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अदभुत प्रेम की विचित्र कथा - Part 1

आप सुन रहे हैं तो कोई ऍम किताब का नाम है । अद्भुत प्रेम की विचित्र का था जिसे लिखा है अश्विनी भटनागर में अर्जी आशीष जैन की आवाज में फॅस उन्हें तो मन चाहे हूँ । एक डैनी चालीस वर्ष का हो गया था । वो सफल था, संपन्न था और प्रसन्न था । इधर कुछ समय से उसे लगने लगा था कि वह जिंदगी के साथ रजी एक मस्त साजिश की आनंद धारा में बह रहा है । उसने पास नहीं पडे थे और से लगा था कि वह यकीनन उसकी जिंदगी को सही मायने में परिभाषित करते थे । मस्त साजिश की आनंद धारा दस साल से मौज में था और उससे पहले के बाद साल यानी उसकी कामकाजी जिंदगी के पहले पांच साल रोमांचक चुनौतियों की श्रृंखलाओं से भरे हुए थे । बार बार उसका सामना अपने से कहीं ज्यादा कामयाब और पुनर् मान लोगों से हुआ था और हर बार डैनी ने पाया था कि एन मौके पर उसके दिमाग के कौंधने उनको चकाचौंध कर दिया था । दैनिक पछाडकर मौकों का इस्तेमाल सहयोगी की किस्मत के पूरी तरह से दोहन के लिए किया था । वैसे किस्मत उसके हुनर पर हमेशा रिश्ते रही थी और अगर कुछ पलों के लिए उस ने साथ छोडा भी था तो वो बडे अनमने मन से जुडा हुई थी । उसने कभी लम्बी वोट नहीं की थी । वो तो बस चौखट के बाद अंतराल खत्म होने का बेसब्री से इंतजार करती रहती थी । पांच सालों में ऐसा कभी नहीं हुआ था कि डैनी को किस्मत की जरूरत महसूस हुई हो और उसके इंतजार में उसके दांत भेज गए हो था । उसने कभी कभी थोडा बेचैन जरूर कराया था पर फिर अफरा तफरी में पेश हो गई थी । इसके चलते डैनी को यकीन हो गया था कि उसके दिमाग के छल मिला है और मौकों की नजाकत नहीं । उसकी जिंदगी को ऐसी कशिश दी थी की किस्मत उसकी तरफ खुदबखुद फिजी चली आती थी । ये ही मस्त साजिश नहीं तो और क्या थी । लेकिन अजीब बात ये थी कि जब भी फॅमिली को गले से उतारने की कोशिश करता था तो उसके अलग से बेवजह ही सूखी खोखली से हँसी फूट पडती थी । उसकी समझ में नहीं आता था कि वह क्यों अनायास ही हँस पडता था । शायद साजिश का मस्त होना अपने आप में हास्यास्पद था और इसीलिए असीसी छूट जाती थी या फिर साजिश में होने की वजह से वो खिसियानी हंसी थी । एक तरह का तंज था उसे अपनी हंसी कभी ये वाली तो कभी वो वाली लगती थी । पर जो भी हो दैनिक हँसी में गुदगुदी देने वाली मौज नहीं थी । उसमें कुछ हूँ, खा पन महसूस होता था । वो कुछ अटपटी सी लगती थी लेकिन उसके बहनोई अनिल को उसके हँसी बेहद पसंद थी । अनिल एक भला और मोहम्मदी शक सा और पूरे दुनिया में अपना झंडा गाडने की ताबडतोड कोशिश ने उसे तोड दिया था । उसने आठ अब भी थी पर इतनी नहीं उससे हो कुछ पका सकेंगे । उनके वो खुद ही पक चुका था । जो ना जल भेजा था । अनिल कॉर्पोरेट कबाड बन चुका था । अनिल को देने की हँसी में प्रशिक्ष लगती थी । उसका कहना था की बडी नफासत से नुमाइश किए बिना वह अपने को निहार लेता था । ये देने की खास अगाधी पाँच भी करता था लेकिन अगले को चुकता भी नहीं था । खुद की खूबियाँ बडे अंदाज से बखान करता था और उसमें से शान मारने की हूँ नहीं आती थी । अनिल कहता था की तरह तो कोई डाॅॅ मगर असरदार तरीके से कराता है । कभी कभार डाॅॅ रूखापन आ जाता था लेकिन हम उसे नजरअंदाज कर देता था । फाइनल कहता था ऍम था और उसके बदलते मूड को अगर तवज्जो ना दी जाए तो बेहतर था । थोडी बहुत खलिश । हर कामयाब जिंदगी की दाल का नमक थी । दूसरों को अपने स्वाद अनुसार उसे नहीं रखना चाहिए था पैसे अनिल में बुराई ये थी कि वो एक अच्छा था । आपने कॉर्पोरेट हादसे के बाद उसने हाथ कटे उसूलों की दुशाला ओड दी थी जिसे वो कभी कभी धूप तो जरूर दिखा देता था और अंदाजा नहीं था कि दुशाला कहीं बीच से तो कहीं कोनों से गल चुका था । डैनी ने बहुत सारी कोशिश की थी वो उस दुशाले को छोडकर नया जामा पहले आखिर उसकी छोटी प्यारी बहन का पति था लेकिन नया पन उसके व्यक्तित्व का नाम नहीं था । नए जाने की आजमाइश में उलझता गिरता ही रहा था । तभी उसे ढीला लगता था तो कभी तंग । अनिल कहता था कि वो उसको बेतुका लगता था, वो खींच जाता था । फिर आपने कोशिश दुशाला में दुख का लेता था । डैनी को ये बात आती नहीं थी । कुछ हद तक चर्चा बाहर भी पैदा करती थी लेकिन बहस फिजूल थी । वो घोडे को पानी तक ले जा सकता था पर पानी पिला तो नहीं सकता था । और फिर अगर घोडा बहनोई हो तो मजबूरी अलग तरीके की हो जाती थी । पहन के शहर के आगे हद से ज्यादा वो खोलना उससे कुनबे की रवायत में नहीं था । बहनोई का मान रखना उसकी परवरिश का हिस्सा था । इसे वह कैसे नजरअंदाज कर सकता था? भला? वैसे भी उसे ज्योति इतनी प्यारी लगी थी कि बहन को जरा सी भी तकलीफ देना उसके लिए नाकाबिले बर्दाश्त था । इसीलिए उसने अनिल को बदलने का इरादा छोड दिया था । वो खुद आगे बढ गया था । ऍम फ्लैट में अकेले ठार छे रहता था । बडी सी खाने की मेज पर अकेले ही बैठ कर खाता था और महंगे गुदगुदे बिस्तर पर अकेले होता था । घर में कुछ चहल पहल बनी रहे । इसीलिए उसने उम्दा नस्ल का कुत्ता पाल लिया था । उसकी देखभाल करने के लिए नौकरानी भी रख ली थी । उत्तर से वह अक्सर बातें करता था तो तो उसकी बात ध्यान से सुनता था । समझता भी था । आपने बन का एहसास दिलाता था । मोहब्बत करता था । उधर नौ कराने के बाद और थी । वो चीनी थी, सिर्फ अपनी भाषा जानती थी और काम भर के लगभग आधे दर्जन अंग्रेजी शब्द समझती थी । जैसे वोटर को कम डोर क्लोज फॅमिली को नौकरानी की खातिर चीनी भाषा सीखने की कोई जहाँ नहीं थी, जैसे कि नौकरानी कांग्रेस जी का पूरा वाक्य समझने की जरूरत महसूस नहीं होती थी । वो साथ थे । कुत्ते की वजह से । कुत्ते को नौकरानी की जरूरत थी और इसी नाते डैनी नौकरानी को पाले हुए था । एक बार उसके माता पिता हांगकांग उसके घर आए थे । बहुत दिनों से वो चाहता था कि माँ बाप आएँ और देखें उनके छोटे से दिन उन्होंने अपने लिए कैसी शानशौकत भरी जिंदगी तराशी थी । उसने उन्हें बताया कि हांगकांग की गेटिंग प्राइज एक निराली दुनिया थी । ऊंची पहाडी पर बना हुआ आसमा को भेजता उसका फ्लाइट नीचे बच्चे हुए शहर का दिलकश नजारा पेश करता था बशर्ते बादलों का पड दाना हो । बादल घिरते ही फ्रेंड उन पर तैरने लगता था । ठीक वैसे ही जैसे परियों की कहानियों में उसने सुना था । वो आलीशान, खुशगवार और रोमानी था । आप लोगों को यकीनन बहुत पसंद आएगा । उसने कहा था पर माने एक दिन में ही कह दिया कि घर में उनका दम घुटता था । दैनिक उनकी बात पर इतना चौका था कि लडखडा गया था । मेरे पकडकर खून से बैठ गया । मन ही मन नाम जो करने लगा था, उसके फ्लैट के तीन कमरे ऍम और हवा में झूलता खोला । आनंद कुल मिलाकर उसके सहारनपुर के एचआईजी फ्लैट से दोगुना या फिर तीन गुना बडा था । ताजा हवा, भरपूर रोशनी और दिलकश नजारा । इसके लिए उसने लाखों डॉलर खर्च किए थे । उनके लिए तो ये मतलब थे यहाँ का दम घुट रहा था । अब वो माँ को काफी देर तक देखता रहा था । उसके दिमाग की नसें फट पडने को हमारा हो रही थी । वो पैर पडना चाहता था । सिर पर चढी झल्लाहट घर की दीवार पर बार भेजना चाहता था । बट वो खामोश रहा था । यहाँ दीवार ही दीवार हैं । मशीनें हैं लोग कहाँ है घर के बाहर हैं न भीतर माँ फूट पडी थी । मैं घंटो घंटो घूमती रहती हुई नहीं दीवारों के बीच करती हूँ को छूने से इन छाती पर चढा आता है । सब कुछ बहुत बडा बोझ रखता है और तुम तुम घर पर बडा होते ही कम हो । सुबह से लेकर देर रात तक बस काम में ही उलझे रहते हो । उधर उसके पिता के अपने मसले नहीं । उन्हें हर चीज ज्यादा मालूम होती थी । जरूरत से कहीं ज्यादा खामखां । उन्होंने ड्राइंग रूम की दीवार पर पंगे बडे से टेलीविजन को देखा था और बोले थे इतने बडे स्क्रीन की क्या जरूरत है भला? जैसा बत्तीस इंच का सहारनपुर में लगा है, उतना ही काफी है । यहाँ ऍम भरसक कोशिश की थी । उन्हें होम थिएटर सिस्टम की बारीकियां बताए, लेकिन उन्होंने उन्होंने उसे हाथ से वर्ष दिया था, पर बस चल दिए थे । रहने की सुने बगैर डैनी उनके रवैये पर हैरान रह गया था । अंदर ही अंदर उनकी प्रतिक्रिया एक तरफ तो मन मसोस रही थी, दूसरी तरफ उसका दिवाज विश्लेषण करने में लगा हुआ था । आखिरकार उनको शान बान से इतनी परेशानी क्यू थी जो मुख्य पर मुख्य निकाल रहे थे । जब की उनको अपने बेटे की तरक्की पर खुश होना चाहिए था । बेहतर रहन सहन से ठोंकनी काट रहे थे, क्यों घबरा रहे थे? दरअसल डैनी ने निष्कर्ष निकाला था । समस्या सिर्फ दो लोगों की नहीं थी, बल्कि पूरी कॉम की थी । हर शख्स बदरंग माहौल में इतने लम्बे अरसे से था । उसके दिलो दिमाग में वो पूरी तरह से घर कर चुका था । गलन का वो इस कदर आदी हो चुका था कि शौकत का जरा भी कतरा उसको खडकता था । हर तरफ खाकी खाती थी और सब महज खाकसार है । खाडसे समय रहने से ही उनका मकसद पूरा होता था क्योंकि उन्हें और कोई उम्मीद अपने से नहीं थी । इस छह की तस्वीर भर और नुमाया होती थी । चारों तरफ जीवन एक व्यवस्था रहन सहन, सुस्त और उबाऊ था । सुस्ती दिलो दिमाग में बैठ गई थी । सोच को खुल लग गया था जिसकी वजह से रोशन खयाली से उन्होंने तौबा कर ली थी । सब पुरानी खींची हुई लकीर के फकीर बन गए थे और इस फकीरी में ही अपनी शान समझते थे । ऍम नहीं तो शुरू से ही अलग था । उसे दागदार उजाले नहीं चाहिए थे उसे चमकती साफ सुबह की तलाश थी । पीडित इधर पीनी बदरंगी ओडे हुए तथाकथित भारतीयता का दामन झटक कर वो अलग हो जाना चाहता था । शिकार करने आया था, शिकार बनने नहीं । डैनी को मालूम था । इसके परिवेश में व्याप्त माहौल के बावजूद वो अपने दिमागी और जिस्मानी हरकत से बाज नहीं आएगा । उसकी अकल की कौन कामयाबी का रास्ता रोशन करेगी और से तेजी से आगे बढाएगी । वो अपनी जांबाजी को दुनिया भर के जाबाजों से जोडना चाहता था । गहरे समुद्र में अपना बेटा डालने का बीडा उठाना चाहता था । वो संस्कृति का हिस्सा नहीं बनना चाहता था । जो वंचना को पोसती हो और प्राप्ति को नकारती हो । उसे जहां थी कि वो सफलता की रोमांचक हिलोरे पैदा करेंगे । एक के बाद ही कामयाबियां हासिल करें जिस पर उसका पूरा वजूद तरक्की जमा तरक्की बन कर रहा हूँ । इससे क्या फर्क पडता था कि वो अकेले बैठ कर खाता था । क्या फिर कुत्ते से बातें करता था । तब हम ऐसे लोग थे तो इस सब करते थे । इससे भी ज्यादा करते थे और सब समृद्ध थे, सफल थे और और खुश भी थे । मस्त साजिश की आनंद धारा वाले लाभ उसे एक और वजह से भी पसंद हैं । उन्हें रोमांच था, ठीक वैसा जैसा उसने अपनी जिंदगी को दिया था । सालों तक उसने गुपचुप खुद अपने साथ सांठगांठ की थी जिसके जरिए वह मुश्किलों की चट्टानों पर उंगल भर पकडते बनाकर ऊपर और ऊपर चढने में कामयाब हुआ था । आज वो शिखर पडता था और डेटिंग साइट पर खडा होकर नीचे जमा नजरों को तसल्ली से निहार सकता था । ऊपर आ चुका था । अब नीचे जाने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता था । उस अपनी पहुंच पर यकीन था । वास्तव में उसकी दिल्ली खुशी बदरंग माहौल से बच निकलने के लिए अपने साथ की गई कामयाब मस साजिश में थी । साजिश की कामयाबी पहले उसके बच निकलने में थी और फिर तरक्की जमा तरक्की पानी में थी । एक तरह से उसकी कामयाबियों को अगर एक के ऊपर एक रख दिया जाता तो वे गेटिंग हाइट की ऊंचाई को भी आसानी से नहीं सकती थी और किस्मत से साठगांठ खूब हुई थी और आज जो उस मस्त साजिश का नतीजा था, जिसकी आनंद धारा उसके चारों तरफ हिलोरे ले रही थी ।

अदभुत प्रेम की विचित्र कथा - Part 2

दो डेनी ॅ की छत वाले दो कमरों के छोटे से मकान में बडा हुआ था । तंग जगह की वजह से अपने को पंद्रह हुआ सा महसूस करता था । अपने घर के छोटे आकार पर उसे की जाती नहीं । इतने छोटे मकान में भला कौन चैन से रह सकता था । लेकिन खुश देखते थे । दैनिक था कि घर वालों की खुशी बनावटी थी, मजबूरी वाली नहीं । इस बनावट पर भी वो खींच जाता था । फिर मनी मनी क्या करता था कि उसका जीवन एक फॅस वाली छत के मकान से दूसरे ऍप्स वाली छत के मकान के बीच का सफर हरगिज नहीं होगा । वो कुछ और करेगा । इससे जिंदगी फिर कभी कंगना हो आगे बढना था और से मालूम था कि अगर वो अपने दिमाग का सही इस्तेमाल करता है तो सब कुछ संभव हो जाएगा । अपनी तैयारी उसने जल्द ही कर लीजिए और उस पर सबका ये था कि कच्ची उम्र में ही वहाँ को माँ से अलग करने में माहिर हो गया था । वो समझ गया था बीए की डिग्री बेकार थी और शिक्षा की नौकरी उससे भी बत्तर दी । वो अपने को इन तक सीमित नहीं कर सकता था । उसको बहुत बेहतर जिंदगी चाहिए नहीं शुरू शुरू में नायाब जिंदगी का स्वाद उसको खामखयाली रखता था । फॅमिली इस तरह दिल में रहा था कि उस पर सुना हो गया था । उसके पीछे अपने अपने को बडे हिसाब से दौडाने लगा था । उसके पिता सिर बी ए पास नहीं और डैनी को लगता था कि खालिस् बी । ए पास से ये कतई उम्मीद नहीं की जा सकती थी कि वह बेहतरी के लिए कोई रणनीति बनाएगा क्या? फिर ब्रांडिंग जैसे नए विचारों का सिर आप अकड सकेगा? उनके शैक्षिक कौशल में मूलभूत करी थी और इसलिए उनकी कुलजमा काबिलियत से कोसो दूर की बात थी । ये पास होने का मतलब लिख लेना पड सकता ना और गिनती गिन लेना था । जब ये सब ठीक ठाक सीख जाते थे तो एक लडकी की लाइन के आखिरी छोड से नत्थी कर दिया जाता था या फिर किसी खस्ता हाल स्कूल में मास्टर बना दिया जाता था । सब रहट के कनस्तर थे । एक घेरे में बंधे हुए एकदम लामबंद । पहले स्कूल के रहत पर बन्दे थे । अफ्रीकी फर्क सिर्फ इतना था कि छोटा कनस्तर बडा हो जाता था पर पानी निकालने और उबलने के बीच में रहता खाली का खाली था । लेकिन समय बदल रहा था और उन्हें क्या कम से कम उसके पिता को तो बेहतर नजरिया अख्तियार करने की जरूरत नहीं है । ऍम से क्या उम्मीद की जा सकती थी? वो कैसे अपने को लीग से अलग कर सकते थे? कैसे कुछ नया सोच सकते थे और अगर ऐसा करने की कोशिश भी करते हैं तो उसको चतुराई कहा जाता है । उन दिनों चतुर होने का मतलब था चालू होना । बेईमान होना तो ठंड और फिर हाथ हुआ करते थे या फिर पश्चिमी दुनिया के चंद पूंजीवादी बस तब उसके पिता जैसे लोग कनिस्तर बनने में ही अपनी वाहवाही समझते थे । उनके मुताबिक एक लीग तो होनी ही चाहिए थी । चाहे किसी भी वास्ते यही एक तरीका था शायद ईमानदार तरीका, फैशनेबल तरीका जो सबको भागता था । अपनी ना किसी दूसरे की पीठ से लगाकर लाइन में खडे होना ही स्वीकार्य था और लाइन के लगे लोग आगे तभी सकते थे जब समाजवाद ऍम दुनिया के किसी दूर होने में हलचल होती थी । लाइन से हटकर कुछ कर रहा या जतन करना पाप था । दूसरे शब्दों में लाइन में लगे रहना अवामी मजहब की रवायत थी । इसमें कोई गुस्ताखी नहीं हो सकती थी । रवायत निभाते हुए पिताजी ने उसका नाम तीन अनाथ रख दिया । शक था उन्होंने ये नाकाबिले बर्दाश्त देसी ना अपने स्कूल के किसी बडे अफसर को खुश करने की खातिर रखा था, ना उन जैसे लोगों की शिक्षित जैसा ही था । नीरज देशवार बे मजा मुफलिस पुरान खंड ऍम फॅमिली ने अपने पिता से अपने नाम को लेकर एक बार सवाल भी किया था । उन्होंने अपने स्कूल मास्टर वाले अंदाज में समझाया था ये ईश्वर का पर्याय है उस सर्वशक्तिमान का जो दीन हीन प्राणियों का नाथ है और डैनी को दीना नहीं नहीं लगा था और नाथ में अनाप जाहिर हुआ था । उसके पिता का नाम देवकीनंदन था यानी देवकी के पुत्र कृष्ण । लेकिन अपनी छोले जैसी लंबी कमीज में उनके हड्डियों के ढांचे सरीके वजन पर झूलती रहती थी और फॅमिली इनके पख्तून में खुसी रहती थी । वो खूबसूरत का नहीं आया कि बॉडी नकल लगते थे । वृन्दावन के सुबह भागों में जिनके इर्दगिर्द गोपियां मंडराया करती थी तो ईश्वर थे । जिन्होंने गीता का उपदेश दिया था । उस जिस्मानी और रूहानी धर्मस्वरूप का नाम उन्होंने खटिया लिया था । उसके पिता तो वैसा पांच पढा भी नहीं सकते थे । कृष्ण जैसी दिलकशी अपने में लाना तो बहुत दूर की बात । उसे अक्सर हैरत होती थी कि जिस नाम से ईश्वर ने धरती पर हूँ, धारण किया था । उस नाम को रखने की जरूरत क्या थी? क्या जरूरत थी के नाम के जरिए गरीब, अमीर और अमीर गरीब का स्वांग रचा । पर ऐसा ही चलता था । उसके एक अमीर पडोसी जो कोयले और राशन की दुकान के मालिक थे । कहना गरीब जब था और वैसे भी वो सिर्फ दीनानाथ नहीं था । उसकी माँ से वीनू कहकर बुलाती थी । दोस्तों से दिन कहकर पुकारना पसंद करते थे । बस क्लास में हजरी लगाते समय दीनानाथ नाम लिया जाता था । बाकी सब समय दिन ही पूछता था । दसवीं में दाखिल होते ही उसने फैसला किया था कि वो अपना नाम बदल देगा । वो डी नाथ बन गया की दूसरी बार था तो उसका नाम संक्षिप्त हुआ था । पहली बार पैदाइश के समय पिता ने समाजवादी और जाती विहीनता के अपना सिद्धांतों को उस पर लाते हुए नाम से जाती सोचा दीक्षित घटा दिया था रावण दिन आना । दीक्षा सिर्फ दीनानाथ हो गया था । जन्म से ही कांटछांट शुरू हो गयी थी । इसीलिए उसने अपना नाम और छोटा कर दिया तो कोई कोहराम नहीं मचा था । आखिरकार जब कोका कोला हो सकता था तो दीनानाथ तीन आप तो नहीं हो सकता था । ऍम छोटा था, ट्रेंडी था और शायद स्मार्ट भी कॉलेज पहुंचने पर डी ना केवल नाथ हो गया उसे पुकारने वालों को इस बात से कोई सरोकार नहीं था । नाम ने डीके मायने क्या थे ये विवरण फिजूल था ना याद रहने वाला नाम था । बाकी सब बे मतलब था । लेकिन नाथ हो क्या डीना याददाश के लिए ठीक थे । पर दोनों में वो ठसक नहीं थी जिसकी इसको तलाश उसका कॉलेज का साथी लंबा बना ठना राजेंद्र सबके लिए रहेंगी था जब लडकियाँ राजेंद्र को रहेंगी के नाम से पुकारते थी । बिना को बहुत अच्छा लगता था । एक अजीब से विदेशी कशिश थी उस नाम में जब धूलभरे फुटबॉल मैदान के आरपार बोलता था । उसका विदेशीपन बेतकल्लुफी बिल्कुल वैसे ही थी जैसे बचपन में बडे आॅफर टाइप किरदार रहेंगी में थी । रेंगी में किसका रोमांस था नाथ में कतई नहीं था । हाँ तो उसे कुछ लडकियों ने बताया भी था कि उन्हें नाथ बुलाना बिल्कुल पसंद नहीं था क्योंकि उसका मतलब मालिक था एक बेहतर नाम और जरूरी हो गया था ना । क्या डीना लंबी दौड वाले नाम नहीं थे । दूर कहीं वो भविष्य उस की प्रतीक्षा कर रहा था जिसका उसे पहली बार रहेंगी के साथ ऑफिसर्स क्लब जाकर दिखा था । वहां उसने गौर फरमाया था इस साहब सरीखे देखने वालों को कडक कलफ की कोई शानदार वर्दी में मेरे वहाँ पर सलीके से बडा सा ऍम डाले अदब से ड्रिंक सर्व कर रहे थे वो भी एक दिन बडे शहर के लाउंज में यकीनन बैठा होगा जहाँ फर्स्ट हरे सफेद गुलाबी संगमरमर के होंगे न कि छोटे शहर के सीमेंट वाले रेंगी ने उसका तार्रुफ शहर के खिलाते होटल से भी करवाया था । एक अजीब से दिलफरेब महक थी होटल की आबोहवा में घर की भूख से हम अपने घर में दोस्तों के घरों में अलग अलग तरह की भूख लगती थी । एक घर से दूसरे घर जाने का मतलब एक दम से दूसरी भूमि जा रहा था । उसको ये सफर नापसंद था उसका अपना घर धीमी सुरक्षा भी आज पर चडी पीनी दार और तवे पर सिखती रोटियों की गन समिति रहता था । एक रुकी सौंधी सी मैं जो आटे के पक नहीं होती थी । सुबह दस बजे खाना बनना शुरू होता था और घंटे बर्बाद जब चौके में छोटी चौकियों पर काली गाय के दूध से बने देशी घी के साथ परोसा जाता था, उसकी महक नथुनों में भर जाती थी । रूखापन चुपड जाता था । ये तो नहीं कह सकता था क्यों से ये सब ना पसंद था, बस रहेंगे । घर में पसरी गन कुछ अलग ही थी और तेज थी रेंगी की तरह पहली मुलाकात में यूज ऍम बाहों में जगह लिया था वो चला गया था वो उसके बूक आक्रमक थी, सिर्फ बढ चढकर बोलती थी शायद इसीलिए उसको खाने वाले भी तेज तरार थे । उसके अपने घर में साथ समझी पकती थी जिसकी मुफलिस तासीर की वजह से घर वालों में कातरभाव बच गया था । लेकिन इन सब बातों से अलग ॅ होटल इसलिए भी बताया था तो वो बहुत साफ और उसकी मैं गैर जानदार थी । उसकी लॉबी आने की तरह चमक रही थी । ऐसी सफाई उसने पहले कभी नहीं देखी थी । रहेंगी के घर में भी नहीं । होटल में बढिया मखमली सोफे थे जिन पर बैठे या आसपास बोल के लोग कुछ पूछा कर बोल रहे थे । साफ सुथरा हल्का सा ठंडा शांत माहौल बेहद ही नाजुक मजाक था और जब वह रहेंगे के साथ लंच के लिए चाइनीज घूम गया तो खाने की महक भी चुप चाप एक शर्मीली लडकी की तरह उसकी बगलगीर हो गई थी ये मैं उसके घर की तरह न तो जी पी थी नहीं रेंगी के घर के माफिक तेज तरार कोई तुम सही थी, माकूल थी । टैनी उसको अपने जीवन का हिस्सा बना लेना चाहता था । ऐसे होटलों और क्लबों में वो बचना चाहता था और मैं जाने से पहले वो ऑफिस में बैठना चाहता था । इसमें साफ सुथरे के दिन हो । प्रॉस्टेट शीशे के दरवाजे हूँ और खिडकियों पर वेनेशियन ब्लाइंड्स लगे हैं । उसके पिता स्कूल में अध्यापक कक्ष में बैठते थे । इसमें गंदली कुर्सियां नहीं हैं । उनमें से कुछ की हालत कितनी खराब थी । उन्हें रस्सियों से बांधकर खडा किया गया था । बीच में बडी लम्बी सी मेज पर चाहिए चाहे और समय के बंद माता थे । जिसके चारों तरफ एक सी लंबी बेरंग कमीजें और पे बम लगी पतलू ने पहले मास्टर बैठते थे । छत पे टंगा एकमात्र ऊर्जा विहीन पंखा नीचे बैठे मास्टर को घूमता रहता था । टोमॅटो की तरह ही कभी कभी काम करता । ज्यादातर वक्त उसमें करंट नहीं होता था । बस दिन महीने सालों से लटक रहा था । बेमन झूल रहा था । मास्टरों की तरह दीनानाथ दीक्षित उर्फ दीनानाथ यानी दिन लूँ उर्फ डी ना जब कॉलेज में दाखिल हुआ तो उसकी खुद को भी हुई तंगी से खींच निकालने की चाहत और तेज हो गई जिंदगी और अपने से उसकी उम्मीदें बिल्कुल साफ हो गई थी । उसके खिलाफ हो, टेरॅरिज्म, ऍम जैसी फिल्मों में होती थी । विदेशी कमीजों और पतलूनों का बडी पसंद है और खुशरंग चमक चटाइयां चाहिए थी । मारुति कार्य उसके जहन में पहले ही बस चुकी थी । कॉलेज का समय काटते हुए बडी संजीदगी से उसने उनको आम आदमी की कार से एयर कंडीशन चमकीली कार में तब्दील होते देखा था । वो चाहता था जल्द ही वह भी अपनी चमचमाती लाल मारुती में बैठकर होटलों और प्रभु में जाए । जाॅन अदब से झुककर उसको सलाम होंगे । दूसरे शब्दों में उसे वो सबको चाहिए था जो उच्च आय वर्ग में शामिल होने के लिए जरूरी था, जो उसे स्टेटस दे सकता था । पैसे उसे मालूम था कि वो अचानक अभी नहीं हो सकता था और अगर हो भी गया तो भी जगह जगह हीरो वाली सोच चार ढल अपने में नहीं ला सकता था । उसके पिता समाजवादी सोच के थे जिनके लिए अमीर होना पूरी बात थी । आमिर गैरभरोसेमंद और संदल होते थे जिनके शरीर पर पूर्व पूर्व मक्कारी से भरा होता था । वो कहते थे कि अमीर हो ना, एक बात है पर खुशहाल होना एकदम अलग बात थी । उनके मुताबिक अमीरों पर हमेशा दुखी रहने की लानत पडी थी जबकि गरीबों को हमेशा खुश और संतुष्ट रहने की दुआ लगी थी । अमीरों को नामालूम कितने तरीके की बीमारियाँ घेरे रहती थी और जैसे जैसे उनकी दौलत में इजाफा होता था, उनका शरीफ घटता जाता था । सच यह था उसे बताया गया था की दौलत के साथ बुरी बुरी लाते हैं । खुद ब खुद चली आती थी और आदमी का सत्यानाश कर देती थी । इसलिए उच्च मध्यवर्ग जैसा लेवल उसी चर्चा था । ये फिक्र नया नया चल अब दिखाया था और शायद देने के लिए ही गढा गया था । इसमें अमीरी गरीबी से बराबरी की दूरी थी । ये वर्ग न तो खरीद था नहीं अभी लेकिन उसके पास सुविधा भोगने भर की संपन्नता थी । उच्च मध्यवर्ग होने का मतलब तीन बेड रूम का मकान था । इसके आगे छोटा सा लॉन हो, एक लाल, उनकी मारुती कार पहले, बिना ऐसी और फिर इसी वाली कमरों में कूलर और ऍम हो । उसके साथ एक सीन से बडी कुर्सियों की जगह फॅमिली वाले सोफे जरूरी थी । फर्श पर टूट की मैच से बढकर कालीन का बच्चा होना उच्चता का संकेत था । इन घरों में रसोई की जगह किचन होता था, जिसमें संगमर्मर ॅ इतने साफ और सफेद होते थे, उन पर रोटी दे दी जाती है । रेंगी का घर ऐसा ही था । पढते थे, साइड टेबल थी । साथ में बैठकर खाने के लिए । डाइनिंग टेबल और बातों में जो प्रश्न था उस सब कुछ एक चुटकी में कटक लेता था । रहेंगी के कमरे में पांच पांच किलो वाले रूम चेक दे नहीं थे । वहाँ नए तरीके के डनलप के गुदगुदे गद्दे और नरम गुदास तक किए थे । जिन्हें जितना जी चाहे तोडमोड हो और उनकी शक नहीं भी करती थी । दैनिक और रहेंगी का था । क्या पसंद था उसके अपने तकिए में तो टूटी हुई की दरारें इस कदर थी कि उनमें गिरकर उसकी गर्दन कई बार टेढी हो चुकी थी । सुबह की गुस्ल के दौरान डैनी वहाँ एक फीट लंबे आईने के सामने खडे होकर अपने प्रतिबिम् से अक्सर सवाल करता था । उसमें ऐसी कौन सी कमी थी जिसकी वजह से वह उच्च मध्यवर्ग में शामिल नहीं हो सकता था । पहले वो अपने चेहरे का आकलन करता था तो उसे ठीक ठाक लगता था । उसके नए नक्ष दीजिए । खान इस भ्रमण वाले थे । दीक्षित होने के बावजूद उसका रंग गोरा था और सब गोरा नहीं । कितने धूप सा गोरा था । पी की काली मुझे घनी बहुत हैं और काले घुंघराले बाल गोरे रंग को और उपहार देते थे । उसके माँ बाप भी गोरे थे । बहन ज्योति नहीं लेकिन उस कारण तीखा हो रहा था । उसके अलावा उसका कद बिना जूतों के छह फीट का था । अपने पिता से लगभग पांच छह इंच ऊपर उसका शरीर ढीला था और अपनी मैरून रंग की टी शर्ट पहनते हुए जब अपनी बाहें मोडता था तो बाहों में मछलियां फडकने लगती थी । उसे अपनी ये पालतू मछलियाँ बेहद पसंद थी । मास्टर देवकीनंदन की नौकरी उस की पढाई लिखाई को धार देने में काम आई थी । शिक्षा तो उनका जाती धर्म था और उन्होंने अपनी निम्न मध्यमवर्गीय हैसियत के बावजूद अपने एकमात्र पुत्र पर अपने समस्त विद्यालय ज्ञान भंडार की वर्ष कर दी थी । नतीजतन दिन हूँ अपने स्कूल का टॉपर था । विषेशकर गणित में उसका आसानी कोई नहीं था । उसके पिता को विश्वास था उनका बेटा प्रधानाचार्य की सीधी भर्ती परीक्षा में अगर बैठा तो जरूर अव्वल आएगा और अपनी जिंदगी वो राज्य के बडे शहर में अच्छे स्कूल के प्रधानाचार्य के रूप में शुरू करेगा । डाॅ जब कभी सुबह अपने से सवाल करता था तो उसे एक ही जवाब मिलता था उसमें वो सब कुछ था जो उच्च मध्यवर्ग का हिस्सा होने के लिए जरूरी था । उसे यकीन था कि ग्रेजुएट होकर निकलने के कुछ ही सालों में वो अपना मुकाम हासिल कर लेगा । एक विकल्प भारतीय प्रशासनिक सेवा का था । आईएएस अधिकारियों का अपना ड्रॉप था । विदेश के असली मालिक थे जो अमीर सुंदर लडकियों से बिहार चाहते थे, लोगों में जाया करते थे और सुख साधन से संबंध जीवन बिताया करते थे । उनकी जी हुजूरी अलग से होती थी और दूसरा विकल्प इंजीनियरिंग का था । कुछ सुन रखा था कि सरकारी विभागों के इंजीनियर टनों के हिसाब से पैसे कमाते थे । लेकिन उनका रुतवा आईए सरीखा नहीं था । उसको इंजीनियर बेहद मुँह हमेशा अधीनस् टाइप भी लगते थे । उनको पैसा होने के बाद भी गरीब और असहाय बनकर रहना पडता था । लेकिन अब सर इंजीनियर डॉक्टर बनने से पहले उसे अपने लिए एक बढिया सा अपर क्लास नाम खोजना था । एक ऐसा नाम जो क्लबों के मैं खानों में या फिर टेनिस कोर्ट में नफीस याराना अंदाज से बुखार आ जा सके । उसे कैसा नाम चाहिए था की छूटी छोटी सफेद स्कर्ट ओ में क्लब में आने वाली हसीनाओं के फोन से लबों पर भी खूब सकें । उसी रहेंगी नाम पसंद था और उसको तो पहले ही राजेंद्र ने अपना लिया था । रहेंगी ने एडी सुझाया और बताया कि गायक एडी मर्फी एक महान हस्ती था । रहेंगी और एडी का काफी अभी अच्छा बैठता था । उसने लगभग एक हफ्ते उस पर विचार किया था । ईडी सुनने बोलने में ठीक था पर एक अश्विन का नाम था । एडी मर्फी महान व्यक्ति होंगे । दुनिया भर में उनके सैकडों चाहने वाले भी होंगे । लेकिन नाम का पहला हिस्सा सुनते ही तो शकल सामने आती थी । वो एक काले आदमी की थी । वो तो हो रहा था । उसका नाम ऐसा कैसे हो सकता था । किसी सुनते ही काला सा चेहरा आंखों के सामने तैरने लगे । सोचने तय किया कि किसी माकूल नाम की खोज उसे जारी रखनी होगी । नाम कुछ तो उसकी झोली में अपने आप आ गिरा था । वो पांच की लाइब्रेरी में कुछ किताबें तलाश कर रहा था । एक पूरी की पूरी शरीर उस पर आगे जैसे तैसे उसने जब उस भारी ढेर को खुद पर से हटाया तो एक किताब उसकी खोज में पडी रह गई थी । कुछ किताब के कवर पर एक सर्जरी से निभा डाली थी । उस पर स्टोन फॉर्म डैनी फिशर लिखा था । वहीं फर्श पर बैठा रहा और शब्दों को देर तक गौर से देखता रहा । टीना दिन लूँ पहनी वह ना मिल गया था । उसे दीनानाथ अबसे डैनी होगा । उसने खुद को अपना नया परिचय दिया था । ऍम बच्चों के कॉल नहीं रहनी । सुनने में अच्छा लगता था । एकदम अच्छा लडकियों को भी अच्छा लगेगा । ऍम के लिए भी सटीक था । इसी नाम के साथ वो बाजार में उतरेगा ।

अदभुत प्रेम की विचित्र कथा - Part 3

दीनानाथ को डैनी होने में कुछ खास दिक्कत पेश नहीं आई थी । उसने जो निश्चय किया था उसको हासिल करके ही दम लिया था । कच्ची उम्र से ही उसने हालत पर हावी होने की आदत डालनी शुरू कर दी थी । उसके सामने जो भी परिस्थिति आती थी उस पर अपना सिक्का जमाने के लिए अखिल दौडाने लगता था । पहले वो स्थिति को समझता था, फिर उसमें वो जिससे तलाशता था जिनसे उसकी पकडे बन सकें और फिर उलझन को तसल्ली और बडे गौर से अखिल की रोशनी में लाकर सुलझा देता था । उसे ऐसा करना रोमांचक लगता था तो उसका दमाद हर बार उसी तारतम् में से दौडता था जिसे नई चमचमाती फरारी कार का इंजन दौड रहा हूँ । उसके लिए दिमाग चलाना फरारी की सवारी करने जैसा था । उसे खूब मजा आता था जब वो एक पल में ही रफ्तार पकड लेता था और दूसरे पाल न्यूट्रल गेयर में आकर बेआवाज बढने लगता था । शानदार पावर थी । दोनों ही कृतियों में दैनिक उसके लग पड गई थी । अपना नाम बदलने की जरूरत को उसने खूब सोच विचार करके पूरा किया था । घर पर एकदम से नहीं बताया था क्योंकि इसकी अभी जरूरत नहीं थी । नाम को घर में धीरे से पहुंचाना था । बाकी विरोध एकदम से नहीं खडा हो । नाम का सॉफ्ट लांच भी वाजिब था और उसके बाद मध्य अल्प समय में कोशिश करनी थी कि नया नाम प्राकृतिक रूप से आम चलन में आ जाए । सॉफ्ट लॉन्च इसलिए भी जरूरी था क्योंकि पिताजी अपनी परंपरागत समाजवादी विश्वास की दहलीज को इसके लांघने के अंदेशे भर से बिफर सकते थे । लाॅ लियो क्या? फिर बॉरिस जैसा सोशल इस टाइप का नाम होता तो अलग बात थी । उस पर उन्हें ऐतराज नहीं होता और अगर होता भी तो बहुत कम ऍम तो एकदम ही नाकाबिले बर्दाश्त था । एकदम ना माकूल अमेरिकी था जिसमें से भ्रष्टाचारी पूंजीवाद की बदबू आती थी । आसमान सिर पर उठा लेते और माँ दिनभर अपने चिरपरिचित अंदाज में भगवन करती रहती है । दिना में क्या बुराई है । दिनो पहले साध् तरीके से पूछती फिर एक सुर में शुरू हो जाती है तुम्हारे दोस्तों ने तुम्हारा दिमाग खराब कर दिया है बिगड रहे हो तो और उस रहेंगी के बच्चे से तो तुम दूर ही रहो । फॅमिली ज्यादा है वहाँ पर बहुत करके छोडेगा तुम्हें घर की किस किस से बचने के लिए डैनी ने लॉन्च स्टेटर्जी पहले ही बना ली थी । पहले चरण मास्टर रहेंगी के दोस्तों के बीच नाम चलाया । सबको नाम अच्छा लगा था और जल्दी उनकी जुबान पर भी चढ गया था । अगला कदम था कि दोस्त उसके घर आकर नहीं नाम से पुकारे रहेंगी । को फिर लगाया गया और एक दोपहर उसने घर आकर ज्योति से डैनी के बारे में पूछा था । पल भर का तो डेनी सुनकर कुछ भगवान ही गई पर रहेंगी ने उसे इतना कि कि दोस्तो न जाने कब से उसे इसी नाम से पुकारते आ रहे थे । ज्योति ने गंदे उसका और फिर जोर से बहनी कहकर पुकारा था । ज्योति के जरिए डैनी अवतार घर में अब स्थापित हो गए थे लेकिन उसको पक्का पता था उसके माता पिता नया नाम नहीं अपनाएंगे । वो अपना तरीका कभी नहीं बदल सकते थे और घर में दिल्लू दिनों की गुहार लगी रहती थी । अच्छा इससे कोई खास फर्क नहीं पडने वाला था । वैसे भी कौन से फॅस की छत वाले छोटे से मकान में जिंदगी बितानी थी । नाम के बाद शिक्षक में भी निखार लाना बेहद जरूरी था पर इसके लिए उसे पहले कुछ बुनियादी दिक्कतों से जूझ रहा था । एक दिक्कत शेट्टी हर कोई आराम से शिफ्ट कर लेता था । ऍफ जाता था शायद मर्ज पुस्तैनी हिंदी मीडियम होने की वजह से था । उसकी हवा सी नहीं बन पाती थी कि शिट, कुदरत ही निकल पडे । एक हफ्ते तक वो शिफ्ट करने में पूरी संजीदगी से लगा रहा था । पर बात बनी नहीं देनी अपनी नाकाबलियत पर छोटा था । फिर एक दिन रहेंगे ने उसे तब से समझाया । शिफ्ट निकालने की कई तरीके होते हैं । ऍम जगह, समय और सब घर पर निर्भर दी । हर एक मुझे एक अलग तरह की शिक्षा जुडी थी । जैसे अगर मूड खराब है तो शिट अलग तरीके से निकलेगी । उसे भीतर से खूब सारा जोर लगाकर बाहर की ओर धकेलना होगा । जैसे कि हम जब गुस्सा होते हैं तो पेट से खीजकर आवाज निकालते हैं । खुशी वाली शर्ट इससे एकदम अलग होती नहीं है । वो मस्ती में सीटी बजाते हुए बाहर निकलती थी । वो हल्की और झागदार होती थी और जब निकलती थी तो चेहरे की मांसपेशियां, रिलेक्स और आंखें चमकदार हो जाती थी । कभी कभी इसके बाद मुस्कराहट या बेसाख्ता हंसी भी आ जाती थी । दुख वाली शिट धीरे धीरे मशक्कत के साथ निकलती थी । उसमें फैलाव होता था जिसको समझने में एक घडी से ज्यादा समय लगता था । दुख भरी शिप भारी मन की नुमाइश करती थी । इसमें झुके हुए कंधे और कुत्ते के काम जैसे लटके हुए हूँ की तस्वीर साफ दिखाई देती थी । उसमें किसी पिटे हुए इंसान का दर्द मुखर होता था । जैसे कि के एल । सहगल के गंभीर नगमों में टूटे दिलों की हताशा गूंजती थी । दुख भरी शिफ्ट के चार अक्षर ऍम आई टी अब तो उस समय हुए अलग अलग निकलते थे । वे उदास सहित कुछ समय हवा में लटके रहते थे और फिर धर्म से गिर पडते थे । आम सेट सबसे आसान होती थी । वो ॅ निकलती थी, अचानक फिसल जाती थी । पता भी नहीं लगता कि कब हो गई । ये सहज क्रिया गई जैसे बेवजह गंभीर कुछ गाना या फिर जब कुछ करने को ना हो तो इधर उधर देखना उसका कुछ मतलब नहीं होता था । बस हो जाती थी अपनी उंगलियों के नाखून देखते हुए भी आप छिटपुट बुला सकते थे । बेमकसद बिन बोले बोलने की तरह । पर इससे अधूरी लव पूरे जैसे लगते थे । वैसे ये किसी अनमनी बातचीत से कहीं बेहतर थी तो की आप दुनियादारी से एकदम बेपरवाह लगते थे । अपने में हुए हुए नहीं । नहीं जितनी कोशिश करता था उतनी ही बात बिगडती जाती थी । रहेंगी की जुबान चली थी । उस पर मक्खन की तरफ फसल दी थी पर उसके मुंह में मूसल बन कर रखी थी । वो लगातार शिट करता था क्लास में, खेल के मैदान में, बाजार में, बिस्तर पर लेटे हुए और यहाँ तक कि संडास में भी और उस से नहीं हो पा रहा था । हमेशा शिट सिट में तब्दील हो जाती थी । ये चार जलावन अक्सर ऐसे थे कि कभी उसके मुंह से एक साथ निकलते ही नहीं थे । तीन ही रह जाते थे । शिट का एच गायब हो जाता था और लगता था कि सिट यानी बैठने के लिए कहा जा रहा था । असल में सारा दोष उसके माता पिता का था जिनके पुरातनपंथी विचारों की वजह से उसको कान्वेंट स्कूल की जगह सरकारी स्कूल का मुंह देखना पडा था । रहेंगी ने उसे बताया था कि कॉन्वेंट स्कूलों में सिर्फ अंग्रेजी हालेस अंग्रेजी बोली जाती थी । यहाँ तक कि खेलते समय खाने की छुट्टी में भी अगर कोई हिंदी काॅपी बोल देता था, उस पर जुर्माना लगा दिया जाता था । ये थी अच्छी शिक्षा जिसमें एच के सही उच्चारण पर जोर दिया जाता था । उनकी देशी किसकी नहीं जिसमें सब चलता था । उसके मन में आता था कि अपने बाप से पूछे कि दुनिया उसका कैसे भला करेगी । अगर वो ठीक से भी नहीं कर सकता था । उन्होंने समझाना चाहता था की अच्छी परवरिश और अच्छा स्टेटस पाने के लिए शिवतत्व की बहुत अहमियत थी । उसके बिना वो उसी दलदल में हमेशा फसा रहेगा जहाँ साला ही सौ रुपया था । ऊंची लोग साले से परहेज करते थे और सिर्फ शिफ्ट कहना पसंद करते थे । पिताजी नहीं समझ पा रहे थे की जिंदगी गली मोहल्ले से निकलकर कॉलोनी में बस करेगी । जहाँ पर अगर आप ठीक तरीके से शिक्षित नहीं कर सकते थे तो वहाँ रहने के काबिल नहीं थे । इस पर है कि दिक्कत ऍम कहने में थी । यहाँ भी बेचने समस्या खडी कर रखी थी । मैन को भी उस तरीके से वो नहीं खींच पाता था जैसे रहेंगी कर लेता था । ऍम आसान था क्योंकि डैनी नाम अपनाने के बाद भी का वो आगे हो गया था । डाॅन कब चचेरे से हो गए थे । धीरे धीरे वाॅल भी फिल्म मिल गया था फॅमिली जैसा जहाँ उसने पहन लिया था और अब उस पर फबने भी लगा था । यही वो रंगीन पैरहन थे, स्टेटस को सजाते और सामान पे थे । दुनिया के मेले में जाने के लिए डैनी दो तिहाई तैयार हो चुका था । शेट्टी बचा था लेकिन उसको यकीन था क्या? आज नहीं तो कल ठीक से शिफ्ट करने लगेगा ।

