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Transcript

Ankh Michoni - Trailor

Arc me, Johnny Dish! Donkey! Go, honey, Go Take it gradually. Okay. Yeah. Okay. Scott on job. Uh, could be charging.

Part 1

ऍम पर मैं रश्मि शर्मा और आप सुन रहे हैं । विश्व दुख द्वारा प्रकाशित किताब आंख निचानी कुक ऍम सुनी जो मन चाहे मैं गुमशुदा लोगों को मेरी तलाश है मेरी तलाश में छोटे हैं घर में मुझे अपनी तरह है । शायद इसी तलाश में खोया हूँ । मैंने सोच और कमरे के दरवाजे में ताला लगा दिया है । अच्छी तरह तले को खींचकर किया फिर नीचे लाॅक कम लोग बैठे थे । सतर्क निगाहों से मैंने चारों तरफ देखा । मैं लोगों की निगाहों से बचकर बाहर निकल जाना चाहता था । होटल के दरवाजे के पास पहुंच गए मैंने मोर करते एक काउंटर के पास कोने में बैठे हुए मोटी से व्यक्ति ने अपनी सामने फैले हुए अख्तार को एक तरफ किसका? मुझे हो तो क्या फॅमिली मैं खतरा टांगी का पी लगी मस्तिष्क की नसे, फुल रक्त की शिराओं और उप श्रीराव में रोष भरी उत्तेजना फैल के शहर लखनऊ । उसका चर्चा लगता है मोटा नहीं । मैंने सोचा कोल्को रांखी नुकीली मुझे चेहरे पर वही शिप्टन क्या मेरी पच्चास सुनकर उससे मुझे पहचान लिया था? डगमगाते कदमों और धडकते तेल को संभाल कर में तेजी से भारत क्या पैंट के पीछे वाली जेब से काला चश्मा निकाल कर लगा लिया? आंखिन शिप कहीं मैं फिसलनभरी ढलवान वाली पर ट्वेंटी पर आ गया । ऍम की सांस की । पर मैं पूरी तरह आश्वस्त नहीं होता था कि सोचती नगर लोग मुझे पहचानने लगे हैं । काले चश्में और पडी हुई तारीख के बाद छूट रोक मुझे स्कूल करती थी । कल के अखबार में विज्ञापन निकला था । गुमशुदा कितना मेरी फोटो भी छपी थी । तलाश कर के लाने वाले के लिए इनाम की घोषणा की थी । तब से अब तक मुझे महसूस हो रहा है कि लोगों की सर्च लाये जैसी नहीं ही बराबर मेरा पीछा कर रही हैं । हर आदमी मुझे जनसूचना सराहता, सबकी निगाहें मुझे फराल खूनी समझती है । हर किसी को पता नहीं है तो क्या है कि होटल छोड दिया चाहिए । फिर कहाँ जाऊंगा किसी होटल में उसमें भी क्या अंतर पडेगा? तो क्या शेखर भाई के यहाँ जाना ठीक रहेगा? पर वहाँ जाने से भी क्या पति का हो सकता है उनके पास मेरे को मैं हो जाने की सूचना गई हूँ मैंने ठीक सामने की होती है पूरी नैनीताल का एकमात्र में था । टीवी जैसी इंसानी भीड थी वहाँ मुझे ये फिर लगती थी सागर में एक बूंद विलीन हो जाती है । अपना अस्तित्व खो बैठती है । शायद इसीलिए मुझे भीड भाड में आना जाना अच्छा लगता है मेरे पास से एक सचिन कैसे तथ्य रंग का डबल प्रेस कसूर और सोलह ऍम अखरोट के पेंट को फिसलनभरी पगडंडी पर जमा जमा कर चल रही थी । शायद वो भी मेरे होटल से ही आ रही थी मेरे पास आकर वो एक क्षण के लिए ठिठके मुझ से लटकता सिकार हाथ में पकड लिया कुछ खोल कर देखा फिर मचल करी मैंने कनखियों से उन की ओर देखा उपहार बार पर्यटन मेरी ओर देख लेते थे तीन ऍम क्या इंसान ने भी मुझे पहचान लिया? एक हाहाकारी सहायता का पूछ मुझे छटपटाकर कितनी ने कहा ही मेरा पीछा कर रही है अपने को बदलने की मैंने कितनी कोशिश की पांच दिन से दाढी नहीं बनाई । हर समय काला चश्मा लगाए इसलिए इंसान की आंख ही उसके असली रूप को प्रकट कर देती है । किन को छिपाने में ही सार हैं । आंखें छिपाते ही इंसान का व्यक्तित्व छिप जाता था तो सब कुछ भी कहा एकदम असफर पता नहीं लोग क्यों ऐसा कहती आज का इंसान कितना अकेला अर्चना भी और पे गाना है । मैं अपनी पडोसी तक को नहीं पहचानते । क्या आज के आदमी का ये तथाकथित अकेलापन एक बढत होगा नहीं सुदूर परिचित स्थान पर अपनी को में छिपा पाने में असमर्थ हूं मैं लोगों के लिए अजनबी बन गया हूँ मैंने जीत से सिगरेट का पैकेट नहीं था । एक सिगरेट सुलगाते पडी सावधानी से वर्ष में भी की । पथरीली टाॅपर पाऊँ जमा जमा कर नीचे वाॅकर दाल मान पर चढना आसान होता करना कितना मुश्किल मैंने मैं मेरी जा कर के पास पहुंचा तो फॅमिली खडा हो गया हूँ और एक तक सीमेंट की एक ताकि पेंशन गेस या घर के बाहर में हिंदी की झाडियाँ नहीं आॅक्सी मेंट की बेंच बनी हुई थी । शायद पगडंडी प्रचार होने वालों के लिए बैठकर सुस्तानी ही नहीं किया । रविवार की टीम प्रार्थना करने वालों की पहले की हैं, उस पर भी नहीं नहीं । आज पांचवां नहीं मैं पांच दिन से बार बार इस समय उसे किसी बेंच पर बैठे हुए देखा । मेरा मांॅग क्या मैं बैठी थी काली शिफॉन की सारी उस पर साॅस । वे बेंच पर टुकडे होकर थी । चेहरा घटनाओं के बीच दबाव था सेल के फॅमिली गोनी आपको मैं तो मन साल पॅन था । पहले दिन तो मैंने कोई ध्यान नहीं । दूसरे दिन ध्यान आकर्षित हो । तीसरे दिन मन में कुछ सत्ता चली । चौथे दिन ठिठककर रुका तीस तक उसी देखता था खर्च पानी पानी नहीं । मन में भीषण गंदा सा छिडका पता नहीं कौन है, यहाँ क्यों आती हैं, कैसी एक ही तरीके से बैठी है । उसका मुख्य कैसा है? आज तक नहीं आया हूँ । फॅमिली का है यह परित्यक्ता हुई पागल महिला है । हो सकता है तीनों की तरह जिंदगी से मजाक करने वाली कोई प्रयोगवादी नारी हूँ । वैसे ही बैठी थी शांत तथा नहीं उसे बोलना चालना अथवा उसकी व्यथा कथा के अंतर में झांकना समझती है । मैं पगडंडी पर फिसलता हुआ सनी मॉल रोड पर हट गया । वहाँ काफी भीड भारत महाल की निचली सडक पर होने वाले और घुडसवारों जा रही थी । मैं उससे भी नीचे उतर कर खेल के किनारे किनारे ही निर्मल खास की फॅमिली पर चल नहीं हूँ । कई बार सतर्क होकर मैंने चारों ओर देगा । मुझे खर्च होता था जैसी भीड की आंकी मेरी तलाश में जुटी फॅस मेरे मन में एक विचार आया उस खयाल नहीं मेरे मन के खींचे तारों को छेड फील करती हूँ मैं क्यों कर रहा हूँ मैं कोई खूनी हूँ क्यूँ? उचक्का क्या चाहते हो तो नहीं । मैं घर से भागकर आया हूँ फिर लोग मुझे क्यों खुलकर देखती हो सकता है मेरा विचित्र व्यक्तित्व उन्हें चौंकाता शाम के धुंधलके में भी आंखों निकालना चाहिए दाढी बडे हुए बान लडकियों जैसी की है ड्राॅ ईट पर छूटता गले से बनाकर क्या लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए ये अनोखा दूँ? खाफी नहीं सांस डूब रही थी चारों ओर पर्वतों से घिरी नैनीताल की पहले अनुमान चाहिए थी सारा माहौल ऍम था मैंने आकाश की ओर टका भी हट कांता ऍम वहाँ झूल रही थी खाली बात है हमारा आए थे झील में बच्चे हो जैसे नाम ऍम सुप्रीम और रात रंग कि मधुरिमा में नहीं मुझे लगा मेरी जिंदगी भी हूँ बिना तरह की पतवार रहे शून्य में कह रही है ऍम सिर्फ मैं ही सवाल तू दुनिया किनारे लगाओ । ये सब मुझ पर निर्भर करता है । मैं याॅर्क के पास से गुजर रहा था । डाॅन आधुनिक प्रसाधन संयुक्त महिलाओं को देखकर मुझे अपने अंदर एक अजीब सा खालीपन महसूस मैंने अपनी ॅ सच यह खाली पर नहीं एक शाश्वत ऍम गतिहीनता नहीं एक विराट समस्या का ननंद टुकडा मेरी इंटर में बहुत कच्चे कागारौल जैसा झड झडकर ऍम मेरी जहाँ नहीं नहीं होगी मैंने अपने दोनों हाथ फॅमिली फ्लैट में पहुंच गया । हंसी मजाक रंगीन थीं खेलकूद इन सबसे पाॅड अरे एकदम शिथिल साहूकर सोचने लगा कहाँ हो गया हूँ मेरी पीठ के पीछे थी उनकी चाइना भी सामने थी अतल गहराई वाली नहीं थी बीच में था अतीत और भविष्य से था एक लक्ष्यहीन ऍम आपने भाग रहा था पर किस से पीछा छुडाकर ठाकर मैं कहाँ राहत ऍफ कहाँ से ड्राइवर की सीट से बिल्कुल सीट से सटकर में बैठा था बस फॅमिली और वर्तुलाकार पर्वतीय सडक मैं सच मचकुण्ड सून सुबह अच्छा खेडकी की बाहर देखा है हजारों मीटर नीचे मिठाइयाँ मेरी आंखों में चुभ रही थी सडक के किनारे बडी बडे शिलाखंड जान प्रथम नीचे बहती जल्दी ढलानों करोगे वृक्षों पर खेल तीन लंगूर की नहीं सब कुछ सामान्य सकता बस का गढवाली ड्राइवर एक हाथ से स्टीयरिंग पकडकर सिकरी से बस चला रहा है । दूसरी हाथ से वो बराबर रुमानिया खा रहा है । फॅमिली चीज सभी अंतर में विशाल काई शून्य चिंता आशा ऍम कुछ भी शेष नहीं रह गया था । बस की चक्करदार यात्रा के दौरान बस ई की समस्या नहीं मेरे मन कर रहा हूँ । नहीं नहीं, नहीं नहीं किंसी तब तक हो क्या मधुर भैया की यहाँ जाना ठीक है उन का पता मेरे पास मैंने अपना हुआ नहीं था ना उसमें सौ का एक नोट दस दस की छह नोट कुछ चल रहा है कितने दिन चलेंगे ये मुठ्ठीभर पैसे फिर उसके बाद बट हुई से जुडी डायरी में मधुर बढिया का पता लिखा था उसी पत्थर मैं आश्वस्त हूं उस पति में कुछ ऐसा आकर्षण बंद नहीं भारत की सेना का । यही नहीं राजसी पर मैंने सीधे शेखर भाई के यहाँ नहीं जाने का फैसला कर दिया उनके यहाँ जाने का मतलब होता हूँ घटना मैं घर छोड कर रहे हैं हम अपनी तलाश को अधूरा छोडकर घर नहीं लौटना चाहता हूँ सोचते सोचते हैं चाहता हूँ सीट के नीचे रखी अपनी फॅमिली से टकरा एकमात्र ऍम मेरे जीवन निर्वाह का सारा सामान चार मनपसंद किताबी कपडे पूर्ण नहीं बीच खाने की चाहते हैं हवा पहर कर झूठ नहीं मना किया सेवेन का सामान ऍम की कुछ हाँ जी ये बस नैनीताल का पहुंची की मैंने पलट कर दी पिछली सीट पर एक अधेडावस्था के व्यापारी टाइप सचिन मैं ही थे उनकी बगल में एक नवविवाहिता नवयोवना मैं लालकुॅआ उसका चेहरा लगता था पिछले नहीं देखा टाइप का था उसको देखकर मैंने सोचा की महिला इन सचिन की पहली पत्नी कभी नहीं हो सकता पे सचिन बराबर मेरी और प्रश्न सूचक दृष्टि से देखे जा रही थी । मैं गौर से उस युवती देख रहा था और संचय में पडा सोच रहा था क्या? प्रश्न मुझसे पूछा गया था मैं एक फॅमिली लगा । आपने बताया नहीं मुझे उन सचिन का स्वर सुनाई दिया मैं पालता । फिर मैंने ठंडी गर्मी का मुझे नहीं मालूम में सामने देखकर सोचने लगा ये बस नैनीताल कब पहुंचेगी? दिल्ली में बस में सवार होने से पहले मैंने पूछताछ खिडकी पर यह प्रश्न पूछा था और मुझे उत्तर में मिला । शाम छह बजे नहीं । पर फिर पलटा और उस दूसरी महिला की ओर देखते हुए और सचिन से बोला छह बैठी हूँ तो अभी आधा घंटा है वे सचिन बढकर फिर मेरी ओर शंकालु दृष्टि से देखने लगी । शायद इस तरह मेरे आना या सूचना देने का उन्होंने कोई गलत अर्थ निकाल लिया था या फिर मैं ही उनकी दूसरी या तीसरी पत्नी को पार पार खोरकर शालीनता की सीमा को पहले क्या मैं फिर आगे देखती हूँ । मेरी शर्ट की खेत में शिखर ढाई का पत्र पडा था तो उन्होंने इस करने में मुझे नैनीताल आने का निमंत्रण है । लिखा था क्या भावी देखती कतिरा जी नहीं करता हूँ शादी हुई तब तेरी वार्षिक परीक्षाएं हो रही थी इसलिए नहीं आ पाए अब क्या नहीं तेरी यानी शेख मेरी चचेरे भाई मुझसे भडास नहीं रखती । नैनीताल के कॉलेज में लग रहे हैं । पिछले वर्ष उनकी शादी हुई थी । तब मेरे बीए फाइनल के इम्तिहान हो रही थी । घर से सब लोग आई थी सिर्फ मैं ही रह गया । नाॅट कर मम्मी पापा अपनी भाभी की प्रशंसा के पुल बांध दिए थे । कितनी सुंदर सुशील और सब है । हमारे तो छूट भी नहीं गया है । अलका ने छोटा सा कागज लिख कर मुझे दिया था ही नहीं हूँ । शेखर भैया और भाविनी प्रेम विवाह किया । भारत मैं नाॅन बढिया का आग्रह पूरा होने जा रहा था । किन परिस्थितियों में? अचानक मुझे उस नवविवाहित दंपत्ति के पीछे बैठे कुछ कॉलेज के लडकों का उन्मुक्त एक्टर हाँ सुनाई थी । मन ही मन में उन सज्जन की बहन नहीं है, अवस्था की कल्पना करती हूँ । साथ ही मुझे सहायता का बूथ छटपटा क्या छात्र ही मैं भी छात्र हाँ नहीं, मैं क्यों नहीं था? ऍम की पांच हो गई थी । नहीं उससे ज्यादा ठीक ही मेरी जीतना ऍम मैं पहुंच चक्का सा इधर उधर ऍम

Part 2

मैं सामने खेल के नारे लगे । रेलिंग साहरे जाकर खडा हो गया । मेरी पीठ पीछे झील थी सामनी नैना देवी का मंदिर अगर धूप की सुगंध मेरे नथुनों में आ रही थी । भक्तों द्वारा गाय जाने वाले पहुंचने का स्वर्ण मेरे कानूनी पड रहा था । फिर मेरा मानना शांत था । उससे लगभग चार मीटर की दूरी पर रेलिंग के सहारे एक भिखारी बैठी थी । मैं ले कुछ पहले कपडे पहने एक झबरीला कुत्ता उसके ॅ चक्कर लगा रहा था । अचानक फ्लाइट्स में भगदड मच गई । मैंने देखा मैदान में सैट के लिए आए हुए स्त्रीपुरुष बालक बूढे भाग रही और पिटाई सिनेमा नीचे मैदान के एक होने में इकट्ठे हो रही सारा मैदान लगभग खाली हो गया । मेरे मन में कोतूहल जान आखिर मैदान के उस कोने में ऐसा क्या हुआ जिससे सब लोग वहाँ इकट्ठा हो गए । दस पैसा बाबू जी मैं दृष्टि कुमाई कटेगा । भिखारिन मेरी बगल में खडी दस पैसे मांग रही थी । यंत्रवत मेरा हाथ जीतनी । मैंने एक रुपए का एक सिक्का निकालकर पे खाली इनकी हथौडी में रखते हैं । आप नहीं है मैं मुझे कहाँ? उधर भिखारी ने उसको नी की ओर इशारा करती है । दूर से मुझे लगा मैदान के उस कोने में इंसानों की भी नहीं । एक बहुत बडा शहद की मक्खियों का छत्ता लगा है क्या हो रहा हूँ? मैंने पूछा था सिनेमा की छुट्टियाँ हैं नाम आप जी कहकर घर चली गई । एक अत्यंत महत्वपूर्ण दृश्य एक नगर घटना में बदल गया तो फिल्मी कलाकार किसी फिल्म की शूटिंग के लिए नहीं पता नहीं और ये लोग उनके दर्शनों के लिए उमड पडे । मेरा मन वितृष्णा से भर क्या मैं अपनी होटल की ओर धीरे धीरे चलता एक अपराध भावना मेरे मन में घर की हुई घर वालों ने अखबारों में विज्ञापन क्यों? क्या सचमुच मैं अपराधी क्या वास्तव में मैं गुमशुदा यहाँ हूँ क्या घरवालों को मंच पर सैनिक भी विश्वास नहीं क्या उन्होंने समझा कि मैंने आत्महत्या कर ली होगी क्या मुझे जीवन की विसंगतियों और समस्याओं से जूझने की शक्ति नहीं अचानक तीस ठंडी हमारे सिर्फ हुई के रेशे जैसी जमीन के काम हवा में खुल गए ये हमारा मेरी तमतमाए गानो जलती आँखों को पडी सुख हो मैंने आप क्यों पर उसमें आसमान की हद खाना हो गया शॅल मेरी आंखों कि आगे मेरी विभक्त और कटी हुई जिंदगी के चूडे चीजें खून है मम्मी का क्रूड अनीता को साथ साथ समझे तीन रहस्यमय या चाँद आपका गुना यहाँ हारसिंगार का कुमार मैंने अपने जीवन में एक अभिन्न अंग के रूप में एक इंसान के काम इस काम ना कि तहमीद एक व्यक्ति नहीं और टूट गया था सिर्फ उदासीनता और एक निशान कहाँ है पराजय के बाद पैदा होने वाली सीट किए इससे ऍम शेखर है । हो सकता है मैं जिंदा तेज ध्वंसात्मक समझता है दुनिया तारीख को समझती वाला भावात्मक रूप से बचपन मतलब चाहे हूँ, उनके पास जाना ठीक रहेगा । सामने लहलहाती नैनीझील का हराया था । कह रहा खाना पड गया खून कि भरी हवा में रजत सीटीसी आगे चाइना पी के ऊंचे पर्वतों के ऊपर क्योंकि घने वृक्षों की फोन गेम सीमट फॅार मैदान के ऊपर इकट्ठा हो । सच वो हुआ नहीं । रोहित की पांच फोन जैसी ठेर के ढेर कहानी था नमी से भूजल, हवा के साठ वर्ष की छोटी छोटी दिनभर, ऐसी नमक ऍम, उसमें ही की शक्ति, किसी किसी भी छेडती, पूरी कागज जैसे सपाट । अर्थहीन लोग इधर उधर दौडने । भागने लोग घर भी से भाग रहे थे । क्यों? मैंने सोचा क्या भाषा की कारण? क्या उन्हें अपनी सभ्यता के प्रतीक कपडों के खराब होनी कटर उपहार मैं ठीक है । हम से आप एक ही नहीं जा रही थी, खटक रहे सिर्फ होगी बिल्कुल मीठी था, रिकॉर्ड नहीं थी एक दूसरे की तरफ भी नहीं देख रहे हैं जब कभी कोई किसी से टकरा जाता तो सिर्फ चरंपंथी अभी भी क्रोधित होती अभी केसरी कभी उठते कभी हस्ते फिर हो मैं चुप चाप ऍम मैदान और मान टूट खाली वर्ष में ही नहीं किंतु तीस हमारे जैसे रद्दी कागजों के टुकडे की जैसे हम लोगों को थोडा वर्ष हो । नहीं मेरी तमतमाई कालों पर वर्षा की भूमि थी । बडी सुखता ही लगते हैं मैंने मुंबई ऊपर उठा नहीं चलता हूँ । मैं पगडंडी से होकर ऊपर चलती लगा । मैं शमी काफी तेजी आ गई । ऊपर खापड रास्ता फिसलनभरी चढा । ऊपर से तेज वर्षा सिर के ऊपर से आकर सारी शरीर में रहता हूँ । मेरे तक शरीर में ठंड की चोट चोरी हो । मैं गिरजाघर तक पहुंचते पहुंचते । हाफ जरा सुस्तानी के लिए ठीक ही था की मैं पूरी तरह छाप हूँ । वो अभी भी वहाँ बेंच पर गए थे । वो वर्ष में बैठे भी रही थी महिला का तो सडक पर लगे पिछले के कमतों को छोडने वाले पतली तार पर बैठी हुई कोई ऐसा ही है यार मेरे पापा को जैसे किसी ने ऍम कुछ कदम आगे जाकर मैं फिर लौट आया । मैं अपने आप पर नियंत्रण ऍम तेज था । कौन है? वह भी चित्र रहे से? मैं ही नहीं काल्पनिक सहानुभूति और भावात्मक संवेदना से मैं अभिभूत हो गया । मैं उसके पास क्या उसकी वहाँ को कसकर पकडा और उसे छत छोडता हुआ पूरा उठु उसी जैसे पिछली का झटका लगा । फिर फुर्ती से उठे ॅ चीखती हुई बोली तुमने मुझे जो स्थिति की गंभीरता से अनभिज्ञ मैंने इसमें भरे स्वर मीका उससे कोई गलती हुई । क्या तुमने मुझे छूने की हिम्मत कैसे की? वहाँ पर शमी भी रही थी तो मैं क्या हूँ? ऍम क्या कर रही है? तुमको उससे क्या मतलब? आप इस तरह से पीटने से बीमार हो जाएंगे तो मैं क्यों तकलीफ हो रही है? मैं मौन होंगे उसमे हरी के मुख पर भी आक्रोशपूर्ण मान छाती मुझे लगा महिला जिंदगी की एक क्रूर किन्नौनी वास्तविकता हैं । दुख उसके जीवन का एक अनिवार्य अंग नहीं । एक निरर्थक दुर्घटना मैंने उसे गौरसी । उसकी कटी हुई पहाड वर्ष में ठीक ईद के तहत इकट्ठा हो गए थे । काली शिफॉन की भी की साडी नहीं एक दम वीनस की प्रतिमा उसकी नाथ ऍम था और कानून से वर्षा की बूंदे चल रही थी । अब वहाँ खडे होकर क्या कर रही हूँ । वहाँ तो यहाँ से तो एक काम कमाकर पूरी मैंने एक नई जिंदगी के दर्शन कर लिए थे । अभी तक खडी हूँ क्या इस तरह नहीं होगी । इस बार उस नारी के स्वर में रोष था मैंने लिफ्ट होटल की ओर चल पडा । एक हीट की भावना मेरे मन में हूँ जी इससे अच्छा कुछ एक कचरा विद्यार्थी हूँ । मेरे अंदर अभी बचपना है क्या जरूरत थी एक अनजान एक अच्छा भी महिला को छूने या उससे सहानुभूति दिखाने की । मैं मुसीबत में फंस सकता था तो बात खत्म हो गयी नहीं तो कुछ का कुछ हो सकता था । ये मेरी नाथानी है । अपनी नाथानी पाँच बचता था । क्वेशन हल्की पढ रही थी । बार बार पिछली चमक रहे थे । कुछ दूर जाकर में परेड पिछली और उस विचित्र महिला की साडी पर्यटन की सलमा सितारें ऍम और पहाडी वृक्षों की कोई जमीन फोन किया हूँ । मैं होटल की ओर पड रहा था और पाँच बार पलट कर पीछे देख रहा था । नहीं नहीं मैं होटल के अपने कमरे में पहुंच गया । मैंने अपनी के लिए कपडे पति और घंटी बजाकर पहले को बुलाया । दीनो अरहर छोडकर खडा हो गया । खाने में आज क्या बना है? क्यों नहीं साहब नहीं जाएगा तो क्या अभी खाना नहीं बना ऍम मैं झुंझला हूँ । हजीब चाकघाट हैं ये तीन का बच्चा तो साहब नाम खाना खा लिया । तीन । ऊॅं मैं पाॅल मन में कुछ फॅमिली लगा । मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि आज की वर्षा भी कि शाम को मैंने जिंदगी की कौन सी सच्चाई खुश दिखा रहा है । किसी की के प्रति एक नए ऍम मेरे अंदर ही हूँ किसी जमाने की इसमें की तहर ने उसका क्या नारी के प्रति आकर्षण करते ही नहीं था । टीम थी तीनों की यहाँ ही कमाल करती हूँ । दिन खाना लिया है । मैं पनप तहत क्या दी उन्होंने खाने की थाली में इस पर रखी । फिर मेरे को उठाकर पलंग के पास है नहीं खानी पर एक कुछ टी सीने का वही डाल । सबसे और खाना देखकर तेल तो क्या होटल का खाना मैंने अपनी मर्जी से चुना था । मैंने खाना शुरू कर दिया । तीनों में ही फर्श पर आॅक्शन ठहरकर उस कीमत से अच्छा खाना कैसा लगा हूँ? ठीक हैं । मैंने ऍम भाव से मालकिन की नजर बचाकर डालने की का तडका लगा दिया था । मालकिन की मैं सर बचाकर मैं उन्हें साहब पडी । कंजूस पाई पाई को दान से पकडती मुझे यहाँ आया । तीन दिन पहले भी उन्होंने बताया था कि इस होटल की मांग की । एक विधवा महिला, उसका पति काफी सालों पहले नहीं नहीं चीन में टूट गया था । अब हमारे थी । खुद पूरा होटल चलाती भी जाना कर रहे आवाज दी ने उसके एक और उन का बखान कर रहा था । मुझे चुप देखकर मैं बोला साहब, महीने के बीस रुपये देती तब वहाँ भी बताइए । आज की महंगाई के जमाने में बीस रुपए से क्या होता है? खाना भी तो फ्री होगा । मैंने पूछा था क्या खाना साहब दोनों समय रुकी रोटियाँ बस एक दाल खाने को देती हैं । शक्ति होसूर खुद नहीं खाती तो नौकरों को क्या खिलाएंगे? अच्छा मसूर एक बात बताऊँ । दीनू इतनी बात पूरी नहीं ऍम नीचे से उसे किसी ने पुकारा तो उठा हुआ बोला, ऍम की सस्ता भी नहीं सकते । हॅूं चला गया । मैंने खाना खत्म किया और कमरे में चहलकदमी करनी । दिनों की जाते ही मैं होटल की मालकिन के विषय में क्या? सच तो यह था कि मुझे शहर की आदानी लगे थे । घर से ज्यादा याद मुझे तीनों की आ रही थी । शायद दिल्ली छोडने में मुझे सबसे ज्यादा तकनीक तीनों के कारण की हुई है । घर से मैं भागा था । परवीन ई बार बार मुझे अपनी ओर खींचता हूँ । तीन । अलका के बाद रही तो हैं मेरे जीवन का आकर्षण नहीं है मेरी जीवन का मधुर संघ कैसे आई थी ना मेरी जिंदगी में । तीन मेरी चिकन का हमारे मिस कारपेंटर की क्लास की मेरी सीट के बाद ही लडकियों की सीटी शुरू हो जाती थी । तीनों की सीट मेरे बगल में थी । वो हमेशा की तरह शांत और गंभीर बैठी थी । डेस्क पर खुली किताबों में काॅम साहब पिछले कई दिनों से मैं नोट कर रहा था जबकि कोई खाली पीरियड होता पीनो लाइब्रेरी में जाकर पहुंचाती फॅसने किसी प्रोफेसर के आने में देर होती तो वो चुप चाप बैठी हुई कोई किताब पढ भी रहे थे । अन्य सभी लडके लडकियां चटर पटर पार्टी करते रहेंगे । तीनों के पास उसकी सहेली ही रहेंगे में उसी छेडछाड करती कठिन प्रतिक्रिया ही फॅमिली मैं कनखियों से बार बार तीनों को देख रहा था । मिस कारपेंटर कंट्रीज की कविता लाभ पढा रही हूँ । मेरे भी पहले कुछ नहीं पड रहा था । अचानक मेरे पास ही बैठे अखिलेश्वर ने मेरी जांच चुटकी काटी और धीरे से बोला कंपनी एकदम सीट भी हैं, कम हूँ तेरी पडोसन ये प्रेम नहीं प्रेम के ऊपर व्यंग्यात्मक टिप्पणी वीनू कहते हैं मैं चौंका, मेरा ध्यान उधर नहीं था । इधर मैं अखिलेश की चुहलबाजी में फसक । उधर वीनू मिस कारपेंटर से किसी पंथी की व्याख्या मैं सोच रही थी । तीनों ये भी प्रेम का एक रूप होता है । इसमें भी सच्चाई नहीं । मिस साहिबा प्रेमी गहराई होती है । क्रीम तियांग और संतुलन चाहता है, विक्षिप्तता नहीं । पर हर इंसान की जिंदगी में ऐसी स्टेज जरूर आती है जब पागल सा हो जाता हूँ में इस कारपेंटर के स्वर्णी खेला बंद था । ये एकदम व्यक्तिगत अनुभव है । पीछे से हमारे हर पूरी क्लास में हंसी का ठहाका । गूंज क्या मैं स्काॅलर को हिंदी नहीं आती थी इसलिए वो कुछ भी समझ नहीं । तीनों की आंखों में हल्की फॅमिली सहमत हूँ । अगला पी नेट प्रोफेसर चतुर्भि था । मैंने पता लगा लिया था कि वह उस दिन छुट्टी पर थी । मैंने साहस जुटाकर एकचित लिखकर तीनों की ओर खिसका हूँ । उन्होंने चिट्ठी पढ ही पाल घर को होती थी । फिर उठकर क्लास से बाहर चली गई । मैं भी उठा और दूसरे दरवाजे से निकलकर कैसे में पहुंच गया । कहीं क्या कहना है? तीनों की वैसे चुकी थी । मेरे सामने बैठे था । सुनकर बुरा तो नहीं मानोगी नहीं क्या यूनिवर्सिटी में टॉप करने का इरादा है? मतलब नहीं समझे नहीं । यदि इसी तरह गंभीरतापूर्वक शुरू से जुलाई सेशन में पढाई में जुट जाएंगे तो क्या यही कहने के लिए आपने मुझे ऍम ही तो आपने इस्काॅन से बहस कर रही थी तो क्या हुआ? मैडम को इतना भी पता नहीं की प्रेम साइंस का फार्मूला नहीं, जिसे परिभाषा की चौपाटी में कैद किया जा सके । मैं जानती हूँ फिर देहरा बिना ऑर्डर लिए दो कॉफी के प्याले रखे घर की तीसरी लेती हैं में डाल लूँ फिरमान आज अखिलेश्वर ने मिस कारपेंटर केपीजेपी के समझा क्या क्या वीनू ने तटस्थता भरे स्वर में पूछा हूँ फॅार हाजिरी ले रही थी । अखिलेश्वर नाथ की जगह उन्होंने िनट पुकारा । हालांकि देवेश्वर नहीं फटाक से उत्तर दिया हाँ प्यारी, मैं मुस्कुरा दिया ये सब सस्ती बातें मैं चुप रहेंगे । हम दोनों काफी भी देते हैं । तीनों हमेशा की तरह चुप थी । मैं कुछ पूछता तो बस उत्तर सीटीटी मैं खुल नहीं पा रही थी । मैं चाहकर भी जो कहना चाहता था वो कह नहीं पा रहा हूँ । तीनो आप इतनी उदास क्यों लेती है? इस पाँच मुस्कराई फिर उपहास खरीद पर भी बोली तुमसे किसने का? मैं देखता हूँ तो तुम्हारे ख्याल से मेरी गंभीरता, उदासी शहीद पर इतनी गंभीर क्यों रहती हूँ? क्या यही पूछने के लिए एक कप काफी का खून किया था वही तो फीस काफी खत्म हो गयी पीनोट खडी हूँ और कहते से बाहर निकल आए पीछे पीछे पहुंचा ऍम कंपनी के लिए धन्यवाद । काफी के लिए धन्यवाद नहीं हूँ ऍम हूँ मैं ऐसा खोया की बीस पर रखी बहरे की खाली प्लेट भी तो कॉफी ओके रुपये रखेगा । ध्यान नहीं रहता वीनू पैसे रखा था सारी ऍम अब समझ में आया निरर्थक गैर संजीत की कितनी भी का चीज होती है कहकर महीने मुस्कराएं चलेंगे । मेरी कुछ भी समझ में नहीं आया आपने । मुझे पता चलता है महम मिलन एक अंतहीन संबंधों की सुखद

