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शरणार्थी - 1

नमस्कार दोस्तो, ऍम पर मैं हुआ आपके साथ आजी शिखा से लेकर डॉक्टर तारा सिंह की लिखी किताब आंसू की गाॅव सुनी । जो मनचाहे शरणार्थी पौष का महीना था । सलीम अन्यमनस्कता मस्जिद की गुंबद को निहारता, उसकी आंखों में उसके नये राशि जीवन की क्रोधाग्नि किसी सैलाब की तरह डुबो देने उस की ओर बढता चला रहा था । जब से उसका विदेश सचिव प्रेम से आयुक्त हुआ, तब से उसके एकांत जीवन बिताने की सामग्री में इस तरह की जड सौंदर्यबोध भी एक स्थान रखने लगा । उसकी आंखों से नींद दूर जा चुकी थी, घर काटने दौडता था । आंखों में किसी कवि की कल्पना सी कोई स्वर्गीय आकृति नहीं बल्कि उसका बेटा जुम्मन रहता था, जिसे उसने अपने लघु से सृजा और पाला था, जिसके सामने सुख शांति का लालच सब कुछ था, जिस पर उसने तीनों काल लुटा रखा था और जिसे पाकिर पत्नी फातिमा से कहता था फातिमा जानती हूँ । ऊपर वाले के पास जितना भी धन था, सब के सब उसमें हमारी झोली में डाल दिया हूँ । फातिमा आग्रह स्वर्ग में पूछती थी वो कैसे? सलीम गर्व से बोल पडता था पुत्र के रूप में जुम्मन को हमारी गोद में सौंपकर पति की बात सुनकर फातिमा का मुख उसके त्याग के हवन कुंड की अग्नि के प्रकाश से दमक उठता था । उसका अचल खुशी के आंसू से भेंट जाता था और प्राण पक्षी जुम्मन को लेकर आसमान को छूने उडने लगता था । एक सलीम अपनी मुझे खडी कर पत्नी फातिमा से कहा फातिमा हम चाहिए जितना भी गरीबों मगर इस बात का खयाल रखना जुम्मन की खुराक में कभी कमीना जानती हो । जिस वृक्ष की जडी गहरी होती हैं उसे बार बार सोचना नहीं पडता है । वक्त जमीन से आद्रता खींचकर हरा भरा रहता है और हरा भरा वृक्ष ही अस्थिर प्रकाश में बागीचे के तथा अंधकार को अपने सिरों पर संभाले रखता है । इस विचार में हमारे जीवन के था अंधेरी को हमारा पुत्र संभालेगा दोनों पति पत्नी ने मिलकर मजदूरी करने का व्रत उठा लिया । कभी घास काटकर उसे बाजार में बेचकर, कभी जंगल से लकडी लाकर कभी मुखिया के दरवाजे पर रात रात भर लकडी के साथ अपना कलेजा भर्ती रहता था और इस से मिले पैसों से जुम्मन की पढाई लिखाई का खर्चा पूरा करता था । जो मन भी पढने लिखने में कुशाग्र बुद्धि का था उसने दशमी पास कर शहर जाकर कॉलेज की पढाई पूरी की । बाद उसे एक अच्छी नौकरी भी मिल गई । पुत्र को नौकरी मिल गई । जानकर दोनों पति पत्नी ने कहा आज हमारा ये पूरा हो गया । मेरा बेटा अपने पैर पर खडा हो गया हूँ । लेकिन इस खुशी को दो साल भी नहीं होगा था की साधुता और सज्जनता की मूरत सलीम पर भाग्य ने बहुत बडा कुठाराघात कर दिया । प्राथिमक गठिया के दर्द से परेशान रहने लगी । बच चल नहीं पाती थी । सलीम के लिए गांव में अकेला रहकर पत्नी को शहर इलाज के लिए ले जाना मुश्किल था । सोचने जुम्मन को फोन कर बताया बेटा तुम्हारी माँ उठ बैठ नहीं सकती है । गठिया का दर्द उसे नई पंगु बना दिया है । गांव में कोई डॉक्टर वैद्य भी नहीं है जो उसे ले जाकर दिखाऊँ शहर ले जाना मेरे लिए मून की नहीं है इसलिए तुम आकर हमें अपने पास ले चलो । वही रहकर किसी डॉक्टर से इलाज करवा देना । जो मैंने कहा ठीक है मैं जल्दी आने की कोशिश करता हूँ । देखते देखते महीना बीत गया लेकिन जुम्मन आने की बात तो दूर एक फोन कर हाल समाचार भी नहीं पूछा । पुत्र के इस रवैये से सलीम बहुत उदास रहने लगा । उसकी आंखें हमेशा आकाश की ओर लगी रहती थी । सोचता था सलीम हमें लेने नहीं आया । कोई बात नहीं एक सो नहीं कर लेता हूँ । मामूली शिष्टाचार भी नहीं निभाया सारी दुनिया हमें जलील किया कम से कम बिता जानकर वर तो छोड देता । रात हो चुकी थी लैंप केशिंग प्रकाश में फातिमा ने देखा उसका पति सलीम उसकी ओर प्रश्न सूचक दृष्टि से निहार रहा है । फातिमा समझ गई सलीम का भी घोर कम इस तरह की गंभीरता की कल्पना कर अधीर हो जा रहा है । उसने कहा सलीम! मैं जानती हूँ इस अपमान के सामने जीवन के और सारी क्लेश तो अच्छे हैं । इस समय तुम्हारी दशा उस बालक सी है जो फोडी पर नशनल कि शनि पीडा न सहकर उसके फूटने नासूर पडने, वर्षों खाट पर पडी रहने और कथाचित्र प्राणांत हो जाने के भाई को भी भूल जाता है । सलीम ने अपनी मनोव्यथा छिपाने के लिए सर झुका दिया बोला जिसका पूरा जीवन इस चिंता में कटा हो कि कैसे अपने संतान का भविष्य सुखी बनाई । वसंत आन बडा होकर अपने ही माँ बाप के दुख का कारण बनी तो कलेजा फटता है ना फातिमा आर्द्र हो बोली हमारी सभ्यता का आदर्श यहाँ तक गिर चुका है, मालूम नहीं था याद कर दुःख होता है जिस लडके ने कभी जबान नहीं खोली । हमेशा गुलामों की तरह हाथ बांधी हाजिर जहाँ वहाँ आजी का ये कितना बदल जाएगा चौंकाने वाली बात है । फातिमा कुछ बोलना चाह रही थी मगर सलीम बीच में बोल पडा फातिमा अपने गांव के मंदिर के पुजारी श्रीकांत को तो जानती हो ना, उसे भी एक बेटा है, नाम है भुवन । आजकल मंदिर का पुजारी वही है, लेकिन चढावे का प्रसाद हो या दान की हुई सोने चांदी से भरी आरती की थाली । घर पहुंचते ही श्रीकांत के हाथ में सौंपकर खुद दोस्तों के बीच गप्पें लडानी चला जाता है । घर लौटकर कभी नहीं जानने की कोशिश करता की थाली में हीरा था या मार्टी फातिमा कुछ जवाब देकर केवल इतना बोल कर चुप हो गई ऍम भित्ती कितनी अस्थिर है बाल ऊपर की दीवार तो वर्ष में गिरती है पर तेरी दीवार बेला पानी के बूंद की तरह रह जाती है । आंधी में दीपक का कुछ भरोसा तो किया जा सकता है, पर तीन या नहीं तेरी स्थिरता के आगे एक अबूद बालक का घरौंदा पर्वत है । सलीम जीवन के अलग भी सुख से व्यक्त हो चुका था । उसका कल्पित स्वर्ग धरती पर आगे रहा था । वह खुद पर काबू नहीं कर पाए और बोला फातिमा! अपनी ही संतान को इतना बिना को सोच सोच कर देखो तो उस पर हमारा कोई ऋण बाकी नहीं है, जिससे हम ना पाकर इतना निराश जीते हैं । हैरी जब हम उसे पाल रहे थे और वह तिल तिलकर बडा हो रहा था तब उसे देख हम भी कम आनंद नहीं उठाए थे । हमारी आत्मा ने उस त्याग में संतोष और पूर्णता का भी तो अनुभव किया था । सोचू फिर हमारा ऋणी कैसे हुआ? पत्नी फातिमा अपने पति सलीम की आंखों कि आद्रता से अनभिज्ञ नहीं थी । उसमें गंभीर भाव से कहा आप का भाव बिल्कुल गलत है । अगर ऐसा ही है तो माता पिता के लिए जो कहा गया है वो गलत हो जाएगा की धरती पर वो सब्जी नहीं देकर ऋण उत्तराय । इस तरह हर संतान अपने माँ बाप का ऋण पालने में ही उतार देता । फिर रवि तो बोली सलीम तुम कब तक आपने अंधेरी घर के उस दीपक की ज्योति में अपना भविष्य रौशन करते रहोगे जिसे तुमने अपने लघु से सीन सीजकर रोशन किया था । अब छोडो इन सब साडी पत्नी के प्यार के स्वाभाविक आलोक में बीते दिनों को जब आंखों में झिलमिलाते देखा वह काम गया और कातर स्वर में बोला फातिमा कैसे भूल जाऊ । उन दिनों को जहाँ हम जीवन की सत्तर साल छोड आए हैं, उन दिनों की गरीबी की प्रचंड अग्नि करता हूँ । आज मुझे और अधिक छूट जाता है । जब जो मन तेरे साथ था उसकी आंखों कि ठंडक में हिम मुकुटधारी पर्वत की शीतलता भी कम लगती थी । जानती हूँ मैंने अपने और जुम्मन के बीच कभी अल्लाह को नहीं आने दिया । क्योंकि मैं जो मन को अपना खुदा मानता था, जो बिहार करती हुई और कुलाची भर्ती हुई, किडनी को किसी ने तीर मारकर घायल कर दिया हूँ तो पति की बात सुनकर फातिमा के हृदय के भीतर एक दर्द उठा और वह वहीं गिर पडी । पत्नी को जमीन पर गिरा देख सलीम विचलित हो गया । उसमें वो इतना भरे स्वर में कई बार आवास लगाए । लेकिन फातिमा अपनी जगह से एक इंच ना ही नहीं सलीम ने छूकर देखा तो फातिमा संसार को छोड कर जा चुकी थी । इस घटना सिर्फ टूट गया । उसका जीते रह कर रूप धारण कर दिया । जोर का बुखार चढाया, सारी रात अचेत पडा रहा । सुबह बाकी खुली देखा जो मन आफंदी खडा है । उसने अपनी उभरते हुए आंसूओं को रोक कर कहा बेटा तुम्हारी माँ के साथ में अपना अंतिम कर्तव्य भी पूरा नहीं कर सका । मुझे माफ कर देना । आशा की मिट्टी हुई छाया को कब तक थामी रखती हूँ । इतना कहकर सलीम ने भी अपनी आंखें मूंद ली ।

फतेह सिंह - 2

फतेहसिंह संध्या की कालिमा की निर्दय निर्लज्जता में कोई की मुरीद पर बैठा फतेहसिंह पत्नी सबीना से पूछता है सबीना क्या तुम जानती हूँ रूदन में कितना उल्लास कितनी शांति और कितना बाल होता है सभी ना आंचल को संभालती हुई बोली क्यों तुम को आज इन सब बातों को जानने की जरूरत पड गई । अल्लाह का नाम न लेकर रोधन लेकर बैंक के फॅमिली पानी को निहारते हुए बोला जो किसी की स्मृति में किसी के वियोग में से सबसे सक्कर और बिलग बिलग कर नहीं रोया, वह जीवन के ऐसे सुख से वंचित है जिसपर सैकडों हसी न्योछावर हैं । उस मीठी वेदना का आनंद उन्हीं से पूछो जिन्होंने ये सौभाग्य प्राप्त किया है । सच पूछो तो हंसी के बाद मान खेल हो जाता है । आत्मा शुरू हो जाती है । मान लो हम थक चुके हो, पराभूत हो गई हूँ । दुर्योधन के बाद एक नई स्फूर्ति, एक नवीन जीवन एक नवीन उत्साह का अनुभव होता है । जैसा कि आज मैं अनुभव कर रहा हूँ । फिर काफी लेजी में बोला सबीना में सदैव तुम्हारा एहसानमंद रहूंगा । तुमने उस वक्त मुझे संभाला है जब मेरे जीवन की टूटी हुई किश्ती जीवन सागर में गोते खा रही थी । वे दिन मेरी जिंदगी के बेहतरीन दिन है । उन स्मृतियों को मैं अपने दिल में देवता की तरह स्थापित कर पूछता रहा हूँ और पूछता रहूंगा जीवन भर सच पूछो तो उस वक्त संसार में मुझसे अधिक दुखी जीवन से निराज चिंता आगमी में जलता हुआ प्राणी मूर्ति शायद ही कोई था । मुझे अपने जीवन से इतनी नाराजगी थी कि मैं काला साहब का भी स्वागत करने के लिए आतुर था । मुझे लगता था अगर कोई मेरी रक्षक कर सकती है, इस चिंता से मुक्ति दिला सकता है तो वह सुधा नहीं । विषय सभी ना । फतेह सिंह की ओर देखते हुए दीनता से कहा पति सिंह तुम भूल जाते हो की तुम एक वैश्या को पत्नी बनाकर ब्याह लाए हो और वैश्या को अच्छे बुरे सभी प्रकार के आदमियों से साबित का पडता है । उसकी आंखों में आदमियों की परक होती है मुझे तुम में और दूसरे व्यक्ति में बहुत फर्क दिखाई देता था । तुम को देखकर तरह नहीं एक सहानुभूति उत्पन्न होती थी । मैं समझ गई थी कि यह व्यक्ति एक रतन है जिसे समय की मैली चादर नहीं ढक रखा है । उसे हटाकर झाड पोछकर अमूल्य बनाया जा सकता है । सच मानू इसमें मेरा भी स्वार्थ था । मैंने तुम्हारे लिए जो कुछ भी किया आपने स्वार्थरहित क्या? पति सिंह अपने सर खुजलाते हुए बोला तुम भी कम नहीं थी, बला की सुंदरी थी । खूश जमा देने वाली तुम्हारी चाल थी । पहली नजर में ही मैं तुमारा गुलाम बन गया था । सभी ना शर्माती हुई बोली दिललगी छोडो मेरे बहुत कम पडे हैं और मुझे जाना होगा तुम्हारी उल्टी सीधी बातों में रात के दस बज गए । खाना भी बनाना है । क्षेत्र में भूली गई थी । पति सिंह की मुद्रा से ऐसा तेजवान हो गई । उसकी बुझी हुई आंखें चमक उठीं । देख की नसीब तन गई । उसने सबीना की बाह मरोडते हुए कहा तुम तो जाकर खाना बनाओगी । मैं यहाँ मुरेरा पर बैठ कर क्या करूंगा? कभी इतना भी तुमने नहीं सोचा चलो मैं भी चलता हूँ । इतना कहते फतेह सिंह के यौवनकाल के सरोवर में मोहब्बत की कमल खिल गए । क्षेत्र कि पूर्णिमा थी । मगर सबीना के गोरे अंग के आगे चंद की ज्योत्सना मात खा रही थी, जिसे देखकर पति सिंह के अंग अंग से पहाडों की चोटियों पर के गेम की तरह पसीना चूने लगा फतेसिंह सबीना के आगे खडा होकर बडे ही अदब के साथ बोला सबीना देखो मेरी तरफ मुझे देखकर तुम्हें नहीं लगता कि तुम्हारी सुंदरता के सुरम्य तट पर गर्मी कुछ ज्यादा है अन्यथा कोई पर मैं जब तक था इतनी गर्मी वातावरण में तो नहीं थी । सभी ना फतेह सिंह की बडी बडी आंखों कोसले ऐसे देखा और आज्ञाकारिता सी चाहते बोली लगता है कोई भाई और उद्वेग तुम्हारी मन पर कुछ अधिक ही बोझ डाल रहा है, यह सुन कर पाते । सिंह की दाडी और मोर्चों के भीतर छिपी दादू की पंक्तियां जगह थी । वहाँ ऐसी थी कि हृदय की मर्मान्तक पीडा की अभिव्यक्ति समझना मुश्किल था । कहने लगा व्यवहारकुशल मनुष्य संसार के भाग्य से औरत की रक्षा के लिए जनता है । जैसे मैंने जन्म लिया है । सभी ने इससे दृष्टि से पति सिंह को निहारते हुए पूछा वो कैसे पति सिंह जाडी की रात के समान ठण्डे स्वर में बोला वो ऐसी जैसे ही मेरे दिल में तुम्हारा प्यार जोर मारा । मैं जाकर तुम को अपने घर लिया या सभी ने अनमयस्क होकर कहा इसमें नई बात क्या है? पति सिंह हसते हुए बोला लगता है पिंजरे में गाने वाली चिडिया पर्वत राशियों में आकर अपना राग भूल गयी है । सभी ना चुटकी लेते हुए उत्तर दिया किसने तुम्हारा पति सिंह नाम रखा तुम्हारे नाम से तुम्हारा थोडा भी मेल नहीं खाता । क्या ही अच्छा होता जो तुम्हारा नाम हार सिंह होता । दिन भर बीबी से हारते रहते हो हर नाम रखते हो पाते सिंह स्वाॅट संभलकर पास बैठते हुए बोला मनुष्य पर नाम का कुछ भी असर नहीं पडता मेरे गांव कि पंडित जी को ही ले लो । नाम है धनिकलाल । मगर बेचारी के पास धन के नाम पर एक मिट्टी का घर है, लेकिन भिखना सेट को देखो, करोडों का कारोबारी है और नाम है देखना । सत्य के रंग से रंगी प्रदेश सिंह की ये बातें सबीना को अस्वस्थ कर गई । सभी ने इस तरह अपनी सफाई थी । बोली फतेसिंह बुरा मान गए । मैं तो यही मजा कर गई । क्या मुझे मालूम नहीं है? पुरुषों के लिए राजनीति, धर्म, ललित कला, साहित्य, इतिहास और ऐसे हजारों विषय हैं, जिनके आधार पर भी युवतियों से गहरी दोस्ती पैदा कर सकते हैं । इस पर पाते सिंह आग बबूला हो उठा । चिल्लाकर बोला, कम लिप्सा उन देशों के लिए आकर्षण का प्रधान विषय है, जहाँ लोगों की मनोवृत्तियां संकुचित रहती है । मैं तो मुंबई जैसे शहर में रह चुका हूँ । कितनी सुंदरियों के साथ मेरी दोस्ती थी । उनके साथ नाचा, खाया घूमा । परमू से कभी ऐसा शब्द नहीं निकला, जिसे सुनकर युवती को लज्जा से सिर झुकाना पडे । फिर धीरे से कहा अच्छे और बुरे लोग कहा नहीं, रात के दो बज चुके थे । पश्चिम में निषेध के चतुर्थ दोपहर में अपनी स्वल्प किरणों से चतुर्दशी का चंद्रमा हस रहा था । पूर्व प्रकृति अपने सपने मुकित नेत्रों को अलग से खोल रही थी । सबीना का गोरा बदन चांदनी की रोशनी में ऐसा एक बार खेला था । प्रेम मुकलेश फतेहसिंह कर रहे उस को छूने के लिए अधीर होता था । वहाँ आगे बढा । मगर सबीना ने उसे यह कहते हुए रोक दिया, सुनो, मन की उच्छृंखलता को भी ना रुकना भी एक बात है । पति सिंह आपने गिरे मुझ को ऊपर की ओर उठाकर धीरे से बोला आप का ये रूप जो फासला को भास्कर अपनी और मेरा लेता है, बडा कोमल, अथक, कठोर एवं भयानक होता है । तब आपका सुख सुंदर ही नहीं । आकर्षक के साथ साथ इतना शक्तिशाली अनुभव होता है । उसमें विजय दर्द भरा होता है और ऐसा पास पाप नहीं चलता । फतेह सिंह की बातों को सुनकर सबीना प्रेम विभोर हो, विचलित हो, ठीक उसके हृदय में भी पाप की सेना का आक्रमण बडा प्रबल होने लगा । वह इतनी विचलित हो गई कि पाते सिंह से पराजित हो । अपने आवेश की बाहें फैलाकर पति सिंह से लिपट गई । फतेह सिंह की मांसल भूल जाओ ने भी सबीना को अपनी आलिंगन में भर लिया । सभी ना ने देखा प्रात्र आंखें खोल रहा है । किसान अपने खेत पर जाने की तैयारी कर रहा है । वो बैठे पांच ही विस्तार पर पडा फतेहसिंह हो रहा था । उसने धक्का देकर फतेह सिंह को जाने के लिए कहा । फतेह सिंह ने जाते हुए एक अंगडाई ली और उठ खडा हो गया और हसते हुए चकित नजरों से सभी ना की ओर ताकते हुए बोला कौन कहता है कि सुबह केवल अमीरी में है?

