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अम्मा: जयललिता -1 (अम्मा)

आप सुन रही है तो कॅश किताब का नाम है अम्मा जयललिता कैसे बनी एक फिल्मी सितारे से सियासत की सरकार जिसे लिखा है वासंती है आर जे मनीष की आवाज में कोई ऍम सुनेगी जो मन चाहे हम मुझे सिर्फ दो साल की थी जब उसके पिता चाहे राम का मृत शरीर घर लाया गया । बहक काली दुखद रात जयललिता की स्मृति में अब भी जीवन है और उनके उठापटक भरे जीवन के निराशा भरे पलों में सतह उन्हें परेशान किया है । असाधारण खूबसूरती और प्रतिभा से शुरू हुए जीवन को अचानक बीच भवन तरह तरह के तहत क्यों के बीच फेंका गया जिसमें अबोध बच्ची को फौलाद से बनी अम्मा में परिवर्तित कर दिया । पति की मौत के बाद जयराम की वृद्धा बेटा के पास अपने दो छोटे छोटे बच्चों पुत्र तब तो और पुत्री अमोल जयललिता को घर में सभी इसी नाम से बुलाते थे को लेकर अपने पिता के घर बेंगलुरु जाने के अलावा कोई चारा नहीं था । मूलरूप से तमिलनाडु में श्रीरंगम के ब्राह्मण रंगास्वामी अयंगर हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड में एक साधारण नौकरी पाने के बाद बेंगलुरु में रहने लगे थे । उनका परिवार आकर्षक चाहे मोहरे अत्यंत गोरे रंग के लिए भी जाना जाता था । उनकी तीन बेहद खूबसूरत बेटियां थी । मेरा काम हो जाये और पद्मा और एक पुत्र श्रीनिवासन एक आम परंपरागत रूढिवादी मध्यमवर्गीय ब्राह्मण परिवार था जिसमें हंगा स्वामी आयंगर और उनकी पत्नी कमा शर्मा रोज विधिपूर्वक पूजा पाठ किया करते थे । अपने बच्चों की परवरिश ठीक से करने की इच्छा । युवा और संदर्भ वेदा अपने पिता पर आए अतिरिक्त आर्थिक बोझ को कम करने के लिए आयकर कार्यालय में दिख सके ट्रियल काम करते लगी । हालांकि चलती ही उसे इस बात का एहसास हो गया कि अपनी सीमित ऐसे वह बच्चों की न्यूनतम जरूरतों को पूरा करने के अलावा और कुछ नहीं कर सकती है । उसी दौरान कन्नड फिल्मों के प्रति असर कैमराज अर्ज की बिना पर नजर पडी है । उसकी खूबसूरती से विस्मित हैं और उसे अपनी नई फिल्में उतारना चाहते थे । जब वो पिता के पिता की अनुमति लेने पहुंचे तो क्रोधित अयंगर ने उन्हें बैरंग वापस लौटा दिया । पिता की सबसे छोटी बहन पद्मा अभी कॉलेज में पढाई कर ही रही थी । दूसरी बहन अंबुजा विद्रोही टाइप की थी और बहन एयर होस्टेस बन चुकी थी और इसी के साथ अयान करने घोषित कर दिया कि उनके लिए उनकी दूसरी बेटी मर चुकी है । अंबुजा पर इसका कोई असर नहीं पडा । उसने फिल्मों में अभिनय करना शुरू कर दिया और अपना नाम बदलकर विद्यावती कर लिया । तहत चेन्नई में बस गए हम भुजाने बेटा से चेन्नई अगर उसके साथ रहने का आग्रह किया ताकि उसके बच्चे बेहतर स्कूल में पढ सकें । यह एक ऐसा प्रस्ताव था जिससे फिर ठुकरा नहीं सकती थी और इस तरह ठीक है और उसके बच्चे अंबुजा के घर आकर रहने लगे । बच्चों को स्कूल में दाखिला करा दिया गया लेकिन विद्यावती से मिलने आने वाले प्रोड्यूसरों को लगा कि वेदा भी देखने में किस फिल्म स्टार से कम नहीं है । उन्होंने उसे अभिनेत्री बनने के लिए प्रेरित किया और अपनी बहन की आरामदेह जिंदगी को देखते हुए नेता ने फैसला कर दिया कि अपने बच्चों को अच्छी परवरिश देने लायक संपन्न बनने के खाते हैं । उसके पास एकमात्र यही रास्ता है केंद्र राज्य । उसने एक बार फिर उसे एक भूमिका थी और जल्दी ही पेदा जिसका नया नाम संध्या था, एक व्यस्त स्टार बन चुकी थी । जम्मू के जीवन का आशांत और उथलपुथल बारा एक नया चरण शुरू होने को था हूँ ।

अम्मा: जयललिता -2 (तन्हा बचपन)

तनाव बचपन संध्या को जल्दी ही एहसास हो गया कि अभिनय के अपने प्रस्ताव जीवन में उसके लिए अपने बच्चों का ठीक से खयाल पाना असंभव था । इसलिए उसने अपने बच्चों को अपने पिता के पास बंगलौर भेज दिया । छोटे से बच्चे को हमेशा अपनी माँ की याद सताती रहती है । बच्चे संध्या के संक्षिप्त प्रभास का इंतजार करते रहते थे जब पहले उपहारों और मिठाइयों से लगी हुई बंगलौर पहुंचती थी । दोनों बच्चों को पुस्तकें पढना पसंद था पर संध्या उनके लिए बडी संख्या में कहानियों की किताबें लगती थी ताकि जब वापस चेन्नई के लिए रवाना हो तो होने के बजाय किताबों में कुल छे रहे हैं । बंगलौर के अपने नए स्कूल विशप कॉटन में हमलोग का मन लग गया था । यहाँ उसने चार साल बताये । इसके बाद बच्चों के जीवन में एक बार फिर उथल पुथल आएगी संध्या की बहन पद्मा की जो बहुत अब्बू की देखभाल करती थी । शादी हो गई और बहन ससुराल चली गई । ऐसे में संध्या ने बच्चों को दोबारा चेन्नई लाने का फैसला किया । जयललिता अपनी माँ के पास दोबारा आकर बहुत खुश थे लेकिन जल्दी ही उसे इस बात का एहसास हो गया कि उसकी माँ पहले से कहीं ज्यादा व्यस्त हो चुकी थी और बच्चों के साथ समय बिताने के लिए उसके पास नहीं के बराबर समय था । जयललिता अपनी माँ के साथ रहने की लालसा को कभी भी छोड नहीं पाए । चपेट दस साल की थी तब उससे चेन्नई के प्रतिष्ठित स्कूल चर्च पाॅइंट में दाखिला लिया । पढाई में अव्वल पहने और अपने मतलब रुपये बाहर के कारण बहुत जल्दी कि शिक्षकों की प्यारी बन गए । उसके साथ की लडकियाँ उसकी खूबसूरती कि प्रशंसक थी । उसका नाम खुला था जो दक्षिण भारतीयों के लिए असामान्य बात थी । लम्बे रेशमी बाल थे और उस पर से खूबसूरत आंखें । एक अभिनेत्री की बेटी होने के कारण उसके व्यक्तिगत क्लाइमर की एक अतिरिक्त आभाव थी । स्कूल में मिलने वाली प्रशंसा ने जयललिता को जहाँ खुशी और आत्मविश्वास दिया वहीं अंदर से पहले इस बात को लेकर बहुत खुश थी कि उसकी खुशियों और चिंताओं को बांटने के लिए संध्या कभी भी उसके पास नहीं होती थी । आगे चलकर अपनी आत्म कथा में उसने लिखा कि कैसे दो दिनों तक अपनी माँ से नहीं मिल पाने के बाद अगली रात देर रात तक चाहिए रही उन्हें अपना निबंधन दिखाने के लिए जिसका शीर्षक था मेरी माँ मेरे लिए उसके क्या मायने हैं । उसने बांध के लिए जयललिता पुरस्कृत हुई थी और उसके शिक्षक को उसका लेखन इतना पसंद आया कि उसने पूरे क्लास को से पढकर सुनाया । उस रात जब संध्या काफी देर से घर लौटी तो उसे बेटी गहरी नींद में मिली । उसके सीढी पर एक नोटबुक पडी थी । जब संध्या ने जयललिता को उठाना चाहते तो पहुँचा कहीं बहते आंसुओं के बीच उसने वहाँ को बताया कि कैसे पहले पिछले दो दिनों से उसे अपना निबंध दिखाना चाह रहे थे । संध्या उसके पास बैठ गई और उसे निबंध पढकर सुनने को कहा । जयललिता ने उस घटना के बारे में लिखा है, उन्होंने मेरे कालों को सहलाया और यह कहते हुए मुझे जो माँ की यह बहुत ही खूबसूरत में बंद हैं । मैंने मुझे गले लगाते हुए कहा मानकर मैंने तो वह इंतजार कराया । ऐसा दोबारा नहीं होगा लेकिन ऐसा बारंबार हुआ माँ का इंतजार करना एक आदत बन गई । किसी के साथ निराशा हर नाराज की पैदा हुई और वह बेवक्त घर आने वालों, फिल्म प्रोड्यूसरों और डॉक्टरों से चेन्नई लगी । उसने अपने हाथ की सारी किताबें पढ डाली । मालूम है उसके लिए इस अप्रिय माहौल से बचने का एक उपाय हूँ । उसे डॉक्टर या वकील बनने का सपना देखा था । या फिर भाग्यशाली रही तो भारतीय प्रशासनिक सेवा में शामिल होती है परन्तु पहन फिल्मी दुनिया से दूर रहने के लिए अटल थी हूँ । जयललिता को बहुत पहले ही पता चल गया था कि एक्टिंग के पेशे से बदनामी जुडी हुई है । किसी अभिनेत्री की कोई इज्जत नहीं करता है । चाहे कितनी भी मेहनत करें कितना भी सफल हूँ । संध्या और उसके बच्चे त्याग रहा है । नगर में शाॅ स्ट्रीट पर रहते थे जब जयललिता तेरह वर्ष की थी । पडोस में दो घर दूर रहने वाली एक लडकी ने उस से मित्रता की । पहली चर्च पार्क कॉन्वेंट नहीं थी से दो साल सीरियल अब उनको इस दोस्ती पर करता था क्योंकि एक सीनियर आम तौर पर जूनियरों से फैसला बना कर रखा करती थी । चला लेता खोजते कि शाम को स्कूल से आने के बाद कोई तो है साथ देने के लिए दोनों लडकियाँ छत पर जा कर पाते करना पसंद करती थी । जयललिता को मालूम नहीं था कि उसके मित्र इतना नियमित रूप से उसके छत पर आपने ऍम गुपचुप संदेशों का आदान प्रदान करने आती है । लडका एक चयन व्यवसायिक का बेटा था । बहतु घर दूर सडक के अंत के अपने मकान की छत पर खडा रहता है अपने मित्र के हरकतों पर गौर करने के बाद जयललिता ने एक दिन पूछ लिया कि आखिर चल क्या रहा है? लडकी ने बता दिया कि उसे उस लडके से प्यार है और उसने जयललिता से उसके माता पिता को यह राज नहीं बताने का आग्रह किया । उसने जयललिता से एक आग्रह और क्या की जिस दिन भर उसके यहाँ नहीं आ पाए तो वह लडके तक इशारों में यह सूचना पहुंचाते । जयललिता एक रहस्य की राजदार बनकर पर एक प्रेम प्रसंग में मध्यस्थ बनकर बहुत रोमांचित थी । अगले दिन उसके मित्र नहीं आई । जब लडके को उसके मित्र दिखाई नहीं पडी तो उसने इशारों में जयललिता से पूछा की बह रहा है । जयललिता ने भी इशारों में ही बता दिया की बहन नहीं है । उस मोहल्ले में दूर भेजने वाली एक महिला ने एक दिन कुछ प्यार से जुडी इन हरकतों को देख लिया और फिर अगले ही दिन उसने इसका तो हर आरोपी देगा । अब वह भागकर लडकी के घर गयी और उसके माता पिता को आगाह किया कि वे अपनी बेटी को एक अभिनेत्री के घर नहीं भेजे हैं क्योंकि अभिनेत्री कि बेदी एक इश्कबाज है । उनकी बेटी की प्रतिष्ठा को गिरा देगी । लडकी ने जयललिता के घर आना बंद कर दिया । जयललिता को इस नए घटनाक्रम की जानकारी नहीं थे इसलिए बहुत पता लगाने उसके घर गई कि आखिर क्या बात है । पहले अब आप रह गई जब उसके मित्र ने मात्र एक दूध वाली की कही बातों के आधार पर उसे अंदर नहीं आने दिया । उसने कहा कि तुम ने मुझे लडके से मिलवाया और मुझे बिगाडा है । लडकी की मां अपनी बेटी के पीछे की और या चढाई खडी थी । पाक जयललिता को ऐसे घूम रही थी मानव सारा दोष उसी का होगा । जयललिता नहीं अपना विरोध दर्ज कराना चाहा लेकिन यह देखकर हो गई की लडकी में अपनी माँ से सच कहने का साहस नहीं रहा । आप पहले उसे बलि का बकरा बनाने के लिए तैयार थे । जयललिता इस घटना से होने के साथ साथ अंदर तक दुखी भी थी । अपनी आत्मकथा में उसमें लिखा है, मुझे विश्वासघात शब्द का मतलब है मालूम हो चुका था । मैंने बिल्कुल निष्कपटता के साथ उस लडकी की मदद करने की कोशिश की थी । मैंने सोचा उसके सामने खडे रहना भी मेरे लिए अपमानजनक है । मैं भाग कर अपने घर आ गई और छप्पन के लिए बैठे घंटों तक रोते रहे या एक अपमानजनक था । मैंने अपनी माँ को इस बारे में कभी नहीं बताया । संध्या ने शुरू में अपनी बेटी के लिए फिल्मों में करियर की बात नहीं सोचे थे पर वह अपनी बेटी को एक अच्छी नृत्यांगना जरूर बनाना चाहते थे । बेंगलुरु से रहने के लिए चेन्नई आने के साथ ही प्रमुख उस दौर के प्रतिष्ठित सत्य शिक्षक कीजिए संस्था के संरक्षण में रख दिया गया । जयललिता जपात् में एक बेहतरीन नृत्यांगना बनी । नत्य सीखने के इच्छुक नहीं लेकिन सबसे बडे ही धैर्य भाग और प्रेरक शिक्षक थी और उन्होंने उसे इतना प्रशिक्षित कर दिया की मई उन्नीस सौ साठ में जब मैं मात्र सहारा साल की थी, अपनी नृत्य कला का पहला मंच पे प्रदर्शन कर सके । फिल्मों से जुडे कई बडे लोग संध्या की बेटी का पहला डरते प्रदर्शन देखने आए । चीन में उस जमाने के अनेक प्रमुख अभिनेता, अभिनेत्री और प्रोड्यूसर्स शामिल थे । उस तरह की सबसे प्रतिभाशाली अभिनेता शिवाजी गणेशन समारोह की अध्यक्षता कर रहे थे । उन्होंने जयललिता के डरते की तारीफ की और सोने की मूरत जैसी प्यारी बताया । मैं चाहूंगा कि यह बेहद लोकप्रिय फिल्म स्टार बनें । संध्या और जयललिता उनकी इस बात से खुश थे लेकिन उन्होंने इसे गंभीरता से नहीं लिया । दोनों का तरह संकल्प था कि जयललिता फिल्मों की दुनिया में नहीं जाएगी नही शिवाजी को इस बात का अनुमान था टू जैसे कालू वाली क्या नहीं बच्चे एक दिन उनके साथ उनकी नायिका के रूप में अभिनय करेगी । जयललिता की सहपाठी और उनकी राजनीति में आने तक उनकी नजदीकी मित्र रही श्रीमती के पास अपने स्कूल के दिनों के अनेकों कैसे हैं तुझे याद करते हैं । यहाँ एक लिखित नियम था की चर्चा की सारी लडकियाँ साॅस कॉलेज जाएंगे इसलिए हमने भी इस पहला जाने का फैसला किया चले तथा कहाँ करती थी कि वह आईएस ज्वाइन करेगी या डॉक्टर बनेंगे । पढाई लिखाई के क्षेत्र में अपने भविष्य को लेकर बहुत आशान्वित थी इसलिए जब उसकी मां उसे फिल्म शूट पर साथ ले जाती है तो अपना विरोध जताते लेकिन ज्यादा जोर शोर से नहीं क्योंकि अपने स्वभाव से ही अच्छे प्रभार बडी लडकी थी चला लेता । अक्सर अपनी माँ से कहती है कि फिल्मी दुनिया का माहौल उसे पसंद नहीं है पर ये है कि फिल्मों से जुडे पुरुष है और उसे कामुकता भरी नजरों से देखते हैं । जया कहाँ करती थी जब मैं चाहती हूँ की कमी नहीं यहाँ बैठे मुझे मैं उन्हें देख कर चलना चाहती हूँ । हर तरह ॅ पतले और मोटे और तेल चुपडें माँ मुझे उनके साथ बैठने और बातचीत करने के लिए कहती है । मुझे से नाॅन के साथ ही जब कहती थी कि श्रीमती को अब भी वो याद है । सहायता और पर जयललिता को अहसास था कि उससे बहस करने के लिए बात किया जा रहा है कि उसकी प्रकृति के विपरीत है तो उसे भी अपने सहपाठियों की तरह एक सामान्य पारिवारिक जीवन जीने की चाहते हैं । श्रीमती याद करती है कि जहाँ से स्कूल से लेने के लिए उसकी माँ या भर पिताजी आते थे नहीं चला । नेता के कारण अक्सर तेल से आती है इसलिए मैं उसकी कार आने तक उसके साथ रहती थी । मुझे अपनी मैट्रिकुलेशन की परीक्षा के दौरान एक वाकया याद है । हमें परीक्षा देने के लिए लेनी पेनिंगटन कॉलेज जाना था । परीक्षा प्रवेश पत्र लेने के बाद हम स्कूल के बाहर अपनी अपनी कारों का इंतजार कर रहे थे लेकिन उसकी कार आई ही नहीं । जब मेरे पिताजी मुझे लेने आए तो उन्होंने उसे भी परीक्षा केंद्र तक छोडने का प्रस्ताव किया ना उसकी परीक्षा छोड सकती थी । मेरे पिताजी फिल्म स्टूडियो में फोटोग्राफर का काम करते थे और उन्हें जानती थी तो मैं थोडा हिचकिचाई लेकिन फिर हमारे कार्य में बैठ गए । इस छोटी सी बात होता है । कभी नहीं बोले । बहुत भावनात्मक होकर इस घटना की चर्चा करते हैं । तुम्हारे पिताजी ने मदद नहीं की होती हैं तो मैं परीक्षा नहीं दे पाते हैं । मैं कहती हूँ मेरे घर में किसी को चिंता नहीं है । उस स्कूल से बेस्ट आउटगोइंग स्टूडेंट का शीर्ष मिला था । उसने पूरे राज्य में दूसरा स्थान प्राप्त किया था । इसके पास जो स्कूल के पुरस्कार समारोह में उसके घर से कोई नहीं आया था । श्रीमती ने आगे बताया हूँ मैं कॉलेज में पडने की पहुंच चुके हैं लेकिन एडमिशन आरंभ होने से पहले ही आपके के खेल के कारण फिल्म संसार में पूरी तरह उतर चुकी थी और आए थे और ओवन की शूटिंग करने में प्रस्तुत थी । इसलिए उसने मुझसे इस निर्देश के साथ उसके लिए भी फॉर्म खरीदकर भर देने के लिए कहा की है । उसके लिए वही विषय भरता हूँ जो मैंने अपने ले चुके थे । मैंने फाइन आर्ट्स चुना था और उसके लिए भी किसी विकल्प कुचल दिया । शुल्क जमा करा दिया । मैं सत्र के पहले दिन कॉलेज आएगा ऍम इसमें बहुत कडे अनुशासन का माहौल था । जयललिता खाली हाथ कक्षा में आई थी । कोई नोटबुक किताब नहीं लग रहा सुशीला मेरी जयललिता के बारे में कुछ भी नहीं जानते थे । उन्होंने जैसे कुछ सवाल पूछे जयललिता ने कहा कि उसके पास किताब नहीं है । लेक्चरर बहुत क्रोधित हो गए, पहचाना को डांटने लगी और उनके सामान मनोज रुकने का नाम नहीं ले रहे थे । तो फिर तुम क्लास में आई हूँ । सिर्फ एक गुडिया की तरह कपडे पहनने के लिए दोपहर के खाने के लिए कर गई । पत्थर कभी कॉलेज वापस नहीं आई । मैंने उस से पूछा कि मैं उस पर कायम हो गई है । उसने कहा है उस तरह के माहौल को छोड नहीं सकते हैं । मैंने उनसे कहा कि मैं किसी दूसरे कॉलेज में पढने की कोशिश करेंगे । तब उसने कहा कि उसे इस बात का एहसास हो चुका है कि एक्टिंग पर पढाई दोनों साथ साथ करना असंभव है । पास अपने तरफ उस समय फिल्मों में इतनी व्यस्त थी कि उसके लिए पढाई करने का समय नहीं था । मैं अपनी फिल्में एमजीआर के साथ अभिनय कर रहे थे तो आदमी जो उसकी जिंदगी की दिशा को अच्छा हो जाता हूँ पूरी तरह पता निकालने वाला था । जयललिता बिना सोचे समझे दूसरी दुनिया में कदम रख चुकी थी । इस बात से अनभिज्ञ के यहाँ दुनिया है । सपनों पर हताशा की साजिश करता हूँ और चालबाजों की फॅमिली

अम्मा: जयललिता - 3 (एक सितारे का जन्म)

एक सितारे का जन्म तो खर्चे चला लेता । चोपन जगह से दूर रहने के लिए दृढप्रतिज्ञ थी । पूरी तरह फिल्मों में कैसे आ गई है वो भी अपनी किशोरावस्था में ही जब उसने फिल्मों की दुनिया में अपना पहला कदम डाला । से मालूम नहीं था कि बॅाबी को पार कर चुकी है जिसके परस्पर कोटेदारों से निकलने का कोई रास्ता नहीं है । फिल्म कर्णन के सौवें दिन का समारोह मनाया जा रहा था जिसमें समझाने अभिनय किया था । जयललिता की मैट्रिकुलेशन की परीक्षा संपन्न हो चुकी थी और कॉलेज शुरू होने में अभी दो महीने की देरी थी । संध्या ने जयललिता को भी अपने साथ ले लिया जिसने पहली बार साडी पहनी थी कॅश जमा मेहमान यह देखकर हैरान थे की संध्या की बेटी एक सब बहुत सुंदर बन चुकी है जब समारोह में आये लोग रवाना हो रहे थे मेजबान और काॅलोनी उनसे थोडी देर रुकने को कहा जब तक ये संध्या से थोडी बात कर लें । उन्होंने संध्या को बताया कि अगले ही आते हैं बहुत नहीं आई । कन्नड फिल्म की शूटिंग शुरू कर रहे हैं और पहले उसकी बेटी को नायिका के रूप में पेश करना चाहते हैं । माँ और बेटी दोनों पहुंचक की रह गई संध्या ने जो उस समय तक अपनी बेटी के दिल में नहीं करने को लेकर दृढप्रतिज्ञ थी, टीम इस पर में कहा कि जयललिता को दो महीने में कॉलेज ज्वाइन करना है । पत्थरों ने उसे भरोसा दिलाया कि तब तक शूटिंग पूरी हो जाएगी । अपनी बेटी के प्रतिरोध की आशंका के साथ संध्या जयललिता की तरफ बडी और पूछता हूँ कि इस बारे में उस की क्या राय हैं । जयललिता ने हाँ कहकर अपनी माँ को चकित कर दिया । शायद उसने यही सोचता हूँ कि स्कूल कॉलेज के बीच की दो महीने की अवधि को बताने का यह एक मजेदार तरीका होगा । लेकिन पंथल उसे हुई उस पर भाग्य पूर्ण भेड के बाद जयललिता को अपने आप एक में लिए गए फैसले के बारे में सोचने का शायद कोई मौका मिला हूँ । उसे तुरंत मैसूर के लिए रवाना होना पडा जहाँ वृंदावन गार्डन में शूटिंग शुरु होनी थी । फिल्मी उसके लिए लिखने वाले पत्रकार फिल्म न्यूज आनंदन जिन्होंने बाद में जयललिता के सेन संपर्क अधिकारी की भूमिका निभाई । मैसूर की एक घटना की चल जा सकते हैं जिसमें जयललिता इतनी डर व्यक्ति के रूप में सामने आई । हालांकि उस वक्त उनकी उम्र मात्र सोलह साल की थी । मंडम अयंगर समुदाय से थी जो कर्नाटक से आते हैं । लेकिन एक पत्रिका में छपे लेख में उन्हें यह कहते बताया गया मैं तमिल हूँ मेरी माँ श्रीरंगम से । इससे कर्नाटक का कन्नडिगा समुदाय क्रोधित हो गया जो उन्हें अपना मानता था । धमकियां मिलने के बाद उन्हें मैसूर के दशहरा कला महोत्सव पे दस्ते का आपका निर्धारित कार्यक्रम करना पडा । दो महीने बाद मैसूर के चामुंडी स्टूडियो में निर्देशक पंथल ऊ की फिल्म की शूटिंग के दौरान दशहरा कला महोत्सव के आयोजकों को भनक लग गई की चला देता रहा है और उन्होंने उनका विरोध करने का फैसला किया । स्टूडियो मैंने चार हो जब खबर मिली की करीब सौ लोग जयललिता की पढाई करने के लिए स्टूडियो की ओर आ रहे हैं तो उसने स्टूडियो के सभी द्वारों को बंद करवा दिया । लेकिन कुछ शरारती तत्व गेट के ऊपर से कूद कर स्टूडियो परिसर में दाखिल हो गए । उनके हाथ में ठंडे थे और कन्नड में चला रहे थे । हाय को दिया दरवाजे पर खडे सुरक्षाकर्मियों और पत्रकारों से धक्का मुक्की करते हुए अंदर गए पत्तलों ने उनसे कल्याण में बात की और चले जाने की गिनती की लेकिन मांग करते रहेंगे खुद को कन्नडी का नहीं बताने के लिए जयललिता माफी मांगे । फॅमिली हुई पढना ही देंगे । उन्होंने विरोध करने वालों से आंखें मिलाते हुए शुद्ध कन्नड में कहा मैंने कुछ भी गलत नहीं कहा है ना भारत के इस बात की माफी मांग मैं तमिल हूँ । लाके ॅ इतने में वहां पुलिसकर्मी जिसमें प्रदर्शनकारियों को समझा पर जाकर वहाँ से निकाला । अगले दिन तमाम तमिल अखबारों की हेडलाइन्स एक जैसी थी कि कन्नाडिगा प्रदर्शनकारियों ने जयललिता को जान से मारने की कोशिश की । मैसूर में अपनी पहली फिल्म की शूटिंग जयललिता के लिए मौज मस्ती वाला अनुभव रहा है लेकिन चेन्नई लौटने के बाद उन्होंने स्कोर ज्यादा ध्यान नहीं दिया । दरअसल उनके पास शिक्षा मंत्रालय का एक पत्र हैं जिसमें मैट्रिकुलेशन की परीक्षा में उनके बेहतरीन प्रदर्शन को देखते हुए आगे की पढाई के लिए छात्रवृत्ति की पेशकश की गई थी । इस पत्र को पाकर बेहद रोमांचित थी और उच्च शिक्षा की अपनी योजना पर आगे पडने को बिलकुल तैयार भी है । लेकिन तभी उसके पास प्रतिष्ठित निर्देशक श्रीधर की एक फिल्म में नायिका की भूमिका का प्रस्ताव आया । जब समझा ने कहा कि श्रीधर के ऑफर कट कराना उनकी मूर्खता होगी तो जयललिता को बहुत गुस्सा आया और उन्होंने विरोध के स्वर उठाए । कई वर्ष पांच जयललिता ने एक इंटरव्यू में बताया, मैंने घर पर तूफान खडा कर दिया । मैंने झगडा किया, रोहित और गुस्सा दिखाया । ऍम फिल्मों में तय हो चुका था । उन्हें अपनी जिद छोडनी पडेगी क्योंकि संध्या ने बताया था उनके आर्थिक स्थिति वास्तव में उतनी अच्छी नहीं है जितना मैं सोचती थी या जैसा उन्होंने विलासतापूर्ण जीवन शैली में ढल कर बच्चों को यकीन दिला रखा था । संध्या के पास अपना सादा काम नहीं लगता हूँ और उस की बचत खत्म होने पर आंखों में कटी उस राहत के बाद जयललिता ने महसूस किया कि वह अपनी माँ की अनसुनी नहीं कर सकती हैं जिन्होंने परिवार की जिंदगी आरामदेह बनाने के लिए इतना परिश्रम किया था और एक बार जब उन्होंने तय कर लिया कि उनका भविष्य फिल्मों में है और उन्हें अपनी शिक्षा संबंधी सपने छोड देने चाहिए । जयललिता ने खुद पर थोपे गए करियर में अपना बेहतरीन प्रदर्शन करने की ठान ली । एक इंटरव्यू में उन्होंने इस पर कुछ नहीं है, खबर नहीं दिखा सकते हैं क्योंकि मेरे अंदर एक बात तो है । जब मैं कोई काम करती हूँ तो अधूरे मन से या उदासीनता के साथ नहीं, भले ही कुत्ते को नहलाने जैसा कोई काम क्यों ना हो । फिल्मों में काम करने के बारे में भी मेरी यही सोचती हूँ । मेरी भी कोई ऍम घर का काल नहीं था । दो भाषाओं तमिल तेलगु ओके फिल्मों में मुख्य नायिका की भूमिका के जरिए रातो रात में प्रसिद्धि और शानदार सफलता पहुंच चुकी थी । इंटरव्यू की समाप्ति उन्होंने क्या कहते हुई थी । मैं इस दुनिया में कुछ भी कर सकने के लिए खुद को तैयार कर सकती हूँ । तभी जिंदगी के उतार चढाव के दौरान इस मंत्र पर कायम रहेगा । जब वह श्रीधर की फिल्में काम कर ही रही थी कि निर्देशक पंथल उन्हें उन्हें आॅइल और वन के लिए साइन कर लिया जिसमें वह अपने से पैंतीस साल पडे । लोकप्रियता एमजीआर की नायिका थी तब मात्र सोलह साल के लिए शूटिंग के दौरान ऍम जो दूसरे सेट पर शूटिंग कर रहे थे अपने प्रशंसकों की फिर के साथ जयललिता के सेट बनाएगा । श्रीधर ने उसे आगे बढकर ऍम करने को कहा जब ऍफआईआर के सामने आज छोडकर खडी थी एमजीआर यह देखकर किस्मत हो रहे होंगे कि है स्कूल कल उनकी सहायता की भूमिका में नहीं ऍफआईआर के साथ जो पहला दृश्यों ने करना था बहस वहाॅ शर्मा रहे थे बहुत घबरा रही थी जबकि क्या तुम शर्मिली होकर शाम तक चला तो पास ऍम काम रही थी उसे सहज करने के लिए एमजीआर को अपने सारे मनोहरी तरीके इस्तेमाल करने पडेंगे । लेकिन लेकिन ऍम देखकर चकित थी कि वही लडकी कुर्सी पर बैठे कुछ किताब पढने में तल्लीन थी । सेट पर आ रहे सीनियर कर्मकारों को अभिवादन तक नहीं कर पा रहे थे । पंथल फिल्म उद्योग में पालन किए जाने वाले शिष्टाचार पर जोर देते थे इसलिए उन्होंने संध्या से कहा कि मैं अपनी बेटी को व्यवहारकुशलता सिखाए । जयललिता अपनी माँ पर गुस्सा थी और उन्होंने कह दिया कि यदि उन्हें इन नियम परंपराओं का पालन करना पडेगा तो वह फिल्म की शूटिंग जारी नहीं रख सकती हूँ । लेकिन क्या निश्चित था कि उन्हें अपने इस प्रचार को बदलना होगा । जयललिता ने बात में लिखा है कि उनकी अपनी माँ के साथ नियमित रूप से झडपें होती थी लेकिन हर बार अंत में संध्या की ही बात रहती थी । जयललिता को अहसास था की अब संध्या के साथ एकमात्र शख्स वही रह गई हैं । उन का भाई पप्पू जानी चाहिए । कुमार स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से घिरा हुआ था और नियमित रूप से स्कूल भी नहीं जा पा रहा था । आगे चलकर परसों बाद जयललिता ने अचानक पत्तों से संबंध तोड है और मैं अपनी पत्नी और बच्चों के साथ दूसरे मकान हो गया । जयललिता के मित्रों या उसके जनसंपर्क अधिकारियों में से किसी को भी उनके अपने भाई से, जिसका निधन हो चुका है, संबंधों के बारे में कोई जानकारी नहीं । श्रीमती कहती है, उसने हम से अपने परिवार की कभी चर्चा नहीं । उसके जन्मदिन की पार्टियों में भी उसका भाई कभी नहीं देखा । अच्छी बात है क्योंकि आपने पूर्ण संस्मरणों में जब कुम्मनम पत्रिका में सिलसिलेवार रूप से छपे, उन्होंने बहुत प्यार से बेंगलुरु में आपात में चेन्नई में अपने भाई के साथ बचपन के मजाकों का जिक्र किया है । धीरे धीरे चला लेता फिल्म जगत में पालन किया जाने वाला प्रोटोकॉल सीखें पैसारे सीनियर कलाकारों का उत्पादन करती है । अब कभी कब किये रहती है और अगले शॉट के लिए बुलाए जाने तक एक पुस्तक लिए किसी कोने में कुर्सी पर बैठी रहती जब आए थे और उनकी शूटिंग चल रही थी । तमिलनाडु में हिंदी विरोधी आंदोलन उबाल परख कबड मुनेत्र कडगम, एआईएडीएमके के सभी कैडर और सदस्यों से, जिनमें एमजीआर और अन्य अभिनेता शामिल थे । आंदोलन में भागीदारी की अपेक्षा की जाती थी । लेकिन यह सोच कर के सेट से कलाकारों की अनुपस्तिथि, तमिल फिल्म उद्योग पदरपुरा सब डालेगी । पार्टी प्रमुख सी एन अन्नादुरई ने उन्हें शूटिंग शेड्यूल का पालन करने की छूट दे दी आए थे और ओवन के कुछ कृषक कर्नाटक में कार्यवाही के पास एक छोटे से टापू पर फिल्माए गए थे । एक दिन जब खुल वर्ष गोवा में छूट गई जहाँ फिल्म यूनिट रुकी हुई थी बमुश्किल सत्रह कि जयललिता ने सबको भौंचक्का कर दिया । जब है एक मछुआरे की नौका पर सवार होकर उस तापू तक पहुंच गयी आॅन अत्यंत सफल फिल्म साबित होगी । इसमें पक्का कर दिया कि एमजीआर और जयललिता की जोडी उस दौर में सर्वाधिक लोकप्रिय साबित होगी । हालांकि एमसीआई रखने उम्र के पांचवें दशक में थे और जयललिता अपने किशोर मई में । फिल्म जगत के कई लोगों ने जिस एक और बात पर गौर किया कुछ नहीं भाई के साथ तो कुछ लोगों ने अस्वीकृति के भाव के साथ रहता हूँ । जयललिता से एमजीआर का भर्ता लगा जहाँ अधिकतर लोग इस पर टिप्पणी करने से बचते रहें क्योंकि मुझे अत्यंत ताकतवर शख्सियत है । लेकिन उन्हीं के बीच एक पास तीन का साथ था आरॅन यानी आरएमबी ऍफआईआर करने का सहयोगी और फिल्म प्रड्यूसर जो ये कहते हुए किसी भी कीमत पर इस रिश्ते को तोडने के लिए कटिबद्ध था की पहचान ललिता नामक दुष्टात्मा से एमजीआर की रक्षा करना चाहता है । उसकी नजरों में जयललिता एक बहकाने वाली रूप से थे । आर । एम । बी । को इस बात का भाग नहीं था कि जयललिता को लेकर खुद एमजीआर की भावनाएँ बहुत गहरी हो चुकी थी । खाना कि राजनीतिक कारणों से बहस सार्वजनिक नहीं कर सकते थे । यदि ऍफ में बडी एक लडकी पर जो उम्र के लिहाज से उनकी बेटी हो सकती थी आ सकते थे तो वहीं आर । एम । बी । पर इस रिश्ते को खत्म करने की सनक सवार थी । आरएमपी की दुश्मनी के मद्देनजर जयललिता अकेली और कमजोर देखा ही नहीं है ।

