Made with  in India

Buy PremiumDownload Kuku FM

Transcript

Introduction and Chapter 1 अधिकारी कौन

स्वागत है आप सभी का मैं राज राज की जुबानी इस वक्त आपको ले जाने आया हूँ एक और वो के सफर में एक पूर्ण आध्याय एक सबर पर । इसके अंत में हम अपने आप में एक नया इंसान से मिलेंगे । नये मान और नए विचारों के साथ तो अपने आप को तैयार कर लीजिए और मेरा नाम राज है । साथ निभाऊंगा अंत तक फॅसने जब मन चाहे अध्याय एक अधिकारी कौन है हमारा जीवन तीन स्तर पर चलता है, पहला है आदि बहुत एक दूसरा है आज ब्रेक तथा तीसरा है आध्यात्मिक आदिभौतिक जीवन । आज डेविक के बिना तथा आज देविक जीवन आध्यात्मिक जीवन के बिना अधूरा है । जिस प्रकार अगर कोई मनुष्य अपनी जीवनी लिखे और वह सिर्फ अपनी जाग्रत अवस्था के ही बारे में लिखता है मतलब उसने सिर्फ अपने संपूर्ण जीवन के एक तिहाई भाग की ही कहानी लिखी है । बाकी की दो तिहाई भाग में क्या वह जीवित नहीं था? तो जितनी भी जीवनी हम लोगों ने आज तक पडी वो सम्पूर्ण है । उन का कोई मतलब नहीं है । जिस प्रकार मान ले हमें कुछ पौधों में शोध करना है, उसमें फोटो ऍम को स्टडी करना है । तो क्या हम केवल डेटाइम केरेटा आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुंच सकते हैं । नहीं क्योंकि इन कंपनी डेटा हमारे किसी काम का नहीं, ये सही रिजल्ट नहीं देगा बल्कि भ्रम पैदा करेगा । उसी प्रकार आदिभौतिक क्षेत्र माननीय संसार या हमारे अनुभव का क्षेत्र आदिदैविक और आध्यात्मिक क्षेत्र के बिना मनुष्य में भ्रम पैदा करता है । आदिदैविक क्षेत्र या अनुभव होने का स्तर है अर्थात अनुभव की प्रक्रिया । जैसे यदि हमारी आंखों में जो दृष्टि है वो हो गई अनुभव की प्रक्रिया या आधी देवी क्षेत्र तथा तीसरा जीवन का स्तर है । आध्यात्मिक सर अब थोडा ध्यान देने वाली बात है । आदिभौतिक से आदिदैविक तक ज्यादा तक लोगों की समझ में आ जाता है परंतु ज्यादातर लोग आदि बहुत ही को ही सत्य समझ लेते हैं । जबकि यहाँ पर ये समझना बहुत ही जरूरी है कि आदिभौतिक की सत्ता आदिदैविक की वजह से है तथा आदि देव इक्कीस सत्ता आध्यात्मिक क्षेत्र की वजह से है । जैसे मैं चश्मा पहनता हूँ क्योंकि चश्मा बाहर का रंगरूप देख रहा है नहीं क्योंकि चश्मा अपने लिए तथा अपने आप बाहर की विषय वस्तुओं को प्रकाशित नहीं कर रहा है, वो आंखों के लिए काम कर रहा है । तो क्या आंखे रंगरूप को देख रही है? नहीं यदि आंखों में दृष्टि न हो तो चाहे यहाँ की कितनी सुंदर या स्वस्थ क्यों ना लगे उन का कोई मतलब नहीं । तो क्या सुर दृष्टि के द्वारा हम बाहर की विषय वस्तु रंग रूप को देख तथा अनुभव कर रहे हैं । थोडा चिंतन करने से पता चलेगा कि यदि आंखों के पीछे मन ना हो तो हम आंखों में दृष्टि होते हुए भी कुछ नहीं देखते हैं । तो फिर क्या मन सब चीजों का प्रकाशक है? नहीं मन अपने आप में जड है । मन में यदि चैतन्य ना हो तो मान कुछ भी नहीं है । ऐसा करते करते हमें ये पता चलता है कि आखिर ये कौन है जिसके कारण आदि भौतिक तथा आदिदैविक क्षेत्र अपना अपना कार्य कर रहे हैं । यही क्षेत्र आध्यात्मिक क्षेत्र कहलाता है । मान लिया एक मलेशिया भी बिल्कुल स्वस्थ है । वो आदि बहुत एक तथा आदिदैविक क्षेत्र को देख रहा है, उसमें व्यवहार कर रहा है । दूसरे ही शायद उसकी मृत्यु हो जाती है तो आदमी वही है, उसकी आंखें भी वैसी ही है । लेकिन अब उसके लिए आदिभौतिक और आदित्य क्षेत्र का कोई मतलब नहीं है क्योंकि आध्यात्म क्षेत्र ने देख के द्वारा आदिभौतिक और आदित्य क्षेत्र को प्रकाशित करना बंद कर दिया है । तो कुल मिलाकर बात ये हो गई कि इस पुस्तक को पडने के लिए आपको किसी भी तरह के अधिकार की जरूरत नहीं है । लेकिन इस पुस्तक को समझने तथा इस पर चिंतन वही कर सकता है जो जीवन का अर्थ केवल आदि बहुत क्षेत्र अर्थात आहार खाने पीने, निद्रा, सोना, भाई अर्थात अपने को संरक्षित करना, डेढ अभिमान तथा मैं बच्चे पैदा करना । इन चार बातों के अलावा समझता हूँ जो मनीष चयन, चारो आहार, निद्रा, भय, मैथुन इन्ही को जीवन समझता है, वह पुस्तक को अध्ययन करने का अधिकारी नहीं है । क्योंकि इस पुस्तक को समझने के लिए पहले हमें जीवन के बारे में जो हमारी अनगिनत गलत धारणाएं हैं, उन को ठीक करना होगा । तभी इस पुस्तक में बताए गए तथ्यों को समझा जा सकता है ।

Chapter 2 पुस्तक का प्रयोजन

अध्याय दो पुस्तक का प्रयोजन एक बार मैंने स्वामी अनुभव आनंद जी के एक सत्संग में वेदांत के बारे में सुना जिसमें उन्होंने बोला कि हम सभी परमात्मस्वरूप है, चाहे हम जाने या ना जाने चाहे हम मानिया नामानि । स्वामी जी ने ये भी बताया कि सभी वेदों का सार उपनिषद हैं । सभी उपनिषदों का सार भगवत गीता है । उस दिन मेरे मन में अचानक एक संकल्प आया कि मैं भगवत गीता का अध्ययन करूंगा । मैं सबसे पहले श्री रामसुखदास जी रचित गीताप्रेस के द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भगवद्गीता लेकर आया । सात में वेदांत बोध किताब भी लाया । तब तक ही दोनों मेरे लिए किताब मात्र थी । जैसी और किताबे होती है । मैंने एक घंटा रोज भगवदगीता का अध्ययन शुरू किया लेकिन मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था । बस में किताब की तरह भगवत गीता का अध्ययन कर रहा था । फिर एक दिन चिंतन शुरू किया और विधान की किताब महात्माओं के जीवन चरित्र जैसे बाबा नीम करोली का जीवन चरित्र भगवद् रमन्ना ऋषि के बारे में तथा स्वामी योगानंद जी महाराज के बारे में पढा लेकिन सभी एक ही बात कह रहे थे क्या परमात्मस्वरूप हो बस अज्ञान के द्वारा ये ज्ञान ढका हुआ है और अज्ञान है अपना देहात में भाग अगर हमें परमात्मा का अनुभव करना है तो देख को जानना होगा ये देख क्या है और जब हम यह जान लेंगे तो हमें देखने से अलग होकर चिंतन करना होगा । मैं बचपन से ही ज्यादा धार्मिक प्रवृत्ति, पूजा पाठ करने वाला नहीं था । मुझे मंदिर में भीड देखकर लोगों को भगवान का दर्शन करने के लिए कतार तोड दे देखकर या फिर भगवान से केवल इच्छाओं की पूर्ति के लिए आग्रह करता देखकर अच्छा नहीं लगता था । मैं सोचता था कि यदि भगवान इच्छापूर्ति का साधन मात्र है तो फिर सबकी इच्छा पूरी क्यों नहीं होती? बहुत सारे सवाल हमेशा मन में थे पर इन पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया और जब मैंने वेदांत पढना और समझना शुरू किया तो उसमें पाया कि परमात्मा केवल इच्छापूर्ति का साधन नहीं है । मैंने स्वामी विवेकानंद का जीवन चरित्र पडा । मैंने भगवान रामकृष्ण परमहंस के बारे में पढना शुरू किया । सभी ने इसी बात का समर्थन किया कि हम परमात्मस्वरूप है और ये जान लेना ही ज्ञान है और मोक्ष केवल ज्ञान के द्वारा ही हो सकता है । जब तक मैंने भगवद्गीता पडना शुरू नहीं किया था मेरे मन में इस जगत को लेकर अपने आप को लेकर कोई संसय नहीं था । लेकिन अब मेरे पास सैकडों सवाल थे और मेरी जाने की इच्छा तीव्र थी क्योंकि जब तक मनुष्य के मन में सवाल नहीं होते वो जो देखता है, अनुभव करता है उसी को सत्य मानता है । परन्तु कुछ सवालों के जवाब हमें इस जगत और जगत की वस्तुओं से परे ले जाते हैं और जीवन का उद्देश्य बन जाते हैं । आखिर हम कौन हैं? विभिन्न प्रकार की जीव जंतु कौन है? ये जगत क्या है? यहाँ पर होने वाले अनुभव किया है, ईश्वर क्या है? वो कैसे सब का नियमन करता है? धर्म क्या है, धर्म क्या है? उपासना क्या है की भक्ति और उपासना में क्या भीड है? और इन सब का स्थान देश हमारा स्वरूप परमात्मा कौन है? ऐसे ही बहुत से सवाल थी जो मुझे परेशान कर रहे थे । फिर मैंने निश्चय किया कि मैं उन सवालों के जवाब जानकर ही रहूंगा । मैंने भगवान शंकराचार्य, भगवान रामकृष्ण परमहंस और भगवान रमन्ना ऋषि को अपना गुरु बनाया और चिंतन शुरू किया । मैंने पाया कि क्या हम विचार करते हैं या हमारे मन में विचार आते हैं । दरअसल हम विकारों को विचार का नाम दे देते हैं । मन में कैसे भी विचार आए और हम सोचते हैं कि हम विचारवान बन गए । ये तो वही बात हुई कि एक बगीचे में जंगल की तरह कैसे भी पेड पौधे उगाए और फिर भी हम से बडी चाहिए काहे नहीं । जब तक उस बगीचे में जाकर हमें आनंद का अनुभव होता है तभी तक को एक बगीचा है अन्यथा वह एक डरावना जंगल है । ठीक उसी प्रकार अगर जान विचारों के द्वारा हमें आनंद का अनुभव नहीं होता वो विकास है । पहले हमें विचार और विकास तथा चिंतन और चिंता में अंतर समझना होगा । विचारों के द्वारा हम विकारों से मुक्त हो सकते हैं । चिंतन के द्वारा हम चिंता से मुक्त हो सकते हैं । इस संसार में हमें हर चीज सीखनी पडती है । चाहे वह रोटी बनाना हो, गाडी चलाना हो या कोई भी काम । जब हमें जगत में आते हैं तो हमें कुछ भी नहीं आता । धीरे धीरे हम सब सीखते हैं । उसी प्रकार विचार कैसे करना है ये भी सीखना पडता है । जिन विचारों के द्वारा हम चिंता से मुक्त हो जाते हैं, हमारे मन के प्रश्न शांत हो जाते हैं, उसे चिंतन कहते हैं तथा जान विचारों के कारण हम अपने आप में ही उलझ जाते हैं, उन्हें विकार या चिंता कहते हैं । इस पुस्तक में आपको विचार कैसे करें यही बताया जाएगा और जितने भी आपके आध्यात्म को लेकर प्रश्न है, सभी का समाधान करने का प्रयत्न किया जाएगा । जिस प्रकार मेरे मन के विकार जो बहुत से प्रश्नों के रूप में मेरे सामने थे, शांत हो गए । इस पुस्तक का यही प्रयोजन है कि जो भी आध्यात्म में प्रवेश कर रहे हैं, जिन्हें अपने स्वरूप को जानने की तीव्र इच्छा है, उनके भी प्रश्न को शांत किया जा सके तथा जिनके मन में कोई प्रश्न नहीं है उनके सामने बहुत से प्रश्न पैदा किया जा सके क्योंकि सत्य कुछ और ही है । सब के इतना संदर है कि शायद हम लोग इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते ।

Chapter 3 सामान्य गलत अवधाराणाये

अध्याय तीन सामान्य गलत अवधारणाएं एक बार एक महिला ने भगवान रमन्ना ऋषि से पूछा भगवान कई लोग जगत में बहुत ही मृदुभाषी, सरल स्वभाव और परिवार की देखभाल करने वाले होते हैं । परंतु जब उन से सतसंग की अथवा आध्यात्म की बात करें तो वे ये बात सुनना ही नहीं चाहते । ऐसा क्यों? भगवान कहते हैं सत्संगी आध्यात्मिक जगत में मनुष्य की जो मूलभूत गलत अवधारणाएं हैं, उन पर प्रहार होता है । उसने अपने पूरे जीवन में जिसको सत्यम आना है और उसी में क्या है? जब उसे ये बताया जाता है कि तुम देख नहीं हो तो उसे गलत लगता है । बाबा जी क्या बोल रहे हैं ये कैसे हो सकता है? इसलिए वो ये सब सुनना ही नहीं चाहता है । संचार में दो जगह आदमी स्वस्थ होने के लिए जाता है । पहला हस्पताल दूसरा जिम क्या जितनी भीड अस्पताल में होती है उतनी भीड जिम में भी होती है? नहीं क्योंकि अस्पताल में वे लोग जाते हैं जो बीमार है और ठीक होना चाहते हैं और जिम में वे लोग जाते हैं जो स्वस्थ है और उससे भी ज्यादा बनना चाहते है । उसी प्रकार जो मनुष्य घर को लेकर पति पत्नी को लेकर बच्चों को लेकर दुखी हो जाते हैं, वहीं मंदिरों में अपनी मनोकामना पूर्ण करने जाते हैं । परंतु जो स्वस्थ है जिससे कोई इच्छा नहीं है वही अपने को जानने के लिए सत्संग या महापुरुषों की शरण में आते हैं । उपनिषद कहते हैं आया महात्मा मलही ने न लग गया या अध्यात्म बलहीन लोगों के लिए नहीं है । बलहीन लोगों से तात्पर्य है जो अपनी गलत धारणाओं को बदलना नहीं चाहते । मुख्यतः हमारी गलत धारणाएं छह प्रश्नों को लेकर है । पहला जीत क्या है? दूसरा देख क्या है? तीसरा जगत क्या है? चौथा ईश्वर क्या है? पांचवां आध्यात्मिक साधना क्या है? छठा और इन सब का अधिष्ठान कौन है? इस पुस्तक में नहीं । गलत धारणाओं को समझाने तथा इन धारणाओं के नीचे जो अपना असली स्वरूप छिपा है, उसी को जानने का प्रयास किया जाएगा । महात्मा जान कहते हैं कि किसी भी शास्त्र का अध्ययन हमें स्वयं नहीं करना चाहिए, क्योंकि जब हम व्यवहारिक जगत में किसी अध्यापक से कोई प्रश्न पूछते हैं तो अध्यापक उस प्रश्न को संबोधित करते हुए उत्तर देते हैं, पर हिन्दू आध्यात्मिक जगत में महात्मा जान प्रश्नों को संबोधित नहीं करते हैं । अपितू प्रश्न पूछने वाले की स्थिति को ध्यान में रखते हुए प्रश्न का उत्तर देते हैं और वे सिर्फ उत्तर देते हैं परंतु समाधान हमें स्वयं खोजना पडता है । इसलिए उपनिषद में कहा गया है तद्वीर ज्ञानामृत था गुरु मेवा भी अच्छे समीत पानी श्रोत्रीय उम्र मान िस्टम । अगर हमें वास्तव में अपने स्वरूप को जानना है तो हमें गुरु की शरण में जाना होगा, थोडा गुरु शब्द को जान लेते हैं । ये गुरु किया है और गुरु कैसा होना चाहिए? गुरु हमारे हृदय में जिज्ञासा के रूप में प्रकट होते हैं । हमारे में अपने अनुभवों से सीखने की क्षमता को गुरु कहते हैं । जो आदमी अपनी अनुभूतियों से नहीं सीखता उसको साक्षात् भगवान भी नहीं सिखा सकता । हम बडे प्यार से कहते हैं कृष्ण बंदे जगद्गुरू अगर कृष्ण भगवान जगद्गुरु होते तो क्या वो दुर्योधन धृतराष्ट्र को नहीं सिखा सकते थे । इसलिए गुरु और शिष्य के रिश्ते में शिष्य का महत्व होता है, गुरु का नहीं । अगर दूसरा उदाहरण देखे तो एक लडकी को गुरु द्रोणाचार्य शिक्षा देने से मना कर दिया तो क्या वो उसकी सीखने की क्षमता को रोक पाएं । वो फिर भी अर्जुन से श्रेष्ठ धनुर्धर साबित हुए हैं । इसलिए जब तक कोई स्वयं सीखना नहीं चाहता उसको कोई नहीं सिखा सकता और जो जिज्ञासा युक्त होकर जानना चाहता है उसे जानने से कोई नहीं रोक सकता । अगर हम भगवद्गीता की प्रथम अध्याय का अवलोकन करे तो उसमें भगवान ने अर्जुन के मन में संसद का बीस डाला । जब वर्जन कहते हैं कृषि के क्षमता दावा उम्मीद माह वही पाते सेन्य गुरु भाई और मध्य प्रथम स्थापय या में छूट कि है अच्छी यूथ मेरा रथ दोनों सेनाओं के मध्य में ले चलो । मैं विरोधी सेना में देख तो लूँ की मुझे युद्ध किससे करना है । तब भगवान को तो विकल्प था कि वह अर्जुन का रथ दुर्योधन दुशासन के सामने खडा करेंगे या भीष्म द्रोणाचार्य के सामने । अगर भगवान अर्जुन कारक सीधे दुर्योधन दुशासन के सामने ले जाते तो अर्जुन के मन में कोई मोह का प्रसंग निर्माण ही नहीं होता और युद्ध शुरू हो जाता है । परंतु भगवान ने ऐसा नहीं किया । भगवान ने अर्जुन के मन में मौका प्रशन पैदा करने के लिए रथ भीष्म आचार्य और द्रोणाचार्य के सामने ले जाकर खडा कर दिया और बोले भीष्म अदरूनी प्रमुखता सर्वे शाम छह महीने क्षेत्र काम ओ आज पार्थ पर शैतान समय वेता गुरु नीति तब अर्जन कहते हैं कथन भीष्म हम संघ केंद्रो नाम ऊँचा, मधुसुधन भी ही प्रतियो त्सुनामी पूजा फरवरी सुधन हे भगवान! मैं अपने दादा को और गुरु को कैसे मारो । वैसे उसको लडाई करने में कोई समस्या नहीं थी परंतु मैं आप लोगों को कैसे मारो? ये समस्या थी और उसने अपने इस मूवी को सही ठहराने के लिए प्रथम अध्याय में भगवान को ज्ञान पढाने करने की भी कोशिश की । परंतु अर्जुन ये भूल गया कि मैं रणभूमि में कौन हूँ, शिष्य हूँ, होता हूँ, भाई हूँ या यौद्धा । इसी प्रकार हमें जगत में आकर ये भूल जाते हैं कि हम वास्तव में कौन है और जब जब भगवान हमारे जीवन में कुछ समस्या ले आते हैं तो ये उनका हम पर उनका अनुग्रह होता है । वो समस्या हमें परेशानी में डालने के लिए नहीं होती । वो एक संकेत होता है कि हम जाने की वास्तव में हम कौन हैं और सभी समस्याओं से निकल जाए । जब हम अपने अनुभव से सीखना शुरू कर देते हैं तो हमारे मन में अपने बारे में जानने की इच्छा होना स्वाभाविक है । परंतु ये इच्छा तीव्र जिज्ञासा पूर्ण होनी चाहिए । एक बार स्वामी विवेकानंद जी ने भगवान रामकृष्ण परमहंस से कहा कि माँ काली आपसे बात करती हैं पर मुझे नहीं ऐसा क्यों? भगवान ने कहा तुम चाहते ही नहीं की माँ काली नाम से बात करें । जब तुम चाहोगी तो उसे अवश्य बात करेंगी । इस पर स्वामी विवेकानंद ने कहा, मैं चाहता हूँ भगवान राम कृष्ण बोले नहीं तुम पूर्ण रूप से नहीं चाहते हो तो स्वामी विवेकानंद बोले पूर्ण रूप से शाहना मतलब भगवान राम कृष्ण बोले, चलो इस बारे में बाद में बात करेंगे । पहले गंगा जी में स्नान करके आते हैं और जब स्वामी विवेकानंद स्नान के लिए गंगा जी में उतरे तब भगवान राम कृष्णा ने स्वामी विवेकानंद का सिर्फ अकडकर पानी में नीचे दबा दिया और काफी देर तक दवा कर ही रखा । फिर स्वामी विवेकानंद ने जोर से झटका मारकर अपना सिर ऊपर निकाल लिया । तब भगवान राम कृष्ण बोले, नरेंद्र जब तुम्हारा सिर्फ पानी के अंदर था तो तुम जैसे सांस लेने के लिए तडप रहे थे । उस समय तो मैं सास के अतिरिक्त कुछ भी नहीं चाहिए था । इसी प्रकार जब तुम्हारी माता की प्रति ऐसी ही तीव्र इच्छा होगी, महत्व से अवश्य बात करेंगे । जब हमारे मन में तीव्र इच्छा होगी अपने आप को जानने की, तब हमारे जीवन में भगवान के अनुग्रह से गुरु महाराज का पर्दापण होता है । हमें कभी भी जीवन में गुरु की खोज के लिए भटकना नहीं चाहिए । गुरु अपने आप आपके जीवन में आ जाते हैं । गुरु कैसा होना चाहिए? इस पर उपनिषद कहते हैं, शोध नियम और ब्लाॅस्ट जिन्होंने शास्त्रों का अध्ययन किया है और उसको अपने जीवन में जया है । जिसकी निष्ठा ब्रह्मा में अकाउंट है और जिसे जगत में कुछ और सिद्ध नहीं करना है वही गुरु आपको आपके हित की बात बताएगा । अगर हम अपने मन से गुरु की खोज करेंगे तो मन हमेशा नामरूप के पीछे दौडता है और वो अयोग्य मनुष्य को गुरु मान लेता है । इसलिए आप निरंतर अपना अंतःकर्ण शुद्व कीजिए । गुरु भगवान आपके जीवन में अवश्य आएंगे । जब आपका अंतर कारण शुद्व हो जाएगा तब तक आप निरंतर प्रयत्न में लगे रहे ।

Chapter 4 जीवन क्या है

अध्याय चार जीवन क्या है? हिन्दू धर्म में जीवन में चार पुरुषार्थों का वर्णन मिलता है धर्म, अर्थ कम । मौत धर्म के लिए हमें धर्मशास्त्र का उपदेश किया जाता है । सत्यम बद् धर्म चार स्वाध्याय आना हाँ मदन आचार्या ये प्रियम धन मार क्या प्रजातंत्र घूमा विव अच्छे सी सत्यानी प्रमोदी तब हम धर्मानन्द सहमति तब हम कुशलानंद प्रमत्त तब भूत तीय ना प्रगति तब हम स्वाध्याय प्रवचन अभी आमना प्रमादी तब क्या धर्मशास्त्र में हमें संसार में रहते हुए किस प्रकार का आचरण करना है तथा धर्म पूर्ण आचरन करते हुए हमें किस प्रकार भरण पोषण के लिए धन का अर्जन करना है ये बताया जाता है । उसके बाद कामनापूर्ति का विषय आता है । कामनापूर्ति के लिए उपासना शास्त्रों का उपदेश किया जाता है । भगवत गीता में आता है सहायक यहाँ पर जहाँ रिश्ता पूर्वाचल प्रजापति ऍम हमें वो ऍम मधु देवानंद नवैतानि तेरे रेवा भगवंत हुआ परस्पर भगवंत श्री यहाँ पर हम हॅाट कामनापूर्ति के लिए हम विभिन्न देवी देवताओं का आवाहन करते हैं । विभिन्न यज्ञ कर्मकांड करते हैं और अपनी कामनाएं पूरी करने का प्रयास करते हैं । लेकिन मनीष की कामनाएं कभी पूरी नहीं हो सकती । इसलिए बताया जाता है की कामनाओं पर नियंत्रन करके हमें मौका के लिए अग्रसर होना चाहिए । इसके लिए चार आश्रमों का विधान है । पहला ब्रह्माचारी, दूसरा गृहस्त, तीसरा वन प्रस्थान, चौथा सन्य भगवान शंकराचार्य कहते हैं कर्माणि चित्र सिद्धर्थ अम्मी का आग्रह यार तुम उपासना मोक्षार्थी ब्रह्मा विज्ञानम् टीवी ॅ जीवन का एकमात्र लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति तथा ज्ञान का नाश है तभी हम अपने स्वरूप को जान सकते हैं । जिस दिन हमारे मन में ये सवाल आ जाता है कस्टम को हम कुछ आया था कामे जनि को में ताथा इतनी पर िभाग सर्व मसार हम विश्वम त्यक्त्वा स्वप्न विचार उस दिन जो भी हम कर्म करते हैं वो अपने चित्र की शुद्धि के लिए उपकरण मान जाता है । जो भी हम उपासना करते हैं वो मन को एकाग्र करने के लिए एक साधन बन जाता है और ज्ञान प्राप्ति के मार्ग खुल जाते हैं । किसी भी कर्म का फल आप या पुण्य होता है । कोई भी कर्म का फल शास्वत नहीं है । कर्म वो है जो क्रिया के द्वारा संपन्न होता है, जो एक दे शिवम काल विषय में होता है और संपन्न हो जाता है । भगवत गीता में भगवान कहते हैं जो कार्य में जितनी वृद्धि के लिए नहीं किया जाता है वह कर्म कर्मयोग कहलाता है । वो केवल शारीरिक परीक्षण मात्र है । उसका फल श्रीन होने के उपरांत हम पुनः अपनी पहली अवस्था में आ जाते हैं । धनवान कहते हैं ते दम भुक्त्वा स्वर्गलोक कम विशाल अनशन पुण्य मृत्यु लोग कमिशन थी ए वित्र ही धर्म मनु प्रपन्ना गटागट कम कम कम पाँच घंटे परंतु जो करमचट की शुद्धि के लिए किया जाता है वह कर्म कर्मयोग कहलाता है । भगवान कहते हैं का ये ऍम बुद्धिया ॅ पी योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्तवा आत्मशुद्धि आई महात्मा जान भी कर्म करते हैं लेकिन आत्मशुद्धि के लिए क्योंकि कर्म किए बिना तो मैंने शिक्षण भी नहीं रह सकता । तो फिर कर्म के द्वारा हम अपने स्वरूप को नहीं पहचान सकते हैं । केवल ज्ञान ही एकमात्र साधन है जो हमें अपने स्वरूप में स्थिति दिला सकता है । तुलसीदासजी कहते हैं धर्म थे वृत्ति जो विज्ञान ग्यारह मोक्ष प्रदत इतनी वेनम बखाना । वेदों के ज्ञान भाग को परिषद कहा गया है । उपनिषद शब्द का अर्थ है उप माने कि समीप नी माने के निश्चय और सदमा ने कि हिंसा गति एवं अवसाद उप एवं नींद उपसर्ग है सर ये धातु है सबके तीन अर्थ है गति यानी की अंतिम लक्ष्य, दूसरा हिंसा, अज्ञान का नाश, तीसरा अवसाद जो की है ढीला करना यानी कि गलत धारणाओं को ढीला करना । उपनिषदें ब्रह्मा विद्या उच्यते । उपनिषद को ब्रह्मा विद्या कहा गया है । उपनिषद ब्रह्मा विद्या का ज्ञान नहीं है तो परिषद ब्रह्मा विद्या ही है । ये ज्ञान ही ब्रह्मा है । उपनिषद को वेदान्त भी कहते हैं । यानी वेदों का अंतिम भाग वेदों का सार । जब हमने धर्मपूर्वक अपने जीवन को दिया है और उपासना से अतः करन को शुद्ध किया है तो फिर उपनिषद के द्वारा हम अपने स्वरूप को जान सकते हैं । यही जीवन का एकमात्र प्रयोजन है । अपने स्वरूप को जाने के लिए प्रस्थान रही को श्रोत माना गया है । ये है उपनिषद ब्रह्मसूत्र, भगवद्गीता इस किताब में उपनिषद, ब्रह्मसूत्र तथा भगवद्गीता को समझ पाना कठिन है । अतः जहाँ पर भी कुछ मैदान की तकनीकी शब्द प्रयोग में लाए जाएंगे, वहीं पर उन्हें समझाया जाएगा । हमारे शरीर में दो भाग है, एक है संरचनात्मक तथा दूसरा है क्रियात्मक । संरचनात्मक शरीर वो है जो आंखों से दिखाई देता है । जैसे हमारी आंखें, कान, नाक तो अच्छा तथा शरीर के अन्य भाग । चिकित्सा के क्षेत्र में इन्ही संरचनात्मक भागों की पढाई कराई जाती है । यही संरचना एक प्रकार की प्रजाति के सभी प्राणियों में सामान होती है । चाहे वह काला आदमी हो या गोरा छोटा हो या बडा हो इसलिए जब कोई डॉक्टर किसी आदमी का ऑपरेशन करता है तो ये नहीं कहता है कि मुझे वो स्पेसीमेन चाहिए जिस पर मैंने पढाई करते वक्त प्रैक्टिस की थी । उदाहरण के लिए संरचनात्मक अंग आंख है जो की हमें दिखाई देती है और जिससे डॉक्टर देखते हैं परन्तु इसका क्रियात्मक भाग दृष्टि होती है । दृष्टि को हम नहीं देख सकते हैं । श्रवण शक्ति को हम सुन नहीं सकते हैं और ये दृष्टि श्रवण शक्ति सभी प्रकार की आंखों में सामान है । आंखें नीली है, दृष्टि नीली नहीं होती । आंखे लाल हो, दृष्टि लाल नहीं हो जाती है । भारतीय भाइयों की दृष्टि तथा चीनी भाइयों की दृष्टि एक ही है । चाहे उनकी आंख का आकार भारतीयों से अलग क्यों ना हो । एक गाय की दृष्टि और एक आदमी की दृष्टि सामान है । इनमें कोई अंतर नहीं है । एक उदाहरण से सरल भाषा में समझने का प्रयास करते हैं । बाहरी जगत में रंगरूप वस्तुएं अनेक है । दिन भर में हम सैकडों वस्तुओं को देखते हैं तो हम ये समझने का प्रयास करते हैं कि उन वस्तुओं को कौन देख रहा है । मैं चश्मा पहनता हूँ तो क्या चश्मा उन वस्तुओं को देख रहा है? नहीं चश्मों के पीछे आंखे हैं । आंखी संरचनात्मक है क्या? आंखों में जो डिजाइन बना है यह वस्तुओं को देख रही है? नहीं दृष्टि के पीछे मन ना होतो दृष्टि भी नहीं देख सकती । और जैसे कभी कभी कोई बच्चे या आदमी आँखे खोल कर सोते हैं तो क्या वे देखते हैं नहीं? अगर आंखों के पीछे मन ना हो तो हम नहीं देख सकते हैं । आप क्या वस्तुओं को मन देख रहा है? मन कैसे चीजों को देख सकता है क्योंकि मन की कोई स्वतंत्र सकता है ही नहीं । जब तक मन में चित्र का प्रकाश ना हो तो मन है ही नहीं । भगवान श्रीराम कहते हैं मानसम् तो के मार्ग आनी कृते ऍम मार्ग आर जवाब अगर आप मान के बारे में सोचने लगे की ये क्या है तो मन है ही नहीं । मैंने गायब हो जाता है चेतना सभी प्राणियों के लिए सामान्य सार्व भाव है । चाहे वो गधा हो, मनुष्य हो, वो कीडे मकोडे या पेड हो । चेतना को हम बाद में समझने का प्रयास करेंगे । पहले हम मान के बारे में समझने का प्रयास करते हैं क्योंकि चेतना ऍम ये सार्वभौम तथ्य है । उस पर हमारा नियंत्रण नहीं है । परन्तु जब क्षेत्रा मान के रूप में प्रकट होती है तो उस पर हमारा नियंत्रण आ जाता है । विधानसभा तीन शरीरों का विवरण आता है । पहला है स्कूल शरीर । इसका अन्य मैं कुछ भी कहते हैं । जो भी हमें संरचनात्मक शरीर दिखता है, वह स्थूल शरीर हैं । जैसे पांच इंद्रियों के उपकरण, आठ नाक का बच्चा तथा जेवा इनको कर्मेन्द्रियां भी कहते हैं । स्कूल शरीर की परिभाषा बताते हुए उपनिषद में आता है । स्कूल शरीर, आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी इन पंचमहाभूतों से बना है । जितनी भी हमारे शरीर के अंग उत्तर कोशिका बनी है, पंचमहाभूतों के संघात से बनी है और ये सभी के लिए सामान्य है । चाहे वो कोई अपराधी है या धर्मात्मा । ये पंचमहाभूत सभी के लिए सामान्य हैं । अब थोडा सूक्ष्म शरीर को समझते हैं सूक्ष्म शरीर पाँच प्राण दस इंद्रिया मन और बुद्धि से मिलकर बना है पाँच प्राण और दस इंद्रिया इस प्रकार है पांच । प्राण, प्राण, अपान, समान, ब्यान और उदान पांच प्राण है । पांच । कर्मेन्द्रियां वहाँ हाथ, पैर, गुदा और उपस्थ पांच कर्मेन्द्रियां है । पांच । ज्ञानी प्रिया कान, त्वचा, नेत्र, जेवा और नासिका पांच यानि दरिया है । सूक्ष्म शरीर को बताते हुए कहते हैं कि अपंजीकृत पंचमहाभूत अर्थात जब ये पंचमहाभूत शरीर के रूप में नहीं होते । ये पंच महाभूत, पंचक, ज्ञानेन्द्रिय, पंचक, कर्मेन्द्रियां, मन और बुद्धि ये मिलकर सूक्ष्म शरीर का निर्माण करती है । इसमें अहंकार भी आता है । अहंकार भी तत्व है जिसके कारण हमारा शरीर बंधा रहता है । सभी दत्त वापस में बंधे रहते हैं । चाहे वह गहरी नींद हो या समाधि व्यवस्था । कारण शरीर स्थूल और सूक्ष्म शरीरों का कारण हैं इसलिए उसे कारण शरीर कहते हैं । जैसे कि पहले बताया गया की स्कूल देर केवल उपकरण मात्र है । इस जगत में व्यवहार करने के लिए तथा सुख दुख भोगने के लिए ये अपना स्वरूप नहीं हो सकता क्योंकि हमें शरीर को मेरा शरीर कहते हैं । जैसे मेरा फोन, मेरा बच्चा, मेरा चश्मा, मेरा पेट मेरी आँखे तो जो मेरा है वह मैं कैसे हो सकता हूँ । एक उदाहरण से समझने का प्रयास करते हैं । कुछ दिन पहले मैं भोपाल गया था । वहाँ पर हमारे साथ एक वैज्ञानिक महोदय रहते थे । एक दिन उनके साथ एक दुर्घटना हो गई और उनका एक पैर डॉक्टर को काटना पडा । जब वैज्ञानिक महोदय को पता चला तो बोले मेरा पैर कहाँ गया, मेरा पैर लेके आओ । फिर उन्हें उन का पैर दिखाया गया जो की काफी फट गया था । वो वैज्ञानिक महोदय उसे देख भी नहीं पाए और कहने लगी से फेंक दो, ये मेरा पैर नहीं है । फिर डॉक्टर ने उन्हें एक नकली बहर लगाने का सुझाव दिया तो वे राजी हो गए । अब वो नकली पाँच ही उनका पास है । इस उधारण से दो चीजें सीखने को मिलती है । वो पाव जो काटा गया वो वैज्ञानिक महोदय का था परन्तु वैज्ञानिक महोद है । वह पाव नहीं वो उससे अन्य हैं । जब वहाँ उनके शरीर से जुडा हुआ था तो वह मैं के अंतर्गत आता था । परन्तु जैसे ही वो उनके शरीर से अलग हो गया वो पवन का नहीं रहा । वो मैं से बाहर चला गया । जिस वस्तु को हम मैं के अंतर्गत नहीं रखते वह अन्य में आता है और उसी को हम जगत कहते हैं लेकिन ये मिथ्या में है । ये मैं देख के साथ जुडा हुआ । मैं इसको अहंता कहते हैं । ये जाग्रत अवस्था का मैं जब हम जगह हुए जगत में व्यवहार करते हैं तो ये हमारा व्यवहार बुद्धि प्रदान होता है जो मैं के साथ जुडकर अहंता कहलाता है । स्थूल शरीर की स्कूल बुड्ढी है । अब हम स्वप्नावस्था का थोडा विश्लेशण करते हैं । स्वप्न में हमारा शरीर इंद्रिया कुछ काम नहीं करती । केवल मन नहीं होता है जो काम करता है स्वप्न में हम कुछ भी सपना देखते हैं उस समय वो हमें हकीकत जान पडता है और सपने में हमें ये नहीं लगता कि हम सपना देख रहे हैं । फिर हम जो सपने में चीजें देखते हैं वह कहाँ से दिखती है जबकि उस वक्त हमारी आंखे बंद होती है जैसे कि पहले बताया जा चुका है । चित्र को वृत्तियों या संस्कारों का स्टोरीज हाउस कहा गया है । मंचित से वृत्तियों को उठाकर वृत्तियों से एक स्वप्न संसार का निर्माण कर देता है । उस सपने में जो दिखता है वो भी मन का ही प्रक्षेपण हैं । जो देखता है वह भी मन है और स्वप्ने में जो हमारी इंद्रियों पर नियंत्रण करता है वह भी मन है । इसलिए स्वप्ने अवस्था मान प्रधान है । स्वप्न हमें याद रहते हैं कुछ पूरे कुछ अधूरे परन्तु स्वप्ने के संस्कार चित्र में जमा नहीं होते क्योंकि वहाँ कर्तापन पैदा नहीं होता । इस बारे में थोडा बाद में हम विस्तार से चर्चा करेंगे । अभी हम यह जान लेते हैं कि स्वप्न के केवल मन कार्य करता है । अब आते ही तीसरी व्यवस्था पर अर्थात सुषुप्ति अवस्था डीपली हम आठ घंटे की नींद में दो घंटे सुषुप्ति अवस्था में रहते हैं । जब हम पूर्ण रूप से अंधकार में होते हैं । ना कोई सपना होता है और ना ही मन । इंद्रियों का कोई व्यापार होता है फिर भी हम होते हैं अर्थात वहाँ पर सूक्ष्म शरीर भी नहीं होता और स्कूल शरीर तो होता ही नहीं । फिर हम कहाँ होते हैं हमारे लिए? उस समय न जगत होता है, न स्थूल शरीर और न सूक्ष्म शरीर होता है । उस समय केवल हमें आनंद का अनुभव होता है । हमें निंद्रा के द्वारा जो आनंद प्राप्त होता है वो इसी अवस्था था । सुषुप्ति अवस्था का ही आनंद होता है । इस व्यवस्था में कुछ नहीं रहते हुए भी हम होते हैं । मैं होता है तभी तो हम निद्रा से जाते हैं तो कहते हैं कि मुझे बहुत अच्छी नींद आई पर बीच में कुछ सपने भी आए । जब डीप स्लीप में कोई नहीं था तो जागने के बाद ये बाकी कौन कह सकता है । ये बात की वही कह सकता है जो जागृत में भी था, स्वप्न में भी था और सुन सकती में भी था । परन्तु तीनों अवस्थाओं का आधार होते हुए भी तीनों अवस्थाओं से प्रभावित नहीं था । जो शरीर को बांधे हुए था था । उस समय डीपली कुछ नहीं होते हुए भी शरीर की सभी क्रियाएं चल रही थी । खाना बच रहा था, बाल बढ रहे थे, साल से चल रही थी और पंचमहाभूत आपस में बंधे हुए थे था । मैं वहाँ भी था परन्तु मैं के साथ अज्ञान कारण दही भी था । इसलिए हमें अपने शरीर का तथा बहारी जगत का कुछ भाग नहीं था । किसी को अहंकार कहते हैं अर्थात सुषुप्ति अवस्था अहंकार प्रधान है । अगर सुषुप्ति अवस्था में अज्ञान ना हो तो सिर्फ मैं बच्चा रहता है । यही अपना स्वरूप है और ये समाधि अवस्था में होता है । समाधि अवस्था चित्र फॅस प्रधान होती है । हमें सब चीजों का भान रहता है बिना इंद्रियो तथा मन की ये अपना असली स्वरूप है । यहाँ पर ये बात सिद्ध हो जाती है कि हम ना दोस्त स्कूल दे रहे हैं, न सूक्ष्मः और ना ही कारण येह । हमारा असली स्वरूप इन सबसे परे हैं । स्थूल शरीर में छह विकास आने स्वाभाविक है और ये सभी सोल शरीर के लिए सामान्य । पहले ये गर्भ में होता है फिर यह जन्म लेता है फिर ऊपर की ओर बढता है फिर चौडाई में बढता है । फिर इसमें शायद शुरू होता है और अंत में मर जाता है । इनको शर्ट विकार कहते हैं । ये स्थूल शरीर एक उपकरण मात्र है जैसे कोई गाडी हो । गाडी का जो ढांचा हमें दिखता है उसमें विभिन्न प्रकार के इंस्ट्रूमेंट एक साथ जोड दिए जाते हैं । लेकिन अगर उस गाडी में हॉर्स पावर नाम नहीं तो वह चल नहीं पाएगी और अगर इसमें हॉर्स पावर बन भी रही है जब तक उस गाडी को चलाने वाला चालक ना हो तो गाडी नहीं चलेगी । उसी प्रकार स्थूल शरीर में ये सूक्ष्म शरीररूपी चालक ना हो तो ये देख किसी काम का नहीं की चल ही नहीं सकता । स्कूल शरीर को आज भी बहुत शरीर भी कहते हैं जैसे हमारी आंख कान ये जो दिखाई देते हैं यारी बहुत ठीक है । इन रंगों में कार्यशक्ति जैसे आंख में दृष्टि, कान में श्रवण शक्ति ये आदि देविक है । देव शब्द का अर्थ है दो तीन ना इत्ती दाॅये जब प्रकाशक है परंतु प्रभावित नहीं है वो देव है । हमारी आँख में दृष्टि सभी वस्तुओं को देखती है चाहे वह बुरी हो या अच्छी । अच्छी वस्तुओं को देखकर दृष्टि बढ नहीं जाती और बुरी वस्तुओं को देखकर काम नहीं हो जाती है । चाहे यहाँ के एक आदमी को देखे या एक हजार आदमियों को देखे दृष्टि पर कोई फर्क नहीं पडता । हमारी आदिभौतिक आंखे भले ही कुछ गलत काम देकर बंद हो जाए परंतु दृष्टि बंद नहीं होती । इसलिए एक बार सिद्धांत के रूप में हमेशा याद रखनी चाहिए । जो प्रकाशक होता है वो प्रभावित नहीं होता है परंतु आंख में दृष्टि और कान में श्रवण शक्ति भी स्व प्रकाशित नहीं है । जब तक चेतना के धागे से शरीर बंदा नहीं हो तब तक आंख में दृष्टि और कान में श्रवण शक्ति नहीं हो सकती या आध्यात्मिक क्षेत्र है । इसे आदि आध्यात्मिक नहीं कहते हैं क्योंकि इसकी परे कुछ नहीं है । चाहे शास्त्र हो या जगत का कोई भी ज्ञान हो वो हमेशा आदिभौतिक, आदिदैविक तथा अध्यात्मिक स्तर पर होता है । जब मनुष्य आदिभौतिक और आदिदैविक जगत से निकल कर आध्यात्मिक स्तर पर आ जाता है तो इसी को ही अंतर्मुखी होना कहा जाता है । इसी को ही अंतर्मुखी मनुष्य कहते हैं । आधी बहुत एक संसार है, एक तरह से धर्म संबंधित है । आज दैहिक देवी देवताओं से संबंधित है । ये उपासना का क्षेत्र हैं । आध्यात्मिक सोच ही चैतन्य । परमात्मा जो हमारा स्वरूप है उससे संबंधित है । संसार को समझ ही कहा जाता है तथा देह को व्यक्ति कहा जाता है और जो समझ ही में है वहीं व्यष्टि में है । जब हम अपने जीवन के सभी अनुभवों को अपने से जोड लेते हैं तो हम आध्यात्मिक जगत में प्रवेश कर जाते हैं ।

Chapter 5 शास्त्रों के अध्ययन का तात्पर्य

अध्याय पांच । शास्त्रों के अध्ययन का तात्पर्य हिन्दू धर्म में वेद को ज्ञान का स्रोत माना गया है । चार वेदों के अतिरिक्त पुरानी इतिहास धर्मशास्त्र, उपवेद तथा योगशास्त्र है । इनका विस्तारपूर्वक विवरण हम यहाँ नहीं करेंगे । हम यहाँ पर ये जानने की कोशिश करेंगे कि आखिर इतने सारे धर्म ग्रंथों में जो लिखा है उसका टाइप पर्याप्तता, उसका मकसद क्या है । अगर देखा जाए तो चाहे हम किसी कुल अथवा जाती में जान मिले । हम सभी जन्म से शुद्र होते हैं तो क्योंकि हम रोते हुए पैदा होते हैं और मनुस्मृति में कहा गया है जन्मना जायती शुद्ध रहा संस्कार आज भवेद् वजह वेदपाठ आ भवेद् विप रहा ब्रह्मा जाना अतिथि ब्राहम्णा तो जितने भी शास्त्र लिखे गए हैं उनका एक ही प्रयोजन है कि हम शूद्र बुद्धि से निकलकर ब्रह्मा, वेता ब्राह्मण पर तक पहुंचे । फिर चाहे वो धर्मशास्त्र हो, उपासना, भक्ति, योग या ज्ञान साधना हो । इन सब का प्रयोजन मनुष्य को अपने स्वभाव से हटाकर स्वरूप तक ले जाना है । लेकिन अगर हम अपनी बुद्धि लगाकर विभिन्न शास्त्रों का अध्ययन करते हैं तो हमें ऐसा लगता है कि धर्म में अलग बाते बताई गई है । उपासना कुछ अलग कह रही है । पुराणों में कहानियाँ कुछ और कह रही है । ये हमारी बुद्धि में भेजता निर्माण करता है । अगर हम लोग अपनी मर्जी से शास्त्रों का अध्ययन करेंगे तो हमारी बुद्धि कभी भी उस प्रयोजन को नहीं समझ पाएगी जो शास्त्र समझाना चाहते हैं । एक उदाहरण से इसको समझने का प्रयास करें । एक बार की बात है, मैं अपने किसी रिश्तेदार के घर गया था । छुट्टी बिताने के लिए जो हमारे रिश्तेदार थे, उनके दो बच्चे थे । एक बडी लडकी थी जो करीब ग्यारह वर्ष की थी तथा छोटा लडका था जो एक साल का था । दोनों की आयु में दस वर्ष का अंतर था । सर्दियों के दिन थे । दोपहर का वक्त था । माता जी खाना बना रही थी और मैं और हमारे भाई साहब जी बैठे हुए थे । धूप में तो अभी माता जी ने मीडिया से कहा छोटू वहाँ देर से हो रहा है, उसे सलाद हो । मैं खाना बना रही हूँ । मीडिया ने अपने भाई को उठाया और उसे बाहर धूप में ले आई । मैं उसे देख रहा था तो मैंने कहा बेटा, इसके अंदर चुनाव बिटिया बोली की पहले ही सो जाए तो उसे अंदर लेता दूंगी । इतना कहकर वह अपने भाई को जो रो रहा था, उसे का हुआ छिडिया तितली और बहुत सारी चीजें दिखाने लगी तो लडका छुट हो गया । फिर उसने उसे एक साल के बच्चे को एक कहानी सुनानी शुरू कर दिया । उस कहानी का कोई मतलब नहीं था । बस ऐसे ही वो उसे कहानी बताने लगी तथा लडका चुप होकर सुनने लगा । फिर थोडी देर बाद बच्चा हो गया और वह लडकी अपने भाई को अंदर ले गए और उसे रजाई से ढक दिया और वह बाहर अगर खेलने लगी तब मैंने उस बच्ची को अपने पास बुलाया और पूछा मेरा तुमने क्या क्या तुम्हारी माता जी ने तो कहा था कि अपने भाई को सलाद और तुमने उसे बाहर लाकर पहले वो चिडियाँ तितली दिखाई और फिर एक बेकार सी कहानी सुनाई जिसका अर्थ उसे मालूम ही नहीं । तुमने ऐसा क्यों किया? वो बच्ची चुप हो गई । कुछ देर बाद वो बोली चाचा जी, आपको कोई छोटा भाई है क्या? मैंने कहा नहीं वो बोली फिर आप नहीं समझ पा हुए हैं और मैं फैसले लगा लेकिन मैंने इस से बहुत कुछ सीखा । मैंने इसे सीखा कि हमारे शास्त्र भी हमें यही सिखाते हैं । जब हम छोटे होते हैं तो हमें धर्मशास्त्र संसार के बारे में बताते हैं और संसार में कैसे आचरन करना है ये बताते हैं । जैसे उस बच्ची ने उसे बाहर की वस्तुएं का हुआ इटली उस बच्चे को दिखाई, फिर हमारे उपासना शास्त्र जैसे पुराण की कहानियों के माध्यम से बताते हैं कि कैसे उन कहानियों से सीखें की चाहे वो भूल लोग हो, स्वर्ग लोग हो या जगत में कोई भी लोग हो सभी जगह कामनाएँ, छाव का ही साम्राज्य है । हम चाहे कुछ भी कर्म कर लिए, कोई भी कर्म कांड कर लिए । हमें जीवन में कृतकृत्य ता फुलफिल्मेंट का अनुभव नहीं आ सकता । जैसे कि एक भी विचार जब तक हमारे मन में है हमें नींद नहीं आ सकती । भगवद्गीता कहती है तेरह विद्या माम सोंपा हा पूत पापा ये गे विश्वास वर्ग तीन प्रार्थन ते ते पुन्य मासा अध्या सुरेंद्र लोग मशीन नंती दिव्यानंदजी देव भोगान तेरे नाम भुक्त्वा स्वर्ग लोग कम विशालं श्रेणी पुण्य मत्री लो कमिशन थी ए वक्त रही धर्मन ऊपर अपन नागिता खतम कम कम वाला बनते । वेदों में प्रथम जो तीन भागों में धर्म, उपासना और कर्मकांड बताए जाते हैं उनको करके मनीष केंद्र की पदवी भी प्राप्त कर सकता है परंतु यह कोई स्थाई प्रोमिनेंट पद भी नहीं है । वहाँ पर भोग करके फिर से आपको मृत्युलोक में आना ही पडेगा ऍम वहीँ चक्कर लगा रहेगा । सभी शास्त्र यही बताते हैं कि धर्म, उपासना, योग ये सब साधन है । साथ ही नहीं साध्य ज्ञान और भक्ति है जिससे हम अपने स्वरूप को जानकार उस परम तत्व में मिल सकते हैं और इस आवागमन के चक्कर से छूट सकते हैं । शास्त्रों की एक और प्रयोजन को भली भांति प्रकार से समझ लेते हैं और ये प्रयोजन है । हमें ये बताना की मृत्यु और संभव है । हमारी मृत्यु हो ही नहीं सकती । हमें का खंड सकता है अब इस पर थोडा विचार करते हैं । शास्त्रों में जब ये पसंद आता है कि जहाँ पर बताते हैं कि पिछला जन्म था, पुनर्जन्म होगा तो इसके दो देश है पहला ये बताने के लिए की हम ये जान लेगी । हम पिछले जन्म में भी थे और अज्ञान के कारण अगला जन्म भी होगा तो हम मारे कब और दूसरी बात है हमें इस संसार में जो भी सुख दुख मिलते हैं हम इनके लिए अन्य मनुष्य परिस्थिति को जिम्मेदार बताना बंद कर दे । वो बताते हैं कि पिछले जन्म में हमने अमुक अमुक पाप किए जिसके कारण इस जन्म सुख दुख का अनुभव हो रहा है । महाभारत में ग्रंथ आता है उसका नाम है सनद । सुजा दिया उसमें सनत्कुमार जी का धृतराष्ट्र को देश का वाक ध्यान है । यह विदेश त्रित राष्ट्र को महाभारत खत्म होने पर उसके अंतिम समय पर दिया गया था । इसमें सनत्कुमार जीने धृतराष्ट्र जी को तर्क से यह सिद्ध करके बताया की मृत्यु संभव है आज तक न कोई मरा है और ना ही कोई मारेगा । सनत्कुमार जी कहते हैं यू अन्यथा संत महात्मा नमनीय था प्रतिबद्धित ए कीमतें न कृतम् पाप अम् चोर इन आत्मा पहाडियां कहते हैं कि हम हैं कुछ और और हम अपने को कुछ और ही मान बैठे हैं हम है परमात्मस्वरूप अपने आप को मान बैठे है देख कर जी इससे बडा पाव और चोरी किया हो सकती है । जिस दिन हमारी बुद्धि में छोटी सी बात बैठ गई उस दिन से हमारा अध्यात्मिक जीवन शुरू हो जाता है और जब तक हम अपने आपको देह जीवीए सब मानेंगे हमें अपने स्वरूप के दर्शन नहीं हो सकते हैं तो सभी शास्त्रों का दाद पर यही है कि हमारी बहुत जगत में रहकर आदित्य विक के द्वारा आध्यात्मिक जीवन तक पहुंचाएं ।