बागवां की बेरुखी - 3

दाडवा की बेरुखी छोटी छोटी पहाडियों से घिरा सिमरिया गांव और गांव के बीचोंबीच नदी का रूप लेकर बेहतर पहाडियों की तलहटी से कल कल कर निकलता हूँ । कल नाथ करता पानी सदियों से गांव के लोगों की प्यास बुझाता रहा है । लहलहाते खेत, खिलखिलाते बच्चे सब के सब इस नदी की देन है वरना यहाँ के लोग इतने सुखी संपन्न नहीं होते । यही कारण है कि गांव वाली इस नदी को भगवान का दर्जा देकर इसकी पूजा करते हैं । हर चतुर्मासी को यहाँ मेला लगता है । बडी ही रमली जगह है यह गांव । नदी तट के दोनों किनारों को जगह खडे रंग बिरंगे खुशबूदार जंगली फूलों की कतारें गांव को अपनी सौरभ से चौबीस घंटे नहलाती रहती हैं । शाम के वक्त दो यहाँ का दृश्य देखते बनता है । जब संध्या आपने रंगीला पर पहाडियों पर फैला देती है और ऊपर आकाश में विहंग पंक्तियां बांधकर कलरव करती अपने घोसले को लौट रहे होते हैं तब उनके कोमल परों की लहर की झटकेदार समीर से नदी के पानी में तरंगे उत्पन्न होती है जिससे दोनों किनारे खडी खुशबूदार फूल गांव पर और अधिक सौरभ लुटाती हैं । मगर जब रात की काली चादर इनको पूरी तरह ढकेलती है दिन का या लुभावना दृश्य तब बडा भयावह रूप ले लेता हूँ । ये सभी काले देखती सामान खडी दिखाई पडते हैं । मानव गांव को जब कभी निकलेंगे जो पृथ्वी की तरह धैर्यवान मालती को निर्मम नियति निकल गई । जब तक जीवित रही उसका जीवन दीप ऊपर की ओर जाने के लिए तडप पढाता रहा । उसके अपने की ठोकरों ने उसके शांति संपन्न विधेयको विक्षिप्त बना दिया था । उसके मानसिक रूप लोगों में किसी ने उसकी सहायता नहीं । उसकी शारीरिक चेतना, मानसिक अनुभूति से मिलकर जब भी उत्तेजित हुई उसने अपने हृदय द्रव्य को आंखों कि निर्झर डी बनाकर धीरे धीरे बढा दिया । रात के अंधेरे में जब भी उसकी आंखें कुछ ढूंढती थी तब उसे घर के पिछवाडे के नदी जल में भरता हुआ अपना ही प्रतिबिम्ब दिखाई देता था जिसे देखकर डर जाती थी । उसकी उखडी उखडी मनोस्थिति को समझने की किसी ने कभी कोशिश नहीं की । किसी ने नहीं सोचा कि उसे पेट भर अनाज की सेवा और भी कुछ चाहिए । वही गृहस्थी लडकी थी । मगर खुद उसके जन्मदाता ने उसकी गृहस्थी को अपने सुख की खातिर उजाड दिया । शादी के बाद उसके माता पिता ने उसे पति के घर सात जाने नहीं दिया । अपने घर ये लेकर रख लिया कि हम पति पति दोनों बूढे और अकेले हैं । इससे कुछ दिन हमारे साथ रहने दीजिए । इसका अचानक दूर जाना । हम लोग सही नहीं सकेंगे । मगर मालती को अपने माँ बाप का यह विचार पसंद नहीं आया । वह चाहती थी कि पति के साथ रहे कोठी में बैठी हूँ । अपनी किस्मत को रोती थी और ईश्वर से भी नहीं करती थी कि उसके प्राण निकल जाए । वही कप राधि की तरह सोचती थी क्या ऐसी ही शादी के लिए मैं इतने दिनों से प्रतीक्षा करती आ रही थी । जीवन अभिलाषाएं मंडप के नीचे हवन कुंड में जलकर भस्म हो जाएगी । मालती दिनभर घर के काम में लगी रहती थी । थोडा बहुत समय निकलता भी था तो मां सुनैना की कराने की आवाज सुनकर एक नवदीक्षिता घर में परायन मनुष्य की तरह दौडती हुई माँ के पास पहुंच जाती थी । जाकर पूछती थी माँ तुम को क्या हुआ? तुम क्यों करा रही हूँ? सुनेना यानी मालती की माँ अपनी बातों में मिश्री खोलकर मगर बडी ही कठोरता से कहती थी मालती बेटा नहीं थोडा घुटने का ये रोग अब साथ ही जाएगा । जब तू जाकर सोचा रात के दस बज चुके हैं । सुबह हमारे पिता जी को शहर जाना है । उनका खाना टीफिन भी जल्दी चाहिए । तब मालती बडी ही संयमित होकर उत्तरमें कहती माँ तुमको करती छोड भला मैं कैसे हो सकती हूँ । तुम चौबीसों घंटे दर्द से करती रहती हूँ । क्यों नहीं डॉक्टर को दिखा लेती हो? हो सकता है दवा से ठीक हो जाए । मालिश करने से तो जाने से रहा । तब सुनेना मालती की आत्मा को भेजने के लिए कहती थी । बेटी कभी तुझे गोद में उठाकर इसी पैर पर दो मील दूर तुझे स्कूल छोडने में जाए करती थी । सदस्य पैसा नहीं था । ये तो बीते दस सालों से ऐसा हुआ है । सुनकर माँ के प्रति मालती का प्यार और बढ जाता था । उसके अंग अंग में वात्सल्य फूट पडता था । ऐसे पुलक उठता था कि वहाँ के चरणों को अपने माथे से लगाकर कहती थी माँ तुम बुरा मान गई । मेरे सीने में जो ये सांसी चल रही हैं, ये तुम्हारा ही तो दिया है । इंसान सुपर तुम्हारा और सिर्फ तुम्हारा अधिकार है । उत्तर में सुनाना कहती थी बेटा मैं भी तो आज दस सालों से तुम्हारी ही सेवा सुश्रुषा की बदौलत जल्दी हूँ तो जो ससुराल अपने पति के साथ चली गई होती तो मैं कब की मर गई होती । माँ की मीठी बोली और अपनत्व पाकर मालती अनुराग की मूर्ति बानी बैठी माँ का पैर दबाती रहती थी तब तक जब तक कि सुनाना सो नहीं जाती थी । इस तरह मातृ सेवा को अपने जीवन तब का वरदान बना चुकी थी । संध्या ढल रही थी सूर्या भगवान किसी हारी सिपाही की डर मस्तक झुकाए कोई आठ खोज रहे थे । प्रकाश अंधकार की पाँच डेली कुछ चलता जा रहा था । ऐसा किसी के पैर की आहट पाकर मालती चौंक गई । मुडकर देखी देखा दरवाजे पर आम के पेड के ऊपर सिमट कर बैठे होते, पर कोई पत्थर मार रहा है और तोता खेलने का नाम नहीं ले रहे हैं । वो डॉट कर पेड के पास गई और उस पत्थर मारने वाले से बोली हूँ, इस मेरी पक्षी को पत्थर क्यों मार रहे हैं? रात के वक्त ये कहा जाएंगे । नीचे उतरते ही नहीं, कुत्ते बिल्लियाँ मार डालेंगे । इन पर दया कीजिये । सर इस बार ये शब्द मालती के मुख से निकले । पर मालती का धार्मिक भाग उस आदमी के अंतर करण को स्पर्श नहीं कर सका जैसे बाजी से रात निकलता है । उसी प्रकार मालती के मुझसे या बोल निकलता रहा हूँ, पर सब विरत है । प्रभाव शून्य उस पर कोई असर नहीं पडा । वहाँ आदमी पत्थर मारता ही रहा हूँ, तब तक जब तक तोता डाली छोडकर उड नहीं गया । यह सब देखकर मालती की आखिरी डबडबाई यो तो ऋषि मुनियों की जितने गुण है वे सभी मालती में कूट कूटकर भरे हुए थे । पर इन्हीं गुणों के चलते लोग उसे बेवकूफ भी समझते थे । कुछ लोग कहते थे यह लडकी अर्ध पागल है । ससुराल न जाकर माँ बाप के घर रहती है । कुछ लोग कहते थे इसमें मालती का अशिक्षित होना सबसे बडा कारण है जिससे वो अपने स्वाभाविक जीवन तत्व के सिद्धांतों की अवहेलना कर सजीवता विहीन जीव की तरह जल्दी रहती है । पिता जरूरत से ज्यादा तुनुकमिजाज जी थे । उनका कहना था, अपना अपना दृष्टिकोण है पति के पीछे पीछे पालतू जीव बनकर चलना । ये अभी कोई जिंदगी है, हमारे पास है तो आजाद हैं । इसका बच्चा भी अंग्रेजी स्कूल में पडता है । वह उस कंजूस के पास जाकर क्या करेगी जिससे उठने बैठने तक की अगले नहीं है । लेकिन भूल जाते थे कि औरत का जीते फूल से नाजुक होता है । वह अपने भावों को व्यक्त करने के लिए साहस नहीं जुटा सकती । वह या नहीं बता सकती कि कौन सी कमी का काटा उसकी विधेयको घायल कर रहा है । मालती भी गुमानी घर वालों की बातें सुनकर पति से द्वेष करने लगी थी । एक दिन तालाब में स्नान करती मालती ने मां सुनैना से कहा हाँ मैं दोबारा मां बनने जा रही हूँ । जब सुनते ही सुनाई ना का मुख सूख गया वह चकरा गई । लेकिन बडी वाक की निपुणता के साथ बोली मालती, तुमको कितनी बार में चेता चुकी हूँ कि दूसरा बच्चा तुम्हारे लिए प्राणघातक होगा, लेकिन तुम मेरी बात को रत्ती भर भी अहमियत नहीं देती । मालती आप ही नीची कर सहमती हुई । फिर बोली मैं क्या करूँ? यह सुनकर सुनैना का धैर्य टूट गया । उसने आंखि तरीख कर कहा बेटा पति का कहाँ मानना पत्नी का धर्म होता है, लेकिन यहाँ तो तुम धर्म के रूप में पति के भाई की उपासना कर रही हूँ । तुम इतना डरती हूँ । तुम उसकी क्रीम दासी तो नहीं हो । तुम्हारी गृह नेतृत्व का अधिकार केवल तुम्हारी पदक स्खलन ही छीन सकता है जो कि कभी संभव नहीं है । मालती के पिता तो डर माल में भी पत्नी की बात का समर्थन करते हुए कहा क्यों मारती बेटा, तुम्हें भी यही मंजूर है । सुनैना किसी आती हुई बोली अभी क्या बिगडा है चाहे तो इसे नष्ट कर आजाद हो सकती है । दामाजी को तो चाम प्यारा है । आदमी नहीं इसको कुछ होने पर वह तो तुरंत अपना दूसरा क्या कर लेगा? उसका किया जाएगा । जाएगा तो हम लोगों का मालती में धैर्य की कमी नहीं थी । अच्छा बुरा सब कुछ सुनते रहना उसका स्वभाव बन चुका था । भला ऐसी ज्ञान मरीदी बेटी किस स्वार्थी माँ बाप को पसंद नहीं आएगी इसलिए क्रोधित हो । सुनैना बोली जो मर्जी करूँ मेरे भाग्य में चैन से जीना नहीं लिखा है तो इसमें तुम्हारा क्या दोष है? फिर गंभीर भाव से बोली आज मुझे समझ में आ रहा है कि हमने तुझे अपने पास रखने का जो निर्णय लिया था वो गलत था । मालती झुंझलाकर बोली आप क्यों मेरे पीछे पडे हुए हैं आप लोग अपने अपने फिक्र कीजिए, मुझे छोड दीजिए । अगर तैंतीस में मारना ही लिखा होगा तो मर जाऊंगी । मालती पहली बार अपनी कामनाएँ भविष्य की ज्वाला में झुलस टी देख कांप उठी और भीरूता का कच्चा धागा जो उसके मन दिमाग को जकडकर बांध रखा था तोड दी । उसने माँ की ओर आग्नेय नेत्रों से देखते हुए कहा माँ तुम्हारी दूध का स्वाद तो मैं आज भी नहीं भूले हूँ लेकिन मैं तुम्हारी ही जिसमें का हिस्सा हो या तुम भूल गई । सुनेना मालती के अंशु सिंचित गालों को अपने दोनों हाथों में लेते हुए बोली मालती! मैंने तो बस इतना ही कहा ना कि ईश्वर को दूसरे संतान देने की इतनी जल्दी क्या थी? तुमने तो उससे कभी प्रार्थना भी तो नहीं की थी । खेल चलो छोडो जो होना है होगा । ऐसे भी कोई वृक्ष जल और प्रकाश से बढता है । पवन के प्रबल झोंके से सुदृढ होता है, मजबूत होता है । इसी तरह साहस और हिम्मत का विकास भी दुःख के आहतों से होता है । मैं जानती हुई संसार में सबसे बडा अधिकार सेवा त्याग से ही मिलता है । तुम्हारा आदर्श कभी विलास नहीं रहा मगर ये भी सही है कि आमोद प्रमोद को होम कर देने से वैवाहिक जिंदगी नहीं चल सकती । वंश को आगे ले जाने के लिए वंश का उत्तराधिकारी देना भी एक सेवावृद्धि है और यही वृद्ध वर्ष सीमेंट है जो दंपति को जीवन पर्यंत प्रेम और साल चोरी में जोडी रखता है । जिस पर बडे बडे आघातों का कोई असर नहीं होता । जहाँ सेवा व्रत की कमी है वही विवाह विच्छेद है । परित्याग है अविश्वास है । मालती माँ की बात सुनकर उत्तेजित हो बोली अगर मर्द नालायक है तब वाकपटुता में प्रवीण सुनैना औरत जितनी क्षमाशील होती है, बदले में पति से उसे उतना ही आदर मिलता है । तुमसे उसे जितनी भक्ति है, उसके बाल पर तुम सरलता से उसे सीधा कर सकती हूँ । पर अभी वह सब तुमको कुछ नहीं सोचना है । मैं होना फिर तुम्हारे पिता भी तो कुछ नहीं होगा, सब ठीक हो जाएगा । मालती यह सोच सोचकर मारी जा रही थी की दुनिया में मेरे सिवा कौन प्राणी ऐसा निर्णय जो होगा जो इस दिशा में भी जिंदा रहा होगा । मालती अब तक जिस संदेह की आग में भस्म हो रही थी, अब शब्द गुड बेकसी धधक में लगी कर्तव्य की वेदी पर वहाँ अपनी सारी कामनाएं होम कर चुकी थी । हृदय हो रहा था, लेकिन मुख पर हंसी का रंग लिए खडी सोचती रही । अब तक सारी चिंताएं मुझे थी । मगर अब पति को भी बताना होगा कि अब मुझे यहाँ नहीं रहना । मालती दो महीने तक इसी उधेडबुन में पडी रही । वह तय नहीं कर पा रही थी कि पति को बताना ठीक होगा या गलत । उसी ना खाना अच्छा लगता न सोनू उस पर दिनभर घर का काम काज से परेशान हो चुकी थी । तबियत सात नहीं दे रही थी । चक्कर खाकर बैठ जाना आम बात हो चुकी थी । एक दिन इसमें माँ से कहा माँ, तुम्हारी दामाद का भेजा इस महीने का पैसा तो आ चुका होगा । सुनेना अचंभित हो बोली हाँ मगर क्या बात है? मालती मुझे कुछ पैसे चाहिए । सोचती हूँ डॉक्टर को दिखा लो । पैसे की बात सुनते ही सुनैना भडक गयी । चिल्लाकर बोली तुम्हारे पति ने उतने ही पैसे भेजे हैं जितना तुम्हारी गर्भवती होने से पहले भेजा करते थे । वे सभी पैसे खर्च हो चुके हैं तो मैं काम करूँ । दामाजी को फोन कर कुछ पैसे मंगवा लो । मालती समझ गई । आज तक मेरे माता पिता मुझे अपने पास रखने के लिए क्यों इतने परेशान थे । अब मुझे अपने मान सम्मान के लेने से अपनी आत्मरक्षा के लिए इस घर को छोडना होगा । मालती घर तो नहीं छोड सकी । पैसे के अभाव में दवाई के बिना एक दिन उसने दुनिया ही छोड दी ।

स्वर्ग-सुख - 4

ऍम पिता हरिविलास के अचानक स्वर्ग सिधार जाने के बाद हरभजन बहुत अकेला हो गया था । वह भूखा प्यासा लगे । बदल थकान से चूर मानव बरसों से वीरानों में आबादियों की खाक छान रहा हूँ । तलवे कार्टून से छल दी हुए शरीर में हड्डियाँ ही हड्डियाँ अपने काम पे कदम को संभालना सका और वही सडक के किनारे गंदे नाले के पास बैठ कर सोचने लगा मनुष्य की चिता जलकर बुझ जाती है । मार्टिस मिल एकाकार हो जाती है, लेकिन उसे चाहने वालों के दिलों में बहुत उसके खून मजे संग मिलकर धू धूकर तब तक चलता रहता है जब तक उसकी सांसे रहती हैं । ऐसा क्यों? उसके मरे पिता की बुझी चिता फिर से धधक उठी जिसके आलोक में हरभजन के दिल का पवित्र भावना नमक उठा, चिंता की लगते उसके गले से निपट गई वह । फिर से एक बार पिता की चिता अग्नि में भस्म होने लगा । बेजान बदहवास वहाँ से उठा और घर की ओर चलने लगा । जो जो उसके कदम बढ रहे थे उस की हिम्मत बढती चली जा रही थी । उसे लग रहा था आज मैं अकेला नहीं । संघ मेरे पिता हैं जो मुठ्ठीभर रात मेरी हथेली पर रखकर कह रहे हैं । हरभजन ये जीवन बडा कीमती है । इससे कीमती और कुछ नहीं । इसे यू ना मिटाओ अपने पास ही मतलब जानती हूँ । जिसके पास हिम्मत है बस समय के ऊंचे से ऊंचे पहाड पर भी चढ जाता है । हरभजन घर पहुंचे तो देखा उसकी माँ यशोधरा एक मैली फटी साडी पहने दरवाजे पर खडी उसके आने की राह को हसरत भरी ने कहा से ताक रही है चेहरा शोक और चिंता में डूबा हुआ लडखडाती हुई वह हरभजन के पास आयु रोती हुई पूछे । अब तक तो कहा था बेटा पति को तो मैं पहले खो चुकी हूँ । एक फॅमिली जिसके साथ मैं जीने की हिम्मत जुटा रही हूँ तो मुझ से दूर जाने की तैयारी करने लग गए । मैं तो तुम्हारे पिता के साथ ही चली गई होती लेकिन लेकिन स्वार्थ और कर्तव्य ने मुझे मरने नहीं दिया । हर पचिम व्यथित कंट्री से मिमी आते हुए बोला ही माम मुझे माफ कर तो आइंदा ऐसा नहीं होगा । माँ यशोधरा आंखों के आंसू पोछकर बोली ना लाए । आकाश में उडने वाले पक्षी को भी शाम होने पर अपना बसेरा याद आता है और वहाँ पे घोसले में लौट आता है मगर तू इतनी रात गए कहाँ पडा रहता है घर में एक विधवा माँ है, यह भी तो भूल जाता है । माँ की बात सुनकर हरभजन आप उठा उसके अंतस्तल की गहराइयों में एक लहर से उठी । उसे लगा कि पिता के जाने के बाद ऐसे ही माँ का जीवन टूटी हुई नौकाओं की भर्ती हो चुका है । उस पर मैं उसे इतने कष्ट दे रहा हूँ । क्या एक संतान का यही कर्तव्य है कि पिता के शोक में जन्म देने वाली मां को भूल जाए? हरभजन के सामने कठिन समस्या थी । आत्मा स्वर्गवासी पिता के रूप के साथ थी तो धर्म विधवा माँ के साथ न वो पिता की याद को छोड सकता था । नही मातृ प्रेम को वह जानता था । धर्म का वेग हृदय को हिला देता है तो यादि हिल कोरकर रख देती हैं । सोच कर हरभजन की आंखें डबडबाई सोचने लगा । अनजाने में ही सही जो मैं कर रहा हूँ या बूढी मां पर एक प्रकार का अत्याचार है । मेरे पितृ पी और भक्ति ने माँ पर बहुत अत्याचार किया, लेकिन अब से ऐसा नहीं होगा । अब से माँ को खुश रखने के लिए वह सब कुछ करूंगा, जो मुझे करना चाहिए । बेटी को गुमसुम बैठा देखना यशोधरा को उसकी सरलता पर दया आ गई । उसने अपराधी भाव से मुस्कुराकर कहा, तुम कल्पनाओ के संसार में रहती रहती, प्रत्यक्ष संसार से अलग हो गए । न स्नान, न खाना, न किसी से बातें करना । मैं ये तीन सरलता जरूर अच्छी चीज है । पर इसका अर्थ या नहीं कि आदमी फूहड बन जाएगा । अब उठो भी भोजन का समय निकलता जा रहा है । हरभजन को पहली बार इस कथन में कुछ सार जान पडा विद्वजनों कि भारतीय उसे भी अपनी भूल को स्वीकार करने में विलंब हुआ । बहुत बडी तेजी से उठो और एक गमछा लेकर कोई पर स्नान करने चला गया । कुछ देर बाद जब लौटा देखा माँ खाना परोस रही है वह झटपट दो गिलास पानी भर लाया और माँ के साथ खाने बैठ गया । खाना खाते खाते हरभजन ने माँ से पूछा माँ प्राणी मन के भीतर कभी कभी किसी किसी के लिए इतना आदर और सम्मान क्यों आ जाता है कि उसके बिना जीवन निरर्थक लगने लगता है? यशोधरा बोली, बेटा ये एक प्रकार की सुविधा है । यू कहो आत्मविश्वास की मंजिल । हम सभी उस महान सत्ता के सूक्ष्मा जो समस्त ब्रह्मांड में व्याप्त है । देश में पूर्ण के गुणों का होना लाजमी है । हम इसे बुरा नहीं मानते । बुरा तो तब है जब हम किसी के सामने सत्कार और पीछे उसकी उपेक्षा करते हैं । आस्था की भीप चट्टान की तरह अडिग होना चाहिए न कि बालू की दीवार की तरह कमजोर जिसे जब चाहे गिरा दे मगर इसका अर्थ या नहीं होता कि इसकी आड में हमें जगत को भूल जाएँ । जो प्रत्यक्ष हमारे सामने हैं । यशोधरा अपनी नजर के सामने अपने बेटे को इसका डर पिता के वियोग में घुट घुट कर जीता देगा । किसी अनहोनी की कल्पना कर उसका प्राण सूखा जा रहा था मगर उसमें खुलकर कहने की हिम्मत नहीं थी । उसने बडे धीरज से कहा बेटा, मैं जानती हूँ तो महाराष्ट्र गए अपने पिता के लिए कितना व्यथित हैं । मगर तुम्हारे पास अपने भावों को व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं है क्योंकि तुम एक बार बार रोना आता है क्यों? तो गुमसुम जहाँ तहाँ बैठे आती जाती लोगों को टकटकी लगाए निहारते रहते हैं उनमें तुम किसी ढूंढते हो बेटा यूरो कर अपने आंसू से जीवन की सूखी नदी को भर कर उसके चारों तरफ हरियाली नहीं लाई जा सकती । जानते हो मेरी भी इच्छा होती है कि जहर पी लूँ । विधाता को संसार, दयालु, दीनबंधु और न जाने क्या क्या उपाधियां देता है । मैं कहती हूँ उससे निर्दयी, निर्मम मिनिस्टर कोई शत्रु भी नहीं हो सकता । पूर्व जन्म का संस्कार केवल मन को समझाने की चीज है । जिस दंड का हेतु ही हमें ना मालूम हूँ, उस दंड का मूल्य ही क्या बहुत जबरदस्त की लाठी है, जो आघात करने के लिए कोई कार्य नगर लेती है । अब हमारी इस निर्जन काटो भरे जीवन प्रदेश में दूर दूर तक कहीं रोशनी नहीं है । इसलिए हमें तुम्हारे पिता की मृत्यु की दिव्य ज्योति के सहारे ही अकेले चलना होगा । जानती हूँ अभी तक जो सागर के हिलोरों का अंतर कहाँ होता है? ध्वनि कहाँ वायु भग्न हो जाती है कोई नहीं जानता है ठीक उसी तरह मानव जीवन, उस हिलोर के सेवा उस ध्वनि के सिवा और कुछ नहीं उसका अवसान भी उतना ही शांत, उतना ही अध्यक्ष हो तो क्या आश्चर्य बेटा मृत्यु जीवन यात्रा का एक विश्राम मात्र है, जहाँ यात्रा का अंत नहीं, नया उत्थान होता है । विराम और विश्राम से यह बुझने वाला दीपक कुछ देर और प्रकाशमान रहता कौन नहीं चाहता हूँ, लेकिन चाहने भर से कुछ नहीं होता हूँ । जलना बुझना सब उसके हाथ है । हमारे हाथ कुछ नहीं तो आप का महीना था । आकाश में जल शून्य की टुकडे इधर से उधर दौड भाग कर रहे थे । हरभजन उनमें खंडों की बौखलाहट को अपने अशांत मन से जोडकर चिंतित हो उठा । उसे लगा ये भी उसी के जैसा ही व्यथित भाग्य का मारा है, जो लाख जतन के बावजूद भी एक टुकडे दूसरे से मिल नहीं पा रहे हैं । उस की आशंका हो रही थी कि यह सब दंड अपने पापों का फल है । मैंने भी कोई पास क्या है, जो मेरे पिता मुझसे बिछुड गए, लेकिन पडोस के इसमें ही लाल को देखो । दूसरों का गला दबाकर सुबह से शाम तक दुकानदारी के नाम पर पैसे घर लाता है । उससे तो कोई दंड नहीं मिलता । ऐसा हरभजन की मुद्रा तेज हो गई । उसकी बुझी हुई आंखें चमक उठीं । बेहद कि नसीब तन गई । वह दौडता हुआ माँ के पास गया और की की आते हुए बोला मां पिता जी का जीवन क्या एक दीर्घ तपस्या ही तो था । दो जून की रोटी के लिए सुबह से शाम तक मुखिया के दरवाजे पर लकडी चीरने के साथ साथ अपना कलेजा फाडते रहते थे । अपने घर दीपक न जला पानी की चिंता में दूसरों के घर से आ रहे दीपक की धुंधली रोशनी में बैठकर ईश्वर को भेजने वाले मेरे पिता ने कभी सुख को नहीं देखा । क्या भी, जो चाहते तो उसमें ही लाल चाचा की तरह बेईमानी का पैसा कमा कर सुखी नहीं रहते । अवश्य रहते लेकिन उन्होंने सादा ही ईमानदारी को अपने जीवन जीने का उद्देश्य मना लेकिन मैं ऐसा नहीं करूंगा । सद्गुणों की चर्चा आत्मा को शांति तो पहुंचा सकती है, पेट की आपको नहीं बुझा सकती । बेटी की इस बात से यशोधरा चिंतित हो बोली बेटा, तेरी मानसिक दुर्बलता तुमसे यह बुलाई जा रही है तो तुम जाकर सोचा सुबह इसपर बात करेंगे । हरभजन अपनी मनोव्यथा के बोझ तले दबा बिस्तर पर जाकर लेट किया लेकिन उसकी आंखों में नींद कहाँ थी? वार सास के साथ चिंता की भीषण भारत जिसने आज छह महीने से उसकी आत्मा को दबा कर रखा था, उसकी सारी मनो गया था जो उसके भीतर ज्वाला बन उसे जलाकर भस्म किए जा रही थी । उसकी सारी दुर्बलता मानव आज उड गई और जो एक भरपूर आत्मविश्वास लेकर खडा हो गया । मनी मन का अब तक पैसा मुझे चकमा दिया है, अब उसे मैं दूंगा । यह सोचते उसकी आंखों में भाग्य से लडने का जितना नशा था, जिसमें में उतनी सफलता नहीं थी जो योगियों के मेलन की रात बटोहिया के पहाड की रात होती है कि वो रात इस विचार में कटी सुबह उठा किसी अपूर्ण सात को अपने ही हमें छिपाए हुए वह घर से निरुद्देश्य दिशा की ओर चल पडा जो मृत्यु से पहले मनुष्य माल की सारी एशिया, सारा भेदभाव, सारा द्वेष नष्ट हो जाता है कि उसने संसाल से अपने सारे गिले शिकवे भुला दिए और अपने पिता की पुनरावृत्ति श्रद्धा के सामने अपनी साधु उसकी इस मृति लिए आंसू से धुले स्वच्छ मन को अवरुद्ध कंठ से कहा मैं अपने अरमानों की समाधि पर तुम को और रोने नहीं दूंगा । माना कि पिता के बगैर में जीवित नहीं रह सकता, केवल तडक सकता हूँ । लेकिन जो टी का भाव तडपन की आंधी में भी काम नहीं होता तभी पीछे से किसी की ऋद्धये विदार्इ का बाजार कोई उसे नाम लेकर रुकने की गुहार लगा रहा था । उसने मुडकर देखा तो ठिठककर खडा हो गया । पास जाकर देखा तो जिसे वह छाया समझ रहा था वह उसकी माँ यशोधरा थी जो पीछे पीछे दौड दौड कर हाफ नहीं थी । मांग को देखकर हरभजन की आंखे आदमी हो गई । हरभजन का मातृ स्नेह जीवन पाँच की अंधेरे में मानव दीपक के समान उसकी चिंता जर्जर आकृति को शोभा प्रदान करने लगी । उसने माँ की गली से लगभग महसूस किया कि स्वर्ग सुख और कहीं नहीं इसी धरती पर है और वह भी माँ के चरणों के नीचे वहाँ के चरणों पर गिर पडा और बोला मेरी नालायकी ने तुम्हें बहुत दुख दिया है । मुझे माफ कर तो इस सक्षम में अपराध की सजा मुझे ऊपर वाला क्या देगा? यह तो नहीं मालूम लेकिन माँ के कदमों के नीचे जन्नत हैं या आज हुआ मालूम?

