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Shri Krishna (Dwitiya Adhyay) 3.3 in  |  Audio book and podcasts

Shri Krishna (Dwitiya Adhyay) 3.3

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श्री कृष्ण Written by गुरुदत्त Published by हिंदी साहित्य सदन Voiceover Artist : Suresh Mudgal Producer : Saransh Studios Author : गुरुदत्त
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हाँ, तीन जब कई वर्ष तक राज्य चलता रहा हूँ और अर्जुन का विवाह कृष्ण की बहन सुभद्रा से हो गया तो नारद के सुझाव पर सिस्टर ने राज शुरू जब करने का विचार किया । नारद ने यूज मिस्टर को बताया रिस्ट तुम्हारे पिता महाराज पांडु के बडे भाई धृतराष्ट्र के नाम पर असम में यज्ञ किया था और जब तक पांडो जीवित रहा भारत वर्ष देश में शांति स्थापित रही । पांडू के देहांत के उपरांत भारत वर्ष के राजाओं पर अंकुश नहीं रहा और जरा संजय से उच्छृंखल राजा उत्पन्न हो गए आते हैं । इन सब को नियंत्रण में रखने के लिए उन्हें अश्वमेघ यज्ञ अथवा उससे भी बडा राज शुरू करना चाहिए । नारद ने आगे कहा राजन! इस भूमंडल पर व्यवस्था रखने के लिए जिससे प्राणी मात्र को धर्म व्यवस्था का सुख प्राप्त हो सके, किसी एक राज्य का शक्ति शाली होना आवश्यक है । अश्विन में क्या अथवा राष्ट्रीय यज्ञ सब की स्वीकृति से किसी एक राजा का बडा होना है ये हम ऋषि मुनियों का तो भी है कि किसी धर्मात्मा इस वरपरायण तो था । न्यायप्रिय राजा को चक्रवर्ती पद प्राप्त कर आए । इस कारण में ये समझता हूँ कि इस समय भूमंडल में तुम्हारा चक्रवर्ती राजा होना अत्यावश्यक जरासंध, जयेंद्र बुरी हुआ । शिशुपाल इत्यादि नरेश अपना संग बना रहे हैं । वे सब के सब असर प्रकृति के राजा हे । इस कारण तो मैं अपने पिता की परंपरा को स्थिर रखने का यत्न करना चाहिए । सिस्टर ने पूछा भगवन्! इस योग को करने के लिए क्या करना चाहिए? इसके लिए तुम अपने संबंधी और मित्र वासुदेव कृष्ण से सम्मत्ति करो । वहाँ तुमको इस विषय में ठीक सम्मति दे सकता है ना? भारत के इस कथन से मिस्टर ने तुरंत एक दूध द्वारका भेज दिया । ट्रेशन को प्रॉमिस के लिए बुला लिया । कृष्ण भी कुछ वैसा ही विचार कर रहा था जैसा कि नारद ने कहा था । भारत वर्ष में कुछ सूट राज्य बना रहे थे और उनके समृद्ध होने का अर्थ यह था कि प्रजा में आसुरी प्रकृति का विस्तार हो । इस कारण यदि चक्रवती पद किसी देवी राज्य को मिल जाए तो भारत वर्ष की प्रजा में धर्म व्यवस्था रखी जा सकेगी । आती है । जब युधिष्टर का निमंत्रण आया तो काॅस्ट िनापुर में जा पहुंचा हूँ । ऍम कृष्ण का आदर सत्कार कर नारद की समिति बता दी । कृष्ण का कहना था पांडु लंदन नारंग का विचार अतिशुभ । मैं इसे आपके सर्वथा उपयुक्त मानता हूँ परन्तु देश की वर्तमान अवस्था देखकर में समझता हूँ कि राष्ट्र युग की घोषणा करने से पूर्व कुछ अन्य बातें करनी है जिससे यज्ञ निर्विघ्न समाप्त हो सके । जब तक मगद का राजा जरासंध जीवित है, वह आपका राष्ट्र युग सफल नहीं होने देगा हुए हैं । यह क्यों का विरोधी है तो वह चक्रवती पद की प्रथा को भी पसंद नहीं करता है । वह बलपूर्वक साम्राज्य स्थापित कर श्रम सम्राट बनने में विश्वास सकता है । दोनों में अंतर है । चक्रवर्ती राजा अन्य राज्यों पर शासन स्थापित नहीं करता हूँ । केवल वहाँ की धर्म व्यवस्था में पेडों देता है परंतु एक सम्राट अन्य राज्यों की प्रजा पर शासन भी करता है । वहाँ की राजाओं को अपना प्रतिद्वंदी मानकर उनको बंदीग्रह में बंद कर रखता है । जरा सनने अपने समीप के राज्यों से यही व्यवहार किया है । कुछ राजाओं के साथ उसकी संदीप भी है । ये सब राजा किरासन का साथ देंगे और तुम्हारा साथ नहीं देंगे । इस कारण यह की घोषणा करने से पूर्व जरासंध को भारत वर्ष के चित्रपट से हटा देना चाहिए । वास्तव में तुरंत राष्ट्र चक्रवाती राजा है और आज से बहुत पहले उसे जरासंध को आपने वर्ष में करना चाहिए था परन्तु ऍम भी जरा सनकी नीति को पसंद करता है । जब जरासंध मथुरा पर आक्रमण की तैयारी कर रहा था तो हम ने अपना एक राजदूत हस्तिनापुर