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इन्दिरा गांधी 1

दोस्तों आज हम बात करने जा रहे है भारत की पहली और अब तक की एकमात्र महिला प्रधानमंत्री की, जी हां आप बिलकुल सही समझे हम बात करने जा रहे हैं श्रीमती इंदिरा नेहरू गांधी की | आज हम जानेंगे कि कैसे इंदिरा नेहरू से बनी इंदिरा गांधी और फिर इंदिरा गांधी से प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी | दोस्तों इंदिरा गांधी का जन्म 19 नवम्बर 1917 को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में हुआ था, इनके पिता का नाम तो हम सभी जानते हैं, जी हां भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू, इनकी माता का नाम कमला नेहरू था | इंदिरा का जन्म देश की स्वतंत्रता में योगदान देने वाले मोतीलाल नेहरु के परिवार में हुआ था. इंदिरा के पिता जवाहरलाल एक सुशिक्षित वकील और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय सदस्य थे. वो नेहरूजी की इकलौती जीवित संतान थी, जीवित यहां बताना इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि बहुत कम लोग जानते हैं कि नेहरू जी का एक बेटा भी था जो कुछ वर्ष की आयु में ही मारा गया था | इंदिरा गांधी जब पैदा हुई थी उस दौर में ग़रीब आज़ादी के लिए लगातार संघर्ष कर रहा था,गांधी जी ने अंग्रेज़ो के खिलाफ मोर्चा खोल रखा था, जिसमें नेहरू जी भी उनके साथ थे,वो देखती थी कि बड़े बड़े लीडर्स उनके घर आ जा रहे हैं, नेहरू जी मीटिंग्स कर रहे हैं,साथ ही साथ लीडर्स और नेहरू जी जेल भी जा रहे हैं, पुलिस गिरफ्तारी के लिए उनके घर आती जाती रहती थी, देश भावना इसी लिए इंदिरा के मन मे भी बचपन से ही कूट कूट कर भर गई थी, नेहरू जी गांधी जी के साथ आज़ादी कार्यक्रमों में व्यस्त रहते थे,और इंदिरा की माँ कमला नेहरू बीमार रहती थी, जिस वजह से इंदिरा को बचपन में माँ बाप का प्रेम कम ही मिला,नेहरू जी और इंदिरा में ज़्यादातर बात पत्र के ज़रिए ही हुआ करती थी, वैसे तो वो जिस आनंद भवन में रहती थी वो एक शानदार कोठी थी, जिसमें काफी सारे नोकर चाकर इंदिरा के इर्द गिर्द जी हुज़ूरी मे घूमते रहते थे, इसी लिए इंदिरा गाहे बगाहे नोकरों को इखट्टा कर लिया करती थी और खुद स्टूल पर खड़े होकर अंग्रेज़ो के खिलाफ भाषण देती थी, उस समय भारत के राष्ट्रवादी आंदोलन की एक रणनीति में विदेशी ब्रिटिश उत्पादों का बहिष्कार करना भी शामिल था. और उस छोटी सी उम्र में, इंदिरा ने विदेशी वस्तुओं की होली अक्सर जलते देखी थी, एक बार इंदिरा की आंटी पेरिस से इंदिरा के लिए वहाँ से कुछ पोशाक लेकर आई थी, जिनमे वहाँ की खूबसूरत फ़्रॉक्स भी थी, जिसे देख कर इंदिरा का मन ललचाया, लेकिन बचपन से ही इंदिरा ने अपने पिता और गांधी जी को आज़ादी के लिए संघर्ष करते हुए देखा था, तो उन्होंने अपनी आंटी से उन कपड़ो को लेने के लिए मना कर दिया, फिर न जाने उनके नन्हे मन क्या आयी, उन्होंने उन कपड़ो को लेकर सार्वजिनक रूप से उनकी होली जलाई, इस किस्से से पता लगता है कि जिस उम्र में छोटे मासूम बच्चे खूबसूरत चीज़ों को देख कर एक दम बहक जाते हैं उस उम्र में भी इंदिरा के मन मे देश भावना सबसे ऊपर थी, इसका प्रमाण एक और किस्से में मिलता है, इंदिरा को बचपन से ही गुड़िया बहुत पसंद थी, क्योंकि माँ और पिता दोनों का साथ ही उंन्हे कम मिला था, ऐसे में उंन्हे जो बातें करनी होती थी वो अपनी गुड़िया से करती थी, उनकी गुड़िया उनकी बेस्ट फ़्रेंड हुआ करती थी, लेकिन जब उन्होंने कपड़ो की होली जलाई तब उन्होंने सोचा कि उनकी गुड़िया भी तो विदेशी है,वो भी तो इंग्लैंड से बन कर आई है, उन्होंने 7/8 साल की उम्र में दिल पर पत्थर रख उस गुड़िया को भी आग के हवाले कर दिया, इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़ कर नही देखा, उनका ये देश प्रेम बढ़ता ही गया, जब सब बच्चे स्कूल ड्रेस पहन कर जाते थे, तब इंदिरा ने खादी पहन कर स्कूल जाना शुरू किया, उनके ऐसा करने की वजह से उनके टीचर उनसे खासा खफा रहते थे, उनके टीचर कहते थे कि तुम अभी