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Shri Krishna (Dwitiya Adhyay) 3.4 in Hindi

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AuthorNitin
श्री कृष्ण Written by गुरुदत्त Published by हिंदी साहित्य सदन Voiceover Artist : Suresh Mudgal Producer : Saransh Studios Author : गुरुदत्त
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द्वितीय अध्याय भाग चार । उसी दिन मध्य आरोन तक राज्य प्रसाद के भीतर ही अखाडे में दोनों योगदान निकल आए हैं । पहले दिन का युद्ध अनियमित रहा और ये निश्चित हुआ युद्ध अगले दिन भी जारी रहेगा । अगले दिन भी हार जीत का निर्णय नहीं हो । तीसरे दिन जरासंध को ये सूचना मिली की नगर की प्राचीर पर रखा नगाडा किसी ने तोड फोड दिया । जरा सन को संदेह हुआ कि यह युद्ध करने के लिए आईएस स्नातकों का ही कार्य खाते । तीसरे दिन युद्ध होने से पूर्व उसने स्नातकों से पूछा है तुम कौन हूँ? मुझे पता चला है ये तुम यहाँ चोरी चोरी आए हुए तीन कृष्ण ने दिया महाराज हम चोरी चोरी नहीं आए । हम प्रत्यक्ष में यहाँ आए हैं । केवल हमने नाम लिखाने से अपने को बचाया है । इसमें कारण ये था कि हम झूठ नहीं बोलते और यदि अपना सत्यनाम बता देते हैं तो आप हमसे युद्ध नहीं करते और हमें बिना युद्ध किए बंदीगृह में डालने का यत्न करते हैं । हम युद्ध करने के उद्देश्य से यहाँ आए हैं । तब हम बिना कुछ किये ही उद्देश्य से विफल कर दिए जाते हैं । पर तुम कौन हूँ? जरा सन का प्रश्न था और आज मैं वासुदेव प्रश्न है ये मेरे साथ जो खडा है । पांडु लंदन अर्जुन है और वह जो आपसे युद्ध के लिए खडा है । ये अर्जुन का बडा भाई भीमसेन हैं । हम यहां केवल मात्र आपसे द्वंद युद्ध करने के लिए आए हैं और यदि मैं तुमको अब बंदी बनाने की अगर देखो तो क्या करेंगे । आप ऐसा नहीं कर सकते हैं । भूमि ससुर के राज्य जो तीस पुर को आदि घडी में भस्म कर देने वाले और कश्मीर के दामोदर की एक अच्छी होनी सेना को कुछ दिनों में मृत्यु के घाट उतार देने वाले को आप बंदी नहीं बना सकेंगे परंतु मैं तो अन्य बात कहता है । आप टीम से दो दिन युद्ध लड कर बिना उसे पराजित किए यदि उसे बंदी बनाएंगे तो लोग ये कहेगी कि जब आपको अपने जीतने सकने का विश्वास हो गया तब आप ने इसे और उसके साथियों को धर्मपूर्वक बंदी बना लिया है । इससे आपकी भारी निंदा होने लगेगी और एक छतरी के लिए लोक निंदा से बढकर अन्य कोई लज्जा की बात नहीं । ये आप मत कर मेरी यही समझती है । किरासन को ये दूसरी युक्ति अधिक उपयोग प्रति हुई । जहाँ तक सुदर्शनचक्र के अस्तित्व का पसंद था उसे इसके कृष्ण के पास होने का विश्वास नहीं था । बिना अपनी आंखों से देखिए मैं उस पर विश्वास कर नहीं सकता है । हाँ, निंदा की बातों से प्रत्यक्ष दिखाई देती थी । उसने युद्ध करना ही उचित समझा । युद्ध चौदह दिन तक चलता था