Chapter 6 अज्ञान का स्वरुप

अध्याय छह अज्ञान का स्वरूप अज्ञान का अर्थ ज्ञान का भाव नहीं बल्कि ज्ञान की अपूर्णता को कहा जाता है, क्योंकि ज्ञान का कभी अभाव नहीं हो सकता है । कुछ तो है पता नहीं क्या है ये स्थिति अज्ञान है या पूर्ण ज्ञान अज्ञान क्या है, इसको समझने का प्रयास करते हैं । मनीष यहाँ केवल विजिबल स्पेक्ट्रम को भी देख सकती है । कॅण्टकी प्रकाश द्वारा प्रकाशित वस्तुओं को देख सकती है । इसी प्रकार मनीष कान बीस से बीस हजार डाॅॅ तक की वो भी सुन सकते हैं । परंतु अगर कोई ये कहे कि जो मुझे दिखाई अथवा सुनाई देता है, मैं बस उसी को मानता हूँ । उससे आगे पीछे कुछ होता ही नहीं तो यह पूर्णज्ञान है । इसे अज्ञान कहते हैं । पेड से पता गिरता है तो उसकी आवाज हमें सुनाई नहीं दी थी । अगर कोई ये कहे कि पेड से पत्ता गिरने की आवाज नहीं होती तो इसको अज्ञान कहेंगे । देवी को ही सत्य मानना यही अज्ञान है । चार हुआ दी लोग कहते हैं भस्मीभूत अस्य देहस्य पुनरागमन को तरह परिणाम कृत्वा घृतम् पिटाई ऍम ऋण लेकर भी ही पीओ, क्योंकि ये देख ही सकते हैं । यही अपना स्वरूप है । सनद कुमार जी कहते हैं कि इस देह को अपना मानना ये तो सरासर चोरी है क्योंकि ना ये देख हमने पैदा किया ना यह देह हमारी बात मानता है । एक उदाहरण से समझने का प्रयास करते हैं । इस संसार में कोई भी मनुष्य होगी नहीं होना चाहता । वो चाहता है कि उसका शरीर हमेशा स्वस्थ रहे । वो कभी बूढा ना हो लेकिन क्या देखो हमारी बात मानता है । देखो फिर भी बूढा होता है और दे हमें रोग आते हैं । फिर ये देखा हम कैसे हो सकते हैं । अगर हम विचार करेंगे तो पाएंगे कि जब ये देर हम माता की गर्व में था तब भी मैं ही था । लेकिन देख कोई और था । जब ये देख बालक का था तब उसमें भी मैं ही था । जब जवानी का देखा था तब भी मैं तो वही था जो बालक में था । हम नहीं बदले लेकिन ये देख निरंतर रोज बदल रहा है । जब देखो बूढा हो जाएगा तो मैं जो का तो रहूँगा और जब देख नहीं रहेगा तो भी हम रहेंगे यहाँ पर । भगवत गीता कहती है देहिनो! स्मेल था दही तो मारम योग नाम जरा तथा देहांत प्रति रिद्धि रस तत्र जमूरियत थी वह सांसी जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरो प्राणी तथा शरीराणि विहाय जीर्णा न्यन्यानि संयाति नवानि देही हमें एक अखंड सकता है केवल इस देख के माध्यम से जगत में हम केवल व्यक्त होते हैं और जब देख नहीं होता तो अव्यक्त अवस्था में रहते हैं । जैसे बीच में पूरा का पूरा पेड रहता है । जैसे जिले में लहरे रहती है वैसे ही हम भी रहते हैं हमेशा अपने स्वरूप शुद्ध चैतन्य में अव्यक्ता दिनी भूतानि व्यक्त मध्यानी भारत अव्यक्त निधान, नानेर तत्र का परी देवना इस संसार में हमारे स्वभाव इस बात पर अवलंबित होता है कि हमने अपने आपको समझा क्या है? क्या हमने अपने आपको दे हम आना है या जीव मारा है या इन दोनों की पारी समझा है । अपने को देख मानना वैसे ही है जैसे हम बिजली को बल्ब मान ले तथा अपने को जीव मानना वैसे ही है जिससे हम बिजली को प्रकाश मान ले । ना बिजली बल्ब है न बिजली प्रकाश बिजली इन दोनों से परे हैं जो बाल भी में प्रकाश के रूप में व्यक्त हो रही है । ऐसे ही शुद्ध चैतन्य परमात्मा जीवन तेरह से पढे हैं । शुद्ध चैतन्य इस देख रूपी बल्ब में प्रकाश रुपये जीव के रूप में व्यक्त हो रहा है अर्थात सत्य चैतन्य है न कि देखो हर चीज बहुत से मनीषियों की समझ में पढकर या महात्माओं की बातें सुनकर ये तो समझ में आ जाता है कि हम ये देखा तो नहीं है परंतु में अपने आपको जीव समझ लेते हैं और फिर हम लोगों को जीत के नाम पर डराया जाता है । पाप पुण्य का चक्कर अच्छी ओनी बुरी उन्नीस वर्ग नर्क जन्म मरण इसमें आदमी फंस जाता है । इसमें ही जीवन बर्बाद हो जाता है । भगवान भगवत गीता में कहते हैं कि मैं सभी जीवों में जीवन हूँ जी नहीं मैं जीवन के रूप में सभी प्राणियों में समान रूप से व्यक्त हूँ । जीवन सर्वभूतेषु अगर किसी स्कूल की परीक्षा में एक प्रश्न आता है जो कि इस प्रकार है हमारे पास पांच तरह के दूध के सैंपल है जिनमें वसा की मात्रा दशमलव पांच, तेरह, चौदह, बारह, दस दशमलव नौ है । तो अगर इन सब पांचों दूध को मिला दिया जाता तो मिश्रण में वसा की मात्रा कितनी होगी । अब अगर इस प्रश्न के उत्तर में कोई छात्र लिखे मान लिया मिश्रण में वसा की मात्रा एक प्रतिशत है और इतना लिख कर छोड दें वाॅश ना करे तो क्या उसको अंक मिलेंगे? ठीक उसी प्रकार अगर हम कहते हैं कि मान लिया मैं यानी कि जीव जब तक इस जीत की वैल्यू स्टाइलिश ना करे तो क्या यह जान पाएंगे कि जीत क्या है और फिर आदमी पाप पुणे के बीच में फस जाता है । पापु अहम पापकर्म अहा! हम तो इस चीज को समझने के लिए चिंतन करते हैं । थोडा ध्यान देना ये थोडा सूक्ष्म विषय है । जब मैं अपने आप को मैं कहता हूँ तो ये मैं कौन हैं? जब मैं कहता हूँ मैं दुखी हूँ जब मैं कहता हूँ कि मैं जवान हूँ जब मैं कहता हूँ कि मैं सेल्फमेड मैन हूँ जब मैं कहता हूँ कि मैं खुश हूँ । जब मैं कहता हूँ मैं भूखा प्यासा हूँ तो क्या ये जो पांच मैं ये एक ही है या अलग अलग है? अगर ये एक ही है तो एक मैं पांच कैसे बन गया? और ये भी अलग अलग है तो इतने सारे मैं हमारे अंदर कैसे हैं? जबकि शरीर तो एक ही है । मन भी एक ही है थोडा ध्यान देना । ये प्रसंग पहले भी इस पुस्तक में आया है । जगत में रंग रूप अनेक है । उनको देखने वाली इंद्रिया दृष्टि सभी मनुष्यों में एक है । इंद्रिया पांच है मगर उन को प्रकाशित करने वाला मन एक है । परंतु यमन सभी मनुष्यों में एक होते हुए भी एक नहीं है । मान जिसका प्राप्त कव्य है वह चेतना सभी मनुष्यों में एक है चेतना । इसकी प्रकृति में अभिव्यक्ति एक है । वह शुद्ध चैतन्य पूरी सृष्टि में एक है और बस यही एक है । इसके परे कुछ भी नहीं । एक दो तरह के होते हैं । एक वो एक होता है जिसमें कुछ हो जाए तो उस एक की मात्रा कम हो जाती है या उस एक को अगर विभाजित या गुणा करके उसकी मात्रा बदल जाती है जबकि दूसरा एक वो एक है । चाहे उसको कुछ भी करो वो उतना का उतना ही रहता है । वह एक को हम आनन्द कहते हैं । मैं इसमें कमी की जा सकती है और ना इसको बढाया जा सकता है । इसी आनंद को योग में परमात्मा, विधान में ब्रह्माण तथा भक्ति में भगवान कहा जाता है । थोडा यहाँ सांख्या दर्शन का सिद्धांत लेते हैं । सांखी कहता है, अकेले प्रकृति जड है, इसमें संसार नहीं है, अकेले शुद्ध चैतन्य में भी संसार नहीं है । चेतना यानी की प्रकृति और शुद्ध चाहता नहीं । जब चैतन्य जीतना के रूप में प्रकट हो सकता है तो उसे सजीव कहते हैं और जब चैतन्य चेतना के रूप में प्रकट नहीं होता है तो उसे निर्जीव कहते हैं । चैतन्य सर्वत्र है । संसार में कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है जिसमें चैतन्य ना हो परंतु जिसमें वह चेतना के रूप में प्रकट हो रहा है वो सजीव प्राणी है तथा जिनमें वह चेतना के रूप में प्रकट नहीं हो रहा है । वो निर्जीव प्राणी चेतना को प्राकृतिक के आधार पर चार स्तरों में बांटा जा सकता है । पहला है पेड पौधे । दूसरा है कीडे मकोडे । तीसरे है पशु तथा चौथा वह सर्वोच्च स्तर है । मनीष पेड पौधों में प्रकृति तत्व ज्यादा है इसलिए इनमें इंद्रिया इत्यादि नहीं है । कीडे मकोडों में इंडिया है पर विकसित नहीं हैं । पशुओं में इंद्रिया पूर्ण रूप से विकसित है परंतु मन नहीं है । लेकिन मनुष्य में चेतना का प्राकृतिक हम मान के रूप में पूर्ण रूप से हैं । मन को हम यहाँ अंतःकर्ण चतुष्टय कहेंगे । हालांकि ये दोनों एक ही है । एक लाख मान चार भागों में विभक्त सा भासता है माइंड नित्यबुद्धि अहंकार, मन कैसा कार्य करता है, थोडा विचार करते हैं । मन हमेशा वृत्ति रूप में ही कार्य करता है । मन में दो तरह की वृद्धि होती है, एक है हम वृत्ति यानी कि अपने बारे में तथा दूसरी है । इधर वृत्ति संसार के बारे में जब हम किसी वस्तु विषय के बारे में बोलते हैं तो पहले ये वृत्ति शब्द का रूप ग्रहण करती है । फिर ये मन में प्रवेश करती है और फिर मैंने उस व्यक्ति का आकार ग्रहण कर लेता है और हमें उस वस्तु विषय का मान के द्वारा आभास होता है जिस वस्तु का आकार मान ग्रहण नहीं कर सकता है, हमें उसका आभास नहीं होता है । जैसे जब हम आकाश कहते हैं तो ये वृत्ति मन में प्रवेश करती है । मगर क्योंकि आकाश का कोई आकार नहीं है, इसी कारण मान आकाश का कार्यग्रहण नहीं करता है और आकाश का अनुभव हमें नहीं आता । आकाश का दाद पर ये मात्र शब्द है । इसलिए आकाश में शब्द तो है पर आकाश का कोई आकार रंग रूप नहीं है । अच्छा इस चेतना के प्रतिबिंब युक्त व्यक्ति को कहते हैं मैं और हम तथा चेतना के बिना वाले प्रतिबिंब को कहते हैं मैं नहीं इदम हमारा शरीर पांच प्रमुख कोषों से मिलकर बना है । अन्य मई कोष प्राण, मई कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश आनंदमय कोश कोर्स का मतलब ये नहीं कि ये अलग अलग पार्ट है शरीर के बल्कि हमको अपने बारे में अमृति जो भी आज तक आई है, अथवा जो भी भविष्य में आएगी वो इन पांच कोशिश को लेकर ही आते हैं । अन्य मई कोश स्थूल शरीर जैसे हाथ पांच पांच जनतंत्र पेट इसमें आते हैं । प्राणमय कोश पाँच प्राण जिनके द्वारा हमारे देह में चेतना का प्रवाह होता है । प्राणों को लेकर हमें भूख प्यास की वृत्तियां आती है । मनोमय कोश मन में सुख दुःख, लाभ हानि जयपुर आ जाये अपमान इनको लेकर वृत्तियां आती है । विज्ञानमय कोश ये बुद्धि का क्षेत्र हैं । विज्ञानमय कोश में ही परमात्मा का प्रतिबिंब बचत आभास के रूप में पडता है । अमृति जब विज्ञान में कोष में पडे परमात्मा के प्रतिबिम् बचत आभास के साथ दे हद से ज्यादा काम में कर लेती है तो इसी को अहंकार कहते हैं और वह देख को अपना मानने लग जाता है । जी को समझने के लिए एक उदाहरण लेते हैं । पति क्या है अगर हमें पति शब्द को परिभाषित करना पडे तो हम कहेंगे पति माने की आदमी प्लस पत्नी प्लस पत्नी में आदमी का प्रतिबिंब पति नाम की कोई वस्तु नहीं होती बल्कि पति को पास ही है । जब आदमी पत्नी की आबादी को ग्रहण करता है तो उसे पति कहते हैं जीव यानी कि परमात्मा प्लस अंत करण चतुष्टय यानी कि मंचित बुद्धि, अहंकार, प्लस बुद्धि में परमात्मा का प्रतिबिंब, चिराग, आभास ऐसे ही जीत नाम की कोई वस्तु नहीं है । जब हम परमात्मा पर अंत करने की उपाधि चढा देते हैं तो वही जीव कहलाता है । मन स्वयं में जड है । जब तक इसमें परमात्मा का प्रतिबिंबन ना हो इस को थोडा और समझने का प्रयास करते हैं । जब हम दर्पण के आगे खडे होते हैं तो क्या देखते हैं यहाँ पर महात्मा की जगह हम अपने आप को रख देते हैं । अंतकर्लह मन की जगह दर्पण हो गया और जो आभास है उधर पन में हमारा प्रतिबिंब हो गया । इन तीनों में से सत्य क्या है? क्या प्रतिबिंबन सकती है? नहीं क्या हमारे बिना दर्पण में प्रतिबिंबित संभव है और अगर दर्पण और प्रतिबिंबन ना रहे तो क्या हमारा कोई नुकसान होगा? इन तीनों में केवल परमात्मस्वरूप हम सकते हैं, उसी प्रकार न पति सकते है । ना पत्नी सकते हैं बल्कि केवल आदमी और स्त्री सत्य है । जीव जब अनेक प्रकार के उपाधियों को ग्रहण करता है तो जी भी एक नहीं रह जाता । ये भी बदलता रहता है । शास्त्रों में तीन प्रकार के जीवों का वर्णन मिलता है व्यवहार इन चीफ जाग्रत अवस्था में हम व्यावहारिक जीव होते हैं । सुबह हम जैसे ही नहीं से जाते हैं तो कभी हम लोगों ने विश्लेषण किया है कि हम जो एक्शन पहले कही और थे स्वप्ने में या कहीं भी नहीं थे तो छुट्टी में वो अचानक से जाग्रत अवस्था में आते ही सब कुछ बदल सा जाता है । हमारी वृद्धि, चित्र, स्टोरी, फॅमिली इसके साथ जुड जाती है और हमारी देह के साथ ताराम तक कनेक्शन हो जाता है । ये दोनों चीजें होने में उतना ही समय लगता है जितना स्विच ऑन करती ही बल्ब के चलने से फिर हम उठते हैं जागृत को सत्य मानने लगते हैं । ये व्यवहारिक सकते हैं । फिर हम माँ बाप, पति पुत्र अवसर सुख दुखी बन जाते हैं । ऍम रिश्तों की उपाधि युक्त जीव को सत्य मानने लगते हैं । स्वप्न अकल्पित जी इसे प्रतिभासिंह सकते भी कहते हैं तथा मिथ्या आत्मा भी कहा गया है । स्वप्न व्यवस्था में हमारा माने के नए जगत का निर्माण करता है । इस अवस्था में सभी चीजें सत्य ना होते हुए भी सत्य सी लगती है और ये जीव रोज नया होता है । जो स्वप्न अकल्पित जीव कल के स्वप्न में था वह आज के सपने से अलग था । यहाँ पर थोडा ध्यान देना अब आपको थोडा कन्फ्यूज करने का काम किया जा रहा है । ये बताने के लिए कितना व्यवहारिक जी सकते है और न स्वप्न अकल्पित जीव ही सकते हैं । एक उदाहरण के तौर पर इसको समझने का प्रयास करते हैं । अष्टावक्र गीता में एक प्रसंग आता है । एक बार राजा विधेयक जनक ने देखा कि उनके राज्य में सूखा अकाल पड गया । सभी लोग भूखे प्यासे तडप रहे हैं । सारे राजकोष खाली हो गए हैं और राजा जनक भी भूखे प्यासे इधर उधर घूम रहे हैं । उन्हें बहुत तेज प्यास लगी है । वे पाने के लिए तडप रहे हैं और वे प्यास से व्याकुल एक आदिवासी परिवार के पास पहुंच गए । तब आदिवासी लोग नहीं, उन्हें पीने के लिए गिलास पानी दिया । जैसे ही राजा जनक पानी पीने लगे तभी एक बाज वहाँ गया और उसने राजा के हाथ से पानी का ग्लास अपने पंजों में भरकर जमीन पर गिरा दिया । तभी अचानक छटपटाकर राजा जनक कियां खुली तो वह देखते हैं कि वे अपने महल में हैं और वहाँ पर सेवक लोग खडे हैं । पानी उनके बिस्तर के पास ही रखा है । राजा जनक ने पानी पिया परंतु उनका गला अब भी तक सूख रहा था । हाथ पा शिथिल हो गए थे । उस समय राजा के मन में बस एक ही सवाल घर कर गया था । वे सभी से ये ही पूछते थे जो भी उनसे मिलता था बताओ ये सच या वो सच । अगले दिन दरबार में उन्होंने सभी ज्ञानी लोगों को बुलाया और पूरा किस्सा बयान कर के पूछने लगे । बताओ ये सच या वो सच? तभी उनकी सभा में अष्टावक्र महाराज पधारे । उनका देह बडा ही विचित्र था । वे आठ जगह से टेडे थे और दिखने में भी काफी गुरु थे । सभा में उन्हें देख कर सभी ज्ञानीजन महात्मा हसने लगे तो इस पर महाराज अष्टावक्र भी हसने लगे । तब राजा जनक ने उन्हें प्रणाम करते हुए पूछा भगवान ये लोग तो आपको देखकर हस रहे हैं, आप क्या देखकर हस रहे हैं? महाराज अष्टावक्र बोले राजन मैंने तो सुना था कि आपकी सभा में ज्ञानी लोग विराजते हैं मगर यहाँ तो सभी चमार लोग बैठे हैं जिनकी नजर केवल चमडी पर हैं इसलिए मैं हस रहा हूँ । तब राजा ने उनका सत्कार किया था । आपने स्वप्न का पूरा वृतान्त सुनाकर पूछा भगवान मैं ये जानना चाहता हूँ कि ये इस समय में जो अनुभव कर रहा हूँ व्यवहारिक सत्य जिसमें इंद्रियों का व्यापार है । ये सच है या जो मैंने स्वप्ने में अनुभव किया । प्रतिभासिंह सत्य जहाँ मनी का व्यापार है वो सकते हैं । तब महाराज अष्टावक्र बोले हे राजन! ना तो ये इंद्रियों का व्यापार सकते है ना वो मन का व्यापार सकते है बल्कि जो इन दोनों का आधार देते हुए भी इन दोनों से प्रभावित नहीं परमार्थिक सत्य वही सच है और बोले ना ये सच, ना वो सच, बस तुम ही तुम सच । फिर राजा जनक ने महाराज अष्टावक्र से ज्ञान दीक्षा देने के लिए कहा तो महाराज स्टाॅक मैंने उन्हें जो ज्ञान दिया वर श्रावक रंगीता के नाम से प्रसिद्ध हुआ । परमार्थिक जी वह है मुद्दे हैं इंद्रियो तथा मन से परे हैं जो जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, समाधि सबका आधार है, परंतु जाग्रत आने पर जाता नहीं । स्वस्थ होने पर सोता नहीं हो सकती, में अंधकार में नहीं होता और समाधि टूटने पर टूटता नहीं । वो सबका आधार है परन्तु किसी से प्रभावित नहीं, यही अपना स्वरूप है । परमार्थिक जीव को जीव कहना गलत है । ये जीव नहीं, जीवन परमात्मा मात्र है । भगवत गीता में भगवान कहते हैं सर्वस्य चाहं हृदि । सन्नि विष्ठ तो मत्तः स्मृति फिर क्या नाम मत लो हम छा विदेश सर्वेयर हमें वेद्यो वेदान्त कृतवीर्य विधेयक चाह हम सभी के हृदय में मैं ही हूँ और मेरे ही कारण जागरण, स्वप्न सुक्ति, समाधि है और सभी वेद विद्याओं का उद्देश्य मेरे को जानने में ही हैं और जो मेरे को जान लेता है वो मेरा ही स्वरूप है । वही ज्ञान है और इसको जानने वाला ही ज्ञानी

Chapter 7 जगत का स्वरुप

अध्याय साथ जगत का स्वरूप किसी भी वस्तु के निर्माण के लिए कम से कम तीन चीजों की आवश्यकता होती है । पहला उपादान काॅस्ट दूसरा निमित्त कारण फॅस । तीसरा क्रिया काॅस्ट एक उदाहरण में समझा जा सकता है । एक घर को बनाने के लिए हमें मिट्टी की आवश्यकता होती है । मिट्टी यहाँ पर उपादान कारण है । मिट्टी अपने आप घर नहीं बन सकती उसके लिए कुम्हार निमित्त कारण है । उसी प्रकार जगत के निर्माण के लिए भी ये तीन चीजें होना जरूरी है परंतु उपनिषद वेदांत के अनुसार ब्रह्म ही जगत का अभिन्न निमित उपादान कारण है अर्थात वही घर की मिट्टी है, वही कुम्हार है और वही सहयोग । उपनिषद कहते हैं कि ब्रह्म के अलावा कुछ है ही नहीं । जिस प्रकार भगवत गीता में आता है वासुदेव सर्वर सबकुछ वासुदेव ही है । सत्रह जो भी है वही है अमृत चयन मृत्यु सदस्य हमर जिन तथा वे अनादिकाल से है तथा उन को ना सत कहा जा सकता है ना असद वेन दोनों से पर ये है क्योंकि उनके अलावा कुछ भी नहीं अलादीन तब रम रमाना सत्य ना सब अच्छे थे । मुंडकोपनिषद में तीन उदाहरणों के द्वारा ब्रह्मा का अभिन्न निमित्त उपादान कारण होना सिद्ध किया गया है । पहला जैसे मकडी अपना घर बनाने के लिए मटीरियल बाहर से नहीं लाती है । वो अपने अंदर से ज्यादा निकालती है और फिर उसे अपने ही अंदर ले लेती है । उसी प्रकार ब्रह्मा अपनी से ही जगत की उत्पत्ति करते हैं और फिर उसे अपने में ही संभाल लेते हैं क्योंकि उत्पत्ति उसकी होती है जो पहले न हो । ये जगत अनंतकाल से ब्रह्मा प्रकट होता है और फिर उसी में समा जाता है इसलिए उसे व्यक्त और अव्यक्त कहा जाता है । पृथ्वी अपने आप में जड है, बहन, दूसरे पेड पौधे तथा अन्य जीवित प्राणी उत्पन्न होते हैं तथा जीवित प्राणी मनुष्य के शरीर से निर्जीव बाल केशव पन्ना होते हैं । अतः इन दोनों उदाहरणों में स्पष्ट है कि जब जड वस्तु जीवन को व्यक्त कर सकती है और जीवित मनुष्य में से जड वस्तु का उदय हो सकता है तो उपादान कारण निमित्त कारण भी बन सकता है और यही हुआ है । एक बार में कहीं जगत की उत्पत्ति के बारे में बात कर रहा था तो कॉलेज में पढने वाले छात्र ने मुझसे पूछा फिर लेकिन हमने तो जगत की उत्पत्ति के बारे में ब्लैक होल, तेरी और बिगबैंग मेरी बडी है और आपकी उपादान और नाम ित्य कारण बता रहे हो क्या जो साइंस में बताया है वो गलत है? मैं थोडी देर शांत रहा । फिर मैंने उससे पूछा ये होल क्या होता है? फॅमिली फाइन होल । अब वो स्टूडेंट शांत हो गया । फिर मैंने उसे कहा देखो होल माने अभाव जैसे दीवार में छेद तो क्या बिना दीवार के होल संभव है? तो ये जो ब्लैक होल है ये होल किसमें है? होल बनने के लिए पहले कुछ तो चाहिए जिसमें ये होल है उसी को तुम रमाया परमात्मा कह सकते हो । ये ब्लैक होल का बनना क्रिया हो सकती है । परंतु इसमें करता और कारण परमात्मा के सिवा कुछ नहीं । उसी प्रकार बिगबैंग खेल में विस्फोट हुए जिसके कारण ये पिंडी टकराये । लेकिन किससे टकराए लेकिन इन सब में परमात्मा ही हैं उपादान कारण और नृत्य कारण जो जगह हम देख रही है, ये उस कारण का कार्य है । एक और उदाहरण समझ लेते हैं । परमात्मा कार्य और कारण को आधार होते हुए भी इन दोनों से परे हैं । जैसे समुद्र में लहरें उठती है । इसे समुद्र कारण हो गया है, उपदान भी और नियमित भी, क्योंकि अगर समुद्र नहीं है तो लहरें आ ही नहीं सकती और लहरें उस कारण का कार्य हो गई लेकिन अगर पानी की दृष्टि से देखा जाए तो ना कारण है और न कार्य । अगर पानी से कोई बोले कि आप जब समुद्र या महासागर के रूप में होते हो तो बहुत डरावनी लगते हो परंतु जब लहरों के रूप में होते हो तो बहुत सुन्दर लगते हो तो पानी कहेगा ये समुद्र क्या होता है और ये लहरे क्या होती है? क्योंकि पानी की दृष्टि में चाहे समुद्र हो, लहरें हो या बर्फ के तूफान, सब पानी है उसी प्रकार परमात्मा की दृष्टि में कारण कार्य है ही नहीं क्योंकि वो अकेला मात्र है । एक मेवा द्वितीय नाॅक उसी परमात्मा में अनेक श्रृष्टि बनती और बिगडती है परंतु वो जियो का त्यौहार है । थोडा हमारी बुद्धि होती है । ये स्कूल बुद्धि कहलाती है । जब चार और चिंतन के बहुत पडी है जो हमेशा हमें कैसे पैसे कमाना है, कैसे बढिया ऐशो आराम से जीना है, इन्हीं सब में लगी रहती है । अगर हमें अपने और परमात्मा के बारे में जानना है तो हमें सूक्ष्म बुद्धि साॅफ्ट को जाग्रत करना होगा । शुद्ध बुद्धि वो है जो हमें अपना ज्ञान करा सकती है । इसी के माध्यम से हम अगर विचार चिंतन करें तो हम पाएंगे कि जब हम कहते हैं समुद्र में पानी बहुत गहरा है या इस आभूषण में सोना है तो हम गलत कहते हैं । जरा सोचेंगे तो पता चलेगा कि समुद्र में पानी नहीं है, पानी में समुद्र है, आभूषण में सोना नहीं है, सोने में आभूषण है, ठीक उसी प्रकार हम जगत में नहीं है । हम में ही ये जगत है । एक बार किसी ने मुझसे पूछा था कि सृष्टि का निर्माण कब हुआ है? तो मैंने उससे प्रश्न के बदले में प्रश्न पूछा डर पन में प्रतिबिंब कब से दिखाई दे रहा है तो वो चुप हो गया और थोडा सोचकर बोला हमेशा से फिर मैंने कहा उसी प्रकार ये जगत हमेशा से है परंतु तुम्हारे लिए ये तब से है जब सितम पैदा हुए अर्थात इस देने के रूप में व्यक्त हुए और इस दे हमें भी ये जगह तुमको तभी भाजपा है जब तुम्हारी इंद्रियों के साथ संसार के विषय रंग रूप का व्यापार होता है अन्यथा गहरी नींद डीप स्लीप में बताओ तुम्हारे लिए संसार कहाँ चला जाता है? ये जगह माँ चीजों के कारण ही सत्य सा प्रतीत होता है । भगवान शंकराचार्य कहते हैं अस्सी भर्ती प्रियम रूपए नाम चेंज शपथ चकम आदित्य ऍम ब्रहमा । रुपम जगह रुपए तक तो हम ये पांच चीजें हैं अस्ती, सत्य, भारतीय, ॅ, नाम, विषय और रूप । विषयों का आकार । पहला अस्सी का अर्थ है सत्ता सब जिन भी वस्तुओं में हम हैं, लगाते हैं अर्थ होना जैसे किताब है, बैन हैं, पेड है, कुत्ता है, गिलास है, घर है, मनीष है, पंखा है । जो भी वस्तु हमें है के रूप में दिखती है या अनुभव में आती है उसको अस्ती कहते हैं । भर्ती चिट जो भी वस्तु हमें सजीव नजर आती है अर्थात जिनमें चेतनता प्रकट हो रही हैं जैसे कीडे, मकोडे, जानवर तथा मनुष्य ये सभी भर्ती में आते हैं । प्रिया आनंद सत्र का विस्तार चित है और चित का विस्तार आनंद हमें से ऐसे समझ लेते हैं । सत्य परमात्मा है । चित्र परमात्मा की शक्ति और आनंद उस परमात्मा की शक्ति की अभिव्यक्ति है । तीनों सत चित आनंद को मिलकर सच्चितानंद कहा जाता है तथा इन तीन शब्दों के द्वारा परमात्मा को लिखाया जाता है । सब परमात्मा की चित्शक्ति आनंद के रूप में केवल मनुष्यमात्र में अभिव्यक्ति होती है । जैसे बिजली केवल बल्ब में ही अभिव्यक्ति होती है, पत्थरिया दीवार में नहीं । इसको ऐसे भी समझा जा सकता है । ईट पत्थर में परमात्मा केवल सत्ता सत मात्र के रूप में प्रकट होता है । पीडित पौधों में परमात्मा सत्ता के साथ जीवन के रूप में प्रकट हो रहा है । कीडे मकोडों से लेकर बडे जानवर तक परमात्मा सत्ता, जीवन तथा ज्ञान के रूप में प्रकट हो रहा है । उदाहरण के तौर पर जब कोई मनुष्य एक बगीचे में बहुत से सुंदर फूलों को देखता है तो वो आनंद को प्रकट करता है और उन्हें फूलों को यदि एक भेज देखती है तो उसे आनन्द प्रकट नहीं होता । वो उससे पेट भरने की सोचती है और उन फूलों को खा लेती है । जानवरों को आनंद के लिए भोग पर अवलंबित रहना पडता है । भोग के द्वारा उनको तृप्ति मिलती है परंतु मनुष्यों को आनंद के लिए भोग पर अवलंबित रहने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि समझदार मनुष्य जानता है कि आनंद तो उसका अपना स्वरूप है । वह भोग के बिना भी आनंद को प्रकट कर सकता है क्योंकि आनंद बाहर की वस्तुओं में नहीं है । आनंद हमारे अंदर ही है । इस विषय पर बाद में विस्तार से चिंतन किया जाएगा । चौथा नाम रूप जगत का चौथा घटक है । इस जगत में जो भी हमें वस्तु दिखती है सबसे पहले उसका नाम याद किया जाता है । जब हम पैदा होते हैं तो सबसे पहले एक नाम दे दिया जाता है । संबोधन के लिए इसी प्रकार हर वस्तु का जो भी नहीं दिखाई देती है उसका नाम दिया जाता है । संचार के सारे पदार्थ अगर देखा जाए तो पंचमहाभूत से ही बने हैं परन्तु हमें असम के अलग अलग वस्तुएं दिखाई देती है । पंचमहाभूत संगठन, आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी इनके द्वारा इतने विविधता निर्माण हो गई और हम इस नाम और रूप को सत्य मान लेते हैं । उन्हीं पंचमहाभूतों से मनुष्य देखा बना है और उन्हीं से सब चराचर जगत जो वायु मनीष दे हमें है, वही वायु बाहरी जगत में है । जो पंचमहाभूत व्यक्ति में है वहीं सृष्टी में है । फिर नामरूप की ये विविधता कहाँ से आई और हमें नामरूप को सत्य मान बैठे यहीं से जगत का निर्माण हो गया । एक उदाहरण से समझ लेते हैं हम जो माला भगवान के विग्रह को पहनाती है या किसी नेता को क्या माला नाम की कोई वस्तु होती है, मान लो में एक माला लेता हूँ और उसका वजन कर लेता हूँ । उसका वजन मना एक किलोग्राम है । फिर उस माला का जो धागा है उसे कार्ड देता हूँ और फिर सभी फूलों का और धागों का वजन करता हूँ क्योंकि वजन कम हो जाएगा मज्जन उतना ही मिलेगा । लेकिन सवाल यह है कि जब कुछ भी नष्ट नहीं हुआ, फिर ये माला नाम की वस्तु कहाँ गई? कहीं नहीं गयी क्योंकि माला नाम की कोई वस्तु थी ही नहीं । बस कुछ फूलों को हमने धागे में पिरोकर एक नया रूप तैयार किया और इसको माला का नाम दे दिया । अब यही उदाहरण को लगाए सब जगह जो भी वस्तु आपको दिखाई देती है, चाहे वो कार हो, घर हो, चाहे कुछ भी हो, उसी प्रकार अगर हमें सुधार इनको अपने पर लगाए तो हमारे देख पंचमहाभूतों से मिलकर बना है । इन पंचमहाभूतों को पांच फूल मान लेते हैं और इन पांच फूलों को चैतन्य रूपी धागे में पिरोकर देख रूपी माला बन गई और हम अपने को रमेश, महेश, सुरेश, गणेश, दिनेश नामक नाम से पुकारने लगे और जबकि हमें इन देह उपाधियों के नाम का भी अर्थ पता नहीं । यही जगत का कारण है । यही से जगत का निर्माण हो गया । भगवान भगवत गीता में कहते हैं मत यहाँ पर तरम नान नियत खींच अगस्ती । धनंजय मई सर्वमिदं प्रोथम सूत्रे मणि गन्ना ऍम मुझ से परे कुछ भी नहीं है । मैं जगत से चैतन्य रूपी धागे में बंधा हुआ हूँ । जैसे कोई मणियों की माला, उसमें धागे कारण ही होती है । एक बार की बात है, हम किसी सुनार की दुकान में गए । सुनार हमारा अच्छा दोस्त था । वो हमें जानता था तो मजाक में हम से पूछने लगा, अगर मैं आपको दोस्त होने की मूर्ति दिखाओ जिनमें से एक राम की हो और एक रावण की तो अब घर कौन सी मूर्ति ले जाना पसंद करेंगे? वो कहते हैं, मैं आपको जानता हूँ आप थोडे धार्मिक स्वभाव के हैं । आप तो राम की मूर्ति लेंगे । तब मैंने उसे कहा ये बताओ स्वर्ण ज्यादा किसमें है? राम की मूर्ति में रावण की मूर्ति में वो बोले रावण की मूर्ति में तो फिर हमने कहा हम रावण की मूर्ति ले जाना पसंद करेंगे तो महाशय हंसने लगे और बोले आप भी दब । हमने उनसे कहा देखो सब कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि आपका ध्यान कहाँ पर है । अगर हमारा ध्यान नाम ऊपर है तो हम राम की मूर्ति लेंगे और अगर हमारा ध्यान तत्वों पर है तो हम रावण की मूर्ति लेंगे क्योंकि जिस सोने से रावण की मूर्ति बनी है उसी से राम अब क्या अब ये कहेंगे कि रावण की मूर्ति वाला स्वर्ण अपवित्र है और राम वाला पवित्रा नहीं दोनों स्वर्ण नहीं है चाहे वो राम हो या रावण । हमने एक बार और कहीं की रह अक्सर जो राम में है क्या वह रह अक्सर जो रावण में है उस से अलग हैं । जब तक हम रंग रूप नाम में फंसे है हमें संसार दिखाई देता है परंतु जब हम नामरूप बता देते हैं तो हमें जगत में परमात्मा के दर्शन होते हैं । जब संन्यास की दीक्षा दी जाती है तो गिरजा होम किया जाता है जिसमें जिसको सन्यास दिया जाता है वो अपना दाह संस्कार स्वयं करता है और वहाँ पर सन्यासी स्पष्ट इकरम का उच्चारण किया जाता है । नाकर मनाना पराया धन इंटिया आगे ने के अमृतत्व मान शुरू पर एंड ना काम नहीं खतम हो हाय आम िवराज थे यद्यपि यूम विशन्ति जिसमें कहते हैं न कर्म सेना धन से और नानी आयु से ही अमृतत्व की प्राप्ति होती है । केवल नामरूप के त्याग से ही अमृत तत्व की प्राप्ति होती है इसलिए उस मनुष्य को जो संन्यास लेता है उसे अपने नाम का त्याग करना पडता है तथा नाम बदलकर किसी प्रिफिक्स के साथ आनंद लगा दिया जाता है और बताया जाता है कि आनंद बाहर जगत में नहीं है आप ही आनंद स्वरूप हो, नाम के साथ साथ रूप भी बदल दिया जाता है । कुछ अलग तरह के वस्त्र दिए जाते हैं तथा बताया जाता है कि आज से आप संसार की विषय वस्तुओं पर आलम बित नहीं रहोगे क्योंकि महाभारत का लिखते हैं सर्व परिवार से दुख, सर्व आत्मसंतोष, सुख जगत की वस्तुओं पर परावलंबन ही हमारे दुख का मुख्य कारण है और इन सब संस्कारों के हो जाने के बाद जो मनुष्य एक साधारण मनीष था उसको अब महात्मा या स्वामी कहा जाता है लेकिन अगर आजकल देखी थी कुछ लोग सन्यास लेते हैं ताकि वह धर्म के नाम पर उपासना के नाम तथा भक्ति के नाम पर लोगों के मन में भय तथा गिलानी का निर्माण करके अपना काम बना सके । ये लोग संसार की आबादी को छोडकर सो कॉल्ड आध्यात्मिक उपाधि हो । मंडलेश्वर महामंडलेश्वर को छुडा लेते हैं । ये आध्यात्म नहीं है, ये पाखंड है और यही से संसार में भेद निर्माण होता है । मैं हिंदू में, मुसलमान में ये भक्त, मैं, वो भक्त, मैं कम वक्त यही चलता रहता है और हम लोग पूरा जीवन इसी में बर्बाद कर देते हैं । ना अवधूत उपनिषद में पहला ही मंत्रा आता है फिश वादन, ग्रुप देवापुर नाह अद्वेत वासना जिसके जीवन में भगवान की अनुग्रह से सब में एक तत्व को देखने की दृष्टि आ जाती है । उसके लिए जगत, परमात्मा और अपने में कोई अंतर नहीं रह जाता है । लेकिन परमात्मा की अनुग्रह के लिए हमको लायक बनना पडेगा । इसी को शास्त्र की भाषा में कहते हैं तत्व के लिए अधिकारी बनना । अनुग्रह को अंग्रेजी में ग्रेस कहते हैं । इसे घटना याद आती है । एक बार एक बीएससी कक्षा में दो विद्यार्थी फाइनल एग्जाम में एक विषय में फेल हो गए । एक विद्यार्थी को विश्वविद्यालय ने ग्रीस मांस देकर पास कर दिया जबकि दूसरा फेल ही रहा । वो पास नहीं हुआ । अब जो विद्यार्थी फेल हुआ वह कोर्ट में चला गया कि दूसरे लडके को तो पास कर दिया और मुझे पास नहीं किया । कोर्ट में शिक्षक तथा विश्वविद्यालयों के प्रतिनिधि को बुलाया गया । जब दोनों विद्यार्थियों के अंग देखे गए तो पता चला कि विश्वविद्यालय ने जिस विद्यार्थी को पास किया था उसके पैंतालीस अंक थे । जबकि जो विद्यार्थी फेल हो गया था उसकी सात अंक थे । विश्वविद्यालय ने तीन अंक का ग्रेस देकर उसको पास कर दिया । लेकिन जो विद्यार्थी फेल हुआ उसका तर्क था कि विश्वविद्यालय चाहे तीन अंकों का ग्रेज देवयात्रा चालीस अंकों का क्रेज थे, विश्वविद्यालय की जेब से किया जाता है । उसका कोई नुकसान है क्या? आप बताइए कि उसका तर्क तो ठीक ही था कि विश्वविद्यालय की जेब से किया जाता है, लेकिन ऐसा होता नहीं है थी । उसी प्रकार हम आप लोग सोचते हैं । हम चाहे लायक हो या न लायक भगवान का अनुग्रह हम पर होना चाहिए । इसमें भगवान की जेब से किया जाता है, लेकिन ऐसा होता नहीं । जगह हमें शाम आपेक्षिकता के कारण प्रतीत होता है, जबकि परमात्मा सम्पूर्णता है । अगर सापेक्षिता न हो तो जगत है ही नहीं । सापेक्षता के खत्म होने पर जो संपूर्ण बच्चा रहता है वो है परमात्मा । इसको ऐसे समझते हैं । परिवर्तन सापेक्षिता के कारण होता है और हम देखते हैं कि जगत लगातार परिवर्तनीय है । अगर जगत में परिवर्तन हो रहे हैं तो एक अपरिवर्तनीय तत्व का होना आवश्यक है । जो इन सभी दिखाई देने वाले परिवर्तनों का अधिष्ठान आधार है, वहीं परमात्मा है । उसी प्रकार हमारे देर में भी वह नित्य उपलब्ध तत्व होते हैं के सभी परिवर्तनों का आधार है । वही अपना स्वरूप है । भगवान शंकराचार्य दक्षिणामूर्ति स्त्रोतम में बताते हैं विश्वम दर्पण दृश्यमान नगरी तुल्य मिजान डर खतम पश्चिम नाथ मनी माया बही री । वह भूत नाम याद आ गया यह साक्षात कुरुते प्रभूत समय स्वात मान में वाद श्याम दस में श्रीगुरु मूर्तये नमः इदम श्री दक्षिणामूर्त्तये ये जगह दर्पण में एक नगरी के पडे हुए प्रतिबिंब के जैसा है । प्रतिबिंब होता हुआ सब भासता तो है परंतु होता नहीं । जब ये जगत का प्रतिबिंब जब हमारे अंत करण में दिखता है तभी ये जगत हमें भाषा है । देखा जाए तो जगत ने हमारे अंतकरण में प्रतिबंध की तरह प्रवेश किया है और ये प्रतिबिंब हमारे ही कारण है इसकी स्वतंत्र सत्ता रही हैं । ये भारी जगह हमारा ही विस्तार है । थोडा ध्यान से चिंतन करते हैं । जब हम एक पांच सौ लोगों से भरे कॉन्फ्रेंस हॉल में लोगों को देखते हैं तो क्या हम उन्हें अपने अंदर देखते हैं कि बाहर जो लोग साइंस जानते हैं तो जानते होंगे कि बाहर की वस्तुओं का प्रतिबिंब मात्र हमारे रेटिना पर पडता है । वह भी उल्टा तो हम उस उल्टे प्रतिबंध को देखते हैं । अगर वह प्रतिबिंबन ना बने जैसे अंधकार में आंखे बंद होने पर तो वस्तुओं के बाहर होने के बावजूद हम उनको नहीं देख पाएंगे तो बाहर ही वस्तुओं को देखने के लिए उन का प्रतिबिंब हमारे अंदर बनना जरूरी है । आंखों के माध्यम से चीजों का हमारे अंतकरण में प्रवेश होता है और अंतकरण में बने प्रतिबिंब को ही हम देखते हैं । इसलिए अंत करने के बिना बाहर ही जगत के वस्तुओं की सत्ता ही नहीं है । इसलिए ये बहारी जगत के बिना तो हमारा होना सत्य है परंतु हमारे बिना बहारी जगत का अस्तित्व ही नहीं है क्योंकि जो तत्व सच्चितानंद जगत में व्याप्त हैं वही अपना स्वरूप है । क्या समुद्र की लहरों का जल और जिस जाल में समुद्र व्याप्त है अलग अलग हैं? नहीं, दोनों एक ही है । बस हमें रंग रूप, देशकाल, परिस्थिति उपयोगिता के कारण अलग सा प्रतीत होता है । वही परमात्मा जब रंगरूप की उपाधि को धारण करता है, अंतर्जगत कहलाता है, ठीक उसी प्रकार जैसे अब आदमी पुत्र की उपाधि धारण करता है तो वहीं पता कहलाता है और जब वही परमात्मा पाँच कोशों की उपाधि के साथ मान के रूप में व्यक्त होता है तो वह जीव कहलाता है । जैसे एक आदमी जब देश के प्रति एक नागरिक की उपाधि को धारण कर के एक प्रतिनिधि के रूप में व्यक्त होता है, वहीं राष्ट्रपति कहलाता है । दोनों ही स्थिति में चाहे आदमी पिता बना हो या राष्ट्रपति, सत्य आदमी ही है । अगर पुत्र नहीं भी रहा आदमी फिर भी रहता है । उसी प्रकार चाहे देख रहे ना रहे, जगत रहे ना रहे । परमात्मा जियो का तियोंग है और वही अपना स्वरूप है । भगवान शंकराचार्य कहती है वैसी गति कहा काम विकास रहा शुष् के नी रे कहा का सारा श्रेय वित्तीय कहा परिवार हो गया आते तत्व के संसार उस एकमात्र तत्व को जान लेने पर ना मैं बचता है ना यह संसार उसके लिए परमात्मा मात्र के अलावा दूसरी सत्ता है यही