अदभुत प्रेम की विचित्र कथा - Part 4

चार रेंगने उसे बताया था कि भारतीय प्रशासनिक सेवा का जमाना सत्तर के दशक के आखिरी सालों में लग गया था और मैनेजमेंट ट्रेनी प्रोग्राम भी । अस्सी के दशक में देव खत्म हो गए थे । ये नब्बे वाले साल थे और इन दिनों समूचे देश में बदलाव के जुनून के बाल भले फट रहे थे, रहेंगी के पिता हाल ही में कॉनफेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्रीज के सेमिनार में राजनीति और उद्योग के दिग्गजों को सुन कर लौटे थे । नए प्रधानमंत्री क्या ख्यालात पिछले प्रधानमंत्रियों से अंगदादि वो चाहते थे कि अर्थव्यवस्था में उदारीकरण हूँ, सेवा क्षेत्र पर होने वाले सरकारी भारी भरकम खर्चे कम हो और भारतीय बाजार में बडे खिलाडियों को उतरने के मौके दिए जाएं । यानी हवाई थी कि अब उदारीकरण होगा, क्रोध होगी और कॉरपोरेट व्यवस्था को बढने का मौका दिया जाएगा । रहेंगी ने बताया की खुद बिजनेस में होने के बावजूद उसके पिता ने तय किया था कि उनका बेटा पहले एमबीए की डिग्री हासिल करेगा और फिर बिजनेस में उतरेगा । यही अब सफलता का रास्ता है । उन्होंने जोर देकर कहा था और से अलग अलग बिजनेस मैनेजमेंट संस्थानों में दाखिले के लिए तैयारी करने को कहा । रेंगी ने डैनी को बताया था कि एनडीए वालों की मांग इस कदर थी उन्हें महीने के बीस तीस हजार आसानी से मिल जाते थे और हॉर्स अलग से मिलते थे, बॉक्स में होते हैं । डैनी ने अचकचाकर पूछ डाला डैडी कहते हैं बॉक्स माने अपने सारे खर्चे कंपनी से वसूलना जिसे आप होटल दिखाएँ । बिल कंपनी देगी । सिनेमा देखें बिल कंपनी के माथे यानी ऐसे ही सब पहले से एंटरटेनमेंट अलाउंस कहा जाता था तो कुछ एक लोगों को ही नसीब था और अब हर किसी को मिलते थे । दोनों ने पूरी दोपहर एनडीए वालों के पास पर बता डाला । रेंगी को कुछ कुछ जानकारी तो थी और वो अपने दोस्त को जताना चाहता था जिसे कंपनी जॉब के बारे में सारी मालूमात है । उसने अपने पैदा का एम । बी । ए । के बारे में एक लाख सुन रखा था और उसी की बिना पर अपनी पतंग को ढील दे देकर उडाता गया था । दैनिक हाथ में हूँ टीचर की की सनसनाहट में मस्त हो गया था । पास के आकाश में गोते लगा रहे थे । मालूम नहीं मेरी दूर के रिश्ते की बहन टट्टी में काम करती है । बताती है कि उसके शैम्पू का खर्चा भी उसकी कंपनी देती है । यानी खाना भी कंपनी के सिर्फ और नहाना भी डैनी ने ढाका लगाया था । आॅटो हर महीने शैम्पू की दो बोतलें खरीदती है । इम्पोर्टेन्ट वाली खुद इस्तेमाल करती है और दूसरी माँ को भेज देती है । उसने शैम्पू का नाम भी बताया था । ऍम ऐसा कुछ था, हद है या दैनिक नाक सिकोडते हुए कहा था अरे नहीं और सुनो । वो हर महीने काजू बादाम कंपनी के खर्चे पर खरीदती है, अपने भाई बहनों को भेज देती है और अपने आप के लिए हर छह महीने पर एक फ्रेश एयर भी भेज देती है । वो महंगी वाली इसके ऊपर लकडी का टक्कर होता है । एक से ज्यादा खरीद नहीं सकती क्योंकि अभी शादी नहीं हुई है । ऑपरेशन को कैसे जस्टिफाई करेगी बेचारी ऍफ का लगाते हैं । अपनी चांग पर हाथ मारा तो मेरे से कैसे मिलता है? रेल नीतियां प्रशित है और बिल पर परफ्यूम लिखवाती है । दोनों उसके शातिर तरीके पर खूब देर तक हस्ते रहे थे । जितनी बातें करते गए उतना ही उनका यकीन पुख्ता होता गया की अगर वो इस एनडीए नाम की नैया पर सवार हो लें । उनकी सारी जिंदगी बिना कुछ खर्च किए ऐशो आराम से गुजरेगी । एक बार एमबीए की डिग्री मिल गई तो हमें बस स्वास्थ देखना होगा और एक महंगा चमडे का ब्रीफकेस लेकर पहला होगा । बढिया से बढिया होटलों में लोगों के साथ लंच उडाएंगे फिर कॉकटेल के बाद डिनर एनडीए वाले और करते ही क्या है? मौज उडाते हैं रहेंगी की आंखों में कई सितारे और एक आप शाम चमकने लगा था । उसकी जिंदगी का मकसद अब तय हो चुका था और दोनों मैनेजमेंट संस्थानों के एंट्रेंस की तैयारी से जुडी बारीकियां जुटाने में लग गए । कॉलेज के बाद ऍम पूरे दम हमसे लग गए । दैनिक जीवन शानदार थी रहेंगी की अंग्रेजी अच्छी थी । साथ मिलकर पढना दोनों के लिए फायदे का सौदा था । ये तो वही बात हो गई कि एक अंधा, एक लंगडा एक सहारा दूजा डैनी ने पहले ही दिन प्रैक्टिस टेस्ट होने पर जुमला मारा था । दोनों टेस्ट में पास हो गए । कोई आए तो नहीं मिला पढैनी का दाखिला रहेंगी से बेहतर इंस्टिट्यूट में हुआ था ऍम दोस्ती की खातिर उसे छोडकर रहेंगी वाले इंस्ट्यूट में नाम लिखवा लिया उससे क्या फर्क पडता है या की किस स्कूल से एमबीए किया है डिग्री तो वहीं मिलेगी ना रहेंगी को अपने फैसले के बारे में बताते हुए उसने ये दलील दी थी । हम जब एक साथ रहेंगे तो ज्यादा मस्ती करेंगे । रहेंगी की पीठ पर धौल जमाते हुए उसने कहा था तो दोस्ती हमेशा के लिए होती है और इन छोटी मोटी बातों से कोई फर्क नहीं पडता है । ऍसे नजर भरकर देखा था पर जवाब में कहा कुछ नहीं था । बिजनेस स्कूल एकदम वही था । यानी शेख मैं मास्टरों के लिए जब पूरे शागिर नहीं बल्कि गुलामों की नई खेप थी । इन को सताने के लिए वो हर पल नए तरीके इजाद करते रहते थे । सूरज उगने से लेकर डूब नेता मास्टर दे रहने से उन्हें ऐसे हारते थे । वालों प्रोफेशनल मैनेजर बन ने के लिए बोझ तले चुकी बीट और बेहद खाई हथेलियां जरूरी हैं । अगर उन सरे ले कोई स्टेशन की तैयारी नहीं चल रही होती तो केस स्टडी प्रोजेक्ट रिपोर्ट सी ॅरियर रहेंगी, जहाँ पे सोते हर पल वक्त छत पे रहते हैं और सफल को पूछते रहते थे जब उन्होंने इस नामुराद एनडीए फोर्स को गंभीरता से लिया था । तसल्ली बस इस बात की थी कि उनकी जुबान पर कुछ नहीं लगता चढ गए थे कि उनके हालात बखूबी बयान करते थे । दिन में कई बार उनको लगता था कि वे पकडो और स्कूल हो चुके हैं । दोनों सबको अगर बदल का इस्तेमाल भी करने लगे थे । सुबह के तीन बजे अपना प्रजेंटेशन बढाते वक्त जब बडबडाता था ऍम रेंगी का दर्द रैलिस क्रूड में जाहिर हो जाता था । जुबानी गुनाहों के अलावा दैनिकी परवरिश ने उसे और शबानी हरकतों से बचा कर रखा था । सिगरेट और शराब को उसने हाथ भी नहीं लगाया था जबकि इसके ज्यादातर साथ ही इनमें से एक या दोनों का सहारा गाहे बगाहे ले लिया करते थे । वह अक्सर धुआ धुआ हो जाता था और धोनी के चलने उडाने में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं थी । रेंगी सिगरेट से ज्यादा शराब पसंद करता था और तीन पैग के बाद क्रिकेट जरूरी था । रहता था की शराब दिए बिना सिगरेट का कश मारने से पीटने चैनल होने लगती थी । कोर्स का पहला सारे अच्छे अच्छे सपने की तरह हो गया । ऍम पूरी होती नहीं थी और जब छुट्टियों में वह घर जाता था, सारे वक्त होता रहता था । उसकी बहुत खुश खोज रहा था । इसके दिल्ली ऊपर जलन, कुकडे, रिश्तेदारों ने कुछ ऐसा जादू टोना कर दिया है कि उसके पास नहीं होती । बेचारा हर बार सुबह पडा रहता है । उधर उसके पिता उसकी आंखों में झगडते रहते थे । जब भी दिन सूखा रुकता था तो वो उसे बडे गौर से देखते थे । इसे पता लगाने की कोशिश कर रहे हो कि लडके को कोई भी तो नहीं लगती है । उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि उनका बेटा जब से एनडीए करने गया था तब उसकी आखिर क्यों मोदी रहने लगी थी । उसके पहनने ओढने का ढंग भी बदल गया था । ज्यादातर वो ढीली ढीली देखकर पहनता था और बाल एकदम रुपया हो गए थे । घर छोडने से पहले तक तो वो बाकायदा कुर्ता पायजामा पहनता था और रहने के बाद बालों में खूब सारा क्यो कार्यक्रम तेल लगाना कभी नहीं बोलता था । लेकिन अब अब उसकी आंखों वालों और चेहरों से चमक पूरी तरह गायब हो गई थी । कुछ गडबड तो जरूर ही शिक्षा रात के खाने के बाद देवकीनंदन ने पूरी संजीदगी से घर के संस्कारों और स्कूल कॉलेजों में पहले नशे के चलन पर लंबा चौडा व्याख्यान दे दिया । मास्टरी वाले अंदाज उन्होंने कहा कि शिक्षकों, माता पिता और छात्रों को रात दिन नशे की बुरी लग से होशियार रहना चाहिए क्योंकि इससे जवान हम स्वस्थ शरीर को खडा हो जाता है । टाइमिंग थोडी देर तो उन्हें सुना था लेकिन जल्दी उसे छपकी आ गई थी । इनके नाम बंद हो गया था । उनके बेटे को नशे की लत लग गई है । क्योंकि सिर्फ नशेडी ही बैठे बैठे हाथ में खाली हो सकते थे । कोर्स के दूसरे साल को कुछ ही हफ्ते हुए थे की रहेंगी ने एक दिन बताया उसके पिता ने अमेरिकन यूनिवर्सिटी में उसके दाखिले का इंतजाम कर दिया है । पैसे और प्रभाव की बदौलत भारत में की गई एक साल की पढाई का क्रेडिट भी मिल पाना मुमकिन हो गया था । रहेंगे । वहाँ दूसरे साल में सीधे दाखिल हो सकता था और एक साल या ज्यादा से ज्यादा डेढ साल में अपना कोर्स पूरा कर सकता था । उसमें डैनी को बताया कि उसके पिता को यकीन था कि विदेशी डिग्री हर हाल में भारतीय डिग्री से बेहतर थी और दुनिया में कहीं भी डॉक्टरी दिलवा सकती थी । उदारीकरण के दौर में विदेशों में भारतीय मैनेजरों की मांग हो चली थी इसलिए बाहर जाना ही हो गया था रहेंगी जाने से और डैनी का साथ छूटने से तो भी तो देख रहा था और डैनी को लगा के अंदर ही अंदर वो खुश था और क्यों ना हो । मैंने सोचा और रिटर्न ज्यादा कीमती होता है । उस रात डैनी और रहेंगी । ऍफ इसके सीढियों पर बहुत देर तक बैठे रहे थे । एकदम चुप चाप फॅमिली गई थी और पहली ड्रिंक ली थी । फिर वो अपने को रोक नहीं पाया था । दारू पीता रहा था और कशमकश लगता रहा था । जब तक की बोटल और सिगरेट का पैकेट खत्म नहीं हो गए थे उसके साथ धोखा हुआ था । पक्का दोस्ती की खातिर एक बेवकूफ की तरफ से बेहतर कॉलेज छोड दिया था और अब तो उसको छोड रहा था । फॅस क्रूड । नशे में वो अपने पर खूब हँसा था और ऍम भी था । रहेंगी के हाथ से थामने की कोशिश करते रहे थे । ऍफ दिया था अब बिहार दोस्त के नहीं धोखेबाज के हाथ थे और जिंदगी को तो चलते ही रहना था । डेली को मौके मौके पर अपने दोस्त की याद जरूर आती थी और उसने इस हम को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया था । सारा ध्यान पढाई पर लगा दिया और अच्छे नंबरों से सभी अंतर हम पास करता गया । खाली समय में डाॅन पडता था ये जानने समझने के लिए की असल कॉर्पोरेट जगत ने चल क्या रहा है । मैंने खुद को कभी फाॅरेस्ट रूप में नहीं देखा था । अंकों ढेर में घंटों सर खपाना । फिर उसमें से फिजूल सा निष्कर्ष निकाला तो शायद ही किसी काम का हो । उसे बेहद बहु लगता था । स्टॉक मार्केट रिपोर्ट और महारथियों की बनाई फ्यूचर रीडिंग को जब पडता था तो उनके डाउन पर से झुंझलाहट होते ऊंचाई की पत्तियों को पढकर भविष्य बताने जैसा स्वाद था जिसमें बडे बडे दिमागदार लोग भविष्यवाणी करते रहते थे कि आज शेयर मार्केट उछाले लेगा और कल हम से गिरेगा । शायद आपस में उनके पास कोई कोर्ट जैसा कुछ था कि जब अब बोलेंगे तो डाउन होगा या फिर अपने बनाए हुए बेहतरीन आंकडों का विश्लेषण और कंपनियों के नतीजों की ना कॉल सिर्फ दिखावा था । वास्तव में विश्व को जानने का दावा करने वाले चमदार चेहरे पाखंडी जवाब के तीरंदाज रहे तो अंधेरे में तीर चलाकर अपनी काबिलियत खाते रहते थे । लेकिन आंकडों के मकडजाल में उलझाने वाले इन विशेषज्ञों के बहुतेरे अंधभक्त थे । ठीक वैसे ही जैसे गेरुआ कपडे पहने पेड के नीचे बैठे सडक छाप ज्योतिषी के होते थे जो खुद समझते जानते कुछ नहीं थे और लोग पर लोग की बातें करने से बाज नहीं आते थे । रहने के लिए ये नए जमाने के बरामद थे । इनके विश्वास किस आधार पर तय किए जाते थे कि वे किस बिजनेस स्कूल से पढ करने गए थे । स्कूल भी सरयूपारीण और कान्यकुब्ज जी की तरह दो अलग अलग हिस्सों में बंटे हुए थे । दोनों ही अपने को असली भ्रमण बताते थे । पूरी तरह से आश्वस्त थे कि दुनिया उन्हीं के इर्द गिर्द घूमती है और उनका कहा हुआ भ्रम सत्य के अलावा कुछ नहीं है । ऊच नीच के दंभ के साथ साथ वो इसमें भी जरूर महसूस करते थे । उनका कोई कुछ बिगाड नहीं सकता था, चाहे वो कितनी बडी गलती क्यों ना कर लें । इसीलिए ये काम को खिलवाड समझते थे । खिलवाड खत्म होने से पहले ही पाला बदल देते थे । विशिष्ट भ्रमण उसी को मानते थे । जल्दी जल्दी जजमान बदलने की कुव्वत रखता हूँ । यानी बारह साल में एक दर्जन नौकरियाँ कर चुका हूँ । ज्यादा पैसा और पहुँच पाने का ही सारा खेल था और उसी में शौहरत थी वास्तव में अपने को शातिर तरीके से बेचने की कला बिजनेस स्कूल मोटी फीस लेकर सिखाते थे । टहनी समझ गया था की कामयाबी पाने के लिए उसको पेशेवर दोस्तों और जानकारों का मकड जाल बुनना होगा । हमेशा आगे बढने की होड में लगे रहना होगा और अपने को ऐसे पेश करना होगा । उसको पाने की ललक दूसरी कंपनियों में हमेशा बनी रहे । दूसरे शब्दों में उसको काफी कारनामों के सहारे अपने को अचरज और आकर्षण का केंद्र बनाना था । एक दिन उसके बिजनेस स्टेटर्जी के प्रोफेसर नहीं मूड में आकर कहा था की कंपनी की नौकरी लगभग झपक वाली सुहागरात की तरह होती है । उन्होंने कहा था नए संभोग का रोमांच रात भर का होता है तो रात के बाद ठहर गया तो फिर बेमुरव्वत जान जानना फस गया । पिछले पार्टी करो और आगे बढो पार्टी के झूठे बर्तन किसी और पोटॅटो दैनिकों बात पसंद आई थी । उसे सुनकर माँ की याद आई थी । हमेशा औरों के खाने के बाद बढता उठाने और चौका साफ करने में लगी रहती थी । आपसे मुझसे हर गया था वैसा अपनी जिंदगी के साथ नहीं होने देगा । पार्टी करेगा और निकलेगा । कॉर्पोरेट जगत में तो ऐसा होता ही है ना उसको अपवाद बनने की क्या जरूरत थी ।

अदभुत प्रेम की विचित्र कथा - Part 5

पापा जी दैनिक कॉलेज खत्म करके घर लौटते हुए काफी खुश था । उसने घर वालों को नहीं बताया था कि उसे बडे बैंक में नौकरी मिल गई थी । वो मंजर को अपनी आंखों से देखना चाहता था । तब खबर सुनकर सब दंग रह जाएंगे और फिर धीरे से खुशी की लहर मुस्कराहट बनकर वोटों से शुरू होकर कानों तक फैल जाएगी । उनकी आखिर चमकने लगेंगे जब उन्हें बताएगा कि उसकी पहली तनख्वाह पूरे पच्चीस हजार रुपए होगी और उसके ऊपर उॅची मिलेंगे । इतनी बडी रकम सुनकर महत्व शायद बेहोशी हो जाएगी । पूरी जिंदगी उन्होंने कुछ हजार रुपए से ज्यादा कभी नहीं देखे थे । हालांकि कुछ महीनों से वो अपने अडोस पडोस वालों को बताने लगी थी । उनके पति की पगार जल्द ही पांच अंकों में पहुंचने वाली है । रिटायरमेंट पूरे छः महीने पहले दैनिक के परिवार उन के जाने वालों के बीच दस हजार वाली नौकरी बहुत बडी बात थी । अगर कोई दस हजार कमाता था तो उसके साथ बडी जब से पेश आना होता था । हाल ही में पिता के दोस्त ने अपनी बेटी की शादी एक दस हजार की थी । इतना काबिल दामाद मिलने पर वो इतने खुश हुये थे कि उधार लेकर उन्होंने दहेज में मारूति कार दे डाली थी । लोगों ने दस हजार का ससुर कहने लगे थे जिसे सुनकर वे फूले नहीं समाते थे । राज देवकीनंदन का छोटा सा दिन हूँ । इतना बडा हो गया था कि उसने पहली ही छलांग में पूरे पच्चीस हजार रुपए अपने नाम दर्ज कर लिए थे । वो नस पास अलग थे । हालांकि डैनी अपनी उपलब्धि पर बार बार था । पूरी बात बताने में उसको हिचक हो रही थी । उसे डर था कि लोकतंत्र हुआ बोनस और बॉक्स कीगन सुनकर एक एक विश्वास नहीं करेंगे । इसलिए उसने फैसला किया था कि वह पच्चीस हजार तो बताएगा और उसके साथ कहेगा कि हर तीन महीने पर उसको पच्चीस हजार का बोनस अलग से मिलेगा । इस तरह से बताना ज्यादा शालीन था बजाय इसके कि वो कहे की असल में उसको पैंतीस हजार हर महीने मिलने वाले थे । पैंतीस हजार बहुत से लोगों को एकदम से हजम नहीं होना था । फौरन कहेंगे कि दिन में शेखी बघार रहा है । घर पहुंचते ही बडो की पैर छुआ आई । राम राम और गले मिलने की कवायद शुरू हो गई थी और सारे लोग उससे मिलने आए हुए थे । दिन की मौजूदगी से डैनी को अपना ऍम छत वाला दो कमरे का घर और तंग नजर आने लगा था । बीस साल में पहली बार उसकी नजर दीवारों की बुरी हालत पर पडी थी जिनपर पुताई से नहीं हुई थी । पीछे आंगन में बेहतर से कई पलंग लगे हुए थे । इन पर कपडे शुभ रहे थे । उसकी निगाह बेबस घर की हर चीज पर पड रही थी और कुलजमा मंजर किसी घटियां चौल जैसा था । ज्योति सबसे ज्यादा उत्साह में थी । दैनिक पहुंचते ही उसने मेरे लिए चलाया भैया की रट लगा दी थी । जीन्स टॉप देखकर वो झूठी थी । उसकी खुशी से डैनी का मन भर आया था । हाँ तो उसने साडी दी थी और पिता को कुत्ता दिया था । हाँ, साडी पाकर बहुत खुश हुई थी और इस खुशी में बार बार उसका माथा चूमने दी थी । पिताजी ने कुर्ता ले लिया पर चुप रहे । उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि उनका लडका एमबीए होने के बाद भी क्यों मुसी गंदी ढीली से निक्कर पहन कर घूम रहा था । माना कि वह सफर से आया था पर कम से कम तो पहनी सकता था । अरे निक्कर पहन कर कौन निकलता है? घर से बाहर लोगों के छठे हैं । देवकीनंदन ने बेटे से बात शुरू कर दी तो तो रिजल्ट आ गया । अभी नहीं कब आएगा? जल्दी ही कितनी जल्दी । शायद एक महीने बाद हूँ तो क्या करने का इरादा है । नौकरी के से तलाश होगे, कहीं अप्लाई किया है, अप्लाई करने की जरूरत नहीं है । शायद दैनिक बे परवाह जवाब दिया और अपनी अटैची खोलकर पेंट सोचने लग गया था । उसको मालूम था कि पिताजी को निक्कर नागवार गुजर रही है और शाम बताने से पहले उसे पैंट पहन लेनी चाहिए । वो पेंट लेकर झट से दूसरे कमरे में बदलने चला गया । देवकीनंदन ने अपने सबको समेटा । उस पर एक गांठ और लगाई और बेटे का इंतजार करने लगे । दैनिक जब कमरे से बाहर निकला तो उसने देखा लोग तंग कमरे में भी अपने लिए जगह बनाकर बैठे हुए थे । परिवार वाले रिश्तेदार तो उस पडोसी गर्मजोशी से बातचीत में मशगूल थे । कडी बार ऍम हजारे पर बोल हजार फरमाया । उसकी जिंदगी के सभी अंशधारी मौजूद थे । उसके निवेशके लाभांश का ऐलान अब हो सकता था । पापा डाॅट होते हुए हल्के से शुरू किया अप्लाई करने की हमें जरूरत नहीं है क्योंकि हमारे यहाँ कैम्पस रिक्रूटमेन्ट हो जाता है । क्या कर लिया? उन्होंने अपने मास्टर वाले अंदाज में इस तरह से पूछा जैसे आपने विद्यार्थी से उसके होम वर्क के बारे में तहकीकात कर रहे हो । हम हो गया तो दैनिक अपनी माँ की तरफ बडा और उन को अपनी बाहों में भर लिया । माँ नौकरी मिल गई है उसने उनकी खान नया कर रहा था पर तंग कमरे में सुनाई सभी को पड गया । मानस को निपटा लिया था । बार बार बलियाली थी और पुरम सारे देवी देवताओं का आह्वान करके उनके सामने नतमस्तक हो गई थी । इस तरह की नौकरी मिली हैं । धीरे के नंदन ने अपने सूखे से अंदाज में पूछा बैंक में मिली है और मांग मुझे पच्चीस हजार रुपये हर महीने मिलेंगे । ऍम अलग से क्या पच्चीस हजार जो भी चलाई थी ऍम हिला दिया । मैंने फिर डैनी को खेलने लगा दिया और इस बार सहारा पाने के लिए उसको पकड लिया था । खुशी के मारे उसके पैर जवाब दे रहे थे । आंखों से झर झर आंसू बहने के लिए थे । देवकीनंदन जैसे पकडा गए थे । डैनी ने उनके पैर छुए पर उनके मुंह से आशीर्वाद नहीं निकल पाया था । लोग मुबारकबाद देने के लिए बडे तो थे पर हाथ मिलाने के लिए उनका हाथ नहीं पा रहा था । पच्चीस ऍम लगता था जैसे किसी ने सीने पर तो आपका गोला दाद दिया होगा । ऍम की बात बता रहे हो । आखिरकार उनके मुंह से आवाज निकली थी था पच्चीस हजार आतंकवाद और उसके ऊपर बाॅस ऍम हो कुछ भी मिल सकता है जैसे कि दो चार हजार रुपए हर महीने पच्चीस के ऊपर आप और तो क्या होगा की सब मिलाकर कितने मिलेंगे । हर महीने फॅसने आतुर होकर पूछा दैनिक फैसला किया था कि वो अपनी असली तनख्वाह नहीं बताएगा । पैंतीस हजार कुछ ज्यादा ही लगेंगे लोगों को पर अपने को रोक नहीं पाया था । अगर सब ठीक रहा तो सब मिलाकर पैंतीस पड जाएंगे । उसमें बिना हिचकिचाए कहा पर फिर शर्मा गया । लोग अपनी जगहों से कुछ खडे हुए थे । कमरे में करंट दौड गया था हैं । अरे अपना दिन तो भाग नहीं बन गया है । किसी ने आवाज लगाई ऍम आपका लायक बेटा है तो उस ने ऐलान कर दिया हम तो पहले ही जानते थे हैं कि दिन्दू मोहल्ले का नाम रोशन करेगा । बस वक्त का इंतजार था कि कब इसकी काबिलियत परवान चढती है । तीसरे ने वहाँ वहाँ वाले अंदाज में कहा था पांच वाली आंटी हफ्ते हफ्ते अचानक प्रकट हुई और उन्होंने दिनों का असर अपनी छाती से जब कालिया होनहार बच्चा कितना प्यारा है, उन्होंने अपना पूरा लाड उडेलते हुए बुला रहा था । उनके ब्लाउज में भरे सूखे हुए पसीने की महक से डैनी का दिमाग चकरा गया था । अंडे कोई अच्छा डियोड्रेंट क्यों नहीं लगती हैं? ऐसी सडेली से मैं इसलिए घूम रही हैं । आपने गलत करते हुए सोचा था या आपको घर मिलेगी? ऑफिस में इसी होगा । ज्योति ने उत्सुकता से पूछा था ट्रेनिंग इतिहास उसके गले में हाथ डालकर अपनी तरफ खींच लिया था । रहना तो मैं तेरे लिए लूंगा । ऍम बैंक में नौकरी मिली है वहाँ इसी तो होगा ही । बदली भैया हम तो मुझे स्कूटी दिलवा दोगे ना, अरे क्यों नहीं पर तो पहले लाइसेंस बनवाने की उम्र तक तो बहुत यहाँ कोई लाइसेंस की जरूरत नहीं है । भैया सब चलता है यानी हस पढा था । ठीक है बहन जी अगले साल तेरी सोलह सालगिरा पर मुझे स्कूटी दिलवा दूंगा । ज्योति माने खुशी के उछल पडी थी ऍम एक बुजुर्गवार ने उनकी कोहनी पकडते हुए कहा की होती कि स्कूटी से पहले तो देवकीनंदन को एक्सॅन स्कूटर खरीदवाते कब तक बिचारे स्कूल साइकिल से जाते रहेंगे? उम्र हो गयी है नहीं मुझे नहीं चाहिए मैं बैठी हूँ रहते हुए वो कमरे से निकलकर तालान में आ गए । आंखों में आंसू बहुत देर से भरे थे । किसी तरह उन्हें रोके हुए थे । पर बांध अब टूट गया था । दोस्तों के सामने रोना अलग बात थी, पर बेटे के आगे वो आंसू नहीं कब कर सकते थे । चाहे खुशी के आंसू भी नहीं रहने के पास तीस दिन का वक्त था । पहला तुम तो खत्म हो ही गया था पर लोगों की आवाजाही कम नहीं हुई थी । कोई ना कोई कहीं से खबर सुनकर मुबारकबाद देने चला रहा था और डैनी को बार बार आशीष लेनी पड रही थी । वो हर चेहरे को अच्छी तरह से जानता पहचानता था । सबसे कोई न कोई बचपन की यादें जुडी हुई थी और आज वो सबको लेपटॉप के माफिक सलेक्ट करके डिलीट में डालना चाहता था । हाँ, डिस्को रिबूट करना था क्योंकि उसे यकीन था कि इन पुरानी फाइलों की जिंदगी में अब कभी जरूरत नहीं पडेगी । दैनिक घर पर था और नहीं भी था । उसे किसी तरह तीस दिन काटने थे और इसके लिए उसने अपने को सुन कर लिया था । जैसा माँ कहती थी, वैसा ही कर लेता था । आने के दूसरे ही दिन उन्होंने जगह पर रख दिया था । मैंने कहा सबसे आगे माँ की चौकी के सामने बैठो तो बैठ गया । ठीक बाजू में दो बडे बडे स्पीकर फुल वॉल्यूम पर बेसुरे गायक की माता की भेंटें ऍम फोन तरीके से पहुँच रहे थे । ऍम कर भाग जाएगा लेकिन वो बैठा रहा था । मोहल्ले वाले लगातार दस के नोट से उस पर वार फिर करते थे और हर बार से वोटों पर मुस्कराहट लानी पडती थी । पीछे बैठे अंकल आंटी ऐसी तालियाँ बजा रहे थे और सिर्फ लहरा रहे थे जैसे किसी रॉक शो में हो पंडाल में बच्चे हाथ पर अब दौड भाग मचाए हुए थे तो गंदा सा पाए जाना पहने हुए था तो कोई लगी निक्कर किसी तरह से कमर पर पढाये हुए था । उनकी सारी कोशिश ये थी कि किसी तरह नजर बचाकर शेयर परसवार देवी के सामने रखे हुए प्रसाद में से कुछ चुरा ले । कई बार प्रसाद के थाल पर हाथ मारा जा चुका था । देवी का बहुत उनके सामने लूट रहा था और वो बेचारी कुछ कर भी नहीं सकती थी । दैनि नहीं बचपन में बहुत सारे जगह पे देखे थे । उन्होंने मजा भी आता था । मेरे रात तक वो और उसके दोस्त इसी तरह की हरकतें भी क्या करते थे । राज् घूम रहा था गंदा सा पंडाल टूटी कुर्सियों पर रखे बहुत हूँ । नायलोन की साडी पहने आंटी लोग और धीरे पाए जाने वाले अंकल कुछ अजीब से लग रहे थे । वो कहीं पर भी अपनी नजर ठहराना नहीं चाहता था । कुछ भी दीदी के काबिल नहीं था । शुकराना अदा होने के बाद खाने का सिलसिला शुरू हो गया था । दैनिक बडी नौकरी पा गया था इसलिए सब चाहते थे कि वो उनके घर खाने पर आए । मैंने किसी से नहीं कहा था जिसकी वजह से सप्ताहिक खाने का मूल हो गए । जबकि डैनी के जाने में सिर्फ चौबीस दिन ही बचे थे । ज्योति ने दीवार पर टंगे कैलेंडर पर मेजबानों का नाम सिलसिलेवार डाल दिया था । डैनी ने माँ को समझाने की लाख कोशिश की थी और उन्होंने एक नहीं सुनी । सब जगह जाना जरूरी था । किसी को भी काटा नहीं जा सकता था । क्या एक रात में दो बार खाना क्यों ना खाना पडेगा? इस सिलसिले के पीछे मकसद देखी था रिश्ता किसी की बेटी, किसी की बहन, भतीजी भांजी शादी की उम्र में थी और डैनी उनके लिए बेहतरीन खुला हो सकता था । हर जगह सलाम दो आठ ठंडा गरम होने के फौरन बाद एक ही सवाल थन खिला देता था ऍम पहले क्या इरादा है? अमूमन? डैनी जवाब भी नहीं दे पाता था कि आंटी जी उसकी माँ से शुरू हो जाती थी । दिन में जैसे लडके के लिए तो घरेलू लडकी ही ठीक रहेगी । अरे ऐसी लडकी जो उसके साथ कोर्ट बैठ मिले और साथ में हमारे आपके परिवारों में फिर भी हो जाए । संस्कारी होनी चाहिए । देश तरार नहीं आजकल की बिगडी लडकियों की तरह रात के खाने के दौरान कई बार ऐसा हुआ कि मेजबानों ने लडकी दिखाने का कार्यक्रम भी साथ में निपटा दिया था । सही वक्त पर अक्सर खाने से ठीक पहले लडकी को ड्राइंग रूम में दाखिल करवा दिया जाता था । बताया जाता था कि बीच मेरी खाना बनाने में लगी थी । बस अभी फायरिंग हुई है । डैनी को पूरा मौका दिया जाता था कि वह नजर भर के उसे देख लें, बातचीत कर लेंगे । बाद में खाना खाते समय लडकी की खूबियों पर सबसे ना होता था । एक अलवर माँ यहाँ लडकी पर ठहर गई थी और डैनी ने फौरन से पेश्तर अंकल जी के सामने साफ साफ कर दिया था । उसे अगले पांच साल तक शादी करने की नहीं है तो कोई मुगालता ना पालें । पर सबने फसकर उसकी बात उडा दी । उधर ज्योति को ये सब बहुत बढिया लग रहा था क्योंकि अचानक कई लडकियाँ उससे दोस्ती करना चाहती थी, घर आना चाहती थी । उसकी पूछ हर तरफ हो रही थी । पर डैनी को मालूम था कि उसे क्या चाहिए । उसे लंबी गोरी, छरहरे बदन वाली और पर घर आने की सुंदर लडकी चाहिए थी तो शिफॉन चनौन पहनकर विलायती तरफ उससे ऍम तो खानी का शहर उसके जीवन में खोले । रिकॉर्ड पहनने वाली के पास वो भटकने वाला भी नहीं था । बहुत लेट है । आज ही राजी वालियों से उसने तो वहाँ कर ली थी ।

अदभुत प्रेम की विचित्र कथा - Part 6

छह डैनी मु अंधेरे उठ गया था आपने इस्त्री किए हुए कपडों को उसने एक बार फिर उलट पलट कर देखा । कमी स्टाॅक और रुमाल सब करा रहे थे । घर से चलते वक्त पिताजी ने उसे अच्छे से टाइटन दिया था जो उन्हें सालों पहले एक विद्यार्थी ने भेंट में दिया था । भाई पर लगकर पिन खूब फब रही थी । काले जूतों को पिछली रात ही वो अच्छी तरह से चमका चुका था । दो दिन से वो बालों में शैंपू करना टाल रहा था क्योंकि पहली नौकरी के पहले दिन बालों में नई चमक अच्छी लगती नहीं । आराम से तैयार हुआ । कई बार उसने अपने कोशिशें मैंने हारा था । चलते चलते से माँ की याद आ गई थी । कुछ हो गया आंखें मूंदकर उसने माँ का खयाल किया था और उन्यासी गायत्री मंत्र मन ही मन पडने लगा था । माँ से कम से कम तीन बार पडने को हमेशा कहती थी पहले कभी उनकी राय प्रश्न ध्यान नहीं दिया था । पर आज आज बरबस ही सब कुछ हो गया था । बस एक कमी थी होती तो उसे गले लगाकर बहुत सारा आशीर्वाद भी दे दी । उनकी गैरमौजूदगी उसको बेहद खटक रही थी । दैनि ने भरे मन से फ्लैट का ताला बंद किया और आपने पहले दफ्तर में पहले दिन की अपनी आमद लिखाने निकल पडा । दीनानाथ उर्फ डीना और ऍम एनडीए अंतरराष्ट्रीय बैंक के करोड प्लेस दिल्ली ऑफिस में पसीने से धरपकड पहुंचा था । उसने ऑटो में सफर करने के बजाय टैक्सी पकड ली थी । ऍम स्कूल वाले ऑटो नहीं बैठते । उसको बताया गया था । लेकिन कोर्ट की वजह से जल्दी उसे पसीना छूटने लगा । जमजम आती इमारत की छठी मंजिल पर पहुंचते ही उसने राहत की सांस ली थी । वहाँ वातानुकूलित बयार बह रही थी । कुछ पर रोककर बयार कोसना अपने में समेट लिया था । वो अब इसी आबोहवा में रहेगा । उस पर अपना मालिकाना हक जमाएगा । डाॅक्टर पसंद था । पाए मैं हेल्प हूँ । ऍम कहा फॅस को नजर भर के देखा और फिर मुस्तैदी से प्रमाण । मेरा नाम दीनानाथ है । दे नहीं मुझे ब्रांच हेड से मिलना है । ज्वाइन कर रहा हूँ तो तो आप नहीं हैं । एक मिनट सर उस हिसाब से कहा था और ऍम पर बात करने लगी थी । हालांकि उस की निगाहें डैनी पर ही टिकी जी होना है । उसमें डैनी को ब्रांड झटके केविन की तरफ ले जाते हुए बताया था और फिर हल्के से मजाक किया था । मैं देख रही हूँ कि नई भर्ती में सुधार आ गया है । पहले की भर्तियां भी पूरी नहीं है । मैंने नहीं भारत से कहा था मोना हस पडी थी । दफ्तर में काम करने में मजा आएगा । ऍसे सोचा था । ब्रांच है तो देखते ही डैनी को लगा था । जैसे किसी ने उसे पालने से सीधे उठाकर ऑफिस में बैठा दिया था । वो छोटा सा मोटा सा बच्चा था । इसके दूध के दाम भी अभी आने बाकी थे । कदकाठी भी ठीक वैसे ही थी और जब डैनी से हाथ मिलाने के लिए आगे बडा ऐसा लगता जैसे कोई बता उसकी तरफ चली आ रही थी । आए ऍम बडे महीन तरीके से तो चलाया था ऍम अनुभव मैं है पर यहाँ एक दूसरे को पहले नाम से ही पुकारते हैं और ऍम मैं टी ना फॅसा जवाब दिया था । अनुभव अपने नाम के अनुसार अनुभव को कम मिलाते हुए किसी तरह से अपनी कुर्सी पर फिर बैठ गया और एक फाइल उठाकर उसमें लगती कागजों में मुश्किल हो गया था । पहले कुछ घंटों तक उस की तरफ देखता रहा था । शायद कुछ और रहेगा । पर अनुभव अपने ही गणित में उलझा हुआ था । दस मिनट के इंतजार के बाद कहने की समझ में आया कि बच्चा हुआ आदमी तो बार बार अंकों से भरे कागजों को उलट पुलट कर इसी गायब संख्या को तलाश रहा था तो परेशान था की उस की बडी सी आंकडे से कैसे निकल भागी थी । पंद्रह मिनट के इंतजार के बाद टहनी अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के लिए हल्के से खाता था । उसके जवाब में अनुभव ने फोन उठाकर काफी मंगवाई थी और हालांकि उसका सिर्फ अपने लिए ही कहा था चपरासी दो कप कॉफी लिया था कॉफी के प्यालों पर सुनहरे रंग का सुंदर डिजाइन डैनी को बहुत भाया था । अंतरराष्ट्रीय कंपनी में काम करने की बात ही कुछ और है । उसे मन ही मन कहा था । हर चीज बडे नफासत से करते हैं ये लोग । उधर अनुभव अनुभव उसके काम नहीं आ रहा था । आधे घंटे से ज्यादा बीत चुका था जिसके दौरान उसका तेज जमा कई बार चक्कर हिंदी की तरह घूम चुका था और परेशानी अभी भी मोबाइल खडी थी । दैनिक दोबारा खाता था और इस बार अनुभव ने अपने दो अधिकारियों को तलब कर दिया । दोनों उम्र में उसे काफी बडे थे । जब देखो हम लोगों ने क्या किया है कुछ लाया एक घंटे से ढूंढ रहा हूँ, मिल नहीं रहा है कहाँ है वो आता हूँ करता तो इसी में था कहाँ गायब हो गया है मैं मैं देखता हूँ सर दोनों में से सामने और लंबे वाले नहीं । मखमली लहजे में कहा था सिर्फ देख ही नहीं बल्कि ठीक से इसको स्टडी करो । आधे घंटे में मुझे पूरी रिपोर्ट चाहिए । अरे हेड ऑफिस वाले सुबह से मेरा यहाँ उठाये हुए हैं । अनुभव पडता था और फिर उसने फाइल उठाकर उन पर ठीक थी । दोनों ने फाइल के कागज उठाए थे और चुप ऍम निकल गए थे । अनुभव कॉफी मांगने की प्रक्रिया दौड रही रहा था कि एकाएक उसे डैनी की मौजूदगी के एहसास ने टंक मारा था । तुम मैं ऍम कर पूछा था जी जी सर, तो तुम यहाँ बैठे किसका इंतजार कर रहे हो? उसमें चेंज खडा कर रहा था । अभी तक काम सीखना क्यों नहीं शुरू किया? तुमने अनुभव बदनुमा अंदाज में उठा और अपनी भारी चांगों को आपस में रहते हुए बाहर निकल गया था । कुछ देर बाद वो सामने रंग वाले आदमी के साथ लौटा था । विशाल ये ऍम अपने साथ ले जाओ और उसको सारा काम समझा दो और अरे इससे पहले मैं भूल जाऊँ । मैं औपचारिक तरीके से बैंक में तुम्हारा स्वागत करता हूँ और उम्मीद करता हूँ कि बैंक और तोहरे बीच का रिश्ता दोनों के लिए फायदेमंद रहेगा । उसने कटे हुए अंदाज में कहा था, शुक्रिया दैनि ने हल्के से झुककर कॉर्निश की थी । अनुभव बहुत ही अक्लमंद है । विशाल ने कमरे से बाहर निकलते ही कहा था, हमारी जिंदगी टॉपर रहा है । हमारे यहाँ इनको अकल ची बच्चे कहते हैं । उनके साथ काम कर के बहुत कोशिश हो गए । ऍम विशाल की तरफ गौर से देखा था । वो पता करना चाहता था कि उस ने तंज किया था या फिर वाकई में वह अनुभव भक्त था । विशाल का चेहरा कोहरा था । उस पर से कुछ पढा नहीं जा सकता था । मैं एक साल से यहाँ हूँ । इससे पहले मैं आठ साल तक एक सरकारी बैंक था । अनुभव में छह महीने पहले जॉइन किया है । इससे पहले वह कलकता में जूतों की पॉलिश बनाने वाली एक कंपनी में था । बिजनेस स्कूल छोडने के बाद इसकी पहली नौकरी थी । छह महीने उसमें रहा फिर यहाँ आ गया । प्रचल भाव के बारे में कहा जाता है कि वह चीन इयर्स है । गलत तो उसका कोई जवाब ही नहीं है और शायद इसी वजह से बैंक वालो ने उसे पॉलिस कि कंपनी से उठाकर यहाँ ब्रांच हेड बना दिया है । ये बडी बात है क्योंकि हमारे बैंक की सिर्फ छह ही ब्रांच है । हालांकि वित्तीय वर्ष के हम तक बीस हो जाएंगे । विशाल ने बडी तफ्सील से बैंक के बारे में डैनी को समझाया था तो खुद क्रेडिट कार्ड डिवीजन का मुखिया था और दैनिक उसके नीचे लाया गया था । चार अन्य लोग से देखते थे और दो ऑफिस का काम काज संभालते थे । अभी हमारे डिवीजन छोटा है । धीरे धीरे इस में काफी इजाफा होने वाला है । फॅमिली को खबरदार किया था । ब्रांच हेड को छोडकर दफ्तर में सभी खुले हॉल में बैठते थे । सब के पास एक छोटी सी काम करने की बढिया जगह थी । मर्द मुलाजिम गहरे रंग के सूट पहने हुए थे । दिन पढाई के साथ कडक सफेद कमीज बहुत खुबसूरत लग रही थी । काउंटर पर हल्की नीली साडी पहने खडी लडकियाँ पडे अगर वह सलीके से ग्राहकों से पेश आ रही थी । संजीव जी और एहतराम से माहौल लबा लब था । डैनी को बैंक में इंतजाम भाग गया था । आर्थिक उदारीकरण की नीति अपने साथ महकदार और खूबसूरत दफ्तर लेकर आई थी । जिनमें ना तो पहले की तरह चिल्ला चिल्लाकर बोलने वाले ग्राहकों के हुजूम थे और नहीं उनसे निकलती पसीने की बदबू थी । अंतरराष्ट्रीय बैंक अपने साथ अपना काम करने का तरीका साथ लाये थे । इसमें क्राइम के लिए लाल कालीन बिछा था । काउंटर से तीन फीट पहले ही सफेद लकीर खींची हुई थी जहाँ पर रुककर ग्राहक अपनी बारी का इंतजार करते थे । पैसे भी कम ग्राहक होने की वजह से कोई लाइन नहीं लगती थी और अगर कभी दो चार लोग एक साथ वहाँ भी जाते थे तो लडकियाँ जल्दी से उसके पास पहुंच जाती थी । बहुत धीरे झराए रखती थी डैनी ने ठंडे खामोश माहौल पर नजर दौडाई और अनायास ही उसे उन दिनों की याद आ गई जब उसके पिता छोटे छोटे कामों के लिए उसको बैंक दौडा दिया करते थे जहाँ पर मैनेजर के तंग दफ्तर में लोग अपना काम करवाने के लिए एक के ऊपर एक चढे रहते थे । हर तरफ चीख चिल्लाहट बची रहती थी । इसमें दबे हुए गुप्ता जी किसी तरह से लोगों को निपटाते रहते थे । अक्सर उस हायतौबा से इतना जीत जाते थे उन्हें एकनाली बंदूक से लैस क्योंकि राज थापा को बुलवाना पडता था । भीड को धकियाने में वह काफी माहिर था । तब तो बाहर करो एक भी ना बच्चे मेरा दोस्त हो या रिश्तेदार ऍसे उत्तारी उस समय चलाते थे । उनका कमरा साफ हो जाता था लेकिन कुछ देर के लिए ही एकनाली धारी थापा के इधर उधर होते ही डीडर फिर से उन पर उतर आता था । ऐसे हालात के बावजूद करिश्माई तरीके से सबका कम वक्त रहते हो जाता था और शाम को बैंक का हिसाब भी दुरुस्त मिलता था । वैसे सरकारी बैंक की नौकरी अच्छी नौकरी माने जाती थी । सुबह दस से शाम पांच बजे तक की नौकरी थी । पगार भी अच्छी थी और उसके साथ कई सहूलियतें हुई थी । बैंक में नौकरी करने का मतलब था मासी से जीना । अगर आप दफ्तर में अफरा तफरी को झेल सकते हो तो आपने बैंक का नजारा देखकर डैनी मुस्कराया था । पुराने बैंकों की कोई भी परेशानी उसकी नौकरी में नहीं थी और पैसे और ऍम ज्यादा है । उसे हर तरह के लोगों के मूड नहीं लगना था और नहीं अपनी हवास को ऊंचा कर रहा था । बैंक में लोग दबे कदम आ जा रहे थे तभी जुबान में बातें कर रहे थे । शाम झील के किनारों को हल्के से था । तब आती लहरों की तरह दोपहर हो चली थी और उसको कोई काम नहीं दिया गया था । उसने अपना कंप्यूटर चालू कर लिया था और से देखकर खुशी हुई थी । कि उसमें इंटरनेट कनेक्शन भी था । वो रहेंगी को घंटे घर घंटे के हिसाब से मेल जरूर करेगा । आकर उसको भी तो पता चलना चाहिए कि हिंदुस्तान तरक्की कर रहा है । टैनी ने विशाल से क्रेडिट कार्ड फोल्डर खोलने के लिए पासवर्ड मांगा था और विशाल से डाल दिया था । वह भी मिल जाएगा । उसमें जवाब दिया था चलती क्या है और अगर तुम कुछ करना चाहते हो तो कैश काउंटर पर निशा के पीछे बैठा हूँ । देखो काम कैसे होता है? आपने शायद दादल है उससे जाकर फॅालो । काम के बारे में निशाने पूरे एहतराम के साथ नजदीकी आमद और रवानगी के सिलसिले को बयां किया था । निशाने जिस तरीके से उसकी जब अफजाही की थी उसे पसंद आई थी और इस वजह से उसको निशा भी फौरन पसंद आ गई थी तो उसे काफी संजीदा किस्म की लडकी लगी थी और जब उसने और लडकियों से मिलवाया था तो उनके रवैये से भी तस्दीक हो गया था । हमेशा भरोसेमंद है तो बोला की तरह नहीं थी लेकिन दफ्तर में दाखिल होते ही दैनि पर फब्ती कस दी थी । दैनिक विभाग में निशा का नाम दर्ज कर लिया था । वो काम की थी ब्लॅड बनने पर वो उसको अपने स्टाफ में जरूर रखेगा । उसको यकीन था कि फौरन से पेश्तर वो ब्लॅड बन जाएगा । एनडीए वाले कुछ जल्दी तरक्की करते थे । ज्यादा से ज्यादा आठ नौ महीने बहुत बुरे हालत हुए तो एक साल में ब्लॅड बन जाते थे और अगर उसके साथ ऐसा नहीं हुआ तो और नौकरियाँ उसको तलाश रही थी । बूट पॉलिश वाली कंपनी में भी जा सकता था । दो बजे विशाल लंच के लिए उसको भी टेवर पड गया था । अपना खाना खोलने से पहले उसने चपरासी को बुलाया था और अनुभव के खाने के बारे में पूछा था । भाषा ले आया हूँ । उसने जवाब दिया था देखा हूँ विशाल से पैकेट खोलने को कहा था और फिर बारीकी से हर चीज का मुआयना किया था । ठीक है साहब, खाना ठीक सवा दो बजे लगा देना । मुझे विशाल ने डेनी के भाव पढ लिया थे और उसने अपना घर के खाने का टिफिन खोला था और दैनिक उसमें से खाने की दावत थी । आज वह ज्यादा रोटियां दाल सब्जी लाया था क्योंकि उसको मालूम था कि मैं डिप्टी मैनेजर ज्वाइन करने वाला था । फिलहाल उसके नीचे काम करेगा और जल्द ही उससे आगे निकल जाएगा । विशाल को बखूबी मालूम था कि डैनी एनडीए था और वो नहीं था था । डेली उसका बॉस बनेगा और फिर बाजार में लंबे समय तक ऊंचे ऊंचे कोठों पर बैठेगा । विशाल को डैनी से बनाकर रखनी थी और आगे की रोटी चलाने के लिए उसे अपनी बीवी से खाने में चार रोटियां ज्यादा रखने को कहा था । अनुभव अपने खाने के बारे में बहुत पर्टिकुलर है । उससे टिफिन खोलते हुए बताना शुरू किया था । इस आज उसने नेपोलियन पिज्जा मंगाया है । मालूम है कि उसके साथ वह ऍम मसाले का पैकेट और दो फॅमिली फ्लैट लेता है, जिसके खाने की गलत है । आधा पौना भी । डर डर नहीं हो सकता । उसको सब नपा तुला चाहिए । हर काम पडी बारीकी से करता है । मुझे उसका ठंड बहुत पसंद है । कहते हुए विशाल ने भोली सी मुस्कराहट बिखेरती पर सब मतलब ये नहीं है कि वह अकेला किस्म का आदमी है । उसने फौरन अपनी बात पर सफाई दी थी । मुझे ही लो, मैं अपनी दाल में ठीक तीन चम्मच की डलवाता हूँ । रत्ती भर भी न ज्यादा न कम, मुझे तीन चम्मच की ही पसंद है । जैसे अनुभव को पिज्जा के साथ दो पैकेट कैसा पसंद है और जिस दिन वो बर्गर मंगाता है, उस दिन तो खैर नहीं । अगर उसमें से मुझे ऐड टपक रही हो । मुझे तो मुझे भी बहुत पसंद है । दैनिक ने हंसते हुए कहा था तो बढिया है वो पडेगी तुम दोनों में पर ख्याल रखना कि मस्टर्ड थोडी सी भी अगर बासी हो गई तो शहर हो जाती है । विशाल की टिप्पणी पर डे नहीं घुस पडा था । वो एक का एक कमरा है । सर नजर आने लगा था । जल्दी से उठकर वो अनुभव के केबिन की तरफ लगता था और वापस दिया गया था । उसके चेहरे पर तसल्ली झट रही थी । भगवान आपने चपरासी महादेव का भला करें । मैं एकदम भूल ही गया था कि अनुभव को पिता के साथ कोल्ड्रिंग नहीं । कॉफी चाहिए होती है । ऊपर है उसको यहाँ था । अब अब सब ठीक है । उसने राहत की लंबी सांस छोडी थी । थोडी देर तक दोनों खामोशी से खाना खाते रहे थे । खुशहाल भी । उसे कॉफी ठीक लग रहा था । काम जानता था और चुप चाप कर लाता था । ब्रांच मैनेजर होने पर वो उस को साथ रखने की बात सोच सकता था । ब्रांच में दूसरे नंबर पर ऐसा ही आदमी चाहिए रहता था जो छोटी छोटी चीजों का भी खयाल रखें और अपने अवसर पर भूल सुनने दे । सुबह क्या हुआ था अनुभव ने आपसे आधे घंटे में रिपोर्ट मांगी थी । बडे परेशान लग रहे थे वो डैनी ने रोटी को दाल में डुबोते हुए पूछा था वो नहीं नहीं कुछ खास नहीं । विशाल ने मुस्कुराकर जवाब दिया, अनुभव कुछ एंट्री ढूंढ रहा था । हमारे डाटा ऑपरेटर ने उसको पेज गलत तरीके से लगा कर दिये थे । बिचारे अनुभव को क्या मालूम था कि पेट खराब सडक लगे हुए हैं तो तलाशता रहा और फिर खींच गया था । अब सब ठीक है पर बेवजह उसकी सुबह खराब हो गई थी । डैनी विशाल को ध्यान से चल रहा था । जाहिर हो रहा था की विशाल अनुभव का जूनियर ही नहीं था बल्कि एक तरह से उसकी धाय मां भी बन गया था । पहले से पहले ही वो अनुभव की जरूरत होगा । परेशानियों को समझ लेता था और उन को दूर करने के लिए इंतजामात में लग जाता था । पीछे बैठ कर वो खामोशी से दफ्तर चला रहा था ताकि उसके अवसर को जरूरी काम करने का मौका और वक्त मिल सकें । प्रशाल वाकी डैनी की टीम में शामिल होने लाया था । डैनी ने पहले ही दिन दिशा और विशाल को एक तरह से अपन स्टाफ मान लिया था । जहाँ तक अनुभव का सवाल था तो उसको विश्वास था कि वो उससे राफ्ता कायम कर लेगा । दोनों की जाती एक थी यानी वो बिजनेस स्कूल के जनेउधारी भ्रमण थे जबकि विशाल वगैरह निचली जाति के थे, जो अपनी मेहनत या सूरत की वजह से खटारा सरकारी बैंकों से पकडकर उनकी हिम्मत के लिए लाए गए थे । उनसे बस काम भर का साहब कार रखा जा सकता था । टैनी पहली नजर में समझ गया था कि अनुभव चाहे कितना भी अकल कि बच्चा क्यों ना हो और उसमें आत्मविश्वास की कमी थी । टेनी अपना ट्रक और बहुत तौर तरीकों का इस्तेमाल कर छोटू मोटू बतक किस्म के अनुभव पर हावी हो सकता था । साथ ही अगले कुछ महीनों में उसे ऐसे पैंतरे खेलने दे के अनुभव नाम मात्र का ब्रांच हेड बन कर रह जाए और दैनिक सिक्का इस तरह चलें किसकी खनक दूर तक सुनाई पडेंगे । खाने के बाद टैनी अपने कंप्यूटर पर बेवजह लगा रहा था । सारे लोग से झुकाए काम में जुटे थे । ऐसे में खाली बैठना उसको अजीब लग रहा था । इसी की ठंडी हवा और खामोश माहौल में उसको बार बार छपकी आने लगती थी । बमुश्किल वो अपनी आंखें खुली रख पा रहा था । बैठे बैठे उसको कभी घर की याद आती थी । यहाँ जो भी अपने भाई की कामयाबी पर अब भी रोमांचित थी तो कभी रहेंगी की इसने विलायती यूनिवर्सिटी में दाखिला लेकर उसे बीज भर में छोड दिया था । रेंगी से उसे कोई द्वेष नहीं था । उसमें डैनी को बहुत कुछ सिखाया था । यहाँ तक कि उसकी जिंदगी को नया मोड भी दिया था और उसका अचानक जाना आज भी गहरे दर्द की तरह तीस रहा था । उस यकीन था रहेंगी और उसके पिता एक साल पहले ही विदेश यूनिवर्सिटी की कोशिश में लगे थे । पर रहेंगे ना, इसका कभी जिक्र नहीं किया था अगर वो डैनी को दाखिला लेते वक्त हल्का सा भी आगाह कर देता । डैनी अच्छे वाले स्कूल में ही अपना नाम लिखवा लेता और रहेंगी की वजह से नीचे आया था और उसने साथ निभाने की जगह बेवफाई की थी । दोस्ती का दम भरकर टैनी नहीं बेवकूफी की थी । इसका हर्जाना उसको जिंदगी भर भुगतना पडेगा । ऐसी दोस्ती से उसने अब तो बात कर ली थी । मोनू उसकी तरफ आ रही थी । डाॅन भगाई और चेहरे पर बडी सी मुस्कान फैला दी । वक्त काटने के लिए मोना वाजिद सामान थी तो फिर बहुत गोलकर हल्की से फसाया था । हमारे साथ उसे शरारती लहजे में पूछा था और उसकी शैतानी पर हंसी नहीं । उसी खनखनाती हंसी सारे माहौल में खुशी की लहर की तरह फैल गई और रहने के लिए कॉफी लेकर आई और बिना कुछ बोले अपनी सीट पर जा बैठी । दैनिक उसकी अदा बेहद पसंद आई थी । पूरा हफ्ता गुजर गया । डैनी को कोई काम नहीं दिया गया था । कभी कभी विशाल से क्रेडिट कार्ड के फॉर्म भरने के लिए ग्राहकों की मदद में लगा देता था । बाकी समय वह खाली बैठा रहता था । अनुभव अपनी उलझनों में ऐसा फंसा रहता था । इसको रहने की तरफ देखने की फुर्सत भी नहीं थी । कॅश विशाल के हवाले कर दिया था । डैनी को कम देना उसकी जिम्मेदारी थी । हफ्ते के बाद दैनिक कश्यप पुख्ता होने लगा था कि उसको काम काज से दूर इसलिए रखा जा रहा है कि किसी स्मार्ट एनडीए की अपने काम में दखलंदाजी अनुभव और ख्याल नहीं चाहते थे । उनका रोज मर्रा का एक तरीका बन गया था, जिसमें डैनी की कोई जरूरत नहीं थी । डैनी को अपने साथ इनका रवैया नागवार गुजर रहा था और वह उसका नहीं सकता था । उसने विशाल के साथ बात करने की कोशिश भी की थी, लेकिन उसको उस वक्त टाल दिया गया था । पर दोपहर के खाने के समय विशाल डैनी को अपने साथ जरूर बैठाता था और खाना पूरी इज्जत के साथ भरोसा था । पर क्रेडिट कार्ड डिवीजन और उसमें डैनी की भूमिका के बाद जब भी उठती थी तो वो कन्नी काट जाता था । फॅमिली शुरू शुरू में अंदाजा लगाया था कि अनुभव उसको नए माहौल को समझने का मौका दे रहा है और जैसे ही वो तैयार हो जाएगा उसको वहीं बहुत जो देगा जो एक एमबीए दूसरे को देता था । पर अनुभव ने दोबारा पलट कर देखा भी नहीं था । दैनिक कि सुबह की जोशीली सलाम दुआ भी अनुभव पूरी तरह से कबूल नहीं करता था । हल्का सा सिर हिलाकर आगे बढ जाता था । ऍम था । कुछ दिनों बाद ऍसे राफ्ता कायम करने की ठानी थी । जैसे ही मौका मिलता था उसके आसपास मंडराने लगता था । मौसम से लेकर नौकरी तक की छोटी छोटी गुफ्त वो उसने मोना से करनी शुरू कर दी थी । उसका मकसद होना से वो जानकारी हासिल करना था जिसके हालात के बारे में सुराग मिल सके । दो दिनों की बात चीत नहीं । उसे पता चल गया था कि अनुभव खानदानी कंपनी वाला था । उसके डैडी बता शू कंपनी में ऊंचे ओहदे पर थे । बेटे की शू पॉलिश कंपनी में नौकरी उन्होंने ही लग गई थी । जूते और कॉलेज का रिश्ता समझते हो उन्होंने शेरवानी से पूछा था । उसने आगे बताया था कि बैंक वाले अनुभव को अपने यहाँ लाने के लिए इसलिए दीवाने हो गए थे क्योंकि कलकत्ता के गोल्फ क्लब में उसकी तेज अकल के चर्चे िकायत होने लगे थे । बैंक के आला अफसरों के काम तक भी बात पहुंची थी और उन्होंने फौरन लोगों को दुगुनी पगार पर दिल्ली जैसी बडी ब्रांच की जिम्मेदारी सौंप दी थी । बोला की जानकारी के मुताबिक अनुभव के डैडी और बैंक के मैनेजिंग डायरेक्टर लंगोटिया यार थे और वो व्यक्ति ज्यादा दूर नहीं था । जब अकल जी बच्चा तरक्की पाकर या तो मुंबई चला जाएगा और वहाँ नहीं तो दक्षिणपूर्व एशिया के किसी अच्छे शहर में पोस्ट कर दिया जाएगा । होना की बातों ने दैनिक जी परेशानी में डाल दिया था । उसने सोचा कि वह अनुभव पर हावी हो जाएगा, पर जिस तरह की उसकी पहुंचती उससे डैनी मुकाबला नहीं कर सकता था । अब वो किसी भी हाल में अनुभव को ये महसूस नहीं होने दे सकता था कि वो उस पर चढ के बोल रहा है । तब के रहने में ही भलाई थी और नौकरी जा सकती थी । दैनिक नौकरी कम आना नहीं चाहता था लेकिन उसको अपने लिए आशा अनुभव की जल्द से जल्द तरह के बारे में नजर आ रही थी । उसको ऐसा कुछ करना था जिससे उसके अनुभव से गरीबी इतनी बढ जाए कि अपनी जगह छोड के वक्त वही डैनी का नाम आगे बढा दें । पर फिलहाल ऐसा होता नजर नहीं आ रहा था । अनुभव तो उसकी तरफ आप उठाकर देखता भी नहीं था । छः चम्मच बनने से कम नहीं चलना था । उसको कल्टी अवतार में अपने को प्रकट करना था । डैनी ने एक हफ्ते और इंतजार करने की ठानी और इस दौरान मासूम रंगरूट बन गया । वो दफ्तर में सबसे कामकाज की जानकारी लेने में जुट गया । दोपहर के खाने के वक्त बडे अदब से विशाल के सरकारी बैंक के टाॅपर अफसरा सुनता था । इसकी वजह से विशाल को जल्दी महसूस होने लगा था । वो दैनिक पूरी तरह से उसका शागिर्द बन गया था । क्रेडिट का डिवीजन कि अंदरूनी परेशानियाँ भी वो डैनी से साझा करने लगा था । देने के हाथ ब्रांच हेड के केबिन का दरवाजा खोलने की चाबी लग गई थी । विशाल से उसको ये भी पता चला था कि अनुभव को वो लोग सख्त ना पसंद थे जो अपनी सोच रखते थे । वो कहता था जिसे सिर्फ जानकारी चाहिए, नीति नहीं, नीति बनाना उसका काम था । पर कुछ जानकारी इस तरह से चाहता था जिसमें नीति साफ झलक रही हो । रात दिन वो आंकडों का पहाड बनवाता था और फिर उसमें से तू ढूंढने के लिए स्टाफ को लगा देता था । इस तरह लंबे समय तक सबको अपने साथ उलझाए रखता था । जब सब काफी हैरान परेशान हो जाते थे तो वह एक का एक ऐलान करता था । स्टाफ की नाकाबिलियत के बावजूद उस ने प्रतिभाग लगाकर हल ढूंढ लिया है । सबकी मेहनत को नकार कर वह कामयाबी करता आज अपने सिर पर रख लेता । ऍम खुश होता था और उसकी खुशी में सब अपनी खुशी जाहिर करते थे । दैनिकों तरीका पसंद था । पहले मुलाजिमों का पूरा तेल निकाल लो और फिर उन्हें भूसा बताकर मेरी ही बना दो । ऐसा करने से वो दबे रहते थे । उनकी हिम्मत खत्म हो जाती थी और अपनी दबंगई कायम रहती थी । खुद को सातवें आसमान पर दिखाने के लिए और उनको गर्त में रखे लाख जरूरी था । अनुभव शायद बेड से ही मैनेजमेंट के दांवपेच सी कराया था और इसीलिए उसे अकल चीज बच्चा कहा जाता था । अच्छा यह संस्था वो थोडा चलता था । पदक की माफिक चलता था । छोटा सा मोटा सा था और उनकी नजरें आपने पट्टिकाएं रखने में माहिर था । सब उसकी संबंध करने के लिए बने थे और उसके खिदमत करके अपने को निहाल कर रहे थे । असल में डैनी ने नतीजा निकाला था कि अच्छा मैनेजर वही था । अपने मुलाजिमों को बिना फल की इच्छा किए कर्म करने को प्रेरित करता था । दूसरे शब्दों में उनको कर्म बोध कराता था और खुद फल खाता था । असरदार रहनुमाई । इसी को कहा जाता था ऍम फैसला किया कि वह असरदार रहनुमा बनेगा, अनुभव से भी नहीं बेहतर ।

