे कि बच्चों में कुछ बेहतरी हुई है लेकिन मुझे पूरी तरह ठीक होता कोई दिखा नहीं था । ज्यादातर वे सभी को पांच छह महीने तक लगातार इलाज करने का बताते और रूपा इसी बीच उन मरीजों के अभिभावकों को इस तरह निचोड लेती की मोहलत के अंत तक वे किसी तरह बाबाजी के चंगुल से या तो निकल गए होते या निकलने की पाइस करने लगते हैं । वो खुद जहां बाबा जी की शक्ति की परीक्षा ले रहे होते हैं, वहाँ रूपा, उनकी अभिभावकों की सहनशक्ति, उनकी दानशक्ति की परीक्षा लेती रहती, अपने बच्चों पर जी जान न्योछावर करने, सहज ही उत्सुक और उनकी सेहत के सामने पैसे की परवाह नहीं करने वाले माँ बाप बहुत देर तक शोषण का शिकार बने रहते । फिर भी बाबा जी का असम उनके लिए एक आश्रम स्थल तो था ही । रूपा का दो दिन बाद ऑर्डर से फोन आ गया । भाभी अभिषेक जी से कह कर दो चार हजार डॉलर भिजवा दीजिए । इस गति अनिल ने तो बडा धोखा किया । उठाकर अपने दोस्त क्या ठरवा दिया? मैं तो बीच पर होटल में ठहरना चाहती हूँ । मुझे इस तरह अंजान लोगों के घर पर ठहरने से बेहद नफरत है । मुझे किसी की दखलंदाजी पसंद नहीं । हम तो यहाँ अपनी मर्जी से घूमने फिरने आए हैं । बाहर में बैठकर ट्रिंग करूंगी । संगीत सुन लूंगी, ट्रीमिंग करूंगी । किसी के घर पर ही बैठना था तो फ्लोरिडा आने की भला जरूरत क्या थी? अभिषेक ने फोन ले लिया था । उसने अपने चार कार्ड का नंबर दे दिया और कहा कि जितना मर्जी चाहे उस पर खर्चा कर सकती हैं । मुझे खीज हुई किसी के मुँह से जरा सी बात निकल जाए यह और उसी के साथ चल पडती है । अब लडाई कर के होटल में आ गई है तो हम सवाल ये सब लेकिन अगले दिन हालचाल पूछने के लिए जब मैंने रूपा को होटल के कमरे में फोन किया तो फिर धोनी ने फोन उठाया । रूपा ने मेरे फोन की कतई उम्मीद नहीं की होगी । उन्हें बाबा जी को ही उसका होटल का पता था । किसी आई सी बोली हम अकेले बोर हो रहे थे । फिर धोनी को यहाँ काम से आना ही था । अच्छा हो गया ना । मैं तो आपका हाल पूछना चाहती थी । खूब मजा आ रहा है अभिषेक को मेरा थैंक्स कर देना । बहुत ही बढिया होटल है ये । मैंने बीच पर पहनने वाले ढेर सारी तरह से ली हैं । तीन अलग अलग डिजाइन के सिमी सूट लिए हैं । अब पतली हो गई हो ना तो बडी वैराइटी है मेरे नाक में मेरी साइज अठारह से चौदह पर आ गई है बिरयानी और आज मैं बोर्ड पर एक आइलैंड को जा रहे हैं । लौटों की कब अभी कुछ पता नहीं । जब जी भर जाएगा बाबा जी एक हफ्ते बाद वाशिंगटन से आए तो रूपा वापस नहीं आई थी । बाबा जी बार बार उसे फोन करते रहे तो वह कमरे में ही नहीं मिलती । एक बार मैंने फोन उठाया तो रूपा बोली यह बाबा जी को क्या हो गया है? दस दस मैसेज एक ही दिन में मैं होटल के कमरे में बैठे तो आई नहीं ना । पावभाजी बेहद नाराज हुए थे तो मैं लौटना है तो कल की फ्लाइट से आ जाओ वरना कभी भी आने की जरूरत नहीं । रूपा अगले दिन सचमुच लौटाई । मुझे अभिषेक के सिर पर चढते हुए खर्च की फिक्र थी । इसलिए रूपा के लौटने से राहत मिली । बाबा जी भी खूब कुछ देख रहे थे । उस दिन मंदिर में आशीर्वाद देते हुए बाबा जी ने हवा में मंत्र बोलते हुए कुछ पकडने की कोशिश की और हाथ में आए हुए शालीग्राम को अभिषेक को भेज दिया । इस तरह से हवा में हाथ हिलाते हुए एक अंगूठी मुझे भी दी गई । सुनना को एक कीमती पत्थर मिला । बाबा जी कहने लगे आजकल देवी की ऐसी कृपा है कि बस, शिवलिंग और कीमती पत्थरों की वर्षा हो रही है । रूपा का हफ्ते बर्बाद, जन्मदिन था । मैं बोली और सबको तो इतना सब कुछ देते रहे हैं । मेरे लिए कुछ भी नहीं है । आपके पास पत्नी के लिए कुछ मांगने से मेरी शक्ति का हनन होता है । पास बैठे वक्त बोले हम किस लिए हैं जन्मदिन वाले रोज रूपा को सोने के कडे हीरे के हार और अनेक लाल हीरे पन्ने जडी अंगूठियां भेंट हुई रूपा ने जन्मदिन मनाने का शोर भी खूब मचाया था जैसे कि कोई पांच साल की बच्ची हूँ । एक होटल के बडे से हॉल में डिस्को और हिंदुस्तानी पकवानों के साथ जन्मदिन मनाया गया । रूपा ने ढेर सारे घेरे वाली पैरों तक लंबी काली ड्रेस बनवाई थी । बिना और लो कट गले की कुछ वजन कम होने की वजह से भी रही थी पर फिर भी मांस की दे रो पडते हैं । अभी भी कैसी पोशाक से बाहर की ओर उभरी हुई थी । खासतौर से जिस्म के ऊपरी भाग में रूपा नास्ति रही घंटों नासी रही और हर एक को फ्लोर पर खींच करना चाहिए और वजन घटाने के उत्साह में और भी जाना नास्ति रही हिरोनी उसके जन्मोत्सव पर मौजूद नहीं था । यू रूपा ने खुद ही सबको फोन करके जन्मदिन पर आने का न्योता दिया था । फिर धोनी को भी बुलाया तो होगा । पर वह शायद बाबा जी से कुछ बचने भी लगा था । बाबा जी ने उससे बात करना भी बंद किया था लेकिन लगता है उसने फूल जरूर भेजे थे । बाबा जी को उसके फ्लोरिडा में होने की कोई खबर नहीं थी । रूपा अभी भी बाबाजी के सामने जिसका आने पर कह दिया करती थी तो उस आदमी से तो मैं उम्र भर बात नहीं करूंगी । बडा कंफ्यूज आदमी है । पता नहीं बाबा जी को चाहता है या मुझे रूपा के जन्मदिन की पार्टी से हम सुबह पांच बजे लौटे थे । आठ बजे जब फोन की घंटी बजी तो बडे बेमन से उठाया था । होगा अल्पना उनसे बहुत जरूरी बात करनी है । आवाज पहचानी थी पर अधिन इंडिया है । दिमाग को पूरी पहचान नहीं आ रही थी । धुंध को छटने में कुछ वक्त लग रहा था । कौन बोल रहा है मैंने कॉल क्या हो रही हूँ । कल रात बडी देर से लौटे थे । लेकिन तुम इतने दिनों बाद था । अल्पना तुमसे बात करनी ही है कि आज मिलती होगी । इस बारे में आकर बताउंगी । ग्यारह बजे कैसा रहेगा ठीक है लंच साथ लेंगे रिकॉर्ड इतने दिनों बाद मेरा दिमाग पूरी तरह से जम गया । क्या बात होगी । शायद आपने लगाई इल्जाम की बात करनी होगी । नहीं । बाबा जी से माफी तो नहीं मांगना चाहती । शायद की इस वापस ले लेगी । क्या सही होगा? ऐसा करता क्या? जोड स्पोर्ट में