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1. इंदिरा की मौत, किवदंति का जन्म

आप सुन रहे हैं । फॅमिली किताब का नाम है इंदिरा । भारत की सबसे शक्तिशाली प्रधानमंत्री जिससे लिखा है सागरिका घोष ने । आरजेडी आशीष जैन की आवाज में कुकू एफ एम सुने जो मन चाहे इंदिरा की माँ किवदंती का चंद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या अक्तूबर उन्नीस सौ चौरासी को उनके दो अंगरक्षकों के हाथों हुई । दोनों सिख थे । उनकी हत्या से सिखों के जनसंहार की ऐसी खूनी धारा वही जिसे इतिहास ने उन्नीस सौ चौरासी के सिख विरोधी दिल्ली दंगे के नाम से दर्ज किया । इसमें हजारों सिखों को सरेआम मौत के घाट उतार दिया गया । उनकी हत्या ने ऐसे गहमागहमी भरे साल का अंत किया । इसके दौरान श्रीमती गांधी ने अमृतसर स्तर सिख आस्था के सबसे पवित्र प्रति स्वर्ण मंदिर में भारत की सेना को सशस्त्र ऑपरेशन का आदेश दिया था । लॉटरी श्रीमती कम थी । आप की हत्या वाले दिन मैं दिल्ली विश्वविद्यालय स्थित अपने कॉलेज में थी । दोपहर से पहले ही लोगों को ये पता चल गया था कि इंदिरा गांधी किसी भयानक दुर्घटना की शिकार हो गई थी । आप की मृत्यु की औपचारिक घोषणा तब तक नहीं की गई थी लेकिन अफवाहों का बाजार गर्म था । हम आपस में अविश्वसनीय अंदाज में फुसफुसाकर बात कर रहे थे । विशेष गांधीको खोली मार दी गई । हम अपने मन को ये समझा ही नहीं पा रहे थे कि शायद आप की मृत्यु हो चुकी है । इंदिरा गांधी क्या कभी मर भी सकती थी? हमारी जिंदगियों पर अपनी शख्सियत की अमिट छाप छोडने वाली महिला यू अचानक नहीं रही थी । ये तो कोई सोच भी नहीं सकता था । ये बात ही अकल्पनीय और बेच चुकी थी के दशक के हमारे जैसे बच्चों के लिए तो आप जीते जी अमर हो चुकी थी आप भारत रुपये जहाज पर लगी स्थायी प्रतिमा थी गढने हमेशा बनी रहने वाली एक मौजूदगी आपको क्या अपनी मृत्यु का पूर्वाभास होने लगा था? अपनी मृत्यु से कई दिन पहले अपने किसी मित्र से आपने कहा था मैं सबसे एकदम आज आ गई हूँ । क्या आप डर गई थी? अपने दुश्मनों के षड्यंत्र का भय आपको सदा रहा था । शायद इसीलिए अपने जीवन के आखिरी दिनों में आपने निरीश्वरवादी नेहरू की बेटी ने कर्मकांडो मंदिरों, तंत्रमंत्र और अंधविश्वासों का दामन हम लिया था । अपनी मृत्यु से चार दिन पूर्व आप श्रीनगर लगभग तीर्थ यात्रा के अंदाज में गई थी । आप वहाँ मंदिर, दरगाह और संतोष सूफियों के सामने माथा टेकने गई थी । आपने श्रीनगर दौरे से पूर्व ये निर्देश दे दिया था कि आप की मृत्यु के बाद आपकी चिता की भस्म को हिमालय पर छितरा दिया जाए । आप की जीवन लीला का अंत हालांकि राजनीति में आपके शांत लगी ले प्रदार्पण के विपरीत बेहद नाटकीय सर रक्तरंजित रूप में हुआ । आपका जीवन तूफानों और परेशानियों से घिरा रहा । हालांकि आपके पिता रहे तो इसकी भविष्यवाणी अपने जीते जी ही कर दी थी । आपके महाकाव्यात्मक ऍम आपके आपके वदंति को ऐसी रंगते दी जैसी शायद पिछले लंबी निरर्थक बीतती और बुझती हुई जिंदगी को तभी हासिल नहीं होती । उस समय पे सधे हुए कदमों से उद्देश्यपूर्ण तरीके से घर से बाहर आई थी ये बात इकत्तीस अक्टूबर उन्नीस सौ चौरासी की तारीख थी । अगले दिन एक नवंबर की सुबह के अखबारों की सुर्खियां थे । इंदिरा गांधी की गोली मारकर हत्या । सिख सुरक्षाकर्मियों ने छाती पेट में गोलियां दागी । अपनी मृत्यु की पूर्व संध्या को उन्होंने भुवनेश्वर में सभा को संबोधित किया था और जबरदस्त भीड के सामने अर्थ नाथ किया था । आज मैं यहाँ हूँ । कल में शायद यहाँ आ रहा हूँ । मेरे मरने पर मेरे खून की एक एक बूंद भारत को ऊर्जा देगी और शक्तिशाली बनाएगी । भारतीय प्रशासनिक सेवा के पूर्व अधिकारी और तब इंदिरा गांधी के सचिवालय के निदेशक वजाहत हबीबुल्लाह भुवनेश्वर में उनके साथ ही थे । वजाहत उनके सचिवालय में उन्नीस सौ बयासी में ही शामिल हुए थे । उनके अनुसार वो भाषण तेरह तुझको अर्पण के अंदाज में था । मानव भारत को वापस जनता को समर्पित कर रही थी मानव वो कह रही थी कि मैं जो कुछ भी कर सकती थी, कर चुके हैं । अब इसे आप खुद संभाली । साधु लक्ष्मण जूने, जिनसे वह श्रीनगर के अंतिम दौरे नहीं मिली थी, याद करते हुए बताया, बहुत उनके बहुत गरीब थी । उन्होंने जब उनसे किसी इमारत का उद्घाटन करने को कहा, उनका जवाब था यदि में जिंदा रही तो जरूर आउंगी । उनकी मृत्यु के बाद बेलूरमठ स्थित रामकृष्ण मिशन के एक साधु ने याद किया । इंदिरा गांधी ने उन्हें भी उसी अक्टूबर में असम में मृत्यु के बारे में कुछ ऐसा ही पत्र लिख दिया था । मृत्यु का शिकंजा करीब आता दिख रहा था । भले ही शरीर ऊर्जा से भरपूर था । उनकी इच्छा शक्ति डूब रही थी, शायद शून्य में विलीन होने को आतुर थी । तारीख की सुबह ठंडी और धूप से भरपूर थी । उनका पूरा दिन बेहद व्यस्त था । सुबह के समय उनके इंटरव्यू की वीडियोग्राफी के लिए अपनी टीवी टीम के साथ मेरे था स्तंभकार और प्रसारक पीटर उससे लोग इंतजार कर रहे थे । दोपहर को ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री जाॅन के साथ मुलाकात नहीं फिर उन्हें ऍम के साथ औपचारिक रात्रिभोज कर रहा था । मैं उस दिन सुबह उनसे उस समय मिला जब वो इंटरव्यू देने के लिए तैयार हो रही थी और उनकी ब्यूटिशियन उनका मेकअप करने में जुटी हुई थी । डॉक्टर कृष्णप्रसाद माथुर ने अपनी ज्यादा को टटोलते हुए बताया । वो में उनके प्रधानमंत्री बनने के समय से ही उनके डॉक्टर थे और बिला नागा हर सुबह उनकी जांच करने जाते थे । डॉक्टर ने बताया कि वो हमेशा एकदम चुस्त दुरुस्त रहती थी और उन्हें ऐसा याद नहीं पडता कि कभी वो बीमार पडी हो । उनका स्वस्थ है । इतना बेहद खूबसूरत था कि मेडिकल समस्याओं की चर्चा के बजाय हम लोग अन्य बातें कर लिया करते थे । उस दिन मैंने कहा कि टाइम पत्रिका में पडा था कि रोनाल्ड रीगन आपने टीवी इंटरव्यू के लिए मेकप कराने से मना कर दिया था । उन्होंने इस बात का जोरदार खंडन किया और बताया, रीगन मेकप तो करते ही थे साथ ही कान में एयर पीस भी लगाते थे । इसके जरिए उन्हें उन सवालों के जवाब मुहैया किये जाते थे । पत्रकार उनसे पूछते थे । माँ को लगता है कि उन्हें अपनी मृत्यु का पूर्वाभ्यास हो गया था तो मुझसे कहा करती थी मैं अचानक मरूंगी किसी दुर्घटना में सवेरे नौ बजे के बाद वो तैयार थी । अपने निवास सफदरगंज रूप से तेजी से भागते हुए अपने दफ्तर बगल के एक अकबर रोड स्थित बंगले की और घुमावदार रास्ते पर लंबे डग भर्ती हुई चल पडी जहाँ उस तरह की टेलीविजन टीम उनका इंतजार कर रही थी । उन्हें सूरज की तेज किरणों से बचाने के लिए पुलिस वाला उनके सर पर छाता ने साथ साथ चल रहा था । उनके पीछे निजी सहायक आरके धवन चल रहे थे और उनके भी पीछे उनके सेवक तथा उनकी सुरक्षा के लिए तैनात पुलिस सब इंस्पेक्टर थे । ये हमेशा की तरह सुसज्जित और ताजा तम लग रही थी । हमेशा िखारी जब तुमसे संभाली हुई सुपौल काठी के मालकिन इंदिरा गांधी उस दिन तो खासकर बेहतरीन स्वास्थ से दमकती, तरोताजा और सुन्दर लग रही थी । उन्होंने काली पट्टी वाली केसरिया रंग की साडी पहनी हुई थी और उससे मिलती जुलती नाजुक सी काले रंग की सैंडल उनके पैरों में थी । उनके कंधे पर था कशीदाकारी वाली लाल छोला कैमरे पर अपने व्यक्तित्व को आकर्षण देने के लिए उन्होंने उस दिन बुलेटफ्रूफ जैकेट नहीं पहन रखी थी । अपनी जान पर बार बार गंभीर खतरे के कारण वो उसे पहनने को मजबूर हो गई थी । तो दरवाजे से बाहर निकली और झाडियों की कतारों, लिली के फूलों से पत्ते, ताला और बगीचे को पार करते हुए अपने अकबर रोड्स्टर दफ्तर को ले जाने वाले छोटे से एक गेट की तरफ पडी । इस रास्ते से रोज गुजरती थी विजय छोटे गेट के पास पहुंची तो वहाँ सब इंस्पेक्टर बेअंत सिंह ने गा होने आया । प्रेमसिंह उनके अंगरक्षक दस्ते में पिछले नौ साल से शामिल था और उसके साथ विदेश भी गया था जिसमें उनकी हालिया लंदन यात्रा भी शामिल थी । ऑपरेशन ब्लूस्टार के बाद उसे सिख होने के कारण उनके सुरक्षा दस्ते से कुछ ही समय पहले हटाया गया था । लेकिन इंदिरा नहीं उसे वापस बुलवा कर ही दम लिया । उन्होंने हमेशा की तरह उसका अभिवादन नमस्ते से क्या । बहन सिंह ने जवाब में अपना रिवॉल्वर उठाया और उन पर निशाना साथ दिया । उन्होंने पूछा, क्या कर रहे हो? इंदिरा गांधी व्यवहारिक थी । सहज बहुत से सीट थी । कल्पनाओं की उडान भरना उन्हें नहीं आता था । उनके दिमाग में ये बात जरूर कौन ही होगी की बहन सिंह क्या करने पर उतारू है । वो भी ऐसे दिन जब सूर्य की सुनहली किरणों ने मृत्यु संबंधी सभी विचारों को ठिकाने लगा दिया था और बेहद व्यस्त दिन अपने छोटे से छोटे कामों के बखूबी निपट जाने के इंतजार में था । हवा में पल भर की खामोशी रही । फिर उसने गोलियां चलाई, एकदम करीब से एक के बाद एक पांच गोलियां । अभी बेयंत के दूसरी तरफ कौन से एक और युवा सेक सिपाही सपूर्ण सिंह नमूदार हुआ । बाईस साल का सपोर्ट सिंह गुरदासपुर में लंबी छुट्टी बिताकर बस लौटा ही था और डांस पर कब से कुछ उग्रवाद की पौधशाला बना हुआ था । छप्पन सिंह के बाद घबराहट के मारे मानव जमीन से चिपक गए । अभी बेल चलाया हो रहा है । सुनते ही सपोर्ट नहीं लडते, हाथों से अपनी ऍन पच्चीस गोलियाँ दी । इंदिरा गांधी परमाणु गोलियों का छोटा सा चक्रवात टूट पडा, जिसने उनकी इकहरी काया के लगभग हर हिस्से को बींध दिया । मुझे एक के बाद एक तीन गोलियां चलने की आवाज सुनाई दी । पीटर उस्तीनोव ने बताया, दफ्तर में लोग कहने लगे ये पक्का पटाखे होंगे । उसके बाद स्वचालित हथियार से तब तक गोलियां चलने की आवाज आई । मानव हमलावर कोई कसर नहीं छोडना चाहते थे । मुझे नहीं उनके बचने की कोई भी गुंजाइश लगी भवन तक खडे रह गई । एक दम जरूरी है । वो याद करते हुए बताते हैं, मैं जब भी वो दिन याद करता हूँ तो पागल हो जाता है । उस वाकये का याद करने से बचता हूँ । बहुत जब गोलियां दागने लगा तब तक उस जमीन पर गिर चुकी थी । धवन आगे लगते हैं । अन्य सुरक्षाकर्मी भी दौड कर खून से लगभग इंदिरा गांधी को संभालने पहुंचे । लेकिन बेयंत सिंह और सतवंत सिंह के चेहरे पर शिकन तक नहीं और उन्होंने अपने हथियार किए । मोहन सिंह ने पंजाबी में कहा, मुझे जो करना था मैं कर चुका । अच्छा तुम्हें करना है वो करो । कुछ मिनट में भारत तिब्बत सीमा पुलिस के जवानों ने प्रेम सिंह और सपंत को काबू में कर लिया । वो लोग इंदिरा गांधी के घर की सुरक्षा के लिए तैनात थे । हम उसी दिन सिपाहियों से हुई । छीनाझपटी ने गोली खाकर मारा गया । सब हम और उसके षडयंत्रकारी साथी किधर सिंह को चार साल से अधिक समय बाद कौनसी दी गई । अपनी दादी की हत्या के तीन दशक बाद राहुल गांधी ने अपने दो दोस्तों प्रेम सिंह और सतवंत सिंह को याद किया । मेरे दोस्त थे जयंत मुझे बैडमिंटन खेलना सिखाया था उसने कभी मुझ से पूछा भी था कि मेरी दादी कहाँ होती थी और क्या उनकी सुरक्षा काफी थी । उसने मुझे बताया यदि कोई कभी हथगोला फेंककर मारे याद रखना तो फौरन जमीन पर लेट जाना होगा । मुझे बाद में समझ में आया कि दिवाली के दौरान स्वतंत्र और प्रेम उन पर हथगोला फेंकने के फेर में थे । इंदिरा गांधी के जीवन पर मंडरा रहे गंभीर खतरे के प्रति इंटेलिजेंस ब्यूरो आईबी पूरी तरह खबरदार था । रिसर्च ऍम रोके । मुखिया पद से सेवानिवृत्त ऍफ को बुलाकर उनकी सुरक्षा का जिम्मा सौंपा गया । उन्होंने उनके अंगरक्षक दस्ते में सिखों की मौजूदगी के प्रति बार बार चेतावनी दी थी । बावजूद इसके उनकी निजी सुरक्षा नहीं है । मुस्तैदी का हैरतनाक अभाव उस प्रशासनिक पतन की निशानी था । सरकार चलाने की उनकी सामंती व्यक्ति पर आप और केंद्रीकृत शैली से पैदा हुई थी । उन के आस पास समुचित सुरक्षा और खुफिया प्रक्रियाओं के पालन का सरासर अभाव था । प्रधानमंत्री की सुरक्षा को भी जिस अमर्यादित और लापरवाह तरीके से अंजाम क्या जा रहा था और चर्यजनक है, प्रशासनिक निर्णय प्रक्रिया के खोखलेपन का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है की बेहन सिंह उनके अंगरक्षक दस्ते से हटाए जाने के वर उत्तर सीधे इंदिरा के पास अपील करने पहुंच गया था और आईबी के मुखिया द्वारा किया गया तबादला रुकवाने में कामयाब रहा । आई । पी । के इस निर्देश के बावजूद की उन की चारदीवारी के भीतर एकमात्र दो हथियारबंद सिख सुरक्षाकर्मी कभी भी नहीं रहने दिए जाए । सतनामसिंह इसका उल्लंघन में कामयाब रहा हूँ । वो भी इतना आसान सब बहाना बनाकर इसका पीठ खाता था । इसलिए उसे आवास की चारदीवारी के भीतर ही रहने दिया जाए । अपनी सुरक्षा में प्रत्यक्ष खामियों के प्रति ऐसा लगता है कि वे खुद भी बेहद लापरवाह हो गई थी । वो जब मेरी हत्या करने आएंगे तो कोई भी नहीं बचा पाएगा । उन्होंने लगभग असहाय भाग्यवादी की तरह ऐसा कहा था । प्रधानमंत्री के घर पर टाॅक क्योंकि चाय पीने गया था । स्टाॅक्स काम नहीं आ सके । उन्हें उठाकर सफेद फॅार कार में डाला जा रहा था । तब ही भीतर से सोनिया गांधी ये चिल्लाती हुई दौडी आई हमी ऍम भी सोनिया गांधी याद करती हैं । मैंने जब शूट सुना गोलियों का मैंने सोचा कि शायद दिवाली के बच्चे कुछ पटाके छोडे जा रहे थे । मन में संदेह गहराया । मैं बाहर की और भागी तो गोलियों से वृद्धि उनकी देह देखी । मैं इसका अंदेशा था । मेरी सास को पूर्वाभास इस बात का उन्होंने इस बारे में उनसे जिक्र किया कि उन्होंने खास तौर पर राहुल से बात की थी । उन्होंने बकायदा हिदायत भी दी थी । है सोनिया भवन और अन्य सुरक्षा करनी दिनेश भट्ट सभी अंडर में चढ गए । सोनिया गांधी पिछले सीट पर अपनी संस्कृति सिर अपनी गोद में संभाले थे और एक अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान एम्स की और रवाना हुए । उस समय सडक सवेरे कि भीड से खचाखच थी । उनकी गाडी रैंक भर पा रही थी । लोग जब अस्पताल पहुंचे तो जूनियर डॉक्टर जानकर हैरान रह गए । उनका मरीज कौन है? टूर्नामेंटों में ही वरिष्ठ सर्जन और फिजिशियन आदि तमाम डॉक्टर वहाँ घटना हो गए । लगातार खून चढाना शुरू किया गया । सर्जन उनकी छाती और पेट का ऑपरेशन में जुटे और खून जुटाने के लिए आम जनता से रक्तदान की अपील की गई । ऍम कर लोग इतनी भारी तादाद में आ गए । वहाँ भगदड का नंबर गया । उसी दोपहर को लगभग दो बज कर बीस मिनट पर इंदिरा गांधी की मौत की घोषणा कर दी गई और सामान के सडसठ जन्मदिन में महज तीन हफ्ते बाकी थे । हालांकि बीबीसी पर उनकी मृत्यु की घोषणा कई घंटे पहले ही कर दी गई । नहीं । संवैधानिक प्रक्रिया के अनुसार पद पर ही प्रधानमंत्री की मृत्यु हो जाने पर उनके उत्तराधिकारी को तब कल शपथ दिलाना आवश्यक होता है क्योंकि प्रधानमंत्री के नहीं रहने से सरकार का सब तो खत्म हो जाता है । इसलिए आकाशवाणी पर प्रधानमंत्री की मृत्यु की घोषणा हूँ । राजीव गांधी को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाने से चंद मिनट पूर्व ही की गई आकाशवाणी पर कांपते हुए औपचारिक सुर में बस पितृ भर घोषणा की गई । हम खेदपूर्वक प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की मृत्यु हुई है । घोषणा करते हैं । उत्तर और उत्तराधिकारी राजीव गांधी को दिल्ली पहुंचाने में कुछ घंटे का समय लगा । राजीव गांधी बंगाल में चुनाव प्रचार अभियान छोडकर उल्टी पहुँच वापस आए । राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह भी यमन में सना से गडबडी में दिल्ली आए ताकि राजीव को फौरन शपथ दिलाई जा सके । राजीव तो बीबीसी रेडियो पर शोक समाचार पहले ही सुन रहे थे । उन्होंने चिंता में डूबी आवाज में अपने साथियों से पूछा वो इतनी सारी कोरियों की अधिकारी थी आपने अंतिम वर्षों के दौरान इंदिरा गांधी ने इसे सुनिश्चित किया था सिर्फ राजीव जी उनके उत्तराधिकारी बन सकें । अब तक मंत्रिमंडलीय साथियों मुख्यमंत्री हो और पार्टी के पदाधिकारियों के पर्व इसकदर कतरे जा चुके थे कि प्रधानमंत्री, कांग्रेस अध्यक्ष और लोकसभा में संसदीय दल के नेता यानी सभी प्रमुख पदों से वो खुद काबिज थी और उन के बाद भी उनके पुत्र के अलावा और कोई भी उत्तराधिकारी नहीं था । इकत्तीस अक्टूबर को अपनी माँ की हत्या के नौ घंटे बाद शाम छह बजकर पैंतालीस पाॅलिस वर्षीय राजीव गांधी को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिला दी गई । डॉक्टर माथुर कविता सुनाते हैं, इंदिरा नहीं है । उनके लिए लिखा था ऑन लोग डॉक्टर वाॅ और मल्टी कलर्ड फिर हमें डॉक्टर को जानते हैं जो दिन रात काम में लगा रहता है । कमर दर्द से लेकर जुकाम पर हम मालिश अथवा रंगबिरंगी गोलियों के सहारे सारी बीमारियों का इलाज करता है तो हम आपको बताते हैं उन पर वह वार्ना खाता था कि अंत तक जब उनकी मृत्यु हुई तो उनके स्वास्थ्य की बीस साल से देखभाल करने के बावजूद मेरे पास उनके लिए कोई इलाज ही नहीं था । तीन मूर्ति भवन में तिरंगे में लिपटे उनके शव का अंतिम दर्शन करने मानव जनसैलाब उमड पडा था । उन्होंने इसी भवन में अपने पिता जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमंत्री काल में सत्रह साल बताए थे । दर्शनार्थियों के नारे इंदिरा गांधी अमर रहे हैं, वहाँ घूम रहे थे । शोक रेस्ट भीड के बीच से तभी खून जमा देने वाली चीज आपको जी उनका बदलाव खून चलेंगे । दिल्ली में कत्लेआम की लहरों की बदले की भावना ने नाक की तरफ फन फैला । सिखों पर हमले उसी तरह शुरू हो गए । बसों और रेलगाडियों से उतार बार कर सिख ऊपर मिट्टी का तेल डालकर उसे जिंदा चलाया जा रहा था । अन्य सिखों को उनके घरों से बाहर घसीटकर तलवारों से काटकर मार दिया गया । खुली कमीजों में लाना, आंखों नौजवान, हाथों में साइकिल की जंजीरें, लोहे के सरिये था । मैं चाकू लहराते बेखौफ गलियों में अपने शिकार ढूंढ रहे थे । ऐसे ही किसी गिरोह ने बस को रोककर पूछा बस में कोई सिखता नहीं है । इसी बस में लेखक अमिताभ घोष भी सवारियों में शामिल थे, जो तब दिल्ली विश्वविद्यालय नहीं पढाते थे । वो लिखते हैं, उनकी आवाज में कोई उत्तेजना नहीं थी और यही सब सेटल नाम की बात सवारियों ने मिलकर एक सिख मुसाफिर को सीट के नीचे छुपा रखा हूँ । जवाब में नगार के साथ सर हिलाते हुए एक साथ कई आवाज गूंजी नहीं, यहाँ कोई भी शक नहीं है । आखिरकार दंगाइयों की टोली लौटे और हाथ से बस को आगे बढने का इशारा किया । अम् रिंग रोड पर आगे बढे मगर कोई भी कुछ नहीं बोल रहा था । दिल्ली धडक रही थी, सिखों की दुकान है, सरेआम लूटी और बसे जलाई जा रही थी । मजदूरों की कॉलोनी तृणों पुरी के वक्त दिसंबर ब्लॉक में मौजूद लगभग सभी सिख मर्द जिंदा जला दिए गए थे । हाथ साहब दिल्ली के सिख विरोधी दंगों का प्रतीक बन चुका है । ये है स्वतंत्र भारत के इतिहास में किसी भी शहर के किसी एक मोहल्ले में हुआ सबसे बडा जनसंहार था । दो सिखों को तो गुरुद्वारा रकाबगंज के मुख्यद्वार पर ही जिंदा जला दिया गया था । तीन बेटों की पैंतालीस वर्षीय मांग गुरदीप कौर को निर्वस्त्र करके उसके किशोर बेटों के सामने ही बलात्कार किया गया । इतना ही नहीं फिर वैश्यों ने उस निर्वस्त्र मेरी माँ की आंखों के सामने उसके किशोर बेटों को जिंदा जला डाला । इस लोमहर्षक नृत्य के दौरान भी जुनूनी भीड ये हिमाकत भरा ऐलान कर रही थी । कोई भी सिक्का बच्चा नहीं बचेगा । भारत की पुलिस व्यवस्था के सबसे काले अध्यायों में शुमार इन घटनाओं को कानून के रखवाले जानबूझ कर अनदेखा कर रहे थे । कई जगह हिंसा में उन की मिलीभगत रही और उन्होंने शिकायत दर्ज करने से मना कर दिया । दंगों के शिकार कुछ लोगों ने हिम्मत जुटाकर अपनी सुरक्षा के लिए दंगाइयों का मुकाबला क्या बोलते उन्ही को पकड लिया गया । एक नवंबर की शाम से दो नवंबर की शाम तक हालांकि सेना तैनात कर दी गई थी मगर तीन दिन नरसंहार बहुत का और लूटपाट का सिलसिला तीन नवंबर की शाम तक विरोध तो जारी रहा । गवाहों ने कांग्रेस के नेताओं सज्जन कुमार, जगदीश टाइटलर, एचकेएल भगत और धरमदास शास्त्री के शराब की तो दंगाइयों का नेतृत्व कर रहे थे । जिंदा जलते लोगों, घरों, दुकानों और बसों से उठते धुएं के गोवा जगह जगह से लपलपाते हेमंत ऋतु के साफ आसमान की और बढते हुए मौत किसानों का ऐसा उस करा रहे थे । दंगे रुकने तक दिल्ली में तीन हजार से अपनी जान से हो चुके थे और पचास हजार पलायन कर गए थे । गुजरात के दंगे जहाँ मुख्यमंत्री के नाम से नीचे हुए थे, नई दिल्ली के दंगे प्रधानमंत्री के नाक के नीचे हुए । ये कहना है पत्रकार मनोज में टाका उन्होंने उन्नीस सौ चौरासी के दंगों पर किताब लिखी है । दंगों के पखवाडेभर बाद इंदिरा गांधी की जयंती पर आयोजित विशाल सभा में राजीव ये कहने वाले थे जब एक बडा पेड गिरता है तो स्वाभाविक है उसके आस पास की धरती कुछ मिल जाए । बीस साल पूर्व जब जवाहरलाल नेहरू की शवयात्रा दिल्ली की सडकों पर निकली थी दस लाख से अधिक लोग उन्हें नम आंखों से विदा करने जमा हुए थे तो वो उस रूट पर उस समय दुनिया की सबसे भीडभाड वाली जगह हो गया था । मेहरू के अंतर दर्शन के लिए लोग मानव टूट पडे थे । हर पेड और बिजली के खंभों पर रोक थे इंदिरा गांधी के पति फिरोजगांधी की शवयात्रा देखने के लिए भी उन्नीस सौ साठ में हजारों लोग तीन मूर्ति भवन से निगम बोध घाट पर सडक किनारे चलते इंदिरा के बेटे संजय गांधी की मौत के बाद ही सडक किनारे जमा भीड नहीं उसे मौन श्रद्धांजलि दी थी । लेकिन इंदिरा गांधी की अंतिम यात्रा के दौरान तीन नवंबर हो तीन मूर्ति भवन से यमुना किनारे स्थित शांतिवन के चित्र असफलता अब राजस्थान का नाम शक्ति स्थल है तो गाडी पर फूलों से ढके उनके शव के साथ चल रहे शोधार्थियों की संख्या बहुत कम थी । यह बात दीगर है तो गाडी के पीछे पैदल आ रहे नामचीन शोक आरतियों में मदर टेरेसा भी शामिल थी । शहर में तनाव जारी था । सब कुछ मानव ठहर गया था । प्रिया श्रीमती इंदिरा गांधी आपने हत्या के बाद पहले पागलपन से भरपूर तंग हो मानव आपकी याद ने आपके खून में सर कोई अनुष्ठान हो आपने निर्जीव काया के चारों और हो रहे उस जिन्होंने तांडव को आप क्या मानती है? ऐसा था मानवती की बुराइयों के राक्षसों को बुलाकर तबाही का लाइसेंस थमा दिया गया हो । एक ही धार्मिक समुदाय के बच्चों की हत्या और तो उसे बडा का मर्दों को जिन्दा जलाना वो सब आप के नाम पर नहीं अपने लिए ऐसा एक स्मारक आपको पसंद नहीं आता है । किसी विशेष धर्म के लोगों का जनसंहार इससे भारत की धर्मनिरपेक्ष छवि में गहरी दरार पडे । इस बार आपको बेहद ना आस्था, दंगे क्या धर्मनिरपेक्ष भारत के निर्माण में आपकी विफलता का जलन प्रतीक नहीं थे? सेना द्वारा स्वर्ण मंदिर में कार्रवाई के बाद जब इंटेलिजेंस ब्यूरो के निदेशक नहीं, आपकी सुरक्षा दस्ते में से सभी सिख कर्मियों को हटा देने की सिफारिश की थी । आपने फाइल पर लिखा था, क्या हम धर्मनिरपेक्ष नहीं है? लेकिन आप लोगों के बीच जीवंत धडकती हुई धर्मनिरपेक्षता को पैदा नहीं कर पाई । आपने? आपने अंतिम वर्षों में हिन्दू शब्दाडंबर का सहारा लेकर धर्मनिरपेक्षता की नदी को गंदा किया था । आपने अपनी धार्मिक प्रवर्तियों को सार्वजनिक रूप में ऐसे प्रदर्शित किया जैसे आप से पहले किसी भी प्रधानमंत्री ने प्रदर्शित नहीं किया था, चाहे वो शास्त्री हूँ या फिर आपके पिता । आपने धर्मनिरपेक्षता के संवैधानिक दायित्व के आगे तो शीर्ष नवाया, मगर धार्मिक प्रतीकात्मकता को सार्वजनिक जीवन और राजनीतिक बहस में शामिल हो जाने दिया । सैद्धांतिक धर्मनिरपेक्षता के साथ आप के द्वारा धार्मिकता को गडमड अंदाज में मिलाया जाना शायद आपके द्वारा लोकलुभावन ता का शिखर छू लेने के बावजूद जनता से आपके अभिजात पांच ले का नतीजा था । आपके द्वारा बुलेटप्रूफ जैकेट नहीं पहनने अथवा अपने सुरक्षाकर्मियों की अनदेखी करने से इस साफ होता है कि आप पुराने जमाने के भारत में जी रही थी । जब घरेलू कर्मचारियों के वफादारी पर आंख मूंदकर भरोसा किया जाता था । जब घर की सुरक्षा परिवार के मुखिया के विराट व्यक्तित्व में निहित होती थी, सब सुरक्षाकर्मी भी परिवार में खुल मिल जाया करते थे । आपको हकदारी के इस भाव में सुरक्षा का अहसास होता था । आपके बचपन के घर में प्रचलित सामंती तौर तरीको में सबको अपनी हैसियत का अहसास था, इसलिए बंदूक तानने की कोई सपने में भी नहीं सोच सकता था । आपने उस तरह के भारत में कुली धर्मनिरपेक्षता का फायदा सीखा था । पहुँचने विक्रम में संस्थाबद्ध धर्मनिरपेक्षता तो ऐसी धर्मनिरपेक्षता ऊपर से थोपे गए सुधारवादी सबका की तरह आगे बढने की कोशिश कर रही जनता को रूस दिखानी पडती हूँ ही आप खुद अंधविश्वासों और कर्मकांड में लगी हुई थी था । भारत में धर्मनिरपेक्षता की खुराक रोजाना देने की जरूरत का आपको भलीभांति अहसास था । आपने बंटवारे की विभीषिका, सांप्रदायिक दंगों के कारण गांधी जी की वेदना अतिवाद से घबराते नेहरू को देखा था । इसके बावजूद आप की मृत्यु पर फूट पडे घर, सांप्रदायिक दंगे । उस देश में धर्मनिरपेक्षता की भावना जगह पाने के आपके प्रयासों का जबरदस्त माहौल उडा रहे थे । इस पर आपने लगभग दो दशकों तक राज किया था । प्रधानमंत्री ने मंदिर का विध्वंस कर दिया और मंदिर के उपास कोने प्रधानमंत्री का अंत कर दिया । हत्या के बाद इंदिरा गांधी के व्यक्तित्व पर शहादत का चोला चल गया । लोकगाथा बन गई, ऐसा चरित्र बन गई जिसकी जून का था । आज भी राष्ट्रीय पुराण कथा की तरह बात चीज आती है । पूछनी, आराम नहीं, प्यारी घनत् आदि तमाम रूपों में होने के बावजूद वे सर्वोच्च बलिदान का प्रतीक बन गई । उन्होंने युद्ध सम्राज्ञी की तरह शासन किया और फिर भारत की एकता रूपी अपने देश के लिए अपनी जान को बलिदान कर दिया । सफदरगंज रोड अब इंदिरा गांधी स्मारक संग्रहालय है । वहाँ इतनी तादाद में लोग श्रद्धांजलि देने आते हैं, जितने और किसी राजनेता के स्मारक पर नहीं जाते । गांधी के स्मारकों पर भी रहे इंदिरा गांधी के स्मारक पर लोग तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश से, बांग्लादेश से कश्मीर से बंगाल से । इसलिए स्कूली बच्चे, बुजुर्ग और युवा सभी आते हैं । वे भारत की रानी थी, भारत की शासक थी । इंदिरा गांधी जैसा कोई भी नहीं हो सकता । यह कहना है त्यागराजन का, जो तमिलनाडु के स्कूल में शिक्षक है । हर की रानी लेकिन वो तो प्रधानमंत्री थी ना प्रशासन थी शासन । मुखिया सिर्फ राजनेता नहीं, उनके लिए इंदिरा खुद प्रतीक थी । बिना ताज की एक सम्राज्ञी राष्ट्रीयता का साकार रूप कोलकाता से आई अनुराधा ने कहा, इंदिरा गांधी जैसा कोई भी नहीं हो सकता । स्मारक के प्रसारण केंद्र में उनके जीवन पर आधारित छोटी सी फिल्म देखने के बाद सुबह ते हुए वो गोली उनके जैसा कोई भी नहीं है और नहीं कभी दूसरी इंदिरा गांधी पैदा हो सकती हैं । उन्होंने अपनी मृत्यु के विरासत के रूप में चुनाव में कांग्रेस को चार सौ सीटें दिला देंगे । कांग्रेस उन्नीस सौ चौरासी के आम चुनाव में आजाद भारत के इतिहास में सबसे अधिक सीटों पर जीत हासिल हुई । मैं ही मुद्दा हूँ । उन्होंने उन्नीस के चुनाव के बारे में कहा था, साल उन्नीस सौ चौरासी के चुनाव में मुद्दा उन की हत्या थी । मृत्योपरांत समाधान के प्रति के रूप में भारतीय मतदाताओं ने उस चुनाव को उनके स्मारक में बदल दिया । साल उन्नीस सौ चौरासी का चुनाव तो शवयात्रा थी । इसमें लोगों ने उनकी याद को वोट दिया । एक लोकतंत्र शो उनका स्मृति पर्व बन गया । राजीव गांधी को अपूर्व बहुमत मिला क्योंकि वे इंदिरा के शोक संतप्त बेटे थे और नागरिक उनके साथ आ जुटे क्योंकि उनका दुख उन्हें निजी दुख प्रति हुआ । उन्हें चाहूँ हो रहा हूँ, कभी किसी निजी शत्रु, सभी अबूझ साम्रागी । उनकी मौत के बाद लगभग सभी भारतीयों को सिर्फ पढते, साया उठ जाने का एहसास हुआ । उसके बाद भारत पर बहुमत वाली सरकार का शासन भले ही रहा मगर उस भारत में बेचैनी और गुस्से की लहर चल रही थी । असम से कश्मीर और पंजाब का सांप्रदायिक और धार्मिक तनाव पडने लगा । वर्ष उन्नीस सौ अस्सी के पूरे दशक के दौरान सांप्रदायिक तनाव खत बताता रहा और जगह जगह दंगे हुये, पुलिस में अत्याचार किये और मौतों का आंकडा बढता गया । उनकी हत्या के बाद हत्याओं की मानो बाढ ही आ गई । मुरादाबाद, असम, पंजाब और मुंबई भिवंडी में हुई हत्याओं के रूप में उन के बाद मेरठ और भागलपुर में भी तंग ए और हत्याएं हुई । अस्सी का दशक रक्तरंजित दशक रहा । लेकिन देश के भाग्य में तो और भी बडे पैमाने पर हिंसा बंदी जब उन्नीस सौ बानबे में बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बाद देश में बंटवारे के बाद सबसे बडे पैमाने पर और बुरे नतीजों वाले दंगे हुये । लश्कर, उत्तरी भारत और मुंबई में धर्मनिरपेक्षता और जातीय सौहार्द पर उससे पहले कभी इतना खतरा नहीं मंडराया । बाहर में खून माद की जो लहर वही उससे नेहरु की धर्मनिरपेक्षता को कमजोर और निर्जीव बना दिया । जगह जगह धार्मिक संघर्षों की तैयारी चल रही थी तो शाहबानो फैसले से उबल पडी । इसमें राजीव गांधी की सरकार पर मुसलमानों के धार्मिक अतिवाद को पुष्ट करने का आरोप लगा । चाहवानों फैसले को खारिज करने के बाद ही एलकेआडवाणी की सोमनाथ से अयोध्या रथयात्रा की रहा बनी जिसने आक्रामक हिंदुत्व हो बताया और उसी की पीठ पर चढकर भारतीय जनता पार्टी ने लोकप्रियता के कुलांचे भरना शुरू कर दिया । इंदिरा ने इस मायने में अपने पीछे ऐसा लोकतंत्र छोडा जो अनेक रंगों वाले हिंसक कट्टरपंथ से गिरा हुआ था । अपने आखिरी दिनों में क्या वो बेहद स्वार्थी हो गई थी । क्या उन्होंने किसी भी कीमत पर राजनीतिक वर्चस्व बनाए रखने की छोंक में अपने पिता के आदर्शों को ताक पर रख दिया था? क्या ऊंचे आदर्शों पर अमल की राह में राजनीतिक समीकरण आडे आ रहे थे? चारों और भडकती आपके बीच शायद अग्निशमन के तौर तरीके भूल गई थी । हिंसक भारत में तबदील होते गांधी के भारत के इस तौर में उनके प्रशासनिक तौर तरीके शास्त्र की संस्थाओं को और नुकसान ही पहुंचा रहे थे । सत्ता के चंद हाथों में केंद्रित हो जाने के कारण उनकी सरकार असहाय और क्रूर प्रतीत होने लगी थी । इसके बावजूद जिम ऑडिशन के गीत की तरह मृत्यु हम सबको देवदूत बना देती है और वहाँ हमारे पंख होगा देती है । जहाँ कभी कंधे थे कार्य कौवे के पंजों की तरह । चिकने आपने स्मारक पर जमा दर्शनार्थियों की भीड के लिए इंदिरा गांधी महारानी के समान है । उस की तस्वीर के सामने से उनके अबूझ रात सी पन से चमत्कृत होते हुए सर झुकाए गुजरते हैं । वो उनके जीवन की उन सादा तस्वीरों को श्रद्धाभाव से देखते निहान होते हैं । इन को ऐसी स्टोरीज लगती है जिसने छोकरे बन यानी टॉमबॉय और देवरानी दोनों के किरदार निभाए । इससे साडी पहनने के बावजूद कांटेदार बाड के नीचे से छत पर झुककर निकल जाने में पूरे नहीं था । इसका सर भले ही साडी के पल्लू से ढका रहता था मगर दृष्टि में विद्रोही तेवर लगते थे । ऐसी और सबके सामने रहकर भी रहस्यमय थी । कहा जाता है कि उन्होंने गलतियां जरूर की मगर उनकी अपनी जान कुर्बान कर के उसकी भरपाई भी तो की । उन्होंने पाप जरूर किया मगर उनकी निगाह में फरिश्ते का दर्जा पा चुकी थी । उन्होंने चुकी की और स्थापित परंपराओं से खिलवाड किया । मगर बावजूद इसके संदेश यही गया वो जनता की परवाह कर दी थी । उनके उतार चढाव बडी जिंदगी को लोगों ने विजय और विनाशा की गाथा के रूप में ही परिभाषित किया । वो जब तक जीवित रही, राजनीति की धुरी बनी रहे हैं और उन के तौर तरीको को भला माना जाए या फिर बुरा । भारत के सार्वजनिक जीवन का आईना भी वही रही । उनके स्मारक के दर्शनार्थियों की नजरों में इंदिरा गांधी की खामियां उन्हें और भी अधिक महान बनाती हैं । चर्म सत्ता अपने पास होने के बावजूद जनता में उनकी नरमदिल शासक की छवि जीवित रही । इतना शाह नेता थी तो किसी ना किसी तरह अपने विरोधियों से असुरक्षित थी । लडती, आवाज और दुबली पतली काया के बावजूद युद्ध थी । अपने सर को साडी के पल्लू से ढाकने के बावजूद डटकर लोहा लेती थी । विरोधाभासों का पुलिंदा मगर जनता की भीड को एक झटके में मुझको लेने वाली अपने निजी दुखों को ताक पर रखकर भारत की तरक्की में जुट जाने की उनकी प्रवर्ति उन्हें याद करने वालों के दिलों में उनकी छाप को अमित बनाती हैं । नेहरू की बेटी बेहद नफीस कुलीन खानदान से थी । गरीबों में घुलने मिलने वाली एक राजकुमारी । किसी कुलीन के जनता का मसीहा बन जाने किए छवि ही उनके रहस्यमय व्यक्तित्व का मर्म ये नहीं इन साथ थी । इनकी खून से लथपथ सैनिक की तरह रण क्षेत्र में मृत्यु हुई । उनका शरीर गोलियों से छलनी और सुरुचिपूर्ण साडी रक्तरंजित थी । इंदिरा गांधी ने भारतीय नागरिक के मन में भारतीय राज्य के प्रति प्यार को समाप्त कर दिया । साल उन्नीस सौ पचास के दशक हैं, नए राष्ट्र, राज्य और उसके नागरिकों के बीच पंडित क्या और अपनेपन के रिश्ते को तो नेहरू काल कि फिल्मों में भरपूर दिखा । नए बने बांध, बिजलीघर और सडके उनके पात्रों के प्यार । मोहम्मद के हजार और सुबह अंत भी पष्ठभूमि में दिखाई जाती थी । इंदिरा नहीं गांठकर एक झटके में खत्म कर दिया । भारत राष्ट्र राज्य नेहरू काल में लोगों के भीतर अपना पन जग आता था, मगर इंदिरा काल में उसके प्रति घना पैदा हो गयी । सब से भी महत्वपूर्ण और उनके जीवन का घोषित लक्ष्य उनके लिए धर्मनिरपेक्ष भारत था और धर्मनिरपेक्ष भारत ही उनके जीवन की सबसे बडी नाकामी रही । उनकी नाकामियां जो भी हो मगर उनकी मौत नहीं, एक किवदंती को जन्म दिया । बलिदान की बदौलत नेता के सारे पाप धुल गए और उन का अंत ही उन्हें अमर कर गया । जनता की निगाहों में इंदिरा गांधी ने ऐसा अंदर तो प्राप्त कर लिया । ऐसा सामान्य रूप से ढलते राजनीतिक अस्तित्व और उम्र के बोझ से अपने हाथों से छूटते सत्ता के तार संभालने के प्रयास में होती विफलता उन्हें कभी हासिल न करने देता । ग्रीको आतुर देश के स्वतंत्रता आन्दोलन की आज के बीच में पैदा हो कर ये अपने ही लडते हुए देश पर आपकी लपटो किस तरह छा गई?

2. क्रांति की बेटी

ग्राम थी की बेटी इंदिरा गांधी का जन्म उन्नीस नवंबर उन्नीस सौ सत्रह को इलाहाबाद में हुआ था । जवाहरलाल नेहरू और कमला नेहरू की एकमात्र संतान और उस नाते मोतीलाल नेहरू की वो अकेली होती थी । उनकी शिक्षा इलाहाबाद गुजर रहे हैं । पूरा शांति निकेतन और ऑक्सफोर्ड हुई । साल उन्नीस सौ बीस और उन्नीस सौ तीस के दशकों के दौरान उनके जीवन में बहुत गहरा उतार चढाव आया और वो अस्थिर रही क्योंकि वे स्वतंत्रता संग्राम में अपने परिवार को गहराई से शामिल होते देख रही थी । अपनी माँ कमला से उनका बहुत गहन चुनाव था । रे उन्नीस सौ में ही चल रही है । उन्होंने उन्नीस सौ सैंतीस में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में दाखिला हासिल किया लेकिन गंभीर रूप से बीमार पड जाने से पढाई छोडकर भारत लौट आए । प्री श्रीमती गांधी नेहरू खानदान में पैदा होने के लिए आप के क्या मायने थे? क्या आपके नाम के आगे लगे उपनाम और वंशावली ने आप की राजनीति को परवान चढाया? नेहरू खानदान से होने का फर्ज कश्मीरी होने का जबरदस्त सांस्कृतिक कर अन्य अनेक प्रवासी समुदायों की तरह आपका परिवार भी अपनी कश्मीरी पहचान को कसकर जगह रहा । शायद इसीलिए अपने को इलाहाबाद का मूल निवासी नहीं दे पा । जिस शहर में आप का जन्म हुआ, जहाँ आप के परिवार का घर था । आपका परिवार सिर्फ उच्च जाति के पंडितों का ही नहीं बल्कि समृद्ध और पुलिस भी था । उसके अनेक सदस्य पश्चिमी तौर तरीके अपनाकर प्रबुद्ध और अपने पारिवारिक विशेषता जबरदस्त ऊर्जा से भरपूर थे । आप के दादा मोतीलाल नेहरू अत्यंत सफल वकील थे । आपके जननायक पता जवाहरलाल क्रांतिकारी और विद्वान दोनों के गुणों से लबरेज थे । उनकी बहने विजय लक्ष्मी और कृष्णा तो संस्कृत स्त्रियाँ भी और आपके नजदीकी रिश्ते के भाई बीके नेहरू भावी नामी राजनयिक होने वाले थे । महात्मा गांधी, लाल बहादुर शास्त्री, ऍम यूरी, वैज्ञानिक मारी क्यूरी की बेटी । आपने घर आए और वहाँ ठहरे भी । आपका परिवार देशभक्त और सामाजिक रूप से अनुकरणीय था । नेहरू होने के कारण क्या मन में हमेशा ये भाव खेले रहा कि भारत में सर्वश्रेष्ठ तो होना ही चाहिए और साथ ही साथ विपत्तियों से जूझते हुए भी अविचल रहना चाहिए, मानो सैनिकों की टुकडी के कप्तान के रूप में चल गया हूँ । इसका क्या ये हुआ जैसे परिवार ने नेतृत्व बोर्ड बचपन से ही विकसित हो जाये । नेहरू खानदान, सामाजिक प्रतिष्ठा और आजादी की लडाई दोनों ही मामलों में अगुवा था । नेहरू होने के नाते क्या आपको हमेशा ऐसा एहसास रहा । क्या प्रस्थान प्राकृतिक रूप से सबसे आगे ही था । इंदिरा गांधी का जन्म इलाहाबाद स्तर आनंद भवन में उन्नीस नवंबर उन्नीस सौ सत्रह को हुआ था । आनंद भवन उनके दादा और बेहद सफल वकील मोतीलाल नेहरू का घर था । वो इलाहाबाद का पहला ऐसा घर था । इसमें ताजा पानी और बिजली, चौबीस घंटे उपलब्धि, घर के आनंद ॅ, इंडोर सुनीपुर और सवारी का घेरा और मकान के चारों और घने ऊंचे पेडों की कतारों वाला लंबा चौडा बाद इस बयालीस कमरों वाले विशाल रात से घर के मुखिया मोती लाल नेहरू थे । घर के परिचारक बकायदा वर्दी में होते थे । घर की साजसज्जा आॅन कि शिव प्रतियों और यूरोप के विभिन्न स्थानों से लाए गए चांदी के कांटे छुरी चम्मच हूँ । अब प्लेट तो खाना खाने की प्लेटों आदि से अनुपम लगती थी । आनंद भवन में पूरा नेहरू खानदान किसी ब्रांच परिवार की तरह रहता था । विजय लक्ष्मी पंडित नहीं कभी बीके नेहरू से पूछा था हम नेहरू अपने परिवार के रूप में कुछ अहंकारी तो नहीं है? बी के नेहरू का जवाब था, इन्कारी होने लायक हमारे पास बहुत कुछ है । मोतीलाल खूब काम आते थे और खूब खर्च करते हैं । अभी शौक में वो जब एडवर्ड सप्तम द्वारा खरीदे गए बोहेमियन धूप के चश्मे जैसा ही चश्मा खरीद लाए । उनकी पत्नी स्वरूपरानी शिकायती लहजे में बोली इलाहाबाद में कौन की कद्र करने वाला है और हमें सम्राट एडवर्ड जैसा आचरण क्यों होना चाहिए? मुगल दरबार की भाषाओं और भी और फारसी में भी पारंगत होने के कारण मोतीलाल अंग्रेज, पारसी और हिंदू संस्कृतियों का मिश्रण थे । उनका नेहरू गांधी वंशजों को अपने खानदान की यही बहुलतावादी धर्मनिरपेक्ष उच्च संस्कृति विरासत में मिली । वो अपनी मेहनत से अपने पैरों पर खडे हुए सफल पेशेवर थे जिनका मिजाज नवाबी चाहूँ अपनी प्रतिभा और लगन के बूते ही उन्होंने इलाहाबाद की स्कूल उडाती पुरानीबस्ती से निकल कर किसी फ्रांसीसी सामंत बडे सैन्य और जैसा भवन जीवन जीने का सामान जुटाया था । जीवन आकर्षक व्यक्तित्व के वाले मोतीलाल ने अपने आस पास बेहद योग किया और प्रतिभाशाली लोगों का जुटान किया हुआ था । होतीलाल अन्य सभी नेहरू हों से कहीं अधिक बेहतर और सफल प्रधानमंत्री शुद्ध होते हैं । जहाँ भी बैठते थे, कतार वहीं से शुरू हो जाती थी । मोतीलाल हालांकि सवेरे रोसू पहनते और शराब देते पश्चिमी खाना खा गई । बेहतरीन अंग्रेजी बोलते और बच्चों के लिए अंग्रेज गवर्नेंस और शिक्षकों को नौकरी पर रखे हुए थे । वहीं स्वरूपरानी अपनी देशी परंपरा पर अडिग रहती थी । अपने पति के ठीक बोला वे धर्म पारायण और पारंपरिक कश्मीर भ्रमण पिस्टल थी । उनका खाना भी उनकी निजी शाकाहारी रसोई में ही पकाया जाता था । इंदिरन की बुआ कृष्णा हठीसिंह लिखा भी है हम लोग हफ्ते में छह दिन आपने पश्चिमी रंजन के कपडे पहनकर विक्टोरियाई कुर्सियों पर बैठकर पश्चिमी शैली में भोजन करते थे । सातवें दिन अथवा हिंदू त्योहारों पर हम लोग हिन्दू तहजीब में खाना खाते थे । पूरब और पश्चिम । इस तरह आनंद भवन में अलग अलग मगर सहअस्तित्व के भाव से साथ साथ मौजूद थे । मतलब दोनों आपस में मिलते शायद ही कभी थे । मोदीलहर और स्वरूपरानी के तीन बच्चे हुए । जवाहर लाल सबसे बडे और सुदर्शन थे । अपने पिता का अरमान होने के साथ ही साल हैरो और कैम्ब्रिज जैसे उस समय के सबसे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में पडेंगे और जिन्हें इंग्लैंड में वकालत का न्यौता मिला था । उन के बाद ही विजय लक्ष्मी और नाम नहीं जिनके घरेलू नाम को उनकी अंग्रेज गवर्नेंस नहीं अपनी सुविधा के लिए छाट कर नहीं कर दिया था । सुंदर और आकर्षक व्यक्तित्व वाली नैन बडी बेटी थी और तीसरी तथा सबसे छोटी संतान कृष्णा और बेटी थी । इंदिरा की तो मेरी बहन नयनतारा सहगल ने लिखा है, मोतीलाल ने अपनी बेटियों पर तनमन ढंग से प्यार न्यौछावर किया । मगर अपने बेटे पर वो जांच रखते थे । जवाहर पर तो दरअसल पूरे खानदान की आस उम्मीदे थी, वैसे ही लगी थी जैसे राजकुमारों और युवराजों से अक्सर की जाती है जवाहरलाल नेहरू का आपने छुटपन में किसी राजकुमार जैसा ही रुतबा था । बीके नेहरू ने याद करते हैं । जवाहरलाल ने उसी दौरान सबसे प्रिय परिचारक पर चलाते हुए एक बार जैन की बोतल फेंक दी थी । मैंने मॉम डैड मांगा था, चैन नहीं । जैन की बोतल फेंके जाते ही हरी अपनी जान बचाकर भागा और दीवार से टकराकर बोतल की खर्चे में खडे गई । जवाहरलाल उन्नीस सौ बारह में कैमरे से पढकर भारत लौटे । उनके निजी शब्दों में भारतीय के बजाय लगभग अंग्रेज बनकर किसी हद तक घमंडी और तारीख के लायक तो कतई नहीं । अगले दो दशक में उनका व्यक्तित्व नाट के रूप में बदलाव । ऐसा सफर इसे इतिहासकार सुनील खिलनानी तो निर्माण बताते हैं की प्रक्रिया अंततः डिस्कवरी ऑफ इंडिया लिखिए जाने के साथ पूरी हुई । उन्होंने स्वतंत्रता प्राप्ति से कुछ वर्ष पहले अंग्रेजों की कैद में लिखना शुरू किया था । अपने को भारतीय बनाने की प्रक्रिया में जवाहरलाल नेहरू ने अपना दिमाग में अपने लायक देश की कल्पना भी कर ली थी । इसे उन्होंने अपने सपनों के भारत को शब्दों में साकार करते हुए मूर्त रूप दे दिया था । ऐसी पुस्तक जवाहरलाल के मुकम्मल भारतीय स्वरूप का घोषणापत्र बनेंगे । उनके पता नहीं जब खुद उनकी शादी तय करने की कोशिश की । जवाहरलाल ने हालांकि कडा विरोध तो नहीं किया मगर इतना जरूर कहा आपसी समझ बने बिना शादी नहीं होनी चाहिए । मुझे ये बात अन्याय और क्रूरतापूर्ण लगती है की किसी की जिंदगी महज बच्चे पैदा करने में ही बर्बाद कर दी जाए । मोतीलाल दिखाने की हद तक पश्चिमी जीवन शैली अपना लेने के बावजूद भीतर से क्योंकि पारंपरिक ग्रामीण थे इसलिए उन्होंने अपने हिसाब से अपने चहेते बेटे के लायक लडकी छोटी सी सुंदरी कमला कॉल को ढूंढ निकाला । कमला धूप में चमचमाती बर्फ जैसी पूरी चिट्टी, घने, काले, चमकीले बालों और हैरानी जैसी बडी बडी भूरी आंखों वाली थी । पसंद पंचमी के महूरत में हुई उनकी शादी का भव्य और विशाल इंतजाम किया गया । लगभग शाही दरबार जैसा हूँ । उनके लिए पुरानी दिल्ली के बाहर तंबू में जैसे पूरा मोहल्ला बसाया गया था । इसका नाम रखा गया नेहरू ऍम । एक साल बाद जवाहरलाल नेहरू के बच्चे के जन्म की बडी गहरी आज लगी हुई थी । इंदिरा जिस कर्जदार रात में पैदा हुई उस समय आनंद भवन में पूरा खानदान और दोस्त बेसब्री से खुशखबरी का इंतजार कर रहे थे और मोतीलाल तथा उसके साथ ही संघीय अपनी लाइब्रेरी में पहुँच के पैर डाल रहे थे । रात के करीब ग्यारह बजे इंदिरा गांधी की दादी रूपरानी ने जच्चा के कमरे से बाहर आकर ये मुक्तसर घोषणा की । हुआ तो मोती लाल ने पूछा बच्चा हुआ मानो अपनी पत्नी की निस्तेज आवास है । फौरन अंदाजा लगाते हुए कि बच्चा शायद लडका नहीं था, उन्होंने निराशा को अपनी कुल लास्ट भरी आवाज से दबाने की कोशिश की होगी । प्रस्तुति करवाने वाली स्कॉटिश डॉक्टर ने उल्लासित आवाज में जवाहरलाल से कहा सुंदर बेटी पैदा हुई है सर मगर शुरू प्राणी नहीं डपट दिया । बेटा होना चाहिए था । यहाँ जमा औरतों के चेहरे हालांकि भटक गए थे और वहाँ जमा लोगों ने जता दिया । उन्हें भी इतनी निरुत्साही घोषणा से कोई बहुत खुशी नहीं हुई लेकिन नवजात के दादा ने फौरन बात संभाली और अपनी पत्नी को छत पे देख रहा हूँ । हमने अपने बेटे और बेटियों की परवरिश में क्या कभी कोई भेदभाव किया है? उन्होंने मानो आशीर्वाद बडा ऐलान किया आप उन्हें क्या बराबरी से नहीं चाहती । ये लडकी हजारों फोटो से भी ज्यादा काबिल साबित होगी । बच्ची का नाम इंदिरा प्रियदर्शनी रखा गया । रूसी क्रांति के साल में पैदा हुई जिसमे हजार की सत्ता को उखाड फेंका था । चार इसीलिए उनके पिता कहते थे हंगामाखेज परेशान । दुनिया में क्रांति की बेटी पैदा हुई है । इंदिरा ने आगे चलकर लिखा मेरा परिवार हालांकि इतना भी रूढिवादी नहीं था कि बेटी पैदा होने को अपना दुर्भाग्य समझे तो भी बेटे को खास और आवश्यक माना जाता था । नेहरू बंधन की आंखों के तारे जवाहर लाल की पहली संतान होने के नाते बीसवीं सदी के आरंभिक दौर के भारतीय परिवार के लिए यही उपयुक्त माना जाता था कि वह बहुमूल्य बच्चा पुत्र ही हो । अपने जन्म से सबको निराश करने के भाव से शायद ये आजीवन पीडित रहेंगे । उनकी माँ बचपन में उन्हें बहुदा लडकों वाले कपडों में तैयार करती थी और उन्हें अक्सर लडका समझने की भूल भी लोग कर बैठते थे । और अपने बचपन में अपने पिता को लिखी चिट्ठियों के अंत में उन्होंने अपने को हिंदू बॉय भी लिखा । उनके दादा ने इस सब के बावजूद उन्हें कभी ये महसूस नहीं होने दिया कि वे निराशा की प्रतीक थी । मोतीलाल ने उनके लंदन से खास तौर पर प्राॅक्टर यानी बच्चा गाडी मंगवा कर दी और उनके लिए भव्य नामकरण समारोह आयोजित किया । अपनी तैयारी हिंदू के लिए मोतीलाल का खास प्यार उनके बचपन में लगातार बना रहा हूँ । नहीं । जब अपने दादा का जिक्र करती थी, उनकी आंखें खुशी और उसमें से जमा होते हैं । मुझे नहीं याद पडता कि अपने दादा को ये जितने भाव प्रवण रूप में याद करती थी, उतनी शिद्दत कभी अपने पिता को याद करते हुए उनसे छलकी हूँ । पूछा भगत लिखती हैं, जो तीन दशक तक इंदिरा की सामाजिक सचिव रहे हैं हैं । शायद संयोग ही है कि दुनिया में सभी आई जब उनका परिवार गांधी के स्वतंत्र उद्घोष की चपेट में आने वाला था । गांधी उन्नीस सौ पंद्रह में ही दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटकर इंदिरा के पैदा होने से पहले ही जवाहर लाल से मिलकर उन्हें प्रभावित कर चुके थे । नेहरू खानदान में तूफान की तरह घुसे और जवाहरलाल के लिए समानांतर पितातुल्य व्यक्ति तो बन गए । इससे मोतीलाल के उस सारे सपने शायद खंडित हो गए होंगे तो उन्होंने अपने बेटे के भारतीय प्रशासनिक सेवा अथवा कामयाब वकील बन जाने के लिए देखे होंगे । गांधीवादी संस्थान जिसे खादी सत्याग्रह विदेशी सामान का बहिष्कार आनंद भवन में बैठ कर गए थे । ऐसा घर इसमें बागीचों में दावते आयोजित होती थी और जाने माने लोग शामिल होते थे । गांधी से हमारा परिवार इस कदर प्रभावित था कि मेरी शादी के समय ये भी उन्होंने ही तय किया कि मैं कौन सी साडी पहनकर विवाह करूँ । विजय लक्ष्मी पंडित नहीं याद करते हुए बताया वो खादी के अलावा और किसी तरह की हो भी नहीं सकती थी । हालांकि मेरी मार्च से नाखुश थी मगर बाद यानि कस्तूरबा गांधी जी की पत्र अपने हाथों से महीने खादी की साडी के लिए सूट का था और बुनाई के बाद उसे गुलाबी रंग लाया गया । नेहरू खानदान के लोगों का जल्द ही कायापलट होने वाला था । रॉॅकीज उन्नीस सौ उन्नीस में हुए व्यापक भारतीय विरोध प्रदर्शनों को न शिष्टतापूर्वक कुछ चला गया । ऍम में भारतीयों के नागरिक अधिकार छीन लेने का प्रावधान था । प्रदर्शनकारी भारतीय नेता गिरफ्तार कर लिए गए थे ऐसा आदेश भी जारी किया गया । अमृतसर की जिस गली में किसी अंग्रेज और उससे हाथापाई की गई थी उस पर भारतीय पुरुष सीधे नहीं चल सकते हैं बल्कि उन्हें घुटनों के बल रेंगना होगा । तेरह अप्रैल उन्नीस सौ उम्मीद को अंग्रेज सैनिकों ने चिडिया वाला बाग में जमा शांतिपूर्ण और निहत्थे भारतीयों की सभा पर बिना चेतावनी दिए अंधाधुंध गोलियां चला दी जो अमृतसर में विरोध सभा और सालाना बैसाखी मेले के लिए आए हुए थे । चारों मकानों से घिरे जलियाँवाला बाग में घुस नहीं और निकलने का एक ही रास्ता था और से घेरकर खडे अंग्रेज सैनिकों ने जब गोलियां चलाई लोग जान बचाने को कहीं भाग भी नहीं पाए । आपसे निहत्थे लोगों पर गोलियों की बौछारों ने आदमियों और तो बच्चों सभी को अंग्रेजों के हाथों नृशंस मौत की नींद छोडा दिया । सरकारी आंकडों के मुताबिक उस जघन्य गोलीकांड में कुल तीन सौ उन्यासी मौते हुई और बारह सौ लोग घायल हुए थे । हत्याकांड के खलनायक अंग्रेज कमांडर जनरल डायर नहीं तब भी झल्लाते हुए कहा था, सैनिकों के गोलीबारी रोकने का एकमात्र कारण गोलीबारूद खत्म हो जाना था । उसने कहा कि वह नैतिक प्रभाव पैदा करना चाहता था । जनसंहार ने भारतीयों को हत्प्रभ तेज और सक्रिय कर दिया था । अंग्रेजों के प्रति तटस्थ रहने वाले लोग थी । गांधी के आंदोलन में बढ चढकर शामिल हुए । कभी रविन्द्रनाथ ठाकुर नहीं, अंग्रेज साम्राज्य द्वारा दी गई सर्वोच्च पदरी नई को वापस कर दिया । जवाहरलाल अपने साथ आनंद भवन में जलियाँवाला बाग से इकट्ठी की गई कुछ गोलियां और उनके खोखे लेकर आए थे । उपनिवेशवाद का निश्चिंत अन्याय बेनकाब हो गया था । राज का हल्का फुल्का विरोध उम्र के विद्रोह में तब्दील हो गया । जलियाँवाला बाग कांड ने हमारे इतिहास का रुख ही मोड दिया । केंद्र ने याद करते हुए कहा झिझक और संधि झड से खत्म हो गए थे । इंदिरा के अनुसार कुछ ऐसा घट गया था जिससे पूरा परिवार आंदोलित हो उठा । उस से हमारा जीवन एकदम बदल गया । गांधीवादी असहयोग आंदोलन में कुछ नही । मोतीलाल ने वकालत का पेशा छोड दिया । छत त्याग रहे और स्वदेशी उनके परिवार के लिए धर्म युद्ध बन गए । विदेशी सामान का बहिष्कार किया गया । विरोध का गांधीवादी तरीका पूर्णतः अंगीकार कर लिया गया । आनंद भवन के नीचे गाडियां और झाडफानूस गायब हो गए । विदेशी देश में कपडे और सवेरे रोसू विदेशी सामान की होली के हवाले कर दिए गए । घर आए किसी व्यक्ति ने जब इंदिरा को ताना मारा कि वह विदेशी गुडिया से क्यों खेल रही है, तो उस छोटी सी बच्ची ने फ्रांस की बनी अपने पसंदीदा गुडिया को आग के हवाले कर दिया और दुख डॉक्टर तथा देश भक्ति के कर्तव्य के मिले जुले भाव से उसे पिघल से देखती रही । कई पर असपास उन्होंने किसी के सामने कबूला । गुडिया दोस्त मेरी बच्ची थी । मुझे माचिस की तीली जलाने से आज तक नफरत है । वो बच्चे अपने शानदार महलनुमा घर को रातोरात क्रांति और सत्याग्रह गढने तब्दील होते सबसी देख रही थी । उसके माता पिता सहित घर के बहुत सारे लोगों के जेल जाने और वापस आने का सिलसिला भी शुरू हो चुका था । नेहरू होने का मतलब अब सिर्फ आमिर और विशेषाधिकार संपन्न होना नहीं रह गया था बल्कि इसका मतलब अब विद्रोही परिवार का सदस्य होना बन गया था । सम्राज्यवाद के खिलाफ लंबी लडाई की शारीरिक और मानसिक मशक्तत और कठिनाइयाँ बर्दाश्त करने की शुरुआत हो गई थी । इंदिरा याद करती हुई बताती थी, घर के लोग सुबह सुबह ही बाहर चले जाते थे । अलग अलग दिशाओं में समूचा घर ऐसे तनाव का शिकार हो गया था कि कोई सामान्य जीवन नहीं जी पा रहा था । बच्ची इंदिरा के मन में भी विद्रोही प्रवर्ति घर कर गई । उनके व्यक्तित्व में सत्ता और विपत्ति से लडने की स्वाभाविक प्रकृति समाप्ति जा रही थी । प्रियंका गांधी बताती हैं, मेरी जीजाजी क्रांतिकारी और वो आजीवन वैसी ही रहें । आनंद भवन के बाहर लगी पट्टिका पर अब लिखा है घर ईदगाह के ढांचे से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है । हमारे स्वतंत्रता संग्राम सिस्का गहन जुडाव है और उसकी दीवारों के भीतर बडे बडे फैसले हुए और महान घटनाओं को अंजाम दिया गया । कमरों की सूरत शक्ल पुराने जमाने की सुरूचिपूर्ण सी है वहाँ खिलाफ चडे सोफा नक्काशीदार किताबों की कतारों से बडी लाइब्रेरी नाम लिखिए । कब लेता दी हैं इन पर सच्ची ले हर फोटो में जी एन लिखा है । इसका आगे का भार अलंकृत पायों पर टिका विस्तृत गुंबदाकार है । इसके खुले झरोखे हैं जिससे यह किसी राजस्थानी हवेली और मुगल महल का मिला जुला रूप सकता है । हालांकि मौजूद आनंदवन अपने असल स्वरूप में नहीं है । नेहरू परिवार इस अपेक्षाकृत छोटे मगर फिर भी भव्य इमारत में उन्नीस सौ उन्तीस में रहने आया था । उसी साल जब जवाहरलाल ने अपने पिता के हाथों से कांग्रेस अध्यक्ष की बागडोर संभालकर कांग्रेस का लक्ष्य पूर्ण स्वराज्य निर्धारित किया था । असल आनंद भवन का नाम अब स्वराज भवन है और वो वर्तमान आनंद भवन से सटा हुआ है । इंदिरा उसी विशाल महलनुमा इमारत नहीं पैदा हुई थी । विलासिता के पर्याय महल से आंदोलन के केंद्र के रूप में बदल जाने संबंधी आनंद भवन का कायाकल्प कुछ ठीक ही परेशानियों का शिकार बने बिना नहीं हो पाया था । महात्मा का अनुशासन खासकर शराब के प्रयोग पर कडी रोक पर अमल करना कोई आसान नहीं था । बीके नेहरू नहीं कुछ हास्यात्मक अंदाज में लिखा है मोतीलाल हालांकि उन्नीस सौ इक्कीस बाईस असहयोग आंदोलन के दौरान शराब से तौबा कर ली थी ऍम उन्होंने फिर पीना शुरू कर दिया । इसके दिलचस्प बजाए ये थी होती लाल ने अपने मन में ये मान लिया था । बंगाल के प्रखर स्वतंत्रता सेनानी चितरंजनदास की मौत गांधी जी के आग्रह पर शराब पीना छोड देने से उनके शरीर को लगे झटके के कारण हुई थी । मोतीलाल ये कहने से भी नहीं गई गांधी ने ही उनके प्रिय मित्र चितरंजनदास की हत्या और यदि उन्होंने यानी मोतीलाल ने फौरन विस्की पीना फिर से शुरू नहीं क्या होता है वो भी शायद तब तक मर चुके होते मोतीलाल दरअसल जवाहरलाल पर गांधी केस नहीं की वजह से हमेशा उनके प्रतिद्वंदी जैसे रहे । भारत के सबसे अमीर वकील आजादी की लडाई में शायद उतनी शिद्दत से गांधी के लिए नहीं बल्कि अपने बेटे की खातिर होते थे । उनके गरीब रहने के लिए, रूस में उनके कंधे से कंधा मिलाकर नारे लगाने के लिए और साथ साथ कैदखाने में जाने के लिए नेहरू की जीवनी कारॅपोरेट ने भी लिखा है उनके पुत्र नहीं क्योंकि उनकी कमाऊ वकालत की जिम्मेदारी उठाने से मना कर दिया था । इसलिए मोतीलाल नहीं अपने बेटे के पेशे राजनीति को अपना लिया । साल उन्नीस सौ पच्चीस नहीं अंग्रेजों ने जवाहर लाल को गिरफ्तार करके पहली बार जेल की जा दिया । बाद में होने को बार गए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को अवैध घोषित कर दिया गया था । मोतीलाल को भी कांग्रेस का सदस्य होने के कारण गिरफ्तार करके छह महीने के लिए जेल भेजा गया हूँ । उनका कसूर प्रिंस ऑफ वेल्स की इलाहाबाद यात्रा के दौरान हडताल और प्रदर्शन का आयोजन किया जाना ठहराया गया । महज चार बरस की इंदिरा नैनी सेंट्रल जेल में अपने दादा पर चलाए गए मुकदमे के दौरान उनकी गोद में अपलक और निर्भरता से बानी बैठी रहती थी । कटघरे में अपनी पोती को अपनी गोद में बिठाकर मोतीलाल ने अंग्रेजों की सत्ता को सीधी चुनौती दी । उन्ही के शब्द का प्रयोग करें तो उन्होंने ये जताया मुकदमे की कार्रवाई की अहमियत उनके लिए तमाशा से अधिक नहीं थी । इसके कुछ ही समय बाद पूरे परिवार ने उन्नीस सौ किससे । गांधी के असहयोग आंदोलन और खिलाफत आंदोलन में सक्रिय भागीदारी है । इसी आंदोलन से जवाहरलाल के राजनीतिक जीवन की शुरुआत हुई । उस वक्त मानव समूचा देश बहुआयामी और संगठन मगर जबरदस्त मित्रो में उठ खडा हुआ था । जवाहरलाल तब अधिक युवा क्रांतिकारी थे जो एक साल के भीतर स्वराज हासिल कर लेने के गांधी के वायदे को पूरा करने की लडाई के लिए उद्धव थे । उन्होंने ये कबूल किया कि आंदोलन के दौरान गोरखपुर के निकट चोरी चौरा पुलिसथाने को आंदोलनकारियों द्वारा चला डालने से हिंसा कोई मुहिम को जब गांधी ने अचानक और एकतरफा कार्यवाही के तहत खत्म कर दिया तो उन्हें नाराज की और हताशा का एहसास हुआ हूँ । उसके बाद तो राष्ट्रीय आंदोलन तितर बितर होकर स्वराजजी हो और यथा स्थिति वादियों के बीच बढ गया था । वे तो चुनाव में शामिल हुए और जिन्होंने गांव में गांधी के राजनीतिक और रचनात्मक कार्यक्रम पर काम करना शुरू किया । नेहरू के समर्थक कांग्रेस की दिशा तय करने संबंधी मोतीलाल किराये के विरुद्ध थे । अपने बेटे की तरह गांधीवादी सत्याग्रह के लिए सफाई उत्साहित नहीं थे । उन्होंने उन्नीस सौ चुनाव लडने के लिए स्वराज पार्टी बना ले जवाहरलाल बार बार कहते थे अंग्रेज राजसत्ता के अंतर्गत स्वराज निरर्थकता । हमारा महान देश एकदम स्वतंत्र देश होना चाहिए । उनके पिता हूँ । जब पूर्ण स्वतंत्रता के पक्ष में लगातार प्रचंड प्रचार के लिए उनका मजाक उडा रहे थे हैं । जवाहर लाल को ऐसा लगने लगा । उनके पिता ने उन्हें अपने मन से निकाल दिया और ये स्वराज पार्टी द्वारा अंग्रेजों की मर्जी से बनने वाली विधायी संस्थाओं में शामिल होने की उतावली से दूर ही रहे जिसका कांग्रेस द्वारा बहिष्कार चल ही रहा था । परिवार के दोनों मुख्य पुरुषों द्वारा अपने भिन्न राजनीतिक लक्ष्यों में डूब जाने के कारण आनंद भवन में बैठकों और अभियानों का तांता लग गया । जवाहरलाल अब अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव बन गए थे जबकि मोतीलाल अपनी पार्टी में व्यस्त थे और आनंद भवन में खाना खाने के समय भी माहौल खासा तनावग्रस्त रहने लगा है । इन हालात के बावजूद उन्नीस सौ किसके असहयोग आंदोलन को अचानक समाप्त किए जाने से आजादी के आंदोलन में आया गतिरोध उम्मीद सौ सत्ताईस में सिर्फ अंग्रेज नुमाइंदो वाले साइमन कमीशन की भारत यात्रा के ग्रुप है । प्रदर्शनों की झडी लगने से दूर हो गया । इस महीने देशव्यापी स्तर पर नागरिक अवज्ञा या सिविल नाफरमानी आंदोलन का रूप ले लिया । इंदिरा इस गहरे एहसास के साथ बडी हुई है । वे स्वतंत्रता आन्दोलन के कर्जा परिवार की सदस्य थी । गांधी तो समझते हैं जिन्होंने लोगों को आजादी के पक्ष में खडा होने का आत्मविश्वास दिया है । मगर नेहरू खानदान में उस महान लक्ष्य को प्रतिष्ठा और महत्ता प्रदान की । उस भव्य अनुभवी घर में महात्मा के बार बार आने जाने और उन्हें परिवार के बुजुर्ग के समान ही दर्जा मिल जाने के बीच बडी हो रही इंदिरा के मन में मेहरु और गांधी के लिए बराबर इज्जत पंजाब गई थी । उनके परिवार ने उन्हें किसी भी रूप में अपनी राजनीतिक गतिविधियों से दूर रखने की कोशिश नहीं की । उन्हें भी बहुत कम उम्र में विद्रोह में दीक्षित कर दिया गया । वे जब बमुश्किल पांच साल की थी, अभी उनके दादा ने उन्हें चरखा दवा दिया । उन्हें मानव खानदानी तरह परिवार के बच्चों की तरह उनके नन्हें हाथों से पकडकर किस लिए पानी में उछाल दिया गया था । वो खुद ही खानदानी पेशे में पारंगत हो जाएंगे । मजबूत इच्छाशक्ति और विद्रोही मिजाज वाली इंदिरा के व्यक्तित्व को तराशने अन्य महत्वपूर्ण भारत की था । उनके नाम के आगे नेहरू लगा था । लेकिन वे उन नेहरू से लोहा लेती रही हैं जिन्होंने उनकी प्यारी मां कमला नेहरू उस बॉल को अपमानित किया था । वे अपनी कोमलांगी माँ कमला की मजबूत ढाल साबित हुई । अपनी माँ को जब भी ये अपमानित होते हुए देखती उनकी तरफ दारी में दर जाती है और अपने पिता के परिवार से लोहा लेती बडे हो जाने पर, अपने जीवन में देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए शक्तिशाली परस्पर विरोधी सत्ता के वैश्विक लोगों के सामने रखने वाली भारत के प्रधानमंत्री ने विरोध के फायदों और शक्ति का मतलब बचपन में ही समझ लिया था । कमला की परवरिश हालांकि पुरानी दिल्ली के परंपरिक कश्मीर परिवार में हुई थी । शादी के बाद तो अंग्रेजी बोलने लगे, आधुनिक पश्चिमी जीवन शैली में पडे परिवार में आ गई थी । वो हिंदी बोलती थी और अंग्रेजी में उनका हाथ तंग था तथा खानपान के सुरूचिपूर्ण अंग्रेजी तौर तरीको से अनजान होने के कारण थोडी घंटे से खाना भी नहीं खा पाती थी । परिष्कृत अथवा हाजिरजवाब और सामाजिक हावभावों से मेहरूम होने के कारण उन्हें अक्सर अपमानित और अनदेखा किया जाता था । जवाहर लाल विजय लक्ष्मी और स्वरूपरानी दोनों के ही चाहते थे और उन पर वह अपना पहला हक मानती थी । मगर कमला उनकी आपकी किरकिरी थी और वे उन्हें सबके सामने भी बात बात पर झडक में तथा अपमानित करने से बाज नहीं आती थी । परिवार है सामान्यतः कभी अंग्रेजी फिल्म देखने का तय किया, उनसे उसे देखने को चलने के लिए पूछना तो दूर फुट ऊंची आवाज में उन्हें ये जब लाया गया वो अंग्रेजी तो समझ नहीं पाएंगे नाजुक छुआ अंतर्मुखी मगर गर्व नहीं और टीवी कमला सबसे दुःख मैं घर गयी । अपने पति के गांधीवादी आंदोलन में व्यस्त रहने के कारण मैं रोज रोज होने वाले अपमान के आगे निपट अकेली पड गई । जवाहरलाल नेहरू आंदोलन में से अपने लिए जो सीमित समय निकाल पाते थे उसमें भी कमला उनका साथ पाने के लिए सांस और नानक से वोट लगानी पडती है । विजय लक्ष्मी उस ने बचपन से ही अपने भाई की सिर्फ खडी थी, उन पर पूरा हक जताती ऐसा सब घर सवारी करने जाते हैं । एक दूसरे को कविता पढकर सुनाते और ऍम के लिए कमला मानो अनाधिकृत आवांछित उच्चतम बाहरी शख्सियत थी जिन्होंने उनके भाई