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12. Kasoorvar Kaun

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The Five W in Stammering यानी हकलाहट के पाँच "क" यह किताब हकलाहट की समस्या के विषय को समर्पित है । अपनी इस किताब में मैने पाँच "क" , क्या ,क्यों , कब , कहाँ , कैसे यानि हकलाहट की समस्या क्या है । हकलाहट की समस्या क्यों पैदा होती है । हकलाहट की समस्या कब पैदा होती है । हकलाहट की समस्या कहाँ सबसे ज़्यादा यां कहाँ सबसे कम पैदा होती है । हकलाहट की समस्या को कैसे क़ाबू में किया जाए । इन सबका वर्णन करने की कोशिश की है । और इसके साथ हकलाहट के जीवन पर आधारित कुछ लोगों की कहानियाँ हैं। इन कहानियों में से कुछ कहानियाँ काल्पनिक हैं और कुछ सत्य जीवन पर आधारित हैं। और यह सब कहानियाँ हकलाहट के पाँच " क " को ध्यान में रख कर लिखी गई है। और साथ में इनके ज़रिये यह बताने की कोशिश की गई है की हकलाहट की समस्या से जूझ रहे व्यक्ति के जीवन कौन कौन सी समस्याएँ आती हैं और इस समस्या को कैसे क़ाबू में किया जाए । Voiceover Artist : Ashish Jain Script Writer : Rohit Verma Rimpu
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भाग बाडा कसूरवार कौन? हकलाहट की समस्या किसी व्यक्ति के जीवन पर बहुत बुरा प्रभाव डालती है । लेकिन अगर ये समस्या किसी लडकी में हो तो ये समस्या उसका जीवन इस हद तक बदल सकती है । यू पहले की इस हद तक बर्बाद कर सकती है, इसकी कल्पना करना भी मुश्किल है । ये कहानी शीतल नाम के पात्र के इर्द गिर्द घूमती है, जिसको उसके पति ने शादी के पांच महीने बाद ही तलाक दे दिया था । इसमें उसका कसूर सिर्फ इतना था कि वह हकलाहट की समस्या से पीडित थी । लेकिन इसके बावजूद उस लडकी ने हार नहीं मानी और जीवन में एक योद्धा की भांति समाज से लडकर अकेले रहकर अपना जीवन निर्वाह कर रही है हो जिन्हें रोहित जी से बात कर सकती हूँ तो गए थे हाँ जी बोलिए जी मैं ईशा बात कर रही हूँ । मैंने आपका नंबर आपके फेसबुक पेज से लिया है । रोहित ठीक है जी बोलिये, मैं आपकी क्या सहायता कर सकता हूँ? दिशा मेरी एक सहेली है, इसका नाम शीतल है । उसके बेटे की हकलाहट की समस्या के बारे में आपसे बात करना चाहती हूँ । क्या आप हमारी कुछ मदद करेंगे? हाँ जी बिल्कुल, मैं आपकी हरसंभव मदद करने के लिए तैयार हूँ । आप हो सके तो उसे रविवार को मेरे घर ले आना । मुझसे जितना संभव होगा न उसकी मदद करूंगा की शादी बहुत बहुत शुक्रिया । आपका हमेश रविवार को आपसे मिलने आ रहे हैं और फिर रविवार वाले दिन एशिया अपनी सहेली और उसके बेटे के साथ मिलने मुझसे मिलने के लिए आती है । कुछ देर बातें करने के बाद मैं ईशा की सहेली शीतल से उसके बेटे की हकलाहट की समस्या के बारे में पूछने लगता हूँ परन्तु शीतल की कुछ बोलने के बजाय एशिया मेरी बातों का जवाब देने लगती है । मैं ईशा को चुप रहने का इशारा करता हूँ और शीतल कोई मेरी बातों का जवाब देने के लिए कहने रखता हूँ । इससे पहले किसी तार कुछ बोलती शाम से कहती है रोहित जी, असल में बात ये है कि शीतल उसका बेटा दोनों ही हकलाहट की समस्या से पीडित हैं जिस वजह से शीतल बोलने में झिझक महसूस करती है । आप जो कुछ भी पूछना चाहते हैं मुझ से पूछ सकते हैं । एशिया की बात सुनकर में कुछ देर खामोश का हो गया । कुछ देर खामोश रहने के बाद मैंने उनसे कहा देखिए मैं माफी चाहता हूँ । लेकिन जब तक मुझे हकलाहट की समस्या के शुरू होने की असली वजह के बारे में पता नहीं चलेगा । तब तक मैं कुछ नहीं कर सकूंगा । इसलिए अगर हो सके शीतल जी को मेरी बातों का जवाब देने दें । मैं शीतल को बुलवाना चाहता था क्योंकि मैं उसके हकलाहट की समस्या का ये स्तर जांचना चाहता था । इसलिए मैं बार बार शीतल को बोलने के लिए उकसा रहा था । आखिरकार शीतल मेरी बातों का जवाब देने लगती है । शीतल कहती है, ये मेरा बेटा है । इसका नाम मोहित है । इस की उम्र पांच साल है । इसे बोलने में अच्छा आती हैं । क्या आप हमारी कुछ मदद करोगे? हॉस्पिटल के इस प्रकार बोलने से मैं हैरान था । हैरानी इसलिए थी कि वह बिना किसी रोक के एकदम साफ बोल रही थी । परंतु वो हर शब्द को लम्बा खींच रही थी । उसके बोलते समय मैंने एक और बात देखी कि जब वो बोल रही थी तो वह हर शब्द के बाद अपनी टांग पर धीरे से चपत लगा रही थी । यानी हर चपत के बाद वो एक शब्द बोलती और हराने की बात ये थी कि वो किसी भी शब्द पर अटक नहीं रही थी । शीतल के इस प्रकार के बर्ताव के कारण मेरी उत्सुकता मोहित से ज्यादा शीतल की और थी । मशीन चल के बारे में और जानना चाहता था क्योंकि उसने अपनी टकराहट की समस्या का जिस प्रकार से समाधान खोजा है वो काबिले तारीफ था और मैं इसके पीछे की कहानी को जानना चाहता था । मैंने शीतल को कहा देखिए मुझे गलत मत समझना क्योंकि मैं हकलाहट की समस्या पर शोध करता रहता हूँ । लोग इस समस्या के समाधान के लिए कई प्रकार के टोटके लगाते हैं लेकिन जिस प्रकार का टोटका आप लगा रही हैं इससे पहले मैंने ये आज तक नहीं देखा । क्या आप अपने इस प्रकार के बोलने के बारे में कुछ बता सकती हैं? मेरी बात के जवाब में वो ठीक पहले जैसी यानि अपनी टांग पर चपत लगाते हुए धीरे धीरे बोलती है । रोहित जी मैंने अपने जीवन की सारी चीज खानी एक डायरी में लिखती है अगर आप