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Shri Krishna (Dwitiya Adhyay) 3.7 in  |  Audio book and podcasts

Shri Krishna (Dwitiya Adhyay) 3.7

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श्री कृष्ण Written by गुरुदत्त Published by हिंदी साहित्य सदन Voiceover Artist : Suresh Mudgal Producer : Saransh Studios Author : गुरुदत्त
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द्वितीय अध्याय भाग साथ जब कृष्ण को पता चला कि पांडव विराट नगर में है तो वह वहाँ अपनी बहन समुद्रा तथा अन्य मित्रों और संबंधियों के साथ पहुंच गया । द्रोपदी का भाई दृष्ट तुम भी वहाँ आ गया । इस अवसर पर विराट की राजकुमारी उतरा जिससे अर्जुन गुप्त रहने के काल में नृत्य संगीत सिखाता रहा था का विवाह अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु से हो गया । इस विवाह के अवसर पर पांडवों के अन्य संबंधी भी एकत्रित हो गए । कृष्ण, उसका भाई बलराम और अन्य यदि वंसी वहाँ पहुंचे । अब वन्य और उत्तरा का विवाह हुआ । साथ ही पांडवों के बहुत से मित्र और संबंधी जब एकत्रित हुए तो विचार होने लगा कि डिस्ट्र देखो किस प्रकार अब राज्य प्राप्त करना चाहिए । कृष्ण का कहना था, पांडवों ने जुए में स्वीकार की वेश अर्थपूर्ण कर दी है । पाते उन्हें विराट नगर से सीधा इंद्रप्रस्थ जाना चाहिए और वहाँ पहुंच अपने को राजा घोषित कर देना चाहिए । रजिस्टर का कहना था, जब हमने सर पूरी कर दी है तो इस प्रकार चोरी चोरी राज्य लेने में क्या आवश्यकता है? मैं यहाँ से महाराज धृतराष्ट्र को पत्र लिख देता हूँ कि उन्हें इंद्रप्रस्थ से अपने कर्मचारियों को बुला राज्य हमें वापिस कर देना चाहिए । परंतु भैया ये मिस्टर दुर्योधन इस प्रकार राज्य नहीं देगा तब तुम है उसके विरुद्ध युद्ध की घोषणा करनी पडेगी । ये अधिक कठिन होगा तथा इसमें खानी भी बहुत होगी । चुपचाप इंद्रप्रस्थ वीजा । वहाँ पर अधिकार जमा लेने पर तुम कुछ भी अगर नहीं कर रहे हैं और एक बार तुमने इंद्रप्रस्थ पर अधिकार प्राप्त कर लिया तो युद्ध होने पर तुमसे है जी उन पर विजय प्राप्त कर सकेंगे । और हम तो बलराम का कहना था । अब ये मिस्टर आदि के लिए उन्हें वन को लोड जाने के अतिरिक्त अन्य कोई चारा नहीं है । रिजिस्टर हुए में अपना राज्य भाइयों और पत्नी को हराकर देश में इतना बदलाव हो चुका है कि कोई भी बना व्यक्ति उसके पक्ष में लडने के लिए तैयार नहीं होगा । परंतु वहां अन्य संबंधी और मित्र को पुष्टि थे । बे बलराम के स्थान कृष्ण की सम्मति को मानते थे । मिस्टर चुपचाप इंद्रप्रस्थ में जाने के स्थान तो उनको बताकर राज्य प्राप्त करना धर्मिक मानता था । बाकी सबको युधिष्टर के बाद माननी पडी । कृष्णा इससे प्रसन्न नहीं हुआ । विराट नगर में अभिमन्यु और उत्तरा के विभाग के अवसर पर कोई गोष्ठी में ये निश्चित हुआ कि युधिष्टर महाराज द्रुपद के पुरोहित को दुरुस्त राष्ट्र के पास भेजे और उससे यूज मिस्टर को राज्य वापिस कर देने