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Ep 5: विपदा का संहार - Part 1

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ब्योमकेश बक्शी की रहस्यमयी कहानियाँ writer: सारदेंदु बंद्योपाध्याय Voiceover Artist : Harish Darshan Sharma Script Writer : Sardendu Bandopadhyay
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बहुत पांच विपदा का संहार । निराश होकर ब्योमकेश ने अखबार मेरी गोद में फेंक दिया और बढ बढाने लगा । कोच नहीं कहीं भी कुछ नहीं है । इस से तो अच्छा है कि प्रेस वाले अखबार के प्रश्नों को खाली ही छोड दें । कम से कम छपाई का खर्चा तो बचेगा । मुझे उसकी झुंझलाहट बर्दाश्त नहीं हुई तो क्या कुछ भी नहीं है? अखबार में तो मैं तो कहते हो कि दुनिया की सारी खबरें केवल वर्गीकृत विज्ञापनों में होती है क्योंकि इसने मायूसी में एक जरूर सुलगाया और बोला नहीं कुछ नहीं । व्यक्तिगत सूचनाओं में भी कुछ नहीं । किसी ने विज्ञापन दिया है कि वह विधवा से शादी करना चाहता है । विधवा ही क्यों? जबकि कुमारी लडकियों की कतार लगी हुई है । जरूर उसके मन में चोर बैठा है । बात तो सही लगती है और भी तो कुछ होगा । एक बीमा कंपनी ने बडा इस्तिहार छापा वहाँ संयुक्त रूप से पति पत्नी का बीमा करेगी और यदि किसी कारण से उन में से एक की मृत्यु हो जाती है तो बीमा की सारी रकम जीवित साथी को मिलेगी । ये बीमा कंपनियां जीवन को इतना कष्टमय बना सकती है यानी आदमी शांति से मार भी नहीं पाएगा । ऐसा क्या है इसमें भी तुम्हें कोई गुण दोष दिखाई देता है । बीमा कंपनी को तो प्रत्यक्ष रूप से कोई फायदा नहीं होने वाला है । पर क्या यह लोगों के दिमाग में अपराध का बीज बोना जैसा नहीं है? मैं समझा नहीं । ज्यादा विस्तार से समझाओ तो समझो ब्योमकेश ने कोई उत्तर नहीं दिया । उसने हताशा से भरा निश्वास छोडा । अपने पैरों को मेज पर रखकर छत की ओर देखते हुए चाहे रूट का कष्ट खींचने लगा । सर्दियों का मौसम था, क्रिसमस की छुट्टियां चल रही थी । कलकत्ता वासी छुट्टियाँ मनाने शहर छोडकर दूरस्थ स्थलों के लिए निकल गए थे और दूसरे शहरों के वासी कलकत्ता घूमने आ गए थे । या कहानी तब की है जब ब्योमकेश का विवाह नहीं हुआ था । अपने दैनिक कार्यक्रम के अनुकूल हम दोनों सुबह चाय पर अखबार पढ रहे थे । तीन महीने की लंबी अवधि बिलकुल खाली गुजरी थी । खाली बैठे बैठे ब्योमकेश जैसे मजबूत व्यक्ति में भी एक प्रकार की और निकला बन बैठ गया था । दिनभर खाली बन के दिन लुढकते जा रहे थे । हर एक दिन अखबार देखते कि शायद कुछ मिल जाए पर सब व्यर्थ अखबारों में जो भी भरा होता हमारे लिए बेकार था । दिन बीतने के साथ मान भी बोझिल होने लगता था । मैं कल्पना ही नहीं कर सकता था की सोचने की ऊर्जा के अभाव में ब्योमकेश का मस्तिष्क कितना भूका होगा । मैंने