Chapter 8 ईश्वर का स्वरुप

अध्याय आठ ईश्वर का स्वरूप जब हमें घर का निर्माण करते हैं तो हम पहले घर का एक नक्शा बनाते हैं फिर उस नक्शे के अनुरूप ही घर का निर्माण करते हैं जिसमें घर के सभी सदस्य सुविधा अनुसार रह सके । घर में पानी की व्यवस्था, खाना बनाने के लिए रसोई घर तथा रोशनी के लिए इलेक्ट्रिसिटी तथा और भी अनेक व्यवस्थाओं को मकान में रखते हैं ताकि हमें वहाँ रहने में कोई परेशानी ना हो । ठीक उसी प्रकार अगर हम प्रकृति की ओर देखे तो प्रकृति में भी अनेक व्यवस्थाएं की गई है जिससे कि परमात्मा इस जड प्रकृति में जीवन के रूप में व्यक्त हो सके । पानी हमेशा तरह ही रहता है । अग्रि हमेशा गर्मी है, सूर्य की ऊर्जा का शहर नहीं है । इन सब का नियमन कैसे होता है? कभी शायद हमने ये सोचा ही नहीं । हमारी पृथ्वी तेईस डिग्री झुकी हुई है । ये अपनी धूरी पर भी होती है और सूर्य के चारों ओर भी होती है । हमारा एक सौरमंडल है । ये जो गुरुत्वाकर्षण जिसके कारण हम पृथ्वी में बचे हुए हैं तथा विभिन्न इरशत र, विभिन्न आकाशगंगाएं तथा ये ब्रह्माण जोकि अनंत है इसका नियमन कैसे होता? क्या बिना संचालय की ये संभव है? छोटी सी संस्था नहीं चल सकती है । एक घर अपने आप नहीं बन सकता है तो फिर ये अनंत ब्रह्मांड किस के निर्देशानुसार चल रहा है । ऋतुएँ बदल रही है । हम ऑक्सीजन लेते हैं तथा बहुत ही ऑक्सीजन छोडते हैं । ये परस्पर भाव क्या स्वता ही है । ऐसे हजारों प्रश्नों के बारे में हम कभी चिंता नहीं नहीं करते हैं । करते हैं तो बस चिंता जैसे अरे आज के लिए क्लाइमेट चेंज की वजह से गर्मी बढ गई है । पता नहीं दुनिया का क्या होने वाला है । लेकिन हम लोग ये नहीं जानते हैं कि दुनिया का कुछ नहीं होगा । जो होगा वो आपका होगा और हमारा होगा क्योंकि प्रकृति और परमात्मा तो आना आदि और अंत है । भगवान भगवत गीता में कहते हैं प्रकृति पुरुष अम् चाहे विदर्भ दिन आदि उभाव पी विक, रामशब्द गुड, ऍफ विद्धि प्रकृति, संभवानाएं प्रकृति और पुरुष दोनों बना दी है । जिस प्रकार अग्नि में दायिका शक्ति तभी से है जबसे अग्नि है इसलिए परमात्मा ना दी है तो प्रकृति भी बना दी है । सांख्य दर्शन में परमात्मा चेतना सत्ता को पुरुष शब्द से लगाया जाता है तथा विदाउट में उसी परमात्मा को ब्रह्मा कहा जाता है तथा प्रकृति को माया कहा जाता है । योग तथा सांख्य दर्शन जड चेतन विवेक करता है । परमात्मा तथा प्रकृति को अलग अलग बताने के लिए जब की वेदान्त, मिमांसा तथा वैशेषिक दर्शन में सत् असत्, विवेक किया जाता है, सब परमात्मा है तथा असद माया है । भगवत गीता में भगवान कहते हैं भूमि राफोल अलोम वायु हक हम मनो धीरे अहंकार ईटीएम भिन्ना प्रकृति रिश्ता था अप्रिय मी जस्ट दुनियाँ प्रकृति विद्धि में पर आराम जीव भूता महाबाहो ये दम धारयति जगह मेरी दो प्रकृतियाँ हैं । एक है पर आ प्रकृति और दूसरी है अपरा प्रकृति, पंचमहाभूत, मान्य बुद्धि और अहंकार । ये मेरी अपरा प्रकृति है । इसको अश्रद्धा प्रकृति भी कहा गया है तथा जो चेतन सत्ताईस अश्रद्धा प्रकृति को धारण करती है वो मेरा पर आ प्रकृति है । दोनों ही प्रकृतियों को भगवान ने अपनी कहा है । फिर कहते हैं नया अध्यक्ष प्रकृति ही सोते सचार चरम ऍम कौन तेज जगह विपरी वर्त थी मेरी अध्यक्षता में प्रकृति सभी चर अचर प्राणी मात्र की रचना करती है और फिर मैं सृष्टी में प्रवेश करता हूँ । जिस प्रकार पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाशीय, पंच, महाभूत प्राणियों के छोटी बडी, अच्छे बुरे सभी शरीरों में प्रविष्ट होते हुए भी वास्तव में प्रविष्ट नहीं है अर्थात वे ही है उसी तरह मैं वन प्राणियों में प्रविष्ट होते हुए भी वास्तव में उनमें प्रविष्ट नहीं अर्थात मैं ही मैं हूँ । थोडा इसको समझने का प्रयास करते हैं । ये भगवान का प्रवेश जगत में ऐसा ही है जैसा दर्पण में हमारा प्रवेश । ये प्रवेश बिना प्रवेश के प्रवेश है । जब हम दर्पण के आगे खडे होते हैं तो हम दर्पणों को नहीं देखते । हम अपने को देखते हैं, दर्पण को देखने का प्रयास करते हैं तो मानो हम गायब हो जाते हैं । देर में हमारा प्रवेश बिना प्रवेश के प्रवेश है । ठीक उसी प्रकार पर महात्मा का जगत में प्रवेश बिना प्रवेश के प्रवेश है । इसको थोडा और समझना है तो ऐसे समझ लेते हैं । मान लिया हमने किसी मनुष्य को भागते हुए ध्यान से देखा और फिर हम से वो टकरा गया और हमने उसको देखा फिर वह चला गया । फिर थोडी देर बाद पुलिस वहाँ और वो हम से पूछती है कि क्या तुमने एक आदमी को यहाँ से भागते हुए देखा है? वो आदमी खून करके भागा है । हम कहेंगे हाँ देखा है पुलिस कहेगी हमारे पास उस आदमी कोई क्षेत्र नहीं है । आप उसका चित्र बनाने में मदद करो । एक्सॅन के द्वारा उसका फोटो बनवाओ तो हम कहेंगे हाँ, बिल्कुल क्यों नहीं? वहाँ आदमी मुझसे टकराया था और आप उसका फोटो बनवा देते हैं । ये कैसे हुआ? क्या हुआ? आदमी आपके अंदर प्रवेश कर गया था । ये प्रवेश भी बिना प्रवेश का ही था । तभी तो उसका फोटो आपके अंदर से ही निकला । अब परमात्मा जगत कि परा और अपरा प्रकृति में प्रवेश करके करता क्या है? परमात्मा दोनों प्रकृतियों का नियमन करता है । ईश्वरः सर्वभूतानां नाम विदेश एयर जॉइंट स्थिति, ब्राम्हण सर्वभूतानि यंत्र रोड हानि मा या हे अर्जुन मैं परमात्मा ईश्वर की उपाधि को धारण करके संपूर्ण प्राणियों के हृदय में रहता है और अपनी माया प्रकृति से शरीररूपी यंत्र पर अरुण हुए संपूर्ण प्राणियों को उनके स्वभाव के अनुसार भ्रमण कराता रहता हूँ । परमात्मा ब्रह्मा प्लस माया यानि कि ईश्वर जो की है । नियामक ईश्वर को समझाने के लिए पहले हमें माया को समझना होगा । वेदान्त में कहा जाता है ये तो वाच ओम निवर्तन्ते अप्राप्य मांॅ परमात्मा और उसकी माया के बारे में हम चाहे कितना भी कहले समझ ले, दोनों ही पकड में नहीं आ सकते । माया के लिए कहा जाता है नियति अन्नया इ टीम आया मेरी से अन्य जो भी है वह माया है अर्थात परमात्मा से अन्य जो भी है वह माया है । माया परमात्मा की अखंड शक्ति है जो पांच तरह के भेदों का निर्माण करते हैं । पहला जीव जगत में भेज, दूसरा जीवेश्वर में भेज । तीसरा जगदीश्वर में भेद, चौथा जगह जीव में भेद और पांचवां जीव जीव में भेज । इन्ही भेदों के कारण चतुर्दश भवन जगत का निर्माण होता है । माया को त्रिगुणात्मक कहा जाता है अर्थात माया में तीन शक्तियां विद्यमान है । पहला आवरण शक्ति आवरण शक्ति जगत में परमात्मा को छुपा के रखती है या ये कहे आवरण शक्ति के कारण प्रकृति में परमात्मा छुपा रहता है तो ढाई को धारण से समझ लेते हैं । जो विज्ञान साइंस जानते हैं वे डिस्कवरी खोज का अर्थ भी जानते होंगे । जैसे हम कहते हैं कि हमने मलेरिया के खिलाफ एक दवाई की खोज की है, डिस्कवरी की है । जब कोई नई खोज डिस्कवरी होती है तो क्या वह वस्तु बनाई जाती है या नहीं? एक बात बहुत ही स्पष्टता से समझ लेनी चाहिए कि इस जगत में नही सद्वस्तु का अभाव होता है और न ही असत वस्तु का ना तो विद्यते भावो ना भावो विद्यते सप्ताह उभरी ओरापी रिकॅार्ड नहीं तत्वदर्शी भी ही जो वस्तु है ही नहीं उसका निर्माण नहीं होता और जो है उसका नाश नहीं होता । केवल अवस्था में परिवर्तन तथा व्यक्त अव्यक्त ही होता है । जैसे बर्फ का पानी बन जाता है तथा फिर वो पानी से भाग बनता है तथा फिर भाप से पानी बन जाता है । उसी प्रकार जब हम कहते हैं नए डिस्कवरी, जिसके लिए नोबल प्राइज दिए जाते हैं, क्या वे वस्तुएं प्रकृति में नहीं थी? वे सभी वस्तुएं प्रकृति में विद्यमान थी और भविष्य में जितनी भी नहीं डिस्कवरी होगी, वे सभी प्रकृति में विद्यमान है । बस उन पर अभी आवरण कवर पडा हुआ है और जब ज्ञान के द्वारा ये आवरण हट जाता है तो इसी को डिस्कवर कहा जाता है । उसी तरह प्रगति में परमात्मा ही है, परंतु अपनी आवरण शक्ति के द्वारा ढका हुआ है । इसी को परमात्मा की आवरण शक्ति कहते हैं । दूसरा विक्षेप शक्ति माया की आवरण शक्ति के कारण विक्षेप शक्ति जन्म लेती है । जब माया के द्वारा परमात्मा ढक जाता है तो स्वरूप के स्थान पर स्वाभाव पैदा हो जाता है । एक उदाहरण से समझ लेते हैं । हमारा स्वरूप आनंद में हैं । हम सच्चिदानन्द स्वरूप है । ये स्वरूप जब आवरण शक्ति अज्ञान के कारण ढक गया तो हम प्रकृति को सत्य मान लेते हैं और बाहर प्रकृति की वस्तुओं में आनंद खोजते रहते हैं और ये आनंद के लिए एक के बाद एक तथा अनंत इच्छाएं हमारे मन में जन्म लेती है । ये चाय और कुछ नहीं बल्कि मन में केवल विक्षेप मात्र है । मान लो किसी को सुबह चाय पीने की आदत है और एक दिनों से उसी समय चाय नहीं मिली तो मन में विक्षेप पैदा होने लगती है । इन्हीं विक्षेप ओ के कारण हम दुख का अनुभव करते हैं और कुछ समय बाद जब चाहे मिल गई तो मान के विक्षेप शांत हो जाते हैं कि अच्छा आये मिलने के बाद भी हमारे मन में विक्षेप आते हैं । नहीं चाय मिल गई विक्षेप शांत किसी को हम सब कहते हैं हम विषय रूपी दुख की शांति को सब कहते हैं परन्तु आनंद इन सबसे परे हैं । सुख दुख प्रकृति में है, परमात्मा में है । हमें संसार में आनंद नहीं खोजते बल्कि हम उन वस्तुओं को खोजते हैं जो हमारे विक्षेप पोसे थोडे समय के लिए हमें निजात दिला सके जैसे कि पेन किलर लेकिन पेन किलर किसी रोग का पाॅइंट इलाज नहीं है और फिर इन वस्तुओं की प्राप्ति के लिए कर्म करते हैं और जिंदगी भर यही चलता रहता है । भगवान रमन्ना ऋषि का कहा हुआ एक किस्सा याद आता है वो बता रहे थे कि ये गांव का सीधा साधा आदमी थोडा पढा लिखा आराम से अपनी खेती करता है । फिर एक दिन तो कोई बता देता है कि भाई तुम तो पढे लिखे हो, अच्छा बोलते भी हो तुम गांव में प्रधान के लिए चुनाव क्यों नहीं लडते । बस वहीं से उसके मन में विक्षेप शुरू हो जाते हैं । फिर वह प्रधान बन जाता है फिर सोचता है प्रधान क्या होता है? ब्लॉक लेवल पर लगना चाहिए फिर वो ब्लॉक प्रमुख बनता है । फिर वो विधायक को देखकर सोचता है की अगर मैं विधायक बन जाऊँ मजा तो तभी है फिर विधायक और फिर दिन रात हर पल यही कि मैं सांसद कैसे बनाऊँ? चलो फिर सांसद भी बन जाता है फिर मंत्री बनना और फिर एक दिन मंत्री भी बन जाता है और फिर उसकी नजर घडी पर जाती है और वो उसे देखते ही रहता है और सोचता है मैंने तो पीएम प्राइम मिनिस्टर सेट किया था । ये एम आई एग्री मिनिस्टर कैसे हो गया और फिर से दुखी हो जाता है और पूरी जिंदगी इसी में खत्म हो जाती है । और यही है मन की विक्षेप शक्ति । तीसरा ज्ञानशक्ति परमात्मा की माया में ऐसा नहीं कि केवल आवरण और विक्षेप शक्ति ही है । इसमें ज्ञानशक्ति भी है । ज्ञानशक्ति वह है जिसके द्वारा हम परमात्मा पर पडे आवरण को ज्ञान के द्वारा हटाकर सभी विक्षेप ओं को शांत कर लेते हैं । एक उदाहरण से समझाते हैं, एक बार में रात के समय कहीं जा रहा था । उस वक्त में छोटा ही था कोई दस बारह साल का केवल चंद्रमा की रोशनी ही थी और कोई प्रकाश नहीं था । तभी मेरा पाव किसी वस्तु पर पढा दिखने में वह साहब जैसा लग रहा था । मुझे आभास हुआ कि मेरे पास से कोई वस्तु टकराई है । अंधेरे में वह साहब जैसा लग रहा था । मैं एक दम घबरा गया । मैंने सोचा साहब ने मुझे काट लिया है । मैं भागकर घर गया और मैंने अपने पिताजी को सारी बात बताई । घर में सभी लोग घबरा गए । पिताजी जल्दी से टॉर्च लेकर आए की देखते हैं साफ है भी या नहीं । यदि है तो वह कैसे दिखता है । सभी लोग जल्दी से मुझे लेकर साहब के पास गए और जैसे ही टॉर्च की लाइट उस पर पडी तो देखा कि वह एक रस्सी है । अब सभी लोग शांत हो गए और मैं भी खुश हो गया कि ये साफ नहीं रस्सी है । शायद ये किस्सा हम सभी लोगों के साथ कभी न कभी जरूर हुआ होगा । अब इसका थोडा विश्लेशण करते हैं मुझे प्रकाश के अभाव के कारण रसीद आप लगी प्रकाश के अभाव को हम ज्ञान की अपूर्णता मान लेते हैं जिसके कारण आवरण शक्ति का निर्माण हुआ और उस रस्सी पर साहब अध्यारोपित हो गया । यहाँ पर रस्सी स्थान है जिसपर साहब अध्यारोपित हुआ । जिस प्रकार पृथ्वी की गति सूर्य पर अध्यारोपित होने के बाद हमें सूर्य का उदय और अस्त दिखाई देता है । जबकि हम ये जानते हैं कि सूर्य का कभी उदय और अस्त नहीं होता । उसी प्रकार आवरण शक्ति के कारण रस्सी पर साफ अध्यारोपित हो गया और उसी के कारण विक्षेप शक्ति का निर्माण हुआ जिसके कारण सभी परेशान हो गए । फिर जब प्रकाश रुपये ज्ञान का प्रकाश साम पर पडा तो वह रस्सी निकला, ये ज्ञानरूपी प्रकाश ही ज्ञानशक्ति है । लेकिन अब सवाल यह उठता है कि वह साहब कहाँ से आया था? और फिर वह साहब कहाँ चला गया? साफ होगा तब आएगा जाएगा ना? साफ था ही नहीं वो तो एक प्रतीत मात्र थी और ये प्रतीत किसकी कारण थी । माया के गुणों के कारण माया हट गई प्रतिनिधि भी हट गई । भगवान चंद्राचार्य माया पाँच अकरम में बताते हैं कि माया इन तीन गुणों के कारण ही संभव चीजों को संभव कर देती है । माया की ये तीन गुण ही चार प्रभाव पैदा करती है । पहला माया की तीन गुण ही जीत को देख जैसे बांधते हैं । ये तीन गुण मानव दे हमें तमस, रजस और सत्वगुण के रूप में विद्यमान होते हैं तथा इन्हें गुणों के कारण ही जी पहले देर से बांधता है और फिर देह को संसार के संबंध संगम तथा कर्म में लगा देते हैं । इसका हम थोडा बाद में चिंतन करेंगे कि कैसे ये सब घटित होता है । दूसरा माया जगदीश जीव और जगत में भेद उत्पन्न करती है जिसके कारण ये तीन प्रतीत होते हैं जबकि ये तीनों एक ही है । जब मनुष्य देह के साथ तादात्म्य कर लेता है तो वह छोटे दायरे में फस जाता है । वो उस दिन तक सीमित रहता है और अज्ञान, कामना और कर्म में फस कर अपने स्वरूप को भूल जाता है । यही उसके दुःख का कारण बन जाता है । इश्वर को जगत का अंतर्यामी इंटरनल कंट्रोल ऑफ द वर्ल्ड भी कहा जाता है जो माया की उपाधि धारण करके जीवर जगत का नियमन करता है । तीसरा माया के कारण ही सच्चिदानंद परमात्मा जो की निर्गुण तथा निराकार है वो देख के साथ तादात्म्य करके सगुण साकार बन जाता है । फिर वो लगन साकार दे है । अपने स्वरूप को भूलकर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शुद्र आदि बनता है तथा वहीं देखा । फिर सांसारिक विषयों वस्तुओं में मोह को जन्म देता है । चौथा माया के कारण ही एक मेवा द्वितीय परमात्मा ब्रह्मा, रेव विष्णु तथा शिव बनकर सृष्टि की उत्पत्ति, पालन तथा विनाश का कार्य करते हैं । माया और परमात्मा को एक उदाहरण से समझने का प्रयास करते हैं । मान लेते हैं परमात्मा अग्नि तो माया इसकी शक्ति दादी का शक्ति है । अग्निस्वरूप परमात्मा तो दादी का शक्ति के बिना रह सकता है परंतु दाही का शक्ति बिना अग्नि के नहीं रह सकती है । अब ये ऐसे समझते हैं एक लडकी की मैं इसका उदाहरण लेते हैं । लडकी की मेज में अग्नि बिना अपनी दादी का शक्ति के विद्यमान है । क्या कोई ये कह सकता है कि लडकी की मेज में आग नहीं है, उसमें अग्नि केवल अग्नि के रूप में है । इसमें दायिका शक्ति प्रकट नहीं है । इसलिए अग्नि सभी रंग रूपों का आधार है । लेकिन जब ये अग्नि की दादी का शक्ति मेज में प्रकट हो जाती है तो मेज को जलाकर भस्म कर देती है । जब अग्निदाह ई का शक्ति के साथ है तो इसका रंग रूप नहीं है । अग्नि के साथ दायिका शक्ति के प्रकटीकरण को आप ईश्वर कह सकते हैं । परमाणु और प्रकृति माया को समझने के लिए एक उदाहरण और लेते हैं । आप सभी ने वह चित्र अवश्य देखा होगा जिसमें माँ काली भगवान शिव के ऊपर पांच रखे हुए हैं । उनके गले में बावन मुण्डों की माला है तथा माता की जीत निकली हुई है । अगर आपसे कोई पूछे कि ये किसका चित्र है तो आप कहेंगे माता कालीका चित्र हैं । ये तो नहीं कहते कि भगवान शिव का चित्र हैं । अब इसका थोडा चिंतन करते हैं । इस चित्र में दर्शाया गया है कि जब प्रकृति माया का प्रकटीकरण होता है या जब परमात्मा अपनी माया को प्रकट करते हैं तो परमात्मा माया के पीछे छिप जाते हैं । जिस प्रकार भगवान शिव के ऊपर माता है इसमें भगवान शांत है तथा माया के पीछे छिप गए हैं तथा माया ने परमात्मा को ढक दिया है । ये माया की आवरण शक्ति है । जब परमात्मा ढक जाते हैं तो प्रकृति माया में विक्षेप उत्पन्न होते हैं । यहाँ पर माता विक्षेप है जिसके कारण उनकी जवाब बाहर आ गई है । ये विक्षेप शक्ति है और माँ के गले में बावन मुण्डों की माला हिंदी के बावन अक्सर है जो ज्ञान को दर्शाते हैं । अगर आप लोगों ने हिंदी पडी होगी तो आप जानते होंगे कि हिंदी के बावन वर्णों को आठ श्रेणियों में बांटा गया है जिन्हें ऍम मूर्धन्य, डॅाक, काॅस्ट तथा संतोष कहा जाता है । यह विभाजन इन वर्णों के उच्चारण में प्रयोग होने वाले अंगों के आधार पर किया गया है । जैसे ऍफ बाभनगामा में पांच वर्णों को ओष्ठ कहा जाता है । इसमें उच्चारण के लिए केवल दोनों ही प्रयोग में लाए जाते हैं । हमारे सभी शास्त्र ही वर्णों के द्वारा ही प्रतिपादित है । इन्हीं बावन वर्णों के इस प्रकार के विभाजन को देवीपुराण में जीवीके आठ अलग अलग रूपों को दर्शाया गया है जिनकी हम नवरात्रों में आराधना करते हैं । तो ये है माया की ज्ञानशक्ति । अगर हम ज्ञानशक्ति के द्वारा परमात्मा की शरण में चले गए तो हम देखेंगे कि माया के द्वारा उत्पन्न आवरण और विक्षेप सभी शांत हो जाएंगे और हमें माया के पीछे जो परमात्मा माया की उपाधि के रूप द्वारा ईश्वर बना था उस सर्व चित्त आनंद स्वरूप परमात्मा ही दिखाई देगा । भगवान भगवत गीता में कहते हैं मनुष्य दे हमें प्रकृति द्वारा उत्पन्न गुणों को सत्यम ज्ञान, रजस विक्षेप तथा तमस आवरण कहा जाता है । इन्हें तीन गुणों के कारण दही परमात्मस्वरूप । हम इस देश को अपना स्वरूप मानकर एक स्वभाव का निर्माण करता है, जिससे यह अहम पत्नी की उपाधि को सत्य मानकर पति बन जाता है और इसी प्रकार जड मन अंतकरण के द्वारा इन गुणों से उत्पन्न स्वभाव से बंधता है । कोई कोई विवेकशील पुरुष देह को उत्पन्न करने वाले इन तीनों गुणों का अतिक्रमण करके जन्म मृत्यु और वृद्धावस्था रूपी दुखों से रहित हुआ अमरता का अनुभव करता है । ऐसे मनुष्यों को जीवन्मुक्त कहा जाता है । अब सवाल यह भी उठ सकता है कि इस जगत का निर्माण क्या मनुष्यों तथा अन्य प्राणियों को दुःख देने के लिए किया गया है? नहीं ऐसा बिल्कुल नहीं है । शास्त्रों में दो सृष्टि का जिक्र आता है । एक है ईश्वर । श्रृष्टि दूसरी है जिस श्रृष्टि अब इन दोनों का चिंतन करते हैं । चेतना की अभिव्यक्ति के आधार पर संपूर्ण जीव जगत को हम पांच स्तरों में बांट सकते हैं । पहला पेड पौधे इनमें केवल जीवन है तथा सभी क्रियाए प्रकृति के द्वारा संपन्न की जाती है । दूसरा कीडे मकौडे इनमें जीवन के साथ साथ भूख के लिए इंद्रिया भी दी गई है परंतु इन पर भी प्रकृति का ही नियंत्रण है । तीसरा जानवर पशु पश्चिमी । इतनी पशु इनमें जीवन है, भोग के लिए इंद्रिया है तथा ज्ञान भी है परंतु इनमें परमात्मा मान के रूप में अभिव्यक्ति नहीं है । इनमें काम, क्रोध, हिंसा, प्रेम भी है परन्तु फ्री मिल नहीं है । ये किसी वस्तु परिस्थिति का परसों हिंदू कर सकते हैं पर प्रोजेक्शन नहीं कर सकते । आनंद का अनुभव नहीं कर सकते, केवल भोक कर सकते हैं । चौथा मनुष्य मनुष्य का अर्थ है मन तथा सतरूपा की संतान मनु मान के सूचक है । इनमें मन तथा फ्री विल है तथा आनंद मनुष्य का इंट्रिन्सिक गढ है । जैसे अग्नि का दायिका शक्ति तथा पानी की तरलता । इनका इंट्रिन्सिक गढ है । मनीष ही केवल कर्म का निर्माण कर सकता है । पेड पौधे, कीडे, मकौडे तथा जानवर कर्म का निर्माण नहीं कर सकते हैं । कर्म विषय को थोडा बाद में चिंतन करेंगे । पांचवां देवता दो अपना आई थी । देवता जो प्रकाशक है वह देवता है । देवता भी पाप पुण्य कर्म का निर्माण नहीं कर सकती है । जिस प्रकार आंखे चाहिए, अच्छा देखे या बुरा दृष्टि को पाप पुण्य नहीं लगता उसी प्रकार देवता भी कर्म नहीं कर सकते हैं । इनमें भी फ्री बिल नहीं है । देवतागण केवल अर्जित किए हुए पुष्प का तो करते हैं और जब वह पुष्पक आ फल खत्म हो जाता है । फिर से देवगन पृथ्वी पर मनुष्य के रूप में जन्म लेता है और अगर फिर पाप किए तो कीडे मकोडे जानवर और पुण्य किए तो फिर से देवता भगवद्गीता कहती है नाम माम कर्माणि लिम्पन्ति ना मैं कर्मफल एस प्रवाह, इत इमाम योगी जानाति कर्म भरना सब बध्यते । ये चक्कर यूपी चलता रहता है क्योंकि परमात्मा को माया प्रभावित नहीं करती है । माया की उपाधि को धारण करके परमात्मा ईश्वर के रूप में इन सब का नियमन करता है । ईश्वर सृष्टि में कहीं भी दुख नहीं है । कोई भी पाप पुण्य नहीं है । कर्मों के पाप पुण्य केवल मनुष्य तक ही है इसलिए ईश्वर सृष्टि में दुख नहीं है । आनंद ही आनंद है तो फिर दुखी कौन है? और ये दुख कहाँ से आता है? एक उदाहरण लेते हैं । एक अविवाहित लडका रोज भगवान का नाम लेता है, आनंद में रहता है और रोज शाम को मंदिर जाता है । फिर एक दिन व मंदिर में एक लडकी को देखता है । यहाँ ईश्वर श्रृष्टि है । अगर वह लडकी को देखकर वहीं रुक जाए और मान तक आंखों ने जो देखा वह ना पहुंचे तो वह ईश्वर सृष्टि की घटना है । ना इसमें सुख है न दुख । परन्तु अगर ये बात मंतर पहुंच गई तो फिर मन का काम शुरू हो जाता है और यहाँ से जीव सृष्टि शुरू हो जाती है । मन प्रोजेक्शन स्टार्ट करता है काश वो लडकी मेरी बीवी बन जाए । अभी वह मंदिर जाएगा लेकिन जहाँ पहले वह मंदिर आनंद को प्रकट करने के लिए ज्यादा था अब वह कामना पूर्ति के लिए मंदिर जाएगा और यहीं से जीव सृष्टि में दुख निर्माण होता है । हर एक मनुष्य की जीव सृष्टि अलग होती है लेकिन ईश्वर सृष्टि सभी के लिए सामान्य है । मेरी जीव सृष्टि में वे लोग वस्तुए, इच्छाएं तथा रिश्ते हैं जो किसी भी अन्य मनुष्य की सृष्टि में नहीं है । दो जीव सृष्टि एक समान नहीं हो सकती है । ईश्वर सृष्टि में स्त्री है । जीव सृष्टि में बेटी, बहन, माँ, पत्नी, सास है । ईश्वर सृष्टि में अग्नि, वायु जल है । जीव सृष्टि में इनको उपयोग करके बनाई गई उपयोगिता वाली वस्तुएं हैं जैसे रेलगाडी, हवाई जहाज आदि । ईश्वर सृष्टि में इच्छा घृणा, मध्य मार्च से अहंकार रात द्वेष है ही नहीं । ये सभी जीव कि सृष्टि में है और ये सब मन के विकार है । जिस प्रकार देख का विकार, बुखार होना बीमार पडना है उसी प्रकार जब मन बीमार होता है तो ये सब मान के विकास होते हैं । अगर मान स्वस्थ है तो हमे श्वर सृष्टी में है और वहाँ आनंद ही आनंद भगवत गीता में भगवान कहते हैं देवी एशिया गुड नही मम्मा याद रख दिया या मामेव ये प्रपद्यंते माया मेन काम तरन्ति ते अर्जुन ये जो मेरी माया है इस को पार करना बहुत कठिन है लेकिन असंभव नहीं है । अगर जो मेरी शरण में आ जाता है तो तुम उस माया से डर कर सकता है । भगवान की शरण में जा रहा मतलब सब जगह परमात्मा का ही दर्शन होगा । परमात्मा के अलावा कोई दूसरी सत्ता है ही नहीं । जब भी हमारा विश्वास अकादमी हो जाएगा तो हम अपने में जगत में तथा ईश्वर में भी परमात्मा का ही दर्शन करेंगे । ड्वाइट दूसरों का होना केवल मानसिक कल्पना है । द्वैध है ही नहीं । जब तक अवैध है तब तक ही संसार है । तब तक ही माया है । तब तक ही जिव है जब द्वैध की दुर्गंध मेड जाती है तो सब जगह अपनी ही स्वरूप का विस्तार नजर आता है । भगवान कहते हैं यू माम पश्चिम थी सर्व तार सर्वम् चलाई पश्यति तस्यां हम ना प्रणेश श्यामी सच में प्रणश्यति जो मुझे सब जगह और सभी में मुझे ही देखता है वो मेरे लिए नहीं उपलब्ध है तथा मैं उसके लिए नित्य उपलब्ध हूँ ।

CHAPTER 9 परमात्मा का स्वरुप

अध्याय नो परमात्मा का स्वरूप उपनिषद में एक बहुत सुंदर कथा आती है जहाँ बताते हैं कि एक शिष्य गुरु महाराज के पास जाता है और कहता है कि हे गुरु महाराज! हमें परमात्मा के स्वरूप के बारे में कुछ बताऊँ । कृप्या करके हमें परमात्मा क्या है इसका ज्ञान दीजिए । गुरु महाराज कहते हैं कि तुम खुद परमात्मा को जा रहा क्योंकि या तो वह जो निवर्तते अप्राप्य मांॅ । परमात्मा वाणी का विषय नहीं है और ना ही मान के द्वारा इसको जाना जा सकता है । शिष्य कहते हैं कि गुरु महाराज कृप्या करके कुछ तो बताइए । तब गुरु महाराज कहते हैं परमात्मा क्या है ये तो मैं नहीं बता सकता परन्तु क्या नहीं है ये बता सकता हूँ । तब गुरु महाराज कहते हैं जो ज्ञात और अज्ञात के परे हैं वह परमात्मा है । अब इसको खोजो याद किया है जो तुम जानती हूँ हो गया है और जो तुम नहीं जानते हो वो अज्ञात है परमात्मा ये दोनों ही नहीं है । उदाहरण के लिए मैं हिंदी जानता हूँ और तमिल नहीं जानता हूँ । इसका मतलब परमात्मा ना हिंदी है न तमिल अपितु इन दोनों की पारी है ये परिषद के दो अर्थ है सूक्ष्म तथा सर्वव्यापी । एक उदाहरण से समझाते हैं आदमी क्या है? आदमी एक पति पिता पुत्र होते हुए भी इनके परे हैं । अगर पति पिता पुत्र नहीं है तब भी आदमी जो कत्यों हैं । इसी प्रकार परमात्मा ज्ञात मतलब कार्य तथा अज्ञात मतलब कारण के पर है । जिस प्रकार लहरे कार्य है तथा समुद्र कारण परन्तु अगर ये दोनों नहीं रहे तो भी पानी रहेगा अर्थात पानी, लहरें, कार्य और समुद्र कारण के परे हैं । अब ये सवाल उठता है कि फिर परमात्मा को जाने कैसे आध्यात्मकि क्षेत्र में सबसे बडी परेशानी तब आती है जब हम हर वस्तु को ऑब्जेक्टिविटी जानने का प्रयास करते हैं । ऑब्जेक्टिविटी हम उन्हीं वस्तुओं की जान सकते हैं जो मन, बुद्धि, चित्र के दायरे में है । लेकिन जो वस्तु इन सबसे परे हैं उसको कैसे जाने । फिर मनीष के एक कल्पना प्रोजेक्शन करना शुरू करता है । वो सोचता है अगर मेरे दो हाथ है तो परमात्मा के हजारों हाथ होंगे क्योंकि वो मनुष्यों से श्रेष्ठ और शक्तिशाली है । फिर वो सोचता है कि मनुष्य का एक सिर है तो परमात्मा के हजार से होंगे और फिर वो कल्पना करके एक चित्र इमेज का निर्माण करता है और उसे परमात्मा सोचने लगता है और सोचता है कि परमात्मा मुझसे अन्य हैं । फिर से दूर ढकेल देता है और अपने को तुच्छ समझने लगता है । इसलिए परमात्मा बन जाता है । इच्छाओ को पूरा करने का साधन और संसार बन जाता है । सात दिया थोडा चिंतन करते हैं । जब हम को एक नया उपकरण इंस्ट्रूमेंट खरीदते हैं तो उसके साथ एक ऑपरेटिंग मानवर भी दिया जाता है ताकि उस मानवर को पढकर हम इंस्ट्रूमेंट के बारे में थोडा जान सके । उसी प्रकार हमारी वेद, उपनिषद तथा अन्य शास्त्र भी मानवेल है परमात्मा के बारे में हमें बताने के लिए । लेकिन अगर हमारे पास सिर्फ फॅमिली ही है और इंस्ट्रूमेंट नहीं तो क्या इंस्ट्रूमेंट चलाने का अनुभव हमें आ सकता है? एक और उदाहरण ले लेते हैं । हमारे एक मित्र ने हमसे पूछा कि अल्मोडा में खाने का सबसे अच्छा होटल कौनसा है? हमने उसको बताया तो वह होटल में गया शाम को फिर वो हम से मिला और कहता है यार वो होटल तो बहुत बढिया था । हजारों तरह के व्यंजन थे । मैंने वहाँ का मेन्यू एकदम कंटेस्ट पढ लिया । मगर मेरा पेट तो भर ही नहीं तो मैंने उससे पूछा तो उन्हें खाना खाया की नहीं तो वो बोले खाना तो नहीं खाया बस उसके बारे में पढा । फिर हमने उससे कहा भाई पेट भरने के लिए भोजन खाना पडता है, उसी प्रकार हमने परमात्मा के बारे में बहुत कुछ पडा, बहुत सुना लेकिन क्या हमने उसका अनुभव किया । लेकिन फिर वही सवाल आता है कि अनुभव तो इंद्रियो मान्य बुद्धि के द्वारा ही किया जा सकता है । और जो अनुभव इंद्रिया, मन, बुद्धि के द्वारा होता है, उस सकते नहीं होता । वो एक मानसिक प्रगति है । लेकिन क्या कभी आपने ऐसा अनुभव किया है जो इंडिया मंदबुद्धि के द्वारा नहीं होता लेकिन अनुभव लगते होता है । वह अनुभव है हमारा होना । जी हाँ, हमारा होना हमें है । इस बात को हम आंख से देखकर जानते हैं या मन से सोच कर जानते हैं या बुद्धि से निश्चय कर की जानते हैं? नहीं हमारा होना हम मन बुद्धि इंद्रिया से नहीं जानते लेकिन हम होते हैं । एक बार मेरे एक मित्र स्कूल के मुझे पंद्रह साल बाद मिला । पहले तो मुझे देखता रहा फिर वो मेरे पास अगर मुझसे पूछा सर क्या वो स्कूल में पढती थी? मैंने कहा तो क्या रमेशपाल को जानते हो? वो आपकी जैसा ही दिखता था तो मैंने उस की ओर देख और बोला था हाना मतलब मैंने कहा देखो हाँ क्योंकि मैं रमेशपाल को जानता हूँ और ना इसलिए क्योंकि मैं डॉक्टर रमेशपाल को ऐसे नहीं जानता जैसे आप जानते हो अपने से अन्य के जैसे वो हमारे मित्र थोडा कंफ्यूज हो गए । फिर हमने टॉपिक चेंज कर दिया । अध्यात्म में जानना और होना एक होता है इसको ऐसे समझ लेते हैं । मान लिया मेरे हाथ में पुस्तक है इसको अस्ती प्रत्या कहते हैं और जब मैंने पुस्तक को उम्मीद पर रख दिया तो मेरे हाथ में पुस्तक नहीं है इसको नास्ति प्रत्येक रहते हैं और जहाँ पर अस्तीन आसी प्रत्ये संभव है उसे अनात्मा प्रगति कहा जाता है । लेकिन जहाँ पर अस्तीन आर्थिक प्रगति की संभावना नहीं है उसको आत्मपरक कहा जाता है । इसको थोडा ध्यान से समझने का प्रयास करेंगे क्योंकि ये थोडा सूक्ष्मा विषय है । यह पुस्तक है इसको मैं जानता हूँ । ये पुस्तक मैं नहीं हूँ इसको मैं जानता हूँ । ये पुस्तक है इस प्रकार और ये पुस्तक में नहीं हो ये भी और ये मैं जानता हूँ इसको भी मैं जानता हूँ । लेकिन क्या ये प्रति हम अपने पर लगा सकते हैं? क्या हम ये कह सकते हैं कि मैं हूँ और ये मैं नहीं ये मैं जानता हूँ तथा इस को भी मैं जानता हूँ नहीं क्योंकि यहाँ पर जानी गई वस्तु जे को जाने वाला गया था, पैदा नहीं हुआ इसलिए केवल ज्ञान मात्र है अर्थात जिस ज्ञान में जे अनात्म तथा ज्ञाता जानने वाला पैदा नहीं होता वो ज्ञान परमात्मस्वरूप है । मन और बुद्धि के द्वारा किसी भी अनात्मनस्तु के ज्ञान के लिए, भूख के लिए तथा कर्म के लिए इस त्रिपाणी की आवश्यकता होती है जैसे भोग, भोग्य और भोक्ता तथा कर्म क्रिया तथा करता । इन त्रिपुरी में से जब भोग्य भोक्ता अब वो कर्म करता नहीं रहता तथा भोग्या क्रिया परमात्मस्वरूप होती है । अगर हमें परमात्मा को पकडना है तो हमें हर एक जगह उस तत्व को ढूंढना खोजना होगा जो प्रकाशक तो है पर प्रभावित नहीं जो सबका आधार तो है पर जिसका होना किसी पर अवलंबित नहीं है थोडा और समझने का प्रयास करते हैं । जब भगवान भगवत गीता में कहते हैं नए रिनछिन दंदी शस्त्राणि नैनं दहति पावक कहा न चैनं क्लेदयन्त्यापो ना शोषयति मारुत रहा तो यहाँ पर वो आत्मा की बात कर रहे हैं और एक बार आत्मा और परमात्मा अलग अलग नहीं है । जैसे मीठा और बहुत मीठा अलग अलग नहीं है । जैसे समुद्र का पानी और नाले का पानी अलग अलग नहीं है, उसी प्रकार आत्मा चैतन्या परमात्मा परम चैतन्या अलग अलग नहीं तो यहाँ पर आत्मा के बारे में भगवान बता रहे हैं कि हे अर्जुन! आत्मा को न शस्त्र काट सकते हैं और ना वायु सुखा सकती है । ना पानी पिला कर सकती है और न अग्नि जला सकती है । तो आत्मा को तो हम लोग कैसे पकडे? ये तो मुसीबत है तो होने की कोशिश करते हैं कि क्या ये बात किसी और पर भी लागू होती है । विचार करने से पता चलेगा कि आकाश अनंत है, आकाश का कोई आकार नहीं, कोई प्रकार नहीं आकाश तत्व है और आकाश में चाहे कितनी भी शास्त्र चले, आकाश कटता नहीं । आकाश में चाहे पूरी पृथ्वी, ग्रह नक्षत्रों में आग लग जाए, आकाश चलता नहीं और कितने ही तूफान आ जाये । आकाश सूखता नहीं तो हम आकाश को परमात्मा का पडोसी मान सकते हैं क्योंकि उपनिषद कहती है ऍम सर्व ओमकार रामनिरंजन हम आकाश सभी आकारों का आधार है परन्तु किसी भी आकार से प्रभावित नहीं है लेकिन ये दृष्टि एक दिन में नहीं आ सकती । दृष्टि परिवर्तन करने के लिए पहले हमें ये ध्यान देना होगा की जगत में व्यवहार करते हुए हमारा ध्यान कहाँ पर है । अगर हमारा ध्यान जी एम मस्त ऊपर होगा तो हम विषयों में फस जायेंगे और जगत को सुधारने का प्रयत्न करेंगे । मगर जिस जगत को भगवान नहीं सुधार पाए उसे हम कैसे सुधार सकते हैं और अगर हमारा ध्यान यात्रा पर होगा तो हम अपने को ये सिद्ध करने में लग जाएंगे की हम कैसे अच्छे हैं और अन्य कैसे खराब है । हमारा ध्यान केवल ज्ञान पर होगा तो हम ज्ञान से सीखेंगे और जब उस ज्ञान को हम अपने ऊपर लगाएंगे तो अपनी अनुभूतियों में हमें परमात्मा का दर्शन होगा । जिस दिन हमें अनेकता में एकता को देखने की दृष्टि मिल गई उसी दिन हमें एक में अनेक को भी देखने की दृष्टि मिल जाएगी । अनेकता में एक को देखना ये ज्ञान का मार्ग है और एक में सभी का दर्शन करना ये भक्ति का मार्ग है । एक बार हमारे मित्र जो डॉक्टर है मुझसे मिलने आए रात के आठ बज गए थे । मैं कुछ पढ रहा था तो वो आए और कमरे में किताबें देखकर बोले की मुझे थोडा ये विधान के बारे में कुछ बताओ । मैं परमात्मा का दर्शन हर जगह कैसे कर सकता हूँ । बोले में पूजा पाठ करता हूँ लेकिन बस ऐसे ही तुम कुछ बताओ । मैंने उनसे कहा अच्छा एक बात बताओ तुम्हें इस कमरे में क्या क्या दिख रहा है । उन्होंने कहा, मैं इस कुर्सी, बेड, सोफा, किताबें और भी काफी वस्तुए । छोटी से छोटी उन्होंने नहीं । फिर मैंने उनसे कहा कुछ छूट तो नहीं रहा । एक बार सोच लोग । उन्होंने कहा कुछ नहीं बस यही दिख रहा है । फिर मैंने लाइट ऑफ कर दी और उनसे पूछा अब क्या दिख रहा है? बोले कुछ भी नहीं । फिर मैंने लाइट ऑन कर दी और कहा अब क्या दिख रहा है? फिर वही उन्होंने जवाब दिया, मतलब आपको सब दिख रहा है, लेकिन जिसके कारण सब दिख रहा है वह प्रकाश नहीं दिख रहा । वो बोले ये तो मैं भूल ही गया । मैंने कहा यही ज्ञान है वेदांत का । हर जगह उस तत्व को पकडने की कोशिश करो तो मैं परमात्मा के दर्शन होने शुरू हो जाएंगे । भगवान भगवत गीता में कहते हैं, सर्वभूतेषु ये नहीं काम भाव मॅाम ईक्षते अविभक्त अम् विभक्ति श्योताज ज्ञानम् वृद्धि साथ ही काम । जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य संपूर्ण विभक्त प्राणियों में विभाग रहित एक अविनाशी भाव सत्ता को देखता है उस ज्ञान को हे अर्जुन! तुम सात्विक जा रहा हूँ । इसके अलावा जो भी ज्ञान है उसे पश्चिम बुद्धि ज्ञान कहा गया है । भागवत महापुराण में श्री शुक्रदेव जी राजा परीक्षित से कहते हैं टू राजन मारी शेट्टी पश्चिम बुद्धि में मामजा ही नजात प्राग भूतो देवस्वम ना नाम शशि सिराजिन अब तुम ये पश्चिम बुद्धि वाला ज्ञान छोड दो की मैं मर जाऊंगा । जैसे शरीर पहले नहीं था, पीछे पैदा हुआ और फिर मर जाऊंगा । ऐसे तुम पहले नहीं थे । पीछे पैदा हुए फिर मर जाएगा । ऐसा कदापि सत्य नहीं है । जब तक हमें पश्चिम बुद्धि रहेगी, हम कभी भी परमात्मा का अनुभव नहीं कर सकते । उसके स्वरूप को जानने की बात तो बहुत दूर है । अब थोडा विधान उपनिषद के अनुरूप परमात्मा के स्वरूप को समझने का प्रयास करते हैं । विधान में किसी भी वस्तु को लिखा ने इंडिया गेट करने के लिए दो सिद्धांतों का प्रयोग किया जाता है । पहला स्वरूप लक्षण दूसरा तठस्थ । लक्षण स्वरूप लक्षण द्वारा जिस वस्तु को लिखने का प्रयास करते हैं, उसके गुणों के बारे में सीधे वर्णन किया जाता है । जैसे अगर हमें लक्षण के द्वारा किसी मनुष्य के बारे में बताना है तो हम कहेंगे । रमेश पांच फुट दस इंच लंबाई के वैज्ञानिक हैं जो विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान अल्मोडा में कार्यरत है । ये हो गया स्वाॅट दूसरा होता है टाॅक षण । इसमें मान लीजिए किसी तीसरे मनुष्य के बारे में बताना है जिसको वो नहीं जानता है तो हम क्या कहेंगे? आप अल्मोडा में उस आदमी को जानते हो? नहीं? ऐसे हम उससे पूछते रहेंगे जब तक वो अल्मोडा में किसी को जानते नहीं । फिर वो कहेगा हम उस आदमी को जानता हूँ तो हम कहेंगे हाँ आप सुनाओ रमेश उसके भाई के साले का पडोसी है जाओ रमेश को ढूंढ लोग इसे हम नीति नीति प्रक्रिया भी कहते हैं ।

Chapter 9 (i) स्वरुप लक्षण

स्वरूप लक्षण अब पहले हम स्वरूप लक्षण के बारे में चिंतन करते हैं । तैत्तिरीयोपनिषद में परमात्मा को स्वरूप लक्षण से लिखाया गया है । सभी उपनिषद ब्रह्मा वेदान्त में परमात्मा को ब्रह्मा शब्द से बताया जाता है । वहाँ कहते हैं सत्य क्या नाम अनंत ब्रह्मा । उसमें गुरु महाराज कहते हैं जो सत्य है, ज्ञान स्वरूप है तथा अनंत है वह ब्रह्मा है । अब इन तीनों स्वरूप लक्षणों पर थोडा चंदन करते हैं । सत्य को सत भी कहते हैं । अनेक तरह की विवेक का वर्णन शास्त्रों में मिलता है । जैसे न्यायशास्त्र में तूल, तंदूर विवेक । साथ ही शास्त्र में जड, चेतन विवेक । इसी प्रकार उपनिषद् में सत्, असत्, विवेक किया जाता है । महेशानंद गिरि महाराज कहते हैं सत्य ियासत वो है जो व्यवस्था में देखा गया, अनंतकाल से वो वैसा ही है और आगे अनंतकाल तक वैसा ही दिखे । उसे सत् कहा जाता है । हर था जो देशकाल परिस्थिति से प्रभावित नहीं है वही सब है । उपनिषद में आता है ब्रह्मा सत्य जगत, मिथ्या । जो वस्तु निरंतर बदल रही है या जिसके अनुभव होने के लिए किसी परिस्थिति विशेष की आवश्यकता होती है, वो सत्य नहीं, वो मिथ्या है । जगत निरंतर परिवर्तनशील है तथा ये जगह तभी अनुभव में आता है जब हमारा शरीर अथवा मान के साथ तादाद में होता है जब हमारा दी है कि सात आधा में नहीं है । जैसा की गहरी नींद में ये जगत हमारे लिए होता ही नहीं है । इसलिए इस जगह को मिथ्या कहा गया है । मैं क्या शब्द को थोडा और समझने का प्रयास करते हैं? एक उदाहरण के माध्यम से रेगिस्तान में गर्मी के दिनों में मृग मरीचिका का अनुभव होता है अर्थात मेराज वाटर दिखता है परंतु जितना इसके नजदीक जाते हैं वो भी हम से उतना ही दूर जाता रहता है और ये प्रतीति मनुष्य को भी देखती है । मेरे को भी यही परिस्थिति दिखती है और वह ज्ञान के कारण पानी पीने की चाहते रेगिस्तान में उस मरीचिका के पीछे भागता, भागता थक कर अपने प्राण त्याग देता है । इसमें राज वाटर के ना होते हुए भी प्रतिनिधि अनुभव को मित्तियां प्रत्येक कहा जाता है । इसलिए जो भी अनुभव हमको इन्द्रिय और विषयों के संयोग से आते हैं वो सत्य नहीं है । भगवान भगवत गीता में कहते हैं देहिनो उसमें था दे है काम आरंभ, योग नाम जरा तथा देहांत अप्राप्त तीर धीरज तत्र मंयती हमारा देश पहले बहुत छोटा होता है इतना छोटा की माता की । उधर में इसे आंखों से देखा भी नहीं जा सकता । फिर शिशु देह होता है, फिर ऊपर की ओर बढता है और एक कुमार का देख बन जाता है और फिर इसमें शय शुरू हो जाता है और ये देह अंत में मर जाता है । लेकिन जो धीरे ज्ञानी पुरुष है वो जानते हैं कि जब ये देख नहीं था मैं तब भी था और जब ये देख नहीं रहेगा । ये देखा फिर भी रहेगा इसमें क्या शोक करना? जैसे हम यदि कोई फॅमिली मूवी देखने जाते हैं, लाइट बंद कर दी जाती है । हमारी कुर्सी का मूवमेन्ट भी फिल्म के एक्शन के अनुसार होता है । कानों में सौं का इफेक्ट अलग होता है अर्थात हमें सेवेंटी मूवीस का अनुभव करने के लिए अनेक उपकरण दिए जाते हैं । तभी इन परिस्थितियों में हमको सेवेंटी मूवीस का अनुभव आता है । उसी प्रकार जब हम पहले अव्यक्त थे, हमारे पास नहीं, इंद्रियों के उपकरण थे, ना सोचने के लिए मन था पर तब भी हम थे । फिर हम पैदा हुए और हमें इस जगत को अनुभव करने के लिए ये इन्द्रियों और मन नामक उपकरण दिए गए । हमने जगत का अनुभव किया और फिर ये जगत नामक मूवी खत्म हो गई और हमसे ये उपकरण वापस ले लिए गए तो हम तो फिर भी रहेंगे । यही अपना स्वरूप है । इस पूरे उदाहरण का विश्लेषण करें तो हम पाएंगे ना तो मूवी सकती थी, ना मूवी का अनुभव करने के लिए दिए गए उपकरण सकते थे । कोई वस्तु सकती थी तो वो हम थे । भगवान इसी बात को भगवत गीता में कहते हैं व्यक्त आज नहीं बतानी व्यक्त मध्यानी भारत अव्यक्त ऍम तत्र का परी देखना ये तो अव्यक्त और व्यक्त का खेल चल रहा है । इसमें परेशान होने वाली कोई बात नहीं है । जब हम रात्रि में सोने के लिए जाते हैं तो क्या हम परेशान होते हैं कि मेरा घर मेरे बच्चे ये जगह तब मुझे छूट नहीं जा रहा है क्योंकि अगर हम नहीं छोडेंगे नहीं तो सो नहीं सकते और हमें पता है हम कहाँ जा रहे हैं । बस कुछ समय के लिए हम अव्यक्त अवस्था में जाएंगे और फिर से व्यक्त हो जाएंगे । उसी प्रकार की जगह में भी व्यक्त अव्यक्त का खेल चलता रहता है । अनेक दृष्टियां बनती है, बिगडती है परंतु जो इन सब का अधिष्ठान ब्रह्मा है, जो कातिया रहता है उसमें शरण्य भर भी तथा लेशमात्र भी परिवर्तन नहीं आता । वह ब्रह्मा ही एकमात्र सत्य है । ब्रह्मा का दूसरा स्वरूप लक्षण है । ज्ञान परमात्मा ज्ञान स्वरूप हैं । अब थोडा ज्ञान को समझने का प्रयास करते हैं । बहुत एक जगत में हमेशा हम सापेक्षिता में जीते हैं जैसे यह वस्तु उसके जैसी है । ये उस वस्तु का ज्ञान है जैसे फिजिक्स का गया मेडिसिन का ज्ञान तथा अन्य सभी ज्ञान में सभी ज्ञान सापेक्षता के ज्ञान है जो हमें इंद्रियो, मन और बुद्धि से ग्रहण होते हैं परन्तु परमात्मा किसी के जैसा नहीं है । परमात्मा ज्ञान मात्र है तथा एकमेव अद्वितीय है । भागवत में एक बहुत सुंदर कथा आती है । उसमें मनुमहाराज तथा उनकी पत्नी सतरूपा ने भगवान विष्णु की आराधना की क्योंकि उनका कोई पुत्र नहीं था । तब भगवान विष्णु प्रसन्न होकर उन दोनों से वर मांगने के लिए कहते हैं । इस पर मनुमहाराज कहते हैं कि हे भगवान! हमें कोई पुत्र नहीं है । अगर आप प्रसन्न है तो हमें वार दीजिए कि हमें आपके जैसे पुत्र की प्राप्ति हो । इस पर भगवान मुस्कुराते हैं और कहते हैं मेरे जैसा कोई है ही नहीं । मैं तो अपने जैसा एकमात्र हो इसलिए मेरे जैसा तो नहीं वरन में स्वयं आपके पुत्र के रूप में प्रकट होगा और फिर जब मनुमहाराज तथा सतरूपा पृथ्वी पर दशरत तथा कौशल्या बनकर आए तो भगवान पृथ्वी पर श्रीरामचंद्रजी के दे हमें प्रकट हुए । इस जगत में कोई भी उपलब्धि ज्ञानात्मक होती है । अगर हमें ज्ञान नहीं है तो वह वस्तु कभी भी हमें नहीं मिल सकती । उद्धारण के लिए एक दिन मैंने अपनी बिटिया से कहा कि टेबल पर पेन ड्राइव रखा है, इसको उठा कर लिया हूँ । बेटी अभी पांच साल की ही थी । वो तो चली गई उठाने के लिए । लेकिन टेबल पर और भी बहुत सारी चीजें रखी हुई थी । वह कैलकुलेटर ले आई । तब मैंने उसे कहा ये पेन ड्राइव नहीं होता है तो मैं पता है पेनड्राइव क्या होता है । उसमें कहा नहीं । उस दिन मैं ये बात समझा कि जब तक हमें किसी वस्तु का ज्ञान नहीं होता हमें उसकी उपलब्धि नहीं हो सकती । ये बात परमात्मा के लिए भी सकते है । लेकिन सांसारिक वस्तुओं की उपलब्धि वाले ज्ञान को हम ेंद्रीय मन से जानते हैं परन्तु परमात्मा को ना हम इन्द्रियों से और ना मन से जान सकते हैं क्योंकि ये ज्ञान अब्जेक्टिव ज्ञान नहीं है । परमात्मा सब्जेक्टिव ज्ञान स्वरूप है, उपनिषद में आता है यहाँ मनसा ना मन होते ये ना हो और मनो मतम् । तरी ब्रह्मात्मज वृद्वि । नीलम यदि हम उपासते । गुरु महाराज कहते हैं कि जिसके कारण मन में विचार करने की क्षमता है मगर मैंने उस पर महात्मा को जानने की क्षमता नहीं है । उस परमात्मा को तुम केवल अनुभव कर सकते हो, परमात्मा का प्रकटीकरण दे हमें मान के रूप में होता है और जब ये मन स्वयं अपनी तरफ मुड जाता है तो वह गायब हो जाता है । अगर मन से कार्य करने के बजाय जब हम मान पर कार्य करना शुरू कर देते हैं तो उसके बाद जो ज्ञान हमें होता है वो परमात्मा स्वरूप होता है क्योंकि उस ज्ञान में ज्ञाता नहीं होता । ज्ञान, तृप्ति, गेया, ज्ञान और ज्ञाता में हमारा ध्यान कहाँ पर है ये हमारे आध्यात्मिक जीवन में जानना बहुत जरूरी है । अगर हमारा ध्यान हमसे किसी अन्य वस्तु, व्यक्ति अथवा स्थान पर है तो हम बहिर्मुखी है और ऐसा व्यक्ति का ध्यान हमेशा बाहर ही होता है । पूरा जीवन ये ऐसा वैसा है, ये अच्छा है । वह बुरा इसी में कट जाता है और फिर हम अन्य को सुधारने में लग जाते हैं । परन्तु हम ये भूल जाते हैं कि जहां भगवान विफल फेल हो गए वहाँ हम कैसे पास हो सकते हैं । और यदि मनुष्य का ध्यान ज्यादा पर है अर्थात जिसे ज्ञान हो रहा है तो मनुष्य को उस ज्ञान का अहंकार होना स्वाभाविक है और फिर कौन न्यूज तीस सदृश्य नया हमारे जैसा कौन है ये बात हो जाती है । और जहाँ ये बात हुई समझो साधक का जीवन बर्बाद । इसलिए परमात्मा ज्ञान में प्रकट होता है जिसमें अन्य का भाव है ही नहीं और जाने वाला पैदा नहीं होता । जैसे हमारा होना मैं हूँ, मात्र बचता है उस बिहार में उस वक्त केवल परमात्मा मात्र होता है । ब्रह्मा का तीसरा स्वरूप लक्षण है अनंत जैसे कि पहले भी आया है, मनुष्य की बुद्धि कभी भी आनंद का चिंतन नहीं कर सकती, क्योंकि मनुष्य की इंद्रियों की क्षमता सीमित है । मन भी उन्हीं वस्तुओं का चिंतन कर सकता है जो उसे इंद्रियों से प्राप्त हुई है । जिस प्रकार अगर किसी मनुष्य को जिंदगी भर एक कमरे में ही रखा जाए तो वो कभी भी बाहर के आकाश विस्तार का अनुभव नहीं लगा सकता । उसी प्रकार हम सभी लोग अपनी अपनी जीव सृष्टि में ही जीते हैं । इसलिए हम कभी अनंत के बारे में चिंतन नहीं कर सकते । क्या कोई चिंतन कर सकता है? आकाश कितना बडा है जिसमें पृथ्वी जैसे अनगिनत ग्रह घूम रहे हैं, नहीं कर सकते क्योंकि हम सभी एक छोटे दायरे में फंसे है और जो छोटे दायरे में फसा है उसको अनंत का अनुभव नहीं आ सकता । एक उधारण से समझने का प्रयास करते हैं । एक मेंढक कुएँ में रहता था । उम्र भर वह कोई से बाहर गया ही नहीं । एक दिन उसी तरहा एक समुद्र की मछली उसको मैं गिरी तो मेन देखने उस मछली से पूछा तुम कौन हूँ और यहाँ कहाँ से आई हो तो मछली बोली मैं एक मछली हूँ और मैं समुद्र से आई हूँ । मेंढक बोला ये समुद्र क्या होता है? मछली बोली समुद्र होता है जिसमें बहुत सारा पानी होता है । मेंढक बोला कितना पानी? उसने छलांग लगाई । क्या इतना पानी होता है? मछली बोली नहीं इससे भी ज्यादा फिर मेंडक हुए की एक किनारे से दूसरे किनारे तक खुदा और बोला क्या इतना पानी होता है? मछली बोली नहीं । इससे भी ज्यादा तब मेंढक बोला इससे ज्यादा पानी कैसे हो सकता है? वो मछली से बोला मुझे जानना है कि इतना पानी होता है समुद्र में । तब मछली उसे समुद्र में ले गई और बोली अब बताओ कितना पानी उसी प्रकार गांव, जिला, प्रदेश देश पृथ्वी नौ ग्रह सौरमंडल, आकाशगंगा फिर हजारों आकाशगंगा फिर आगे क्या अनंत ब्राॅड क्या हम अनंत की कल्पना कर सकते हैं । आनंद वह है जिसमें से कितना भी निकल जाए वो काम नहीं होता और चाहे कितने भी जुड जाए तो अनंत बढता नहीं । जिसका ना कभी नाश हुआ न कभी जन्मा हुआ, ना घटने बढने से उसके विकास आए और जो नृत्य है उसमें कितनी ही श्रृष्टि या बनती बिगडती रहती है परंतु वो उतने का उतना ही है । परमात्मा पूर्ण हैं । जब कुछ नहीं था तब भी वह पूर्ण था और जब सब कुछ खत्म हो जाएगा तो भी वह पूर्ण ही रहेगा । इसलिए अनंत में अंश केवल प्रतिनिधि मात्र है । अनंत में अंशिक कल्पित मात्र है क्योंकि अनंद के अंश भी अनंत ही होते हैं या ये कहलो अनंत के अंश होते ही नहीं है । भगवत गीता में जब भगवान कहते हैं मैं वाहन शो जीवलोके जीव भूतहा सनातनः ना मार रहा चर्चा इंद्रयाणी प्रकृति स्थानी कर सकती जी मेरा ही अंश है ये इसी प्रकार का अंश है जैसे एक आदमी अपने पांच पुत्रों के लिए कह दी की ये पांच मेरी ही अंश है तो क्या वो आदमी पांच में बढ गया उसके पास भागो गए नहीं क्योंकि ये विभाजन केवल उपाधि का है । अगर पांच पुत्र ना रहे तो भी आदमी चौकाते हो रहेगा । उसी प्रकार चाहे जीव रहे ना रहे । परमात्मा जो खाते हो रहेगा और क्योंकि अनंत परमात्मा के हम अंश है तो इससे यह भी सिद्ध होता है कि हम भी अनंत ही है । चाहे हम जाने या ना जाने माने या ना माने । हम भी परमात्मस्वरूप ही है ।