ही किसी के कहने में आकर केस क्या होगा? निकालने कम बोलने वाले लोग अक्सर गुंडे किस्म के होते हैं । निकाल भी शायद बाहर से सादी और चुप देखने वाली । अंदर ही अंदर अपनी प्रतिक्रियाएं समेटे रखती होगी । लेकिन लगती तो वह भी भले ही है । किसी का जानबूझकर नुकसान क्यों करेगी? कितना मुश्किल लगता है इस लडकी तक पहुंचना वो हिंदुस्तानी होता तो आधी बात अपने आप ही समझ में आ जाती । पर निकालने चुकी बात करने से ही इंकार कर दिया था । इसलिए उसकी सारी भावनाएं मेरे लिए रहस्य बनी हुई थी । अपने संस्कारों के साथ मैं कितनी अलग किस्म की लडकी थी । उसे सही परखने के मानदंड भी मेरे पास नहीं थे । आज को मिलना चाहती है । वह मौका लगते ही मैंने उससे पूछ लिया था या पुलिस की रिपोर्ट सच थी तो फीसदी सच, लेकिन मेरा रिपोर्ट करने का कोई इरादा नहीं था । कुछ परिस्थिति ऐसी बन गई । जब मैं बाबा जी को अपनी गाडी में बैठाकर कॉटेज वाली जगह पहुंची तो अंधेरा हो चुका था और तुम्हें मालूम हैं इतनी सोनी सी जगह है मैं बाबा जी को इस तरह इंकार कर मैं खुद ही बुरी तरह से डरी हुई थी । लगा कि रास्ते में ही मुझे कुछ हो ना जाए । किसी से सीधे मुनि जी की कोटरी पर चली गई । एक वही कॉटेज थी जहाँ बत्तियां टिमटिमा रही थी । बाकी तो सब जगह दे रहा था । मोदी जी को तो मैं कुछ भी नहीं बताती हूँ । और मेरे इस तरह बेवक्त घबराए से आने की वजह जब उन्होंने बार बार पूछे तो मैंने भी सब कुछ बता दिया । उन्होंने सोज आया था कि मुझे पुलिस में रिपोर्ट जरूर करनी चाहिए पर ना उनकी जातियां बढ सकती है । लेकिन अल्पना मैंने कुछ गलत तो नहीं किया था तो तुम खुद ही देख लो कितना चार सौ बीस है ये आदमी और निकालने अपने बैग में से एक वीडियो टेप निकाल कर दिया । अल्पना यह टेप दिखाने के लिए ही तुम से मिलना जरूरी था । तुम लोग आखिर मेरे मित्रो, तुम को बचाना फर्ज है । लेकिन यह टेप क्या है? अभी जब बाबा जी वाशिंगटन में जिस गुजराती परिवार के साथ ठहरे थे, उनके जवान बच्चों ने कमरे में छुपकर कैमरे फिक्स करके सब कुछ देख कर लिया है । तुम हैरान होगी बाबा जी की जो जो बातें चमत्कार में थी उन सब के छल को कैमरे ने बडी सफाई से पकड लिया है । हम सब तो मंत्रमुक्त थे, कुछ देख ही नहीं पाते थे लेकिन कैमरा तो मशीन है ना । कभी कभी मशीनों में इंसान से ज्यादा कल होती है । खासकर अब्जेक्टिव ली देखना हो तो वे हम से ज्यादा समर्थ हैं । हम दोनों ने साथ बैठकर ही पीसीआर पटेल देखा । सब कुछ साफ साफ था । बाबा जी की मालाएं सुलझाना, अपनी कुर्सी की गद्दी के नीचे शालीग्राम मालाएं और कीमती पत्थर छुपाना, आरती पर चढे पैसे गिनना सवालों की पर्चियों के बारे में बात करते करते जवाब लिखने और पूछने वाले के हाथ में पर्ची को कुछ मुझे करते हुए पर्ची बदल देना । क्योंकि बाबा जी खुद हमेशा कुर्सी पर ऊंचाई पर होते तो जमीन पर बैठा आदमी उनके हाथों की हरकत ठीक से नहीं देखता था । जो भी उस वक्त ज्यादातर भक्तों की आंखे बंद रहती है या कभी कभी वे उन्हें आंखे बंद करके देवी का ध्यान करने का आदेश भी देते हैं । उस फिल्म में बाबा जी का कच्चा चिट्ठा मेरे सामने खुल्ला पडा था । हिन्दू वाली पोडिया भी बडी चतुराई से बदल दी गई थी । मन की कोमल से कोमलतम परतों को जैसे कोई उधेड रहा था बिजली के करंट मारते एक के बाद एक झटके । कोई अपने तन मन को धरोहर रख दे और पता लगे कि खुले बाजार में नीलाम हो चुके हैं ये लोगों के विश्वासों के साथ इतना बडा मजाक पर फिर भी कुछ पाल बात हैं मन को आराम सम्मेलन अब तो अभिषेक मानेगा तुमको ये टेप कैसे मिला? निकाल मेरी कजन हैना वाशिंगटन में वह भी जब जब बाबा जी वाशिंगटन जाते उनसे मिला करती थी । इस गुजराती दंपत्ति नहीं उसे बताया था । वह कह रही थी कि दंपत्ति की मर्जी के खिलाफ उनके बच्चों ने छुप कर है, फिल्म बनाई थी । बच्चों को लगता था कि उनके माँ बाप फिजूल में बाबा जी पर कितना रुपया बर्बाद कर रहे हैं । यह फिल्म मेरे केस को बडा मजबूत बना सकती है जो मेरा हिन्दू धर्म से कुछ लेना देना तो है नहीं । फिर भी मन में डर लगा रहता है कि बाबा जी अपनी काली शक्तियों के इस्तेमाल से कुछ बुरा ना कर दें । पर इस टेप को देखने के बाद मेरे मन से सारे डर गायब हो चुके थे । सच में बहुत बडे फॉर होते हैं । हिंदुस्तानी हिंदुस्तानी माफ करना तो मैं नहीं कह रही । पर ऐसे अनुभव के बाद किसी हिंदुस्तानी पर विश्वास जमता नहीं । लेकिन तुम लोग कुछ कुछ हमारे जैसे ही हो, असली हिन्दुस्तानी नहीं । अभिषेक भी तो मेरी तरह उसे समझाना । अब और बेवकूफ नहीं बने यह टेप । अभी तुम रख लो अभिषेक और अपने दूसरे दोस्तों को भी दिखाना । मैं आज करन से भी बात करूंगी । निकाल चली गई तो मैं सोचती रही कि अभिषेक को कितना बडा शौक लगेगा । उसने तो अपने को पूरी तरह से समर्पित कर रखा है । आपने भगवान को ही कोई पाप करते देख ले तो विश्वास की थाली लेकर किसकी पूजा करेगा, कहाँ जाएगा? क्या थाली समेत मंदिर की छत से कूद मरने की इच्छा नहीं जागेगी । शायद ये है आपने बहुत करीबी के मरने से भी बडा हादसा होगा । भावनात्मक रूप से कितना भी निर्भर हो चुका है । अभिषेक बाबा जी पर बच्चे की उसकी माँ मिल जाए तो और वह भी सयाना समझदार बच्चा जो भाव और अभाव को पडता है । लेकिन सबसे पहले मुझे सारा किस्सा अभिषेक को ही बताना था । मुझ से भी ज्यादा जरूरी है उसका जानना । जो सच्चाई है उसका सामना तो करना ही है । अफसोस हो तो कम से कम आगे के लिए तो सचेत हो जाएगा । अभी भी बहुत कुछ और खोने को बच सकते हैं । अभिषेक फिर से अपनी नॉर्मल जिंदगी शुरू कर सकता है । मैं बडी बेताबी से अभिषेक का इंतजार करने लगी । अभिषेक के घर पहुंचते ही उतनी ही बेताबी से बिना विराम लगाए मैंने उसे निकाल और टेप का किस्सा सुना दिया । चलो हाथ मुँह बोलो तो टेप लगाती हूँ क्या तुम्हारे पास है एक्टिव?