भेजा था और महाराज से प्रार्थना की थी कि जरासंध को रोके परन्तु हस्तिनापुर राज्य ने हमारी प्रार्थना नहीं सुनी । परिणाम ये हुआ की हमें अकेले ही उसके अठारह आक्रमणों में लडना पडा था । इसका अभिप्राय यह था कि धृतराष्ट्र ने अपने चक्रवर्ती पद का क्या कर दिया है । उन दिनों हम पर युवराज ने भी आक्रमण किया था । हमें एक विदेशी राज्य से अकेले ही लडना पडा था । मेरा ये सुनिश्चित मत है कि जब आसन से युद्ध की घोषणा किए बिना और अपने को चक्रवर्ती पद का प्रत्याशी घोषित करने से पूर्व उसी धुन युद्ध में ललकारकर मार डालना चाहिए जैसे मैंने कंस को मार डाला था । तो क्या आज रासन को इस प्रकार मारना धर्मयुक्त होगा? मिस्टर का प्रश्न था यह सर्वथा धर्मयुक्त होगा । मेरी योजना यह है कि उसकी इच्छा से उसके साथ धुन युद्ध लडा जाएगा । जब वह अपने प्रतिद्वंदी की जलकार पर अखाडे में स्वेच्छा से उतर आएगा तब उसके साथ युद्ध धर्म युक्त नहीं हो परंतु वासुदेव उसके स्वास्थ्य, धन युद्ध कौन कर सकता है? मैं तो घर होता है । मैं जानता हूँ फॅार हमारे यहाँ हस्तिनापुर में एक व्यक्ति है जो उसे द्वंद युद्ध में पछाड सकता है । भीम का उससे द्वंद युद्ध हो जाए तो मैं समझता हूँ कि ये संभव सिस्टर भाई की जान को अपने चक्रवर्ती राजा बनने के लोग में बाहर में डालना नहीं चाहता था । परन्तु जब टीम को पता चला कि कृष्ण जरा सन से उसका धुन युद्ध पसंद करता है तो उसने श्रम बडे भाई को कह दिया है कि वह जरा सन से युद्ध करेगा । इस पर अर्जुन भी इस काम के लिए तैयार हो गया । अतः ॅ कृष्ण, अर्जुन और भीम तीनों चुपचाप मदद की राजधानी राजगृह के लिए चल पडे । हस्तिनापुर में यूज सिस्टर के अतिरिक्त अन्य किसी को विधित नहीं था कि वे लोग किधर को और किस प्रयोजन से हैं । कृष्ण, भीम और अर्जुन एक ही रथ पर सवार हो । रथ भी स्वीट भी चलाते हुए राजगिरे के बाहर पहुंचे तो उनको पता चला कि नगर में कोई व्यक्ति अपना नाम धाम बताए बिना प्रवेश नहीं कर सकता हूँ । वो झूठा नाम लिखना नहीं चाहते थे और सत्य नाम बताने पर तो जरा सन, कृष्ण आदि को तुरंत सेना के बाल से बंदी बना ले था । इस कारण उन्होंने बिना नाम बताए नगर में जाने की योजना बना ली । नगर प्राचीर के ऊंचे स्थान पर एक नगारा लगा था । जब भी प्राचीन का उल्लंघन कर कोई किसी भी स्थान से बिना नाम धाम बताएं, नगर में घोषणा चाहता था तो वह नगारा बजने लगता था और चोरी चोरी नगर में घुसने वाला पकड लिया जाता था । ये रहस्य पता करके ये तीनों व्यक्ति उस पहाडी पर पहुंचे जहाँ ये नगारा रखा था और उस नगारे में लगी तारों हूँ और सूत्रों को काट डाला जिससे प्राचीर उल्लंघन करने वाले की सूचना नगारे को मिलती थी और वह बजने लगता था । इन सूचना स्रोतों को काट देने से बिना किसी को सूचना दिए नगर में जा पहुंचे । नगर में पहुंच वे एक मंदिर में ठहर गए । वहाँ स्नानादि कर और स्नातकोत्तर ऐसे वस्त्र पहन ये राज द्वार पर जा पहुंचे । प्रतिहार द्वारा इन्होंने भीतर सूचना बीजी की तीन सनातक महाराज से भेंट करने आए हैं । जरा सनने पूछ लिया कि वे क्या चाहते हैं? कृष्ण ने उत्तर भेजा है हम महाराष्ट्र शर्म निवेदन करेंगे, ये किसी के द्वारा नहीं कहा जा सकता । विवस जरासंध को इन स्नातकों से मिलना बडा ये राशन से बातचीत प्रसन्न ने श्रम भी की । उसने कहा महाराज हम आपसी एक भीख मांगने आए । मान लो यहाँ स्नातकों और विद्यार्थियों की सब इच्छाएं पूर्ण की जाती है । इस पर कृष्ण ने कहा हमारी प्रार्थना है है की आप हम में से किसी एक के साथ द्वंद युद्ध करें । जरासंध को यह युद्ध के लिए ललकार प्रतीत हुई और छतरी सुभाव रखते हुए वहाँ युद्ध के लिए तैयार हो गया । उसने पूछा हूँ कौन युद्ध करेगा जिसे आप पसंद करेंगे? जरा सनने तीनों स्नातकों में से सबसे बेहद काई के साथ युद्ध करना स्वीकार किया ।

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श्री कृष्ण Written by गुरुदत्त Published by हिंदी साहित्य सदन Voiceover Artist : Suresh Mudgal Producer : Saransh Studios Author : गुरुदत्त
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