इस विषय में ज्यादा चर्चा करना उचित नहीं समझा क्योंकि मुझे लगा यदि मैच की चर्चा करूंगा तो शायद कहीं यह सोच बैठे हैं कि मैं उस पर निठल्ले का दोष मान रहा हूँ । आज सुबह भी उसके निराश चेहरे को देखकर मुझे दुख हुआ यह सोचकर कि जिस अंधी गली में वहाँ फंसा बैठा है, उसे बाहर निकालने के लिए स्वयं ही योग्य है । मैंने खाली बन गई, चर्चा छोड दी और चुपचाप अखबार के पन्नों में हो गया । सर्दियों में कल करता सम्मेलनों और सेमिनार होगा, गढ बन जाता है । इस वर्ष में सम्मेलनों की बाढ थी । अखबार वालों को अपने पन्ने भरने का भरपूर मसाला मिल रहा था । तरह तरह की खबरें तरह तरह के सांस्कृतिक कार्यक्रमों के विस्तृत समाचार मैंने देखा । इस समय कोई छह से सात सम्मेलन चल रहे थे । इसके अतिरिक्त दिल्ली में अखिल भारतीय साइंस कांग्रेस चल रही थी । बडे बडे दिग्गज वैज्ञानिक देश के कोने होने से एकत्र होकर अपने सारगर्भित धुआंधार भाषणों से दिल्ली के प्रदूषण को और बढा रहे थे । उन की खबरों को पडने से उत्पन्न जो सेकेंड हैंड प्रदूषण मेरा मस्तिष्क झेल रहा है वह निश्चित रूप से मस्तिष्क पर एक कलोन छोड जाएगा । मैं अक्सर सोचता हूँ कि हमारे वैज्ञानिक काम करने से ज्यादा बोलते हैं । वैज्ञानिक जितना बडा होगा उसका भाषण उतना ही बडा होगा । अगर कोई विमान या इस स्टीम इंजन का आविष्कार करे और धुंआधार लेक्चर दे तो उसको तो सुनने का बनता है । पर जब तो मैं किराया उसके मारने तक की दवा नहीं बना सकते तो तुम्हारी लफ्फाजी कौन सुनता है साहब की जब बकवास है साइंस कांग्रेस की खबर पढते हुए एक नाम देखकर कुछ दिलचस्पी हुई । नाम था कलकत्ता के विख्यात प्रोफेसर और रिसर्चर डॉक्टर देवकुमार सरकार । उन्होंने अधिवेशन में एक लंबा भाषण दिया था । ऐसा नहीं कि बंगाल के अन्य प्रसिद्ध वैज्ञानिकों ने भाषणों से सम्मेलन को लाभान्वित न क्या हो । पर प्रोफेसर देवकुमार सरकार के नाम पर नजर इसलिए बडी कि वे हमारे पडोसी है । हमारे घर से दो मकान छोडकर कोने वाला मकान हो नहीं रहा है । यह भी हमारी उनके जान भेजा नहीं थी । किंतु हम उनके बेटे हाबिल को जानते थे जो हमारे यहाँ आया करता था वहाँ ऍम के इसका बडा पसंद था । अठारह उन्नीस साल का युवक हाँ, अबुल कॉलेज का छात्र था । वहाँ आता और बडी श्रद्धा से ब्योमकेश को ताकता रहता था और ब्योमकेश मुस्कुराकर मन ही मन उसकी श्रद्धांजलि स्वीकार कर लेता हूँ । कभी कभी हम हम उनको चाय पर भी बुलाते, उस समय उसके रोमांच का कोई अंत ना होता । इस लिहाज से भी मेरे मन में जिज्ञासा थी कि हमारे उस युवा मित्र के पिता ने अपने भाषण में क्या कहा । एक सरसरी निगाह डालकर मैंने पाया कि उन्होंने भारतीय वैज्ञानिकों को विकास में जो आर्थिक कठिनाई आती है, उन के बारे में विस्तार से चर्चा की है । मैंने सोचा यदि में उसे जोर से पढकर