और चौदह दिन मैं थक कर चूर हो भूमि पर गिर गया है । भीम ने उसकी एक टन को पकडो और दूसरी पर अपना पांव रख उसके शरीर को चीज डाल जरा सुने मर गया । इस पर जरा सन का पुत्र सहदेव अपने सैनिकों को लेकर युद्ध करने को आदम का । वह इन तीनों स्नातकों को पकडते हैं, मृत्युदंड देना चाहता था । सेना को अपने पर आक्रमण करते देख अर्जुन ने अपना गांडीव धनुष निकाल लिया और सेना से युद्ध करने लगा । परंतु इसी समय जरासंध की पत्नी ने अपने महारानी होने के अधिकार से युद्ध बंद करा प्रश्न और सहदेव की संधि करवा दी । श्रीकृष्ण किरासन के पुत्र सहदेव का राजतिलक कर उसे मगर देश का राजा घोषित कर दिया और सैकडों राजाओं को जो जरासंध के बंदी थे, स्वतंत्रता दिलवा दिया । इस प्रकार अपना उद्देश्यपूर्ण कर कृष्ण आदि हस्तिनापुर लोट आए और तब युधिष्टर नहीं राज शुरू की घोषणा करते हैं । जरासंध के मारे जाने पर असूल राज्यों के गुट मैं कल रात मच गई और वे यत्न करने लगे कि रिजिस्टर के राष्ट्रीय में विघ्न डालने भारत वर्ष में इस गुटके राजा थे शिशुपाल, रुक्मी, जयद्रथ, दुर्योधन, करण जरासंध इनका नेता था । जरासंध के मारे जाने पर ये गुट दुर्बल पड गया था । इस कारण आपने गुटके बाल को बनाए रखने के लिए इन का विचार था कि राज्य युग में सम्मिलित नहीं हूँ । राष्ट्रीय के लिए हम भी एकत्रित होने में बाधा खडी करें परंतु इनकी आशा को भंग किया । भीष्म पितामह दुर्योधन ने अपनी इच्छा बता दी कि ये राशि युद्ध का विरोध करेगा । इस पर बेस्ट पिता मैंने कहा जो नियमनुसार यूज मिस्टर हस्तिनापुर विजय के लिए सेना भेज देगा पिता में तब हम उससे युद्ध करेंगे । वो पांच वही है भाइयों की, सो साल और उनके संबंधी और मित्र है । इस कारण वे तुम को पराजित कर देंगे । रन तो पिता में मेरे भी तो संबंधी मेरी ओर से लडेंगे । पहले उनसे पूछो कि वे लडेंगे क्या? किताब में पहले तो मैं आपसे पूछता हूँ कि आप मेरे पक्ष में लडेंगे अथवा नहीं नहीं क्योंकि तुम्हारे पक्ष में धर्म की स्वीकृति नहीं तो मुस्लिम राष्ट्र यह कर नहीं सकते हैं । तुम अपने भाई के इस प्रयास में विभिन्न डालोगे तो कोई भी राजा तुम्हारी सहायता नहीं करेंगे परंतु जब पिता में और गुरु द्रोणाचार्य जी मेरी सहायता करेंगे तो मैं क्यों नहीं कर सकूँ ये इस कारण कि तुम्हारे बडे वही नहीं करने की इच्छा और भोजना पहले कर दिए तो पिछड गए । देखो वीडियो धन जी तुमने इसी का विरोध किया तो मैं रजिस्टर की ओर से तुम्हारे विरूद्ध युद्ध करूंगा । दुर्योधन हूँ पर हम तो जब उसने अपने गुटके साथियों से सम्मत्ति की तो उसके मित्र शिशुपाल ने ये बताया यग में विभिन्न डाला जाए और उसे असफल करने का उपाय बताए । उसने कहा कि प्रत्यक्ष रूप में हम यह का समर्थन करें तो यज्ञ कार्य में विभिन्न डालें और यह को असफल कर देंगे । दुर्योधन यूज सिस्टर की योग्यता को तो मानता था परन्तु