मेरे जीवन के बारे में कुछ जानना चाहते हैं, ठीक है तो मैं आपको अपनी वह डायरी पडने के लिए दे दूंगी । परन्तु सबसे पहले आप मेरे बेटे मोहित की समस्या के समाधान के बारे में बता दें । ये मेरा इकलौता बेटा है । मैं नहीं चाहती कि हकलाहट की समस्या के कारण जो कष्ट मैंने उठाया है वो कश्मीर मेरे बेटे को भी उठाना पडेगा । उसके बाद मेरा ध्यान मोहित की और पडा । मोहित एक पांच साल का छोटा बच्चा था जिसने अभी बोलना शुरू ही किया था और से बुलवाने के लिए कुछ बातें मैं पूछने लगा मैंने बात नोटिस की है की मोहित मेरी बातों का जवाब जल्दबाजी में तीस तेज बोल कर दे रहा था और फिर जैसा हकलाहट की समस्या से पीडित व्यक्ति के स्वभाव में होता है तो मेरी हर बात का जवाब काफी जल्दबाजी में दे रहा था । कुछ देर उससे बातें करने के बाद मैंने मोहित की माँ यानी शीतल से कहा देखो जो समय समय पर भी बीच में रुक रहा है वो इसलिए है क्योंकि वह काफी तेजी से बोल रहा है और ये स्वाभाविक बात है तो की मोहित करते वहाँ काफी तेज है । उसका आईक्यू लेवल भी बहुत ज्यादा है । ऐसे बच्चे आपकी बात काफी जल्दबाजी में कहते हैं और यही जल्दबाजी उनके हकलाने का कारण बन जाती है । मैं आपको एक उदाहरण माध्यम से समझाता हूँ मान लो एक कमरे में आप सब पारिवारिक सदस्य बैठे हैं जिनकी संख्या दस के आस पास है । उन में से कोई एक सदस्य आपसे सबसे पहले एक पहली बूझने के लिए कहता है । उस पहेली का जवाब मोहित को आता है । अब उसकी मनोदशा ऐसी हो जाती है कि वह ये सोचने रखता है । इससे पहले की कोई और सदस्य पहली का हाल बताए वो इसका हल आप सबको बता देगा और इस हडबडी में तेजी से बोलने की कोशिश करने लगेगा । ये सब कुछ उसके दिमाग में इतनी तेजी से होने लगता है कि वो आराम से बोलने के बारे में सोचता नहीं है । उसे लगता है कि कोई और इस पहली का जवाब दे या न दे उसे इसका जवाब सबसे पहले देना होगा । और फिर यही सब कुछ उसकी हकलाहट का कारण बन जाता है । और अगर इस बीच वहाँ बैठे किसी सदस्य ने उसके हकलाहट की समस्या का मजाक बनाया है तो वो डर जाता है और यही डर उसकी हकलाहट की समस्या को बडा देता है । भविष्य में तो सब के बीच कतराने लगेगा और वो अपना आत्मविश्वास होने लगेगा । इस प्रकार की समस्या को हल करने का एक ही उपाय है और आप उसका विश्वास जी तो और उसकी बात को ध्यान से सुनने की कोशिश करो और जब भी वो हकलाने लगे तो उसे आराम से बोलने के लिए प्रेरित करो । आप उसके मित्र बनाओ ताकि वो आपसे बिना झिझक या बिना डर के आपसे बात कर सके । हकलाहट की समस्या को काबू में करने के लिए कुछ विशेष प्रकार के व्यायाम होते हैं जो कि इस की आयु छोटी होने के कारण मैं इसे करने की सलाह नहीं दे सकता क्योंकि इसका बालमन इन व्यायामों की वजह से डर जाएगा और हो सकता है इनकी वजह से सहमत सहमत सा रहने लगे । शीतल ने मेरी बात को गौर से सुना और कहा, रोहित जी जैसा ठीक समझे । मैं आपको विश्वास दिलाती हूँ कि मैं अपने बेटे के साथ एक मित्र के जैसा व्यवहार करूंगी और उसकी बातों का मजाक बनने से परहेज करूंगी । अब हमें इजाजत दें हम जाना चाहेंगे ये कहकर उन्होंने मुझसे विदा ली । जाते समय मैंने शीतल से उसकी डायरी का जिक्र किया और उसने डायरी को पडने की अपनी इच्छा जाहिर की । शीतल ने वादा किया कि वह जल्द ही मुझे अपनी डायरी पडने के लिए दे देगी और उनके जाने के कुछ ही दिनों के बाद ही शीतल ने मुझे अपनी डायरी पडने के लिए दी । शीतल की डायरी पढकर मैं सन्न रह गया । मैं कुछ भी ना कहने की स्थिति में था । उसने अपनी जिंदगी में इतनी मुसीबतें झेली हैं कि ये सब बयां करना मेरे लिए मुश्किल था । मैंने शीतल से कहा की मैं उसकी इस डायरी की कहानी अपनी किताब लिखना चाहता हूँ ताकी इसके माध्यम से मैं समाज को हकलाहट की समस्या से जूझ रहे व्यक्ति के जीवन के बारे में बताना चाहता हूँ और आपकी ये कहा नहीं मेरी इस मकसद के लिए बहुत मददगार साबित होगी । पहले तो शीतल इसके लिए मना कर देती है लेकिन मेरे बार बार आग्रह करने पर आखिरकार वो मान जाती है । आ गए आप शीतल की डायरी के वो पन्ने पडेंगे जो कि अपने आप में एक संपूर्ण जीवन गाथा है तो जीवन का था जो कि हमें ये सोचने के लिए मजबूर कर देगी सिख क्या समाज में एक लडकी के रूप में पैदा होना कोई सुलह है? क्षेत्र की डायरी की ये पन्ने समाज से प्रश्न पूछते हैं क्या अतराहट की समस्या से पीडित व्यक्ति को जीने का या समाज में रहने का कोई हक है? मेरी डायरी? वैसे तो मुझे लिखने का कोई शौक नहीं है परन्तु मैं अपनी कहानी एक खास मकसद के लिए लिख रही हैं । अपनी कहानी के माध्यम से मैं समाज में कुछ प्रश्न पूछना चाहती हूँ । प्रश्न यह है कि मेरा कुसूर क्या है? मैं लडकी के रूप में पैदा हुई । क्या ये मेरा कसूर है या फिर मुझे बोलते समय कुछ समस्या होती है? आखिर क्यों इस समाज ने नर्क के समान मेरा जीवन बना दिया । वो समाज जिसमें मेरे सब परिवार वाले शामिल हैं जिन्हें में अपना मानती हूँ । आखिर क्यों वो मेरे अपने होते हुए भी मेरे साथ गैर जैसा बर्ताव करते हैं । मेरे पति ने मुझे छोड दिया और वो भी मेरे बिना कोई कसूर के चलेगा । मैं अपना अपने मायके जा सकती थी और अपने ससुराल में जा सकती थी क्योंकि मैं एक शादी शुदा औरत थी । इसका पति उसे एक विधवा औरत की जैसे बर्ताव करता था परंतु