Part 3

कलाम पर सीधा नहीं था । मेरे घर की याद में खोया हुआ था । सिर्फ भी था जब काई जमी पानी की सतह सी सिर्फ निकालती मछली जैसा उछल कर बाहर पार्क बाहर आ रहा था । सब लोगों पर मेरे भारती की क्या प्रतिक्रिया हुई हूँ । नहीं नहीं मैंने सोचा और मम्मी करवाहट सी खुल गई हूँ । मेरी व्यवहार से रुकी हुई हूँ क्या रोककर उन्होंने युवतियां की सुजा ली होंगी क्या खाना पीना छोडकर फर्श पर पीस कडी हूँ । उनका इकलौता बेटा क्या होती तो अवश्य ऐसा करती है । उनकी बेटी ने भाग कर उन पर उपकार किया । कम से कम अपनी संतोष तो होगा की चलो उनकी चोरी पकडने वाला चला गया । यदि वहीं होता तो मैं चौबीस घंटे के उससे आंखें चुराती । अपने आप को अपराधी, समय से उसका शायद मानसी, अधिक दुख और पीडा अलका को हुई होगी । उसने जरूर खाना पीना छोड दिया तो जरूर होती रही होगी । यह भी निश्चित है कि वह सोने ही होगी । तीन चुनौती बडे भाई को कमा बैठने का सत्रह हाँ कैसी चाहता हूँ की बिचारी किसी से कुछ कह भी तो नहीं सकती । प्रकृति ने उसके साथ भी कैसा क्रूर मजा किया । बचपन से ही मैं सुन सकती है ना पूछ सकती । पर प्रकृति ने उसके इस आभाव को तीन और इस तरह से पूरा कर दिया है । पहला नहीं बेहद खूबसूरत है । क्या हो पाया है? उनका नी बिल्कुल संगमरमर में तराशी मूर्ति रखती है । ऍम प्रकृति ने उसी विलक्षण बुद्धि नहीं है । एक साधारण लडकी नहीं ऐसी प्रतिभा होना असंभव तीसरी उसकी उनकी हो नहीं चाहते । उसके हाथ रंगों की ऐसी सुष्टि करते हैं कि दर्शक मंत्रमुक्त रहे जाता हूँ । उसकी चित्रकला कि शाम को अपनी आजीविका बना लिया । शुरू किया चित्र तो वो बनाती थी । कई बार दिल्ली की विभिन्न काॅलोनी, उसके चित्रों की प्रदर्शनी भी हुई जिसे आलोचकों ने सराहत फिर उसने एक व्यावसायिक चित्रकला का दो वर्ष का कुछ पूरा कर दिया । आज कल को एक सरकारी दफ्तर में व्यावसायिक चित्रकार के रूप में काम कर रही है । एकल का ये तो है घर में जो उसकी सुख दुख की भागीदारी करती है, उसकी भारतीय से अलका को कितना दुख हुआ होगा? अलका की समस्या को लेकर वह कितना परेशान? शायद अपरोक्ष रूप से अलका की समस्या भी उसकी भागने के लिए जिम्मेदार है । बेघर समय सोचता रहता था अलका दीदी का भी बहुत कैसे होगा? कौन लडका एक गूंगी बहरी लडकी को स्वीकार करेगा । एक लडके ने उसे देखा था । केवल से पता लगा कि लडकी क्योंकि पहले है तो अलग होता है । तेरे टूट गया ऍम मुस्करा रही । मैंने शादी में पूछा अलका नी मुझे अपनी कमरे में चलने के लिए का मैं उसके पीछे पीछे हो लिया । अपनी कमरे में जाकर उसने चिट पर कुछ ऐसा लिखा भैया आप समझते हैं कि मेरा गूंगापन या बहरापन एक अभिशाप है तो मैं उसे वरदान समझती हूँ । पता नहीं आज की दुनिया को क्या हो गया है । पता नहीं आज के लोग कैसे बदल करेंगे । अब कुछ भी अच्छा सुनिया पूछने के लिए रहा ही कहाँ है नहीं । अलका की इस पीडा की अभिव्यक्ति में भी उसकी भावात्मक परिपक्वता छलक रही थी । वो जरूर सोचती होगी भैया तो ये क्या क्या जाना था तो मुझ से मिलकर तो जाती हूँ अपनी बहन से कोई इस तरह भाग कर जाता है । तब पापा मैं जानता हूँ पापा के मन में कौन सी प्रतिक्रिया हुई होगी । उसमें कष्ट का क्रोध ठीक होगा । वो रोना धोना, खाना पीना छोडने में विश्वास नहीं करते । उन्होंने भारी कदमों से बाहर पार्क वर्ष को पीता सका । हाथों को नचाकर नथनी पालक आंखों से अंगारी बरसाकर वो चीज ही होंगे ऐसी नालायक औलाद से तो न हो तो अच्छा है । पहले तो आवारा गर्दी करेंगे । वाहियात लोगों की संगत में रहेंगे । तेल में देखेंगे । जासूसी उपन्यास पढेंगे, इश्क फरमाएंगे । जब सालाना इम्तिहान में फेल हो जाएंगे तो चरित्रहीन लडकियों की तरह घर से भाग खडे हूँ । हूँ । फॅमिली ओसे इशारों द्वारा पापा से क्षमा याचना की । उसने हविष्य आंखों से डूबी लाना, आंखों में करुणा भरकर पापा की ओर देखा । मुझे पता हैं उन्होंने अलका से क्या कहाँ होगा । उन्होंने अलका को सांत्वना दी होगी और कहा होगा तो वो दिए आपने नालायक ढाई के लिए गया तो जाने दे तो मैं तुझे अपना बेटा समझूंगा । यही सोचूंगा कि इस घर में कभी कोई लडका पैदा ही नहीं हुआ । अलका नहीं पापा के सामने दोनों हाथ जोड दिए होगी तो पापा को मैं जानता हूँ । कोई एक शांत ऍम जब तक ठंडे रहते हैं तो ही पचास स्पोर्ट होता है ना तो इस तरह का गर्म अलावा और धुआंधर कर निकालता है कि चारों तरफ ऍफ का दृश्य हो जाता हूँ । अलका के हाथ छोडने का अंतर को ये सभी ही हूँ । उस ना लाए थे । हमारे बारे में कोई ख्याल नहीं किया तो हम लोग भी उसके लिए क्यों परेशान जब उसे ही माँ का मुहैया बहन के प्यार की परवाह नहीं की तो तुम लोग क्यों उसके लिए जान दे रही हूँ । जाएगा कहाँ देरी की भडास निकाल कर दो चार दिन में भटकता भटकता वापस आ जाएगा करो उसी तलाश तो कीजिए । माॅस् मैं जानता हूँ कि कोरी औपचारिकता होगी । मैं नहीं चाहती कि मैं घर का कहाँ तलाश करूँ । पुलिस में रिपोर्ट लिखवा दी है । अखबारों में विज्ञापन नहीं दिए हैं । सभी नाते रिश्तेदारों को तार चिट्ठियां डाल दी हैं । अब तुम ही बताओ और क्या करूँ? कहाँ तलाश करो वहाँ । क्या खूबियां कुछ अलग आई हूँ मैं जानता हूँ ये सब नाटक होगा फॅमिली नहीं मगर मच्छी आंसू पापा को प्रभावित करने की । चार । पापा की क्रोधाग्नि धोनी वेक से भरत को ठीक है । वो जीत चीखकर कहेंगे और मना लडका होने का जश्न डालो । आचार ऐसे लडकों का देख लिया कैसा श्रवण कुमार निकला वो ही? मैं तो पहले ही कहता था कि आजकल नालायक लडकों से लडकियां लाख दर्जे अच्छी कम से कम दबकर तो रहती है । घर के काम काज में हाथ बटाती, पढने लिखने में ध्यान लगती है पर आजकल के छोकरी पैदाबार नहीं होंगे । पहले लोग फ्री शुरू कर देंगे । अब क्या होगा? मैंने कहा होगा तब क्या होना है? सब चौपट कर दिया । उसने सोचा था ऍम करके कहीं अच्छी नौकरी मिल जाएगी । कुछ दिनों में उस की शादी कर देंगे । घर में लक्ष्मी से बहुआ जाएगी, दोनों की सेवा करेगी । जिंदगी की शेष तीन सुख शांति से कट जाएंगे तो मैं भी नौकरी करने की जरूरत नहीं रहेगी । रोसना नायक ने हमारी सारी आशाओं पर पानी फेरती हाँ चुप रह गई होंगी । मैं मुस्कुराती । काश मैं उस समय होता तो पापा से ये कहे बिना नहीं चुकता हूँ । खापा जी मम्मी नौकरी कर ही नहीं छोडेंगे तो मजबूरन नहीं मनोरंजन के लिए नौकरी करती है और पापा आपको पता नहीं । मैं सिर्फ फॅमिली फेल होने के कारण नहीं भागता हूँ । मेरे घर से भागने का कुछ और कारण भी है । अब मैं आपको क्या पता हूँ, बताऊंगा तो आप विश्वास नहीं कर सकेंगे । हो सकता है आप मेरे एक चांटा रसीद करते हैं तो कृष्ण है हूँ कि क्या मैं आपको अपने घर से भागने का कारण बताने का साहस छोटा काम का तभी बत्ती चली गई । कमरे में अंधेरा छा गया । मैं ॅ और दरवाजे पर आकर खडा । बाहर धन घोर अंधेरा छाया हुआ था । तो क्या पूरा नैनीताल अंधेरे में खोया हुआ है । जगी जब सेट हुआ या मेरी वाली मेरे रंग गए सांस सरकारी अंधेरी निस्तब्धता । इस गीत के संगीत से कसमसा के सामने पहाडी पर फौजी बैठ रखे हैं । वहीं से इस गीत की आवाज आ रही थी शायद कोई सैनी कर रहा है तभी बिजली आ गई । चारों तरफ काला आकाश हूँ और उसके नीचे पर्वतों पर बने घरों में जलती बिजलियों का रखा है । एक बच्चे ऐसा दृश्य बनने कर रहा हूँ । मैं लौटकर कलन पर लेट गया । बत्तीस चली गई तरह अंधेरे में पलंग पर पढूं मैं एक बार फिर तीन मन में क्या प्रतिक्रिया जन्मी होगी? क्या उसे पता चल गया होगा कि मैं घर से बाहर हूँ? अब तक तो से जरूर पता चाहता हूँ । कॉलेज करना है तो क्या हुआ तो घर फोन किया होगा । फिर उसे एक बार तो पडी हूँ नहीं उसे जरूर पता चल गया होगा । ऐसी बात थी कहाँ छुट्टी उन्होंने जरूर सोचा होगा । राज कायम है वही जिंदगी की कडवी नहीं वास्तविकताओं का सामना नहीं करता हूँ और खीरे हुई सैनिक कितना भाग खडा हूँ । समस्याओं का डटकर सामना करने के लिए आत्मविश्वास और साहस की होती है । पर कायम लोग भाग खडे हो ठीक है दिन मैं कायल हूँ मैं भागता हूँ तार इसके लिए कुछ अंशु में तुम भी जिम्मेदार नहीं । नहीं सच्ची वीनोम मैंने तुम्हें प्यार की । मैंने अपने जीवन के अभिन्न अंग के रूप में तुम्हारी कामना की थी । मैंने सोचा था कि तुम मेरे जीवन के सुख दुख की खाकीधारी करूँगी, लेकिन तुमने मुझे क्या है? सिर्फ अनिश्चितता तीनों तो याद हैं जून के पहले हफ्ते की बहन करूँ । अलसाई सी दोपहर घर में सिर्फ मामा तुम ही थे मम्मी टाॅल का तीनों अपने काम पर गई थी । कॅश मैं अपना संतुलन खो गया था । मैंने थोडा प्रयास भी किया । मेरी उत्तेजना पर तुमने अपने शांत के हमार से ठंडे पानी की चीजें होती है । मैं संतुष्ट था । तुमने कहा था ऍम थोडी गंभीरता से कम विवाह से पूर्व शारीरिक संबंध वास्तव कह रही थी । वासना से इंसान का पतन होता है तो तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है । लेकिन मैं नहीं जानता हूँ तुम प्रेम सम्बन्ध में शरीर को कैसे अलग कर सकती हूँ । जिसे तुम कलुषित कहती हूँ, उसमें प्रेम की पूर्णता समझता हूँ । ट्रिंबल काल्पनिक स्थिति नहीं । मैं तो किसानों का संपूर्ण समागम हूँ । क्या भी वहाँ से पूर्वी उचित है? प्रेम में उचित अनुचित कुछ नहीं होता हूँ मैं यही से चरणों का भटकना शुरू हो जाता है । इसके लिए प्रेम नहीं । हम दोषी ऍम, तुम्हारी असंगत पार्टी, मेरी समझ से बाहर अकेले का में ऐसे ही होता है कि सेना का हो रहा है । वहाँ से पूर्व शारीरिक संबंधों की कल्पना मात्र से सी रूटीन ऍम पूर्ण रूप से सफल रहा । फिर शाम को हम दोनों ने काफी पीने का प्रोग्राम बनाये । हमें कनॉट प्लेस जाना था । मैंने स्कूटर स्टार्ट किया । अरविन्द के पिछले सीट पर बैठने की प्रतीक्षा करता हूँ । परवीन नहीं बैठी ठगी इसी खडी नहीं ऍम की मुखमुद्रा कठोर सी लग रही थी । बैठना मेरी स्वर में झनझनाहट मैं वैसी ही सिर झुकाए खडी रहेगी क्या बात ही राॅड करूँ, क्यों बतलाती स्कूटर बंद कर ऍम कर दिया पर स्कूटर की सीट पर ही बैठा हूँ । फिर होना हूँ क्या? पकडकर बैठी हूँ तब मेरी समझ में आएगा की क्या बात है? मैं सिर्फ मुस्कुरा दिया ऍम उन्होंने पूछा और हटाती क्यों रोज रोज पेट निकल जाती थी फिर पीछे बैठने वाला क्या पकडे मेरा कंधा ऍम यही समझ लूँ तो मेरा अनुमान से ही निकला हूँ । इसमें कुछ बुराई है । तुम जानते हो रहा यहीं आकर मेरा और तुम्हारा मतभेद शुरू हो जाता है । मतभेद हर मान्य स्थिति का अनिवार्य अंग के बिना कुछ नहीं होता । किसी सोच में डूबी सी लग रही थी अब कॉफी पीने चलना है या नहीं? चलो मैंने सीट पर बैठे बैठे एक टिक मार्क ऍम पिछली सीट पर बैठ के उस ने मेरा कंधा पकडने की जगह मेरी सीट को पकड रखा था तुम्हारे लिए मैं अस्पृश्य हूँ हूँ कहकर मैंने स्कूटर चला दिया हूँ । ऍम तीनों का हाथ उठा अमेरिकन धीरे पर हूँ ठण्ड कम ऍम कुछ क्षणों बात मुझे लगा जैसी तीनों की हथेली ऐसी नहीं है । मुझे अपने कंधे पर की फॅमिली हमें फिर सिर्फ फॅमिली के इम्तिहान में ही नहीं सेम थी कि नहीं । मीनू से बहुत छुपाकर मेरे भागने की सेवा ही किया था ।

Part 4

मैंने वैवाहिक संबंधों की शवयात्रा देखी है । रह भी दूर नहीं बाहर नहीं घर भी मैं कलम कर लेता था हम मेरी आंखों के सामने बारी बारी से अल ऍम और तीनों के चेहरे आ रही थीं । हजार रही हूँ फॅमिली में भाग रहा हूँ मैं ग्रुप निर्माण अविश्वस्नीय दृश्य मेरा पीछा कर रहा था । उस तरीके से नहीं बजे घर छोडने पर मजबूर कर ही दिया था । यहाँ आकर भी वह मुझे चैन नहीं लेने दे रहा हूँ । बार बार मेरे पीछे रखा था । सोचने पर मजबूर हो गया । ऍम वाहिक संबंधों में इस तरह की तरक्की और विश्वासघात संभव है । आदर्श की मूर्ति छूट छूट गई थी मम्मी के प्रति आकर और प्रति लिखा की प्रतिमा खंड खंड हूॅं शुरू से उनके बारे में सोचने पर मजबूर हो गया । जब से मैंने होश संभाला घर में के चित्र समाधा ऍम हर समय खींचा की जहाँ खुश हूँ टाॅल बच्चों की होने के पास चू परेशानी शांति हर वक्त मन हो सहसन नाटक घर में ही था मम्मी पापा के संबंध भी अच्छी नहीं । नाम एक दूसरे से कभी प्रेमभरी बातें करते हैं और ना ही उन्हें कभी झगडा । मैंने मम्मी को ना कभी हस्ते देखा मैं हूँ मैंने आपको न कभी दुखी देखा हूँ । अच्छी था सुबह होती शाम इतनी रात कहना भी फिर चली जाती है । यही क्रम चलता है । कभी कुछ नहीं सकता । हर समय सबकुछ ठीक सर । तो ये ही सन्नाटा और एक रस्ता मम्मी पप्पा के बीच की अदृश्य दरार का सूचित । अलका की व्यथा का कारण पापा हमेशा उदासीन से रहती है । उन्होंने घर से मैं था ऍम सुबह उठते चाहे तीन सत्ताधार पढना शेफ करना, नहाना धोना खाना भी नौ बजते ही वो अपने दफ्तर के लिए रवाना हो जाती है । शाम को अंधेरा होने की बात वो लौट आते ही फौरन खनक इतनी जल्दी खाना इसलिए खाली दी थी उनको लंच के जाने क्या करती है । खाना खाने के बाद धूम से अक्सर एक काम करते हैं । यहाँ तो छूटना अंकल की यहाँ शतरंज खेलने चले जाते हैं या फिर सोने की काम है । पलंग पे लेटकर किताबी पडती थी । पता नहीं कौन सी अजीब अजीब से किताबें पढ थी । उन किताबों पर हमेशा बादामी कागज का कवर चढा रहा था । एक चैनल का उनका दूर तीनी उनके कमरे में गई थी । पापा बात सुन गए थे । उसने देखा एक किताब खुली हुई पलंग पर पडी है । अलका ने उत्सुकता वर्ष वही किताब उठाने और बाधवानी कवर हटा करती एक स्त्री की नंगी तस्वीर उस पर छपी थी । मैं उनसे गौर से देख ही रही थी । कितने में पापा आ गई । दस । फिर क्या था दो चांटी अलका को पुरस्कार मिल के तहत नकार सहलाती हुई है और मुझे लिखकर सब कुछ बताते हैं । मेरी उत्सुकता जाती थी । आखिर उन किताबों में ऐसा क्या किसी बच्चे नहीं पढ सकती या फिर बच्चों की देखने पर उन्हें डंट था । पापा की सारी किताबें उनके पलंग के पास अलमारी में बंद रहती थी । हमारी नेताला लगा रहा था । किसी को साँस हमारी को छूने की जा सकती थी । यानी लाख कोशिश की एक दो बार उस ताली को तोडने की चेष्टा भी सब ठीक है । तो मैंने सोचा था चलो पापा हम दोनों को प्यार नहीं करती तो नहीं करी । कई बार वो हम दोनों को डांट फटकार देते थे । टांटी फटकारी तो सबसे कोई अंतर नहीं पडता है । इसी तरह हम दोनों सोचती और फिर पापा के हमार से हम अपमानित और प्रताडित नहीं होती । शुरू शुरू में हमें मम्मी से प्यार किया । वो भी नौकरी करती थी, पर मेरे समय से दफ्तर जाती समय से लौटा थी । हम लोगों का ध्यान रखते हैं । हमें ममता और स्पीड थी पर जब कभी मम्मी हमसे नाराज होती तो हम दोनों दास हो जाती है । हमे की नाराज की हमारे अस्तित्व के रेशे रेशे को झटपटा चाहती । हमें हमें प्यार तो करती थी तो पापा से इतनी नौकरी ओकरी क्यों रहती थी? हम दोनों में बचपना इसलिए हम उस कारण को खोजती हूँ । फिर एक दिन पडोस के इलाज लक्ष्मी ने हम दोनों को बडी चक्कर में डाल दिया हूँ । राजलक्ष्मी अलका की सही नहीं है । एक दिन शाम को वो आई बडी खुश नहीं हूँ । ऍम बडे खुश नजर आ रही हूँ क्या बात ही मैंने पूछा हमारे घर एक नन्हा सा भैया आया है । वो अच्छा कॅाल का भी खुश हो गए । ये सुनकर अब हम दो भाई दो बहन हो गए । हमारी मम्मी पापा आपस में प्यार करते हैं । राष्ट्रपति मेरे अंकर में कुलबुलाता प्रश्न बाहर आया हूँ । फॅमिली खिलखिलाकर हंसती हुई हूँ । जब उसके हंसी रुकी तो धीमी से बोली क्राज भाई, एक बात बताऊँ खता हूँ हमारे मम्मी पापा का आपस में को क्या करते हैं? हसते बोलते हैं इसीलिए तो हमारे यहाँ पे भी आया है । फॅमिली फिर कहीं तो ये बात है । मैं सोचती लगा हमारे मम्मी पापा पस्ती क्या नहीं हूँ । फिर नया भी भी कैसे आ सकता है? ऍम और हमारी मम्मी पापा में प्यार नहीं तो मैं और अलका कहाँ से आ गई । तब हम बहुत छोटे थे आपने उन बातों को सोचता हूँ वहाँ से आ जाती है समय के प्रवाह के साथ हम दोनों मम्मी का प्यार भी घूमते थे । ये उस बडी पार्टी के पास है । कितना पैसा खर्च हुआ था उस पार्टी घर को खूब सजाया गया था की सारी खाने पीने की चीजें मेजों पर सजीत काफी लोग आए थे मम्मी ने कि नहीं मिस्टर कपूर से हम दोनों का परिचय कराने की खातिर का था सर ये रहे हमारे बच्चे यहाॅं का दोनों बडी सीधे संजीदा होशियार हम तो उन्होंने यहाँ छोडकर कपूर साहब का अभिवादन कर दिया था । बडी प्यारी बच्चे हैं मम्मी के होठों पर एक ऐश्वर्यपूर्ण मुस्कानों भरा है काफी हमें पता चलता है । मिस्टर कपूर मम्मी के पास पार्टी सूत्रों पर थी । लोग डट करती रही थी । कह रहे लगा रहे थे पापा भी पार्टी में शामिल पर वो ऐसे लग रही थी जैसे बैटरी से चलने वाला कोई स्वचालित खिलाना । मैंने एक बात नोट की, मम्मी ने भी कांड शराब का छोटा सा फेंक दिया था । थापाक नसीब चलते हैं । उसके लिए मिस्टर कपूर ने अनुरोध किया था हम मम्मी उसी टाइम नहीं रात के एक बजे तक पार्टी चलती रही । ऍम खाना पीना करती हूँ । पापा को जल्दी सोने की आदत थी इसलिए वह बारह बजे पार्टी से उठते हैं । दूसरे देना में पता चला कि मम्मी ने ये पार्टी अपनी तरफ की होने की खुशी में दी थी । मिस्टर कपूर की कंपनी में मम्मी का काम करते हैं । कंपनी को काफी लाभ हुआ था । इसलिए मिस्टर कपूर नहीं मम्मी को पूरे तीन सौ रुपये की तरह की थी । मम्मी को तरह की नहीं उन्होंने कुछ पायेगा पर हम नहीं भी करते हो । हम लोगों को प्यार करने की भी उनके पास समय कहाँ था हो तब तक चलती जाती ऍम इट । वहाँ तथा छुट्टियों के दिन भी । फिर कश्मीर पापा पहले से ज्यादा उदासीन होते हैं । उनकी किताबों की संख्या पर नहीं लगी । शतरंज खेलने का समय भी पास किया कितना का और अजीत पन आ गया था चारों की । पर उस तटस्थता भरे माहौल ने मुझे और अलका ऍम हम दोनों के लिए करीब समय बीत रहा था । किसी बोझिल माहौल में हम बडे हो गए । अलका कमर्शियल फॅमिली हमें ऍम पापा की रूटीन सिंध की परिवर्तित घर में मम्मी ही सबसे ज्यादा क्रियाशील । उनकी कंपनी तरक्की कर रही थी । साथ ही मम्मी भी तरक्की की मंजिल तय कर रही थी । मिस्टर कपूर की मम्मी पर बहुत पति अक्सर मिस्टर कपूर हमारे घर आती हम लोगों के लिए ठीक है । सारे उपहार लाते । ठीक कुमार हमलोग की उनके घर खाने पर कहीं मैं लगभग हमारे घर के सदस्य बन चुकी थी । कुछ भी चीज मैं खाना तीन भी आंखें जिससे मुझे घर छोडने पर मजबूर करती है । मेरा इनमे का रिसर्ट निकल चुका था । मैं पीता हूँ टोटल मिलाकर फिल्में पांच से ही होता है तो उस पर सफलता नहीं मुझे छोड कर रखा है तो मैं क्या करता हूँ पूरी पूरी तैयारी पीपल भी अच्छा हुआ । पता नहीं क्या कारण कि मैं उसे पास नहीं हो पाया । मुझे इस पेपर में दोबारा बैठे की जा सकती मिलके सितंबर में परीक्षा होनी थी, खालीज बनते हैं इसलिए मैं दिन में कॉलेज की लाइफ रहे चला जाता और नहीं पडता रहा था जो उनकी वह सुबह भी विचित्र घर का आप आपकी तक बच्चा चुकी थी । मैं लाइब्रेरी जाने की तैयारी कर रहा था ना जाने की हम भी तैयार हूँ । क्यों नहीं । दफ्तर नहीं जाना था तो पूछता हूँ तैयार होकर मम्मी के पास किया और पूरा दिखा मैं जा रहा हूँ । नहीं नहीं तीन ऍम शाम को पांच बजे पांच । कहीं कुछ काम है? नहीं । दो शन का मैंने गौर से देखा । मम्मी कुछ परेशान से लग रही थी । उनके मुख पर कुछ ऐसी चित्र से? भाव मैंने पहले कभी नहीं । इन्हें साहस जुटाकर पूछे । ऑफिस नहीं चाहिए । नहीं क्यों? अभी उन्होंने अब तक नहीं या शायद इस की जरूरत नहीं है । आप अस्वस्थ लग रही है क्या पढ तीस के तहत है । कोहली ने नीचे प्लीज कुछ पर पडा है । नहीं लेकर मम्मी अंदर चली गई । मैं लाइब्रेरी जाने के लिए चलती है । उस दिन शनिवार था । छुट्टियों के दिनों में शनिवार को लाइब्रेरी सिर्फ एक बजे तक खुलती है । एक फॅमिली बंद । अब मैंने घर लौट जाना ही उचित समझा । मम्मी की तबियत ठीक नहीं थी । कहीं उन की तबीयत और ज्यादा गडबड ना हो । मुझे इसी बात की आशंका घर लौटी समय मेरे मन में खेत की भावना भी मौजूद । सुबह मम्मी के पूछने पर मैंने कह दिया था कि मैं पांच बजे तक लौटूंगा । उस समय बिहानी नहीं है कि अच्छा नहीं मानता हूँ । मेरी चलती घर पहुंचती पर जरूर चौकिंग मैं घर पहुंचा मैं सोच रहा था अगर मम्मी का सिर तक बढ गया होगा तो पलंग पर सिर्फ बांधे पडी होगी वहाँ से कर रह रही हूँ पर घर के पास पहुंचकर मुझे कुछ और ही आभास हुआ ऍम के बाहर काम साथ हूँ अचानक मुझे मम्मी का खिलखिलाकर हंसने का स्वस्थ नहीं साथ एक पुरुष भी हो हनी फॅमिली क्यों नहीं खडी हूँ मैंने यह स्वस्थ अच्छा है मिस्टर कपूर का उठाएंगे इधर मानसी से कम सटाएँ चुप चाप कुछ सुनता हूँ क्या? घर में कोई नहीं मिस्टर कपील पूछेंगे सब है मम्मी इतना तो नहीं ऑफिस कहीं हल्का अपने ऑफिस है राज कांग्रेस गया है नौकर दो घंटे की छुट्टी पर हैं मेरा भी तो यही मैं था पता हम मैं समझ नहीं अब से दर्द कैसा है? मम्मी ने कोई उत्तर नहीं ऍम । उन्होंने पूछा और अच्छा बताइए आप क्या लेंगे? जो मुझे चाहिए वहाँ दे सकेंगे । मैं समझा नहीं अपना समझी का नाटक कर रही है । बताइए तो सही हाँ मैं पीता हूँ वो आपके पास है तो उस कहकर मम्मी थी क्या? इस समय बात कर मैंने कोई मिस्टर कपूर ने अपनी बहुत पूरी नहीं ऐसी कोई बात नहीं आपका हर समय स्वागत हैं हूँ आपके इस निमंत्रण को मैं कैसे ठुकरा सकता हूँ हरी हरी मिस्टर कपूर मैं कहा कि न सुन सकता मैंने फटाक से धर्मासती पर दोनों हाथ वो अंदर से बन नहीं था दरवाजा खुल क्या नहीं नहीं देखा मम्मी और मिस्टर कपूर एक ही सौंपी पर बैठे थे मिस्टर कपूर का एक हाथ मम्मी की बगल में था नहीं कैसे मिस्टर कपूर की सीरीज टिकट मेरे उस अप्रत्याशित आगमन से दोनों सकते होंगे मम्मी छटपटाकर खडी हो गए अपने बालों को दोनों हाथों से संभावना रोष भरी होली तो मांगे मैंने कुछ कहानी मेरे हाथ में जो नोट थी फिसल कर नीचे फर्श पर किस चुकी थी तुम्हें तो कहा था कि तुम पांच बजे आउंगी जी आ नहीं रहा । शनिवार था मिस्टर कपूर का चेहरा शायद पीला पड गया था । मेरी आंखों में खून तरह है ऍम मैंने अनजाने में मम्मी के रंग में भंग कर दिया था । मैं उन दोनों को वहीं छोडकर अंदर चला कि अपने कमरे में जाकर थोडा आराम से पलंग पर गिर पड । मेरी आंखों में आंसू मैंने मम्मी की उस की खुद ही कल्पना नहीं थी । मेरी चेतना होती जा रही थी कुछ सिर्फ पांच का ऍम क्या आप मम्मी मस्तियाँ ही मिला सकेंगे? हम हमने के सामने नसरी उठा सकूँगा नहीं जाने की थी मैं अच्छे साॅस खाना हो नहीं हो सकता । अलका सीधी मैंने कुछ नहीं हो पाया । उसी रात को मैंने अपनी जेब खर्च के बच्चे रूपये की नहीं तो काफी नहीं है । नहीं नहीं घर छोडने का फैसला । फिर मुझे लग रहा था कि अभी कुछ दिन और मैं यहाँ रहा । ऍम जोगी जबसे तुम आया मेरी थोडे रन के समझ सकता है । नहीं नहीं चीन की समझ फ्री चेतना लौटा, नई दिल्ली में नहीं नैनीताल था और दूर पहाडी से आते हुए ईरान स्ट्रांग विंडो भी एक जीत की पंक्ति सुन रहा हूँ । अंतर में कोई तो बता रहा था ऍम जी कुछ अब आप लोग ही बताई में अपनी मनो दशक की सिखा कैसी हो? क्या भी आप लोग मुझे गुमशुदा या घूम रहा समझती तुम कितने विश्वासघाती, क्रूर, निर्मम निष्ठुर हूँ, छटपटा रही हूँ पर क्या तो मेरी पीडा को समझ सके पूरी तरह हो क्या? पहली बार स्वर्ण स्पष्ट हुई थी । ये स्वर रहे थे मेरे पडोस की कमरे इस नारी के स्वर्ग के साथ कुछ और धनियाँ भी चुकी हूँ भी चौकन्ना हो गया