अपने को भी वह अयोग्य नहीं मानता हूँ । मैं समझता था कि उसके भाई बंधु और मित्र अयोग्य है अन्यथा वह अब तक राष्ट्रीय युग कर चुका होता । बातचीत की इस निराशा में उसे शिशुपाल और सकू नहीं नहीं ये मार्ग बताया । यह कार्य में विभिन् खडा किया जाए । इस पर भी अभी तक किसी प्रकार के विभिन्न का स्वरूप स्पष्ट नहीं किया जा सकता है । प्रश्न इत्यादि ने गिरिव्रज । सिल्लोड । तेहि अर्जुन, भीम, नकुल और सहदेव । चारों दिशाओं में यह कि हम भी प्राप्त करने के लिए चल पडे राज शूज । अक्का विप्रा ये था की पूर्ण जम्बूद्वीप को सांस्कृतिक सूत्र में बंधा जा सके । जम्बूद्वीप आजकल के यूरेशियाई महाद्वीप का नाम था । अर्जुन उत्तर की हो और समुद्र तक अभी प्राप्त करने गया और सहदेव दक्षिण में सागर तट तक । नकुल पश्चिम में वहाँ तक गया । जहां तक सागर था और भीम पूर्व की ओर सागर, तब तक गया यू मिस्टर का राष्ट्रीय । बहुत धूम धाम से इंद्रप्रस्थ संपन्न किया गया । इस युग में जम्मू जी के सब राजाओं ने जब के लिए अभी प्राप्त की गई और वह पद्म स्वर्ण मूल्य के रूप में एकत्रित होगी । इस हवि को उन्हें बहुमंडल के ब्राह्मणों में बांट दिया गया । यह यह की दक्षिण के रूप में था । इस युग में दुनियो धोना दी गुटके राजा भी सम्मिलित हुए हैं । यज्ञ में विदुरजी को धन बांटने का कार्य दिया गया था । तुम योजना दी । परिवार के लोगों को जगह में कई प्रकार की सेवाएं करने का कार्य दिया गया । ऑपरेशन ने स्वेच्छा से यज्ञ में सम्मिलित होने वाले ब्राहमणों के पाउंड होने का कार्य लिया । टूरिस्टर श्रम तो यजमान था । उसके भाई यह भी संबंधी सेवाएं कर रहे थे । लाखों लोगों की भीड एकत्रित हुई थी और उसमें चारों वर्ग के लोग थे । यह समाप्त हुआ और यह का अंतिम कार्य था । यह संबंधी सभा उस सभा का प्रमुख बनाया गया । कृष्ण को ये नारद के सुझाव पर बेस्ट पिता ने सभा के प्रस्ताव के रूप में उपस्थित क्या किसी ने आपत्ति नहीं की तो नकुल ने कृष्ण के चरण स्पर्श किए और उनको ले जाकर सभापति के आसन पर बिठाने के लिए सभा के मध्य में ले आया । कश्मीर प्रमुख के आसन पर बैठ नहीं लगा था कि शिशुपाल खडा हूँ, आपत्ति करने लगा । उसने कहा सभागर, मैं इस स्थान पर प्रश्न को बैठने का विरोध करता हूँ । चीज भोपाल की आपत्ति हुई थी । प्रश्न नहीं तो राजा था नहीं धम्मन विद्वान । ये वास्तव में बहुत ही छोटे से राज्य का एक तुच्छ व्यक्ति है । कहते है उस बहुमंडल के नरेशों को ब्राहमणों की सभा में इस पद के लिए उपयुक्त नहीं है । बेस्ट पिता ने इसे सोपाल को उत्तर दिया । बेटा से ऊपर तो नहीं जानते हैं । परन्तु मैं जानता हूँ कि इस समय भूमंडल में कृष्ण के सम्मान महान विद्वान और सूरवीर व्यक्ति कोई नहीं है । राज्यों के इस समुदाय में एक भी राजा ऐसा नहीं दिखाई देता जो युद्ध में श्रीकृष्ण के तेज से परास्त हो चुका हूँ । देश