के मन में उनकी जगह पर कब्जा कर लिया था । इलाहाबाद में अपने बचपन से ही इंदिरा के मित्र पुपुल जयकर लिखती है, जनता की सम्मोहित दृष्टि के केंद्र अपने पिता और विजय लक्ष्मी की बुद्धिमता और खूबसूरती के आगे अलग थलग पड जाने की शिकार कमला और इंद्रा अपने को बेहद ही महसूस करते थे । इंदिरा आत्महीनता की भावना की शिकार होकर गुमसुम रहने लगी थी और आजीवन इसी भावना से पीडित रही है । अब तो ये सोच कर भी खडक लगता है की अपनी शादी के महज आठ महीने बाद भाई ये जब करें विजय लक्ष्मी आगे चलकर लिखने वाली थी । उनके अनुसार भावी द्वारा मुझे ना पसंद करना शायद जाए जी था पिछले नहीं कि मैंने कुछ किया था बल्कि भाई और मेरे बीच जो एकात्मकता थी उसके कारण उसी विजय लक्ष्मी इस तरह बचपन में ही उनका दिल टूटने की वजह बने अपने भाई के प्यार को बढने से रोकने की प्रवर्ति ही नहीं बल्कि अपने भाई की पत्नी के प्रति नफरत सबको जता देने के साथ ही साथ उन्होंने जो विध्वंसक और अपमानजनक शब्द बोले सब रहें । इंदिरा के मन पर अस्थाई असर डाला इंदिरा जब चौदह साल की थीम उन्होंने सुना क्योंकि बुआ उन्हें बदसूरत और मूड कह रहे थे । स्कूर आकलन से तो इस तरह और नटखट बच्ची मानव सदमे की शिकार होकर अंतर्मुखी और संकोची किशोरी में तब्दील हो गई और उसमें पूरी जवानी यही संताप झेला । इंदिरा ने बाद में कहा उस टिप्पणी से मैं मन ही मन टूट गए । अपनी मौत से पखवाडेभर पहले भी उन्होंने वो टिप्पणी बखूबी याद है ऍम शब्दों को कभी भुला पाई अपनी फुँसी को माफ कर पाई और हमेशा बदला लेने के लिए मौके का इंतजार करती रही । नेहरू ने बाद में लिखा थी, इंदिरा और विजय लक्ष्मी एक दूसरे को अपमानित करते रहेंगे । इंदिरा की हत्या के बाद विजय लक्ष्मी ने कुछ उत्तर पूर्व आॅर्ट से कहा, मैं ये नहीं समझ पाती उसे मुझ से इतनी नफरत क्यों थी? मैंने तो हमेशा उससे प्यार किया और उसे अपनी बेटी बाना इंदिरा के मन की नफरत कभी कम नहीं हुई है । प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जब उन्नीस सौ सत्तर में जवाहरलाल नेहरू ट्रस्ट वो आनंद भवन सौंपने का फैसला किया । अपनी फूफी को अपने पैतृक घर में आखिरी बार ठहरने की इजाजत भी इंदिरा ने नहीं दी । उन्होंने उन्नीस सौ चौहत्तर में अपने छोटे बेटे संजय की शादी में भी अपनी फूफी को निमंत्रित नहीं किया । को फिजी लेलो जवाब, प्रतिशोध और बेदर्दी जैसी प्रवृत्तियां इंदिरा बहुदा जताती थी तो कई मायनों में लगातार उत्पीडित होने की मानसिकता से पैदा हुई थी । अपने पिता की तरह क्षमादान और उदारता के ऊंचे पायदानों पर चढने के बजाय बहुदा बदले की भावना से कार्रवाई कर देती थी । उनका विस्फोटक प्रो मन के भीतर ही भीतर खत बनाता रहता था । वो मन में शिकायतों की गांठ बांध लेती थी । और कभी उन्हें भूल नहीं तथा क्षमादान में कामयाब नहीं हो पाएगा । आनंद भवन में नाराजगी और निवेश से लबालब महिलाओं की दुनिया में कमला बिसूरती हुई बीमार पड गई और इंद्रा नहीं उसी में जीना तथा लडना सीख लिया । कमला की भावनात्मक वेदना से उनका स्वास्थ बिगडने लगा । इंदिरा ने पारिवारिक एशिया के घूंसों को अपने चेहरे पर झेलकर घर के भीतर मौजूद सभी दुश्मनों से निपटना सीख लिया । वो अपनी माँ की समीक्षा के लिए अपने पिता से भी अक्सर नाराज हो जाती थी । जवाहर लाल को गुस्से में लिखा करती थी आपको बता दी हैं आपके पीछे से घर में हो क्या रहा है । आपको पता है कि जब मम्मी की हालत बहुत खराब थी तो घर में तमाम लोग मौजूद थे । मगर उन में से कोई भी उनका हाल पूछने या उनके पास कुछ देर बैठने को नहीं फटका और उनको जब तकलीफ हो रही थी तो किसी ने उनकी मदद नहीं की । मम्मी को अकेले छोडना खतरे से खाली नहीं है । कमला के प्रति जवाहरलाल के व्यवहार के लिए उन्होंने कभी उन्हें माफ नहीं किया । उनके मन में जो शिकायत थी उनके द्वारा अपनी शादी करने के फैसले के मौके पर अपने पिता के प्रति विद्रोह के रूप में फूट पडी थी । अपनी माँ जैसी दुर्गति से वह बचना चाहती थी । बाद में कहा मैंने उनके दिल पर चोट लगते देखी थी और मैं अपने साथ पैसा नहीं होने देने के लिए उद्धव थी । मैं उन्हें बहुत शिद्दत से प्यार करती थी और मुझे जब लगा कि उनसे अन्याय किया जा रहा था । बहन की तरफ से खडी हुई और लोगों से डटकर लोहा लिया । उन्होंने कहा, मेरे जीवन में माँ की विशेष भूमिका नहीं बहुत चरित्र और उनका गहरा असर पडा । उनके बाद के वर्षों में इंदिरा गांधी के बिस्तर के सर खाने की दीवार जहाँ लाल की नहीं बल्कि कमला नेहरू की तस्वीर टंगी रहती थी । एक तरफ उनकी माँ ही कमजोर और बीमा और उनके पिता की और के परिवार का जीवन ऊर्जा और मकसद से लबरेज रहता था । दोनों पक्षों के बीच का अंतर उनके दिमाग में बैठ गया । सच तो यह है कि इंदिरा और उनके पिता के बीच संबंधों के बारे में तो खूब लिखा गया है मगर उनकी माँ से उनके संबंधों के बारे में बहुत कम ही खोजबीन की गई है । इसके बावजूद अपने जीवन में अनेक मौकों पर विषेशकर कमजोर लोगों में इंदिरा ने अपनी माँ में जो शैतान विपक्षियों की शुद्ध लेकिन अनुव्रत शिकार नहीं देखी । कमजोरी और असुरक्षा का जिक्र किया । मजबूती के पलों में वे नेहरू की अटलता की याद दिलाती थी, लेकिन विपक्षी काल में वे हमला बन जाती थी । आध्यात्मिक गुरुओं पर निर्भर अपनी माँ की तरह अकेले घुटती हुई पीडित बेसहारा औरत हो जाती थी तो अकेले तरह तरह के दुश्मनों से लोहा लेने की कोशिश कर रही हूँ । इंद्रजीत बडी हो रही थी । उनके व्यक्तित्व को दर्शाने के लिए विनम्र और अच्छी जैसे विशेषण प्रयोग किए जाते थे, लेकिन उनकी ज्वलंत आत्मा पर किसी का शायद ही ध्यान गया । उनकी बुआ कृष्णा हठीसिंह के अनुसार इंदिरा ने कभी एक हादसे खम्बा पकडता है और दूसरे हाथ को तानते हुए अपनी जलती काली आंखों से घूरते हुए उनसे कहा था, मैं जून ऑफ और बनने का खास कर रही हूँ । मैं किसी दिन अपने लोगों को आजाद करवाकर रहेंगे । ऍर इसको आगे चलकर बताने वाली थी । मैं हमेशा शांत रही और जब मैं छोटी थी तो लोगों को लगता था मेरे भीतर जोशी नहीं था, लेकिन याद हमेशा रही है । फर्क सिर्फ इतना है कि कोई इसे देख नहीं पाया । अलावा उस वक्त जब इसकी लपट उठने नहीं, भले ही बिल्ली दुबली पतली और उदासीन दिखती नहीं है मगर वो अपना समय आने पर नेहरू वंश की विरासत के अनुरूप अपनी शेष बताता ठहराने का मंसूबा पाले हुए हैं । अपनी सामर्थ्य बाहर अधिक से अधिक नौकरों को इकट्ठा करके उनके सामने मेज पर खडे होकर भाषण देना मेरा पसंदीदा खेल था । बडो की बातचीत में इस्तेमाल किए गए मुहावरों को बिना अर्थ जाने ही भाषण में दोहराती थी कांग्रेस की लडकों की पोशाक । खादी का कुर्ता पायजामा पहने और गांधी टोपी लगाए वो अपने मकसद के लिए लडने वाली युवा कार्यकर्ता की तेरह बरस की उम्र में अपने पिता को चिट्ठी में लिखा करती थी मेरे ऍम बनवाए गए हैं दौड में और कसरत के लिए । आपके प्यारे हिंदू बॉडी की ओर से ऐसा बॉय यानी लडका जो लडकी से कम नहीं था । जो अपने पिता को उसके लिए अपने मन में तय भूमिका निभाने के लिए अपनी शारीरिक चुस्ती दुरुस्ती के प्रति आश्वस्त करने के लिए तेजी से दौडता, बेड पर चलता हूँ और जिम्नास्टिक करता था । उसकी आरंभिक पहचान लडकी से अधिक लडके के रूप में थी । वो जवाहर लाल की पहली सम्मान थी जिसके लिए ये मायने नहीं रखता था कि वो लडकी थी या लडका जिसकी एक मामूली सी झलक थी उसके जन्म और खानदान की विशिष्टता ने । उनके व्यक्तित्व में इस तरी के बजाय पुरुष के गुण अधिक मात्रा में विरोधी थे । लैंगिक भेदभाव के पडे ऐसी विशिष्ट पहचान जो आजीवन उनके व्यक्तित्व में शामिल रही । लडकी इंदिरा नहीं थी वो अगर वो यानी लडकी लडका हिंदू बाॅक्सर कहती भी थी है कि उन्होंने कभी खुद को लडकी अथवा स्त्री के रूप में नहीं आता हूँ और उनकी पहचान लिंग के बजाय खान ना और बाद में उनकी सत्ता के द्वारा परिभाषित हुई है । जब तेरह साल की थी तब नेहरू ने उन्हें चिट्ठी में लिखा था भारत ने आज हम इतिहास पर आ रहे हैं तो तुम्हारा और मेरा सौभाग्य है । हम स्वयं इस महान नाटक में भागीदार है । वो इस बात को कभी नहीं भूले कि वो इतिहास को जी रही थी और उसका निर्माण भी कर रही थी । उन्होंने आजीवन अपने विचारों और भावनाओं को पुर्जों और चिट्ठियों में लिखा । मानव भावी पीढियों के लिए स्पष्टीकरण की सामग्री छोड कर जा रही हूँ । नेहरू ने भी उन्हें कभी ये भूल ने नहीं दिया । वैसे पिता थे चाहते थे कि वह भविष्य में महानता के चक्र को कूदकर छू सके । मेरे पिता शारीरिक व्यायाम और चुस्त दुरुस्त रहने के प्रबल हामी थे । इसलिए मुझे रोज दौड लगानी पडती थी और दौडना ही नहीं बल्कि सही अदा के साथ दौडना होता था । वो कहते थे, दौडते हुए मुझे सब भी देखना चाहिए । मुझे तैराकी सिखाने की उन्हें बडी इच्छा थी और सिखाने का उनका तरीका ये था बस मुझे पानी में छोड देते थे और मुझे खुद अपनी क्षमता भर अच्छे से हाथ पांव मारने होते थे । इंडिया को एॅफ की रचनाएं पडनी लगी और गैरीबाल्डी के बारे में भी पढ कर जाना पडा । इतिहास के प्रति अपने पिता के लगाव में शामिल होना पडा हूँ । लगातार चुस्त दुरुस्त रहना पडा हूँ और बिगडी हुई सिर्फ बडी लडकी की तरह व्यवहार करने से बचना बडा बडे होने के उनके समूचे जीवनकाल के दौरान नेहरू का बार बार जेल जाना और बाहर आना लगा रहा हूँ और उन्हें लगातार प्यार भरे खत लिखते रहे जिनमें उनके मानसिक और शारीरिक विकास के लिए बौद्धिक और भावनात्मक बातें होती थी । बच्चों को कांग्रेस से जोडने के लिए बनाई गई वानर सेना की गतिविधियों में जब उन्होंने शामिल होना शुरू किया तो नेहरू ने जेल से लिखा है छोटे से सिपाही लडके, अपना ख्याल हो अपने सिर के बाल खडे होने की भी कोशिश करो । उन का असर विलक्षण होता है । कमला की बीमारी ने उन्हें नेहरू परिवार की गतिमान जिंदगी से अलग थलग कर दिया था । उनकी शादी में अडचन बन गई थी और उनके लिए महाराष्ट्र के दौरों का कारण भी बन गई थी । जवाहरलाल नहीं चाहते थे कि उनकी बेटी भी कल को इस सब की शिकार हो जाए । वो खुद भी ॅ और सक्रिय व्यक्ति थे और बीमारी को ना पसंद करते थे । उनकी राय में बीमारी, चरित्र कमजोरी की निशानी थी । उन्होंने अपने आरंभिक पत्रों में ये सलाह भी दी एकदम चुस्त दुरुस्त रहने की कोशिश करो । मुझे लगता है कि व्यक्ति के लिए तंदुरुस्त नहीं रह पाने से बडी गलती कोई नहीं है । उन्होंने आगे लिखा, कुछ उम्मीद है कि तुम खुद को ढीलीढाली और थुलथुल कब गए? नहीं होने होगी । जब अपनी किशोरावस्था के शुरुआती दौर में थी तो नेहरू ने विजय लक्ष्मी पंडित से कुबूल किया, यदि मुझे कोई बात ना पसंद है तो वो कहे लोग जो जीवन में मटरगश्ती करते रहते हैं, बाकी सब से ये उम्मीद करते हुए थे, उनकी सुख सुविधाओं की चाकरी में लगे रहेंगे । हिन्दू में ऐसी ही अनेक प्रवृत्तियां पैदा हो गई हैं । आप केंद्र और दूसरों के लिए बिल्कुल नहीं सोचती । विजय शांति निकेतन में पड रही थी तब उनसे ये पूछा करते थे व्यायाम कर रही हो ना तो उसका जिक्र ही नहीं करती । बंगाली लडकियों जैसी और ताना हो जाने की कोशिश मत करना तो एकदम नाजुक और फूल सी कोमल होती हैं तथा कडी कसरत नहीं करवाती । सवेरे उठकर दौड लगा हूँ । अन्य पत्रों में उन्होंने यह हिदायत थी कि उन्हें समाज के लडाके वहाँ असंतुष्ट स्वभाव का नमूना नहीं बन जाना चाहिए । उन्हें साडी नहीं बल्कि फ्रॉक पहनने की हिदायत देते हुए लिखा, मैं खुश हूँ कि तुमने अपने अधिकतर बालों से छुटकारा पा लिया और तुम्हें फ्रॉक ही पहननी चाहिए थी । साडी तो कमरों की वर्दी नहीं है ये तो आरामतलब लोगों का प्रधान है । लगातार सिखाते समझाते पिता के रूप में नेहरू वरदान और अभिशाप दोनों ही शुद्ध होते रहे होंगे । उनके पापु लगातार उन्हें अपने आप को सुधारने की राह पर चलाया रखते हैं और उनकी कमजोरियों के प्रति बेहद संवेदनशील थे । अभी जब पंद्रह वर्ष की थी तो उन्होंने लिखा मुझे पता है कि हिंदू मुझे और कमला को बेहद चाहती है । उसके बावजूद वो हमें और अन्य लोगों को सरासर नजर अंदाज कर देती है । वो सपनों और अनिश्चय की दुनिया में डूबी रहती है । मुझे लगता है उसे आसमान से जमीन पर उतार लाने के लिए किसी खेल क्या कारखाने में काम करना चाहिए? परिवार के इस नहीं मुखिया होने के बावजूद अपनी बेटी की परवरिश करके उसे अपने सिद्धांतों के आधार पर विकसित होने की तरह करना चाहते थे । खानदान और कुलीन सामाजिक वर्ग की बारिश के साथ ही साथ आंदोलन और विचारधारा की बेटी के रूप में भी । इस मामले में गांधी के मुकाबले अपनी संतान को अपनी विचारात्मक रूपरेखा के अनुसार पाल सकने में नेहरू शायद अधिक कामयाब रहे । अपने बच्चों की परवरिश में गांधी के अपने निजी प्रयोग, कम से कम उनके बडे बेटे के संदर्भ में तो आजीवन संतानों चित विद्रोहों के रूप में प्रस्फुटित हुए इंदिरा की शिक्षा हमेशा टुकडों में बंटी रही और कभी औपचारिक डिग्री कहीं से भी हासिल नहीं कर पाई । इसके बावजूद शांति निकेतन से ऑक्सफोर्ड तक हुई उनकी शिक्षा दीक्षा ने उन्हें भले ही अपने पिता की इच्छा के अनुसार बौद्धिक अथवा विद्वान न बनने दिया हो मगर उससे बौद्धिक रूप से जिज्ञासु और विचारों को ग्रहण करने के लिए उत्साहित जरूर हो पाई । प्रखर हाजिरजवाब पैनी नजर वाली और पडने की शौकीन थी मगर अपने पिता की तरह विचारों पर अमल करने वाली अथवा अवधारणाओं की तह तक जाने की चौकी नहीं थी । वे कलात्मक और साहित्यिक रुचि वाली तो थी मगर इतिहास और इतिहास के विश्लेषण में उनकी खास दिलचस्पी नहीं थी । जवाहरलाल को लगता था कि इंदिरा की शिक्षा दीक्षा राष्ट्र निर्माण की आवश्यकता के अनुरूप होनी चाहिए ताकि वो हमारे सपनों का भारत बनाने के लिए ईदर ईट चुनने में साहसिक भूमिका निभा सकें । मैं चाहता हूँ की इस सर्वस्व समर्पित करने वाले कार्य के लिए तो अपने दिमाग और शरीर को प्रशिक्षित और तैयार कर लो । कोई जब सात साल की थी तो नेहरू ने इलाहाबाद में फॅमिली स्कूल से उनका नाम कटाने पर जोर दिया, जहां मोतीलाल ने उनका दाखिला करवाया हुआ था । उनका तर्क था कि उस प्रकार के स्कूल में बच्चे की उपस्थिति से कांग्रेस के विदेशी के बहिष्कार के सिद्धांत का उल्लंघन हो रहा था । अंततः इंदिरा का नाम पिता के आदेश से स्कूल से कटवाकर उन्हें घर पर ही शिक्षकों के सुपर कर दिया गया । इस प्रकार सात साल की बच्ची के स्वतंत्रता सेनानी बनने की प्रक्रिया शुरू हो गई । अपने माता पिता के जीवन में उन्होंने विभिन्न भूमिका निभाई । अपने पिता के शागिर और अपने माँ की रक्षा उनसे अपने पिता की अव्वल शिक्षा बनने की उम्मीद की गई उनकी उम्मीदों की महान ऊंचाइयों को छूने लायक बनने की भी । जब अपनी माँ की देखभाल करते हुए ये उनकी भावनात्मक अकेलेपन की दुनिया में शामिल होती थी तो अपने साझे दुश्मनों पर हमले को सन्नद्ध देखती थी । कमला का स्वास्थ्य उन्नीस सौ जो इसमें तब शारीरिक और मानसिक रूप दोनों से ही टूट गया जब गर्भावस्था का समय पूरा होने से पहले ही पैदा हुए बच्चे की दो दिन बाद मृत्यु हो गई । बेटा पैदा करने के बाद जाहिर है उनके ससुरालियों की निगाहों में उनके लिए कुछ मुँह जरूर पैदा होती और उन्हें भी अपने अस्तित्व के प्रति खोया हुआ आत्मविश्वास वापस मिल जाता हूँ । लेकिन बच्चे की मृत्यु ने उन्हें इस राहत से वंचित कर दिया । नवजात की मृत्यु के बाद वो बुरी तरह बीमार पड गई । उन्हें फेफडों कि तपेदिक क्या नहीं टीवी कि बीमारी होने का पता चला । इसे उन्नीस सौ बीस में मौत की सजा माना जाता था । इलाज के लिए उन्हें लखनऊ के अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन हालत और बिगडते चले गए । कमला ने बीमारी से आजिज आकर नेहरू के कैमरे से ही गहरे तो सैयद महबूत को लिखा मैं सब पर बोझ बन गई हूँ । महमूद प्रबल देश भक्त थे । वो आगे जाकर मुस्लिम लीग का विरोधी करने वाले थे और हमेशा नेहरूके वफादार दोस्त हुए । महमूद कमला कोर्स भी पढाते थे और उन्हें कमला बहुत भरोसेमंद दोस्त मानती थी । मेरी इच्छा है मुझे बहुत चल दिया जाए । उन्होंने महमूद को दूसरे पत्र में लिखा जब मैं अपनी बर्बादी के बारे में सोचती हूँ तो लगता है कि कम उम्र की लडकियों को अपना जीवन मेरी तरह बेकार करने से बचाया जाना चाहिए । तपेदिक विशेषज्ञों द्वारा कमला के इलाज के लिए परिवार उन्नीस सौ छब्बीस नहीं स्विट्जरलैंड की यात्रा पर गया जहां पकडने के लिए इलाहाबाद सही मुम्बई के बीच रेलगाडी के सफर में अधिकतर समय इन्दिरा आपकी माँ की गोद में बैठे नहीं । उन्हें अपने साथ ले जा रहे मोतीलाल ने जवाहर लाल को लिखा मैं देखा हिंदू ने कमला को बार बार चुनाव झडकर को रोकना चाहिए । संभव हो तो उन्हें एक दूसरे के गले लगने से भी रोकना चाहिए पसीने तक मैं बीमारी के विषाणु होते हैं । रीजन नादान किशोरी थी तब भी अपनी बीमार दुखियारी माँ को अपनी पत्नी बाहों के घेरे में दस कर पीछे रहती थी और अपने जीवन में आगे जाकर उन्हें बेसहारा लोगों की रक्षक की भूमिका और छवि दोनों ही बखूबी मिलेंगे । स्विट्जरलैंड में जवाहर लाल ने इंदिरा को अलग अलग स्कूलों में भर्ती किया । सबसे पहले जेनेवा केले कॉल इंटरनेशनल में जहाँ पे महज आठ बरस की उम्र में अपने आवासीय फ्लैट से स्कूल तक अकेली ही जाती थी । मुझे फ्रेंच भाषा का एक शब्द भी समझ में नहीं आता था । जब मैं यहाँ जनेवा पहुंचेगी तो मुझे अंग्रेजी बोलने का भी मामूली ज्ञान ही था । मेरे पिता तो चले जाते लेखकों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं के साथ बैठक के लिए और मुझे मेरी बीमार माँ के साथ छोड गए । मुझे हमारी काम वाली बाई को समझाना पडता था । मुझे बाजार जाना पडता था । इसी सब के कारण फ्रेंच बोलना सीट गई । इससे मुझे आत्मनिर्भर होने में मदद मिली । मोदी लाल ने भी अपने बेटे को लिखा । हिन्दू छोटी से होने पर भी बेहद कर्मठ लडकी है । स्विस कस्बे में रहना सीख रही है । बहुत बहादुरी का काम है । बिहारी छोटी सिंधु चमत्कार है, लेकिन जल्द ही वह भी बीमार पड गई और सिस्टर के मारे की कहीं उसे भी अपनी माँ का रोकना लग जाए । नेहरू ने उन्हें जानवर से दूर बॉक्स में ले कॉल नवले भेज दिया । भू जगह उनके माँ बाप के स्थान से दो घंटे की यात्रा के फैसले पर थी । जवाहरलाल ने राजनीति से एक साल की छुट्टी ले ली थी और पिता बेटी सात सौ स्कीम करने तथा बर्फ के गोले एक दूसरे पर उछालने जाते थे । जवाहरलाल अपने पिता को इंदिरा केस किंग सीखने के बारे में भी लिखते रहते थे । साल में पेरिस यात्रा के दौरान उन्होंने भीड में आपने पापु के कंधे पर चढकर पहली बार अकेले हवाई जहाज को अटलांटिक को पार करके पेरिस के पास ले बोर्गे में उतार रहे विमानचालक जॉॅब को देखा और खुशी के मारे तालियाँ बजाये पिता और बेटी के बीच उनके बचपन के दौरान खासी गहरी आत्मीयता थी । नेहरू उनके साथ खेलते थे, उन्हें स्कीइंग और तैराकी सिखाने के लिए प्रयास करते थे और बेहद नहीं । सिख संरक्षक होने के नाते दुनिया से उनकी पहचान कराते थे । लेकिन ऐसा उनकी ऊंची उम्मीदों के सामने इंदिरा के डटने और उनके संरक्षणवाद को नियंत्रित करने की कोशिश शुरू हो जाने तक ही चल पाया । हम लोग का स्वास्थ्य सुधारने पर वो सौ सत्ताईस में पूरा भारत लौट आए । अब इंदिरा काफी समझदार और स्वतंत्र, सोचने लायक और फ्रेंच भाषा तथा स्कीम में भी परवीन हो गई थी । देश में पूर्ण स्वराज की उद्घोषणा के लिए माहौल बन रहा था । सन में साइमन कमीशन के खिलाफ अनेक भारतीय शहरों में आन्दोलन हो रहा था । विरोध प्रदर्शनों के दौरान अंग्रेजों की लाठियों ने जवाहर लाल को भी नहीं बख्शा । कांग्रेस के लोकप्रिय नेता लाला लाजपत राय जब लाहौर में मौन विरोध के रूस का नेतृत्व कर रहे थे तो अंग्रेजों की लाठी ने उनके सर पर करारी चोट मारी की वजह से उन के बाद में मौत हो गई । दोनों नेहरू भारत के भविष्य के बारे में ऐसे आमने सामने थे । जवाहर लाल और मोतीलाल के बीच मतभेद से आनंद भवन का माहौल विस्फोटक हो गया । मोतीलाल जहाँ अंग्रेजों की राजसत्ता के अंतर्गत ही भारत को डोमिनियन तथा स्वतंत्र उपनिवेश का दर्जा दिलाने के हामी थे, वहीं जवाहर लाल ने पूर्ण स्वतंत्रता के लक्ष्य की घोषणा कर दी । मोतीलाल अपने बेटे की हरकतों से अधीर हो गए । उन्होंने धन दौलत के हिसाब किताब में जवाहरलाल नेहरू के अनाडीपन पर कई बार निराशा जताई और जवाहर में पैसे गांधी द्वारा प्रवर्तित उग्र सुधारवाद के प्रति भी वे हमेशा आशंकित रहते थे । बीके नेहरू ने लिखा है कि मोतीलाल कहते थे कि वह अपना धन दौलत उस मूवी के भरोसे नहीं छोड कर जाएंगे क्योंकि वो उसे योगी गवाह देगा और उन के बजाय वे कमला अथवा हिंदू में से किसी के नाम अपनी सारी दौलत कर देंगे । अंतर्निहित, भावनात्मक और विचारधारात्मक मतभेद निर्णायक मोर पड आ गए थे । नेहरू लिखते हैं, पिता और बेटे के बीच संबंध इस कदर बिगड चुके थे कि राजनीतिक विषयों पर घर के भीतर बहस से बचा जाने लगा । साल उन्नीस सौ ढाई इसमें कमजोर कमला ने, दूसरे बच्चे की चाहत में दर्दनाक घर बात चेला और दो तथा अकेलेपन की खाई ने और गहरे उतर गई इंदिरा के लिए । हालांकि ये समय बेहद रोमांचक था । आपने चारों तरफ निरंतर जारी घटनाक्रम के बीच जीने के कारण उन्हें समझ में आने लगा था कि वे बडी महत्वपूर्ण घटनाओं की साक्षी बन रही थी और उनके भीतर भी कुछ साहसिक करतब दिखाने की उमंग जगने रही थी । मात्र ग्यारह वर्ष की उम्र में परिवार के साथ में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के कलकत्ता अधिवेशन के लिए गई । इस जब सहित होकर उन्होंने नाश्ते में पूरे आधा दर्जन के लिए चट करके अपने परिवार को आश्चर्य में डाल दिया क्योंकि उन्हें तो यही पता था कि खाने पीने के मामले में वो नकली थी । कलकत्ता दौरे में मौजूद एक लडका सिद्धार्थ शंकर रही । वर्षों बाद कलकत्ता में उनकी याद में उनके इस करतब की याद नहीं । उसी खिडकी के बाहर केले का एक पेड लगाने वाला था । सुधर । शंकर ने मोतीलाल के पुराने मित्र चितरंजनदास के पोते थे । इंदिरा ने बाद में सिद्धार्थ से बातचीत में ये भी कबूल किया वैसा करके वे उन लोगों को प्रभावित करना चाहती थी जो उन्हें देख कर नेहरू खानदान की अहमियत के लिहाज से बहुत कमजोर और नगर नी समझ लेते थे । कांग्रेस के दिसंबर उन्नीस सौ बहत्तर में हुए लाहौर अधिवेशन में राष्ट्रवाद के आंदोलन को उसका सतारा गांधी के ऋषि को सेनापति मिल गया । इसके बारे में प्रसिद्ध है । तब उसने बैलों की बग्गी में बैठने से मना करते हुए सफेद घोडे की पीठ पर लाहौर की सडकें ना पर सबको विस मत कर दिया । नेहरू के जीतने का स्टाॅक लिखते हैं, जवाहर के लिए लाहौर अधिवेशन का महत्व उनकी राजनीतिक जीत से कहीं ज्यादा अहम था । ये तो उनका राष्ट्र था । वो खडी आई और वो पुरुष भी आया । चालीस वर्षीय जवाहर ने चली आ रही वंशवादी परंपरा में अपने पिता से कांग्रेस अध्यक्ष का पद हासिल किया पूर्ण स्वराज का ऐलान कर दिया । बेहद उत्साहपूर्वक कब तक दिसंबर उन्नीस सौ ऍम भारत का झंडा तिरंगा फहराया गया । पूर्ण स्वराज के प्रस्ताव को तैयार करते समय नेहरू ने इंदिरा से उसकी टाइप की हुई पहली प्रति को ऊंची आवाज में पढवा इंदिरा ने जब उसे पढ कर सुना दिया । उन्होंने कहा क्योंकि हमने से जोर से पडा है इसलिए अब हम इसके लिए प्रतिबद्ध हो । बाद में उन्होंने कहा दी, पूरी तरह स्वतंत्र होने के बाद मुझे भी जैसी थी । लाहौर अधिवेशन के बाद नेहरू राष्ट्रीय आंदोलन के मनभावन युवराज हो गए । उनकी बेपनाह लोकप्रियता चारों और फैल गई और शायद इसी से घबराकर उन्होंने आत्मालोचना और मिमांसा के अंदाज में मॉर्डन रिव्यू में उन्नीस सौ सैंतीस में चालक के नाम से ही लेखी लिख डाला । दक्षिण एशिया के किसी राजनेता के लिए ये अभूतपूर्व कदम था । अपनी ही कलम से अपने कटु आलोचना करने वाले इस लेख का शीर्षक था राष्ट्रपति, कांग्रेस अध्यक्ष तब राष्ट्रपति कहलाते थे और उसमें तथा कथित राष्ट्रपति कि जनमानस में बनी पवित्र छवि को तोडकर उसे सामान्य नेता सिद्ध करने की कोशिश की गई थी । अपनी ही निंदा करते हुए उन्होंने लिखा, उनकी जिस मुस्कराहट पर जनमानस न्यौछावर हो जाने को आतुर है वो मात्र उन्हें आकर्षित करने की युक्ति भर है ताकि उस भीड का सद्भाव हासिल किया जा सके । इसके मन में वो पहले ही अपनी जगह बना चुके थे । किसी जननेता की सूची समझी युक्ति ये खुद ही बखिया उधेडने आत्मालोचना करने वाला ऐसा अद्भुत लेख था जो उन्हीं के समान लोकप्रिय इंदिरा गांधी कभी अज्ञात लेखक के रूप में लिखने की भी हिम्मत नहीं जुटा सकती थी । छह अप्रैल की सुबह साढे छह बजे महत्वा ने तटीय गांव गाडी में समुद्र में खडे होकर किसी बर्तन में खारे समुद्री पानी को भरा और सवाल कर नमक बना । ऐसा करके उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत का नमक कानून ही नहीं तोडा बल्कि उस की रात सत्ता को सीधी चुनौती दे दी । उनके सामान्य से कौतुक ने देशभर में जबरदस्त नागरिक अवज्ञा आंदोलन छेड दिया । दांडी नमक सत्याग्रह यात्रा के समर्थन में देश भर में यात्राएं निकाली गई और प्रदर्शन हुए । मोतीलाल को अचंभित करते हुए कमला भी अपनी बीमारी का बिस्तर त्यागकर जुलूसों के नेतृत्व में जुट गई । बे इलाहाबाद में अंग्रेजों द्वारा संचालित इविंग क्रिश्चियन कॉलेज पर ऐसे ही धरने का नेतृत्व कर रही थी । तभी बौखलाई पुलिस नहीं उसे तितर बितर करने को लाठीचार्ज कर दिया और भीड से घिरी कमला चिलचिलाती धूप में बेहोश हो गई । बडी औरतों के उस करने को असमंजस से देख रहा था । कॉलेज का एक विद्यार्थी कमला की मदद के लिए लगता अठारह बरस के शिवक का नाम करो । उस गांधी था ऊंचे मंसूबों वाला युवा जो बचपन से लोगों को मजाक में बुद्धू बनाने में माहिर था । बेहद नाजुक खूबसूरत कमला से पलक झपकते प्रभावित हो गया था जो एक प्रखर आंदोलनकारी बन चुकी थी । कॉलेज छोडकर वह कांग्रेस के कार्यकर्ता बन गए और नेहरू के अन्य सहायको की तरह दोनों नेहरू हों का अपना आदर्श मानते हुए नियमत आनंद भवन आने जाने लगे । उनके जीवनीकार बर्टिल फॉक लिखते हैं, कमला नेहरू ने फिर उसके लिए मानव नई दुनिया के दरवाजे खोल दिए थे । रोज बम्बई स्थित मरीन इंजीनियर के पुत्र है लेकिन उन्हें उनकी अविवाहित बुआ डॉक्टर शीरी कमी सारी उतने गोद लेकर इलाहाबाद में ही उनकी परवरिश की थी । डॉक्टर कमी सरिया जानी मानी सर्जन थी लेकिन फिर उसके परिवार की सामाजिक हैसियत नेहरू खानदान से कम थी । उनका परिवार न तो उतना लोकप्रिय था और न ही उतनी विशेष उपलब्धियों से युक्त था । इसी वजह से नेहरू परिवार और इंद्रा से परवान चढ रहे अपने रिश्तों में रोज को आजीवन हीन भावना से ग्रस्त रहना पडा । इंदिरा तब तक कांग्रेस के बाद संगठन वानर सेना कि कर्मठ सदस्य हो चुकी थी । वो अपने वानर दल की सेनापति थी, जो बहुत अज्ञातवास करने वाले कांग्रेसियों के लिए चिट्ठी, पत्री, भोजन और सूचनाओं का आदान प्रदान करते थे । हमारे घर के पास के किसी गांव में जब गोलीबारी हुई तो हमें खुद घायल युवाओं प्रदर्शनकारियों के पास जाना पडा । मैं सेवा से इस प्रकार परिचित हुई उस समय तेरह अथवा चौदह साल की रही होंगी । चौदह साल की थी जब नमक सत्याग्रह के दौरान झंडा फहराने वाले आंदोलनकारी पर लाठी बरसाकर उसे गिरफ्तार कर लिया गया । उसे जब राशिद कर ले जाया जा रहा था तो झंडा उन्हें सौंपते हुए उसने चिल्लाकर कहा, इसे किरने मत देना । झंडे को गिरने मत देना । नहीं ताजिन्दगी इंदिरा गांधी भारत के झंडे को करने नहीं देगी । राजसत्ता ने नमक सत्याग्रहियों की धरपकड चालू कर दी । जवाहरलाल पर उन्हें में राजद्रोह का आरोप लगाकर फिर से जेल में डाल दिया गया । नैनी सेंट्रल जेल में उन्हें तेरह साल की इंदिरा को पत्र लिखने का सिलसिला शुरू किया । बाद में भावपूर्ण रूप से लिखित ऍम यानी विश्व इतिहास की झलक नामक किताब का रूप लेने वाले थे । ऍम इतिहास को समझने वाले सबका है जिसमें सभ्यताओं के उत्थान और पतन का विवेचन है और अशोक तथा सिकंदर महान जैसे चरित्रों की जीवन गाथा समाहित है । इससे पता चलता है नेहरू कितने मनोयोग से अपनी बेटी को उन महान चरित्रों से परिचित कराना चाहते थे, जिनके जीवन को उन्हें अपना आदर्श बनाना चाहिए था । इस प्रक्रिया में वे उनके और अपने लिए भी नए गडे जा रहे देश के वास्ते विचारों और मूल्यों का मीजान बैठा रहे थे । नेहरू जब जेल में थे तभी कमला भी गिरफ्तार कर ली गई । कमला अब तक नहीं जिंदगी जीने लगी थी । तिरस्कृत पुत्रवधू और उपेक्षित पत्नी ने खुद की और अपने शोषित देशवासियों की स्वतंत्रता के लिए आंदोलनकारी बन गई थी । स्वतंत्र होने की चाहत की कीमत में बखूबी समझती थी । उन्होंने आजादी के संघर्ष में खुद को स्वतंत्रता सेनानी और संगठन करता के समान छोड दिया था और उन्नीस सौ इकत्तीस में वो जब बंदी बनाई गई तो ये इंदिरा की जीत थी । इससे इनके पिता की कांग्रेस के रूप में कमला की धार चल गई । आजादी की लडाई तेज होने के साथ साथ वो भी आंदोलनकारी के रूप में तेज तरार होती गई । उनके ससुराल वालों ने भी कमला की इज्जत करनी शुरू की । कृष्णा हठीसिंग लिखती है, अब हम ने साहस के साथ कमला हर एक परिस्थिति का मुस्कुराकर सामना करते हैं । जवाहर ने जब अपना जीवन देशभर के लिए न्यौछावर कर दिया । हमला भी उनके नक्शे कदम पर चलने से नहीं चुकी । भारत में यदि कभी कोई उत्कृष्ट सेनानी था वो कमला थी । नए सिरे से अपने पैरों पर खडी हुई माँ अपनी गर्व बेटी को चिट्ठी में आपसी अंतरंगता और रक्षात्मक मुद्रा में लिखती है, मैं बैरक के बाहर चब्बी टहलने के लिए निकलती हूँ तो मुझे तुम्हारा ख्याल आता है । मैं जब यहाँ हो जाऊंगी तो हम टहलने के लिए साथ साथ बाहर जाया करेंगे । हालांकि वो मौका छह महीने बाद आएगा लेकिन छह महीने बीतने का तो तुम्हें या तुझे पता भी नहीं चलेगा । पत्र में कमला का संबोधन होता था हिन्दू जी को क्या जिसमें सम्मानसूचक शब्द जी सामान्यतय अपनों से बडों के लिए प्रयोग होता है । इंदिरा ने कहा लोग मेरे दादा जी और पिता को तो जानते हैं । अगर और भी अधिक महत्वपूर्ण भाग मेरी माने अदा किया था । मेरे पिता ने जब गांधी जी का साथ देने का मन बनाया तो उन्हें समूचे परिवार का विरोध झेलना पडा था । सिर्फ मेरी माँ के साहसिक और लगातार समर्थन के बूते ही वो इतना बडा फैसला कर पाए जिसने भारत के इतिहास पर अमिट छाप छोडी । वो अपनी माँ को अपने बूते स्वतंत्रता सेनानी बनने की छवि करना चाहते थे, अपने पिता की पिछलग्गू के रूप में नहीं । मैं यहाँ सुलझी हुई स्त्रीवादी थी । ये ऐसी स्थिति थी जिससे मैं तब नहीं समझ पाई क्योंकि मुझे तो अपने मनमोहन सिंह जीवन जीने की छूट थी । इस बात से कोई फर्क ही नहीं पडता था कि मैं लडका था या फिर लडकी । मेरे पिता मेरे पिता को पतियों के तहत भरे पत्र मिलते थे । आपकी पत्नी हमारी पत्नी को भी भडका रही है । वो अपने माँ पिता को बराबरी से तो बोलती थी । मानव कमला को इतिहास में उनके अधिकृत स्थान तक उठाना उनका कर्तव्य हो । कहती थी मैं असाधारण पता और विलक्षण माँ की बेटी हूँ । छह फरवरी उन्नीस ऍन मोतीलाल नेहरू का देहांत हो गया । उनकी मृत्यु इंदिरा के जीवन में घटित पहली मौत थी । ऐसी इससे व्यसन रह गई । उन्होंने अपने सबसे बडे समर्थक को खो दिया था । मोतीलाल ऐसे चढ उधर मना कुशल पुरुष थे जिनके प्रति इंदिरा का लगा आपने परिष्कृत पिता के मुकाबले स्वाभाविक रूप से अधिक था । जवाहर लाल की हर समय नुक्ताचीनी करती, सुधर करने को आतुर आंखों के विपरीत उन्हें मोतीलाल से भरपूर बिना शर्त स्वाभाविक लाड प्यार मिला था । महात्मा के सुझाव पर मई उन्नीस सौ इकत्तीस इंदिरा को इलाहाबाद से दूर पुणे में ब्लॅक स्कूल में दाखिल करा दिया गया । सुधारवाद स्कूल को स्पोर्ट में पडे समाजवादी जाऊंगी वकील और उनकी पत्नी पूरी भाई चलाते थे । उन्होंने वहाँ से अपनी स्कूली शिक्षा मध्यम दर्जे में पूरी की । पुणे में नाखुश थी अपनी फूफी की शूल भी चुभने वाली टिप्पणी और आनंद भवन में पारिवारिक अशांति के बीच अकेली पडी अपनी माँ की स्थिति उन्हें सालती रहती थी । कमला से मानो छीनकर अलग कर दी गयी । वो प्रकृति की शरण में चली गई । स्कूल के मैदान में खडे प्राचीन रक्षियों के सारे में शांति महसूस करने लगी । जीवन भर अपने दुखों से राहत पाने के लिए पेडों और वनों की शरण में जाती रही । हरियाली का मंडप अपनी हवाओं की सरसराहट के गीतों और ढूंढते लिपटे दुलार से उन्हें सराबोर करता और अपनी खुशबूदार धन इच्छाओं में उन्हें सुरक्षित करता । उन्होंने कहा है मैं बचपन से ही वृक्षों को जीवन रक्षक आश्रय मानती रही हूँ । जवाहर लाल उन्हें लिखने वाले थे । हम में से किसी को ही और कम से कम तो मैं तो हताश होना क्या उससे भयभीत होना ही नहीं चाहिए । सब कुछ अनुकूल होने पर तो मुस्कुराना सबसे आसान है, लेकिन जब सब कुछ अनुकूल न हो तो तो मेरी प्रिया दसवीं पास करने के बाद में उन्होंने रमणीय ग्रामीण परिवेश में रविंद्रनाथ टैगोर द्वारा स्थापित विश्वविद्यालय शांति निकेतन में दाखिला लिया । इंदिरा के हाथों शान्तिनिकेतन के अधिकारियों को भेजे गए नेहरू के पत्र से पता चलता है उनकी शिक्षा की वो कितनी बारीकी से पढा करते थे । उसके माता पिता की इच्छा है ये किसी विषय में विशेष योग्यता हासिल करें जिसकी बदौलत की आर्थिक रूप से स्वावलंबी हो सके । अपने गुजारे के लिए पति पर घर भर न रहे । उसके मन में सामाजिक अथवा सार्वजनिक कार्य करने की धुंधली से अच्छा है । लेकिन किसी खास विषय में विशिष्ट ज्ञान जरूरी है । शारीरिक व्यायाम के बिना ये अमूमन सुस्त और अस्वस्थ हो जाती हैं । इंदिरा ने शांति निकेतन में अपनी शिक्षा तो पूरी नहीं की मगर टैगोर का उनके जीवन पर बुनियादी असर बडा अपने पिता और बाद में अपने पति के अलावा यदि वे किसी से बौद्धिक रूप में सबसे अधिक प्रभावित हुई, वो टैगोर थे । टैगोर की कविता, जिसमें बहुत मुक्ति और दिव्यता के लिए आत्म की छटपटाहट परिलक्षित होती थी, उनके कलात्मकता दिमाग को प्रभावित कर गई । गुरुदेव को भारतीय मूल्यों और संस्कृति की सबसे प्रखर अभिव्यक्ति मानने लगी । भारतीय होने पर गर्व, मगर सार्वभौमिक व्यक्तित्व इसका सरोकार संस्कृति के संकुचित स्वरूप से नहीं, बल्कि स्वतंत्रता और समूची मानवता के लिए समर्थक था । मेरे पिता ने भी वैसे ही विचार जताए बिना गहराई तक राष्ट्रीय हो, कोई भी अंतरराष्ट्रीय नहीं हो सकता । टैगोर के विचार और प्रयास मानव मात्र को और ऊंचाई तक ले जाने के लिए थे । शांति निकेतन में उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ । मेरे मन में जमा कटुता और डॉक्टर धुलकर साफ हो गई और वे कलात्मक और काव्यात्मक उत्कंठा की नई दुनिया से परिषद हुई हैं, जिससे उनके भीतर तब तक अपरिचित रहा साहित्य और संगीत के प्रति अनुराग पैदा हुआ । इंदिरा जब शांति निकेतन में थी तो कमला फिर से बीमार पड गई और उन्नीस सौ चौंतीस में वे कमला के रिश्ते के भाई और निजी चिकित्सा डॉक्टर मदन लाल और नेहरू के वफादार सेवा हरी के संग अपनी माँ को लेकर पहले भो वाली में टीबी अस्पताल और फिर उन्नीस सौ पैंतीस में जर्मनी स्थित बॉडी वाली वर्ग के सेनिटोरियम में तथा हम तथा स्विट्जरलैंड के लॉसान स्थित क्लाॅक सिलवाना गई । यहाँ अट्ठाईस फरवरी उन्नीस सौ छत्तीस को कमला ने दम तोड दिया । अठारह वर्ष केंद्र के मन को इससे गहरा सदमा लगा जिससे वह जिंदगी भर उबर नहीं पाए । कमला अपने जीवन के अंतिम दौर में इतनी धार्मिक हो गई थी । उन्होंने ब्रह्मचर्य की शपथ ही ले ली थी और इंदिरा के लिए वे पवित्रता की मूरत बनी रही । मेरी माँ युवा और पवित्रा थी । यौवन और पवित्रता की खूबसूरत तस्वीरें कमला के उत्तर साध्वी जैसी पवित्रता इंदिरा के लिए हमेशा नैतिकता का मानदंड और बात के जीवन में अपनाई गई धार्मिकता की प्रेरणा रही । अपने पिता को हालांकि उन्होंने कभी संत कहा था मगर उनके लिए संतत्व की पराकाष्ठा दरअसल कमला थी । इसकी बराबरी उनके पिता कभी नहीं कर पाए । मन से पस्त और सुन हो चुकी इंदिरा ने अगले पांच साल तक जवाहर लाल के सपने को पूरा करने के लिए अपनी इच्छा और दिमाग को मार लिया । कमला की मृत्यु के पहले से ही वो ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में दाखिले की परीक्षा देने की तैयारी कर रही थी । अपनी माँ की मृत्यु के चार महीने बाद उन्होंने समरविले कॉलेज में दाखिले की कठिन सात घंटे लंबी प्रवेश परीक्षा नहीं । पहले और दूसरे प्रयास में वो फेल हो गई । मगर तीसरी कोशिश कामयाब रही हैं, लाते नहीं । भाषा के ज्ञान की कमी बार बार उनके आडे आ रही थी । इस विषय से वह बेहद घबराती थी । उन्होंने ऑक्सफोर्ड में प्रवेश परीक्षा की तैयारी के लिए ब्रिस्टल के निकट बैडमिंटन स्कूल में दाखिला लिया । शिक्षा की दृष्टि से कडी मेहनत करवाने वाला लडकियों का पब्लिक स्कूल था । मशहूर उपन्यास का आॅॅफ बैडमिंटन की छात्रा थी तो वो इंदिरा को नाखुश, अकेली तथा अपने भविष्य के प्रति आशंकित छात्रा के रूप में याद करती हैं । उनका जीवन हालांकि खुशियों से एकदम खाली नहीं था । काम ना जब बॅाल क्लिनिक में भरती थी तब भी पूरी वफादारी से नेहरू परिवार को देखने जर्मनी गए । फिरोजगांधी उस समय लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में पढ रहे थे और इंदिरा फिर ओस तथा उनकी मित्र शांत । गांधी बहुदा लंदन में संगीत के कॉन्सर्ट और नाटक देखने तथा पान की तलाश में भी साथ साथ जाया करते थे । इंदिरा ने समरविले कॉलेज में उन्नीस सौ सैंतीस की क्लास में दाखिला लिया था । उन्होंने बाद में हालांकि ये दावा किया ऑक्सफोर्ड जाने का फैसला उनके पिता का नहीं बल्कि खुद उन का था । ऑक्स पोर्ट जाने का निर्णय अंततः हम मेरा ही था । मुझे नहीं लगता कि उससे मेरे पिता का कोई खास ताल्लुक था । ऑक्सफोर्ड को चुनने का कारण फिर उसका इंग्लैंड में मौजूद होना भी था । मैं उन्हें ज्यादातर मित्र ही मानती थी । परिवार और भारत की कडी के रूप में भी । ऑक्सफोर्ड तबसे थी तो सारे समय पढाई के अलावा तमाम अन्य गतिविधियों से गहराई से जुडी रही । वेज ऑक्सफोर्ड में दाखिल हुई । तब तक फिर उसके साथ रोमांटिक रूप से जुड गई थी । वर्षों बाद जब राजीव की प्रेमिका के रूप में सोनिया गांधी उनसे पहली बार मिली थी । उन्होंने सोनिया को बताया, मैं खुद करें युवा और प्यार में डूबी हुई थी । फिर उसने हालांकि उनसे अनेक बार शादी की पेशकश की । मगर उन्होंने पेरिस में जाकर हमे वाली सोमरविले में भर्ती होते समय मेरे पेरिस में रूप से मिली और उन्होंने मां मात्रे में सेक्टर कोई पैसे लेकर की सीढियों पर उनसे शादी करने का अनुरोध किया । उनके अपने शब्दों में गुनगुनी धूप में नहाया दिल जवान और उन्मुक्त था । हम खुद जवान और प्रेममग्न थे । रूस में जब पहली बार इंदिरा से शादी का अनुरोध किया, मैं सोलह साल की थी । कमला ने इंकार कर दिया । शादी के लिहाज से उनकी बेटी की उम्र बहुत कम थे । रोज के लिए इंदिरा उनके प्रिय पुरुष नेहरू की बेटी थी और वो उनके आदर्शों से भी उतने ही प्रभावित थे जितने उनकी बेटी से । विडंबना यह रही कि उनके परिवार और उसके भीतर उनका जीवन ही बाद में फिर उसकी भावनात्मक समस्याओं का कारण बनने वाले थे । फिर उसकी बुआ डॉक्टर कमी सारी । आपने ये सोचकर लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में उनकी पढाई का खर्चा उठाने की हामी भरी थी । उससे कम से कम नेहरू खानदान के प्रति उनके लगाव से छुटकारा मिल जाएगा । लेकिन ॅ इसी समय एक दूसरे के सबसे अधिक करीब थे और उनका व्यक्तित्व बढ गया था । वो एक और स्पोर्ट की ग्रेजुएट बनकर अपने पिता की उम्मीदों पर खरी उतरने की कोशिश में थी और और दूसरी और लंदन में जारी गतिविधियों में । फिर उसके साथ आंदोलनकारी की भूमिका उन्हें अधिक आकर्षित कर रही थी । फिर उसके साथ वो इंडिया लीग की सक्रिय थी । ये ब्रिटेन में भारत की आजादी के लिए आंदोलनरत परिवर्तनकारी संगठन था । इसके अगुआ प्रखंड चिंता अच्छी वीके कृष्णमेनन थे । जो वकील, प्रकाशक और लोग विद्वान थे । कृष्णा मेनन ने नेहरू को पहले ही प्रभावित किया था । जवाहर लाल के काले मरियल भद्दे मगर अत्यंत बुद्धिमान मानस मित्र है । मैंने अचानक एक बार उनसे कुछ लोगों की बैठक को संबोधित करने को कहा और उन्होंने जिस प्रकार अपनी बात कही है उस पर श्रोताओं में से कोई चिल्लाया ये तो बोलती नहीं तो अच्छी आती है । प्रधानमंत्री रहते वो इस किस्से को मुझे लेकर सुना देंगे । ये बात दीगर है । कितना वो श्रोताओं की भीड को संबोधित करने और उन्हें बांधे रखने में दक्ष हो चुकी थी । इस अवधि की उनकी ज्यादे बहुत सुविधा ही नहीं है । इस अवधि की उनकी तस्वीरों में बेहद दुबली और जब दिखाई देती हैं, उनके साथ भी उन्हें अस्वस्थ, शारीरिक और बुद्धिमत्ता के स्तर पर कतई सामान्य और फिर उसको अपने जीवन का संबल मान उन्हीं की परिक्रमा करती लडकी के रूप में याद करते हैं । उनके पिता के मित्र भी कतई उनसे कतई प्रभावित नहीं थे । उन्हें भीरु, शर्मीले, नादान लडकी बताया गया तो राजनीतिक रूप से विचारशून्य और विशुद्ध अपने पिता की बेटी थी । उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में फॅमिली अथवा ऑक्सफोर्ड की मजलिस में होने वाली बहस को भी शंकर गहरी कोशिश की, मगर बौद्धिक रूप में निखर कर उतनी विलक्षण नहीं हो पाई जितनी उनके पिता की चाहत थी । नेहरू के यूरोपीय मित्रों में शामिल थे । नोबेल पुरस्कार पाने वाले फ्रेंच लिखा था आंद्रे जी लेखक और तरह सिद्धांतकार ऍम अल रो जीवविज्ञानी और वैश्विक वादी जूलियन हक्सले और समाज सुधारक समाज शास्त्री बिट्रीज ऍम नेहरू जब उनसे मिलते और विभिन्न विषयों पर चर्चा करते थे, कुछ इंदिरा के सामने भी तो दुर्भाग्य से उन्हें खुद नहीं कुशाग्रता की कमी सालती होगी । ऑक्सफोर्ड में आपने पहले ही साल में वे दो बार कोशिश करके भी परीक्षा में पांच ना हो पाए । ये मॉडरेशन परीक्षा थी, जिसे पास करके ही ऑनर्स की पढाई शुरू की जा सकती थी । सभी अन्य विषयों में पास हो गई मगर हर बार अपने लिए डरावनी बन चुकी लाते नहीं । भाषा के पर्चे में अटक जाती थी । ईशा स्वाभाविक ही था क्योंकि उन्हें अन्य अंग्रेज विद्यार्थियों की तरह भाषा के अभ्यास का मौका ही नहीं मिला था, जो वर्षों से इसकी पढाई कर रहे थे । उनके पास आखिरी मौका बचा था । यदि वह फिर से फेल हो जाती तो उन्हें निचली फ्रांस में भेजे जाने अथवा ऑक्सफोर्ड छोड कर चले जाने के आदेश का अपमान झेलना पडता । खांसी, जुकाम और तनाव के बारे बीमार पड गई । ऑक्सफोर्ड उनके समकालीन रहे निखिल चक्रवर्ती को लगता है कि उन देना हो । उनकी बीमारी की डर पास दरअसल आसान बहाना भर होती थी ताकि वे ऑक्सफोर्ड से नीचे भेजी जाने से बच सकें । उन्होंने उन्होंने तक तय कर लिया और प्रयास नहीं करेंगे और स्पोर्ट को छोड देंगे । इसकी जानकारी हालांकि उन्होंने तब तक अपने पिता को इस्टर से नहीं दी कि कहीं भी उसके प्रति आकाश ना हो जाए । इस बीच नेहरू खुद यूरोप पहुंच गए और उनकी बैठकों और भाषणों का अटूट सिलसिला शुरू हो गया और वो भी उनके साथ उस दौरे में शामिल हुए । उनके जाने से पहले ऍम से कहा, यदि तुम अपने पिता के साथ गयी तो उनकी पिछलग्गू बनकर रहे होगी । अच्छा ये है कि तुम उनके साथ मच चाहूँ तो मैं खुद अपनी राह बनानी चाहिए । लेकिन वे तो यूरोप की राजनीतिक गहमागहमी और नेहरू के चारों और होने वाली हलचल में शामिल होने को आतुर थी । नेहरू का बहुत व्यस्त कार्यक्रम था । उसमें राजनेताओं और विद्वानों से मुलाकात, पता, सार्वजनिक सभाओं में जाना, भाषण करना शामिल था । ये कार्यक्रम कृष्णा मैंने आयोजित किए थे । पिता और बेटी साथ साथ विश्व शांति सम्मेलन में शरीक होने पेरिस जाएगा । यहाँ स्पेन के कुछ समूह आंदोलन कर रहे थे जब सम्मेलन में स्पेन के गृहयुद्ध की कम्युनिस्ट नायिका लाॅ सोनारिया की बोलने से रोका गया तो इंदिरा उत्तेजित होकर उनके समर्थन में उतर आए । अपने युवा आंदोलनकारी दिनों को याद करते हुए उन्होंने बताया, मुझे स्पेन के गृहयुद्ध नहीं गहराई तक प्रभावित किया । ब्लॅक होते हुए भेजा । बुडापेस् पहुंचे तो इंदिरा को लूट इसी नामक गंभीर बीमारी हो गई । नेहरू ने उनसे अपने साथ भारत लौट चलने का आग्रह किया जिसे उन्होंने मान लिया । नवंबर में भारत लौटाने पर वो किस साल की हुई और उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर लिया जिसके लिए वो कुछ समय से आतुर थीं । शायद वॉक चोट को भूल चुकी थी और मन ही मन उन्होंने अपनी राह चुन ली थी । वो एकांत में मन लगाकर घंटों पढाई करने के लिए नहीं बनी थी । रेडिकल अभियान में शामिल होना उन्हें अधिक खाता था । लातीनी भाषा सीखने की लडाई के बजाय विभिन्न जनमुद्दों के लिए लडना चाहती थी । उन्होंने मन ही मन ठान लिया था ऑक्सफोर्ड से कुट्टी और राजनीतिक आंदोलनों से दोस्ती लंदन में जो राजनीति से पगे दिनों और फिर उसका ही तसव्वुर करती थी । युवा परिवर्तनकारी थी जो मोहब्बत में गले तक डूबी होने के बावजूद इंग्लैंड में मौजूद भारतीय विद्यार्थियों के मन में मची हुई युवा उचित खलबली मैं सक्रियता से शामिल होना चाहते थे । जब तक पढाई लिखाई के माहौल में रही उनकी तबियत ऍम ही रहे हैं । लेकिन बाद में जब राजनीति में शामिल होने के बाद पिच चुस्तदुरूस्त और मजबूत हो गई, अपना मन माफिक माहौल मिलते ही मुरझाते फूल मेहमानो जाना आ गई हो । फिर उस तब तक लंदन ही थे और फिर लौटकर उनके साथ हो जाने को छठ बता रही थी । उन्होंने अपने पिता से बात की है कि वे वापस स्पोर्ट जाना चाहती हैं । हालांकि समय जिले में फिर से पडने की उनकी कतई मंशा नहीं थी । उन्होंने नेहरू को मना लिया कि उन्हें इंग्लैंड लौटने दिया जाए जबकि उनके स्वास्थ्य और यूरोप में छोडने जा रहे युद्ध के बारे में चिंतित थे । वे उन्नीस सौ सैंतालीस की गर्मियों में लंडन वापस पहुंच गई और फिर उसके निवास के पास ही अपने लिए भी किराये पर कमरा ले लिया । रोज भी तब तक लंदन स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स की पढाई को तिलांजलि देकर विभिन्न आंदोलनकारी समूहों में शामिल हो गए थे । लंदन । मेरे इंडिया लीग की गतिविधियों में और भी मनोयोग से जुड गई और कृष्णामेनन कि गरीबी हो गई । अब तक उनकी फिर उसके वामपंथी मित्रों मोहन कुमारमंगलम, पीएन हक्सर, निखिल चक्रवर्ती और मुल्कराज आराम से भी दोस्ती और जुडा स्थापित हो गया था । ये सभी मेनन के शिक्षक है । कुमारमंगलम आगे जाकर उनके मंत्रिमंडल में मंत्री बने और हक्सर उनके आडे वक्त के साथ ही सिद्ध हुए । साल उन्नीस सौ सैंतालीस में सितंबर महीना आते । यूरोप में युद्ध छिड गया और साथ ही इंदिरा की तरह बिगड गई । परिवार और मित्रों ने तय किया कि उन्हें लंदन से बाहर ले जाना चाहिए और उन्नीस सौ सैंतालीस के आखिरी दौर में उन्हें महात्मा की सलाह पर स्विट्जरलैंड में लाॅट ओरियन में भर्ती करा दिया गया । ऍम में लंबे समय तक रहने के बाद वे उन्नीस सौ सैंतालीस में युद्ध से पस्त यूरोप में फिर उसके सारे थे की चाहत में लंदन लौट गईं । उन्होंने नेहरू को केबल क्या कल रात पहुंच गए मगर कार्यक्रम अनिश्चित ही है । असल में उन्होंने अपना कार्यक्रम मन ही मन तय कर रखा था । अब तक रोज और उनके बीच गुप्त सगाई हुए चार साल बीत चुके थे और उन्होंने अब भारत लौटकर विवाह रचाने का फैसला किया । मार्च प्री और फिर रोज पानी के जहाज से भारत चले आए । ऑक्सफोर्ड से डिग्री पाने में नाकाम रही इंदिरा उलझन शर्मा और अपर्याप्तता के बहुत से भी हुई थी ऑक्सफोर्ड के अपने दिनों की व्याख्या उन्होंने कुछ इस प्रकार की सब लोगों की जेल में बंद होने और ऐसे ही हालात होने के कारण मेरा मन पढाई में बिलकुल भी नहीं लगता था । प्रिया श्रीमती गांधी ऑक्सफोर्ड की डिग्री हासिल करने में अपनी नाकामी पर आप लज्जित और संकोच की शिकार हो रही थी । आपने अपने पिता के पसंदीदा विषय आधुनिक इतिहास के अध्ययन को चुनाव अगर आपकी दिलचस्पी किसी भी विषय में जगह में नहीं पाई और आपकी शिक्षित दिशा भी नहीं तय कर पाएं । शांति निकेतन ही अकेला शिक्षा संस्थान था, जहाँ आप खिल गई थी, जहाँ आपका दिमाग और आत्मा भी सांस लेने लगे थे । जहाँ आप अधिक कलात्मक इच्छाओं को अपना सकती थी, जहाँ आपके चुने गए विषय स्पोर्ट की चुनौती पर पाठ्यक्रम से कुछ काम कठिन थे । ऑक्सफोर्ड में आपकी नाकामी का, आपके पिता से आपके संबंधों पर क्या असर पडा है कि आपको यह पीडादायक सच पता था । उनके सपनों पर खरी उतरने में आप नाकाम सब हुई । समरविले से नेहरू को संबोधित आपके अपेक्षाकृत प्यार भरे पत्र से साफ प्रतीत होता है । उनकी पुष्टि पाने के लिए आप कितनी बेताव रहती नहीं? प्यारे बापू मुझे डर लग रहा है कि मैं भी आप की कुछ गंदी आते अपना रही हूँ । मुझे सुबह बाहर जाना पडा । फिर दो बजे लेवर स्टडी ग्रुप की बैठक थी । सात बजे में डाल के साथ रात का खाना खा रही थी । साढे आठ बजे मुझे मस्जिद की बैठक में जाना था तो क्योंकि कृष्णा मेनन बोलने वाले थे । ऍफ पार्लियामेंट यानी संसद की उत्पत्ति पर मेरे निबंध हो । क्लास में सवेरे दस बजे पडा जाना था । मैंने उसे पौने एक बजे तक पडा और सवा तीन बजे तक लिखती रहे हैं । मुझे मेरे निबंध पर वैरी गुड यानी बहुत बढिया टिप्पणी मिलेगी । आप जब बीमार पडी हैं तो आपके पिता कुछ अनुदान हो गए । उन्होंने आपको लिखा स्वास्थ्य का सीधा ता लोग मन से है । चिंता और कुलबुलाहट को ताक पर रख दो । आप जब ऍम में थी तो उन्होंने आपको भारत लौटने के लिए पागल होने से बचने की सलाह लिखा । मुझे भारत चाहिए । तुम्हारा कर्तव्य अथवा जिम्मेदारी की भावना नहीं । तुम्हारे और मेरे लिए बोझ बन जाए । नेहरू की साफ तौर पर यह अंशाति व्याप अपने पैरों पर परवाज भरा सीखे और उस की दुनिया में अथवा उनके पंखों के नीचे शरण पाने को दौडी नहीं चली आए । आपको ऐसा महसूस हुआ कि ऑक्सफोर्ड के बाद आपके प्रति आपके पिता के मन में कुछ खटास आई हो और वो छोडने के तत्काल बाद फिर उससे शादी का आपका फैसला आपके पिता के उम्मीदों से परे आपके लिए जीवन की तलाश का प्रयास था । बाद में विद्वानों और विचारकों से विचार विमर्श करना क्या शैक्षिक उपलब्धियां हासिल करने में अपनी नाकामी की भरपाई करने की कोशिश था? आप हाजिरजवाब, संवेदनशील, अश्चर्यजनक रूप से फटाफट और हमेशा पडने वाली शख्सियत तो थी मगर ऑक्सफोर्ड के अनुभव ने आप में आजीवन आत्मविश्वास की कमी भर दें और शैक्षिक रूप में आप से अधिक योग्य लोगों के प्रति असुरक्षा का भाव जगा दिया । ऑक्सफोर्ड की पढाई बीच में ही छोड देने के कारण आपके भीतर खुद को अपने पिता की दृष्टि में योग्य सिद्ध करने की हो तो घर नहीं कर गई थी है ।

3. सत्ताकांशी स्त्री से नेहरु की उत्तराधिकारी

सत्ता आकांक्षी इस तरी से नेहरू की उत्तराधिकारी इंदिरा नेहरू ने उन्नीस सौ बयालीस में फिरोजगांधी से विभाग क्या जिनसे उन्होंने दो पुत्रों राजीव और संजय को जन्म दिया । जवाहरलाल नेहरू के में प्रधानमंत्री बनने के बाद अपने पिता के घर में उनकी आधिकाधिक मेजबान के रूप में उनके साथ आकर रहने लगी । में कांग्रेस के अध्यक्ष बने नेहरू की मृत्यु के बाद में लाल बहादुर शास्त्री की सरकार में सूचना एवं प्रसारण मंत्री के रूप में शामिल हो गए तथा उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा उजागर हो गई । फिर उसके साथ इंदिरा का प्रेम फिर उनसे विवाह उनकी माँ तथा उनके परिवार के साथ उनकी निकटता की स्वाभाविक परिणति थी । उनके बीच का इस संबंध बीमार कमला नेहरू की देखभाल के दौरान परवान चला था । दिन के अंतिम दिनों में दोनों ही बहुत ख्याल रखते थे क्योंकि वे उन्हें बेहद चाहते थे । हम देख चुके ऍम में कमला के उपचार के दौरान रोज भी वहाँ इंदिरा का साथ देने पहुंच गए थे । उनके मित्र क्षमता गांधी के मुताबिक इंदिरा और फिर उसके बीच कमला कि यादव का मजबूत बंधन था । उनके मन में नेहरू पर विजय लक्ष्मी के बढते प्रभाव के प्रति रोष था । दोनों को ऐसा था कि जवाहर लाल उनका परिवार कमला के भोलेपन वार शादी को समझने में नाकाम रहा । विवाह करने का उनका फैसला भी पिता की इच्छा के प्रति विद्रोही अभिव्यक्ति थी । रोज गांधी तेज तर्रार, प्रबल तथा मिलनसार व्यक्ति थे, जिन्हें उम्दा भोजन वहाँ आराम है । जीवन जीना पसंद था । ये आदतें परिष्कृत एवं सभ्य मिजाज वाले जवाहर लाल के विपरीत थी । वे उच्चवर्गीय परिवार के वंशज भी नहीं थे तथा उनकी बुआ डॉक्टर कमी सारी के उच्चशिक्षित होने के बावजूद फिर उसका परिवार नेहरूके पुलिन खानदानों की बराबरी नहीं कर सकता था । रूस, जो व्यवस्था के दौरान नेहरू के सच्चे अनुयायी रहे थे, जो कमला से पहली मुलाकात में ही उनके प्रति बुद्ध हो गए थे । कमला तथा फिर उसके बीच प्रेम संबंध के बारे में बातें की कुछ जुगाली भी हुई थी, जिसे फिर उसके जीवनी लेखक नहीं ये कहते हुए खारिज कर दिया नेहरू ने भी या फाइन सुनी थी, लेकिन उन्होंने इन्हें खारिज कर दिया था और फिर उसके आनंद भवन आने जाने पर कोई रोक नहीं लगाई गई । यद्यपि उनके बीच संबंधों की अफवाह चलती रही और इलाहाबाद में दो और इंगित करते पोस्टर भी दिखाई दिए । जवाहरलाल ने अपने कांग्रेस साथी और मित्र मीनू मसानी से कभी मजाक में कहा भी था हूँ क्या तुम कल्पना कर सकते हो की कोई मेरी पत्नी से प्रेम कर सकता है । इस पर मसानी ने हिम्मत करके कहा कि वे खुद ही कमला से प्रेम कर सकते थे जिसपर नेहरू ने टेढी नजर से उन्हें पूरा आसानी ने बाद में लिखा था । रोज का कमला के प्रति बच्चे जैसा प्रेम था । हालांकि कमला और फिर उस की प्रेम कहानी की संभावना मामूली सी भी नहीं थी क्योंकि अपने पति तथा परिवार के साथ उन्हें गहरा लगाव था और आनंद भवन सबके लिए हमेशा खुला रहता था । सच्चाई ये भी थी युवाओं आदर्शवादी फिरो दरअसल कमला तथा जवाहर लाल को अपना शुभचिंतक समझते थे कमला जब ब्रेडन वीलर भी मृत्युशैया पर थी तब इंदिरा को फिर उसका बहुत बडा सहारा था । अपनी माँ की मृत्यु के बाद जब इंदिरा को अकेलापन महसूस हुआ रोज उनके साथ खडे थे । इंदिरा कहती दीजिए, रोज हमेशा मेरे साथ खडे रहे इंदिरा ने जब स्पोर्ट में दाखिला लिया तो फिर उस पहले से ही लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में थे और इस दौरान इंदिरा पूरी समय फिर उसके साथ ही व्यस्त रहती थी । पढाई लिखाई में होशियार उग्र सुधारवादी इलाहाबादी कश्मीरी युवक परमेश्वर डाॅ में लंदन की वकालत की पढाई कर रहे थे, बहुत उम्दा खाना पकाते थे और अपने घरों का खाना याद करने वाले भारतीय अक्सर उन्हें उनके खास कश्मीरी व्यंजन पकाने के लिए निमंत्रित करते थे । फिर उसके घर में इंदिरा और फिर उसके लिए खाना पकाने को याद करते हैं । लाॅरी हमसे अपनी लंबी बीमारी का इलाज करवाकर इंदिरा जब वापस आई तो वह थकी हुई थी तो याद करते हैं कि फिर उसके सानिध्य में वो खुश रहती थी और ये युगल किताबों से भरे फिर उसके छोटे से घर में अपने सोने की व्यवस्था के बारे में कोई दिखावा नहीं करते थे । इससे पहले उन्नीस सौ सैंतीस में ऑॅल तक की पढाई पूरी होने से पूर्व रूस के प्रभाव में इंदिरा जब इंडिया लीग के परिवर्तनकामी सिद्धांतों से प्रभावित थी तब ही पहली बार नेहरू से उन्होंने खुलकर कटु मतभेद जताया । नेहरू ने दरअसल इंदिरा को अपने इस निर्णय के बारे में लिखा था आपने अगले इंग्लैंड दौरे में लोथियन के राइस फिलिप्स हेनरी घर के घर में रहेंगे । उन्हें ये कबूल नहीं था । डाॅन ब्रिटेन के प्रधानमंत्री लॉयड जॉर्ज का पूर्व निजी सचिव था और से हिटलर के हितरक्षक के रूप में जाना जाता था । इसलिए इंदिरा लोथियन के घर ठहरने का आमंत्रण अपने पिता द्वारा स्वीकार करने पर नाराज हो गई थी । सर्वसम्मति को तवज्जो देने वाले नेहरू ने अपने इस निर्णय का आधार ये बताया कि वो तथा मेहरू प्रतिष्ठित राजनेता के दिन की भारत में विशिष्ट पहचान थी । नेहरू का ये जवाब अपनी पुत्री के विचारों को चतुराई से खारिज करने की कोशिश थी और ये उत्तरी द्वारा पिता का डटकर विरोध किए जाने तथा उनके विचारों से मुखर असहमती जताने का पहला अवसर लिखित उदाहरण है । रिजल्ट ही उनका और भी हटीला विरोध करने वाली थी । फिर उस और इंदिरा डरबन होते हुए उन्नीस सौ बार इसमें भारत वापस आ गए । रंगभेद से जूझ रहे दक्षिण अफ्रीका में इंदिरा ने नस्ली भेदभाव को नजदीक से देखा । वहाँ के भारतीय समुदाय ने उन्हें अपने समारोह में आने को निमंत्रित किया तो उन्होंने श्रोताओं को झकझोरते हुए आपने पहले जोशीले भाषण में ताज्जुब जताया जितनी निरीहता से भारतीयों ने रंगभेद गोरों की सत्ता के आगे घुटने टेक रखे थे । अपनी शादी के निर्णय पर अटल इंदिरा भारत पहुंची है । इस मामले में जवाहर लाल का डटकर विरोध करने के लिए भी वो उद्वेलित अधीर थी । यहां पहुंचते ही वे महात्मा गांधी से मिलने गयी । गांधी आश्रम में उन्हें सिल्क की साडी पहने और लिपस्टिक लगाए देखकर उनसे चेहरा धो लेने और खादी पहनने को कहा गया । सुनते ही इंदिरा का आश्रम से मोहभंग हो गया । सेवाग्राम के वातावरण में छोटी छोटी बातों पर झगडे होते थे । जैसे आज गांधी जी का भोजन कौन अंदर लेकर जाएगा, उनके कागजात कौन ली जाएगा? प्रवर्ति से दिक्कत आई गांधीवादी नहीं थी । यद्यपि इस बात की प्रशंसक थे महात्मा बहस और विरोध से कितने आनंद होते थे । उनके साथ मैंने वाद विवाद काम नहीं किया । वो ईमानदारी से दी गई राय को कभी छोटा नहीं समझते थे और ऐसे लोगों से हमेशा बात करते थे तो उनसे असहमत होते थे । वे भी उनसे असहमत लोगों में शुमार थी । कुछ बातों को गांधीवाद का नंबर कहकर उनकी आलोचना करती थी । यद्यपि बाद के जीवन में उन्हें ये स्वीकार करना पडा । जिन बातों को वह बौद्धिकता हुआ, आज की उलट समझती थी, वहीं उनका जबरदस्त संबंध था । उन्हें जनसाधारण को साथ लेकर चलना होता था । हर बात को इतनी सरल भाषा में प्रस्तुत करना होता था, उसे वे समझ सके । फिर भी गांधी के विचार उनकी समझ के लिहाज से काल्पनिक थे । उन्हें लगता था महात्मा के मन में नए राष्ट्र का कोई खाता ही नहीं था । उस खाके का सर्वाधिकार पूर्ण कहा उनके पापु का था । हालांकि तब तो बापू के साथ घमासान बाकी था । इस युवा इंग्लैंड पलट क्रांतिकारी का गांधी के आश्रम से मोहभंग हो चुका था । वहीं इस से भी गहरा अंतर इंदिरा और उनके पिता के बीच में फिर उसको लेकर मौजूद था । मैं इस संबंध के कट्टर विरोधी थे । ऐसा दोनों की अलग अलग जाति या संप्रदाय होने के कारण नहीं, बल्कि इसलिए था कि फिर उसकी सामाजिक पृष्ठभूमि दरअसल इंदिरा के सामान नहीं थी । नेहरू की बहन हूँ विजय लक्ष्मी पंडित तथा कृष्णा हठीसिंह ने भी कश्मीरी पंडित, जाति व संप्रदाय से बाहर विवाह किया था, लेकिन उन के पति रणदीप पंडित वगैरह । तब राजा ऍम बहुत शिक्षित तथा विद्वान लोग थे । दोनों वकील थे, नामी परिवारों से थे । परस्पर जुडे कुलीन भारतीय समाज से थे । उत्कृष्ट वाला उत्तम लोगों का समुदाय । इसका नेहरू बहुत ध्यान रखते थे । रोज दुनिया में शामिल नहीं थे और इंदिरा के समान उनके पास विश्वविद्यालय की कोई डिग्री भी नहीं थी । जवाहरलाल के लिए खानदानी इज्जत बहुमूल्य थी । उन्होंने आशंका हुई उनके अनुसार जो महान विरासत थी, उससे इंदिरा भूख फेर रही थी । उन्होंने विस्तृत होकर इंदिरा को लिखा, खराब स्वास्थ्य के बावजूद तुम्हारा यूरोप से वापस आना तथा अचानक शादी करना बेहद न समझे की बात है । इंदिरा की जीवनीकार कैटरीना फ्रेंड को लगता है कि नेहरू की नाराजगी की वजह कुछ और भी थी । उनके अनुसार कमला ने पारिवारिक मित्र एसी ऍफआईआर के सामने ही नेहरू से कहा था इंदिरा को फिर उससे शादी नहीं करनी चाहिए क्योंकि सरोज और स्थिरचित्त है तथा ये इंदिरा के जीवन की भारी भूल होगी । भुआ होने के नाते एक ना मुनासिब से बात करते हुए विजय लक्ष्मी ने सुझाव दे दिया कि विभाग करने के बजाय इंदिरा को फिर उसके साथ प्रेम सम्बन्ध चला लेना चाहिए । इस अपमानजनक टिप्पणी राहत इंदिरा पारिवारिक दबाव के बर्तन मैदान में कट गई । हालत बिगडते देख महात्मा गांधी को हस्तक्षेप करना पडा और उन्होंने रिश्ते को कबूल कर लिया । उनका कहना था की युगल की व्यक्तिगत निर्णय का सम्मान किया जाना चाहिए । गांधी ने फिर ओवर इंदिरा के विवाह के बारे में लिखा, रोज नहीं । कमला नेहरू की बीमारी में उनकी सेवा की उनके लिए पुत्र के समान था । यूरोप में इंदिरा की बीमारी के दौरान भी उसने उसकी बहुत मदद की । उन दोनों के बीच स्वाभाविक निकटता हो गयी थी । धीरे धीरे परस्पर आकर्षण में सब्बीर हो गए । विभाग के लिए स्वीकृति न देना, निर्दयता होती समय बदलने के साथ इस प्रकार के गठजोडों का समाज के हित में बढना और हम भारी है । गांधी जी का आशीर्वाद प्राप्त कर युवा दंपत्ति पसंद थे । जब भी उन्होंने इसके बाद महात्मा द्वारा