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Ep 3: तरनतुला का जहर - Part 2 in  | undefined undefined मे |  Audio book and podcasts

Story | 21mins

Ep 3: तरनतुला का जहर - Part 2 in 

AuthorHarish Darshan Sharma
ब्योमकेश बक्शी की रहस्यमयी कहानियाँ writer: सारदेंदु बंद्योपाध्याय Voiceover Artist : Harish Darshan Sharma Script Writer : Sardendu Bandopadhyay
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अपनी उबकाई को रोकते हुए मैंने उस व्यक्ति को देखा । लेकिन तब तक वह अपने लेखक कर्म व्यस्त हो चुका था । उसका पार्कर पैन तेजी से लिखता जा रहा था । ऍम में एक और मारकर पहन रखा था । जो संभव है उस लेखन के रुकने की प्रतीक्षा कर रहा था, जब शायद वहाँ अपनी रसिक लाइनों को मार्क करें और ठीक वही हुआ । जैसे ही पेज समाप्त हुआ, उन्होंने लल्याल सही वाला मार्कर पैन उठाकर बडे मनोयोग से कुछ लाइनों को मार के करना चाहता हूँ । हिन्दू चुकी से आई समाप्त हो गयी थी इसलिए उन्होंने स्टैंड में रखी लाल जाएगी । दवा से फिर से स्याही भरी और अपने काम में लग गए । मैंने अपना ध्यान अब दूसरी ओर लगाया । अलमारी में कुछ भरी दवाइयों की बोतलों के अलावा और कुछ नहीं था । मोहन ने बताया, मोहन ने बताया दवाएं उसने दी है । कमरे में दो दरवाजे और दो खिडकियाँ थी । एक दरवाजा जिससे हम अंदर आए थे । दूसरा मुझे बताया गया बातों में बोलता है । मैंने बाथरूम भी जाकर देखा । सामान्य जैसा ही था तो लिया साबुन, तेल टूथपेस्ट आ रही क्या? दिन तो कुछ नहीं था । खिडकियाँ मुझे बताया गया कभी खुलती नहीं । हमेशा बंद ही रहती है । मैंने देखा, लेकिन मस्तिष्क खाली ही रहा । मैंने सोचा क्यों ना दीवारों को खटका । अगर देखो लेकिन फिर यह सोचकर रुक गया कि संभव है कि इन लोगों का उनमें कोई गुप्त वॉल्टियर खजाना हो । एक का एक मेरी निगाह दीवार के आने में रखे । चांदी से निर्मित इत्र होल्ड पर बडी उसमें सोई रखी हुई थी । मैंने उसे उठाकर देखा और आहिस्ता से अरुण से पूछा, क्या ये इतने का प्रयोग करते हैं? आजकल जाते हुए उसने सिर हिलाकर कहा, कह नहीं सकता । यदि करते होते तो उनका शरीर महकता । यह कब से? यहाँ तो मुझे याद है । यह पिताजी स्वयं खरीद कर लाए थे । मैंने मुडकर देखा । नंदूलाल बाबूल लेखन रोककर मुझे घूर रहे थे । उत्सुकता से मैंने रूई के टुकडे वो इतने में भी हो कर अपनी पॉकेट में रख लिया । अंत में मैंने पूरे कमरे को एक भरपूर नजर से देखा । नंदूलाल बाबू की नजर बराबर मेरा पीछा करते रही । उनके चेहरे पर अब भी व्यंग भरी मुस्कान थी । हम लोग बाहर बरामदे में अगर बैठ गए । मैंने कहा मैं आप सब लोगों से कुछ प्रश्न करना चाहता हूँ । कृपया सही सही उत्तर दें । अरुण बोला, अवश्य आप पूछे । मैंने पूछा क्या आप लोग निरंतर पहरेदारी करते हैं और कौन है जो इसमें शामिल हैं । अब है माँ और मैं । हम बारी बारी से पहले पर बैठते हैं । हम नौकरी या किसी अन्य बाहरी व्यक्ति को अंदर जाने नहीं देते । क्या किसी ने