Part 5

पास का कंगना रात की निरव तमिल वहाँ सीधा मुखर हो गया था । उसमें से आती ध्वनियों ने मुझे चौंका की मेरी कमरे का नंबर चौबीस नहीं, कमरे की बदन में अंतिम कमरा नंबर पच्चीस इंदु कमरून के बीच लकडी का पार्टीशन पिछले पांच दिनों से कमरा पर इसमें से आने वाली आवाज ही मेरे लिए एक जटिल रहे सी बन गई । शुरू शुरू में मैंने कोई ध्यान नहीं है । कोई विशेष बात ही नहीं हुई थी । किसी मेरा ध्यान उस ओर आकर्षित होता है । लगभग चौबीस घंटे वह कमरा बंद है । कभी अंदर से तो कभी बाहर हूँ । कॉरीडोर में आते जाते हैं तथा नहीं लगा कि उसमें कौन रहता है हूँ किसी को माल सुंदर और एकांतप्रिय किन तो बीमार नारी के रहने का आभास मुझे मिला था । चूडियों की खनक का हाल कर कभी कभी खांसी की हमारे बीमा पास नहीं । संजीव की मधुर किन्तु अत्यंत धीमी ता शायद उसकी पांच ट्रांजिस्टर कई बार एक नाहरी शायद नौकरानी को आदेश देगी । दिन में कई पांच हम साथ कर मैंने सुनी की कोशिश की । बस कुछ फॅमिली जैसा गई । नहीं । आज खाना नहीं खाते हैं, ठीक नहीं साडी ड्रेस जरा मुझे दवाई की शीशी तो उठाते नहीं ना । शायद नहीं ना है । मैंने उसी भी खत्म वो ही व्यवस्था की स्ट्रीट ऍम कर नीचे भाग दौड क्या करती थी । उसके हाव भाव में ऐसी जल्दी उत्तेजना और चिंता रहे जैसे घर में कोई भीषण दुर्घटना चाहते हैं । पहले तो मैं ये समझता हूँ की गर्मी काटने के लिए ये संपन्न परिवार की महिला अपनी नौकरानी को साथ लेकर मैंने होता नहीं है । पति भी चाहिए, व्यापार या नौकरी की उलझन के कारण नहीं आ पाया । किसी भी देना सकता है । पति के पीछे रह जाने से बेचारे परेशान रहती थी, उसी की प्रतीक्षा कर रही है । शायद उस घर में पर्दा प्रथा अभी प्रचलित है । इसीलिए वो बिना किसी पुरुष के साथ घूमने फिरने नहीं जाते, चौबीस घंटे कमरे में बंद पडी होती रहती है । इस कमरे से खांसी अट्ठाइस को की आवाज आनी शुरु होगी । तो मैंने सोचा शायद वो ऍम मैदानों की भीषण गर्मी से बचने के लिए स्वस्थ लाभ के लिए यहाँ इतनी दिन हो गया । नहीं तो उस नारे की दर्शन हुई और न ही उसका पति है । हूँ तो बहुत ही जरूरी है जिनके कारण मेरे मन में उस नारी के प्रति संदेह और रहस्यमय उत्सुकता पडती है । एक तरफ महीने सूचित की कहीं कोई जासूस पहला तो नहीं? पहली बात की थी कि सुबह शाम नहीं घूमने जाएंगे । सुबह मैं जब कम्बल से मुझे की । तंद्रा सीबू झील पलंग पर पडा होता है । पास कमरे में खटपट शुरू हो जाती है । उसकी बात कमरे में बच्चा सुनाई दी थी । करीब आधा पौने घंटे के बाद पाॅड उसकी कमरे में जाकर खत्म हो जाती है । कमरे में फिर मध्यम आवासों की पत्ती पंकज पर भरोसा नहीं है । इस सब के बीच में सिर्फ पालन कर लेता हूँ । ऐसा ही शांत नहीं होता । जब मैं शाम को निकलता तो पडोस की कमरे पर ताला लगा है । नाटक ऍम राज कहना चाहती, मेरा खाना पीना भी खत्म हो जाता है । ये गए सुबह वाली पद जापान और पडोस की कमरे में जाकर खत्म हो जाती है । मैंने कई बाहर क्रेज नहीं किया । जब कभी बरामदी में पता ऍम मैं उठता और दरवाजा खोलकर पहुंच क्षमता तब तक उसका कमरा पंद्रह चाहिए । उस पद चाहत की गूंजने का कोई निश्चित समय नहीं । मैंने कहीं बाहर बरामदे में खडे होकर पद जात के आने जाने की प्रतीक्षा की थी । मैं सफल नहीं होता है । दो बार मैंने उस पर विचार को पकडा था तो दोनों बाप वो नौ कराने की बच्चा हो मालकिन की पाँच ना मेरे लिए ऍम कर रहे थे । कल से आप की फॅमिली किसमें पडोस की कमरे की रहे से की जानू को से हटा हूँ हूँ उस कमरे में नारी कांत के अनामा एक दबा ठका पुरुष वर्ग ही सुनाई दे नहीं मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे बहता नाम अदृश्य नारी पुरुष । इसी बहुत ही महत्वपूर्ण मसले फॅमिली फुसफुसा करते हैं । हमारे यहाँ पर कोई दिखाई नहीं था । पुरूष टीम जीत दिखाई नहीं दिया । पिछले दो तीन ओमी कमरे की एकमात्र की थी जो बरामदे में होती है । खुली छूट था मैं सोचता था जो भी पच्चीस नंबर से दूसरे का मेरे स्कूली खिडकी के सामने से ही तो होकर को सीख हूँ । उस की भी ऐसा था । पिछले दो तीन के अनुभव में मुझे एक दम परेशान कर दिया था । काफी की क्या रहस्य मेरे अंतर में टॅाप मेरा अंतर जैसी विभाजित हो गया मेरा एक पाँच कहता हमारे पास सैलानियों को अपना रूप फॅसने आई है । ऍम ये गलत है है तो कोई कुलीन घराने की नहीं शॅाप के लिए आई ऍम था उसका पति हो सकता है । पति है तो चौबीस घंटे साथ क्यों नहीं रहता? इस तरह चोरी छिपे क्यों मिलने आता है? किस तरह भीम इयाॅन क्यों करता हूँ? निश्चितौर सहित होकर क्यों नहीं बोलता? शायद पता नहीं तो हो सकता है इस तरीका नैनीताल में रहने वाला कोई रिश्तेदार ही हूँ क्या रात पेहना को नहीं है । नहीं नहीं लेकिन तो पैदा करता हूँ । हो सकता है वो दुकानदार हो । आजकल टूटी सीजन चल रहा है । शायद दिन में उसे आने की फुर्सत मिलती हूँ और अगर वह महिला के रिश्तेदार है तो ये महिला उसकी कर क्यों नहीं हो? इस होटल में से आने की क्या जरूरत थी? कई रिश्ते ऐसे भी होते हैं जिनमें हिस्ट्री की बात नहीं है । अग्री सस्ती किस्म की औरत होती तो एक ही पुरुष कहाँ था? सुबह से रात तक लोगों का तांता लगा रहे थे । हाथ भी होंगे तो मैं क्या बताऊँ छोडो भी खाती रहती है ये तो सब निगाहों पर निर्भर करता है । किसी भी चीज को जिसने कहाँ से देती हूँ मैं वैसे ही दिखाई देती है । निगाही मानव स्थिति की वास्तविकता तो पता नहीं सकती । ठीक है पीना वास्तविकता जानी केवल अनुमान के आधार पर ऐसी बातों पर अपना निर्णय देना कहां तक न्यायसंगत मानव जीवन उलझनों से भरा हुआ है । जल्दबाजी में किया गया । कोई भी साधारणीकरण हमेशा सही नहीं हो सकता तो पता लगा हूँ पाँच तरीख तक मैं शांत हो गया । मेरे अंतर में छोडे हुए युद्ध की समाप्ति होगी । इस युद्धविराम के बाद मैंने ठंडी तेल से सोचा उसकी क्या मुश्किल है? इस सहसी में नारी की नौकरानी से दोस्ती गांठकर सच्चाई का पता लगाया जा सकता है । तभी दरवाजा सकता हूँ । पल भर के लिए चाहिए क्या? तीनों अंदर आ गया । खाना खा लिया तो कब का तो तीनों खाने की बटन नहीं नहीं अपन के पास रखी थाली उठाने के लिए झुका ही था कि मेरे अंदर पिछली किसी गति से एक विचार था । क्यों ना तीनों से ही रहस्यमय नारी के बारे में पूछो उसको कुछ मालूम ही होगा । तीनों जूठी थाली लेकर जाने के लिए तैयार था । जाने से पहले उसने मुझसे पूछा वो जो सोने से पहले चाय या कॉफी लेंगे । कुछ फॅस मुझे याद आया घर पर रात को सोने के समय हल्का मुझे ओवर तीन मिला । एक क्लास थी, कितनी अच्छी नींद आती थी तो दूध पीकर तो चाइना नहीं नहीं वैसे ही नहीं नहीं आती चाहे पीकर तो सारी रात जाना पडेगा मैंने टू फॅमिली का तीनों फिर भी खडे हो । मैं सोचता हूँ नहीं नहीं आती ठोक नहीं लगती कुछ भी अच्छा नहीं लगता है कुछ भी नहीं सूचना लगता है चुप चाप अन्धेरे रास्ते पर टटोल टटोलकर चल रहा है खाॅ क्यूँ शायद में रखकर आज एक फॅमिली है पीते कल की कल बीस स्थितियां आज भी स्थिरता तथा अनिश्चितता आनेवाले कल की असंतुष्टि तथा उन संपत्ति जीवन की रह इससे बडी विविधता की भवन में पढकर मैं अपना सब कुछ होता है । तीनो वापस जाने के लिए मुझे हर दरवाजे तक पहुंच गए मैंने उसे वो ठीक चक्कर खडा हूँ आॅटो बताऊँ पूछूं पर उस की कमी भी कम रहता है । पच्चीस दिसंबर में हो अच्छा शर्मा कहानी एक महीने से रह रही दिल्ली से आएंगे । अकेले हो जी नहीं उनके साथ उनकी नौकरानी भी है । अरे वो तो मुझे ऍम पर क्या कोई आदमी नहीं नहीं हूँ । अकेली क्या बीमारी मेरे ख्याल से तो मुझे भली चंगी हैं । देखने वाले में कैसी है? खूब अच्छी लगती है । वो शायद खूब पढी लिखी भी हैं । अच्छा तो मैं कैसे पता नहीं फुजोऊ गमार और पढी लिखी आज भारत में फर्क नहीं होता क्या? मुस्कुराती तो आप ही सब क्यों पूछ रहे हैं? खरीद वैसे ही थी । मैं चुप हो गया तो तीनों ने मुझे जो कुछ बताया उसका अनुमान से पहले ही लगा चुका था । मैं तीनों से किसी ने रहस्य के उद्घाटन के आशा करता हूँ । एकदम ऍम मैंने साहस जुटाकर तीनों से अंतिम प्रश्न पूछे हैं । तीन । क्या कोई खास नहीं इनके बारे में कुछ खास बात क्या होती है? ऐसी होती हैं, वैसे ही है तो तीनों ने सेहत सही नहीं का धर्म उसको रहती है । अच्छा नहीं नहीं अब तुम जब देखो सुबह चाहे छह बजे तक जरूर लेते । आना इतनी जल्दी । हम कल सुबह में कुछ नहीं जाना चाहता हूँ और आप सो रही हूँ तो धरे तो मुझे जगह नहीं ना । बहुत अच्छा हो चुकी ऍम में एक बार फिर पलंग पर आ कर ली थी । मैंने पत्ती बिछाती । सोने की कोशिश करने लगा । मीन जाने कहाँ हो गई थी । बार बार शाम को सुना । वार्तालाप अंतर में उभर रहा था । आज उन दोनों की स्वर्ण हो गए थे । मैं उन लोगों को स्पष्ट संसद था । शायद वो महिला लौट आई थी । उसकी नौकरानी ने चौकर भारी स्वर में कहा था राम राम बीबी जी हाँ तो एक भी नहीं जल्दी से कपडे बदल लीजिएगा । मैं बीमार हो जाएंगे । अभी तक नहीं आपकी ना । बीबी जी बडी लापरवाही से कम लेती है । महिला शायद फिर भी मांगेंगे भी बी जे आप कपडे बदल मैं आपके लिए नीचे से एक प्याली गर्म चाय के लेकर आती हूँ । उस महिला नहीं जैसे आपने हूँ हूँ । फिर प्रधानमंत्री में पचास हो पांच मिनट में नौकरानी नीचे से कॉफी लेकर लौटाई । कुछ तीरकमान शहीद हो नहीं कॉफी पी रही क्या? बात ही नहीं भी आपकी तबीयत ठीक नहीं है । शरीर हो रहा है । आंखों में जलन हो रही है । पहली पाँच पडोस की कमरे से इतनी छह दस वर्ष तो उस पर वही महिला बोली अरे बीबी जी, आपका माथा तो पूरी तरह से तब रहा है । फिर हाँ आप पलंग पर लेना चाहिए । मैं आपका माथा दबा देती हूँ । कुछ बल्कि शांति पीबीजी क्यों? बेकार में आप अपनी जान होम देने पर तुली है तो पूजा शीला फिर डीरेक मान छा गया । पडोस के कमरे में मेरे ऊपर तंत्र समझा नहीं लगी । पडोस की कमरे से खांसी की आवास पूछती लगी ।

Part 6

रात के गहरे सन्नाटे और घनघोर निरव ताकि बीच मुझे किसी के रोने का स्वर सुनाई थी । कॅश क्या हो रहा है आज की मैं सो पाऊंगा या नहीं ये सारी रात यूँही कोरी जातियां हुई निकल जाएंगे ऍम का हल्का सा तीनी थी नहीं हिचकी यहाँ पे उच्छवास के कारण उठते ऍम मैंने कानून को सतर्क किया पूरी तरह से एकाग्रचित होकर में सुन नहीं ये सूरज पडोस की रहस्यमय कमरे तो महिला हो रही है ऍम क्या उसकी तबियत खराब हो गयी है? सिर में तेज दर्द हो रहा है । मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था । चुकी हो जाओ मन्दाकिनी मैं चौकिया तो पुरुष किया हूँ । ये उसी का स्वस्थ था तो उस महिला का नाम ढूँढा कि नहीं ऍम पता नहीं रंगरूट ने कैसी होगी महिला शाहिद कुछ नहीं बोली । कब तक ऐसी रोती रहोगी । चीन की जिंदगी में रोना लिखा है वो हमेशा होते ही रहेंगे । इसमें लिखा है तुम्हारी जिंदगी में रोना तुम नहीं मैंने और नहीं तो क्या कैसे? क्या तुमने अपनी के सामने ये शपथ नहीं ली थी कि तुम मुझे हमेशा सुखी रखेंगे । फिर उसका थे तो नहीं हुआ कि तुम मेरी जिंदगी पर एकाधिकार का अनुचित दावा कर नहीं नहीं किया । ये ऍम थोडी सी शांति और सुख की कामना करती थी तो क्या तुम्हारी कामना पूर्ण नहीं हुई? महिला शायद मान होंगे पर मंदाकिनी शायद तुम अपनी खुशी के लिए मेरी जिंदगी की खुशियों का मूल्य चुकाना चाहती थी । एक ऐसे संभव होता हूँ नहीं तो कभी नहीं चाहते तेज मैं तुम से याद दिलाना चाहती थी कि मैं भी तुम्हारे प्रेम के हिस्सेदार हूँ । मधुर आपने जानता था तुम क्या जाती हूँ? मैं फिर से अपनी स्थिति स्पष्ट करना चाहता हूँ । सातवां तुम्हारा स्थान कभी नहीं ले सकती । सातवां की मेरी जिंदगी में वो जगह है । उसे तुम कभी नष्ट नहीं कर सकते । इन दो स्थितियों के बीच संतुलन रखना मीरा काम और उससे समझाता करना तो तुम्हारा करता हूँ मैं बहुत इस संतुलन या समझौते का प्रश्न नहीं । वे बहुजन की जटिल समस्या है । विभाजन वो भी बहुत चिंदी जिसका परिणाम होता है कटा अलका और कभी खाती हूँ मैं नहीं समझता तुम कैसे समझो की मधुर सात नौ मेरे क्षेत्र का अतिक्रमण किया है । इसका फैसला करना मेरा काम है, तुम्हारा नहीं । अपने अधिकार क्षेत्र के अतिक्रमण का फैसला करने का हक । फिर मुझे रंगीन चश्में पहनने वाली न्यायाधीश के विदेशी सच्चा निर्णय नहीं नहीं करता मंदाकिनी तुम शालीनता की सारी सीमाएं लांघने की कोशिश कर रही हूँ । फिर से कोशिश करती हूँ पर हम उन्हें पहले ही नाम चुके हैं । मंदाकिनी मधु अपनी स्वर्ण नियंत्रण रखेंगे । वॅार नहीं सकती । हमेशा कडवा होता है । मैं अपनी जिंदगी में कडवाहट नहीं चाहता कि में कई नई बात नहीं सुन रहे हैं । पर मेरे कहने से नंबर कौनसे असर पडता है? हाँ, अब क्या असर पडेगा मत की सीमा की मैं ही किया गया सिर्फ ठंडी पड रही थी मेरी तो सारी खुशियां खर्च की मिटन साथ ही सब कुछ सुन रहा था । पर भर कमान होते ही मुझे अपनी होने का आप हो लगता है इस लम्बे अंतराल से भी तो नहीं कोई अंतर नहीं बढ पुरूष का स्वर्ग हो जाएगा । अंतर क्या पडता है मैं तो जिंदगी में सिर्फ मुक्ति की कामना शीर्ष मुक्ति की कामना हामद मुझे भी बहुत ऍफ का ये पूजा और नहीं लाया जाएगा । ठीक है मैं तो भी सुखी देखना चाहता हूँ ये भी मुक्ति ही तो मैं सुबह सकती है । मैं तुम्हारे ऊपर से अपने सारे अधिकार वापस लेता हूँ । ऍम किस लिए इस मुक्ति की घोषणा के लिए कर इस घोषणा के लिए मेरे सुख की दुहाई क्यों देती हूँ तो फेस किसके सुब की दुहाई दू इसमें तुम्हारा भी तो सुख चुका है मेरा अच्छा आदमी के साथ तुम्हारा में बाद प्रेम मेहता चल सके उसके साथ वो पिक्चर नाटक और संगीत कार्यक्रम देख सकते ऍम खाना इंसान सी रिकॉर्ड खरीद मेरी खरीदे हुए रेडियोग्राम पर उन्हें ऍम करना मेरे बिस्तर पर तुम तो मंदा की नहीं महिला छुट होगी कर उसकी कंट्री से छुट्टी हुई छुट्टी हुई हिचकियों का सर मैं स्पष्ट सुनता रहा कुछ क्षण मौन के बाद तो फिर पूछते हैं टीवी ही पाॅइंट जब साथ ना तुम्हारी प्रदेश बाकियों के मेरे भी बंद कर किसी तो यही मैं जिंदगी के फॅमिली नहीं तब मैं जिंदगी की पतझड के बीच में सूखे पत्तों की खरखरा संकेत अब बस करो मन्दाकिनी नहीं भी जानती हूँ हूँ की रात रात खर्च तुम दोनों आलिंगन पांच में पाँच सुनहरे सपने देखते हो चमकीले भविष्य की योजनाओं में बंद ही रहा हूँ की फिर में फॅमिली तुम लोग गुदगुदी बिस्तर में पडे रीमा लाभ ऍम फॅमिली की भाई को अस्सी हजार से कहा रही हूँ चुप करो मन्दाकिनी ऍम तुम्हारे यहाँ छोटी ऍन बोलो खास इतने दिनों बाद ही बांध टूटा है मुझे के ही लेंगे तो अंतरिम ऍम मैं जाने कब से उमर खुमार कर मुझे भी मार्च हुई थी । हाँ सच में उसे चैट से पकडकर बाहर निकालकर फैंकना चाहती हूँ । शायद मतलब इतने कोई उत्तर नहीं किया । शहीद तुम उसी ऍर के लिए ले जाए तो तुम्हारी गली में बाॅस संगीत की धुन कस थी । रखती हुई हूँ सिंधु की कितना मीठा सपना कि मैंने अब जाना है । मैं खुद करिअॅर संगीत समझे नहीं रहे चलेगा वो तो पागल की चीख बनकर पहुँच है कहीं तो हाँ साथ पीढी । पेट्रोलिंग तो क्योंकि कलॅर कि व्यक्ति की सुप्रीम ऍम सब कुछ नॅशनल करते निभाना होगा । ऍम किसी कुम्हार के हाँ वे से निकलता हुआ क्यों हुआ? कहीं जाओ मन्दाकिनी में सब सुन रहा हूँ नहीं काम सिर्फ सुन रही हूँ मत । भाग से ही तुम दोनों की जिंदगी में वास्ता किया था । झूठे की आज की रोशनी और मधुरिमा का प्रवाह होगा और मेरी ठहरी हुई सिंधु की फॅमिली लिए समा चाहिए । तुम भावुकता की सीमा इलान रही हो । मन्दाकिनी तो खर्च पीडा की केंद्रीय चीज में डूब उतर नहीं शायद ही सोच रही हूँ । नहीं ऐसा नहीं मैं सोच रही हूँ क्यों साधना की संपर्क में तो सुख्खू नहीं मिलेगी हूँ तो सबकुछ मनचाहा पाकर ठीक खाली होगी । साथ ना कभी कभी पूर्णता नहीं दे पाई कि संजय वो मधु सबसे रहेगा । ऍम तुम अपनी भाजपा मैं जीवन की अपूर्ण का की खाने को पहुंॅचे । इस अपूर्णता के प्रति अनभिज्ञता ही संसार के जीवन की सबसे बडी फॅमिली जिसकी शिकार तुम खुद भी हो, मंदा की नहीं । नहीं मतलब फॅमिली का शिकार तुम दोनों हूँ तो उसका ऍम रही । किस बात को हमेशा याद रखना जो दूसरों की सुख पर डाका डालते हैं ना? खून पर कभी भी विश्वास नहीं किया जा सकता हूँ । खुशियों का डाकू अंत में दुख का सीजन कर चले जाते हैं । तुम आवश्यकता से अधिक भावुक हो गई । मैं भावुकता की बात ही नहीं कर रही । सत्य का उद्घाटन कर रही हूँ तो उन्होंने मेरे साथ अन्याय किया । मैंने पीर होगा है, न्याय को सहा । अन्याय को सहने वाला और पीर को भोगने वाला व्यक्ति व्यक्ति को उजागर करते । मंदाकिनी अब बस करो तो उनकी भी चुप हो जाती है । कुछ क्षण का मौन हूँ । मैं तो साॅस तो क्यों ठंड लग रही है हूँ क्या बुखार ही क्यों नहीं सकती? डॉक्टर से दवा क्यों नहीं मिली होता है? फिर कसमसाता साॅस बाहर पडी जोरों से पट पट हो नहीं नहीं शायद वर्ष शुरू हो गई में भी हद परेशानी चुका था तो ये पुरुष नारी पति पति है हूँ मैं वैवाहिक संबंधों की शवयात्रा सेक्टर कर रखा है आपकी मेरे पडोस के कभी भी एक और विवाह संबंध अंतिम सांसे नहीं ऍम हूँ सूखी पत्ती एक भी कहाँ सरे एक्टर पर कचोट भरा ऍम धूल घरे बंगोली बस इन्हीं से घिरा में हूँ वर्ष था मुझे सब फॅमिली सिंचाई के बावजूद मेरी कमर में सरसराहट से बढती जा रही है के अंदर में कुछ ठंडा ठंडा पसीना सकते हो नियांग चालान नहीं लेगी सोने की हर कोशिश भी हो रही है नींद को बुलाने के लिए । जैसे ही मैं काम एक स्वस्थ बनाकर मेरे सर्वस्व कोच अच्छा होता था । रामना अस्फुट सस्वर मेरे कानूनी मुझे मैं हूँ तो भी रोक नहीं का मुझे क्या ठीक है कि तुम्हारा चुनाव तुम्हारी निर्णय को स्वीकार ऍम ठीक है । लगता है खाई काफी चौडी और गहरी हो चुकी है मुझे तो कोर ऊंची दीवार ने सर आ रही है अच्छा मन्दाकिनी ऍम मंदाकिनी नहीं शायद कोई नहीं पल भर के बाद बाहर बरामदे में एक धीमी सी बच्चा सीरियल मुखरित अगले कुछ क्षणों में उस पत्र चार तस्वर रात की निरव तमिल होगी । अच्छा पूरे इस महीना का पति है । फिर भी मैं यहाँ नहीं थे । इसका मतलब है कि और सम्बन्ध तब तो चुके । क्या नहीं करानी थी इस खानपुर कृष्य कि एक दशक शहीद फिर वो कहाँ चली गई कि काॅल किसी की पानी पानी रूनी का स्वस्थ नहीं । मैं अपनी पणकर उठकर पहले क्या हमें क्या करेंगे? मैंने कल सुबह शेखर भाई के पास जाने का पक्का फैसला कर लीजिए ।

Part 7

जब नींद नहीं आती तो मैं कहाँ कहाँ भटक चलता है । कीस बिखरा बिखरा इधर उधर उडता रहता है । यही हालत मेरी थी पडोस वाली कमरे की । रहस्यमय नारी से कट नीरा मंच शेखर भाई, प्रचार कर शेखर खाई मेरे चचेरे भाई हैं उनके पापा और मेरे पापा सगे भाई शेखर घायल किताब था विदेश सेवा में अक्सर विदेशों में रहते तीन तीन वर्ष के विदेशों की पोस्टिंग के बीच पे कुछ दिन के लिए भारत के हेड क्वार्टर में आ जाती है । शेखर भाई उनकी एक मात्र समझता है पहले बचपन में चाचा जी हाँ नहीं हमारे यहाँ ही छोड जाए करते थे । फिर बाद में उन्होंने उन्हें नैनीताल के पब्लिक स्कूल में भर्ती करा दिया था । चाचा जी को नैनीताल इतना पसंद था की उन्होंने रिटायर होने के बाद यही सेटल होने का पक्का फैसला कर दिया था । इसलिए उन्होंने नैनीताल में एक कोठी भी खडे थे । बजे खूबियाँ जब चाचा चीनी नैनीताल की ये कोठी खरीदी थी तब पापा नहीं होनी इतनी थी से झिडकी दी थी । आपने कहा था छोटे तुम तो जीवन भर भारत के बाहर रहोगे फिर रोटी को खरीदने से फायदा भैया मैं गरीबी में जिंदगी बिता कर आमिर के रूप में मरने की नीति में विश्वास नहीं रखता हूँ । मतलब हरी आप तो जानते ही नहीं कि विदेशों में पोस्टिंग होने पर कितना पैसा मिलता है । कितनी भी कोशिश करूं, खर्च नहीं हो सकता है । ये सारा पैसा इकट्ठा हो गया तो मैंने सोचा कि पर नैनीताल में कोठी करे । इतना तो अनुत्पादक काम में पैसा लगाना है । हरी भैया मैं इतने पैसों का क्या करूंगा? ऊपर से शेखर के अतिरिक्त और कोई जिम्मेदारी नहीं । कोई लडकियाँ भी नहीं । जिनके विवाह में मुझे दानदहेज देने की चिंता हूँ । मैंने फैसला लिया है कि पेंशन लेकर मैं आराम से नैनीताल में रहूँ, छोटे हैं । अभी तो तेरी रिटायरमेंट में बहुत वर्ष पडे हैं । फिर इस कोठी के आउट हाउस में किसी को रख लेना । उससे कोई किराया फिर मत लेना । उसकी कुछ महीने उसे दे देना तो कोठी की देखभाल कर लेगा तो सारी साल हो खाली पडी रहेगी । हरे आपकी कमाल करते हैं भैया ही गर्मी की छुट्टियों में आप सब लोग वहाँ जा कर रही गाना रहने की जगह का पैसा नहीं लगे तो जैसे दिल्ली में रहे । वैसे नैनीताल में था । बाकी कुछ नहीं और चुप हो गई । फिर कुछ वर्षों के बाद हो गया । छह भाइयों समय फॅसने थे चार पांच वर्ष पहले की बात है । चाचा जी की पोस्टिंग जिनेवा में हुई थी । कॅश इंडिया की जहाज द्वारा जिनेवा जा रहे है । साथ नहीं चाची जी भी थी, फिर नीचे नहीं वाली । पहुंचता ऐस पर्वत शिखर से टकराकर हवाई जहाज हो क्या? लगभग एक सौ बीस यात्रियों की मृत्यु हुई । उनकी शक तक नहीं । सारी शक्तिहीन केसरी चाहकर पर्स में तब की शेखर भाई उन दिनों हमारे यहाँ रह कर ही पढ रहे हैं । इस दुर्घटना ने पापा को ऐसा आघात पहुंचा कि वह तो बिस्तर पर बीमार पडे । शेखर भाई को बडा आघात पहुंचा पर मम्मी पापा ने अपनी से ही अनंता से उनके इस आप आपको पूरा कर दिया । शेखर थाई नहीं कर लिया था । फिर उन्होंने नैनीताल के कॉलेज में लेक्चरार की पोस्ट वहाँ से चलिये अपने पापा की खरीदी हुई कोठी में रहने लगे । पिछले वर्ष हो दिल्ली आई थी । मम्मी पापा से अपने वहाँ के विषय में विचार विमर्श करना चाहते थे । उन्होंने एक लडकी पसंद थी । उनके साथ उसी कॉलेज में लेक्चरर थी । जब शेखर भाई को लडकी पसंद थी तो मम्मी पापा को क्या आपत्ति होती है । उन्होंने इसलिए वहाँ की स्वीकृति दी थी । नैनीताल में ही विवाह हुआ था । मम्मी पापा अलका तथा अन्य सारे नाते रिश्तेदार है । मैं ना मेरी परीक्षाएं चल रही है तब से एक वर्ष हो गया मेरे मन में अपनी भाभी को देखती की उत्कंठा । अलका विवाह की कुछ फोटोस लाइट उसमें तो वहाँ भी काफी सुंदर लग रही थी । इस पीछे कर घाई नहीं मेरे अनेक पत्र । पहले पत्र में तो उन्होंने धमकी भी दे दी । यदि तो शीघ्र ही नैनीताल नहीं आया तो तेरी भावी प्रत्येक कभी बातें करेंगे उसे एक वर्ष के भीतर शेखर भाई ने मुझे अनेक पत्र लिखे । इन सब से मुझे भैया भाभी के संबंधों के उतार चढाव का पूरा आभास मिल चुका था । पहले कुछ पत्रों में शिखर भाई ने लिखा था राज तेरी भाभी बहुत सुन्दर संस्कृत और सुशील है । किस से मिलती हैं ऐसी पत्नियां? सच इस का साथ पाकर लगता है निजी जिन्दगी पूरन हो गई फिर बीच के कुछ पत्रों में शिखर भाई ने बडी सतर्क भाषा में लिखा था जिंदगी अब सब दल पर आकर सब ठीक चल रहा है । शुक्ल पक्ष में सागर में ज्वार आता हूँ, कृष्णपक्ष आती आती जवाहर घाटी में बदल चाहता हूँ । शायद दो महीने पहले मेरे शेखर भाई के इस पत्र कुछ चौंका । क्या उसमें उन्होंने अपने अंतर की था और असंतुष्टि को अपरोक्ष रूप में प्रकट कर ही दिया था । उन्होंने ये कहा था हूँ राज्य में वहाँ क्या होता है? ये महीने अब जाना है, यह हुआ है जहाँ अपना सर्वस्व दांव पर लग जाता है । जो चीज जाता है उसका क्या कहना? पर जीतने वाला तो एक होता है हाथ में माने यानी होती है हूँ एक फॅमिली जो आज जीतता है ना कल उसकी हार निश्चित । मैं बुरी तरह से उखडकर रह गया था इस पत्र को पढकर क्या शेखर भाई इतनी जल्दी? हाँ । फिर आगे उन्होंने लिखा था ऍम शायद तो इन बातों को अभी नहीं समझे । मैंने तो यही देखती है तो इस सबका कोई गलत मत लगा लेना नहीं किसी और को ये पत्र देना समझा हूँ पर मैं शेखर भाई के विश्वास की रक्षा न करता है । तीनों मेरी हमरा मैंने उसे पत्र दिखाया । शायद शेखर भाई को उसने कोई आपत्ती नहीं होती । शायद वो चाहती थी मम्मी पापा उस पत्र को नदी तीनो बाहर से इस पत्र को पड रही थी । शायद नहीं, अभी नहीं झगडा हो गया है । मैंने अपने विचार प्रकट किए । राज्य इस पत्र में जो बातचीत ही है तो इतनी सर नहीं हूँ । ऍम भैया की व्यथा का स्रोत रोज मर्रा होने वाली छोटी मोटी अर्थहीन बात ही नहीं हो सकती है । मुझे लगता है भैया भाभी का प्यार धनवान पर आ गया है । तुम कहना क्या चाहती हूँ यही कि प्रारंभ में हम लोग लैला मजनू शीरी पर हाथ की राॅकी नकल करती हूँ । नहीं नहीं मुझे एक शेर याद आ रहा है तो सुनाओ जब तक ना हम मिले थे जुदाई का था मारा है अब ये मलान है की तमन्ना तीन हम ठीक कह रही हूँ ना लाॅरी पर हार ही था रोमियो जूलिएट अमर प्रेमी इनमें किसी भी जोडी की शादी हो जाती है और से शादी के बाद यदि वे वैसा ही प्रेम कामयाब रख पाती था । बात होती है विवाह के बाद प्रेम को जीवित रखती में क्या परेशानी हो? जिंदगी की नंगी वास्तविकताओं से टकराकर सारी शायद और कोमल भावनाएं चूर चूर हो जाती है । फिर तो खाने के मैन्यू या साडी को लेकर फौरन रह युद्ध शुरू हो जाता है । हाँ ऐसा ही होता है ऍम प्यार और प्रेमदेव सफल होने के लिए संतुलन और समरसता अत्यंत आवश्यक है । अधिकांश व्यक्ति शुरू शुरू में लैला मजनू टाइप प्याज करेंगे तो दैनिक जीवन में उतनी गहराई को कायम रखना नामुमकिन और शायद उनकी कह रही होगी हूँ तो क्या शेखर भाई और वहाँ भी का प्यार थी । इस छोटी सी अवधि में ढलवान पर आ गया है । मेरे मन में सुखदर्शन भी हो गयी नहीं हूँ । कल सुबह शेखर भाई के यहाँ जाना ही चाहिए । जो भी होगा उसका सामना करूंगा । पर शेखर भाई से मिलकर मेरे भविष्य की कौन सी रूपरेखा का निर्माण होगा तो पता नहीं वहाँ भी कैसा व्यवहार करेंगे आप? शेखर घाई उनकी व्यवहार में कर्मी इसमें हैं और आत्मीयता होगी । चाहे जैसी भी उनकी मनोदशा मुझे देखकर फूल की तरह खेल जाएंगे । मीडिया कश्मीर का आगमन से वह चौक पे वो लपक कर प्रेमपूर्वक मुझे कल से लगा देंगे । मुझे जोर से भेजेंगे । हर इतना जोर से की शायद मेरी चीख निकल जाए । ये शेखर भाई की आदत है । मुझ से कहीं ज्यादा बलेश ते हैं । शक्तिशाली भुजाओं में भरकर हर छोटे बडे की चीज निकाल देना उनकी होती है । अक्सर विवाह से पूर्व तो मुझे इसी तरह खींचते थे । तभी एक दिन मैंने उनसे मजाक में कहा था शेखर भाई बडी बुरी आदत पड गई है आपकी अगर ये हॉबीज याद हो रही तो देख लेना, भावी जाना आपको तलाक दे देंगे । शेखर भाई फंस पर फिर मेरे गाल पर चुटकी काटकर बोली अबे कर रहे ऐसे गर्म और मजबूत आलिंगन में बंद कर घुलने और पिछले के लिए तरस आती हैं । कुछ भी हो मुझे शेखर भाई के इस बात पर कभी विश्वास नहीं हुआ बल्कि मुझे उसका उल्टा ही अनुभव हो । मैंने शेखर भाई की फिलॉस्पी को विंडो के उपर आजमाना चाहता हूँ । उन्होंने मुझे किया । उसने कहा ये नए नए आइडियाज कहाँ से लाते हैं? क्या कॅश भरत मिलाप के बाद शेखर भाई मुझे बिठाएंगे । फिर वो भाभी को आवाज देंगे । अरे सुनती हो तुम्हारा लक्ष्मण देवर आया है जरा बाहर तो आप उसके लिए एक प्याली कॉफी तो लिया कॉफी तो उसकी उपपत्नी हैं, था भी आएंगे । बडी प्रेम से परिचय होगा में भावी से छेडछाड करूंगा । तब वो शर्म से लाल हो जाएंगे तो वो मुझ पर बिगडेंगे नाराज होंगे । फिर तीस ओवर में कहेंगे अभी कर रहे पांच दिन हो गये नैनीताल आएगा, अरब शकल दिखा रहा है । अब नहीं जाना है तो होटल में क्यों रुका? अब पांच दिन बाद आया है तो भी सामान उठाकर नहीं लाये । चल बात लेकर आसामान होटल का बिल चुका कराना । कुछ पैसों की जरूरत हो तो ले जाते हैं से बाहर भी से परिचय कराने की बात शेखर भाई करेंगे । अनीता आप वल दर्जे के नाम आ रहे हैं इन बिहार में फेल हो गए तो घर से भाग खडे हुए है ना आपके देवर न्यूजियम की किसी अजायब घर में रखने लायक मुझे लगा किसी ने मेरे तरफ से को कॉलेज सीट कप चाय पीती भी चार टूट के शायद मेरा नाम था हल्की हल्की हवा कछु की नहीं शायद मेरे दरवाजे से टकराया था किसी ने हाल ऐसी थपथपायेंगे नहीं ये कोरा भ्रम नहीं नहीं ये हवा का झोंका जरूर कोई फिर तीन रात कहीं हो सकता है । पल भर के लिए भयभीत होंगे मम्मी पापा शेखर या फिर होटल की मालकिन फॅस । डॉक्टर खाना हो गया । सोच नहीं लगा हूँ नहीं कहाँ दरवाजे में छेद होता नहीं छांटकर वहाँ ठीक ही था कि कौन है मान क्षणों का पहुँच सकता हूँ क्या मैंने भाॅति भगवान से थोडा सा खोलकर मैंने पढा था । मेरी आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा । एक अव्यक्त भय के कारण मेरे शरीर में एक छुट्टी हुई थी । अंधेरी जाते हैं कसमसाता सन्नाठा वर्ष भेजी पत्थर आकाश में चमकती बीच गंभीर आवाज ऍम ही थी सर मामी काम का पार्टी इसके साथ साथ आज की वर्ष खेलती हूँ । मेरे कमरे के बाहर बरामदे नहीं शाम वाली वही रहे । इससे महीना भट्टी की तरह उसकी जलती ऍम तथा सारे चाहे मैं हूँ, लेकिन कर्तव्य भी मोर सा खडा है कुछ भी सोच पाने में असमर्थ यहाँ के सियासी इसे कैसे मालूम हुआ कि मैं स्कूटर में इस कमरे में ठहरा हूँ । कहेंगे मुझे किसी मुसीबत में फंसा नहीं तो नहीं आई । अच्छा रहता है । फॅमिली साहनुभूति प्रदर्शित करते हैं तो वहाँ फिर खडी थी मेरी समझ में नहीं आ रहा हूँ कि वह जीवित नारी थी या किसी अभी सब प्रीत चाय तुम हाँ हाँ, तो चक्की सीरीज फिर आप क्या हूँ? इस समय अच्छा यहाँ कुछ प्रश्न मेरे ऍम तो मेरी पडोसी हूँ । जी नहीं, थोडी सहज हुई है फॅमिली की मैंने साहस जुटाकर पूछे तो पच्चीस दिसंबर में आप तीन अंदर जाएगी । नहीं, ठीक है, वहाँ पहुंच सकती है । आप की तबीयत ठीक नहीं लगती है । आपको सर्दी लग रही है । इस तरह को कुछ नहीं हुआ कि कुछ फॅमिली सूरी मैंने तुम्हारी नींद में खाॅ जी नहीं क्या मतलब साढे ग्यारह से ऊपर हो गए हैं । घर में सो नहीं पा रहा? नहीं नहीं नहीं नहीं आती कि तो तुम्हारे पास होगी क्या मीन की कोई मेरे मुँह की गोली है वो मानसी खडी नहीं मैं एक टैक्सी देखता हूँ जल्दी जीवन कर रहे हैं इससे मेरी सामने संकट नहीं पर हम घूमने समय लालिमायुक्त शून्य स्वस्थ रह रंग से भरे शरीर के एॅफ अमरत्व भर एक्शन सिटी मेरी चेतन जैसी लोग होते हैं ठीक है सारी जहाँ छटपटाती उसी का हम तेजी से अपनी कमरे भी चली थी कॅश और पलंग पर आपन उसकी हम लेवॅल हिस्से नही मकडी के चली नष्ट हो चुकी थी नहीं हो सकती है चाइनीस इच्छा और सोने का आप करना चाहती हूँ फिर मुझे नींद नहीं आएगी नैनीताल आने की थान पहली बार मेरे मन में पश्चिम था की फॅमिली अंतर में एक विचित्र सी नीली रोशनी का सेना कुमार क्या इस तरह से भागकर मैंने अच्छा किया? ऍम नहीं तुम्हारी भूल क्यूँ अंदर ही अंदर किसी ने कुछ भागना मूर्खता ॅ ऐसी परिस्थितियों में और चारा ही था मैं फेल हुआ माँ का असंगत मेहमान तो तब तेल होने पर लोग आत्महत्या कर लेते हैं जो होती हैं जिनमें बाद एक और भावात्मक परिपक्वता नहीं होती । नहीं ऐसा करती हूँ तो ऐसे नहीं हो रहा है । फिर मैं क्या करता हूँ असफल होने वाली व्यक्ति को चाहिए कि वह सफलताओं का कारणों की विवेचना करें । प्रयत्न करें । पहले वाली है सफलताओं के कारणों से बच्चे देखे तो कैसे सफल नहीं होता हूँ । मुस्कुराती ईरान तक ठीक ही तो कह रहा था भर्ती से कौन सी समस्या हल हो जाती है? लोग हैं जो सफल होने के बावजूद प्रयास नहीं जुडे रहते हैं । फिर सफलता एक दिन उनकी कदम चूमने लगती है । शायद सबसे अधिक उपन्न भर मुझे तीनो से ही मिलेगा नहीं नहीं नहीं नहीं चलो हाॅट तुम जैसे कहा हर इंसान को मैं अपने जीवन का आधार कैसे बना सकती हूँ । बस मेरे पास एक ही उत्तर होगा नहीं तो मुझे क्षमा करूँ । गलती करना इंसान का काम हैं । हम इंसान से गलती होती है पर एक सफल और मोर फिफ्टी में सिर्फ यही अंतर होता है । सफल और बुद्धिमान व्यक्ति एक गलती को कभी नहीं हो रहा था । जबकि मोर व्यक्ति एक ही गलती को बार पांच दोहराता तो दिया गई बिना पूछे ही कुछ नहीं ऍम होगा और वह हस्ते हस्ते दोहरी हो जाएगी ।