अम्मा: जयललिता - 4 (उनके नायक एमजीआर)

तो उनके नायक एमजीआर फिल्म न्यूज आनंदन के अनुसार आरएम वीरप्पन के मन में जयललिता के प्रति देश था जिसकी कोई बुनियाद नहीं । उन्होंने बताया, निश्चय ही एमजीआर या किसी प्रोड्यूसर को लेकर पहनना तो इश्क में पागल थी नहीं । पति महत्वकांशा रखती थी । मैं बेहद अनुशासित थी और उसने अपनी गरिमा को बनाए रखा था लेकिन हम ने खुलकर दिखा दिया था कि जयललिता के लिए उन के दिल में खास जगह है । उन्होंने यह आग्रह किया कि उनकी सभी फिल्मों में वही उनकी ढाई कर रखी जाए । जब आर । एम । बी । ने ऐसा नहीं किया तो एमजीआर ने उसे शूटिंग के लिए खूब इंतजार करवाया और उसके प्रोडक्शन को अनिश्चितकाल तक लटकाए रखा । जब जयललिता थार के रेगिस्तान में एमजीआर के साथ अदिम छप्पन की शूटिंग कर रहे थे तो उनकी भूमिका एक गुलाम लडकी की थी । उस कथानक के हिसाब से उन्हें खाली पहुँच शूटिंग करनी पडी क्योंकि यूनिट के बाकी सदस्यों ने अपने छोटे पहन रखे थे । किसी को पता नहीं चला कि हर को सकते पाल के साथ मृत तब कर और गर्म होती जा रही थी । जब कुछ वक्त के बाद जयललिता तपती रहत को सहन नहीं कर पा रही थी तब उनकी तकलीफ को महसूस करते हुए एमजीआर में यूनिट को पैक अप करने का आदेश दिया । लेकिन चलता की परेशानी यहीं समाप्त नहीं हुई । उन्हें कार पार तक एक लंबी दूरी तय करनी पडी । बाद में एक इंटरव्यू में उन्होंने इस बारे में कहा, बिल्कुल नर्क वाली स्थिति थी । मेरे लिए आगे एक कदम भी पढाना मुश्किल हो गया था और मैं फिर नहीं पीती है । मैंने एक भी शब्द नहीं बोला लेकिन एमजीआर को शायद मेरी पीडा का अंदाजा लग गया था । अचानक मेरे पीछे से आये और मुझे अपनी बाहों में उठा दिया । पति के बाहर भी एक हीरो थे । एक और घटना है जिसने उन्हें हमेशा के लिए ऍफआईआर का आभारी बना दिया । डाइटिंग के कठोर दौर के बाद जयललिता अपने घर में मूर्च्छित हो गई । उनके मैनेजर ने एमजीआर से संपर्क किया जो तत्काल वहाँ पहुंचे और उन्हें एक नर्सिंग होम में ले जाने का प्रबंध किया । लेकिन सबाना होने में देर हो रही थी क्योंकि हर कोई जयललिता के घर में ही रहने वाली है । उनकी मौसियों का इंतजार कर रहा था जो उसके साथ अस्पताल चलते ऐसे में फॅार गए और देखा कि वे इस बात को लेकर झगड रही थी कि जयललिता की चाबियां किसके पास रहे हैं । फॅमिली का कुछ आपने कब से मिले लिया और नर्सिंग होम में जब चला लेता को होश आया तो उन्हें सौंप दिया । इस घटना नहीं चाहिए है । जाहिर कर उन्हें मानसिक चोट पहुंचाई की बहन अपने परिजनों पर भरोसा नहीं कर सकती है । वहाँ उसकी सलामती को लेकर एमजीआर की चिंता ने उन्हें गहरे तक प्रभावित किया । खासकर इसलिए भी के चला लेता की मांग उन्हें किसकी उम्र में अकेला और अनाथ महसूस करने के लिए छोड कर भगवान को प्यारी हो चुके थे । जब जयललिता को रात को सडक मार्ग से कहीं जाना होता है तो हम यार एक सुरक्षा वाहन की व्यवस्था करते थे । जयललिता के घर पर पत्थरबाजी की एक घटना के बाद कहा जाता है कि उन्होंने सुरक्षा बलों की विशेष टुकडी उनके घर पर तैनात करती हूँ । एमजीआर से उनके संबंधों में उथल पुथल शुरू हुई । उन्नीस सौ सत्तर के दशक के आरंभ में जब एमजीआर से ज्यादा से ज्यादा लगता और मनचला जैसे कमसिन अभिनेत्रियों के साथ काम करने लगे और इसमें आरएमबी की सिर्फ जुनून की भूमिका थी । संचार राजनीति में भी व्यस्त रहने लगे थे क्योंकि वह करुणानिधि सरकार के काल में डीएमके पार्टी के कोषाध्यक्ष लेकिन घर करुणानिधि से उनका गंभीर मतभेद हो गया । हालांकि आराम भी का मानना था कि यह भी जयललिता के प्रभाव के कारण ही हुआ । एमजीआर और करुणानिधि के बीच एक समय बहुत नजदीकी मित्रता थी जब सीएन अन्नादुराई का निधन हुआ । वरिष्ठम नेता ऍम के उनकी जगह लेने की अपेक्षा थी । लेकिन एमजीआर ने करुणानिधि के नाम पर जोर दिया और पार्टी कार्यकर्ताओं पर उनके प्रभाव के कारण करुणानिधि पार्टी नेता के रूप में चल दिए गए । लेकिन करुणानिधि को एमजीआर की लोकप्रियता का फायदा और उन्होंने मंत्रिमंडल के गठन के समय चतुराई से एमजीआर को बाहर रखा और उन्हें डीएमके पार्टी का कोषाध्यक्ष बना दिया । इस दौरान जयललिता से उन के जनसंपर्क अधिकारी तहत दक्षिण भारत की पहली कलाकार थी जिन्होंने नियमित वेतन पर एक जनसंपर्क अधिकारी नियुक्त कर रखा था । उन के रूप में नजदीकी से जुडे रहने वाले फिल्म न्यूज आनंदन का मानना था कि एमजीआर के प्रतिकृत के लोग जयललिता की प्रसिद्धि और एमजीआर से उनकी नजदीकी से चलते हैं । जब मैं उनका पीआरओ था मैं जानता था दोपहर में एक बजे एमजीआर के कार उन्हें ले जाने के लिए आएगी । एक घंटे के बाद वापस आ जाती थी । जयललिता उसी दौरान को इस गार्डन में अपना मकान बनवा रहे थे । जब घर बनाया गया तो हाउस वॉर्मिंग पार्टी में एक एमजीआर को छोडकर पूरा फिल्म उद्योग मौजूद था । कोई उनकी अनुपस्थिति पर चकित था क्योंकि दोनों के संबंधों के बारे में अफवाहों की कमी नहीं दे । आनंदन ने बताया, अगली सुबह उन्हें शूटिंग के लिए कश्मीर जाना था । जब विमान पर सवार हुई तो पाया एमजीआर पास किसी पर विराजमान है । एमसीआर का भी कश्मीर में एक शूटिंग होता है लेकिन चला लेता शिवाजी कंडीशन के साथ एक अन्य कल में काम कर रही थी । दोनों की शूटिंग लोकेशन के बीच चालीस मील का फासला था । लेकिन कश्मीर पहुंचने पर एमजीआर जयललिता को अपने साथ ले गए । उधर चालीस मील दूर उनके शूटिंग लोकेशन तक पहुंचाया चलता । इस बारे में कुछ नहीं कर सकती थी । ऍम कुछ कह दिया तो पहले होना ही चाहिए था । लेकिन कुछ समय बाद जयललिता को एमजीआर का दबंग प्रभुत्ववादी रूप देखने को मिला । पहचान लेता की हर गतिविधि को नियंत्रित करने लगे थे । यहाँ तक की बहन किस तरह की पोशाक पहनेंगी । इतना ही नहीं उन्होंने जयललिता के धन को भी अपने नियंत्रण में ले लिया था और आपने ही पैसे लेने के लिए उन्हें ऍफआईआर के अच्छे मूड का इंतजार करना पडता था । जया को घुटन महसूस होने लगे और मैं आजाद होना चाहती थी । दोनों के बीच मनमुटाव तब काफी बढ गया जब जयललिता ने एमजीआर के साथ सिंगापुर जाने से मना कर दिया । आनंदन ने बताया, पहले एकल नृत्य प्रस्तुतियां देती थी । कॅश भी तैयार करती थी । उन्होंने कावेरी तथा काॅफी नामक एक महत्वकांशी नृत्यनाटिका तैयार की थी जो इतनी अधिक लोकप्रिय हुई कि उन्हें दुनिया भर से इसकी प्रस्तुति के आमंत्रण मिलने लगे । उन्होंने विश्वभ्रमण का कार्यक्रम तैयार किया और प्रस्तुति के सभी आमंत्रणों को स्वीकार कर लिया । कार्यक्रम को अंतिम रूप दिया जा रहा था । यहाँ तक के अग्रिम शुल्क के रूप में पैसे भी ले दिए गए थे । उसी दौरान सिंगापुर में अंतरराष्ट्रीय तमिल सम्मेलन आयोजित किया गया । सम्मेलन में एमजीआर मुख्या देते थे और उन्होंने जयललिता को यह सलाह देते हुए अपने साथ चलने को कहा कि वहीं से बहन अपने विश्व भ्रमण पर निकल जाएगा । जयललिता ने मना कर दिया जबकि तब एमजीआर मुख्यमंत्री भी रहे । एमसीआर चलता को अपने साथ ले जाने पर जोर देते रहे और उन्हें चुनौती दी की उनकी अनुमति के बिना पैर विश्वभ्रमण पर जाकर दिखाए । जयललिता इतनी क्रोधित हुई की उन्होंने अपने विश्वभ्रमण का पूरा कार्यक्रम ही रद्द कर दिया पर दौरे के लिए चुने हुए कलाकारों को उनके शुल्क का भुगतान कर दिया । इतना ही है उन्होंने नृत्यनाटिका दल को भी भंग कर दिया । अनुमति के लिए एमडीआर की कुहार नहीं लगाना चाहती थी । वहीं आरएम वीरप्पन एमजीआर से रिश्ते के संबंध में जयललिता को अपनी बातें थोपने वाली और उत्पीडक के रूप में देखते हैं । याद करते हैं उन्नीस सौ के विधानसभा चुनाव में टीएमके की जीत का श्रेय मैं एमजीआर के अंतिम चरण के चुनाव अभियान की कमान संभालने को देता हूँ । हालांकि करुणानिधि इस बात को लेकर असंतुष्ट है । विजयोत्सव में पार्टी कार्यकर्ता दो महिलाओं के साथ आए । एक करुणानिधि के लिए हर दूसरा ऍफआईआर के लिए पर अपना बंदा गायब था । मैं मुसलमान के पेश में इस महिला के साथ नेपाल रवाना हो चुका था । जब वापस लौटे जयललिता ने उन्हें करुणानिधि से मंत्रिमंडल में स्थान मांगने को कहा जो करुणानिधि ने उन्हें नहीं दिया था । जो व्यक्ति किंगमेकर हूँ वह वाला कितना नीचे? क्योंकि करुणानिधि ने कहा तो पहले फिल्में करना छोडो तब मेरे पास हो । उस समय तक ऍफआईआर की राजनीतिक ताकत पद हासिल करने की कोई इच्छा नहीं थी । जयललिता ने एमजीआर करुणानिधि के इस झगडे को हवा दी ताकि वो एमजीआर के साथ ज्यादा समय बिता सकें । वीरप्पन की बात अविश्वसनीय लगती है । एमजीआर उम्र के पचास के दशक थे यानी इतनी उम्र दराज के अपने से आधी उम्र की किसी युवती के प्रभाव में शायद ही आ सकें और पीएमके में विभाजन तो को नहीं था । एमजीआर की लोकप्रियता दिन दूनी रात चौगुनी पड रही थी जबकि करुणानिधि पीछे छूट जाने खतरे में होने का भाव महसूस कर रहे थे । हालांकि एमजीआर ही थे जिन्होंने अन्नादुराई की मौत के बाद करुणानिधि को मुख्यमंत्री का पद दिलवाया था । उन के चुनावों के बाद एमजीआर डीएमके का कोषाध्यक्ष होने के साथ साथ विधानसभा का सदस्य भी हो चुके थे क्योंकि उनकी प्रवृत्ति सार्वजनिक तौर पर अनेकों सहित सवाल पूछने की थी । करुणानिधि नहीं उन्हें अनुशासनहीनता के आरोप में पार्टी से निकाल दिया अपने निष्कासन के सप्ताह भर बाहर अठारह अक्टूबर में एमजीआर ने एक नई राजनीतिक पार्टी अन्नाद्रविड मुनेत्र कषगम के गठन की घोषणा की । ऍफ राजनीति में और गहरे उतर चुके थे और किसी किसान जयललिता और उनके रास्ते भी ज्यादा हो गए । जयललिता के लिए की एक तरह से बंद देशों से मुक्ति के समान था और अब है अन्य कलाकारों के साथ काम करने लगी । इसी दौर में उन्होंने तेलगु फिल्मों के स्टार शोभन बाबू से मित्रता की, जो एमजीआर के मुकाबले बहुत सुबह थे । उनके अपूर्वा संस्मरणों के अनुसार इस दोस्ती नहीं की गंभीर रिश्ते का रूप ले लिया । उस दौर के उनके दोस्तों को मालूम था कि बहुत बाबू से प्यार करती थी, उनसे शादी करना चाहती थी और आम महिलाओं की तरह ही एक सामान्य क्रास भी बताना चाहती थी । उनकी स्कूल की दोस्त जानने और उसके पति पंकज बुलानी बताते हैं कि जब उन्हें एक दिन पुलिस गार्डन में लंच पर बुलाया गया, ज्यादा नेता ने उन्हें शोभन बाबू के साथ अपनी शादी की तस्वीरों का एक विशाल एल्बम दिखाया । चांदनी कहती है या पंडित जी और रस्मों के साथ एक पक्की ब्राह्मण चाहती थी । जयललिता ने कहा, इतने बेहतरीन इंसान है । मैं इतनी ज्यादा खुश हूँ । एक दुल्हन की तरह शर्मा नहीं दिया और देख सकती थी की तरह खुश है लेकिन सेल काम कर रहे से बना हुआ है । किसी और ने कभी उसको देखने का कोई से कर नहीं किया है । अन्य सूत्रों का कहना है कि शोभन बाबू के साथ चला लेता की शादी अभी हुई नहीं । उनके मित्र श्रीमती के अनुसार पहचानती थी कि शोभन बाबू पहले से शादीशुदा है और उसका किशोर आएगा । एक बेटा भी है लेकिन उसने जयललिता को मोहित करना था । उस से भी मुलाकात कर पाई गई थी । मैं बेहद आकर्षक व्यक्ति था । मैं समझती हूँ जिन कारणों से चला देता है उसकी ओर आकर्षित हुई रहता । उसका बुद्धिमान और बहुत पढा लिखा होना है । उसके साथ किताबों पर चर्चा कर सकती थी । शोभन बाबू जयललिता की तरह मैं आशीष लेकिन उसी की तरह कल मंदिर के साथ बात करते थे । जलस्तर कभी भी फ्लर्ट करने वाली नहीं रही है और इस बात को लेकर गंभीर रहती थी कि उसके मित्रता किन से हैं । मैं उससे पारंपरिक अयंगर की शादी करना चाहती थी । शायद बैजंती माला की तथा जिसमें एक शादीशुदा व्यक्ति डॉक्टर पाली से विवाह किया था । उसने अयंगर खाली मंगलसूत्र बनाने में मेरी मदद मांगी । उसने मुझे अपने घर पर प्रस्तावित गुप्त विवाहिक समारोह में भाग लेने को कहा । उसने बताया कि वह पहले ही दिल्ली से साडी खरीद चुकी थी । उसने सुबह छह बजे उसने मुझे कॉल किया और शादी का कार्यक्रम होने की सूचना देकर फोन काट दिया । जब श्रीमती ने बात में उनसे पूछा कि आखिर क्या बात हो गई तो चला लेता नहीं । इशारों इशारों में समझाया । शोभन बाबू की पत्नी ने कुछ आपत्ति की थी । आनंदन को इस बात पर संदेह था कि वह शोबन बाबू से शादी करना भी जाते थे । लेकिन उन्होंने स्वीकार किया कि जयललिता को शोभन बाबू पसंद थे । चोट के पिया करो रहने के दौरान नियमित रूप से पोइस गार्डन आया करते थे । ऐसी अफवाहें उडी थी कि जयललिता की उसकी प्रेमिका से शादी को एॅफ पाया था । आनंदन के अनुसार हम क्या किसी भी सीमा तक चल सकते थे । शोभन बाबू से उनके रिश्ते अचानक टूटने के पीछे जो भी कारण रहा हूँ उन्होंने इस रिश्ते के बारे में लिखा हूँ । महत्व कितना भर से ही उनके विरोधियों के हाथों में एक या दो खा गया जिसे उन्होंने जयललिता पर जी भरकर चलाया । उन्होंने उनको एक चालू महिला के रूप में पेश किया । ॅ जैसे व्यक्ति के साथ छोडने के काबिल नहीं थी । गठित टूट चुकी जयललिता ने अपनी ख्याति के शिखर पर होने के दौरान ही फिल्मों से संन्यास लिया और बिल्कुल अलग अलग रहने लगे । आरंभी को जयललिता के फिल्मों से संन्यास लेने पर हैं जरूर खुशी हुई होगी । लेकिन उन्हें वे इस बात का अंदाजा नहीं होगा कि गुमनामी में जाना जयललिता की किस्मत में नहीं था ।

अम्मा: जयललिता - 5 (राजनीतिक शुरुआत)

