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Ep 5: विपदा का संहार - Part 3

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ब्योमकेश बक्शी की रहस्यमयी कहानियाँ writer: सारदेंदु बंद्योपाध्याय Voiceover Artist : Harish Darshan Sharma Script Writer : Sardendu Bandopadhyay
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किसी एक पर नहीं है, लेकिन मुझे पूर्ण विश्वास है कि इसमें कुछ गलत हुआ है । बिरेन बाबू ने हामी में सिर हिलाते हुए कहा मुझे लगता तो है आपको देवकुमार बाबू की पत्नी के बारे में क्या सोचते हैं? ब्योमकेश कुछ देर शांत रहा । फिर धीरे से बोला, देखिए इधर उधर शक बैंक में से कोई लाभ नहीं । इस रहस्य को सुलझाने के लिए हमें पहले मृत्यु का कारण ढूंढना होगा । जब तक हमें यह नहीं पता लगता तब तक किसी पर शक करने से कुछ लाभ नहीं होगा । हाँ, इतना जरूर याद रखने की बात है कि जिस समय रेखा की मौत हुई उस समय वहाँ उसकी माँ और भाई ये दोनों ही घर में मौजूद थे । लेकिन इसी कारण वर्ष मुख्य समस्या को नहीं बोलना चाहिए । लेकिन जब डॉक्टर ही उसे नहीं बता पाया तो डॉक्टर में तो केवल लाश ही देखी है । हमने तो बहुत कुछ देखा है इसलिए यहाँ कोई असंभव नहीं की हम बाहर ढूंढ ले जो डॉक्टर नहीं रूम पाया है । कुछ संदेह से बिरेन बाबू बोले यह तो ठीक है पर चलिए आप जो कहते हैं वही सही है । आप तो देवकुमार बाबू की तरफ से शुरू से ही है और अंत तक रहेंगे भी । तो चलिए हम लोग मिलकर काम करते हैं । जब जरूरत पडेगी तो आपस में सलाह मशवरा करते रहेंगे । क्षणिक मुस्कान के साथ ब्योमकेश बोला है नहीं भाई, अभी थोडी देर पहले देवकुमार बाबू यहाँ आए थे । उन्होंने मुझे ड्यूटी करने से स्वतंत्र कर दिया है । आज तेरे से बिरेन बाबू ने कहा अच्छा हाँ । वे फीस दिए बगैर मेरा काम नहीं चाहते और फीस के लिए उनके पास उतने पैसे नहीं है । वाह वाह क्या कहते हैं उनके पास पैसे नहीं है, उनकी अच्छी नौकरी है और सुनाए काफी मोटी तनखा भी लेते हैं । हो सकता है यहाँ सही भी हो । यह सुनकर बिलियन बाबू की थी । उन्होंने चढ गयी । वे बोले अच्छा तो यह बात है । लगता है मुझे देवकुमार के आर्थिक स्थिति का चिट्ठा खोलना होगा । पर उसका और आपको काम पर न लगाने का रिश्ता क्या हो सकता है? क्या किसी को बचाना चाहते हैं? यह सुनकर मेरी हंसी फूट पडी । देवकुमार बाबू किसी को बचाने के लिए ब्योमकेश की सेवाओं से इंकार कर देंगे । यहाँ विचार मात्र ही हास्यास्पद बिरेन बाबू को मेरा हसना घर गया । उन्होंने कुछ टुकडे पन से पूछा इसमें हम नहीं क्या बात है? मैंने कुछ संजीदगी से उत्तर दिया । क्या आपने देवकुमार बाबू को देखा है? नहीं, यदि देखा होता तो समझ जाते मैं क्यों है? ज्यादा वीरेन बाबू जाने के लिए तैयार हो गए । उन्होंने भी उनके से कहा, मैं इस केस की छानबीन तब तक करता रहूंगा, जब तक मैं इसके दल में नहीं बहुत जाता है । मैं भी देखता हूँ, यहाँ कितना गहरा है, लेकिन आपको मैं छोडूंगा नहीं । देवकुमार बाबू ने भले ही छोड दिया