इतर भाग 19

भाग उन्नीस हाँ निकाल तुम्हें दिखाने के लिए छोड गई है । पल भर खामोश रहा अभिषेक मुझे नहीं देखना कोई टिप् क्या मुझे टेप देखने से भी बडा धक्का अभिषेक के इनकार से लग रहा था । पहले पुलिस में झूठ मूठ की रिपोर्ट लिखवाई । अब उसे सबूत करने के लिए उल्टा सीधा टेप बनवा लिया । सब बाबा जी को फंसाने जालसाजी मुझे नहीं देखना ऐसा कुछ लेकिन अभिषेक तस्वीर में बाबा जी है ना । कोई और तो मौजूद है ही नहीं जो टूट तो नहीं हो सकता । मुझे कोई दिलचस्पी नहीं है । स्टेट में तो मैं भी इस बारे में किसी और से कोई बात करने की जरूरत नहीं । लेकिन हमें बाबा जी को बदला भी तो देना चाहिए । ये सावधान तो हो जाए । बहुत से लोग हम से पहले ही टेप के बारे में जानते हैं । बात तो आखिरकार खुलेगी । खुलने दो मुझे नहीं से कुछ लेना देना । लेकिन मैंने गौर किया अभिषेक के चेहरे पर पिलाई । खा रही थी आपने विश्वास का मुखौटा बहुत देर तक नहीं थोडे रह सकता है । कुछ काम हम बाबा जी से मिलने गए तो अभिषेक भीतर गडे । कांटे के दर्द को बहुत देर तक छुपाये नहीं रख सका । उसे लगा बाबा जी के प्रति उसकी भक्ति यही कहती है कि वह उनके प्रति सच्चा रहे और सच का आग्रह है कि मन की शंका गुरु के सामने रख दी जाएगी । सेवाएँ रूपा के बाबा जी के आस पास कोई था ही नहीं । बाबा जी क्या आपने सुना है कि जब वाशिंगटन में थे तो उन लोगों ने आप पर कोई वीडियो फिल्म बनाई थी? वीडियो फिल्म कैसी? फिल्म हमको तो मैं आपको सावधान करना चाहता था । आपके दुश्मन किस बारे में है? फिल्म मैंने देखी तो नहीं सुना भर ही है कि आप मोतियों की माला सुन जा रहे थे । बाबा जी के चेहरे पर कुछ रंग जल्दी से आ गई । रूपा देखा तुमने अपने किए का परिणाम सारे का मुझ पर सौंपकर घूमने में लगी रहती हूँ । अगर तुम साथ होती तो ऐसा कुछ हो सकता था । रूपा की तरफ रुख करके बाबा जी ने जिस तरह दबे क्रोध में है, बात की उससे बहुत सी बातें जैसे अपने आप ही मेरे सामने साफ होती चली गई । मुझे जैसे कंप्यूटर में भरी सूचनाओं की फाइल का कोर्ट मिल गया था तो इसलिए बाबाजी रूपा को हरदम साथ रखते थे । रूपा के पास ही रहती थी । चमत्कार करने की सारी सामग्री तभी मैं हरदम भक्तों के सवालों के वक्त कमरे में मौजूद रहती थी । आपने बैडरूम को वहाँ ताला लगा कर रखती थी, वहीं छिपे रहते थे । सूटकेसों में ये शालीग्राम मालाएं, कीमती पत्थर, सिंदूर की पुडिया और हरदम भारी सकाला बैक दी । इसलिए मैं साथ रखती थी । तभी बाबा जी उसका इतना ड्रॉप रहते थे । वही तो उनके रहस्यों की एकमात्र सहवाग थी । जानती थी कि उसके बिना बाबा जी की गति नहीं । बाबा जी अगर उस्ताद थे तो वह उनका पूरा जम्मू रहा या शायद उल्टा था क्योंकि नाचने वाली शायद रूपा ही थी । बहुत चौकस थी । रूपा की आंखें बाबा जी की इर्दगिर्द रहने वालों को बडी फुर्ती से पढती रहती थी । लोगों से बात करके हाल बता कर बहुत कुछ जान जाती थी । फिर जो जिस धंधे में होता है, उससे वैसे ही मांगे की जाती है । रूपा के चेहरे पर भी कुछ घबराहट जलकी पर जल्दी ही उसने अपना सहज यानी आक्रामक रूप धारण कर लिया । सहन करने की भी एक सीमा होती है । आप लोगों में इतना रम जाते हैं कि असली मकसद भूल जाते हैं । मुझे तो लगने लगा था कि मैं ही बाहर वाली हूँ । आप भले लोग, भले बस एक, मैं ही सब की आप में कांटे की तरह चढती हूँ । आपने खुद लोगों के सामने मुझे छोटा किया है, मेरी बेइज्जती की है । पहले तो आप ऐसा नहीं करते थे । कहते कहते रूपा के रुलाई फूट पडी मैं आखिर सब कुछ अपने लिए तो नहीं करती । गहने चाहे मैं पहनूँ और बुरे वक्त में वे आती के काम आएंगे । सब मुझे बुरा कहते हैं । इस वार्ती हूँ, गुस्सैल हूँ सब की पूजा और प्यार तो आपको मिलता है मुझे जैसे मालूम नहीं सब आप ही से मिलने आते हैं । मुझे तो वो कहते हैं मुझे तो पता नहीं कैसी जिंदगी मिली । अपना वक्त भी अपना नहीं । अगर नहीं किसी से बात करती हूँ तो कहते हैं कि बाबा जी की पत्नी बडी रोड है, किसी से बात तक नहीं करती और अगर करती हैं तो रास्ते का रोडा बनती हूँ । मेरा तो कहीं से छुटकारा नहीं । मुझे मालूम है कल को आप नहीं हूँ तो इनमें से कोई मेरी सूरत तक देखना पसंद नहीं करेगा । पत्नियों को पूछता ही कौन है, मुझे भी बाबाजी होना चाहिए था । रूपा के अंतिम वाक्य में मुझे कुछ चौकाया जैसा की रूपा और बाबा जी में कुछ साठ घाटिया । सौदेबाजी हुई हो कि कौन बाबाजी बनेगा और अब रूपा पछता रही हो कि उसे बाबा जी वाली भूमिका लेनी चाहिए थी । टेली की भूमिका में वह घाटे में रही । क्या रूपा सच पूछ में बाबा जी की पत्नी थी या की? सिर्फ भूमिका ही निभाई जा रही थी । पर इतनी दूर का सोचना मेरे लिए ठीक नहीं । प्रमाण भी तो जुटाना पडेगा जो इससे फर्क भी क्या पडता है कि पति पत्नी है या नहीं । पुरुष नारी का रिश्ता तो है । ये बाबा जी पिघल आए थे । जेड किसी देते बोले तो मगर बाबाजी होती तो भी तुम्हारा यही हाल होता । उनको दूसरों को हैंडल करना आता ही नहीं । तुम छोटी छोटी चीजें मांग कर खुश हो लेती हूँ । हम किसी से भी कुछ नहीं मांगते । पर आदमी जब इतना फ्लाइट हो जाता है तो वह खुद ऑफर करता है । हम तब भी कुछ नहीं लेते हैं । फिर आदमी को विश्वास हो जाता है कि हम ईमानदार हैं, किसी मतलब से इलाज नहीं कर रहे हैं । तब मैं आदमी हमारे लिए जान देने तक के लिए तैयार हो जाता है । बाबा जी ने यही लगाम लगा दी । इससे आगे में क्या कहते हैं यह मैं जानती थी । मैंने खुद से कहा कि ये आदमी सच में जान ही लेता है । जान से काम कुछ नहीं अभिषेक के फिक्र बडे चेहरे को गौर कर बाबा जी बोले अभिषेक जी आप क्यों तब से चिंता में पडे हैं अरे