ब्योमकेश को सुना हूँ तो शायद ब्योमकेश के बोझिल मस्तिष्क को कुछ राहत पहुंचे । यह सोचकर मैं बोला सुनो हमारे हाथ खुल के पिता ने दिल्ली में क्या कहा है क्योंकि इसमें कोई उत्साह नहीं दिखाया और नहीं आपने नजरों को छत की बीमों से हटाया फिर भी मैंने पढना शुरू कर दिया । इस तथ्य को स्वीकार कर लेने में हमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि कोई भी राष्ट्र वैज्ञानिक ज्ञान के बिना महान राष्ट्र नहीं बन सकता । यहाँ आमधारणा बन गई है कि भारतीय वैज्ञानिकों में खोज और आविष्कार तथा उत्पादक रिसर्च करने की क्षमता नहीं है और इसी को भारत के स्वावलम्बी न हो पाने का एक प्रमुख कारण बताया जाता है । लेकिन यहां धरना बिल्कुल गलत है, इसका कोई आधार नहीं है । इसका सबूत है हमारा गौरव में इतिहास । यहाँ यहाँ बता नहीं की आवश्यकता नहीं है कि भारत का प्राचीन काल ज्ञान और विज्ञान में इतना वैभवपूर्ण और उन्नतशील था, जिसके सूत्रों के बल पर ही आधुनिक विज्ञान की उत्पत्ति हुई और सुदूर क्षेत्रों में उसका विस्तार हुआ । आधुनिक वैज्ञानिक चिंतन के चार आधार सिस्टम है गणित, खगोल विद्या, चिकित्सा और मूर्तिकला । इन चारों का जनक भर्ती है । फिर भी आज के युग में यह तर्को व्यर्थ ही कहा जाता है । इसके परिणामस्वरूप हमारी आविष्कार की अद्भुत क्षमता हाउस की ओर अग्रसर है । ऐसा क्यों हुआ? क्या हमारी मानसिक ऊर्जा समाप्त हो गई है? नहीं, ऐसा नहीं है । इसके कारण कुछ और है, जिसमें हमारी योग्यता की ऊर्जा को निष्क्रिय बना दिया है । राजीन गाल में ऋषि, मुनि और ज्ञानियों को राजकीय संरक्षण प्राप्त था । उन्हें संसाधनों के बारे में चिंता नहीं करनी पडती थी । जब कभी धन की आवश्यकता होती तो वह राजकीय कोर्स से प्राप्त हो जाता था । राजकीय कोष की अकूत संपदा उनकी खोज और आविष्कारों के लिए हरदम उपलब्ध रहती थी । आर्थिक संसाधनों की चिंताओं से मुक्त रहकर ज्ञानी और वैज्ञानिक अपनी संपूर्ण ऊर्जा अपने शोध में लगाते थे और इसी के परिणामस्वरूप उन्हें अपने प्रयासों में पूर्ण सफलता मिलती थी । लेकिन हमारे वैज्ञानिकों की दशा कैसी है? सरकारें वैज्ञानिक शोध को प्रश्रय देने से कतराते है । उधर समाज का आर्थिक रूप से सक्षम धनी वैभवशाली वर्ग भी अनुसंधान और शोध की योजनाओं में खास दिलचस्पी नहीं रखता है । ऐसी स्थिति में हमें सीमित साधनों में बंद कर अपना कार्य करना पडता है या साधक भी कुछ अनुदान अदुआ कुछ विश्वविद्यालयों के आर्थिक सहयोग से एकत्र धन पर आधारित रहते हैं । इसलिए हमारी कार्यक्षमता और सफलता भी उसी के अनुरूप नियंत्रित रहती है । हमारी स्थिति ठीक उस हुए की बात है जो एक हाथ को अपनी पीठ पर ढो नहीं सकता । हम साधनों के अभाव में बडे आविष्कार करने लायक नहीं रहते हैं । एक अभावग्रस्त मस्तिष्क विराट की कल्पना कैसे कर सकता