दिए गए व्यवहारिक ब्रह्मचर्य के सुझाव का मजबूती से विरोध किया । नेहरू भी अब विरोध नहीं कर पाए और पिता पुत्री के बीच इच्छा शक्ति के इस गंभीर मुकाबले में चीज बेटी की हुई । यदि इंदिरा का व्यक्ति तो अपने पिता की शागिर और माँ की संरक्षक के दो भागों में विभाजित था तो कमला का पक्ष पति के चुनाव में जवाहरलाल के पक्ष पर भारी पढाते । कमला के प्रति लगभग इंदिरा के समान ही समर्पित । फिर उससे व्यवहार करना केवल अपनी माँ के प्रति समर्पण का प्रदर्शन ही नहीं था बल्कि पिता के लिए ये इशारा भी था । ये सोच, विचार और व्यवहार की दृष्टि से भी स्वायत्त हो चुके हैं । उन्होंने कहा पापु सिद्धांतों को समझाते थे, लेकिन संबंधों को समझने में उन्हें बहुत समय लगा । बात के जीवन में इंदिरा ने अपने पत्रों में या फिर बोल कर भी अपने पिता का जिक्र, प्रशंसा तथा लगाव से क्या तो वे कभी भावनाओं में नहीं नहीं मान उनके लिए उनके मनोभाव पर पीडा तथा असुरक्षा का पर्दा बडा हो । इन्दिरा व नेहरू के मध्य बहुत आदमी है उस नहीं जन्नत संबंध था तो उनमें कर जोशी का अभाव था । फिर भले ही वो उनके लिए समर्पित थी और हमेशा उनके आदेश के पालन को तैयार रहती थी । रोज वो इंदिरा नेहरू का व्यवहार छत्तीस मार्च उन्नीस सौ बयालीस को रामनवमी के दिन हुआ था । इसी वर्ष गांधी ने अंग्रेजों के विरुद्ध भारत छोडो का नारा दिया था । उन्होंने अपने पिता द्वारा जेल में काटे गये सूत से बोली साडी पहनी और तू लेने कांग्रेसकार्यकर्ता कि सफेद खादी की वर्दी धारण की । विभाग के रस्में खुले आसमान के नीचे आनंद उनके पिछले बरामदे में संपन्न हुई । छरहरी और कोमल इंदिरा अपने तीखे नए नक्ष वाले दमकते और तरोताजा चेहरे के साथ कुछ उदास मगर बहुत सुन्दर लग रही थी । फिर उससे शादी करके मैं सदियों पुरानी परंपराओं को तोड रही थी और इससे तूफान खडा हो गया था तो निसंदेह मेरे ही परिवार के कई लोग बहुत खडे हुए थे । पुरुष प्रधान असहमती के विरुद्ध तनकर खडे रहने की प्रवर्ति उनके जीवन में बार बार दिखाई दी । बाहर से नर्म देखने वाले तत्व को जो चलाते हुए उन्होंने ऐसी दृढता दिखाई जो देखने में तो अचानक उनके वास्तविक चरित्र का उजागर होना प्रतीत हुआ मगर इसे सोच समझकर विनम्रता के मुखौटों के पीछे छुपा हुआ था । आपने विद्रोह के बारे में कुछ गर्व के साथ उनका कहना था, पूरा तेजेश मेरी शादी के खिलाफ था । अपने पिता के विरुद्ध उन्होंने खुद का तो मित्रता संघर्ष छोडा था और अपनी जीत से वह बेहद कुश्ती बावजूद इसके इंग्लैंड से वापसी की । रोमानियत को जल्द ही उदासी निकलने वाली थी श्रीमती गांधी फिर उसे आपका विवाह सफल नहीं था और उसने खुशियों को ग्रहण लगाकर आप दोनों को एकाकीपन की खाई में धकेल लिया । अपने त्यौहार के तेरह साल बाद उन्नीस सौ पचपन में आपने डॉरोथी नॉर्मल को लिखा । मैं अपने घरेलू जीवन में अत्यधिक दुखी हूँ और रही हूँ । अपीडा तथा नाखुशी बेमानी हो चुकी है । मुझे हालांकि दुख है कि मुझे किसी अन्य मनुष्य के साथ सामान्य वहाँ परिपूर्ण संबंध बन पाने संबंधी जीवन की सबसे खूबसूरत नियामक हासिल नहीं हो पाई क्योंकि मुझे लगता है कि केवल इसी प्रकार किसी का व्यक्तित्व पूरा विकसित फल फूल सकता है । आपके फिर उसके बीच क्या अनिश्चित हुआ? क्या उनको इस बात से तकलीफ होने लगी थी । क्या प्रधानमंत्री की बेटी थी जिसे उदाहरण के लिए सरकारी दावतों में आप अपने पिता की बगल में बैठती थी जबकि दामाद होने तो बाद में संसद सदस्य होने के कारण उन्हें हमेशा पीछे की पंक्तियों में कमतर लोगों के साथ बैठना पडता था । नेहरू ने आपसे प्रधानमंत्री निवास में रहने के लिए कहा तो आपने हामी भर दी और लखनऊ के उस घर को जैसे आपने अपने पति के साथ बताया था । लगभग छोड दिया । आप हमेशा ही फिर उसकी पत्नी होने से पहले नेहरू की बेटी थी । लखनऊ की गृहणी बनकर खुश नहीं थी क्योंकि आपको तीन मूर्ति भवन में अधिक हव्यवाट् रोमांचक जीवन बुला रहा था । ऐसा जीवन आपको लगता था कि आपकी तकदीर था लखनऊ में फिर उसके साथ आपके लिए पत्नी और मां के रूप में नीरज जीवन था । लेकिन आपको हमेशा से लगता था कि आप अधिक बडे काम करने के लिए बनी थी और आपको देश के फलक पर अपनी जगह बनानी थी । यह पूछे जाने पर कि आप अपने पिता के पास वापस आ गई आप कहाँ करती थी? मेरे लिए ऐसा करना स्वाभाविक था क्योंकि मेरे पति के मुकाबले मेरे पिता अधिक महत्वपूर्ण काम कर रहे थे । आपने अपने पिता के घर में वापस आने को लेकर किसी मित्र से ये कहते हुए देश भक्ति के कार्य जैसा मोड दे दिया था । ये मुल्क के लिए जरूरी था उनकी कोई देखभाल करें और ये काम करने के लिए मेरे अलावा कोई नहीं था । आपने फिर उससे विवाह करने के लिए अपने पिता का मुकाबला किया । लेकिन नेहरू और फिर उसके बीच किसी एक को चुनने के मौके पर आखिरकार आपने नेहरू को तरजीह दी और उसके परिणाम की भी परवाह नहीं की या आपके जीवन का सबसे कठिन व्यक्तिगत फैसला था । ऐसा फैसला जिसका पति व पुत्रों के साथ आपके संबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव पडने वाला था । अपनी शादी के छह माह के बाद भारत छोडो आंदोलन में पूरे जोश के साथ भाग लेने के कारण फिर उस और इंदिरा जेल चले गए । इंदिरा को नैनी जेल तथा फिर उसको फैजाबाद जेल में भेजा गया । इंदिरा को लगभग एक साल के बाद छोड दिया गया परन्तु जेल जाना यात्रा में महत्वपूर्ण पढा था । अपने पिता और बहुत से रिश्तेदारों को बार बार जेल जाते हुए देखकर उनको विश्वास हो चला था । ये उनकी पारिवारिक जीवन पद्धति का ही संस्कार था । जेल मेरे लिए खास अनुभव था । वो कहती थी मेरी माँ और पिता दोनों की तरफ से दर्जनों रिश्तेदारों ने जेल में लंबे समय गुजारे थे । मुझे और किसी भी दूसरे परिवार की कोई जानकारी नहीं है जो आजादी की लडाई और उसकी तकलीफों से इतना जुडा रहा हो । जानवरों की तरह झंडों में आत्म सम्मान से वंचित जब मैं बीमार हुई तो मुझे ओवल टीम पीने के लिए कहा गया । फिर अधीक्षक में पडता फाड दिया और मुझसे कहा अगर तुम्हें लगता है कि तुम्हें ये सब मिलने वाला है तो तुम भुलावे में हो । जेल में वो महीने मेरे जीवन का महत्वपूर्ण थे । जब उन्हें और फिर उसको जेल से रिहा कर दिया गया तो दोनों आनंद भवन में रहने लगे । वो घर जिस पर दोनों को अपने साझा इतिहास की धुरी होने का गर्व था, फिर उस बागीचे की देखभाल में लग गए और इंदिरा इस भव्य पुराने घर की दीवारों पर रंग कर रहे हैं और उसके कमरों को खोया गौरव लौटाने के काम में जुट गई । इंदिरा जल्द ही गर्भवती हुई और बीस अगस्त उन्नीस सौ चौमाल इसको मुंबई में उनकी पहली संतान राजीव रतन फिर जिस नेहरू गांधी का जन्म हुआ, उनका ये नाम इसलिए चुना गया समझ रहे जितना वो फिरोज गांधी का बेटा था उतना ही नेहरू का नाती भी था । बापू ने जेल से उसे लिखा नेहरू को अतिरिक्त नाम की तरह जोड दिया जाए तो कैसा रहेगा? नेहरू गांधी नहीं वो मूर्खतापूर्ण लगता है बल्कि नेहरू अतिरिक्त नाम के रूप में बच्चे के जन्म के बाद पैसे के लिए इंदिरा की चिंता बढने लगी क्योंकि उस समय कांग्रेस की कानूनी सहायता समिति ने काम कर रहे विरोध की कमाई काफी नहीं थी और तीन लोगों के परिवार को धन के लिए इंदिरा के पिता पर निर्भर होना पडा । नेहरू ने लिखा पैसों के मामले में चिंता करना तो भरी बोलता है । काम बिना हित के चाय मेरे खाते से पैसे निकाल सकती हूँ । चाहे जब उसको जरूरत हो तो केन्द्र के लिए शर्मनाक स्थिति थी और कुछ समय के लिए चिंता से बचने के लिए वे नवजात राजीव के साथ कश्मीर की चीड की महक वाली सजाओं में छुट्टियाँ बिताने चली गई जहां वे फिर उसके बढते हुए चिडचिडेपन से दूर अपने रिश्तेदारों के सुविधा संपन्न बंगलो में रही । वे कश्मीर आकर हमेशा बेहद खुश होती थी । आपने कश्मीरी चलों पर उन्हें लास्ट था और उन्होंने आजीवन कश्मीर आना जाना जारी रखा । उनका जन्म बेशक इलाहाबाद में हुआ था लेकिन मैं अपने आपको पहाडों की बेटी कहती थी और हमेशा अपने परिवार को हम कश्मीरी बुलाती थी । भगत याद करती हैं । वो कहती थी हम ऐसे नहीं पकाते हैं या फिर हम कुछ मसाले नहीं डालते । इस हमसे तात्पर्य कश्मीरी होने से था । कश्मीर के पहाडों, उनके पेडों की तस्वीरें, पूरे जीवन उनके बैडरूम में टंगी रही । कश्मीर उनका पुरखों का घर था । जीवन का सहारा था, सपनों की जन्मभूमि थी । भारत का सिरमौर था । उत्कृष्ट, शानदार, बुलंद और हिमालयी मैदान के भीड भरे सबते हुए राज्यों के मुकाबले हर लिहाज से ऊंचा कश्मीर में चिनार के वक्ष सम्बल का माध्यम और अपरिवर्तनीय भारत के प्रतीक बन जाएंगे । उनके कश्मीर प्रवास के दौरान समाचार मिला । नेहरू को अंग्रेजों के जेल से उनके सबसे लंबे और थकाऊ दौरे के बाद आजाद कर दिया गया है । इंदिरा को ये लगा कि उन्हें फौरन अपने पिता के साथ होना चाहिए । इस समय में मैं और कुछ नहीं केवल पत्नी और माफी । जिस क्षण मैंने सुना कि मेरे पिता रहा हो गए, उसी पल में अपने बच्चे को भूल गयी के परिवार ने ये कहा कि मेरे जाने से क्या होगा । मैंने कहा नहीं मालूम लेकिन मुझे बचाना है । महिलाबाद वापस आ गई मुझे सिर्फ जाना है । यही इशारा बाद में उन्होंने अपने पति को भी क्या नेहरू ने उन्हें प्रधानमंत्री निवास कि मेजबान और गृहस्वामिनी के रूप में आने के लिए कहा । यद्यपि वे स्वयं कबूल कर चुकी थी कि वह पत्नी और मां थी । उनके लिए सबसे जरूरी था अपने पिता के साथ होना । पति और बच्चों का नंबर उनके बाद आता था । जवाहरलाल नेहरू अपनी अंतिम जेलयात्रा से जून उन्नीस सौ पैंतालीस को बाहर आए नेहरू जेल से निकलकर महापुरुष के रूप में छा गए । उनका उद्दाम सहारा विशाल जनसमूह के प्यार और विश्वास का प्रतीक बन गया । छप्पन वर्षीय पंडित जी समुद्री तूफान को पार करके आए थे । आजादी के कष्टदायक संघर्ष के दौरान गांधी के साथ खडे नेहरू पटेल जख्मी हुए और उन्हें विश्वास खाद भी झेलना पडा । लेकिन उनके बावजूद भारत के भविष्य के अपने आदर्शों को धूमिल नहीं होने दिया । आजादी के ठीक पहले जेल में भी थे । कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण वर्षों में उन्हें मुस्लिम लीग के कुछ करो तथा भारत के बंटवारे की भावी योजना की जानकारी नहीं थी । रूप से चौधरी आई आंखों के साथ जेल से बाहर आए । फिर भी ये शानदार वापसी थी । हम लाए हैं तूफान से कश्ती निकाल के उन्नीस सौ पचास के दशक का एक मशहूर हिंदी गाना था जो आजाद भारत के संस्थापकों के लंबे संघर्ष का सटीक वर्णन करता था । फूफा के बीस घुसकर जाने और उसकी हर हर आती गहराइयों में से स्वतंत्र भारत की छोटी सी कश्ती को खींच करने का लाने की एक का था अंग्रेजों के गुलाम । भारत में उन्नीस सौ सैंतालीस में एक सौ दो सीटों के लिए हुए आखिरी आम चुनाव में कांग्रेस उनसठ सीटों के साथ एक मात्र सबसे बडे दल के रूप में चुनकर आएँ, लेकिन जिन्ना की मुस्लिम लीग ने मुस्लिम निर्वाचन क्षेत्रों में एकतरफा जीत हासिल कर लें । नेहरू के नेतृत्व में जब अंतरिम सरकार को शपथ दिलाई गई, इंदिरा नहीं त्यारी पापु को लिखा मैं दिल्ली में आपकी और से आप से ज्यादा उस महान संगठन की इसके आप प्रतिनिधि हैं तो जीत को अपने आंखों से देखने के लिए बेहद तरस रही हूँ । इंदिरा के आरंभ में दोबारा गर्भवती हुई । इस समय तक फिर उसको लखनऊ में नेहरू द्वारा स्थापित अखबार नेशनल हेरॉल्ड के निदेशक पद पर नौकरी मिल गई थी और उन्होंने हजरतगंज इलाके में किराए पर बंगला ले लिया था । रोज कुशल भागवा और बडे थे और इंदिरा की गृह संचार योग्यता के साथ मिलकर उन्होंने छोटा सा पारिवारिक घरौंदा बना डाला । लेकिन वो खुश नहीं थी और उन्होंने अपने पिता को लिखा हमारे सुनवाई शहरों में एक अजीब सी मुर्दनी छाई है । भ्रष्टाचार और ढिलाई माहौल को दुखद बना रहे हैं । कुछ लोगों की आत्मसंतुष्टि, कुछ का कपट । जीवन में यहाँ जरा सी भी रवानी नहीं है या विश्वसनीय नहीं है कि फासीवाद के आडम्बरपूर्ण, जालने दासियों लाखों लोगों को आकर्षित कर लिया है । राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ आरएसएस जर्मनी की तर्ज पर तेजी से मजबूत होता जा रहा है । अधिकतर कांग्रेसियों और सरकारी नौकरों का भी इन प्रवृत्तियों को समर्थन हासिल है । हिंदू दक्षिणपंथ उनका जीवन भर दुश्मन रहा । हालांकि बाद में अनेक अवसरों पर इंदिरा ने उन्हें बहुत उनकी ही चालू में मात देने की कोशिश की । खुशहाल पारिवारिक जीवन शायद उनके भाग्य में नहीं था । उन का संबंध बेवफाई क्षेत्र रहा । ऍम फिरो जिन्हें डोरोथी नार्मन सरासर ना पसंद करती थी और जिन्हें उन्होंने मुझे बताया था एक बेवफा पति थे । इंदिरा अपने पति की आवारा नजरों को हमेशा लडती रहती थी । रूस के दोस्त निखिल चक्रवर्ती को लगता था रोज और तू के मामले में कमजोर था । वो जब इंदिरा से हर एक हफ्ते मिलने चाहता था तब भी उसकी इंग्लैंड में एक और प्रेमिका थी । उसके अनेक प्रेम संबंध थे और वह संबंधों को नकार नहीं पाता था और ये सब इंदिरा जानती थी । हेराल् जल्द ही वित्तीय संकट में फंस गया और फिर उस पर अखबार के पैसे के दुरुपयोग का आरोप लगा । इससे इंदिरा बहुत नाराज हुई । करेले पर नीम चडने की कहावत तब और चढता हुई जब वो लखनऊ के एक राजनेता अली जहीर की बेहद खूबसूरत बीवी के इश्क में पड गए । जबकि इंदिरा के गर्व में संजय पड रहा था । कहा तो यह भी जाता है कि वो इंदिरा की नजदीकी रिश्ते की छोटी बहन चंद्रलेखा पंडित पर भी विदा थे । बॉटल फॅर उसके किसी मित्र के हवाले से रखा है । स्वभाव से रोमानी फिर रोज कामदेव बालों का जल्दी और आसानी से शिकार हो जाता था । अली जहीर की पत्नी के साथ प्रेम संबंध ने इतना तूल पकडा । नेहरू को अपने मित्र की रफी अहमद किदवई को मामले को संभालने और फिर उसको ये समझाने के लिए लखनऊ भेजना पडा कि वो इस प्रेम सम्बन्ध से तौबा कर ले । दिल्ली में यॉर्क रोड स्थित नेहरू के घर पर गहरी प्रसव पीडा के बाद नेहरू परिवार नहीं चौदह दिसम्बर उन्नीस सौ छियालीस को और एक बेटे संजय का जन्म हुआ । प्रस्तुति में इंदिरा का अत्यधिक खून रह गया और वो बस मौत के मुंह से वापस आएँ । इंदिरा ने याद करते हुए बताया हम बेटी की आशा कर रहे थे । सच्ची है कि हमने सिर्फ लडकियों के नाम ही सोचे हुए थे । बस बच्चे का नाम महाभारत के चरित्र के नाम पर संजय रखा गया जिसने कुरुक्षेत्र के युद्ध के दृश्यों का प्रस्तान नेत्रहीन राजा धृतराष्ट्र को सुनाया था । नाम का चयन विचित्र रूप में उपयुक्त अपने समय में संजय ने अपनी माँ को दृष्टिहीन माँ जैसा बना दिया था जिसे धृतराष्ट्र प्रवर्ति का शिकार भी कहाँ जा सकता है अथवा कहा जाए । ऐसी माँ जो अपनी संतान की गलतियों पर भी ममता में अंधी हो चुकी थी । संजय के जन्म के समय नेहरू के घर में मेहमानों की भीड लग गई थी और फिर उसको दिल्ली की ठिठुरती सर्दी में बागीचे में गडे । तंबू में सोना पडा उपेक्षित से दामाद के लिए जो अपने ही पुत्र के जन्म की प्रतीक्षा में था । घर के बाहर तंबू में रहना लज्जाजनक स्मृति थी । उनके बेटे जब बडे हुए तो वही अपने नाना द्वारा रोज की अनदेखी का विरोध करने लगे और उन्हें लगने लगा कि इंदिरा उनके पिता की उपेक्षा करती है, लेकिन बालकों ने अपने नाना को गलत समझा था । नेहरू पर हालांकि आरोप लगे कि अपनी बेटी को अपने घर में रहने के लिए कहकर उन्होंने उसकी शादी के टूटने में योगदान किया, मगर दिल से चाहते थे केंद्र और फिर रोज खुश रहे हैं । उन्होंने विजय लक्ष्मी पंडित को लिखा, मेरी ये दिले अच्छा हिन्दू की गृहस्ती बस जाए तो रोज हैराल्ड में ही काम करते रहे और हिंदू साल में अधिकतर समय वहीं बिताए । नेहरू मध्यरात्रि से एक मिनट पहले दिल्ली में चौदह अगस्त उन्नीस सौ सैंतालीस को संविधान समिति में दुनिया को भारत के नियति सम्मेलन के बारे में बताने के लिए जब खडे हुए तो दर्शक दीर्घा में उन्हें ध्यान से सुन रही इंदिरा पिछले दूसरी ही दुनिया में पहुंच गई । ये मेरे जीवन के सबसे अधिक चौरानवे बार रोमांचक झंड थे । वो परिणति जिसके लिए बहुत सारे लोगों ने संघर्ष दिया था । पंद्रह अगस्त उन्नीस सौ सैंतालीस हो अब भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड बहुत बैटर ने नेहरू को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई । उसके बाद माउंटबेटन दंपत्ति द्वारा दी गई शानदार दावत में इंदिरा अपने पिता के साथ बैठी थी और फिर उसको माउंटबैटन के प्रेस हताश के साथ दूर की मेज पर बैठना पडा । माउंटबेटन दंपत्ति ने फिर उसको कोई भाव नहीं दिया की साफ हो गया कि वे दो दिशाओं में खिंच रही थी और दांपत्य जीवन में कलेश था । इंदिरा प्रारब्ध की और पिछले को लालायित थी । उनकी महत्वाकांक्षा और आत्मा नई पहल की और कुलांचे भर रही थी । उनका चुका जैसे जैसे अपने पिता की और हो रहा था, विरोध चर्चा हाथ में दूर छिटक रहे थे । अपना समय पे लखनऊ में व्यतीत कर रहे थे । रोजाना सुबह लखनऊ के कॉफी हाउस जाते और अपने दोस्तों से राजनीतिक चर्चा करते हैं । जबकि इंदिरा दिल्ली वाली मन स्थिति में थी । उमंगे करने वाली मध्यरात्रि के बाद उस जाग्रत अवस्था में थी । उनका अदम्य साहस इन्होंने मार रहा था । स्वतंत्रता तो आई मगर उसकी खुशी पर बटवारे के दौरान एशियाना सांप्रदायिक दंगों का ग्रहण लग गया जिससे कम से कम दस लाख लोगों को लिया । बंटवारे में लगभग एक करोड सत्तर लाख लोग अपने घरों से विस्थापित हो गए । भारतीय साम्राज्य से अंग्रेजों की वापसी अपने पीछे जनसंहार का साया छोड गई थी । भारत या पाकिस्तान की और समुदायों के पलायन के संघर्ष में सिख एवं हिंदू और मुसलमान एक दूसरे को बेरहमी से मार रहे थे । खचाखच भरी ट्रेनों की सारी सवालिया मार दी जाती है । रेलवे स्टेशन खून से लाल थे । बंटवारे के बाद भयाक्रांत नेहरू ने लिखा, लोगों ने जैसी भीषण पाशविकता और परपीडक टूटता दिखाई उसकी मैं कल्पना भी नहीं कर सकता हूँ । दहशत की भी कोई सीमा नहीं होती होगी । अगर उत्तर भारत में इंदिरा हो वो भी बार की जा चुकी है । बच्चों को सडकों पर जानवरों की तरह जगह किया जा रहा है । ये तो मेरी बर्दाश्त से बाहर है । उन्होंने बाद में कहा मेरे जीते जी भारत हिन्दू राष्ट्र नहीं बन पाएगा । धर्म आधारित राष्ट्र का विचार मात्र ही न केवल मध्ययुगीन है, अब तो मूर्खतापूर्ण भी है । हम महात्मा गांधी द्वारा दिखाए गए रास्ते का या तो पालन कर सकते ही या इसका विरोध कर सकते हैं । तीसरा कोई भी मार्ग उपलब्ध नहीं है । भारत की विदेशों में बदनामी हो रही है । भारत की धर्मनिरपेक्षता को सुरक्षित रखने के नेहरू के निश्चय ही उनके गृह राज्य कश्मीर को लडखडाते हुए राष्ट्र पाकिस्तान के चंगुल में जाने से बचाया । अक्टूबर उम्मीद सौ सैंतालीस में पाकिस्तान के उत्तर पश्चिमी सीमांत प्रांत के पख्तून कबाइलियों को पाकिस्तान की तरफ से सीमा पार करा के कश्मीर में गुपचुप रातोरात फसाया गया । वो कश्मीर पर जबरदस्ती कब्जा करने के लिए लोग हत्या, बलात्कार करते हुए आगे बडने लगे । कश्मीर के महाराजा हरि सिंह अपनी जान बचाकर जम्मू पहुंचे और जहाँ उन्होंने ते मुझे मन पर दस्तखत करके जम्मू कश्मीर को भारत में शामिल कर दिया । भारतीय सेना की टुकडियां सत्ताईस अक्टूबर को सुबह श्रीनगर पहुंची थी और उन्होंने राजधानी की मोर्चाबंदी कर ली थी । सोच ये है कि आज कश्मीर को भी भारतीय धर्मनिरपेक्ष अंक का अभिन्न हिस्सा बनाने के नेहरू के सपने की धज्जियां उड रही हैं । उसके बजाय जिन्ना का तो राष्ट्र का सिद्धांत हावी होता दिखाई दे रहा है । घाटी में अंतहीन खूनी विरोध जारी है और हिंदू जम्मू तथा मुस्लिम कश्मीर के बीच विभाजन की कडवी हकीकत साफ दिख रही है जिससे नेहरू ने बचने का भरसक प्रयत्न किया था । बंटवारे के खून खराबे के दौरान इंदिरा ट्रेन से मसूरी से दिल्ली वापस आ रही थी । तभी उन्होंने देखा कि शादी स्टेशन पर दो व्रत मुसलमानों पर लोगों का पूरा हुजूम हमला कर रहा था । केवल तौलिया लपेटे तुरंत ट्रेन से कूद पडे हैं और उन्होंने भीड के बीच में से एक बूढे व्यक्ति को बचा लिया । संघर्ष की स्थिति में उनकी तात्कालिक प्रतिक्रिया यही होती थी कि वे सकुचाने के बजाय हमेशा भीतर घुसकर हालात को नियंत्रित कर लेती थी । वे तनावपूर्ण स्थिति में कभी भी हिम्मत नहीं हारती थी । मानो बचपन से ही उन्हें हर एक विपदा का निपुणता से सामना करना सिखाया गया हो । दंगों के दौरान किसी दूसरी घटना में उन्होंने भीड को गुस्से से घूम कर देगा और कहा, मैं इस आदमी का जीवन बचा रही हूँ । हम लोग मुझे मारने के बाद ही इसे मार सकते हो । महात्मा उनकी हिम्मत से प्रभावित थे । उन्होंने दिल्ली में उनसे शरणार्थी शिविरों में काम करने के लिए कहा । राहत और सेवा में मर स्कूल हो गई जिसके लिए उनकी तारीफ हुई और संकटकाल लें । हमेशा की तरह उनकी सर्वोत्तम क्षमताओं को काम पर लगा दिया । आगे चलकर उन्होंने बताया कि शरणार्थी शिविरों में ही आरएसएस के साथ मेरा संघर्ष शुरू हुआ । कुछ भोलेभाले देखने वाले लोग आसपास घूम रहे थे । उनके पास गुप्ती थी । इसमें छडी के अंदर तलवार होती थी । उससे वो किसी के भी सर पर मारते तो वो तो टुकडे हो जाता है । आपकी संघर्ष उनके समूचे राजनीतिक जीवन में बरकरार रहा हूँ । उन्नीस सौ सत्तर के दशक में आरएसएस को जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चले इंदिरा विरोधी आंदोलन के जरिए मुख्यधारा में आने का मौका मिल गया । इंदिरा ने उसका बदला । इमरजेंसी के दौरान उस पर प्रतिबंध लगाकर निकाला । धार्मिक घृणा रहे । उन्नीस सौ अडतालीस में जनवरी की एक सर्द शाम हो प्रेम के दूध का जीवन हर लिया । नई दिल्ली स्थित बिडला हाउस में जनवरी की शाम को जब महात्मा प्रार्थनास्थल की और जा रहे थे, तभी नाथूराम गोडसे ने तीन खातक गोलियाँ गांधी जी की देह में चौक नहीं । इस नफरत के खिलाफ महात्मा ने आजीवन संघर्ष किया । उन पर भी भारी पडा । घटना से इंदिरा हिल गयी । जन्म से अब तक गांधी का सारा उनके जीवन में चट्टान की तरह बना रहा । उन्होंने जैसी खबर सुनी बिरला हाउस की तरफ लपकी । बाद में दोनों हाथों में फूल भर उन्होंने पार्थिव शरीर पर चलाने के लिए ले गई । बिरला हाउस तब आपकी हुई निस्तब्धता थी । हवा में बाबू की हत्या का गहरा सदमा कह रहा था । नाॅक कमरे में लाइफ पत्रिका की फोटोग्राफर मार्केट बुर्के वाई । अत्यधिक ऊंची एडी के जूते पहने, ठक ठक करती कमरे में फंसी । वहाँ मौजूद फिर ओजने लगभग करुँगा । कैमरा छीना उसे कमरे से पहले और उस महिला ने श्रद्धांजलि, प्रार्थना और गहरे शोक में डूबे स्थान को पवित्र कर दिया । इंडिया ने कहा, गांधी जी ने अपने दो दुर्बल हाथों से समुचित ऍम का मनोबल ऊपर उठाया था । नेहरू ने देश को संबोधित किया, हमारे जीवन की रोशनी पहुँच गयी है और चारों तरफ अधिकार है । किसी विक्षिप्त आदमी ने बापू का जीवन समाप्त कर दिया और हमें इस शहर का सामना करना होगा नहीं, जहर को निकाल फेंकना होगा । अब नेहरू की सुरक्षा पर भी ध्यान दिया गया और तय हुआ कि उन्हें अंग्रेजों के मुख्य सेनापति के निवास तीन मूर्ति भवन में आ जाना चाहिए । नेहरू की सुरक्षा के लिए तब तक कोई भी अंगरक्षक तैनात नहीं था । प्रधानमंत्री के कार्यालय या निवास में कोई भी आ जा सकता था, लेकिन नेहरू का पुलिस की सुरक्षा की सरकार थी । नेहरू के तीन मूर्ति भवन में आ जाने के साथ इंदिरा और दोनों बेटों ने भी लगभग पूरी तरह उनके साथ ही आ गए थे । इंदिरा स्थिति में न तो शादीशुदा थी और न ही चुनाव । अगर मैं नहीं आती तो मेरे पिता को बुरा लगता । मना करना कठिन था । बडी समस्या थी क्योंकि फिर उसके लिए स्वाभाविक था कि उन्हें मेरा जाना कतई पसंद नहीं आएगा । क्या कभी नेहरू ने उन्हें अपने लिए अथवा उनकी खाते अपने साथ रहने को कहा था हूँ । सागर लिखते हैं, रूस के साथ की परेशानियों ने उन्हें जिस अकेलेपन और दिल टूटने के त्रास में धकेल दिया था, उसे झेल पाना उनके पिता के लिए बेहद तकलीफ तेज था । अपने पति का घर छोडने का फैसला और उन के बजाय अपने पिता के घर रहने जाना उनके जीवन का बेहद महत्वपूर्ण निर्णय था जिससे फिर उसको इंदिरा के जीवन में अपनी दोयम हैसियत का अहसास हो गया था । कांग्रेस की किसी बैठक में नहीं हूँ तो कांग्रेस के लोगों पर अपने बीवी और बच्चों को साथ लाने पर भडके रोज फट पडेगी अपनी पत्नी को यहाँ साथ मैं नहीं लाया हूँ । बच्चों का दाखिला दिल्ली के ही नर्सरी स्कूल में हो गया और इंदिरा तीन मूर्ति भवन में घर गृहस्ती की व्यवस्था के किशीदा काम में व्यस्त हो गई । औपचारिक बोझ कार्यक्रमों के आकर्षक शांत वर्ष सुरूचिपूर्ण आयोजन में इंदिरा को उम्मीद सौ उनचास नहीं अगर पांच का सामना करना पडा और उनके वैवाहिक जीवन में नई जान डाल सकने वाली संतान के अनार पानी से उनके प्रभाविक संबंधों पर भी तुषारापात हो गया । यह बात दीगर है । इसके बदले पिता के साथ उनके लिए नई दुनिया के दरवाजे खुल गए थे । त्रिमूर्ति भवन में सत्ता के हिलोरे लेते जीवन का कुशल प्रबंध करने के साथ ही नेहरू के साथ अमेरिका और बाद में अन्य देशों की यात्रा पर भी गई कर बात के बाद डॉक्टर नहीं । हालांकि उन्हें अमेरिका की यात्रा रद्द करने की सलाह दी थी तो उन्होंने जाने की ठान रखी थी और हो कहीं भी फिर उसको छोड कर नई राह पर निकल गई थी । अमेरिका में भारत की तत्कालीन राजदूत मुझे लक्ष्य में पंडित नहीं जानबूझ कर इंदिरा को सारे सरकारी समारोह से अलग था । उन्हें उपेक्षित देख कर बहुत शास्त्री होमी जे बाबा ऍम तथा परमाणु ऊर्जा आयोग के संस्थापक थे । उन्हें दोपहर व रात के खाने के लिए बाहर ले जाने लगे । यात्रा के दौरान लेखक फोटोग्राफर डॉरोथी नॉर्मल से भी मिले और वह जल्द ही उनकी घनिष्ठ मित्र बन गई । उन्होंने इंदिरा को जाने माने लेख को चित्रकारों, विचारकों तथा संगीत नदियों से मिलवाया, थिएटरों में गई और फिर और आठ गैलरियों में गई और जीने के नहीं, तरीके से परिचित होने के एहसास के साथ भारत लौटे । बहुत बातें उस समय को याद करते हुए इंदिरा कहती थी, वहाँ तमाम क्षेत्रों के अगुवा व्यक्तित्वों से लगातार संपर्क हुआ । मैं अपने पिता के साथ कुछ उनके कुछ दौरों पर गई तो कारणों, सत्ता और कई अन्य नेता हमारे साथ रहे । चीन में मेरी भेंट माओत्से तुम बच्चा हूँ, एनलाइ से हुई । स्विट्जरलैंड में चार्ली चैप्लिन हमसे मिलने आएगा । लखनऊ की नीरज दुनिया से दूर वो करने लगी थी । उन्होंने बात बताने की कोशिश की । शुरू में वो उन्नत जिंदगी जीने के लिए अनिच्छुक । मैं मेहमाननवाज बनने की राह से कदम कदम पर बच रही थी । मैं उन तथाकथित सामाजिक जिम्मेदारियों से घबराई हुई थी । हमारे यहाँ मेहमान हमेशा रहते थे । शुरुआती घबराहट के बावजूद वो अपने स्वाभाविक माहौल में रह गई थी । छवि गतिविधियों की धुरी बनकर अपने नए दायित्व को सफल बनाने के लिए संकल्प वो रेंजरों की सूची बहुत होगा । फूलों की सजावट, पर्दे, चादर, नदियों के खोल और अन्य रोज मर्रा । घरेलू प्रबंध में गहरी रुचि होने लगे । संवेदनशील और कल्पनाशील मेजबान तो थी ही । तीन मूर्ति के बारे में अपनी शुरुआती आशंकाओं को वो कुछ यूज जात करती थी । ऐसी लंबे चौडे कमरे दूर तक जाते । गलियारे क्या मैंने कभी रहने लायक बनाया जा सकता था? क्या इनमें घर जैसा महसूस किया जा सकता था? उन्होंने मन ही मन ऊंचे मानदंड तय किए और उनकी कसौटी पर खरी भी उतरी घर की हर एक छोटी बडी व्यवस्था पर वे खुद ध्यान देने लगी । उनकी शानदार व्यवस्थापन कुशलता दिखाई देने लगी । मानस कहावत पर अमल कर रही हूँ । यदि किसी को कोई काम करना हो तो बेहतर है क्योंकि बढिया ढंग से करेंगे । इसलिए मैं उसी में रम गई । प्रधानमंत्री बन जाने के बाद भी घरेलू व्यवस्था पर उनकी पैनी और खास निभा रहती थी । आपने पश्चिम बंगाल यात्रा के दौरान किसी निरक्षण बंगले में उनके ठहरने के समय युवा जिला आयुक्त याद करते हैं की उन्होंने उनसे कहा जिला आयुक्त महोदय मुझे अच्छा लगा कि आपने गुसलखाने में मेरे इस्तेमाल के लिए नए तौलिये रखती है । ध्यान रखें कि अगली बार जब नए तौलिये खडी दें तो उन्हें मेहमानों के इस्तेमाल के लिए रखने से पहले हलवा जरूर लें । नए तौलिये जब तक एक बार धुल नहीं जायेंगे, इलेवन को सोच नहीं सकते हैं । प्रधानमंत्री रहते हुए भी किसी की विशिष्ट शैली को उनकी पार किया के पकडे ही लेती थी । पश्चिम बंगाल की उसी दौरे में पूरी जीत में सवार होकर हाथ हिलाते लोगों की भीड के बगल से निकलते हुए उनकी नजर किसी खूबसूरत स्त्री पर पडे वो कनिष्ठ वकील रूम आप कॉल और खोज थी, बाद में हाईकोर्ट के नामी न्यायमूर्ति बने । तब ये अपने भाई भास्कर घोष से मिलने आई हुई थी । जो जिला स्तरीय अधिकारी थे । उस दिन को वहाँ इंदिरा की सभा देखने आई थी । इंदिरा ने हाथ हिलाना और मुस्कुराना जारी रखते हैं और उन्हें देखते हुए इंटेलिजेंस ब्यूरो के निदेशक गोपालदत्त से मुश्किल सवाल पूछ लिया । पता ये मिस्टर दत्त आपको क्या लगता है कि वो युवती ने कौनसी शैली की साडी पहनी हुई है? आई पी के अवसर ने हकलाते हुए कहा सिल सिल की साडी लग रही है मैं इन्होंने प्रतिवाद किया ऍम नहीं है तो तब आऊं ये कोयंबटूर के हैंडलूम साडी है फॅार ध्यान देना ही आपके लिए बेहतर है । बाद में घोष ने जब बॉल से पूछा क्या सब कुछ वो साडी कोयंबटूर के हैंडलूम की थी तो बॉल ने बताया आप इंदिरा गांधी कि महर नजर और संदर्भ की सहज समझना जवाब थी उन्हें कपडे और बुनावट और उस पर उकेरे गए शिल्प सहित समझती रंग डिजाइन को वे दूसरों के नाकाम रहने पर भी आसानी से पहचान लेती थी और अपने परिवेश में प्राथमिकता के भाव रोक देती थी । प्रधानमंत्री आवास में उन्होंने प्रधानमंत्री के कामकाज और राजनीति के आरंभिक सबक सीखना शुरू कर दिया ऍम उन्होंने उत्तर प्रदेश की राजनीति की सडक और उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री जी बी पंत द्वारा नेशनल हेरॉल्ड की संपादकीय नीतियों में हस्तक्षेप करने के बारे में अपने पिता को पत्र लिखा । उन्होंने नेहरू को लिखा, यदि आप पाँच जी को अपनी हरकतों से बाज आने को नहीं कहेंगे तो भारत में भविष्य में लोकतन्त्र और प्रेस की आजादी की बात मत कीजियेगा । दो दशक पा रिजल्ट निरंकुश प्रधानमंत्री बने तो यही शब्द विडंबना में व्यंग्यपूर्ण प्रतीत हुए । नेहरू ने उनकी उपेक्षा की थी तो के चुनाव में जब उन्होंने अपने जीवन है, महत्वपूर्ण दोनों पुरुषों रायबरेली में रोज और फूलपुर में नेहरू के लिए प्रचार किया । नेहरू उनके ऊर्जावान तौर तरीके से प्रभावित हुए । उन्होंने एडविना माउंटबैटन हो विस्तार से लिखा है । वो इंदिरा के उत्कृष्ट कार्य से कितने अच्छे थे और विजय लक्ष्मी पंडित को ये कहते हुए लिखा, हिन्दू पिछले एक साल में और खासतौर पर चुनाव के दौरान अचानक बडी और परिपक्व होने लगी है । उसने पूरे भारत में प्रभावी ढंग से काम किया है । एकदम किसी सेनापति की तरह जंग की व्यू रचना कर रहा हूँ । वो इलाहाबाद में बिल्कुल नायिका जैसी हैं । लगभग ऐसा था जैसे वह प्रशंसा जात अचंभे से थे । जैसे कि उन्हें उम्मीद ही नहीं थी कि वो वास्तव में किसी भी क्षेत्र में बेहतरीन सिद्ध हो सकती है । रायबरेली के लोग याद करते हैं । इंदिरा ने फिर उसके लिए तांगे में बैठकर प्रचार किया था । ओ । पी यादव रायबरेली से पुराने कांग्रेसी और अनुभवी वकील है । उन्होंने याद करके बताया, उन दिनों कोई वातानुकूलित कार्य जीत नहीं थे । तांगे की सवारी करती या पैदल चलते थे तो किसी बहु की तरह प्रचार करती थी । चुनाव क्षेत्र में बडों के लिए बहुत सम्मान के साथ कभी किसी का नाम नहीं लेती थी । हमेशा ठाकुर साहब क्या पंडित जी के नाम से ही पुकारते थी । उनका सिर्फ छाडि के पल्लू से हमेशा ढका रहता था । रोज जो आजादी की जंग के दौरान अपनी निर्भीकता के लिए मशहूर थे । आपने कमजोर हृदय के बावजूद अनेको बार अंग्रेजों द्वारा पिटाई के दौरान डटे रहे सहित राजनेता थे । धारा प्रभाव हिंदी और इलाहाबाद की बहुत सी स्थानीय बोलियां आसानी से बोल लेते थे । रोज नए लोगों के साथ काम करने की अदम्य क्षमता दिखाई । गांधी जी ने एक बार फिर उसके बारे में कहा था, अगर मेरे पास मेरे लिए काम करने वाले फिर उस जैसे सात लडके हो तो मैं सात दिनों में स्वराज हासिल कर लो । रोज को रायबरेली से जो जबरदस्त जीत हासिल हुई, उस से इंदिरा में चुनावी हलचल के प्रति तब तक पाँच इन्हें आकर्षण ने अपनी आंखें खोली । राजनीति के प्रति उनका आकर्षण स्वाभाविक था । भले ही यह बात स्वीकार नहीं करती थी, मगर उनमें सार्वजनिक जीवन के प्रति बखूबी बहुत खूब जोश था । ऊपर से इनकार करने के बावजूद अंदर से बहुत कुछ करने को व्याकुल थी वो दोनों हालांकि दूर जा चुके थे, मगर उन्नीस सौ बावन में इंदिरा द्वारा फिर उसके लिए जबरदस्त प्रचार मैं शुद्ध कर दिया । उन के बीच राजनीतिक मैत्री तब भी जारी थी । राजनीतिक उथल पुथल के दौरान दोनों ने अंतरंग संबंध बनाए थे । वे विश्वविद्यालय के दिनों में वैचारिक प्रतिबद्धता नहीं साझेदार थे । युवावस्था में दोनों ने तिरंगा साथ फहराया था और दोनों का जीवन आनंद भवन कि आंदोलनकारी भावना में पडा हुआ था । हालांकि फिर उसकी राजनीतिक तरक्की होने पर दोनों के बीच पेशेवर प्रदर्शन वर्धा के बीच पडने लगे थे । जैसे जैसे रूस की संसदीय गतिविधियां लोगों का ध्यान खींचने लगी, इंदिरा को गृहणी वार सहयोगी की भूमिका तो बधाई लगने लगी । इंदिरा को तो अपने जन्म के आधार पर शिष्टता हासिल थी तो प्रतिभावान फिर रोज रायबरेली से दो बार जीतकर अपने प्रयासों से प्रसिद्ध होते जा रहे थे । संसद में निर्णय वक्ता के रूप में भ्रष्टाचार के प्रश्नों का एक के बाद एक डटकर खुलासा कर रहे थे । आरंभ में मौत पीछे बैठने वाले नवनिर्वाचित फिर रोज संसद में शानदार प्रतिभा दिखाने लगे । कांग्रेस के अंदर वामपंथी थे, जैसे चालीस का दशकों में नेहरू थे । उन्होंने उन्नीस सौ पचपन में जीवन बीमा कारोबार में अगर सौदों का खुलासा कर भारत में जीवन बीमा के राष्ट्रीयकरण के लिए सरकार को मजबूर किया था । प्रेस की आजादी के मुखर रक्षक थे पता उन्होंने भारतीय प्रेस द्वारा संसदीय कार्यवाही की रिपोर्टिंग की स्वीकृति दिलवाने के मुहिम की सदारत की थी । हालांकि इस नियम को आपातकाल में इंदिरा ने रद्द करने वाली थी । रूस तीन सफलता हूँ के बावजूद शायद इन की वजह से ही उनके दिल्ली आ जाने पर भी पति पत्नी के संबंध सुधर रहे पाये । उन्हें नेहरू की मौजूदगी में होती थी । इसीलिए तीन मूर्ति भवन में रहना उन्हें असहनीय लगने लगा था । यद्यपि अपने ससुर के वो वास्तविक प्रशंसक थे, लेकिन उन्हें लगता था कि नेहरू के आस पास के माहौल में कुछ नकलीपन था और उन्हें प्रधानमंत्री का दामाद गहराना सख्त ना पसंद था । रूस के दोषियों और प्रेम संबंधों के विषय में होती रही रोज द्वारा आकर्षक सांसदों तारकेश्वरी सिन्हा, महमूद सुल्तान और सुमित्रा जोशी के साथ अपनी मित्रता का सार्वजनिक प्रदर्शन किया जाने लगा । मानो अपने महान ससुराल वालों को चलाने और उन्हें अपमानित करने में उन्हें मजा आता था । यद्यपि तारकेश्वरी सिन्हा ने ऐसे संबंधों का यह कहते हुए खंडन किया, यदि कोई पुरुष व स्त्री साथ में दिन का खाना खा लें तो तुरंत उनके बीच अंतरंग संबंध की फट जाती है । मैंने एक बार इंदिरा गांधी से पूछा, क्या वो ऐसी अफवाहों पर विश्वास करती थी और मैं विवाहित महिला थी? मेरा परिवार था और संभालने के लिए रिजर्व थी । उन्होंने कहा था, ऐसी अफवाहों पर विश्वास नहीं करते हैं । फिर उसके प्रेम संबंध, बहस, आशिकी का जोश थे अथवा गहरे कामुक मेलजोल । इस बारे में लगातार बातें होती थी और ज्यादातर लोगों को यकीन था । रोज के ब्रेन संबंधों के कारण या फिर इंदिरा के समर्पित पत्नी न होने के कारण दोनों का तलाक हो जाएगा । नेहरू के सचिव रहे एम ओ मथाई छोटी कदकाठी के फुर्ती रहे । वह किसी काम से जी नहीं चुराने वाले व्यक्ति थे । उन्नीस सौ छियालीस से उम्मीद सौ तक पूरे तेरह साल नेहरू की परछाई बनकर रहे । वो मैं के नाम से मशहूर और सिंधु जल और दिलचस्प व्यक्तित्व के धनी थे । भाषा प्रवीण और हाजिरजवाबी उत्साही काम करने के लती, कार्यकुशल, स्पष्टवादी और निर्भीक व्यक्ति थे । इस पर नेहरू आंख मूंदकर भरोसा करते थे । इंदिरा को नेहरू से उनकी नजदीकी विजय लक्ष्मी और एडविना माउंटबैटन के साथ उनकी आत्मीयता की तरह ही ना पसंद थी । हालांकि मथाई से तमाम नाराजगी के बावजूद मथाई कि वह कथित प्रेमिका भी थी । मथाई की आत्मकथा ऍफ नेहरू एज में कथित रूप में उनके लिखे गए अध्याय का शीर्षक अच्छा ही था, जिसमें वो उत्तेजनापूर्ण इंदिरा का उल्लेख करते हैं जिनके साथ ऐसा बताते हैं कि उनका बारह वर्ष लंबा प्रेम सम्बन्ध था । इस कथित अध्याय के विभिन्न संस्करण दक्षिणपंथी वेबसाइटों पर व्यापक रूप में उपलब्ध है । इनके विवरण में ऐसी पंक्तियां लिखी गयी हैं जैसे उसकी क्लियोपेट्रा जैसी ना है । फॅमिली आंखें हैं और वीनस जैसे सन है । सब चाय के अनुसार उसकी रूकी और घृणास्पद छवि केवल स्त्रियोचित आत्मसुरक्षा व्यवस्था । वो बिस्तर में अतिरिक्त मजेदार थी । संभोग के दौरान उसमें फ्रांसीसी और तो और केरल की नायर महिलाओं जैसी कलात्मकता का समीक्षण महसूस होता था । उसे लंबे लंबे चुंबन पसंद थे और वो लेखक से गणपति हो गई तथा उसे कर पास कराना पडा है । अपुष्ट ऑनलाइन संस्करण के अनुसार इंदिरा कहती थी वो कभी भी किसी हिंदू के साथ विभाग करना बर्दाश्त नहीं कर सकती थी और एक पर उन्होंने कहा मुझे रानी मक्खी अच्छी लगती है । मैं ऊपर हवा में उडते हुए प्रेम करना पसंद करूंगी । अध्याय की अंतिम पडती है ना उससे बेहद प्रेम करने लगा था । शीन हम जिस अध्याय में अन्तरंग शारीरिक संबंधों का बहुत बेबाक और विस्तृत विवरण किया गया है वो कभी प्रकाशित नहीं हुआ । लेकिन फ्रैंक का मानना है कि मधाई नहीं ऐसे लिखा था और मेनका गांधी ने अपनी सास से विवाद हो जाने पर इस विशेष अध्याय को प्रसारित किया था । हालांकि बधाई की इस पुस्तक के प्रकाशन हर आनंद प्रकाशन के नरेन्द्र कुमार का कहना है कि वह यह नहीं कह सकते कि मथाई नहीं शी लिखा था या नहीं क्योंकि प्रकाशक को मूल पांडुलिपि के साथ वो अध्याय प्राप्त नहीं हुआ था । मथाई के साथ संबंध पर इंदिरा कभी कोई स्पष्टीकरण नहीं आया । नेहरू के जीवनी लेखक सर्वपल्ली गोपाल का कहना है कि इंदिरा और मधाई को एक दूसरे को लुभाने में मजा आता था और इस संबंध का वर्णन इस रूप में करते हैं । इंदिरा मथाई को सामान्य सीमा से अधिक बढावा देती थी प्रैंक लिखा है कि बीके नेहरू वर्सिस जिनके पास इंदिरा की बुराई करने का कोई कारण नहीं था । इसी साक्षात्कार में बताया कि इंदिरा और मंगाई के बीच कोई न तो संबंध था और श्री नामक अध्याय में कल्पना के मुकाबले सच्चाई अधिक थी । नेहरू गांधी खानदान के निकट सहयोगी कांग्रेस के पूर्व नेता और इंदिरा के सचिवालय नहीं उम्मीद सूट से उन्नीस सौ इकहत्तर तक नौकरशाह रहे नटवर सिंह कहते हैं, मथाई ने नेहरू को बहुत नुकसान पहुंचाया । वो आगे कहते हैं, उसी आई ए सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी के बहुत निकट थे । उन्नीस सौ छियालीस से उन्नीस सौ उनसठ के बीच नेहरू के मेरे से गुजरने वाला हर एक दस्तावेज सी । आई । को पहुंच जाता था । उन्होंने निजी स्वास्थ्य में प्रेम संबंधों संबंधी सारी कहानियां खुद फैलाई । रोज गांधी के मित्र निखिल चक्रवर्ती ने जब मथाई द्वारा संपत्तियों के सन्देहास्पद लेनदेन और विदेशों में धन छुपाने के षड्यंत्रों का खुलासा किया तो उन्हें शर्म के मारे उन्नीस सौ चौंसठ में नेहरू की सेवा के आगे नहीं पडी था । इन्दिरा के बारे में उसके लेख कडवाहट भरे व्यक्ति के प्रतिशोधी उदगार हो सकते हैं । फिर उसकी मृत्यु से दो साल पहले उन्नीस सौ अट्ठावन में जब जय करने इंदिरा कोई अफवाह के बारे में बताया जिसके मुताबिक तो फिर उससे बदला लेने के लिए अन्य पुरुषों के साथ प्रेम संबंध बना रही थी । इंदिरा कुछ से नहीं बोली इससे पहले की तुम दिल्ली की कक्षा मंडली से इस बारे में जानो मैं बता दूँ मैं फिर उसको तलाक दे रही हूँ । फिर खुद अपने दोस्त केंद्र मल्होत्रा पर कर्जे देखो । इससे पहले की तुम इस बारे में तोडे । मरोडे गए विवरण शुरू मैं तुम्हें बता दूँ मैंने प्रधानमंत्री निवास जाना एकदम बंद कर दिया है । उन्होंने अब इंदिरा को हिंदू मेरी पत्नी कहना बंद कर दिया था जैसा वो अभी तक कहते आए थे और इसकी जगह श्रीमती इंदिरा गांधी कहना शुरू कर दिया था । बाद में हालांकि स्पष्ट हो गया की औपचारिक अलगाव के लिए उन में से कोई भी उत्सुक नहीं था । रोज की मृत्यु से कई महा पूर्व दोनों ने सुलह का भी कोई प्रयास नहीं किया । संसद भी जैसे जैसे रूस का प्रभाव बढ रहा था, इंदिरा ने भी उन्नीस सौ पचपन में कांग्रेस कार्य समिति की सदस्य बनकर अपनी राजनीतिक जमीन तलाशनी शुरू कर दी । नेहरू की जीवनी लेखक मेरी सेटल लिखती है । किसी के साथ जब वो अपने पति की परिचारिका और रानी बेटी से आगे निकल गई और रातोंरात उनके बारे में नजरिया बदल गया । उसी समय से वो राजनेता की श्रेणी में डाल दी गई । उन्नीस सौ पचपन में तो कांग्रेस की केंद्रीय चुनाव समिति के लिए भी चुने गए । अखिल भारतीय युवा कांग्रेस के अध्यक्ष बनी और उन्नीस सौ छप्पन में इलाहाबाद कांग्रेस समिति की भी अध्यक्ष बने । साल उन्नीस सौ के चुनाव में प्रचंड प्रचार करने के बाद उन्नीस सौ अट्ठावन में कांग्रेस के शक्तिशाली केंद्रीय संसदीय बोर्ड की सदस्य बन गई । वो अभी भी बाहरी तौर पर सार्वजनिक जीवन में दिखावटी उदासीनता जला दी थी । भाई कार्यसमिती में रहने की अभी तक नहीं हुई । आप मुझे बुजुर्ग राजनेता के रूप में सोच सकते हैं । उन्होंने इसे दोहराते रहना एक रणनीति बना ली थी । मानव राजनीति में आकर वो न जाने कितनी मुसीबत में थी । जब गांधी जीवित थे, तब गोविंद बल्लभ पंत ने मुझसे उत्तर प्रदेश विधानसभा में आने के लिए कहा था । मैंने साफ मना कर दिया था इसकी । पंत जी ने गांधी जी से शिकायत की । इस नादान लडकी को गलती देखिए, ये खुद को मुझसे ज्यादा चतुर समझती है । मुझे नहीं लगता था की मैं हर काम कर पाउंगी । इसके अलावा मेरे बच्चे भी बहुत छोटे थे । वो अपने कर्तव्य को मुस्तैदी से करने वाला को उत्साही व्यक्ति थी । शुरू में झिझक जाहिर करता है नाना करने वाली एक जब व्यक्ति वो राजनीति में प्रवेश लेने से जितनी शिद्दत से इनकार करती थी उसका उतना ही उल्टा मतलब होता था । अमेरिकी पत्रकार ऍम लिखा कोई भी सार्वजनिक हस्ती इतनी शिद्दत से अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को छुपाती नहीं है और उससे ज्यादा अविश्वसनीय कुछ नहीं था । जीवन भर उनका निजी व राजनीतिक रवैया यही रहा । वो ज्यादा से ज्यादा ताकत हासिल करती गई । साथ ही ऊपरी तौर पर वो सबसे वितृष्णा होने का दावा भी कर दी रही । वो तो सब से छुटकारा पाना चाहती थी । रोज उन्नीस सौ सत्तावन के चुनाव में रायबरेली से दोबारा निर्वाचित हुए इंदिरा ने फिर उतनी ही मेहनत से प्रचार किया जितना उन्नीस सौ बावन में किया था । लेकिन इस बार फिर उसके बजाय नेहरू के लिए इंडिया का जोश ज्यादा रहा । संसद में रोज का फिर से दबदबा हो गया । सुर्ख गोल मटोल और चतुर कारोबारी की तरह । वो अपनी हास्य प्रतिभा से सेंट्रल हॉल में चल डाल देते थे । वो जहाँ बैठते थे उस सीट को फिर उस कॉर्नर के नाम से जाना जाने लगा । चर्चा में तब आए जब गहरी छानबीन के बाद उन्होंने सदन ने खुलासा किया भारतीय जीवन बीमा कंपनी ने किसी निजी व्यापारी को कर्ज के संकट से किस प्रकार हुआ था । मूंदरा कांड के नाम से चर्चित इस घोटाले से संसद हिल गयी और नेहरू के नजदीकी सहयोगी वित्तमंत्री टी टी कृष्णमाचारी को क्या पत्र देना पडा इस खुलासे की वजह से फिर उसकी पहचान जॉइंट किलर के रूप में होने लगे । साथ ही वो संसदीय लोकप्रियता के शिखर पर पहुंच गए थे । बावजूद इसके वो अपनी नाकाम शादी के कारण कुंठित और गुस्से में थे और में तीन मूर्ति भवन से निकलकर आपने संसद निवास में आ गए । कभी जोश से लबरेज और शाही जीवन का शो कि ये हसमुख इंसान अपने तन अकेला और उदास हो गया था । अत्यधिक शराब और सिगरेट के नशे में स्कूल खुलने लगा । संसद में उन्होंने जो अपनी पहचान लडाई उसमें नेहरू और इंदिरा के प्रति बल्कि समझती थी । फिर वो जब तीन मूर्ति भवन में इंडिया से मिलने जाते हैं तो वे हमेशा उदास रहते हैं और उनका रिश्ता संवाद ही हो गया था । खाने की मेज पर भी रस्मी बातचीत ही हो पाती । त्रिमूर्ति भवन में जिसका उपयोग हमेशा स्वागत होता था, उसने खुद ही अपने को बाहरी व्यक्ति मान लिया था और भोजन करते हुए या अपने बेटों के साथ समय बिताते हुए भी बहुत कम सौजन्य जाहिर करते । इसके जवाब में तब भारत की प्रथम महिला का किरदार निभा रही श्रीमती इंदिरा का रवैया उपेक्षापूर्ण और तिरस्कारपूर्ण रहता था । फिर उसका मजाज तब जाकर कुछ ठीक होता हूँ जब अपने बेटों के कमरे में जाते हैं । दोनों बेटे अपने पिता के साथ यांत्रिकी उपकरणों के खिलोनों में रम जाते हैं और घंटों उनसे तरह तरह की वस्तुएं बनाने में डूबे रहे । रोज से जब किसी दूसरे ही पूछा कि वे अपने बेटों को इतने सारे यांत्रिकी ये काम क्यों से खाते रहते हैं, तो उन्होंने व्यंग्यपूर्वक खुद हो जाते हुए कहा मेरे बेटों की मां अमीर है, लेकिन पापा बहुत गरीब है, मैं ये सुनिश्चित कर रहा हूँ ये कभी भूखे ना रहे । अपने पति के चिडचिडेपन और कुम था की तुलना नहीं । इंदिरा शानदार मिजाज में और सेहतमंद थी । पढाई लिखाई के दिनों में उनको घेरे रहने वाली बीमारियाँ अश्चर्यजनक रूप से गायब हो चुकी थी । ज्यादा खूबसूरत और मांसल धीरेंद्र ब्रह्मचारी जैसी हस्ती के संरक्षण में प्रतिदिन योग अभ्यास करती है । इसका नेहरू से परिचय कराया गया था । अपने बच्चों को बोर्डिंग स्कूल भेजने के बाद आगे की राह और किसी ऐसी भूमिका को तलाशने लगी तो निर्भय अविवादित लोक कल्याण से जुडी हो । उन्होंने चुनावों के दौरान प्रचार किया । प्रत्याशियों के चुनाव में भाग लिया । कांग्रेस पार्टी ने अलग अलग भूमिकाओं में काम किया लेकिन अभी तक लगाते हुए कहती थी केवल शातिर लोग ही उनके चुनाव लडने की बातें कर रहे थे । हालांकि उन्नीस सौ सत्तावन में चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने ये कबूला । ये अनुभव मजेदार था और उन्होंने पद्मजा नायडू को लिखा, रोहतक में सिर्फ मेरे कारण एक लाख लोग थे । कल्पना हो इससे साफ है उनके मन में किया था और उस बच्चे की तरह थी तो बडी एहतियात से किसी मिठाई कोचक रहा था और डर रहा था कि उसे ज्यादा स्वादिष्ट न लगने लगे । उस सावधानी से अपने पैर राजनीति के तलाब उतार रही थी । मान उन्हें ये पूर्वाभास हो । किसका नशीला रोमांच उन्हें झटके से पहले जाएगा में इंदिरा नहीं मुख्य रूप से तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष यू एंडेवर, गृहमंत्री जीबीपंत के जोर देने पर पैंतालीस वर्ष की आयु में कांग्रेस अध्यक्ष बनने के लिए खुद को तैयार कर दिया । कांग्रेस के वरिष्ठ लोगों ने इंदिरा पर ये दायित्व लेने के लिए जो डाला नेहरू ने सिर्फ इतना कहा आप लोगों का फैसला भले हो, मैं इसमें शामिल नहीं होने वाला । निश्चय ही देश के लिए उत्सुक नहीं थे और उन्होंने इसका पता लगने पर चुप्पी साधे रखी । उनका कहना था, सामान्यतः था ये ठीक नहीं है । मेरे प्रधानमंत्री रहते हैं । मेरी पुत्री कांग्रेसअध्यक्ष बन जाए । हिसाब नहीं है कि नेहरू ने जब उनसे दिल्ली आने और अपने साथ रहने के लिए कहा था तो ऐसा उनकी लडखडाती हुई शादी के प्रति एक पिता की संवेदनशीलता की वजह से किया था या फिर वो सचमुच चाहते थे कि वो उनकी परिचारिका के तौर पर उनके साथ रहे । इसीलिए निश्चित है नेहरू के भीतर का लोकतांत्रिक ये नहीं चाहता था कि उनके नाम पर राजनीतिक वंश स्थापित हो और इंदिरा के राजनीतिक जगत में प्रवेश करने की आतुरता से क्रुद्ध और और सहज थे । रामचंद्र गुहा कहते हैं, नेहरू के दिमाग में ये कभी नहीं आया था कि वो कभी भी प्रधानमंत्री के रूप में उन का स्थान लेंगे । वो कहते हैं कि मानते थे इंदिरा किसी न किसी राजनीतिक होने का में आएंगे लेकिन वो कोई छोटी भूमिका होगी हम तथा जो हुआ वो सरासर दुर्घटना थी । नेहरू अपने परिवार को भागीदार बनाते थे तो निश्चित सीमा टीटीके के त्यागपत्र के बाद कुछ लोगों ने सुझाव दिया कि विजय लक्ष्मी पंडित को उनकी कैबिनेट में शामिल होना चाहिए । नेहरू ने साफ कह दिया, उनके प्रधानमंत्री रहते हुए कभी भी उनकी बहन या पुत्र मंत्रिपरिषद में शामिल नहीं होंगी । इंदिरा के लिए अपनी पहचान स्थापित करने की इच्छा नहीं । उन्हें और बडी राजनीतिक भूमिका पानी को प्रेरित किया और अपने खानदानी पेशे की और वो चुंबक की तरह खिंच रही थी । पूरे होते जा रहे प्रधानमंत्री को अपनी बेटी का साथ चाहिए था । इंदिरा ने इस परिस्थिति का फायदा उठाया । बार बार इस्तीफे की कोशिश के बावजूद नहीं होगा । अपना सिंघासन से पाक की तरह मजबूती से चिपके रहे । उनका लगातार और लम्बा कार्यकाल इंदिरा के लिए बहुत फायदेमंद रहा जिसने आपने पापु के प्रधानमंत्री काल के आखिरी सालों को राजनीति के शिखर पर खुद को स्थापित करने के लिए इस्तेमाल किया और क्यों नहीं होती आजादी की जंग ने महिलाओं के सशक्तिकरण को तेज किया था । सरोजनी नायडू और विजय लक्ष्मी पंडित जैसी महिलाओं ने अपनी प्रभावशाली पहचान बनाई थी और सुभद्रा जोशी तथा शिव राजवती नेहरू जैसी सांसदों ने हिन्दू संहिता विधेयक पर बहस के दौरान महिलाओं के अधिकारों के पक्ष की ठोस पैरोकारी की थी । इंदिरा शायद एक नारीवादी की तरह न जानी जाती है, लेकिन अपनी शादी या पिता के आग्रहों के आगे अपनी महत्वाकांक्षाओं को त्यागना उन्होंने स्वीकार नहीं किया । मोतीलाल नेहरू की आत्मा उन्होंने अपना जीवन कठिन परिश्रम और महत्वाकांक्षा से बनाया था । उनकी पौत्री दें समझा थी अपने वैवाहिक जीवन को सामान्य बनाने का प्रयास । अपनी इच्छित महत्ती भूमिका की तुलना में अनुपयुक्त ये बात ऍम खराब सेहत के बावजूद नेहरू के साथ अमेरिका यात्रा पर जाने पर उतारू होने, स्वेच्छा से विभिन्न पदों को स्वीकार कर कांग्रेस पार्टी ने खुश नहीं । चुनाव के दौरान थकाऊ प्रचार अभियान और नहरों के लिए पहले उनके आंख और कान बनकर और बाद में उन का प्रतिरूप बनकर दृढतापूर्वक राजनीतिक संघर्ष करने से साफ जाहिर थी वे लखनऊ के बगीचे में गुलाब लगाने भर से कभी भी संतुष्ट नहीं थी । चाहे वो छवि बनाने के लिए उन्हें कितना भी कठिन प्रयास तो ना करना पडा हूँ । मैं ऐसी कहानी सुनाती हूँ । मेरा वैवाहिक जीवन विफल हो गया । मैंने अपने पति को छोड दिया । हम दोनों ही बहुत अडियल थे । उन्होंने मना किया होता तो मैं सार्वजनिक जीवन में कतई नहीं जाती । लेकिन मैं जब सार्वजनिक जीवन में कई तो उन्होंने इसे पसंद करके भी पसंद नहीं । क्या अन्य लोग तो पत्थर थे । लोग कहते थे कैसा लगता है प्रमुख और उसका पति हो ना शादी में पुरुष के अहंकार पर चोट कर रहा हूँ । सबसे बडी बुराई है इंदिरा का राजनीतिक था । उसके लिए उनसे दूर जाने का प्रतीक था । पत्नी के दायित्वों से दूर और लगभग उग्र सोच के अनुसार उन्हें ये संबंध पूरी तरह खत्म होने का सूचक लगा । लेकिन परिवार के पुरुषों की असहमती को अनदेखा करते हुए वो स्मार्ट गहराई से उतरती गई । कांग्रेस अध्यक्ष बनने के अपने निर्णय के बारे में बाद में कहने वाली थी । उस समय के कांग्रेस अध्यक्ष यू एंडेवर ने मुझसे कहा, बाहर से चीजों की आलोचना करने के बजाय तो मैं भीतर आकर काम करना चाहिए । कांग्रेस पर हमला हो रहा है । कांग्रेस में अन्य लोगों के द्वारा तो में बचाव करने के लिए आगे आना चाहिए । क्या ये लोग रहता से बोलते हैं? कोई कुछ नहीं करता हूँ । मुझे दुख है । मैंने बहुत पहले सकती भूमिका नहीं निभाई क्योंकि तब मैं शायद अपने पिता के लिए ज्यादा खुशी बटोर पार्टी । उन्होंने अपनी जीवनी लेखक टॉम ऑफिस से जोर देकर कहा कि वो कभी भी कांग्रेस अध्यक्ष नहीं बनना चाहती थी और ना ही कभी उनके पिता वैसा चाहते थे । लेकिन पार्टी के वरिष्ठजनों द्वारा दोनों को जबरदस्ती इसके लिए मनाया गया । कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में उन के शुभारंभ के दिन दो फरवरी उन्नीस सौ उनसठ को पुराने घाघ नेताओं के बीच वो सफेद साडी और उन्हें हुए सफेद ब्लाउज में अपने तीखे नए नक्ष और झुकी नजर के साथ किसी नाजुक मेम ने जैसी दिख रही थी । ऍम पार्टी जी पार्टी के मुखिया बनने वाली सबसे युवा महिला नेता ऍम ने लिखा, यद्यपि अपने आरंभिक भाषण में उन्होंने दुर्बलता की हर सोच को झुठला दिया । उन्होंने उन्नीस सौ सपा उनके फिल्म रानी रूपमती के इस गाने का संदर्भ दिया हम भारत की नारी हैं कोमल कोमल भूल नहीं हम जो आना की चिंगारी हैं । जब इंदिरा ने अध्यक्ष के रूप में शक्ति प्रदर्शन किया, जल्द ही उनके पति राजनीतिक विरोधी बन गए । अध्यक्ष के रूप में उनका कार्यकाल असरदार रहा । बॉम्बे स्टेट भाषाई आंदोलन के कारण दो हिस्सों में बढ गया और मई उन्नीस सौ साठ दें । महाराष्ट्र और गुजरात अस्तित्व में आए । नेहरू भाषाई आधार पर राज्य बनाने के कट्टर विरोधी थे तो महत्वपूर्ण शासकीय मामलों में राजनीतिक समीकरण को सबसे अधिक तर जी देना इंदिरा की विषेशता थी जिसे उन्होंने आरंभिक चरण में भी दिखा दिया । मैं कहती थी, मुझे यकीन था कि हम गुजरात और महाराष्ट्र में चुनाव हारेंगे और कल गांव के समर्थक दल जीतकर विभाजन के पक्ष में वोट दे देंगे । हमें क्या हासिल होता अपने प्रधानमंत्री काल का एक दशक पूरा होने पर उन्नीस सौ सत्तावन में नेहरू को पहली चुनौती झेलनी पडी जब केरल में कम्युनिस्ट चुनाव जीत कर सत्तारूढ हो गए जीतने देश को हर में डाल दिया । भारत में पहली बार कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया सीपीआई चुनाव के जरिए सत्तारूढ हुई थी । क्रांतिकारी जनो बाहर की सीमाओं से निकलकर लोकतांत्रिक मुख्यधारा में शामिल हुई थी । केरल के विद्यालयों की कक्षाओं में गांधी के स्थान पर ऍम की तस्वीरें लगने से कांग्रेस न पत्ते में जा रही थी और कांग्रेस के वोट बैंक को बढती चुनौती के कारण संकट उसमें असुरक्षा पैदा हो रही है । कांग्रेस मुस्लिम लीग जैसे धर्म आधारित दलों से गठबंधन नहीं करने की कसम खा रखी थी परन्तु राजनीतिक समीकरण विचारधारा के ऊपर हावी हुए । अब इंदिरा ने बतौर कांग्रेस अध्यक्ष ये दिखा दिया कि राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी को हराने के लिए वो गैर धर्मनिरपेक्ष संगठनों से साझेदारी में भी नहीं हिचकेंगे । कांग्रेस ने केरल में ईएमएस नंबूदिरीपाद के शिक्षा विधेयक का विरोध करने के लिए ईसाई चर्च, फॅमिली और नायर सेवा समिति के समर्थन का निर्णय किया । विरोध प्रदर्शन फैले और कांग्रेस अध्यक्षा के रूप में इंदिरा ने अपना पूरा जोर स्तर पर लगा दिया । नेहरू नम्बूदरी पांच सरकार को शिक्षा विधेयक द्वारा मुस्लिम और ईसाई समुदाय के हितों को नुकसान होने के बिना पर बकवास करें । बॅास उन्होंने नई दिल्ली से राज्य में आपने वफादार कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बाद फिर सांप्रदायिक हिंदू मुस्लिम लीग के साथ अशांति को हवा दी । उन्होंने ये दिखा दिया कि वे सब और निरंकुश नेता बन सकती थी और उसका फायदा मिला । साल उन्नीस सौ उनसठ में कुछ फिरोजगांधी द्वारा मुखालफत सहित जबरदस्त विरोध के बावजूद केरल की सरकार को बर्खास्त कर दिया गया । केरल सरकार की बर्खास्तगी को इंदिरा के निर्णायक तौर तरीके, निरंकुश कार्यवाही, संस्थागत भ्रष्टाचार की उपेक्षा और नेहरू के पढते हुए और संवैधानिक दृष्टि से सही तरीके के प्रतिकूल शैली की झलक माना गया । उनका घर सुव्यवस्थित रखने वाली, उत्कृष्ट गृहस्वामिनी वाला जनून प्रजातांत्रिक मानकों संबंधी सभी बौद्धिक चिंताओं पर भारी पडा । केरल में जब कम्युनिस्टों को हराकर कांग्रेस अगला चुनाव जीत गई तो इंदिरा बहुत फुल थी । पहले ही वो उपलब्धि लोकतांत्रिक प्रणाली से निर्वाचन राज्य सरकार को गिराकर हासिल हुई हो । प्रश्न ही है कि संस्थागत निष्ठा के प्रबल समर्थक नेहरू ने केरल के विषय में इंदिरा के सामने हथियार तो डाले, चाहे नेहरू भी कांग्रेस के भविष्य के प्रति चिंतित थे और उन्हें लगा कि कम्युनिस्ट चुनौती को सिर उठाते ही कुचल देना चाहिए । सैद्धांतिक रूप में नेहरू स्वयं सामने वाले से असहमत और युगोस्लाविया वह हंगरी में फॅस पद्धतियों के आलोचक होते जा रहे थे । नेहरू भी सब कुछ ऐसा विश्वास करते रह रहे थे । पीएम इसका विरोध ऐसी सरकार के वक्त जन आक्रोश की लहर की अभी रखती थी, तो नियमित गिरफ्तारियां तो हजारों प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज करवा रही थी । उसने गोलियां चलवाकर बीस लोगों को मौत के घाट उतार दिया था । केरल के अपने दौरे में नेहरू को सडकों पर उन मान और सामूहिक घना की मूड की दीवार दिखाई थी और मैं विश्वास हो गया । इस सामने वाले हिंसा और अराजकता फैला रहा था । नेहरू ने नंबूदरीपाद को नए सिरे से चुनाव कराने के लिए कहा भी तो ये मैं साफ मना कर दिया । परिणामस्वरूप उनकी सरकार पर खास हो गई, लेकिन बेटी को इस निर्णय पर अपने पिता की गहरी बेचने का अंदाजा था । इंदिरा ने बाद नहीं केरल सरकार की बर्खास्तगी में अपनी प्रमुख भूमिका से इनकार किया । मार्क्सवादी हमेशा मुझ पर अपनी सरकार गिराने का दोष बढते रहे हैं लेकिन केन्द्र के राजी हुए बिना कभी नहीं हो पाता हूँ । अकेली मेरी राय से हालत नहीं बदलने वाले थे । मेरे पिता और सरोज इससे खुश नहीं थे । लेकिन पंतजी तत्कालीन गृहमंत्री निश्चिंत थे, ये तो होना ही चाहिए । मेरी भूमिका इतनी महत्वपूर्ण नहीं थी जितनी बतलाई गई । इतिहासकार मानते हैं । इसके लिए वो अकेली जिम्मेदार नहीं थी । पता और कांग्रेस अध्यक्ष भी अपनी बात कह सकती थी । लेकिन हम तो था नेहरू नहीं । अपने एक निर्णय से ये नस की सरकार बर्खास्त सर्वपल्ली गोपाल कहते हैं, ये कैसा फैसला था जिसने इसमें नेहरू की प्रतिष्ठा को कलंकित किया और उनकी स्थिति बेहद कमजोर है । बहरहाल, चाहे वो सीधे जिम्मेदार थी या नहीं मगर केरल के कारण इंदिरा और फिर उसके बीच गंभीर व्यवहारिक कल पैदा हो गयी । केरल को लेकर रोज बहुत तेज थे । केरल की सरकार की बर्खास्तगी की मूर्खता के विरुद्ध लगातार मंत्रियों को समझा रहे थे । वो अपनी पत्नी की अलोकतांत्रिक हरकत के सामने अपनी पराजय से बेहद कटु हो गए थे । वो यहाँ पत्रकार जनार्दन ठाकुर द्वारा बताया गया हिस्सा बताते हैं । केरल के मामले पर नेहरू गांधी परिवार में नाश्ते की मेज पर भी चर्चा हुई और रोज नहीं इंदिरा से कहा, कतई उचित नहीं है । हम लोगों को धमका रही हो । हम फासीवादी हो । इंदिरा गुस्से में तमतमाकर कमरे से ये कहते हुए बाहर निकल गई मुझे फासीवादी कह रहे हो । मैं इसे बर्दाश्त नहीं कर सकती है । केरल नहीं पति पत्नी के मतभेदों को सार्वजनिक कर दिया । इंदिरा के मित्रों में शुमार एक प्रतिबद्ध मार्क्सवादी मेरी शेजवलकर समयवधि सरकार की बर्खास्तगी पर साफ साफ नाराज उनका मानना था यद्यपि फिरो और इंद्रा दोनों ही समाजवादी और राष्ट्रवादी थे । मगर रोज संघवादी, ब्लाॅस्ट और इंदिरा तानाशाह वो सारी शक्तियां अपने मुठ्ठी में बंद करना चाहती थी । वो एक संघ के रूप में भारत के खिलाफ थी । उनके विचार में संघवादी राष्ट्र बनने लायक भारत का पर्याप्त विकास ही नहीं हुआ था । वो अभिमानी नेहरू थी । साम्राज्ञी जैसी संकल्पशील जो अपनी प्रजा के बेलगाम होने पर उन्हें अपनी सत्ता से काबू करती थी । रोज सुधारवादी कार्यकर्ता जो सिद्धांत के लिए संघर्ष करने दें, प्रसन्न रहते थे । इंदिरा ने उन्नीस सौ उनसठ डोरोथी नार्मन को लिखने वाली थी मुसीबतों का विशाल सागर मुझे निकलता जा रहा है । रोज मेरे अस्तित्व से हमेशा रोहित रहे हैं लेकिन अब चुकी अध्यक्ष बन गई है । वो ऐसी दुश्मनी दिखाते हैं कि माहौल विषैला होता लग रहा है सिर्फ मेरे लिए मुश्किलें बढाने को । उस सामने वादियों की तरफ ज्यादा से ज्यादा झुकते चले जा रहे हैं । कांग्रेस को मजबूत करने के लिए मेरी सारी मेहनत नहीं बलीचा लगा रहे हैं । इसके बाद इंदिरा ने कांग्रेस के अध्यक्ष पद से बमुश्किल एक वर्ष पूरा होने से पहले ही इस्तीफा दे दिया । उन्होंने अपने पिता से कहा कि उन्हें लगता है की उन्होंने अपना कर्ज चुका दिया । बीस अक्तूबर उन्नीस सौ उनसठ की सर्द रात नहीं बिस्तर में घंटों करवटे बदलने के बाद सुबह पौने चार बजे ही उठ बैठी और अपने पापा को लिखा । पिछले आठ वर्षों में मैंने ज्यादा से ज्यादा परिश्रम के साथ काम किया है । ये महसूस करते हुए कि शायद मैं तभी भी पर्याप्त नहीं कर पाते हैं । पिछले वर्ष वो छोड आया तो मैंने हल्का महसूस किया मानो आखिरी कर्ज चुक गया । मैंने ये महसूस