राजनीतिक शुरुआत ऑल इंडिया द्रविड मुनेत्र कषगम यानी अन्नाद्रमुक पार्टी का सम्मेलन पांडीचेरी के पास कठोर में बडे स्तर पर आयोजित किया गया था । पप्पू रखा है, स्टार स्पीकर को सुनने के लिए जमा था जो पहला राजनीतिक भाषण देने वाली थी जिसे उसने खुद ही तैयार किया था । हालांकि ज्यादातर लोग खास तौर पर एक खूबसूरत चेहरे का दीदार करने आए थे लेकिन उन्हें एक प्रभावशाली और जोशीला भाषण सुनने को मिला हूँ । तमिलनाडु की सितारों भरी राजनीति में एक फॅसे कईयों की प्रक्रिया तो नहीं चार जून उन्नीस सौ बयासी को जयललिता सत्तारूढ अन्नाद्रमुक पार्टी में शामिल हो गई और एक रूपया देकर पार्टी कार्ड होल्डर बन गई । कड्डलोर में उन्हें कार्यबल जैसे जुलूस पर घुमाया गया जैसे कि हम के ने अपने मुखपत्र में छपी रिपोर्ट में काॅप ने बताया, आखिर क्या कारण था जो राजनीतिक दुनिया में कदम रखना पडता है उन्हें जानने वाले बता दें कि मैं आपको आर्थिक रूप से परिपूर्ण थी और अपनी प्रतिभा का सही उपयोग करना चाहती थी । जब की तरफ जगत के लोग उनकी बराबरी के नहीं थे उन्होंने खुद कहा था कि वे जनता की सेवा करना चाहती है । लेकिन जो कहा था वह यह है कि कम प्रेम प्रसंग फिल्मी दुनिया में अपनी हैसियत घटने जाने के बाद उनके पास कोई विकल्प नहीं रह गया था । उन्होंने अब ॅ सुधारने की कोशिश शुरू की जो दूसरी वास तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बन चुके थे । दोनों के बीच पिछले दस वर्षों से संपर्क टूटा हुआ था । उन्हें लगा क्या आ रही उन्हें एक नई शुरुआत के लिए आधार दे सकते हैं । राजनीति में जयललिता को आकर्षित किया लेकिन वो नहीं है । अच्छी तरह पता था कि इसमें कितनी चुनौतियां होती है । डीएमके ने उनके इस जुमले को पकड लिया कि वह जनता की सेवा के लिए राजनीति में नहीं है और अंतर भद्दी टिप्पणियों की बौछार करते हैं । यहाँ तक कहा गया कि जयललिता नहीं जनता की सेवा के लिए अपना तब तक समर्पित कर देने का प्रस्ताव किया है । इसलिए तमिलनाडु की जनता को उनकी इस पेशकश का फायदा उठाने के लिए आगे आना चाहिए । पार्टी में बहुत से लोगों का मानना था की वह उन्नीस सौ में अलगाव के समय एमजीआर की जिंदगी से बाहर हो चुकी थी । तो कर करीब एक दशक बाद दोनों दोबारा किस तरह साथ है । सबसे ज्यादा जिस व्यक्ति को झटका लगा, मैं निसंदेह आॅफ सरकार में कैबिनेट मंत्री है । फिर अपन को बाद में जानकारी मिली कि जब एक बार ऍफआईआर अमेरिका की सरकारी यात्रा पर थे, जयललिता भी नहीं, नहीं तो मोटापे का इलाज करने के लिए अमेरिका गई थी । एक साझा मित्र ने दोनों के बीच मुलाकात की व्यवस्था की । मुक्तसर से मुलाकात ही जयललिता के लिए एमजीआर का हृदय परिवर्तन करने के वास्ते पर्याप्त थी । आर । एम । भी जानते थे कि पार्टी के सदस्य के रूप में मात्र सजावटी वस्तु बनकर नहीं रहेंगे तो महत्वाकांक्षी थी अन्नाद्रमुक के ग्लैमरस चेहरे के रूप में या फिर मतदाताओं को आकर्षित करने वाले गुड की डली की तरह इस्तेमाल होकर संतुष्ट नहीं रह सकती थी । मैं खुद के बारे में और अपनी क्षमताओं को लेकर आत्मविश्वास से भरी थी । उन्होंने एक राष्ट्रीय अंग्रेजी दैनिक को साक्षात्कार में कहा, मैं हल्के मिली जाने वाले व्यक्ति नहीं हूँ और उन्होंने जनता को यही यकीन दिलाने के लिए ऍफआईआर की चुनी हुई उत्तराधिकारी है । उन से अपनी निकटता का खुलकर प्रदर्शन किया । उसके बाद से आरोपी के लिए जयललिता की पडती प्रतिष्ठा में पटना लगाना एक मिशन बन गया ताकि उनके नेता को उसको उसका का शिकार बनने से बचाया जा सके । वरिष्ठ पत्रकार और कुछ दिनों तक जयललिता के भाषण लिखने का काम करने वाले सुनाई के अनुसार जयललिता को राजनीति में लाने का फैसला खुद ऍफआईआर का था । याद करते हैं मुख्यमंत्री के रूप में अपनी जिम्मेदारियों के चलते ॅ पहले की तरह सार्वजनिक सभाओं में शामिल नहीं हो सकते थे । जब जयललिता ने उनसे दोबारा रिश्ते कायम करने की पहल की तो देखिए क्या पडेगा? क्योंकि बात लगी एमजीआर कोई ऐसी शख्सियत की जरूरत थी जो फिर आकर्षित करें । आप करुणानिधि का मुकाबला करें । करुणानिधि अपनी सभाओं में एमजीआर पर अत्यंत तीखे हमले कर रहे थे । एमजीआर ने जनसभाओं में जयललिता के उपयोग का फैसला किया । उन्होंने मुझे जयललिता को भाषण देना सिखाने के लिए कहा । जयललिता तत्काल लोकप्रिय हो गए । उनकी सभाओं में जुटने वाली भीड को देखकर डीएमके में चिंता की लहर आप थी । जयललिता डीएमके नेता करुणानिधि की कर विवादों का उन्हीं के स्तर पर जाकर जवाब दे सकती थी । अन्नाद्रमुक के सभी चला सचिव जयललिता का समर्थन कपिल तैयार थे । पूरी पार्टी उनके पीछे खरीदी है । उनको पक्का यकीन था कि तलाइवा के बाद अम्मा उन का स्थान लेंगे । जल्दी ही उन्हें पार्टी का प्रचार सचिव बना दिया गया । आर । एम । बी एस डी सोमसुंदरम और कुछ अन्य पार्टी नेता जयललिता के खिलाफ सक्रिय हो चुके थे । लेकिन सबकी चला । सचिव पार्टी के आम कार्यकर्ता जयललिता के साथ थे इसलिए विरोधी नेताओं की साजिश है । अंततः उनका कोई नुकसान नहीं कर सके । सुनाई कहते हैं, एमजीआर उन्हें चाहते थे । यह चक्सा चलता है और सत्ता मानती थी कि दोनों में शारीरिक अंतरंगता स्वाभाविक है । लेकिन दोनों ने इस अंतरंगता का कभी भी सार्वजनिक प्रदर्शन नहीं किया । इस बारे में दोनों गरिमापूर्ण बने रहे । जयललिता को पूरा विश्वास था के अन्नाद्रमुक में अपने विरोधियों से उन्हें तब तक कोई खतरा नहीं है जब तक उनके प्रतिपालक एमजीआर का उन पर भरोसा है । एक पत्रिका को इंटरव्यू में जयललिता ने कहा, एमजीआर से उनके रिश्ते बडे स्पेशल थे । हमारे रिश्ते बिल्कुल अलग तरह है, भले ही बहुत उम्र में मुझे बहुत पडे हैं । सच पर खाली समय का हर एक पल हम परस्पर बातें करते बताते हैं । हम दुनिया के हर विषय पर चर्चा करते हैं । हम विज्ञान, दर्शन, साहित्य आदि परवाह नहीं करते हैं । हम दोनों की ही शास्त्रीय संगीत ज्योतिषशास् पर खगोलशास्त्र में गहरी रुचि है । हमारे बीच समानताएं बहुत अधिक । उन्होंने इस विषय पर आगे कहा, मैं हमारे लिए सब कुछ है । फॅमिली तथा माता, संरक्षक, मित्र, दार्शनिक और मार्ग दर्शक है । बहन मेरा सहारा है । पैसे किसी भी व्यक्ति का साथ नहीं जोडते हैं जिनका उन पर भरोसा हूँ । साहिर है जयललिता नहीं यह नहीं कहा की बहन मेरे प्रेमी भी है लेकिन पार्टी कार्यकर्ता है सही मानते थे और इसका पाँच जयललिता उनके लिए और विशेष प्रयाति ऍम को अन्ना या बडा भाई कहते थे और इसलिए जयललिता को अन्य यदि भाभी कहने लगे हैं । जब एमजीआर ने जयललिता को पार्टी का प्रचार सचिव बनाया तो उनका कद और महत्व कई गुना पड गया । उन्होंने जानबूझकर आपने रामधन को महीन करना शुरू कर दिया । शायद खुद पर लगे फिल्म अभिनेत्री होने से जुडे धब्बे को हटाने के उद्देश्य से इस बात का संकेत था कि अपनी राजनीतिक भूमिका को लेकर तब गंभीर है । सुलाई कहते हैं कि उन्होंने कभी भी जयललिता को भडके लिए निवास भी नहीं देखा । वह शायद ही कोई आभूषण पहनती थी । हमेशा अन्नाद्रमुक पार्टी के रंगों के किनारे वाले साधारण सफेद साडी पहनती थी । इसके बावजूद पहले बेहद सुंदर दिखती थी और आम जनता उन्हें ज्यादा से ज्यादा निहारना चाहती थी । सभाओं में उनकी उपस्थिति चुकी होती थी और जब मैं अपने जोरदार भाषणों में करुणानिधि पर हमला करते तो फिर काला भार आभास में अपनी सहमती जगह जनसभाओं के लिए उनका एक जांचा परखा तरीका और वह सीधे भीड में संभाल चलती है । क्या आप करुणानिधि के पेश पूर्ण बयानों से सहमत हैं? क्या आप की उन से सहमती है? फिर इसका उत्तर कानफाडू नहीं मैं दे दी है । एमजीआर के मध्याहन भोजन योजना और विकास की अन्य योजना हूँ तथा उनकी अच्छाई हूँ और उदारता की प्रशंसा करते हुए वहाँ उपस्थित लोगों से अपील करती है मैं आप से पूछती हूँ आप मुझे बताइए क्या आप सुरक्षित लगवा के साथ नहीं भीड उन कार भरते हैं? हाँ, पूरे तमिलनाडु के उनके तूफानी दौरे बेहद सफल साबित हुए हैं । पर स्कोर पार्टी के शकुनी क्यों की भी नजर थे जिन्होंने कौर क्या के चला । नेता के दौरे का प्रबंध उस वक्त था और धूमधाम के साथ किया जा रहा था । जैसा सिर्फ ऍफआईआर के लिए हुआ करता था तो भाषण पर ही रुकने वाली नहीं थी । उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की एमजीआर ने उन्हें पूर्ण अधिकार दे रखा है । अन्नाद्रमुक पार्टी मुख्यालय में काफी सक्रियता देखी जाने लगे और कार्यालय में जयललिता के कार्यक्रम बारीकी से तैयार किए जा रहे थे ताकि बडी संख्या में कार्यकर्ता उन्हें सुनने पहुंचे और उनसे अपनी बातें बता सके । अपनी समस्याओं के समाधान के लिए उनसे दिशा निर्देश दे सके । कार्यकर्ताओं से प्राप्त आप इतना हूँ और प्रार्थनापत्रों को अपनी अनुशंसाओं के साथ ऍर को भेज देते हैं । उन्होंने खुद पार्टी प्रशासन में खामियों को दुरुस्त करने की जिम्मेदारी लेनी मध्यान भोजन केंद्रों का औचक निरीक्षण किया और ठीक से काम नहीं कर रहे कर्मचारियों की खिंचाई की । अपने चुनाव क्षेत्र कि सुबह नहीं लेकर एमजीआर के सांबर अम् गार्डंस निवास के चक्कर लगाने वाले विधायकों की पार्टी पदों से छुट्टी कर दी गई । पार्टी की बैठकों में अनुपस्थित रहने वाले वरिष्ठ पार्टी सदस्यों को कारण बताओ नोटिस थमाए गए । लोग यही मान रहे थे कि भाई जो भी कदम उठाती है उसमें एमजीआर की सहमती होती हैं । शीघ्र ही उनके खिलाफ फेकना था अभियान शुरू हो गया । पार्टी के वरिष्ठ सदस्य जयललिता के अधिकारों के बढने की गति को देख कर चिंतित थे और उन्हें इस बात की फिक्र भी थी की चलती ही पार्टी के इस नौसीखिया सदस्य को मंत्री पद दिया जाएगा । लेकिन एमजीआर गुजरा और सोच रहे थे । उन्हें दिल्ली में एक स्मार्ट व्यक्ति की जरूरत थी जो उन क्या केन्द्र के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभा सकें । जयललिता बेहतरीन अंग्रेजी बोलती थी । उनकी हिंदी भी धाराप्रवाह एमजीआर चौबीस मार्च उन्नीस सौ चौरासी को जयललिता को राज्यसभा के लिए नामित करने की घोषणा करते हैं । उन्हें राज्यसभा में जो सीट दी गई उसका नंबर एक सौ पचास था । यानी वही जीटॅाक में सांसद रहते हुए सीएन अन्नादुराई के पास जयललिता जहाँ भी जाती थी, वहीं आकर्षण का केंद्र हो जाती हैं । राज्यसभा में उन के पहले भाषण को स्पष्ट उच्चारण और प्रभावोत्पादक शब्दों के लिए खूब वाहवाही मिली है । उस दौरान राज्यसभा के सदस्य रहे खुशवंत सिंह ने । उसने मतलब सुंदरता के संगम के रूप में, उनकी तारीख के, यहाँ तक कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी प्रभावित हुए बिना नहीं रही । एमजीआर अब चाहते थे कि चला लेता इंदिरा गांधी से मुलाकात करें । सोलह । जिन्हें ऍफआईआर नहीं जयललिता की मदद के लिए दिल्ली भेजा था उस मुलाकात के बारे में बताते हैं, कांग्रेस का टीएमके के साथ गठजोड था । हमारा प्रस्ताव किया था कि कांग्रेस अन्नाद्रमुक के साथ जयललिता को जिम्मेदारी दी गई थी कि वे इस बात पर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को राजी करने का प्रयास करें । जयललिता को इस बैठक के लिए दस मिनट ही दिए गए थे, लेकिन मुलाकात तीस मिनट तक चली है । इंदिरा गांधी इस कदर प्रभावित हुई कि जब हम वापस लौट रहे थे तो उन्होंने तमिलनाडु कांग्रेस के नेता मूपनार को उसी फाइट से गठबंधन पर बातचीत करने के लिए भेज दिया था । लेकिन इंदिरा गांधी से मुलाकात के बाद जयललिता ने इस बारे में तत्काल एमजीआर को रिपोर्ट नहीं किया जैसा कि उनके द्वारा ये जिम्मेदारी सौंपे जाने के कारण अपेक्षा की जा रही थी । जाहिर है ऍर मुलाकात का परिणाम जानने को लेकर बेचैन थे । जब हम इंदिरा गांधी के आवाज से लौट रहे थे । मैंने चैनल नेता को कहा हूँ ऍफआईआर को सारी जानकारी दे । उन्होंने थोडी लापरवाही से कहा ऐसा किया जाएगा लेकिन उन्होंने यह काम किया नहीं । एमजीआर ने मुझे फोन कर पूछने के लिए कहा कि आखिर मुलाकात में क्या निकला हूँ । हम उसे दिन चेन्नई के लिए रवाना हो गए और फ्लाइट में मैंने उनसे पूछा हूँ कि आपने था भाई को बैठक की जानकारी नहीं दी । उन्होंने कहा हम पैसे भी उनसे व्यक्तिगत रूप से मिल रहे हैं । मैंने सोचा उस दौरान हमने सब कुछ बता देंगे । उनके अपने नेता को पूरी गंभीरता से नहीं लेने के इस व्यवहार से एमजीआर तक गलत संगत पहुंचा हूँ । ऐसा लग रहा था कि वे अपनी हैसियत से कहीं बडी होती जा रही नहीं । एमजीआर के अंतर्गत मौजूद वरिष्ठ पार्टी नेता चिंगारी को खबर देने का काम जारी रखे हुए थे, जिसने अंततः आप करूँ ले लिया । अब ये जयललिता के विरोधियों का संतुष्ट करने के लिए उठाया गया कदम को या फिर उन पर लगाम लगाने के लिए पार्टी के महाधिवेशन में एमजीआर जयललिता को प्रचार सचिव के पद से मुक्त करने की घोषणा कर दी ऍम इस बात का एहसास हो चुका था कि जयललिता को प्रमुखता देने के उनके कदम ने पार्टी को एक तरह से तो दोनों में बांट दिया है । जयललिता में उनका भरोसा धीरे धीरे कम होता जा रहा था । क्या कम से कम सडक नेता लगा ही था?

अम्मा: जयललिता - 6 (खलबली)

खलबली पांच अक्टूबर होने सौ चौरासी को जयललिता के पैरों तले जमीन खिसक गई । एमजीआर अचानक बीमार हो गए । उन्हें लगता मार गया और उनकी आवाज बंद हो गई थी । चलती सोने चेन्नई के अपोलो अस्पताल ले जाया गया । चला लेता ये खबर सुनकर आवाक रह गई थी कि आईसीयू में भर्ती एमजीआर जिंदगी की लडाई लड रहे हैं । इस खबर के आम जनता और विपक्ष तक पहुंचने के राजनीतिक परिणामों की आशंका के चलते अन्नाद्रमुक के शीर्ष नेतृत्व ने किसी को भी आईसीओ तक जाने पर रोक लगा दी थी । भास्कर चला नेता को मारना ऍफआईआर तक नहीं पहुंचने देने की व्यवस्था की गई । यह आप करके यदि चला लेता ने अस्पताल का रुख किया तो उसकी पिटाई भी हो सकती है । अपोलो के प्रमुख डॉक्टर प्रताप रेड्डी ने उन्हें दूर ही रहने की सलाह दी । शीघ्र ही एमजीआर कोई इलाज के लिए न्यूयॉर्क के ब्रुकलिन हॉस्पिटल ले जाया गया । विश्वसनीय सूत्रों से यह जानना उलझन में डाल देता है कि इस घटना से कुछ महीने पहले तक जयललिता एमजीआर से विवाह करने को बरकरार थी । सुनाई के अनुसार उन्होंने अपने रिश्ते को पैर रूप देने की हर संभव कोशिश की । एमजीआर जब पहली बार मुख्यमंत्री बने तो जयललिता ने उन पर शादी के लिए काफी दबाव डाला था लेकिन ऐसा हुआ नहीं । ऍम दोबारा मुख्यमंत्री बने तो उन्नीस सौ बयासी के आसपास जयललिता ने मुकाम्बिकाई में विवाह बंधन में बंधने का फैसला किया । उन्होंने एक दिन मुझे बुलाकर का अमित कल कहीं जाना है हमारे साथ चलने के लिए तैयार रहना । इसके तुरंत बाद ऍफआईआर ने मुझे कॉल किया और कहा मैं एक दिन के लिए कल शहर में नहीं रहूंगा तो इस काटा चाहकर कृप्या उन्हें संभाल हूँ । जब मैं वहां पहुंचा, जयललिता बहुत ही प्रसन्न चित्र देखे हैं । हमें किसी का इंतजार है । उन्होंने मुझे कहा हम बारह बजे तक इंतजार करते रहे । वेस्ट कोस्ट एक्सप्रेस के निकलने का समय बीत चुका था जिससे हम लोगों को भी जाना था । ऍफ ही नहीं मेरे खयाल से योजना मुकाम्बिकाई जाकर शादी करने के लिए जयललिता ने इसके लिए दबाव डाला होगा । लेकिन एमजीआर अपनी पत्नी जानकी के साथ शहर से बाहर जा चुके थे और उनसे संपर्क नहीं किया जा सकता था । जयललिता को ऐसा हो गया कि उन्हें धोखा दिया गया था । गुस्से में बैच चीजों को फेंकने और तोडने लगी । बाद में एम सी आपने मुझे बताया कि जयललिता ने उनसे शादी करने के लिए उन्हें परेशान कर रखा था इसलिए उन्होंने खा कर दी थी । यह जयललिता को धोखा देने जैसा तो था ही, लेकिन एमजीआर ने इस बारे में कभी भी गंभीरता से नहीं सोचा । चेन्नई से एमजीआर की अनुपस्थिति का चला लेता के विरोधियों ने फायदा उठाया और उनके खिलाफ हमले तेज कर दिए । यहाँ तक कि जयललिता से दिल्ली के तमिलनाडु हाउस में वीआईपी रूम भी छीन लिया गया जो उन्हें एमजीआर ने आवंटित किया था । एमजीआर से जयललिता का कोई संपर्क नहीं रह गया था । उन्हें एमजीआर के स्वास्थ्य के बारे में बिल्कुल अंधेरे में रखा जा रहा था । पहचाना के एक दिन उनसे अन्नाद्रमुक संसदीय दल के उपनेता का पद छीन दिया गया जो उन्हें एमजीआर ने सौंपा था । प्रतिक्रिया में चला लेता ने उन्हें अपमानित करने और हाशिए पर डालने में जुटे अन्नाद्रमुक के अवांछित उनके मंडली की खुलकर कटु आलोचना शुरू कर दी । पत्रकारों ने इसे हाथों हाथ क्या इस कदर तीखी भाषा और शीर्ष नेतृत्व के खिलाफ जोरदार आरोपों से अच्छी सुर्खियां बनती थी । अपने घर के बाहर जमा अंग्रेजी के अखबारों के प्रतिनिधियों के लिए बहुत धाराप्रवाह कॉमेंट वाली अंग्रेजी बोलती थी ताकि पूरे देश को पता चले कि तमिलनाडु में किस तरह की राजनीतिक नौटंकी चल रही है, में कितना भर पर ही नहीं रुकी । उन्होंने कुछ ऐसे बयान भी दिए जो आगे चलकर उनके लिए भी मुसीबत बने हैं । रिपोर्टों में उन्हें ऐसा कहते हुए बताया गया, यदि मेरा संदेह सही है यदि एमजीआर का दिमाग सचमुच में ठीक नहीं है और वे इन लोगों की कैद में है । जब एमजीआर के संदेहास्पद मानसिक स्थिति और एमजीआर की पत्नी जानकी की संदिग्ध वैवाहिक स्थिति पर बयान दे रही थी, उनके शत्रु हर शब्द को सावधानीपूर्वक ब्राॅन अमेरिका टैक्स कर रहे थे । जयललिता ने दिल्ली का दौरा किया और तमिलनाडु की स्थिति पर कुछ केंद्रीय नेताओं और मंत्रियों से चर्चा की । इससे उनके विरोधियों को और मसाला मिल गया और उन्होंने यह कहानी फैला दी कि वह अन्नाद्रमुक सरकार को गिराने के लिए कांग्रेस के साथ समझौता कर रही है । एमजीआर अभी अमेरिका में स्वास्थ्य लाभ मिल कर रहे थे कि संसदीय चुनाव का ऐलान हो गया । इंदिरा गांधी की हत्या के बाद प्रधानमंत्री बने राजीव गांधी ने दिसंबर उन्नीस सौ चौरासी में चुनाव कराने का फैसला कर लिया । कांग्रेस की सहयोगी पार्टी अन्नाद्रमुक ने आम चुनाव के साथ ही विधानसभा चुनाव कराने का निर्णय किया । हालांकि पार्टी नेता परिदृश्य से बाहर थे । आर एम बी का त्रिंड विश्वास था कि अन्नाद्रमुक ही देगी क्योंकि दिवंगत इंदिरा गांधी पाॅल दोनों के लिए सहानुभूति की लहर चल रही थी लेकिन फिर जयललिता को प्रचार अभियान के आसपास भी फटकने नहीं देना चाहते थे । लेकिन राजीव गांधी के हस्तक्षेप के बाद जयललिता को भी चुनाव प्रचार करने दिया गया । उस दौरान उनके साथ मौजूद रहे सोलाई बताते हैं कि जनता पर जयललिता का चाहता हूँ । एक बार फिर सिर चढकर बोला जनसभाओं में जब वह कहती कि एमजीआर स्वस्थ हैं, मैं वापस लौटेंगे तो लोग खुशी से चीखते और तेज तक तालियाँ बचती । चुनाव में अन्ना प्रमुख भारी बहुमत से जीता ऍम डेढ महीने के बाद वापस लौटे और एयरपोर्ट पर इंतजार कर रही कार तक पहुंचने के पहले उन्होंने वहाँ हजारों की संख्या में मौजूद प्रशंसकों की तरफ हाथ हिलाया । उन्हें देख कर लोग नारे लगा रहे थे और रो रहे थे । स्वस्थ होकर उनका तेलता जो लौटा था लेकिन जयललिता एमजीआर के स्वागत के लिए मौजूद नहीं । उन्हें नहीं बताया गया था कि एमजीआर का विमान सेना के सेंट थॉमस हवाईपट्टी पर उतरने का पहले नंबर कम में एयरपोर्ट पर इंतजार करती रही

अम्मा: जयललिता - 7 (सज़ा)

सजा जयललिता की आशंका के विपरीत एमजीआर मानसिक और शारीरिक रूप से अच्छे स्वास्थ्य के साथ वापस लौट सिर्फ बोलने में दिक्कत थी । जयललिता ने उनसे मिलने के हर संभव कोशिश की लेकिन उन्होंने मिलने की इच्छा का कोई संकेत नहीं दिया । जो अंतरंगता दोनों के बीच रही होगी । बहुत सपनों की बात थी । ये तो था कॅरियर उन पर गुस्सा इंतजार कराना । अपनी अनुपस् थिति में हाँ नेपाल करने के लिए जयललिता को सजा देने का उनका अपना तरीका था । एमजीआर हमेशा ही पैसे एक दूरी रखने के हामिद है । कभी नहीं चाहते थे कि कोई पार्टी पदाधिकारी मीडिया को इंटरव्यू जयललिता ने इस नियम का उल्लंघन किया था । मैं भी उनके बीमार होकर हजारों किलोमीटर दूर एक अस्पताल में भर्ती होने के दौरान भले ही जयललिता को बात है किया गया था लेकिन उन्होंने अन्नाद्रमुक के आंतरिक खींचतान को सार्वजनिक बहस पर व्यंग का विषय बनाकर गलती की थी, जिसका डीएमके ने जमकर फायदा उठाया । एमजीआर का क्रोध उनकी पत्नी जानकी की वैवाहिक स्थिति को लेकर जयललिता की टिप्पणी को लेकर भी था जो शालीनता की सारी सीमाएं लांघ देंगे । सामान था जयललिता जानती थी की साडी उन्हें एमजीआर से मिलने का मौका मिला तो वह नरम पड जाएंगे । हुआ भी ऐसा ही है जब वह जापान में स्पीच थैरेपी के कोर्स को पूरा कर दिल्ली होते हुए वापस लौट रहे थे । जयललिता उनसे मिलने में सफल रहे थे । यह बडा ही भावपूर्ण पुनर्मिलन रहा होगा जैसा कि चेन्नई पहुंचने के बाद एमजीआर के उठाए गए परित कदमों से लगता है । पांच सितंबर को पचास सचिव के पद से हटाए जाने के ठीक एक साल बाद जयललिता को दोबारा यह पद दे दिया गया । लेकिन उन्हें स्थानीय निकाय चुनावों में प्रचार नहीं करने दिया गया । ऍम भी प्रचार नहीं किया था और पार्टी को डीएमके के हाथों की खानी पडी । एक तरह से इससे साबित हो गया कि किसी चुनावी जीत में जयललिता की उपस्तिथि अहम भूमिका निभाती है । इस हादसे एमजीआर को चिंता हुई और उन्होंने अपनी लोकप्रियता बढाने के लिए अपने प्रशंसकों के क्लबों को सक्रिय करने का फैसला किया । उन्होंने मदुरई में इन लोगों का एक बडा सम्मेलन आयोजित किया । ऍफआईआर की पत्नी जाहिर तौर पर जयललिता को ना पसंद करती थी और उन्होंने उनकी पार्टी में दोबारा वापसी का सोर सोर से विरोध किया । लेकिन यह दिखाने के लिए के निचले स्तर पर सब कुछ सही चल रहा है । एमजीआर विमान में दोनों के साथ मदुरई पहुंचे जयललिता अब उत्साह से भरी हुई थी । प्रशंसकों के पडे चलो उसको उन्होंने ही झंडा दिखाया । सम्मेलन के अंतिम दिन प्रशंसकों को संबोधन का उनका क्रम एमजीआर के ठीक पहले था । उन्होंने एमजीआर को चांदी का छह फुट लंबा राजतंत्र सौंपा जिसपर सोने की कलई चली थी । उन्होंने एमजीआर के पैर छूकर उनका आशीर्वाद लिया । प्रशंसकों ने जयललिता के इस पर बाहर का दिल खोलकर स्वागत किया । वहाँ उपस्थित प्रशंसकों को उम्मीद थी कि एमजीआर एक महत्वपूर्ण घोषणा करेंगे जयललिता को एॅफ की बागडौर सौंपने की । लेकिन उन्होंने इस बारे में कुछ नहीं कहा । आयोजन के बाद एमजीआर चानकी के साथ रवाना हो गए । उन्होंने जयललिता की तरफ देखा तक नहीं । इस घटनाक्रम के साक्षी रहे लोगों के अनुसार बहस तब खडी थी यकीन नहीं कर पा रही थी कि उन्हें इस तरह अपमानित किया गया । वो भी बडी संख्या में । वहाँ मौजूद उन पार्टी कार्यकर्ताओं के सामने जो उन्हें एमजीआर का करीबी मानते थे और इसीलिए उन्हें अन्य यानी भी जाकर बुलाते थे । मदुरई से लौटने के सप्ताह भर बाद अपने गुस्से और अपमान को फूलते हुए हैं । जयललिता ने एमजीआर कोई बेहद भावपूर्ण पत्र लिखा । तमिल में लिखा पत्र छह पुलिस के पेज का था उन्होंने फिर की । यदि मैंने अब की भावनाओं को ठेस पहुंचाई, कृपया मुझे माफ करते हैं । मैं किसी से जानकी के बारे में बात नहीं करेंगे । मैं आहत थी इसलिए मैंने कुछ कह दिया होगा । मदुरई में जो हुआ उससे मैं इतना परेशान थी कि अपने मित्र शशि से बात की और उसे अपनी भावनाएं खुलकर बताती हैं । अब आगे मैं अपना नहीं खोलेंगे । मेरे व्यवहार के लिए मुझे माफ करें और कृपाकर मुझे क्रोध नहीं करें । आपके समय मेरा है कौन? आप को छोडकर मैं कहाँ जाओगे? क्या मैं आपकी अब नहीं हूँ? मैं यह पत्र अनंत चुंबनों के साथ दिख रही है । हमें मिले एक सप्ताह से ऊपर हो चुका है । मुझे अपने आप से कम से कम कल मिलने कृता कर मुझे आठ हजार नहीं । क्या आप अब भी महसूस नहीं कर रहे हैं कि आपके मेरा प्यार लगत है । इसमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ है । मेरे मरने तक इसमें कोई बदलाव नहीं आएगा । मैं भी चाहती हूँ मुझे आपकी चाहते हैं । जयललिता जिस मित्र की बात कर रही थी तो शशिकला थे । अमरीका में एमजीआर के अस्पताल में होने के दौरान मतलब थोडी की रहने वाली शशिकला में पुलिस कार्डन के कोठी के साथ संभाल का काम अपने हाथों में ले लिया और बहुत भावनात्मक रूप से कमजोर हो चुकी जयललिता का विश्वासपात्र बन गई । पुनर्निर्वाचन नामक एक सरकारी सेवक की पत्नी थी जिसमें शायद जयललिता के सक्रिय राजनीति में आने से पहले अपनी पत्नी की उनसे मित्रता के फायदों को आप लिया होगा । शशिकला आयोजनों की वीडियो रिकॉर्डिंग क्या करती थी और वो इस घाटन के पास उनकी वीडियो की दुकान थी जहाँ से जयललिता देखने के लिए फिल्मों के कैसे मंगाया करती थी, वो आपको इस गार्डन में प्रवेश पाने में सफल रही । सम्भवता जयललिता को यह भरोसा दिलाने के पास जो उन्हें अपनी देखभाल के लिए किसी को रखने की जरूरत है और वह हाउसकीपर और किरण लेकर की जिम्मेदारी नहीं आ सकती है । मदुरई से लौटने के बाद चैत्र लेता है अपना गुस्सा और अपनी पीडा अपनी नई मित्र से साझा किया । साहिर है ठीक रही उनके शब्द अन्नाद्रमुक सुप्रीमो तक पहुंचा दिए गए थे । सहज विश्वास नहीं होता । एक अभिमानी महिला के रूप में जाने जाने वाली जयललिता किसी के सामने झुकेंगे गिराएंगे भले ही वो एमजीआर ही चुना, लेकिन पत्र से जो रहस्यमय रूप से एमजीआर के आस पास रहने वाले हर व्यक्ति के पास पहुंच चुका था । एकता बनाई हुई और हताश महिला की छवि स्पष्ट हो जाती है । सहायता पर चला लेता भविष्य को लेकर आशंकित थी । उन्हें पता था कि यार अपने अंत की ओर पढ रहे हैं लेकिन उन्होंने अब तक उन्हें अधिकार वाला ऐसा कोई पद नहीं दिया है जो विरोधियों को चुप करा सकते हैं । उन्होंने अनुमान लगा लिया था की पार्टी में किसी प्रभावी पद के बिना एमजीआर की पत्नी जानकी खुलकर उनका मजाक उडा सकती थी । ऐसा अपमान असहनीय होता है । उस भावपूर्ण पत्र के सर ये निसंदेह उन्होंने बुजुर्ग नेता के दिल में ऐसा भाव चलाने की उम्मीद की थी कि पहले उन्हें राजनीतिक अधिकार देते थे जिनके सहारे उनके निधन के बाद के अनिश्चित तौर का सामना किया जा सकता है । एमजीआर नाम में चाहता था उन्हें लोगों के दिलों में जगह बनाने के लिए इतना की जरूरत थी । यह देर हो जाने से पहले अपने चारों और जमा बछडियों से अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक महिला की उत्तरजीविता से जुडा एक कदम था । उसका उद्देश्य एमजीआर के राजनीतिक उत्तराधिकारी के अपने दावे को ब्लॅक पिता चौबीस दिसंबर उन्नीस सौ सत्तासी क्या सुबह एमजीआर का हो गया? फॅमिली में इस दुनिया को छोडना चाहते थे, वैसा ही हुआ मैं अंतिम समय तक मुख्यमंत्री पद पर कायम थे । अभी अपने लोगों के नेता थे और उनकी मानसिक स्थिति थी । ठीक थी । उन्होंने कभी भी अपना उत्तराधिकारी घोषित करने का इरादा नहीं किया था । नहीं होने अपने जाने के बाद के हंगामे की चिंता थी ।

अम्मा: जयललिता - 8 (एमजीआर के बाद)