है? इस सब के बावजूद मेरा अटूट विश्वास है कि यदि हम अपने मस्तिष्क को आर्थिक चिंताओं से मुक्त रखकर अपने शोध और अनुसंधान कार्यों में प्रयासरत रहे हैं तो कोई कारण नहीं कि हम विज्ञान के क्षेत्र में दुनिया के दूसरे देशों से पिछड जाए । लेकिन सच्चाई यह है कि हम अभावग्रस्त हैं तो इसके मायने यह नहीं है कि हमारे वैज्ञानिक चुपचाप बैठे हैं । बल्कि इन विपरीत स्थितियों के बावजूद उन्होंने अब तक जो भी शोध, अनुसंधान और आविष्कार किए हैं, वे तारीफ के काबिल हैं । क्या कोई ऐसी एजेंसी है जो इन छोटे छोटे वैज्ञानिकों की प्रयोगशालाओं में होने वाले प्रयोगों और आविष्कारों का हिसाब रखती हो? यहाँ राजू की बात है कि छोटी छोटी प्रयोगशालाओं में ही ऐसे आविष्कार हो जाते हैं जिसे देखकर सब वैज्ञानिक आश्चर्यचकित रह जाते हैं और अपने अविष्कार को दुनिया की नजर से बचाकर दूसरी खोजों में लग जाते हैं । वे जानते हैं कि वे अकेले हैं, कोई उनकी सहायता के लिए आने वाला नहीं है । ऐसी विचित्र स्थिति में किसी को अपनी खोया आविष्कार बताने में भी भाव खाते हैं क्योंकि उन्हें भय रहता है कि जिस शहर किसी को उनके आविष्कार का पता चल जाएगा, वहाँ उसकी खोज कर रहे वैज्ञानिक से चीन कर अपने पर ले लेगा । क्योंकि दुनिया में ऐसे चोरो की कमी नहीं है । इसलिए मेरी आप लोगों से अपील है हमें आर्थिक सहायता तो हमारे पास शोध व अनुसंधान के लिए नियंत्रित साधन हूँ तथा वैज्ञानिकों को उनके आविष्कारों का श्रेय देने की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए । हम जाते हैं बात बात प्रोफेसर के ज्ञान की चर्चा में मैं भूल गया की कोई और भी उसे सुन रहा है । ब्योमकेश ने एक का एक बीच में काट दिया । बाजी इतना काफी है क्या हुआ हमें यहाँ चाहिए । हमें वहाँ चाहिए और वहाँ भी चाहिए । यहाँ सुनते सुनते कान पक गए बस दूर के ढोल सुहावने लगते हैं । मैंने कहा यही दो दोस्त फेल होने के बहाने अनेक हैं । देवकुमार बाबू का भाषण पढकर लगता है कि देश के ज्ञानी और विज्ञानी भी काम चोरी की इस प्रवर्ति से बडी नहीं है । ब्योमकेश के उदास होठों पर हल्की सी मुस्कान तैर गई । वहाँ बोला हाँ बोल देखने में एक सीधा सादा लडका दिखाई देता है और बुद्धिमान है । उसके पिता होने के नाते देवकुमार बाबू कैसे ऐसे फिजूल की बातें आपने लेक्चर में बोलते फिरते हैं । यह जरूरी नहीं कि बुद्धिमान लडके का पिता मेधावी हो । क्या तुम प्रोफेसर सरकार से मिले हो? मैंने पूछा मैं शायद नहीं मिला हूँ और उनसे मिलने की लालसा भी नहीं हुई लेकिन सुना है कि उन्होंने दूसरी शादी की है । इससे बडी मूर्खता और क्या होगी? और ब्योमकेश ने फिर से अपनी आंखें बंद कर ली । घडी ने साढे आठ बजाये मुझे कुछ सूझ नहीं रहा था तो मैं कुर्तिराम से एक और कब चाय बनाने के लिए कहने जा ही रहा था कि