इन्हें कभी नशा लेते हुए देखा है? नहीं, हम ने कभी नहीं देखा, लेकिन जब जब लेते हैं हमें पता लग जाता है । क्या किसी ने देखा है कि वहाँ जहर कैसा होता है? जब खुल कर लिया करते थे तब मैंने देखा था । वहाँ सफेद पारदर्शी पानी जैसा तरल पदार्थ है, जिसे पहले होम्योपैथी दवा की बोतल में रखा जाता था । वो फलों के जूस में उसकी कुछ बूंदें डाल देते थे । आप निश्चित रूप से कह सकते हैं की वैसी बोतल उनके कमरे में अब नहीं है । जी हां, निश्चित रूप से हमने कमरे को हर प्रकार से छान मारा है । तब जाहिर है वह कहीं से आता है । कौन लाता होगा? अरुण ने सिर्फ लाते हुए कहा हो, हमें नहीं मालूम क्या तीनों के अलावा कोई अन्य व्यक्ति कमरे में नहीं, उसका सावधानी से सोचिए नहीं । डॉक्टर के अलावा कोई और रही है । मेरी जांच समाप्त हो गई । इससे अधिक मैं और पूछता भी किया । मैं तसल्ली से बैठकर सोचने लगा कि क्या पूछा जा सकता है । एक का एक ब्योमकेश की बात याद आ गई । मैंने नए सिरे से पूछना शुरू किया क्या इनके डाक से पत्र आते हैं? नहीं पारलिया कुछ और तब और उन्हें उत्तर दिया । हाँ, सप्ताह में एक बार उनके नाम रजिस्टर्ड लिफाफा आता है । उत्सुक्ता वर्ष मैं आगे जो गया कहाँ ज्यादा है? कौन भेजता है और उनका सिर्फ संकोच में शर्म से झुक गया? नहीं कलकत्ता से ही आता है भेजने वाली महिला है रेबेका लाइट । मैंने कहा वो तो यह बात है । क्या आप लोगों में से किसी ने देखा है कि उसमें क्या होता है? हाँ, अरुण ने उत्तर देते हुए मोहन की ओर देखा तो क्या होता है उसमें? मैंने उतावले सफर में पूछा । कोरे कागज हाँ, कुछ कोरे कागज फोल्ड करके रखे होते हैं । बस और कुछ नहीं । मैंने आज अम्बे से दोहराया और कुछ नहीं नहीं । मैं कुछ क्षणों के लिए भौचक्का गुमसुम रह गया । फिर दोबारा से पूछा क्या निश्चित रूप से कह सकते हैं कि उस लिफाफे में और कुछ नहीं होता? अरुण मुस्कुराकर बोला, नहीं, यद्यपि पिताजी स्वयं हस्ताक्षर कर पत्र लेते हैं पर खोलता मैं ही हूँ । उन कोरे कागजों के अलावा उसमें कुछ नहीं होता । क्या प्रत्येक पत्र को हर बार तुम्हें खोलते हो? कहाँ खोलते हो पिताजी के कमरे में जहाँ पोस्टमेन पिताजी को हस्ताक्षर करने के बाद देता है, लेकिन यह तो विचित्र बात है । खाली कोरे कागजों को रजिस्टर्ड डाक से भेजने का मतलब क्या है? अरुण में सिर्फ लाकर कहा मैं नहीं जानता । मैं काफी देर तक मूल की तरह बैठा रहा । अंत में एक निश्वास के बाद धीरे से जाने के लिए उठा । पहली बार जब रजिस्टर लिफाफे का जिक्र हुआ था तो मुझे लगा था कि मैंने निशाना मार लिया है । लेकिन बाद में जब निराश होना पडा तो लगा वह हरिद्वार अभी तक जो का क्यों बंद ही है । मुझे लगा कि यद्यपि यह रहस्य है तो आसान किन्तु इसे सुलझाना मेरे बुद्धि कौशल से बाहर है । चेहरे धोखा भी देते हैं । जहर और लकवे से ग्रस्त इस रद्द का चेहरा वैसा ही है । इसकी चालाकियों से सुलझना मेरे बस की बात नहीं है । इसके लिए ब्योमकेश जैसी तेजधार वाली स्पष्ट वह कुशाग्र बुद्धि