बच्ची हो, इन सब बड़े मसलों से तुम्हे दूर रह कर सिर्फ पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, लेकिन इंदिरा का पूरा ध्यान भारत की स्वतंत्रता में लगा हुआ था, जब महात्मा गांधी इंद्रा के घर अल्लाहाबाद आये तो इंद्रा ने उनसे कहा पिता जी बड़े आंदोलनों में मुझे हिस्सा नही लेने देते, में क्या करूँ, तब महात्मा गांधी ने कहा अगर बड़े स्तर पर कुछ नही कर सकती तो छोटे स्तर पर करो, लेकिन कुछ करो ज़रूर, महात्मा गांधी की बात का इंदिरा के बाल मन पर ऐसा असर हुआ कि उन्होंने 12 वर्ष की उम्र में अपनी वानर सेना तैयार की, जिसका नाम उन्होंने बन्दर ब्रिगेड रखा,आगे चलकर इसी वानर सेना में लगभग 60 हज़ार क्रांतिकारी युवा जुड़ गए थे, जिन्होंने आम लोगो को ब्रिटिश राज के खिलाफ संबोधित किया, ये अपनी वानर सेना के साथ झंडे सिलती थी,खादी के कपड़े सिलती थी, उन दिनों बीमारियों का भी दौर था, जिस वजह से कोई भी छोटी बीमारी सतर्कता और स्वच्छता न बरतने के कारण महामारी बन कर फेल जाती थी, जैसे हैजा, चेचक,बुखार,तो इनकी वानर सेना उन लोगो की भी मदद किया करती थी,साथ ही साथ ब्रतिशो के खिलाफ प्रदर्शन के बारे में लोगो तक जानकारियां पहुंचाना भी इनकी वानर सेना का काम था, दोस्तो ब्रटिश राज होते हुए बर्टीशो के खिलाफ बोलना बिल्कुल भी आसान नही था, लेकिन इंदिरा को इसकी परवाह नही थी,बल्कि वो तो अपना योगदान देकर बहुत खुश थी, इंदिरा गांधी जब थोड़ी और बड़ी हुई तो उन्होंने अपने पिता के साथ घूमने की ज़िद करनी शुरू कर दी, क्योंकि जवाहरलाल नेहरू देश विदेश में बहुत घूमते रहते थे,तो इंदिरा भी उनके साथ हो लेती थी, वो जहाँ भी जाति उस जगह के बारे में पूरा जानने को आतुर रहती थी, ज्ञान की भूख उनमें कूट कूट के भरी थी, वो जवाहरलाल नेहरु से हर तरह के सवाल करती थी, कभी कभी जवाहर लाल नेहरू उनसे उकता भी जाते थे, लेकिन फिर भी वो बिल आखिर उनके सवाल का जवाब दे ही देते थे, शुरुआती दिनों में ये स्कूल कम ही गयी, उनका ज़्यादातर ध्यान स्व शिक्षा पर था, सेल्फ एजुकेशन के लिए उनका ये जानना ज़रूरी था कि जो वो जान रही है वो सही है या नही इसके लिए भी उन्होंने अपने पिता का सहारा लिया, जवाहर लाल नेहरू जब इंदिरा को साथ नही ले जाते थे तो दुनिया के बारे में उंन्हे पत्र में लिख कर बताते थे, यहां एक रोचक बात ये भी बताते चलें कि इंदिरा को जानवरों से बहुत प्यार था,जब उन्होंने गुड़ियों को जला दिया था तो उनके बेस्ट फ्रेंड भी खत्म हो गए थे, अब ज़िन्दगी में एक न एक बेस्ट फ्रेंड तो हर किसी को चाहिये होता है, और किसी बाहरी को दोस्त बनाना इंदिरा के लिये सख्त मना था, बल्कि बिना इजाज़त बिना किसी (गार्ड) नोकर के बाहर जाने पर भी पाबंदी थी, ऐसे में इंदिरा ने जानवरों से दोस्ती शुरू की,इनके पास कबूतर से लेकर खरगोश,कुत्ते,भालू तक सभी जानवर थे,इसके अलावा लखनऊ जू ने इन्हें तीन चीते भी उपहार में दिए थे, जिनके नाम इन्होंने भीम भैरव और हिडिम्बा रखे थे, दोस्तों कमाल की बात है ना, आजकल की लड़कियां कुत्ते और बकरों तक से डरती हैं, और इंदिरा जी ने चीते पाल रखे थे, इनका यही पशु प्रेम देखते हुए जब ये हिमालय गयी थी तो वहाँ भी इन्हें एक क्यूट पांडा उपहार में दिया गया, खेर आगे बढ़ते हैं, अब तक इंदिरा की उम्र लगभग 16 वर्ष हो चुकी थी इंदिरा ने पुणे विश्वविद्यालय से मेट्रिक पास कर लिया और पश्चिम बंगाल में शांतिनिकेतन में रवनिद्रनाथ टैगोर निर्मित विश्व-भारती विश्वविद्यालय से भी थोड़ी शिक्षा हासिल कर ली थी,रवींद्रनाथ टैगोर ने ही इन्हें प्रियदर्शिनी नाम दिया था, उसके बाद इंदिरा के पास दो ऑप्शन थे बाहर पढ़ने जाने के लिए, पहला ऑप्शन पेरिस था, और दूसरा इंग्लैंड, ये ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी चुनती हैं, उसकी वजह होती है इनका क्रश फिरोज़ गांधी जो लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में पढ़ रहे थे, अब आप सोच रहे होंगे फिरोज़ गांधी इनके क्रश कैसे बने, तो ये भी हम बताते चलते हैं कि जब ये कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ रही होती है तब फ्लैग सेरेमनी होती है, वो चल ही रही होती है कि तभी ब्रिटिश पुलिस आ कर लाठी चार्ज कर देती है, फिरोज़ गांधी इनके हाथ में झंडा थमा देते हैं, और ब्रटिश फ़ौज इनके ऊपर लाठियां बरसाती हैं, लेकिन ये झंडा नही गिरने देती है, वो इंदिरा गांधी का पहला सामना था लाठी चार्ज से, उसके बाद दोनों एक दूसरे को जान गए थे, इसके बाद दूसरी बार इनकी मुलाकात राजीव गांधी से मार्च 1930 मैं हुई, जब इंदिरा की माँ कमला नेहरू अल्लाहाबाद में एक कॉलेज के सामने धरना दे रही थी, और गर्मी और बीमारी की वजह से बेहोश हो गई थी, ऐसे में फिरोज़ गांधी(जो कि उस धरने में शामिल थे) ने कमला नेहरू को संभाला और उनके घर ले गए,इसके बाद से फिरोज़ का इंदिरा के घर आना जाना खुल गया था,जब भी दोनों खाली होते ढेर सारी बातें करते, उसमे देश से लेकर नेचर तक हर तरह की बात होती थी, फिरोज़ के सेवा भाव वाले व्यव्हार से इंदिरा खासी आकर्षित थी, इतिहास कार यहां लिखतें हैं कि तीन साल तक इंदिरा और फिरोज़ की आपस में बातें होती रही, इसी बीच फिरोज़ ने इंदिरा को प्रपोज़ भी किया, लेकिन वो लड़की ही क्या जो पहले प्रपोज़ल में ही मान जाये, इंदिरा ने एकदम साफ मना कर दिया, इश्क़ में नाकाम हुए फिरोज़ अब अपनी पढ़ाई की तरफ सजग हो गए थे, और लंदन स्कूल ऑफ इकॉनोमिक्स पढ़ाई के लिए जा चुके थे, तो इंदिरा के ऑक्सफ़ोर्ड जाने के पीछे मुख्य कारण इंदिरा के क्रश फिरोज़ भी थे, लगभग 1935-36 में इंदिरा इंग्लैड में ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी की प्रवेश परीक्षा में बैठी, लेकिन ये उसमे सफल नही हो पाई,उसकी मुख्य वजह इनकी माँ की बीमारी भी थी,जो तपेदिक से लंबे समय से ग्रस्त थी, और उनका देहांत भी इसी साल हुआ, ये इंदिरा के लिए बड़ा सदमा था, फिर भी इन्होंने हिम्मत नही हारी,परीक्षा पास न कर पाने के बाद इन्होंने ब्रिस्टल शहर के बैडमिंटन स्कूल में कुछ वक्त बिताया, उसके बाद 1937 में इन्होंने परीक्षा पास की और सोमरविल कॉलेज,ऑक्सफ़ोर्ड में प्रवेश पा लिया, इस समय इनकी मुलाक़ात अक्सर फिरोज़ से होने लगी थी,माँ की मौत के सदमे से उबरने में फिरोज़ ने इंदिरा की बहुत मदद की, इसी वजह से दोनों में नज़दीकियां बढ़ने लगी, धीरे धीरे प्यार परवान चढ़ा,इन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की और 1941 में इंडिया वापस आ गयी,जिस वक्त ये वापस आयी हिंदुस्तान के हालात बहुत खराब थे,द्वित्तीय विश्व युद्घ चल रहा था, जिसमे इंग्लैंड बुरी तरह उलझा हुआ था, मोके की नज़ाकत को भाँपते हुए गांधी जी ने अंग्रेज़ो भारत छोड़ो आंदोलन चला दिया था,जिसकी वजह से बिर्टिश ने गांधी जी को तुरंत गिरफ्तार कर लिया था, इनके साथ ही नेहरू जी भी जेल में थे, इंदिरा फिरोज़ से शादी का मन बना चुकी थी, इसकी जानकारी इंदिरा ने अपने पिता जवाहर लाल नेहरू को दी,जवाहर लाल नेहरू से पहले इंदिरा को इस शादी के लिए उनके डॉक्टर ने मना कर दिया था, क्योंकि इंदिरा माँ की मौत के बाद बहुत कमज़ोर हो गयी थी, और उनके फैमिली डॉक्टर ने कहा कि वो इस लायक नही है कि गर्भ धारण कर सके, इसलिए बेहतर यही होगा कि वो शादी न करें, लेकिन इंदिरा ने किसी की कोई बात नही सुनी और आखिरकार 1942 में इंदिरा ने अल्लाहाबाद में फिरोज़ से शादी कर ली,अब कमाल की बात ये है कि जिन इंदिरा को डॉक्टर ने स्वास्थ्य का हवाला देकर शादी के लिए मना करा था, अगले दो साल में उन्ही इंदिरा ने सन 1944 में बेटे (राजीव) को जन्म दिया,क्योंकि फिरोज़ पारसी थे और इंदिरा हिन्दू इस वजह से इंदिरा और फिरोज़ दोनों की जोड़ी खासा नापसन्द किया जा रहा था,क्योंकि राजनीति में धर्म का तड़का तब भी लगता था,ऐसे में महात्मा गांधी ने इस जोड़ी को समर्थन दिया और ये सार्वजनिक बयान दिया, जिसमें उनका मीडिया से अनुरोध भी शामिल था “मैं अपमानजनक पत्रों के लेखकों को अपने गुस्से को कम करने के लिए इस शादी में आकर नवयुगल को आशीर्वाद देने के लिए आमंत्रित करता हूं” और कहा जाता हैं कि