एमजीआर के टाल एमजीआर नहीं रहे हैं । ये है उनके लिए एक बडा आघात था । वह जयललिता को मझधार में छोडकर चल पाते । सदमे की हालत में उन्होंने ड्राइवर को बुलाया था । ऍफआईआर के निवास रामबरन गार्डंस जा पहुंचे । लेकिन वहां पहुंचने पर उन्हें अंदर जाने से मना कर दिया गया । मैं कहाँ से उतरी और दरवाजे पर मुक्के मारे? अंत में जब दरवाजा खुला कोई उन्हें बता नहीं रहा था कि नेता का पार्थिव शरीर कहाँ रखा है । वह ऊपर नीचे और आगे पीछे भागते रही लेकिन उनके लिए सारे दरवाजे बंद थे ताकि वह उस व्यक्ति के पार्थिव शरीर को नहीं देख सके । चुनाव सिर्फ उसके प्रतिपालक थे बल्कि जिसके साथ उनका इतना नजदीकी और भावनात्मक जुडाव था । अंततः जयललिता को बताया गया कि एमजीआर के पार्थिव शरीर को पीछे की तरफ से से निकालकर राजाजी हॉल ले जाया जा चुका है । वह हफ्ते हुए भाग कर आपने कहा में बैठे और ड्राइवर को तेजी से वहाँ पहुंचने का निर्देश दिया । राजाजी हॉल पहुंचने पर बहुत दौडते हुए पार्थिव शरीर तक पहुंची और कसकर से चिपक गई । एमजीआर अपने ट्रेडमार्क, पहनावे, पूरी बाकी शर्ट, रोजेदार टोपी और काले चश्मे में बेजान पडे थे । सिने स्टार रहे उस व्यक्ति जिसने उनकी माँ को उनकी प्यारी जम्मू का ध्यान रखने का बचन दिया था कि बेजान शरीर को देखो । जयललिता को ऐसा क्या हुआ होगा ये समझा जा सकता है पर उन्होंने आंसू नहीं गिराएंगे और कोई नहीं । एमजीआर के शव के पास दो दिनों तक पहले दिन तेरह घंटे और दूसरे दिन आठ घंटे खडे रहेगा । उन्होंने वहाँ आ रहे शोका को लोगों को स्तब्ध कर दिया । उन्होंने खुद को तैयार किया की बहन शारीरिक थकान को अभी होनी नहीं देंगे । लेकिन मानसिक और शारीरिक प्रताडना अन्य दिशाओं से आए । जानकी की कई समर्थक महिलाएं उनकी बगल में खडी हुई और उन्होंने जयललिता के पहलुओं को कुचला । उनके शरीर में ना कुछ जो भाई और चोटियां भरी ताकि मैं वहाँ से हट जाए लेकिन वो अपमान के घूंट पीते हुए हैं । अपने अभिमान को छोडते हुए अविचलित वहाँ तैनात रही । उस जगह से नहीं मिलने किस्मत पर कायम रहेगा । मैं अपनी इर्दगिर्द के माहौल से मालूम पेपर वहाँ नहीं है लेकिन एक सवाल जरूर ही उनके दिमाग पर चोट कर रहा होगा । अब आगे क्या? मैं अडतीस साल की थी और अविवाहित थी और उस व्यक्ति द्वारा अनिश्चितता के भंवर में छोड दी गई थी जो पहचान पडा था । जो उज्ज्वल भविष्य के वायदों के साथ उन्हें राजनीति में लेकर आया था । जयललिता जो पार्टी कार्यकर्ताओं की नजरों में एमजीआर की सहज उत्तराधिकारी रही थी, आज किसी काम की मानी नहीं जा रही थी । दिवंगत नेता के दर्शन के लिए भी उन्हें विशेष प्रयास करने पर रहते हैं । लेकिन पराजय को फिर चुकाकर स्वीकार करना उनकी प्रकृति में नहीं था । अब एमजीआर के पार्थिव शरीर को तोपगाडी में रखा गया है तो चाहता था उसके पीछे पीछे चल रही थी । वो अपने नेता के पार्थिव शरीर में कुछ चक्कर चढाना पर शव यात्रा में शरीक होना चाहती थी । ड्यूटी पर तैनात सैनिकों ने हाथ बढाकर उन्हें गाडी पर ऊपर की जाए । एक बार पीछे से किसी के कुछ से मैं चलाने की आवाज आई तो उन्होंने देखा विधायक डॉक्टर केपी रामालिंगम खतरनाक ढंग से उनकी तरफ पढ रहे थे । अचानक उन पर हमला हुआ । जानकी के भतीजे दीपन ने उनके तलाक पर चोट की । उसने उन्हें तोपगाडी से धक्के देकर उतार दिया । उन्हें चोट और खरोचें हाँ तो पहुंच चुकी थी । दीपना रामलिंगन के शब्दों में उन्होंने जयललिता को कुलटा कहा । से आहत होकर उन्होंने अंतिम संस्कार में शामिल नहीं होने का फैसला किया । उन्होंने उनकी कॉन्टेक्ट सरकार में घर पहुंचा दिया गया । सैनिकों का दल उनकी सुरक्षा सुनिश्चित कर रहा था । यह बात जंगल की आग की तरह फैली और पार्टी कार्यकर्ताओं में सच में की लहर दौड गई हूँ । अपमानित जयललिता को उनसे मिलने आ रहे कार्यकर्ताओं की भीड से जिसमें कई सांसद और विधायक भी शामिल थे सरोही उत्साह बना होगा । उनसे मिलने आ रहे पार्टीजन ॅ तो तराधिकार पर उनके दावे को समर्थन देने की कसमें खा रहे थे । कई तो खुलकर बोल रहे थे कि हमें एक करिश्माई नेता चाहिए । करिश्मा वाली एकमात्र व्यक्ति जयललिता है । जयललिता को भरोसा हो गया की भले ही एमजीआर में उत्तर तराधिकारी घोषित नहीं किया हो, जनता के बीच उन का असर कम नहीं हुआ है और हम पार्टी जान उनके पक्ष में ही रहे देंगे लेकिन चुनाव की कोई आवश्यकता नहीं । पन्ना प्रमुख ने भारी बहुमत से फिलहाल जीता था और अगला चुनाव अभी तो वर्ष दूर था । प्रमुख के सत्तर विधायकों ने चांदी की को अपना समर्थन देते हुए राज्यपाल ऍफ पुराना को एक विज्ञप्ति सौंपी । राज्यपाल ने जानकी को सरकार गठित करने का न्यौता दे दिया और सात जनवरी होने स्वर्ण ध्यान से जान के तमिलनाडु की मुख्यमंत्री बन गई । उन्हें जनवरी तक सदन में अपना बहुमत साबित करना था । उस दिन सदन में खूब शोर शराबा हो रहा था क्योंकि स्पीकर खुलकर चानकी का दे रहे थे । कई विधायकों ने इस तरह के नियमों का उल्लंघन किए जाने का विरोध किया । अचानक कुछ गुंडे सदन में आतंकी और उन्होंने जयललिता समर्थकों और कांग्रेस के विधायकों की पिटाई शुरू करती । इस मार पिटाई के बीच किसी ने पुलिस को खबर कर दी । तमिलनाडु के इतिहास में पहली बार पुलिस ने सदन में प्रवेश किया और विधायकों पर लाठियां बरसाई । व्यवस्था के इस आलम मेस भी करने सरकार के विश्वास बातचीत ने की घोषणा करती है । अब जयललिता को सदन के घटनाक्रम की पूरी जानकारी दी गई । उन्होंने समझ लिया कि समय बर्बाद करने का मौका नहीं है । उन्होंने एक बयान जारी कर कहा, तमिलनाडु में लोकतंत्र की हत्या हुई है और राज्यपाल से जानकी मंत्रिमंडल को तुरंत सत्ता से बेदखल करने की अपील की । सरकार विरोधी खेमे के अन्नाद्रमुक विधायक स्थानीय कांग्रेस सदस्यों के साथ राज्यपाल से मिले और उन्हें घटनाक्रम की पूरी जानकारी दी । इसके बाद राज्यपाल ने केंद्र को अपनी रिपोर्ट भेजी और राज्य की राजनीतिक स्थिति को देखते हुए सरकार को बर्खास्त करके वहाँ आपातस्थिति घोषित करने की अनुशंसा केंद्र सरकार ने राज्यपाल की अनुशंसा को स्वीकार कही । जयललिता अपने लिए चेस्ट नए अवसर की उम्मीद कर रही थी । मैं अमित से भी पहले आ चुका था ।

अम्मा: जयललिता - 9 (ताकत पर ताकत)

ताकत पर ताकत तमिलनाडु में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया । संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप छह महीने के बेहतर राज्य में चुनाव कराए जा रहे थे । अन्नाद्रमुक पार्टी दो धडों में बढ गई । एक की अगुवाई एमजीआर की विधवा जानकी आई वीरप्पन जैसे धाकड नेताओं के समर्थन से कर रही थी जबकि दूसरे का नेतृत्व जयललिता के हाथ में था । जयललिता का मानना था की पार्टी के आम कार्यकर्ताओं का समर्थन उनकी ताकत है । उल्लेखनीय है कि एमजीआर का अंतिम संस्कार संपन्न होने से पहले आम कार्यकर्ता मातम और अपमानित किए जाने की इस घडी में उनके प्रति अपने प्यार और समर्थन को जाहिर करने के लिए पुलिस गार्डन के पास जमा होने लगे थे । उस दिन वह किसी से मिलने के मूड में नहीं थी लेकिन वो लोगों का आधार व्यक्त करने के लिए छत पर गए । उन्हें देखते ही वहाँ जमा कार्यकर्ता एक सौ में नारा लगाने लगे, हमारी नेता अमर रहे । तमिलनाडु के भावी मुख्यमंत्री सिंदबाद एमजीआर के निधन के बाद पहली बार उनकी आंखों से आंसू बह उन्होंने हाथ जोडते हुए कृपाकर मुझे ऐसे उपाध्याय नहीं देंगे । मुझे धनिया पद की परवाह नहीं है । मैं तो सिर्फ उन कार्यों को आपकी सहायता से आगे बढा होंगी जो मुझे आप के नेता ने सौंपे । उन्होंने कार्यकर्ताओं को बताया कि वह राजनीतिक जीवन छोडना चाहती थी लेकिन एमजीआर ने अपनी माँ सत्य की तस्वीर पर उनका हाथ रखवाकर शपथ दिला दी कि मैं राजनीति नहीं छोडेंगे । पार्टी नेतृत्व पर उनकी दावेदारी एकमात्र इस तर्क पर आधारित थी की ऍफआईआर स्वयं चाहते थे । एम । टी । आर । के अपनी दिवंगत मां की तस्वीर पर हाथ रखकर जयललिता को शपथ दिलवाने जैसी भावना बात कार्यकर्ताओं के दिलों में घर कर गई और जिसने उन्हें एमजीआर के अपनों की पंक्ति में भी मजबूती से बिठा दिया । नहीं नहीं कि आरएम वीरप्पन ने बाद में बताया कि सारी कहानी छोडती जो कभी घटित ही नहीं हुई थी । सदस्य विरोध में नारे लगाते हुए सदन के बीचोंबीच आ गए । डीएमके विधायकों ने भी इसके विरोध में नारेबाजी कि जयललिता ने जब अपनी बात दोहराई कि आपराधिक कृत्यों के लिए आरोपित एक व्यक्ति को बजट पेश करने नहीं दिया जाना चाहिए तो कथित तौर पर करुणानिधि ने जयललिता के शोभन बाबू से संबंधों के बारे में एक भद्दी टिप्पणी की । जैसे जाहिर है सदन के रिकॉर्ड से निकाल दिया गया । किसी सबके बीच एक अन्नाद्रमुक सदस्य ने करुणानिधि पर हमला किया, बैठक मंगा रहे और उनका चश्मा नीचे गिरकर टूट गया । बस क्या था डीएमके के कई मंत्री अपने नेता की सुरक्षा के लिए आ गया गए । दोनों तरफ से एक दूसरे पर चीजें फेंकी जा रही थी । माइको को उखाडकर हथियारों के रूप में उपयोग किया जा रहा था । अन्नाद्रमुक के एक सदस्य ने बजट के बन्दों के चीथडे चीथडे कर दिए हैं । जयललिता के सर पर किताबें और चप्पल आ करके रहें स्पीकर ने सदन की कार्यवाही स्थगित कर दी । मुख्यमंत्री को उनकी पार्टी के सदस्यों ने अपने घेरे में लेकर सुरक्षित बाहर निकाला जबकि सदन में उत्पाद मच्छर रहा । समाचार पत्र का संडे की रिपोर्ट में कहा गया, झगडा बढता देख जयललिता ने सदन से निकलने की कोशिश की । यही वहाँ का था जब प्रमुख के एक सदस्य ने उनको रोकने की कोशिश की और उनकी साडी खींची मानव है । उन्हें निर्वस्त्र करने की कोशिश कर रहा हूँ । जयललिता फर्श पर कर चुकी थी और उठ खडे होने का प्रयास कर रहे थे । अन्नाद्रमुक के हट्टे कट्टे रहेगा ने प्रमुख सदस्य की तुराई कर जयललिता को मुक्त कराया । बुरी तरह का पढाई और सुबह थी । जयललिता को अन्ना प्रमुख विधायकों ने सदन से बाहर निकाला । उससे और अपमान से भरी जयललिता क्रोधित पांचाली की तरह कसमें खाती हुई चली गई की जब तक एक महिला के सुरक्षित सदन की कार्यवाही में हिस्सा लेने लायक माहौल नहीं बन जाता तहत विधानसभा में कदम नहीं रखेंगे तो इसमें यह भी जोड सकती थी कि जब तक मैच मुख्यमंत्री के रूप में सदन में प्रवेश नहीं करती, उस दिन के बाद से जयललिता उस पूरी घटना का अपने फायदे में उपयोग करने की कोशिश करते रहेंगे । एक सोचा समझा प्रयास लोगों की सहानुभूति ले रहे हैं और अपने पर हुए हमले को महिलाओं की प्रतिष्ठा और इज्जत पर होने वाले हमले के उदाहरण के सबूत के तौर पर पेश करने के लिए तो

अम्मा: जयललिता - 10 (इतिहास का निर्माण)

इतिहास का निर्माण जब तमिलनाडु में करुणानिधि सत्ता में आए तो यह माना जा रहा था कि वह श्रीलंका के मुद्दे पर जनता में दिल्ली विरोधी भावनाएं उभारने की कोशिश करेंगे । इससे जुडा कोई भी आंदोलन भारतीय शांति रक्षक दल यानी आईपीकेएफ द्वारा उत्तरी और पूर्वी श्रीलंका में उठाए जैसे कडे कदमों को आलोचना का निशाना बनाया था । लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल इलम करें एलटीटी और तमिलनाडु के राजनीतिक गुटों के बीच संपर्क उन तीन महीनों के दौरान खुलकर सामने आ गए । च कर्मचार इलाज के लिए अमेरिका में थे । खुसी आती में आई पी के अपने सैन्य उपायों से एलटीटीई से निपटने का फैसला किया था । ऍसे साहनुभूति रखते थे लेकिन अलग फिलम की उसकी मांग तो समर्थन नहीं करते थे । जब एलटीटी एमजीआर से संपर्क बनाने में नाकाम रहा तो उसने करूणानिधि से राजनीतिक मदद की गुहार की । इसलिए एमजीआर के निधन के बाद एलटीटीई एक एटीएम के के और नजदीक आने का पूर्वानुमान था । उधर केंद्र सरकार एलपीडीटी पर सैन्य तौर तरीकों से काबू पाने के लिए प्रयासरत थी ताकि उनके बिना शर्त आत्मसमर्पण करने का आधार तैयार किया जा सके । करुणानिधि ने खुद को हमेशा असली तमिल के रूप में पेश करने की कोशिश की थी । उनके विरोधी एमजीआर की जडें मलयाली परिवार में थी जबकि जयललिता कर्नाटक की प्रधानमंत्री । इसलिए उन्होंने श्रीलंका के तमिलों से खून का रिश्ता बताया था और उन्हें इस मुद्दे के भावना पर प्रभाव का भी अंदाजा था । पहले ही सवाल उठा चुके थे । यदि केंद्र अलग स्वतंत्र राष्ट्र के लिए फलस्तीनियों के संघर्ष का समर्थन कर सकता है तो मैं तमिल ईलम के आंदोलन का समर्थन क्यों नहीं करता? जब है उन्नीस सौ नवासी में सत्ता में आए तो यहाँ विचार तमिलनाडु सरकार का आधिकारिक दृष्टिकोण बन गया । तमिल उग्रवादियों के परस्पर विरोधी रहते खुले आम तमिलनाडु में सक्रिय आते हैं जहाँ उनके बीच झगडे और गोलीबारी हुआ करती थी । आम जनता, डीएमके और उसकी सरकार के खुले समर्थन से इन गुटों खासकर के एल । टी । टी । ई । के खर्चे में तेजी से फैलती नेटवर्क को लेकर सशंकित थी । डीएमके और एलटीटीई समर्थक संगठन जाफना में आईपीकेएफ के अभियानों और सेना की ज्यादतियों को लेकर गुस्से में थे । करुणानिधि की लगातार शिकायतों के बीच भारतीय सेना लंका के तमिलों की रक्षा करने की जगह उनकी मौतों के लिए जिम्मेदार है । केंद्र की बी । पी । सिंह की सरकार ने आईपीकेएफ को वापस बुला लिया । टीएमके वीपीसिंह सरकार की सहयोगी और भागीदार थी । डीएमके के एक सांसद वी गोपालस्वामी ने एलटीटीई नेता प्रभाकरन से मुलाकात के लिए बिना पासपोर्ट वीजा के जाफना कि एक पखवाडे की गुप्त यात्रा के लिए जयललिता की अगुवाई में अन्नाद्रमुक ने करुणानिधि के इस्तीफे की मांग करते हुए केंद्र से डीएमके सरकार को बर्खास्त करने की अपील की क्योंकि उनके अनुसार राज्य सरकार राष्ट्र की सुरक्षा के लिए खतरा बन गई थी लेकिन केंद्र ने जयललिता को कभी गंभीरता से नहीं लिया । उन्नीस सौ नब्बे के अंत में वीपी सिंह की सरकार गिर गई और चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने हैं । अब तमिलनाडु को एलटीटीई के खतरे से बचाने के लिए करुणानिधि सरकार को बर्खास्त करने कि जयललिता की मांग को कांग्रेस का समर्थन भी मिल गया । प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जयललिता से उनके आवास पर मिलने के लिए अपने मंत्रिमंडलीय सहयोगियों के साथ तमिलनाडु आ रहे हैं । उन्होंने जानबूझकर करुणानिधि से मुलाकात नहीं किया । करुणानिधि जान गए होंगे कि आगे क्या होने वाला है लेकिन बहन अपने कदम पीछे खींचने के लिए तैयार नहीं है था । केंद्र ने अनुच्छेद तीन सौ अट्ठावन का उपयोग करते हुए करुणानिधि की सरकार को बर्खास्त कर दिया कि आपकी सरकार का जाना । जयललिता के लिए एक बडी हौसला आप सही थी और उन्होंने इसे अपनी व्यक्तिगत जीत के रूप में देखा । वह आसन्न विधानसभा चुनावों के लिए कांग्रेस के साथ सीटों को लेकर समझौते के लिए भी सहमत हुई । किसी दौरान चंद्रशेखर की अल्पमत सरकार करने के साथ केंद्र की राजनीतिक अनिश्चितता पे खत्म हो गए । हर संसदीय चुनाव सामने आ गया । इसलिए तमिलनाडु में अब विधानसभा और लोकसभा के चुनाव साथ साथ होने थे । करुणानिधि न्याय की गुहार के साथ जनता के समक्ष के आने की तैयारियाँ कर रहे थे, लेकिन घटनाक्रम में ऐसा अप्रत्याशित बदलाव आया कि उनके सारे आकलन धरे रह गए । मई उन्नीस सौ इक्यानवे चेन्नई से अडतीस किलोमीटर दूर श्रीपेरंबदूर में एक चुनावी जनसभा में एलटीए के एक आत्मघाती हमलावर ने कांग्रेस अध्यक्ष राजीव गांधी की हत्या कर दी । जयललिता भी राज्य का तूफानी चुनावी दौरा कर रहे थे । जब यह सहित हुआ कि कांग्रेस नेता की हत्या के पीछे एलटीटीई है तो उनकी त्वरित प्रतिक्रिया थी । हमें पहले ही आगाह नहीं किया था । राजीव गांधी हत्याकांड पर जैन आयोग की रिपोर्ट में करुणानिधि को तमिलनाडु में आतंकवादियों के लिए उपयुक्त माहौल बनाने के लिए दोषी ठहराए जाने से पहले ही राज्य की जनता उन पर आरोप तय कर चुकी थी और उन्होंने मतों के जरिए उन्हें सत्ता से खदेडकर अपना कुछ जाहिर किया । लोकसभा और विधानसभा दोनों ही चुनावों में डीएमके को अपमानजनक बना जाएगा । मुझे देखना बडा अन्ना प्रमुख कि जयललिता विशाल बहुमत के साथ तमिलनाडु की सत्ता के लिए निर्वाचित इतिहास बन चुका था । तहत तमिलनाडु की पहली निर्वाचित महिला मुख्यमंत्री बनी राज्य की महिला विरोधी राजनीति में जिसमें हर स्तर पर उन्हें तोडने का प्रयास किया । जयललिता के लिए ये यात्रा कठिन और अक्सर क्रूड साबित हुई थी । एक अन्य स्तर पर विलक्षण जीत थी क्योंकि होते हुए वह द्रविडियन दल का नेतृत्व कर रहे थे तो

अम्मा: जयललिता - 11 (मैडम मुख्यमंत्री)

मैं मुख्यमंत्री यह जयललिता की विजय का बाल था । अन्नाद्रमुक के निर्णायक जीत से पार्टी में उन लोगों का मुंह बंद हो चुका था जिन्होंने जयललिता को समाप्त करने की हर संभव कोशिश की थी । वो साबित कर चुकी थी कि एमटीसीआर के बाद वही पार्टी का चेहरा थी और उनके पास वोट खींचने की ताकत है । चौबीस जुलाई उन्नीस सौ को उन्होंने मद्रास विश्वविद्यालय के शताब्दी उत्सव हॉल में ईश्वर के नाम पर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली । जब वो समारोह से निकल रही थी, उनके मंत्रिमंडल में नए चेहरे के रूप में शामिल सेनगोट्टियां उनके पैरों पर गिर पडे । कई कनिष्ठ मंत्री तो और भी आगे निकल गए जब जयललिता के आगे दंडवत लेटकर स्मार्टफोन की देती हो नेता पूजन की एक नई परंपरा शुरू हो चुकी थी । पुरुष समाज जो हाल तक उन्हें नीचा दिखाने में लगा हुआ था अब उनके चरणों में पढा था वो अपनी नई पोशाक रेशमी साडी के ऊपर बिना वहाँ का एक लबादा जो अगले पांच वर्षों तक उनके ट्रेस कोर्ट का हिस्सा बना रहा । मैं चमक रहे थे ऐसी अटकलें लगाई गई की प्रशाल का लबादे के अंदर मैं बुलैटप्रूफ बंडी पहनती है । नौकरशाह तो मानो उनकी शिष्टाचार सौम्यता त्रुटिहीन अंग्रेजी और बैठकों में शामिल होने से पहले किए गए हो । पारीक होमवर्क के मुरीद हो गए । वे राज्य के लिए उनकी दृष्टि और योजनाओं तथा एलटीटीई जैसे जटिल समस्याओं की उनके समझ और उससे निपटने में उनकी तरफ ता से भी काम प्रभावित नहीं थे और केंद्र में अपने सहयोगी दल कांग्रेस से विभिन्न मुद्दों पर प्रचार । एक मतभेद को चाहे वो कर्नाटक के साथ कावेरी जल विवाद हो, आरक्षण नीति हो या फिर कच्चातिवू द्वीप तमिलनाडु को सौंपने का मुद्दा जिससे उन्हें सौ चौहत्तर में श्रीलंका का मान लिए जाने से राज्य के मछुआरों के जीवन यापन पर असर पडा था । पहले इलाज करती थी तो उसका नया बडा हुआ आत्मविश्वास शायद उनकी इस भावना से आया हूँ कि वह अपन तथा एमजीआर के सारे से बाहर आ चुकी है । यह जीत उनकी और सिर्फ फोन की थी । लेकिन इन सबके साथ ही मैं अपनी आलोचनाओं को लेकर पहले से ज्यादा असहिष्णु भी हो गई थी । खासकर उन संवाददाताओं के खिलाफ जो उनकी उपलब्धियों की चर्चा तो नहीं करते लेकिन कुछ भी गलत होने पर उन पर आरोप लगाने के लिए तैयार बैठे रहते हैं । संभालते हैं अठारह फरवरी उन्नीस सौ पांडेय को महामा कम मंदिर में उनके स्थान के बाद से जब भगदड में वहाँ अडतालीस तीर्थयात्रियों की मौत हो गई थी । उनका पीडिया से मोहरबंद शुरू हो गया था । उनके लिए बेहतरीन इसलिए भी महत्वपूर्ण था की है । उनका जन्मदिन था । बहुत ज्योतिषियों की सलाह पर वहाँ गई थी जिन्होंने भविष्यवाणी की थी कि उस दिन वहाँ महादीप करना उनके महान भविष्य को सुनिश्चित करेगा । पूरा पुलिसबल उन्हें जेड श्रेणी की सुरक्षा उपलब्ध कराने में जुटा हुआ था । उनके स्थान के लिए एक बुलेटप्रूफ खेला तैयार किया गया था । तीर्थयात्रियों की संख्या बढती जा रही थी जिनमें से ज्यादा उन्हें देखने की इच्छा से वहाँ पे ना कि ग्रह नक्षत्रों के शुभ संयोग के कारण अचानक एक मंदिर की दीवार भीड के बहुत से गिर गए । इससे फैली अफरा तफरी और डॉक्टर को नियंत्रित करने के लिए वहाँ पुलिस की उपस्थिति नाममात्र की थी । थोडी ही देर पहले मुख्यमंत्री के रवाना होने पर अधिकतर पुलिस वाले भी चले गए थे । जयललिता सदमे में थी लेकिन लग नहीं रहा था कि वह भगदड में हुई मौतों को किसी भी तरह अपने दौरे से जोडकर देखती है । ज्योतिषी उन्हें यहाँ कहने का साहस नहीं जुटा पा रहे थे कि यह एक अशोक शुरुआत थी । अन्ना प्रमुख और उसकी सरकार का प्रेस के प्रति रवैया जयललिता के सत्ता में आने के महीने भर के भीतर ही स्पष्ट हो चला था । जब तमिल साप्ताहिक काम हमने एमजीआर और जयललिता के शासनों की तुलना करते हुए एक संपादक क्या लिखा जिसमें कुछ आलोचनात्मक शब्द थे तो भीड ने पत्रिका के दफ्तर में तोडफोड की और कुछ कर्मचारियों की पिटाई भी होती है । उनकी पार्टी का मानना था की अपने नेता को दोषरहित महाशक्ति के रूप में प्रस्तुत करने के लिए ये जरूरी पन पडा था । मीडिया को धमकाने का अगला मामला में आया अपना केरन पत्रिका ने आरोप लगाया कि सरकार ने कुछ लोगों के फोन टैप करने का आदेश दिया है । संपादक और प्रकाशक को गिरफ्तार कर लिया गया और उन पर मुकदमे तैयार किए गए । नक्कीरन के कार्यालय पर अन्नाद्रमुक के कार्यकर्ताओं ने हमले भी किए । यहाँ तक कि सार्वजनिक मंचों पर दिए गए भाषणों पर भी कडी प्रतिक्रिया हुई । विपक्ष के कई वक्ताओं को अशालीन भाषा में निंदा कोन हमले के आरोप में गिरफ्तार किया गया । क्रांतिकारी नेता सुरक्षित वाइवा जिस नाम से मैं आज जाने जाती है की परिभाषा शीघ्र ही यथार्थ बंदी जा रहे थे । पार्टी कार्यकर्ता जयललिता का चेहरा अपने बदन पर टैटू कराने लगे हैं । हर घोषणा हर नहीं योजना उनके परमाण के रूप में होने लगे और साथ में रहता था उनका बडे आकार का फोटो । तमिलनाडु सरकार एक व्यक्ति जयललिता की सरकार बन कर रह गई तो जहाँ भी जाती उनके विशाल कार्यकर्ता आउट स्वागत में खडे रहते हैं । जब मैं चेन्नई की एक मंदिर के तलाब की सफाई कार्य का उद्घाटन करने गई तो उनके लिए फूलों का कई इंच मोटा गलीचा बिछाया गया था । उन्हें तरह का मीनाक्षी और यहाँ तक कि निर्मल वर्जन मेरी के रूप में प्रदर्शित करने वाले पोस्टर जगह जगह देखे जाने लगे । इस कटिया चाटुकारिता के समानांतर ही उनके परमाणु पर सवाल उठाने वाले नौकरशाह और पेशेवर समय हर किसी के खिलाफ क्रूरता की संस्कृति भी फल फूल रही थी । प्रताडित हुए लोगों में स्मार्ट आईएएस अधिकारी चंद्रलेखा भी शामिल थी, जिन्होंने सरकार के सदन पेट्रोकैमिकल इंडस्ट्रीज कॉर्पोरेशन चले स्पिक के शहरों को उन्हें पौने दाम पर बेचने के फैसले पर स्पष्टीकरण मांगा था । उनके चेहरे पर एसिड फेंका गया और ऐसी अफवाहें सामने आई कि हमलावरों को जयललिता की स्वीकृति थी । हालांकि कानूनी रूप से यह बात कभी साबित नहीं हो पाएगा । चंद्रलेखा कई महीनों तक अस्पताल में भर्ती रही और अंतत आप उन्होंने आईएएस की अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया । जनता पार्टी के तत्कालीन प्रमुख और पूर्व केंद्रीय मंत्री सुब्रमण्यम स्वामी ने जब जयललिता पर तांसी भूमि घोटाले में शामिल होने का आरोप लगाया और उनके खिलाफ मामला दर्ज कराया तो अन्नाद्रमुक कार्यकर्ताओं ने उन पर हमले किए । ऐसी खबरें आईं कि जयललिता ने पार्टी पदाधिकारियों को बुलाया और उन पर चीखें की । तुम होती धारियों में से किसी में इतना दम नहीं किस आदमी को चुप करा सके । चेन्नई के प्रमुख वकील ऍम प्रतिशत आरक्षण जारी रखने के अन्नाद्रमुक सरकार के विधेयक को जब चुनौती दी तो इक्कीस जुलाई उन्नीस सौ चौरानवे को उनकी जमकर पिटाई हुई । हम उन्हें कई महीनों तक अस्पताल में रहना पडा । जयललिता के नेतृत्व के दौरान अन्नाद्रमुक में दहशत का जो माहौल बना रखा था लोग उसकी चर्चा करने के अलावा भी कई तरह की बातें करने लगे थे । जल्दी ही उनकी नाक के नीचे कथिततौर पर भारी भ्रष्टाचार को लेकर अफवाह फैलने लगी । खासकर जस्ट मिठाई के साथ । उन के निकट मित्र शशिकला और उसके रिश्तेदार जमीन और अन्य चीजों पर काम से कर रहे थे । शशिकला जयललिता से उसके रिश्तों ने पार्टी के अंदर भी जयललिता की प्रतिष्ठा को काम किया । एमजीआर के निधन के बाद एक रिक्तता बनने की आशंका पाले बडे छोटे सभी कार्यकर्ताओं ने राहत की सांस ली थी । लेकिन अब वरिष्ठ पार्टी पदाधिकारियों पर अपने भविष्य को लेकर नहीं चिंता होने लगी थी । कार्यकर्ता भी असमंजस में थे कि क्या करें कि ऐसा उन मुट्ठीभर लोगों के कारण हो रहा था जो बाहर से लाकर पार्टी में बिठाए गए थे लेकिन उनका बहुत लगातार बढ रहा था ।

अम्मा: जयललिता - 12 (उसे सारे राज पता थे)