का आग्रह करें । महाराज द्रुपद ने रोहित को दूध बनाकर दुरुस्त राष्ट्र की सभा में भेजा गया तो बहुत राष्ट्र स्पष्ट कह दिया कि रिश्ता आदि को तो वनों में ही रहने का अभ्यास हो गए हैं । इसका अब उनको अपने भाई दुर्योधन को कष्ट नहीं देना चाहिए । वे वन में ही रहा करें तो अधिक ठीक रहेगा हूँ । पांडवों के वन में तथा गुप्त रूप में रहने की अवधि में दुर्योधन आदि ने डिस्ट्र को बदनाम करने का भरसक प्रयत्न किया था । इस पर यू सिस्टर के पक्ष में सात अक्षोहिनी सेना एकत्रित हो गई । ये सब कृष्ण और महाराज ध्रुपद के प्रयत्न का ही फल था । दुर्योधन के पक्ष में ग्यारह अक्षौहिणी सेना एकत्रित हो गई । दुर्योधन अपने समधी बलराम के पास सहायता के लिए पहुंचा । बलराम जानता था की कृष्ण की रुचि की ओर है । इसका उसने दुर्योधन को ये सम्मति दी कि वे कृष्ण के पास जाए और उससे ही सहायता मांगे । यदि एक बार कृष्ण मान गया तो यदुवंशी दुर्योधन की ओर से लडेंगे । इस सम्मति को स्वीकार कर दुर्योधन कृष्ण किसी होंगे पहुंच गया । वहाँ अर्जुन भी सहायता मांगने आया हुआ था । कृष्ण उस समय सो रहा था और दोनों संबंधी कृष्ण के पलंग के समीप बैठ गए । अर्जुन पाओगे सभी बैठा हुआ था और दुर्योधन सिर की ओर बैठा था । इस कारण कृष्ण जब उठा तो उसकी दृष्टि पहले अर्जुन पर पडी है । कृष्ण को अर्जुन ने नमस्कार क्या और आपने आने का कारण बता दिया । पूर्व इसके की कृष्ण कुछ कहे दूरियाॅ बोला था भैया मैं भी आया हूँ, वो तो आप भी आए हुए हैं, आप कैसे हैं? इस पर दुर्योधन ने भी अपनी मांग उपस् थित कर दी । उसने कहा हूँ हस्तिनापुर में युद्ध हो रहा है । आप हमारे समधी, इसका आप सेना से हमारी ओर से लडे । यही याचना कृष्ण ने मुस्कुराते हुए का संभव मेरे पुत्र सम्मान है और फिर सुभद्रा मेरी बहन है । इस कारण मैं तुम दोनों को इनकार नहीं कर सकता । अतः मैं ये कहता हूँ कि एक ओर यादव की एक अक्षौहिणी सेना होगी और दूसरी ओर मैं अकेला बिना अस्त्रशस्त्र के रहूंगा । अब तुम दोनों देख लोग कोन क्या चाहता है? मेरी दृष्टि पहले अर्जुन पर पडी है इसका मांगने का पहला अधिकार उसका है । दुर्योधन पहले श्रम मांगना चाहता था परन्तु कृष्ण ने अर्जुन की ओर देख पूछ लिया और जो बताऊँ क्या चाहते हूँ और जो उन ने कहा भैया मैं तो तुम्हारा पूर्ण सहयोग सेना और अस्त्रशस्त्र सहित मांगने आया था । पर तो जब तुम्हारी यही इच्छा है तो मैं केवल तो में अपने साथ चाहता हूँ । तुम्हारी सेना नहीं । यही तो दुर्योधन चाहता था । उसकी दृष्टि में एक अक्षौहिणी सेना अकेले कृष्ण और वह भी वस्त्र वस्त्र सहित से बहुत अधिक शक्तिशाली थी । इसका अर्जुन को मूल्य समझ हस पडा और सेना लेकर प्रसन्न हो गया । इस पर कृष्ण ने कह दिया दुर्योधन यदि लक्ष्मणा का स्वस्थ और भैया बलराम सेना के साथ गया तो मैं भी पांडवों की ओर से सस्ता उठाऊंगा पाते । अपने संबंधी को ये कह देना की तुलना सेना और मुझे हैं परन्तु बलराम और मैं प्रथक है । यदि वह तुम्हारी ओर से लडेगा तो मैं पांडवों