महात्मा गांधी ने ही राजनीतिक छवि बनाये रखने के लिए फिरोज और इंदिरा को गाँधी लगाने का सुझाव दिया था. तभी से इंदिरा नेहरू बन गयी इंदिरा गांधी, और फिरोज़ पारसी बन गए फिरोज़ गांधी, इस तरह महात्मा गांधी ने भारतीय राजनीति में भूचाल आने से बचा लिया था, इसके बाद इंदिरा पॉलिटिक्स में अपनी सक्रियता बढ़ाती है,नेशनल आंदोलन में हिस्सा लेती है, कई बार जेल जाती हैं, इनके पति फिरोज़ गांधी भी राजनीति में बहुत एक्टिव रहते हैं, राजनीति में इंदिरा लाल बहादुर शास्त्री के अंतर्गत काम करती है, शुरू में वो लाल बहादुर शास्त्री से इतनी प्रभावित नही होती हैं लेकिन धीरे धीरे वो जब लाल बहादुर को करीब से जानती है तो उनसे प्रभावित हुए बिना नही रहती, वक़्त बीतता है, 1945 में देश आज़ाद होता है, 1946 में इंदिरा को दूसरा बेटा होता है जिनका नाम वो संजय गांधी रखती हैं, इसके बाद उनके पिता जवाहर लाल नेहरु 15 अगस्त 1947 में भारत के पहले प्रधान मंत्री बनते हैं, इंदिरा के के लिए भी ये बड़ा गर्व का मौका होता है, इसके बाद इंदिरा अपने पिता के साथ अल्लाहाबाद से दिल्ली आ जाती हैं,लेकिन क्योंकि आज़ादी के बाद दंगे भड़क जाते हैं,शायद ये अब तक के भारत के सबसे बड़े दंगे थे, ऐसे में महात्मा गांधी इंदिरा से उस वक़्त कहते हैं कुछ न कुछ करना होगा,अगर हमने इस वक़्त कुछ नही किया तो हालात बहुत ज़्यादा खराब हो जायँगे,और देश को बहुत नुक़सान होगा,इंदिरा ये बात सुनती हैं और दिल्ली में एक जगह जाती हैं, जहां की लोकल्टी मुस्लिम होती हैं, वहाँ सब लोग बहुत डरे हुए होते है,वेसे वो हालात ही ऐसे थे कि हिन्दू मुस्लिम दोनों ही बहुत डरे हुए थे, तब इंदिरा मुस्लिम लोकल्टी के लीडर से बात करती हैं,उन्हें समझाती हैं कि वो पीस रिस्टोर करने में उनकी मदद करें, और उंन्हे आश्वासन देती हैं कि उन्हें कोई नुकसान नही होगा, शुरू में तो मुस्लिम लीडर इंदिरा की बात मानने से साफ इंकार कर देते हैं, वो कहते हैं कि हम कैसे मान ले कि जो हमारी जान लेने पर तुले है वो हमारे साथ शांति वार्ता करेंगे, लेकिन जब इंदिरा उंन्हे बहुत कन्वेंस करती हैं तो वो मान जाते हैं, इसी तरह इंदिरा हिंदुओ को भी मना लेती हैं, इस किस्से के बाद कांग्रेस पार्टी इंदिरा से बहुत प्रभावित होती है, और उनकी बहुत वाह वाही होती है, इंदिरा की बहादुरी एक और किस्से से पता लगती है,जब इंदिरा कार में कहीं जा रही होती हैं तो देखती है 200 लोगों की भीड़ एक आदमी को दौड़ा रही है, इंदिरा उस आदमी को अपनी और दौड़ता हुआ देख कर रोक लेती हैं और भीड़ के सामने जाकर खड़ी हो जाती हैं, और कहती है तुम क्यों इस आदमी को मारना चाहते हो? तब भीड़ में से उनका लीडर निकल कर कहता है ये फलां धर्म का आदमी है,आप हमारा रास्ता छोड़ दो नही तो बहुत बुरा अंजाम होगा, लेकिन इंदिरा तो इंदिरा थी, वो डरने वालों में से कहाँ थी, वो कहती है तुम मेरे रहते इस आदमी को नही मार सकते, इसने तुम्हारा कुछ भी नही बिगाड़ा है, इंदिरा के तेवर देख कर पूरी भीड़ दबे पांव वापस लौट जाती है, दिल्ली में इंदिरा सरकारी तौर पर एक निजी सहायक के रूप में काम करती हैं,लेकिन फिरोज़ अल्लाहाबाद नही छोड़ते, क्योंकि फिरोज तब दी नेशनल हेरल्ड में एडिटर का काम कर रहे थे, इस न्यूज़ पेपर को मोतीलाल नेहरु ने ही शुरू किया था, लेकिन इंदिरा का जाना शायद फिरोज़ को पसन्द नही आया था, वेसे तो 1951-52 के लोकसभा चुनावों में इंदिरा गांधी ने अपने पति फिरोज गांधी के लिए बहुत भी बहुत सी चुनावी सभाएं आयोजित की और उनके समर्थन में चलने वाले चुनावी अभियान का नेतृत्व किया.