Chapter 9 (ii) तठस्थ लक्षण

तटस्थ लक्षण स्वरूप लक्षण के पश्चात हम तटस्थ लक्षणों के द्वारा परमात्मा को पकडने का प्रयास करेंगे । किसी भी उपनिषद ये अन्य शास्त्रों में परमात्मा के बारे में जो भी कहते अथवा सुनते हैं वो हमारे मन, बुद्धि और अहंकार की उपज होती है । परंतु एक बात उपनिषद में बहुत ही साफ तौर पर कही गई है कि परमात्मा को हम अन्य के रूप में नहीं पहचान सकते हैं । अर्थात जब तक हम परमात्मा, ब्रह्म या भगवान को ऐसे देखेंगे या जानेंगे जैसे हम जगत की वस्तुओं को जानते हैं तो परमात्मा कभी भी हमारे ज्ञान में प्रकट नहीं हो सकते क्योंकि जहाँ अन्य की प्रतिदि है वहाँ दुलावत है और जहाँ वयवस् है वहाँ मन है और जहाँ मन है वहाँ संसार है । एक बार एक शिष्य गुरु महाराज जी के पास गया और बोला कि मैं जानना चाहता हूँ कि परमात्मा कौन है और कहाँ है? गुरु महाराज बोलेगी, परमात्मा यही है और वह परमात्मा तुम ही हो । कोशिशें ये कहकर वहाँ से चला गया की पता नहीं कि गुरु महाराज ये क्या बोल रहे हैं । इनको कुछ पता नहीं है । ऐसा भी कहीं हो सकता है । तब वह शिष्य भगवान रमन्ना ऋषि के पास गया और बताया कि मैंने गुरु महाराज जी से पूछा कि परमात्मा कौन है और कहा है तो वो बोले कि मैं परमात्मा हूँ, ऐसा नहीं हो सकता है भगवान आप मुझे इस बारे में कुछ बताइए । भगवान रमन्ना ऋषि ने कहा कि उन गुरु महाराज ने कहा तो ठीक परन्तु ऐसे ही कहा जैसे हम एक प्राइमरी कक्षा के बच्चे को कहते । खगोलविज्ञान के बारे में भगवान बोले देखो मैं तुम्हें एक लाइन में बताता हूँ, परमात्मा किया है तो मैं इस पर सोचोगे तो तुम्हें परमात्मा की प्राप्ति हो जाएगी । भगवान रमना ऋषि बोले कि तुम जिस जिस वस्तु का त्याग कर सकते हो वो परमात्मा नहीं है, वो जगह और जगत की वस्तुए है और जिस वस्तु का त्याग संभव नहीं है वह परमात्मा है । अब जाओ और चिंतन करूँ । वेदान्त में इस प्रक्रिया को ने तीन आईडी प्रक्रिया कहा जाता है । इसके द्वारा हम क्या नहीं है उसका त्याग और हम जो है उसका ग्रहण किया जाता है । अगर हम जो नहीं है उसका त्याग कर दे तो हम स्वतः ही वहाँ पहुंच जाते हैं । जो अपना स्वरूप है वहीं परमात्मा का अनुभव है । थोडा चिंतन करते हैं । ये जो दे हम अपने को समझ रहे हैं । ये कहाँ से आया । ये देख पहले हुआ था । उससे पहले बच्चा था, उससे पहले शिशु था, उससे पहले मानता के गर्व में था और उस से पहले कहा था पिता के वीडियो में या माता के अंडर में और उससे पहले कहा था कहीं नहीं था क्योंकि ये देख अपना है ही नहीं । ये माता पिता का दिया हुआ दे रहा है । परन्तु इस देख के अंदर जो दही है वो अभी भी है, पहले भी था और इस देख के नष्ट होने के बाद भी, जहाँ का तो रहेगा इस देह को देख नहीं चला रहा है । जिस प्रकार एक गाडी को स्वयम गाडी नहीं चला सकती, उसे मनीष चलता है । उसी प्रकार देख को भी दही चैतन्य चला रहा है । वहीं चैतन्य परमात्मा की इस दे हमें अभी व्यक्ति है, हमें उस तक पहुंचना है । उसके लिए केवल चिंतन ही एकमात्र उपाय है । जब इस बात पर चिंतन करते रहेंगे तो हम अपने हर एक अनुभव से सीखेंगे क्योंकि अभी हमारे सभी अनुभव जगत को लेकर है । जब हम विचार के द्वारा सीखने की प्रक्रिया को अपने पर लगाएंगे तो हमारी हर एक अनुभूति में केवल परमात्मा ही प्रकट होगा । इसी को विधान की साधना कहा जाता है । लेकिन जैसे कि मैंने पहले भी बताया जो मनुष्य आशिष है, बलिष्ठ है तथा दृढ है वहीं इस विधान साधना के पथ पर चलने का योग्य अधिकारी है और एक बार आप को उस परमात्मस्वरूप का अनुभव आ गया तो आप जीवन तो जियेंगे परंतु एक अखंड आनंद के साथ । क्योंकि जीवन में जितने भी पापपुण्य सुख दुख है वो सभी गलत भ्रांति के कारण है क्योंकि भगवान की श्रृष्टि में दुख है ही नहीं । ये जगत आनंद स्वरूप परमात्मा से ही उत्पन्न हुआ है और हम उस परमात्मा के आनंद को प्रकट करने के इंस्ट्रूमेंट है तो दुख कहीं नहीं है । अब थोडा इस नीति नीति प्रक्रिया पर चिंतन करते हैं और इसको आपने देख पर लगाकर देखते हैं कि आखिर हम कौन हैं या वो क्या वस्तु है जिसका त्याग संभव नहीं है । प्रकरण ग्रंथ पाँच विदेशी के तृतीय अध्याय में बताया जाता है कि परमात्मा देख के अंदर विराजमान है और पंच कोषों से ढका हुआ है । वो परमात्मा इन सभी पांच कोशिश को प्रकाशित करता तो है परंतु इन सभी से परे हैं ठीक उसी प्रकार जैसे मैं पति बनकर पत्नी को प्रकाशित करता हूँ । पिता बनकर पुत्र को प्रकाशित करता हूँ । पुत्र बनकर माता पिता को प्रकाशित करता हूँ । लेकिन मैं पति पिता पुत्र होते हुए भी इन सब से परे हूँ । ये पंच कोष है अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश आनंद मई कोष । पहले भी इनको शो का विषय आ चुका है । हमारे संपूर्ण ज्ञान तथा मैंने में वृत्तियां नहीं । पांच स्तरों पर आती है पंचकोश विवेक के द्वारा ये बताया जाता है कि इन पांचों को योगी हमारे देख का स्ट्रक्चर इन्फॉर्मेशन नियंत्रन करते हैं । ये हम नहीं हो सकते हैं क्योंकि इस सभी का त्याग जीवित रहते संभव है । अगर जीवित रहते हम इन पांचों का त्याग कर सकते हैं तो ये हम कैसे हो सकते हैं । हम तो वह है जो अखंड है जो एक छोडने के लिए भी अभी इस देह को छोड दे तो ये देख परमात्मा को चेतना के रूप में अभिव्यक्त नहीं कर सकता । यहाँ पर एक बात सोचने योग्य है । जब ये दे हम मर जाता है तो क्या होता है । एक बात बहुत ही अच्छे ढंग से दिमाग में बैठ आने वाली है कि परमात्मा मुर्दे व्यक्ति में भी है परंतु परमात्मा की अभिव्यक्ति चेतना के रूप में मुर्दे में नहीं हो रही है । ठीक उसी प्रकार जैसे फ्यूज बल्ब में बिजली की अभिव्यक्ति प्रकाश के रूप में नहीं हो रही है । पहले अन्नमय कोश पर विचार करते हैं कि ये हम कैसे नहीं हो सकते हैं । अन्नमय कोश वो है जो अन्य के द्वारा बनाई है, जैसे हाथ पाव हमारा डिस्टर्ब सिस्टम इत्यादि । अगर हम अन्य खाना बंद कर दे तो ये सभी शिथिल हो जाएंगे । परंतु अन्नमय कोश हम नहीं हो सकते क्योंकि ये देहना तो हमने पैदा किया ना । इस पर हमारा कोई कंट्रोल है । ये देख तो नित्य बदल रहा है लेकिन हम तो नहीं बदल रहे । इसलिए हमें नित्य विकार आ रही है । परन्तु हम में तो विकास नहीं आ रही । क्या कोई मनुष्य बूढा होना चाहता है? लेकिन फिर भी ये देख बूढा होता है तथा इसमें रोग होते हैं । प्राणमय कोश पर आते हैं । पहले प्राण को समझ लेते हैं । प्राण क्या है? प्राण पांच तरह के होते हैं जो फॅमिली अलग है । इन्हें प्राण, अपान, उदान, बयान तथा सामान कहा जाता है । प्राण मूलाधार से द्वादशं गोयल ऊपर स्वाद ही स्थान चक्र, उससे द्वादशं, गोले, ऊपर मणिपुर चक्र, उसके ऊपर अनाहत चक्र, फिर विशुद्ध चक्र, फिर आ गया चक्र और फिर सहस्त्रार चक्र सभी सात चक्रों में विचरण करते हैं और इन्हीं के द्वारा चेतनता का प्रवाह पूरे शरीर में होता है । प्राण स्कूल देखा तथा मान के बीच की कडी है प्राणों के द्वारा ही मन का तादाद में देख के साथ होता है जिससे देश जीवित रहता है परंतु अगर हम ध्यान दे तो हम प्राणायाम के द्वारा प्राणों का नहीं अमन कर सकते हैं अर्थात प्राणों का शरीर में नियंत्रन कर सकते हैं तो जो प्राणों का नियमन कर सकता है वह प्राणों से सर्वदा भी होना चाहिए क्योंकि जिसका नियमन हो रहा है तथा जो नियमन कर रहा है वो एक कैसे हो सकता है जैसे गाडी को सडक पर चलकर गाडी को कहा जाना है तथा गाडी को कितनी गति पर जाना है जो इसका नियमन कर रहा है वो गाडी से भिन्न है । एक बात और स्पष्ट समझने योग्य है कि प्राण चल रही है इसलिए शरीर में जीवन नहीं है । शरीर में जीवन है इसलिए प्राण चल रहे हैं । जीवन के कारण प्राण है ना कि प्राणों के कारण जीवन पतंजलि योगसूत्र के विभूतिपाद में महर्षि कहते हैं कि अगर मन को संयमित करके प्राणों को घंटे प्रदेश में केंद्रित तथा स्थापित कर दिया जाए तो आदमी बिना भूख प्याज के कई वर्षों तक समाज हित में रह सकता है । इसका मतलब अम् प्राणों को नियंत्रन में लाकर प्राण में कोच पर भी विजय पा सकते हैं । परन्तु हम ये प्राण बिलकुल नहीं हो सकते और नई प्राण परमात्मा का ही स्वरूप है क्योंकि प्राण भी अपने में जड है । अगर चेतना इसके साथ ना जुडी हो तो अब थोडा चिंतन मनोमय कोश पर करते हैं । मान के बारे में पहले भी हम थोडा चिंतन कर चुके हैं । एक बार सत्रह अठारह साल के एक बच्चे ने मुझसे पूछा था कि सर आप बार बार बोलते हैं की मान देवा मनुष्या नाम कारनाम बंधा मोक्ष हो मान ही हमारे बंधन का कारण है और मान ही हमारे मुख्य आनंद का कारण है लेकिन ये मन किया है ये आज तक समझ में नहीं आया । हमें माइंड पता है हमारे विद्यालय में निर्भर सिस्टम के बारे में पढाया जाता है जिसमें हमने ब्रेन स्पाइनल कॉर्ड न्यूरॉन्स एक्स्ट्रा के बारे में पढा है परंतु मान के बारे में वहाँ नहीं पढाते । थोडा बताया कि ये मान कहाँ होता है । मैंने बच्चे से बोला कि मैं एक सवाल पूछना हूँ पर अपने पास ही रखना । मैंने पूछा सात प्लस आठ प्लस पांच बता छह माइनस एक कितना होगा उसने थोडा सोच और बोला चार मैंने कहा था उत्तर मत देना चलो उत्तर दे दिया कोई बात नहीं अब ये बताओ ये जो गणित तुमने क्या कहाँ? क्या बोला दिमाग में अच्छा अगर अभी तुम्हारे दिमाग का ऑपरेशन किया जाए तो क्या ये गणतंत्र मिलेगा? बच्चा थोडा कंफ्यूज हो गया बोला नहीं फिर मैंने उसको कहा देखो तुम लोग कंप्यूटर तो बढते होगी । उसमें कितनी सारी मूवी इस पढाई की किताबें, गाने और इलेक्शन होता है ना? बच्चे ने जवाब दिया हाँ वो कहाँ होती है? बोला हार्ड डिस्क में स्टोर होती है । अच्छा अभी काम करना । उस कंप्यूटर का पहले वजन वेट कर लेना । फिर उसका जितना भी डेटा है वो सब डिलीट कर देना और फिर से उस कंप्यूटर का वजन कर रहा हूँ । क्या कम्प्यूटर का वजन कम हो जाएगा? बोला नहीं काम नहीं होगा अगर काम नहीं होगा तो फिर वो जो इतनी सारी चीजे कंप्यूटर के अंदर थी वो कहाँ गई? मतलब ये सर्दी नहीं थी, बस देख रही थी । इसी को वर्चुअल वर्ल्ड कहते हैं कि किसी प्रकार मन हमारे ब्रेन सी पी योगी हार्ड डिस्क में स्टोर वर्चुअल वर्ल्ड है । चुनाव होते हुए भी है लेकिन वास्तव में मन नाम की कोई वस्तु है ही नहीं । भगवान रमना जी कहते हैं मानसम् तू के मारने कृते नए वह महान असम मार्ग आर जवान मन की गांधी संसार हमें न होते हुए भी भागता है, जबकि मन की अपनी कोई सकता है ही नहीं । ये तभी तक है जब तक कि मन की इन्क्वायरी शुरू नहीं होती । एक बार आप मान के बारे में सोचो, मान गायब हो जाता है । मन तभी तक जीवित रहता है जब तक इसमें संसार के विषय नामरूप । भूत भविष्य है । एक बार मन वर्तमान में आ गया और हमने मान के बारे में सोचना प्रारंभ कर दिया । मन मर जाता है जैसे गहरी नींद में गहरी नींद । डीप स्लीप में जगह नहीं है तो मन भी नहीं है । हमारे होने के लिए मन की आवश्यकता कदापि नहीं है । फिलहाल इतना जान लेते हैं कि मान के कारण ही हमें संसार के सभी विषय सुख, दुःख, लाभ, हानि अपना पराया का आभास होता है । लेकिन मन की अपनी स्वतंत्रता सत्ता नहीं है । यदि मन में परमात्मा के चैतन्य का प्रकाश नहीं है तो मन ही नहीं उत्तराखंड में अल्मोडा के पास एक संत हो गए । उन्हें लोग बाबा नीम करोली के नाम से जानते हैं । में बाबा के काफी अंग्रेज भक्त बन गए थे । बाबा हनुमान जी के परम भक्त थे । एक बार किसी अंग्रेज भक्त के साथ उसका एक अंग्रेज दोस्त भी बाबा से मिलने आया । दूसरा अंग्रेज नशीली दवाई एलएसडी का एक था । वो कई सालों से ले भी ले रहा था । उसने कहा बाबा मैं इस नशे से छुटकारा चाहता हूँ, लेकिन कई वर्षों से मैं इसको ले रहा हूँ । इसलिए अब इसके बिना रहा नहीं जाता हूँ । बाबा मुस्कराएं और बोले कितना दूर लेते हो । अंग्रेज बोला आधी गोली चौबीस घंटे चल जाती है । बाबा ने कहा अभी तुम्हारे पास कितनी को लिया है । अंग्रेज बोला अभी मेरे पास बीस गोलियां है । बाबा ने कहा जरा मुझे दिखाना तो बाबा रे । वो संग्रह से बीस गोलियों बिल्ली और पूरी बीस गोलियां मुंह में डालकर ऊपर से आधा गिलास पानी पी लिया । ये देखकर अंग्रेज खबरे आ गए । उनमें से एक अंग्रेज बाहर ये बोल कर जाने लगा की मैं डॉक्टर को बुलाकर लाता हूँ तो बाबा बोले कोई जरूरत नहीं तो उन्होंने यहाँ पर बैठ जाओ । दोनों के पसीने छूट गए और किसी तरह से वहीं पर बैठ गए । बाप और वे दोनों उसी कमरे में दो घंटे तक बैठे रहे लेकिन बाबा का उन गोलियों एलएसडी का बिल्कुल भी असर उन पर नहीं हुआ जो घंटे बाद अंग्रेजों ने देखा कि बाबा बिल्कुल स्वस्थ है । तो एक अंग्रेज ने पूछा कि बाबा ऐसे कैसे हो गया? मैं आधी गोली खाता हूँ और दिनभर नशे में रहता हूँ, लेकिन आप पर इसका कोई असर नहीं हुआ । ऐसा कैसे हो सकता है? तब बाबा मुस्कुराए और बोले तो उन्हें नशा तुम्हारे मन के कारण होता है । तुम्हारा मन जमीन गोलियों के साथ तादात्म्य करता है । तभी तो मैं नशा होता है और तुम्हारा मन इन गोलियों से तादात में इसलिए करता है कि तुम्हारा मन तुम्हारे नियंत्रन में नहीं है । लेकिन मैं अपने मन को ऐसे देखता हूँ जैसे इस वक्त मैं तुम्हें देख रहा हूँ और मेरा मन कभी भी मेरे नियंत्रण से बाहर नहीं जाता । इसलिए मेरे मन नहीं इन गोलियों के साथ तादात में नहीं किया और मुझे नशा नहीं हुआ । अगर तुम भी इस नशे को छोडना चाहते हो तो पहले अपने मन पर नियंत्रण करना सीखो जिस दिन तुम्हारा अपने मन पर नियंत्रण हो जाएगा । संसार की कोई भी वस्तु तुम्हें संसार में नहीं मान सकती क्योंकि नशा केवल दवाइयों या विष्णु का नहीं होता । इस संसार में जिन वस्तुओं के कारण हम बंधन महसूस करते हैं । वो सब एलएसटी सामान ही है । चाहे वो धन हो, पद हो या अन्य कोई भी चीज हो । उस दिन से वो अंग्रेज बाबा जी का भक्त बन गया । विज्ञानमय कोश बुद्धि का क्षेत्र है । देखो एक होता है ज्ञान तथा एक होता है । विज्ञान । ज्ञान साइंस है तथा विज्ञान टेक्नोलॉजी है । ज्ञान का क्षेत्र मन है तथा विज्ञान का क्षेत्र बुड्ढी है । मन हमेशा दूसरों के बारे में चन्दन करता है तथा बुद्धि हमेशा मैं के बारे में ही सोचती है । जब ये विज्ञानमय कोश अन्नमय कोश देह के साथ जुडता है तो मैं यह देखो ये मान लेता है । जिस प्रकार पुत्र के सामने आते ही मैं यहाँ मान लेता हूँ कि मैं पिता हूँ, उस समय और कुछ नहीं होता । केवल पिता परन्तु जैसे ही पुत्र गया और पत्नी आ गई, उस समय हम अपने आप को बेचारा पति मान लेते हैं । बुद्धि के कारण ही हमें कृत्र अभिमान पैदा होता है । मैंने ये किया मैंने वो किया लेकिन ये बुद्धि केवल तभी है जब हम इस जगत के साथ व्यवहार करते हैं जैसे जागृत अवस्था में परन्तु स्वप्नावस्था तथा सुषुप्ति अवस्था में बुद्धि नहीं होती तो फिर जो वस्तु केवल चौबीस घंटों से कुछ घंटे ही हमारे साथ है, वो हम कैसे हो सकते हैं और वह नीति परमात्मा भी बुद्धि कैसे हो सकते हैं? आनंद में कोशिश भोग का क्षेत्र है । हमने रसगुल्ला खाया, मजा आया तो हमारे दिमाग में ये बैठ गया की रसगुल्ला गाने से आनंद मिलता है परन्तु के ऐसा ही है क्या रसगुल्ले में आनंद है यार ये आनंद जो रसगुल्ला खाकर हमें मिला ये हमारे पास पहले से ही था लेकिन जब हमने रसगुल्ला खाया तब ये आनंद प्रकट हुआ । अगर रसगुल्ला में आनंद होता तो पचास रसगुल्ले खाने के बाद इनका वन में रसगुल्ले में भी हमें पहले रसगुल्ले जैसा नहीं जाना चाहिए था परन्तु ऐसा नहीं होता । आनंद में को उसमें हमें संसार के विषय वस्तुओं से मिलने वाले सुख की अनुभूति होती है । लेकिन ये आनंद हमें बाहर से मिला है । जब तक ये अज्ञान है तब तक इस आनन्दमय कोश में परमात्मा का प्रॉक्टर इस नहीं हो सकता । लेकिन जब ये समझ में आ जाता है कि संसार की विषय वस्तु हुए केवल अधिक स्थान मात्र है, इन पर जो आनंद छिडका गया है वो अपने स्वरूप का ही आना हैं । तभी आनंद में कोष परमात्मा के प्राकट्य का स्थान बन जाता है ये आनंद हमारा स्वरूप इंट्रिन्सिक कैरेक्टर है । जिस प्रकार दायिका शक्ति अग्नि का तथा शीतलता पानी का स्वरूप है । आनंद में कोष भी परमात्मा का स्वरूप नहीं है लेकिन इस आनंद में कोष में परमात्मा ही आनंद के रूप में प्रकट होता है । अब इन पांचों कोशिश को एक उदाहरण में समझ लेते हैं । मान लो में कहीं जा रहा हूँ और एक बाइक सवार ने मुझे टक्कर मार दी जिससे मेरा एक हाथ में फ्रैक्चर आ गया । अब थोडा ध्यान देना ये मेरा हाथ है जो खाल मांस हड्डी से बना है जिसमें फ्रैक्चर हुआ इसको अन्नमय कोश कहेंगे । हड्डी टूट जाने के बाद भी इस हाथ में प्राण है अर्थात ये जो ऊर्जा उस हाथ में प्रवाहित हो रही है हाथ के चलाने पर आने के लिए ये प्राण मैं कोच है । फिर एक महीने बाद प्लास्टर कट गया तो मैंने सोचा कि अपने हाथ को ऊपर उठाता हूँ । ये जो मेरा सोचना है ये मनोमय कोश का कार्य है और फिर ये अनुभाव कि मेरे हाथ उठा लिया है । ये विज्ञान कोच है अपने हाथ ऊपर उठा लिया इसके द्वारा जो मुझे आनंद की प्राप्ति हुई । ये आनन्दमय कोश है परंतु इनमें से कोई भी अपना असली स्वरूप नहीं है । अपना असली स्वरूप वो है जिसके कारण ये पांचों कोष है । परंतु जो इन सब का अधिष्ठान होते हुए भी इन सबका कारण होते हुए भी इन सबसे परे हैं । जैसे बनी पाने के कारण ही सभी तरह के स्वादों का अनुभव । खट्टा मीठा कडवा हमको होता है, परंतु पानी का अपना कोई स्वाद नहीं है । वह सभी स्वादों का अधिष्ठान होते हुए भी इन सभी से परे हैं । वहीं अपना स्वरूप है । एक बात बहुत ही स्पष्ट समझनी होंगी की अभी तक जो भी परमात्मा के बारे में बताया तथा लिखा गया है वो तभी तक सकते हैं जब तक कि हम से दूर है । क्योंकि जेब छान हमें परमात्मा का अनुभव हुआ । उस वक्त ये सब बताना, लिखना, सोचना सब खत्म हो जाता है क्योंकि वही परमात्मा गुरु बनकर उपदेश करता है और वही परमात्मा शिष्य मन कर उपदेश सुनता है । वहीं भोक्ता है, वही भोग्य है । वो एक मात्र है तो उसके बारे में कोई क्या लिखें । हम परमात्मा कोई दांत में सच्चितानंद स्वरूप कहते हैं, इस पर पहले बताया जा चुका है । संत ज्ञानेश्वर महाराज कहते हैं कि सच्चितानंद कहकर हम परमात्मा का अपमान करते हैं क्योंकि वह सत् भी है । असद भी है और सत् असत् दोनों से परे भी है । हम उचित इसलिए कह रहे हैं क्योंकि हमने जडता अंचित्य में भगवान को नहीं देखा लेकिन वहाँ भी है आनंद स्वरूप परमात्मा है परन्तु क्या उसको आनंद कहना ठीक है? जब दुख है ही नहीं, ये तो उसी प्रकार हुआ है जैसे किसी का एक ही बच्चा हो और वह किसी से ये कहे कि मेरा बडा लडका है तो दूसरा आदमी पूछेगा । छोटा लडका कहाँ है? आप कहेंगे कि छोटा तो है ही नहीं । तो जब दूसरा है ही नहीं तो छोटा बडा कहने की आवश्यकता है क्या? आनंद स्वरूप कहना भी उचित नहीं । वहीं पर महात्मा जब नामरूप की उपाधि धारण करता है तो उसे जगत कहा जाता है । वहीं परमात्मा माया की उपाधि धारण करता है, उसी को ईश्वर कहा जाता है । वहीं परमात्मा जब पाँच कोशों की उपाधि धारण करता है और देश के रूप में प्रकट होता है तो जीव कहा जाता है । परन्तु परमात्मा ये तीनों होते हुए भी इन सबसे परे हैं । ठीक उसी प्रकार जैसे एक आदमी, पति, पत्नी, पिता होते हुए भी वो इन सब से परे हैं । भगवान भगवत गीता में कहते हैं, सर्वस्य अच्छा हमने दी सैन्य विष्णु मथा स्मृति विज्ञानम् पहुँचा विदेश सर्वे हमें वेद्यो ग्दांस्क ऋग्वेद विवेक चाह हम सभी के हृदय में मैं ही हूँ । मेरे ही कारण जब जागृत स्वप्न, सुषुप्ति और समाधि का अनुभव करता है परन्तु मैं इन सबका आधार होते हुए भी इन से परे हूँ जो इस किताब में लिखा जा रहा है । ये मैंने किताबों में पढकर या किसी से सुन कर नहीं सीखा इसलिए आपको किसी भी किताब में नहीं मिलेगा । अगर हमें जीव जगत, ईश्वर तथा परमात्मा को समझना है तो एक उदाहरण से समझ सकते हैं । एक बार में क्रिकेट का खेल टीवी पर देख रहा था । हालांकि क्रिकेट मुझे बिलकुल पसंद नहीं है लेकिन जब हम सीखना शुरू करते हैं तो हम उन चीजों से ज्यादा सीखते हैं जो हमें पसंद नहीं होती तो हमने क्रिकेट से क्या सीखा? मैंने सीखा कि क्रिकेट में चार प्रमुख चीजें होती है जिनके बिना क्रिकेट का खेल संभव नहीं है, वो है बैटिंग वाली टीम, फील्डिंग वाली डीएम, अंपायर तथा एक मैदान । अब ऍम को आप जीव समझ लीजिए । बोलर को जगत समझ लीजिए । हम बाहर को ईश्वर समझ लीजिए तथा परमात्मा को मैदान समझ लीजिए जिस पर ये खेला जा रहा है । अब इस पर थोडा चिंतन करते हैं । गेंदबाज को जगत कहा क्योंकि जगत की विषय वस्तु ही खिलाडी को देखते हैं । ये जगत विभिन्न विषय वस्तु खिलाडी रूबी जीव की ओर फेंकता है तथा जीव इंद्रियो एवं मान के द्वारा इन बहारी विषय वस्तुओं के प्रति रिएक्ट करता है । विभिन्न तरह की गेंद रूपी विषय जीव के समक्ष आती है और ये जीव जगत का खेल चलता रहता है । ईश्वर रुपये अंपायर केवल निर्णय लेता है । उसे ना बैट्समैन से मतलब है ना बोलर से । अगर बोलर बैट्समैन को आउट कर देता है तो अंपायर से बताएगा वो ना खुश होगा न दुखी । उसी प्रकार अगर बैट्समेन छह मार देता है तो वह अंपायर से बताएगा । वो ना कोई होगा ना दुखी । उसी प्रकार ईश्वर सिर्फ बताता है । ये निर्णायक का कार्य करता है कि ये जीव जगत में किस प्रकार व्यवहार कर रहा है । ईश्वर चीफ तथा जगत के द्वारा प्रभावित नहीं है । अब थोडा ध्यान देना अगर बैटिंग टीम ने वॉकओवर दे दिया तो क्या बोलिंग टीम फिर भी बोलिंग करती रहेगी नहीं? और जब बैटिंग और बोलिंग टीम खेल नहीं खेलेगी तो अंपायर फिर भी मैदान में रहेगा नहीं । और यदि बोरिंग टीम, बैटिंग टीम और अंपायर मैदान में ना रहे तो क्या मैदान की कुछ हानि होगी नहीं । मैदान को कोई फर्क नहीं, चाहे उस पर खेल खेला जा रहा हूँ । ये खेलना खेला जा रहा है । मैदान योगा तो ही रहता है । ठीक उसी प्रकार जब ये जीव जगत के विषय वस्तुओं को वॉकआउट त्याग देता है तो ईश्वर की माया जीव पर कार्य करना बंद कर देती है और चाहे उस पर महात्मा पर ये जीव जगत ईश्वर का खेल खेला जाए ना खेला जाए, परमात्मा पर कोई फर्क नहीं पडता । उसी प्रकार जीव तब तक ही है जब तक वह जगत को सपने मानता है और एक बार हम देहात महाभाव से ऊपर उठकर जब जीव भाव का भी त्याग कर देते हैं तो जो बचता है वहीं परमात्मा है, वहीं अपना स्वरूप है ।

CHAPTER 10 आध्यात्मिक साधना

अध्याय दस आध्यात्मिक साधना अब हम जिस क्षेत्र में प्रवेश करने जा रहे हैं इसमें आप लोगों ने जो भी आज तक सुनकर पढ कर रखा हुआ है उन पर प्रहार होने वाला है । इसलिए कृपया इस खंड को कुछ बन करना पडे अर्थात इस खंड को हम अगर किसी धर्म, संप्रदाय, जाति, देवता हुआ, किसी भी गुरु के शिष्य अनुयायी बनकर पडेंगे तो हम शायद सही ढंग से बताई गई बातों का तात्पर्य निर्णय नहीं कर पाएंगे । जब हमें संसार में आते हैं तो तीन चार साल तक हमें कुछ पता नहीं होता कि हम कौन हैं, कहाँ से आए हैं, क्या करते हैं । फिर हमें सभी लोग एक नाम से पुकारते हैं तो हमें लगता है कि अमूक नाम में हूँ और हमें बताया जाता है कि अमूक औरत हमारी माता है तथा माता फिर बताती है कि अमुक आदमी हमारे पिता है और हम अपने को एक नाम से तथा माता पिता की उपाधि से जानने लग जाते हैं । हम ने से शायद ही किसी ने कभी ये विचार क्या होगा कि क्या ये आदमी औरत थी मेरे माता पिता है क्या मैं वही हो जिस नाम से लोग मुझे पुकारते हैं । फिर भी हम ये सब मान लेते हैं । क्यों मानते हैं श्रद्धा की कारें? हमारा पूरा जीवन श्रद्धा के कारण ही चलता है क्योंकि हम कुछ नहीं जानते हम कहाँ से आए हैं, हमें कहाँ जाना है । बस जैसा कोई बता देता है वो हम मान लेते हैं और उसी के अनुरूप हम जगत में व्यवहार करते हैं । इसलिए श्रद्धा हमारे जीवन को चलाने के लिए एक शक्ति का कार्य करती है । एक हमारे वैज्ञानिक मित्र थे, वो हमारे साथ एक बार मंदिर आ गए तो मंदिर में जाते हुए उन्होंने हमसे कहा कि डॉक्टर साहब, मैं तो ये सब नहीं मानता । मंदिर में जाना, पूजा पाठ कराना क्या होता है इससे मैंने उससे पूछा किसको भगवान को गोली नहीं हमें अच्छे लोग तो बेचारे परेशान है और जब बेकार लोग हैं मजे में है तो फिर मैंने उनसे पूछा और उसको छोडो ये बताओ आप कैसे हो? वो बोले हम तो मजे में है तो फिर मैं हजार और आगे चल दिया लेकिन भगवान की दया से उनकी कुछ समझ में नहीं आया । देखो जब तक हमारे हृदय में किसी भी वस्तु के प्रति महाबम बुद्धि जागृत नहीं होती है तब तक वह वस्तु हमें बेकार ही लगती है । हमारे माता पिता के प्रति हमारे मन में श्रद्धा है इसलिए उन का हमारे जीवन में महत्व है । क्या किसी ने कहा है कि मेरे माता पिता बेकार है? नहीं क्योंकि हमारी उनके प्रति श्रद्धा है । इसलिए पहली चीज जो हमें जगत में आने पर सीखते हैं वो है श्रद्धा । अतहर श्रद्धा क्या हो गई अज्ञान से ज्ञान के क्षेत्र में जाने के लिए जो आंतरिक शक्ति है उसे श्रद्धा कहते हैं । जब हम बिना श्रद्धा के विचार करते हैं तो ये हमारे आंतरिक विचारों में प्रकट नहीं होती है और हम उन विचारों के द्वारा अपने आप में ही उलझ जाते हैं । इन विचारों को ही हम विकार कहते हैं । लेकिन जब हम श्रद्धापूर्वक विचार करते हैं तो उन विचारों के द्वारा हमारी विचार करने की शक्ति शुद्ध होती है और फिर हमें अपने बारे में, जगत के बारे में तथा परमात्मा के बारे में जानने की छपरखट होती है । भगवान शंकराचार्य श्रद्धा के बारे में कहते हैं कि जब तक दो चीजों पर श्रद्धा नहीं होगी, हम आध्यात्म के क्षेत्र में आगे नहीं बढ सकते हैं । शास्त्र गुरु वाक्य सिया सत्य बुद्ध अवधारण नाम सारा श्रद्धा कथिता साडी भरिया या वस्तु पर भेजते पहला है हमारे शास्त्रों पर श्रद्धा तथा दूसरा गुरुवार की परिश्रम था । जब तक हमारे मन में ये विधेयक आत्मक विचार पॉजिटिव थॉट्स नहीं आते हैं कि जो शास्त्रों में बताया गया है तथा जो गुरु ने कहा है वह सत्य तो है परंतु वह कैसे सकते हैं तब तक हमारी खोज शुरू नहीं होती है और एक बार ये सत्य को समझने तथा कहीं हुई बातों का तात्पर्य निर्णय करने की क्षमता हमारे अंदर आ गई तो आपको न शास्त्र पडने की जरूरत है और ना गुरु महाराज की । लेकिन जब तक हम अज्ञान में हैं हम शास्त्रों में बताई गई बातों का तात्पर्य निर्णय नहीं कर सकते हैं तब तक हमे शास्त्रों का सहारा लेना ही पडेगा और शास्त्र में बताई गई बातों का तात्पर्य निर्णय तब तक नहीं होगा जब तक कि हम अपने अनुभवों से सीखना शुरू नहीं करते और इस प्रक्रिया के लिए हम एक गुरु की आवश्यकता होती है लेकिन मैं यहाँ पर फिर से साफ कर देना चाहता हूँ की गुरु कोई व्यक्ति नहीं होता है । गुरु ये तत्व है इसको समझने के लिए हम एक श्लोक देखते हैं जो आपने सुना होगा गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरा गुरूर साक्षात परब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नमः । इसमें आपको बताया गया होगा कि गुरु ही ब्रह्मा है । गुरु ही विष्णु है और गुरु ही महेश्वर है इसलिए उन गुरु को नमस्कार देखो । ध्यान देना इसका ये अर्थ बिल्कुल नहीं है । ये अर्थ आपको वो लोग बताते हैं जो गुरु बने हैं, भक्तों का चित्रण करने के लिए नहीं बल्कि भक्तों का वित्त हरण करने की है । इसलिए ऐसे गुरुओं से हमेशा सावधान रहे । जिस भी मनुष्य को इस जगत में कुछ करना है तथा जिसे इस जगत में कुछ भी अपेक्षा है वो कभी भी आपको आपके हित की बात नहीं बताएगा । जिसको आप से कुछ नहीं चाहिए यहाँ तक कि उसको आपका धन तो गया, आपका मन भी नहीं चाहिए । वो भी आपको आपके हित की बात बता सकता है । इस लोग का अर्थ इस प्रकार है कि भगवान ब्रह्मा हमारे जीवन में गुरु के रूप में आते हैं तथा भगवान शिव हमारे जीवन में गुरु के रूप में आते हैं और भगवान विष्णु हमारे जीवन में गुरु के रूप में आते हैं और जो ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों का आधार है वह परमात्मा ब्रह्म भी स्वयं हमारे जीवन में गुरु के रूप में आते हैं लेकिन हम उनको पहचानते नहीं क्योंकि हमने देखना ही नहीं चाहते । भगवान ब्रह्मा का काम है श्रृष्टि की रचना करना क्या हम एक सृष्टि की रचना नहीं करते? हर एक आदमी की अपनी एक सृष्टि होती है । जीवनदृष्टि भगवान ब्रह्मा को समझती अन्तः करण चतुष्टय कहा जाता है । वह ब्रह्मा ही इस देह में मंचित बुद्धि और अहंकार के रूप में प्रकट होते हैं । मगर हम इनसे सीखने के बजाय इनका उपयोग करने लग जाते हैं । तो इसके कारण हमें ब्रह्मा द्वारा प्रदत्त ज्ञान नहीं मिलता । भगवान विष्णु को जगत का पालन पोषण करता कहा जाता है । हम जाग्रत अवस्था में रोजाना कई ऐसे अनुभवों से गुजरते हैं । अगर हम इन अनुभवों को आधार से जोडकर देखें तो इससे बडी कोई आधात्मिक सीखो ही नहीं सकती । जैसे उदाहरण के लिए महाभारत में यक्ष भगवान युधिष्ठिर से सवाल पूछते हैं कि है युधिष्टिर इस संसार का सबसे बडा रहस्य क्या है? तब युधिष्ठिर कहते हैं की है भगवान एक मनुष्य अपने जीवन में कई बार शमसान घाट जाता है । कभी अपने दादा को जलाने के लिए, कभी अपने पिता को जलाने के लिए, कभी अनेक सगे संबंधियों को जलाने के लिए । लेकिन वह ये कभी नहीं सोचता कि मैं यहाँ एक ना एक दिन जरूर चलने के लिए आऊंगा । शमशान से निकलते ही वह फिर से इस तरह से जीने लगता है जैसे उसका नंबर कभी आएगा ही नहीं । वहीं तेरा मेरा झूठ, पाखंड, हिंसा, लडाई, झगडा, लो क्रोध उसमें कुछ बदलाव नहीं आता है । उसी प्रकार भगवान महेश्वर भी हमारे जीवन में गुरु बनकर आती हैं । भगवान शिव रूद्र है, रूद्र मतलब जरूर लाते हैं । कई लोग पूछते हैं कि हमारे जीवन में कष्ट क्यों आते हैं? हमें दुख होते हैं । हमने भगवान का क्या बिगाडा है? अब जरा सोचो क्या भगवान हमें दुखी होने के लिए हमें रुलाने के लिए दुख देते हैं? नहीं एक उदाहरण लेते हैं । मान लो कि मेरे पेट में कैंसर का गोला हो और मुझे इसका दुख ना हो तो क्या में कभी भी इसे ठीक करने का प्रयत्न करूंगा नहीं । जब जब दे हमें दुख होता है तो ये बताने के लिए की प्रकृति में विकृति आनी शुरु हो गई है । कृपया इसे ठीक कर ले । हमको तो भगवान का शुक्रिया करना चाहिए कि हमारे शरीर में कुछ भी परेशानी होती ही । एक सिग्नल के जरिये हमें बताया जाता है कि इससे पहले की कुछ बडी परेशानी हो । कृप्या वहाँ ध्यान देते भागवत महापुराण में अवदूत हो पा क्या नाम का एक आध्याय आता है जिसमें बताया गया है कि एक बार महाराज यदु कहीं विचरन कर रहे थे तो उन्हें रास्ते में एक अवधूत महात्मा को देखा । वो अवरोध कोई और नहीं बल्कि स्वयं भगवान दत्तात्रेय थे । महाराज उन्होंने देखा कि ये अवधूत बिल्कुल मस्त चेहरे में मुस्कुराहट शांतानंद में चल रहे थे । उनके पास ना कपडा थाना गाडी न कुछ और लेकिन चेहरा माधवानंद से खेल रहा था तो यदु महाराज उनके पास गए और बोले की है अवधूत महाराज आपके पास कुछ भी नहीं है । इतना बच्चे ना शिष्य ना पहनने के लिए कपडे जवाहारात फिर भी आप इतने प्रसन्न कैसे हो? वहाँ विरोध कहते हैं मेरे पास ये सब चीजें नहीं है इसलिए मैं खुश हूँ । जब राजा कहते हैं तो क्या इनसे वस्तुओं के बिना भी इतना खुश रहा जा सकता है? भगवान कहते हैं हाँ ये सब आपने कहाँ से सीखा? तब भगवान दत्तात्रेय कहते हैं कि हे राजन ये सब मैंने गुरुओं से सीखा । तब ये जो महाराज कहते हैं गुरुओं से क्या आपकी एक से ज्यादा गुरु हैं? वो कहते हैं, जो दरिद्री होता है उसका एक गुरु होता है और जो ज्ञान संपन्न होता है उसका इस जगत में हर वह वस्तु गुरु है जिससे उस ने कुछ सीखा है । फिर वे बताते हैं कि मेरे चौबीस गुरु हैं और ये आनंद में होने की कला मैंने इन्हीं से सीखी है । मेरे गुरु है पृथ्वी, जल, वायु, आकाश, अग्नि, अजगर, हाथ ही सर, चंद्र, सूर्या, पतंगा, धावडा, मधुमक्खी, मकडी, शहद, खट्टा करने वाली, हिरणी, वैश्या, मच्छी, गिद्ध, एकबालक, कन्या धनुष बनाने वाला समुद्र और भ्रम की थी । फिर भगवान दत्तात्रेय महाराज को बताते हैं कि उन्होंने अपने इन गुरुओं से क्या क्या सीखा । देखो आधार में गुरु महत्व का नहीं है बल्कि शिष्य महत्व का होता है । जो कुछ जाना ही नहीं चाहता उसे तो भगवान स्वयं आकर भी नहीं सिखा सकते और जो अपने स्वरूप को जानने के लिए उत्सुक है उसे भगवान भी नहीं रोक सकते । आध्यात्मिक साधना को समझने के लिए पहले कुछ व्यक्तियों को हमें समझना पडेगा । जब तक इनके बारे में हम स्पष्ट नहीं हो जाते हम आगे नहीं बढ सकते । इन तथ्यों में प्रमुख है जीवन का प्रयोजन, कर्म का प्रयोजन, उपासना का प्रयोजन, योग का प्रयोजन, ज्ञान साधन और भक्ति साधना ।

Chapter 10 (i) - जीवन का प्रयोजन

जीवन का प्रयोजन अभी तक जो भी बातें बताई गई उनसे इतना तो समझ सकते हैं कि हम असल में कौन है? हम देख कदापि नहीं हो सकते । हम जीत भी नहीं है बल्कि हम जीवन जीव प्लस बनना है और जीवन की अभिव्यक्ति सभी मनुष्यों में, जानवरों में कीडे मकोडों में सामान्य हैं । सभी मनुष्यों में आंख दीखने का ही काम करती है । हम में जो दृष्टि है ये तत्व सभी प्राणियों में सीम है । उसी प्रकार श्रवण शक्ति जिन उपकरणों से भी व्यक्त हो रही है वो अलग अलग हो सकते हैं । लेकिन श्रवण शक्ति सभी में सामान्य है । देखो सभी प्राणियों की देह पंचमहाभूतों से बने हैं । ऐसा नहीं है कि जो गरीब है उसमें साढे चार महाभूत हैं और जो आमिर है उसमें साढे पांच महाभूत है नहीं । इसलिए इनकी अभिव्यक्ति भी सभी में सामान्य शिरडी साई बाबा की पोती में एक कहानी आती है । एक बार बाबा कहीं से भी शिक्षा लेकर द्वारिकामाई आए तो बहुत जोर जोर से चिल्लाने लगे की कोई है मेरे लिए रोटी बना दू । मुझे बहुत जोर की भूख लगी है । तब वहाँ पर एक लक्ष्मी नाम की एक भक्ति थी । वो आई और बोली बाबा मैं अभी कुछ बना देती हूँ । उसने जल्दी जल्दी कुछ रोटियां बनाई और बाबा को दीदी बाबा ने उनमें से एक भी रोटी नहीं खाई और सब की सब रोटी दरवाजे के बाहर खडे कुत्ते को दे दी । लक्ष्मी बोली, बाबा आपने ऐसा क्यों किया? फिर बाबा बोले क्योंकि वो कुत्ता भूखा था और मैं भी भूखा था लेकिन ये जो भूख है ये मुझे और इस कुत्ते में सामान्य हैं । ऐसा नहीं की मेरी भूख उसकी भूख से अलग है क्योंकि ये तत्व है और इस तत्व की अभिव्यक्ति सभी प्राणियों में सामान्य हैं । उसी प्रकार निद्रा में भी जो डीपली व्यवस्था है वो सभी प्राणियों में एक जैसी है । ये भी एक तत्व है । इसकी अभिव्यक्ति भी सभी में सामान्य है तथा कम मैथुन बच्चे पैदा कर रहा है । ये भी सभी जीवों में सेम है, चाहे वह कीट पतंगा हो या मनुष्य । एक कीडे को जो इस भोग में आनंद मिलता है वो एक वरिष्ठ के आनंद से आई खाती के आनंद से अलग नहीं है । इसलिए कुल मिलाकर चार चीजें हो गई जो की सभी प्राणियों में सामान्य इसलिए कहते हैं आहार निद्रा भय मैं समझा सामान्य में ये तक पशु फिर नराणाम् आहार खाना पीना देखो हम लोग जब से जगत में आते है । उस वक्त से हम लोग खाना शुरू करते हैं और ये जो दिए है ये खाने से ही बना है । तो हमारे जीवन का पहला उद्देश्य बन जाता है खाना पीना । दूसरा निद्रा हम अपना लगभग आधा जीवन सोने में बताते है और आलस्य, निद्रा, प्रमाद में जीवन का मानो एक हिस्सा सा बन जाता है । तीसरा भय अपने को बचाए रखना ये सभी प्राणियों में सामान्य है । इस संसार में कौन मारना चाहता है कोई भी नहीं । केवल कुछ मुर्खों को छोडकर ये वो लोग हैं जो आत्महत्या करते हैं इस पर भी विचार करेंगे । लेकिन थोडा बाद में तथा चौथा जीवन का उद्देश्य है बच्चे पैदा करना । क्या वास्तव में यही मनीष जीवन का उद्देश्य है या इन चारों के अलावा मनीष जीवन का कुछ और भी प्रयोजन हो सकता है । जिस दिन ये प्रश्न हमारे मन में आ जाता है समझ लो उसी समय से हमने आध्यात्मिक साधना में प्रवेश करने का पहला कदम उठाया है । एक बाद हमें स्पष्ट तौर पर समझनी होगी । लाखों करोडों साल की प्रकृति के मेहनत के फलस्वरूप मनुष्य हमें हमें कुछ ऐसे उपकरण प्रदान किए गए हैं जो और किसी भी प्राणी समुदाय में नहीं है । इन उपकरणों में से सबसे बडा उपकरण जो प्रकृति द्वारा मनुष्य को प्रदत है वो है मन तथा बुद्धि, जिसके द्वारा हमारा प्रकृति से परे प्रकृति के अधिपति परमात्मा के साथ हमारा कनेक्शन हो सकता है और प्रकृति स्वयं चाहती है कि मनुष्य अपने स्वरूप को जाने । इसलिए सभी तरह की वस्तुओं को प्रकृति समय समय पर व्यक्त करती रहती है जिसके कारण प्राणी समुदाय में वो सॉल्यूशन संभव होता है । लेकिन मनुष्य में इन सब के बाद अगर आगे कोई वो ऑडिशन संभव है तो वह यह है कि हम अपने असली स्वरूप को समझे और प्रकृति की कैसे निकल जाए । उपकरणों का उद्देश्य एक उदाहरण से समझाते हैं । एक बार में किसी आंख के डॉक्टर के पास आग दिखाने गया क्योंकि कुछ दिनों से मेरे सिर में कुछ दर्द हो रहा था तो डॉक्टर ने मेरा चश्मा क्या आईसाइट विषय करें तो पता चला कि मैंने गलत नंबर का चश्मा बनवा लिया था जिससे सर दर्द हो रहा था । डॉक्टर ने मुझे सही नंबर का चश्मा बनाने के लिए कहा और कहा कि कुछ समय बाद सिर दर्द बंद हो जाएगा । डॉक्टर साहब ने मुझे ऐसे ही पूछ लिया, क्या क्या करते हैं? मैंने उनसे कहा कि मैं भी डॉक्टर हूँ । इस पर वो बोले अच्छा आप किस चीज के डॉक्टर है? मैंने कहा मैं आई डॉक्टर हो तो वो डॉक्टर साहब बोले आपके डॉक्टर मैंने कहा नहीं मैं ॅ डॉक्टर हूँ । ये मैं जो हम अपने आप को कहते हैं ये मैं कौन है ये मैं लोगों को बताने का प्रयास करता हूँ । डॉक्टर साहब मेरी और देखे और बोले आपकी उम्र तो भी कम ही हैं । फिर आप ये क्या चक्कर में पड गए हो और बोले आपस आध्यात्म बाली लाइन में कब से हो अब थोडा ध्यान देना वो डॉक्टर साहब ऐसे ही शायद सत्तर पचहत्तर साल के होंगे और वहाँ अध्यात्मक को लाइन बता रहे थे तो मैं भी कच्चे गुरु को चला नहीं हूँ । मैंने भी कह दिया कि डॉक्टर साहब बस जब से लाइन मारनी छोड दी तब से ये वाली लाइन बिगड ली । दो हसने लगे और बोले अच्छा मेरा एक प्रश्न है क्या आप इसका जवाब दे सकते हैं? हमने कहा पूछिये क्या पूछना है? उन्होंने पूछा बताइए हमारे जीवन का क्या प्रयोजन है? अब मैं हसा और मन में सोचा कि जो आदमी अपने जीवन के सत्तर वर्ष बता चुका है वो ये सवाल पूछ रहा है । यानी उसने सत्तर साल बिना किसी प्रयोजन के ही निकाल दिए । फिर मैंने उनसे कहा, अभी आपने मुझे चश्मा बदलने के लिए कहा । इस चश्मे का क्या प्रयोजन है? देखो, इस चश्मे का अपना कोई प्रयोजन नहीं है । इस चश्मे का मात्र इतना ही प्रयोजन है कि इसके माध्यम से हम ठीक ढंग से देख पाए । यह चश्मा एक इंस्ट्रूमेंट है । इसके माध्यम से हमारी दृष्टि सही ढंग से रंग रूप ग्रहण करती है और यह संसार के रंगरूप हमेशा कश्मीर के माध्यम से वैसे ही दिखते हैं, जैसे वह है । चश्मा अपने लिए नहीं देखता तो दृष्टि के लिए देखता है । उसी प्रकार दृष्टि अपने आप प्रकाशित नहीं होती । ये दृष्टि चेतन ने के प्रकाश से प्रकाशित है । तो देखने वाला कौन हुआ, ये हुआ । मैं आए परमात्मस्वरूप और हमने पुराना चश्मा फेंक दिया, क्योंकि वह हमारी आंखों में फिट नहीं था । फिर मैंने डॉक्टर साहब से कहा कि सर, अब यही बात अपने जीवन के प्रयोजन पर लगाओ । हमारे जीवन का कोई प्रयोजन नहीं है । यदि हम एक अनफिट इंस्ट्रूमेंट है, हमारे जीवन का प्रयोजन उस दिन बन जाता है, जब हम परमात्मा को प्रकट करने का एक फिट इंस्ट्रूमेंट बन जाते हैं । जिस दिन हम परमात्मा को अपने द्वारा प्रकट करने का एक लायक माध्यम बन गए । उस दिन हमारे जीवन का प्रयोजन पूरा हो जाता है । फिर हम कुछ करते नहीं । हमारे माध्यम से बर्मा तो अपने कार्य करवाता है । फिर ये जीवन की धारा बहिर्मुखता से हटकर अंतर्मुखी हो जाती है । इसी को राधा कहते हैं और ये प्रेम और आनंद के द्वारा जगत में अभिव्यक्त होती है । इसलिए भगवान शंकराचार्य कहते हैं याद येट कर्म करोमि ताकत दाद अखिल हम संबोध आवा अरब हम । इसलिए हमारे जीवन का एकमात्र परियोजन यही है कि हमें ऐसे लायक बने कि परमात्मा हमारे माध्यम से प्रकट होने के लिए मजबूर हो जाए । और ये तभी संभव है जब हम परमात्मा द्वारा प्रदत्त उपकरणों, मन, बुद्धि, इंद्रियों को गर्म के द्वारा शुद्ध करके अंत में इन सभी उपकरणों को उस परमात्मा में मिला दें ।

Chapter 10 (ii) - कर्मो का प्रयोजन

कर्मों का प्रयोजन भगवत गीता में भगवान तीसरे अध्याय में कहते हैं ना ही कश् शिक्षण भी जाती हूँ तिष्ठतु या कर्म कृत कार्य थी या आवश्यकता कर्म सरवाहा प्रकृति जयगुरु नहीं है । कोई भी मनुष्य किसी भी अवस्था में अथवा काल में छठ मात्र के लिए भी कर्म किये बिना नहीं रह सकता क्योंकि प्रकृति की परिवर्त हुए सभी प्राणियों से प्रकृति द्वारा उत्पन्न गुड कर्म करवा लेते हैं । कर्म को लेकर जितनी ध्यान दिया है शायद ही किसी चीज को लेकर होगी इसलिए इसको हम थोडा ध्यान से समझते हैं । भगवान कहते हैं कि हम हर्षण कर्म कर रही है, सोते जागती उठते बैठते एक्शन के लिए भी हम कर्म से नहीं छूटते हैं । जब हम इस पृथ्वी पर आते हैं जिनमें से ही हम कुछ न कुछ करने लग जाते हैं । हम यहाँ पर पिछला जन्म, अगला जन्म, पाप पुण्य का ज्यादा विवेचन नहीं करेंगे । लेकिन एक बात यहाँ पर जानने योग्य है कि भले ही हम इस देख को जन्म के वक्त ग्रहण करते हैं परन्तु हम एक अखंड अविनाशी सकता है तथा हमारे संस्कार कलेक्ट्रेट में मेरी ही है जो इस जीव के लिए ये निर्णय करती है कि वह किस देखता धारण करेगा । इसलिए ये बात बिल्कुल स्पष्ट समझ लेना चाहिए कि हम अपने बच्चों को केवल देखा प्रदान करते हैं । उस देह का स्वामी दही हम निर्माण नहीं करते । जिस प्रकार हम घर बनाते हैं परन्तु घर का किरायदार हम नहीं बनाते । हमारा जीवन दो तरह के संस्कारों से ही चलता है वहाँ राग और द्वेष एक छोटा बच्चा कहता है मुझे दूर अच्छा नहीं लगता है, मुझे तो आइसक्रीम अच्छी लगती है तो इराक दिवेश का क्या लॉजिक है? ये है हमारी कलेक्ट्रेट मैं मेरी जो हमने बहुत सारे जन्मों में बनाई है और हमारा वर्तमान जीवन भी राग द्वेष से ही प्रेरित होकर चलता है और ये ऍम मरीज ही हमारे अगले जन्म की रूपरेखा तैयार करते हैं । तो क्या हम जो भी कर्म करते हैं वो अगला जन्म लेने के लिए करते हैं? ऐसे तो कभी भी हम जन्म मरण के इस चक्र से छूट ही नहीं पाएंगे लेकिन ऐसा नहीं है । भगवान भगवत गीता में ही कहते हैं कर मानू या पी बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मण रहा अगर मनुष्य बोद्धव्यं गहना कर्मणो गति ही कर्मों की गति बहुत ही गहन है अर्थात कर्मों को समझ पाना आसान नहीं है । इसलिए सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि गर्म होते क्या है और गर्म का प्रयोजन क्या है? एक उदाहरण लेते हैं एक बार में डिस्कवरी चैनल पर कुछ देख रहा था । मेरी बिटिया जो आठ साल की थी वह साथ बैठी थी । तभी टीवी में एक शेर हिरण का पीछा करके उसे दबोच लेता है और उसे मार डालता है । तभी मेरी बिटिया कहती है कि पापा ये देखो शेर कितना गन्दा है । बिचारे हिरण को मार दिया । भगवान भी अब शेर को सजा देंगे । मैं उस वक्त चुप हो गया और मैंने टीवी बंद कर दिया । लेकिन फिर मैंने चिंतन शुरू किया की क्या उस शेर को हिरण को मारने की सजा मिलेगी क्योंकि अगर वही हिरन को एक आदमी मार देता तो उसको सजा मिलना तो तय था परन्तु अगर शेर ने मारा तो सजा मिलेगी या नहीं, इस पर चिंतन शुरू हो गया और इसी चिंतन के द्वारा मुझे कर्म के सिद्धांत का रहस्य पता चला । भगवान भगवद्गीता के अंत में जाकर कहते हैं पाँच चेदानी महाबाहो कार्य नानी निबोध में सांख्यिक रितान ते प्रोक्ता नी सिद्धये सर्व कर्म नाम अधिष्ठान अम् तथा करता कर्णम । चार । पृथ्वी धाम विधा आशय प्रत्यक्ष चेष्टा । डेवन चाहे मात्र पंचमम् हे अर्जुन! गर्म ओं का अंत करने वाले साख्य सिद्धांत में संपूर्ण कर्मों की सिद्धि के लिए पांच कारण बताए गए हैं । इन को तो समझ ले ये पांच कारण है अधिष्ठान करता अनेक प्रकार के कारण विभिन्न चेष्टाए एवं पांचवां कारण है देव अथवा संस्कार अधिष्ठान करन, चेष्टा तथा संस्कार मिलकर क्रिया का निर्माण करते हैं परंतु इस क्रिया के साथ जब करता जुड जाता है तब कर्म का निर्माण हो जाता है । क्रिया प्लस करता गंतत्व, अभिमान, कर्म कर्म की बहुत अच्छी परिभाषा मैंने एक पुलिस वाले सीसीटी एक बार की बात है । उस समय में पंतनगर में पडता था तो मैं किसी काम से हल्द्वानी गया, वहाँ पर और चलते हैं और ऑटो में बडी भीड होती है । आगे वो ड्राइवर की सीट होती है । लेकिन हमारे ऑटो वाले ने आगे वाली सीट पर तीन लोगों को बैठा दिया और खुद साइड में बैठ करोडो चला रहा था तथा मैं स्टीरिंग के बिल्कुल सामने बैठा था । तभी एक पुलिस वाले ने ऑटो को रोका और वो मुझे डांटने लगा कि तुम ने इतने लोगों को क्यों बिठाया? अब तुम्हारा चालान होगा । तभी मैंने उसे कहा कि ऑटो मैं नहीं चला रहा हूँ । मैं तो यात्री हूँ तो उस पुलिसवाले ने मुझे छोड दी और मुझे सौरी कहा और इसलिए ड्राइवर को पकड लिया । उस दिन मुझे समझ आ गया कि ट्रैफिक की रूल उसी पर लागू होते हैं जो गाडी चलाता है । गाडी में बैठने वाले पर ट्राफिक के रूल लागू नहीं होते हैं । अब यही बात कर्म पर लागू होती है । क्रिया शुरू होती है और खत्म हो जाती है । क्रिया कर्म तभी बनता है जब उसके साथ करता जुड जाता है । जैसे हम ने खाना खाया ये कर में है क्योंकि वहाँ पर कर्तृत्व अभिमान है कि मैं खाना खा रहा हूँ । एक बार खाना पेट में गया तो क्या कभी हमें अभिमान होता है कि मैं खाना बचा रहा हूँ । खाना बचाना ये क्रिया है क्योंकि यहाँ मैं खाना बचा रहा हूँ । ये कर्तापन नहीं है तो अगर उस खाने के द्वारा कॉन्स्टिपेशन हो गया तो पाप नहीं और डीसेंट्री लग लगी तो पुण्य नहीं लगता । जहाँ जहाँ क्रिया के साथ मैं जुडा है वहाँ कर्म का निर्माण होता है और इस कर्म से कर्मफल इच्छा का निर्माण होता है । यही कर्मों में राग द्वेष का निर्माण करती है और फिर पाप पुण्य, शुभ अशुभ सब धंदा शुरू हो जाता है । भगवान भगवत गीता में कहते हैं तो न कर्तृत्व न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः न कर्मफल सहयोग हम स्वभाव वस्तु प्रवर्तन थी । परमात्मा की श्रृष्टि में कर्म नहीं है क्योंकि वहाँ कर्तव्य अभिमान नहीं है । इसलिए भगवान कहते हैं कि ना में कर्म का निर्माण करता हूँ, न कर्तृत्व अभिमान का और ना ही कर्मफल मेरे द्वारा दिए जाते हैं । ये सब प्रकृति में होता है । मनुष्य में प्रकृति जन्य गुणों के कारण से उत्पन्न स्वभाव मनुष्य से ये सब करवाता है । उदाहरण के लिए माँ को अपने बच्चे से प्यार होता है । माँ अपने बच्चे से प्यार करती नहीं और एक लडका लडकी से प्यार करता है । उनका प्यार होता नहीं इसलिए लडका लडकी कहते हैं विहार फॉरेन लाभ वे प्यार में गिरते हैं तो चोट लगने स्वाभाविक है । जब एक औरत मा बनती है तो सब उसे बच्चे की देखभाल करने की सलाह देते हैं । कोई ये नहीं कहता या सिखाता की उसे अपने बच्चे से प्यार कैसे करना है । क्योंकि माँ अपने बच्चे से प्यार ये ईश्वर श्रीश्री में ये क्रिया है और एक लडकी का लडकी से प्यार । ये जीव सृष्टि के ये कर में है एक उदाहरण और लेते हैं गंगा नदी को हिंदुओं में मानता तू ले समझा गया है तथा इसका पानी गंगाजल बहुत शुद्ध माना गया है । माँ गंगा जब गोमुख से निकलकर गंगा सागर की ओर बहती है तो ये करोडों लोगों की प्याज बुझाती है तो गंगा को इसका पुण्य नहीं मिलता और यही गंगा माता जब विकराल रूप धारण करके सुनामी, बाढ आदि के द्वारा गांव और शहरों का नाश कर देती है तो गंगा को इसका पाप नहीं लगता क्योंकि गंगा का बहना ये क्रिया है । गंगा माता में कर्तत्व अभिमान नहीं है इसलिए वहाँ पाप पुण्य कुछ नहीं । भगवान इसी बात को भगवत गीता में कहते हैं । यह सेना अमृतो भावः धीरे सियाना लिखते थे हत्वा पीस इमाम लोग का ना हन्ति ना निबध्यते जिस मनुष्य में मैं कर रहा हूँ ऐसा भाव नहीं है तथा जिसकी बुद्धि गर्म में ली पाय मान नहीं है वो यदि संसार के सभी लोगों को मार डाले तो भी ये कर मना उसको लगता है और ना वो िसकर्म के द्वारा बढता है । जैसे यदि हम सपने में किसी व्यक्ति की हत्या कर देते हैं तो क्या जागृत अवस्था में हमें उसका पछतावा होगा और क्या हम पर पुलिस केस चलेगा? नहीं क्योंकि इस वक्त व्यवस्था में बुद्धि होती ही नहीं, वहाँ सिर्फ मान कार्य करता है । उसी प्रकार जो इस जागृत सपने से ऊपर उठ गया है । वो जगत में कुछ नहीं करता । उसके माध्यम से परमात्मा अपना कार्य करवाते हैं और जितने भी हमारे बडे साधु संत हो गए उन्होंने कभी भी कोई कार्य मैं कर रहा हूँ ये सोचकर नहीं किया । उन के माध्यम से हर इच्छा द्वारा में सभी महान कार्य संपन्न हुए । जैसे भगवान शंकराचार्य, भगवान रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद भगवान कहते हैं कि मनीष दे हमें प्रकट होने के बाद तो कर्म करने ही पडेंगे और मैं भी जब देख के रूप में पृथ्वी पर अवतार लेता हो तो मैं भी कर्म करता हूँ । गर्म से कोई नहीं बच सकता । जो लोग घरों में कथा, पूजा, हवन कराते हैं उन्हें पता होगा कि वास्तव में यजमान कुछ नहीं करता । संपूर्ण यज्ञ पंडित जी करते हैं इसलिए यज्ञ कर्मकांड का फल पंडित को ना मिल जाए । इसके लिए पंडित जी यज्ञ से पहले यजमान से एक एफिडेविट हस्ताक्षर कराकर भगवान को भेज देते हैं । इसको हम संकल्प कर लेना । कहते हैं कि मैं अमुक स्थान पर इस काल में अपने पडोसी के नाश करने के लिए ये यज्ञ कर रहा हूँ । ये भगवान फॅमिली नो डाउन इसका पर मुझे ही मिले । पंडित या किसी अन्य को नहीं तो इसको कहते हैं कर्म इसमें अब चार जी से हो गई गर्म करने का संकल्प, क्रिया कर्तव्य, अभिमान और कर्मफल, अच्छा कर्म करने का संकल्प कर्तव्य अभिमान और कर्मफल अच्छा । ये तीन चीजें मैं से उत्पन्न है गर्म करने का संकल्प मैंने क्या कर्तव्य विमान मेरा है और इस कर्म के द्वारा फल भी मुझे मिले । इसको शास्त्रविधि में कर्म भो कहा जाता है तथा जब ये तीनों चीजें तो है लेकिन कर्मफल भगवत को अर्पण कर देते हैं तो इसे कर्मयोग कहते हैं । इन सब बातों से यह तो स्पष्ट हो गया कि हम काम करने से बच नहीं सकते लेकिन गर्म भूख स्थान पर कर्मयोग को धारण किया जा सकता है । भगवान भगवत गीता में कहते हैं का ये मन ऐसा बुद्धिया केवल नरेंद्र यही रवि योगी वहाँ कर्म कुर्वन्ति सङ्गं । त्यक्त्वा तो मशरत दिये जो बुद्धि जान लोग है वह कर्म केवल संसार के संबंध और संग्रहण से आ सकती हटाने के लिए तथा आत्मशुद्धि के लिए ही करते हैं । बाकी उनको कर्मों से और कोई प्रमोशन नहीं रहे था । उपनिषद में अविद्या, कम कर्म इनको हृदय ग्रंथि कहा गया है । जगत की वस्तुओं को सत्य मानकर उन की प्राप्ति की इच्छा को कम कहा जाता है । और जब हमारे कर्म काम के द्वारा प्रेरित होते हैं तो इसी को हृदय ग्रंथियां गार्ड कहते हैं जो हमें संसार से बात भी है । लेकिन जब हमारे कर्म काम के द्वारा प्रेरित नहीं होते तो यही कर्म हमारे लिए मोक्ष के द्वार का साधन बन जाते हैं । फिर हम जीवन में घटने वाली प्रत्येक घटनाओं से सीखना शुरू करते हैं और जिस कार्य के द्वारा हम सीखते हैं उसके संस्कार हमारे चित्र पर नहीं पडते । जैसे कि पहले भी बताया गया है प्रत्येक कर्म के दो ही संस्कार हमारे मन पर पडते हैं । राग और द्वेष और हमारे जीवन का केवल यही उद्देश्य मात्र है कि जो हमारे जन्मजन्मांतर के संग्रहित संस्कार है उन्हें ज्ञान की अग्नि के द्वारा नष्ट करके नए संस्कार ना बनने दें । जिस दिन हमारे संस्कारों का अकाउंट जीरो हो गया, उस दिन हम परमात्मा के साथ एक स्वरूप हो जाएंगे । जब हम जीवन के प्रत्येक कर्म को परमात्मा से जोड देते हैं तब हमारे जीवन का हर एक अनुभव आध्यात्मिक साधना बन जाता है । उदाहरण के लिए बचपन में प्रत्येक मनुष्य ने कभी कभी अग्नि को स्पर्श अवश्य क्या होगा? अब आपने अपने आप से पूछे कि क्या आपके मन में अग्नि के लिए प्रेम है या द्वेष कुछ भी नहीं है न राग नादवी क्योंकि हमने उस कर्म के द्वारा सीखा की अग्नि गर्म होती है । इस को हाथ नहीं लगाना चाहिए । हमने सबसे बडी गलती यही कि कि हम सीखते नहीं है । एक बार कहीं पर रामायण की कथा चल रही थी तो जो कथावाचक थे बडे ही करुणा भाव में कथा कह रहे थे । वो बता रहे थे कि रामचन्द्र जी को जब वनवास हो गया तो उस समय जब अयोध्या से जा रहे थे तो दशरथ कैसे रो रहे थे । उसको बडे विस्तार से बता रहे थे तो एक हमारे मित्र ने हमसे पूछा कि देखो पब्लिक कैसे हो रही है? आप इस पर क्या कहना चाहोगे? हमने कहा ये सब बेवकूफ है क्योंकि इन्होंने रामायण से कुछ सीखा ही नहीं । और इस बात पर हमारे मित्र ने हमसे कहा तो आपने क्या सीखा? हमने कहा देखो हमने रामायण के इस प्रसंग सी ये सीखा कि अगर स्वयं भगवान भी आपके पुत्र बनकर आ जाए तो भी अगर आप में ज्ञान की कमी है तो आप की मृत्यु का कारण वो आपका पुत्र ही बनेगा । जब भगवान पुत्र है तो दशरथ जी का ये हाल है । हमारे और आपके पुत्र तो कबूतर है तो हमारा क्या हाल होगा और दूसरी तरफ हमने भगवान राम से ये सीखा कि जब उन्हें राजा बनने के लिए कहा गया तो वे बिल्कुल शांत थे और जब उन्हें वनवास में जाने के लिए कहा गया तब भी वह उतने ही शांत थे क्योंकि भगवान राम ने दस साल की उम्र में ही भगवान वशिष्ठ से योग वशिष्ठ का ज्ञान प्राप्त कर लिया था । इसलिए मैं जानती थी ये जगत कुछ नहीं है ये मेरा ही विस्तार है । में चाहे महल में रहूँ या जंगल में क्या फर्क पडता है । जब कोई कार्य शुरू करने से पहले आप के मन में की स्थिति तथा कार्य खत्म होने के बाद आपके माने की स्थिति एक जैसी शांत प्रसन्न रहती है तो उस कार्य का आप पर कोई संस्कार नहीं पडता तथा जब हम उस कार्य से कुछ सीख कर अपनी पुरानी गलत धारणाएं समाप्त कर देते हैं तो हमारे पुराने संस्कार धीरे धीरे छेड होने लगते हैं । यही सभी कर्मों का प्रयोजन है ।