की ओर से लडूंगा । दुर्योधन और जो दोनों इस प्रबंध से प्रसन्न थे । दोनों ओर की सेनाएं कुरुक्षेत्र के मैदान में लडने के लिए तैयार होकर आगे युद्ध से पूर्व दुरुस्त राष्ट्र की ओर से उसका सम्मति दाता संजय युद्ध मिस्टर को समझाने आ पहुंचा । संजय न्यूज मिस्टर को कहा आप समझता, बुद्धिमान, धर्मात्मा और त्यागमूर्ति हैं आप । शमा वहाँ भी अपने में रखते हैं और जो धन निरुद्धि पदलोलुप स्वार्थी युद्ध में लाखों मारे जाएंगे और इनकी मृत्यु का पाप उस पर होगा जो युद्ध के इस भयंकर परिणाम को जानता हूँ । अभी इनमें सम्मलित होने वाला है । ऐसे महाराज धृतराष्ट्र का कहना है कि बुद्धिमान न्यूडिस्ट को समझदारी करनी चाहिए और राज्य के लिए मुर्ख दुर्योधन के पीछे लगकर इस महान हत्याकांड में कारण नहीं होना चाहिए । उसे भारी पाप लगेगा । रजिस्टर संजय के वचनों से प्रभावित हो गया । उसने पूछा और हमारे पिता तुल्य महाराज हमें क्या करने की सम्मति देते हैं? संजय का उत्तर था संसार में बहुत लोग हैं जो राज्य के बिना भी जीवित रहते हैं और सुखपूर्वक रहते हुए अपना पर लोग सुधर रहे हैं । महाराज की ये समझती है कि आप लोगों को वही कुछ करना चाहिए जो संसार में कोटि कोटि मनुष्य कर रहे हैं । युनिस्ट इस छुट्टी को स्वीकार कर युद्ध से बाहर रहने को तैयार हो गया । किशन ने जब देखा युधिष्टर साधु बनना चाहता है तो उसे चिंता लगे । उसने उस समय बात को टालने के लिए कहा । संजय जी आप तो लंबी यात्रा से आए हैं और अत्यंत थके हुए प्रतीत होते हैं । मेरी सम्मति है कि आपको यहाँ रात भर वो मिस्टर का आतिथ्य शिव कार करना चाहिए । कल हम आपको विदा करते समय युनिस्ट जी का विचारित उत्तर दे देंगे । रात के समय कृशन ने पांच भाइयों तथा द्रोपदी को प्रत्यक में बुलाकर पूछा संजय जी द्वारा लाए संदेश पर क्या प्रतिक्रिया? सिस्टर ने अपने मन की बात बता दी । उसने कहा महाराज दूतवास ने बात तो ठीक चाहिए । हम युद्ध के भयंकर परिणामों को समझते हैं । हमें इस से बचने का उपाय करना चाहिए । इसपर रोक दी ने कह दिया और भले तथा बुद्धिमान लोगों को मुख्य मारना चाहिए क्योंकि दुष्ट, दुराचारी, अनर्थ भाषी और आप पाइप का पेट सामान्य लोगों के साधनों से भर नहीं पाता हूँ । रन तुम्हारा नी क्या भूखी मर रही हैं ये मिस्टर ने पूछा मैं अपनी बात नहीं कर रही हैं । मैं तो जो कुछ हूँ मैं आपकी छाया ही हूँ । परन्तु मैं उन कोटि कोटि मानो की बात कर रही हूँ जो दुष्ट दुःशासन से पीडित हो करो से और अन्य बहुत से ग्रस्त है । तो मैं ये सर्च लगा देता हूँ कि निर्धनों पर यदि दुर्योधन कर हटा दे तो हम युद्ध नहीं करेंगे । परन्तु महाराष्ट्र चौकी का कहना था इस बात का क्या विश्वास है कि वह आज मान्य बात का सदैव पालन करेगा । ये वही दुरुस्त राष्ट्र इसमें ये कहा था कि यदि हम बारह वर्ष बहनों में रहकर तेरह वर्ष गुप्त रह सके तो हमें हमारा राज्य वापिस कर देंगे और अब हमें उपदेश दे रहे हैं कि हमें युद्ध नहीं करना चाहिए । इस पर कृशन ने बातों का