उस समय फिरोज रायबरेली से चुनाव लड़ रहे थे. लेकिन इंदिरा के दिल्ली जाने के बाद फिरोज सरकार के भ्रष्टाचार के विरुद्ध बड़ा चेहरा बन गए. शायद ये संयोग नहीं था लेकिन इसी साल यानी 1955 में फिरोज़ ने कांग्रेस पार्टी के भीतर भ्रष्टाचार विरोधी अभियान शुरू किया. इंदिरा गांधी इसी साल पार्टी की वर्किंग कमेटी और केंद्रीय चुनाव समिति सदस्य बनी थीं. फिरोज़ ने बहुत से भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों का पर्दा फाश किया,जिसमे बीमा कम्पनी और वित्त मंत्री टीटी कृष्णामचारी का नाम शामिल था. वित्त मंत्री को तब जवाहर लाल नेहरु का करीबी माना जाता था और फिरोज़ की वजह से उंन्हे इस्तीफा तक देना पड़ा, शायद यही वजह थी कि उन दिनों फिरोज़ और इंदिरा में दूरी आ गयी थी, और धीरे धीरे ये दूरी बढ़ने लगी,फिरोज़ के इतने बढ़िया काम के बाद भी इंदिरा ने कभी भी सदन में उनकी तारीफ नही की, इसके बाद 1959 में इंदिरा गांधी को कांग्रेस का अध्य्क्ष चुना गया,जब इंदिरा गांधी कांग्रेस की अध्यक्ष थीं उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि केरल में चुनी हुई पहली कम्यूनिस्ट सरकार को पलट कर वहां राष्ट्रपति शासन लगाया जाए.इसके पीछे भी एक लंबा किस्सा है, लेकिन वो फिर कभी, कहा जाता है कि कम्युनिस्ट सरकार गिराने की वजह से फिरोज़ इतने नाराज़ थे कि उन्होंने आनंद भवन में नाश्ते की मेज़ पर इसके लिए इंदिरा को फ़ासीवादी तक कह दिया था,उस वक्त नेहरू भी वहीं मौजूद थे. इसके बाद एक स्पीच में उन्होंने लगभग आपातकाल के संकेत दे दिए थे. फिरोज़ ने केरल के मामले में जिस तरह की प्रतिक्रिया दी थी वो इंदिरा के लिए चेतावनी की तरह थी.इस चेतावनी को इंदिरा ने गम्भीरता से लिया और उन्होंने अपना समय पूरा होने से पहले पार्टी के अध्यक्ष के पद से त्यागपत्र दे दिया. और इसके बाद 1960 में वो छुट्टियां मनाने कश्मीर चले गए, इसके बाद 1960 में ही दिल का दौरा पड़ने से फिरोज़ गांधी की मौत हो गयी, और उनकी कॉम्प्लिकेटेड लव स्टोरी खत्म हो गयी, इसके बाद 27 मई 1964 में जवाहर लाल नेहरू का भी निधन हो गया, एक के बाद एक लगे झटके से इंदिरा इतना अवसाद ग्रस्त हुईं के उन्होंने राजनीति में कभी न उतरने का फैसला कर लिया था,लगभग 1964 में ही लाल बहादुर शास्त्री ने इन्हें राजनीति में उतरने के लिए बहुत कन्वेंस किया,अगर लाल बहादुर शास्त्री न होते तो शायद इंदिरा फिर कभी चुनाव न लड़ती, शास्त्री जी के समझाने के बाद उन्होंने चुनाव लड़ा और जीती भी, उनकी नियुक्ति एक राज्यसभा सदस्य के रूप में हुई। इसके बाद वे लालबहादुर शास्त्री के मंत्रिमंडल में सूचना और प्रसारण मत्री बनीं, लाल बहादुर के साथ रह कर उन्होंने सदन में अपनी अच्छी पहचान बनाई,और राजनीति में खुद को मजबूत किया, 11 जनवरी 1966 में लाल बहादुर शास्त्री का भी उज़्बेकिस्तान के ताशकंद में रहस्यमयी रूप से निधन हो गया, जिसके बाद बहुमत के चुनाव में इंदिरा गांधी को के.कामराज की मदद के द्वारा प्रधानमंत्री चुना गया, जब इंदिरा को प्रधानमंत्री का ताज मिला तो वो कांटो से सजा हुआ था, हर तरफ से भारत के खिलाफ साज़िशें रची जा रही थी,चाइना से भारत युद्ध हार चुका था, लाल बहादुर शास्त्री के नेतृत्व में पाकिस्तान भी कुछ दिन पहले ही हमला कर चुका था, अमेरिका भी आंखे दिखा रहा था,देश की अर्थव्यवस्था भी बहुत खराब थी,साथ ही साथ प्रधानमंत्री बनने की दौड़ में बहुत सारे लोग खुल के सामने आ गए थे, जिनमें चौधरी चरण सिंह, मोरारजी देसाई, जैसे दिग्गज नेता थे, ऐसे में इंदिरा ने देश का कार्यभार सम्भाला, उन्होंने अपने बच्चों को भी सम्भाला, देश की अर्थव्यवस्था के लिए बड़े बड़े फैसले लिए, सेना को मजबूत किया, अब वो लोग सकते में आ गए जिन्होनें इंदिरा को ये सोच कर चुना था कि इन्हें कांटो का ताज दे दिया जाए,नुकसान होगा तो इंदिरा की छवि का,और साथ ही साथ फायदा हमारा होगा, जब जैसा चाहेंगे इंदिरा को चलाएंगे, लेकिन इंदिरा कहाँ किसी के काबू में आने वालों में से थी, 1969 में उन्होंने कांग्रेस पार्टी को ही दो फाड़ कर दिया, और अपनी पार्टी को कांग्रेस आर नाम दे दिया, मोरारजी देसाई वगेरा लोग दूसरी पार्टी में चले गए, इसके बाद इंदिरा ने प्रिंसि पर्स उन्मूलन चलाया, जैसे कि कुछ लोग नही जानते हैं कि ये प्रिंसि पर्स उन्मूलन क्या है तो हम उंन्हे बताते चले कि ये अंग्रेज़ो द्वारा राजाओं के साथ हुआ सौदा था, अंग्रेज़ो ने सभी रियासतें राज्य अपने कब्ज़े में लिए थे, और राजाओं की पेंशन