माला सुलझाने से क्या होता है? आरती के पैसे भी हम नहीं करेंगे तो और कौन देने का कोई और कुछ नहीं बिगाड सकता हमारा यह लीजिए हम तो बल्कि आपको खुशखबरी सुनने वाले थे और बाबा जी ने साइड टेबल पर रखे कागजों में से एक पत्रिका निकली । दूसरी दुनिया पत्रिका के कवर पर बाबा जी की तस्वीर थी । अंदर बाबा जी पर छह सात सपनों का लम्बा लेख था । कई तरह की तस्वीरें ऑपरेशन करते हुए समाधि में बैठे हुए मोटी मोटी सुर्खियों में लिखा था कि बाबा जी आजकल अमेरिका भर में छाए हुए हैं । हजारों लोगों की मरणांतक बीमारियों का इलाज उन्होंने किया है । बडे आदर के साथ उनका नाम उस पूरे देश में लिया जाता है । यू बाबा जी की अमेरिका के प्रेसिडेंट के साथ कोई तस्वीर नहीं थी । उन्होंने हिन्दू धर्म और भारत का नाम विदेशों में रोशन किया है । देखा विषय जी अब चाहे वे लोग कुछ भी कहते रहे, लेख पढकर इनको इतना तो मानना ही पडेगा कि हम कोई ऐसे वैसे ऑर्डिनेरी आदमी नहीं है, काम किए हैं । कोई झूठ मूठ नाम के नहीं है । आप देखते चलिए हम इन को कितना प्रभावित कर देंगे की कोई हमारा या आप का बाल बांका नहीं कर सकता । ऐसी मुसीबत कोई पहली बार नहीं आई । ऐसा तो होता ही रहता है । हर तरह के लोग हैं । संसार में कुछ विश्वास करते हैं कुछ नहीं । आप रुपए से ही पूछे । पहले भी बडी बडी बातें हो चुकी है । बाबा जी ने रूपा की ओर सहमती पाने के लिए देखा पर वह अभी तक उसी रूप से मूड में बैठी थी जैसे कि दुनिया की सबसे बडी तोप यारी वही थी बाबा जी और उनके भक्तों ने एक साथ मिलकर उस पर जुल्म किया है । देखा ना आपने? अभिषेक जी कैसे तारीफों के पुल बांधे गए हैं बाबा जी के लिए और मेरा नाम तक नहीं देख लिया ना क्या हस्ती है मैं भी कभी कभी सोचती हूँ कि मैं भी बगैरह कपडे पहनकर निकल जाऊँ । देखो मेरे बिना कैसे काम चलता है बाबा जी का लेकिन आपको साधु बनने की क्या जरूरत है ताकि सब को पता चल जाए कि मैं भी बाबाजी से कुछ काम नहीं लीजिए । कोई भगवे कपडे पहनने से साधु थोडी बन जाता है । बाबा जी का ज्ञान आध्यात्मिक शक्ति रहने दो जितना इन को आता है उतना मुझे भी आता है । मैं होती तो देखते हैं कौन कहता है नहीं बाबा जी रूपा अपनी रो में बोले जा रही थी मेरे कान एकदम से खडे हो गए । मैं क्या कह रही है? रूपा यह वही औरत है जिसने मुझ से कहा था कि बाबा जी को तो देवी से खास शक्तियां मिली हुई है । वह तो उनकी पत्नी मात्र है और आज मैं कह रही है कि उसे भी उतना ही आता है जितना बाबा जी को । इसका मतलब है की रूपा को खुद बाबा जी में कोई खास शक्ति होने का कत्तई विश्वास नहीं । ये सारा विश्वास दूसरों को ठगने की खातिर थोडा हुआ है । तो आखिर क्या है रूपा बाबाजी के फैला इस सारे तंत्र जालका एक कलपुर्जा या कि मकडी की तरह खुद उसने ही जाल बुना है । कौन सूत्रधार है इस खेल का? या की सूत्रधार और नटी ने मिलकर ही सारा खेल रचा है । क्या मतलब है रूपा के यह कहने का कि मैंने होती तो देखते हैं कौन कहता है नहीं बाबा जी या कि यह बिना समझे क्या गई गर्वोक्ति थी जो रूपा को लेकर कोई नई बात नहीं हो सकती थी या मैं ही फालतू में लकीरों के बीच में पढ रही थी और अगर रूपा कोई बाबा जी की विशेष शक्तियों पर कोई विश्वास नहीं फिर भी वह उनके अपने लाभ के लिए पूरे तन मन धन से उनके साथ लगी रही हैं । दोनों की आपसी सौदेबाजी है शायद वहाँ तब तो ये वॉल स्ट्रीट की सट्टेबाजी से भी कहीं बडा और भारी व्यापार है । और क्या कमाल की बिजनेसमैन शिप है? वॉल स्ट्रीट में तो लोग धन ही लगाते हैं । यहाँ तन, मन, धन सबकुछ बारी मुझे क्या करना चाहिए? अभिषेक को कैसे इस साल से बाहर निकालो । उधर बाबा जी को भी रूपा पर गुस्सा आने लगा था । तुम तो आज कल ज्यादा ही बड बड करती हूँ । लगता है तो मैं भी अमेरिका की हवा लग गई है । हाँ, तुम भी कर लो, वही चार ड्रेस इसका पहली है । अमेरिका की हवा लगना हो गया तो मैं भी दूसरी औरतों की तरह जलन होने लगी । मुझे अपने आप यहाँ का पहनावा पहने या जो भी धीरे पहने या मोटी मैं तो किसी से कुछ कहने नहीं जाती । पर मैं पहनती हूँ तो सबकी आंखों में आग लग जाती है तो मैंने सुबह कभी कुछ पहनने से रोका है । जो इस तरह बस ने लग गई तुमने सही दूसरे लोगों की नजर तो मुझ पर रहती है । वे तो यही चाहते हैं ना । मैं भी बस सफेद हो गया साडी पहने माताजी बने बैठे हम अपनी मर्जी से पहले रहती तो किसी को फूटी आंख नहीं सुहाती । तुमको कौन सी परवाह है किसी की परवाह करती तो आत्महत्या ही करनी पड जाती है और आत्महत्या के नाम से मेरा ध्यान सीधे विभूति की ओर गया उसका जरी के बॉर्डर की भारी भरकम साडी में लिपटा दुबला कमजोर जिसमें मेरे जहन को झटका सा देकर गुजर गया । इतनी सेवा खेती विभूति ने रूपा पर रूपा उसे नौकरानी की तरह दुत्कारने लग गई थी । जवान से तो रूपा औरतों को बडी हिमायती बनी रहती थी । फिर होती को क्यों नहीं बचाने की कोशिश की? क्या वह भी है? मानती थी कि बाबा जी और विभूति के बीच में कुछ चल रहा है लेकिन रुपए खुद तो खुले हम बाबाजी के सामने ही पुरुषों से हिलती मिलती है । लगता है इस बारे में या तो उसे छूट मिली हुई है या बाबा जी स्वभाव से ही लिबरल किस्म के हैं । वरना उसकी कई लोगों की आंखों में चुभने वाली हरकतें बाबा जी क्यों कर सहते? नवरात्रों पर जिस मुखडे सारे मौजूद पुरुषों के साथ रूपा जब घूम रही थी तो कुछ और तूने तो तानाकसी की थी और बाबा जी ने इसे कोई तूल नहीं दिया था । एक हिंदुस्तानी नैतिकता के नजरिए से मुझे बाबा जी और रूपा का रिश्ता कुछ अजीब भी लगा जैसे कि पिरोने के साथ ही रूपा का खुला घूमना, फिर अनिल के साथ फ्लोरिडा चला जाना । एक सामान्य औरत को उसका