बिरजुवा के माता-पिता - 5

बिरजु हुआ कि माता पिता संध्या हो गई थी । अब तक जो लोग खेत खलिहानों पर काम के लिए गए हुए थे, सभी अपने अपने घर की ओर भागे चले जा रहे थे । ठंड पिशाच की तरह धरती पर बढती चली आ रही थी आकाश फिर काली बादल का जमावडा बढता जा रहा था । जब कभी बारिश की संभावना थी, उसी चिंता में कल का लाभ कैसे चलेगा? सोच चाचा लक्ष्मण सूखे घास फूस को बटोरने लगे और आप ही आप बुदबुदाते हुए बोले ऐसे ही क्या काम? ठंड धमनियों में रक्त की जगह हिम बह रहा है उस पर अब बारिश भगवान ही बचाएगा । तभी उन्होंने देखा पर रोज का बिल हुआ । एक नन्हे बच्चे को सीने से लगाए अपनी ही धुन मित्तल लीन होकर कहीं जा रहा है ऐसे मौसम में जहाँ लोग बाहर से घर की ओर भाग रहे हैं और बिजुआ घर से बाहर वो भी एक नन्हे बच्चे को गोद में लिए सीने से चिपकाए । सबको चाचा को अटपटा लगा । चाचा ने बिरज हुआ को आवाज देकर अपने पास बुलाया । पूछा ऍम हुआ ऐसे मौसम में तो मैं दूधमुंहे बच्चे को लेकर कहा जा रहे हो आओ अलाव जल रहा है । थोडा ताप लो, थोडी गर्मी बच्चे को भी मिल जाएगी देखो वो कैसे शहर के पत्ते की तरह काम कराएं । बिरज हुआ अलाव के पास बैठे हुए पूछा चाचा की आपको मालूम है कि हमारे गांव के छोड से होकर जो नदी बहती है पौष पूर्णिमा की रात वहां लोगों का जमावडा लगता है आपने कभी देखा है चाचा अचंभित हो बोला ऐसा मिला बिरज हुआ पौष की पूर्णिमा की पूर्ण चांदनी में जब नदी की धारा संचालन की शीतल रोशनी मिलती है जानते हैं चाचा देखने में वह चांदी के गली जैसा दिखता है । लगता है नदी जतनी जडित आभूषण पहने नीचे स्वरों में गाती चंद की तरफ सर झुकाए नींद में सोते वृक्षों को अपना नृत्य दिखा रही है । बेटियों के मुझसे प्रकृति की उस मादक शोभा का वर्णन सुनकर चाचा मस्त हुए चले जा रहे थे । मान उनका बालपन अपनी सारी क्रीडाओं के साथ लौट आया हूँ । तभी बच्चे होने लगा जिसे सुनकर चाचा में जागरी देवताओं का भाव आ गया । बोले बेजू क्या ये अच्छा होता? बच्चे को तुम इसकी दादी के पास छोड देते हैं । दादी का भी जी बहलता और ये अभी ठंड से बचा रहता । चाचा का ये वचन तोपों के गोले की तरह जो दीवार तक कुछ छेद कर डालता है । बिरजू के विधेयको छेद कर दिया । बेचू कोषण मूर्ती बन बैठा रहा । फिर कुछ जवाब ना देकर मुन्नी को कुछ करते हुए सर झुकाकर मानी । जूते पड गए । जाने लगा । बिरजू का ऐसा व्यवहार देखकर चाचा का आरोप मुखमण्डल आपकी भर्ती उनके अंतर पट को जलाने लगा । चाचा ने सर्च नेता से उसे रोककर पूछा बिरजु, तुम्हारे माता पिता तीर्थ पर निकले हैं क्या? इधर कुछ दिनों से वे लोग देखते नहीं है, वरना दो चार दिनों में एक बार दर्शन तो हो ही जाए करता था । बिरजू ने निश्चित भाव से कहा हाँ, कुछ ऐसा ही समझो चाचा गर्वपूर्ण नमृता से पूछे । कब लौटेंगे लोग? बिरजु अपना गंजा सिर हिलाकर बोला पता नहीं फिल्म बनाकर कहा जब लौटेंगे तब देखेंगे । कोठी का धान तो है नहीं जो बंद कर रख दूंगा । चाचा बिजुआ का हावभाव देखकर विद्रोह का भाव धारण करते हुए बोले वहाँ बेटा जो तलवार कभी केले नहीं कर पाती थी । आज तलवार नी किसान पर चढकर लोगों को काटने लगी । किसी ने सच कहा है । गुड खिलाकर जान लेने वाले की अपेक्षा जहर खिलाकर मारने वालों की संख्या कम है । बिरजू अपनी योग्यता, दक्षता और पुरूषत्व पर इतना बडा आक्षेप कैसे सह सकता सो उसमें भी कह दिया ठीक है चाचा मैं गवाह भी मूर्ख हू । फिर आप अपने दरवाजे पर मुझे बुलाते क्यों? चाचा झुंझलाते हुए बोले बिरजु बे बात की बात मत बनाओ मगर तुम्हारी जानकारी के लिए ये बता देना चाहता हूँ की अन्य यात्राओं की तरफ विचार के भी पडाव होते हैं । तो मैं पडाव को छोडकर दूसरे पडाव पर तब तक नहीं जा सकते जबतक पिछले पडाव के इतिहास को प्रत्यक्ष कोई सबूत नहीं दे देते हैं । जानती हूँ जिस माता पिता को हमारे शास्त्र में देवता का दर्जा दिया गया है उसके लिए तुम्हारी विजय में मात्र दया है, प्रेम नहीं । और जब प्रेम नहीं तब गया जैसे सुना है जो जिस से प्रेम करता है उसकी आतुर नम्र चांस सरल मुद्रा सादा ही प्रेम करने वालों के समक्ष फिरा करती है तब उस से दूर रहना मुश्किल हो जाता है । चाचा की बातें सुनकर बिरज हुआ की आंखों में चाचा के लिए तिरस्कार की ज्योति चमक उठी उसका पुरूषत्व लज्जित हो उत्तेजित हो था उसने दृण सफर में बुदबुदाया कहाँ भाषण अच्छा देख लेते हैं फिर आऊंगा सुनने अभी के लिए धन्यवाद । चाचा ने भी मन ही मन का इतनी देर तक मुझको जो तुमने बर्दास्त क्या उसके लिए शुक्रिया । बिजी हो जाने के बाद यह बात चाचा के जीते हुए लहरों की भारतीय उठती गिरती रही कि बिरेझर के पास विलास के साधनों की कमी नहीं है । अव्वल दर्जी का मकान है, जमीन है । अपार दिन का मालिक है तो क्या? संपत्ति की ऊंची दीवार ने माँ बेटी को दूर कर अलग कर दिया । एक दिन चाचा सैर करके लौट रहे थे तभी रास्ते में उनकी मुलाकात उनके पुराने मित्र से हो गई । दोनों में राम सलाम हुआ, गले मिले, हाल समाचार जाना चाचा फिर मिलेंगे बोल कर जब जाने लगे उनका मित्रा हद बुद्धि सर खडा संज्ञाहीन होकर चाचा को जाते हुए देखता रहा । चाचा नहीं जब पलट कर देखा उनको लगा मेरा मित्र मुझसे कुछ कहना चाह रहा है । वे जल्दी जल्दी कदम बढाते हुए मित्र के पास आए और पूछे मित्र कुछ कहना है मित्र दुख प्रकट करते हुए बोला एक बार तुमको बताना भूल गया था । चाचा बोले तो बता डालो ना देर किस बात की । मित्र ने बताया जानते हो वो जो अपने मोहल्ले का बिल हुआ है ना उसने माँ बाप को वृद्ध आश्रम भेज दिया । चाचा ने अचंभित हो पूछा का क्यूँ मित्र या सब तो नहीं पता लेकिन हाँ रूप राशि की खान सुषमा जिस दिन से बिरज हुआ की पत्नी बन गए बिरज बुआ के घर कदम रखी । उसी दिन से वह अपने सास ससुर के साथ घर में काला शुरू कर दी और एक समकोण बनाने वाली रेखाओं की भर्ती उन दोनों से अलग हो गई । इतना तक तो ठीक था मित्र ऐसा ही है तो तब हो गया जब मेरे जुआ के सामने उसकी पत्नी सुषमा चाची से मारपीट करती थी और विजय हुआ चुपचाप गम सादे देखता रहता था । चाचा हुवा खोकर बोले तो गांव के लोग । वे भी चुप रहे । मित्र ने कहा बहु के निर्णय की अपील कहीं नहीं थी तो परिस्थिति का यथार्थ ज्ञान होते ही दोनों पति पत्नी यानी फिर हुआ के माता पिता अपने कर्तव्य का निश्चय कर लिए । जानते हो मित्र वे उन लोगों में नहीं थे जो अपने स्वार्थ के लिए अपना अच्छा बुरा बिना सोचे बहु के उपमुख् कातालीना करते । उनका कहना था चाहे जैसी भी नौकरी करो, पहले अपनी आत्मरक्षा करूँ । वे लोग भी बहुत आत्मविश्वास भी मानी थी । तभी अपनी आत्मरक्षा के लिए खुद ही घर छोड कर चले गए । चाचा पूछे कहाँ मित्र ने बताया नहीं मालूम चाचा गांव की पंचायत शिकायत क्यों नहीं किया । मित्र वाणी को अगर सत्य की ताकत ना मिले तब सबके भी गूंगा हो जाता है ।

प्रायश्चित - 6

ऍम बसंत कि सपने सजोये जीवन जीने वाले घनशाम के घर एकदिन सचमुच बसंत बनकर उसका प्रपौत्र रूप देव जन्म लिया । उसे गोद में भर्ती ही उसके जोश, बाल, दया, साहस, आत्मविश्वास, गौरव, मानव, पवित्र उज्वल और पूरन हो गया । जब भी वह रूप देव के सुंदर सुगठित शरीर को देखता था, उसका उदास मन चमक उठता था । लेकिन दूसरे ही पल घर की आर्थिक तंगी का खयाल कर बलरूप देख के भविष्य को सोच कर रो पडता था । रूप देव भी अपने दादा घनश्याम से बेहद प्यार करता था । दादा के कांदे से झूल रहे झोले को वह जब भी देखता था दादा की गले से लिपट जाता । वह जानता था दादा जी बाजार से लौट रहे हैं । जब भी झोला उनकी कंट्री से लटक रहा है, इस झोले में टॉफी है । जब तक वह ट्रॉफी नहीं ले लेता था, डाॅन दू की तरह मंडराते रहता था और अवसर पार्टी टॉफी निकालकर खाने बैठ जाता था । लेकिन आज पहली बार रूप देव ने देखा । दादा बाजार से लौटकर अपने झूले को सर के नीचे तकिया बनाकर आंगन में बिछे खटोले पर चुप चाप आंखे बंद कर लेट गए । रूप देव भी वही दादा के बगल में दादा की आंख खुलने की आस लिए बैठे बैठे हो गया । यह सब देखकर नीरू यानी घनश्याम की पत्नी को चिढाते वह होकर बोली घनश्याम तुम सो रहे हो ये अभी कोई सोने का वक्त है । उठो देखो तुम्हारे बगल में कौन सो रहा है? घनश्याम ने आंखें खोलकर देखा तो उसकी आंखे भराई वह यही तो बोला माफ कर दे बेटा, मैं अपनी निश्चितता की वेदना के अंतर्नाद में तुझे भूल गया था । वे रूप देख की तरफ आर्थिक दृष्टि से देखते हुए बोले ऍम वीरू मैं आज एक अपराधी मैंने एक बहुत बडा अपराध किया है तो वह भी ऐसा अपराध जिसकी शर्मा मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर, गुरुद्वारा कहीं नहीं है । मीरू ने अचंभित हो पूछा कैसा प्राप्त तुम किसकी बात कर रहे हो? घनशाम दुखी हो बोला जिससे मैं कसाई की तरफ से देखकर रोड पर पडता हुआ छोड आया । मैं उसकी बात कर रहा हूँ । नीरू घनश्याम की बात समझ नहीं आ रही थी । वकील हूँ बोली मुझे वाली बुझाते रहोगे या कुछ खुलकर बताओगे भी । मगर घनश्याम का बुझाओ बाल जारी रहा । आगे बोला निर्मला नीरू फॅमिली में नहीं हूँ । जो कहते हैं स्त्री और पुरुष में समान शक्तियां हैं, उनमें कोई भिन्नता नहीं है । मैं कहता हूँ स्त्रीपुरुष से उतनी ही श्रेष्ठ है जितना प्रकाश अंधेरे से मनुष्य के लिए शर्मा त्याग और अहिंसा जीवन के जो उच्चतम आदर्श है । स्त्री इन आदर्शों को प्राप्त कर चुकी है और पुरुष धर्म, आध्यात्म और ऋषियों की शरण लेकर भी उस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए सदियों से जोर मार रहा है परन्तु आज तक सफल ना हो सका । नेहरू को लगा जैसे पहली बार उसने घनश्याम को अपने गृहस्थी के अखाडे में पटखनी देकर आकाश तक का दी । उसने दीन स्वर में पूछा हाँ तो तुमने अब तक ये बताया नहीं कि वह बच्चा कौन है? घनश्याम जिसे तुम सडक पर घायल अवस्था में छोड आए घनशाम बिना कुछ बताए आगे बोला नीरू मैं प्राणियों के विकास में इस तरीके आस इनको पुरूषों के आसन से उसी तरह श्रेष्ठ समझता हूँ जिस तरह प्रेम, त्याग और श्रद्धा को हिंसा संग्राम से श्रेष्ठ माना जाता है । नीरू की धैर्य का बांध टूट रहा था । उसने हिंदू पूछा अगर नहीं बताने का निश्चय कर आए हो तो छोडो मुझे बहुत कम में मैं जाती हूँ । घनश्याम नीरू को रोकते हुए बोला जाना मत नहीं तो तुम भी मेरी तरह पचता होगी । मेरे मैंने हाथ जोडकर बोली अब बताइए भी । घनश्याम एक लंबी सांस फेंकते हुए बोला, नेहरू, आज में बाजार से लौटते वक्त ड्यूटी सूरज की आलोप में एक बाल भी खारी के जीते । हम उसको गुम होते देखा, पर कुछ नहीं कर सका । तभी से मुझे लगता है मैं कोई अपराधी अपनी आंखों से आप चुराई चलता हूँ । फिर अफसोस कर बोला, काश! मैंने उसे डॉक्टर के यहाँ पहुंचा होता, लेकिन अब क्या होगा? पता नहीं जिंदा भी है या नहीं । निर्मला यानी नीरू घनश्याम की आंखों में एक विचित्र दर्द को तैरती देख रही थी । उसी लगभग घनशाम जिस तरह थे उस बच्चे की याद में कहीं इसे डॉक्टर के यहाँ ना ले जाना पडे । उसमें घनश्याम को समझाते हुए कहा, अब तो बहुत देर होगी, फिर भी अगर तुम्हें देरी से ही आदमी जाएगी तो क्या काम है? लोग तो उम्र भर गिरकर संभलना नहीं चाहते । ऐसे उत्तरदायित्व का ज्ञान बहुत है । हमारी संकुचित व्यवहारों का सुधारक होता है । मेरा दावा है कि आज के बाद तुमको कभी पछताना नहीं पडेगा, क्योंकि तुम्हारी जमीन जा चुकी है । पुरानी गलती ही ज्ञान बनकर तुम्हारा पथप्रदर्शक रहेगी । घनशाम निर्मला की ओर देखकर प्रकृतिस्थ होकर कहा, नीरू मैं अत्याचारी हूँ, जो समाज के भय से अपने कानों पर हाथ रखकर आपके कर चलाए जा रहा हूँ, जिसे दूसरा तो सुनता है पर मैं खुद ही नहीं सुन पाता हूँ । कारण मैंने अपने दोनों कान बंद कर रखे हैं अन्यथा उसकी जीत मेरी कलेजी को चीट कर मुझे रुक जाने के लिए अवश्य मजबूर कर दिया । बात करते करते अचानक घनश्याम ने देखा डूबती सूरज की कमजोर गिरने उसके पास बडे शीशे पर तडप रही । उसने झटपट अपने कंधे पर का गमछा उस शीशे पर डाल दिया जिससे कि उसका तड अपना बंद हो गया । किडनी गमछी पर आकर स्थिर हो गई । मान लो, अब उसमें भी ताकत नहीं बची की तरफ भी सके । यह सब देखकर घनशाम को बीते कल की घटना स्मृति हुआ । उसी लेगा मासूम भी जो कल मेरे ऑटो से धक्का खाकर बीच सडक पर कटी पेट की तरह गिर गया था । कुछ दिन इसी तरह तडपा होगा और फिर शांत हो गया होगा । नीरू संज्ञाहीन सी घनशाम की तरफ तक लगाए उसकी बातों को सुन रही थी वह व्यथित हूं । वेदना स्वर में बोली मैं समझ रही हूँ घनशाम तुम्हारी दर्द को जो अपराध तुमसे अनजानी अवस्था में हो गया उसके लिए खुद को अपराधी बहुत कर रहे हो । लेकिन घनश्याम अब उन घटनाओं को धूल जाने की कोशिश करूँ । इतना इस समय बीत जाने के बाद अब तुम चाहकर भी उस मासूम की मदद नहीं कर सकते । मगर एक बात याद रखो, भूत का भार आदमी का मन ही नहीं कमर भी तोड देता है । इसमें जीवन शक्ति इतनी कम हो जाती है कि इसे भूत भविष्य में फैला देने से भी यह मध्यम नहीं होता तो व्यर्थ में अपनी भूल के लिए पश्चताप के मलबे के नीचे दबे जा रहे हो । बल्कि आइंदा ऐसी गलती न हो इसके लिए तुम खुदा को गवाह रखकर यह शपथ लोगों की ऐसी गलती कभी नहीं करूंगा । तभी अपने मानव धर्म को पूरा कर सक होगी । पश्चताप मोक्ष की प्राप्ति नहीं करा सकता बल्कि मानवता के खयाल को और कमजोर कर देता है । वज्ञानिक जो मानवता को पीस देवज्ञानी नहीं, गोलू है, पश्चताप करती करती, प्राण ही निकल जाए तो देर किस काम का । इसलिए पश्चताप को छोडो बल्कि आगे ऐसा न हो इसके लिए सचेत रहूँ । घनशाम नीरू की बात का बिना कोई जवाब दिए धीरे धीरे उस खटोले की ओर चल दिया जिस पर रूप देव ट्रॉफी की आस लिए हो रहा था । उसने रूप देव को नींद से जगाया चूमा फिर पूछा आज आपको ट्रॉफी नहीं चाहिए । रूटीन खोलते ही ज्यादा की छाती से लगकर गले से चिपक गया । बोला टाटा जी ट्रॉफी दीजिए ना घनशाम झोले से दो ट्रॉफी निकाला और रूप देव की ओर बढाते हुए कहा ये लीजिए ट्रॉफी रूप आतुर हो टॉफियों कि तरफ लपका जिसे अब पालक नजरों से घनशाम निहारता रहा । फिर नेहरू से कहा एक भूल को सुधारने की चिंता में में आज दूसरी भूल कर रहा था । मुझे बात कर दो ।