की जरूरत है । मन में हताशा थी । सोचा जांच की पूरी रिपोर्ट ब्योमकेश को दे दूंगा । इसी उद्देश्य से उठने वाला था कि मन में एक बात कौन गई । मैंने पूछा अच्छा यह तो बताइए क्या नंदूलाल बाबू किसी को पत्र लिखते हैं और उन बोला नहीं तो अलबत्ता हर महीने मनीआॅर्डर जरूर भेजते हैं किसे? अरुण ने फिर शर्म से मु नीचा कर लिया और बोला उसी जीजू महिला को । इस पर मोहन ने स्पष्टीकरण दिया वहाँ कभी नंदूलाल बाबू की वो समझा कितने कम मिलते हैं? काफी बडी रकम हमें नहीं मालूम क्यों भेजते हैं? उत्तर मेरे होठों पर आते आते रुक गया ऍन लेकिन मैंने मूव नहीं खोला और मोहन को वहीं छोडकर घर से बाहर आ गया । जब मैं घर पहुंचा तो आठ बजने वाले थे । ब्योमकेश अपने कमरे में था । मेरे घट कराने पर । द्वार खोलते ही बोला कैसा रहा हूँ, ऐसे खोला नहीं अगर मैं बैठ गया बे उनके लिए कागज को मैग्नीफाइंग ग्लास लगाकर पड रहा था । उसने मुझ पर तेज दृष्टि डालकर कटाक्ष किया । कब से इतने शौकीन बनने हो यहाँ इत्र फुलेल अरे भाई, इतने लगाया नहीं, केवल ढोकर लाया हूँ । मैंने पूरा प्रदान विस्तार से ब्योमकेश को बता दिया । ब्योमकेश ने बडे ध्यान से सब कुछ सुना । अंत में मैंने कहा मैं तो सूरज नहीं पाया दोस्त अब तुम्हें दखल देना होगा लेकिन मेरा मन कहता है इस इत्र की बारीकी से खोजबीन इस रास्ते को सुन जा सकती है रहस्य किसका? ब्योमकेश ने इत्र की रोई को सूंघते हुए कहा वाह क्या खुशबू है? शुद्ध अम् बुरीतरह है? हाँ, तो तुम क्या कह रहे थे? और वहाँ मित्र को अपनी कलाई पर रगडते हुए बोला हाँ क्या कह रहे थे? क्या सुलझेगा? मैंने कुछ हिचकी जाते हुए कहा । संभव है इत्र के बहाने नंदूलाल बाबू ब्योमकेश ठहाका मारकर हंस दिया । क्या ऐसी खुशबूदार चीज छिपाए जा सकती है, जिसकी खुशबू दूर तक फैलती है? क्या? तो मैं ऐसा कोई जिनमें मिला, जिसके आधार पर तुम कहते हो कि नंदलाल बाबू वास्तव में इसका प्रयोग करते हैं? नहीं, मेरे प्यारे दोस्त तो तुम गलत जगह दस तक दे रहे हो । दूसरी ओर देखने की कोशिश करो । यहाँ देखो कि वहाँ जहर भीतर कैसे आता है? कैसे नंदूलाल बाबू सबकी नजरों के सामने गटक लेते हैं? कोरे कागज रजिस्टर्ड पोस्ट क्यों आते हैं? उस महिला को पैसा क्यों भेजा जाता है? इन सब बातों पर तुमने ध्यान दिया । मैंने निराश स्वर में बोला, मैंने इन सभी बातों पर सोचा है, लेकिन वैसे का हल खोज लेना मेरे बस की बात नहीं तो फिर से सोचो । ध्यान लगाकर सोचो बस की बात नहीं है । का क्या मतलब? हताशा से तो हताशा ही मिलती है । यहाँ तुम भी जानते हो एक बार फिर से गहराई में डूबकर सोचूँ और जब तक हल ना मिले तब तक सोचते रहो । इतना कहकर उसने फिर लैंड उठा लिया । मैंने पूछा तो तुम कब जाओगे? मैं भी सोच रहा हूँ, लेकिन गहराई से नहीं सोच पा रहा हूँ । यह जालसाल और फिर से वहाँ मेज पर जुड गया । मैं उठकर ड्राइंग रूम में आ गया । आराम कुर्सी पर लेटकर दोबारा सोचने लगा । जो भी हो इतना मुश्किल तो नहीं लगता और ऐसा लगता है कि मैं यह सुझाव भी सकता