हो, पर मैं जब तक जरूरत होगी सहायता के लिए आप के पास जाऊंगा भी है । यहाँ तो अच्छा प्रस्ताव है । ब्योमकेश बोला मैं अपनी ओर से भरसक सहायता करूंगा । मेरा भी इस केस में निजी स्वार्थ हो गया है । हाँ, बोल के कारण चलिये ठीक गए पर भी उनके बाबू क्या जांच के दो एक संकेत सुजा सकते हैं । किस दिशा से शुरुआत की जाए? आप की नजर में कोई संकेत तो उम्र ही होंगे । ब्योमकेश ने कुछ देर सोचकर कहा, क्यों ना शुरुआत डॉक्टर रुद्रा से की जाए । संभव तरह रहस्य की खून जी उन्हीं के पास से मिल सकती है । बिरेन बाबू जरा चौकर बोले हो तो ठीक है । आप कहता है तो उनका सिर्फ कुछ सोचने में झुक गया और वैसे ही वे चले गए । पांच छह दिन ऐसे ही बीत गए । ब्योमकेश पहले जैसी मुद्रा में लेट गया था । सुबह अखबार पडता, खिडकी से खाली आंखों से देखा करता । शाम को भी मेज पर पैर टिकाकर खिडकी से बाहर का नजारा देखता रहता । बिरेन बाबू का भी आना नहीं हुआ । इसलिए हमें पता भी नहीं कि केस में कितनी प्रगति हुई है । बस एक ही आगंतुक था हाँ । अबुल दो तीन रोज में वहाँ आकर बैठ जाता और सुनील होने उदास आंखों से सबको देखता रहता । ब्योमकेश ने उसका हौसला बढाने के लिए क्या क्या मैं कहा पर उसके सोनी आंखों में अंतर नहीं आया । हम पूछते भी की घर में क्या हो रहा है? उसके उत्तर भी । हाँ, अबुल केवल देखते रहने में ही दे जाता । शायद गम के सैलाब में उसके मस्तिष्क को जड बना दिया था । वहाँ हमें एक एक करके देखता और चुपचाप दरवाजा खोलकर सीढियां उतर जाता । वहाँ अपने घर के बारे में जो कुछ इशारों में बदलाव आया, उसे पता लगा कि उसकी सौतेली माँ का व्यवहार और भी कर्कश हो गया है । अंतर रहा । एक दिन वहाँ आया और गहरी सांस लेकर बोला तो पिताजी आज रात पटना जा रहे हैं । शायद उनका लेक्चर है । मैंने अनुमान लगाया कि देवकुमार बाबू शोकाकुल वातावरण से त्रस्त होकर पटना भाग रहे हैं । उन जैसे बुलाकर वैज्ञानिक जीवन वास्तव में दयनीय हो गया था । उस दिन हाँ बोल के जाने के बाद बिरेन बाबू का आगमन हुआ । उनके चेहरे से स्पष्ट था कि केस में वे अधिक बढ नहीं पाए हैं । ब्योमकेश ने उनका भरपूर स्वागत किया । चाय का समय था और चाय भी आ गई । ब्योमकेश ने बिरेन बाबू की ओर देखकर पूछा तो कैसा चल रहा है? चाहेगी? चुस्की लेकर बिलेन बाबू ने गंभीर मुद्रा में कहा, कोई भी प्रगति नहीं किसी भी और कुछ नहीं मिल पाया है । अभी तक सबूतो छोडिये शक की गुंजाइश भी नहीं बन पा रही है । अलबत्ता मुझे यह विश्वास जरूर हो गया है कि यह रहस्य बहुत ही कहीं गहराई में छुपा है । कदम कदम पर जितना में फैल हो रहा हूँ, उतना ही विश्वास गहराता जा रहा है । ब्योमकेश ने पूछा । मृत्यु के कारण की खोज में कुछ नया पता लगा । बिरेन बाबू ने सिर हिलाते हुए कहा, मैं डॉक्टर के पास गया था । वैसे तो अपनी रिपोर्ट के बाहर वहाँ कुछ कहने को तैयार ही नहीं है । पर मुझे लगता है उन के बाहर से एक स्टोरी है । उनका अनुमान है की मृत्यु किसी अज्ञात जहर की गैसे सोंपने से रजय आजाद की अदालत हो सकती है । उन्होंने