लांछन - 7

लांछन एक दिन किशोर ने अपने मित्र रमेश से कहा जानते हो रमेश अपना पडोसी कुमार तो यही जानता है कि उसकी पत्नी शीला घोड पति व्रता है । राह चलते उसकी आंखें जमीन पर से ऊपर उठती रहीं । लेकिन उसी या नहीं पता कि शीला का मान रखने वाली चिडिया है जो कभी इस जान तो कभी उसका उसके ऑफिस चले जाने के बाद जब बन ठनकर खिडकी पर खडी होती है तब मोहल्ले के शोध में उसे देख देख कर जानते हो क्या बोलते हैं? रमेश यानी किशोर कर पडोसी रखती । शोषक दृष्टि से किशोर की तरफ देख कर कहा नरक में जाओगे तो ऐसी बातें मुझसे निकालते तो में शर्म नहीं आती । किसी और के बारे में बोला होता तब मान भी लेता तुम शीला बेटी के बारे में बोल रही हूँ । कार्य तुमको ॅ देवी है । देवी ईश्वर की परम भक्त इन नींद खुलते शिवोपासना में लग जाती है । बाहर काली की मूर्ति को नहला धुलाकर फूलमाला चढाकर पहले आरती करती है । बाद अपने पेट पूजा की व्यवस्था करती है तो उस पर या लांछन लगा रहे हो कि वह बच्चे हैं । तुम जीते जी नरक में जाओगे । रमेश की बात खत्म होते ही किशोर जोर जोर से खिलखिलाकर हंसने लगा । किशोर के इस कदर हसने का आशय रमेश को समझने में देर ना लगी । वह समझ गया इस हंसी में व्यंग की कितनी जहर खुले हुए हैं । रमेश कुछ देश चुक रहा । फिर बोला कि अपने जीवन को रस्में बनाने के लिए तुम्हारे पास केवल एक ही उपाय है चलो अच्छा है आत्मविस्मृति जो एक्शन के लिए भी अगर संसार की चिंताओं से मुक्त कर दे तो क्या काम है? रमेश की बात सुनकर किशोर की आंखों से आज झडने लगा वाॅच । शोषक नजरों से रमेश की ओर देखकर बोला तुम क्या सोचते हूँ अपने स्वार्थवश मैंने यह सब बोल कर कुमार की धर्मपत्नी का अहित किया । रमेश गंभीर रूप बोला, बिलकुल ठीक कहा तुमने एक अबला पर लांछन लगाकर जो किया उसके प्रायश्चित में आगे का जीवन मूंग की काली मत होने में लगा दो तो उपयुक्त होगा । रमेश की तरह की शोर तार की कोई व्यवहार चित्र नहीं था इसलिए वहाँ से चले जाने में ही उसने अपनी भलाई समझी । एक दिन किशोर की बेटी सुनीता से अचानक रास्ते में रमेश की मुलाकात हो गई । सुनीता देखते ही दूर से बोली हो चर्चा कैसे हैं? रमेश सकपकाते हुए बोला ठीक हूँ बेटी बाजार जा रहा हूँ । दवाई लाने और मनी का हमारी सभ्यता का आदर्श इतना ऊपर हो चुका है कि अब अपने पिता सामान बडे बुजुर्ग का पैर छूने में घृणा होती है । स्थित बच्ची शीला ये जो देखती घूमेंगे, खींच लेती है और दोनों हाथों से पैर छूकर आशीर्वाद मांगती है । क्या ही कुलीन परिवार से ऐसे ग्रुप को बदनाम करना पाप है । अपना घर तो संभल पता नहीं चला है । दूसरे की बहु बेटियों की निंदा और बदनाम करने दोपहर का वक्त था । कुवैत यानी शीला का प्रतीक रमेश के घर आया और बातों बातों में बताया चाचा शीला कई दिनों से बीमार है इसलिए एक बार चल कर देख लेते । मेरे पिताजी का कहना है कि रमेश चाचा को अगर एक बार दिखा सको तो वह जल्दी ठीक हो जाएगी क्योंकि वे पढे लिखे रहते हैं । उन्होंने रोक दुख की तो पढाई की है इसलिए मेरा आपसे निवेदन है कि एक बार आप चलकर शीला को देख लेते हैं । रमेश मुस्कुराते हुए बोला चलो मैं भी आता हूँ तो अच्छा कहकर घर जाने लगा और मनी मन या सोचता रहा । सचमुच पिता जी ने जैसा बताया था वैसे ही है । हमेशा चाहिए । ऐसे आदमी के लिए धन पूछे हैं वरना पूछते हैं कि मेरी फीस जानते हो, सचमुच सभ्यता से ऊंचा धन का स्थान नहीं होता । जो आदमी पैसे को भगवान समझते है, ये सब भी नहीं है । ऐसे मनुष्य संसार के लिए अभिशाप है और समाज के लिए विपत्ति । रमेश चाचा जब किशोर के दरवाजे पर पहुंचे देखा ऊपर की खिडकियां बंद है । अच्छा हुआ जो खिडकियाँ कभी बंद नहीं होती थी वह बिल्कुल बंद है । उन्हें चिंता होने लगी । उनका विस्मित कदम बढता हुआ आंगन में चारपाई के पास जाकर रुक गया । देखा शीला लेटी हुई है । उसकी आंखें खुली है मगर शरीर अच्छे थे । उन्होंने उसे धीरे से आवाज दी । शीला मैं रमेश चाचा पहचान रही हो । बेटर सुनते ही जाने शीला में कहाँ से वो ताकत आ गयी । वो बिजली की तरह उठ कर बैठ गई । घूंघट निकालकर मुंह ढक लिया और शिकायत के सफर में बोली चाचा जिस निधि को पाकर में विपत्ति को संपत्ति समझकर जी रही थी, जिस दीपक से आशा धैर्य और अब लम्बी पा रही थी, मुझे क्या पता था कि वह मेरे अंधकार में जीवन का दीप नहीं है । उसकी बातों को सुनकर रमेश चाचा विचलित छोटे और पूछा बेटी या तुम को क्या हो गया है? अभी तुम बीमार हो, कमजोर हो । ऐसी हालत में इस कदर की बातें करना ठीक नहीं है । लेकिन शीला जिस विभूति को पाकर ईश्वर की मिस्टर और भक्ति उसके रूम रूम में व्याप्त हो गई थी, विभूति उससे जबरन छिन गई थी । वहाँ अस्थिर नेत्रों से रमेश की ओर देखकर बोली चर्चा आप कहते चित्र को शांति रखो और बताओ तुम को क्या हुआ है? चाचा जी क्या आप भी यही जानते हैं जो मैं जानती हूँ? रमेश निराशा से विकल्प बोला तुम क्या जानती हूँ? बेटी अशक्ति शीर्ष शीला बोली मैं ऍर पतनोन्मुखी हूँ । रमेश समझ गया यह किसने लगाई है? रमेश सम्मान भरे शब्दों में कहा पानी पर जब तक कोई आवरण है, उसमें सूर्य का प्रकाश नहीं पहुंच सकता । अर्थात लज्जा, शील और सभ्यता की लौट दीवार को संस्कारी नहीं तोड सकता या काम तो किशोर जैसा ब्रश टर्निस स्टोरी कर सकता है । शीला आंख नीचे किए बोली मगर वे आपके मित्र हैं । रमेश उपेक्षा भाव से कहा । साथ में विश्व या जानते हुए भी हम उसे दूध पिलाते हैं । भोग लिप्सा आदमी को स्वार्थ ध्यान बना देती है, लेकिन उसकी आत्मा इतनी कम उम्र में इतनी अभ्यस्त और कठोर कैसे हो गई कि एक निरापराध की आत्मा की हत्या करते । मैं उससे अभी जाकर बात करता हूँ । सब ठीक हो जाएगा । शीला ने भर्राई आवाज में पूछा कि आप ठीक हो जाएगा । चाचा आप किसके पास जा रहे हैं? आप तो स्वयं एक डॉक्टर है । दवाइयाँ तो दिए नहीं, मैं कैसे ठीक हो जाऊंगी? रमेश न्याय बुद्धि किसी युक्ति को नहीं स्वीकारता । तुमको मृत्यु के पंजी में पहुंचाने वाला मेरा दोस्त किशोर है । जो पूजा तब रत को अपने जीवन का आधार बताता है । विलास ने उसकी विवेक बुद्धि को सम्मोहित कर दिया है । उसे कभी खयाल भी नहीं आता है कि वह जो कर रहा है, वह आप है । उसके हाथों कितने के घर टूट रहे हैं? कितने बेगुना बे समय मौत पाए हैं । उसे एकांत विचार का अवसर ही नहीं मिलता । बम मनोरंजन के लिए नित्य नया सामान जुटाता है । ये सब कर उसे अपना सौभाग्य सूर्य उदय होता हुआ मालूम होता है । उसके हाथों कितने घरों की बर्बादी हुई, कितने घर लूटे, कितने घर टूटे, उसी खुद भी पता नहीं होगा । मंदिर तो मार्च के बाद किसी प्रकार की चिंता छोड दो । सबकी कर दूंगा की शोर से मिलकर एक शाम ऑफिस से लॉटरी किशोर से रमेश की भेंट हो गई । उन्होंने किशोर का हाल समाचार पूछा । किशोर ने कहा, सब ठीक है, मगर आप कहाँ से आ रहे हैं? रमेश ने बताया, शीला बहुत बीमार है । कमजोरी इतनी है कि दो चार वाक्य बोलने के बाद ही वर्ष फील हो जाती है । दस पांच मिनट अचेत पडी रहती है । कदाचित किसी चिंता की चिता पर लेटी हुई है । यह सब देखने के बाद मुझे भीषण फ्रांस वेदना हो रही है । जमीन शोधित नेत्रों से किशोर की तरफ देखकर आगे बोला, शीला की मनोव्यथा उसकी व्यथा से कहीं अधिक विदारे यह कहते रमेश का चेहरा उतर आया । आंखें बोझिल हुआ बोला तुम नहीं जानते हैं उसमें तो पति व्रता की वेदी पर अपने आपको अर्पित कर रखा है । पति को पास ना पाकर उसे लगता है कि ये घर सुना है । यहाँ अंधेरी का वास है । तब वो उसे ढूंढने खिडकी पर जा खडी होती है ताकि उसकी यादों के चेहरे के उजाले में रह सके और तुमने उस पर लांछन लगाया कि वह बच चलन है । रमेश फिर कोमलता में डूबे स्वर्ग में बोला, ईश्वर ने जिसे विजय पर दी है, वह आदमी का पोशाक नहीं देखता । उसके गुण और चरित्र देखता है तो उनको कैसे समझाओं कि प्रत्येक रानी के अंदर मान सम्मान की शुदा होती है । इसलिए कि यही तो हमारे आत्मविकास की मंजिल है । हम उस महान सत्ता की सुशांत सिंह जो समस्त ब्रह्मांड में व्याप्त है । इसलिए कृति सम्मान, आत्मोन्नति और ज्ञान की ओर हमारी स्वाभाविक रुचि है । मैं तो इस लालसा को बुरा नहीं मानता अर्थात शीला अगर खिडकी के पास खडी रहती है आपने आत्मा उत्सर्ग के लिए ना कि किसी और की चाह में । तभी ऑफिस से लौट रहे कुंवर की नजर रमेश चाचा और किशोर पर बडी वह नजदीक जाकर पहले तो दोनों की पैर हुआ । फिर पूछा चाचा आप दोनों यहाँ कोई बात है क्या? रमेश ओवर का बिना कोई जवाब दिए वहाँ से यह कहते हुए चल दिया की मैं जरा जल्दी में हूँ फिर कभी बात करूंगा । किशोर के चले जाने के बाद रमेश चाचा कुमार को समझाते हुए बोले, मित्तियां संसार रचने वाली प्राणी से दूर रहो । अन्यथा वहाँ आज शीला पर कल तुम पर कुछ ऐसा ही लांछन लगा देगा क्योंकि उसकी कुटिल नीति का साहस दिनों दिन बढता चला जाएगा । उसकी हिंसक मनोवृत्ति और शक्तिवान होती चली जाएगी । रमेश कुछ देर चुप रहा, फिर राहत कंट्री से बोला । शीला की कल तभी पाॅप प्रेम उसकी धर्म पर आया था । उस की पति भक्ति उसके स्वास्थ्य, त्याग, उसकी सेवा निष्ठा कौन से गुण की? मैं तुम्हारी आगे प्रशंसा करो समझ नहीं आता वह पत्ति वंचित होकर सडक पर भटकती फिरी क्या तुम ये चाहते हो? क्या इतनी इनिस्टा, इतना त्याग इतना विमर्श किसी देवी प्रेरणा का परिचायक नहीं है । हम अक्सर दूसरों की बातों में आकर पथभ्रष्ट हो जाते हैं और किसी के झूठ पर पश्चताप करके भोगविलास युक्त जीवन को ठुकराकर फटी हालों का जीवन बिताने के लिए किसी और को अपराधी ठहरा देते हैं । ऐसा करके कुमार तुम दुनिया के सामने न्याय का कोई ऊंचा आदर्श तो नहीं उपस् थित करना चाहते हो । अपनी आंखे तो सही देखती, नहीं तो दूसरों की निगाह से शीला को देख रहे हो, जो घोर बात है ।

उधार का दूध - 8

अच्छा उधर का दूध । गंगा राम एक तपस्वी कि भारतीय पेड के नीचे थका शांत परेशान बैठा हुआ था, पर उसकी शांति में नये राशि की वेदना भरी हुई थी । सागर की हिचकोले थे, आंखों में उमंगों और आशाओं का भस्म था । वह सोच रहा था धूप ही रहने की दिन भी मेरे देवर कम नहीं हुए । शायद कोई अज्ञात ताकत प्रेरक बनकर मेरे साथ रहता था । मेरी गरीबी में बुद्धि शक्ति सादा ही अपनी ओर मुझे झुकाए रखती थी । उसी के आश्रय में मेरा आत्मविश्वास जगह जो मैं अपनी दरिद्रता से लड सका, अपनी अभिभावकों को कभी भी अपने प्रेम और समर्पण के अ स्थान से गिरने नहीं दिया । यह सोचकर के निर्धन जीवन के सामने विलासी जीवन तो अच्छे हैं । त्याग और श्रद्धा के सामने उस की कोई औकात नहीं है । मानव का जीवन थे । केवल और केवल सुख भोग बद्धन अर्जुन का नहीं होना चाहिए । अगर हमारी महापुरुष अपना जीवन, मान प्रतिष्ठा और कृति में बिताए होती तो आज उन्हें कोई नहीं जानता । उनकी आत्मा बलिदान नहीं, उन्हें अमर बनाया । प्रतिष्ठा कभी भी धन और विलास पर अवलंबित नहीं रहती । गंगा राम की चिंताओं की तरह उसके गांव की छोड पर अपार भयंकर गोमती की लहरें व्याकुल परेशान रह रही थी । वहाँ अचानक उठा और गोमती तट पर जाता था । आकुल हृदय का जल तरंगों से बैठते ही प्रेम हो गया । तभी पीछे से बेचैन कर देने वाली उसेक आवाज सुनाई पडी । उसने मुडकर देखा । उसे लगा कोई आकृति दरिद्र दृष्टि से उसकी तरफ देखकर उससे पूछ रही है बेटा, तुम यहाँ इस निर्जनता में बैठ कर क्या सोच रहे हो? एक्शन के लिए तेजबहादुर के शरीर का रक्त प्रवाह रुक गया । वो भी तो कंपनी लगा मगर दूसरे ही पल उसे लगा या आकृति कोई और नहीं उसकी माँ है । गंगा राम दोनों हाथों से अपनी माँ के पांव छूने की असफल चेष्टा करते हुए बोला हाँ मैं सोच रहा हूँ वह रामदेव के दूध का बकाया पैसा चुका दो । माँ गंभीर भाव से बोली तो चुका दोना रोका किसने? गंगा राम रूआंसा वो बोला मेरी दीनता नहीं मानी । गर्दन हिलाकर कहा हाँ वो तो है बेटा पर चुकाना तो हो गई तो मैं काम करूँ । रामदेव से महीने दो महीने का समय मांग लो और हर रोज कुछ को जोडकर उसके पैसे चुकता कर तो गंगा राम ने दीन भाव से कहा माँ, उसने कई बार मुझे समय दिया है, अब नहीं देगा । अब तो दुत्कार कर भगा देगा । माँ प्रचंड होकर बोली जो भी हो पर वह मानवता की हत्या तो नहीं कर सकता ना । एक बार कोशिश कर देखो मैं अभी के लिए जाती हूँ फिर मिलूंगी और आखिरी थी विलीन हो गई । गंगा राम माँ की बात मानकर सोचा कोशिश में हर इस क्या है? हो सकता है तो मान जाए गंगा राम रामदेव के घर की तरफ जा ही रहा था । देखा रामदेव झटकता हुआ उसी की तरफ बढता रहा है । गंगा राम दौडता हुआ उसके पास गया और बोला रामदेव सांजू आई है सर्दी बढ रही है ऐसे में तुम कहाँ जा रहे हो? रामदेव रोजी तो बोला तुम्हारी आज्ञा जहाँ जहाँ जाने की होगी मुझे वहाँ वहाँ जाना ही पडेगा । सुना था इंसान पाक मोहब्बत की लंबी पर उम्र भर के लिए मतवाला हो जाता है । मैं पागल भी ना हो तो कैसी दोस्ती गंगा राम युद्ध कंट्री से आत्मीयता के साथ बोला रामदेव बस आखिरी बार एक मौका देखो ज्यादा नहीं एक महीने का दोस्ती की कसम इस बार स्वीट समेत चुकता कर दूंगा । रामदेव गंगा राम की बात पर बुरी तरह बौखला उठा और धरती पर ठोकते हुए कहा ये राहत तुम्हारे एक झूठ का पुरस्कार और लाख पटकते हुए बोला ये दिया एक महीने का समय गंगा राम कृतज्ञता भाव से कहा तुम्हारी बहुत बडी कृपा है । रामदेव उपेक्षा भाव से बोला रहने भी दो ये सब बात होनी बातें हैं अभी के लिए मैं जाता हूँ पर एक महीने बाद फिर मिलूंगा । रामदेव के जाने के बाद गंगा राम चिंतित उदास रसोई घर में जाकर बैठ गया और एक एक थाली हार्डी ग्लास सब निकाल कर उंगलियों पर उनके नाम जोडने लगा । पैसे की पूरी न होते देख उसने तय किया कि घर पे होगा क्योंकि इस एक महीने में अपनी मेहनत और किफायत से भी पैसे पूरे होना नामुमकिन हूँ । तो अभी उस अन्धेरे पन्ने, उसे दीपक के समान कोई आकृति रोशनी प्रदान करती हुई पूछे । बेटा गंगा राम आखिर तुमने रामदेव से उधार किस लिए थे? या तो बताया ही नहीं । गंगा राम भर्राई आवाज में कहा माँ कुछ दिन पहले में काफी जोरों से बीमार पडा था । कमजोरी पी थी की लाठी पकडकर चलने लगा था । अभी बगल वाले डॉक्टर भैया जी ने मुझे अपने पास बुलाया, कुछ दवाइयाँ दी और बोले गंगा राम तो कुछ दूध दिया करो, बहुत कमजोर हो लेकिन मेरे पास पैसे तो थे नहीं । मैं क्या करता हूँ या जान करके अपने गांव के रामदेव के पास दो पैसे हैं । अच्छा खासा दूध बाजार भेजता है । मैं उसके घर गया, उससे विनती की । कहा रामदेव मुझे कुछ दिनों के लिए आधा सेल दूध देने की अगर लहर बनी करो तो मैं बच जाउंगा । अन्यथा मेरा मरना तय । रामदेव मेरी तरफ देखा । उसे मेरे कंकाल पर दया आ गई और इसी शर्त पर दूध देने के लिए तैयार हुआ कि मैं समय पर दूध का दाम चुकता कर दूंगा । पर मैं ऐसा नहीं कर पाया । उसका रूस का तगादा मुझे आत्महत्या करने के लिए मजबूर कर रहा है । इसके सेवा मेरे लिए कोई दूसरा रास्ता भी तो नहीं बचा है । बेटी की बेबसी जानकर माने का बेटा मानव जीवन इतिहास का यह प्रत्यक्ष सबूत हैं कि यहाँ पैसे वाले राजा है और गरीब लॉकेट । यहाँ गरीब कितनी बार अपनी आत्महत्या करते हैं, वो खुद भी गिर नहीं पार्टी बावजूद मैं कहूंगी इंसान को अपना वसूल किसी भी हालत में त्यागना नहीं चाहिए । बेटा बकाया रखकर इस दुनिया से भागना भी बात है । पूर्व जन्म में न जाने में क्या आप आप की थी, जिसका प्रायश्चित स्वरूप आज तो मेरा बेटा बनकर गरीबी का बोझ उठाए घूम रहे हो माँ की काली परछाई को धीरे धीरे जाती देख ऐसा उसका मन उडकर माँ के चरणों में जा गिरा और व्यथा में डूबी स्वर में बोला माँ मुझे बचालो पर थोडी दूर जाने के बाद ही परछाई हो गयी । वो विवश लाचार हो एक वियोगी पक्षी की तरह अपने छोटे से घुस ले में लौट आया और रोते रोते माकू वचन दिया । जब तक दूध का दाम चुकता नहीं कर देता में चैन से नहीं बैठूंगा । मंतर जितना बडा आघात होता है, मन की प्रतिक्रिया भी उतनी ही बडी होती है । दूध का बकाया पैसा गंगा राम के अंतर सिस्टर को मत कर रख दिया था । चिंता और बीमारी गंगा राम को दिन बदिन चिता की ओर लिये जा रहा था । उसमें अब इतनी भी कूबत नहीं बची थी कि कहीं मजदूरी कर सके । उसकी स्थिति एक पंखहीन पक्षी की तरह हो गई थी । गंगा राम ठंड से बचने के लिए घर के भीतर अलाव जला रखा था । उससे चिनगारी उछली और गंगा राम की धोती को पकड ली । जो भावना चाहकर भी भाग नहीं पाया उसके हाथ पांव का आपने लगे शरीर के सारे अंग शिथिल पड गए और वह भागने की कोशिश में वहीं कच्ची मिट्टी के घडे की तरह जमीन पर मूवी भाड लुढक गया । बचने के लिए उसने आवाज लगाई, लेकिन कमजोर कंट्री से आवाज बाहर नहीं निकली । जब आपकी लपटें ऊपर खपरैल पर लहराने लगी तब आवाज पर रूस के लोग दौड कर उसके पास आए । मगर तब तक देर हो चुकी थी । गंगा राम कर्ज की नुकीले पंजों से घायल होकर इस दुनिया से जा चुका था । उसकी हड्डियों से चटक चल टक्कर निकल रही । चिनगारियां ऊपर उछल उछल कर क्या रही थी? कौन कहता है इस दुनिया का मालिक एक हैं हूँ?