किया जैसे मैं छोटे से पिंजरे में बंद पंची है । उनका लहजा कुछ हद तक अविश्वसनीय था । वो जानती थी की अपनी नियति से दामन छुडाकर भाग रही थी और बाद नहीं । उन्हें अपने निर्णय से निराशा भी हुई । पता और पार्टी अध्यक्ष उन्होंने जो हासिल किया था उस पर उन्हें गर्व था और सबको छोड देने का दुख दी तो कि वास्तव में अपनी इच्छा के बजाय उन्होंने अपने पिता और पति की अनकही इच्छाओं का मान रखते हुए वैसा किया था । वो अपने अध्यक्षीय कार्यकाल कि यादव को बडे भावभीने रूप में याद करती थी । मैं सही समय पर कार्यालय जाती थी । सुबह ठीक नौ बजे हमने नया परिवर्तन किया की पहली बार कांग्रेस दफ्तर सभी के लिए खोल दिया । मैंने व्यापक यात्राएं की, गोष्ठियां आयोजित करवाई, पदयात्राएं की, उसको ठीक किया और एकदम युवा ढांचे की व्यवस्था की और भाग्य वाली कांग्रेस पार्टी ने मेरे साथ चढाई पर चढ ने से इंकार कर दिया । उनके मीडिया सलाहकार एचवाई शारदाप्रसाद लिखते हैं, कांग्रेस अध्यक्ष के पद पर रहते हुए अपने पिता के साथ उनके सहज संबंध नहीं थे । उन में केरल के मामले में मतभेद था । ये और फिर रोज गांधी का स्वास्थ्य उनके अचानक पद छोडने का कारण है । एक दशक के बाद उन्होंने अपनी सोच के अनुरूप कांग्रेस पार्टी बनाई । उनके पिता जब पति की परछाई से मुक्त थी । क्या अपनी शादी पर ध्यान देने के लिए अध्यक्ष पद छोडना? उनका अंतिम प्रयास था? रोज एक तरह से उनकी राजनीतिक गुरू थे । पढाई के दौरान इंग्लैंड में वही थे जिन्होंने उन्हें लेबर पार्टी की राजनीति फासीवाद विरोधी आंदोलन में रूचि लेने के लिए प्रोत्साहित किया था । रोज नहीं पश्चिमी शास्त्रीय संगीत से भी उनका परिचय कराया था । कहती थी सभी नेहरू बहुत बेसुरे लोग थे तो फिर रोज था जिसने पश्चिमी शास्त्रीय संगीत के आनंद से हमें परिषद कराया । इस सब के ऊपर फिर उसने ही पूरी लगन से उनकी माँ की सेवा की थी । ऐसा जोडीदार केवल पति ही नहीं बल्कि हाथ में हाथ लिए संगीत भी था । कठिन सफर में हम रही था सरपरस् और मार्ग दर्शक था जून उन्नीस सौ साठ में । फिर उस इंदिरा और बच्चे कश्मीर में छुट्टियाँ बिताने गए और वहाँ डल झील में शिकारे पर रहे । ये वो अवसर था इसके बारे में । बाद में वो बताने वाली थी । उन्होंने तय कर लिया था अपने पिता की मृत्यु के बाद वो पूरी तरह से फिर उसके प्रति समर्पित हो जाएंगे । उनका ये निश्चय तभी कसौटी पर नहीं कसा जा सका । उन्नीस सौ साठ में आठ सितंबर को फिर उसकी दिल के दौरे से मौत हो गई । वो इंद्रा को एक ऐसी हालत में छोडकर गए जहाँ मेरा पूरा मानसिक और शारीरिक जीवन अचानक बदल गया । मैं शारीरिक रूप से बीमार थी । दो हिस्सों में बंटी हुई थी भगत याद करती हैं कि पंडित जी फ्रूट्स और संजय तीनों की मृत्यु में से सबसे अधिक रूस की मृत्यु से टूटी थी क्योंकि शायद बहुत कुछ ऐसा था जो अनसुलझा और अधूरा छूट गया था । शायद नेहरू की बेटी से विवाह करने के कारण उनके अपमान और मायूसी को वो समझती थी और कहीं ना कहीं उन्होंने फिर उसको उनके रसिक स्वभाव और विद्रोही तेवरों के लिए सचमुच माफ कर दिया था । उन का संबंध पेचीदा और बहू पडती था और जैसा बाहर से प्रतीत होता था, उससे कहीं ज्यादा फिरोज इंदिरा की जिंदगी और व्यक्तित्व का हिस्सा थे । पति होने के बजाय लगभग एक पारिवारिक सदस्य थे, था, बहुत झगडते थे । हम दोनों एक जैसे अडियल थे । एक जैसे जिद । हम दोनों में से कोई भी हार नहीं मानना चाहता था और मुझे याद करके अच्छा लगता है । ये झगडे हमारी जिंदगी ने जान डाल देते थे, क्योंकि इनके बिना हमारा साधारण और उबाऊ सामान्य जीवन होता । दोनों भिन्न होने के बजाय एक जैसे थे । मजबूत तूफानी व्यक्ति और एक दूसरे पढाई होने के लिए प्रवर्तन नटवर सिंह याद करते हैं, उनकी मृत्यु से टूट गई थी मैंने बस पति उन्हें रोते हुए देखा था । उनकी देह को त्रिमूर्ति भवन लाया गया था । पंडित जी ने देखा श्रद्धांजलि देने के लिए गरीबों की भीड लगी है । उन्होंने कहा, मुझे नहीं मालूम था कि फिर वो जितना लोकप्रिय था । इंदिरा गांधी पूरे समय आसनों में डूबी थी । आनंद मोहन लिखते हैं, रूस को इंद्रा पसंद नहीं करती थी लेकिन उन्हें बिहार जरूर करती थी । डॉक्टर माथुर याद करते हैं कि इंदिरा जब भी रूस के बारे में कोई मजेदार किस्सा सुना दी, विशुद्ध प्रेम के साथ हसती थी । उनका पसंदीदा किस्सा इसके बारे में था । वो कैसे घोडे से गिर गए थे । एक और किस्सा ये था कि कैसे शंकर ने उनका सोते हुए का कार्टून बनाया था क्योंकि मुलाकात का समय भूल गए थे और उस समय सोते रह गए थे और प्रमाण भर याद करते हैं । वो ये सारे किस्से लगातार हंसते हुए सुनाया करती थी । रूस की मृत्यु के बाद उन्होंने अपने आप को राजनीतिक कार्यों में छोड दिया । कांग्रेस कार्य समिति के लिए वे उन्नीस सौ इकसठ में चुनी गई । केंद्रीय चुनाव समिति की सदस्य बनी और फिर उसके लिए अपने काम को खोलकर उन्नीस सौ बासठ के आम चुनाव में पूरी शिद्दत से प्रचार में जुट गई । रूस के गुजरने के तीन साल के भीतर नेहरू भी चल बसे । अपने जीवन के दो सबसे महत्वपूर्ण पुरुषों की अनुपस्थिति में अलग है । इंदिरा भरने वाली थी । चीन की सेना ने उन्नीस सौ बासठ के अक्टूबर में मार्च करते हुए भारत व चीन के बीच वास्तविक सीमा रेखा मैकमोहन रेखा को पार करके भारतीय इलाके पर कब्जा कर लिया । चीन के साथ तनाव बढता जा रहा था । तीन सडक का निर्माण कर रखा था जिसमें भारत के अक्साई चिन इलाके के कुछ हिस्से का भी अतिक्रमण किया गया था । चीन के साथ तनाव पहले से बढ रहा था क्योंकि तिब्बत के नेता दलाईलामा के भाग कराने पर भारत ने उन्हें राजनीतिक शरण दे दी थी । चीन का हमला भीषण और अप्रत्याशित था और भारतीय सेनाएं मैदान छोडकर भाग गई । तैयारी से महरूम और नाकाफी हथियारों वाली सेना का आक्रमणकारियों से कोई मुकाबला नहीं था । कुछ वीरतापूर्ण मिसालों में जैसे रेजाउल लॉक के युद्ध में सैनिकों ने भारतीय चौकियों की रक्षा करते हुए जीवन बलिदान कर दिया । नेहरू ने दिलेरी के साथ चीन से दोस्ती का हाथ बडा था । भारत और चीन ने उन्नीस सौ में पंचशील के पांच सिद्धांतों पर आधारित शांतिपूर्ण सह अस्तित्व के समझौते पर हस्ताक्षर किए थे और एशिया की हवायें हिन्दी चीनी भाई भाई के नारों से मजबूर हो गई थी । अब नहीं हो तो चीन की घुसपैठ को मामूली बता रहे थे और गश्त के दौरान हल्की फुल्की मुठभेड कह रहे थे । एक दम आराम थे चीन के भाई भाई वाली भावना में तो कैसे घबराए हुए युद्ध के कुछ दिनों के अंदर आकाशवाणी रेडियो पर प्रसारण के दौरान उनकी आवाज बार बार लरज रही थी । चीन की सरकार ने भलाई के बदले दुष्टता लौट आई है । वो लगभग फुसफुसा रहे थे लेकिन इंदिरा ने अपने आप को हम मस्त संभाला और युद्ध के मोर्चे की और तुरंत चढ पडी । बाकी राहत सामग्री का वितरण ठीक प्रकार से हो सके । शायद ये जानते हुए भी कि उनके पिता चीन के आक्रमण के इस आघात को सहन नहीं कर पाएंगे, उनके लिए बचाव की मुद्रा के रूप में उन्होंने स्वयं को निजी योगदान के लिए तैयार किया और असम में तेजपुर की यात्रा पर निकल पडेंगे । फिर एक बार निडर सच्चा हो और संकट से लडने के लिए सन्नद्ध होकर ये बताने के लिए कम से कम नेहरू परिवार के सदस्य की बुद्धि उसके साथ एक और चुनौती के हमने सामने मुकाबले के लिए तैयार हैं । संकट की चेतावनी की अनदेखी करके, तेज बारिश के बीच और भयातुर लोगों से मिलती हुई सेना के हवाई जहाज से तेजपुर के लिए निकल पडे । चीन की सेना तेजपुर से केवल दीनशाह तीस मील दूर थे और उनके सुबह तक वहाँ पहुंच जाने की आशंका थी कि आरक्षित इलाका था सेना की टुकडियां और पुलिस मैदान छोडकर भाग चुकी थी । उनके वहाँ जाने से जवानों का हौसला बडा बहादुर थी । वो स्वभाव है तो साहसी थी । आगे जब बडी लडाई लडी जानी थी उनकी व्यक्तिगत सुरक्षा के कोई मायने नहीं थे । इस शुभ रात्रि में सब जानता मत देखा हूँ । लगता था वो नेहरू को संकेत दे रही थी । रोशनी खत्म होने से पहले तेजी से कदम बढा हो । संकटकाल मंत्री साहस और दृढता हूँ । अविश्वसनीय थे उन्नीस सौ बासठ के युद्ध के दौरान और उसके बाद इंदिरा ने जुझारू राष्ट्रवाद और अद्भुत साहस का प्रदर्शन किया अपने पिता से ये कहने में उन्होंने चिरपरिचत निष्ठुरता भी दिखाई । यदि लोग काम नहीं करते तो उन्हें हटना चाहिए । रक्षामंत्री कृष्णामेनन के इस्तीफे की उठ रही मांग के संदर्भ में कहा गया था, यद्यपि नेहरू अपने पुराने दोस्त और सहयोगी के प्रति कार्यवाही से हिचक रहे थे । मेनन चीन के खतरे की गंभीरता आंकडे में विफल रहे थे । ये मानते हुए कि असली खतरा चीन से नहीं बल्कि पाकिस्तान से था, उन्होंने भारत द्वारा आधुनिक हथियार प्रणालियां खरीदने में अडंगा लगा दिया था और सेना की भर्तियों में हस्तक्षेप किया था । किससे नाराज तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल केएस थिमैया ने इस्तीफे की चेतावनी दे डाली । मैनन की अनिर्णय के कारण भारतीय सेना दुखद रूप से तैयार ही नहीं थी । भारत के पहले प्रधानमंत्री हो उन्नीस सौ बासठ के युद्ध ने स्पष्ट कर दिया वो फिर कभी अपनी शारीरिक ताकत, बौद्धिक कौशल और नैतिक बल वापस नहीं पा सके । निर्मल और हमें उनके कंधे ढलक गए थे और उनकी आंखें खानी खाली और उम्मीद ही हो गई थी । नेहरू तीन बार पहले ही इस्तीफा देने की कोशिश कर चुके थे । इंदिरा ने कभी उन्हें ये लिखते हुए इसके लिए प्रोत्साहित भी किया था । हमारी राजनीति में बहुत कुछ सड चुका है । लोग शराफत और महानता को समझने में असमर्थ है । तीन से युद्ध के बाद उन्होंने दुखी होकर स्वीकार किया है कि भारत अब तक आपने भ्रम में जीता रहा । राष्ट्रपति राधाकृष्णन तक मेहरू की आलोचना से बाज नहीं आए और उन पर भुलावे में जीने और लापरवाही का आरोप लगा दिया । उन्नीस सौ बासठ के चुनाव में कांग्रेस की निश्चयात्मक जीत हुई तो पार्टी को वोट कुछ काम मिले । भारतीय जनसंघ और स्वतंत्रता पार्टी को लोकसभा में काम शाह चौदह वो अठारह सीटें मिली । नेहरू अवैद्ध नहीं थे । संसद में में जे बी कृपलानी, मीनू मसानी और राम मनोहर लोहिया ने मेज पीट कर इस्तीफा दो नेहरू इस्तीफा दो का शोर मचाते हुए नेहरू को लगातार खडी खडी सुनाई । संसद भवन के बाहर भी विपक्ष के हजारों समर्थक इन्ही नारों से आसमान खुल जा रहे थे । इंदिरा रक्षात्मक मुद्रा में आगे आए । उन्होंने जैसा कहा था मैं तो तीन चार वर्ष की उम्र से ही अपनी देखभाल खुद कर रही थी । मैं हमेशा अपने माता पिता की भी देखभाल करती रही हूँ । उन्होंने कभी जैसे कमला का बचाव किया था वैसे ही अब नेहरू की सुरक्षा के लिए आता है । जबकि कमजोर हो रहे दिग्गज के नजदीकी साथी भी उनके लिए घातक सिद्ध हो रहे थे । कृष्णा मेनन को पद से हटा दिया गया । नेहरू के बाद शक्ति पन्ने यानी छत्रपों की टोली पार्टी में उभरने लगे । इंदिरा ने में डोरोथी नार्मन को लिखा था कि वह भारत को छोडकर इंग्लैंड में छोटे से घर में बचना चाहती थी । लंदन में एक घर का जिक्र करते हुए इसे खरीदने में उनकी दिलचस्पी थी और जो बाद में पता चला किसी और में खरीद लिया । उन्होंने लिखा, पिछले वर्षों में मेरी निजता और गुमनामी की जरूरत धीरे धीरे बढती गई है । अपने पर आसक्त हुए अमेरिका के राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन को अप्रैल में नेहरू का एक पत्र पहुंचाने वो अमेरिका गई । वो बाद में और अधिक मंत्र मुग्ध हो गया था । प्रेस से मिलिए कार्यक्रम के दौरान जब पूछा गया क्या वो नेहरू के उत्तराधिकारी बनकर कार्य करना स्वीकार करेंगे तो उन्होंने कहा, नब्बे प्रतिशत में अस्वीकार करेंगे । दरअसल नाममात्र के बाकी दस प्रतिशत अघोषित क्षेत्र में ही इंदिरा के सपने मौजूद थे । भले ही उन्होंने नॉर्मल को लिखकर ये धारणा जताई थी कि वो अपना पिंड छुडाना चाहती थी । भुवनेश्वर में में कांग्रेस के अधिवेशन को संबोधित करते हुए नेहरू अचानक गिर पडे । ये मस्तिष्काघात था डाॅन के शरीर के हिस्से को लकवाग्रस्त कर दिया था । नेहरू को असुरक्षित देखकर उनके विरोधियों ने घेरेबंदी मजबूत कर दी । पापु के खिलाफ सोची समझी और सुनियोजित मुहिम चल रही है । इंदिरा ने मई में बी के नेहरू को लिखा उन को कमजोर कर नहीं और अगर मुमकिन हो तो बुखार देने की हर कोशिश की जा रही है । पहले जैसे कतई नहीं रहे । एक के बाद दूसरे पुराने साथ ही पल्ला झाड रहे हैं । अब शुद्ध लोगों से घिरे हुए हैं । इस समय दिल्ली दरबार में जोशो खरोश से अंदाजा लगाया जा रहा था उनकी ताकत कहाँ तक फैली हुई थी और वो कथित गद्दी के पीछे की ताकत समझे जाने से बिल्कुल भी नाखुश नहीं थी । हालांकि वो अभी भी बहकाने की कूटनीति कर रही थी तो नॉर्मल को फिर से लिखने वाली थी । भारत और दुर्भावना एशिया और शत्रुता से निकल जाने की इच्छा है । जवाहरलाल नेहरू की सत्ताईस मई उन्नीस सौ चौंसठ हो हो गई । किसी के साथ इंदिरा गांधी की आपके सोनी और दे रंग हो गई क्योंकि वो एक झटके में अपने उस रक्षात्मक घेरे से महरूम हो गई थी जिसने उन्हें बढा दी हुई थी । इसीलिए अपने पिता की विरासत को समझने की कोशिश शुरू की और उनके नाम को उन्होंने अपना सुरक्षा कवच बना लिया । अपने निजी दुख को हावी न होने देते हुए उन्होंने पिता की अंत्येष्ठि की व्यवस्था बेहद सावधानी से अपने हाथ में ले ली । यह भी सुनिश्चित किया घर के कर्मचारी चाकचौबंद दिखाई दें और उन्हें कडाई से निर्देश दिए कि नेहरू की साफ सफाई पर जोर देने की आदत को निभाते हुए गन्दगी न होने देंगे । उन्होंने दृढतापूर्वक अपने पिता के अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ले उतनी ही कुशलता से जितनी से वे उनकी विरासत को अपने कंधों पर लेने वाली थी । ध्यान रखते हुए पार्थिव देह बर्फ में पूरी तरह ढकी रहे ताकि बीच कर्मियों की गर्मी में उसमें शर्म हो । नरगिस के फूल वहाँ पर्याप्त मात्रा में हो । तेरे को सुसज्जित करने के लिए गेंदा और गुलाब के फूल मंगाए गए । की भजन वैसे ही कराई जायें जैसे नेहरू को पसंद थे । वो भेजा सूती, सफेद साडी और लंबी आस्तीन के ब्लाउज में झडी की तरह सीधी बैठी थी और हजारों शोकाकुल लोग पंक्तियों में नवजात भारत राष्ट्र को दुनिया के महानतम लोकतंत्रों की श्रेणी में बराबरी पर खडा करने का सपना देखने की हिमाकत करने वाले बीसवीं सदी के महानतम राजनेताओं में शुमार तत्व केशव पर फूल चढाकर श्रद्धांजलि दे रहे थे । उस रास्ते के दोनों और पंक्तियों में मनुष्यों का सागर लहरा रहा था । जिसके रास्ते विशेष ट्रेन से उनके अवशेषों को इलाहाबाद ले जाया जा रहा था । पेट्रोल पर हर जगह लोग थे फूलों की पंखुडियों बरसाते हुए, जमीन पर खंबों पर छत की शहतीर ऊपर दुकान की छतों पर, घरों की छतों पर पेडों पर भीड का कोई ओर छोर नहीं था । ऐसी जबरदस्त लोकप्रियता थी फुल्ल मोहन तेजस्वी, जवाहर लाल की इसे राजा नहीं बनना था । विनम्र और सादगी पसंद लालबहादुर शास्त्री अप्रत्यक्ष उत्तराधिकारी थे, स्वतंत्रता संग्राम युग के सहयोगी थे, जिन्होंने नेहरू के नजदीकी सहायक के रूप में काम किया था और इंदिरा की कुछ भ्रष्ट टिप्पणियों का लक्ष्य भी थे । उन्नीस सौ छप्पन में जब शास्त्री जी ने रेल दुर्घटना के बाद इस्तीफा दिया और पद छोडने के बाद नेहरू और दूसरों की प्रशंसा के पात्र बनाए । इंदिरा ने व्यंग्यात्मक लहजे में उनके कूटनीतिक प्रयोजनों को इंगित किया था । हर कोई समझता था उन्होंने दुर्घटना की वजह से मंत्री पद से इस्तीफा दिया था तो इसका चुनावों से भी कुछ ना कुछ लेना देना रहा होगा । ऐसा उन्होंने आगानी सौ सत्तावन के आम चुनाव की तरफ इशारा करते हुए कहा था । अब उनके पिता की मृत्यु के बाद उनके उत्तराधिकारी बेटी के पास आएगा । मैं बिलकुल भी मंत्री नहीं बनना चाहती थी । आगे चलकर वो बताने वाली थी । शास्त्री जी मेरे पास आए और बोले उन्हें स्थिरता बनाए रखने के लिए मंत्रिमंडल में नेहरू खानदान का सदस्य जरूर होना चाहिए । मैंने सहमती नहीं नहीं, मैं बहुत अनिच्छुक लेकिन आकाशवाणी पर घोषणा कर दी गई कि दूसरों के साथ मुझे भी शपथ दिलाई जाएगी । इस प्रकार मैं मंत्री बने हैं । जबकि मैं कहती हूँ कि मैं राजनीतिक नेतृत्व नहीं करना चाहती थी । मेरे लिए समस्याओं से दूर रहना संभव नहीं था । उनकी राजनीतिक सहजबुद्धि तेजी से जाग्रत हो गई थी । उन्होंने पहले ही पुपुल जयकर को बताया था पापु के ना होने पर ये लोग मुझे रहने नहीं देंगे । शायद उस लडाई को उचित संध्या करने के लिए जो उन्होंने पहले ही शुरू की हुई थी । इंदिरा अपने पिता की शहादत को स्वीकार करने के लिए तैयार थी तो सामान्यतः इज्जत करती थी । उन्हें सत्ता नहीं चाहिए । लेकिन उन्होंने हमेशा ये स्पष्ट कहा था कि अगर उनके पिता की विरासत को पलटने का खतरा हुआ तो बाहर नहीं रह पाएंगे । तो स्वाभाविक रूप में उन्हें वो हरसंभव काम करना था जिससे भारत नेहरूवादी ढांचे में सुरक्षित रहे । ये नेहरू की पत्री होने के कारण उनका कर्तव्य था । प्रिया श्रीमती गांधी अब आरंभ से ही राजनीतिक पुरानी थी । आपने चाहे जितना भी लोगों को इसके विपरीत समझाने की कोशिश की हो, आप की राजनीतिक महत्वाकांक्षा वास्तव में कब तेज हुई थी? क्या तब तो फिर उस रायबरेली से जीते थे और संसद में चमक रहे थे? क्या अब जब आपने उम्मीद सौ बावन और के चुनावों में प्रचार किया था और जनसभाओं में आपने उल्लास की भावनाओं को स्वीकार किया था, आपका स्पष्ट राजनीतिक चुका हूँ? तब निश्चय ही उत्कर्ष पढ था जब आप कांग्रेस अध्यक्षा बनी और आपने फोरी तौर पर फैसले किए । आपके पिता की मृत्यु के बाद आपको लगता था की वापसी नहीं होगी और आप नेहरूवादी विरासत की रक्षा करना चाहती थी । वास्तव में आप की राजनीतिक महत्वाकांक्षा को हवा देने की आवश्यकता नहीं थी क्योंकि वो तो आपने मौजूद ही थी अपने लिए । वहाँ के अवसर पर आप अपने पिता को बताना चाहते थे । आपको गुम नानी चाहिए, एक ऐसा जीवन जिसमें बखेडा ना हो । क्या आप अपने पति और बच्चों का खयाल रखना चाहती थी और ऐसा घर चाहती थी तो पुस्तको संगीत और मित्रों से भरा हो तो गुमनामी शायद वो चीज थी ही नहीं । इस की आपको चाहत रही हो । आप ने कहा था । ये कहना बिल्कुल सच नहीं है कि आपके पिता ने आपको सरकार का मुखिया बनने के लिए तैयार किया क्योंकि यदि उन्होंने ऐसा किया होता तो उन्होंने मुझे अपने निर्णय के बारे में बताया होता । उन्होंने ऐसा नहीं किया था । भोजन के समय आप नेहरू को अपने सवालों से तंग किया करती थी लेकिन वो हमेशा चुप्पी साधे रहते थे । आपको अफसोस था, आपके पिता ने आपको तैयार नहीं किया । यही कारण था कि जीवन में बाद में आपको अपने पुत्र को मेहनत से तैयार करना था । क्योंकि आपके मन में शिकायत थी क्या आपके पिता ने आपको तैयार करके नहीं होता रहा था? क्या अपने अपने पिता केस नहीं? मैं पित्र सत्तात्मक दृष्टिकोण के खिलाफ विद्रोह किया था जिसके तहत आपको महज घर के संरक्षक और मेजबानी के योग्य ही समझा गया था । उदार फुल पता नेहरू ने आपको इतना समझदार अथवा दूरदृष्टा कभी समझा ही नहीं था । क्या आप महान सिद्ध हो सकें? गांधी से लेकर पटेल तक भारत के स्वतंत्रता सेनानियों ने अपने बच्चों को पर्दे के पीछे ही रखा और नेहरू इसका बाद नहीं थे । क्या नेहरू की मृत्यु नहीं, आपको बंधनों से मुक्त होने और शर्मीली लडकी के बजाय अव्वल नारी के अपना अस्तित्व को अभिव्यक्त करने का अवसर दिया था । आपके पिता जैसे ही परिदृश्य से बोझ हुए, आपको खुद को प्रकट करने का मौका मिल गया । न केवल नेहरू की पुत्री के रूप में बल्कि राजसी परिवार, राजसी मिजाज, निर्विरोध सत्ता के हमें और स्वाभाविक नेता । मोतीलाल की पौत्री के रूप में भी आप रन के लिए तैयार हूँ ऐसे जीवन के लिए जिसकी आपके बापू ने आपके लिए कभी कल्पना भी नहीं की थी ।

4. गूँगी गुड़िया से देवी तक

गूंगी गुडिया से तेरी तक साल उन्नीस सौ चौंसठ नेहरू की मृत्यु के बाद लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने और इंदिरा गांधी ने भी उनके मंत्रिमंडल में सूचना एवं प्रसारण मंत्री का पदभार संभाला । शास्त्री की मृत्यु के बाद में प्रधानमंत्री बन गई और उन्नीस सौ सत्तर तक इस पद पर रही साल से के बीच में बढते बढते सप्ताह के शिखर पर पहुंच गई । उन्होंने उन्नीस सौ बहत्तर में कांग्रेस पार्टी को तोड दिया । उन से सत्तर चुनाव में अपने बेहद लोकप्रिय नारे गरीबी हटाओ की बदौलत उन्होंने चुनाव में जबरदस्त जीत हासिल की । उन्नीस सौ इकहत्तर में बांग्लादेश युद्ध में भारत की जबरदस्त जीत का नेतृत्व किया । इन वर्षों में भारत की सम्राज्ञी के रूप में उनकी जय जयकार प्रिया श्रीमती गांधी भारत के प्रधानमंत्री के रूप में क्या आप हमेशा अपने मन में अपने पिता की उत्तराधिकारी बनने की आकांक्षा गुप्त रूप से पाले हुए थी? क्या आप हमेशा ऐसा सोचती थी कि अपने माता पिता के सपनों का भारत सिर्फ आप ही बनाकर उसे अक्षर रख सकती थी? नेहरू जब सलाह के लिए मोरारजी देसाई और के कामराज जैसे अपने साथियों से मंत्रणा करते थे, आप सिर्फ मेहमान नवाज की भूमिका तक सीमित थी । अब आप अपने को उपेक्षित महसूस करती थी । आपके अपने मित्र ने कहा था, आप को कभी कभी लगता था आपके पिता को आपसे भी और जिक मंत्रणा करनी चाहिए थी । प्रधानमंत्री के रूप में आपके आरंभिक वर्ष कठिनाई से भरपूर थे । आपके विरोधी आपको गूंगी गुडिया पुकारते थे । क्या आपको उनकी बुद्धि पर तरह चाहता था या आपके विरोधी आपके भीतर दबे फलादि इरादों को भाव नहीं पाते थे? आपने लोकप्रिय बनने के लिए अपने भीतर छिपे शक्तिपुंज को चतुराईपूर्वक दबा रखा था और आप उन पर मन ही मन ऐसा करती होंगी । वो आपके भीतर से भी परमाणु ऊर्जा को आंख नहीं पाते थे । इसके बारे में कभी आपने कहा था की आपके भीतर उभरती रहती है । राजनीति में आपका आगमन लगभग अनियंत्रित ताकत के झटके की तरह हुआ था । मैं जब ऐसे कामों को देखती हूँ जिन्हें अंजाम नहीं दिया जा रहा है तो उन्हें करने की मेरे भीतर प्रबल इच्छा उम्र नहीं लगती है । मेरा यही रवैया है । यदि ये कमरा गंदा है तो मैं इसमें झाडू लगा देंगे । सच तो यह है कि आप होंगी कोरिया कभी नहीं थी और राजनीति से बचने के बाद आप का पसंदीदा जुमला था उन काली मगर उन पहनी आंखों में आपके अपने विलक्षण कदम ने विश्वास की जो चला करती थी । ये आपके शब्दों में शुद्र गहरी गहरे नहीं थे बल्कि आप स्वयं थी जिसे आप अपने पिता का सबसे उपयुक्त उत्तराधिकारी मानती थी । भले ही स्वयं ऐसा ना चाहते हूँ मगर बीके नेहरू आपकी उस क्रोध भरी दृष्टि को याद करते हैं जब उन्होंने राजीव और संजय की तरह नेहरू की अस्थियां जमा करने में हाथ बटाने की कोशिश की तो उन्हें आपकी कडी मना ही कर दी नहीं रहा था । सामना करना पडा । इंदिरा के चेहरे पर आए भाव देखकर मुझे ये पक्का पता चल गया कि उन्हें वहाँ मेरी उपस् थिति पर साॅस था । उसके जरिए साफ और बिना लाग लपेट के जब आ रही थी इस सप्ताह के उत्तराधिकारी सिर्फ वहीं होंगी और उनके बाद उनके पुत्र होंगे । नेहरू की विरासत पर किसी भी अन्य नेहरू को हक जमाने की जरूरत नहीं करनी चाहिए । कांग्रेस की सर्वोच्च नेता बनने तक के सफर में इंदिरा गांधी को पार्टी के बुजुर्ग और अपने प्रति सतत विरोध से भरे नेताओं के गिर हो और संसद में उनका मजाक उडाते, विपक्षियों से अपन और मन को घायल कर देने की हद तक लडाई करनी पडी और अंततः कठिन बाधाओं पर उनकी इच्छा शक्ति की जीत हुई । ऐसी स्थिति कि शिखर तक दृढ इच्छाशक्ति के साथ कठिन चढाई थी । ना सिर्फ अपने पूर्व लिखित भाग्य के प्रति लगातार जागरूक थी बल्कि सत्ता को समझने और उसके प्रयोग की इसके पास स्वाभाविक क्षमता भी मौजूद थी । वो क्रांति की बेटी थी और उन्होंने राजनीति के लहराते समुद्र को मुझे हुए राजनीतिक खिलाडी की चतुराई से पार किया । नटवर सिंह कहते हैं, अपने पिता के मुकाबले उनकी राहत बेहद कठिन रही । उन्होंने जो कठिनाइयां झेली वैसी कभी नेहरू को नहीं झेलनी पडी । नेहरू के मुकाबले कोई था ही नहीं । उन के समय में तो विपक्ष भी नहीं था । नेहरू के आरंभिक दस साल तो एक दम आराम से कट रहे लेकिन उनके साथ ऐसा नहीं रहा लेकिन उनका दिमाग ही सियासती था । नेहरू के मुकाबले भले ही कोई कद्दावर राजनीतिक प्रतिद्वंदी नहीं था लेकिन उनका कार्यकाल भी कोई फूलों की सेज नहीं था । उन्हें भी अर्थव्यवस्था से लेकर बढते भ्रष्टाचार, राज्यों में भाषाई आंदोलन तथा दक्षिणपंथी हिंदू और कम्युनिस्ट जमातों के हिंसक विरोध जैसे बहन चुनौतियों का सामना करना पडा था । भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन के बारे में बहुत चिंतित थे । आंध्र प्रदेश के गठन के बाद उनका कहना था, हमने ततैया के छत्ते में हाथ डाल दिया है और मुझे लगता है कि हम सबको उनके डंक झेलने पडेंगे । नेहरू की सरकार ने जब हिंदू कोड बिल को संसद में मंजूरी दी इससे महिलाओं के विरासत और विभाग के अधिकार मजबूत हुए थे । उसके विरोध में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ नहीं सडकों पर जुलूस निकाला और नारा लगाया हूँ मेहरू मुर्दाबाद । तेलंगाना वितरकों के दौरान उन्होंने आंध्र प्रदेश में वामपंथियों के विप्लब को झेला । उन की पंचवर्षीय योजना की कडी आलोचना हुई और उनके अपना मूड साथ ही चक्रवर्ती राजगोपालाचारी नहीं नहीं सो सत्तावन में अस्सी साल की उम्र में कांग्रेस छोडकर उन्नीस सौ उनसठ में नेहरू की समाजवादी नीतियों के विरोध में स्वतंत्र पार्टी बनाने की धर्मनिरपेक्ष देश के रूप में भारत के भविष्य के प्रति चिंतित थे क्योंकि मुसलमान बडी तादाद में लगातार भारत छोडकर पाकिस्तान जा रहे थे । उन्होंने से चिंतित होकर राज्यों के मुख्यमंत्रियों में बेहद व्यथापूर्ण पत्र लिखा । पंत रहा, ये हमारे ही हाथ में है कि हम अपने अल्पसंख्यकों के लिए ऐसा माहौल पैदा करें जिसमें वो हमारी और से अधिकारपूर्ण और बराबर व्यवहार के प्रति आश्वस्त होकर जी सकें । हम यदि ऐसा नहीं कर पाए तो हम नाकाम हो जाएंगे । उनके मित्र आंध्र माल रोने जब उनसे पूछा की आजादी के बाद से उन्हें सबसे बडी चुनौती क्या झेलनी पडी । नेहरू का जवाब था धार्मिक देश में धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना । नेहरू ने स्वतंत्र भारत को सफलतापूर्वक कार्यरत संवैधानिक धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र बनाने के लिए दिन रात एक कर दिया था । ऐसा करके विमानों उन सब लोगों को मुंहतोड जवाब दे रहे थे । उन्होंने आजादी के समय लडखडाते भारत के प्रति भविष्य पर प्रश्नचिन्ह लगाया था । ऐसा करके वो शायद अपने ही पिता के सामने अपना पक्ष सही सिद्ध करने की कोशिश कर रहे थे । जिन्होंने कभी स्वतंत्र देश के लिए अपने बेटे के मूल परिवर्तनकामी आंदोलन का मखौल उडाया था । उनकी कैसी भी विचित्र समस्याएँ रही हूँ । मगर संवैधानिक अनुशासन के अनुरूप नहरो हमेशा बातचीत और लचीलेपन से पेश आएगा । हालांकि उनकी बेटी का रुख ऐसा नहीं था । मेरे पिता तो संत थे, जिन्होंने भटक कर राजनीति का रुख कर लिया । वो कहाँ करती थी लेकिन मैं तो कठोर राजनेता हूँ लुइस कैरोल की पूछता हूँ तू लुकिंग ऍम पर बनी फिल्म में जैसा रेड ग्रीन कहती हैं, मेरे अनेक रूप है प्रिया लेकिन दिल्ली ईमानदारी उनमें शामिल नहीं है । अपनी ही पार्टी के बुजुर्ग नेताओं द्वारा जबरदस्त विरोध के कारण वो आम सहमती की राहत कतई नहीं अपना सकती थी । उनके प्रति मर्दाना पूर्वाग्रह निर्माण और उद्दंडता की हद तक था जिसके सामने तो बहुत अकेली पड जाती थी अपनी जगह पर डटे रहना और फिर शिखर पर पहुंचने की राव में उन्हें उखाड पछाड की राजनीति अपनानी पडेंगी । इसके नेहरू को शायद ही कभी जरूरत पडी थी । मेहरू भले ही शिथिल रहकर भी महान कहना सकते थे मगर उन्हें हमेशा सावधान रहना पडता था भरमाने के लिए और छापामार शैली में और अपने खिलाफ षड्यंत्र करने वालों को ध्वस्त करने के अपने सबसे भरोसेमंद हथियार जनता के साथ । उन्हें हर एक मोड पर सत्ताधारी नेताओं से निपटना बडा जिन पुरुषों को प्यार करती थी, उन का अनुमोदन लेना पडा और अपने खिलाफ साजिश रचने वालों को जिन्होंने रियो चित अप्रत्याशित तौर से परास्त किया, अपनी परिस्थितियों की आवश्यक हो, उन्हें लगने लगा था की उदारता की कोई गुंजाइश उनके कोटे में ही नहीं, नेहरू द्वारा अपनी बेटी को अपनी उत्तराधिकारी के रूप में तैयार कर नहीं है या आगे बढने का कोई सबूत नहीं मिलता । इस बात का उल्लेख पहले भी किया जा चुका । अपने आपको नेहरू का स्वाभाविक उत्तराधिकारी मानने वाले कांग्रेस के ही सिद्धांतवादी अनुभवी नेता मोरारजी देसाई नहीं जब इशारे इशारे में बताने की कोशिश की । नेहरू स्वयं इंदिरा को प्रधानमंत्री पद के लिए तैयार कर रहे थे । नेहरू ने साफ साफ कहा इससे साफ है ये कल्पना की सबसे ऊंची उडान है । संसदीय लोकतंत्र में वंशवादी उत्तराधिकार की अवधारणा की कोई जगह नहीं है । इसके अलावा मैं स्वयं भी इस प्रवर्ति का घोर विरोधी हूँ । इंदिरा ने भी लगभग शिकायती जैसे मैं कहा था मेरे पिता नहीं, सरकारी कामकाज के बारे में उस से कभी बात नहीं । कभी नहीं नहीं । मैंने कभी उनसे पूछा और उन्होंने खुद भी कोई सूचना मुझे कभी नहीं दी । नेहरू की मृत्यु से पहले ही लोग अमूमन ये मानने लगे थे कि दिखने में छोटे से दुबले पतले, मगर दृढनिश्चयी नंबर और सम्माननीय लालबहादुर शास्त्री ही अगले प्रधानमंत्री होंगे । नेहरू ने भी शास्त्री के लिए भरपूर अनुमोदन जताया था नेहरू को दरअसल अपने साथ ही शास्त्री पर गहरा भरोसा था । उनको वे और अधिक सत्ता हस्तांतरित करने को तैयार देखने लगे थे । साल में रेल दुर्घटना के बाद लाल बहादुर शास्त्री ने रेलवे मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया तो नेहरू ने मुझे लक्ष्मी को लिखा । इस बात पर पूरे देश में जिस पर पश्चाताप जताया जा रहा है इससे पता चलता है । लाल बहादुर कितने अधिक लोकप्रिय हैं? मैं देख कर बहुत खुश हूँ कि अतिरिक्त जिम्मेदारियों के निर्वाह में कितने पर पक्का हो गए हैं । अपनी मृत्यु से छह महीने पहले ही नेहरू ने अपनी अधिकतर जिम्मेदारियाँ शास्त्री को सौंप दी थी, जिन्हें कामराज प्लान में मंत्री पद से इस्तीफा दे देने के बाद भी मंत्रिमंडल में अचानक दोबारा शामिल कर लिया गया था । नेहरू के जीवन की सांस इस तेजी से डालने लगी थी और में भारत चीन युद्ध के बाद वेतन और मन से जिस गहराई तक रहे थे, उसे देखकर कांग्रेस पार्टी ने उन्नीस सौ बासठ में ही अपनी रणनीति बना ली थी । कामराज प्लान के रूप में मशहूर ये ऐसी रणनीति थी । जाहिर है, लोगों के साथ कांग्रेस के संपर्क को उन्हें स्थापित करने के लिए से बनाया गया था । जो लोग लगातार विभिन्न उच्च पदों पर विराजमान थे, ऐसी धारणा बनी कि जनता से उनका संपर्क खत्म हो गया था । कामराज योजना के मुताबिक वरिष्ठ कांग्रेसियों को भले ही वह मुख्यमंत्री हूँ, क्या फिर कैबिनेट मंत्री अपने पद को त्यागकर पार्टी के काम नहीं छुप जाना था? काम राज्य हो जाने का मतलब था उन्हें पद से हटाकर पार्टी के लिए धरातल पर काम करने को भेजा गया । कुछ लोगों की राय में योजना इंदिरा के चतुर दिमाग की दूरगामी सोच की उपज थी । नेहरू के आखिरी दिनों में राजनीतिक प्रतिद्वंदियों को ठिकाने लगाने की शादी । चार । इंदिरा ने हालांकि ये दावा किया कि उन्हें इसकी भनक ही नहीं थी । मैं तो अपने पिता के साथ पहलगांव में थी । श्री बीजू पटनायक नमक से इस योजना का प्रस्ताव किया । मुझे ये नहीं पता था ये श्री कामराज के दिमाग की उपज थे । मैंने पूछा लोगों की प्रतिक्रिया क्या होगी? उनका जवाब था मैं उन्हें समझा होगा । बहुत दिनों में सुना ये वाकई श्री कामराज की ही योजना थी । उसके बाद योजना के लिए प्रतिबद्धता और उसे एक झटके में लागू किया जाना । उसके लिए इंदिरा का पत्ता समर्थन होना भी चलता है । योजना के पीछे ये बात भी साफ थी कि वह सत्ता को अपने हाथों में समेटना चाहती थी । उनके शातिर दिमाग झडक इस बात में भी मिलती है कि वे तमाम बडे नेताओं के पर उतर कार सबको बराबरी पर लाना चाहती थी ताकि उन में से कोई भी खुद को नेहरू के उत्तराधिकारी के तौर पर पेश न कर सके । नेहरू ने खुद भी इस योजना को भरपूर अनुमोदित किया । वो जैसे पत्ते भी मिलते हैं । उन्हीं के दिमाग की उपज थी और कहा था ये ऐसी सोच थी जो अचानक सूजी और खुद ब खुद धीरे धीरे बढती गई । योजना के तहत छह कैबिनेट मंत्रियों और छह सबसे सत्तावन मुख्यमंत्रियों ने अपने पदों को त्याग दिया । इस बता मोरारजी देसाई, लालबहादुर शास्त्री, जगजीवन राम, खुद कामराज, बीजू पटनायक और इसके पाटल आदि अपने पदों से इस्तीफा देकर पार्टी के लिए काम करने चले गए । इस प्रकार मोरारजी और उनके समकक्ष अन्य नेता बराबरी पर आ गए । योजना का नामकरण कुमार सोनी कामराज के नाम पर हुआ । घनी मूंछों और हट्टे कट्टे वजूद वाले कामराज तब तमिलनाडु के मुख्यमंत्री थे । वो इतिहास में किंगमेकर के रूप में दर्ज तो हुए साथ ही उम्मीद सूत्री चढ गयी । कांग्रेस अध्यक्ष बने काम रात में ही अन्य अनुभवी बुजुर्ग नेताओं को मिलाकर वो गुड बनाया था जो सिंडिकेट के नाम से मशहूर हुआ । सिंडीकेट में स्वतंत्रता आन्दोलन और राजनीति में तपे तपाए वो बहादुर लडाके नेता शामिल थे तो कांग्रेस के सत्ता संपन्न छत्रक थे और मैं शामिल थे । पश्चिम बंगाल के दुर्जेय संगठक अतुल्य हो बाद में कर्नाटक बने तत्कालीन मैसूर राज्य के चश्मा धारी मगर शक्तिशाली सिद्धू वन हल्ली निजलिंगप्पा स्वतंत्रता आन्दोलन के विकेट नेता और आंध्र प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री एन । संजीव रेड्डी और विद्वान जबरदस्त वक्ता तथा बम्बई के बेताज बादशाह फैलाने वाले सदाशिव कानून जी । एस । के । पाटिल नेहरू दरअसल संघवाद यानी ऍम को संसदीय प्रणाली की कुंजी मानते थे । यह बात दीगर है कि वो अपनी कल्पना के अनुसार संघवाद की जडें उतनी गहराई तक जमा कर उसे संस्थागत रूप नहीं दे पाए जितना चाहते थे । बावजूद इसके उन्होंने छत्रपों के साथ परस्पर सम्मानजनक ढंग से सहयोग किया क्योंकि उनकी मान्यता थी कि भारत दरअसल राजनीतिक हम सांस्कृतिक विविधता से ही मजबूत पडेगा । नेहरू के किसी भी उत्तराधिकारी के चरणों में आपने वफादारी समर्थक करने में नाकाम इन क्षत्रपों का मानना था उनके अवसान के बाद पार्टी सामूहिक नेतृत्व के आधार पर अपना दबदबा बरकरार पाएगी । नेहरू की मृत्यु गए कुछ ही समय बाद कामराज ने कहा था, राष्ट्रीय परिदृश्य से नेहरू की विदाई के बाद हुए खालीपन को कोई भी नेता अकेले भर पाने के लायक नहीं है । इसलिए पार्टी को सामूहिक नेतृत्व, सामूहिक दायित्व और सामूहिक रंग ढंग के सिद्धांत पर अमल करना होगा । इस प्रकार कांग्रेस के सप्ताह सिंडिकेट के हाथों में केंद्रित हो गई । नेहरू की मृत्यु होने पर वही लोग भाग्य नियंता हो गए, उन का दबदबा तो खाता था, मगर उनकी दृष्टि अपने प्रादेशिक नजरिए के कारण बहुत सीमित थे । शारदा प्रसाद लिखते हैं, सिंडिकेट में शामिल क्षेत्रीय वर्चस्व नहीं, अब वह थे । मगर उनमें से किसी के भी व्यक्तित्व में नेहरू पत्ते अथवा आजाद जैसी विराटता नहित नहीं है । वेस्ट महत्वपूर्ण तथ्य को समझने में नाकाम रहे । प्रधानमंत्री का किसी भी समूह के आगे नतमस्तक होना दरअसल संसदीय लोकतंत्र की मूल भावना के विपरीत था । नेहरू की मृत्यु के वक्त कांग्रेस की चमक भी फीकी पडने लगी थी । क्षेत्रीय और भाषाई अस्मिता के मुखर होने के कारण सौ पचास के दशक में भाषाई आधार पर राज्यों का पुनर्गठन हो चुका था । अब प्रभुत्वशाली जातियों को पिछडी जातियों से चुनौती मिलने लगी थी । कांग्रेस की स्थापित प्रणाली प्रभावशाली व्यक्तित्वों की छत्रछाया की श्रृंखला के जरिए सत्ता में बने रहने अथवा वोट पाने के लिए छत्रपों परनिर्भरता की चूलें हिलने लगी थी । राजनीतिक परिदृश्य में वामपंथियों का उदय हो चुका था और उन्होंने कांग्रेस की छत्रछाया में से गांवों के गरीबों को अपने बारे में खींचना शुरू कर दिया था । कांग्रेस की मध्यम वाम धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक पहचान को एक और तो वामपंथियों से कडी चुनौती मिलने शुरू हो गई थी । वहीं दूसरी और जनसंघ के झंडे तले लामबंद हो रहे हैं तो की और से हिंदूवादी राजनीति की पूंछ भी लगातार बढ कर कांग्रेस को डराने लगी थी । जनसंघ को दरअसल कांग्रेस में मौजूद रूढिवादी हिन्दू तब तो भी अपनाने लगे थे । नेहरू की समाजवादी नीतियों से नाराज होकर कांग्रेस से पल्ला झाडना चाहते थे । सांप्रदायिक तनाव सुतर्रा रूप में पसंद नहीं लगा था । बार बार दंगे होने लगे थे । उन्नीस सौ इकसठ में जबलपुर में हुए भीषण दंगे तो यहाँ तक नारे लग गए पाकिस्तान या कब्रिस्तान । सारे का मतलब सब था कि मुसलमान या तो पाकिस्तान चले जाएं वरना उनकी हत्या कर दी जाएगी । इस साहिर है कि धर्म के नाम पर हिंदूवादी उग्रवाद बढ रहा था । कांग्रेस के सामने जब नई और विविध चुनौतियां पेश आ रही थी ऍम उसी भी उसका असाधारण नेता दुनिया से विदा हो गया । नेहरू की मृत्यु के बाद पहले प्रधानमंत्री की इच्छा के अनुरूप सिंडीकेट ने अपना समर्थन शास्त्री को दिया । हालांकि सबकी जुबान पर यही बात थी कि बेहद सक्षम मोरारजी देसाई को जान बूझकर वंचित किया गया । सत्तर साल के लपेटे में पहुंच चुके देसाई हालांकि नेहरू के मंत्रिमंडल में प्रधानमंत्री का पद संभाल चुके थे मगर सब सिद्धांतवादी होने के कारण अकेले पड जाते थे । राहुल प्रशासन तो थे ही अगर सिंडिकेट को उनसे सबसे बडा खतरा यही था कि वह सत्ता को अपने मुठ्ठी में करके उन सब की छुट्टी कर देंगे । नैतिक मूल्यों के प्रबल हानि देसाई शराबबंदी के लिए चुम्मी थे । उन्होंने फिल्मों में चुंबन को किसी भी प्रकार से दिखाने को प्रतिबंधित कर दिया था । मोरारजी भाई का दिल्ली में कांग्रेस सरकार की पेचीदा राजनीति से इसीलिए शायद कभी तालमेल नहीं बैठ पाया । इंदिरा को मोरारजी से डर भी लगता था और उनसे नफरत की थी । उनके कथित दक्षिणपंथी रूझान के प्रति हमेशा शंकित रहती थी । नेहरूवादी उन्नीस सौ पचास के दशक के आदर्शवाद से भटकते हुए कांग्रेस उन्नीस सौ साठ के दशक में सत्ता में बने रहने की खातिर समझौता परस्ती पर उतारू हो गई थी । मोरारजी क्योंकि कडाई से मूल गांधीवाद के पालन के हामिद थे इसलिए नेहरू के बाद कांग्रेस का नया नेतृत्व उनसे घबराने और डरने के कारण उन्हें किनारे कर देने पर आमादा था । लाल बहादुर शास्त्री को नौ जून उन्नीस सौ को बकायदा प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाने के साथ ही जहाँ सिंडिकेट हावी हुआ वहीं मोरारजी भाई को नीचा देखना पडा । शास्त्री ने इंदिरा गांधी को अपने मंत्रिमंडल में शामिल किया क्योंकि वह नेहरू की बेटी थी और इस नाते नई सरकार तथा नेहरू और स्वतंत्रता संग्राम के आधार मंडल के बीच महत्वपूर्ण कडी साबित हो सकती थी । उन्होंने ये जानते हुए ही इंदिरा में उन्हें पछाडने की पूरी काबिलियत थी । उन्हें सूचना और प्रसारण जैसे अपेक्षाकृत हल्के मंत्रालय का प्रभारी बनाया था । शास्त्री के जीवनी लेखक सीपी श्रीवास्तव ने लिखा है, नेहरू के देहांत के तीन दिन बाद ही शास्त्री ने इंदिरा को ये कहने के लिए फोन किया अब आप मुल्क को संभाल लीजिए लेकिन उन्होंने इस समझना कर दिया । बाद में उनका कहना था की उनकी एक नहीं चली और शास्त्री के मंत्रिमंडल में शामिल होने के लिए उन पर दबाव डाला गया । उनकी कथित जैसे आपको वेलेस हैंं गन्ने सत्ता के नजदीक रहने की । उनके सत्रह के बावजूद राजनीतिक महत्वाकांक्षा से इनकार करने की उनकी आदत पता है । यदि वो वाकई इतनी ही ज्यादा अन बनी थी तो सरकार में शामिल होने के लिए उन्होंने हामी क्यों भरी । वो भी तब जबकि उन्होंने एक ही साल पहले डोसी नॉर्मन को लिखा था । वो हमेशा के लिए भारत को छोडना चाहते थे । इंदिरा गांधी सुर्खियों में रहने की आदी थी । जीवन भर सबसे महत्वपूर्ण बनी रही और समय की किताब में कुमराह बंद हो जाने वाली नहीं थी । मंत्री पद की शपथ लेने के बाद उन्नीस सौ चौंसठ में उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुईं क्योंकि उन्होंने नेहरू के चुनाव क्षेत्र फूलपुर से उप चुनाव नहीं लडना तय किया था । सूचना और प्रसारण मंत्रालय तक सीमित कर दिए जाने से तो मंत्री पद संभालने के बाद से ही परेशान थी और बहुत इस बात से अपमानित और खुद को अलग थलग महसूस कर दी थी । भास्कर हो पश्चिम बंगाल के तबादले पर मंत्रालय ने उप सचिव बनकर आए तो उनसे उन्होंने पहला सवाल ये पूछा था हमारी पार्टी का प्रबंध उत्तरी बंगाल में कैसा चल रहा है और स्थानीय विधायक कैसा काम कर रहे हैं? उनकी दिलचस्पी पूरी तरह कांग्रेस के राजनीतिक भविष्य में थी । ये लगभग ऐसा ही था । मानव को तत्कालीन नेतृत्व के प्रति आश्वस्त नहीं थी और इस बात से चिंतित थी । शास्त्री के बस का ये काम नहीं था । इंदिरा ने बाद में कहा थी, शास्त्री सब कुछ सक्षम थे अथवा नहीं । मगर वो हमेशा कहते थे कि पंडित जी के बाद वो तो मामूली व्यक्ति ही थे । इससे लोग असुरक्षित महसूस करने लगे । नेतृत्व जो भी करें उसे अपने नेता होने पर भरोसा होना चाहिए । शुरू में लोग बडे ही उनकी सादगी के कायल रहे । मगर वो ये भी सोचते थे कि कहीं इससे शक्ति पर असर तो नहीं पडेगा । उनके पास शास्त्री का इंतजार करने का धैर्य नहीं था और जिस पद पर वह थे उसके दायित्वों के निर्भर के लिए वे उन्हें कमजोर और अक्षम मानते थे । वे तो उनकी सरकार के प्रति अनादर भी जताने से बात नहीं आती थी । सूचना प्रसारण मंत्री के रूप में उन्हें सफदरगंज रोड का नया मकान आवंटित किया गया तो पेडों और बागीचों से भरपूर लुटियन शैली का खूबसूरत ढांचा था सफदरगंज रोड । हालांकि अपेक्षाकृत छोटा बंगला था मगर उन्होंने अपने सार्वजनिक जीवन की पूरी उम्र किसी में गुजारे । इसी में उन्होंने लोगों से मुलाकात के लिए सुबह अपना दरबार लगना प्रारम्भ किया, जो अपने पिता की विरासत पर धीरे धीरे अपना दावा ठोकने की शुरुआत था । लोगों के बीच अपनी लोकप्रियता का प्रदर्शन करने से वो कभी नहीं चुकी थी और आने वाले महीनों में सत्ता पर इंदिरा की दावेदारी में यही सबसे महत्वपूर्ण कारक साबित होने वाला था । उसके दरवार उनकी दृष्टि में व्यवहारिक लोकतंत्र की मिसाल थे । मेरे हिसाब से लोकतंत्र को इसी तरह काम करना चाहिए । मुझसे मिलने हरेक तबके के लोग आते हैं । मध्यमवर्गीय गरीब उद्योगपति पेशेवर और मैं उनसे सूचना जमा करती हूँ । ये कोई शांतिकाल नहीं था । मद्रास में भाषाई दंगे छोडे हुए थे । अंग्रेजी की जगह हिंदी को भारत की राजभाषा बनाने की आशंका से प्रदर्शनकारी सडकों पर खुद आत्मदाह कर रहे थे । तमिलनाडू में इसी आंदोलन की पीठ पर चढकर द्रविड पार्टियों ने अपनी जगह बनाई । इंदिरा चीन से युद्ध के दौरान जिस प्रकार अचानक तेजपुर जा पहुंची थी उसी तरह मद्रास के लिए पहली उडान में बैठकर इंदिरा फिर से आंदोलन के गढ में जा को दें । वहां पहुंचकर हालात शांत करने के लिए आंदोलनकारियों से बात की जबकि प्रधानमंत्री चुपचाप दिल्ली में ही बैठे रहे । उन्होंने सूचना प्रसारण मंत्री के अपने अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण करके ऐसा जताया मानो वही सब कुछ संभाल नहीं हूँ । इंद्रा मल्होत्रा ने जब उन्हें याद दिलाया कि उन्होंने तो प्रधानमंत्री को भी पीछे छोड दिया तो भडक गयी बोलिंग मैं सूचना और प्रसारण मंत्री ही नहीं थी बल्कि मैं देश के नेताओं में शामिल हो । मैं भी आज इस्तीफा दे दूँ तो तुम्हें क्या लगता है ये सरकार बच पाएगी । मैं तो मैं बता रही हूँ कि ये नहीं बचेगी । मैंने प्रधानमंत्री के अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण किया है और यदि जरूरत पडी तो दोबारा करोंगे । नेहरू के बेटे देश को व्यवस्थित रहा पर अगर सरकार नहीं उनकी परिकल्पित व्यवस्था का काम पूरा करने से पहले चैन से कतई बैठने वाली नहीं थी, उनका ये दृढविश्वास उनके पिता की इच्छानुसार परिस्थितियों से निपटने के फैसले किया जाए । ऐसा करना उनके और सिर्फ नहीं के भाग्य में पता था । ये बात उनके दिमाग में इस कदर बैठ चुकी थी कि मंत्रिमंडल के पद में अनुसार उनकी हैसियत की सीमा क्या हूँ । वैसी छोटी छोटी बातें उनसे नजर अंदाज हो जाती थी । शास्त्री को उनके मन में प्रतिद्वंदता का भान हो गया और उन्होंने सरकार के ऊंचे गलियारों के दरवाजे उनके लिए बंद कर दिए । उसके बावजूद बाद नहीं आई और जनता की आवाज को समझने के तुरूप के इक्के की आड में उनके अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण करते रहेंगे । नेहरू की बेटी को काम करते दोबारा देखने का बडा मौका जल्द ही हाथ लग गया । उसी साल अगस्त में कश्मीर में भारी संकट खडा हुआ या होने लगी । पाकिस्तानी सेना के घुसपैठिये श्रीनगर में आ चुके थे और वहाँ के नागरिक सरकार को जल्दी उखाड फेंकने की तैयारी में थे । इंदिरा गांधी उन दिनों सहयोग से श्रीनगर में ही छुट्टियाँ मना रही थी, भारत नहीं । जम्मू कश्मीर में घुसपैठ के विरुद्ध पाकिस्तान पर जबरदस्त सैन्य हमला कर दिया और सौ पैंसठ के युद्ध की लडाई शुरू हो गई और खतरे की तमाम चेतावनियों को नजरंदाज करके इंदिरा कश्मीर में ही डेटिंग नहीं । इतना ही नहीं बकायदा हेलीकॉप्टर पर सवार होकर मोर्चे पर जा पहुंची और जवानों का मनोबल बढाने के लिए सैन्य शिविरों और अस्पतालों का दौरा करने लगी । वे उडकर रणनीतिक लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण हाजीपीर दर्रे तक जा पहुंची । इससे भारतीय सेना ने आपने अनेक जवानों की वीरगति की कीमत पर लडकर पाकिस्तान से छीन लिया था । उनके अचानक वहाँ पहुंचने से चकित जवानों ने उनका जोरदार नारेबाजी से स्वागत किया । हाजीपीर दर्रे पर कब्जे की जंग के अगुवा से पैसा ला मेजर रणजीतसिंह दयाल थे । बाद नहीं, दयाल साहब नहीं उन्नीस सौ चौरासी में अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर पर सेना के ऑपरेशन ब्लूस्टार की रणनीति बनाई । सैनिकों के बीच पहुंचकर इंदिरा के भी उल्लास का ठिकाना नहीं रहा । युद्ध लड रहे जवान मान उनके द्वारा भारत की जाबाज और लडाकू अंदाज में रक्षा का ही प्रतिरूप थे । चीन से युद्ध के बाद में लगातार सीमा पर तैनात जवानों के बीच आ जा रही थी और हथियारबंद सेना से मुझे विशेष लगाव हो गया था । खुशी के बारे मेरे लिए नारे लगा रहे जवानों से मैंने कहा कि हम हाजीपीर कतई नहीं लौटाएंगे । बूढी महिलाओं के मंत्रिमंडल में अकेला हूँ । हालांकि एकदम नारीवादी प्रशंसा नहीं है । मगर इस समय इन्दिरा के बारे में ऐसा ही कहा जाता था । वैसी छोकरी थी जिन्होंने ये दिखा दिया की लडाई में अटूट मर्दानगी के क्या मायने होते थे । उनके दिल्ली लौटने पर उन्होंने शास्त्री के अनमनेपन के बावजूद उन से मिलकर उन्हें युद्ध की दिशा तय करने के बारे में समझाने की कोशिश की । उन्होंने युद्ध की रणनीतियों के बारे में पूरा पडता ही लिख कर शास्त्री को दे डाला । तत्कालीन खबरों के अनुसार अच्छा सच्चाई शास्त्री ने अपने हाथ में मरे हुए चूहे की पूछ की तरह उस पर्चे कोकोनेट थामकर पूछा इसका क्या करेंगे? बावजूद इसके शास्त्री जल्द ही देश के नायक बनने वाले थे और नहीं रोकी बेटी फिर से अपने को किसी कोने में सिमटी हुई पाने वाली थी । पाकिस्तानी हम लोगों का भारतीय सैनिकों ने मुंहतोड जवाब दिया । सितंबर में संयुक्त राष्ट्र ने बिना शर्त युद्ध ग्राम का आह्वान किया और लडाई हो खत्म हुई थी । भारत ने कश्मीर हथियाने की पाकिस्तान की और एक कोशिश नाकाम कर दी थी और पाकिस्तानी सेना के दाम घटते कर दिए थे । साल उन्नीस सौ बासठ के मुकाबले उम्मीद सौ पैंसठ गर्वपूर्ण खडी थी और छोटे कद के शास्त्री की हैसियत दस फुट जितनी लंबी हो गई । उनका नारा जय जवान, जय किसान हर किसी की जवान था । शास्त्री को सोवियत संघ की मध्यस्थता में पाकिस्तान के आयुक्त खान से वार्ता के लिए पांच कर्मचार पडा । रास्ते की सफलता देखकर इंदिरा प्रिफर पडी । उन्होंने अपने बेटे संजय को लिखा, शास्त्री कमजोर थे मगर हमने उन्हें राष्ट्रनायक बना दिया । ऐसा लगता है संजय तभी से उनका राजनीतिक हमराज हो गया था । उन्होंने अपने निकटवर्ती सलाहकारों को बुलाया । इनमें शामिल थे प्रदेश उपमंत्री दिनेशसिंह, योजना आयोग के उपाध्यक्ष अशोक मेहता, तत्कालीन राज्यसभा सदस्य इंद्रकुमार गुजराल और पत्रकार रोमेश आपा । उन लोगों ने उनसे राजनीतिक छत पर अपना वाजिब हक हासिल करने की गुजारिश साल पैंसठ के युद्ध के बाद उनके मन में घूमती । राजनीतिक महत्वाकांक्षा, उनके कार्यकाल आपसे जाहिर होने लगी । ॅ और अधिक लोहा लेने के लिए खुद को तैयार करने लगी । जाहिर है कि अपनी आदत के मुताबिक सबसे वो लगातार इंकार कर दे रहे हैं । उन्होंने में विजय लक्ष्मी पंडित को लिखा, ये बात सोचकर विचित्र लग सकता है कि राजनीति में कोई व्यक्ति राजनीतिक महत्वाकांक्षा विहीन भी हो सकता है । लेकिन मुझे लगता है मैं वैसी ही सनकी हूँ आॅडीशन की थी । उन्हें पता था कि उनकी गति राजनीति में ही थी । उसके बावजूद वो दिखाने के लिए उस से इंकार करते रहेंगे । इसके बजाय वो बार बार यही बात दोहराती रही । शास्त्री ने अपने कामकाज से सिद्ध कर दिया कि वह दरअसल उनके पिता के पासंग भी नहीं थे । श्री शास्त्री ऐसे लोगों से घिरे हैं जो पश्चिमी गुटके समर्थक थे । साल के लिए रूसियों ने जब ताशकंद नहीं सुलहनामे की बैठक का सुझाव दिया तो शास्त्री ने पूछा इस बात का कहीं अमेरिका तो बुरा नहीं मान जाएगा । मुझे याद है इस रवैये से मैं बहुत परेशान थे क्योंकि मुझे लग रहा था कि हमें किसी भी देश को हमारे अंदरूनी मामलों में दखल देने को बढावा नहीं देना चाहिए । मुझे याद है समाजवादी रहा से कांग्रेस के भटकने के बारे में मुझे चेतावनी देनी पडी थी । पिता की मृत्यु के बाद रूढीवादी ताकतें सर उठाने लगी थी । शब्दकोश के अनुसार समाजवादी का मतलब था उनके समर्थक और रूढिवादी वो थे जो उनका विरोध करते थे । उनका साथ देने वाले सब समाजवादी और प्रगतिशील थे । मगर उनके मुकाबले सब अमेरिकी, पिट्ठू और दक्षिणपंथी विध्वंसक थे । हाँ, शास्त्रीय दी प्रधानमंत्री के रूप में जिंदा रहकर अपनी जडे जमाने में कामयाब हो जाते तो इंदिरा गांधी को शायद उनका कार्यकाल नेहरूवादी रास्ते से भटकाव के रूप में दिखाई देता है । वो होकर कहती थी, राष्ट्रीय जी जनसंघ के प्रति नरमी से पेश आने प्रतीत होते थे तो स्वभाव में अत्यंत रवि नाम हैं और कुछ लोग विनम्रता तथा समझौतापूर्ण व्यवहार की कमजोरी समझ लेते हैं । समय ने अचानक करवट ली और ऐतिहासिक दुर्घटना के कारण और इतिहास ऐसी दुर्घटनाओं से भरा पडा है । इनका फायदा उन लोगों को मिला जिनकी किस्मत ने इतिहास पर अपनी छाप छोडना लिखा हुआ है । मिसाल के लिए यदि उन्नीस सौ पचास में सरदार पटेल की मृत्यु होती तो क्या नेहरू निर्द्वंद्व भाव से राज कर पाते? भारत और पाकिस्तान के बीच ताशकंद समझौते के अगले दिन ग्यारह जनवरी उन्नीस सौ छियासठ की सुबह मात्र उन्नीस महीने प्रधानमंत्री रहे इकसठ वर्षीय लालबहादुर शास्त्री का देहांत हो गया । कांग्रेस में खलबली मच गई । चांदी कटने शास्त्री की जगह स्वीकार करने के लिए कामराज को मनाने की जी तोड कोशिश की । इसके जवाब में बताते हैं कि उन्होंने ये कहा हिंदी जानता हूँ अंग्रेजी अब फिर कैसे? चंडीगढ फिर से एक बात पर बैठ गई । मोरारजी को इस पद से दूर रखना होगा । उनके अडियल स्वभाव के कारण चंडीगढ के नेता डरते थे कि प्रधानमंत्री बनते ही वो निर्दोष होकर अपनी पैठ बना लेंगे और फिर से सत्ता का संतुलन उनके हाथ से निकल जाएगा । ऐसे हालत में सिंडिकेट की निगाहा अंततः नेहरू की बेटी पर जाते गी साल के आम चुनाव में महज तेरह महीने बाकी थे । वो राष्ट्रीय हसती थी, गुटों और क्षेत्रवाद से कहीं ऊपर थी । नेहरू का भी वही प्रत्यक्ष सूत्र थी और वोटरों को आकर्षित करने में उन सबसे अधिक काजल थी । वो महज अडतालीस साल की अपेक्षा कृत युवा थी । संसद में किसी सवाल का जवाब देते समय उनके हाथ पूरी तरह काम करते थे क्योंकि वे सार्वजनिक भाषण करते समय पूरी तरह खबर आ जाती थी । इसलिए उन्होंने सोचा कि अपनी प्रवर्ति के अनुसार की पृष्ठभूमि में ही रहना पसंद करेंगे । मृदुभाषी तो समझकर बोलने वाली थी वो पिछले चंडीगढ ने उन्हें निरापद माना । उनका महिला होना उनके लिए फायदेमंद साबित हुआ । इंदिरा ने कहा था, मैं भी बेटा होती तो नेहरू जी की इतनी मदद नहीं कर पाती । राजनीति की दुनिया उन हालात के प्रति कहीं अधिक संवेदनशील और चौकन् नहीं होती । महिला होना जहाँ उनके लिए मददगार था वहीं मुसीबत भी बन जाता था । सत्ता में मतदान सिंडिकेट को लगा कि वह निरापद तो रहेंगे ही, उनकी सत्ता को भी उनसे कोई चुनौती मिलने की गुंजाइश नहीं थी । उन्हें लगा सकता की सीढियाँ चढने के बावजूद वो नाम के लिए ही प्रधानमंत्री होंगे । चिकनी मिट्टी का ऐसा लाॅट इसे वह मन माफिक आकार में ढालते रहेंगे उनकी राय ने वो इंग्लैंड की महारानी के सवाल सरकार की लगभग प्रतिकात्मक मुखिया रहेंगी और ये लोग पर्दे के पीछे से राज करते रहेंगे । बीके नेहरू ने लिखा उनके लिए इंदिरा किसी अलग किशोरी के समान थी जिनके बारे में वे सोचते थे कि उन्हें मनमाने ढंग से चलाना आसान होगा । मुझे से लड किशोरी समझते थे उसे आंकडे में उनसे कितनी बडी भूल हुई ये उन्हें जल्द ही बाजी हारने पर समझ आ जाने वाला था । शारदा प्रसाद लिखते हैं, अपनी औकात से कम आंका जाना हमेशा फायदे मंद रहता है । उन्होंने देश को जल्द ही बता दिया कि राजनीतिक शतरंज की बिसात पर वो कितनी शातिर खिलाडी थी । पिछले अध्याय में हमने जैसा पाया अपने पिता के देहांत से एक साल पूर्व इंदिरा गांधी ने डोरोथी नार्मन को भारत छोड देने की अपनी इच्छा के बारे में लिखा था । यदि शास्त्री की मृत्यु होती यदि वह कनिष्ठ मंत्री ही बनी रहती तो शायद वो अंततः भारत छोडकर चले जाते हैं । समय ने ऐसी करवट ली शास्त्री की मृत्यु ने उन का रास्ता साफ कर दिया । सत्ता के शिखर पर पहुंचकर उन्होंने अपने बेटे राजीव को रॉबर्ट फ्रांस की ये पंक्तियां लिखें राजा बनने से महरूम रहना कितना अधिक कठिन है वो भी तब जबकि वह गुण आपके भीतर हो और हालात भी अनुकूल हो । पुपुल जयकर उनसे जब शास्त्री जी की मृत्यु के बाद मिलने आई तो उन्हें इंदिरा अपने उत्साह को छुपाती लगी है । बाहर से शांत मगर मन ही मन खुश । मेरे समर्थन के बिना कोई भी प्रधानमंत्री नहीं बन सकता । उन्होंने अपने पत्ते बडी होशियारी से चले देसाई जहाँ प्रधानमंत्री पद पर अपना दावा सार्वजनिक कर चुके थे, ये शरमाते हुए रणनीतिक चुप्पी धारण किए हुए रहे । बस इतना ही बोले कि वे कांग्रेस तथा उसके अध्यक्ष कामराज की इच्छा के अनुसार चलेंगी । मोरारजी ने अपने और इंदिरा के बीच खुले चुनाव की मांग की जिसमें कांग्रेस के सारे सांसद मतदान करें । नेतृत्व के लिए की उम्मीद फरवरी को गुप्त मतदान द्वारा इंदिरा को तीन सौ पचपन और मोरारजी को महज एक सौ उनहत्तर वोट मिले । इंदिरा गांधी ने उन्नीस सौ चौंसठ कि चौबीस जनवरी हो वर्ष की आयु में पहली बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली । उन्होंने स्वीकारा मोरारजी देसाई के विरुद्ध हवा ही बनी हुई थी । मुझे लगता है कि उस क्षण लोग मेरे पक्ष में होने से कहीं अधिक उनके खिलाफ थे । मान मनोवल और लोगों का मन जीतने के रणनीतिक कौशल से मेहरु मोरारजी को शास्त्री और इंदिरा दोनों से ही मात खानी पडे । इंदिरा ने सब के मन में ये बात बिठाने की कोशिश की कि वह आजादी के गौरवपूर्ण संघर्ष के आशीर्वाद से ही अपना पद संभालने जा रही थी । अपने चुनाव के दिन वो संसद भवन में आपने शौल पर गुलाब का फूल तंग कर पहुंची थी । बिल्कुल वैसे ही जैसे नेहरू अपनी शेरवानी पर गुलाब चाहते थे । पद की शपथ लेते समय भी उन्होंने मैं ईश्वर के नाम पर शपथ लेती हूँ । कहने के बजाय उन्होंने मैं विधिपूर्वक प्रतिज्ञा करदी हूँ । शब्दों का उच्चारण क्या वे सत्ता में नेहरू की परछाई थी? बेटी के सिर के ऊपर पहले प्रधानमंत्री की आत्मा मंडराती लगती थी । वे अगले ग्यारह साल प्रधानमंत्री रहने वाली थी । उस दौरान उनका जो कायापलट हुआ उसे कई विश्लेषक महाकाव्यात्मक बताते हैं । जिस व्यक्ति हुए नौसिखिया से लेकर निरंकुश कुलमाता किसी भी बयान कर सकते हैं कि उन का मामला काया पलट के बजाय उनके मूल स्वभाव का करवट लेना था । ये उनके व्यक्तित्व के ऐसे लक्षणों का प्रस्फुटन था जो उनके भीतर हमेशा से दबे हुए थे । पर्दा हटने भर से भीतरी गुण नमूदार हो गए थे । अलग बच्चा अब भले ही कांपते हाथों वाला बालिग युवा बन गया था मगर ये पूर्वाभ्यास के दौरान होने वाली स्वाभाविक घबराहट, भर्ती आखिरकार फैसले की रात आई तो अभिनय के दौरान ऐसी प्रतिभा निखर कर सबके सामने आई जो भीतर ही भीतर से से पढ रही थी । स्मार्टली याद करते हैं आरंभ वो एकदम असहाय देखती थी । वे आगे कहते हैं, साल में हुई उनकी प्रेस कॉन्फ्रेंस में जब पत्रकार चारों और से सवालों की बौछार कर रहे थे तो उनकी भी बन गई थी । किसी अन्य पत्रकार ने लिखा, उनकी अपनी कोई शैली ही नहीं है । यदि कोई शैली है भी तो दिखावटी है । उनकी हरेक जुंबिश मरहूम जवाहरलाल नेहरू की नकल भर लगती है । कुछ तो हर ढंग से नकल की गई । कुछ हास्यास्पद क्योंकि उससे मूलतत्व की मधुर यादें ताजा हो जाती हैं, लेकिन जल्द ही वह विशिष्ट शैली की छाप छोडने लगे । सिर्फ पांच साल बाद उनसे जब मैं बंगलादेश शुद्ध के दौरान मिला तो उनका व्यक्तित्व समूचा बदल चुका था । ऐसी शख्सियत जिसे आप साक्षात्कार के दौरान पछाड नहीं सकते थे, उनकी छरहरी काया से उनकी क्षमताओं का अनुमान लगाना असंभव हो गया था । उनके सचिवालय में उन्नीस सौ छियासठ में शामिल हुए नौकरशाह मनमोहन मौनी मल्होत्रा याद करते हैं, आप जब पहली बार उन्हें देखते थे, ये देखते हैं कि वो कितनी छोटी और दुबली पतली थी । तो तत्काल तो यही प्रतिक्रिया होती थी । भगवान भला करें देश को चलाने की कोशिश करने वाली यही औरत है । भगवान ऐसा वो कैसे कर लेती है । भारत को उस की पहली महिला प्रधानमंत्री मिली जिससे अपनी शख्सियत को महिला तक सीमित करने से साफ इंकार कर दिया । हालांकि पश्चिम में नारीवादी आंदोलन आगे बढ रहा था लेकिन उन्होंने खुद को किसी भी वैकल्पिक कोने में कैद करने से इंकार कर दिया । पूरी शिद्दत से मुख्यधारा में शामिल होने के अलावा उन्हें कुछ भी गवारा नहीं था । इस काम के बारे में मैं खुद को और अब समझकर कभी नहीं सोचती । यदि कोई स्त्री किसी भी पेशे के लिए योग्य है तो उसे उस पेशे में काम करने का अवसर मिलना चाहिए । मैं भी अपना काम करते समय खुद को और उसके रूप में नहीं आते हैं । मैं तो बस भारत की अपना नागरिक हूँ और इस देश की प्रथम से विकास देश से भी हूँ । आरंभ में तो ये अग्नि परीक्षा ही थी । अनुभवी न होने और अपने विरोधियों द्वारा हताश करने की हद तक खेले जाने के कारण संसद ने आवाज लडखडाने से उनकी कितनी बन जाती थी । उन्नीस सौ छियासठ उनके लिए बेहद डरावना था । इंदिरा ने भारत की सत्ता ऐसे समय में संभाली जबकि बारिश लगातार दो साल से रूठी हुई थी । भारत झूठें खाद्यान की जबरदस्त में और चावल लूटने के लिए मचे दंगों की चपेट में था । नागालैंड में उग्रवाद जारी था जो आदिवासी अलग राज्य मांग रहे थे और पंजाबी सुबह की मांग भी जोर पकड रही थी जिसका सीधा मतलब था सिख राज्य की सरेआम सांप्रदायिक मांग । अर्थव्यवस्था बुरी तरह लडखडा रही थी । समाचारों के अनुसार इक्कीस सौ चौरानवे करोड रुपये मूल्य के आयात के मुकाबले महज बारह सौ चौंसठ करोड रुपये मूल्य का माल ही निर्यात होने के कारण व्यापार घाटा नौ सौ तीस करोड रुपए जा पहुंचा था हूँ । संयुक्त राज्य अमेरिका नहीं । उन्नीस सौ पैंसठ के युद्ध के दौरान भारत और पाकिस्तान दोनों की सहायता करना बंद कर दिया था और अतिरिक्त खाद्यान्न वाले क्षेत्रों से खाद्यान्न संकट वाले क्षेत्रों को अनाज भेजने संबंधी खाद्यान वितरण प्रणाली का बता बैठ गया था । असंतोष सुलग रही उन सर्दियों में सरकार के खिलाफ ताशकंद समझौते के तहत हाजीपीर कर रहा है । पाकिस्तान का लौटा देने के कारण लोग गुस्से में थे । इंदिरा का संसद में जबरदस्त मखौल उडा और उन्हें तरह तरह के ताने सुनने पडे । नेहरू परिवार के ताजिंदगी आलोचक रहे समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया ने एक सेक्सिस्ट यानी लैंगिक भेदभाव से भरे हमले में यहाँ तक ताना दे डाला । ये तो और कुछ नहीं बस गूंगी गुडिया है । नटवर सिंह याद करते हैं, उन्होंने संसद में उनसे बेहद भद्दा व्यवहार किया । मीनू मसानी ना, किरन मुखर्जी लोहिया, इन्होंने उनकी दुर्गत का डाली चुटीले उन्मुक्त मसानी लंदन स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स के ग्रेजुएट और वकील, शानदार वक्ता और जुनूनी