हूँ । शुरुआत फिर से की जाए । कोरे कागज रजिस्टर्ड पोस्ट से क्यों? क्या उन कागजों में किसी गुप्ती स्याही से लिखा कोई संदेश है? यदि वहाँ है भी तो उससे नंदलाल बाबू को क्या लाभ? उससे उन्हें जहर की खुराक कैसे मिलती है? चलो मान लिया कि जहर कमरे में नंदूलाल बाबू तक पहुंच भी जाता है, पर उसे छुपाते कहा है और कैसे होम्योपेथी दवा की बोतलों में कैसे रखते हैं इतनी नजरों के सामने? और फिर उनके कमरे की जांच पडताल के लिए लोग भी तो आते जाते रहते हैं । वे कैसे करते हैं? यहां जब इन तमाम सवालों पर गहन चिंतन करते हुए अब तक मैं पांच रूट भी चुका था, किन्तु मैं एक प्रश्न का भी उत्तर नहीं खोज पाया था । मैंने अंततः उम्मीद छोडी थी कि एक आए, फिर एक विचार हो जा । मैं उठ कर सीधा हो गया । क्या ऐसा संभव है और क्यों नहीं संभव हो सकता है? सोचने में अजीब जरूर है, लेकिन हो भी सकता है । ब्योमकेश भी कहता है कि यदि समस्या का एक अध्यात्मक रास्ता निकल सकता है, भले ही वह पटा हूँ, उस पर चलना है, बुद्धिमानी है । इस मामले में वही रास्ता अपनाना चाहिए । मैं ब्योमकेश के पास जाना ही वाला था कि वहाँ स्वयं आ गया । उसने मेरे चेहरे को देखा तो उत्सुकतावश पूछा, क्या कोई सुराग मिला? हाँ लगता तो है, वह बताओ क्या है? जब बताने की बारी आई तो मुझे कुछ हिचकिचाहट हुई । लेकिन मैंने उसे दरकिनार करते हुए कहा, देखो मुझे अभी अभी याद आया कि मैंने नंदूलाल बाबू की दीवारों पर मकडियों को देखा था । मुझे लगता है कि वे उन्हें पकडकर खा जाते हैं । ब्योमकेश की हंसी फूट पडी जी, तो तुम सच में एक महान विद्वान हो । तुम्हारा कोई जवाब नहीं रहे भाई । ये दीवारों की मकडियां यदि इन्हें कोई खाली लेता है तो शरीर पर कुछ दानों के अलावा कुछ नहीं होता । कोई नशा नहीं होता समझे आज सफर में मैंने कहा ठीक है तो मैं क्यों नहीं ढूंढ लेते हैं? ब्योमकेश गंभीर मुद्रा में कुर्सी पर बैठ गया । उसने चरोट सुलगाकर पूछा क्या तुम समझ पाए हो? कोरे कागज डाक से क्यों आते हैं? नहीं क्या तुम ने सोचा कि वह जो महिला को हर महीने क्यों भुगतान जाता है? नहीं क्या तो मैं अब तक यह भी नहीं सोच पाए हो कि नंदूलाल बाबू अश्लील कहानियों में कुछ लाइनें क्यों अंडरलाइन करते हैं? नहीं पर क्या तुम सोच पाए? हाँ, शायद कहते हुए ब्योमकेश नीचे रूडका एक जोरदार कस लगाया । उसकी आगे बंद थी । लेकिन जब तक एक तथ्य के बारे में पूरी तरह निश्चित नहीं हो जाता, मैं कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं हूँ । क्या है वह तथ्य? मैं जानना चाहता हूँ कि नंदलाल बाबू की जीभ का रंग कैसा है? मुझे लगा वहाँ मेरा उल्लू खींच रहा है । रुकी आवाजों मैंने कहा क्या मेरा मजाक उडा रहे हो? मजाक ब्योमकेश ने चौक कर आंखें खोली और मेरे चेहरे के भावों को पढकर बोला तो तुम तो नाराज हो गए । सच में मैं मजाक नहीं कर रहा हूँ । पूरा रहस्य केवल नंदू बाबू की जीत के रंग पर ही निर्भर कर रहा है । यदि रंगलाल है तो मेरा अनुमान सही है । यदि वहाँ लाल नहीं है