सूत्र अपने हाथ में लेते हुए कहा रजिस्टर! यही तो बहन द्रोपदी कह रही है कि इस समय तो तुम्हारी विशाल सेना और उसमें अनेक मुद्दों को देखकर धृतराष्ट्र जो कुछ भी प्रजा के हित की बात हम कहेंगे मान जाएगा । प्रजा ने इंद्रप्रस्थ का राज्य और भूमंडल का चक्रवर्ती राज्य तो तुम्हें दिया था । इस कारण मैं तुमसे आशा करती है कि तुम ने यज्ञ समय राज्य चलाने का जो वचन दिया था उसे पूरा करो और उनकी इस आतंकी की रक्षा करूँगा । डिस्टर्ब कृष्ण की नियुक्ति से मौन हो गया । इस पर कृष्ण ने पुणे का भैया यही उपदेश धृतराष्ट्र को अपने प्रिय पुत्र दुनिया तो उनको देना चाहिए था और यदि उसकी बात को उसका अपना सगा पुत्र नहीं मानता तो उसका क्या अधिकार है कि वह एक सत्यवादी और धर्म पर हैं । यू मिस्टर को वही उत्तेज दिन उस ने आज तक आपका कब और कौन सा कल्याण क्या है कि आपको उसकी बात माननी पडेगी । कृष्ण ने आगे का आज भूमंडल के दुष्ट लोगों की संख्या अधिक हो गई है । परमात्मा ने तो मैं चक्रवर्ती राज्य दिया था जिससे तुम विद्वान धर्मात्मा लोगों की रक्षा कर सकू तुमने उन लोगों से विश्वासघात किया है जिन्होंने तो मैं राज्य युग की सामर्थ्य प्रदान की थी । दूसरी ओर दुर्योधन ने संसार की आसुर प्रवर्ति वालों को अपने अपने राज्य में अन्याय और अत्याचार का राज्य चलाने की स्वीकृति दे रखी है । इस कारण वे लोग दलबल सहित अपने गुरु की रक्षा के लिए चले आए हैं । ऍम हो कि जहाँ धर्म है वहाँ ही बीजी होती है । बी जे सुनी पशुओं के मुंडी गिनकर पदार्पण नहीं करती है । ये धर्म धर्म को देखकर आती है । इस पर अर्जुन ने बात समझ कृष्ण की बात का समर्थन कर दिया । उसने कहा भैया मुझे कुछ दिन हुए देवऋषि नारद मिले थे । वो हमारी सेना का निरीक्षण करने आए थे । उन्होंने कहा था कि विजय तो वहाँ ही होगी जहां धर्म व्यवस्थापक प्रश्न है । अरे तो एक छोटी सी सेना में हम विजयी होंगे क्या कृष्ण ने कह दिया विजयी होंगे तो चक्रवर्ती राज्य करेंगे और यदि युद्ध में मारे गए तो अनंतकाल तक स्वर्ग सुख भोगेंगे धर्म के पक्ष में मारते हुए व्यापक कीर्ति का लाभ करेंगे । प्राथमिक कॉल संजय को टेंशन नहीं ये उत्तर देकर वापिस दृढविश्वास के पास भेज दिया । कृष्ण ने कहा संजय जी आप महाराज बलोतरा से जाकर ये कहते हैं कि हमें उन पर दया आती है तो मैं चक्षु विहीन है और जो कुछ उनको अपने पुत्र दुर्योधन को कहना चाहिए भूल से अपने भाई पांडु के पुत्र मिनिस्टर को कह रहे हैं कृपया उनको बता दीजिए की उन की शिक्षा का पात्र उनके अपने घर में ही दुर्योधन है । इस उत्तर के उपरांत ये आवश्यक हो गया कि रजिस्टर की ओर से भी कोई शांति दूत जाए । अतुलकृष्ण को इस काम के लिए उपयुक्त समझा गया हो ।

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श्री कृष्ण Written by गुरुदत्त Published by हिंदी साहित्य सदन Voiceover Artist : Suresh Mudgal Producer : Saransh Studios Author : गुरुदत्त
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