समाजवादी नाथ पाई । विद्वतापूर्ण और स्पष्टवादी लोग क्या और वामपंथी बॉक्स फूट से बडे वकील हीरेन मुखर्जी नेहरू के पसंदीदा सांसद । वो इतनी बढिया ऑफिस ओनियन अंग्रेजी बोलते थे । उनके भाषणों के दौरान नेहरू तक मंत्रमुग्ध होकर उन्हें सुनते थे, उन दूर गए और साहसी संसदीय प्रभाव में शामिल थे, जिनसे इंदिरा का अपने आरंभिक वर्षों में पारा पडा । ये ऐसे लोग थे जो खुले हम उनका मखौल उडाते थे और उनकी कमियों को मजे ले लेकर दोहराते हुए उन्हें नीचा दिखाने का कोई भी मौका नहीं कम आते थे । सोनिया गांधी ने हाल में एक साक्षात्कार में याद किया, बेंद्र का किस कदर उपहास उडाया जाता था, हाँ और याद करते हैं । आरंभिक दिनों में तो घबराहट के मारे उनका पेट ही खराब हो जाया करता था । बाद में भी उन्नीस सौ बहत्तर में उन्हें जब बजट पेश करना था तो वो इस कदर घबरा गई, उनके मुझसे आवाज निकलने ही बंद हो गई । मैंने उन्हें कुल्ले करने पे करने की सलाह दी है । मगर कोई उपाय कारगर नहीं हुआ । बोझ तो दरअसल उनके दिमाग पर था । ये तो अग्नि दीक्षा थी, जिसे वह कभी नहीं भुला पाई और इसी वजह से अपने बाद के सालों में संसद का दर्जा गिराकर उन नेहरू की तरह उनकी बहसों का आनंद लेने के बजाय उसका तिरस्कार करने लगी । नटवर सिंह आग्रहपूर्वक कहते हैं, उनकी वास्तव में कोई तुलना ही नहीं थी । सदन में नेहरू जब भी बोलने के लिए खडे होते थे और एक व्यक्ति खुद ब खुद बैठ जाता था और चुप चाप उन्हें सुनने लगता था । उन्हें तो वैसी जब कतई नहीं मिली । इंदिरा गांधी को उन्नीस सौ छियासठ में ये साफ पता था कि उनके सामने सबसे आवश्यक कार्य अनाज की समुचित मात्रा में आपूर्ति का प्रबंध करना था । खाद्यान के भंडार रीत रहे थे और अनाज के आयात के लिए विदेशी मुद्रा का भी भारी टोटा था । भुखमरी का खतरा सिर पर मंडरा रहा था । भारत को बिना मांगी खाद्यान और विदेशी मुद्रा देने के लिए राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन को मनाने के इरादे से मार्च के आखिरी दिनों में अमेरिका की यात्रा पर रवाना हुई । वो जब संयुक्त राज्य में पहुंची तो हालांकि वहाँ के कुछ अखबारों का शीर्षक था न्यू इंडियन लीडर । काम पे गए आधार भारत की नई नेता भीक मांगने चली आई । टेक्सस के ऊंचे पूरे जॉनसन के मन को भारत की सुरूचिपूर्ण युवा प्रधानमंत्री भाग गई । शानदार ढंग से सजीली ऑपरेशन से भरपूर गुफा शैली में बाल बनाकर, खूबसूरत चुनिंदा साडी पहनकर और ध्यानाकर्षक शिष्टाचार के बूते वहाँ छा गई । नटवर सिंह याद करते हैं विदेश में उन्होंने अपने पहनने ओढने तथा अपनी सात सजा पर खासा ध्यान दिया । सलीके से बने । बालो ऊंची एडी के जूतों को पहने हुए वो किसी महारानी जैसी लग रही थी । वो विलक्षण दिख रही थी । जॉनसन तो एकदम बिच ही गए और बोले की उनकी इच्छा है । इस लडकी का कोई नुकसान न होने पाए । इंदिरा ने बाद याद किया । अखबारों ने लिखा, राष्ट्रपति जॉनसन ने मेरी जैसी आवभगत की । वैसी आतुरता किसी भी राष्ट्रपति रहे, कभी किसी मेहमान के लिए नहीं दिखाई । वो रात के खाने पर आए, मगर वापस जाने का नाम ही नहीं ले रहे थे । उन दिनों उनका दौरा बेहद सफल रहा था । उनकी उपस् थिति से वशीभूत जॉनसन ने तीस लाख टन खाद्यान्न और नब्बे लाख डॉलर की सहायता देने का वादा कर दिया । हालांकि भारत को भी उन के बदले विश्व बैंक अंतरराष्ट्रीय मुद्रा को और अमेरिकी प्रशासन की इच्छा के अनुरूप आर्थिक सुधार शुरू करने थे । उन सुधारों में शामिल थे कृषि को ज्यादा से ज्यादा प्राथमिकता देना, निजी निवेश और निजी विदेशी निवेश को बढावा देने के और अधिक उपाय करना, सार्वजनिक प्रतिष्ठानों को कम तवज्जो देना और उन सबसे अधिक महत्वपूर्ण ये कि भारतीय रुपये का बडे पैमाने पर अवमूल्यन करना । शायद वे क्योंकि इस निर्णय के परिणामों को गहराई से समझ नहीं पाएंगे । इसलिए उन्हें तब तक शायद इस मुहावरे की जानकारी ही नहीं थी । स्वस्थ आर्थिक से एक खराब राजनीति है । शायद इसलिए कि अमेरिका में गर्मजोशी से हुए स्वागत और राष्ट्रपति जॉनसन से हुई अपनी बैठक के बेहद सकारात्मक रुख के कारण विश्वास ने आसमान पर थी । उन्होंने प्रधानमंत्री बनने के चार महीने में ही कडा फैसला करने का दुस्साहस किया । अमेरिका के अपने दौरे के मुखर विरोध को नजरअंदाज करके उन्होंने भारतीय रुपए का अवमूल्यन कर दिया । छह जून उन्नीस सौ छियासठ को किए गए इस मशहूर फैसले की खबर देते हुए टाइम्स ऑफ इंडिया ने पहले पन्ने पर बैनर हेडलाइन छापी, रुपये ॅ छत्तीस दशमलव पांच परसेंट रुपए का छत्तीस दशमलव पांच प्रतिशत अवमूल्यन वो बडी से तो बच गए । भारत दिवालियेपन की कगार से भी लौट आया । घरेलू उत्पादन में अंधाधुंध तेजी लाकर व्यापार घाटा कम करने में भी कामयाबी मिलेगी । लेकिन राजनीतिक मोर्चे पर तो हल्ला बोल की नौबत आ गई । अमेरिका से खाद्यान सहायता को ही अपमानजनक माना जा रहा था और ऊपर से अमेरिकी दबाव में रुपये के मूल्य नहीं । राजनीति की आग में ही डालकर उसे और भडका दिया । समाजवादी भारत निर्गुट आंदोलन का प्रामाणिक हुआ । अब हाथों में कटोरा लेकर अंकल सैम के हो हो, बिना नानुकुर किए सर झुकाकर तामील करने पर आमादा था । अवमूल्यन ने इंदिरा गांधी को सबकी नजरों में गिरा दिया । कांग्रेस कार्यसमिति ने भी इसके बहुत निंदा प्रस्ताव पारित किया । उनके पुराने साथ ही कृष्ण मेनन ने उन पर जबरदस्त जुबानी हमले की अगुवाई की । उनके वामपंथी रुझान वाले मित्रों और सलाहकारों, उनके निजी वफादारों के मंत्रणा दल के सदस्यों जैसे युवा नंदनी सत्पथी, जो समय लेखक और ओडिशा से सांसद तथा उनकी नजदीकी सहकर भी थी और बाद में ओडिशा के मुख्यमंत्री बनने वाली थी । उमाशंकर दीक्षित, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारका प्रसाद मिश्र और इंद्रकुमार गुजराल ने तत्काल समाजवादी राष्ट्रवादी नीतियों को फिर से अपनाने की वकालत की ताकि जनता का भरोसा फिर से पुख्ता किया जा सके और इस आरोप का भी मुकाबला किया जा सके । इंदिरा दरअसल अमेरिकी मिट्ठू बन गई थी । इतनी अप्रत्याशित और तीसरी आलोचना से सुधबुध खो बैठी इंदिरा तेजी से अपनी वाम धर्मनिरपेक्ष साहब को बचाने की राह पर चलने के लिए उन्होंने वियतनाम में अमेरिका द्वारा बमबारी और साम्राज्यवादी आक्रमण की तीखी निंदा की । पूंजी की आवक पर नियंत्रण खत्म करने जैसे और उदारवादी उपायों को अपनाने से परहेज किया । नवंबर में त्रिशूल लहराते हजारों नागा सन्यासियों के साथ हिंदू समूहों ने गौहत्या पर तत्काल रोक लगवाने के लिए संसद में घुसने की कोशिश की । बेकाबू भीड हिंसक हुई तो पुलिस ने गोली चला दी । बवाल में कुछ प्रदर्शनकारी मारे गए । इससे हालत और बिगड गए । दुकानों और इमारतों में आगजनी होने लगी । इससे काबू करने के लिए रात होते होते उम्मीद सौ सैंतालीस यानी आजादी के बाद पहली बार सेना को सडकों पर करना पडा । इंदिरा गांधी ने ये घोषणा करके अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि चमकाने की कोशिश की । वो गौरक्षकों के सामने कतई हथियार नहीं डालेगी । उनसे पहले नेहरू ने गौहत्या पर रोक लगाने से ये कहते हुए इंकार कर दिया था कि वे फिजूल, मूर्खतापूर्ण और बेहुदा मांग को मानने के बजाय इस्तीफा देना पसंद करेंगे । नेहरू की बेटी ने भी उसी नजरिये से बलवाई साधुओं की बुद्धि पर तरस खाते हुए कडाई से ही नहीं बल्कि बेरहमी से गौरक्षा आंदोलन को कुचल दिया । मौके का फायदा उठाकर उन्होंने गृहमंत्री गुलजारीलाल नंदा से इस्तीफा भी ले लिया क्योंकि उन्हें हमेशा वो ना पसंद थे । नंदा धर्मनिष्ठ हिंदू और गौरक्षा के लिए प्रतिबद्ध थे । अमेरिकी आलोचना परस्पर वामपंथ की और अचानक रुख मोड लेने को जाहिर है संयुक्त राज्य खत्म नहीं कर पाएगा । इंदिरा पर मोहित जॉनसर अब उनके द्वारा अमेरिका की निंदा किए जाने से आगबबूला हो गए । संयुक्त राज्य में आरंभ हुई मत्री टूट गई । खाद्यान् की खेप आने में तेज होने लगी । अमेरिका की अहमदाबाद पहले से ही बेहद धीरे धीरे और रुक रुक कर आ रही थी । वहाँ और दक्षिणपंथी हूँ । दोनों की ओर से देश है । गिरवी रखने के आरोप तो झेल ही नहीं थी । ऊपर से अनाज की आधी अधूरी खेत होने के कारण राजनीतिक पटल पर एक दम अकेली पड गई । ऐसा लगता है कि तब तक वो राजनीतिक प्रक्रिया को ठीक से समझ नहीं पाएंगे अथवा नीतियों की घोषणा से पहले राजनीतिक सहमती बनाने की तैयारी करने के गोर से वो अनजान थी । इसकी समझना होने के कारण जनता से अपने जुडाव के अपने यकीन नहीं हो रहा । भटक गए । उनका यह बयान उनके राजनीतिक अंदाज की झलक देता है । इसमें अपने ही धन के भीतर से आलोचना झेलने के बावजूद उन्होंने ऐलान किया, यहाँ सवाल यह है कि पार्टी किसको चाहती है और जानता किसको चाहती है? जनता के बीच मेरी लोकप्रियता एकछत्र है । नटवर सिंह कहते हैं, अवमूल्यन के फैसले पर उन्हें सचमुच रंज था । उन्हें उस फैसले की महत्ता अमेरिका में भारत के तत्कालीन राजदूत बीके नेहरू और उनके प्रमुख सचिव एलके झा जैसे दक्षिणपंथियों ने समझाई थी । बाद में उनको समझाया कि उनसे तो बडी भारी गलती हो गई । सिंडीकेट सरेआम धमकाने लगा । अपने पद और अस्तित्व के लिए उन के रहमोकरम पर निर्भर और निर्वाचित एवं नाम है इस जीव कि इतनी मजाल कैसे हो, ये स्वायत्त होकर सोचने और फैसले करने लगे । अवमूल्यन से पहले उनके द्वारा कामकाज तक को विश्वास में नहीं लेने से उनके और उनके पूर्व खैरख्वाहों के बीच हालत सैनी की खाई पैदा हो गयी । अवमूल्यन के कारण इंदिरा और कामराज के रास्ते जुदा जुदा होने की बुनियाद पड गई । सिंडिकेट को लगता था कि फैसलों के अनुमोदन का हक सिर्फ पार्टी को ही था, जबकि इंद्रा अपने बारे में उनके आरंभिक आकलन के ठीक विपरीत प्रधानमंत्री के रूप में अपनी प्रभुता पर जोर देने पर उतारू थी । कामराज गुस्से में बन बनाए । बडे आदमी की बेटी होकर छोटे लोगों जैसी गलती इंदिरा ने बारह जून को आकाशवाणी पर देश को भरोसे में लिया । मैं आपसे साथ साथ कह रही हूँ, रुपये के अवमूल्यन का फैसला कतई आसान नहीं था । हर एक देश की तारीख में ऐसे मौके आते हैं, जब उसकी इच्छाशक्ति कसौटी पर कसी जाती है और उसका भविष्य संकल्पबद्ध कार्यवाही तथा साहसिक फैसले करने की क्षमता पर निर्भर करता है । अमेरिकी मदद और अवमूल्यन के लिए अमेरिकी दबाव उन्नीस सौ छियासठ में राजनीतिक रूप से विस्फोटक पहले ही साबित हुए हो, मगर मैं तीन ही साल बाद एक अमेरिकी ने आकर भारत को उबारा । वे नेहरू के काल में पहली बार भारत आए थे । इतिहास में दर्ज हरित क्रांति ने उन्नीस सौ सत्तर के दशक में भारत को गेहूं, मक्का और चावल की पैदावार में आत्मनिर्भर बना दिया । हरित क्रांति की बुनियाद लाल बहादुर शास्त्री और उनके कृषि मंत्री सी । सुब्रमण्यम ने डाली थी । उस क्रांति के जनक थे आयोगों से आए नॉर्मन बोरलॉग । नोबेल पुरस्कार प्राप्त इस अमेरिकी कृषि विशेषज्ञ को दशकों बाद भारत सरकार पद्मविभूषण से सम्मानित करने वाली थी । प्रिया श्रीमती गांधी रुपए का अवमूल्यन क्या सिंडिकेट को तिलांजलि देने की और आपका पहला कदम था? चाहिए स्वायत्त रूप से काम करने के आपके संकल्प की उनके लिए पहली झलक थी । इस बात की पहली बात की थी क्या भले ही उनके द्वारा नियुक्त गूंगी गुडिया कितनी भी हूँ, मगर प्रधानमंत्री कि हत्यारों के प्रयोग के लिए आप खुद फैसला करेंगे और पार्टी के नंबरदारों का नहीं देखेंगे । आप उस कुर्सी पर बैठी थी, जिसकी आप सही मायनों में हकदार थी और उसी हिसाब से शासन करेंगी । इससे देश हित में उचित मानेंगे । आप ये भी जानती थी कि प्रधानमंत्री के रूप में काम करने और नेहरू के सपनों का भारत बनाने के लिए आपको उनकी मन मर्जी से कभी भी दिए गए अधिकारों से कहीं अधिक स्वायत्तता चाहिए थी । आपको नियंत्रन से नफरत थी, जो पार्टी के बहुत लोगों की नजर में वो आप पर लगाते रहे थे । कामराज चाहते थे सत्ता को सिर्फ पार्टी के नेताओं के साथ ही नहीं बल्कि राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ भी साझा किया जाए । जाहिर है कि सत्ता को इस तरह साझा करते ही आपको प्रधानमंत्री के रूप में हाथ पर हाथ धरकर बैठना पड जाता और राजकाज ठप हो जाता । नेहरू को सत्ता को साझा करने की जरूरत अभी इसलिए नहीं पडी, उनका कद सबसे ऊंचा था । लेकिन आप के समर्थकों को लगता था कि आपको पार्टी के बहुत लोगों पर चोट करनी चाहिए । जबकि आपके आलोचक कहते थे क्या आम सहमती से रात नहीं चला पा रही और निर्णय करने के सारे अधिकार अपनी मुट्ठी में करना चाहती थी? क्या तक आपको यह लग गया था आपकी पार्टी के बहुत लोगों को आप बेहद असहनीय होती जा रही थी और उनके तथा आपके बीच साझेदारी नहीं चल पाएगी । क्या अवमूल्यन के मुद्दे पर कटे बवाल ने आपको ये अच्छी तरह समझा दिया था कि आगे से हर एक फैसले को लोकप्रियता और जनसमर्थन की कसौटी पर प्रश्न जरूरी होगा क्योंकि आपके प्रतिद्वंदी पीठ में खंजर भोंकने को तब पर थे भारत की आजादी बीस साल गिरा के साल इंदिरा पचास साल की होने वाली थी । अपनी स्वीकारोक्ति के अनुसार बेहद चुस्त दुरुस्त थी और रोजाना नियमित योग करती थी । इसी साल उन की सहनशीलता की परीक्षा हुई । आम चुनाव नियत समय पर फरवरी में हुए उन पर और भी सेक्सिस्ट टिप्पणियों की बौछार की गई । राममनोहर लोहिया ने लोगों का आह्वान किया कि वे कांग्रेस को सत्ता से उखाड है कि ताकि बिहारी स्त्री को अपनी बर्दाश्त थे, अधिक पीडा और परेशानी न झेलनी पडे । इंदिरा तो धुआंधार चुनाव प्रचार कर रही थी । इसके दौरान भुवनेश्वर में उनकी ना की हड्डी भी टूट गई क्योंकि भीड में से किसी ने उनके चेहरे पर सामने से पत्थर दे मारा था । वो फिर भी डटी रही और पत्थरबाज भीड पर चलाई क्या भ्रष्टता है? मुकाबले में डटे रहने पर उतारू होकर उन्होंने सभा डर सभा चुनाव प्रचार जारी रखा, भले ही उनकी नाक पर चढी पट्टी ने उनका आधा चेहरा ढाकरिया था जिससे वे उन्ही के शब्दों में बैटमेन जैसी लगने लगी थी । ना की हड्डी टूटने के बाद बिना की प्लास्टिक सर्जरी करवाने की भी सोचने लगी थी और उन्होंने इस बारे में डॉरोथी नॉर्मल को लिखा नहीं था । प्लास्टिक सर्जरी के बारे में जब से सुना था मैं अपनी ना का कुछ करवाना चाहती रही हूँ । मुझे लगा की रस्मी हल्ले गुल्ले के बिना ये तभी हो सकता है जबकि छुटपुट एक्सीडेंट हो जाए इसकी वजह से मैं इसमें ठीक करा सकूँ । लेकिन वो इस कॉस्मेटिक सर्जरी के लिए कभी समय ही नहीं निकाल पाएं और सारी जिंदगी अपनी लंबी न की दुखद याद के साथ ही जीती रहें । वे तो सुसंस्कृत मेमसाहब थी । भारत की जनता के लिए कौतूहल फॅसने है की प्रति जो उन्नीस सौ साठ के दशक में भी मेम साहबों की एक झलक पाने को आतुर रहती थी । उसके साथ ही साथ बीमा प्रभाव की कोमलता भरी झाप भी अपने श्रोताओं के मन पर छोडती थी जिससे भारतीय गृहणियां बेहद प्रभावित होती थी । उनके एक जीवनीकार ने भी लिखा है कि अभी जांच और लोकलुभावन नारों का यही अदृश्य मेल उनकी राजनीतिक सफलता का रास्ता सिंडिकेट से घिरी होने के कारण उन्होंने उन्नीस सौ सडसठ का चुनाव अभियान किसी विरांगना के सवाल लडा और भारत के सभी लोगों को ऐसे लहजे में अपना परिवार बताकर लोगों का दिल जीता । इसकी नकल कुछ नेता आज कल भी कर रहे हैं । छोटी सी स्त्री मद्रासी छोकरी ने लोगों के दिलों में अपनी जगह बनाने की ठानी और ये कहते हुए गले लगाने से भी परहेज नहीं किया । आप ही मेरा परिवार हैं । मेरे करोडों परिवारजन इनकी मुझे देखभाल करनी है । उन्हें पता था कि परिवार की भाषा ऐसा संसाधन है । इसे सिंडिकेट वाले कभी नहीं पा सकते थे । क्या कामराज भीड के अरब पर सवार होकर हर बार लोगों का वैसा ही प्यार पा सकते थे? क्या मोरारजी में वह हुनर था? लडती आवाज वाली काफी लडकी तो ना जाने कहां ओझल हो गई थी । घबराहट में बार बार पहलू बदलने की मुद्रा की जगह अब साडी और तेज कदमों ने ले ली थी । उनकी आवाज हालांकि अभी पतली ही थी मगर नई ऊर्जा ने उनमें जोश भर दिया था । अक्सर उनके चेहरे पर आने वाले शर्मीले उबाऊ भाव बदल चुके थे । अब उनकी थोडी दृढता से बनी होती थी । उनकी ठीक इसी मुस्कराहट भी आत्मविश्वास से लबरेज चमकती आंखों वाली मोहक मुस्कान में बदल चुकी है । उन्होंने इसी चुनाव में रोज गांधी के चुनाव क्षेत्र रायबरेली से पहली बार चुनाव लडा । शायद रोज की गरीब परस्त वाम पैरोकारी की विरासत पर दावा करना चाहती थी । रायबरेली के बुजुर्गवार को उनका वो चुनाव प्रचार अब भी याद है । उस समय कांग्रेस सेवादल के युवा सदस्य रहे दीनदयाल शास्त्री कहते हैं वो यहाँ पर हूँ के रूप में आई थी । उनके सिर का पल्लू कभी नहीं पडता था और वो जनता के बीच में जा घुसती थी । उन्होंने जब फिरोज गांधी के लिए चुनाव प्रचार किया था, हम उन्हें तभी से जानते थे । वो खुद के गरीब परस्त होने की छवि पर भरोसा कर रही थी और कोशिश कर रही थी कि आम आदमी का समर्थन पा सकें । राजनीति के मंत्रं से नई देवी निकलकर आई थी इंदिरा गांधी आम जनता की मसीहा । उन्हें सुनने के लिए अच्छा भीड जुटने लगी । गरीबों के लिए उम्मीद की बात सुनने के लिए मानव उनकी आवाज वंचितों और दबे कुचलों की आवाज बनने वाली थी । विचारधारा राजनीति की वाहक बनने के बजाय उसकी पिछलग्गू बन गई । इंदिरा गांधी के लिए विचारधारा यू भी प्रतिबद्धता नहीं बल्कि सत्ता हथियाने का उपकरण मात्र थी । विचारधारा का महत्व उनके लिए तभी तक था जब तक वो सत्ता दिला सकें । उसके लिए वैसी प्रतिबद्धता तो कतई नहीं थी, जैसी नेहरू अथवा फिर उसके भीतर दी । ये रुपये के अवमूल्यन से लगे झटके का सबका था । आर्थिक निर्णयों को उनके राजनीतिक परिणामों के तराजू पर तोला जाना जरूरी है । यदि उसका राजनीतिक नतीजा फायदेमंद होने का भरोसा हो तो आर्थिकी को भी उसी राह पर चलना पडता है । उनके भीतर सच को परखने का माद्दा अब तक नहीं था । के नेताओं को आर्थिक नीतियों यानी अवमूल्यन जैसी के लिए अनुकूल राजनीतिक माहौल बनाना पडता है । जान है, वे लागू करना चाहते हैं । राजनीतिक सहमती निर्माण की कोशिश के बजाय उनकी राजनीति टकराव और लाठी डंडे की थी । अपने प्रतिद्वंदियों से मुकाबले के लिए इंदिरा गांधी ने लोकलुभावन आर्थिक नीतियों और जनता से भावनात्मक बंधन को सबसे कामयाब उपकरणों के रूप में प्रयोग किया और इनकी हमेशा अहमियत रहने वाली थी । बावजूद इसके वोट खींचने की उनकी पहली परीक्षा के नतीजे योजना पर पूरी तरह खरे नहीं उतरे । कांग्रेस के वोटों की संख्या में बहुत घट गई । सिंडीकेट का सूपडा साफ हुआ और अपने ही घरों में उन्हें धूल चाटनी पडी । कामराज किसी काल्पनिक पछाड के समान द्रविड मुनेत्र कडगम प्रमुख के अट्ठाईस वर्षीय छात्र नेता से पूरी तरह चुनाव हार गए । अजी एसके बाटेल्को अपना से जॉर्ज फर्नांडीज नहीं मुंबई में पटक नहीं दे दी । अपनी सी उपलब्धि के बूते जॉर्ज को जॉर्ज फॅस मिला । मतदाताओं ने ओडिशा में बीजू पटनायक पता पश्चिम बंगाल में अतुल्य घोष को भी ठुकरा दिया । सिंडीकेट ठारी मगर इंदिरा गांधी जीत गई । रायबरेली के चुनाव में वे भारी बहुमत से विजयी रही । अपने नेतृत्व में हुए पहले ही चुनाव में मिली उत्साहजनक जीत से पुपुल जयकर को अपनी दोस्त की पहुंची खेली हुई मिली और उनका कहना था कि कांग्रेस के बुजुर्ग नेताओं का जनता से नाता टूट चुका था । शुद्ध हो गया चांदी कैट को उसकी औकात बताने के बाद वो अकेली हो जाने वाली थी, जिससे आने वाले सालों में उन के सबसे अच्छे और सबसे पूरे पहलू नमूदार होने वाले थे । कांग्रेस को उन्नीस सौ सडसठ के चुनाव से गहरा झटका लगा । राजनीति विज्ञानी रजनी कोठारी जैसा लिखते हैं, ये भारतीय राजनीति में निर्णायक सब हुए । स्वतंत्र भारत में पहली बार कांग्रेस के आधिपत्य को गंभीर चुनौती मिली थी । कांग्रेस दो सौ तेरह सीटों के मामूली बहुमत के साथ सदन में जीत कराई थी । स्वतंत्र पार्टी और भारतीय जनसंघ के प्रति चंद समर्थन में देशभर में जबरदस्त बढोतरी हुई । इन दोनों ही दलों को इंद्रा, हमारी धर्मनिरपेक्षता, हमारे समाजवाद और हमारी विदेश नीति की सर असर विरोधी मानती थी । स्वतंत्र पार्टी अथवा दक्षिणपंथी दल नहीं, चौवालीस सीट जीतकर और हिंदू पुनरुत्थानवादी भारतीय जनसंघ ने पैंतीस सीटें जीतकर जबरदस्त बढत दर्ज की । उसी साल राज्यों के विधानसभा चुनाव में महान अनुभवी दल को मतदाता ने कई राज्यों में ठुकरा दिया । उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे हिंदी पट्टी के रीड दुवा राज्यों सहित केरल, पंजाब, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, राजस्थान, तमिलनाडु में कांग्रेस की कमर टूट गई और कांग्रेस के विरोधी वामपंथियों, अकालियों प्रमुख तथा संयुक्त विधायक दल ने उसकी जगह सत्ता हासिल कर ली । संयुक्त विधायक दल हालांकि सब यही गठबंधन ही साबित हुआ । कांग्रेस का देशव्यापी स्तर पर इतने जबरदस्त स्वरूप से पहली बार ही साहब का पडा था और अनेक पर्यवेक्षकों ने इसकी वजह बहुत क्या बंदी के लिए दिल्ली आर्डर टेस्ट साधुओं के प्रति अपना ही बर्बरता बताएंगे । इंदिरा गांधी इसका जवाब अपने चिरपरिचित मास्टर फॅस इंद्रा यानी अमन की प्रतीक इंदिरा ठोक कर देने वाली थी । क्या दी उन्नीसवी सदी और बीसवीं सदी के आरंभ में फॅसने का अथवा ब्रिटिश साम्राज्य के आधिपत्य के कारण दुनिया भर में अपेक्षाकृत शांति रहेगी तो उसी तरह फॅस । इंदिरा भी इंदिरा गांधी के आधिपत्य द्वारा स्थापित हुआ । इंदिरा गांधी की साम्राज्यवादी लहजे में थोडी गई व्यवस्था थी । फॅस । इंद्रा तभी तो करती थी, जब उनका मुकाबला उनकी राय में अव्यवस्था से होता था । साल उन्नीस सौ उनहत्तर आते आते पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, बिहार और पंजाब में राष्ट्रपति शासन लागू हो गया । टूट की कगार पर खडी पार्टी में इंदिरा और सिंडिकेट साथ साथ शांतिपूर्वक नहीं रह सकते थे और करो या मरो का टकराव अवश्यंभावी हो गया । उन्हें सिंडिकेट को नष्ट करना था, ऍम निपटा देता है । हालांकि उस समय अपने बूते आम चुनाव जीत लेने के कारण इंदिरा को सिंडिकेट सर्वोच्च कार्यकारी पद लेने से रोक नहीं सका । इंदिरा गांधी को तेरह मार्च ऍम लगातार दूसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई गई । अब पार्टी के आता हूँ द्वारा नामांकित नहीं, बल्कि निर्वाचित नेता थी, जिनके पीछे जनता की ताकत थी । उसके बावजूद उन्हें चुनाव जीतकर आए मोरारजी देसाई को काम रांची समझौते के तहत बर्दाश्त करके उप प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री बनाना पडा । अपनी स्वायत्तता और कार्यकारी प्राधिकार जताने के लिए उन्होंने रामराज अथवा मोरारजी से बिना सलाह ये ही अपने वफादारों वाईबी चव्हाण हो । प्रधानमंत्री और जगजीवन राम को कृषि जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय सौंपे । उनके सामने दोहरी चुनौती थी अपने हिसाब से तय नीतियों को कायम करना और मंत्रिमंडल में अपना एक बार स्थापक करना । जाहिर है कि आसान नहीं था । मोरारजी ने जानबूझकर सार्वजनिक रूप में उन्हें नीचा दिखाया । योजना आयोग की बैठक में उनका उपहास किया इंदिराबेन आप ये मामला नहीं समझती । इससे मुझे कर लेने दीजिए । वो गुस्से में आगबबूला हो गयी । कत्रिम शांति के भीतर तनाव करवटे ले रहा था । बावजूद इसके अब उनके साथ एक काबिल सलाहकार था । ऐसा व्यक्ति जो उन्हें राजनीति कि भूल भुलैया में पैर जमा कर चलने के लिए दिशा दिखा रहा था । रुपए के अवमूल्यन से चीजें गए । सबका ने इस व्यक्ति को इंदिरा के पास पहुंचा दिया । इंदिरा गांधी के आगामी वैभवशाली दिनों के पीछे किसी व्यक्ति का दिमाग था । उनका जाना के और रणनीति का । अपने कार्यकाल का अंत आते आते उन्हें किवदंती कहा जाने लगा था । वो सफल मिस्त्री के पीछे खडे पुरुष थे । अमेरिका के सामने घुटने देखने के कानफोडू आरोपों के बाद और चुनाव में आधी हार के बाद इंदिरा वामपंथ और पति की हद तक लोकलुभावन नीति की शरण में चली गई । सत्ता भी में वापसी के बाद उन्होंने अवमूल्यन की पैरोकारी करने वाले सलाहकार अशोक मेहता और सी । सुब्रमण्यम की छुट्टी कर दी । उन्होंने उन नीतियों के समर्थक अपने प्रमुख सचिव एलके झा को भी हटा दिया । झा की जगह पर उन्होंने परमेश्वर नारायण हक्सर को नियुक्त किया । पी एन हजार अथवा बब्बू अच्छा उम्मीद में इंदिरा गांधी के प्रमुख सचिव बने और पद संभालने के कुछ ही समय के भीतर उन्हें देश के सबसे अधिक सत्ता संपन्न नौकरशाह कहा जाने लगा । उन्नीस सौ तक इस पद पर रहे सुदर्शन विद्वान कश्मीरी पंडित रोज गांधी के दोस्त ॅ लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स स्नातक और पूर्व राजनयिक पीएन हक्सर प्रकृति की सौगात थे । कई साल पहले लंदन में उन्होंने अपने मित्रों इंदिरा और फिर उसको लजीज कश्मीरी खाने बनाकर खिलाये थे । अब उन का सबसे अधिक विश्वासपात्र नौकरशाह बनने पर उन्होंने कश्मीरी कोष दावा से भी कहीं अधिक प्रभावशाली नीतियां बनाई । बलोतरा कहते हैं, गर्मजोश उदार, प्रखर विद्वान । यह अक्सर ही थे जिनका हाथ उनकी अनेक जीतों के पीछे था । बैंकों के राष्ट्रीयकरण में उन्होंने प्रमुख भूमिका निभाई । गरीबी हटाओ, नारा भी उन्होंने खडा और उन्नीस सौ इकहत्तर के युद्ध के सारथी भी वही थे । अक्सर को हालांकि धर्मनिरपेक्ष मूल्यों में पक्का यकीन था, फिर भी संस्कृत श्लोक और पारसी शेयर उनके मुंह से पांच बात पर निकल आते थे । उनके तर्कों में भी वाल्मिकी से लेकर वॉल्तेयर पक्की उक्तियां बखूबी शामिल रहती थी । अक्सर का वामपंथी बहुत गहरा था । वजाहत हबीबुल्लाह के अनुसार अक्सर उनके रोमेश थापर जैसे अन्य दोस्तों के वामपंथ को व्यावहारिक जामा पहनाकर हजम होने लायक बनाते थे और उनके सामने पेश कर देते हैं । रक्षा के कारण ही दे उस और वाममार्ग की अनुगामी बनने से बची रही दिन पर उनके दोस्तों ने लाना चाहते थे । साल के लिए उन्होंने अपने समाजवादी एजेंडे को जब बढाया तब भी उन्होंने बैंकों का राष्ट्रीयकरण तो किया मगर विदेश व्यापार को छोड दिया नहीं । उन्होंने विदेशी निवेशकों को मिलने वाली सारी रियायतों को खत्म किया । अक्सर का वामपंथ उनकी यानी अक्सर कि व्यावहारिक सोच को उस कदर होत्रा नहीं कर पाया था । नटवर सिंह कहते हैं, अक्सर के रूप में उन्हें विलक्षण व्यक्ति मिल गया था । उन्हें यदि कोई बात गलत लगती थी तो वो उनसे साफ साफ पैसा कहने में हिस्से चाहते भी नहीं थे । वो कह देते थे, मेरा जी ये नहीं होगा । इसके बारे में सोची । साल उन्नीस सौ इकहत्तर के युद्ध के पीछे वही थे । सच यह है ये युद्ध उन्ही के दिमाग की उपज था, इन्दिरा के नहीं । अक्सर की इस भूमिका को हालांकि अन्य लोग कितनी तारीख नहीं करते । इंदर मल्होत्रा की मान्यता थी अक्सर उन्हें कसकर वामपंथी वैचारिक रहा, पर ले गए और प्रतिबद्ध जन सेवा यानी ऐसा अवसर जो तटस्थ कार्यकारी होने के बजाय विचारधारात्मक रूप से जुडा हो, के प्रति पक्षपात करके प्रशासनिक मूल्यों को कमजोर । क्या राजनीति में रंगी नौकरशाही की हालांकि समाधान में मना ही है? आर । के । धवन कहते हैं, इंदिरा खुद न तो वामपंथी थी और ना ही दक्षिणपंथी । दरअसल अक्सर में उन्हें वामपंथी रहा, पर चलाया अक्सर कि वह बडी गलती थी । इस प्रकार इंदिरा गांधी के आरंभिक साल अक्सर राज के बन गए थे । नेहरू को समर्पित ये वामपंथी भारत को नेहरू की दृष्टि के देश में बदलने को आतुर था । इस मिशन के लिए सरकार में हरेक स्तर पर समान सोच वाले लोगों की नियुक्ति की गई । इससे विचारधारा और निष्पक्ष नौकरशाही के बीच की बारीक रेखा मिट गई । अक्सर के अंतर्गत प्रधानमंत्री सचिवालय सुसंगठित और बेहद शक्तिशाली समूह बन गया । सामान्यतः मंत्रिमंडलीय सचिव ही नौकरशाही के सर्वोच्च अवसर होते थे, मगर तब हक्सर का समूह उस को भी आदेशित करने लगा । अवसर के बाद पी । एन । धरने प्रमुख सचिव का पद संभाला था । बेहक सर को आंदोलनकारी बताते हैं कि अपने बॉस को सफल प्रधानमंत्री बनाना चाहते थे । प्रधानमंत्री सचिवालय में हर एक नियुक्ति से पहले तो ये तस्वीर कर लेते थे । उसकी इंदिरा के प्रति निष्ठा होनी चाहिए । अक्सर की देख रेख में ही इंदिरा ने आर्थिक सुधार और अमेरिका विरोधी धारा वाली नेता के रूप में अपनी पहचान बनाई । अक्सर और उनके मगन साथ ही राजनयिक ऍम डीपी धर, अर्थशास्त्री एंड घर और सुरक्षा सलाहकार आरॅन । सभी बेहद योग्य कश्मीरी पंडित नौकरशाह इंदिरा के दरबार के नवरत्न थे और प्रगतिशील छवि में भारत का निर्माण करना चाहते थे । छवियों का पूजक प्रशासन और सर्वशक्तिमान प्रधानमंत्री सचिवालय के व्यापक संस्थागत परिणाम तो भारत को सही और प्रगतिशील तरीके से बदलने के उत्साह में कहीं मिला गए । अंततः अक्सर के अपनी बहुत से मतभेद हो गए । एक झटके में उनकी नजरों से गिरने के क्रम में इंदिरा उनकी शक्ल देखना भी ना पसंद करने लगी । उन का कसूर बस इतना था कि उनकी टकरा उन्हें खुद से भी कहीं अधिक प्रिय व्यक्ति से हो गई थी । वे उनके वरिष्ठ पुत्र संजय गाँधी, इंदिरा और पार्टी के पीछे में ही इस बात पर नया मोर्चा खुल गया कि भारतीय गणतंत्र का तीसरा राष्ट्रपति कौन होगा? राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधा कश्मीर का कार्यकाल समाप्त होने वाला था । इन्दिरा के लिए अपनी पसंद के राष्ट्रपति का चुनाव निहायत जरूरी था । पार्टी द्वारा उनसे खार खाने के कारण बर्खास्तगी की तलवार उनके सिर पर हमेशा लडती रहती थी । राधाकृष्णन इंदिरा को अपने द्वारा संरक्षित मानते थे । उन के प्रति उनके मन में बात चल ले और अनौपचारिकता का भाव था । उनकी बात सुनने के बजाय वे उन्हें कामकाज के बारे में उपदेश दिया करते थे । अपनी पार्टी से बढ रहे तनाव से निपटने के लिए उनको अपने पर हूँ नहीं चला पाने वाले राष्ट्रपति की जरूरत थी और उन्हें डॉक्टर जाकिर हुसैन के रूप में उपयुक्त उम्मीदवार मिल गए । हालांकि चांदी के डॉक्टर राधाकृष्णन को दोबारा निर्वाचित करने पर आमादा था । उन्होंने अपने प्रतिद्वंदियों पर महज एक सवाल दागकर हालात अपने पक्ष में कर लिए । उनके उस सवाल का कांग्रेस की पवित्र धर्मनिरपेक्ष छवि से सीधा ताल्लुक था जिससे उस दौरान बढ रहे सांप्रदायिक दंगों के कारण फिर से स्थापित करना उनके लिए बेहद जरूरी था । उन्होंने सिंडिकेट से पूछा, लोग जब ये पूछेंगे कि जाकिर हुसैन का नाम टूट कराया गया, आप क्या जवाब देंगे? फिर उन्होंने सिंडिकेट को ये कहकर ताना मारा । इसी मुसलमान का राष्ट्रपति बनना बहुत सारे लोगों को राज नहीं आ रहा । धर्मनिरपेक्ष उपलब्धि पर इंदिरा को बहुत ना आस्था अपनी पढाई में वो कहती थी, मैं जब कांग्रेस अध्यक्ष थी और उससे पहले भी अनेक लोगों को लगता था कि कोई अल्पसंख्यक कैसे मुख्यमंत्री हो सकता है । क्योंकि बहुमत दूसरे धर्म के लोगों का है । वो इसे कभी कुबूल नहीं करेंगे । इसलिए इसपर मैंने चुपचाप बिना शोर अथवा नारेबाजी किए काम किया और मैं माहौल बदलने में कामयाब रही । इसलिए अब भारत के राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च पदों पर भी मुसलमान निर्वाचित हो रहे हैं । प्रभागीय सही भविष्य में ये स्पष्ट हो जाएगा कि धर्मनिरपेक्षता पर अमल के मामले में उनकी नीति गहराई तक काम करने के बजाय महज प्रतीकात्मक थी । जाकर उसे के मई महीने में विधि विधान से राष्ट्रपति बन गए । उसी साल इंदिरा ने दस सूत्री समाजवादी कार्यक्रम की घोषणा की । हरित क्रांति का शुरूआती फायदा उन्नीस सौ तक आते आते नजर आने लगा । जो जिला कलक्टर तमाम किसानों को बोरलॉग दौरा इजात किए गए अधिक उपज वाले बीच को अपनाने के लिए बनाने में नाकाम रहे थे, उन्हीं के मूवी अब आश्चर्य से खुले रह गए थे । किसान अब उन चीजों को काला बाजार से खरीद रहे थे । भारत के स्थानीय धान के पौधे तेज बारिश अथवा आंधी में जहाँ धराशाई हो जाते थे वहीं बोलो के बीच से निकले बोलने पौधे, आंधी, बारिश और बाढ में भी निरापद खडे थे । मजबूत होने वाले ये पौधे पैदावार भी जबरदस्त ले रहे थे । बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और पंजाब में निर्वाचित सरकारों की बर्खास्तगी के कारण इंदिरा शक्तिशाली राजनीतिक प्रतिद्वंदी बन गई थी और उनकी सफलता उनके राजनीतिक निंदकों के गले की फांस बन रही थी । साल उन्नीस सौ अडसठ खत्म होने पडते हैं । इंदिरा को सत्ता से बेदखल करने के लिए कामराज और मोरारजी ने कमर कस लें । वे दोनों तब तक हालांकि इस हकीकत से वाकिफ नहीं थे । उनका साबका इससे पढा था । इन्दिरा जल्दी अपने प्रतिद्वंदियों के मंसूबे विफल करने के लिए ऐसा अभियान चलाएंगी जिससे सचमुच उनका दिवाला निकल जाएगा । चुनाव में में लगे झटके के बाद कांग्रेस के अपेक्षाकत युवा सदस्य करीब समाजवादी, अनुसूचित जाति, अल्पसंख्यक और वंचितों को आकर्षित करने संबंधी नीतियों की और लौटने की मांग कर रहे थे । अवमूल्यन और अमेरिका से सम्बंधों जैसी दक्षिणपंथी पैतरेबाजी को उन्नीस सौ सडसठ के आम चुनाव में पार्टी की दुर्गति के लिए जिम्मेदार माना जा रहा था । चंडीगढ को प्रतिक्रियावादी दक्षिणपंथी उन लोगों का गिरोह प्रचारित करके इंदिरा को युवा तुर्कों का मुखिया बताया गया । आंखों में चमक ला देने वाली समाजवादी आशा की किरण जो कांग्रेस के यशस्वी अतीत को लौटा लाएंगे, कांग्रेस नहीं था और इंदिरा के वफादार पसंद साठे नहीं याद किया । वो धीरे धीरे कांग्रेस के युवाओं को अपने चारों और लामबंद करने लगे । उन्होंने तमाम समाजवादी और प्रगतिशील लोगों को इकट्ठा कर लिया जिससे सिंडिकैट अलग थलग पड गया । दूसरे वाम उन्मुख दौर की बढती मांग के बीच इंदिरा गांधी नहीं, राजनीतिक लडाई के रुख को विचारधारा के टकराव का रूप दे दिया । छातर हक्सर तो साथ ही तो उनकी लगभग हर एक चाल सटीक पड रही थी । जाकिर हुसैन का उन्नीस सौ उनहत्तर में तीन मई को अचानक देहांत हो जाने से भाग जब आने की लडाई का नया दौर शुरू हो गया । चंडीगढ फिर से अपनी पसंद नीलम संजीव रेड्डी हो उम्मीदवार के रूप में थोपने पर आमादा था । इंदिरा गांधी ने पैसे कहा, प्रधानमंत्री पर राष्ट्रपति उम्मीदवार थोपना दरअसल उनके पद पर हमला है । प्रधानमंत्री की स्वायत्तता के लिए लडेंगे । हालांकि चंडीगढ उनको नीचा दिखाने पर उतारू था । अंततः था । संजीव रेड्डी की उम्मीदवारी स्वीकार करने के बजाय उन्होंने वीवी गिरी को मैदान में उतार दिया । अपने प्रतिद्वंदियों से लडाई के निर्णायक दौर में इंदिरा गांधी एकदम चौकस और होशियार थी और मजबूत किसे कदम रह रही थी वो तवे उल्लेखनीय और प्रतिभाशाली राजनेता दिए नटवर सिंह लगते हैं । इंदिरा गांधी को ये हो गया था कि सिंधी के द्वारा संजीव रेड्डी बनाने के लिए समर्थन देने का मकसद उन्हें प्रधानमंत्री पद से बेदखल करके उनकी जगह पर मोरारजी को बढाना है । सोलह जून उन्नीस सौ सत्तर हो बिजली गिरफ्तार से चोट करते हुए अपने कट्टर प्रतिद्वंदी मोरारजी देसाई को वित्त मंत्री के पद से हटा दिया और मीडिया को बताया उन के वित्त मंत्री रहते अपना प्रगतिशील आर्थिक एजेंडा लागू करने से उन्हें रोका जा रहा था । उन्हें हालांकि उप प्रधानमंत्री पद से नहीं हटाया गया था मगर इंदिरा की चाल से संदेश आई नहीं और उन इस्तीफा दे दिया और इंदिरा तथा अक्सर की चाल सफल हो गई । कुछ ही दिन के भीतर इंदिरा गांधी ने और भी सनसनीखेज चाल चलते हुए राष्ट्रपति के अध्यादेश के जरिए प्रधानमंत्री की निजी कार्यवाही के रूप में देश के सबसे बडे चौदह व्यापारिक बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया । सरकार के नजरिए से ये बैंक सिर्फ अमीरों के लिए काम कर रहे थे और गरीबों को कर्ज नहीं देते थे । भारत माता नहीं, इसका दिल आपने वंचित बच्चों के लिए उनके आंसू होता था । आकाशवाणी पर घोषणा की मैंने शिकायत की । मेरे पास जूते नहीं थे, जब मैं ऐसे किसी से मिली जिसके पास पाओ नहीं थे । व्यापारिक समुदाय उत्तराधिकार पाए । राजकुमार और अन्यों ने राष्ट्रीयकरण की निंदा करते हुए कहा कि भारत ने इंदिरा सामने बाद राज्य स्थापित करना चाह रही थी । उन्होंने अपनी सफाई कुछ इस प्रकार दी । बैंक राष्ट्रीयकरण तो सामने वाले को रोकने के लिए जरूरी था । व्यापारिक समुदाय को ये समझ में नहीं आता । इसका कोई विकल्प नहीं है । धुर दक्षिणपंथी नीतियों कि भारत में कतई गुंजाइश नहीं थी । देश का समूचा रुझान मध्य वामपंथी हैं । बैंक राष्ट्रीयकरण का मकसद गरीबों के दिल को जीतना और ऍम तथा विपक्ष को दूर बिठाए रखना था । ये तो साहसी सोचा समझा और रणनीतिक राजनीतिक डाउट था जिसका मकसद राजनीति के केंद्र में स्थापित होना था । खाला के भारत के उदार अर्थव्यवस्था बनने की राह बंद हो गई थी । बोरी मल्होत्रा कहते हैं बढकर देखने पर ये साफ दिखता है । उनके अनेक आर्थिक निर्णय गलत थे । बैंक राष्ट्रीयकरण से दरअसल सिंडिकेट के मंसूबों पर जबरदस्त चोट पडी थी । मगर वृद्धि में तेजी लाने के समीचीन उपायों के अभाव में जैसा की कुछ ने डर जताया भी था, ये और अधिक लोकलुभावन नीतियों के गर्त में ले जाएगा । वहाँ लिखते हैं, बैंक राष्ट्रीयकरण दरअसल नीति के रूप में अक्सर को इसलिए पसंद आया उन के समाजवाद की बुनियाद नैतिकता की । हालांकि इंदिरा के लिए उपाय कांग्रेस के पुराने नेताओं के मुकाबले अपने को भिन्न दिखाने का जरिया मात्र था । पत्रकार स्वामिनाथन अय्यर बताते हैं, जो उन्नीस सौ उनहत्तर से पहले बैंकों पर दरअसल बडे उद्योगों का रास्ता और इंदिरा गांधी ने उन का राष्ट्रीयकरण उन पर राजनेताओं की था जमाने के लिए किया । उनका मकसद अगर गरीबों की मदद कर रहा था तो वे उन्हें आसानी से गरीबों को कर्ज देने का आदेश दे सकती थी । उसके बजाय बैंकों को सरकार के तहत करने का उनका मकसद विपक्ष का दिवाला निकालना और स्वतंत्र पार्टी को पैसे की आमद रोकना था, जो के बाद से मुख्य विपक्षी दल था और जिसके आका उद्योगपति और महाराजा लोग थे । इसका नतीजा यह रहा स्वतंत्र पार्टी की कमर टूट गई और उद्योगपति उनके कदम चूमने लगे । हालांकि गरीबी तो से लेकर उन्नीस सौ तक रत्ती भर भी दूर नहीं हुई । इंदिरा की बैंक राष्ट्रीयकरण जैसी गरीबी हटाओ, नीतियों की झूठी मंशा और परिणाम की पोल अपने आप खुल जाती है । धोखाधडी हो अथवा नहीं, मगर बैंक राष्ट्रीयकरण का मुख्य उद्देश्य सिंडिकेट के पांव बांध देना था । इसे कुछ लोगों ने धोबीपाट जैसा असरदार बताया । नीति के रूप में बैंक राष्ट्रीयकरण के पक्ष में उनकी दिलचस्पी भले न रही हो, मगर इस साल से जानता उनके पीछे जी जान से एकजुट हो गई । चांदी काट के मन में यदि अब भी उन्हें बर्खास्त करने के मंसूबे रहे हो तो इंदिरा गांधी के चारों और जबरदस्त सकारात्मक जनसमर्थन का सुरक्षा कवच बन चुका था । नटवर सिंह याद करते हैं, बैंक राष्ट्रीयकरण भारत सरकार के सबसे गुप्त रहे उपायों में शामिल है । कुछ जवाब चार पांच लोगों के अलावा इस की किसी को भनक भी नहीं थी । उसी के कारण उनके विरोधियों पर यह गाज की तरह गिरा । अचानक आई इस आफत से वो विस्मित रह गए । उन दिनों में सचिवालय सुराग तक नहीं लगने देते थे । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दो हजार सोलह के नवंबर वहाँ में विमुद्रीकरण की घोषणा से भी देश ऐसे ही चकित रह गया और उसका राजनीतिक फायदा भी वैसा ही हुआ । हालांकि इसकी अर्थव्यवस्था पर पडे प्रभावों पर मतभेद हैं । केंद्र मल्होत्रा दिल्ली की गलियों में बैंक राष्ट्रीयकरण की खुशी मना रही भीड के बीच उसके परिणाम की खबर करने गए थे । मल्होत्रा ने गलियों में खुशी से नाच रहे रिक्शावालों और अन्य गरीबों से पूछा ऐसा अब आपको भी बैंक के अंदर गए हो । उनका जवाब था, नहीं, हम तो नहीं है । मल्होत्रा का अगला सवाल था क्या आप आगे कभी बैंक के भीतर जाएंगे? उनका उत्तर था नहीं और उत्तरा ने पडताल करनी चाहिए । फिर आप खुशी से पागल को हो रहे हैं । चलाई हमारी समझ में क्यों नहीं आता? आखिरकार अब जाकर ही सही, गरीबों के लिए कुछ किया है और अमीरों को सबक सिखाया गया है । जनता की प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने जनता के प्यार के मचान पर चढकर सिंडिकेट की कब्र खोद डाली । पुराने नेताओं को चिडचिडे रूढिवादी बूढों के रूप में शैतान की तरह पेश किया गया जिन्हें नए भारत की हिलोरे मारती ऊर्जा और नए समाजवादी गरीब परस्त आंदोलन का आभाष ही नहीं था । सडकों पर लोग को लसत थे और इंदिरा गांधी की तेज तर्रार युवा छवि जनता के मन में बस गई थी । उनकी जीत में सोने पर सुहागा साबित हुआ । इंदिरा गांधी के उम्मीदवार बीवी गिरी कर राष्ट्रपति के चुनाव में विजयी घोषित होना मुकाबला बेहद खडा था । इंदिरा इस चुनौती से भी शाम चेहरे पर हास्यपूर्ण भाव के साथ निफ्टी परिणामों की घोषणा की । तारीख से पहली शाम को वे पुपुल जयकर को आमलेट खाते और बीच ओवन का संगीत सुनते मिलेगी । वो पल घबराने की कतई जरूरत नहीं है । ये मुकाबला कडा है अगर मैं इसके लिए तैयार हूँ । गिरि सिंडिकेट के उम्मीदवार नीलम संजीव रेड्डी को हराकर चौबीस अगस्त उन्नीस सौ उनहत्तर को राष्ट्रपति बन गए । गिरी की जीत की घोषणा होते ही कांग्रेस के भीतरी संकट में उफान आ गया । इंदिरा गांधी और सिंडिकेट के बीच टकराव का निर्णायक दौर पहुंचान कांग्रेस में विभाजन की नौबत आ गई थी । कामराज की जगह सिंडिकेट के दिग्गज शुद्ध वन हल्ली निजलिंगप्पा उन्नीस सौ में कांग्रेस अध्यक्ष बने थे । उन्होंने उन्नीस सौ उनहत्तर के अक्टूबर माह में इंदिरा गांधी को खुला खत लिखा जिसमें उन पर व्यक्ति पूजा चलाने का आरोप लगाया गया । साथ ही इस बात पर भी जोर दिया गया जिन मुट्ठीभर लोगों पर वो सत्ता पर कब्जा करने की कोशिश का आरोप लगा रही हैं उन्होंने ही उनको प्रधानमंत्री बनाया था । छठी भविष्यवाणी की तरह उन्होंने ये भी आरोप उन पर लगाया की अपने प्रति निजी वफादारी को आप कांग्रेस तथा देश के प्रति वफादारी का पैमाना बना रही हैं । शारदा प्रसाद लिखते हैं, आपके निजलिंगप्पा के सत्रह तो अच्छी थी लेकिन उनमें राष्ट्रीय नेता जैसी गहराई और बडप्पन नहीं था । तोड फोड की राजनीति में माहिर शक्तिशाली शब्दों से जूझ रहे थे इसलिए उनके पास भी नहीं थे । साल उन्नीस सौ करके एक नवंबर को कांग्रेस कार्यसमिति की दूर समानांतर बैठकें हुई । इनमें से बुजुर्गों द्वारा बुलाई गई बैठक कांग्रेस के जंतर मंतर मार्ग स्थित मुख्यालय में हुई और दूसरी बैठक प्रधानमंत्री के एक सफदरगंज मार्ग स्थित निवास पर हुई । बैठक के बाद इंदिरा गांधी ने कांग्रेस जनों को लिखा । महज व्यक्तित्व के अहम का टकराव नहीं है कि समाजवाद के लिए परिवर्तन के हमी लोगों और यथा इस प्रतिवादियों तथा लकीर के फकीर ओ के बीच का संघर्ष है । इस झटके से उत लेकिन और कमजोर पड चुके निजलिंगप्पा नहीं उन्हें कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से निलंबित कर दिया । इसकी घोषणा का मजबून कुछ इस प्रकार था । कांग्रेस को अफसोस के साथ मजबूरन इंदिरा गांधी को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निलंबित करना पड रहा है । इंदिरा ने गुस्से में ईंट का जवाब पत्थर से देते हुए लिखा, मुट्ठी भर लोगों की ये दृष्टता है कि लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित जनता की नेता के विरुद्ध है अनुशासनात्मक कार्रवाई करें । हम उनके सामने हथियार डाल दी अथवा अपने संगठन से ऐसे अलोकतांत्रिक और फासीवादी लोगों को निकाल बाहर करके उसे साफ कर लें । राजनीतिक गहमागहमी के बीच आप सरकार वो हुआ तो टाला नहीं जा सकता था । महान टूट साकार हुई । कांग्रेस जनों से दोनों गुटों में से किसी को भी चुन लेने को कहा गया । संसद के दोनों सदनों में कांग्रेस के कुल चार सौ सांसदों में से तीन सौ दस नहीं इंदिरा को अपना नेता मान लिया । इंदिरा ने नई कांग्रेस का नेतृत्व संभाल लिया और सिंडीकेट कांग्रेस बना ली । संसद के दोनों सदनों में वह अल्पमत में आ गई, लेकिन उनके सौभाग्य से सामने वादियों और क्षेत्रीय दलों ने उन्हें समर्थन देकर कांग्रेस द्वारा सदन में लाए गए अविश्वास प्रस्ताव को गिरा दिया । इंदिरा गांधी अब नई कांग्रेस की सर्वोच्च नेता थी । इनके सदस्य समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता संबंधी उनकी विचारधारा के अनुयायी थे । उन्होंने सिंडिकेट को बार बार पटक नहीं । हालांकि उनका लक्ष्य कांग्रेस को तोडना नहीं, बल्कि उस पर नियंत्रण हासिल करना था । मानव महात्मा जी कि ऊंचे आदर्शों वाली राजनीति को दफन करने के लिए ही गांधी के जन्म शताब्दी वर्ष में ही कांग्रेस में दो फाड हुआ । वहाँ डाली कहते हैं, कांग्रेस में विभाजन के साथ ही पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र भी चीज ना शुरू हो गया । उन्होंने पार्टी में खुद को सर्वोच्च नेता घोषित कर के आंतरिक लोकतंत्र खत्म कर दिया । उन्होंने जब पार्टी को तोडा तभी उन का असली रूप सामने आया । लेकिन कांग्रेस कान्त भी समझो तभी हो गया और फिर एकाधिकारवाद शुरू हुआ । पार्टी ने विभाजन से ही आगे जाकर वंशवादी शासन की नींव पडी । एक ही नेता के नेतृत्व वाली पार्टी में कांग्रेस के संस्थागत स्वरूप को खत्म करने की भी शुरुआत हुई । कार्यसमिती और संसदीय बोर्ड जैसे पार्टी के महत्वपूर्ण हम लोगों पर इंदिरा ने एकछत्र नियंत्रण जमा लिया । उनके बाकी जीवन काल गए । उनके नियंत्रण वाली कांग्रेस में पार्टी चुनाव कभी नहीं हो पाएगा । हर एक कांग्रेसी को इंदिरा के प्रति वफादारी का नया इम्तिहान देना होता है । धीरे धीरे उन सभी मुख्यमंत्रियों की भी छुट्टी कर दी गई जिन्होंने चंडीगढ के विरुद्ध उनका समर्थन नहीं किया था और उनकी जगह उनके द्वारा मनोनीत मुख्यमंत्री लेने लगे । उन्होंने छत्रपों की नई खेप को उभरने की इजाजत नहीं दी । कांग्रेस को तोडने की उनकी हरकत हो राजनीतिक गैंगस्टर का कारनामा बताया गया हूँ । एक ऐसे व्यक्तित्व का कारनामा इसके निजी प्रभुत्व को अब डरावना और खतरनाक माना जाने लगा । ये नेहरू की कांग्रेस का अंतर था । राजनीतिक सत्ता संबंधी इंदिरा की समझ नेहरू की समझ से बुनियादी रूप से अलग थी । नेहरू की मान्यता थी कि असली सत्ता ऐसी परिस्थिति को प्रोत्साहित करते हुए आती है, जहां सत्ता का भौंडा प्रदर्शन नहीं करना पडेगा । इंदिरा को बहुत अपनी ताकत दिखाकर अपने विरोधियों की नजरों में अपनी साख की कमी की भरपाई करनी पडती थी । उन्हें शायद ऐसा लगता था कि नेहरू की समझ गलत थी की सत्ता का प्रयोग भर ही काफी नहीं था, बल्कि सत्ता का उस तरह प्रयोग होते देखना भी जरूरी था । तभी उन्होंने अपने किसी मित्र से कहा था कि नेहरू अपने को चुनौती देने वालों के प्रति भी बेहद उदार थे और यदि उनके वर्ष में होता तो वे उन्हें बेहिचक दरवाजा दिखा देती है । वेज ऐसा करने की स्थिति में आई तो उन्होंने एक दम पैसा ही किया भी । उन्होंने क्वीन ऑफ ऑर्ट्स के प्रसिद्ध प्रतिशोध सिर कलम कर देने को बार बार आजमाया । सत्ता को समझ नहीं और सत्ता के प्रयोग की जब नौबत आई तो इंदिरा ने अपने बापू को मीलों पीछे छोड दिया । उन्होंने शारदा प्रसाद को कभी ऐसी कविता भेजी, इसका भाव उनके जीवन से मिलता जुलता था । मेरे प्रभु को जरूरत होती तो मैं उनके पास जाती । पूरी रास्ते सरपट दौडते हुए । लेकिन ये मामला राज्य से संबंधित है और महिला होने के नाते मुझे रुकना चाहिए । मैं बागीचे में घूमने, लघु और जमा करूँ मदर ऑफ वर्ल्ड की ले ली । मेरे पास योजना थी जिससे राज्य बच जाता है । लेकिन मेरे विचार तो लडकी के हैं । बुजुर्ग सियासत दान चटाई पर बैठते हैं और आधा दिन तक बहस में निकाल देते हैं । उनके पास सौ योजनाएं हैं, बनाई और रद्द की गई मेरा तरीका ही अकीला उपाय था । प्रिया श्रीमती गांधी कांग्रेस पार्टी तोडने का आपको मलाल भी हुआ क्या कांग्रेस ऐतिहासिक ताकत रही थी । ऐसा आंदोलन जिसके प्रति आपका परिवार समर्पित था । ऐसी पार्टी जिसके लिए आपके ज्यादा प्रताप पति ने भी पसीना बहाया था । इस दल के लिए आप की माता ने भी स्वेच्छा से कुर्बानी दी । उसके बावजूद आप जरा भी नहीं हिचकिचाएगी और आपने पार्टी के दो खाड कर दिए । आप के अस्तित्व पर जब संकट आया तो आपने पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र की भी परवाह नहीं की । यदि आपने परिस्थिति की और लगन से हल करने और बातचीत तथा सलाह मशविरे के जरिए मुस्लिम को सुलझाने की कोशिश की होते हैं । शायद सिंडीकेट से आपका झगडा ऐसे निर्णायक बोर्ड पर नहीं पहुंचता । उसकी कितनी बडी कीमत चुकानी पडती है । लेकिन कांग्रेस को तोडे बिना शायद आप अपना अस्तित्व को बचा नहीं और अपना वर्चस्व बनाने में कामयाब हो पाती है । आपने कभी निजी राज के खतरों के बारे में सोचा? यहाँ कभी विराट अस्तित्व वाली कांग्रेस मैं एक व्यक्ति के चारों और सिमट कर रहे जाएगी । नहीं, ऐसी बातों से आप कभी विचलित नहीं हुई । आपने जो किया वैसा इसलिए क्या ॅ आपको नफरत हो गई थी और आपके पापु के अंतिम वर्षों में उन का जो हाल किया गया उस से भी आप दुखी थी । आपने ये पक्की धारणा बना ली थी कि आपके पिता की शराफत नहीं भी कमजोर कर दिया था । उनके आदर्शवादी स्वभाव ने उन्हें अपने विरोधियों पर कडी कार्यवाही करने के मामले में अक्षम कर दिया था । आपने इसी साक्षत्कार ने कहा था इसी अवधि में कुछ लोग मेरी कार्यों की तुलना मेरे पिता के मानकों से करने लगे । ऐसी तुलना मुझे नहीं सुहाती । अब कोई वॅार ऍम अपने पिता का प्रतिशोध लेने वाले के लिए कुछ भी असंभव नहीं । कुछ उसी भाव की स्थिति थी । कम से कम आरंभ में तो क्योंकि मुझे लगा कि उनकी दृष्टि है और राजनीति को सही सिद्ध करना चाहिए, लेकिन अपने पिता का प्रतिशोध लेने के फेर में नहीं । आपने उनके दल की अकाल मृत्यु का मार्ग तो नहीं प्रशस्त कर दिया? इंदिरा नहीं जब देश की बागडोर संभालने, उसके बाद उनके लिए वह मानो जैसे उनकी बहुत ही बन गई । सत्ता के लिए उन की कोशिश पवित्र कर्तव्य ऐसा करता है जिससे उनके परिवार और स्वतंत्रता के संघर्ष का मान पडता था । उनके बिना भारत भारत ही नहीं था । स्वतंत्रता संग्राम के काल से उनका कोई सूत्र ही नहीं था । नेहरू गांधी की विरासत भी नहीं थी । उनकी विजय भारत की जीत थी । उनकी पराजय भारत की हार थी । गरीब परस्त आंदोलनकारी रवैया अब सत्ता को हासिल करने का उपकरण बन गया था । हालिया राष्ट्र के बाद तेज तरार युवरानी को अब अपना ऊर्जावान समाजवादी एजेंडा नई नहीं ऊर्जावान हुई जनता की कांग्रेस के हिस्से के रूप में आगे बढाना था । बैंक राष्ट्रीयकरण के बाद इंदिरा गांधी की सरकार ने भारत के उत्तराधिकार प्राप्त हो राजे रजवाडों के लिए लागू विशेषाधिकार भी उन्हें सरकार से मिलने वाली मान राशि यानी प्रीविपर्स बंद करके समाप्त कर दिए । इसके लिए मैं संसद नहीं उन्नीस सौ सत्तर के सितंबर माह में बकायदा संविधान संशोधन विधेयक लेकर आई । अभी जाते वर्ग के विशेषाधिकारों के खिलाफ लडाई का इससे बेहतर उदाहरण क्या हो सकता था की सामंतवादी महाराजाओं के विरुद्ध मोर्चा खोला जायेंगे जिन्हें खजानों और जमीन जायदाद की विरासत मिली थी । इस कार्यवाही से भारत सरकार के खजाने को सालाना साठ लाख डॉलर से अधिक राशि की बचत हुई । उन्होंने कहा है लोगों को सबसे ज्यादा पर विपक्ष नहीं बल्कि बाकी सुविधाएं बडी लगती थी । पूर्व राजघराने मुफ्त की बिजली और पानी का लुत्फ उठाते थे । गरीब से गरीब आदमी को भी पानी का बिल चुकाना पडता था । अगर राज्य महाराजाओं को नहीं यही सब विशेषाधिकार आम आदमी की आपस में खटकते थे । ये विधेयक जब राज्यसभा में गिर गया तो इंदिरा गांधी ने राष्ट्रपति द्वारा अध्यादेश जारी करवाकर इसे कानूनी जामा पहना दिया । लेकिन रजवाडों ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देकर वहाँ से इसे रद्द करवा लिया । सर्वोच्च अदालत इससे पहले राष्ट्रीयकृत बैंकों के लिए मुआवजा संबंधी प्रावधानों को भी ठुकरा चुकी थी । हालांकि बैंकों तथा अन्य उद्योगों का राष्ट्रीयकरण करने संबंधी संसद के अधिकार पर उस ने मुहर लगाई थी । ऐसे में साफ हो गया सुधारवादी सरकार को जनता से किए गए वायदे पूरे करने तथा लोकतांत्रिक पद्धति से सामाजिक एवं आर्थिक परिवर्तन लाने संबंधी एजेंडा लागू करने के लिए संविधान के संशोधन के लायक व्यापक बहुमत चाहिए । इसलिए अक्सर की सलाह पर उन्होंने उन्नीस सौ इकहत्तर में मध्यावधि चुनाव करवा डाले । इंदिरा बैंकों के राष्ट्रीयकरण, प्रीविपर्स की जडों पर आघात और कांग्रेस में बंटवारे की पृष्ठभूमि में लोकप्रिय नारे गरीबी हटाओ के साथ उन्नीस सौ के मध्यावधि चुनाव मैदान में उतरी । विरोधियों के अपने विरुद्ध निजी और निम्न स्तरीय इंदिरा हटाओ जैसे नारे के साथ प्रचार के उलट वो नैतिकता का उच्च मानदंड स्थापित करने का संदेश देती हुई प्रचार में जुट गई । मोनी मल्होत्रा कहते हैं, गरीबी हटाओ दरअसल हक्सर के दिमाग में उपजा था और ये दूसरा सफल दांव था । रायबरेली के निवासी याद करते हैं कि चुनावी सभाओं में आपको कैसे विपक्ष के महागठबंधन इसमें शामिल थे । जनसंघ, स्वतंत्र पार्टी, कांग्रेस संगठन, समाजवादी और अन्य का माहौल उडा दी थी, जो उन के गरीबी हटाओ नारे के जवाब में इंदिरा हटाओ नारा गढकर उनके खिलाफ प्रचार कर रहा था । अपनी सभाओं में इंदिरा करती थी । वो कहते हैं, इंदिरा हटाओ हूँ । मैं कहती हूं गरीबी हटाओ । न्यूजवीक पत्रिका के संवाददाता ने जब उनसे पूछा कि चुनाव के प्रमुख मुद्दे क्या है, उन्होंने चमकती आंखों से जवाब दिया, मैं हूँ मुद्दा । जब से भरी नौसीखिया राजनेता नहीं मिला चुकी थी उसकी जगह खडी थी दोषी वक्ता प्रतिक्रिया के विरुद्ध नायके समाजसुधार चुनाव प्रचार के दौरान बयालीस दिन में उन्होंने छत्तीस हजार किलोमीटर से ज्यादा फाॅर्स करके तीन सौ से ज्यादा चुनाव सभाओं में भाषण दिए और उन्हें दो करोड से अधिक लोगों ने सुना अथवा देखा । उनकी दूर खुश ऊर्जा का जबरदस्त पुरस्कार मिला । नहीं कांग्रेस आर्को उन्नीस सौ में लोकसभा की तीन सौ बावन सीटों पर जबरदस्त जीत मिले । इसके बूते उसे सदन में दो तिहाई बहुमत मिल गया । पिछले के चुनावों में हुई हानि की भरपाई हो गई । इंदिरा गांधी ने सत्ता के शिखर पर नई लकीर खींचती । उन्हें में अठारह मार्च को तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई गई । उन्नीस सौ इकहत्तर की चुनावी जीत के पैमाने कांग्रेस के रेडिकल हिस्से को ये भरोसा दिलाया कि जनता ने उनके समाजवादी एजेंडे के पक्ष में बहुमत दिया था । प्रगतिशील शक्तियों की चीज पुरानी सामंतवादी व्यवस्था का ध्वस्त हो, ना ऐसे कानून बनाना जिनसे ये सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन मुकम्मल होगा । इंदिरा की क्रांति के यही सब घोषित मकसद थे । और वह अवधि शुरू हुई जब इंदिरा गांधी ने फ्रेंड्स के शब्दों में लाल देखना शुरू कर दिया । लाल रंग जल्द ही उनकी भी दृष्टि और विचारों पर हावी हो जाने वाला था क्योंकि शुद्ध शुरू हो गया था और उनके दिमाग ने रक्तिम लहरें हिलोरे लेने लगी थी । क्रांतिकारी नेता की लोकप्रियता में जबरदस्त बढोतरी होने वाली थी । उनके गरीब परस्त सुधारवादी व्यक्तित्व में युद्ध की नायिका का तेजपुंज भी छोडने वाला था । भारतीय सेना ने के दिसंबर में निर्णय क्षेत्र के बाद पूर्वी पाकिस्तान को मुक्ति दिला दी । इससे बांग्लादेश का जन्म हुआ और इंदिरा गांधी युद्ध में निर्णायक जीत हासिल कर पाने वाली भारत की पहली प्रधानमंत्री बन गई । बांग्लादेश युद्ध के बाद तो उनकी लोकप्रियता कुलांचे भरने लगी । प्रिया श्रीमती गांधी बांग्लादेशी शुद्ध क्या आपके लिए इतिहास से बदला लेने का मौका था? क्या ये पाकिस्तान से हिसाब बराबर करने की कोशिश थी? संयुक्त राज्य अमेरिका से पाकिस्तान के समर्थन का बदला था तो राष्ट्रवाद के खोखलेपन का पर्दाफाश करने का अवसर था । इसका गांधी और आपके पिता ने डटकर विरोध किया । इस उन्नीस सौ इकहत्तर के युद्ध ने आपके पिता द्वारा उन्नीस सौ बासठ में भुगते अपमान को धो दिया । नेहरू को दुनिया में जबरदस्त सम्मानित भारत की विरासत मिली थी महात्मा गांधी का भारत लेकिन आपने ऐसा भारत पाया जो चीन के हाथों से अपनी था । ऐसा भारत जो पाकिस्तान के रहमोकरम पर निर्भर लगता था । ऐसा भारत जिसने घमासान लडाई के बाद जीते गए हाजीपीर दर्रे को ताशकंद वार्ता में अपने हाथ से झटक दिया था । भारत की महानता खुद के पुनर्स्थापित होने की बात हो रही थी । कल्पना करें तो पूर्वी पाकिस्तान के बंगाली क्या आपको इसलिए प्रिया थे? क्या आपका बंगाल से लंबा जुडाव रहा था? टैगोर का एथना चलो रहे आपके प्रिय गीतों में शामिल था । आप बंगाल में स्तर शांति निकेतन में पडी थी । यही वो जगह थी जहां आपकी आत्मा स्पोर्ट से भी अधिक खुलेपन के साथ परवान चढी और आप रविंद्रनाथ टैगोर को पूछती थी । बांग्लादेश शुद्ध की पूर्व संध्या पर आपने कलकत्ता में हुई आमसभा में कहा आमी बंगला बूझते परी बोलते बारी ना मैं बंगाली भाषा समझ लेती हूँ, बोल नहीं सकती । इस तरह बंगलादेशियों के मन में आपके लिए जो खास भाव है उसी तरह शायद आपके मन में भी बंगाल के लिए विशेष पढ सकती । बंगलादेश शुद्ध ने वैश्विक मंच पर भी आपको खास दर्जा दिला दिया था । आपके पिता ने वैश्विक नेता बनने के लिए निर्गुट आंदोलन का नेतृत्व किया था । अब आपने भी दुनिया को जता दिया था कि नेहरू की बेटी ने भी सचमुच अपनी जगह दुनिया में बना ली थी । उपमहाद्वीप का भूगोल बदल कर और पाकिस्तान को तोडकर आप पाकिस्तान और अमेरिका दोनों को ही कडा संदेश दे रही थी । उन्नीस सौ इकहत्तर के युद्ध के बाद आप इंदिरा गांधी भारत की सबसे अधिक सत्तावन प्रधानमंत्री थी जो अपने देश हित में और अपने नैतिक मूल्यों के अनुसार बेहद लडाकू अंदाज में डेट जाती थी । बाहरी अमेरिका के सामने छाती तानकर प्रतिरोधी अंदाज में आप जैसे डेटिंग उसमें आपको इस समय भारत की सुपर वो मैं यानी जाबाज महिला के रूप में स्थापित कर दिया । इसके बाद दुनिया के किसी भी महाशक्ति ने आपसे अथवा भारत से पंगा लेने की जरूरत नहीं । करीब एक हजार मील लंबी भारतीय सीमा से विभाजन पश्चिमी पूर्वी क्षेत्रों में बता पाकिस्तान अपने जन्मकाल से ही शीजोफ्रेनिया था । वहाँ की सरकार पर पश्चिमी पाकिस्तान के पूरे क्षेत्र के पंजाबियों और पठानों का रास्ता है । उनके मुकाबले सांवले सलोने, पूरब के बांग्लाभाषियों, पाकिस्तान के प्रशासन अथवा पाकिस्तानी प्रतिष्ठान में कोई जगह नहीं थी । पूरब के बंगालियों के लिए उनकी बंगाली भाषा उनकी अस्मिता से जुडी थी और उर्दू को पाकिस्तान की राजभाषा बनाना उन्हें कतई राज नहीं आया । उर्दू विरोधी दंगों में उम्मीद सौ बावन में मारे गए छात्रों का बंगलादेश में आज भी शहीदों जैसा सम्मान किया जाता है । पाकिस्तान के पहले आम चुनाव में उन्नीस सौ सत्तर में छह मुजीबुर्रहमान की पार्टी अवामी लीग को जबरदस्त जीत हासिल हुई । ऐसी जी जिसके बूते उसके पाई पीने वाले नेता शेख मुझे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री पद के हकदार हो गए थे जिन्हें इंदिरा ने भावुक गर्मजोशी से लबरेज पितृतुल्य व्यक्तित्व कहा था । लेकिन पश्चिमी पाकिस्तान में सबसे बडे दल के रूप में आई पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के नेता जाॅन और फौजी प्रशासक जनरल यहाँ या खान ने अवामी लीग की विजय को स्वीकार करने से इंकार कर दिया क्योंकि उन्हें शक था कि मुझे पाकिस्तान को तोडकर अलग हो जाएंगे । और तो दरअसल मुझ को अपना राजनीतिक दुश्मन समझते थे और उन्हें पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनाए जाने के बाद उनके गले उतरनी नामुमकिन थी । यहाँ खान ने मुझे को सत्ता से बाहर रखने के लिए पाकिस्तान की नेशनल असेंबली को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया । यहाँ क्या बताते हैं कि अपने अफसरों से उन्होंने कहा इन बैंको लोगों से कोई समझौता नहीं हो सकता जब तक उनकी अकेले ठीक से और बडे पैमाने पर ठिकाने ना लगा दी जाए । नेशनल असेंबली में अवामी लीग को उसका हक देने से मेहरूम रखने के बाद जब साफ हो गई तो पूर्वी पाकिस्तान नहीं, जबरदस्त नागरिक अवज्ञा आंदोलन शुरू हो गया । यहाँ या खान और उनके साथ ही इधर तो आवामी लीग और शेख मुजीब से बातचीत कर रहे थे और उधर पश्चिमी पाकिस्तान द्वारा पूरा सेना तैनात की जाने लगे । पूर्वी पाकिस्तान में जब जबरदस्त प्रदर्शन होने लगे तो यहाँ याने उन्हें दबाने के लिए नेशनल सकता और कठोरताओं से ताकत का प्रयोग किया और पाकिस्तानी सेना के हाथों जनसंहार, बलात्कार, लूटपाट और आगजनी के दौर पर दौर उन पर थोपे गए । हजारों मासूम प्रोफेसर, बुद्धिजीवी और विद्यार्थियों को मौत के घाट उतार दिया गया । स्वतंत्र शोधकर्ताओं के अनुसार तीन लाख लोगों की हत्या की गई और कम से कम चार लाख औरतों से बडा किया गया । बच्चों की आंखें निकाल दी गई और उनके अंग काट काट कर हवा में उछाले गए और क्योंकि छातियां