यहाँ तुमने देखने की कोशिश नहीं की है ना नहीं । मैंने उनकी जीविका रंग देखने की कोशिश नहीं की । ब्योमकेश ने हस्कर कहा जब की यहाँ देखना पहला काम होना चाहिए था । चलो कोई बात नहीं, एक काम करो । नंदूलाल बाबू के बेटे को फोन करके पूछ लोग वह सोचेगा । मैं मजाक कर रहा हूँ क्योंकि इसमें हाथों को हिलाया और एक कवी के अंदाज में बोलने लगा । दवना क्या घबरा कैसा हिम्मत है तो रोक जाना कैसा । मैं दूसरे कमरे में गया । फोन का नंबर ढूंढकर मैंने फोन किया । मोहन अभी तक वही था । उसी ने फोन उठाया और जवाब में बोला मैंने तो मैं यह नहीं बताया था क्योंकि मैंने नहीं सोचा था । यहाँ जानकारी इस रहस्य में कोई मायने भी रखती होगी । उसमें कहा नंदूलाल बाबू की जीभ का रंग सुर्ख लाल है या कुछ अटपटा जरूर है क्योंकि वो पानी वगैरह तो खाते नहीं लेकिन दुनिया क्यों पूछ रहे हो? मैंने ब्योमकेश को इशारे से बुलाया । उसने पूछा रंगलाल ही है ना । तो मिल गया । उसने फोन लेते हुए कहा डॉक्टर साहब, अच्छा हुआ कि आप मिल गए । आपकी समस्या सोलह गई । हाँ अजीत नहीं सुलझाई है । मैंने तो केवल थोडी मदद की है । मैं तो आप जानते हैं । उस जालसाज के केस में फंसा हुआ था । उसे भी मैंने सुलझा लिया है । आपको अधिक कुछ नहीं करना है । केवल लाल से आई की दवा और मैन को उस कमरे से हटा लीजिए । हाँ, बस ठीक है । यही आप आप समझ गए होंगे और कल समय निकालकर हमारे यहाँ आ जाइए । मैं पूरा खुलासा विस्तार से समझा दूंगा । नमस्कार जरूर । मैं आपका आभार अजीत तक जरूर पहुंचा दूंगा । मैंने आपसे नहीं कहा था कि उसका मस्तिष्क आजकल तेजधार की तरह हो गया है और ब्योमकेश ने हसते हुए फोन रख दिया । ड्राइंग रूम में लौटने पर मैंने जरा कठोर होते हुए कहा मैं सोच रहा हूँ मुझे भी टुकडो टुकडों में हल सूझ रहा है । पर तुम विस्तारपूर्वक मुझे बताओ कि तुमने कौन सा तरीका अपनाया? ब्योमकेश घडी देखकर बोला खाने का समय हो गया है । ज्योतिराम कभी भी बुला सकता है । फिर भी चलो । संक्षेप में तो मैं बताता हूँ तुम शुरू से ही गलत मार्ग पर चले हो । पहला प्रमुख काम यहाँ पता लगाना था कि वहाँ जहर कमरे में घुसता कैसे हैं । उसके पैर तो है नहीं । जो चल कर वहाँ पहुंचे । जाहिर है कि उसको लाने वाला कोई तो है, वहाँ कौन है? पांच लोग अंदर जाते हैं । डॉक्टर दो लडके, पत्नी और एक अन्य व्यक्ति ये चार व्यक्ति तो लाएंगे नहीं तो रहा वहाँ पांचवा व्यक्ति । यह पांचवां व्यक्ति कौन हैं? यहाँ पांचवां व्यक्ति पोस्टमैन हैं । वहाँ सप्ताह में एक बार आता है और जहर उसके जरिए कमरे में घुसता है । लेकिन लिफाफे में कोरे कागज के अलावा कुछ नहीं होता । यही तो चालाकी है । सब लोग यही सोचते हैं कि लिफाफे में ही शायद जहर भी होता हूँ । इसलिए लोगों का ध्यान पोस्टमेन पर नहीं जाता । पर यहाँ पोस्टमैन बहुत तेज आदमी है । वहाँ ऍम की दावत बदल देता है । किसी को पता नहीं चलता । रजिस्टर्ड पोस्ट से कोरे कागज भेजने का उद्देश्य केवल पोस्टमेन को नंदूलाल बाबू के कमरे में प्रवेश करवाना