Part 8

शेखर भाई के कॉर्टेज तक पहुंचते पहुंचते मैं पूरी तरह से हम माफी पर पसीने की बूंदें साॅस ये परेशन ईको तो खडी पहाडी चल रहा है ये नहीं कि कहीं रिस्ता नहीं हूँ क्योंकि पता ही गलत हो गया तो मैं क्या करूँ? शेखर भाई घर पर मिले या नहीं मिले नहीं उठाती को लेकर वहाँ चले गए हूँ । चाचा जी ने वर्षों पहले ही है । कॉटेज खरीदी थी ही नहीं । नहीं बनाने का सहयोगी नहीं बना में पहली पारी हूँ वो भी इंडिया । चित्र परिस्थिति हूँ पूरी बनाई पर भी खडी नहीं देखा हो रही थी रात को जो फैन्स किया था किसी के अनुसार साढे पांच बजे उठ बैठ सुनीन ठीक से नहीं सिर भारी भारी हो रहा हूँ । उनकी सारे शरीर पर एक भूत सौ पडा हुआ था । मैं बिना चाहिए तैयार होकर सीधा चल पडा तो विश्वास था की शेखर भाई की यहाँ पहुंचती ही गर्म गर्म चाहिए । कॉफी पीने को मिलेगी । चटपटी मजेदार पाती हंसी कहता हूँ कि पटाखे फूटेंगे तेज करने की क्या तो मेरी जल्दी आने का एक होता है जी शेखर भाई और भाभी के कॉलेज के समय के बारे में कुछ मालूम नहीं था । नहीं सोचा था डेढ होने पर दोनों कहीं कॉलेज रवाना नहीं मुझे तो उसे शाम तक की गई पडे नोटिस की ओर बढते हुए मैंने पलट कर रहे नहीं होती लेनी चीन यानी जैसी लग रही थी भरा के पानी हरी रन का में ही हो रहा है सूरज उसकी कहानी लाने का प्रतिबंध हरी पानी पर पढ रहा हूँ नहीं शेखर की कॉलेज की बहुत पहुंच गया उनकी नींद रेट वहाँ लगी थी मुझे पांच का संतोष की पता ठीक हमें रास्ते में भेंट का नहीं ऍम तक पहुंचकर में खेला था जैसी में काफी जल्दी आ गया ऍम बाकि एक दम से इंसान से पडेंगे । नैनीताल की सुबह चंद्र आधी बातें छोड चुके थे आकाश नियुक्ति सूरज किया हूँ हूँ ब्लॅक तो क्या आप शेखर भाई और भाभी अभी तक सोई पडी कहीं ऐसा तो नहीं की वो नैनीताल से बाहर हूँ । फॅमिली मुख्यद्वार पर स्माॅल कहीं दिखाई नहीं होना शेखर भाई सोई पडेगी नहीं वो हमेशा ये किताबों की की दे रहे हैं अच्छा हैं कल रात तक पडती रहे होंगे क्या करेंगे सभी मुझे कराना है कि कॉटेज की पिछवाडे जाकर देखिए कही शेखर भाई उधर मांगवानी न कर रही हूँ उन्हें फूलों से लगा है ऍम पिछवाडे पहुंच मेरा अनुमान सही नहीं मखमली घास काॅल्स पडी थी बीच में उस पर स्टेनलेस स्टील का तीसरे रखा था । पहले बहुत सूरत सिटी कोनसी चढी थी शेखर भाई कुर्सी पर चुपचाप कम सबसे पहले नहीं एक तमक उनकी पीठ मेरी ओर थी । तेजी से आगे बढाना सीटी बजाता हुआ शेखर भाई के ठीक सामने जाता हूँ । अरे राजू तो! बस शेखर भाई ने इतना हीं ऍम आपको तटस्थता की मूर्ति से लग रही थी मैं उनकी उठने और मुझे आलिंगनबद्ध करने की प्रतीक्षा के बीच बीडी आशा निराशा में बदल गया क्या मैं शेखर भाई ने शांत सामने पडी कुर्सी की ओर इशारा करते हुए हूँ मैं सेहत क्या? शेखर भाई को क्या हो गया है? कैसा अजनबीपन भरा है उनके आंखों में? क्या वो मुझसे नाराज मैं कुछ भी निर्णय नहीं कर पा रहा था । डाॅन उनके सामने पडी कोई नहीं कर दिया हूँ, समझ भी नहीं था ये वास्तविकता है या मैं स्वाॅट एक और भाई मुझे लगा मुझसे नहीं अपने आप से पूछ रही ऍसे उनकी ओर देखा भीषण परिवर्तन आ गया था । शेखर भाई हूँ यहाँ ऍम चलता नहीं जाने कहाँ कपूर की तरह नहीं वहाँ पर हमेशा छाई रहने वाले इसमें ही की स्निग्धता का पता नहीं कैसे उदासीनता की गहरी करता भरी ऍम शेखर भाई के संपूर्ण व्यक्तित्व पर उल्लास का चुनाव शा चाह रहा था । उसकी जगह एक नाम निष्क्रिय ऍम शेखर खाई का ये है भयावह रूपांतरण कैसी हो गया? इस समय तो कहाँ से आ रहा ऍम दिल्ली से कब आया? चार पाँच दिन हो गए इतने वर्षों बाद भी मिलने पर शेखर भाई के व्यवहार में एक ढक्कन की हुई है । क्या उनके पास घर से कोई सूचना नहीं? क्या उसी के कारण ऍम या फिर तो यहाँ का नहीं? क्या शेखर थाई ता बगल कहीं तो फिर तो मेरे पास नैनीताल बनाने की इतनी गर्म निमंत्रण क्यों भेजते रहे? इस तरह बिना सूचना दिए ही अचानक कैसे आगे शेखर भाई की निगाहें पास ही तैयारी में होंगे? फूलों फॅमिली मैंने कोई उत्तर नहीं दिया । मैं बहुत यूज किया था इसका था की शेखर भाई के पास मेरे घर से भारती की कोई सूचना नहीं, कई के सिख सकते हैं । जब घर वालों ने अखबार तक में विज्ञापन देती हूँ तो क्या नाते रिश्तेदारों को सूचित नहीं किया होगा? फिर क्या शेखर भाई ने अखबार में भी मेरे बारे में नहीं पर ऍम चलो दो चार दिन और नैनीताल नहीं चाहिए । यदि शेखर ढाई को मेरे बारे में सब कुछ पता होता हूँ तो मुझे डांट फटकार थे और पहली बस से दिल्ली के लिए रवाना करती नहीं चाहती हूँ । शेखर घाई नहीं कहा और फैली हुई टांगों को सिकोडकर तो मेरे लिए चाय बनाने लगी थी । कोनसी हटाते ही स्टील की केटली तब तब करने लगी चाहे काॅरीडोर बढाते हुए उन्होंने पूछा कहाँ ॅ होटल किस नहीं? मैंने होटल का नाम बता दिया आपने गलती चाहे की पहली पकडकर मैं सोचती लगा । इंसान कितनी जल्दी रन करना था, कितनी स्वास्थ्य और ग्रुप हो गए हैं । शेखर फॅमिली इतनी भी शराब पर शेष नहीं रहेंगे कि कम से कम औपचारिकता के नाते ही पूछते थे कि घर होते हुए भी तुम होटल में क्यों ढूँढ रही हूँ । यहाँ आई तो सामान क्यों नहीं उठा ले । आज तीन नैनीताल नहीं रहे हो । राज कष्ट फैला रही हूँ । तनी चाय का खून था, चारों देखती लगाओ माहौल में एक अजीब सी वीरानी ऍम साल अच्छा पैसा था । मुझे महसूस हो रहा था कि कुछ जरूर अघटित घट गया है । इसका क्या भाभी मायके चली गई? हो सकता है इसी कारण शेखर भाई ही बैठी हूँ । अभी कहाँ है? मैंने कुछ सकता पूर्व पूछे एक घर खाई ने एक्शन के लिए मेरी ओर ऐसी सोनी अर्धशहरी नाम नहीं था । हाँ सीखा का जैसे कोई अत्यंत ही अप्रत्याशित । यह दुखद समाचार सुनने वाली हूँ । फिर ऍम सो रही हो रही है तो फिर इतना निराश नहीं की क्या बात है मैं एक सांसद के फिर मैं पाँच छे भाई के मुख परछाई तटस्थ था और ज्यादा हो गई । टी कोनसी को हाथ लेकर मैं उस पार कर ही रंग बिरंगे फूलों को निहारती रही । ऍम मैंने गंभीरता, उदासी और आप चार एकता का फोर ऍम । जब शेखर भाई हमारे साथ दिल्ली रहते थे, तब हम दोनों के बीच एक मान समझौता हुआ था । मुझे इसकी यहाँ करेंगे । दोनों ने एक साथ उदास ना होने का फैसला किया था । ये एक अट्ठाईस उदास होते तो मैं एकदम खुशनुमा में हमारे करता हूँ । यदि मैं होता तो शेखर भाई के विहार में खुलासा था । इस तरह आशारानी, राजमा सुख दुख के बीच संतुलन हो जाता हूँ और जिंदगी आंख मिचौली कि खेल बन जाती हूँ । मैं ग्लास भरकर पूरा हूँ । लेकर भाई, ये क्या मोहर्रमी शकल बना रखी है तो भाई शेखर खाई नहीं जैसे कुछ सुना ही नहीं । वो ठीक उसी को बोलते बोलते रहे हो नहीं खाते हुए घर पे तो सब ठीक है ना? अल्का कैसे हैं? पांच दिन पहले सब ठीक थे ऍम शेखर भाई ने अपनी दोनों टांगे तिपाई पर सिर्फ पीछे कुर्सी पर टिका करेंगे तो अधिक मंडी आंखों से सामने लगे घने वृक्षों की फुनगियों को देखती रहेगी । क्या बात है? शेखर भाई एक में क्या हो गया है? मैं खुल नहीं लगा था । अंकल आंटी अच्छे हैं । अभी तक आप की बहने की आदत नहीं गई । शेखर भाई हम कह रहे हैं खेती की आप सुना रहे हैं कल्याण की शेखर भाई कुछ नहीं बोलेंगे । उन्होंने आंखों को खोला और मेरी ओर ता का मुझे लगा सृष्टी में चल रहा है ऍम हूँ शेखर भाई ये क्या मॉर्डन, अमूर्त काला जैसी शक्ल बना रखी है । आप इतने दिनों बाद मिले हैं फिर बिना कोई बातचीत, न कुछ हंसी दिल्लगी ना भावी जी के दर्शन ही कराए हैं । अभी तक उनके ना होने पर अगर आप इतनी परेशान हैं तो मैं नहीं जहाँ पर लाता हूँ । शेखर भाई जैसे घटा उन्होंने काम अपने को खींच लिया भी रहा अकडकर बच्चे रुकने का संकेत करते हुए पुलिस रहनी थी क्यों बेकार में उसे डिस्टर्ब करने से क्या फायदा? क्या भाभी रात भर अखंडपाठ करती रही हैं क्या? जो इतना दिन चढाने परसो रही नहीं तो क्या वहाँ भी वो सिटी देर तक सोती रहती है? नहीं राजकीय बातें उसी कल ठीक से नहीं नहीं ऍम कल की रात के सीमन होती जितनी प्राणी ठीक से नहीं हो पाएगी । मैंने साहस जुटाकर पूछे । आपकी होते भावी क्यों नहीं हो पाई? उसकी तबीयत ठीक नहीं है । क्या हो, क्या शुरू हो गई हैं? पूछ कर में मुस्कुराती शेखर भाई प्रस्तर मूर्ति जैसी शांत तो मेरा अनुमान से ही हैं नहीं । फिर उसी माइग्रेन की शिकायत नहीं । लॉटरी सिर्फ एक पर शुरू हुआ तो तीन चार दिन के लिए अनीता को चौपट कर देता है । रहस्य का उद्घाटन हो चुका था तो शेखर खाई की उदासी का कारण बाहर ही की बीमारी है । मैंने सहज होते हुए कहा शेखर भाई, जिंदगी में ये सब चलता ही रहता है । फिर इसमें इतना उदास होने की क्या बात है? शेखर भाई कुछ नहीं एक तक स्कूलों की तैयारी को देखते थे । कुछ देर तक हम दोनों चुपचाप बैठे रहे । बच्चों का शोर पड गया । हवा की खून की देखी होगी । चाइना पी के पीछे पूरा सूरज पकडा गया था । जहाँ हो गई थी फांसी चीज दिखाई दे देगी चमकीली रोशनी झील के ऊपर छा गई है । चटकीली रुपए लिए हो मुझे वहाँ भी को देखने के उताबले हो रही भाजपा दरवाजे की होती था । मैं उत्सुकतापूर्वक उस क्षण की प्रतीक्षा कर रहा था जब वोट कर बाहर नहीं हमें उन्हें थी कुछ तो वो झेल समता बना हल्का करेंगे । मैं वहाँ भी को देखने की उत्कंठा को दबा पाने में असमर्थ समय सोच कर रहा हूँ देने का शेखर भाई मैं अंदर जाकर भावी को देखा हूँ । नहीं रहा इस ट्रक होने पर वो घट जाती हैं । मैं खुद उखड गया । मैं शेखर भाई का इशारा समझ गया । शायद वो चाहते थे कि मैं उस समय चलना चाहिए । ठीक है मैं ऍम मैं उठ खडा हुआ और स्वर में तल्खी भरकर पूरा अच्छा शेखर भाई चलता हूँ । इतनी जल्दी जाम का फिर कब आएगा? जवाब लोगों को सूट करे तो राज का खाना हम लोगों के साथ भाषा में उस समय तक भावी जान चाहेंगे । कसमसाती से क्रांति छा गई थी शेखर भाई की वहाँ पर कुछ नहीं सिर्फ खडे होंगे । शायद मुझे कि तक छुडाने की औपचारिकता निभानी । मैं चल पडा, मेरे पीछे पीछे शेखर खाएंगे । पानी पलट कर देखा तो भीषण रूप से क्या हुआ? शिखर कुछ खास नहीं । फिर भी आप तो पूरी तरह से लंगडाकर चल रही है । ऍम क्या सच कुछ मैं कोई निर्णय नहीं करना चाहिए क्योंकि से बाहर आकर धनवान पगडंडी पर आ गया । शेखर भाई मुझे क्या तक छोड कर वापस चले गए? मैं पहलवान वाली पट्टी पर से संस्था सजा रहा था । मेरा मन शेखर भाई के पास था, ये आनी चाहिए । ऍम था कैसा? हम सोचा अंतर आया है । शेखर भाई की जिंदगी में इतना ऍम न रुकने के लिए कहा । ना खाने पीने का आग्रह होटल में ठहरा हूँ तो उनकी बल्ला से हाँ पीसी नहीं मिली थी कि सब क्या है? शेखर था है कि जिंदगी की वजह से है इसका कहाँ गई? क्या उनके और खाते के बीच की कि खान खडी हो गई । एक और आश्चर्य की बात हक्कानी शेखर भाई के पास मेरी भाई की कोई सूचना क्यों नहीं दी थी? क्या पापानि अवश्यंभावी से समझौता कर लिया? क्या उन्होंने फैसला कर लिया है? गया तो जाने दो । मेरा मांॅग ज्यादा चिंतित हूं । मैं अपनी मनोदशा की तुलना शेखर भाई की स्थिति से काॅफी शेखर घाई का असंगत बेहवास नहीं, नहीं कुछ भी नहीं समझता है । सिर्फ नीचे और नीचे उतरता चल रहा था मुझे नीचे झील के पास पहुंच करें । बात का ऐसा किसी घर आई हूँ कहीं वो केवल संतुलित में हमारा ही तो नहीं एजेंसी से इंसान बडा होता है वो गंभीर होता चला जाता है इसका बचपना छिछला पर और निरर्थक हास परिहास का स्थान कभी तली नहीं लगती है कहीं में गंभीरता को उधर हसी तो नहीं समझता था हो सकता है शेखर भाई किशन संयंत्र हमार को मेरी मनोदशा नी से ही रूपी देखिये आंखों पर काला चश्मा लगा तो चटकीली धूप की मेल पड जाती है ।

Part 9

होटल लौट आया हूँ एक विशालकाय प्रश्न आजकल की भांति ऍम प्रवेश ऍम थी शेखर भाई को अपने भविष्य का आधार मानने की भारी गलती का ऐसा मैं हूँ । अपने दरवाजे पर लगे ताले को खोलते समय मेरी नसल पडोस वाले कमरे के दरवाजे पर पडी । उसकी ताला लगा था ही महिला नहीं चाहिए । नहीं दरवाजा खोलकर मैं अंदर कमरे में हूँ । ऍम था मुझे लगा जैसे मैं किसी भी लाना तो भरे तो खाने में कैद हो गया मैं आराम ऍम माथा पकडकर ऍम मुझे सुबह की एक बार क्या नहीं शेखर भाई के हम जाने के लिए जैसे ही मैं अपने कमरे से बाहर निकलो, मेरी ने कहा पडोस की कमरे के दरवाजे पर पर बहुत खुला था अनचाहे ऍम वो यंत्रवत कमरे के अंदर चला गया । शायद मुझे होते ही मालूम था कि मैं वहाँ क्यों गया था । पलंग कर ली थी । यहाँ नहीं उसका कोई प्रभावी कैसी? कम्बल को कलॅर शायद थी । मेरे आने को कोई महत्व नहीं दिया हूँ । इसके लिए मुझे बैठने तक के लिए नहीं कहा । उस की तरह ही नहीं ऍम सहमा सकता हूँ मैं कहाँ फॅमिली ऍम कमरे में आने की आवश्यकता ऍम बच्चे अपने आने के अच्छे को स्पष्ट करना था किसी ऍसे क्षमा मांगने आया हूँ । किस बात कर लूँ उसे बिना मेरी तरफ देखिये पूछा रात मैं आपकी सेवा नाॅक ऐसी तो मैं आपको गोली नहीं दे सकता हूँ कुछ लगता है आपने मुझे क्षमा नहीं किया इस बात की वो मूॅग तरफ नहीं गिरते । मेरी और खुलकर नहीं हूँ । होने का ही नहीं चाहिए ऐसा क्या था कि मैं ठीक हूँ भी खडा था मुझे लगा उसकी निगाहें कह रही है यहाँ पर ये बनी की बाते करते हूँ उनसे मिलने का कोई अच्छा ठोस ऍम काफी सोच के चार करके मैंने पूछा हूँ तब आप की तबीयत कैसी है? ठीक है फिर ऍम यदि आपको मेरी किसी सेवा की आवश्यकता हूँ तो नहीं संकोच कहती हूँ फंसा से कोई सामान मामन फॅमिली आपकी नौकरानी दिखाई नहीं थी ही नहीं गए हैं क्या उसी चुकी हूँ उसके आक्रोशपूर्ण मान के सामने ऍम ट्रक रहेगी ऐसे ऍम मैंने बातों का सिलसिला आगे बढाते हुए भास्कर नैनीताल का मौसम एकदम गीला और पूरे हो गया हूँ ऍम लगभग सारा नैनीताल खाली हो चला है । आप कब तक रहेंगे हूँ हूँ क्या सच में बीमारी ऍम मान ही रही उसे फिर मेरी और ऍम भारी भारी पलकों को उठाकर उसने मुझे आंध्र नहीं हूँ । आप किसी अच्छे डॉक्टर से अपना चेकअप कर रही हूँ । अगर आप कहीं तो एक बात करूँ उसे काफी देर बाद अपना मान थोडा नहीं पूरा तो नहीं । मैं हूँ ही नहीं । उसकी आंखों में खेला ऍम इस समय अगर आप मुझे अकेला छोड दूँ, आपकी बडी करता हूँ पी सकता था एक अपराध और खेल भावना से मेरा मन भर बे कहा मैंने उसके अंधेरे पाँच कमरे में घुसती । अनाधिकार चीजे अपनानी हाँ छोडकर जमा मानता हूँ मैं कमरे से बाहर अब उस की कमी नहीं । ताला लगा है तो कहाँ चली गई थी । चित्र में ही है । मुझे बडा अकेलापन महसूस हो रहा था । ये लग रहा था कि पहले से ज्यादा फाॅर्स सुना क्या? अभी तो सुबह की सिर्फ दस बजे थी । एक नहीं दिन की सिर्फ शुरुआत थी । हालांकि नहीं शेखर भाई के पास हुआ था । समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूँ । पिछले दिनों ऍम का चप्पा चप्पा मिल गया था । दस बार नाॅट तो पिक्चर भी देख चुका था चाइना भी चलने की मेरे अंदर कीमती अब अकेला जाऊंगी तो कहा करूँगी तो इन दिनों में पहली बार मुझे लगा की जिंदगी टिकन पहुँचता है । मैं कैसी ऍम, क्या जिसमें संस्था तो फॅमिली हम कुर्सी के सामने पडी ऍम नया अकेला ही पेशंस आज खेलते खेलते मुझे तीनों की हत्या था तो मेरे पास यहाँ होती है । अवचेतन मन में रात को सैनिक द्वारा कराया जाने वाला होगी । तो बताइए तीनों के साथ होने पर क्या मेरे स्थान सरकारी नहीं चाहती । तभी किसी ने मेरे कमरे का करवा सकता था । बिजली किसी गति से मेरे मन नहीं सोचा यहाँ जरूर तो सुबह की आपने ठंडे व्यहवार के लिए छम्मा नहीं क्या मैं करा सकता हूँ । नहीं नहीं रही हूँ एक परिचित से सचिन दरवाजे के पास फिट के खडी थी खडा हूँ औपचारिकतावश में बोला आई कश्मीर चाहिए हूँ उन्होंने ऍम मैंने गौर से नहीं देखा हूँ रहा हूँ और कपडों से तो भत्र व्यक्ति कुछ फॅमिली घर से लग रहे थे । नहीं मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ । मैं उस परिचित व्यक्ति के आगमन से काम किया था । क्षमा कीजिए मैं आपकी खेल में देखना डाल रहा हूँ । जी नहीं, ऐसी कोई बात नहीं । मैं तो बस ईवी समय काटने के लिए मेरा मतलब है तो लगता है अकेले ही ऍम मैं क्या आखिर ये व्यक्ति मुझे इतनी रूचि क्यों ले रहा हूँ? तो पल भर के लिए मान हुआ तो मैंने कहा कश्मीर रखी अच्छा ठीक है । धन्यवाद खडा ही था । फिर भी कुछ सोच विचारकर बोला आपको कुछ पता है कि ये है कहाँ गई कौन चाहे मंदा की नहीं ऍम मैं ये नाम सुनकर चौकिया आप की पडोसन वो खर्चा चाहिए । मैं उनसे मिलने आया था, पर कमरा बंद है । ताला लगा है । सोचा आप से कुछ की मुझे मालूम नहीं है । कहाँ गई तुम कर्वे स्तंभित सक है । उसके मुख पर विषाद और खेत की भावनाएँ स्पष्ट रूप से उठी हुई थी नहीं । जैसे अपने आप से ही पूछ रहा था, उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करेंगे । मेरे सामने रात पढते के पीछे से आने वाली आवाजों का रहस्य उद्घाटन हो चुका था तो यहीं है मधुर महाशय मन्दाकिनी जी के पति और इन दोनों को विभाजित करने वाले हैं । कोई साथ नहीं । मेरा मन कटुता से भर नहीं । मेन मेन महाशय के प्रति जो आदर और सम्मान उपजत हूँ । कपूर की तरह मुझे दूसरी नारी की खातिर अपनी पत्नी को यूज छोडने नहीं श्रद्धा का पात्र नहीं सकता । मन में कृष्णा मैं एक तक उस की होती है । आपको कोई आपत्ति तो नहीं? इस आकस्मि प्रश्न को सुनकर में चौंकिये ऍम मैं आप का मतलब नहीं समझा । क्या मैं थोडी देर आपके कमरे में ठहरकर मन्दाकिनी की प्रतीक्षा कर सकता हूँ? मैं ऍम अब बैठना चाहूँगा । शॅल अच्छा धन्यवाद वो कुर्सी पर आराम से बैठ गया । मैं भी दूसरी कुर्सी कर पहले खेली खेलना क्या? मैं तो यही टाइम पास कर रहा हूँ अकेले खेलने में मन नहीं लगता तो मेरे साथ जैसी आपकी मजबूती फॅमिली गा मुझे फॅमिली नहीं कमाल है तो क्या जानती है जमीन नहीं सही, कितने रुपये हुआ नहीं बिना स्टेट के खेलना जमता नहीं ऍम के खेल जमा लेता हूँ । धमान है मुझे मधुर बाबू बडे ही विचित्र व्यक्ति लगे होता । शूट है उनको उलट पुलट कर देखा और सुना उनके मुख की आकृति में पल भर के लिए खिंचावाई फिर वही शेख रही । संभागीय ताशों को बांटते से पहले वह पूरे क्योंकि हम लोगों को कुछ देर साथ रहना है । क्यों ना आपस परिचय कर ली मुझे पी । पी । मल्होत्रा कहती स्टाॅल पूरी तरह चौंकिए पीएम व्यक्ति मन्दाकिनी का पति यानी नहीं तो फिर ये मन्दाकिनी का कर लगता है । उससे मिलने क्यों है? मंदाकिनी की रहस् से रोमांस से भरी कहानी पर फिर सुरज करेंगे फिर पूरी तरह से होना चाहिए । क्या यह व्यक्ति रहे हैं जिसकी वजह से मंदाकिनी और मधुर के बीच तीन खडी हो गई । दिल्ली में मेरा एक रेस्टोरेंट अच्छा चलता है तो नहीं निकाल नहीं रही थी, नहीं तो फिर दिल्ली से आया हूँ । मान सरोवर में कह रहा हूँ और आप के लिए नहीं अच्छा । मैं भी दिल्ली से आया हूँ पर आपको दिल्ली में कभी देखा नहीं । मिस्टर मल्होत्रा ने व्यंग्य पहले गर्मी का दिल्ली कोई छोटा मोटा गांव नहीं मिस्टर जहाँ हर आदमी एक दूसरे को जानता हूँ । फिर भी कभी कभी ऐसा लगता है कि धजी छोडिये भी । आज तो वो जमाना आ गया है कि एक ही छत के नीचे रहने वाले इंसान एक दूसरे के लिए अजनबी बने रहते हैं । मेरी समझ में एक बात नहीं है क्या ये उसकी पीटी एक साधारण का मैंने बातों का सिलसिला आगे बढाते देगा । फिर भी एक ही शहर के लोग कहीं दूर बाहर मिल जाएंगे तो थोडी बहुत आत्मीयता और निकटता तो महसूस होने लगती है । अच्छा हाँ जी कैसी बातें करते हैं । नहीं गलत है । फिर छोडिए इन बात हूँ आप अपने बारे में भी कुछ बताइए ना तो मुझे राज कहते हैं । तीन ऍम धन्यवाद दिल्ली से आई । जी अकेले हैं अकेले ही कैसे पल भर के लिए मैं समझा ऍम पिछली सी थी ये व्यक्ति मेरे बारे में इतनी गहराई से क्यों जानना चाहता हूँ ये रहस्यमय व्यक्ति इनाम की लालच भी तो मेरे पास नहीं है । क्या सोचने लग गया कुछ नहीं मेरा मंदिर आपके चेहरे पर बेहद परेशानी और निराशाजनक रही ऐसी कोई बात नहीं । आप ऐसा ही होता है । मिस्टर अकेला इंसान ऐसा ही होता है मिस्टर मल्होत्रा नहीं था उनके होठों पर एक की हंसी भी कर के मैंने गौर से उनकी आंखों में जाकर खेला था वहाँ पर शायद ही का घनीभूत तीरा का एक टुकडा ऍम मिस्टर मल्होत्रा नहीं कुछ देर तक हम चुप चाप हमें खेलते । एक बार मेरे पास बहुत अच्छी बात है । दो पत्ते फेंक के बाद मैं शोक कहती की स्थिति में आ गया कि अचानक मिस्टर मल्होत्रा नहीं, अपने पति और तीसरी से उठ के कमरे से बाहर चले । मैं बहुत चक्कर आ रही है । पर अगले ही छानबीन लौट की निराशा भरे स्वर में बोले मैं समझा था, लौट रही हैं तो क्या? वो नहीं नहीं मेरा फॅमिली आइये ना मिस्टर मल्होत्रा ने कलाई पर बन्दे खडे थे और तटस्थ प्रभाव से बोल साढे ग्यारह बज रही अब चलूंगा इतनी जल्दी बस इतनी प्रतीक्षा कभी शाम को आएगा ना आपसे मिलकर सच पूछ बडी खुशी हुई देखी कोशिश करूंगा कोशिश नहीं वायदा कीजिए ऍम क्यों? लोगों का खयाल है कि मैं अपने वादे भूल जाता हूँ । पीछे मिस्टर मलहोत्रा को छोडने बरामदे तक आएगा की चमकीली धूप दिखे थे । ठंडी हवा चल रही थी जैसे ही मिस्टर मल्होत्रा ने हाथ जोडकर चीनी की तरफ कदम बढाए की मैंने कहा पिस्टर मल्होत्रा अगर आप पुराना माने तो एक बात पूछनी ऍम मिस्टर मल्होत्रा से साफ साफ उनके और मंदाकिनी के संबंधों के विषय में पूछ लूँ चाहे वो इसे शालीनता की सीमाओं का उल्लंघन ऍम प्रश्न सुनकर मिस्टर मल्होत्रा ठिठकी उनकी मुखमुद्रा गंभीर आंखों में बरसाती आकाश सी फॅमिली फिर वर्ष भी के लिए स्वाॅट इस समय अगर अपना ही पूछे ऍम इतना कहकर तेजी से फॅमिली उस प्रश्न पूछने के लिए अपनी बदलना और मिस्टर मल्होत्रा की दूरदर्शिता कि प्रशंसक मेरी आंखों में तरल सा को हसा भर क्या मैं आजकल कमरे में आके दरवाजा बंद करके मैं पलंग पर शाॅल मिस्टर मलहोत्रा नहीं हूँ कि सुना था उनका और मंदाकिनी करके रिश्ता है ऍम