आखिरकार मेरा कसूर किया था । यही सब सवालों के जवाबों को ढूंढने के लिए मैं अपनी कहानी लिख रहा हूँ । चाहे जो भी हो, मैं हार नहीं मानती और अपनी आखिरी समझता के समाज से अपनी लडाई जारी रखती हूँ । मेरा नाम शीटर है कि मेरा कसूर नहीं है । मेरा कसूर शायद यह है कि मैंने एक लडकी के रूप में जन्म लिया था । मेरा जन्म हुआ तो सबसे दुखी मेरे पिता और दादा दादी थे । महत्व खुश थी और दुखी क्योंकि मेरा जन्म मेरी दो बहनों के बाद हुआ था । इस वजह से मेरी माँ होगी । मेरे जन्म होने का एकलौता कसूरवार मानकर मेरे पिता और मेरे दादा दादी के ताने सुनने पडते थे । जब मैं रोती थी तो मुझे चुप करवाने वाला मेरी माँ के सिवाय कोई नहीं था । मेरी दादी तो मुझे देखकर ऐसे भूख फेर लेती जैसे कि मैं उसकी कोई दुश्मन है । जब मैं कुछ बडी हुई तो मैं दुनियादारी समझने लगी । मैं अपने साथ हो रहे बर्ताव को भी समझने लगी परंतु मैं कुछ भी नहीं कर पा रही थी । साल के दो दिन मेरे लिए सबसे अच्छे होते थे वो थे नवरात्रों के दिन क्योंकि इन दिनों मेरे दादा दादी और घर के बाकी के सदस्य मेरी पूजा करते थे । यही वहीं आज पडोस के लोग भी मुझे अपने में ले जाया करते थे और मुझे नित नई नई वस्तुएं खाने और पहनने को देते थे । मेरी समझ में बात आज तक नहीं आई की मेरी पूजा करते हुए लोग मेरे जैसों के पैदा होने की भगवान से प्रार्थना क्यों करते थे हूँ । आखिर मेरा कसूर क्या था? मैं लडकी हुई है, ये मेरा कसूर था । आज मेरा जन्मदिन है । मैं आज आठ साल की हो गई हूँ परन्तु मेरा जन्मदिन कोई नहीं माना रहा । मैं क्लास में जब भी किसी का जन्मदिन होता है तो वो टॉफियां लेकर स्कूल में आते हैं और सब बच्चों में बांटते हैं । मैंने भी अपने पिता से कहा वो मुझे कुछ ट्राफियाँ डाल कर दी ताकि मैं भी अपने दोस्तों में टॉफियां बांट कर अपना जन्मदिन बना सकूँ । लेकिन इससे पहले कि वह कुछ बोलते मेरी दादी बोलने लगी रे अगर तेरे जन्म होने पर कोई खुश नहीं था तो तेरह जन्मदिन क्यों मनाया ना । हम तो अपने खानदान का बारिश चाहते थे क्योंकि हमारे वंश को आगे बढाएगी और तू बता नहीं कहाँ से आगे पता नहीं हमने कौन से पास किए हैं जो आज तक अच्छी औलाद का सुख नहीं हो पा रहे हैं और ये जो तेरी माँ है ना । अरे फसाद की जड यही है तीन तीन लडकियाँ पैदा कर सकती है पर आज तक ये ढंग की औलाद नहीं पैदा कर सके । प्रभाग यहाँ से जन्मदिन मनाना है । दादी की बातें सुनकर में अपने आप को रोने से रोक ना सके हो रही थी लेकिन मुझे चुप कराने वाला कोई नहीं था । मेरे पिता नहीं तो पहले ही मुझे मुंह फेर लिया था । माँ बेबस थी शायद इसलिए क्योंकि वो अकेली मेरे जन्म होने की जिम्मेवार थी है । कुछ देर होने के बाद में स्कूल चली गई । मेरा जन्मदिन था आज और मैं इस दिन का कब से इंतजार कर रही थी । मैंने अपनी सहेलियों को पहले से ही अपने जन्मदिन के बारे में बता दिया था । वो सब मेरा स्कूल में इंतजार कर रही थी क्योंकि उनको मैंने टॉफियां खाने को दी थी । लेकिन वो नादान थी । वो ये नहीं जानती थी कि मैं गुनहगार हूँ था । मैं अपने परिवार की गुनेहगार हूँ । मेरा सबसे बडा गुना ये है कि मैं एक लडकी हूं । अब मैं स्कूल में पहुंच चुकी थी । मेरी सहेलियां मेरे आते ही टॉफियों की मांग करने लगी है । मैंने उनकी बात तक कोई भी जवाब नहीं दिया और चुप रहे । कुछ समय के बाद मेरी अध्यापिका जो कक्षा में आए और मेरी एक सहेली ने उन्हें मेरे जल्द इनके बारे में बताया । अध्यापिका जी ने मेरी और देखा और मुझे जन्मदिन की बधाई दी और साथ ही उन्होंने मेरे से टॉफियों की मांग की । मेरे पास टॉफियां वगैरह कुछ नहीं था और यही बात मैंने उनको बता दी । उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया और टॉफियां न लाने का कारण पूछने लगे । लेकिन मैं कुछ नहीं बोली क्योंकि मैं अपने परिवार वालों के खिलाफ बोल कर उन की बेज्जती नहीं करना चाहती थी । कुछ देर के बाद उन्होंने मुझे मेरी जगह पर जाने के लिए कहा । मैं चुप चाप अपनी कक्षा के कोने में जाकर बैठ गई और जोर जोर से रोने लगी । कुछ देर बाद वहीं बेहोश हो गई । मेरे स्कूल वालों ने मुझे अस्पताल में दाखिल करवाया । वहाँ डॉक्टर से पता लगा कि मुझे कमजोरी की वजह से चक्कर आया था । फिर याद आया । मैंने पिछली रात को कुछ नहीं खाया था और सुबह तो दादी नहीं । जो सेवा की थी उस वजह से कुछ खाने का मन ही नहीं कर रहा था । कुछ देर के बाद मेरे परिवार वाले मेरे पास अस्पताल आए । दादी भी साथ में थी । मेरी माँ मेरा हाल पूछ रही थी लेकिन मेरे मुंह से आवाज नहीं निकल रही थी । मुझे पता नहीं चल रहा था कि ये सब दादी की वजह से है या फिर मैं बेहोश होने के कारण गूंगी हो गई हूँ । मैं वहीं लेट गई और मुझे नींद आ गई । अभी आग लगी थी कि एक डॉक्टर मुझे देखने के लिए कमरे में आया । मेरी वहाँ नहीं मुझे उठाया । कुछ देर तक डॉक्टर में जांच करता रहा । कुछ देर के बाद मेरी माँ से बोला क्या आप इसे कुछ खाने पीने को नहीं देती? कितनी कमजोर है? डॉक्टर के सवालों का किसी के पास कोई जवाब नहीं था । कुछ देर के बाद मुझे अस्पताल से छुट्टी दे दी गई और हम सब घर पर आ गए । मैं जन्मदिन पर टॉफियां बांटने की वजह से अपनी बेइज्जती महसूस कर रही थी । शायद यही कारण था कि मैं कुछ सदमे में थी । मैं चुप चाप अपने कमरे