हिंदुस्तानी पति कहाँ इस तरह की इजाजत देता है । क्या यहाँ भी रूपा और बाबा जी का कोई आपसी समझौता है या की रूपा को कुछ करने से रोकने की हिम्मत या ताकत बाबा जी में नहीं है और उन्हीं की वजह से उनका व्यक्ति या व्यवसायिक कुछ भी हो सकता है । अपार्टमेंट का सौदा हो गया था तीन हफ्ते बाद की अधिकार हस्तांतरण की तारीख पक्की हुई थी तो अभिषेक ने बताया कि वकील की फीस निकालने के बावजूद शहर से दूर बाबा जी के आश्रम के लिए एक घर भी उन पैसों से खरीदा जा सकता है । बाबा जी जब वकील से मिले तो अभिषेक ने उसे भी बाबाजी से अपने विषय में सवाल पूछने को कहा । वकील खुद भी बेहद अचंभित हो गया । उसे लगा बाबा जी तो बडे खाली गुरु हैं । कहने लगा कि कई लडकियाँ बडी फ्रस्ट्रेडेट होती हैं । उनका अपना मन करता है और जब रेस्पॉन्स नहीं मिलता तो इस तरह के झूठे इल्जाम लगा देती हैं । ऐसा यहाँ अक्सर होता है । लगता है आप के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ है । किसी जमीन पर आपका केस लडूंगा, कुछ खोजबीन, इन्वेस्टिगेशन वगैरह करना पडेगा । लडकी का सामान्यतय व्यवहार कैसा है? कोई मनोवैज्ञानिक समस्या तो नहीं । कभी कभी ये लोग साइकिक केस होते हैं । अगर लडकी के इस विड्रॉ कर ले तो तब तो बहुत ही बढिया होगा । उससे बात की जा सकती है । उस पैसे देकर भी मनाया जा सकता है । शायद मैं मानेगी नहीं । कोशिश करके देखी जा सकती है । इसकी तारीख कब तक पडेगी कुछ कहा नहीं जा सकता । महीनों लग सकते हैं तो मैं हिंदुस्तान नहीं जा सकता है । आपका पासपोर्ट तो पुलिस के पास है । जब तक कुछ फैसला नहीं हो जाता लौटाएंगे नहीं । अभिषेक बहुत खुश था कि बाबा जी ने वकील को भी चमत्कृत कर दिया है । अब तो जीत ही जाएंगे । कहीं अभिषेक के आपने कमजोर होते विश्वास को जैसे फिर से ठोस जमीन मिल गई थी । मुझे तो लगता था की अभिषेक के मन में बाबा जी को लेकर कभी संदेह उठता भी तो उस की किसी को कुछ कहने की हिम्मत ही नहीं पडती । बाबाजी के सामने तो योगी मैं कमजोर पड जाता और मेरे सामने कहीं गलती से जाहिर कर बैठता तो मैं बात पकडकर बैठ जाती है । बाबा जी को छोडने या उन पर विश्वास करने के मेरे आग्रह को लेकर उसके पास बडा सीधा जवाब था जिस व्यक्ति को मैं खुद इतने करीब से जानता हूँ और अगर मेरा विश्वास सहज उसपर जमता है, व्यक्ति मेरे मन को भाता है तो मैं किसी और की बातों को क्यों मानूँ? दूसरे तो मुझ से कहीं ज्यादा दूर है और दूसरी ओर लोगों के मन में भी अभिषेक के प्रति कुछ कुछ भक्ति आने लगी थी । बाबा जी की बातों को अभिषेक ज्यादा साफ, सुंदर और सुलझी हुई भाषा में बता पाता था । बाबा जी को भी इस बात का पक्का भरोसा हो गया था कि अभिषेक ही उन का सही उत्तराधिकारी है और अभिषेक पर इस तरह के इंतजाम की वो पूरी जिम्मेदारी बेखटके डाल सकते हैं । वे कह भी देते हैं, मुझे हिंदुस्तान जाना पडे तो पीछे से आप ही संभालिये का । सब वकील का कहना था कि बाबा जी की ज्यादा से ज्यादा यही सजा होगी कि उनको हिंदुस्तान वापस भेज दिया जाए । इस पर बाबा जी अभिषेक से कहते हैं फिक्र मत कीजिएगा, हम कोशिश करके फिर लौटाएंगे । हमारी प्रधानमंत्री के दफ्तर में भी पहचान है । कुछ न कुछ इंतजाम होगा ही । रूपा को अभिषेक से इच्छा भी होती थी कि बाबा जी उससे ज्यादा अभिषेक पर भरोसा करने लगे हैं । जबकि बाबा जी ने अभी अपनी पूरी विद्या अभिषेक को नहीं सिखाई थी । बाबा जी के जीते या हारते मैं तो अभिषेक को हार ही चुकी थी । मैं या तो उसका साथ दे सकती थी या किनारे हो जाती । दोनों ही बातें मेरे लिए बेहद मुश्किल थी । अभिषेक अभी भी मेरी जिंदगी के केंद्र में था । जब की मैं उसके केंद्र से हट चुकी थी । लेकिन मेरी त्रासदी सिर्फ मेरी अपनी ही थी । अभिषेक तो आपने लखनऊ में आनंद अवस्था में था । मेरे पूछने पर की अभिषेक तो मैं यह सब जिंदगी नस करना नहीं लगता । उसने कहा था अभी तो मैंने जिंदगी का असली सुख पाया है । अपने भीतर गहरी शांति महसूस करता हूँ । बडी नई सी अपूर्व की अनुमति है ये है लोग योगी झूठमूठ में सफलता के पीछे पागल होकर पडे रहते हैं सच्ची सफलता सच्चा आनंद तो इंसान के भीतर है उसी को पहचानना है अपना उसी का तिरस्कार करके छटपटाते रहते हैं लोग । मैं अभिषेक को गलत भी कैसे कहूं? जो सच उसने पाया है उसके नियमों के आधार पर जीना उसी के लिए सही और सहज है । ये और बात है कि उस सच में मैं भागीदार नहीं हो सकती क्योंकि जो कुछ भी मैं देखता हूँ मैं बहुत अलग है । इस आध्यात्मिकता का परिणाम बहुत एकता का ऐसा प्रचंड और भयानक लगाव है । उस आध्यात्मिकता को मैं क्यों लूँ? जो मुझे दिख रहा है वह मुझे नहीं पाना है । अभिषेक का कहना है कि शब्दों के बाण को दिशाओं तक पहुंचाने के लिए धन का वाहन चाहिए । पर्व शब्द बाण ही क्या जो अपनी अंदरूनी ताकत से ही दिशाओं को नये भेज सकें । पर पैसे की बात अभिषेक के लिए योगी कोई अहमियत रखती ही नहीं । मैं कहता है अल्पना जहाँ मैं पहुंच गया हूँ वहाँ से फिर भी रोज मर्रा की भागदौड वाली कुछ जिंदगी के साथ निर्वाह एकदम नामुमकिन लगता है । तो मैं शाम अस्पताल के चक्कर आगे बढने की प्रतियोगिता पैसे कमाने का दबाव, हर महीने सैकडों मिल चुका नहीं मोटर गैराज का बिल, बिजली का बिल, फोन का बिल, कपडों के बिल, राशन का बिल । मुझे तो लगता है कि मुझे एक तरह की आत्मिक थकान हो गई थी । अब जैसे आत्मा को राहत मिली है, अब फिर से कैसे उसे उन्हीं जमीनों में झोंक दू

इतर भाग 20