खास किस्म के चाकुओं से तराशकर अलग कर दी गई । यहाँ या ने कहा, उनमें से तीस लाख को मौत के घाट उतार हो और फिर बाकी सब हमारे गुलाम हो जाएंगे तथा कथित लोकतांत्रिक भुट्टों ने भी प्रत्यक्षतः है इस जनसंहार को मंजूरी दी थी जब उन्होंने सेना को ये कहते हुए धन्यवाद दिया की उन्होंने पाकिस्तान को बचा लिया । मुझे को पश्चिमी पाकिस्तान की जेल में डाल दिया गया । लुटे पिटे और दहशत जगह पूर्वी पाकिस्तान के शरणार्थियों ने बचने के लिए भारत का रुख कर लिया और संकट के सबसे गहरे वक्त में दस लाख बंगाली शरणार्थी भारत आए । इसके कारण भारत के संसाधनों पर दबाव पड गया । असल में अमेरिका नहीं उन अधिकारियों की आवाज दबा दी जिन्होंने इस जनसंहार के बारे में बोलने की कोशिश की । इस्लामाबाद को अगर रूप से हथियार दिए गए और चीन को भी भारत की सीमा पर अपनी सेना तैनात करने को प्रोत्साहित किया गया । गैरी जे बॉस नहीं । अपनी सेहरा देने वाली किताब ब्लड टेलीग्राम में लिखा है कि अमेरिका की कूटनीति के लिए ये बेहद लज्जाजनक अच्छा था क्योंकि वाशिंगटन में इतने बडे जनसंहार की तरफ से जान बूझ कर आंखें मूंदे रखें । जिस समस्या को पाकिस्तान की आंतरिक समस्या बताया गया तो भारत के लिए भी आंतरिक समस्या बन गई थी । इंदिरा कहने वाली थी इंदिरा गांधी कुछ समय के लिए एकदम निष्क्रिय थी और जयप्रकाश नारायण जैसे आंदोलनकारियों ने पूर्वी पाकिस्तान में जनसंहार पर वैश्विक सम्मेलन का आयोजन किया था । उन्होंने गुस्से में कहा, इंडिया को क्या ये मुगालता है कि वो मेरी अनदेखी कर सकती हैं? मैंने उसे फ्रॉक में बच्ची के रूप में भी देखा है । यप्रकाश नहीं । अधीर होते हुए इंदिरा से कहा, पाकिस्तान पर फौरन हमला होना चाहिए । लेकिन इंदिरा गांधी सही समय का इंतजार करती रही । उन्होंने उन्नीस सौ सत्तर की मई के अंत में पश्चिम बंगाल आसान और त्रिपुरा जाता है । वहाँ शरणार्थी शिविरों का जायजा लिया । उनके साथ गए सीएन धर लिखते हैं, हमने जो देखा उसे बयान करना असंभव है । उनकी शारीरिक और मानसिक स्थिति, उनके भर यात्रा, चेहरे और निजी त्रासदियों ने हमारी नैतिक संवेदना को छोड कर रख दिया । शरणार्थियों के झुंड के झुंड उनसे बात करने के लिए उन के इंतजार में थे । प्रधानमंत्री मानवीय त्रासदी की इस पराकाष्ठा को देखकर इतनी भावुक हो गई, उनका गला हीरोज गया । बांग्लादेश सेना के अनेक रेजीमेंट भी जिन्होंने पश्चिमी पाकिस्तान के खिलाफ विद्रोह किया था, शरणार्थियों में शामिल थी । आगे जाकर वही बंगलादेश को मुक्त कराने के लिए बनी छापा बार सेना मुक्ति वाहिनी की शक्ल लेने वाली थी जिन्हें भारतीय सेना से सलाह और प्रशिक्षण दोनों मिले । इंदिरा ने कहा, दुनिया को ये पता लगना चाहिए की यहाँ क्या हो रहा है । हम पाकिस्तान को ये जनसंहार जारी नहीं रखने दे सकते । इंदिरा ने खुद मोर्चा संभाला । वो अंतरराष्ट्रीय बिरादरी को पाकिस्तान द्वारा अपने पूर्वी हिस्से में चलाए जा रहे आतंकराज के बारे में चेताती रही । उन्होंने कहा कि वह दुनिया की चेतना को झकझोर देंगे और पूर्वी पाकिस्तानियों द्वारा झेली जा रही है । परवत्ता को दुनिया को बताएंगे । पाकिस्तान को रोकने के लिए कभी कुछ भी क्यों नहीं किया जा रहा था? युद्ध से पहले की गई राजनयिक तैयारियाँ अत्यंत चौकस और सुव्यवस्थित थी । अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हेनरी किसिंजर सात जुलाई उम्मीद और हो भारत आए । उनके जाने के बाद जल्द ही भारत को पता चला । किसिंजर चीन के रास्ते में दिल्ली भी इसलिए रुके थे इस संबंध सुधारवाने का नाटक कर सके । ये सहयोग ही है कि किसिंजर जब दिल्ली में थे, भारत सरकार ने उनके लिए चीन के लजीज खाने की दावत आयोजित की थी । व्यंजनों की उपयुक्तता के बारे में बाद में अक्सर नहीं । ये टिप्पणी की थी दिल्ली से किसिंजर पाकिस्तान के लिए रवाना हुए । यहाँ से यहाँ खान ने उन्हें पाकिस्तानी सेना के हवाई जहाज में बीजिंग के लिए रवाना किया । कुछ दिनों के भीतर दो दशक से अधिक चले चीन अमेरिकी संबंध विच्छेद के बाद निक्सन नहीं चीन के दौरे की घोषणा की और उन्होंने फरवरी उन्नीस सौ को वहाँ का दौरा किया । भारत ने अपने संक्षिप्त प्रवास के दौरान किसिंजर ने इशारा किया था कि पाकिस्तान से यह युद्ध हुआ तो भारत को चीन के मित्र पाकिस्तान के विरुद्ध किसी भूमिका की अपेक्षा अमेरिका से नहीं करनी चाहिए । सच तो यह है कनेक्शन के चीन दौरे की अधिकतर तैयारी को यहाँ खान ने ही पाकिस्तान के मित्र चाहूँ लाइसेंस गुप्त वार्ता के जरिए अंजाम लिया था । भारत के विरुद्ध अमेरिका ने पाकिस्तान की और गहरा झुकाव दिखाया । भारत को भी मित्रों की तलाश थी । इंदिरा और हक्सर नहीं लिया । ऍफ द्वारा तीन साल पूर्व की गई मित्रता संधि के न्यौते पर पांच चीजें शुरू की । इसमें दोनों देशों के लिए प्रतिबद्धता का अनुच्छेद चलवाया के एक दूसरे के विरुद्ध वो किसी भी तीसरे पक्ष को उस स्थिति में कोई भी सहायता नहीं देंगे यदि वह दूसरे पक्ष के साथ किसी लडाई झगडे में लिप्त होगा । इंदिरा के राजनाथ डीपी धरने जो तब सोवियत संघ में भारत के राजदूत थे । मॉस्को में इसकी जमीन तैयार की भारत सोवियत शांति, मैत्री और सहयोग समझौते पर दिल्ली में नौ अगस्त उन्नीस सौ अठहत्तर को दस हुए । इसके लिए सोवियत विदेश मंत्री आंद्री ग्रोमिको भारत आए थे कि समझौता होने के बाद इंदिरा गांधी अक्सर और अन्य वफादारों के साथ पहले सोवियत संघ गई ताकि सोवियत नेताओं ब्लॅक और करुँगी । इनसे बात करके की निश्चित कर लिया जाए यदि सैन्य संघर्ष होता है और सोवियत संघ से मदद नहीं जाए । उसके बाद देख यूरोप और अमेरिका के तीस दिन लंबे दौरे पर गई और उन्होंने लंदन तथा वाशिंगटन में बुद्धिजीवियों और मीडिया की सहानुभूति लेने के लिए अनेक सभाओं को संबोधित किया । बीबीसी को दिए इंटरव्यू में उनसे पूछा गया, बंगलादेश के मामले में भारत को और अधिक धीरज क्यों नहीं रखना चाहिए? आंखों से अंगारे, बरसाते हुए जल करने, इंदिरा में मोतीलाल जैसी दृढता देखिए । इंदिरा ने चोट कि हिटलर ने जब हमले किए तो आप क्यों नहीं कहा कि आओ बर्दाश्त करें, चुप रहे, जर्मनी से शांति बनाए रखें और यहूदियों को मरने दे वॅार में ये जताने से नहीं चूकी । मुझे नहीं लगता है एक पडोसी देश के हालात के बारे में हम अपनी आंखे बंद कर सकते हैं । हमें पाकिस्तान के सैनिक शासन से खतरा है अप्रत्यक्ष हमले की स्थिति बनी हुई है । पाकिस्तान जैसे पहले था, पैसे दोबारा कभी नहीं रह पाएगा । यहाँ खान ने मानो मदहोशी में दावा किया, बहुत मुझे नहीं करा सकती है । इंदिरा ने जवाबी हमला किया । मुझे उस टिप्पणी की परवाह नहीं है । इससे उस व्यक्ति की मानसिकता जाहिर होती है । अमेरिका के रास्ते में मौनी मल्होत्रा खुद को उनके द्वारा रूढिवादी निक्सन के बारे में दी गई चेतावनी याद करते हैं, जिसके प्रशासन की प्रदर्शनकारी विद्यार्थियों से ही अदावत हो गई थी । उस समय मेरे बाल लंबे थे और मुझे याद है उन्होंने मुझसे कहा था कि मौनी मुझे लगता है कि तुम्हारे बाल कटवा लेने में ही खैरियत है । मैंने सुना है कनेक्शन लंबे बालों वाले युवाओं को ना पसंद करता है । बाद में पता चला कि इंदिरा और राष्ट्रपति निक्सन दोनों ही एक दूसरे को ना पसंद करते थे । वो आखिरी उपाय के रूप में अमेरिकी राष्ट्रपति से मिलने के लिए गई थी ताकि अमेरिका यहाँ या खान पर कुछ दबाव डाले । लेकिन दिल्ली से गई जिद्दी महिला और कैलिफोरनिया के रिपब्लिकन पार्टी का निर्दयी नेता इसके बाद भारत के लिए समय ही नहीं था । दोनों आरंभ से ही एक दूसरे को पसंद नहीं आए । बास के अनुसार निक्सन ने भारतीयों को एकदम घृणास्पद, धोखेबाज और सोवियत समर्थक पाया और इंदिरा को भद्दे तरीके से बूढी कुतिया बताया और कहा, मेरी समझ में नहीं आ रहा उस बेकार देश में आखिर क्यों कोई बच्चे पैदा करेगा? लेकिन वो करते हैं और यहाँ तक किया गया भारतीय ऐसे हरामी है । उन्हें एक व्यापक अकाल की जरूरत है । वो सब था और अमेरिकी पत्रकार ऍम हर्ष ने लिखा, उसने इंदिरा से पैंतालीस मिनट तक इंतजार करवाया । उसने किसिंजर को उद्धृत किया हूँ । इंदिरा ने बडी नफासत सेलेक्शन के साथ थोडी पिछडे हुए विद्यार्थी की प्रशंसा करने वाले प्रोफेसर की डर है व्यवहार किया । फॅमिली बर्दाश्त नहीं कर पाया और उनके बारे में उसकी टिप्पणियां हमेशा छापने लायक नहीं होती थी । कैसा? किसिंजर ने बाद में लिखा दोनों नेताओं के बीच जबरदस्त तू तू मैंने हो जाने के बाद निक्सन ने किसिंजर से कहा, हम बूढी चुडैल पर कुछ ज्यादा ही मेहरबान हो गए । वो कहते हैं, इंदिरा और निक्सन के बीच शिखर वार्ता एकदम मन की भडास निकालने वाला वाकया था ही । मल्होत्रा कहते हैं वार्ता बेहद बुरी हुई है । किसिंजर दरअसल यहाँ से उपग्रह था और भारत से उसका रिश्ता हमेशा छत्तीस का रहा लेकिन को उनसे यानी इंदिरा से घना थे और उनके प्रति बेहद कट था । ऐसी भी खबरें आई ऍम नहीं । किसेन्जर से कहा था कि वह बांग्लादेशी शरणार्थियों को भारत आने ही क्यों दे रही है । उन्हें तो सीमा पर ही गोली मार देनी चाहिए । वैसी मानसिकता से मुकाबला कर रही थी । मल्होत्रा अपनी आंखों के सामने घटी घटना याद करते हैं । इससे साफ साफ पता चलता है इंदिरा विपरीत परिस्थितियों से कैसे भी पडती थी । इलेक्शन ने उनके सम्मान में जिस राजकीय भोज का आयोजन किया था, उसमें वो अर्ध अंडाकार मेज के सिरे पर राष्ट्रपति के साथ बैठी थी । पूछ के दौरान उन्होंने अपनी आंखें दस के बंद कर रखी थी और वो एक शब्द भी नहीं बोली । वहाँ के बंद किए बैठी रही और निक्सन की घबराहट बढती गई । यदि कोई उनसे सवाल करदाम उनका जवाब नपा तुला होता हूँ । सारे मेहमानों के बीच में वो निश्चल बैठी रही और औपचारिक दावत के दौरान पूरे समय उन्होंने अपनी आंखे कसकर बांध रखी । ये बेहतरीन मगर गहरी चोट करने वाला इंदिरा का हजार था । बाद में मल्होत्रा ने जब उनसे पूछा कि उन्होंने वैसा क्यों किया तो उन्होंने उडता हुआ सा जवाब दिया । उनके सिर में भीषण दर्द हो रहा था और उतरा कहते हैं जाहिर है कि सिर दर्द की बात सरासर झूठी है । वे तो नाटकीयता में प्रवीण थी । संयुक्त राज्य द्वारा अपमानित इंदिरा गांधी ने निक्सन को बडी सफाई से सार्वजनिक तौर पर जलील कर दिया था । युद्ध की आकस्मिकता ने हालांकि खाने की उनकी सुरूचिपूर्ण शैली के शौक में कोई दखल नहीं दी । संयुक्त राज्य से वापसी के समय ब्रसल्स में रुकने के दौरान और उतना याद करते हैं ये किसी राष्ट्र में मैन्यू पडने के लिए । उन्होंने सजीले लाॅस यानी चश्मे को बहुत ही चुटीले अंदाज में निकाल कर पढना अपने सिर पर मंडराते । युद्ध के बादलों के बावजूद न्यूयॉर्क में उन्होंने न्यूयॉर्क, फिल हार्मोनिक और सिस्टर कि संगीत संध्या को सुनने का समय निकाल ही लिया । लंदन में रॉयल पहले में इगोर स्टाॅक्स की का पहले नृत्य राइट्स ऑफ स्प्रिंग देखा जिसमें महान सो भी अपना ऍफ नृत्य कर रहे थे और जियाना में बीथोवन के फिर डेलिया का आनंद लिया । यूरोप का आनंद दरअसल उन्होंने जवानी के दिनों में खूब उठाया था । वो यहाँ विश्व युद्ध से बिगडे हालात के दौरान ही रही थी । उसी समय उनका साबका नई राजनीतिक विचारधाराओं और कलाओं से पडा था । पहले नेहरू के साथ और बाद में फिर उसकी संगत में यूरोप और अमेरिका की अभी जाती संस्कृति उनके भारतीय और पश्चिमी दोनों ही संस्कृतियों की प्राचीन परंपराओं की उत्तराधिकारी की आत्म छवि में शामिल थी । उनके हर एक कदम को घूरते मीडिया की निगाहों से उस दौरान क्योंकि वह मुक्ति । इसलिए सत्तर के दशक के आरंभ में कोई भारतीय प्रधानमंत्री वहाँ कुछ मौज मस्ती भी कर सकता था । पहले ही युद्ध सामने दिख रहा हूँ और सीमाओं पर कत्लेआम चल रहा हूँ । पहले और पाकिस्तान से दुश्मनी, रणनीति, कूटनीति और बीथोवन ये सभी मानव इंदिरा के व्यक्तित्व में शामिल थे । उनका व्यक्तित्व दरअसल स्वयं के लिए और सभी भारतीयों के लिए वैश्विक पहचान का उद्घोष था । वो अंतर राष्ट्रवादी देशभक्ति जो सिर्फ भारत का नैतिक नेतृत्व ही नहीं कर रही थी बल्कि विश्व में इसकी सांस्कृतिक अगुवाई पर भी जोर देते थे । काम और मौज मस्ती उनके लिए कोई अलग अलग व्यवसाय नहीं थे बल्कि वे उनकी रगों में साथ साथ दौडते थे । उसी साल बाद में बांग्लादेश शुद्ध शुरू होने से ठीक पहले कलकत्ता से जल्दबाजी में वापस आते समय पे नॉर्वे के खोजी जाया वार और एयर डाल की पुस्तक पडने में शांतचित्त तू भी हुई थी जिसमें उसने अटलांटिक महासागर को भोजपत्र की नाव पार पार करने के रोमांचित अनुभवों को लिखा था । उन के आस पास मौजूद सभी लोग इतने बडे संकट से दत्तचित्त होकर निपटने की उनकी क्षमता पर चकित थे । उनके अमेरिकी दौरे के बाद ये स्पष्ट था की निक्सन कोई मदद नहीं करेंगे और भारत को अपने बूते पर ही संकट से निपटना होगा । शर्णार्थियों की मौजूदगी और निर्वाचन में ताजउद्दीन अहमद कि बंगलादेश सरकार के दबाव में नई दिल्ली के लिए कार्रवाई करना अवश्यंभावी हो गया था । इंदिरा नहीं चाहती थी कि भारत को हमलावर माना जाए लेकिन पाकिस्तान बडी आसानी से इंदिरा के हाथों में खेल गया । पाकिस्तानियों ने तीन दिसंबर उन्नीस सौ को भारत के विरुद्ध ऑपरेशन चंगेज खान के नेतृत्व में धावा बोल दिया । पाकिस्तान की वायुसेना ने पश्चिमी सेक्टर में भारतीय वायुसेना के अड्डों पर बमबारी और कश्मीर में गोलाबारी के जरिए हमला किया कि हमला पाकिस्तान का अनलकी स्ट्राइक यानी दुर्भाग्यपूर्ण हमला बताया गया । जुम्ला दरअसल अंग्रेजी नाम से बाजार में उपलब्ध है । मशहूर ब्रांड की सिगरेट लकी स्ट्राइक के विलोम के रूप में गढा गया था । इंदिरा को जब खबर मिली तो उस समय वो कलकत्ता में किसी सभा को संबोधित कर रही थी । उन्होंने कहा, प्रभु का लाख लाख शुक्र है कि उन्होंने हम पर हमला कर दिया । भारत को युद्ध छेडने का उपयुक्त करन दे दिया था और इंदिरा जब हमले का फैसला लेती हमेशा ही वह बहुत देर हम हमला होता था । इंदिरा गांधी ने अपने जनरलों तत्कालीन सेनाध्यक्ष ऍफ जे मानिकशा, पूर्व कप्तान के मुख्य कमांडर जगजीत सिंह अरोडा के नेतृत्व में सेना की मदद से पूर्वी पाकिस्तान पर चढाई कर दी । अब मशहूर हो चुके उस खुले खत्म ऍम को लिखा था । रोधक और छुप दिखने में कोई हिचक नहीं हुई । उन्होंने संयुक्त राज्य पर सीधे अपनी जिम्मेदारी से बचने का आरोप लगाया । यहाँ राजनीतिक समाधान की जरूरत थी । वहाँ जबानी जमा खर्च किया गया । लेकिन ऐसा करने के लिए एक भी कदम नहीं उठाया गया । हमें अपने लिए कुछ नहीं चाहिए । हमें इन तोहमतों और उकसावों से गहरी पीडा हुई है कि हमने इस संकट को तूफान तक पहुंचाया लेकिन गुस्से से आगबबूला हो गए और भारत के हमले की निंदा की । अमेरिका के सातवें बेडे का कार्यबल रवाना किया गया और वो बंगाल की खाडी की ओर बढने लगा । इस बडे का नेतृत्व परमाणु युद्धक जहाज एंटरप्राइज कर रहा था । इंद्र उसके बावजूद भी रही । नई दिल्ली के रामलीला मैदान बारह दिसंबर को जनसभा कर रही थी । अभी सातवें बेडे के भारत की ओर बढने की बना के हम की तरह प्रश्न फूटी और भारत के लडाकू विमानों ने सभा में मौजूद लोगों की सुरक्षा के लिए सभास्थल पर मंडराना शुरू कर दिया । अगर जी हम पीछे नहीं हटेंगे हम एक कदम भी पीछे नहीं हटेंगे । बादमें वह कहने वाली थी हम अपनी आजादी की हमेशा रक्षा करेंगे तो नौ बताई सिर्फ घूंसों से भी अपने देश की रक्षा के लिए हमारे पास हथियार होने चाहिए । हमारे आदर्शों के पीछे मेरी प्रतिबद्धता होनी चाहिए । बीके नेहरू, जिनकी अमेरिका परस्ती युद्ध के प्रति अमेरिका के रवैये से ध्वस्त हो गई थी, लिखते हैं भारत को आतंकित करने की इसको हर कोशिश का इंदिरा गांधी ने माकूल मुंहतोड जवाब दिया । दिन के इस दौरान प्रदर्शित साहस पर उनके बडे से बडे विरोधी ने भी कभी सवाल नहीं उठाया । गुहा हालांकि इस और ध्यान आकर्षित करते हैं कि भारत को दी गई अमेरिकी धमकी खोखली थी । वियतनाम ने पहले ही मुक्की खा चुका संयुक्त राज्य अमेरिका एक नए युद्ध का बोझ नहीं उठा सकता था, खासकर भारत सोवियत समझौते के वजूद आ जाने के कारण । लेकिन इंदिरा के दृढ आत्मसंयम की पूरी दुनिया ने तारीख मोतीलाल की तरह वह पहाड जैसी स्थिरता से अपने इरादे पर डटी रही । युद्ध चौदह दिनों में खत्म हो गया । पाकिस्तान ने साथ में बडे की बंगाल की खाडी में पहुंचने से पहले ही आत्मसमर्पण कर दिया और भारतीय सेना ने ढाका को मुक्त करा दिया । इंदिरा गांधी ने निक्सन और किसेन्जर को ऐसे विपत्तिकाल में धूल चटाई जबकि जरा सा भी देखने पर भारत जबरदस्त युद्ध मैं गिर जाता । पश्चिमी पाकिस्तान की सेना कि नेशनल्स पार्टी थी विपरीत भारतीय सेना ने आचार संहिता के कडाई से पालन की मिसाल बना दी । ब्रिटेन के पत्रकार ने लिखा, अस्थाई तौर पर कब्जा करने वाली सेना के रूप में भारतीय सेना का आचरण रणभूमि में उसके आचरण से कहीं अधिक श्रेष्ठ हुआ है और अजित पाकिस्तानी सेना ने सोलह दिसंबर से सत्तर को भारत के सामने बिना शर्त हथियार डाल दिए । दूसरे विश्वयुद्ध के बाद इतनी बडी तादाद में पहली बार किसी सेना ने आत्मसमर्पण किया था । अपने हथियार डालने वाले इन सैन्य अफसरों और जवानों की संख्या हजार से अधिक थी । बांग्लादेश का जन्म हुआ, इंदिरा गांधी ने उसी दिन संसद में घोषणा की । पश्चिमी पाकिस्तान की सेना ने बंगलादेश में बिना शर्त हथियार डाल दिए हैं । आत्म समर्पण की दरख्वास्त पर पाकिस्तान पूर्वी कमान की ओर से लेफ्टिनेंट जनरल एके नियाजी ने दस्तखत किए थे । लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोडा ने आत्मसमर्पण की दरख्वास्त मंजूर की । यहाँ का अब स्वतंत्र देश की मुफ्त राजधानी है । हमें अपनी थल सेना, नौसेना, वायुसेना तथा सीमा सुरक्षाबल पर नाज है । नए देश बांग्लादेश की जनता को हमारी शुभकामनाएं । सदन ने खडे होकर इस वक्तव्य का गर्मजोशी से स्वागत किया । संसद और पूरे देश में लोग उत्साह से सडकों पर नारेबाजी करने लगे और नाच गाने, ढोल बाजे के साथ मिठाई बातें । कुछ नेताओं ने उनकी प्रशंसा करते हुए उन्हें देवी दुर्गा का अवतार ही कह दिया । जनसंघ के नेता अटल बिहारी वाजपेयी के बारे में खबर छपी । उन्होंने उन्हें अभिनव चंडी दुर्गा कहकर विभूषित किया । भारत के बाद में उन्होंने इसका खंडन किया । विपक्ष के सांसदों ने उनकी प्रशंसा की । जनता खूब उमंग थी । महज एक दशक पहले चीन द्वारा पराजित थे । अपने पैरों पर खडा हो गया था । इसकी देशभक्ति और उसका नैतिक मकसद फिर से कुलांचे भरने लगा । इंदिरा गांधी ने युद्ध की जिम्मेदारी सीधे अपने कंधों पर ली थी और उनके साथ मुट्ठीभर अफसरों का समूह शामिल था । अच्छा जासूस शिरोमणि, विदेशी खुफिया सूचना विशेषज्ञों आॅव होंगे । संघ में राजदूत दीप ईधर और विदेश सचिव ऍम उनके कश्मीरी नवरत्न थे जिन्हें कश्मीरी माफिया भी पुकारा जाता था । ये भरी छोटी उठाने वाली रणनीति थी । इसका मतलब था यदि वो विफल होती तो वो उनका वॉटर लू साबित होते हैं । आत्मविश्वास से लबरेज होकर उन्होंने कहा कि मुझे इस बारे में रखती भर शंका नहीं थी कि बांग्लादेशी अपनी स्वतंत्रता जीत लेंगे और हम गलत पक्ष का साथ कतई नहीं दे सकते थे । मुझे इस बात पर सबसे अधिक गर्व है । युद्ध को इतनी सफाई से अंजाम दिया गया । सेना के नेतृत्व और मेरे तथा सशस्त्र बलों के बीच जबरदस्त समझदारी के कारण लगातार उनके संपर्क में नहीं स्मार्टली मानते हैं इस चाइना की भूमिका निर्णायक रहें उन्नीस सौ में बुनियादी भूमिका सेना की थी । वो इस से पहले ही निपटाना चाहती थी । लेकिन मानिकशॉ पूर्वी कमान से मिली जानकारी के आधार पर इंकार कर दिया । उन्होंने साफ साफ उनसे कहा की समुचित तैयारी और बारिश का मौसम समाप्त हुए बगैर इस कार्यवाही को अंजाम नहीं दिया जा सकता वाली बताते हैं । बावजूद इसके सेना के इतिहासकार श्रीनाथ राघवन का तर्क है कि बांग्लादेश संकट के आरंभिक काल में पूर्वी पाकिस्तान पर चढाई की योजनाओं के बारे में भारत यूपी सावधान था । इसलिए मान अच्छा द्वारा थोडा ठहरकर हमला करने की कहाँ नहीं किसी हद तक असत्य भी हो सकती है । उनके द्वारा पश्चिमी मोर्चे पर घोषित तत्काल युद्धविराम की जो उन्होंने कथित रूप से हक्सर की ही सडक पर किया था । उच्च राजनीतिक सूझबूझ के लिए खूब तारीफ हुई । पाकिस्तान को धराशाई करने वाले घूसे को तत्काल मखमली दस्ताने में लौटाने का असर उतना कारगर नहीं रहा होता अगर पश्चिम में लडाई अटकती, भटकती और गैर जरूरी तौर पर जारी रहती है । विजयी होने के बावजूद इंदिरा बहुत शिष्ट और सयाना थी । बाद के महीनों में एक करोड बांग्लादेशी शरणार्थियों को बहुत तेजी और दक्षतापूर्वक स्वदेश वापस भेज देने से उनके बांग्लादेश विजय अभियान का आदर्श समापन हुआ । भारत की पहली और एकमात्र ऐसी प्रधानमंत्री रही प्रदेश की मुख्य सेनापति ना होते हुए भी उस ऊंचाई तक पहुंची हमेशा के दुश्मन । पाकिस्तान के वक्त निर्णायक सैन्य विजय की विजेता रहें, असहाय बांग्लादेशियों की मुक्तिदाता बनी जो अदम्य, साहसी महिला थी । सब के बावजूद उनके लिए ये उनकी दिनचर्या में मानव सामान्य काम रहा हो । क्या होता है यदि पाकिस्तान की सहायता के लिए महाशक्ति अमेरिका बीच में कूद पडता क्या होता? यदि भारत के विरुद्ध चीन भी कार्रवाई कर देता हूँ? क्या होता यदि भारत सोवियत शांति संधि पर अमल नहीं होता ये स्पष्ट है । इनमें से कोई भी आशंका उन्हें दिखा नहीं पाई । भारतीय सेना ने जिस तरह चढाई की उस दिन डॉक्टर माथुर जब उनके घर पहुंचे तो उन्होंने देखा वे अपना दीवान की चादर बदल रही थी और भगत याद करती हैं । युद्ध तेज होने के बावजूद उत्तर जाने से पहले अपने घर के फूलदान के फूल बदलना नहीं भूलते थे । नटवर सिंह बताते हैं कि वो इतनी शांत क्यों थी जो युद्ध के बावजूद उनका नेतृत्व इतना धीर गंभीर रहा । इसलिए उन्नीस सौ सत्तर को लगभग पूरा का पूरा अकेले हक्सर नहीं संचालित किया । सिंह कहते हैं, उनके प्रधानमंत्रित्व के पीछे उन्हीं का दिमाग चलता था । साल उन्नीस सौ इकहत्तर की कार्यवाही का संचालन उन्होंने क्या? इसमें उनके साथ डीपी धर टी, एम कॉम, रक्षा सचिव ये भी लाल और सेना के पक्ष से जनरल मानिकशा तथा अन्य तो थे ही । पाकिस्तान की हार के बाद के जून में शिमला में हुई शांति वार्ता के दौरान इंदिरा पूरी तरह ये जताने में लगी रही । भारत का इरादा ऐसा पता ही नहीं है कि पाकिस्तान मूंग की खाता हुआ दिखाई पडे । रीजन हिमाचल भवन पहुंची जहाँ भुट्टो को ठहरना था । उन्होंने देखा कि व्यवस्था बेहद लचर थी । पदों और गद्दियों के खिलाफ ओके रंग अलग अलग थे । फर्नीचर भी बेमेल रखा था और पढते जमीन से करीब एक एक फुट छोटे थे । इस पर उन्होंने भट्टों के ठहरने की जगह की सजावट खुद शुरू कर दी और वहाँ जमा कर्मचारी आपस में प्रधानमंत्री के अंतरराष्ट्रीय मानदंडों के बारे में कानाफूसी करते रहे । अगर लिखती हैं कि नए सिरे से व्यवस्थित करने का लम्बा तौर शुरू हुआ, मुख्यमंत्री के घर गए और वहाँ से उनके बैठ सहित कुछ सामान उठा लाये । हम राजभवन गए और गहरे लाल रंग कि मूंगिया रेशम के बिस्तर पर बिछाने वाली मोटी चादर ले आए । हमने राष्ट्रपति भवन से चांदी की कलम, दवात का सेट और स्टेशनरी देने की दरख्वास्त की । मुझे नहीं लगता कि श्री फट तो और उनकी बेटी को पूरा इस बात का एहसास भी हुआ होगा । उनके ठहरने की जगह को कुछ बेहतर बनाने में श्रीमती गांधी ने खुद कितनी मेहनत की थी । आंतरिक साथ सब जा के प्रति अपने गहरे रुझान की वो बहुत चर्चा कर दी थी और खुद आंतरिक सज्जा का जानी इंटीरियर डिजाइनर बनने की अपनी इच्छा बताने से भी नहीं जी सकते थे । भीतरी सज्जा से लेकर युद्ध लडने वर्क बढे लिया । हल करने से लेकर चालाक राजनेताओं के ग्रहों को मात देने सहित इंदिरा गांधी अनेक दुनियाओं में जीती थी का भारत पाकिस्तान के बीच स्थिर शांति स्थापित करना थी । इसी कमरे की नए सिरे से साथ सजा करना जितना आसान होता है । भारत और पाकिस्तान के प्रतिनिधिमंडल एक दूसरे की मौजूदगी में सर असर असहज थे और शिमला वार्ता टूटने के कगार पडती, मगर अंतिम क्षणों में इंदिरा और भट्टों के बीच अलग से हुई बातचीत में नई राह दिखा दी । शिमला समझौते के अंतर्गत भारत और पाकिस्तान कश्मीर के मामलों में द्विपक्षीय बातचीत करने के लिए प्रतिबद्ध हुए और दिसंबर उन्नीस सौ सत्तर की युद्धविराम रेखा को नियंत्रन रेखा का नाम दे दिया गया । उसके पीछे भारतीय पक्ष रमन नहीं उम्मीद थी क्या होता था कि अंतरराष्ट्रीय सीमा बन जाएगी जिससे कश्मीर के दर्जे का मुद्दा भी सुबह जाएगा, जिसके लिए दोनों देश सहमत थे । उसका दोनों पक्ष सम्मान करेंगे और किसी विपक्ष की पूर्वघोषित स्थिति पर पांच नहीं आएगी । लेकिन शिमला समझौते में गंभीर कमियां थी । ये कानूनी रूप में बाध्यकारी तो था ही नहीं, बल्कि जिन दो नेताओं के दस्तखत से लागू माना गया समझौता उन्हीं के लगातार सप्ताह में बने रहने का मोहताज था । फोटो तो महीने भर में ही समझौते से मुकर गए । उन्होंने पाकिस्तान की नेशनल असेंबली में ये कहकर इसे खारिज कर दिया किसी भी अंतरराष्ट्रीय सीमा का पालन करना तो दूर जम्मू कश्मीर की आवाम के आत्मनिर्णय के लिए संघर्ष को जारी रखेंगे । पाकिस्तानी और बांग्लादेशी युद्धबंदियों के लौटने का मामला भी घर में रहा क्योंकि स्वतंत्र देश के तौर पर बांग्लादेश को पाकिस्तान मान्यता ही नहीं दे रहा था । युद्धबंदियों की अदला बदली का मामला लंबी बात चीत के बाद उन्नीस सौ चौहत्तर में जाकर सोडा शिमला समझौते को आज कर आए दिन तोडा जा रहा है । कश्मीर के मुद्दे को पाकिस्तान बहुरा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाता रहता है और नियंत्रण रेखा के पालन की उसकी नियत पढ तो करगिल युद्ध और सीमापार से होने वाले हमले और छापे सवाल उठाते ही रहे हैं । इंदिरा ने बाद में शिमला वार्ता के बारे में अपने मन में निराशा की भावना का इजहार भी किया । उन्हें लगता था कि वह भुट्टो के प्रति अत्यधिक उदार रही और बडों ने अपनी और से भारत के प्रति मैत्री की कोई प्रतिबद्धता नहीं जताई । उन्हें लगता था की फोटो क्योंकि सेना कि मुट्ठी में थे इसलिए भारत के साथ शांति स्थापक की भूमिका निभाना उनके लिए मुश्किल था । वो कहती थी, जब उन्होंने सेना से समझौता करना शुरू किया, अभी सही के ते था इस सेना अभी हो जाएगी । इन सब के बावजूद बांग्लादेश शुद्ध नहीं । इंदिरा गांधी की छवि को जनमानस में गहराई तक बच्चा दिया अविस्मर्णीय नेता ऐसी इस तरह जिन्होंने पाकिस्तान को इतनी बुरी तरह हराया और थोडा जिस पर कोई भी अन्य नेता शायद कभी न करवाता है । भारत अलग अलग पडने के बावजूद विजेता था और एक स्त्री का साहस भारत का साकार स्वरूप था । उनके द्वारा ही चुने गए राष्ट्रपति वीवी गिरि ने उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया । कांग्रेस ने में तेरह राज्यों के विधानसभा चुनाव में जबरदस्त जीत हासिल की । राज्यों में ताजा चुनाव युद्ध में जीत से जगह आश्वस्ति भाव के तहत कराए गए थे । हजारों बच्चियों का नामकरण भी इंदिरा के नाम पर हुआ । अब गूंगी गुडिया की जगह दुर्गा की अवतार खडी थी । इसे पांच साल पहले संसद में तानाकशी और अपमान का जबरदस्त शिकार होना पडता था । उनकी शक्ति की अवतार के रूप में पूजा होने लगी तो इकनॉमिस् पत्रिका ने उन्हें भारत की सम्राज्ञी का खिताब दे डाला । अच्छा साल उन्नीस सौ सत्तर के आम चुनाव में भारत के ऐसे जननेता का उदय हुआ जिससे भारत ने कभी नहीं देखा गया था और बांग्लादेश के युद्ध ने ऐसे प्रधानमंत्री से परिचय कराया तो लगभग पूरी दुनिया द्वारा ठुकराए जाने के बावजूद अपने संकल्प पर साहस के साथ टट्टी रहने वाली थी । दुनिया में इंदिरा की भूमिका दरअसल उनकी भारत में भूमिका जैसी ही थी । नगर अपने प्रति ईमानदार और जिसे वे राष्ट्रीय अस्मिता समझती थी, उसकी लगन से रक्षा करने के जज्बे से प्रेरित वो कहती थी खुले देवा, ईमानदार साम्राज्यवाद की जगह लुकी छिपे उपनिवेशवाद ने ले ली है । उनके मुकाबले के लिए हमें कोरे आदर्शवाद अथवा पूरी भावनात्मकता से आगे जाना पडेगा । हमें स्पष्ट सोच और निरपेक्ष विश्लेषण की आवश्यकता है । दुनिया में स्वायत्तता पर जोर देने की उनकी प्रवर्ति चंडीगढ अपने पिता अपने पति के मुकाबले कम करने के लिए अपनी स्वायत्तता के लिए की गई लडाई की याद दिलाती थी । निर्गुट ता सिर्फ प्रतिबद्धता से ही नहीं बल्कि अस्मिता का दावा करने का साधन भी था । बांग्लादेश शुद्ध से पहले दुनिया में भारत अलग थलग था और सोवियत संघ के अलावा कोई भी देश के साथ नहीं था । फिर भी इंदिरा ने सार युद्ध को अंजाम ही नहीं दिया बल्कि दुनिया को अपने मकसद के न्यायोचित होने का भरोसा दिलाने की कोशिश भी की । पत्रका इंद्रजीत बनवार लिखते हैं, अपनी मृत्यु के समय तक वो भारत को वैश्विक पटल पर स्थापित कर चुकी थी । ये कोई अविकसित मनमानी से चलने वाला देश नहीं था और अपने राष्ट्रीय हित के बारे में बोलने के अपने अधिकार की तनकर ऍफ करेगा । इंदिरा गांधी ने भारत की शेरनी की तरह रक्षा की । अपना समझकर मातृत्व कर्तव्य के साथ लोकतांत्रिक होने के अलावा सभी कुछ था । इसी मातृवत नियंत्रन के कारण जल्द ही लोकतंत्र का गला घुटने वाला था । लोकतांत्रिक भारत का सबसे अंधेरा अध्याय मोबाइल खडा था जब नेहरू की बेटी ही नेहरू के सपने हो रॉम देने वाली थी ।

5. बददिमाग तानाशाह : आपातकाल की ओर पतन, 1972-77

बददिमाग तानाशाह आपातकालकी और पतन उन्नीस सौ बहत्तर से उन्नीस सौ सत्तर इंदिरा गांधी ने बांग्लादेश युद्ध जीतने के चार साल के भीतर ही देश पर आंतरिक आपातकाल लगा लिया । अगले इस महीने के लिए भारत में लोकतंत्र समाप्त हो गया । नागरिक अधिकार निलंबित किए गए । हजारों लोगों को बंदी बनाया गया । झोंपडपट्टी हटाने और नसबंदी कार्यक्रम पर जोर दिया गया । मीडिया पर भारी पाबंदियां लगाई गई लेकिन सबकुछ चकत् करते हुए में उन्होंने हम चुनाव कराने की घोषणा कर दी है । इससे आपातकाल खत्म हो गया । इंदिरा और कांग्रेस का के आम चुनाव में सूपडा साफ हो गया और चुनाव जीतकर जनता पार्टी सत्तारूढ हुई जिससे इंदिरा गांधी के ग्यारह साल लंबे प्रधानमंत्रित्व पर भी विराम लग दिया । प्री श्रीमती गांधी हर एक नागरिक आपसे एक सवाल तो पूछना चाहेगा के आखिर आपातकाल आपने क्यों लगाया? आपने उन्हें नागरिकों से लोकतांत्रिक आजादियों क्यों छीन ली जिन्होंने आपके पक्ष में उम्मीद से सत्तर में इतना जबरदस्त मत दिया था । वो भी उन नागरिकों से जिनके अधिकारियों के लिए आप के दादा पिता महात्मा गांधी ने अपनी पूरी जिंदगी खपाने । उन्होंने अंग्रेजों से जो छीना था उसे आपने हडप लिया । भारतीय नागरिक इक्कीस महीने के लिए लगभग वैसे ही गुलाम बन गए, जैसे वह लम्बे साम्राज्यवादी बूटों के नीचे पिसते रहे थे । इलाहाबाद हाईकोर्ट के कदम फैसले ने उन्नीस सौ इकहत्तर के आम चुनाव में आपके द्वारा रायबरेली सीट से जीते गए चुनाव को रद्द कर दिया । अदालती आदेश के बाद आप प्रधानमंत्री पद पर नहीं रह सकती थी । नेहरू ऐसे में क्या करते हैं? वे तो फौरन इस्तीफा दे देते । सिंगर जान के प्रति आदर्शवादी जैसी अवहेलना जताते और फिर नैतिक रूप में सही सिद्ध हो कर दोबारा सत्ता पा जाते । मुख्यमंत्रियों को लिखे किसी पत्र में नेहरू ने लिखा था, हमें ये याद रखना होगा कि हमारी सरकारें आज जो भी कुछ कर रही हैं, वहीं भविष्य के प्रशासनों के लिए नजीर बनेंगे । वो अधिकार जो आज शायद सही कारणों के लिए प्रयुक्त किए जा रहे हैं, वही शायद बाद में सरासर गैर मुनासिब और शायद एकदम आपत्तिजनक कारणों के लिए इस्तेमाल किए जाएंगे । तो दांतों के मामले में कमजोरी हमेशा ही खतरनाक सब होती है । आप सैद्धांतिक स्तर पर कमजोर हो गई । आपने आपातकाल लगाया, आपने अपने शासन के प्रति तात्कालिक चुनौती को भोथरा किया । मगर क्या आपको ऐसे उपायों के दूरगामी परिणाम के बारे में सोचने की कभी फुर्सत मिली? आपातकाल का कोई भी हिस्सा आपके छोटे बेटे संजय के साथ आपके संबंधों के उल्लेख के बिना पूरा नहीं हो सकता है । आप आंख मूंदकर प्यार करती थी । संजय को आप सबसे अच्छी तरह जानती थी, संजय नहीं । बचपन में हमेशा आपको चिंता में डाला आपको लगता था कि आप के बडे बेटे राजीव के मुकाबले उसका अधिक ध्यान रखना पडेगा । इसके बावजूद आपने आपने लगभग समूची सरकार जाहिर है कि देश की ही बात दौर उसे क्यों होती थी? आपने जिन कारणों से आपातकाल लगाया, उनमें एकमात्र संजय की इच्छा की ही भूमिका नहीं थी । उसके बजाय आपने ऐसा इसलिए किया क्योंकि आप अपने राजनीतिक जीवन की उस खास धारणा से अभिभूत थी । आपने अपरिहार्य होने के प्रति आश्वस्ति का भाव आपने आपने ते यही सोचा है कि आप अच्छे और सही पन की मिसाल थी । आपने जो भी कुछ किया, वो आपके जन्म और वंश के कारण मालूम था । सिर्फ आप ही भारत प्रशासन कर सकती थी । देश को अन्य लोगों के हाथ में नहीं सौंपा जा सकता था, क्योंकि आपके दुश्मन तो भारत के दुश्मन थे । नाम नेहरूवादी, चश्मे से बाहर भारत का मूल्यांकन अकल्पनीय स्थिति थी और आपकी मालिकाना प्रवृत्तियां हावी थी । आपने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद ये कहा भी था के आस पास ऐसा कोई भी नजर नहीं आता जो इसके हरे खतरे से निपट सके । बंद पर यानी प्रधानमंत्री के रूप में बने रहना मेरा कर्तव्य था । हालांकि मैं ऐसा चाहती नहीं हूँ । आपातकाल की घोषणा की पूर्व संध्या पर आपने अपने पुराने मित्र और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे से कहा था, मैं ऐसा महसूस करती हूँ कि भारत किसी बच्चे की तरह है और जैसे किसी बच्चे को कोई कभी कभी उठाकर झुलाता है, वैसे ही मुझे लगता है कि हमें भारत को छोडना पडेगा । जब कोई पूरा देश आपका बच्चा हो तो उसका शासकीय सिद्धांत यही रह जाता है कि माँ ही सबसे बेहतर जानती है । इंदिरा गांधी में सत्ता के शिखर पर थी । नेता शब्द को मूर्तिमान करते हैं । ऐसा इस हद तक था । उनके कट्टर विचारधारात्मक विरोधी आरएसएस और भाजपा आज उन्हें ही मजबूत नेतृत्व का आदर्श मानते हैं, भले ही तत्कालीन जनसंघ ने उनके पतन के लिए कितना ही जोर लगाया हो । भाजपा, आरएसएस तथा संघ परिवार भले ही गांधी खानदान और जवाहरलाल नेहरू को पानी पी पीकर को से मगर वे इंदिरा गांधी को शायद ही कभी निशाना बनाते हैं । राजनीति में गुरुघंटाल थी, एकदम स्वाभाविक रूप में कृष्णा हठीसिंह याद करती हैं जब वह तीन या चार साल की थी । अभी से इंदिरा ने बस राजनीति के बारे में ही बातचीत होने की उनकी फुफेरी बहन नयनतारा सहगल याद करती हैं, जिनके लिए राजनीति महज चुनाव हुआ । पेशा है उन्हें वो बात है ही नहीं । वो इंदिरा के भीतर थी । अपने अधिकार क्षेत्र की भावना । उनमें स्वाभाविक रूप में नींद में चलने वाले की तरह अपने आस पास की भलीभांति जानकारी थी । अपनी पार्टी ने सर्वोच्च उनकी निजी लोकप्रियता दरअसल समूची कांग्रेस पर भरी थी । तेरह साडी में रजिया सुल्तान के राज के बाद भारत ने उन्हें पहली सम्राज्ञी कहा जाता था । उनके आलोचक उन्हें भारत की मान जनरल भी कहते थे । उनके चुनाव क्षेत्र रायबरेली में जैसे ही सडक पडती है, उसके मुहाने पर झलकारीबाई की प्रतिमा लगी है । अनेक ऐतिहासिक सो के अनुसार गलत युद्ध था और वीरांगना झलकारी वाई ही । बहुत भेज बदलकर अठारह सौ सत्तावन के गदर की नायिका मशहू झांसी की रानी के रूप में लडाई करती थी । ये प्रतिमा घुड सवार महिला योद्दा की है जिसकी तलवार हाथ में सामने तली हुई है और चेहरे पर जीवटता का दृढसंकल्प दिखता है । अकेली सारी विपत्तियों से लडती महिला योद्धा जो आपने तथा अपने देश के अस्तित्व के लिए युद्धरत थी । यही इंदिरा के व्यक्तित्व का परिकल्प नायकत्व था । लोगों के मन में भी भारत कि योद्धा महारानियों दुर्गा से लेकर रजिया सुल्तान तक और जनमानस में बसी विरांगनाओं का मिला जुला प्रतिमान थी और आज भी है ऐसी शख्सियत जिसने कल्पना और वास्तविकता के अंतर को मिटा दिया । झलकारीबाई का किवदंती पूर्ण युद्धघोष था उन्हें देख देखो हमको राजनाथ दी हो । छह चाहे कुछ भी हो जाए मगर मैं अपने राज्य का अहित नहीं होने देंगे । उसके बावजूद प्रतिशोधपूर्ण नायिका अपने राजनेता के कपडों को छटक कर मानवीय दृष्टा नेता का चोला नहीं पहन पायेंगे । झूठ फट लडाइयों और निजी झडपों की जीत कि भूल भुलैया में फंस कर बडे युद्ध में पराजित हो गई थी । वो शायद ये समझ नहीं पाई कि इतने विशाल कब की नेता होने के नाते विपक्षी को तत्काल नेस्तनाबूत कर देना बेहद छोटा सा लक्ष्य था । उनके पिता यदि आदर्शवादी थे तो वे यथार्थ के धरातल पर छोड तोडने माहिर थी । सहानुभूतिपूर्ण तर्क ये होगा कि उनका विरोध इतना ज्यादा था कि उन्हें संस्थाओं को सिर्फ राज करने के लिए ही नहीं बल्कि अपने अस्तित्व की खातिर भी कमजोर करना पडा । इंदिरा के निजी सचिव एनके शेषन नहीं याद किया । प्रधानमंत्री बेहद बददिमाग हो गई थी । खुद को दुर्गा पुकारा जाना उन्हें बहुत पसंद था । बांग्लादेश विजय निर्णायक मोड थी । संजय एकमात्र ऐसे शख्स है जिनकी शायद कोई भी बात को नहीं डाल सकती थी और किसी भी व्यक्ति को बर्दाश्त करना उन्हें गवारा नहीं था । बंगलादेश के बाद तो मानो वो मतवाली हो गई । संजय ने पूरा अधिकार जमा लिया । ऑडिशन जान के जीवन में ना होता तो ये महान प्रधानमंत्री सिद्ध हो सकती थी । आम चुनाव में में हुई भारी जी और बांग्लादेश युद्ध के बाद जो जबरदस्त सकता उनके हाथ लगी, उस से उन का माथा खराब हो गया । बांग्लादेश की उपलब्धि की अपार सफलता ने उन्हें डरा दिया और दुर्गा से तुलना के कारण उन्हें अपनी कमियों के प्रति असुरक्षा खेलने लगी । इसी असुरक्षा ने उन्हें इतनी विराट सफलता के बावजूद आश्चर्यजनक तेजी से शब्द और मानसिक उन मान के गर्त में धकेल दिया । साल उन्नीस सौ इकहत्तर में शिखर छूने के बाद वो तो में पतन की आखिरी सीढी की और लगातार लुढकती गई । मैं चार साल की छोटी सी अवधि में चापलूसों से खेल जाने के कारण उन्होंने योग्य स्वतंत्रचेता सलाहकारों के लिए अपना करवा जा बंद कर दिया और छुट्टियों की बात सुनने में मजबूर हो गए । उनके भीतर अजय होने की खतरनाक गलत फैमी घर करने लगी थी । लोकतंत्र में करिश्में की भूमिका पर चर्चा करते हुए स्टेटमैन अखबार ने उन्नीस सौ इकहत्तर के चुनाव के संदर्भ में लिखा, क्या निष्ठुर संकल्प शीलता के साथ करिश्में का दोहन लोकतंत्र प्रणाली नहीं चल सकता है? इस बारे में विचार होना अभी बाकी है । क्या कृष्णा की अभी लोकतंत्र के लिए घातक है? मौनी मल्होत्रा याद करते हैं, कुछ लोग ऐसे हैं जो विफलता को नहीं बचा पाते, लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं जो सफलता को बर्दाश्त नहीं कर पाते । वे दूसरी श्रेणी में आती थी । जनता का सीन क्या जबरदस्त जीत दर्ज की? सफलता समस्या बन गई और उसका नतीजा इस अक्खडपन के रूप में निकला । उनकी सफलता चारों और छा गई और किसी हद तक उनकी गाडी पटरी से उतर गई । उनके चरित्र के कलुषित पक्ष अभी होने लगे और फिर रही सही कसर उनके बेटे ने पूरी करके उन की गाडी पटरी से उतार दी । नेहरू के ठीक उलट प्रवृतियां साफ थी । हिंदी में सफलता को नहीं बचा पाई तो नेहरू भी विफलता बर्दाश्त नहीं कर पाए । तीन से युद्ध उनके काल में भ्रष्टाचार के कांड और कश्मीर पर गतिरोध नहीं, नेहरू की आत्मा को जख्मी कर दिया । ऐसा नेता जिनकी नैतिकता की एक सूची की प्रमाणिकता उनके कट्टर आलोचकों को भी माननी पडती थी । बारा शाह के रूप में इंदिरा गांधी के विकास के हिस्से में हर साल उनके छोटे बेटे संजय गांधी उडान नहीं है । किस्सा ऐसा है जो जताता है कि किसी नेता ने कैसे पार्टी और आंदोलन चाहिए । मूवी छोडकर अपने परिवार और वंश को तवज्जो दी । मेहरू जो कांग्रेस के अनुशासित सिपाही थे, अपनी पार्टी को हमेशा अपने से बडा मानते रहे और उससे भी महान स्वतंत्रता आन्दोलन के बहुत के रूप में पार्टी ऐसा प्रतिष्ठान थी जिसके प्रति वो अपने को गहराई से एक रिस्तेदार मानते थे । लेकिन इंदिरा गांधी ने राजनीति में अपनी पैठ और सर्वोच्चता जमाने के लिए नई कांग्रेस पैदा कर लेंगे । पूरी तरह उन पर निर्भर कांग्रेस ऐसा दल इसमें योग्यता का पैमाना राजनीतिक क्षमता नहीं बल्कि निजी वफादारी, अपने से कम योग्य लोगों की संगत उन्हें भागने लगे और अपनों से अधिक योग्य लोगों से घबराने लगी । खासकर जडों से खुद उगकर उभरने वाले स्वायत्त प्रवृत्ति के लोगों से राजनीतिक सूझबूझ की झलक मिलते हैं । खतरे के प्रति सतर्क होने लगे । नेहरू को अन्य नेताओं की उपलब्धियों और असहमती के द्वारा भी कभी खतरा नहीं लगा । उन के पहले मंत्रिमंडल में विचारधाराओं को जगह हासिल थी । इसमें श्यामाप्रसाद मुखर्जी, जिन्हें बाद में जनसंघ स्थापित किया और बी । आर । अंबेडकर शामिल थे । सच तो यह है कि उनके चारों और जो विराट व्यक्तित्व थे, उनसे उनका अपना कल बहुत ऊंचा हुआ । मुख्यमंत्रियों को लिखे उनके पत्रों से ही पता लगता है कि वे अपने सहकर्मियों के साथ संबंध गहरे करने को कितने अधिक उत्सुक है । नेहरू शायद ऐसा इसलिए कर पाएंगे, पार्टी पर उन का वर्चस्व साफ साफ होता था । उनके विपरीत इंद्रा अपने ही भारी भरकम नेताओं से घमासान के बाद शीर्ष पर पहुंच पाई थी । इसीलिए प्रतिद्वंदता को नापसंद कर दी थी भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी की राय ने । सत्ता के प्रश्न पर उनका नजरिया साफ था । उन्हें कोई भी प्रतिद्वंदी बर्दाश्त नहीं कर रहा था । राजनीति के बढते वैट, ठीक रन की और पार्टी को दरकिनार करने के कारण पैदा हुए खालीपन में ये स्वाभाविक ही था कि वे अपने खून का मूड जो रहेंगी । इंदिरा ने लोकतांत्रिक बहुपक्षीय कांग्रेस को तोडकर नष्ट क्या बंगलादेश शुद्ध के बाद द्विपक्षीय राज शाली वाली शैली को अपनाने लगी । भारत के संविधान में काफी सोच समझकर सत्ता को संतुलित किया था । जनता की संप्रभुता को विभिन्न समान दर्जे की संस्थाओं में नहीं किया था । यहाँ न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका एवं स्वतंत्र प्रेस आपस में मिलकर और एक दूसरे पर अंकुश लगाकर लोकतंत्र को बरकरार रखती थी । इंदिरा ने उस संतुलन को बेदर्दी से छिन्न भिन्न कर दिया । ये कोई सरे आम सैन्य तख्तापलट नहीं था । इसके बजाय उन्होंने भीतर से ही संतुलन पलट दिया । पार्टी और सरकार के जब मन से बनाए गए ढांचे पर उन्होंने अंधाधुंध हमले किए, हालांकि नेहरू ने उन्हें बहुत ध्यान से सींचा था । कभी बेहद शक्तिशाली कांग्रेस ने जब इंदिरा केसर असर नौसीखिए बेटे के आधिपत्य को बिना किए शर्मा के धारण कर लिया, उस से साफ हो गया पार्टी किस कदर पर निश्चित हो चुकी थी । आइए अब संजय गांधी का रुख करेंगे ऐसा पुत्र । इसके बारे में ये प्रबल धारणा रही थी । वो अपनी माँ का अभिशाप था । इंदिरा गांधी का छोटा बेटा इंग्लैंड से उन्नीस सौ सडसठ में भारत लौटा खूबसूरत बल्कि नकचढा महज इक्कीस वर्ष उम्र का । उसका अपने नाना की तरह इतिहास अथवा दर्शन और माँ की तरह कला के प्रति कोई रुझान नहीं था । उसके बजाय अपने पिता की तरह उस एक्टर, हवाई जहाज और सभी यांत्रिक उपकरणों में गहरी दिलचस्पी थी । शायद फिरोजगांधी के साथ मैं हूँ यंत्र खेल खेलते हुए बडे होने का नतीजा था दूर स्कूल में पढाई अधूरी छोडकर दिल्ली के सेंट कोलंबस में उन्होंने अपनी स्कूली पढाई पूरी की । कॉलेज की पढाई में दिलचस्पी होने के कारण उसे इंग्लैंड में क्यू स्थित फॅस के कारखाने में पांच साल की अप्रेंटसशिप पर भेज दिया गया था । वहाँ से भी वो तीन साल बाद भाग खडा हुआ । उसकी छवि पॅाल आवारा की बनने लगी और उसे इंग्लैंड में बिना लाइसेंस हासिल किए कार चलाने और गतिसीमा के उल्लंघन के जुर्म में गिरफ्तार भी होना पडा । जयकर याद करती हैं, संजय बेहुदा आवारा था, बहुत उलझता हुआ और कार से खिलवाड करता हुआ और अवांछित दोस्तों की संगत का शिकार पहले नेहरू नरेंद्रा के यहाँ यानी प्रधानमंत्रियों के ही घर में पैदा हुए और पले संजय नहीं । सत्ता भी सराबोर और अधिकृत माहौल को अपना जन्मसिद्ध अधिकार मान लिया था । उतावली में कुछ भी कर बैठने की जगह को हर कीमत पर बनवा लेने की मानसिकता के साथ । इसके बावजूद उधर उनका पकता और प्रगतिशील युवक था । वो अपना रास्ता तो घूमना चाहता था । महानता के बोझ तले पिसकर जीते हुए और उसकी कसौटी पर खरा उतरने की चुनौती से वो ऊब चुका था और अपने माँ की तरह हमेशा इतिहास की बंदिश का शिकार था । संजय की जब थी कि खानदान की यशोगाथा में अपने कारनामे दर्ज कराने नहीं उसकी माँ उसकी मदद कार बनेंगे को इंग्लैंड से भारत लौट कराया । पूरी तरह देशी कार्यकरी और कल पुर्जों से बनी का मारुती बनाने के सपने के साथ मारुति दरअसल अवन देवता के पुत्र का नाम है । शायद संजय उनको उनके सामान ही आंकडा होगा । धाक वाले माँ बाप की संतान इन्हें पीछे छोड देने की उनमें संभावना थी । रामायण के प्रमुख चरित्र हनुमान हो कभी कभी मारुती कहा जाता है जिनमें हवा की गति से उडने की क्षमता थी और संजय भी हवाई जहाज के भीतर आकाश छोडने का शौकीन था । संजय भारती खांदी इसके बावजूद संजय जल्द ही ऐसी शख्सियत बन जाने वाले थे जिनकी परछाई भारत पर ही गहरा गई । इश्वरीय के बजाय पैशाचिक उनका नाम ही छल कपट का पर्याय और सरकारी सत्ता के निष्ठुर दुरुपयोग का तो तक बनने वाला था । चापलूस सरकार द्वारा सार्वजनिक संसाधनों का निजी अय्याशी और लाभ के लिए दुरुपयोग पर आंखें मूंद लेने के लिए मजबूर कर देने वाला संजय अपने माँ और अपनी युवा पत्नी का चाहता था । मेनका याद करती हैं संजय और राजीव के बीच जमीन आसमान का अंतर था । राजीव और सोनिया का मिजाज सर असर पश्चिमी था । उनके दोस्त भी पश्चिमी तौर तरीको वाले थे । खूब घूमते पडते थे और यूरोप तथा अमेरिका के फैशन से हम कदम रहते थे । वे अपनी छुट्टियाँ हमेशा विदेश में ही बिताते थे । उन की कमाई हमेशा उपलब्धियां होती थी । संजय एकदम हिंदुस्तानी मिजाज के थे और हिंदी बोलना अधिक खाता था । कुर्ता पायजामा पहनते थे । हम लोग बाकी लोगों से घुलते मिलते नहीं थे । हमारी रसूखदार मित्रमंडली भी नहीं थी और हमारे पास अपनी संपत्ति के नाम पर कुछ भी नहीं था । एक बार जब मैं साडी खरीद लाई तो उन्होंने मुझे पूछा तुम्हें क्या वाकई इसकी जरूरत है? हम अपनी अन्य सभी साडियो को प्रयोग कर चुकी हो । मुझे वो साडी लौटा कर रहा । बडा वजाहत हबीबुल्लाह, राजीव और संजय के साथ दून स्कूल थे । अभी बुला याद करते हैं । माँ दरअसल राजीव के बजाय संजय से अधिक आत्मीय प्रतीत होती थी । संजय जिंदादिल और मजा किया था । हमेशा सब की छुट्टी लेता था । राजीव कहीं अधिक गंभीर था । संजय की भारत वापसी के साल भर के भीतर ही उन्नीस सौ के नवंबर माह में लोकसभा को ये बताया गया की अन्य कार उत्पादकों के साथ साथ संजय गांधी ने भी देश के लिए स्वदेश में बनी सस्ती कर बनाने के लिए सरकार से लाइसेंस मना है । इसकी कीमत छह हजार रुपये होगी । भारत की पहली स्वनिर्मित कार्यसिद्ध होने वाली थी लो जी था हम लोग तो इस साल बाद उत्पादन करने के लिए इस लाइसेंस पर छत ट्राॅला के दावों को दरकिनार करके क्यों थे । उन दिनों व्यापार उद्योग जमाने के लिए सरकार से लाइसेंस लेना पडता था । बाईस वर्षीय नौसिखिया संजय हूँ विशुद्ध भारतीय सामग्री से सालाना पचास हजार कार उत्पादित करने के लिए लाइसेंस केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में दे दिया गया । किसकी सदारत संजय की मां कर रही थी? खबरों के मुताबिक तत्कालीन औद्योगिक विकास मंत्री फखरुद्दीन अली अहमद बाद में इंदिरा के वफादार राष्ट्रपति हुए जिन्होंने आपातकाल के अध्यादेश पर दस्तखत किए थे और उनके मातहत मंत्री दोनों नहीं अपनी आखा की मंशा को सिर माथे रखकर संजय को मंजूरी की चिट्ठी जारी कर दी । विपक्ष ने भाई भतीजावाद और मर्यादा भंग करने का शोर मचाया । समाजवादी संसद जॉर्ज फर्नांडीज ने गुस्से में कहा इंदिरा बेहाई से भाई भतीजावाद अपना रही है अटल बिहारी वाजपेयी कर्जे ये तो उन्मुक्त भ्रष्टाचार है । व्यापार संबंधी योग्यता अथवा अनुभव से रहीन होने के बावजूद उन्हें अपनी माँ की सरकार की कृपा से आगे बेहसारा फायदा होने वाला था । वे अचानक विशाल कार उत्पादन औद्योगिक परिसर के मुखिया हो गए जिसमें एक करोड रुपए का निवेश होना था । जबकि साल उन्नीस सौ सत्तर सत्तर के लिए उनकी घोषित आमदनी महज सात सौ अडतालीस रुपये थी । संजय की कार परियोजना को इंदिरा द्वारा आंख मूंदकर की जा रही मदद, उसके बारे में आलोचना एक भी अल्फाज नहीं सुनने की मानसिकता लेवॅल रचित ऍम क्वीन ऑफ के शब्दों की जांच चलाते हैं । वंडरलैंड का शासन में अकेले चलाती हूँ । हमारी दखलंदाजी बर्दाश्त नहीं की जाएगी । वक्त बीतने के बाद हम देखते हैं कि भारत में मारुति क्रांति के सहयोग खून जनक तो संजय थे भले ही मरणोपरांत लेकिन तब तो उसका मारुती का सपना इंदिरा के गले की फांस बन गया था । उन्हें देख कर उनके विरोधी यू भी उन पर भडक गए थे । और अब मारूति परियोजना नहीं तो मानो उन्हें इंदिरा के खिलाफ सुनहरा अवसर और स्थाई मास्टर दे दिया जिसका वे आसानी से और सही मायने में प्रयोग करने लगे । मारुति सुजुकी का आज देश के इतिहास का हिस्सा है । सर उन्नीस सौ अस्सी के दशक के साइकिल और स्कूटर चलाने वाले लोगों की पीढी के लिए मारुति आठ सौ सडक पर सुरक्षित गाडी चलाने से लेकर सामाजिक उन्नति का द्योतक है । उसका साथ ही मारुति ने तब के मध्यवर्ग को कार मालिक होने और समाजवादी भारत में सामाजिक उन्नति का प्रतीक होने का गौरव भी प्रदान किया । ऍम उन्नीस सौ पचास के दशक के भारत का आई थी मारुति उन्नीस सौ अस्सी के दशक के आखिरी कार और उन्नीस सौ नब्बे के दशक के आरंभिक कालका रत की चार पहिए की ऐसी सुरक्षित सवारी । इससे लाखों परिवारों को पहली बार कार मालिक बनने का सुखद ऍम संजय ने देशी फॅस बनाने का सपना देखा था और उसकी माता उनके सपने को साकार करने में जी जान से जुटी थी । मारुति परियोजना संजय के लिए ऊंची राजनीति और बडे उद्योगों की दुनिया में सीधे दखल का सुनहरा मौका लाई है और उसकी गतिविधियां जैसे जैसे अधिक विवादास्पद होती गई वो राजनीतिक सत्ता अपने की और अग्रसर होता गया । मारुति मोटर्स लिमिटेड कंपनी का गठन उन्नीस सौ इकहत्तर में किया गया और संजय उसके प्रबंध निदेशक बने । उन्होंने पुरानी दिल्ली के गुलाबी बाग इलाके में स्तर अपनी वक्त चौक में सबसे पहले कार के ढांचे यानी चेस इसका निर्माण किया था जिसमें जामा मस्जिद के आसपास की दुकानों से कल पुर्जे लाकर फिट किए गए और ऍम मोटर साइकिल के इंजन से उसमें लगाया गया । इस प्रक्रिया से ग्रामीण भारत में आज तक अनपढ मिस्त्री पुराने वाहनों के कलपुर्जे लगाकर कच्ची सडकों पर सामान और सवारी ढोने के लिए जुगन नामक वाहन बनाकर चलाते हैं । यू तो जुगाड शब्द का मतलब ही नहीं थी कहीं का रोडा भानुमती ने उनका जोडा के तर्ज पर अपना काम निकालना है । लेकिन हमारी पारंपरिक मेधा से तैयार वाहन को भी अब चुका दम मिल गया है । एक में पानी देने वाले पंप के इंजन से तैयार वाहन उत्तर ही नहीं पश्चिमी मध्य और पूर्वी भारत तक में गांव कस्बों की सडकों पर गन्ने की पूछ लिया और स्थान या गेहूं के बोरे लादे लाइन में लगे दिख जाएंगे । पर सर कितना है कि संजय ने जो भानुमति का कुनबा जोडा था, थोडे आना दर्जी का चुका था । वो बडे पैमाने पर प्रयोग के लिए वाहन तैयार करने की सुविधा के बजाय शायद हस्तशिल्प की कोई कलाकृति बना रहे थे । इंदिरा की सरकार संजय की मदद नहीं मानो बच गई । ताजा ताजा राष्ट्रीयकृत बैंकों ने लगभग पचहत्तर लाख रुपए राशि का कर्ज बिना किसी गारंटी के उन्हें सौंप दिया । सेंट्रल बैंक के अध्यक्ष धर्मवीर तनेजा को मजबूरन संजय को ये बताना पडा कि वह उनके लिए और राशि जारी नहीं कर सकते तो तनेजा को एक सफदरगंज रोड बुलाया गया । यहाँ बताया जाता है कि संजय ने उन्हें पद से बर्खास्त कर देने की धमकी नहीं पहने । जाने इसके बावजूद जब उठते नहीं देखे तो सेंट्रल बैंक के अध्यक्ष पद पर उन्हें बरकरार रखने से इंकार कर दिया गया । हरियाणा के मुख्यमंत्री बंसीलाल है । कायदे कानून को धता बताते हुए संजय को कौडियों के मोल हथियारों के गोदाम हिनस्ति चार सौ एकड कृषि भूमि पेश नहीं है । हालांकि रक्षा नियमों के अनुसार हथियारों के गोदाम के पास उद्योगधंधे लगाने की अनुमति पर रोक है संजय कोई जमीन कथित रूप में दस हजार रुपए प्रति एकड के भाव पीची गई थी जबकि उसके आस पास की जमीन प्रभाव उस समय पैंतीस हजार रुपए प्रति एकड हूँ । साल में जब हिंदुस्तान टाइम्स के संपादक बीजी वर्गीज ने संजय की गांधी की कंपनी के बारे में आलोचनात्मक लेख छापे हैं उन्हें खडे खडे पद से हटा दिया गया । हिंदुस्तान टाइम्स के मालिक एक बडा भी दरअसल मारूति के निवेशकों में शुमार थे । सरकार और व्यापार के पहिए मानव संजय की एक आवास पर रुकने अथवा चलने लगे थे । भवन जब प्रधानमंत्री निवास सही उद्योगपतियों को फोन करते थे तो ये स्वाभाविक था की वह एहसान करने के लिए आतुर हो जाएगा । शायद ये सोचते हुए इंदिरा स्वयं परियोजना में निजी दिलचस्पी ले रही हैं । लेकिन ऐसा भारी समर्थन मिलने के बावजूद मारूति बनाने में संजय नाकाम रहे । मई उन्नीस सौ तिहत्तर में पत्रकार उमा वासुदेव को संजय जब मारुती का मुआयना कराने के लिए उसमें बैठाकर घुमाने ले गए तो उन्हें समझ में आया कि कहाँ तो सर असर नाकाम है क्योंकि उसमें से तेल छू रहा था और वह बेहद गर्म हो गई थी । बस देव याद किया वो मारुती आठ सौ में मुझे बैठाकर अस्सी किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से फैक्ट्री परिसर का चक्कर लगाने लगा तो मैं तो उधर गई । जनता के लिए बडे पैमाने पर बादत होने वाले उत्पाद की जगह खासकर बनाया गया डिजाइनर वाहन था ठीक से काम ही नहीं कर रहा था । इससे साफ है संजय की मारूति ग्रामीण भारत में चलने वाले जुगाड वाहनों के बराबर भी नहीं थी जो गांव वालों को बैठाकर उनकी मंजिल तक हफ्ते है । घर आते हुए मजे में पहुंचा देता है । मारुति दरअसल लाइसेंस परमिट राज की बीमारियों का प्रतीक पर गई थी । इस बात का जलन तो महारण्ये किस इंदिरा भारतीय राजनीति की त्रित राष्ट्र बिहारी यानी अपने बच्चे की महत्वाकांक्षी गलतियों को माँ बाप द्वारा जानबूझकर नजरअंदाज किए जाने से ग्रस्त थी । उन्होंने तो मारुती को देशी भारतीय उद्यम की उपमा देकर उसे भारतीय युवाओं द्वारा अपनाने का ब्रेना दायक उदाहरण तक ठहरा दिया । उन्होंने शायद इस बात का फिल्म ही नहीं था कि उनकी सरकार की साख पर मारुति कैसे बट्टा लगा रही थी । उस जमाने नहीं इंडिया टुडे पत्रिका में कार्यरत पत्रका सुनील सेठी ने इसे संक्षेप ने बताया मारुति लिमिटेड अंत तक बडे पैमाने पर जमीन पर कब से और वित्तीय घोटाले का रूप ले लिया । राष्ट्रीय कर बैंकों द्वारा चापलूसी भरा कर्ज, मेला, व्यापारिक समूहों तथा व्यापारियों से पैसा बैठने के लिए फिरौती और प्लेट में संजय के शक्ति प्रदर्शन का विरोध कर नहीं अथवा उनकी बात ना मानने वाले बैंकरों कैबिनेटमंत्री हो और बडे उद्योगपतियों की छुट्टी कर दी गई । आप कल के दौरान मारुति की तरफ से ध्यान हटाकर हूँ संजय ने और बडे पैमाने पर धांधली शुरू कर दी । जनता सरकार ने मारुती परियोजना को उन्नीस सौ बहत्तर में खत्म कर दिया और उसके मामलों की जांच के लिए एक कमेटी गठित समिति ने अत्यंत आलोचनात्मक निष्कर्ष पेश किया । इंदिरा गांधी जब उन्नीस सौ अस्सी में दोबारा सत्तारूढ हुई तो संजय की मृत्यु के बाद उन्होंने अपने बेटे के सपने को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया । मारुति उद्योग को उन्नीस सौ इक्यासी में सरकारी कंपनी के रूप में गठित किया गया और उसके तथा जापान की सुजुकी कंपनी के अभी संयुक्त उद्यम करार हुआ हूँ । संजय तो कार बनाने में नाकाम रहे लेकिन कचरे के उस फेर में जान फूंकने के लिए पेशेवर कार उत्पादक की जरूरत थी । सुजुकी ने कदम आगे बढाया और संजय द्वारा बनाए गए छूटे हुए तथा बेहद गर्म हो जाने वाले डिब्बे की जगह मारुति सुजुकी का निर्माण कर दिया जो भारत की टूटी फूटी सडकों पर छोटी मगर मजबूत कार के रूप में सडक पर दौडने लगे । तरक्की ये हफ्ता आम आदमी का वाहन भारत में भी पैदा हो गया था । संजय ने तो हालांकि भारत की वॅार नहीं बना पाए फिर भी उसने ऐसा असंभव सपना देखा जो आखिरकार पूरा हुआ । भले ही वो विदेशी प्रौद्योगिकी और सरकारी कृपा की ताकत से ही पूरा हुआ हो । आपने मारुती के प्रयोग के पूरे साल में तथा इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्रित्व की साफ की जो उन्होंने बाली ली उसके कारण संजय लगातार विपक्ष तथा प्रेस के सीधे निशाने पर रहे । इंदिरा ऐसी नजर आती है कि वे इन हमलों की वजह नहीं समझ पा रही हैं और इन दिनों वो नाराज दिखती और बम्बई के गैरेज में हवाई जहाज बनाने वाले पूर्वी यूरोप के पादरी का हवाला देकर आश्चर्य जताती रही यदि उसने विमान बना लिया था । संजय कार्य का निर्माण जो नहीं कर सकता हूँ वो बार बार यही कहने लगी कि मेरे बेटे को नाहक निशाना बनाया जा रहा है और बदनाम किया जा रहा है । साक्षात्कारों में उन्होंने ये भी कहा, मेरा बेटा तो राजनीति में कतई शामिल है ही नहीं । दिल से लगभग धैर्य चुकने की हद तक चाहती थी कि वह सफल मानो उस पर ये उनका उद्धार हो अथवा उनकी मदद करना उनका कर्तव्य हो । उससे उन्हें सचमुच मारूति बना देने की वास्तविक उम्मीद अथवा उसे किसी सरकारी काम नहीं व्यस्त देखना चाहती थी । मगर इस जरूर लगता है कि वे उसकी कोई भी फरमाइश ठुकराने में पक्षिम । उन्हें इस बात करना था भारत की पहली विशुद्ध भारत में बनी कार के उत्पादन की संभावना नहीं मान उनके राष्ट्रवाद को पर लगा दिए थे और इस मेड इन इंडिया का परियोजना को उनका बेटा पूरा करने की कोशिश कर रहा था । इस बात नहीं उनकी नजरों में उसे देशभक्त नेहरू खानदान के समुचित उत्तराधिकारी का दर्जा दे दिया था । बंगलादेश शुद्ध के दौरान प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कामकाज से संजय दूर ही रहा । शायद संकट की विकरालता के कारण इंदिरा को समय सिद्ध योग्यता वाले लोगों की जरूरत थी और भी इसके लिए हक्सर तथा मानिकशा जैसे बुद्धिमान तथा अनुभवी लोगों पर निर्भर करना पडा । युद्ध के बाद जैसे जैसे अपनी हैसियत से ज्यादा ऊंचाकर पानी लगा उसका टकराव सीधे अपनी माँ की सरकार के प्रभारी व्यक्ति से हो गया । शारदा प्रसाद इसकी पुष्टि करते हैं । युवराज की हरकतों पर संप्रभु और अधिकारी के बीच बदमजगी पडने लगी । अक्सर और संजय दरअसल एक दूसरे को आरंभ से ही ना पसंद करते थे । अक्सर नहीं तो इंदिरा को किसी समय चेताया था, संजय को मारुती का लाइसेंस देने पर राजनीति के कटघरे में खडी हो जाएंगे । उन्होंने बंसीलाल के साथ हरियाणा में भूमि के सौदे को भी गलत ठहराया और इंदिरा गांधी को सलाह दी कि वह संजय को दिल्ली से कहीं दूर भेज दें ताकि मारुती से जुडे घोटाले थोडे दिनों में लोगों की याद से उतर जायेंगे । नटवर सिंह कहते हैं, अक्सर ने उन्हें बडी साफगोई से कहा था कि आपको भारत के प्रधानमंत्री अथवा संजय की मां में से किसी एक स्थिति को चुनना पडेगा । वसंत साठे नहीं याद किया और युवक और उसकी गतिविधियों के बारे में अक्सर ने उन्हें चेताया था मगर उनकी चेतावनियों का उल्टा ही असर हुआ । संजय ने अपनी तरफ से अपनी माँ को अक्सर के विरुद्ध भडकाने में भी कोई कसर नहीं छोडी थी । जाने कहाँ से या वहाँ उडी ये अक्सर खुद बंगलादेश विजय का सहारा अपने सिर मान रहे थे । वो अपने चहेतों को फायदा पहुंचा रहे थे । इंदिरा का एकबार छुडाकर खुद ही सत्ता शिरोमणि के रूप में काम कर रहे हैं । संरक्षक, माँ और उन्मादी प्रधानमंत्री ने अपने बेटे के आलोचक को अपने यहाँ से हटाने में तेरी नहीं की । अक्सर के अधिकार छिनने लगे । शारदा प्रसाद लिखते हैं, गलत फहमी की खाई बढने के बहुत सारे कारण थे जिनमें उन्हें चाहने वालों द्वारा उनकी बात बात पर प्रशंसा किया जाना भी शामिल था । प्रमुख सचिव के रूप में उन्नीस सौ तिहत्तर में जब अक्सर का कार्यकाल बढाने का मौका आया तो इंदिरा गांधी ने उन्हें हटा दिया । बाद उन्होंने योजना आयोग के उपाध्यक्ष जैसे राइट वही पद पर बिठा दिया । आपातकाल लगने के बाद उन्नीस सौ पचहत्तर में दिल्ली में कपडे की मशहूर दुकान पंडित प्रदर्शन इसके मालिक हक्सर के रिश्तेदार हैं । उस पर छापा पडने वाला था और संजय के आदेशानुसार अक्सर के अस्सी साल का बुजुर्ग नजदीकी रिश्तेदार की गिरफ्तारी होने वाली थी । इससे साफ है तब तक संबंध किस कदर बिगड गए थे । गिरफ्तारी जब हुई तब इंदिरा को कथित रूप से इस की जानकारी नहीं थी और उन्हें जब पता लगा तो उन्होंने वरिष्ठ नागरिक को छुडाने के लिए तत्काल दखअंदाजी की । अच्छा है उसकी भरपाई के लिए हक्सर की । माता का जब उन्नीस सौ उन्यासी में देहांत हुआ तो आपने शिष्टाचार का परिचय देते हुए सब कुछ होने के बावजूद वो उनके घर दुःख व्यक्त करने के लिए मिलने अक्सर की छुट्टी होते ही इंदिरा अपने सबसे निर्णय सलाहकार से हाथ हो गई थी । उनकी जगह दूसरे कश्मीरी पंडित तथा बुद्धिमान एवं समझदार अर्थशास्त्री पि ऍफ अगले चार साल तक उस पद पर रहे मगर अक्सर की तरह हर उनसे कभी नजरे मिलाकर तक नहीं कर पाए और अक्सर के अनुसार प्रधानमंत्री से घर की राय जब होती थी तो वे रीढविहीन सुद्ध होते थे परमेश्वर नारायण हत्सा शीर्ष नौकरशाह जिन्होंने इंदिरा को बैंकों के राष्ट्रीयकरण, कांग्रेस तोडने, प्रिवीपर्स खत्म करने तथा बंगलादेश युद्ध में हाथ पकडकर उनको राह दिखाई उन्हें अब वो पद छोडने को संजय गांधी के कारण मजबूर किया गया जिसके वह पर्याय बन गए थे । उनकी विदाई इंदिरा गांधी पर बेहद भारी पडने वाली थी । संजय के उदय के साथ अन्य लोगों के दिन भी फिर रहे जिससे सिगरेट के आदि कमेरी राजेंद्र कुमार धवन धवन पहले आकाशवाणी ने कर्मचारी थे और उन्हें इंदिरा गांधी के कर्मचारी वर्ग में उनके रिश्ते के भाई यशपाल कपूर ने में शामिल किया था जिस पाल तब जवाहरलाल नेहरू के कर्मचारी वर्ग में शामिल थे । आर के धवन की तरक्की के साथ ही भारत के सरकारी ढांचे में सबसे महत्वपूर्ण दिए यानी निजी सहायक सहयोग शुरू हुआ । सत्ता के केंद्र की आंख नाथ कार पीए अनेक वीआईपी लोगों के यहाँ अपने ही वफादार लोगों को जमा देता है जिससे उसकी सत्ता और सूचनाओं का दायरा व्यापक होता जाता है । इन्हीं कारणों से वो अपने बॉस के लिए अपरिहार्य तथा स्वयंभू सत्ता का दलाल बन जाता है । नेहरू का निजी सचिव एमओ मथाई यदि भारत में सप्ताह का पहला दलाल पीए था । उसके बाद दूसरा नंबर आरके धवन को ही मिलता है । इसमें कोई शक नहीं यूपीए की सत्ता उसके उस आता की सत्ता पर निर्भर है । इस की सेवा में वो तैनात होता है और यदि उसके बॉस के हाथ से सत्ता के सारे सूत्र हो तो फिर उसकी खुद की सत्ता के भी पर निकल आते हैं । तो धवन से पहले वहाँ पर मथाई था और उसके बाद विन्सेट जॉर्ज आया जो कथित रूप में केरल में सबसे तेज गति से टाइप करने का पुरस्कार जीत चुका था । जॉर्ज भी पहले इंदिरा गांधी के कर्मचारी वर्ग में शामिल हुआ और फिर वो राजीव और बाद में सोनिया गांधी का । पीएम ना धवन और जॉर्ज कि धमक से ये पता चलता है कि कांग्रेस में लगातार ये प्रवर्ति बढ रही थी । सत्ता जमीनी लोकप्रियता के बजाय सर्व सत्ता संपन्न सर्वोच्च परिवार को नियंत्रित करने वाले हाथों से प्रवाहित हो रही है । यदि नेहरू के देहांत के बाद भारत में सबसे अधिक महत्वपूर्ण लोग सिंडिकेट के बुजुर्ग नेता से तो इंदिरा की मृत्यु के बाद दूसरा सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति आर के । धवन था । इस परिवर्तन से यह स्पष्ट होता है कि नेहरू की मृत्यु के बाद जब सत्ता का केंद्रीकरण हुआ तो फिर सत्ता केसरो तक पहुंच को नियंत्रित करने वाले दलालों का प्रभुत्व बेशुमार तादाद नहीं हम ही हो गया । आपातकाल के दौरान पर्दे के पीछे जो कुछ चल रहा था उसके लिए धवन को ही जिम्मेदार ठहराया गया क्योंकि वो हर समय इन्दिरा के साथ उनकी अमित परछाई के रूप में रहते थे । धीरे धीरे धवन और संजय गांधी प्रधानमंत्री के घर तक पहुंच को मिलकर नियंत्रित करने लगे । धवन कहते हैं, हम चाहे जो भी काम करें, हमेशा इंदिरा को ध्यान में रखकर करते थे । उनके प्रति मेरी मुकम्मल वफादारी । मैंने उनके साथ जितने भी समय काम किया, उस दौरान उनका अहित करने संबंधी कोई भी काम नहीं किया । उन के लिए मैं दिन में चौबीसों घंटे हफ्ते में सातों दिन काम करता था । उन्नीस सौ से लेकर लगातार बाईस साल तक न कभी काम की छुट्टी और ना कभी छुट्टी के दिन छुट्टी । मैंने उनके खिलाफ जहाँ आयोग यानी जनता सरकार द्वारा आपातकाल की ज्यादतियों की जांच के लिए उन्नीस सौ में नियुक्त जांच आयोग उसके सामने गवाही देने से इंकार कर दिया था और अपनी वफादारी के लिए जेल की हवा भी खाई थी । उनके अथवा संजय के हितों पर चोट करने के लिए क्या मैं कभी कुछ कर सकता था? मेरा एकमात्र लक्ष्य यही देखना था कि कुछ भी खत्म हो जाये । दुर्भाग्य से सभी कुछ गलत होना शुरू हो गया था । इंदिरा और संजय के बीच परस्पर सुरक्षात्मक गुप्त शक्तिशाली बंधन था । इसे माँ द्वारा अनुशासन करने की कोई कोशिश अथवा कोई भी संतान उचित मर्यादा तोड नहीं पाई । बेटे के आधिपत्य के सामने माँ मानवशक्ति ही हो जाती थी । उसके चरणों में चुप चाप अपना साम्राज्य समर्पित कर देती थी । उन्होंने मातृत्व को किसी इस तरीके की सर्वोच्च परिपूर्णता बताया था । इसके बावजूद उन्होंने मातृत्व को सत्ता के फायदे बांटने के रूप में परिभाषित कर डाला । मेरा बचपन क्योंकि इतना आरक्षित और अकेलेपन का शिकार था इसलिए अपने बच्चों के लिए अपना सारा समय समर्पित करने के लिए मैं प्रतिबद्ध थी । बच्चे के लिए अपनी माता के प्यार और देखभाल की उतनी ही गहराई आवश्यकता है जितनी किसी पौधे के लिए । धूप और पानी की । माँ के लिए उसके बच्चों का फर्ज सबसे पहले आना चाहिए । कभी किसी अन्य स्त्री ने जब कहा मैं अपने बेटों के साथ अधिक समय नहीं बताता होंगे । संजय हुए बात बेहद बुरी लगी और मेरी और लगाते हुए उसने कहा, मेरी माँ बहुत सारे महत्वपूर्ण काम करती है । उसके बावजूद वो मेरे साथ इतना ही खेल लेती है जितना आप हैं अपने छोटे से बेटे के साथ नहीं कर पाते । संजय अपनी माँ का रक्षक और भी ऐसी माँ जो हाथ में सत्ता आते ही इस बात के लिए समूचा प्रयास करती थी उसे उनका भरपूर प्यार और देखभाल नसीब हो सके । हम देखी चुके हैं कि नेहरू ज्यादातर इंदिरा पर बौद्धिक और भावनात्मक ध्यान दिया करते थे और उन्होंने भी संजय की देखभाल में कोई कसर नहीं उठा रखी थी । मगर ये बहुत एक सुखी दे पाएंगे, बौद्धिक रूप से उसे समृद्ध नहीं कर पाएंगे । इंदिरा गांधी ने जैसे ही प्रधानमंत्री कार्यालय को अपने बेटे के हाथ का खिलौना बनने दिया, माँ और प्रधानमंत्री दोनों ही रूको, मैं विफल हो गई । बच्चों की परवरिश के मामले में माता पिता तो हमको हमेशा अपराधबोध से ग्रस्त महसूस करते हैं और इंदिरा के तत्कालीन पर्यवेक्षक कहते हैं कि अपनी शादी की कठिनाइयों और अपनी ऍफ रोज की विपरीत जीवन शैली के द्वैत के कारण है । इंदिरा के मन में अपराधबोध निशा रहता था । उनके बेटे जैसे जैसे बडे हुए तुम्हें शायद ऐसा लगा कि उनके पिता के साथ अन्याय हुआ क्योंकि नेहरू की बेटी के रूप में इंदिरा के हाथ में यहाँ सत्ता और रसूख दोनों थे जब कि रोज सादगी और सामान्य सी परिस्थितियों में जीवन यापन करते रहे । अपने ऐसी माँ होने के कारण मन में अनजाने ही अपराधबोध बैठा लेने जिसने फिर उसके मुकाबले नेहरू हो चुका हूँ और उसके पिता को अपने जीवन में दूसरे नंबर पर धकेल दिया था । इसलिए उन्हें ये गहरा अहसास था । अपने पिता की मृत्यु के लिए संजय शायद मन ही मन उन्हें दोषी मानता था । माँ पिता के अपराधबोध को ताड लेने पर वो बहुत बच्चे के लिए मनमानी की छूट का लाइसेंस बन जाता है । और इस साफ है कि संजय भी इंदिरा की कमजोरियों का फायदा उठाता था । बच्चों की अपने लिए अपने पिता द्वारा महान सपने देखने से इनकार करने के विरुद्ध बगावत कर चुकी थी । इसलिए अपने बेटे को शिखर तक पहुंचाने के लिए उन्होंने उनके विपरी हरसंभव प्रयास किए । इन जरा अपने पिता नेहरू के घर में आरामदायक जीवन के बीच सत्तावन रोज गांधी सामान्य पृष्ठभूमि से होने के बावजूद प्रतिभाशाली पिता थे । मैंने संजय अपना आदर्श मानता था । संजय के बचपन में खास किस्म की भावनात्मक मानसिक असुरक्षा तो घेरती थी, इसके कारण वो अपनी माँ का समर्थन पाने को अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझता था । शायद रूस द्वारा झेले गए अपमान का पंचनामा बदला लेने के लिए कभी सुरक्षा, कभी जिद्दी मिजाज का । संजय अपनी माँ से अपनी जब मनवाकर ही दम लेता था । घर में वो नवाब यादों की तरह व्यवहार करता था । आपने नाश्ते में खाई जाने वाली चीज हूँ और उनके पकाने की शैली, स्वास्थ्य गंद आदि के बारे में गुजरती भर समझौता नहीं करता था । वो उबले अंडों और क्रीम गले डालिये का नाश्ता करता था । ये बानकी तब की है जब इंदिरा के में सत्ताच्युत हो जाने पर उनका परिवार प्रधानमंत्री निवास से किसी अन्य मकान में रहने गया और सोनिया गांधी का घर चलाने की जिम्मेदारी थी । फिर अंडे संजय की पसंद के अनुसार नहीं पता पाएं तो उसने गुस्सा होकर वो तस्तरी हवा में उछाल दी । बी के । नेहरू और उनकी पत्नी गौरी नहरो अवाक रह गए और उसकी माँ भी चुप्पी साधे रही । उसे डांटने की शायद उनमें हिम्मत नहीं थी, मगर अपमान का भाव उनके चेहरे पर तारीख था । आपातकाल के दौरान आकाशवाणी के लिए जब नई परिषद हम चुनी जा रही थी, तब रविशंकर द्वारा तैयार धन को सुनकर अनुमोदित करने के लिए इंदिरा के साथ संजय भी आया हुआ था और संगीत के बारे में इंदिरा के बजाय संजय नहीं अपनी राय जताई और इंदिरा चुप चाप सुनती रही और सारी बातचीत उसे ही करने दी । बेटे पर माँ की इस नहीं मई मगर कुछ भजन इतनी निर्भरता ने पहले फैसलों की निष्पक्षता को प्रभावित किया जिससे आरंभ में शांति का मतलब हम हुआ और फिर तीन उन्माद और एकाकीपन खाली हुआ । इससे तानाशाहीपूर्ण सप्ताह की और मोड दिया गया । उन्हें यह समझाने में वो कामयाब रहा कि वह दोनों मिलकर ही दुनिया का मुकाबला कर सकते थे । मार्क कहते हैं, इसमें कोई शक नहीं है । उनकी आपस में बहुत गहरे संबंध थे । वो याद करते हैं कि कभी चुनाव प्रचार के दौरान जब वो इंदिरा का सक्षम प्यार करने के लिए इंतजार कर रहे थे उन की आ रही थी । अभी बताया गया की संजय का फोन आया था । वो लगभग खूब हुई फोन की और लडकी मानव उस की ओर से आए । फोन के कारण उनका मन बेहद प्रसन्न हो गया था । इसमें कोई शक नहीं उनके लिए उसका जबरदस्त है तो था उनके संबंधों के बारे में । उस समय तरह तरह की अजीब सी अफवाहें फैली हुई थी । उनमें से कुछ के अनुसार उनके बीच मजबूरी का संबंध था । पत्रकार फॅसने आपने निबंध पसंद है मुफ्फसिल जंक्शन में ये माना आपातकाल के दौरान ये लिखने के लिए वह शर्मिंदा थे । संजय का वहाँ पर वर्चस्व, ब्लैक मिल अथवा आपस में यौन संपर्क के कारण भी संभावना था । चैट ने कहा कि ये दावे सरासर बेबुनियाद थे । उन्हें ये तो स्पष्ट है उसे अत्यधिक सहारा होता था । चुकी तो मर्दानी शक्ति का प्रतीक था जिसके इंदिरा कभी बहुत इच्छुक थी और एक हिंदू बुआई नया जीवन आ गया । आई अब उन घटनाओं का रुख करते हैं जिनके कारण पच्चीस जून उन्नीस सौ पचहत्तर को आपातकाल लागू किया गया । ये घटनाएं एक दूसरे पर ऐसी तेजी से गिरी मानो कोई ताश का महल रह गया हो । बंगलादेशी युद्ध के बाद खुशी मनाने का जनज्वार उठा था । वो लगभग और उन्ही कडवी, आर्थिक कठिनाइयों और राजनीतिक संघर्ष के सिर उठाते पहाडों में सफल हो गया । ऐसा प्रतीत हुआ मानो भारत की शासक देवी से देवताओं को खुद ही एशिया हो गई । बांग्लादेश विजय के तो गाल बार मानव त्रासदियों की झडी लग गई । बांग्लादेश चाहे एक करोड शर्णार्थियों का भारत पर भारी बोझ पडा हूँ, कोड देखा चाहिए लगातार तीन साल उन्नीस सौ बहत्तर, तिहत्तर और चौहत्तर में सूखा पड गया । अनाज का उत्पादन आठ प्रतिशत घट गया । खाद्यान के दाम आसमान छूने लगे । इसके साथ ही पहला तेल का झटका में लगा जब पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन आॅल रातोंरात कच्चे तेल के दामों में चार गुना की जबरदस्त वृद्धि कर दी । इसकी वजह से हर चीज के दाम बेतहाशा बढ गए । महंगाई की दर उन्नीस सौ चौहत्तर आते आते हैं । तीस फीसदी को छूने लगे । महंगे दाम और पिल्लर देशभर में छा गई । भारत जबरदस्त आर्थिक संकट की चपेट में आ गया । इससे अराजकता फैल गई । प्रदर्शन ऍर हडताल देश के अनेक हिस्सों में आए दिन होने लगे । मुंबई, मैसूर, नागपुर और केरल के कुछ हिस्सों में खाद्यान की लूटपाट शुरू हो गए । साल उन्नीस सौ बहत्तर और बेहतर के दौरान सिर्फ मुंबई में ही बारह हजार से अधिक हडतालें हुए । कारखाने बंद हुए और बेरोजगारी मानव महामारी बन गई । निराश नौजवान भरी धूप में गलियों के नुक्कड पर बहस मुबाहिसे और लडाई तक पहुँचने लगे । पश्चिमी दुनिया में भी आर्थिक स्थिति बिगडने लगी । इसकी वजह से उन्नीस सौ अस्सी के दशक थे । मार्गेट थेचर और रोनाल्ड रीगन जैसे नेताओं और परिवर्तनकारी नई आर्थिक नीतियां लागू हुई । लेकिन इंदिरा गांधी के लिए कालका ये सबसे महत्वपूर्ण चक्र और कुछ नहीं । विपक्ष की साजिश भर्ती कांग्रेस विरोधीदल विकास में बाधा डाल रहे थे । बार बार कम लोगों का आह्वान किया जा रहा था । किसानों से अपना मान नहीं बेचने को कहा गया, कर नहीं चुकाने की सलाह भी दी गई । उनका लक्ष्य सरकार को निष्क्रिय करना और देश की छाती पर चढकर सत्ता हथियाना था । बांग्लादेश विजय के बाद इंदिरा गांधी ने वास्तविक कायापलट के लिए सत्ता हासिल की, लेकिन इस सप्ताह का बेहतर उपयोग करने से वो छूट गई भी हमेशा बनते हुए इतिहास में भागीदार होने के प्रति जगह नहीं है । लेकिन इतिहास की नई इबारत लिखने का उन्हें न जाने क्यों अपने पर भरोसा नहीं था । बांग्लादेश विजय ने देश को नई सोच और आशावाद से वो क्या ऐसी उम्मीद भरी सोच इसे नई प्रकार की राजनीति करने के लिए ढाला जा सकता था और नेता द्वारा आपसी समझौते का ऐसा युग शुरू किया जा सकता था । इसे अपने विरोधियों से सहमती स्थापित करने के प्रयास का आत्मविश्वास होना चाहिए था । अब तो गरीबी हटाओ के लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में व्यापक राजनीतिक समझ बनाने की आवश्यकता पर ध्यान देने की बजाय व्यापक श्रमिक और ग्रामीण असंतोष तथा युवाओं में बढती कुंठा को अर्थव्यवस्था में भारी गिरावट के मानक के रूप में नहीं पहचान कर इंदिरा गांधी ने छुद्र राजनीति करनी शुरू कर दी, संधि और चौकन्नेपन के दलदल में घुसने लगे और उनके हर एक प्रदर्शन अथवा आलोचना भारत की प्रतिकात्मक सेनापति के रूप में अपनी विकास यात्रा में रोडा अटकाने की कोशिश महसूस होने लगे । भविष्य की और आपने की बजाय तो पीछे देखने लगी और भविष्य के लिए महत्वपूर्ण नई संस्थाओं और विचारों की रचना के कौशल की भारी कमी क्षेत्र ध्वस्त हो गई । प्रतिद्वन्दियों पर जीत दर्ज करने और राजनीतिक रूप में अव्वल बने रहने की जिद में उन्होंने भारत को नई बौद्धिक दिशा देने से स्वयं को खुद ही मेहरूम कर दिया । इतना विशाल बहुमत मिलने के बावजूद भविष्य की नई राह बनाने की क्षमता उनके द्वारा वंशगत नहीं । पास अपना और न ही उसे हासिल कर सकता ना किसी त्रासदी से कम नहीं था । सत्ता पाने को बहुत लगाए बैठे लोगों के राजनीतिक समीकरणों और दैनिक जीवन की बिगडती स्थितियों के बीच विस्फोटक खाल मेर हो गया । विपक्ष का उन्नीस सौ इकहत्तर में सफाया हो गया था । उसका इंदिरा हटाओ अभियान टॅापलेस हो गया था तो अब ये राजनीति में फिर से छाने के लिए मौका ताड रहा था । उनके दुश्मनों को धीरे धीरे ये समझ में आया । वोटों के बडी संख्या में बट जाने को देखकर इंदिरा को हराने का सबसे बढिया मौका उनके खिलाफ संयुक्त मोर्चा बना लेना होगा । इसे आज महागठबन्धन कहते हैं । इंदिरा विरोधी गठबंधन तैयार होने लगा जबकि इंदिरा गांधी देशभर में फैले असंतोष को दबाने के लिए राजनीतिक नियंत्रन के हजार को अपनाने लगी । बढती सामाजिक बचानी होते कर उन्होंने अपने जाने पहचाने हत्या, ॅ अथवा बिजली कौंधने जैसी तेजी से ऊपर से साम्राज्य नियंत्रन थोपने की कोशिश की । कांग्रेस के मुख्यमंत्रियों की दिल्ली से नियुक्ति की प्रक्रिया धडपकड चुकी थी । इंदिरा गांधी के नामांकित नेताओं ने राज्यों की बागडोर संभालने जबकि कुछ उतने ही बेवफा नेताओं को बर्खास्त कर दिया गया । राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगाकर अथवा विधानसभाओं को निलंबित अवधि में रखकर दिल्ली से उन का शासन चलाने की परंपरा चलने के लिए ताकि सत्तारूढ दल को चुनौती देने से विपक्ष को रोका जा सके । मंत्रिमंडल और पार्टी दोनों ही अब लगभग पूरी तरह इंदिरा के अंगूठे के नीचे आ गए । संकट मुंहबाए होने के बावजूद आर्थिक नीति भ्रमित थी । ये इस वक्त की तात्कालिक आवश्यकताओं और बिना सोचे समझे लोकलुभावन समाजवाद के बीच होते खाने लगे । उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा को आया । मैं फिर से कर्ज लिया और उसकी कठोर शर्तों को भी कुबूल कर लिया । उसके बावजूद प्रेस में छपी उस खबर के खानदान के लिए लपकी । वो भारतीय बाजार में निवेश के लिए बहुराष्ट्रीय निगमों को बुलावा दे रही थी । अवमूल्यन के सबका उनका दिमाग में ताजा थे । अपने ही दल में वामपंथियों के दबाव के कारण संकट को अर्थव्यवस्था के और अधिक बुनियादी सुधार केस अवसर में नहीं बदला जा सका । बहुदा कहती थी कि उन्हें मिश्रित अर्थव्यवस्था ही अधिक व्यावहारिक लगती है और आर्थिक मुद्दों पर उनकी कोई पहले से तय विचारधारा नहीं थी । किसी भी तरफ से कटता रूप में प्रतिबद्ध नहीं थी । साल उन्नीस सौ सत्तर में अपने एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा, हम निश्चित अर्थव्यवस्था के लिए प्रतिबद्ध रहे हैं । हम मध्यमार्गी हैं लेकिन मध्य से वाम किया और मिश्रित अर्थव्यवस्था टिकाऊ अवधारणा है और समाजवादी सामाजिक रचना था । साधन है बांध के आपने सक्षात्कार में कहने वाली थी, हमारे यहाँ गरीबी बडी समस्या है । हम इससे बाजार के थपेडों के भरोसे नहीं छोड सकते और बडे कारोबारों को मनमानी की छूट नहीं दे सकते । हम खुद को समाजवादी कहते हैं लेकिन ये सोवियत संघ अथवा सामने वाली देशों का समाजवाद नहीं है । हम अपनी राह खुद पाने का प्रयास कर रहे हैं । अरे उस रहा को ढूंढ ही नहीं पाए क्योंकि राजनीतिक और आर्थिक जगत के करता हूँ से उन्हें वास्तविक जानकारियां मिल ही नहीं रही थी । लाइसेंस परमिट राज नहीं, अर्थव्यवस्था में काम की आजादी का उत्तरा खोल दिया और राजनीतिक नियंत्रण नहीं । राजनीति में आलोचनात्मक आवाजों को खामोश कर दिया । चापलूसों द्वारा प्राप्त जानकारी पर निर्भरता के सहारे वो नहीं रहा का निर्माण कर भी कैसे सकती थी । ऐसे में कोई आश्चर्य नहीं । वो इस मिश्रित अर्थव्यवस्था को ठीक से प्रभाषित और लागू करने अथवा ये स्पष्ट करने में विफल रही कि हमारी अपनी रहा क्या थी । इसके बजाय फौजी उपायों के घेरे में उसका रह गई । हालत में विध्वंसक थे, समाजवादी अथवा नहीं । निजी पडे कारोबारों को उत्पादन के विस्तार की अनुमति देनी पडी और मांग का गला घोटना पडा । नौबत यहां तक आ गई की सरकार को मजदूरी की दर पर अंकुश लगाकर मांग घटाने की कोशिश करनी पडेगी । इस उपाय को कामगार वर्ग विरोधी बताकर निंदा की गई । सार्वजनिक उद्यमों के अनुसार निजी क्षेत्र को कडाई से नियमितकरने और विदेशी सहायता पर निर्भरता घटाने संबंधी विचारधारात्मक प्रतिबद्धताएं ताकपर रखनी पडेगी क्योंकि आवश्यक वस्तुओं की किल्लत बढ रही थी और उन के विरोध में प्रदर्शन भी घने होते जा रहे थे । सरकार ने बेहतर में जब खाद्यान का फोक व्यापार अपने हाथ में लिया और फिर उसमें समस्या पैदा होने लगी तो इस फैसले से हडबडी में पिंड छुडाए जाने से साफ होता है नीतिगत और विचारधारात्मक स्तर पर गहरा भ्रम । अनाज के थोक व्यापार का राष्ट्रीयकरण करने के फैसले की भनक लगते ही बाजार से खाद्यान्न भंडार गायब हो गए । बाजार में गेहूं अथवा चावल उपलब्ध ही ना भो पाने की आशंका से उपभोक्ताओं में आक्रोश फैल गया । केरल में खाद्यान के ट्रकों में लूटपाट हो गयी । किल्लत के कारण खाद्यान के भारी तादाद में आयात की जरूरत आन पडी जिसके कारण भारत फिर से खाद्यान्न आयात के शिकंजे में पहुँच गया । अनाज के थोक व्यापार के राष्ट्रीयकरण की कोशिश पता लगता है कि कठिन आर्थिक वास्तविकताओं से तो चार होने के बावजूद इंदिरा विचारधारात्मक बोझ के नीचे तभी रही वर्ष लगातार तीसरे साल जब में भी धोखा दे गयी । राजनीति के मुकाबले आर्थिक नीतियों को तवज्जो देने की मजबूरी पैदा हो गयी । में महंगाई निरोधक उपाय आरंभ किए और डॉक्टर मनमोहन सिंह के नेतृत्व में उधर आर्थिक सलाहकारों की अपनी टीम का समर्थन किया । अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष से कर्ज लेने के अलावा भी कोई चारा नहीं था । पहले हुए जिक्र के अनुसार इसके साथ लोकलुभावन योजनाओं और खर्चों पर रोक लगाने की रश्मि शर्तें भी माननी पडी । व्यवहारिकता की झोंक में आकर उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष की शर्तें मान तो ली, मगर तब तक बहुत देर हो चुकी थी । मनमोहन सिंह बाद में कहने वाले थे कि वे उनके उत्साह से प्रभावित थे । इसे अपनाकर उन्होंने इस समय राजनीतिक अलोकप्रियता के खतरे वाले महंगाई रोधी नीतियों के उपाय को स्वीकार किया । लेकिन उस अर्थव्यवस्था के व्यवस्थित रूप में बंधन काटने का विकल्प पौरी आपात उपाय नहीं हो सकते थे, जो भारत के नागरिकों को ही टेस्ट नहीं लगी थी । जैसा मनमोहन सिंह लगभग दो दशक बात करने वाले थे । अर्थव्यवस्था को में ऐसी नीतियों की जरूरत थी, जिनसे आमूलचूल कायाकल्प हो सके । लेकिन इंदिरा ने घबराहट में आधे अधूरे उपाय किए और गरीबी हटाओ नारा निर्दयी चुटकुलों के समान लगने लगा । देवी ने सोचा कि उन्हें राज करने का देवीय अधिकार था, मगर उनकी जनता हिंसक विरोध पर उतारू हो गई । उनमें रसूखदार वकील और न्यायिक बिरादरी भी शामिल थी । इंदिरा और न्यायपालिका के बीच सीधा टकराव हुआ । प्रगतिशील कानून बनाने की बुनियाद पर आधारित इंदिरा क्रांति के लिए न्यायपालिका का सहयोग आवश्यक था । उनके अनेक नीतियों को अदालतें पहले ही खारिज कर चुकी थी । पहले हुए जिक्र की तरह सुप्रीम कोर्ट नहीं प्रीवीपर्स खत्म करने संबंधी राष्ट्रपति के अध्यादेश को खारिज कर दिया था और बैंकों के राष्ट्रीयकरण में निहित मुआवजे के प्रावधानों को भी कानूनी चुनौती मिलने पर सुप्रीम कोर्ट ने पलट दिया था । कांग्रेस के परिवर्तनकारी ये बढ बनाने लगे थे न्यायपालिका यानी नौकरशाही की तरह जबरदस्त सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन लाने के विराट लक्ष्य के लिए प्रतिबद्ध होनी चाहिए जिनका इंद्रा क्रांति ने जोर शोर से वायदा किया था । प्रतिबद्ध न्यायपालिका के सबसे मुखर पैरोकारों में मोहन कुमारमंगलम भी शामिल थे । वे एटॉन और कैम्ब्रिज में पढे लिखे समाजवादी इंदिरा के नजदीकी सहयोगी रोज गांधी के मित्र होने के साथ ही साथ इंदिरा के मंत्रिमंडल में मंत्री भी थे । भारत के कुलीन वामपंथ की मिसाल उनका समूह कांग्रेस फॉर्म और सोशलिस्ट एक्शन उन्नीस सौ में सामने आया था । विकास बदल के लिए अधीर थे और न्यायपालिका द्वारा अटकाये गए रोडों पर बेचैनी जाहिर कर रहे थे । साल में गोलकनाथ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ये साफ मना था की बुनियादी अधिकारों के मामले में विधायिका अथवा सरकार कोई दखलंदाजी नहीं कर सकती । बुनियादी अधिकारों को सामान्य संशोधन प्रक्रियाओं के द्वारा संशोधित भी नहीं किया जा सकता है । लेकिन अब गरीबों के नाम पर हासिल की गई उन्नीस सौ की जबरदस्त जीत के जोश में राजनीति ने न्यायपालिका ने तक नंदाजी के मनसूबे भी बांध रही है और परिवर्तनकामी पक्ष संविधान को बदलने और बुनियादी अधिकारों में फेरबदल करने में संसद के अधिकारों का दावा करने लगे । भला इंदिरा के नेतृत्व में साहसी नए युग के आगमन को न्यायाधीश कैसे रोक सकते थे? और इस प्रकार संविधान में तो इसमें पच्चीस छब्बीस संशोधनों को और के बीच एक ही वर्ष के भीतर एक के बाद एक पारित कर दिया गया । ये संशोधन बैंकों के राष्ट्रीयकरण और प्रीविपर्स के खात्मे को कानूनी जामा पहना नहीं तथा बुनियादी अधिकारों में कतर ब्योंत के संसद के अधिकार यानी संप्रभु जनता के प्रतिनिधि के रूप में का दावा करने से संबंधित थे । संविधान से बार बार खिलवाड का खतरनाक उदाहरण कायम हुआ । उसका अर्थ यह था कि भविष्य में कुछ काम समझदार लोग भी समुदाय के और अधिक भले के नाम पर कुछ व्यक्तिगत अधिकारों को समाप्त करने के लिए अधिकृत महसूस कर सकते थे और करेंगे भी । इन संशोधनों को चुनौती दी गई प्रसिद्ध केशवानंद भारतीय मुकदमे को अप्रैल उन्नीस सौ तिहत्तर में आया भारतीय लोकतंत्र को बचाने वाला मामला बताया गया । इस मामले में तेरह न्यायाधीशों की पीठ में से सात न्यायाधीशों ने एक मामूली बहुमत था । संविधान के बुनियादी ढांचे में से संपत्ति के अधिकार को बाहर करते हुए इस बात पर सहमती जताई, संसद को संविधान संशोधित करने के असीमित अधिकार नहीं है और संविधान के बुनियादी ढांचे अथवा आवश्यक विशेषताओं में संसद द्वारा किए गए संशोधनों को अदालतें खारिज कर सकती थी । केशवनंद भारतीय फैसले में गोलकनाथ निर्णय के सिद्धांतों को ही मोटे तौर पर इंगित किया गया था, मगर इंदिरा सरकार ने इसे अपने लिए गंभीर झटका मारा । फैसले के अगले ही दिन भारत के मुख्य न्यायाधीश एस एम । सीकरी सेवानिवृत्त हुए । अगले मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति करते हुए इंदिरा गांधी ने नाटकीय रूप में तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों की अनदेखी कर दी । उन्होंने न्यायमूर्ति ए एंड्रे को अप्रैल तिहत्तर में भारत का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त कर दिया । न्यायमूर्ति रेने केशवानंद भारती मामले में सरकार के पक्ष में राय जब आई थी एन रे की नियुक्ति ने खड बहुत मचा दिया । परमाणु देश के गाल पर तमाचा मारकर उसे जगह दिया । वरिष्ठता की अनदेखी किए जाने पर तीनों न्यायाधीशों ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया । न्यायपालिका को पालतू बनाने का शोर उठा । न्यायविदों ने अपने दस्तखत से बयान जारी करके अदालतों की स्वतंत्रता पर ग्रहण लगाने की सरकारी कोशिशों की निंदा की । लेकिन अपनी राह में कोई भी बाधा आने पर इंदिरा उसका जवाब ज्यादा से ज्यादा इसी रूप में देने लगी । फॅस इंदिरा यहाँ भी ठोक दिया गया और वैक अमोल खेलते हुए एक आंख वाले साइक्लोप्स की तरह । इंदिरा सरकार ने जब भी और जहां भी कोई विरोधी आवास अथवा राय उभरती दिखाई दी, उसे दबा दिया । ऐसे कुछ ही सप्ताह बाद न्यायपालिका के विरुद्ध इंदिरा के कट्टर समर्थकों में शामिल कुमारमंगलम की हवाई दुर्घटना में मृत्यु हो गई । पूर्व मुख्य न्यायाधीश एम हिदायतुल्ला की टिप्पणी थी तो सरकार की कार्यवाही ऐसी कोशिश भविष्योन्मुख न्यायाधीशों की खेप तैयार करने की नहीं बल्कि ऐसे न्यायाधीशों को प्रोत्साहित करने का प्रयास था तो मुख्य न्यायाधीश के पद से जुडे फायदों पर नजर गडा रहे हैं । लोगों को सर्वोच्च नेता बेहद नाराज करने लगी थी । उत्तर प्रदेश के प्रादेशिक सशस्त्रबल यानी पीएसी प्रोवेंशियल आम्र्ड कांस्टेबुलरी ने के मई माह में बुनियादी वस्तुओं की किल्लत के विरोध में मित्र को कर दिया और बेहतर वेतन एवं कार्य परिस्थितियों में सुधार की मांग की । उन्होंने हथियार खानों पर कब्जा कर लिया, सरकारी संपत्ति बार हमला किया और अधिकारियों की सर हम हुप्पू । दिल्ली की पीएसी के विद्रोह से निपटने के लिए सेना लगाई गई । इस झूमाझटकी में तीस विद्रोही पुलिस वाले गोली खाकर मर गए और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी को इस्तीफा देना पडा । अगले ही साल के जनवरी महीने गुजरात में विद्यार्थी महंगाई के खिलाफ सडकों पर उतर आए । ये प्रदर्शन आपकी तेजी से बढते हुए नवनिर्माण आंदोलन में और व्यापक रूप ले गई । इसका मकसद नई राजनीतिक संस्कृति विकसित करना और इंदिरा की सरकार को चुनौती देना था, आंदोलन नहीं । गुजरात के मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल के इस्तीफे की मांग की । छात्र आंदोलन नहीं, समूचे राज्य को अपनी चपेट में ले लिया । बस चलाई और दुकानें लूटी गई तथा पूरा राज्य अराजकता की भेंट चढता हुआ लगने लगा । महीने भर में सौ से ज्यादा लोग दंगे में मारे जा चुके थे । अन्य तीन सौ लोग घायल और आठ हजार लोग गिरफ्तार कर लिए गए । वहाँ कांग्रेस की ही सरकार होने के बावजूद महीने भर बाद के फरवरी माह में गुजरात में राष्ट्रपति शासन लग गया । बावजूद इसके इंदिरा गांधी यही मानती रहे हैं । ये सब उनके खिलाफ अमेरिका की खुफिया एजेंसी सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी यानी सीआईए का राजनीतिक षड्यंत्र था । उनकी सरकार ने निष्ठुरता से जवाबी हमला किया । गुजरात में प्रदर्शनकारियों की तरफ से और फिर सरकार की जवाबी कार्रवाई में अपूर्वा हिंसा भारत में विरोध से सरकार द्वारा निपटने की संस्कृति में निर्णायक मोड साबित हुई । उग्र प्रदर्शन और राज्य की निर्दयतापूर्ण जवाबी कार्रवाई पश्चिम बंगाल में भी दिखाई थी । नक्सलवाद उन्नीस सौ साठ के दशक में अंतिम वर्षों में बंगाल के गांव में और कलकत्ता के शहर युवाओं के बीच चढे जमाने लगा था । नक्सल नेता चारू मजूमदार रहे । उन्नीस सौ इकहत्तर में सफाई की लाइन एन आई रिलेशन लाइन का नारा दे डाला । इसका मकसद वर्ग शत्रुओं का खात्मा करना था । बंगाल में हिंसक नक्सलवादी आंदोलन को पश्चिम बंगाल के पुलिस ने व्यवस्था तरीके से कुचल दिया । नक्सलवादियों के बडे पैमाने पर खातमे में शामिल होने का आरोप केंद्रीय शिक्षा मंत्री सिद्धार्थशंकर रही और कांग्रेस के युवा नेता प्रियरंजन दासमुंशी पर लगा । इंदिरा के बचपन के घनिष्ठ मित्र और नजदीकी सहयोगी रे में पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बनाए जाने वाले थे । पश्चिम बंगाल में से कर के बीच बहुत बार राष्ट्रपति शासन लगा । प्रदर्शन और हडताल जारी रहने के बीच हिन्दूवादी ताकतों को संगठित होने का सुनहरा मौका मिल गया । कांग्रेस के दमघोटू आधिपत्य नहीं । इस मौके पर इंदिरा गांधी के विरुद्ध संघर्ष में विपक्ष को डेविड बनाम गोलियाँ जैसा परिदृश्य बनाने में कामयाबी मिली । विराट सरकारी मशीनरी के विरुद्ध है । उन्हें जनता की निगाहों में नायक का दर्जा मिल गया । जनसंघ ने छात्र आंदोलन के लिए अपना अलग संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद खडा कर लिया । इसका मकसद कांग्रेस से संघर्ष के साथ ही साथ वामपंथी छात्र संगठनों के विरुद्ध हिन्दू युवा संगठन को स्थापित करना भी था । विद्यार्थी परिषद ने नवनिर्माण आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और अन्य छात्रों के साथ मिलकर बाद में बिहार आंदोलन छेड दिया । जनसंघ को हमेशा नेहरू खानदान से मानव भारी नफरत थी क्योंकि वे उनके हिंदू बहुसंख्यक विश्वदृष्टि के लिए मजबूत धर्मनिरपेक्ष चुनौती पेश पढते थे । जबकि वे इस मौके को अपना राजनीतिक आधार बढाने के लिए उपयुक्त मान रहे थे । वैचारिक हूँ अथवा नहीं, इंदिरा विरोधी तमाम ताकतें उन्हें हराने के लिए हर एक रास्ता अपनाने पर उतारू हो गई थी । अपने विरोधियों के प्रति इंदिरा के तरफ स्टार और मानसिक उन्माद के कारण देश में राजनीतिक टकराव का माहौल बन गया और बातचीत की कोई गुंजाइश बाकी नहीं रही । अपने विपक्षियों के साथ समझौते अथवा गलत सैनी को पाटने के प्रयास के बजाय इंदिरा ने सामान्य लोकतांत्रिक प्रक्रिया को ही अंगूठा दिखाना शुरू कर दिया । भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता हिरेन मुखर्जी ने में लिखा, संसद की कार्यवाही में भाग लेकर खुश होने वाले अपने पिता के डुप्री श्रीमती गांधी का जी इससे उचटता है । संसद तो लोगों के बिगडे मिजाज का प्रतिनिधित्व कर रही है और प्रधानमंत्री को उसे आत्मसात करते हुए उस के प्रति सकारात्मक रुख अपनाना चाहिए । लेकिन वे तो संसद के सत्रों में अपनी आवश्यक उपस् थिति से भी मून चुरा रही हैं । कभी कभी ऐसा लगने लगता है कि कहीं भी राष्ट्रपति प्रणाली की सरकार तो नहीं चाहती, लेकिन इस देश के निजाम को नुकसान हो रहा है । राजनीति बुरी तरह विभाजित हो गई और भारत धीरे धीरे अराजकता का शिकार होने लगा । साल उन्नीस सौ की आरंभिक अराजकता के बीच इंदिरा विरोधी आंदोलन का नेतृत्व संभालते हुए और ये कहते हुए वे अब सरकारी दमन के मूंग का वहाँ नहीं बने रह सकते हैं । बहत्तर वर्षीय जयप्रकाश नारायण विपक्ष के साथ खडे हो गए । स्वतंत्रता सेनानी और मार्क्सवाद एवं गांधीवाद के विचित्र मिश्रण बताए जाने वाले जयप्रकाश भारत के देहात में पैदा हुए थे, मगर उनकी शिक्षा दीक्षा संयुक्त राज्य अमेरिकी विश्वविद्यालय में हुई थी । वो किसी जमाने में नेहरू के प्रशंसक और मित्र होते थे तथा उनकी पत्नी प्रभावती देवी और कमला नेहरू भी अंतरंग सखियाँ थे । बिहार के सिताबदियारा नामक नदी द्वीप में पैदा हुए जयप्रकाश निम्न मध्यमवर्गीय परिवार से थे । ये विशेषाधिकार प्राप्त पश्चिमी तौर तरीकों में पली इंदिरा के धुरविरोधी सामाजिक धोपर खडे थे । युवा प्रदर्शनकारियों के लिए वे मेरी अन तोडने रूपी कुलीन और ताकतवर इंदिरा के मुकाबले डटे । पके हुए बालों वाले सब ऑटम थे । जयप्रकाश का पाँच रतनाम जेपी था और वे आजादी के बाद मुख्यधारा की राजनीति से रिटायर्ड हो गए थे और समाजसुधार को समर्पित सादा जीवन जी रहे थे । सच तो यह है कि प्रधानमंत्री के रूप में नेहरू के उत्तराधिकारी बनने में उनकी जी जब को देखकर कांग्रेस के भीतर कि वामपंथी ताकतों को गहरी निराशा हुई थी, अब भारत भर में उठे असंतोष के ज्वार पर चढकर उन्होंने ऐसा आह्वान किया जिससे संसदीय लोकतंत्र के तत्कालीन स्वरूप पर ही प्रश्नचिन्ह लग गया । आजादी के नायक और सत्ता तथा संपत्ति से अनेक वर्षों से प्रमुख जेपी नैतिक केंद्र बिंदु बन गए । इनके चारों और वामपंथियों से लेकर दक्षिणपंथियों तक तमाम इंदिरा विरोधी ताकतें लामबंद हो गई । जनसंघ और आरएसएस से लेकर समाजवादियों और सीपीआई ऍम सभी जे । पी । के झंडे तले इंदिरा गांधी की सरकार को उखाड फेंकने के लिए एकजुट हो गए थे । ये गठबंधन दो हजार ग्यारह में अन्ना हजारे के चारों तरफ होगे । भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से उपजे नैतिक गठबंधन का एक तरह से विराट पूर्वज था । इसके बावजूद कुछ लोगों ने जे । पी । के प्रति गहरा अविश्वास भी खुलकर क्या? बीके नेहरू लिखते हैं, जवाहरलाल नहीं । जब संसद में विपक्ष न होने से दुखी होकर जेपी से संसद में आने और अपनी जगह संभालने के लिए याचना की मनाया पूछा और उन्हें समझाने की कोशिश की तब भी जेपी ने नेहरू को दृढता से अपनी नकार सुना दी । नेहरू लिखते हैं, वो व्यक्ति सरासर नकारात्मक था न कि सकारात्मक । पूरी तरह विध्वंसक थे । अच्छा पता नहीं की आलोचना करेंगे, आंदोलन करेंगे, हिंसा तक को बढावा देंगे । लेकिन कोई भी सकारात्मक रचनात्मक उपाय उस लक्ष्य को पाने के लिए नहीं बताएंगे । उनकी राय में क्या जाना चाहिए? उनकी तरफ से पता ही नहीं था कि सकारात्मक तरीके से क्या क्या जाना चाहिए । उनकी आलोचना भले ही कैसी भी रही हो, जे पी उस दौरान मसीहा थे । जेपी के नेतृत्व में के आरंभ में ही बिहार आंदोलन शुरू हो गया । आंदोलन के तहत छात्रों के जरूर प्रदर्शन और बिहार विधानसभा का घेराव आदि गतिविधियां चलती रही । गुजरात के समान ही आंदोलन का लक्ष्य मुख्यमंत्री को सत्ता से हटाना था । जेपी के विशाल कद और अपील के कारण अलग अलग समूह एकजुट हो गए । पटना विश्वविद्यालय में तब पढ रहे लालू प्रसाद यादव बिहार छात्र संघर्ष समिति के अध्यक्ष बन गए । उसके सदस्यों में सुशील मोदी तथा रामविलास पासवान भी शामिल थे । इस उथल पुथल भरे समय में भ्रष्टाचार का अनेक सिर वाला दाना फिर खडा हो गया । एक अधिकार एवं प्रतिबंधात्मक व्यापार व्यवहार कानून उम्मीद तो उठता था । विदेशी मुद्रा नियमन अधिनियम उन्नीस सौ तिहत्तर जैसे कानूनों के बलबूते उद्योग व्यापार पर सरकार का नियंत्रण दमघोटू हो गया था । अत्यधिक नियंत्रन से भ्रष्टाचार उपजना स्वाभाविक है । अनुमतियों लाइसेंस परमिट हो और अनुमोदनों के प्रभारी नियंताओं के हाथ में और सीमित विशेषाधिकार आ गए थे । स्मार्टली कहते हैं, सरकार के विभिन्न मंत्रालयों में मंत्री रहे ललित नारायण मिश्र कांग्रेस के लिए चंदा जमा करने वाले लोगों में सबसे मशहूर थे । मंत्री के तौर पर कथित रूप में ऐसा प्रतिष्ठान चला रहे थे जिसमें अपने कारोबार के लिए लाइसेंस के इच्छुक लोगों द्वारा कथित रूप में कांग्रेस के कोष में मोटी राशि चुकाई जा रही थी । धवन और यशपाल कपूर द्वारा दलाली और वसूली के इससे भी आम थे मगर कभी कोई आरोप सिद्ध नहीं हो पाया । यदि हम कुछ पीछे जाकर उन्नीस सौ पर नजर डालें तो हम पाएंगे समाजवाद की चमक के पहले कुछ अदृश्य ताकतें जड जमा चुकी थी । साल उन्नीस सौ सत्तर के नागर वाला प्राण से ये खुलासा हुआ की वसूली के गिरोह कितने बडे पैमाने पर उन लोगों के इर्द गिर्द चल रहे थे जिनकी सत्तावन लोगों तक बैठ के बांग्लादेश युद्ध के पहले के मई महीने में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में मुख्य खजांची वेद प्रकाश मल्होत्रा ने फोन पर ऐसी आवाज सुनी जिसमें खुद को प्रधानमंत्री बताया और उनकी आवाज की नकल कि व्यक्ति ने मल्होत्रा को सौ सौ रुपए के नोटों की गड्डी बनाकर सात लाख रुपए बैंक से निकालकर बांग्लादेश के बाबू को थमा देने को कहा । व्यक्ति सेना का पूर्व अफसर रुस्तम सोहराब नागरवाला निकला तो कुछ लोगों के अनुसार रोक के लिए काम करता था । मल्होत्रा ने जब प्रधानमंत्री कार्यालय को इसकी सूचना दी तो वहां हडकंप मच गया और हक्सर ने जिनके हाथ में उस समय तक कमान बनी हुई थी बलोतरा को तब डाल पुलिस के पास जाने को कहा । नगर वाला गिरफ्तार हुआ और उसने इंदिरा गांधी का बहुरूपिया बनने की बात कबूल कर लेंगे । अप्रत्याशित रूप से तीन दिन में तेजी से चले मुकदमे के बाद नगरवाला को जेल भेज दिया गया । यहाँ वो बाद में अपने कबूलनामे से मुकर गया और उसके मुकरने की जांच हो पाती उससे पहले ही वो उन्नीस सौ बहत्तर में दिल के दौरे से मर गया । संयोग से उस मामले की जांच कर रहा पुलिस अफसर भी कार दुर्घटना में मारा गया । मल्होत्रा को स्टेट बैंक से बर्खास्त कर दिया गया और रहस्यमय मामला बंद कर दिया गया । उनकी प्रेस में नागरवाला कांड सुर्खियों में छाया रहा था । कभी किसी को पता नहीं लग पाया बिना अगर वाला नहीं किस के लिए ऐसा किया था वो कोई सिर्फ राम या सीआईए का पेट तो जैसे की बात में आरोप लगा इसका मकसद इंदिरा को बदनाम करना था अथवा सचमुच प्रधानमंत्री का एजेंट था । नगरवाला को यदि घरेलू अथवा विदेशी स्तर पर ताकतवर संरक्षण नहीं मिला होता तो क्या वो प्रधानमंत्री के आवास की नक्ल की हिमाकत कर सकता था? क्या इंदिरा गांधी खुद नागरवाला की संरक्षक थी और जिन्होंने बाद में उसकी हत्या करवा दी? महज फोन पर मिले निर्देश के बूते बलोतरा नोटों की इतनी बडी राशि किसी बैंक से क्यों निकालेगा? केंद्र सरकार के अस्पष्ट अंधियारे दोनों में सवाल और प्रयास डूबती उतराते रहे । केंद्र मल्होत्रा ने लिखा, पैसा जमा करने के धंधे में नेहरू ने अपने हाथ कभी गंदे नहीं किए । उन्होंने ये काम मुंबई में कांग्रेस के छपरा एसके पाटिल जैसे अन्य नेताओं को सौंप रखा था । लेकिन इंदिरा क्योंकि अन्य किसी पर भी भरोसा नहीं कर सकती थी इसलिए उन्होंने पार्टी के लिए चंदा जमा करने और पैसा जारी करने पर खुद कडा नियंत्रण बना रखा था क्योंकि पार्टी के लिए आने वाले पैसे पर खुद नियंत्रण रखती थी । अफवाहे उडनी लगी कि प्रधानमंत्री निवास में नोटों के सूटकेस ले जाए जाते थे । राजनीतिक भ्रष्टाचार बढाने के लिए अब जिम्मेदार माने जा रहे उपाय यानी कंपनियों द्वारा राजनीतिक दलों को चंदा दिए जाने पर इंदिरा ने उन्नीस सौ बहत्तर में रोक लगा दी थी क्योंकि उन्हें डर था की कंपनियाँ सिर्फ दक्षिणपंथी स्वतंत्र पार्टी को ही चंदा देंगे । कानूनी रूप में भी अब क्योंकि चंदा देने पर रोक लगा दी गई थी इसलिए नेताओं और उद्योगपतियों के बीच गुपचुप लेन देन होने लगा । व्यापार और नेताओं के बीच सौदेबाजी खुली और पारदर्शी होने के बजाय चोरी छुपे होने लगी । राजनीतिक दलों को ईमानदारी से चंदा जमा करने से रोकने के दमघोटू ढंग की परछाई में सन्यास पद गठजोड होने लगे । साल से लेकर उन्नीस सौ पचहत्तर में आपातकाल की घोषणा तक भारत में अशांति का राज रहा । भारत में प्रशासनिक दृष्टि से ये सबसे अधिक डरावना अकाल था । इसमें आए दिन खेरा बंद विद्रोह और शांति के आभार, धरने तथा हडतालें होते रहे । इनमें सबसे अधिक शक्तिशाली विरोध देश व्यापी रेलवे हडताल के रूप में उभरा । हडताल आठ मई उन्नीस सौ चौहत्तर को शुरू हुई जब चौदह लाख रेलवे कर्मचारियों ने आठ घंटे के कार्य दिवस और वेतन में प्रतिशत बढोतरी की मांग रखें । इंदिरा गांधी ने हडताल को अगर घोषित करके मजदूर यूनियन के नेता और तीस तरह समाजवादी जॉर्ज फर्नांडिस को गिरफ्तार करवा दिया । आक्रमक फर्नांडिस नहीं अपने से अधिक समझौतावादी नेताओं से रेलवे कर्मचारियों की हडताल का नेतृत्व हासिल कर लिया था और ये ऐलान कर दिया था कि उनका लक्ष्य इंदिरा गांधी की सरकार को गिरा देना और रेल परिवहन का चक्का जाम करना था । धरने बाद में लिखा वो राजनीति में आपने राहत तलाश रहा था और उसे अपने समर्थक वर्ग की तलाश थी । ऐसे में बीस लाख असंतुष्ट कर्मचारियों का समूह हाथ लग जाना उसके लिए नियामक ही था । ऍम गिरफ्तार होते ही दस लाख रेलकर्मचारियों ने काम रोको पर अमल शुरू कर दिया । इसके बदले सरकार उन्हें निष्ठुरता से खदेडने लगी । हजारों कुछ वर्णनों के अनुसार चालीस हजार रेलकर्मचारियों को गिरफ्तार करके जेल की हवा खिला दी गई । उनके परिवारों को बेघर कर दिया गया और उनमें से अनेक अनाथ हो गए । हिंसा में भी भारी संख्या में लोग जख्मी हुए । सरकार ने इतनी निर्दयता से अत्याचार किए, जैसे भारत में उससे पहले कभी नहीं हुए । इंदिरा द्वारा पढाई से रेलवे हडताल के दमन की मध्यवर्ग ने तारीफ भी की, क्योंकि वे रेलगाडियों के समय से चलने के कारण खुश हुए । लेकिन किसी के साथ देश में इंदिरा विरोधी लहर पैदा करने का चस्पा विपक्ष के भीतर घुस गया । पडताल तो कुछ जल्दी गई, लेकिन उस भारत माता के प्रति उससे और असुविधा की लहरें दूर तक फैली । जो क्रूर सौतेली माँ के समान व्यवहार कर रही थी, उन्होंने हडताल को इतनी कडाई से क्यों दबाया? जबकि वे तो गरीबों की स्वघोषित संरक्षक थी । ये पक्का मानकर रेलकर्मचारी उनके खिलाफ थे । वे आरंभिक दौर में भी उनके प्रति वास्तविक सहानुभूति का भाव अपने भीतर जगह नहीं पाएंगे । कहती थी ऐसे समय पर रेलवे की हडताल जब खाद्यान्न की ढुलाई सबसे अधिक महत्वपूर्ण थी जब आती है कि विपक्ष जनता का कितना सच्चा हितैषी था । उन्होंने कर्मचारियों को काम के बजाय धरना देने के लिए उकसाया । ऐसा वातावरण नहीं था । इसमें कोई भी देश समृद्ध अथवा जिंदा रह सकता था की निष्ठुरता से की गई कार्यवाही का एक कमजोर बचाव था । इससे और अधिक परेशानियां पैदा हुई । वो इस बात का कभी कोई जवाब नहीं दे पाईं । चुनाव में बुरी तरह हारने के बावजूद विपक्ष इतने बडे पैमाने पर कर्मचारियों को लामबंद करने में कैसे कामयाब रहा । जनता से अपने मशहूर जुडाव के बावजूद रेलकर्मचारियों का दिल जीतने में नाकाम हो रही हैं । हरी उथल पुथल के बीच देश ने ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल कर डाली । रेलवे की हडताल आठ मई उन्नीस सौ चौहत्तर को शुरू हुई और उसके महज दस दिन बाद ही दिलचस्प संयोग के तहत अठारह मई उन्नीस सौ चौहत्तर को बुद्ध मुस्कराए । राजस्थान के पोकरण स्तर बालू की टीमों के नीचे परमाणु परीक्षण के साथ ही भारत परमाणु शक्ति बन गया । शांतिपूर्ण परमाणु विस्फोट भारत के परमाणु कार्यक्रम की सुखद परिनीति था । इसे परमाणु भौतिकशास्त्री भूमि जहाँगीर बाबा ने उन्नीस सौ पचास के दशक में आरंभ किया था । चीन के हाथों उन्नीस सौ बासठ में और पाकिस्तान द्वारा में हमला झेलने के बाद भारतीय नेतृत्व पर इस बात का गहरा घरेलू दबाव था कि उग्रह परमाणु नीति अपनाई जाएगी । हालांकि गांधीवादी अहिंसा के अनुयायी शास्त्री परमाणु हथियारों के नैतिक विरोधी थे और उन्होंने ये घोषणा की थी कि भारत सिर्फ शांतिपूर्ण परमाणु विस्फोटकों को विकसित करने का प्रयास करेगा । इंदिरा गांधी ने भी प्रधानमंत्री बनते ही परमाणु हथियारों के प्रति अपने नैतिक विरोध को सार्वजनिक रूप में जगाया । लेकिन बांग्लादेश शुद्ध के बाद उप महादीप में भारत के प्रभुत्वशाली शक्ति के रूप में भरने के साथ ही तथा भारत पर बहुत जमाने की अमेरिकी कोशिश के अनुभव के बाद उन्होंने परमाणु उपकरण के परीक्षण को अपना समर्थन दे दिया था । हार मरुस्थल के नीचे की समय अठारह मई की सुबह जबरदस्त तेजी से थरथराई अजीब विडंबना रही । ये परीक्षण बुद्ध जयंती के दिन हुआ जिसकी वजह से बुद्ध का नाम परमाणु बम से जुड गया और इसका नामकरण स्माइलिंग बुद्ध पड गया । साल चौहत्तर की उस चिलचिलाती गर्मी में क्या बुद्ध का मुस्कराना पहले से तय था अथवा उन्हें ऊपरी आदेश के तहत मुस्कराने को कहा गया था ताकि उससे प्रधानमंत्री की ताकत का प्रदर्शन हो सके और देश व्यापी गहरे खतरों की ओर से जनता का ध्यान हटाया जा सके । इस प्रश्न का जवाब दो शायद बुद्ध के पास ही होगा । उस दिन इंदिरा गांधी को देख नहीं डॉक्टर माथुर पहुंचे तो वहीं अत्यंत बेचैन और अधीर थी उस दिन इतनी सुबह सुबह उन्हें औपचारिक रूप में तैयार देखकर और बार बार फोन उठाकर उसे वापस रखता हुआ देखकर आश्चर्यचकित थे । उनके बिस्तर से लगी मेज पर उन्होंने खुली डायरी रखी देगी । इसमें अपने हाथ से गायत्री मंत्र लिखा हुआ था । मैंने उन्हें मेरी दिशा में ये बडबडाते थोडा जाओ भगवान के लिए चले जाओ । मैं बेहद परेशान हुआ और वहाँ से तत्काल चला गया हूँ । डॉक्टर वहाँ से पीएम घर को देखने गए और वे भी उतने ही तनावग्रस्त तथा बेचे लग रहे थे । उन्हें इस बेचैनी का राज दोपहर बाद शारदा प्रसाद का फोन आने पर पता चला । जब उन्होंने कहा भारत ने परमाणु बम विस्फोट कर लिया । प्रधानमंत्री ने संसद में आज दोपहर इसकी घोषणा कि विस्फोट सवेरे आठ बजे हुआ । प्रधानमंत्री को कटु संदेश मिला हूँ । बुद्ध ऍम यानी बुद्ध मुस्कुरा रहे हैं । माथुर कहते हैं, मुझे तब ये एहसास हुआ कि उस सुबह वेक्यूम इतनी तनावग्रस्त और बेचैन थे । बुद्ध की मुस्कुराने के बाद भी देश में शांति स्थापित नहीं हुई । हिंसक प्रदर्शनों के द्वार पर ज्वार उठकर भारत को हिला रहे थे । जेपी के आंदोलन का वर्णन करते हुए श्यामलाल ने टाइम्स ऑफ इंडिया में लिखा, जेपी ऐसा राजनीतिक वातावरण बना रहे हैं । प्रोग्राम जी के लिए नहीं बल्कि अराजकता के अनुकूल है । हिंदू ने पूछा, बीजेपी को अपने सार्वजनिक प्रभाव का दुरुपयोग करके कानून व्यवस्था तथा समूचे लोकतांत्रिक ढांचे के लिए अपमान का सूत्रपात करना चाहिए । नेता की तलाश कर रहे युवाओं के लिए जेपी मालूम वरदान साबित हुए और उनके लक्ष्य के लिए वो इतिहास का कुहासा चीर कर प्रकट हुए हैं । युवाओं तथा आजादी के संघर्ष के बीच का पूर्व है । इसे उन्होंने अपने आंदोलन के अग्रदूत के रूप में स्थापित कर लिया था । मानो गांधी पुनर्जीवित हो गए हो । ये समझकर की इंदिरा को सिर्फ सारा विपक्ष मिलकर ही हरा सकता था । जेपी ने कांग्रेस यानी संगठन के अध्यक्ष मोरारजी जनसंघ तथा समाजवादियों को मिलाकर इंदिरा के खिलाफ जनता मोर्चा अथवा जनता फ्रंट बना लिया । ये मोर्चा ही बाद में जनता पार्टी बनने वाला था । चुनाव में इंदिरा गांधी का डटकर मुकाबला कर दी है । शुरुआती चुनावी हवा से साफ हो गया था । लोग जनता मोर्चा को समर्थन देने को तैयार हैं । जबलपुर में हुए उपचुनाव में जनता मोर्चा के उम्मीदवार ने अधिक कांग्रेस के पास उखाडकर एक झटके में उसके उम्मीदवार को खडा दिया । जबलपुर । दरअसल आधी सदी से कांग्रेस का गढ था । ऍफ इंडिया ने लिखा ये तो कांग्रेस के खिलाफ तूफान था । उन्नीस सौ चौहत्तर में जबलपुर उपचुनाव के विजेता थे । वहाँ इंजीनियरिंग कर रहे एक अनजान से छात्र नेता जीतकर सबसे युवा सांसद बने । उनका नाम था शरद यादव । जनता मोर्चा के लिए धीरे धीरे और उपचुनावों में भी जीत दर्ज होने वाली थी । इस बीच बिहार में प्रदर्शन पूरे उफान पडते हैं । केन्द्र सरकार ने वहाँ भी सकती से काम किया । प्रदर्शनकारी भीड पर लाठियां बरसाई और आंसूगैस से तितर बितर करने की कोशिश की गई । इस सबसे बिना घबराए जेपी ने पांच जून उम्मीद सौ चौहत्तर को पटना के गांधी मैदान में हुई सभा में संपूर्ण क्रांति का नारा दिया । इंदिरा ने बिहार आंदोलन के नेताओं से बातचीत से साफ इंकार कर दिया था ना कि मोहन धारिया जैसे कांग्रेस के सदस्यों ने ऐसा करने का सुझाव दिया । मोहन धारिया ने बाद में कांग्रेस के भीतर आपातकाल की आलोचना की । इस पूरे साल के दौरान इंदिरा गांधी विदेशी हाथ के षड्यंत्र का राग अलापती रही । उनकी सरकार को गिराना चाहता था । सत्तर के दशक के आरंभ के आंदोलन को भारी समर्थन हासिल था । सिर्फ आंतरिक ही नहीं हमें अंतरराष्ट्रीय एजेंसी की कारगुजारियों को भी देखना पडता था के कौन भारत ने कब आया और किस समय है । उन्होंने दोहराया, हमारा लक्ष्य तो गरीबी का उन्मूलन था । मगर हम इस काम को करने के लिए जैसे ही आगे बढे पैसे, आर्थिक, सत्ता, प्रेस, स्थानीय और विदेशी उद्योग हमारी रहा । रोकने को एकजुट हो गए । उन्होंने ये मानने से इंकार कर दिया कि असंतोष और शिकायतों के वैद्य कारण थे । बृहद आर्थिक परेशानी की हालत होने के बावजूद निर्वाचित सरकार को विपक्ष सरासर असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक हथकंडों के जरिए गिराना चाहता था । चुनाव के इंतजार के लिए तैयार नहीं थे, शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने के लिए भी तैयार नहीं थे । छात्र सडकों पर उतरे हुए थे, पुस्तकालयों में आग लगा रहे थे और वैज्ञानिक उपकरणों को तोड रहे थे । सरकारी मशीनरी गैर जिम्मेदार हो रही थी । आप सरकारी पदाधिकारियों को कभी भी दिल्ली के गोलचक्करों पर बैठे ताश खेलते देख सकते थे । सारी व्यवस्था दरकने का खतरा पैदा हो गया था । धारिया प्रश्न कम रामधन और पूर्व छात्र नेता चंद्रशेखर जैसे सुधारवादियों ने इंदिरा से जनता मोर्चा की चुनावी जीत से सबक सीखने का अनुरोध किया और राजनीतिक समझौते के अपने आह्वान को दोहराया । आर्थिक और सामाजिक संकट से निपटने के लिए सर्वदलीय संयुक्त पहल होनी चाहिए । ये उनका तर्क था । इंदिरा ऐसा कुछ भी नहीं करने वाली थी । उसके बाद उन्होंने धारिया को ये कहते हुए लिखा, आपका मंत्रिमंडल में रहना अब उचित नहीं होगा क्योंकि आपके विचार अब कांग्रेस पार्टी की सोच से मेल नहीं खाते हैं । धरिया ने उन्नीस सौ पचहत्तर में इंदिरा सरकार से इस्तीफा दे दिया और आवास का लागू होते ही कांग्रेस छोड देने वाले थे । धारिया बाद में इंटरव्यू आपने कहने वाले थे । श्रीमती गांधी किसी भी कीमत पर जेपी से बातचीत के लिए तैयार नहीं थी । उन्हें लगता था कि वे अपदस्थ करके खुद प्रधानमंत्री बनना चाहते थे । मगर जेपी वैश्वक कतई नहीं करना चाहते थे । यही बातचीत की मांग करना अपराध माना गया तो मैं वैसा अपराध हजार बार दोहराने को तैयार था । देवी भले ही घरेलू मोर्चे पर युद्धरत थी, लेकिन उन्होंने दुर्गा जैसा और एक काम विदेश में कर डाला । उन्होंने दिखाया कि वह घिरी हैं अथवा नहीं । मगर जब पेक्स इंदिरा लागू हो पडोस में हुक्म उधौली बर्दाश्त नहीं की जाएगी । जब सिक्किम जिस की रक्षा का भार भारत पर था, ये वंशवादी शासक चोग्याल और उनकी अमेरिकी पत्नी हो फूकने अधिक स्वायत्त सिक्किम बनाने की कोशिश शुरू की । इंदिरा गांधी ने चोट की । सिक्किम में लंबे समय से अधिक लोकतांत्रिक सरकार बनाने की मांग की जा रही थी और इंदिरा को लगता था सिक्किम कि जनता को आजाद कराना उनका कर्तव्य था और चोग्याल द्वारा अपनी अलग रहा अपना नहीं । और संभव है चीन से करीबी बढाने की किसी भी कोशिश को शक्ति से दवा ना भी उसमें शामिल था । सिक्किम ने लोकतांत्रिक व्यवस्था समर्थक आंदोलन था । इसमें अनेक भारत समर्थक दल मैदान में थे और सिक्किम नेशनल कांग्रेस जैसे अन्य दल भी थे । सिक्किम में उन्नीस सौ चौहत्तर में चुनाव हुए । चुनाव के बाद जब वहाँ लोकतंत्र समर्थक चोग्याल विरोधी परिणाम आया तो मुख्यमंत्री ने सत्ता संभाली और चौकियाल संवैधानिक राजा हो गए । संसद में सिक्किम को भारत का एसोशिएट स्टेट बनाते हुए संविधान संशोधन विधेयक पेश किया गया । हम राइट चोग्याल लें, अपनी हैसियत बचाने के लिए दिल्ली की उडान भरी । अगर वहाँ उन्हें निष्ठुर और निरपेक्ष इंदिरा मिलेगी भारत के हित ताओं पर थे । पर इंदिरा गांधी स्वायत्ता के बारे में सिक्किमी चिंता को मानने को कतई तैयार रही थी । संभावना ये भी थी कि राजनीतिक उठा पटक के बीच इंदिरा ताकत जताने के किसी भी मौके को आसानी से लपक लेंगे । गंगटोक में भारतीय सेना ने आठ अप्रैल को घेराबंदी कर दी । चोग्याल के महल पर पहरा बैठाकर उन्हें नजरबंद कर दिया गया । रायशुमारी की व्यवस्था की गई । चोग्याल और उसके वंश के तीन सौ साल पुराने शासन का अंत हो गया, लेकिन भी भारत में शामिल होकर इसका बाइसवां राज्य बन गया । सिक्किम के भारत में विलय के समय इन्दिरा गांधी पूरी तरह घिरी हुई थी । जेपी आंदोलन तूफान पर था और आर्थिक संकट भारत को हैरान कर रखा था । उसके बावजूद इंदिरा नीत भारत ने जबरदस्त आत्मविश्वास के साथ सिक्किम को अपने भीतर शामिल कर लिया । हालांकि मोरारजी ने जबरदस्ती किए गए इस कब्जे का विरोध किया । पेक्स इंदिरा का करिश्मा पडोस में तो चल गया, मगर देश के भीतर उसे लगाना जा रहा था । उसके शत्रुओं ने उन्हें चक्रव्यूह में घेर लिया था और अनेक नायक कान के समान इसको निर्णायक युद्ध में उसके रखने धोखा दे दिया था । इंदिरा के भी बहुप्रचारित राजनीतिक कौशल ने उन्हें तब था बता दिया था जब उन्हें उस की सबसे अधिक जरूरत थी । दोनों पक्षों के शुभचिंतकों ने इंदिरा गांधी और जेपी के बीच में सुलह सफाई पर जोर दिया और नवंबर उन्नीस सौ चौहत्तर में जाकर उन के बीच बैठक हो पाएगी । लेकिन इंदिरा के मन में जे । पी । के लिए शायद ही कोई जब बच्चे हैं, साल उन्नीस सौ नवासी में उनकी मृत्यु पर वह लिखने वाली थी । बेचारे बूढे जेब में उनका दिमाग कितना बहमत था? जीवन ऐसा कुछ हो गया उस ग्रंथि से ग्रस्त थे जिसे मैं सीधे सीधे गांधीवादी ढकोसला ही कह सकती हूँ । मेरे पिता से ईशानी उनके जीवन को जड कर दिया । सत्तर वर्षीय क्रांतिकारी तथा सर्व सत्तात्मक प्रधानमंत्री के बीच पुराने पारिवारिक रिश्ते थे, जब मेरे अविश्वास के कुहासे के बाद परिवारों के बीच पुराने संबंधों को याद करते हुए बुजुर्ग ने उस महिला की और मैत्री का हाथ बडा इसे में बच्ची के रूप में जानते थे । जेपी ने इंदिरा को गमला द्वारा प्रभावती देवी को लिखे गए पत्रों का संग्रह सौंपा । इसे पाकर इंदिरा ने आभार जताया । बावजूद इसके बैठक बेकार रही और एक क्रुद्ध मुठभेड साबित हुई । इंदिरा ने जेपी पर सीआईए का एजेंट होने का आरोप लगाया । उन्हें वे नाचीज समझते रहे और मानते थे । जहाँ वो हैं, उनका उन्हें कोई हक नहीं था और उन पर आरोप लगाया कि वो सोवियत शैली की तानाशाही भारत पर थोपना चाहती हैं । उनके पास जे । पी के लिए कोई समय नहीं था और उन्होंने उनके जो निर्णय था और गैर जिम्मेदार विचार ठहराये तथा उन्हें अराजकता का सिद्धांतकार बताया । बीजेपी के लिए इंदिरा का व्यक्तिवादी मत और उनकी सर्वोच्च सत्तर असहनीय थे । बैठक बेहद उत्तेजित रुख के साथ खत्म हुई । यूनाइटेड किंगडम में भारत के उच्चायोग और तब भारत आए हुए दी के नेहरू ने । केंद्र सरकार को इंदिरा के डर से निश्चल पाया आ गया । उन्नीस सौ चौहत्तर के अंतिम दिनों का है । वो अपने साथ की संदेश लाए । लॉर्ड माउंटबेटन को इस बात से शिकायत थी उनकी तस्वीर अब राष्ट्रपति भवन में नहीं लग रही । नेहरू ने राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से मिलकर ये बात बताई । अहमद इस बात से सहमत थे कि माऊंटबेटन की शिकायत जांच थी, मगर उन्होंने मना वो इस बारे में कुछ नहीं कर सकते हैं । उन्होंने बस इतना कहा, शराब उनसे कह दीजिए । उनसे का साफ मतलब इंडिया से था । बाद में मुझे सहयोग से पता लगा । राष्ट्रपति पर प्रधानमंत्री का आधिपत्य इतना अधिक था । राष्ट्रपति भवन का प्रशासनिक भाग भी उन्ही के आधार इंदिरा के नियंत्रण में था । महीनो बाद फखरुद्दीन अली अहमद उसको इंदिरा गांधी का सचमुच वफादार साबित करने वाले थे । जब उनके निर्देशानुसार आपातकाल लागू करने के आदेश पर दस्तखत किए । इसकी प्रतिक्रिया में वो मशहूर कार्टून नमूदार हुआ जिसमें उन्हें आपातकाल की अधिसूचना पर नहाने के टब में बैठे बैठे तश्कर करते हुए दिखाकर राष्ट्रपति पद की गरिमा इस लगते दिखाया गया था । इंदिरा के रेल मंत्री और कांग्रेस पार्टी का चंदा उगाने वाले नेता ललित नारायण मिश्र की जनवरी उन्नीस सौ पचहत्तर में समस्तीपुर रेलवे स्टेशन पर हुए बम विस्फोट में हत्या हो गई । इंदिरा गांधी ने इस कार्यवाही को अपनी हत्या का पूर्वनियोजित अभ्यास बताया । वसंत साठे याद किया मिश्रा की हत्या से वो दहशत ज्यादा हो गई थी । कोई संदेह में लगातार गिरती गई कि उनके शत्रुओं से उनकी जान को खतरा था । मिश्रा की हत्या के लिए कुछ आनंदमार्गियों को अदालत से सजा हुई और इस गुप्त हिंदू संप्रदाय पर अब इंदिरा गांधी को अपदस्थ करने की कोशिश का आरोप लगा था । उनकी अपनी राजनीतिक हत्या के भारत मानव लिखी जा चुकी हो । फरवरी में जेपी ने सेना और पुलिस से अवैध और अन्यायपूर्ण आदेशों का पालन करने से इनकार करने का आह्वान किया । इसी आह्वान को वे ऐतिहासिक दिल्ली में आपातकाल की घोषणा की पूर्व संध्या को रामलीला मैदान की सभा में दोहराने वाले थे । मार्च में जेपी ने संसद तक जुलूस का नेतृत्व किया । लम्बा और भीड बडा जुलूस जो पुरानी और नई दिल्ली की गलियों तक फैला हुआ था और उसके बाद भरी सभा में उन्होंने भावनात्मक सफर में इंदिरा गांधी से इस्तीफा दे देने की मांग के । गुजरात में नवासी वर्षीय मोरारजी देसाई बारह मार्च उन्नीस सौ को नवनिर्माण आंदोलन के समर्थन में अनिश्चितकालीन उपवास पर बैठ गए । उनकी मांग थी राज्य में चुनावों की तिथि घोषित की जाएगी । देसाई ने पत्रकार ओरियाना फलासी से ये बात कबूल की वो तो इंदिरा गांधी से लडाई की शुरुआत थी इसकी मैं उन्नीस सौ से प्रतीक्षा कर रहा था । बहुत पहले से अपने को ना पसंद व्यक्ति की मृत्यु की आशंका खडी होने पर इंदिरा ने जून में गुजरात में ताजा चुनाव कराने की हामी भर दी जिसमें जनता मोर्चा ने कांग्रेस को भारी शिकस्त दी । गुजरात में जनता मोर्चा की जीत के दिन है । इंदिरा गांधी के राजनीतिक जीवन की सबसे कठिन घडी आन खडी हुई है । इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा नहीं बारह जून को यह फैसला सुनाया । इंद्रा अपने चुनाव में धांधली के लिए दोषी थी कि मुकदमा रात नारायण ने दायर किया था जिन्हें भारत का क्राउन प्रिंस कहा जाता था । सिर पर हरा पटका बांधे समाजवादी नेता राजनारायण को इंदिरा ने में रायबरेली में हराया था । उन्होंने ही इंदिरा हटाओ नाराज खडा था । इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रायबरेली से लोकसभा के लिए इंदिरा गांधी की जीत को निरस्त कर दिया और उनके चुनाव लडने अथवा निर्वाचित पद संभालने पर छह साल के लिए रोक लग गई थी । जांच के आधार पर अदालत में पाया उनके निजी सचिव यशपाल कपूर नहीं चुनाव के दौरान उनके एजेंट के रूप में काम किया था । तब तब उन्होंने सरकारी नौकरी से इस्तीफा भी नहीं दिया था । अदालत में ये भी पाया कि इंदिरा ने उन्नीस सौ इकहत्तर की चुनावी सभाओं के लिए मंच बनाने और लाउडस्पीकरों के लिए बिजली उपलब्ध कराने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार के कर्मचारियों की सहायता का प्रयोग किया था । फैसले के परिणाम तत्काल जगजाहिर थे । उन्हें इस्तीफा देना पडेगा । बावजूद इसके आरोप इसकदर सबहि थे । इधर टाइम्स लंदन अखबार ने लिखा, ये तो प्रधानमंत्री को यातायात नियम के उल्लंघन के आरोप में बर्खास्त कर रहे जैसा था । हमारे नेता आजकल जिन आरोपों से घिरे रहते हैं उनकी तुलना में तथा उनके द्वारा चुनाव में सरकारी मशीनरी के खुलेआम दुरुपयोग के मुकाबले प्रधानमंत्री को इस आरोप में इस आधार पर बर्खास्त कर दिए जाने से उन्होंने स्थानीय लाउडस्पीकरों और मंचों का प्रयोग किया । ना दरअसल ये लगेगा कि अपराध की तुलना में मिली सजा में कोई तालमेल नहीं था । आरोप बेशक छुटपुट थे मगर इंदिरा गांधी पर भारी नैतिक दायित्व पडा था । इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला जिस दिन आया उसी दिन उनके लिए मनहूस खबर भी आई । गुजरात विधानसभा चुनाव में जनता फ्रंट नहीं कांग्रेस को धूल चटा दी थी । बारह जून