उसको सारे राजपता दें । जयललिता और शशिकला का संबंधता सिर्फ एक रहे से था बल्कि यह उन लोगों में रोष का कारण भी था जो एक समय जयललिता की सर्वाधिक भरोसेमंद समर्थक हैं । जयललिता ने जो अपने एकमात्र भाई अपने रिश्तेदारों और मित्रों से किनारा कर चुकी थी, अब शशिकला को उडान तिर्वा सगोत्री घोषित कर दिया यानी पहन जैसा होता नहीं है । पार्टी कार्यकर्ताओं को विश्वास था कि शशिकला और उसके करीबियों ने लोहे की एक दीवार खडी कर उनको तलाईवी से अलग कर रखा है । होने लगता था की मुलाकात की उनकी प्रार्थना और व्यक्तिगत पत्र जयललिता तक अब शायद नहीं पहुंचते हैं । जयललिता ने पार्टी कार्यालय में आना बंद कर दिया था और बहुत चला सचिवों से भी नहीं मिल रही थी जो उन्हें जमीनी हकीकत के बारे में बताते हैं । थम्मा बदल चुकी थी । शशिकला में ऐसा क्या था की उदासीनता प्रथक रहने वाली चला लेता उस पर पूरा भरोसा करने लगी । जयललिता चाहती थी कि वे शादी और बच्चों वाला सामान्य जीवन व्यतीत करें जो उनके भाग्य में नहीं था । अब कम से कम मन किया मित्र थी, उनकी चिंताओं को सहानुभूति के साथ सुनते थे । चोट के कामों पर सवाल नहीं उठाती थी जिसने उनके घर की देखभाल का काम संभाल रखा था और जो उन्हें शासन के मामले में सलाह नहीं देती थी । इसलिए जब लोग कहते कि उनके कई राजनीतिक फैसले के पीछे शशिकला का हाथ है तो उन्हें खींच होती थी । यहाँ सिर्फ मुख्यमंत्री के रूप में उनकी प्रतिष्ठा के खिलाफ था बल्कि बिल्कुल बकवास पे मई उन्नीस सौ छियानवे के विधानसभा चुनाव में जयललिता की करारी हार के पीछे एक कारण शशिकला और उसके करीबी लोगों की ज्यादतियों को दिया जा रहा था । उस अपमानजनक पर आ जाए और करुणानिधि सरकार की शशिकला को । विदेशी मुद्रा कानून के उल्लंघन के आरोप में शशिकला को गिरफ्तार कर जेल भेजने की नाटकीय कार्रवाई के बाद द हिंदू अखबार को एक लंबे इंटरव्यू में जयललिता ने आरोपों का जोरदार खंडन किया । स्त्री मित्र का बचाव किया शशिकला ने एक संविधानेत्तर सत्ता केन्द्र के रूप में कभी काम नहीं किया । लोगों को समझना चाहिए कि एक राजनेता को भी अपने घर की साज संभाल के लिए किसी की जरूरत होती है । किसी पुरुष राजनेता के घर में पत्नी होती है और एक महिला राजनेता के निजी कार्यों को उसका पति क्या भाई संभालता है? मेरा कोई नहीं है । ये तो शशिकला ही है कि जिसके मेरे घर के साथ संभाल के लिए आगे आने के बाद मैं राजनीति पर पूरा ध्यान केंद्रित कर सके । एमजीआर की मौत के बाद मैं पीडादायक तौर से कुछ और मेरे घर पर कोई नहीं था क्योंकि किसी तरह से मदद करता हूँ । उस दौरान शशिकला नटराजन ने सहायता करने का प्रस्ताव किया इसलिए मैंने भरोसा करते हुए उनके प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया । दोनों मेरे यहाँ रहने हरकतें लंबे समय से जयललिता के साथ रहे । कर्मचारियों को हटाकर शशिकला नटराजन अपने लोगों को ले आए । उन्होंने उनकी नीति सुरक्षा के लिए गृह कैच के सुरक्षाकर्मियों की सेवा नटराजन को उनके प्रत्या मामलों को संभालने का कार्य सौंपा गया । जयललिता के खुद के शब्दों में लेकिन चलती है नटराजन अपने हाथों से निकल गया और मुझे उसकी कठोरता और दखलांदाजी की प्रवृति पसंद नहीं थी । इसलिए मैंने उसे अपने घर चले जाने को कहा । लेकिन शशिकला ने मेरे साथ ही रहने का विकल्प चुना । क्या मेरे मुख्यमंत्री बनने के पूरे साल भर पहले की बात है? नटराजन दोबारा इस घर में कदम नहीं रखा । शशिकला ने मेरे साथ रहने और मुझे नैतिक समर्थन देने और मेरी देखभाल करने के लिए अपनी पूरी जिंदगी न्यौछावर करती है । वास्तव में एक बार उसने मेरी जान तक बचाए । उसकी वजह से ही मैं जीवित रही और पार्टी को उन्हें सुविक्रांते में एक भारी चीज चलाने के काबिल कर पाएंगे । यह सोचकर रखते होता है कि चला लेता इतनी भोली हो सकती है तो भरोसा हो गया कि सिर्फ उसके प्रदेश के कारण शशिकला एक ही शहर में रह रहे अपने पति से संपर्क नहीं करेंगे । उनके शशिकला से संबंधों को लेकर एक निर्देश पूरन बात फैलाई गई कि दोनों समलैंगिक हैं । इसके प्रमाण के रूप में कथित रूप से जयललिता द्वारा अपने निजी चिकित्सक को लिखे एक पत्र को सार्वजनिक किया गया । डॉक्टर और चला लेता दोनों ने इस तरह के किसी पत्र के अस्तित्व से इनकार किया । लेकिन डीएमके के नेता अक्सर जयललिता की छवि बिगाडने के लिए इस तरह के हथकंडे अपनाते थे । जब से मैं करे पालने आपने टीवी कार्यक्रम में उनसे इस बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि इस तरह के बेहुदे आरोपों को बे हमेशा ही नजरअंदाज कर दे रही हैं । लेकिन यह तो बिल्कुल साफ हो चुका था कि शशिकला के रिश्तेदार जिनका उल्लेख मन्नारगुडी माफिया के रूप में किया जाता था, लगातार प्रभाव बढाते जा रहे थे । वे जयललिता के दौरों के साथ साथ उनके मुलाकातियों और उनके लिए आने वाले फोन कॉल्स पर नियंत्रण रखने लगे । शशिकला जयललिता की जिंदगी में आने के बाद उनके भरोसे के साथ आ तक लोग धीरे धीरे उनसे दूर हो गए । शशिकला जयललिता के अंतरंग मित्र बन चुकी थी । जाने माने पत्रकार का मानना है कि यह एक वित्तीय चाल है जिसमें दोनों फंसे हुए हैं । शशिकला एक ऐसी महिला है जो जयललिता के बारे में बहुत सस्ता जानकारी रखती है । जयललिता उसे किनारा नहीं कर सकती है ।

अम्मा: जयललिता - 13 (दीवार पर लिखी इबारत)

दीवार पर लिखी इबारत शशिकला से जुडी अफवाहों और ऍम जयललिता को तमिलनाडु और केंद्र स्तर पर नई समस्याओं का भी सामना करना पडा । केंद्र में जयललिता की सहयोगी कांग्रेस पार्टी शुरू में अपने प्रयास नेता राजीव गांधी के हत्यारे एलटीटीई के तमिलनाडु में गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए उठाए गए त्वरित वक्त कठोर कदमों और इस बारे में उनके तरफ इरादे को लेकर जयललिता से खुश थी । हालांकि उन्होंने ऐसा कांग्रेस को खुश करने के लिए नहीं बल्कि आपने दृढविश्वास के कारण क्या था? लेकिन कांग्रेस नेताओं को तब आश्चर्य हुआ और खेल हुई जब जुलाई में अपनी पार्टी के मदुरई सम्मेलन में उन्होंने एक बडा बयान दिया कि उन्हें मिली भारी चुनावी सफलता एक महत्व उनके करिश्मे के कारण थी और इसमें राजीव गांधी की हत्या के बाद चली सहानुभूति की लहर की कोई भूमिका नहीं थी । अन्नाद्रमुक के उत्साही कार्यकर्ताओं ने मदुरई में उनका आसमान को छूता एक सौ पैंतीस फीट का कटआउट खडा किया था । यह इस बात की ओर इशारा था कि उन्हें अपने पैरों तले जमीन की खबर नहीं है । एमजीआर को जहाँ इस बात का स्पष्ट अंदाजा था कि केंद्र में शासन कर रही कांग्रेस और तमिलनाडु स्थित उनके स्थानीय नेताओं से दुश्मनी मोल लेना महंगा पड सकता है । वही जयललिता मानते थे कि सिर्फ और सिर्फ उनका करिश्मा और उनकी लोकप्रियता ही उन्हें कीर्ति के पद पर ले जाएगी । सरकारी मशीनरी पृष्ठभूमि में जा चुकी थी । अधिकारी मुकदर्शक मात्र रह गए थे और उनके पास जाने पर पार्टी पदाधिकारियों के साथ साथ मंत्रियों तक के वो आदर और भाई के कारण नहीं पाते थे । ने जो खुद बदनाम थे तो उन्हें नाराज करने वाले किसी पत्रकार को थप्पड मारने और उसका कॉलर पकडने के लिए जाल तक सीख दी थी कि प्रेस पर विश्वास नहीं किया जा सकता है । कुछ दिनों के लिए पैसे सौहार्दपूर्ण संबंध रखने के बाद जयललिता भी पैसे दूर हो गई और उनके साथ शत्रुता रखने वाले अखबारों और पत्रिकाओं के खिलाफ मानहानि के सौ से ज्यादा मुकदमे दायर किए गए तो यह घोषणा भी की कि अखबार जो भी लिखें उससे उन्हें कोई फर्क नहीं पडता है क्योंकि बनता था उसे पढते तो है नहीं । प्रेस को अलग थलग रखना और विरोध के स्वरों को नमाना । एक बडी भूलती । जल्दी ही उनकी राज्यपाल से धन गई । हम जब मतभेद काफी बढ गए तो एक भी अखबार उनका समर्थन करने वाला नहीं था । कांग्रेस के साथ गठजोड नाजुक स्थिति में पहुंच गया । जयललिता ने एकतरफा घोषणा करती कि अन्नाद्रमुक का कांग्रेस के साथ गठबंधन समाप्त हो गया है जबकि हम के के समान ही कांग्रेस के स्थानीय नेताओं ने भी आरोप लगाया कि सरकार में भारी भ्रष्टाचार संबंधी शिकायतों को राज्यपाल भीष्मनारायण सिंह नजरअंदाज करते हैं । केंद्र सक्रियता दिखाते हुए डॉक्टर चेंज रेडी को नया राज्यपाल नियुक्त कर दिया । ऐसा देखना था कि चेन्ना रेड्डी जयललिता पर अब कसने के दृढ इरादे के साथ आए थे । फाइलों को निपटाने की बात हो या कुलपतियों की नियुक्ति की हर कदम पर दोनों पक्षों में खींचतान और बयानबाजी हो रही थी । उसके बाद जयललिता ने गवर्नर से राजभवन में रस्मी भेज नहीं करने के आरोप के जवाब में विधानसभा में क्या है कहकर धमका कर दिया कि उनका या व्यवहार इसलिए है क्योंकि जब मैं राजभवन गई थी तो राज्यपाल दें, उनसे बुरा बर्ताव किया था । उनका कहना था कि राज्यपाल अब अपने व्यवहार पर हमारे गुस्से को लेकर छिडे बैठे हैं । पूरा सदन तब था विपक्ष पीडिया ने तुरंत प्रतिक्रिया दी कि वह पहले की तरह ही नौटंकी कर रही हैं । चुकी है तो वह पूर्व अभिनेत्री ही । मैं भी अपनी नैतिकता को लेकर सवालिया घेरे में रहने वाली अभिनेत्री जब चेन्ना रेड्डी दिल्ली में प्रेस से मुखातिब हुए तो उन्होंने तमिलनाडु में कानून व्यवस्था ध्वस्त होने और भारी भ्रष्टाचार की बात करते हुए केंद्र सरकार को जयललिता की सरकार को बर्खास्त करने की सलाह दी । जयललिता ने भी तुरंत जवाबी कदम उठाते हुए तब पढो विधानसभा से एक प्रस्ताव पारित करवाया जिस भारत सरकार से राज्यपाल को वापस बुलाने का अनुरोध करने की बात थी । प्रस्ताव पर संविधान के अनुच्छेद एक सौ पचपन में संशोधन की मांग भी की गई थी ताकि राज्यपाल की नियुक्ति मुख्यमंत्री से सलाह के बाद ही की जा सके । राज्यपाल के व्यवहार पर किसी बहस की अनुमति नहीं दी गई । द हिंदू अखबार के संपादक क्या मैं इसे मर्यादा का घोर उल्लंघन करार दिया गया? अगले ही धन मद्रास उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसले में उनकी याचिका खारिज कर दी, जिसमें उन्होंने भ्रष्टाचार के आरोप उन पर मुकदमा की अनुमति देने के राज्यपाल के फैसले को चुनौती दी थी । न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उच्च पदों पर विराजमान व्यक्तियों को उस जवाबदेही से मुक्ति नहीं दी जा सकती जिसकी आम नागरिकों से अपेक्षा की जाती है । आगे का घटनाक्रम स्पष्ट हो चला था, लेकिन उन्होंने जानबूछकर इस पर और नहीं किया । अब तक वहाँ प्रयास को अपने इस से पूरी तरह दूर कर चुकी थी और प्रेस में बारंबार इस तरह की रिपोर्टे चल रही थी कि अगले चुनाव के लिए पार्टी के कोष को भरने की जरूरत है और हर सरकारी विभाग में भ्रष्टाचार चरम पर है । जिन मामलों में निचली अदालतों ने जयललिता को दोषी पाया, उनमें से एक मामला राज्य के पर्यावरण संबंधी उन कानूनों में संशोधन करने का था जिनके तहत बिल्डर्स पहाडी दो मंजिला से ज्यादा उस टाइम पे नहीं बना सकते थे । माना जाता है कि ऐसा खास तौर पर ऍम स्टेट होटेल के बिल्डर राकेश मित्तल की सुविधा के लिए किया गया था जिसने साथ बनवा ली थी । सरकार पहले ही को तरीके से काम करने वाली और आम जनता की पहुंच से दूर होने की बदनामी खेल रही थी । अब उसे कैश एंड कैरी सरकार भी कहा जाने लगा था और सरकार के चौथे साल के अंत तक उनका शासन गुंडा राज का पर्यायवाची हो चुका था । ठीक है

अम्मा: जयललिता - 14 (आलीशान शादी)

आलीशान शादी जयललिता जैसा श्रीरंगम का मन समुदाय से आती थी । बहत अम्मा द्वारा शशिकला के भतीजे सुधाकरन को गोद लेने से अचंभित था क्योंकि बहत थेवर समुदाय से था जिसका चाहते पदानुक्रम में अहान घरों से काफी नीचे स्थान था । इस समुदाय से पार्टी के भीतर उस वर्ग को भी बडा झटका लगा जो पहले ही शशिकला के परिवार का प्रभाव पडने से दुखी था । इसके बाद चौंकाने वाला एक और घटना क्रम सामने आया । जयललिता ने सुधाकरन की शादी शिवाजी गणेशन की पोती सत्य लक्ष्य में से कर रहे की घोषणा की । शिवाजी गणेशन जयललिता के सहकलाकार होने के साथ साथ एमजीआर के पेशेवर प्रतिद्वंदी भी रहे थे । उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं से कहा, मैं चाहती हूँ कि इसे आप अपने घर में हो रही शादी के रूप में देखे । आप सभी इसमें भागीदार बनकर आयोजन को सफल बनाएंगे । जयललिता ने उस लडके को कोट लेने का फैसला क्यों किया जिससे उनका कोई विशेष लगाव भी नहीं था । याद रहे इस शादी के कुछ महीनों बात अपनी चुनावी पढना चाहे के बाद उन्होंने सुधाकरन से सारे संबंध तोड लिया और उसे दूध में गिरी मक्खी की तरह निकाल फेंका । लेकिन इस कदर पूरी तरह अनपेक्षित कदम उठाने के लिए किस तरह के दबाव में थी । पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए यह उनके कमजोर पडते जाने की निशानी थी । सम्भवता यह फायदे को देख कर किया गया फैसला था । छह थेवर समझ तो फट बैंक मजबूत कर के लिए जिनके दक्षिणी जिलों में अच्छी खासी संख्या थी या फिर अपनी परिसंपत्तियों का एक हिस्सा अपने गोत्रीय बेटे के नाम कर सुरक्षित रखने के लिए या फिर मैं अपने घर में शादी करने के विचार को लेकर बहुत सारा होता है जिसमें उनकी भूमिका तुम्हें की मतलब उस फिल्म कहानी की तरह जिसमें उनकी भूमिका राजमाता की थी । यह शादी बहुत बडी राजनीतिक भूल साबित हुई जिसने पार्टी के बीच और जनता के बीच दोनों ही जगह उनकी छवि को नुकसान पहुंचा । शादी में धन का भौंडा प्रदर्शन किया गया था । जैसे करुणानिधि के नाती के स्वामित्व वाले डीएमके समर्थक संते पिने प्रसारित कर ग्रामीण जनता तक को दिखला दिया था । इस कारण चला नेता पर अब जनता के धन की लूट करने का आरोप आसानी से लगाया जा सकता था । इस शादी नहीं शशिकला और उसके पप्पा की तरफ भी जनता का ध्यान खींचा । वो इस गार्डन की साथ संभाल करने वाली इस महिला का इस कदर महत्वपूर्ण स्थिति तक उत्थान कैसे हुआ शादी सितंबर उन्नीस सौ में हुई । इस आयोग में आमंत्रित दो लाख मेहमानों के स्वागत के लिए तैयारियाँ महीनों पहले शुरू हो गए और इसमें सरकारी मशीनरी का जमकर दुरुपयोग किया गया । सिटी कॉर्पोरेशन ऑफ राज्य विद्युत निगम के कर्मचारियों समेत विभिन्न महकमे के लोगों की सेवाएं दी गई । भारत उसको भडकीली सजावट से भर दिया गया । बडे बडे द्वारा दर्शकदीर्घा, आकाशदीप और अन्य सजावट ऐसी थी कि कोई ऍम खडे थे, तब थे और आतिशबाजी थी । ये सब इस तरह देखते थे जैसा कि फिल्मों में होने वाली शाहिद नदियों में दिखाया जाता है । सुधा करना उसकी दुल्हन को भी राजकुमार राजकुमारी जैसी पोशाक में तैयार किया गया था । गहनों से लदी जयललिता किसी महारानी की तरह नहीं हारते हुए मंद मंद मुस्कुरा रही थी । जब की भी पोशाक में तैयार युक्तियां बन ठनकर सामने से गुजरती शशिकला और जयललिता पर चमेली के सुगंधित कलियां और गुलाब की पंखुडियां उतर जा रही थी । ऐसी अटकलें लगाई कि शादी समारोह पर सौ करोड रुपए का खर्चा है । हालांकि बात में किन जातियों में जयललिता ने इस आंकडे को बकवास करार किया । एक विशेष तस्वीर अनेक पत्रिकाओं में छपे जिसमें शशिकला और जयललिता सिर्फ सिर्फ आउट आभूषण से लगती है । सब है तस्वीर डीएमके ने प्रस्तृत की हो और फोटो से छेडछाड की गई होगी । लेकिन ये इस शादी की सबसे अविस्मरणीय तस्वीर साबित होगा । अगले साल जब चुनाव हुए हैं तो अपनी अम्मा के रूप में चला लगता को पूछने वाले उनके प्रशंसक भारी संख्या में उनसे दूर कर चुके थे । उसने सौ छियानवे के चुनावों में अपनी करारी हार के बाद इंडिया टुडे को दिए । एक तो गलत साक्षात्कार ऍम कि पे आपने कोहली पुत्र की जैसी शादी उन्होंने कराई तो एक ऐसी बडी भूल थी जिसका उन्हें हमेशा अब सोच रहेगा । चुनावों से पहले के महीनों में जयललिता की लोकप्रियता में बहुत तेज गिरावट आई थी लेकिन ऐसा लगता था मानो उन्हें इसका एहसास नहीं है । उनके और उनके मंत्रिमण्डलीय सहयोगियों के खिलाफ अदालतों में एक एक कर भ्रष्टाचार के मामलों का हम बात लगता जा रहा था । लेकिन उनकी मात्र प्रतिक्रिया मीडिया पर छोटी अफवाएं फैलाने का आरोप लगाने तक ही सीमित थी । चतुर करुणानिधि के नेतृत्व वाली डीएमके जनता के मूड में आये बदलाव को भलीभांति भागते हुए चुनावों की तैयारी में जुट गई थी जिसमें उसे जयललिता को सत्ता से बेदखल करने का भरोसा था । तमिलनाडु कांग्रेस के नेता केंद्रीय नेतृत्व को जयललिता सरकार की बढती अलोकप्रियता और उन्नीस सौ घंटे के चुनावों में गठबंधन सहयोगी रहने के बावजूद उनके तो मिल रहे तिरस्कार के बारे में नियमित रूप से रिपोर्ट दे रहे थे । उन्होंने मई उन्नीस सौ छियानवे के चुनावों के लिए डीएमके के साथ गठजोड का सुझाव भी दिया । लेकिन कांग्रेस हाईकमान ने उनके सुझाव की उपेक्षा करते हुए मार्च में लोकसभा और विधानसभा चुनावों के लिए अन्नाद्रमुक के साथ कर जोड के घोषणा करती । कांग्रेस हाईकमान के इस बारे में अपने तरफ थे । टीएमके पर एलटीटीई के षड्यंत्रों के लिए राज्य में और उधर जमीन तैयार कर राजीव गांधी की हत्या के लिए जिम्मेदार होने का आरोप लगाया गया था तथा मत्था आपसे मार आते सोचा भी नहीं था कि उनके फैसले से चेन्नई में अशांति फैल जाएगी । सत्यमूर्ति भवन के विशाल लॉन में प्रधानमंत्री के चलते पुतले को देखते हुए जी । के । ने पार्टी के दो हिस्सों में टूटने का ऐलान किया । तीस मार्च होगा डीएमके प्रमुख करुणानिधि से मिले और उनके साथ अपनी नई पार्टी तमिल मानिला कांग्रेस टीएमसी का गठबंधन करने की घोषणा करते पनीर आपकी कांग्रेस जयललिता के साथ गठबंधन पर कायम रही है । जयललिता को भरोसा था कि कांग्रेस के साथ रहने से उन्हें और शशिकला को प्रवर्तन निदेशालय की जांच में राहत मिल सकेगी । शशिकला चीजे टीवी के अध्यक्ष और निदेशक थी जिसपर विदेशी मुद्रा नियमन कानून के उल्लंघन का आरोप लगाया गया था । सुधाकरन के भाई टीटीके दिनाकरन पर प्रवर्तन निदेशालय ने काफी पोसा फेरा के तहत विदेशी मुद्रा संबंधी अव्यवस्थाओं के लिए मामले दर्ज कराए थे । तमिलनाडू में रिपोर्टों की बाहर आ गई थी जिनमें बताया जाता कि शशिकला के रिश्तेदार कैसे जयललिता से अपनी नजदीकी का फायदा उठा रहे हैं और जमीन खरीदने के अभियान में जुटे हुए हैं । मीडिया में उन भावनाओं और वहाँ घरों की सूची भी आएगा जो कथित रूप से शशिकला के भाइयों और भतीजों ने असाधारण रूप से कम कीमतों पर खरीदे थे । बस में इनके बेनामी सौदे होने का आरोप लगाया गया । फिल्म स्टार रजनीकांत विपक्ष के चुनावी अभियान से जुड गए । उन्होंने खुलकर कहा कि यदि तमिल जनता ने चला लेता को दोबारा सत्ता दी तो उन्होंने भगवान भी माफ नहीं करेंगे । उनके इस बयान को सनटीवी ने बारह बार प्रसारित किया । जब चुनाव सिर पर आ गया तो चला लेता कि गलत कार्य चर्चा के केंद्र में आ चुके थे जबकि उनके कई उल्लेखनीय उपलब्धियों को नजर अंदाज कर दिया गया था । उनके पांच वर्षों के शासन में तमिलनाडु वयस्क साक्षरता के मामले में प्रतिशत के आंकडे के साथ केरल के बाद देश में दूसरे नंबर पर आ गया था । कोई याद करने वाला नहीं था कि किस कदर दृढ निश्चय से उनकी सरकार ने एलटीटीई को राज्य से खदेडकर शांति का माहौल बनाया था । पूरी तरह महिला पुलिस कर्मियों वाले पुलिस थाने खोले गए थे और उनके पूरे कार्यकाल में कोई भी चाहती है या सांप्रदायिक दंगा नहीं हुआ । जब उन्नीस सौ छियानवे में लोकसभा और विधानसभा चुनावों के परिणाम आए तो जयललिता की बोलती बंद थी । राज्य के सभी संसदीय सीटों पर डीएमके, टीएमसी, वाम का जोड कर कब्जा हो गया । राज्य की सत्ता डीएमके को पूर्ण बहुमत के साथ मिली जब क्या नाद्रमुक को विधानसभा की दो सौ चौंतीस सीटों में से सब चार पर जीत हासिल हुई हैं । यहाँ तक कि जयललिता को अपनी सीट पर गोर पर भी जहाँ उन्होंने बहुत काम कराया था हार का स्वाद चखना पडा । महीने भर के भीतर शशिकला और दिनाकरन को विदेश मुद्रा विनिमय कानून के उल्लंघन के आरोपों में गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया । यह इस बात का संकेत था कि आगे आगे क्या सब होने वाला था । अब जयललिता करुणानिधि के नेतृत्व वाली डीएमके सरकार की तरह पर निर्भर थे । करुणानिधि उन्हें राजनीतिक रूप से खत्म करने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोडने वाले थे बल्कि उन्हें अपमानित करने वाले जो और भी बुरा था ।

अम्मा: जयललिता - 15 (सियासी बदला)

वो सियासी बदला । डीएमके के चुनाव घोषणा पत्र में करुणानिधि ने चला लेता और उनके निकट संबंधियों की संपत्ति जब्त करने, विभिन्न आरोपों की जांच कराने और दोषियों को सजा दिलाने का वायदा किया था । अब जबकि वह सत्ता में थे, इन वायदों को पूरा करने का समय आ गया था । उन्हें न्यायपालिका काफी साथ था । अदालतों ने जयललिता के अग्रिम जमानत की याचिकाओं को ठुकराते हुए कार्यवाही करने में तेरी के लिए करुणानिधि सरकार को फटकार भी लगाई थी । अम्मा के शासनकाल में मुकदर्शक रही जनता अब इन्तहां भ्रष्टाचार को लेकर गुस्से में थी । लेकिन करुणानिधि को ये भी पता था कि यदि ऐसा देखा कि सरकार जानबूझकर जला देता को निशाना बना रही है तो रणनीति बोलता भी पढ सकती थी । उन्हें जनता थी कि जयललिता को जेल भेजे जाने पर राज्य में उनके लिए सहानुभूति की लहर फट जाएगी क्योंकि राज्य इस तरह के सामूहिक उन्माद के लिए जाना भी जाता रहा था । पर जयललिता की गिरफ्तारी एक राजनीतिक जरूरत बन चुकी थी । करुँगी पार्टी के कार्यकर्ता बदले की भावना से उबल रहे थे और उनका तहर है कम होता जा रहा था । एक वक्त था जब करुणानिधि चला लेता को राजनीति में नौसीखिए अपने बेटे स्टालिन के लिए कठिन प्रतिद्वंद्वी मानते थे । लेकिन अब उन्हें लग रहा था कि जेल की सीखचों के पीछे डाल दिए जाने और अपने खिलाफ मुकदमों की अंतहीन श्रृंखला से घिरकर वो चला लेता हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी । उन्होंने पांच दिसंबर को अपने मंत्रिमंडलीय सहयोगियों के साथ जयललिता को जेल में डालने के नाम पे नुकसान पर चर्चा की खास फैसला ले लिया । छह दिसंबर की दोपहर मद्रास उच्च न्यायालय के जज न्यायमूर्ति सी शिवप्पा ने जयललिता की अग्रिम जमानत के साथ याचिकाओं को निरस्त कर दिया । इनमें से एक मामला आठ दशमलव तिरेपन करोड रुपये का रंगीन टीवी घोटाले का था जिसमें अंततः उन पर मुकदमा चला और उनकी गिरफ्तारी हुई थी । जब जयललिता को पता चला कि उनकी जमानत याचिकाएं खारिज हो गई है तो उन्हें अपनी गिरफ्तारी अवश्यंभावी दिख रही थी । गिरफ्तारी वाले सुबह जब वो स्नान करने के बाद गहरे लाल रंग की साडी पहनकर पूजा घर में खडी हुई थी तो उस वक्त के उस उनकी मानसिक अवस्था को समझा जा सकता है । उन्हें जरूर हैरानी हुई होगी । क्या ईश्वर ने भी उन पापों के लिए उनका साथ छोड दिया जो उन्होंने जानबूझ कर तो नहीं किए थे । जहाँ तक उन्हें जानकारी थी, भ्रष्टाचार के सारे आरोप झूठे और पडा चढाकर लगाए गए थे । उनके ऑडिटर्स ने उनसे कहा था कि सब कुछ का हिसाब किताब है, अब कानून की सीमाओं में है । वह खुद को निर्दोष कैसे स्थापित करेगी? पूजाघर अगर बत्तियों और चमेली की खुशबू से भरा हुआ था । क्या उन्हें पिताजी की स्मृति हो रही थी जो एक आकर्षक व्यक्ति थे और अपने अच्छी खासी संपत्ति को बर्बाद कर निराशा में मारे थे । मैं तो भारी बहुमत के साथ सत्ता में आई थी लेकिन सारा समर्थन खो दिया । यह सब सत्ता से बेदखली ही नहीं रहे बल्कि प्रतिष्ठा की हानि और अपमान का भाव उन्हें खाए जा रहा था । उन्होंने सोचा होगा की अब सब कुछ को यहीं विराम दे देना चाहिए तो पहले कई बार किस दिशा में कोशिश कर चुकी थी । हम उस दौरान के उनके विचारों को नहीं जान सकते । साथ संभावना इस बात की है कि उन्होंने जैसा पहले भी कई बार किया था, खुद को संभाला होगा और आगे की लडाई लडने का फैसला किया होगा । जब वहाँ अंततः अपने घर के सामने चुप चाप जमा अपने समर्थकों से मुखातिब हुई है । उनके चेहरे की कांति हीनता साफ झलक रही थी । उन्होंने अपना दाहिना हाथ उठाकर अंगुलियों से भी बनाया और कहा ऍम सकते । कल हमारा है तो महिला पुलिस कर्मियों से गिरी जयललिता पुलिस के गाडी में बैठे हैं । मतलब सेंट्रल जेल में विचाराधीन कैदी नंबर दो पांच सौ पैंतीस चुपचाप अपनी कोठरी में दाखिल हुई । फॅमिली भी उनकी गिरफ्तारी की दृश्य प्रसारित कर रहा था । इसके बाद जब जयललिता के घर और अन्य स्थानों पर छापे पडे तो सब देवी ने उन कार्यवाहियों को बारह बार प्रसारित किया ताकि जनता बरामद किए गए आभूषणों और अन्य पेश कीमती चीजों को देख सके क्योंकि एक कलाकार रही पूर्व मुख्यमंत्री की संपत्ति थी । उनकी गिरफ्तारी से पहले अन्नाद्रमुक के ढाई हजार से ज्यादा समर्थकों को हिरासत में ले लिया गया इसलिए विरोध ज्यादा नहीं देखा । एक समर्थक ने आत्महत्या कर ली और कुछ बसों को चलाया गया । करुणानिधि ने पत्रकारों से कहा की गिरफ्तारी राजनीतिक प्रतिशोध की कार्यवाही नहीं थे । हमने सिर्फ अदालत के निर्देशों का पालन किया । वीडियो कैसेट की एक साधारण दुकान चलाने वाली शशिकला नहीं पांच वर्षों से भी कम समय में एक हजार करोड की संपत्ति जमा कर लेते हैं । उसके राशन कार्ड, मतदाता पहचान पत्र, किसी संदेह की गुंजाइश नहीं रहने देते हैं कि वह जयललिता के साथ पोलिस कार्टन में रहती थी । किसी रिपोर्ट नहीं क्या पूछने की जहमत नहीं उठाई की सरकार दोनों की संपत्तियों के अनुमानित कीमत पर कैसे पहुंचे? अपनी गिरफ्तारी से पहले ही जब शशिकला और अन्नाद्रमुक के कई पूर्व मंत्रियों को हिरासत में लिया गया, जयललिता ने सत्ताईस अगस्त उन्नीस सौ छात्रों को घोषणा की कि शशिकला से जिसे मैं हमेशा उडान प्रवासन उत्तरी बताती रही थी, अब उनका कोई वास्ता नहीं है । उन्होंने यह भी घोषणा की उनके फैसले सिर्फ और सिर्फ उनके थे जो किसी व्यक्ति या परिवार के दबाव में नहीं दिए गए थे । जयललिता के संबंध तोडने के बाद भी शशिकला ने असाधारण वफादारी दिखाई और उनके खिलाफ एक प्रशस्त बोलने से बचते रहें । पुलिस की क्राइम ब्रांच ने रंगीन टीवी मामले में जो सबूत जुटाए उन के अनुसार दिसंबर में जयललिता ने टीवी सेट्स की खरीद से संबंधित फाइल मंगवाई और एक टीवी की कीमत चौदह हजार पांच सौ रुपए निश्चित कर दी जो बाजार से ज्यादा कीमत थी । जांच अधिकारियों का कहना था की क्योंकि ग्राम पंचायतों में वितरित करने के लिए कम से कम पैंतालीस हजार तीन सौ दो टीवी से खरीदे जाने थे । इसलिए परी डिस्काउंट के लिए मोलतोल क्या जाना संभव था जो तो राज्य और केंद्र की एजेंसियों ने जयललिता के खिलाफ छह अन्य मामले खोल रखे थे लेकिन करुणानिधि सरकार ने उन्हें खेलने के लिए टीवी घोटाले को चुना । इसमें सौदे को अंतिम रूप देने में उनकी व्यक्तिगत भागीदारी साहिर होती थी । जब चला नेता गिरफ्तार हुई अधिकतर अखबारों ने भविष्यवाणी की कि उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के इतने सारे मामले होने के कारण उनके लिए राजनीतिक रूप से फिर से उठ खडे होना बहुत ही मुश्किल होगा । लेकिन तुगलक पत्रिका के संपादक और लेखक चोर हम स्वामी ने भविष्यवाणी की आप उनके राजनीतिक अवसान की बात नहीं कर सकते हैं । जयललिता अठ्ठाइस दिनों के लिए जेल में रहे और जब वो बाहर आई तो नरम पडने के बजाय पहले से अधिक दृढ निश्चय थी । यह एक पीडादायक अनुभव रहा होगा । बाद में उन्होंने विस्तार से बताया कि उन्होंने चूहों से बडे खेल में कितनी मुश्किलें झेलनी । उन्होंने चेल के भीतर जिस कदर मर्यादित व्यवहार दिखाया उससे चेल बॉर्डर प्रभावित हुए बिना नहीं रहे । उन्होंने वहाँ कभी कोई शिकायत नहीं की तरह किसी से बात नहीं करती थी । अपना पूरा समय उन्होंने पढते हुए कहा था । जेल से वापस आने के बाद जनता के सामने वो बिना बहनों के साथ की भरे व्यक्तित्व के साथ उपस् थित हुई । एक ऐसी महिला जान के गहनें सब कर लिया गए थे । परिसंपत्तियां फ्रीज कर दी गई थी और आवास में कुर्की कर दी गई थी । पुरुषों के प्रभुत्व वाली राजनीतिक दुनिया में प्रताडित की गई । एक अकेले महिला जनता का दिल पसीज गया और हाँ चो रामास्वामी सही थे । जयललिता को हाशिया पर नहीं डाला जा सकता था । उनकी तरह नमस्ते कल हमारा है । भविष्यवाणी सही साबित हुई है ।