भाग बीस आत्मिक थकान क्या होती है मैंने कभी महसूस नहीं पर शायद अभिषेक के संदर्भ में उसका अंदाजा लगा सकती हूँ । जो व्यक्ति साल में सिर्फ दो हफ्ते छुट्टी लेता हूँ और बाकी वक्त रोज कम से कम बारह घंटे काम करें जो पढाई और छत्तीस घंटे लगातार काम करके रेजीडेन्सी खत्म करें । फिर सर्जन जैसे तनावभरे डॉक्टरी पेशे की लाइन ले ले और उसमें भी पूरे आत्मसमर्पण के साथ काम करें । उसे आत्मिक थकान तो होगी । किसी को शायद बरनोट होना कहते हैं । यहाँ फिर फटी लेकिन अगर बाबा जी से मुलाकात नहीं हुई होती तो क्या अभिषेक को इस आत्मिक थकान का एहसास होता? क्या तब किसी और रूप में प्रकट होती है थकान? क्या रूप होता है उसका? अगर मैं अभिषेक को छोड देती हूँ तो मेरी अपनी जिंदगी भी क्या रह जाती है ना मेरी कोई औलाद है जिसके सहारे जी लूँ ले देकर मेरा सब कुछ तो अभिषेक की है । जब अभिषेक को मैं जब उसकी चुने हुए रास्ते से हटा नहीं सकी, बहुत कोशिश करके देख ली । कोई आसार नहीं देखते हैं वह जिंदगी के पुराने ढर्रे पर तो लौटे गए ही नहीं तब क्या? क्या बस यही संभावना नहीं बची की मैं ही उसके साथ बनी रहूँ एक और रूपा बस यही नियति रह गई है मेरे लिए रूपा बन जाने की रूपा का अपने साथ सामने बैठाकर अजीब आत्म दया से महसूस हो रही है मुझे कितनी अतिरिक्ति, इतना उलझाव और कितनी छटपटाहट है रूपा की जिंदगी में कभी खुश नहीं देखा इस लडकी को हमेशा यह तो कुछ पाने को लालायित या किसी को चोट करने पर आमादा या फिर कभी ने खत्म होने वाली शिकायतों का सिलसिला? क्या यही नियति मेरे भी सामने हैं? लेकिन ये स्वयं और सहजता है । क्या हर समय के अनुरूप क्या सहज की परिभाषा बदल जाती हैं? मेरे से के लिए क्या है सहज? मेरा अपना व्यक्तित्व, मेरा सोचना समझना मेरा घर मेरा इसने संसार लेकिन अभिषेक के लिए इन्हीं सब चीजों को छोडकर किसी और रास्ते पर सात या पीछे चल पडना क्या सहज हैं? छोड दूँ सोचना बस चल तू अभिषेक के पीछे यह भी तो मेरा सहज हो सकता है । अभिषेक को रोकना मेरे लिए सही है, क्योंकि मेरा समझना मुझे यही बतलाता है । जब दो विश्वासों में टकराव हो तो क्या करना चाहिए, जिसमें बहुजन हिताय हूँ क्या मेरा और अभिषेक का ही भला साथ चलने में नहीं । मैं ज्ञान मार्ग पर हूँ और वह भक्ति मार्ग पर मैं बिना सवाल उठाए चुपचाप समर्पित रहना चाहता है और मेरे भीतर के सवालों के बच्चे लहूलुहान किए दे रहे हैं । तब क्या हमारे रास्ते अलग अलग ही रहेंगे? सब कुछ तो छीना ही जा चुका है । अगले हफ्ते अपार्टमेंट की भी क्लोजिंग बाबा जी ने तो बाहें फैलाकर बस कह दिया है अच्छा क्या अभिषेक अब तुम और अपना हमारे घर में ही रहना । इसकी भी गई तारीख नहीं निकल रही थी । कभी प्रॉसीक्यूटर ही छुट्टी पर तो कभी वकील शहर के बाद एक बार हल्ला करके अब सब खामोश हो चुके थे । फिर भी तलवार तो सिर पर लटक रही थी । जब तक जो भी फैसला नहीं कर देते हैं । अगले दिन अचानक निकाल का फोन आया था । मैं जिनेवा जा रही हूँ क्या? हाँ मैं और कर्मचारी कर रहे हैं । सच ऍम शादी कर रहे हैं अगले महीने पर मैं फिलहाल लौटूंगी नहीं । साल दो साल जिनेवा में ही रहने का इरादा है । एक टेंपरेरी अपार्टमेंट भी मिल रहा है । बहुत बढिया हुआ या तो लेकिन हाँ बोलो वैसे तुमने पुलिस केस किया है ना उसके लिए नहीं होगी वो फॉरगेटिंग मेरे पास वह सब सोचने के लिए फुर्सत नहीं । यहाँ भी बाबाजी ने जो दो बातें मुझसे कही थी, वे दोनों पूरी होने जा रही । मेरी वह किताब वाशिंगटन बाहम जज वाइकिंग प्रकाशन ने स्वीकृत कर ली है । शायद उनमें पावर तो है ही । थोडा बहुत लोगों को प्रभावित करने के लिए चमत्कार कर लेना । कोई इतना बडा पाप नहीं । बट आॅफिस ओके दिन जिनेवा से फोन करूंगी । मैंने अभिषेक से निकाल के जाने की बात बतलाई तो उसने झट से वकील को फोन किया । वकील ने कहा कि सच में अगर मैं देश से ही गायब हो जाती है तो केस खारिज हो जाएगा । एक बहुत बडा बोझ बाबा जी की सर से उतर गया था । अभिषेक के विश्वास पर जो कुछ खरोंचे आई होंगी, वे अपने नामोनिशान समेत गायब हो गई थी । वह मुझसे बोला, देखा तुमने अल्टीमेट ली । सभी बाबा जी की ताकत के सामने सिर्फ नाम आते हैं । बेचारे बाबा जी तो सबका भलाई करते हैं । दुनिया में बे मतलब भला करने वाले लोग रहे ही नहीं । तभी उनकी नियत पर भी शक किया जाता है । पर हम लोग भूल जाते हैं कि हिंदुस्तानी विद्या की तो परंपरा ही यही रही है । शुल्क या पैसे लेने से तो विद्या गायब ही हो जाती है । फिर अब तो तुम्हें बाबा जी की सच्चाई का सबूत मिल गया था । अगले हफ्ते तो अपार्टमेंट की चाबी क्लोजिंग के वक्त खरीदार को सौंप देनी पडेगी । हम आज ही से धीरे धीरे आश्रम में सामान पहुंचाना क्यों नहीं शुरू करते हैं? मेरा दिल फिर से डूबने लगा था । मैंने कच्ची से आवाज में कहा या कोई और चारा नहीं पता नहीं क्या हुआ अभिषेक को एकदम बडा कोटा इतनी स्वार्थी क्यों हो तो एक भले काम में ही लग रहा है पैसा मैं कोई जो या शराब में तो नहीं गवारा जो तो मैं बुरा लगे तीस पैसे से तो आश्रम बनेगा । लोगों का इलाज होगा हमें । हमको तो अपने आप को खुशकिस्मत मानना चाहिए । जिन्हें ऐसा मौका मिला है अपनी व्यक्तिगत जरूरतों के लिए तो हर कोई कमाता खर्च होता है उससे ऊपर उतना तो किसी किसी के ही नसीब में है । ठीक है बताओ पहले कौन से सामान ते करूँ । कपडों के सूटकेस तो इतना सामान वहाँ का समाएगा । कोई वेयर हाउस ले लेंगे । बाद में असम की अपनी इमारत बन जाएगी तो इस्तेमाल हो ही जाएगा । देखना चाहूँ तो फिर तो उस नहीं जिंदगी में पुराने सामान की भी परछाई क्यों हो? बाबा जी के घर के बेडरूम में से एक खाली पडा कमरा हमें दे दिया गया था । जो रूपा इस कमरे का भी इस्तेमाल कर लिया करती थी । छूट के सो में से कपडे निकालकर अलमारी में रखते हुए मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं अचानक विधवा हो गई हूँ और किसी और के असम में आप ही हूँ । अपने घर से इतना मोह वहाँ रहते हुए महसूस नहीं किया था । इतना अब छोडने पर हो रहा था । दरअसल कुरूपा के कमरे का दरवाजा मेरे सामने ही पडता था । अपनी ड्रेसिंग टेबल के आने में मैं रूपा को अपने कमरे में बिच करते हुए बहुत पूर्ण से देख पा रही थी । मुझे अजीब भी लग रहा था पर निगाहें कभी कबार उधर चली जाती थी । दरवाजा बंद करने की मेरी इच्छा भी नहीं थी । जो भी इतनी होटल हो रही थी । ऍम टेबल के आने में मैंने बाबा जी को देखा । कमरे इतने करीब थे की आवाज भी साफ सुनाई पडती थी । यूँ बाबा जी आपने सहसवार में रूपा से बोल रहे थे । नीचे राजेश बैठा है । वहीं जिसके बेटे को ठीक से सुनाई नहीं देता जाओ जाकर कुछ शॉपिंग कर लो । तुम बडे परदे वाला टीवी सेट वगैरह खरीदने की बात कर रही थी ना । उस दिन रूपा आईने के सामने बैठे लिपस्टिकों के अलग अलग शेड्स लगाकर अपनी शोभा नहीं आ रही थी । अभी जाऊँ और क्या अभी खुश है मैं उसकी बेटे में कुछ फर्क पडा है, खुला खर्च करेगा और ऊपर उठने को हुई तो बाबा जी बोले और सोनू आज रात प्रतिभा कि रीड का ऑपरेशन करना है । रूपा हूँ करती हुई दरवाजे से बाहर निकलने को हुई तो बाबा जी ने दोबारा कहा सुना नहीं रात को ऑपरेशन होगा । रूप आने जाने की जल्दी में ही कहा तो तो क्या अब तुम्हें बताना पडेगा वो सॉरी । मुझे ध्यान ही नहीं रहा इतने दिन से क्या, जो नहीं कोई ऑपरेशन और रूपा ने अलमारी का ताला खोलकर एक दराज में से उभरी हुई इसी थैली निकाली । बाबा जी ने उसे बाहर से ही छूकर महसूस किया । ऐसा लगता था जैसे थैली में पानी बनाओ और फिर मुझे ज्यादा सोचना नहीं पडा । ऑपरेशन के वक्त बहने वाला खून यही होगा । तब से कितने प्रमाण ढूंढती रही थी, कितने अनुमान जोडे थे । इतनी अटकल बच्चों लगाए थे । आज सब कुछ मेरे सामने घट रहा था और मैं देख कर भी देखना नहीं चाहती थी बल्कि चाहती थी बुरी तरह से चाह रही थी कि कोई मुझे झूठा साबित कर दे । काश! मैं झूठी होती या अभिषेक को वो जोड दिखा पाती । अभिषेक तब भी कह देता हूँ पैसा तो चाहिए ही वरना आश्रम का खर्चा कैसे निकलेगा? और थैली देखकर कहता जरूर इसमें ऑपरेशन करने की दवा होगी या ऐसा ही कुछ जो जैसा देखना चाहता है वैसा ही देखता या देख पाता है तो सच्चाई हमेशा ऍफ होती है । ऍम टूट या निरपेक्ष नहीं । जमीन सूरज के इर्द गिर्द घूमती है । इस सच्चाई को तो हम एब्सॉल्यूट मान लेते हैं पर अपने अस्तित्व से इतर कुछ नहीं । विज्ञान द्वारा सुझाए गए इस सच को हमेशा चुनौती देते रहते हैं तो चुनौती देते हैं क्या? इसलिए कि जो कुछ सामने हैं उसी को अंतिम मानकर चलने का हमें साहस नहीं या नश्वरता को चुनौती देकर हम उससे आगे बढ जाना चाहते हैं । क्या जिंदगी के आ गए साबित कर देना चाहते हैं कि हम जिंदगी से बडे हैं । जिंदगी का मतलब जिंदगी है यह मानकर हम उसको दूसरे दूसरे मतलब ठोकते रहते हैं । अगर जिंदगी का मतलब जिंदगी है इस सच को मान लिया जाए तो क्या जिंदगी अपनी पूरी रंगत और खूबसूरती के साथ नहीं जी जाएगी? पर कितने लोग ऐसा समझते स्वीकार पाते हैं । क्या हर कोई जिंदगी में कुछ इतना ढूंढने में लगा है? सीढियों पर किसी के दनदनाते हुए छोडने की आवाज ने मुझे चौंका दिया । ऐसा अधिकार भरे दनदनाते कदम सिर्फ रूपा के ही हो सकते हैं । कमरे में आते ही उसने भरे हुए लिफाफे पलंग पर पटक दिए । बाबा जी ने भी उन कदमों के भाव को पहचाना होगा । घबराए से रूपा के कमरे में गए रूपा दबी आवाज में चिल्ला रही थी । अच्छा बेवकूफ बनाया । मेरा हजार डॉलर के कपडे चुन लिए मैंने और जब काउंटर पर पैसे देने का वक्त आया तो जाना बोले कि मेरी जेब में तो सिर्फ तीस डॉलर है । मैंने कहा तो फिर कार्ड दे दीजिए । कहने लगा कि कार्ड तो में रखता ही नहीं । मुझे तो सारे उल्लू बना जाते हैं । मैंने कहा था ना कि ये सारे कंजूस गुजराती हैं । इनसे एक डॉलर नहीं निकलवा सकते तो सारे पैसे मुझे अपने पर से निकालने पडेगा । अब मत भेजना कभी मुझे इसके साथ शॉपिंग करने मैं तो तंग ही आ गई हूँ । जो भी इस जंजाल से सीधे से अपनी फीस लगाओ और छुट्टी करो ये है क्या की पैसे? पैसे के लिए तरकी भी सोचे योजनाएं बनाऊँ, ज्यादा बोलो मत । नीचे लोग बैठे हैं बोलूंगी मेरे हजार डॉलर बर्बाद कर दिए तो क्या तुमने अपने लिए ही तो खरीदा है किसी और के लिए तो नहीं उससे? क्या मुझे योगी तो शॉपिंग करने नहीं जाना था । कोई बात नहीं । जो हुआ हुआ अब मेरी बदनामी मत करवा हूँ तो मैं भी आदमी आदमी की पहचान होनी चाहिए । मेरी भी तो बदनामी हुई है । अब दुनिया भर से कहता फिरेगा की रूपा ने मुझसे चालाकी से हजार खर्च उठाने की कोशिश की पर मैं तो बच गया । जब तक किसी में भक्ति न हो, मुझ से मत कहलवाया करो । तुम चुप करोगी या नहीं और बाबा जी ने रूपा के चेहरे पर अपने बडे बडे मजबूत हाथों से दो थप्पड जमाए । रूपा गानों को दोनों हाथ से ढके पलंग पर ऑनली लेटकर सिसकने लगी । बाबा जी ने मंदिर में जाकर दरवाजा बंद कर लिया । मैं सुन से अपने कमरे में बैठे यह सारा नाटक देखती रही । लगा कि इस नाटक पर कभी पटाक्षेप होगा ही नहीं । मन हुआ की रूपा को जाकर सहला दूँ पर समझ नहीं पा रही थी कि मेरी क्या भूमिका है । क्या मैं इस नाटक की एक दर्शक हूँ या अभिनेत्री या मात्र पर्दे के पीछे से झांकने की अनधिकार चेष्टा करने वाली कोई ऍम पर किसी की मार खाकर इस तरह चुप हो जाना मुझ से सही नहीं जाता था । मैं उठकर उसके कमरे में चली गई । अपना दायां हाथ मैंने रूपा के सिर पर रख दिया । वह मिली नहीं । मैंने धीरे धीरे उसके बाद फैलाने शुरू कर दिए । मैं किसी तरह उस तक अपनी हमदर्दी पहुंचा देना चाहती