Part 10

मैं जिंदगी के रेशमी मकड जाल में फंसकर अवश्य साफ किया । बाहर पांच घर लौट की सोचने लगा तभी जैसे कोई अंतर ऍम यदि उसी तरह खाली हाथ लौटना तो कैसे भागी क्योंकि ठीक तरह मैं क्या करूँ? नहीं तो इस चक्र में घुस किया पर समझ नहीं आता क्योंकि मैं पलंग पर पडा था । हुआ सोचता हूँ, दुख रहा हूँ । मुझे तरह तरह की अहसास हो रहे थे । हर ऐसा मुझे काम करता था । मुझे महसूस हो क्या? चारों तरफ ऊंचे मुझे बीच बीच में लगता है बडे इसे प्याले में पानी भर दिया है । हफ्ते हर अकेले सैलानी को उस पीठ होती है तभी मेरी कमरे का करवा सकते । तीनों ने अंदर झांककर देखा फिर वही दरवाजे पर खडे होकर उसके थी । मिस भी पूछा खाना हो ऍम तीनों अंदर हो कितनी मच गई हूँ तो पहले का एक बच्चा है । मुझे भूख नहीं लगी । ऍफ का समय हो चुका था इसलिए दिनों अपने कर्तव्य का निर्वाह कर दिया । ऍम तो मुझे नहीं रुक नहीं तो खाली हो । मैंने कहा ना मुझे भूख नहीं खाली पेट गडबड हो जाती है । नहीं कुछ नहीं कुछ हल्का ले लीजिए । कहीं तो फॅस तीनों की आग्रह भरी आत्मीयता के सामने मेरा प्रतिवाद ऍम भी चुका हूँ । मेरी मॉम को स्वीकृति मानकर तीनो चला गया रवित होगी शुरू से इस पहले ने मुझे प्रभावित किया था इतना हूँ हर समय सेवा करने को प्रस्तुत ऍम पूछ आई तथा माॅस्को पानी के पास पडी हुई इस पर रखा तो खुद वर्षभर पहले फिर कुछ फॅमिली हूँ । चाय बना तो थोडा ऍम मैं चुप चाप अगले कुछ चाय तक वैसे बैठा रहा जैसे कोई बिकी हुई थी । फिर वहाँ छोडकर पहुंॅच करूँ हूँ इस नरक से छुटकारा दिलाती थी मैं जिंदगी भर आपका एहसान मानूँगा यहाँ तो मैं ऐसी क्या परेशानी हूँ? बाल बच्चे भूखा मर रहे हैं कैसी घर वाले पांच बच्चों को लेकर अल्मोडा रहती है । यहाँ की तरफ में छह प्राणियों को दो वक्त की रोटी नसीब हो सकती है तो में मालकिन सॅान्ग बढाने के लिए कहा तो हिम्मत नहीं पडेगा ऐसा क्या पैसा बढाने की बात करते हैं । हम नौकरी से निकालते कि ये क्यों हुजुर उधर पहाडों में बडी गरीबी, बेकारी और भुखमरी हैं में आज ही नौकरी छोड दूँ तो कल उसे और भी कम रुपयों में आदमी मिल जाएगा । ऍम तीनों की समस्या का क्या समाधान हो सकता है हूँ हूँ दिल्ली में कोई नौकरी दिलवा दीजिए तो काम बन जाएगा । दिल्ली में तुम रह सको के दिन क्यों नहीं? हमारे गांव के बहुत सारे आदमी है वो पर वहाँ मकान परसों मैं कहना कि बहुत दिक्कत होती है, महंगाई भी बहुत है वहाँ कुछ भी हो तो मुझे एक मौका दे दी । तुम परेशान हो जाओगे हूँ किस मेरे से तो अच्छा ही होगा ना वहाँ ऍम इंसान इस होटल को भाॅति क्योंकि चाय बना हूँ अभी नहीं फॅस । हारकर मैंने तीनों से पूछने का फैसला करेंगे ऍम तथा हूँ । पूछे तो बार बार इस जगह को नरक क्यों कह रही हूँ । जिस जगह घूमने आए हूँ गंदगी हो दुःख हो ही रही हूँ धोखाधडी हूँ फुजूल वही ना रखें ने तीनों की इस दार्शनिकता से पूरी तरह सहमत नहीं तो ये सारी पाती इतने बताऊँ क्या इस होटल में होती है तो इसका मतलब हैं इस होटल के साथ आज कहानियां भी जुडी हुई है । इस बार तीनों कुछ भी हो थोडा सा साॅस सोच रहा हूँ काम उसी साडी पाती करना ठीक होगा ये नहीं तो जवाब नहीं दिया हूँ । आप क्या कर रही हो तुम यहाँ पैसे कम मिलते हैं वहाँ तक ठीक है । करीब के अलावा भी कोई शिकायत हैं बताएँ कुछ किसी को कानोकान खबर नहीं होनी चाहिए । ॅ और कमरे का दरवाजा अंदर से बंद कर रहा हूँ की मेरी पलंग के साथ सटकर फर्श पर बैठकर हूँ । कुछ सोचता हूँ ऍम चाहे तो भी पानी हो जाएगा तो बताना खाना पीना तो चलता रहेगा हूँ । ये होटल की मालकिन देखे है ना । हाँ हाँ मैंने पिछले दिनों में कोई तीन चार बार मैंने उसे देखा था जबकि नीचे टाइमिंग खाने मैंने खाना ऍम आपकी आकर्षक व्यक्तित्व है । इसका पहाडी तो करते ही नहीं कि गोरी जगह कोर्से मुख पर एक विचित्र ऐसा कैसा रहेंगे वेद होने के बाद जो उसकी बक रहे खाएँ । हर समय पितरो हिस्सा करती रहे नहीं उसका शरीर एकदम भरा भरा सा । मैंने कई बार उसकी वजन का अनुमान लगाया । अस्सी से पचासी किलोग्राम सिंह कम किसी हालत में नहीं हूँ । मुझे उनकी तीन किसी बेहद अच्छी लगी की तो गोल चमकीली पॉलिसियाँ तो सब लोग कट ब्लाउस से झांकते । उसके गोरे गोरे बच्चों की मां साल का का संधीर था । तीसरी उसकी पीठ के नीचे कमर के दोनों ओर हाँ चलता कि दो गहरी वे बडी चुस्ती फुर्ती से बहनों को वाटर देनी और बिल काट नहीं । पिछले दिनों गौर से देखा तो मैं सोचता हूँ की पी । सी । डी । साथ ही नहीं कितनी दिखाई देती । कमाल की आना था भरे पूरा होटल के लिए चला रही हैं ये कौन सा काम कमाल की बात है । दीनों मुस्कराहट दिए हैं तो हम क्या है वो जो होटल तो चलाती है उसके अलावा और जो कुछ करती है उसको आप सुनेंगे तो हैरान रह जाएंगे । वो क्या करती है? युवा घर चलाती है वो कहाँ है? मैंने तो देखा नहीं है तो बेसमेंट में हैं, होटलों में जुआघर होते हैं इसमें कौनसी अनोखी बात ऍम दे के साथ उपलब्ध है तो क्या हुआ हूँ वहाँ शराब का दौर चलता है सबको तो इसमें कम से खास बात हुई हूँ वहाँ वो शराब का गैरकानूनी गंदा करती है हूँ करने दे तो जैसे क्या है मुझे तो इन सब से कुछ नहीं साहब उपहार में जाए जो जी में आये करें मुझे क्या काम करती है तो क्या करती हूँ मेरे पीछे हाथ धोकर पडी है वो तो कामचोरी करता हूँ । अरे जो इंसान अपना काम ईमानदारी और मेहनत से नहीं करता उसका मालिक उससे क्या कुछ भी नहीं कहेगा । मालिक कैसे खुश रह सकता है? तीनों हस्ती एक ऐसी चीज ले हंसी मुझसे कह रही है तो धूप हूँ अधकचरे नौजवान बिना मुझसे पूछे ऍम कितनी चीनी डालो साहब ऍम कितनी होगी तो मैं तो तीनों की बातों के रहस्य में अच्छा हुआ था उसकी भी कोई चिंता नहीं तो हम आॅटाे ठंडी हो चुकी थी मैं कट कट करके उसे दो ही घूंट में भी तीनों नहीं थे उठाए और पलंग के नीचे रहेंगे खा पडे सीधे हैं मुझे मुझे लगा तीनों कह रहा है हम पढे थे मैं तमतमाकर मैं उसे लगता नहीं वाला था क्यों मुस्कुराता हूँ ही मैं स्वाॅट नहीं समझे आप फॅमिली अंतर में पिछले से कम है । पल भर में सब कुछ स्पष्ट करियर स्थिति बडी ही स्वाभाविक तथा असंगत लगी । इतनी बडी और अच्छे होटल की मालकी पहले किसान मन में विश्वास जम नहीं रहा था । मैंने वहाँ से दिनों की होती है । शारीरिक रूप से फॅमिली उसकी शारीरिक शक्ति को देखती हूँ । पूछूं हीटर के मारे नहीं नहीं आती । इस बार मेरा मन जैसे हर काॅमन मुस्कुराती पूछा उसी मालूम है कि तुम पांच बच्चों के बात हो । जी हाँ मुझे तीस पर भी प्रोत्साहक उसे ये भी तो मालूम है कि मैं उनका कोई बात नहीं वो कैसे हूँ ये आ रहे मेरे बडे भाई की बीवी उन्हीं से उसके पांच बच्चे हुए हैं । फिर एक ढाई को बांध उठा रहे । क्या ऐसी वो जंगल में लकडी काटे गए थे । फिर उन का कुछ पता नहीं चला जाएगा । फिर हमारे गांव के रीति रिवाज के अनुसार मुझे उससे शादी करनी पडेगी । तुम्हारे कोई बच्चा नहीं हुआ । नहीं हो जाएगा नेपाल भारत को सोच में डूब गया जैसे कोहरा छंट गया । फॅसा हुआ बोला ऍम जिंदगी में ऐसे भी माँ की कमाते हैं माँ लेकिन उसे कुछ नहीं तो भी मैं लेकिन को कुछ करती । मैं तेरी पहुंॅच तेरी पगार बढा देगी क्या बात कर रहे हैं, ऐसा ही गलत कह रहा हूँ । ऍम खोर हैं तो कहना क्या चाहता हूँ? हाँ, पहले वाला बैरा आराम से नैनीझील की गहराई में सो रहा है क्या? क्या मुझे और ये खून चुस्ती है? गन्ने का रस निकाल कर दी जाती है । फिर शूज को बेरहमी से फेंक देती थी । समझा नहीं जूझ जैसे ही तालुकों पर से पर्दा हटा है, वह उस इंसान को गुंडों से मरवाकर झील में फिंकवा देती हैं । हूँ सचमुच में सारे शरीर में झूठ नहीं । यहाँ भी बताइए वो जो ये नरक है की नहीं तो मुझे दिल्ली ले चलिए, मैं जिंदगी भर आपकी सेवा करूँगा तो हमारे घर पर काम करो । फिर किसी से कुछ हूँ । कितने पैसे लोगे जो हुजूर देंगे मैं खुशी खुशी से ले लूंगा । ठीक है कल तक तो मैं बता दूँ देखिए हूँ ना मत कीजिएगा तीनों नीचे से हमारा सही फॅस कैसा हुआ? तीनों ट्राॅफी तीखे साहब ये बातें किसी को बताना चाहिए वरना मैं मौत हमारा जाऊँ काम निश्चिंत रहो । तीनों चला गया । घर में एक विश्वस्त नौकर की आवश्यकता थी हूँ । मैंने दीनों को घर ले जाने का फैसला कर दिया । अभी नहीं नहीं मेरी कमरे ऍम क्या हाथ बढाकर में पलंग से नीचे उतर रहा है ।

Part 11

दरबान सीकर मन्दाकिनी जी कहिए चाहे क्या मैं अंदर आ सकती हूँ कमरे में सितार की मथुरावासी आई पंद्रह कश्मीर रखें मैं सकपकाया सक्रियता अपनी तो आराम कुर्सी पे थे अनढके पक्ष को साढे खींचकर बैठकर उन्होंने एक दीर्घ निश्वास अच्छा की हरी स्माॅल तुम्हें मैं अच्छा हूँ चलो मेरे सामने वाली कुर्सी पर बैठे ही समझ भी नहीं आ रहा था कि वह मेरे पास क्यों नहीं सुबह तो मेरे कमरे में आई थी ऍम नहीं । ऐसी ही अच्छा बाद में मैंने सोचा कि मुझे ऐसे नहीं जाना चाहिए । ठीक है पर मुझे भी अफसोस आपको क्यूँ? मैंने आपके साथ काफी रोक हमें हमारा क्या नहीं नहीं ऐसी कोई बात नहीं है । कुछ कयामत की थी । मेरे ख्याल से उसको पहुंचाएंगे जी, मैंने तो उसको माइंड नहीं किया करते हैं । आप की तबीयत कैसी? क्यों मेरी तबीयत को क्या मुझे लगा था? क्या बीमारी है? नहीं तू मैं काम नहीं देंगे । फिर उन्होंने गहरी संस्कृत, एक दम स्वस्थ नॉर्मल होने की भूमिका जैसी कल रात को मैं अपना बाकि पूरे निकल पाए । मैं साहसी नहीं जुटा पाए । तेजी दौर खबरें हुआ एक तक उनकी होती है और भले और आश्चर्य की मिलीजुली अनुभूति से ओतप्रोत कल रात को क्या हुआ उन्होंने अधिकारपूर्ण स्पॅाट आपको नींद की गोली की जरूरत थी ना तो क्या हुआ मैंने सोचा जरूरत से ज्यादा सोचना भी बीमारी है हूँ मैं लचित हो गया ऐसा कौन सा इंसान है जिसको कभी का बाहर नेत्रविहीन रात ना बितानी पडती थी । नींद ना आए तो इसका मतलब ये तो नहीं खराब वर्ष में भीड भी तो गए थे । तो क्या मैं कांग्रेस की तरह करके अरब जानबूजकर? क्योंकि नहीं मंदाकिनी जी ने मेरी तरफ फूटकर दिखा फिर मुस्कराकर पूरी हम काफी होशियार होती । याद नहीं कैसे जाना? मैंने साहस छोटा करूँ आज तुमने खाने की हडताल क्यों करती है? मैंने नोट किया । मन्दाकिनी जी मेरे नुकीले प्रश्न से साफ बचकर नहीं कर दिया । उन्होंने प्रसन्न हूँ कहाँ नहीं तू तो क्या फॅमिली थी ये सब आपको कैसे पता चला अभी दिनों से हूँ । लगता है तुम सुबह की बात का फरामान के जी नहीं तब तो ऐसा ही है । आप फिर अविश्वास करेंगे नहीं नहीं । फिर क्या है कोई खास बात तो नहीं । किसका क्या कह रही हूँ ठीक अजीत पंद्रह पंद्रह हादसा मोहाली फन किया था, अकेली क्या करती हूँ? बस यही बोर होता रहता हूँ । कभी पलंग पर पडा रहता हूँ या फिर बाहर निरुद्देश्य घूमने निकल जाता हूँ तुम कैसी की वहाँ? मन्दाकिनी नहीं जी ने अपनी ठीक ही नहीं मुझे ठीक रहती है । पूरी तरह से था पल भर के लिए मैं चौंका फिर कुछ नर्वस था हुआ ही संभाल के हूँ या क्या कह रही है? निशांत ऍम हो सकता है मैं नहीं कर लेती हूँ किसी गलती । मैंने एक बार में एक विज्ञापन देख उसकी छुट्टी फोटो हो तुम से भी लेती थी । सिर्फ इतना ही फर्क । इस फोटो वाली लडकी की तैयारी नहीं थी । पल भर की नहीं हिचका थे शीघ्र ही मैंने मन ही मन फैसला करती है । स्वयं आरोपित इस मान मास कर रहे ऍम दाकिनी जी को नहीं पता था कई बार गर्म हो जाता है ना ऍम हो सकता है अक्सर किसी को देख कर ऐसा लगता है मानो उसे हम पहले भी कहीं देख चुके हैं । किसका शायद तुम की कहती हूँ पर मेरी समझ में नहीं आती । क्या लोग कैसे भर्ती की हुई? नहीं क्या उतरती हूँ? यदि प्रश्न का उत्तर मेरे पास होता तो मैं घर से खुद क्यों था? क्या उनकी पास अपनी समस्या सुलझाने के लिए कोई और रास्ता नहीं? क्या ये हठधर्मी क्या ऐसे लोग कायल होते हैं? क्या उनका दृष्टिकोण एकांगी होता है । अभी दूसरी की दृष्टिकोण को समझता ही नहीं चाहती । मंदाकिनी जी बोलिए चली जा रही । मुझे लग रहा था जैसे वो मुझसे नहीं अपने आपसे ये ऍम प्रश्न पूछे जा रहे हैं । मुझे थोडी सी असुविधा और फॅमिली प्रसंग को बताना चाहता हूँ । इसलिए मैंने का अब चाहिए काफी कुछ देंगी । बंदा के नीचे मांॅ अच्छी थी । कॅश सबकुछ पता चला था । उसी बोली मैंने पहले ही कहा था तो काफी होशियार मालूम होती हैं । इस प्रशंसा के लिए धन्यवाद आपने मेरे प्रश्न का उत्तर नहीं थी कि समय कुछ भी लेने की छनी क्यों? अभी कुछ दिन पहले ही टोमॅटो दिया है । कॉफी भी पी अच्छा अचानक मुझे मिस्टर मल्होत्रा किया था । मन्दाकिनी जी को सोचे तो कर देना चाहिए कि वो उनसे मिलने आई थी । आपका कमरा बंद था हूँ । आप कहीं गई थी क्या आपकी बीजेपी ऍफ से मिलने आई थी । कांथि कोई मिस्टर मनोहर थी । मल्होत्रा मंदाकिनी जी के मुख पर भी चित्र से हूँ । फिर मैं उलझती हुई से बोलिए नहीं तो किसी मल्होत्रा को नहीं जानती । वो तो को खूब अच्छी तरह से जानते हैं । अच्छा मांॅ मैं तो आपकी काफी देर तक प्रतीक्षा करते रहेंगे । मेरी प्रतीक्षा कहाँ? मेरी कम नहीं है कि तीन दिन बैठिए यही कोई घंटे डेढ घंटे की घंटी ये चीज थी । आदमी काफी दिलचस्प, हसमुख और होशियार लगे तुम मिस्टर मल्होत्रा ऍम करती रहेगी । काश खेलती नहीं हम दोनों किस के साथ जमीन ली थी उन्होंने हाँ पर आपको कैसे पता चला हूँ? समय के साथ साथ अनुमान लगाने की कला ही जाती है । कहकर मन्दाकिनी सहित चर्चा दैनिक और से मंदाकिनी जी की होते हैं । उनके मुख पर अब पहली बार ना कि चाहती हूँ । उस वक्त सी लग रही थी निकलेगा । उन्होंने मिस्टर मल्होत्रा की पहले को सुलझा लिया है । मिस्र मल्होत्रा खूब अच्छे ही खेल लेते हैं । मैंने कहा कांजी तक अच्छा इसलिए मल्होत्रा और कितना तो हार हार होती हैं उसे? मैं आप से क्या फायदा? तो नहीं तो नहीं । कई बार बहुत अच्छे पति है । शो मेरी होनी थी, पर एक पति की प्रतीक्षा करते करते हार गया । शो होते होते रहे । चाहता हूँ कई बार हाथ फर्स्ट क्लास पत्ती होने पर भी ऐसी हानि हाँ शायद ठीक कह रही हूँ । आजकल तो ये ही जीते हैं जिनके हाथ में अविश्वास, संदेह, निर्ममता खेलना अन्याय के होते हैं । क्या कह रही हैं ऍम मन्दाकिनी जी के भयावह हताश अनिक मूड की आतंकी टाइमिंग टूटता चाहिए किसका अंजानी में ऐसी बात करके जिसका तरह तक लगाया जा सकता है फिर वो घबरा करता हूँ । फिर उन्होंने दोनों हाथों को हवा में फेंक कर वे अगर समझता से प्रकट करती हूँ मेरा वो मतलब नहीं था । मैं कहना चाहती थी कि हम मेरी समझ में नहीं आता है कि मैं अपने आप को कैसे स्पेशल करूँ । मैं समझ गया क्या यही है कि आज इंसान प्रेम, शराफत, नम्रता, विश्वास गया और सहानुभूति के पत्तों को हाथ में पकडे हुए हो । क्यों ठीक समझा ना? शायद पर बंदा की नहीं थी उनकी यह हार वास्तविक हार नहीं एक शाॅल मन्दाकिनी जी कुछ फिर संतुष्ट सीधे पूरी पर गंदे पर तो मानों कि जी तो उसकी होती है ना? जी नहीं ये चीज तो वास्तव में हार है करी है जिंदगी इतनी आसान चीज नहीं जितना तुम समझते हो । फॅमिली सिंदगी से टीवी रखती हूँ कि तुम किसी हारे हुए जुआरी से पूछा मुझे तो लगता है आपकी एक में है कई बार क्या हाल है आप ही बताइए मंदा की नहीं जी कुछ उदास हूँ की मुझे लगा वो अतीत की गर्त कुमार भरी करी होंगी तक नहीं ऍम को देखता हूँ हार को दोहराना बडी ही कष्ट प्रक्रिया है हम उसे रहने नहीं फिर आप आंटी भी उसका बोझ हल्का हो जाता है खुशी बांटने से बढ जाती है सिंदगी की पेस्ट ऍम अस होती है तो मैं कैसे तीस ऍम ये सब मेरी समझ से बाहर की बात है खाजपुरा एक वर्ष हो गया है उसका मेरी मुक्ति की कामना के काम पर मेरे पति ने अपनी स्वीकृति की सी लगती है ऍम ट्रेन चाहिए थी मनचाही बंधनों का चूना टूट फॅस उस छलना महीने मेरे प्रति बच्चे छीन हूँ मंदिर की नहीं थी अपनी संपत्ति सी स्मृतियों को क्रम से याद कर रही हूँ करने कल की सुनी बातों से इसका क्रम्प बैठा था । एक बात स्पष्ट हो चुकी थी मंदाकिनी परित्याग क्या और उनकी उनकी पति के बीच की विभाजक नहीं खाना है । एक नहीं जो अनाधिकार खींचता द्वारा दूसरों की जगह हथिया लेते हैं, उन पर विश्वास करना मोड करता है । ये खतरे से खाली नहीं पर शायद आपकी कह रही है । टूटने के बाद दो स्थिति आती है थाना पनकी जुडे रहे या फिर खंड खंड ऍम तो अगर यहाँ मेरे मुख से नहीं मेरी समझ में नहीं आता । मैं कहा बीच की स्थिति हैं भी जुडी हूँ अच्छी टक्कर फिक्सिंग अजीब परेशानी नहीं हूँ ऍम मन्दाकिनी जी की आंखें हो गई और उनका स्वर्ण फल आया हुआ है तेरी आंखों के सामने रहस्य की सारी पडते उठे ऐसी नारी गिरिजाघर के बस सीमेंट के बीच ठंडी पहंचकर नहीं क्या करें सिंघासन खैनी नारी की यही भी उठ खडी हूँ मुझे आपसे पूरी सही होती है मैं भी खडा हो गया आप सारी कॅश मुझे मेरा मतलब है मैं किसी की सहानुभूति की मोहताज नहीं उत्तेजित होकर पूरी शीघ्र ही संभव है फॅमिली एक छपा करो था क्या की हूँ न जाने किस ऍम हूँ आप मुझ पर भरोसा कर सकते हैं कि उस विश्वास की रक्षा करते हैं यह करो तेजी से कमरे से बाहर निकल के मैं कमरे में अकेला नहीं ही है । फॅमिली कितना कुछ तो माॅर्डन पर आकर बढाना, जिंदगी भी कैसी एम यूज पहली ऍम नहीं बाहर ऍम पहाडों पर रुपये प्रेक्षकों की फुनगियों से धोनी जैसे काले बात है नीचे वो कर रहे हैं ऐसी खुश हूँ पतली भरी तो कह रहे थे तीनो स्कूटर की पिछली सीट पर लम्बा रास्ता स्ट्रेंस की मेरी बगल में हाॅट मुझे बडी होती होगी । उस दिन सुबह से ही आकाश में बादल चाहिए लडकी थी थोडी थोडी बूंदाबांदी हो रही है हवा में मस्ती घर ही उनकी कहीं मैं कॉलेज पहुंचता था तीनो कॉलेज के गेट करी खडे थे मुझे देखकर ऍम ऊपर आकाश की ओर उठाया और ऍम मौसम है फॅमिली मैडम उदाहरण देना हो तो सही देना चाहिए ईद की लाइन कुछ इस तरह है मौसम है प्याज की एक ही बात है ना तीनों फिर भी कहाँ चलना है हूँ फिर ये है तो नहीं पूछेगी कहाँ चले तो बता दूँ सितारों से आगे जहाँ पीना कम होगी फिर मुझे छिडकती हुई बोली आज पडे रोमेंटिक हो रही हूँ ये मौसम से तुम्हारा पिकनिक पर चलाने का प्रस्ताव मैं तो फॅमिली हुआ हूँ और कोई हो तो कभी बन जाता है । अब तक बच्ची किए जाओ की या कहीं जाने का फैसला भी करोगे हूँ बट करले चली सुना है बडी खूबसूरत जगह है तो काफी दूर है पर जाना है कोई पैदल थोडी चलना है फिर भी खरीद ज्यादा दूर नहीं है कब तक लौट आएंगे हूँ हम लोग राॅकी उन्होंने मुझे कसकर पकडा जिसके संपूर्ण शरीर दस पर निर्भर चुनी । सुखद अनुभूति हुई हुई था राज स्कूटर थोडा टीमा कर लो ना नीनू नहीं मेरी और समिता कर मेरे काम था क्यों डर लग रहा है क्या? नहीं तो फिर सोचती हूँ ये रास्ता कहीं जल्दी नहीं हूँ । मैंने अपना सीधा हाथ पीछे क्या और तीनों का हत्था ऍन अपना हाथ छोडा गया और ऍम स्कूटर पर मत फरमाएंगे । मैं स्कूटर चलता है । कुछ देर तक मान छाया रहा हूँ सडक पर बहुत ट्रैफिक था काली काली पर क्या नीचे चुकी आ रही थी । किसी भी समय वर्ष हो सकती है । तुम चुप हो गए उन्होंने मेरे पीठ पर चुटकी काटकर अच्छा हैं । नहीं तो तो सोच रही हूँ था क्या यही की हनीमून मनाने कहाँ जायेंगे? ऍम इसमें जस्टिन की क्या बात है? तुम्हारे ऍम से ही थी । इसलिए मैंने कौन सी मीनू में मेरी फॅमिली नाम पहले पढाई खत्म कीजिए । हो जाए नौकरी लगाई, फिर हनीमून के सपने देखना शुरू कीजिए नहीं पर फिर चुके हैं । शायद उन्होंने ठीक ही कहा था हम लोग बट कल एक पहुंच गए । मैंने स्कूटर स्टैंड पर रखा । अंदर काफी भीड भाड । पीले कहाँ है? इधर तो दिखाई नहीं देती । उन्होंने पूछा उस ऊंची दीवार बांध के उस पार बोल नहीं सकते हैं हमारे पास खडी एक नहीं होती ने मुस्कराकर बीवी को उन्होंने एक दूसरे का हाथ पकड तेजी से बांध की सीढियां ऊपर एक लिस्ट बना हम लोगों पर पहुंचे तो दूर तक पर्वतों के बीच भी एक चीन दिखेंगे कितना सुंदर दृश्य ऍम हम दोनों बांध पर एक स्थान टाॅक तू तक सीमित जलराशि बिक्री पडेंगे अनायास बहुत हल्की बूंदाबांदी होनी मैं सडक है जैसे नमक राज एकता पूछूँ । पूछा साहस है तब ही नहीं होगा तो तुम से उधार ले लूंगा क्या? सच मुझे तुम उससे प्यार करती हूँ । पता नहीं क्या कहूँ तीनो पूरी तरह चाहते हैं तीनों प्यार कोई वस्तु नहीं जिसे शब्दों के माध्यम से अभिव्यक्त प्रिया सिद्ध किया जा सके । यह तो एक अहसास होता है किसी से किया जा सकता है हूँ मैंने काम ना की तुम्हारी कामना मेरी कामना कोई आधारभूत अंतर नहीं हूँ तीनों ने एक बडा सकंदर उठाते फिर में था ऍम पानी के दायरे खींचते ऍम फिर मेरी कंधे पर अपनी फॅमिली मैं ना जाने कौन से हम लोग नहीं होगी । हाँ,