में माँ के साथ लेटी हुई थी कि तभी दादी मेरे कमरे में आई और मेरा हालचाल पूछने की बजाय मुझे और मेरी माँ को उसने लगी । उसने मुझे बहुत बुरा भला कहा । इसको मैं यहाँ पर लिखना ठीक नहीं समझती है । दादी की बातों और उनके व्यवहार का मेरे बाल मन पर इतना गहरा असर पडा कि वह भविष्य में मेरी हकलाहट का कारण बना क्योंकि उनके बिहार की वजह से मैं हर समय दर्जी और सहनी सी रहती थी । उनका व्यवहार मेरी दोनों बहनों, खासकर सबसे बडी बहन के प्रति ठीक था । पता नहीं मेरे साथ ही उनकी क्या दुश्मनी थी? मेरी दादी के साथ साथ मेरे पिता और ज्यादा भी अक्सर मुझे नजरअंदाज करते रहते हैं । मेरी माँ का व्यवहार मेरे प्रति कुछ ठीक था लेकिन इतना भी ठीक नहीं जितना होना चाहिए था । कुल मिलाकर मेरे परिवार का झुकाव मेरे मुकाबले मेरी दोनों बहनों की और कुछ ज्यादा ही था । पिताजी को शराब की लत ने घेर लिया । वो पहले से ही शराब के आदी थे लेकिन कुछ दिनों से कुछ ज्यादा ही शराब पीने लगे थे । मेरी बात जब भी उन्हें रोकती तो वो उनसे लडना झगडना शुरू कर देते थे । तंग आकर मेरी माने मेरे दादा जी को मेरे पिता जी के शराब पीने की आदत के बारे में बात की । मेरे दादा जी ने उनको बहुत समझाया लेकिन वो नहीं माने । जब भी ज्यादा पिताजी को शराब न पीने के बारे में कहते तो पिता जी उन्हें कहावत सुनाकर चुप करा देते हैं । उनकी वो कहावत आज मुझे याद है तो कुछ ऐसे थी टूर जोड जाएंगे, माल जमाई खाएंगे यानी उनकी सोच ये हो गई कि हमने पैसा किसके लिए करवाना है । हम पैसे चाय, दाद जोडते रह जाएंगे और अंत में ये सब कुछ उनके जमाएं यानी मेरे और मेरी बहनों के पति संभाल लेंगे । और फिर दादी के बारे में तो कुछ पूछो ही मत, क्योंकि मेरी नजरों में उनसे नीच औरत शायद ही कोई हो तो जब भी कभी ऐसी बात होती तो मेरी दादी मेरे पिता के समझाने के बजाय मुझ को कोसने लगती । वो अक्सर यही कहती रहती की अक्सर मेरी जगह कोई लडका पैदा हो जाता तो हम सबको आज ये दिन देखना पडता है । यानी उनकी नजरों में मेरे पिताजी के शराब पीने और घर में हो रहे कलह कलेश की जिम्मेदार अकेली मैं थी । जिस सब सोचते थे कि अगर मैं पैदा न होकर मेरी जगह कोई लडका पैदा होता है तो इन सब ने आज बहुत सुखी जीवन व्यतीत कर रहे होना था । एक दिन की बात है, मेरी दादी को सीने में तेज दर्द था । मेरे परिवार वाले झट से उन्हें अस्पताल ले गए । मेरे परिवार के सब सदस्य अस्पताल में मेरी दादी के कमरे के बाहर उनकी जल्द ठीक होने की प्रार्थना कर रहे थे । परंतु उन सब एक शख्स ऐसा था, उनकी मृत्यु के लिए प्रार्थना कर रहा था । यानी वो सब परिवार से उल्टी चाहता था । वो समय दादी का अंतिम समय हो और वह सदस्य कोई और नहीं बल्कि मैं थी और भगवान ने मेरी सुन ली । यानी मेरी दादी भगवान के पास चली गई । दादी की मृत्यु पर मेरे परिवार के सब सदस्यों का रो रोकर बुरा हाल था परन्तु मेरी खुशी का तो जैसे ठिकाना ही नहीं रहा हूँ । यानी मैं बहुत खुश थी क्योंकि मेरे जीवन की आधी समस्या तो दादी अपने साथ परलोक ले गई थी । दादी के मरने के बाद मैंने कुछ राहत की सांस ली और मैंने सोचा की अब मुझे मेरे जीवन में कोई तकलीफ नहीं होगी । परंतु मेरा जीवन वैसा नहीं था कि जैसे मैंने सोचा था । जब मेरी उम्र बारह वर्ष के आसपास हुई तो मैं एक नई समस्या से गिर गई । ये नई समस्या मेरी हकलाने की समस्या थी । की समस्या पहले तो काफी कम और कभी कभी ही होती थी और तो उम्र बढने के साथ साथ की समस्या भी बढने लगी थी । इस नई समस्या के कारण मैं अपने आप में ही कैद होकर रह गई । यानी मैंने घर से बाहर निकलना और बातें करना बहुत ही कम कर दिया था । मैं अपना ज्यादातर समय अपने कमरे में ही बिताने लगी है । मैंने अपने रिश्तेदारों के घर पर जाना लगभग बंद ही कर दिया था । हर तरफ मेरी हकलाहट की समस्या का मजाक बनाया जा रहा था । इस वजह से चुप रहना जब काम बातचीत करना मेरी आदत में शुमार हो चुका था । कई लोग मेरी इस काम बोलने की आदत की वजह से मुझे घमंडी और नकचढी के हक नहीं लगे थे । बडी होने के साथ ही समस्या भी बडी होने लगी । मैं हर समय तनाव में रहने लगी । सातवीं कक्षा में पढते हुए मेरे सहपाठियों ने मेरा नाम शीतल से बदलकर हक ली । शीतल रख दिया क्योंकि कुछ ही दिनों में पक्का सबकी जुबान में चढ गया । अब मुझे शीतल नहीं बल्कि अगली शीतल के नाम से जानने लगे थे । धीरे धीरे ये नाम मेरी पहचान बन कर रह गया । नहीं काबिलियत, मेरा होना और मेरा आत्म सम्मान इस नाम से मुझ से छीन लिया गया । आठवीं कक्षा से मैं बहुत ही अच्छे नम्बरों में पास हुई । यही नहीं मैंने पूरे स्कूल में पहले स्थान में आकर सबको चौंका दिया था । मैंने मेरिट लिस्ट में आकर अपना मजाक बनाने वालों को जवाब दे दिया । मुझे इस बात की खुशी और आज सकती है परन्तु मेरी किस्मत में खुशी नाम का शब्द नहीं लिखा था । मैं नवीं कक्षा की पढाई के सिलसिले में अपनी बहनों के स्कूल में दाखिल हो गई क्योंकि मेरा पिछला स्कूल सिर्फ आठवीं कक्षा तक ही था । न वो स्कूल में जाने पर मेरी पुरानी मुसीबतें भी मेरे साथ हुआ आई थी । मैं नई कक्षा में नवे लोगों के सामने ज्यादा हकला रही थी । लोग मेरी तरफ देख कर मुस्कुरा रहे थे । मेरे हकलाहट का मजाक बनाया जा रहा था । मैं आठवीं कक्षा नहीं पहले स्थान पर थी लेकिन सब इस बात