बांध दी थी, जो अंग्रेज़ो के जाने के बाद भी भारतीय सरकार द्वारा उन राजाओं को मुफ्त में दी जा रही थी, जब इंदिरा ने देखा कि देश तो खुद ग़रीबी से जूझ रहा है, लोग भूखे मरने को तैयार हैं ऐसे में हम मुफ्त में इन्हें पेंशन क्यो दें, तो उन्होंने इसके खिलाफ संविधान में संशोधन कर के इसे बंद कर दिया, जिसके बाद राजा और प्रजा में अंतर कम हुआ और गरीबों की हितेषी कही जाने वाली इंदिरा गरीबों के करीब हो गयी, इसके बाद जो एक बड़ी चुनोती इंदिरा का इंतेज़ार कर रही थी वो थी पूर्व पाकिस्तान(अब का बांग्लादेश) में उठा आंदोलन, इस आंदोलन को दबाने के लिए पश्चिमी पाकिस्तान की सेनाएं वहां गयी, और उन्होने मारकाट मचानी शुरू कर दी, वो लोग इतने क्रूर थे कि मासूम बच्चों बूढ़ों और औरतों तक को नही छोड़ते थे,बच्चों को ज़िंदा आग में भून देते थे, औरतों का बलात्कार कर देते थे,उनके ज़ुल्म ऐसे थे कि यहाँ सुनाना सम्भव नहीं, ज़ुल्मों से परेशान होकर बंगला लोगों ने भारत में शरण लेनी शुरू कर दी, भारी तादाद में लोग वहां से हिंदुस्तान कूच करने लगे, हिंदुस्तान पहले ही अपनी समस्याओं में उलझा हुआ था, सरकारी खज़ाने अपनी जनता के लिए ही बहुत कम पड़ रहे थे, ऐसे में 10 लाख शणरार्थीयों ने आकर इंदिरा की मुश्किलें और बढ़ा दी थी, इस सब को देखते हुए इंदिरा ने बंगला में संघर्ष कर रहे स्वंत्रता सेनानियों को समर्थन दे दिया, इसके बाद हालात और खराब तब हुए जब अमेरिका के राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने ये कोशिश शुरू कर दी कि सयुंक्त राज्य अमेरिका इस मसले में पाकिस्तान के साथ खड़ा हो, दोस्तों एक बात तो बिल्कुल साफ है कि अमेरिका हमेशा से भारत की पीठ में खंजर घोंप्ता आया है, इधर चीन भी पाकिस्तान को लगातार हथ्यार दे रहा था, और भारत पहले ही शांति सन्धि पर लाल बहादुर द्वारा उज़्बेकिस्तान में शांति सन्धि पर हस्ताक्षर कर चुका था, इस सब का फायदा उठा रहा था पाकिस्तान, जब भारत के पास संसाधन कम होने लगे तो इंदिरा ने आज़मी लीग को समर्थन देते हुए उंन्हे पाकिस्तान से लड़ने के लिए प्रेरित किया और साथ ही हिंदुस्तान से फ़ौज भी भेजी, 3 दिसंबर 1971 को बौखलाए पाकिस्तानी सैनिकों ने भारत के बेस पर बमबारी शुरू कर दी, और भारतीय सेना के बारे में तो आप जानते ही है, अगर भारतीय सेना को खुली छूट दे दी जाए तो 10 दिन में पाकिस्तान को फिर से हिंदुस्तान में मिला दे, और वही हुआ जिसकी उम्मीद थी, भारतीय फौज की कारवाई से घबराकर 16 दिसंबर तक पाकिस्तानी फौज ने आत्मसर्मपण कर दिया, पूर्वी पाकिस्तान अब इंदिरा की वजह से बंगला देश बन चुका था, इंदिरा के इस चतुराई भरे फैसले से हिंदुस्तानी भी खुश थे,बंगलादेशी भी खुश थे, और शणरार्थी भी खुश थे,ज़ालिमों के ज़ुल्म का अंत हो चुका था, जंग खत्म होने के बाद इंदिरा ने घोषणा की के में वो इंसान नही जो दबाव में काम करू, चाहे वो कोई व्यक्ति हो या फिर देश, लेकिन इंदिरा इस हादसे के बाद ये जान गयी थी कि बुरे वक्त में भारत की मदद के लिये कोई आगे नही आएगा, इसलिये इंदिरा ने परमाणु बम की तैयारियां ज़ोर शोर से शुरु करा दी, 18 मई 1974 को जैसलमेर के मलका गांव में पहला भारतीय परमाणु परीक्षण किया गया, इस दिन बुद्ध पूर्णिमा थी, जिसकी वजह से इंदिरा ने इसे बुद्ध मुस्कुराए(स्माइलइंग बुद्धा) नाम दिया था, पहला सफल परमाणु परीक्षण कर भारत ने दुनिया को चोंका दिया था, हालांकि उसके बाद भारत को अमेरिका और चीन द्वारा काफी धमकियां भी मिली, लेकिन इंदिरा अपने काम से लगी रहीं, 1975 में भारत की अर्थव्यवस्था कमज़ोर पड़ चुकी थी, जिसकी वजह से विपक्ष ने इंदिरा सरकार के खिलाफ आंदोलन छेड़ रखा था, साथ ही विपक्ष के राजनारायण की तरफ से इंदिरा गांधी के खिलाफ हाई कोर्ट में कैस भी दायर हो था ही, जिसमे उनपर चुनाव में धांधली का आरोप लगा हुआ था, ये मामला तो 1971 के चुनावों का था लेकिन उसकी सुनवाई 12 जून 1975 को हुई, जिसके जज जगमोहन लाल सिन्हा थे, उन्होंने राजनारायण के आरोपों को सही पाया और इंदिरा का रायबरेली