लाल चुनरी - 9

लाल चुनरी संध्या हो गई थी । गांव के लगभग घर घर से धोने के काली बादल उठने लगी थी । जीता रूपा की मांग बरसात में लकडियों के मेरे जाने के कारण छोला सुरगानी में उद्विग्न हो रही थी । उसे समझ नहीं आ रहा था आज खाना कैसे बनेगा । तभी उसे ऐसा लगा कि यदि रूपा के पिता ज्ञानदेव इन लकडियों को छह बजे के नीचे रखी होती, तब आज मेरी यह दुर्दशा नहीं होती । गुस्से में वीता अपने पति के चरित्र, उसके सद्गुणों और सत्कार्यों की इतनी कुशलता से उल्लेख किए जा रही थी, मानो पति भक्ति में जीवन की ऐतिहासिक गंभीरता का रंग आ गया हूँ । इसमें संदेह नहीं कि उसके एक एक शब्द से क्रोधाग्नि टपक रही थी । तभी ज्ञानचंद बैलों को भूसा डालकर आंगन में आए । पत्नी के मुझसे निर्दय बज्र प्रहार सुनकर उसी सुखद पुष्प वर्षा की तरह जान पडी । उसके हृदय को थोडा दुख जरूर पहुंचा, लेकिन तुरंत ही विजय में नई आकांक्षाएं तरंगे मारने लगे । सोचने लगा अब तक जो मैं सोच रहा था कि मैं लक्ष्यहीन जी रहा हूँ, ऐसी बात नहीं है । मुझे तो विपुल गुणों की संपत्ति का खजाना है । तभी रूपए दरवाजे पर से भागती हुई माँ माँ चिल्लाती रीता के पास रूपा की डबडबाई नजरों की ओर देखकर पूछे । क्या सब ठीक है? ऊपर विलाप करती हुई बोली मैं मेरा लाल काम चल रहा है । गीता ने झटपट बेटी को गोद में उठाकर चूमते हुए कहा तुम्हारा वो लाल गमछा गलती से खेल जाते वक्त तुम्हारे पापा को मैंने दे दिया था । सच तो यह है बेटा सुबह जब तुम्हारे पापा खेत पर जा रहे थे, उस वक्त अंधेरा था । मुझे रंग समझ नहीं आया । मुझसे गलती हो गई । मुझे माफ कर दो, मैं कान पर करती हूँ । दोबारा ऐसी गलती नहीं होगी । रूपा वहाँ पर दया कर बोली चीज के रूपा को संतुष्ट पार्क रीता के मुझसे एक ठंडी सांस निकली मान उसने जीवन का एक जंग जीत लिया होगा । रीता ने रूपा को विश्वास दिलाते हुए कहा मैं अभी गमशाली करती हूँ, तब तक तुम कमरे में जाकर बैठो । आंगन में ठंड बढती जा रही है । सर्दी लग जाएगी । मैं यू गए और यूआई रुपए निराशापूर्ण नहीं की दृष्टि से माँ को दरवाजे की ओर जाते हुए निहारती रही । रीता दरवाजे पर जाकर पति ज्ञानचंद्र को जोर जोर से आवाज देकर बुलाई बोली कहाँ थी आप? मैं कब से ढूंढ रही हूँ? ज्ञान चल मैं तो यही था कहूँ क्या बात है वीता पूछे रूपा का वो लाल गमछा कहा है अभी दीजिए व जोरो कर परेशान है । सुनती ज्ञानचंद्र गमझे को लेकर रूपा के पास दौडा आया और रूपा को गोद में उठाकर पूछा क्या तुमको लाल गम चाहिए? चाहिए जो सिर हिलाकर बोली? हाँ सुनकर ज्ञानचंद की आंखों से आंसू निकल रुपए पिता को जूते देख पूछे पापा आप रो क्यों रहे हैं? ज्ञानचंद बेटा मेरी आंखों में धूल पड गया था । अब निकल गया रुपए । पापा के हाथ से झटपट गमछा ली और दुल्हन बनकर खेलने लगी हूँ । ज्ञानचंद वही पलंग पर पडा । चिंता नया राशि और विषाद के सागर में गोते लगाने लगा । उसके मन को सिर्फ एक ही भावना आंदोलित कर रही थी कि एक दिन रूपा सच मुझे लाल चुनर ओढ कर जब मेरे घर से चली जाएगी, तब उसके बगैर में जिंदा कैसे रहूंगा? अपने सौभाग्य के सुरभ भी उद्यान में सौरभ वायु और माधुरी का आनंद उठा चुका एकता आपने खेले उद्यान को दूसरे के हवाले कैसे करेगा? जिस पौधे को मैं अपने इस ने जैसे सीख रहा हूँ, उसकी एक एक मधुर स्मृतियां मुझे मार डालेगी उसके आने की जब बांटने हारूंगा तब खुद को मानसिक व्यग्रता में भी स्वस्थ पाऊंगा हूँ । मुझे आज से ही एक अपराधी की तरह उस दिन के दंड की प्रतीक्षा करनी पडेगी । ज्ञानचंद की मनोवृत्ति किसी परीक्षार्थी छात्र से हो रही थी जो पुस्तकों से प्रेम तो करता है पर ज्यादा ध्यान उन्हें भागों पर देता है जो परीक्षा में आ सकते हैं । दिन बीते बरस पीता इंतजार की घडियां खत्म हुई । रूपा जवान हो गयी । ज्ञानचंद को उस कल्पना जगत से प्रत्यक्ष में आना पडा । बीस साल के इच्छुक का घर होता हूँ । एक बाल में पददलित हो गया टिहरी गांव के वासी रामानुज मास्टर का छोटा बेटा प्रताप सिंह के साथ । ज्ञानचंद जब रूपा की शादी पक्की कर घर लौटा तब उससे बडा, दुखी और उससे ज्यादा सुखी दुनिया में कोई नहीं था । सच्ची कहा गया है मानव विधेयक रहस्यमय वस्तु होता है तभी तो वह लाखों की ओर आंख उठाकर नहीं देखता हूँ । पौडियों पर आप फिसल जाती हूँ । रूपा की माँ धनाडीह लोगों को छोड कर एक गरीब परिवार के लडके को अपनी बेटी के लिए उपयुक्त समझकर शादी तय करती । जानकर रूपा कतार के नीचे बलिदान के बकरी की तरह कडक नहीं लगी । भविष्यों से डराने लगा हूँ वह सामने से बढती आ रही गरीबी की परछाई में खुद को विलुप्त होते देखने लगी । उसके अंतराल की गहराइयों से एक लहर से उठती जान पडी जिसमें उसका अपना अतीत जीवन टूटी हुई नौकाओं की भांति उतरता हुआ दिखाई दिया हूँ । वरुन कंट्री से माफी जाकर बोली माँ शादी की इतनी जल्दी भी किया है कुछ दिन और ठहर जाती हूँ । अभी मेरी उम्र ही क्या है? रीता मुस्कुराती हुई बोली बेटा, जीवन पर्यंत कोई माँ बाप अपनी बेटी को घर में नहीं रख सका । राजा रंक सब को एक दिन अपनी बेटी को विदा करना होता है । मैं सोचती हूँ या शुभ काम आज जब करना ही है तो कल क्यों? आज क्यों नहीं चिंतित और बेबसी के बोझ से दबी रूपा गठित कंट्री से बोली माँ मैं तो उसके घर जाकर गरीबी के पिछले में बंद उस पक्षी की तरफ फडफड आती होंगी जो चाहकर भी कभी नहीं तीलियों को तोड नहीं सके । रीता ने एक बार रूपए की तरफ देखा और आंखें फेर रुपए कुछ देर तक खडी रही । बाद अपने कमरे में चली आई और पलंग पर लेटकर सोचने लगे माँ बाप का कहाँ मानना कुल मर्यादा की पहली उत्तम चीज होती है । उस पर प्राण तक न्यौछावर लोग करते आ रहे हैं तो फिर में अपनी खुशी न्यौछावर करने से क्यों भाग रही हूँ? शोक युक्त विचारों ने रूपा को इतना महसूसा की उसकी आंखें भराई व खाट पर बैठकर दीवार की तरफ वो कर के रोने लगी । उसे अपनी व्यवस्था पर इतना दुख कभी नहीं हुआ । मैं अपनी स्वास्थ्य परता, अपनी इच्छा लिप्सा, अपनी शुद्धता पर इतनी ग्लानि कभी नहीं हुई । आत्मरक्षा की अग्नि जो एक्शन पहले प्रदीप हुई थी, इन आंसुओं से बुझ गई । वह माँ के पास जाकर मूर्तिवत खडी हो गई या देखकर रीता प्रेमानुराग से वेवल । वो बेटी का सिर अपनी गोद में रख गए । अशोक प्लावित नेत्र सिंह उसे कुछ करने लगी । उसके सर कृष्णा नेत्रों से रूपा को देखा तो पाया उसमें शर्मा प्रार्थना भरी हुई है । मानव कह रही हूँ हाँ मैं कितनी श्रद्धा ही ना और जड भक्त हूँ । तुम्हारे प्यार और बलिदान की कदर नहीं कर सकते तो मेरे लिए क्या नहीं किया? मेरी रेडियो में शक्ति का अंकुर जमाया, जन्म दिया । तुम्हारी मधुमिश्रित बातों ने स्वर्गीय आनंद दिया । मेरी आंखों पर पर्दा कैसे पड गया? मैं इतनी कृतघ्न कैसे हो गई? मुझे बात करता हूँ और अभी से तुम्हारी खुशी ही मेरी खुशी होगी । इसलिए तुम शादी की तैयारी करूँ । रीता प्रेम फोन मत हो । बोली देखो बेटा लडका तो एक से एक मिले पर किसी ना किसी कारण वर्ष सभी झूठ दे गए । मगर जिसे मैंने पसंद किया है वह घर का तो गरीब है, पर तुम को बहुत खुश रखेगा । कारण वही उच्च विचार का लडका होगा । तभी तो उसे इतनी जल्दी विदेश जाने का मौका मिल रहा है । साथ ही जिसके संग उसकी शादी होगी उसे भी साथ लेकर जायेगा । तुम विदेश में रहोगी । नई दुनिया नए लोगों से मिलने की पैसे की कमी तो रहेगी नहीं जीने के लिए और क्या चाहिए? माँ की बात सुनकर रूपा पुलकित हो गई । उस आनंद में जीवन कर रहे थे । उसकी कल्पना में सच्चरित्र हो नाचने लगा । उसकी तबियत लहराने लगी । रुपए दो तीन मिनट तक विचार में मग्न रही । फिर अपना विचार प्रकट करती हुई बोली मां तुम जो चित समझो करूँ, मैं तुम्हारे साथ हूं । लगना तय हुआ हूँ । बारात आई हूँ । वेद मंत्रों के साथ रूपा की शादी संपन्न हो गई । शादी के मंडप में जल रही चंपई अग्निज्वाला से रूपा का मुख्य कुंदन की तरह चमक रहा था । सबकी आंखे उसी के मुख दीपक की ओर लगी हुई थी । लेकिन रूपा की नजर नई नई साडियो के बीच उस लाल चुनर को ढूंढ रही थी जिसे उसने बचपन में गमछा स्वरूप अपने पिता से पाया था । माने भी बार बार कहा था रूपा इस लाल गमछे से सौ गुना सुंदर लाल चुनर तुम्हारे लिए शादी में तुम्हारा वर लेकर आएगा । इधर आंगन में रागरंग था । उधर कमरे में बैठे रूपा उदास मायूस उस चुनर के इंतजार में व्याकुल हो रही थी । उसे लग रहा था माँ की बातें कहीं झूठी ना निकले । जब उससे और धैर्य ना धरा गया । वह उन्माद की दशा में उठकर अपनी माँ पिता के पास आई । बोली हाँ क्या कर रही हूँ? मैं समझ गयी । वो बेटी को खींचकर अपनी गोद में बिठाकर फूट फूटकर रोने लगी । बोली बेटा, मैं हारी, तुम जीती तुम्हारा कहना सही था की रिश्तेदारी और दोस्ती अपनी बराबरी में होनी चाहिए अन्यथा यह देखती नहीं । मगर अब कुछ करने का नहीं था । रूपा बिना चुनर की ससुराल विदा हो गई । ससुराल का माहौल देखकर रूपए डर गई । रुपए ऐश्वर्यशाली पिता की पुत्री थी । उसे यहाँ इतना आराम भी ना था जो उसकी मैं की की नौकरानियों को था । उसका पति विजय स्वार्थ से भी था । परिवार के लोग, लोग भी बिस टूर कर्तव्यहीनता उसके पति के शब्दों से रूपा का विजय छलनी रहा करता था । विजय हमेशा रूपा को लज्जित और अपमानित करना अपना धर्म बना लिया था । इन सब कारणों से रूपा की दशा उस पतंग की तरह हो गई थी, जिसकी डोर टूट गई हो अथवा उस वृक्ष की तरह जिसकी जड कट गई हूँ । यद्यपि उसे पति की स्वार्थ भक्ति से घृणा थी, मगर वह गर्व, शीला, धर्मनिष्ठा, संतोष और त्याग के आदर्श का पालन करने वाली नारी थी तो उसने इस भाव को अपने पति सेवा में कभी बाधक नहीं बनने दिया । रूपा आज साठ की हो चुकी है और विजय सत्तर की उम्र के साथ । विजय के व्यवहार में काफी बदलाव आ गया है । जब लोहे की गर्मी दूर हुई, उसमें ठंडक आई, तब जाकर विजय में पश्चताप का भाव उदय हुआ आपने उस व्यवहार के लिए विजय आज बहुत पछताते हैं, मगर खुद को न कोसकर उस घडी को कोसते हैं जब ये सब घट रहा था । कहते हैं तुम प्रेम की देवी हो, वात्सल्य की मूर्ति निर्दोष निष्कलंक ये मेरा दुर्भाग्य है कि मैं तुम्हारी कदर ना कर सका । रूपा प्रेम फोन मत होकर बोली, भगवान के लिए ऐसी बातें मुझसे नहीं निकालो । रूपा की बातें सुनकर इतने दिनों से जल्दी आ रही निष्ठुरता और और श्रद्धा की अगली विजय की आंखों से बह रहे वासियों से बुझ गई विजय रोता हुआ बोला रूपा हम दोनों पति पत्नी के सुरभि पर्वत के नीचे निर्मल अंधकार में गुफा थी, जिसे मैं जानता नहीं था । मैंने तो स्वच्छ जल समझकर अपना पैर बढाया था लेकिन खीचड में फंस गया । जिसे मैं उज्वल कंचना मैं लहराता हुआ जल समझ रहा था उसी में मुझे धोखा दिया आज में अपनी निर्लज्जता और शुद्धता पर बहुत दुखी हो जानती हो रूपा जबसे स्वार्थपरता का पर्दा मेरे नेत्रों पर से हटा है, मैं बस यही सोचता हूँ कि मेरी तरह अगर तुम भी अधर्मी स्वार्थी बन जाती तब क्या होता है निराशा की यातनापूर्ण अकेलेपन में मुझे बारी बारी से सभी बातें तुम्हारे साथ किए गए दुर्व्यवहार डराते हैं रूपा मेरे भी जुल्मों को तुम्हें कैसे साहब तुम्हारी जगह मैं होता तो शायद नहीं पाता । मेरे जैसा कुकर्मी शायद ही कोई दुनिया में होगा, शर्माती है ये सोचकर की जो रात दिन मेरे सुख दुख की साथी बन कर एक पैर पर खडी रहती थी उसी के साथ इतना कठोर व्यवहार रूपा ईश्वर तो माफ नहीं करेगा और करना भी नहीं चाहिए तो मुझे माफ कर देना रूपए ताड गए कि आज प्रेम ने उन मट्टा का पद ग्रहण किया है और कदाचित यही उसकी पराकाष्ठा है । उसमें मुस्कुराकर कहा विजय अभी तुम से मेरी एक शिकायत है । विजय कम उठा । भर्राई आवाज में पूछा क्या है? रूपानी कहा विजय शादी की चुनरी बाकी है कब होगी? विजय उठ ओर जाने लगा । रूपाणी पूछा कहाँ चले विजय चुनरी लाने किसी का बकाया उधार नहीं रखना चाहिए । रुपए अभी नहीं अब चुनरी ओढकर घूमने के दिन बच्चे का लेकिन हाँ मेरी लाश पर एक चुनरी जरूर उठा देना, पर खयाल रहे उसका रंग लाल हो मेरे पिता जी की उस गमछी की तरह जिसकी याद मुझे आज भी तडपाती है ।

स्मृति लौट आई है - 10

स्मृति लौट आई है । भारतीय विश श्रृंखल पवन ने माधव की जिंदगी के हिसाब के पन्नों को जगत के आ चल पर जब तितर बितर कर दिया, वर टूट गया । स्नेहित छवि की पूजा के लिए नित्य नए नए उपकरण जुटाने वाला माधव मन तो लिखा को हृदय रक्त में डुबो डुबोकर जड हो गए । बही दृश्य कि अनेक आकृतियों को विकृतियों में स्थायी रूप से बदलने लगा । बीत रही रजनी की काली छाया में अपने दुःख गाथा को अतीत की गर्व शाली निशा की सुख खता सही मिलाकर कुछ कहने लगा । उसके की अब व्यक्ति ध्वनि साल तक हो । उसमें स्मृति को कलेजा फाड देने वाली करोड आवाज से पुकारा । पागलों की तरह चिल्लाकर कहा स्मृति आज मुझे तुम्हारी जरूरत है तो लौटाओ मेरे पास मैं अपनी जिंदगी के पन्ने पन्ने को लेट रहा हूँ । हर नजर आंखों के सामने नाज रहा है, लेकिन जब हिसाब जोडता हूँ, हर बार मात खा जाता हूँ । अब तुम्हारी बगैर इसी कौन सुलझाएगा । एक दिन स्मृति कांपती हुई माधव के पास आकर खडी हुई । माधव का स्मृति से सामना लगभग दस साल बाद हुआ था । स्मृति बूढी हो चुकी थी । नजरे मोटी और दिमाग कमजोर हो गई थी । उसने माध्यम द्वारा बनाए चित्र को बहुत देर निहारा । फिर बोली माधव या क्या तुमने सुंदर सुंदर इन आकृतियों को काले रंग डालकर बदरंग क्यों कर दिया? पहले वाला ही अच्छा था, इसी उसी तरह छोड तो इन काले रंगों को हटा दूँ । स्मृति की बात सुनकर माधव का मुख भयानक होता था । उसमें रोते हुए कहा मेरी जिंदगी का हिसाब जिन पन्नों में था वक हो गया जवानी कुछ याद है, ज्यादा भूल गया तुम खून पन्नू की बातों को याद कराने बुलाया है । मैं जानता हूँ ये आकृतियां कुरूप हो गई है, लेकिन चित्रकार चल चित्र बनाने बैठता है । तब वर्तमान को अधिक पसंद करता है । सूरज की तपती धूप में झुलस ता आदमी हिमानी मंडित उपत्यका में वसंत की फूली हुई वल्लरी पर मध्याहन का तब अपनी सुखद कांति बरसा रहा है, ऐसा नहीं कह सकता है, नहीं बना सकता है । स्मृति समाज से डरो नहीं । अत्याचारी समाज पाक शब्द दुकानों पर हाथ रखकर चलता है । वह पाक शब्द दूसरों को सुनाई पडता है, जबकि वह स्वयं नहीं सुनता । ऐसे लोग समाज को भ्रांति में रखना चाहते हैं । संपन्न व्यवस्था के विकास का रंग अभाव के रंग को नहीं कह सकता । स्मृति जब ध्यान टूटा देखी, सचमुच माधव उसके आश्रम में आश्रय मांग रहा था । अपने जीवन के लघु दीपको अनंत की धारा में बहानी आतुर बैठा माधव जीवन का हिसाब ही तो मांगता है । अपने और संसार के विश्वासघात की ठोकरों ने इसे विक्षिप्त बना दिया है । इसके मानसिक विप्लब में मेरी सहायता की से सख्त जरूरत है । स्मृति माध्यम से नम्रतापूर्वक कहा इसकी चिंता तुम छोड दो । तुमने बुरे कामों के लिए अपने त्याग तपस्या की पूंजी को नहीं उडाया, बल्कि इससे कुल की कृति फैली है । मौसम में अत्यंत विनती भरी स्वर में कहा माना कि तुम्हारी बात ही सही है, लेकिन हिसाब मिलता क्यों नहीं? लोगों से सूद की एक कौडी नहीं छोडने वाला माधव आज उसी हिसाब को करने में कुछ याद आता है । ज्यादा भूल जाता है, तब था, खासकर रोने क्यों बैठ जाता है? स्मृति धूंधी करंट से गदगद होकर बोली । वो इसलिए कि वहाँ रोटी आकर तुम्हारी समक्ष खडी रहती थी । यहाँ अपने खडे रहते हैं और अपने को दिया गया आदमी कभी लौटा नहीं पाया । माधव ने सजल और दीनता भरी आंखों से स्मृति को देखा और हाथ जोडकर कहा । इसलिए तो मैंने तुम को बुलाया है । मेरा हिसाब तुम्हारी सेवा कोई नहीं कर सकता । सच मानू स्मृति मैं अपनी जिंदगी के हिसाब के उन पन्नों को जिससे मैंने अपने मन क्षेत्रों में बांधकर जग में रहकर भी जगह से दूर सुदूर वन के कोने में अपनी छाती से लगाएं । एक बंगाल की तरह बैठा रहता हूँ । लोग मुझे पागल समझकर रास्ते बदल लेते हैं । कहते हैं जब से स्मृति से दूर भाग कर गई है तब से यह पागल हो गया है । कोई पूछता तक नहीं कि दिन के इस चीज में मैंने क्या छुपा रखा है । स्मृति ने देखा उसके मन का निश्चिंत भाव और शरीर का बाल धीरे धीरे शीन होता जा रहा है तो अभी घर की चिंता नहीं करता बल्कि बुलाने का प्रयत्न करता है । पहले उसकी त्याग तपस्या उसके जीवन यज्ञ की आपूर्ति का एकमात्र प्रिक्षित था जो उसके इसने की तैयारी में अकेली खडी थी । किन्तु उसकी यारी में कुछ अनचाही कटीली घास उग आए हैं । जो माधव को चलने नहीं देते, उसके पांव के तलवे को लहूलुहान कर देते हैं । स्मृति ने माधव के वित्तीय वेदना को कम करने के लिए कहा । पिता का जीवन तब का जीवन होता है । लोकमत इसके विपरीत कुछ नहीं देख सकता है । जीवन की सार्थकता भी इसी पर टिकी है । माधव स्मृति की सलाह, रन जो बोला तुम क्या चाहती हूँ मैं जीवन भर तपस्वी बन कर रह रुखा सूखा खाओ जमीन परसो मोटर, छोटा पहनूँ घर से दूर कहीं और चला जाऊँ या मुझसे नहीं होगा । आज तक तपस्वी जीवन तो बिताया । खुद खाली पेट रहकर सबको रोटी खिलाया । रात के बारह बजे घर लौटा । सुबह धीरे मु रोटी की खोज में निकल गया । छह महीने तक बीमार पडा । दवाइयाँ नहीं, डॉक्टर नहीं दिखाया और नीम का काढा पी जा रहा । बदन पर जीतने भी नसीब नहीं थी, फिर भी खुश था यह सोचकर कि हमारा जीवन यह कि पैसे के अभाव में भी पूर्णता की ओर जा रहा है । क्या इस संसार भी पिता ही एकमात्र धर्म का ठेकेदार है? संतान को धर्म से कुछ लेना देना नहीं । परिस्थिति का यथार्थ ज्ञान होते ही स्मृति ने अपना कर्तव्य तय कर लिया कि मैं माधव से दूर रहकर माधव कि आत्मरक्षा नहीं कर सकती । कितना न्याय है कि घर में दीपक तो जलते हैं, मगर माधव रोशनी को तरस जाता है । आत्मशक्ति के इस कल्पनातीत उदाहरण ने उसकी भौतिक बुद्धि को कैसे आक्रांत कर दिया? निःशुल्क धैर्य को ईश्वर निष्ठा का प्रसाद मानकर स्मृति अपने मन मंदिर में सेवा का पुतला माधव को श्रद्धा भरी आंखों से देखी । उसी लगा कि कोई दिव्यदर्शन कर रही हूँ । इसी मानसिक पराभव की दशा में उसके अंतर करन से निकला ईश्वर मुझे प्रकाश दो, मुझे उबारो और रोती हुई । उसने माधव के त्याग और सेवा कि जिन शब्दों में सराहना की, माधव के अंतर करन की सारी मलिनता आएँ । धुलकर निर्मल हो गयी । माधव के मन में प्रकाश आ गया । उसकी सारी चिंताएं, शंकाएं, अंधकार की भारतीय मिट गए । स्मृति का कल्पना चित्र उसकी आंखों के सामने खडा हो गया । माधव ने सिर उठाया तो उसकी आंखों में नशा था । वन नशा जिसमें अलग से नहीं छूटती थी, लालिमा नहीं देखती थी । विस्मृति नहीं जागृती थी उसकी आत्मा । इसके पहले कभी इतनी उदार, इतनी विशाल इतनी प्रफुल्लित नहीं थी उसकी आत्मा को अब खुशबूदार मीठे शरबत की जरूरत नहीं । वर्ष शीतल पानी भरे ग्लास की ओर लपका उसका मन जैसी गंगा की उफनती लहरों पर तैरता हुआ सकीना को खोज रहा था । विधेयक गंगा की लहरों की ओर्तन मेहता सी ताकते ताकते उसे मालूम हुआ मैं बाहर जा रहा हूँ । उसने चौंककर घर की ओर देखा । दोनों आंखे आंसू में डूबी हुई हैं और स्मृति उसका हाथ था में जीवन रंगभूमि की ओर चली जा रही है । वह स्मृति को देखकर नन्हे बालक की तरह खेल खिलाया जिसे देख नहीं यानी जिंदगी बोली माध्यम तुम्हारी स्मृति लौट आई है हूँ ।

