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मात्र अच्छे कुल में जन्म लेना ही आपको उत्तम नहीं बनाता है, बल्कि आपको अपने कुल के उत्तरदायित्व भी निभाने होते हैं । यही उत्तरदायित्व आपका आपके कुल के लिए होता है । यदि श्रेष्ठ कुल में जन्म लेने के उपरांत भी आप अपना उत्तरदायित्व नहीं निभा पाते हैं तो आपका चंद लेना कलंक है । मैंने विचारों से दंड आधार भुत चंदेश्वर वह इंदर ओतप्रोत थे । उन्हें अब अनुमान हो गया था कि कुमार को गोलक में बैठने के पूर्व ही सब पता था । हर था, वो सब पहले ही जानते थे । कई बार प्रयास करने के उपरांत जब लोजन भरेंगे उठा तो उसने शेष सभी तीनों को प्रणाम किया । अब उसने कुमार कमलेन्द्र सही प्रार्थना की । प्रभु! आपके दर्शन से पता नहीं क्यों मन इतना अधिक प्रफुल्लित हो गया है कि आज से पूर्व कभी नहीं हुआ कहाँ प्रभु आशुतोष केन्द्र के सेवक है अथवा स्वयं भी प्रभु है । मेरी बहन में अत्यंत उत्कंठा जागृत हो रही है । मेरे मन की अंतर्दशा का संभावना आपको ज्ञान हो ही गया होगा । इतना सुनने के उपरांत चंदेश्वर आगे बढे और बोले, आपका अनुमान सकते ही है । हर खाओ प्रभु नहीं । ये प्रभु आशुतोष केन्द्र के पुत्र कुमार कडे ंद्र हैं । इतना सुनते ही वहां उपस्थित सभी भाव विभोर हो गए । इतने भावविभोर के उन्होंने किसी को बैठे तक के लिए नहीं कहा । इस समय सभा में सभी खडे थे । कोई किसी से कुछ न कह रहा था और मैं कुछ पूछ रहा था । जब न कोई सामने उपस् थित व्यक्ति से पूछे और ना कुछ कहे बस मूर्ति के सवाल शरीर के साथ साथ मान भीचर हो जाए अर्थात मन अपनी गतिशीलता को भूल जाए तो समझना चाहिए । व्यक्ति सब बात हो चुका है । सब आप ही आंखों को बंद कर बैठा ही मात्र नहीं है । जब आपका मन अपनी गति अर्थात अपना कर मैं भूल जाये तो समझो सवाद व्यवस्था आ गई । तब कुमार गजेंद्र नहीं ध्यान हटाने के लिए कहा । क्या हम सब स्थान ग्रहण कर सकते हैं आप? प्रभु हम में ही तो है तो पहले अपने प्रभु कोटा पहचान सके और अब आंखों का दोष । वह मन का तो शॉप कि प्रभु से पटना ही नहीं चाहते हैं । एकता कहते हुए लोचन भेंगी अपने हाथों से पकडकर कुमार का नरेंद्र को अपने आसन पतले गया और उन्होंने कुमार को अपने आसन पर बैठाया । पहले तो कुमार गजेंद्र नहीं वहाँ बैठने से मना कर दिया परंतु बहुत आग्रह करने पर उन्होंने आसन पर बैठा स्वीकार कर लिया । कुमार के आसन पर बैठते ही सभी ने आसन ग्रहण किया । डंडधार भोजन अवेशवर वह इंदूर को भी सन सम्मान आसन पर बैठाया गया । अब दोनों ही पक्षों के मन में विभिन्न प्रकार के प्रश्न थी । तब मन की उत्सुकता को नियंत्रित न कर पाने के कारण दंड आधार ने भ्रष्ट क्या मैं अपने मन के उत्कंठा को संभाल नहीं पा रहा हूँ? इसी कारण कुछ प्रश्न करना चाह रहा हूँ । यदि आप सभी की अनुमति हो तो दूसरे पक्ष ने बोल कर और शेष तीनों ने मौन स्वीकृति दे दी । तब डंडधार ने प्रश्न किया मैंने जितना अभी तक