अदभुत प्रेम की विचित्र कथा - Part 7

साथ महीने का दूसरा शनिवार आ रहा था और डैनी को अपनी पहली पार्टी का न्यौता मिल चुका था । हो ना पार्टी दे रही थी । इसमें अनुभव को छोडकर दफ्तर के सभी लोगों को बुलाया गया था । विशाल और उसके लडके तो होंगे ही पर काउंटर पर खडी होने वाली लडकियाँ भी आने वाली थी । इसके अलावा उन्होंने बताया था उसके कुछ बाहर के दोस्त होंगे और मेरे दो चार पुराने आशिक भी आएंगे । वो ना के घर का पता जानकर दैनिक चौंक गया था । दिल्ली की सबसे अमीर बस्तियों में से एक में उसका पडा समाचार था । अरे मैंने नहीं बनवाया है उसने डैनी के कौन तो हमको शाम करते हुए कहा था फॅस के बाद मेरे को दिया था । उसके अलावा पास के मोहल्ले में उसके दो फ्लैट और भी थी जिसको उसने किराए पर चढा रखा था । मुझे बैंक की तनख्वा की जरूरत नहीं है और मैं घर में खाली तो बैठ नहीं सकती हूँ । नौकरी वक्त गुजारने के लिए करती हूँ उस हसते हुए कहा था हो सकता है कभी बैंक वालो को मुझ पर तालाश आ जाए और मेरा प्रमोशन कर दें । समझना है रिटायर होने से पहले कम से कम असिस्टेंट मैनेजर तो बन ही जाऊँ नहीं । मोना के घर तय वक्त से एक घंटे देरी से पहुंचा था । क्या चुके थे बाहरी गेट के सामने कारों और स्कूटरों की लंबी कतार लगी थी । जाहिर था कि देर जाने का चलन खत्म हो चुका था । एक तबके में वक्त की पाबंदी का पूरा ख्याल रखा जाता था । उन का घर बहुत सुन्दर था । बडे लॉन में करीब में से फूल लगे हुए थे । बगीचे को देखकर लगता था कि किसी ने बडे मन और लगन से उनको सजाया था । घर का दरवाजा मोटी टीक, लकडी का था जिसपर खूबसूरत नक्काशी की हुई थी । उसके खुलते ही सभी तरह की सात सजा से लैस ड्राइंग रूम था । इसमें पार्टी चल रही थी । दैनिक ओमूरा का मकान बहुत पसंद आया । उसके जीने का तरीका अच्छा लगा था । अचानक उसे दफ्तर की रिसेप्टर्स नहीं रही थी । टहनी ने उसे गौर से देखा था और से लगा कि वो उसकी दोस्त हो सकती थी नहीं । उस समूह बनाकर कहा था मेरी पार्टी में कोई इतना लेट नहीं आता है जितना तुम आए हो । मोहणा की हल्की सी झिडकी से वह खिसिया गया था । पर इससे पहले कि वो कुछ कहता विशाल उसका हाथ पकडकर लोगों से मिलवाने ले गया था । दफ्तर के लोगों के अलावा कई नामीगिरामी लोग मौजूद थे । उनमें एक मशहूर विज्ञापन कंपनी का वाइस प्रेसिडेंट, कई सरकारी अफसर, मशहूर फनकार और अंतर्राष्ट्रीय हवाई इसके पायलट थे । सभी हम उम्र थे और पार्टी के जोश में थे । मोराजी रईसी और शाम का माहौल देखकर डैनी पहले कुछ घबरा सा गया तो कभी ऐसी पार्टी में नहीं गया था । लोग आराम वाले कपडे पहने हुए थे । यहाँ तक कि विशाल लिख कर और चमकीले नीले रंग की टीशर्ट में था । मोना स्कर्ट और बिना बहुत टॉप पहने हुए थी । जबकि निशा जी जिसमें सुंदर लग रही थीं, दैनिक अपने सूट बूट पर शर्म आ रही थी । प्रशांत उसका शव पूछा, मैंने कहना तो चाहता था कि वह नहीं पिता है पर अब कह नहीं पाया । विशाल जब तक उसके लिए बैग लाता टैनी ने मौका देखकर कोर्ट उतार दिया था और कमीज कि बही चढा ली थी । अब वह थोडा बहुत ठीक दिख रहा था । दैनिकों अकेले खडे देखकर निशा आ गई और से बातें करने लगी । दफ्तर की संगीता निशा बेबाक हँसी मजाक कर रही थी । उसे सर की जगह दे नहीं कह रही हैं । महीने में पार्टी अपने घर पर करती रहती है और बीच में हम में से कोई एक अपने घर में रख लेता है । इस तरह महीने की तो पार्टियां हो जाती हैं । इस तरह थोडी बहुत पार्टी कर लेते हैं तो वहीं ना अच्छे से गुजर जाता है । निशाने समझाया था । टेनिस की बात तो सुन रहा था पर उसकी नजर बार बार निशा के ग्लास पर लौट आती थी । निशान वक्त शर्माती रही थी या फिर शरबत में आप भी शामिल थी । भरे गिलास को देखकर कुछ कहा नहीं जा सकता था । अचानक उसके लिए जानकारी जरूरी हो गई थी क्योंकि तभी वह निशा के बारे में फैसला ले सकता था । ऐसा नहीं है कि उससे कुछ फरक पडने वाला था और दीनानाथ के संस्कार कहते थे कि अच्छी लडकियां शराब नहीं पीती थीं । दैनिकों निशा अच्छी लडकी लगी थी । वो पक्के तौर पर जानना चाहता था कि निशा इस तरह की या फिर उस तरह की लडकी है । एंडिंग आपने गिलास में खून भरा और आखिर पूछ लिया था तुम क्या कर रही हो तो कोई विकास शर्मा गुटकर । दैनिक जुबान से उन्यासी फिसल गया था । निशाने उसे एक साधु उस काम दी थी और फिर किसी और से बात करने के लिए मुड गई । दो घंटे और कई पैर के बाद पार्टी गरमाने लगी थी । प्रिंटर बाबू शायराना अंदाज में बुरे चाल चलन की अच्छाइयाँ बताने में मस्त थे लडकियाँ उनकी रंगीली बात सुनकर माइक कार्ड और माई गॉड के सुर पड चटखारे ले रही थी । मर्द उनसे दूर जाकर खडे हुए थे । उन को मालूम था बाबू जी अपना मजाक बनवा कर ही मानेंगे । दूसरी तरफ पायलट बेहतर देखने वाली लडकियों को पटाने में लगे थे । प्रदेश यात्रा की कहानियां हमेशा से लडकियों का दिल लुभाने के काम आती रही थी और उनके कपडों और मेकअप के सामान की मांग कम नहीं हुई थी और पायलट से दोस्ती करने का मतलब उसको इन चीजों के लिए मुझे चुना था । पायलट भी जेब भरी थी करने के लिए तैयार रहते थे अगर लडकी उनके साथ सपने को ढाल लेने को तैयार हो जाती थी । विज्ञापन कंपनी वाला अपने में ही खुश था और तीस मिनट के बाद वोट कर बार तक आता था और अपने लिए बडा सा जाम बनवा लेता था । पीते पीते जब भी उसे अकेलापन लगता था तो खुद से कुछ बातें कर लेता था । होना के लिए बहुत कुछ खास था क्योंकि समय समय पर वो उसके पास की जताने पहुंच जाती थी कि वो उसका पूरा खयाल रख रही है । ड्राइंग रूम के बीच का हिस्सा खाली कर दिया गया था और डिस्को संगीत बचने लगा था । विशाल ने बोला को पहले डांस के लिए बुलाया था । वो बेहतरीन तालमेल से रहे थे । उनको देखकर डैनी को ऐसा लग रहा था जैसे दोनों एक साथ बरसों से नाच रहे थे । विशाल यू तो दफ्तर में मोना की तरफ देखता भी नहीं था । पिछले दो हफ्तों में दैनिक विशाल को कभी मोनो से बात करते नहीं देखा था । आज वो उसके साथ ऐसे नाच रहा था जैसे उसका खाद बंद हो । डैनी को उसका दोगलापन खड रहा था और बोलना वो तो पूरे मुझे ले रही थी । उसने कभी जिक्र नहीं किया था कि वह विशाल के इतने खरीद थी । दफ्तर के बाहर उसने विशाल को हस हस कर जरूर बताया होगा । किस तरह नया रंगरूप डैनी उस शरारत करने की कोशिश करता हूँ या थर्ड कैसे अनुभव के बारे में जानकारी हासिल करने में जुटा था और जो फॅमिली लडकियाँ जो नीले रंग की साडी बहन का सोम्य तरीके से ग्राहकों से बात कर दी थी । यहाँ पर नंगी टांगे उछल उछल कर नाच रही थी । एक तो यार किस्म के पायलट के साथ लगी थी तो दूसरी तेली किस्म के सरकारी अफसर को पूरा तवज्जो दे रही थी । नाच गाना अपने पूरे शबाब पर था तो स्तर वाले गंभीर मुखौटे हट गए थे । मौत का माहौल सब परसवार था । टेन ही बस अकेला रह गया था तो बार के एक स्कूल पर जाकर बैठा और अपने लिए तीसरा पैट उस ने बनवाया । दो के बाद उसको शुरू हो गया था । तीसरा उन पर टिंचर लगाने के लिए टैलीको पार्टी अच्छी लग रही थी । कॉलेज जैसी पार्टियों के बारे में सुना जरूर था पर किसी ने उसको मैं कभी बुलाया नहीं था । अब वहाँ पहुंच गया था पर अभी पूरी तरह से नहीं । उसको वो अहमियत नहीं मिल रही थी जिसकी उसको आरजू थी । वो बाजू में बैठा वह शराब पी रहा था जबकि उसे लडकियों से घर आ होना चाहिए था । इनके साथ शरण भरे अंदाज में हसी मजाक कर सकता और सारी रात किसी नाजरीन के साथ रखता रखता । फिलहाल और लोग मुझे कर रहे थे और वह अकेला बैठा किला सहला रहा था । उसने ड्राइंग रूम में मोना को खोजने के लिए नजर दौडाई और एक है उसके नहीं था । एक लंबी सी गुलाबी रंग की कमीज पहने लडकी पर ठहर गई । वो अकेले ही अपने में मस्त नाच रही थी । उसकी कमर तक लंबे बाल थे जिन्हें उसने खुला छोड रखा था । जी के नाॅन और उसका रंग तो दिया था । कद के बावजूद उसकी रीड एकदम सीधी थी । दूसरी लडकियों से अलग वन जाने में थोडा झुककर चलती थी चाय । उसका अंदर का आत्मविश्वास रीड को सीधा रखे हुए था । ऍसे देर तक देखता रहा था । उससे फौरन मिलना चाहता था । वो एकदम अलग किस्म की थी । लगभग वैसी कैसी हो चाहता था । संगीत के ढलते ही लडकी ने अपने को भी डाला क्या? और उसकी तरफ पढना शुरू कर दिया । उससे कदम बढाते ही डैनी को पक्का अंदेशा हो गया था कि वो बार में बैग लेने नहीं आ रही थी बल्कि उससे पांच करने आ रही थी और वो एक अनजान आदमी से यही क्यों बात करना चाहती थी । ऐसा क्या हो गया था? या उसने ऐसा क्या कर दिया था जिससे वो लडकी उसकी तरफ इस तरह से बडी आ रही थी । उसका रूप देखकर डैनी कुछ खत्म हो गया । तुम मुझे हो रहे थे, उसका पहुंचते ही किया था । सवाल में गुस्सा है, झल्लाहट नहीं था और जिस तरह से उस से पूछा गया तो साफ जाहिर था कि लडकी को फौरन सच्चा जवाब चाहिए था । मैं मैं कहाँ घूम रहा था? डैनी बुदबुदाया था झूठ मत बोलो । हम भूल रहे थे उस डैनी को ललकारा था । माफ कीजियेगा आपको हर तभी हुई है नहीं । मुझे कोई गलत से भी नहीं हुई है हूँ घूम रहे थे । फॅसने अपनी नजर तो मोदी थी उसे आप मिला नहीं पा रहा था । रंगे हाथों पकडा गया । आप बताओ जल्दी बताओ में इंतजार कर रही हूँ । उसने सीधे सीधे जवाब मांगा था । इससे पहले की डैनी खोलता मोना नहीं यहाँ पडी थी । उसने लडकी के हाथ में हार डाला और शोखी भरे अंदाज में पूछा था गिरजा तो मेरे बहुत से अब तक मिली होगी? नहीं नहीं तो नहीं हूँ । पर अभी इनसे एक सवाल मैंने जरूर पूछा था । चलो सवाल का जवाब दे देती हूँ । ये गिरिजा है । बहुत प्यारी सी बहुत अच्छी तो विज्ञापन कंपनी में पडे होते पर है तुम से बात करके अच्छा लगेगा । दैनिक किसी तरह से हलो बुदबुदाया था । फिर जब उस कराई थी वो ना उसकी पीठ होगी थी और फिर आगे बढ गई थी । पहले मैंने तुमसे सवाल किया था फिर शुरू हो गई थी । मैं तुम्हारे पीने के लिए क्या कर सकता हूँ? ऍम पूछा था एक गिलास पानी उसी तरह से जवाब दिया था । सैनिक जल्दी से पानी ले आया था और तुम्हारा काम कैसा चल रहा है? विज्ञापन मानो की जिंदगी तो निराली होती है । मैंने कुछ बात बदलने की कोशिश की थी । तुम मुझे क्यों खुल रहे थे? उसने फिर पूछा था मैं नहीं बोल रहा था, तुम भूल रहे थे नहीं, मैं तो सिर्फ लोगों को रास्ते हुए देख रहा था और हो सकता है मैं तुम को देखा हूँ । शायद और उसे कुछ देर ज्यादा देखा हूँ । तुम मुझे घूर रहे थे । उसमें जब की थी तो मैं कैसे पता है? क्योंकि मैंने तो मैं घूमते हुए देखा था तो साफ कहा था मतलब मैं नहीं, तुम तो मुझे बोल रही थी । फॅसने की कोशिश की थी । ज्यादा शास्त्र बनने की कोशिश मत करो । जब कोई मुझे घूरता है तो मुझे पता चल जाता है । समझे फॅमिली खून भरी थी । सवाल का जवाब देने के लिए अब वो तैयार था । भागे जा मैं तो मेरी तरफ देखा था और फिर तो मैं देखता ही रह गया था । अगर तो में से पूरा मानती हूँ तो मैं बुरा लगता है तो हम साडी असम से जान बुझकर नहीं हुआ था । चलो हूँ दोस्त बन जाते हैं, ऍम रहा और दोस्ती का हाथ आगे बढा लिया । गिरजा पांच से और भी सुंदर लग रही थी । उसका असर हल्का से पीछे की तरफ डाला रहता था । ऐसा लगता था कि वह सिर उठाकर जीने की आदि है । इससे वो आपने कब से लंबी भी ज्यादा लगती थी । डैनी के गंदे से थोडा ऊपर ही देखती थी । उसकी आंखों से ईमानदारी झलक रही थी । पर मिलाकर डैनी को लगा था कि गिर जाता । किसी भी मशहूर हेरोइन क्या मॉडल्स से ज्यादा सुंदर नहीं । उसका दिल में कुछ कुछ होने लगा था । फिर जाने उसका बडा हुआ हाथ नहीं थामा था । उसकी तरफ ऐसे ताक रही थी मानो उसके सवाल का जवाब किसी भी समय रहने की आंखों में उतरने वाला था । मैंने आप चुराने कोशिश कर रहा था और गिरिजा का उन पर सख्त पहरा था । चलते कुछ नहीं बैठे हैं । उसमें हार कर रहा था, गिर जाने, सिर हिलाकर हामी भरी थी और उसके पीछे कमरे के शांत होने की तरफ चलती थी तो दिल्ली की रहने वाली हो रैनी में बैठे ही पूछा था । उसने बेपरवाह से जवाब दिया था । साफ था उसे परवाह सिर्फ अपने सवाल के जवाब की थी । कॅश सोचा फिर फैसला लिया की अब जो भी हो वो गिरजा से साफ साफ बात करेगा । कोई लागलपेट की गुंजाइश नहीं थी । गिरजा मैं तो मैं सच बता देना चाहता हूँ लेकिन बुरा नहीं मानना हूँ । सुनने को बेताब है । उसे तबाह से जवाब दिया था उसकी आंखों में अचानक समझ आ गई थी तो ठीक पकडा था । मैं तुम्हें वास्तव में घूम रहा था । हाँ तो घूम रहे थे । मुझे मालूम था उसने । जोश ने कहा था और फिर कुछ रुककर होने से पूछा था पर तुम मुझे घूर हो रहे थे जो क्योंकि मेरी नजर तुम से आगे नहीं बढ रही थी । हम पर अटक गई थी तो बहुत सुन्दर हो फिर जब शर्मा की थी डैनी ने बाद आगे बढाई थी तुम पर मेरी नजर इत्तेफाकन पडी थी । पूरी शाम गुजर गई थी पर तुम से कहीं देखी नहीं थी । उस वक्त में बार बार अकेला खडा हुआ था और लोगों को नाचते हुए ऐसे ही देख रहा था । और फिर अचानक तुम सामने आ गई थी । मैं तो मैं देखता ही रह गया था । तुमको मेरा देखना घूरना लगा होगा । अच्छा है पत्नी से भी फॅमिली में बडी नफासत से अपनी बात कह डाली थी । दिल जाने पहली बार उसकी तरफ नजर भरकर देखा था । फॅमिली से मुस्कराहट उसके होठों पर खेल रही थी । डैनी ने सिलसिला आगे बढाया था । देखो मैंने तो तुम भी सच सच बता दिया है और क्या तुम भी सच कहने का हौसला रखती हूँ? हाँ, मैंने भी तो वहाँ खडे हुए देखा था । वो भी सोचा था कि क्या आदमी कौन है? फिर जाने साहब कोई से कहा था और कुछ नहीं । क्या तुम ने भी मुझे नहीं हो रहा था । नहीं मेरे को मैं खुलकर नहीं देखा था । तुम्हारे बारे में सवाल जरूर मान नहीं उठा था । दैनिक उसकी दे बाकी बहुत पसंद आई थी । उसने फिर अपना हाथ बढा दिया था । मुझसे दोस्ती करोगी । हाँ जरूर हाथ मिलाते हुए कहा था पर आगे से लडकियों को मत भूलना । वो बेचैन हो जाती हैं ।

अदभुत प्रेम की विचित्र कथा - Part 8

हैं । आठ तीन महीने बीत गए थे पर डैनी को कोई काम नहीं दिया गया था । उसने अनुभव का दरवाजा खटखटाने की कोशिश की थी, पर वो बंद ही रहा था । दूसरी तरफ विशाल आपने वन से बात तो जरूर करता था और बैंक के किसी भी मुद्दे के पास उसे फटक में नहीं देता था । साफ था उन्होंने मिलकर उसके हाथ बांध दिए और कोने में बिठा दिया था । हाल ही में मुख्यालय से इंस्पेक्शन के लिए टीम आई थी । तीन दिन ठहरी थी । अनुभव और विशाल ने उसकी घेराबंदी ऐसी की थी । इसको डैनी के होने का एहसास तक नहीं हुआ था । इस दौरान विशाल ने डेनी से कई काम किए थे जिसकी वजह से उसको तीर रात तक दफ्तर में बैठना पडता था । पर मेल मुलाकात उसको दूर रखा गया था । नहीं और मोना तक पर ये कर्म फरमाया गया था और डैनी को पीछे के कमरे से बाहर नहीं आने दिया गया था । दैनिक खून का घूंट पीकर रह गया था डैनी को फल इस इसलिए भी ज्यादा थी क्योंकि उसने टीम के सामने पेश करने के लिए क्रेडिट का डिवीजन पर बहुत मेहनत से प्रेजेंटेशन बनाया था । बहुत दिनों से विशाल माता बच्ची में लगा हुआ था कि किस तरह से बैंकों के कारणों की बिक्री पढाई जाए और उसे कोई तरकीब सूट नहीं रही थी । हर कोशिश नाकामयाब हो रही थी । बात पता लगते ही डैनी ने अपना दिमाग को इस परेशानी को सुलझाने में जोड दिया था और जल्द ही कारगर तरीका भी ढूंढ निकाला था । उसके हिसाब सहित बैंक को बडे कॉरपोरेट घरानों को धूप में कार्ड बेचने चाहिए थे । जिनको भी अपने मुलाजिमों को बॉक्स और अन्य सुविधाएं देने के काम मिलना सकते थे । इस तरह बिल जमा करने की जरूरत नहीं पडती थी । सिर्फ क्रेडिट कार्ड स्टेटमेंट ही काफी था । फर्जी बिल बनवाना भी इससे खत्म हो जाना था । मैंने को यकीन था इस की सोच बैंक के आला अफसरों को पसंद आएगी और उनकी निगाहों में चढ जाएगा । ऐसा हुआ नहीं था । अनुभव और विशाल ने उसको बांध दिया था । उन लाचार छूट में था पर अपना रोना किसी के आगे नहीं हो सकता था । हर हफ्ते वो घर फोन करता था पर इधर उधर की बात नहीं करता था । एकप्रश्न बताया कि कौन से नए कपडे खरीदे थे तो कभी फ्रिज, रंगीन टीवी सेट खरीदने के बारे में बताया । हर बार माउस की खरीदारी सुनकर चौंक जाती थी । उनकी समझ में नहीं आता था कि दिन में सिर्फ तीन महीनों में उसे कुछ कैसे खरीद लिया था । इसको जुटाने उन्हें पूरी उम्र लग गई थी । रंगीन टीवी तो अभी उनकी बहुत से बाहर था । एक रह अपना हम गलत करने के लिए डैनी ने घर की कमी पूरी कर दी थी । जो भी की खुशी से चहकती आवास सुनकर उसके दिल को कुछ राहत मिली थी । डैनी ने गिरिजा को कुछ मर्तबा फोन तो किया था और उस से मुलाकात सिर्फ एक बार और हुई थी । बोलना की दूसरी पार्टी में गिर जैसे मिलना उसे अच्छा लगा था और दोनों खूब नाचे थे । एक बार अपने हालत पर फिर जैसे मशविरा लेने का खयाल उसका दिमाग में आया था । आखिरकार नौकरी का तजुर्बा फिर जब वो से ज्यादा था और वो उसको अमल में नहीं लाया था । वो नहीं चाहता था कि गिर जा । उसको ऐसा आदमी समझने लगे, अपनी परेशानियां नहीं संभाल सकता था । गिरजा खुद मुख्तार थी, अपनी जिम्मेदारी खुद उठाती थी, कॅश नहीं । अपने को लाचार सा कैसे पेश कर सकता था । उसका ड्रॉप खत्म हो जाता है और गिर जा उसको किनारे करके आगे बढ सकती थी । डैनी चुप मार गया था और अंदर ही अंदर घुटता रहा था । दफ्तर में बडी खबर इंस्पेक्शन टीम के जाने के दो हफ्ते बाद आई थी । तीन ने वापस लौटकर अनुभव की तारीफों के ऐसे पुल बांध थे कि सिंगापुर पोस्टिंग का तोहफा उस पर नजर करना लाल भी समझा गया था । उस की तनख्वा दी इस कदर बढा दी गई थी कि सुनकर डैनी चकरा गया था । पर उसके बाद का धमाका इतना बडा था टेनी लडखडा गया था अपने को संभालते हुए उसका मुंह से कई बार तो मैं निकला था । अनुभव जा रहा था और उसकी जगह दुशाला रहा था । बिना एमबीए के ही वो ब्रांच हेड बन गया था । हो गई दैनिक डिग्री धरी जेब भरी रह गई थी मैं । खबर के साथ दैनिक झटके में दफ्तर की पूरी राजनीति समझ में आ गई । विशाल ने पहले से ही अनुभव अपनी जान में फसा रखा था । बडे तरीके से उसने अनुभव को हर छोटे बडे काम के लिए अपने पर आश्रित कर लिया था । जहाँ भी अनुभव फसता था, विशाल चुप चाप मदद कर देता था । उसका साया भी था और जिन भी जो मेरे आका के अंदाज में हर वक्त पे शेख हिम्मत रहता था । दैनिक भर्ती से जहाँ विशाल को सीधे खतरा महसूस हुआ था वहीं अनुभव भी उसे आगे नहीं बढने देना चाहता था । अनुभव में आप विश्वास की कमी थी । ऍसे वो और बढ गई थी । अगर वो डैनी को काम करने देता तो उस पर हावी हो सकता था । शायद उसने रहने की आंखों में सबको जल्द हासिल करने की ललक भी पढ ली थी । उस पर नकेल कसने के लिए उस को काम से दूर रखना जरूरी था । डैनी को यकीन था कि अनुभव को विशाल में ही ये महीन सियासी खेल समझाया था । असल में डैनी बदबूदार सरकारी बैंक के बहुत बडे अग्नेसे आदमी से हार चुका था । प्रशाल ने सलीके से डैनी को हाशिये पर लगाकर खुद को अनुभव का खासुलखास बना दिया था । काम ना देकर उसको हिस् हद तक अनुभव की नजरों से दूर रखा था कि वह भूल ही गया था । एक और एनडीए उसके दफ्तर में काम करता था । उधर विशाल ने अनुभव की आंखों में अपने को इस कदर चला लिया था कि उसके अलावा उसे कुछ दिखता ही नहीं था । विशाल ने फिर धीरे से अपना काम बना लिया था और ब्रांच हैड वन बैठा अनुभव की विदाई पार्टी दैनिकों एक और जख्म दे गई थी । अनुभव ने वहाँ पहले विशाल की खूब तारीफ की थी और फिर साथियों का नाम लेकर उनका शुक्रिया अदा किया था । टेनिस के ठीक सामने बैठा था पर अनुभव के जवान पर उसका नाम तक नहीं आया । दूसरी तरफ विशाल ने डैनी को ब्रांड का दूसरे नंबर का अवसर फौरन घोषित कर दिया था और आपने नीचे काम करने का न्यौता दे डाला था । मैंने ये सुनकर बन गया था नंबर दो और वो भी विशाल के नीचे और मैं डैनी उस रात अपने अंधेरे बंद कमरे में लेता अपनी किस्मत को पूछता रहा था । उसकी आंखों के सामने केवल में बैठे हुए हल्के से मुस्कुराते हुए विशाल का चेहरा नहीं चाहता था तो उसे हर सांस में कई बार सर कहने के लिए उकसा रहा था । तो बिलबिला जाता था पैसे ट्रेनिंग सोचने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं था की नौकरी करते हुए उसे कुछ महीने ही हुए थे । जबकि विशाल के पास बैंक का आठ साल का तजुर्बा था । उसका ब्रांच हेड बनना शायद वाजिब था । वो तो अपने को अनुभव से जोडकर सोच रहा था । उसकी तरह भाव भी तो एकदम कोरा था । जब से पॉलिश कंपनी से बैंक में लाया गया था जब हैड बन सकता है तो डेनी तो नहीं बन सकता था की की विशाल कहाँ से आ गया था । क्या बिजनेस स्कूल में नहीं बताया गया था कि उनके यहाँ पढ लेने के बाद लडके सीधे ऊपर बैठते हैं । किसी खटारा बैंक के तजुर्बेकार ओके नीचे काम नहीं करते । सब होना एनडीए की पहली थी । बर्दाश्त से बाहर थी । अनुभव उसे पसंद नहीं था । पर कम से कम वो बिजनेस स्कूल भ्रमण था उसके पास । अकल जी बच्चे का खिताब तो था । उसके नीचे थोडे समय के लिए काम किया जा सकता था लेकिन ध्यान के साथ नहीं । दैनिक खून खोल रहा था । उसके सामने का मंजर बेहद नागवार था । उछल के साथ वो काम नहीं कर सकता था । एक दिन भी नहीं । अगर वह भी सामने होता तो डाॅन देता हूँ । उससे मुझे घडी पर नजर डाली थी । अभी रात को सिर्फ ग्यारह बजे थे । उसने फ्लैट पर पाला जडा । पता नहीं क्यों पास के पीसीओ पर जाकर ज्योति को फोन लगाया था । ज्योति मैं कल से पैसे भेज रहा हूँ । शाम तक स्कूटी खरीद लो । उससे कहा था और फिर काफी देर तक चुप चाप छोटी के मुझे मान के साथ इसको ने खाता रहा था । ज्योति कि बक बक और स्कूटी को लेकर उसका दीवाना पर उसके दिल को अजीब सा चयन दे रहा था । ज्योति के बाद उसने वहाँ से लंबी बात की थी और पिता से भी है । मैंने जब डांट कर कहा था इन लोगों को जरा संभलकर चल रहा । अरे अनाब! शनाब तरीके से पैसे बर्बाद मत कर तो उस से अच्छा लगा था । उनकी झिडकी सुनकर हजार था और उसको अपनी हंसी हो खुली सी लगी थी । घर बात करके देने की तबियत शायद कुछ सुधरी थी । वो कुछ देर टहलता रहा था और फिर अपने कमरे में आकर गहरी नींद हो गया । देर से उठकर उसने गंदे कपडे फिर से पहले थे । विशाल का ब्रांच हेड के तौर पर पहला दिन था पर उसको क्या परवाह ही प्रशाल को थी और अपने गहरे रंग के सूट के साथ हल्की गुलाबी टाई लगाकर वो खूब जम रहा था । अनुभव भी आया था बैंक का काम शुरू होने से पहले उसने विशाल को खजाने की चाबियां भाव आने की रस्म अदा की थी । मोना ने टेक ओवर की फाइलों पर लाल रंग का फीता भी वान दिया था और जिस समय अनुभव ने उनको विशाल को सौंपा था उस समय डैनी को लगा था । जैसे कि डोनाल्ड अनुभव मेन ट्रक के काले लोथार सरीके विशाल को तोफा दे रहा था । रस्म पूरी होने के बाद जैसे ही विशाल अपनी कुर्सी पर बैठा था तो उँगलियों से कमरा भूल गया था । विशाल के साथ ही लंबे समय तक तालियां बजाते रहे थे । उनका उत्साह देखकर अनुभव सब पकडा गया था । उसे लगा था कि लोग विशाल के आने से ज्यादा उसके जाने की खुशी में ताली बजा रहे थे । डैनी को भी हो गया था मोना निशा और विशाल के बीच में शुरू से ही मिली भगत थी । उन्होंने वास्तव में अनुभव का चरखा का आता था । कुछ अनुभव पर तरह आ गया था । अनुभव उनके चम्बल में रहा था और से पता भी नहीं चला था का उसने डाॅॅ स्कूल वालों पर भरोसा क्या होता है न केंद्र, सरकारी बैंक एक लडकों पर प्रशाल नहीं आते ही डैनी को काम में जोड दिया था । दिनभर दौडता था और अगर से काम में कोई भूल चूक हो जाती थी उस पर बढता नहीं था । वो हिस्सा से डैनी को जाहिर कर देता था । उसकी गलती पकडी गई थी और दुरुस्त भी कर दी गई थी । कुछ दिनों बाद विशाल ने जब दैनिकों क्रेडिट कार्ड की बिक्री को बढाने के लिए कोई तरकीब सोचने के लिए कहा था तो मैंने अपना पुराना प्रजेंटेशन निकाल लाया था । विशाल ने उसे ध्यान से सुना और फिर उसे मंजूरी दे दी गई थी । डैनी ने विशाल से बिक्री का लक्ष्य छोटा रखने को पढा था । उछल मान गया था और काम शुरू होने के कुछ तो बात । उसने लक्ष्य पंद्रह फीसदी पढा दिया था । टैनी ने और मेहनत करनी शुरू कर दी थी । पर जैसे ही वो लक्ष्य के पास आया था विशाल ने उसको फिर दस फीसदी बढा दिया था । विशाल का कहना था कि बैंक के बडे अफसर डिग्री की नई रणनीति को परीक्षण के मामले की तरह ले रहे थे । उसको कारगर साबित करने के लिए बिक्री का लक्ष्य साधारण से ज्यादा होना चाहिए था । दैनिक बात समझ में आ गई थी और पूरे जोश से अपने को साबित करने में लग गया था । छह महीने में ही उसने मैदान मार लिया था । अपने काम में दैनिक इतना शुरू हो गया था कि गिरिजा को फोन करना उसको याद नहीं रहता था । अपनी तरफ से गिर जा जब भी फोन करती थी तो वह बातें हमसे बात करूंगा । वायदा करके फोन रख देता था । डैडी गिरिजा से बात करना तो चाहता था और सुबह आठ बजे से लेकर रात के ग्यारह बजे तक फुर्सत नहीं मिल पाती थी । इस दौरान डैनी को विशाल कभी बहुत अच्छा लगता था तो कभी बहुत बुरा काम करने में भी । उसे कभी भी बहुत आनंद आता था तो कभी वो ज्यादा था । पर अच्छा हो या बुरा वैसे हालत नहीं रहना चाहता था तो उसको अपने होने का अहसास दिलाते रहते थे । ये जरूर था कि वह ब्रांच हेड नहीं था और विशाल को सर भी कहना पडता था । पर इन सब छोटी बातों का उसके लिए वास्तव में कोई मतलब नहीं रह गया था । विशाल उसका भूत बना रखा था और वो पेड से उल्टा लटककर खुश था । रहेंगी अगर उसकी दशा देखता तो कहता क्षेत्र हैं, पडे रहेंगे कि बुरी तरह निश्चित नहीं थी बल्कि अच्छी वाली थी । जिसके निकलते ही मन और तन हल्का हो जाता था, डाॅन कर रहा था । एक के बाद एक महीना कर अव्वल नतीजे ला रहा था । उसकी जिंदगी में एक मस्त साजिश की निर्मल धारा बहनी शुरू हो गई थी । उसको भला और क्या चाहिए था?

अदभुत प्रेम की विचित्र कथा - Part 9

नौ ऍसे दैनिक गिरिजन से नहीं मिला था पर ज्यादा करना जब भी बात हुई थी तो हर बार वो से अच्छी और बहुत अच्छी लगी थी । गिर जाएगा । बाद करने का तरीका बेहद साहस था । ऍम ऐसी मजाक में उसका अलग अंदाज साफ लगता था । जब भी पहुंचती थी तो दिल खोलकर हसती थी । रहने के काम के दवा को भी उस समझती थी और उसी कोशिश रहती थी इसके आडे ना आए । दैनिक जब कभी गिर जा के साथ जिंदगी के बारे में सोचता था तो अमूमन रोमांचित होता था । मोना ने उनके भी चोट रही चिंगारी को हवा देने की कोशिश की थी । एक बार तो उसने हसते हुए कह डाला था कि वे दोनों एक दूजे के लिए बने हैं । अगर वह हसीन है तो तुम गबरू जवान हो । दोनों प्रोफेशनल हूँ, पक्के इरादे वाले हो और जब साथ नाश्ते हो तो बेहतरीन जोडी देखते हो । और सबसे बडी बात ये है दे नहीं उस ने छेडा था गिजर खाना बहुत बढिया बना लेती है और तुम्हें खाना बहुत पसंद है । इससे ज्यादा और क्या चाहिए किसी मर्द को? मैंने उसकी बात पर छह गया था तो छुट्टियाँ एक साथ आ रही थी । बैंक की नौकरी में ऐसा काम होता था कि रविवार के आगे या पीछे भी छुट्टी हूँ । डैनी ने घर जाने की सोची थी क्योंकि कई महीनों से उसे वहाँ जाने का मौका नहीं मिला था और उसने जाना टाल दिया था । उसकी जगह गिरिजा के साथ वक्त बिताकर उसका मन टटोलना चाहता था । देखना चाहता था कि वो और गिर जाए । कितने पानी में थे । उसने गिरजा को ताज होटल के बाद में मिलने का न्यौता दिया था । दैनिक होटल समय से पांच मिनट पहले पहुंचकर अपना होलिया समर मिलने की तैयारी में उसने एक दिन पहले ही अशोक होटल जाकर अपने बाल कटवाये थे और अपने गोरेपन को छत करने के लिए सोना बात भी लिया था । ऐसे मौके पर सूट पहनना उसको वाजिब नहीं लगा था । इसलिए हल्की हरिज उनकी सिल्की कमीज पर उसने कार्डिगन डाल लिया था । कमीज के रंग से पेंट मैचिंग थी और गले में इसका बना हुआ था । चीजें में जब डैनी ने अपने को देखा तो उसे अपने पर रश होने लगा था । गिर जभी तकल्लुफ में नहीं पडी थी । रोजी रंग की स्कर्ट और सफेद हाउस में वैसी खेल रही थी कि डैनी देखता रह गया था । एक दम सीधी रीड पर उठा हुआ सर उसको भीड से अलग करता था और जब वह चलकर उसके पास आ रही थी तो उसके शाही अंदाज के सामने लोगों की निगाहें बरबस छूट गई थी । मैंने अपनी खुशकिस्मती पर जहर उठा था । पार्के सबसे दूर और सबसे अंधेरे वाले कोने में डैनी ने गिरजा को ले जाकर बिठाया था । एक तरफ बार के हल्ले गुल्ले से दूर चैन से बैठकर गिरजा से बात करना चाहता था तो दूसरी तरफ गिरजा खूब लोगों की घूरती निगाहों से दूर भी रखना चाहता था । उसको याद था गिरजा घुटने से बेचैन हो जाती थी । ऍम गिर जाने वर्जन मेरी वर्जन रहने से कैंसर हो जाता है । उसमें शरारत की थी । तुम परेशान मत ऍम जवाब दिया था की बीमारी लगने से पहले में शादी कर लूंगी । कुछ दे नौकरीपेशे पर तस्वरों करते रहे थे । डैनी आगे बाद बढाना चाहता था उसने अपने लिए एक और ड्रिंक मंगवाई और गिरजा की वर्जन मैरिको ब्लडी मैरी में तब्दील कर दिया था । नहीं ब्लडी मैरी नहीं, नहीं नहीं मैंने कभी शराब नहीं पी है । उस ने जोर देकर कहा था कभी ना कभी तो पहली बार होना ही है । तो फिर आज क्यों नहीं । उस ने जवाब में कहा था देख जा नहीं मानी थी । टैनी ने फिर समझाया था पीकर तो देखो अच्छा लगेगा अगर ना लगे तो छोड देना । उसने बहलाया था वो गिर जाए तो जरूर मिलाना चाहता था जिससे बात पे जहाँ तक हो सके । वैसे भी इतनी खूबसूरत लडकी के साथ हम पहला बनने का खयाल उसको बेहद रूमानी लगने लगा था । फिर जाने डरते हुए पहले ब्लडी मैरी का एक छोटा सा घूम लिया । फिर लम्बा घूम पारा था । रहे तो बहुत अच्छी है । मुझे पसंद आई । उसने खिलखिलाकर कहा था । दैनिक झूम उठा था । उसकी लाइफ सेट हो गई थी । वो पांच सितारा होटल में बैठा था । उसके सामने एक बेहद खूबसूरत लडकी थी तो उसके साथ पी रही थी । उसकी हैसियत इतनी थी कि वह बिना परेशान हुए बिल भर सकता था । सहारनपुर जैसे शहर के निम्न मध्यम वर्ग कलर का भला इससे ज्यादा और क्या पा सकता था । बातचीत के दौरान गिरजा ने बताया था इसकी शुरूआती पढाई मसूरी के बडे स्कूल में हुई थी । फिर वो दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज आ गई थी जहां उसने इंग्लिश लिटरेचर में बी ए ऑनर्स किया था । इसके बाद डैडी ने अपने दोस्त जो विज्ञापन कंपनी के एमडी हैं से कहा, और मुझे नौकरी मिल गई भेजा नहीं । कंधे उसका दिए थे, फॅमिली में है । डैनी ने ऐसे ही पूछ लिया था । पर जवाब सुनकर सन्न रह गया । फिर जा के पिता देश की सबसे बडी स्कूटर कंपनी के सर्वेसर्वा थे । यही नहीं मैनेजमेंट की दुनिया में बहुत बडी हैसियत वाले नाम भी थे । हफ्ते भर पहले ही डैनी ने उनका एक लंबा इंटरव्यू अखबार में पडा था । ऍम उसे अपनी किस्मत पर विश्वास नहीं हो रहा था । वो कॉर्पोरेट दुनिया के धुरंधर की लडकी के साथ इतने दिनों से दोस्ती में था और उसे पता भी नहीं था । वो अपनी जहालत पर हैरान था । किस हद हो गई थी ऍम तुम उनकी बेटी हो हैरानी दिखाते हुए कहा था तो जाने माने प्रोफेशनल है । हर कोई उनकी बहुत जब करता है । हाँ मैं जानती हूँ गिर जाने अनमना सा जवाब दिया । गाडी अपने काम से पूरी तरह से जुडे हुए हैं । वहाँ से भी थोडा बहुत जुडे होते तो मतलब पंद्रह साल पहले वो अलग हो गए थे । मैं बहुत छोटी थी । मैंने अपनी पूरी जिंदगी हॉस्टल में गुजारी है । कितनी बुरी बात है ना ऍसे पूछा था । हमारे हम ने कहा है । उन्होंने बहुत पहले दूसरी शादी कर ली थी । देसाई अंकल से हम लोग मिलते रहते हैं और उतना नहीं जितना काफी हो । पहुंॅच उसे धीरे से पूछा था भेजा है । जब उनका पूरा नाम बताया तो डैनी को लगा था की खुशी के मारे वह मर जाएगा । देसाई उसके बैंक के डायरेक्टर थे । ऍम ऍम डैनी ने अपने को संभाला पर पूरा धीरज रखकर उसे कुछ और सवाल पूछ रहे थे । डैडी के साथ रहती हूँ नहीं और उनसे रोड पर मेरा अपना फ्लैट है । कोई भाई बहन उनको अपने झगडे से फुर्सत मिलती तो शायद होते हुए फिलहाल नहीं हूँ । एक तरह से उनके लिए अच्छा ही है । सिर्फ एक की परेशानी है । उनके सामने तो चार नहीं ऐसा नहीं कहते । ऍसे झिडकी दी थी । हर माँ बाप अपने बच्चों को प्यार करते हैं और अब तो हमें भी करते हैं । चाहे आपस में कितनी भी तकरार हो, गिरजा सिर हिलाकर हामी तो भर दी और वो उसकी बात सुन नहीं सकती थी । उसके अंदर जज्बात घूम रहे थे जिन पर काबू पाने की कोशिश में वह नाकाम हो रही थी । उसके गौर ब्लडी मैरी मंगवाई थी । अंदर की टूटन बाहर जाहिर होने लगी थी । डैनी ने बढकर उसका हाथ थाम लिया । फिर जाने सहारे को भेज दिया था । हाथ पकडे हुए दोनों काफी देर तक बैठे रहे थे । नहीं उससे हमदर्दी हो चली थी । गिरजा मासूम थी । उसके पास सब कुछ होते हुए भी कुछ नहीं था । उसके माँ बाप शहर में तो थे पर उस से बहुत दूर थे । बिचारी को अकेले रहना पड रहा था । उसकी बदनसीबी उसको खल रही थी । टेनिस की हौसलाअफजाई करना चाहता था । कहना चाहता था कि उसके हालत को बेहतर बनाने के लिए उसके साथ खडा होना चाहता है । रहनी नहीं उसका हाथ फिरसे तो पपाया और उसकी वहाँ को हल्के हाथ से सहारा दिया था । उसे हर उठी । उसने अपनी दुनियाँ फिर दौड आई थी ऍफ उठाकर से न करने की गुजारिश की थी । पटानी नहीं नहीं रुका था । उसने गिर जा के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए । उसके हथेली पर अपनी उंगलियां मचा दी थी तो वहाँ पे उसने फिर अपनी फॅमिली ने उसको खारिज कर दिया था । बे बस उसकी तरफ देखती रही थी । उडानी को रोकना भी चाहती थी और शायद नहीं भी उसे कुछ मीठा मीठा सा महसूस हो रहा था ना पहले कभी नहीं हुआ था । डैनी भी बह रहा था । उसके होश में काबू हो रहे थे । वो अपने को रोक नहीं पा रहा था । अच्छा ना उठ कर सके । जा अपनी बाहों में भर लिया और उसके होठों पर अपने वोट रखती है । उससे लिपट गई थी । इसे डैनी के सहारे को अपने में उठा लेना चाहती हो । कुछ देर बाद उन्हें और उनकी मौजूदगी का एहसास हुआ और झट से वो अलग हो गए । फॅमिली जगह पर जाकर बैठ गया । अपने किए पर शर्मा रहा था तो मुझे किसके क्या ले जाने छटपटाते पूछा था क्योंकि मैं तुम समापत करना चाहता हूँ । छत नहीं है, यही कह रही हूँ सच कह रहा हूँ अगर तुम सच कह रहे हो तो मैं तुमसे कुछ कहना चाहती हूँ क्या? नहीं नहीं शर्माते हुए कहा था अभी तुम से प्यार करती हूँ । ट्रेनिंग उसका हाथ की तरफ अपना हाथ बडा । उसने अपने दोनों खाते उसको थमा दिए थे । दैनिक जज्बात लबालब हो चले थे । फिर जा के आंखों के कोछर चला आए थे । उन्होंने कहा तो मुझसे प्यार करते हो । खाना मुझे शादी कर लो, हम अगर राजी हो तो कर लूंगा । कुछ हसते हुए जवाब दिया था सब कुछ बहुत जल्दी जल्दी हो रहा था । उस एरा नहीं पकड पा रहा था । मैं राजी हूँ । उसमें शाही अंदाज में हाथ फैलाकर कहा था इतने बडे बात की इतनी खूबसूरत लडकी इतनी जल्दी उससे शादी करने को राजी हो गई थी । सुनकर उसे कश् आने लगा था और हमें शादी अभी इसी वक्त कर लेनी चाहिए । गिर जाने फैसला सुना दिया था । आप था, इतनी जल्दी क्या है? दैनिक ने बहुत होकर पूछा था तो मुझे किस करने की भी क्या जल्दी थी? उसने तपाक से जवाब क्या मुझे कोई जल्दी नहीं थी । वह बस हो गया था । ठीक है पर जब तुमने मुझे किस कर ही लिया है और कहा है कि तुम मुझसे प्यार करते हैं और उसके बाद प्रपोज भी किया है । इस पर मैंने हमें भी भर दी है तो हम शादी क्यों नहीं कर सकते हैं? अच्छा कुछ हो गया है । जहाँ ने समझाने की कोशिश की थी । छब्बीस तरह अचानक नहीं होती है । उसको सिलसिला होता है तो डाॅॅ नहीं डाल रहा हूँ । मैं सिर्फ इतना कह रहा हूँ अगर हम सब आ गए प्यार करते हो तो मुझे अभी इसी वक्त शादी करो मगर रिजर्व बीच में उसके बाद काट दी थी । नहीं नहीं अगर तुम उसे दिल्ली तौर से प्यार करते हो तो मुझे अभी शादी कर लोगे । पर ना मुझे लगेगा तुम मुझ से खेल रहे थे । वो खडी हुई और बिल लाने को कहा उससे अभी के अभी शादी कर लो नहीं मुझे अच्छा लगेगा । ऍफ तो अपनी जो बता रही थी और साथ में उसको मजबूर भी कर रही थी । डाॅ । चकरघन्नी सब इस कदर घूम रहा था उसका माथा धर्म हो गया था । गिरजा वो सब थी जो चाहता था खूबसूरत, ईमानदार, पढी लिखी और घर आने वाली हूँ । जल्दी से उसे उन लोगों से मिलवा सकती थी जिनसे मिलने के लिए और लोग करते थे । हर तरह से वो उसके लिए ही बनी थी । उसको डाल नहीं सकता था और अगर ऐसा करने की कोशिश भी करता है तो उसका अंजाम ठीक नहीं होना था । वो खुद चलकर उसके पास आई थी और अगर वो जरा सब हिचक गया तो उसको तहाँ उम्र माफ नहीं करेगी । उस की सारी दलीलें बेकार साबित हो जाएंगी । मौका भी था उसपर अमल जरूरी था तो मंदिर जा रहे हैं कि नहीं । रिलिजन सीधे तौर से पूछा था हाँ हम इसी वक्त मंदिर जा रहे हैं । ट्रैन में पूरे चोट से जवाब दिया था और उसके बहुत आपके बाहर डाल दी थी तो फिर जाने प्यार से अपना सर उसके समझे बता दिया था । रात बहुत हो चुकी थी पर उससे उनको कोई मतलब नहीं था । होटल के बाहर ही गजरे देश की लडकी मिल गई थी । उन्होंने उसे कई सारे गजरे खरीदे और दो छोटी मालाओं में घुस दिया था । पांच ही बदला बंद था । कपाट बंद हो चुके थे पर उन्होंने उसके बाहर सीढियों पर खडे होकर एक दूसरे को जानना डाली थी । गिर जाने देर रात तक वहाँ दुआ मांगी और फिर अपने पति की बाहों में समा गयी थी । उसके चेहरे पर तरोताजा रॉड को भराई थी । बहुत खुश लग रही थी वो । शादी करने के बाद फिर ताज होटल शादी का जश्न मनाने के लिए लौटे थे और फिर फिर जाके फ्लैट पर चले गए थे । अगले दिन छुट्टी थी । वे आराम से सुबह उठ सकते थे । दैनिकी शादी सिर्फ पच्चीस साल की उम्र में जादू तौर से हो गई थी । उसे यकीन नहीं हो रहा था कि ये सब सपना नहीं और की थी ।