यह सब स्पष्ट रूप से नहीं कहा किंतु लगता है उनका विश्वास कुछ ऐसा ही है । ब्योमकेश ने एक्शन सोचने के बाद कहा क्या आपने उन्हें बताया था की मृत्यु चूल्हा सुलझाने के समय हुई है? हाँ, कुछ मिनट और चिंतन के बाद ब्योमकेश ने कहा चलिए यहाँ तो ठीक है और दूसरी तरफ क्या आपने डॉक्टर रुद्रा के बारे में पता क्या हाँ जहाँ तक मुझे पता चला कि यहाँ व्यक्ति निहायत थी, कमीना और पैसे के लिए खून चूसने वाला ऍफ है । फिर वहाँ तो यह भी है कि आपने आविष्कार का प्रयोग करने के चक्कर में उसने टेटनेस के अनेक रोगियों का सफाया तक कर दिया है लेकिन इस केस में उनके खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला । यह सही है कि देवकुमार बाबू की लडकी और डॉक्टर रुद्रा के लडके के बीच बातचीत चल रही थी । डॉक्टर रुद्रा ने दहेज के दस हजार रुपये की मांग भी रख दी थी जिससे देवकुमार बाबू ने पैसा न होने की वजह से टुकडा दिया था । लेकिन डॉक्टर रुद्रा का लडका एक होना युवा है । उसने अपने पिता का विरोध किया और इसको लेकर पिता से उसका जवाब हुआ । इसी बीच यह दुर्घटना हो गई । रेखा आएगा । एक मर गई । उसके बाद से मुझे पता लगाएगी लडकियों में घर छोड दिया है । उसका विश्वास है कि रेखा की मौत के लिए उसके पिता अप्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार हैं । मन मत के घर छोड देने की खबर नहीं थी । शेष बातें हमारे लिए नहीं नहीं थी जब वीरेन बाबू चुप हो गए तो क्योंकि उसने पूछा आपने कहा था कि देवकुमार बाबू की आर्थिक स्थिति के बारे में पता करेंगे? क्या कुछ पता क्या हाँ पता किया था । उनकी आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं है । कोई उधर वगैरह नहीं है । पर दस से बारह हजार एक बार में शादी में लगाना उनके लिए संभव नहीं है तो वे रुपये पैसों के मामले में ज्यादा परवाह नहीं करते हैं । दूसरे व्यवहारिक भी कम है । हालांकि कॉलेज से आठ सौ रुपए का खासा वेतन मिलता है । लेकिन आपको जानकर आश्चर्य होगा कि वेतन का बडा भाग बीमा कंपनी को प्रीमियम चुकाने में खर्चा हो जाता है । उन्होंने जीवन बीमा कराया है । वहाँ भी इतनी देर से की महीने का प्रीमियम भी बडी रकम हो जाती है । उसको चुकाने के बाद वेतन में ज्यादा कुछ बच नहीं बंदा ब्योमकेश ने आश्चर्य से पूछा पचास हजार रुपए यह तो और क्या पॉलिसी उनियाना में उनके अकेले नहीं संयुक्त रूप से पति पत्नी के नाम हैं । यहाँ बीमा उन्होंने पिछले वर्ष ही कराया है । उन की दूसरी शादी है । यदि उन्हें एक आये कुछ हो जाए तो बेचारी विधवा बेसहारा ना हो जाए मेरे विचार से । इसलिए उन्होंने संयुक्त बीमा कराया है । बच्चों को इसमें से कोई बात नहीं मिलेगा । अच्छा और कुछ और । क्या मैंने हाबिल पर भी नजर रखने के लिए एक आदमी को लगा दिया है । शायद उससे ही कुछ नया पता लग जाए । लडका तो जैसे पागल हो गया है । उसने कॉलेज जाना छोड दिया है । दिन भर सडकों को नापता फिरता है । कभी कभी चुपचाप पार्क में बैठा रहता है और लगभग रोजाना आपके यहाँ एक चक्कर जरूर लगता है । मैंने देखा एक का एक ब्योमकेश आलस्य छोडकर चपल हो गया है । इतने दिनों बाद उसकी आंखों में चमक देखकर मुझे लगा कि उसे जरूर कोई नया आवाज हुआ है । मेरे रथ है की धडकन बढ गई । मैं समझा कि शायद वहाँ कुछ बोलेगा । लेकिन ब्योमकेश अपने चेहरे पर प्रत्यक्षतः कुछ प्रकट न करते हुए अपने पहले अंदाज में ही बोला हाँ, अबुल को छोड दिया जाए । क्या आप लौटकर पुलिसथाने जाएंगे? हैना अगर जरूरत पडी तो मैं आपको फोन करूँगा । वीरेन बाबू को ब्योमकेश का व्यवहार थोडा अटपटा जरूर लगा, पर उन्होंने प्रकट नहीं किया और चले गए । उन के चले जाने के बाद ब्योमकेश तेज कदमो से कमरे में चक्कर लगाने लगा । उसकी आंखों में वहाँ पुरानी चमक फिर कौन होने लगी? मैं पूछ नहीं जा रहा था कि उसने बिरेन बाबू को एकाएक क्यों इस प्रकार विदा कर दिया । तभी देखा कि वह रुक गया है । उसने कुर्सी से कॉल उठाते हुए कहा चलो जरा घूम कर आते हैं । यहाँ मेरा दम घुट रहा है । हम दोनों बाहर निकल आए । ब्योमकेश का बिना किसी उद्देश्य के घर से निकल जाना कोई नई बात नहीं थी । वहाँ उसके व्यवहार में शामिल था । कोई काम न रहने पर चुपचाप कोने में बैठे रहना भी उसकी विशेषताओं में से एक था । उसके साथ गैर अगर मैं भी आलसी बन गया था और बाहर घूमने की अभिलाषा लगभग समाप्त हो गई थी । इसलिए मुझे खुशी हुई कि आखिरकार ब्योमकेश अपने गर्म मस्तिष्क को ठंडा करने के लिए बाहर निकलने को तैयार हुआ । लेकिन जैसे जैसे हम चलने लगे, मेरी खुशी डूबने लगी । ब्योमकेश की चाल बहुत तेज थी । वहाँ इतनी तेज चल रहा था कि रास्ते में लोगों से टकराने लगा । मैंने उससे थोडा इसका चलने को कहा पर उस पर जैसे कोई असर ही नहीं । बडा उसके चहाल इतनी तेज थी कि भीड में कभी वहाँ वृद्ध व्यक्ति के पास पर चढ जाता तो कभी कॉलेज जाती । कन्या से टकराते टकराते बचता जैसे एक धुन में चलता जा रहा कोई चक्रवात हो । मैंने कभी उसका यह पागल बन नहीं देखा था । मैं समझ रहा था कि उसे जरूर कुछ ऐसा सूत्र मिला है जिसको पकडने के दौड में उसके मानसिक श्रम की तेज रफ्तार ने मुकाबले उसका शारीरिक श्रम पिछडता जा रहा है । लेकिन सडक पर चलने वालों को कौन का है? और इस तरह रास्ते में लोगों की गालियाँ और कटाक्ष झेलते हुए हम कॉलेज स्क्वायर पहुंच गए । पूरा वातावरण् कॉलेज के छात्र छात्राओं से अटा पडा था । उनकी हसी, ऊँची आवाज में बातें लोग जो मैं मौका देखकर ब्योमकेश को बहुत से पकडकर एक कोने में ले गया । चौक के बीचोंबीच तलाक था । उसके दोनों ओर से लोगों का हुजूम जा रहा था । हम लोग एक ओवर के रेलवे में मिल गए । उसमें टकराने की गुंजाइश कम थी । ब्योमकेश के चेहरे पर शिकन जो कि क्यों थी और उसे जैसे हो भी नहीं था कि वह कहा है बार बार उसका शॉल कंधों से किसका जा रहा था लेकिन उसे उस की जरा भी परवाह नहीं थी । मैं बडी देर से यही सोच रहा था कि आखिर बिरेन बाबू और ब्योमकेश वार्तालाप में ऐसा किया था जिसने ब्योमकेश के मस्तिष्क को पहले गेयर में शिफ्ट कर दिया और पंजाब मेल की तरह भागने लग गया । क्या रेखा के रहस्य