ब्योमकेश आंखें खोलकर सीधा बैठ गया । मुझे सीढियों से पदक आपकी आवाज सुनाई दी है । कोई आ रहा है उसने कान फिर से लगाए और आबुल बोलते हुए फिर निराज मन से लेट गया । काबुल ही है । क्यों आया? लगता है जल्दी में एक्शन बाद दरवाजा खोलकर हाँ अबुल तेजी से अंदर आकर बैठ गया । उसके ऊपर हवाइयां उड रही थी । आंखों में भय था जैसे कोई विभत्स घटना देखी हो । वहाँ कोई आकर्षक लडका नहीं था । मोटी धुल धुल, देवर, गोल चेहरा और हल्की घास जैसी दाडी वहाँ व्याकुल दिखाई दिया । मैंने उठकर पूछा यहाँ बोल क्या हुआ? लेकिन हाउसफुल पागल की तरह ब्योमकेश को देख रहा था । मेरी बात शायद उसने सुनी नहीं । वहाँ उठा और लडखडाकर ब्योमकेश के नजदीक पहुंचा और बडबडाया भी । उनके सर्वनाश मेरी बहनें का एक मर गई और वहाँ जोर जोर से रोने लगा । ब्योमकेश ने हाबिल का हाथ पकडकर उसे कुर्सी पर बैठाया । कुछ देर वहाँ वैसे ही रोता रहा । अनायास विवस्त्र कान से लडका अपना होश खो बैठा था । हम लोगों को अब तक यह नहीं मालूम था कि हाँ बुल की बहन भी है । उसने अपने परिवार के बारे में कभी कुछ नहीं बताया था । मैंने इतना ही सुना था की हाँ बुल की माँ के मरने के बाद देवकुमार बाबू ने शादी कर ली है और हाँ अबुल तथा उसकी नई माँ के बीच अच्छा रिश्ता नहीं है । थोडी देर में हाँ बोल कुछ शांत हुआ और बताने लगा पिताजी दिल्ली गए हैं और घर में वहाँ उसकी बहन और उसकी माँ है । आज सुबह रोज की तरह पडने के लिए ऊपर अपने कमरे में चला गया । घडी में आठ घंटे बजने के बाद उसे माँ की ठीक सुनाई दी । वहाँ नीचे भागा । उसने देखा की माँ रसोई के बाहर खडी जोर जोर से रो रही है । मैं समझ नहीं पाया कि वह क्या कर रही है । इसलिए मैंने रसोई में घुसकर देखा की उसकी बहन रेखा इस टोकी और झुकी खडी है । उसमें उससे पूछा कि उसे क्या हुआ है । जब उसने कोई उत्तर नहीं दिया तो मैंने उसके पास जाकर उसे हिलाकर देखा तो पता लगा कि वह मर चुकी है । उसकी देह ठंडे पत्थर जैसी और हाथ पैर अकड गए थे । इतना कहकर हाँ अबुल फिर से सिसकने लगा । मैं क्या करूँ भी उनके पिताजी यहाँ नहीं है । इसलिए मैं आपके पास बाहर आया हूँ । रेखा मर गई थी । भगवान यहाँ कैसे हो गया भी उनके इस बार हाँ अबुल की दशा देखकर मुझे भी नया आ गयी । ब्योमकेश नेहा बोल के कंधों पर हाथ रखकर कहा हाँ बोल, अपने को संभालो भाई । संकट में हिम्मत नहीं हारते । अच्छा यहाँ बताओ कि रेखा को क्या कोई बीमारी थी? कोई रजाई की बीमारी मैं नहीं जान का । मैं नहीं समझता । ऐसा कुछ था क्या? उम्र थी सोलह वर्ष वहाँ मेरे से दो वार से छोटी है । क्या उसे हाल ही में बेरी, बेरी या कोई अन्य बीमारी हुई हो? नहीं ब्योमकेश ने कुछ देर सोचा फिर बोला चलो तुम्हारे घर चलते हैं । जब तक मैं स्वयं देख लू क्या हुआ है तब तक मैं कुछ नहीं कह सकता हूँ । तुम अपने पिता