अम्मा: जयललिता - 16 (घायल बाघिन)

वो घायल पाकिर जेल से रिहा होने के बाद जयललिता अगले नौ महीनों तक एक तरह से एकांत पास में नहीं किसी अपराधबोध क्या शर्मिंदगी के कारण नहीं । मैं घायल भाग्य की तरह थी जिसके गुस्से को नियंत्रित नहीं रखा जा सकता था तो उसे अपना अधिकार लेकर रहना था । अपने खुद के अस्तित्व के लिए उन्हें पार्टी को बचाना था जो निष्क्रिय हो चुकी दिख रही थी । जब पहनना इस तरह से पार्टी कार्यालय में उपस्थित हुई तो कार्यकर्ताओं की खुशी का ठिकाना नहीं था । उनके कानून हाथों या कल ही में कोई आभूषण नहीं था । उन्होंने पोशाक के ऊपर रहने वाला लगता भी हटा दिया था । कार्यकर्ताओं से उन्होंने कहा, मैं अब भी राजनीति में हूँ क्योंकि मैं नहीं जाती की इतिहास यह दर्ज हो कि अन्नाद्रमुक पार्टी जैसे एमजीआर ने करुणानिधि के विरोध में बनाया था । करुणानिधि के हाथों समाप्त हो गई । उनकी बातों ने समर्थकों को रुला दिया था । पार्टी उनके बिना नहीं चल सकती थी और इसी में जयललिता की ताकत है क्या दिखाना भी जरूरी था कि वो अब भी निर्विवाद नेता है जैसे पार्टी के भीतर कोई चुनौती नहीं दे सकता । यह दिल्ली के राजनीतिक माहौल में बदलाव था जिसने जयललिता को एक बार फिर सक्रिय कर दिया । नवंबर बाॅम्बे में जारी हुई चयन आयोग की रिपोर्ट ने डीएमके को एक बडा झटका दिया जो उस समय केंद्र की आई के गुजराल की संयुक्त मोर्चा सरकार की सहयोगी ही नहीं बल्कि मंत्रिमंडल का भी हिस्सा थी । राजीव गांधी हत्याकांड के व्यापक परिदृश्य की पडताल करने वाले आयोग ने डीएमके का खास तौर पर से जैन आयोग की रिपोर्ट में करुणानिधि और उनकी पार्टी को राजीव गांधी के हत्यारों को बढावा देने का दोषी करार दिया । अब संयुक्त मोर्चा सरकार को बाहर से समर्थन दे रही कांग्रेस पार्टी ने कुछ साल मंत्रिमंडल से टीएमके को हटाए जाने की मांग की । ऐसा नहीं होने पर कांग्रेस ने अपना समर्थन वापस लेने की चेतावनी दी थी । करुणानिधि झुकने को तैयार नहीं हुए क्योंकि कांग्रेस की धमकी पर स्वयं ही मंत्रियों को निकाल लेने से यह संदेश जाता की उन्होंने चयन आयोग के निष्कर्ष को स्वीकार कर लिया है । जब कांग्रेस ने अल्टीमेटम जारी कर दिया तो गुजराल ने डीएमके मंत्रियों के इस्तीफे का चार दिनों तक इंतजार किया लेकिन जब ऐसा हुआ नहीं तो उन्होंने राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा भेज दिया । देश अब मध्यावधि चुनाव की ओर अग्रसर था । जयललिता ने चलती ही हिसाब किताब बिठा लिया कि कांग्रेस जहाँ अपनी खोई ताकत अब भी हासिल नहीं कर पाई है, वहीं भारतीय जनता पार्टी अभूतपूर्व ताकत के साथ उभरते दिखा रही है । उन्होंने ऐसे मैं हल्का पानी से गुपचुप भेड कर भाजपा के साथ गठबंधन किया, जो द्रविड राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत थी । उन्होंने महसूस किया कि एक ऐसे राष्ट्रीय तल से हाथ फैलाना जरूरी है जिसके दिल्ली में सरकार बनाने के अच्छे आसार हो । भाजपा को लोकसभा में सशक्त समर्थन देकर बहन मंत्रिमंडल में महत्वपूर्ण विभागों में अपने मंत्री बैठा सकती थी, जो उन्हें भ्रष्टाचार के विभिन्न मामलों से बाहर निकालने में सहायक होते हैं । अगर तहत भाग्यशाली रही तो केंद्रीय नेतृत्व को तमिलनाडू की डीएमके सरकार को गिराने के लिए भी राजी कर पाएगी और इस तरह उनकी वापसी का रास्ता साफ हो सकेगा । जयललिता की राजनीति थी पूरी ताकत के साथ चुनाव प्रचार करना, खुद को ऐसी महिला के रूप में प्रदर्शित करना जैसे करुणानिधि ने झूठे आरोपों में फंसाया है, जिसमें उन्हें आम अपराधियों की तरह अठ्ठाइस दिनों के लिए जेल में रहने को मजबूर किया । ऐसे उन्हें लोगों की सहानुभूति मिलने की संभावना थी । उनके अभियान में केंद्र में एक स्थिर सरकार की जरूरत पर भी बल दिया गया । चुनाव के ठीक पहले एक और घटना हुई जिसमें जयललिता को फायदा पहुंचाया । चौदह फरवरी उन्नीस सौ को जिस दिन भाजपा नेता एलके आडवाणी को कोयंबटूर में एक चुनावी सामान संबोधित करनी थी, वहाँ कुल तेरह जगहों पर हम धमाके हुए जिनमें कम से कम पचास लोग मारे गए । अपनी सभा के समय में एक बदलाव के कारण आठवाणी सुरक्षित रहे । बम धमाकों ने डीएमके को हिला दिया और करुणानिधि को परेशान कर दिया क्योंकि पूर्व चेतावनी पर ध्यान नहीं देने को लेकर उनकी ओर उंगलियां उठाई थी । दरअसल जब दिसंबर उन्नीस सौ बानबे में अयोध्या में बाबरी मस्जिद को गिराया गया, उसके बाद से कोयंबटूर में अल उम्मा नामक सांप्रदायिक संगठन अपनी जडे जमा रहा था । करुणानिधि रहे इस संगठन के समर्थकों और पुलिस के बीच आए दिन होने वाली झडपों पर ध्यान नहीं दिया था । जयललिता शहर तक शहर घूमकर करुणानिधि पर आरोप लगाती रही । करुणानिधि सरकार ने तमिलनाडु को जो उनके कार्यकाल में शांति का उपमा था, चरमपंथियों के लिए सुरक्षित सैरगाह और निर्दोष आम जनों के लिए असुरक्षित स्थान में बदल दिया है । संसदीय चुनाव में डीएमके घर छोडकर सूपडा साफ हो गया जबकि जयललिता के नेतृत्व वाले गठबंधन को तीस सीटों पर सफलता मिले जिनमें से अठारह अकेले अन्नाद्रमुक ने जीती थी । जनता मानो खुल चुकी थी कि उसने दो साल पहले जयललिता का पूरियाँ बिस्तर बनवाया था । जयललिता खुश थे । एक बार फिर उनमें ताकत आ चुकी थी । भाजपा जिससे स्पष्ट बहुमत नहीं मिल पाया था, सत्ता में बने रहने के लिए उनके अठारह सांसदों पर निर्भर थी । यह सौदेबाजी का बढिया अवसर था जो उनके एकसूत्र एजेंडे राज्य में कानून व्यवस्था की खराब स्थिति के बहाने डीएमके सरकार की बर्खास्तगी जो पूरा कर सकता था । जयललिता ने जब केंद्र की भाजपानीत सरकार को बिना शर्त समर्थन दिया था तो उन्हें साहब तौर पर उम्मीद है कि उन्हें अहम सहयोगी की मान्यता देने के लिए प्रधानमंत्री तुरंत टीएमके सरकार को बर्खास्त कर देंगे । प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने बारह महीनों तक उनके साथ शाही बर्ताव किया । उन्होंने उनके हित में अपना मंत्री चुनने और विभाग बांटने का विशेषाधिकार छोड दिया । वाजपेयी ने वरिष्ठ अधिकारियों की नियुक्ति और बर्खास्तगी संबंधी उनकी बातें भी मानी । लेकिन करुणानिधि की निर्वाचित सरकार को देखिए हटाया जयललिता ने ताकि मंत्रियों रामकृष्ण हेगडे, बूटा सिंह और राम जेठमलानी को हटाए जाने की मांग की । बूटा सिंह को तो हटा दिया गया लेकिन बाकी को पद पर बने रहने दिया गया । जब उन्होंने रक्षामंत्री जॉर्ज फर्नांडिस के नौसेना प्रमुख एडमिरल पृष्ठों भागवत को हटाने के आदेश पर आपत्ति जताई तो संघ परिवार ने खूब हो हल्ला मचाया कि जयललिता लक्ष्मण रेखा लांघ रही है । जयललिता ने जॉर्ज फर्नांडिस को बर्खास्त किए जाने की मांग की । ऐसा लग रहा था कि वह करुणानिधि को दिखाना चाहती थी कि वह केंद्र में कितनी ताकतवर हैं । जयललिता पहुंच जल्दबाजी में दिख रही है । उन्होंने अपने खिलाफ मामले देखा ही विशेष अदालतों की वैधता को चुनौती थी । लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने विशेष अदालतों को काम करने की अनुमति दे दी । अब मुकदमे चलती ही शुरू होने वाले थे और भले ही उनके वकील दावा कर रहे हो कि वह बिलकुल पाकसाफ साबित होंगी, लेकिन खुद जयललिता को डर था कि डीएमके कोई न कोई चाल चलकर उन्हें भारी नुकसान पहुंचा सकती है । ऐसे में दिल्ली पहुंचे हाँ, संयोग से चाय पार्टी में गई जहां कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी समेत सभी बडे कांग्रेसी नेता मौजूद थे या केंद्र की भाजपा सरकार के लिए ब्लैक मेल संदेश की तरह था कि यदि उनकी मांगे नहीं मानी गई तो वह पाला भी बदल सकती हैं और जो लास्ट भी था बहन हो गया । माना जाता है कि भाजपा फर्नांडिस की बर्खास्तगी की मांग मानने को तैयार नहीं हुई और अपनी मांग नहीं माने जाने के आधार पर जयललिता ने में केंद्र सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया और इसके बाद अविश्वास प्रस्ताव पर हुई वोटिंग में नाटकीय रूप से मात्र एक मत से पीछे रह जाने वाली सरकार गिर गए । कांग्रेस ने ये कहते हुए सरकार गठित करने का एक टाइम इयर प्रयास किया कि उसके पास पर्याप्त संख्या में सांसद है लेकिन इस बारे में मैं प्रमाण नहीं दे पाएँ । नए चुनावों की घोषणा कर दी गई लेकिन भाजपानीत सरकार को एक कार्यवाहक सरकार के रूप में बने रहने दिया गया जैसे कारगिल युद्ध से भी निपटना पडा । जयललिता के लिए यह एक हार थी लेकिन उन्होंने इसपर कोई खेद नहीं जताया । उनके इस व्यवहार से उनके दुश्मनों की स्थिति मजबूत हुई । यह सब उन्नीस सौ निन्यानवे में हुआ था । डीएमके के स्वर्ण जयंती वर्ष में विडंबना ही कही जाएगी कि इसी वर्ष पार्टी को एक बडा नीतिगत फैसला लेना पडा हूँ जो उसकी विचारधारा के खिलाफ गया । करुणानिधि ने तत्कालीन राजनीतिक घटनाक्रम पर विचार करने के लिए पार्टी के कार्यकारी परिषद की बैठक बुलाई । परिषद एकमत थे की पार्टी की सर्वोच्च प्राथमिकता जयललिता के खतरे को रोकना है । डीएमके राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के बीच ऐतिहासिक पैनस जनता के बावजूद डीएमके के कार्यकारी परिषद ने भाजपा को समर्थन देने का फैसला किया । जैन आयोग की रिपोर्ट के बाद से सोनिया गांधी डीएमके से दूरी बनाए रखने की नीति पर चल रहे थे । भाजपा आपातकाल के दिनों से ही करुणानिधि के मित्र रहे थे और उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण उन्होंने डीएमके सरकार को बर्खास्त करने के जयललिता के आग्रह को नहीं माना था । इसलिए आगामी चुनाव में डीएमके भाजपा के साथ होने का सोचा समझा फैसला कर सकती थी । जयललिता यह अनुमान नहीं लगाई थी कि उन्हें खत्म करने के लिए डीएमके इतना आगे तक जा सकती है ।

अम्मा: जयललिता - 17 (सियासी बदला)

सियासी बदला भाजपा की सरकार गिरने के बाद में लोकसभा के नए चुनाव कराए जाने की घोषणा हुई तो जयललिता को अहसास हो गया कि उन्हें फिर से खुद को तैयार करना होगा । एक बार फिर लडाई लडनी होगी । वाजपेयी सरकार के पतन में मुख्य किरदार होने के कारण ऐसा लाजमी लग रहा था कि जयललिता कांग्रेस के साथ अपने गठबंधन को एक बार फिर खडा करेगी । लेकिन भाजपा के साथ कल जोड में रहने के दौरान उन्होंने सोनिया गांधी की राष्ट्रीयता को लेकर कठोर टिप्पणियां की थी । अब उन्होंने अपने अभिमान को ताक पर रखते हुए व्यवहारिक बनने की जरूरत थी । उन्होंने कांग्रेस के साथ एक चुनावी समझौता किया । अपने खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों को लेकर डीएमके सरकार के उत्साह को देखते हुए जयललिता के लिए केंद्र की सरकार में रखा लिखना जरूरी था । उनके प्रशंसकों को विचारधारा संबंधी बहस क्या चुनावों के तानेबाने की ज्यादा समझ शायद ही रही होगी? उनके लिए मायने रखने वाली एकमात्र चीज थी किसी भी गठबंधन में अम्मा, फिर जेता बनकर रुपये और यह है कि खलनायक दुर्योधन रुपये करुणानिधि समाप्त हो जाए । अपनी ही कहीं बात बुलाते हुए या पार्टी कार्यकर्ताओं से किये वायदे को ताक पर रखते हुए शशिकला से उनका कोई वास्ता नहीं रह गया है । जयललिता ने शशिकला के भतीजे टीटीके दिनाकरन को पेरियाकुलम सीट से टिकट दे दिया । प्रवर्तन निदेशालय दिनाकरन के खिलाफ विदेशी मुद्रा विनिमय कानून के उल्लंघन के मामलों की पडताल कर रहा था और वह अभी अभी जेल से बाहर आए थे । करीब दो साल तक जेल में रहने के बाद शशिकला अभी जमानत पर बाहर थी । ऐसी अफवाहें चली कि वे वापस तो इसका आर्डन में आ गई हैं । अभी कुछ दिनों तक लोगों की नजरों से दूर रही लेकिन जल्दी ही वह चुनावी दौरों पर जयललिता के साथ देखने लगी । पार्टी कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों को यह सुहाने ही रहा था लेकिन दबी जुबान में ही इस संबंध में बातें कर रहे थे । शायद विमान चुके थे कि राजनीतिक कामों में सक्रिय एक अकेली महिला के लिए व्यावहारिक कारणों से शशिकला जैसी किसी शख्स की जरूरत होती होगी । उनकी सभाओं में भारी भीड जुटी रही और जनसैलाब को देखकर जरूर ही उनके दल को ठंडक पहुंचती होगी की अब भी जनता बाद उनकी पकट बनी हुई है । अगर उनकी सहयोगी पार्टी कांग्रेस को तमिलनाडु में जीत मिली तो सिर्फ और सिर्फ उनके करिश्मे के कारण । उन्होंने एक बार भी सोनिया गांधी का जिक्र प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में नहीं किया । उन्होंने सोनिया गांधी से मिलने का एक मौका भी करवाया । बेलोर में उन्हें सोनिया के साथ एक चुनावी सभा में भाग लेना था लेकिन वो ये कहते हुए सभास्थल पर नहीं पहुंचे कि वो ट्रैफिक जैम में फंस गई थी । सोनिया ने कुछ देर तक उनका इंतजार करने के बाद सभा को संबोधित किया और तिथि के लिए रवाना हो गए । हिन्दू अखबार ने इस बारे में करुणानिधि की टिप्पणी प्रकाशित किया कि यदि कांग्रेस सचमुच में सत्ता में होती है तो जयललिता के लखनऊ से तंग आकर सोनिया गांधी इटली भाग जाएंगे । जब परिणाम आए तो जयललिता के मात्र दस सांसद थे जबकि भाजपा टीएमके मोर्चे को छब्बीस सीटे मिली थी । अकल्पनीय खंडित हो चुका था । डीएमके वाजपेयी सरकार का कम थी । डीएमके और भाजपा के बीच एक बहुत कट बंद था । जयललिता उनकी साझा दुश्मन थी । करुणानिधि के प्रिया भांजे मुरासोली मारन को एक महत्वपूर्ण मंत्रालय, वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय का मंत्री बनाया गया । जिस रामजेठमलानी को उन्होंने अपनी जिसके कारण विरोधी बना लिया था उन्हें विधि मंत्रालय मिलाता हूँ जो जयललिता के लिए बुरी खबर है । एक बार फिर उनका भविष्य खराब देखा था

अम्मा: जयललिता - 18 (सितारों पर जादू)

तो सितारों पर जादू उन्हें बताया गया था कि किसी का भाग्य बदलने के लिए सितारों में हेरफेर की जा सकती है, उन्हें मनाया जा सकता है । अंक ज्योतिष के अनुसार संख्याएं भी भाग्य को बदल सकती है तो उन्होंने बताया गया की ना उनका भाग्यशाली नंबर है । इसलिए उनके नाम में एक अंग्रेजी का ये अक्सर जोडा गया और वह तो ए वाली जयललिता बन गई । एक अन्य चौतीस हरे रंग को उनके लिए भाग्यशाली बताया । जब वो सत्ता में वापस आई और हरा रंग पहनना शुरू किया तो नौकरशाही भी हरे रंग के पीछे भागने लगे और छत से लेकर का नीचे तक और कलम से लेकर सार्वजनिक आयोजनों में भी देता था । सब कुछ हरे रंग में रंग दिए गए । महिला कर्मचारी हरे रंग के अलग अलग क्षेत्र के सरिया पहन रही थी और तीस दिन के उत्तरार्ध में ज्योतिषियों ने कहा कि अस्थाई तौर पर ही सही है उनके राशिफल में नक्षत्रों की स्थिति प्रतिकूल है । उन्होंने कहा कि बाहरी चीजों को नियंत्रण में रख सकती है । उन्होंने एक लंबी सूची सौंपी की क्या करना है और क्या नहीं लेकिन डूबते को तिनके का सहारा की तर्ज पर उन्होंने सबका पालन किया नहीं । सहस्राब्दी की शुरूआत उनके लिए अच्छी नजर नहीं आ रही थी । बारह जनवरी दो हजार को खबर आई के अन्नाद्रमुक के पूर्व विधायक मलिका को भ्रष्टाचार के आरोपों में दोषी पाया गया है और उन्हें सात वर्ष का कठोर कारावास मिला है । आमधारणा अब दुखता हो गई कि अन्नाद्रमुक भ्रष्ट हैं । पार्टी कार्यालय में निराशा का माहौल बन गया । तांसी भूमि घोटाले पर जल्दी ही फैसला आने वाला था । अब माँ का भविष्य क्या होगा? पार्टी का भविष्य क्या होगा? किसी को भाग नहीं था । जयललिता को भी नहीं कि बारह घंटे के भीतर मोड बदल जाएगा । अगले सुबह मद्रास हाईकोर्ट के जज एस तक राजनयिक जयललिता को तांसी मामले में बरी कर दिया । जयललिता की हाँ आश्चर्य का ठिकाना नहीं था । निश्चय ही है । किसी देवता की कृपा थी या फिर नक्षत्रों की दशा में कोई बदलाव आया था । ऍसे इस बारे में टिककर पर ब्रेकिंग ॅ किया । अगले दिन अन्नाद्रमुक के मुखपत्र नौ तो एमजीआर में हैडलाइन थी । धर्म की जीत हुई, दुर्भावना की हार हुई । बी । एम के खेमे में घोर निराशा का माहौल था । करुणानिधि और उनके सलाहकारों को इस मामले से पूरी उम्मीद थी । तमिलनाडु के आपराधिक जांच विभाग के विशेष शाखा सीबीसीआईडी ने आरोपपत्र में कहा था कि चेन्नई के किंडी औद्योगिक केंद्र में सरकारी प्रतिष्ठा तांसी के स्वामित्व भोपाली तीन दशमलव अठहत्तर एकड जमीन उन्नीस सौ चौरानवे पांडे में जया पब्लिकेशंस और शशि एंटरप्राइसेस ने जिसमें जयललिता और शशिकला की साझेदारी थी, बाजार भाव से काम पर खरीदी थी और सरकार को चूना लगाया था । इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह थी कि जयललिता ने राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में अपनी शक्तियों का खुला दुरुपयोग किया था । जज तंग राज ने आरोप की कानूनी वैधता पर सवाल उठाया, सरकारी सेवक सरकारी परिसंपत्ति हासिल नहीं करेंगे । यह मात्र दिशा निर्देश था, कोई कानून नहीं । इसलिए क्या है दंडनीय अपराध नहीं था । इसके अलावा इस बात के सबूत भी नहीं थे कि जिससे अभियोजन पक्ष का आरोप सिद्ध होता हो कि जयललिता ने चाल चली और अपने अधिकारों का दुरुपयोग कर सरकार को धोखा देते हुए जमीन हासिल की । अंतर था । सुप्रीम कोर्ट ने भी उन्हें यह कहते हुए बरी कर दिया कि अभियोजन पक्ष का मामला कमजोर है । लेकिन जल्दी ही एक बडा झटका लगा विशेष अदालत के जज भी राधाकृष्णन ने, जिन्होंने उन्हें कोयला आयात घोटाला मामले में बरी किया था । जयललिता और उनके पूर्व मंत्रिमंडलीय सहयोगी सेल्वागणपति, आईएएस अधिकारी एच एम पांडे और होटल प्लेस इंडस्ट्री के मालिक राकेश मित्तल एवं पी शनमुगम को हिल स्टेशन कोडाई कनाल में होटल में अतिरिक्त मंजिले बन पाने के लिए सामूहिक रूप से पर्यावरण कानूनों के उल्लंघन की साजिश करने का दोषी ठहराया । उन्हें एक वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई । अदालत में मौजूद जयललिता सदमे में थी । जब खबर बाहर आम लोगों तक पहुंचे तो हंगामा खडा हो गया । पार्टी मुख्यालय में अन्नाद्रमुक के आम कार्यकर्ता आप ऐसे बाहर हो गए राज्य में दंगे बढा कोर्ट हैं । दस पैसे जला दी गए जबकि अन्य को नुकसान पहुंचाया गया । पुलिस को मारो लकवा मार गया था । हिंसा अब अमानवीय स्तर पर पहुंच गयी जब अन्नाद्रमुक समर्थकों ने धर्मपुरी से वापस आ रही तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय की एक बस को आग लगा दिया तो छात्राओं से भरी हुई थी तीन छात्राओं गायत्री कोकिला, वाणी और है ज्यादा की मौत हो गए जबकि सोलह अन्य जलने से घायल हो गई । जयललिता की प्रतिक्रिया एक हारे हुए बुरे खिलाडी जैसी थी । उन्होंने टीएमके पर इस हमले की साजिश करने का आरोप लगाते हुए कहा कि विरोधी पार्टी तीन सीटों के लिए होने वाले आगामी उपचुनावों से पहले अन्ना प्रमुख की छवि खराब करना चाहती है । करुणानिधि के आलोचक तक जयललिता के इस आरोप को हास्यस्पद मान रहे थे । अन्नाद्रमुक समर्थक हमलावरों के लिए अपने चेहरे क्या अपराध को छुपाने का कोई रास्ता नहीं था? उन्होंने सभी टीवी चैनलों को रास्ता जाम करने के अपने कार्यक्रम के पूर्व जानकारी दे रखी थी ताकि अनुम आता क्या जानकारी पहुंच सके की उनके प्रति उनकी कितनी निष्ठा और भक्ति है । इस दुखद घटना की फिल्मिंग सिर्फ सनटीवी ने बल्कि चाहती विनय भी की थी और स्थानीय संवाददाताओं ने तस्वीरों और सजीव वर्णन के साथ इसकी रिपोर्टिंग की थी । अन्नाद्रमुक समर्थकों को बस पर पेट्रोल छिडककर आग लगाते देखा जा सकता था, शिक्षकों और छात्राओं की चीखपुकार पर कोई ध्यान नहीं दे रहे थे । जब जयललिता ने घटना के वीडियो क्लिप देखें और सुनिश्चित किया कि हमलावर वास्तव में उन्हीं की पार्टी के समर्थक थे तो उनके हो उससे का ठिकाना नहीं रहा । कोई भी कारण नहीं था कि वह हमलावर कार्यकर्ताओं का समर्थन कर पाती । सरकार ने मामले की सीबीसीआईडी जांच की घोषणा की । उन बेचारी लडकियों की स्मृति उन्हें प्रचलित करती रही । युवा और प्रतिभावान लडकियाँ जो गरीब घर से थी और तमाम अवरोधों के बावजूद पढाई कर रहे थे, उनके दिलों में बडे सपने थे । उन मूर्खों के कारण सब खाक हो गया । अभी व्यवस्थाओं ने कहा था चिंता नहीं करूँ, कुछ परिहारा प्राइस सर की जा सकते हैं । अपने पास होने के लिए आपके पास हमेशा कई विकल्प होते हैं ।

अम्मा: जयललिता - 19 (देवताओं की पूजा)

देवताओं की पूजा उधर करुणानिधि के परिवार में बडे बेटे अलागिरी और उसे छोटे स्टालिन के बीच जिसे करुणानिधि के उत्तराधिकारी के रूप में तैयार किया जा रहा था, भाई भाई की प्रतिद्वंदिता के कारण मतभेद पैदा हो रहे थे । अलागिरी मदुरई में रहता था जहाँ उसने किसी दादा की तरह अपना साम्राज्य बना रखा था । बहस थाणे पुलिस प्रशासन और यहाँ तक कि मंत्रियों तक को हडकाता था । जयललिता इस उम्मीद के साथ बडे कौन से इस पर नजर रख रही थी कि इससे डीएमके की छवि खराब होगी । लेकिन उन्हें एक और धक्का लगा । तांसी भ्रष्टाचार का मामला जिसमें देश की सर्वोच्च अदालत ने उन्हें बरी कर दिया था । सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर ही नहीं सिरे से सुनवाई के लिए हाईकोर्ट में आ गया । इस बार उन्हें अन्य सह आरोपियों के साथ तीन वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई । जयललिता को पक्का विश्वास था कि अभियोजन पक्ष ने बचाव पक्ष को रिश्वत खिलाकर केस को खराब करा दिया है । अब सवाल कहता कि क्या उन्हें चुनाव लडने दिया जाएगा? निसंदेह तो सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सकती थी लेकिन किसे पता था कि अंतिम फैसला कितने समय बाद आता और ये कौन जानता था कि सुप्रीम कोर्ट में आने वाला फैसला उनके खिलाफ नहीं होता । फैसले के खिलाफ जब उन्होंने मद्रास हाईकोर्ट में अपील दायर की तो अदालत ने सजा पर रोक तो लगा दी लेकिन सजा के फैसले को बदलने की जरूरत नहीं समझे । उन्हें आश्चर्य हो रहा होगा कि कोई अनिष्टकर बुरी ताकत उनके खिलाफ काम तो नहीं कर रही है जो उनके नियंत्रण से परे हैं । देवताओं को पसंद करने कुंभकोणम के कुम्भेश्वर मंदिर गयी जनता के सामने बहुत बिना अगर बनाई गई अन्नाद्रमुक की उनके इसमें वर्षगांठ के अवसर पर वो जयजयकार करती भीड के सामने गरजी । किसी से डरने की जरूरत नहीं है । करुणानिधि के पास मुझे जनता की अदालत में पराजित करने की कूवत नहीं है । तभी तो वहाँ मुझे पराजित करने के लिए विशेष अदालतों में जा रहे हैं । चाहे जितनी करुणानिधि मेरे खिलाफ चालीस चले, वे आने वाले दिनों में हमसे हमारी जीत नहीं खेल सकते हैं । इस निराशाजनक कढी में उनके साहस और नेतृत्व नहीं । अन्नाद्रमुक कार्यकर्ताओं के मन में एक नया जोश खूब दिया । उन्होंने कार्यकर्ताओं में यह विश्वास भर दिया कि भविष्य सुरक्षित है और उन्हें निजी तौर पर लगे अदालत ही झटके अस्थायी है । इसके बाद भावनाओं में बहते हुए उन्होंने कहा, यदि करुणानिधि जिंदा रहे तो दो हजार एक में सत्ता में वापस लौटने बाद मैं उन्हें जिंदगी भर के लिए जेल में डाल देंगे । तमिलनाडु में चुनाव के लिए मई दो हजार एक की तारीखें तय की गई थी । जयललिता चुनाव लड सकेंगे या नहीं इसपर अस्पष्टता ने करुणानिधि का आत्मविश्वास बढा दिया था । जयललिता ने चार सीटों पर नामांकन के पर्चे दाखिल किए लेकिन चुनाव अधिकारियों ने एक एक करके उनके सारे पर्चे रद्द करती है । उन्होंने इसके पीछे जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा आठ भाग तीन के प्रावधानों का उल्लेख किया जिसमें ऐसे किसी व्यक्ति को अयोग्य घोषित किया गया है जिसे सुनवाई अदालत ने किसी भी मामले में दोषी ठहराते हुए दो वर्ष से ज्यादा कैद की सजा सुनाई हो । जयललिता को अंदाजा रहा होगा कि इस तरह की व्यवस्था दी जा सकती है लेकिन उन्हें ये भी पता होगा कि आगे क्या करना है तो राज्य के कोने कोने में जाकर जनता से अपील करेंगे । उन्होंने जनता के समक्ष मुद्दों, सिद्धांतों या अपनी भावी योजनाओं की चर्चा कर समय बर्बाद नहीं किया । उन्होंने मतदाताओं से कहा कि उन्हें गलत फसाया जा रहा है । वो न्याय के लिए लड रही हैं, अपने अस्तित्व की लडाई लड रही हैं । उन्होंने कहा, करुणानिधि ने सोच समझकर मुझे खत्म करने की साजिश रची है । मैं उसका मुखौटा नोचकर उसका असली चेहरा सामने लाऊंगी । उन्होंने एक एक कर गिनाया की कैसे डीएमके नेता ने उनके खिलाफ झूठे मामले शुरू करवाएं, झूठे सबूत बनाए और उनके चारों नामांकन पत्रों को खारिज करने के लिए चुनाव अधिकारियों पर दबाव डाला । मेरे लिए हर फैसले से ज्यादा महत्वपूर्ण जनता का फैसला है । इसके बाद अपना आंचल फैलाते हुए उन्होंने विनती की मैं आपके सामने भीक मांगने के लिए खडी हूँ । वहाँ मौजूद अनेक लोग रो पडे थे । जयललिता के खुद के चुनाव लडने पर रोक लगनी होने के बावजूद उनकी पार्टी भारी बहुमत से पिटाई हुई । उन्होंने जोर देकर कहा कि अन्नाद्रमुक को मिला जनादेश दरअसल होने राज्य का शासन चलाने के लिए मिला आदेश है उन्हें विधायक दल का नेता चल दिया गया और तमिलनाडु के राज्यपाल फातिमा बीवी ने उन्हें सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया । भारतीय संविधान का अनुच्छेद एक सौ चौंसठ राज्यपाल को किसी को भी मुख्यमंत्री बनने के लिए बुलाने का अधिकार देता है हूँ ।