का सूत्रों से मिल गया है? लगभग आधा घंटा चलने के बाद घूम के फिर अपनी चेतन अवस्था में लौट आया । उसने मेरी और देख कर कहा देवकुमार बाबू, आज शाम को पटना जाने वाले हैं ना? मैंने स्वीकारोक्ति में सिर हिलाया, वो नहीं जा सकते हैं । उन्हें ब्योमकेश आगे भीड देखकर और तेजी से चलने लगा । मैंने देखा कि एक कॉर्नर की एक बेंच के पास लोगों की भीड जमा है । वे जोर जोर से बोले जा रहे थे । जो लोग कुछ दूरी पर खडे थे, वे गर्दन झुकाकर उसी और देखकर जानना चाह रहे थे कि क्या हुआ है । उनके चेहरों से लग रहा था कि वहाँ कोई साधारण घटना घटी है । वहां पहुंचकर ब्योमकेश भीड में घुस गया । उसने पूछा मामला गया है । एक युवक ने उत्तर दिया मुझे ठीक से पता नहीं मेरे ख्याल से कोई बैंच पर बैठे बैठे मर गया है । ब्योमकेश ने भीड में घुसकर रास्ता बनाया । मैं भी उसके पीछे पीछे गया । बेंच के पास पहुंचने के बाद हमने देखा एक युवक सिर नीचे किए हुए बैठा है जैसे कि हो गया हो । उसका सेर सीने की ओर लडका था और पैर आगे की ओर है । उसके होठों के बीच एक सिगरेट चिपकी हुई थी पर उसे जलाया नहीं गया था । उसके बाद हाथ की मुट्ठी में माचिस थी । एक मेडिकल छात्र में उसकी नब्ज टटोलने की कोशिश की और बोला साज नहीं है । इस की मृत्यु हो गई है । शाम का झुटपुटा हो गया था और भीड में स्पष्ट कुछ दिखाई भी नहीं दे रहा था । ब्योमकेश ने मृत युवक की थोडी उठाकर उसका चेहरा दिखाना चाहा पर चेहरा देखते ही जैसे करंट लग गया । मेरा भी धक्का से रह गया । वहाँ हाँ अबुल था । जल्द ही पुलिस आ गई । हमने देवकुमार बाबू का पता दे दिया और वहाँ से चलती है । रास्ते में सडक की रोशनी जल गई थी । देश कदमों से लौटते वक्त ब्योमकेश दहशत से त्रस्त आवाज में बोला किस्मत में कितना भयंकर बदला लिया । कितना विभाग से मजाक है? मेरा मस्तिष्क बिल्कुल बुजुर्ग चुका था । लेकिन इस शोक के वातावरण में मैं केवल यही कामना कर रहा था कि यदि जीवन के परे भी कोई दुनिया है तो हाँ अबुल की प्यारी बहन की आत्मा का मिलन अपने भाई के आत्मा से हो गया होगा । घर पहुंचकर ब्योमकेश ने कमरे में घुसकर दरवाजा बंद कर लिया । थोडी देर में मैंने उसको फोन करते सुना । करीब एक घंटे बाद ब्योमकेश अपने कमरे से निकला और थकी हुई आवाज में पुत्री राम से चाय लाने को कहा । उसके बाद वहाँ सिर झुकाए सोचता रहा । मैंने भी उसे परेशान करना उचित नहीं समझा । साढे आठ बजे बिरेन बाबू आ गए । ब्योमकेश ने उनसे पूछा, आप वारंट लेकर आए हैं? बिरेन बाबू ने स्वीकार उसी में सिर हिला दिया । कुछ मिनटों में हम लोग देवकुमार बाबू के घर के सामने खडे थे । घर में मरघट जैसी शांति थी । कहीं कोई लाइट का चेन्नई नहीं था । केवल नीचे के कमरे में रोशनी हो रही थी क्योंकि इसने दरवाजा खटखटाया । कोई उत्तर न मिलने पर उसने दरवाजा ढीला तो वह खुल गया । हम लोगों ने अंदर प्रवेश क्या छोटे से कमरे में एक सोफे पर देवकुमार बाबू चुपचाप बैठे थे । हमारे अंदर आने पर उन्होंने रक्तरंजित नेत्रों से हमें देखा और कुछ क्षण यो ही देखते