को तार देकर तुरंत आने को कहो लेकिन उनको अभी जरूरी है कि हमें डॉक्टर मिले । डॉक्टर रुद्रा तो तुम्हारे बगल नहीं रहते हैं ना तब चलो अजित जल्दी ही हम देवकुमार बाबू के घर पहुंच गए । घर सामने से तिकोना था । जैसे दोनों तरफ बने घरों ने इस घर को दोनों ओर से घेरकर तिकोना कर दिया हो । इसलिए नीचे एक कमरा और रसोई दिखाई थी । उसके साथ भंडारघर और पीछे बाद रूम था । घर के दरवाजे पर पहुंचते हुए हमें दिखाई दिया । एक महिला खडी चीख रही है । स्वर में परेशानी और व्याकुलता थी, लेकिन शोक का आभास करना ही नहीं था । इस पर था कि महिला अपनी युवा पुत्री के मरने के शोक से चिल्ला रही है । दरवाजे पर एक बूढा नौकर दिग्भ्रमित होकर खडा था । ब्योमकेश ने उससे कहा तो यहाँ काम करते हो ना जाओ सामने के घर से डॉक्टर बाबू को बुला लाओ । कुछ काम मिले जाने से वह खुश होकर बोला जी, सब और चला गया । हम लोग हाँ बोल के साथ अंदर दाखिल हुए । जिस महिला की चीज हमें बाहर से सुनाई दी थी, वहाँ सीढियों से नीचे घडी चिल्ला चिल्लाकर अपने से ही बात करती जा रही थी । हमारे कदमों की आवाज से उसने चौंककर हमें अजीब नजरों से देखा कि हाँ बोल के साथ दो अजनबी आ रहे हैं तो जल्दी से आचल ढककर सीढियों से ऊपर चढ गई । चाहते समय मैंने उसके चेहरे की झलक से महसूस किया कि उसे हमारा अच्छा नहीं लगा । झलक के तुरंत बाद उसने चेहरे को आज कल से छिपा लिया । हाँ, अबुल धीरे से बडबडाया मेरी माँ है वो अच्छा । ब्योमकेश ने कहा रसोई किधर है? हाँ बोलने छोटे से चौक की और इशारा कर दिया । उसके बगल में छोटे छोटे कमरे थे । सबसे बडा कमरा रसोई घर था, बाहर नहीं लगा था जिसकी टपकती बूंदों से वह स्थान चिकना हो गया था । हमने अपने जूते उदार दिए और अंदर गए । कमरे में रोशनी की कमी थी । कोई खिडकी भी नहीं थी । आप बोलने आगे बढकर रसोई का स्विच दबाया जिससे एक मटमेला प्रकाश पहला और हमें साफ दिखाई देने लगा । दरवाजे के सामने वाली दीवार से सटे दो कोयले के चूल्हे एक ऊंचाई पर बने हुए थे जिनमें कोयला भरा था । पर उनमें जला हुआ एक भी ज्यादा । एक जून के सामने एक लडकी आगे वो झुकी खडी थी जैसे पूजा कर रही हो । उसका सिर आगे की तरफ झुका हुआ था । एक हाथ नीचे लटका झूल रहा था । लेकिन पीछे से देखने में नहीं लगता था कि उसके देह में जान नहीं है । ब्योमकेश ने झुककर उसके हाथ की कलाई पकडकर नब्ज देखी । उसके चहरे को देख कर मैं जान गया कि उसको नब्बे नहीं मिली । उसके हाथ को देखकर ब्योमकेश ने उसके मुंह को उठाने की कोशिश की । वह थोडा सा ही ऊपर उठा सकता क्योंकि अब तक सारे शरीर में एक हम जब गई थी देखने में लडकी आ कर सकती । रंग गोरा तिकोनिया चेहरे पर मछली जैसे हो उसकी उम्र के लिहाज से शरीर भरा भरा था । लंबे बालों को शायद उसने यही छोड रखा था । जो पीछे जुल रहे थे । वहाँ छपी