अदभुत प्रेम की विचित्र कथा - Part 10

दस जब रहनी क्या खुली थी तो उसने अपने को मखमली बिस्तर पर पाया था । कमरे में इसी गुनगुना रहा था माहौल गुनगुना था एक दम ताजा, खुशनुमा फॅमिली और एक बार फिर वाली थी उसके आस पास और क्या था वो सच में बेहद मुलायम बिस्तर पर लेटा था । जिसपर जितनी चादर पडी हुई थी उसके बगल में एक हूँ सुकून से हो रही थी । उसके वोटों पर हल्की सी मुस्कुराहट खेल रही थी । दैनिक नजदीक जाकर गिरजा की बंद आंखों के पीछे झांकने की कोशिश की थी । कॅश उठा शॅल क्या किस्मत है खुशी के मारे को झूठा था । उसका मन कलाबाजियां खा रहा था । पैर खुशी रखने के लिए बेचैन हो रहे थे । उसका जोश उठा ले ले रहा था लेकिन लेकिन उसने अपने परेशान किया और बगल में सो रही राजकुमारी को निहारने में लग गया था । गिरिजा वास्तव में किसी आसवानी करिश्में की तरफ की जिंदगी नाटक की थी । अपने साथ ऐसी सौगात दिलाई थी जिससे हर सिम, सिम दरवाजा उसके एक इशारे पर खुल सकता था । दैनिक ने पहले गिरजाघर नेता के बारे में सोचा और फिर सौतेले पिता की हैसियत पर गौर किया था । दोनों मिलकर और अकेले अकेले भी उसको वो सहारा दे सकते थे जिसमें वो सातवे आसमान की उडान पलक झपकते ही भर सकता था । गिर जा के पता तो कुछ भी करने को तैयार होंगे । उसने अपने को बताया था आखिरकार उनकी काॅफी तो साथ नहीं रहते थे और शायद उनके बीच रिश्ता बहुत खुशनुमा नहीं था । पर पिता के दिल में कुछ मलाल जरूर होगा जो बेटी दामाद की बेहतरी के लिए मजबूर कर देगा । दैनि अपने से मतलब था और उसे अपने ससुर से गहरा रिश्ता बनाने में कोई दिक्कत पेश नहीं होने वाली थी । सौतेले ससुर के बारे में वो अभी कुछ पक्के तौर पर नहीं कह सकता था । उसका नाम तो सुना था पर वो कैसे आदमी है इस बारे में उसे ज्यादा भी नहीं था । पर गिरजा उनसे ज्यादा करा मिलती रहती थी । उसके जरिए रेजोल् पढाया जा सकता था । और हाँ भेजा की बात ही तो थी । अपनी बेटी की खातिर वह देसाई साहब से कुछ भी करवा सकती थी । ये सोचकर दैनि के चेहरे पर भरपूर मुस्कराहट खेलो की थी । मैंने बेटा उसका मनी मान अपनी पीठ ठोकी थी । ऊपर वाले ने छप्परफाड करते उसको दिया है । अलर्ट मौज कर अपने घर के बारे में उससे ज्यादा नहीं जा रहा था । पिताजी उनके और अपने रहन सहन के बारे में संजीदगी से नुक्ताचीनी करेंगे क्योंकि असल में वो अपनों से बडे होने वालों से कपडा आते थे । पता नहीं उनके दिल में कौन सा डर बैठा था की वह उनके सामने सहन जाते थे । शायद सरकारी स्कूल के अध्यापकों के दब्बूपन वाला स्वभाव उनमें बैठ गया था । पर शादी हो चुकी थी । मैंने एक नई जिंदगी के साथ कदम ताल करने के अलावा उनके पास और कोई चारा नहीं था । दूसरी तरफ माँ बहुत खुश होंगे । उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा होगा की उनकी बहू इतनी गोरी और सुंदर होगी । बॅाल से यूपी खयाल आया था क्या गिर जा के बगैर छुएगी या फिर पहले कुछ दिनों में से ढके गी अगर वैसा करेंगे तो माँ उसकी बलैया लेती नहीं सकें । अगर नहीं भी करेगी तो कोई भी आसमान नहीं रुकने वाला था । अपने बेटे से बहुत प्यार करती थी । उस की खुशी में ही उनकी खुशी थी और ज्योति ज्योति तो भाभी को पाकर उछल ही पडेगी । उसकी और गिरिजा की खूब पडेगी क्योंकि ज्योति बहुत मोहब्बत की लडकी थी । सबका दल चुटकी में जीत लेती थी । वो गिर जैसे कहेगा ज्योति को अपनी शादी जिंदगी में ले ले और ऐसा बना देंगे । उसको बडी असर दूल्हा मिल जाएगी । अपनी सुंदर और सुशील बहन के लिए ऐसा पति चाहता था जिसके साथ बराबरी से खडा हो सके और ऐसी जिंदगी दे जिसमें मुफलिसी का साया दूर दूर तक ना हो । पर ये सब तो बात की बातें थी तो हम वाली परेशानी अपने घर की थी । वो गिरिजा या उसके माँ बाप को एस्बेस्टस की छत वाले दो कमरे के मकान में नहीं ले जा सकता था । उसको कुछ और इंतजाम करना पडेगा, ऐसा इंतजाम जिससे अपनी गुरबत को छुपाया जा सके । मकान तो वह भी खरीद नहीं सकता था, पर लोन लेकर घरवालों को किराये के मकान में जरूर जमा सकता था । फिर जाने आपके खोली और हल्की सी अगर आएगी उसका मुस्कराकर देखा और फिर आंख बंद कर दी । फॅमिली में उसको अपनी बाहों में भर लिया । उसके सीने से लग गई । क्या सोच रहे थे तो उसने अलसाई आवाज में पूछा था अपनी तुम्हारी नहीं जिंदगी के बारे में बहुत मजेदार होगी । ना था क्या बजाएं? ऍम साढे दस हो चुकी थी और रूप अभी तक नहीं आई । उसको तो आठ बजे आ जाना चाहिए था । एक गिरजा का चेहरा गुस्से से तमतमा उठा । अच्छा नहीं तो उसने बाद संभालने की कोशिश की थी । अच्छा ये है ना, इसके ना आने की वजह से हम लोग देर तक छोड सकें । और ये भी तो हो सकता है कि वह भाई हो और हम लोग नींद में घंटी ना सुन पाऊं । उसके पास घर की चाबी हैं इसलिए उसको घंटे में जाने की जरूरत नहीं है । गिरजा ने गुस्से में कहा था सुबह की चाहे भी मुझे देनी थी, नहीं कहा रह गई । जाने दो से यहाँ ऍसे कहा था क्योंकि घर में धर्म चाइना बनाता हूँ । मैं अच्छी लगेगी तो बना लेंगे । सच्ची में बना लोगे उसका चेहरा फिर खेलो था ना । फिर सच्चाई ये थी कि डैनी को चाय बनानी आती नहीं थी । घर पर मैं बना देती थी तो हॉस्टल में चाहे वाला था । उसको सिर्फ इतना मालूम था कि उबलते पानी में बहुत सारी चाय की पत्ती और दूध झोंक किया जाता था और कई चम्मच चीनी मिला दी जाती थी । वो बोलने पर उसे सस्ते से क्लासों में डाल कर दिया जाता था, जिसपर हाथ से देखने का मजा ही अलग था । डैनी भेजा को अपनी बाहों में कुछ देर समय दे रहा था । वो चाय बनाने या बनाने से बचने की तरकीब सोचने में लग गया था । उसे अचानक फिल्म याद आ गई जिसमें लडका चाय बनाने के लिए किचन में गया था और फिर उसने बर्तन से लेकर पकती कहाँ रखी है तक की तहकीकात बार बार चिल्लाकर की थी । लडकी इतने सारे सवालों का जवाब देने की बजाय खुद किचन में आ गई थी । फिल्में चाहे तो बाद में बनी थी प्यार मोहब्बत सिलसिला पहले शुरू हो गया था । डैनी ने डोर पकडने थी अच्छा डाइनिंग मैं तुम्हारे लिए चाय बना कर रहा हूँ । उसने नाटकी अंदाज होते हुए कहा था गिर जा नहीं मुस्कराकर अपनी आंखे बंद कर ली थी । होना कहा है उसमे किचन से आवाज लगाई थी और कोई जवाब नहीं आया था । फिर से दूध निकालने के बाद उसने पूछा था चाय की पत्ती कहाँ है? कोई जवाब नहीं आया था । गैस कैसे खुलती है । सन्नाटा कायम था और चीनी कहाँ है? उसने बेहसारा आवाज लगाई थी, दैनि नहीं । किसी तरह चाय बनाई और बोंसाई चाइना काटी । सेट खोज कर उसमें सजा दूध और चीनी अलग स्पोर्ट में रखे थे । ठीक वैसे ही जैसे होटल वाले करते थे । फ्री लेकर वह गिर जा के कमरे में दाखिल हुआ । फिर गहरी नींद सुनना रही थी । कॅश को सोते रहे दिया । पहली बार वो चाय बना कर ला रहा था और गिर जाए फिर जा बे परवाह सो रही थी । उसको इंतजार करना चाहिए था, गिर जाता । इस तरह हो जाना तो अच्छा नहीं लगा था । पर थोडी देर नहीं उसने ये सोचकर मन बहला लिया था । उसमें गिरजा का नहीं बल्कि बीतीरात कसूर था । सब कुछ ज्यादा ही हो गया था । मस्ती भी और ब्लडी मैरी भी उसने चाहे बिस्तर के पास रख दी और बाहर आकर टेलीविजन देखने लगा । एक घंटे बाद गिरजा उठी और डैनी को तलाशते हुए ड्राइंग रूम में दाखिल हुई थी । मैं मुझे चाहे नहीं दी । उसने घुसते ही शिकायत थी हो गई थी । मैं चाय के साथ होती हूँ । उसने गोद में बैठते हैं । बताया था सुबह के पहले दो कप मैं सोते सोते ही पीती हूँ । क्या कर मिल जाने । डैनी को अपनी तरफ खींच लिया था और उसके होठों पर अपने होटल दिए थे । चौक गया था मैं चाय गर्म कर दूँ । ऍम से खुश होकर पूछा था चाहे कौन फिर से गरम करता है, भला मैं बनाओ । पर इससे पहले की दैनिक उठता गिरजा की नौकरानी आ गई थी उसने । मेरी में हिंसा है । उसके लिए चाय बनाई और फिर घर साफ करने में जुट गई । फिर जा नहाने चली गई और देर तक नहीं आती रही थी । डैनी टेलीविजन देखता रहा था प्रदायनी अब क्या हो गई हमारी कुछ? डैनी के बालों में उंगलियां फेरते हुए पूछा था अब आधा दर्जन बच्चे होंगे । हमारे फॅस कर कहा था वहाँ क्यों नहीं? अंदर जो काम है और हौसला दिखाओ उसमें चक्कर जवाब दिया था । पैसे दे नहीं मैं तो पहली नजर में तुम परसदा हो गई थी । हम दिल में कुछ पडता था तुम्हारे बारे में । पर कल रात के बाद वो खत्म हो चुका है । मैं सच नहीं बहुत प्यार करती हूँ । दैनिक अब्दल ढोल गया था ऐसे बताओ बिरयानी बात आगे बढाई थी हम अपनी शादी के बारे में । लोगों को कैसे बतायेंगे आप? तुम्हारे घर वालों को मुझे डैडी को बताना होगा । उन्हें अच्छा नहीं लगेगा । क्यों कैसे अच्छा लगेगा? ऍसे जवाब दिया था क्या तुम्हें मालूम नहीं है कि बाबा शादी ऐसे ही तय नहीं कर देते हैं तो पहले बातचीत करना चाहते हैं । दैनिक हम खान सिर हिला दिया था और हमारे घर वाले क्या कहेंगे? नहीं । असल में उन के बारे में मुझे कुछ नहीं बताया है । मेरे पिता मास्टर है । मतलब प्रोफेसर हैं । सैनी में हर बढाते हुए कहा मैं घर देखती है और मेरी एक बहन है ज्योति सब सहारनपुर में रहते हैं । नारंगपुर खाएँ दिल्ली के पास ही है । लगभग सौ किलोमीटर दूर है । दैनिक की बात सुनते सुनते भेजा कुछ सोचना पड गई थी तुम डैडी को पैसे बताओगी । ऍफ का ध्यान खींचने के लिए पूछा था । पता नहीं उन्हें किसी भी चीज का चार होना पसंद नहीं है । और मम्मी अरे उन का हाल तो डैडी से भी बुरा है । उनको सब निज से तो चाहिए । जरा सा भी डर डर नहीं हो सकता है । गिरजा की बात सुनकर डैनी सोचना पड गया था । कल रात से आज सुबह तक तो सब मनमाफिक हुआ था । अब परेशानी खडी हुई थी उसका ठीक हाल निकलना था । परेशान हूँ तो सोच लेंगे । उसने खुद को हौसला दिलाया था । उसको भी अपने घर के हालात सुधारने के लिए वक्त चाहिए था और जीजा की परेशानी को मौका दे सकती थी क्या हम उसने यही बात बनाते हुए कहा था हमारे दे दिया मम्मी के पास अभी नहीं जा सकते हैं । हम उनसे जाकर कहते हम ने शादी कर ली है थोडी नहीं तो फिर मैं तो हाथ नहीं कहा था ग्रुप चाहूँ इतनी जल्दी मत करो । मेरा फैसला ठीक था । रिजल्ट दृढता से कहा हम ना मुझे किस किया था मैंने तो करने दिया था क्योंकि मैं तुमसे प्यार करती हूँ । अम् इसके बाद अगला कदम उठाना था । शादी कर नहीं करनी थी । चल मान लिया हमने ठीक किया पर अब क्या करें? कैसे करेंगे? फिर जा चुप रही । दैनिक उसको पूरे तीस सेकंड दिए थे । सुनो । उसने आखिर में कहा था हम ऐसा क्यों नहीं करते हैं कि उनको धीरे धीरे बताएं । मतलब तुम कल परसो घरवालों को बताओ कि तुम्हारी मुलाकात एक अच्छे लडके से हुई है और तुम उसके बारे में कुछ सोच रही हो । फिर कुछ दिन बाद मेरे बारे में और बातें बताओ । इस तरह महीने दो महीने में पूरी बात उनके सामने रख लो । फिर जाना उसकी तरफ अजीब निगाहों से देखा था । डैनी को लगा था कि गिरिजा उसकी बात का गलत मतलब निकाल रही थी । देखो मैं ये कह रहा हूँ । उसने जल्दी से सफाई दी थी । हमें जो करना था वो हमने कर लिया है । हम शादीशुदा हैं पर हमें घर वालों का भी तो ख्याल रखना है । उनको ऐसा लगना चाहिए की सब उनकी मन मर्जी से हुआ है तो मुझे मिलवा हूँ जिससे हमारी पसंद पर वह मुहर लगा सकें । तुम्हारा मतलब हम मुझे कुछ नहीं बताया । फिर जब सीधी बात करने वालों में से थी, उसको लागलपेट पसंद नहीं था । सफेद झूठ बोलना उसके वर्ष की बात नहीं थी । अगर हम से सीधा सवाल करेंगे तो मैं एकदम सीधा सच्चा जवाब देंगे । पर अगर नहीं करते हैं तो उनके जज्बात की खाते हम लोग चुप रहेंगे । मिर्जा को बात समझ में आ गई । एक हफ्ते बाद उसने डैनी को बताया था । उसके डैडी आलोक मित्रा ने दिल्ली गोल्फ क्लब में लंच करने का न्यौता भेजा है । फॅमिली से कहा था कि वो अपने कुछ खास दोस्तों से उनको मिलवाना चाहती है तो फौरन राजी हो गए थे । किस्सा बताते हुए वो खूब हंसी थी । खेल खेलने से मजा आ रहा था । लंच पर जाने के लिए डैनी ने अपने को खुद तैयार किया था । बस स्कूल में बताया गया था कि अपने को बेचना सबसे जरूरी होता है और माल तब तक ठीक से नहीं दिखता है जब तक उसकी साथ समझा बेहतरी नहीं होती है । इस मशविरे पर चलकर ध्यानी ने गिरजा को जीता था । अब ससुर साहब पर पता बनी थी यानी संवरकर लंच पर पहुंचा था । मित्र साथ कहीं से भी बंगाली नहीं लगते हो ना तो सामने थे नहीं पिटे और नहीं तो बहुत है । वे लंबे और पूरे थे । उनके उठने बैठने का अंदाज शाही था । उनके बीच भी गिरजा की तरह बनी हुई थी । दोनों जब साथ खडे होते थे तो शानदार लगते थे । यानि ने गर्मजोशी से हाथ बनाया और फिर उनके ठीक बगल में खडा हो गया था । वो चाहता था मित्रा साहब पर उसके लम्बाई और रंग असर डाले । गिरजा ने भी आपने उन्ही दोस्तों को बनाया था जिनके बीच यानि अलग से दिखाई नहीं । वो ना कोशिश नहीं बुलाया था क्योंकि वो सबका ध्यान अपनी तरफ खींच सकती थी । उसकी जगह उसने अपने दफ्तर की दो लडकियों को बनाया था जिसमें एक बेतरतीब से चमकीले कपडे पहने हुए थी तो दूसरी ऐसी थी मानो उसके मुंबई जवान ही ना हो । दो लडके भी थे । एक उसके स्कूल का साथी था जो शायद उसका नाकाम आशिक था और दूसरा हसमुख सा आम किस्म का नौजवान था । इन सबके बीच डैनी किसान अलग ही दिख रही थी । बताया साहब बेहद नफीस मेहमाननवाज थे । उन्होंने हर एक से अंतरंग बातचीत की थी और सबका हर तरह से ख्याल रखा था । यानी उनके तरीके का फॉर्म घायल हो गया था । उस सत्र साहब बहुत ही सुलझे हुए आदमी लगे थे । उसके निचले तबके से होने को नजरअंदाज करने में होता ही नहीं बरतने वाले थे । डैनी को वो खुद मुख्तारी के हक में खडे होने वाले लगे थे । खाने के बाद जब सब लोग जा चुके थे तो चलते चलते मित्रा साहब ने डेनी से उसके बैंक के बारे में पूछा था । समय ब्रांच का हैं, कौन है विशाल कौन? दिशा और सर किसी सरकारी बैंक से आया है । उसके बाद का छह डिग्री हैं । मैं हूँ पर तजुर्बा है । मित्र साथ में कुछ नहीं कहा था । बस हल्का सा से लाया था और अपनी महंगी मर्सिडीज बैंज में बैठ कर चले गए । गिरजा जब अपनी कार लेकर आई तो उसने शरारत से पूछा था ऍम मैं तो नहीं छोड दूँ । फॅमिली हसते उस की गाडी में बैठ गया था । दो दिन बाद मुंबई से बुलावा आ गया था और डैनी अगले तीन दिन बैंक के मुख्यालय में बडे अफसरों से मुलाकातों में मसरूफ रहा था । उसने तफ्सील से अपनी क्रेडिट कार्ड की बिक्री बढाने वाली योजना बनाएगी और साथ ही उनके सामने ब्लॅक सिस्टम में अपनी नई इजाद पेश भी थी । सब ने उसकी बात बडे ध्यान से सुने । उसे बहुत कुछ और करने का हौसला लिया था । डैनी को ऐसा लगा था जिससे सब उसके बुरी हो गए थे । एक हफ्ते बाद विशाल का ट्रांसफर बॉम्बे हो गया था । बॉर्डेक्स समंदर में उसे छोटी सी मछली बना दिया गया था । विशाल कोइल महीना था । उसको उखाडने के पीछे गुपचुप ढंग से मित्रा साहब का दामाद लगा था । रात को जब उसने गिरजा को खबर सुनाई तो इतनी जल्द प्रांत हेड बनने पर वह हैरान रह गई । प्रसाद में दैनिक की तरक्की से बहुत खुश भी हुई । मित्रा साहब ने बात अपने तक ही रखी थी ।

अदभुत प्रेम की विचित्र कथा - Part 11

ग्यारह डैनी तरक्की पाकर बेहद खुश था । मुंबई में आला अफसरों से आंख मिलाकर साहस और आत्मविश्वास से उसने अपनी बात कही थी । मन ही मन उसे अपनी कारगुजारी पर फर्क था क्योंकि बिरला ही कोई रंगरूट पहले ही दौर में इस तरह की कामयाबी अपने नाम दर्ज करा सकता था । उससे सिर्फ माँ को मुंबई में हुई बातचीत का पूरा ब्यौरा दिया था । हर एक छोटी बडी बात उसने बताई थी । उसने बताया था कि अब उस की तनख्वा पच्चीस हजार से बढकर पैंतीस हजार हो गई थी । बॉक्स भी बढ गए थे । बैंक में पहली बार ऐसा हुआ था कि किसी को इतना बडा प्रमोशन मिला था । डैनी माँ के आगे शेखी नहीं बनाना चाहता था पर अपनी कामयाबी बयां करने से अपने को रोक नहीं पाया था । शायद माँ को सुनने के जरिए वो खुद मुंबई के लम्बे दोबारा जीना चाहता था । माँ कई बार आपने खुशी के आंसू रोक नहीं पाई थी । उन्होंने बेटे को बाहर बार दवाई दी थी और ऊपर वाले का शुक्रिया अदा किया था । लाड दिखाने का उन का यही तरीका था । डैनिका भी दिल भर आया था । माँ से लंबी बातचीत से जो भी बेचैन हो उठी थी उसने माँ के हाथ से फोन छीन लिया और पूरे सुर में चाहती थी । इस बार मेरे को क्या मिलेगा? भैया अरे अभी तो स्कूटी दी है तो ये बहुत नौकरी मिलने पडती थी । मुझे इस बार कुछ बढिया चाहिए । अच्छा बहना, बढिया दूंगा । तेरे लिए भावी लिया हूँ क्या? युवती चौक गई थी उसने बोलने की कोशिश की थी पर आवाज फस गई थी । अचानक भाभी का जिक्र उसके गले नहीं उतरा था । उसने फोन माँ को दवा दिया था । नहीं है मेरे लिए भाभी ला रहे हैं । वो बुदबुदाई थी माने फोन को ले लिया था पर कुछ पल वो भी संसी खडी रह गई थी । ये ज्योति क्या कह रही है दिन हूँ । उन्होंने आखिरकार पूछा था कुछ नहीं आॅस्कर बात टाल दी थी । मैं तो इस की खिचाई कर रहा था । देखा भाभी का नाम सुनते ही घबरा गई । पता नहीं क्या करेगी जब वो वास्तव में आ जाएगी । सैनी ने ढाका लगाया था परमाणु मैं दो चार दिन बाद घर आ रहा हूँ । मैं सोच रहा था अब आप लोगों के लिए अच्छा सा घर किराए पर ले देखो । देखो नामक करना हो तो मेरे लिए पिताजी और ज्योति के लिए मुझे इतना तो करने दो । वो अपने द्विवेदी अंकल है ना की प्रॉपर्टी का काम करते हैं । उन से कहो तीन चार हजार रुपए का कोई मकान तलाश कर रहे हैं । वहाँ को गश्त आ गया था । चार हजार इतना महंगा तो पागल हो गया है क्या दिनों? हाँ, तुम्हारा बेटा नालायक नहीं निकला है । इतना तो आसानी से कर सकता है । बाहर होने लगी थी । साथ में खडी ज्योति भी । दोनों खुश थी । उन का दिन लोग इतना कामयाब हो गया है कि अपने बूते पे उनको दो कमरे के तंग मकान से रिहाई दिला रहा है । तीन चार हजार का किराया देने को तैयार है । पिताजी पास बैठे सब सुन रहे थे, पर उन्होंने कुछ नहीं कहा था । बेटे की पेशकश नाम का सीना फूला दिया था । ब्रांच हेड की कुर्सी संभालते ही डैनी ने अपने को काम में झोंक दिया था । अनुभव विशाल के वक्तव्यों से खाली बैठना पडा था और उस दौरान उसने बैंक के कामकाज में दिक्कतों को नामजद कर लिया था । अब उन पर अमल करने का समय आ गया था । उसे क्रेडिट कार्ड बिक्री को बढाकर बैंक के अफसरों को अपना मुरीद बनाना था । साथ ही अलग अलग विभागों को उसे ऐसी पटरी पर डालना था और ब्रांचों के लिए मिसाल बन जाए । दैनि ने मुख्यालय से असिस्टेंट मैनेजर की भर्ती के लिए कहा था । वहाँ से यहाँ आने के बाद उसने अपने जैसे एनडीए वालों के आवेदनों को खारिज कर दिया था । बैंक में कैश लो और ट्रेजरी ऑपरेशन का तजुर्बा रखने वालों को रख लिया था । उसके आते ही डैनी ने उनसे कमर तोड मेहनत करवाई थी । वो उसे पढना चाहता था । आदमी खराब निकला था । हर बार उसने देने की उम्मीद से ज्यादा ही करके दिखाया था । बैंक के रोज मर्रा का काम अब वो संभाल सकता था और डैनी अपना समय नेटवर्किंग में लगा सकता था । डैनी ने अपने स्टाफ में भी कई फेरबदल किए । निशा कोसने नए असिस्टेंट मैनेजर के साथ लगा दिया था और कैश का नया सिस्टम लागू करने के बहाने उसे देर शाम तक दफ्तर में बैठने के लिए मजबूर कर दिया था । निशा को अच्छा नहीं लगा था । बडा खुश था कि वह दुखी हो रही थी । आखिरकार विशाल के आने पर सबसे ज्यादा ताली उसी ने बताई थी । मोना को उसने रिसेप्शन से हटाकर क्रेडिट कार्ड की टेलीमार्केटिंग में डाल दिया था । रिसेप्शन पर मुस्करा मुस्कुराकर लोगों से काफी मेलजोल बढा लेती थी । अब्बू से ऐसे नहीं करने देगा मोना को मार्केटिंग सख्त ना पसंद थी इसलिए उसने उसको वहाँ लगाया था । विशाल की पार्टी का सारा इंतजाम मोना ने किया था । ट्रेनिंग जानता था । मोना को मालूम है वो खुन्नस निकाल रहा है । वो परेशान थी और इसलिए दुखती रग पर बाहर रखने से भी नहीं चूकता था । हर शाम काम का जायजा लेने के बहाने वो उसे अपने केबिन बुलाकर कॉफी पिलाता था । होना जाने से कतराती नहीं थी, रहने के लडके को समझती थी और इसीलिए गैर पालने की बजाय उसने डैनी को माफ कर दिया । वैसे मोनाको विशाल से ज्यादा दे नहीं पसंद था और अगर हालात अलग होते तो उसी के साथ खडी होती है । पर विशाल के समय की अपनी मजबूरियाँ थी । अनुभव का जाना और विशाल का आना तय था । अनुभव ज्यादा दिन नहीं चल सकता था जबकि विशाल लंबी रेस का घोडा लग रहा था । डैनी ने एका एक बरसात पलट दी थी । यानी सप्ताह के अंत में घर गया था जहां उसने मन भर कर माँ के हाथ का बना खाना खाया था । ज्योति के साथ खूब मस्ती की थी और जमकर सोया था । पिताजी ने मुंबई की मुलाकातों के बारे में जो भी सवाल किए थे उसका जवाब डैनी ने बढ चढ कर दिया था । उसने पिताजी को अपने जैसे पेशेवर लोगों के खर्चीले रहन सहन के बारे में अवगत कराया और आगाह किया था कि आज नहीं तो कल उसको बीस तहजीब का हिस्सा बनना पडेगा । मेरी ख्वाइश अगले पांच साल में वाइस प्रेजिडेंट बनकर एक लाख रुपए महीना कमाने की है । उसने देवकीनंदन के सामने अपनी इच्छा का बेबाक खुलासा किया । वो चुप रहे थे । कमाने और उडाने की नई लालसा पर उन्होंने अपनी राय जाहिर नहीं की थी । द्विवेदी अंकल ने एचआईजी मकान तलाश किया था । उसमें नाम था और गाडी खडी करने के लिए ग्यारह भी था । डैनी को मकान पसंद आया था और उसने फौरन सामान शिफ्ट करा दिया था । डाॅटर्स छत वाले दो कमरे के तंग मकान से निजात मिल गई थी । घरा उसके आने जाने के लायक हो गया था । गिर जा से मांगी हुई गाडी में बैठने से कुछ देर पहले दैनिक माँ को बताया था कि उसको दिल्ली में एक लडकी पसंद आ गई थी । आप लोग भी उसको देख लेंगे । अगर आपको ठीक लगती है तो फिर आगे सोचते हैं । मेरे को अगर पसंद है तो मुझे भी पसंद आएगी देना । उन्होंने बिहार से स्कूल चिपका लिया था तो अपनी पसंद देख हमारी चिंता मत कर । कुछ देर डैनी माँ की छाती से लगा रहा था । उसका दुलार पाने के लिए वह कुछ भी कर सकता था । पर बेटा इस बात का ख्याल रखना की जोडी बराबरी की होनी चाहिए । माँ ने उसका चेहरा उठाते हुए कहा था मुझे जिंदगी में अगर सिर उठाकर चलना है तो तेरे दोनों पर एक जैसे होने चाहिए । अगर कोई छोटा या बडा हुआ तो तू लडखडा जाएगा । दैनिक फिर उनके गले लग गया था । महान उसको सर पर हाथ फेर दिया था । कोई जल्दी नहीं है । बेटा उसको ठीक से देख समझ ले और तब तू जब कहेगा हम भी उसे आकर देख लेंगे । पैसे मेरी भी नजर में कुछ लडकियाँ हैं । उन्होंने मुस्कराकर कहा था हम पहले से देख लो बाकी लडकियों की बात हम बाद में करेंगे । ठीक है तो पिताजी को लडकी वालों के घर का पता पता बता जा बाकी तहकीकात खुद कर लेंगे । दैनिक कहना तो चाहता था कि मित्रा साहब पिताजी की पहुंच से बाहर हैं । उनके बारे में जानने के लिए महंगी मैगजीनें खरीदने पडेंगे जिसमें उनके फोटो और इंटरव्यू छपते थे । स्कूल की लाइब्रेरी बेटा ऐसी मैं जिन आप ही नहीं थी, जिनको पढकर मित्रा साहब जैसी शख्सियत से वो वाकिफ हो पाते । पिताजी से उसने शादी के बारे में कोई बात नहीं की थी । उसको तो माँ के मन में डालना था । इनका दिन हूँ । अपनी पसंद की लडकी से शादी करेगा । फिर कुछ समय बाद गिरिजा उसके घरवालों के बारे में वो थोडा थोडा बताना शुरू कर देगा । उनको अमीर खानदान की बहू लाने के लिए तैयार करेगा । पैसे भी गिर जाए और उनका रिश्ता दूर का ही रहना था । क्योंकि नौकरी की भागदौड उसे घर से अलग रखने वाली थी । असल और कारगर रिश्ता तो उसका और गिरजा का बनना था । उसका और बित्रा साहब और देसाई साहब का बना था । मगर देसाई साहब ने गिर जा के बारे में सोच लिया था । उनके बीवी एक साल से अपनी बेटी को बहाने पर आमादा थी । मैं आलोक कब और इंतजार नहीं कर सकती हूँ । वो एक दिन अचानक भडक उठी थी । उन्हें कॉल खेलने से फुर्सत नहीं । बेटी शादी लायक हो गई है । पर उनसे क्या तुम फौरन लडका तलाश हूँ क्योंकि मुझे गिरजा की शादी कर रही हैं । देसाई साहब खोज में लग गए थे और जल्द ही कई रिश्ते आ गए थे । उनमें से एक उन्हें बेहद पसंद आया था । लडका आईआईएम अहमदाबाद से था । अट्ठाईस साल का उसके पिता एक विदेशी कंपनी के चेयरमैन थे और वह बंगोली भी थे । गिरजा की माँ लडके से मिलकर इतना जोश में आ गई थी कि हीरो का कडा देकर तुरंत रोकना चाहती थी । एन वक्त पर देसाई साहब ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया था । पहले गिरजा से तो मिलवा तो उन्होंने प्यार से झटका था । उसके हाँ कहने के बाद ही कोई रस्म करना । गिरजा उसी इतवार को अनमोल से मिली थी जब डैनी उसकी कार लेकर अपने घर गया था । गिर जा की माँ से नहीं बताया था कि वो उसे अनमोल से मिलवाने के लिए बुला रही है । बस इतना कहा था कि दोपहर के वक्त आ जाना । शादी की बात करने से पहले वो देखना चाहती थी कि गिर जाए और अनमोल आपस में कैसे घुलते मिलते हैं । पैसे भी गिर जा । जब भी लडकी थी जिसको मन मर्जी से ढाका नहीं जा सकता था । सिर्फ प्यार से सही रास्ता दिखाया जा सकता था । गिरजा और अनमोल की खूब बनी थी । अनमोल उन लडकों में था तो बडी नफासत से अपनी बात कहने और उसको मनवाने का होना रखता था । वो जानता था किस वक्त हाँ में हाँ मिलानी है और कब और कैसे न कहना है ना एक दफा की कोई सलीके से पेश करता था कि सुनने वाला उसकी अदा पर फिदा हो जाता था । अनमूल की विदेश यात्राओं के किस्से और नौकरी की अलबेली कहानियाँ गिरजा को खूब पसंद आई थी । उसने ऐसा समा बांधा की गिरजा एक मन होकर उसको सुनती रही थी । अपनी माँ के घर पहली बार उसे ऐसा मेहमान मिला था जिससे मिलकर उसको अच्छा लगा था । अनमोल ने मौका देखकर उसको अगले द्वार सात कॉफी पीने की दावत भी दे दी थी । गिर जाने फौरन हाँ कर दी थी । ऍम कैसा लगा? गिरजा की माँ ने बाद में पूछा । बहुत अच्छा गिरजा चाहती थी तो फिर हम उसके घर वालों से बात करें । जल्दी क्या है देखती हूँ । बुधवार को पहले से मिल लूँ फिर बताउंगी नहीं उन जल्दी नहीं डालेंगे । लेकिन तुम अपना मन जल्द से जल्द बनाओ । ऐसे लडके रोज नहीं मिलते हैं । मालूम है वहाँ अनमूल बहुत अच्छा है हूँ । वो माँ के गले लग गई थी । मैसेज देसाई को लगा था जैसे उनके सर से बहुत बडा बोझ उतर गया था । जो का मित्र साहब नहीं कर पाए थे उन्होंने आसानी से कर दिया था । वैसे भी ये किसी काम के लायक नहीं थे । बस खेल सकते थे । मैं सरदेसाई ने गुस्से से अपनी गर्दन झटक दी थी । डैनी रात ग्यारह बजे सहारनपुर से लौटा था । गिरजाघर पर नहीं थी तो टेलीविजन देखने बैठ गया । उसने अपना काम कर दिया था । घर वाले बेहतर रिहाइश में पहुंच गए थे और शादी का इरादा भी उसने उनको बता दिया था । अब कुछ दिनों बाद सबको दिल्ली बुलाकर वो देखा दिखाई भी पूरी करवा देगा और उसके बाद सहारनपुर में छोटी सी मंगनी की रस्म हो सकती थी । दैनिक ध्यान शादी पर चला गया था । मित्रा साहब अपनी बेटी की शादी जरूर बडे धूम धडाके से करना चाहेंगे । उनके बहुत सारे रिश्तेदार, दोस्त और जानने वाले इसमें शिरकत करने के लिए बेताब होंगे । सभी ऊपर के तबके के नामीगिरामी लोग होंगे और उस की तरफ से ऐसा कोई नहीं होगा । डैनी ने मनी मंत्री अपने मेहमानों की फेहरिस् बनानी शुरू की थी और फिर उसमें से ढेरों नाम कार्ड भी दिए थे । ऐसे लोगों को बनाने से क्या फायदा था? शादी की शानशौकत बचाना पाएं और अपनी हैसियत दिखाकर सबको शर्मिंदा कर रहे हैं । गिरजा आधी रात के बाद लौटी थी । उसके चेहरे की लाली और चहक बता रही थी कि ब्लडी मैरी की संगत खूब रही थी । ऐसा नहीं था वो रोज पीती थी पर जब भी मेरी जी से मिलना होता था तो अच्छी चलती थी । दैनिक को हल्की सी तुमने गिर जाता । दिलकश रख दीजिए । ब्लडी मैरी कॉम टमाटर का रस उसके गालों पर चला जाता था और बहुत का उसकी आंखों में चमक खोल देती थी । जिससे गिरिजा का अलग पन खेल होता था । वो मस्त हो जाती थी आई उसने आते ही डैनी को बाहों में पढ लिया था । कब आएगा एक घंटा पहले कैसा है सब बढिया और हमारा दिन कैसा रहा? फिर उस की गोदी में असर गयी । उसकी आंखों में शरारत कह रही थी । आज दोपहर में मम्मी के घर गई थी और वहाँ बहुत दिलचस्प लडके से मुलाकात हुई । उसके आस मारते हुए कहा था, हाँ आया अहमदाबाद का है । मम्मी ने उसे खाने पर बुलाया था तो ऐसे नहीं मुलाकात उसने सहजता से पूछा था । पर आई एम के चार लाख चार बार उसके सीने में खंजर की तरह कर चुके थे । अच्छा लगा । मैंने उसे भी बता दिया है कि वह मुझे अच्छा लगा है । बढिया दैनिक बुलाया था और मैं उस से शादी भी कर सकती हूँ । उसने आधी बंद आपको से झांककर इरादा जताया था । डैनी चौक गया था नहीं नहीं कर सकती है तो वही मुझे शादी हो चुकि है । उसकी आवाज कुछ ऊंची हो गई थी । गिरजा उसकी गोदी से उठ खडी हुई थी । हमने शादी करने का फैसला किया था और फिर कर ली थी । अब हम कुंवारे होने का फैसला कर लेते हैं । जब हम अपने को बिहार सकते हैं तो अनबिया क्यों नहीं सकते हैं? नहीं तो है इसमें परेशानी क्या है? डैनी उसका तरफ सुनकर सन्न रह गया था । पर मैं कौन हूँ? उसने हडबडाहट में पूछा था मेरे बारे में कुछ बताओ जो सच है । मतलब दैनिक खुला का खुला रह गया था । बताएंगे हम कुछ दिन साथ रहे थे । धोनी के पैर कहाँ गए थे? उसने प्रसिद्ध दीवार से टिका दिया । गिर जाने मोहब्बत से उसके बालों में उंगलियां विरोधी थी । मैंने कहा था वो मुझे अच्छा लगा है । तुमसे भी तो प्यार करती हूँ पर तुम शादी करने की बात कर रही थी । हाँ भी सकती हूँ । अभी क्या मालूम क्या होगा । गिर जाने कम थे । उसका आए थे और बेडरूम की तरफ चल दी थी । दैनिक उसका हाथ पकड लिया था । क्या तुम्हारा मन मेरे बारे में अभी विपक्षा नहीं है, पर बुधवार तक देखते हैं दैनिक का माथा चूमकर वह बेडरूम में चली गई थी । दैनिक अखबार था । कुछ देर बाद वह से जरूर पुकारेगी पर उसके डर से कोई आवाज नहीं आई थी ।

अदभुत प्रेम की विचित्र कथा - Part 12

बारह डाॅ । अपने दफ्तर में बैठा था और उसकी नजर सामने लगी पेंटिंग पर टिकी हुई थी । पेंटिंग की पृष्ठभूमि में पीठ टिकाए हुए एक लडकी इत्मीनान से बैठी थी और सामने की तरफ नथुने फुलाए हुए एक रौबीला घोडा अपने अगले पैरों को हवा में उछाल रहा था । दोनों आकृतियों के चारों तरफ गहरा लाल रंग फैला हुआ था और किनारों पर पीले रंग के कुछ छोटे थे । पता नहीं किसने पसंद करके उसको दफ्तर के लिए खरीदा था और कमरे में लगाया था । डैनी ने उस पर कभी ध्यान नहीं दिया था । आज आज इसकी नजर हट नहीं रही थी । उन गाडी चलते रंगों में अजीब सा सम्मोहन था । तेज इतनी कर रहे थे । ठीक उसी तरह जैसे गिरजा का गोरा रंग गहरी नीली मखमली चादर पर बिखर कर करता था । गिरिजा अमूमन अपने घुटने हल्की से मोड कर लेती थी और फिर उसकी तरफ शैतानी भरी आंखों से देखती थी । उसकी ज्यादा पैसा जादू था कि डैनी आप ऐसे बाहर हो जाता था और जब गुलाबी चादर पर लेती थी तो बेहद मासूम लगती थी । चादर का गुलाबी रंग उसके पदन परछा जाता था और वो कोई आसमानी शहजादी सी लगने लगती थी । सफाई चौदह डैनी को पसंद नहीं थी । गिरजा का गोरापन उसमें मिल जाता था । सब सपाट हो जाता था । नीला और गुलाबी रंग दो अलग तरीके के जज्बात जगते थे । नीले में ली जाने का मन करता था तो गुलाबी का शुरू देर तक रहता था । पेंटिंग का मस्त घोडा और उसके आसपास का चटक लाल रंग लिन्ने वाला जज्बा जगा रहा था । कृषि रात को सोना नहीं था । गिरिजा की बातें कानून घूम रही थी । उसका रवैया बार बार उसकी आंखों के सामने ना जाता था । हो सकता था गिर जा के जुबान पर ब्लडी मैरी चढकर बोल रही थी । उसने अपने को समझाने की कोशिश की थी । पर जिस तरह से शादी की बात की थी उससे साफ था तो सोच में पड गई थी । डैनी बखूबी जानता था कि गिरजा फैसले लेने में देर नहीं करती थी । वो बेबाक और निश्छल थी । बीती रात हुई बातों को वो इसलिए मजाक में नहीं ले सकता था । वो उसके साथ होते हुए भी किसी और के बारे में गंभीरता से सोच रही थी । और क्या वो ऐसी लडकी थी । गिरजा से अलग हो जाने के खयाल नहीं । उसे हिला दिया था वो अभी अभी तो मिली थी । मित्र और देसाई साहब भी गजब की किस्मत से उसकी जिंदगी में आने वाले थे और अचानक सबकुछ मिट्टी में मिलता हुआ दिखाई दे रहा था । एक पल उसकी तिजोरी लबालब भरी हुई थी और दूसरे ही पल लूटी पडी थी । ठीक वैसे जैसे किसी बैंक में डकैती पड गई हूँ । अनमोल ने उसकी तिजोरी लूट ली थी और वो कुछ भी नहीं कर सकता था । बस धक्का वक्ता सा खडा गुवार देख सकता था । अब उसको फिर से सिर आप पकडना पडेगा पर कौन सा और कहाँ से इसको पकडेगी उस था । अचानक बोलना कमरे में दाखिल हुई थी । डैनी ने लपक कर चमकदार मुस्कान कोड नहीं सब ठीक है ना सर वो उन्होंने खैरियत जानी चाहिए थी । आप अपने सिर को ऐसे ही ला रहे थे जिससे उस पर कोई बोझ आ गया हूँ और कुछ नहीं आॅस्कर कहा था । कुछ देर पहले जो पडा था और दिमाग में मच्छर की तरह बन बना रहा था, उसी से छुटकारा पाने की कोशिश कर रहा था । अब तो माँ गई हो तो उनको पेश कर देता हूँ । हाँ जरूर उन्होंने उत्साह से कहा था तो किस्सा यू है । एक आदमी अपनी फॅमिली के साथ बैंक में था । डाॅन लुटेरा उसमें घुसा चाहूँ जल्दी से जमीन पर लेट जाओ, चिल्लाया, ऍफ उठाई और आंखे बंद करके जमीन पर लेट गई । कुछ देर तक जब उसे कोई हरकत महसूस नहीं हुई कुछ ना आपके खोलकर बहुत करूंगा और देखा वो उसके बगल में ही पडे हैं पास मैं यहाँ हूँ । आप वहाँ कहाँ पडे हैं? ऍम ही हो रही है । ऑफिस पार्टी नहीं चलाई जो उसका उठाकर लग गई है । डैनी का चुटकुला सुनकर मोना खो फंसी थी । वो हसते हुए अच्छी लग रही थी । डॅान फिर से देखा और इस बार उसे शरारत सी महसूस हुई थी । होना गिरिजा का मुकाबला तो नहीं कर सकती थी पर बुरी भी नहीं थी । उसकी कशिश अलग थी, बोला है । उसने आहिस्ता से कहा काफी अरसे से हमारी बात नहीं हो पाई है । मैं दफ्तर के कामों में इस कदर फंस गया था कि तुम्हें लंच पर या शाम कि ड्रिंक पर ले जा नहीं सका कि आज शाम को नहीं चले तो नहीं । चलो चलते हैं वो ना फौरन तैयार हो गई थी तो फिर आठ बजे लाउंज बार में मिलते हैं । कुछ तय कर दिया था । डैनी ने बोला तो यूँही कह दिया था शायद उसकी खुशनुमा । हसी ने उसे मोना के साथ वक्त बताने के लिए उकसाया था, गिर जाता है । सुबह ही फ्रिज पर संदेश लग गई थी कि वह रात डैडी के घर रहेगी । उसका जन्मदिन था । उसके बाद डैनी ने रात अपने फ्लैट में बिताने का फैसला किया था । शुरू में वो अपना फ्लैट छोडकर पूरी तरह से गिर जा के घर में बस में जा रहा था । पर काम के चलते उसको खाली करने का मौका नहीं मिला था । चन्दन पहले ही उसने फ्लैट में सफाई भी करवाई थी । गिरजा से दो अपने बिस्तर पर अकेले ही रात काटना चाहता था । मोना के आने से दैनिक ध्यान गिरजा से हटकर आपने पराठे का था । आपको गिर जा के फैसले का इंतजार नहीं कर सकता था । उसे फौरन से पेश्तर अपने को महसूस कर रहा था । इससे पहले की गिरजा मित्र साहब को अपनी नई पसंद बताए और फिर मुंबई में बैठे अफसरों को पता चले कि मित्रा साहब का हाथ अब उसके सिर पर नहीं था । उसे तेज हरकत करनी थी, ऍम बढा लिया था । उसने पहले मुंबई में वायॅर को फोन मिलाया और अपने क्रेडिट कार्ड डिवीजन के बारे में बात करने के लिए वक्त मांगा । उन्होंने उसे दो दिन बाद का समय दे दिया । डाॅट सिविल से बात की और उन्हें अपनी बिक्री के बारे में बढा चढाकर बताया था । मैं आप से मिलकर बिक्री को और बढाने के बारे में बात करना चाहता हूँ । आप मुझे सही रास्ता दिखा सकते हैं । उसने अदब से कहा था उन्होंने भी इसको वक्त दे दिया । बीच में डैनी ने मित्र साहब के दफ्तर फोर मिलाया था और जन्मदिन की मुबारकबाद उनके सैकेट्री के पास छोड दी थी । उनसे सीधे बात नहीं करना चाहता था । बेटी के लिए हुए जख्म अभी भरे थे । मित्रा साहब के आगे अपनी मौजूदगी दर्ज कराकर वो कुछ नंबर बनाना चाहता था । जिन्हें वक्त बेवक्त वो कभी भुला सकें । रहने का मन कुछ अच्छा गया था तो दिल्ली से दूर भाग जाना चाहता था । फिर जा के सलूशन उसका दिल दुखा दिया था । दूर जाकर ही इस गम से निजात मिल सकती थी और वक्त रहते किलेबंदी करके तो पूरी हार से बच सकता था । मुंबई में बैठे अफसरों का दोहन तब तक हो सकता था जब तक डैनी उनकी आंखों का सारा बना हुआ था । उसके पास इतवार तक का समय था । उसके बाद होने आंखों में बडी किरकिरी की तरह खटक नहीं लगेगा । तीनों फोन मिलने के बाद मैंने पूरा दिन क्रेडिट कार्ड, मुँह की बारीकियां ढूंढने में लगा रहा था । उसने हिंदुस्तान भर की ब्रांचों से क्रेडिट कार्ड बिक्री के आंकडे चबा डाले थे । पर फिर भी जब मन नहीं भरा था तो एशिया को भी अपनी गिरफ्त में ले लिया था । आंकडों से साफ था ये सब ब्रांचों से कहीं ज्यादा बिक्री उसकी ब्रांच में हुई थी । उनको और गौर से देखते हुए उसकी नजर हांगकांग पर टिक गई थी । हांगकांग कमीश् है और उसका बैंक वहाँ कुछ नहीं कर पा रहा था । उसने दिल्ली के बाजार को दोबारा से पढना शुरू किया था क्योंकि उसे लगा था कि दोनों बाजार बहुत मिलते जुलते थे । जल्दी इसकी समझ में आ गया । दिल्ली के लिए बनाई गई उसकी रणनीति कुछ फेरबदल करके हांगकांग में भी कारगर हो सकती है, दैनिक होगा और कुछ देर सोचता रहा तो कह सकता था की बिक्री बढाने की रणनीति दिल्ली में कामयाब हो चुकी थी । अब आधारभूत चीजों को और सरदार तरीके से लागू करके बढत को बस बरकरार रखना था । उस ने नया रास्ता खोल दिया था । अब उसे एक नई चुनौती की सरकार थी । एक नए परिवेश में वो अपने को आजमाना चाहता था । दक्षिणपूर्व एशिया के लिए वो तैयार था । उसने सोचा वो कहेगा कि दक्षिणपूर्व एशिया नया उभरता बाजार है । पर बैंक के सिर्फ यहाँ मौजूदगी काफी नहीं थी । बैंक को अपना काम इस तरह से बढाना पडेगा । इससे ग्राहकों की सभी जरूरतें एक छत के नीचे पूरी हो जाए । क्रेडिट का ऐसी ही जरूरत थी । पर एशियाई लोग प्लास्टिक मनी को लेकर सहज थे । उसका मॉर्डल वो कहेगा । इस मानसिकता को पर लेकर चीजें बडे कॉरपोरेट घरानों के पास जाएगा और उनके जरिए प्लास्टिक मनी को आम लोगों की जिंदगी में खोल देगा । दिल्ली में वैसा कर चुका था । हांगकांग में भी कर सकता था । उसने एशिया में क्रेडिट कार्ड बिजनेस को लेकर नई प्रजेंटेशन पर काम शुरू कर दिया । इसके केंद्र में उसने खुद को रखा । डैनी अपनी अगले को जोडना खूब जानता था । साथ ही गली कूचों में विधायक सालों ने उसे लडना और जीतना सिखा दिया था । गिरने के बाद उठकर पलटवार करने में वो माहिर था । वर्ष पर होने के बावजूद वो शुरू से ही देखता था । निचले तबके के मोहल्ले में रहता था और उसकी दोस्ती मुझे मोहल्ले वालों से थी । उनके उठने बैठने के तरीको को उसने अपने में उतार लिया था । मन मर्जी से अपने को तब्दील करने की कुव्वत उसने अपने में पान ली थी । आपने अमीर दोस्तों से उन के तौर तरीके, हावभाव और जुबान जुमले के साथ मिलता था । वो किसी से कम नहीं था । उसका एलआईजी होना महज एक बीच का दौर था । उसमें ज्यादा जरूर हुआ था और उसकी जिंदगी कहीं और बीत नहीं थी । अपने को लेकर उसका यकीन रहेंगी । जैसे दोस्तों से मेलजोल में साफ नजर आता था । मगर मिल जाए फिर जाने से झटका दे दिया था । खुशकिस्मती चलकर उसके पास आई थी और फौरन ही उसे बेरहमी से नोचकर दूर फेक दिया गया था । जब गिर जाने उसमें दिलचस्पी दिखानी शुरू की थी तो वह हैरान रह गया था और जब उसे उसके संबंधों का पता चला था तो उसे उसे घर आ गया था । अच्छा खाना अच्छे दिन आसमान से टपक पडे थे । उनमें हो गया था । भूल गया था कि अगर कुछ अच्छा लगा सकता है तो अचानक जा भी सकता है । पर हो गिरजा का साथ वस्तुओं में चाहता था, उससे प्यार करता था । उसको अपनी मोहम्मद पर जितना यकीन था, उससे ज्यादा गिर जाता था तो उसमें ऐसा क्यों किया था? क्या वो उसे इस्तेमाल करके फेंकने वाली थी? लेकिन हांगकांग वाली सूचना उसका मन खुश कर दिया था । उसे विश्वास था कि वह बखूबी इस मौके का पूरा फायदा उठा लेगा । अगर से मुंबई से हाँ नहीं जाती है तो फिर जैसे उसका हिसाब बराबर हो जाएगा । वैसे अपने जख्म पर मरहम लगाने का एक और तरीका भी था । उसके पास आठ बजे डैनी मौसे लाउंज में मिला था । उसने जमकर पी थी और मोना को खूब मजा आया था । दस बजे के करीब उसने मोरों से खुलकर फ्लाइट करना शुरू कर दिया था और ग्यारह बजते बजते उसने अपने फ्लैट में चलकर आखिरी पैक पीने की दावत मोना को दे डाली थी । फौरन राजी हो गई । अगली सुबह घर में डैनी को नाश्ता कराने के बाद मोना दफ्तर गई थी ।