रहे । फिर उनके चेहरे पर एक कटु मुस्कान उभर आई । सिर हिलाकर वे बडबडाए । मेरी तमाम मेहनत, शोध का फल सब कुछ व्यर्थ ही रह गया । मैंने समुद्र का मंथन किया और मिला क्या? जहर की हांडी बिरेन बाबू ने आगे बढकर कहा, देवकुमार बाबू, हमारे पास आपके नाम का वारंट है, जैसे वेब होश में आए हो । उन्होंने इंस्पेक्टर की वर्दी देखकर कहा, आप आ गए हैं । अच्छा हुआ । मैं स्वयं पुलिस स्टेशन जाने की सोच रहा था । उन्होंने दोनों हाथों को आगे बढाकर कहा लीजिए हथकडी लगा दीजिए । बिरेन बाबू बोले इस की जरूरत नहीं पडेगी । गवादर के पहले अपने खिलाफ चार्ज सुन लीजिए, जो आप पर लगाए गए हैं और फिर ऐसे दिखाया जैसे पढने के लिए तैयार हो रहे हैं । हिंदू देवकुमार बाबू फिर से अचेतन अवस्था में चले गए । उन्होंने अपने पॉकेट में हाथ डालकर कुछ ढूंढने की कोशिश करते करते फिर बनाना शुरू कर दिया । किस्मत और नहीं तो क्यों? हाँ बोल ही क्यों उस माचिस का प्रयोग करेगा? मैंने क्या सोचा था और क्या हो गया? मैं तो चाहता था कि रेखा की शानदार शादी करूँ । मेरी खुद की एक बडी प्रयोगशाला हो । हाँ अबुल को पडने विदेश भेजूँ । उसने पॉकेट से सिगार निकालकर होठों पर लगा लिया । ब्योमकेश ने अपनी जेब से माचिस निकालकर उनके सिगार को सुलझा दिया । उसने कहा देवकुमार बाबू, आपको यहाँ मैच मौत से हमें दे देनी होगी । देवकुमार बाबू ने चौकर देखा, ब्योमकेश बाबू आप ही है? घबराइए नहीं, मैं अपने को नहीं मारूंगा । मैंने अपने बेटी बेटे को मार दिया । मैं तो अब चाहता हूँ कि मुझे अपराधी की तरफ फांसी पर लटकाया जाए । ब्योमकेश ने कहा तो पाया वहाँ मैच बॉक्स दे दीजिए । देवकुमार बाबू ने अपनी जेब से मैच बॉक्स निकालकर सामने मेज पर रख दिया और कहा, यह रहा वहाँ मैच बॉक्स । लेकिन खबरदार यहाँ खतरनाक चीज है । यहाँ तीली में जहर लगा है । एक बार जलाई की गए बच नहीं सकते । ब्यू उनके इसने मैच बॉक्स उठाकर बिरेन बाबू को दे दिया । उन्होंने बडी सावधानी से अपनी पॉकेट में रख लिया हूँ । देवकुमार बाबू फिर बोलने लगे, क्या खूब आविष्कार है? एक बार के जलाने पर मौत और किसी तरह कोई सबूत ही नहीं । यहाँ आविष्कार आधुनिक युद्ध की परिभाषा को ही बदल डालता केवल जहर ही नहीं है । यहाँ विनाश का सूत्र है । लेकिन सब कुछ डूब गया और एक लंबा निश्वास छोडकर वे हो गए । बहुत ही फॅसे बिरेंद्र बोले देवकुमार बाबू, अब चलने का समय आ गया है । चलिए वे तपाक से उठ गए । कुछ संकोच करते हुए ब्योमकेश ने पूछा क्या आपकी पत्नी घर में मौजूद हैं? पत्नी देवकुमार बाबू की आंखें रोज से भयानक हो गई । वे जोर से पागलो की तरह चिल्लाये । पत्नी मेरी फांसी के बाद उसे ही मेरे बीमा की पूरी रकम मिलेगी । यही तो किस्मत का खेल है । चलिए आइए चलते हैं । टैक्सी बुलाई गई । ब्योमकेश ने उन्हें टैक्सी में ले जाकर बैठाया । उनके बराबर बिरेन बाबू बैठे हैं । जाने कहाँ से दो सिपाही प्रकट होकर टैक्सी में बैठ गए । देवकुमार बाबू अंदर सही दिलाए । ब्योमकेश बाबू आप चाहते ही थे मेरी रेखा की मौत के रहस्य आप सुन