सूती साडी पहनी थी । दोनों हाथों में सोने की तीन तीन चूडियां, कान में टॉप तथा गले में हल्का स्वर्ण हार था । ब्योमकेश ने नजदीक से एक बार फिर उसका मुआयना किया । वहाँ सीधा होकर तीन कदम पीछे गया । वहाँ से उसने एक बार फिर देखा । पूरा मुआयना करने के बाद वहाँ दोबारा उसके पास गया और इस बार लडकी के मुडे हुए दाय आपको देखा उसने हथेली देखनी चाहिए तो देखा वह कोयले से काली हो गई थी । स्पष्ट था कि उसने ही चूल्हे में कोयला भरा था । पूछने देखा की हथेली के अंगूठे से पहली उंगली सभी हुई है । दोनों को अलग करने में एक छोटा तिनका निकल कर नीचे गिर गया । उसने उठाकर देखा वह जली हुई माचिस की तीली थी । दिल्ली को नजदीक से देखने के बाद उसने उसे फेंक दिया । फिर उसने लडकी के बाएं हाथ को देखा । अकेली बंद थी । उसकी हथेलियों को हटाकर मुट्ठी गोली तो नीचे माचिस की डिब्बी गिर गई । ब्यू उनके इसने डिब्बे को खोलकर देखा । उसमें कुछ तीलियाँ बची हुई थी । फिर सोच कर वहाँ धीरे से बोला, वही तो जो मैंने सोचा था, वही निकली । मृत्यु तभी हुई जब उसने सोलह सौ लगाने के लिए माचिस जलाई । ब्योमकेश ने अब उसे छोडकर रसोई घर में चारों और नजर दौडाई । उसने लडकी के पीछे से दरवाजे तक फर्ज पर बने पद जिन लोगों को देखा और बोला, नहीं, मृत्यु के समय रसोई घर में कोई और नहीं था । बाद में एक महिला ने प्रवेश किया और फिर हाँ बोल अंदर आया । उसी समय रसोई घर के बाहर कुछ आवाजें सुनाई दी क्योंकि बोला शायद डॉक्टर साहब आए हैं । हाँ, अबुल उन्हें अंदर ले आओ । काबुल चला गया । उस समय मौका देखकर मैंने पूछा कुछ मिला । ब्योमकेश ने हताहत से स्वर में कहा ऐसा कुछ नहीं । इतना जरूर पता लगा की मृत्यु से पहले तक का लडकी को जरा भी आवाज नहीं था कि उसकी मृत्यु होने वाली है । हाँ, अबुल डॉक्टर रुद्रा को लेकर आ गया । डॉक्टर रुद्रा मध्यवय के कलकत्ता के जाने माने फिजीशियन थे, किन्तु वे अपने रूखे स्वभाव और क्रोध के कारण बदनाम भी थे । उनका पारा हमेशा आसमान पर रहता था । यहाँ तक कि मरने वाले मरीज के सामने भी उनका बढता हूँ । इतना बेहुदा और कर्कश होता था की कोई और डॉक्टर होता तो उसको दुकान छोडकर भाग जाना पडता है । लेकिन जहाँ तक योग्यता का प्रश्न था वे अपने हुनर में इतने माहिर थे कि लोग उनके इस स्वभाव के बावजूद हमेशा उन्हीं के पास आते थे और यही उनकी सफलता का रहस्य था । उन की प्रैक्टिस भी बहुत तगडी थी । डॉक्टर रुद्रा की शक्ल उनका परिचय देने के लिए काफी थी । काले यानि कोयले से काले घोडे जैसे ऊपर चमकती छोटी छोटी लाल आंखें जिसपर पडती वह देशक में आ जाता है । वोटों पर भी बहुत कर्कशता कोर्ट पैंट और जूते पहने । जैसे ही उनका प्रवेश हुआ तो लगा जैसे वातावरण में तेज गर्मी की लहर व्याप्त हो गई है । हाँ बोलने चुपचाप अपनी बहन की और इशारा कर दिया