उन्नीस सौ पचहत्तर इंदिरा गांधी के लिए कतई अच्छा दिन नहीं था । डॉक्टर बात और कहते हैं और वो भी जब फैसला सुना तो बेहद परेशान हुई क्योंकि उन्हें इस बात का एहसास ही नहीं था कि मुकदमा उनके खिलाफ जा रहा था । उन्हें एक बार अदालत ने बुलवा भेजा था और राज नारायण के वकील शांतिभूषण ने उनसे जिरह की थी । तो इस प्रकार के मुकदमे में बयान देने के लिए अदालत में बुलाई गई पहली प्रधानमंत्री थी शांतिभूषण के पुत्र और वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण । याद करते हैं कि वे जब अदालत में मई तो आरंभ में बहुत धीर गंभीर थी लेकिन सिर्फ के दौरान कुछ बेचैन और उद्विग्न हो गई । प्रशांत ने इस मुकदमे के बारे में पुस्तक भी लिखी । भूषण कहते हैं, जिन्हें सफलतापूर्वक मगर कडाई से की गई और उसके खत्म होते होते इंदिरा गांधी संतुष्ट । देखिए, इस तरह निष्पक्ष थी आरोप हल्के फुल्के रहे हो अथवा नहीं मगर उनके पिता ऐसी स्थिति में क्या करते हैं, संस्थाओं को पोषित करने पर डटे रहे । नेहरू ऐसा फैसला आने पर शायद तत्काल अपने पद से इस्तीफा दे देते हैं । हमने ये देखा दी है । नेहरू ने इस से कहीं कम गंभीर निजी आरोप लगने पर अपने प्रधानमंत्रित्व के दौरान तीन बार त्यागपत्र देने की मंशा जाहिर की थी । लेकिन इंद्रा अपने शत्रुओं से अपने को बचाने में लगी हुई थी जिन्हें उन्होंने भारत का दुश्मन करार दिया हुआ था । ऐसी राजनीतिक संस्कृति खडी करने की राह पर अग्रसर थी जिसमें संस्थाएं रोडा समझी जाती थी की संस्कृति चारों तरफ फैली हुई है । इसमें व्यक्तिवादी शासन का अर्थ है ना सिर्फ कानूनों के प्रति निरादर बल्कि नैतिक मूल्यों के प्रति भी इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्णय ने इंदिरा विरोधी आंदोलन को मजबूती दे दी । उन्हें अब लगने लगा कि उनके पास तत्काल इस्तीफा देने के अलावा कोई रहा नहीं । उनके विरोधी तो बिना देर किए उनसे बहुत छुडवाने पर डटे थे । मगर वे अपनी लोकप्रियता के लिए आश्वस्त रही । संकट और परेशानियों ने मानो उन्हें हमेशा मजबूत बनाया था और अब उन्होंने जितना अधिक उन पर इस्तीफे का दबाव डाला उतना ही अधिक रक्षात्मक और ऍम उनके भाषणों में सुनाई पडने लग गई । पखवाडे भर के भीतर ही भारत की देवी इतनी जबरदस्त तैयारी के साथ भारी जवाबी वार करेंगी । उनके प्रतिद्वंदी आत्म समर्पण को मजबूर हो जाएंगे और ये समझ ही नहीं पाएंगे वे किस चीज की चपेट में आ गए । दुर्गा अपना गुस्सा सनसनीखेज और पूरी तरह अप्रत्याशित तरीके से जब आएंगे । हालांकि फैसला सुनाए जाने के तत्काल बाद लोग उस गर्म दोपहरी नहीं, सब नहीं और विकल्पहीनता के भर में डूब गए । ऐसी खबरें आने लगी कि एल एन मिश्रा की हत्या के कथित आरोपी आनंद मार्गियों का ही इस मामले में हाथ है । सुधार शंकर रहने उसी साल जनवरी में लिखा था कि आनंद मार्गियों और आरएसएस के सदस्यों की सूचियां हर राज्य को बनानी चाहिए क्योंकि उन्हें डर था कि वे इंदिरा को अस्थिर करने का षड्यंत्र कर रहे थे । प्रधानमंत्री निवास में गतिविधियां तेज हो गई । पश्चिम बंगाल के चुस्त दुरुस्त मुख्यमंत्री और इंदिरा गांधी के पुराने मित्र थे । उनके अनुरोध पर फटाफट दिल्ली आ गए । वकील होने के साथ साथ रही क्रिकेट और टेनिस खेलने की शौकीन थे । उनके सलाहकार अपनी अपनी सलाह लेकर उनके चारों और जमा हो गए । अपने पद से इस्तीफा नहीं देने की प्रेरणा इंदिरा को कैसे हुई, उसके कारण और व्याख्याएं बताई गई हैं । इस्तीफा देना चाहती थी अथवा उन्होंने वैसा जहाँ ही नहीं प्रधानमंत्री सचिवालय पूर्व संयुक्त सचिव बीएन टंडन ने अपनी डायरी में लिखा है कि जल्द ही साफ हो गया पीएम को इस्तीफा देने की कभी इच्छा नहीं थी और नहीं वो ऐसा करने जा रही थी । मुझे लगा कि वे सत्ता में बरकरार रहने का कोई भी साधन अपनाने से नहीं चूकेंगे । ऐसा लगता है कि उन्होंने खुद को समझा लिया । फैसला उनके विरुद्ध नहीं बल्कि देश की जनता के खिलाफ है । पीएम की सोच में हरसंभव साधन अपनाना उचित है । मेरी उससे सप्ताह में बने रहने में मदद मिलती हो तो रहने बाद में याद किया । उनकी पहली इच्छा तो पद छोड देने की ही हुई थी । रे के तत्कालीन सचिव भास्कर होश याद करते हैं । मैंने कहा इंदिरा पद छोडने पर अटल थी । उन्होंने मनी मनी तय कर लिया था । उन्होंने इसे तब बदला जब कांग्रेस के बुजुर्ग नेता जगजीवन राम ने कहा कि मैडम आप इस्तीफा बिलकुल भी मत दीजिए क्योंकि यदि आप देती हैं तो रुपया आपने उत्तराधिकारी का चुनाव हम पर छोड दें । उनकी इतना कहते ही उनकी भाव भंगिमा बदल गई और उनकी मंशा का उन्हें अहसास हो गया । उनकी आंख में दृढ निश्चय की चमक आ गई । उन्हें लग गया कि इस्तीफा देते ही वे सत्ता से पूरी तरह हाथ धो बैठेंगे । अच्छा तो ये है कि कांग्रेस के दिग्गज जो बाद में इंदिरा का साथ छोड देने वाले जगजीवन राम ने साफ कह दिया था, उनकी वफादारी सिर्फ इंदिरा के लिए आरक्षित थी । यदि किसी अन्य उत्तराधिकारी का प्रश्न उठाया तो उन्होंने बताया कि उनका दावा कहीं अधिक प्रबल था । जय कर का मानना है कि इस मोड पर संजय की इच्छा सबसे अधिक महत्वपूर्ण थी । फैसले के दिन करके अपने कारखाने से संजय जब घर लौटा, उसने गुस्से में दावा किया उसकी माँ द्वारा इस्तीफा देने का सवाल ही पैदा नहीं होता । उसका दावा किया था कि अभी जो लोग वफादारी की कसम खा रहे हैं, बाद में उनकी पीठ में छुरा भाव देंगे । मेनका गांधी की व्याख्या अलग है । आम धारणा के विपरीत आपातकाल का रचियता संजय कतई नहीं थे । ये तो सुधर शंकर रही । यानी कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष डीके बरुआ । कांग्रेस के नेता केसी पंत मुट्ठीभर वामपंथियों का जोशीला समूह ही थे, जिन्होंने उन्हें उकसाया और उकसाते रहे । उन्हें सबसे पहले ये सूची बाबू जगजीवन राम को प्रधानमंत्री बनाया जाए और अपना मामला सुलझने तक इंतजार किया जाए । लेकिन उनके मन में उन्होंने ये कहकर डर बैठा दिया यदि एक बार आपने प्रधानमंत्री का पद छोड दिया, आपको ये फिर कभी वापस नहीं मिलेगा । वो आपको निपटाकर ही दम लेंगे । पेशी लिए पद पर डटी रही । मेरी सांस का सबसे बडा गुण ये था कि उनके भीतर अदम्य जिजीविषा थी । वो इस बात को भी शायद डरी होंगी । उन के बाद जो कोई भी पद संभालेगा उन्हें सत्ता से दूर रखने के लिए । संजय के खडे मुर्दे उखाडेगा । धवन कहते हैं, वे सौ फीसद अलोकतांत्रिक थी और वो बार बार इस्तीफा देने को कहती रही, लेकिन अन्य सब पर हुआ । जगजीवन राम उन सब ने कहा कि उन्हें वैसा नहीं करना चाहिए । उन पर भी दबाव डालते रहे । उन्होंने इस बाबत बयान भी दिया था । वफादारी की प्रतिज्ञा इसे पीएन हक्सर ने लिखा था । जॉब किनारे करके योजना आयोग ने डाल दिए गए थे और उनके मंत्रियों ने उस पर दस्तखत किए थे । अपनी वफादारी जताने के लिए टीके भरवाने नाटकीय ढंग से नारा लगाया इंदिरा इस इंडिया इंडिया इज इंदिरा टू आॅल इंदिरा ही भारत है और भारत ही इंदिरा है । दोनों अविभाज्य हैं । वो दावा करेंगे कि पद पर बने रहने का कारण और कुछ नहीं । बस आत्मा की आवाज जनता के प्रति अपने कर्तव्य के पालन और विदेशी षड्यंत्रकारियों को नाकाम करने की भावना थी । बहुत कहती थी कि वे महज पद के लिए सत्ता से नहीं चिपकी रही थी, बल्कि इसलिए रही कि आरोपी मामूली थी और उन्हें हाथ पर हाथ धरकर बैठने से पहले बहुत सारे काम करना चाहिए । मुझे यदि प्रधानमंत्री बने ही रहना होता हूँ । मेरा गुजारा तो पार्टी के आपका लोगों के इशारों पर नाच कर भी चल जाता है । वो कभी भी मेरे द्वारा सत्ता छोडने के पक्ष में नहीं होते हैं । मैं तो आजीवन प्रधानमंत्री बने रहेंगे । जेपी आंदोलन और उसकी वजह से उनके खिलाफ उठ रही आवाजों के संदर्भ में देखें तो इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला तूफानी रात में उनके चरणों पर बिजली गिरा देने के समान घातक था । उस मौके पर अपनी माँ के रक्षक की भूमिका बेटे ने निभाई । मेरी कहानी याद किया संजय अभी तक तो पूरी तरह राजनीतिक हैं लेकिन जब जेपी आंदोलन फैलने लगा और फैसला आया तभी उन्होंने अपना कदम इस और बढाया । बेटा अपनी माँ का संरक्षक बन गया । किसी पर भरोसा ना करते हुए भावी धोखेबाजों से घिरे हुए उन्होंने अपने वफादार उद्दंड बच्चे को कसकर पकड लिया और किसी अन्य सलाह से अधिक उसके शब्दों को महत्व दिया । इस समय उनका व्यवहार नेहरू की फितरत के विपरीत उन्होंने अपने सबसे कमजोर छडों में भी शायद ही कभी सलाह लेने के लिए अपनी बेटी का मूड जो हुआ होगा । उन्होंने हालांकि अपने पिता के एकदम विपरीत गहन राजनीतिक संकट के क्षणों में अपने ही छोटे बेटे के अलावा अन्य किसी को भी अपना विश्वासपात्र नहीं समझा । वो अपने मन में अपनी माता के सभी सहकर्मियों से जबरदस्त नफरत करता था क्योंकि उसे लगता था कि भी उसके साथ नहीं थे और मारुति का उन्होंने पूरी शिद्दत से समर्थन नहीं किया था । ये समझकर की राजनीतिक सत्ता परिवर्तित होते ही वो और उसकी मारूति परियोजना गंभीर राजनीतिक संकट में फंस जायेंगे । उसे अपनी सुरक्षा के लिए भी सरकार में अपनी माँ के बने रहने की जरूरत थी । उसके बदले उन्होंने उसे अपनी ढाल बना लिया । मानव वही उनका संकटमोचक हो । एक दूसरे को बचाते हुए माँ और बेटे ने गहराते अंधेरे का मिलकर मुकाबला क्या? बीएन टंडन लिखते हैं, कानूनी पक्ष जो भी हो, फैसले के नैतिक आधार की जांच करने का साहस किसी के भीतर दिखाई नहीं दिया । पीएम की कृपा से इन पिछले पांच सालों में नैतिक मूल्यों और मापदंडों का समूचा अवमूल्यन हो गया । इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति सलाह ने बारह जून के अपने मूल निर्देश में फैसले पर बीस दिन की स्वयं ही रोक लगा दी थी । के सरकार उस बीच इंदिरा का उत्तराधिकारी नियुक्त कर ले । इंदिरा ने जून को सुप्रीम कोर्ट में अपील की और इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर मिशन और संपूर्ण रोक लगाने की यात्रा की । सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति वी । आर । कृष्ण अय्यर नहीं जून को सशर्त रोक लगाई । पद पर बनी रह सकती थी । मगर अपनी अपील के निपटारे तक संसद में मतदान नहीं कर सकती । इसके कारण थे निष्क्रिय आधी अधूरी नाम भर की प्रधानमंत्री विपक्ष किसी भी कीमत पर अदालत में उन के मामले को आगे नहीं बढने देना चाहता था । उनके आगे कोई बंदा नहीं थी । जेपी कि सेना इंद्रा को हटाना चाहती थी और तत्काल हटाना चाहती थी । मोरारजी ने ओरियाना फल बच्ची को बताया की दिल्ली की रामलीला मैदान में उनकी पच्चीस जून की प्रस्तावित सभा के मौके पर हम वहाँ दिन और रात धरना देंगे । हमारी मंशा उन्हें उखाड फेकने की है । इस्तीफा देने के लिए मजबूर करने की है । ये ते है लेडी हमारे इस आंदोलन के सामने टिक नहीं पाएगी । सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने से पहले संजय और धवन उनके घर के आस पास इंद्रा समर्थक प्रदर्शन करवा रहे थे और कांग्रेस ने उनके समर्थन में लगातार सभाएं आयोजित की । संजय ही सब कुछ देख रहे थे । इनमें सबसे बडी और सबसे असरदार सभा दिल्ली के बोट क्लब पर हुई जहां भारी संख्या में आए लोगों ने उनके समर्थन में नारे लगाए । बीएन टंडन अपनी डायरी में लिखते हैं, आई के गुजराल से मुझे आज पता चला संजय ने उन्हें बुलाकर कडी फटकार लगाई थी क्योंकि कल की सभा का ढंग से प्रचार नहीं किया गया तो इस बात से नाराज हैं । पीएम के समर्थन में जारी अभियान को समुचित प्रचार नहीं मिल रहा । अगर अपमानजनक दृश्य की गवाह है जहाँ गुजराल पढ संजय जोर से चलना है । संजय गुस्से में थे और सभाओं के आधे अधूरे प्रचार के लिए गुजराल पर चलाए । गुजराल ने अपमानित तो महसूस किया मगर बोल ही भी नहीं । संजय के वहाँ से जाने के बाद हमने एक दूसरे की और देखा और हाथ जोडकर मैंने आसमान को । ताजा आपातकाल की घोषणा के बाद इंदिरा ने आई के गुजराल को संजय की सिफारिश पर सूचना और प्रसारण मंत्री के पद से हटा दिया और उनकी जगह विद्याचरण शुक्ला को नियुक्त कर दिया । शुक्ला वही व्यक्ति थे जिन्हें इंदिरा का कोई बस बुखार आ गया । गोयबल्स नाजी प्रचारमंत्री था । इंदिरा गांधी ने पच्चीस जून की सुबह रहे से कहा था, हम गंभीर संकट से घिरे हैं । गुजरात के विधानसभा भंग है । बिहार की भी भंग है कि सिलसिला नहीं हो जाएगा । लोकतंत्र हो जाएगा । उस कठोर आपात कार्रवाई बेहद जरूरी है । उन्हें भले ही अभी तक अनुच्छेद तीन सौ बावन की जानकारी नहीं रही, लेकिन आपात कार्रवाई से उनका मतलब लोकतंत्र बचाने के लिए तत्काल कोई उपाय अपनाने से था । आपातकाल को सही ठहराने के लिए बहुत खतरे में लोकतंत्र जुमला ही प्रयोग करती थी । उनके दृष्टिकोण से उन्होंने लोकतंत्र का अपहरण करके भारत के लोकतंत्र की रक्षा की थी । रे ने तब उन्हें समझाया कि संविधान में उल्लिखित अनुच्छेद तीन सौ बावन के अंतर्गत विदेशी हमले अथवा आंतरिक अशांति फैलने की सूरत में केंद्र सरकार राष्ट्रीय आपातकाल की स्थिति लागू कर सकती है । रामलीला मैदान में विपक्षियों की सभा ने इंदिरा को यह बहाना दे दिया जिसकी उन्हें तलाश थी । खुफिया अधिकारियों ने पहले ही बता चुके थे दिल्ली के रामलीला मैदान में जेपी उस शाम सेना और पुलिस वद्र हो कर देने का आह्वान करेंगे । उन्होंने वही किया था । रामलीला मैदान में पच्चीस जून की शाम अभूतपूर्व भीड जमा हुई । जेपी ने जब रामधारी सिंह दिनकर की कविता की पंक्तियां पडी सिंहासन खाली करो कि जनता आती है उनका भरी जयजयकार हुआ । जेपी ने पहले भी किए गए आह्वान को दोहराया की पुलिस और सेना को अवैध ऍम और संवैधानिक आदेशों का पालन नहीं करना चाहिए । जेपी ने जैसे ही इंदिरा से तत्काल पद छोडने को कहा, इतने समर्थन में उन कार भरी इंदिरा बाद में कहेंगे । उन्होंने पुलिस और सेना को उनके कर्तव्य से विमुख करने की कोशिश की थी । क्या कोई देश सशस्त्र सेनाओं से विद्रोह करने के आह्वान को बर्दाश्त करेगा? इंदिरा गांधी का स्पष्ट मत्था जेपी का आह्वान सरकार की संप्रभुता के विरुद्ध आंतरिक हमला था । भारत की संप्रभुता पर गृहयुद्ध का खतरा पैदा किया जा रहा था । कुंभ कपूर ध्यान दिलाते हैं आपातकाल को सही ठहराने के लिए श्रीमती गांधी ने जे । पी । के शब्दों को बाद में बार बार उद्धृत किया । मगर तथ्य तो यह है कि आपातकाल की तैयारियाँ कई महीने पहले से नियोजित की जा रही थी । आपातकाल जैसी कार्रवाइयों पर लगभग एक साल से विचार चल रहा था । ऐसा सिद्धार्थशंकर रे द्वारा किए गए इंटरव्यू से जाहिर हुआ । उन्होंने कहा कि बहुत पहले अगस्त उन्नीस सौ चौहत्तर में ही उन्होंने इंदिरा गांधी को ये कहते हुए लिखा था वे असामाजिक तत्वों के खिलाफ कार्रवाई कर रहे थे । हालांकि उन्हें पता था इससे कठिनाई पैदा हो सकती थी । दरअसल उन्नीस सौ साठ के अंतिम वर्षों और उन्नीस सौ सत्तर के दशक के आरंभिक वर्षों में नक्सलवादियों के विरुद्ध उनकी सरकार द्वारा ये जा रहे कठोर और नृशंस उपायों का जिक्र कर रहे थे जब उन पर मानव अधिकारों के अंधाधुंध उल्लंघन का आरोप लगा था । इंदिरा गांधी और सिद्धार्थ शंकर रही हूँ में पच्चीस जून की शाम को राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से मिलने गए । उन्होंने राष्ट्रपति को बताया, देश की संप्रभुता को क्योंकि प्रत्यक्ष खतरा पैदा हो गया था, इसलिए आंतरिक आपातकाल लागू करना जरूरी था । उसी रात में आपातकाल लागू करने का अध्यादेश राष्ट्रपति के दस्तखत करने के लिए राष्ट्रपति भवन भेजा गया । आधी रात से कुछ मिनट पहले पच्चीस जून को राष्ट्रपति ने अध्यादेश पर दस्तखत किए । भारत गणतंत्र अब आपात स्थिति में था । आपातकालकी उचित ही कडी निंदा हुई । मगर जयप्रकाश के आंदोलन पर भी सवाल उठे । निर्वाचित सरकार के विरुद्ध सत्याग्रह की अवधारणा क्या परिभाषा के लिहाज से अमान्य हैं? गुहा ने एक पूर्व आईसीएस अफसर द्वारा जेपी को लिखे पत्र का उल्लेख किया है । इसमें लिखा था, निर्वाचित विधानसभा को बर्खास्त करने की मांग करने के कारण बिहार अनुरंजन असंवैधानिक ऍम अलोकतांत्रिक दोनों है । सत्याग्रह आखिरकार उपनिवेशवादी शासन के खिलाफ गांधी का हजार था । इसका मकसद जनता द्वारा निर्वाचित लोकतांत्रिक व्यवस्था के विरुद्ध प्रयोग किया जाना नहीं था । हडतालों सत्याग्रह हूँ । व्यापक नागरिक अशांति और पुलिस से नागरिक अवज्ञा के आह्वान से घिरी सरकार क्या अपना इकबाल को लागू करने के लिए कार्रवाई करने को कर्तव्य से भरी हुई नहीं है? इंदिरा गांधी के पास क्या उन प्रावधानों को थोपने के अलावा कोई रास्ता नहीं था जिन्हें उन्होंने लोकतंत्र का सिर्फ अस्थायी निलंबन बताया था? उन्होंने बाद में कहा, मैंने आपातकाल को दवा के समान बताया था । यदि कोई व्यक्ति बीमार है तो आपको उसे दवा खिलानी पडती है । इसे व्यक्ति भले पसंद ना करें, मगर उसके लिए वो आवश्यक है । जेपी ने जब घोषणा की निर्वाचित सरकार शासन का अपना नैतिक अधिकार हो चुकी है, तो क्या वे ऐसी भयावह परिपार्टी की बुनियाद नहीं डाल रहे थे? इसके जरिए मतदान पेटी से निकले जनादेश के बजाय नारों और जुमलों से उकसाई गई जनता की क्षणिक मांग के द्वारा निर्वाचित सरकार को अब उखाडकर फेंका जा सकता था । अगर हम यह स्वीकार भी कर लें, बीजेपी के नेतृत्व वाला आंदोलन लोकतांत्रिक नहीं था, तो इंदिरा ने भी अपनी तरफ से इसे समझने में काम अगली दिखाई । विपक्ष उनके प्रति इतना अधिक आक्रमक कैसे हो गया? उन्होंने सत्ता के प्रयोग हो, अपना अधिकार जारी रखने के साथ भ्रामक रूप में घालमेल कर दिया । लेकिन उन्होंने अपने नैतिक इकवाल को भी संजय की गतिविधियों द्वारा धीरे धीरे और खतरनाक रूप में छीजने दिया । संजय को अपने द्वारा खुला संरक्षण नहीं नहीं और आंदोलनकारियों के साथ कोई समझौता करने अथवा ये दिखाने से इनकार करके अपने नैतिक बल को कमजोर क्या वे उनकी शिकायतों को समझने का प्रयास कर रही थी? चार । दा प्रसाद लिखते हैं, आपातकाल का सहारा इसलिए लेना पडा क्योंकि सत्याग्रह का कोई तोड सरकारों के पास नहीं है । सत्याग्रह की शक्ति से भलीभांति परिचित थे । सत्याग्रह के प्रति सरकारी जवाब बल प्रयोग होता है । इसका सहारा तब भी लेना पडता है, जब सरकारों को अपनी नैतिक उपयुक्तता बहाल करने की और कोई रहा नहीं सोचती । इंदिरा के पक्ष का मत था कि जेपी आंदोलन का कोई जमीनी आधार नहीं था कि आरएसएस और जनसंघ द्वारा शुरू किया गया अभियान था तो जितनी तेजी से शुरू हुआ था, वैसे ही बिखर गया । अंत में जनता क्रांति इसके नेताओं को लील जाएगी और बिजली की कौन सिद्ध होगी और इंदिरा गांधी भी सकती हुई तानाशाह के रूप में प्रकट होंगे । दोनों पक्षों की ओर से ये हिचक ही परिस्थिति को बचा पाया, यदि जनशक्ति निर्वाचित प्रधानमंत्री को पदच्यूत कर दे दी अथवा इंदिरा लोकतंत्र को हमेशा के लिए खत्म कर देती है । भारत अकल्पनीय संघर्ष के चक्रव्यूह में फंस जाता । आपातकाल हालांकि मूलपाठ था, मगर सिर्फ जन दबाव के माध्यम से निर्वाचित सरकार को गिराने वाले लोग भी कोई लोकतंत्र के मसीहा नहीं कहना सकते । ऐसा कहा गया जहाँ दस की जरूरत होती थी वहाँ सौ इकाइयों का बाल लगा देने की । इंदिरा गांधी की आदत का ही नतीजा था । आबादकार इंदिरा ने बाद में सवाल पूछे जाने पर आपातकाल के समर्थन में अनेक कारण गिनाए और उसके आरंभिक महीनों में उन्हें भरोसा था । ये बेहद फायदेमंद था । उन्होंने लिखा, गृहयुद्ध की कोई घोषणा नहीं की गई की सच है कि मैंने आपातकाल लगाया है और जयप्रकाश नारायण तथा मोरारजी देसाई सहित अनेक विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार किया है । जयप्रकाश नारायण ने रामलीला मैदान में सभा संबोधित की । इसमें उन्होंने सेना और पुलिस से सरकार के हुक्म उगली की अपील की । इसे कोई सरकार बर्दाश्त नहीं कर सकती । इंदिरा की घनिष्ठ मित्र जयकर आपातकालकी जबरदस्त आलोचक थी । विषेशकर प्रेस पर सेंसरशिप थोपे जाने की । उन्होंने उनसे पूछा, हम जवाहरलाल नेहरू की बेटी इसकी अनुमति कैसे दे सकती थी? इंदिरा ने जवाब दिया, मेरे खिलाफ षडयंत्रों से तो मन जान हो । जयप्रकाश और मोरारजी भाई को मुझसे हमेशा नफरत रही है । हमेशा मुझे बर्बाद करने के लिए उतावले हो रहे थे । उनका रुख लगातार यही रहा । लोकतंत्र आंदोलनकारियों के कारण खटाई में पड रहा था, न कि उनके कारण और उन्होंने तो बल्कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए कार्रवाई की थी । उससे कहेंगी राष्ट्र के नाम प्रसारण ने सत्ताइस जून की रात को मैं नहीं आपातकाल लागू करने का कारण बता दिया । हिंसा और घृणा का वातावरण पैदा कर दिया था । उनमें से एक नहीं यहाँ तक कह दिया कि हथियारबंद बलों को उन आदेशों का पालन नहीं करना चाहिए जिन्हें गलत समझते हैं । आपातकाल लागू होने के बाद से समूचे देश में हालात सामान्य है । हिंसक कार्यवाही और देश दोपहर के सत्याग्रह ए तो समूचे प्रतिष्ठान को धराशायी कर देंगे । इसे इतने परिश्रम और आशाओं के साथ इतने वर्षों में निर्मित किया गया है । मुझे भरोसा है कि आपातकाल को जल्द ही समाप्त कर देना जरूर संभव होगा । आप जानते हैं कि प्रेस की आजादी में मेरा गहरा विश्वास रहा है और आज भी है । मगर अन्य सभी स्वतंत्रताओं की तरह इसका प्रयोग भी जिम्मेदारी और संयम के साथ होना चाहिए । वो आगे कहीं जरा सोचिए, यदि हम लोगों तक खाद्यान्न नहीं पहुंचा पाते तो क्या होता है? तो यही कहते हैं सरकारी चंद्र निकम्मा है, इसलिए इसे हटना चाहिए । लोकतंत्र प्रणालियों को पहले भी इसी प्रकार हटाया गया है । इसीलिए हमने तो दर्शन लोकतंत्र को बचाया है । उसके घनिष्ठ लोगों का ये मानना है कि उन्होंने आरंभ से ही डटकर हालांकि से सही ठहराया । मगर इंदिरा इस फैसले से पूरी तरह सहमत नहीं थी । भगत लिखती हैं, श्रीमती गांधी दुविधा में कोई काम डाल सकती थी, मगर वह चतुर और अनुभवी व्यक्ति थी और कभी कभी जल्दबाजी में धडाधड फैसले करने के बजाय बेहतर है की दुविधा नहीं । उन पर विचार किया जाए । शायद उनके राजनीतिक जीवन के दो अत्यंत फॅालो आपातकाल और ऑपरेशन ब्लूस्टार के मामले में श्रीमती गांधी की अपनी निजी शैली में नहीं लेने दिया गया । प्रिया श्रीमती थी । आपातकाल घोषित करने के अलावा कोई चारा नहीं था । नहीं, आपने जब इस्तीफा देने का फैसला किया तो और कोई विकल्प नहीं था । लेकिन आपके लंबे राजनीतिक अनुभव की बदौलत क्या आप ये पूर्वानुमान नहीं कर पाई कि संविधान को निलंबित करने का भारत पर क्या असर पडेगा? अपने बेटे संजय को आपके द्वारा खुलेआम बढावा देने के कारण जनता की नजरों में आपके इकबाल पर भारी पहुंचाई, उसके बावजूद आपने शाही आत्मविश्वास के साथ लोगों से उम्मीद की कि वह माँ और बेटे की गलतियों को चुप चाप कबूल कर लें । आप ने ये सोचा कि आप जो भी करेंगी उसे जानता, आंख मूंदकर मान ले कि क्योंकि आप इंदिरा गांधी थी । आपके सहयोगियों ने जवाब से शक्ति के प्रयोग नहीं, संयम बरतने और आपके विरोधियों से बातचीत की कोशिश करने का अनुरोध किया । तो आपने सुपाय को एक बार भी नहीं अपना क्योंकि आपको ये विश्वास था कि आंदोलन निराधार था । इसके बजाय आपने होटल ता की राह अपनाई । पुराने राजनीतिक सहयोगियों को बहुत गंदे भीड भरे कैदखानों में डाल दिया गया । आपने ऐसा कहा साधारण अपराधों के लिए गिरफ्तार लोग ये मान रहे थे कि वो राजनीतिक बंदी थे लेकिन एल के आडवाणी, अटल बिहारी वाजपेयी विजय राज्य संध्या को कैद में रखने का । इसके अलावा भी कोई अन्य कारण था कि वो जनसंघ के नेता और आपके राजनीतिक धुरविरोधी थे । यदि आप इस्तीफा देना चाहती थी तो आपने अपनी इच्छा को दूसरों की बातों में आकर बदल कर दिया । आप संजय की गतिविधियों पर पडता डालने और उसे बचाने की साफ साफ कोशिश कर रही थी । आप भलीभांति जानती थी, उसकी कारगुजारियों पर नई सरकार क्या रुख अपनाएगी? आप विपक्ष को सबका प्रदान करने देने से रोकने को उत्तर थी क्योंकि आपकी ये धारणा थी कि वे भारत और संजय दोनों को बर्बाद कर देंगे । आपने डर था यदि आपने पत्या किया तो नेहरू हराना हमेशा के लिए सभा हो जाएगा । आपातकाल की कहानी अक्सर सुनाई गई है और उचित रूप में अंधेरे पक्ष सहित विपक्षियों को जेल भेजने, प्रेस का गला घोंट नहीं, जबरदस्ती नसबंदी अभियान चला नहीं और झोंपडपट्टी हटाने की मुहिम के भारत भारत में आजादी के बाद बने इतिहास पर खुली हुई है आपातकालकी कठोर छवियां उन लोगों के लिए मैंने तो तुम से पहले ये कहा था तो हराने की घडी चाहिएँ लोकतांत्रिक रिवायत भारत में लंबी नहीं चल पाएगी और फॅमिली की सरकार यहाँ के अनुकूल नहीं थी । महात्मा गांधी ने समूची आबादी के भीतर व्यक्तिगत आजादी की चाहत जगह दी थी । नहर उन्हें अपना बौद्धिक आधार कैम्ब्रिज और हैरो में होने के कारण ये सपना देखा था । भारत भी अंग्रेजी लोकतंत्र का संस्करण सब हो सकता था । अंबेडकर ने गणतंत्र के संविधान को प्रगतिशील सामाजिक परिवर्तन पर आधारित करके कलमबद्ध किया था । पटेल ने भारत को भौगोलिक रूप में संगठन किया था, जिसमें उत्तर अधिकारवादी राजाओं को जनता की संप्रभुता के प्रति जवाबदेह बनाया गया था । इसके बावजूद स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत की साहसिक और पे बात तस्वीर बनाने के लिए तरक्की की तो सभी हुई कुछ ही चली गई । वो टकरावों अनसुलझी असमता हूँ और जागरूकता के गहरे अंतर के उतार चढावों के एक उथल पुथल भरे नक्शे पर चलेगी और उसे ताजा रंगाई तथा मजबूत आदर्शवाद की खुराक चाहिए थी, ताकि उस आकृति की पहचान, ताजगी और अपील बनी रहे । इंदिरा गांधी के भारत ने उस निर्भीक कम विश्वास से लबालब पेंटिंग की जगह पर सत्ता और साजिशों की लक्ष्यहीन टुटपुंजिया चित्रकारी चस्पा कर दी थी और आपातकाल ने हम तथा उस साहसिक तस्वीर के कैनवास को ही जितने जितने कर दिया और धूल के बवंडर में पड पडा था, छोड दिया । महात्मा गांधी ने जहाँ अपने अनुयायियों से अपने आप को पृष्ट बनाने को सत्य और अहिंसा के निजी प्रतिमानों की ऊंचाई को छूने को कहा था वहीं इंदिरा ने उन्हें चूर चूर करने वाले लोकलुभावन करतबों की नींव डाली व्यक्ति की निकृष्टतम अनुभूतियों से अपील के लिए जहाँ गरीबी हटाने के सरलीकृत संदेशों ने उन उच्च आह्वानों को मिटा डाला हूँ जिन्होंने गांधी भारतीय लोकतंत्र की निशानियां मानते थे । स्वतंत्रता संग्राम ने बडी संख्या में राजनीतिक योग्यता वाले लोगों को तैयार किया था क्योंकि उन गुलाम लोगों के बीच मौजूद पढे लिखे लोगों ने अपने विचारों को आगे आकर आजमानी का साहस दिखाया था । मगर मुझे सोच और अभिव्यक्ति के प्रति इंदिरा गांधी के अविश्वास नहीं, कांग्रेस में अपना भविष्य तलाश नहीं हो, उत्सव पूछी, उपलब्धि वाले लोगों का रास्ता रोक दिया जबकि नेहरू युग में वैसे अनेक लोगों ने कांग्रेस को अपना था । आपातकाल के दौरान भारत के सबसे मेधावी राजनीतिक व्यक्तित्वों को बडी तादाद में सलाखों के पीछे जीवन गुजारना पडा । शिक्षित और योग्य लोगों के पेशे के बजाय राजनीति के दरवाजे जल्द ही वैसे लोगों के लिए बंद हो गए । सार्वजनिक जीवन की एकमात्र योग्यता कातर वफादारी को मानने से राजी नहीं हुए । उनके सामने उन्नीस सौ इकहत्तर में सुनहरा मौका था, जब वे जबरदस्त जनादेश के बूते उदारता की राजनीति की शुरुआत कर सकती थी । लेकिन जनादेश और सैन्य विजय को अपनी निजी उपलब्धि कि भारत की एकमात्र उम्मीद वही थी, मानकर वो अपने पिता की सामंजस्य वादी राजनीति पर अमल करने से अथवा ऐसे युग का विस्तार करने में चूक गई, जिससे वे नेहरूके साहसिक संविधानवाद की योग्य उत्तराधिकारी साबित हो पाती है । उनके द्वारा प्रिवीपर्स खत्म करने और महारानी गायत्री देवी को बंदी बनाने से नाराज माउंटबैटन नहीं, जैसा अपनी डायरी में लिखा भी उस शब्द के साधारण मायनों में तो जाहिर है भ्रष्ट नहीं है, मगर अपनी औकात से बहुत आगे बढ गए हैं और हर एक के साथ सकती तथा जटिलताओं से पेश आ रही हैं । बहरहाल, आपातकाल की घोषणा के बाद उन्हें अनपेक्षित समूह से समर्थन की पेशकश हुई । उन्होंने हालांकि आपातकाल में आरएसएस को प्रतिबंधित कर दिया था, मगर खुफिया ब्यूरो के पूर्व निदेशक टीवी राजेश्वर द्वारा लिखित पुस्तक में यह उल्लेख है विदेश को व्यवस्थित करने की उनकी कोशिश और बाद में संजय की परिवार नियोजन लागू करने की मुहिम । विषेशकर मुसलमानों के बीच आरएसएस मुखिया बालासाहब देवरस बडे भारी समझते । बताया जाता है कि देवरस तो इंदिरा से मिलने को भी आते थे लेकिन उन्होंने मना कर दिया क्योंकि वो खुद को आरएसएस के प्रति सहानुभूति प्रदर्शित करते नहीं बताना चाहते हैं । वैसे भी अभी तो उनका रवैया शायद ही किसी के प्रति सहानुभूतिपूर्ण था । संजय गांधी और उनके कृपापात्र गृहराज्यमंत्री ओम मेहता ने मिलकर विपक्ष के उन नेताओं की सूची बनाई है जिन्हें बंधी बनाया जाना था । गिरफ्तारियां जून को देर रात से ही शुरू कर दी गई । जयप्रकाश नारायण और मोरारजी देसाई को नींद से जगाकर उन्हें बताया गया कि वे बंदी बनाए जाते हैं । विपक्ष के अन्य नेताओं की तरह कांग्रेस के सदस्यों चंद्रशेखर और मोहन दारिया को भी जी पी । के प्रति सहानुभूतिपूर्ण रुख के लिए बंदी बना लिया गया । गिरफ्तारियों का सिलसिला शुरू होते ही दिल्ली के बहादुरशाह जफर मार अथवा पीठ हिस्ट्री लंदन की वह सडक जिसके किनारे वहाँ के ज्यादातर अखबारों के दफ्तर इस तरह की बिजली आपूर्ति अचानक रूप दी गई है । अधिकतर अखबारों के दफ्तरों को छापाखानों में अंधेरा पसर में से सिर्फ दो ही समाचारपत्र देश में आपातकाल लागू होने का समाचार अगली सुबह छापा अखबार थे हिंदुस्तान टाइम्स आॅफ और ये भी दिल्ली से इसलिए छपा है क्योंकि इनके कार्यालय और छापाखाने बहादुरशाह जफर मार्ग पर ना होकर दूसरी जगह पडते हैं । हिन्दू अखबार में शीर्षक था ऍम पोस्ट राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रीय आपातकाल लागू निवारक गिरफ्तारियां, प्रेस सेंसरशिप हो पा गया । बताया गया की इंदिरा ने अखबारों की बिजली काटने की इजाजत नहीं दी थी मगर संजय और उनके साथियों ने उनकी अनदेखी करके वैसा क्या? इंदिरा ने पच्चीस जून को कथित रूप मेरे को आश्वस्त किया । प्रधान ठीक है, बिजली रहेगी । उसके बावजूद बिजली काट ही दी गई जहाँ आयोग के सामने पेश हुए । गवाहों ने कहा कि अखबारों के दफ्तर की बिजली संजय के आदेश पर काटी गई थी, रही नहीं । जब बिजली रोक देने पर ये कहते हुए समूची कार्यवाही न्याय विरुद्ध थी, अपनी गंभीर परेशानी जताई । संजय मेरे से कहा था, हम लोगों को देश चलाना कहाँ होता है? आपातकाल लागू करने का फैसला करते समय इन्दिरा नहीं, अपने मंत्रिमंडल को तुच्छ समझकर उसकी अवहेलना है । मंत्रिमंडल को अगले दिन सुबह से ही इसकी जानकारी दी गई । जब सरदार स्वर्ण सिंह इस पर ये कहते हुए सवाल करने वाले एकमात्र मंत्री साबित हुए भारी आपातकाल जब पहले से ही लागू था, आपातकाल लागू करने की क्या जरूरत आन पडी पवन सिंह ने बाद में अपने मित्रों से कहा की थानेदारी नहीं चलेगी । उनकी हिमाकत का जवाब जल्दी उन्हें मंत्रिमंडल से हटा कर दिया गया है । उनकी जगह संजय के घनिष्ठ हरियाणा के मुख्यमंत्री तथा मारुति परियोजना के समर्पण बंसी लाल को मंत्री नियुक्त कर दिया गया । भारत भर में बुनियादी अधिकार निरस्त कर दिए गए हडतालों और यूनियनों को प्रतिबंधित कर दिया गया और प्रदर्शनकारियों की धरपकड की गई । साल उन्नीस सौ इकहत्तर में परे कुख्यात कानून मीसा अथवा मेंटेनेंस ऑफ इंटरनल सिक्योरिटी ॅ यानी आंतरिक सुरक्षा संरक्षण अधिनियम के तहत सार्वजनिक कार्य करता हूँ । प्रदर्शनकारियों और इंदिरा की अवज्ञा करने वाले लगभग हर एक व्यक्ति को बंदी बना दिया गया । मीसाबंदियों को दो साल तक बिना मुकदमे कैद रखा जा सकता था । कांग्रेस विरोधी छब्बीस संगठनों को प्रतिबंधित किया गया और मैं शामिल थे । आरएसएस भारत की कम्युनिस्ट पार्टी, मार्क्सवादी अथवा माकपा तथा भारत की कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी लेनिनवादी अथवा भाकपा माले अलवत्ता भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी अथवा भाग पाने इंदिरा और आपातकाल का खुलेआम समर्थन । क्या चारों और अचानक चुप्पी छा गई । वरिष्ठ राजनेता भी नहीं बोल रहे थे । सामान्यतः कोलाहल से भरपूर भारतीय उपमहाद्वीप को भयाक्रांत खामोशी ने घेर लिया । अधिनायक बात से खुशामदी कला भी पैदा हो गयी । चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन में विजयी इंदिरा के मूर्तिशिल्प बना डाले, जिनमें वे दुर्गा बनी दहाडते शेर पर सवार थी । उनकी देश भर में नुमाइस लगाई गई । अखबारों पर सेंसरशिप के साथ ही साथ है । सकारात्मक खबरों पर ही जोर देने के दिशा निर्देश भी जारी कर दिए गए । इंडिया की तस्वीर वाले विराट बोर चौराहों पर नमूदार हो गए । इन पर नारा लिखा था दलिदर इजराइल फ्यूचर स्प्राइट नेता सही हैं, भविष्य उज्ज्वल है । बीबीसी के माँ डाली सहित विदेशी पत्रकारों को भारत छोडकर जाने का फरमान सुना दिया गया । यदि वे भारत से समाचार भेजने के इच्छुक थे, उनके लिए भी सेंसरशिप के नियम बना दिए गए । तली ज्यादा करते हैं । विदेशी पत्रकारों और सरकार के बीच इस बारे में हम तो बातचीत चली । क्या हम सेंसरशिप नियमों पर दस्तखत करेंगे? बीबीसी ने अन्य कई के साथ दस करने से मना कर दिया । मुझे शाम फोन पर पूरा माफी मांगते हुए हिदायत मिली मैं या तो चौबीस घंटे में देश छोडकर चला जाऊं वरना गिरफ्तार होने को तैयार हूँ । कुल पत्रकार गिरफ्तार किए गए थे जिनमें इंदिरा निंदर इंडियन एक्सप्रेस के कुलदीप नैयर भी शामिल थे । नहीं और मैं याद किया अम् अच्छे दोस्त होते थे । उन्हें गंदे चुटकुले पसंद थे और मुझे उन्हें सुनने को कहती थी । उनके संबंध कभी भले ही कितनी ही दोस्ताना रहे हो मगर नहीं करके उन पर केंद्र हरे । आलोचनात्मक लेख साहिर हैं । उनके गले उतनी अच्छी तरह नहीं उतर पाए जितने की उनके अशिष्ट चुटकुले । आपातकाल लगने के आरंभिक कुछ महीनों में शहरी मध्यमवर्ग नहीं, खराब व्यवस्था हो । नहीं अंतहीन हडतालों और बंद से मुक्ति और अर्थव्यवस्था के धीरे से फिर जी उठने का स्वागत किया । अधिकतर विपक्ष के कारागार में बंद होने के कारण संसद में आपातकाल के प्रस्ताव को आसानी से मंजूरी मिल गई । आपातकाल के आरंभिक कुछ वहाँ ईसन शाम और स्थिरता पूर्ण माहौल में काटे । इसमें प्रधानमंत्री को भी शांति मिले । गोवा उन्नीस सौ पचहत्तर के अक्टूबर महाने भारत दौरे पर आए टाइम पत्रिका के रिपोर्टर को उद्धृत करते हैं । इसमें लौटकर लिखा था कि प्रेस की आजादी और वैसे ही अधिकारों के भारत की साठ करोड आबादी में से अधिकतर लोगों के लिए कोई खास मायने नहीं थे, जो मुद्रास्फीति की दर पिछले साल गिरकर दस फीसद का कहीं अधिक साफ रखते थे । शहरी मध्यम वर्ग में से अधिकतर लोगों ने आपातकाल का स्वागत करके राहत की सांस लेते हैं । कुछ लोग तो यहाँ तक कहने लगे कि भारत में क्या लोकतंत्र वाकई प्रासंगिक था । लेकिन इंदिरा को जिस समय सामने डटकर अर्थव्यवस्था का कायाकल्प करना चाहिए था वो छूट गई । लोकतांत्रिक सरकार बहुत पहले राजनीतिक परिणामों के डर से बडे आर्थिक उपाय करने से बचती हैं । लोकतांत्रिक, शोरगुल विहीन और अपनी राह में रोडे अटकाने से मेहरूम विपक्ष जैसी अनुकूल परिस्थिति के चलते आपातकाल के दौरान भारत को विचारधारात्मक बोझ के जुडे से मुक्त करके सतत आर्थिक वृद्धि की राह पर अग्रसर किया जा सकता था । इसके बजाय व्यापार उद्योग लगाने के लिए अनगिनत बाधाएं जारी रही हैं । भारतीयों को विदेशी मुद्रा रखने का कोई अधिकार नहीं था । इसलिए भारतीय कंपनियां देश की सीमा के बाहर व्यापार बढाने की सपने में भी नहीं सोच सकती थी । नियंत्रन और लाइसेंस राज के कारण नागरिकों के जीवन में भारत सरकार की डरावनी परछाई घर कर गई थी । ऐसा बदलने की हर एक कोशिश का नेहरू की विरासत बदलने की साजिश कहकर विरोध किया गया । ऐसा सिर्फ उनके सामने वाली सहयोगी ही नहीं बल्कि उनके अपने कांग्रेसी साथी भी जोर शोर से करते थे । इंदिरा गांधी उस दौर में हालांकि वास्तविक परिवर्तन के लिए राजनीति को ढल सकने में सक्षम थी, मगर वे इसमें भी चूक हो गई तो हमेशा यही शिकायत करती थी । उनके हाथ में अपनी नीतियों को लागू करने के लिए जरूरी सत्ता का अभाव था । छत्ता के लिए सिंडिकेट से उनका संघर्ष दरअसल उनकी अपनी स्वायत्तता के लिए था । उसके बावजूद उन्हें जब निर्वाध नीतियां बनाने और उन्हें लागू करने लायक संपूर्ण सत्ता हासिल हुई, तब भी होने जाने किस वजह से असहाय और ठहराव की शिकार रही और पास समय समय पर पैदा होने वाले संकटों के और ही हल ढूंढने में ही लगी रही । भ्रष्ट ये था कि विकासपरक आर्थिक ढांचा बनाने के लिए उनके दिमाग में किसी भी स्पष्ट सोच अथवा सामाजिक आर्थिक कार्यक्रम का अभाव था । भारत के भविष्य के लिए उनकी दृष्टि न जाने कैसे मध्यम अवधि तक ही सीमित थे । आर्थिक उदारवाद को अपनाने के बजाय इंदिरा गांधी समूची राजनीतिक सत्ता अपने हाथों में केंद्रित करने में जुट गई । संसद को सर्वोच्च सत्ता प्रदान करने वाले एक के बाद एक अनेक विधेयक पारित किए गए । इंदिरा का समाधान पुकारे जाने वाले कुछ क्या बयान? इस संशोधन को संसद में पारित किया जिसके तहत संविधान के बुनियादी ढांचे में संशोधन का हक भी संसद को अदा कर दिया गया था । लोकसभा और राज्यों के विधानसभा की अवधि बढाकर छह साल कर दी गई । झांसी केंद्र सरकार को वैसे किसी भी राज्य में सेना को उतारने का अधिकार दे दिया गया जहाँ उसकी राय में कानून व्यवस्था का संकट खडा हो गया था । संविधान की प्रस्तावना बदल दी गई, संप्रभुता संपन्न लोकतांत्रिक गणतंत्र के बजाय उसके बाद भारत संप्रभुता संपन्न समाजवादी धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणतंत्र हो गया । स्वतंत्र प्रेस के हामी और नेशनल हेराल्ड अखबार के संपादक रहे रोज गांधी ने उन्नीस सौ छप्पन में संसदीय बहस की खबर करते हुए पत्रकारों को कानूनी संरक्षण देने का कानून संसद के रूप में पारित कराया था । इस कानून को भी रद्द कर दिया गया । उसके बाद सांसदों के भाषण को किसी भी प्रकार अथवा रूप में छापने अथवा प्रसारक करने पर रोक लग गई । इंदिरा गांधी ने बाद में सेंसरशिप के बारे में कहा, अखबार उन ताकतों के साथ मिले हुए थे तो उन सामाजिक और आर्थिक परिवर्तनों की राह में रोडा अटका रहे थे जिन्हें हम लागू करना चाह रहे हैं । हालांकि उन्होंने झेंपते हुए ये भी माना कि सेंसरशिप को सुव्यवस्थित रूप में लागू नहीं किया गया । में लगता था कि कोई आचार संहिता बनाई जा सकती थी । दस अगस्त उन्नीस सौ पचहत्तर को संशोधन लागू किया गया । इसमें राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के चुनाव को कानूनी अदालतों की समीक्षा से बाहर कर दिया गया । उन्नीस सौ इकहत्तर में इंदिरा गांधी की जीत को सर्वोच्च न्यायालय ने वैध घोषित कर दिया । आपातकाल लागू होने के दो महीने बाद पंद्रह अगस्त को बंगलादेश के राष्ट्रपति शेख मुजीबुर्रहमान और उनके परिवार की नृशंस हत्या कर दी गई । महज दस साल के उनके बेटे का भी उनके घर में गोली मारकर खत्म कर दिया गया था । इससे इंदिरा का यह है और बढ गया कि उनके विरोधियों द्वारा उसी तरह उनकी हत्या का षड्यंत्र रचा जा रहा था । निर्द्वंद्व सत्ता की चाहत में ये डर भी जुड गया की उनकी तरह से भी आलोचना उनके जीवन के लिए खतरनाक रूप धारण कर सकती थी । इंदिरा और मुजीब का उत्थान और पतन सामान ही था । दोनों ही राजनीतिक सप्ताह का शिखर पर पहुंचकर अचानक अपनी सत्ता की वैद्यता केश चरण के शिकार हो गए । बंगलादेश के जन्म के तीन साल बाद मुझे लोकतंत्र को अंगूठा दिखाकर नागरिक अधिकार निरस्त कर दिए और बांग्लादेश ने एकदलीय सप्ताह निरूपित कर दी थी । अपने विरोधियों के खिलाफ इंदिरा गांधी का गुस्सा देशभर में उसी दौर में कथित रूप में उनके जीवन पर बनी फिल्म आंधी के नाम की तरह छा गया था । मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल के अनुसार आपातकाल लागू होने पर पहले ही साल एक लाख दस हजार से ज्यादा लोगों की धरपकड करके उन्हें बिना मुकदमे ही बंदी बना कर रखा गया । आपातकाल के किस बंदी सलाखों के पीछे मर गए? ऐसा लगता है कि इसमें निजी खुलना और जनाना रंजिश की भी बडी भूमिका रही । दो महारानियों जयपुर की गायत्रीदेवी और ग्वालियर की राजमाता विजय राज्य संध्या को तो उचक्कों के बीच जेल में डाल दिया गया था । गायत्रीदेवी का तो दुनिया के कुछ सबसे खूबसूरत महिलाओं में शुमार था । दोनों ही महारानियां इंदिरा की राजनीतिक प्रतिद्वंदी थी । डॉक्टर माथुर लिखते हैं, तारकेश्वरी सिन्हा जैसी प्रधानमंत्री कि प्रतिद्वंदियों के अनुसार इन दोनों महिलाओं को ईशा वर्ष बंदी बनाकर शारीरिक मानसिक यात्रा दी गई थी । जॉर्ज फर्नांडिस भूमिगत हो गए थे और एक के बाद एक बम धमाके करवा रहे थे जिनसे पुल टूटने और रेलगाडियां पटरी से उतरने के हाथ से हो रहे थे । इंदिरा ने उसी बीच फ्री नेहरू से कहा, फर्नांडीस मुझे बम से उडा देना चाहता है । फर्नांडिस को अंतर ऍम करता तो कर लिया मगर उसके लिए उनके भाई लॉरेंस को पुलिस के हाथों भीषण यातना झेलनी पडी । लोकतंत्र कार्यप्रणाली की चिता की राख में से संजय गांधी और उनका दल मानव फिनिक्स पक्षी की तरह प्रकट हुआ । इसमें शामिल थे बंसीलाल, आरके धवन, ओम मेहता, विद्याचरण शुक्ल और कुछ अन्य । इन्हें जल्द ही आपातकालकी चांडाल चौकडी कहा जाने लगा । अपनी माँ पर संजय का नियंत्रन मुकम्मिल हो गया था । माँ बेटे के संबंधों के बारे में अफवाहें उडने लगी । किसी विदेशी संवाददाता ने गांधी परिवार के घर पर खाना खाने गए किसी अनाम मेहमान के हवाले से लिखा था संजय ने इंदिरा गांधी के चेहरे पर एक साथ छह तमाचे जडे थे और वे सन्न खडी पहुंचे, खाती रही उससे वो यमराज की तरह डरती हैं । अलवत्ता मेनका गांधी तमाचे केस अमाशय का जोरदार खंडन करती हैं और लेखक वेद मेहता ने पारिवारिक सूत्र के हवाले से लिखा, भगवान भी इंदिरा गांधी के चेहरे पर छह समाचार नहीं मार सकता था की बीस रुपए की अफवाहें संजय की हैसियत की विसंगतियों पर जरूर रोशनी डालती हैं । होना तो राजनीति में और ना ही सरकार में किसी पद पर था । कांग्रेस का औपचारिक सदस्य भी नहीं था । फिर भी निर्णय प्रक्रिया में उसकी चलती थी और ऐसा लगता है कि इंदिरा के काम काज में भी उसका दखल था । डॉक्टर कहते हैं वे स्वयं ही संजय की शिकार थी । अपने छोटे बेटे के प्रति अपने प्यार के अतिरिक्त के मोहपाश में बंदी वो खुद ही छटपटाती थी । केंद्र मल्होत्रा ने याद किया नेहरू और इंदिरा दोनों के ही मंत्रिमंडल में मंत्री रहे केशव देव मालवीय ने उन्हें बताया था । इन्दिरा इस बात से आश्वस्त है । इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला आने के बाद उनके जीवन के सबसे संकटग्रस्त समय में सिर्फ संजय नहीं उन्हें राजनीतिक रूप में बर्बाद होने से बचाया था और उनकी हत्या होने से भी उन्हें बचाया था । इंदिरा गांधी ने बीस सूत्रीय कार्यक्रम की घोषणा की । इसका मकसद आपातकाल के दौरान देश का पुनरुद्धार करना था । इसके तहत जहाँ गांव में बसे गरीबों का कर्ज माफ किया गया, वहीं बंधुआ मजदूरी को भी अवैध घोषित कर दिया गया । दुकानों के कांच के शोकेस में उनकी तस्वीर लगाकर इस कार्यक्रम के प्रति समर्थन जताना भी अनिवार्य किया गया । संजय गांधी ने अलग से पांच सूत्रीय कार्यक्रम जारी किया, जिससे जनता अधिक उत्साहित हुई । उसके लक्ष्य थे रोड शिक्षा दहेज उन्मूलन, जाति प्रथा उन्मूलन, पर्यावरण का सौंदर्यकरण, सबसे विवादास्पद परिवार नियोजन का अतिवादी कार्यक्रम उत्तल मगर भविष्योन्मुख, पेट दर्द, अव्यवहारिक अकडू और मूलगामी । सामाजिक प्रक्रियाओं से अनभिज्ञ होने के बावजूद ठंडी । मैंने अपने नए तौर तरीकों से अनेक लोगों का ध्यान खींचा । इसी दौरान संजय के चारों और दरबारी छुटने लगे । नौकरशाह नवीन चावला पुलिस अवसर प्रीतम सिंह भिंडर, राजनेता अंबिका सोनी, सोशलाइट रुकसाना, सुल्तान धवन और धीरेंद्र ब्रह्मचारी दिल्ली के दरबार में ऐसा शहर जहां महत्वाकांक्षा हमेशा नैतिकता की बलि ले लेती है । नए राज के सामने अनेक लोग उन्हें दंडवत होना शुरू कर दिया । विजय लक्ष्मी ने अपनी बेटी नयनतारा से कहा, मैं परेशान थी तरह ने तौर तरीके से । इनमें पुरुष और स्त्रियां पकडकर जेल में डाले जा नहीं अथवा अपनी नौकरी जाने के डर से रेंगने लगे थे । मेरे खुद के आत्मसम्मान को लगा कि मुझे विरोध करना चाहिए । संजय का मशहूर नारा पाते कम कम ज्यादा उनके कठोर गंदगी साफ करने वाले रवैये का प्रतीक था । एक जल्दबाज किसी स्तर पर ढीलेढाले भारत का विरोधी करता जो अपनी माँ को दिखा देगा कि काम कैसे कराया जाता है । उसे लगता था कि झटके से और तानाशाही तौर तरीके से मनुष्यों की उस विशाल आबादी को ठोक पीट कर ही निश्चित आकार में ढाला जा सकता है । इसके प्रति उसके मन में कोई इज्जत नहीं थी । नेता की इच्छा को मानने के लिए बाध्य करने को लोगों को कुचलना पडे तो वो भी मंजूर था । आपातकाल दरअसल संजय के लिए राजनीतिक पहचान बनाने का वक्त स्वागत हुआ । वही इसका चेहरा था । उसने इस दौरान अपनी माँ को भी प्रभावहीन कर दिया और उसकी सत्ता प्रभाव तथा आत्मविश्वास कुलांचे भरता चला गया । आपातकाल लागू होते समय वह मात्र उनत्तीस साल का था । ऐसा युवक जिसे अभी ये भरोसा हो गया था उस की विरासत भारत अंततः और उचित रूप में हो उसका हो गया था । इसे वह अपनी मर्जी के अनुसार सही कर सकता था क्योंकि वो अपनी माँ का पुत्र था और ये ऐसा देश था जिस पर उसका परिवार अपने जन्मसिद्ध अधिकार के तहत राज कर रहा था । ठंडी का राज्य स्थापित करने में संजय गांधी जुड गए । साल दो हजार तेरह में जब राहुल गांधी ने संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के अध्यादेश को बकवास बताते हुए सार्वजनिक रूप में सरकार के प्रति अपना तिरस्कार जताया । वो अपने ठसक दार चाचा की साधिकार रांची शैली का ही अनुसरण कर रहे थे । के अगस्त महीने की भेद खोलती एक घटना जताती है । इंदिरा संजय से कितना ज्यादा डरती थी और से नियंत्रित करने के लिए शायद ही कुछ कर सकती थी । एक पे धडक इंटरव्यू में संजय ने उन्हें हमेशा ही अपनी माँ के वाम झुकाव वाले मित्रों और सलाहकारों से नफरत थी । सर्च पत्रिका की उमा वासुदेव से कहा, समाजवादी अर्थव्यवस्था भारत के लिए सिरे से गलत थी । उन्होंने सामने वादियों पर लानत भेजते हुए कहा, जहाँ तक सामने वादियों की बात थी, मुझे नहीं लगता कि आपको उनसे अधिक हमीर और भ्रष्ट लोग और कहीं मिलेंगे और कहा कि सार्वजनिक उद्योगों को अपनी स्वाभाविक मौत मार नहीं देना चाहिए । उन्होंने कहा, सारे आर्थिक प्रतिबंध खत्म होने चाहिए । बडे कारोबारों और बहुराष्ट्रीय निगमों की तारीख की और सुझाव दिया कि नेहरूवादी अर्थव्यवस्था के समूचे ढांचे को इसे उनकी माँ बचाए हुए थी, नष्ट किया जाना चाहिए । खबर तो ये भी है कि उन्होंने अपनी माँ के मंत्रिमंडलीय सहयोगियों को मूर्खों की जमात कहा था । साक्षात्कार की खबर जब समाचार एजेंसी से जारी हुई तो इंदिरा के तो मानो तोते उड गए । उनके सगे बेटे द्वारा नेहरू की समाजवादी विरासत और उनके सामने वाली साझेदारों पर पीछे उछाला जाना तो राजनीतिक पार उसका काम करता । संजय नहीं सामने वादियों के बारे में बेहद न समझी बडा बयान दिया है । अब हम क्या करें? मुझे गहरी चिंता हो रही है । मैं कुछ चिंतित हैं । क्या हम बहाना बनाए अथवा करें? मैं लग रहा है उन्होंने ये सब बातें घर को हाथ से जल्दबाजी में लिखे नोट में कहीं । उन्होंने घर और विद्याचरण शुक्ला से पत्रिका की प्रतियां सार्वजनिक होने से पहले उसे हटा लेने में मदद मांगी । साक्षात्कार वापस किया गया और संजय ने अनिच्छा के साथ एक स्पष्टीकरण जारी किया । लेकिन भाजपा नाराज हो गई और सो के संग ने भी इस पर अपनी नाराजगी जाहिर की । सर्च का साक्षात्कार इंदिरा गांधी के लिए भारी शर्मिंदगी का कारण बना के प्रधानमंत्री से भी आगे बढकर बोलने की संजय की गुस्ताखी थी जो एक तथा कथित युवराज द्वारा भरोसे से ओतप्रोत बयान था तो ये मानता था कि वो छुट्टियों की जमाना और दुविधाग्रस्त माँ से भी ऊपर उठ गया है और सिर्फ उसी के पास भारत की तमाम परेशानियों का इलाज था अपनी माँ के गुस्से से । संजय के डरने के बजाय वास्तविकता ये थी खुद इंदिरा नुकसान को सीमित करने के लिए हाथ पैर मारती रहती । मानव से नाराज करने से वो डर रही हूँ । संजय को मन मर्जी से बोल नहीं अथवा करने से रोकने में इंदिरा गांधी की नाकामी ही आपातकाल की सबसे बडी बीमारी थी । ये डरी हुई माँ अकूत सत्ता की असुरक्षित प्रयोगकर्ता थी । आपातकाल के दौरान राजनीतिक कार्रवाई के लिए संजय का मंच युवा कांग्रेस बनी । चंडीगढ में कोमागाटा मारू नगर के दिसंबर महीने में हुए कांग्रेस के अधिवेशन नहीं संजय ने राजनेता का औपचारिक सोलह पहन लिया । कांग्रेस की किसी सत्र में वह पहली बार मंच पर नमूदार हुए । गगनभेदी नारों और तालियों की गडगडाहट ने उन्हें अपनी माँ के उत्तराधिकारी के रूप में स्थापित कर दिया । संजय ने निश्चल पडी युवा कांग्रेस को उसके पास पर खडे करके उसे कांग्रेस के प्रतिद्वंदी सत्ता के केन्द्र के रूप में विकसित करने से शुरुआत की । इसके लिए संजय की जो साठ दिन पैंतीस वर्षीय अंबिका सोनी को युवा कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया । अमरीका को राजनीति में इंदिरा ही लाई थी और किसी राजनयिक की पत्नी सूरी याद करती हैं । संजय नहीं सार्वजनिक जीवन में अपनी आमदरफ्त शुरू ही की थी । उन्होंने कभी कोई पद नहीं संभाला और उनकी दिलचस्पी लोगों से मिलने जुलने में थी । संजय के बारे में लोगों की राय अतिवादी है लेकिन वही जब हम से बहुत मिलते थे और हमारे युवा कांग्रेस के दफ्तर में हम से बात करने आते थे तो उन्होंने कभी भी अपना रौब जमाने की कोशिश नहीं की था । उनका आभामंडल तो चाहिए इंदिरा में मेरी कारा को बाद में बताने वाली थी । संजय की बुनियादी दिलचस्पी राजनीति में थी ही नहीं, मगर तब उसकी खूब आलोचना और उस पर जबरदस्त हमले किए गए थे । तो संसद में जाने के लिए चुनाव इसलिए लडना चाहता था क्योंकि झूठे आरोपों का जवाब देने का उसे वही एकमात्र उपाय लगता था । आपातकाल में युवा कांग्रेस की तो दोबारा हो गई युवा नेता जिन्हें संजय नहीं शामिल किया था, उनकी परछाई बन गांव का दौरा करने लगे, लेकिन कभी गांधी और कभी नेहरू की तरह विनम्रतापूर्वक उसे खोजने के मिशन पर नहीं बल्कि रॉक दिखा नहीं और आदेश देने के लिए वो भी सर्वशक्तिमान गांधी पुत्र कि प्रतिबंधित सत्ता के मद में चूर होकर युवाकांग्रेस में कुछ बेहद ऊर्जावान राजनीतिक व्यक्त तो मौजूद थे । उनमें से अनेक राजनीति में संजय द्वारा छांटे गए छापामार दस्ते में शामिल थे । लेकिन उसी संगठन ने कुछ ऐसे लोगों को भी आसरा दिया जिन्हें ठग माना जाता था, जिनकी पहचान दुकानदारों को चमकाकर, उनसे पैसा वसूलने वालों और बाहुबलियों के रूप में स्थापित थी । इंदिरा गांधी खडी खडी देखती रही । शायद संजय के संगठनात्मक कौशल पर मुग्ध होकर उन्होंने उसे सोचने वाला नहीं बल्कि करने वाला बताया था । गुवाहाटी में के नवंबर महीने में हुए कांग्रेस के अधिवेशन नहीं । संजय को युवा कांग्रेस के सर्वोच्च नेता के रूप में स्थापित कर दिया और महत्व एमरित तुम्हें के लिहाज से वो कांग्रेस अध्यक्ष की जगह लेता दिखा । इंदिरा नहीं मातृवत गर्व के साथ घोषित किया । हमारी गर्जना चुरा ली गई है । ऐसी शख्सियत होने के बावजूद इससे कांग्रेस को मोतीलाल के हाथों से जवाहरलाल के हाथों में आते हैं और विकसित होते देखा था । अब वो संजय के नेतृत्व से अभिभूत हुई जा रही थी । ये बात खुद ही साफ कर देती हैं कि इतने वर्षों में इंदिरा में क्या बदलाव आए थे । उनके अभिभूत होने का और भी कारण माना जा सकता है । शायद लगभग वैसा ही था कि वो संजय और उसकी चौकडी में उन्नीस सौ तीस के दशक के इंग्लैंड में उस क्रांतिकारी विद्यार्थी समूह की झलक देख रही थी जिसमें वो खुद भी बडी शिद्दत से शामिल । शायद अपनी विध्वंसक बेटे की हरकतों को देखकर उनके भीतर को क्रांतिकारी चाहत गया था तो कभी वो खुद थी और उसमें भी पुरानी स्थापित व्यवस्था को तगडी चुनौती देने वाले व्यक्तित्व की कल्पना कर रही थी जिसके उन्होंने अभी खुद से बीस कीजिए । कांग्रेस की एक समूची पीढी को ही संजय और युवा कांग्रेस लील जाने वाले थे । विंद्रा कि व्यक्ति पूजा के चलते पहले ही जर्जर हो चुकी थी । हालांकि संजय द्वारा चुने गए युवा नेताओं में से अनेक आज कांग्रेस के प्रभावशाली नेता हो गए हैं । इससे पता चलता है युवा गांधी राजनीतिक योग्यता को परखने में उतना अनाडी भी नहीं था । अंबिका सोनी, कमलनाथ और आनंद शर्मा जैसे पार्टी के बडे नेताओं ने अपनी राजनीतिक पारी संजय की छत्रछाया में युवा कांग्रेस में ही शुरू की थी । कभी संजय के सिपाही थे ये लोग प्रधानमंत्री सचिवालय को मानो टक्कर देने के लिए प्रधानमंत्री के घर पर समानांतर सरकार स्थापित हो गई थी । संजय के साथ ही बंसीलाल और ओम मेहता केंद्र सरकार भी रक्षा और गृह मंत्रालय का भार संभाल चुके थे । प्रधानमंत्री सचिवालय और समानांतर सरकार के बीच बाहर बार खींचतान होने लगी थी क्योंकि संजय और उनकी चौकडी नियुक्तियों की प्रक्रिया को खुद को नियंत्रित करने पर आमादा हो गई थी । वो भी बहुत वरिष्ठ अधिकारियों को दरकिनार करके । मौनी मल्होत्रा याद करते हैं । ये ऐसा समय था जब सत्ता का केंद्र उनके घर पर स्थानांतरित हो गया था । अपने को दिलासा देने के लिए साउथ ब्लॉक के अवसरों में ये जुमला कर लिया था । ये उनका दफ्तर जल विभाग था और वो उनका घर सीवरेज विभाग का निराश कुंठित होकर धर अपने पद से इस्तीफा देना चाहते थे । मगर हक्सर में उन्हें निरुत्साहित क्या? दीपक सर ने सलाह दी इसे और अधिक पतन से बचाने के लिए हमें व्यवस्था में बरकरार रहना चाहिए । व्यवस्था से बाहर होते हैं, आपकी कोई पूछ नहीं रहेगी । साल के आखिरी महीनों में अब इंद्रा के दरबार में भीषण पिता में बन चुके हैं । भारत के दौरे पर आए बीके नेहरू ने पी । एन । हक्सर से कुबूल क्या वे इंदिरा गांधी से बात करना चाहते थे और उनसे ये कहना चाहते थे ये बेहद खतरनाक और घोर आपत्तिजनक था । कानून के राज को संजय गांधी के राज में बदला जा रहा था । वो भी तब जबकि पार्टी अथवा सरकार ने वो किसी भी औपचारिक पद पर नहीं था । उसकी सत्ता का एकमात्र आधार इतना ही था कि वो अपनी माँ का लाडला था, अलबत्ता अक्सर नहीं । उन्हें इंडिया से एक शब्द भी कहने की हिमाकत नहीं करने की सलाह दी है क्योंकि वे संजय को श्रद्धायुक्त है । सराहना सम्मान के विचित्र मिश्रत भाव से आती थी । उसे भी परिपूर्ण मानती थी और उनकी नजरों में वह गलत कभी हो ही नहीं सकता । संजय के बारे में सब नहीं की मामूली अभिव्यक्ति पर भी पथराव किया जाता था । अक्सर ने उनसे कहा यदि इंदिरा से उन्होंने कुछ भी कहा तो इंदिरा तक उनकी पहुंच खत्म हो जाएगी । अब्बू भाई यानी हक चार अपने अनुभव से प्रेरित होकर बोल रहे थे क्योंकि उनकी बर्खास्तगी की वजह भी तो संजय ही था । संजय भट्ट के चलते सूरत नागरिकों पर कोडे बरसाकर उन्हें सरकारी नीति के अनुसार ढालने को । उधर निरंकुश राजसत्ता के दबदबे को दिल्ली के तुर्कमान गेट इलाके से झोंपडपट्टी हटाने और जबरिया नसबंदी मुहिम के पीछे महसूस किया गया । दिल्ली में के अप्रैल महीने में झोंपडपट्टी हटाने की मुहिम विभिन्न क्षेत्रों में चल रही थी । तुर्कमान गेट के पास निरीक्षण दौरे पर गए संजय ने गेट पर ही खडे होकर जगमोहन से कहा मैं तुर्कमान गेट में खडे होकर जामा मस्जिद और देखना चाहता हूँ । संजय के फरमाबरदार जगमोहन दिल्ली विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष थे । चाहे फरमान जारी होते ही वफादार हो तामिल करने को दौड पढाई तुर्कमान गेट को फौरन खाली कराया जाना था । संजय के कट्टर वफादार से बदलकर जगमोहन बाद में भाजपा समर्थक का चोला धारण कर लेने वाले थे । ये इस बात की मिसाल है व्यक्ति परत भारतीय राजनीति में वफादारियां हमेशा व्यक्तिगत होती हैं न कि विचारधारा पर आभार । तुर्कमान गेट इलाकों में तब दुकानें, झुग्गियों, झोपडपट्टियों और बाजारों की भरमार थी । क्या हजारों की तादाद में लोग बसे हुए थे? गहने डिजाइन करने वाली खूबसूरत रुकसाना सुल्तान ने उन्नीस सौ छिहत्तर के अप्रैल माह के मध्य में तो जाना हाउस नसबंदी केंद्र किसी क्षेत्र में शुरू किया धागे सरकारी नसबंदी कार्यक्रम को सार्थक किया जा सके । तुर्कमान गेट पर पहला बुलडोजर तेरह अप्रैल को आया और उसने घरों की दीवारों तथा छतों को ढहाना शुरू कर दिया । स्थानीय निवासियों ने इसे रोकने को जब रुकसाना की मदद मांगी तो उसने भी उनसे हर हफ्ते तीन सौ नसबंदी कराने के अपने लक्ष्य को पूरा करने में सहयोग करने की शर्त रखती । नसबंदी शिविर और बुलडोजरों के बीच तुर्कमान गेट क्षेत्र में लोगों के भीतर तनाव खतरनाक ढंग से उबलने लगा । सभी उन्नीस अप्रैल हो नसबंदी करवाने के लिए आये लोगों से भरी गाडी दुजाना हाउस पहुंचने पर उसके बाहर ही प्रदर्शन होने लगा । दिन ढलते तक वहाँ केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल की टुकडियां तैनात कर दी गई । उन्होंने आंसूगैस छोडकर हालात सामान्य करने की कोशिश की उसके बावजूद लोगों का गुस्सा बढता चला गया और जल्द ही भीड पथराव छोडे की बोतलों और तेजाब के बमों की बौछार करने लगी । जवाब में पुलिसबल नहीं गोलीबारी रद्द कर दी । चौदह राउंड गोलियां बरसाई गई । मृतकों की संख्या का अनुमान अलग अलग है । सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक कुल आठ लोग मारे गए मगर गैरसरकारी आंकडों के मुताबिक एक सौ से ज्यादा लोगों को अपनी जान से हाथ होने पडे और बडी संख्या में अन्य लोग घायल हुए हैं । मारे गए लोगों में मात्र तेरह वर्ष का एक लडका भी शामिल था तो महज किनारे खडा था । तुर्कमान गेट इलाके में मई के मध्य तक रोजाना तो इस घंटे कर्फ्यू लगाए रखा गया ताकि तोड फोड जारी रखी जा सके और कुमार गेट को झोपडपट्टी मुक्त करने का अभियान समाप्त होने तक पेट दर्द, तबाही की परिपाटी डाल से हुए डेढ लाख छुट्टियाँ और दुकानें साफ कर दी गई और सत्तर हजार बाशिंदों को बसों में ठूसकर यमुना किनारे कांटेदार तार वाली बाढ में घिरे जमीन के छोटे छोटे टुकडों पर जबरिया पुनर्वासित कर दिया गया । तुर्कमान गेट झोंपडपट्टी सफाई अभियान में बरती गई कठोरता से ये साफ हो गया कि भारत में लोकतंत्र दम तोड चुका था । लोकतंत्र के बजाय अब स्पेश में सरकारी हुक्म के पालन के लिए घर तोडे और जिंदगियां खत्म की जा सकती थी । आपातकाल शैली के सौंदर्यीकरण अभियान का शिकार अन्य अनेक शहर भी हुए । सडके चौडी करने के लिए वाराणसी की प्राचीन हवेलियों को आधा तोड दिया गया । जिसकी वजह से ऐतिहासिक विश्वनाथ मंदिर की गाली ऐसी लगने लगी थी मानो वहाँ बमबारी हुई हो । संजय की शैली अब भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास संबंधी कार्यवाहियों में लोकतंत्र प्रक्रिया के तहत गौरी और सोचे समझे तरीके अपनाने को मजबूर सरकारों की तुलना में तीस काम अलग थी । सुंदरीकरण से भी ज्यादा बरबार संजय गांधी के दिमाग की दूसरी खप जबरिया नसबंदी मुहिम थे । भारत में लगातार बढती आबादी को उसकी गरीबी के प्रमुख कारणों में शुमार किया जाता रहा था । अंडा बांटकर आबादी को नियंत्रित करने जैसे नीतिगत उपाय बेकार साबित हुए थे । संजय ने अब ठान लिया था कि भारत की आबादी को तब टाल और प्रभावी तरीके से घटाया जाना चाहिए । इंदिरा गांधी ने भी परिवार नियोजन कार्यक्रम को उत्साहपूर्वक लागू करने का तय किया और वही इसके विरुद्ध कोई भी तर्क सुनने को तैयार नहीं थी । मेनका गांधी बताती हैं कि परिवार नियोजन कार्यक्रम की प्रेरणा संजय को कैसे मिली । संजय दरअसल राजनीतिक संवेदनशीलता से अनभिज्ञ थे । राजनीतिक थे और उन्हें इस बात का एहसास ही नहीं हो पाया कि आपातकाल जैसे कार्यक्रम में अब परिवार नियोजन कार्यक्रम का घालमेल नहीं कर सकते । परिवार नियोजन कार्यक्रम की योजना बहुत पहले से थी, लेकिन सहयोग से दोनों का घालमेल हो गया और सारी बुराई उनके मध्य मार दी गई । वो मात्र सत्ताईस साल के ही तो थे । तथ्य में गलती हमने उनकी निजी किसी भी गलती के लिए कभी उन्हें माफ नहीं किया । हमें उनसे सौ साल अनुभवी व्यक्ति की उम्मीद की । उन्होंने जल्दी से अपनी बात पूरी की । उनके लिए ये कोई माफी नहीं है । इसमें कोई शक नहीं कि उनके नाम पर विचित्र घटनाएं हुई थी । यहां सवाल यह है कि संजय किस अधिकार के तहत नीति बना और लागू कर रहे थे? जाहिर है सिर्फ अपने जन्मसिद्ध अधिकार से जो ऐसी माँ ने उन्हें दिया था । इस की सबसे बडी विडंबना यह रही