अदभुत प्रेम की विचित्र कथा - Part 13

तेरा डैनी को मुंबई पहली नजर में जज गई । पिछली बार वो बडी हडबडी में मुंबई आया था । उसका दिमाग होने वाली मुलाकातों में उलझा हुआ था । उस को आभास था कि मित्रा साहब ने बैंक के आला अफसरों से उसका जिक्र किया होगा । इसकी वजह से उसको बुलावा भेजा गया था । पर उसके आगे क्या होना था, उसका उसे कतई नहीं था । वो तैयारी करके जरूर पहुंचा था, लेकिन असमंजस में था । इस दिमागी परेशानी के बावजूद उसे मुंबई पसंद आएगी । उसकी रवान की अच्छी लगी थी । शायद वो अरब सागर के उतार चढाव की प्रतिकृति थी । मुंबई सुबह मंद मंद बहती थी । दोपहर को शहर उठाने लेता था । शाम को हिलोरे मारता था और रात को गरजता था । मुंबई समंदर था और समंदर मुंबई । मुंबई का माहौल दिल्ली से एकदम अलग था । दिल्ली चारों तरफ से घेर लेती थी । कुछ तरह दबोच लेती थी की दम घुटने लगता था । मुंबई में दम नहीं होता था । ऍम एक साथ धजी हुई । झुग्गी झोपडियों और गंगनचुंबी इमारतों के बावजूद उसमें खुलापन था । हर तरफ बयार ही बयार थी और जिसमें पैसे की महत्व खास तौर पर शुमार थी । दिल्ली में सत्ता की सडांध थी जबकि मुंबई में एक ही दलाल स्ट्रीट थी । इसमें कारोबार सीधा साफ और ईमानदारी वाला था । दिल्ली में हर गली जलेबी की तरह सीधी थी और दलाल उससे भी ज्यादा कमाओ फिर आऊ थे । किसको किस मोड पढना चाहते वहाँ नहीं जा सकता था । दैनिक दिल्ली से शांति फ्लाइट ली अपने अफसरों से मुलाकात के पहले ही वो मुंबई की रात अपनी बाहों में समेट लेना चाहता था । उसको वो बाॅस होटल में ठहराया गया था । वहाँ का माहौल खुशनुमा था और दक्षिणी मुंबई का नजारा भी वहाँ से बेहद उम्दा था । लडकपन के दिनों में जब ओबराय की शानशौकत के बारे में सुना था, उसका दिल में आप जगह था । एक बढिया सी गाडी उसको होटल में लेकर आई है और दरबान बडे अदब से उसको सलाम करके दरवाजा खोल रहा है । तस्वीरों में उसने ओबराय के शानदार कमरे रेस्ट्रां समुद्र को निहार तो स्विमिंग पूल देखा था और साथ में अपने को वहाँ पर मालिकाना अंदाज में रहते हुए भी निहारा था । आज उसका सपना हकीकत में तब्दील हो चुका था । अब ये शानशौकत उसकी जिंदगी का हिस्सा बन चुकी थी तो खुश था । अपने मुकाम पर पहुंच चुका था । मित्रा साहब के जन्मदिन की बात वाली सुबह को गिरजा का फोन आया था । तो खुश थी कि डॅडी के लिए बधाई संदेश छोडा था । सिलिकाॅन बेटी का गाल थपथपाकर उन्होंने कहा था चिट्ठी के पास मैसेज छोड दिया । उस सीधे मुझे बताई देनी चाहिए थी । इतना तकलीफ क्यों करता है ये साथ ही मित्रा साहब को नहीं पसंद था । उनकी बात गिरजा को अच्छी लगी थी । शाम को जब दैनिक गिर जा के फ्लैट पर लौटा उसका इंतजार कर रही थी । कॅश की पार्टी के बारे में बताया तो डैनी ने मुंबई जाने के बारे में इतना दी थी । बीती रात का कोई जिक्र नहीं हुआ था । दोनों लिपटकर चैन से हो गए थे । परिसर डायरी ने ये नहीं लिया । सब कुछ ठीक हो गया है । गिरजा की बात होने से आगाह कर दिया था । अब सब कुछ अनिश्चित था । जैसे बडे जुए में होता है । वक्त रहते उसको ऐसा दांव लगाना था जिसमें हार में भी जीत हो सके । बडी जीत की उम्मीद नहीं पालना चाहता था । जबकि हो सकता था गिरजा अनमूल के खयाल से हटकर उसके पास वापस आ जाए । अगर ऐसा होता है तो तीनों एक के उसकी जेब में होंगे नहीं तो तो किसी बिहार में अब घाटे कि बाजी में नहीं कर सकता था । वो गिर जाता कभी तोला, कभी माशा वाले मिजाज का पूरा खामियाजा भुगतना से अपने को मैं पूछ रखना चाहता था । दे नहीं । तेरह तक मुंबई की मरीन ड्राइव पर घूमता रहा था । उसके पैर सडक पर तो जरूर थे और उसका दिमाग अपने प्रेजेंटेशन के साथ टहल रहा था । हांगकांग के बाजार के बारे में अगर उसकी सूचकांक कर गयी वो फौरन लंबी छलांग लगा सकता था । निवासी भारतीय से अनिवासी भारतीय बन सकता था । घूमते हुए उसने कल सुबह कहे जाने वाले लडके को घंटों दोहराया था । उसे एक भी शब्द ऐसा नहीं कहना था । इससे बैंक के अफसरों को लगे कि बैंक के नाम पर खुद फायदा उठाने के लिए बेकरार था । दैनिक जब होता लोटा तो काफी थक चुका था पर अपने से खुश भी था । उसके दिमाग में अब सब कुछ साफ था । वो होटल के बाद की तरफ मुड गया । बाहर लोगों से भरा हुआ था जिनको उसने अखबारों और मैगजीन में या फिर टीवी में देखा था । उनके बीच में होना डैनी को पसंद है । ज्यादातर लोग एक दूसरे को जानते थे । दैनिक जैसे गुमनाम चेहरे एक आज ही थे । जल्द ही वो भी अपनी पहचान बना लेगा । ऍर होटलों में लोग उसके नाम से जुडे चेहरे को ढूंढेंगे । उसमें एक बार में कुछ बीआरपी और फिर कमरे में खाना मंगवा लिया । खाने का इंतजार करते हुए उसे जूती का ख्याल आया था । मुंबई से उसके लिए क्या ले जा सकता था । कपडे मुंबई के सबसे महंगे होटल से खरीदा गया पडता उसे जरूर पसंद आएगा । कल मीटिंग खत्म होने के बाद उसके लिए बढिया सा कुर्ता खरीद लेगा और गिरिजा होटल में घूमते हुए उसने दुकान पर कुछ फैशन जूलरी देखी थी । बहुत सुंदर थी पर गिर जा के रवैये के चलते उसको कुछ नजर करना ठीक था । उसने फैसला किया अगर मन हुआ तो चलते समय उसके लिए खरीदारी करेगा । पर मूड के बारे में वो मन बना चुका था । उस की तनख्वा में बडा इजाफा जरूर करवाएगा । हो सकेगा तो प्रमोशन भी करवा देगा । वो लायक थी । उसकी काबिलियत का एहतराम होना जरूरी था । क्रेडिट कार्ड की बिक्री में वो इजाफा ला सकती थी । हम से कम हूँ । असिस्टेंट मैनेजर का पौधा तो उसे मिलना ही चाहिए था । डैनी को याद था । उन्होंने एक बार कहा कि रिटायर्ड होने से पहले अगर वो असिस्टेंट मैनेजर बंदी तो बहुत खुश होगी । टेनिस से खुश करना चाहता था अगली सुधा एच आर के वाइॅन् उसके काहे को वो कागज पर लिखते भी जा रहे थे । आखिर में उन्होंने डैनी को तीन लोग और देने पर अपनी मंजूरी दे दी थी । फॅार बनाने पर भी वो राजी हो गए थे । दैनिक को शाबाशी देते हुए उन्होंने कहा था कि उस जैसे नौजवान कम होते हैं जो अपने नीचे के लोगों में छुपा होना पहचान कर उन्हें सही जिम्मेदारी देते हैं । उनके बता रही डैनी ने मोना को रिसेप्शन से हटाकर टेलीमार्केटिंग में रखकर उसे अपने को साबित करने का मौका दिया था और जब वह खरी उतरी थी उसके सामने नई चुनौती रखने की पेशकश कर दी थी । चलते चलते उन्होंने कहा था कि डैनी ने मुलाजिमों को बखूबी परखा है और ये बात उसके निजी फाइल में दर्ज कर देंगे । एक तरह से वो उसको प्रशंसापत्र दे रहे थे । ऍम मीटिंग से निकला तो स्वयं से बहुत खुश था । उसने पुराने दिनों की खातिर विशाल को ढूंढकर हेलो करना चाहा था । वहाँ कई कतारें थी जिनमें से एक में विशाल बैठा था । वो नामालूम सी जगह पर नामालूम से चेहरा हो गया था । सैनिकों पल भर के लिए उससे हमदर्दी हुआ आई थी । आखिर उसने डैनी को अच्छे से बढता था । सात लंच खिलाया था कुछ बैंकिंग की तिकडमें भी सिखाई थी तो बुरा आदमी नहीं था । डैनी ने उस सहित गर्मजोशी से हाथ मिलाया था और शाम को होटल में फ्रेंड्स की दावत भी दे डाली थी । डैनी ने विशाल के साथ शाम चलती ही निपटा दी थी । सुबह वाइस प्रेजिडेंट के साथ होने वाली अहम मुलाकात के लिए वो अपने को तैयार करना चाहता था । अशोक बिस्तर आदमी था । वो आईआईएम कलकत्ता का टॉपर रह चुका था । बढिया क्रिकेट खेलता था और जब मैंने पहली बार से मिला था अपने क्रिकेट के शौक की जानकारी भी उसे यूज ही दे दी थी । क्रिकेट का जिक्र होते ही अशोक काफी खुल गया था । वैसे भी दिल्ली वाले लडके के बारे में दो बोर्ड के मेंबरान उससे बात कर चुके थे । वो जान गया था की दैनिक रिश्ते रसूखवाले लोगों से हैं । पहुंच के अलावा अशोक को दैनिकी खुद परस्ती और बेबाक सोच पसंद आई थी । अशोक के बारह साल के तजुर्बे की तुलना में दैनिक कहीं नहीं खडा था और इसीलिए वो अच्छा शागिर्द बन सकता था । सिर्फ हैंड के तौर पर अशोक को अच्छी टीम बनानी थी और डैनी उसके लिए माकूल उम्मीदवार हो सकता था । कुछ साल बाद वो एक अहम किरदार बनकर उभर भी सकता था । अशोक ने देने की बात खुले दिमाग से सुनी थी । बीच बीच में उसका सवाल पूछे थे और दैनिक दिए गए आंकडों पर कुछ सवालिया निशान भी लगाए थे । पढाने के पास चीज का जवाब था उसकी खुद एतमाद ही को देखकर अशोक हैरान रह गया था । पैसे आधे घंटे के अंदर ही वो समझ गया था कि दे नहीं । हांगकांग पोस्टिंग के लिए अपनी सिफारिश कर रहा था पर वो जिस नफासत से कर रहा था अशोक को अच्छी लगी । दैनिक वो आगे बढाना चाहता था और आखिरी फैसला करने से पहले ठीक से सोच लेना चाहता था । दैनि अभी बहुत नया था और विदेशी पोस्टिंग अमूमन ऐसे लोगों को नहीं दी जाती थी । चलो अच्छी बात मिलते हैं ये थोडा सोचने दो चार बजे फॅमिली को विदा किया था जब डैनी चार बजे लौटा । अशोक एक मीटिंग खत्म कर रहा था । उसके साथ विश्वास कुमार उर्फ लूटू था । लूटू ठिगने कद का गोलमटोल सा था और उसमें जवानी का जोश भरपूर था । उसने मिलते ही बताया था कि अशोक जैसे पुराने दोस्त के पास इंटरनेट पोर्टल बनाने के लिए बैंक कर्ज की सडा लेने कोई भी चलाया था । वो करोडों रुपए की बात ऐसे कर रहा था जैसे उसके लिए चिल्लर हूँ । अशोक लेता हूँ की बात संजीदगी से सुन तो रहा था । फसाद चाहे था की वो आगे जा चुका था । आखिरकार लूटने अशोक से विदा ली थी और फिर डैनी से गर्मजोशी से हाथ मिलाते हुए कहा था अशोक ने मुझे बताया है तो एक होनहार नौजवान हो । मुम्बई में कहाँ हो? फॅमिली हर मैं भी वही हूँ । ऍम मिलते हैं पर शाम को मेरी फ्लाइट है तो मैं रात दस बजे की फ्लाइट चलेगी । कल सुबह की मेरे को पहुंचना है । दैनिक कहना चाहा था पर लोगों ने आगे कहने का मौका नहीं दिया । हम होटल के बारे में शाम सात बजे मिलते हैं । उन साढे दस के बाद पहली फ्लाइट से दिल्ली जाओगे । फॅमिली में बचने की कोशिश की थी । हम दिल्ली में मिल सकते हैं । वहाँ शायद ज्यादा प्रसिद्ध होगी । नहीं नहीं आज ऍम हो गया है । ऍसे देखा था । चाहे उसे बचा सकता था पर लो टूट ताड लिया था और अशोक से मुखातिब होकर कहा था जो तो अपना मन बनाने में मदद कर हूँ जिससे बात कर रहे हैं । अशोक ने कंधे उसका दिए थे ऍम बाद में मिलते हैं तुम्हारा ना टिकट भी वही मिल जाएगा । उसमें मुस्कराकर कहा था और कमरे से निकल गया था । ऍम दैनिक गहरी सांस छोडी थी फॅार लगता है तो यही चला रहे हैं । अशोक अपनी पीठ कुर्सी से टिका दी थी । एक तरह से ऍम लूडो इस देश के सबसे बडे अखबार के मालिक का बेटा है होगी क्लाॅक बहुत है । दैनिक ऊँट गोल हो गए थे लेकिन मुझे दिलचस्पी की वजह से अच्छा नहीं । हम चावल आराम सेटिंग हो बाकी बातें बहुत बता देगा । अशोक ने फिर दैनिक प्रेजेंटेशन की हार्ड कॉपी निकली और उस पर बात शुरू कर दी । अशोक ने माना कि डैनी ने बडी सूझबूझ और मेहनत से बिक्री में बढत लाने की योजना बनाई थी । नहीं मैं तुमसे तिफाक सकता हूँ । हमारी सोच वाकई काबिले तारीफ है तो मुझे हम समझाने की तैयारी करो । एक डेढ महीना तो लग ही जाएगा । सब कुछ होने में उसने डैनी को दिली मुबारकबाद दी थी । ऍसे बाहर निकला तो उसे ऐसा लगा जैसे वो हवा में तैयार रहा था । अपने पडोसी शकील जरूर था पर एकदम से मंजूरी मिलने की उसे बीस नहीं थी । उन्होंने ऐसा होने में बहुत वक्त लगता था । पहले ब्लॅक देखा जाता था तो उसमें कुछ एक कमियां निकाली जाती थी । इनको ठीक कर दोबारा या फिर दुबारा या चौबारा बात की जाती थी हूँ । उसके बाद और बडे अफसरों के पास राय के लिए भेजा जाता था । इस बीच एच आर वाले भी टंगडी मारने की कोशिश करते थे और अगर इस साल से किसी तरह से निकल गए तो बैंक के प्रेजिडेंट की चिडिया बैठने जरूरत थी । वो अपना वक्त अलग लेते थे । बैंक चाहे देशी हो या विदेशी, ऐसी पोस्टिंग पाना या करवाना कोई मामूली चीज नहीं थी । इसीलिए उसने खुद को अंतिम मंजूरी मिलने से पहले कई बार दिल्ली मुंबई के चक्कर लगाने के लिए तैयार कर रखा था । उसकी योजना नकारी भी जा सकती थी क्योंकि वह इतना सुंदर बेकार नहीं था । बिक्री योजना जैसा अहम काम उस पर छोडा जा सके । कभी कभी ऐसा भी होता था कि बडे अफसर छोटे अफसरों के काम को अपनी सोच बताकर आगे नंबर बना लेते थे, खुद बडा फायदा उठा लेते थे और छोटे का मूड बन रखने के लिए कुछ टुकडे डाल देते थे । मगर अशोक नहीं ऐसा कुछ नहीं किया । उसने भले आदमी की तरह उसका दायर उसे दिया था और बमुश्किल चंद घंटों में ही उसके विदेश पोस्टिंग भी करवा दी थी । दैनिक अपनी शानदार किस्मत पर है कि नहीं हो रहा था । उसके खुश हो गए थे । बार बार ऐसा लग रहा था जैसे वो तो कुछ सपना देख रहा था । असल में अभी बहुत कुछ होना बाकी था । डैनी ने अपने को बमुश्किल संभाला था । ऑफिस के कोने में बैठ कर उसने लंबी लंबी सांसें नहीं । डॉक्टर मन में अशोक कर रहा हुआ दोहराया था । हाँ, उसे ठीक सुना था । उसको हांगकांग पोस्टिंग वास्तव में मिल गई थी । उसका मन यहाँ खेल उठा था तो फोन की तरफ बेतहाशा लगता था । उसे बस घर बात करनी थी । माँ की आवास फौरन सुन्नी थी और ज्योति के भी चार पिताजी भी फोन पर आ जाए और अपनी खुशी जाहिर कर दें । उनकी आंखों में खुशी के आंसू देखने के लिए बेताब था । ऍम गदगद होटल लौटा । दफ्तर में तो सब ठीक रहा था, पर घरवालों ने उसको लबालब कर दिया था । उसकी खुशी के सामने उसकी खुशी कुछ नहीं थी । उसको सैकडों बार दुलारा गया था । माँ तो अपने को रोक ही नहीं पा रही थी । बोलते बोलते रुक जाती थी । उनके आंसू उनके मन की बात आगे कह जाते थे । रहने का दिल भी कई बार भरा था तो उसने घर वालों की उम्मीद से भी ज्यादा कर दिखाया था तो खुश था कि वह खरा उतरा था । लूडो बार में इंतजार कर रहा था । इससे पहले तुम कुछ करूँ उसमें रहने की । घुसते ही कहा था अपना टिकट संभालो, रात ग्यारह बजे का टिकट है । तुम्हारा दैनिक नहीं शुक्रिया बुदबुदाया था और ऍम तो वो एक बिगडैल रही । ज्यादा की लगभग सुनने के मूड में बिल्कुल नहीं था । वो बस ड्रिंक पीने आया था तो अशोक मुझसे कहा था लूटने डैनी के बारे में छोटी मोटी जानकारी पता कर ली थी । उसके बिजनेस स्कूल में कैसे नंबर आए थे । इस समय वह कैसा कर रहा था वगैरह वगैरह । जानकर डैनी को अच्छा लगा की लोड हूँ । ऐसे ही मिलने नहीं आ गया था बल्कि उसने रहने के बारे में पता करने की जहमत भी उठाई थी । ऍम बूम को लेकर बहुत उत्साह था । उसका एक अखबार और एक न्यूज चैनल था । लेकिन दोनों ही साझा विरासत है । वो अपने आप कुछ करना चाहता था और इसके लिए उसने डॉट कॉम बिजनेस चुना था । वो प्रिंट और टीवी को एक डिजिटल फॉर्मेट देना चाह रहा था और उसके लिए उसे ऐसे आदमी की तलाश थी । उसका बिजनेस प्रपोजल बना सके । उसमें डैनी को बताया था । डॉट कॉम का बिजनेस आने वाले सालों में ढेड सौ करोड का होने वाला था और अगर वह शुरुआती दौर में ही उसमें घुस जाता है । आगे बडा फायदा ते था हमारे बैंक से मुझे पंद्रह करोड रुपए चाहिए । मैं अपनी गाडी कमाई का डेढ करोड लगाने को तैयार है । मैं डॉट कॉम वाले बन्दे से मिल जाऊंगा तो तुम्हें इस धंधे की बारीकियां समझा देगा । मुझे पूरा बिजनेस प्लान चाहिए जिसमें तुम्हें रेवेन्यू मॉर्डल पर खास ध्यान देना है । मुझे तुम्हारे बैंक से लोन चाहिए और तुम मुझे ये लोग दिला सकते हो । मैं कुछ नहीं कह सकता हूँ, टोमॅटो का था । मैंने ऐसा काम पहले कभी नहीं किया है । मेरे ख्याल से तो मैं ऐसे किसी से बात करनी चाहिए जो बैंकिंग के नजरिए से इस धंधे को देख सकें । लोटो उसकी बात सुनकर मुस्कराया था और फिर उसके कंधे पर भरोसे से हाथ लगता फिक्र मत करो तो मैं दोस्त बना सकता हूँ । मैं उसे बनावटी अंदाज में कहा था और जोर से हंसा था । हम कर सकते हैं । जीतने वाले घोडे को पहचानने में माहिर हूँ । दसवीं क्लास से घोडों की रेस प्रभाव लगातार रहा हूँ । उसे शरारत से कहा था । दैनिक लो टू से बच निकलने की जुगत सोच ही रहा था कि लोगों से पकड लिया मैं रिपोर्ट तो मैं पंद्रह लाख दूंगा । चेक नहीं क्या? आधा भी और बाकि काम होने पर बैंक से उसका कोई मतलब नहीं होगा । ये मामला हम दोस्तों के बीच ही रहेगा । उसने आखिरी बात पर जोर दिया था । टेनिस के बाद पर दंग रह गया था । कुछ देर तक लोगों को ताकता रहा था । लोगों को लगा था कि उसने बोली काम लगाई है । ओके ऍम उसने अंग्रेजों वाले अंदाज में कहा था तुम्हारे जेब खर्च ही खाते । मैं एक दो लाख और बता देता हूँ । दैनिक फॉर नहीं । हकीकत की दुनिया में लौट आया था । लोग गरम था मौके का पूरा फायदा उठाया जा सकता था । हाँ तो तो यकीन है तुम ठीक आदमी चूना ही होगी । मेरी पसंद कभी गडबड नहीं होती है । डाॅ । फॅार आते हुए कहा था मेरे दोस्त मुझे कोई शक नहीं है कि हम एक अच्छी टीम बनेंगे । फिर से सोच लो ऍम अस सोचने को रहे किया गया है । सब हो चुका है । दैनिक अपना ग्लास फिर भरा और गहरी सोच में डूबता साहब नोटों पर लगा था । यूटूब बेचैनी उसके कुछ बोलने का इंतजार कर रहा था । तो अगर मैं काम शुरू होने से पहले ही तो मैं ऐसी तरक्की बताऊँ जिससे तुम्हारे जेब के पैसे बच जाए तो कैसा रहेगा? ठीक ना गोल मटोल लोटो खुशी से उछल पडा ऍम मैं मारवाडी हूँ हम लोग ऐसी तरकीबें नहीं निकालते रहते तो भूखे मर गए होते हैं । मैं ज्यादा लागत दिखाने की बात नहीं कर रहा हूँ बल्कि उससे भी बडी चालाकी की बात कर रहा हूँ लूट में अपनी आखिर रिकॉर्ड ली थी भर मतलब उसे क्या गई देखते हैं जरूर ऍम फ्लाइट के लिए जब ऍफ पर निकला उसके बैग में माँ के लिए एक महंगा केस और ज्योति के लिए होटल की दुकान से सबसे बडी फॅमिली । उसके कोर्ट की जेब में पांच लाख रुपये भी थे कि लोगों ने पहली किश्त कहकर जबरदस्ती ठूस दिए थे । टैक्सी में चलते हुए डैनी ने बीते दिन के सारे वाकिए को याद किया था और से लगा कि उससे खुश किस्मत और कोई हो ही नहीं सकता था । अशोक से मिलने के बाद पडोसी मंद मंद मुस्कान लिए वो दिन भर घूमता रहा था और चार बैठती कर उस समझना हो गया था उसे अपनी खुदमुख्तारी पर अब यकीन था हवाई अड्डे पर उसने एसटीडी बूथ खोजकर गिरजा को बताया था कि वह देर रात तक ही दिल्ली पहुंच जाएगा ।

अदभुत प्रेम की विचित्र कथा - Part 14

चौदह है । सप्ताह अपने को निपटाने की ताक में था और डैनी भी छुट्टी के लिए बेताब था । उसका दिमाग में काम को लेकर बहुत कुछ चल रहा था । कहीं दूर होने में इतवार को अनमोल के साथ होने वाली गिरजा की मुलाकात भी फडक रही थी । पर यानी ने उस को खास तवज्जो देना बंद कर दिया था । अगर गिरजा को जाना है तो जाए उसे खुद ही फैसला करना था । डैनी कुछ नहीं कर सकता था । डैनी ने पहले सोचा था कि गिरजा से लंबी बात करें । अपनी बात रखें । उसे बताया की उसका किसी और के बारे में सोचना उसे अच्छा नहीं लगा था । वो गिरिजा को बताना चाहता था । उसे गुस्सा आया था, तकलीफ हुई थी, जलालत भी महसूस हुई थी । ऐसा लगा था जैसे उसने उसे इस्तेमाल किया था और मुंबई से लौटने के बाद कुछ भी कहना उसको बेमायने लगने लगा था । वो अपना दिमाग इन सब बातों में नहीं जा सकता था । उसे हांगकांग जाने से पहले बहुत से काम निपटाने से गिर जा से ज्यादा उसको अपने काम रोमांचकारी लगने लगे और फायदेमंद नहीं डेहनी शनिवार दोपहर के बाद से ही लो टू के डॉट कॉम वालों से मुलाकात शुरू कर देना चाहता था । वो चाहता था कि पहले डॉट कॉम बिजनेस को पूरी तरह से समझ ले और फिर रेवेन्यू और बैंक लोन के बारे में अपना काम करें । असल में उसे न तो डॉट कॉम के बारे में कुछ मालूम था और न ही लोनिंग के पेंचों के बारे में उसकी जानकारी थी और उसे अपनी अगले पर भरोसा था । वो जानता था यही अक् लगाएगा । सब परेशानियाँ अपने आप दूर हो जाएंगे । बिजनेस प्रपोजल का पहला खाका तैयार करने के लिए उस ने अपने को चार दिन दिए थे । उसके बाद दो दिन में सब ठीक ठाक करके वो उसको लोटों को पेश कर देगा । छः दिनों में ये काम करने के लिए उसे पागलों की तरह उसमें जुटना था । काम जल्दी खत्म करने की उस पर धुन सवार थे । वो अगले वाले िद्वार घर जाना चाहता था । उसे माँ और ज्योति की याद बहुत बता रही थी । शुक्रवार की रात डेनिंग गिरजा को खाने पर ले गया था तो पूछना चाहता था कि अनमोल के साथ इतवार की मुलाकात पक्की थी या उसने योगी सिर्फ हल्के में कहा था और सवाल जुबान पर ही टिक गया था और उसने उसे फिसलाने की कोशिश भी नहीं की थी । गिरजा से उसकी बातचीत खुशगवार चल रही थी । सवाल के दखल की गुंजाइश नहीं बनती थी । मुंबई में मिली कामयाबी भी दैनिक गिर जैसी साझा करना चाहता था और उसने अपने आप को रोक लिया । हांगकांग की पोस्टिंग के बारे में सुनकर देशा गिरजा बहुत खुश होती, पर अगर वो उसे अभी बता देता तो उसका असर अनमोल को लेकर गिर जा के फैसले पर पड सकता था । अपना दूसरा ड्रिंक लेते हुए उसने सोचा कि गिरजा को उसके बारे में अपना मन सिर्फ इस जानकारी पर ही बनाना होगा कि वह दिल्ली में ब्रांच था । अपनी नई पोस्टिंग के बारे में बताने से लगेगा । जैसे वो विदेश में बेहतर जिंदगी दिखाकर उसे ललचाने की कोशिश कर रहा था । गिरजा को आज का डैनी पूरी तरह से पसंद आना चाहिए था न कि बडी नौकरी पर जाने वाला दे नहीं । रिजा खुश लग रही थी । मैंने उसे हंसने खिलखिलाने के बहुतेरे मौके दे रहा था । ऐसा करने में ब्लडी मैरी उसका बखूबी साथ निभा रही थी । उसके लतीफों पर उद्यम खोलकर हस रही थी तो बातों में पूरी तरह मस्त हो गई थी । दोनों एक दूसरे की टांग भी जमकर खींच रहे थे । जब डैनी ज्यादा खिचाई कर देता था तो गिरजा आपने हो गोल करके रूट जाने का दिखावा करती थी । डैनी को वोट गोल करने वाली अदा इतनी दिलकश लगी थी की का एक घर जा के रसीले होटों के बीच सिगार देखने की तमन्ना उसमें जाग गई थी । कल जो होगा तो होगा पर आज वो गिर जा के साथ अपनी हर तमन्ना पूरी करना चाहता था । वो अभी गिरजा को स्वीकार के कष्ट लेते हुए नहीं हारेगा और उसके बाद घर जाकर उसके लिए नीली रेशमी चादर बिछा आएगा । उस पर लेटी गिर जा के रूपहले मादक जिसमें को अपनी आंखों और दिमाग में हमेशा के लिए उतार लेगा । गिरजा को पीना उसमें सिखाया था । प्यार करना उस ने सिखाया था और अब नए तरीके से ऐश करना भी सिखाने जा रहा था । अच्छी भली लडकी को उसमें एकदम बिगाड दिया था । दैनि ने गिरजा को सिगरेट पीने के लिए राजी कर लिया था । उसने तफ्सील से बताया था कि कैसे सिगार का छोड काटा जाता है, उसको किस अंदाज से जलाया जाता है और फिर होने हॉल कैसे गहरे कश मारे जाते हैं । मैंने खुद कभी स्वीकार नहीं दिया था और फिर भी एक मंझे हुए कश्म । आज की तरह उसने चेहरा सुट्टा लगाकर सिगार गिरजा को थमा दिया था । सिगार मुँह में लगाने से लेकर कश् भरने तक में फिर जा को तमाम मुश्किलात पेश आई । उसके फूहडपन ने उसको और दिलकश बना दिया था । सुख गुलाबी होटों के बीच दबाकर जब वो लम्बे गहरे और पूरे सिगार का कष्ट पडती थी उसकी नौ पर सुलगता अंगारा गिरजा की आंखों कि काली पुतलियों में दो लाल सितारों की तरह चमक उठता था । मासूम सी शैतानी उसकी आंखों में खेलने लगती थी । डैनी ने गिरजा को आप हमारी थी और उसने उसका करारा जवाब दिया था । शैतानियां बढती जा रही थी । डैनी को अपने दिल की धडकनें साफ सुनाई पडने लगी थी । अपनी बढती हुई सांसों पर काबू पाते हुए उसने फुसफुसाया था ये लोग लाइक अ ग्रेट ऍम कल जाने बडी अदा सगार अपने वोटों से हटाया था उसे अपनी उंगलियों से लटकाकर उसकी तरफ झुकते हुए माकूल जवाब दे डाला था ऍम अपनी बेबाक हरकत पर वो खिलखिला पडी थी । लंबे पशुओं के बीच देर तक हस्ती रही थी । ये पहली बार था की दोनों ने बातचीत में अपशब्द कहे थे । मगर ऐसा करने से शाम केहरी खुला भी हो गई थी । दैनिक आप सब कुछ और अच्छा लगने लगा था और इससे पहले की गुलाबी माहौल । कुछ काम हो जाए तो उसकी धडकनों के द्वार में बता जाए । उसे गिरजा को उडा ले जा रहा था । नीली रेशमी चादर बुला रही थी । गिरजा भी माहौल की नरमी में खुल रही थी । बेचैन होकर उसने बिल मंगवाया था और डैनी से सटकर खडी हो गई थी । उसकी आंखों में उस बच्चे वाली जब थी जिसका मन फौरन आइसक्रीम खाने के लिए उतावला हो रहा था । ऍम सुबह जल्दी उठकर दिन भर के काम पर नजर डाली । लोटों का काम वो बैंक बंद होने के बाद करेगा । उसे पूरा ध्यान इस काम पर लगाना था ताकि उसमें चार दिन से ज्यादा न लगे । जैसे चार दिन के काम के लिए पंद्रह लाख रुपए का सौदा बुरा नहीं था । सोच कर वह मुस्करा दिया । पहुंच आ गए थे । वो माँ को दे सकता था । ज्योति की शादी के लिए पांच साल की एफडी में उसको डाला जा सकता था की ऐसा भी कर सकता था की शादी के लिए दो अभी दे दें और बाकी से अपने लिए गाडी खरीद लें । मारुती से कुछ बेहतर घर जाने के लिए वो गिरजा की कार दोबारा उधार नहीं लेना चाहता था । उसके हाथ में पैसे थे, किसी का मोहताज बनने की अब उसे कोई जरूरत नहीं थी । दे नहीं । जल्दी तैयार होकर दफ्तर के लिए आधा घंटा पहले निकल पडा । ऑफिस बिल्डिंग के बगल वाले कार डीलर के यहां पहुंचकर उसने मारुति एस्टीम कि फरमाइश की थी । लाल रंग छोटी मारुति पर ठीक लगता था । बडी स्टीम पर नहीं । उसने काली स्टीम खरीद लें । सुबह की हल्की रोशनी में उत्तम जमाती काली कार में सवार होकर दफ्तर पहुंचा । कार की खरीदने दैनिक अमन खुश कर दिया था । उसकी पिछली शाम और रात बहुत खुशनुमा रही थी और सुबह उसने अपनी पहली गाडी भी ले ली थी । घर पर जो साइकिल थी उसे पिताजी ने अपने लिए खरीदी थी । फिर यानी की जरूरत पूरी करने के लिए उसे दे दी थी । वही साइकिल खरीदने के पैसे नहीं थे । पर पुरानी खस्ता साइकिल सहित बडी कारदार वो एक ही छलांग में पहुंच गया था । अपनी कामयाबी पर उसको ना आस्था, डाॅ मन ही मन गुनगुनाता हुआ दफ्तर में दाखिल हुआ । बोला में उसकी खुशी देखकर वजह पूछे । हाँ बोला बहुत खुश हूँ । मैंने स्टीम खरीदी है और तुम पहली हो जिससे मैं ये बात बता रहा हूँ । उसने उत्साह से कहा था । उन्होंने जब हाथ मिलाकर बधाई दी । दैनिक देर तक उसका हाथ में रहा था । उसे लगा था जैसे कार खरीदने के लिए । उसको गिरजा को भी साथ ले जाना चाहिए था तो बहुत खुश होती है । पैसे भी । कुछ घंटों पहले ही उसने गिर जा के साथ अच्छा वक्त बताया था । गिरजा को साथ में लेकर उसके साथ नाइंसाफी की थी । इसका फोर्स शायद उसे हो रहा था लेकिन फिर उसे अमूल का खयाल आया । जब से मिलने जा रही थी वो भी तो अच्छा नहीं कर रही थी । अफसोस करने का कोई मायने नहीं था । डैनी ने मोना को कॉफी पीने के लिए रोक लिया था । उसको देखकर उसके मन में ऐसे ही खयाल आया था की विशाल और मोना के बीच में भी कुछ था । क्या उसने पार्टी में उन लोगों को साथ नाश्ते हुए देखा था । दोनों खूब हिल मिलकर नाच रहे थे । उनके बीच कुछ भी हो सकता था पर उससे क्या फर्क पडने वाला था । डैनी को जब सहारे की शिद्दत से जरूरत थी तो मोना ने उसका साथ दिया था और अब उस की बारी थी । विशाल जो नहीं कर पाया था वो डैनी नहीं कर दिया था । होता उम्र उसकी अहसानमंद रहेगी । होना अब मेरी बारी है तो मैं बधाई देने की हमारे लिए एक अच्छी खबर है । मेरे पास मुन्ना कि आखिर फैल गई थी और क्या चुपचाप उसके होठों पर आकर ठहर गया था । मैं तो तीन मौके देता हूँ अंदाजा लगा हूँ हूँ तुमने मेरे लिए अमीर बूटा ढूंढ निकाला है । इसके साथ में अपनी जिंदगी आराम से बिता सकूंगी । पुराने घुसकर कहा तुम्हारी खाई सिर्फ व्यक्ति हैं यानी नहीं चढाया था बिल्कुल बूढे अमीर को पटा लेना हर लडकी का सपना होता है वो फालतू की बात मत करो । ठीक से बताओ बोला में गंभीरता से सोचने का स्वांग भरा था और फिर फूट पडी थी शायद मेरा प्रमोशन हो रहा है । ये ही सही पकडा है । डैनी ने शाबाशी दी थी और डीआई पूरा नेजल थामते हुए कहा था मैं तो बेहोश होने वाली हूँ । इतनी जल्दी नहीं । अभी कुछ और भी है मेरे पास तुम्हारे लिए चली बताओ डायरी और ऍम यानि अपनी मेर से उठकर मोना की तरफ गया था और उसने अपना हाथ बढाया था । मोना ने उसका हाथ थाम लिया । होना हमारी जिंदगी का सपना सच होने जा रहा है । तुम जल्दी असिस्टेंट मैनेजर बना दी जाएगी । याद है मेरी शुरुआती दिनों में तुमने मुझसे मजाक में कहा था । इसके बारे में मुझे तुम्हारे लिए ये करना ही था । मुबारक हो । उन्होंने तेजी से अपना हाथ छुडा लिया और डैनी से निपट गई थी । नानी को अच्छा लगा । कम से कम होना तो उसके किए के लिए शुक्रगुजार थी । अगर वो आज आठ बजे तक काम से फारिग हो जाता है तो मुन्ना को खाने पर जरूर ले जाएगा । मोना के जाने के बाद गिरजा का फोन आया था । तुमने जाने से पहले मुझे जगह है क्यों नहीं? उसने अलसाई सी शिकायत की थी । जाने की इतनी क्या जल्दी थी? कुछ काम था क्या? काम था? बताओ मुझे हाँ नहीं । उसके एक एक शब् से प्यार टपक रहा था । कुछ खास नहीं तो मुझे बताना नहीं चाहते हैं क्या? कुछ तो है जो तुम मुझसे छुपा रहे हो । फिर चलो नहीं बताना चाहते हो तो मत बताओ । नहीं इसका था । गिरिजा ने प्यार से फोन किया था । अगर वो उसको लटकाएगा तो वह टूट जाएगी । पटानी ने बहुत बदलने की कोशिश की थी । क्या प्लान है इसका तो मुझे बताना नहीं । चाहते ना उसकी आवाज में खीज उतार आई थी । क्या प्लान है आज का डाॅॅ दोहराया था । यहाँ बताऊँ तो मैं गहरी ने अपने विकल्पों पर गौर किया था । वो उसे खुश देखना चाहता था । चाहता था कि वह चहकती रहे, लेकिन उसकी बात समझकर सीधा जवाब क्यों नहीं देती थी? क्यों अनमोल के साथ इतवार वाली मुलाकात के बारे में उसको पक्के तौर पर नहीं बताती थी? उसका खड बन डैनी को काट रहा था । मैं कुछ पूछता हूँ तुमसे और तुम हो की बजाय सीधा जवाब देने के बहस बोल रही हूँ । मैंने पहले पूछा था उसने पलट कर कहा मैंने बताया तो मुझे यकीन नहीं हो रहा है । मत करो या की लेकिन यही असलियत है । गिरजा कुछ पर खामोश रही । ये पहली बार था जब गहरी ने उसे कडी आवाज में बात की थी । मेरा कोई प्लान नहीं है । दो बजे के आस पास ऑफिस होंगी और आठ बजे तक नहीं रहूंगी । उसने रूंधी हुई आवाज में इस जवाब दिया था दैनिक उस पडा अरे यार, मैं तो मैं चला रहा था । मुझे कुछ जरूरी काम था और मैं तुम्हें उसके बारे में बताना चाहता हूँ । क्या क्या पता हो मैंने आज ऑफिस जाते वक्त स्टीम खरीदी है तो मैं सरप्राइज देना चाहता था इसलिए नहीं लगाया था । वो ऍम की है । लाइक एकदम काली नहीं बल्कि काले का हाल का सामना शेड है । गर्ड तो मुझे अच्छे लगे और कार को चलाने में शायद तुम्हें मजा आएगा । उसमें जो उससे कहा भेजा चलो आगरा ड्राइव पर चलते हैं । मंत्र है पर आज नहीं चलता हूँ, दे नहीं हूँ । मैं बोल के साथ आठ बजे डिनर पर जा रही हूँ । लौटने में शायद देर हो जाएगी । लेकिन तुमने तो कहा था कि तुम्हारा कोई प्रोग्राम नहीं कहा था । ठीक वैसे ही जैसे तुमने कुछ काम था कहा था । उसने डैनी की नकल उतारते हुए जवाब दिया और फिर धीरे से फोन रख दिया । स्वयं पर काबू पाने के लिए डैनी ने कई लम्बी लम्बी शासित हैं, जीती और अपनी कुर्सी में फस गया था ।

अदभुत प्रेम की विचित्र कथा - Part 15

पंद्रह लूटू का काम सिर्फ चार दिनों में पूरा हो गया था । पहले दिन बोलो टू के बन्दों के साथ कई घंटे बैठा था और डॉट कॉम की शब्दावली से लेकर उसकी पहुंच तक को उसने अपने दिमाग में उतार लिया था । इससे पहले बैंक की फाइलों में से उसने एक जाने माने कंसलटेंट का बनाया हुआ पुराना बिजनस प्रपोजल ढूंढ निकाला था और उसे गहराई से पढ समझ भी लिया था । वो फाइल को घर उठा लाया ताकि प्रपोजल के फॉर्मेट और छोटी छोटी मगर जरूरी चीजों को उसमें से देख कर अपना काम और चमका सकेंगे । डायरेक्ट पूरी कोशिश नहीं की प्रोपोजल उस जैसे कई और प्रपोज दिनों से हटकर देखें जिससे उस को मंजूरी अपने बूते पर ही मिल जाए । वैसे दिल्ली से तो उसे ही मंजूर कर के आगे बढा रहा था और मुंबई में बैंक के अफसरों से लूटू की अच्छी पहचान थी ही दैनिक विश्वास था । लूटने मुंबई में भी कई अफसरों को उसकी तरह कंसलटेंट पर आ रखा होगा । हो सकता था अशोक जी उसका हमजोली हो और अगर हो भी तो उसको क्या? डैनी को तो अपना काम एक मंझे हुए पेशेवर खिलाडी की तरह करके देना था । उसका दिमाग में खयाल जरूर आया था की वो उसी बैंक का हिस्सा है जो लोन देने वाला है और इसीलिए वह गलत कर रहा है और उसने इस फैल को पनपने नहीं दिया था । डॉट कॉम वालों के साथ मीटिंग के बाद डैनी मेरिडियन होटल से इंडिया गेट की तरफ चला गया था । बाहर के मौसम से वो बेअसर था क्योंकि अब उसके पास ईसी कहाँ थी? डैनी ने इसी की कोलिन बढा दी थी ताकि ठंडी हवा का पूरा सुख उठा सके । चलते चलते उसे गिरजा का खयाल आया । उसने डैनी का अच्छा उल्लू बनाया था । डैनी मुस्करा उठा । गिरजा चालाक थी शायद इसीलिए उसे पसंद थी । एक पीसीओ पर रुककर उसने मोना को फोन लगाया । रात के तकरीबन दस बज गए थे । काम की वजह से मुझ से बाहर खाना खाने की बात करना भूल गया था । शायद वो घर पर हूँ और अगर वो वहाँ है तो उसे निकलने के लिए राजी कर सकता था । उसका नंबर लगते ही उन्होंने फोन उठा लिया । मुझे पता था हम फोन करोगे । उन्होंने शरारत से कहा वो मैं एक मीटिंग से निकला हूँ और ये सब छोडो ना घर चले आओ साथ में मच्छी झोल खाते हैं मैं तो मैं बाहर ले चलता हूँ बाहर होना हसी कम ऑॅल वक्त बर्बाद मत करूँ । मैं तुम्हारा शुक्रिया अभी की अभी अदा करना चाहती हूँ । अरे नहीं होना ऐसी कोई बात नहीं है । डैनी ने सफाई देने की कोशिश की । मालूम है अब बस चले आओ । कल सुबह का ब्रेकफास्ट हमारे घर पर करेंगे । मैं इंतजार कर रही हूँ कहकर उसने फोन काट दिया । डैनी मोना के साथ जरूर था पर रात भर गिर जा के बारे में सोचता रहा था । उसे मोना बेहद पसंद थी । पर गिरजा उसकी चाहत थी । ठीक वैसे ही जैसे गिरजा उसे चाहती थी, पर अनमोल उसे पसंद था । हो सकता था आज रात को अपनी चाहत और पसंद की अदला बदली कर लें । वो ढुलमुल हो रही थी, अपनी बात पर टिकी नहीं रही थी । और जहाँ तक मोना का सवाल था वो बस उसे पसंद ही करता था और कुछ नहीं पसंद इसलिए करता था क्योंकि उसने डैनी के लिए बहुत कुछ किया था । मोना ने उससे कभी कोई फिजूल सवाल भी नहीं किया था और नहीं होशियार बनने की कोशिश की थी । वो जैसा था पैसा था और मोना उसी हिसाब से चलती थी । आपको गिर जाती तरह अचानक गुलाटी नहीं मारती थी । आधी रात को मंदिर में शादी जैसे ऊटपटांग प्रस्ताव नहीं रखती थी । होना स्थिर थी । गिरजा स्तर नहीं थी । दोनों से पसंद थी । हो सकता था अगर वह कोशिश करे तो उससे मोहब्बत भी कर सकता था । अगर गिर जैसा अनमोल के साथ कर सकती थी तो वो क्यों नहीं कर सकता था । होना ही क्यों? वो किसी और मछली को भी फंसा सकता था । उसे एक बढिया मोटी मछली फंसाने के लिए बस अपना दिमाग ही तो चलाना था । डैनी देर से सोकर उठा था । नींद टुकडे टुकडे आई थी । थकान लग रही थी । जी कर रहा था । करवट बदलकर फिर हो जायेगा । पर आज का काम उसके इंतजार में था । उसे शाम तक बिजनेस प्रपोजल का खाका तैयार कर लेना था और अगली रात तक उसे पूरी तरह से दुरुस्त करना था । गिरजा खाया लाया था । ऐसी रही होगी इसकी शाम और उसने अपने आप को कम की तरफ मोड दिया था । जल्दी से तैयार होकर उसने अनमनी सीमोन के गाल पर पत्ती मारी थी और निकल पडा था । नाश्ता करना भी भूल गया था । अपने फ्लैट में पहुंचते ही दैनिक काम में जुट गया । घर में इसी नहीं था पर उसको गर्मी महसूस नहीं हुई । उसका सारा ध्यान प्रोपोजल पडता था । और वो उस पर भूत की तरह तब तक जुटा रहा है जब तक वह पूरा नहीं हो पाया । शाम के पांच बजे उसे अच्छा जोरों की भूख महसूस हुई । पिज्जा बनाने जा रहा था और दाल रोटी की होटल मार गई । पेट भरने और स्वास्थ के लिए देशी खाने से बेहतर उसे और कुछ नहीं लगता था । फिर उसने गिरजा को फोन मिला क्या कर रही हूँ? कुछ नहीं पिछली बार की तरह उसने हस्कर पूछा पिज्जा कटाक्ष पर दिल खोलकर ऐसी थी धूम । कहाँ हूँ अपने फ्लैट में और चले आओ घर में कोई नहीं है । फिर जाने शरारत भरे अंदाज में फुसफुसाया और फिर अपनी हरकत पर खिलखिला पडी थी । उसी की खडखडाहट डैनी के कानों में देर तक पूछती रही थी उसे वो बेसुरी और कर्कश लग रही थी । जैसे किसी ने उसके खोखले दिल पर चमडा चढाकर सूखी लकडियों से चोट करती हूँ तो खास दे रही थी और उस की खडखडाहट का गहरा दर्द सीने को फाड रहा था । गिरजा की दावत को खारिज करके डैनी अपने को अंधेरे कमरे में बंद कर लेना चाहता था । उसने मन कडा करने की भरपूर कोशिश भी की थी पर अपने को रोक नहीं पाया । दैनि ने पूछा नहीं और गिरजा ने बताया नहीं । नई कार के नाम पर उन्होंने घर पर ही जाम टकराए और बैठकर टीवी देख रहे । थोडी देर बाद गिरजा ने कहा था जिसकी तबीयत कुछ ठीक नहीं लग रही है और वो सोने चली गई । दैनिक देर रात तक अपने प्रपोजल पर काम करता रहा । प्रपोजल मंगलवार की सुबह लोगों के पास पहुंच गया । कुछ घंटों बाद उसने फोन करके अपनी खुशी जाहिर की । दैनिक बेहतरीन काम किया था । सुंदर बिल्कुल उसकी मर्जी के हिसाब से था । वो दस का करके टैनी के पास दोपहर तक भिजवा रहा था ताकि उस पर आगे की कार्यवाही कर सकें । दैनिक सप्ताह के अंत तक घर जाने की बात लोगों को बताई थी । लोगों ने फाइल के साथ एक लिफाफा भी भेज दिया । दैनिक पांच ज्योति के लिए अलग कर दिए थे और बाकी अपने पास रखे थे । बीच में मित्र साहब का अचानक होना गया था । उसके साथ लंच करना चाहते थे । उन के न्यौते पर मुझे चौक गया । पर तो करनी ही थी मित्र साहब जैसे बडे कॉरपोरेट नाम के साथ रंज करने के लिए । जब जाने माने नाम भी सिर के बल चलने को तैयार थे । डैनी की क्या बिसात थी उनके आसपास देखने से लोग चर्चा में आ जाते थे । वैसे तो डैनी ने ऊपरी तौर पर मित्रा साहब से पूरी गर्मजोशी से हाँ कर दी थी और गिर जा के पिता से मिलने को लेकर वो कुछ घबरा गया था । दैनिकों लगा था कि गिर जाने उन्हें सब कुछ बता दिया था और एक पिता की हैसियत से उन्होंने डैनी को बुरी खबर सुनने की जिम्मेदारी खुद पर ले ली थी । इसीलिए पिछली रात गिर जाने अनमोल के बारे में कुछ नहीं कहा और उसको घर बनाने के बाद भी जल्दी सोने चली गई थी । उसे यकीन था कि गिरजा रात गहरे सोच में पडी हुई थी और सुबह दैनिक के साथ मामला निपटाने के लिए अपने डैडी को बीच में डाल दिया । बिचारी हमें नहीं से मासूम बच्चे क्या आपने अक्रमण तजुर्बेकार बाप है? इतनी सी मदद नहीं रह सकती थी । डैनी हर सूरते हाल से निपटने के लिए खुद को तैयार करने में जुट गया था । उसने अपने रिश्ते के बारे में बारीकी से सोचना शुरू कर दिया । पता नहीं फिर जाने मित्र साहब को उसके बारे में क्या बताया था और कैसे बताया था । हो सकता था उसने कहा हो । डैनी ने पहली ही मुलाकात में शराब पिलाकर उसे फैसला लिया था और आधी रात को शादी भी कर डाली थी ताकि इससे तरक्की पाने की सीडी बना सके । ये भी हो सकता था की मिसाल मित्रा ने अपने तलाकशुदा पति को समझाया हूँ कि सहारनपुर के फटीचर टीचर के बेटे के मुकाबले अनमोल उनकी बेटी के लिए कहीं बेहतर रिश्ता था । संभावनाएं बेहिसाब थी और दैनिक जितना सोचता था उसे हर एक सूरत संभव होती दिखती थी । एक मर्तबा दो उसकी आंखों के सामने फिल्मी सीन भी घूम गया था, जिसमें मित्रा साहब बडे नाटकीय अंदाज में कह रहे थे, ये ऍम जितनी रकम चाहे भर लो और दूर हो जाओ । मेरी बेटी की जिंदगी से बदहाल सूरतेहाल से है । अपनी के घोडे दौडाकर ही मिल सकती थी । डैनी ने अपने आप कल को मशक्कत करने में लगा दिया । उसने दराज से कागज कलम निकले और लिखना शुरू कर दिया । सबसे पहले उसने अपनी शख्सियत की खूबियों की । फिर इस पर आए । उसके पास अच्छी शफीक, अच्छा मिजाज और अच्छा दिमाग था । उसने अपनी पेशेवर जिंदगी की शुरुआत भी अच्छी की थी और हांगकांग पोस्टिंग में उसकी हैसियत में बडा इजाफा ला दिया था । एक तरह से वो अनुभव की बराबरी पर पहुंच चुका था क्योंकि वहाँ तक की तरह नहीं चलता था इसलिए जल्दी आगे भी निकल सकता था । हो सकता था कभी अनुभव उसके नीचे काम भी करना पडेगा और अगर ऐसा होता है तो उस अंकल जी बच्चे को समझ में आएगा । किसने डैनी को नजरंदाज करके कितनी बडी गलती की थी । अपनी खुशफहमी पर डेनिम्स कराया पर साथ इसको यकीन भी था कि कुछ सालों में वो अपने पेशे के हाजारों में से एक होगा । उसकी खास खूबी ट्रेनिंग कागज पर लिखा था उसका लोगों से दरपेश होने का सलीका था । इसी वजह से लो टू एक छोटी सी मुलाकात नहीं उसका मुरीद हो गया था । उसका गिरजा पर भी असर उम्दा रहा था और अशोक विशाल मुन्ना मेरे पर भी उसका रह था । और तो बेहद तजुर्बेकार मित्रा साहब जिसके कायल हो गए थे अगर वो कायल नहीं होते तो फॅमिली लंच के बाद उसके ब्रांच हेल्थ के बारे में नहीं पूछते । इसकी बजाय वो गिरिजा को डैनी से पिंड छुडाने की सलाह देते हैं । वैसे भी मित्रा साहब के बारे में मशहूर था कि वो आज भी और हालत पहचानने में माहिर थे । उन पर कोई मामूली आदमी असर नहीं डाल सकता था पर डैनी ने ये कारनामा कर दिखाया था । मित्रा साहब ने एक नौजवान की असल कीमत पहचानने में न तो जल्दबाजी की थी और न ही गलती । तो फिर मुस्कराया था अगर वो मित्रा साहब जैसे नामी गिरामी शख्स को अपनी गिरफ्त में ले सकता था, उन जैसे और ऊपर भी अपनी छाप क्यों नहीं छोड सकता था । उसने अपने शुरुआती दौर में ही एक बडा और मुश्किल इम्तिहान पास कर लिया था जिससे उसका हौसला खासा बढ गया था । पर क्या वो गिरजा को लेकर हौसला रख सकता था? उसकी ताकत थी या उसकी कमजोरी? क्या सिर्फ एक मौका नहीं? क्या चुनौती इसकी लंगडी लगने से उचित हो सकता था? वो मित्र साहब उसके खिलाफ कुछ इस तरह से भडका सकती थी कि डैनी की पेशेवर जिंदगी को आपको पूरी तरह से चौपट करने पर उतारू हो सकते थे । गिर जाए । तेज तरार लडकी थी जिसमें किसी भी हालत का सामना कर रहे हैं और उनसे माफिक जवाब हासिल करने की हिम्मत थी । उसकी ये बात अच्छी भी थी और बुरी भी । वो अख्खड थी और अगर उसके दिमाग में आ गया कि डैनी उसे छात्रा दे रहा है तो वह पलक झपकाए बिना उसे मिटा सकती थी । कुछ फितूर तो उसके दिमाग में जरूर चल रहा था तभी वो अनमोल को जांचने में लगी थी हूँ ऍम थोडा और उस पर बडे बडे अक्षरों में अनमोल लिखा था गजान मूल के बारे में क्यों सोच रही है? लिखते हुए उसने कलम को इतनी जोर से कागज पडता जीता था की वह कहीं कहीं फट गया था । वो मुझे सच में प्यार नहीं करती है और उस रात पीने के बाद उसने शादी रचाने का नाटक किया था और मुझे एक खिलौना बनाकर अपने घर ले आई थी । उसने तैश में लिखा था मैं उसके खेल का सामान था । बस दैनिक ने अपने लिखे को एक बार पडा और अपने बारे में खेल का सामान लिखा हुआ उसे पसंद नहीं आया । उसने उसको काट दिया था । ना तो सामान था और नहीं । गिरजा उस तरह की लडकी थी । डैनी उसे वास्तव में अच्छा लगा था और तभी मोना की पार्टी के बाद उसके साथ शाम बिताने के लिए तैयार हो गई थी । उसको और जानना चाहती थी और बातचीत के दौरान हो गई थी । गिर जाने कोई खेल नहीं खेला था । डैनी ने लिखा था बल्कि उसके साथ कोई और बेबाकी ने उसको अपने जज्बातों को जाहिर करने के लिए मजबूर कर दिया था । उसकी शख्सियत ऐसी ही थी । तभी तो वह जब करके मंदिर ले गई थी और घर ले जाने से पहले उसने शादी की, उसने ये सब मौज की खाते नहीं किया था । वो सब दिल से चाहती थी और चाहत उसकी ताकत बन सकती थी । पर फिर अनमोल क्यूँ उससे सवाल कागज, परदादा और उसको भरने के लिए कई बार उसके नीचे कलम फिर नहीं उसने दिन से चाहती है । वो काट कर उसकी जगह बहुत पसंद करती है लिख दिया था । इसमें कोई शक नहीं था कि आगे चाहे कुछ भी हो वो ताउम्र डैनी को अपने वजूद से नहीं बता सकती थी । उसको अहसास था वह गिरजा की कमजोरी है और अगर सब कुछ ठीक रहता तो शायद गिरजा देने की सबसे बडी ताकत बन जाती । गिर जाए । उसके लिए सही थी । उसके मिलता ही सब कुछ बेहतर होने लगा था । उसके जैसी लडकी के सपने उसने सहारनपुर वाले दिनों में देखे थे । एक बहुत ही प्यारी ही खानदानी लडकी के सपने शिफॉन और नॉन के मखमली शाम को बखूबी बढ सकें । दूसरी तरफ भेजा अच्छी तरह से जानती थी कि डैनी के साथ उसकी जोडी जबरदस्त देखती है । उसका ऐसा महसूस करना ट्रैनी ने लिखा उसको हालात संभालने का मौका देता है । उसे बस तरीके खोजने होंगे, गिर जाता है । कश्मीर ढंग से उसकी जिंदगी ना आई थी । डैनी को अहसास था कि उसके जैसा बडी किस्मत वाला करोडों में इक्का दुक्का ही होता होगा । किस में गिरजा को उंगली पकडकर उसके दरवाजे तक लाई थी, पर गिरजा दहलीज पर खडी है, इसके चाह रही थी । उसके अनुमान होने पर उसको क्या समझे? पूरी तरह उसके साथ थी या खिलाफ हो रही थी । वैसे अमूल का नाम लेकर उसमें जाहिर कर दिया था कि वह फिलहाल पूरी तरह से उसके साथ नहीं थी । अगर वहाँ जैसा कर सकती तो कुछ साल बाद और कुछ भी कर सकती थी और डैनी की जिंदगी में नई हलचल पैदा हो सकती थी । फिर जा पर पूरी तरह से अखबार अभी नहीं किया जा सकता था और इसलिए उसे अपने लिए खतरे की तरह देखा जा सकता था । पर गिरजा अनमोल के बारे में आखिर क्यों सोच रही थी? उसने वजह लिखनी शुरू कर दी हूँ । बेवकूफ थी । रही इस बात की बिगबाॅस इसे जब चाहे कुछ भी करने की आदत पड चुकी थी । फैसला पहले लेती थी और सोचती बाद में भी वो टूटे परिवार से थी और इसलिए किसी से जुडने में हिचकी चाहती थी । वो सिर्फ और सिर्फ अपना सोचती थी । ऍम रुपया । ऐसी पहले उसका कोई मतलब नहीं था । उसने कागज को चिंदी चिंदी कर दिया था । उसने एक और कागज उठाया और इस बार मित्रा साहब का नाम उस पर लिख दिया । उसे तय करना था कि जब वो उनसे मिलेगा तो कैसे पेश आएगा । उसे तय करना था कि अगर गिरजा का मुद्दा उठता है तो क्या करेगा और अगर कुछ और बात होती है तो उसका रुख क्या होना चाहिए । उस वैसी तैयारी करनी थी जिसमें और मुद्दे गिर जा के मुद्दे पर हावी हो जाए और वह मित्रा साहब का हर हाल में सजा बन जाये अपनी खूबियों की तो वो लेकर वो संतुष्ट था । उसमें खूबियाँ और उनसे ज्यादा भी उसे आसानी से अनदेखा नहीं किया जा सकता था । फिर जा के शौहर की तरह भी नहीं । एक परेशानी अभी और थी । उसने मित्रा साहब और गिरजा को बताया था । उसके पिता टीचर थे । उस ने ये नहीं बताया था कि वह सरकारी स्कूल में टीचर थे । दोनों ये मानकर चल रहे थे कि वह यूनिवर्सिटी में टीचर है । असलियत पता चलने पर मित्रा साब भडक सकते थे । उनके लिए ऐसे दामाद को अपनाना शायद मुश्किल हो सकता था जो एक छोटे से स्कूल मास्टर का बेटा था । दोनों परिवारों के बीच ये बहुत बडा हैसियत का फर्क था । टाॅक उनके सामने सीना ठोककर कह सकता था । वो खुदमुख्तार था और हालांकि से बाप दादों से कुछ नहीं मिला था । पर उसमें इतनी को वक्त थी की आने वाली नस्लों के लिए वह जरूर को छोडकर जाएगा । पता नहीं क्यों उसे यकीन था मित्रा साहब उसकी बात को पसंद करेंगे और मिसिस बत्रा जरूर परेशान होंगे और ऐसी बातों को लेकर अक्सर बखेडा खडा कर देती थी । डैनी उसे कभी मिला तो नहीं था पर जैसा गिरजा ने बताया था उस हिसाब से वो हैसियत पहले पडती थी और बाद बाद में करती थी । डैनी ने फौरन से पेश्तर ऍफ का ख्याल अपने दिमाग से खदेड दिया और मित्र साहब से मुलाकात को कामयाब बनाने के जहन में लग गया था । उसने अपना नाम दोबारा से पडा । समस्या क्या थी? उसने खुद से जोर से पूछा । जवाब मित्रा साहब ने उसे मिलने बुलाया था । मैं कोई भी बेढंगा सवाल कर सकते थे । गिरजा से दूर हो जाने को भी कह सकते थे । उसे किसी भी हालत का सामना करने के लिए अपने आपको तैयार रखना था तो सोच में पड गया और उसकी कलम अपनी मित्रा साहब के नाम के चारों ओर घेरा बनाते हुए चलने लगी । उसके निशान गहरे से गहरे होते गए थे । जल्दी ही मित्र साहब घेरे में समा गए । डैनी ने उसके हरे घेरे में देखा था और जवाब लपक कर बाहर आ गया था । बेवजह ही सीधी सी बात के लिए उसने इतना वक्त बर्बाद किया था । गिरजा से उसका रिश्ता कैसा भी रहे, पर मित्रा साहब से उसे सीधा और पुख्ता रिश्ता बनाना था । अगर वैसा कर लेता है तो गिरजा अनमोल के साथ जाए या किसी और के साथ, उस पर कोई फर्क नहीं पडने वाला था । मित्रा साहब उसके लिए सबसे जरूरी थे । पर पता नहीं क्यों उसको यकीन हो चला था कि गिरजा उससे अलग होने पर भी उसकी ज्यादा खिलाफत नहीं करेंगे । अब वो मित्र साहब के सामने अपनी कमजोरी छिपाने के बजाय अपनी खूबियां रख सकता था । उसका बडा मौका मित्र साहब को अपनी काबिलियत दिखाने में था और अगर वैसा कर लेता है तो उसे किसी से कहीं से भी कोई खतरा नहीं था । डाॅ । और मुस्काता चला गया । उसके पास अकल थी और वो उसका इस्तेमाल करने का हुनर भी रखता था । डाॅन अपने से बेहद खुश था ।