ज्योति - 11

हूँ । ज्योति दाडिम लाल फूलों से भरी उद्यान के बीचोंबीच बने चंद्रचूड के घर में किसी चीज की कमी नहीं थी । बावजूद उसका जीवन नीरव निकुंज में बीत रहा था । वह चुपचाप रहता । घर की छत पर बैठे नदी के उस पार की हरियाली को निहारती कब अंधकार का पडता खेत जाता उसे पता तक नहीं चलता हूँ । रोज की यही उसकी दिनचर्या थी । तारों से सुशोभित गगन के नीचे अवाॅर्ड लाखों से केवल ऊपर की ओर निहारता रहता हूँ । एक दिन पर छत पर बैठा अन्यमनस्कता होकर गांव की छोड से बहती गंगा की उम्र की धारा को देख रहा था कि अचानक नीचे आंगन से पिता शैल सिंह की आवाज आई । बेटा चंद्रचूड कहाँ हूँ । पिता की आवाज सुनकर चंद्रचूड भय से आंदोलित हो उठा । धीरे धीरे छत की सीढियों से उतरकर पिता के सामने खडा हो गया । पूछा पिताजी आप मुझ से कुछ कह रहे थे । शेरसिंह प्रसन्नता के साथ बोले । बेटा, तुम्हारी शादी के लिए कुछ लडकियों की फोटो लाया हूँ, जो तुम को दिखाना चाहता हूँ । चंद्रचूड शर्माते हुए बोला हूँ अभी इस की जरूरत क्या है? पिता जी पिता शेरसिंह मुस्कुराते हुए बोले बेटा जवानी कसाई की नजरों से नहीं छिपती तो इन सब बातों को छोडो और इनमें से किसी कुछ उन लोग चंद्रचूड सौन्दर्य का चुनाव करते वक्त मन ही मन कितना उत्कंठित है । पिता को समझने में देर नहीं लगी । उन्होंने देखा चंद्रचूड ज्योति नाम की लडकी की तस्वीर देखने में इतना लीन हो गया कि वह उत्साह की एकांत नी राफ्ता में विलीन हो गया । पिता शेरसिंह उसकी निर्भरता को भंग करते हुए पूछे । सच मुझे क्या ये लडकी सुंदर है चंद्रचूड शर्म से आंखें झुका ली, बोला पता नहीं । शेयर सिंह ने कहा मुझे भी ये लडकी सबसे अधिक सुंदर लगी । यद्यपि अंगारी की तरह गोली नहीं है मगर गठन साझे में ढला हुआ है । चंद्रचूड चंद्रा से चौकर उस सहत सौंदर्य को पुणे एक बार देखा और विश्व समस्या में पढकर सोचने लगा सुंदर ही नहीं आकर्षक भी हैं वित्त शैल सिंह चंद्रचूड से मजाक भाव में कहे चलो फूल को अब तक जिस बुलबुल की खोज थी वह तो मिल गई लेकिन मिलन दिन को पक्का हूँ । शैल सिंह विचारते हुए चंद्रचूड की माँ के पास गए और ज्योति की तस्वीर दिखाते हुए बोले भाग्यवान ये देखो ये रही तुम्हारी होने वाली बहुत आज से से संभाल कर रखना । मैं लडकी के घर उसके माँ बाप से बात पक्की करने जा रहा हूँ । वैशाख शुक्लपक्ष पंचमी को चंद्रचूड की शादी ज्योति के साथ बडे धूमधाम से संपन्न हो गई । बहुत घर आई । घर के सभी सदस्य ज्योति को पाकर बहुत खुश थे । ज्योति भी खुश थी, रहना भी चाहिए । आभूषण मंडित चंद्रचूड के घर में आखिर कमी किस चीज की थी? चंद्रचूड नाटक और काला तो था, मगर उसकी छोटी छोटी मुझे उसके सुडौल चेहरे पर बहुत अच्छी चलती थी । मातृ सेवा पितृ भक्ति उसकी अभिलाषाओं का स्वर्ग था । स्वर्ग के निवासियों को भी शायद वहाँ आनंद नहीं मिलता होगा, जो उसे अपने माता पिता की भक्ति में मिलता था । वह दिन रात सोते जाते ज्यादा से ज्यादा अपने माता पिता के साथ बातचीत में लगा देता है और बाकी बचे समय पर छत पर बैठकर इधर ज्योति चंद्रचूड के इंतजार में उसकी राह देखते देखती थक कर सो जाती थी और कभी जब छत पर जाकर देखती तो चंद्रचूड झूले पर सो रहा होता था । वह गुस्से से तिलमिला उठती । कहती अकेले ही रहना था तो मुझे क्यों लाएंगे? मेरे तो करम फूटे थी, जो तुम्हारी घर आई वरना यहाँ तो पशु भी नहीं रहना चाहेगा । क्या मैं करूँ काली कलूटी हूँ, बातचीत में भूंज हूँ मुझे क्या कमी है? वो तो मुझ से किनारा की रहते हो, ना कहीं जाना, आना आना । इतना कठोर संयम बरतना मेरे लिए संभव नहीं है । ज्योति का विवेक इस आघात का जब भी विरोध करने लगता, विजय प्यार की होती और बच चुप हो जाती हूँ । एक दिन चंद्रचूड शहर जाने के लिए तैयार हो रहा था । नई फुलपैंट, नए जूते पहने, कलाई पर बडी घडी लगाई और जब दर्पण के सामने अपनी सूरत देखी तब उसका गर्भ और उल्लास से मुखमण्डल प्रज्वलित होता था । सोचने लगा सौन्दर्य का मेरे रूप में कोई लक्षण न होने के बावजूद मेरी छुट्टी नागौर गोल्ड चेहरा हूँ । आज किसी देव तथा के मुख्यपात्र से कम नहीं लग रहा है । तभी ज्योति ने कमरे में प्रवेश किया । उसने चंद्रचूड को दर्पण के आगे खडा देख कर रहा हूँ । जिंदा दिल वृद्धों के साथ तो मोहब्बत का आनंद उठाया जा सकता है, लेकिन ऐसा रुखा निर्जीव मनुष्य जवान भी हो तो दूसरों को लाश बना देता है । ऐसी जवानी व्यर्थ हैं । चंद्रचूड बनाते हुए बोला, तो तुम्हारे साथ अयोग्य शास्त्र पर चर्चा करने का मेरा मूड नहीं है । मैं जरूरी काम से शहर जा रहा हूँ । मुझे आने में दो से तीन दिन की देरी होगी । मेरी चिन्ता ना करना, माँ की देखभाल करना और खुद का भी खयाल रखना हूँ । जो मन ही मन झुंझला थी उसने खुद को धिक्कारते हुए कहा तुम जैसे प्रीति व्यक्ति सर्जन का यही हर्ष होना था । तुम सम्मान के पास नहीं हूँ । स्वार्थ में संसार में कोई अपना नहीं होता । फिर पति जो कि तुम्हारी तरफ देखता तक नहीं, तुम्हारा सम्मान क्यों करें? थोडी देर बाद नीति कुशल ज्योति के विजय की ज्वाला तो शांत हो गई लेकिन मन की ज्वाला जो कि क्यों दहकती रही । पति तो घर पर थे नहीं तो इस हालत के लिए ईश्वर को कोसने लगी हूँ । कहीं तुम से अधिक निर्दलीय धरती पर मुझे और कोई नहीं देखता हूँ । तुम जितने दयालु हो उससे कई गुना निर्दयी हूँ । ऐसे ईश्वर की कल्पना से मुझे दुख होता है । विचार वालों ने प्रेम को सबसे बडी शक्ति मना है और यही सच भी है । तो दंड भय से सृष्टि का संचालन करते हो तो मैं और आदमी में कोई फर्क नहीं है । तुम जो करते हो वही तो मेरे पति भी करते हैं । मुझसे रिश्ता तोड देने की धमकी दे देकर अपनी बात मनवाते हैं । तो तुम क्या जानो? एक दंड बरसों के प्रेम को मिट्टी में मिला सकता है । ऐसे आतंकवाद दंड में जीवन के लिए मैं तुम्हारा ऐसा नहीं ले सकती । नहीं मैं तुमको अपने जीवन संबंधी समझौते में साझा ही करना चाहती हूँ । तीन दिन बाद जब चंद्रचूड शहर से लौटा देखा घर से पांच सौ कदम पश्चिम की ओर एक मंदिर के चबूतरे पर अपनी प्रेम माधुरी में वीरबल शर्मीली ज्योति बैठी को सोच रही है । ज्योति सामली थी । जैसे सावन कि मेघ वाला में छिपे हुए आलू पिंदू का प्रकाश निखारने की अदम्य चेष्टा कर रहा हूँ, वैसे ही उसका सुगठित यौवन शरीर के भीतर उद्देलित हो रहा था । ज्योति कि एकांत में विनर निवेदन उसकी भाव प्रवक्ता को और भी उत्तेजित कर रहा था । ऐसा उसकी निस्तब्धता को किसी के पद आपने भंग कर दिया । नजर उठाकर देखी तो सामने चंद्रचूड खडा था । वह घबराई हुई पूछे । आप अब शहर से कब लौटेंगे? चंद्रचूड को अपने अहंकार का आश्रय मिला । थोडा सा भी देख जो ज्योति के लिए उसके मन में टिमटिमा रहा था, बोला या जगह बहू बेटियों के बैठने के लिए नहीं है । चलो घर चलो । पति की ओर से इतना प्यार पाकर ज्योति के विजय में तीव्र अनुभूति जाग उठी । एक्शन में वही भिखारिन की तरह जो एक मुठी भीग के बदले समस्त संचित धन लुटा देना चाहती हूँ । वह धीरे धीरे उठी और चंद्रचूड के साथ उसके शिथिल कदम घर की ओर बढने लगे । रास्ते भर सोचती रही । देखो आज आशा से भरी विजय यात्रा किस विश्राम भवन को पहुंचती है । दोनों गुमसुम घर के भीतर पहुंचे । चंद्रचूड ने अपना बैग खोला । बैक्सी पोटली निकली और ज्योति की ओर बढाते हुए बोला ये तुम्हारे लिए है । खोलकर देखो पसंद आए तो बताना ज्योति धीरे से चंद्रचूड के हाथ से पोटली लेकर खास पर बैठ के उसने पोटली खोली तो उसके होश उड गए । इधर चंद्रचूड सोच रहा था शहर जाते दिन की तरह आज भी मुझे दायित्वहीन कहकर कोसेगी कहेगी । मेरे और तुम्हारे बीच सदियों की दूरी का पर्दा क्यों पडा रहता है तो मुझे क्यों नहीं हटा देते हैं? ज्योति की बातें सुनकर रोज पूर्ण मगर बडे ही सुलझे । ऐसे में दीन भाव से कहूंगा जो मैं नहीं कर सका । तुमने भी तो नहीं किया । ज्योति चुपचाप रही । उसमें कोई जवाब नहीं दिया । वर डाली हुई थी उसका भविष्य का अंधेरी खाई की तरह सामने मुंह खोले खडा दिख रहा था । मानो से निकल जाएगा, नजर नहीं । इसी चिंता में कब उसकी आंखें लग गई, हो गई । दूसरे दिन सोकर उठी तो उसके मन में एक विचित्र साहस का उदय हो गया था । मानव उसमें कोई व्यक्ति प्रवेश कर गई हूँ । यही हालत चंद्रचूड की भी थी । कल से वहाँ माता पिता के निर्णय को माने समझता था, लेकिन आज उसमें वायु की हिम्मत पैदा हो गई थी । चंद्रचूड मनी मनी सोच रहा था, यह देख माता पिता का है । लेकिन आत्मा तो मेरी है और शादी ये दो आत्माओं का मिलन होता है । मैं इन आत्माओं की इच्छाओं का कत्ल कुल मर्यादा की झिझक के नाम पर कब तक करता रहूंगा? रात ज्योति के एक एक शब्द में कितना अनुराग टपक रहा था । उसमें कितना कम्पन था, कितनी विकलता थी, कितनी तीव्र आकांक्षा आई थी इतने प्रमाणों के होते हुए निराशा के लिए अब जगह कहा है, जो मैं अपनी दूसरी रात को भी विरल की सूली पर चढा दो । अपने हृदय की हिम्मत की सारी संपत्ति लगाकर मैंने जिंदगी की एक नाव लगवाई । वह भी अपनी झूठी शान और गलत सोच के दरिया में डूब जाएगी । नहीं, ऐसा नहीं हो सकता । ठीक है ना टूटी है तो उसके साथ मैं भी डूब जाऊंगा चंद्रचूड, जो पत्नी की अनदेखी कर अब तक संतोष का आनंद उठाते आ रहा था । अब चिंता की सजीव मूर्ति बना बैठा था । आत्माभिमान जो संतोष का प्रसाद था, उसके चित्र से विलुप्त हो चुका था । उसे प्रतीत हो रहा था की वेदना से भरी कोई आवाज जिसमें कोयल किसी मस्ती है, अभी है, किसी वेदना है । झरनों सर जोर है और आधी सफल । इसमें वह सब कुछ है जो मेरी ओर बढती चली आ रही है । उसका अंतकरण पवित्र हो गया । उसे लगा कि अब एक्शन भी देरी मृत्यु की यंत्रणा है । पर दौडता हुआ ज्योति के कमरे में पहुंचा देखा । समस्त सुमन समूह का सौरभ से ज्योति हो रही है । देखकर चंद्रचूड के धैर्य का अंतिम बिंदु शुरू हो गया । अब उस की चाह में केवल और केवल दाह बाकी रह गया था, जिसे ज्योति ही ठंडा कर सकती है । वह प्रज्वलित । प्रदीप की तरह प्रकाश फैलाता हुआ फ्रांस पोषण पुकार के साथ ज्योति से निपट गया । ज्योति ने आंखें खोलकर देखा और सिर्फ इतना कहकर चुप हो गई । तुम्हारा प्रेम और वैराग्य दोनों सराहनीय है ।

मृग मरीचिका - 12

मृग मरीचिका बहुत हार्ड कपा देनेवाली रात के दो बज रहे थे । काशी को कम्बल बिना नींद नहीं आ रही थी । वह बांस की खटोले पर अपनी फटी जूट की चादर ओड घुटनों को छाती से लगाए काम रहा था । तभी उसकी नजर अपने घर के टूटे ठाठ से ऊपर आकाश पर पडी । वह सहम गया । भाई और शंका से कम्पित हुआ था । उसने बगल में सोई अपनी पत्नी कसूरी को नींद से जगाकर पूछा कसूरी सो रही हो? कसूरी आंखे खोलकर आकाश की ओर देखी । बोली अभी तो सत्तर अस्सी आकाश में आए भी नहीं और तुम जाकर बैठ गए । सो जाओ । सुबह धीरे मुखेड पर जाना होगा । सुना है बेमौसम की बारिश से धान की फसल तबाह हो गई है । उसका पानी निकालना अत्यंत आवश्यक है । करना बहुत ही सड जाएंगे । काशी मन उदास कर बोला तुम सोचा मेरी आंखों में नींद कहाँ है? जो सोचा हूँ आगे भगवान पर भरोसा रखो, सब ठीक हो जाएगा । लेकिन अच्छा होता जो मेरी तरह तुम भी एक बार आकाश की शून्यता को देख लेती हूँ, वहाँ कितनी निर्जनता है, कितना दे रहा है कसूरी अनमने ढंग से ऊपर की ओर देखी बोली बहुत अंधेरा है, मगर हम दोनों की जिंदगी से का । काशी ने पूछा वो कैसे कसूरी बोली काशी या अंधेरा कुछ घंटों का है, थोडी देर बाद छठ जाएगा । जब सूरज उजाला लेकर आएगा या अंधेरा हमारी जिंदगी के अंधेरी की तरह स्थायी नहीं है । या तो हमारे जीवन का मात्र एक आंशिक चित्रा है । अक्षय बात को मोड देते हुए बोला, कसूरी देखो हम से भी अधिक का भागे लोग हैं दुनिया में जो वृक्ष के नीचे अपना जीवन गुजारा कर रहे हैं । कम से कम हमारे पास टूटा फूटा ही सही, एक घर तो है । इसे तुम काम मत समझो । हमारे लिए यह एक सुरक्षित खेला है । यहाँ सूर्य चांद और हवा को छोडकर किसी दूसरे सिरफिरों की निगाहों का पानी तक नहीं पहुंचता । यहाँ तक पहुंचने में उनके पास जो लडखडाने लगते हैं । अक्षय की बातों का शनी का आनंद बडी जल्दी ही बीत गया और फिर वही निराशा उसके दिल पर छा गई । इस मरहम से ना ही उसका दिल भरा और न ही जिगर का दर्द मिटा । कसूरी बोली, मैं भी मानती हूँ कि तुम्हारे झोपडे पर एक लाख महल न्योछावर है । कारण यहाँ रहकर मैंने उन चीजों को पाया जिसे पाने के लिए कभी कभी महल भी आंसू बहाने के लिए बात ही होते हैं । काशी लडखडाई आवाज में पूछा वो क्या है? कसूरी आंखों के आंसू को हंसी में लपेटते हुए कसूरी ने कहा औलाद तुम भूल गए कि हमारी एक नहीं दो दो लाख है जिन्हें हम ने जन्म दिया है । पाला है बडा किया है । काशी जहरीली हसी हस्कर बोला बदनसीबों की तकदीर में औलाद नहीं होते । उनकी नसीब में सिर्फ रोना और रोना और मर जाना होता है । उनकी जिंदगी का आरंभ और अंत कुछ नहीं होता । वेबस् जीवन देखते हैं । कसूरी काशी के प्रेम में डूबी हुई जिसे गहने और अशर्फियों के ढेर बिच्छू के डंक से लगते थे । खुली हवा के मुकाबले बंद पिंजरा कहीं ज्यादा अच्छा लगता था । निराशा भाव से जवाब दी हम गरीब हैं हमारे पास नही रंग है नही रूप ना ही पैसे फिर क्यों कोई हमसे हमदर्दी रखें । खून कहने को अपने हैं बहते तो अलग अलग शरीर में है । कसूरी का जवाब सुनकर काशी का चेहरा फीका पड गया या एक ऐसा प्रश्न था जिसका उत्तर देना उसके लिए संसार का सबसे मुश्किल प्रश्न था । कसूरी कुलीनता के साथ काशी के सामने भिखारिन से बैठे काशी को निहारी जा रही थी । तभी काशी तीव्र कंट्री से बोल उठा गहरी छोडो भी अब कब तक दुखता रोग की? कसूरी बोली जब तक विजय में सांस है और सांस में वे दोनों है तब तक अक्षय पुत्र नहीं नहीं, हम दोनों को सच्चा बैरागी बना दिया । सच पूछो तो मेरे लिए दुख और सुख का अंतर कर पाना मुश्किल हो गया । दोनों ही मुझे बिच्छू के डंक की तरह रखते हैं । हम दरिद्रता की पैरों तले दबे हुए अपने शीन जीवन की मृत्यु के हाथों से छीनने में प्राण दे रहे हैं । क्यों नहीं अच्छा होता कि रूस की से सकती जिंदगी का अंत कर दिया जाएगा? वफाकी उम्मीद थी, जिससे वहीं लगा करता है मैं हूँ जिसे कभी पानी नहीं मिला । जानती हूँ कसूरी जिंदगी की वह उम्र जब इंसान को सहारे की सबसे अधिक जरूरत पडती है तब मैं अकेला हूँ । सोने की लाठी के सहारे चलता हूँ, गिरता हूँ तो उठ नहीं पाता हूँ । जबकि हम लोग उतने बूढी नहीं है जितना देखते हैं यह सब वक्त की बेरुखी ये कसूरी ठीक ही कहा जाता है । जरूरत पर पौधे को तरी मिल जाए तो जिंदगी भर के लिए उसकी जडें मजबूत हो जाती है । अच्छी खुराक और देखभाल न पानी से हम दोनों की जिंदगी खुश हो गई है । कभी कभी लगता है यह संसार किसी भी आई ईश्वर का नहीं है वर्ना जो चीज जिसे जब मिलनी चाहिए मिलती क्यों नहीं है? कसूरी विषाद भरे स्वर में उत्तर दी बोली काशी आकाश पर से अंधेरा हट चुका है सूर्य दिखाई देने लगा है उठूँ हाथ मुँह धोकर कल की कुछ बासी रोटियां पडी है खालू खेत पर जाना है देरी फसल को बर्बाद कर देगा जीवन की पूंजी जो मेरा निच का अभिमान था वह तो चूर चूर हो गया । अब इसे बर्बाद न होने दो । काशी हाथ धोकर सूखी बासी रोटी चबाने लगा । रुखे होठों पर एक दो दाने चिपक के जो दरिद्र मुख में जाना अस्वीकार कर रहे थे । तभी टीम के ग्लास में पानी लेकर कसूरी आई बोली पानी पी लो । कोर्ट से चिपके रोटी के दाने हट जाएंगे । काशी कसूरी के हाथ से पानी लेकर गठित गढकर एक ही सांस में गया और बोला तेरे घर क्या अब तुम भी कुछ खालो तब तक में अंगूठा लेकर आता हूँ । कल यू सिद्ध हो गया था । बाहर सूख रहा है । फिर कुछ देर ठहर गया । बोला जानती हूँ कसूरी ऊपर वाले की व्यापक सत्ता मलिन वेशभूषा को देखते ही दूर दूर आकर भगा देता है हमें खेद पर मंदिर होकर जाना है तो क्यों नहीं रुक कर उससे भी बातें करते चले या पता है जिसका कोई नहीं अपना होता, उसका ईश्वर भी बेगाना हो जाता है । कसूरी अपने दुःख तरंग को शांत करती हुई मनी मनी बोले संसार कि विश्वासघात की टोकरी तुम्हारी विधेयको विक्षिप्त कर दी है, जिसके कारण तुम ईश्वर से विमुख होते चले जा रहे हो । वन्य जीवन के लघु दीपको अनंत की धारा में बाहर देने की यह बुरी सोच पहले तो तुम्हें नहीं थी । काशी दुखी होकर उन स्वर्ग में बोला ठीक हो कसूरी! पहले मेरी महत्वकांशा मेरे उन्नतशील विचार मुझे बराबर दौडाते रहे । मैं अपनी कुशलता और सफलता पर अगर आते हुए अपने भाग्य को धोखा देता रहा था और अपने आप को विजयी सोच रहा था, समझ रहा था एक दिन सुखी होकर संतुष्ट होकर चैन से घर में बैठ जाओ का जब बडे हो जाएंगे! किन्तु वाह मेरी मृग मरीचिका थी ।

क्या यह वही शाम है? - 13

क्या ये वही शाम है? जिंदगी भर धर्म की अलौकिक वीरता के साथ चट्टान की तरह अटल खडी अविचलित जीते आ रहे बिरजू चाचा आज पहली बार कमजोर मेरी शाम की चोट को संभालना सके और अपने ही रास्ते से विचलित हो अपने मित्र बंसीधर से बोले, बंसीधर! क्या यही है वह शाम जिसकी निर्मम साई की याद मुझे जीवन भर रह रहकर डराती आई । इसके सामने आज मेरी योग्यता और विद्वता दोनों हार गई । विधेयक के संकुचित पात्र में इसे संभालकर रखना अब बहुत संभव नहीं । हालांकि मेरी जेब में घर में और अच्छे कर्मों के कुबेर का धन भरा हुआ है, जिसे देखता तो ऊपर गिर नहीं सकता । मैं और नीति की शक्ति मिट्टी बन चुकी है । मगर दूसरी ओर इस कमजोर शाम को देखो ये इतनी घातक और अजय कैसे है जो शेर के ऊपर चढकर उसके गर्दन को मरोड देती है, जिससे उसकी आंखे निकल आती हैं । फिर खुद की ओर इशारा कर चाचा बोले मेरी तरफ देखो बंसीधर वक्त किस तरह भी में कदम आहिस्ता आहिस्ता स्वर्ग लोग से मृत्यु लोग मेरी तरफ पडती आ रही है । बंसीधर ने अपने मित्र को परेशान देख व्यग्र पूछा । फिर जो लेकिन हुआ क्या या क्यों नहीं बतलाती? किसी से मारपीट हुई तो चलो उसके नाम थाने में रपट लिखवाई और अगर भाग्य आक्रोश है तो किसी मंदिर में चलकर भगवान के चरणों में बैठ कर दिए जलाए उनसे विनती करें भगवान बडी ही भक्त वत्सल होते हैं । सुना है भगवान अपने भक्तों की रक्षा के लिए शीर्ष सागर से दौडे और गज को ग्राहक के मुझसे बचाएं । विश्व किसी आकर और तालियां बजाकर बोले यह सब कहने की बात है । बंसीधर किसी योद्धा को जितना घमंड अपनी तरफ बार पर होता है, उतना ही घमंडी भक्त को अपनी भक्ति पर होता है । लेकिन क्या हूँ जीवन भर उस व्यक्ति से मैं जिसे दूर रखने की भीख मांगता रहा देखो आज मुझ से लिपटी मेरे साथ तुम्हारी आंखों के सामने खडी है अभी तो संकोची बन खडी है दिन बीतने दो ज्यादा नहीं एक दो साल देखना मुझ से लिपटी सोई मिलेगी तुम को घर से शमशान तक इस संसार में आकर किसी दिन भी मैं सुखी नहीं रहा । मनुष्य योनि में जन्म पार कर भी तिरस्कृत रहा जवानी ऋषि अभिशाप की भर्ती मेरे जीवन का दोनों और सुख को गरीब दवाई में आकर मेरी सारी अभिलाषाओं को बटोरकर एक जगह जमा कर उसमें आग लगा दी । अब तो मेरी चारों तरफ दुख । अग्नि की राख का अंबार ही अंबार है । फिर मनी मन बुदबुदाते बोला पहले गरीब हवाई अब संध्या दे दी बंसीधर कुछ देर तक संबित सा खडा बिरजू की बातों को सुनता रहा । फिर एक अपराधी की तरह परिवर्तित स्वर्ग में बोला बिरजू क्या याद है तुमको? कुसुम कहानी जिसमें मूर शुभ और पिक फूलों से लदी झाडियों में विहार करते थे और उस गहन वन के कोने में एक पर्णकुटी हुआ करती थी, जहाँ हम सभी गांव के बच्चे एक साथ खेलने जाए करते थे । उस पर्णकुटी में एक विधवा ताई और एक बच्चा जो हम लोगों के साथ खेलता था । जहाँ करता था बिच्छू बंसीधर के जीते में घुस जाने वाली नजर उसकी ओर डालते हुए पूछा था तो क्या हुआ वे लोग सभी ठीक है । तुम्हारी कर मुलाकात हुई थी । टाइम क्या बता रही थी? क्या आज भी मेरी शिकायत पहले की तरह तुम से की कहीं होगी? बिरजू बहुत नटखट है, जंगली इलाका है । यहाँ शेर भाग रहते हैं, लेकिन वसुंधरा का है । मकरन्द मुँह में भरी नी ड्रमर जो गुलाब से उठने में असमर्थ थी, उनके पीछे भागता फिरता था । कटीली झाडियों की भी परवाह नहीं करता था । बंसीधर अपने आंसूओं से यादव की घाव को धोता हुआ बोला बिरजु नियति किसी को नहीं छोडती । क्रोध ओर शोक की गति वैक्सी बेहतीन नियति नदी की धारा कभी नहीं सूखती । वह ज्यादा बेटी रहती है । यहाँ नीति बसंत को भी धरती पर रहने की आज्ञा नहीं है । बंसीधर की बातों से बेड चूका ही दे । फ्रांस रुक गए । उसने अपने हिलती डुलती कलेवर को किसी तरह संभाला और कांपते हुए बोला बंसीधर! कितनी मेरी ढहकर विलुप्त हो जा रही प्राण को अपनी बातों का अभिलंब देकर कुछ देर जो ढांढस बंधाया, उसके लिए जब तक जिन्दा रहूंगा तो तुम्हारा कर्जदार बनकर जी हूँ । बंसीधर ने कहा बिरजु! सत्य की पहचान बहुत दुर्लभ है, क्योंकि उसे प्रकट करने के साथ ही नफरत है । सत्य और झूठ का पुतला अपने ही सत्य की छाया को छू नहीं सकता । कारण ये दोनों ही सदस्य बंद कार में रहते हैं । फिर संध्या तो सकते हैं, तो उसे अपनी ओर बढते नहीं । कितना डरती, क्यों क्यों खुद को एक रोगी समझकर संध्या के हाथों उसके पास का गुलाम बनकर जीना चाहते हो । बिट्टू कमीज की पॉकेट से रूमाल निकालकर आंसू पोंछते हुए बोला, हाँ ऍम तुम ने ठीक ही कहा भाई और उसकी निर्दयता ने मेरी सद्भावनाओं को इतना विकृत कर दिया कि मुझे डॅडी देखने लगी । तार इसमें मेरा क्या दोष? माना कि मैं संध्या का गुलाम मुझे उससे डेड ने या उसके बारे में अपशब्द कहने का कोई हक नहीं । पर मैं तो इसका सिर्फ और सिर्फ वही गुलाम मानसिक नहीं । यहाँ तो वही गुलामी पीछे होती है । मानसिक गुलामी पहले हो जाती है । ऐसा क्यों? बंसीधर बेड चुकी ओर देखते हुए कहा । इसलिए कि लोग उसके आने का इंतजार जन्म से ही शुरू कर देते हैं । जैसे उसकी कोई प्रिय वस्तु जितनी खडकपुर, जलन, दिल में उसके आने के लिए रहती है, वैसा और कहीं संभव नहीं । जो जिंदगी को कडवा बना रखा है, उसका खयाल तुम अपने दिल से निकाल दो, क्योंकि जिंदगी बंदिशों का तो नाम नहीं । बचपन की जाते ही जवानी एक एक कर टूटने लगती है और एक दिन शोकमग्न और बेबसी से झुकी जिंदगी न उम्मीदी की कब्र में जाकर दफन हो जाती है । बिरजू की आंखें आकाश की ओर थी । शाम का छायाचित्र कठोर हो चुका था । उसमें मन में वेदना, आंखों में पानी की बरसात लिए, सांस के धुंधले अंधेरे में अपनी संभावित चिता की रोशनी में, पूर्णिमा का चांजू नीलगगन के विशाल सागर में बादलों गोल टुकडों से ओझल हुआ जा दिख रहा था । देख कर बोला देखो बंसीधर ऊपर आकाश की ओर जवानी कि स्वर्ण का पीलापन भी इस संध्या को सुनहली न बना सका । बंसीधर रूंधी करंट से बेड चुकी बातों को स्वीकारते हुए बोला, वहाँ पे जो सूर्य सामान, स्वर्णा तीन ठो निकलती जवानी अगर दिन है तो कालीमाता में वीरा का सहयोग लिए बुढापा रात है, जिसकी प्रतीक्षा चाहिए । अनचाही हम जीवन भर करते आ रहे थे, यह वहीं शाम है ।