डॉक्टर रुद्रा ने अपनी आदत के अनुसार रूखे स्वर में कहा यहाँ है मर गई गया । ब्योमकेश बोला आप देखिए और बताइए । डॉक्टर रुद्रा ने क्रोधी निगाह से ब्योमकेश को देखा और बोले आपको नहीं है मैं पारिवारिक मित्र हूँ वो उन्होंने ब्योमकेश को अनसुना करते हुए हाब उनसे पूछा यहाँ लडकी कौन है? देवकुमार बाबू के बेटे हाँ बोलने स्वीकारोक्ति में सिर हिला दिया । डॉक्टर रुद्रा के चेहरे पर एक उत्सुकता रह गई । उन्होंने बोला सिकोडते हुए पूछा । इसी का नाम रेखा है । काबुल ने फिर से दिला दिया, क्या हुआ इसे कुछ नहीं । एक डॉक्टर रुद्रा में झुककर लडकी की नब्ज देख कर आंखों की पुतलियां देखी और उठकर बोले उसकी मृत्यु हो चुकी है । मैं क्यों लगभग दो घंटे पहले हुई है । शरीर अकड गया है । उन्होंने यह बडे चाव से कहा जैसे यह सुनकर मौजूद लोगों में खुशी की लहर दोडने वाली हो । ब्योमकेश ने पूछा क्या यहाँ संभव है की मृत्यु का कारण पता लग सकें । यह हाल आज के पोस्टमार्टम पर ही पता चलेगा । मैं जाता हूँ मेरे भी इसके बत्तीस रुपए मेरे घर में भेज देते हैं । और हाँ, पुलिस को सूचना करना ना बोली है क्योंकि मृत्यु प्राकृतिक है । यह कहकर डॉक्टर रुद्रा घर से बाहर निकल गए । रसोई घर से बाहर आते हुए ब्योमकेश बोला, हाँ, पुलिस को सूचित करना तो जरूरी है अन्यथा बाद में समस्या उत्पन्न हो सकती है । मैं स्थानीय चौकी के इंस्पेक्टर वीरेन बाबू को जानता हूँ । मैं उन्हें सूचित कर देता हूँ । उसने कागज पर कुछ पंक्तियां लिखकर नौकर को देते हुए कहा कि वहाँ यह चिट्ठी स्थानीय पुलिस चौकी में जा कर देते हैं । फिर बोला, बॉडी से अब और कोई छेडछाड हो पुलिस अगर खोदी देख लेगी सब कुछ और उसने रसोई घर को बंद करके हांगुल से कहा हाँ बोल, एक बार रेखा के कमरे का मुआयना कर लेना उचित होगा । हाँ! बोलने । गंभीर आवाज में कहा चलिए और आगे आगे सीढियाँ चढने लगा । शुरू होने के बाद वहाँ जैसे जरूरत हो गया था और यंत्रवत बात करता था । जो पूछा जाता था उतना ही उत्तर बस प्रथम तल पर तीन कमरे थे जिनमें से अंतिम कमरा देखा था और पहले दो कमरे संभव था । देव बाबू और उनकी पत्नी के बैडरूम थे । रेखा का कमरा यद्यपि छोटा था पर साफ सुथरा था । एक तरफ पलंग दूसरी और खिडकी के पास दस जिसके बाद दो बुक्स थे जिनमें बंगला पुस्तकें भरी हुई थी । एक कोने में शीशा लगा हुआ था जिसके नीचे ब्रस्ट रिबिन हेयर क्लिप टंगे हुए थे । कहने का मतलब यहाँ की कमरे में आकर लगता था कि यहाँ एक दक्षिण समझदार पढी लिखी लडकी का कमरा है ।

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ब्योमकेश बक्शी की रहस्यमयी कहानियाँ writer: सारदेंदु बंद्योपाध्याय Voiceover Artist : Harish Darshan Sharma Script Writer : Sardendu Bandopadhyay
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