को नजरअंदाज कर मेरी हकलाहट की समस्या से मेरे दिमाग और मेरे आईक्यू लेवल का अंदाजा लगाने लगे थे । अगली शीतल के साथ साथ सब मुझे नालायक, भोंदू और न जाने क्या क्या कहकर पुकारने लगे थे । मेरी बहनों को इस बात के बारे में पता चल गया था और वो मेरी मदद करने के बजाय मुझे बिलकुल ही नजर अंदाज करने लगी थी क्योंकि वो सोचती थी कि कहीं मेरे साथ साथ लोग उन्हें भी हक ली की बहन कह करना पुकारने लगे परन्तु मैं उनकी बहन थी और वो बात छिपाकर नहीं रख सकती थी । धीरे धीरे मेरे नए स्कूल के सब लोगों को हमारे रिश्तों के बारे में पता चल गया और वह सब मेरे साथ साथ उन्हें भी हक ली की बहन कहकर चढाने लगे थे । जिस वजह से मेरी दोनों बहनें मुझसे नफरत करने लगी थी । मेरे कारण लोग उन्हें भी चलाने लगे थे जिस वजह से वो तकरीबन हर रोज मुझसे लडती झगडती थी और इस सब लडाई झगडे का एकमात्र कारण मेरी हकलाहट की समस्या ही थी । अपने माता पिता की नफरत झेलने के बाद अब मैं अपनी बहनों की नफरत का शिकार होने लगी थी । मैं अपनी जिंदगी से तंग आ चुकी थी और इन सब से छुटकारा पाने के लिए मेरे मन में आत्महत्या का विचार आता रहता है परन्तु मैं चाहकर भी ऐसा नहीं कर पाती तो शायद मैं जिंदगी से लडना चाहती थी और या फिर मुझे बचपन से ही ऐसी जिल्लत भरी जिंदगी जीने की आदत सी हो गई थी । मैं अपने जीवन में एकदम अकेली थी । मेरा कोई मित्र नहीं था जिसके साथ मैं अपने दिल की बात कह सकती क्योंकि माने तो पहले से मुझ से मुंह फेर लिया था । अब मेरी बहनों ने भी मुझसे मुंह फेर लिया था । मेरे अकेलेपन को दूर करने में मेरी मदद मेरी इस डायरी ने की । मैं जब भी उदास होता या तनावग्रस्त होती तो डायरी लिख कर अपना तनाव दूर करती है । परंतु मुझे डर अक्सर बना रहता कि कोई मेरी डायरी को कहीं पढना ले । इस वजह से मैं डायरी खत्म होते ही उसे फाडकर या आग लगाकर नष्ट कर दी थी । मैं अब बडी हो गई थी । बडी होने के साथ साथ मेरी समस्या भी बडी होती गई । अपनी हकलाहट की समस्या के चलते मैं हर समय तनाव में रहने लगी जिस वजह से मैं धीरे धीरे पढाई में पिछडती चली गई और जिसके चलते दसवीं कक्षा में मैंने अपनी उम्मीद से काफी कम नंबर लिए जैसे तैसे दसवीं कक्षा पास कर चुकी थी और आगे की पढाई के लिए मैंने कॉलेज में जाना था परन्तु मैं अपनी हकलाहट की समस्या की वजह से वहाँ पडने से कतरा रही थी क्योंकि स्कूल में तो जैसे तैसे चुप रहकर या कम बोल कर गुजारा कर लेती थी परंतु कॉलेज में बोले बिना गुजारा नहीं था । कुल मिलाकर कॉलेज की जिंदगी मेरे लिए बहुत मुश्किल थी इसलिए मैंने बिना कॉलेज में दाखिला लेकर घर बैठे ही पढाई करने का फैसला किया । मेरे परिवार वालों ने मेरे इस फैसले पर कोई प्रतिक्रिया नहीं की यानी उन्होंने ये कभी नहीं पूछा कि मैंने कॉलेज न जाने का फैसला क्यों लिया । अब मुझे दुनियादारी की कुछ कुछ समझ आ रही थी । अब मैं लगभग सारा दिन घर में समय बिताने लगी । एक दिन में अपने कमरे में बैठी हुई थी । पता नहीं मेरे मन में क्या ख्याल आया और मैं सोचने लगी मैं अपनी मुश्किलों के बारे में सोचने लगी थी और आखिरकार अपने आप से विचार विमर्श करते हुए मैं इस नतीजे पर पहुंची की अगर मेरी जिंदगी में दो बातें होती तो मेरी जिंदगी आज कुछ और ही होती है । पहली बात ये है कि मैं एक लडकी के रूप में पैदा न होकर एक लडके के रूप में जन्म लेती और दूसरी बात ये है कि अगर मुझे हकलाहट की समस्या ना होती तो मैं ऐसे जीवन की कल्पना करने लग पडी थी । तब मेरा जीवन कैसा होता है? अगर मैं लडका होती तो कोई मुझे नजर अंदाज न करता । दादा दादी, माता पिता का भरपूर प्यार मिलता । मैं अपने परिवार का सबसे लाडला सदस्य होता । मेरे एक ही बार कहने से मेरे हर प्रकार की ख्वाहिशें पूरी करी जाती और अगर मुझे हकलाहट जैसी कोई समस्या होती तो ये सोने में सुहागे जैसी बात होती है । मैं अभी ये सोच ही रही थी कि तभी मेरे मन में एक का एक एक ख्याल आता है और मैं अपनी हकलाहट की समस्या के ठीक होने के बारे में सोचने लग जाती हूँ । मैं ये सोचती हूँ कि अगर अब मेरी हकलाहट की समस्या ठीक हो जाती है तो मेरे जीवन की आधी समस्याएं ठीक हो जाती हैं । मेरे जीवन कुछ बदल सकता है । कुछ देर में ही ऐसी कशमकश के बीच मुझे नींद आ जाती है और मैं सो जाती हूँ । मैं सपना देखने लग जाती हूँ । सपने में देखती हूँ कि मेरी हकलाहट की समस्या बिल्कुल ठीक हो गई है । मैं सामान्य जैसी बोलने लग गई हूँ । मेरी दुनिया बदल गई है । मैं उन सब को पलट कर जवाब देने लगी हूँ जो मुझे बुरा भला कहता है । मैं सब से झगडा कर सकती हूँ । मेरी दुनिया बदल गई है । मैं उन सब को पलट कर जवाब देने लगी हूँ जो मुझे बुरा भला कहता है । मैं सबसे झगडा कर सकती हूँ । सब की बातों का जवाब देने लगी हूँ मैं हाँ, खासकर सबसे बातें करती हूँ । फिर बहुत सारी सहेलिया है । सब मुझे मेरा असली नाम लेकर पुकारने लगे हैं । लेकिन सपना तो आखिरकार सपना ही होता है और जल्दी से वो टूट जाता है क्योंकि वो और लोग होंगे जिनके सपने पूरे होते हैं । मेरे सपने तो टूटने के लिए बने हैं । जल्दी ही मेरी नींद खुल जाती है और मैं सपने से बाहर आ जाती हूँ और मैं ये सोचने लगती हूँ कि ये सब क्या सच हो सकता है और अगर ये सब सच हो सकता है मेरे जीवन में कुछ सुधार हो सकता है । अपने इन