Part 12

खुली तो देखा चारों तरफ गांॅधी रा फैल गया है । आपने उठा बत्तीस चलाते ही कमरा हल्के नीले प्रकाश से भर गया । मैंने उन मनसा होकर घडी की ओर देखा । सवा छे बच रहे थे । हवा चलती चलती बंद हो गई थी । कमरे में उमस घुटन भर गई थी । मेरे चारों ओर एक शून्य सी दृष्टि से हो गई थी । मैं चमकीले तीन में सोया था । अंधेरी शाम नहीं चाहता था । नहीं हुए कपडे बच्चे प्रश्न था शेखर है कि हम चाहूँगा नहीं । उन्हें तो बिरयानी नहाने के बारे में कुछ खास सबका होगी हूँ । पर मेरे अंदर अनीता भाभी को देखती थी । अदम्य लालसा थी । शेखर भाई में आश्चर्यजनक परिवर्तन के रहे सीखे । किसी सूत्र को पकडने की कामना हूँ । दवा नहीं आ रहा था पर अभी तो बहुत चलती थी । ये खाने पर बुलाया गया था । अभी दो घंटे की देरी थी । मैंने अपनी निर्णय को कुछ देर के लिए हूँ । विभाग भी करलिया हूँ । मैंने अपने मुंह पर हाथ फेरा तो बडा विजिट कर लग गया । गाडी काफी पड गई थी । मैंने कल सुबह से साफ कर देने का फैसला कर लिया । कोई मुझे पहचानी तो चाहती हैं तो कोई खूनी या अपराधी तो नहीं है । आकाश कहना काॅपर को हँसी में खुले पागल नहीं थी । वातावरण् तब था पर वह तथ्य वर्ष से आने से पूर्व की नहीं थी । मिशेला का वर्ष नहीं अचानक हवा चलने लगी । ठंडी हवा मेरे कलेजे में चुकी तो मैंने कोर्ट की दोनों को आलस घरे करेंगे । एक सिगरेट सुलझानी और ऍम हा जमा कर नीचे उतर के लगा । मुझे लगा शायद चलने से उतर नाम काफी मुश्किल का, खास तौर पर पहाडी ऍम ठीक है मेरी जान धीमी पडती मैं कुछ भूल गया था मेरे मन में पश्चताप पगडंडी पर उतरते समय मैं रिचा घर के बाहर सीमेंट की बेंच की होती हो गया था इसकी हूँ । शायद मेरे अंतर्मन में यह फैसला हो चुका था कि मंदाकिनी अब वह नहीं बैठेगी । अब उस की क्या जरूरत है तो सुनी बेंच की ओर देखकर कैसा रखेंगे हूँ सच कोई एक रोमांचकारी अनूप होती हूँ ऍम धीरे धीरे पट्टन कि पच्चास ठीक था, गिरिजाघर तक पहुंचती पहुंचती मैं लगभग हफ्ते लगा हूँ मेरी चेतना को एक्सबॅाक्स हिंदी की सारी की समूह ऍम हैं । अच्छा अच्छा आखिर मन्दाकिनी चीनी उस पेंच को क्यूँ उतनी तीन लाख का समाधीस्थल बना रखा है । शायद आज वह अपनी समाप्त हो । मेरा अनुमान ऍम ये फैसला नहीं कर पा रहा था उसकी समझ नहीं । इतना ही नहीं क्या उसे पकडकर जोर से झुक छोडकर पूछूँ आखिरी सत्य है इसके लिए तुम टूटी तारीख जैसी भटक रही हूँ क्या कह रहे हो जो तुम अपनी दुख की सार्वजनिक प्रदर्शनी हर रोज लगती हूँ तुम्हें कुछ सुख शांति मिलती है कुछ चाँद तक में कोई फैसला नहीं कर पा रही हूँ कुछ दूरी पर था अंदर ही रहना सीधा का मैं साहस जुटाकर आगे ऍम के समीप पहुंचकर मैंने अपने आप को नहीं किया । अभी इस मतलब होनी चाहिए वैसे ही बैठी रही ऍम मैंने उसे तुम फाॅर्स मंदाकिनी आप इस समय यहाँ क्या कर रही है? ऍम समझे क्या वह की नहीं विचारों में खोई हुई हूँ मैं साहस जुटाकर आगे बढे और इसकी फॅमिली को पकडकर जब छोडने ही वाला था कि वो तमतमाकर जॅानी ऍम मेरी माँ ऍम प्रभानी लगी मुझे लगा में चक्कर खाकर किस जमकर तुम मुझे छोडने की हिम्मत कैसे ही पीछे सकता । अफसोस है तो हमारा किस्म की लडकी होती हूँ अच्छा मानता हूँ हाँ छोटी और पलट कर तेजी से तब ठंडी पर हूँ ऍम । मुझे उसके दो शब्द स्पष्ट सुनाई थी जिला का बेशक नहीं करा रहे खून से थे जो मेरी पीठ पर मारी थी । मैंने उन्हें संघर्ष स्वीकार कर दिए । गलती करने पर इंसान को दंड पीना ही चाहिए । मुझे भी तो गलती हुई थी । वो ही मंदाकिनी नहीं, अंधेरे मुझे था है कोई और परिचित नहीं आती । सिर्काडियन तक बात सीमित रही । करना तो मेरी पिटाई भी कर सकती थी या फिर बजे पुलिस के हवाले भी कर सकते हैं । अच्छा अच्छा का भाव लिए मैं नीचे उतर रहा है । उस परिचित से फैसला की पडी रील होश नहीं गोरी काम कमाई का और खाने पालों का होगा । अभी भी मेरी आंखों के सामने कह रही थी नीचे मान रोड पर आकार में काम की तीस तक झील के तट पर करीब क्यारियों में निरुद्देश्य घूम था । मुझे एक फॅमिली ने के लिए रेस्ट्रो में घुस गया । फॅमिली के अंदर और उनकी पहल करनी पानी के ऊपर टिकी हुई नहीं । उसी फॅमिली जाकर एक कोने की सीट पर लकडी की रेलिंग पर हो रखा है । उन पर होती है न जाने की थी । चीन की पानी नहीं हूँ, फॅमिली हूँ । वहाँ से हटा लिया ॅ गया था वो एक पहली पार्टी लिया है, पता नहीं था शिष्टाचार पर ऍम के कारण उसने पूछा कुछ खाने के लिए लेंगे सब नहीं बाॅल और उसमें शुगर कॅाफी झमत्से चलानी रखता हूँ । मैंने ऍम मिलाकर से छह सात कहती थी पानी के ऊपर ले ट्रॅाफी का ये ऍम फॅर मैं सोचने लगा इंसान की जिंदगी की एक उद्देश्यपूर्ण करती है किसी की नियुक्ति भैया करती दोनों ही ना इंसान क्या करेगा ऐसे ठीक था चलना चाहिए क्यूँ कहाँ किस ऍफ का दूसरा नाम क्या फिर ऐसी जिंदगी को गिरिजाघर की बाहर रहने की झाडियों कि समीर सीमेंट के बेंच पर समाधि लगाना ऍम एक फॅमिली है । यदि वह अपरिचित महिला अभी धारा चाहिए तो क्या शायद मुझे उठाकर ऍम तब नहीं क्या कर सकता है? मैं सचमुच भयभीत हो गया । मैंने जल्दी जल्दी प्रॉफिट तेल के पैसे चुकाकर रेस्ट रूम से बाहर निकलना है । साढे सात बज चुके थे । दैनि शेखर पढाई के हम जाने का फैसला कर दिया ऍम क्या अनीता भाभी के दर्शन हो सकेंगे? शेखर की जिंदगी के रूपांतरण का रहस्योद्घाटन चढाई बचा रहा चार में जीत मन में विचित्र सीईओ सारे तन मेरी विशेष फिर खाली नहीं शेखर का ही हूँ । उस स्टडी में बैठे कोई किताब पढ रही थी जी ठीक कर उन्होंने किताब को रख के फिर हम उस तरह और खडे हो गया । मुझे महसूस हुआ शेखर खाई नहीं जबरदस्ती मिक्स करने की कोशिश की । कोई इस नाटक भी बुरी तरह सफल रही । उन्होंने खुद ही है सिद्ध कर दिया है कि उनकी यह मुस्कान किसी आप ब्रांच शेखर भाई, पूरे और बैठ के मैं भी बैठ के मैंने चार हूँ हूँ बैंकों में किताबी भरी थी एक कोने में खुबसूरत ऍम रखा था उसका हल्का प्रकार स्टाॅपर हूँ क्या हाल ही फ्रांस शेखर भाई ने औपचारिकता निभाती ठीक है वो क्या किस तरह हूँ सारा दिन पढा रहे हैं पे चुप हो गए अब की बार मैंने पहले मैंने पूछा जब हम हो रही है शेखर भाई कुछ नहीं सिर्फ मुस्कराहट क्या बात है । भावी नजर नहीं आ रही अपनी किसी सहेली की बच्चे की वर्षगांठ भी नहीं । अकेले तो बस आती ही होगी यहाँ पे अक्सर अकेले ही मैं अपना वाक्य पूरा नहीं कर पा रहा हूँ । शेखर भाई ने ऐसी रहस्य में दृष्टि से मेरी ओर देखा हूँ कि मैं अपनी बाकी को पूरा करने का साहस नहीं जुटा पाता है तो कुछ नहीं बोले । पर उनकी सोनी धुंधली नहीं होंगे । एक अनुसूची समस्याएँ भी नहीं । साथ ही उस समस्या को सुलझा न पाने के कारण उत्पन्न समर्थता के चिन्ह हुई साफ ना चला नहीं थी धीरे नहीं मेरे सामने अस्पष्टता का कोकरा छुट्टी था शेखर भाई की समस्या का नंगा रूप मेरे सामने तो यहाँ ही वैवाहिक संबंध मृत्यु की पहले फॅार कदम रखता हूँ हूँ कहाँ संतुलन क्या शारीरिक संबंधों में? क्या फिर मान सिंह तथा भावात्मक टकराव ही या फिर रीमा धक्के से उत्पन्न ऍम पाॅड ये सब इतनी जल्दी कैसे हो गया? क्या पता हूँ मेरी खुद समझ में नहीं आता है । लगता है जैसे सब कुछ अपने आप सहज रूप से होता चला गया । बिल्कुल ऐसे ही जैसे वृक्षों की डालियों में पहले छोटी छोटी कोमल कोमल कोकली आती हैं फिर भी बढती हैं पत्ते बनती हैं भागे कुछ मैं कही शिखर है अंतिम स्थिति सूख काॅन् रोक सकता है इस प्रक्रिया हो शेखर भाई गलती किसी बिंदु पर पहुंच कर रहे हैं, हूँ तो मुझे नहीं हूँ । पता नहीं खाने की कभी कोशिश की आपने राज चुनाव इंसान की नियति इस चुनाव से बच करने का ना उसके बस के बाहर है वो मेरा विश्वास, धमकियाँ, शेखर खाई सावधानी या जानबूझकर रेंद्र की के एक गलत स्विच पर हाथ रखा या फिर शायद अनीता बाहर भी ही किसी किनौनी आकांक्षा से संचालित हो चुकी है शायद शेखर भाई और अनीता भाभी जो नहीं उसके लिए जो है वो नष्ट करती हूँ समस्या का या तो शेखर भाई को छुप जाएं या नेता भावी ही कुछ कदम लाॅट करिए उदासीनता उपेक्षा, निराशा कहाँ लेकर भटके की इन दोनों फॅमिली नहीं मैं ऍम शेखर भाई मैं सोचता हूँ जो इंसान दोषी व्यक्ति को प्रेम और सहानुभूति नहीं दे सका मैंने दोष व्यक्ति को कुछ नहीं पाता हूँ । खर इंसान अपने रूप में ही अपनी दुनिया का निर्माण के तहरा इन सारी दुनियाओं का कोई तो फॅार होगा ना शेखर भाई मैं सोनी ने कहा हॅूं भी चिंता मत में से पांव पसारे सिगरेट भी हैं कुछ पल ठहरकर पूरी मैं जानता हो रहा है जीवन का निर्वाह विनाश की प्रक्रिया द्वारा संभालती हूँ जिंदगी में सफलता नहीं अप्रत्याशित संकट ही अपवाद मात्र है टीम की आधारशिला ट्रेन ही नहीं तभी बाहर कॉटेज का गेट खुलने क्या हाँ शेखर का एक घबरा से बताओ सिकोडकर संभलकर बैठे हैं और संभलकर लगता है अनीता फॅमिली में भरकर लेकर खाए क्यों ठीक और उखडे स्वाॅट तो इसमें इतना का बनाने की क्या बात है? खुद नहीं जानता रहा है । पर इतना जरूर है या नेता के उपर स्थिति में मुझे लगता है जैसी में कोई तो उस वक्त देखा क्या ये अनीता भाभी की उपस् थिति का प्रभाव है ये तुम्हारी मानसिक कुंठा ऍम टाॅक करें नारे की मूर्ति ठिठककर होगी बडी बडी रोष होंगे तमतमाई घने बालों का बना ऍम मेरे सामने साहब का भीषण रूप से क्या मैं इस बुरी तरह घबरा गया की मुझे लगा तुम्हारी आकृति को देखकर चेतना शुरू

Part 13

प्रेम नारी असहाय से वहाँ खडी थी मुझे तक की नहीं उसके मुख पर कोई भाव था जाॅन ऍम शेखर भाई नहीं छुट्टी थोडी तो बोली अन्दर आवाज नहीं था । अनीता भाग्य हो गई । मैंने खडे होकर उनका अभिवादन करनी है । आप नहीं मेरे अभिवादन का उत्तर देने की जरूरत ही नहीं । आप समझे ना इससे परिचय करती हूँ । शेखर खाएँ अतीक आरॅन को छोडने की कोशिश कर रहे थे शायद हाँ एक दूसरे से परिचय नहीं । अनीता भाभी के होठों पर एक विद्रुप सी उसका नाम कराई । फिर उन्होंने अपना शांतिधारा उसे तहत करके कुर्सी पर लगता है हम लोग का मिले शेखर खाई नहीं चेहरे से भर कर पूछता हूँ यहीं से पूछ लेना पैसे हर क्या? तो गिरिजा घर के बाहर भी सीमेंट की बेंच पर आज शाम को ये अनीता भाभी ही बैठी थी । मैं शेखर ढाई को क्या पता था ऍम तो दोनों की मुलाकात कहाँ हूँ इससे पूर्व की मैं कुछ कहने का साहस जुटा था हूँ हूँ हूँ हूँ यही है राजभाषा है वहाँ । पर एक तरफ तुम कह रही थी की तो मैं किससे को जानती हूँ । अभी पूछ रही हूँ आखिर की चक्कर क्या हैं? शेखर पानी पूरी तरह हो तो यही महाशय जो घर से बिना कुछ कहे सुने भाग करे हुए । अनीता भावी नहीं फॅमिली का एक बात में भी होना चाहिए । सुबह शेखर भाई को तो कुछ पता नहीं था । फिर अनीता भाभी को कैसे पता चलेगा कि वे घर से भागकर नहीं निकाल आया हूँ । तो वहीं कैसे पता चला की वो दिल्ली से बात कराया है । शेखर भाई नहीं अनीता भावी से आश्चर्य पहुँच पूछता हूँ दो तीन दिन पहले दिल्ली से अंकल का फोन आया था । मैं आपसे कहना भूल गयी हूँ । ये बातें अनीता भावी शेखर भाई को कुछ नहीं बताती हूँ । उधर शेखर भाई ने भी शायद उनको मेरी सुबह आने के विषय में कुछ नहीं बताया । ऐसा कुछ तो दोनों के बीच कोई अदृश्य दीवार खडी हो गई । क्या इसीलिए पानी का ही मन था की नहीं की तरह वो सीमेंट के भी कुछ नहीं नहीं नहीं । अनीता भाभी कुर्सी पर बैठा हूँ । मैं अभी तक सकपकाया सकता था । शेखर भाई प्रतिक्रिया ही कर लेती हूँ । कभी नहीं है और पानी से भरे तीन क्लास में इस तरह का ही नहीं । अनीता भाभी ने कर्कश स्वर में नौकरानी को डांटते हुए कहा, और तुझे क्या हो गया है? रामबिहारी क्योंकि मालकिन किसी कितनी बार कहा है कि मुझे माल की मत कहा करो, फॅमिली से खडे हो अनीता भाबी फिर होगी क्या? सिर्फ पानी पिलाकर ये जानना चाहती है तो ऍम साहब नहीं बात मैंने कितनी बार कहा है तो उससे मुझे मेनसाह मत बनाकर तो फिर क्या क्या करते हो राम तैयारी के स्वर्वेद झल्लाहट उपर आएगी मुझे किसी संबोधन की जरूरत नहीं हम कैरी करने को हुई तो अनीता पहाडी फिर घर के पूरा चलदी महरानी हुकुम कीजिए ना क्या कॉफी पीने के लिए हर शाम तक से प्रार्थना कभी बडी आपने समझी थी पार्टी से आ रही है तेरे घर से तो ये लोग भी पार्टी से आ रही है । उन लोगों के लिए तो मेरे कॉफी का पानी पहले ही उपाय दिया है । आपकी भी लेकर आती है मुझे नेता वहाँ की की उनके दर्शन मुझे भी एक छोटी सी बहुत हूँ । इतना बडा अफसाना बनाया जा सकता । शेखर महीने ऍम और एक ही सांसद से खाली करती हैं उन की हर क्रिया में एक अतिरिक्त संस्थान । शायद नीता भाभी स्तंभित सी थी हमी लालिमा घटेगी और छोडे के ऊपर उभरे ढीले पान शायद एक नहीं कई कहती थी हूँ नहीं उत्तेजित कर रखा था पिछली राम तैयारी का पत्र हूँ । उसकी मीडिया आकस्मिक उपस्थि तीसरी शेखर भाई के वोटों पर । रुपये एक जीन्स जैसे उस क्षण में चारों तरफ पवित्र ऐसी शांति, अनीता भाभी की निगाहें और मुझ पर आकर केंद्रित हो गई । भरी पहली निगाहों में मुझे एक ही ना उसी समय हुई नहीं होनी चाहिए । फिर अचानक मुझे ऐसा हुआ । जैसी में श्रीलंका अच्छी नहीं । अनीता भाभी उसका प्रतीक बन गया है । शेखर भाई थे । अनीता भागे की उसी के पीछे आकर खडे हो गए । तिरुपति । धीरे धीरे उनके कानून को सीखना पिछले का शांति की यह है । दोनों के ऊपर तामसिक होगी । उनके जीवन में फॅार खा पडता समझते हो जाएंगे । तब मैं काम था । अनायास अनीता भाभी के आंखों में कुछ ऐसे भाव हो गई । शेखर ही इसमें प्रदर्शन का क्या नहीं? फिर मैं खुली खिडकी की पांच देखती हुई थी । के स्वर्ण बोली मैं जानती हूँ ये उपहार नहीं, इस सबका कोई नहीं । मुझे सब की कोई जरूरत नहीं है था कि आखिर पांच क्या एक कुछ नहीं । मैं तो सिर्फ इतना चाहती हूँ कि दोषी या कमजोर को भी नहीं उपहार देना चाहिए । तो मान्यता उन की बात है । भाई पर राज किसी को भी उसके गुण के कारण प्रेम करना कोई मायने नहीं रखता । नहीं उस पर कोई ऐसा नहीं । मैंने कहा ना कि मान्यताओं की बात है । भाभी जी इस बार अनीता भाभी उखड गया । तीखे स्वर में बोली कौन सी मान्यताएं दुनिया को न्याय के लिए, स्वतंत्रता को, प्रेम के लिए, विश्वास को, बाधिता के लिए, स्वार्थ को, गुंडों के लिए, मूल्यों को, आवश्यकताओं के लिए खुशी को कर्तव्य के लिए इसने हैं और सहानुभूति को रूढीवादी परंपराओं के लिए यहाँ की मान्यता मेरा रूम रूम नहीं, रोशनी से प्रकाशित होगी । फॅमिली तो वहाँ भी दोषी कमजोर हो गया । नहीं । तीन । चखती लेकिन शेखर खाई क्या वही अनीता भाभी को प्रेम देने में समझ थी । अनीता भाभी का ये तू एक बहुत ठीक नहीं मानी से भरा रहस्यमय तर्क नहीं । पति प्रेम से वंचित एक नारी का बचाव पक्ष यह स्पष्ट व्यंग्य नहीं । स्पष्ट रूप से प्रेम के लिए दावा राम कैरी कॉफी खाली कॉफी देख करनी तक हाथ नहीं । आंखें शरीर उकताकर पूरी कृषिक कपट लाएगी । खुद ही खाली ऍम थोडी देर में ही खाना लेना है । खाली कॉफी चलेगी । राम कैरी संतुष्ट ही चली गई । मोहन के आवरण मिले थे । हम तीन कॉफी पीते रहे, काफी खत्म हो गए । एक लंबा पहुंचाया स्पीच शेखर खाई, एक रंगीन पत्रिका के करनी बोलते हैं । अनीता भाभी कोई कोई सिर्फ तिरपालों को सहलाती रही नहीं । चक्रव्यू में घुस तो गया था कश्मीर चलने का रास्ता नहीं खोज पा रहा हूँ । अनीता हूँ उठकर देखो खाना बना या नहीं? अनीता भाभी चुपचाप थी ही करनी चाहिए । आती जाती उनकी नहीं ही फर्ज । पर किसी टिकिंग अच्छा उनके लिए शेखर भाई चुकी । फिर एक डी र्थन िश्मा छोडकर पूल की तरह । अनीता आपने आपने कैसी अजनबी बन गई? यही अनीता है जिससे क्रीम की जगह एक ठंडी तटस् तथा मिलती है । जो भी देती हूँ नहीं मिलता है । शेखर ऍम नहीं नहीं अंदर ही अंदर कितना चटक क्या नेता के अंदर एक ऐसे साथ ही कल समय की जो अपनी मंजिल पर पहुंचने के लिए साथ साथ जूझती चलते हैं और असफल होने पर निराश नहीं होती हूँ । शेखर भाई पर उस सब का स्त्रोत कहाँ है? धन्यता मानी तो इसके लिए दोषी ऍम खाना लग गया है । ऍम तो नहीं थी कॅश खाना शुरू करने से पहले मुझे महसूस जैसे मैंने जिंदगी की हर वास्तविकता था नहीं होती । फॅमिली फॅमिली चाहता हूँ । अनीता भाभी पार पार हो ठीक हैं । विचार मंत्री करें । समझता है जैसी उस वक्त में पी किसी मृत मित्र से बात करेंगे हूँ तो उन तीनो बाहर नान्यांग नहीं नहीं । शेखर भाई ने स्वीकृति सुलखनी घुमती और सीधे सीधे आंगन में घूमते हुए मैंने सोचा शेखर था यार अनीता भाग तो हिन्दू है जिनकी नगर से फॅमिली फॅमिली मैं तीनों की सिर्फ नहीं हूँ । शायद महीने के अंदर सांस का मान मेरी करें । फॅमिली संतोष कमा नहीं थी । क्या इन दोनों की असंतुष्टि का बात हैं? समझौते की भावना कर रहा हूँ । ठीक है भाई थोडा नंगडा सीरीज है तो चाहती थी कि नेताओं नहीं समझा तो थी नहीं जाने किस मुॅह तो हम दोनों की तीन पीछे हूँ । आखिरी कब तक चलेगा बिना सोचे विचारे में नहीं । क्या अभी ठीक है? क्या आप लोगों की यही इच्छा है कि आप असफल रही? क्या कह रही हूँ? मैं कुछ नहीं मालूम । तुम नहीं तृप्ति होगा होता तब तुम्हें पता चलता कि वहाँ भी लगभग निचुड होगी । तब मैं सोची नहीं । अच्छा नहीं तो ऍम हुआ हूँ । तीनों को अस्थायी रूप से खोया है । मम्मी को परपुरुष की बहुत घूमी हूँ । मंदाकिनी जी की अधूरी कटी फटी जिंदगी के तहत हूँ पीछे खडी अभी अदृश्य दीवार से सिर तक किसी की सिर्फ खाता हूँ मैं भी मैं स्वाॅट वहाँ मैंने बहुत कुछ होता है कभी नहीं सीखी बहुत बडी खुशी के लिए छोटी छोटी खुशियों की आहुति देना आत्मन् होंगे वापस करेंगे थोडा पीछे आपकी जिंदगी का ये है की नोना ठहरा आप दोनों को लिए बैठेगा जिंदगी की नींद । प्रतियोगिता पर नहीं समझाती पट्टी अकेलापन अपने आप में शून्य पीर जिंदगी का एक अनिवार्य ही शेखर भाई अनीता भाभी के होते । मुझे अंधेरी की पृष्ठभूमि में चमक थी । शेखर भाई के चीखने की पीली रूकी किसानों पाॅलिसी चमत् स्पष्ट नहीं अगले क्षणों का फॅमिली ऍम पीछे हूँ हो जाएगा शेखर ढाई ने साॅस था घर पर सूचित करते हो । इस बार अनीता भाभी ने पूछा विमान ऍम फिर न जाने अनीता भाभी को कैसे तीसरी सेंटर चली गई । जाने से पहले मैं भावी की लौटीं । उत्सुकतापूर्वक प्रतीक्षा हो । अनीता नहीं लौटेगी उस होनी चली गई शेखर भाई सोनी यह खूनी में मुस्कुराती । खतरा नहीं कुछ क्षण कमार अच्छा शेखर तक चलता हूँ, होटल में ठहरा है । अच्छा नहीं लगता ही सामान उठाना ना ऍम और नहीं तो क्या कहीं औपचारिकता करने । वहाँ तो नहीं हो रहा है तो कैसी बातें करती हूँ । ठंड पड गई है, शिखर है और मैंने प्रसंग बदल दिया तो तो जाना चाहता है तो चाहे तो मेरा उन्नीस का देता हूँ नहीं कोई जरूरत थी खाॅ देखो कहकर में बाहर आके आपने सीधी पगडंडी पर उतरने लगा पहले उतर रहा है फिर मालरोड ऍम उतारती समय मुझे लग रहा था जैसे भी चल नहीं रहा की भी जैसी मुझे दे रहा हूँ मालरोड आया तो पेंट लिया दुख भी नहीं थी सडक पर जंझू नीति किसी सुनसान होनी ने आंख चलाकर कुछ पहाडी ऍम उनके पास कुछ झबरी ने कुछ भी बैठे हैं होटल वाली चढाइयां हूँ गिरिजाघर के पांच से कुछ ना हो सीमेंट की सुननी पडी थी हूँ ।

Part 14

फॅस फॅमिली फॅमिली नहीं ऍम नहीं आंकी मून करता था की कल्पना कि रंगीन पटल पर एक नारी का मुख्य उधर रहे आकाश ऍम किस काम उठाई है धंधा की नहीं ऍम ऍम होटल की ओर चल पडे मैं होटल में घुसा था सर्वत्र अंधकार का था ऊपर जाने के लिए सीढियों पर पाओ रखा तो महसूस हुआ अगली सीढियों पर एक आकृति चल रही है ऍम पूंजी तो अकस्मात ऍम नहीं है तो फॅमिली बयान ही रहा है । तब नहीं होटल की पत्ती को क्या हो गया? मैं ऊपर पहुंच गया । मैं उस ही हुई आकृति के समानांतर खाया था ऍम ऍम ये निमंत्रण था क्या? खाती मैं आकृति के पीछे नहीं उसकी कमरे में पहुंचा तो मुझे हुई ऍम ये अंधेरा भाटी ऍम तभी कमरे में भट्टी का किला प्रकाश पहले ना कराने ने मोमबत्ती जलाकर लगती थी । कमरे में कब्रिस्तान शांति थी हल्की हमारा खिडकी के शीशे से बराबर से काॅफी सारा कमला हल्के पीले रंग की अस्पष्ट धुंधलके ऍम हूँ मैं कुर्सी पर बैठा हूँ ऍम तभी बत्तियां सारा कमरा तेज प्रकाश भी नहीं मिला अभी भी कराने के पास खडी थी उसने मारकर मोमबत्ती को बुझा दिए मेरी बेटी पढ रहे हैं हूँ हूँ लेकर मन्दाकिनी नहीं शॅल बारी शुरू हो गई है फॅमिली नहीं चाहेंगे कॅश कभी सोचा नहीं दिल्ली टीटी का बहुत मन करता है कि थी क्यूँ मेरी सारी शरीर में रंजीन सी सरसराहट हो रही है कुछ दिन तक खेला हूँ फिर तीसरे खडी नहीं फिर दरवाजा खोलकर वहाँ चलेंगे दरवाजा खोलती ठेले पालक जैसे प्रतिनिधि हमारा की तीस हो चाॅइस दशक की रंगीन पत्रिकाओं पन्नी ऍम इतनी ठंड भी कहाँ नहीं मैंने पूछना था खाना खाने के तहत ऍम चक्कर लगा कर रहे हैं इतनी सर्दी में अचानक से पति चाहिए अमरान धीरे में तो क्या जरूर मोमबत्ती जलाती से का मैं उठा अच्छे से माचिस निकालकर ही चलता है हवा नहीं थी कमरा पर फिर भी नहीं जानी मोमबत्ती लाभ भाजपा कम जाती थी बाहर हवा की धारा हट नहीं अंदर कसमसाहट हम तभी ऊपर पहाड पर बनी बाॅक्सिंग उसी सैनिक के खाने की आवाज क्योंकि ऍम उसी की की है मैं समझ में नहीं आया कि क्या कहूं ऍम नहीं की लगता है हल्की रूई के सहस्त्र तहों को चीज हो किसी का प्रेमा लाभ वातावरण में पूछ रहा है मैं सेक्रेट भी रहा था करवाता हूँ कमरे में उमर खुमाड एकाद बार मंदाकिनी जी को खांसी का ठसका भी आया था । आपकी समय कुछ ज्यादा ही चिंतित हैं । मैंने मन्दाकिनी जी के अंदर में झटका चाहता था वो एक कम सकता हूँ वहाँ पढाकर पूरी नहीं ऐसी बात नहीं है । मेरे मुख पर अविश्वास की रेखाएं खींची थी । कुछ बोलिए ना आप चुप क्यों हैं? मैं सोच रही थी जिंदगी में सुख ॅ दोनों हाथों से पकडने की कोशिश इंसान कहाँ पहुंच जाता है । चुप इंद्रधनुष साथ नहीं आता तो आपने कहाँ की थीमी ऍम करती थी मंदा कि नीचे जो विकट हो गया उसे लौटाया नहीं जा सकता । हूँ ही नहीं । जीवन में हम लोग जो फैसले देते हैं उनके परिणामों को तो हमें भुगतना ही पडता है । चाहे हम होकर भुक्ति यह किस करता हूँ । शायद मेरे शक्त मन्दाकिनी के अंदर की गहनतम गहराइयों में हाल चलना चाहिए भी कुछ फॅमिली है । आप कुछ कहना चाहती हूँ हाँ, तुम ने ठीक ही कहा तो मैं अपने फैसले के परिणामों को भूल रही दूसरी विगत की दाहक स्मृतियां अबकी मेरे अंतर को हर समय चल साथ ही रहते हैं । कुछ भी सोच कर मैंने आपकी राॅकी इलाज है क्या विमॅन आप हंस क्या रही हैं आप? क्या ऍम मैंने ऐसा क्या क्या है बोलनी की शिक्षा दे रहे हूँ । पता नहीं क्या मालूम है भी कितना मुश्किल काम है । फॅमिली आपका एक थी और छितिज के काॅपियों की होली चलती है मेरे रूम रूम में मधुर की सांसी ऍम तुम ही बताओ मधुर के अस्तित्व के अहसास में कैसे नहीं कर सकती? कॅश बाहर बरामदे में किसी की पदचाप पूंजी मन्दाकिनी एक कम खटा फॅस उसके मुंह से निकल के शीला नहीं फॅमिली आई थी शीला ने पाॅवर रखती है फिर एक तक मंदाकिनी की होती नहीं जहाँ सोने का समय हो गया । मन था कि नहीं, मोमबत्ती की पीली लाख कम कम आ रही है । कुछ काम तो नहीं दी थी । नहीं ये ऍम मंदाकिनी जी कुछ मेरी उमा सुनी सुनी ने कहाँ फिर ऍम भी खेल कर्पूरी ऍम शायद मनना की नहीं जी बातों का प्रसंग करना चाहती थी । इस अपने फॅमिली पे कॉफी के प्याले पर दृष्टियाॅ पूछ रही थी तो मेरे बारे में क्या सोचती हूँ? क्या मैं इस प्रश्न के लिए कई कहीं नहीं है । मैं तुरंत उत्तर भी नहीं दे पाया । मुझे लगा मन्दाकिनी जी प्रश्न पूछकर शाह लज्जित हो गई । उनकी प्रश्न की गूंज अभी भी मेरी चारों लिपटी हुई थी । मेरी सीक्रेट खत्म । मैंने उसे हिस्ट्री में मसल दिया । फिर कुछ गर्मी लेने के लिए हाथों की हथेलियों ऍम हमने बताया नहीं, मैंने कुछ सोचा नहीं है । कुछ भी नहीं अच्छा वैसे ही आपकी मोमबत्ती की तरह कल कल कल रही कहाँ चारों ओर कटु स्मृतियों की सूखी पत्ती खटखटाते हुए मंडराते रहते हैं । आप दिशाहीन सी एक धूरी रहित गरीब ही में काॅपर खाती रहती है । ऍम लेने दीजिए इन ठंडी रात तू मियां मधुर जी के विश्वासघात की याद करके विक्षित सी हो जाती है । जब था का पूछ सही हो जाता है तो मुझे आपके अंतर में चरमराने । किसी आवाज सुनाई देती है ही, चरमराहट टूटने की पहले से ही होती है । नहीं हाॅकी लगभग ठीक पडेगा उनकी तेज स्वर से जैसे सारा माहौल पहल क्या मुझे मंदा की नहीं देखी? माथे पर उभरती फॅमिली का चेहरा वर्षाकालीन आकाश प्रतिबंध रन पता था मैं कुछ और तो नहीं सोचते । मैंने सीक्रेट का आॅक्सी हुआ निकालकर पूरा हो, इससे ज्यादा भी सोच सकता हूँ में सोचना नहीं चाहिए क्यों? फिर मैं अपने जीवन में कुछ भी सोच पाने की स्थिति में नहीं रहे । जमकर हाँ, बस एक कामना है मेरे मन नहीं लेकिन यही की आपको इस कसमसाती पीडा से मुक्ति मिलेगी । मंदाकिनी थी शायद ठंड के कारण धरती बनाने लगी थी । उन्होंने बॉल को कसकर अपनी चारों ॅ और उत्तेजित होकर थोडी और उसको टीका माध्यम बनना चाहते हो तो नहीं मैं पूरी तरह छटपटा क्या ये क्या कहती है बंदा की नहीं निशत पकाकर खडा किया फिर मैं उत्तेजित स्वर्ण धोना ये कब कहाँ मैंने हर पांच कही नहीं चलते हैं । हर बात का इस तरह गलत नहीं लिया जाता हूँ तो मैं तीन तेजित के हो गए हैं क्या करूँ नहीं हूँ बैठ के सर्दी बढ रही हैं । मिलिट्री ब्लॅक से आने मना जीत हम चुका था । मोमबत्ती का पीला प्रकार और कुहासा मिला । चुनाव कर एक विभाग से वातावरण की सृष्टि कर रहे थे तो तुम मुझे सुखी देखना चाहते हो । कुछ तेज भाई मंदा की नहीं जी नहीं पूछा । अनथक के लिए मैं मानता हूँ ना कॉफी पी लीजिए, ठंडी हो रही है । तुम जानती हूँ खुशी का स्रोत कहाँ है? शायद उसी की खोज में लोग अपने जीवन को खंडहर बना डालते हैं । तभी मंदाकिनी जी पवन सिंह कमरे में चहलकदमी करती हूँ । सिर्फ पल भर के लिए मेरे सामने आकर खडी हूँ दैनिक जीवन में एक महत्वपूर्ण खोज की है क्या मैंने सुना हूँ काटने के पास ऍम घूम रहे थे । मन था की नहीं चाहिए घर । तभी ऍम और मोमबत्ती फिर से चल रही थी । आपकी स्कूज का जिक्र कर रही है कौन सी खोज? क्या यही समझा नहीं? तब ही पत्तियाँ कमरा दूधिया प्रकाश से भर गया । तुम इस अंधेरी उजाली की आंख मिचौली देख रही हूँ किसी का नाम जिंदगी मुझे लगा मेरी अंतर में भी बत्तीस चली थी मेरे माइंड के सारे अंत अंधेरी जब मंगाई थी विश्वास की सीटी में बंद मनका मोटी विराट सुख की सृष्टि करता हूँ । इंस्टाॅल मंदाकिनी जी की सुख पर एक आने की एक सीट छोटी चल रही थी । पर मंदाकिनी जी हम सब प्रकृति के शमशान में भटक रही । हम चारों ओर खेलना, विश्वासघात, विद्वेष, प्रतिशोध, अविश्वास मांॅ तो अंधेरी की बात कर रही हूँ । मैं तो जाने का जिक्र कर रही थी । अचानक फिर पति चली गई । अंधेरी का विस्फोट हुआ चारों तरफ फॅमिली बिखर के । मैं मोमबत्ती जलाने के लिए उठा तो बोली नहीं, नहीं नहीं वैसे हम मैंने पूछा क्यों मंदाकिनी जी का था बहुत पास मोमबत्ती चलाने से क्या फायदा? इंसान को अंधेरे में रहने की आदत डालनी चाहिए । किस देखने को हँसी कीप रकम पर निशक्त ठंडी हवा की काम कभी और परछाइयों की विप्लब से कमरा भर के अपनी नहीं जाएंगे मैं अंतरिक्ष से नीचे पृथ्वी पर मंदाकिनी चीनी कुछ उत्तर नहीं वर्ष शुरू हो गई । नैनीताल खाली होने लगा है करें जी पर रखा है पचपन सकता हूँ मंदा की नहीं जी जैसे कुछ याद कर रहे हैं क्या तो याद आ के फॅस तो तभी बाहर बरामदे में किसी की पद कम सुनाई थी फिर बाल घर के लिए वो पच्चास ठहर के मुझे लगा वो दरवाजा खटकाने का साहस नहीं जुटा पा रही नहीं आतंक का नहीं मंदाकिनी जी ने काम कपाटिया वास्ते कुछ कौन है नहीं इस समय कोई नहीं आ जाएंगे । बत्तियाँ कमरा प्रकाश से यहाँ है मिस्टर मंडोत्रा को कमरे में आते हुए देखा था ।