अदभुत प्रेम की विचित्र कथा - Part 16

सोल है । डेली तयशुदा वक्त से कुछ पहले ही गौर पहुंच गया था । उसने सीधे रेस्ट रूम में जाकर अपने को आने में जांचा परखा था और फिर मित्रा साहब के इंतजार में बैठ गया । मेरा साहब दस मिनट बाद आए । सुबह से गोल्ड खेल रहे थे । सफेद पैंट और टीशर्ट में वो चौंच रहे थे । उनकी चार ढल और तौर तरीके को देख कर डैनी एक बार फिर प्रभावित हुआ । इनके अंदाज के आगे तो शाह और सुल्तान भी पानी भरें । उसने सोचा था और फिर आगे बढकर उनसे हाथ मिला । मित्रा साहब ने फौरन अपना हाथ ज्ञानी के कंधे पर डाल दिया और उसे क्लब के बाद की तरफ मोड दिया था । अच्छा क्या, जो वक्त निकालकर तुम आ गए तो मैं देख कर बहुत खुशी हुई । ये तो आपका बडप्पन है सर । आप ने मुझे बुलाया । दैनिक ने संजीदगी से जवाब दिया, मेरी खुशकिस्मती है कि आपने याद किया सर । शुक्रिया मित्रा साहब मुस्कुराए और उसके बाद उन्होंने खिडकी के बाहर फैले मखमली हरे मैदान पर नजर दौडाते हुए कहा था, क्या खेल है ये भी सालों से खेलता रहा हूँ । अभी भी मन नहीं भरा खेलते हो । नौ सौ कभी मौका नहीं मिला । खेलना चाहिए तो मैं हमारे खिलाडियों वाली डीलडौल है । स्पॉट नहीं तो कुछ और खेलो । कॅलेज में क्रिकेट अच्छा खेल लेता था और फुटबॉल भी । टेबल टेनिस भी ठीक ठाक खेल लेता हूँ । मित्रा साहब के चेहरे पर मुस्कान मिल गई । उन्हें शायद दैनिक खेल से लगा बेहद पसंद आया था । मुझे लग रहा था तुमने खिलाडियों वाली बात है । हम सब ने अपने मोहल्ले में क्रिकेट खेला है । फाॅर्स की बात ही कुछ और है और शालीन लोगों का खेल है । मित्र साहब के मुंह से निकला मोहल्ला लाॅ क्या उन्होंने चंद पूछ कर उसका इस्तेमाल किया था? एक खिदमतगार बडे अदब से मित्रा साहब के सामने पेश हुआ था । उन्होंने जिन ऍम कहकर दैनिक की तरफ सवालिया निगाहों से लिखा था ऍम मित्र साहब उसे कुछ और पीने के लिए जो डालेंगे उन्होंने कुछ नहीं कहा था । ऍम काम कैसा चल रहा है जिनका घूम भरते हुए उन्होंने पूछा था नहीं ठीक चल रहा है सर, काम करने में मजा आ रहा है । जी बिलकुल काफी कुछ सीखने को मिल रहा है । बैंक में क्या क्या देखते हो? मित्र साहब के सवाल पूछने के तरीके से डाॅॅ फौरन समझ गया था । वो उसका इंटरव्यू ले रहे हैं । उस ने भी उम्मीदवार का किरदार पूरी संजीदगी से निभाना शुरू कर दिया । अगले पंद्रह मिनट तक मैंने अपने कामकाज को तफ्सील से बताता रहा था । उसने बेहतर काॅलम, लोन संबंधी प्रक्रिया और क्रेडिट कार्ड से प्रमोशन के बारे में अपनी कामयाबियां दिला दी । क्रेडिट कार्ड बिजनेस के बारे में खासकर उसने अपने मंसूबे बयान किए थे जिनपर बैंक के अफसरों ने मंजूरी की मुहर लगा दी थी । उसने मुंबई दौरे और अशोक से मुलाकात के बारे में भी मित्र साहब को बताया था और ज्यादा असर जमाने की नियत से बहुत सारे आंकडे उनके सामने दिखा दिए थे । मथुरा साहब ने उसकी बात गौर से सुनी । साफ था वो डैनी को तो बोल रहे थे । डैनी के लिए एक मौका था इसका वो पूरा फायदा उठा सकता था । उन पर गहरी छाप छोडने में बस अभी तक इतना ही कर पाया हूँ । सर, अंतरराष्ट्रीय बैंक में मेरा रोल छोटा सा है, जितना कर सकता था । क्या आगे और कोशिश करूंगा? ऍम उसका कर अपनी बात खत्म कर दी । मित्र साहब ने आगे बढकर उसका हाथ दबाया था । सैनिकों सनसनी से महसूस हुई तो बहुत अच्छा काम किया है और इस समय में इतना कुछ तुमको मैं हमारी बात देता हूँ । उन्होंने दैनिक आहार फिर दबा है । उसको जी अच्छा लगा, वहाँ पीछे खींचना चाहता था, पर पत्थर सा हो गया था । उसका दिमाग तेजी चार कप में आया तो मित्र साहब को अपनी काबलियत और पोपट दिखाने आया था और बहुत हद तक अपने मकसद में कामयाब भी हो गया था । खुश था वो । लेकिन जिस तरह से उन्होंने उसका हाथ पकडा उस वक्त पकडा गया था । पहली बार उसने सोचा था कि वह हाथ दबाकर शाबाशी दे रहे हैं । पर दो बारह होने पर उसे कुछ अजीब लगा था । हो सकता था ये उनका प्यार जताने का तरीका हूँ और क्योंकि वह तक उनके करीबियों में से नहीं था इसलिए उसे अजीब लग रहा था । तुमने बताया था तुम्हारे पिता प्रोफेसर हैं, कहाँ पढाते हैं । उन्होंने अपना दूसरा ड्रिंक बनाते हुए ऐसी पूछा था यानी सवाल के लिए तैयार था वो प्रोफेसर नहीं ऍफ जवाब दिया, मैं सहारनपुर से हूँ और मेरे पिताजी स्कूल टीचर हैं । एक सरकारी स्कूल में दैनिक जवाब सुनकर मित्रा साहब के न तो चेहरे के भाव और नहीं उसमें उनकी दिलचस्पी कम होती देखिए और कोई नहीं कोई प्रोफेसर है या नहीं इससे फर्क नहीं पडता । टीचर टीचर होता है दैनिक पता है मुझे अपने कॉलेज के प्रोफेसर कुछ खास याद नहीं है लेकिन अपने स्कूल टीचर्स की मेरी याद बेशुमार है । आज मैं जो हूँ उन्हीं की बदौलत मथुरा साहब के बाद में वाकई ईमानदारी थी । इसमें डैनी को भरोसा दिया था कि उसके परिवार की वह कदर करेंगे । वो खुद अपने को उनका कर्जदार मान रहे थे । मित्र साहब ने अपने और दैनिक के लिए बेड फिर टोस्ट लाने को खिदमतगार से कहा था और फिर उसकी तरफ मुखातिब होकर बोले थे आपका बंगाली होगा, मछली के बिना मेरा काम नहीं चलता और ये लोग जानते हैं । मुझे कौनसे फिश पसंद है और कैसी बनने है । मुझे यकीन है एक बार खाने के बाद तुम भी बहुत बार ऐसे खाने यहाँ होंगे जी बिल्कुल ऍम लाया । मुलाकात अच्छी जा रही थी घर पर उसने बातचीत का रुख घरेलू करते हुए कहा था सर हम सब शाकाहारी है पर मुझे अच्छा नॉन वेजिटेरियन खाने का शौक अब लग गया है तो बुदबुदाए अपने हो गए । खाना खाते ही मित्र साहब पर टूट पडे । किए हुए मछली के टुकडों को वह कपास कप में रखते जा रहे थे । उनका ध्यान सिर्फ और सिर्फ खाने में था और उसमें फॅमिली हो गए कि पसीने की बूंदें उनके मौके पर चल मिलने लगी थी । यानी हराम सब देखता रहा । मतलब वाकई में खाने के बेहद शौकीन थे, कट रही है । उन्होंने आसन में कहा था माथे का पसीना पहुंचा और जिनका एक लंबा खूंट पडा, फॅमिली को खाना बनाना नहीं आता था । मैंने ये ठिकाना ढूंढ लिया था । मुझे मेरी मछली और गॉड दोनों मिल जाते हैं । इनके अलावा मुझे और क्या चाहिए जी सर, मुझे भी मछली अच्छी लगी और सर मैं गोल्ड पर हाथ जरूर आजमाऊंगा । अब से फायदा रहा बहुत बढिया । अगर तुम ऐसा करोगे तो देखना कितनी दूर तक जाओगे । ज्यादातर लोग गुसलखाने में सोचने का काम करते हैं । मैं गौर खेलते समय करता हूँ, उसल के समय काम करता है, पर इस दूर तक फैली हरियाली में नजर कोई गहराई मिलती है । कॉरपोरेट लीडरों के लिए दूर की नजर जरूरी है और साथ ही ऐसा खेल खेलना सीखना । इसमें नाॅट काफी हो और ऍम हम सब ऐसा ही तो करना चाहते हैं ना के बाद एक ही बार में नहीं पार हो जाए । बार बार की किस किस ना करनी पडेगी । मित्र साहब अपनी बात कहकर मुस्कराए थे । मुझे उम्मीद है तो मेरी बात समझ रहे हो गए । कामयाबी एक झटके में हासिल की जाती है । किस किस के नहीं ये सर दैनिक जल्दी से हामी भर दी थी । मित्रा साहब दैनिक जीवन में हाथ डालकर सब बाहरी दरवाजे की ओर ले चले । उन्होंने चलते चलते उसका कंधा थपथपाया था और पीठ पर भी खास फेरा । दैनिक जिंदगी इतनी मुश्किल नहीं है । अगर आप जानते हैं उसे कहाँ कैसे घुमाना है । स्विंग बहुत अहम चीज है खेल में सबकुछ इसी पर टिका हुआ है । बरखुरदार मेरी ऐसे ही सिरफिरे ला दिया । वो समझ नहीं पा रहा था । बातचीत आखिर किस्त शाम जा रही थी । मुलाकात खत्म होने को आ रही थी पर उन्होंने गिरजा का नाम भी नहीं लिया था और नहीं उससे होने वाले रिश्ते की तरफ कोई इशारा किया था । मैंने सुना है तुम्हारी पोस्टिंग हांगकांग हो रही है मेरा साहब ने अचानक सवाल फैसला था जी फॅार हुई है सर मित्रा साहब ने डेनी से हाथ मिलाया था । फिर उसके दोनों को हल्के से दबाया था दो बार पर तो मगर इतनी दूर न जाना चाहो तो मुझे फोन करना मुझे कॅण्टकी जरूरत है और मुझे लगता है तो उसके लिए सही हो गई । सोशल फिर बताना नहीं कोई जल्दी नहीं है । उन्होंने कहा था और अपनी कार की और बढ दिए । ऍम खुला का खुला रह गया । ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने उसका दिमाग को खोदकर उसमें मट्ठा डाल लिया था । सामने लगे आईने में उसने अपने को आवाज खडा देखा तो अपने को संभालने की कोशिश की थी । मित्रा साहब उसको अपने नीचे नौकरी दे रहे थे । उन्हें ऍन चाहिए था और उसके लिए वो उसकी पीठ पर हाथ फिर गए थे और दोनों को भी जांच रहे थे । पानी साफ था मित्रा साहब से इसलिए नौकरी दे रहे थे क्योंकि गिरिजा ने उन्हें कुछ नहीं बताया था । इतने दिन बीत गए थे और उसने बात शुरू भी नहीं की थी । शरारतन भी कुछ नहीं कहा था । हो गयी ऐसी लडकी थी । दैनि ने अपनी कार गिर जा के दफ्तर की तरह दौडा । उसे काम पर वापस पहुंचना था पर गिरिजन से मिलना टाला नहीं जा सकता था । उसको बेहद झुंझलाहट हो रही थी अपने बाप को और उसको किस मोड पर लाकर खडा कर दिया था इस लडकी ने शादी करने की तो उसे बहुत जल्दी थी लेकिन उसके बाद का मूड में दही जम गया था और उसके ऊपर या मोल उसे गिरजा से इसी वक्त बात करने की उससे समझती क्या थी कि क्या वही आप मजाक कर रही थी । उसे अभी के अभी दो टूक जवाब चाहिए था । दैनिक गिर जा के दफ्तर में हैरान परेशान खुजा वो पहले कभी गिर जा के दफ्तर नहीं गया था और रिसेप्शन पर खडे हो कर गिर जा के बारे में पूछना । उसे कुछ अटपटा लग रहा था । उसकी उरी हुई शपिंग देखकर फॅसने पानी का ग्लास मंगवा लिया । मुँह देखकर बहुत खुश हुई थी । आए हम यहाँ कैसे? उसने चाहकर पूछा । बडे अधिकार सोचना डैनी की वहाँ थामकर लॉबी के कोने में सजे सोफे की और ले गई । पता नहीं सकती तुम्हें देखकर मैं कितनी खुश हूँ । उसने कंधे पर से रखते हुए कहा था, पर तुम्हारा आना कैसे हुआ? मैंने कई बार घूम निकला । उसी देशी से सवाल करने आया था । लेकिन फिर जा के मोहम्मद भरे आवभगत उसे हत्प्रभ कर दिया था । उसे कुछ सूझ नहीं रहा था । उसने एक और गिलास पानी मांगा । गिरजा उसकी हालत देखकर प्रशासन उठी । कोई बात नहीं । उससे पानी के बडे बडे घुट लेते हुए कहने की कोशिश की थी । कुछ हो गया गया । हाँ, उसने पानी का गिलास एक्साम्स में खत्म कर दिया । तुम्हें नौकरी से निकाल दिया । क्या उसकी आंखों में आंसू उसके बाद अनुभव पडे थे सवाल सुनते ही डॅाक कैसे अलग हो गया जैसे गिर जाने डंक मार दिया हो उस चौक पडी से निकाल दिया गया निकाल दिया गया उच्च पडा था बिजली मासूम से जवाब दिया था मैंने ऐसे ही सोचा था क्योंकि तुम बडे परेशान लग रहे हो, ढहनी का मन हो के सिर पटक ले । ऐसा सोच भी कैसे सकती थी । तुम परेशान हो । उसने धीरे से पूछ बताया था हैं क्यों? क्योंकि मुझे जॉब ऑफर हुई है तो उसमें परेशान होने की क्या बात है क्योंकि वह जॉॅब उस ने खुश होकर कहा मुझे मालूम था वो तो मैं पसंद करते हैं । तो उन्होंने मेरे बारे में क्या कहा था? कुछ खास नहीं । बस यही की तो अच्छे लडके हो । हमारे बारे में कुछ कहा था नहीं बताना चाहिए था ना हमारी बात हुई थी । याद है वहाँ पर मैं उन्हें अब तक नहीं बता सकी था । कैसे बताती है इधर तुम बहुत ज्यादा मसलों फिर रही हो ना । उस ने तंज कसा ऍम विजय ने ठंडी सांस लेकर कहा रहा हूँ तुम क्या कह रहे हो? मैं भी समझ नहीं पा रही हूँ । नहीं समझ में नहीं आ रहा है कि मेरे डैडी ऑफर्स तुम परेशान हो हम यहाँ नहीं घर पर बात करते हैं । दैनिक दिमाग दौडने लगा था जो वो कह रहा था और जब गुज्जर समझ रही जिसमें बहुत फर्क था । कोई संभावित या वास्तविक दामाद की तरह बोल रहा था और गिरजा रिश्ते की नजाकत को समझ नहीं रही थी । शायद उससे कतई अंजाम थी । उसने बात खत्म करने का फैसला ले लिया था । दफ्तर में बैठकर ऐसी बातें करना ठीक नहीं था । आठ बजे तक हाॅल शायद पहले भी तभी बात करेंगे । ठीक है उसने गिर जाते । एक पल के लिए बाहों में समेटा था और फिर जल्दी से निकल गया । फॅस नजदीकी को पाकर खुश थी । अपने दफ्तर लौटते वक्त उसमें दिन का लेखा जोखा किया । अच्छी बात ये थी कि मित्र साहब ने उसे गिरजा से अलग रखकर को सोचा था । उन्हें इंप्रेस करने में कामयाब रहा । हिंदुस्तान के सबसे बडे कॉरपोरेट के चेयरमेन के एग्जिक्यूटिव असिस्टेंट की नौकरी वाकई कुछ मामूली बात नहीं थी । उद्योग जगत के नामचीन लोगों के साथ उठने बैठने के रास्ते खोलती थी । और सबसे बडी बात ये थी कि वह बिना किसी का दामाद हुए अपनी हस्ती खुद बना सकता था । अचानक ही वो खुश हो उठा तो हासिल करने निकला था । उसे मिल गया था । फिर जैसे नाराज होकर क्या फायदा था । सर कम हो चुका था, गिर जाए । इस लिहाज से गैर जरूरी हो चुकी थी ।

अदभुत प्रेम की विचित्र कथा - Part 17

सत्रह दफ्तर से डैनी की गैरमौजूदगी के दौरान लो टू का तीन बार फोन आया था । हर बार उसने फौरन वापस फोन करने का संदेश छोडा था । डैनी को लगा था यूटूब प्रपोजल में कुछ फेरबदल करना चाहता था या फिर उसमें नहीं जानकारी जुडवाना चाहता था । उसका मन फिलहाल इस तरह का काम करने का नहीं था, लिहाजा उसने लोटों को पलट कर फोन करने की सहमत नहीं उठाई थी । वो बैंक का लेखा जोखा देखने में मुस्लिम हो गया था । पर तकरीबन घंटे बर्बाद सिर्फ फोन बज उठा । डैनी ने फोन बेमन से उठाया पर आवाज में लोटने मुनासिब गर्मजोशी खोल दी । ऍम दूसरी तरफ से लोट चलाया था । बहुत हो गया । बैंक का काम जान हो गए । चलो शनिवार इतवार गोवा चलते हैं, मजे करेंगे । हाँ हुआ । फॅमिली आया था तो पार्टी पार्टी है । गया फॅार पार्टी है । पंद्रह बीस लोग होंगे । बस हम सब शुक्रवार रात की फ्लाइट लेंगे और रविवार को आखिरी फ्लाइट से वापस आ जाएंगे । गए चलेगा तो मैं हुआ और वो भी उन लोगों के साथ जिनके बारे मुझे अभी तक सिर्फ सालों में ही पडा था । ऍम और है होना शायद इसी को कहा जाता था । टेनिस से हर उठाता लूट उसको रईसजादों के खास गुट में शामिल होने की दावत दे रहा था । मैं तो चाहता हूँ और सबसे मुझे घर जाना है, लोट होगी । हँसी छूट गई, बस क्यों रहे हो? मैंने उसकी लकडबग्घे सभी की हंसी जैसी नहीं थी । अरे आप ये वीकेंड में घर जाते हो पहुंच जाता या छुट्टी खुद मुस्ती मारने के लिए होती है? नहीं मेरा इरादा था की तो मैं भूल जाओ अपने इरादों को हम नया प्लान है, हुआ नहीं । पार्टी अगर मैं बता दूँ कि कौन कौन आ रहा है तो तुम बेहोश हो जाओगे तो जल्दी हाँ कर मैं हमारे बुकिंग करा देता हूँ । पैसे कौन को ना रहे हैं । दैनिक दिलचस्पी कुछ चाहती थी । लूटू ने एक सौ एक रईसजादों के नाम गिना डाले । शनिवार इतवार की जगह में छुट्टी लेकर पहले घरो आता हूँ । दैनिक मजबूर होकर सोचा और मैंने सुना है लडकियों के बारे में तो भी बताया ही नहीं । जो हमारे साथ जा रही हैं । पूरे जोश में कहा था और अभिनेत्रियां मॉर्डल कुलीन कॉर्पोरेट घरानों की लडकियों के नाम गिरा दिए । नाम सुंदर सुंदर डैनी एक नाम पर अटक गया । उसके दिमाग में आखिरी कुछ नाम दोहराए थे । था बिल्कुल वो तूने गिरजा मित्रा का नाम लिया था बचाना उसका कलेजा पेट हर्षा फडकने लगा ठीक है तो मैं तुम से बाद में बात करता हूँ । अभी मैं कुछ लोगों के साथ बैठा हूँ । डाॅॅ जल्दी से कह कर फोन काट दिया था । दैनिक अगला सूख गया था । अभी दिमाग को पूरी तरह चैन आया भी नहीं था की एक जलजले ने उसे उखाड दिया । उसने पिटाई ढीली की और एक गिलास ठंडा पानी दिया । उसका दिमाग घूम गया था । एक दिन नहीं इतना कुछ मित्र साहब से अच्छी मुलाकात से दिन शुरू हुआ था और उसका छूना छाना और नौकरी देने की अच्छी पेशकश आ गई थी जिससे उसे गिरजा पर गुस्सा आ चुका था । उधर पूरे मसले पर गिरजा की मासूमियत ऐसी जिसकी तबीयत छक हो गई उसने अपने घर संभाल नहीं था कि लूटने एक नई हसरत जगह थी जिसमें पता नहीं कहाँ से गिरजा प्रकट हो गई थी । ये लडकी क्या है टॅाक हो गया । लूटों को वो कैसे जानती थी और उसके इतना करीब थी कि उसकी जाति जिन्दगी का है, सभी थी । उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि लोगों को जैसे घाम के साथ कैसे उठ बैठ सकती थी । और सबसे बडी बात ये थी कि लो तूने गिरजा का नाम उन लडकियों के साथ लिया था जो दिल बहलाने का सामान थी, टहनी बिलबिला उठा, लूट और गिरजा पर चलाना चाहता था । मिर्जा को लोटा को जानने की कोई जरूरत नहीं थी और नहीं लो टू में गिर जा के लिए हल्के तरीके से बात करने की जरूरत होनी चाहिए थी । भेजा की वाकफियत और लो टू का अंदाज उसकी बर्दाश्त की हदों से जूझ रहा था । ऍम होगा खडा हुआ और बेसब्री से पहले लगा उसे गुज्जर से बात करनी ही होगी । फिर वह करना चाह रही थी । मोना कैबिन में आई और उसकी हालत देखकर थक गई । कोई परेशानी है सर? उसने धीरे से पूछा कि मीठी आवाज सुनकर डैनी को शाह को चैन मिला हो और वो उसकी और बेबस बात कर रहा हूँ । मोना जल्दी से उसके लिए कॉफी आई थी । ट्रॅफी के छोटे छोटे घूंट भरने लगा । होना सबसे बैठे उसे देखती रही थी । विकेट पर हम कहीं मसरूफ हूँ । मैंने कुछ देर बाद पूछा हो सकता है पर अभी पक्का नहीं है । शहर से कहीं बाहर जा रही हूँ, कह नहीं सकती नहीं जाने की सोच रही हूँ । पहली में जोर देकर पूछा अगर गिरजा गोवा जा रही थी तो हो सकता है कि शायद होना भी जा रही हूँ । अगर दोनों चीज सहेलियाँ हैं पूछ रही हूँ मैंने कुछ नहीं ऐसे कुछ सोच रहा था क्या असल मैं दैन ने आगे झुककर कहा मुझे पार्टी के लिए गोवा बनाया है । समझ नहीं पा रहा हूँ की चाहूँ या न जाऊँ । तुम जा रही हो गया किसने बनाया है? नोट नाम का बंदा है । मीडिया फैलेगा जानती हूँ से होना बडे प्यार समझ कराई लोटो कौन नहीं जानता । दे नहीं बडा विल्सैक है । मेरी कई पार्टियों में आ चुका है । हैं तो ऐसा लगता है वो और हाँ तुम कुछ ज्यादा ही पूछ रहे हो । उसमें शरारत से कहा है पर डाॅॅ एकदम से बडा गया । अंदर भरी हुई खीज चलकर बाहर आ गई थी । ज्यादा गया तो चलना पडा । ज्यादा से क्या मतलब है तुम्हारा एक सीधा सवाल पूछ रहा हूँ । सीधा सा जवाब नहीं दे सकती हूँ मुझ पर चाॅस उन्होंने फौरन शराब दिया । सोलह ॅ बाहर निकल गया । उसे और बर्दाश्त नहीं हो पा रहा था । कुछ देर बाद जब दैनिक वापस आए तो मुझ को उसने सब्र से बैठे पाया । क्या बात है उन्होंने प्यार से दोबारा पर्याप्त की । दैनिक का मन तो आगे जा के बारे में पूछने का था, पर उसे लोटों की बात शुरू कर दी । होना छोटी के बारे में कुछ और बताओ फॅमिली जानना जरूरी है । उसने धीरे से कहा, उसके पास पैसा है और वो जानता है उसे कहाँ और किस पर खर्च करना है । उसके पास पावर है, वो जानता है उसका लोगों पर कैसे इस्तेमाल करना है । बस इतनी सी बात है उसके पास जो कुछ है तो है । इस बात को लेकर परेशान होना या झगडा मूल्य फिजूल है । वैसे उसमें क्या क्या है जो तुम इतना परेशान हूँ? दैनिकों लगा उन्होंने एकदम मार्केट की बात कही थी, लेकिन उस परेशानी लोटों से नहीं की जा सकती । रिजा के लोगों से रिश्ते को लेकर थी, पर वो दोनों से खुलकर नहीं पूछ सकता था । उसको अपने और फिर जा के बारे में बता नहीं सकता था । उसको लोटों की बात के जरिए गिरजा कि असलियत तक पहुंचता था । उसने लंबी सांस भरकर कम थे । उसका दिए कुछ लोग । उसे कोई परेशानी नहीं है । बस ये बंदा मुझे पार्टी में ले जाने पर आमादा है । सुबह से कॉल पर कॉल किए जा रहा है । जब मैं काम से बाहर गया था, तभी सी कई कौनसा आई थी । मुझे अपने पर इतना दबाव पसंद नहीं है । उन्होंने सहानुभूति जताई और अपनी राय दे डाली । मुझे पता है कितना पीछे पडता है पर जाने में कोई हर्ज नहीं है । उसकी पार्टी वाकई मजेदार होती हैं लेकिन लोगों में तुम्हारा नाम नहीं लिया । पर तुम्हारी सहेली गिर जाए । मित्रा का नाम जरूर लिया था । मैं तुम्हारे यहाँ पार्टी मुझे मिला था । पूरा डैनी की बात सुनकर पूरा किसी आ गई । मेरा नाम चलेगा वीजा करेगा क्योंकि वह कॉर्पोरेट शिक्षा की बेटी है । उसका नाम याद रखेगा । और जहाँ तक मेरा सवाल है तो जब उसे कुछ खूबसूरत लडकियों की जरूरत होती है तो वो मुझे तलाश लेता है । मोना की साफगोई ने डैनी को एक पल के लिए हैरान कर दिया । साफ था उसे अपने बारे में कोई हर सैनी नहीं थी । जिस तरह क्यों ताक रहे हो भाई, कौन सा पहाड टूट पडा है । मुझे अपनी औकात पता है और से कैसे संभाल कर रखना है ये भी पता है । माॅस् बातों में ये सब चलता है यानी फिर भी ताकता रहा । उसका मोदी खुला हुआ था । पर मुझे लोटों की पार्टियां पसंद है । उन्होंने मुस्कुराते हुए अपनी बात जारी रखी तो मौज मस्ती होती है वहाँ तुम तो जानते हो । मैं ऐसी जगह खुश रहती हूँ क्योंकि क्या पता का मुझे वहाँ बीला अमीर नौजवान मिल जाए जो उम्र भर मेरा साथ निभाएगा । याद करो मैं तुमसे पार्टी में मिली थी ना आपने दी हुई पार्टी नहीं सही पर मिली तो पार्टी नहीं थी । अपनी बात पर वह जोर से हंस पडी । टहनी को अचानक उसपर तरह है उससे सहानुभूति निमोना का हाथ अब दबाया । फॅमिली लडकी थी और छोटू का उसको सामान की तरह पार्टियों में बुलाना उसे शायद अच्छा नहीं लगा था । नहीं तो आपने कुछ तरह इस्तेमाल नहीं होने देना चाहिए । ना चाहते हुए भी कह गया बोला की हिम्मत यहाँ से उसके भीतर तक उतर गई थी । दे नहीं अपनी कस्बे वाली मानसिकता से बाहर निकलो । उसने फॉर ललकारा था । जिंदगी इतनी आसान नहीं जितना कम समझते हो । हम सब एक दूसरे को हर वक्त इस्तेमाल करते हैं । ऐसे ही सब चलता है और हमेशा से ही चलेगा की तरीका अगर तुमको पसंद हैं तो क्या कहने? पर हाँ करना पसंद है तो भी वह किसी को कोई फर्क नहीं पडता कि तुम क्या सोचते हो । बस हम रोते रहे जाओगे और बाकी लोग मलाई उडाई ले जाएंगे । शहर के मेले में आए हो दस भाई बंधुओं से अब छोडो हंसो के लोग ठीक कह रही दिशा है । माहौल में घुल जाना ही बेहतर होता था । उस ने मोर्चा नहीं खोला जा सकता था, होना चाहती थी । उसका क्या इस्तमाल हो रहा था और उससे झगडने की बजाय वो आपने इस्तेमाल को अलग तरीके से इस्तेमाल कर रही थी । नुकसान किसी का नहीं हो रहा था । दोनों के लिए फायदे का सौदा था । दैनिकों मोना के बारे में जानकर पूरा तो लगा था पर अब उसको और उसके हालत को बेहतर समझ पा रहा था । और गिर जाए उसका । क्या मेरा मतलब है रिजल्ट से लड्डू घबराता है । दोनों के घरवाले एक दूसरे को जानते हैं, दोस्त हैं । लोगों को पता है गिरजा अपनी मर्जी के मालिक है और गिर जा के लिए लो टू सिर्फ एक मजाक है । दोनों की बात सुनकर डैनिक्स सूरत पर कुछ चयन कराया होना भाग गई । मुझे उसी शाम लग गया था की चिंगारी शोला बनने वाली है । उसमें शरारत कहा मुझे लग रहा तुम दोनों के बीच अब जरूर कुछ चल रहा है । तरह नहीं ऐसा कुछ नहीं है । मैंने जल्दी से सफाई दी । कोई दिलचस्पी मुलाकात थी बस और कुछ नहीं तो ठीक ऍम और मैं दुनिया में जी नहीं पाओगे । चलो मुझे फौरन सब सच सच बताऊँ । कुछ नहीं भाई मेरी दो चार बार बात हुई है बस और कुछ नहीं । पटना पता ही बात पर मैं तो नहीं पाते कि बात बताती हूँ । उन्होंने आगे झुकी और फुसफुसाई । उसे लगता है तो वो सिंगर मा दिया है । मोना के लाॅ की तरह चुके हैं । शर्मा दिया घटिया बाद उसने कही थी क्या उसने करना दिया था इसलिए गिरजा उसके साथ डिनर पर गई थी और फिर बिस्तर तक ले गई थी । क्या एक बडे आदमी की बेटी बिना दूसरे के बारे में सूचित कुछ भी कर सकती थी । उसको किसी की परवाह नहीं होती है । वो ना के कहने का मतलब क्या था । वैसे गंदे अल्फाजों का उसने इस्तेमाल कर डाला था । होना तुम्हारी बात मुझे अच्छी नहीं लगी । नहीं अच्छी लगी तो नहीं लगी पर जो है सब है । और मैंने तो मैं बिना लाग लपेट के सब साफ साफ बता दिया है । उस ने बेबाकी से जवाब दिया, समय कैसे मालूम? मोना हंस पडी हम लडकियाँ आपस में बात करती हैं और उसमें क्या रहता है । फिर कभी बताउंगी मस्ती हुई बहुत ही और कमरे से बाहर जाते जाते रुककर बोली मैं भी आउंगी गोवा तुम जा रहे हो चांदी से रेत पर समुद्र किनारे तुम्हारे साथ ऍम गिर जाती होगी । हमारे सारे सवालों का जवाब तो मैं वहीं मिल जाएगा । इससे पहले की दैनिक कुछ कहता हूँ झटके से बाहर निकल गई । गोवा में सारे सवालों का जवाब मिल जाएगा । इन्हें झमेला किया था अपना सिर पीटने के लिए उसका मन बेचैन हो ज्यादा

अदभुत प्रेम की विचित्र कथा - Part 18

अठारह डैनी जब गिर जा के फ्लैट पर पहुंचा तो नहाकर गुसलखाने से निकल रही थी । उसके जीने वालों से पानी की बूंदे फिसलकर चेहरे पर नगों की तरह चमक रही थी । दो चार तो उसके गुलाबी होठों का बोसा लेने के लिए मचलकर ना की ऊंचाई से कूद भी पडी है । काले घने वालों के झुरमुट से भी का साथ चौदहवीं का चांद प्रमुख रहा था, जिस पर नजर पड रही डैनी डर हो गया था । कुछ खाने के बाहर डैनी को खडा देखकर गिर जा सकता आ गई थी । नीले तौलिए में लिपटी वह पल भर ठंड की और देखते ही देखते उसके गाल शर्म से सुरु हो गए थे । डैनी ने एक हाथ से उसकी कलाई पकडी और दूसरा हा उसकी कमर में डालकर नास्ता हुआ तो स्तर तक ले गया । दैनिक बेताब रोमानियत पर गिरजा हंस पडी टायॅज कर अलग कर दिया और दोनों एक दूसरे से बुरी तरह पुरुष कर बिस्तर पर गिर पडेंगे । ऍफ नहीं बनाई थी और शायद मिलाना भी नहीं चाहता था । असल में ये सोचना भी नहीं चाहता था कि वह फिर जा के साथ है । उसके सामने रेशमी नीली चादर पर बस एक संगमर्मर शरीर था । इसे वह पेज जब भोग लेने पर आमादा था । जुनून के आगे नाम पहचान या रिश्ता बेमानी था । अपनी खाली जरूरत को बदस्तूर पूरा करने में हाल ही किया था । वैसे भी ऐसा सो की नफासत सहित करके मिलना भी किया था । बाहर छोरा बहत रहा था और उससे पहले की उस पर पानी डल जाए । उसके अंदर से खेला जा सकता था । बाद में धूम इसे आखिर तो चलने की थी । मोबाइल ठंडा होने के बाद वो बिस्तर पर लेटे हुए काफी देर तक धोनी के चलों में उलझे हुए थे । एक सिगरेट दोनों के हो चूम रही थी और मैं खोल नहीं पा रही थी । दैनिक खामोश अपने में सिमटा हुआ था और गिर जान उसके सीने में मुझे छुपा लिया था । डाॅन दिनभर की घटनाओं के बारे में सोचने की कोशिश की थी लेकिन उसका दिमाग सुनना था । बेजा हाँ बे एहसास बेतरतीब सब एक दूसरे पर पडे हुए थे । कुछ देर में गिरजा को नहीं आ गई थी । होते हुए उसका मुंह हल्का खुल गया था और होठों पर मीठी सी मुस्कान उभर आई थी । डैनी नहीं खूबसूरत मासूम चेहरा देखा तो जरूर था पर वो उसकी नजरों से आज उतार नहीं पा रहा था । धीरे सोचना खुद को फिर से अलग किया था और बाहर टीवी देखने चला गया था । उसे लगा था टीवी की चलती फिरती तस्वीरें शायद उसमें फिर से हरकत पैदा कर देंगे । उसकी बासी आती उनको थोडा टहला कर तरोताजा कर देंगे । डैनी ने पहले न्यूज देखी और फिर मन बहलाने के लिए कुछ मनोरंजन वाले कार्यक्रमों पर नजर दौडाई । एक फिल्म नहीं बेहद रोमांचक चुम्मन चल रहा था । इसको देखकर उसको भेजा का ख्याल आ गया । उसने याद करने की कोशिश की थी कि क्या कुछ देर पहले उसने गिर जाता । चंबल लिया था? यहाँ नहीं, पर कुछ याद नहीं आया । उसने अपने जुनून को सिर्फ ठंडा किया था । नीली मखमल पर संगमरमरी का भी अब धुंधली पड गई थी । कुछ भी ठीक से जहन में उभर नहीं रहा था । बस फॅमिली तो बार बार जोर मार रही थी और उस से जूझते जूझते वो थक गया था थकान की । तब की उन्हें उसे आखिरकार सुना दिया था । फिर जा के सिर पर एक हल्की सी चप्पा ने उसे जगह दिया । उसने अभी भी तन पर कुछ डालने की जहमत नहीं उठाई थी, पर अपने और उसके लिए ड्रिंक बनाने की मशक्कत जरूर कर ली थी । आराम से सामने कुर्सी पर बैठकर उसने तूम दोपहर छोडकर अपनी नीचे दवा लिए थे । प्रतिन कैसा रहा? ठीक था तो मेरे ऑफिस आए तो बडे परेशान लग रहे थे । क्या हुआ था? नहीं कुछ नहीं फॅमिली ढंग से जवाब दिया कितने गुस्सा किये थे तो हाँ बोलो बोलने से कोई फायदा नहीं होगा हूँ पर बताओ तो सही है । डाॅक् नंबर खून भरा तो सोच में पड गया था । क्या वो सिर्फ मित्रा साहब की नौकरी वाली पेशकश के बारे में बताया या फिर गिर जैसे गिला करे कि उसने अपने डैडी को उनके रिश्ते के बारे में अभी तक कुछ बताया क्यों नहीं था? मामला अनमोल कर ले जा सकता था उसे मथुरा साहब से मुलाकात के बाद बेहद गुस्सा जरूर आया था और अब उसे कुछ भी महसूस नहीं हो रहा था । बस मन थोडा भारी था फिर उसकी गोद में आकर बैठ गई । मैंने सवाल के बीच अपना पूरा वजन डाल दिया है ताकि तुमसे मिलके में डालो, उसमें शरारत से कहा और उसके माथे को चूम लिया । गिरजा उसने धीरे धीरे कहना शुरू किया मुझे गुस्सा आ गया था तो मेरे डैडी ने मुझे नौकरी देने की बात की थी तो उनकी बात सुनकर मुझे झटका लगा था क्योंकि मैं मान बैठा था तुमने हमारे बारे में उन्हें इशारा जरूर किया होगा । फिर जाने से रोकने की कोशिश की हूँ । उनसे बात करने का समय नहीं मिला । पर मुझे तो ये मालूम नहीं था ना तुमने भी इस बारे में कभी कुछ नहीं किया । साढे कुछ बताना चाहिए था । डाॅन अपनी गलती मान ले । सॉरी का क्या मतलब है? हम साथ रह रहे हैं । पर तुमने इस बारे में मुझे कुछ कहना जरूरी नहीं समझा तो मुझे समझती हूँ ही को अचानक पैसा गया । भेजा उसके गोल से । एक का एक ऐसे ही जैसे डैनी के शब्दों से वहाँ से उसका आकर दूर किया हूँ । टेनिस स्वयं पर काबू पाने के लिए उठ खडा हुआ और हमले में चहल करनी करने लगा । वो मसले को खत्म करना चाहता था । पर साथ ही आप भी होता जा रहा था हमारा रिश्ता कहाँ जा रहा है । फिर चाहे मुझे साफ साफ बताऊँ । दैनिक चिल्ला पडा भेजा ने कोई जवाब नहीं दिया । बस उसकी तरफ तक देखती रही थी । दैनिक ने अपने देश को भी डर बंद करने के लिए आंखें मूंद ली । वो गिरजा से खफा जरूर था पर उसे अपने जवान के अनुसार चुभोकर घायल नहीं करना चाहता था । उभरते हुए मन को ठंडा कर तो संजीव जी से गुफ्तगू कर सकता था । उसने दस तक गिनती की नहीं फिर अपनी आंखे खोलते हैं । ऍम मुझे शायद ऐसे चलाना नहीं चाहिए था । वादा करूँ फिर कभी नहीं चला हो गई । उसने मासूम से दरख्वास्त ऍम बाहों में भेज दिया तो हम लोटों के साथ गोवा जा रही हूँ । उसने धीरे से पूछा हम कैसे जानते हो? उसे फॅमिली हूँ? हमने बताया नहीं ऍम शिकवा किया था । हाँ छत वक्त नहीं मिला बताने का । फिर जाने हसते उस की नकल उतारी और डायरी उसकी शैतानी पर मुस्कुराये बिना नहीं रह पाया । देखा मैं तुमको यही कहना चाह रही थी । जब तो मैं कुछ आ गया था गिर जाने । चंचल लहजे में कहा मैं डेट से बात करूंगी पर उसने कंधे उचका दिए । ठीक है कोई बात नहीं । डैनी ने उसके बालों पर प्यार से हाथ फेरा । पर अब क्या इस बारे में तुम्हारा कुछ करने का इरादा है या नहीं । पहले तुम बताओ डैडी के साथ मुलाकात में क्या हुआ था? पता नहीं उन को क्या सूझा कि उन्होंने मुझे अचानक गोल्फ क्लब में लंच पर बना लिया । फिर बता और ऍम करने का ऑफर दे दिया । देखा मैं कहती थी ना, वो तो मैं पसंद करते हैं, गिर जाता जाएगी । पर कैसे पसंद करते हैं । पता है सिस्टम क्या बताओ और दामाद देखो अभी तय हो गया है कि वो तो मैं बतौर असिस्टेंट जरूर पसंद करते हैं । जहां तक दामाद की बात है तो मैं अभी कुछ कह नहीं सकती हूँ । मतलब सच बात ये है कि मैं कुछ कह नहीं सकती, गिर जाते । यहाँ के डेनिस हटकर दूर कहीं तक गई थी । वीजा साफ कह दिया था कि वह पशोपेश में है । डैनी ने न सुनने के लिए अपने को तैयार तो किया था और वैसे भी अभी गिर जाने न कहाँ भी नहीं था । पर फिर भी हो सकते हो गया था । महज चार लब्जो में ही गिर जाने से गहरी कुम्भ चोट पहुंचा दी थी । बिलबिलाकर वह सब की और ताकने लगा था । दैनिक मैं नहीं जानती कि मैं जो कह रही हूँ वो सही है या नहीं । पर हम लोगों को थोडा रुकना चाहिये था । इतनी जल्दी नहीं करनी चाहिए थी । मैं तुम सच में चाहती हूँ । इसमें कोई शक नहीं है कि हमने एक दूसरे के साथ अच्छा टाइम स्पेंड किया है । हमारी शादी को कई महीने बीत गए हैं लेकिन अभी तक मुझे शादी शुदा होने जैसा लग नहीं रहा है तो मेरी बात समझ रहे हो ना । दैनिक छत को और गौर से देखने लगा था । छत के दाने होने से कुछ पलस्तर पड रहा था । सरसरी तौर से देखने पर सब ठीक लगता था पर थोडी सी नजर टिकते ही टूटन आंखों में चुभने लगी थी । गिर जाता हाथ उसके कंधे पर था और उसका स्पष्ट दैनिकों महसूस नहीं हो रहा था । हमें इतनी हडबडी नहीं करनी चाहिए थी । थोडा सब्र करना चाहिए था । मैंने हडबडी नहीं की थी डाॅट कर कहा मैंने तो कहा था जल्दी क्या है तुम्हारी शादी की जब की थी मैंने की थी क्योंकि मुझे उस रात थोडी चढ गयी थी । पहली बार पी थी ना रिजल्ट दो टूक जवाब दिया ऍम फिर चलने लगा है चढ गई थी । उसने भद्दा समूह बनाया । पडनी न तुम से बहुत प्यार करती हूँ । बहुत सारा प्यार गिर जाने पूरी शिद्दत से कहा और उसकी तरफ एक केस उछाल दिया । दैनिक कुछ देर उसको घूरता रहा था । अब करना क्या है? उसने आखिर में हारकर पूछा कुछ नहीं डाइनिंग अपनी सवालिया नेहा और पहनी कर उस पर टिका दी थी । मैं छोड नहीं सकती फॅस कर भी क्या मैं तुमसे प्यार करती हूँ । तो मैं जाने नहीं दे सकते हैं । अभी हम साथ रहेंगे । आगे देखते हैं क्या होता है और हमारे ऍम ऍम जो भी फैसला करोगे तो मंजूर होगा तो बाहर बात बहुत हल्के ढंग से नहीं ले रही हूँ । नहीं, मैं समझदारी बरतने की कोशिश कर रही हूँ, साथ रहेंगे और फिर जैसा जैसा पेश आता जाएगा हम पैसा वैसा करते जाएंगे । गिरजा तुम समझ भी रही हूँ कि तुम क्या कह रही हो? नहीं बहुत नहीं समझ रही हूँ और इस समय जो महसूस कर रही हूँ वो कह रही हूँ । उस ने दो टूक कहा था और अपने कमरे में चली गई । दैनिक कुछ देर तक हवा खडा रहा और फिर उसने खाली हाथों को उंगलियां चटकाने के काम में लगा दिया । उंगलियों के चटकने की आवाज जब सन्नाटे को चीरती थी तो अच्छा लगता था । हर चटक पर उसको हालत का कोई पहलू याद आ जाता था । उसकी उंगलियों की तरह दस पहले तो थे ही दोनों कडाई चटक में पर पूरे बारह हो गए थे । अब बस गर्दन का चना बाकी था । समझदारी बढते हैं । उसने कहा था समय के साथ मैं चलते हैं तो बयासी बडबडा उठा था । पर फिर कहीं उसे लगा था कि गिरिजा के दिए हुए झटकों के बावजूद वो उसका और मुरीद हो गया । गिर जाने, बडी साफगोई और ईमानदारी से आपने पशोपेश को बयां कर दिया था । दैनिक उसने किसी भी तरह से बहकाने की कोशिश नहीं की और नहीं अपने मन की बात छुपाई । उस ने माना था कि वो उसे चाहती है । लेकिन ये भी कह दिया था कि इसका मन अभी पूरी तरह से पुख्ता नहीं था । गोवा चल रहे हो ना बिरयानी । कमलेश आवाज लगाई काम बढिया चलो चलते हैं, मजे करते हैं । ठीक है वो कमरे में जींस और टीशर्ट पहने दाखिल हुए यानी की नजर को ताड गई । अरे काम वाली आती होगी उसके सामने योगी तो नहीं घूम सकती ना तुम्हारी बात है और उसके लिए तो उस पहनना ही था । यह कर उसकी गोद में चढ गयी जा रही । मुझे तुम्हारे साथ हर हाल में अच्छा लगता है बिरयानी प्यार से कहा था और उसके सीने में सिर्फ छुपा लिया था । तुमने बताया नहीं, हम लोग को इतनी अच्छी तरह से कैसे जानते हो तो तुम्हारा दोस्त कैसे बना? उससे दोस्ती नहीं है, सिर्फ कारोबारी तालुका है । जो भी हो और अच्छा क्या उसमें जो तुम्हें भी बुला लिया । मुझे फिक्र थी तो मेरे बगैर यहाँ अकेलापन महसूस कर हो गए । भेजा ने शरारत से डैनी की, वहाँ पर चुटकी का उसमें मोना को भी बुलाया है । मालूम है होना छोटू की पार्टियों में खाली जगह भरने के लिए अच्छी है । वैद्य ने हस कर रहा था दैनिक उसके हसी शायद अच्छी नहीं लगी । मुझे लगा था तुम लोग दोस्त हो । हाँ ऍम दोस्त हैं । जब करने को और कुछ नहीं होता तो मैं उसकी पार्टियों में चली जाती हूँ । तो हम लोग आपस में बातें भी करते होगे हूँ, बिल्कुल करते हैं । मर्दों के बारे में क्यों नहीं? वो ना मर्दों को खूब समझती है, बहुत अच्छी सलाह देती है । गिरता खिलखिलाकर हंस पडी थी और तुम उस से चला लेती हो तो मेरे बारे में हम मेरे बारे में फिर उसकी छाती में और समझ गई । मैंने ली थी पर मानी नहीं थी । क्यों? क्योंकि उस की सलाह से ज्यादा पसंद मुझको तुम थे । डैनी को दिमाग में फिर से हरारत महसूस होने लगे । बोना में गिरजा को बरगलाने की जरूरत की थी । क्या कह रही थी मेरे बारे में वो ना की हरकत । उसका मन खट्टा तो कर दिया था और उसने फौरन जुबान पर शहर रखकर गिरजा से होने से पूछा था उसके सवाल बाॅर उठाकर उसने शराब भरी आंखों से उसे देखा था । मैं क्या बताऊँ बस शुक्र मनाओ के मैंने उस दिन दिल की सुनी थी, दिमाग की नहीं । हम हमारे साथ डिनर करने आ गई थी । डैनी को मोना की गंभीर गिरजा को गरमा दिया है वाली बात याद आ गई । उन्होंने बढा चढाकर नहीं बताया था । हालांकि उसके लव जरूर कुछ भद्दे थे । अब ये पक्का हो गया था की पहली मुलाकात में ही उसने गुर्जर को इतना प्रभावित कर दिया था । इमोन्स उसके बारे में तस्वीर करने का वो नहीं चुकी थी । क्या चाहता तुमने माने मेरे बारे में ऍम डालना चाहा पर यानी नहीं माना मेरी खूब बुराई की होगी नहीं उसमें कोई बुराई नहीं की थी बल्कि उल्टा तुम से हमदर्दी जताई थी । फॅार दी थी क्यों? किसी काम वाली के आने की आहट सुनकर गिरजा उसकी गोद से हटकर सामने बैठ गई । हमसे बुआ जा रहे हैं ना वही बात करेंगे । खूब चलेगी जब मिल बैठेंगे हम लोग गिर जाने घुसकर कहा था और अपने कमरे में चली गई यानी सोफे पर पसर गया था । सवालों के जवाब फिर कल गए थे