सच्ची श्रद्धांजलि - 14

सच्ची श्रद्धांजलि दोपहर की दो बच रहे थे । मनोहरदास हाथ धोकर तकिये की सहारे बैठा खाने का इंतजार कर रहा था । तभी छोटा बेटा अग्निवेश बच्चों के साथ खेलकर थका परेशान उसकी गोद में आकर बैठ गया और बातों ही बातों में पूछ दिया पिता जी आप सारा दिन काम करते हैं, फिर भी थकते नहीं क्यों? मैं भी आपकी तरह दिनभर खेलता हूँ । ॅ मनोहरदास हस्ता हुआ बोला ऐसी बात नहीं है बेटा काम का बोझ कभी कभी मुझे थका भी देता है । अग्नि पिता की ओर घूम कर देखते हुए फिर पूछा तब क्या करते हैं? मनोहरदास उदासीन भाव से बोला कुछ देर बैठ के फिर उदरपूर्ति करता हूँ और क्या करूंगा । फिर मनी मान भिन्न भिन्न आया । कहा तुम्हारी तरह मेरे माता पिता तो है नहीं । दूसरा कोई मुझे अपनी गोद में बिठाकर क्यों आराम करने देगा? अग्निवेश एक अपराधी सा मूल्य रुंआसा हो । बोला आप अपनी पिता की गोद में क्यों नहीं? व्यक्ति पापा क्या वह बैठने नहीं देते? ऐसा है तो आप माँ की ही गोद में बैठी है । जानते हैं जब आप घर पर नहीं होते हैं तब मैं माँ की गोद में बैठा हूँ । बेटी की बात सुनकर मनोहरदास की आंखों से आंसू टपक टपक कर धरती पर गिरने लगे । वह वेदना जो अब तक मूर्छित पडी थी । शीतल जल के इन छोटों को पाकर सचेत हो गई और सारे अंगों को छोड दिया । इसी पीडा को दबाए रखने के लिए तो वहाँ की स्मृति को खुलकर कभी नहीं छेडता था । उसे अच्छे थी, रखना चाहता था । मान लो कोई भी खाली माँ अपने बच्चे को इसलिए जगाने से डरती हूँ कि वह तुरंत खाने को मांगेगा । पिता की आंखों के गर्म आंसू की बूंदी अग्निवेश को बुरी तरह डर आ गई । उसने पिता की आंखों के आंसू पूछते भी कहा पिताजी भूख लगी है, जो आप हो रहे हैं । मनोहरदास में अपने पुत्र अग्निवेश की ओर देखा तो पता नहीं क्यों उसका पितृत्व थे, उसे गाली लगाने के लिए आतुर होता था और दोनों विधेयक ट्रेन के सूत्र में बंध गए । एक पुत्र नहीं था तो दूसरी ओर पितृभक्ति मनोहरदास करुँगी । मातृभक्ति की याद में अपनी श्रद्धा की पूरी चढाने के लिए जानी कब से उसकी आत्मा तडफ रही थी । वो अपनी कृपिन विजय में जितना प्रेम संचित कर रखा था, आज माता के औसतन में एकत्र होने वाले दूध की भर्ती निकलने के लिए आतुर हो गया । बस सर झुकाकर रोने लगा वे सारी कठोर भाग जो बराबर उसके मन में माँ के प्रति यानि जब जीवित थी, उठते रहते थे वे सारी कटु वचन जो उसने गलती से कहे थे । इस समय सैकडों बिच्छू के समान डंक मार रहे थे । हाईवे इतना बुरा व्यवहार कभी उस प्राणी के साथ था, जो गंगा की तरह पवित्र और सागर सा गंभीर था । जबकि उस विजय में मेरे लिए इतनी कोमलता थी कि मैं जब कभी उसके हाथ में इन गिलास पानी पकडा देता था तो वह कितनी मजबूर आंखों से मेरी तरफ देखती थी । बीती बातों को याद कर उसका कलेजा फटा जा रहा था । आज उन चरणों में सर रखने की प्रबल इच्छा उसे विदेश से आत्मा तक को रुलाई जा रही थी । वह सोचने लगा, मुझे सापुतारा का होना एक माँ के लिए कलंक है । मेरा प्राण निकल ड्यूटी जाता सोच सोच कर मनोहरदास का कलेजा छाती फाडकर बाहर निकल जाना चाहता था । जाडी की संध्या थी । जोर की बारिश हो रही थी । दिन ढलने से पहले ही अंधेरा अपना भयावह रूप धारण कर लिया था । दरवाजे पर खडे अमरूद के पेड की पत्तियां हवा में कापटी हुई सरसराहट की आवाज निकाल रही थी । मान लो कोई आत्मा पत्तियों पर बैठी सिसक रही हो । सुनकर मनोहरदास कम हो गया । उसे लगा कि पेड की आड में मर्माहत सी खडी उसकी माँ से मिलती जुलती कोई आकृति उस की ओर बढती चली जा रही है । उस की खुशी की सीमा नहीं रही । उसने तय किया मुझे अब अपना अधम जीवन माँ की पुण्यात्मा के साथ गुजारना चाहिए । मैंने सदैव उसका निरादर किया है । सोचते सोचते मनोहरदास का शोक उद्गार जो अब तक भय के नीचे दबा जा रहा था, उबल पडा वो अपनी माँ की आकृति के हाथों को अपने गले में डालने के लिए अधीर हो । आगे बढा । तभी उधर से एक मोटर गाडी गुजरी देख गरबा हक्का बक्का रह गया । उसने देखा एक गाय कहीं से भटकती हुई ठंड से बचने के लिए वहाँ आश्रय तलाश रही है । उसकी सारी मनोव्यथा जो अब तक उसका रस चूस रही थी, छूमंतर हो गई । उसे लगा अब तक वहाँ बेकार भार को अपने ऊपर लादकर जोडियों विश्वासों के मलबे के नीचे ब्लेड से दवा जा रहा था । वो अपनी दुनिया में खोया हुआ था कि अचानक उसके कानों में आवाज आई । राम नाम सत्य है । उसने पीछे मुडकर देखा । कई मनुष्य एक लाश को अपने कंधे पर उठाए चले जा रहे हैं । मनोहरदास के पांव वही थी । टक्कर रह गए । वह मूर्ति की भर्ती खडा सोचता रहा क्या? तृषा वृत अंधेरे में भी विधाता का कालचक्र चलता रहता है । उसने अंतिम यात्रा में चल रहे एक आदमी को रोककर पूछा हूँ कौन जा रहा है? उसने कहा मेरी माँ सुनते ही उसके मुंह से निकल पडा, ऊपर वाले तुम्हारी कठोर करुना की जय हो । जिस माँ को लोग अपने प्राण से भी ज्यादा प्यार करते हैं, उसे एक दिन अपने ही हाथों आपके हवाली करना होता है । क्या विडंबना है? कितनी क्रूर परंपरा है बोल कर वहाँ एक आज्ञाकारी बालक की भर्ती घर के भीतर चला गया और गद्दे पर लेट गया । मगर उसकी आंखों में पूर्वावस्था की करूँ स्मृतियां स्वप्न की भारतीय आने लगी । सुबह हुई तो उसकी दशा और खराब हो गई । तेज बुखार आ गया । आंखे चढ गई । न हस्ता था, ना बोलता था । बस चुपचाप पडा रहता था या सब देखकर उसकी पत्नी सुधा घबरा गई । उसने पूछा अजी आप को क्या हो गया? कुछ बताते क्यों नहीं? सुबह के दस बज चुके हैं । एक बार के लिए भी आप खेले तक नहीं । मनोहरदास ने आंसूओं के आवेदको रोकते हुए अनमने ढंग से कहा कुछ नहीं हुआ है । तुम अपने घर का काम देखो । सुधर पति की आज्ञानुसार गाय को चारा डालने बथान पर चली गई । कुछ देर बातचीत लौटी । देखी मनोहरदास यथावत अपनी जगह है । देखकर सुधा और कुछ पूछने की हिम्मत नहीं जुटा सकी । वह संज्ञाशून्य हो गयी । आत्मव इतना आर्य के समान उसके रेते को चीरने लगा । उसने साहस जुटाकर मनोहरदास की ओर सजल आंखों से देखा और अधीर होकर पति के समूह जाकर बैठ के बोली देखो मनोहर नही तुम अपनी चिंता का कारण बताती हूँ और न दिन की ग्यारह बज गई । हाथ धोकर नाश्ता करते हो तुम जैसे बुद्धिमान आदमी के द्वारा एक निर्मूल कल्पित संभावना के पीछे अपना दाना पानी छोड देना बडी खेत की बात है । मनोहरदास का गौरव शादी जीते प्रत्युत्तर देने के लिए विकल्प हो था । फिर सोचा इस कडवी दवा को पान कर लेना ही उचित होगा । उसने मन ही मन कहा मैं मानता हूँ कि दुनिया में सिर्फ मेरी माँ नहीं मारी है और उनकी भी मारी है । मगर ऊपर वाले में सहने की शक्ति सबको तो एक जैसी नहीं दी । कोई थोडे से टूट जाते हैं, कुछ टूटकर भी खडे रहते हैं । सहनी और न सहने की जडे आदमी के हृदय के भीतर होती है, जिसे खोदकर काटा नहीं जा सकता । उसे अपने बीते बचपन की एक घटना याद आने लगी । जब हाँ जी दी थी तब मेरा ये जीवन कितना मनोहर था । उन दिनों लगता था यह संसार मानो प्रेम की थी और क्या की खान है? क्या वह कोई अन्य संसार था? इन्हीं विचारों में मनोहरदास की आंखें छप्पन गई और चलचित्र की भांति सारी घटनाएं आंखों के सामने नाश लगी । उसने देखा किसी बात पर पिताजी उसे डाट रहे हैं । मैं तो रहा हूँ मुझे रोता देख मेरी मार हो रही है मुझे चुप कराने के लिए । मान्य दिवाली की बच्ची लड्डू लाकर मुझे तब पिता जी माँ से बोले क्या हो रहा है? माने कहा यहाँ डांटने वाली को लड्डू ने ही मिलते हैं । लड्डू डांट खाने वाली को मिलता है । पिताजी बोले तो तुम अपने बेटे से कहूँ, एक बार मुझे डाटते सुनकर में हसने लगा माँ पिताजी भी हंसने लगे । इन शुभ वर्षों को गुजरे हुए पांच साल हो गए । कितने प्राणियों को संसार की सुख सामग्रियां इस परिमाण में मिलती हैं कि उनके लिए दिन सादा होली और रात्रि दीवाली देती है । कितने लोग तो ऐसे भी है जिनके आनंद के दिन कुछ बलिया कुछ घंटे या कुछ दिनों के लिए आती है । फिर बिजली की भारतीय चमक कर सदा के लिए लुप्त हो जाती हैं । इतने में उसकी पत्नी सुधा उसके पास आकर खडी हो गई । मनोहरदास की निगाह उस पर पडी । ऐसा जान पडा मानो उसके शरीर में फिर से रक्त संचार हुआ । उसने पत्नी से कहा, सुधा काश में मुसलमान या ईसाई होता । तब मैं अपनी आपको फूलों से सनी मिट्टी में मिलाकर माँ के संघ उसी कब्र में पडा रहता हूँ । जिस कमरे में माँ को दफनाता तब मेरी मामा से दूर नहीं होती । मैं उसके बगैर जिंदा नहीं रह सकता हूँ । वह मुझ से जुदा होकर चैन नहीं पाती होगी । सुधा पति की बात पर बोझ वो बोली मनोहर मेरी बात मालूम किसी इंसान को आत्म और अल्लाह के बीच में नहीं आना चाहिए तभी आत्मा शांति से रह सकती है और यही माँ के लिए तुम्हारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी ।

बंदिनी - 15

बन्दिनी रात के बरसात से गांव के नदी नाले उफन रहे थे । आम के वृक्ष के पत्तों से पानी ढोलक रहा था कि अचानक दक्षिण पवन ने फल से नदी डालियों से ऐसी उठ खेलियां नहीं की । उसका संचित धन अस्त व्यस्त हो धरती पर बिखर गया जिसे देखकर दूर खडी रेल ऊषा की किरणों की तरह खिलखिलाकर हंस पडी और बोली तेरह हाल भी मेरी तरह तुम और मैं दोनों एक नाव की सवारी है । साथ चल रही उसकी सहेली सुषमा चौक गई । उसने हरियाली से लदी ढलवां तट के बीचोंबीच कल कल बह रही नदी की ओर दिखाकर कहा क्या तुम इसे देखकर हस रही हो या ऊपर? आकाश में मजीरा से भरी छा रही घाटा को देखकर आखिर तुम्हारी हसने का कारण क्या है? सुषमा पूछने पर रेनू शांत हो गयी । उसकी आंखों से झर झर कर आंसू बहने लगे । उसने दोनों हाथों आपने बहे जा रही आंसू को पूछते हुए कहा मुझे और उसमें कोई अंतर नहीं । इसलिए सुषमा रेनू के उत्तर को सुनकर मुस्कुराती हुई बोली रेनू तुम्हारी इस उदासीनता को देखकर मेरी चिंता बढ जाती है । तुम सच सच बताओ शायद मैं तेरी कुछ सहायता कर सकूँ । रेलू सुषमा की प्रश्न के जवाब में सिर्फ इतना बोल कर चुप हो गई । हारने वाली को विजेता की ओर से कोई पुरस्कार नहीं मिला । सुषमा समझ के रेनू के हृदय की संचित किया था । इस भीषण विद्रोह के रूप में प्रकट होने का कुछ तो कारण है अन्यथा अपने दर्द को व्यक्त कर इतनी करो नहीं हो जाती । उसने रेनू को अपनी दोस्ती का वास्ता देते हुए पूछा, रेनू! क्या बात है? मुझे बताओ । लेनोवो अपने जीवन में इतना उसने धन किसी से नहीं पाई थी । सुबह टूट गई । बच्चों की तरह बिलख उठी । उसके बीते दिनों की स्मृतियां चमकीले तारों की तरह प्रज्वलित हो गई । उस आत्मसम्मोहन दशा में उसने जो कुछ बताया, सुनकर सुषमा चकित रह गई । उसने कहा, बचपन से मैं दिल में एक सपना पाली हुई थी कि मेरा हम सफर वो होगा जिसके दिल में आज हुए होंगे । दर्द होगा, त्याग होगा, जो मेरे साथ हो सकेगा, जो मेरे साथ चल सकेगा । लेकिन रेनू के स्वर में निराशा थी । रोज था आहत सम्मान का रुदन था । भर्राई आवाज में बोली मैं पति सेवा को अपने व्रत का आधार मानकर अपने गृहस्थ जीवन को दीर्घायु बनाने की भरपूर कोशिश कर रही थी, लेकिन उन के प्यार में वह माधुरी को मिलता नहीं देखी जिससे मेरी आत्मा तृप्त हो । मेरी जिंदगी में उनकी बे रूखाई दिनबदिन जंग भरने लगी । इन चंद सालों में मेरे शरीर पर क्या क्या बीता? मैं सिर्फ इतना जानती हूँ कि मैं मौत की जंजीरों में जकडी चली जा रही हूँ । तुम्हारी तरह मैं भी रूहानी बुलंदियों पर उड सकती थी जो उनका साथ मिला होता । सुषमा रेनू से जो सुनना चाहती थी उत्तर मिल गया । बस समझ गई विलासिनी रेनू तपस्विनी बनकर क्यों जीती है उसने जिसमें भरी आंखों से रेलों की ओर देखा और तीखे स्वर में पूछा अब तक तुम कैसे सह रही थी तो उनको तो कब का उसका घर छोडकर अपने माँ बाप के पास लौट आना चाहिए था । अरे तुम्हारे पति में न तो देवत्व है, न मनुष्यत्व ही है । केवल और केवल अहम की मदांधता और पति होने की ही निर्लज्जता है । रेलू आंध्र होकर बोली मैं अपने प्रेम थाल में अपनी आत्मा का सारा अनुराग सारा आनंद उनके चरणों में समर्पित करने ली गई थी, लेकिन उन का ये रूप देखकर मैं भयभीत हो गई । मेरा थाल मेरे हाथ से छूटकर गिर गया और धूप, दीप, नैवेद्य सब भूमि पर बिखर गए । मेरी चेतना का एक एक रूम जैसे ट्रेन से विद्रोह करने लगा । जी में आया की बोल दू आपकी और मेरे रास्ते एक नहीं हो सकती क्योंकि प्रेम शासन में कोई दूसरा शासन मुझे स्वीकार नहीं । लेकिन अपने माँ बाप और समाज का खयाल कर कभी कहना सकी सहती गई कहती गई तब मैं यौवना थी स्वस्थ थी इसलिए तबियत आत्मचिंतन का समय नहीं मिला की सोचू जब तक पानी के ऊपर आवरण है सूर्य का प्रकाश भीतर नहीं प्रवेश कर सकता । फिर अपनी वैवाहिक सजा की मियाद बताकर पूरी जानती हो रही हूँ । मेरी शादी को आज पचास साल होने जा रहा है । इस बीच उन्होंने कभी मेरी कदर नहीं ट्रेन की भूख होनी थी तो मुझे भी थी वो जो कुछ मुझसे चाहते थे मैं भी उनसे वही सबको चाहती थी जो चीज मुझे न दे सके तो मुझसे न पाकर इतना क्यों दंड हो गए । क्या इसलिए कि वे पुरुष है और मैं कबलाना री? उनको तो समझना चाहिए था । नारी लज्जा की मूरत होती है, अपनी चाहत को टूटता देख देख कर सकती है । मौत को गले लगा सकती हैं लेकिन शर्म की एक पत्नी दीवार को तोड नहीं सकती । सुषमा तो आत्मोन्नति के प्रयास में तुम्हारा जीवन इतना शुष्क मेरे हुआ है । ऋण हूँ माँ बाप ने बचपन में पति के प्रति दिल में जो त्यागकर दीपक जला दिया था, उसकी लो जरा भी मंदिर ना पडी इस की कोशिश में सादा कर दी रही हैं । सुषमा दीर्घ निश्वास लेकर बोली वह प्रणय भी कैसा जो विशाल की छुट्टी हो । रेनू यही त्रिदेव से बोली जिस दिन में उनके घर के ही विराट को गले में बाहों का हार डाले, आंखें नशी से लाल उन्मत्त कि भारतीय पहुंचे जैसे कोई ज्यादा असामी से महाजन के रुपये वसूल करने आया हूँ । मेरा घूंघट हटाते ही बोले मैं तो मैं देखने नहीं आया हूँ बल्कि मैं तो तुमको मन क्रम से पानी आया हूँ । इसलिए तुमको मेरा स्वागत मुस्कुराकर करना चाहिए । तुम तो ऐसे मुंह ढककर बैठी हो जैसे मैं कोई रावण तुम को मेरी सूर्य देखना कबूल नहीं । फिर मेरी बात को पकडकर अपनी ओर खींचा । जैसे ही उनका हाथ मेरे शरीर पर पडा, मुझे लगा जैसी कोई सर कार्ड लिया हो । सिर से पांव तक में पत्थर की हो गई । मैं अपनी आंखे मूंदी । उनकी अगली हरकत की प्रतीक्षा करने लगी । तभी उन्होंने मेरे ऊपर एक जोर का तमाचा लगा दिया । मेरी आंखों सेक्टर टक्कर बूंदे गिरने लगे । वे इतने पर भी नहीं रुके । गोली ज्यादा ढकोसला मत करो । इसके बाद सोने के सारे सपने मेरे टूट गए जिससे में उनके घर पहुंचने से पहले देख रही थी जी में आया क्या दूँ आप के साथ शादी का आशय या नहीं की मैं आपकी लौंडी हूँ । शायद आपको मालूम नहीं प्रेम के शासन में और कोई दूसरा शासन में स्वीकार नहीं कर सकती । मैं आपकी ब्याहता हूँ । आपने अग्नि देवता के समक्ष अपने बुजुर्गों की उपस् थिति में मुझे अर्धांगिनी के रूप में स्वीकारा है । इसके पहले ही उन्होंने मुझे घसीटकर कमरे से बाहर निकाल दिया और अंदर से कि वार्ड बंद कर दिए । उस दिन से मैं ईश्वर से एक विनती करती रही । ईश्वर वे अपना विवाह करने मुझे छोड दे । जो मर्जी इस्त्री में केवल रूप देखना चाहता है, उसके लिए स्त्री केवल और केवल स्वार्थ सिद्धि का साधन है । ऐसे मर्ड पति नहीं बन सकते । सुषमा मूर्ति बस बैठी हूँ । रेनू की बातें सुनती रही । मालू उसके ऊपर एक के बाद एक जूते पढ रहे हूँ । रेनू कुछ बोलना चाहिए पर शब्दों की जगह कंट्री में जैसे नमक का डेला पडा हुआ हूँ । कुछ बोलना सके, सिर्फ उसकी आंखों में आंसुओं का सागर उमड आया । सुषमा की आंखों में भी आंसू थे । मगर छिपे हुए चिंतित दुखी सुषमा अपने मनोबल से उसे दबाई हुई थी, लेकिन उसकी छल चला दिया कि आप वोट विनय तीन मुख श्री उसे निशस्त्र किए जा रहे थे । उसके दबी आंसू फगवारी की तरह उबल पडे । वहाँ वो ठक्कर रोने लगी । रेनू ने सुषमा को गले लगाकर कहा एक अभागिन के लिए तुम क्यों रो रही हूँ और कितना रोगी? मेरा तो नसीब भी ऐसा है तुम्हारी रोने से बदल थोडी ही जाएगा । रेनू की ये शब्द सुषमा को फोडे की तरह तीस मारने लगे । उस ने कहा जब सत्तर वर्ष तक संसार के समर में जमा रहने वाला नायक हथियार डाल दी तो जो नायक कल उतरा है, उसका क्या होगा? रेनू वासु की धार से अपने यौवन की कलुषित जीवन चिन्ह को धोनी की असफल कोशिश करती हुई बोली सुषमा सच तो यह है कि स्त्री मर्यादा के अनुसार जब तक घर वालों से दो चार खडी खोटी नहीं सुन लेती हूँ, मेरा भी पशुता मन विरक्ति से नहीं भरता है । सुषमा झुंझलाकर रेनू की ओर की बोली तुम्हारी बातों में लहर है, दम नहीं अन्यथा प्रतिकूल परिस्थितियों में भी कोई सेडनी चक्कर नहीं बैठा रह सकता है । तुम्हारी सर्वज्ञता तुमको प्रतिकार का घूंघट उलटने नहीं देती है तो मैंने आकांशा का नशा पी रखा है । इसीलिए इतनी विवश हूँ । रेनू की आगे चल चला आई बोली भाई हूँ, लेकिन ये नहीं हो सकता । मैं कृति दासी हूँ । मेरे माता पिता ने अगली देवता के समक्ष उनके हाथों में दान स्वरूप मुझे भेंट किया है । सुषमा विचलित हो बोली यह असत्य है । सत्य नहीं हो सकता । पशुओं के समान मनुष्य नहीं देख सकते हैं । तुमने अनजाने में जो साथ जीने बढने की प्रतिज्ञा ली है उसे तोड दो और लौटाओ अपने घर । रेनू कुछ देर तक तब दो शून्य सी खडी रही । फिर ऐसा पति के घर की तरफ दौड गई ।