सवालों का जवाब ढूंढने के लिए मैं अपनी बहन के कमरे में पडे कंप्यूटर का इस्तेमाल करती हूँ । लेकिन इससे पहले कि मैं कुछ ढूंढ पाती मेरी बहन अचानक ही वहाँ जाती है और मुझे कंप्यूटर चलाते हुए देख लेती है जिस वजह से वो मुझसे झगडा करने रखती है । अपनी बहन से झगडा करते वक्त में हकलाने लगती हूँ जिसका वह काफी मजाक बनाती है । मैं रोने लगती हूँ । मुझे रोता हुआ देखकर को खामोश हो जाती है और पता नहीं उसके मन में क्या आता है । वो मुझे अपने गले से लगाकर चुप कराने लगती है । हाँ, पहली बार किसी ने मुझे प्यार से गले लगाया है । अपनी बहन का ही प्यार देखकर मैं उससे जोर से लिपट जाती हूँ और फूट फूटकर रोने लगती हूँ । मेरी बहन मुझे चुप करवाती है और मुझे कंप्यूटर चलाने को दे देती है परंतु मेरा रोना बम नहीं होता । कुछ देर के बाद में चुप हो जाती हूँ होने के कारण मैं काफी हल्का महसूस करती हैं । मेरी बहन मुझे हाथ होने के लिए कहती है । मैं बात सौ में जाकर अपने आपको बातों में बंद कर देती हूँ और आई नहीं की और देखकर अपने आपसे एक रण करती हूँ कि जैसे भी हो, अब मुझे किसी भी कीमत पर अपनी हकलाने की समस्या से छुटकारा पाना ही होगा । मैं कमरे में वापस आती हूँ । मेरी बहन अब वहाँ से जा चुकी थी । मैं कंप्यूटर पर अपनी समस्या का हल खोजने लगी । मैंने हकलाहट के ऊपर कई लेख पडे, लेकिन मेरी समस्या का मुझे कुछ संतोषजनक हाल नहीं मिल रहा था । मैंने उल्लेखों में बताए गए बहुत तरीके अपनाए, लेकिन कोई भी तरीका कारगर साबित नहीं हुआ । ऐसा शायद इसलिए क्योंकि मैं अपने हकलाहट की समस्या का हल जल्द से जल्द चाहती थी । लेकिन मैं ये नहीं चाहती थी कि हकलाहट एक ऐसी समस्या है जो की इतनी जल्दी से ठीक नहीं होती । अब मैं कुछ हद तक ठीक से बोल पा रही थी, लेकिन उतना नहीं जितना होना चाहिए । मेरी हकलाहट की समस्या कुछ काबू में आने से मेरी जीवन शैली में सुधार आ रहा था । अब मैं अपनी बात लोगों तक पहुंचा पा रही थी । मुझे तस्वीरें बनाने का शौक था । बचपन से ही मैं किसी का चेहरा देखकर उसकी तस्वीर बना देती थी । लेकिन अपनी आदत के अनुसार मैं किसी को इस बारे में नहीं बताती थी । ऐसा शायद इसलिए क्योंकि मैं अपनी हकलाहट की समस्या के कारण बहुत ही शर्मीले स्वभाव की थी । अब जबकि मेरे हकलाहट की समस्या कुछ काबू में आ गई थी और मेरे पास पर्याप्त समय भी था । मैं अपनी इस छुपी हुई कला को फिर से बाहर निकालना चाहती थी और मैंने अपने इस शौक को अपनी पहचान बनाने का निश्चित किया । मेरे इस चौक को शुरूआती चरण से ही लोगों की सराहना मिलनी शुरू हो गई थी । मैंने सबसे पहली तस्वीर अपनी बहन की बनाई थी जिसको उसने इंटरनेट में डाल दिया । इसमें रातो रात मैं अपनी कला के कारण पहचाने जाने लगे । मेरी बहन ने मुझे अपनी कला को आगे बढाने के लिए बहुत प्रोत्साहित किया । अब मेरी इस बिना चप्पल के नाव को एक मकसद मिल गया था और धीरे धीरे मैं अपने इस मकसद में आगे बढ रही थी । कुछ ही समय में मेरी ख्याति दुनिया के कोने कोने में पहुंचने लगी थी । मैं भारत की नहीं पूरी दुनिया की मशहूर हस्तियों की तस्वीरें बनाने लगी थी । मेरे पिता जो कभी मुझसे नफरत करते थे । आज मेरी वजह से उन्हें नहीं पहचान मिल रही थी । आठ लोग मुझे उनकी बेटी नहीं बल्कि उन्हें मेरा पिता कहने लगे थे । मेरी इस काल के कारण अखबारों में मेरे नाम का डंका बजने लगा । सब और मेरे नाम की चर्चा होने लगी थी । मैंने अपनी कला को आगे बढाने के लिए अपनी आठ गैलरी खोलनी । धीरे धीरे मेरी कला की प्रदर्शनी हर शहर में होने लगी । उन्हीं दिनों मेरी मुलाकात राकेश से हुई । पहली ही मुलाकात में वो मुझे अच्छा लगने लगा । राकेश के पिता हमारे शहर के नामचीन शख्सियतों में से एक थे । राकेश मेरे पास अपनी तस्वीर बनाने के लिए आया था । कुछ दिनों की मुलाकातों के बाद उसने अपने प्यार का इजहार मुझसे कर दिया । पहले तो मैं कुछ समझ नहीं पाई लेकिन फिर भी मैंने हमें इससे रहना दिया । हम दोनों एक दूसरे के प्यार में पड गए थे और हम दोनों में मुलाकातों का दौर शुरू हो चुका था । कुछ ही मुलाकातों के बाद मैंने अपने जीवन की कडवी सच्चाई राकेश को बता दी । यानी उसे अपने हकलाहट की समस्या के बारे में अवगत कराया । राकेश ने बताया कि उसे मेरे बारे में पहले से ही सब कुछ मालूम है और उसके बावजूद वो मुझे दिल से मोहम्मद करता है । एक तरफ जहां में राकेश के प्यार में पड गई थी वहाँ दूसरी तरफ मेरी कला के कारण मेरी प्रसिद्धि अपनी चरम सीमा पर थी । यानी मेरे जीवन में खुशियां चारों तरफ महक रही थी । लेकिन जहाँ मैं और मेरा परिवार लेंस कामयाबी पर खुश था वही मेरी सबसे बडी बहन नाखुश थी । तो शायद इसलिए क्योंकि पूरे परिवार का झुकाव उस की ओर से हटकर मेरी और हो गया था । वो मुझ से इस कदर नाराज थी कि अपनी शादी पर विदाई के मौके पर उसने मुझसे पर भी मिलना नहीं चाहते है । मेरी सबसे बडी बहन की शादी के बाद मेरे परिवार वाले मेरी दूसरी बडी बहन की शादी करना चाहते थे लेकिन वो अभी अपनी पढाई पूरा करना चाहती थी । इसलिए मेरे परिवार ने मेरी बडी बहन से पहले मेरी शादी का फैसला किया । मेरे परिवार वाले मेरे और राकेश के बारे में पहले से ही जानते थे । इस बारे में उनको मेरी बहन ने पहले ही बता दिया था और हमारे रिश्ते से उन सब को कोई एतराज नहीं था । मेरे पिताजी ने राकेश के परिवार से मिलकर हमारी शादी की बात की और कुछ ही दिनों में हमारी शादी तय हो गई । एक तरफ जहां मेरी शादी राकेश से होने वाली थी और मैं खुश थी वहीं दूसरी तरफ में आपने हकलाहट की समस्या के कारण कुछ परेशान थी क्योंकि मेरी हकलाहट की समस्या के बारे में राकेश के परिवार में से राकेश के अलावा और कोई नहीं जानता था । मैंने अपनी परेशानी यानी और प्लाॅट की समस्या के बारे में राकेश से बात की और साथ में उसे ये भी कहा कि वो इस बारे में अपने परिवार को अवगत करवा दें ताकि बाद में इस वजह से कोई समस्या खडी ना हो । राकेश ने मुझे भरोसा दिलाया कि वह सब संभाल लेगा और मेरी समस्या के कारण उसके परिवार में मुझे किसी प्रकार की कोई परेशानी नहीं होगी । राकेश के इस बात पर मैं बहुत खुश थे क्योंकि मुझे भरोसा दिलाया था कि वह हर पल उसका साथ देगा । आखिरकार जिस दिन का मुझे बेसब्री से इंतजार था वो दिन आ गया । तयशुदा दिन में मेरी और राकेश की शादी संपन्न हुई । हमारी शादी बहुत ही धूमधाम से हुई थी । हमारी शादी की पूरे भारत की नामचीन शख्सियतों ने शिरकत की थी । हमारी शादी को पूरे शहर में चर्चा थी है मैं अपनी ससुराल में आ गई थी । ससुराल में मैं बहुत ही डरी और सहमी सी महसूस कर रही थी क्योंकि इस असमंजस में थी कि क्या मेरी हकलाहट की समस्या के बारे में मेरे ससुराल वालों को मालूम हैं या नहीं । और अगर मालूम है तो उन सब का रवैया मेरे प्रति कैसा होगा और अगर इस बारे में नहीं मालूम हो तो वह सब मेरे साथ कैसा बर्ताव करेंगे? मैं ये सोच रही थी कि तभी राकेश मेरी और ध्यान दिया और मुझसे मेरी उदासी का कारण पूछने लगा । मैंने सारी बातें राकेश को बता दी और से पूछा क्या उसके परिवार वाले उसकी हकलाहट की समस्या के बारे में जानते हैं? अगर जानते हैं तो ठीक है, लेकिन अगर नहीं जानते तो कृपया उन्हें पहले ही बता दो ताकि वो मेरी समस्या का मजाक उडाने लगे । राकेश मेरी बात सुनकर तुरंत अपनी माँ और बहन को अपने पास बुलाने गया और उनसे सारी बात बयान कर दी । राकेश की माँ को जब मेरी समस्या के बारे में पता चला तो उन्होंने मुझे गले लगा लिया और मुझे भरोसा दिलाया कि वह और उसका परिवार हर पल उसके साथ हैं । अपनी सास यानी राकेश की माँ की बातों से मुझे कुछ राहत की सांस ली और मैं सामान्य पडता रखने लगी । मेरी ननद यानी राकेश की बहन कभी कबार मेरी समस्या का थोडा बहुत मजाक बना लेती थी । परंतु उसकी बातों को मैं अक्सर नजर अंदाज करती रहती । मेरी जिंदगी सामान्य जैसी चलने लगी थी । एक दिन राकेश ने मुझसे कहा कि वो उसके दोस्त के यहाँ पार्टी में जाना है और मुझे जल्द से जल्द तैयार होने को कहा । उसके कुछ दिनों के बाद हम दोनों राकेश के दोस्त की पार्टी में शामिल होने के लिए रवाना हो गए । पार्टी में जाने से पहले राकेश ने मुझसे कहा कि वहाँ पार्टी में उसके और भी दोस्त आने वाले हैं और वो मेरी वजह से अपने दोस्तों के सामने बेज्जती नहीं करवाना पिछले राकेश नहीं मुझे ज्यादातर चुप रहने को कहा । मैं राकेश की बात का इशारा समझ चुकी थी लेकिन मैं सोच रही थी कि ईस्सर तो राकेश मुझे भरोसा दिलाता रहता है कि वह हर पर उसके साथ है । श्री तरफ मेरे साथ इस प्रकार हीन भावना जैसा पडता हूँ कर रहा है । मैं भी यही सब सोच ही रही थी कि हम राकेश के दोस्त के घर कब पहुंच गए मालूम नहीं पडा । राकेश के दोस्तों में पहले कभी नहीं मिली थी । कुछ शादीशुदा था राकेश के सब नहीं पुराने दोस्त वहाँ मौजूद थे । कुछ दोस्त अपनी पत्नियों के साथ आए हुए थे । अचानक राकेश के दोस्त की पत्नी ने मुझसे कुछ पूछा और मैं उसकी बात का जवाब देते समय कुछ हकलाने लगी जिससे उनको मेरी हकलाने की समस्या के बारे में पता चल गया और उसने वहाँ मौजूद बाकी ओरतों को भी बता दिया । कुछ समय के बाद सब मेरा मजाक बनाने के लिए मेरे पास आने लगे और मुझ से कुछ न कुछ पूछने लगे । संसद के सवालों से मैं कुछ डर गई थी । इस वजह से अचानक से मेरी हकलाहट की समस्या इतनी बढ गई कि मैं उन सब की बातों का जवाब ठीक ढंग से नहीं दे पा रही थी । कुछ समय के दौरान ही मेरी हकलाहट का मजाक बनने लगा । परंतु इन सबके बीच राकेश कुछ भी नहीं बोल पा रहा था । यानी वो चुपचाप वहाँ खडा होकर मेरी बेइज्जती का तमाशा देख रहा था । इतना ही नहीं तो मन ही मन मुस्करा भी रहा था और बेबस होगा अपनी बेज्जती का तमाशा देखते रहे । मैं एक विश्व स्तर की पेंटर थी और अपनी कला का लोहा पूरे विश्व में मनवा चुकी थी । यही नहीं पार्टी में मौजूद सभी लोगों से ज्यादा गुनी थी । यानी मेरी काबिलियत वहाँ मौजूद सब लोगों से ज्यादा थी लेकिन फिर भी वो सब मुझ पर हस रहे थे । मैंने राकेश को वहाँ से जाने के लिए कहा लेकिन उसने मना कर दिया । वो सब मेरा मजाक बनाकर मेरे ऊपर हंस रहे थे । इतना ही नहीं कुछ लोग तो मेरी हकलाहट की नकल उतारने लगे थे । मैं राकेश की और देख रही थी । कुछ देर के बाद मैंने उसे दूसरी तरफ मूंग करके मेरे ऊपर हंसते हुए देखा । मैं गुस्से में राकेश को छोडकर अकेली घर की और निकल पडी । कुछ समय पर चार राकेश भी मेरे पीछे भी आ गया । उसने घर आते ही मुझे लडना शुरू कर दिया । मुझे लडाई कर रहा था क्योंकि मैं वहाँ से उसे छोडकर अकेली घर आ गई थी । मेरे मन में राकेश के प्रति बहुत गुस्सा था लेकिन वह खामखा नाजायज