Chapter 10 (iii) - उपासना का प्रयोजन

उपासना का प्रयोजन गर्मी की प्रसंग में हमने देखा कि कर्म हमें संसार से बांधता है । हम बचपन से कुछ न कुछ कर्म करते हैं । कुछ पाने के लिए कर्म ये आदि बहुत क्षेत्र है जहाँ पर हम अपने देहात, मन, बुद्धि तथा वाणी के द्वारा कार्य करके संसार में कुछ करना चाहते हैं । लेकिन जब हम अपने सामर्थ्य से कुछ कार्य नहीं कर सकते हैं, अपने को किसी वस्तु की उपलब्धि के लिए तैयार नहीं समझते हैं तब हम आदि देवी क्षेत्र में प्रवेश करते हैं जिससे हम विभिन्न देवी देवताओं की शक्ति का आवाहन करके अपने कार्य को सिद्ध करना चाहते हैं । इसमें गलत कुछ नहीं है लेकिन हमारे अज्ञान की परिकाष्ठा तो तब हो जाती है जब हम विभिन्न कर्मकांडों को भक्ति का नाम दे देते हैं । एक बार बहुत ही स्पष्ट तौर पर समझ लेनी चाहिए कि ये भक्ति नहीं है की उपासना का क्षेत्र हैं, उपवास लगाते हैं । उप नजदीक आसन बैठना परमात्मा के नजदीक जाकर बैठा लेकिन उपासना जब कर्मकांड तथा अपनी इच्छाओं की पूर्ति का साधन बन जाता है और आदमी इसमें इतनी बुरी तरह फंस जाता है कि वो ये भूल जाता है कि आज तक किसी भी मनुष्य की संपूर्ण इच्छाएं पूरी नहीं हुई है और न होंगी । लेकिन हम लोग यही सोचते हैं कि अपनी इच्छाओ को पूरा करना ही जीवन का उद्देश्य है । एक बार बहुत ही स्पष्ट तौर पर समझ ले जहाँ जहाँ अच्छा कामनापूर्ति है वहां वहां संसार है और जो आपको इच्छा पूरी करने में लगता है वो आपका गुरु या हितेषी नहीं वह का सबसे बडा दुश्मन है । हमारे जीवन का उद्देश्य अपनी इच्छाओ को पूरा करना नहीं बल्कि सभी इच्छाओ से बडे चले जाना है । सच्चा गुरु है जो आपको इच्छाओ से परे ले जाता है । अगर आप और हम अपने जीवन का अवलोकन करें तो पाएंगे कि आज तक हमने क्या किया । हमने सिर्फ अपनी इच्छाओ को पूरा करने का असफल प्रयास किया । असफल इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि क्या हमारी सभी छह पूरी हो गई । अगर आपकी सभी चाय पूरी हो गई और आपको अब कोई भी इच्छा नहीं हो, यहाँ की जीने की भी नहीं और मरने की भी नहीं तो आपको कुछ भी पढने, लिखने, सीखने, पूजा पाठ करने या ये किताब पढने की भी जरूरत नहीं है । आप मुक्त हो चुके हैं लेकिन हम जानते हैं कि अभी हमारे अंदर छावडा कामनाओं का पहाड है । एक बार एक बहुत ही विद्वान पंडित जी ने मुझे बोला कि आप कहते हैं कि भगवान से कुछ नहीं मांगा । हम मनुष्य लोग तो दुखी है, अज्ञानी है इसलिए भगवान की शक्ति का आवहन अपनी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं । यदि भगवान को हमारा मांगना पसंद नहीं होता तो वे हमें देते हैं क्यों? इसलिए भगवान भी जाते हैं कि मनुष्य मेरी शरण में आए और मैं उसकी इच्छाएं पूरी कर दूँ तो इसमें गलत किया है । हमने कहा कुछ गलत नहीं है । हमने कब कहा कि गलत है । ये तो अच्छी बात है कि अब भगवान की शरण में जा रहे हो । उनसे मांग रहे हो क्योंकि भगवान ने स्वयं कहा है कि मुझे जो जिस भाव से जो बचता है मैं भी उसे उसी प्रकार से भजता हूं अर्थात उसको फल देता हूँ । तुलसीदास जी भी कहते हैं जाकी रही भावना जैसी प्रभु सूरत देखी तिन तैसी । कई लोग ये भी कहते हैं कि भगवान तो परमात्मा है और उनकी संतान है और यदि एक संतान अपने पिता से नहीं मांगेगा तो किससे मांगेगा । अब एक बात ये ध्यान देने वाली है कि क्या हम भगवान को परम पिता स्वीकार करते हैं? यदि हाँ तो क्या एक पिता को ये नहीं मालूम कि मेरे बच्चे के लिए उपयोगी चीज क्या है और क्या अनुपयोगी है और क्या हितकारी वस्तु है और क्या अहितकारी देखो एक बात बहुत ही स्पष्ट समझ लेनी चाहिए कि हमको जो भी परमात्मा से मिलता है या मिला है वही हमारे लिए श्रेयस्कर हैं । परन्तु हम लोग श्री और प्रिया में अंतर नहीं समझते । हम वो चीज चाहते हैं जो हमें प्रिया लगती है ना कि वो जो हमारे उद्वार के लिए श्रिय की है । एक उदाहरण से थोडा समझने का प्रयास करते हैं । मान लो कक्षा छह में पढने वाला कोई बच्चा है । अब वो अपने किसी दोस्त के पास एक रिमोट वाली गाडी देख लेता है । फिर वह घर बनाकर अपने पिता से कहता है कि मुझे वैसे ही गाडी चाहिए तो पिताजी क्या कहेंगे? बेटा तुम्हारे पास पहले से ही बहुत गाडियाँ हैं तो इसको लेकर क्या करोगे लेकिन बच्चा अपनी जिद पर बना रहता है तो हारकर पिताजी कहते हैं ठीक है मैं तुझे वैसी गाडी लाकर दूंगा । लेकिन मेरी एक शर्त है कि तुझे अपनी कक्षा में प्रथम आना पडेगा तो वो बच्चा मान जाता है और वह कक्षा में प्रथम आने के लिए पढाई करना शुरू कर देता है । अभी सुधर से हमने क्या सीखा? हमने ये सीखा कि बच्चे को पता नहीं है कि मेरे लिए क्या ज्यादा महत्व की वस्तु है गाडी या पढाई लेकिन एक पिता ने बच्चे की इच्छा पूरी तो की लेकिन क्या पिता का उद्देश्य बच्चे की इच्छा पूरी करने का था? नहीं । उसका उद्देश्य बच्चे की किसी तरह उसके लिए जो भी श्रेष्ठ कर मार्ग है उस पर लगाना था । उसी प्रकार भगवान भी हम लोगों की इच्छापूर्ति करते हैं कि कभी ना कभी तो इस मुल्क बच्चे का मन मुझसे लगेगा । कभी तो मेरे बारे में जाने की इच्छा मेरे बच्चों में होगी । एक बात बहुत ही स्पष्ट समझ लेनी चाहिए कि जो वस्तु परिस्थिति में हम इस वक्त है वही हमारे उद्वार के लिए सर्वश्रेष्ठ है । अर्जुन भगवान से पूछता है की है भगवान ने स्थित प्रज्ञा आदमी स्टेडी विंस दिन के क्या लक्षण होते हैं? स्थित प्रज्ञा मतलब जिसका ज्ञान वेज हम कभी करप्ट नहीं होता है । तब भगवान कहते हैं तो वजह हाथ ज्यादा काम रात सर्वान् बार थम मनोज टन आत्म ये बात माना तुष्टः स्थित प्रज्ञ स्त दो चित्ते जिस वक्त मनुष्य के मन में सभी कामनाओं का अंतर हो जाता है और वो अपने आप में ही संतुष्ट रहता है । उस वक्त समझो वो स्टडी वजह अवस्था में पहुंच गया है । लेकिन हमारी समझदारी करप्ट होती रहती है । एक बार हम अपने दोस्तों के साथ वृन्दावन गए । वहाँ प्रेम मंदिर में हमने भगवान के दर्शन किये और जब बाहर आए तो सभी मित्रों में ऐसी ही बात चलने लगी कि भगवान से किसने क्या मांगा । सभी बजाने लगे कि हमने ये मांगा । हमने वो मांगा तब सब हम से भी पूछने लगे और डॉक्टर आपने मांगा । उस वक्त मैंने कहा कि कुछ नहीं उस वक्त पता नहीं क्या हुआ । जैसे ही मैंने कुछ नहीं मांगा, ऐसा कहा । मुझे एक अद्भुत शांति का अनुभव हुआ क्योंकि सब कुछ देने वाला था । भले ही वो अनुभव कुछ समय के लिए ही था मगर उस वक्त मुझे ऐसा लगा मानो मुझे सब कुछ मिल गया । उस समय के बाद मैंने निर्णय लिया कि भगवान से मैं कभी कुछ नहीं मांगा । उस समय के बाद मेरे जीवन में एक आम नागरिक परिवर्तन आया और उसी परिवर्तन के कारण आज मैं इस किताब के माध्यम से अपने विचार व्यक्त कर पा रहा हूँ । थोडा ध्यान से चिंतन करना हम लोग मंदिर जाते हैं, अच्छी बात है लेकिन हम वहाँ जाकर क्या करते हैं । भगवान के साथ खुल्लम खुल्ला व्यापार करते हैं । इसी को कहते हैं मैं ऍम ऍम । हम भगवान से कहते हैं कि ये भगवान आपके पास अपारशक्ति है मगर इच्छा एक भी नहीं और मेरे पास अपार इच्छाए है मगर उन्हें इच्छाओ को पूरा करने की शक्ति बिल्कुल नहीं । इससे आपकी शक्ति व्यर्थ नष्ट हो रही है और मेरी चाय पूरी नहीं हो रही है । तो क्यों ना हम एक एमओयू कर ले । आप अपनी शक्ति से मेरी चाय पूरी कर देना और बदले में मैं आपको कुछ चढावा चढा दूंगा । देखो ये नाता उपासना है और ना भक्ति । ये उपासना का बिगडा रूप है जिससे हमारी श्रद्धा, वासना, भक्ति तथा भगवान तो बन जाते हैं साधन तथा ये देख और संसार बन जाता है साथ में इससे हमें अपने आप को बचाना है । एक बात अच्छी तरह से समझ ले । कर्म, उपासना, धर्म, ज्ञान, भक्ति ये सब साधन है और परमात्मा अंतिम लक्ष्य साधे हैं और एक बार आप परमात्मा तक पहुंच गए तो ये सब साधन छोड दे रहे हैं । इनमें फैसला नहीं है जैसे हम कपडों से मैं निकालने के लिए उन कपडों पर सावन लगाते हैं और उन्हें रगडते हैं लेकिन हम कपडों पर साबुन को लगा नहीं छोड के अंत में उसे भी निकाल देते हैं । उसी प्रकार सभी साधन जरूरी है पर इंडियन लक्ष्य नहीं है । लेकिन जब तक हम अपनी समझदारी को ठीक नहीं करेंगे तब तक हम इधर उधर भटकते रहेंगे और परमात्मा के अलावा हमें हर वस्तु की चाहे होगी भगवान रमना ऋषि कहानी कहते थे । वो बता रही थी कि जब तक हम अपने आप को सही ढंग से नहीं जानेंगे हम परमात्मा को छोडकर हर वस्तु की चाह करेंगे । ये बता दिए थे कि एक बार किसी महात्मा जी ने भगवान की बडी कठोर तपस्या की । भगवान विष्णु अपना वाहन लेकर उसके पास आए और बोले मेरे साथ चलो अब तुम वैकुंठ में रहना । महात्मा जी ने कहा कि ये भगवान मैं अकेला नहीं जाना चाहता । मैं औरों का भी भला करना चाहता हूँ । मैं कुछ लोगों से पूछता हूँ अगर वो हमारे साथ आएंगे तो उनका भी उद्वार हो जाएगा । इस पर भगवान बोले कि ये महात्मा आप अपना उधार करो फिर भी अगर तुम जिद कर रहे हो तो जिसे तुम कहोगे वो हमारे साथ आ सकता है । फिर महात्मा जी एक संन्यासी के पास गए और बोले सन्यासी भगवान के यहाँ से ऑफर है । आप मेरे साथ चलो सीधे वाॅर्ड । इस पर सन्यासी बोले, नहीं, अभी मैं कैसे आ सकता हूँ । अभी तो मेरे चेले बनने शुरू हुए हैं, फिर आश्रम बनेगा । फिर उस आश्रम में मैं प्रवचन दिया करूंगा । अभी मैं तुम्हारे साथ नहीं आ सकता । विचारे महात्माजी हताश हो गए और वह एक बानरस थी । रिटायर्ड पोषण के पास गए और फिर यही कहा । इसपर बानरस थी, बोला मैं तुम्हारे साथ कैसे आ सकता हूँ? अभी तो भगवान का मंदिर बनाना शुरू किया है । फिर इसमें मूर्ति स्थापित करनी है । फिर भगवान को नीति स्नान करना है, पूजा करनी है । मैं भला अभी कैसे आ सकता हूँ । इस पर महात्माजी थोडे और निराश हो गए । फिर गृहस्थी के पास गए और बोले, चलो भगवान के वैकुंठ से भगवान का वहाँ लेकर आया हूँ, वहाँ रहेंगे । तब ग्रहस्थ आदमी बोला आपका दिमाग खराब हो गया । अभी तो मेरे बच्चे छोटे हैं । अभी तो इन की शादी करानी है । फिर इनके बच्चों को खिलाना है । अभी मैं कैसे आ सकता हूँ । फिर महात्मा जी वहाँ से भी लौट गए और अंत में वो ब्रह्माचारी स्टूडियो के पास गए, जो वेदों का अध्ययन कर रहा था । महात्मा जी ने उस ब्रह्माचारी से कहा कि तुम वेद का अध्ययन क्यों कर रहे हो? ब्रह्मचारी बोला ज्ञान के लिए ताकि परमात्मा को जान से को तब महात्मा जी बोले कि है पुत्र भगवान स्वयं आए हैं । तुम चाहो तो अभी तुम भगवद्धाम चल सकते हो मेरे साथ । इसपर ब्रह्मचारी बोला अभी तो मैंने केवल एक ही बेड पडा है । अभी औरों का ही अध्ययन करना है । फिर ज्ञान का विस्तार करना है । लोगों को भगवान के बारे में बताना है । अभी मैं आपके साथ नहीं आ सकता । फिर महात्मा जी बहुत परेशान होकर भगवान के पास लौट रहे थे । तभी रास्ते में उन्हें एक सोवर मिला । महात्मा जी ने सोचा बिचारा सुवर योनि कितनी गंदी है इसको इससे निजात दिलाने के लिए इसके उद्वार के लिए एक बार इससे भी पूछ लेता हूँ तो वो सोवर से पूछते हैं कि देखो तुम याद धरती पर कितनी गंदे रहते हो तो मेरे साथ वैकुंठ चलो वहाँ तुम आराम से भगवान के साथ रहना । इस पर सोवर कहता है कि मैं अकेला नहीं हूँ । मेरी पत्नी स्व । रानी फीमेल पिक भी है । मुझे उस से पूछना पडेगा । महात्मा जी ने कहा ठीक है तो पूछता हूँ मैं यही तुम्हारा इंतजार करता हूँ । कुछ देर बाद सुबह वापस आया तो बोला कि स्वरागिनी कह रही है कि हमें नहीं पता ये वैकुंठ क्या होता है लेकिन हमारा खाना अगर वहाँ मिले तो हम वहाँ चल सकते हैं । इस पर महात्मा जी को बहुत गुस्सा आया और मन में बोले मैं यहाँ हीरे बेचने की बात कर रहा हूँ और लोग मुझ से ही मांग रहे हैं । यही संचार है । किसको चाहिए भगवान किसको चाहिए? शांत मन अगर एक बार हम जगत में फस गए तो हमें परेशान रहने की भी आदत पड जाती है । फिर हम भगवान को सिर्फ एक जरिया मात्र समझ लेते हैं । अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए उपवास लगा दूसरा स्तर है सिर्फ दिया या अपने में दैविक शक्तियों का जागरण । जब हम जगत में कुछ साबित करना चाहते हैं तो उसके लिए हम दैनिक शक्तियों का आवाहन करते हैं और पूरा जीवन इसी में बर्बाद हो जाता है । एक बार बहुत ही अच्छी तरह समझ ले । जहाँ पर लेन देन है वहाँ प्रेम नहीं होता । आपने कुछ कर्मकांड क्या उसका फल आपको इच्छापूर्ति सिद्धि से मिल गया? इससे आप परमात्मा जो सभी शक्तियों का स्रोत है उसको नहीं पा सकते हैं । ये उसी प्रकार है कि जैसे हम एक साहूकार के पास नौकरी के लिए गए । हमने कुछ काम किया । बदले में साहूकार ने हमें कुछ पैसे दे दिए तो पैसे खत्म हो गए । फिर से साहूकार के बाद गए । फिर से कुछ काम किया और फिर कुछ मिल गया । इससे साहुकार आपका नहीं होगा और न ही वह अपनी तिजोरी की चाबी आपको देगा । लेकिन अगर आप ड्यूटी को डिवोशन में बदल देते तो शायद साहूकार आपका हो सकता है । उसी प्रकार अगर हमें सभी इच्छाओं का त्याग करके सिद्धियों की कामना बिना नित्य कर्तव्य कर्म के द्वारा अपना अंत करने, शुद्ध करके उपासना के द्वारा शुद्ध अंतःकर्ण को परमात्मा में लगाए तो हमें जो प्राप्त होगा वो उसी प्रकार होगा जैसे हमें सभी छाव का त्याग करके गहरी नींद में प्राप्त होता है । एक बार एक आदमी ने मुझसे पूछा कि राॅ बुरा मत मानना, लेकिन भगवान का नाम लेने से क्या मिलता है? मैंने उससे कहा कि देखो तुम भी बुरा मत मानना तो बनी हो गया, बोला नहीं, मैंने कहा लेकिन बातें तुम बनी है, जैसे ही कर रहे हो । देखो भगवान का नाम लेने से कुछ नहीं मिलता । लेकिन भगवान का नाम जी वहाँ पर आता है, आपके जीवन की सबसे बडी उपलब्धि है । फिर मैंने उसे कहा तो मैं सोने से क्या मिलता है बल्कि निद्रा में तुम जो भी तुम्हारे पास होता है वो खोल लेते हो और निद्रा की कीमत उससे पूछो जिसे नींद ना आने की बीमारी है उसी प्रकार हमें भगवान का नाम ना लेने की बीमारी है । एक बार इस बीमारी से निकल कर देखो फिर जो तुम्हें मिलेगा आपको संसार की किसी वस्तु से नहीं मिल सकता । भगवान् शंकराचार्य कहते हैं न कर मनाना प्रजा या धनी त्याग नहीं के अमृतत्व मान शुरू न कर्म के द्वारा शिष्यों को बढाकर या फिर बच्चे ही पैदा कर के और ना ही धन के द्वारा अमृतत्व की प्राप्ति नहीं हो सकती बल्कि एकमात्र अमृतत्व की प्राप्ति का साधन इन सब का त्याग है । अब यहाँ पर एक सवाल जो सभी के मन में उठता है कि हम नौकरी छोड दें, क्या घर छोड दी और क्या सैलरी लेना छोड दें ऐसा कुछ छोड छाड कर हिमालय पर चले जाएँ । इन सब का यह अर्थ कदापि नहीं है । जो भी भगवत गीता में उपनिषद में बताया गया है । ये सब बातें हमें अजीब लगती है क्योंकि हम उन सभी बातों का प्रयोजन सही ढंग से ग्रहण नहीं करते हैं । हमें कर में भी करने है, उपासना भी करना है, धर्म पर भी चलना है तथा योग को भी पकडकर रखना है । लेकिन ये सब साधन है जिस प्रकार हमें नौकरी भी करनी है बाबा जी नहीं बनना है । परंतु हर वक्त ये ध्यान रखना है की हमारे जीवन का प्रयोजन केवल नौकरी करना, दूसरे की बुराई करना, इधर उधर की बातें करना, टीवी देखना, खाना पीना, घूमना फिरना यही नहीं है । जीवन में कृति, कृतिका इन सब काम उससे कभी भी नहीं आ सकती । एक उदाहरण ले लेते हैं । एक बार कहीं पर मैंने भागवत का एक प्रसंग सुनाया कि भगवान के अवतार हो गए जिनका नाम था ऋषभ देव महाराज । उन्होंने दस हजार सारा पृथ्वी पर राज्य किया और अंत में अपना राजपाट आपने जेष्ठ पुत्र भरत जी को दे दिया और कुछ जंगल में चले गए । इस पर एक सज्जन बीच में खडे हो गए और बोले क्या डॉक्टर दस हजार साल भी कोई जीता है? आप इस कहानी से कहना क्या चाहते हैं? फिर हम ने कहा देखो ये कहानी का प्रयोजन यह है कि चाहे कोई मनीष संपूर्ण पृथ्वी का दस हजार सालों तक भी राज कर ले, उसे सबसे कृतकृत्य फुलफिल्मेंट नहीं आ सकती । जिन लोगों ने भागवत महापुराण अथवा भगवद्गीता पडी है वे जानते होंगे की परीक्षा जी को जैसे ही पता चला कि सातवें दिन तक्षक आएगा और मुझे ढूँढ लेगा जिससे मेरी मृत्यु हो जाएगी । उन्होंने एक विशन गवाये बिना अपना सभी राजपाट छोड दिया और एकांत में गंगा जी के किनारे चले गए । फिर वहाँ पर उन्होंने पूरी भागवत सुखदेव जी से सुनी । घटनाएं कुछ नहीं बदली, दक्षता आया और परीक्षित महाराज को डसा लेकिन वह परीक्षित महाराज की मृत्यु नहीं, उनको दो उसी वक्त मोक्ष मिल गया था जिस वक्त उन्होंने देहात में भाव का त्याग कर दिया था । उसी प्रकार भगवान ने अर्जुन को भगवद्गीता सुनाई । युद्ध का प्रसंग नहीं बदलाव केवल जो अर्जुन को मोहन था, जो अर्जुन पाप पुण्य को लेकर रो रहा था, भगवान द्वारा प्रदत्त ज्ञान से वो नष्ट हुआ । जीवन में पहले हमें अपनी दृष्टि में परिवर्तन लाना है । दृष्टि में परिवर्तन के लिए ही ये कर्म धर्म, उपासना, योग के साधन है । सब कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि हमने अपने आपको समझा क्या है? सभी साधनों का एक ही तात्पर्य है कि हम अपने दिमाग से यह निकाल दे कि हम दे है हमारी सत्ता देने से पढे हैं । उपासना, तपस्या, साधना ये सभी प्रयोजन हैं । मनुष्य को कोई भी कर्म निष्काम हो सकता है लेकिन निष्प्रयोजन नहीं । जब तक हम निष्कामता को प्राप्त नहीं करते तब तक हम शास्त्रों में आई । इन बातों जैसे तपस्या तथा साधना इनका मतलब भी नहीं समझ सकते हैं । थोडा तपस्या तथा साधना के स्वरूप को भी समझ लेते हैं । टाॅवर्स का अर्थ अपने शरीर को कष्ट देना कदापि नहीं हैं । हम लोग हठपूर्वक व्रत रखते हैं । नवरात्रों में मुख्यतः फिर कई लोग चंद्रमास भी करते हैं । सब का अर्थ अपने शरीर को कष्ट देकर भगवान का सिर खाना नहीं है । भगवान भगवत गीता में स्पष्ट कहते हैं अ शास्त्रविहित अम् गोरहम तब कहते ये तक पहुँचना दम बा हंकार संयुक्ता कम रात बलान बता रहा हूँ कर्षि अंतर शरीर अस्थमा भूत ग्राम मचती साहब माम चौहान तरह श्री रस्तम टन विद्याचरण शयान जो मनुष्य हठपूर्वक धोखा रहता है तथा अन्य अनेक प्रकार के कष्ट उपासना एवं तपस्या के नाम पर शरीर को देता है, वो इस देह में स्थित मुझ परमात्मा का अनादर करता है । इस पर भगवान शंकराचार्य भी कहते हैं कुरुते गंगा सागर गम नाम व्रत परिपालन मतवाद आनंद ग्यारह ही इन सर्वम् तीन भजति ना मुक्ति जन्मशती चाहे आप कितनी भी गंगा जी में डुबकी लगा लो, कितने ही वृद्ध कर लोग दान कर लो । जब तक आपको इन सबके करने का प्रयोजन नहीं मालूम हो जाता, मुक्ति नहीं मिल सकती है क्योंकि कोई भी उपलब्धि हमेशा ज्ञानात्मक होती है । जिस वस्तु का हमें ज्ञान नहीं है वो वस्तु होते हुए भी उसकी सत्ता हमारे लिए है ही नहीं । अर्थात उसकी उपलब्धि हमें तब तक नहीं होगी जब तक उस वस्तु का ज्ञान नहीं होता । एक उदाहरण के द्वारा समझ लेते हैं । एक बार में कहीं बाहर से घर पर आया और आराम से चाय पी रहा था । तभी मेरी बिटिया मेरे पास आई और जो जैसे लाने लगी मैंने आराम सिंचाई मेज पर रखे और उससे पूछा मुझे देकर क्यों चला रही हो? कुछ छोटी सी बच्ची बोली आप आपके सर पर मकडी स्पाइडर है । मैं आईने के पास गया और मैंने उस मकडी को सिर्फ से निकालकर बाहर फेंक दिया । उस घटना से मैंने एक बात सीखी की जब तक हमें किसी वस्तु का ज्ञान नहीं होता, वह वस्तु हमारे लिए होती ही नहीं है । जैसे जब तक मुझे उस मछली का गया नहीं था, वो मकडी मेरे सिर पर होते हुए भी मेरे लिए नहीं थी । ठीक उसी प्रकार गहरी नींद में हमें अपने शरीर का क्या नहीं होता तो हमारा शरीर हमारे लिए होता ही नहीं है । उसी प्रकार जब तक हमें उपासना, तपस्या और साधना के तट पर एक अभियान नहीं है । ये चीजें करते हुए भी इन सभी से हमारे जीवन में कोई बदलाव नहीं आ सकता । कई लोग तपस्या का मतलब ये निकाल लेते हैं की तपस्या मतलब जंगल में चले जाओ, गुफा में जाकर बैठ जाओ जैसा फिल्मों में दिखाते हैं । इसको लेकर भगवान् शंकराचार्य कहते हैं अगर वही ही पृष्ठे भानु रात्र, अच्छे बुक, समर्पित जानू, करतल भिक्षा तरुण तलवास रहा तभी ना मुझे थी आशा पाशा लोग सोचते हैं गर्मी के दिनों में आज तब ना रात्री को जुगनू की तरह जागना, जंगल में जाकर रहना ये सब तपस्या है नहीं ये सब तपस्या की कार्टून है । असली समस्या का अर्थ है अपने स्वभाव को बदलकर अपने स्वरूप में लौटाना और अपने स्वरूप को जानने के बाद अपने स्वरूप में ही स्थित रहना । चाहे बाहर का जगह जैसा भी हो । परिस्थितियां जैसी भी आए आपके मन पर इनका कोई भी अच्छा बुरा संस्कार निर्माण नहीं हो रहा है । तो आप थोडी वो सेवेन चौबीस घंटे सातों दिन तपस्या में हूँ । भगवान चंद्राचार्य कर्म और उपासना का प्रयोजन बताते हुए कहते हैं कर्माणि चित्र शुद्धयर्थ एकाग्र यार तुम उपासना ऍम ब्रह्मा विज्ञान अमिति वेदांता डंडे महा गर्मियों के द्वारा चित्र शुद्ध होना यदि कर्मों का प्रयोजन है तो ये कर्मयोग है और यदि कर्मों का प्रयोजन कुछ पा लेना और फिर उस वस्तु का भोग करना है तो ये कर्म रोग है । उसी प्रकार भाजना का प्रयोजन, मन की एकाग्रता, परावलंबन से छुटकारा तथा आत्मविश्वास का जागृत करना है । तो ये तपस्या ठीक है । नेता तपस्या केवल बाहरी आडंबर मात्र है और कुछ नहीं हमने देखा है मुझे तो बस्तियां साधन करने वाले होते हैं । इतना डर डर के जीते हैं । मंगलवार को ये नहीं करना है । एकादशी को खाना नहीं खाना है, दायां हाथ लगा पास हो गया बाया हाथ लगाया तो पूजा खराब हो गयी । इन्ही सब चीजों में पूरा जीवन बर्बाद । भगवान साफ कहते हैं अब हम सत्र शर्म शुद्धि ही यान योग्य व्यवस्थिति ही दानम दमश्क यज्ञस्य स्वाध्याय पर और जब हम ये डर डर के जीना ये आध्यात्म नहीं है । ये परमात्मा का तो महान है । त्रिपुरा रहस्य एक बहुत ही सुंदर ग्रंथ है । उसमें एक कथा आती है । वहाँ बताते हैं कि भगवान परशुराम ने इक्कीस बार पृथ्वी को छत्रिय विहीन कर दिया तो उनमें थोडा अहंकार आ गया और इस बार उनका सामना भगवान रामचंद्र से हो गया और जब भगवान राम चंद्र ने उनका अहंकार समाप्त कर दिया तो भगवान राम ने उन्हें मलयगिरि पर्वत पर जाने के लिए कहा । जब परिश्रम जी मलयगिरि पर्वत की ओर जा रहे थे रास्ते में उन्हें एक फक्कड महात्मा मिले । उन को देखकर परिष् राम जी बिलकुल आनंद विभोर हो गए । मानव भगवान वर्ष राम जी को जो आनंद कभी नहीं मिला था वो आनंद उन अवधूत महात्मा के पास खडे होने मात्र से मिल रहा था । तब वर्ष राम जी ने और महात्मा जी को अपना परिचय दिया और कहा कि कि महात्मा मैं यहाँ अद्भुत आनंद का अनुभव कैसे कर रहा हूँ, ये कैसा आनंद है । आप मुझे बीस आनंद की प्राप्ति का रास्ता बताइए । महात्मा जी इसके लिए आप जो कहेंगे वो मैं करने को तैयार हूँ । वह महात्मा बोले की अरे आप तो बडे शूरवीर है मैं आपको ये नहीं बता सकता । बस में ये बता सकता हूँ की ये ब्रह्मानंद का ट्रेलर है । अगर जो में इस को जाना है तो तुम मलयगिरि पर्वत पर अवधूत सिरोमणी भगवान दत्तात्रेय के पास जाओ तो मैं बता सकते हैं । तब परशुरामजी भगवान दत्तात्रेय के पास गए और बोले कि हे भगवान, मुझे ब्रह्मानंद पाने के लिए क्या करना होगा । आप मुझे बताइए । भगवान दत्तात्रेय ने एक पत्थर उठाया और पृथ्वी पर स्थापित करके बोले कि ये त्रिपुरा दी हुई है । चौदह साल तक इन देवी की नीति उपासना करो, इनको स्नान कराओ, उन की आरती करो । फिर बाद में देखेंगे क्या करना है । परेश राम जी ने त्रिपुरा देवी की उपासना शुरू कर दी और पूरे चौदह साल तक वो यही करते रहे । एक दिन परशुरामजी के मन में आचार्य का आया कि मैं ये क्या कर रहा हूँ । पूरे चौदह साल से मैं त्रिपुरा देवी उपासना कर रहा हूँ । जब की मुझे ये भी नहीं पता कि ये दीवी कौन है । मैंने इससे पहले इनका नाम तक भी नहीं सुना तो फिर इनकी उपासना करने से क्या होगा? मेरे तो चौदह साल वेयर थी गवा दिए भगवान दत्तात्रेय से चलकर पूछना होगी आखिर ये त्रिपुरा देवी कौन हैं और ये उपासना उन्होंने मुझे करने के लिए क्योंकि ही जब की मैं उनसे ब्रह्मानंद के बारे में जानना चाहता था, परशुरामजी नहीं । विचारों के साथ भगवान दत्तात्रेय के पास गए अपनी सारी मन की बातें दत्तात्रे भगवान से कहीं इस पर भगवान दत्तात्रेय बोले कि ये परशुरामजी आपकी चौदह साल विकार नहीं गए । आप के मन में परमात्मा को जानने की जिज्ञासा को आने के लिए पूरे चौदह साल लग गए । इन चौदह साल में आपने जो भी कुछ किया, उसी का यह परिणाम है क्या बाद त्रिपुरा देवी के बारे में जानना चाहते हैं । अब आप इस ब्रह्मज्ञान के अधिकारी बन गए हैं? जवाब यहाँ आए थे तो अब कुछ कर्म करके ब्रह्मानंद को पाना चाहते थे, लेकिन ब्रह्मकर्म का विषय नहीं है । ये ज्ञान का विषय है । प्रमानंद और मोक्ष एक ही है और बिना ज्ञान की मोक्ष संभव नहीं है । इसलिए अब मैं आपको इंटरव्यू के बारे में बताऊंगा । धर्म, कर्म, उपासना, योग, प्राणायाम ये सब जरूरी है परंतु ये साधन मात्र ठीक उसी प्रकार जैसे नर्सरी, किंडरगार्डन, हाईस्कूल, ग्रेजुएशन ये सब जरूरी है एक वैज्ञानिक बनने के लिए । लेकिन ये सब साधन है विज्ञानिक पद तक पहुंचने के लिए । क्या नर्सरी किंडरगार्डन पास करना किसी के जीवन का उद्देश्य होता है? नहीं, यदि जीवन का उद्देश्य कुछ बडा हासिल करना है तो ये सब तो सीरिया है और ये सब जरूरी है । यदि हमने धर्म का जीवन किया है तो संचार से उभरती उसका उद्देश्य है और यदि हमने समझदारी के साथ संसार से उभरती प्राप्त की है तो वगैरा ले आना स्वाभाविक है और वैराग्य यदि हमारे जीवन में आ गया है तो हमको परमात्मा का ज्ञान होना जरूरी है और यही मोक्ष का एकमात्र साधन है । हम लोग जीवन को तीन स्टेज में ही सकते हैं । पहला फॅमिली काम पाॅप पहला है पैशनेट ली । जीवन को जीना जीवन में कभी भी खाली होगा, नहीं बैठना चाहिए । जब हम छोटे होते हैं तो दस बारह वर्ष की आयु से ही जीवन में कुछ पद प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए लक्ष्य निर्धारित करें और हम उसको प्राप्त करने के लिए खुश होकर कर्म करेंगे, किसी दबाव से नहीं । अपनी इच्छा से अपना पूर्ण प्रयत्न करें । हम अवश्य सफल होंगे लेकिन ये सब करते हुए हमारे जीवन में उतार चढाव आएंगे । सुख दुःख, लाभ हानि होंगे । इस पर भगवान कहते हैं कि सुख दुख के समय कृत्वा लाभा लाभ हो जाया जाए हूँ तो युद्धा ये ऍम पाप वापसी ऐसी अब जीवन में जो भी कुछ कर रहे हो हरा बाहर ईद बंधुओं जैसे सुख दुःख, लाभ हानि, जय पराजय से प्रभावित हुए बिना अपने लक्ष्य प्राप्ति के लिए कर्म करते हो तो आपको कभी भी पाप नहीं लगेगा और खाता भविष्य ही लक्ष्य पाजा होगी । अब हमने जो लक्ष्य निर्धारित किया था वो आप को मिल गया । उदाहरण के लिए आपने एक वैज्ञानिक बनने का लक्ष्य निर्धारित किया और उसके लिए आप ने मेहनत की और आप एक वैज्ञानिक बन गए । अब दूसरा चरण है डाॅगी का मतलब ये बिल्कुल नहीं है की नौकरी छोड दो या फिर अपना काम सही से मत करो । शादी मत करो और सब कुछ छोडकर जंगल में जाओ नहीं । अब आप कर्म उसी प्रकार करो जैसे पहले क्या? लेकिन बिना किसी लक्ष्य के अब हमें कर्म केवल आनंद को प्रकट करने के लिए करने हैं । हम लोग गलती नहीं करते हैं कि हम वैज्ञानिक बनकर ये सोचते हैं कि मैं निदेशक कब्बन होगा । निदेशक के बाद महानिदेशक कब बनाऊंगा? हम कभी अपने से ये नहीं कह पाते । दस बार नौ सौ हम लोग एक के बाद एक चीजों में लगाते जाते हैं । कर्म करते वक्त ध्यान कहा है आपने ओरिया जगत की ओर अगर आपका ध्यान जगत की ओर है तो अब सादा दुखी रहेंगे । पि पि ऍफ समथिंग टू संबंधी मेरा की मतलब समझदारी के साथ संसार के विषय वस्तुओं से ऊपर हो जाना । अगर हम समझदारी के साथ संसार से उबरते नहीं होते बल्कि किसी परिस्थिति के दबाव में वह चीज हमें छोडनी पडती है तो एक रोग का रूप ले लेता है । इसी को डिप्रेशन कहा जाता है । वैराग्य का अर्थ राग का उल्टा नहीं है । राग का उल्टा द्वेष होता है । बैराग्य का मतलब राग और द्वेष के परे जाना है । उदासीन भाव से जीना ही वैराग्य है अर्थात कोई वस्तु कर्म के द्वारा मिल गई तो उसके कारण खुश नहीं होना । अगर नहीं मिले तो दुखी नहीं हो रहा । यही वैराग्य है । भगवान इसी को अन्य शब्दों में कहते हैं निराश ीरिया जितात्मा तत्सर्व परी रहा शारीर हम केवलम कर्म कुर्बन ना आपने होती ऍम लेकिन ये धीरे धीरे तभी हो सकता है जब हमारी समझदारी बढेगी । जब हम ये जानने का प्रयास करेंगे कि आखिर हम है कौन क्यों जिस दिन हम संचार की विषय वस्तुओं से अपने आनंद को अलग करना शुरू कर देते हैं । समझ लेना चाहिए कि अब हम दूसरे चरण डाॅन की ओर अग्रसर है । जीवन का तीसरा चरण है काम पाॅड भक्ति भारतीय बहुत शुद्ध भाव है । इसको हम आगे विस्तार से जानने का प्रयास करेंगे । लेकिन यहाँ पर हम ये जान लेते हैं कि अपने स्वरूप को जानने के बाद उस स्वरूप में नित्य निरंतर रहना ही भक्ति है । ये वो व्यवस्था है जिसमें परमात्मा मनुष्य के आध्यात्मिक हृदय में प्रकट होता है । उस मनुष्य को भक्त कहते हैं था । उस भक्त की जगत में अभिव्यक्ति को भक्ति कहा जाता है और ये तब तक संभव नहीं है जब तक हमें परमात्मा तत्व का एकीकरण ज्ञान नहीं हो जाता है हूँ ।

Chapter 10 (iv) - योग का प्रयोजन

योग का प्रयोजन योग को लेकर जितनी भ्रांतिया इस वक्त विश्व भर में है, शायद ही किसी अन्य विषय को लेकर होगी । योग को लेकर पिछले दस सालों में जितनी भ्रांतियां फैली है, इसके कारण हम लोग योग के मतलब को ही शायद भूल गए हैं । योग का तात्पर्य है जुडना । क्या जुडना और किस से जुडना? क्या टूटी हुई हड्डी को जोडना आया? अपनी आयु में आठ दस साल एक्सट्रा जोडना । क्या ये योग हैं या फिर योग? मॅन स्ट्रेटनिंग निभाएँ । एक बार में दिल्ली में एक बुक स्टॉल में गया, जहां पर योग के ऊपर लिखी गई पुस्तक की प्रदर्शनी लगी हुई थी । वहाँ पर मैंने देखा कि योग पर हजारों पुस्तकें हिंदी इंग्लिश में लिखी गई और कुछ पुस्तके देखकर मेरा सर चकरा गया । कुछ पुस्तके थी जैसे योगा, फॅस योगा ऍम मतलब योगा ना हो गया, आलू हो गया, जो कहीं भी फिट कर दो, जो जिंदगी में फेल हो जाता है, वह योग सीखना शुरू कर देता है । एक बात बहुत ही अच्छे ढंग से समझ लेनी चाहिए कि ये सब योग नहीं है । अगर आज योगसूत्र के रचियता महर्षि पतंजलि जिंदा होते तो इन लोगों को समझाते कि मैंने योगशास्त्र इन सब चीजों के लिए नहीं लिखा । योगशास्त्र एक बहुत ही सूक्ष्म अध्यात्मिक ग्रंथ हैं । इस पर थोडा विचार करने की जरूरत है । अब जरा सोचो क्या कोई मनुष्य गाय को गोबर के लिए पालता है? नहीं, गाय को हम दूध के लिए पालते हैं । गोबर तो बाइक अलग है । वह तो मिलना ही है । ठीक उसी प्रकार अच्छा स्वास्थ्य रोगों से मुक्ति जिस अब योग के बाइप्रोडक्ट है । योगशास्त्र में पतंजलि महाराज कहते हैं तदा दृष्टि हूँ स्वरूपे देवस्थानम योग के द्वारा हम अपने स्वरूप को जांच है । यही योग का उद्देश्य है और इसके लिए पतंजलि महाराज ने अष्टांग योग का वर्णन किया । लेकिन हम लोग अपने को पतंजलि महाराज से भी ज्यादा होशियार समझने लगे । हम लोग सीधे प्राणायाम, आसन, ध्यान और समाधि की बात करते हैं । एक बार कहीं पर किसी पार्टी में हम लोग गए वहाँ पर हमारे साथ कुछ हमारे साथ के वैज्ञानिक महोदय भी थे । अगले ही दिन विश्व योग दिवस मनाया जाना था तो ऐसे ही योग की बातें शुरू हो गई तो हमारे साथ ही बोलेगी । मैं तो आजकल ध्यान कर रहा हूँ । आधा घंटा रोज सुबह शाम परन्तु कुछ फर्क ही नहीं पड रहा है । फिर वो मुझसे पूछे लगेगी । ध्यान कैसे करें? मैंने उन डॉक्टर साहब से पूछा कितनी रोटी खाते हो कि आप का पेट भर जाए? बोले इस बात का ध्यान से क्या मतलब है? हमने कहा बताइए तो सही । उन्होंने कहा सात रोटी तो मैंने जो रूढियों का ढेर था उसमें से ऊपर से गिनना शुरू किया और साथ में रोटी निकालकर डॉग साहब को दे दी और कहा कि ये लीजिए साथ ही रोटी शायद बस इसको खाकर आपका पेट भर जाएगा । इस पर वो बोले अरे ऐसे कैसे हो सकता है इसके पहले की छह रोटी भी तो खाऊंगा तभी तो पेट भरेगा । हमने कहा अच्छा, आप तो बहुत ही समझदार है । यहाँ पर आप एक से लेकर सात तक की सारी रोटी खाना चाहते हैं और योग में सीधे सातवें नंबर पर छलांग मार रहे हैं । ये दूसरी प्रकार हुआ कि ये कक्षा के पांच विध्यार्थी को कॅश पढाई शुरू कर दी जाए तो उसकी समझ में क्या है कि उसी प्रकार जब तक आप यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि इनको क्रमसे अपने जीवन में नहीं उतारेंगे और सीधे ध्यान समाधि का अभ्यास करेंगे और सोचेंगे कि कुछ होगा तो मैं आपको गारंटी देता हूँ कुछ नहीं होगा ऍम यानी कि ध्यान इतना कम हो गया है कि आम भी इतना काम नहीं है जितना सो कॅश । जब तक आपके ऍफ बिल्कुल स्पष्ट नहीं हो जाते आपका दिमाग आपको चक्कर कटवाता रहेगा और आप केवल मान से कल्पनाओ में ही जीते रहेंगे । अच्छा स्वास्थ्य, लम्बी आयु हमारे जीवन का उद्देश्य कभी भी नहीं हो सकते हैं । क्या करेंगे हम लंबा जीवित रहकर? हाँ अच्छे स्वास्थ्य का विमान जितना ज्यादा किसी मनुष्य को होता है उतना शायद किसी और चीज का नहीं होता । इसलिए जब जब हमारे जीवन में दुख के प्रसंग आते हैं, हमें इन दुखों को परमात्मा का प्रसाद समझना चाहिए । किसी सूफी महात्मा ने बहुत ही अच्छा कहा है । यदि वह दर्दे दिल है जो उनको पाता है, भगवान भरा करें, उसका जो दिल दुखता है । जब हमारे जीवन में कोई रोग दुःख आता है, उस समय हम भगवान के पास होते हैं । इसलिए कहा जाता है फॅमिली, पतंजलि योगशास्त्र का पूरा विवरण करना तो यहाँ संभव नहीं है परन्तु कुछ सूत्रों को अवश्य हमें समझना पडेगा । पहले ही सूत्र में महाकवि कहते हैं अच्छा युगान शास् नाम योग का उद्देश्य हमारे जीवन में अनुशासन को लाना है । एन कंट्रोल्ड माइंड के नॉट टू होगा वो लिया डिसिप्लिन एजुकेटेड माइंड इस कंट्रोल माइंड दूसरे सूत्र में कहा गया है योगश्चित्तवृत्तिनिरोध मन में उठने वाली वृत्तियों के निरोध को योग कहते हैं । यहाँ पर थोडा एक बात समझने योग्य है कि क्या हंड्रेड पोषन चित्तवृत्तियों का निरोध हो सकता है? हो सकता है लेकिन आधे घंटे के लिए या तब जब तक हम जगत के साथ व्यवहार न कर रहे हो जैसे सुषुप्ति, डीपली व्यवस्था में परन्तु जब हम जगत में व्यवहार करते हैं तो कैसे चित्र में वृत्तियों को आने से हम रोक सकते हैं और यदि हम जबरदस्ती मन को बांधने की कोशिश करेंगे तो मैंने भी बच्चे की तरह बागी हो जाता है । तो फिर क्या करें मैंने की अपनी कोई स्वतंत्र सकता नहीं है । आप जैसा आचार विचार व्यवहार करते हैं मैंने वैसा ही आपका अनुसरण करता है । आप मरे को जितना महत्व देंगे माना आपको उतना ही परेशान करेगा । इसलिए एक बहुत ही अच्छा उपाय है की आप मान के प्रति उदासीन रिमेन इन डिफरेंट उदासीन रहे । मन में चाहे जो भी विचार आया अब उस की ओर ज्यादा ध्यान दे तो धीरे धीरे आपका मन आपको परेशान करना बंद कर देगा । ठीक उसी तरह जिस तरह आपका पडोसी चाहे आप के बारे में कुछ भी कहता रहे अगर आप उस पर याद नहीं करते तो वो अपने आप शांत हो जाएगा । मान के बारे में थोडा आगे हम और चंदन करेंगे लेकिन यहाँ पर ये बात बहुत अच्छी तरह जान ले । योगशास्त्र में कहीं पर भी योग के द्वारा क्या क्या बीमारियाँ ठीक होती है । योग के द्वारा आयोग बढाने के तरीके के बारे में कहीं पर भी विवरण नहीं है । ये सब स्वतः होता है । जब हम आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश करते हैं तो ये सब बाईप्रोडक्ट के रूप में हमें मिलते हैं । आसन को लेकर हम जो जिमनास्ट का प्रदर्शन करते है और उसे भी योग का नाम देते हैं, ये भी हमारा ज्ञान ही हैं । आसन को लेकर पतंजलि महर्षि कहते हैं स्थिर सुकमा सनम प्रयत्न शैथिल्य आनंद है समाप्ति बइयां जब हम किसी वस्तु को पाने का प्रयत्न करते हैं तो उस प्रयत्न के दौरान हमें सुख का अनुभव नहीं होता । लेकिन जब वह वस्तु हमें प्राप्त हो जाती है तो हमारे सभी प्रेत नस शिथिल हो जाते हैं और ये सुख हमेशा के लिए होता है । आशंका मतलब एक स्थान पर बैठना नहीं है । अगर एक ही पोश्चर में बैठना तथा किसी से भी प्रभावित न होना ये योग होता तो हमारे हिंदुस्तान की सभी वैसे महायोगी होती क्योंकि एक बार भेज बीच सडक पर बैठ गई तो फिर कोई भी गाडी हो कौन से उठा नहीं सकते । योग का उद्देश्य अपने में परिवर्तन लाने से है । अपने मन को शांत, प्रसन्न, विचारशील सावधान रखना है जिससे हम शांत मन से भगवान का चिंतन मनव्वर ध्यान कर सके । और एक बार शांत मन में चिंतन मनन और निधि ध्यान आसन की आदत पड गई तो ये मान्य स्वतः ही गायब हो जाता है । फिर हम ध्यान कर दे नहीं योग कर दे नहीं हम चौबीस घंटे सातों दिन ध्यान में जीते हैं, योग में रहते हैं । ये तो बात हुई योग की योगशास्त्र के अनुसार पर इंद्र भगवान श्रीकृष्ण को योगेश्वर कहा गया है ना कि महर्षि पतंजलि को । इसलिए योगेश्वर भगवान भगवत गीता में योग के बारे में क्या कहते हैं इस पर भी चिंता न वश्य करना चाहिए । भगवान ने भगवत गीता में अठारह तरह के विभिन्न योगों के बारे में अर्जुन को बताया । अभी इस पर सोचने वाली बात यह है कि अर्जुन ने रणभूमि में उन अठारह तरह की योगों में से कौन सा योग किया । अर्जुन ने कुछ भी नहीं किया फिर भी अर्जुन ने युद्ध जीता दादा भगवान योगेश्वर कहलाए । यत्र योगेश्वर कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धर रहा । तत्र श्रीर्विजयो भूत ईर्द रुवान नीतिर्मतिर्मम भगवत गीता के अंतिम श्लोक में संजय कहते हैं कि जहाँ योगेश्वर कृष्ण स्वयं तथा धनुर्धर अर्जुन हो वहाँ तो विजय निश्चित है ये मेरा निश्चित मत है । भगवान ने भगवत गीता में कर्म, योग, भक्ति, योग, ज्ञान, योग तीनों के बारे में विस्तार से बताया और अर्जुन पर इन सब का एक ही प्रभाव पडा । नेशनल मोहा स्मृति उपलब्धा स्वत्व प्रसाद आसान में अच्छे स्थित तो उसमें गत संदेहा परिश्य वाॅ इस योगशास्त्र में बताया गया । ज्ञान के द्वारा उसका मोहन नष्ट हो गया और उस को ज्ञान की प्राप्ति हुई । जब अर्जुन ने देखा कि मेरे गुरु मेरे दादा जी तथा अन्य सगे संबंधी ही मेरे सामने खडे हैं जिनके साथ मुझे युद्ध करना है तो ये भूल गया कि मैं कौन हूँ? क्या युद्धभूमि में आने से पहले उसे नहीं पता था कि मुझे अपनों से ही युद्ध करना पडेगा । वहाँ उसका मुंह हजार कुठार भ्रम ने उसे ढेर लिया । उसे पता नहीं चल पा रहा था की मैं बहुत रहूँ । मैं शिष्य हूँ या मैं एक योद्धा हूँ । इसी मौके कारण युद्ध करने से इंकार कर दिया क्योंकि वह यह भूल गया था की रणभूमि में वो सिर्फ एक योद्धा है और रणभूमि में वो युद्ध करने आया है जिस प्रकार हमें संसार में अगर अपने स्वरूप को भूल जाते है और तरह तरह के सांसारिक कार्यों में लगकर पूरा जीवन इसी में निकाल देते हैं । कबीरदासजी कहते हैं कबीरा वो दिन याद कर पाक उपर दल शीर्ष भारतीय लोग में आई के ऑफिसर गया जगदीश हमारे जीवन का एकमात्र प्रयोजन पर महात्मा को अपने माध्यम से प्रकट होने देना ही है और यदि परमात्मा आनंदस्वरूप है तो हमेशा आनंद में रहना ही जीवन का एकमात्र प्रयोजन बन जाता है और जब हमारे माध्यम से हमेशा आनंद ही प्रकट होता है यही ऍम चौबीस घंटे सातों दिन योग की स्थिति कही जाती है । इसके लिए भगवान कहते हैं दम विद्यात् दुख संयोग वीओ गम योग संगीता फॅारेन योग तब क्यों योगों ने र्विणत चेतसा जीवन में दुकाना एक अलग बात है और इन दुःखों के साथ तादात्म्य करके दुखी होना एक अलग बात है । जो मनुष्य जीवन में जो खाने पर दुखी होने से इंकार कर देता है वह निश्चय ही हमेशा योग की स्थिति में रहता है और ये स्थिति केवल समत्व समझा के द्वारा ही आ सकती है । इसलिए भगवान कहते हैं योगा इस तरह कुरु कर्माणि संगत त्यक्तवा धनंजय सिद्धि सिद्धि ओहो समूह भूत्वा समत्वं योग उच्यते । जो मनुष्य कर्म तो करता है परंतु उन कर्मों के साथ बंधता नहीं । वह सुख दुःख में समान रहता है । वही योगी है । ऐसा मनुष्य योग करता नहीं, वो योग में जीता है और उसके माध्यम से आनंद ही आनंद प्रकट होता है । लेकिन ये तभी संभव है जब हम अपनी असलियत पहचान जाते हैं । वरना पूरी जिंदगी आदमी कभी योग में फसता है, कभी उपासना में और कभी धर्म में और अपना पूरा जीवन ही नहीं मैं बर्बाद हो जाता है ।