अदभुत प्रेम की विचित्र कथा - Part 19

हैं । उन्नीस गोवा की हवाई यात्रा से पहले डैनी को हवाई बोसा लेने और देने का गुरु सीखने का मौका मिला था । उसने टीवी पर लोगों को ऐसा करते देखा था पर कभी सोचा भी नहीं था कि एक दिन उसको भी ऐसा करने की नौबत आन पडेगी । यानि जब पहुंचा तो लूडो हवाई अड्डे के बाहर खडा था और डेनिस हाथ मिलाने के बाद उसके दोनों गालों पर हवाई से बडी गर्मजोशी से जड दिए थे । फॅमिली सब पकडा गया था मर्दों के बीच जैसे चम्मन की उम्मीद उसको कब ही नहीं थी । लूडो से अभिनेत्री किम से मिलवाया था तो ना जाने क्यों ऍम मिलकर ऐसी खुश हुई थी । उसने उछलते हुए उस को अपनी बाहों में भेज दिया था और फिर उसके दोनों गानों पर अपनी गर्म सांस के स्पष्ट डालने की रस्म अदायगी कर दी थी । टहनी बमुश्किल इस हवाई बोलते बाजी को न बात हो गया था और कई और अंजान लोगों के इतने करीब आने की खयाल से खौफ पैदा हो गया था । उसको लगा था जैसे जिस पर अचानक मकडी चल गई हूँ, दो को झेले गया था और लोग उसकी बर्दाश्त का सख्त इम्तिहान ले सकते थे । गिरिजा को बाद में आना था । दैनिक फ्लाइट से निकला था तो वह तैयार हो रही थी । उसने कहा था कि बेहतर होगा दोनों हवाई अड्डे अलग अलग पहुंचे । दैनि टैक्सी करके पहुंचा भेजा अपनी गाडी जाने वाली थी । दो लडकियाँ प्रस्थान कक्ष में चाहते हुए दाखिल हुई और लोगों को देखकर खुशी से चीख पडे । उनमें से छोटे कद वाली कसी हुई चीज पहने थी । लडकी ने अपनी गोरी और थोडे भरे बदन वाली स्कर्ट पहने सहेली को लो टू से पहले मिलने की दौड में पछाड दिया था । उसने नोटों को पूरे जोश से देर तक अपनी बाहों में दबोचे रखा था और फिर पंजों के बल उचककर कई हवाई चुंबन उस पर न्यौछावर कर दिए थे । लोगों ने भी रस्मअदायगी में कोई कसर नहीं छोडी थी । दूसरी लडकी सब्र से अपनी बारी का इंतजार तो जरूर कर रही थी पर उसके चेहरे सजा था की इंतजार करना उसको अच्छा नहीं लग रहा था । अपनी सहेली की गर्मजोशी को देखकर वह खींच रही थी । उसके होठों की महीन से मुस्कान कह रही थी कि इस बार की चूक को बाद में सूद समेत वसूलेगी हूँ । छोटू की लिपटा छुट्टी के चलते डैनी ने लोट उसे कुछ कदम का फैसला बना लिया । नहीं चाहता था कि लोटों के बाद भी लडकियाँ उसपर टिड्डियों की तरह टूट पडे । उनसे सिर्फ हाथ हिलाकर या हाई कहकर मिलना चाहता था । लूडो ने उन्हें टॅावर नाटिकल वाली आशा थी और भरे बदन वाली अर्चना । दोनों मॉर्डल थी की दोनों हैं तो समझो हमारे दोनों हाथों में लड्डू हैं । लोगों ने शरारत से कहा था हमेशा साथ रहती हैं यहाँ तक कि एक ही घर में रहती हैं । लडकियों ने सिर्फ बना साथ हाय कहकर दैनिक को टाल दिया और टू टू के साथ आगे बढ गई । लूटू के मेहबान अब एक के बाद एक आने लगे थे । उनमें शुरू हो गया था और दैनिक कॉफी वेंडिंग मशीन की तरफ बढ गया था । उसने मोना को आते देखा तो उसके लिए भी कॉफी ले आया । कुछ देर में गिर जल्दी पहुंच गयी । फॅमिली को अपने लिए कॉफी लाने फिर भेज दिया । बातचीत करते हुए डाॅॅ क्या सबका मिलने का और हवाई चुंबन देने का तरीका अलग अलग था । आशा ने लोटों के गानों से अपने वोटों को दूर रखा था और अपना पूरा बदन उस पर डाल दिया था । बाद में दूर से खाली पीली सांस छोडने का क्या मतलब था? ऍम बनाया था उसने भरपूर छपी तो पहले ही मार ली थी । इससे तो रहता था उस सीधे लोटों के होठों का चुंबन लेती और बात खत्म कर दी है । वो वजह ही सारा नाटक किया था उसने । और सारी कारगुजारी के बावजूद दैनिक वो एक मस्त लडकी लगी थी । दूसरी तरफ अर्चना थोडी दूरी रखकर लोटों से लगती थी । उसने अपने और लोटों के सीने के बीच वह अहम फास्ट आ रखा था जिसमें नजदीकियां पालने की दावत तो जरूर थी पर फौरन न्योछावर हो जाने का फायदा नहीं था । डैनी को भरे बदन वाली अर्चना कुछ मतलब पर्स लगी थी । अपने पत्ते खोलने से पहले दूसरे की चाल समझने की सलाहियत रखती थी । दलित एक उद्योगपति का बेटा था । उसने अपने बदन को बडे एहतियात से छोटों से दूर रखते हुए हवाई चुंबन की रस्म निभाई थी और उसके बाद गर्मजोशी से हाथ मिलाया था । ऍफ लगा कि दिलीप अपने मेजबान से एक औपचारिक दूरी बनाए रखना चाहता हूँ । खुद को थोडा अलग रखना चाहता था । शायद उसकी दिलचस्पी और उससे ज्यादा अपनी में थी । सब्यसाची और फॅमिली जहाँ मना डिजाइनर था, उसका मेडॉल बदन लाॅट देने वाला था । उसने लोटों के आस पास की । हवा को वही नहीं था बल्कि उसके गाल को भी छूट डाला था । उसकी लार के निशान एयरपोर्ट की रोशनी में तीर्था छोटू के गाल पर चलते रहे थे । डैनी को लगा था कि सभी उस तरह का इंसान था जो हर जगह आपने निशान छोडने पर आमादा रहता था । वो करेगा काम, पर हमेशा दिखाएगा ज्यादा ट्रीटी ग्लैमर फोटोग्राफर थी जिसने अपने बदन को इसलिए बेहद दुबला कर लिया था जिससे उसके सिर्फ वो बाहर ही मर्दों की नजर में आए । उसने सफेद शिफॉन की साडी अपनी टुंडी से इस कदर नीचे मानी थी लगता था कभी भी फिसलकर उसके घुटनों तक पहुंचाएगी साडी कमरबंद खतरनाक तरीके सिटी की हुई थी । ऑफिसर देखने वालों की हसन ना चाहते हुए भी हिलोरे लेने लगती थी । प्रीति भरपूर नजाकत की नुमाइश करते हुए कोहनी से हाथ उठाए लोटों के पास गई थी और एक फीट का फैसला रखते हुए उसने हवाई बहुत से उडा दिए थे । दैनिक उसका छुई मुई वाला अंदाज बेहद दिखावटी लगा था । प्रीति स्वांग कर रही थी । एक किरदार पेश कर रही थी तो उसकी असलियत से एकदम अलग था । डैनी ने लोगों के मिलने के तरीके से उनको तोडने की अपनी कोशिश को गिरजा और मोना पर आजमाने की सोची तो दोनों को अच्छी तरह से जानता था इसलिए उनके मिलने के तरीके से और लोगों के बारे में अपनी पर की तस्वीर कर सकता था । घर जाने मशीनी अंदाज में अपना चेहरा थोडा सा आगे क्या था ताकि लो टू दूर से ही अपना हवाई बोसा उडानें अपनी बारी वो टाल गई थी और पूरी रस्म एकतरफा होकर रह गई थी । दूसरी तरफ मोना ने पूरे खुलूस से लोटों के साथ हवाई बोर्ड से पढते थे । साफ था की नहीं बल्कि सारी रस्में निभाने के लिए वह देता थी उसमें बने रहने के लिए उसके रिवाजों को अपना चुकी थी । गिरजा और मोना का बढता उनकी शख्सियत और हैसियत के हिसाब से एकदम माकूल था । उसका मतलब ये था कि डैनी ने और उनको भी उनके हावभाव से ठीक पहचाना था । लो टू और उसके सोलह दोस्त उडान भरते हैं जहाँ का आगे का हिस्सा पडने लगाकर उनके लिए खासकर अलग किया गया था । बेटी खोलने का संकेत आते ही हवाई सुंदरिया कहीं कोनों से निकलकर अचानक हाजिर हो गई थी और मुँह मेहमानों की कीमती वहाँ पर उसने लगी थी । उडान में मद्यपान की मनाही जरूर थी और खास लोगों पर हम कानून कभी लागू नहीं होता था । आसमानी पार्टी शुरू हो चुकी थी । प्रीति अपनी सीट से उठी । उसने लो टू और गोवा के नाम जाम टकराया । सभी तरफ से गिलासों की खडखडाहट घुल गयी । शराब में शौक कइयों को फौरन बुलाने के लिए लूट में सबसे एक घूंट में अपना पैमाना खाली करने का दूसरा क्या और सब ने पेशतर आपने जाम खाली कर दिए । बहुत ले फिर खुली मु बहने लगी और तार गले सुर में आ गए थे । दैनिक चुप चाप अपनी दूसरी ड्रिंक के घूम भर रहा था । पहली ड्रिंक में उसे हल्की खुमारी से भर दिया था । उसे अप्रीति की तरफ देखा । अपने नाम की तरह ही खुबसूरत लग रही थी । उसकी साडी अब भी खतरनाक तरीके से पूरे से झूल रही थी । अल्केश जरूर में से डैनी झांककर पता करने की कोशिश की थी की कमर के काफी नीचे प्रीटी ने अपनी साडी कैसे टिका रही थी । शायद उसने सटीक जगहों पर फोक लगवा रखे थे जिनकी वजह से साडी अपनी जगह कायम करना, चलने फिरने में कब की फसल गई होती हैं । बहन का मन शहर की ओर मुड गया जहाँ वो पडा हुआ था । कैसी सहमत में जीने के बारे में उसने कभी बात में भी सोचा था । रेंगी के साथ उसने तमाम धर्म दोपहर बिताई की जिनमें उन्होंने अपने आने वाले कल के बारे में कई सपने बुने थे और उन सभी सपनों में एक स्कूल भी ऐसा नहीं था जिसमें उन्होंने अपने को बेहद नामचीन सहमत नहीं जहाँ छलकाते हुए गोवा के लिए उडान भरते हुए देखा था उस वक्त अगर खुदा ना खास्ता ऐसे सोचते भी तो अपने को अफीमची होने का खिताब खुद ही बच्चे थे । उनके आपको बस मारुती कार में शहर करने तक ही जाते थे । रहेंगी को यकीन था कि डायनिंग मारुती जल्दी नहीं खरीद पाएगा और इसलिए उसने सलाह दी थी कि नौकरी लगते ही उसको अपने लिए दहेज वाली लडकी तलाश नहीं पडेगी । एक मारूति कार के साथ ठीक ठाक देखने वाली बीवी और किसी शहरी क्लब में उठने बैठने की गुंजाइश ही उनकी जवान हसरतों की हद थी । बडे होटलों में शामिल बिताना या हवाई जहाज पर आए दिन सफर करने के दावों पर उसे फ्लार ही तब कर सकते थे । उनका हकीकत होना दूर के ढोल थे । दैनिक अपने पिता का खयाल आ गया था और उसका कलेजा उठा था । उन्होंने जिंदगी में देखा ही किया था सुबह से शाम तक विचारे मेहनत करके परिवार के लिए बस जहाँ सूखी रोटी का जुगाड कर पाते थे । अपने को कितना घाटा आया था उन्होंने चूककर कांटा हो गए थे पर फिर भी उन्होंने इस नहीं खुद को काटकर उसके और ज्योति के लिए अच्छे से अच्छा किया था । स्कूल में पढाने के बाद कुछ रुपये और कमाने के लिए उन्होंने अपनी शाम में ट्यूशन पढाने में घूम कर दी थी । तभी जवान में घर के खर्चे चलाने को लेकर माँ पिताजी के बीच बातचीत कमरों में पहुँच गई थी । उन्होंने बडी जब तो जहद में घर चलाया था । बच्चों को बाला पर कभी भी तंग हालत तो आपने पढा भी नहीं होने दिया और नहीं उसका सारे बच्चों पर बडने दिया फॅस को भरे मन से देखा था । उसमें से ली गई उसकी एक वोट की कीमत उसके पिताजी की कई महीने की तनख्वा से शायद ज्यादा नहीं कुछ महीनों में ही उस मुकाम पर था जहाँ अमीरजादों के साथ ऐयाशी कर रहा था । पैसा पानी की तरह बढा रहा था । जबकि पिताजी ने अपनी सारी जिंदगी घर के खाली बर्तनों में दो मुट्ठी अनाज भरने में बिता दी थी । जिंदगी ने वास्तव में देवकीनंदन के साथ कुछ अच्छा नहीं किया था । एक के बाद एक नाइंसाफियों की थी । अब उनकी जिंदगी को खुशगवार का बनाने में कोई कसर नहीं छोडेगा । ऐसा कुछ करेगा जिससे वो अपनी गुरबत से निजात पा जाए और बीती जिंदगी को एक हो जाए । उसने इरादा क्या वो अच्छा बेटा बनकर दिखाएगा? ऋण तो नहीं उतार सकता था पर अपना फर्स्ट पूरी मोहब्बत और पहुंचने से जरूर लगा कर सकता था । अपने माँ बाप के बारे में सोचते सोचते रहने की जज्बा छलक उठे और उनके बदन में फुल पूरी दौड आई थी । सब ठीक है ना डायन उसके बगल में बैठे लोगों ने पूछा था था टाइम ही नहीं जल्दी से कहा था और लम्बे पतले चैंपियन गला से बडा सा खून भर दिया था । क्लास बहुत सुंदर है, डाउन चलाया हूँ । उसमें ऐसे लोगों से पूछा था मुझे क्या मालूम कहा चाहे ॅ इंतजाम देखो तो उन्होंने तुनक कर रहा था पहनी हस पडा मालूम है भाई खाकसार नहीं है बल्कि मुगले आजम है । मैं इसलिए पूछा क्योंकि आपकी तरह बेहद नफीस फॅस ऍम फिर उसका हाथ पकडकर हवाई जहाज के बीचोंबीच ले गया । अरे सब सुनो कुछ मस्ती करते हैं । मेरे साथ ही गबरू जवान है और ये उस लडकी को इनाम में मिलेगा जो मुझे खुश कर देगी । तो आप हाॅल शुरू होता है । लगाओ दाब खूबसूरत लडका पाओ । उसने हस्कर दैनिक वहाँ मारेंगे । उसके दोनों को सबसे पाया था और शरारत से उसकी छाती पर हाथ फेर दिया था । सीटियों और तालियों से जहाज खून जुड था । दैनिक शर्म के मारे सिर से पैर तक लाल हो गया । उसकी बोली लगाई जा रही थी । मालिक लोटो गुलाम डैनी को नीलाम कर रहा था । माना कि ये सब हल्का फुल्का मजाक कहाँ पर डैनी को अपनी दवाई से अपराध हो रहा था । उसको लग रहा था जैसे लोग तो उसको मांस के लोथडे की तरह भूखे भेडियों के बीच उठा रहा था । सर लडकियाँ ही क्यों बोली लगाए मैं भी हूँ साडी पी जिसे दौडता हुआ आया और ऍम आने लगा । चीटियों का शोर एक बार फिर गूंज उठा । दैनिक गिर जाती तरफ देखा था उसके आंखों में रहने के लिए कोई हमदर्दी नहीं थी बल्कि वह मस्ती जवारी हुई थी । पूरा मजा ले रही थी । आज शाम बढती हुई आई थी । उसके होठों पर शरारती मुस्कराहट थी । लड्डू बोली तो माल देखने के बाद लगती है । पहले माल तो देखा हूँ । उसने खिला कर रहा है और अचानक अपना हाथ नीचे मारने की कोशिश ऍफ का दोनों हाथ अपनी पब्लिक के आगे कर लिया सीटियाँ फिर बाजू ठीक ठाक से सारा माहौल लबान लव हो गया । सब उस पर हस रहे थे और उसी के थपेडे उसपर हंटर की तरह पढ रहे थे और बडे के पढते हैं । उसकी सांसे रुक जाती थी और जैसे ही वो ओवर था और पेडा पड जाता हूँ उसको सिर्फ होने लगा । बता रहा था वो पर कुछ नहीं कर सकता था । उसकी आबरू मुझे रही थी । इस तरह बाजार जलील हो रही थी पर वो सिर्फ और सिर्फ मुस्कुरा रहा था । मौका मिलते ही दैनिक पास वाली सीट पर हम से बैठ गया । उसके आंखों में उसपे ठिठोली करते चेहरे सायों की तरह मिर्ची झोंक रहे थे । वो एक एक को पकडकर उनकी हालत से जवान खींच देना चाहता था । बेशर्मी और बिहाई कोतल वेयर पहले रगड कर अपनी सबको फिर से बोल हम करना चाहता था । मैंने अपनी आंखों को जोर से बंद कर लिया और हम बीस सांसद हम गोवा नहीं करने वाले हैं । कृप्या अपनी सुरक्षा बेटी पहुँचे । पायलट के आवास पर भी जहाज में पहुँच गई थी ।

अदभुत प्रेम की विचित्र कथा - Part 20

जी अब छोडो भी दे नहीं उसे मजाक था उसका तो उनको दे रहे हो । उन्होंने मैच के दूसरे और बैठे दैनिक को हल्के से झटका तो मैं मजाक लगा था । हाँ हाँ हाँ, वाकई मजाक हूँ । सब कुछ भी अचानक हो गया था । उसके पीछे कोई गहरा मकसद नहीं था । सब मस्ती के मूड में थे । टैनी अपनी कुर्सी और पहुँच गया था और ऐसे कुछ होकर मत बैठो । तुम जैसे जवान मर्द का गठबंधन जाना खटकता है अपनी रीड सीधी करो भाई । उन्होंने उसका शिकायत की है । रबडी जवान वहाँ क्या शानदार खिताब लो टून तुमको दिया था मुझे कोई इस तरह सीन कहता तो मैं ही जाती है और अफसोस हमें लोग सीन मानने के लिए तैयार ही नहीं होना हंस पडी थी फॅार गई लोटों की हरकत उसके साथ एक संगीन वारदात थी जिसकी होना हसी में उडाई जा रही थी । शायद उसकी नौ समझी थी या फिर वो उसको चला रही थी । उस पर खुद तो बीती नहीं थी और इसलिए उसको हल्के तरीके से ले रही थी । यूट्यूब उसको सरेआम तमाशा बनाया था जिसमें उसे जांच आउट बोला गया था और उसकी खिल्ली उडाई गई थी । ये तो मासूम समझ नहीं था बल्कि घात लगाकर लूट थी, जिसका घटियापन था । मैं खुद गई थी । बच्चन होने का सबूत था, उनकी जलालत की नवांश करता था और उनके माहौल के लिए दैनिकों अचानक उबकाई आने लगी और उसको रोकने के लिए सीधा होकर बैठ गया था । ऐसे ठीक है । उन्होंने फौरन कहा था और जब मैं सीधे हो ही गए हो तो अपने दिमाग को भी सीधा कर रहे । उलटे सीधे खयालों को अपने दिमाग से निकालो और हालत को वैसे ही समझो जैसे हैं । मेरा मतलब है कि जो कुछ भी वो सिर्फ एक मजाक था । इसका मकसद सिर्फ और सिर्फ मस्ती थी तो भी कोई नीचा नहीं दिखा रहा था । ये कितना था की तुम पर लोगों की नजर पडी तो मुझे समझ में नहीं भी हो और इसलिए नजर में चढे हुए थे । दूसरों को मस्ती करने दो और खुद भी करो । बेवजह परेशान होकर छुट्टियों को बर्बाद मत करो । उन्होंने समझाते हुए हल्के से उसका हाथ कबार रैनी ने हार हटा लिया । ऍम ठीक है, रहने देते हैं मुझे तुम्हारे लडका हुआ चेहरा देखने का कोई शौक नहीं है । पर एक आखिरी बार सुन लो अपना बेचारा पाँच छोड दो अपने मिडिल क्लास वाली जहनियत से निकला हूँ नहीं तो ये तो मैं ले डूबेगी । वैसे भी फटे पुराने ख्यालात कोडकर उनका मसीहा बनकर अपने को दूसरों से ऊंचा साबित करने के अलावा तुम्हारे पास कुछ नहीं है । उसी मुझे हो जब की जिंदगी में करने को बहुत कुछ और भी है । पूरा उठकर खडी हुई ट्रेनिंग कलाई पकडकर वापस कुर्सी पर बैठा दिया । क्या खाते हैं मेडल प्लान्स मान सकता हूँ विचारों हाँ ट्रेनिंग । उस समय कहा तो मैं लगता अपनी जब को बनाए रखना विचार है, मिडिल क्लास है और अपने को नंगा करवाना । ऍम नंगेपन से ही आगे बढता है । आदमी मतलब खुद मंगा हो जाए और फिर दूसरों को भी नंगा करते अपनी जब तारकर बेआबरू के झुंड में शामिल हो जायेगा । अपर क्लास बन जाए । होना कुछ नहीं, सिर्फ एक तक देखती रही है । देखो मैं जोकर बन कर नहीं बल्कि एक दोस्त की हॅूं । बराबरी की हैसियत से नोटों तुम्हारे लिए जरूरी हो सकता है । पर मेरे लिए उन्होंने चांदी की चम्मच लिए पैदा हुआ बेवकूफ है । उससे ज्यादा कुछ नहीं । मुझे उसकी कोई परवाह नहीं है । पढना क्यों करूंगा? मैं दोनों से तक देखती रही । इस तरह से हो रही हो तो कुछ लग रहा हूँ या मैं हाँ । उन्होंने कहा नहीं फिर कुर्सी में घुस गया । उसमें ताकत बच्ची होती कि अपना सामान बांधकर फौरन दिल्ली जा सकता हूँ और वहाँ से सीधे सहारनपुर के लिए रवाना हो जाता । चाय घरवाले उसका इंतजार कर रहे होंगे । वो भी उन्हें अपनी नई कार दिखाने के लिए बेताब था । ज्योति की शादी के लिए पांच लाख रुपए भी देने थे । ज्योति के चेहरे पर फट रही खुशी माँ की दुलार भरी बातें और पिता जी की आंखों की चमक उसके सामने ऐसे तैर गई जैसे वास्तव में गोवा में नहीं बल्कि सहारनपुर की फॅमिली छक्के नीचे खडा था । वो अहमद था कि घर वालों को झांसा देकर हुआ चलाया । अपने घर की खुशी छोडकर बाहर की खुशी के लिए दौड पडा । उससे पडी भूल हुई थी घर की यहाँ को अंदर पड समझने के लिए उसमें आपकी फॅमिली होना उठ खडी हुई थी । तुम्हारा कमरे नंबर टिकट सुबह रहा है । हमारे सामान वहीं पहुंचा दिया गया है । आधे घंटे बाद साॅस मिल रहे हैं । आ जाना हूँ । बेहतर बहुत चली गई । कितनी देर तक नहीं बैठा रहा तो सोचना चाहता था, उसका था । गुस्सा हो ना काफी नहीं था । उसे गुस्से के पार को सोचना था । डाॅक्टर लाउंज में पहुंचा तो आधी से ज्यादा रात भी चुकी थी । चैंपियन ना उन से लेकर बाहर समुद्र के किनारे तक पढ रही थी । उसको दिलीप दिख गया । सिर्फ वही था जो लोटों के मजाक पर ऐसा नहीं था कि वह मुस्कराया था और उस उसका हट नहीं उसकी ना पसंद की झलक रही थी । अपनी शाम की शुरुआत फॅमिली के साथ करना चाहता था । प्रोडूसर तुम्हारे बारे में काफी सुना है । अपने हाथ मिलाते हुए कहा था लगता है तो उसके लिए कुछ शाम ना काम क्या है? नहीं, कुछ खास नहीं । मैंने नहीं छेडते हुए जवाब दिया । उनको लोगों की आदत जानते हो । वो छोटी बातों को बढा चढाकर बोलता है । मिले फल कैसे हंसा और दैनिकों लाउंज के दूर होने में ले गया । जहां शोर कम था, लोग क्या करने जा रहा है? उसने बताया नहीं हूँ, कुछ तो जरूर है पर पक्के तौर पर नहीं पता है । आपने कहा था पर मेरे बारे मुझे पक्के तौर पर बहुत कुछ बता दिया है । ट्रेनिंग हफ्ते में कहा गोश्त छुपाता है, सिर्फ खाल दिखाने में माहिर है । वो हुआ क्या? सूट कहा पहुॅचते चलता है लोटने । ठीक कहा था डाॅन गया । उसने अपना एक गिलास बडा सा खून भरकर खत्म कर दिया । मानो उसके साथ अपनी को भी खत्म करना चाह रहा हूँ । लो टू बडा सोचता है अपने दादा की तरह नहीं है तो नेताओं की चापलूसी के जरिए लाइसेंस और परमिट लेकर माल की कालाबाजारी करते थे । बोलते हल्के से मुस्करा कर रहा था । साफ था वो लोटों को खाना नहीं रही नहीं मानता था चलो इन बातों को छोडो तो मुझे लोगों के बारे में कुछ बता रहे थे ना मैं तुमको जरूर बताऊंगा खासकर इसलिए क्योंकि तुम दोनों अच्छे दोस्त भी हो और मैं बैंक करूँ और ऍम अपने कस्टमर की इजाजत के बनाने में नहीं खोल सकता । उसका हम रह हूँ मैं हाँ बिल्कुल ठीक नहीं है । हमें वकील की जब करता हूँ क्या पता कल मेरे बैंकर हूँ और मैं तुमसे ऐसी राजधानी की उम्मीद रखूंगा । उसको उस कर रहा था । चलो ग्लास्को गिरा कर लेते हैं, फॅस पर डाली थी । काफी भीड हो गई थी । जोडों में स्थानीय लोगों को भी पार्टी में बुला लिया था । सब पर मस्ती का आलम छाया हुआ था । कुछ कोनों में खडे हस हस कर बात कर रहे थे तो कुछ नाचने में मगन है । टेनिस में नोट किया कि मार तो हर आकार प्रकार के थे और लडकियाँ अच्छी थी । एक दम दुबली और लम्बी उन्होंने पागलपन की हद तक डाइटिंग और जमीन करके अपने शरीर को सुखा डाला था । साथ ही सब ने अपने चेहरे पर एक से मुस्लिम चिपका रही थी जो अगर कभी तक चलती थी तो उसे फौरन फिरसे चपटा लेती थी । शायद पार्टी के लिए खास तरह की मुस्कान पहनना जरूरी था और राहुल कासवान अधूरा रह जाता है । सभी रही जातियां थीं क्योंकि उनके बदन पर कपडे कम थे और माणिक ज्यादा । दूसरी तरफ मर्द अलग अलग किस्म के थे । कुछ नाच गाने और हसीनाओं को नजर अंदाज करके आपस में ही संजीव जी से बातचीत में मसरूफ थे । शायद उन्हें मालूम था कि वह जब चाहेंगे लडकियाँ हाजिर हो जाएगी । पर फिलहाल उन का और मर्दो से मिलना ज्यादा जरूरी था । वो आपने वक्त का सही इस्तेमाल करना चाहते थे, दूसरे किस्म के मारे मेले में अपने को होने के लिए उतरे थे, बेतहाशा पी रहे थे और खूंटा तोड नाच नाचने पर आमादा थे और कपडे सभी सारे रोज मर्रा वाले ही पहने थे । कोई भी सजधजकर नहीं आया था । साफ था क्योंकि असर डालने के लिए भडकीले निवास की जरूरत नहीं थी । उनका नाम खुदबखुद उनकी हैसियत बयां कर देता था और उनको मनचाहा वर नहीं जाता था । नोटों का मेला अपनी पूरी रेलम पेल पर पहुंच रहा था । लोग पीकर बहकने लगे थे और शबाब माहौल में घुस गया था । चल ही डैनी को लगा मर्द और औरतें एक दूसरे पर ऐसे टूट पडेंगे, जैसे वो अभी तक मसालेदार तंदूरी मुर्गों, कीटाणु, छाती, क्या गला नोचकर चटकारे ले रहे थे । उनके बदन सांझे चूल्हे पर पूरी तरह सिख चुके थे । उनका दस्तरख्वान पर फैल जाना ही बस अब बाकी था । सुबह नंगी बोटियां और सूखा सालन हर तरफ बिखरा दिखाई देना था । महात्मा मंजर पेश होते ही हैं, नहीं तो उसका यादें । ऐसी पार्टी के बारे में सोचकर जवानी में वो रोमांचित हो जाता था और आज उसमें शरीक होने के बाद उसका जीत में चला गया था । पेट से लेकर जुबान की नौ तक खट्टा बंद इस तरह से सर सर आ रहा था । जिसे पूछ साथ चल रहा हूँ । वो उसे फौरन गूगल देना चाहता था तो मुझे तक आकर लौट जाता था । कुछ देर पेट में कुंडली मारकर बैठा था और फिर रेंगने लगता था और सबको उसे पेट से खींच कर बाहर निकालना था, उसे कुचल देना था । उसको पाल नहीं सकता था, क्योंकि जिंदगी की आहट से उसने प्रेफर उठा लिया था । उसको पाने के लिए डैनी ने बडी मेहनत की थी । उसके लडकपन के ख्वाब हकीकत में तब्दील होकर उसका आज और कल बन रहे थे । बीते कल की वजह से उसको आज पर उबकाई आ रही थी तो ठीक नहीं था । आज मैं उसे रहना बचना था । पिछली खुराक में उसको तंदुरुस्त करके अपना काम कर दिया था । उसके पेट में पडे रहने का अब उन मतलब नहीं था । पेट साफ करने का वक्त आ गया था तो कर सकता था । सहारनपुर से लाइफ साहब को मार सकता था । क्या उसमें नोटों के बंदे मजाक को भुलाकर अपने को पार्टी के लिए तैयार नहीं कर लिया था? ऐसा करना जरूरी था क्योंकि अपनी मंजिल तक की दूरी को तय करने के लिए उसे नए माहौल भी सांस लेनी थी । अपने रास्ते पर निकल चुका था और कामयाब होने का वायदा अपने सिख कर चुका था । पलट कर देखना बेमानी था । नए देश में नया भेज पहन कर उसको मुलाजीम मत नहीं कुबोत करनी थी । डैनी ने नोट ऊपर अपनी मुस्कराहट न्यौछावर करते हुए गलबहियों में समीर किया था । हमने तो आज मुझे ठोक दिया था । उसने शरण भरी शिकायत की थी । दोस्त नहीं हो गई तो फिर कौन ठोकेगा? डाॅॅ लोड होने छुटकी काटी थी और फिर उसका हाथ पकडकर भेजा और आयशा की तरफ ले गया । टॅाम से गिरजा को गले लगा जबकि लोटों ने आशा को अपनी चारों तरफ लपेट लिया था । वो तो ऍफ अच्छा नहीं किया था । गिर जाने प्यार से शिकायत की थी तो मैं ऐसा नहीं करना चाहिए था । हरेक गलत किया मैंने कितना अच्छा वो देखता है ये शर्त लगा सकता हूँ । तुम भी मनी मान मानती हूँ कि ये असली गबरू जवान है । बाकी सब उसके सामने बेकार है । जोडो हम जानते हो ना । मैं कभी झूठ नहीं बोलती है तो बोलो जीजा ने नजर भर डैनी को देखा था उसकी आंखों में कुछ नहीं शीतलहर गई थी । कॅश आधे लम्बी में खुद को भेजा की आंखों में टूट जाने दिया था । उसने अपनी बल्कि छुपा ली थी जैसे दैनिक सूरत को अपनी आंखों में कैद कर रही थी और फिर बडी आधा से कहा था हाँ मेरी सबसे अच्छा है लो ट्यूशन पडा ये ये ये देखो हमारी गिरजा को एक ही मुलाकात उसका क्या हाल हो गया है और डाॅॅ हमारे सवालों वाकई काफी बुलंद है तो पैक और गिर जा के बाहर से दैनिक ऐसा लगा जैसे किसी ने उसे गहरे खुद धीरे से निकालकर दोपहर की रोशनी में क्या कर दिया था । क्या फिर उसकी सूनी रात को चौधरी के चानकी दमक मिल गई थी? कुछ मिला उठा था सब कुछ आपको पीछे छूट गया था वो आसमान में कहीं तैर रहा था यहाँ ये पाल उसके भीतर उतरकर हम सही हो चुका था । डाॅन नहीं, आप सब कुछ आगे था । पीछे कुछ नहीं था । ऍम रोड पर ले गया और तुम्हें झूम उठे थे । अपने आप ही उनके कदम से कदम मिल रहे थे और बाहों में बाहें गिर गई थी । गिरिजा उसे ऐसे लिपटी थी जैसे उसके सहारे के बिना वो ढेर हो जाएगी । दैनिक के साथ वो गला भी माहौल में लहराने लगी थी । उसमें खुलने लगी थी । मोहम्मद का नशा सिर चढकर खुली आंखों से बोलने लगा था । टैनी उसे लॉबी के दूसरी ओर ले गया जहां कुछ दीवान और आराम कुर्सियां बंद रोशनी में रखी गई थी । उस को अपनी बाहों में समेटकर उसके आंखों में हमेशा के लिए टूट जाना चाहता था । दिल में हजारों रोमानी खयालात मैं चल रहे थे पर सोबान खुश हो गई थी । वैसे भी ऐसा लब्जों को पीछे छोड आए थे । वो एक मखमली तकिया बन गए थे जिन पर सर रखकर गिरजा उसके साथ नहीं हो सकती थी । फॅमिली धीरे से कहा भेजा उसका सीने में और समझ गई थी । टेनिस से देर तक क्यूँ थाने रहा था । कभी कभी थोडा सबसे रूकती थी और फिर उसका सीने में और दस जाती थी । उसके सिहरन दैनिक चुका देती थी और वो जल्दी से उस को अपनी बाहों में और कुछ लेता था । तिलिस्मी लम्हों ने उनको अपनी कोर्ट में ले लिया था । दुनिया कौन से काट दिया था वो ठहर गए थे । अच्छा सब कुछ ठहर गया । ठहराव में मोहब्बत की रवानी थी जिसमें वो बैठे निकले ।

अदभुत प्रेम की विचित्र कथा - Part 21

पार्टी लाओ । उन से निकलकर बाहर रीत में लौट रही थी । प्याले वहीं रह गए थे और उनकी जगह गोलियाँ और भरी हुई सिगरेट निकल चुकी थी । प्रीति ने गोली प्रेमियों के लिए लंगर खोल दिया और सेबी ने धुआँ खोरों का डेरा जमा लिया । दोनों का अपना अपना इलाका था जिसमें मैं किसी ओझा की तरह झाडफूँक और सट्टेबाजी अपने चेलों से करवा रहे थे । प्रेक्टिस साडी अभी भी स्कूलों पर वैसे ही खतरनाक तरीके से लटक रही थी । लहरों के बडे हाथों से बचकर निकल तो आई थी पर दरिया की मौज में उसकी जवान तल्खी को नहीं छोड दिया था । कमर से वो अब भरे थके मन से लटक रही थी । कुमार एक जगह से दूसरी जगह सर पर दौड रहा था । एक कोने से आवाज लगाई जाती थी तो उसका जवाब किसी दूसरे कोने से आता था । देश के अंधेरों में थके उसको ठिठका देते थे और फिर कहीं से बहती हुई खिलखिलाहट की बयार उसकी अपनी सांसे दोबारा चला देती थी । खामोश राहत ने आवाजों की धमाचौकडी तरिया को परेशान करने वाली थी । वो लगभग कर उनको अपने किनारे से खदेड देता था और जैसी फरक कर देखता हूँ उन को फिर से अठखेलियां करते पाता था । वो खींच रहा था उरा कर उन्हें दूर रहने के राय दे रहा था । पर कुमार तो मारा था, बेसुध होने तक इठलाने से बात नहीं आ सकता हूँ । गिरजा और दे नहीं । इन सब से हटकर थोडी तो अपनी नजदीक या समिति बैठे हुए हैं । रहने के पास कुछ कहने को नहीं था । सब खुदबखुद जाहिर हो रहा था और गिरजा उसकी बहुत कम कर उसकी तरफ दिख गई थी । दूसरे हाथ से और रेट पर डीयू के रही थी और उसको अपने जी के साथ पिरोने की कोशिश कर रही थी । उसके नेता अचानक देनी पडी, उस की कोशिश को चाव से देख रहा था और शर्मा नहीं । जल्दी से उसने लिखा मिटा दिया था और दिल बनाने में लगते हैं । दैनिक मुस्कुराता देखकर उसने उसी भी मिटा दिया और फिर एक गोला खींच दिया था । बोले के भीतर उससे छोटा और फिर उससे छोटा गोला बनाती गयी थी । जब तक लाइन खींचने कि जगह ही नहीं बची थी, गई जा रही थी और उसने बडी लज्जत से बीच ऊॅ लगाकर से सलाह दिया था । आप जैसी नजदीकी डैनी ने अभी कभी महसूस नहीं की थी । पहली रात फॅमिली है । उनको पता ही नहीं चला कब उनकी गरम सांसों से एक पल पिघल कर दूसरे में खुल गया था । उस रात को एक दूसरे के लिए ऍम और बदन टूट कर बिखर जाने पर आमादा दें । पर आज की रात अलग थी । सब शाम था बे बना मोहम्मद के एहसास में जो पढने से कतरा रहा था । इस बात की कोमल कलियां एक के बाद एक चटक तरुण को अपने खुशबू से खेल रही थी । साथ कश्यप पूरा करने के लिए हम गए थे आए मोना कहीं पांच से चलाई थी ऍसे अंधेरे में नजरें दौडाएं उसे दरिया से निकल कर अपनी तरफ आते हुए देखा । छोटी छोटी लहरें उसके टखनों को पकडकर रोक लेने के लिए मचल रही थी । पर वो उछलते कूदते उनसे अपना पैर छुडाते हुए भागती चली आ रही थी । उसमें बहुत छोटी निक्कर और कैसी हुई टी शर्ट पहन रखी थी तो गहरी मिली । रात में दहकते लाल अंगारी की तरह होटल की भी की रोशनी में चमक रही थी । अरे कहाँ थे तुम लोग? मैं कितनी देर से तो मैं हर जगह घूम रही थी । उन्होंने शिकायत और उनके बीच में निधान से गिर पडेंगे । मैं तो समुद्र में नहीं कर आई हूँ हो । ये कहते हुए उसने अपना अकेलापन उन पर छिडक दिया था । अच्छा मुझे तो लगा तुम पसीने में नहीं हुई हो । ॅ शरारत से कहा था अगर तुम मेरे साथ डांस करते तो शायद मैं पसीने में जरूर रहा जाती । पर तुम तो कहीं और लगे हुए थे । इसलिए मैंने अपने को समुद्र के हवाले कर दिया । तुमने नहीं किया तो क्या हुआ, उसने तो मुझे तार कर दिया । मोना बेहतहाशा हंस पडी । डैनी और गिरता उसके अस्सी हमने का इंतजार करते देख रहे थे ऍम उसने अपनी हंसी रोकते हुए कहा था देखो तो हम सब यहाँ गोवा में है तो मैं गिर जाए क्या बात है और हमारे साथ ही काम तारे समंदर के हवा वाह सोचा भी नहीं था कि ऐसा साथ इतनी जल्दी नहीं हो जाएगा । कितना अच्छा लग रहा है ना । मोना की बात पर डैनी मुस्करा दिया था । उसने गिरजा की तरफ देखा था वो अपने में कोई हुई खुशी लग रही थी । शायद उसको मालूम नहीं था कि मोना गोवा में सब कुछ बताने वाली थी या फिर उसको मालूम था और दोनों सही वक्त का इंतजार कर रही थी । तो मैंने कहा था कि हम पहुँचते हैं, आपस में बात करती हैं और बिल्कुल उसी तरह उन्होंने भी कहा था, हम सब हुआ जा रहे हैं । वहीं सब बातें करेंगे । साफ था कि वो अपनी बिसात बिछा रही थी । वक्त रहते उसे छोडो प्यादों को बाजी में उतार देना ही ठीक था और नाश्य और मौत होने में तेरी नहीं लगेगी । डैनी उठा और भरी हुई सिगरेटें सभी से ले आया था । दोनों लडकियों ने लंबे लंबे कश मारे और बातचीत में मजबूर हो गयी । माहौल और उसके धुएँ की मस्ती उन पर छा रही थी । बात बात में उनकी बेलगाम हंसी छूट जाती थी और एक बात सही । दूसरी बात पर वैसे फुदक रही थी जिससे छूट गया डाल डाल हो सकती थी । वो पेपर वहाँ होती जा रही थी । पडनी संजीदा होता जा रहा था । उसने अपनी सिगरेट से कुछ छोटे कश मारे थे और से बुझा दिया था । उसका सारा ध्यान लडकियों की बातों पर था । उसको सुनना चाहता था, समझना चाहता था जिससे अपने को तैयार रख सकें । धरिया की तरह वो कभी भी उछाल मार सकती थी । उसे पानी पानी कर सकती थी । टैनी आधे घंटे तक इंतजार करता रहा पर दोनों अपने में ही उलझी हुई थी । उन्होंने डैनी की मौजूदगी को भुला दिया था । ऍफ का बार खाना भी था लेकिन उन्होंने ध्यान नहीं दिया और इंतजार मुश्किल हो रहा था । उसे ही पहल करनी थी । किस्सा आज ही खत्म करना था । हम हैं उनसे बात तो करनी है । उन्होंने उसकी टोक पर उस कर रहा था बस करने ही वाले थे । आखिरकार हम तीनों है । प्रसाद में हसीन लाख मौसम और तरिया का किनारा हूँ । होना कॅश होगा तुम्हारे मुझसे हसीन राहत मौसम सुनकर अजीब लगता है । थोडा अजीब लगता है । करेंगे न तो रोमानी हो रही थी इसीलिए तो अजीब लग रहा था । फिर जाने मुस्कराकर कहा तो छोडो वैसे भी मैं पेंटिंग किस्म की हो नहीं पैसे एक मिल दूर से मैं अपने सामने इश्कबाजी होती देख रही थी । कहा नहीं ऐसे ही पूछ डाला और मैं तुमको हद करते हो या पूछ रहे हो? कहाँ बोला ने अपनी चांद पर हाथ मारा था और जोर से हंस पडी थी । रही यहाँ और कहा अंदर भी देख सकता है कि मामला संगीत है । मैंने गलत कहाँ गिर जाए । गिरजा हंस पडी थी । ऐसा नहीं होना दैनिक शर्माते हुए बुलाया था । ऐसा क्या नहीं है? जी फॅालो कार दिया मुझे एक मील दूर से दिख रहा था और तुम कहते हैं ऐसा नहीं है भाई याद करो मैं तुमसे पहले कहा था ना कि तुमने गिरजा को गरमा दिया है । फॅमिली को एक बार फिर चल रहे हो ना । इस तरह की खबर बात मत करो उसमें वो ना कुछ कडक दिया बाल बना गई थी तो इस तरीके से बात करूँ हूँ क्या तुमने तमीजदार इकट्ठे का लिया हुआ है । अगर उसको तुमने गरमा दिया है तो करवा दिया है और तुम भी तो गिर जा के पीछे हफ्ते फिर रहे हो । हाँ वही कह रही हूँ जो है टेनिस चुप हो गया । होना की जुबान वैसे भी तेज थी और क्योंकि वो चली थी इसलिए उससे भरना ठीक नहीं था । नहीं होने की बात का बुरा मत मानो । रीजन होने से कहा गलत कुछ नहीं कह रही है । अगर तुम चाहो तो ये ही बात में दूसरे तरीके से कह देती हो तो मुझे सब कुछ पसंद आए थे । देखा सही कहा था ना मैंने । उन्होंने खुश होकर कहा था मुझे तो पहले दिन ही लग गया था की तुम दोनों की जरूरत पड जाएगी । ये तुम्हारी खामखयाली भी तो हो सकती थी । ट्रेनिंग बात को और खुलवाने की नियत से कहा था हम तो रहने दो फिर जाने अपने दिल की बात कबूलने की हिम्मत है और तुम तो अभी भी ऐसे बन रहे हो जैसे कुछ है ही नहीं । ट्रेनिंग अपने गुस्से को नीचे के अलावा और कुछ देश उस पर बैठा रहा था हूँ । सच है कि हम एक दूसरे को पसंद करते हैं पर इससे ज्यादा कुछ नहीं है । उसने सही ढंग से कहा था उसने गिर जा के और उम्मीद देखा कि वो उसकी बात से रजामंदी जताएगी और होना बीच में ही बोल पडी थी । अच्छा इससे ज्यादा कुछ नहीं क्या है? अगर है तो मेरे ठेंगे से उसने चिढकर कहा डैनी को जिस मौके की तलाश थी, उसे मिल गया था । उसने मोना को उकसाने के लिए पाँच कर दिया । हाँ, बिलकुल तो मैं क्या पडी है उन्हें गिरजा को मेरे बारे में उल्टा सीधा यही बताया था । उन्होंने फिर आंखें उठाई और खून कर देखा । मैंने क्या कहा था उसने बुक करा था बुरी बुरी बातें कही थी । फिर जा कुर्सी आ गई थी वो गाना शांत हो जाओ ऍम चला रहा है । उन्होंने चिपट करोड खडी हुई थी और गिरजा की बात सुनकर बैठ गई हूँ । मैं चला रहा था डैनी ने आगे बढकर मोना साहब थपथपाया था पर तुमने गिर जाए कुछ सिखाया पडा है तो थाना उससे दूरी बनाए रखने को कहा था । ना भेजा ने प्यार से दोनों के गले में पानी डालते ऍम को बताया था कि तुमने मुझे आगाह किया था और मैंने इसलिए बताया था क्योंकि तुमने मुझसे पूछा था उन्होंने पलट कर कहा था, मैंने दैनिक खुशी भी बताया था और मैंने डैनी को कहा था कि तुम ने उसके बारे में पूछा था पर मैंने ये नहीं बताया था कि तुमने क्या पूछा था डैनी दिया ये दिखाने के लिए कि वह बातचीत को गंभीरता से नहीं बल्कि हल्के फुल्के तरीके से ले रहा था । ठीक है खुद ही साफ हो गए हैं कि गिर जाने तुमसे मेरे बारे में पूछा था तुमने उसे कुछ पता हो तो मैं क्या बताया था? मैंने बताया था ना दोनों से पहले गिरजा बोल पडी थी । मैंने की राय नहीं मानी । उन्होंने गिरजा को तीखी निभा से देखा था मैंने कोई राय नहीं नहीं थी । गिरजा को स्वस्थ था । वहीं कहा था और क्या थी वह सच्चाई । टैनी ने पूछा छोडो भी रीजन जल्दी से बात करती थी । रात गयी बात पीता हुआ कल होने वाले कल कर सिला होता है फिर चाहे होना पाॅड ऍम को परेशान कर दिया है । मैंने नहीं तो नहीं तो उन्होंने तपाक से कहा तुम कर भी नहीं सकते हो तो मेरे लिए हो गया । मैं तुम्हारी वजह से परेशान हूँ । दैनिक कोई जवाब नहीं दिया । बस कंधे उस कार्य थे । होना को तैश आ गया था । बस ऍम मनोहर और देखो अभी ये जो मिडिल क्लास वाली नैतिकता का नाटक हॅाट दिखाना इस अपने पास हो ऍम खाते हुई थी । कॅश हमेशा तुम्हारे बारे में अच्छा ही कहती है । जब मैंने तुम्हारे बारे में से पूछा था तो उसने साफ चाहता तुम इसे बहुत पसंद हो । हमारी खुलकर तारीफ की थी इसमें फॅसने इतनी तारीफ की थी । किसको सुनकर मैं तुम्हें और ज्यादा पसंद करने लगी थी । उसमें कुछ ऐसा तो कहा था जिस सब थोडा सोचने पर मजबूर हो गई । ऍम नहीं उसने कुछ खास नहीं कहा था । विजय ने बात टालते हुए कहा जाॅन की मेरी जैसी मासूम लडकी को देख समझ कर चलना चाहिए । मतलब अच्छे ऍम अरे भाई लडके तो लडके होते हैं । उनसे जरा होशियार रहने में हर्ज क्या है । फिर जाने मुस्कराकर कहा था तो कम हूँ ऍम दिखाई । गिरजा मंद मंद मुस्कुराती रही थी । वो ना ईथरम से हरकत में आ गई । मशीन उसके इरादे पकता कर दिए थे तो अपनी बात कहने पर आवादा होती थी पर वहाँ से आगे बढ चुकी थी । उसे अब कोई नहीं रोक सकता था । मैं बताती हूँ मैंने गिरजा को क्या बताया था? उस ने गुस्से से कहा था खींच लिया था और अपनी उम्मीद रहने की तरफ तान दी थी । मैंने गिरजा को बताया था कि तुम्हें एक मिनट ऍसे बताया था कि तुम एक अच्छे आदमी हो । सारे मिडिल क्लास वाले अच्छे आदमी ही होते हैं । अच्छे मगर कूढमगज होते हैं । अच्छे पर बेकार होते हैं । ऐसे लोग होते हैं जो बातें तो बहुत बडी बडी करते हैं लेकिन अपनी नाक से आगे उन कुछ नहीं दिखता है । उनकी दूर की नजर कमजोर होती है और सोच पुरानपंथी होती है । पूरा एक पड चुकी थी । उसने हम पहुँच की थी । मैंने गिरजा को सलाह दी थी कि तुम से दूर रहे तो वो तुमको तुम्हारी तंग गलियों से बाहर नहीं जा सकेगी बल्कि तो उसको उस में घसीट कर रही हो गयी । उसका दमाद को मिडिल क्लास वाला हो गई । उन्होंने बोलते बोलते होने लगेगी दैनिक पत्थर बडा सब सुन पा रहे हैं गिर जाने के पास बडी और रेट में उंगलियाँ फिरना शुरू कर दिया था । सब चुके हैं कर्नाटक के बियाबान में डैनी को कुछ नहीं सूझ रहा था । कहीं तूफान खडा हुआ था जिसकी आवाज उसके कानों में बज रही थी और उसकी गर्म हवाओं के थपेडे उसके बदन पर चाबुक की तरह पढ रहे थे । उन्होंने उसको सूली पर चढा दिया था तो तरह रहा था और मोना अदलाबाद करने पर उतारू थी तो हमारे साथ दरअसल दिक्कत क्या है? जानते हैं उन्होंने उन्होंने फिर से शुरू किया हम अच्छे आदमी हो भले मना तो मुझे तुमसे कोई प्रॉब्लम नहीं है । अगर प्रॉब्लम है तो तुम्हारे घर चलाए भारी भरकम सामान से उनको लगता है तो मतलब पुरानी दुनिया से बाहर आ गए हो और तुमने नए तौर तरीकों को अपना लिया है । पर जब लोगों ने हमसे मजा किया ऍम पडे थे फॅस की तरह इस पर खडा पानी सर ऐसी बात में पड जाता है तो पानी पानी इसलिए हो रहे थे क्योंकि ये खास तरह की शर्मिंदगी तुम्हारे वजूद में समाई हुई है । तुम्हारे मेडल क्लास मौजूद में मुझे हो गए । कभी आगे नहीं बढ पाओगे । उन्होंने सांस लेने के लिए रुकी थी पर पास ऊपर बरामद और हाँ मैं तो मैं एक बात और बता दूँ सोचते हो ऐसा बन गया हूँ ऐसा बन गया हूँ । पर हकीकत यह है कि तुम आज भी खुलेआम हो । अपनी मानसिकता के मिडिल क्लास पोंगापंथी तुम्हारे लिए पोस्ट जवाहरात है । इसको नाॅक सकते हो । नहीं काम मिला सकते हो । यहाँ से बाहर है, जिससे सफर में पहले बिस्तरबंद और टीम का बच्चा हुआ करते थे । मुझे नहीं लगता तुम कभी अपने सामान से अपने को अलग करता हूँ । हमेशा बंद हो गई, क्योंकि इसके आगे तुम कभी सोच भी नहीं सकते हैं । मजबूरी है तोहरे वजूद की, फिर भेजा तो बन्दे उसके दुनिया एकदम अलग है । वो मजबूर नहीं है तो पाखंड सिर पर उठाए पैदा नहीं हुई थी । इसलिए अगर उसका मन चाहे तो तो मैं अक्सर हो सकती है । पर तो में बच्चा नहीं सकती है । अच्छा यही कहा था । मैंने गिरजा से खुश हुआ दैनिक तमाम बातें चुपचाप सुन ली थी । उसको मोना के तीखे आरोप कुछ री जरूर लगे थे और उसमें उन पर कुछ खास ध्यान नहीं दिया । कुछ घंटे पहले अगर मुझे ऐसा कहती तो जरूर उससे उलझता और पार्टी में आने से पहले उसने घर से लाया गया सामान दरिया में बहा दिया था । कुछ तैयारी जवा रात की पोटली बना कर उन्हें गहरे पानी में डूबो दिया था । ऍम थी का अंतिम संस्कार और करके वो कमरे से निकला था । होना गलत समझ रही थी । उसको पुराना डैनी समझकर बोल रही थी । उस को नहीं मालूम था कि वो अपने वजूद की सलाखें तोडकर फरार हो चुका था । बीते सालों में उसने उन्हें किस किसका ढीला तो कर दिया था और उन्हें ताकत लगाकर तोडने में वो थोडी देर पहले ही कामयाब हुआ था । धूल से सनी जिंदगी से निजात पा चुका था । अब वो आजाद था, नए तट पर खडा था । उसकी जीतकर सिलसिला इन्ही रेत के टीलों से शुरू होना था और बहुत दूर तक जाना था । वो जीत सकता था क्योंकि पहले भी जीता था । जीत दिमाग में होती है और अगर दिमाग को जोड दिया जाए तो जीत पर मुक्ति कष्ट जाती है । उसने अपनी मतलब जब भी लगाई उसने उसको बदल दिया था । एक तरह से वो अपनी बदलती सोच का निति जन्मता अवतार था । उसने अपना नाम बदल दिया था । दीनानाथ से डैनी हो गया था । जवान बदल दी थी । साला पीछे छूट गया था, अहम और शिफ्ट चढ गए थे और अपने मुफलिसी से चार चार हाथ करके वो तंगी से वही इसी को छीन रहा था । अब ऍम पूरी तरह बदल चुका था था । वो मिडिल क्लास में पैदा हुआ था । उसका नाम नहीं था । वो अखिल का कुमार था । एक मामूली जिंदगी को भी हुजूर उनकी हैसियत पहुँच सकता हूँ । उन्होंने उसको समझती जरूर थी पर पूरी तरह से नहीं । उसको मालूम नहीं था कि वो अपना बिस्तरबंद और तीन का बक्सा बहुत पहले ही अपनी गली के मोड पर छोडा था और ही दिया फटाफट आगे निकल गया था । शरण वफा ईमानदारी और मेहनत के खानदानी जवाना उसमें जरूर साथ रखे थे । पर आज उसने उनको विसर्जित कर दिया था । लगे देश में वो नंदा खडा था । बोलना को उसके नंगेपन का इल्म नहीं था और इसलिए गलत पेड पर चढकर वह म्याऊ म्याऊ कर रही थी । अब वो अपनी रफ्तार और बढा सकता था । वक्त भी माकूल था । लाइसेंस परमिट राज खत्म हो रहा था । यानी लाला लोग बिचारे होने की कगार पढते । दलालों की दुकानें उठ रही थी और उनकी जगह नई पडी लिखी पेशेवर जमा चल रही थी । बाजार में बदलाव के हलचल को समझें और उसका फायदा उठाने के लिए नए पैंतरों की जरूरत वालों में सरसों का तेल लगाए लाला हूँ । उनकी चांस, फिफ्टी, औलादों की सोच और उनकी पुरातनपंथी मानसिकता उनको ले बैठने वाली थी । वास्तव में पुराना भारी सामान में लोग लेकर चल रहे थे और इल्जाम मोना उस पर लगा रही थी कि आप मजाक उसने अपने को बदल लिया था । पर रईसजादे अपने लाइसेंस राज के जेवरों की दवाई से पास नहीं आ रहे थे । गैर जरूरी भार लो टू जैसे लोग लागे घूम रहे थे और देने के लिए मौका था कि उनकी उंगली पकडकर पहुंचे तक पहुंचाया । उन को ज्ञान देकर हल्का करें और अपने काॅम भजन में इजाफा करते हैं । बोला कि बेबाक बयानी के बाद गिरजा खुद में समझ गई थी । उसको मोना का तैश में आकर ज्यादा बोलना ठीक नहीं लगा था । दैनि ने गिरजा को छोडा नहीं वैसे ही रहने दिया । उसका सारा ध्यान अब अगले चौबीस घंटों पर था । इसके दौरान उसे लोटों के दोस्तों को अपना मुरीद बनाना था । इस बार वो उनके साथ को एक अजनबी की तरह आया था और अगली बार वो उनके राजदार और हमदम की हैसियत से आना चाहता था । पैसे से काबली चमक चाहती है । पैसे वाला होना अपने में काबिलियत नहीं होती है । लो टू इसीलिए उसको ढूंढता हुआ आया था । टैनी में काबिलियत थी पैसे से वो उसको चमकाकर अपनी एक बेहतरीन पहचान बना सकता था जिससे उसे किसी के पास जाने की जरूरत ना पडे बल्कि लोग उसके पास आने को मजबूर हो जायेंगे । अगली सुबह फॅसने पर लग गया । हालांकि होटल में खाना और रहना मस्त था फिर भी जानबूझकर डैनी ने पूरा बिल ही नहीं बडा बल्कि उसके साथ बडी बक्शीश भी छोडी थी । उसने तफ्सील से दिल्ली के कारोबार के बारे में बात की थी और महत्व बातों में उसे तमाम तरीके बताए थे जिनसे वो अपनी लागत घटाकर ज्यादा मुनाफा कमा सकता था । तकनीकी ताने वाले में उसने दिलीप को ऐसा फसा दिया था कि नाश्ता खत्म हो । नेता उसको डैनी की सख्त जरूरत महसूस होने लगी थी । दलित के बाद फॅमिली में सभी की तरफ रुख किया था । उसने उससे कपडों के थोक और खुदरा बाजार पर बात की थी । उसने सभी को बताया था कि महंगे कपडे बेचने में वायदा कम होने जा रहा था और असली मुनाफा सस्ते रोजाना पहने जाने वाले कपडों में था । आर्थिक उदारीकरण आने की वजह से आम लोगों के पास खर्च करने के लिए अब ज्यादा पैसे थे । इसको एक और महंगा कपडा खरीदने में नहीं लगाने वाले थे । उनको रोज बढिया कपडे चाहिए थे । उनके बजट में आ जाए । सेबी को ऐसे सस्ते और आकर्षक कपडे बनाने चाहिए थे । ये लोग एक खरीदने जाए तो और खरीद कर लौटे । सभी ने डैनी को ध्यान से सुना था और फिर कबूला । वो अपना कारोबार बढाने की सोच तो रहा था और उसको तरीका नहीं सूझ रहा था । हमें जल्दी मिलना होगा । उसमें दे नहीं रहा । बेहद अपनेपन से दबाते हुए कहा था आपने और समय बर्बाद नहीं कर सकता है । अच्छा हुआ तो मुझे मिल गए । अब कुछ करेंगे । बाद में वो आशा को तैराने ले गया था और अर्चना के साथ उसने बीआरपी थी । दोपहर के खाने के वक्त उसने प्रिटी से दोस्ती काट ली थी । सबके फोन नंबर उसने डायरी में लिख लिए थे । ये वो नंबर थे जो उसकी पार्टियों में खाली जगह भरने के काम आने वाले थे । गोवा से डैनी खुश नहीं था । उसने अपने लिए अमीरजादों के बीच ठीक ठाक जगह बना ली थी । उनको अपनी जरूरत महसूस करा दी थी । अभी बहुत कुछ करना बाकी था । पर मिले समय में काफी कुछ हो गया था । अखिल से चलना जज्बाती होने से कहीं बेहतर था ।