Part 15

मिस्टर मल्होत्रा मेरी तरफ देखकर इस तरह मुस्कराएं की मैं खबरें मैंने अपनी घबराहट पर पता डालने के लिए कहा । आज सुबह ही थी मैंने वो सूचना मन्दाकिनी जी को दे दी थी । मिस्टर मन होता हूँ मिस्टर होता तो आप ही थी सुबह मंडा की नहीं कि जैसे बुरी तरह हूँ । ये तो बडी अच्छी बात है कि तुम दोनों पहले से ही परिचित हूँ फिर कर मिस्टर मल्होत्रा नहीं ऍम थोडी थी मधु तो ये नाटक करने की क्या जरूरत थी? फॅमिली इस बार मैं पूरी तरह से क्या करे? बंदा की नहीं ये जिंदगी किसी नाटक से कम है । तुमने मल्होत्रा का स्वर्ण क्यों मारा बताऊँ ये अपने नौजवान पडोसी है ना धन से थोडी दिल्लगी करने के लिए इसमें दिल्लगी करने की कांस्य बात नहीं । इस बार मैंने पूछा था भाई लगी करने के लिए किसी खास करन की आवश्यकता नहीं पडती हूँ । मुझे का मधुर बापू असली कारण छुपाना चाहते हैं । छत्तीस देश में आकर मेरी और मंदाकिनी ॅ संबंधों की कह रहा हूँ ना पाँच चाहती थी पर ये भी कोई दिल लगी हुई मंदाकिनी जी ने वो भाॅति का ऍम अब गंभीर बात सुन लीजिए मैं मथुरा मन्दाकिनी का पति सुबह तुमसे जो होटल रेस्ट्रों की बात की थी, वो भी गलत थी । असल में मैं सर्विस करता हूँ । मैं बहुत बुरा इंसान की पत्नी मेरे साथ नहीं रहती है । इसका कारण हम दोनों के बीच बस करो । मधुर मंदाकिनी नहीं । मधुर जी को बीच में ही रोक दिया । मैंने मन्दाकिनी चुकी हूँ । गौर से देखा वहाँ एक विचित्र सा खालीपन व्यक्ति का पंद्रह था । मुझे ना का इस सबका नहीं हूँ । मैं हूँ । मधुर जी के मुख पर उत्तेजना थी । एक तक मेरी ओर देख रहे हैं । फिर कुछ क्षण मान रहकर बोले अभी आपके कमरे में झांककर देखा खाली पडा था । नहीं तो मैंने तो समझा दिल्ली लौट के हैं । नहीं तो कहकर मैं सिर्फ खिसियानी से हंसी हंस कर रहे । क्या आपके कॉलेज भी तो खुल गए होंगे जी जी! तो फिर हम नीचे क्यों नहीं जाती है? हम जानते हैं मैं कुछ नहीं जानता हूँ । मधुर जी की बात सुनकर में सकपका किया । फिर अपने आपको संयत करके बोला आगे पडने के विषय में अभी कोई फैसला नहीं करता हूँ । मध्य उसी की चेहरी पर संतुष्टि या सहमती का कोई भाव नहीं था । गंभीर स्वर में बोले आप कहते हैं तो मान लेता हूँ पर मेरे लिए कुछ और सोचना भी दिसंबर हैं । मैं भी तो हो गया । मुझे लगा मधुर जी अपनी स्टेज को सजाकर चल गए । जरूर कोई भयावह नाटक अभिनीत करने का फैसला कर लिया है उन्होंने । मैं आप का मतलब नहीं समझा । अभी समझता हूँ । देखिए आप कहते हैं कि आप इसलिए दिल्ली वापस नहीं गए हैं क्योंकि आपने आगे पडने की विषय में कोई फैसला नहीं किया है । मैं ये सोचने के लिए स्वतंत्र हूँ क्या इस वजह से नहीं किसी अन्य कारण से यहाँ रुकी हुई क्यों मंदा की ठीक कह रहा हो? ना हो मेरी नस नस में रोष भरी तेजना फैल झेला का मतलब जी एक फॅमिली फंसाना चाहती हैं मैंने मैं कृष्णा से भरकर मन्दाकिनी जी की ओर देखा । उनका चीज थी तमतमाया हुआ था । तभी मेरे मन में खेत की घटना की फॅमिली में फंसा मुझे सब से क्या लेना देना था । पता नहीं अभी सुनार की उत्सुकता का परिणाम ठोकना पडेगा । मधुर कि बार बार मंदाकिनी की ओर देखी जा रही थी । उनकी आंखों में ऐसी चमक थी, किसी सच मुझको जीत गई हूँ । वो ऐसे मुस्कुरा रहे थे जैसे उन्होंने सचमुच मंदाकिनी तो चोरी करते रंगे हाथों से हूँ । ऍम मत हो जी का ये चाल मुझे नहीं मान जाती । नहीं जी को फंसाने के लिए फेंका क्या है? मैं उठ खडा पूरा मैं चलता हूँ । फिर एबॅट आप कहाँ चलती है? उसे जाने दो । मन्दाकिनी लेकिन फर्मी आवेश था क्या ये हमारा निजी मामला है? किसी तीसरे इंसान को व्यक्त में बीच में लाने से क्या फायदा? मधुर हूँ खिलखिलाकर हंस पडेगी इसमें हस्ती की क्या बात थी? यही तो मैं भी इतने दिनों से कह रहा था । क्या अपने निजी मामलों में किसी तीसरे इंसान को घसीटना कहाँ की प्रतिमा नी मैं समझ गई क्या नहीं तुम कहना चाहती हूँ मैं चलो भाई तीसरे इंसान का अभिनेता के रूप में नहीं, एक दर्शक के रूप में होना जरूरी है । मतलब सीने दृण सर्दी का अच्छा क्यों मंदा की नहीं पूछा हूँ । नाटक को देखने वाला कोई तो होना चाहिए । ऍम खाॅन मैं कह रहा था कि आप इसलिए होटल मिट्टी के हैं, जिससे उसी के लिए छोड दो मत हो । मंदा के नीचे मधुर जी को कुछ भी कहने दीजिए । कल्पना का क्षेत्र सीमाहीन होता है । मैं कुछ भी सोचने के लिए स्वतंत्र हैं कि उनका दृष्टिकोण होगा । मैं उन को इसके लिए दोषी नहीं ठहराऊंगा । मैंने अपने अंतर भी शक्ति जुटाकर का मधुर बापू मेरी तरफ देख कर मुस्कुरा रहे । फिर मंदाकिनी जैसे बोली बीजेपी हट खुशी है कि एक ऐसा व्यक्ति तो मिला मेरे जैसे भी जा सकता है । मंदाकिनी तो आज तक स्वीकार नहीं किया कि हमारा मन ही एक निर्देशक है जो जिंदगी के नाटक को सुखांत या तो खाना बनाता है, मंदाकिनी थी, उत्तेजित हो गई । उनकी कनपटी की नसे फुल के सांस जोर जोर से चलने के कारण वहाँ इतनी सी लगी थी । अचानक उन्हें जोर से खांसी आई और अपने दोनों हाथों से पक्ष को दबाकर खास नहीं । जब उनकी खांसी रुकी तो कठोर स्वर्ग में बोली । यदि जिंदगी की सच्ची कसौटी मन है तो फिर उस व्यक्ति का निर्णायक कौन सत्य सापेक्ष होता है । मतलब ही नहीं बनता कि नहीं जीने के ही निगाहों से मधुर जी को देखा खेला का उनकी तेज निगाहों से मत हो । जी के अस्तित्व का भी शादी शादी हो जाएगा । फिर उन्होंने लगभग ठीक कर का अगर जिंदगी में सत्ती ही सा पेश यह रिलेटिव हो चुका है तो फिर फंडामेंटल क्या है? मान कहकर मतलब आप मुस्कराती मैं ये सब में नहीं मानती । मंदाकिनी कैसी कैसी सृष्टि करता है मानव मन कभी स्वर्ग कभी न कभी साहूकार बन जाए तो जिंदगी मैं पर ये भर जाता है । मन चोर बन जाए तो सब कुछ चूक जाता है । सिर्फ रिक्ति रह जाती है । मंत्रा की नहीं जी मांग थी बंदा कि नहीं तुम जानती हूँ इस दुनिया में वही पीडित होते हैं । ये कल्पनाशील होती है इंसान के मन में बेईमानी सिद्ध करते समय क्या तुम खुद दिमाग ईमानदारी बरत रही हूँ? मेरी दिमागी बेईमानी की कल्पना भी तुम्हारे मन की ही उपज मंदा की फिर मंदाकिनी चॅू ठीक है । अगर इंसान कमानी सब कुछ है तो मैं क्या कह सकती हूँ कि हम बैठ कर शराब पी जी हमें मन को आदेश दूंगी की सोचू मेरे पति धर्म चर्चा कर रही है । मतलब आप ऊपर इस बीएनके का कोई ऐसा नहीं हुआ । बहुत शांत और निर्विकार भाव से पूरी ये स्थिति गलत है । अगर मैं शराब पी रहा हूँ तो तुम्हारी मन को धर्म चर्चा की बात सोचना भी नहीं चाहिए । मुझे बहलाने की कोशिश मत करो मत हूँ । मैं जानती हूँ तुम क्या कहना चाहती हूँ । खुशी है कि तुम काफी समझदार पर दुखी की यह तो पर एक बात का दुख है । तुम्हारी दृष्टि संतुलित नहीं । यहाँ सब कुछ साफ साफ के हिट गानों मत हो । मिस्टर राज के सामने मैं चला जाता हूँ । मैं खडा अभी कुछ दिन पहले तुम ने राज की एक दर्शक के रूप में काम ना की थी । घाट काम नहीं एक नाॅक तो मिस्टर राजा ठहरिये आप लोगों की व्यक्तिगत बातों में ये व्यक्तिगत नहीं है । सार्वभौमिक समस्या है मिस्टर राज्य । इसी ऍम तुम शुरू करो की या मैं मधुर चीनी शांत भाव से पूछा तीसरे कोई अंतर नहीं पडने वाला । बंदा के नीचे किस पर में तटस्थता रहती है? साधना की कारण ही तो मत से नाराज हो ना । प्रश्न मत पूछिए । खेती चाहिए क्या? साधना के प्रति आकर्षित होकर मैंने तुम्हारी उपेक्षा की था कि नीचे पल भर मान रही बोलो क्या तुम्हें सचमुच मुझसे उपेक्षा मिली थी? मंदाकिनी जी सकपकाई सी लग रही थी फिर देख रही संभाल के फॅमिली शायद फॅमिली नहीं जिसमें तुम कह रहे हैं फिर की । साथ ही एक विवाहिता नारी अपने पति पर पूर्ण एकाधिकार चाहती है । किसी रेखा पर आकर बंद कर सकता है, जनता की नहीं । इस बात को फिलहाल छोड ही दिया जाए तो अच्छा रहेगा । आखिर साधना ने कब तुम्हारा स्थान हथियाना चाहता हूँ तो नहीं नहीं क्यों कहाँ था मैं साधना का स्थान ले सकती हूँ न साथ ना मेरा इसमें मैंने कौन सी गलती की थी । मैंने की कहाँ था नाॅट ना मेरी पत्नी बन सकती है और ना ही तो जिसके साथ मेरे दफ्तर की औपचारिक संबंध है । फिर तुमने मुझे मुक्ति का अधिकार क्यों दिया? मैं क्रूर ऍम तथा में विश्वास नहीं करता । मंदा के मैं स्वतंत्रता का हिमायती हूँ । मैं सोचता हूँ कि किसी पर अनुचित बंधन लादना ठीक नहीं । प्रबंधनों से बेहद का विरोध चाहता हूँ । विरोध एक विघटनकारी प्रकृति है जैसी नहीं की कुछ भी नहीं कर देती है तुमने मुझे पहले क्यों नहीं बताया? मुझे अवसर कब दिया तुम नहीं देने का प्रवेश नहीं कहा था मुझे तो शुरू से ही सब कुछ चेंज सलाह का तो मेरी तरफ तुम्हारा ऍम उधर साथ ना की तरफ हमारा चुका इस संबंध में मुझे बस दो बातें कही नहीं नहीं जैसे तुम को उनको ना अपन कहती हूँ । माॅक एकाग्रता और स्थायित्व है मैं और जैसा नहीं लोग शुरू शुरू में प्रेम की कुतुब मीनार ही बनाते समय के प्रवाह में एक फॅारेन ढल जाती है । फिर आ जाती है एक ढलवान सर जिस पर उतरकर प्री न जाने का हक हो जाता है । समझे हूँ नहीं । उतार चढाव नहीं चाहता था तो सीधी साधी समतल भूमि पर तुम्हारा हाथ थामी एक ही चल चलना चाहता था मैं हम साथ थी कुछ पिछले लग रहा था जैसे मेरी जिंदगी की नहीं खेती झूठ नहीं मंदाकिनी जी के पर भी भावों के चलो ऍम सांसद होता टी । टी । मधुर बापू नहीं फिर कहना चाह क्या अब नहीं पूरी की पांच माना साधना के प्रति मेरा झुकाव एक कट हो सकते हैं तो तुमने मुझे लौटाने के लिए क्या क्या ठीक तो था खडी हूँ जैसे जिंदगी की गिनती की कडवी समस्याओं का सामना करने का एक ही उपाय ऍम क्या इनसे संघर्ष नहीं किया जा सकता हूँ मैं ऍम हाँ जबतक सांसे भरती थी कब तक था? क्योंकि कहाँ पहुंच चुकी यहाँ भी पहुंच चुकी और रुक होगी सिंध की फिर वही टी सी कडवेपन प्लेट में रखकर पेश करेंगे फिर क्या करोगे फिर शुरू करते हो की इस तरह भाग ढाक कर अपनी को नष्ट करना कहाँ की बुद्दिमानी मैं उत्तेजित होकर ऍम मिस्टर ऍम भागना ॅ अपनी हार को स्वीकार ना है शुतुरमुर्ग की तरह ऍम बस करो मधुर मन्दाकिनी जीत तेज ऍम रुक कर मोर्चा जमा कर जिंदगी से जूझने वाले ही जीतते हैं फिर बाहर हो जाए तो कोई बात नहीं कम से कम ये मलाल तो नहीं रहता कि हम बिना लडे मैं ऍम कमरे में सन्नाटा छाया हुआ था जो की प्रक्रिया शायद आरंभ हो चुकी थी । मुझे इजाजत ही है मैंने देने स्वर में मधुर आपको से पूछा बंदा की नहीं जी से पूछती हूँ तुम जा सकती हूँ । इसी चुकाएं उनकी कमरे से करने का है । एक ताजा शीतलहर ऍम तेजी से अपने कमरे में घुस गया ।

Part 16

कलाम पर लिखते ही मुझे एक बात का एहसास हुआ हूँ । मैं आज से तीन वर्ष पूर्व नहीं बल्कि अब से कोई तीस मिनट पूर मैं सकूँ नहीं । अंदर ही अंदर बहुत प्रगति की वो मुझे लग रहा था बिचित्र सीधे था और अकेलेपन से उत्पन्न थकान का पोछा प्रतिपल हल्का होता जा रहा है । चारों तरफ फैला बदरंग अंधेरा पि धीरे धीरे मेरे अंतर्मन रिश्ता चल रहा है और वहाँ से अलग थी । असंतोष की इस वक्त नहीं । आज अब धीरे धीरे धमकी पडती जा रही है । अंदर मुझे कोयलों पर घंटी जहाँ पर चलती जा रही है ऐसे में तीनों की याद एक स्वाभाविक हूँ । तीन मोटी पूरे ऐश्वर्या के साथ मेरे सामने खडी नहीं कनेक्शन कही बात थी बहुत सेंड पूछे । प्रश्न उन सब का अंतिम संस्कार हम दोनों को मिलकर करना । तीनो तो महा समय पाप पुण्य की बात छोड देती हूँ तो नहीं मैं इस मेले में पढने के लिए तैयार नहीं । आप क्या होता है उसकी कौनसे परिणाम इंसान को भोगने पडते हैं? उन्नीस क्या होता है उसके काम से अच्छे परिणाम होते हैं, ये सब मैं नहीं जानता हूँ । मैंने तो पाप पुण्य की विभाजक रेखा को मिलते हुए देखा है । नहीं मैं जानता नहीं सिर्फ महसूस करता हूँ अपनी साथ सियासी करना, अपनी भावनाओं के खिलाफ षड्यंत्र करना, अपने ही हाथों अपनी स्वर कॉम्युनिस्ट संकुचित सिद्धांतों की खाते जिंदगी के अमृतसर घराें शानू को कमांडिंग हूँ सीमित दायरों और परिपार्टी से चले आ रहे सिद्धांतों के बारे में कैद करके अपनी छोटी छोटी सुबह ऍम मेरी ने कहा ही सप्ताह मैंने पाप होता हुआ देखा है भी तुम्हारी बात में नहीं कहता हूँ पर अपनी बात किस्तम तुम्हारे साथ बिताया । ए के अच्छा जैसे कि एक पाँच मिनट पाँच आता था । हर बीतने वाले पलकी पांग उठाते कितनी पिक्चरें हमने साथ साथ थी । हम दोनों लूँ क्या? तीन घंटे तीन बल्कि जैसे नहीं भी चाहती थी । क्या इसी को प्यार नहीं की स्थिति कितनी बार हम लोगों ने साथ साथ कॉफी पी, सच करता हूँ । तुम्हारी साथ की हुई हर काफी का स्वाद अलग होता था । कॉफी की हल्की सी करवाहट कैसी सुख खत्म अधूरी भरी में था हूँ क्या इस सब के तहत तुम्हारी आदमी का नहीं थी? नहीं हम दोनों जब साथ साथ होते तो दुनिया कैसे पतली पतली सी लगती लगता था जैसे आकाश का नीला रंग और ज्यादा करना हो गया । हमें महसूस होता जैसे पेडों की सूखी तहमीना सदाबहार की फूलों से कैसे कैसे रंग बदलते? सुबह शाम जिंदगी के गहनतम रहस्यों की नई नई बस्ती हूँ । क्या ऍम और स्वाभाविकता को गति नहीं कहती हूँ? मीनू प्रीमत गति में अटूट बंधन होता है । इस क्षेत्र में पाप पुण्य, उचित अनुचित की सारी दीवारें ढह जाती है । जब सहज प्रेम के प्रवाह में इंसान रहता है तो जिंदगी की सारी कटुता, कालिमा व्यथा पीर आप से आप पहुँच जाती है उन सुगंधित क्षणों की स्मृति भटके जहाँ जैसी की प्रकाश स्तंभ अपना कर रास्ता दिखाती हर तीनों ये प्रेम संपूर्ण व्यक्तित्व से होता है । इंसान के व्यक्तित्व की त्रिमूर्ति की एक अंक का था । उसे एक अंक ही बनाते हैं । मुझे नहीं मानो तो मुझसे कहाँ तक सहमत हूँ । मैं नहीं जानता हूँ भविष्य में क्या होने वाला है । जितना भी भविष्य के बारे में सोचता हूँ, उतना ही व्यस्त था । फिर हो जाता हूँ । मुझे तो हर समय एक भीषण आशंका छत छोडती रहती है । कई काम से मैं पिछडा नहीं चाहूँगा तो उनसे भी छोडकर मैं अपनी जीवन का आधार खो बैठूंगा । अपनी आधार तीन जीवन का फर्ज ये बोझ तो बहुत होता है । आधार फिफ्टी परसेंट की चलती नहीं हो सकती है । तुम जानती हूँ, गॅाड लगती है घरों छे आती हैं और यहाँ तक तो सब हो खरीद के यहाँ की वीनू मैंने इस प्रेम की शव यात्रा निकलती देखिए वहाँ से पूर्व का यह स्वस्थ तथा युवा प्रेम एक झटके से बीमार हो जाता हूँ । ॅ जाता है कहीं से अच्छा हो जाता है । पांच सच मैंने कितने बीमार मृतप्राय वैवाहिक संपत्ति की मैंने घर पे ही देखा है । मम्मी पापा के संबंधों की सूखी चलता रहा हूँ । मम्मी के जीवन में परपुरुष का आगमन कीमक पंद्रह इन संबंधों को चार चलता है । मैंने मन्दाकिनी के उजडे इस वर्ग को देखा है । पति की जिंदगी में एक पराई स्त्री का आगमन वैवाहिक जीवन में पतझड बट कराता है । सब हरियाली समाप्त हो जाती है । भावनाओं कि कोमल पत्ते सूखकर मैंने शेखर खाई और अनीता बहावी के छह ट्रस्ट संबंधों को देखा । एक आप कहाँ नासूर पाँच जाता है और सारी ड्रीम हूॅं वीनू आज सफल प्रेम की प्रतीक केस जाकर के पहाड में हिंदी की झाडी से सटी सीमेंट की बेंच भी नहीं देखी । वहाँ मैंने दूसरों को बैठे देखा है, खुद बैठा हूँ चीज होती होती हूँ तो क्या तुम ने भी वहाँ के प्रति अविश्वास प्रस्ताव पास कर दिया है? राम कि तुम पूछ रही हूँ शुरू शुरू में मैं मृत्यु ट्राई संबंधों को देख कर ही काम खत्म किया । अगर इस बीच जिंदगी के रहे क्योंकि कितनी करते उखडकर मैं अनेक अंक का मैं कह हिंदी ईरान सुनसान घाटियों के बीच सिक्स रहा हूँ । अंत में मैं घाटी के मुखानी पर पहुंचा रोशनी का एक सैलाब उमर पढाती इस रोशनी में तुम्हारा सुनहरी सी आप हमें नहाकर थमस करा रही होगी तो वहाँ चाहेगा पूछ रही हूँ खाउंगी मैं लौट आया हूँ । फिर तुम कम हो गए थे, हम होता था पर अब मैंने अपनी खोज कर दिए । मैंने आपको तलाश दिया तो हो किसी पूछ रही होगी पर मैं ठीक हूँ । तुम्हारी अंतर खुशी के पटाखे फट रही । बाहर रात रंग की दिवाली सच बताओ ना हो । मैं प्यासा था । मैं थकी हुई ॅ जैसा भागता रहा । चारों तरफ छटनी कल कल छल छल करती रहती रही । जल की फुहारें बढती रहेगी पर मैं प्यासा करते हैं ऐसा ही हूँ पर जिंदगी के संक्षिप्त अंतर राजनीति में कौन सा मंत्र दे दिया । मैं अपने आप से मुक्ति पा गया हूँ । मैं अकेलेपन और कूट के आती हूँ से निकल कर सच्चाई की मीठी जनता ऍम ऍम कैसी आठ चाली के खेल काॅल ऍम हाँ सब कुछ बता दूंगा तो वापस लौटा हूँ खामी ऍम सबसे भी होना चाहता हूँ दूसरे दिन सुबह था मैं बडा हल्का हल्का महसूस कर रहा था सात बडी गहरी नींद आई एक फॅमिली शायद और दिनों की अपेक्षा अधिक चटकीली धोती की खुशनुमा समझती बाहर हल्की हवा चल रही है पर्वत शिखरों उसी शायद तरह अलसी धूप थोडा क्या आ रही है मेरी अंग अंग अमित कास्की भरी हुई थी तभी दरवाजे प्रतिषतक सुबह ही सुबह कौन क्या मैं ऍम सामने शीला खडी थी कुछ हडबडी में थी पूरी जल्दी चली कहाँ ऍम आप को दी थी याद कर रही है क्या बात है मुझे मालूम नहीं फिर इतनी जल्दी की क्या बात है? कह नहीं सकते क्या कर शीला जाने के लिए उनसे कहूँ मैं आता हूँ । मैं भी कमरे में ही था । बालकाण्ड है उन्हें गाउन पहन लिया और बाहर बरामदे नहीं । शायद मंदाकिनी जी और मधुर बाबु कि संबंधों की घटना विशेषों का जीर्णोद्धार हो गया है । मैंने सोचा टीवी दृष्टि सामने वाले शिखर पर पडी, उस पर होंगे ब्रेक वर्ष से धुलकर धूप भी नहाकर एकदम कहते हरी धन के लेते हैं । सारा दृश्य एकदम ताजा करनी चित्र सकता तो मैंने दृष्टि को फैलाया । सामने वाले शिखर से थोडा पर ही चाहिए ना । कितने दिन बाद लगा था ये झंडा । इसका मतलब था मेरी आंखों के सामने का आकाश की नहीं चाइना पी के पीछे फैला हुआ अनंत आकाश भी नहीं । रावसाहब मैं निंदा की नीचे के कमरे के बाहर जाकर पल भर के लिए झटका इतनी चलती सुबह उन्होंने फॅमिली दरवाजे को हाथ लगा है क्या में अंतर आ सकता हूँ । फॅस मैं अंदर चला गया । सारा कमरा अस्त व्यस्त । मंदाकिनी जी बडी फुर्ती से सामान पैक कर रही थी । आप जा रही हैं मंदाकिनी जी क्या इसीलिए बुलाया था सोचा जाने से पहले तुमको बता दूँ कर जा रही है । तभी नौ बजे वाली पैसे मैंने पूरी कमरे का महिना कि खेला । मन्दाकिनी जी का सम्मान बांधनी में मदद कर रही थी । मधुरापुर नजर नहीं आ रही है तभी मैं चौंक पडा । सीधे हाथ की दीवार पर कडी खूंटी पर कत्थई रंग का वो सूट था । किसी कल रात मधुर बाबू पहनी हुई थी । नहीं तो क्या वो कल रात यही इसी कमरे में रहे थे । हो सकता है मुझे कुछ नहीं था । मैं तो ऐसी गहरी नींद तैयार की । एक ही नींद सविता तुम कब तक ठहर रही हूँ । मंदाकिनी जी ने मुझसे सीधा प्रश्न पूछ देखिए चिट्ठी सोचता हूँ मुझे भी लौट जाना चाहिए । दिल्ली में मिलों की क्या दिया चाहेंगी तो सिर्फ आना जी तो मंदाकिनी जी मधुर बापू के साथ लौट रही ये प्रश्न की पुष्टि करने के लिए मैंने मन्दाकिनी जी से पूछ दिया । मधुर आप दिखाई नहीं दे रहे हैं । वो बातों में है, रात को ही रही थी तो आपके लिए नैनीताल की सबसे बडी उपलब्धि कौनसी रहे हैं? मांॅ तीन चलो एक गंभीर प्रश्न का कितना हल्का उत्तर किया था तो क्या शीला को भी साथ दिल्ली ले जा रही हैं? तीन । मैंने शीला की ओर देखा उसका चेहरा पूछा हुआ हूँ पता नहीं क्यों? कल तक तो दिल्ली जाने के लिए उतावली थी । क्या हो गया उसे मधुर ऍम उनका चीज ही कम खेला हुआ था । कॅश वो चाहिए कटवानी और हो क्या? हाल चाल हैं, ठीक है कई अपन लोग चलती है । अच्छा है तुम भी चलो ना फिर वही सोच रहा हूँ । अब सोचने के लिए रखा ही क्या है? नहीं चाहिए । मेरा मतलब था कि दिल्ली लौटाऊं पढो लिखो । कोई अच्छी सी नौकरी पकडो शादी करो और सिर्फ तथा नहीं हूँ । मधुर ऍम नहीं । मैंने उन्हें देखा से जल्दी ही कम से कम दो बच्चों के पिता बन जा फेमस कर रहे थे । मैं जानता था मधुर बापू कुछ पहुँच गए पर कहना सके मैं स्पष्टवादिता पर होता है । मैंने कहा हाँ अब कुछ और कहना चाहती थी नहीं तो फिर भी सलाह देने के लिए यहाँ पटके क्यों थे? सोचा कहीं मन्दाकिनी नाराज हो जाएगा करें । इसमें भी नाराज होने की क्या बात है? मन था कि नहीं? ये सलाह मैंने रात साहब को एक खास वजह से दिए । क्या खास वजह बच्चे पत्नी के पाव में जंजीर बन जाती है । फिर वो वेयर थी, भाग पाने में असमर्थ होती है की गहमा कर सके । ऍम भी रहेंगे । पश्चिम ही मधुर पापु ने वातावरण को सहन कर दिया । क्या बज रहा है मंदाकिनी मधुर का तो तैयार होकर साढे अगर नौ बजे वाली बस पकडने का इरादा हो तो आप चलना चाहिए । मैंने उनका अभिवादन किया, सुखद यात्रा की कामना की और वापस अपने कमरे दिया गया ।