चुनाव निरस्त कर दिया, इसके बाद इंदिरा अपने केस को सुप्रीम कोर्ट ले गयी, और वहाँ उनकी पैरवी के लिए मशहूर वकील एन पालखीवाला को नियुक्त किया था, सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अय्यर ने फ़ैसला दिया था कि इंदिरा गांधी संसद की कार्यवाही में भाग तो ले सकती हैं लेकिन वोट नहीं कर सकतीं. यानी सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले के मुताबिक, इंदिरा गांधी की लोकसभा सदस्यता चालू रह सकती थी. जस्टिस अय्यर के इस फ़ैसले के बाद विपक्ष ने इंदिरा गांधी पर अपने हमले तेज़ कर दिए. और 25 जून को दिल्ली में जयप्रकाश नारायण की रैली रामलीला मैदान में हुई.ये रैली बहुत बड़ी थी, इसमें जय प्रकाश नारायण ने ‘संपूर्ण क्रांति’ का ऐलान किया, जिसके अंतर्गत विद्यार्थियों, किसानों और आम मजदूरों को एक साथ लाया गया, और इसी रैली के बाद इंदिरा गांधी ने आधी रात को देश में आपातकाल की घोषणा कर दी... 1975 में आपातकाल लगाया गया था,और ये 3 साल तक चला, इस आपातकाल में रातों रात तमाम दिग्गज नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया, इसके पीछे इंदिरा गांधी ने तर्क दिया था कि सरकार ने सभी नेशनल सिक्यूरिटी एजेंसी को इस बात के लिए सावधान कर दिया कि पकिस्तान से युद्द होने वाला है. इस युद्ध के अतिरिक्त सरकार के सामने जो तात्कालिक समस्याएं थीं वह था सूखा और सन 1973 का तेल संकट. इन संकटों से जूझते हुए भारत की अर्थ व्यवस्था काफ़ी खराब हो गयी थी. इंदिरा का कहना था कि देश के अन्दर हो रहे हड़ताल और प्रतिवाद ने सरकार को कार्य करने में पूरी तरह से असक्षम बना दिया है, जिस वजह से भारत की व्यवस्था खराब होती जा रही थी. और भारत को समृद्ध बनाने के लिए आपातकाल ज़रूरी थी, इस आपातकाल में इंदिरा गाँधी ने ’20- पॉइंट’ इकनोमिक प्रोग्राम को तैयार किया, जिसका उद्देश्य देश के कृषि और औद्योगिक विकास को प्रगति देना था. इसी के साथ सरकार ग़रीबी और अशिक्षा से भी लड़ना चाहती थी, किन्तु इन सब के पीछे सरकार का अनुशासन असहनीय था और इसे ‘डिसिप्लिन ऑफ़ द ग्रेवयार्ड’ कहा गया. इमरजेंसी के दौरान ये ऐलान किया गया कि सभी ट्रेनें समय पर चलेंगी और सारे कर्मचारी अपने काम पर आसानी से जा सकेंगे और काम कर सकेंगे. सरकारी कार्यालयों में उनके कार्यों का लेखा जोखा पहले की ही तरह रहेगा. इस ’20 पॉइंट्स’ के अलावा संजय गाँधी ने भी पांच और पॉइंट्स का वर्णन किया. इन पांच पॉइंट्स की सहायता से संजय गाँधी देश में शिक्षा, परिवार नियोजन योजना, वृक्षारोपण, जातिवाद की समाप्ति और दहेज़ प्रथा को समाप्त करना चाहते थे. कालांतर में इमरजेंसी के दौरान इन दोनों प्रोग्राम को एक साथ करके ‘ट्वेंटी फाइव’ पॉइंट प्रोग्राम बनाया गया. 1977 में इंदिरा गांधी को लगा कि अब देश सामान्य है और स्थिति उनके काबू में है तो उन्होंने आपातकाल हटा दिया और दोबारा चुनाव कराने का फैसला किया, लेकिन इस चुनाव में वो बुरी तरह से हार गई,जनता दल ने उन्हें हराया, और देश को पहली बार गैर कांग्रेसी नेता मोरारजी देसाई मिले, इंदिरा की हार की एक मुख्य वजह संजय गांधी का जबरन नसबंदी कराना भी था, एक आंकड़े के मुताबिक उन्होंने 10 मिलियन लोगों की नसबंदी कराई थी, चुनाव जीतने के बाद जनता दल के नेता इंदिरा के खिलाफ खुल कर अपमानजनक शब्द बोलने लगे थे,इंदिरा को इस बात की भी आशंका थी कि संजय गाँधी के जबरन नसबंदी कार्यक्रम से प्रभावित लोग संजय गाँधी को ज़बरदस्ती पकड़ कर तुर्कमान गेट ले जाएंगे और उनकी सार्वजनिक रूप से नसबंदी करेंगे. ये पहली बार था जब इंदिरा गांधी डरी थी, क्योंकि उन्हें संजय की बहुत फिक्र थी, जब ये बात जेपी जयप्रकाश नारायण को पता लगी तो वो उनसे मिलने उनके आवास पर गए, और इंदिरा को ढांढस बंधाया, और वहां से आकर जेपी ने एक वक्तव्य जारी कर कहा कि इंदिरा गाँधी का राजनीतिक जीवन अभी समाप्त नहीं हुआ है. ये जनता पार्टी के नेताओं को एक संकेत था कि बदले की राजनीति न की जाए. इस के बाद इंदिरा गांधी ने भारत छोड़ने का मन बना लिया था, लेकिन