जाना है अथवा देखा है उसमें इस प्रकार का स्थान अथवा इस प्रकार के लोग अथवा केवल पडोसी परुष आप समझ रहे हैं कि मैं क्या कहना चाहता हूँ । मेरा अभिप्राय था की यहाँ पर सर्वथा भिन्नता के कारण सब कुछ अप्राकृतिक सा प्रतीत हो रहा है । आप सम्भवता समझ गए होंगे कि मैं क्या कहना चाहता हूँ । जब व्यक्ति बहुत ही अप्रत्याशित वस्तुओं अथवा व्यक्तियों को देखता अथवा सुनता है तो पहले पहले उसके थी, अपनी कसौटी पर उसको कसना चाहती हैं । परन्तु जब उत्थे भी अपनी कसौटी पर कस नहीं पाती है तो उसकी चीज हुआ उसका साथ नहीं देती हैं । आप ऐसे भी समझ सकते हैं कि जब मन थे ये अस्पष्टता के साथ नहीं समझ पा रहे हो तो क्या पूछा जा सकता है । साथ ही पूछना भी आवश्यक हो भले ही ना पता होगी क्या पूछना है । परंतु यह तो निश्चित है कि कुछ उसका तो है । सम्भवता उत्तर जानने वाले को ये पता हूँ की सामने वाला क्या पूछना चाहता है । यहाँ पर यही विकट स्थिति है । तब लोचन फिलिंग जी ने कहा प्रभु यह स्थान जहाँ पर हम लोग इस समय है वो स्थान अधिक समय तक नहीं रहने वाला है । हाँ अधिक समय तक नहीं रहने वाला है । इसका क्या अभिप्राय इतनी ही चर्चा हो पाई थी कि एक का एक विशाल कक्ष में ना जाने कहां से देवदत्ता बडे ने प्रवेश किया । उनको देख कर ही कुमार भोजन देशभर डंडधार वही दूर के अतिरिक्त सभी अपने आसन पर खडे हो गए । सभी ने देवदत्त मणि को प्रणाम किया । बिलोचन भृंगी ने देवदत्त मनी, सही कुमार गजेंद्र का परिचय कराना चाहा । तब देवदत्त मनी ने कहा मैं जानता हूँ इनका नाम दलितेन्द्र है और इनके पिता का नाम आशुतोष है । ये सभी पृथ्वीलोक से आए हैं । आप सभी के मन में जो कंठ आए हैं वो मैं समाप्त करने का प्रयास करता हूँ । सर्वप्रथम आप ये जान ले कि मैं महाराज, आशुतोष इंद्र का मित्र देवदत्त हो । मणिका भाव पूरी मेरा निवास स्थान है । ये वो स्थान है जहाँ बारह हजार आशुतोष इंद्रा आ चुके हैं । बाहर आ जाता तो सुरेंद्र इस समय डिब्बे काल अस्त्र के प्रभाव से घायल होने का अभिनय कर रहे हैं । शमा करें घायल होने के अभिनय से ही आपका क्या अभिप्राय? क्या वे घायल नहीं है? अर्थात काल देश लाना व्यस्त है । आप ये क्या कह रहे हैं? नहीं नहीं, मुझे अभिनय शब्द का प्रयोग नहीं करना चाहिए था । वास्तव में प्रभु लीला कर रहे हैं । आप अन्य थाना ले क्या आप क्या क्या और कोई उनको स्वस्थ हुआ अस्वस्थ्यकर सकता है । वे स्वस्थता या अस्वस्थता, जीत या हार जो आप हम सोच सकते हैं उससे परे हैं । यदि हम वो आप कुछ भी ना करें तो भी होगा । वही जो होना है हम आपको साधन मात्र है । आने वाले जन्मों में महाराज आशुतोष इंद्रा अपने मूल चरित्र रूप में आ जाएगी जहाँ उनके नाम से जीव को मुक्ति प्राप्त हो जाएगी । अब मैं आपके प्रश्नों के उत्तर देता हूँ । ये लोग अब समाप्त हो जाएगा । वैसे तो प्राम्भ के अतिरिक्त सभी कुछ नश्वर है, उसी प्रकार अब इसका समय सभी आ गया है । ये लोग