तौर पर अपना गुस्सा मेरे ऊपर निकाल रहा था । अच्छा है तो मेरे ऊपर नाराज होकर अपनी गलतियों को छुपाना चाहता था । पार्टी के जाने के बाद से हमारा अक्सर झगडा होने लगा । छोटी छोटी बातों को लेकर मुझसे लडना झगडना शुरू कर देता क्योंकि उसको पता था कि मैं अपनी हकलाहट की समस्या के कारण उसकी बातों का विरोध नहीं कर सकती और अगर कभी कबार हकलाते हुए ही मैं उसकी बातों का जवाब देने लगती है तो वो मेरी नकल उतारकर मेरी हकलाहट का मजाक बनाने लगता । मैं उसके स्वभाव में अचानक आए बदलाव की वजह से हराम थी । एक दिन तो किसी वजह से ये हमारा झगडा इतना बढ गया । राकेश का परिवार के सभी सदस्य मेरे कमरे में आ गए । मैं रो रही थी और वो सबके सामने मेरे ऊपर बेंजाम लगाई जा रहा था । मुझे जिसके पहले शब्द याद है तेरे से शादी करके मैंने अपने जीवन की सबसे बडी भूल की है क्योंकि तू अगली है और जहाँ भी महत्व में लेकर जाता हूँ तुम्हारी वजह से लोग मेरे ऊपर उसने लगते हैं । हमने मेरे दोस्तों के बीच मेरी बेइज्जती करवा दी है । मैं तो मैं कहीं लेकर नहीं जा सकता हूँ । मुझे तो पहले से ही सब कुछ समझ जाना चाहिए था । राकेश की बात सुनकर मुझ से रहा नहीं गया और मैं उसकी बातों का जवाब देने लगी परंतु मैं घर की वजह से हकलाने लगी । मुझे हकलाता हुआ देख वहां मौजूद राकेश पारिवारिक सदस्य मेरे ऊपर हंसने लगे और मेरी नकल उतारने लगे । तभी राकेश ने मुझे का तो छुप कर बैठे रहे और एक बात समझ ले तो तकलीफ है और सारी जिंदगी हाँ प्राति ही रहेगी । अच्छा होता कि तो खून भी होती है कम से कम जो लोग तेरे ऊपर हंस रहे हैं वो तेरे गूंगापन की वजह से तुझ पर कुछ तरह खा सकते थे । उस दिन के बाद मैंने अपने जीवन का बहुत बडा फैसला लिया । मैंने राकेश से तत्काल तलाक लेने का फैसला किया । मेरे परिवार वालों ने मुझे बहुत समझाने की कोशिश की लेकिन वह सब अपने फैसले को बदल नहीं पाए क्योंकि मैं अपने स्वाभिमान और आत्मसम्मान की रक्षा करना चाहती थी तो हर समय घुटन भरी जिंदगी जीना नहीं चाहती थी । प्रदेश ने मुझे धोखा दिया था क्योंकि शादी से पहले ही मेरी हकलाहट की समस्या के बारे में जानता था और उसने मुझे मेरी हरसंभव मदद करने का भरोसा दिया था । राकेश से मेरे धोके की वजह से मेरी शादी के नाम से विश्वास ही उठ गया । इस वजह से मैंने दोबारा शादी न करने का फैसला लिया । जब मैं राकेश से तलाक का केस लड रही थी तो उन दिनों मैं घर पति थी । राकेश को इस बात का पता था लेकिन उसने एक बार भी मुझसे मेरा हाल नहीं पूछा । तलाक लेते समय न्यायाधीश ने मुझसे कहा अगर वो चाहे तो वह राकेश के परिवार की तरफ से आपको गुजारा भत्ता लगा सकता हूँ । लेकिन मैंने ऐसा सब करने से मना कर दिया । अभी मेरे वकील ने मुझ पर दबाव डालना शुरू किया कि हम राकेश के परिवार के ऊपर फोर नाइंटी एट ए के तहत मामला दर्ज करवा दें । लेकिन मैंने ऐसा करने से भी इंकार कर दिया और न्यायाधीश ने जल्द से जल्द तलाक की अर्जी को मंजूर करने की गुजारिश की । आज मैं अपने घर में रह रही हूँ । जी हाँ अपना घर वो घर जो ना तो मेरा मायका है और नहीं मेरा ससुराल । वो मेरा खुद का घर है जहाँ मैं और मेरा बेटा रहते हैं । मैं अपनी कला की बदौलत अपना जीवन निर्वाह ही नहीं कर रही बल्कि समाज में अपना कद ऊंचा करके जी रही हूँ । आज मुझे कोई परवाह नहीं है कि मेरी बहनें या मेरे माता पिता मेरे साथ कैसा बर्ताव करते हैं और नहीं मुझे इस बात की चिंता है कि लोग मेरे बारे में क्या सोचेंगे । मेरा तलाक मेरी शादी के चार महीनों के बाद ही हो गया था और इस सब की वजह का आज तक पता नहीं चला हूँ । जो भी मुझसे मेरे तलाक का कारण पूछते हैं मैं इसका जवाब देते समय हकलाने रखती हूँ और मेरे हाथ लाते ही वो हंसने लगते हैं और मैं धीमी गति से बोलते हुए उन्हें कहती हूँ मेरे तलाक का कारण मेरी हकलाहट की समस्या नहीं है बल्कि मेरे तलाक की असली वजह तो आप जैसे लोग हैं जो किसी भी समस्या का बेवज है, मजाक बना देते हैं । शीतल की जिंदगी में आई परेशानियों के लिए आप कसूरवार किसे मानते हैं? अगर आपके पास कोई जवाब है जिससे आप पूर्ण रूप से सहमत है तो मैं समझूंगा कि मेरा ये कहानी लिखना सही मायने में सार्थक है । वो

Details
The Five W in Stammering यानी हकलाहट के पाँच "क" यह किताब हकलाहट की समस्या के विषय को समर्पित है । अपनी इस किताब में मैने पाँच "क" , क्या ,क्यों , कब , कहाँ , कैसे यानि हकलाहट की समस्या क्या है । हकलाहट की समस्या क्यों पैदा होती है । हकलाहट की समस्या कब पैदा होती है । हकलाहट की समस्या कहाँ सबसे ज़्यादा यां कहाँ सबसे कम पैदा होती है । हकलाहट की समस्या को कैसे क़ाबू में किया जाए । इन सबका वर्णन करने की कोशिश की है । और इसके साथ हकलाहट के जीवन पर आधारित कुछ लोगों की कहानियाँ हैं। इन कहानियों में से कुछ कहानियाँ काल्पनिक हैं और कुछ सत्य जीवन पर आधारित हैं। और यह सब कहानियाँ हकलाहट के पाँच " क " को ध्यान में रख कर लिखी गई है। और साथ में इनके ज़रिये यह बताने की कोशिश की गई है की हकलाहट की समस्या से जूझ रहे व्यक्ति के जीवन कौन कौन सी समस्याएँ आती हैं और इस समस्या को कैसे क़ाबू में किया जाए । Voiceover Artist : Ashish Jain Script Writer : Rohit Verma Rimpu
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