जाए । मैं आपका आभारी हूँ । हम लोग फुटपाथ पर खडे रह गए और टैक्सी चली गई । दो एक दिन तक ब्योमकेश ने इस केस की चर्चा नहीं की । मैं उसके मस्तिष्क की हालत समझ सकता था । इसलिए मैंने भी इस सिलसिले में कोई बात नहीं किए । पर तीसरे दिन शाम को वहाँ अपने आप ही बोलने लगा । अंग्रेजी में कहावत है बदले की भावना घर आती है अड्डा जमाने के लिए और यही देवकुमार बाबू के साथ हुआ । वे अपनी पत्नी की हत्या करना चाहते थे लेकिन किस्मत देखिए दो बार उन्होंने अपना निशाना बनाया तो दोनों बार अपने बेटी और बेटे को खो बैठे जो उन्हें अपने जीवन से भी ज्यादा प्यारे थे । यह विधि का विधान था कि देवकुमार बाबू अनजाने में ही एक असाधारण आविष्कार करने में सफल हो गए थे जिसकी उन्होंने स्वयं कल्पना तक नहीं की थी लेकिन आर्थिक साधन के अभाव में वे उसका उचित प्रयोग नहीं कर पाए । ऐसे आविष्कार काॅल बुक करने के लिए आवेदन नहीं किया जा सकता है क्योंकि वाणिज्यिक मार्केट में इसका कोई मूल्य नहीं है । लेकिन युद्ध योनिमुख देश जैसे जर्मनी, जापान अथवा फ्रान दादी को इस अविष्कार की यदि भनक भी पड जाए तो वेज फॉर्मूले को लेकर अपनी प्रयोगशालाओं में शोध करके नरसंहार के हथियार बनाने में जुट जाएंगे और आविष्कार करने वाले न तो कुछ कर पाएगा और न ही उससे इसका कोई लाभ हो पाएगा । इसलिए देवकुमार बाबू ने इसको अपने तक ही सीमित रखा । इस शहर के विभिन्न प्रयोगों के लिए बडे पैमाने पर अनुसंधान की जरूरत थी और इसलिए उन्हें आर्थिक अनुदान चाहिए था । लेकिन आर्थिक सहायता का कोई प्रश्न नहीं था । उन्हें पैसों की सख्त जरूरत थी क्योंकि इसके प्रयोग पर शोध करने के लिए उन्हें अपनी प्रयोगशाला चाहिए थी और उसके लिए पैसे का होना जरूरी था और पैसे आते कहाँ से? इधर घर में उनका जीवन दुश्वार होता जा रहा था । उनकी पत्नी ने अपने हरकतों से उनकी स्थिति को दयनीय बना दिया था । जो लोग मानसिक गतिविधियों में व्यस्त रहते हैं, उन्हें घरेलू जीवन में अमन चैन की जरूरत होती है । हिन्दू उनके जीवन में इसका नितांत अभाव था । उनकी पत्नी की तुनक मिजाजी, रूखापन और बात बात पर रोने पीटने के व्यवहार ने देवकुमार बाबू के जीवन को बाजार कर दिया था । स्वभाव से वे शांत पुरुष थे । एक शांतिपूर्ण जीवन में रहकर आपने वैज्ञानिक शोध में प्रगति करते रहने से अधिक उन्हें कोई और चाह रही थी । अपने बच्चों के प्रति उनके प्यार को देख कर । यहाँ इस पर तो हो जाता है कि वे अपने बच्चों का कितना ख्याल क्या करते थे । उनकी दूसरी पत्नी ने यदि प्रयास किया होता तो वहाँ भी उनके प्रेम की भागीदार बन सकती थी, तो उसकी प्रकृति का गठन नहीं, दूसरा था । नौ बात यहाँ तक आ गई थी कि देवकुमार बाबू उसके चेहरे तक से नफरत करने लगे थे ।

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ब्योमकेश बक्शी की रहस्यमयी कहानियाँ writer: सारदेंदु बंद्योपाध्याय Voiceover Artist : Harish Darshan Sharma Script Writer : Sardendu Bandopadhyay
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