समाप्त हो जाएगा । अर्थात् ये लोग हमने वहां आशुतोष इंद्रा नहीं इसी कारण छोडा था आपने वह पिता श्री इस कुछ सुना था कब? इतने वर्ष पूर्व क्या पिताश्री यहाँ आ चुके हैं । आप सभी आश्रय है ना करें । मेरी बात को ध्यान से सुने । आपके पिता के पिछले जन्म में हम लोग यहां आए थे । तब भी आपके पिता हमारे मित्र थे । मैं इसी रूप में था । आपके पिता को सब याद है । तब हम लोगों ने ये एक ऐसा लोग खोजा था जो अब समाप्त होने वाला हूँ । तब ये लोग हमने निश्चित किया । यहाँ पर एक हजार सात लोग हैं । उन्हें आपके पिता के अंशुल से बनाया गया है । इनमें से सभी तुम्हारे पिता के अलग अलग हिस्सों से लिए गए रक्त कडी गांव से निर्मित है । एक यहाँ पर नहीं है । वो अपने प्रभु के कार्य में लिप्त हैं । उसका नाम लाॅचिंग । इस प्रकार कुल एक हजार आठ लोग यहाँ पर थे । सभी का नाम उन्हीं अंगों के आधार पर रखा गया जिससे वे निर्मित थी । उदाहरण के लिए लटक रहेंगी । लाॅक मुकेश से निर्मित लोचन भरेंगे का निर्माण प्रभु के स्टोर से किया गया । डन तब रहेंगे का निर्माण प्रभु के दातों के अंशुल से किया गया । इसी प्रकार एक हजार आठ का निर्माण यहाँ पर किया गया । मैं आपको क्या कहकर पुकारूं? यदि आप इतना कहकर कुमार करेंगे, शांत हो गए । तब देवदत्त मणि ने कहा मेरा नाम तो आप जानते ही हैं । यदि आप चाहो तो मुझे देवा श्री के नाम से भी बुखार सकते हैं । यहाँ मुझे आपके भ्राता कुमार कार्तिक केंद्र नहीं दिया था । हाथ उत्तम देवस् से जी मेरा एक प्रश्न यह है आप निर्मित शब्द का प्रयोग क्यों कर रहे हैं? क्या निर्मित शब्द के स्थान पर को बार तो भारत प्रश्न उचित है परन्तु यहाँ निर्मित शब्द ही उपयुक्त है । ये सभी वैज्ञानिक अनुसंधानों की मदद से बने इन सभी की विशेषताएं अलग अलग हैं । इसी कारण इन सब की बनावट पर रंगरूप भिन्न है । एक विशेष बात और भी है डंडधार चीनी का देवर स्ट्रेची यदि हमारे यहाँ आने के पूर्व कोई और लोग से आखिरी नहीं ले जाता तब तो इतना कहने के उपरांत ठंडक हाथ शांत हो गए । डंडधार की बात में या थार थका का बाहर था अच्छा । यह सुनकर सभी देवता की ओर देखने लगे । आप के बाद सत्य नहीं हो सकती है । दंडधारी करन इनको बलपूर्वक ले चारा लगभग असंभव है और अब आप ये जाएंगे नहीं । इस बात का आर्थिक सामान्यता कोई नहीं जान पाया । तब कुछ पल शांत रहने के उपरांत पुरा देवश्री कहना प्रारम्भ किया । इनके अंदर मानवीय पर यांत्रिकी दोनों है । मानवीय कोण ये है कि ये सभी मदद सियों की तरह भावों से ओतप्रोत है । साथ ही यांत्रिकी गोला इस प्रकार है कि यंत्र की भर्ती, बिना रुके, बिना थके कार्य करने की क्षमता, इसके अतिरिक्त हर एक अलग अलग विशेषताओं से परिपूर्ण उदाहरण के लिए लडते रहेंगे । लड करेंगे जब जहाँ चाहे बिना साधन के पहुँच सकता है । साथ ही पल बहुत ही गया था । ऐसे प्रकार सभी की अपनी अपनी विशेषताएं हैं । यदि ये सभी एक साथ हैं तो कभी कोई इन को