Part 17

मैं काम पे सकता हूँ । इतने दिनों से अंदर से बंद रहने वाला काम राम आज पहाड से पाँच एक बडा सा था ना उस कमरे पर छोडने लगेगा । मधुर आप तो इतनी जल्दी क्यों कर रही है? बस नौ बजे आती है होटल से बस स्टैंड सिर्फ पांच मिनट का पैदल रास्ता है । फिर उन लोगों ने अपनी सीटें भी रिसर्च कर रही हूँ । मन था के नीचे के चले जाने पर क्या यहाँ सोनसा नहीं हो जाएगा? तभी मुझे आना की साढे आठ बज रही । आज तीनों सुबह की चाय भी नहीं किया । मुझे बैठ की क्या था? मैंने दिनों को आदेश दे रखा था कि सात बजे तक चाहे जरूर लेना चाहेंगे । जगह घूमी हूँ तो आज तीनों को किया हूँ । शायद हो सकता है तो सुपर चाहे लेकर आया हूँ । मैं तो गहरी नींद में सो रहा था । शायद से मुझे लगाने की कोशिश की होगी । असफल रहने पर हो चाहे वापस ले किया हूँ । मैंने सर्विस वाली घंटे का बटन दबा दिया और दिनों के आने की प्रतीक्षा करता हूँ । मैंने अपने मुंह पर हाथ सीरम तो दाढी पूरी तरह से चुकी है । मैंने शेरघाटी का फैसला कट गया । अब अपने आप को छिपाए रखने से क्या फायदा? मुझे लोगों ने ही नहीं मैंने अपने आप को भी तलाश दिया था । मैंने शेविंग का सामान नहीं का ऍम के पास खडे होकर ऍफ को निहारा । कितना परिवर्तन आ गया था मुझे दैनिक काॅलर ट्रक कट कर छात्रा नहीं तभी दरवाजा खुला । एक परिचित सब व्यक्ति साधिकार दरवाजा खोलकर अंदर आॅस्कर खडा क्या? आश्चर्य कर कर मैंने पूछा कहीं आपने भी कम थी ना? तो तुम होटल के ब्लॅक दिनों क्यों नहीं आई? नहीं नहीं क्या हो गया उसे । आज सुबह की चाय भी नहीं थी । उस की दो दो कल रात से ही नहीं है । साहब क्या कल रात से ड्यूटी पर नहीं है, किसी की छुट्टी पर गया है? नहीं तो क्या उसे नौकरी से निकाल दिया गया है? जी नहीं तो खुद नौकरी छोडकर चला गया । कुछ पता नहीं था हम किसी को उसके बारे में कुछ पता नहीं साहब । वो अचानक किसी को बिना कुछ कहे चला गया । रात को उसकी तलाश भी की थी तो वो तो ऐसा गायब हुआ कि कुछ पता ही नहीं चलता हूँ । इस बार मेरा अंतर काम किया हूँ । वो गरीब भी था कि कहीं होटल की मालकिन कि वास्तव का शिकार होकर नैनीझील की अतल गहराई में तो नहीं पहुंच गया । क्या होगा जिस पांच करता था नहीं हूँ रोज के कारण मेरा रोम रोम काम किया मेरा चीज जहाँ हूँ कि मैं अभी नीचे जाओ होटल की मालकिन से चीखकर करूँ बताओ तीनों कहाँ ही होना बताए तो उसकी गर्दन मरोड कर रहे हो जो आपने घंटी बजाएगी हूँ । चाय लूँ तो तीनों का कुछ भी पता नहीं जी हो चुकी ठीक है आप चाहिए फॅमिली आई नया पहला चलेंगे । दाढी पर काफी सावन पुत्र चुका था । फॅार उठाकर गाडी साफ करनी शुरू की । मन बेहद देखना था । एक तो मन ताकि नहीं जा रही है । उधर तीन तरह से मैं परिस्थितियों में गायब हो चुका था । मैं खेमन से दाढी बना रहा था और उस मना स्थिति के कारण मैंने एक दो जगह कंकाल भी कहा गया था । रिजर्व को धोकर मैंने रख दिया । फिर को तौलिये से पहुंचकर आफ्टरशेव लोशन लगा दिया । सारी मुख पर एक विचित्र सी चरमराहट नहीं गई । तभी फिर कमरा ऍम मैंने पलट कर देखा हूँ । पूरी तरह होंगे कल फांसी पर होटल की मालकिन खडी थी ठगा सब्सिडी तरह है मैं जनता किसी मूर्ति जैसी पोस्ट बनाई कमरे की चौखट पर खडी थी । मैंने पहली बार उसी ने कहा भरकर देखा ना? मास्टर तो बेहद आकर्षक लग रही थी कि तुमको राणा गदर आया भरा ऍम बडी बडी आंखें कि खेलना । उससे अपने शरीर से कसकर शॉल लपेट रखा था । शॉल में उसकी दोनों पुष्ट कोरियाइयों का उपहार स्पष्ट नजर आ रहा था । मुझे बेहद यौनि आकर्षण से युक्त लगी, पर वो भी मेरी तरह जैसे देख रही थी । जैसे कहीं इस वक्त लोग भी खो गई हूँ । आई आई मैंने उसका स्वस्थ संगठन करती है तो मुझे लग रहा था मैं गलत कमरे में आ गई हूँ कि शायद अब गलती से सही कमरे में आ गई । मैंने औपचारिकता निभाती, गलती से नहीं जानबूझ कर रही हूँ तो कमरा क्यों गलत लगता आपको देखकर ऐसा ही मैं तो सुबह अच्छा । वो कैसे? जरा शीशे में अपना बहुत देखी तो तुम्हें देख चुका हूँ । बस छे करने के बाद आपका व्यक्तित्व कैसा निकला हूँ? मालकिन के मुख से अपनी प्रशंसा सुनकर में काम किया । मैंने प्रसन्न बदल दिया । मैंने पूछा हूँ आज सुबह ही सुबह कैसे कष्ट किया ही रहते हैं । आपका पडोस वाला कमरा खाली हो रहा है ना उसी का चार्ज लेने आई थी । अच्छा इधर आई तो सोचा आप को भी पूछती चलू आपको कोई तकलीफ तो नहीं । हाथ के राज में रहते हुए किसी को तकलीफ हो सकती हूँ । आप रुक रही थी था फिलहाल काम ही कोई तकलीफ हो तो मुझे जरूर बताइएगा । अचानक मुझे कुछ याद है । मैंने पूछा हूँ ये तीनों कहाँ चला गया? कल रात से उसका कोई पता नहीं । क्या आपने उसे नौकरी से निकाल दिया? जी नहीं, मैं क्यों निकालती? शायद वो अपने वर्तमान मेहतन से असंतुष्ट था इसलिए खुद ही छोडकर चला गया होगा कितना पर ये कितनी गलत बात है । कितनी गैरजिम्मेदारी की बात है । भागना हो तो बता कर जाए । इंसान मेरे अंतर का छोड कुल बोला था मैं कैसे? समझौता मालकिन भागने वाले भर्ती ही इसलिए है कि वे किसी को कुछ भी नहीं पता । पानी में और समझ होती भी जानते हैं कि उनकी सुन नहीं पाना । कोई भी में इस बात को तबाह किया और बोला मैं से आदमी काफी होशियार था । आपका तो चार रुपये बढाते तीन तो शायद रात साह ये बडी खराब कम होती है । इन्हें इंसान से नहीं पैसे से होता है । आप कितना ही बढा दीजिए, एक अभी संतुष्ट नहीं होंगे । यहाँ तो चार रुपये ज्यादा मिलने की संभावना हूँ । हाँ, पुरानी से पुरानी नौकरी छोडकर बहुत खडे होते हैं । मैं तो तंग आ गई हुई हूँ । ऍम मैंने देखा बरामदे से मधुर बोल रही ऍम एक पहाडी कुली आगे आगे सामान्य कर नीचे उतर गया । उसके पीछे थे । मतलब हूँ मन्दाकिनी सुशील पी जा रही थी उनका अभिवादन करती कि मैंने कहाँ छोटी अच्छा मैं चलती हूँ कहकर होटल की मालकिन नीति चली गई । मैंने नोट किया मधुर बाबू तथा मन्दाकिनी एक तक मेरे मुख की ओर देख रही थी । इस तरह के देख रही हैं आप लोग मुझ से रहा नहीं किया । मैंने पूछ लिया । हाथ भी बन गए हम । इस तरह ये मधुर बापू कस्टमर तुम्हारा रूपांतरण हो गया है । मंदाकिनी ऍम और इस पर को सिर्फ मैं ही हूँ । अच्छा मिस्टर राज । पता तो तुमने रखी लिया है दिल्ली आओ तो मिलना जरूर कहकर मथुरा पूछ रहे हैं । मंदा की नहीं की सहायता उनकी अच्छी थी । मेरी निगाहें शिला पर पडी । कुछ नहीं लग रही थी । फिर उचित प्रसन्न होना चाहिए था । मुझे लगा शीला मत से कुछ कहना चाहते थे, कह नहीं पा रही थी इसलिए का तक दृष्टि से मेरे को देखती हुई सकती हुई नीचे चली गई । लोगों की चाहते हैं मुझे ऍम नया पहना यहाँ चाहिए रखकर चलती है । मुझे पहले और मेरी मेरी फॅमिली तीन होता तो कहता साहब चाय बना दूँ, बैठे चाहे पीछे माफ कीजिए । आज बहुत देर होंगे । मैं कुर्सी पर बैठकर अपनी भी चाय बनाने लगा । तभी शीला हाथ बनाती हूँ मेरे कमरे में रखी हूँ नहीं किया । मेरी समझ में नहीं आया कि शीला क्यों वापस आई तो मैं जैसे तैसे आपसे प्रार्थना करते हैं । हाँ बोलो शिला, अब तीनों को दिल्ली तीनों तो है कहाँ? वो आपको बस स्टैंड पर मिलेगा? ऍम हाँ हुजूर और सुबह से शाम तक नहीं आपका इंतजार करेगा । कहकर शीला जाने के लिए मूॅग शीला ठिठककर में तीनों के बारे में ये सब कैसे मालूम? हिला कुछ नहीं हुआ । तुम दिनों के लिए क्यों सिफारिश कर रही हूँ? साहब मुझे तीन हो रही है साहब और मेम साहब आगे चले गए हैं । मैं बहाना बना कर दो मिनट के लिए आई हूँ । बच्चा नहीं हिंदी तो मेरी बातों का उत्तर नहीं होगी तो तो कैसा होगा तुम दिनों की नौकरी दिल्ली में चाहती हूँ हो आपका बडा उपकार होगा हम दोनों पर । तो फिर मेरे पहले वाले प्रश्न का उत्तर दूं मेरा आदमी है वो कहकर शीला पिना अगले प्रश्नोत्तरों की परवाह करती हुई छत भक्ति मैं तो का असर है । एक ऐसी पहेली है यह कैसा गोरखधंधा है तो कहता था कि उसके घर वाले गांव में और को मार रही है । सेना मैंने चाहिए और खडा हूँ के तीनों नहीं छूट बोला । सोच के जिन्होंने झूठ बोला पर स्वार्थ वर्ष नहीं । आत्मरक्षा की रोटी पानी के खाते हैं । मैंने दिन में किसी भी समय बस स्टैंड बचाकर उससे मिलने का फैसला कर लिया । इतनी शक्ति थर्राहट सत्तरह व्यक्त थी । मुझे लगा मैं होटल की कमरे में नहीं, किसी ऍम क्या पडोस का कमरा खाली होने से इतना अंतर पड गया और कमरे भी तो ही । उनमें भी तो लोग रहती है । कल उन सबसे ऍम थी । मुझे लगा अपने इस होटल में ही रहता हूँ और इस की जरूरत है क्या जिंदगी की आप खुद ही रहस्यमयी गांठों की यंत्रणा से निरंतर कार्य सारी छटपटाहट पर अब नियंत्रण से मुझे मुक्ति मिलती है । पनीर खाती मैंने वापस दिल्ली लॉटिंग का फैसला की क्यों नहीं? दोपहर के बाद किसी कसी चलता हूँ पर उससे पहले होटल का हिसाब साफ कर देना चाहिए । मैं उतर के नीचे लाउंज पहुंच गया । होटल की मालकिन मुझे कहीं दिखाई नहीं थी । मेरी आंखें उसे तलाश कर रही हैं । तभी मुझे अंदर से डांट फटकार के स्वर आती सुनाई थी । शायद होटल की मालकिन नौकरों और भैरो को डांट फटकार नहीं में खडा प्रतीक्षा करता हूँ वो बाहर आगे तो तेजित और काम कमाई हूँ मुझे देखते ही उसका रूपांतरण हो गया तो सही हो गया उसके होठों पर मुस्कान ऊपर बडी सस्ती और ऍम मेरा मन मैं कृष्णा से भर गया । कहीं क्या सेवा की जाए? ऍम पूछा उन नहीं साफ करते हैं ऐसा उसकी इतनी जल्दी क्या है? मैं जा रहा हूँ । जा रही हूँ ऐसी चौकडी कब आज अभी थोडी देर में पर इतनी चलती हूँ । इसमें जल्दी की क्या बात है हूँ । पर अभी कुछ देर पहले तो आपने कोई फैसला नहीं किया था । कहकर वह फिर मुस्कुराई अकेली है । मैं समझ रहा हूँ कहकर मैं मैनेजर वाली सीट पर जाकर जमकर कुछ रजिस्टर फॅमिली नहीं ही क्या समझे हैं । कुछ हूँ मुझे क्या फायदा था उसने जो कुछ समझा है समझ नहीं हूँ उससे मुझे अन्तर पडता है । उसने बिल बना लिया । फिर मुझे देती हुई बोली आशा है आपको यहाँ कोई असुविधा नहीं हुई होगी । जी नहीं नहीं आपको यहाँ का प्रबंध पसंद आया । बाहर तो अगले साल आएगी तो यही ऍम अवश्य पहले से लिख देंगे कि आप आ रहे हैं तो सुविधा रहेगी । अच्छा । मैंने बिल का पेमेंट किया बचाने के लिए मुझे ही था । मुझे लगा की मालकिन की आंखों में एक ढकी दबी सीट था । महराई । अगले साल तो के लिए नहीं आना है । इस व्यक्तिगत प्रश्न को सुनकर में ठीक है क्या मैं पाँच तक मैंने पूर कर मालकिन की ओर देखा था और हादसे का ऐसा मिश्रण हम देखने को मिलता है । मैं का मतलब नहीं समझा । अगले साल हनीमून के लिए आई ऍम उसने हनीमून शब्द का उच्चारण किया । इस तरह की मेरे रूम रूम में उत्तेजना, भर्ती कुछ कन्सेशन दीजिएगा । सब कुछ फ्री कहकर खिलखिलाकर बातों के सिलसिले को आगे कायम रख पाने का साहस मिला चुक किया था । मैंने उसे धन्यवाद दिया और अपनी कमरे में आ गया । नाटक के अंतिम अंक के लिए मैं सच्चा पूरी हो चुकी थी ।

Part 18

जिस रास्ते से मैं उसी से वापस ॅ किसानी और इस लॉटरी में जमीन आसमान का अंतर बस से आया था । हॅूं अकेला आया था पर अब तो इंसान के साथ पिछली सीट पर मेरे बगल में बैठी हूँ । अगली सीट पर ड्राइवर के साथ नहीं था । धनवान पर टैक्सी बढती जा रही है । भयंकर मोर ओवर सर्पाकार कुशमूल सडक पर तीस ऍम कई बार मुझे ऐसा लगा कि जैसे पार पार कोई मुझे सोर्सिग करते छोटी छोटी था । मैं आया था तब उदास दुखी था । असंतुष्ट वहाँ का हुआ एक इंसान था एक गलत पैटर्न का शिखर, ऍम ऍम परिपक्वता ऍम अरे ऍम, मैंने जीवन के सुख के स्रोत की तलाश कर रहे थे । मैंने सफलता की महामंत्र के दर्शन करेंगे । जिंदगी सुख, टुक, सफलता, सफलता, अंधेरे, रोशनी की आंख नहीं चाहिए । ये हमारे हाथ में है कि हम कब की स्थिति को कैसे संभाला । एक ही स्थिति से विभिन्न हूँ । इस तरह से जूझती शेखर और अनीता भाभी को ही ले ली । यदि संतान नहीं होती तो क्या ये ऐसी भयावह स्थिति हैं जिससे पति पत्नी के संबंधों की सारी मधुरिमा नष्ट हो चाहे कदापि नहीं । अल्पसंख्य व्यक्ति ऐसे हैं जिनकी हम बच्चे नहीं होती हूँ । क्या फर्क पडता है । घर सुना अच्छा है ये शांति इतनी फिर मामा जी नहीं समस्या को सुलझाने का प्रयास किए । अनीता वहाँ भी किसी बच्चे को कोहली है ना, इससे कोई फर्क नहीं पडता था । पति पत्नी संतानहीन होने के बावजूद सुखी रह सकती हूँ । ये सिर्फ सोचने पर निर्भर करता हूँ । इस प्रश्न को लेकर जीवन को विश्वास बना देना कहाँ की थी? मानी मुश्किल है । यदि मैं ऐसी स्थिति में रहूँ तो मुझे बडा सुख नहीं । मुझे तो शांति पसंद है देश की आप पार्टी पहले ही बहुत पड चुकी है । यदि एक परिवार इस वृद्धि में सहयोग नदी क्योंकि तीन अच्छी बात है । ये स्थिति जनहित नहीं नहीं । अनीता भाभी पडी लिखी होकर भी न समझे की बात क्या है? और शेखर भाई इतनी बुद्धिमान होकर भी अनीता भाभी को समझा नहीं पाए । सिर्फ दृष्टिकोण की बात थी मैं हम दोनों के संबंधों में असंतुलन उत्पन्न होने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता था । मन्दाकिनी तथा मथुरा हूँ मंदाकिनियों एक आधारहीन गलतफहमी का शिकार हो गई । पता नहीं कितनी वैवाहिक संबंध इन छोटी मोटी महत्वहीन गलतियों के कारण तो नहीं हो जाती है । पति यदि परिस्थिति से बात भी कर लेता है या उसके साथ किसी रेस्ट्रों में बैठकर एक रैली कॉफी पी लेता है । कभी कभार पिक्चर देखा था तो नारी क्या सोचती है कि उसके अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण हो गया । शायद है संकुचित मनोवृत्ति का परिचायक तंग भी है दफ्तर में से पुरूष साथ साथ काम करेंगे तो ऐसा होना एक दम स्वाभाविक जिंदगी सच मुझे एक पूछ रही थी । जहां शीत ऋतु आती तो फिर बसंत भी आता हैं जिंदगी में पाल घर के लिए निराशा का अंधेरा चाहता हूँ तो शीघ्र ही आशा की चटकीली थूक पिक्चर रहती है । सब हमारे हाथ में है हम चाहिए तो अंधेरे ऍम चाहिए तो मेरे को तीस रोशनी में बदल सकती मैंने पहले छेनी के लोगों को देखा ऍम जो है कुंडली टक्कर नहीं ऍम अपनी आंखों पर चढे काले चश्मा को उतार फेंक ऍम टैक्सी की खिडकी से बाहर है भारी बारिश से सारे चेहरे मेरी मन की आंखों क्या क्या रही थी कॅश भाई की भी छोडने के कारण दुखी है सुख दुख से टाॅक ऍम असंतुष्टि के कारण निराश शेखर भाई, अतिरिक्ति और अपूर्णता की चारदीवारी में कैद, जीवन से कटी फटी अनीथा जीवन की घनीभूत, तेरह का प्रत्येक मन की एक गलत पैटन की शिकार ताकि जीवन को चीनी की अदम्य लालसा सी प्रेरित मथुरा । जीवन के आधारभूत सुखों की सोच भी छुट्टी तीन हर में शायद इन सबका योग पर जीवन के वीरान रेगिस्तान में झटका । एक जैसे चीनी का महामंत्र मिल चुका था । पर अब सब कुछ सामान्य होटल की मालकिन कपील कपील मेंट करके मैं ऊपर अपने कमरे में पहुंचा । सब कुछ डिलीट क्या सलाह नहीं तो वो चार चीजें जो इधर उधर बिखरे थी । इकट्ठी काॅफी में लगाएंगे । एक बच्चे दूसरी बस दिल्ली जाती थी । मैंने उसी में वापस लाइटिंग का फैसला कर लिया । मैंने सोचा क्यों? ऍम इधर से काफी भीड भाड चल रही थी । यदि समय पर टिकट नहीं मिला तो बडी परेशानी हो जाएगी । एक बच्चे वाली बस आंख नहीं । फिर एक दिन नैनीताल में और ठहरना पडेगा । मैंने कमरे का दरवाजा बंद कर दिया । ताला लगा हूँ और बस स्टैंड की ओर चल दिया । मैं गिरिजाघर कि समीर पहुंच गया । चटकीली धूप में उसका क्रॉस तब तब कर रहा था । मेहंदी की झाड के पास ऍम सुनी थी । दूर चाइना पीठ पर सफेद झंडा फहरा रहा था । मैं नीचे सडक पर हूँ । खेल की सतह एकदम रुपहली से लगते हैं । बस स्टैंड पर पहुंच फॅमिली खेती की ओर जाने ही लगा था कि मेरे जाने कहाँ से भी नहीं निकला है । मेरे सामने आकर उसे हाथ छोडे । फिर अचानक मेरे पाउच होने के लिए छुपके । अरे ये क्या कर रहे हो? कहता हुआ मैं दो कदम पीछे हट के हम तीनों को दोनों कंधों से पकडकर उठा रहे हो । जो हमारी बात है आपके भरोसे पर ये मैंने होटल की नौकरी छोड दूँ । मैं तो आज सुबह बेहद कबरा किया था । तीन क्यों मुझे तो बचाना गायब हो गए थे । मैं तो समझा कि दीनू कुछ नहीं तो सिर्फ मुस्कुराती । पर तुम इस तरह मालिक इनसे बिना कुछ कहीं सुने पहुंॅचा कैदी जेल से भागने के लिए जेलर से इजाजत लेता है । किस टाॅस तो मुझे दिल्ली ले चलेंगे ना । तीनों वहाँ छोड कर गए । नेता की मूर्ति बनकर खडा रहूँ । मन ही मन सोचने लगा आदमी मेहनती, ईमानदार और विश्वासपात्र घर में कोई नौकरी टिकता ही नहीं । शायद तीनों जम जाए । मम्मी पापा को क्या आपत्ति हो सकती है । यदि वे उसे घर पर नाम भी रखना चाहिए तो किसी दफ्तर में दैनिक मजदूरी पर रखा देंगे । वहाँ से भी इसी करीब सौ रुपये महीना मिल ही जाएंगे । मैंने मन ही मन दीनों को दिल्ली ले जाने का फैसला काट दिया । पर तभी मुझे शीला किया था । ग्रोथ की एक लहर है । मुझे हिलाकर देखो तुम झूठी बोलते हो । मैंने पूछा नहीं तो मैं और झूट तीनो कुछ काम करा सकते हो । एक बार से तुम झूठ बोल रहे हो वो जोर आप माई बाप हैं । मैं आपसे झूठ बोलने लगा । तुम्हारी घरवाली गांव में है ना । इस बार तीनों का चेहरा हो गया वहाँ छोडकर पूरा तो क्या वो जो आपको सब मालूम हो गया? हाँ शीला नहीं बताया हूँ हूँ अब आपसे क्या छिपाना? आज से मैं झूठ नहीं बोलना चाहता हूँ । फिर जिंदा रहने की खातिर बोलना पड । होटल में किसी को भी इस बारे में मालूम नहीं है इसलिए मैंने सोचा दीवारों के भी काम होते हैं ना हो चुकी हूँ तो तुम लोग कैसे मैनेज कर लेती थी? हो जो मैं तो यहाँ काम करता ही था । घरवाली को कब तक गांव में अकेला छोड सकता था पर उसी यहाँ बुलाकर अलग भी तो नहीं रख सकता था । बस उसे होटल में बुला लिया । वो अजनबी बन कराएंगे, माल की नहीं होटल में कुछ शर्तों पर रख दिया उसे खाना और रहना मुझे इसके एवज में दोनों वक्त रसोई के बर्तन साफ करना हाॅर्न तो कुछ नहीं पर मालिकिन में एक बात की इजाजत देती होटल में ठहरने वालों को यदि नौकरानी की आवश्यकता हो तो उनका काम करके उनसे वेतन ले सकती थी । कमाल है अब वो जो शीला तो दिल्ली चली गई है तुम्हे चलों की देखो हूँ । तीनों खुशी से नाच उठा । मैंने जेब से पर्स निकाला । अब एक की जगह दो टिकटे नहीं नहीं थी हूँ मैंने पैसे की नहीं मेरे पास पांच रुपए की कमी थी । अब तो हमारे पास कुछ पैसे ही नहीं हूँ । मेरे पास तो हो जूते फूटी कौडी भी नहीं । फिर क्या शेखर भाई के पास जाकर मानना चाहिए मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा था । मैं चिंतित हूं । क्या बात है वो टिकट के लिए रुपये कम पड रहे हैं कितनी पांच रुपये? हाँ छुट्टी दिनों की आंखें चौडी हो गयी । वो दृढ स्वर में बोल रहा हूँ जो आप ही ठहरी । मैं जाता हूँ शायद काम बन जाऊँ । तीनो चला गया । झील के तट पर लगी रेलिंग कर कोहनी टेक कर खडा हो गया है । करीब आधा घंटा बाद ऍम हो गया काम मैंने उत्सुकतापूर्वक पूछा कहाँ हूँ क्या जमाना आ गया है आज छह महीने हो गए पांच रुपये उधार लिए साला देता ही नहीं अच्छा दिन तुम बेफिक्र हो । मैं इंतजाम कर का जब तक मैं ना लौटू ही रहा हूँ, बहुत अच्छा हो । मैंने रिजर्वेशन खिडकी से पूछताछ की तो पता चला कि यदि मैं एक घंटे बात यहाँ तो दिल्ली के लिए दो टिकटे मिल जाएंगे । होटल की ओर चाहता हूँ । मैंने मन ही मन होटल की मालकिन से पच्चीस रुपये उधार मांगने का फैसला कर लिया । आज शाम को दिल्ली पहुँच जाऊंगा । कल ये उसे मनी ऑर्डर कर दूंगा । पांच रुपए मांगने में मुझे शर्म आ रही थी । फिर रास्ते में खर्चे के लिए भी तो चाहिए था । होटल हो मालकिन राउंड में मैनेजर की सीट पर जमीन बैठे थे । मैंने उस से अनुरोध किया पैसे देने के लिए फौरन तैयार हो गया । पर शायद आपको पैसों की जरूरत नहीं पडी हो । क्यों ऊपर आपके कमरे में कुछ मेहमान इंतजार कर रहे हैं । मेहमान में चौंकियां बुरी तरह घबरा क्या आखिर समय पर ही फोन किया सर मेरी कमरे में तो साला नहीं था । मैंने इसे खुलवा दिया था । आपने डुप्लीकेट चाबी से हूँ । फटाफट सीढियां चढकर ऊपर अपने कमरे में पहुंचा पहुंचा तो दंग रह गया । मम्मी और शेखर भाई वहाँ मौजूद थी । मुझे देखते ही मम्मी पलंग से उठी और मुझे वक्त से मुझे भेज कर भी के गले में पूरी धीरे बच्चे तो मिल क्या? उन्हें हम सबकी जान ही निकाल कर रही थी । आपको कैसे पता लगा? मुझे सब मालूम होना चाहिए था । भ्रम में जैसे मान काम ही नहीं कर रहा था । कल रात दस बजे शेखर ने फोन किया था । बस सुबह चार बजे टैक्सी लेकर चल पडी । इतनी सुबह इतनी दूर का सफर और अकेली टैक्सी लेकर चलती है हूँ थे । पंत नगर वाली मामा जी भी तो दिल्ली आए थे । वो भी साथ थी । मामा जी पन्द्र नगर उतर के नहीं तो मामा मामी जी से घर के घर है । मैं धीमे धीमे सहज होने लगा । घर पर सब ठीक है । अच्छा ठीक होना है । सब का बुरा हाल हो गया है । अलका कैसी है उसे देखेगा तो तुझे लगेगा । जैसे महीनों से बीमार है वह हूँ । आज तीनों भी रोज करती है । बहुत परेशान थी । परसों तो उसकी आंखों में आंसू आ गए । अच्छा कहकर मैंने कनखियों से शेखर भाई की होते उत्तर ऍसे आराम कुर्सी पर बैठे । अच्छा तमाचा किया तो नहीं रहा । नाक में दम हो गया । सारे जान पहचान वालों में तहलका मच गया । एक आये, दूसरा चाहिए फोन बाहर से आने जाने वालों का तांता लग गया । खोई हूँ के लिए मन नी अभी भी हम करती है जी नहीं ये भागे हुए लोगों की तलाश है । पर शेखर ढाई पहुंचते । अचानक मुझे मामी जी का कहना तो पंत नगर के कृषि विश्वविद्यालय में लेक्चरर मैंने पूछा मामा मामी से कैसे आई ही नहीं । मालूम नहीं तो भैया के पांचवें लडका हुआ है । पांचवां तो लोग लडके के लिए लडकियों की लाइन लगाते चली जाती है और यहाँ मामा जी ने एक लडकी की खाते पूरे पांच छोकरों की लाइन लगती है । शेखर भाई ने भी अपनी चुप्पी जो उसी गलती का प्रयास चित करनी है चाहूँ ऑपरेशन कराने आए हैं । मैं बेवकूफ की तरह पूछना था । शेखर की बिगडी बनाने आए हैं बच्चे मम्मी ऍम कैसी बिक्री मैं कुछ समझा नहीं । मम्मी तेरे मामा मामी शेखर की बहु को समझाने बुझाने में लगी हूँ । यदि वो राजी हो गई तो बस काम बन जाएगा । मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा । मम्मी तुम तो एकदम गार्डन हो गए । हो रहा शेखर भाई उत्तेजित होकर पूरी मामा जी अपना मातृत्व अनीता को सौंपना चाहती हैं । मतलब वो चाहती है नेता भावी उनके नवजात शिशु को गोद ले ली नहीं पूछ रहा हूँ । हाँ जी हाँ शुक्र है ना । समझ में तो आया करीब के लिए । अभी से मतलब है कि इसके लिए इतनी जल्दी मैंने तुझे बताया था क्या प्रकृति ने अनीता को मातृत्व का वरदान नहीं दिया । कुछ देर के लिए कमरे में सन्नाटा छा की । तुमने यहाँ का सब हिसाब किताब कर दिया है । मम्मी ने पूछा हूँ चलिए चलिए आप बेकार परेशान मैं तो आज खुद एक बजे वाली बस से लौट रहे पर हमें क्या मालूम था आपका इसकी जगह टैक्सी क्यों नहीं आई? टैक्सी में तो बहुत पैसा लगा होगा । दोनों तरफ से कर ली थी इसलिए सस्ती पड गई । फिर भी काफी पैसा लग गया होगा । लग जायेंगे पैसा किस लिए । बस में आने से क्या परेशानी थी । पहली बस शाम से पहले नहीं पहुंचती । किसी को सब्र नहीं हो रहा था । मैं तो चाहती थी कि मेरे पंख लग जाएगी और मैं छोडकर नैनीताल पहुंचे । हम लोग उठे ऍम मैंने अपनी एकमात्र अटैची उठाई चल दिया । होटल की मालकिन ने मुझे घूरकर देखा और मुस्कुराती कब नहीं चाहिए । मैंने कहा हूँ उसे मुस्कराती नहीं आपका बहुत बहुत धन्यवाद । यहाँ सब तरह की सुविधा थी मैंने । औपचारिकता नहीं हम तीनो बाहर आएंगे । तब दंडी से उतरते हुए मुझे तीनों की आदत नहीं । मम्मी से उसके विषय में बातें कीं । उन्होंने खुशी खुशी से दिल्ली ले जाना स्वीकार कर लिया । हम रोकने के मालरोड पहुंचे । टैक्सी वहीं खडी हमारी प्रतीक्षा कर रहे हैं की कृष्ण हूँ दिल्ली अभी चल देना चाहिए क्या शेखर भाई के यहाँ दोपहर का खाना खाते हैं? शेखर भाई का अनुरोध था की हम लोग ऍम थी नहीं मेरे लिए नैनीताल एक पढाई जगह बन चुका था । मुझे लग रहा था कि अभी इस जगह में कोई आकर्षण शेष नहीं रहेंगे । हम लोग को नहीं दिल्ली जाने का फैसला नहीं । जैसा भी फैसला हूँ हमें लिखते हैं । मम्मी ने टैक्सी में बैठे हुए शेखर भाई से अच्छा अनीता को समझाते हैं । भारत आधी अधूरी जिंदगी जी कल कभी कुछ नहीं रह सकती है तो दूसरों को खुश रख सकती है । कोशिश करूँगा बिना एक बच्चे के जीवनक्रम भंग हो जाता है । मैं जानता हूँ आंटी जी मैं भी टैक्सी में बैठ गया । मम्मी ऍम शेखर खाई टैक्सी की खिडकी पर ऍम अंदर जहाँ मेरी और देखकर मुस्कराए ऍम इसकी अधूरी जिंदगी को भी पूरा कर दीजिएगा । ये भाग दौड हो जाएगा । किसी काबिल हो जाए ये शेखर घंटी जी कुछ होते हैं जो काबिल होने के बाद ही शादी करते हैं । कुछ ऐसे भी होते हैं, शांति के पास काफी हो जाती है । ठीक है तुम्हारी अंकल से बात करूँ । खेखर खाई ऍम तीनों महान खडा मेरी प्रतीक्षा कर रहा था । हम लोगों की निर्णय को सुनकर वाॅल । पहले पिछला दरवाजा खुला । मम्मी के पांव का स्पर्श की, इंटर फंसा बंद करके अगली सीट पर जाकर पहनेंगे । टैक्सी तेजी से पहाडों से उतरती काठगोदाम कि समीर पहुंच रही थी । इस बीच में वह ख्यानत जिसकी नई कम उम्मीद थी । अभी आपकी तरह मेरे अवचेतन मन को चकली हुए था मेरी अम्मी के बीच जैसे मान का पट्टा टंगा हुआ था । मम्मी बार बार उसे हटाने की कोशिश कर रही थी तो हम कोई तकलीफ तो नहीं हुई ना रहा नहीं तो शेखर की यहाँ क्यों नहीं? पहले ही होटल में अकेले रहने से मुझे डर तो नहीं लगा । मैंने कोई उत्तर नहीं दिया । सिर्फ भेज दिया । मुझे पैसों की तंगी तो नहीं हुई नहीं फिर मन कैसे लगता था? पी कुछ विमान का एक बहुत लंबा तरह मेरे ख्याल से तो उस बात का अभी तक नहीं भूला है । मुझे लगा मम्मी ने बडा साहस जुटाकर ये प्रश्न पूछा ही मैंने कनखियों से देखा तो मेरी ओर नहीं हाथ नहीं मैं मानता हूँ आंखों से दिखाई देने वाली स्थिति भी अक्सर जिंदगी की सच्चाई नहीं । अब कहना क्या चाहती है । जिस पथरीली सडक पर टैक्सी दौड रहे हैं ना? कौन जाने इसके अंदर में एक मीठी चल कीधारा चुपचाप रह रही हूँ तो क्या वो सब छूट था? हाँ, मेरी बेटी तो सिर्फ एक नाटक था, एक साथ थे । साथ ही नहीं वो तो एक सीढी थी जिसपर पहुंॅची हाँ नीचे उठना चाहती हूँ । सोचती हूँ वो सब कहाँ तक उचित था । मम्मी हूँ मैं दिल्ली लौट रहा था बडी खुशनुमा अनुभूति हो रही थी मुझे लौटना हमेशा स्टेशन का श्रृंगार होता है हूँ हूँ सबको मेरे बच्ची हूँ हूँ । मैं महसूस कर रहा था मेरा पुनर्जन्म हो रहा है । जिंदगी की आंख नहीं जानी चाहिए थी अंधेरे के पास रोशनी का सैलाब उमर पडा था ।

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