प्रेत-यात्रामार्ग - 16

प्रीत यात्रा मार्ग गरीबनाथ के स्तर पर काली पट्टी बंधा देख उसके दादा रामदास समझ गए कि गरीबनाथ के सिर में दर्द है तभी उसकी माँ ने तांत्रिक को बुलवाकर उसके सर पर काली पट्टी बंधवाई है । रामदास ने आवाज देकर गरीबनाथ को अपने पास बुलाया और पूछा क्या तुम आज फिर उस नीम के पेड के नीचे खेलने गए थे? गरीब भयभीत हो धीमी आवाज में बोला हाँ गया था लेकिन सच मानी । दादा जी मैं जाना नहीं चाहता था । दादा रामदास गुस्से से आगबबूला होते हुए बोले तब फिर गया क्यों? गरीब बोला वह कुंवर का छोटा बेटर टू जितना है ना जो मेरे साथ पडता है । वही मुझे बुलाकर वहाँ खेलने ले गया । रामदास को गरीबनाथ पर क्रोध की जगह हसिया थे । उन्होंने गरीबनाथ को समझाते हुए कहा कोई तो मैं कहीं जाने का रहेगा तो तुम वहाँ चले जाओ । गरीबनाथ चुभ रहा । रामदास ने उसके छोटे छोटे गालों को सहलाते हुए कहा बेटा तो मैं कहता हूँ तुम अपनी छोटी बहन गुडिया को टूस ना कि घर सदा के लिए रखा । गरीबनाथ कुछ देर तक विचारता रहा, सोचता रहा फिर बोल उठा नहीं, मैं उसे नहीं दूंगा तो मेरी बहन है । इस पर रामदास बोले लेकिन ऐसा नहीं करने पर दूसरा तुमसे नाराज हो जाएगा । क्या इसके लिए तैयार हो? गरीबनाथ दर्शाता हुआ बोला हाँ मैं तैयार हूँ । दादा रामदास बोले ठीक है तो अब से चूसना नाराज हो या खुश उसकी परवाह तुम नहीं करोगे । गरीबनाथ में कडे शब्दों में कहा नहीं, कभी नहीं करूंगा और अब से उसके बुलाए से कभी कहीं नहीं जाऊंगा । गरीबनाथ से ऐसे उत्तर की उम्मीद नहीं थी । सुनकर दादा की आंखों से अनुराग टपक पडा । उनका एक एक रूम फुल्की थोडी था । उन्होंने ईश्वर से कहा हे ईश्वर, तुम्हारा लाख लाख शुक्र है गरीबनाथ कुछ देर बाद दादा की नजदीक गया और विनीत स्वर में पूछा लेकिन दादा जी मैं वहाँ खेलने क्यों नहीं जाऊँ? यह तो आपने बताया ही नहीं । दादा बिना किसी लाग लपेट के बोले, वहाँ प्रेत रहता है जो मनुष्य को बीमार पडा देता है । गरीबनाथ में आश्चर्यचकित हो पूछा हीट रेट क्या है? कहाँ से आता है? रामदास गरीब रात को समझाते हुए बोले, आदमी मरने के बाद भूत बन जाता है, लेकिन अभी तुम बच्चे हो, तुम्हारे लिए और अधिक को जाने की जरूरत नहीं है । बस जब मैं नीम के पेड के नीचे खेलने से मना करता हूँ तो तुम वहाँ नहीं जाओगे । गरीब सिर खुजलाते हुए बोला, मत बताइए । मैं समझ गया उधर से प्रेरित आता जाता है क्योंकि वहाँ एक बोर्ड लगा हुआ है । ट्रेन, यात्रा मार्ग, दादा हंसी और वाणी को विभूषित कर बोले बेटा, उधर से प्रेम नहीं, मरे हुए आदमी को अंतिम संस्कार के लिए ले जाया जाता है दूर कालीमाई के मंदिर के पास एक नदी है, वहाँ शमशान है । मरने के बाद घर वाले मृत शरीर को जिस रास्ते से ले जाकर उसकी अन्त्येष्टि क्रिया करते हैं उसे ही प्रेरित यात्रा मार्ग कहा जाता है । मृत्यु उपरांत मृत आत्मा तब तक ट्रेन बनकर भटकती रहती है जब तक कि उसके पुत्र पौत्रों द्वारा पिंडदान नहीं किया जाता है । इसलिए मृत्युपरांत दस दिनों तक पिंडदान आवश्यक बताया गया है । दसवें दिन पिंडदान के चार भाग होते हैं । दो भाग मृतदेह को प्राप्त होते हैं । तीसरा हिस्सा यमदूत को प्राप्त होता है और चौथा हिस्सा पापात्मा रूप रेट का ग्रास बनता है । मृत शरीर के अंतिम संस्कार के उपरांत पिंडदान से प्रेत को हाथ के बराबर शरीर प्राप्त होता है । पिंड शरीर धारण कर ग्यारहवीं बारहवीं दिन भोजन करता है और तेरह दिन यमदूत उसे पृथ्वी लोग से हम लोग लेकर चला जाता है । गरीब न चुपचाप कहानी सुन रहा था, तभी ज्यादा बोले ठीक है, अब तुम समझ गए होगे फ्रेंड क्या होता है । मगर गरीबनाथ कप चुप रहने वालों में से था । वह आगे जानने के लिए और अधिक उत्साहित हो उठा । बोला, आप भी मरने के बाद प्रेत बनकर प्रेत यात्रा मार्ग पर उछल कूद मचाएंगे, तब तक जब तक कि मैं आपका पिंडदान न कर दो । ज्यादा बोले इसलिए पिंडदान करना भूलना मत, क्योंकि अनिष्ट शक्तियां अधिकतर भूलोक पर निवास करती हैं, जहाँ पे मनुष्य को आवेशित करती हैं । इन अनिष्ट शक्तियों का अस्तित्व विभिन्न स्थानों पर होता है । जीवित और निर्जीव वस्तुओं में वे अपना केंद्र बना लेते हैं । ये काली शक्तियां साधारण मनुष्य वृक्षों में यानी फॅमिली, पीपल, महुआ आदि के ऊपर अपना स्थाना बनाती है । ये शक्तियां मूलभूत वायु तत्व से बनने की वजह से इन्हें सूक्ष्म दृष्टि के बिना देखना संभव नहीं होता । कई बार अग्नि संस्कार अच्छे ढंग से नहीं किए जाने से भी मृतका देह इस परिसर में बार बार दिखाई देता है । ऐसे स्थानों में जाने से अनेक लोगों को अस्वस्थ लगना, भारीपन, थकान आदि प्रतीत होता है । तथापि कभी कभी थकान की वजह से भी होता है । दादा का बोलना बंद हुआ । अचानक गरीबनाथ रोने लगा । दादा ने गरीबनाथ को कुछ करते हुए गोद में बिठाकर पूछा बेटा, तुम क्यों नहीं क्यों लगे? गरीबनाथ रोते हुए बोला मुझे भी भूत ने पकड कर रखा है । इसलिए मेरी सिर्फ ॅ होता है । तभी गरीबनाथ के गुरु जी शिवा सिंह जी आ गए । उन्होंने दादा से पूछा गरीबनाथ क्यों हो रहा है? दादा ने क्रमशः नीम के पेड के नीचे खेलने तक की घटना गुरूजी को बताई । सुनकर गुरु जी ठहाके मारकर हंसने लगे । बोले गरीबनाथ चुप हो जा । आंसू पूछ कर मेरे पास मैं बताता हूँ तुमको भूत क्या होता है? पहले तो मैं जल रही बिजली बत्ती को बंद करो । गरीबनाथ स्विच ऑफ कर दिया । गुरूजी ने पूछा जो अभी तक रोशनी थी वो कहाँ गई? गरीबनाथ होते हुए कहा पर टर्न नहीं गुरूजी हसते हुए फिर बोले अब स्विच ऑन कर दो । स्विच ऑन करती ही अंधेरा खत्म हो गया । लाइफ चलती गरीबनाथ खिलखिलाकर हंस पडा । गुरु जी पूछे तो हस क्यों रहे हो? गरीबनाथ ने कहा बाल तब बीता जब मैंने बिजली का स्विच ऑफ किया और अब भी है । लेकिन तब अंधेरा इसलिए था की उसमें एनर्जी नहीं थी । इनर्जी को कोई पकडा नहीं सकता । गुरु जी बोले अरे गरीबनाथ तुम तो बहुत होशियार बच्चा हूँ । ठीक इसी तरह आदमी की आत्मा एक लाइट है । जब तक आदमी के शरीर में वर है, आदमी जिंदा है और उसके निकलते ही आदमी निर्जीव हो जाता है । दरअसल भूत प्रेत सब आदमी का अंधविश्वास है, फिर भी अभी तुम बच्चे हो इसलिए सुनसान जगह पर तुम को नहीं जाना चाहिए क्योंकि निर्जनता भी एक प्रकार का भूत है । जहाँ आदमी कभी कभी इस प्रकार डर जाता है कि उसकी मौत भी हो सकती है । ऐसे में लोग कहते हैं उसे भूत ने मार डाला, ट्रेंट ने पटक दिया जिस से गिरकर उसका सर फट गया और उसकी मौत हो गई हूँ ।

भुतना का तोता - 17

भूतना का तोता देहरी गांव के भूतना का एक का एक पशुता छोड देता बन जाना लोगों को अचरज में डाल दिया । किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था । ये सब हुआ कैसे? वही लोग जो कभी उसकी बात का मखौल उडाया करते थे । अब उस की हर बात को एक पुण्य आत्मा की आवाज समझने लगे । भूतना कहता था संत का काम है उपदेश देना और भक्त का काम है अक्सर शा उसका पालन करना । इसी को गुरुभक्ति कहते हैं । हमारे ग्रंथों में भी यही कहा गया है कि गुरु की अवहेलना करना महापाप है । गुरु प्रमुख रानी नरक में जाता है । ऐसे ही वचन द्वारा भूतना धीरे धीरे त्यागी महापुरुष की श्रेणी में गिना जाने लगा । उसकी श्रद्धा करने वालों की संख्या बढने लगी । श्रोताओं में पटवारी, चौकीदार, थानेदार कभी कभी तो बडे हकीम भी आ जाने लगे । भूतना भी उन लोगों का जोरदार स्वागत करने लगा । आठों पहर अपमान का घूंट पीने वाला भूतना प्रतिबद्धता का वक्त इन्कारी बन गया, जिससे दोनों तरह के पुरुषों का विधेयक दीपक प्रकाशित होने लगा । एक दिन भूत ना अपने घर के छप्पर पर बैठा एक तोते को पकडने में किसी तरह कामयाब हो गया । फिर क्या था भुगतना का दिन फिर गया । उसकी तो चांदी निकल आई । उसने सबसे पहले दो तीन को हाँ और न कहना सिखाया । जब तोता पूरी तरह हाना बोलने लगा, तब उसे लेकर भूतना गांव के बाहर एक चौराहे पर बैठ गया । लोगों के पूछने पर बताया था या एक चमत्कारी होता है या किसी भी समस्या का हल होना और न होना हाँ और नाम में बता देता है । कितनी अल्प आवस्था में भूतना तोते की अलौकिक सिद्धि को देखकर लोग विस्मित हो जाने लगे । आज परोस के समस्त गांव में उसकी ख्याति फैल जाने लगी, मानो उस ने दिग्विजय कर लिया हूँ । ऐसे तो उतना बहुत गरीब और दुर्बल नौजवान था, लेकिन उसका तोता उसके रूप को चमत्कृत कर दिया था । भूतना गांव के मुखिया सोहन लाल की पत्नी कलावती जो एक गर्व शीला, धर्मनिष्ठा, संतोष और त्याग के आदर्श का पालन करने वाली नारी थी, जिसके चरित्र में रमणीयता और लालित्य के साथ पुरुषों का साहस और धैर्य भी मिला हुआ था । यद्यपि अपने पति की स्वार्थ भक्ति से उसे बहुत अच्छी थी, पर इस भाव को वह पत्ति सेवा में कभी बाधक नहीं बनने दी । उसी जब पति के अध्यक्ष पतन का पता चला, तब उसकी बच्ची खुशी श्रद्धा भी चली गई या नफरत नहीं, बल्कि उस की ही चिंता थी । उसने कई बार अपने व्यंग शहरों से छेदना और कटु शब्दों से पति के विधेयको वेदना चाहते । मगर सोहनलाल पर इसका कोई प्रभाव नहीं पडता । पति की नित्यम इंडियन ड्रिलिंग दृश्य ने कलावति के दिल से अपनेपन को मिटा दिया था । कभी सोच तीस में हस्तक्षेप करो, कभी सोचती आत्महत्या कर ली । सारी रात आंखों में कर जाती दिन निकल जाती । तभी एक औरत ने बातों ही बातों में बताया बोली जानती हो कलावति अपने गांव के भूतना के पास एक होता है, सुनती हूँ तोता सटीक भविष्यवाणी करता है, कला होती है । जानकर हस्ती हुई बोली अच्छा ऐसी बात है तो कल में उससे मिलकर देखती हूँ । सच है या कोई छलावा, मैं जाकर उससे पूछूँगा । मेरी दस वर्षों की अविश्रांत तपस्या निष्फल क्यू हो गयी । जीवन की आशाएं आकर लॉट हो गई । उसके वापस लाने के लिए मैंने अपनी आत्मा पर कितना अत्याचार किया । देवताओं की आगे कितनी मिलती मांगी पर सारे प्रयत्न निष्फल रही । क्यों इन शोक युक्त विचारों से खुद को उसने इतना को सर की उसकी आंखें भर आई । अपनी व्यवस्था पर उसे इतना दुख कभी नहीं हुआ था, जितना आज बताते हुए हो रहा था । यद्यपि कलावति मनु भागों को गुप्त रखने में सिद्धहस्त लेकिन आज उसका किसी आया चेहरा उसकी सारगर्भित प्रेम व्याख्या का पर्दा खोल दे रहा था । उसकी व्यग्रता इतनी बढ गई थी कि वह स्थिर रह सके । स्त्री धर्म उसके पैरों को चौखट से बाहर जाने नहीं दे रहा था । बार बार वार धर्म की शिलाओं से टकराकर लौट आती थी । उसी लगा कि धर्म से कह रहा है क्रीम नश्वर है । मिसाल नहीं कौन? किसका पति कौन किसकी पत्नी या सब माया जाल है, पर मैं अविनाशी हूँ तो मेरी रक्षा करूँगा । कलावती स्तंभित हो गई, पर धमकी कि उठती लहरी कलावति के मंडे को ना तोड सके । चित्र की दृढता और मनोबल का उसे अनुभव भी नहीं हुआ । उसे अपने जीवन के सागर तट की रक्षा स्वयं करना होगा । कारण उसकी सारी आकांक्षाएं इसी तटपर विश्राम किया करती थी, जिसे प्रेमलता ने इस रक्षा तट को विध्वंस कर दिया । वह जल्दी जल्दी कदम बढाती हुई उस चमत्कारी तोते से मिलने घुटना के घर पहुंच गई । जेट महीने की चिलचिलाती धूप में एक अनजान उस पर जवान महिला को देखकर भूतना किसी अनहोनी की आशंका से आप उठा । उसमें विनती कर पूछा, नया राशि मुखी तुम्हारी क्या समस्या है जो इस झुलस टी धूप में तुम सबसे आंखे बचाकर मुझसे मिलने आई हो तो मैं देख कर लगता है तुम कोई साधारण नारी नहीं बल्कि किसी प्राचीन देव का था कि पातरी हो कलावती व्यंग भाव से बोली सुना है तुम्हारे पास एक चमत्कारी होता है, जो तीनों कालका ज्ञानी है, जिसके पास हर समस्या का हल है । भूतना ने जोर देकर कहा हाँ वो तो है । कलावति ने तलकर कहा तो एक बार उसका दर्शन करा हूँ । भूतना अभी लेकर आता हूँ । बोलकर घर के भीतर गया और तोते को लाकर कलावति के सामने रख दिया । कहा ये रहा वो तोता इसकी शक्ति का अनुभव खुद कर नीचे पूछे क्या पूछना है? कलावति तोती से मधुर स्वर में पूछा अच्छा तो तुम यह बताओ जो मर्द अपने वैवाहिक जीवन का दायित्व नहीं निभाता है । स्वच्छंद काम क्रीडा की तरंगों में सांडों की तरह दूसरों की हरी भरी खेती में मूड डालकर अपने कुत्सित अभिलाषाओं को तृप्त करता है । इसके बाद उसके बीआई पिता का उसके साथ क्या कर्तव्य बनता है? क्या तब भी ब्याहता पत्नी धर्म को मानने के लिए बाध्य हैं । तोते ने नाम गर्दन हिला दिया । भूतनाथ नुकीली दृष्टि से कलावति की ओर देख और समझ गया यहाँ स्वाधीन कार है । तौर पति हित का परस्पर विरोध हो रहा है । निःसंदेह या शिकार रास्ता भटक कर यहाँ आया है । इसी जाल में फंसने से अब कोई रोक नहीं सकता । भूतना कलावति से बडी ही संजीदा होकर बोला बाहर बडी गर्मी है और आप मेरी अतिथि हैं । अतिथि सत्कार मनोज का धर्म है । इसलिए आप मेरे घर के भीतर आइए । कुछ चाय पानी का इंतजाम में करता हूँ । कलावति गंभीर हो कठोर आवाज में कहीं तुम अपनी किसी स्वार्थ सिद्धि की खाते मुझे अपने बहुमूल्य उद्देश्य से भटका तो नहीं रहे हो? अन्यथा इतना आवभगत क्यों? भूतना माफ कीजिए या हमारा? मनोज घर में है । आप को कबूल नहीं तो कोई बात नहीं । गर्मी का तापमान सातवें आसमान पर है, शाम भी होने वाला है और निर्दयी, अधर्मी लोग रास्ते पर उतरने वाले ही हैं । उनसे आपकी रक्षा करना मेरा धर्म बनता है । इसलिए मैंने आपसे निवेदन किया कलावती! तिरस्कार भरी नजरों से उसकी ओर देख कर पुलिस मैं तुम्हारी कृतज्ञता और दया का भाग नहीं उठा सकती । इसलिए तुम अपने ज्ञान सरोवर के जल को आंदोलित होने से रोको । भूतना तोते की कसम खाकर कहा मैं अपने शरणागत धर्म की रक्षा करूँ । सेवा मेरा कोई स्वार्थ नहीं है । कलावती अपने क्रोध को दबाकर विनम्र हो बोली, मैंने आज तक ऐश्वर्या की प्रतिष्ठा बस सम्मान की बात सुनी थी, मगर मैं वो देख रही हूँ, ऐसा कभी नहीं देखा था, न सुना था । इसलिए आज में तुम्हारी प्राण पालक ता तत्पर्ता को देखकर हैरान हूँ । दुर्वासा ओं का भंडार बना भूतना बडे ही इत्मीनान से बोला आईआरसी तो रईसों का गहना होता है । हम जैसे गरीबों का वही यशी हाथ की हथकडी है । भूत ना अपने त्याग का परिचय देकर कलावति की श्रद्धा का पात्र बन गया । फिर क्या था, अब तो भूतना का कपट, गरीब जग सबकुछ कलावति को उपयुक्त लगने लगा । भूतना ने भी यह सोचकर कि स्वार्थ सिद्धि के लिए किसी पर आठ से शास्त्र चलाना भी विजय प्राप्ति का साधन है । औचित्य अनौचित्य निर्णय तो सफलता के अधीन है । जीते तो पुण्य हारी तो पाप भूतना ने कलावति के मनोगत विचारों को उसी तरह प्रोत्साहित किया, जैसी कोई कबूतर बाज बहते हुए कबूतरों के लिए दाने बिखेर भी खेल कर अपनी छतरी पर बुलाता है और एक एक कर सभी कबूतर फंस जाते हैं । कलावति ने अपने सभी मनोगत भावों को भूतना से अपना जान बता दिया । सारी बातें सुनकर भूतना को यह समझते देर नहीं लगी कि कलावति के बेटे यौवन की अग्नि अभी तक निर्वेद की राख से ढकी हुई है । मगर भीतर धधक रही है उसमें वजन पर मुस्कुराहट अंग पर ब्रह्मचर्य की रक्षिता लाते हुए कहा और देखना कर आप घर लौट चाहिए । मगर एक बार कल फिर आपको आना होगा । अच्छा तो होता कि आप रात यही रुक जाती, सुबह पडते चली जाती । कलावति ने मनी मन काफी विचार के बाद तय किया कि जाना फिर आना ठीक नहीं होगा । ऐसे भी एक रात के लिए अतिथि सत्कार के आश्रय को ठुकराना भी तो ठीक नहीं है । क्यों नहीं भूतना की बात मानकर यही रुक जाओ । सुबह लौट क्योंकि कलावति को उतना के कठोर ब्रह्मचर्य के आदर्श को देखकर रिधम में विश्वास हो गया कि देव प्रतिमा सा दिखने वाला भूत ना कभी मेरा अनिष्ट नहीं कर सकता । वहाँ आंखे बंद कर एक खटोले पर हो गई । आंख लगी भी नहीं थी कि उसे लगा कोई मानव आकृति उस की ओर बढती आ रही है । कलावति चिल्ला उठी बोली तुम कौन हो? जो भी होगा अब और एक कदम भी आगे नहीं बढना । आकृति रुक गए और पूछे क्या? या आप का अंतिम हुक्म रहे और हाथ जोडकर बोले, मैं स्त्रियों के मनोभावों से सर्वथा अपरिचित हूँ, क्योंकि मैं कुमारा हूँ । इसलिए संभव है मैं उतावलेपन में यहाँ चलाया । मेरी दुस्साहस पर आपका प्रसन्न होना स्वाभाविक है । कोई गौरवशाली रमनी इतनी सहज नीति से वशीभूत नहीं हो सकती, यह मुझे पता नहीं था । लगता है अपने सतित्व रक्षा करते करते अपनी प्रेम वासना को पूरी तरह दबा दिया, वरना आप मेरा तिरस्कार नहीं करती । ठीक है, मैं चला जाता हूँ । कलावति विस्मित हो भूतना को जाते हुए देखती रही और मन ही मन बुदबुदाई ईश्वर मुझे माफ करना । मैं परिस्थितियों की अंधभक्ति थी, इसलिए मुझे आज यह सब देखना पडा, जिसे में धर्म परायण, सच्चरित्र और सत्यनिष्ठ युवक समझी थी । असल में वह प्रशासनिक लगा । इसमें किसी का दोष नहीं है । मुझे तो मेरे अपने चरित्र ज्ञान नहीं धोखा दिया ।

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