हरा नहीं सकता हूँ । आप ऐसे समझ सकते हैं इन को मिला दें तो आज आशुतोष केन्द्र के समान हो जाएंगे । देवश्री जे आप का क्या अभिप्राय कुमार ये प्रश्न आप पूछ रहे हैं, आप स्वतः ही सक्षम हैं । फिर भी यदि आपने प्रश्न कर ही दिया है तो मैं इसे अपना दायित्व मानता हूँ । कि मैं उत्तर आज आज तो सेंटर की क्षमता है, जितनी है कुछ काल पश्चात अनंतो हो जाएंगी । इसीलिए पहले आज से तुलना की परन्तु वो प्रश्न की आप चिंतित ना हो, मैं आपके प्रश्न का उत्तर दे रहा हूँ । इतने बलशाली होने के कारण इन्हें यहाँ सही कोई नहीं ले जा सकता । क्या बात तो शैलेंद्र या उन का अंश यहाँ आएगा तब उसके रक्त कणिकाओं से इनकी रक्त कणिकाओं के सामंजस्य के उपरांत जब इनके शरीर से यांत्रिकी विधि से संप्रेषण किया जाएगा, तब ये सभी जन जायेंगे और आपके साथ जाने पर रहने के लिए प्रेरित हो जाएंगे । अब वो समय आ गया है इसके लिए चलिए वो यांत्रिकी प्रतिक्रिया पूर्णकर ली जाए । इस प्रकार सभी समझ गए कि क्यों ना इन सभी के लिए डेविड शब्द परिभाषित किया गया । इसके बाद वैज्ञानिक विधि से उन सभी को इस प्रकार प्रेरित कर दिया गया कि वे सदैव आशुतोष इंद्रा परिवार के लिए ही कार्य करें । उनका जन्म तो इसे उद्देश्य के लिए हुआ था । अब एक प्रश्न और शेष था । ये अस्थान क्यों और कैसे समाप्त हो जाएगा? इस पर देवश्री देख रहा हूँ । क्या स्थान वो है जहाँ पर इस प्रकार के परीक्षण किए गए? हम सभी चाहते हैं कि ये कोई भी न जान पाए कि ऐसा भी संभव है । मैंने वहां आशुतोष इंद्रा एक ऐसा स्थान चुना था जहाँ बहुत वर्ष के उपरांत एक क्षुद्रग्रह आकर संघर्ष तो करेगा । उसके टक्कर इतनी भीषण होगी के संस्थान का चिन्नई समाप्त हो जाएगा । अब यहाँ से चलने की तैयारी करूँ मेरी गाडी बहुत इसके अनुसार बहुत समय अब अधिक दूर रही है । अब हमें यह स्थान छोड देना चाहिए । मैं कुमार गजेंद्र का नया नाम रखना चाहता हूँ । नया नाम इसका क्या अभिप्राय हैं? तुम यहाँ पर सैकडों वर्षों से प्रतीक्षारत बडों को ले जा रहे हो तो अपराजेय है तो तुम्हारे सब खाएँ । सेवक है । भक्त है अच्छा तो भारत नया नाम होगा गणपति । तब सभी ने गणपति गणेशचंद्र की जय हो का उद्घोष किया । गणपति गड ेंद्र की जय हो से वो लोग गुंजायमान हो कर अपने को धन्य मान रहा था । उस लोग का भाग के देखो सब आप तो सभी को होना है, चाहे सचिव हो चाहे निति परन्तु ऐसी समाप्ति तो मोक्ष कहलाती है । सभी अपने अपने स्थान पर बैठे जहाँ कुमार गन इंद्रा नहीं बैठने को कहा । इसके उपरांत को बार कल इंद्रा नहीं अपने हाथ से छोटे यंत्र में यांत्रिकी प्रतिक्रिया प्रारंभ की । देवा श्री अपने लोग को चले गए । कुछ शहरों में गणपति गजेंद्र की खून समाप्त हुई और एक ऐसा विस्फोट हुआ जिसकी चमक कुछ क्षणों के लिए सूर्य के समान प्रतीत हो और फिर अंधकार के आगोश में तो लोकसभा के लिए समझ गया हूँ ।

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