थी । कुछ पल बाद उसने करवट लेकर मेरी और देखा । आंखों कि कोरो से आंसुओं की कितनी ही दार आएँ । गालों पर छितरी हुई थी, पर चेहरे पर सहजता लाने की कोशिश करते हुए बोली बैठो भावी मैं दुविधा में थी कि मैं कैसे बताऊँ करूँ कि उनकी लडाई मैंने सुन ली है या नहीं सुनी । रूपा के चेहरे पर सस्ता लाने की कोशिश मुझसे यही कह रही थी की बात को वहीं तक रहने दिया जाए । अभिषेक लौट आए । आपका चेहरा बहुत लाल लग रहा है । पता नहीं किस्मत में यही शायद प्रेशर हाई होगा । कुछ घबराहट से भी हो रही है दवा है । आइए गिलास पानी ला दूँगी । मैं पानी लेने नीचे आई तो देखा बाबा जी भक्तों की महफिल जमाएं भाषण कर रहे हैं । उनका चेहरा हमेशा की तरह शांत और प्रसन्न दिख रहा था । मुझे उस चेहरे पर अजीब तामसिक छाया देखी । मैंने सोचा कि इस शहर को देख क्या कोई कह सकता है कि थोडी देर पहले ही इस आदमी ने अपनी पत्नी को गालियाँ दी है और उसे मारा है । मैं ऊपर आई तो रूपा दोनों गांव में घुटने को घेर पलंग पर बैठी उदास आंखों से छूटने में ताक रही थी । मैंने रूपा का रणचंडी रूप देखा था । कालिका का रूप देखा था मानिनी और अभी सारी का शायद फ्लर्ट कहना बेहतर होगा और जिसमें की प्यास में तडपि रोपा को भी देखा था । पर इतनी गहरी उदासी से घिरी रूपा को मैंने कभी नहीं देखा था । बैठो अभी मुझे पानी का ग्लास लिए खडा देख उसने कहा दवा खा लीजिए साल होंगे । उसने मरे मन से कहा एक लंबी चुप्पी रूपाजी आपको यहाँ कैसा लगता है यहाँ कहाँ अमेरिका में नहीं यहाँ इस माहौल में इतने लोगों के बीच यह तो मेरी जिंदगी है । कुछ लगने नहीं लगने की तो बात ही नहीं । हम लोग पता नहीं कितने सालों से ऐसे ही घूम रहे हैं । अब तो आदत ही पड गई है टिक्कर रहने से वो होने लगती है । बाबा जी तो अमेरिका में आश्रम बनाकर यही टिक जाना चाहते हैं । मैं तो यहाँ से भी कहीं और किसी दूसरे देश में जाना चाहती हूँ । यहाँ बाबा जी को चेले बहुत मिल गए हैं । लेकिन आपको इतने लोगों के साथ पहले लगता था कि मुझे अपनी प्राइवेसी मिले । पर अब जब लोग आस पास नहीं होते तो अकेलापन भी लगने लगता है । कभी लोगों से मन को घबराहट भी होने लगती है । पर शायद कहीं भी विस्तार नहीं । आपको यहाँ पर कैसा लग रहा था? अभी मैं चुप रही । मन का जवाब देना पता नहीं सही होता या नहीं । एक बात करूँगा । अभी मुझे मालूम है आपको जरूर तकलीफ हो रही होगी । पर क्या इतना ही हमारा सौभाग्य नहीं कि हमारे पतियों ने हमें छोड नहीं दिया वरन कौन रोक सकता था बाबा जी को या अभिषेक को ही, अगर वे आपको त्यागकर इस काम में लगते हैं । मैं तो इसीलिए हर तरह से बाबा जी का साथ देती हूँ । मेरे मुंह से निकल पडा मार खाकर भी अपमान की याद से रूपा की आंखें फिर से की ली हो । सच में कभी कभी मन होता है सब को छोडकर या तो भाग जाऊँ या कुछ खाकर मर जाऊं । हर तरह से मैं ही बुरी पडती हूँ पर कोई और चारा भी नहीं । रूपा सिसकियां भरती रही मुझे अपने आप पर ग्लानि और शोक हो रहा था । मैं फिर यहाँ क्यों आ गई? मुझे इस सब से क्या लेना देना? ऐसा बोल उठी । अभिषेक पता नहीं कब लौटे गाडी तो है ही । मैं घर जाती हूँ । देर नहीं हो गई है । कोई बात नहीं घर जाकर और पैकिंग भी तो करनी है । अपार्टमेंट की क्लोजिंग से एक दिन पहले अभिषेक ने टैंपो मंगवा लिया था कि सारा सामान बाबाजी के ही गैराज में छोड देंगे । सामान हमसे पहले पहुंच गया था और ऍम टिकाया जा रहा था । लेकिन कार से उतरते ही मेरी निगाह सामान की ओर मैं जाकर बाहर लॉन में खडी रूपा पर जम गयी । उसने जो गया रंग की लूंगी और स्लीवलेस करता हूँ । ठीक बाबा जी वाला पहनावा पहन रखा था । लगता था नया नया ही अपने ना आपका बनवाया है । बाल धोकर खुले छोडे हुए थे । चेहरे पर हल्का सा मेकअप था जो गया लिपिस्टिक और जो भी आतंकी ही बिंदी लगाई हुई थी । वजन कम होने के कारण रूपा के नए नक्स पहले से कुछ देखें और ज्यादा आकर्षक लगने लगे थे । मुझे सामना होते हुए बोली मैं जा रही हूँ कहाँ फिर धोनी के साथ टेक्सस अपना नया आश्रम खोलूंगी । क्या बाबा जी के साथ? नहीं? बाबा जी को इस से कुछ लेना देना नहीं है । लेकिन बाबा जी को अभी मेरी जरूरत नहीं । उनकी देखभाल करने वाले बहुत से है यहाँ अब मैं आपको आजमाना चाहती हूँ तुम जरूर कामयाब होगी । रूपा ऐसी ग्लैमरस गुरुवाणी भला किसने देखी होगी और अमेरिकी क्लाइंट्स लाने का काम करेगा? पिरो नी उसे विश्वास है तुम पर वह तो शुरू से ही मुझे शक्ति देखता रहा है । मुझे ही अपने पर भरोसा नहीं था । लगता था सिर्फ बाबा जी ही क्या हुआ था उस पर मेरे भीतर जैसे किसी महासागर का तूफान उमड आया था । लगता था एक पल भी खडी रही तो चकराकर गिर जाउंगी । पता नहीं किस दिशा में मोड दिया है उसमें मुझे और मैं अपने से बेखबर बढती जा रही हूँ । इतना जानती हूँ कोई डर नहीं है मुझे तूफान पर पैर रखकर मैं खुद ही निकल गई हूँ उससे इतर की खोज में क्योंकि वह खोज मेरी अपनी ही है, उसमें कोई और माध्यम नहीं बन सकता है । वह इधर मेरा अपना इधर है, किसी की धंधेबाजी का उपकरण नहीं । उसकी पहचान मुझे खुद ही करनी है । चाहे अधूरी हो या पूरी, अपने स्तर पर ही अपनी क्षमता के अनुरूप ही पहचानोगे उसे वहीं सच्ची पहचान होगी । किसी का बहकावा नहीं होगा कि शरीर को छत्रछाया दिलाने के लिए आत्मा को क्यों धरोवर? देखो जब मौत का सामना करने के लिए हम अकेले पे हथियार हो जाते हैं तो जिंदगी का सामना करने के लिए इतने सामान जुटाने की क्या जरूरत है । जिंदगी उसी मौत का ही तो एक विस्तार है और वह इतर मौत का ही एक चेहरा या जिंदगी का ही एक और विस्तार हूँ ।

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