Chapter 10 (v) - ज्ञान साधना

ज्ञान साधना भगवान भगवत गीता में ज्ञान की बात करते हुए कहते हैं नहीं यानी इन सदर शाम पवित्र में ही विद्यते तक स्वयं योग संसद धंधा कालेन आत्मनि विंदति । ज्ञान के समान पवित्र कुछ और है ही नहीं । आदमी को ज्ञान होने के बाद उस की सभी कर्म समाप्त हो जाते हैं । अब तक के हमारे किए गए चन्दन से यह स्पष्ट हो गया कि पूरा विश्व जगत तीन भागों से मिलकर बना हुआ ऐसा प्रतीत होता है । पहला प्रकृति जड, दूसरा पुरुष अंतःकरण, तीसरा ब्रहम् परमात्मा, शुद्ध चैतन्य ब्रह्म और प्रकृति के सहयोग से पुरुष अंत करने की नी शक्ति होती है । अकेले परमात्मा में संसार नहीं है और केवल प्रकृति में भी संसार नहीं है । लेकिन जब परमात्मा प्रकृति के माध्यम से प्रकट होता है तो वह अच्छी इतना कहलाती है । जैसे जब एक देश की सभी वोट एक मनुष्य के माध्यम से प्रकट होती है तो उसे प्रधानमंत्री कहते हैं । ये चेतरा जब पुरुष के देख से प्रकट होती है तो उसे दाढी आती है और यही चेतरा जब स्त्री के देने से प्रकट होती है तो उसे दाडी नहीं आती है । चेतरा सभी में सामान्य है । एक गधे या एक मनुष्य में ये चेतना था तो एक समान हैं । वही चेतना सकता जब एक गाय के माध्यम से प्रकट होती है तो दूध निकालता है । लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि चेतन सत्ता परमात्मा दूध के समान है और परमात्मा जब सिर्फ के माध्यम से प्रकट होता है तो विश्व निकालता है । इसका दाद पर ये नहीं कि परमात्मा विश्व के समान है । एक बार किसी ने मुझसे पूछा कि आप कहते हैं कि परमात्मा एक ही है लेकिन हिंदुओं में तो तैंतीस करोड देवता को मानते हैं । वे क्या भगवान नहीं है? हमने उनसे कहा कि देखो महात्मा जी, आप तैंतीस करोड देवी देवता कह रहे हो गया । बता सकती हूँ कि इस ब्रह्मांड में कितने मनुष्य, जीव जंतु, कीडे, मकौडे पौधे हैं । उन्होंने कहा नहीं, वे सब के सब परमात्मा ही हैं । अनंत में अनेकता केवल कल्पित मात्र होती है । जिस प्रकार एक हजार रुपए के नोट में पांच रुपये भी है, दस भी है, पचास भी है और सौ पांच सौ भी है । बस फर्क केवल आपकी दृष्टि का है कि आप क्या देख रहे हो, हजार रुपये पूरा देख रहे हो या उसकी चीन लेकर अलग अलग नोटों को देख रहे हो । किसी भी ज्ञान के लिए अमित तीन तक क्यों की आवश्यकता होती है उनमें से यही एक भी नहीं हो तो ज्ञान नहीं हो सकता है । पहला है ज्ञान का विषय जगत दूसरा है ज्ञान की प्रक्रिया । उपकरण और तीसरा है गया था जिसे ज्ञान हो रहा है । इन तीन तिथियों में से पहला है ज्ञान का विषय जगह थी तथा तीसरा ज्ञाता चैतन्य । सभी प्राणियों के लिए सामान्य अंदर यदि है तो केवल ज्ञान की प्रक्रिया में इसको उदाहरण से समझ लेना ठीक रहेगा । एक दर्पण है और हम उसमें अपने प्रतिबिंब को देखते हैं । यहाँ पर ज्ञाता हो गए हम ज्ञान के लिए उपकरण हो गया, दर्पण तथा ज्ञान का विषय हो गया प्रतिबिम् जब हम अपने प्रतिबिंब को देखते हैं तो हमारा ये ज्ञान होता है कि हम अपने को ही देख रहे हैं । लेकिन यदि एक चिडिया दर्पण में आपने प्रतिबंध को देखती है तो उसका गया यह है कि उस प्रतिबंध के अंदर अन्य कोई दूसरी चिडिया है और वो उस प्रतिबंध पर अपनी चोंच मार मारकर खून निकाल लेती है । अब वो चिडिया उस दर्पण के आगे बैठ कर चाहे जब करें, यज्ञ करे, दान करें, वह प्रतिबिंब दिखना बंद नहीं होगा । जब तक वो झडिया ये नहीं समझ लेती की ये प्रतिबिंबन अन्य कोई और नहीं है । ये उसका अपना ही स्वरूप है । ठीक उसी प्रकार जब तक हम जगत को, भगवान को और अपने आप को सही तरह से जान नहीं लेते तब तक हमें इस जगत में दुख नजर आते हैं । भगवान अपने से दूर नजर आती है और अपने आप को हम जिंदगी भर बापू तुम हम पापकर्म आ हम किसी प्रकार को उससे रहते हैं । मैं हूॅं फॅमिली ये संत तुकाराम का कहना है ज्ञान केवल अज्ञान का भाव है । ज्ञान में कोई भी नयी वस्तु अथवा धारणा का निर्माण नहीं होता है बल्कि जो हमारी गलत धारणाओं, अज्ञान के आवरण है उन को हटाना है । जिस प्रकार एक फल के अंदर बीज होता है, बस बीस तक पहुंचने के लिए सब हटाना पडता है, ठीक उसी प्रकार हम लोग कहते हैं सेल्फ डिस्कवरी । इसको हमसे ऍम नहीं कहते हैं । डिस्कवरी मारे कवर्स को हटा देना पहले हमें जगत के आदिकारण बीच तक पहुंचना पडेगा । इसके लिए हमारी स्कूल बुद्धि काम नहीं करेगी । इसके लिए हमें सूक्ष्म बुद्धि से विचार करना पडेगा । एक बार ये सवाल मुझ से किसी ने पूछा था कि जिस बुद्धि के द्वारा हम इस भौतिक जगत की चीजों के बारे में जानते हैं क्या उस बुड्ढी के द्वारा हम परमात्मा तक नहीं पहुंच सकते? हम ने कहा कि भौतिक स्कूल, बुद्धि और परमात्मा सूक्ष्म बुद्धि में थोडा फर्क है । इसे ऐसे समझ लीजिए कि ये कुल्हाडी के द्वारा हम बडे से बडा विश्व काट सकते हैं परन्तु क्या उस कुल्हाडी के द्वारा हम्मा शेविंग कर सकते है? यानी कि दाडी बना सकते हैं? नहीं । ठीक उसी प्रकार परमात्मा प्रकृति के द्वारा ढका गया है और बहुत एक स्कूल बुद्धि भी प्रकृति का ही अंग है जो मन के साथ मिलकर कार्य करती है । जब स्कूल बुद्धि मान के साथ अपने तादात मुखत्यार करके चुनाव भाषा परमात्मा का प्रतिबिंब के साथ तादात्म्य कर लेती है तो ये बुद्धि सूक्ष्म कही जाती है और इस सूक्ष्म बुद्धि के द्वारा ही परमात्मा का चिंतन किया जा सकता है । थोडा स्थूल और सूक्ष्म को समझने के लिए एक और उदाहरण लेते हैं । जिस पधारती या वस्तु में जितने ज्यादा गुण होते हैं वो उतना स्कूल होता है जैसे पृथ्वी में शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध सभी पांच गुण है तो पृथ्वी सबसे स्कूल है जबकि आकाश में केवल शब्द गुण है तो आकाश सभी पंचमहाभूतों से सूक्ष्म है । उसी प्रकार प्रकाशक होता है । वो हमेशा प्रकाशित वस्तु से शुरू होता है । जैसे सूर्य सृष्टि का प्रकाशक है लेकिन सूर्य को कौन प्रकाशित करता है, सूर्य को हमारी दृष्टि प्रकाशित करती है । इसलिए हमारी आंखों में देखने की शक्ति सूर्य से सूक्ष्म है । हमारी आंखों में देखने की शक्ति को मन प्रकाशित करता है इसलिए मन दृष्टि से सूक्ष्म है । मन का प्रकाशक चैतन्या चित आभास है इसलिए परमात्मा चंदावास मन और स्कूल बुद्धि से भी सूक्ष्म है । सामान्यतः हम ये सोचते हैं कि अगर कोई मनुष्य भौतिक जगत में बहुत बुद्धिमान है तो ये परमात्म तत्व को जानने का अधिकारी हो सकता है । परंतु ऐसा नहीं है और ऐसा भी नहीं है कि जो भौतिक जगत में फेल हो गए हैं या जिनकी स्कूल बुद्धि ने काम करना ही बंद कर दिया है, जो नालायक है वो इस तत्व को जान सकता है । भगवान भगवत गीता में कहते हैं काम ऍम ज्ञाना हाँ प्रपद्यन्ते नियत देवता टम टम नियम मास था, ये प्रकृतियाँ नियताः फस गया । अब भगवान को किस भाव से देखते हैं, ये दृष्टि मायने रखती है । क्या परेशान हूँ और भगवान को परेशान के कारण याद कर रहे हो? या आपको भगवान से धन दौलत चाहिए या फिर आप जिज्ञासा वाले मन से परमात्मा को जानने के इच्छुक हो या फिर आप अपने स्वरूप में परमात्मा का अनुभव करना चाहते हो । जो जिस भाव से परमात्मा को चाहता है, परमात्मा भी उसी भाव से उसके संपूर्ण फल को प्रदान करते हैं । ज्ञान की साधना को समझने के लिए हमें चरणबद्ध तरीके से चलना होगा क्योंकि अभी तक हमारी बुद्धि, मन, इंद्रिया सभी बाहर गामी है । कैसे हम परमात्मस्वरूप का अनुभव कर सकते हैं । अब उन सब स्टेप्स पर आ जाते हैं पहला इंद्रियों का नियमन । भगवत गीता में अर्जुन भगवान से पूछते हैं कि हे भगवान ऍम प्रयुक्त हो या पापं चरति पुरुषः अन्य छपी वार्षिणी याँ बलादी विनियोजित हूँ । मनुष्य ना चाहते हुए भी किस कारण से पाप करने के लिए प्रेरित हो जाता है । तब भगवान कहते हैं काम एश करो देश रजोगुण, समुद्र भरवा महाजनों महापाप माँ सिद्धेहम यहाँ ऍम रजोगुण से उत्पन्न जीवन में ये करना है वो करना है । ये जो करने का रोग है । इसी को रजोगुण कहा गया है । काम ना और कामना पूरी न होने पर उसे उत्पन्न क्रोध ही सभी पापों की जड है । हे अर्जुन! इनको तो अपना सबसे बडा दुश्मन समझता और आगे कहते हैं इन्द्रियाणि मनो बुद्धि रस्सियां रिश्ता नाम अच्छे एहते रवि मोहैया तेश ज्ञान माँ मृत्यु देहिनम् तस्मात् त्वम् इंद्रियानी यादव नियम में भरतर्षभ पाप मानम रजही सोनम ग्यारह विज्ञान आश्रम इस काम ना की तीन स्तर है जहाँ ये निवास करती है । सबसे पहले इंडिया, दूसरे स्तर पर मन तथा तीसरे स्तर पर बुद्धि । इसलिए है अर्जुन सबसे पहले तुम अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण लाना शुरू करूँ । कभी हम लोगों ने सोचा है कि हमारी आंखें बाहर की ही विषय वस्तु क्यों देखती है? हमारे कान बाहर की आवाज क्यों सुनते हैं? सभी इंद्रिया बाहर की ओर है । इसको लेकर उपनिषद में एक लोग आता है पर आ गयी खानी वित्र ना स्वयं भूस स्मार्ट परांगत पश्यति नान तार आत्मन् कश्मीर धीर प्रत्यगात्मा मैच दा वृत्त शंकर मृत तत्व मच्छर पांच ज्ञानेन्द्रियां हमेशा बाहर के विषय वस्तुओं में ही लगी रहती है और जो ये इंद्रिया हमको दिखाती है, अनुभव करती है, हम उसी को सत्य मान लेते हैं । कभी ये विचार तक नहीं आता कि जो मैं देख रहा हूँ, ये सत्य है भी या नहीं । लेकिन जब हमारी आंखे कमजोर हो जाती है तब हमारा ध्यान बाहर की तरफ जाता है कि बाहर सब धुंधला क्यों दिख रहा है । तब पता चलता है कि बाहर का जो भी दिखता है, सुनता है । वो हमारे इंद्रियों पर निर्भर करता है । विषयवस्तु बाहर है परंतु उनका अनुभव हम बाहर नहीं करते है । जब हम किसी को देखते हैं तो हम उसे कहा देखते हैं अपने से बाहर या अपने अंदर इस जगत का कोई भी अनुभव हमें बाहर नहीं होता । सब हमारे अंदर ही है । यह संपूर्ण जगह जिसका आज तक हमने अनुभव किया है और जो आगे हम अनुभव करेंगे वो सब इसी वक्त हमारे में मौजूद है । बस हमें उसका ज्ञान नहीं है । हमें संसार की विषयवस्तुओं का ज्ञान होता है । ज्ञान इन्द्रियों के द्वारा अब हम इंद्रियों का प्रयोग कैसे करते हैं यह हम पर निर्भर करता है । हमारे इंद्रियों के माध्यम से क्या देखना चाहते हैं ये सब हमारे कंट्रोल में होना चाहिए । बाहर की विषय वस्तु इन इंद्रियों को कैसे कण्ट्रोल कर सकती है? नहीं, ये हम निर्णय लेंगे कि हमें इन इंद्रियों से क्या ग्रहण करना है और क्या ग्रहण नहीं करना है । क्योंकि ये इंद्रिया हमारे उपकरण है तो सबसे पहले इन्द्रियों पर नियंत्रण बहुत आवश्यक है । बाहर की विषय वस्तुओं की सत्ता हमारे इंद्रियों के कारण है और इंद्रियों का पूरा कंट्रोल हमारे हाथ में है । पहले बाहर की विषय वस्तु हुए हम पर प्रभाव डालना बंद कर दे तो हम अपने स्वरूप तक पहुंचने की एक सीढी पार कर जाते हैं । लेकिन सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि ये नियमन कैसे होगा? क्या किसी बाहर की विषय वस्तु को देखे नहीं? सुने नहीं, स्पर्श ना करें । अगर ऐसा होता तो हम को फ्री इंद्रिया परमात्मा द्वारा प्रदत्त ही नहीं होती । ऐसा नहीं है जैसा हमको अक्सर बताया जाता है । गांधीजी के तीन मंदिर बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो, बुरा मत बोलो । लोग अक्सर कहते हैं कि मैं ऐसा बोलना नहीं चाहता था, मगर मेरे मुंह से निकल गया और फिर इस बात को लेकर परेशान होते रहते हैं । आंखों से देखना, कानों से सुनाई देना ये प्रकृति की हम को सबसे बडी देन है । हम मनुष्य अपने बाहरी ज्ञान का प्रतिशत ज्ञान देखकर या फिर सुन कर ही ग्रहण करते हैं तथा अपने ज्ञान को हम जब वहाँ वाणी के द्वारा व्यक्त करते हैं तो विषय वस्तुओं के अंदर आने की गेट हो गए देखना, दृष्टि और सुनना श्रवण शक्ति तथा बाहर व्यक्त करने का माध्यम हो गया । वाणी जब हम रोजाना अनगिनत विषय वस्तुओं को आंखों से देखते हैं, इनमें से कुछ विषय वस्तुओं आंखों के द्वारा देखी जाती है लेकिन मैं हमारे मंतर प्रवेश नहीं करती और वे विषयवस्तु का मन पर कोई छाप संस्कार भी नहीं पडता । इसलिए उन व्यक्तियों विषय वस्तुओं का हमारे हार्ड डिस्क चित्र में भी स्टोरेज नहीं होता है । लेकिन जिन विषयवस्तुओं को हम देख कर उसके बारे में चिंतन शुरू कर देते हैं और जिसके साथ हम अपने को जोडकर देखते हैं, उस विषय वस्तु का मन में प्रवेश होता है और इसके संस्कार बनते हैं उसी प्रकार है जैसे आंख को आप दर्पण के स्थान पर रख दो तो ये दर्पण दिन भर में हजारों लोगों को प्रकाशित करेगा लेकिन दर्पण इनमें से किसी भी चेहरे के साथ चिपकेगा नहीं । लेकिन अगर अपन का कहा जब कैमरे में फिट हो जाता है और था इसका आज के साथ हमने मान भी जोड दिया तो ये फिर एक कैमरे के लेंस की तरह काम करेगा जो प्रतिबंध को सत्य मानकर मन में उसे संग्रहित करता रहेगा । तो इंद्रियों को नियंत्रित करने का मतलब ये हो गया कि उनके द्वारा प्रभावित ना हुए । और ये तो नियम है कि जब प्रकाशक होता है वो प्रभावित नहीं होता जैसे हमारी आंखे सभी रंगों को प्रकाशित करती है परंतु आंखों पर उन रंगों का कोई प्रभाव नहीं होता । हमारी आंखों के सामने चाहे एक वस्तु हो या हजार प्रकार की वस्तुएं, हमारे कान चाहे भगवान का नाम सुने या गाली, श्रवण शक्ति दोनों को ही सुनती है । ऐसा नहीं है कि कान गाली नहीं सुनते या गाली सुनकर खराब हो जाते हैं नहीं तो फिर गडबडी कहाँ है? गडबडी है हमारे मन में इंद्रियों की स्वतंत्र सकता नहीं है । जब तक हमारे मन के साथ करेंगे ना हूँ । इंद्रियों के नियमन करने के लिए । भगवान भगवत गीता में कहते हैं देवी द्विज गुरु प्राज्ञ पूछना शौच मार । जवाब ब्रह्मचर्य महिन् साज शरीरम् । तब उच्चतर देव, ग्रामीण और गुरु का पूजन, बाहरी तथा आंतरिक साफ सफाई, स्वभाव में सरलता, ब्रह्मचर्य का आचरन, अहिंसा ये सब वो कार्य है जिससे हमारी इंद्रियां धीरे धीरे विषयों से हटना प्रारंभ हो जाती है । अनुभव एक कर्म वाक्यं सत्यम प्रियतम शयद स्वाध्याय । आप जैसा नाम चैव वांगमय हम तब उच्यते । हमारी जिला एक ड्यूल बोपल इंद्रीय है । ये ज्ञान इंद्रीय भी है और कामेंद्रियां वहाँ पानी भी है । इसलिए यदि हमने अपनी जगह पर नियंत्रण पा लिया तो हमने पचास प्रतिशत तक इंद्रियों को नियंत्रन में कर लिया । ये मान सकते हैं किसी मनुष्य की जगह का वजन किया जाए तथा इस की पूरे शरीर का वजन किया जाए और दोनों का अनुपात निकाला जाए तो शायद जगह का वजन पूरे शरीर के वजन का हजार वह हिस्सा भी नहीं होगा । परन्तु ये विवाह पूरी जिंदगी आदमी को बहुत बुरी तरह ना चाहती रहती है । आप के दोस्त भी बनाती है और संसार में दुश्मनों का भी निर्माण करवाती है । जहाँ पर नियंत्रण लाने के लिए मैं दो दिन ज्ञान की साधनाएं बताता हूँ । इनको ट्राई करके आप काफी हद तक इसको नियंत्रन में ला सकते हैं । पहला कभी भी अनावश्यक ना बोले और बोलने से पहले एक बार अवश्य मन में विचार कर ले कि क्या ये बात बोलनी आवश्यक है । दूसरा कभी भी खाना खाने से पहले तथा खाना खाने के बाद खाने के बारे में ना सोचे और ना बात करें । तीसरा हमेशा दूसरों को आदरणीय शब्दों से संबोधित करें । आप तीनों बातों को यदि अपनाओगे तो धीरे धीरे आप मानी तथा रचना पर नियंत्रण पा सकते हैं । ये बात मैंने एक स्थान पर कहीं तो लोग कहने लगे कि ऐसे तो सब लोग होंगे ही हो जाएंगे । देखो भगवत गीता में भगवान कहते हैं मैं यहाँ प्रसाद हाॅग रहा । भाव सम शुद्धि रखती है । तब तो माने समुचे थे जो मलेशिया केले में शांत होकर कुछ देर नहीं बैठ सकता तथा जो बेकार के बाद विवाद से दूर नहीं रह सकता तो मुझे पाने का अधिकारी नहीं है । आप लोगों ने अक्सर सुना होगा कि माताएं बहनें अपने बहु की अथवा सास के बारे में बातें करती है तो क्या कहती है । वो कहती है देखो कहना नहीं चाहिए मगर कह देती हूँ अरे जब पता है कहना नहीं चाहिए तो फिर चुप रहो ना । हमेशा इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि जो शब्द दूसरों के मन में उद्वेग हलचल पैदा करे । विश अब हमें अपनी वाणी से कभी भी नहीं निकालनी चाहिए । हम हमेशा जब भी बोले तो दूसरों को आदरणीय शब्दों के साथ संबोधित करेंगे । इसमें फायदा हमारा ही होता है । जब हम मंदिर में जाते हैं तो भगवान के सामने हाथ जोडकर प्रणाम करते हैं । इसमें भगवान का क्या फायदा है? कुछ भी नहीं परंतु इसमें फायदा हमारा है । संस्कृत में श्लोक आता है । अत्यंत मालिन, ओदेह दही अत्यंत निर्मल माल इनसे मलीन व्यक्ति के दे । हमें जो परमात्मस्वरूप दही है वह अत्यंत निर्मल है । हम मूर्ति में भगवान को देखकर उसके आगे सिर झुका लेते हैं । तो क्या भगवान के द्वारा बनाई गई स्वयं भगवत स्वरूप अनिश्चित देह का हम आदर नहीं कर सकते । एक बार आप ऐसा करके तो देखिए इससे धीरे धीरे आप में आध्यात्मिक हृदय का निर्माण होगा और अपने स्वरूप को जाने की इच्छा स्वतः ही आप में आने लगेगी । लेकिन कई लोगों को हमने कहते हुए सुना है कि ये तो बहुत कठिन है अपनी नौकरी करते हुए व्यवसाय करते हुए हमें को झूठ बोलना भी पडता है । कडवे वचन कहने बढते हैं तो ये सब कैसे संभव है । देखो इंद्रियों का संबंध सीधे बहुत एक जगह से हैं और इंद्रियों का नियमन प्रथम स्टेज है । अच्छा ये बताओ कि पैसा हमारा कठिन है या सरल है । यदि पैसे कमाना आज के दौर में कठिन है ये बात तो सब लोग जानते हैं । तो आज तक किसी ने ये कहा है कि पैसा कमाना कठिन है इसलिए मैं पैसा नहीं कमाऊंगा नहीं । सभी लोग अलग अलग तरीके निकालते हैं, बढाई करते हैं, बहुत सारे काम करते हैं जिससे ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाया जाए । क्या हूँ क्योंकि पैसों का महत्व हमारे दिमाग में बचपन से कूट कूटकर भरा गया है । इसी प्रकार हमारे दिमाग में जिस दिन ये जाने की इच्छा हो गई कि हम कौन हैं, कहाँ से आए? क्या जीवन यही है? असली प्रसन्नता क्या विषय वस्तुओं तथा संबंधों से आ सकती है? उस दिन आप अपने आप बहुत सारे तरीके निकाल होगे अपने स्वरूप लगाने के । इसलिए जब तक आध्यात्म के प्रति महात्मा बुड्ढी नहीं है तब तक अच्छी बातें सुनो । भगवान का भजन करो, सच्चं करो, चिंतन करो और अपने कर्तव्य कर्म करते रहो । एक दिन स्वता ही आपके मन में जिज्ञासा उत्पन्न होगी । कुछ दिन से ये इंद्रियों के नियमन के बताए गए तरीके आपको बहुत ही सरल मालूम पडेंगे । अब दूसरा मणिका नियमन करोडों वर्ष की अवधि के बाद प्रकृति ने मनरूपी एक घटक का निर्माण किया है । जो लोग ऍम को मानते हैं वो ये समझ सकते हैं कि मनुष्य का विकास प्रकृति के द्वारा कैसे हुआ । मनसा सिद्ध देते इतनी मनुष्य जो मन के माध्यम से जगत में प्रकट होता है वह मनुष्य कहलाता है । मैन प्रकृति का मनुष्य को सबसे बेहतरीन उपहार है । लेकिन दूसरी ओर उपनिषद तथा भगवत गीता में ये भी आता है हाथ मैं वहाँ आत्मन् हूँ । बंधुरात्मैव रिपुरात्मन अहा । मनमाने शिखर सबसे बडा दोस्त भी है और मन सबसे बडा शत्रु भी है । भगवान कहते हैं इन हरियाणा मनुष्य आस में भूत आ नाम असमी चेतना इंद्रियों में मैं हूँ मन भगवान की विभूति है फिर हमारे लिए बंधन तथा दुख का कारण कैसे बन जाता है? भगवान कहते हैं बन्धुरात्मात्मनस्त्स्य येनात्मैवात्मना जीता अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् जो मैंने विषयों से बंधा हुआ है वो मैं दुख का कारण है और जो मंदिर विषय है वो मुख्य कारण है । तो समझदारी के साथ पहले हमें विषय वस्तुओं से उपर मत होना है फिर इंद्रियों में आ गए । इंडिया तभी कार्य करती है जब उनके साथ मान जुडा हो तो आप हमें मन में आये । अब हमें मान पर कार्य करना है और यहीं से आध्यात्मिक ज्ञान की सदर शुरू होती है क्योंकि मान के द्वारा इंद्रियों और इंद्रियों के द्वारा विषय प्रकाशित है । मन एक तरह से पुल है परमात्मा और संसार के बीच । यदि हमारा ये पुल ब्रिज ठीक हो गया तो समझ ले कि हम अपने स्वरूप के अत्यंत निकट पहुंच गए हैं । संसार में जब से हम आते हैं तब से हमें यही बताया जाता है कि काम करो, मन से पढाई करो, मन से खेलो, मन से नौकरी करो मन से लेकिन कोई भी ये नहीं बताया था कि ये मन किया है और क्या इस मन पर हमें कार्य नहीं करना चाहिए । जब मैं पंतनगर विश्वविद्यालय में था तो हमारे गुरूजी थे । वो नजारा जिम जाया करते थे । एक दिन मैंने उनसे पूछा सराब रोज जिम क्यों जाते हो? उन्होंने कहा, कसरत करने के लिए मैंने उनसे कहा कि मैं सुबह से शाम तक लेबॉरेटरी में काम करता हूँ तो मैं थक जाता हूँ । आप सुबह सुबह जिम जाते हो और फिर ऑफिस आकर दिन भर काम करते हो । आप थकते नहीं । वे बोले अगर मैं सुबह जिम ना जाओ तो मैं अवश्य थक जाऊंगा । मैं दिन भर के काम से नाथ को इसलिए मैं जब जाता हूँ । उस समय तो मैंने सर से बहस नहीं की लेकिन बाद में मैंने सोचा कि ऐसा कैसे हो सकता है की जिम में वो कसरत करते हैं तो क्या कसरत करने से आदमी थकता नहीं है? चिंतन करने के बाद मुझे इस तथ्य का पता चला कि जिम में हम शरीर पर कार्य करते है और ऑफिस में हम शरीर के द्वारा कार्य करते हैं । दोनों में बहुत फर्क है । इसी प्रकार हम जब जगत में व्यवहार करते हैं तो मन से कार्य करते हैं जिसके द्वारा हम संस्कार इकट्ठा कलेक्ट करते हैं । परंतु जब हम मान पर कार्य करना शुरू करते हैं तो हम मन में संग्रहित संस्कारों को हटाने का कार्य करते हैं जिससे हम अपने आप के नजदीक पहुंच जाते हैं । एक उदाहरण से और समझने का प्रयास करते हैं । कुछ दिन पहले मैंने अपनी एक कॉटन की कमी शॉर्ट हुई और जब सुखाई तो उसने बहुत सारी सेल बातें पड गई जिससे वो इतनी प्यारी सी कमीज बहुत ही खराब दिख रही थी । फिर मैंने सोचा कि इस कमीज पर प्रेस कर लेता हूँ । फिर मैंने उस कमीज की बढिया से स्त्री का डाली और वह कमीज फिर से बहुत ही सुंदर दिखने लगी । ये शायद आप लोगों ने भी कभी ना कभी अनुभव किया होगा परंतु मैंने उससे दो बहुत अच्छी चीज सीखी । पहला क्या वास्तव में सलवटें नाम की कोई वस्तु होती है और अगर नहीं होती तो वह दिखती क्यों है? और यदि होती है तो स्त्री करने के बाद वो कहाँ नहीं । यह संसार भी उन सलवटों की तरह है, ये दिखता है, अनुभव होता है परंतु होता नहीं वरना ये नित्य नींद में कहाँ चला जाता है और देह की समाप्ति के बाद यह संसार कहाँ चले जाएगा? सलवटों के साथ वह शर्ट भर्ती दिख रही थी लेकिन जब हमने टेढी मेढी सलवटों को निकालकर उसकी जगह कृ इस नाम की एक सलवार डाल दी तो वह शर्ट अपने सौंदर्य स्वरूप में आ गई । ठीक उसी प्रकार मन में करोडों वृत्तियां हैं जिसके कारण मन शांत होता है, दुख का कारण बनता है और बुढापे में जाकर हैंग हो जाता है । परन्तु यदि हम इन सभी व्यक्तियों को एक ही दिशा में मोड दे तो फिर मन रहता ही नहीं है । जिस ज्ञान में वृत्तियां नहीं होती उसी को चैतन्य कहते हैं । फिर जो आनंद और सौंदर्य प्रकट होता है वह भगवत स्वरूप होता है । मान के बारे में हम लोग पूर्व में चिंतन कर चुके हैं कि मन की अपनी कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं होती है । इसमें जैसे आप इनपुट डालेंगे, वैसे ये परमात्मा तत्व चयन करने के प्रकाश में कार्य करेगा । हम यहाँ पर मन को अपने पर हावी होने से कैसे रोक सकते हैं इस पर चिंतन करेंगे । ये मन हमारा है । हम इसको एक दोस्त की तरह भी रख सकते हैं और एक मजदूर की तरह दबाकर भी रख सकते हैं । पर कभी कभी ये मान हम पर हावी हो जाता है । जी हां, हम पर ही हाँ जी यह हम पर निर्भर करता है । लेकिन इस संसार के अच्छे बुरे जो भी अब हमें आते हैं वो मान के कारण ही है । लेकिन एक बात बहुत स्पष्ट है कि मान हम नहीं है, मान हमसे अन्य हैं । जब ये हम से अन्य है तो मन चाहे दुखी हो या सुखी, हम पर कोई प्रभाव नहीं पढना चाहिए । लेकिन ऐसा नहीं होता । कुछ उदाहरण लेते हैं यह थोडा आपको विचित्र लगेंगे परंतु यही सत्य है । पहला उदाहरण जहाँ हम पहले रहते थे वहाँ हमारे पडोसी थे । वे शाम के समय ज्यादातर मदिरापान में रहते थे तो एक दिन शाम को अपने आराम से टीवी पर गाने चलाकर दारू पी रहे थे । जब अपना काम खत्म करके खाना खाने लगे तो उनके घर से फोन आया कि उनकी माताजी का स्वर्गवास दो घंटे पहले हो गया है । जैसे ही उन्हें फोन आया वह जोर जोर से रोने लगे और उसी समय गाडी बुलाई तथा अपने घर चले गए । अब आप लोग सोचेंगे इसमें क्या है? उस दिन मैंने मान के बारे में बहुत कुछ जाना । दूसरा उदाहरण एक दिन ऑफिस में कुछ प्रोजेक्ट प्रजेंटेशन चल रहा था तो एक वैज्ञानिक महोदय कुछ परेशान से बैठे थे तो हमारे निर्देशक ने उनसे कहा आॅड तो वैज्ञानिक मुस्कुराए और कहा नहीं सर, ऐसी कोई बात नहीं है । फिर वैज्ञानिक महोदय का प्रजेंटेशन आया और वह किसी बात पर गलत बोल गए तो हमारे निर्देशक ने उस समय ऐसे ही कह दिया मैं बस फिर क्या था ये मोहरे ऐसे नाराज हो गए । तरह गुस्सा आ गया कि उनका चेहरा लाल हो गया । फिर हमारे निर्देशक ने उन्हें सौरी बोला तो वो थोडा शांत हुए । तीसरा उदाहरण एक बार मेरे हाथ में एक फोडा हो गया जो काफी भयानक हो गया था तो मैं डॉक्टर के पास गया तो डॉक्टर ने कहा कि इसके अंदर काफी गंदगी भरी है । इसे चीरा लगाकर निकालना पडेगा । हमने कहा ठीक है निकालो । फिर डॉक्टर बोले कि मैं आपको लोकल एनिस्थीशिया दे देता हूँ तो आपको दर्द नहीं होगा और आपसी देख भी लेना कि हमें कैसे करते हैं । डॉक्टर एक इंजेक्शन लगाया और मेरा हाथ केमिकल मेडिटेशन में चला गया । फिर डॉक् ने उसे काठा दबाया और खूब फस निकालकर पट्टी बांधी और हम अपने घर आ गए । अब हम इन तीन उदाहरणों के द्वारा मन को समझने का प्रयास करते हैं । पहले उदाहरण में हमने ये सीखा कि सुख दुख की केवल अपने मन की कल्पना है । हमारे जितने भी रिश्ते नाते है । उनका हमसे कोई सीधा कनेक्शन नहीं है । जैसे लाइट बिल का स्विच ऑन ऑफ करो तो बाल चलेगा तथा बंद होगा क्योंकि वहाँ डिरेक्ट कनेक्शन है परन्तु हमारा इस जगत के विषय वस्तु संबंधों से ऐसा नहीं है । अगर किसी आदमी को एक करोड की लॉटरी भी लग जाए और मन वहाँ नहीं है तो सुख नहीं है । और यदि किसी व्यक्ति के संबंधी की मृत्यु हो जाए और मन नहीं है तो दुख नहीं है । सुख दुख बाहर कहीं नहीं है । ये तो केवल भ्रांति है कि वह पैदा हो गया, वो मर गया । जब तक हम उस विषय के साथ तादात में नहीं करते, हमें कोई भी दुखी नहीं कर सकता हूँ । दूसरा उदाहरण ये सीखा की साइड और मार्टिन शब्दों में इतना अंदर कैसे आ गया । इसकी जगह एम कर देने से जैसे पूरे हालात ही बदल गए । ये केवल अंग्रेजी वर्णमाला का एक अक्षर ही तो है क्योंकि हमारे मन में साइड को लेकर एक अलग ही भाव जुडा है और महान को लेकर दूसरा और ये हमने इसी संसार से सीखा है । लेकिन जिस बच्चे को साइड और माँ का अर्थ नहीं मालूम, तुम उसे कुछ भी कहते रहो, उस पर कोई प्रभाव नहीं है । हमारा मन हमें इन विषयों के साथ जुडकर हमको सुखी दुखी बनाता है । जबकि हम तो मन से अलग है ना । तीसरा उदाहरण ये सीखा कि आज तक जितने भी दुख हमें इस देह को लेकर हुए हैं ये दुख देख को नहीं होंगे बल्कि हमारे मन में हुए हैं । लेकिन क्योंकि मन को हमने अपना माना इसलिए हमें लगता है कि जो भी कुछ मन को हो रहा है वह मुझे ही हो रहा है । परन्तु जब मन पर कार्य करना शुरू करते हैं तो हमें पता चलता है कि हमारी सत्ता मन से सादा ही अलग थी । इसी को देखा तो भाव का त्याग करना कहते हैं और यही ज्ञान कि आध्यात्मिक साधना है । एक बार मैं यह स्पष्ट कर दूँ हम जब तक अपने को इस देह और मन से अलग देखना प्रारंभ नहीं कर देते आप कुछ भी कर लूँ आपको यह संसार परेशान करेगा ये देख परेशान करेगा और आप मनोज साल से कभी भी बाहर नहीं आ सकते हैं । तो अब ये सवाल आता है कि ये कहने के लिए तो ठीक है कि देहातों भाव का त्याग करो लेकिन प्रैक्टिक की ये कैसे संभव है । भगवान भगवत गीता में मानसिक तब के बारे में बताते हैं मैं यहाँ प्रसाद हर सोम में त्वम् मान मात्रा में नहीं रहा । भाव संशोध ई रिक्तियां तक को मान समझते मन में प्रसन्नता, सौमिता मौन मन पर नियंत्रण तथा पुराने संस्कारों को मिटाना तथा नए संस्कार का निर्माण न होने देना ये मान के तब है । इन्हीं के द्वारा हम पहले रिहा, आत्मभाव तथा अंत में जीवात्मा भाव का भी त्याग कर सकते हैं और अपने भगवत स्वरूप को वापस पहचान सकते हैं । जिस प्रकार एक तांबे के बर्तन पर मैं जम जम के वह काला पड जाता है और हम रगड रगड कर उसे साफ कर देते हैं तो वो फिर से समझ जाता है क्योंकि वह चमक उसका अपना स्वरूप है । हमने वह चमक पैदा नहीं कि बस हमने मैं हल्की परत को हटा दिया । उसी प्रकार भगवान कहते हैं की है अर्जुन श्रृति प्रति पन्ना ज्यादा स्थास्थ्य दीनेश चला । समाधान चला बुद्ध इस तरहा योगम वापसी तूने अपने दिमाग में बहुत सारा कूडा करकट भर रखा है । पाप दुनिया, जन्म मरण स्वर्ग नरक पहले इन सबको तो अपने दिमाग से निकाल फेंक तब देख तुझे हर जगह हरशरण मैं ही देखूंगा । मैं आपको कुछ भी दिया बता सकता हूँ जिनके द्वारा आप व्यवहारिक तरीके से मन से परे जा सकते हैं । ये कोई साधारण विधिया नहीं है । वे सभी उपनिषद भगवदगीता के इतने साल के अध्ययन तथा मैंने खुद अपनी जीवन में उतारी है । अभी एक एक करके हम इन विधियों का चिंतन करेंगे । मन का कार्य मनीष यदि हमें क्या है ये जीवित कैसे रहता है? मान के रहने के लिए तीन प्रमुख भोजन है । पहला भूतकाल के मुद्दों को उखाडना, दूसरा भविष्य को लेकर व्यर्थ की चिंता तथा तीसरा वर्तमान में अन्य के साथ तुलना । ये तीन कार्य मन करता है और इन्हीं से वो जिंदा रहता है । इसलिए सबसे पहले हमें ये करना है कि किसी से भी ना उसके भूतकाल के बारे में पूछे और न कभी अपने भूतकाल के बारे में किसी से बात करें । क्योंकि भूतकाल देखता है हमारा नहीं । हम तो वहीं है जो बचपन में भी थे, जवानी में भी थे और बुढापे में भी रहेंगे तथा देख के बाद भी रहेंगे । भविष्य को लेकर चिंता सबसे खतरनाक चीज है । अध्यात्म भूत, भविष्य देख के होते हैं । अगर भविष्य में कोई बात ऐसी होने वाली है जो अप्रिय है तो उसके लिए तैयार रहो अन्यथा भविष्य के बारे में कभी भी नहीं सोचना चाहिए और एक बात अच्छी तरह से जान लें कि जो भी आप इस वक्त हुई आपका खुद का बनाया हुआ है । इसलिए वर्तमान में कभी भी किसी को अपनी हालत का जिम्मेदार नाथ है । राइट ऍम जो भी हमें संसार में करते हैं उसकी जरूरत किसी को नहीं है । जो भी हम करते हैं वो अपनी जरूरत है । उपनिषद में आता है आत्मरस तू काम आएँ, सर्वम् प्रियम भवति ये अपने दिमाग से निकाल देखी । आप किसी के लिए कुछ कर रहे हैं या किसी को इस की जरूरत है । वरना बुढापे में मैंने लोगों को कहते हुए सुना है कि हमने अपने बच्चों के लिए इतना की और वो मुझे पूछते नहीं । देखो बहुत स्पष्ट बात है माँ बाप को बच्चों की जरूरत होती है बच्चों को नहीं । तभी तो जिनके बच्चे नहीं होते वो दुःखी होते हैं और फिर बच्चों से हजारों इच्छाएं पाल लेते हैं । यही आशक्ति आगे दुख का कारण बनती है । किसी भी व्यर्थ के बाद विवाद में ना पडे इसके लिए भगवान मौन का तब बताते हैं । लेकिन मौन का मतलब ये नहीं है कि हम अन्य से तो नहीं बोलेंगे लेकिन अपने मन में हमेशा वृत्तियों का तूफान लेकर घूमते रहेंगे । मौन ये वाणी की तब नहीं है या माने का तब है जो मनुष्य शांत सहज है । वो अपने आप से कम बोलता है और अन्य से उतना ही बोलता है जितनी जरूरत हो । कभी भी अन्य के कारण दुखी ना हो गए । जो अन्य संबंध और संग्रह वो अपनी देख के कारण दुखी होता है उसे भगवान भी प्रसन्ना नहीं कर सकते हैं । इसलिए हमेशा प्रसन्न रहना ये भगवान की सबसे बडी भक्ति है । लेकिन यह प्रसन्नता किसी विषय वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति पर अवलंबित नहीं होनी चाहिए । हम आनंदस्वरूप है कि अपने स्वरूप की प्रसन्नता है जो हमारे माध्यम से प्रकट हो रही है । हमें संसार में दुखी होने के लिए नहीं आया लेकिन ये बात हमारी समझ में तभी आएगी जब हम जीवन के आधारभूत नियमों को समझेंगे । आखिरी बात ये बात शायद थोडा आपको अजीब लगे परंतु यही सत्य है । संसार में अगर सब से बडा कोई रोग है तो वह है दूसरों को सुधारने का । ये सो कॉल्ड समाजसेवा का कभी भी सोशल वर्कर बनने की कोशिश ना करें । ऍम एक बहुत बडे महात्मा हो गए जिसका नाम था निसर्ग दास महाराज । उन्होंने कहा था, दोस्त उठ राइट आॅफ देखो एक बात बहुत अच्छी प्रकार समझ लेनी चाहिए कि यह संसार पहले भी ऐसा ही था । अब भी वैसा ही है और हमारे जाने के बाद भी वैसा ही रहेगा । भगवान राम आए चले गए कहाँ है रामराज भगवान कृष्ण आए कुछ नहीं कर सके महाभारत फिर भी हुआ यह वंश का नाश फिर भी हुआ द्वारिका फिर भी जल में डूबी भगवान बुद्ध आये अहिंसा का पाठ पढाया लेकिन फिर भी यह संसार ऐसा ही है । इसके चक्कर में ज्यादा नहीं पढना है । भगवान भगवत गीता में कहते हैं उदवीर दाद मनाते मानम नात्मानमवसादयेत् आत्मैव ह्यात्मनो बंधुरात्मैव रिपुरात्मन अहा हमें संसार में अपना उधार करने आए हैं । जगत में आप चाहे कोई भी काम करें लेकिन अगर उस कार्य के द्वारा आपके मन पर जरा सी भी खराब हो जा रही है तो वहाँ से तुरंत निकल जाओ । कर्तव्य कर्म करने को यज्ञ सामान बताया गया है । कर मना करने के बजाय कर्म करना श्रेष्ठ होता है । ये उपनिषद में बताया गया है । लेकिन कर्म करके उसका फल मिलेगा तब हम खुश हो जाएंगे । ये नहीं होना चाहिए । अगर हम दारू नहीं पीते हैं तो हमारे लिए समाजसेवा मतलब किसी को भी दारू नहीं पीनी चाहिए । हम यदि मांस मच्छी नहीं खाते तो समाज सेवा का मतलब सबको घास खानी चाहिए । अपनी बात मनवाना ये दुराग्रह है । असली समाजसेवा वह है जब हमारे माध्यम से सब कुछ होता है और हमें ये भी पता नहीं होता कि क्या ये मेरे माध्यम से हुआ है । अगर एक बार ये एनजीओ नॉन बॉडी ऑर्गनाइजेशन के चक्कर में पड गए तो फिर हम ने ये किया हमने वह क्या हम बेहतर है दूसरा खराब है बस वहीं संसार से फिर से शुरू और आदमी को अहंकार हो जाता है हमारे जैसा कौन है आरडीओ भेज नवान असमी को न्यूज तीस दृश्यों मया यक्षी दासियाँ मीमो देश्य ऍम विमोहित आहा किसी जगह बहुत ही सुंदर वह के लिखा था नो बडी फॅसने वहाँ भी जो जीवन में कुछ बना है वह दुखी है और जो कुछ नहीं बना वो सादा खुश है । आदमी कभी देखी नहीं होता जब जब हम दुखी होते हैं उस वक्त हम कुछ न कुछ बने होते हैं जैसे ऑफिस में कौन दुखी है फॅार में कौन दुखी है? एक पति पुत्रिया एक बेटा आदमी कभी दुखी नहीं होता ये जो बनावटी है ये हमेशा दुखी होता है । इसलिए पूरी आध्यात्मिक साधना में जो बनावटी है उसे छोडो एक आदमी मात्र बन जाए । यही है इसके लिए करना कुछ नहीं है । बस समझना है कि सत्य किया है और बनावटी क्या है । ऍम अगर आपने यहाँ बताई हुई बातें कर ली तो धीरे धीरे आपका मन चैतन्यमय खोलना शुरू हो जाएगा । ठीक उसी प्रकार जैसे एक बर्फ का टुकडा पानी में बिना आवाज किए घुलने लगता है । फिर आप संसार में वैसे ही रहोगे जैसे पहले रहते थे । परन्तु अब आप के माध्यम से परमात्मा ही प्रकट होगा । आप सभी कार्य करोगी लेकिन करता पैदा नहीं होगा । यही है ज्ञान के साथ था तो चलिए बुद्धियोग साधना बुद्धि का नियमन । इस संसार में दो तरह के मनुष्य होते हैं । पहला इंटेलिजेंट यानी कि समझदार, दूसरे ऍम बुद्धिमान ॅ । जो समझदार आदमी है वो कभी दुखी नहीं होता है क्योंकि उसके फंडामेंटल्स बिल्कुल क्लियर होते हैं और समझदारी की नहीं । बातों को भगवान भगवत गीता में अर्जुन से कहते हैं, ध्याये तो विश्व यान पंद्रह संगती शुरू बजाए थे संघात सन जायती कम से कम आठ करोड हो जाए थे । क्रोधाद्भवति समूह सम्मोह हाथ स्मृति विभ्रम अहा स्मृति भवन शायद बुद्धिनाश ओ बुद्धिनाश शायद प्रणश्यति बहुत ही साफ साफ बताया गया है । आप जितना संसार के विषय वस्तुओं के बारे में सोचेंगे, उतना उन के प्रति आकर्षण पैदा होगा । आकर्षण के कारण उन विषयों को पाने की कामना पैदा होती है । फिर कर्म के द्वारा यही कामना पूरी हो गई तो और पानी की इच्छा लोग पैदा होता है और यही कामना पूरी नहीं हुई तो क्रोध उत्पन्न होता है और क्रोध मनुष्य में समूह लूजन पैदा करता है, जिसके कारण आपके अच्छे बुरे कार्य को सोचने समझने की शक्ति हर ली जाती है । इसी के कारण बुद्धि का नाश हो जाता है और जिसमें बुद्धि का नाश हो गया, उसका पतन निश्चित है । ये बहुत ही सरल इक्वेशन है । इसको शायद हम सब लोग जानते हैं । आजकल तो गूगल तथा वह साहब महाराज पर सुबह सुबह इतना ज्ञान मिलता है । लगता है कि किसी साधु महात्मा, आध्यात्मिक गुरु की जरूरत ही नहीं । फिर भी रोज अखबार अनेक अप्रिय घटनाओं से भरा होता है । ऐसा इसलिए होता है कि वह ज्ञान पुस्तक से उतरकर मस्तक में नहीं जाता । मैंने किसी पुस्तक में पढा था । जिस समाज में कार्यपालिका, इन्द्रियाँ, भ्रष्ट को तो वह समाज फिर भी चल सकता है और जिस समाज की सरकार के मंत्री लोग मान भ्रष्ट हो तो वहाँ भी लोग जैसे तैसे गुजारा कर ही लेते हैं । बरिंदरजीत समाज की न्यायपालिका बुद्धि भ्रष्ट हो गई उस समाज का सत्यानाश होना निश्चित है । भगवान कहते हैं इंद्रियाणि परानिया हो रेंद्र ये यहाँ पर हम मना मना सस्ती ऊपर अब धीरे जो बुद्धे है प्रकाश दूसरा हा इंद्रियों से परे मन है, मन से परे बुड्ढी है परंतु बुद्धि से भी बडे ये कामना है इसलिए जब तक काम ना पर विजय नहीं मिलती है तब तक सब व्यर्थ है और कामरा पर विजय केवल बुद्धि द्वारा ही मिल सकती है क्योंकि बुद्धि में परमात्मा का प्रतिबिंब बचत आभास के रूप में पडता है । हम लोग जीवन का प्रेरक किसे मानते हैं सब कुछ इस बात पर निर्भर करती है । हमारे जीवन का प्रेरक कम है या श्याम है । यदि प्रेरक कम है तो आप कभी भी ये नहीं समझ पाएंगे कि एक पशु के जीवन जीने में और एक मनुष्य के जीवन जीने में अंतर भी हो सकता है और जीवन का प्रेरक श्याम हो तो बस थोडा बुद्धि को कामना से हटाकर देखिए परमात्मा तो आप किसी कामना के पीछे आराम से बैठे वन से हो जा रहे हैं । भगवान ने भगवत गीता में बुद्धियोग की बहुत ही तारीफ की है और इसको सत्यम योग का नाम दिया सत्व माने सब में समान भाव से उसी परमात्मा को देखना विद्या विनय कंपनी ग्रामणी गवी हस्तिनी शुनि चैव शिवप्पा केचप पंडिता हा समदर्शन हा जो विद्यावान ज्ञानीजन मनुष्य है वो एक ब्रामण गाये हाथ चांडाल तथा कुत्ते में कोई अंतर नहीं देखता हूँ उस सब में उसी परमात्मा को ही देखता है । भौतिक जगत में हम जिनको ज्ञानी स्कॉलर कहते हैं, अगर उसके पास की दृष्टि नहीं है तो उसकी बुद्धि अभी शुद्ध नहीं है । चाहे वो कितनी भी नोबल प्राइज क्यों ना जीत ले । वो बुड्ढी परमात्मा तत्व को नहीं पड सकती है परंतु जिस दिन आप को ये समझ में आ गया कि हर जगह परमात्मा ही है वहीं प्रकट हो रहा है उस दिन समझ लेना कि हमको दिव्यदृष्टि प्राप्त हो गई है । लेकिन अभी हमारे भेद बुद्धि है, हम परमात्मा में भी भेद करते हैं । ये राम है वही है जो लोग रामायण और कुरान को लेकर मंदिर तथा मस्जिद को लेकर झगडा करते हैं । शायद ही उन्होंने कभी रामायण या कुरान उठाकर भी देखी हो । ईशावास्योपनिषद कहता है आवासीय मैडम सर्वम् यत्किंचित जगत्यानी जगत तीन तीन तीन भज्जी जगहा माँग रह रह कस्ट धना यह संसार परमात्मा से ओतप्रोत है । यह संसार भगवान की विभूति है परंतु भेद बुद्धि के कारण हम उसे देख नहीं रहे हैं । हम लोग कहते हैं कण कण में भगवान है, ये भेद बुद्धि है, कनगन भगवान में है, ये समबुद्धि है । ठीक उसी प्रकार जैसे हम कहते हैं कि समुद्र में पानी बहुत गहरा है । अब जरा सोचिए की बारे में समुद्र है या समुद्र में पानी । पानी में समुद्र पानी में ही लहरें हैं लेकिन हमारी बुद्धि इसको पकडा नहीं पाती । ये वही सत्य मान लेती है जिसको इंद्रियों द्वारा दिखाया जाता है । इसलिए हमको बुद्धियोग के लिए पहले अनेकता में एकता को पकडने की कोशिश करनी होगी क्योंकि अनेकता केवल अ वो पा अधिक है । द्वैध सत्य नहीं है । अद्वैत ही परम सकते हैं उसे एक तत्व को पकडने के लिए । मैं आपको कुछ विधियां बताता हूँ । आप इसका अभ्यास वाइस पर चिंतन कर सकते हैं । जैसे पहले भी बताया गया है कि हमारा अस्सी से नब्बे प्रतिशत ज्ञान हमें हमारी दो इंद्री दृष्टि और श्रवण शक्ति के द्वारा ही होता है । पहली है दृष्टि के द्वारा अपनी बुद्धि से सब में एक तत्व कैसे देखें इस पर चिंतन करेंगे । सामान्यतः देखा जाए तो अपनी दृष्टि में परिवर्तन लाना ही आध्यात्मिक साधना है । एक औरत को देखने का नजरिया सबका अलग अलग होता है । एक पुत्र उसी औरत को बहुत ही आदर से देखता है । एक भाई उसे औरत को अलग भाव से देखता है और एक साथ उस भारत को देखना भी नहीं चाहती । ऐसा क्यों? क्योंकि अलग अलग रिश्तों के साथ अलग अलग भाव जुडे हैं । लेकिन वो एक औरत है इस भाव से उसे कौन देखता है? शायद वो स्वयं रूपरंग के कारण इन्द्रियाँ ढक गई है । इंद्रियों के कारण मैंने ढक गया है मान के कारण जागृत स्वपन सुषुप्ति समाधि ढकी गई है तथा इन चारों अवस्थाओं के कारण वो ढक गया है जो इन सबका आधार है । रंग रूप हजारों है परंतु इन सभी का प्रकाशक दृष्टि ये सभी मनुष्यों में एक जैसी है और इस दृष्टि को खास बात ये है कि ये बिना रंगरूप के रहे ही नहीं सकती । जहाँ दृष्टि को रंगरूप नहीं दिखता, वहाँ ये दृष्टिभ्रम के कारण स्वयं ही रंगरूप का निर्माण कर लेती है । उदाहरण के लिए अनंदा आकाश को अगर हम ऊपर की ओर देखे तो हम आज समानी नीला रंग दिखाई देता है । जबकि हम जानते हैं कि आकाश कोई रंग नहीं होता । ठीक उसी प्रकार जब हम आंखे बंद कर लेते हैं तब भी हमें एक रंग दिखाई देता है । काला रण करन की दृष्टि बिना रंग के है ही नहीं । इसलिए ये भी कहा नहीं जा सकता कि रंग रूप के कारण दृष्टि है या दृष्टि के कारण रंगरूप है । यहाँ पर कार्यकारण मिथ्या साबित हो जाता है । हम जब बहुत से रंगरूप देखते हैं तो हम क्या देखते हैं? हम उस वस्तु से परिवर्तित प्रकाश को देखते हैं जो कि हमारी आंखों की रेटीना पर एक उलटा प्रतिबिंब बनता है । हम उसको देखते हैं, वो भी अपने अंदर बाहर । हम कुछ नहीं देखते हैं तो सभी रंग रूप को प्रकाशक हो गया । प्रकाश तथा सभी आकारों का आधार हो गया । आकाश अगर प्रकाश और आकाश न हो तो रंगरूप संभव ही नहीं है । जवाब किसी भी वस्तु का आकार, प्रकार, रंग रूप अपने भीतर देखते हैं । तो फिर काला, गोरा, छोटा बडा ये सब आपके अंदर है, बाहर नहीं है । इसलिए आप जब बाहर की विषय वस्तुओं को देखें तो ध्यान हमेशा जो प्रकाशक है उस पर होना चाहिए । इन फिजिकल वर्ल्ड ऍप्स पीती हूँ । जब हमारा ध्यान प्रकाशित वस्तुओं से हटकर प्रकाशक पर जाना शुरू हो जाएगा तो ये विषय वस्तु के होते हुए भी ये हमें परेशान नहीं करेगी । इसके लिए आप एक अंधेरे कमरे में बैठे रोशनी की एक भी किरण कमरे में न आ रही हो । अब आप आंख खोलकर बाहर कि चीजों को देखने का प्रयास करें । कुछ नहीं देखते हुए भी आप देख रहे हैं इसको कहते हैं अद्वैत साधना । दूसरा तथ्य इस बारे में ये हो सकता है हमें वस्तुए अलग अलग क्यों दिखाई देती है । मान लो एक दीवार है बिल्कुल सफेद रंग की । उस पर एक लाल रंग की पेंट की एक पट्टी है एक नीले रंग की और एक पीले रंग की । इस पर आपसे कोई पूछे की दीवार पर कितने रंग है तो आप कहेंगे तीन रंग लाल, नीला, पीला लेकिन ये अलग अलग रंग सफेद दीवार के कारण दिख रहे हैं । उस तरफ किसी का ध्यान नहीं जाता है । अब अगर दीवार लाल कर दी जाए तो जो लालपट्टी थी वो नहीं दिखेगी । इसलिए जितने भी रंग हमें देखते हैं वो किसी आरे स्थान पर अध्यारोपित होते हैं जिसके कारण रंग अलग अलग दिखते हैं । थोडा इसको और समझने का प्रयास करते हैं । आप एक बडे पात्र में दस छोटे छोटे कटोरी रखिए और दस कटोरियों में पानी डाली और बडे पात्र को दस कटोरियों सहित रात में बाहर रखकर चंद देखने का प्रयास कीजिए । अब आपको अलग अलग कटोरी में दस अलग अलग चंद देखेंगे तो क्या चंद दस बन गए नहीं । अब आप बडी पात्र में पानी डाले । जब तक की कटोरिया उसमें डूब नहीं जाती तो अब आप बडे पात्र में एक ही जान देखेंगे । यही हमारे साथ भी हुआ है । परमात्मा का प्रतिबिंब सभी प्राणियों में सामान्य है । बस सब का पात्र अलग अलग है । हमें इसी बात को समझना है । यही ज्ञान की साधना है । दूसरी है श्रवण शक्ति । श्रवण शक्ति के द्वारा अपनी बुद्धि से सब में एक तत्व कैसे देखें हम लोग आगे बंद करके रंग रूप से जो आपने दृष्टि को हटा सकते हैं लेकिन हमारी श्रवण शक्ति को हम बंद नहीं कर सकते हैं । श्रावण में अध्ययन कैसे पाए ये एक बहुत कठिन प्रक्रिया है परन्तु अगर थोडा बुद्धि का प्रयोग करके चिंतन करें तो ये बहुत ही सरल हो जाती है । एक उदाहरण से समझाते हैं महान लिया में चार बार कहता हूँ राम राम राम राम । अब आप चिंतन करो कि ये रामशब्द हमें चार बार क्यों सुनाई दिया? क्योंकि जब मैंने पहली बार राम कहा तो राम कहने के बाद कुछ देर फिर शांति थी और इसी प्रकार हर एक शब्द के बाद कुछ शांति थी । अब दो बातें सोचने वाली है । पहली क्या जो रामशब्द कहने के बाद वाली पहली शांति थी वह दूसरी शांति से भिन्न थी तथा दूसरी अगर दो शब्दों के बीच यदि शांति न हो तो क्या हमें शब्द अलग अलग सुनाई दे सकते हैं? शांति एक है । अशांति शब्द अनेक है परंतु शांति शांति के बिना संभव ही नहीं । थोडा ध्यान देना पडेगा इस बात पर यहाँ अभाव भी भावात्मक है । अभाव एक ही होता है जो भाग में भी है परंतु भाव से प्रभावित नहीं होता और जो अभाव में भी है परंतु जिसका अभाव नहीं होता वो जो भाव अभाव के परे हैं वो अपना स्वरूप है । शब्द का आभाव होता है शांति का नहीं । काम, क्रोध, लोग मोहम्मद मात्सर्य के अभाव को शांति कहते हैं । अगर शांति अब भावात्मक होती तो इस की प्राप्ति का प्रयास संभव ही नहीं होता परंतु ऐसा नहीं है । शांति के कारण शांति का निर्माण होता है । अशांति कारण शांति का नहीं, शांति एक है । अशांति अनेक है परंतु एक ऐसी शांति है जो शांति के कारण बढती नहीं है और अशांति की विरोध ही नहीं है बल्कि दोनों का आधार है । उसी को प्रशांति कहते हैं । इसी कारण जिस जगह हमारे शिरडी साईं बाबा का मंदिर है उस जगह को प्रशांती निलायम कहते हैं तो हमेशा शांति पर ध्यान देने का प्रयास करे जो सभी शब्दों का आधार है लेकिन शब्दों से प्रभावित नहीं है । इसको कहते हैं अभाव में भाव की साधना । आप जब इसका उच्चारण करते हैं तो ये ध्यान देखिए कहाँ प्रकट हुआ और कुछ समय रहने के बाद ये कहाँ चला गया । आप पाएंगे कि ये जहाँ से प्रकट हुआ था वापस ये वहीं लौट जाता है । इस ध्यान की साधना का अभ्यास करते करते हम लोग धीरे धीरे शब्दों के कारण परेशान होना बंद हो जाएंगे और स्वतः ही आभास होगा कि मैं ही हूँ । जगत को प्रकाशित कर रहा हूँ परन्तु मैं किसी से प्रभावित नहीं हूँ । इसी को कहते हैं बुद्धियोग या बुद्धि की साधना । यहाँ पर ये बात स्पष्ट करना आवश्यक हो जाता है कि ज्ञान जब तक पुस्तक में रहता है तो हम को प्रभावित नहीं करता और उसका उपयोग भी हमारे लिए कुछ नहीं होता । परंतु कभी कभी जब ये ज्ञान पुस्तक से हटकर मस्तक में आता है तो आदमी को उसका अभिमान हो जाता है । फिर दो बातें होती है ऐसा अभिमानी व्यक्ति या तो वो आधा पक्की ज्ञान को उल्टी प्रवचन के रूप में लोगों को सुधारने के लिए लगा देता है । यहाँ फिर उसके मन में यह भाव आ जाता है कि हमारे के जैसे नहीं, तबला पेटी लेकर हमेशा गाने गाते रहते हैं । हम भला मंदिर क्यों जाए? हम तो ज्ञानी है, पूजा पाठ क्यों करना? जब हमें इसका दाद पर यह पता है और हम लोगों की जैसे नहीं है । मांस मदिरा उल्टी बात करते रहते हैं और कई बार तो लोग ये भी कह देते हैं कि अब तो मैं ज्ञानी हो गया हूँ । अब जगत में कार्य करने का मन नहीं लगता, आप कार्य कर के क्या करेंगे? ये लोग होते हैं जिन्होंने सिर्फ ज्ञान सुना तो है परंतु उस पर चिंतन मनन और निधि रिया आसन नहीं किया । इनके लिए आध्यात्म पॉजिटिव एनर्जी की जगह नेगेटिव एनर्जी का काम करता है क्योंकि ज्ञान अभी बच्चा नहीं, किसी को कहते हैं मुँह कॉन्स्टीपेशन । एक बार एक चालीस पचास साल के युवक ने मुझसे पूछा कि मैंने भगवद्गीता पढी, उसमें भगवान कृष्ण नहीं तो हमेशा अहम की बात करें तो मेरी पूजा कर तो मेरी शरण में आ जाओ । मेरी भक्ति कर मैं ये कर दूंगा, मैं वो कर दूंगा । क्या भगवान कृष्ण अहंकारी नहीं थे । मैंने उनसे सीधे यही कहा कि आपको स्पिरिच्युअल कॉन्स्टिपेशन हो गया है । आप जल्दी से इसका इलाज कीजिए । पढना ही हानिकारक साबित होगा । मैंने उन महोदय से ये पूछा कि क्या भगवत गीता में कहीं पर भी ये लिखा है कि श्री कृष्णा हुआ आज नहीं कृष्णा नाम भगवत गीता में केवल दो जगह आया है । एक जब भगवान कहते हैं की दुश्मनी गोत्र में उत्पन्न वालों में मैं कृष्ण हो तथा दूसरा जब संजय बिल्कुल अंतिम श्लोक में कहते हैं यत्र योगेश्वर अहा कृष्णा हूँ । एक जगह भगवान श्रीकृष्ण को भगवान की विभूति बताते हैं तथा दूसरी जगह संजय भगवान को कृष्णा नाम से संबोधित करते हैं । सभी जगह या तो अहम शब्द प्रयोग किया गया है या श्रीभगवानुवाच शब्द प्रयोग किया गया है । जैसे कि पहले भी बताया जा चुका है । हमारे जीवन का प्रयोजन यही है कि हमारे माध्यम से परमात्मा प्रकट हो सके । जब श्री कृष्ण अर्जुन को भगवत गीता का ज्ञान दे रहे थे तो उस समय श्रीकृष्ण नहीं बोल रहे थे । उस समय उन के माध्यम से भगवान के वचन निकल रहे थे इसलिए कहीं पर भी श्रीकृष्ण आवाज नहीं लिखा गया है तथा दूसरा अहम शब्द का अर्थ अहंकार या मैं नहीं है । इसका अर्थ है नहीं । हाँ हाँ बंटी वो जिसका कभी नाश नहीं होता है । सादा ऐसा ही है जैसा वो आदि में था । उस परम तत्व को अहम कहा गया है । अगर मैदान का ज्ञान हम दूसरों पर लगाने का प्रयास करेंगे तो ये अनुसार वेदांत कहलाता है और यदि वेदांत का ज्ञान हम अपने जीवन में उतारते हैं तो यही भक्ति बन जाती है । जो भी हमें संसार में करते हैं यदि उसका प्रभाव जगह पर पड रहा है तो हम समाज सेवक है और यदि प्रभाव हम पर पड रहा है तो हम शायद हक है । भगवान ने पूरी भगवत गीता अर्जुन को सुनाई सभी सवालों के जवाब भी दिए लेकिन अंत में आकर कहते हैं ये थे छह सी तथा क्यूँकि है अर्जुन मेरा काम तो मैं बताना आगे तुम्हारी इच्छा है । जैसे तुम्हें ठीक लगे वैसा करूँ तो भगवान के द्वारा बताई गई बातों ने अर्जुन के लिए पॉजिटिव एनर्जी सकारात्मक ऊर्जा का कार्य किया और उसने पूरा युद्ध बिना किसी रात दिवेश, भय, ग्लानि, पढना ही राजा बनने के लिए या युद्ध जीतने के लिए क्या? बस उसने फल की इच्छा के आवेश कर्मफल को त्यागकर केवल कर्तव्य कर्म किया जिसका परिणाम ये हुआ कि वह युद्ध जीता और उसके मन पर उस युद्ध के द्वारा एक खरोच तक नहीं आई । यही ज्ञान की सदर का प्रयोजन है कि हमें संसार में अपने सभी कर्तव्य कर्म, उत्साह, खुशी के साथ करें । ना की खुशी के लिए कर्म करें । वरना लोग जितना परेशान अध्यात्म को लेकर होते हैं, इतना किसी भी वस्तु को लेकर नहीं होते हैं । आध्यात्मिक मनुष्य माने जो गंभीर हो, कभी हस्ता नहीं । हमेशा डर डर कर राम राम करता रहता है या अध्यात्म का मतलब नहीं है । अध्यात्म मतलब ये जहाँ लेना कि हमें संसार में एलटीसी टूर पर आए हैं । ये अपना पाँच मिनट घर नहीं है । हमें वापस वही जाना है । लेकिन जब तक हम एलटीसी पर जाते हैं तो क्या वहाँ दुखी होने जाते हैं? वहाँ पर हम एंजॉय करने चाहते हैं और वहाँ पर पैसे लोगों के साथ रिश्ते नहीं बनाते, बस आनंदपूर्वक रहते हैं । इस प्रकार हमें भी जगत में आकर किसी भी संबंधी या संग्रह से चिपक ना नहीं है । यहाँ आए हैं आनंद व्यक्त करने के लिए और एक दिन जब एलटीसी पैकेज खत्म हो जाएगा तो वापस जाना ही पडेगा ।