अम्मा: जयललिता - 20 (प्रतिशोध)

प्रतिशोध प्रतिशोध की अब मेरी बारी है । यह जयललिता का मुख्य एजेंडा है । यह चलती ही स्पष्ट हो गया हूँ । अन्नाद्रमुक की चुनावी जीत के कुछ सप्ताह बाद तीस जून दो हजार एक को रात के दो बजे करुणानिधि को चेन्नई के ओलिवर रोड स्थित उनके आवास पर सोते से जगा कर बिस्तर से एक तरह से उठा लिया गया । रिपोर्टों के अनुसार पर्शिया डीएमके नेता को कपडे बदलने तक का मौका नहीं दिया गया । टेलीफोन लाइनें काट दी गई थी और करुणानिधि का आवास निर्दलीय दिख रहे पुलिस कर्मियों से भरा हुआ था जो अम्मा के आदेशों का पालन करने के लिए वहाँ आए थे । वहीं पुलिस कर्मी जो करुणानिधि के मुख्यमंत्री रहने के दौरान हमेशा उनके सामने सावधान की मुद्रा में खडे रहते थे । अपने मोबाइल फोन से मैं अपने भरोसे के व्यक्ति और ढांचे पूरा सो निवारन को घटनाक्रम की जानकारी देने में सफल रहे । केंद्रीय मंत्री मारन उस समय चेन्नई में थे । कुछ भी मिंटो में वो करुणानिधि के आवास पर मौजूद थे । सेंट टीवी की टीम भी वहां पहुंच चुकी थी और शायद भर्ती के रूप में पुलिस वालों ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया । क्या नजर अंदाज किया कि उनकी गतिविधियां कैमरों में रिकॉर्ड हो रही हैं । जब दस पुलिस कर्मी करुणानिधि को सीढियों से घसीटते हुए नीचे ला रहे थे तो कमजोर डरे हुए करुणानिधि दर्द के मारे अयो बोलते हुए करहा रहे थे । नीचे लाने पर उन्हें वहाँ खडी पुलिस की गाडी में धकेलकर डाल दिया गया । गिरफ्तारी का वारंट दिखाने की मांग करने पर मारन को भी क्या दिया गया? बाद में पुलिस ने मारन और तब तक वहाँ पहुंच चुके एक अन्य केंद्रीय मंत्री टीआर बालू के साथ हाथापाई भी की । सनटीवी दृश्यम के महत्व को समझता था इसलिए इन्हें तीस जून की सुबह से लगातार दिखाया गया । यहाँ तक कि करुणानिधि के आलोचकों को भी इन्हें देखकर पुलिस की बर्बरता पर चिंता हुई होगी । मुरासोली मारन को पुलिसिया कार्रवाई का अंदेशा रहा होगा और उन्होंने सनटीवी की टीम को हर समय तैयार रहने को कह रखा होगा । दूसरी तरफ जयललिता को यह अंदाजा नहीं रहा होगा कि टीवी के लोग पुलिस कार्रवाई के दौरान मौजूद रह सकते हैं । उन्होंने जो गहरी रात में करुणानिधि की गिरफ्तारी का आदेश दिया था क्योंकि वह नहीं चाहती थी कि मीडिया में इसका तमाशा बने । जयललिता को आम जनों और मीडिया में गिरफ्तारी के दृश्यों के असर का भी अंदाजा नहीं रहा होगा । मीडिया तो हमेशा ही करुणानिधि के शासनकाल में जयललिता के शासन के मुकाबले सादा स्वतंत्र महसूस करता था । इस घटना ने न सिर्फ तमिलनाडु में बल्कि पूरे देश में रोष पैदा कर दिया । केंद्र में सत्तारूढ एनडीए का एक दल रक्षामंत्री जॉर्ज फर्नांडीस के नेतृत्व में चेन्नई आकर सेंट्रल जेल में करुणानिधि से मिला । इस दल ने राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाए जाने की अनुशंसा की लेकिन प्रधानमंत्री वाजपेयी जनसमर्थन से बने किसी सरकार के खिलाफ जल्दबाजी में कोई कदम उठाने के पक्ष में नहीं है । केंद्र की काज राज्यपाल फातिमा पीवी पर गिरी । उन्हें तमिलनाडु की स्थिति पत निष्पक्ष राय नहीं देने के कारण वापस बुला लिया गया पाते । माँ बीवी की वैसे ही आलोचना हो रही थी की उन्होंने उस जयललिता को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी जिन्हें चुनाव लडने तक की अनुमति नहीं थे । राज्यपाल को वापस बुलाने के केंद्र के फैसले ने जयललिता को एक गंभीर चेतावनी दी जिन्होंने दो केंद्रीय मंत्रियों और तुरंत बाद डीएमके प्रमुख को रिहा करने का आदेश दिया । करुणानिधि, स्टालिन और बारह अन्य के खिलाफ मामला फ्लाईओवरों के निर्माण में कथित वित्तीय अनियमितता का था । गिरफ्तारी एक एफआईआर के आधार पर की गई थी जैसे खुद धागे रहे एक नगर निगम आयुक्त ने दायर किया था । जयललिता ने अपने विरोधियों को जिनके लिए उनके मन में सिर्फ और सिर्फ घृणा थी, काम करके आता था लेकिन वे जयललिता से कहीं होशियार निकले । उन्होंने किसी एकजुट टीम की तरह काम किया और करुणानिधि को अपने विशाल परिवार का भी समर्थन था जो संकट के समय हमेशा उनके साथ खडा होता था । जयललिता के साथ अच्छे सलाहकार नहीं थे इसलिए वहाँ एक के बाद एक कल दिया कर दी गई क्योंकि उन्ही लोगों की सुन रही थी उनके मन लायक बातें ही करते थे ।

अम्मा: जयललिता - 21 (वापसी)

तो वापसी इक्कीस सितंबर दो हजार एक को सुप्रीम कोर्ट ने पहले फैसला सुनाया जिसका उन्हें डर था । चौदह मई को जयललिता के तमिलनाडु की मुख्यमंत्री के रूप में नियुक्ति असंवैधानिक थी जो मानी जाती है । उत्तेजक देख रही जयललिता ने पुलिस गार्डन में मंत्रियों और चला सचिवों की बैठक बुलाई । उसके तुरंत बाद तो राजभवन के लिए रवाना हो गई । उनकी कार्यपत्र राष्ट्रीय ध्वज नहीं बल्कि सिर्फ अन्नाद्रमुक का झंडा था । राज्यपाल सी के रंगराजन को उन्होंने सूचित किया कि वह पद छोड रही है और उसी दिन शाम तक उनके उत्तराधिकारी की घोषणा कर दी जाएगी । जयललिता ने पहली बार विधायक पडे पन्नीरसेल्वम को मुख्यमंत्री नियुक्त किया तेवर समुदाय के करीब किसान के स्नातक बेटे पनीरसेल्वम एक विनम्र व्यक्ति थे जो अपनी सादगी के लिए जाने जाते थे । वे और शपथ लेने वाले सभी मंत्री जयललिता के पैरों में गिर गए और उनका आशीर्वाद लिया । उनकी श्रद्धा को स्वीकारते हुए अम्मा असाधारण रूप से शांत दिख रही थी । व्यवहारिक रूप में मुख्यमंत्री अब भी वही थी । ऐसा कहा गया है कि पनीरसेल्वम पोइस गार्डन परिसर में रहने आ गए थे और हर फाइल दस्तखत होने से पहले जयललिता के पास निरीक्षण के लिए जाती थी । सरकारी दफ्तरों के गलियारों में अम्मा की वापसी का इंतजार किया जा रहा था और ऐसा अपेक्षा से कहीं जल्दी हुआ । दिसंबर दो हजार एक में मद्रास हाईकोर्ट में तांसी मामले में उन्हें और उनके साथ तीन वर्ष की सजा पाए अन्य लोगों को बरी कर दिया । अब चुनाव लडने के लिए स्वतंत्र थी । सबसे ज्यादा राहत जैसे मिली वो थे पनीरसेल्वम जो रामायण में जंगल से राम की वापसी का इंतजार कर रहे हैं । भारत के समान है । अम्मा की वापसी का इंतजार कर रहे थे । जयललिता चुनाव में खडी हुई और भारी बहुमत से पिटाई हुई । मुख्यमंत्री की कुर्सी से उनकी संक्षिप्त अनुपस्तिथि का किसी को एहसास तक नहीं हुआ था । पीछे मुडकर देखने पर किसी के मन में यह संभाला सकता था की क्या वो आपकी स्मृति से अपने पांच वर्षों के उस तानाशाह शासन को मिटाना चाहेंगे जो दो हजार छह में एक बार फिर उनके पतन का कारण बना । उन्होंने समाज के सभी तबकों को पहली बना दिया था । छात्र उनसे विधानसभा में स्वतः लिए गए उस फैसले से नाराज थे जिसके तहत नए सचिवालय भवन के निर्माण के लिए सौ वर्ष पुराने तीन मैरी कॉलेज को ध्वस्त किया जाना था । छात्रों और शिक्षाविदों के भारी विरोध के बाद अंततः इस योजना को रद्द किया गया । दो दिनों की हडताल करने वालों को बर्खास्त कर उन्होंने सरकारी कर्मचारियों को नाराज क्या मंदिर में पूजा के दौरान पशु बलि पर रोक लगाकर ग्रामीण जनता को दुखी किया? सांसद और एनडीए के सहयोगी भी गोपाल स्वामी को गिरफ्तार करके केंद्र को चढाया और सोनिया गांधी पर तीखे हमले करके कांग्रेस की दुश्मनी मूल्य लेकिन सबसे ज्यादा पीडित मीडिया था । हर एक अखबार को मानहानि के आरोप में अदालत के कटघरे तक पहुंचा दिया गया था । ऊपर से उनके समर्थक नियमित रूप से मीडिया के स्तरों में तोड फोड मचाते थे । उन्होंने तक हिंदू के संपादक को गिरफ्तार करने की कोशिश तक की । मंत्रियों और अधिकारियों को सब पानी निर्देश दिए गए कि वे मीडिया से बात ना करें । उन्होंने अपने मंत्रियों की सांस को अटकाये रखा था । मंत्रिमंडल से अचानक किसी को हटा दिया जाता था या फिर मनमाने तरीके से उनके विभाग बदल दिए जाते थे । वो पहले ही एक बडा झटका झेल चुकी थी जब सुप्रीम कोर्ट ने उनके और चार अन्य के खिलाफ चेन्नई की विशेष अदालत में चल रहे आय से अधिक संपत्ति के एक मामले को बेंगलुरु की एक विशेष अदालत में स्थानांतरित कर दिया यह आदेश डीएमके महासचिव के अंबाझगन की याचिका पर दिया गया था जिसमें उन्होंने स्वतंत्र और निष्पक्ष सुनवाई के लिए मामले को राज्य से बाहर भेजने की मांग करते हुए आरोप लगाया था की सुनवाई की निष्पक्षता पर जनता का भरोसा बहुत कम रह गया है । दो हजार चार आते आते जब संसदीय चुनाव की तैयारियाँ चल रही थी, जयललिता अलग थलग और वास्तविक दुनिया से दूर हो चुकी थी । मीडिया उनके अच्छे कार्यों के लिए भी उनकी तारीफ नहीं कर रहा था । विधानसभा में अपने बहुमत के मत में जोर जयललिता को आसन में तूफान का एहसास तक नहीं हुआ तो पान प्रस्तार पकडता जा रहा था । करुणानिधि भाग गए थे कि भाजपा धीरे धीरे जयललिता की तरफ पड रही है इसलिए उन्होंने उसके साथ गठबंधन को तोडकर धर्मनिरपेक्ष दलों का एक महागठबंधन बना लिया । कांग्रेस पार्टी ने तमिलनाडु की जनता का मूड देखते हुए जैन आयोग की रिपोर्ट से जुडी अपनी भावनाओं को दरकिनार कर करुणानिधि की तरफ सहयोग का खास बढा दिया । करुणानिधि के लिए ये मात्र संसदीय चुनाव नहीं था । यह दो साल बाद होने वाले विधानसभा चुनाव का पूर्व परीक्षण था ।

अम्मा: जयललिता - 22 (पराजय, लेकिन पतन नहीं)

तो पर आ जाएगा लेकिन पता नहीं जयललिता को सहज विश्वास नहीं हुआ । डीएमके गठजोड को दो हजार चार के संसदीय चुनाव में राज्य के सभी उनतालीस सीटों पर जीत मिली थी तो तुलित करुणानिधि ने ऐलान किया कि यह जयललिता के जनविरोधी शासन के खिलाफ आया फैसला है । यह डीएमके का फिर से उभार था जो उन्हें डरा रहा था । आप के बदले की राजनीति में बहुत कल्पना कर सकती थी कि यदि दो हजार छह का विधानसभा चुनाव डीएमके के पक्ष में गया तो उनके खिलाफ प्रतिशोध की कैसी कार्रवाई हो सकती है । उन्हें अब चलती से ऐसे कदम उठाने की जरूरत थी जो लोकप्रियता के अब तक के सबसे निचले स्तर से उनको ऊपर उठा सकें । अपने कार्यकाल के अंतिम दो वर्षों में उन्होंने प्रशंसनीय दरता दिखाते हुए सुशासन पर ध्यान केंद्रित किया और एक प्रशासक के रूप में अपनी काबिलियत प्रदर्शित की है । उन्होंने परेशान चल संचार के महत्व को गम्भीरता से लेते हुए आदेश जारी किया कि अगले दो महीनों के भीतर चेन्नई के हर घर में वर्षा का जल जमा करने वाले टैंक निर्मित किए जाए । अवैध और नकली शराब पीकर मरने वालों की बढती संख्या को कम करने के लिए उन्होंने फैसला किया कि सरकार शराब की दुकानें टेस्ट मैच संचालित करेंगे जहाँ सस्ती दर पर शराब उपलब्ध कराई जाएगी । इस योजना से हजारों बेरोजगार स्नातकों को जहाँ नौकरी मिली वहीं सरकारी खजाना भी भर गया । उनकी जीत का सबसे बडा अवसर अठारह अक्टूबर दो हजार चार को आया जब टीवी चैनलों पर कुख्यात चंदन तस्कर वीरप्पन के मारे जाने की खबर क्लास हुई । वीरप्पन तमिलनाडु पुलिस के स्पेशल टास्क फोर्स के साथ धर्मापुरी में मुठभेड में मारा गया था । पुलिस को उसकी तलाश हाथियों की हत्या, पुलिस वालों और आम जनों के अपहरण और हत्या तथा चंदन के हजारों पेडों को काटने से जुडे अनेक मामलों में थी । उसके द्वारा अपह्रत लोगों में कन्नड सिनेमा लोकप्रिय स्टार राजकुमार भी थे जिन्हें उसने सौ दिनों तक आपने कब से मैं रखा हूँ । करुणानिधि और कर्नाटक की सरकारें वीरप्पन को पकडने के अपने प्रयासों में नाकाम रही थी और जनता को लगने लगा था कि चंदन तस्कर कभी भी कानून के चंगुल में नहीं आएगा । जयललिता जब दो हजार एक में फिर से सत्ता में आई थी उन्होंने साॅस फोर्स को पूरी छूट और समर्थन दिया और अब जब टांसपोर्ट को सफलता मिली जयललिता की लोकप्रियता में बहुत ज्यादा हुआ । इसके बाद उन्होंने ऐसा कुछ किया कि उनके विरोधी तक वहाँ चक्के रह गए । दीपावली के दिन कांची के शंकराचार्य को गिरफ्तार कर दिया गया । जयललिता कांची मठ के उत्साही भक्त के रूप में जानी जाती थी और किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि वह ऐसा कोई कदम उठाएंगे । गांधी के धर्माचार्य को महिला विरोधी विचार प्रचारित करने दिया गया था जिससे पढी लिखी महिलाओं में रोष था लेकिन अब उन्हें आपराधिक मामले में गिरफ्तार किया गया था । मठ में अवांछित गतिविधियों के बारे में अफवाहें पहले से ही थी । आचार्य एक महत्वाकांक्षी व्यक्ति थे जिनकी राजनीति में दखल बढती जा रही थी और उनका प्रभाव तमिलनाडु से बाहर भी था । इसलिए उनके जैसे ताकतवर और प्रभावशाली व्यक्ति को गिरफ्तार करने के लिए हिम्मत की दरकार थे । यह आश्चर्य की बात थी कि ब्राह्मण समुदाय के एक वर्ग को छोडकर तमिलनाडु की आम जनता ने जयललिता के कदम का समर्थन किया । यहाँ तक कि करुणानिधि ने भी उन से सहमती जताई जब उन्होंने कहा कि कानून के सामने सब बराबर है । कांचीपुरम का विवाद थमता इससे पहले ही वहाँ एक उपचुनाव होना था जिसका परिणाम बताता है कि जयललिता ने सही किया था । ये गलत उनके लिए राहत और शेष भारत के लिए आश्चर्य की बात रही है की कांचीपुरम की सीट पर अन्नाद्रमुक विजयी रही है । इसके बाद आई एक प्राकृतिक महा आपका हूँ । छब्बीस दिसंबर दो हजार चार को तमिलनाडु के तटों पर सुनामी लहरों ने तांडव मचाया । सैंकडों लोग लहरों में समझ है हजारों मकान हो गए समय का भाई बिना जयललिता की सरकार राहत और बचाव कार्य में जुट चुकी थी । इस अभूतपूर्व चुनौती का सामना करने के लिए उनके प्रशासन को श्रेय देना होगा सुनामी की । वहाँ आपका को लेकर अधिकारियों की प्रतिक्रिया ऐसी थी मानो या उनके अपने घर में हुआ है तो जयललिता के पूर्ण समर्थन और निर्देशों पर काम कर रहे थे । यहाँ तक कि उनसे शत्रुता रखने वाले मीडिया ने भी सुनामी की महा आपदा से प्रभावित लोगों के पुनर्वास कार्यों में उनकी सरकार के महती प्रयासों और इस संकट से निपटने में उनके द्वारा प्रदर्शित कौशलता और प्रतिबद्धता की तारीफ की । जैसे जैसे विधानसभा चुनाव करीब आ रहे थे, जनता का मूड जयललिता के समर्थन में होता जा रहा था । यहाँ तक कि दिल्ली में सत्ता के गलियारों में भी उनकी तारीफ सुनी जा सकती थी । अब चिंता करने का वक्त डीएमके नेता करुणानिधि के लिए था । तब कैसे इस महिला को सत्ता से बेदखल कर पाएंगे जो अपनी हर अपमानजनक पराजय से शक्ति हासिल करती है । उन्हें कुछ होटल योजना बनानी पडेगी और उन्होंने बिल्कुल ऐसा ही किया है ।

अम्मा: जयललिता - 23 (डीएमके का पलटवार)

डीएमके का पलटवार जब दो हजार छह के विधानसभा चुनावों के प्रचार कार्य शुरू हुए तो डीएमके कट जोड के दलों ने टीवी कैमरे के सामने घोषणा की कि उन्होंने सिर्फ एक वजह से हाथ मिलाए हैं । उनका मुख्य लक्ष्य बॉम्बे लाइफ को नष्ट करना है तो मिलाई किसी महिला के लिए एक अपमानजनक शब्द है । जयललिता इससे अविचलित अपनी जीत के प्रति आश्वस्त रही सुनामी के बाद के दिनों में उनके निर्देश पर चला । अधिकारियों ने जो अच्छे काम किए थे उनकी खासी दारी कोई दी और जयललिता को विश्वास था कि वो प्रतिद्वंदियों पर भारी पड रही हैं । लेकिन डीएमके ने उनके इस आत्मविश्वास की खबर निकाल दी । चुनाव जब बिलकुल सर पर था, वे एक असाधारण चुनाव घोषणापत्र लेकर आए । उन्होंने गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों के लिए दो रुपये किलो चावल, मुफ्त रंगीन टीवी और मुफ्त गैस कनेक्शन का फायदा क्या भूमिहीन गरीबों के लिए घोषणा पत्र में दो एकड जमीन का फायदा था । डीएमके का घोषणापत्र एक चुनावी मास्टर स्ट्रोक था जो करुणानिधि महिला मतदाताओं में कभी लोकप्रिय नहीं रहे । अब एक धनी और उदार पिता के रूप में देखे जा रहे थे जो उसी तरह उपहार देगा जैसे एक बात अपनी बेटी को देता है । विधानसभा चुनावों में डीएमके गठबंधन को जीत हासिल हुई । हालांकि मतदाताओं को तमाम तरह के प्रलोभन देने के बाद भी पूर्ण बहुमत पाने में नाकाम रहा था । जयललिता के अन्नाद्रमुक का प्रदर्शन भी बिल्कुल खराब नहीं था । एक सौ एक सीटों के साथ यह डीएमके के बाद दूसरी सबसे बडी पार्टी के रूप में सामने आई । सम्भवता अन्नाद्रमुक का प्रदर्शन और भी अच्छा रहता है यदि फिल्म स्टार रजनीकांत ने एक नया दल डीएमडीके शुरू नहीं क्या होता है जिसे जयललिता ने धूल कहकर खारिज कर दिया था । डीएमडीके ने आठ प्रतिशत वोट हासिल कर अन्नाद्रमुक के जनाधार में सेंध लगाई थी । कुल पैंतीस सीटों पर जीतने वाली कांग्रेस ने मंत्रिमंडल में जगह पाने की उम्मीद की थी, लेकिन करुणानिधि उसे दूर रखने में सफल रहे और इस तरह सहयोगी दलों के बाहर से समर्थन के दम पर डीएमके के हाथों में संपूर्ण सत्ता थी । शपथ लेने के कुछ मिनट बाद करुणानिधि ने लाट के अंदाज में दो रुपए प्रतिकिलो की दर से राशन का चावल बेचने के सरकारी के आदेश पर हस्ताक्षर कर दिया । महीने भर के भीतर मुफ्त रंगीन टीवी और गैस कनेक्शन के वितरण का कार्य आरंभ हो गया । लेकिन अब मुख्यमंत्री अपने पारिवारिक झमेलों में सादा उलझे रहने लगे । लंबे समय से अफ्वाहों का बाजार कर्म था कि करुणानिधि के परिवार में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है और यह भाइयों अजगिरी स्टालिन के बीच प्रतिद्वंदिता नहीं थी जिससे कि पूरा तमिलनाडु परिचय था बल्कि यह मारन भाइयों करुणानिधि के भांजे मुरासोली मारन के बेटों के बढते प्रभाव के कारण था हूँ । पारिवारिक मतभेद तब खुलकर सामने आ गए जब तमिल दैनिक दिनाकरन ने एक सर्वे झापा की टीएमके पार्टी के भीतर करूणानिधि का उत्तराधिकारी कौन होना चाहिए । उल्लेखनीय है कि दिनाकरन का स्वागत पर दयानिधि मारन के भाई कलानिधि मारन के सन टीवी नेटवर्क के पास है । सर्वे के परिणाम में कहा गया था, प्रतिशत मतदाता एम के स्टालिन को करुणानिधि के उत्तराधिकारी के रूप में देखना चाहते हैं । सिर्फ दो प्रतिशत लोग अजगिरी के पक्ष में हैं । आग लगाने के लिए इतने चंदारी काफी थी । नौ मई दो हजार सात को अलागिरी के समर्थकों ने मदुरई में दिनाकरन के कार्यालय पर हमला कर दिया । काफी तोड फोड की गई और पेट्रोल बम भी फेंके गए । इस हमले में मीडिया ग्रुप के दो कर्मचारी और एक सुरक्षा गार्ड की मौत हो गई । अपने बुलेटिनों में सनटीवी ने अलागिरी की गिरफ्तारी की मांग करते हुए आरोप लगाया के उन्होंने खुद आपने कुंडों से हमला करवाया था । तमिलनाडु के सबसे लोकप्रिय टेलीविजन चैनल सनटीवी के दर्शक यह सब देखकर आतंकी थे । डीएमके को जल्दी ही अहसास हो गया की और सादा बदनामी नहीं हो इसके लिए तुरंत प्रयास किए जाने की जरूरत है । राज्य के बिजली मंत्री रिकॉर्ड वीरास्वामी ने खुलासा किया कि दयानिधि मारन ने कथित रूप से धमकी दी है कि जा गिरी को गिरफ्तार नहीं किया गया तो इसके बुरे परिणाम हो सकते हैं । डीएमके पार्टी ने एक बैठक के बाद दयानिधि मारन की पार्टी विरोधी गतिविधियों के लिए निंदा की और पार्टी नेता करुणानिधि को उसके खिलाफ कार्रवाई करने के लिए अधिकृत क्या युवा नेता दयानिधि ने जैसे केंद्रीय संचार और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री के रूप में थोडे ही दिनों में सफलता सफलता मिली थी, अपना इस्तीफा सौंप दिया । करुणानिधि ने बडी चतुराई से क्या कहते हुए मीडिया को चुप करा दिया कि वह मद्रासी हमले की जांच का काम सीबीआई को देने की अनुशंसा कर रहे हैं क्योंकि उनके खुद के बेटे का इसमें हाथ बताया जा रहा है । जल्दी ही बात स्पष्ट हो गई कि परिवारिक कलह के पीछे पैसे और ताकत की खींचतान है । अचानक ही मांगन भाइयों और परिवार के बुजुर्ग मुखिया करुणानिधि में मेल मिलाप हो गया और परिवार के प्रसन्न और एक जो तस्वीर सभी तमिल अखबारों में प्रकाशित हुई जब अपने पुराने गठबंधन सहयोगियों के साथ ही डीएमके दो हजार नौ के लोकसभा चुनावों में गई और उसे अठारह सीटों पर जीत हासिल हुई तो करुणानिधि ने केंद्र में सत्ता में आई कांग्रेस के साथ मोल भाव कर दयानिधि मारन के लिए मंत्रिमंडल में शामिल कराने के साथ साथ अजहागिरी के लिए भी एक जगह बनवा दी । अजगिरी इससे पहले तमिलनाडु से बाहर कदम तक में ही रखा था । करुणानिधि ने अपनी बेटी कनिमोझी को भी राज्यसभा में भेज दिया । करुणानिधि द्वारा इस तरह खुलकर अपने परिवार को आगे बढाने के कदम पर पार्टी के भीतर बेचनी पडती जा रही थी । डीएमके के भीतर इस तरह की बातें होने के बावजूद संसदीय चुनाव के बाद कमजोर देखने वाली पार्टी अन्नाद्रमुक थे । इससे क्या है? साहिर होता था कि तमिलनाडु में चुनाव जीतने के लिए एक अच्छा गठबंधन क्यों जरूरी है? भले ही चुनाव लोकसभा के हूँ क्या विधानसभा के? लेकिन जयललिता का अपने गठबंधन सहयोगियों के प्रति रवैया फिर भी संतोषजनक नहीं था । उन्होंने या तो सहयोगी दलों की अपेक्षा की या उनकी मांगों पर विचार करने से इंकार कर दिया । आपने पार्टी जनों से भी लगातार दूर होती जा रही थी । पार्टी के चला सचिव और विधायक उनकी सलाह चाहते थे लेकिन हम मान चेन्नई से कहे रहने लगी थी । उनका काफी समय ऊटी स्थित अपने कोडानाडु रिजॉर्ट में बीतता था ।

अम्मा: जयललिता - 24 (अभी नहीं तो कभी नहीं)