है । और फिर तुम ने अपनी जांच में एक और गोल यहाँ की की, जो महिला को भेजे जाने वाले पैसे को तुमने पेंशन मान लिया । यहाँ परंपरा कहीं भी नहीं रही । यह रकम जहर की कीमत है, जो वहाँ महिला पोस्टमेन के जरिए नंदूलाल बाबू तक पहुंचती है । अब देखो जहर नंदूलाल बाबू को हाथों में कैसे पहुंच जाता है और कोई शक में नहीं करता । लेकिन कमरे के अंदर भी निरंतर बहरा रहता है तो कैसे वे उसे खा लेते हैं और यहीं पर उसका लेखन काम में आता है । कागज और कलम स्याही सब कुछ वहीं है । जहर के लिए उन्हें कहीं जाने की जरूरत नहीं है । यहाँ काम वहाँ बैठे बैठे ही कर लेते हैं । वे काले बहन से लिखते हैं, बीवी बीच में लाल पेन से लाइन खींचते हैं और जब भी अवसर मिलता है, लाल पेन की निब को मुंह से चूस लेते हैं । जब पैन में से ही खत्म हो जाती है तब वे उसे दोबारा भर लेते हैं । अब तुम समझे कि उनकी जीविका रंग लाल क्यों हैं? लेकिन तुम नहीं हैं । कैसे जाना है कि वह लाल ही होगी? क्या वह काली स्याही नहीं हो सकती? आ रहे नहीं, तुमने देखा नहीं । काली स्याही का प्रयोग कितना अधिक है? क्या नंदलाल बाबू चाहेंगे कि उनकी कीमती चीज ही बर्बाद होती है । इसलिए लेखन के कुछ भागों को ही अंडरलाइन अर्थात लाल चाहिए का प्रयोग आप समझा कितना आसान लगता है? बेशक आसान है, लेकिन इस चालाकी के पीछे जो मस्तिष्क काम कर रहा था, उसे कम नहीं आंकना चाहिए, क्योंकि इतनी आसानी नहीं । अब तक इतने लोगों को मूर्ख बनाया हुआ था । तुमने यह कैसे जा रहा हूँ? बहुत आसानी से इसमें दो ही बात ऐसी थी जो अटपटी थी, जिनका पूरे के से कोई लेना देना नहीं था । इसलिए उन दोनों पर ही मुझे शक हुआ । पहली कोरे कागजों का रजिस्टर्ड पोस्ट से आना, दूसरी नंदूलाल बाबू का धुआंधार लेखन और उसमें कहीं कहीं लाल से आई माफ करना । इन दोनों बातों पर जब मैंने गहनता से सोचना शुरू किया तो मुझे केस का सुराग अपने आप टकरा गया और देखो वहाँ जालसाज भी । इतने में दूसरे कमरे में टेलीफोन की घंटी बजने लगी । हम दोनों ही उस कमरे की तरफ दौडे । ब्योमकेश ने फोन उठाकर बोला, कहीं कौन जहाँ बोल रहे हैं वो डॉक्टर साहब जी कहिए? क्या नंदूलाल बाबू ने हंगामा पैदा कर दिया है? वे क्रोध से लाल पीले हो रहे हैं । यहाँ तो होना ही था । क्या वे अजीत को भद्दी गालियां दे रहे हैं? बेहुदा शब्द इस्तेमाल कर रहे हैं? यहाँ तो ठीक नहीं, गलत है । उन्हें रोका जाना चाहिए, क्योंकि उनका मोह यदि बंद नहीं किया जा सकता तो और कोई उपाय भी नहीं है । जी, जी जी नहीं नहीं जीत के लिए क्यों बुरा मनाएगा । वहाँ जानता है कि इस दुनिया में अच्छा काम निंदा हिलाता है । उसे मालूम है कि फुल्के गुलदस्तों के साथ साथ ईंट पत्थर भी मिलते ही है । यही दुनिया है तो ठीक सर विदा लेता हूँ नमस्कार ।

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ब्योमकेश बक्शी की रहस्यमयी कहानियाँ writer: सारदेंदु बंद्योपाध्याय Voiceover Artist : Harish Darshan Sharma Script Writer : Sardendu Bandopadhyay