Chapter 10 (vi) - भक्ति (साधना)

भक्ति साधना जीवन में हम जो कुछ भी करते हैं उसका केवल एक ही उद्देश्य है कि हमें अपने जीवन में कृतकृत्य फुलफिल्मेंट की प्राप्ति हो जायेगा और उसके लिए जब हम छोटे होते हैं तो हमें ये बताया जाता है कि बेटा जीवन में अगर खुश रहना है तो एक परिवार होना चाहिए । फिर परिवार की खुशी के लिए पैसा होना चाहिए । फिर धीरे धीरे पैसे की परिवार की महत्ता हमारे दिमाग में बिल्कुल फिट हो जाती है । लेकिन को ये नहीं पता था कि कितना पैसा होना चाहिए, कितना बडा घर होना चाहिए या कितनी गाडी होनी चाहिए या अन्य वस्तु हुए । इतनी आने के बाद आपके जीवन में कृतकृत्य यानी कि फुलफिल्मेंट आ जाएगी । ये जगत सापेक्षता की नियम पर चलता है किसी गरीब गांव में जिसके बाद एक लाख रुपए हैं तो वहाँ पर अमीर व्यक्तियों में वह है परंतु वही आदमी अगर एक शहर में आ जाता है तो वह देखता है कि यहाँ तो मैं कुछ भी नहीं इसलिए तो वहाँ पर गरीब है । एक बार बिल्कुल सत्य है कि जब तक हम सापेक्षता की इस जगत को देखते रहेंगे हमारे जीवन में कभी भी कृति कृतिका नहीं आ सकती । भगवान भगवत गीता के पाँच दंश अध्याय के अंतिम श्लोक में कहते हैं ऍम शास्त्र में दम उक्तम भयानक ए तक बुधवा बुद्धि मांस यार कृतकृत्य भारत ये जो मैंने तुझे सबसे गाॅव विदेश क्या है? अगर तो इस पर चिंतन करे और अपनी बुद्धि का प्रयोग करें तो हे अर्जुन तो जीवन में कृतकृत्य को प्राप्त कर सकता है । लेकिन हम लोग जीवन में कुछ सोचना ही नहीं चाहते । बस जैसा किसी ने बता दिया उसको सबके मानकर उस पर रियायत करना शुरू कर देते हैं । एक बार की बात है, शायद मेरी उम्र उस समय कोई अठारह वर्ष की रही होगी । हम लोग टिहरी गढवाल में रहते थे और पडोस में शर्मा जी रहते थे । उन दिनों उत्तरकाशी में काफी तेज भूकंप आया था तो लोग काफी डरे हुए थे । एक दिन शाम को किसी ने शर्मा जी की खिडकी के नीचे खडे होकर ऐसे ही चला दिया कि अरे भूकंप आया, भूकंप आया । शर्मा जी दूसरी मंजिल पर रहते थे । शर्मा जी ने इधर देखाना उधर सीधे अपनी बालकनी में आया और वहाँ से छलांग लगा दी जिससे उनका एक हाथ और पांव की हड्डी टूट गई । हम लोग भी शर्मा जी जैसे ही है । ये जगह हमें बताता जा रहा है कि ऐसे करो, वैसे करो और हम वो सब करते जा रहे हैं । कभी हमने अपने बारे में जानने की कोशिश ही नहीं की । हम कौन है? ईश्वर कौन है? हमारे उससे क्या संबंध है? इस संबंध को जाने को ही भगवान गुह्यतम शास्त्र का नाम दिया है । दर्शन देखा जाए तो हम लोगों को पता ही नहीं होता कि हमें परेशानी है क्या? एक बार एक दसवीं कक्षा का छात्र मेरे पास आया । उसके पिताजी हमारे अच्छे मित्र थे तो उन्होंने उसको मेरे पास भेजा था । वो लडका आते ही मुझसे कहता है वो ऍम कहा कुछ गलत नहीं है । अगर तुम्हें कंपनी चाहिए तो कल से मैं भी तुम्हारे साथ आता हूँ । वो बोला नहीं, अब समझ नहीं रहे हैं इसमें क्या गलत है । मैंने कहा कि कुछ गलत नहीं है क्योंकि तुम जानते ही नहीं हूँ कि दरअसल तुम्हारी समस्या है क्या । मैंने कहा तुम्हारी समस्या ये नहीं है जो तुम बता रहे हो । तुम्हारी समस्या ये है कि जब तुम पढने बैठते हो तो तुम्हारा मन तुम्हारा साथ नहीं देता । हमेशा वही लडकियाँ तुम्हारे मन में आती रहती है । फिर वो थोडा गंभीर हो गया और रोने लगा । फिर वो बोला मेरे साथ के सभी लडके ऐसा ही करते हैं इसलिए मैं भी उनके साथ चला जाता हूँ । इसलिए मेरा मन पढाई में नहीं लगता । फिर मैंने उससे कहा कि अभी तो बहुत छोटे हो इन सभी चीजों को समझने के लिए । लेकिन एक बाद अभी तुम अच्छी तरह से समझ लो । जीवन में गोल जितना बडा होगा, उतनी ही छोटी चीजें तुम्हें परेशान नहीं करेंगे । जीवन का गोल अगर छोटा रखोगे तो हर छोटी मोटी चीजों से तुम परेशान हो जाओगे । फिर मैंने उसको कुछ और मोटिवेशनल बातें बताई और डेरी सुबह उठकर भगवत गीता का एक अध्याय सुनने के लिए कहा । धीरे धीरे एक साल में वही लडका कितना बदल गया कि दसवीं कक्षा में उसके बहुत ही अच्छे ग्रेड जाए । हमारे जीवन में उपलब्धियां टारगेट से बहुत सारे हो सकते हैं, परंतु गोल उद्देश्य एक ही है कि हम कैसे भी करके जान ले । क्या आखिर हम है कौन और फिर ये जानने के बाद उस अपने स्वरूप का अनुभव और नित्य निरंतर उसी स्वरूप में बने रहना, यही हमारे जीवन का एकमात्र उद्देश्य है । जैसे अगर हमें अल्मोडा से दिल्ली जाना है तो इसके भी कई मार्ग है और सभी मार्ग अंततः दिल्ली को ही जाते हैं । ठीक उसी प्रकार योग उपासना, कुंडलिनी धर्म ये सभी ज्ञान तक पहुंचने के मार्ग है और उस ज्ञान की अनुभूति भक्ति है । जिस प्रकार हमने एक मार्ग में से किसी मार्ग पर चलकर दिल्ली पहुंच गए और दिल्ली पहुंचने के बाद हमने जब उस दिल्ली का अनुभव किया जो पहले नहीं हुआ था । उसके बाद कहीं और जाना शीर्ष नहीं है क्योंकि हम साधनों के द्वारा साठ तक पहुंच गए हैं । इसको हम इस तरह से भी समझ सकते हैं । मान लो हमें बद्रीनाथ भगवान के दर्शन करने के लिए जाना है । तो सबसे पहले अगर हमारे मन में बदरान भगवान की महत्ता ही नहीं है तो हम इस बारे में सोचेंगे ही नहीं । लेकिन एक बार हमारे मन में भगवान को देखने की जिज्ञासा उत्पन्न हो गई तो फिर हमारा मन हमें परेशान करना शुरू करेगा कि यदि ये रास्ता बहुत कठिन है और क्या होगा? बद्रीनाथ जाकर इससे बढिया और कहीं घूमने चलते हैं । लेकिन अगर यहाँ पर बुद्धि के द्वारा अपने मन पर विजय प्राप्त कर ली तो आपका आधा काम हो गया । फिर बुद्धि, कर्तव्य अभिमान से ये निर्णय कर लेते हैं की ठीक है हम बद्रीनाथ ही जाएंगे । फिल्म बद्रीनाथ तक जाने के विभिन्न मार्गों के बारे में जानना शुरू करते हैं और फिर अपनी सुविधा अनुसार एक मार्ग का निर्णय कर लेते हैं । फिर हम अपने घर से बहुत सारा सामान लेकर विभिन्न उपायों जैसे हवाई जहाज रेलगाडी, बस टैक्सी के द्वारा मंदिर तक पहुंच गए और फिर अपना सारा सामान होटल में छोड देते हैं तो फिर मंदिर के बाहर जूते चप्पल भी छोड देते हैं और बिल्कुल खाली हाथ भगवान के सामने होते हैं । अब ये जो यात्रा थी यही हमारी आध्यात्मिक यात्रा की कहानी है । जब तक हमारे हृदय में इस परमात्म तत्व को जानने की जिज्ञासा नहीं होती तब तक सब ठीक है लेकिन जहाँ हमने पूजा पाठ करना शुरू कर दिया, हमारा मन हमको परेशान करने लगता है । मैंने हमें समझाने का प्रयास करता है कि ये कोई उम्र है, भगवत गीता पडने की पूजा पाठ करने की और जब बुढापे में हम किसी लायक नहीं रहे थे जब सरकार भी हमें रिटायर्ड कर देती है और परिवार के सदस्य हमें किसी लायक नहीं समझते तब हम आध्यात्मकि लायक बनने की नाकामयाब कोशिश करते हैं । जब हमें अपना नाम तक याद नहीं रहता तब हम भगवद्गीता पढना शुरू करते हैं । लेकिन यदि हमारी जिज्ञासा तीव्र है तो हम अपने सभी कर्तव्य कर्म करते हुए भी परमात्म तत्व को जान सकते हैं । पूजा पाठ, उपासना धर्म में सब केवल हमें अपने साथ तक पहुंचाने वाले साधन है और एक बार हम उस तत्व के साथ एक हो गए तो फिर ना योग ना क्या नवास, नाना धर्म और ना ही भक्ति बचती है । फिर केवल पर महात्मा मात्र ही रह जाता है जो कि एक मात्र सकते हैं । अब सवाल यह आता है कि हमें कैसे पता चलेगा कि हम आध्यात्म के सही मार्ग पर जा रहे हैं या नहीं । यह सवाल एक महोदय ने मुझसे पूछा था तो मैंने उनसे कहा कि चले इसका जवाब हम खाना खाने के बाद देंगे । फिर वो महोदय और मैं खाना खाने लगे तो जब उन्होंने दो रोटी खाई थी तो मैंने उनसे कहा आप का पेट भर गया है, आप जाओ । थोडा नाराज हो गए और बोले आपको कैसे पता मेरा पेट भर गया, मैं अभी और खाऊंगा । फिर उन्होंने पूरा खाना खाया और वह उठने लगे तो मैंने उनसे कहा अरे अभी आपका पेट भरा नहीं । अभी आप चार रोटी और खाओ । वे बिल्कुल नाराज हो गए और बोले डॉक् सब ये क्या बात है । आप ऐसा बोल रहे हैं । मैंने उनसे माफी मांगी और कहा देखो जिस तरह मैं या अन्य संसार का कोई भी व्यक्ति हर निर्णय नहीं ले सकता कि आपकी सुविधा शांत कितना खाना खाने से होगी । यानि कि आपकी भूख कितना खाना खाने से शांत होगी । उसी प्रकार ये भी आपको कोई नहीं बता सकता है कि अब जीवन में आध्यात्मिक एसे ही रास्ते पर चल रही है । क्या नहीं केवल आप की अनुभूति है । आप स्वयं जान सकते हैं और कोई नहीं जान सकता । लेकिन ऍम देखकर यह बता सकता हूँ कि आपको इस मार्ग पर कैसे चलना है । जिस प्रकार मान लोग जिस मनीष ने आज तक कभी पानी नहीं देखा वो उसके गुण धर्म बताकर उसे समझा सकता है । लेकिन उसे पाने का अनुभव तभी होगा जब वो पानी का अनुभव करेगा । ठीक उसी प्रकार एक भक्त की अनुभूति को केवल वही जानता है । लेकिन जितना मैंने जाना है वो मैं आपको बताता हूँ । सबसे पहले हमें कुछ मूलभूत बातें समझनी होगी जो हमारे मैंने में भक्ति को लेकर है उसको समझ लेते हैं । पहला भक्ति एवं आशक्ति भगवत गीता में भगवान ने हमेशा अनन्य भक्ति का ही जिक्र किया है । अन्य मतलब अन्य कोई है ही नहीं । एक मात्र सत्ता को मानना अद्वैत अनन्य भक्ति का पहला लक्षण है जहाँ पर हमें अन्य का भाव आता है । वहीं पर राग द्वेष गिलानी एशिया भाई होता है । जैसे मान लो कोई आदमी जंगल में शिकार करने के लिए गया और वहाँ रास्ता भटक गया तथा उसको जंगल में ही रात हो गई । अब वो जंगल में बेचारा डर के मारे कह रहा था कि कोई जंगली जानवर ना आ जाए और उस पर हमला ना करते । ये सोचते सोचते हो गया । जब नहीं इनमें कराटे मार रहा था तो उस वक्त वहाँ पर शेयर आया लेकिन शेयर में उस पर हमला करने के बजाय वो डरकर वहाँ से भाग गया । जब तक वैध है तब तक ही मन के विकार है । जमीन में एक पति खराडे मारता है तो उसमें वह हिम्मत कहाँ से आ जाती है कि वह जो पत्नी के आगे मो तक नहीं खोल सकता । नींद में इतनी जोर जोर से आवाज करता है क्योंकि वहाँ अन्य दूसरा दिव्या है ही नहीं, सिर्फ वही है । हमने पहले भी चिंतन किया है कि जीव जगत ईश्वर ये तीनों एक परमात्मा पर ही विभिन्न उपाधियां चढा देने से तीन होते हुए से देखते हैं परन्तु ये सत्य नहीं है । सत्य केवल एक मात्र है कि जगत कुछ और नहीं बल्कि मेरे भगवान ही विराट रूप में संपूर्ण जगत में व्याप्त है और योगी मैं भी संपूर्ण स्वरूप का ही हिस्सा हूँ इसलिए मैं भी वही हूँ । यही अनन्य भक्ति है और अपने में उस परमात्म तत्व को पहचानकर यह जान लेना कि ये जीव जगत कुछ और नहीं बल्कि मेरा ही विस्तार है । ये ज्ञान है । ज्ञान और भक्ति अलग नहीं है । ज्ञान की परिपूर्णता को भक्ति कहते हैं तथा भक्ति के आधार को ज्ञान कहते हैं । दोनों भक्ति और ज्ञान में अन्य कुछ बचता ही नहीं है । केवल वासुदेव सर्व यही भाव शेष रह जाता है । बिना भक्ति के ज्ञान पांडित्य है तथा बिना ज्ञान के भक्ति केवल आशक्ति मात्र है । कई लोग वेदांत तथा भगवत गीता पर पीएचडी करते हैं । क्या हम भगवान को सर्टिफिकेट दे रहे हैं कि बहुत अच्छी बात कही आपने? आजकल देखा गया है कि कई कम उम्र के बच्चे भी भगवत गीता को कंठस्थ याद कर लेते हैं तथा कई तो टीवी पर भागवत महापुराण की कथा भी करते हुए दिख जाते हैं । मेरा तो ज्ञान है ना भक्ति है ये पांच देते हैं । उनका तत्त्व से कुछ लेना देना नहीं है । जब तक इस ज्ञान पर चिंतन मनन और विधि ध्यान आसन नहीं होता तब तक ये ज्ञान दूसरों को बताने के लिए ठीक है । अब हम लोग जो करते हैं उस पर आ जाते हैं । ऍम देखा जाए तो हमारी पूजा पाठ, उपासना, धर्म योग जिसको हम भक्ति का नाम दे देते हैं, ये भक्ति नहीं आ सकती है और जो आशक्ति है वो जहाँ भी सकती है ये रूकती नहीं है । ये उसी प्रकार है जैसे कोई गंगा किनारे गया तो गंगादास जमुना किनारे गया तो जमनादास और घर पर आया तो देवदास फिर बुढापे में आकर यही बोलते फिरते हैं । हम ने इतना क्या? भगवान का हम को क्या मिला? अरे भाई किसने कहा था करने के लिए भागवान कोई जरूरत नहीं है तुम्हारे किए कि क्योंकि परमात्मा पूर्ण है । अपेक्षा केवल अपूर्णता में होती है परिपूर्णता में नहीं । हमने अपने आपको अपूर्ण समझ लिया है इसलिए हम संसार की विषय वस्तु रिश्ते नातों को पानी की अपेक्षा करते हैं और इससे हम प्रेम का नाम देते हैं । ये बात थोडी बचाने में कठिन है परंतु एक बात बहुत ही सही तरीके से दिमाग में उतार लेनी चाहिए कि जो भी हमें संसार में रिश्ते नाते बनाते हैं वह केवल लेन देन के हिसाब से बनाते हैं और इन रिश्तों में हम प्यार प्रेम का नाम दे देते हैं । भगवान शंकराचार्य कहते हैं वैसी गते कहाँ काम विकास रहा शुष् के निर्णय कहा कासा रहा चुने वित्तीय कहा परिवार हो गया आते तत्व कहा संसार रहा हमारा इस संसार में जो भी किसी व्यक्ति या वस्तु को लेकर प्रेम है वहाँ कौन प्रेम है इसको कहते हैं गुणों के कारण प्रेम जिस व्यक्ति के साथ हमारी विचारधारा मिलती है उसे हम कहते हैं कि मुझे उस से प्रेम है । लेकिन जब वही विचारधारा हमारी विचारधारा को सूट नहीं करती तो वह दुश्मन है । चाहे वह पत्नी हो या पुत्र हो या कोई भी हमारा सहकर्मी हूँ हम उससे प्यार नहीं करते हैं । हम लोग उनके गुणों से प्यार करते हैं और यदि उस आदमी के गुण हमसे नहीं मिलते तो फिर वही लडाई झगडा, ईर्षा इसी कारण शायद में पंडित लोग लडके लडकी की शादी से पहले जन्मपत्री के आधार पर गुड मिलाते हैं । लेकिन हमने अधिकांशतः देखा है कि सोलह के सोलह गुण मिलने के बाद भी हमेशा परिवार में तनाव रहता है । तो कहने का तात्पर्य यह है कि कौन प्रेम के कारण ये जिंदगी नहीं चलती । ये जिंदगी चलती है या तो शुद्ध प्रेम भक्ति के कारण या फिर समझदारी ज्ञान के कारण । इसी प्रकार हम जो उपासना करते हैं, उसमें भगवान हमारे लिए बन जाते हैं साधन और ये जगत कि ईट पत्थर बन जाते हैं । साध्य पूजा पाठ, कर्मकांड इनमें मैं का महत्व होता है । भक्ति में मैं रहता ही नहीं, मैं से मुक्ति का नाम ही भक्ति है और यही ज्ञान है । एक बार बहुत ही स्पष्ट है परमात्मा हम से प्रकट हो सकता है, परंतु हम परमात्मा तक पहुंचते पहुंचते गायब हो जाते हैं । ठीक उसी प्रकार जैसे एक नमक की पुडिया को यदि समुद्र की गहराई नापने के लिए समुद्र में डाला जाए तो वह नमक की पुडिया समुद्र की गहराई तक जाते जाते बचती ही नहीं । उस समुद्र के साथ एक हो जाती है । यही भक्ति में भी होता है । थक वो है जो है ही नहीं और वही सब कुछ है । इसको कहते हैं स्टाॅक सॉलिड क्योंकि इसके अतिरिक्त कुछ और है ही नहीं । स्पेस क्योंकि इसी में सब कुछ है । भक्त पर संसार का कोई भी नियम लागू नहीं होता क्योंकि वह कुछ कर्म करता ही नहीं, उसके माध्यम से सभी के लिए आए प्रकृति के गुणों के कारण होती है । परंतु वाहना उन क्रियाओं के कारण करना ही उन क्रियाओं के फल के कारण प्रभावित होता है । लेकिन हम लोग तबला पेटी लेकर भगवान का दिन रात सर खाते रहते हैं और खूब गाने गाते हैं । खूब भजन सुनते हैं । जिंदगी की डोर सौ दीनानाथ के महलों में रखी चाहे झोपडी में वास्ते धन्यवाद निर्विवाद राम राम कहि है जाहि । विधि राखे राम ताही विधि रही है और गाना खत्म होते ही अपना दिमाग चलाने लग जाते हैं । हमारे बोले हुए का हम पर ही असर नहीं होता तो और ऊपर क्या होगा? मैं नाम और जगह नहीं बताऊंगा लेकिन हमारे ही एक मित्र है । वे प्रत्येक रविवार को तबला पेटी लेकर तीस मिनट तक कुछ भजन गाते हैं । उनके घर पर कॉलोनी के कुछ अन्य लोग भी आते हैं और ये वो काफी समय से कर रहे हैं । एक बात समझने वाली है कि ये जो आजकल एक ट्रेंड सा बनता जा रहा है कि रविवार को ही भगवान को याद किया । बाकी दिनों में रात रात तक ऑफिस का काम और केवल अपने अहंकार का पोषण मैं गारंटी देता हूँ, कुछ नहीं होगा इससे जब तक तबला बेटी हाथ में है तो हम भक्त है वरना विभक्त है और ऐसे लोगों में मैं बहुत मजबूत होता है । हर व्यक्ति को संदेह की दृष्टि से देखना, किसी पर विश्वास न करना ये लक्षण ऐसे लोगों में बहुत प्रबल होते हैं । भगवान शंकराचार्य ऐसे लोगों के लिए कहते हैं वीणावादन सौंदर्य भुगते नाजम ते अध्यात्म । कोई पार्ट टाइम जॉब नहीं है कि ट्वेंटी फोर सेवन प्रक्रिया है । इसलिए एक बात बहुत स्पष्ट समझ लिए । भगवान को हमारी किसी भी पूजा पाठ, कर्मकांड यह किरदान, भजन कीर्तन की कोई आवश्यकता नहीं है । ये तो हम अपने मतलब के लिए करते हैं और जब मतलब अपना होता है तो आदमी को उसका अभिमान नहीं होता । भगवान के लिए चाहे एक जोर हो, डाकू हो, दरिद्री हो, देश का प्रधानमंत्री या कोई महात्मा उसके लिए सभी सामान है । भगवान कहते हैं ना मेरे लिए कोई पराया है ना अपना, ना मैं द्वेषवश तीन अप्रिय दूसरा भक्त के लक्षण जब तक भगवान के नाम का रस हमारे हृदय में नहीं उतरता तब तक चाहे आप एक फिल्मी गाना सुने या कोई भजन दोनों बराबर है । भगवान हमारे हृदय में तभी अवतरित होंगे जब भगवान द्वारा बताये गये भक्ति योग का हम पालन करेंगे । भगवान ने भगवत गीता के द्वादश अहा अध्याय भक्तियोग में भक्त के हृदय में अवतरण के लिए कुछ शर्तें रखी है । ये कुल तैंतीस बातें हैं जो एक भक्त में होनी चाहिए । जिस दिन ये बातें हमारे जीवन में उतर आई उस दिन परमात्मा स्वयं तैंतीस कोटि देवी देवताओं के साथ हमारे हिंदी में निवास करेंगे । इन तैंतीस बातों को संक्षेप में हम समझने का प्रयास करते हैं । अधिवेश ता सर्वभूतानां मैत्र हा करोड बच्चा निर्मलों निरहंकार आ रहा समझ दुख सुख रहा शमी पहले श्लोक में गुण बताए गए हैं अधिवेश मित्र करुणान निर्मम ओ निरंकार समझ सुख दुख और समाज छील पहला अधिवेश ना अधिवेश ना का अर्थ है किसी से भी भूल वर्ष भी हमारे मन में कृष्णा का भाव ना बहुत के लोग हेड शब्द का प्रयोग करते हैं जैसे आई है मैं कभी भी शब्द का प्रयोग ना करें । किसी का पर्यायवाची शब्द डिसलाइक फिर भी ठीक है परंतु जहाँ द्वेष घृणा है वो सुविधाएँ में परमात्मा का अवतरण कैसे हो सकता है? दूसरा मित्र मित्र का मतलब ये नहीं कि हम सभी मित्र बनाने में लग जाए । इसका अर्थ यह है कि सभी के साथ हमारा व्यवहार मित्रता का होना चाहिए । तीसरा करना हम लोगों को करोना, दया और सेवा में अंतर जानना होगा । करो ना वो भाव है । जब हम किसी भी प्राणी के साथ एक होकर उसके सुख दुख का अनुभव कर पाते हैं वो है करो ना दया ये थोडा अलग भाव हैं । दया में हम श्रेष्ठ बन जाते हैं और जिस पर गया की जाती है वह दयानीय बन जाता है । इसलिए कभी दया शब्द का प्रयोग न करें तथा तीसरा है सेवा सेवा एक श्रेष्ठ भाव हैं इसमें दूसरे को श्रेष्ठ मानकर उसकी इच्छा अनुरूप जो कार्य हम करते हैं वह सेवा है सेवा अंत करने की । शुद्धि का एक श्रेष्ठ मार्ग है तो उसी दास कहते हैं मैं सेवक सचराचर अम् रूप स्वामी भगवंता । चौथा निर्मलों ममता रहित होना पूरी भगवत गीता को यदि एक वाक्य में समझना है तो हम इस प्रकार समझ सकते हैं कि इसमें अर्जुन की एक बीमारी का जिक्र है जिसका नाम है ममता और इसके लिए जो दवाई बताई गई है उसका नाम है समझा पांचवां निरंकार एक बार बिल्कुल साफ है कि ये समझने की जब जब हम दुखी होते हैं तो उस वक्त हमारा अहंकार बहुत स्ट्रोंग होता है । अहंकार ये एक बहुत बडी रुकावट है हमारी आध्यात्मिक उन्नति में छठा समझ, सुख दुख, जीवन में सुख दुख का प्रसंग आना स्वाभाविक है । लेकिन सुख दुख और दुख के साथ तादात्म्य करके सुखी दुखी होना अलग बात है । जो मनुष्य सुख दुःख में समान है, वहीं प्रभु के प्राप्त भैया की काबिल है । सातवां शमी समझ होना एक बहुत ही बडी आध्यात्मिक साधना है । समाज झील होना मतलब अपने भूतकाल के बोधि को उतार फेंकना छमा हमारे अंदर करने की पवित्रता के लिए एक प्रमुख मार्ग है । जब मनीष क्षमाशील है उसके मन पर संस्कारों का निर्माण नहीं होता है । संतुष्ट संततम् योगी गतात्मा दृढनिश्चय यहाँ मई अर्पित मनो धीरे यो मद्भक्तः हर समय प्रिया हाँ आठवाँ गतात्मा भगवान कहते हैं कि ऐसा योगी जिसका मन हमेशा अपने बस में होता था, जो संतुष्ट हूँ वो मुझे प्रिय है । किताब वहाँ मतलब जिसका आपने पर पूर्ण नियंत्रण है तथा वो मन को जब चाहे जहां चाहे जितने समय के लिए, चाहे किसी भी काम में लगा सकता है, उसे यह आत्मा कहा जाता है । न वहाँ दृढ निश्चय जीवन में दृढ निश्चय का होना बहुत जरूरी है । जब तक हम दृढ निश्चय वहाँ नहीं होते तब तक किसी भी लक्ष्य की प्राप्ति एक समस्या नजर आती है । इसलिए कहते हैं लक्ष्य से दृष्टि हटने के बाद जो दिखता है उसी को समस्या कहते हैं । और दसवां मई अर्पित मनो बुद्धि मंदबुद्धि ये भी प्रकृति का ही अंग है । भक्ति यानी की अनुभूति मन और बुद्धि के द्वारा नहीं होती शुरू त्री से युक्ति, युक्ति से अनुभूति, चिंतन मनन करने के लिए बुद्धि तथा मन की आवश्यकता होती है जिससे हमें ज्ञान प्राप्त होता है । ज्ञान होना भी एक मानसिक प्रक्रिया है लेकिन बहुत ही एक मानसिक प्रक्रिया नहीं है । अपना हमें बोर्ड होता है इसलिए आत्मबोध कहा जाता है ना कि आत्मज्ञान । आत्मबोध आत्मज्ञान से श्रेष्ठ है और यह तभी संभव है जब आत्मज्ञान के बाद हम अपनी मन बुद्धि को परमात्मा को अर्पित करें । यस्मान नोट विजयते लोगों को लोकानां भेजते चलो यहाँ हर शाम अरशद भाइयो द्वय गैर मुक्तों यहाँ साझा में प्रिय हाँ पहला यस्मान नो द्वीप बजते लोग को भगवान कहते हैं कि मेरा भक्त वह है जिसके कारण संसार का कोई भी प्राणी दुखी नहीं है । एक बार कहीं पर मैं बता रहा था कि खुश रहना भगवान की सबसे बडी साधना हैं । तभी एक वहाँ से हमारे पास आए और बोले कि मैं बहुत खुश हूँ और हमेशा मजे में रहता हूँ या मैं साधक हूँ । हमने कहाँ पहले एक प्रश्न का जवाब दो । आपके घर पर सब कैसे हैं? वो महाशय तुरंत बोले अरे सर, उनको छोडिये ये सब न लायक है । हमें अपना देखना है । मैं खुश रहता हूँ, चाहे दुनिया कुछ भी कहे । हमने कहा ठीक है आप खुश रही है और मैं वहाँ से चला आया । फिर एकदिन महाशय के ऑफिस का एक सहकर्मी मुझे मिला तो वह मेरे बिना पूछे उन महाशय के बारे में बताने लगा कि वह घर में बच्चों पर ध्यान नहीं देता । बीबी से हमेशा लडाई करता है और ऑफिस में मदिरा भी कराता है । हमने कहा उस दिन वो ठीक ही कह रहा था कि वह स्पिरिचुअल है, लेकिन वो लिक्विड स्पेशल है । देखो हमारे कारण जगत का कोई भी प्राणी अथवा नियम कानून यदि दुखी है तो ये भक्ति नहीं है कि भोगती है लो कानों द्विजत्व भगवान कहते हैं कि मेरा भक्त वो है जो संचार के किसी भी प्राणी के कारण दुखी नहीं होता । भगवान का भक्त होने का ये मतलब ये बिल्कुल नहीं है कि लोग हमें डोरमैट पायदान की तरह प्रयोग करें । हमें ना तो इस दुनिया में किसी को धोखा देना है और न ही सिद्ध होगा । खाना है इसलिए हमेशा सावधान रहना ये भी एक आध्यात्मिक साधना है । हर्ष अमर्ष भय और भयमुक्त भगवान कहते हैं कि मेरा भक्त वो है जो खुशी में उछलता नहीं है और अप्रिय समाचार से दुखी नहीं होता तथा कभी भी भाई को प्राप्त नहीं होता और मन में उठने वाले विभिन्न उद्वेगों से सदेव अप्रभावित रहता है । इस श्लोक के अनुसार आध्यात्मिक साधना मतलब पहला हम जिएंगे तथा दूसरों को जीने रहेंगे । साथ दूसरा हम किसी को धोखा नहीं देंगे और अन्य से धोखा नहीं खाएंगे । चिट तीसरा हम हमेशा आनंद में रहेंगे लेकिन अन्य को ना खुश करने का प्रयत्न करेंगे और ना दुखी करने का आनंद । यही सच्चिदानंद परमात्मा की साधना हैं । आप एक शहर शुचि रक्षियों रहा सीनों गत दिया था । सरवा आरंभ बरी त्यागी यो मद्भक्तः का समय प्रिया हाँ । तो चलिए आप एक शाह यह संसार में ये जाना बहुत जरूरी है की अपेक्षा आकांक्षा आज शाम ममता ये सभी मानसिक बीमारियां हैं । कोई कोई आदमी अपने बच्चों के नाम अपेक्षा आशा ममता रखते हैं लेकिन जिस प्रकार हम शारीरिक बीमारियों, कब्ज, डायरिया, दर्द पर अपने बच्चों का नाम नहीं रखते ऐसे ही हमें यह समझना होगा की अपेक्षा आज शाम ममता ये भी आध्यात्मकि क्षेत्र में बीमारिया ही है । इसलिए भगवान कहते हैं कि मेरा भक्त कभी भी किसी से कोई भी अपेक्षा नहीं रखता । सूची आज के लिए स्वच्छ भारत अभियान चल रहा है, बहुत अच्छी बात है परन्तु स्वच्छता का तात्पर्य केवल नहाना धोना, बाहर के वातावरण को साफ रखना ही नहीं, स्वच्छता बहारी और आंतरिक स्तर पर होनी चाहिए । भगवान कहते हैं कि मेरा भक्त वो है जो बाहर की साफ सफाई के साथ मानसिक स्तर पर पवित्र हैं । उदासीनता उदासीन का मतलब डिप्रेशन नहीं है या फिर किसी से बात ना करना और हमेशा मुंह फुलाकर रखना ये उदासीन कार्ड नहीं है । उदासीन शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है । उत् प्लस आसीन उत् यहाँ धातु है जिसका अर्थ है ऊपर या श्रेष्ठ स्थान तो उदासीन का अर्थ हुआ कि चाहे जगत में कुछ भी हो या हम चाहे जगत में किसी भी परिस्थिति में हो अन्य के कारण मन की स्थिति को विचलित नहीं होने देंगे । और यदि बहुत ही सीधे शब्दों में कहा जाए तो दासीन कार्ड हैं चाहे बाहर कुछ भी हो, क्या फर्क पडता है गत व्यथा गत वित्त माने किसी भी व्यक्ति, वस्तु, परिस्थिति के प्राप्त होने के कारण अथवा दूर चले जा रहे कारण भक्त दुख रहित रहता है । भगवान भी कहते हैं कि हे अर्जुन गटास उन गता सुनिश्चित नानो शो चलती पंडिता जो दीवार मनीष है वो जो चले गए हैं या जो नहीं गए हैं, दोनों के कारण परेशान नहीं होते । सर्वा रंभ, परित्याग ई, सरवा आरंभ पर इत्यादि शब्द कई बार भगवत गीता में आया है । इसका अर्थ है कि भगवान का भक्त में स्वार्थ और कर्म का अभिमान होता ही नहीं है तो वो जो कुछ भी करता है अपने आराध्य के लिए ही करता है । योजना हर्षित टीना द्वेष तीन अशोक दीन आकांक्ष अति शुभाशुभ परित्याग िरिक्त मान यहाँ समय पर यहाँ तो अब आगे ना है । स्थिति ना सोचती ही भगवान का भक्त वह है जो हर्ष और शोषित शोक से सजा दूर रहता है है । स्थिति का अर्थ यह नहीं कि वह खुश नहीं रहता बल्कि भक्ति ये जानता है की खुशी कही बार है नहीं वो हमेशा आनंद में रहता है । यहां लाख थेरेपी वाले हर्ज की बात भगवान ने नहीं रही है तथा दुखी तो कभी भक्त होता ही नहीं है क्योंकि वो जान ज्यादा है कि सब कुछ परमात्मा ही है और परमात्मा आनंद स्वरूप है । अपना देश की नाक कान शक्ति दृष्टि गार्ड है । द्वेष तथा काङ् क्षति का अर्थ है राग । ये द्वंद्व है राग और द्वेष । इसलिए भगवान कहते हैं कि मेरा भक्त राग द्वेष से सादा दूर रहता है । भगवान ने भगवत गीता के अंत में कहा भी है ब्रह्मा भूतहा प्रसन्नात्मा ना सोच तीन आकांक्ष अति शुभ अशुभ परी त्यागी भगवान के भक्त के लिए कुछ भी ना शिव है ना शुभ है क्योंकि वो जानता है कि राम में भी वही परमात्मा है जो रावण में है । शुभ भी वही है और अशोक भी वही है तो भक्त कभी भी शुभ अशुभ के चक्कर में नहीं पडता । सबहा शत्रोहन, अमित रेज तथा मना अपमान यू हूँ शीतोष्ण सुख दुख ए शूज समाज संगम विविधता टू ले निंदा स्थिति मौनी संतुष्ट हो ये इनके अनुचित अनिकेत स्थिरा मदीर भक्त मान में प्रियोन रहा समाज शर्त राऊत सुमित्री हाँ भगवान कहते हैं कि मेरा भक्त वह है जो चाहे शत्रु हो या मित्र उनमें समान भाव रखता है । यहाँ पर व्यक्तिगत शत्रु और मित्र की बात नहीं हो रही है । क्यों भक्त का तो कोई ना मित्र हैं और ना कोई शत्रु वरन यहाँ पर अच्छे बुरे प्रवृत्ति वाले मनुष्य की ही बात हो रही है । भक्ति के लिए अच्छा देव बुरा दाना कुछ नहीं है । वास्तव में परमात्मा का ही दर्शन करता है सवाह मान अपमान यू हूँ हमारे मैंने में महान अपमान को लेकर बहुत ध्यान दिया है और अधिकांश लोग इस महान अपमान के कारण दुखी होते हैं । थोडा मान अपमान को समझ लेते हैं । मान ये शब्द किसी वस्तु को नापने की एक इकाई है जैसे तापमान, द्रव्यमान तो जब हमारा मान होता है इसका मतलब हमने जो अपने आप को समझा है उसके अनुसार हमें अन्य ने सराहा या पहचान । लेकिन जब अपमान हुआ तो हमारे सामने ऐसी घटना घटी जो हमारे अनुरूप नहीं थी । जब हमारी सोच की नहीं भी गलत है तो हमको अपमान तो लगेगा ही । लेकिन जब हमें ये ज्ञान होता है कि अपमान किसका हो रहा है तो पता चलेगा कि मेरा तो अपमान हो ही नहीं सकता क्योंकि मैं ही तो हो जिसके कारण ही जगत कि सकता है । परन्तु अज्ञानवश हमने अपने आप को दो हाथ किस दे हम मात्र तक सीमित कर रखा है । एक बार एक गांव में एक अत्यंत श्रेष्ठ महात्मा जी आए तो वहाँ गांव की जो पंडित लोग थे उन्होंने कुछ बुरा भला कह देते थे तो महात्मा जी के चेले ने उनको आकर बताया कि अमुक पंडित आपके बारे में बहुत गलत गलत बात बोल रहा था तो महात्मा जी हाँ और बोले क्यों सही कह रहा था बस तुम्हारी समझ में नहीं आया । अगर वो मेरी देह को लेकर मुझे बुरा बोल रहा था तो वहीं बात है तो मैं भी देख को लेकर बोलता हूँ और यदि वह देख को धारण करने वाले जीवन के बारे में गलत बोल रहा था तो उसमें और मुझमें ये चैतन्य अलग नहीं है । वो अपने को ही गलत कह रहा था । सदाशिव दोष ना सुख दुख रहा । भगवान कहते हैं कि मेरा भक्त वो है जो प्रकृति के द्वारा प्रदत्त लाभ हानि, सुख दुख तथा सर्दी गर्मी के कारण परेशान नहीं होता है । वो सभी द्वंद्वों में समान भाव रखता है । समाज संघवी वर्षिता भगवान कहते हैं मेरा भक्त चाहे अकेला हो या भीड में हो, चाहे घर में हो या कुछ काम कर रहा हूँ । कोई उसके साथ रहे या ना रहे वह सभी स्थितियों में सामान रहता है । इस पर भगवान शंकराचार्य भक्त के लिए कहते हैं योग तोवा भोग तो वसं घर तो वह संघ भी ही ना जैसे ब्रह्माणी रमते उच्चत्तम ननद थी, नन्द की ननद थी, ए टू ले निंदा सुनती है जान इन दा और स्थिति को सामान समझने वाला है वह मेरा भक्त है । किसी ने चाहे हमारी बुराई की हो या कोई हमारी आरती उतारें, दोनों ही व्यवस्था में मन की स्थिति सम रहनी चाहिए । वहीं भक्त है मौनी मौन । ये मन का तब है कई लोग साधु महात्मा मौन व्रत रखते हैं परन्तु अंदर में तूफान चलता रहता है । मौन वाणी का तब नहीं है । मौनी मानसिक स्तर पर होता है । जो मनुष्य मौल रहता है वहीं मननशील भी हो सकता है । इसलिए भगवान कहते हैं कि मेरा भक्त मौन है । साइलेंस ऍफ रियालिटी संतुष्ट हो । ये नहीं कि इन चिट भगवान कहते हैं कि मेरा भक्त वह है जो किसी भी बिना कारण के हमेशा संतुष्ट सैटिस्फाइड रहता है । हम लोगों की संतुष्टि किसी कारण के होती है परंतु भक्त वो है जो अकारण ही संतुष्ट रहता है और जो भी कुछ घटित हो रहा है उसको हरी छा मानकर स्वीकार कर लेता है । अनिकेत अनिकेत का अर्थ है कि जो रहने के लिए घर की इच्छा नहीं करता वरना वहाँ संपूर्ण जगत को भी अपना घर समझता है । एक बार में एक आदमी से मिला कहीं कोई साइंटिफिक मीटिंग थी तो उन्होंने अपना नाम डॉक्टर अनिकेत बताया । मीटिंग के बाद हम लोग खाना खा रहे थे तो मैंने डॉक्टर अनिकेत से पूछा कि ये अनिकेत का अर्थ क्या होता है? वो बोले मुझे नहीं पता । मैं हैरान हो गया कि ये कितना बडा साइन तेज पूरी मीटिंग में इतनी बडी बडी बातें कर रहा था । उसको अपने नाम का अर्थ भी नहीं पता । इसी को कहते हैं वही रामी बुद्धि । हम संसार की सभी वस्तुओं को जानना चाहते हैं परन्तु क्या हम संसार की वस्तुओं को जानकर उन को बदल सकते हैं? यह संसार हमारे बदलने से बदला जा सकता है नहीं । लेकिन यदि हम अपने बारे में जाने और स्वयं को बदलने का प्रयास करेंगे तो हमारा दृष्टिकोण संसार के प्रति अवश्य बदल सकता है । हम लोग ईट पत्थर के बारे में जानने में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि जिसके कारण ईट पत्थर का संचार है उसकी तरफ ध्यान ही नहीं देते । मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि हम लोगों में बहुत से कम लोग हैं जो अपने नाम का शाब्दिक अर्थ जानते होंगे और जानती भी है तो उस नाम के अनुरूप किया । हमने अपने आप को जानने की कोशिश की । बस बचपन में किसी पंडित जी नया घर वालों ने इस देह को एक नाम का टाइम लगा दिया और हम लोगों ने पूरा जीवन यही गलत धारणा में गवाह दिया है कि ये दे हमें हूँ और मेरा नाम ये है इस बात पर एक बार अवश्य चिंतन करें । स्थिरमति स्थिरमति का अर्थ है जिसकी मति बुद्धि स्थिर है और जो कभी करप्ट नहीं होती उसको जानने के लिए अब कुछ भी नहीं बचा । वो संदेह रहे ज्ञान को प्राप्त हो चुका है । वहीं मनीष स्थिरमति स्थित प्रज्ञा है । हम लोगों की माटी स्थिर नहीं है क्योंकि हमने बहुत कुछ सुनकर देखकर बढकर ये मान लिया है कि खाओ पीओ मजे करूँ इसी को जीवन कहते हैं लेकिन जिस दिन ये कलईल खीचड हमारे दिमाग से निकल गया उस दिन हमें पता चलेगा । मनुष्य जीवन का तात्पर्य केवल एक ही है कि किसी भी तरह हम जीव जगदीश्वर के मूल तत्व को पहचान ले और ये केवल मनुष्य जीवन में ही संभव है । इस पर भगवान कहते भी है श्रिति विपरीति पन नाती । यदा स्थान स्थिति निश्चल समाधार चला बुद्धिस् तदा योगम वापसी की है और जिन जिस दिन धीरबुद्धि एक निश्चय वाली हो जाएगी और जो भी तूने सुना है उस से भ्रमित हो ना छोड देगा उस दिन तो इस समय प्रयोग को प्राप्त हो जाएगा । इस प्रकार भगवान ने अपने भक्त के ये तय छत्तीसगढ भक्ति योग के द्वारा बताये और कहा कि जिस भक्त में ये सब तय छत्तीसगढ है तो वह साक्षात मेरा ही रूप है । हमने जो ऊपर बातें की ये वह सारे तैंतीस गुण थे जो एक भगवान श्री कृष्ण अपने भक्त में ढूंढते हैं । मैं उसके माध्यम से सदेव प्रकट होता हूँ ऐसा उनका कहना है । जिस प्रकार कुरुक्षेत्र के मैदान में वह परमात्मा भगवान श्रीकृष्ण के माध्यम से संपूर्ण रूप से प्रकट हुए और अर्जुन को भगवत गीता रूपी अमृत पान कराया । ये ते तीस भक्त के लक्षण सुनकर कुछ लोगों के दिमाग में एक बात अवश्य आई होगी । किस में तो भगवान ने ये बताया ही नहीं कि भक्त को कैसे कपडे पहने चाहिए, सुबह कितने बजे उठना चाहिए, कितने घंटे पूजा पाठ करनी चाहिए तथा भक्त का मेकअप कैसा होना चाहिए । भगवान ने ये भी नहीं बताया कि व्रत रखा हो, खूब तबला बेटी ले गए, मेरा भजन करो और जो मेरा भक्त है उसे मैं बदले में क्या क्या देता हूँ । देखो एक बात बहुत ही स्पष्ट समझ लेनी चाहिए हम लोग भक्ति के नाम पर ये जो देवी देवताओं की उपासना करते हैं या अध्यात्म की नर्सरी या ज्यादा से ज्यादा कि जी कक्षा है । मैं ये नहीं कहता कि ये मत करो लेकिन क्या जिंदगी भर की जी कक्षा में रहना अच्छा लगता है? कभी तो हमें बडा होना होगा । बहुत से महात्मा लोगों के अन्य लोग मुझे कहते हैं कि अरे आपको ग्रहस्थ हो, आपके बच्चे हुई है, नौकरी भी करते हैं फिर भी आप ऐसी बातें करते हैं । कई ने तो ये तक कहा कि अगर कोई संन्यासी ऐसी बात करे तो ठीक लगता है परन्तु आप तो अभी जवान हूँ और आपने कहीं से दीक्षा ली है । फिर रात को अध्यात्म भक्ति के बारे में क्या समझ? इन सब चीजों के लिए तो कहीं से पहले दीक्षा लो, फिर हिमालय में जाकर भगवान की तपस्या करूँगा । फिर गुरु की सेवा करो तब जाकर अध्याय पूरा होता है । ऐसे लोगों के प्रति हमारा बहुत ही साफ नजरिया है । पर वह है उदासीनता था । हम कभी भी ऐसे लोगों से किसी भी तरह के बाद विवाद में नहीं पढते क्योंकि नारद भक्ति सूत्र में साफ कहा गया है वादों ना अब लिम्बा कभी भी बेकार के बाद विवाद में ना पडे । क्या मैं परमात्मा को जाने के लिए पहले किसी सर्टिफिकेशन की आवश्यकता है । आध्यात्मिक साधना देशकाल परिस्थिति से परे हैं और जो मनीष ऐसा सोचता है कि भगवान के भक्त बनने के लिए घर छोड देना चाहिए, नौकरी नहीं करनी चाहिए, जंगल में जाकर तपस्या करनी चाहिए । उस मनुष्य की बुद्धि अभी संसार से ही बैठक रही है । इस संसार में जितना धोखा हम अपने आप को देते हैं और किसी को नहीं देते, हमारे एक जान पहचान के साहब है । उनके रिश्तेदार कोई बडे नेता है तो वह बद्रीनाथ धाम गए । उन दिनों बडी भीड चल रही थी तो हमने उनसे कहा कि साहब कैसी रही या था सुना है आजकल बहुत भीड चल रही है । दम पर इतना हमारा पूछना था कि वह एकदम बोले जब हाथ में वीआईपी पास हो तो कहे की भी मैं थोडा हजार तथा उनकी और थोडी तारीफ करके चलाया । कहाँ पर ये है कि हम बद्रीनाथ धाम पर हाथ में वीआईपी पास लेकर भगवान को ये बताने गए थे कि देखो मैं कितना बडा आदमी हूँ । इससे बडी मूर्खता और कुछ नहीं हो सकती । जितने भी ये मंत्री संत्री लोग भगवान के धाम पर जाते हैं कोई नहीं बताया कि जो अखण्ड ब्रह्मांड को अपने में समेटे हुए है उसके लिए क्या राजा क्या रंक । क्या भारत क्या पाकिस्तान लेकिन अहंकार बिमडा आत्मा करता हम इतनी मान्यता इसलिए अगर कभी भगवान के मंदिर में जाओ तो कुछ बन कर्म अच्छा होगा । यहाँ तक कि अपने देहात में भाव का त्याग करके ही हमें मंदिर में प्रवेश करना चाहिए । इसलिए शायद हमारे यहाँ चमडी की चीजों को मंदिर में ले जाना मना है । चमडे का आर्थिक हमारी चमडी देखा है इसलिए अपने आप को धोखा मत दो । जिस दिन हम अपने आप को धोखा देना बंद कर देंगे उस दिन ये जो जगह है आध्यात्म के नाम पर भक्ति के नाम पर एक दूसरे को बेवकूफ बनाने का जो खेल चल रहा है वो अपने आप बंद हो जाएगा ।