तो अभी नहीं तो कभी नहीं । विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष होने और सदन में अपने साठ विधायक होने के बावजूद जयललिता अब कभी कभार ही सदन की बैठकों में नजर आती थी । एक ओर जहां वरिष्ठ पार्टी नेता सदन में मोर्चा थाम के रखे थे । डीएमके सरकार की नीतियों के खिलाफ अक्सर सदन से बहिर्गमन करते हुए जयललिता करुणानिधि कुनबे की बढती संपत्ति और पडते प्रभाव पर नजर रख रही थी । अब अचानक ही स्टालिन का बेटा उदयनिधि और अलागिरी का बेटा दयानिधि अलागिरी बडी बडी फिल्में प्रोड्यूस कर रहे थे । वे तो किसी फाइनेंसर के पास गए थे और ना ही कोई तर्ज लिया था । तो फिर पैसे कहाँ से आ रहे थे । जब करुणानिधि नहीं हम कार लगाई कि यदि मेरे पोते की इच्छा हो तो वह फिल्मों से क्यों नहीं पढ सकते हैं और अपनी तुलना पृथ्वीराज का पूरा राजनीकांत से की तो जयललिता ने इस हास्यास्पद तुलना का उपहास उडाया । बेनामी धन, प्रशासनिक ताकत, दृश्य और प्रिंट मीडिया पर नियंत्रण तमिल फिल्म उद्योग पर लगभग एक आदमी का लोग भला कब तक चुप रहते हैं । खुफिया एजेंसियों के भीतर के कुछ लोगों ने जयललिता को करुणानिधि परिवार और डीएमके सरकार के कुछ मंत्रियों के बीच कारनामों की फेहरिस्त जयललिता को थमा दी । उन्होंने सारी सूचनाओं और आंकडों को भविष्य में उपयोग के लिए संभाल कर रख लिया । इसी दौरान अघोषित बिजली कटौती, महंगाई, अवैध रेत खनन आदि को लेकर शिकायतें बढने लगी थी । यह शिकायत की सूची पहले से ही लंबी थी और इसमें लगातार नहीं विषय जुडते जा रहे थे । जयललिता के लिए पार करने का मौका आ चुका था । अभी नहीं तो कभी नहीं । उन्होंने कोयंबटूर में एक विरोध सम्मेलन आहुत किया ऐसे सवाल उठाने के लिए जो टीएमके को अंदर तक झकझोर देता । जयललिता का दाम फलदायक साबित हुआ । यह स्पष्ट था कि अन्नाद्रमुक नेता के रूप में उनके अधिकार पर आप किसी को आपत्ति नहीं है । उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने सम्मेलन का बडे उत्साह और पूरी कुशलता से आयोजन किया । कोयंबटूर में अभूतपूर्व संख्या में एक अनुमान के अनुसार आठ लाख लोग जमा हुए जब उन्होंने बुरी ताकतों से लडने की कसम खाई और अभिभूत भीड को भरोसा दिलाया कि हम चार का शासन जल्दी ही वापस आएगा । ऐसा लगा मैं बुराई का नाश करने वाली ट्रेन चांदी के प्रति रूप है । लेकिन उनका सबसे तो साहसिक कदम था । आज आखिरी के गढ मदुरई में एक सभा आयोजित करना वहाँ भी भारी भीड जुट गई । लोग अपने और अपने नेता के जान पर खतरे की धमकियों की परवाह नहीं करते हुए सभा में आए थे । कई लोग तो जयललिता को देखने के लिए पंद्रह किलोमीटर पैदल चलकर पहुंचे थे । उनकी आवाज गुंजायमान थी । मुझे अनेक धमकियाँ मिली कि मैं मदुरई आई तो मुझे जान से हाथ धोना पडेगा क्योंकि उनका कहना है कि यह अनजान इंजन यानी बहादुर जोकि अजगिरी के लिए उनके समर्थकों द्वारा प्रयुक्त विशेषण है कहकर है । तालियों के कडकडाहट के बीच उन्होंने ललकार लगाई । क्या मदुराई अलागिरी की आबादी है? मैं ऐसी धमकियों से करने वाली नहीं हूँ । मैं यहाँ आपके सामने खडी हूँ और यह साबित कर चुकी हूँ की असल में बहादुर कौन है । अलागिरी ने इससे पहले उन पर यंग किया था । उनके समर्थकों ने मीनाक्षी, कामाक्षी और विशालाक्षी का रूप मानते हैं । क्या वे उन्हें वर्जन मदर कह सकते हैं? दो हजार ग्यारह के विधानसभा चुनावों से पहले त्रिशंकु विधानसभा के चुनावी भविष्यवाणियां की जा रही थी । जयललिता ने उन्हें गलत साबित कर दिया । अन्नाद्रमुक हैं जो अब विजयकांत की डीएमडीके के गठबंधन में थी । अपने ही बूते पूर्ण बहुमत हासिल किया था । डीएमके को अपमानजनक हार का मुंह देखना पडा । विधानसभा में उसकी हैसियत तीसरे नंबर की रह गई थी ।

अम्मा: जयललिता - 25 (ममतामयी मां)

ममता मई माँ जयललिता जब दो हजार ग्यारह के चुनावों में भारी जीत का आनंद ले रही होंगी तो उन्हें चुनाव हारने के बाद करुणानिधि कुनबे के लिए आये बुरे दिन को देखकर भी मजा आ रहा होगा । केंद्र की कांग्रेसनीत सरकार में मंत्री ए राजा जिन्हें करुणानिधि ने राजनीति में आगे बढाया था, खुद डीएमके नेता की बेटे और राज्यसभा सांसद कनिमोझी को टू जी घोटाले से संबंधित जालसाजी और भ्रष्टाचार के आरोपों में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया था । जयललिता के अनुसार बी । एम । के इस हार के बाद अब कभी उठा नहीं पाएगी और अब अन्नाद्रमुक के लिए चुनौती पेश करने की स्थिति में नहीं रह गई थी । दो हजार ग्यारह के विधानसभा चुनावों में जीत के बाद पार्टी कार्यकर्ताओं से उन्होंने कहा, पिता डीएमके की चिंता नहीं कीजिए । जहां तक इस पार्टी की बात है तो यह एक खत्म कहानी । सत्ता में पिछले अनुभवों ने उन्हें दिखा दिया था कि साधा सोचे विचारे बिना सिर्फ उससे और प्रतिशोध की भावना से की गई कार्रवाइयों से अंततः उन्हें ही नुकसान होता है । इसी कारण मुख्यमंत्री के रूप में उनका तीसरा कार्यकाल अपेक्षाकृत शांत रहा है । हालांकि इसके बावजूद कई मामलों में पहन माफ करने को तैयार नहीं देखी । प्रशासन में उन्हें किसी भी तरह का विरोध बर्दाश्त नहीं हुआ है । उनकी अपेक्षा यही रही कि किसी भी विषय पर उन की बात को कानून जैसा आदर मिलना चाहिए । उन्होंने अपनी उन अनेक लोकलुभावन चल कल्याण योजनाओं के जरिए जनसमर्थन जुटाया जिनके जरिए एक आम आदमी का उसकी जरूरत की सभी चीजें अम्मा के नाम से मिल जाती है । अपनी जनकल्याण योजनाओं और चुनावी भाषणों में उन्होंने खुद को एक माँ के रूप में पेश किया । किसी भी जन असंतोष को उन्होंने दरियादिली दिखाकर काबू में क्या? आईपीएल परिवार के लिए मुफ्त बीस किलो चावल, मिक्सी, ग्राइंडर और पंखे? हालांकि पिछले की गलत अभी दूर नहीं हुई है और स्कूल जाने वाले बच्चों के लिए साइकिल की सारी चीजें अम्मा प्रोडक्ट के रूप में वितरित की गई । शहरों और कस्बों में नगर निगमों द्वारा संचालित अम्मा कैंटीन बनाये गए चार इडली एक रुपये में और सही चावल तीन रुपये में मिलते हैं । तमिल लोग इस पुरानी कहावत पर यकीन करते हैं कि जो आपका पेट भरे तो उम्र उसका एहसान मंदिर हो । दो हजार चौदह के आसन संसदीय चुनाव होने नई परिद्रश्य नाइस आपने बनाएंगे पूरे तमिलनाडु में लगाए गए होर्डिंग्स में जयललिता को प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में पेश किया गया । वहाँ प्रधानमंत्री जैसा व्यवहार करती भी देगी और उन्होंने बडी बडी घोषणाएं की । हालांकि पूरी तरह समझाते हुए हैं कि इन्हें चुनौती दी जाएगी । उन्होंने आजन्म कारावास की सजा काट रहे राजीव गांधी के हत्यारों को रिहा करने का ऐलान किया । अब वहाँ जान पाने की तमन्ना कर रही थी । तमिलनाडु की सभी सीटों पर चीज यदि वहाँ इस आंकडे के आस पास भी पहुंचती है तो किंगमेकर की भूमिका में होगी क्या? सम्भवता किंग की भूमिका अब तीसरे मोर्चे की बात चली तो पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सार्वजनिक रूप से कहा कि यदि संभावना बनी तो प्रधानमंत्री पद के लिए उन्हें समर्थन देंगे । यदि भाजपानीत एनडीए को आम चुनाव में अपर्याप्त सीटें मिली तो उसे जयललिता से समर्थन मांगना पडता है । चाहे जो भी परिणाम हो, उन्होंने मान लिया कि जीत उनकी होगी । अपने पार्टी कार्यकर्ताओं से उन्होंने कहा, अन्नाद्रमुक केंद्र की सत्ता पा सकती है और इस देश को एक नहीं आजादी दिला सकती है । कार्यकर्ता उनकी बातों पर यकीन कर रहे थे लेकिन पूरे देश को चकित कर देने वाली मोदी लहर उनके सारे सपनों को लील करेंगे और भले ही अन्नाद्रमुक सैंतीस संसदीय सीट जीतते हुए तमिलनाडु में अत्यंत सफल रही । वो ना तो किंगमेकर दी और ना ही किंग । लेकिन जयललिता तभी भी पीछे मुडकर देखने वाली नहीं रहे और चुनाव हो सका । उस पर उन्होंने कभी सोच भी नहीं किया । वो वर्तमान में जीती हैं और इस समय अपनी मौजूदा स्थिति से खुश थी । जो भी हो उनकी पार्टी लोकसभा में तीसरी सबसे बडी पार्टी थी और उन्हें पक्का यकीन था कि तमिलनाडु में अब उन्हें हराया नहीं जा सकता है । लेकिन वो अपने सिर पर लटकती तलवार को लगभग भूल ही गई थी । कर्नाटक की अदालत में उनके खिलाफ आय से अधिक संपत्ति का मामला अभी लंबित था या शायद उन्होंने सोचा होगा कि तमिल जनता में उनकी भारी लोकप्रियता और राजनीतिक ताकत के मद्देनजर उन्हें अपनी गलतियों के लिए माफ कर दिया जाएगा । अपने तीसरे कार्यकाल में वो अपनी शक्तियों को बढाती और उनका इस्तेमाल करती दिख रही थी । अतीत में बहुत के खिलाफ चले लगभग हर मुकदमे में पर की गई थी और इसलिए उन्होंने सोचा होगा की बेहिसाब संपत्ति अर्जित करने के मामले में भी वहाँ छूट जाएंगे । सत्ताईस सितंबर दो हजार चौदह को जिस दिन फैसला आना था, सैकडों की संख्या में पार्टी कार्यकर्ता बेंगलुरु में सत्र न्यायालय परिसर में अम्मा की जीत पर पटाके छोडने के लिए बिल्कुल तैयार होकर होते थे इसलिए फैसला बिजली के झटके की तरह लगा । उन्हें दोषी पाया गया था । उनको चार साल के कारावास की सजा सुनाई गई और सौ करोड रुपए का जुर्माना भी हुआ था । अम्मा के चेहरे पर उस तरह का कोई भाव नहीं था जैसा में पुलिस कार्डन से चेंज ले जाए । जाते समय देखा था तब उन्होंने घर के बाहर खडे समर्थकों की ओर लिखा था और लडाई नमस्ते करें । कल हमारा है का उद्घोष किया था । इस बार कुछ देर के लिए बाहर आई अपने विश्वस्त अनुयायी ओ पनीरसेल्वम से बात करने जो उनकी अनुपस्थिति में मुख्यमंत्री होंगे । उन्होंने करीब बीस दिन बेंगलुरु की जेल में चुपचाप पिता है । इस पूरी अवधि में उनका संपूर्ण मंत्रिमंडल और पार्टी के वरिष्ठ नेता धार्मिक अनुष्ठानों से जुडे रहे । तमिलनाडु के मंदिरों में लगभग तारीख देवी देवता की विशेष पूजा की गई । उन्हें स्वास्थ्य कारणों से अठारह अक्टूबर को जमानत पर रिहा कर दिया गया । लेकिन वो खुशियाँ बनाने के लिए इंतजार कर रहे पार्टी कार्यकर्ताओं से नहीं मिले । वो अपने आप में सिमट गई और अगले आठ महीनों तक वो इस गार्डन से बाहर नहीं निकली । किसी को नहीं पता । इस अवधि में उन्होंने अपने घर में क्या क्या ऐसी अफवाहें थीं कि वह गंभीर रूप से बीमार चल रही हैं । इसके बाद उनका भाग्य एक पर फिर पलटा । ग्यारह मई दो हजार पंद्रह को कर्नाटक उच्च न्यायालय ने उन्हें आय से अधिक संपत्ति के मामले में पूरी तरह बरी कर दिया । क्या एक सनसनीखेज वापसी थी जयललिता की प्रतिक्रिया? एक साधारण बयान के रूप में सामने आए फैसले से मैं पूरी तरह संतुष्ट है और इससे साबित हो गया है कि बाहर निर्दोष थे । डीएमके और कर्नाटक सरकार फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने गए लेकिन माँ को इसकी परवाह नहीं थी । आपने ही तौर तरीके के अनुसार उन्होंने तय कर लिया कि जब जो होगा तब उसकी चिंता की जाएगी । एक बार फिर वह मुख्यमंत्री के पद पर कायम थी तो दोबारा चुनाव लडने के लिए उनके पास छह महीने का वक्त था । उनकी अनुपस्थिति में सरकार बिल्कुल ठप पडी थी । वहाँ अपने बीमार होने संबंधी रिपोर्टों को चोट लाते हुए रुकी पडी योजनाओं को शुरू करने लगे । यह सुनिश्चित करते हुए कि इनके लिए श्रेय सिर्फ उन्हें मिले, जब उन्होंने चेन्नई की आरके नगर सीट से चुनाव लडा तो बहुत बहुत भारी अंतर से विजयी हुई । अम्मा इस बात पर खास ध्यान नहीं देती हैं कि उनकी राजनीति में पदार्पण के बाद के वर्षों में तमिलनाडु कितना बदल गया है । इंटरनेट आॅफ से जुडे तमिलनाडु के युवा एक बडे परिवर्तन से कुछ समय हैं । दो तरफ दलों डीएमके और अन्नाद्रमुक के लंबे शासन के खिलाफ नई आवाजें उठ रही हैं । निम्न मध्यवर्ग के बीच भले ही जनकल्याणकारी योजनाएं अत्यंत लोकप्रिय हैं लेकिन युवाओं के अरमान कुछ और है । जब चेन्नई और राज्य के अन्य हिस्सों में अभूतपूर्व बारिश हुई और चेम्बरमबक्कम बांध के द्वार तेर से खोले जाने के कारण चारों तरफ पानी भर गया तो सरकार तीन दिनों तक पंद्रह बनी रही । लोग गुस्से में रहे कि जयललिता ने सहायता कार्य तुरंत शुरू नहीं करवाया । मई दो हजार सोलह के विधानसभा चुनाव करीब आने तक जनता का गुस्सा बना हुआ था और उनके विरोधियों को उम्मीद थी कि इसका असर चुनाव परिणामों पर दिखेगा । चुनाव अभियान के जोर पकडने तक बहुत शांत और आत्मविश्वास से भरी दिखाई दे । डीएमके जहाँ पर करारी से चुनावी समझौते की कोशिश कर रही थी वहीं उन्होंने एक साहसिक घोषणा की कि उनकी पार्टी सभी दो सौ चौंतीस सीटों पर अपने दम पर चुनाव लडेगी । करुणानिधि का एक संयुक्त मोर्चा खडा करने का प्रयास फलीभूत नहीं हुआ और इस कारण चुनाव में पांच पक्षीय मुकाबला हुआ । डीएमके प्लस कांग्रेस, भाजपा, पीएमके और वजह कान का मोर्चा जिसमें जनकल्याण मोर्चे के चार गुड शामिल थे । चुनाव विश्लेषक एकमत थे की सरकार विरोधी मत पडेंगे और इसका फायदा जयललिता को मिलेगा । लेकिन क्या उनका अपना वोटबैंक लक्षण था? क्या पार्टी पर उनकी पकड पक्की थी कि उनके चल कल्याणकारी सोचना है । एक बार फिर उन्हें सत्ता दिलाएंगे । मुकाबला कडा होने वाला था । करुणानिधि का बेटा और घोषित उत्तराधिकारी स्टालिन पिछले साल भर से पूरे तमिलनाडु की यात्रा कर रहा था । आपने ट्रेस और भाषण में बदलाव के बाद पहले एक आधुनिक सोच वाला और जवान व्यक्ति बनकर उधर चुका था । वहाँ आम आदमी की भाषा बोल रहा था । कुल मिलाकर स्टालिन अब तक एक बडे जनाधार वाले नेता के रूप में उभर चुका दिख रहा था । आपने वर्षीय पिता का सही उत्तराधिकारी चुनावी सभाओं में जब जयललिता सिल्वर कलर की अपनी टोएटा कार्डों पर अन्नाद्रमुक की लाल काले झंडे लहराते हुए पहुंचतीं तो समर्थक तालियों के गडगडाहट से उनका स्वागत करते हैं और धीमी चाल में थके हुए मंच पर पहुंचते और एयर कूलर से गिरी । आपने विशेष कुर्सी पर चाहे राजनीति इस बार बहुत पहले की तरह जोशीले भाषण नहीं दे रही थी । इसके बजाय कडी धूप में सुबह से ही अपना इंतजार कर रही लाखों की भीड को एक लिखित भाषण पढकर सुनाती थी । इसमें थी उनकी अपनी उपलब्धियों की सोची और उनके शत्रु करुणानिधि के खिलाफ शिकायतों की । फेहरिस् इस बार पहले जैसी आक्रामक ता और उत्साह नहीं देख रहा था लेकिन भीड को इस से कोई मतलब नहीं दिख रहा था । उल्टे एक रैली से दूसरी तक पहुंचने पर उन्हें सके और उस तरह व्यक्ति के रूप में बाकर समर्थकों के मन में उनके लिए बचाव की प्रवृत्ति पैदा हो रही थी । उनकी रैलियों में रिपोर्टर लोगों से पूछ कर रहे थे, क्या बे इस बार भी उन्हें वोट देंगे? स्पष्ट उत्तर देने वाले काम ही थे । अनेक लोगों ने यह जरूर कहा कि वे उन्हें वोट दें क्या नहीं । उन्हें सुनने के लिए हमेशा ही आएंगे । सत्ता में रहे या नहीं, उनके लिए हमेशा हम आ रहे हैं ।

अम्मा: जयललिता - 26 (क्या सितारे उनकी रक्षा करेंगे)

के सितारे उनकी रक्षा करेंगे । सोलह मई दो हजार सोलह को जयललिता अपने निकट सहयोगी शशिकला के साथ स्टेला मैरिस कॉलेज स्थित मतदान केंद्र पर वोट डालने आई । चुनावपूर्व की रायशुमारियों में एक मत से डीएमके कांग्रेस की जीत की भविष्यवाणियां की जा रही थी । एक रिपोर्टर भाग कर उनसे पूछने आया कि अपनी जीत की संभावनाओं के बारे में वो क्या सोचती हैं? जयललिता कुछ दिन के लिए शांत और भावशून्य देखिए उसके बाद वो मुस्कुराई और कहा तीन दिन रुकिए, आप जान जाएंगे क्या एक अर्थपूर्ण मुस्कान थी? गोपालपुरम में डीएमके नेता तिरानबे वर्षीय करुणानिधि से वोट डालने के बाद पैसा ही सवाल किया गया तो उनका जवाब था, डीएमके पर्याप्त सीटें जीतेगी । यदि विश्लेषकों कि डीएमके की भारी जीत के भविष्य पानियों के परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह एक महत्वकांक्षा रहित बयान था । उन्नीस मई की सुबह तमिलनाडु की जनता अपने टीवी सेट से जब की हुई थी, टीएमके एवं अन्नाद्रमुक के कार्यकर्ता अपने अपने पार्टी कार्यालयों के समक्ष जा चुके थे । परिणाम आने शुरू होने के बाद जयललिता के आवास पोइस गार्डन को जाने वाली सडक पर भीड लगातार पडती जा रही थी । कभी डीएमके आगे दिखता तो अगले ही क्षण अन्नाद्रमुक को बढत मिल जाती है । दोनों पार्टियों की स्थिति में हो रहे इस उतार चढाव ने उनके कार्यकर्ताओं को भारी असमंजस में डाल रखा था । सुबह के दस बजते बजते अन्ना अरिवालयम स्थित डीएमके मुख्यालय में बेचैनी के संकेत दिखने लगे थे । दूर दूर से महिलाएं और पुरुष खुशियाँ मनाने के इरादे से वहाँ जमा हुए गए । जब अन्नाद्रमुक के एक सौ चौबीस सीटों पर आगे चलने की खबर आई । कई रोने लगे तो कई अविश्वास में अपना सर हिला रहे थे । उन्हें पता था कि दलपति यानिक करुणानिधि के पुत्र स्टालिन चुनाव अभियान में किस कदर जी जान लगा दिया था । अब उन्हें डीएमके की जीत का पूरा भरोसा बिता पार्टी मुख्यालय के भीतर मूर्त इलेरी वाला था । एक कमरे में कार्यकर्ता पार्टी नेताओं के स्वामित्व वाला चैनल कलैगनर टीवी देख रहे थे । चैनल की रिपोर्टिंग में अन्नाद्रमुक को मात्र एक सौ चौदह सीटों पर और डीएमके को सीटों पर आगे बताया जा रहा था । वे स्पष्ट हो चुकी हकीकत को नजर अंदाज करते हुए पूरी सुबह अपनी उम्मीदों पर कायम रहे थे । दोपहर तक स्थिति साफ हो चुकी थी कि दो सौ चौंतीस दो सीटों तुलजापुर और अरवाकुरिची में अन्नाद्रमुक द्वारा मतदाताओं में पैसे बांटे जाने के आरोप के कारण चुनाव रद्द कर दिए गए थे । में से सीटों पर जीतकर जयललिता एक बार फिर सत्ता में लौट रही हैं । लेकिन आरके नगर सीट पर जयललिता की जीत का अंतर पहले की तुलना में बहुत कम था । बिजाई उम्मीदवारों में सर्वाधिक मत तिरु प्यार से चुनाव लडे करुणानिधि को मिले थे । टीएमके को नवासी सीटों पर जीत मिली लेकिन अपने सहयोगी कांग्रेस की सीटों के साथ भी उनके पास बहुमत से बहुत कम मात्र सत्य सीटें थी । डीएमके गठबंधन तमिलनाडु विधानसभा में अब तक का सबसे बडा विपक्ष पर बन कर रह गया जैसा कि करुणानिधि ने उल्लेख किया की दोनों पक्षों के बीच मत प्रतिशत का अंतर पहुंच छोटा था । अन्नाद्रमुक ने चालीस दशमलव आठ प्रतिशत वोट हासिल किए जबकि टीएमके कांग्रेस को अडतीस प्रतिशत मत मिले थे । पूर्व संचार मंत्री और करुणानिधि के भांजे मुरासोली मारन के पुत्र दयानिधि मारन ने कहा, तमिलनाडु की जनता का जनादेश पीएमके के लिए था लेकिन दुर्भाग्य से जयललिता ने करोडों रुपए खर्च किए । आलोचना और आरोप जो भी रहे हों, सफलता का कोई विकल्प नहीं होता है । जनता ने निर्णायक मत देते हुए जयललिता को बहुमत दिया था । डीएमके को एक मजबूत विपक्ष के रूप में चुना तथा नए खिलाडियों विजयकांत के मोर्चे और पीएमके को बुरी तरह नकार दिया तो इस गार्डन के बाहर इंतजार ढोल और पटाखे की आवाज से भरी थी । महिलाएं खुशी में नाच रही थी । प्रसन्नचित्त जयललिता अपनी जानी पहचानी पोषा हरी साडी में अपने घर के सामने विजय भाषण देने के लिए उपस् थित हुई । वरिष्ठ अधिकारियों समेत बडी संख्या में मुलाकाती उनके पैरों पर कर रहे थे । उन्होंने कहा, तमिलनाडु की जनता ने जो शानदार जीत हमें दी है उससे मैं अभिभूत हूं । इस ऐतिहासिक जीत के लिए मेरी पार्टी और मैं तमिलनाडु की जनता के लिए नहीं है । जीत सचमुच में ऐतिहासिक थी क्योंकि उन्नीस सौ चौरासी में उपचार के लिए अमेरिका में रहते हुए एमजीआर के चुनाव जीतने के बाद ही पहला मौका था जब एक सत्तारूढ पार्टी चुनाव जीतकर लगातार दूसरी बार सरकार गठित कर रही थी । चुनाव अभियान के दौरान जयललिता ने ऐलान किया था जन सेवा के अलावा उनकी और कोई इच्छा नहीं है और उनका जीवन जनता को समर्पित है । उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया था की उन्होंने किसी अन्य दल के साथ कोई बडा गठबंधन नहीं किया है जबकि दस पार्टियाँ उनके विरोध में खडी हैं जब उन्होंने अकेले दम पर चुनाव लडने की घोषणा की थी । तो उनकी पार्टी के लोग हमेशा की तरह खामोश रहे लेकिन उन्हें चिंता भी देखो कि उनकी नेता का अति आत्मविश्वास कहीं एक खोलना साबित हो । लेकिन साहब तौर पर जयललिता ने हिसाब लगा रखा था कि वह क्या कर रही हैं । उनके इस कदम ने उन्हें सहयोगियों की मांगों के आगे समझौते की जगह अपनी पसंद के अमित बार उतारने की आजादी नहीं । उन्होंने कई नए चेहरों को टिकट देने का साहसिक फैसला किया । पैसे भी ये उनका चेहरा उनका करिश्मा था जिसने उन्हें वोट दिलाया था । जरूरत पडने पर उन्होंने घोषित उम्मीदवारों को बदलने में भी कोताही रहेगी । लेकिन किसी भी कोने से विरोध का कोई स्वर्ग सुनाई नहीं पडा । बिना किसी सहयोगी दल के समर्थन के बहुमत लाने से जयललिता को जो ताकत मिली बहुत अच्छी थी । एक राजनीतिक विश्लेष ने किया । हमेशा दंडवत की मुद्रा में रहे पार्टी नेताओं को अपनी पीठ सीधी करने का मौका कभी नहीं मिलने वाला है । वो निरंकुश है, इसमें कोई संदेह नहीं । लेकिन उनके अनुयायी यह भी जोडेंगे की उनकी नेता कृपाल हुआ है जो जितना और शक्ति धारण करना जानती है । जो विशेष योजनाओं के जरिए व्यवसायी समुदाय किसानों और गरीबों से जुडी रहती है, उन्हें अम्मा ब्रांड के तहत कार्यान्वित अपनी सामाजिक कल्याण योजनाओं के असर का पूरा अहसास है । उन्हें पूरा विश्वास था कि जब वोट डालने का वक्त आएगा लोग अम्मा कैंटीन, अम्मा चल, अम्मा भी विकेट, अम्मा सीमेंट, अम्मा दवाखाना, अम्मा पीठ आदि को नहीं खुलेंगे । ग्रामीण जनता फला अपनी जिंदगी को आसान बनाने वाले पंखे फॅार को कैसे भूल सकती है । उनके चेहरे पर किसी देवी जैसे मुस्कान होती थी । जब वह कहती मक्का लोग गाना मक्का लोग का बेवान मैं जनता के लिए हूँ । सिर्फ जनता के लिए आशीर्वाद पाने के लिए आपको प्रार्थना तक करने की जरूरत नहीं है । भले ही विपक्ष ने जयललिता द्वारा सितंबर दो हजार पंद्रह में आयोजित तमिलनाडु ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट संबंधी दावों का मजाक उडाया हो । यह सम्मेलन कर राहत और रियायती दरों पर भूमि उपलब्ध कराते हुए हैं । राज्य में निवेशकों को लाने में सफल रहा था और वहाँ छोटे जब अति लघु किसानों को शत प्रतिशत सब्सिडी देकर काफी हद तक किसान वर्ग का समर्थन हासिल करने में भी सफल रही थी । मुफ्त बकरियों और गायों के वितरण ने ग्रामीण मतदाताओं को भी उनकी तरफ खींचा । अब उन्होंने छोटे और अति लघु किसानों के सारे कर्ज माफ करने की घोषणा की है । यह उनका सौभाग्य था कि विपक्ष बुरी तरह बढा हुआ था और हास्यास्पद रूप से हर गुट मुख्यमंत्री का पद चाहता था । यह भी उनका भाग्य ही था कि डीएमके टू जी घोटाले में शामिल होने के आरोपों के बाद पिछले चुनावों के दौरान कवाई अपनी लोकप्रियता को अभी तक हासिल नहीं कर सकी थी । जयललिता ने भी डीएमके के परिवारवाद की ज्यादतियों का ढिंढोरा पीटने में अपनी तरफ से कोई कोर कसर नहीं रखी थी । लेकिन इन सबके बावजूद पार्टी को पुनर्स्थापित करने के साल इनके अथक प्रयासों के चलते डीएमके अपना वोट शेयर दस प्रतिशत से अधिक बढाने में कामयाब रही है । इसलिए जयललिता को पता है कि बहुत आराम से नहीं बैठ सकती । करुणानिधि का नाम लेते ही आग उगलना शुरू कर देने वाली चला लेता । जब स्थान से जुडा कोई मामला हो तो बहुत नरम नजर आती हैं । उनके शपथ ग्रहण के दौरान जब नेता प्रतिपक्ष स्टालिन की उपेक्षा हुई और उन्हें चौथी पंक्ति में जगह दी गई तो उन्होंने इस स्कूल पर खेद व्यक्त किया । उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्हें स्टालिन के आयोजन में आने की जानकारी नहीं थी और उन्होंने शपथ ग्रहण के दौरान मौजूद रहने के लिए उनका तहेदिल से आभार व्यक्त किया । मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने के बाद उनकी पहली कार्यवाही उन पांच सौ सरकार संचालित शराब की दुकानों टेस्ट मैच को बंद करने की थी जो स्कूलों या धार्मिक स्थलों के निकट अवस् सकते । वह जानते थे कि खासकर महिला मतदाताओं के लिए क्या एक भावना पर मामला है और उन्होंने अपने घोषणापत्र में किए गए वायदों को पूरा किया, यह सुनिश्चित करते हुए की अल्कोहल की बिक्री पर रोक विभिन्न चरणों में कार्यान्वित की जाएगी । तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के रूप में अपना चौथा कार्यकाल शुरू करने के बावजूद निकट भविष्य में उनके राजनीति भविष्य को लेकर अनिश्चितता कायम है । आय से अधिक संपत्ति के मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला क्या होगा जिसमें कर्नाटक उच्च न्यायालय उन्हें बरी कर चुका है । अब वर्ष के उम्र में वो ऐसी अवस्था में आ चुके हैं और ऐसी चिंताएं अब उन्हें नहीं करती हैं है जैसा की उन्होंने एक बार कहा था कि आज जहां वहां तक पहुंचने में आपका दरिया पार कर चुके हैं लेकिन पार्टी को अपने कंधे पर होने की जिम्मेदारी थकाऊ और कभी कबार निराश करने वाली होती है । वो जानती हैं कि अगली पीढी के नेतृत्व को अपने राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में बढावा देना उनके लिए आत्मघाती होगा । पैसे जिम्मेदारी के लिए कोई सामने है भी नहीं । उन्हें नहीं पता कि उनके बाद पार्टी का क्या होगा । मैं मागम द क्षेत्र में पैदा हुई थी । तमिल में छोटी सी की भाषा में एक कहावत है लगता तो ओपन जगत टाॅल । मखाना क्षेत्र में पैदा हुई महिला दुनिया में किसी से भी अतुलनीय होती है । क्या उन का नक्शा तो उनकी रक्षा करता रहेगा?

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