में ये भी कहा मैंने ये प्रस्ताव महामुनि नारद और महाराज धृतराष्ट्र की अनुमति से ही क्या है परन्तु इससे शिशुपाल संतोष नहीं हुआ । मैं भी जब्त राष्ट्र और कृष्ण की बढ चढकर निंदा करने लगा । जब शिशुपाल ने निंदात्मक वचन कहना आरंभ किया तो प्रश्न ने कह दिया, शिशुपाल तो मेरी बुआ के पुत्र जब तुम पैदा हुए थे तब ये भविष्यवाणी सुनकर तुम मेरे हाथ से मारे जाने वाले हो । तुम्हारी मान्य मुझसे वर मांगा था । मैंने उनको ये वचन दिया था की मैं तुम्हारे एक सौ दुर्वचन समाज कर दूंगा और यदि तुमने इस सीमा का भी उल्लंघन किया तो निचे ही तुम मुझसे मारे जाऊंगी । इस कारण सुन लो तुम जो मुझे और मेरे पूर्वजों को गालियां सुना रहे हो मैं उनकी गन्ना कर रहा हूँ और तुम्हारी गाडियों की संख्या द्रुतगति से बढती जाता है । इस कारण में तो मैं सचेत कर रहा हूँ कि तुम्हें वह सीमा पार्ट नहीं करनी चाहिए जहाँ तक तो मैं छमा करने का । मैंने तुम्हारी माता को वचन दिया हुआ है । इतना के हैं । श्रीकृष्ण सभा के प्रमुख आसन पर बैठ गया सहदेव नहीं उसके चरण में और उन्हें श्री कृष्ण की प्रशंसा । मैं दो वाक्य कहे तो सिर्फ ऊपर अपने स्थान पर बैठा नहीं और उन्हें कृष्ण बीस तथा अन्य राजा महाराजों की निंदा करने लगा । दुर्योधन पहले तो सुसु पाल को आपत्ति करते देख समझा कि वह झगडा कर यग में विभिन्न डालने के लिए ही कह रहा है और वह तो था उसके साथ ही शिशुपाल की सहायता के लिए अपने साथियों को सतर्क करने लगे । परन्तु जब शिशुपाल नहीं बीस और धृतराष्ट्र को भी बुरा होना कहना प्रारम्भ किया तो उसका उत्साह स्थिल पड गया और सकू की सम्मति से उसने चुप रहना ही उचित समझा । जब कृष्ण ने उसे चुनौती दी कि वह उसकी गाडियों की गणना कर रहा है तो शिवपाल और भी अधिक गति से गालियां देने लगा । अंत में उसने कृष्ण की पत्नी रुक्मणि को भी बुरा भला कहना गर्म कर दिया । उसने कहा था, तुम्हारी पत्नी रुक्मणि की मुझे सगाई हो चुकी थी । मेरी वो जीत उनको ही तुमने स्वीकार किया । इस पर कश्मीर खडा हो गया और उसने कहा बस अब सीमा पार हो गई है । तुमने नए केवल मेरी शाम के लिए दिए वचन का उल्लंघन किया है । वरुण एक शक्ति साथ भी महिला पर मिथ्या लांछन लगाए हैं । वह तुम्हारी जूठन नहीं थी । अब सावधान हो जाओ । इतना कहकर कश्मीर सुदर्शनचक्र निकाला उसे शिशुपाल पर चला दिया । एक किशन ने शिशुपाल का सिर धड से पृथक हो भूमि पर लुढकने लगा छू पाल के अन्य सभी साथ ही वह बीत हूँ चुप कर गए । इसके उपरांत बीस की आज्ञा से सबको जब मंडप से उठाया गया ऍम समाप्त किया गया ।

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श्री कृष्ण Written by गुरुदत्त Published by हिंदी साहित्य सदन Voiceover Artist : Suresh Mudgal Producer : Saransh Studios Author : गुरुदत्त
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