अदभुत प्रेम की विचित्र कथा - Part 22

बाई गोवा से लौटकर डैनी ने काम में गहरा गोता लगा दिया । हालात के समंदर में ज्वार के बाद बता गया था लहरें उठने के बाद शांत हो गयी थी । पानी में सबको साफ दिख रहा था । दर्जनों नायाब खयाल उसे अपने आस पास तैरते नजर आ रहे थे । सभी समंदर की रंग बिरंगी मछलियों या फिर मोटी सी रौशन की तरह थे । वो बाजार में महंगे बिकने वाले नगीने थे । डैनी को उनकी अहमियत का अंदाजा था और इसलिए लगभग कर उन को अपनी पोटली में डालने में मसरूफ हो गया था । उसको भाटे में उजागर करते हुए खजाने को जल्द से जल्द जमा कर किनारे लग जाना था । तो फिर कब लौट आए कहा नहीं जा सकता था । दफ्तर का काम वो मशीनी तरीके से निपटा देता था । सुबह से शाम हो जाती थी और उसको पता भी नहीं चलता था कि कौन आया कौन गया । साढे चेहरे उसके सामने धुंधले हो गए थे । वो किसी की तरह के सामने से अगल बगल से गुजर जाते थे । उनका कहा, सुना कहीं दूर उठ रही आवाज की तरह था । दफ्तर की दीवारें, फर्नीचर वगैरह उसे किसी दरिया में डूबते उतरते से लगते थे । एकमात्र ठोस चीज जिसका उसे आभास था वो थी उसकी अपनी अगला । उसी पर वह भरोसा कर सकता था । उसी के साथ वो काम कर सकता था । सरकार की आर्थिक उदारवाद की नीतियों ने कारोबार के नए अवसर खोल दिए थे । पुराने सेट हो और लालाओं की सोच इन तक पहुंची नहीं थी । डैनी आपने लडा रहा था की कैसे उंगली से पकडकर उनको इन मौकों तक ले जाए जिससे भी शुक्राने से उसे लबान लग कर दें । उसे अपने सामने भरपूर फसल लहलहाती दिख रही थी । सर अपनी हासिया लगाकर काटने की मशक्कत उसे करनी । साहूकारों के साथ अपने सरोकारों से भी उसे निपटना था । डैनी में मित्र साहब के सेक्रेटरी को फोन कर उनसे मुलाकात के लिए वक्त की गुजारिश की । थोडी देर में उसका पलट कर फोन आ गया । मित्रा साहब शाम के खाने पर कौन क्लब में उसका इंतजार करेंगे । उनके फॉर्म राजी होने पर यानी कुछ चौका था और उसका मन मिलने को नहीं था । सुमित्रा साहब से उसका मिलन सिर्फ काम जैसा था । इसे जल्द निपटाना था । मित्रा साहब ने उसको भेजा की याद दिला दी । उसी रात की बातचीत के बाद उसने गिरजा और मोना को ऐसा लगने नहीं दिया था । सारा सिलसिला उसे नागवार गुजरा था । उसने अपने मिलाये बदलाव के बारे में बताने की भी जरूरत नहीं समझती । अपने को और उससे मेलजोल बढाने में लगा दिया था और जब भी गिर जाए होना से टकराती या फिर उनसे नजर मिल जाती थी तो वो बडे अपनेपन से दूर से ही हाथ हिलाकर आगे बढ जाता था । एक बार आपको साथ बैठे भी तो डैनी ने मिलना हसी मजाक में डाल दिया था । दिल्ली में उतर कर दे नहीं । फिर जब उसकी कार तक छोडने गया था भेजा के लिए जब वह कार का दरवाजा खोल रहा था तो उसकी सवालिया ने कहा डेहनी पटेल गई थी नहीं उसके साथ घर नहीं आ रहा था क्योंकि बाहर से दोस्त आ रहा था । उसके साथ कुछ दिन ठहरेगा । बिरयानी सिर्फ सर हिला दिया था और चुप चाप चली गई थी । शायद दोनों की बेबाक बयानी से डैनी को हुई तकलीफ को समझ रही थी और इसलिए उसे कुछ वक्त के लिए पनाह छोड देना चाहती थी या फिर वो खुद अपने लिए सर भाई चाहती थी । जो भी था डैनी ने उसके बारे में ज्यादा सोचा नहीं था । उसको बस उसकी खामोश सवालिया निभा याद नहीं है और फिर सिर हिलाकर चले जाना । डैनी ने अशोक सपने हांगकांग तबादले के बारे में भी लगे हाथों बात कर ली थी । हाँ, तबादला तो हो ही रहा है और शायद आपको जल्दी ही तुम्हें जाना पडेगा क्योंकि तुम्हारा नया बहुत वहाँ पहुंच गया है । चीनी है हुड्डा खूसट हमारा खून चूस कर ही दम लेगा । ऍसे निकल गया था । शो खस पडा था । ऍम नहीं हमारे बात की उम्र का नहीं है । आज के समय में अगर कोई एक इंडस्ट्री में दस से ज्यादा साल लगा लेता है तो उसे बुड्डा उसे कहा जाता है कि चीनी बारह साल से है । पुराना पाती है पैसे मुझे बताया गया है कि वह बेहतरीन बावर्ची भी है । हर तरह का खाना बना लेता है । हांगकांग में तो मैं घर का खाना मिलेगा । चीनी घर का खाना दैनिक सोचकर हंसी आ गयी । उसका होने वाला बहुत सब अक्सर इस पशोपेश में रहेगा कि शाम हो उसके लिए चिकन मंचूरियन बनाया या फिर अमेरिकन चौक हुए एक घर वाली जैसा उसका बहुत सारा जो घर वाला खाना बनाने में माहिर था । हिन्दुस्तान में तो वैसे भी भी मिलना गठित हो गया था । वह याद किस्मत थी उसकी एक झटके बहुत और खान समय दोनों मिल गए थे । प्रसाद ही उसने ये भी तय किया चीनी खाने पर एक अच्छी किताबें खरीद लेगा तो जानकारी होनी जरूरी थी और ना बहुत के साथ बातचीत कर सिरा पकडने में मुश्किल हो सकती थी । पैसे भी बहुत शौक में शामिल होने से रिश्ते बेहतर हो जाते थे । उन के संदर्भ बदल जाते थे । हम प्याला हमने वाला दूर तक साथ चलते थे । ठीक साढे सात बजे जब दैनिक गौर क्लब में दाखिल हुआ तो मित्र साहब अपना पहला पैट शुरू कर चुके थे । हमेशा की तरह की पोशाक एकदम चुस्त दुरुस्त और तबियत एकदम खुशनुमा । उनके हावभाव को देख कर कोई अंदाजा नहीं लगा सकता था । कॉर्पोरेट दुनिया का शहर अच्छा दिनभर कई पेचीदा मसलों से जूझ कर उठा है । उनके चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी और नहीं थकान थी । उनका अंदाज आरामपरस्त ताल्लुकेदारों जैसा था, जो सारी दोपहर सोने के बाद इधर लगे । कल फ्री आपने पहन कर मैं फिल्में पश्चिम लाते हैं । उन का सलीका उनकी शिक्षित के बारे में बहुत कुछ बताता था । मित्रा साथ में गर्मजोशी जब हाथ मिलाया और फिर अपनी उंगलियों को उसकी मजबूत बाहों पर उस के लिए ठहर गया । अच्छे लग रहे हो या नहीं, उनकी भारी आवाज क्लब के खामोश माहौल में पहुँच गए । फॅार अगर तो मैं ऑफिस वापस नहीं जाना है तो भाॅति हूँ उन्होंने मुस्कराकर उसकी ऍम क्या हो गया आपको ठीक समझे वो मंगवा लीजिए यानी का गला खुश होने लगा था । डैनी अपने फैसला हूँ उनको दूसरों पर मत छोडो उसने छह पिटाई ऍम बोल दिया था कौनसे ऍम मित्रा साहब मुश्किल हो ऍम के बारे में मुझे ज्यादा कुछ नहीं मालूम हूँ । बार वेटर की मदद ले लेता हूँ तो आप पढे थे उस की जरूरत नहीं पडेगी मैं बताता हूँ क्या होगा हमारे फैसले का जश्न मनाना है इसलिए कुछ उम्दा पियेंगे । उन्होंने चुटकी बजाकर खिदमतगार को बुलाया था हमारे पास वो वाले कुछ बोतलें अभी बच्ची है क्या ऐसा ठीक है? ले लूँ उनका शराब को एक नफीस कद्रदान नहीं जाएगा । मित्रा साहब ने देने की जांच दोबारा बडे प्यार से तब तब आई थी ऍम अच्छी लगी खिदमतगार जल्दी से जाकर मित्र साहब कि फरमान लिया और उसने बडे करीने से उसे पियानो में पेश किया था । मित्र साहब में हूँ हल्के से उसमें नहीं हुए थे । उसके जायके को जुबान पर लिया था और फिर सिर हिलाकर वल्दियत पर मुहर लगा दी । डैनी ने भी खामोशी सपना प्याला उठाया था और खूब वर्धमान पर उतार नहीं जैसे मेरे पास पहले से ही दो अच्छे लडके हैं । प्रसाद ने बात शुरू की और इस अच्छा है कि मुझे एक और लडकी की जरूरत नहीं है । वो कहते कहते रुक गए थे । उन्होंने डैनी की तरफ दो पर देखा और फिर ज्यादा उठाकर एक लंबा खोल लिया था । मुझे तीसरे लडके की जरूरत नहीं है पर मुझे तुम्हारी जरूरत है । पहले ही मुलाकात तो मुझे अच्छे लगे थे । मैंने खुद से कहा था कि ये लडका ऐसा है जो बहुत आगे जा सकता है । उसमें काबिलियत है, होना है । दोबारा मिला तो मुझे यकीन हो गया कि तुम ठीक आदमी हूँ । मैंने तुम्हारे लिए अलग से जगह बनाने का फैसला कर लिया । मित्रा साहब फिर की के बाहर देखने लगे थे । कम रोशनी में जैसे बाहर कुछ तलाश रहे थे । नहीं, धीरे सब बताएगा । मैंने बहुत कुछ अपनी जिंदगी में कमा लिया है । सब कुछ तो है मेरे पास मेरा समय आ गया है कि जिस क्षेत्र में मुझे दौलत शोहरत थी उसके लिए मैं भी कुछ करूं । कुछ तो वापस करूँ, विरासत में कुछ छोड दूँ । मित्रा साहब ने कमरे में अपनी न सिर्फ घुमाई थी । कई लोग उसके सामने छूट गए थे । उन्होंने मुस्कुराकर हर निगाह को कबूला तो हुनरमंद हो, नौजवान हो काम करने के लिए तमाम जिंदगी तुम्हारे सामने पडी है । बहुत नाम कमा सकते हैं । वैसे तो आप जानते ही हो गए कि आने वाला कल बेहद से जीता होने वाला है । हमने जितना सोचा है उससे भी ज्यादा पेचीदा । इसके हमें आज अपनी बुनियाद पक्की करनी है । इससे आने वाले वक्त से हम कारगर तरीके से जुड सकें । मैंने तो मैं सोच समझकर चुनाव क्योंकि तो मुझ से सीखकर मेरी विरासत को नए दौर में आगे बढा सकते हैं । मित्रा साहब अपने में कुछ देर के लिए गुम हो गए थे । दैनिक चुप चाप उनके लौटने का इंतजार करने लगा था तो मैं कह रहा था की उन्होंने इकाई फिर शुरू किया । मैं इंडस्ट्री के लिए कुछ करना चाहता हूँ । आपने दस रुपए की पोटली नई पौध के और हार के हवाले करना चाहता हूँ । मैं चाहता हूँ मेरे तो रवे का असर फायदा तो उठाओ । उन खूब तरक्की करो और अपने साथ इंडस्ट्री को नए आयाम दो और उसको उसकी मंजिल तक पहुंचा हूँ । दैनिक उनकी बात पूरे ध्यान से सुन रहा था । मित्रा साहब ने उसको चुनकर उसपर बहुत बडा एहसान किया था । इससे पहले उन्होंने बैंक के अलग अफसरों को अपने ताल्लुकात के बिना पर उसकी तरफ खास ध्यान देने के लिए नाम बंद किया था । फॅमिली के मुरीद हो गए थे और क्या उसके जहन में सिर्फ यही एक पैमाना था? बडा नहीं । हमने मेरे मन की बात करने का फैसला लिया है, इसलिए आॅॅफ करेंगे । सब काम करना अच्छा रहेगा । तो कुछ मुझे ऐसी हो गई और मैं कुछ काम से उन्होंने मुस्कुराकर अपना प्याला उसके प्यार से टकरा दिया था । शुक्रिया सर, इज्जत अफजाई के लिए शुक्रिया दैनिक खुशी जाहिर की थी । मित्रा साहब खेल पडे थे उन्होंने निश्चिंत होकर ऍम मुस्लिम चार में पहुँच गए थे । लोगों के साथ हिंसा भी थी और ऍम टाइगर श्रॉफ और तंदूर में पका के खडा अलग अलग जा रहे थे । मित्रा साहब कशमकश में थे कि इस पर उंगली रखें । फैसले का इंतजार करते हुए डैनी ने अपने गोल मटोल वाले को हाथ में लेकर थोडा ना चाहे था । जरा सी हवा पाकर मैंने बुलबुले उठ खडे हुए थे । वो एक पल के लिए खूब खोले थे और फिर भात गए थे । दैनिक दोबारा ज्यादा नचाया था और इस बार एक बडा सा बुलबुला खुलकर को पास हो गया था । उसने और फूलने के लिए आस पास के हवा को समझने की कोशिश की थी और ऐसा करने में उसकी खुद की हवा निकल गई । वो टूटकर बह गया था । ज्यादा हवाबाजी के चक्कर में भगवान हो गया था । मित्रा साहब ने अपनी पसंद पर उन्होंने रखती और कितना चार हमारी पूरी करने के लिए रवाना हो चुका था । अब फॅमिली से मुखातिब थे । सर मेरे जीवन के सबसे बेहतरीन रात है । मेरे लिए ये बहुत बडी बात है कि आप जैसे अजीब शख्स ने मुझे किसी है समझा । मेरे पास हजार पास नहीं है जिनसे मैं आपका शुक्रिया कर सकूँ या पता सकूँ की मुझे कैसा लग रहा है कि सुनकर आप मुझे अपने से सीखने का मौका दे रहे हैं । सच में किसमें मुझे छप्पर फाड कर दे रही है? मैं कडी मेहनत करके आपकी उम्मीदों पर खरा उतरना चाहता हूँ । ट्रेनिंग पूरी संजीदगी शखा मित्रा साहब उसकी तरफ तक देख रहे थे । शायद उसके हर लडकी को तो बोल रहे थे । डैनी उनकी तस्वीर पर एकदम जोश में नहीं आया था बल्कि अपने जज्बातों को समय कर ही रिश्ता से पेश आ रहा था । उनको डैनी का तरीका पसंद आ रहा था तो काम करते शुरू करना चाहता हूँ । उन्होंने मुस्कुराकर पूछा था फौरन से पेश्तर सर ऐसा कहाँ होता है जो साथ खुद शागिर को बुलाए और ऊपर से आप जैसा असीम पुस्ता आप जैसा तो दुनिया में कोई है ही नहीं । बिजनेस स्कूल में हमने आपको पडा है तब आप बहुत दूर देखते थे और हम अपने को एकलव्य बनाकर दूर से ही सीखने की कोशिश करते थे । आज आप मुझे खुद शागिर बनाने की पेशकश कर रहे हैं । मैं जिंदगी में ये वाकई करिश्मा है । मैं तो साहब ने खून में अपना पैमाना खाली कर दिया था । खिदमतगार से फिर से भरने में लग गया था । उन्हें यकीन था कि डैनी उनकी शान में अभी और कसीदे काटेगा । सर ट्रेनिंग सभी आवाज में कहा था इससे पहले कि मैं आपके साथ काम शुरू करूँ, मैं कुछ कहना चाहता हूँ तो मैं सिर्फ आपसे ही कह सकता हूँ क्योंकि आप उन चुनिंदा लोगों में से हैं जिनके लिए ईमानदारी सबसे अहम चीज है । मेरी दरख्वास्त है आप सही फैसला लेने में मेरी मदद करें । मित्रा साहब की बहुत सवालियानिशान बनकर कुछ तक गई थी । दैनिक उनके बदले हुए तेवर देखकर थोडा सब पकडा गया था । पर उस ने अपनी बात कहने की हिम्मत जुटा ली थी । सर मैं आपको बता देना चाहता हूँ की आपकी बेटी सिर्फ मेरी दोस्त नहीं है अब बल्कि उससे कुछ ज्यादा है । मित्र साॅफ्ट पड गया था । पडनी ने अपनी बात जारी रखी है । मैंने आपसे मुलाकात का वक्त इसलिए मांगा था जिससे आप अंधेरे में ना रहे हैं । मेरे बारे में फैसला करते वक्त आपको भेजा और मेरे रिश्ते के बारे में मालूम होना चाहिए । आपको बताना शायद मिली जरूरी था क्योंकि हालत को जैसे हैं कि आप डैनी ने लव खोजने की कोशिश की थी पर अटक गया था । मित्रा साहब फेरकर खिडकी के बाहर हो रहे थे जी सर, तेरी ने फिर हिम्मत जुटाई थी । खाई सामने थी । अब एक झटके मुझे कूटकर पार करना था और मैं एक दूसरे को अच्छी तरह जानते हैं । पर अभी हमने कोई बडा फैसला नहीं लिया है । एक दूसरे को देख समझ रहे हैं और सही वक्त पर आगे की जिंदगी के बारे में फैसला लेंगे । पर आपकी जो भी हो, फिलहाल हमारे रिश्ते की वजह से मैं आपकी दी हुई नौकरी नहीं कर सकता हूँ । मुझे न कहते हुए बेहद अफसोस हो रहा है । ऐसा मौका बडे नसीब वालों को ही मिलता है । पर मेरा हाँ मैंने विषय ठीक नहीं होगा । मित्र साहब फिरती के बाहर कुछ देर गुमसुम से देखते रहे । लगता था हो सकते में आ गए थे । जी सर वो बुदबुदाया मुझे कि नहीं मेरी बात को समझेंगी और मुझे माफ कर देंगे । अपन जाने में मेरे लिए कुछ कर रहे थे या आपका बडप्पन है । पर मुझे भी अपना फंस ने भरा था । आपसे अपने रिश्ते की जानकारी चुका कर नहीं रख सकता था । मैं नहीं चाहता लोग कहे कि मित्र साहब ने कोई गलत काम किया था । मित्र साहब अचानक कुर्सी से उठ खडे हुए थे । उन्होंने एक घूंट में अपना प्यार खत्म किया और फिर झटके से ऐसे मुझे थे जैसे उन का पैर कांटो के तार पर पड गया हो । ठीक है या नहीं । ऍम जल्दी से कहकर वह कमरे से बाहर निकल गए । ट्रेन इनके पीछे उठा था पर फिर बैठ गया । मित्र साहब उसकी बात सुनकर सकते में आ गए थे । उनको शायद शर्मिंदगी भी हो रही थी । पर जो भी हो रैनी ने अपनी पेशेवर ईमानदारी जता दी थी । अपनी तंग उनकी टांग के ऊपर रखती थी । कहीं ना कहीं आगे चलकर वो उसके बारे में जरूर सोचेंगे और हो सकता था वो इसी वजह से उनके आडे आने से बचेंगे । भेजा का फैसला उसके और मित्रा साहब का रिश्ता में बेमानी हो गया था । अब वो खुद अपनी बनाई जमीन पर आपने पहलों पर खडा था ।

अदभुत प्रेम की विचित्र कथा - Part 23

तेज हफ्ता खत्म होते ही डैनी सहारनपुर पहुंच गया था । मेरा तबादला हांगकांग हो गया है । मैं दस दिन में वहाँ चला जाऊंगा । उसने बिना लाग लपेट के घरवालों को खबर सुना दी । सबसे नाटक नहीं गई थी ज्योति जिसने उसके आने पर चीखपुकार मचा रखी थी और अपने तरफ से खोलने में लगी थी । जगह खामोश हो गई । उसके हाथ से तोफा छूटकर जमीन पर गिर पडा था । नहीं तो वह कहने के लिए खुला था और उसका गला घोट रहा था । आंखों में मायूसी तैयार गई थी । माँ बाप सुनकर अवाक रह गई थी । कुछ पल बहुत सी बानी खडी रही थी और फिर पास पडी कुर्सी में ऐसे धड गई थी जैसे किसी ने उसकी छाती पर भारी पत्थर रख दिया था । पिताजी ने खबर सुनकर दैनिक आंखों की तलाशी लेनी शुरू कर दी । शायद वो हांगकांग जाने के पीछे छुपी असली वजह ढूंढ रहे थे । खुशी के बजाय माहौल में मातम खुल गया जैसे कोई अचानक चल बसा हो । ढहनी अपनी माँ को बाहों में भरकर कहना चाहता था कि वह जाना नहीं चाहता था और अगर वो कोई चमत्कार करके उसे रोक सकती थी तो फौरन रोक ले । उसे अपना घर अच्छा लगता था । बस उसका मांॅग की छत वाले दो कमरों के मकान की तरफ दौड गया जहाँ से अपनी सारी जिंदगी गुजारी थी । मानव उंगली पकडकर खींच रहा था । अपना कोना कोना दिखा रहा था जहाँ पर दिनों की किलकारियां गूंजा करती थी । उसके रोने का शोर बचता था और उसकी शैतानियों का पुलिंदा अभी तक बिखरा पडा था । उसकी आंखों के सामने वो मंजर नहीं हो रहा था की कैसे कैसे वो मुक्के मारकर तकनीकी रोई को दोनों दोनों में बीच में किसका आता था ताकि सोते समय बीच में फंसकर उसकी कर धरना चाहेंगे । पुरानी बांध की खाट पर न जाने उसने कितनी रातें और दोपहर में बताई थी उस पर पहुँच पडे उसमें ये सब हाँ चुने थे तो वक्त के साथ आज हकीकत में तपती हो रहे थे । अगले घर की सीमेंट के फर्स्ट सोची थी । कई जगह से धंसी हुई सीमेंट पर रोज शाम पालथी मारकर पडने बैठा करता था । उसकी गोदी में समाकर उसने सारे पांच पडे थे । सीलन भरे अंधेरे गुसलखाने ने उसे नहाते वक्त गाने के लिए उकसाया था । सर्दियों में लोटा भर ठंडा पानी पडते ही उच्च है । जगह चिकोटी काटकर बदन को तरन्नुम में ला देता था । छोटी साइकिल पर बैठकर उसने घंटों पिछवाडे के आगमन के चक्कर लगाए थे । आज भी वह सब वहीं थे । डैनी अलग हो गया था । दैनिक कम अंदर चल गया था तो भाग ॅ की छत वाले घर में छूट जाने के लिए देता था । उसको सहारनपुर में नया लॉन्ग वाला घर नहीं चाहिए था । उसको हांगकांग की चमक दमक नहीं चाहिए थी । ये घर नहीं थे, सिर्फ चखी थी । मकान थे उसकी जरूरत मकान और जगह की नहीं थी । दैनिकों दरअसल घर चाहिए था जाना पहचाना अपना वाला घर माँ की छब्बीस इसकी ने खाने की कमर तोड दी । ये हांगकांग कहाँ है? दिन उन्होंने रूंधे हुए गले से पूछा । चीन के पास देवकीनंदन ने जवाब दिया था इंग्लैंड से भी दूर उन्होंने परेशान होकर पूछा ऍम पश्चिम में है और चीन पूरा में है । उन्होंने फिर जवाब दिया था ज्योति दौड कराई थी और दैनिक गले लग गई । बच्चा हो क्या? उसने रोहांसी गुजारिश की थी । टेनिस से जोर से भेज दिया था । उसका मन कर रहा था कि उसकी चोटी खीच और कहे पतली तू तो खामोखा परेशान हो गयी । मैं तो ऐसा कर रहा था । मुझे छोड कर नहीं जा सकता हूँ, होती है । उसे धीरे से उसके कान में कहा था मुझे जाना होगा । काम कर रहे हैं । पहुंचने मेरी मेहनत देखकर यह पोस्टिंग मुझे नाम के तौर पड रही है । मैं कैसे नहीं कर सकता हूँ हूँ हूँ इससे जाना चाहिए । नौकरी पहले है बाकि सब बाद में है । हम लोग रहेंगे । देवकीनंदन ने कहा था और अपनी पत्नी की तरफ पडे थे दूर हो रही हो अरिजीत ये खुशी का मौका है । चलो छप्पन मीठा करता हूँ । मैंने अपने आंसू होती से पहुंचे और कोई में चली गई । मैं दिल्ली के लिए हलवा बनाती हूँ । मैं जाने हांगकांग में इससे मिलेगा भी कि नहीं । जब जाओगे बेटा तो खूब सारा बनाकर साथ में बंद हो गई । कई महीने तक खाते रहे, कॅाल में करते थे । दैनिक हॉस्टल में कई साल रहा था । दिल्ली मुंबई गया था और से कभी ऐसा नहीं लगा था कि वह दूर जा रहा था जैसे उससे कुछ रहा था की सब जगह आसपास लगती थी । जहाँ से जब जी चाहा घर आया जाया जा सकता था । पर हाॅल नक्शे पर भी तो बहुत दूर नजर आता था । दिल्ली से निकलकर बांग्लादेश, वर्मा और फिर महाकाय चीन पार कर नहीं नंदन सा हम हम दिखाई पडता था कश्मीर में दूर था । वहाँ जाने के बाद वापसी मुश्किल नहीं है । दैनिक घर से टूटकर अलग हो रहा था और उसका एहसास उसको कचोट रहा था । ये आखिरी लगी थी । शायद जब घर में सुबह जैसे था आने वाला वक्त उसे अपने ही घर में दो दिन का माहौल बनाने वाला था । उसके मनहूस खयाल को फौरन झटक दिया और अपनी नई गाडी की नुमाइश करने में लग गया था । मैं और ज्योति उसके अंदर बैठ कर पूरे नहीं समझा रहे थे । उसने ज्योति को अपने साथ और बिल खाने के लिए मुंबई के ओबराय होटल से लाये कपडे के लिए छेडना शुरू कर दिया था और फिर माँ के हाथ में नगद पांच लाख रुपए रखती है । हाँ फिर रूपडी की देवकीनंदन सब चुप चाप देख रहे थे । उन्होंने उठकर डैनी के सर पर आशीष भरा हाथ फेरा था और तेजी से बाहर चले गए थे । अपने नए मकान के रोमान बराबर लॉन को वो कुछ देर तक में हर दे रहे । उनका चेहरा खुशी से दमक रहा था । उनका पूत सपूत था । उन हार ही नहीं था बल्कि संस्कार वाला भी था । भगवान ने उनकी सुन ली थी और सूत समेत उनकी मेहनत का फल दे दिया था । देवकीनंदन की आंखें गर्व से चमक उठी थी । उन्होंने जल्दी से आंखों को अखबार के पीछे छुपा लिया था । दोपहर का खाना शानदार नक्काशी वाली लकडी की मेज पर परोसा गया था । नहीं खास सहारनपुरी नकद राशि वाली थी जिसके लिए शहर पूरे देश में मशहूर था । डैनी ने उस पर हाथ फेरा लकडी बढिया बडी किसी किसी गई थी टोकने पर गहरी आवाज उसमें से निकलती थी । मैं इस बढिया थी । ज्योति और माँ उसके इर्द गिर्द बढ रहे थे जो धीरे हांगकांग के बारे में सवालों की झडी लगा दी थी और उधर माँ उसका ध्यान लाड से बनाए हुए खाने की तरफ खींच रही थी । बेटी की टोकाटाकी से वह आखिर में खींच गई थी और उसको डांटकर चुप करा दिया था । उसके बाद उनमें चैन से दिनों की थाली की हर कटोरी और को खाने से लबालब भर दिया । माँ का प्यार थाली में छलक रहा था । बोलने में तो दिनों की डाली थी पर असल में वो बहुत चाइना की ट्रेन थी । सारा खाना सुंदर बोनचाइना स्टेट में लगाया और परोसा गया था । एकदम होटल की तरह है । दैनिकों अच्छा तो लगा था और उसको जमीन पर पालथी मारकर पुरानी स्टील की थाली में खाना खाने की याद आ गई थी । वो भी क्या दिन थे । उसने सोचा था उनके बीच जाने की उसको खुशी तो थी पर थोडा गंभीर था । भैया ज्योति चाहती थी तो मुझे हर महीने सौ डॉलर भेजा । माँ मुझे पैसे देने में बडी कंजूसी करती है । हम तो अभी से इंटरनेशनल हो गई हो । रुपये छोड डॉलर में बात करने लगी हो यानी हस पडा था जो नहीं हूँ मेरा भाई जब डॉलर में काम आता है तो मैं रुपयों में बात क्यों करूँ? तो फिर हांगकांग डॉलर बोलो ऍम डॉलर तो यूएस डॉलर से कम होने ना हाँ तो मुझे हर महीने डेढ सौ हांगकांग डॉलर भेजना पर अच्छी कहीं कि डायनिंग उसकी चोटी खींची थी । लालच नहीं करना चाहिए लेकिन अंदर बीच में बोल पडे लालच पूरी बडा है तो तुम्हरी तरक्की से मैं बहुत खुश हूँ । मेरा शुरुआत हमेशा तुम्हारे साथ है पर बेटा पैसे के पीछे कभी भागना पडता । हमेशा संतोष, तराशना, संतोष करना है क्या पिताजी को हसरतों को पनपने नहीं देता है? श्रेष्ठता की इच्छा रखना अच्छी बात है पर सांसारिक भोग की आकांक्षा रखना ठीक नहीं है । आपकी सबसे में क्या कर रहा हूँ? पहनी नहीं होने से पूछा था हमारे मन में महत्वकांक्षा है, शिष्य का नहीं है देवकीनंदर नहीं मुक्तसर सा उत्तर दिया क्या बुराई है इसमें? मैंने जिंदगी अभी शुरू की है । ठीक से बचने के लिए मुझे जरूरी सामान चाहिए और सामान को जुटाने के लिए पैसे चाहिए । हाँ, पैसा चाहिए लेकिन कितना? हमने भी गृहस्ती चलाई है तो उन दोनों को पाला पोसा है । पढाया लिखाया सब काम हो गया ना । हमने अपनी ख्वाहिशों को हमेशा बांध कर रखा है । उनको अपने मूल्यों पर हावी नहीं होने दिया । किन मूल्यों को वे मूल्य जिनकी कीमत कभी चुका ही नहीं जा सकती है । आत्मसंतोष ही उनका वाजिब भुगतान है । देवकीनंदन ने गंभीरता से कहा था, लेकिन पिताजी अच्छा कमाने में या अमीर होने में बुराई क्या है? कोई बुराई नहीं है बेटा अगर तुम इस अंधीदौड में अपने खुद को होने वरदो ज्यादातर लोग अपने खुद को खो देते हैं । बोर्ड में अपने मूल्य, अपनी लाज और अपनी शर्म करवा देते हैं । इसका तो कहीं ऐसे होते हैं जिनकी जीत शर्मनाक नहीं होती । आपको लगता है मूल्य केवल गरीबों के पास होते हैं । लाश शर्म वाले ही मूल्यवान होते हैं और भाग्य से आज लाश शर्म खोये बिना कोई अमीर नहीं बन सकता । मेरी बात कडवी जरूर है, मगर सच है । गरीब होना शर्मनाक नहीं है । मैंने तुरंत सवाल किया अगर गरीबी कर्महीनता की वजह से है तो शर्मनाक है और अमीरी अगर लाख जुटाकर मिली है तो वो पाप है । डैनी को लगा पिताजी एक स्कूल मास्टर की तरफ से पढा रहे थे । कार सरकारी मास्टर होने के बजाय बिजनेस स्कूल के प्रोफेसर होते तो समझ पाते कि पैसा क्या है और उसमें कितना सामर्थ्य था । मीठा हो ट्रेन की लंदन ने चुप्पी तोडी । अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए भरपूर कमाओ पर जब पूरी हो जाए तो आपने खुद पर ध्यान दो । हमारे पास बहुत पैसे कभी नहीं थे लेकिन हम सुखी थे । जो भी था उससे मैं और तुम्हारी माँ हमेशा खुश रहे । तुमने और ज्योति ने भी हमें बहुत सौंप दिया है । मैं चाहता हूँ हमारी जिंदगी भी खुशहाल हो तो हमेशा सुखी रहो । पैसे का फिर दुखदाई है । उसे क्यों बोल लिया जाए इस दुख को अगर तुम क्या हो गई तो हमेशा सुखी रहोगे । पर पिता जी आज के जमाने में पैसा ही खुशियाँ और सुख देता है । देवकीनंदन ने सिर हिलाकर दैनिकी दलील खारिज कर दी थी । अमीर सुख नहीं है सब जनता सुख है । सुखी होने के लिए तो मैं पहले अपने से संजन होना होगा । फिर अपने आस पास वालों से साजन होना होगा । यहाँ तक कि आपने वक्त का इस्तेमाल भी सब जनता से करना होगा । मेरा सब काम आया नहीं जा सकता है । सब जनता के जरिए सिर्फ बता जा सकता है । ऍसे दिलाया जैसे पिताजी की बात समझ रहा था पर अंदर ही अंदर वह घूम रहा था । उनकी बडी बडी बातें बस बातें थी उनका असल जिंदगी से कोई लेना देना नहीं था । असल जिंदगी में अगर आप के पास पैसा है तो तमाम अवगुण भी गुड बन जाते हैं और गुणों में दे दिए चमक आ जाती है । उससे पहले पैसा कमाना था और पैसे से अपने गुणों को कामती देनी थी । पिताजी की शर्म वाली बात उसका दिमाग में ठहर गई थी पे मोना के कहे मुताबिक ही नजर आ रहे थे । उसने कहा था ना कि शर्म और लिहाज मध्यमवर्ग की जहनियत में ठूस ठूस कर भरे थे जो उसे तरक्की से रोकते थे । पिता जी की वही जहनियत उसे आज टोक रही थी । पर अब कोई फर्क नहीं पडने वाला था । वह अपनी डगर पर निकल चुका था । डेरी तीन दिन घर रुका था । माँ के दुलार और ज्योति के प्यार में वक्त कहाँ हवा हो गया हो, सब पता ही नहीं चला था । स्कूल के दोस्तों से मिलना खासकर बढिया रहा था क्योंकि उनमें से सिर्फ वही था जो कम समय में बहुत आगे बढ गया था । उनसे वो हर दिन मिला । उनकी वहाँ वहाँ सुनना डैनी को अच्छा लगता था । रिश्ता जोडने वाले इस बार नदारद थे जो पिछली बार गर्मजोशी से मिलने आए थे । वो भी बहाना बनाकर अपने घर बैठ गए थे । उनकी समझ में आ गया था की अब लडका पहुंच से बाहर हो गया । उस की शादी अब करोडपति खानदान में होनी थी । मैंने भी इस बात की तस्वीर कर दी थी है । एक दिन नाश्ता करते वक्त उसने डैनी को बताया था क्योंकि जाती कि कई अमीर और असरदार लोग रिश्ता करने के लिए तैयार रहे हैं । क्या लडकियों की फोटो भी आई है उसमें हस्कर पूछा था, हाँ आई है अभी लाती हूँ । मैं फौरन फोटो लेने के लिए दौड पडी थी । ये सबसे अच्छी है । उन्होंने फोटो उसके आगे रखी और बाकी राष्ट्रीय हड्डी की तरह हाथ में पकडे रही थी । दैनिक ने एक बार की उसे देखा था फिर बोला था ये ठीक है पर क्या में और उन को भी देख सकता हूँ । क्यों नहीं बिल्कुल देख आराम से देख सभी नामी खानदानों की लडकियाँ हैं । मैंने तो कभी सपने में भी नहीं सोचा था । ऐसे जाने माने लोग हमारे दरवाजे आएंगे गई उन्हें जी खुश कर दिया है । दिनों उन्होंने दैनिक स्तर पर प्यार से हाथ रखा और खीर लाने चौके में चली गई थी । ज्योति ने उसे गौर से तस्वीरें देखते पकड लिया था । कुछ तस्वीरें उसके हाथ से छीनकर वो चलायेगी माँ भैया बिगड गए हैं, लडकियों को देख रहे हैं रोको नहीं नहीं रात नहीं ज्योति उसके पास आई थी और उस वाली भाभी के बारे में पूछा था जिसको तोहफे में देने का वायदा डैनी ने किया था तो बडे शहर से बाहर भी चाहिए । उसने ज्योति को छेडते हुए बुझाता । पता नहीं पहले वह बुदबुदाई और फिर सहसा चाहे कोई नहीं मैं तो किसी से भी निभाने जाऊंगी तो मेरी चिंता मत करो । बस अपनी पसंद बताओ ऍसे सीने से लगा लिया था तो मेरी चिंता तो करनी है बहना उससे पहले तेरे लिए मोटू घूमना है उसके बाद अपने बारे में सोचूंगा । अपने बिहार की बात पर सब हो जाने की बजाय ज्योति खिलखिलाकर हंस पडी थी । छोटी सी होती है बडी हो गई थी उसे अब गिरजा जैसा साथ चाहिए था । फिर अगर साथ होती तो ज्योति के लिए कितना अच्छा होता । अगली सुबह दिल्ली के लिए निकलते वक्त उसने माँ से कहा था कि वह जो ठीक समझे करें, जिस लडकी बढा धर देगी उसी से वो शादी कर लेगा । उसने ये भी बताया था कि हांगकांग जाने से पहले वो गाडी सहारनपुर भेजवा देगा । उनकी सहूलियत के लिए ड्राइवर भी छोड जाएगा ।

अदभुत प्रेम की विचित्र कथा - Part 24

चौबीस डैनी दिल्ली लोटा तो लो तो उससे दौडते हुए मिलने आया था । देखते ही उसने डैनी को गले लगा लिया था और उसकी तारीफों के पुल बांधने शुरू कर दिए थे । तारीफ करते वक्त वो अटक जाता था क्योंकि तारीख को आगे बढाने के लिए उसके पास अल्फांस कम पड रहे थे । लोटो कुछ लिया था वो दैनिक प्लान बेहद कामयाब हो गया था । न सिर्फ उसे बैंक से लोन मिल गया था बल्कि बाजार से भी काफी सारा पैसा उसने आसानी से उठा लिया था । उसका डॉॅ कागज पर ही था लेकिन उसकी तिजोरी भर चुकी थी । रातूराम बिना कुछ किये वो कई करोड रुपए का मालिक बन गया था । दैनिक हल्की सी मुस्कराहट वोटों पर बिखेरे लो टू के जोश को देख रहा था । लोटो बोल बहुत कुछ रहा था । पड यानी सुन कुछ नहीं रहा था उतने में खोया हुआ था । छोटू जिस कामयाबी पर उसको बधाई दे रहा था उसके बारे में उसे कभी शक नहीं था । जी तो होनी ही थी । लोटो बेवजह उसको आसमान पर चढाए जा रहा था । वैसे नहीं अपनी तारीफ सुनकर उसको कोई खास पर ही नहीं हो रही थी । उसे अगर कुछ अच्छा लग रहा था तो वह छोटू का उसके दफ्तर में खुद चलकर आना और उसके सामने मुरीद बनकर बैठना था । डैनी को आप खुद कहीं जाने की जरूरत नहीं थी । नामीगिरामी हस्तियां उसका पता खोजते हुए आकर अब हाजिरी दे रही थी । लोटों की कामयाबी के चर्चे आम हो गए थे और दैनिक की ढुलाई में लोग लग गए थे । छोटू के साथ कॉफी पीते वक्त शादी का फोन आ गया था । दो घंटे बाद दिल्ली मुलाकात का वक्त मुकर्रर करने पर आमादा था । डैनी ने दोनों को अगले दिन का वक्त दिया था । वो उनसे जल्द से जल्द मिलना चाहता था, जिससे हांगकांग जाने से पहले उनका काम भी वो निपटा देंगे । ज्योति की शादी के मध्य तहत को कुछ लाख रुपए और डाल देना चाहता था और साथ ही दूरदराज देश में बचने के लिए कुछ पैसा अपने हाथ में रखना चाहता था । दोपहर में उसने मुझ को या करवाया था । उन्होंने गर्मजोशी सौ से हाथ मिला और बैठ नहीं माफी की । फॅमिली बस वही गोवा में उस रात के बाद वो डैनी से नजरें मिलाने से कतरा रही और जब कभी डाइनिंग उसकी और हाथ हिलाकर हाय कहा था, उसने रुककर बात नहीं थी । लौटते वक्त भी वो कन्नी काट गई थी । वो हमें वो उस की बराबरी पर थी । वो ग्रुप में उसकी अपनी अकड थी । पर दिल्ली में वह दैनिकी माधव नहीं । आपने अवसर से माफी मांगना वाजिद था तो ठीक ॅ जीत जी से कहा कुछ गलत नहीं था । मैं ॅ के बारे में कुछ नहीं कर सकता है । अगर तुमको मैंने किसी तौर से मायूस किया है तो मुझे बेहद अफसोस होना । डैनी की बात सुनकर उम्मीद नहीं थी कि दैनिक गुस्सा होने के बजाय इस तरह पेश आएगा । उस ने अपने को तैयार किया था । किस तरह वो गलती मानते हुए अपनी बात बैठेगी और उसको मनाने की पुरजोर कोशिश करेंगे । उसको कतई नहीं था कि डैनी उसके सामने खुद को मुस्लिम ठहराएगा या अपनी गलती बेबाकी से कबूलेगा । मैं चोट नहीं पहुंचाना चाहती थी, दे नहीं । उन्होंने दबी जबान में कहा था उस रात को ज्यादा हो गई थी । न जाने में क्या क्या बना दिया था । तुम्हारे जाने के बाद गिर जाने मुझे बहुत डांटा था । कैश में सब कुछ हो गया था । मैं खुद भी शर्मिंदा हो । उनसे कहता हूँ समझ नहीं आ रहा है । मोना के जज्बा छलक उठे थे । ऍम खुद को संभालने का मौका दिया था । होना ऍम थोडी देर बात कर रहा हूँ । अमेठी कहाँ था मैं फिर जा के साथ निभा नहीं पाऊंगा । हमारे कोई भविष्य नहीं । शायद दैनिक की बात सुनकर मानव चुकी थी । कौन सा हूँ दैनिक जी से समझता हूँ । मैं नहीं चाहती कि तुम दोनों के बीच दरार आ रहे और हम दोनों अलग हो जाऊँ । नहीं, बिल्कुल नहीं । और अगर ऐसा हुआ तो मुझे बहुत तकलीफ होगी । मैं अपने आप को कभी माफ नहीं कर पाएंगे । ऐसा मत सोचो ना । फॅमिली प्यार से कर रहा था । ऐसा कुछ नहीं होने वाला है और मेरी एक बात और ध्यान रखना । मैं नहीं चाहता कि मेरी वजह से या किसी भी वजह से तो अपने को मुस्लिम समझो, शर्मिंदा हो । कॅरोना के चेहरे पर आई बालों की एक लट हाथ बढाकर हल्के से हटा दी से हर उठी थी हमने एक दूसरे के साथ बहुत अच्छा वक्त बिताना है । शायद कभी आगे भी बताएंगे । उसको हमेशा याद रखूंगा हूँ हम शायद मुझे भूल जाओ क्योंकि तुम ॅ हो गई । हमारा सपना पूरा हो चुका है वो । मैंने उसका हाथ जोर से पका लिया था । ऐसा फिर कभी मत कहना नहीं नहीं लेता हूँ । वाकई खास हो और हमेशा हो गई । उसने पूरी शिद्दत से कहा था । जवाब में डाइनिंग उसका हाथ बिहार से दवा दिया था । मैं हमेशा याद रखूंगा हो टाइम वर्षों वर्ष ना मिल पाएगा । मेरा फायदा है क्यूँ नहीं जा रहे हो गया? हाँ मैं नहीं चाहता पर बहुत ऍम भेज रहे हैं । अरे ये तो बहुत अच्छी खबर है । बधाई हो होने का । गला खुश हो गया था । अच्छी है बुरी मैं नहीं जानता पर पढाई के लिए शुक्रिया । कुछ दिनों में चला जाऊंगा । गिरजा को बताया तो मैं नहीं सबसे पहले तुम को बताया है । उसको बताना बाकी है । पता नहीं उसको कैसा लगेगा । होना कुछ सोच में डूब गई थी । उसे अच्छा लगेगा तो हमेशा दिल्ली से दूर जाना चाहती थी । पर तुम लोगों ने आगे के बारे में अब तक कुछ बातचीत की है या नहीं । नहीं अभी उसे इतने करीब से मैं जान नहीं सकता हूँ । अच्छा ये सब जरूरी है कि हम दोनों एक दूसरे को पसंद करते हैं । कभी ठीक है, हल्की फुल्की वाकफियत दिल में करार जगाती तो है और वो चल रही खत्म भी हो जाती है । गिरजा भी करार के पार हो जाएगी । क्यों नहीं सब हो जाते हैं । ये कोई जुनूनी मोहब्बत है नहीं की जान के साथ ही जाएगी । उसने गोवा में मेरे बारे में कुछ कहा था क्या? दैनिक ने पूछा था । उसने सिर्फ इतना कहा था कि तुम एक अच्छे लडके हैं और मुझे तो ही जलील करने का कोई हक नहीं था । उसके बाद वो खामोश हो गई थी और खुद में समझ गई थी । मोना बेबाकी से बोल रही थी कॅश को और कोटेदार मेरा मिडिल क्लास होना शायद उसके आगे आ रहा है । सच बताना नहीं, इससे कोई फर्क नहीं पडता है । मेरी सलाह के बाद भी गिर जाने वही किया था जो से करना था और मैं पूरे यकीन से कह सकती हूँ कि वो तो बहुत ज्यादा पसंद करती है । उस की आवाज में मुलायमियत आ गई थी । उस ने नजर उठाकर डैनी गुजारिश की थी । उसका बहुत लगता है । मुझे बहुत उम्मीद है ऍम लाकर हमें भरी थी और उसका हाथ दबाकर वायदा सा किया था । उन्होंने धीरे से हाथ छुडाया था और कमरे के बाहर निकल गई । होना से बात हो गई थी । उस से दोस्त की तरह हुई थी । गोवा का अफसाना एक खूबसूरत मोड पर आकर खत्म हो गया था । मोना के साथ खाते का मिलन हो चुका था । लेन देन बराबरी पर था । खाते को बंद समझा जा सकता था । क्योंकि उसमें आप कोई नया जमा खर्च नहीं होने वाला था । देरशाम जब गिर जा के घर पहुंचा तो उसकी राह देख रही थी । दोपहर में उसने फोन पर भेज जब कहा था कि आज रात उसके साथ छोडेगा हाॅल पास इस्तेमाल में नहीं रहता था । वो कह सकता था कि शाम को हराएगा फसने जान पूछकर साथ सोने की बात कही थी । उसे लगा था कि उसने मद्दी बात की है पर कहने से वो अपने आप को रोक नहीं पाया था । गिरिजन एक मासूम की तरह सिर्फ छोटा सा ओके कहा था । जैसे वो खुद को सजा पाने के लिए तैयार कर चुकी थी, दैनिक लगा था । कहीं न कहीं वो अपने आप को गुनाहगार मान रही थी और उस को मनाने के लिए बदसलूकी बर्दाश्त करने को तैयार नहीं की । दबी हुई आवाज सुनकर दैनिक आपने सलीके पर ऍम खुद ब खुद खत्म हो गया था । उसने अपना इरादा साफ करके ठीक किया था । सब कोई से ही पेश आना गिरजा और उसके लिए बेहतर था । गिरजा के साथ थोडा वक्त रूमानी होने के बाद उसने गिरजा को मित्रा साहब के साथ अपनी मुलाकात के बारे में बताया था । उसने खासकर इस बात पर जोर दिया था उसके पिता उसे नौकरी देना चाह रहे थे । उनके पास दो ऍम थे और फिर भी वो उसे अपने दफ्तर में भर्ती कर लेना चाहते थे । ये मेरी खुशकिस्मती है । उन्होंने मुझे चुनाव ऍम पर मेरे उनके दफ्तर में काम करना गलत होता । उनको मेरे और तुम्हारे बारे में कुछ मालूम नहीं था । पर मैंने बता दिया है कि हम गहरे दोस्त हैं और अभी हम ने अपने रिश्ते पर कोई फैसला नहीं लिया है । ऍम का एहसान उठाना मेरे लिए नामुमकिन था और मैंने इसलिए उनसे माफी मांगी । उनको शर्मिंदा होना पडा क्योंकि तुमने अब तक उन्हें कुछ बताया नहीं था । उसका मुझे अफसोस रहेगा तो मैं बताना चाहती थी मगर फिर जाने धीरे से कहा था । मगर का कोई मतलब नहीं है तो नहीं हो पाया तो नहीं हो पाया तो कोई फर्क नहीं पडता है । दैनिक गिरजा को बाहों में समय किया था । मुझे फैसले करने थे और मैंने कर लिए हैं मुझे हांगकांग से आने की अगले कुछ महीनों तक मोहलत नहीं मिलेगी तो वक्त निकालकर बहुत जरूर लाना है । रिजल्ट चौकर उसकी तरफ देखा था पर कहाँ कुछ नहीं था । डाॅन उसकी निकला था नहीं थी और उस में छात्र कर अपनी मुस्कराहट तार दी थी । जुदा होने की घडी जहाँ पर खडी उसका इंतजार कर रही थी । पर गिरजा में खोला जा रहा था और बुलावा उसको खींच के लिए जा रहा था । गिरजा उसका हाथ पकडकर अपने पांच बैठा सकती थी । पर अपने हाथ को धीरे धीरे छूटने दिया था । दैनिक गिरजा को बेहद चाहा था । उस का साथ पाकर उसे ऐसा लगा था कि दुनिया में उससे बडा खुशनसीब कोई नहीं था । एक तरह से वो उसका पहला प्यार थी । वो ऐसा ख्वाब थी जो हकीकत के छोड दो छोटे ही सहम गई थी । पर जब तक वो हकीकत और अफसाने के बीच थी, उसने डैनी को अपने मखमली आगोश में पेड पढा रोमांच दिया था । दैनिक अमीरों का नौशा बनकर दूर कहीं चमक पर सितारे से उठी झंकार के साथ रह गया था । जमकार खत्म नहीं हुई थी और उसका बहने ठहर गया था । उसके पैर जम रहे थे और खाना की दूर सितारे की सादा उसके जहन में अभी गूंज रही थी और उसकी कंपनी अब महसूस नहीं हो रही थी । अच्छा चारों की सादा हवा में घुलकर बिखर चुकी थी । अब सर उसकी याद भर रह गई थी, जिसको लेकर उसको आगे चल रहा था । अच्छा ही हुआ था । यादे लोगों से बेहतर थी । लोग बोझ बन जाते थे । उनको उठाये उठाये कब तक कोई चल सकता था, दूसरी कर रहा हूँ । यादों के साथ आसानी से गुजर हो सकती थी क्योंकि वो बेज्जत उठकर साहब चल देती थी । यादव का बोझ लोगों की तरह भारी नहीं होता था । मखमल सा हल्का होता था । इसको छोडकर आसानी से सफर किया जा सकता था ।

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