चौधरी चरण सिंह इंदिरा को जेल में डालना चाहते थे,क्योंकि आपातकाल के दौरान इंदिरा ने चौधरी चरण सिंह को तिहाड़ जेल में बंद कराया था, इसी बदले की भावना से चौधरी जी ने इंदिरा का पासपोर्ट जब्त करा लिया था, और शायद यही उनकी सबसे बड़ी गलती थी, उनके ऐसा करने से दो नुकसान हुए, एक तो इंदिरा के प्रति लोगों के मन मे सहानुभूति जागी, दूसरे इंदिरा देश छोड़ कर न जा पाई तो उन्हें खुद को बचाने का रास्ता बस राजनीति ही दिखा, और वही हुआ जो जेपी ने कहा था, जोड़ तोड़ कर के बनाई हुई जनता दल की सरकार ज़्यादा वक़्त नही चली और 1980 में इंदिरा फिर से प्रधानमंत्री बन गयी, 1980 में ही हवाई हादसे में इंदिरा के बेटे संजय गांधी का भी निधन हुआ, संजय गांधी बेहद समझदार थे और अपनी माँ की रीढ़ की हड्डी की तरह थे, 1980 का चुनाव माँ को जिताने में उन्होंने अहम भूमिका निभाई थी, यही वजह थी कि उनके जाने के बाद इंदिरा गांधी का राजनीतिक कैरियर खराब दौर से गुजरने लगा था, 3 साल जैसे तैसे गुज़रे, इधर सिख और हिंदुओं के बीच लंबे समय से चला आ रहा तनाव चरम पर पहुंच चुका था. सिखों के बेहद पवित्र माने जाने वाले स्थल स्वर्ण मंदिर में चरमपंथियों के घुस जाने के कारण इंदिरा गांधी को वहां सेना भेजनी पड़ी. इस करवाई को ब्लू स्टार नाम दिया गया था, चरमपंथी के साथ साथ सैंकड़ों मासूम लोग मारे गए. स्वर्ण मंदिर में सेना भेजने के कारण समूचे भारत के सिखों में इंदिरा गांधी के प्रति जबरदस्त असंतोष और गुस्सा भड़क उठा. उन्हें जान से मारने की धमिकयां मिलने लगीं इंदिरा गांधी को जान से मारने की धमकियां मिल रही थीं. मगर वे ऐसी निर्भीक महिला थीं कि इसकी उन्होंने कभी परवाह नहीं की. अपनी धर्मनिरपेक्ष सोच के कारण ही इंदिरा गांधी बहुसंख्यक हिंदुओं और अल्संख्यक मुस्लिमों, सिखों के बीच किए जाने वाले किसी भी भेदभाव का कड़ा विरोध करती थीं. यहां तक कि जान से मारने की धमकी मिलने के बाद भी पार्टी के कहने पर उन्होंने अपने निजी सिख अंगरक्षकों को बदलने से इंकार कर दिया. स्वर्ण मंदिर घटना के बाद पार्टी ने फैसला लिया कि उनकी सुरक्षा व्यवस्था से सभी सिखों को अलग कर दिया जाए. जब उन्होंने ये सुना तो बहुत नाराज हुईं. उनके आदेश के अनुसार जिन सिख सुरक्षाकर्मियों को हटा दिया गया था उन्हें वापस बुला लिया गया. वे बेहद बहादुर महिला थीं. 31 अक्टूबर की सुबह इंदिरा गांधी की मौत का दिन. वे दिल्ली के अपने घर में थीं. उस दिन इंदिरा का ब्रितानी अभिनेता पीटर उस्तीनोव के साथ एक इंटरव्यू था, वो लॉन में इंदिरा के साथ थे और उनपर एक डाक्यूमेंट्री बना रहे थे. उस समय बेअंत सिंह इंदिरा गांधी के अंगरक्षक थे. जब इंदिरा, पीटर से मिलने के लिए जा रही थी बेअंत ने रास्ते में उन पर हमला कर दिया. बाद में पीटर उस्तीनोव ने बताया, "हम पचास यार्ड की दूरी पर थे. शुरू में गोलियां चलने की तीन आवाजें आईं. मेरे साथ एक इंडियन कैमरामैन था. गोलियों की आवाज आई तो कैमरामैन ने कहा, लगता है कोई फिर पटाखे छोड़ रहा है. जब मशीनगन की आवाज आई तब समझ में आया, ये पटाखे नहीं थे." "बेअंत सिंह सामने आया और अपने रिवॉल्वर से फायरिंग करने लगा. इससे पहले की हम कुछ समझ पाते वह अपना काम कर चुका था." इंदिरा जी ज़मीन पर खून में लथपथ पड़ी थीं. चारों ओर अफ़रातफ़री का माहौल था. मैंने एम्बुलेंस खोजा, मगर वहां कोई एंबुलेंस मौजूद नहीं था. तब हमने एक सिक्योरिटी कार मंगाई और हम आनन-फानन में एम्स के लिए निकल पड़े. डॉक्टरों ने उनका इलाज शुरू कर दिया. ऐम्स के निदेशक ने बताया कि इंदिरा गांधी की हालत बहुत नाजुक है. इंदिरा अगले पांच घंटे तक ऑपरेशन टेबल पर रहीं. उन्हें 80 यूनिट से ज्यादा खून चढ़ाया गया. लेकिन डॉक्टरों ने बताया कि उनकी जान संभवतः तभी जा चुकी थीं जब उन्हें पहली गोली लगी. बेअंत सिंह ने उनकी हत्या के बाद कहा ये स्वर्ण मंदिर में मारे गए लोगो के लिए श्रधांजलि है, और आखिरकार देश एक मजबूत लीडर खो चुका था |

इन्दिरा गांधी 2

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