Chapter 11 आध्यात्मिक जीवन की कला

अध्याय ग्यारह आध्यात्मिक जीवन की कला जीवन कैसी चाहिए? ये प्रश्न शायद सदियों से मनुष्य के दिमाग में घूम रहा है और इसको लेकर अनेक महापुरुषों ने महात्माओं ने और स्वयं भगवान ने पृथ्वी पर आकर हमें बताया कि देखो हमें ऐसे देना चाहिए । लेकिन फिर भी ये सवाल अभी तक झुका क्यों बना हुआ है? इस सवाल के जवाब में मैं यहाँ पर कुछ तथ्य बताना चाहूंगा जो कि आध्यात्म और व्यवहारिक परिपेक्ष्य को साथ लेकर भगवान श्रीकृष्ण के द्वारा तथा अन्य महात्माओं द्वारा बताये गए हैं । हमारा संपूर्ण जीवन कैसे चलता है और आगे कैसे चलेगा ये पूर्ण तथा इस बात पर निर्भर करता है कि हमने अपने आप को क्या समझा है हमने । यदि आपने आपको स्त्री समझा है तो हमारे लिए संसार फिर दो भागों में बढ गया स्त्री और पुरुष । इसी प्रकार यदि हमने अपने आपको धनवान समझा है तो ये संचार फिर दो भागों में बढ गया । धनवान स्त्री, गरीब स्त्री, धनवान पुरुष, गरीब ऐसा करते करते हमने अपने आप को एक सीमित दायरे में बांध लिया । फिर हम जगत में वही देखते हैं जो हम देखना चाहते हैं । एक आदमी से ट्रेन की पटरियों के नजदीक रहता है । वह शोरगुल में भी अपने सब क्रिया कलाप करता है उसी शोरगुल में उसे नींद आती है परन्तु यदि उसे शांत वातावरण में कुछ दिन रहना पडे तो वह परेशान हो जाता है क्योंकि हम अपने स्वभाव के अनुसार जीवन जीते हैं । स्वभाव बनता है अपने स्वरूप पर संस्कारों की पर चढने से । जो भी क्रियाकलाप हम बार बार दोहराते हैं वो हमारे चित्र में संस्कार मेमोरीज के रूप में निशान छोडते हैं और ऍम काफी प्रगाढ हो जाते हैं तो इसी को हम लोग हैबिट स्वाभाव कहते हैं और हमारी पूरी जिंदगी हमारे स्वभाव के अनुसार चलती हैं । स्वभाव भी एक चेन प्रोसेस की तरह होते हैं । एक हैबिट के साथ कुछ मायने ऍम हमारे चित्र में आ जाते हैं और जब हमारी एक हैबिट बन गई तो फिर ये ऍम भी धीरे धीरे मेजर इम्प्रेशन का रूप लेकर दूसरी, तीसरी, चौथी हैबिट बनते रहते हैं । तो जो भी हम आज है या कोई भी जानवर पेड पौधे जो हम देखते हैं वे इस वक्त ऐसे केवल इनमें मेरी इसके कारण है । एक उदाहरण से समझने का प्रयास करते हैं । आप लोगों ने गेंदे मैरीगोल्ड के बीच देखे होंगे बहुत ही छोटे होते हैं । हम लोग ये भी जानते हैं कि गेंदे के फूल रंगों में कई तरह के होते हैं । यदि हम लाल रंग कि गेंदे का बीस तथा पीले रंग की गेंद का बीज आपस में मिला दे तो उनको देखकर अलग कर पाना बहुत ही कठिन है । क्योंकि दोनों एक जैसे हैं । लेकिन दोनों फूलों में जो कलेक्टर मैं मेरी है वो अलग अलग है, भले ही वो हमें दिखाई न दे पर दोनों में विभिन्नता है । यदि मनुष्य का उदाहरण लिया जाए तो हमने देखा है कि यदि एक आदमी के चार पुत्र है तो चारों भले ही देने से एक जैसे देखिए लेकिन इनमें जो कलेक्ट्रेट मैं मेरी संस्कार जिसको हम जीत भी कह सकते हैं वो अलग अलग है । यहाँ पर एक और बाद ध्यान देने वाली है कि हम अपने बच्चों को केवल देह प्रदान करते हैं । उस देह में रहने वाला दही जीवन निर्माण नहीं करते और न ही ये जीव ये निर्णय लेता है कि उसे किस देख के माध्यम से संसार में प्रकट होना है । तो कोई मिलाकर तीन बातों पर हमारा कुछ भी नियंत्रण नहीं है । इनको थोडा ध्यान से समझ गया पहला है कि ये जीव कौनसा देख धारण करेगा । क्या हम लोगों को जन्म के समय ये पता था कि अमुक अमुक हमारे माता पिता होंगे । दूसरा है ये जीव को जीवन में क्या क्या भोग सुख दुख मिलेंगे । जो आदमी ये कहते हैं फॅमिली पता था कि तुम्हें जीवन में क्या मिलने वाला है तथा तीसरा है देखो की मृत्यु ये जीविस देख को कब छोडेगा । यह भी निर्णय जीव नहीं लेता हूँ । एक बार की बात है । शाम को हमारा गीता चिंतन कार्यक्रम चल रहा था तो एक सत्तर पचहत्तर वर्ष के महानुभाव हमारे पास आए और बोले कि डॉक् सब कुछ दिनों से मुझे बहुत डर लग रहा है मृत्यु का और मैं सोचता हूँ कि मेरे मरने के बाद मेरे परिवार का क्या होगा? मैंने उन्हें अपने पांच बैठाया और बोला देखिए जिस चीज का होना निश्चित होता है हम उसके कारण डरते नहीं बल्कि उसके लिए प्रिपरेशन करते हैं । लेकिन अगर आप के मन में ये शंका कंफ्यूजन है कि मैं मरूंगा या नहीं तो मैं आपको गारंटी देता हूँ कि आप मरोगे क्योंकि आपने आपने हमको दे हम आना है । और हाँ, जहाँ तक बात है अब के नाती पोतों की तो आप एक बात बहुत स्पष्ट समझ लीजिए कि हमें ही लगता है कि संसार को या हमारे बच्चों को हमारी जरूरत है क्या जिन बच्चों के माँ बाप नहीं होते वो बढते नहीं । क्या कभी किसी ने ऐसा कहा है कि आर में चालीस साल का हो गया लेकिन अभी दो फुट का बच्चा ही हूँ क्योंकि बचपन में मेरे माँ बाप मर गए थे । हमें ही लगता है कि यह संसार हमारे कारण चल रहा है । जब मैंने ऐसा कहा तो महानुभाव नाराज होकर चले गए । देखो सच्चाई सुनने की ताकत हर किसी में नहीं होती और जो ये लोग डर डर की जीते हैं, ये सरासर भगवान का अपमान करते हैं । क्या भगवान कोई डरने की वस्तु है? भगवान ने भगवत गीता में साफ साफ कहा है, अमृत मृत्यु था सर सच्चा हमारी जान जीवन भी मैं ही हूँ और मृत्यु भी नहीं हूँ । सत्य भी मैं ही हूँ और असद भी नहीं हूँ । सबसे पहले अपने दिमाग में एक बात बहुत ही अच्छी तरह से बिठानी होगी कि सब कुछ वही है तथा वह और मैं अलग नहीं है । जिस दिन ये बात समझ में आ गई उस दिन यह प्रश्न स्वता ही मिट जाता है कि जीवन कैसे चाहिए क्योंकि जीवन हम नहीं जी रहे हैं । हमारे माध्यम से जीवन दिया जा रहा है लेकिन स्थिति हम लोगों में कहने मात्र से नहीं आएगी । ये केवल परमात्मा की अनुग्रह से ही आ सकती है और परमात्मा की अनुग्रह के लिए हमें थोडा लायक बनना पडेगा । थोडी मेहनत करनी पडेगी इस पुस्तक के माध्यम से यहाँ पर मैं कुछ बातें बताऊंगा जिसको यदि हम अपने जीवन में उतार सके तो अभी तक जितना भी इस पुस्तक में लिखा गया है यह सुलझाने का प्रयास किया गया है वह सार्थक सिद्ध होगा । अन्य था मैंने अपने हाथ की खुजली मिटाने के लिए पुस्तक लिख दी और आपने आपने जी वहाँ कि खुजली मिटाने के लिए उस तक पढ ली । पहला पहले में माता पिता जी शुरुआत करता हूँ । जब एक बच्चा पैदा होता है तो केवल वहीं पैदा नहीं होता । उसके साथ एक बाप पैदा होता है, एक मां पैदा होती है और अनेक रिश्ते पैदा होते हैं । इस देह पर प्रथम अधिकार माता पिता का होता है लेकिन माता पिता का अधिकार सिर्फ बच्चे की देख पर होता है, बच्चे की देख के स्वामी दही पर नहीं । इसलिए भ्रूण हत्या को एक पाप माना गया है क्योंकि देखो सिर्फ संचार में नहीं आ रहा है । उसके साथ दही भी अपने संस्कारों को भोगने के लिए संसार में आ रहा है । और आप भ्रूण हत्या करके इस प्रकृति के मार्ग में अवरोध उत्पन्न करते हैं । इसलिए कभी भी प्रकृति की क्रिया कलापों में अवरोधक उत्पन्न करने का कार्य ना करें । दूसरा जब बच्चा इस संसार में आता है तो माँ बाप को ये समझना चाहिए कि हम को इस कार्य के लिए चुना गया है । बच्चे को खूब प्रेम करे लेकिन ये बात हमेशा ध्यान रहे कि यह प्रेम आशक्ति में नाम बदल जाए, माता है, अपने बच्चों से इतना हो जाती है कि मेरा बच्चा सबसे अच्छा है लेकिन औरों के बच्चों से हमें क्या लेना देना? फिर अपने बच्चे को लेकर हम विभिन्न कल्पनायें करना शुरू कर देते हैं । ये हमारा कहना क्यों नहीं मानता? बडा होकर जाना नहीं है । क्या करेगा दूसरों के बच्चे ऐसा ये पढाई क्यों नहीं करता? और यही से दुख शुरू हो जाता है । तीसरा कभी भी बच्चों के कारण दुखी नहीं होना चाहिए क्योंकि जहाँ प्रेम है वहाँ तो दुख है नहीं और जहाँ आशक्ति है वहाँ सुख है ही नहीं । बच्चे को पांच छह साल की उम्र तक प्रेम करें, उसके द्वारा मातृत्व सुख का अनुभव करे और जब बच्चा सात साल का हो जाए तो उसे जीवन के बारे में थोडा बताना शुरू करें, उसमें डिसिप्लेन लाने का प्रयास करें । साथ बारह साल तक यदि बच्चे में डिसिप्लिन नहीं आया तो बच्चा कभी भी एक डिसिप्लिन जीवन नहीं जी सकता । इसके लिए बच्चे को दो बातें अवश्य सिखा है कि जीवन में हमें न सुनना आना चाहिए और ना कहना भी आना चाहिए जो अपने जीवन में ना सुन नहीं सकता और न ही नहीं सकता । को पूरे जीवन परेशान ही रहता है । चौथा जब बच्चा बारह का हो जाए उसको जीवन को पांच नेटली कैसे दिया जाता है ये बताना चाहिए । उसको किसी उच्च लक्ष्य को प्राप्त करने की प्रेरणा दे । उसको जीवन में गोल निर्धारित करने को प्रेरित करें । गोल बहुत ही कि आध्यात्मिक कैसा भी हो सकता है । जैसा बच्चे का स्वभाव हो उसको कर्म करने की स्वतंत्रता प्रदान करनी चाहिए । तेरह साल से उन्नीस साल तक को हम टीनेज कहते हैं । इस समय धर्म, अर्थ, काम तथा इन सब का प्रयोजन केवल मोक्ष है ये बताना चाहिए । ये उम्र का वह समय होता है जब बच्चे को अपनी सबसे ज्यादा जरूरत होती है । इसलिए उसके लिए प्रेरणा का उदाहरण मैंने इस समय बच्चे जैसा घर में देखते हैं वैसा ही करते हैं । भगवान कहते हैं यदा यदा अ चाहती तक देवेंद्र योजना सैयद प्रमाणम् भरते लोहगढ अनुवर्तन थे । जैसा जैसा आचरण हमारे बडे जान करते हैं, छोटी भी वैसे ही उनका अनुसरण करते हैं । इसलिए अपने बच्चों के लिए एक श्रेष्ठ उदाहरण प्रस्तुत करें । पांचवां इसके बाद जब बच्चों, नी सर उम्र पार हो जाए और आपके पैर का जो था उसके पैर में आने लग जाए तो उसके बाद वो आपका पुत्र या पुत्री नहीं रहे जाती । अब उससे आपका संबंध एक मित्र का होना चाहिए । जिस प्रकार एक अच्छे मित्र से हम लोग अपनी सभी बातों का आदान प्रदान करते हैं लेकिन उन से कोई उम्मीद नहीं करते, उसी प्रकार यदि आपका बच्चा भी आपसे बिना हिचक अपनी सभी बातें कर पा रहा है तो आप उसके मित्र है । तीन । खत्म होने के बाद कभी भी अपने निर्णय बच्चे पर थोपना इम्पोज नहीं करना चाहिए बल्कि उसके निर्णय का सम्मान करें । एरिया अपने अपना जीवन माता पिता के रूप में इस प्रकार दिया है तो इससे बडी कोई भी आध्यात्मिक साधना हो ही नहीं सकती । छठा अब हम उस बच्चे पर आते हैं जो बीस साल का हो गया है । बीस साल में मनुष्य का मस्तिष्क सही गलत अच्छा बोलेगा । निर्णय लेने के लिए समर्थवान हो जाता है । अब जीवन में आपको ये जानना है कि मैं किस तरह से क्यों हूँ । उसके लिए आपको धन चाहिए । धन के लिए अपना नौकरी, व्यवसाय कोई भी अपनी रुचि का कार्यक्रम है जिसको करने में आपको प्रसन्नता मिलती है । विराट अपने निर्धारित लक्ष्य को प्राप्त करें । अब आप को शादी करनी है या नहीं करनी है । पैसे कैसे कमाने हैं ये सब बताने की आवश्यकता नहीं है । क्योंकि पच्चीस साल तक आप के मन में इन चीजों का महात्मा इतना प्रगाढ हो चुका होता है । क्या पैसा कमाएंगे ही ये आपकी अभी तक आदि बहुत एक यात्रा है । इसमें आप तीन चीजों पर मुख्य कहा ध्यान देते हैं कि हमें चुस्त रहना है, मस्त रहना है और व्यस्त रहना है । अब हमें आज देवी क्षेत्र में प्रवेश करना है । इसके लिए पहले आप अपने स्वभाव को जानने का प्रयास करें । पूरे चौबीस घंटों में एक ऐसा घंटा निकले जिसमें केवल आप ही हो और आपके साथ कोई ना हो । ना ऑफिस का ना परिवार के सदस्य । आप इसके लिए एक कमरे में आराम से जमीन पर बैठ जाए और अपनी देख पर ध्यान केंद्रित करने का प्रयास करें । बाहरी जगत का कुछ ना सोचे बस यही सोचे कि ये देख क्या है? क्या इस देख के परेड भी कुछ है? ये देख और बाहरी जगत का क्या संबंध है? हम जीवित किस प्रकार है । जितने भी प्रश्न इस देह को लेकर जगत को लेकर आपके मन में आते हैं उन्हें एक डायरी में लिखे हैं । आप के मन में अगर एक के बाद एक और फिर अनेक प्रश्न आ रही है तो आप सही दिशा में हैं । ऐसा आपको तब तक करना है जब तक उन प्रश्नों को जानने की इच्छा आप के मन में प्रकट ना हो जाए । साथ ही साथ आप घर में एक जगह ऐसी चुने जहाँ पर आप किसी देवी देवता को विराजित कर सके । आपके परिवार में यदि पूजा पाठ करते हैं तो वहाँ पर बैठकर आप इस दुनिया को भूल जाए । केवल आपको और आपकी आराध्य देवी देवता अब रोजाना दस पंद्रह मिनट पूजा पाठ करें । अपना सभी कार्य यहाँ तक कि अपने लिए चाहे और कभी कभी सबके लिए खाना बनाये आध्यात्म कोई पार्ट टाइम जॉब नहीं है और ना ही भक्ति एक दिन में हिंदी में प्रकट होती है । एक बार ऐसे ही भागवत कथा का प्रसंग चल रहा था तो एक अम्मा जी ने मुझसे पूछा कि भागवत में तो बताया है कि अजामिल जोकि एक राक्षस प्रवृत्ति का मनुष्य था उसने केवल एक बार नारायण नाम लिया और वह भी ये जानकर नहीं की ये मैं भगवान का नाम ले रहा हूँ । उसने तो नारायण कहकर अपने पुत्र को बुलाया था तो भी उसका उद्धार हो गया तो हम भी बुढापे में क्यों ना भगवान को याद करने और मारते समय भगवान को बुखार ये । इस पर पहले तो मैंने उन अम्मा जी को प्रणाम किया और कहा कि आप धन्य हैं क्या? दिमाग पाया है आपने? मैंने अम्मा जी से कहा अम्मा की आपको ये अनुभव है कि मृत्यु के वक्त क्या अनुभव होता है । उन्होंने कहा नहीं मुझे नहीं पता । फिर मैं वहाँ से पूछा । फॅमिली के साथ ही कह सकती हूँ कि मरते वक्त सिर्फ भगवान का नाम ही आपकी वाणी और मन में होगा । तब वो हमारी सोचने लगी और बोली नहीं गारंटी के साथ तो कोई नहीं कह सकता । हमने कहा लेकिन मैं गारंटी के साथ कह सकता हूँ कि आप अंतिम समय में भगवान के साथ एक होंगे । यदि जो मैं बता रहा हूँ उसको आप समझदारीपूर्वक जीवन में उतार हो । फिर मैंने उनको समझाया कि देखो जो भी हम इस वाणी से सुबह से शाम तक कुछ भी उल्टी सीधी बातें बोलते हैं । इसे बैखरी वाणी कहते हैं । हम लोग बैखरी वाणी में बोलते हैं, जो सर्वदा छोटी है । इस वाणी में सिर्फ शब्द प्रकट होते हैं, उनका अर्थ प्रकट नहीं होता । शब्द को पद भी कहा जाता है और ये बात जब इसके अर्थ के साथ जुडता है तो इसी को पदार्थ कहते हैं । जैसे उदाहरण के लिए मैंने कागज पर लिखा पत्थर और वह कागज किसी को फेंक कर मारा तो भले ही मैं उस कागज पर पत्थर लिखा लेकिन शब्द का अर्थ उसके साथ नहीं था । इसलिए जिसको मैंने कागज फेंक कर मारा उसको चोट नहीं लगेगी । परंतु जिसको मैंने कागज लेकर मारा था यदि उसने मुझे उस पत्थर का अर्थ जोकि पदार्थ है वह फिर कर मारा तो उसमें उसका और उसके साथ साथ उस शब्द का अर्थ भी नहीं है । तो सत्य वो शब्द है जिनके साथ उनके अर्थ भी जुडे होते हैं । मार लिया में ये कहता हूँ कि झूठ बोलना गलत बात है और स्वयं झूठ बोलता हूँ तो ऊपर मेरे स्वास्थ्य का कुछ प्रभाव नहीं पडेगा क्योंकि ये सिर्फ बैकरी वाणी है, शब्द है । पर शब्द का अर्थ बोलने वाले में ही प्रकट नहीं है तो उसका प्रभाव बाहर नहीं होगा । अब वाणी का दूसरा स्तर है मध्यम वाडी । ये मन की वाणी जब विचार मन तक तो आए और वहीं से आकर लौट गए ये मध्य मावाणी । तीसरी वाणी है पश्चिमी वाणी । इसको सिद्ध महात्माओं की वाणी कहा जाता है । इसमें शब्द और शब्द का अर्थ अलग अलग नहीं होते । इसलिए सिद्ध महात्मा लोग बहुत कम बोलते हैं । लेकिन जो भी वह बोलते हैं उस सत्य घटित होता है क्योंकि वह पश्चिमी वाणी में जीते हैं तथा अंतिम वाणी है परावाणी ये शब्द का उद्गम स्थान है । इसको परमात्मा की वाणी भी कहते हैं । जिस प्रकार गोमुख गंगा जी का उद्गम स्थान है लेकिन गोमुख में गंगा जी बिल्कुल शांत अपने स्वरूप में हैं । परावाणी तक मनुष्यमात्र की पहुंच केवल परमात्मा की अनुग्रह से ही हो सकती है । अपने प्रयास नहीं पर हिंदू पश्चिम दीवानी तक हम आसानी से पहुंच सकते हैं और इसके लिए एक बहुत ही आसान तरीका है । यदि हम अपने प्रत्येक साल से भगवान का नाम जोडने, जब भी साँस अंदर ले लूँ तथा बाहर छोडे शिव शुरू में हम भूल जाएंगे । लेकिन यदि सचेत रहकर यह क्रिया की जाए तो पांच छह महीने में भगवान का नाम बैखरी वाणी से मध्यम मानी में तथा उसके बाद तीन चार महीने में ये भगवान का नाम पश्यन्ति वाणी में रम जाएगा । कोई ये भी कह सकता है कि भगवान का नाम लेंगे तो ऑफिस का घर का कार्य कैसे होगा । देखो हम सांस ले रहे हैं तो ऑफिस का या घर का कार्य करने में कोई परेशानी हो रही है । उसी प्रकार आरंभ में कुछ दिन परेशानी अवश्य हो सकती है । लेकिन एक बार हमारी सांसों के साथ भगवान का नाम जुड गया तो जिस प्रकार आपकी सांसे चल रही है उसी प्रकार नित्य निरंतर ये भगवान का नाम भी हमारी आपकी सांसों के साथ चलेगा । पर आपके हृदय में परमात्मा के नाम का रस अपने आप प्रकट होने लगेगा । बिना किसी प्रयत्न, फिर चाहे मृत्यु कभी भी आए, आपके आखिरी स्वास्थ्य के नाम आपके साथ रहेगा । धीरे धीरे जीवन में एक संतुलन लेकर है । पहले आप के लिए आपका करियर ही सब कुछ था । अब आपको प्रोफेशनल लाइफ, पोर्सन लाइव तथा स्पेशल लाइफ के बीच कॉर्डिनेशन बनाना है और ऐसा तभी संभव है । जवाब एक वक्त पर सिर्फ एक ही आइडेंटी रखते हैं । जैसे हम घर पर है तो कभी अपने व्यवसाय अथवा नौकरी का कार्य घर पर डिस्कस ना करें और यदि ऑफिस में है तो घर की बातों को बीच में लाना है और ऐसा करते करते यदि भगवान का लोग रहा पर हुआ तो एक दिन अवश्य ही आपके मन से एक सवाल अवश्य आएगा कि क्या यही जीवन है या इससे ऊपर भी कुछ है । उस दिन समझ लेना कि आपने जो भी अब तक किया है ये सवाल उन सभी कर्मों का फल है । अब यहाँ से आपकी आध्यात्मिक यात्रा शुरू होती है । ये यात्रा ऐसी है जिसमें हमें कहीं जाना नहीं है । हमें इस यात्रा में लौट कराना है । स्वयं की ओर इस यात्रा में कुछ खोजना नहीं है । इसमें खो जाना है । स्वयं में इस यात्रा में कुछ पाना नहीं है । इसमें जो अभी तक पाया है उसे गवाना है । इस यात्रा में कुछ करना नहीं है बल्कि सभी कर्मों से मुक्त होना है । अगर हम लोगों ने यहाँ बताया गई प्रक्रिया के अनुसार जीवन दिया है तो हमारी समझ में आएगा कि आध्यात्म का मतलब घर छोडना, परिवार का त्याग करना, संसार से मुंह मोड लेना या संसार को भला बुरा कहना नहीं है । आध्यात्म केवल गलत धारणाओं को समाप्त करके अपने असली स्वरूप को लौटाना है । आध्यात्म हमें दो बातें सिखाता है कैसे जीना है और कैसे मारना है । जो सही ढंग से दिया नहीं वो सही ढंग से मार भी नहीं सकता । बहुत से लोगों से हमने कहते सुना है कि आध्यात्मिक खोज है खोज इसको थोडा समझते हैं खोज ये दो तरह की होती है एक जिसमें कोई वस्तु जो कहीं दूर हो गए हो उसको खोजने के लिए हमें कुछ कर्म करना होगा । इधर उधर भटकना पडेगा । डब जाकर शायद वस्तु हमें मिल जाये तथा दूसरी तरह की खोज वो है जिसमें वस्तु कहीं खोई नहीं है । परन्तु अज्ञान के कारण वह वस्तु बस ढक गई है वो हमारे पास ही है परंतु हमें उसका ज्ञान नहीं । जैसे एक उदाहरण से समझाते हैं मैं चश्मा पहनता हूँ । पहले कभी कभी मैं चश्मा को आंखों से हटाकर माथे के ऊपर सिर पर रख लेता था । एक बार मैंने ऐसे ही किया । फिर कुछ समय बाद ध्यान आया कि अरे मेरा चश्मा कहाँ गया? फिर चश्मे की खोज शुरू हो गई और जैसे ही मैंने अपनी माता जी से पूछा की मैं चश्मा देखा गया आपने तो वो बोली की तरह सर पर ही तो रखा है और देखा तो चश्मा कहीं खोया नहीं था । वो हमेशा मेरे साथ ही था बस उसका मुझे ज्ञान नहीं था । इसी प्रकार आध्यात्मिक हमारे अज्ञान को हटाने की प्रक्रिया है जिससे हम अपने वास्तविक स्वरूप में लौट सके । इस संसार में जो भी हम करते हैं वो हम ड्यूटी समझकर करते हैं लेकिन यदि वही कहा की हम डिमोशन के साथ करे तो ड्यूटी भी एक आध्यात्मिक साधना बन जाती है । हम लोग जब ड्यूटी करते हैं तो हम मनुष्यों का यूज करते हैं और वस्तुओं से प्रेम करते हैं । लेकिन जब हम डिवोशन के साथ जीवन जीते हैं तो हम वस्तुओं का उपयोग करते हैं ताकि हम मनुष्यों से प्यार कर सके । इसलिए कहा गया है डाॅॅ भगवान शंकराचार्य सपने की परिभाषा बताते हुए कहते हैं स्वप्न माने अन्यथा ग्रहण जो वस्तु जैसी है उसको वैसा ही ना देख पाना ये स्वप्न है तथा निद्रा माने तत्व अस्य अगर हम जो एक परमात्मा तत्व है उसको ना पकड पाना यही नेत्रा है । एक बार में कहीं पर ऐसे ही विधान के कुछ बडे बडे शब्दों के द्वारा लोगों को भ्रमित कर रहा था । हमारा लक्ष्य बिल्कुल साफ है । फॅस दोनों ही स्थिति में दूसरे का भला हो जाता है । जब मैं ऐसे मैदान की बातें बता रहा था तो एक पचास पचपन साल के महाशय बोले किए जो आप बता रहे हैं कि हमेशा खुश रहो और अपने सभी कार्य आज शक्ति के बिना करो । किसी से यहाँ तक कि अपने पुत्र से भी कुछ अपेक्षा नहीं करनी चाहिए । ये आम आदमी की जिंदगी में कैसे संभव है? मैंने उनसे पूछा कि सर आप का नाम जान सकता हूँ । उन्होंने कहा कि फरमान बंसल जैसे ही हमने उनका नाम चुनाव हमारे मुख से एकदम जय श्री राम निकल गया तो बदले में उन्होंने भी जय श्री राम कह दिया । हमने उनसे कहा कि अब भगवान राम को मानते हैं तो उन्होंने कहा हाँ जी बिलकुल तो मैंने कहा अब जो मैं बताने जा रहा हूँ उसको थोडा ध्यान से सुनना वाल्मीकि हमारे में आता है कि हर मान जी भगवान राम से कहते हैं कि हे भगवान देव बुद्धया तो दासो उसमें जीव बुद्धया पद मौसम आत्मबोध याद विवा हम तीस में निश्चित अनुमति ये जगत है ही नहीं । ये केवल रामलीला कृष्णलीला चल रही है और हम इसको इतना सत्य समझ लेते हैं कि जो भी जगत में हमको दिखाई दे रहा है, अनुभव आ रहा है वहीं परम सत्य है बहुत जगह जो हमको अनुभव में आता है । यह संपूर्ण जगह केवल एक प्रतिशत से भी कम है । बाकी सब आप भौतिक है । हमने उन महाशय से पूछा आपने कभी रामलीला देखी है? उन्होंने कहा हाँ देखी है । हमने कहा देखो चाहे रामलीला हो या कोई नाटक । सिनेमा उसमें दो पार्टियां होती है, एक होती है एक्टर लोगों की जो एक्टिंग करते हैं तथा दूसरी होती है । दर्शकों की जो एक्टर होते हैं एक्टर वो है । जिसे जो भी रोल दिया जाता है उसको बहुत ही बेहतरीन ढंग से करता है और रिएक्टर लोग उस नाटक में जो भी वह देखते हैं उसे सत्य मानकर होते हैं । बहुत समय पहले की बात है । उस समय मैं बहुत छोटा था पर मुझे आज भी याद है । उस समय हमारे घर में टीवी नया नया आया । एक दिन टीवी पर कोई फिल्म आ रही थी । उस फिल्म में कुछ लोग मिलकर एक आदमी को मार डालते हैं और बकायदा मरे हुए आदमी का दाह संस्कार भी हो जाता है । उन दिनों हमारे घर पर मेरी नानी क्रायन मदर आई हुई थी । वो ये फिल्म देकर बहुत परेशान हो गयी । हमने उनसे पूछा कि क्या हुआ? उन्होंने कहा कि देखो इस फिल्म के चक्कर में एक आदमी मर गया । अब उस की बीवी बच्चे का क्या होगा? मैंने नानी से कहा ये सब सच में नहीं होता है तो नाटक है तो आदमी नहीं मारा तो नानी ने कहा अरे कैसे नहीं मारा, उसको तो जला भी दिया और जो कहता है नहीं मारा । अभी तो बच्चे हैं तो मुझे मत बता । अमिताभ बच्चन चाहे दिल्ली में कुली की शूटिंग करेगा, दुबई में टीचर की, उसे पता है कि मेरा घर मुंबई है और मैं कहा करूँ चाहे मुझे कोई सा भी रोल दिया जाए, बस मुझे वो रोल बेहतरीन ढंग से निभाना है । यही हमारा जीवन है । जो जीवन को एक्टर की तरह जीता है । वो हर रोल बेहतरीन ढंग से करता है । बंदो किसी भी रोल के साथ चिपक ता नहीं । आप सभी लोगों ने रामायण देखी होगी । आप सभी लोग भगवान राम को पुरुषोत्तम कहते हैं । पता है क्यों? क्योंकि वह सभी पुरुषों में उत्तर मैं थे । उन्होंने हार रोल, फॅमिली प्ले किया परंतु कहीं छिप के नहीं । जब उनको पता चला कि रावन आएगा और सीताजी को लेकर जाएगा तो उन्होंने सीताजी से कहा कि आप अपना रूप तन्मात्रा अग्नि में छुपा दीजिए और सीता माता ने अग्नि में प्रवेश किया और फोटोकॉपी सीता माता बाहर आ गई । ये बात रामचंद्रजी और सीता माता को पता थी । रावण आया और रॉक सीता माता को ले गया और जब सीता माता चली गई तो भगवान ने कितनी बेहतरीन एक्टिंग की । ये खत हेम्बर्ग है । वृक्षों तथा अन्य वस्तुओं से रो रोकर पूछा । बिचारे हम जैसे अज्ञानी मनुष्य को लगा कि देखो रामचंद्रजी कितना प्यार करते हैं अपनी पत्नी को । लेकिन सत्य केवल भगवान राम ही जाते थे । इसी को कहते हैं भगवान की लीला । ये जगह भी भगवान की रंगभूमि है । यहाँ सब कुछ होता था, दिख रहा है परन्तु कुछ भी नहीं हो रहा है । ये जगह ऊपर से जो नाम रूप से ढका हुआ है, इसका यदि विश्लेषण करने लग जाओ तो आपको पता चलेगा कि इस जगह ऊपर से इतना उथलपुथल परिवर्तनशील दिखाई देता है । असल में इसके राजस्थान के रूप में परमात्मा शांत बैठा छिंगम जमा रहा है । जैसे समुद्र ऊपर है । भले ही कितना भी लहरों के कारण परेशान नजर आता है परंतु गहराई में बिल्कुल शांत लहरों से अनछुआ होता है । परंतु हमलोग जगत के नाम रूप को इतना सत्य मान लेते हैं कि उनसे हमारी दृष्टि हटती ही नहीं । अगर एक आध्यात्मिक जीवन जीना है तो कुछ बात हमें अपने गले उतारनी होगी । यहाँ पर कुछ बातें बताई जा रही है । आप इनका विश्लेषण स्वयम करो कि ये कैसे सकते हैं परन्तु ये मैं आपको गारंटी के साथ कह सकता हूँ कि यही सकते हैं । पहला हमारा जीवन चार वस्तुओं का एकीकरण है । ये चार अवस्थाएं हैं जाग्रत, स्वप्न सुन सकती और समाधि जिस प्रकार हम हर सपने में एक नए सपने पुरुष होते हैं उसी प्रकार हम रोज जाग्रत अवस्था में नए जाग्रत पुरुष होते हैं । दूसरा हम लोग दिन भर में कई बार निर्विकल्प समाधि में जाते हैं पर इंदु अज्ञानवश हमें पता नहीं चलता । तीसरा जो भी हम वाणी, मन और बुद्धि के द्वारा बोलते अथवा सोचते हैं वो सब झूठ है । चौथा आज तक सम्पूर्ण जीवन में कोई भी अनुभव हमने अपने बाहर नहीं किया है । इसलिए संपूर्ण संसार का अस्तित्व केवल हमसे है । पांचवां संसार में हमारा किसी पर कोई अधिकार नहीं है । जो भी हम करते हैं, जरूरत अपनी छठा जिसका त्याग नहीं हो सकता वो परमात्मा है और जो कभी पकड में नहीं आ सकता वह जगह है । सातवां एक मैंने एकता केवल अब उत्पादित है सत्य एक है । जिस ज्ञान, मस्ती और नासी प्रतिका ज्ञान होता है वह ज्ञान सत्य नहीं है । आठ बार आध्यात्मिक जगत में प्रश्न को संबोधित नहीं किया जाता । प्रश्न पूछने वालों को संबोधित किया जाता है तथा हमें प्रश्न का उत्तर मिलता है समाधान नहीं । समाधान हमें खुद खोजना पडता है । कितना हुआ कर्मयोग उपासना में मैं की मुक्ति की बात होती है परंतु ज्ञान और भक्ति में मैं से मुक्ति की बात होती है । दसवां अच्छाई का विमान बुराई के अभिमान से ज्यादा खतरनाक होता है । ये बताई गई दस बातें जिस दिन हम ने बचा लिया उस दिन आपको पता चलेगा कि जीवन केवल टाइम पास मात्र है और जो जीवन को टाइम पास के सिद्धांत से जीता है वही केवल जीता है । वरना हम सभी लोग तो केवल मरने के लिए ही जीते हैं । अब थोडा इस टाइम पास वाले सिद्धांत को समझ लेते हैं । एक बार एक आदमी ने चैतन्य महाप्रभु से पूछा कि हे भगवान ना आप हमेशा भगवान का नाम लेते रहते है, ऐसा क्यों करते हैं? इस पर चैतन्य महाप्रभु बोले कि अरे ये तो मैंने अब तक सोचा ही नहीं कि मैं ऐसा क्यों करता हूँ लेकिन तुमने पूछा है तो मैं बता देता हूँ । मैं ये सिर्फ टाइमपास करने के लिए करता हूँ । चैतन्य महाप्रभु को शायद अंग्रेजी नहीं आती थी तो उसको उन्होंने संस्कृत में कहा काल केवल निरंतर हम माने टाइमपास । इस संसार में टाइम पास के सिद्धांत के साथ जीना सबसे बडी आध्यात्मिक साधना है । आज तक बहुत से लोगों ने भागवत महापुराण की कथा कही और बहुत से लोगों ने सुनी । परंतु कोई भी वक्ता शुकदेवजी जैसा नहीं हुआ और कोई भी शुरू था राजा परीक्षित जैसा नहीं हुआ क्योंकि दोनों को ही भागवत केवल टाइम पास के लिए काहे नहीं और सुन्नी थी, कुछ करना नहीं था । ब्रह्मा जी को जब नारायण भगवान ने भागवा चुनाई तो वह सृष्टि निर्माण में व्यस्त हो गए । नाराज जी ने ब्रह्मा जी से कथा सुनी तो वे इसके प्रचार प्रसार में लग गए । लेकिन राजा परीक्षित को पता था कि सात दिन बाद तो मानना है ही । इसलिए पूरी कथा में ध्यान केवल तत्व पर ही था । पहला, जब भी कोई कार्य हम टाइमपास के सिद्धांत से करते हैं तो वहाँ पर मैं का निर्माण नहीं होता । मान लो हमलोग सभी सुबह सुबह अपने आप उठकर केवल टाइम पास के लिए घूमते हैं तो इससे मैं घूम रहा हूँ । ऐसा भाव का निर्माण नहीं होता । एक और अच्छा उदाहरण लेते हैं । एक बार हम सब परिवार किसी अपने रिश्तेदार के यहाँ गए तो ये महाशय तो नहीं थे लेकिन उनकी पत्नी और आठ साल की एक बेटी अगर पर थी हमारी धर्म पत्नी और भावी जी खाना बनाने में लग गए । लेकिन तीनों बच्चों ने हमें घेर लिया कि कैरम बोर्ड खेलते हैं । अब मुझे बहुत तेज भूख लगी थी तो मैंने कहा चलो टाइमपास हो जाएगा, खेल लेते हैं । खेल आधे में ही था । तभी अंदर से आवाज आई कि खाना तैयार है खाना खालो । हम ने बच्चों से कहा चलो खाना खाते हैं तो बच्चों ने हमें पकड लिया की नहीं, खेल पूरा करके ही जा रहे हैं । आप हार रहे हो इसलिए गेंद छोड रहे हो तो अब तो हम जीत कर ही दिखाएंगे । बाहर जी को लेकर बात करने लगे । अब इस घटना से हमने ये टाइम पास वाला सिद्धांत सीखा कि मैं खेल केवल टाइम पास के लिए खेल रहा था । इसलिए हार जीत को लेकर मेरे मन में कोई भाव नहीं था और ना ही उस हार जीत के कारण मैं सुखी दुखी होने वाला था । वहीं दूसरी ओर बच्चे लोग खेल हार जीत के लिए खेल रहे थे इसलिए उनकी सुख दुख उस खेल के साथ जुड गया था । जबकि मेरे साथ ऐसा नहीं हूँ । यही है जीवन जीने का टाइमपास सिद्धांत । भगवान कहते हैं सुख दुख के समय कृत्वा लाभा लाभ हो गया । जया तो युद्धा ये ऍम आप वापसी दूसरा जब हम टाइमपास के सिद्धां के साथ जीवन जीते हैं तो इसमें मैं का निर्माण नहीं होता है और जहाँ मैं का निर्माण नहीं होता है वहाँ थकावट नहीं आती । क्या कभी हम लोगों ने इस बात पर ध्यान दिया है कि हम था क्यों जाते हैं? यदि आपको कहा जाए कि दो सौ बारह लोग विलोम प्रणायाम करोड शायद ही हम लोग दो सौ बार कर पाए क्योंकि उससे पहले ही हम थक जाएंगे जब की पूरे दिन में हम हजार छह सौ बार सांस लेते हैं परंतु रहते नहीं और हमारा हृदय पूरी जिंदगी में करोडो लीडर रक्त को बंद कर देता है । फिर भी थकता नहीं । ऐसा क्यों? क्योंकि सांस लेने में, दिल की धडकने में तथा खाना बचाना इन क्रियाओं के साथ मैं नहीं जुडा है । जहाँ जहाँ मैं कार्य कर रहा हूँ, ऐसा भाव है वहाँ थकावट है । लेकिन जहाँ जहाँ कार्य हो रहा है वहाँ थकावट नहीं है । बच्चे अपने फॅमिली शोर पूरे दिन बिना थके देख सकते हैं । पूरे दिन मिला था कि खेल सकते हैं लेकिन पढने का कहो तो एक घंटे में ही वह थककर सो जाते हैं क्योंकि पढाई के साथ वो मैं जोड लेते हैं । पढाई वो टाइम पास के लिए नहीं करते । पढाई करते वक्त उनमें ये भाव होता है कि मैं पढाई कर रहा हूँ तो कुल मिलाकर दो बातें हो गई एक नाटक करना सीखें जब घर पर है तो घर का नाटक प्रॉफिट ढंग से करो । जब ऑफिस में हो तो वहाँ पर जो आपकी ड्यूटी दी गई है उनका नाटक सही ढंग से करो तथा दूसरा इस बात से हमेशा आश्वस्त रहो कि ये सब टाइम पास के लिए हो रहा है । हमें ज्यादा गंभीर होने की आवश्यकता नहीं है । इन दो बातों के साथ एक और महत्वपूर्ण बात है भूलना सीखो, चीजों को घटनाओं को भूलना सीखो । कई लोग बहुत ही चूज ही होते हैं । वस्तुओं की वृद्धि केवल ब्रांडेड कपडे पहनेंगे, केवल महासिंह शोर पहनेंगे तथा खाने के लिए तो कहना ही क्या । इतना सोचते हैं कि मानव खाना ही सब कुछ हो तो जब हम इन बाहर कि चीजों के बारे में इतना ध्यान रखते हैं तो हमारे मन में किस तरह की बातें जानी चाहिए ये बात का भी हमें ध्यान रखना चाहिए । अपने दिमाग में अनावश्यक बातों को स्थान ना दें क्योंकि जिस प्रकार एक कंप्यूटर की हार्ड इसकी एक स्टोर इसका पार्टी होती है, उसी प्रकार हमारी दिमाग की भी है । इसलिए अनावश्यक विकारों जैसे एशिया द्वेष, मोहन अपना पराया इनको अपने दिमाग से निकाल दें । इसके लिए सबसे अच्छा तरीका है भूलना भूलने की आदत डालें । एक बार एक सरकारी अस्पताल में एक डॉक्टर है । उन्होंने हमें अपने घर पर बुलाया लेकिन कहा कि वह जो आपके साथ दूसरे आपके सहकर्मी है, उनको मत लेकर आना । हमने कहा ठीक है हम उन के घर तो गए लेकिन कुछ फैमिली फंक्शन था । उनके घर पर डॉक्टर साहब हमारे पास है और बोले कि आपको बुरा तो नहीं लगा जो मैंने आपको उस आदमी को लाने के लिए मना किया । दरअसल में उसे नफरत करता हूँ । इसलिए मैं नहीं चाहता था कि वो मेरे घर है । जब उन्होंने ऐसा कहा तो मैं जोर से हंसा । डॉक्टर बोले क्या हुआ आप हो रहे हैं तो मैंने कहा आप कह रहे हो कि मैं उस आदमी को घर नहीं बुलाना चाहता परंतु वो तो आ गया और वो इस समय आपकी सबसे प्रिय स्थान अपने हृदय में बैठा है । नफरत बनकर कहीं मैंने एक बहुत ही सुंदर पंक्ति पडी थी । डाॅ । बिकॉज बूत आरॅन इसलिए जो भी व्यक्ति, वस्तु परिस्थिति हमारे मन के संतुलन को खराब करे उसे वहीं पर कंट्रोलशिफ्ट डिलीट मार देना चाहिए । ये है जीवन जीने का तरीका और यदि हम ऐसे जीवन जीते हैं तो हमारे मन में स्वतः अपने स्वरूप की जानने के प्रति जिज्ञासा प्रकट होगी । आप केवल आगे बढते जायेंगे और आपको रास्ते अपने आप मिलेंगे । और फिर एक दिन हम लोगों को यह एहसास होता है कि नौ वाॅर्ड ये स्थिति को ही कहते हैं । जीवन मुक्ति जीवन्मुक्त पुरुष को यह संसार छोडने के लिए कुछ प्रयाप्त नहीं करने पडते हैं उसके लिए तो संचार होना हो क्या फर्क पडता है क्योंकि वो ये जानता है कि मैं गणादि अविकारी अखंड सकता हूँ और वह जीवन्मुक्त पुरुष अपने स्वरूप में हमेशा स्थित रहकर एक ऐसी स्थिति में आता है जिसमें परमशांति परमसुख का अनुभव मात्र रह जाता है और जो भी हमने जाना बढा सीखा वो सब छूट जाता है । ये अनुभव वैसा ही है । मानव हजारों मील का लम्बा सफर करके गंगा जी गंगा सागर में मिलकर शांत स्थिर हो जाती है । जैसे हम जो स्वास्थ्य के लिए भटकते रहे वो हमें अचानक मिल जाए

Chapter 12 उपसंहार

अध्याय बारा उपसंहार कर्म हूँ । धर्म हो, उपासना हो या भक्ति इन सब का प्रयोजन जानकर जो मनीष है ये सभी चीजें करता है और बस ऐसे ही किसी ने बता दिया और उसने वो चीजें कर ली । इन दोनों मनुष्य की जीवन जीने की कला में बहुत अंतर होता है । जो मनुष्य इन चीजों की प्रयोजन को भलीभांति जानता है वो सावधानीपूर्वक अपने जीवन को जीता है । ये उसी प्रकार है जैसे कोई आदमी गाडी चलाना जानता है और वह कभी भी अपनी गाडी को चलाकर कहीं भी जा सकता है । लेकिन दूसरी तरफ वो है जिसके बाद गाडी तो है मगर वो उसे चलाना नहीं जानता हूँ । इसलिए उसे हमेशा एक ड्राइवर के ऊपर निर्भर रहना पडता है । फिर ऐसे लोगों की जीवन के ड्राइवर बन जाते हैं ये वास्तु शास्त्र वाले पंडित, लोग, कल, योगी, महात्मा तथा कुछ लोगों की ड्राइवर तो ये हमारे आज के राजनेता लोग बन जाते हैं । ये जैसे चाहे वैसे दूसरों के जीवन को तोड मोडकर अपना मतलब निकालते हैं । परमात्मा द्वारा प्रद्युत मनुष्य जीवन बडा ही दुर्लभ है । अगर इसको सही प्रकार से ना किया जाए तो हम आत्महत्या रे बन जाते हैं । आत्महत्या रे का तात्पर्य हैं साथ मदद रुकना पहचानना और जो मनुष्य पूरे जीवन भर आहार, निद्रा, भय, मैथुन इन्हीं चार चीजों में व्यर्थ कर देता है, वहाँ पशुतुल्य ही अपना जीवन जीता है । इसलिए हमें संसार में धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारों पुरुषार्थों का सहारा लेकर केवल यही जानना है कि आखिर हम है कौन और जो भी हमें संसार में कर रही है इसका प्रयोजन क्या है कि अगला जन्म, पिछला जन्म, पाप पुण्य, स्वर्ग, नरक, धर्म, धर्म शास्त्रों में जब ये बातें बताई जाती है तो इन को बताने का तात्पर्य क्या हमें डराना है या कुछ और है । जब हम इन सब का प्रयोजन जान लेते हैं तो पता चलता है कि ये तो केवल हमें सावधानी से जीने की कला के बारे में बता रहे हैं और फिर यही सावधानी से जीना हमारे लिए आध्यात्मिक साधना बन जाती है । भगवान शंकराचार्य बताते हैं कि हमें अपने कर्तव्यों, कर्मों के साथ साथ उधर भी ध्यान देना चाहिए जिसके कारण हम इन कर्मों को करने के लायक बने हैं । उदाहरण के लिए मैं एक सरकारी नौकरी करता हूँ तो मुझे जो भी काम दिया जाता है उसे पूरी ईमानदारी के साथ करना चाहिए । लेकिन यहाँ पर एक बात जाने वाली है कि अगर मेरी आंखों में ये दृष्टि नहीं होती । मेरे कानों में श्रवण शक्ति नहीं होती तथा मेरे मन में चैतन्यता प्रकाश नहीं होता तो भी क्या ये सरकार फिर भी मुझे नौकरी देती? क्या कभी मुर्दों को भी नौकरी मिल सकती है तो ये जो चैतन्य का प्रकाश जिसके द्वारा मेरी सभी इंडिया, मन तथा बुद्धि प्रकाशित है तथा जो हमारे शरीर में स्वतः प्रकाशित है इसको जानना हमारा करते हुए नहीं है । हम लोग पूरा जीवन इधर उधर भागते रहते हैं, कभी इसके लिए कभी उसके लिए । लेकिन इन शुद्ध चैतन्य तत्व पर कभी किसी का ध्यान जाता ही नहीं है । और फिर बुढापे में जब सेवा निर्मित हो जाती है तब सोचते हैं कि पूरा जीवन हमने क्या किया । पूरा जीवन हमने एक ही काम किया अपनी इच्छाओं की पूर्ति का असफल प्रयास । लेकिन अंत में पता चलता है कि आज तक किसी की भी सारी चाय पूरी नहीं हुई और बुढापे में जाकर दो चीजें आदमी को खा जाती है । एक जो काम मुझे करना चाहिए वो मैंने क्यों नहीं किया तथा दूसरा जो काम मुझे नहीं करना चाहिए था वह क्यों किया? इसलिए आज ही से हम समझदारी से जीवन जीना आरंभ करे । इसके लिए भगवान शंकराचार्य कहते हैं भगवद्गीता किंचित जीता गंगा जल लवकनी का पीता सकृत पीएन मुरारी समाचार तस्यां या वहाँ टीम कुरुते चर्चा नित्य भागवत गीता का पाठ करें । भले ही आप की कुछ समझ में ना आए, कभी कभी तीर्थ पर जाये, तीर्थ का मतलब ये नहीं कि घूमने फिर रहे या फिर सेंचरी इंस्पेक्टर बनकर जाना है । कई लोग होते हैं जो तीर्थ स्थानों पर जाकर वहाँ क्या खराब है, इस पर ज्यादा ध्यान देते हैं । बजाय इसके कि क्या हम यहाँ पर स्वच्छता अभियान का सदस्य बनकर आए हैं या मन में परमात्मा के प्रति भाव व्यक्त करने के आए हैं । ऐसे तीर्थ स्थानों पर जाकर साधु संतों से मिलेंगे । कभी ना कभी ईश्वर का अनुग्रह पर अवश्य होगा । ये पुस्तक एक छोटा सा प्रयास है जिसमें परमात्मा ने मुझे निमित्त बनाकर अपने आनंद को प्रकट करने का प्रयास किया है । यह पुस्तक किसी संप्रदाय, जाति या धर्म से प्रेरित नहीं । ये केवल मेरे मन के विचार मात्र है जिनमें चारों के द्वारा हमें एक दिव्यदृष्टि प्राप्त हो सकती है । यह पुस्तक मैंने केवल अपने अनुभवों को साझा करने के लिए लिखी है तथा जिन अनुभव के कारण हम कुछ सीख लेते हैं, वो हमारे मन में संस्कार के रूप में एकत्रित नहीं होते । इसलिए अपने प्रत्येक अनुभव को अध्यात्म के साथ जोड देना यही परमात्मा की सबसे बडी भक्ति है । इस पुस्तक को लिखकर मुझे आनंद का अनुभव हुआ उसको मैं यहाँ पर व्यक्त नहीं कर सकता । ओम अपूर्ण मदरहा पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्ण में वहाँ विशिष्यते उन शांति शांति ही शांति ही ये जारा सुना और समझा एक आध्याय इक सफर हमने इस किताब के रूप में इसका नाम है अपना स्वरूप और जिसके लेखक है जिनके शब्द हैं उनको हमारे तरफ से शत शत प्रणाम । उनका नाम है रमेश सिंह पाल मैराज बस अलविदा लेता हूँ यहाँ से आपकी इजाजत हो तो काफी मजा आया ये सफर पर मैं राज राज की जब आ रही हूँ ऍम सुने जब मन चाहे

share-icon

00:00
00:00